University Library,gurukul Kangri Vishwavidyalaya
षड् दर्शन सम्पत्ति तत्र प्रथम योग दर्शनम्
Front matter
सर
पडू दर्शन सम्पत्तिः
तत्र प्रथम
योग दर्शनम्
पदक्रम भाषा-भाष्य सहित
ले०-सिद्धान्त वाचस्पति
श्री. पं० गोकुलचन्द्र दीक्षित “चन्द्र"
मापति निखिल भारतवर्षीय विद्वत्परिषद् प्रागरा
तथा
HTRA
मैनेजर श्रीभगवानदीन आर्य भास्कर प्रेस आगरा
प्रकाशक
महाशय बैनीराम बुकसेलर
श्रार्य पुस्तक भवन, माईथान भागरा।
घरा पता-देव पुस्तकालय दरेशी नं. २, आगरा।
[ सर्वाधिकार सुरक्षित]
प्रथम संस्करण ] सम्बत् १६६४ वि० [
मसल्स
मूल्य शा)
दो शब्द धर्म, अधर्म. लोक एवं प्रलोक तथा जड़ ओर चेतन क विपन सम्बन्ध जो सत्योपदेश क्षेत्रों में चलाया गया है वह नर्क सिद्ध होते हुये भी वह केवल योग द्वारा ही माक्षात्कार किया जा मकता है। प्रात्मा का साक्षात्कार, परमात्म दर्शन, प्रकृति एवं उसके विकारों का तथ्य रूप वस्तुतः योग में ही सिद्ध होते है योगाढ़ प्राणी को प्रत्येक वस्तु का स्वार हनाम-नक होना है और प्रकृति पुरुप की गांठ बुल कर उसे अपवर्ग सुख (भूमा) की प्राप्त होती है। इस योग को चार भागों में बाँटा गया है। सबीज और निर्वीज समाधि की योग साधन, विभूति लाभ और मोक्ष प्रापि और इन्हीं विपयों को सिद्धि से प्रागी कृत कृत्य हो जाता है । वेद, और उपनिषदों में इन्हीं का गृढ वर्णन भरा है जिसकी तालिका चित्त की वृत्तियों का निराध है। इस याग से प्राणी को यह बोध हो जाना है कि वह अपने आप को देख लेता है और अपने स्वरूप में अवस्थित होकर कैवल्य लाभ करता है। इस योग के उनुष्ठान के लिये गुरु शरण में जाना चाहिये जो स्वयं ब्रह्म निष्ठ और योगी हो वही इसका यथावत मार्गो- पदेश दे सकता है व्यास भाष्य में आया है कि यह भूमि इल भूमि के अनंतर ( व्यवधानहीन पश्चात् ) की है इस विपत्र में योग ही गुरु है जैसे कि योग से योग को जानना योग्य है योग से योग प्रवृत्त होता है प्रथम योग अगले योग को प्रति का कारण है जो योग से सावधान रहता है वह योग में अधिक काल-तक आनन्द लेता है।
( ख ) इसलिये योग के अधिकारी कि जिसे आत्मा और परलोक में श्रद्धा हो इस कर्मानुष्ठान में उतरे अन्यथा नहीं। इस योग की मूल समास में यह प्रक्रियायें है कि ये कथन में स्वल्प भेद त्याग कर सांख्य और योग की समक्रिया माने। यह समस्त जगत सत्व रजस, तमसे युक्त है। गुणों की साम्यावस्था प्रकृति है उससे महतत्व, महतत्व से अहंकार उससे शब्द स्पर्श, रूप, रस, गन्ध नामक पंचतन्मात्रायें और एकादश इन्द्रियां (पांच ज्ञान और पाँच कमेन्द्रियां ग्यारहवा मन) इनके बिपय एक अन्तःकरण के चित्त मन की सृष्टि है। इन पंचतन्मात्र से पाँच महाभूत प्रकृति मूल कारण है वह किसो का कारण नहीं । स्थूल सूक्ष्म जगत सारा साक्षात् अथवा प्रवाह अनादि प्रकृति का परिणाम है चितिशक्ति इस जड़ जगत से सर्वथा भिन्न है वही पुरुप है। यह पुरुष ही जगत का द्रष्टा है जगत उसका दृश्य है इस से परे पुरुप विशेष को ईश्वर कहते हैं । इसी के सत्य सङ्कल्प से प्रकृति कार्य करती है इस प्रकृति का कार्य पुरुष को भोग सामग्री धर्मा धर्म पाप पुण्य रूप कर्म भूमि का प्रदान करना है जो आगमपायी का हेतु है अन्त में जीवको ऋतम्भरा बुद्धि प्राप्त कर लेने पर वह साथ छोड़ देती है और यह पुरुप अपने स्वरूप में ठहर जाता है उसकी अव्याहत गति हो जाती है और पूर्ण कृतकृत्य मानता हुआ ब्रह्मानन्द लेता है। परमानन्द सरस्वती, आगरा।
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श्रद्धांजलि
जिनके कोमल वरद हस्तों से मेरा लालन
पालन एवं शिक्षा का सूत्र पात हुआ, जिन्होंने
मेरी जन्मदाता माता के शरीर अवसान होने
पर मेरे शैशव कालीन पुष्या-माता श्री दुलारी
देवी जी के देख रेख में जीवन-स्वास्थ्य संचार
कराने में सतत उद्योग पूर्वक सफलता प्राप्त का
उन्हीं दिगंवत आत्मा, परम श्रद्धेय श्री पूज्य
पितामह श्री पं० खेमरामजी उपनाम श्री पं०
लालमणि दीक्षित वीणा विशारद की संस्मृति
में सादर समर्पित ।
गोकुलचन्द्र दीक्षित
ॐ योग दर्शनम् समाधिपादः प्रणम्य परमात्मानं गिरानन्दं च सद्गुरुम् श्रात्म-तत्व प्रवोधाय योग भाषा वितन्यते । अथ योगानुशासनम् ॥१॥ प० क्र.-(अथ) अव ( योगाऽनुशासनम् ) योग शिक्षा प्रारंभ करते हैं। सं०-योग किस को कहते हैं योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥२॥ प० ऋ०-(योगः) योग (चित्त + वृत्ति + निरोधः) चित्त की वृत्तियों के रोकने का नाम है। * अनुशासन शास्त्र को कहते हैं इसके कहने का यह भी है कि भगवान् पतंजलि से पूर्व भी योगोपदेश विद्यमान था। पूर्व वेद म पश्चात् को उपनिषदों में इस गुरु शिष्य परम्परा से अब दार्शनिक रूप धारण करता है यह भाव है।
२
के समाधिपाद: के
भाष्य-बाहर जगत के दृश्य का चित्त पर प्रभाव पड़ने से जो
परिवर्तन होता है उस पूर्व आकार से नये परिवन्तिति
आकार वाली दशा का नाम वृत्ति है। यतः । भीतर
आत्मा को उस वृत्ति का अनुभव होना है। इसी का नाम
दृष्टि अथवा वोध है इमी से आत्मा को वोद्धा अथवा
दृष्टा भी कहते हैं और इसी का साक्षात् करने से आत्मा
माक्षी है। जब यह साक्षी जगत के नाना पदार्थ देखता
है तो चित्त सदा इन्हीं वृत्तियों में परिवर्त्तति होता रहता
है अब जिस अवस्था में यह समस्त वृत्तियां लीन हो
जाती हैं उसी अवस्था विशेप का नाम योग है।
विशेष-चित्त की पांच अवस्थायें हैं। क्षिप्त-(रजोगुण वृत्ति से
तत्व का पता न लगने पर झट चित्त का बदल जाना)
(२) मूढ़-(तम र वृत्ति की अधिकता से अधर्म, अज्ञान
की ओर झुकाव) (३) विक्षिप्त-कुछ रजस कुछ तमस
गुणों के कारण कभी चित्त का स्थिर कभी अस्थिर
होना) (४) एकाग्र-(चित्त और आत्मा के भेद प्रदर्शन
से सत्य २ स्वरूप प्रतीति) (५) निरुद्ध-जब चित्त वृत्ति
शून्य हो जावे वह अवस्था)
टि-इन पांचों में पहिली तीन जिज्ञासुओं की और दो पिछली
योगियों की चित्त वृत्तियां होती हैं ।
संभ-निरुद्धावस्था में आत्मा क्या करता है।
my ॐ योग दर्शनम् * तदा दृष्टः स्वरूपेवस्थानम् ॥३॥ प. का-(नदा) नब (द्रष्टु) घटा (आत्मा) की (स्वरूपे) अपने में अवस्थिति-स्थिरता हो जाती है। भा०-यामा अन्तर और वाह्य जगत के भेद पाकर स्वयं बम्प में ठहर जाता है और भ्रमित नहीं होता अपने का सम्हालता है । वुद्धि अचंचल हो जाती है इमी को परमात कहते हैं अर्थात इन्द्रियों सहित मन की निश्चल धारणा का नाम यथार्थ योग है यहां अन्तर ज्ञान की उत्पत्ति तथा वाहा ज्ञान की लयावस्था होती है और उसकी उन्नति अवस्था हो जाती है। सं०-इस व्युत्थानावस्था में पुरुप का क्या स्वरूप होता है वृत्तिसारूप्यमितरत्र ॥४॥ प० क्र--(बृत्तिसारूप्यम् ) वृत्ति की एकावस्था (इतरत्र ) अन्य अवस्था में। भाल-इस दृसरी अवस्था में दृष्टा= आत्मा वृत्ति के समान रूप वाला हो जाता है । अर्थात् जिन वृत्तियों से वह कभी शान्त, कभी अशान्त कभी मूढावस्था का अनुभव करता था इस व्युत्थानावस्था में उस की वृत्तियां इतनी समाहित हो जाती हैं कि उन में कभी हलचल सम्भव ही नहीं रहती और वृत्ति के अनुकूल आत्मा देग्वने लगता है इसी को ख्याति-दर्शन कहते हैं। In ४ और आत्मा * ममाधिपाद: सं०-योगलराण योग की अवस्था की स्थिति एवं व्युत्थानावस्था में आ मा की दशा कहने के पश्चात् अब जिन वृत्तियों के रोकने से योग होता है उसे कहते हैं वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाऽक्लिष्टाः ॥५॥ प० क्र०-(वृत्तयः) वृत्तियां (पंञ्चतय्यः) पांच (क्लिटाऽक्लिष्टा) लिष्ट ( राग द्वेप की हेतुका) और अक्लिष्ट (राग द्वेष नाशिका) हैं। भा०-असंख्य वृत्तियों को पांच भागों में बांटा गया है वह अनु- भव से दो प्रकार की हैं एक वह वृत्ति कि जिससे राग द्वषादि ल श बढ़ते हैं और दूसरी कि जिन से गग द्वेषादि नष्ट होते हैं इन्हीं के वश में आत्मा शुभाशुभ कर्म करने लगता है क्योंकि वृत्तियां अपने अनुकूल संस्कार जो जन्म देती है अर्थात् क्लिष्ट वृत्तिया= बुरे और अलिष्ट=भले संस्कारों को उत्पन्न करती हैं। जिज्ञासु इस से सावधान रहे। सं०-पांच वृत्तियां यह हैं। प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः॥६॥ भाष्य-प्रमाण ( अलौकिक विषय में आगम= वेदानुकूल वृत्ति) विपर्यय (वेद विरुद्ध मिथ्या ज्ञान) विकल्प (वस्तु शून्य शब्द = उपदेश) निद्रा (अभाव प्रतीत सत्ता हीन अनु- * योग दर्शनम् ॐ भव) स्मृतयः (अनुभव युक्त ज्ञान की पुनरावृत्ति) यह पांच प्रकार की वाह्य जगत से वृत्तियों की सृष्टि होती है। मं.-इन्हीं का विशेप विवरण किया जाता है। प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ॥७॥ प० क्र--(प्रत्यक्षाऽनुमानाऽऽगमाः) प्रत्यक्ष अनुमान और आगम (प्रमाणानि) प्रमाण । भाः-प्रमा= यथार्थ वध वृत्ति और अप्रमा=अयथार्थ बोध वृत्ति का नाम है। इसी से प्रमा जो ज्ञान उत्पन्न होता है उसे प्रमाण कहते हैं। इस प्रमाण की तीन दशायें है को प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम द्वारा प्रमा तक पहुँचाते हैं और जिस २ आकार की जो वृत्ति बनती है उसी सम्बन्ध से उसका नाम लिया जाता है। सं-प्रमाण वृत्ति भेद के अनन्तर विपर्य वृत्ति का स्वरूप कहते हैं। विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ॥८॥ प० ऋ०-(विपर्ययः) उल्टा ज्ञान (अतद् रूप प्रतिष्ठम् ) जो रूप में प्रतिष्ठित नहीं। भा०-यथार्थ ज्ञान वस्तु के तथ्य रूप में पाया जाता है और जो ज्ञान वस्तु तथ्य रूप न हो वह मिथ्या ज्ञान होता है। वह आत्मा wr * समाधिपादः इसी की अविद्या कहते हैं यही अनर्थ का बीज है इसी से स्वरूप की हानि होती है और जब आत्मा में अनात्म और अनात्म में अात्म वृत्ति हो जाती है तो वह आत्मा सत्य ज्ञान से कोसों दूर हो जाता है। सं०-विकल्प वृत्ति क्या है ? शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ॥९॥ प० क्र०-(शब्दज्ञानाऽनुपाती) शब्द ज्ञान के पीछे आने वाला (वस्तु शून्यः) वस्तु शून्य-सत्ता हीन ज्ञान । भा०—मैं सुखी हूँ, मैं दुखी हूँ इस को सुन कर जो सुनने बाजे की वृत्ति बनती है उसका नाम विकल्प है, यह ज्ञान वस्तु शून्य है क्योंकि आत्मा जिन वस्तुओं से सुखी दुखी हुआ वह उसका स्वरूप न था जब ही तथ्य रूप भासित हुआ वह विपर्यय ज्ञान दूर हो जाता है। सं०-निद्रा वृत्ति का विवरण इस प्रकार है । अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिनिद्रा ॥१०॥ प. क्र.-(अभावप्रत्ययाऽऽवलम्वना) अभाव की प्रतीत को स्थान देने वाली (वृत्तिः) वृत्ति (निद्रा) निद्रा है । भा:-"मैं सुख से सोया और कुछ भी पता न रहा' इस गाढ़ प्रसुप्ति का नाम निद्रा है । इस दशा में ज्ञान का सर्वथा अभाव नहीं होता किन्तु स्वप्न और जाग्रत की वृत्तियां का अभाव कि “मुझे कुछ पता न रहा” इन शब्दों में . * योग दर्शनम् के प्रकाशित किया जाता है इसी अभाव का पता लगाने वाली उस समय बनी रहने को निद्रा वृत्ति कहते हैं । सं--स्मृति किसे कहते हैं ? अनुभूतविषयासंप्रमोषः स्मृतिः ॥११॥ ५० क० (अनुभूत विपयाऽसम्प्रमोपः) अनुभव किये ज्ञान का न छुपा सकना (म्मृतिः) स्मृति है ! भा०-पदार्थ ज्ञान के पूर्व अथवा पश्चात् जो अनुभव किया जाना है और उससे जो चित्त पर संस्कार पड़ते हैं एवं उसने जो स्मृति होती है स्मृति वृत्ति कही जाती है यह स्मृति संस्कारों के ही अनुकूल हुआ करती है और संस्कार अनुभव के मदृश होते हैं अतः स्मृति का विषय अनु- भव एवं संस्कार है। सं-यह सिद्ध है कि योग का लक्षण वृत्तियों पर अधिकार प्राप्त करना है। अब उनका निरोध (अधिकार) किस प्रकार हो बतलाते हैं। अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निराधः ॥१२॥ ५० ऋ०-( अभ्यास, वैराग्याभ्याम् ) अभ्यास और वैराग्य में (तन-निरोधः) उन (वृत्तिओ) का रोकना। गाद प्रसुप्ति तो एकाग्रता के ही समान है उसको क्यों रोका जावे इस प्रश्न के उत्तर में अनुभव से पता चला कि निद्रा तमोमयी होती है वह सवीन और निज समाधि की विरोधिनी होने से उसका निरोध किया जाना बतलाया है।
* समाधिपादः ॐ भा०-चित्त का प्रवाह विषय और विवेक मार्ग की ओर रहता है। विषय की ओर वहने से कल्याण मार्ग से हट जाता है यही यदि ज्ञान की ओर जावे तो कल्याण प्राप्ति होती है इसलिये विषय की ओर न जावे इसके लिये अभ्यास (प्रतिबन्ध्य) लगावे और वैराग्य उस (विषय में राग रहित हो जाये तो यह उभय निरोध मन चाञ्चल्य पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। सं०-अभ्यास और पैराग्य को कहते हैं। तत्र स्थिती यत्नोऽभ्यास ॥१३॥ प० क्र--(तत्र) उन ( अभ्यास और वैराग्य ) में से ( स्थिती) ठहरने में (यत्रः) प्रयव (अभ्यासः) अभ्यास (स्वभाव डाले या बनावे) भा०-वृत्ति रहित चित्त अपने स्वम्प में तब ठहरता है कि जब, श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि, यज्ञा, यम नियम आदि अन्तरङ्ग और वहिरङ्ग साधनों का अनुष्ठान (अभ्यास) किया जावे। सं०-वह भी एक दो दिन के संयम से नहीं किन्तु स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः १४ ५० क्र--(सः ) वह (तु) परन्तु ( दीर्घकालनैरन्तर्य सत्काराऽऽ सेवितः) लगातार बहुत दिनों तक क्रियानुष्ठान पूर्वक ठीक २ (वा) अथवा बारम्बार सेवन प्रयोग में लाने -
६
* योग दर्शनम् 8
से (दृढ़ भूमिः) दृढ़ अवस्था वाला। (योग होता है)
अर्थात् भूमि बनती है।
भा० -विशेष ऊंची दशा अर्थात् वृत्ति अधिकार हो जाने से
संस्कार योगी को वहेमुख कहते है परन्तु अभ्यास
अन्तरमुख करने वाला है यह पूर्ण पक्क अभ्यास
निरन्तर सेवन (अभ्यास से होता है अन्यथा अभ्यास
शिथिल होने से स्थिरता लीन हो जाती है परन्तु तप,
ब्रह्मचर्य, विद्या और श्रद्धा के योग पूर्वक अभ्यास से
दृढ़ भूमि होती है उक्त दशा में व्युत्थान-संस्कार शीघ्र
उसे दवा नहीं सकते और वैराग्य की ओर गति हो
जाती है।
सं०-वैराग्य किसे कहते हैं।
दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य
वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ॥ १५
पं० क्र--(दृष्टाऽऽनुश्रविक, विषय, वितृष्णस्य ) दृष्ट और आनु-
अविक विषयों में तृष्णा रहित (वशीकार संज्ञा
वैराग्यम् ) वशीकार नामक वैराग्य है।
भा०-दृष्ट और आनुश्रविक दो प्रकार के विषय है। इस लोक
में रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, स्त्री, अन्न, पानादि ऐश्वर्य
दृष्ट कहलाते हैं । शरीरान्तर वेद्य और अवस्थान्तर
वेद्य यह भेद भानुश्रिविक के हैं इस में स्वर्ग, वैदेह्य
प्रकृति लयत्व शारीरान्तर वेद्य हैं दिव्य, गन्ध रसादि
