Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Kavita Kaumudi (part-3)
Front matter
No text on this page.
No text on this page.
-
मुद्रक-श्री सत्ययत, अभ्युदय प्रेस, प्रयाग।
प्रकाशक-१० रामनरेश त्रिपाठी हिन्दी-मंदिर प्रयाग।
भूमिका संस्मत बहुत प्राचीन भाषा है। भारतवर्ष का प्राचीन इतिहास इसी भापा में है। प्राचीन ऋषियों और परिडतों ने इस भाषा में ऐसे,ऐसे ग्रंथ लिखे, जिनसे भूमण्डल पर भारत- चर्प का गौरव चिरस्थायी हो गया है। इस भाषा में शब्दों की संख्या बहुत ही अधिक है। प्रकृति, प्रत्यय और विभक्ति के संयोग से शब्दों की ऐसी रचना की जा सकती है जिनसे मनुष्य के हृदय के गृह से गूढ़ भाव प्रकट हो सकते हैं। ऐसी शकि संसार की अन्य भाषाओं में बहुत ही कम है। संस्कृत भाषा के व्याकरण के समान पूर्ण व्याकरण तो संसार को किसी भाषा में नहीं। विद्वानों का कथन है कि संस्कत ही समस्त पाय-भाषाओं की जननी है। मारतवर्ष के लोग इस भाषा को देववाणी कहते हैं । फाई समय ऐसा था कि संस्कृत इस देश की साधारण योलचाल की भाषा थी। पर अब यह मृतभाषा कही जाती है। : संस्कृत भाषा के ग्रंथ साधारणतः दो भागों में विमक किये जा सकते हैं-एक धर्मग्रंथ, दूसरे साहित्य । धर्मग्रंथ घटारह भागों में विभक है, जिन्हें अठारह विद्या कहते हैं। उनके नाम यह हैं-चार येद, चार उपवेद, छः घेदाङ्ग वार उपाङ्ग। चारों घेदों के नाम हैं-श्रा, यजु, साम और अथये । फमशः चारों उपवेदों के नाम है-मायुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद, और अर्थशास्त्र । छ. घेदाङ्गों के नाम शिक्षा, ज्याकरण, नियक, कल्प, ज्योतिष मोर उन्दा तथा चार ।
उपाङ्गों के माम पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशान हैं इनमें से एक एक विषय मे मम्यन्य रमने पाले भनेक ग्रंथ है। धर्मग्रंथों में भी माहित्य विषयक यहून मी वाते हैं भार साहित्यप्रयों में धर्म विन्यायातों की चर्चा है। फिर भी धर्म और साहित्य दो मिन भिन्न विषय माने गये हैं। साहित्य-प्रन्यों में मुख्य काव्यग्रंथ हैं जो दो भागों में घटि गये हैं, एक को श्रव्य और दूसरे को दृश्य कहते हैं। श्रव्य काव्य तीन प्रकार के होते हैं-एक पद्यमय, जैसे रघुवंश भादिः दूसरे गद्यमय, जैसे कादम्यरी आदि; और तीसरे गद्य-पद्य मय, जिन्हें चम्पू कहते हैं, जैसे नल-चम्पू आदि । दृश्य काभ्य नाटक कहलाते हैं। कविता-कौमुदी का विषय केवल साहित्यिक है । साहित्य में भी श्रव्य काव्यों की ही चर्चा इस में की गई है, और उन्हीं में से उदाहरण उद्धृत किये गये हैं। सम्पादक महाशय ने इस पुस्तक के लिखने में बहुत परिश्रम किया है । कवियों के उत्तम उत्तम श्लोक चुनचुन कर उन्होंने संग्रह किये हैं, जिनसे सहदय पाठकों को अपूर्व आनन्द प्राप्त होगा। कवियों के समय निरूपण में यड़ा मत- भेद है। प्रस्तुत पुस्तक के सम्पादक महाशय ने अपनी स्वतंत्र सम्मति प्रकट की है । खेद है, कि प्रूफ की कुछ अशुद्धियाँ ज्यों की त्यों रह गई हैं। जिनके लिये हम अपने पाठकों से समा प्रार्थी हैं । अगले संस्करण में सब अशुद्धियाँ ठीक कर दी जायेगी। 5. कविता कौमुदी के प्रेमी पाठक इस पुस्तक के लिये पुत दिनों से लालायित हैं। हमारे पास सैकड़ों पत्र मा ।
हैं जिनमें देरी करने के लिये हमें उलहना दिया गया है।
उनसे हमारा सविनय निवेदन है कि अनेक कार्यों में व्यग्र
रहने के कारण हम साहित्य सेवा में कुछ पिछड़ गये हैं
अवश्य, पर इमारा उत्साह कम नहीं हुआ है। इसके बाद
उर्दू या मरेज़ी की कविता-कौमुदी में से जो पहले तैयार
होगी, पाठकों को सेवा में उपस्थित करने की हम तैयारी कर
.
हिन्दी-मन्दिर, प्रयाग।
रामनवमी, १९८१
प्रकाशक
No text on this page.
हिन्दी-मन्दिर प्रयाग द्वारा प्रकाशित पुस्तके " D " " म कविता-कीमुदी, पहला माग-हिन्दी दूसरा भाग-हिन्दी तीसरा भाग-संस्कृत चौथा भाग-उर्दू ( तैयार हो रहा है) ) स्त्रीकधि-कौमुदी-स्त्रीकवियों की जीवनी और कविताओं का संग्रह (तैयार हो रहा है) पथिक (खंडकाव्य) राजसंस्करण, सचित्र, सजिल्द मिलन (खंडकाव्य) कुल लक्ष्मी-विवाह से पहले पढ़ने को पुस्तक, सजिल्द दम्पति सुहद-विवाह के बाद पढ़ने की पुस्तक . सुभद्रा-उपन्यास हिन्दी का संक्षिप्त इतिहास हिन्दी-पद्य-रचना (पिंगल) रहीम--सुप्रसिद्ध रहीम कवि की जीवनी और कविता भौति-शिक्षायली-नीति के श्लोक अर्थसहित आकाश की यात- वात-कथा कहानी, पहला भाग RRRRmaaaaagar " इसरा'मान - - सम्मेलन-परीक्षा तथा हिन्दी के सब सुप्रसिद्ध प्रकाराकों रानी जयमती-उपन्यास, सजिल्द रीडरें-बालकों के लिये पहली पुस्तक दूसरी पुस्तक- तीसरी पुस्तक- चौथी DU पुस्तक- कन्याओं के लिये- कन्या शिक्षापली प० मा० दू० भा० D ती० भा० चौ. भा० " की पुस्तके मिलने का एकमात्र पता- हिन्दी-मन्दिर, प्रयाग।
सूची। पृष्ठ १ पृष्ठ १३५ १४० १४७ कवि कवि १ भझाल जलद २२-धनमय २-अप्पय दीक्षित २३- पद्मगुम ३--अमरक १२४-पण्डित पाजक ४-धमितगति १७/ २५-पाणिनि ५-अश्वघोप २४२६-प्रकाशवर्ष ६-आनन्दवर्धन ३१ | २७-याणभट्ट ७-फरहण ३६ २८-विल्हण ८-कालिदास ४२ २६-मट्ट नारायण ह-कुमारदास ६५३-भह भल्लर १०-कृष्णमिय यति ६७३१-मयभूति ११-क्षेमेन्द्र ७१/३२-भर्तृहरि १२- गोवर्धनाचार्य ८६/३३ भारथि १३---चन्द्रक १२ ३४-भास २५/३५-भिक्षाटन १५-जगनाथ पण्डित ११३६-भोर देव १७२ १८२ ११२ १६ - जयदेव (१) २७-जयदेय (२) २८-जल्दण ११-मत्रिविक्रम ११२/ ३८-मयूरभट्ट २३५ .१२०/४०-मुरारि २४६ १२५/४१-मोरिफा २४६ १२६/४२ - राजानक रमाकर २५० १३३ | ४३-राजशेयर २. दामोदर गुप्त २१-दिवाकर २७२ / नियुक्ति ग्रीन २१६गारद परि ४४-सोलागु २६७/मान ४५-यानि ४६-याल्मीकि ४७-यामुष २८१ ४८-पिफट नितम्या २४ वर्ग ४९-पित्रका ५०-विधारल्य ३०१/ नन्न ५१-यासदेय ३१. शिशिर ५२-शिवस्यामी ३३८चन्द्रमा ५३-शीला महारिका ३४३ चाटु ५५-धीहर्ष' ५५.-सुयन्धु ३.३ / प्रमात पर्णन ५६--सोमदेय भट्ट ३.६ मित्र ५७-हर्षदेव जाति पक्रोक्तिः ३६५/ धापत्ति कवि काय प्रशंसा ३६८/ सेया-पद्धति मिश्र ३७४/ पहेली ३८१ / नवोटा विरदी का प्रलाप ३८४ प्रोषित-महंका सूती याक्य ३८६ खंडिता मसी के प्रति प्रश्न ३१५/ विप्रलम्धा नी ३९३ उत्कंठिता ३६५ घाससत्ता प्रिय आगमन कौमुदो कुञ्ज ३५८ हाम्य ४ दूती पण ४२ ४३६ ४३४ ४३५ ... .
पूर
विषय
अमिसारिका
सामान्य घनिता
नैयायिक प्रशंसा
नयायिक निन्दा
पृष्ठ विषय
४४७ कुवेद्यापहास
४५२ चैयाकरण
४५२/ वीर प्रशंमा
४५३ / जिला
४५५ मूर्स-निन्दा
४५०/ दरिद्र-निन्दा
४५८ राजनीति
गणक प्रशंसा
बुगणक निन्दा
पेद्य-प्रशंसा
५७४
--- पृष्ठ ४०१ ४०४ २६६१ शरद ४३६ ४११ .४२१ १३ ४१५ कवि पृष्ठ विपय ४४-लोलाशुक २६७ मान ४५-चररुचि २७२ | उति-प्रत्युति ४६-याल्मीकि २७७ वसन्त ४७-यासुदेव २८१ ग्रीम ४८-विकट नितम्या २६४ वर्षा १६-विजका ५०-विद्यारण्य ३०१ हेमन्त ५१ व्यासदेव ३११ ] शिशिर ५२-शिवस्वामी ३३८ चन्द्रमा ५३-शीला भट्टारिका ३४३ | चाटु ५५-धीहर्ष ३४५ प्रिय आगमन ५५.-सुपन्धु ३.३ | प्रभात वर्णन ५६-सोमदेव भट्ट ३५६ मिथ ५७ हदेव ३५८ हास्य जाति पक्रोक्ति कवि काव्य प्रशंसा मित्र ३७४ पहेली ३८१ / नवोदा विरही का प्रलाप ३८४ | प्रोपित-मईका दूती याय ३८६ वंदिता ससी के प्रति प्रश्न ३१ विपलब्धा सी ३३ उत्कंठिता श्री.प्रशंसा ३९५ धासकसन्ना धी- ३९५ | स्वाधीन पतिका १ ४ कौमुदो-कुञ्ज . ४ ३६५ भापत्ति ३६८ / सेवा-पद्धति ४ ४ दूती प्रेषण .
कविता-कौमुदी
अकाल जलद
अकालजलद का असली नाम क्या था, इसका पता
अभी तक नहीं चल सका है । सुभाषित ग्रन्थों में इनके नाम
से जो श्लोक उद्धृत किये गये हैं, उनके साथ कर्ता का नाम
"दाक्षिणात्य" लिखा है। इन्होंने कोई अन्ध बनाया था कि
नहीं, अभी तक इसका भी पता नहीं लगा है।
ये महाकवि राजशेयर के पितामह थे । राजशेखर ने
पालरामायण की प्रस्तावना में अपना परिचय इस प्रकार
लिखा है-
"समा यसामीद गुणगण इवाकालजलदः
मुरानन्दः सोऽपि ध्रवणपुर पेयन यचया।
मचान्ये गपयन्ते नर विराजमा मृनशे
महाभागस्तस्मिनयमवनि यायावरकुले ।
इस लोक में अकालजला गुणी बतलाये गये हैं। ये
दक्षिण देश के निवासी थे और यायायर युल में उत्पता हुए
थे। ये नयां सदी में उत्पन्न हुए थे।
इनका भालजलद गाम नहीं था, किन्तु एका नाक
इन्होंने यनारा और उस लोक में भगालजलद शदपा बड़े
No text on this page.
कविता कौमुदी
अकाल जलद
"
अकालजलद का असली नाम क्या था, इसका पता
अभी तक नहीं चल सका है। मुभापित ग्रन्थों में इनके नाम
से जो श्लोक उद्धृत किये गये है, उनके साथ कर्ता का नाम
"दाक्षिणात्य" लिखा है। इन्होंने कोई अन्ध बनाया था कि
नहीं, अभी तक इसका भी पता नहीं लगा है।
ये महाकवि राजशेखर के पितामह थे । राजशेखर ने
पालरामायण की प्रस्तावना में अपना परिचय इस प्रकार
लिखा है-
स मूत्या यवासीह गुणगण इवाकालजलदः
मुरानन्दः सोऽपि श्रवणपुर पेयेन वचया।
मचान्ये गण्यन्त सरल कविराजप्रनयो
महाभागस्तम्मिन्न यमजन यायावरकुलं ।
इस श्लोक में अकालजला गुणी बनलाये गये है। ये
दक्षिण देश के निवासी थे और यायायर कुल में उत्पन हुए
थे।ये नयी सदी में उत्पन्न हुए
थे
इनका अकालजलद नाम नहीं था, किन्तु एक शोक
इन्होंने बनाया और उस श्लोक में अकालजलद शब्द फा ई
।
२
अकाल जलद।
अच्छे ढंग से विन्यास किया। यह दंग लोगों को यहुत
पसन्द आया; तब से इनका नाम ही थकालजलद पड
गया। इनका यह नाम इतना प्रसिद्ध हुआ कि उसने इन
असली नाम का लोप फर दिया। यह श्लोक नीचे लिए
जाता है।
भेकैः कोटरशायिभितमिरमान्तर्गत कच्छपः
पाठीनैः पृथुपकपीटलुठिनैर्य म्मिन् मुहुम तिम्,
तस्मिन् शुकपरम्यकालजदे नागत्य तदितम्,
यनारुण्ठनिमग्नयन्यकरिणा दूधैः परः पीयने ।
यहाँ अकाल जलद के कुछ मनोहर श्लोक उद्धृत किये
जाते हैं-
मुग्धे मुम विषादमन यलनिकम्पो गुगरत्यज्यता
मनाय फिस पुण्डरोकनयने मान्पानिनामानय ।
लक्ष्मी धोधनः म्यवाविधौ धन्यन्नरंवार हला-
दल्या निषेधमान्मनि विधि परिः पातु यः ॥1॥
मुग्ध ! विपाद छोडो. यल नोडनगाले इस कप का
म्याग करा, पुण्डरीफनयने ! उत्तम गाय पारी: इन माननीयों
का आदर करा. म्ययम्बर ममय धन्वन्तरि ने इस प्रकार
पारद में मामी को समााया जा दुसरी पं.लिए प्रतिषेध
दुभा उमका अपने दिन विधि गुन पविष्णु तुम्हारी सा
मायानाय सामुधियां पं धरायामिद
कोम्याग मानले फर्श दुकरण।
पापकानि मानिनिसाविसमाशिनः
मामीपनि मागितारण्य या दृष्टयः ॥ ५॥
३ -- पपिना-पीगुरी। उपानी मेघमगृहम पापत, पिधी फेयुरिमान् नुदारा ध्यान करेंगे। पग पग पेसा पर सपना ! यह पटिन कान तुम्ही मला दुगसन मा पर सयाता सपी लाम पाया गना पर मी नुमाया पर- मार्ग पोर रिनी को सामान नागाणे पार फे. पन में नुमन पाती यग्माया भै: कोटामाजिभिमनमिन E कप: ९ पुरकरग्मिनुमाउनम । मम्गिासरसन पेनासपनिमलse: ९८ पाप फोटर में रहने याद मंदपा मग्न फ समान हो गयापारटुप पृथ्वी के भीतर घुम गये, गलियां पीच में लोट लोट पर जिस तालाश में मृच्छित हो गयी थी, उस सूर्ण सालाप थायर थकालजलद पर काम किया, जिसमेहधणे का यूथ गला दुया दुपा का पानी पी रहा है। এ তন্ত্র দিয়ে সোনু কিন্তু মম। भाठाग्यो शिरमा प्रणम्य पुरमामिन्यदुध पा पुनः।। मा पपस्तदीपमा योनिम्नदीयालय ग्याग्नि पान मदीय वन्मंनि धरानमालभनितम् ॥४॥ शरीर नष्ट हो जाय, पशभूत पञ्चभूनों में मिल जाय, पर विधाता! प्रणाम करयो में बारसे यह मांगता है कि भाप मुझे उसफे तालाय का जल, उमफ दर्पण का प्रकाश, उसफे घर के बांकाश फा थाफाश, उसके मार्ग की भूमि और उसके व मी दया यना।
अगा। अप्पय दीक्षित भपय दीक्षित दमिन नियामी और शव यान्होंने अनेक अन्य यगाये हैं। यंदान, अलार आदि विषयों के इनके ग्रन्थों में मे फनिस्य प्राय पायं गये हैं। इन भाई का नाम नीलकण्ठ दीक्षित था। इन्ही नीलकण्ठ दीभित के पीन नारा यण दीक्षित ने नीलकण्ठचम्पू नाम प्राय यनाया है। उन्हीं चम्पू फे यनाये जाने का ममय १६३७ यतलाया है। मा अनुमानतः अपयदीक्षित फा ममय सोलहवीं सदी का अन्तिम भाग निश्चित किया जाना चाहिए। अप्पय दीक्षित के ग्रन्थ १ आत्मार्पण स्तुति १३ रवानयपरीक्षा २उपक्रम पराक्रम १४ रसिकरजनी ३पुवलयानन्द १५रामायणसारस्वत ४ चतुर्मतसार संग्रह १६ वरदराजशतक ५चन्द्रकुलास्तुतिः १७ बादनक्षत्रमालिका ६चित्रमीमांसा १८ विधिरसायन मुसोपजीर ७ दशकुमारचरितसंक्षेप, ८नामसंग्रहमाला २० वृत्ति वार्तिक प्रझतक स्तव, २१ वैराग्यशतक १० भक्तिशतक २२.शब्दप्रकाश ११ भारततात्पर्य संग्रह २३ शारीरिकन्यायरक्षाम १२ मध्यमतविध्वंस २४ शिवकर्णामृत १६ चीरशैव 4 --- । कविता कौमुदी। २५ शिवतत्त्वविवेक २८ शिवार्चनचन्द्रिका २६ शिवादित्यमणिदीपिका २६ सिद्धान्तलेशसंग्रह २७ शिवालनिर्णय ३० हरिवंशसारचरितम् यहां इनके फुछ मनोहर लोफ उद्धृत किये जाते हैं:- के चौराः के पिशुनाः के रिश्वः केऽपि दायादाः जगदखिल तस्य यशे यस्य यश स्यादिदं चेतः TH चोर कौन है, चुगलखोर कौन है, शत्रु कौन है, और भाई बन्धु कौन है ? यह समस्त संसार उसके वश में है, जिसने अपने चित्त को अपने वश में कर दिया है। हो पुप्पति पुरुपे सलिमुष्णति पुष्पं फलं च तव इव वर्तन्ते सन्तः सममुपकर्तरि चापकर्तरि च ॥२॥ जिस प्रकार वृक्ष जल से सीचने वाले अथवा फल फूल तोड़ने वाले दोनों के साथ समान व्यवहार करता है। उसी प्रकार अपकार करने वाले या उपकार करने वाले दोनों के साथ सजनों का समान व्यवहार होता है। पितृभिः कलहायन्ते पुत्रानध्यापयन्ति पितृभक्तिम् परदारानुपयन्तः परन्ति शाखाणि दारं ॥३॥ पिता के साथ तो पलह किया जाता है, और पुत्रों को ने पितृभक्ति पाई जाती है। स्वयं परखी का उपभोग करते है, भीर स्त्री को शारखोपदेश सुनाते हैं। नीतिज्ञा नियतिज्ञा घेदशा अपि भवन्ति शाखाः मह्मज्ञा अपि लभ्या स्वाज्ञानज्ञानिनो विरा नौति जानने वाले हैं: भाग्य जानने वाले, वेद जानने वाले मी और शारत्र जानने वाले भी हैं ब्रह्म को भी जानने वाले मिल सकते हैं. पर अपने मान को जानने वाले बहुत कम है।