१० क समाधिपादः के अवस्थान्तर वेद्य है। यह चित्त के दिव्य और अदिव्य कारणों से है। यह ऊपर वैराग्य है। सं०-अव पर भैराग्य को कहते हैं। तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् ॥१६ प. क्र.-( तत् ) वह-वैराग्य ( परम् ) सब से ऊंचा ( पुरुष- ख्यातेः) पुरुष साक्षात्कार से (गुणवैतृष्णयम्) गुणों में तृष्णा रहित होना। भा०-दिव्य और अदिव्य दोनों प्रकार के विषयों में. वैराग्य हो जाना अपर वैराग्य है इसी में एकाग्रता होना सम्प्रज्ञात समाधि है इसी में आत्मा और चित्त के भेद का साक्षात्कार होता है इससे ऊपर विवेक ख्याति जो गुणों की अवस्था है उससे चित्त हटा कर जब स्वरूप स्थिति में योगी चाहता है तो यहीं पर धर्म मेघ समाधि होती है इसे ही पर वैराग्य कहा गया है । संसार संक्रम यहीं से टूट जाता है यह ज्ञान की पराकाष्ठा है. यही कैवल्य मुक्ति है। सं०-अव सम्प्रज्ञात समाधि यतः पहिले होती है तो उसका स्वरूप और भेद कहते हैं। वितर्कविचारानन्दास्मितानुगमात् संप्रज्ञातः ॥१७ प. कृ०-(वितर्क, विचारा, ss नन्दा, ऽस्मिता, 5 नुगमात् ) वितर्क, विचार, आनंद और अस्मिता के सम्बध्ध से (सम्प्रज्ञातः ) सम्प्रज्ञात होता है।
*.योग दर्शनम् * ११ भा-वितर्कानुगत में चित्त को स्थूल में साक्षात्कार करना होता है और जिन्हें कभी देखा न सुना था केवल अनुमान मात्र था वह सव साक्षात् होते हैं। इसके दो भेद सवितर्क और निवितर्क होते हैं अर्थात् जब चित्त स्थूला- कार वस्तु को भेदन करके आगे बढ़ता है और पंच तन्मात्राओं के स्वरूप को जानता है तो समस्त विषय प्रत्यक्ष हो जाते हैं इसी क्रम से महतत्व और प्रकृति को साक्षात कर लेता है यह विचारानुगत सम्प्र ज्ञात योग है। आनन्दानुगत योग से बढ़कर अस्मितान गत योग होता है वहां पर इन्द्रियों से सूक्ष्म अस्मिता में चित्त को धारण करना होता है यहीं से जड़ चेतन की गांठ जो पड़ी है उसमें एक रूप प्रतीति होने लगती है। यही अहंकार और इन्द्रियों का कारण है। सं असम्प्रज्ञात योग का स्वरूप तथा उस का उपाय- विरामप्रत्याभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः१८ प० क्र०-(विराम, प्रत्यया, ऽभ्यास, पूर्वः) प्रतीत का अभ्यास विराम है पूर्व जिसके ( संस्कार शेपः) संस्कार जिसमें शेष हैं (अन्य ) दूसरा अर्थात् असम्प्रज्ञात (है) मा०-असम्प्रज्ञात योग द्वारा चित्त की एकाग्र वृति द्वारा स्थूल भूतों से सूक्ष्म भूतों पर्यन्त तत्वों को साक्षात् करने की सिद्धि होकर अपने स्वरूप में स्थिति होनी है। योगी इस योग द्वारा चाहता है कि दृश्यवृत्ति भी न रहे इस प्रतीति का नाम विराम अथवा परम वैराग्य है। यहां १२ * समाधिपादः पर वृत्तियों का सर्वथा अभाव हो जाता है और निरालम्व ज्ञानप्रसाद मात्र से पर वैराग्य ही असम्प्रज्ञा त की उत्पत्ति का हेतु होता है सं0-पूर्व जन्म से योग करते आये और दूसरे इसी जन्म में योगाराधन करने वाले दो प्रकार के जिज्ञासु होते हैं इन में से- - भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ॥१६ प० ऋ०- (भव प्रत्ययः) जन्म सिद्ध प्रतीत ( विदेह प्रक्रति लया नाम् ) विदेह और प्रकृति लयों की। भा-जिन योगियों ने योगारम्भ कर दिया था परन्तु अत्म- साक्षात्कारसे पूर्व ही उनका शरीर छूट गया उन्हें योग भ्रष्ट कहा जाता है यह दो प्रकार माने गये है, विदेह (२) प्रकृति लय । जिन्हें वितर्क समाधि द्वारा स्थूल तत्वों के समस्त विशेषों को साक्षात् करने का अवसर मिला और देह-तत्व के अहं भाव को त्याग विदेह कहलाये प्रकृति लय वह कहलाये कि जिन्हों ने विचार समाधि द्वारा आठ प्रकृतियों को साक्षात किया और चित्त प्रकृति लीन रहने से प्रकृतिलय कहे गये इन दोनो प्रकार के योगियों को आत्मा का साक्षात् कार नहीं होना सिद्ध होता। सं-यह योग क्रिया नष्ट नहीं होती और भ्रष्ट योग पुनर्जन्म लेकर योग साधना करते हैं।
. के योग दर्शनम् * १३ श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञा पूर्वकइतरेषाम् ॥ २०॥ प० क्र-- ( श्रद्धा, बीर्य स्मृति,समाधि, प्रज्ञा पूर्वकः) श्रद्धा वीर्य स्मृति सभाधि और प्रज्ञा ( यह क्रम) जिसका कारण है ( इतरेषाम ) दूसरों को। भा०-सब को जन्म से नैसर्गिक रुचि योग में नहीं होती परन्तु जो विदेह और प्रकृतिलय हैं उनमें श्रद्धा उत्पन्न होकर रुचि हो जाती है उस श्रद्धा से वीर्य ( उत्साह ) उससे प्रवल स्मृति तथा समाधि और उस से पूर्ण प्रज्ञा का , विकास होता है। सं८--किसी को शीघ्र सिद्धि और किसी को देर में होती है इस का कारण। तीनसंवेगानामासन्नः ॥२१॥ पा० क्र--(तीव्र संवेगा नाम ) तीव्र वैराग्यवानों को (आसन्नः) निकट (सिद्धि होती है) भा०—जिन्होंने उग्र तपश्चर्यादि साधन पूर्व जन्म की दृढ़-भूमि के कारण को सम्पादित कर लिया है उन तीन वैरागियों को समाधि एवं उसका फल तत्काल प्राप्त होता है। तीन वैराग्य के क्या क्रम हैं। मृदुमध्याधिमात्रत्वाततोऽपिविशेषः ॥२२॥ प. क्र--(मृदुमध्याऽधि मात्रत्वात्) मृदु-नम्न , मध्य और अधि मात्र-किंचित उग्र होने से (ततः अपि) उससे भी निकट (विशेषः) विशेष =निकटतर और वम (होती है)। सं०-यह समाधिपादः * वैराग्य aho भा०-योगी जो श्रद्धा उपाय से कि जिस में किसी के मृदु किसी के मध्य और किसी के तीव्र होते हैं उसी क्रम से उसका भी मृदु, मध्य और उग्र होता है परन्तु जिसे अधिमात्र उपाय प्राप्त होता है उसे तीव्र वैरान्य से समाधि निकट होतो है और शिथिल उपायों से समाधि दूर होती है अतः अधिमात्र उपाय करना चाहिये। सं०-अव यह बतलाते हैं कि इस के प्राप्ति के और भी उपाय या यही हैं। ईश्वरप्रणिधानाद्वा॥२३॥ पक्र--(ईश्वर प्रणिधानात् ) ईश्वर-प्रणिधान से (वा) अथवा विशेष निकट तम समाधि होती है। भा०-अनन्य चित्त होकर जब योगी ईश्वर-भक्ति में तत्पर तन्मय ) होता है तव उसे ईश्वर प्रसाद पूर्वक दया दृष्टि से प्रत्यक्ष होते हैं और उस सम्प्रसाद से योगी को इच्छा सिद्धि होती है जो योग का लक्ष्य है। सं--ईश्वर के स्वरूप का निरूपण करते हैं। क्लेशकर्मविपाकाशयरपरामृष्टःपुरुषविशेषईश्वरः २४ ५० क्र०-(क्लेश, कर्म विपाका ऽऽ शयः) लश, कर्म (उनके) फल तथा वासनाओं से ( अ, परा मृष्टः) स्पर्श रहित (अछूता) (पुरुष, विशेषः ) पुरुष विशेष ( ईश्वरः) ईश्वर ।
* योग दर्शनम् 8 १५ भा:-इस शरीर में दो पुरुष हैं एक जीव नामक आत्मा है दूसरा परमात्मा नामक आत्मा है, दोनों में भेद इतना ही है कि जीवात्मा, कर्ता, भोक्ता, वासना युक्त रहता है परमात्मा का इन से कोई सम्बन्ध नहीं। इस में भी इतना भेद है कि मुक्ति पुरुप किसी काल में उपर्युक्त कर्मों से रहित होते हैं परन्तु परमात्मा न कभी इन कर्म बन्धनों में किसी देश काल अथवा अवस्था में आया और न आ ही सकता है यही इस पुरुष की विशेष जीवात्मा से है परमात्मा नित्य शुद्ध वुद्ध मुक्त स्वभाव वान है जीवात्मा कभी शुद्ध कभी वुद्ध और कभी मुक्त तथापि सर्वथा और सर्वाश में एक रस नहीं रहता। सं०-ईश्वर का स्वरूप दर्शा कर उसके होने में प्रमाण देते है। तत्र निरतिशयं सर्वज्ञयोजम ॥२५॥ प. क्र.-( तत्र ) उस में (निरतिशयम् ) अतिशय = बढ़ती रहित (सर्वज्ञ, वीजम् ) सर्वज्ञता का बीज । भा०-जिससे कोई वस्तु अधिक बढ़ चढ़ कर न हो वह निरति शय कही जाती है इसी प्रकार मनुष्य में जो सर्वज्ञता का बीज है जो सब प्राणियों में संस्कार योग्यता से थोड़ा बहुत अथवा अधिकाधिक हो वह स्वतिक्षय है अतः इस ज्ञान की जहां सीमा हो वह पूर्ण सर्वज्ञता है यही निरतिशय था। सं:-अतः यह १६ * समाधिपाद- पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ॥२६॥ प० ऋ०-(पूर्वेषां ) पूर्वजों का (अपि ) भी (गुरुः) गुरु है (कालेन ) काल करके (अनवच्छेदात् ) अवच्छेद-3 सीमाः नहीं होने से। भा०--प्रत्येक वस्तु पर काल की सीमा है जो सर्ग में गुरु जन हुये हैं वह भी उससे पूर्व नहीं थे अतः वह भी काल मर्यादा में आते हैं परन्तु परमात्मा काल-रेखा में नहीं आता अतः उसे गुरुओं का गुरु कहा गया है अर्थात् वह स्वर्गारम्भ से जिस प्रकार था अनति सर्ग आदि में भी वही गुरुओं का गुरू रहेगा। अर्थात् ईश्वर ही परम गुरु है। सं०-इस परम गुरु ईश्वर का प्रणिधान कैसे करना चाहिये। तस्य वाचकः प्रणवः॥२७॥ ५० ऋ०-(तस्य) उस (ईश्वर) का (वाचिक-) नाम (प्रणवः) अोवार है। भा०-'ओ३म्' उस परम गुरु ईश्वर का नाम है इस ओङ्कार. का उस परम गुरू से नित्य सम्वन्ध है और सर्ग प्रति सर्ग आदि से अन्त तक यह उद्गीथ उपासना में चिरं- जीव रहेगा। सं०-प्रणिधान किसे कहते हैं।
१७ * योग दर्शनम् * तज्जपस्तदर्थभावनम् ॥२८॥ प० का-( तज, जपः ) उसका जप (तद,ऽर्थ. भावनम् ) उसके भाव (अर्थ) का चिन्तवन करना। भाल-जव योगी उस परमात्मा के वाचक "ओङ्कार"को उपासना में उसके अर्थ ( भाव ) को एकाग्र होकर चिन्तवन करता है तो उसका ध्यान स्थिर हो जाता है और इस से दृढ-चित्त-भूमि वनती है । सं०-उपासना या प्रणिधान का फलक्या है। ततःप्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च ॥२९॥ प० ऋ०-(ततः) उस ( उपासना ) से (प्रत्यक चेतना,ऽधिगमः ) जीवात्मा की प्राप्ति ( अपि ) भी (अन्तरायाऽभावः) विनों का अभाव ( च ) और । भाल-योग करते समय जो विघ्न उपस्थित होते हैं वह सर्वथा निश्शेष हो जाते हैं एवं आसन्नतम ( अति शीघ्र ) समाधि सिद्धि होती है। इस समाधि में जीवात्मा की प्राप्ति ( स्वरूप ज्ञान ) और तदुपरान्त परमात्म प्रकाश-दर्शन होता है क्योंकि जीवात्मा का अन्तर्यामी पुरुप परमात्मा है और ईश्वर का अनुग्रह जो योग में आवश्यक वस्तु है योगी की सहायता करता है । सं.-योग में विन्न क्यार होते हैं।
* समाधिपादः ॐ व्याधिस्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्ति दर्शनालब्धभूमिकत्वानस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः॥३०॥ प० क्र०-( व्याधि त्वानि) व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद आलस्य, अविरति, भान्ति दर्शन, अलब्ध भूमि कत्व, और अनवस्थितत्व (चित्त विक्षेपाः) चित्त का उच्चाट (ते) वे ( अन्तरायाः) विघ्न हैं। भा०-योग करते समय यह नौ प्रकार की विघ्न वाधायें होती हैं अर्थात् धातु रस अथवा इन्द्रिय विचार से ज्वरादि रोग का नाम व्याधि विघ्न है। योग करने की क्रिया न ज्ञात् ( अधूरा ज्ञान ) हो इसे स्त्यान, । यह संशय रहना कि मैं योग कर भी सकूगा या नहीं, संशय । योग के अङ्ग यम नियमादि का उपालन प्रमाद । काम में शरीर व चित्त भारी होवे और योग क्रिया रहित आलस्य । विषयों में इच्छा बनी रहे अविरति । तत्व वस्तु में मिथ्या अभ्यास अर्थात् असत्य ज्ञान भ्रान्ति दर्शन । समाधि अवस्था में न पहुंच सकना अलव्ध भूमि कत्व । समाधि होते हुये भी उस में चित्त न ठहरे अर्थात् ध्येय प्राप्ति से पूर्व ही समाधि जावे उसे अनवस्थितत्व विघ्न माना है यही मल और अन्तराय योग भ्रष्ट कहते हैं।
* योग दर्शनम् * मं०-यह अन्तराय और मल किस कारण होते हैं। दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वास- प्रश्वासा विक्षेपसहभुवः॥३१॥ प० क्र०-(दुःख 'साः) दुःख, दौमनस्य, अंगमे जयत्व, श्वास और प्रश्वास (विक्षेप, सहभुवः) विप के साथी हैं। भा:-क्लश पीड़ा से दुखी होकर उसके विनाश की चेष्टा से जो चिन्ता वह दुःख । उस में असफल प्रयत्न रहने से मन में क्षोभ होना दौर्मनस्य । मनकी दुर्वलता से अंग कम्पन (क्रोध ) अंग में जयत्व । उस से श्वास का अधिक व्यय करना कि जो योग में निर्वलता लाता है श्वास तथा विना इच्छा के कुम्भक प्राणायाम वायु को विगाड़ना प्रश्वास विक्षेप कहे जाते हैं। योगी अपनी श्वास को इच्छा अथवा अनिच्छा से नहीं नष्ट करता वह नियम पूर्वक श्वास स्वभाव से इस पर विजय करता है और तभी तक वह विक्षिद्धवस्था से परे रहेगा। सं०-यह विक्षेप कैसे नष्ट हों। तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्वाभ्यासः॥३२॥ ५० ऋ०-(तत्प्रति षेधाऽर्थम् ) उनके रोकने के लिये (एकतत्वा- ऽभ्यासः ) एक तत्व में अभ्यास ( करना चाहिये ) २० क समाधिपादः 28 भा०-चित्त को किसी एक निश्चित लक्ष्य में लगा कर अनवरत रूप अभ्यास करने से एकाग्रता जागृति होती हैं यह एक तत्व ईश्वर ही है इसी को लक्ष्य में लाकर ध्यान स्वास्थित होने से विक्षेप बाधा नहीं व्यापनी और समाधि सफल होती है। मं०--चित शुद्ध-निर्मल होने का उपाय बतलाते हैं । मैंत्रीकरुणामुदितीपेक्षाणांसुखदुःस्वपुण्यापुण्य विषयाणांभावनातश्चित्तप्रसादनम् ॥३३॥ प० क्र.-(मैत्री करुणा मुदितोपेक्षोणाम् ) मित्रता, दया, हर्ष और उपेक्षा ( उदासीनता ) के ( सुख दुःख पुण्या पुण्य विषयाणाम् ) सुखी दुखी पुण्यात्मा और पापियों के बारे में (भावनतः ) पुनः चिन्तवन) से ( चित्त प्रसादनम् ) चित्त की निर्मलता। भा०-जव तक चित्त से निन्दा, स्तुति, भय, लज्जा, मान अप- मानादि दोष नहीं निकलते चित्त डांवाडोल रहता है उस दशा में आसन दृढ होकर योग नहीं हो सकता अतः क्षुद्र संस्कारों से चित्त को बचाये रहे । इस लिये सत्पुरुषों से मित्रता भावना रक्खे, प्रसन्न रहे, अपु- एयात्माओं के प्रति उदासीनता भावना रक्खे, और अमर्थ (क्रोध हीन) वृत्ति वनावे । सं०-मैत्री भावना से निर्मल-चित्त योगी की क्या स्थित होती है।
* योग दर्शनम् 8 प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वाप्राणस्य॥३४॥ प. क्र.-( प्रच्छर्दन, विधारणाभ्याम् ) वाहर निकालने और ठहराने से (वा) अथवा (प्राणस्य ) प्राण के । भा-प्राणों के जीतने पर चित्त पर अधिकार हो जाता है इस लिये जव मैत्री आदि से चित्त निर्मल हो योग करे तो प्राणों का संयम होकर चित्त वशीकरण हो जाता है । सं०-चित्त को कैसे ठहरावें ! विषयवती वा प्रबृत्तिरुत्पन्ना मनसास्थितिनिबन्धनी॥३५॥ १० (विषयवती) विषयों वाली (वा) अथवा (प्रवृत्ति) मुकाब (उत्पन्ना) उत्पन्न हुई (मनसः ) मनकी ( स्थिति निबन्धनी) स्थिति को बांधने वाली भा-रूप रसादि विषय वाली प्रवृत्ति से मन की स्थिति का बंधन होता है इसलिये यह भी चित्त वशीकार का एक उपाय है कि यदि दिव्य गन्ध साक्षात्कार करना हो तो नासि का के अग्र भाग में चित्त का संयम करे। इसी प्रकार यदि दिव्य रसानंद अनुभव करना हो तो चिह्ना के अग्र भाग में, दिव्य रूप का अनुभव करना होतो तालु में दिव्य स्पर्श का अनुभव जिह्वा के बीच में और दिव्य शब्द साक्षात्कार करने के लिये जिह्वा के मूल में २२ समाधिपादः संयम करना चाहिये । इन के करने से योग श्रद्धा बढ़ती है क्योंकि शीघ्र सिद्ध होते हैं। योग श्रद्धा मूल है । सं-चित्त वशीकार का दूसरा उपाय भी है। विशोका वा ज्योतिष्मती ॥३६॥ ५० क्र.-(वि, शोका) शोक ( सोच ) रहित (वा) अथवा (ज्योतिःस्मति ) ज्योति प्रकाश वाली । भा०-शोक रहित प्रवृति से भी चित्त सयम वनता है क्योंकि वह प्रकाश वाली है और मन को वांध लेती है। निर्मल अन्त- करण का नाम प्रफुल्ल कमला या हृत्पुण्डरीक है वह समस्त नाडियों का केन्द्र होने से एक सु षुम्णा नाड़ी नामक नाल के संयम-द्वारा मन का साक्षात्कार हो जाता हैं यह मन सूर्य, चन्द्र तारा और मणि आभा सहराप्रभाओं के समान अनेक प्रकार का ऊचा नीचा , अनुग्र है इसी को मन की साविक ज्योति कहते हैं इस में संयम करने वाला योगी सूक्ष्म आत्मा को ढूंढ कर कहता है 'मैं हूँ यह सात्विक अस्मिता साक्षात्करण मन और अहंकार सात्विक ज्योतियां है इस के अनुभव से सुख ही सुख प्रतीत होता है यही विशोका प्रवृति है इसा से अनुभूत ज्योतियां विषयवाली ज्योतिष्मती और अस्मिता मात्रा ज्योतिष्मती कहलाती है। सं०-जब ज्योतिष्मती प्रवृति जाग्रत हो तो क्ता होता है !