गप्पय दीक्षित। अरनीत पिवत बादत जाग्रत संविशत तिमत वा सकदपि चिन्तयतान्हः मावधिको देहवन्ध इति ॥ ५॥ माओ, पीआ, जागा, येठी, ठहरो: पर दिन में एक बार: यह बात सोच लो कि इस शरीर का नाश निश्चय है। भोगाय पामराणां योगाय विकिनां शरीरमिदम् भोगाय च योगाय च न कल्पते दुर्विदग्धानाम् ॥ ६ ॥ मृगों के लिए यह शरीर भोग साधन है और विलियों के लिए योग का साधन है। पर दुदिग्धों के लिए न तो यह भांग का साधन है और न योग का। भगुन नियुतं यापि प्रदिशन्न मारताय भोगाय । होगस्ति न फिन्दल: कैपय पदाः ॥७॥ गार के भोग के लिए ना मृदजन हजारी लामा पर दिया करते हैं। पर पांच छः बिल्वपत्र से मुक्ति नहीं गरीदी जाती। पहाः कथगडा कमिन्यनुयुन गृथा देशान् । रोदर कनानपुर मिनि कोऽपि न निशामने लोकः ॥८॥ पदंश फैमा ? प्रदेश ? मा? इस प्रकार यां दशी पं. मंध में प्रश्न यि.या जाता है। पर यमरात को पु अंगीशिय में कोई भी मनुष्य युछ प्रश्न नहीं परत ग्यत:यां मारम्प यदिशायते जागी प्या ममकारः किन्तुमसत्र कनंध्यः ॥९॥ ममभाव (मंगोमा भाग का याग गर दंग गाए । टि गया त्याग पग्ना दिन हो तो ममबार करना चाहिए और यह गर्यत्र फरना घादिए । समान संगारा अपना समझना चाहिए। - ।
फयिता-कौमुदी। पुत्रा इति द्वारा इति पोप्यान् मूजनान्य ते मन्धे नममि निमारमा पोप्य इति नार्वति ॥ १०॥ मूर्ख मनुष्य पुत्रों और स्त्रियों की रक्षा करना अपना पन्य समझते हैं, पर महान मंडूयनी अपनी भारमा सो रक्षा करना अपना कर्तव्य नहीं समझते। अमरुक अमरशतफ नाम से एक पुस्तक इनकी प्रसिद्ध है। उसमें इनके बनाये स्फुट लोकों का संग्रह है। ये सब लोक झार के हैं । इनकी कविता बड़ी ही उत्तम होती थी। ये जाति फे सोनार। इनके विषय में लिखा है “विश्वप्रख्यात. माडीन्धमवलतिलको विश्वकामातीयः" । इनके विषय में पफ किम्वदन्ती प्रचलित है । कहते हैं, शङ्कराचार्य से शास्त्रार्थ करने के लिए जय मण्डन मिश्रको खो तैयार हुई और उन्होंने कामशास्त्र के प्रश्न किये तब शङ्कराचार्य ने कुछ समय मोगा। सन्यासी थे। उन्हें कामशास्त्र की बाते मालूम न थी, थतएव उन्होंने नेपाल के राजा (जिनका उसी समय देहान्त हुआ था ) के शरीर में प्रवेश किया और कामशास्र का शान माम किया। इस किंवदन्ती में चि.तनी प्रामाणिकता है, इसका निश्चय पाटक करेंगे। ये कवि नयमशतक, ये हैं। भानन्दवर्द्धन ने अपने वायर. लोक में इनके श्लोक उद्धत किये हैं। इससे ये नवमशतक में प्रसिद्ध थे यह यात साबित होती है। ऐसी दशा में शङ्कराचार्य के ये समकालीन नहीं हो सकते।
No text on this page.
कविता-फीमुदी। घोड़े ही दिनों में मेरा पाना होगा यह जानकर नुम शोक मत करना । प्रिय को यह बात सुनकर मुन्धा ने यह किया जिससे दूसरों के सभी मा अकस्मात् समास गये। अर्थात् यह मर गया और दूसरे पथिकों का जागा बन्द गया। होलापा गुस्य निधो मम हत गोदामन्याहरी मलापापपयान पानि करणा: पर्नु नरा पारिताः। भग्यानाभिगुणस्य संततगलदाप्पौयया मुग्यता दीपश्यसिसैरसय मदनम्याधिः समादितः ॥ ३ ॥ नायक पर से चलने के समय को पाने पाहता--जयमें घलने को लेकर हुआ, तर चलासी ने मुंह भारी नहीं किया। पणेकि पहाँ माता पिता मादि। इसीसे पह भतिशत पाने भी न कर सकी । फेल बासुओं को धारा पदाती रदी और स्टम्प और गर्म श्यासों से मदन-व्याधियी असहनीयता उमने पतलायी। भादूष्टि प्रसारित्रपरप पदामुहीश्य निविष्णया विलिन्ने परिप्या परिपती रात समुसरति । परेक पशुपातिए पायलियारिमागे भाभूदागन एपमन्दपरिवणीय नवोदितम् ॥ ४॥ अदा तफ दिसायी पड़ता था यहाँ तर उसने पनि के गार्ग पो देसाततर पहलाहुरे, दिनल पपा, माध. सार फलने लगा, इसस परता साफ साक्षिान पर। पुनम से पधिप पोरनी में घर पर पिपा। उसी समय उसे सन्देहमा जिपही माये वो महाँ, इससे पुनः परपिर पर देखने ली। 1 1 १२ अमरका चलनयने शून्या दृष्टिः कृता रालु केन ते क इन सुकृती दानामुबार धुर पराम् । यमभिलिखितप्रायैरङ्ग मुशमि चेतसा पदनकमलपाती कृत्वा निमीलिनलोचना ॥ ५॥ हे सुन्दरनेये, किसने तुम्हारी अबों को शन्य बनाया। फोन पुण्यात्मा द्रव्य वस्तुओं को सीमा यना हुआ है ! थर्थात् यह सुन्दर पुरुष यान है जिसका ध्यान तुम कर रही हो। चिलिपित फे समा तोकर जिस नुम हृदय में नहीं छोड़नी और हाथों पर मुगकाल रपकर तथा आत पन्द फर जिसकी तुम पूजा कर रही हा । भन्योन्यप्रयिताहगा मुलिनमत्याणियोम्पोरि, भ्यस्योडामविकम्मिवाधरदल नि दशन्य मुग्यम् । भामोलास पानवालगलि जायस्थ निन्दपस्य या कम्मद हमीदरातदिन माया स्मयी ॥६॥ लिमी विरहिणी में कोई पूछता है-दोनों हाथों की भंगु. लियों को मिलाने से नमित हुए हाथों पर तुमने अपना मुख एगा, जल्दी जल्दी मांग के चलने गं अधर फॉप रहा है, दुल में मुंह फिट हो गया है, याद थांपों के फोनों से मथः धारा यह रही है । इस प्रकार तुम किम पच्छे या पुरं मनुष्य की मिता पा प्रतिदिन दीनता पृथंय. स्मरण कि करनी दी। प्रियाला पन तिमिए गुमध्यते निदा निम पिगुमनादिन १६यने । wतिपातिपदिशिता सरगुपनारप इपित मान वर्षकारिताः ।.
फायता योगदो।
गांग मुंजपारमा र ममया हदय साक, गदा,
मादमा मानोर यामी दिनमा पला,
randir.भाग, मनप पर पर पर
amar गाना... Airiinfम गुप
भगं गमगीनमम वर मार गया।
Ritemati .
thrukh
inपिगमनामा मुना मरा
साना र ...॥
प.
im.cmtartinागमन
urna, arif. wirin भागमा
Antation.in मि मान
कारीगर पापा
frralia Rurमाम RURA भागममता।
MERTerrayin
Harfritain..।
rintentmatracrafir,
Wite:inikNEERE.॥
पिन
RT Ruri RR Part
Kity for rint
rmirrrrrrr.kini
mercirrentre
अमरपा मानो गरि उनी गमगदति मान: का पानि म तिमिति पुग्ण मनप्रिनगm. में मानरूपी गंग मंदगी, मैं म्यय उनके पास समय नहीं जा सकनी मोर पाई चतुर सगी भी नहीं जबरदस्ती मुझे ले जायाये भी मानी है, अग्नी लघुता के मा से नहीं माने। समय यांत रहा है, जीवन चल है, इन विचारों में मेरा मन चंचल हो रहा है। गुग्धे मुग्धनयव नेनुमबिर: कारः स्मिारस्यने मानं धत्स्व एति विधान अजुना दुरीकु प्रेयमि। सस्यैवं प्रतियोधिना प्रतियचस्तामा मीतानना नीचैःशम हदि म्पितो हिननु में प्रापरः श्रीप्यति ॥ याले।पया पालपन से ही समस्तकाल बिताना चाह हो।मान करना सीखो, धैर्य धारण करी, प्रिय के प्रति सिधा अच्छी नहीं । सखी ने जब इस प्रकार समझाया, तय डरती हरती यह घोली, धीरे धीरे चोलो, नहीं तो हृदय में रहने वाले प्राणेश्वर तुम्हारी ये यातें सुन लेंगे। उपलहदये कि पातम्यात्तथा गृहमागत- वरणातितः प्रेमादिः प्रियः समुपेक्षितः। तदिदमधुना यापमो निरस्तसुखोदया रदिवशरणा दुर्जातानां सहस्त्र रुपां फलम् ॥१२॥ चश्चल हदयवाली। प्रिय घर में आया था, यह तुम चरणों पर पड़ता था, पर उस प्रेमी प्रिय की तुमने उपर की, अब तुम्हारे जीयन . तय सुख दूर हुए, भय रो रो और अपने क्रोधों का फल भोगो।
कविता-कौमुदी। पत्र मभवणेस्ति याप्पगुरुणोनों नेतयोः कामत रागापूर्व हवाधरे घरपयो स्नन्वा भारतकः । माग्दित्तियुनिष्टुरेति भयता निध्यैव रंमाध्यते सालेख लिखतु प्युतीकरपा न्यायेन केनाना | कानों में गहन नहीं हैं, शासुमरे यांपों में फाजल नहीं पहले के समान ओंट पर लाली भी नहीं है, पैरों पर महा- भी नहीं है, सिर्फ या न करने के कारण तुम्हारा को निठुर समझना झूठा मालूम होता है। यह जप पत्र बने लगती है, तो हाथ से परम पट जाते हैं, थर किस प्रकार लिसे? प्रमाने अपने विचारधरः शाम पोएर पस्ते थाहुलते शिरोरुपयो व्यस्तरितिमतः । वैमनगमपारंपारिदिशामा मारिता यातेमा मयि जीवतीति पचन धानसभाम्पते ॥४॥ भारी मलिन दी गयी है। योग पीला पड़ गया है। को गाल दुल हो गये हैं। धांद कंधे से उतरी दुईमा रम होनी है। सिर के याद उसमे हुए हैं। मेरे जाने की १.सुनफर दी जिसकी ऐसी दशा दी जाती है, जो मग्न ती, यह मेरे घले भान पर जीती है, माई ! पद पात सय ट्रम नदी पड़ती। पानानिमिति गुन्दरि गुनभिता या मनसे मोबायां मिरो शामिपा मार। मानम्यारोप रिपारोवार गुरा तिमिन भादि मारा दिल चार पुरा नदी और गुणहीन भी नहीं है। यह प्रिय मुनादार नुम्हारे चरणों पर पड़ा है। इसको उटाहो मार लिए रारा उपाय नहीं होती प्रिय फ.मामने नापिकाको १ अमरुका गये हुए पुनः मिलते हैं इसलिए हे सुन्दरी ! तु चिन्ता मत करना। क्योकि तुम बहुत दुर्घल हो आँसू भर कर जब मैंने यह कहा, तय लजा से उस स्थिर हो गई, गिरते आंसू को उसने पी लिया ओर देखकर हंसती हुई भावी मृत्यु के लिए अपना बतलाया। भम्टिन्न नयनाम्यु बन्धुपु कृतं तापः ससीवाहितो ध्यान देन्यमशेषतः परिजने चिन्ता गुरभ्यापिता । भदपश्यः, किरा निति प्रजति सा श्वासैः परनिधन विपप्या भव विप्रयोगजनित दुःख विभक्त तया ॥ मदा यहनेवाली अथ धारा याधुओं को दे दी, त मसियों में गदिया, यपनी समूची दीनता साथ रहनेपाल फोदी, माता पिता आदि को उमने चिन्ता अर्पित कर मातफल यह बहुत मुरारी है, केरल प्राण फष्ट दे रहे हैं- भारनिधिन्त रह । यियोग व्यथा को उसने इस प्रकार यार दिया। भमरतो नाय न प म गुणरेप रहितः प्रिया मुकाहारसा घरणमले निपतिता। प्रमागम गुरे मनु निजामपिना. गुरापा नाम्यन्यन हदयमतापशमने ॥1॥ गले में धारण कगं । मुम्हारे हदय पं. मन्नाप को दूर करने के बतुरता समझानी।
मौर विद्वानों का हितकारक. यह शाख समाप्त हुआ। अर्थात् फविता-कौमुदी। 7 इससे प्रसन्न हो जाओ, अपना काम है, नहीं तो पछताना E पड़ेगा। कमस्थितासि करभोरु धने निशीधे प्राणाधिनी यमति यत्र निजः प्रियो में। - एकाकिनी पद कथन विभेपि पाले शूरोस्ति पुस्तितशरी मदनःसहायः ॥१८॥ हे करभोरु! इस थंधेरी रात में यहां के लिए तुमने प्रस्थान किया है ? जहाँ प्राणाधिक प्रिय रहते हैं। पाले तुम अकेली हो, डर नहीं लगता ? धौर कामदेव धनुर्याण लेकर साथ - अमितगति ये पक जैन प्रन्यकार हैं। ये धारा नगरी के प्रसिद्धराजा को भोजदेव के चावा मुंजदेव की सभा में थे। इन्होंने धर्म- परीक्षा, सुभाषितरत्नसन्दाह, श्रावकाचार आदि ग्रन्थ लिखे हैं। इन्होंने सुभाषितरत्नसन्दोह के अन्त में उसकी समाप्ति का समय इस प्रकार लिखा है:- समारूदेतस्मिरूत्रिदशवसति विक्रमनूपे सहसे वर्षायां प्रभवति हिचाशदधिक समास पञ्चम्यां भवति धरणिं मुजनृपती सिते पक्ष पोप बुधहितमिदं शानमनधम् । विक्रम के स्वर्गारोहण फे एक हजार पचास घर्ष बीतने पर, मुंजराज के राज्य के समय पौष शुक्ल पञ्चमी के दिन निर्मल । tv Init arte है, उसके यश नहीं होता-क्रोध नहीं करता-यह (महात्या) अमितगति विक्रमी १०५० संवत् में यह अन्य समान हुआ, जिसका सन् ६३ होता है। यहाँ इनके कुछ उत्तम श्लोक दिये जाते हैं। फोपोस्ति यस्य मनुजस्य निमित्तमुक्ती, नो तस्य कोऽपि पुरते गुपिनोऽपि महि। आशीवि भजति को ननु दंदशूक, नानोप्ररोगशमिना मयिनापि युक्त जो मनुष्य यात बात में फ्रोध करता है, अपनी और दूस की आत्मा को दुःख पहुंचाता है, यह मनुष्य चाहे गुणो-अनेत्र गुणों का भण्डार भी क्यों न हो; कोई उसकी मक्कि-संब शुभपा, नहीं करता, पयोंकि उससे अशांति का भय रहता है। देखो, नाना प्रकार के रोगों को शांत करने वाली मणि से युक्त भी दंदशूक जाति के सर्प को कोई नहीं पालता या पकड़ता, व्योंकि वह हानि पहुंचाता है, विष से संयुक्त होता है और पकड़ने पर मनुष्य को काट लेता है। पुण्यं चितं वततपोनियमोपवासः फ्रोधः क्षणेन दहतींधनवद्धताशः मत्वेति तस्य वशमेति न यो महात्मा तस्याभिवृद्धिमुपयाति नरस्य पुण्यं ॥२॥ जो महात्मा पुरुप यह सोचकर कि, “जिस प्रका अग्नि इंधन के समूह को क्षण भर में जलाकर भस्म फर देते है, उसी प्रकार यह मोध भी प्रत, तप, यम, नियम और उप- घासाहारा उत्पन्न हुए पुण्य को बात की पात में नष्ट कर देता पुण्य की वृद्धि करता है। उसका पुण्य यदता है । भपने - +-44 पपिता-कोदो। . htोलोर uriनि गरिसीमहागापा। पनि भागमा नि RTna मनार में n niruशिकता मदन (हानि - मरना उचित मारन शादी कर मपत ६ सिट पायी भार सोपदो पर गया है. क्योंकि पेमा मधिक मधिरापदि दानि पर रपमा एप, मय जम्म में यानी टप.पाल फर गप भार पदांय तो मारकरी पनका सालाने या पर्म मा नाश फर अन्म जन्म मैं नाना दुभा देना है। पारन सिगारिन मनुया पानिशमन सामाrmer पार पनि निमामि निमितनंगी मोनियामीरा जो मनुप्य पर नो मपंदा शांत रहता है। परंतु फिर फारपपरामर हो जाता है, तो उसफा पद मांध उस कारण के नष्ट हो जाने से नष्ट हो जाता है परंतु जो मनुष्य पिना कारण हो कुपित होता रहता, उसके पोध को पोन शांत पर सकनाई। भाषापमयमुपति माया मानेन प्रनिन्दिया विवादमादमयमादिगुणीति मायति वशमतिम शुरदिः ॥ ५॥ भनुप्प मान के कारण मानसिफ पीड़ा, फोप, भय, और दुःशा को मान होता है, निदित का यार ये को धारण करता है, एवं विद्या, दपा, यम आदि समस्त गुणों से हाथ धो परता
२०
ममितान।
है। इस लिए जोधेष्ठ गुदियाले पुरुष, फर्मः
फरने। सदा अपने फो भगुणीही मममा फरतं
मोकापितोऽपि Fast तोऽपि,
परिपतोऽपि पितोमान्यिो।
भभापरिगणितो मनु:-
म्नमाम्नि मं करने परम्..