* योग दर्शनम् १ २३ वीतरागविषयं वा चित्तम् ॥३७॥ प० क्र०-वीत राग, विषयम्, ) राग रहित पुरुषों को विषय ( रुचि ) करने वाला (वा) अथवा (चित्तम् ) चित्त। भा०--ज्योतिष्मती प्रवृति से वीतराग पुरुपों में रुचि बढ़ती है इस से भी चित्त स्थिर हो जाता है क्योंकि उनका सत्संग निर्दोष विषय रहित भावना मुक्त हो जाता है उस प्रभाव से चित्त चचलता रहित ठहर जाता है और विपयों में नहीं जाता सदा उपेक्षा रहित उदासीन रहता है। सं.-चित्त वांधने के और भी उपाय हैं। स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा ।। ३८॥ प० क्र.- ( स्वप्न निद्रा ज्ञाना ऽऽव लम्बनंम् ) स्वप्न ज्ञान और निद्रा ज्ञान को स्थान देने वाला (वा) अथवा । भा०-जीवात्मा जाग्रत में स्थूल में विहार करता है, और सूक्ष्म देह में विना ही स्थूल शरीर के देखता सुनता है और निद्रा में कारण शरीर में विचरता है जब वह स्वप्न और निद्रा के ज्ञान का आश्रय ण जाग्रत में करता है तो उसका चित्त समाहित हो जाता है। सं०-इस से भी एक सुगम उपाय चित्त ठहराने का है। यथाभिमतध्यानाद्वा ।। ३९॥ प० क्र०-( यथा, ऽभिमत ध्यानात् । जिस योगी जो पूर्वोक्त विधि यों से अतिरिक्त ( अभिमत हो उसके ध्यान से (वा) अथवा।
* समाधिपाद-8 भा०—योग में चित्त ठहराने के दो प्रकार हैं वाह्य देश और श्राभ्यान्तर देश अब जहां जिस स्थान में चित्त रुचि के अनुकूल ठहरने लगे वहीं उसी के अनुसार चित्त- स्थैय योग्यता नामक योग बनता है। सं०-चित्त की थिरता का फल क्या है। परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्यवशीकारः॥४०॥ पा० क्र०-(परमाणु, परम महत्वाऽन्तः) सव से बढ़कर सूक्ष्म और सबसे बड़े पर्यन्त ( अस्य ) इसका ( वशीकार) वशीकार होता है। भाल-जव योगी यथामिमत चित्त स्थिरता में परिपक्क हो जाता है तो वह सूक्ष्म से सूक्ष्म परमाण पर्यन्त और महान में लगाने से परम महान-आकाश पर्यन्त जहां चाहे चित्त स्थिर, कर सकता है, अर्थात् अनवरोध चित्त की लगावट स्थिरता की ओर जाती है इस देशा में चित्त- संयम-अनुष्ठान की पुनः आवश्कता नहीं रहती। चित्त वशीकार की यह अन्तिम-स्थिति है। सं०-इस निर्मल चित्त का क्या रूप होता ह है, शोणवृत्तेरभिजातस्येव पणेनेहीतग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनता ममापतिः॥४१॥ १००-( क्षीण वृत्ते ) वृत्तियों से शून्य (अभिजातस्य ) निर्मल ( इव) तुलय (मणे:) मणि की ( गृहीतृग्रहण, ग्राह्यषु) आस्मिता= अहं भाव, इन्द्रिय ग्राह्य-स्थूल जिस वस्तु * योग दर्शनम् 8 सूक्ष्म विषय ( ततस्थ तदज्जनत्ता) उन में स्थित होकर लीन होना (समापत्तिः) तद्रुप होना है। भा०-स्फटिक मणि के समीप जैसा रंग रूप आता है वह उसी के तदाकार रूप हो जाता है इसी भांति चित्त से जब राजस तामस वृत्तियां नष्ट हो जाती हैं तो चित्त इतना स्वच्छ हो जाता है कि उसकी बढ़ी हुई सालिकता से में उसे एकाग्र करना हो वही अपने रूप और आकार को निहित करके वह तद्रप होता है और पूर्ण तन्मयता से उसी में लीन हो जाता है। और ग्राह्य = वाह्म स्थूल सूक्ष्म में, ग्रहण = इन्द्रियादि में, ग्रहीता= अहभाव ( अस्मिता) में लगाकर उनका सम्यक साक्षात्कार करता है। सं०-इस तद्रुपता वश चार भेद प्रतीत होते हैं। तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैःसंकोणी सवितर्का समापत्तिः॥४२॥ प० क्र.-(शब्दार्थ, ज्ञान, विकल्पैः ) शब्द, अर्थ और ज्ञान के विकल्पों से (संकीर्णा) मिली हुई (स वितर्का) सवितर्का =शब्द अर्थ, और ज्ञान के विकल्पों से मिश्रित । -वितर्क समापत्ति समाधि में स्थूल में चित्त एकाग्र किया जाता है । इसी प्रकार सूक्ष्म में चित्त संयम से विचार समापत्ति समाधि होती है । स्थूल में समाधि से संसार २६ ॐ समाधिपाद- स्थूल लक्ष्य समाधि के जितने पदार्थ उनके उतने ही नाम, होते हैं इस लिये एक के ज्ञात होते ही जैसे शेष झट दूसरे का ज्ञान हो जाता है जैसे अर्थ भान होते ही शब्द का स्मरण हा आता है और शब्द श्रवण मात्र से भाव अथवा अर्थ अव गत होता है इस से योगी की सिद्धि हो जाती है। जव पूर्वाभ्यास पूर्वक शब्द, अर्थ, और ज्ञान इन तीनों की प्रतीत होती है तो सवितर्क समाधि वनती है। सं०-इस स्थूल लक्ष्य समाधि के उपरान्त । मृतिपरिशुद्धौ श्वरूपशून्येवार्थ- मानिर्भासा निर्वितर्का ॥४३॥ ५० ऋ०-(स्मृति परिशुद्धौ ) स्मृति नष्ट होने पर ( स्वरूप शून्या, इव) स्वरूप से शून्य के समान ( अर्थ मात्र निर्मासा) अर्थ मात्र की प्रकाशिका (निर्वितर्का) तिर्वतका है। भा० शब्द की जव तक स्मृति बनी रहती है तब तक उसे सवि- तर्का समापत्ति ही कहते है परन्तु जव चित्त केवल अर्थ मात्र का ग्रहण करता हुआ उस ओर को जाता तब स्मृति-भंग हो जाती है और अर्थ प्रतीति ही शेप रहती है इस निर्वितर्का समाधि में यद्यपि ज्ञान तो रहता है परन्तु वह नहीं के बराबर होता है क्योंकि उसकी भिन्न प्रतीति नहीं होती मानो अपने ग्रहण । के योग दर्शनम् * (ज्ञान) स्वरूप को त्याग कर ग्राह्य स्वरूप ही वन जाता है। इसी लिये इसे स्वरूप-शून्या-सहशा कहा जाता है। सं:-स्वरूप शून्या समाधि के अनन्तर क्या है। एतयैव सविचारा निर्विचाराच सूक्ष्मविषया व्याख्याता ॥४४॥ “प. क्र--(एतया, एव) इसी से ( सविचारा, निर्विचारा, च ) सविचारा और निर्विचारा ( सूक्ष्म विषया) मृम्म विषय में (व्याख्याता) विरण की गई है। भा०-यतः स्थूल विषयों में सवितर्का और निर्वितर्का समापत्ति मानी गई है उसी प्रकार सूरम विषयों में सविचारा और निर्विचारा समाधि होती है। सविचारा में मूक्ष्म विषय देश काल निमित्त से प्रतीत होते हैं तथा शब्द अर्थ और ज्ञान के साथ प्रतीत होते हैं परन्तु जव सा क्षात करते २ सव विस्मणा हो जाते हैं और अर्थ मात्र अनुभव होता है निर्विचारा समापत्ति हो जाती है । सं०-सूक्ष्म विषयों की इयत्ता कहां तक है । सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसान ॥४५॥ प० क्र०-( सूक्ष्म, यिषय त्वम् ) सूक्ष्म विषय पने, (च) और ( अलिङ्ग-पर्य व सानम् ) प्रकृति पर्यन्त हैं ।
२८ , * समाधिपाद: भाः-पञ्च महा भूत स्थूल विषय कहे गये हैं उन में सविता और निर्वितर्का समाधि होती है इन्हें साक्षात्कार कर के योगी चित्त क्रम से सविचारा और निर्विचारा समाधि द्वारा सूक्ष्म विषयों को माक्षात् करता है क्योंकि पंच महा भूतों में पंच तन्मात्रा सूक्ष्म ही है उन में अहंकार अहंकार से महतत्व और महतत्व मे प्रकृति मूक्ष्म मानी गई है। सं०-यह चारों समापत्तियां सम्प्रज्ञात समाधि हैं। ता एव सबीजः समाधिः ॥ ४६॥ प० क्र०-(ताः एव ) वे हो (स, वीजः) स वीज (समाधिः) समाधि (है)। भा०-सवीज समाधि सवितर्क निर्वितर्की, सबिचारा और निर्वि- चारा समापत्तियों का ही नाम है इतने तक तो संसार वीज से पुरुष छुटकारा नहीं पाता। संक-निर्विचार समापत्ति सव से ऊंची है उसका रूप कहते हैं। निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः॥४७॥ १० ऋ०-निर्विचार समाधि के सिद्धि होने से स्थिति का प्रवाह निर्मल हो जाता है और स्थिति होने से प्रज्ञा निर्मल होती है इस स्थिति में शुद्ध दर्पण में प्रतिभात स्वरूप की नाई प्रकृति पर्यन्त सव पदार्थो का स्पष्ट साक्षा- कार हो जाता है।
* योग दर्शनम् * २६ सं-निर्विचार की निर्मलता में जो प्रज्ञा होती है उसे क्या कहते हैं। ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा॥४८॥ ५० क्र-( ऋतम्भरा ) सत्य को धारण करने वाली (तत्र ) उस में (प्रज्ञा)प्रज्ञा। मा०-निर्विचार समापत्ति से जो निर्मलता उस में जो प्रज्ञा होती है उसे ही ऋतम्भरा कहते हैं क्योंकि वह सत्य को धारण करने वाली सार्थक हैं उस में भ्रान्ति की गन्ध तक नहीं हाती। सं०-सूक्ष्म पदार्थों का अनुमान और शब्द से भी ज्ञान होता है परन्तु इस प्रज्ञा में विलक्षणता होती है। श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषयाविशेषार्थत्वात ॥१९॥ ५० ऋ०-(श्रुता नुमान, प्रज्ञाभ्याम् ) आगम एवं अनुमान प्रज्ञा से ( अन्य विषया) विषय भिन्न होने से ( विशेषा, ऽर्थत्वात् ) विशेष विषय वाली हैं। भा०-सामान्य और विशेष दो प्रकार के पदार्थ स्वरूप होते हैं। जो सव प्रकार के पदार्थों में पाया जावे वह सामान्य । विशेष का अपना २ रूप है । आगम और अनुमान से केवल पदार्थ ज्ञान होता है वह भी उसके सामान्य रूप का पाया जाता है परन्तु निर्विचार समापत्ति में विशेष रूपका भान होना यही इसकी महत्ता है। सं०-प्रज्ञा का फल यह है कि ।
३० * समाधिपादः तज: संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी॥५०॥ प० क्रा-(तज, जः ) उससे उत्पन्न होने वाला ( संस्कारः ) संस्कार (अन्य, संस्कार, प्रति वन्धी) अन्य संसकारों का अबरोधक ( है )। भार-व्युत्थान के संस्कारों से चित्त की निर्मलता तो समाधि से पूर्व की दशा है परन्तु समाधि अवस्था में जो वोगी को अनुभव होकर उसके संस्कार प्रभाव रखते हैं इनका प्रभाव पूर्व की अपेक्षा वलवान होता है क्योंकि प्रना की निर्मलता में पदार्थ का तत्व अनुभ होता है जो कि व्युत्थान प्रज्ञामें नहीं होती अव इस प्रभाव मे समाधि प्रज्ञा होती है और वह व्युत्थान संस्कार को सर्वथा रोक देते हैं। सं०-अव निरूज समाधि का रूप कहते हैं। तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधा निर्बीजः समाधिः॥ ५१ प० क्र०-(तस्य ) उसके सवीज समाधि के संस्कार के ( अपि) भी (निरोध ) रुक जाने पर (सर्व निरोधात् ) सव की रुकावट से ( निर, वीजः ) निर्वीज समाधि होती है। भा०-युत्थान के संस्कार सवीज समाधि से रुक गये थे अब मवीज समाधि संस्कार चित्त को समाधि प्रज्ञा में
ॐ योग दर्शनम् *
३१
प्रेरणा करते हैं यह वह प्रज्ञा होती है कि जिससे अपने
और प्रकृति भेद को देखता है। यह भेद चित्त और
अपनी एकाग्रवृत्ति द्वारा साक्षात्कार होते हैं। वृत्ति
आत्मा का रूप नहीं किन्तु चित्त का है अतः वह
आत्मा के सम्मुख एक दृश्य मात्र है । इस से आत्मा
हट कर स्व स्वरूप में जाना चाहता है। अत, दृश्य के
मन्मुख कोई दृश्यतो रहा नहीं क्योंकि योगीकी प्रवल
इच्छा ने समाधि प्रज्ञा के संस्कारों को रोक दिया था
अतः वह अपने आप में आजाता है इस दशा में वह
शुद्ध परमात्मा का दर्शन करता है । ओर सव फांसों से
छूट जाता है।
इनि श्री पं० गोकुल चन्द्र दीक्षित कृते भाषा भाष्ये
योग दर्शन समाधि पादः समाप्तः ।
S
क
। ओ३म् ।।
साधनपादः।
तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥१
प. क्र०-(तपः स्वाध्याये, श्वर, प्रणिधानानि) त्प स्वाध्याय
और ईश्वर प्रणिधान (क्रिया योगः) क्रिया योग: कर्म
योग है।
भा०-शीत, उष्ण, सुख, दुख सहना तप। वेदोप निपद धर्म
एवं ब्रह्म विद्या के ग्रन्थों का स्वाध्याय । सर्व कम को
ईश्वर के अर्पण एवं फल त्याग करना ईश्वर प्रणिधान
कहा जाता है।
सं-इस क्रिया योग का क्या फल है।
ममाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च ॥२
प० क्र०-( ससाधि, भावनाऽर्थः) समाधि की उत्पत्ति ही जिसका
उद्देश्य है (ल्केश, तन, करणा,ऽर्थः) जिससे ल्केश द्वन्द
सूक्ष्म-म्यून होना प्रयोजन हैं ( च ) और ।
भा०-प्रवल ल्केस उपस्तित होने से समाधि नहीं हो सकती इस
लिये इस क्रिया योग से चित्त शुद्ध होकर लशों को
कम करता हैं इस से विवेक ख्याति का उदय होता है,
तव क श आमूल चूल नष्ट हो जाते हैं।
* योग दर्शनम् 2
३२
सं०-वह कौन से लश हैं कि जिन के लिये क्रियः योग
आवश्क है।
अविद्याम्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः ॥३
प० क्र.-अविद्या, अस्मिता, राग दूप और अभि निवेश ये
पच लश हैं।
भा०-यह पांचों ही विपर्यय हैं अर्थात मिथ्या ज्ञान अविद्या है
परन्तु अस्मिता, आदि विपर्यय स्वरूप नहीं परन्तु
सवका कारण मूल अविद्या ही है दम लिये अविद्या
का नाश होने पर शेप लश समूल नष्ट हो जाने हैं।
सं०-अविद्या हो सब लशों की जड़ है।
अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रमुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् ४
५० ऋ०-( अविद्या ) मिथ्या ज्ञान ( क्षेत्रम) उत्पत्ति की भूमि
( उत्तरपाम ) उतरो ( अंहकार ) आदि का ( प्रस्त
तनु विच्छिन्नो दाराणाम ) प्रसुप्त, तल, विच्छिन्न
और उदारों का।
भा०—चित्त भूमि के वह क्लेश कि जो होते हुये भी जागरित
नहीं हुये वह प्रसुप्त । जिनकी शक्ति काम करने की
शिथिल ( ढीली) हो गई है अर्थात् पर्याप्त मामग्री
मिलने तक कार्य में असमर्थ तनु । एवं चित्त में राग
होते हुये विछिन्नता को प्राप्त होकर जो उदार होता है
और वही जव विपय राग अन्य विषयों में वर्तमान हो
३४ $ साधन पाद: तो उसे विछिन्न और उदार कहते हैं। जव लश नष्ट हो जाते हैं तो जीवत्मुक्तावस्था पुरुष साक्षात् पूर्वक होती है यही लश की पांचवीं अवस्था है। सं०-अविद्या किसे कहते हैं। अनित्त्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या ॥५ प० क्र०-(अनित्या,ऽशुचि, दुःखीऽनात्मसु ) अनित्य, अपवित्र, दुःख और अनात्मा में ( नित्य शुचि सुखाऽऽत्म ख्यातिः ) नित्य पवित्र सुख और आत्मा का ज्ञान ( अविद्या ) मिथ्या ज्ञान है। भा०-अनित्य को नित्य, अपवित्र को पवित्र, दुखको सुख, स्वरूप से भिन्न शरीर इन्द्रिय और चित्त जो अनात्म वस्तुयें हैं उन्हें आत्म स्वरूप ( अपना रूप) मानना मिथ्या ज्ञान या अविद्या कही जाती है विपर्यय ज्ञान अविद्या है। सं-अस्मिता क्या वस्तु है। दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ॥६॥ प० क्र०-(ग्, दर्शन, शक्त्यों: ) दृक् शक्ति और दर्शन शक्ति का (एकात्मता, इव, ) एक रूप सा हो जाना (अस्मि- ता) है। भा०-पुरुष देखने वाला है बुद्धि दर्शन कराने वाली है। पुरुष * योग दर्शनम् के ३५. भोक्ता तथा वुद्धि भोग्य है यह परस्पर सर्वथा भिन्न हैं परन्तु इन दोनों का एक रूप सा भेद रहित प्रतीत होना अस्मिता लश है इसो को हृदय-ग्रन्यि कहते हैं यही पंच पर्वाअविद्या का एकाङ्ग है । सं०-विवेकोदय से ज्ञान होकर राग द्वेश अभिनिवेश हट जाते हैं अत: प्रमाणित हुआ कि अविद्या अस्मता की उत्पादि काई यही राग द्वेश का मूल है अत-राग किसे कहते है सुखानुशयी रागः॥७ प० क्र०-( सुखा, ऽनुशयी ) सुख के साथ लिपटा हुआ (राग) भा०-जिस वस्तु से सुख लाभ किया हो और उस सुख का स्मरण कर सुख साधान एवं उम में ममता अथवा तृष्णा उत्पन्न हो वह राग कहलाता है । सं०-राग का विरोधी द्वष है उसका लक्षण । दुखानुशयी द्वेषः ॥ ८॥ प० क्र०-(दुखा ऽनुशयी) दुख लिपटा हुआ (द्वेष) द्वेष होता है। भा०-जिस वस्तु से दुख का अनुभव हो उसकी संस्मृति करके उस में दुख तथा साधन में अमर्श (क्रोध ) वह द्वेष सज्ञक है। सं०-अभिनिवेश की जड़ क्लष है अतः उसका लक्षण । के साथ
क साधन पाद
स्वरमबाही विदुषोऽपि तथारूढाभिनिवेशः ।।
प० क्र०-(स्वरस वाही) वहन धर्मवान (स्वभाव से रहने वाला)
(विदुपः अपि ) ज्ञानी के लिये भी ( तथा रूढः कैस्त
प्रसिद्ध अभिनिवेशः ) अभिनिवेश कहलाता है।
भा-प्राणी मात्र अपने अस्तित्व को चाहता है कि मैं ही बना रहूँ
परन्तु इस में जो मरण भय अथवा सत्ता के नाश का
भाव है यही अभिनिवेश कहा जाता है। यह मरने का
डर भीतर से ही वाहर को निरन्तर बहता है यह स्वभा-
विक प्रवाह है। मृत्यु किसी ने नहीं देखी न सामने आकर
किसी को उसने मारा परन्तु जीवन रक्षा के लिये अदृष्ट
मृत्यु से डरना अभिनिवेपता है । यह बड़े विद्वान् से
मृद
पर्यन्न और चींटी से हाथी तक एक सी है।
सं० लशों को दूर कैसे किया जावे।
से प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः ।१०
प. क्र.-(ले) वह (क्लश) (प्रति प्रसव हेयाः) अपने कारण
में लीन होने कारण त्याज्य हैं (सूक्ष्माः) सूक्ष्म ।
मा -लश सूक्ष्म और
स्थूल दो प्रकार हैं उनमें उन सूक्ष्म क्लशों
को जो अपने कारण में लय होजाने वाले हैं त्याग न
करने क्षेव्य हैं क्योंकि वह कारण लीन कि लश
दुखदापी हैं और स्थूल लश के संम्पर्क से बचने के
के योग दर्शनम् *
३७
लिये चित्त धारण योग कहा ही गया है अतः दोनों
पूर्वोत्तर त्याग ने योग्य हैं।
सं०-उन स्थूल सूक्ष्म लशों के नष्ट होने के कार्य।
ध्यान हेयास्तद्वृत्तयः ।११
प० क्र.-(ध्यान, हेयाः) ध्यान से त्याग ने योग्य ( तद् वृत्तयः )
उन की (म्थूल ) वृत्तियां ।
मा- स्थल लश क्रिया
अनुष्ठान
योग द्वारा सूक्ष्म हो
जाते हैं उन्हें ध्यान में लाना इस को फिर इतना
न्यूनाति न्यून करना कि सूक्ष्म सूक्ष्म होते २ अपने
दोप योगी को साक्षान् भासित होने लगें और जब
तक उनका वीज नाश न हो जावे निरन्तर उद्योग
करते रहना क्लोश से बचना है। सूम कश का
नाश केवल निर्वीज समाधि में होता है कि जहां आत्मा
अपने रूप में अवस्थित होता है क्योंकि उस दशा में
चित्त का कुछ काम नहीं रह जाता अतः यह सूरम
लश अपने कारण में विलीन हो जाते हैं यही प्रति
प्रसव कहा जाता है।
सं०-लश क्यों त्याज्य है।
क्लेशमूलः काशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः ॥१२
५० ऋ० (क्लेश, मूलः ) जिस की जड़ क्लेश है ( कर्मा ss शयः)
कर्मों की बासना (दृष्टा, दृष्ट जन्म वेदनीयः) दृष्ट और
अदृष्ट जन्म में जानने योग्य ।
३८
साधनपादः
भा०-पाप पुण्य में प्रवृति का कारण राग द्वेष और मोह है मूढ़
पुरुष राग में फंस कर पाप करता है विचार शील सुत्र
की
इच्छा
से
पुण्य । अतः यह पाप पुण्य
चित भूमि
में ऐसा वीज डाल देते हैं जिसका समय पर फल होता
है यही वीज वासना कहलाती है यह अपूर्व और
अदृष्ट फल कर्माशय कहे जाते हैं। यही धर्माधर्म
हैं। इसो से आवागमन-चक्र चलता है।
सं०-वर्तमान तथा भविष्यत में जो फल मिलता है वह क्या है।
सति मूले तद्विषाको जात्यायुभॊगाः ॥१३
५० ऋ०-(सति होते हुये (मूले ) जड़के (तद्व, विपाकः) उसका
फल (जात्या, ऽऽ पुर, भोगाः) जाति आयु और भोग
(है)
भा०-मीमांसक अपूर्व और नैय्थायिक जिसे अदृष्ट कहते हैं उन
कर्म फलों से जो कर्माशय बनता है उसका फल जाति,
श्रायु और भोग है अर्थात् प्रत्येक उत्पन्न हुये जीव को
किसी जाति (अंडज, स्वेदज, उद्भिज और (जरायुज)
में किसी नियत काल के लिये जिसको आयु कहते हैं
किसी भने या बुरे कर्मों के भोगने को जाना पड़ेगा यही
तीन जन्मे हुये जीव के प्रत्यक्ष काम हैं यह सव पूर्व
वासनानुसार मिलता है। संचित कर्म या कर्माशय है
जिसकी जड़ क्लेश हैं यह विवेक ख्याति से ही कट
सकती है।
३६ ते पाप के योग दर्शनम् ॐ सं०-जाति, आयु, और भोगकर्मों के अनुसार मिलते हैं। हादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात् १४ प. क्र-(ते ) वे (ह्लाद परिताप, फलाः) सुख दुख फल वाले हैं पुण्यापुण्य हेतु त्वात क्योकि उससे पुण्य और पाप होते हैं। भा०-हमारे शुभाशुभ कर्मों के फल अनुकूल हमें जाति, आयु, और भोग प्राप्त होते हैं । पुण्य कर्म शुभ फल और कर्म दुख देते हैं इस लिये लशों के समान इन्हें भी हटाना चाहिये। सं.-विवेकियों के लिये विषय सुख भी अनुकूल नहीं हैं। परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच दुःखमेव सर्व विवेकिनः ॥१५॥ ५० ऋ०-( परिणाम, ताप, संस्कार दुःखैः ) परिणाम ताप और संस्कार के दुःखों से (गुण, वृत्ति विरोधात् ) गुणों के स्वभाव विरुद्ध (च) और ( दुःखम् ) दुख (एव ) ही ( सर्वम् ) सव (विवेकिनः ) विवेकी के लिये। भाल-परिणाम दुःख कि जो विषय सुख का ही परिणाम है क्यों- कि उनके भोगने की तृष्ण वढ़ती है न्यून नहीं होती इस लिये विषयेन्द्रियों के सम्बन्ध को अमृत के स्थान में विष, समझना चाहिये । जो वस्तुयें हमें अभी सुखदायी हैं उनकी प्राप्ति तथा भोग में जो रुकावटें होने पर हृदय *साधनपाद:* संताप बूढ़ता है उससे द्वेप बढ़कर सुख-हीन होती है। चित्त क्रोध, दोप सन्ताप मुक्त होने से दुख का अनुभव. होना ताप दुःखिता है । सुख अनुभव से जो संस्कार चित्त पर पड़ते हैं उनकी स्मृति पुनरावृत्ति आदि श्राव. तियों से राग, मोह, उनके इष्टानिष्ट भाव चिन्तवन से क्ल श प्रवाह वृद्धि का नाम संस्कार दयिता है। सं.-भाव यह कि यह संसार दु:खमय है अतः दुख हेय (त्याज्य) हैं उसी क्रम से हेय हेतु, और हानोपाय का वर्णन किया जाता है। हेयं दुःखमनागतम् ॥ १६॥ प. क्र.- हेयम् ) त्याज्य ( दुःखम् ) दुख (अनागतम् ) पान वाला । भा०-भोगा हुआ दुख भूत कालिक दुख, भोग में आरहा दुख वर्तमान दुख माना जाता है अव उपाय तो आने वाले दुख का होना चाहिये क्योंकि वह रोका जा सकता है। वर्तमान के अनुसार भविष्य और भूत के भोग का नाम वर्तमान होता है अतः भविष्य बनाया जा सकता है। सं०-संसार दुख का कारण है क्या ? द्रपटश्ययोःसंयोगो हे यहेतुः ॥१७.1 प० क्र—(द्रष्ट्व, दृश्य योः) दृष्टा और दृश्य का (संयोगः ) मेल (हेय हेतुः ) हेय कारण है।
स्वरूप * योग दर्शनम् के ४१ भा०-चेतन पुरुष दृष्टा है और वाह्य दृश्य रस रूपादि तथा अध्यात्म जगत में शरीर इन्द्रिय तथा बुद्धि है। जो को भूलकर जगत दृश्य देखने में मग्न रहता है यही दृष्टा और दृश्य संयोग कहलाता है। यही संसार दुःख मूल है । जब पुरुप संयोग निवृत्ति से दृश्य से अपने को हटाकर स्व-स्वरूप में आवे तो संसार दुःख से निवृत्त हो जाता है। सं-वह हटा और दृश्य का सम्बन्ध या संयोग हुआ अब दृश्य का र.प और उसका कार्य किम्वा प्रयोजन कहते हैं। प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूते- न्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थदृश्यम् ॥१८॥ प. क्र.-(प्रकाश क्रिया, स्थिति श.लम्, ) प्रकाश, क्रिया, और स्वभाव वाला (भूतेन्द्रियात्यकम् ) भूत और इन्द्रिय रूप ( भोगऽप वर्गार्थम् ) भोग और अपवर्ग जिसका प्रयोजन हो वह ( दृश्यम् ) दृश्य है। भा०-सत् रज और तम, इन तीनों गुणों के मेल से बना हुआ जो कुछ भी है उसे दृश्य कहा जाता है। सत्व गुण प्रकाश धर्म वाले हैं। रजोगुण क्रिया और कात्मक हैं। तमोगुण स्थिति प्रकाश और क्रिया इन दोनों का अवरोध करना है यह तीनों गुण पापों सूक्ष्म भूत इन्हीं का कार्य है। पांच महाभूत, ४२ * साधनपादः सं०-दृश्य का पूर्ण रूप बताने के लिये अवस्थायों को कहते हैं। विशेषाविशेषलिगमात्रालिंगानि गुणपाणि ॥१९॥ प० क्र०-(विशेष, विशेष लिंग मात्र ऽलिङ्गानि ) विशेष, अवि- शेष लिङ्ग मात्र और अलिङ्ग (गुण पर्वाणि ) गुणों की अवस्थायें। भा०-- पाचों स्थूल भूत, ग्यारह इन्द्रियां, यही सोलह विशेष कहे जाते हैं। पांच तन्मात्रायें जिनसे स्थूल भूत उत्पन्न होते हैं छटा अहंकार जिससे इन्द्रियां उत्पन्न होती हैं यह छः अविशेष हैं महतत्व लिंगमात्र कहा जाता है। गुणों की साम्यावस्था (प्रकृति) अलिङ्ग कहलाती है। प्रधान अव्यक्त और माया भी यही है। अलिंगावस्था प्रलय है उस से सृष्टि उत्पन्न होती है। --दृष्टा का स्वरूप कहते हैं। द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः ॥२०॥ १० ऋ०-(द्रष्टा) देखने वाला (दशि मात्र ) देखने की शक्ति मात्र (शुद्धः अपि ) निर्विकार होकर (प्रत्ययाऽनुपश्यः) वृत्तियों के पीछे देखने वाला। मा०-दृष्टा पुरुष देखने की शक्ति है यह देखना आदि उसका स्वरूप नहीं किन्तु दोनों स्थानों पर वह शक्ति है जो मूल दृष्टा शक्ति है जो चैतन्य धर्मवान है। सं०-अव दृश्य का क्या प्रयोजन है।
ॐ योग दर्शनम् * ४३ तदर्थ एव दृश्यास्यात्मा ॥२१॥ ५० क्र०-( तदर्थः एव ) उसके हेतु ही (दृश्यस्य ) दृश्य का (आत्मा ) स्वरूप है। भा०-यह समस्त दृश्य दृष्टा पुरुप के मोक्ष के लिये है जब भोग और अपवर्ग पूर्ण हो जाते हैं तो पुरुष इस दृश्य को नहीं देखता । शान्त हो जाता है। सं०-यह दृश्य मुक्त जीब का अर्थ साधन करके अन्य जिन कामों में लग जाता है उसे कहते हैं। कृतार्थ प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् २२ प० क्र०-( कृता ऽर्थं प्रति ) प्रयोजन सिद्ध हुये की ( नष्ट अपि ) नष्ट हुआ भी ( अनष्टम् ) नहीं नष्ट होता ( तद्-ऽन्य साधारण त्वान् ) क्योंकि वह दूसरे के साथ भागी होता है। भाव---जब कोई दृष्टा भोग और अपवर्ग को पूरा करके वृतार्थ होता है तो यह दृश्य उसके लिये कुछ कार्य नहीं करता क्योंकि यह दृश्य द्रष्ठा मात्र का भागी है। सं-द्रष्टा और दृश्य का रूप ज्ञान होने पर संयोग स्वरूप कहते हैं स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपापलब्धिहेतुः संयोगः २३ प० क्र०-(स्व, स्वामि शक्तयोः ) स्वशक्ति एवं स्वामिशक्ति के ( स्वरूपोपलब्धि, हेतुः) स्वरूप के प्रत्यक्ष करने का कारण (संयोगः) साथ है।
साधनपादः भा०-यह समस्त सारा पसारा दृश्य पुरुष के निमित्त है इस दृश्य का फल-भोग मोक्ष है उसका भोक्ता पुरुप है अतः पुरुप इसका अधिपति है यह दृश्य उसका स्व है, धन है और अधिकार वस्तु है यह दृश्य अपने आपको नहीं देख सकता पुरुष चेतन इस का दृष्टा है। इस संयोग से दृश्य के स्वरूप की प्राप्ति है उसे भोग कहते हैं और दृशके स्वरूप की प्राप्ति का नाम अपवर्ग (मोक्ष) है यही स्वस्वामि भाव, दृश्य दृष्टा भाव अथवा भोग्य भोक्त भाव सम्वन्ध है। सं०-यह संयोग कैसे हो गया। तस्य हेतुरविद्या ॥२४॥ प० क्र०-( तस्य ) उसका हेतुः) कारण ( अविद्या ) अविद्या है। भा० -पुरुप इस दृश्य से सर्वथा अतिरिक्त है परन्तु इस दृश्य से इतना सटा हुआ है कि अपने को उससे मिन्न नहीं माना। इस संयोग का हेतु मिथ्या ज्ञान है। सं०-इस प्रकार हेय दुख है। हेय का कारण संयोग वह अपने कारण मिथ्या ज्ञान सहित कह दिया अवहानकी व्याख्या की जाती है। तदभावात्संयोगाभावो हानं तद्दृशेः कैवल्यम् २५ प० क्र०-(तद ऽभावात् ) अविद्या के प्रभाव से (संयोगा ऽभावः) संयोग का अभाव (हानम् )हान प्रद है यह (दशेः ) चैतन्य पुरुष का (कैवल्यम् ) मोक्ष है।
४५ * योग दर्शनम् * सं-दृष्टा पुरुष यथार्थ में दृशिमात्र है इसमें दृक् और चिति दो शक्तियां हैं जो इस दृश्य से सर्वथा भिन्न हैं परन्तु इसका इसके साथ ऐसा सम्बन्ध होगया है कि वह अपने को भिन्न नहीं देखता और बाहर के दृश्य देखने से अपने को भूल जाता है यह भूल मूल अविद्या ज्योही गई मेल का योग नष्ट हो जाता है इस संयोग के अभाव को हान अथवा हेय दुख है उसको त्याज्य करना है वह इस प्रकार होगा कि दुख के कारण की निवृति को जावे दुख नहीं होगा। यही स्वरूप प्रतिष्टा है यहीं वन्ध से मुक्त की समस्या हल होती है। सं० हेय की प्राप्ति का क्या उपाय है। विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः ॥२६॥ प० क्र०-( विबेक ख्यातिः ) विवेक ज्ञान अविलवा) निर्मल (हानो पायः) हान का उपाय । भां-शरीर मन, और इन्द्रियां तथा बुद्धि मुझसे भिन्न है मैं इन से सर्वथा भिन्न हूँ इस धारणा को विवेक ख्याति कहते हैं यही तीनों दुखों के दूर करने का उपाय है और मुक्ति का कारण है यही निर्मल ज्ञान हान का उपाय है। यह विवेक ज्ञान समाधि द्वारा आत्मा के साक्षात् करने से होता है। सं०-इस विवेक ज्ञान वाले योगी की प्रज्ञा (बुद्धि) कैसी होगी।
४६ साधनपादः तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ॥२७॥ प० क्र०-(तस्य ) उस की (सप्तधा) सात भांति की (प्रान्त भूमिः) सात प्रकार की अत्युच्च प्रज्ञा-वुद्धि होगी। भा०-पहिली प्रज्ञा यह है कि जो जानता था जान लिया अब कुछ जानना नहीं रहा । (२) दूर करने को था उसे दूर कर दिया (३) साक्षात् जिसे करना था कर लिया (४) जो बनाना था बना डाला (५) चित्त का अपना अधिकार पूर्ण हो गया (६) चित्त के बनाने वाले गुण अपने कारण में लय हो गये (७) गुणों के सम्वन्ध से अधिक ऊंचा पहुँचा स्वरूपमात्र ज्योति पुरुष यही कैवल्य है । यह जीवन्मुक्त दशा होते ही कुशल अथवा विदेह मुक्त होना है। सं०-इस विवेक ख्याति की उत्पत्ति के क्या साधान हैं। योगांगानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदोप्तिराविवेकख्याते. प० क्र०-(यो, ऽगां, ऽनुष्टानात् ) योग के अंग के अनुष्ठान (अशुद्धि क्षये) अशुचिता नाश होने पर (ज्ञान दीप्तिः ) ज्ञान के जागरण होने पर अविवेक ख्यातिः) आविवेक ख्याति तक । भा०-ज्यों २ चित्त निर्मल होता जाता है त्यों २ ज्ञान की ज्योति वढ़ती है और जब तक प्रकृति पुरुप का विवेक ज्ञान नहीं होता तब तक योग के अंगो का अनुष्ठान जो से
योग दशनम् *
४७
अशुद्धि के दूर करने का कारण है करते रहना चाहिये
यही विवेक ख्याति के लाभ का भी कारण है ।
मं०-योग के अंग कौन २ हैं।
यमनियमासनप्राणायाम प्रत्याहार
धारणाध्यानसमाधयोऽष्टावंगानि ।२९
प. क्र.-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रात्याहार, धारण
ध्यान और समाधि पाठ योगाङ्ग हैं।
भा०-योग करने वाले को इन आठ अंगों का अनुष्ठान करना
पड़ता है इन अंगों में धारणा और ध्यान योग में रुका-
वट न पड़े उसके उपाय या साधन हैं। यम नियम से
ध्यान और धारणा बनती है जैसे आसन दृढ़ योगी
प्राणायाम करने में समर्थ होता है और प्राणायाम को
स्थिरता से प्रत्याहार सधता है। इन आठ अंगों में
उपाङ्ग ( साधारण क्रिया सम्वादन) में तप और स्वा-
घ्याय बिना श्रद्धा वीर्य के नहीं होता। धारणा ध्यान
और समाधि विना अभ्यास और वैराग्य के अंसभव है
इस लिये यह उपाङ्ग भी सेवनीय है।
सं०-इन आठ अंगों में से
x विवेक ख्याति में नौ कारण है । उत्पत्तिकारण, स्थिति कारण, भिव्यक्ति
कारण, विकारे कारण, प्रत्यय कारण, प्रति कारण, वियोग कारण, ऊन्यस्व कारण,
धृति कारण (व्यास भाप्य)
साधनपादः अहिंसामत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः॥३० प० क्र०-(अहिंसा, सत्या, ऽस्त्येय, ब्रह्मचर्या, ऽपारि ग्रहाः) जीव क्लेश, ( अहिंसा ) से मिथ्या विपर्यय ( सत्य) चोरी रहित (अस्तेय ) वीर्य रक्षा ( ब्रह्मचर्य ) स्वा- मित्व (अपरिग्रह ) यम कहलाते हैं। भा०-ज्यों २ यह ब्राह्मण ( ब्रह्म का जानने बाला जीव ) व्रता- नुष्ठान से प्रमाद कृत हिसा बीजों से बचता है त्यों २ निर्मल अन्तःकरण होकर चोरी पर पीड़न, असत्मता से बचता है और कामादि रोगों को ब्रह्मचर्य (स्वा- ध्याय, वीर्य रक्षा) से विजय कर किसी पदार्थ का भूमित्व अथवा अधिकार जमा कर व्यामोहित नहीं होता। सं०-यमों की ऊंची अवस्था इन बातों से होती है। जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् ॥३१॥ प० क्र०-( जाति, देश काल समया, ऽनवच्छिन्नाः) जाति, देश काल और संकेत की सीमा रहित (सार्वभौमाः ) सव दशाओं में होने वाले ( महा ब्रतम् ) बड़े व्रत हैं। भा०-यम का पालन सर्वत्र कठिन इस लिये इन्हें एक सीमा में वांध दिया है, वह सीमा जाति, देश काल और संकेत की है इससे अहिंसा नियम बन जाता है और ४६. * योग दर्शनम् * जिज्ञासु द्रोह करना छोड़ देता है क्योंकि जो काम होते हैं उनका किसी जाति (अण्डज, स्वदेज जरायुज, उद्भिज) से हिमा अथवा अहिंसात्मक होगा यह किया कर्म किमी देश (पृथ्वी, अन्तरिक्ष,आकाश ) कहीं पर ही तो होगा जब होगा तो वह प्रातः मध्याह्न और रात्रि अथवा भून भविष्य और वर्तमान काल में ही होगी। जव व्रत ले लिया जावेगा तो उससे हिंसा बन हो न पड़ेगी प्रयोजन अहिंसा व्रत हो जायगा इसी प्रकार शेप कर्म योगी को करने में सरल पड़ते हैं। यह महा- व्रत वही लें कि जिन्हों ने संसार से लगाव छोड़ दिया है। न कि सब रचियादि गृहस्थी वर्ग। संक-नियम साधना क्या है। शौचसन्स्तोपतपः स्वाध्यायेश्वर- प्रणिधानानि नियमाः ॥३२॥ प० क्र०- (शौच, संतोप, तप, स्वाध्याय, श्वर प्रणिधानानि ) पवित्रता, संतोप, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान नियम हैं। भा०-भीतर बाहर को शुद्धि से (चित्त और शरीर) निर्मलता को प्राप्त होता है । इससे मान, मद-ईर्षा, निन्दा स्तुनि योगी बचता है और मैत्री की भावना उत्पन्न होती है अपने पास जो कुछ शरीर क्रिया निर्वाहार्थ है वही पूर्ण पर्याप्त है इस धारणां से दूसरे के वैभव, आदि रोगों साधनपादः में उदासीनता होती है तृष्टा रहित हो जाता है। भूख, प्यास, शोत, ऊष्मा आदि द्वन्द सहने से तपश्चर्या बनती है। प्रोङ्कार उपासना ( उद्गीथ जप) के समर्थक तथा उपदेशक मोक्ष ग्रन्थों की बारम्बार अवृति इससे विज्ञान और तत्व निष्ठा बढ़ती है जब यह दृढ़ता आती है तो योगी सब कुछ ब्रह्मार्पण करता है उसे ईश्वर प्रणिधान कहते हैं । सं०-यम नियमों के पालन में वाधायें आने पर यह प्रतीकार करे वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् ॥३३॥ ५० ऋ०-(वितर्क, वाधने ) वितर्क से वाधित (प्रतिपक्ष भावनम् ) प्रति पक्ष का ध्यान रखना चाहिये। -जो धर्म यम और नियम के विरूद्ध हैं अर्थात् उनके पालन करने करानेमें वाधक जैसे हिंसा झूठ, चोरी व्यभिचार और परिग्रह आदि मिथ्याचार मात्र वितर्क कहलाते हैं यदि किसी निर्वलता वश जब वितर्क उत्पन्न होने लगें अर्थात् प्रतिस्यर्धा, प्रति हिंसा, बदला लेने के विचार और इसी प्रकार के प्रचण्ड उवग श्रावेश आवें तो *मनु भगवान ने, जल से शरीर शुद्धि, सत्य से मन की शुद्धि, शान और तप से भूतात्मा की और शान से बुद्धि की शुद्धि बतलाई है। यह भी बतलाया है कि जिज्ञासु को चाहिये कि यमों का लगातार सेवन करता रहे न कि केवल नियम ही साधे जावें। क्योंकि केवल नियम पालन से यम नहीं पाले जा सकते । यद्यपि दोनों में भेद बतलाया गया है। परन्तु उनका परस्पर घनिष्ट सम्बन्ध है।
योग दर्शनम् इन सबके प्रतिपक्षों पर विचार करें कि मैं तो अभय देने के लिये योग धर्म में गया हूँ वितों से क्या लाभ जब ऐसा योगी चित्तवन करेगा तो वितर्क फल दुख और अज्ञानता से बच जावेगा। सं०-अब वितर्कों का स्वरूप, प्रकार, कारण, धर्म और फल क्या है ! वितकी हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहर्पूवका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् ॥३४ ५० का-(वितर्का) विकल्प संस्कार (हिंसा ऽऽ दयः) हिंसादि (कृत, कारिताऽनुमोदिताः) किये कराये और समर्थन हुये ( लोभ, क्रोध, मोह पूर्वाकाः) मोह, लोभ, क्रोध के जो कारण ( मृदु मध्याऽधि मात्राः) मृदु, मध्य, और तीब्र, (दुःखा ऽज्ञानाऽनन्त फलाः) दुख और अज्ञान का अन्त होना (इनि ) यह (प्रतिपक्ष, भावनम्) प्रतिपक्ष का चिन्तन कहलाता है। भा०-कृत, कारित, और अनुमोदित तीन प्रकार की हिंसा कह- लाती है। अपने हाथों की गई कृत । किसी से कराई गई कीरत। दूसरे की हिंसा का समर्थन अनुमोदित । यह लोभ, क्रोध और मोह से होती है । मृदु हिंसा जैसे गाय के बच्चे को उसके शरीर भरण पोषण योग्य दूध न देकर लोवा, फूका, और अकोर तथा अन्य हिंसक
५२
साधनपादः 8.
में
उपायों से दूध निकाल कर गाय और बच्चे को हानि
पहुंचाना या राजनैतिक इसी प्रकार के प्रजा शोपता
के कार्य । यह मृदु हिंसा मध्य हिंसा तीत्र हिंसा भेदों
से २७ प्रकार की होती है इनके अकान्तर भेद से ८१
प्रकार पाये जाते हैं। यह उत्तरोत्तर हिंसा योगी की
वृत्ति को यम नियम से विचलित करने से त्याज्य है।
सं-कैसे पता चले कि यह संयमी और नियम शील है। उस
के चिन्ह क्या हैं।
अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्संनिधौ वैरत्यागः ॥३५
५० क्र०-(अहिंसा, प्रतिष्टायाम् ) अहिंसा में दृढ़ संयम होने
से (तत् निधौ) उसके समीप (वैर त्यागः) वैर त्या-
गन माना जाता है।
भाल-जब योगी की अहिंसा में अचल मति हो जाती है तो अन्य
प्राणियों के चित्त से योगी के प्रति दुर्भावना नहीं रहती
इस लिये उनके समभाव होने से मृदुता बढ़ती है
निर हो कर योगी निर्भय स्वच्छन्दता से हिसक
पशओं में उनके सजाति की भांति उनमें विचर सकताहै।
सं०-सत्य की क्या कसौटी है !