इन्द्रिययिषय रुपी सपं के विर में पीड़ित लोग
नीच काम भी फर हालत है. और यनकि अपने ही
सम्मान, कुलीनता, पापिय, पांग्मापन, यिरागिता,
मादि समस्त गुणों को मिलकुल भूल जाते हैं, मांत् लौनि
सम्मानादि गुणों से विशिष्ट पुरुष भी विषयों में फंस निय
निंच काम करने में नहीं चूकते
लोकाचिन गुरुजन पितर मवित्री.
पसनाभिमवला मुहद स्वमार।
मृत्य प्रभुतनयमन्य जना मन्यों,
नो मन्यते विषयवैरिवशः कदाचित् ॥
इन्द्रिय विषय भोग रूपी बरी के पक्ष में पहुंच कर
मनुष्य अपने हित और प्यारे लोग जो गुरु, माता, पित
भाई, यहिन, स्त्री, पुत्र, मित्र, स्वामी, सेवक आदि हैं उन्हे में
मूल जाते हैं और इनकी कुछ भी चिंता नहीं करते।
येनेंद्रियाणि विजितान्यतिदुर्धराणि,
तस्याविभूतिरिद नास्ति कुतोपि लोके।
साय व जीवितमनर्थविमुष्मक,
पुसा विविधमतिपूजिवतत्ववोधैः ॥८॥
कविता-कौमुदी। २१ जिस मनुष्य ने इन दुर्जेय इन्द्रियों का जय कर लिया है, इनके पश में न होकर इनपर ही अपना अधिकार जमा लिया है, उस मनुष्य के समान इस संसार में किसी की भी विभूति नहीं है और न किसी का जीवन ही प्रशंसनीय है। भावार्थ- हरएक मनुष्य को इन्द्रियों का जय करना ही योग्य है और उसी से अपने जीवन को कृतार्थ मानना चाहिये। जनयति वचोऽध्यक्तं यक्वं तनोति मलाविल स्वलयति गति हन्ति स्थाम लघीकुस्ते तनुम् । दहति शिसियन्स गानां च योरमकाननं । गमयति वपुर्मानां वा क्रोति जरा न किम् ॥९॥ बुदापे के आने से मनुष्य के वचन अव्यक्त हो जाते हैं, जीभ लड़खड़ाने लगती है, मुंह सर्वदा मल से भरा रहता है ( लार, कफ आदि बहने लगते हैं ) गति स्खलित हो जाती है चलने पर पैर फहीं रखने पर कहीं पड़ जाते हैं, सामर्थ्य नष्ट हो जाता है, शरीर शिथिल होने लगता है, अग्नि से जलाए गए यन के समान यौचन वाफ में मिल जाता है और कहाँ तक कहें जिस का पहले कभी अनुमान भी नहीं कर सकते, यह अवस्था चुदापे से इस शरीर की हो जाती है । प्रवरूपचनपातध्वस्तदीपशिखापमै. रलिमलनि:कामदभूतैः सुखैविपससिभैः। समपरिचितदुःखमान्तः सतामतिनिदितै- रितिकृतमनाशके वृद्धःप्रकम्पयते करी ॥ १० ॥ हमारा अनुमान है कि बुढ़ापे के कारण जो मनुष्य हाथ कंपाते हैं ये सर्वदा अपने अंतरंग के इस प्रकार के भाव प्रकट करते रहते हैं। वे कहते हैं - भाइयो! हमने आयौवनावस्था में अमितगति। कामजन्य सुख भोगे थे, वे अब विपतुल्य हानिकारक सिद्ध हुए। आंधी के रोग से बुझाई गई दीपक की लौ के समान क्षण विनाशी और महादुःख के स्थान निकले। सजन लोग: पहले से इनकी निंदा करते हैं, सो विलयुल ठीक है, उस तनिक भी झूट नहीं । इसलिए इनफा भोगनासर्वथा अनुचित चलयति तनु दृष्ट भ्रान्तिं करोति शरीरिणों रचयति बलादव्यकोक्ति तनोति गतिक्षति । जनपति जनेनाना निदामनर्थपरंपरा हरति सुरभि गन्धं देहाजरा मदिरा यथा ॥1॥ जिस प्रकार मदिरा पीने से शरीर को चल विचल देती है, आगों को घुमा देती है, अस्फुट वचन कहलयाती चलने में याधा डालती है, लोगों में निन्दा का पात्र यना दे है, धीर देह फी मुगधि हर उसे दुर्गधित कर देती है उसी प्रका जरा (वृद्धावस्था ) भी शरीर को कंपा देती है, आंतकी ज्योति फम फर देने से दृष्टि में भ्रांति फर देती है,टे फटे कुणके कुछ शव युलपाती है. पूर्व की भांति ठीक ठीक नहीं चलने देती, लोगों में नाना प्रकार की निंदार फरवाती है और शरीर को दुर्गन्धमय फर देती है। भनि मरण प्रत्यासत्र,विनश्यति पौरन, प्रभवति जरा मांद्वाना विनाश विधायिनी। विरमत बुधाः कामायम्यो कुरतावर रदिमिनिवारणीमान्तस्थित पलित जने ॥१३॥ मायया थाने के समय जो कुछ फेरा श्यंत दो योगों के पान के पास भाकर अपने भागमन रोएस
काखही नागरी
सूचना देते है कि सानो,"हिताहितविनेविसो !
रा मरण अब माप है,। शीघ्र ही मरण आने वाली है,
की अवधि पूरी हो। को यह सीरिया मेप तन के ही
है। देखो ! वह तुम्हारापी आ रहा है,
से कि तुम्हारे वे अंग जो कि इस समय काम करने में
हैं, शक्तिहीन हो जायेंगे। इसलिए काम, अर्थ को छोड़ो;
जो अब तक भोग चुके सो भोग चुके, अव धर्म
और ध्यान दो। अंत के दिनों में भी कुछ अपना हित
।
तृष्णां चित शमयसि मद ज्ञानमाविष्करोति,
नीति सूते हरति विपदं संपदं संचिनोति ।
पुसा लोकद्वितयशुभदा संगतिः सजनानाम्,
किंवा कुर्यान फलममलं दुःखनि शदक्षा ।। १३ ॥
ज्जनो की संगति करने से चित्त की तृष्णा( डाह ) बुझ
है, मद नष्ट हो जाता है, ज्ञान की वृद्धि होती है, नीति
का याचरण करना आने लगता है, विपत्ति दूर भाग
है, सम्पत्ति एकत्र होकर आधय करने लगती है, और
लोक में शुभ फल प्राप्त होता है। इसलिए बहुत कहने
T! समस्त दुःखों के नाश करने में समर्थ सज्जनों की
से पया या उत्तम फल नहीं प्राप्त होते ?
पिताहादि व्यसनविमुख शस्तारापनादि,
यज्ञोल्पादिश्रवणसुखदं न्यायमार्गानुयायि।
तथ्य पथ्य व्यपगतमद सार्थक मुक्तवाद,
यो निधि रचयति वचस्तं युधाः सन्त माहुः ।।
पनाये है। कुछ लोगा का कहना है कि यह योद्ध नहीं थेशीर । पर घ योद्ध नहीं थे। वुद्धचरित की समाप्ति और मधमरा जो पुरोग निको प्रग करने पाले. मनीवि शोक सन्ताफ नाराज, गुदि प्रदान पाने, सुनने में गायमार्ग अनुमान फरने याने, ग, हमार भर्षयास, पापारदिन, निमंद भीर नि पचन योसनेयः दोन, उन्हें पिहान् मांग गन पहनं । मायार्य- मनुष्य सबन पनना चाहें उन्हें पारिप मि.ये उपयुन गुन- पाले पचन पालें। - अश्वघोप महाफपि माययोर फय उत्पन्न हुए ?मनिश्चय करने फा कोई उपाय नहीं है। यह पौद्ध थे: क्योंकि भदन्न यश्योर के नाम से इनफा परिचय पाया जाता है । भदन्त यौर सन्यासियों को फहने थे। अन्यान्य अन्यों फे देखने से पना मिलता है कि युद्धचरित फे अतिरिक्त और भी अन्य इनके इनके नाम के साथ भदन्तं शब्द भ्रम से जोड़ा गया है । उस भ्रम का कारण फेवल यही है कि इन्होंने युद्धार नाम का एफ प्रन्ध यनाया है, पर यहो किसीके चौद्धय अवौद्ध होने का प्रमाण नहीं है। क्योंकि महाफयि व्यासदास शेमेन्द्र ने भी तो “बोधिसत्यावदान कल्पलता" नाम की पुस्तक मनायी है जो कि बौद्ध धर्म से सम्बन्ध रखनेवाली पुस्तक रम्भ की शैली देखने से भी इनके चौद्ध होने का पूरा गण नहीं मिलता।
फविता-फौमुदी २५ बुद्धचरित का.वर्णन रामायण और रघुवंश से समानता खता है । आदिकवि वाल्मीकि और महाकवि कालिदास जिस तरह प्रसाद गुप का आदर किया है और उसमें पना अनुराग प्रकट किया है, उसी तरह इस महाकवि ने - कालिदास के पीछे होनेवाले कवियों के न्यो म जिस रीति की प्रधानता देखी जाती है, उसका परिचय इस महा. फवि के अन्य में यही नहीं है । इससे इस बात के मानने के लिए विवश होना पड़ता है कि यह महाकवि कालिदास के पहले या पीछे उत्पन्न हुआ था। इस समय इस महाकवि का बनाया केवल एकही ग्रन्थ "बुद्धचरित" पाया जाता है। इस ग्रन्थ में शान्तरस प्रधान है और फरुणरस थप्रधान । प्रसाद और माधुर्यमयी वैदर्भी राति है। इनके ग्रन्थ में शान्तरस की जैसी पुष्टि हुई है, जैसा मधुर वर्णन हुआ है, वैसा अन्यान्य कधियों के प्रवन्धों में, कालिदास के प्रबन्धों को छोड़फर, दूसरी जगह नहीं पाया जाता। इनके प्रसिद्ध ग्रन्थ बुद्धचरित से कुछ श्लोक नीचे दिये जाते हैं, जिनसे इनके विषय में ऊपर फही हुई न्याता की पुष्टि होगी। उत तथा भतंरि राज्य निस्पृहे सपोवन याति विवर्णवाससि । भुजौ समुन्धिप्य ततः स वाजिभृदृश दिभुप्रोश पपात घ क्षितौ ॥ १॥ जय राज्य से निरपृड होकर फटे कपड़ों से महाराज -युद्ध) वन में गये, तब घोड़े या साईस दोनों हाथों को उठा कर रोने लगा और रह भूमि पर गिर पड़ा। वलोक्य भूच रोद सदर हयं मुजाभ्यामुपगृहय कन्यवम् । वो निराश दिलामुहमुहुर्पयो शरीरेण पुरं न घेउसा ॥२॥ Aur कर ये गने लगी। हमानश्च दमन्दिर विणकया वहन पशुपा। अश्वघोष। पुनः वह कन्यक नाम के घोड़े को दोनों हाथों से पक फर चिल्ला चिल्लाकर रोने लगा । जव बुद्ध के लौट चलने ३. आशा जाती रही, तव यह केवल शरीर से नगर की ओर चला, चित्त से नहीं। यमेकरात्रेण तु भतु राज्ञया जगाम मार्ग सह तेन वाजिना। इयाय भतु विरह विचिन्तय स्तमेव पन्यानमहोभिरष्टभिः॥३॥ स्वामी ( बुद्ध ) की आज्ञा से जिस मार्ग को उसने । घोड़े के साथ एक रात में से किया था, उसी मार्ग में स्वा के विरह के कारण उसको आठ दिन लग गये। मिशम्म च प्रस्तशरीरगामिनो विनागतौ शाक्पकुलपमेण तो । मुमोघ वाप्प पथि नागरा जनः पुरारथे दाशरथेरियागते ॥४॥ शाक्य कुल के दीपक के बिना शिथिल अङ्ग से चलने घाले उन दोनों को देखकर मार्ग में नगरवासियों ने आंसू पहाये । जैसे पहले रामचन्द्र को धन में छोड़ पर लौटे हुए रथ को देखकर नगरवासी रोये थे। बना कुमारी विनिवृत्त इत्यधा गवाक्षमा प्रतिमदिरेजनाः। वधिक पविलापय वाजिनं पुनगंवाक्षाणि पिधाप गुपः॥ ५॥ नगर की खियों ने सुना कि कुमार लौट आये, मतः ये टारी पर चढ़कर पिदकी पोलपर देखने लगी। पर जब लोगों ने भाई को पीट खाली देवी, उस समय खिड़की पुन राव पापको जनाय दुख प्रतिपदिय ॥
फविता कौमुदी। जय यह राजभवन में गया, तब उसकी आँखों से आँसू यह रहे थे और वह उन्ही धासों से चारों ओर देख रहा था। यह अपने पुष्ट कार से रोता था, मानो अपना दुःस लोगों को बतला रहा था। ततः सवाप्पा महिपी महीपतेः पनवासा महिपीय यत्सला । प्रगृह वाह निपरात गौतमी बिलासपण कदलीय कासनी ॥७॥ देव महाराज की प्रधान रानी गौतमी जिसकी आँखें यांसू से भर गयी थी और जिसकी दशा बछड़े के नष्ट होने पर पल्सला भंस के समान थी; यह हाथ बांध कर गिर पड़ो, जैसे चञ्चल पर्स बाली सोने की कदली गिरती है। सपेव रोप विरगलोचना विपादसम्बन्धकपायगद्गदम् । उवाच निश्वामचलत्पयाधर विगादशाकाशु धरा यशोधरा ॥८i यशोधरा ( बुद्ध की खी) की आँखें शोकायेग के कारण आँसू से भर गयी थी, क्रोध से उसकी आँखें लाल हो गयी थी, अधिक शोक होने के कारण वह बोल नहीं सकती थी, निश्यास से उसकी छाती धड़कती थी। यह बोली- निशि प्रसुप्ताव विहाय मागतः सच्छन्दक मन्मनोरथः । पगते च त्वयि काय च मे सम गतेषु शिघुमते मनः ॥९॥ हे उन्दक ( सेवक) रात को निद्रा में अचेत पड़ी हुई मुझको छोड़कर वह मेरा मनोरथ कहाँ चला गया ? तुम तो लौट आये, गौर कन्याक भी माया। तीनों के एक साथ जाने से मेरा हदय काँप रहा था। पण मायेन हिनि साधुना त्यया सहायेन यथावारिया । गोम्पुत्री मानपुर : स..॥
'- गुग मागिन टोमा ::rm पति :ही रानी नपरा. तुम्हार परिधा गरगामा। पा गुरnिwar मुहान mehraru मनुष्य पारदकिमान अच्छा है और ममरन सनमवाला गिरदा नहीं। मित्र रहा पाले मृतुमने मेरे समरन मुलपाशात पर दिया। भगधागोयामा सभा जदार सपंरपमतस्तथाहि मे बने मुरा नरदन ॥१२॥ यद पन्यया घोहा मी निश्चय मेरा धनि चारने यार है. जिसने मेरा सर्वस्व रात को सय लोगों में सोने परर चोरफेसमान ले गया। यदा समयः गलु सानुनागतानिपुमहारानपि पुनः कशाः । गतः कशापातमया कप त्वयं भिगृहोपा ददय च मे सनम् ॥१॥ यह घोड़ा जय माये हुए वालों को भी सह सकता है, इसके लिए फोड़ा कौन सी वस्तु है, जो यह फोड़े के से मेरी सम्पत्ति और मेरा हृदय देकर चला गया। भनार्यकर्मा गृशमय हेपते नरेन्द्रधिष्ण्यं प्रतिपूरयलिय । पदा ह निवासयविस्म मे प्रियदा हि मूकस्तुरगाधमोडमर्वत ।" यह दुराचारी आज चार यार योल रहा है। महाराज मफान को अपने शब्द से गंजा रहा है, पर जिस समय MUNIA सार पिता-मोती। Ratnा अधमपुर al remetimirmirmalkin riminar Rana || मदागर रायमा,जगमगा उन्होंने पर for freprमहारास उनममुदार पं. सुपर चिटिल गये जमे पर पं. नाही lemiarin frreneurname from परामा ANNARigni॥ छन्दप धार पापादेपर पापानिधय ए-पार महार मसंगतपरगर TER पार इन्द्र प. पृषामा गिरा। का गुरili नेन स्पामिन पारितः । निरीय ranMERAcriltern प1ि0॥ घोर तप. महरा पुनशीप से बस, उनको पशु पापय मामाल १५५ । मार मार भरी बसों में पी का दायर मीन में प प रिलाप पारने लगे। पनि या समरे प्रियालिमहरएयायन्यफ विनिय कृतम्। गुपरिपा पन पनेस में मुतातियोपि परिमारियः ॥१८॥ पाययः, रणी में तुमने मेरे पान से मिय फाम किये है, पराज तुमने मेरापी भएपार किया, क्योंफिगुण- प्रिय मेरे प्रिय पुत्र को नुमने शत्रु के समान पन में भेज दिया।
अश्वयोप सदय मां वा नप तत्र यत्र स प्रज दुई वा पुनरेनमानय । तेहि तस्मान् मम नास्ति जीवित विगादरोगस्य सदोश्यादिव ॥ तो आज तुम मुझको यहाँ ले चलो जहाँ मेरा वह पुत्र है। अया तुम स्वयं शीघ्र जाकर उसीको ले पात्रों क्योंकि उसके बिना मेरा जीना असम्भव है। जैसे किसी रोगी का जीवन अच्छे औषध के बिना असम्भय होता है। प्रचत्वमे मद तदाश्रमाजिर हृतस्त्वया याम मे जलालिः। इमे परिप्सन्निहि मे पिपासयो ममासवः प्रेतगति पियासवः ॥२॥ पे भलेमानुस, मुझे यतलाभो वह स्थान कहा है ? जहां मेरी जलाञ्जलि ( जल देने याले पुत्र ) को तू ले गया है। मेरे प्यासे ये प्राण जो प्रेत-गति को जाने वाले हैं, उसको चाहते हैं। इति सनपवियोगजातदुःखः क्षितिमदर्श सह विहाय धैर्यम् । दशरप इस रामशेोकवश्यो यदु विललाप पो विसंशकम्पः ॥२॥ पुत्र फेरियोग से महाराज को 'यहुत दुःख हुआ। पृथिवी के समान उनकी स्वामाचिफ धीरता जाती रही. राम के शोफ से जैसे दशरथ ने विलाप किया था, उसी प्रकार मधेत होकर महाराज विलाप करने लगे। .
पिता मोगी। आनन्दयर्द्धन पं. मामर भनाभा पांकरमार राख भाभिमागमप में गान ,पापात राग. पणजी मानी जाती। मपन्नि यमांनी सदीप शमीर का राय किपा था। राजहिता में लिnik- "Haic: मोतिरामम्दाना प्रEिTR. गागाभाषपः। रन बनाये पापं.मामा निगं ज्ञान- 1-पन्पालांग। २-विषमयाग सीना ( भारत काश्य । ३-६रिधिमण ४- अनुमचरित "-मारपेक्षा ६. घोरामयिनिधपटीफा देयीशनक महारथि रारोवर ने इनके विषय में लिपादे. "आयनिताजगभीरपकायापनियशिमा। भानम्दाना काय मामीदानम्मपनः ।। इनमे कुछ मनोहर श्लोफ नीचे लिग जाते हैं:- अविरतानुगतिसहमदालसरसवलिय यः। हिनाविधानयुष्यानुदा सनुराममुवीय तात। - मानशान सदा माय फे पार पसरपं.पिशरसारित हो गया हमीर उत्तम चरनुमां पं. म प रा संजी रोमाशिदो रहा है, या पाशार आपका पल्यात परम्य रितेशे दिमाग ममगारमायामः । श्यामे पशुस्नयास्मिन्यपि हिदि मारपर दुः।। फस्याबस्मितितिविपुल टिरगान है। दैत्ये रिन्युपमानो मुनिभिरपिहरिः स्प्रंग रूपांगता || प्राणेश, थापमें समस्त जगत् का सार में एक स्थान देखता हूँ। तुम्हारे इस श्याम शरीर को बड़े पुण्यात्मा देख हैं । इस अमृत को छोड़ कर किस मनुष्य का अनुराग दूस यस्तु में होगा: तुम्हारी पड़ी घड़ी भाग ही अमृत हैं। वं रूपधारी हरि को दैत्य और मुनि दोनों ने इस प्रकार कहा। हरि आपकी रक्षा करें। प्रतीयमान पुनरन्यदेव वस्त्यस्ति पापी महास्यीनाम् । एतत्मसिद्धाययवातिरिकमामाति सारम्विाङ्ग नासु ॥३॥ महाकयियों की वाणी में जो यात मालूम होती है या कुछ और ही है। जिस प्रकार त्रियों के शरीर में प्रसिद्ध अङ्गं फे अतिरिक्त लादप्य एफ दिलक्षण ही शोमा देता है। या सानिव साधुवादमुसरान्मात्सर्यमूकानपि प्रोचैनों कुरुले सतां मतिमतां दहिन सा धास्तवी ।। या याताः श्रुतिगोचर च सहसा पलिपत्कंधरा स्तियंचोपि न मुकशस्यकवलास्तादि क्योनो गिरः॥४॥ जोश मूक यने हुओं को भी साधुओं के समा' साधु धाद देने के लिए पकान पनाये यह बुद्धिमान सजनों की सविनायीमुदी। दृष्टि धादि मदीमीर जिगर गुना परी दी महमा पहिलो का भी परमाग गलगित नही जाप, मोर दाना पानाम पर पया पापिणी पापी है। भनमीन गितम् । भागालारमानी हुन माना॥५॥ पान दिनों का गधिन ममानों का परिश्रम जादरण परना पादन, दुर्शन भी गमना पंगमान नमस्या जापा पासोमनिमगर मा फागु पादागु गती। मुम्रपानकाररावानुन संगमरमाचममि ॥६॥ पर देनेयाने देयतामों पे पदगे जा मनुष्य पर मनुष्य की प्रशंसा धन पं. मोग गं करता है, यद मूग और में उसे पदला नृशंग समभया। रपयमूनि पहनि महामहागि पोयट मुग्नमण्डलमडगाप। सूपांत नामदेशिन पारगमति पेनोदितन दिनमामि माविका पं मनेक यई पर प्रकाश उदित होने , चन्द्रमा भी संसार की गोमाही पदावा है, पर उप होना तो एका सूर्य का है, जिमफ. उदय होने से दिन होता है चोर भस्त होने से राशि दी। होगमन्दादिमति नयाशीपमानापि भूपः स्वर ग्मिन्किल निमुन मूमन मागविष्यत् ६ कोस्यमपि दया गर्नुमात्मानमेय ध्यमः फार गमपति एरो सेप्ययं पश्य पन्द्रः॥८॥ स्वयं क्षीण होने पर भी जो सदा लोफों को आमन्दित करता है, उसफे, स्वर्ग में रहने पर नया प्रातःकाल नहीं .
---
मानन्दपाईन ।
होता । पर भाग्य कमाया मन्द्रमा भी आना ही मरः
फरने के लिए प्याकुल सता है भार इसीम उसका त
समय पीतता है।
नारयोपियनी सनुनं सनी माओवशेष र
मत्य यारयनर पिते ।।
मंजवीजममममस्य नये म्यान गुरा भगा।
सादर त्यादरामेर पेन गुनरा भाग्य पशु मन्मने ।
उसफा लेया शरीर नहीं है, यई दो दान भी नहीं है और
न बड़ा बढ़ा कर (सूड़) है। हायी. यह ठीक है कि याडम्बर
में यह सिंह का नया तुम्हारी परामरीही यर सकता, पर
इसके हृदय में बहा ने एक बड़ा तेजाज रण है, जिससे
तुम्हारे समान पशुभी को यह भपना भोजन समझता है।
फैलि कुरुण्य परिभुव सरोरुहारिण।
गाहव शैलतरनिरिणीपयामि ॥
भावानुरक्तकरिणीकरलालिताल।
मात मुख मृगराजरणामिलापम् ॥10॥
आनन्द करी, कमलों को खायो, पहाड़ी नदियों के जल
फा अवगाहन करो, पर माता ! सिंह से युद्ध की इच्छा छोड़
दो, क्योंकि प्रेमिका हथिनी के हाथों से तुम्हारे अङ्गं लालित
होते हैं।
मनोरयशत तो भुवननाथोचित-
स्तुणैरलमधः नृतः पवादः चिद्रावसु ।
प्रअत्यपि सचेतसा विषयमीशा यो शो!
उत्यपसकन्दरे विधुर एप चिन्तामयिः ॥११॥
जाना। . पनि हो तो म मुक्.िफो छोफर पुनः शरीरमदर्ण करने की मणिा की। Tirulinaatraामा HTTPUR. उस मालिको चार .inा, समय:८. पायर्ग में पड़ी उसे पासन मनु पं. हाय में जो भाग से माती परलोमा पानी पिनामति पागया writiiraHITIRE-- Preguinformation | किनाr: मनापायी-- शरमेकांचनः ॥१२॥ तुम्हारा गो int.मि मथुधारा, नुम्हारे दिवाग ना गोमानिय, समान १५ पिता को मुम, प्रो. मुम्हार मातरं पत्रमा अपार मारी तुम्हारी दोनों की दशा प्रमान है, फिर मित्र, तुम मुझको दी जलाने के लिए क्यों एम रिलमनगरी पगमाराममितिमम् । नवोदय विधाविर पर गुमित करित | मन पो मृष्टि में जी महाररुप निर्माण पीज अडरित आ था, पर था तुम्हारे उदय पं. सम पुरुमित भीर विवि जनार्दन मनिराला पनि भवपालमपणा ममं । मिसपासवर्गपगुला पुनरपीह शरीरपरिप्रहम् ॥१४॥ जनार्दन, यदि या फे चरणों में मेरी कामनारहित स्थिर मेघ: म शार हो। फटिन देपा जाता है। हा परता कल्हण । - कल्हण ये कवि काश्मीर देश के निवासी थे। काश्मीर के इति. हास "राजतरङ्गिणी" का निर्माण इन्होंने ही किया है। कश्मीर- राज जयसिंह के समय में इन्होंने राजतरङ्गिणी बनायी थी। जयसिंहाभ्युदय नामक एक काव्य भी इन्होंने बनाया है। इन्होंने राजतरङ्गिणी यनाने का समय राजतरिङ्गणी में इस प्रकार लिखा है- लौकिकेऽम्दे चतुर्थ शेशफकालस्य साम्प्रतम् । ससत्यात्यधिक यात सहस' परिवत्सरा।। १०७० शक में इन्होंने राजतरङ्गिणी पनायी। ये फरमीर राज्य के प्रधान मन्त्री भी थे। अन्य काश्मीरक फयियों के समान इनकी कविता भी प्रौद और सरस है। देखिए- वृति या पदुमन्यते इति शुध घरोनुरुपौकिमि-- प्यंत निन्दति योग्यता मितमतिः कुर्यस्तुतीराग्मनः। गोपापनि थपति स्थायदन्या। शुस्या दुःपमा वितनुते पोड़ो जनः मारता॥1॥ दुसन मनुष्य भपनी पृत्ति-दुर्जनता को अच्छा समझना है, दया फी पातों से उसफा हृदय दुःखी होता है,भपनीप्रसा करताधार योग्यता की निन्दा फरता है, क्योंकि उसकी पुद्धि चाही हानी है। अनेक प्रकार की मासियों का गति पर पुरे उपायों के अगलम्यन का समर्थन करता है, र पा नाम सुनकर यति तीय पीडा पहुंचाता है। पार सुमस्समदए बदमो पागेल मादादिगु स्वा प्रयापरिन भरने दीनानगरपा फविता फौमुदी। मसो र शोर भीवंदिन सल्गुम्धः विमए स्यने- दित्यन्तःपुरोऽयमः बलयति प्रायः कृतोपक्रियः ॥२॥ दुजन मनुप्य किसी के हारा उपरत होने पर प्रायः इस प्रकार सोचता है, यदि आज मेरे माग्यों का उदय नहीं हुआ तो आज के पहले ही इन्होंने क्यों नहीं दिया ? यदि मुझसे स्यार्थसिद्धि को पाशा न होती तो ये अपने गरीब भाई यन्धुभा को ही क्यों न देते ! मैं इसी पुराइयों को जानता है इसी डर से यह मुझको देता है, नहीं तो यह कृपण फय फा देनेवाला है, उपरत होने पर अधम पुरुष इसी प्रकार सोचते हैं । कणे तत्कययन्ति दुन्दुभिरयै राष्ट्र युदुदनौपितं तपघाइतथा वदन्ति करणं यस्मान्धुपावान्भवेत् ॥ साधन्ते तदुदीयते यदरिणाप्युन मन्ति कैचिानु शाठयमाम्यनिधयस्ते भूभृतो रखकाः ॥ ३ ॥ नगारे की यायाज़ के साथ जो देश में घोषित किया गया है, यह भी जो कानों में कहता है, लजा देने वाली बातों को नम्रतापूर्वक प्रकाशित करता है, हदय को जलाने वाली जो पात, शत्रु नहीं कह सकने उनकी जो तारीफ़ करता है, इस प्रकार की जिसमें शटता और भोलापन होता है, वे ही राजाओं को प्रसन्न कर सकते हैं। हा कष्ट तटवासिनोपि विफल प्रारमारमालोक्य मा- मन्यत्रीय विपासवः प्रतिदिन गच्छन्त्यमी जन्तवः ।। इत्य प्यर्य जलातिभारबहनप्रोन तसेदादिव स्वामूर्ति बड़वानले जलनिधिमन्ये जुहोत्यन्वहम् ॥ ४ ॥ यह बड़े कष्ट की बात है कि मेरे इस जलराशि को विफल समझ फर मेरे तीर पर रहनेवाले जन्तु भी पिपासा से 1 पीडित दोकर गुमर्ग जगह जाने इस गांजलराशियों फपहन करने में उप : मंगमुद्र माना जल यवानल महयन फरता। मांदा परिपागनंगमोशनीगना रक्षणा- रिमारया मानस गुधिन परिणादिनन् ।। गाम्भीपाँधिनमागनारधिनानन्याधाप्रमा देवेषयनामा दुरामा गये नागितम् ॥५॥ यड़ों की मर्यादा के पालन करने में,पयंता की रक्षा करने से धौर विष्णु को विश्राम करने के लिए स्थान देने सं समुद्र ने जो अपनी गम्भीरता का उचित पाल पाया था, यह सब मन्थन पीड़ा की घयाहट से देवताओं को अमृत देकर उसने नष्ट कर दिये। माय पड़वानलः स भगवानाचयं नम्भोनिधि- यत्कर्माविशय विचिन्त्य मनमः कम्पः समुत्पद्यते । एकस्याश्रययस्मरस्य पियतस्तृप्तिनं जाता जल---- ए रन्यस्यापि नदात्मनो न पुस्मन्पापि जातः भ्रमः॥ ६ ॥ आश्चर्य यड्यानल के लिये है, विष्णु के लिए है और समुद्र के लिए भी है, जिसके अदुत काम को सोचकर मनुष्य फा मन कम्पित होने लगता है, एक की -जो अपने आश्रय को ही खाता है -जल पीने से तृप्ति नहीं हुई । अर्थात् यडया नल आज तक जलपीने से तृप्त नहीं हुआ, और विष्णु को घहाँ सोने में कोई कर नहीं हुआ । और दूसरे महात्मा के शरीर को थोड़ा भी श्रम नहीं हुआ ! नाद्वेग यदि यासि यचयहितः कर्ण ददामि क्षण त्यां परामि यदम्युधे किमपि तसिंग्विन्य देत्युत्तरम् ।
फयिता-कौमुदी। नैराश्यानु यानिगा नितिश्यर पददश्यते तृतिः पवितरित्तदधिरंग्यादविंदाहादतः ॥ ७ ॥ गदि तुम ध्यान जाभो भऔर यदि तुम सावधान हो कर मुनो, तो मैं तुमसे पूछनाई - माच पार उत्तर दो, प्यासा माधिक नुम्हारे यहां आकर निराशा-जनित तीरे पश्चात्ताप से गर्म सांस लेकर जो तुम्हारी और देखता है, उससे बड़वानल का दाह कितना अधिक है। इनः स्वपिनि केश्यः कुल मिसय दोपदिपा- मितच शरणाधिना शिसरिणां गया। शेरते ॥ इन माननः सहसमस्त- रहा पिनतमूर्जिन' भग्मह च विचारपुः ॥ ८॥ एक ओर विष्णु माते हैं, दूसरी ओर विष्णु के शत्रुओं का नमूह सोता है, एक और शरण में आये हुए पर्वतों का समूह स करता है, एक और संवर्तक नाम के मंघों के साथ इयानल है । मोह, ममुद्र का शरीर कितना यड़ा है और यह केतना भार सहता है मैकुण्ठाय नियमभिनव शीतभानु भयाय प्रादादुचाश्रयसमपि या यतिणे रात्क गण्यम् ।। मृष्णानाय समरि मुग्ये यदददातिस्म देह कोन्यस्तरमावति गुवनेश्वम्युथैयाधिसत्यः ॥९॥ लक्ष्मी विष्णु फा दी, नधीन चन्द्र शिव को दिया और न्द्र को उच्चैःश्रवा दिया, इनकी तो कोई गिनती नहीं; प्यासे नि को ( अगस्त को , समुद्र ने अपना शरीर तक दे दिया, स समुद्र से यदकर संसार में यौन बड़ा त्यागी है ? बोगपलाः प्रविकिर लहरीः समाधि, क्रियेत यदि रद्धतटाभिमुख्यः । पोधिनः सम्बलु भाग्यविपर्ययाण दातुमनागपि न तस्य तु दातृताया..