मत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ॥३६
प० क्र०-( सत्य प्रतिष्ठायाम् ) सत्य में दृढ़ स्थिति होने से
( क्रिया, फला,ऽऽश्रयत्वम् ) क्रिया और, फल का
आश्रय बनता है।
के योग दर्शनम् के ५३ भा०-योगी का कहा.हुआ सब सत्य होने लगता है क्योंकि उस की.सत्य धर्म में दृढ़ स्थिति हो जाती है उसकी वाणी क्रिया आश्रयवान होकर फलने लगती है। सं०-अस्तेय से लाभ क्या है ! अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ॥३७ क्र०- (अस्तेय प्रतिष्ठायां ) चोरी त्यागन में दृढ़ स्थिति होने पर ( सर्व रत्नो पस्थानम् ) सर्व रत्न उपस्थित रहते हैं। भा०-चोरो के अनेक भेद हैं जिनका प्रभाव जिज्ञासु पर ममता का पड़ता है वह दूसरे की वस्तु अपनी करना चाहता है वह भी प्रवलता से और छुप कर परन्तु जब ज्ञानी सर्व विश्व को ब्रह्ममय देखता है तो सारी विश्व-रत्न राशि उसके दरवार के खद्योत (पटवीजते) बन जाते हैं। सं०-ब्रह्मचर्य पालन का क्या प्रभाव है। ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वोर्यलाभः ॥३८॥ प० ऋ०-( ब्रह्मचर्य प्रतिष्टायाम् ) ब्रह्मचर्य में दृढ़ता होने पर योगी को वीर्य लाभ होता है। भा०-ब्रह्मचर्य से शरीर, इन्द्रियाँ और मन शक्तिशाली हो जाते हैं ब्रह्मचारी की वाणी वलवान और समर्थ हो जाती है। * ब्रह्मचर्य का बीय रक्षा ही अर्थ नहीं है किन्तु स्वाध्याय और योगाभ्यास भी है योगी को इन सब से प्रौढता पा जाती है।
साधनपादः पालन सं०-अपरिग्रह क्या है। अपरिग्रहस्थैर्ये जन्म कथन्तासंवधिः ॥३९॥ ५० क्र०-(अपरि ग्रहत्थैर्ये ) अपरि ग्रह सध जाने पर जन्म कथन्ता सम्बोधः) जन्म क्यों हुआ इसका ज्ञान हो जाता है। भा०-अपरिग्रह में दृढ़ता होने से तीनों जन्मों का ज्ञान हो जाता है यहां ही संस्कारों का साक्षात् किया जाता है अर्थात् विस्मृति की स्मृति हो थाना साक्षात्कार कहा जाता है यमों की स्थिरता में सिद्धियां भी होती हैं। सं०-नियम से यह सिद्धियां होती है। शौचस्त्स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः ॥४०॥ ५० क्र०-( शौचात् ) पवित्रता से (स्वांगजुगुप्सा) अपने अंगों के प्रति निर्ममता और (परैः) अन्यों के (असंसर्गः) साथ का अभाव होता है। भा०-जब योगी यह देखता है कि बारम्बार अंग शुचि करते हुये भी मलिनता शेष है तो वह उसे सतत अशुद्ध समझ कर उसके प्रति निर्मोह (उदासीन) हो जाता है इसी उदासीनतावश वह औरों के संग दोष से भी बच जाता है यह वाह्य शुद्धि उसे मिल जाती है। Ho-अभ्यन्तर शुद्धि कैसे २ कारणों से मिलती है।
ॐ यांग दर्शनम् ॐ सत्त्वशुद्धिसामनस्यैकाग्रयेन्द्रिय- जयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च ॥११॥ ५० ऋ०-(सत्त्व शुद्धि सौमनस्यै काग्रय, न्द्रिय जया, ऽऽत्म दर्शन योग त्वानि,च) अन्तः करण की शुद्धि मन की पवित्रता एकाग्रता (स्थिरता) इन्द्रियों पर अधिकार तथा स्वरूप ज्ञान की योग्यता लाभ करता है। भा०-चित्तके विचार नष्ट होने से शुद्ध एवं स्वच्छ हो जाता है यह स्वच्छता एकाग्रता लाती है क्योंकि चित्त के उवण के कारण ही एकाग्रता नहीं बनती इस एकाग्रता से मन वशीकार होता है मन पर अधिकार होते ही इन्द्रियाँ अपने व्यापारों को छोड़ देती हैं इस प्रकार योगी अन्तः करण चतुष्टय को जीत कर आत्म दर्शन करता है। सं०-संतोष से क्या लाभ है। संतोषादनुत्तमसुखलाभः ४२ प० ऋ०-(सन्तोषात ) संतोष से (अनुत्तम सुख लाभः) परमोत्तम सुख प्राप्त होता है। भा०-संतोष योग से शान्ति प्राकर चित्त स्थिर हो जाता है और भीतर इतना सुख सम्पादन करता है कि वाह्य विषय सुख तुच्छ प्रतीत होते हैं यह मन की पराकाष्ठा की वशीकरण भूमिका है उसके विपरीत असंतोष दुखदाई ...... है।
* साधनपादः * संक-तप से फिर क्या लाभ । कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तासः ॥४३॥ प० ३०-( काये, न्द्रिय सिद्वः) शरीर इन्द्रियों की सिद्धि (अशुद्धि क्षयात् ) अशुद्धि नाश होने से ( तपसः ) तप से। भा०-तप करने वाले की इन्द्रियों के मल विचार एवं शरीर के दोष अस्वस्थता आदि दूर हो कर शुद्ध मन अन्तः करण एवं शरीर नीरोग चुस्त और हलका हो जाता है और इन्द्रियां दूर तक देखने की शक्ति पाती हैं। सं०-फिर स्वाध्याय से क्या लाम होगा। स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः ॥४॥ प० ऋ०-(स्वाध्यायात् ) स्वाध्याय से ( इष्ट देवता संप्रयोगः) इष्ट दिव्य गुण कर सम्बन्ध होता है। भाव-स्वाध्याय एक भोग है कि जिससे इष्ट ज्ञान की प्राप्ति होती है प्रत्येक ज्ञान का एक वाह्य अभिमानी देवता होता है उसके भीतर अभिमानी परमदेव भगवान के दिव्य ज्ञान की प्राप्ति स्वाध्याय द्वारा ही होती है श्रद्धा देवी का निवास दृढ़ होता है और स्वाध्याय साक्षात्कार होने से चित्त का भ्रमात्मक चाञ्चल्य नष्ट होकर व्यवसा यात्मिका बुद्धि हो जाती है। * देवता, ऋपि, और सिद्ध स्वाध्याय शील के दर्शनों को जाते हैं और उसके कार्य सहायक भी होते हैं (ज्यास भाष्य) * योग दर्शनम् ॐ सं०-समाधि में क्या होता है। समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥१५॥ ५० क्र०-(समाधि सिद्धः) समाधि सिद्धि (ईश्वर प्रणि धानात्) ईश्वर प्रणिधान से होती है। भ०-जब योगी ससस्त कर्मों को ईश्वरार्पण करके करता है तो उस ( ईश्वर ) के प्रसाद अथवा अनुग्रह से उसके विघ्न उसका साथ छोड़ देते हैं और उसे ब्रह्मरूपता प्राप्त होता है यह समाधि में घुसने का लाभ है । सं०-श्रासन क्यों लगाया जाता है। स्थिरसुखमासनम् ॥४६॥ प० क्र०-( स्थिर-सुखम् ) जो निश्चल सुखदेने वाला हो वह (आसनम् ) आसन है। भा० -जिस बैठक क्रिया से सुख पूर्वक स्थिरता प्राप्त होवे वह योगासन माना गया है, पद्मासन, वीरासन, भद्रासन, स्वास्तिकासन, सोपाभ्रमासन, पर्यंक समसंस्थान आदि ८४ भेद हैं इन में कुछ हठ योग के आसन हैं कुछ ध्यान योग के कुछ स्वाध्याय योग के कुछ जप योग के, कुछ जप योग आदि के हैं इस लिये योग की विभिन्न क्रियाओं से श्वास प्रश्वास गति पर प्रभाव पड़ता है किस आसन पर क्रिया का सम्बन्ध है ऐसा जान कर सिद्धि शीघ्र होती उलटा करने से सिद्धि में देर ५८ * साधनपादः ही नहीं लगती किन्तु जिज्ञासु को अश्रद्धा हो जाती है और रोग भी गले पड़ जाते हैं । इसे योगोपाय समझ कर नियम से करना चाहिये । क्योंकि आसन की स्थिरता एक योगि-सुख माना है। सं०-इम योगि-आसन-सुख की प्राप्ति कैसे हो। प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम ॥४७॥ प०क्र-(प्रयत्न शैथिल्या, ऽनन्त समापत्ति भ्याम् ) प्रयत्न की ढील और किसी अनन्त (असीम ) पदार्थ लीनता होने से वह श्रासन सुख लाभ होता है। भा०-जिन प्रयत्नों से शरीर धारण होता है, उन्हें शिथिल कर देने पर अनन्त (ब्रह्म ) में चित्त लय करने से जो देह का अभिमान छूट कर आसन दृढ़ता होती है उससे अचल सीधा निर्कम्प शरीर हो जाता है। और इसी को आसन की जीत कहते हैं। और यही ध्यान योग का परम उपाय है। सं०-इस शरीर के निर्कम्प अचल का फल क्या है। ततो द्वन्द्वानभिघातः ॥४८॥ प० क्र०-(ततः) तव ( द्वन्द्वा ऽनभिघातः) द्वन्द्व के प्राघात नहीं लगते। भाव-जब योगासन पर अधिकार हो जाता है तो फिर उसे सर्दी गर्मी, भूख, प्यास, वर्पा, लूह, कुछ नहीं सताते क्योंकि ५६ के योग दर्शनम् ॐ वाय जगत से उसका सम्बन्ध नहीं रहता कि जिनके भय से योगी समाधि भ्रष्ट हो जाते है। सं0-जब यह सब सिद्धियां प्राप्त हो गई फिर प्राणायाम करना चाहिये वह प्राणायाम क्या है। तम्मिन्सतिश्वासप्रश्वासयो- गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥४९॥ प० क्र०-(तस्मिन्, सति ) उन उपायों के सिद्धयन्तर ( श्वास प्रश्वासयोः) सांस के आने जाने की ( गतिविच्छेदः) गति को रोकना (प्राणायामः) प्राणायाम है। भा०-आसन पर विजय पा लेने पर प्राणों के रोकने का नाम प्राणायाम है जब तक आसन-दृढ़ न हो सफल प्राणा- याम नहीं हो सकता। सं०-प्राणायाम के भेद कहते हैं। वाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकाल संख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसक्ष्मः॥५०॥ प० क्र०-(वाह्य, भ्यन्तर स्तम्भ वृत्तिः वाह्य वृत्ति अभ्यन्तर वृत्ति और स्तम्भ वृत्ति (देशकाल संख्याभिः) देशकाल और संख्या से (परि-दृष्टः) देखा जाता है ( दीर्घ सूक्ष्मः ) लम्बा और हलका। भा०-प्राणायाम तीन प्रकार का है वाह्य वृत्ति, आभ्यन्तर वृत्ति और स्तम्भ वृत्ति वाह्य वृत्ति प्राणायाम में नासिका से ६० साधनपादः स्वांस बाहर फेंक कर उसको गति रोक दी जाती है अर्थात् सांस न लेना इसको रेचक प्राणायाम कहते हैं । अभ्यान्तर वृत्ति में बाहर से भीतर सांस खीच कर रोक ली जाती है इसे पूरक प्राणायाम कहते हैं। यह तो सांस की गति रोकनी हुई अब तीसरे में स्तम्भ वृत्ति करना कि न बाहर से भीतर न भीतर से बाहर सांस फैकना किन्तु भीतर को भीतर और बाहर की बाहर जहां की तहां सांस ठहराना इसे कुम्भक प्राणायाम कहते हैं। यह योगी ज्यों २ अभ्यास करता जाता है। देश, काल और संख्या क्रम से थोड़ा ( सूक्ष्म ) बहुत ( लम्बा) होता जाता है। ध्यान रखना पड़ता है कि धीरे २ अभ्यास से परिमाण बढ़ाया जाये इसमें कितने सांसो का एक सांस बनता है २४ स्वांसों का एक सांस बन जाने पर अभ्यास कहलाता है। सं०-चौथा प्राणायाम और भी है। बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ॥५१॥ प० क्र०-( वाह्या, ऽभ्यन्तर विपया-ऽऽ क्षेपी) वाह्य और भीतर के विषय का लांघने वाला (चतुर्थः) चौथा प्राणा- याम है। भाव-रेचक प्राणायाम का सम्बन्ध बाहर से है क्योंकि इसमें प्राणों को बाहर ठहराते हैं। पूरक में भीतर सांस ठहरानी पड़ती, इस लिये इसाका आन्यन्तर सम्बन्ध है के प्राण लांघने वाल * योग दर्शनम् * इन दोनों के अभ्यास से कुम्भक प्राणायाम क्रिया कहते हैं इसे सहित कुम्भक भी कहते हैं । इस सहित कुम्भक में रेचक और पूरक की अपेक्षा रहती है जब इसकी शक्ति बढ़ जाती है तो बिना रेचक और पूरक ठहराये जा सकते हैं इन दोनों भांति के प्राणायाम को चौथा कुम्भक कहा जाता है। सं०-चौथे प्राणायाम का फल क्या है। ततःक्षीयते प्रकाशावरणम् ॥५२॥ प० ऋ०-(ततः) प्राणायाम से (क्षीयते) नाश होता है (प्रकाशा ऽऽवरणम ) विवेक ज्ञान का ढकना उठ जाता है। भा०-विषेक ज्ञान प्रकाश पर जो अविद्या धन पटल का आवरण आकर योगी को क्लोशित करता है वह प्राणायाम अभ्यास से निरन्तर अभ्यास से वह परदा हट जाता है और विशुद्ध विवेक ज्ञान का सूर्य दैदीप्यमान होने लगता है। सं०-प्राणायाम का फल दूसरा और भी है। धारणासु च योग्यता मनसः॥५३॥ प० क्रा०-(धारणासु, च ) धारणाओं में और (योग्यतामनसः) मन की योग्यता उद्भूत होती है। भ०-जितनी धारणायें हैं इस प्राणायाम के अभ्यास से ही मन उन समस्त धारणाओं के योग्य बन जाता है। जहां ६२ साधनपादः . चाहे वहां ध्यान स्थापित कर सकता है इतस्ततः नहीं जाता। . सं०-प्रत्याहार का क्या लक्षण है। स्वविषयासंप्रयोगे चितस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः ॥५४॥ प० क्र०-(स्व, विपया, ऽसम्प्रयोगे ) निज विपय से असम्बन्धित होने से (चित्तस्य ) चित्त के ( स्वरूपा ऽनुकारः इव) स्वम्प की छाया सा ( इन्द्रियाणाम् ) इन्द्रियों का (प्रत्याहारः ) प्रत्याहार है। भा०-चित्त के आधीन वाह्यन्द्रिय वाह्य विपयों को ग्रहण करती है यह प्राणायाम अभ्यास से चित्त जब बाहर की ओर से रुक जाता है तो चित्त की भांति इन्द्रियां भी अवमद्धि हो जाती हैं अतः इस चित्त की अन्तर्मुख वृत्ति होने से इन्द्रियां वाह्य विषय विमुख होकर चित्त के स्वरूप अनुरूप सा बन जाता.है यही प्रत्याहार है सं०-इस प्रत्याहार का क्या फल है। ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् । ५५॥ प० क्र०-(ततः ) उस प्रत्याहार से ( परमा) परमोत्तम (वश्यता) अधीनता में=वशर्तिता (इन्द्रियाणाम) इन्द्रियों का। भा०-जिज्ञासुओं के अनुभव भेद से कोई शब्दादि विषयों में न फसना इन्द्रियजोत है किसी के अनुभव में वेदाविरुद्ध
* योग दशनम् *
विषयां का सेवन और तद्विरुद्ध विषयों अप्रवृत्ति इन्द्रिय
जय है तीसरे शब्दादि भोग्यों को अपने अधिकार पूर्वक
भोगने को इन्द्रिय जय मानते हैं परन्तु विषयों से
सम्बन्ध रहने से भूमि बिगड़ जाने का भय है इसलिये
चित्त के ही निरोध से सर्व इन्द्रिय वश्यता सम्भव है
फिर कोई आशंका नहीं रहती। यही प्रत्याहार का
फल है।
इति श्री पं० गोकुलचन्द्र दीक्षित कृते भाषा भाष्ये योग दर्शन
साधन पाद: समाप्तः।
* ओ३म् अथ विभूति पादारम्भ्यते । सं०-धारणा ध्यान और समाधि का वर्णन यहाँ किया जाता है धारणा किसे कहते हैं। देशवन्धचित्तस्य धारणा ॥१॥ प० ऋ०-( देश, वन्धः) देश में वाधना (चित्तस्य ) चित्त का धारणा है। भा०-धारणा से चित्त प्राणायाम के योग्य बनता है योगी वाह्याभ्यन्तर किसी स्थान में चित्त की अचलता के लिये बाँधता है। अभ्यन्तर में नाभिचक्र, हृत्पुण्डरीक, मूर्द्धा स्थिति ज्योति में, नाक के अग्र भाग में अथवा जिह्वा के आगे के भाग में टिकाना धारणा है। सं०-अब वृत्ति की एकाग्रता को कहते हैं। तत्र प्रत्ययकतानता ध्यानम् ॥२॥ प० क्र०-(तत्र) वहां कि जहां चित्त को लगाया है उस प्रदेश में (प्रत्ययै, कतानता) वृत्ति की एकाग्रता ध्यान है। भाव-जिसमें चित्त को धारण किया गया है उसी प्रदेश में उस की वृत्ति का एकाग्र होना अर्थात् उसका उत्तरोत्तर उदय होता जाना और अन्य प्रवृति का आना ध्यान है संक-समाधि किसे कहते हैं।
. * योग दर्शनम् * ६५ तदेवार्थमात्रनिभासं स्वरूपशून्य-मिव समाधिः३ १८ क्र०-( तत, एव ) वही ध्यान ( अर्थमात्र निर्भासम् ) जिसमें अर्थमात्र भासित होता है (स्वरूप, शून्यम् , इव) स्वरूप से शून्य सा ( समाधि ) है। भाल-जहाँ ज्ञाता ज्ञान ज्ञय, याता, ध्यान, ध्येय जब एक से भासित हों तो उसे ध्यान कहते हैं वहाँ केवल ध्येय मात्र का लगाव रह जाता है और उसका रूप शून्य प्रतीत होता है यही समाधि है। सं0-संयम क्या पदार्थ है। त्रयमेकत्र संयमः ॥४॥ प० क्र०-(अयम् ) तोनों (एकत्र) एक विषय में (संयम.) संयम से भा-जब एक ही विषय में धारणा ध्यान और समाधि एकत्रित हो जाते हैं अर्थात् जहां जिस विषय में योगी की धारण है उसी ध्यान और उसी में चित्त की समाधि हो जावे तो इस एको करण का नाम संयम है। सं०-इस संयम का क्या फल है। तज्जयात्प्रज्ञालोकः ॥५॥ प० ०( तत्-जयात) उसकी विजय से (.प्रज्ञा, ऽऽलोकः) प्रज्ञा का प्रकाश होता है। भा०-ज्यों संयम की स्थिति दृढ़ होती जाती है, त्यों समाधि प्रज्ञा प्रकाश बढ़ता है।
* अथ विभूति पादारम्भ्यते * सं०-संयम का उपयोग क्या है। तस्य भूमिषु विनियोगः ॥६॥ ५० क्र०-(तस्य ) संयम का (भूमिपु भूमियों में (विनियोग) प्रयोग करना चाहिये। भा०-योग की मनोन्नति अवस्थाओं में नीचे की भूमि को जोत कर आगे की भूमि में संयम करना ठीक है क्योंकि पहिले नीचे की भूमि पर संयम किये बिना आगे भूमि में संयम करने से उसका सफल योग नहीं होगा इस लिये सवितर्क में जो निचली भूमि है उसमें संयम कर आगे निर्वितर्क में संयम करना होगा। इसके उत्तर सविचार और निर्विचार में संयम होने से पूर्ण प्रज्ञा प्रकाश होता है। सं० इनमें अन्तरंग और वहिरंग कौन २ हैं। त्रयमन्तरङ्गम् पूर्वेभ्यः ॥७॥ ५० ऋ०-(त्रयम् ) तीनों ( अन्तरङ्गम् ) भीतर का निकट साधन (पूर्वेभ्यः) पहिलों का (है) मा०-योग के आठ अंग है उनमें पहिले पांच ( यम, नियम श्रासन, प्राणायाम और प्रत्याहार ) बहिरंग है तथा धारण, ध्यान और समाधि अन्त रंग है क्योंकि पूर्व अंग केवल चित्त को निर्मल करते हैं परन्तु पिछले योग के साक्षात साधन हैं।
६७ योग दर्शनम् 8 सं०-फिर भी इन साधनों के कुछ और भेद हैं। तदपि बहिरङ्गम् निर्जीजस्य ॥८॥ ५० क्र०-(तत्, अपि ) धारण ध्यान समाधि भी ( वहिरंङ्गम् ) वाहर का साधन अंग हैं (निर्वीजस्य ) निजि का। भाक-धारण ध्यान, ससाधि यह सम्प्रज्ञात योग का अन्तरंग अंग है और निजि (असम्प्रज्ञात ) का वहिरंग अंग है पर वैराग्य के लिये असम्प्रज्ञात साक्षात् साधन है न कि संयम। सं-नि:ज समाधि से चित्त रुक जाता है तो क्या परिणाम होता है। व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निराधक्षणचित्तान्वयो निरोधपरिणामः ॥९॥ प० क्र०-(व्युत्थान, निरोध, संस्कारयोः ) व्युत्थान और निरोध के संस्कार का (आविर्भाव, प्रादुर्भावौ) प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष होना (निरोध, क्षण चिन्ता ऽन्वयः) निरोध होने के समय पीछे चलना (निरोध, परिणामः) निरोध समर का फल है। भाक-चित्त की सारी वृत्तियां निर्वीजावस्था में निरूद्ध हो जाती है उस सवीज सम्प्रज्ञात में का साक्षात्कार निरूजा वस्था में निरुद्ध हो जाता है अतः निर्वीज दशा में प्रतीत कर निष्शेष होता है और व्युत्थान की वृत्तियाँ ६८ * अथ विभूति पादरम्भ्यते * बन्द हो जाती हैं यतः । व्युत्थान के संस्कार चित्त के ही धर्म हैं, परन्तु वृत्तियों के अवरोध से वह नहीं सकते क्योंकि वह वृत्ति रूप नहीं होते, इसी भाँति निरोध के संस्कार भी चित्त के धर्म हैं जब निरोध क्षण में चित्त के भीतर परिणाम होता है तब निरोध संस्कार चित्त के भीतर उत्पन्न होते हैं और व्युत्थान के संस्कार दवते हैं उस दशा में व्युत्थान नष्ट होता है और निरोध संस्कार पड़ता है। उस अवस्था में एक चित्त के संस्कारों का परिवर्तन निरोध परिणाम होता है क्योंकि निरोध समाधि में केवल चित्त में संस्कार शेप रहते हैं। सं०-निरोधावस्था में प्रवल निरोध संस्कारों से व्युत्थान संस्कार के द्वने से क्या परिणाम होता है। तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ॥१०॥ प० ऋ०-(तस्य) चित्त का (प्रशान्त, वाहिता) शान्तिपूर्वक वहना (संस्कारात् ) संस्कार से (होता है) भा०--जब निरोध संस्कार प्रबल होता है यह उसी दशा में हो सकेगा कि जब उस का तिरन्तर अभ्यास किया जावे इसी अभ्यास से व्युत्थान संस्कार दबते हैं तब निरोध संस्कारों की प्रवृत्त परम्परा स्थान पाती है यही चित्त का एक रस बहना अथवा चित्तका प्रशान्त बहन है एक रसानाद इसी को कहते हैं परन्तु यदि सतत् ६४ * योग दर्शनम् ॥ अभ्यास न किया जावेगा तो निरोध संस्कार मन्द ही पड़ेगे किन्तु व्युत्थान संस्कार फिर श्रा दद्यावेंगे। सं०-सम्प्रयात समाधि में चित्त का क्या परिणाम होता है। सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयो चित्तस्य समाधिपरिणामः ॥११॥ प० का-(सर्वार्थ तैका प्रतयोः) विक्षिप्तता और एकाग्रता का (क्षयो, दयो) उदय और विनाश (चित्तस्य) चित्त का (समाधि परिणामः) समाधि परिणाम होता है। भाल-चिच समस्त विषयों में चलता रहता है तब एक विषय में टिक जाना चित्त का एकाग्र धर्म कहा गया है। समाधि में सब से पूर्व चित्त का यह चंचल धर्म दव जाता है और दूसरा अचंचल धर्म स्थिरता का होना यही समाधि-परिणाम समझना चाहिये। सं०-अभ्यास से सर्व विपयों का क्षय हो जाता है तब चित्त की समाहित दशा का क्या परिणाम होता है। ततः पुनःशान्तादितौ तुल्यप्रत्यौ चित्तस्यैकाग्रतापरिणामः ॥१२॥ प० ऋ०-(ततः, पुनः) तव फिर (शान्तो दितौ) शान्त और उदित (तुल्य, प्रत्य यौ) सम वृत्तियाँ (चितस्य) चित्त के (एकाग्रता, परिणामः) एकाग्रता का परिणाम है।