४०
.......
-------
रखा के समान उपग्रल लहरियों को यायु के द्वारा फैलाने
घाले के तट यदि रोग लिये जाय, तो यद याचकांके
भाग्य का ही दोर है, दाता फी दानशशि फादप नहीं है।
भन्तये सतरा मुरन्यागितास्नाने पायोपर-
राखानापतनस्तांगवरपालिप गृहपसी।
व्यक्त मौफिकरत्ना जसकगामामापपरयम्बुधिः
शयोऽन्येन तादरो लमुररि प्राप्यते स्वामिभिः॥॥
जो जल के फण सदा समुद्र में ही रहते हैं, उन्हेंही मेघ
लेजाकर जय पुनः समुद्र को देता है, तय तरङ्गों से आलिङ्गन
फर के समुद्र उनका ग्रहण करता है और उन्हींको मोती
बना देता है । छोटा भी हो, यदि उसका दूसरे आदर करते
हैं, तो स्वामी भी उसका आदर करता है।
परामशति सरह मुहुरपेलच घोक्ष्यते
महत्किमपि रवमित्यसमममदं गृहत ।
फुतोपि परिपेलवच्छविमवाप्य फाचोपले
घहत्यतिकदनां यत वराक्कः पामरः ॥ १२॥
विचारा मूर्प मनुष्य कहीं से फांच का टुकड़ा पाता है
सो उसे बड़ी लालसा से छूता है, यार बार उसे देखता है,
यह पड़ा भारी कोई रन है यह समझ कर प्रसन्नता पूर्वक उसे
छिपाता है, इस प्रकार यह अनेक कष्ट उठाता है।
भस्याः सर्गविधौ प्रजापतिाहो चन्द्रो न संभाव्यते
नो देवः कुसुमायुधो न च मधुई विरिधः प्रमुः ।।
एतन्मे मतमुत्थितेंयममृतात्काचिस्वयं सिंधुना
या मन्याचललोदितन हरये दन्याश्रिय रक्षिता ॥३॥
फपिता-कौमुदी।
४१
इसकी सृष्टि करने के लिए चन्द्रमा प्रजापति नहीं बना
पा। कामदेय भी प्रजापति नहीं था। फिर मसा के प्रजापति
होने को यात तो दूर हो है । मैं तो समझता कि यह
अमृत से स्वयम् उत्पन्न हुई है और मन्धन के समय समुद्र
में विपए को लक्ष्मी देकर इसको रक्षा की थी। मधात् लक्ष्मी
से भी यह सुन्दरी है। इसी लोक के समान कालिदास का
भी लोक है।
मारपरिणापरा वृष्यकेशी सितकरानना ।।
हरिमाया शिवाकारा सर्वदेवमयीव सा ॥४॥
इसका विम्याधर मास्वत (सूर्य या प्रकाशमान है) है,
भरा रुष्ण है, मुंह चन्द्रमा है,मध्यभाग हरि (सिंह या विष्णु)
के समान है, उसफा बाधार शिय (मुन्दर वा महादेव ) है,
वह सर्वदेवमयी है।
सम्पप्रतिपादितः प्रिययचीवदालयासावलि
निदपेण मनामसादपयसा निष्पन्न सेव क्रियः ।।
दायस्तत्तदीप्सित किए फलम्कालेपियालोप्यप्ती
राजन्दानमहोरको पिजपत्ते कल्पद्रुमादीमपि ॥१५॥
अच्छे क्षेत्र (पात्र) में दिया हुआ दानवृक्ष फल्पद्रम
थादि को भी जीत लेता है। प्रियवचनों द्वारा इसके आलबाल
पनवाये जाते हैं भौर दोपरहित मानसिक प्रसन्नतारूपी जल
से पह सींचा जाता है, छोटा होने पर भी यह दाता के मनो.
रयों को पूर्ण करता है।
पो. जनाएकरणाय सजत्युपायं तेनैव सस्य नियमेन भनेदिमाशः ।।
एम प्रसौति मयमायकर यमग्निभूत्वाम्बु दासशमयेन्सलिलस्तमेव ॥६॥
No text on this page.
फविता-कीमुदी। क्यों कि वैसा करता हिम्मत का काम है, साहस का फाम है। उन मतों के समर्थन करने की शक्ति मुभमें नहीं है । एक विद्वार ने कालिदास को गुप्त राजाओं का समकालीन वत- लाया है और अपने इस मत में उन लोगों ने प्रमाण यह दिया है कि कालिदास ने रघुवंश में "गुरु" शब्द का प्रयोग किया है। इस मत का समर्थन करना मेरी शक्ति के बाहर की बात है । इस मत का जय मैं समर्थन करना चाहता हूँ, उस समय “सगुप्तमूल प्रत्यतः" के.गुप्त-शब्द में ऐसी कोई योग्यता दिखाई न पड़ती, जो गुप्त राज्य के समय कालि. दास के होने को प्रमाणित फरे । यहाँ गुप्त शब्द रक्षित के अर्थ में पाया है, यह नामान्त प्रयोज्य गुप्त शब्द नहीं है। यदि इसी प्रकार किसी प्रयुक्त शब्द को देख कर किसी के समय का अनुमान किया जा सकता है, तब ऐसा कोई काल नहीं, जिसमें कालिदास का होना प्रमाणित न किया जा सके। फालिदास पुरुरवा के समय हुए थे, क्योंकि शब्दही नहीं, किन्तु पुरुरवा पर इन्होंने विक्रमोर्वशीय नाटक पनाया है। इसी मकार दुष्यन्त, शिव और रघु, थज, दशरथ, राम सादि सभी के समय कालिदास हुए थे क्योंकि इन सब का इन्होंने वर्णन किया है। इन्हीं कारणों से में कहता हूँ, उन खोजों का सइलन करना मेरे लिए आवश्यक नहीं है। हां, कालिदास के विषय में संस्थत कवियो की जो उकियाँ मिलती हैं, उनका संग्रह कर देना ही मेरे लिए पर्याप्त और प्रामाणिक है। अमिनन्द महाकवि ने कवियों के संबंध में एक श्लोक लिपा है, उसमें कतिपय कवि और उनके माश्रयदाता राजाओं का वर्णन है।
-- ---
फालिदास ।
हालेनोरम पूजया कवियपः श्री पालित सालितः
स्पाति कामपि कालिदासस्यो मीता: शारातिना
भोरपा विततार गदपायपे वागाय पाणी पलम्
सपा ममियपाभिनन्दमपि च श्रीहार का महीना
इस लोक से मालूम होता है कि शक विजयी विक्रम
दित्य के यहां फालिदास रहते थे। कुछ लोग कहते हैं।
इस लोक में पहुवचन का प्रयोग किया गया है, जिस
फम से कम तीन फालिदासों का होना सिद्ध होता है
इस संबन्ध में महाकवि राजशेखर.का एक लोक भी
किया जाता है, जिसमें तीन कालिदासा का होना स
लिखा है-
एकोऽपि जीयते हन्त कालिदासो नदेनधिद।
गनारे ललितोद्गारे कालिदासत्रयो किम् ॥
इस प्रकार नवमसदी के पहले तीन फालिदास हुए थे
यह यात मालूम होती है। फालिदास के नाम से इस समय
अन्य प्रसिद्ध हैं, उनमें कौन किस कालिदास फा बनाया है
'इसका निर्णय करना कठिन है, पणकि इसका कोई पु-
प्रमाण नहीं मिलता।
कालिदास कप हुए थे? उनका समय क्या है? यह पड़ाही
जटिल विपश्यनाया गया है। विक्रमादित्य को समा में कालि-
दास थे घोर विक्रमादित्य का जो समय है अर्थात् ईसपी
सदी से पहले,घोसमय फालिदास का समय है, यह भारतीय
'पण्डितों का कहना है । पर पश्चिमी पण्डित कालिदास कर
समय ५यायाधीं सदी मानते हैं। धारा नगरी केराजा सि-
राज की सभा में परिमल नाम के एक कवि रहते थे, जिन्होंने
फयिता-फीमुदी। अपने को अभिनय फालिदास लिसा है। इससे कुछ लोग इन्हींको फालिदास समाते हैं और सिराज फा समय कालिदास का पतलाते है । वुछ लोग कहते है फालिदास ने मालविकाग्निमित्र नामफ माटफ. में शुगराज अग्निमित्र का वर्णन किया है और उनके युद्ध का उल्लेख किया है जो थामा देखे के समान वर्णन हुआ है। इससे कालिदास का होना ई० स०से पहले मानना चाहिए । रघुघंश, कुमार- सम्भय, मेघदूत, अभिज्ञान शाकुन्तल, मालविकाग्निमित्र और विक्रमोवंशीय ये छः अन्य कालिदास के नाम से प्रसिद्ध हैं। ये संघ अन्य एकही फालिदास फेयनाये है,या मिन्न भिन्न कालि- दासों के, इसका निर्णय करना कठिन है। पर इनकी भाषा पर ध्यान देने से इनये. पफकतत्य होना मानने की इच्छा होती है। इनके अतिरिक्त ऋतुसंहार, नलोदय मादि अन्य भी कालिदास के नाम से प्रसिद्ध है, इन्फे पर्ता कोई दूसरे कालिदास होंगे। ज्योतिथिदामरण नामक ज्योतिप अन्य के फर्ता भी कालिदास थे पर यकालिदास प्रसिद्ध कालिदास से भिन्न थे। (रघुवंश से) भयान्मनः शम्दगुण गुणशः पदं विमानन विगाहमानः रमाकर वीक्ष्य मिथः स जायां रामाभिधानो हरिरिस्युवाच ॥1॥ भगवान रामचन्द्र पुप्पय विमान के द्वारा आकाश मार्ग लङ्का से चले । यहाँसे उन्होंने समुद्र को देखा । उस समय उनके मन में समुद्र के विषय में जो भाव उत्पन्न हुए ये राम- चंन्द्रजी ने अपनी श्री से कहे। से .
पादियात्रा में पं.सामायिष्णु की महिमा ४६ कालिदास। विदेहि पश्यामलयाद्विभक्त मन्सनुमानिलमम्वुरा छायापथेनेव शरत्मसममाकाशमाविष्कृतधारतारम् वैदहि, देखो, मेरे सेतु के द्वारा यह फेनिल चल तक दो भागों में विमत हुआ मालूम प समुद्र शरत्काल के आकाश के समान माद जिसमें मुन्दर तारापछिटफोहों और जो छाया दो भागों में विभक्त हुया हो। गुरोपियक्षाः कपिलेन मध्ये रसातल संक्रमिते तरंगे तदर्थमुरुमदारपनिः पूर्वः फ्लिाय परियधितोदनः ।। इस समुद्र को मेरे पूर्वजों ने ही पदाया है। फरना चाहते थे कपिल उनके यहीय अश्य को रसा लेफर चले गये। उसी अश्य के लिए मेरे पूर्वजा ने गोदी और उसमें यह समुद्र पदा। गर्भ पायमरीयोरमादिदिमताभुक्तं पनि । मदिरापन बहिममी विभति प्रहादन ज्योतिरसम्पनेन । इस समुद्र से सूर्य की फिरण गम धारण करती है, समुद्र में रनों की पृदि दोती है। पिनारपन के जलनयान भाग यह समुद्र धारण करताई भीर प्रराम फरनेपाल योतिरादिफा धारण करता है। सोलामा प्रतिपमान मियत दश व्याप्य दिशो मरिण। किरिस्मानापारपीयमीलया रूपमियतया था ॥५॥ पायनेक थयमा धारण करताराभानी महिमा कयितां-कोदो। ૩. इसकी भी महिमा ऐसी है धीर इतनी है इसका निश्चय नहीं किया जा सकता है। नामिनादाम्बुरहासनेन संस्नूपमानः प्रपमेन पासा । अम युगान्तो विठयोगनिद्रा संहत्य लोकान्पुरुरोऽधिशेते ॥ ६ ॥ प्रलय फाल में भगवान विषणु समस्त लोकों को एकत्र करके हम समुद्र में शयन फरते है और यहां ही विष्णु के नाभिकमल से उत्पन्न आदि प्रहा उनकी स्तुति करते पहरिया गोत्रभिदासगन्धाः शरण्यमेन शतशो महीधाः । नृपाइहोपप्लाविनः परम्पो धर्मांतर मध्यममाध्यन्ते ॥७॥ इन्द्र पर्वतों का पक्ष छेदन फरने लगे । तव अनेक पयत -सकी शरण गये, जिस प्रकार पीड़ित राजा उदासीन धर्मात्मा जा की शरण में जाते हैं। कहते है फि मनाक आदि फई चंद समुद्र की शरण में थय तक वर्तमान हैं। रमातलादादिमयन पुसा भुयः प्रयुफोहनक्रियायाः । भस्यान्टमम्मामलयप्रदं मुहूरवक्तामरण यभूव ॥८॥ बराहायतार में जय भगवान रसातल से पृथवी को अपने तो पर रखकर निकाल रहे थे, तो उस समय यदा हुआ व्यकालीन इसफा स्वच्छ जल, एफ मुहर्त उनके मुख नीशोमा के लिए हुथा था। मुखार्पणेषु प्रकृतिप्रगल्भाः स्वयं तरंगाधरदानदक्षा । अनन्यसामान्यलप्रवृत्तिः पिबत्यसो पाययते च सिन्धुः ॥९॥ नदियाँ समुद्र की ओर मुख करने में स्वभाव से ही गरम हैं और समुद्र भी अपना तरङ्गरूपी अधर देने में दक्ष . फालिदासा है। समुद्र का अपनी स्त्रियों के प्रति यह व्यवहार अनुपम यह नदियों का अधर स्वयं पीता है, अपना उनको पीने लिए देता है। ससत्वमादाय नदीमुखाम्भः संमोलयन्तो विवृताननत्याद । भमी शिरोभिस्तिमयः सरन्धरवं वितन्वन्ति जलप्रवाहान ॥" इन तिमी नाम की मछलियों ने नदी के मुहाने पर प्राणिसहित जल अपने मुंह में लिया। खाने की इच्छा सेज इन्होंने अपना मुंह पन्द फिया, तय इनफे सध्युक्त मस्तक जलधारा निकलने लगी। माउन सहसोत्पतद्विभिमान द्विधा पश्य समुद्रफेनान् । कपोलसमर्पितया य एषा प्रजन्ति कर्णक्षणचामररवम् ॥1॥ यह देखो, जल के हाथो फूद रहे हैं, उनके कूदने के समर समुद्र फैन दो भागों में विभक्त हो जाता है, जो फैन इनके कपोलों पर लगा रहता है, यह एक क्षण के लिए धामर समान मालूम पड़ता है। बेटानिलायमाना मुनगा महामि विस्फजयुनिर्विशेगा। सूर्याशुपपईसरदा प्यजन्त एते मणिमिा फापर ॥१॥ समुद्र के तौर पर य? यह मजगर सर्प पाहुए है, समुद्र की यही पड़ी लहरियों में मिल गये हैं। सूर्य की किरण के पाने से इनके फल के मणि प्रकाशित होत तर पहचाने जाने ६. रासाधि दिनु पर्वालमेलनासामिपंगार। रोतमु कपिशापामनिशाण ॥
. कविता-कौमुदी। ४१ तुम्हारे मधर की समानता करने वाले मूगों पर लह- रियों के वेग से यह शंखों का समूह फैल गया है और मूगों के ऊपर उठते हुए टहनियों में शंखों का मुंह फंस गया है, जिस कारण वे कठिनता से यहां से निकल पाते है। प्रवृतमातण पांसि पातुभावत'धेगाभ्रमता पनेन । भाभाति भूयिष्ठमय समुदः प्रमध्यमानो गिरिणेव भूयः॥ १४ ॥ मेघ ने जल पीना प्रारम्भ ही किया था फि जल के चक्कर के वेग से वह घूमने लगा, ऐसी दशा में मालूम होता है यह समुद्र पुनः पर्वत के द्वारा मथा जाता है । इरादपश्चक्रनिभस्य सन्धी तमालचालीवनराजिनीला । भाभाति बेला लवणाम्दुराशेर्धारानिबढेच कल रेखा ॥ १५ ॥ वह लवण समुद्र लोहे के चक्के के समान है, दूरसे छोटी मालूम पड़ने घाली उसकी तीरभूमि, जो माल ताली आदि रसो से नीली होरही है कलङ्करेखा के समान मालूम पड़ती है। देठानिक केतकरेणुभिस्ते संभावयत्याननमायताक्षि । मामक्षम मण्डनकालहानेवे सीव विम्वाधरवद्धतृष्णम् ॥ १६ ॥ समुद्रतीर का घायु फेतकरेणु से तुम्हारे मुख को शोभित कर रहा है, यह जानता है कि तुम्हारे विम्याधर का मैं अभि- लापीहूँ। और उसके सजाने आदि में जो समय लगेगा, उसके सहने में मैं असमर्थ है। पते वयं सेकतभिप्रशुतिपर्यस्यमुक्तापटक पयोधेः । माठा मुहूर्तेन विमानपेगात्कूले फलावर्जितपूगमालम् ॥ १० ॥ एक मुहूर्त में ही विमान के वेग से हम लोग समुद्र स तौर पर पहुंच गये हैं, जहां तीर की गोली ज़मीन पर . ४ -- पालिदाग। फटी हुई सीपी गे मोनिया टी तुरंभीर फलम: सुपारी फे पृश हैं। सुरम्य तायकरमोर. पानमा, मुगनिधिपानम्। . पपा पिरीमा गमुद्रामानना नियातील भूमिः ॥ ८॥ हे फरमोर, तुम्हार न मृग के समान है, इसलिए तुन पोछे-जिस मार्ग कोम लोग छोद माये हैं-देखो, पह समुद्र से दूर होनेवाली भूमि और न मानों पास दौड़ भाते हैं। पचित्रपया मंचरतं मुरामा शक्तिनाना पसता पिच । पथाविधी में मनमोऽमिलाप प्रयतं पश्य तथा विमानम् mm. कभी देवताओं के मार्ग से, यमी मेघ मार्ग से और का पक्षियों के मार्ग से यह विमान चल रहा है, इसके चलने । विषय में जैसी मेरे मन की इच्छा होती है, वैसेही यह विमान भी चलता है। असौ महेन्दुद्धिपदानुगन्धिसिमागंगावीचिविमशीतः। भाकाशवायुर्दिनयोयनोत्यानाधामति स्वेदलवान्मु ते ॥ २०॥ यह आकाश-वायु जो इन्द्र के हाथी के मदगन्ध से पासित है और गङ्गा की तरङ्गों के संसर्ग से शीतल हो हैदोपहर के कारण तुम्हारे मुंह पर जो पसीना मा उसे पॉछता है। करेण वातापनलम्यितेन स्पृष्टस्यया चण्डि कुतूहलिन्या । भामुघतीवाभरणं द्वितीयमुनिवविक्षुदलयो धनस्ते ॥ ॥ २ चडि, कुतहलिनी होकर तुमने मिडफी से हाथ निकाल छुआ. उससे मेघ का गिद्युत्म्पो आभरण प्रर यको कविता-कौमुदी । ५१ शित हो गया और मालूम पड़ने लगा कि.वह तुम्हे दूसरा थाभरण पहना रहा है। ममी जनस्थानमपोढविप्न मत्वा समारब्धनवोटजानि । अध्यासने चोरभृतो यथास्वं चिरोग्झितान्याश्रममण्डलानि ॥२२॥ जनस्थान के सभी वाधाविघ्न दूर हो गये, यह समझ कर ये मुनिगण नये भोपड़े बना रहे हैं और अपने अपने आश्रमों में जो बहुत दिनों से छूटा हुआ था-' रोपास्थली या विचिन्यता या भ्रष्ट' मया नपुरमेवमूर्ध्याम् । भदृश्यत न्वघरणारविन्दविश्लेपदुःखादिव बद्धमौनम् ।। २३ ॥ यही भूमि है जहाँ तुम को हूँढते हुए मैंने पृथियो पर गिरा हुआ तुम्हारा एक नूपुर देखा था, जो तुम्हारे चरणों दुःख से मानो चुपचाप पड़ा था। त्वं रक्षसा भीरु यतोऽपनीता त मार्गमेताः कृपया लता मे । अदर्शयन्यक्तुमशम वत्यः शाखाभिरायजितपटवाभिः ॥ २४ ॥ हे भोरु, राक्षस तुमको हर कर जिस मार्ग से ले गया यह मार्ग कृपाकर इन लताओं ने मुझे बतलाया था। ये घोल नहीं सकती थी, पर पल्लवहीन शाखाओं के हारा इन्होंने के वियोग यतलाया। पुण्यश्च दर्भार कुरनिर्यपेशास्तयागति समयोधयन्माम् । प्यापारयन्त्यो दिशि दक्षिपस्यामुत्पदमराजीयविलोचनानि ॥ २५ ।। तुम्हारा पता मुझे इन मृगियों ने बताया । इन्हों ने पास खाना छोड़ दिया, और विकसित घ.मल के समान अपनी भासें दक्षिण दिशा की ओर उठायीं, इससे तुम्हारा दक्षिण दिशा में जाना मुझे मालूम हुआ।
फालिदास । -AAAA एतदुगिरेमास्यवतः पुरस्तादाविभवायम्बरखिम् । नव पयो यत्र धनैर्मया च त्यद्विप्रपोगाशु सम विसृष्टम् ॥२६॥ इस माल्यवान् पर्वत के आगे जो भाकाश को छने वाला पर्वत का शिखर दिखायी पड़ता है, यहां मेघों ने.तो नधीन जल बरसाया और मैंने तुम्हारे वियोग से उत्पन्न भा। गन्धय धाराहतपस्वलानां कादम्बमविगतकेशाच। स्मिधार केकाः शिसिनो बभूवुर्यस्मिनसहपानि विना स्वया मे ॥२॥ जहां तुम्हारे बिना मुझे ये सय चीज़ असह्य मालू पड़ती थी-वृष्टि के कारण छोटे छोटे जलाशयों से उत्पा गन्ध, अर्धविफसित फदम्य पुष्प और मयूरों की मनोह में पूर्वांनुभून स्मरता च या कम्पोसा भीरु सपोपपदर गुरापिसारीपयतिवाहितानि मया कप चिदुपनगजितानि ॥२८॥ भीक, उस समय पहले का अनुभूत तुम्हारा सफर मालिङ्गन मन स्मरण किया और उसी स्मृति से गुहा फलनेयाला मेघगर्जन फा समयमंने किसी प्रकार पिताया। मातारशिक्षशिसिवापयोगान्मामक्षिणपत्र विमिनकोशः शिरामममाना मयसम्दस्ते विवाभूमारणलोचनची ॥ २९॥ रस शिखर पर मैंने यिफसित फन्दली फे नये टि से सीपी दुई भूमि माफ फे कण उसमें लगे हुए थे नको देखने से मुझे विवाह के धूम से साल हुई तुम्हार जो का स्मरण हो गया और उससं मुझे पढ़ा कर एमा मानवानीरगनापणदाम्याप्टयारिष्टवारमानि । mad पिलीपदारमनि पम्पासरिटानि Tita.. पुष्प देखें कविता-कौमुदो। यह पम्पा का जल समीपस्प वेतस वन से छिपा हुआ है। पर चञ्चल सारस थोड़ा दिखायी पड़ते हैं। उस पम्पा जल को दूर से पड़ी हुई मेरी दृष्टि मानों थफ कर पान कर रही है मर्यात वहां से हटना नहीं चाहती। भवावियुक्तानि स्थाननाम्नामन्योन्यदत्तोत्पलकेसराणि । इन्दानि इरान्तरवर्तिना ते मया प्रिये सस्पृहमीक्षितानि ॥३॥ यही पम्पासर पर मैंने अवियुक्त चक्रवाफ दम्पती को देखा था। वे आपस में एक दूसरे को कमल केशर दे रहे थे उनको तुमसे दूर रहने वाले मैंने पड़ी स्पृहा से देखा था। इमां तटाशोकलवां च तन्धीस्तनाभिरामस्तवकाभिननाम् । न्वत्माप्ति पुप्या परिरन्धुकामः सौमिक्षिणा साश्रु रह निपिद्धः ॥३२॥ इस पतली पातीर की अशोकलता को, जो गुच्छरूपी स्तनों के कारण नय गयी है, देख कर मैंने समझा कि तुम मिर गई और आलिंगन करने के लिए चला, पर रोते हुए उमण ने मुझे पैसा करने से रोक दिया। भमूर्विमानान्तरलम्बिनौनां ध्रुत्वा स्वनं कांचनकिंकिणीनाम् । मत्युदन्तीय समुत्पतन्यो गोदावरीसारसपढ्यस्त्वाम् ॥ ३३ ।। विमान के भीतर स्टकनेवाली सुवर्ण की घंटियों का सद सुन कर आकाश में उड़ने वाली यह गोदावरी के सारसों की पंक्ति तुम्हारी ओर आ रही है। एषा वयापेशलमध्यपापि घटाम्दुसंवर्षितवारभूता भानन्दपन्युन्मुखकृष्णसारा दृष्टा चिरात्पशवटी मनो मे ॥३॥ यह पंचवटी है, जहां छोटे छोटे आम के वृक्षों को घड़े के बस से नुमने पदाया था, जिसमें कृष्णमृग ऊपर की भोर कामदाम। स रहे हैं । यहुन दिनों पर देगने के कारण यह पंचवटी तुझे आनन्दित कर रही है। भयामुगाई गगयानिगरतरगयानन विनीतगंदः । रहस्यदुत्सानिया मयां ग्मगनि वानीरगृहेषु मुतः ॥ ३५ ॥ यहाँ गोदावरी कतीर पर में शिकार मे लौट कर भाया। गोदावरी की तरंगों से मेरी थकावट दूर हुई और तुम्हारी द में मैं सोगया। मैं यतस गृह का अपना सोना स्मरण करता है। भ्र भेदमाप्रेण पदान्नयोनः प्रशयां यो नहु चकार । . तम्याविलाम्भःपरिशुद्धितीमो मुनेःस्मानपरिग्रहोऽयम् ॥३६॥ जिन्होंने भृकुटि के संचालन मात्र से नद्रुप को इन्द्रपद से दुटा दिया था, उस मुनि का-जो गोद ले जल को शुद्ध बनाने, यह पृथवी का स्थान है, अर्थात् अगस्त्य का भाश्रम है। प्रेताग्निधूमाप्रमनिन्यकीते स्तस्पेदमानान्तविमानमार्गम् । प्रात्वा हविर्गधिरजोविमुक्तः समश्नुते मे लघिमानमात्मा ॥३॥ उस महर्षि के तीनों अग्नियों का धूम जिसमें हवि को गन्ध है, विमानमार्ग तक आरहा है, उसके धने से मेरा मन निष्पाप होगया है और यह हलका मालूम पड़ता है। एनन्मुनेमानिनि शावकणे:पचाप्सरो नाम विहारवारि भमाति पर्यन्तवनं विद्वान्मेघान्तरालयमिवेन्दुविम्यम् ॥ ३८॥ हे मानिनी,यह शातफणीं मुनि के पश्चाप्सर नामफ झोडा तर जो पारो तरफ से पा से घिरा हुमा, मेघों से छिपे चन्द्रमा के समान मालूम पड़ता है।
----- पादिता ITAMITTRIArunghargriना । Alia hatkin carREE २॥ पाने में मुनि दरगान ir pी थे. गाय गते पारी मापन पर बार अपराधी मेज पर पान मा । Eri Rang frame PHRIRATREATRunsilsinal Mirl में गया. उस मुनि पं. यहाँ सदा नयाने मा का चोप. प. पिमान में. ऊपरपाले कमरे नीनियर Nawat yri IIरिः । ther RITE TIfti दाय: initi मारयति गुमाग पं.ये मर सपापी तपस्या Ram पर , पंचाग्नि में पार तो अUिrnाग्यो । गतिमानपानानि । मार सिलिगुराणमातिसमष्टिगानि ॥४२॥ यपि नया गाड्या गं मी पो शहा होगयी है, गने इन सिपी गयी हिरमुस्कुराहट और Eगी मिला उगाना, पि.गी यदान परधनी का दिख- टाना नया उनके लिए प्यपहार इनको विचलित ही फरग। एपीक्षमादायर गगाजी काहगिनार पुशमाचलायम् मानने मयाः सम्यता प्राध्यमिः प्रयुएको ।।४।।
फालिदास ।
ये ऊवं याहु हैं, हमारे स्वागत के लिए इन्होंने
भुजा हमारी ओर उठायी है, उसमें अक्षमाला का
धारण किया है और वह हाथ मृगों की सुजलाहट दूरम
है तथा कुश लाता है।
पायमत्वात्प्रणति' ममैप कम्पेन किंचित्प्रतिगृह्य सूर्म ।
दृष्टि' विमानम्यवधानमुक्ता पुनः सहसाधिपि सनिपत ।।।
ये मौनी है, इस कारण शिर थोड़ा हिला कर इन्होंने में
प्रणाम प्रहण किया है, यिमान फेय्ययधान से मुक्त हुई हुष्टि
पुनः सूर्य की फिरणों में ये लगाते है।
भदः शरण्यः शरमानानस्तपोवन पावनमारिताग्नेः ।
चिराप संतप्पा समिभिरग्नि पो मन्त्रपूता तनुमप्यहोचीत ॥
यह भग्निहोत्री शरमग मुनि
फा पवित्र तपोयन है
जहां शरणार्थियों की रक्षा होती है। लफड़ियों से पान
दिनों तक मग्नि को सन्तुष्ट कर जिसने अन्त में मन्त्रा
अपने शरीर का भी हयन कर दिया।
डापाविनीतापरिममे भूपिश सभाष्यफसेप्यमी।
तस्यातिथीमामधुना सपा स्थिता गुपुनविपारपेषु ॥
या शरमंग के अतिथियों की परियां सुपुत्र के समान
उनके माधम के पक्षों पर है, ये पक्ष मपनी छापावासपपिक
के परिश्रम का दर फरलं है, मोर भनेक प्रकार के फल देते है।
मान् महनि गय नहीं है।
भावनांगारिशीमुचीमा नामनामाणावर
प्रानि में सामान पानिnिsin
दती मुख से सहा गद दोहा सिस
(शिखर पासींग) मेघनी पत्रप.मगा मा पापुर,
फपिता-कौमुदो। गात्रि, यह चित्रकूट पपंत मस्त थल के समान मेरी आँखों कोबांध रहा है। एपा समस्तिमिताहा सरिद्विवान्तरमायतन्यो। मन्दाग्निी माति मगोपटे मुफापसी फण्टगतेय भूमेः ॥४८॥ यह मन्दाकिनी नदी पहुत दूर होने के कारण छोटी मालूम पड़ती है, इसका प्रयाह सुन्दर और निश्चल है, पर्यंत के पास यह नदी पृथ्वी के गले में पड़ी हुई मोतियों की माला के समान मालूम पड़ती है। भय मुभादोऽनुगिर तमादपालमादाय मुगन्धि पस्य । पवार,रा पाण्युपपीटशीमी मयावतंसः परिकल्पितस्ते ॥४९॥ पर्वत के पास सुन्दर उत्प हुआ यह तमाल वृक्ष दिखाई पड़ता है, जिसके सुगन्धित पाटर लेकर यवाडर के समान पीले तुम्हारे फपोलीपर शोभनं घाला कर्णभूपण मैने यनाया था। मनिमहत्रामपिनीतसत्यमपुष्यलिङ्गारफलपन्धि वृक्षम् । .. धनंतपः साधनस्तदपिष्टतोदनतरप्रभावम् ॥ ५० ॥ यह अत्रि मुनि की तपस्या का धन है, जहाँ उनका विशाल प्रभाव स्पट दीख पड़ता है। बिना दण्ड और भय के हो यहाँ के जन्तु यिनीत हैं और पुष्प के यिनाही वृक्ष फल देते हैं। भप्राभिपेकाय साधनानां सप्लपि'हस्तीदरतहेमपद्माम् । प्रवर्तयामास किलानुसूया तिस्रोतसं त्र्यम्बरमौलिमालाम् ।।५१ भनि मुनि फी पत्नी अनुसूया ने यहाँ तपस्वियों के स्नान आदि के लिए गंगा को प्रवाहित किया है, जिस गंगा से सप्तर्षिगण सुवर्ण-कमल तोड़ते हैं और जो गङ्गा शिवजी के मस्तक की माला है।
कालिदास । वीरासनाननुपाम्पीणाममीसमभ्यासितवेदिमायाः । निवातनिष्कम्यतया विभान्ति योगाघिस्दा इव शाखिनोऽपि ५२॥ जिस वेदी पर वीरासन से बैठ कर ऋषि लोग घ्य फरते हैं, उस बंदी पर के वृक्ष वायु के न होने के कार निष्कम्प हैं और वे योगी के समान मालूम पड़ते हैं। त्वया पुरस्तादुपयाचितो यः सोऽयं वटः श्याम इति प्रतीतः। राशिमणीनामिव गारुदानां सपद्मरागः फलितो विभाति । ५३" तुमने पहले जिससे प्रार्थना की थी, यह वही प्रसिर व्यामवट है, जो हरित मणि के राशि के समान मालूम होत है और फलने पर पद्मराग युक्त हरितमणि के राशि के समान बालूम पड़ता है। कचित्प्रभाले पिभिरिन्दनीलमुक्तामयी यष्टिरिवानुविदा । भन्यत्र माला सितपंकजानामिन्दीवरखचितान्तरेव ॥५४॥ गङ्गा और यमुना की तरहों के आपस में मिलने से बालूम पड़ता है कि मुक्तामयी यष्टि में प्रकाशमान इन्द्रनील हो और श्यंत कमल की माला के समान मालूम पड़ता है उसके यीच बीच में नील कमल गूथे गये हो। कचिन्मयाना नियमानमानां कादम्बसगंवतीय पतिः। भन्यप्रकारागुरुदापत्रा भकिमुवचन्दनकम्पितंव ॥ ५५ ॥ यहाँ मानसगेयर कमी श्यंत हमाफी पक्ति-जिसमें ले हसॉरी मिली हुई सी मालूम होती है, और यहाँ पयो पर चन्दन सं चित्र यनाया गया जो फालं माह की याच पांच में सामांची गयी सामादम पड़ता है।
कविता-कौमुदी। चित्प्रभा चान्द्रमसी तमोभिश्छायाविलीनैःशवली कृतेव । अन्यत्र शुभ्रा शरदभ्रलेखा रविवालक्ष्यनभःप्रदेशा ॥ ५६ ॥ फहीं छाया में छिपे अन्धकार से मिली हुई चन्द्रमा की प्रभा के समान और कहीं शरद् के शुभ्र मेघ के समान मालूम पड़ता है जिसके मध्य में आकाश दिखाई पड़ता है। चिच कृपणोरगभूषणेव भस्माङ्गरागा तनुरीश्वरस्य । पश्यानवद्याङ्गि विभाति गङ्गा भिन्नप्रवाहा यमुनातरङ्गः ॥ ५७ ॥ कहीं महादेव के शरीर के समान मालूम पड़ती है, जिसमें काले सर्प लिपटे हैं और जो भस्म के कारण श्वेत है । हे सुन्दराङ्गिः यमुना की तरङ्गों से मिलने के कारण गङ्गा पेसी मालूम पड़ती है, यह तुम देखो। - अभिज्ञानशाकुन्तल से यास्यत्यय शकुन्तलेति हृदय संस्पृष्टमुन्कण्ठया, कण्टः स्तम्भितवाप्पत्तिरनिश चिन्ताज दर्शनम् वैतन्य मम तावदीश महो स्नेहादरण्यौकसः पीड्यन्ते गृहिणः कथं नु तनयाविश्लेपदुःख वैः ॥ ५८ ॥ ।। भाज शकुन्तला जायगी, इससे मेरा हृदय उत्कंठित हो गया है, गले में पाप्प के रुक जाने से आवाज़ नहीं निकलती, कुछ दिखाई नहीं पड़ता। मैं धनवासी है, फिर भी स्नेह के कारण इतना ध्याकुल होगया है। तब संसारी जन कन्या फे नवीन वियोगदुःख से क्यों पीदित न होते होंगे। आंतों से पालामा --- पायुम प्रथम पनि गुम्मायतीनंत या, मादरा प्रियमगहनाशिमा स्नेहन या पर मायः मुगुमाशिपमये यापामायुमरः मेयपाति साना पनि गरनुमायणाम् ॥५५ वृक्षों को सम्बोधन परफे. महर्षि पण्य कहते हैं, ग्य को बिना जल दिय जो म्यय पाले जल न पीनी चापि उसको गहने प्यार ) तथापि स्नेह से पारस तं न तोड़ती थी, जय माप मय को परले पहल फूल 3 T, उस समय जो उत्सय करती थी, यह शकुन्तला । पने पतिगृह में जाती है, थाप मच आशा दें। यस्य त्वया मणविरोणमित दीना सैल न्यपिप्यत मुसे कुशमचिविद्ध, पामाकमुष्टिपरिवदितको जहाति सोऽयन पुत्रकृतकः पदवी मृगतं ॥ ६॥ जिस मृग को कुश का डास लगन से धार होगया र उसमें इङ्गदी का तेल तुमने लगाया था, क्योंकि यह व भरने के लिए प्रसिद्ध है, जिसको तुमने साँचा की ! र पाला था, वह तुम्हारा कृत्रिम पु मृग तुम्हारा स छोड़ता। भस्मान् साधु विचिन्त्य संपनधनानुकुल चात्मनः स्त्वय्यस्याः कथमप्यवान्धयता स्नेहप्रवृत्ति' च ताम्,. सामान्यप्रतिपनिपूर्वकमियं दारेषु दृश्या त्यया, भाग्यायत्तमतः परं न खलु तद्वाच्यं वधूवन्धुभिः ॥1॥ मुनि शकुन्तला के लिए राजा को सन्देशा कहते हैं- तपस्वी हैं इस बात को सोच कर अपने ऊँचे कुल।