* अथ विभूति पादरम्भ्यते * भा०-चित्त विक्षेप के दब जाने से चित्त एकाग्र हो जाता है इस एकाग्रता में भी चित्त परिवर्तित होता रहता है परन्तु विक्षितता में चित्त एक विषय से दूसरे में दौड़ता है वह इस एकाग्रता में नहीं होता परन्तु एक वस्तु को पकड़ लेता है और उसी में लगा रहता है। वृत्तियाँ भी चित्त के परिवर्तन से बदलती है परन्तु वह प्रशान्त चित्तोदय के साथ इनका भी क्रमशः उदय होता रहता है और ममाधि अभंग रहती है यहो चित्त एकाग्रता का परिणाम है। सं०-भूत और इन्द्रियों के क्या परिणाम हैं। एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणा- वस्थापरिणामा व्याख्याताः ॥१३॥ ५० क्र०-( एतेन ) इससे (भूते, न्द्रियेपु) भूतों तथा इन्द्रियों में (धर्म, लक्षणा, ऽवस्था, परिणामा) धर्म लक्षण और अवस्था के फल (व्याख्याताः) वर्णन किये गये सम- झना चाहिये। भा०-पांच भूनों और इन्द्रियों में तीन परिणाम (परिवर्तन) होते हैं धर्म लक्षण तथा अवस्था इन परिणामों के नाम हैं । योगी को निरोध, शान्त व्यहिता, तथा समाधि और एकाग्रता परिणाम जानने पर भूतों तथा इन्द्रियों के परिणाम भिन्न भिन्न अनुभव करने होते हैं इलिये वह जानने लगता है कि असत् की उत्पत्ति
ॐ योग दर्शनम् *
७१
भा० -पोर सत का स्वरूप नाश नहीं होता यही क्रम एक से
दूसरे क्रम में अर्निशि बदलता रहता है यही संसार
चक्र है । समस्त संसार धर्म परिणाम है जैसे कुम्हार
एक मिड्डी के गोले का घड़ा बना डालता है वही गोला
अन्य छोटे बड़े नाना पात्रों के रूप में आता है परन्तु
समस्त आकार मिट्टी के ऊपर है भीतर मिट्टी ही है
मिट्टी (द्रव्य ) धर्मो है और घड़ा आदि धम है यही
एक दूसरे धर्म का आविर्भाव तिरोभाव उस धर्मी
(मिट्टी रूपी द्रव्य ) का धर्म परिणाम कहा जाता है।
अर्थात् द्रव्य में परिणाम नहीं होता धर्म (आकार)
में होता है । लक्षण परिणाम जैसे मिट्टी का वाह्य
श्राकार घट है । घट धारणा के अतिरिक्त उसमें दूसरी
धारणा होना ही असम्भव है यह आकार उसमें
निहित था। अव नया इसलिये कहा गया कि अव
प्रकट हुआ है । अर्थात् मिट्टी का गोला पहले अव्यक्त
था अब व्यक्त आकार में (प्रकट ) होने से उस छिपे
धर्म का आविर्भाव उस धर्म का लक्षण परिणाम के
अतिरिक्त कुछ नहीं। यद्यपि यह अनागत, वर्तमान
और अतीत धर्मवान कथन से विभक्त है परन्तु तीनों
कालों में एकसा बना रहता है यही द्रव्य का लक्षण
परिणाम है । अवस्था परिणाम में उस मिट्टी के घड़े
का नया पुराना संज्ञक भाव परिवर्तन में आने से जब
वह वर्तमान में प्रकट हो गया कहा गया तो वर्तमान
७२ * अथ विभूति पादरम्भ्यते * लक्षण में आया ज्यों २ सूखता गया वर्तमान में उसका पकना दृढ़ होना, उसका रूपान्तर है पकने के पीछे धीरे धीरे भतिज्य तक पहुंचने तक जीर्ण शीर्णता धर्म को ग्रहण करता गया यह दुवेलता वर्तमान लक्षण धर्म की दृढ़ता तथा लगातार प्रतिक्षण इसी धर्म का होता रहना अवस्था परिणाम कहा जाता है। यह परिणाम अपने समस्त परिणामों के पीछे-पीछे लगा रहता है . यही धर्म लक्षण और अवस्था चित्त की असम्प्रज्ञात और असम्प्रयात अवस्था में भी रहते हैं यही क्षिप्त, मूढ़ और विक्षिप्त चित्तावस्था की है सार यह है कि समस्त परिणामों में द्रव्य अपरिवर्तित रहता है केवल उसकी स्थिति परिवर्तन में आती है यहो संस्थिति नष्ट और उत्पन्न होती है ! द्रव्य न उत्पन्न होता है न नष्ट होता है। समस्त दृश्य भिन्न भिन्न संस्थिति मूलमात्र है यह मूल द्रव्य सर्वत्र सत्व, रजस् और तमस् कहलाता है। सं०-जिसमें यह तीन प्रकार का परिणाम होता है उस धर्म का. क्या लक्षण है। शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपातीधर्मी ॥१४॥ १५० क्र०-(शान्तो, दिता, ऽव्यपदेश्य, धर्माऽनुपाती ) भूत, वर्तमान और भविष्यत धर्मों में साथी रहने वाला धर्मी कहलाता है। - * योग दर्शनम् * भा०-धमा द्रव्य बतलाया गया है और धर्म उस द्रव्य के विभिन्न आकार कहे गये हैं। धर्मी सामान्य रूप द्रव्य समस्त प्राकारों में अनुगत (साथी) है) अगले विपयों के प्रति वही धमी बन जाता है इसमें जो धर्म अपना- अपना कार्य कर के नष्ट होते जाते हैं वह उसी में मिलते जाते हैं अर्थात् अव्यक्त होते जाते हैं उन्हें अतीत (भूत) अथवा शान्त कहते हैं। जो प्रकट (वर्तमान) में उदित अथवा व्यक्त हैं यह प्रत्यक्ष अथवा वर्तमान (संसार रूप) और जो अभी तक अव्याक्ताव्यक्त धर्म रहित अर्थात् प्रकट नहीं हुये अर्थात् शक्ति रूप से स्थित हैं आविर्भाव में हैं वह अव्यय देश्य अथवा अनागत किम्वा भविष्यत कहलाते हैं इन नीनों में साथ रहने वाला धर्मी कहता है। धर्म धर्मी से और धर्मी धर्म से कदापि प्रथक नहीं होता। जो कुछ बन चुका (भूत) बना हुआ (वर्तमान) और बनने वाला ( भविष्यत् ) यह उस धर्मी के धर्म हैं यह एक २ धर्मी में अनेक अनेक रहते हैं और अपने अपने निमित्तां के संयोग से प्रगट होते हैं। सं०-एक धर्मी के अनेक धर्म इस प्रकार होते हैं कि- क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुः ॥१५॥ प० क्र०-(क्रमा, ऽन्यत्वम् ) क्रम भेद (परिणाम, ऽन्यत्वे) परिणाम भेद (हेतुः) कारण
* अथ विभूति पदारम्भ्यते ॐ
भा०-एक मिट्टी के बिभिन्न क्रम होते गये पहिले रज (चूर्ण) फिर
गोला फिर घड़ा वही घड़ा टूटा तो पहिले कपाल फिर
ठीकरी फिर पुनः चूर्ण तदुपरान्त दूसरा क्रम जैसा
पहिले था आरंभ हो गया यही अनादि प्रवाह भाव
विकारसृष्टिका है यही क्रम भेद से भिन्न भिन्न परिणा-
मिनी प्रकृति है कि चूरण से गोला, गोला से घड़ा यह
धर्म परिणाम का क्रम हुआ इसी घट का अनागत
भाव वर्तमान भाव क्रम है वही वर्तमान से अतीत
भाव क्रम में चला गया वह व्यक्ति (घट) वर्तमान में
नहीं आता उस से विभिन्न व्यक्ति आना सम्भव है
इसके विशेष जानने की जिज्ञासा वाले योगी करे
वैशषिक दर्शन से लाभ उठाना चाहिये।
सं०-संयम का विपय और उसकी विभूतियां बालाते हैं। परन्तु
पहिले परिणामों में संयम और उसकी सिद्धि की महिमा
को समझाते हैं।
परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम् ।।१६।।
५० ऋ०-(परिणाम, त्रय, संयमात् ) तीनों परिणामों में संयम
करने से (अनीत, ऽनागत् , ज्ञानम् ) भूत और
भविष्य का ज्ञान होता है।
भाल-योगी त्रैकालज्ञ इसी संयम से होता है कि जब वह धर्म,
लक्षण और अवस्था परिणाम प्रति वस्तु में लक्ष्य
रखते संयम करता है। परिणाम विषयों में धारणा
-
योग दर्शनम् * ७५ और ध्यान लगाने से परिणाम साक्षात्कार होता है उन्म साक्षात् से वस्तु जिस जिस अवस्था में हो कर जिस- जिस रूपान्तर को प्राप्त हो कर जितने काल तक पहुंचती है अतः योगी को जिस अवस्था में पहुंचेगी उसका ज्ञान हो जाता है। मं०-संयम से सिद्ध होने वाली विभूतियाँ कहते हैं । शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतर ध्यासात् संकरस्त- पविभागसंयमात्सर्वभूतरुतज्ञानम् । १७॥ प० ऋ०-(शब्दा,ऽर्थ प्रत्ययानाम् ) शब्द, अर्थ, और ज्ञान के ( इतरेतरा, ऽध्यासात् ) पारस्परिक भावना से (संकरः) संकर, और अभेद, भासित होता है (तत्, प्रविभाग, संयमात् ) उन के विभाग में संयम से (सर्व, भूत, रुत, ज्ञानम् ) सब प्राणियों के शब्द का ज्ञान होता है। -किसी वस्तु का जब नाम योगी के सम्मुख आता है तो उसको शब्द और इसका अर्थ तथा उसका ज्ञान तीनों एक ही न होने से अलग अलग भासित होते हैं जैसे गौ शब्द श्रमण से केवल उच्चारण मात्र व्यक्ति का नाम बोध कराता है उससे अर्थ लाभ, दूध और गोवर है यह ज्ञान बुद्धि का धर्म है, व्यवहार में इन तीनों का सम्मेलन सा हो रहा है यद्यपि तीनों भिन्न हैं तथापि अभेद है । इन तीनों में संयमता से स्व * अथ विभूति पादारम्भ्यते * प्राणियों के शब्द का ज्ञान कि वद किन अभिप्राय ने बोला गया है योगी उसी का साक्षात्कार करता है। सं०--संयम से सिद्ध होने वाली विभूतियां यह है। संम्कारसाक्षात्करणार्वजातिज्ञानम् ॥१८॥ प० क्र--(संस्कार, साक्षात्करणान् ) संस्कारों के प्रत्यक्ष करने से ( पूर्व जाति ज्ञानम् ) पूर्व जन्म का ज्ञान होता है । भाव-वासना रूप स्मृति, और क्लेश हेतु को (अविवादि) दाप तथा जाति, आयु और भोग हेतुक धर्माधर्म रूप कारण यह दो प्रकार के संस्कार हैं। यह छुपे हुए नाना रूप उभय संस्कार पिछले जन्म संस्करण योगी के चित्त पर जो प्रभाव डालते हैं उसमें संयम करने से और उनका साक्षात्कार होने पर योगी को जो पूर्व जन्म अथवा अनेक पूर्व जन्मों का ज्ञान होता है उससे जिस देश, जिस काल, अथवा जिस निमि 7 से वह संस्कार पड़े थे उनका ज्ञान हो जाता है यही पूर्व जन्म ज्ञान है। सं0-अनोचिन से दूसरे के चित्त का ज्ञान कैसे होता है। प्रत्ययस्य परचितज्ञानम् ॥१९॥ प. क्र.-(प्रत्ययस्य ) चित्त के (परि, चित, ज्ञानम् ) दूसरे के चित्त का ज्ञान ( होता है)। , * अपने संस्कारों के साक्षात से अपने और दूसरों के संस्कारों के सादात से दुसर जन्म का ज्ञान होता है [व्यास, वाच स्पति भास्य ] * योग दशनम् भा० -मनुष्य का मुख उसके स्वभाव का चित्र है उसमें संयम करने से अथवा (लक्षण धारणा) संयम से जो साक्षात् कार होता है उससे परिचित्त भाव प्रत्यक्ष होता है यह पारचित्त भाव प्रत्यक्ष बतलाता है कि वह वीतराग है संसारी वृत्त वाला यह बचन व्यवहार और चित्तवृत्ति में (वृत्ति के झुकाव ) के सयम करने पर प्राप्त होता है ( इससे समस्त चित्त वशीकार होता है)। सं०-क्या यह चित्त अपने.. विषय सहित साक्षातकार में आता है। न च तत्सालम्बनं तस्याविषयो मृतत्वात् ॥२०॥ प० क्र०-(न, च,) परन्तु नहीं (तत्) वा (चित्त ) ( सा, 55 ल म्वनम् ) विषय युक्त ( तस्य ) उसके ( अवि- पयी, भूतत्वात् विषय न होने से)। भा०-नयम द्वारा उसी का साक्षात्कार होता है जो उसका विषय होगा। संयम का विषय वहो होगा कि जो शब्द अथवा अनुमान से किसी प्रकार जाना गया हो अतः वाह्य चिन्ह अादि से दूसरे के चित्त को इतना मात्र जान सकता है कि वह रागी है अथवा विराग वाला। अब किस विषय में इसका राग है शब्द में या रूप में किस शब्द में या रूप में यद्यपि यह किसी चिह्न से नहीं जाना जाता और जो जाना नहीं उसमें संयम नहीं हो सकता इसलिये चित्त में धर्म राग द्वेप आदि साक्षात-
ॐ अथ विभूति पादारम्भ्यते *
कार होते हैं उसका विषय नहों तैप चित्त का विषय
क्या हैं ? इस प्रकार संयम करता है तो उस ज्ञान हा
जाता है।
सं.-शीरर-रूप में संयम से क्या लाभ है।
कायरूपसंयमात्तग्राह्यशक्तिस्तम्भे
चक्षुःप्रकाशासंप्रयोगेऽन्तधानम् । २१॥
५० ऋ०-( काय रूप संयमात् ) शरीर के भाव में संयम करने से
(तद्, ग्राह्य, शक्ति, स्तम्भे) ग्राम शक्ति स्तम्भन (चक्षुः
प्रकाशा, ऽसम्प्रयोगे) नेत्र के प्रकाश का सम्वन्ध न होने
से (अन्तर्धानम्) छिपना।
भा-शरीर पांच भूतों से बना है वह रूप वाला होने से नेत्रों
से ग्राह्य (देखा) जाता है उस रूप में संयम से रूप
ग्राह्य शक्ति जिस म्प वाले शरीर का प्रत्यक्ष होता है
उसे देखने को शक्ति थम जाती है तब योगी का 'शरीर
अन्य के नेत्र प्रकाश का विषय नहीं होता तब सामने
खड़ा भी उसे कोई नहीं देख सकनार अतः जब वह
अपने शब्द, स्पर्श, रस, गन्ध में संयम करता है उजकी
ग्राह्य शक्ति को थाम लेता है तब उसके पास खड़े
उसके
शब्द
'सकते उसे स्पर्श नहीं कर
को नहीं सुन
सकते।२
पादुद्दा, अंजन, और रसायन इसी के भेदानुगत है।
२चीटियों श्रादि के किसी ने शब्द नहीं सुने । यह समस्त योगि को प्राप्त विभू-
तियां स्वभावतः किसी न किसी योनि में ऐक २ रूप से विद्यमान है।
७६ योग दर्शनम् * सं...कर्म क्या है। सोप क्रमं निरुपक्रमं च कर्म तत्संयमादपरान्तज्ञानमरिष्टेभ्यो वा ॥२२॥ प० क्र.-(सोप क्रम) प्रारंभयुक्त (निम्प क्रम) आरंभहीन (च) 'और (कर्म) कर्म-क्रिया ( तत्, संयमात् ) उसके संयम से (उपरान्त, ज्ञान) मृत्यु ज्ञान (अरिष्टेभ्यः) विपरीत चिह्नों से (वा) अथवा भा०-सोप क्रम और निरूप क्रम दो प्रकार के कर्म होते हैं उसमें संयम से मृत्यु ज्ञान हो जाता है। अथवा विपरीत चिह्नों से मृत्यु का ज्ञान होता है इसमें योगी को यह जानना होता है कि जिन कर्म फलों से आयु मिली है और उसमें जिन कर्मों का फल मिल चुका है और थोड़ा शेष है वह सोप क्रम कर्म और जिनका कार्य अधिक फल देना है वह निरूप क्रम कर्म कहलाता है इसमें संयम से आयु शेश का ज्ञान होता है। शारीरिक प्रत्यूहों (अरिष्टों) के ज्ञान से भी मृत्यु ज्ञान कर लेता है। इसके लक्षण यह हैं कि जब हाथों से कानों को ढंके और भीतर से शब्द न सुनाई दे। हाथों को आँखें ढाकने पर भीतर ज्जोति करण न दिखाई दें यह आध्या- त्मिक अरिष्ट हैं। अपने सम्मुख मृतमूर्ति को देखे तो आधिभौतिक अरिष्ट समझे। सहसा सिद्ध दर्शन होना आदि दैविक अरिष्ट हैं इस से मृत्यु निकट जाने । देश द्वारा । * अथ विभूति पादारम्भ्यते 8 काल भी पता लगता है कि जो केवल योगियों का प्रत्यक्ष होता है। सं०-मैत्री सयम क्यों है। मैत्र्यादिषु वलानि ॥२३॥ प० क्र--(मैत्र्या,ऽऽदिषु) मैत्री आदि में (बलानि) वल से। भा०-मैत्रो, करुणा और मुदिता में साक्षात्कार पदन्ते मयम से योगी का मैत्री बल, करुणा और मुदिता बल बढ़ जाता है इस प्रहर्प-योग योगी संसार का उपकार करता है । संसार को सुखमय बना सकता है। सं-वल में संयम का क्या अर्थ है बलेषु हस्तिबलादीनि । २४॥ प० क्र०-(बलेषु) बलों में (हस्ति बला ऽऽ दीनि) हाथी के बल आदि की प्राप्ति होती है। भाल-जव योगी हाथी के बल में तन्मय हो कर साक्षात् कार- पर्यन्त सयम करता है तो उस में हाथी का बल अा जाता है अर्थात् जिस के बल में संयम करना चाहे उस बल को हो साक्षात्कार कर लेता है। सं०-योगी दूर की वस्तुओं को कैसे देख लेता है ? प्रवृत्त्यालोकन्यासात्सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टज्ञानम् २५ ५० क्र०-(प्रवृत्या, ऽऽलोक, न्यासात् ) प्रवृत्ति प्रकाश से (सूक्ष्म, व्यवहित, विप्रकृष्ट, ज्ञानम् ) छोटी स्थिति वाली और * योग दर्शनम् के ८१ दूर होने वाली वस्तु का ज्ञान होता है। भा०-इस मन की प्रवृत्ति का नाम ज्योतिष्मती है उस प्रवृत्ति में जब योगी संयम करता है तो अदृश्य परमाणु भी उसे प्रत्यक्ष हो जाता है इसी प्रकार पृथ्वी के नीचे दवी हुई खाने आदि जो कुछ भी छुपा हुआ है उस पर संयम से उस प्रकाश को डालता है तो सव वस्तुओं को साक्षा त्कार करता है आंख द्वारा देखने से जो रुकावटें होती है वह इस संयम से नहीं होती। स-भुवनज्ञान किस संयम होता है। भुवनज्ञानं सूर्य संयमात् ॥२६॥ प० क्र०-(भुवन ज्ञानं ) भुवन ज्ञान ( सूर्य ) सूर्य मैं (संयमान् ) संयम में ( होता है) भा०—सूर्य के प्रकाश में साक्षात्कार पर्यन्त संयम का योगी को समस्त मण्डलों का ज्ञान हस्तामलक करता है इससे पूर्व योगी को सात्विक प्रकाशालम्वन करना सिद्ध किया अब यहां भौतिक प्रकाशालम्बन अभिप्रेत होने विवरण किया है। स-तारा व्यूह का ज्ञान किस प्रकार होता है। चन्द्रे ताराब्यूहज्ञानम् ॥२७॥ ५० क्र०-(चन्द्र) चन्द्र में ( तारा व्यूह ज्ञानम् ) तारक समुदाय का ज्ञान होता है। करना १ * अथ विभूति पादारम्भ्यते * भाल-चन्द्रमा में संयम करने से तारागणों की गति का ज्ञान होता है। स-तारक गति का ज्ञान करण क्या है। ध्रवे तग्दतिज्ञानम् ॥२८॥ प० क्र०-(ध्र वे) ध्रुव में ( तद् गति ज्ञानम् उनतारागणों की गति का ज्ञान होता है। भा०-ध्रुब तारे के सयम से प्रत्येक तारागण का ज्ञान योगी का होता हैं अर्थात् उसकी गति एक राशि से दूसरी राशि तक रहेगी साक्षात् होती है। स-शरोर रचना का ज्ञान किस प्रकार होता है। नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम् ॥२९॥ प० क्र-( नाभि, चके ) नाभि के चक में (काय व्यूह ज्ञानम् ) शरीर व्यूह का ज्ञान होता है। भा०-नाभि चक्र में संयम से त्रिदोप (वात, पित्त, कफ) ज्ञान आदि मधिर धातु स्थिति को साक्षात् करता है. सं०-कण्ठ कूप संयम का क्या फल है। कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृक्तिः ॥३०॥ प० क्र०-(कण्ठ कूपे) कण्ठ गर्त में संयम करने से योगी की क्षुत्पिपासा निवृत्तिः) भूख प्यास से निवृत्ति होती है। सूर्य और चन्द्र नाडियां भी है । जिन्हें इड़ा और पिंगला भी कहते है।