कविता-कौमुदी । योर देख कर और यान्धयों की आज्ञा के बिना भी इसने जो तुम पर प्रेम किया है, उसकी ओर देख कर तुम अपनी स्त्रियों में इसे साधारण प्रतिष्ठा का पद देना, इसके बाद जो कुछ है यह भाग्याधीन है, यह कन्या के स्वजनों के कहने की बात . शुश्र पस्व गुरून् कुरु प्रियसखोवृत्त सपनीजने, भविप्रकृतापिरोपणतया मास्म प्रतीपं गमः, भूयिष्ठं भव दक्षिणा परिजने भाग्येप्वनुत्सेक्निी, यानन्येवं गृहिणीपदं युपतयो वामा कुलस्वाधयः ॥ १२ ॥ पतिगृह में जाने के समय मुनि ने शकुन्तला को उपदेश दिया-पड़ों की सेवा करो, अपनी सौतों से प्रियसखी के समान न्यवहार करो, पति यदि अपमान भी करें तो क्रोध से उनके विरुद्धाचरण मत करो, नौकर चाकरों के साथ उदारतापूर्वक यवहार फरो। अपने भाग्य का गर्व मत करो, स्त्रियाँ इसी प्रकार गृहणी पद पाती हैं, इससे विपरीताचरण करनेवाली इल की कण्टक होती हैं। अर्थोहि कन्या परकीय एवं तामद्य सम्प्रेष्य परिगृहीतुः जातो ममाय विशदः प्रकाम प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा ।। ६३ ।। पन्या परफी धन है, उसको पति के पास भेज कर मेरी पारमा हल्फी होगयी है, जिस प्रकार किसी की थाती लौटाने रसारमा प्रसन्न होती है।
कालिदास । मेघदूत से भमिंग प्रियमविधवे विद्धिमामम्वुवाह तत्सन्देशहदयनिहितैरागत त्वत्समीपम्, यो वृन्दानि न्वरयति पथि धाम्यतां प्रपितानाम्, मन्दस्निग्ध्वं निभिरबलावेणिमोक्षोन्सुकानि ॥ १४॥ यक्ष मेघ से अपनी स्त्री से कहने के लिए सन्देश कह है। मैं तुम्हारे पति का मित्र है, मुझे तुम मेघ समझो तुम्हारे पति का संदेश लेकर मैं आया है, मेरा गर्जन सुन - मार्ग में विश्राम करनेवाले ये पधिक जाने के लिए जल्द फरते हैं, जो अपनी स्त्री के वियोगिनी चिन्ह वेणी पंध सुरु पाने के लिए उत्सुक रहते हैं। इत्यागपाते पवनतनयं मैथिलीवोन्मुखी सा स्वामुरकाटोप्ट्यसितहदया वीक्ष्य संभाष्य पैर, धोयत्यस्मात् परमवदिता सौम्यसीमन्तिनीना कान्तोदन्तः मुदतुपनतः संगमात किंचिदनः ।। ६५॥ जय तुम ऐसा कहोगे तो यह हनुमान को जानकी के समान उत्पण्टित दोफर तुम्हारी भोर देखेगी भोर तुम्हारा सरकार करेगी। इस पश्चात् सावधान होफर तुम्हारी पाने एनेगी। सोम्य नियों के लिए पति का संदेश उसके मित्र के द्वारा यदि मिले तो संगम से थोड़ा ही कम है। बामायुप्मन मम च वचनादारमनश्री न.पा एवं तव सहचरी रामगिपाश्रमम्पा अम्या शरमवले पनि यो पियुः माय मुखभविपदा प्रापिनामेव .
No text on this page.
फालिदास । - भच स्तायन्गुहरपनि टिरालुप्यते मे करमरिनमपि न सहते सनम नौ कृतान्तः ॥ ६ ॥ गेरू आदि धातुओं से पत्थर पर मैं तुम्हारी प्रणय कुरी मूर्ति अङ्कित करता है, और उस मृत्ति के चरणों पर जर पड़ना चाहता है उस समय आंसू से ओर भर जाती है, भाग्य ऐसी दशा में भी हम लोगों का सक्षम नहीं देख सक मामाकाशप्रणहितभुज निर्दयाश्सेपहेतो- लब्धायास्ते कयमपि मया स्वमसन्दर्शनेषु, पश्यन्तीनां न खलु यहुशो न स्थली देवताना मुक्तास्थलास्तरकिशलयेप्वधु लेशाः पतन्ति ।। ७० ॥ स्थान में जब कभी मैं तुमको पाता है, तब गाहालिङ्गन फरना चाहता हूँ और गाहालिङ्गन करने के लिए आकार में-शून्य में हाथ बढ़ाता है, मेरी यह दशा देख कर धन देव ताओ के बड़े बड़े अवविन्दु वृक्षों के पत्तों पर गिरते हैं। भिरवा सदयः किशलयपुटान देवदारुगुमाणाम् ये तत्क्षीरस्तुतिमुरभयो दक्षिणेन प्रवृत्ताः आलिंग्यन्ते गुणवतिमया ते तुपाराद्विवाताः पूर्वस्पष्ट' यदि किलभवेदगमभिनवेति ॥1॥ देवदारू वृक्ष के पत्तों से होकर और उसके दूध से पुर्ण जो हिमालय की यायु दक्षिण की ओर से चलती है उसक इस अभिप्राय से थालिडन करता है कि पहले इस पार तुम्हारे अंगों का संयोग हुआ होगा।
फयिता-कोमुदो।
'६५
an-un--.
कुमारदास
इन्होंने जानकीहरण नाम का फाय लिखा है, इनका
यह फाग्य फालिदास के काश्यों के यराबरी का है।महाकवि
राजशेखर ने इनके विषय में इस प्रकार लिखा है-
जानकीदरण कर्नु रघुवंशे स्थिते सति
कविः कुमारदासो या रायणो धा यदि क्षमी ।
कुछ लोगों का कहना है कि ये कुमारदास सिंहल के
राजाये और फालिदास के मित्र छठी सदी में फुमार•
दास नाम का एक राजा सिंहल द्वीप में था, इसका पता
मिलता है । सम्भव है तीन फालिदासों में फा दूसराया तीसरा
कालिदास इनफा मित्र भी रहा हो । सतीशचन्द्र विद्याभूपण
ने बतलाया है कि कालिदास की समाधि का पता सिंहल में
लगा है।
जोहो, इन बातों से यह मानना कि रघुवंश कर्ता फालि-
दास के मित्र कुमारदास थे यह ठीक नहीं: ययोंकि दोनों के
समय में विशेष अन्तर है। हां सिहल के राजा की राम.
चन्द्र में ऐसी प्रगाढ भक्ति का होना अवश्य ही एक आश्चर्य
की बात है।
: कुमारदास की कविता यड़ी ही सरस और स्वाभाविक
होती थी, इन्होंने अपना काव्य रघुवंश की आदर्श मान कर
यनाया है, दुःख की बात है कि आज इसका प्रचार नहीं।
इनके कुछ श्लोक सुनिये।
शिशिरशीकरवाहिनि मारुते
घरति शीतभयादिव सत्वरः।
५
कुमारदास।
मनसिजः प्रविवेश वियांगिनी-
हृदयमाहितशोकहुताशनम् ।
शिशिर ऋतु में ठंढे जलकण लेकर जब हवा यहती थी
तप शीत फे भय से कामदेव शीघ्रही वियोगिनियों के हृदय में
घुस गया, क्योंकि थियोगिनियों के हृदय में शोकाग्नि रपत्री
मान्या विपश्यानय दक्षिणाशा,
मालमय.सर्वत्र करप्रसारी,
हत्यिकततो निःस्य इस प्रकरथे
यसूपसरध्ये धनदस्य पाराम् ।
दरिद पुरोहित जिस प्रकार दक्षिणा की भाशा से चारों
सरफदाय फैलाता फिरता है और धन के लिए दाता के पास
जाता है। उसी प्रकार सूर्य दक्षिणाशा दक्षिण दिशा में धूम
पर उसने सय जगह पर-हाथ पलाये और प्रकाश प्रात
करने के लिए गयेर की दिशा--उत्तर दिशा में यह गपा।
भरि मिनदीहिरोइन
ग्या मममीद पठभ,
भरणांनुगमएर पती
पालनु सम्मादम्ति काटा,
मालिन यय हो गयगम से धन पाहन, or
पहभागादियोri, कुपाटयाल रहे हैं।
पण तो ममाधिपात
मनोविधाननिय ay:
Refrankीना-
सिगना मुमकितई।
कविता-पोमुदो। यदिदेयता हुआ बनाता तो फामदेव दृष्टिपात से अवश्य मारा जाता और यांसे चन्द फर बनाने की उसमें शक्ति ही नहीं है, फिर ब्रह्मा मे जंघा फैसे बनाये, यह युद्धिमानों का - उसके विषय में वितर्क है। पयः प्रकपर्यादुपचीयमान- स्तनदयस्पोदहनश्रमेण भत्यन्तकाश्य वनजायताश्या मध्यो जगामेति ममैप तर्कः । उमर के साथ साथ यहने पाले स्तनों के ढोने के परि- श्रम से उस कमलाक्षी को कमर पतली होगयी है, यह मेरा तर्क है। कृष्णमिथ यति उन्होंने प्रयोषचन्द्रोदय नाम का एक नाटक बनाया है। कोतिरमा नाम फे चालुक्य राजा के पाश्रय में ये रहते थे। कीर्तिया "चन्द्रान्वय" कहे जाते थे, चालुक्य वंशवाले अपने को चन्द्रवंशो समझते हैं इसी कारण कीर्तिवर्मा का विशेषण “चन्द्रान्यय" था, कल चूरी बंश फा राना कर्ण कीर्तिवर्मा का शत्रु था। उसने कीर्तिवमो को पराधीन बना दिया था, पुन: उसके सेनापति ने इन्हें स्वाधीन बनाया, ये ग्यारहयों ई० सदी उत्पन्न हुए थे। कृष्णमिश्र का प्रयोध चन्द्रोदय धार्मिक नाटक है, उसमें कामक्रोध आदि कुवृत्तियों के प्रास्फालन फा वर्णन है, क्षमा सन्तोष आदि से होनेवाले लाभ भी घतलाये गये हैं, अन्त में ब्रह्मतत्व का भी निरूपण अच्छे ढंग से किया गया है । यह म नाटक मक्तिप्रधान है।
मित्रांना एवामिभामेर होगाम गुगामी जानियेमिनिमदिन, गृतीनिनिगमगाहापागम, तीमा मुग्नपरिपः। एफ यस्तु फी चाह मे महादर माइयों में भी पैर होता दियह प्रसिद्ध है। गियी केही फारण फोरय पाण्डयों फठिन पिगंघ हुआ था और उसमें संसार का नाश हुमा सहनमहिन्यानमारमा भवति मयः प्रमवामनारागुः जलधापदयीमयाय प्रमा ज्यटनयिनाशमनुप्रयानि नाशम् । मयमाय में नीच और कुटिल प्रकृतियाले मनुष्यो । जन्म अपने और अपने कुल के नाश के लिए होता धूि मेघ यत.पर पहले अग्नि का नाश करता है पुनः स्वयम् नष्ट होजाता है। अन्धीकरोमि मुवन बधिरीकरोनि, ह धीर' सचेतनमचेतनतां नयामि। कृत्य न पश्यति न ये नहित पोति, धीमानधोतमपि न मतिसन्दधाति । क्रोध कहता है कि मैं लोगों को अन्धा घना देता है चहरी बना देता है, मैं ऐसा कर देता है जिससे मनुष्य अपन कर्तव्य भूल जाता है, बुद्धिमान मनुप्य भी पढ़े हुए विषयों के स्मरण नहीं कर सकता है। m: ध्यायन्ति यां मुखिनि दुःखिनि चानुकम्पा पुण्यक्रियासु मुदितां कुमतावुपेक्षाम् । ET : पुर्व प्रसादमुपयाति हि रागलोम- छेपादिदोपालुपोऽप्ययमन्तरात्मा । +
फयिता कौमुदी।
६६
जो सुलियों से मैत्री, दुलियों से प्रेम, पुण्य से प्रसन्नता का
अनुभव और फुयुद्धि की उपेक्षा करते हैं उनका अन्तरात्मा,
राग लोभ प आदि दोनों में फलुपित होने पर भी शुद्ध हो
जाता है।
प्रायः सुकृतिनामय देवायान्ति सहायताम्,
अपन्धान सु गच्छन्त सादरोऽपि विमुमति ।
: पुण्यात्माओं के कार्यों में प्रायः देवता लोग भी सहायता
करते हैं और कुमार्ग जानेवाले का साथ सहोदर भाई भी
जड़ देता है।
कमोन वाचा शिरमो न शूल
न चित्ततापो न तनो विमदः
न चापि हिंसादिरनयोगः
साध्या परमोध जयेष्मेका।
१.. वचन को परिश्रम नहीं करना पड़ता । शिर में दर्द ही
होता है, चित्त को भी दुःख नहीं होता, शरीर के टूटने फटने
का भी भय नहीं रहता, हिंसा आदि पापों के होने का भी
भय नहीं रहता, केवल में ही (क्षमा) क्रोध को जीतने के
लिए उत्तम साधन हूँ।
त पापकारिणमकारणवाधितार
स्वाध्यायदेवपितृयज्ञतपःझियाणाम्
बोधस्फुलिङ्गमिव दृष्टि भिरु मामन्त
कात्यायनीवम हि विनिपातयामि ।
। उस पापी को जो बिना कारण स्वाध्याय, देव यश पितृ-
यह आदि क्रियाओं को नष्ट करता है, आखों से अग्निस्फुलिंग'
उगलेता है जिस प्रकार कात्यायनी ने महिषासुर को मारा.
था-मैं (क्षमा ) पछाडूंगी।
a
मनोमा यात्रा
पामिरमरमेर पराम
गुममा जगत मिति गितम
. सधीनिनिगममारनामा,
सीमा मुनारिं पः।
एफ यस्तु को चाह में महोदर मामी
दियह प्रसिद्ध है। गिनी केही फारण :
कठिन यिगंध हुआ था और उसमें मंसार ष
सामलियाममायभाना
भवति मयः प्रमयामनातुः
जनधरपदयोमयायमी
ग्यलनग्निाशमनुप्रयानि नाशम् ।
म्यभाय में नीच धीर कुटिल प्रतिवाले
जन्म अपने और अपने कुल के नाश के लिए
मेघ यत.फर पहले यग्नि का नाश करता है पुर
नष्ट होजाता है।
अन्धीकरोमि भुवन यधिरीकरोमि,,
धीर' सचेतनमचेतनता नपामि ।
कृत्य' न पश्यदिन ये महितगणोति,
धीमानधोतमपि न प्रतिसन्दधाति ।
फ्रोध कहता है कि मैं लोगों को अन्याय
छहरा बना देता है, में ऐसा कर देता है जिससे म
फतथ्य भूल जाता है, युद्धिमान मनुष्य भी पढ़े हुए
स्मरण नहीं कर सकता है।
पायन्ति यां मुखिनि दुःखिनि
पुण्यक्रियासु मुदिता
:: 7 एवं प्रसादमुपयाति हि
उपादिदोपकलुशोर
- कविता-कीमुदी। क्षेमेन्द्र ये कश्मीर के रहनेवाले थे । फारगीरराज अनन्तराज के समय में इन्होंने समय मातृका नामफा एक अन्य यनाया था। ये दसवीं सदी के समझे जाते हैं। ये बहुत बड़े पंडित लोक- व्यवहार-चतुर सुकवि और परिधगी थे, इन्होंने धौद्ध- साहित्य की भी पुस्तफै लिखी हैं। इनके पनाये तीस अन्धों का पता अभी तक मिला है। क्षेमेन्द्र के बनाये ग्रन्य १ अभूततरंग काव्य, १६ बोधिसत्यावदानकल्पलता २अवसरसार, १७ भारतमंजरी, ३ौचित्यधिचार चर्चा, १८ मुक्तावली, ४ फनफजानकी, १६ राजाबली, ५कलाविलास २० रामायणमंजरी, ६ कयिकंठाभरण, २१ लावण्यवती, ७ चतुर्वर्गसंग्रह, २२ लोकप्रकाशकोश ८ चारुचर्या, २३ वात्स्यायनसूत्रसार, चित्रभारत, २४व्यासाष्ट्रक १० दशावतार चरित, २५ शशिवंशमहाकाव्य, २९ देशोपदेश, २६ समय मातृका, १२ नीतिकल्पतरू, २७ सुवच तिलक, १३ पद्यकादंबरी, २८ सेव्यसेवकोपदेश, १४ पवनपंचाशिका, २६ शिवसूत्रविमर्शिनी १५ वृहत्कथा मंजरी, ३० म्पन्दनिर्णय, ..