ॐ योग दर्शनम् * भा०-इस कएठ कूप से प्राणों का सन्बन्ध है इसी कारण योगी को भूख प्यास्त्र सताती है उस कण्ठ-कूप-संयम-योग से भूख, प्याम वाधा नहीं करतीं। सं०-स्थिरता कहाँ होती है ? कर्मनाड्यां स्थैर्यम् ॥३१॥ ५० क्र०-( कूर्मनायम् ) कूर्म नाड़ा में संयम से ( स्थैर्यम् ) स्थिरता (होती है) भा०-कएठ कूप से नीचे छाती में कच्छपाकार नाड़ी है उसमें संयम से स्थिरता लाभ होती है। इस से शरीर को कठिन से कठिन अकड़ाना चाहे कि जिसमें कोई हिला डुला सके तो योगो को ऐसा करने का अधिकार होता है। सं०-मूर्धा में क्या भान होता है ? मूर्द्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम् ॥३२॥ ५० ऋ० ( मूर्द्ध ज्योति में संयम द्वारा (सिद्ध दर्शनम् ) सिद्धों का दर्शन लाभ होता है। भा०-ब्रह्मरन्ध्र में जो मस्तक में वह छेद है कि जो गर्भावस्था में सिर बनते समय मर्मस्थान रहता है उसके भीतर चमकने वाली ज्योति मुर्दा ज्योति कहलाती है। योगी उसमें संयम से सिद्धों के दर्शन लाभ करता है। x यु और पृथिवी के मध्य में घूमने वाले सिद्ध हैं यह दिव्य पुरुष दूसरे प्राणियों केन्द्रश्य परन्तु योगी को द्रश्य होते हैं (ब्यास भाष्य तथा भोज वृति) wal . * अथ विभूति पादारम्भ्यते * स-प्रातिम ज्ञान क्या है ? प्रातिभावा सर्वम् ॥३३॥ १० ऋ० (प्रतिभाद वा) अथवा प्रतिभा (ज्ञान) से सर्वम् सब कुछ (जानता है) भा०-योगी के विवेक ज्ञान उदय होने से चित्त का प्रातिम स्फुरना) ज्ञान निर्मल हो जाता है उस भ्रान्ति रहित ज्ञान से योगी सब जानने की शक्ति वाला होता है। सं०-क्या हृदय में मी संयम किया जाता है ? हृदये चित्तसंवित् ॥३४॥ प० क्र०-(हृदये) हृदय में संयम से (चित्त संवित ) चित्त का ज्ञान होता है। भाल-चित्त का निवासस्थान हृदय है उसमें संयम करने से वृत्ति सहित चित्त का साक्षात् होता है। हृदय में वचन वासना पर विजय प्राप्त होने के अनन्तर अब हृदयस्थ पुरुष का ज्ञान योगी को शेष रहता है। सं-पुरुष का ज्ञान किस प्रकार होता है ? मत्त्वपुरुषयोरत्यन्तासंकीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोगः परार्थत्वात् स्वार्थसँयमात्पुरुषज्ञानम ॥३५॥ प० क्र.-(सत्व, पुरुषयोः) बुद्धि तथा पुरुष (अत्यन्ताः संकीर्णयोः) जो परस्पर अत्यन्त भिन्न है उनको (प्रत्यया ऽ विशेष:)
होने से * योग दर्शनम् है प्रतीतियों की एकता ( भोगः) भोग ( है ) उनमें (से) (परार्थ ऽन्य स्वार्थ-संयमात् ) परार्थ प्रतोति भिन्न जो स्वार्थ (प्रतीति ) है उसमें संयम करने से (पुरुष, ज्ञानम् ) पुरुष का ज्ञान होता है। -~-वुद्धि तथा पुरुष दोनों परस्पर विलक्षण हैं इस पुरुष को बुद्धि जैसा भासित कराती है वैसा ही पुरुष को भासित होता है बुद्धि के शाम्त होने से पुरुष शन्त, घोर होने से घोर मूद मूढ़-भासित होता है यह सव परि वर्तन वाट जगत के दृश्य कि जिनसे वुद्धि रूपान्तर को प्राप्त होती है के कारण हुआ करता है अतः बुद्धि- वृत्ति के अनुकूल पुरुष वोध माना गया है बुद्धि वृत्ति और पुरुष वृत्ति में कोई भेद नहीं होना यही भोग है इसमें बुद्धि प्रतीत अथवा भृत्ति परार्थं पुरुष के लिये है और, बुद्धि ने जो वाह्य जगत से दृश्य पुरुष के सम्मुख रक्खे हैं और जो पुरुष में उसको प्रतीत है वह पौर षेय वोध किसी अन्य के लिये नहीं होता। अपने लिये होता है। सं-स्वार्थ में भी क्या संयम होता है ततः प्रातिभश्रावणवेदनादशा- स्वादवाती जायन्ते ॥३६॥ प. -( ततः) स्वार्थ संयम से प्रातिभ श्रावण वेदना ऽऽदशी ऽऽस्वाद, वार्ताः) प्रतिभा से श्रवण से अनुभव से आ दर्श, आस्वाद और गन्ध ज्ञान से उत्पन्न होते हैं।
मन की * अथ विभूति पादारभ्यते 8 भा०-स्वार्थ संयम का फल पुरुप का ज्ञान है यह ज्ञान उसे पट सिद्धियों के ज्ञान पूर्वक होता है उसके पश्चात् सिद्भि होती है। जिस समय स्वाथे संयम होता है योगी का सूक्ष्मना, वैधानिक और कठिन ( अलोकिक ) वस्तुओं के ज्ञान का सामर्थ्य होता है। श्रोत्रंद्रिय से दिव्य शब्द श्रवण का सामर्थ्य होना है। त्वकेन्द्रिय द्वारा दिव्य स्पर्श ज्ञान का सामर्थ्य होता है। नेत्र द्वारा दिव्य रूप देख रे का सामर्थ्य हो जाता है। नासिका से दिव्य गन्ध सूंघने की शक्ति होनी है अब योगी मन सहित इन्द्रियों के सामर्थ्ययुक्त जिन शूक्ष्म विपयों को जानना चाहता है जान लेता है। सं०-अब पौरपेय बोध के अनन्तर योगी को तुष्टि न हो जावे अतः पुनः पुनः प्रयत्न करते रहने को कहा है। ते समाधावुपसाव्युत्थाने शिद्धयः ॥३७ प. क्र.-(ते) प्रातिस ज्ञान (समाधौ) ममाधि में (उप सर्गाः) प्रत्यूह (वाधायें) (है) व्युत्थाने (व्युत्थान) क्रत्थान में (सिद्धयः) सिद्धियां (हैं) भा०-जब इन्द्रियों में दिव्य शक्तियां उत्पन्न होंगी तो उनसे कहीं योगी हर्प और आश्चर्यवश सन्तोष मान कर “कृत- कृत्य हो गया" ऐसा न मानले कि यह तुच्छ सिद्धियां व्युत्थित चित्त की सिद्धियां हैं परन्तु समा- हित चित्त के लिये तो विघ्न ही हैं। क्योंकि इसमें बिहार ॐ योग दर्शनम् * करने वाला पुरुष पुरुप ज्ञान अर्थात् परम सिद्धि को प्राप्त नहीं कर सकता। सं-ज्ञानरूपी विनियों का फल पुरुष दर्शन पर्यन्त हो है वह बतलाया गया अब कर्मरूपी ऐश्वर्य जो संयम फल है उसे कहते हैं। बन्धकारणशेथिल्यात्प्रचारसंवेदनाच्च- चितम्य परशरीरावेशः ३८ प. क्र.-(वन्ध, कारण, शैथिल्यात् ) वन्ध हेतुकी शिथिलता से (प्रचार, संवेदनात् , च) गमन मार्गों के ज्ञान से (चित्तस्य) चित्त का (पर शरीरा ऽऽवेशः) पर शरीर में आवेश (होता है) भा०-पूर्व कर्मानुसार कि जिसके कारण मन चंचल होता हुआ भी एक शरीर में बँधा रहता है उसे कर्म संयम द्वारा योगी को ढीला करना पड़ता है। वह मन उन नाड़ियों में कि जहां उसके घूमने की क्रिया होता है उसमें संयम करके उसको प्रत्यक्ष करता है और अपने से चित्त का निकाल कर पर शरीर में डालता है यही परकाय प्रवेश क्रिया कहलाती है वहां बन्ध के कारण जो कर्म हैं उनके शिथिल होने पर अवरोध (रुकावटें) हट जाती हैं और उन नाड़ियों का ज्ञान होने बह निविघ्न एक शरीर से निकल कर दूसरे में चला जाता * अथ विभूति पादारम्भ्यते * है और चित्त के अनुकूल इन्द्रियां भी उस पर शरीर में आवेश (प्रवेश) कर लेती हैं। सं०-उर्ध्व गति कैसे होती है। उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्व- सङ्ग उत्क्रान्तिश्च ॥३९॥ ५० ऋ०-( उदान, जयात् ) उदान वायु को जीतने से (जल पक, कण्टका, ऽऽदिषु) पानी, कीच, और कांटे आदि में (असंगः) साझा न रखने से (उत्क्रान्तिः च) उर्ध्वगति होती है। भाव-मनुष्य शरीर में पांच प्राण हैं यह स्थान भेद से प्रारण, समान, उदान, ब्यान और अपान कहे जाते हैं यद्यपि मुख्य प्राण एक ही है कि जिस से सांस लेते हैं यह नाक से हृदय तक है। यह सांस-वायु भीतर चार स्थानों में बँट जाती है। यह नाक से हृदम तक है यह सांस-वायु भीतर चार स्थानों में बँट जाती है अपान वायु मूल पुरीष और गर्भ को नोचे खिसकाता है और नाभि से लेकर पाव तक रहती है समान वायु प्रहार रस को यथा स्थान पहुंचाती है। यह हृदय से नाभि तक रहती है । उदान वायु ऊपर उठने का कारण है और सब शरीर में व्यापक है। इसी उदान में संयम करने से योगी की उर्ध्व गति होती है तो न वह पानी ८६ * योग दर्शनम् 8 में डूबता न कींच, काटों में फँसता है किन्तु तूल बल हलका हो जाता है और मरने के समय शुक्ल गति अधिमार्ग से उत्तर मार्ग गति को प्राप्त होता है। सं०-क्या इस उदान के समान अन्य वायु भी जीती जाती हैं समानजयाज्ज्वलनम् ॥४०॥ ५० क्र०-( समान, जयात् ) समान जीतने से ( ज्वलनम् ) जलना नहीं होता। भा:-शरीराग्नि समान के अधिकार में हैं इस समान में संयम से योगी उत्तेजित हो कर उसका शरीर अग्निवत् प्रदीप्त होता है और उसे वाद्य अग्नि नहीं जला सकती। सं०-दिव्य श्रोत्र कैसे प्राप्त होते हैं। श्रोत्राकाशयाः सम्बन्ध- संयमादिव्यं श्रोत्रम् ॥४१॥ १० ऋ०-(श्रोत्रा ss काशयोः) श्रोत्र और आकाश ( सम्बन्ध संयमात् ) के योग सम्बन्ध संयम करने से । दिव्यम् दिव्य ( श्रोत्रम् ) कान (होते हैं) भा०-समस्त शब्द कान से सुने जाते हैं यह साधन (कान) श्राकाश के आश्रय होता है। सुना भी आकाश्रित है इन दोनों.. के सम्बन्ध (आधाराधये भाव योगेन)
६०
घ्राण
ॐ अथ विभूति पादारम्भ्यते *
साधन और साध्य में संयम करने मे दिव्य ओत्र
मिलता है जिस से सूक्ष्म, व्यवहित (विसीय
विभक्त) विप्रकृट (दूर के) शब्द सुन सकता है। इस
भाँति उत्तरोत्तर त्वचा, वायु, आंख, तेज रसना जन
घाण और पृथिघी के सम्बन्ध संमय से दिव्य त्वचा.
नेत्र, रसना और मिनते हैं यह संयम साध्य है
जिन्हें योगी सिद्ध करते हैं
सं०-क्या आकाश में भी उड़ सकता है।
कायाकाशयोः संबन्धसंयमाल्लघु-
तूलसमापत्तेश्वाकाशगमनम् । ४२॥
-(काया, ऽऽकाशयोः) शरीर और आकाश के ( संबन्ध
संयमात् ) सम्बन्ध में संयम से (लघु, तूल समापत्त
च) मई की नाई हलका (शूक्ष्म, ममापत्ति से (आकाश,
गमनम् ' आकाश में जा सकता है !
भा०-शरीर में रन्ध्र जाल हैं इनमें अाकाश है अर्थात् दम
शरीर को अवकाश देने वाला आकाश है उस आकाश
से जो शरीर सम्बन्ध है (प्राप्ति योग) उसमें संयम
करने से मई भांति 'उड़ने वाली
वस्तुओं में
तन्मयता होने से अति लापवतावश योगी आकाश में
गमन कर सकता है।
सं०-माह विदेहा अथवा आवरण क्षय क्या वस्तु है।
-
क योग दर्शनम् के बहिरकल्पिता बृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः ।।४३ । प० म०-( वहिः) वाहः (अ, कल्पिता) कल्पना रहित (वृत्तिः) वृत्ति समान या झुकाव (महा विदेहा) माह विदेहा कहलाती है ( ततः ) उस से ( प्रकाशा ऽऽवरण, क्षयः) प्रकाश के ढकने का नाश होता है। भाल-मन की विदेहा धारणा में मन को शरीर से बाहर स्थापन करना होता है जब योगी ऐसा करता है तो प्रथम वह निमूल कल्पना करनी होती है फिर वह कल्पना रहित यथार्थ हो जाती है यतः मन शरीरके भीतर ठहरा हुआ है ही वही वृत्ति मात्र से बाहर के विपयों में धारण कर लेने से ही विदेहा धारणा बन जाती है। इस धारणा के वल से यथार्थ ही जव मन की बाहर की वृत्तियां होती हैं इसे अकल्पिता विदेहा किम्बा महा विदेहा कहते हैं । इस में योगी कल्पिता के द्वारा अक- ल्पिता की साधना करता है इस धारणा से रजस मूल लश और कर्म विपाक क्षीण हो जाते है और चित्त प्रकाश की उपयुक्त रुकावटें नहीं रहतीं तब योगी का बिना रोक टोक हुआ चित्त यथेच्छ विहार करता है और जानने लगता है। सं०-ग्राह्य-विषय संयम की सिद्धियां कौन २हैं। तमस के
६२
* अथ विभूति पादारम्भ्यते
स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयोर्थवत्व संयमाद्भुतजयः ४४
प० क्र--(स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्मा, ऽन्वया, अर्थ वत्व संयमान)
स्थूल स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय, और अर्थ वाले में संयम
करने से ( भूत, जयः) भूतों का जप ( होता है)
भा०-यह भूत पांच रूपों में बंटे हुये हैं अर्थात् स्थूल, स्वरूप,
सूक्ष्म अन्वय, और अर्थ वत्व । स्थूल रूप में पृथिवी
जल, तेज वायु आकाश जो हमें प्रत्यक्ष है, है।
इन के स्वरूप में गन्ध, स्नेह, उष्णता, कंपन और
अवकाश देना अपने २ नियत धर्म जिन पंच भूत जाने
जाते हैं। तीसरा सूक्ष्म रूप-गन्ध तन्मात्र रसतन्मात्र
रुपतन्मात्र स्पर्श तन्मात्र ओर शब्द तन्मात्र जो इन
स्थूल भूतों के कारण हैं कहलाते हैं । अन्वय रूप में
सत्व, रजस तमस यह तीनों गुण जो अपने प्रकाश
प्रवृत्ति और स्थिति धर्मों से सर्वथा मिश्रित अनुभूत
होते हैं। पांचवां अर्थ वत्व रूप है जो पुरुष के भोग
और अपवर्ग के प्रयोजन सिद्ध में लगा हुआ है यह
वह है कि जिसमें गुणों के भोग और अपवर्ग सिद्धि
की शक्ति है। इन्हीं के संयम द्वारा पाञ्च भौत
वशीकार होता है।
सं-आठ सिद्धियां कैसे मिलती हैं।
* योग दर्शनम् के ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः काय- संपत्तद्धमानभिघातश्च ॥४५॥ ५० क्र--(ततः) उस भूत जय द्वारा (अणिमादि प्रादुर्भावः) अणिमादि का होना ( काय, सम्पत ) शरीर सम्पदा ( तत् धर्मा, ऽभभि घातः च) और उसके धर्मों के का- रण निरोध नहीं होता। भा-अणिमा सिद्धि में योगी सूक्ष्म होने की, लघिमा में हलके होने की महिमा में बड़े होने की, प्राप्ति में पहुँचने की प्रकश में मनोभिलाषा का अनवरोध, वशित्व में वशीकरण, ईशित्व में सत्ताधारी होना वशित्य में सत्य संकल्प शक्ति आ जातो है। यह पहिले कही भूत जप के कारण होती हैं और शरीर सम्पदा भो मिलती है। स-शरीर सम्पदा क्या वस्तु है। रूपलावण्यबलबज्रसंहनन- त्वानि कायसम्पत् ॥४६॥ ५० ऋ०-(रूप, लावण्य, वल वजू संहननत्वानि) स्वरूपवान, लुनाई, वल, और हीरे के समान रचना (शुद्धनिर्मल) (काय सम्बत् ) शरीर की सम्पदा है। भा०-भूतों के जप से आठ सिद्धियां मिलने पर उस योगी का रूप परम दर्शनीय समस्त शरीर कान्ति लावण्य मय * अथ विभूति पादारम्भ्यते * हो जाता है । महानवल और शरीर की वनावट शुद्ध हीरे के समान दृढ़ निर्मल हो जाती है यही चारों शरीर ऐश्वर्य शरीर सम्पदा कहलाती है। सं०-ग्रहण संयम में कोन सी सिद्धियां हैं। ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्व संयमादिन्द्रियजयः ॥४७॥ प० क्र०-(ग्रहण, स्वरूप, ऽस्मिना, ऽन्वयार्थ वत्व संगमान ) ग्रहण, स्वरूप, अस्मिता,अन्वय और प्रयोजन वत्ता में संयम से (इन्द्रिय जयः) इन्द्रिय जय (हाना है) भा०-पादि विषयों का नेत्र से जानना ग्रहण इसमें नेत्र पन का जो सामान्य रूप है वह स्वरूप उसका कारण सात्विक अहंकार वह अस्मिता इनमें तीनों गुणों का लगाव अन्वय इसमें भोग ओर अपवर्ग ( मोक्ष) के लिये होना प्रयोजन पन है । इन इन्द्रियों के इन पांचों रूपों में साक्षात्कार तक संयम होने से इन्द्रियां वश में होती हैं। सं-इन्द्रिय जय करने से लाभ । ततो मनोजविवं विकरणभाव: प्रधानजयश्च ॥४८॥ ५० क्र०-( ततः ) उस इन्द्रिय जय से ( मनोजवित्वम् ) स्व विषय ग्रहण शक्ति वेग, (विकरण भावः) बिना -- ६५ * योग दर्शनम् 8 शरोर के इन्द्रियों में क्रिया शक्ति, ( प्रधान जयः च ) प्रकृति विकार पर अपना अधिकार होना। भा०-योगी का मन वग की मांति प्रत्येक अपने २ विषयों को शक्ति पर अधिकार होना, बिना शरीर साधन के इन्द्रियों में क्रिया शक्ति आना, प्रकृति और विकार पर वशीकरण, यह तीनों मधुप्रतीका नामक सिद्धियां प्राप्त होतो है। स-गृहोट सयम किसे कहते हैं। सत्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाघियतृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च ॥४९॥ प. क्र.- (सत्व पुरुपा न्यता ख्याति, मात्रस्य ) बुद्धि और पुरूप के भेद ज्ञानी को ( सर्व, भावा ऽधष्ठिातृत्वम् ) समस्त भावो का स्वामित्व ( सर्व, ज्ञातृत्वम् ) सर्व ज्ञात होना (लाभ है।) -बुद्धि और वुम्प के भेद को जान लेने से योगी वाहर अंर भोतर समस्त भावों का अधिकारी हो जाता है तब उस को काम, क्रोध, आदि भाव और वाह्य सोन्दर्यादि उसे डावाँडोल नहीं कर सकते किन्तु योगी उन्हें स्वयं-स्व वृत्ति से संचालित करता है और लोकान्तरगत समस्त पदार्थ-तत्व का पूर्ण ज्ञाता हो जाता है। इन दोनों सि- द्धियों को विशोका कहते हैं।
६६ * अथ विभूति पादारम्भ्यते * सं०-बिवेक ख्याति का मुख्य फल क्या है। तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम् ॥५०॥ ५० ऋ०-(तद, वैराग्यात् ) उसके वैराग्य से ( प्रापि-भी) दाष वीज, क्षये) दोषों का बीज नाश होने पर ( कैवल्यम् ) कैवल्य) (होता है।) -बुद्धि और पुरुष भिन्नर हैं यह विवेक भी बुद्धि का ही धर्म और बुद्धि का फल है परन्तु पुरुष का निजस्वरूप नहीं इस लिये अपने स्वरूप में ठहरने के लिये इस विवेक ख्याति द्वारा वैराग्य वृत्ति उत्पन्न होती और इस वैरा ग्योदय से अविद्यादि लशों के वीज अर्थात् अविद्या श्रालेपन संस्कार जल कर चित्त के साथ विलीन हो जाते है उनके नाश होने पर आत्मा के सामने अव वाहर का कोई दृश्य नहीं रहा और पुरुष गुणों से भी पृथक हो गया इसी दशा का नाम कैवल्य है। सं०-योगी को चेतावनी चिह्न का उपदेश । स्थान्युपनिमन्त्रणे मङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात् ॥५१॥ प० ऋ०-(स्थान्युप निमंत्रणे ) स्थानाधीशों के सत्कार से ( सङ्ग, स्मया ऽकरणम्) सम्बन्ध और ममत्व न करना (पुनः) फिर (अनिष्ट प्रसङ्गात् ) अनिष्ट प्रसङ्ग से।
को प्राप्त * योग दर्शनम् 8 भा०-कैवल्य योग का परम पद है वहां तक पहुंचने में जो बीच की भूमियां हैं वह बड़ी मनोहर और रमण शील होती हैं उनमें योगी चकित होकर न विहार करने लगजावे और जिन इन्द्रिधों पर विजय किया है उन्हींके वशर्ति हो कर इन दिव्य विपयों से सम्बन्ध न डाल ले। इस दिव्य प्रलोभन से पुरुप होने में रुकावटें होतो सम्भव हैं अतः उनमें न फंस जाना चाहिये यह चेता- वनी है। क्योंकि योगियों की चार दशायें हैं काल्पनिक, भधु भूमिक, प्रज्ञा ज्योति आर अति क्रान्ति भावनीय । इन में पहिला नये २ योगाराधन का सवितर्क समाधि वाला होता है। दूसरा मधुमत्ती भूमि द्वारा ऋतम्भरा प्रज्ञा को पाकर भूत और इन्द्रियों को जीतने के लिये निर्वितर्क समाधि का साधन करता है तीसरा भूत और इन्द्रियों को जीतने पर स्वार्थ संयम योग से विशोका और संस्कार शेषा इन दो भूमियां को सिद्ध करना चाहता है चोथा मधुमती मधु प्रतीका और विशोका इन तीनों भूमियों में विरक्त हो सब कुछ साधन कर लिया है केवल चित्त लय शेष रहा है और सात प्रकार की प्रान्त भूमि प्रज्ञा वाला है इन में साधक योगी को बीच के समान पति आवाहन नहीं करते इसी प्रकार तीसरे और चौथे को भी नहीं बुलाते। दूसरा जो ऋत- म्भरा प्रज्ञा वाला है उसे ही प्रलोभन दिया जाता है अतः इस प्रलोभन से बचने पर ऊंचा योग हो सकता है * अथ विभूति पादारम्भ्यते * सं० इस संयम के और भिन्न उपाय यह हैं। क्षणतत्क्रमयोः संयमादविवेकजं ज्ञानम् ॥५२॥ ५० ऋ०-(क्षण, तत् , क्रमयोः) क्षण और से क्रम में (संयमात्) संयम करने से (विवेकजं, ज्ञानं ) विवेकज ज्ञान उत्पन्न होता है। भा०—काल का सब से न्यून भाग क्षण कहलाता है उससे और कोई छोटा भाग नहीं होता इसो के आगे प.छे के तार- तम्य को क्रम कहते हैं इन दोनों में संयम करने से विवेकज ज्ञान होता है अर्थात् यह काल क्षण पूर्व काल तण से पीछे का है परन्तु दूसरे से पूर्व का है इस क्रम में जब संयम किया जाता है तो अत्यन्त सूक्ष्म क्षणों के क्रम साक्षात्कार होता है उस सून्म क्षण तारतम्य का निश्चय होता है तब योगी को प्रत्येक सूक्ष्म वस्तु के भिन्न २ साक्षात्कार-सामर्थ्य सिद्धि होती है। सं०-इसका उदाहरण दिया जाता है। जातिलक्षणदैशेरन्यतानवच्छेदात तुल्ययोगस्ततः प्रतिपत्तिः ॥५३॥ ५० क्र०-(जाति, लक्षण देशेः) जाति, लक्षण और देश से (अन्यता, ऽनवच्छेदात् ) भेद के अनिश्चय से तुल्ययोः दो सदृश्यों के (ततः) विवेक जन्म ज्ञान से (प्रतिपत्ति:) निश्चय ( होता है) ६६ * योग दर्शनम् के -~-जाति, लक्षण और देश भेद से पदार्थों में भेद होता है। जैसे एक ही रंग के दो भिन्न जाति के पशु हों तो वहां जाति भेद से और यदि एक ही रंग और जाति के दो पशु हों तो लक्षण भेद से इसी प्रकार एक ही रंग के दो पशु स्थान भेद से बँधे हों देश भेद से जाने जाते हैं परन्तु जहां यह तीनों प्रकार के भेद न हों वहां भेद प्रनीति इस विवेकज ज्ञान संयम से ही होती है। सं०-विवेकज - ज्ञान - फल के लक्षण को कहते हैं। तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयमक्रम चेति विवेकजं ज्ञानम् ॥ १४॥ प० --(तारकं ) संसार सन्तारक (सर्व विषय ) सव का विषय कर्ता ( सर्वथा, विषयं ) सब प्रकार से विषय कर्ता, ( अक्रम) क्रम रहित एक के साथ (विवेकजं, ज्ञानम् ) विवेकज ज्ञान है। भा० - विना उपदेश के स्वप्रतिभा योग से विवेकज ज्ञान होता है सब वस्तुओं को सब अवस्थाओं में एक साथ सब का ज्ञान हाथ पर बदरी फल ( वेर) की भांति प्रत्यक्ष करता है । यह विवेकज ज्ञान पूर्ण ज्ञान कहलाता है संप्रज्ञात योग इसी का अंश है इस दशा में योगो को कोई वस्तु अविषय नहीं रहतो। सं०-बिना विवेक ज्ञान के क्या कैवल्य नहीं होता
* अथ विभूति पादारम्भ्यते *
सत्वपुरुषयोः शुद्घिसाम्ये कैवल्यमिति ॥५५।।
५० ऋ०-( सत्व पुस्योः ) बुद्धि और पुरुप की (शुद्धि, साम्ये)
शुद्धि के समान होने पर कैवल्य होता है।
भा०-जब बुद्धि पर रजम और तमम रूपी मल नहीं रहता तो
उस में पुरुप साक्षात्कार योग्यता आ जाती है इसी
अवस्था में योगी को कैवल्य प्रामे हाती है यह केवल्य
पुरुष और बुद्धि के भेद प्रतीति का नाम है चाहे वह
विभूति प्राप्ति के पीछे ही क्यों न हो और चाहे उससे
पूर्व । कैवल्य के लिए बुद्धि और पुरुष का विवेक ज्ञान
होना मुख्य है ! इससे अविद्या दूर होती है उमने
लश और लोश क्षय से कर्म उससे जन्म का क्रम
बन्द हो जाना है। इस अवस्था में
पुरुप
अपने
शुद्ध
स्वाम्पकार निर्मल ज्योतिवान कंवली हाता है।
।
इति श्री पं० गोकुलचन्द्र दोतित कृते योग दर्शने भाषा भाष्ये
विभूति पादः समानः ।
* ओ३म् * अथ कैवल्य पादारम्भ: . सं०-कैवल्य का निर्णय चित्त और चित्ति के हाथ में है इसलिये कै ल्याप योगी चित्त का निर्णय पांच सिद्धियां द्वारा कहते हैं। जन्मौषधिमन्त्रतपः समाधिजाःसिद्धयः ॥१॥ प. क्र-(जन्मौषधि, मत्र तपः समाधिजाः) जन्म ओपधि मंत्र, तप तथा समाधि से उतपन्न हुई (सिद्धयः) सिद्धियां हैं। भा०-कुछ सिद्धियां ऐसी हैं कि जिसकी उत्पत्ति केवल जन्म मूलक ही हैं उन्हें जन्मजा सिद्धि कहा जिसमें सामि- दिक ज्ञान उनपन्न होता है। पारे आदि रसायन-उप- योगी हव्यों के साधन से सिद्धि होना ओषधिजा-सिद्धि वेदादि स्वाध्याय और इष्ट संयम से मत्रजा सिद्धि, अशुद्धि-क्षय द्वारा शरीर इन्द्रियों की शुद्ध जिसे तप द्वारा प्राप्त करते हैं उसे तपोजा सिद्धि तथा वह सिद्धियां जो विभूति सिद्धियां है जो समाधिजा कहलाती हैं प्राप्त होती हैं। सं०-मंत्र द्वारा कैसे सिद्धि होती है जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात् ॥२।। १० ऋ०-(जात्यन्तर, परिणामः ) अन्य जाति में लोटना ( प्रक त्या, ऽऽपूरात्) प्रकृतियों के भरने से।
अथ कैवल्य पादारम्भ. * भा-शरीर और इन्द्रियों में विलक्षण शक्ति का होना प्रक्रति ( उपादान कारणों ) के परिवर्तन से होता है। शरीर की प्रकृति पांच भौतिक है और अस्मिता इन्द्रियों की। अब ज्यों २ योगी के शरीर और इन्द्रियों के पूर्व अत्र- यव भिन्न हो हो कर उसके स्थान में दूसरे अवयव पूरित होते जाते हैं त्यों २ उसका शरीर बिलक्षण बल बाला बनता है उसी प्रकार उस २ जाति के अनुकूल अवयव पूरित होने पर अन्य जाति परिवर्तन होता है और इस प्रकार परिवर्तन होना योगज धर्म कहलाता है यह मंत्र ता आदि से योगी सम्पादन करता है। सं.-क्या यह प्रेरणा शरीर और इन्द्रिय के अवरोध को ही रोक ती है अथवा परिणाम ऐसे ही होने से होता है। निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिभवत् ॥३॥ ५० क्र०-(निमित्तं ) निमित से (अप्रयोजक ) प्रेरणा करने वाला नहीं। (प्रकृतीनां) प्रकृतियों का ( वर्ण भेदः) रुकावट का हटाना (तु) किन्तु (तत: ) उससे (क्षत्रिक वत्) खेती करने वाले के समान निमित्त प्रकृतियों का प्रेरक धर्मा दि नहीं वह तो उस के अवरोध-आवरण को किसान जैसे क्यिारी से किया। तक जल मार्ग को वे रोक वह जाने के लिये काटता या * योग दर्शनम् * १०३ बन्द करता है उसो भांति वह रुकावट दूरकरता है। भाव यह है कि धर्म के समान अधर्मभी प्रकृतियों की प्रवृत्ति में कारण है जब यह धर्मधर्म की रोकको हटाता है तब शुद्ध परिणाम होने से अच्छा और अधर्म द्वारा जब धर्म प्रवृति को दवाता है तो परिणाम अशुद्ध (बुरा) होता है। सं०-इन निर्माण चित्तों का कारण क्या है निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात् ॥४॥ ५० ऋ०-(निर्माण चित्तानि ) वने चित्त ( अस्मिता मात्रात्) अस्मिता मात्र से। भाक-यह बने हुये चित्त अहंभाव से प्रतीत होते हैं इसीलिये भिन्न- भिन्न चित्तों के अभिप्राय भी भिन्न २ ही होते हैं परन्तु सर मिलकर एक ही कार्य करने वाले बन जाते हैं। सं0-सव मिल कर एक ही कार्य करने के सम्बन्ध में करते हैं। प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमकमनेकेषाम् ॥५॥ ५० ऋ०-(प्रवृत्ति भेदे ) भुकाव यारुमान के भेद से (प्रयोजक ) प्रेरक नहीं (चित्तं ) चित्त ( एक ) एक ( अनेके पाम् बहुतों का। भा०-शरीर मन, हाथ पांव नेत्रादि इन्द्रियां जिस प्रकार चित्त द्वारा प्रेरित होती है और उसी के आधीन काम करती हैं अथवा चित्त उनका अधिष्ठाता है और भार * अथ कैवल्य पादारम्भः * यही चित्त पूर्व चित्त है जो उसे स्वभाव से प्राप्त था शेष तो रचना में आये हुये थे न कि स्वभाव सिद्ध थे। सं०-अब मोक्ष हेतुक चित्त को कहते हैं। तत्र ध्यानजमनाशयम् ॥६॥ प० क्र०-(तत्र) उनमें (घ्थान, जं) ध्यान से उत्पन्न चित्त (अनाशयं) वासना रहित होता है। -निर्माण चित पांच प्रकार के हैं उसमें ध्यान से उत्पन्न चित्त वह क्लेश कर्म वासना हीन होता है और यही शुद्ध चित्त मुक्ति का अधिकारी है शोप लशादि कर्म वासना युक्त हाने से ठीक नहीं। सं-योगी अयोगी दोनो ही कर्म करते है फिर ज्ञोगी के चित्त पर कर्म वासना का न होना व्यक्यिा कारण है। कमीशुक्लाकृष्णं योगिनतिविधमितरेषाम् ॥७॥ ५० क्र०-( कर्म ) कार्य ( अशुक्ला, कृष्णां ) न शुक्ल (शुक्ला ) अशुक्ल (अशुद्ध ) ( योगिनः ) योगी का (विविध) तीन प्रकार का ( इतरेपा) दूसरों का। भा०-योगी जो कर्म करता है वह न शुक्ल न कृष्णा किसी प्रकार का नहीं होता क्योंकि वह वासना रहित कर्म को ईश्वरार्पण करते हैं दूसरे (अयोगियों) के कर्म तीन प्रकार, अर्थात् कृष्णा जो कुत्सित वासना युक्त होता है शुक्र जो तप स्वाध्याय पुण्य कर्म युक्त एवं शुक्लकृष्ण * योग दर्शनम् * मिश्रित कर्म कहलाता है होते हैं और वह वासना युक्त दूषित होते हैं। सं.-अयोगी वासना युक्त यदि होते हैं जो जन्मान्तर प्राप्त होने पर उनमें सब पिछली वासनायें एक बार ही क्यों नहीं प्रकट होतीं। वह चाहे पिछली किसी योनि के बासना संस्कार क्यों न हों। ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभि व्यक्तिवासनानाम् ॥८॥ प० ०-(ततः ) उस कर्म से ( तद्विपाकाऽनुगुणानां, एष) उस के फलानुकूल ही (अभिव्यक्तिः) प्रकट (वासनां) वासनाओं की। भा-कांदय जब होता है तो जैसा कर्म प्रारम्भ किया जाता है उमो के अनुसार वासनायें होती हैं जो प्रतिकूल होनी हैं वह अप्रकट रहती हैं। यह मनुष्य जन्म कर्मों का फल है तो उसमें वासनायें भी वैसी ही हैं जो मानुप जन्म की है अतः मनुष्य का मनुष्य से भोग है और उसी अनुसार चेष्टायें होती हैं यद्यपि इससे पूर्व उसके और भी जन्म हुए होंगे परन्तु वासनायें रची हुई हैं परन्तु वह तब तक न प्रकट होंगी जब तक वह गिर कर नीचे योनि में न पहुंचेगा। -मनुष्य योनि से यदि पशु-योनि में जीव जावे तो यह कैरे मं०-मनुष्य ॐ अथ कैवल्य पादारम्भः * सम्भव है कि निकट वासनाओं का तो स्मरण न रहे और दूर की वासना की स्मृति रहे । जातिदेशकालव्यवहितानांमप्यानन्तर्य स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात् ॥९॥ ५० ऋ०-(जाति देश, काल, व्यवहितानां ) जाति देश और काल से मिश्रित वासनायें ( अपि) भी ( अानन्तर्य) अमिश्रित है ( स्मृति सस्कारयोः) स्मृति और संस्कार के ( एक रूपत्वात् ) समान विषय वाले होने से। भा०-वासना प्रकट होने में कर्म अभिश्रण कारण नहीं होता किन्तु उनका कारण अपना अपना प्रकट करने वाला होता है जिसका प्रकट करने वाला मिल जाता है तो चाहे संस्कार दूर के हों या पास के स्मृिति उत्पन्न करते हैं। संस्कार चित्त में रहा हो करते हैं। उसका व्यक्त करने वाला कारण मिला नहीं कि स्मृति उठ आती है इसी प्रकार जन्मान्तर भावनाओं की भी दशा है, अर्थात् जैसे संस्कार वैसी स्मृति होती है। सं०-प्रथम जन्म में तो संस्कार वासनायें नहीं होती तब फिर समस्त जीव किस प्रकार जाति योग्य भोग्य में चेष्टाओं में पाये जाते हैं। तासामनादित्वं चाशिषा नित्यत्वात् ॥१०॥ ---( तासां) वासनाओं को (अनादित्यं च) अनादिता * योग दर्शम् * भी (आशिषः) इच्छा के (नित्यत्वात) नित्य होने से। भा-प्रत्येक जीव में सदैव बने रहने की स्वाभाविक इच्छा पाई जाती है इस लिए पूर्व जन्म अनुभव पाया जाता जिसकी वासनायें इस जन्म में मृत्यु से बचने की है पूर्व जन्म में भी इसी प्रकार होगी अतः उसके ही अनुसार उसकी वासना बनेगी अत: उत्तरोत्तर जन्म सिद्ध होता है । वासना और जन्म अनादि है कोई भी जन्म सब से पूर्व होता नहीं माना जा सकता है। मं-वासना अनादि हैं फिर उनका प्रभाव कैसा? और वासना रहते मोक्ष कैसी? हेतुफलाश्रयालम्बनैः संगृहीतत्वा देषामभावे तदभावः ॥११॥ प० ऋ०-( हेतु, फला, श्रया, लम्बनैः ) हेतु फल आश्रय और आलम्बन से ( संगृहीतत्वात् )संचय होने से (एषा) हेतु फल आश्रय और आलम्बन के ( अभावे ) प्रभात में (तद् भावः) वासनाओं का अभाव होता है। भाल-वासनायें अनन्त हैं परन्तु यह समस्त कारण, प्रति फल और आधार तथा आश्रय में संचित होती हैं अविद्यादि क्लेश शुक्ल कर्म वासनाओं के कारण हैं जाति, आयु और भोग उसका प्रति फल है जिस के आधार यह दोनो हों वह चित्त हैं। शब्दादि विषय आलम्बन हैं * अथ कैवल्य पादारम्भ: जब तत्व ज्ञान से इनके कारणों का अभाव हो जाता है तब बासना नष्ट हो जाती हैं। सं0-जब असत् की उत्पत्ति नहीं और सत का नाश नहीं तो बासनायें जो सद्रूप है यह कैसे निवृत्त होगी। अतीतानागतं स्वरूपतोऽम्त्यध्व- भेदाद्धमाणाम् ॥१२॥ प. क्र०-(अतीता, ऽना,गतं) भूत और भविष्य ( स्वरूपतः ) स्वरूप से (है). (अध्व, भेदात् ) काल भेद से (धर्माणं) कार्यों के। भा०-ऐसा नहीं होता कि बासनाओं का नाश हो तो वह समूल ही नष्ट हो जाती हों, केवल वर्तमान स्थति से भूत में चली जाती है क्योंकि कार्य अपने कारण में रहा करते हैं उनका भेद काल भेद से माना जाता है यह कार्य भविष्यत अवस्था में हाते हैं तब तक कार्य प्रकट नहीं करते और भूतावस्था में अपना कार्य रोक देते हैं इसी प्रकार बासना स्वरूप से नष्ट नहीं होती किन्तु वह भूतावस्था में चली जाती हैं। सं0--यह धर्म यथार्थ में क्या ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः ॥१३॥ ५० --(ते) वे ( व्यक्त, सूक्ष्माः ) प्रत्यक्ष सून्म (गुणात्मानः) गुणरूप हैं।
के योग दर्शनम् 8 १०६ भा०-वर्तमान धर्म की व्यक्तावस्था है और भूत और भविष्यत् सूक्ष्म हैं यह धर्म महतत्व से भूत भौतिक पर्यन्त सब के सब गुणों के क्रम मात्र हैं यथार्थ में सब गुण स्वरूप ही हैं यह गुण इन्द्रिय प्राह्य नहीं होता जो दिखाई देता है वह गुणों का तारतम्य मात्र ही दीखता है। सं०-यह तीनों गुण मूल कारण हैं तो इन से उद्भूत बस्तु एक कैसे कहला सकती है ! परिणामैकत्वाद्वस्तुतत्वम् ॥१४॥ प० ०-(परिणामै, कत्वात् ) परिणाम के एक होने से ( रस्तु तत्वम् ) वस्तु-एकता होती है। भा०-गुण यद्यपि तीन हैं परन्तु सब मिलकर परिणाम एक ही उत्पन्न करते हैं । यह गुण बहुत होते हुये भी उनके परिणाम एक होने में कोई विरोध नहीं पाता। सं-जगत गुणों का कार्य है कि विज्ञान तत्व भासित होता है। वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोविभक्तः पन्था ॥१५॥ प० का-( वस्तु, साम्ये ) यस्तु के एक हाने से ( चित्त,भेदात ) ज्ञान भेद न ( तयोः ) चित्त और वस्तु का (विभक्तः ) भिम २ ( पन्थाः) मार्ग है । भा:-अब संसार में एक ही पदार्थ को देखकर कोई प्रसन्न और अप्रप्सा होता है इसी प्रकार कोई क्या मोहित होना: कोई उसे उदासीनता अर्थात् उपेक्षा से देखता है अथ कैवल्य पादारम्भः * वस्तु सबको एक सी ही भासित होती है। परन्तु अनेक चित्तों का विषय वह एक वस्तु हो है यह शान कि "वही यह वस्तु है" इस प्रकार की प्रतीति भी सबका एक सी है अतः यह स्वीकार करना पड़ेगा कि चित्त से भिन्न को भिन्न वस्तु अवश्य है जो अपने स्वरूप में स्थित है। मं०-वस्तु ज्ञान से भिन्न हो तौभी उसकी सत्ता तो चित्ताधीन है। न चैकचित्ततन्त्रं वस्त तदप्रमाणकं तदा किं स्यात् ॥१६॥ प० क्र०-(न, च) नहीं (एक चित्त तंत्रं ) एक चित्ताधीन ( वस्तु) पदार्थ हैं (तत् ) वह बिना प्रमाण के (तदा) उस काल में (किं) क्या (स्यात् ) होगी। भा०-वस्तु ज्ञान के सम काल में होती है न कि अन्य काल में इस लिये ग्राह्य वस्तु एक ज्ञान के आधीन नहीं होती क्योंकि उस काल में वह प्रमाण हीन किस प्रकार की होगो क्योंकि वाद्य पदार्थ तो चित्त से भिन्न अपनी स्वतंत्र सत्ता वाले हैं। सं०-पदार्थ यदि चित्त से भिन्न हैं तो कभी उनका ज्ञान होना और कभी न होना इस में क्या कारण है। नदुपरागापेक्षत्वाच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम् ॥१७ --( तदुपरागा, ऽपेक्षत्वात्.) ऽपराग की इच्छा वाला होने
ही।
* योग दर्शनम् 8
१११
अं
चित्तस्य ) चित्त को ( वस्तु ) पदार्थ ( ज्ञाताझा)
प्रतीत तथा अप्रतीति होती है।
'वस्तु है यह और और उसका ज्ञान होना दुसरी बात है
ज्ञान क्रिया के समय चित्त के साथ उस पदार्थ का
सम्बन्ध होना आवश्यक है जो पहिले वाह्य वस्तुओं का
इन्द्रियों से और उस के द्वारा चित्त तक वस्तु-विम्ब
पहुँचने तक जो पदार्थ का चित्त से सम्बन्ध स्थापित
होना है यही वस्तु ज्ञान का कारण है यदि यह
सम्बन्धन हो तो वस्तु ज्ञान नहीं होता।
संक-क्या .वस्तुओं की भांति चित्त को भी ज्ञात और अज्ञात
वृतियाँ हैं।
सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्त यस्तत्प्रभोः
पुरुषस्यापरिणामित्वात् १०
५० क्र०-( सदा ज्ञाताः ) सदैव ज्ञात होती है (चित्त वृत्तयः)
पित्त की वृत्तियां ( तत्प्रभोः) चित्त-प्रभु (पुरुषस्य)
पुरुप को (अ, परिणामित्वात् ) परिणाम शील न
होने से।
भा०-वाम वस्तु का चित्त से सम्बन्ध इन्यिों द्वारा होता है इसी
सम्बन्ध से वस्तु ज्ञात होती हैं परन्तु चित्त-वृत्तियों का
ज्ञाता आत्मा है और इसमें उसे किसी सहायता की
आवश्यकता नहीं क्योंकि चित्त और आत्मा का सीधा
सम्वन्ध है इसलिये वह पुरुष से अज्ञात नहीं चाहे-
११२
अथ कैवल्य पादारम्भ
कभी वह वस्तु
भी अवस्था क्यों न हो। चित्त तो परिणाम
स्थिति जानता है और कभी नह.
पुरुष अपरिणामी है इसलिये यह सदा चिरावृति
जानता है । यह चित्त बाहर की वस्तु योग से उसके
आकार में आती हैं और चिति परिणामहीन होकर
उस परिणित चित्त को देखता है यही चित्त ओर
चिति का अन्तर है
सं0-जन चित्त ही दीपक की भांति प्रकाश और प्रकाशय अपने
आप है तो आत्मा के भिन्न मानने की क्या
आवश्यकता है।
न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात् १९
५० ऋ०-(न) नहीं ( तन् ) चित्त (स्वाभासम् ) स्वप्रकाश
(दृश्यत्वात् ) दृश्य होने से ।
भाल-बाह्य इन्द्रिय और शब्द आदि विषय दृश्य तो हैं परन्तु
स्वप्रकाश नहीं इसी भांति चित्त एक दृश्य है वह भी
स्वप्रकारा वाला नहीं। क्योंकि चित्त के सब परिणाम
दोखते हैं परन्तु यह परिणाम उससे भिन्न है। जा
इनका दृष्टा है वही दूसरा पुरुप या श्रात्मा अथवा
चिति है।
सं.-क्या दृष्टा को एक समय में दो ज्ञान होते हैं।
एकसमये चाभयानबधारणम् ॥२०
--(एक, समये, च ) एक ही समय में ( उभयानक
धारणं ) चित्त और विषय का ज्ञान न होने से ।
* योग दर्शनम् ॐ ११३ पार विषय दो भिन्न वस्तुयें हैं इनका दृष्टा को तक ही ममय में दो ज्ञान प्रताति हाना सम्भव नहीं क्योकि परिणाम में आवेचित्त के लिये भिन्न प्रकार के कार्यो के लिये भिन्न कारणों का होना आवश्यक होता है परन्तु यहां कारग भी एक उत्पत्ति म्प क्रिया है इमम उसके दो विभिन्न प्रकार के कार्य नहीं हो मकते मं.-चित्त विषय को देखना है और वह चित्त आगे के चित्त से देखा जाता है इमसे तो विषय और चित्त दोनों का ज्ञान होना सम्भव है। चितान्तरदृश्ये बुद्धिबृद्धरतिप्रसंगः स्मृतिसंकरचा ॥ २१॥ प. क्र.-(चित्तान्तर, दृश्ये ) अन्य चित्त ग्राह्य होने मे (बुद्धि बुद्धः) बुद्धि की बढ़ोतरी की ( अतिप्रसङ्गः) पुनग- वृत्ति ( स्मृति, संकरः च ) और स्मृति के मिश्रण से। भाल-पहिला चित्त दृसरे चित्त का दृश्य नहीं हो सकता क्योंकि ज्ञान से ज्ञान की अनवस्था हो जायगी और स्मृतियों में बड़ा संमिश्रण हो जावेगा। अर्थात पूर्व किसी वस्तु का ज्ञान फिर उस वस्तु के ज्ञान का ज्ञान, उसके ज्ञान का ज्ञान यह एक ज्ञान कभी अवसान पर न आवेगा क्योंकि जन्य ज्ञान तो दृश्य ही रहेगा और उसके दृष्टा की आवश्यकता बनी ही रहेगी इस लिये चि अथ कैवल्य पादारम्भ से परेचिति शक्ति है जो चित्त की दृष्ट सं.--चित्त यदिनस्वं प्रकाश है न अन्य चित्त का दृश्य है उससे अनुभव कैसे बनेगा। चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्ती स्वबुद्विसंवेदनम् ॥२२॥ १० क्र.-(चितेः ) चितिका (अ प्रति संक्रमायाः) क्रिया रहित में ( तदाकार ऽऽपतौ) चित्ताकार होने मे (म्ब, बुद्ध , संवे दनम् ) अपनो बुद्धि का अनुभव । भा-चित्त में जैसे विषय ज्ञान काल में परिणाम देखा जाता है उस प्रकार का परिणाम चित्त के अनुभव करने में पुरुष में नहीं हाता । पुरुप स्वस्वरूप स्थिति चित्त का देखता है क्योंकि वह दृष्टा और चित्त दृश्य है और शान्त होने में शान्त और क्रोध में क्रोधी हुआ प्रतीत होता है यथार्थ में यह परिणाम चित्त में हैं न कि पुरुष में। सं०-क्या चित्त से भिन्न कोई वाद्य वस्तु है और उसमे भिन्न कोई आत्मा है। द्रष्टदृश्योपरक्त चित्तं सर्वार्थम् ॥ २३॥ १. क्र.-(इष्ट, द्रश्योपरक्तम् ) दृष्टा और "दृश्य से रंजित" (चित्तम् ) चित्त को (सर्वाऽर्थम् ) सम्पूर्ण विषय वाला होता है।
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