शय पीर दर्शनों में इनका मनुरागा, हम कारन कप छोगों की समझ पिय पद गय और पुनः बोर हे गये थाल फरियर प्रन्या में इस शिरानुराग और पतिपय प्रज्यों में युनामुराग द्वारा पहना है। दोनों दर्शनों से संपन्य नेपाल प्रत्य भी इन्होंने यनाये हैं। वारे पेशलता गुगंत्रपिता निरामाना माता मोमुमनिता शिलान्यागिठा, साधी सादरला गले विमुना पार पर मीना दुगे शमरिना व महना कल्याणमाांति 11 प्रभुता में निपुणता, गुणों में प्रेम, हर्ष में निरभिमानिता, मन्य में गुमि, शाखा में सुयुद्धि, धन होने पर दान, साधुओं का आदर, सलों से पराङ्गुना, पापों से डर, दुरा में लश सहन करने की शक्तिये सय गुण महान्मा को कल्याण देने पाले हैं। साभिमानमासमाम्यमौचित्यच्युतमप्रियम् दुःखायमानदीनं या न यदन्ति गुणायता ॥२॥ गुणी मनुष्य ऐसी पाते नहीं कहते जिनसे अभिमान जाहिर हो, जो असम्भव हो, उचित न हो, प्रिय न हो, दुस भपमान अथवा दीनतायुक हो। प्रते विचाई विमति विष सत्येतिको विनये विकारम पुणेवमान कुशले निषेध घमें विरोध न करोति साधुः ॥३॥ प्रत में प्रियाद, विवेक में मतभेद, सत्य सन्देह, विनय में दुर्मायना, गुण में अपमान, कुशल का निषेध और धर्म का विरोध सजन मनुष्य कमी नहीं करते।
कविता-कौमुदी। म्यायः खलैः परिहवश्वलितश्च धर्मः कालः कलिः कलुप एव पर प्रवृत्तः। प्रायेण दुर्जनजनः प्रभविष्णुरेव निश्चक्रिकः परिभवास्पदमेव साधुः ॥ ४ ॥ खलौने न्याय नर कर दिया, धर्म विचलित हुआ, पाप- रूपी फलियुग प्रवृत्त हुआ, प्रायः दुर्जन मनुष्य हो शक्तिमान हुए और छलकपटहीन सजन पुरुषों का पराजय हुआ। पा: पवित्रयति नैय गुणान्क्षिणाति स्नेहं न संहरति नापि मल प्रसूते । पोरावसानरुचिरश्चलतां न धरे सत्संगमः सुकृतिसमनि कोपि दीपः ॥५॥ पात्र को पवित्र करता है, गुणों को (गुण या दीपक की यती) नए नहीं करता, स्नेह ( तेल या प्रेम ) का नाश नहीं करता, कालिख (बुराई या कालिख) भी उत्पन्न नहीं करता, दोपों को (दोपा रात्रि या दोष ) समाप्त करना चाहता है और चञ्चल नहीं होता । यह सत्समागम रूपी एक अद्भुत दीप सजनों के घर में रहता है। जीवनग्रहणे नम्रा गृहीत्वा पुनरुस्थिताः कि कनिष्ठा उत ज्येष्ठा घटीयन्त्रस्य दुर्जनाः ॥ ६ ॥ ...जीवन (जल या प्राण) ग्रहण करने में नम्र, और जीवन ग्रहण कर पुनः उठ खड़े होने वाले दुर्जन, क्या अरहट से छोटे 'है या बड़े ? जल लेना होता है तो अरहट नम्र होजाती है और जल लेकर यह ऊंची होजातो है, इसी प्रकार दुर्जन भी फाम के समय नम्र होजाते हैं, और काम होजाने पर अलग के हो जाते हैं। • 'सदा खण्डनयोग्याय सुपपूर्णाशयाय प ममस्त बहुबीजाय खलायोलूसलाय च ॥॥
गुणी मनुष्य ऐसी बातें नहीं कहते जिनसे अभिमान क्षेमेन्द्र ीय यौद्ध दर्शनों में इनका अनुराग था, इस कारण कुछ लोगों की समझ है कि ये पहले शैय ये और पुनः योद्ध हो गये थे। इनके फतिपय ग्रन्थों में इनका शियानुराग और कतिपय प्रन्यों में युद्धानुराग दीप पड़ता है। दोनों दर्शनी से संवन्ध रखनेयाले अन्य मी इन्होंने यनाये हैं। स्वाम्ये पेशलता गुणेप्रणयिता ह निस्संकता मंत्रे संवृतता श्रु तीमुमतिता विताइये स्यागिता । साधी सादरता खले पिमुखता पापे पर भीरता दुःरीशमाहिष्णुता च महता कल्याणमाकांक्षति प्रभुता में निपुणता, गुणों में प्रेम, हर्ष में निरभिमानिता, मन्त्र में गुप्ति, शास्त्रों में सुयुद्धि, धन होने पर दान, साधुओं का करने की शक्तिये सय गुण महात्मा को कल्याण देने आदर, खलों से पराङ्गुता, पापों से डर, दुःस में क्लेश सहन घाले हैं। साभिमानमासंभाध्यमौचित्यच्युतमप्रियम् दुःसायमानदीनं वा न वदन्ति गुणोपताः ॥२॥ जाहिर हो, जो असम्भव हो, उचित न हो, प्रिय न हो, दुख अपमान अथवा दीनतायुक हो। भते विवाद विमति वियेके सत्येतिर्शकां विनये विकारम गुणेवमान कुशले निषेध धमे विरोध न करोति साधुः ॥३॥ व्रत में वियाद, विवेक में मतभेद, सत्य में सन्देह, विनय में दुर्भावना, गुण में अपमान, कुशल का निषेध और धर्म का विरोध सजन मनुष्य कमी नहीं करते।
कविता-कौमुदी। म्पायः तलैः परिहतचलितश्च धर्मः कालः कलिः कलुप एव पर प्रवृत्तः । मायेण दुर्जनजनः ममविष्णुरेव निश्रक्रिकः परिमवारपदमेव साधुः ॥४॥ 'सलोने न्याय नर कर दिया, धर्म विचलित हुआ, पाप. रूपी कलियुग प्रवृत्त हुआ, प्रायः दुर्जन मनुप्य ही शकिमान हुए और उलफपटहीन सजन पुरुषों का पराजय हुआ। पा पवित्रयति नैव गुणान्क्षिणोति स्नेहं न सहरति नापि मलं प्रसूते । होगवसानरुचिरश्चलता म घरो सत्संगमः सुकृतिसमनि कोपि दीपः ॥५॥ " पात्र को पवित्र करता है, गुणों को (गुण यादीपक फी यत्ती) नष्ट नहीं करता, स्नेह ( तेल या प्रेम ) का नाश नहीं करता, फालिख (बुराई या फालिख) भी उत्पन्न नहीं करता, दोषों को (दोपा रात्रि या दोप ) समाप्त करना चाहता है और चञ्चल नहीं होता। यह सत्समागम रूपी एक अद्भुत दीप सजनों के घर में रहता है। - जीवनग्रहणे नम्रा गृहीत्या पुनरुत्थिताः कि कनिष्ठा उत ज्येष्ठा घटीयन्त्रस्य दुर्जनाः ॥ ६ ॥ जीवन (जल या प्राण) के ग्रहण करने में नम्र, और जीवन प्रहण कर पुनः उठ खड़े होने याले दुर्जन, क्या अरहट से छोटे है या बड़े । जल लेना होता है तो अरहट नन्न होजाती है और जल लेकर यह ऊंची होजाती है, इसी प्रकार दुर्जन भो काम के समय नम्र होजाते हैं, और काम होजाने पर अलग हो जाते हैं। सदा खण्डनयोग्याय तुषपूर्णांशयाय च नमस्तु बहुवीजाय खंलायोखलाय च ॥॥
क्षेमेन्द्र। शैव बौद्ध दर्शनों में इनका अनुराग था, इस कारण कुछ लोगों की समझ है कि ये पहले शैव थे और पुनः यौद्ध हो गये थे। इनके फतिपय ग्रन्थों में इनका शिवानुराग और कतिपय अन्यों में युद्धानुराग दीख पड़ता है। दोनों दर्शनी से संबन्ध रखनेवाले अन्य भी इन्होंने बनाये हैं। स्वाम्ये पेशलता गुणेप्रणयिता हर्षे निस्सकता म संवृतता ध्रुतीसुमतिता वित्तोदये त्यागिता ॥ साधी सादरता खले विमुखता पापे पर भीरता दुारो शसहिष्णुता च महतो कल्याणमाकांक्षति । प्रभुना में निपुणता, गुणों में प्रेम, हर्ष में निरभिमानिना, मन्य में गुमि, शारत्रों में सुयुद्धि, धन होने पर दान, साधुओं का भादर, पलों से पराङ्गता, पापों से डर, दुःस में होश सहन करने की शक्ति ये सय गुण महात्माम को घल्याण पाल हैं। माभिमानमासमा यमौचित्यग्युतमप्रियम् दुखापमानदीन वा न यदन्ति गुणाता॥२॥ गुणी मनुष्ण ऐमी यान नहीं फहत जिनसे अभिमान जाहिर हो, जो असम्भव हो, उचित न हो, नियम, TA भपमान अयया दीनतायुक्त हो। ने विवाद विमति विय सायनिशकी दिनये रिकाम गुगंवमान से निपंच धर्मविरोध मति मा. मन में विवाद, यियंक में मनमंद, राज्य में सन्देह, दुमायना, गुप में परमान, कुशल का निषेध विरोध सनन मनुष्य कमी नहीं करतं । -
कपिता-कौमुदी।
म्यायः सलैः परिवलितश्च धर्मः कालः कलि: कलुप एव पर प्रवृत्तः।
मायेण दुर्जनजनः प्रमविष्णुरेष निकिकः परिभवास्पदमेव साधुः ४॥
। सलोंने न्याय नट फर दिया, धर्म विचलित हुआ, पाप-
रूपी फलियुग प्रवृत्त हुआ, प्रायः दुर्जन मनुष्य हो शक्तिमान
हुए और उलकपटहीन सजन पुरुषों का पराजय हुआ।
पा पवित्रपति नैय गुणान्क्षिणाति स्नेह न सहरति नापि मल प्रसूते ।
दोरावसानरचिरश्चलना न धरे सत्संगमः सुकृतिसमनि कोपि दीपः ॥५॥
पात्र को पवित्र करता है, गुणों को (गुण या दीपक की पत्ती)
नष्ट नहीं करता, स्नेह ( तेल या प्रेम ) का नाश नहीं करता,
कालिख (वुराई या कालिख) भी उत्पन्न नहीं करता, दोपों को
(दोपा रात्रि या दोप) समाप्त करना चाहता है और चञ्चल
नहीं होता। यह सत्समागम रूपी एक अद्भुत दीप सजनों के
घर में रहता है।
जीवनग्रहणे नम्रा गृहीत्या पुनरुत्थिताः
विकनिष्टा उत ज्येष्ठा घटीयन्त्रस्य दुर्जनाः ॥६॥
जीवन (जल या प्राण) के ग्रहण करने में नम्र, और जीवन
ग्रहण कर पुनः उठ खड़े होने वाले दुर्जन, क्या अरहट से छोटे
हैं या बड़े जल लेना होता है तो अरहट नम्र होजाती है
और जल लेकर वह ऊँची होजाती है, इसी प्रकार दुर्जन भी
काम के समय नन्न होजाते हैं, और काम होजाने पर अलग
हो जाते हैं।
सदा खण्डनयोग्याय तुषपूर्णाशयाय प
नमस्तु बहुबीजाय स्खलायोलूस्खलाय च ॥७॥
-- मननों की गुगलगारी करने में एल फममी भोरम, विहफाममा नाम पत्र द्वारा नापी शान पर खल और उलूसल दोनों को नमस्कार, दोनों ही राडन (फांडना या सण्डन) के योग्य है, दोनों के हृदय में तुर (भूसा पार्दुविचार) मरा हुआ है और दोनों हो भनेक योज पाले हैं। निहाइपितसत्पातः पिण्डापी कलहोत्कटः ।। मुल्यतामशुचिनिन्य विभर्ति पिशुनः पुनः॥८॥ चुगल कुत्ते के समान है, क्योंकि दोनों ही अपनी जीम से 'सत्पात्र ( शुद्धपात्र या सजन मनुप्य ) को दूषित करते हैं, दोनो टुफाष्ट्र फे अभिलापो होते हैं, पलह करने में परफे होते हैं मोर दोनों ही सदा भशुद्ध रहते हैं। महोबत सलः पुण्याय पतिः । स्वगुणोदीरणे शेरः परनिन्दामु पारपतिः ॥९॥ पल, माग्ययश मर होने पर भी आतुन पण्डित माधयं है। यह अपने गुणों के कान में शेष मार दूसरों की निन्दा परन में गृहस्पति हैं। बरः मुनगुन्ये सतो शिशिरोमुगः मतः एनिमांझोटे समाल्य विधि." सिर और मुह होते हैं, सय भार उराफ कान है भारसा कार कर यह रहना है। मामाका मूत्रम्य मात्ययगडांगिणः रिटायरमेनारिया ने ते॥ शिमले में माता है, उस पूर्व नहीं शुरनी।
. . कविता-कौमुदी। मायामयः प्रकृत्यैव रागद्वेषमदाकुलः ॥ महतामपि मोहाय संसार इव दुर्जनः ॥ १२॥ संसार और दुर्जन दोनों ही समान हैं, दोनों मायामय है, स्वभाव से ही राग, द्वेष और मद से ये दोनों व्याकुल रहते हैं, इनसे बड़ों को भी मोह उत्पन्न हो जाता है । खचितमपि मायावी रचयत्येव लीलया ।। लधुश्च महतां मध्ये तस्मात्खल इतिस्मृतः ॥ १३॥ माया के द्वारा अनायास ही (ख) आकाश का भी चित्र घह मना लेता है, पड़ों के मध्य में यह लघु है, इसलिए खल कहा जाता है। खलेन धनमतेन नीचेन प्रभविष्णुना ॥ पिशुनेन पदस्थेन हा प्रजे व गमिष्यसि ।।१४ ॥ खल यदि धनी हो, नीच यदि शक्तिशाली हो, चुगल यदि भधिकारी हो तो इस प्रजा की क्या दशा होगी। म सजते सजनवजनीयया भुजगवक्रक्रिययापि दुर्जनः ।। पिय कुमायो समयाभिचारियों विदग्धतामेव हि मन्यते खलः ॥१५॥ सजनों के द्वारा गहित, चुगलखोरी के काम से भी दुर्जन मनुष्य लजित नहीं होते ।खल मनुष्य छल कपट करनेवाली बुद्धि को विद्वत्ता ही समझते हैं। साश्चर्य युधि शौर्यमप्रतिहत तत्पडिताखण्डल, पाश्चोत्तानकरः कृतः स भगवान्दानेन लक्ष्मीपतिः॥ ऐषय स्वकराक्षसप्तभुवन लन्याधिपार यशः सर्वदुर्शनसंगमेन सहसा स्पष्ट विनष्ट' बलेः ॥१६ 7 T -- -- ७६ क्षेमेन्द्र। युद्ध में जिसका अप्रनिहन शायं था, जिससे इन्द्र भी परास्त होगये थे, जिसने दान के लिए, विन्गु से भी याचा करने के लिए हाय फैलवाया, अपने हाथों से जिसने सातों भवनों का ऐश्वर्य पाया था, जिसका यश समुद्र पार तक गया हुआ था, उस पलि का भी शीघ्र ही दुर्जनों के साथ से नाश हो गया। शमयति यशः क्लेश सते दिशल्यशिवा गति जनयति जनोद्वैगायासं नयत्युपहास्यताम् भ्रमयति मति मान हन्ति क्षिणोति जीवित क्षिपति सकल कल्याणानां कुस् सलमंगमः ॥ ७॥ दुर्जनों का साथ यश नाश करता है, क्लेश उत्पन्न करता है, बुरी दशा बनाता है, मनुष्यों का उद्वेग और परेशानी घदाता है, हंसी कराता है, बुद्धि को घुमाता है, मान नष्ट करता है, प्राणों को भी हर लेता है । इस प्रकार यह समस्त कल्याणों के समूह का नाश करता है। न शान्तान्तस्तृपयाधनलवणवारिम्पतिकरैः क्षतम्रायः कापविरविरसरक्षाशनतया । भनिद्रामन्दामिन पसलिलधौरानलमया- स्कंदपांण कष्ट' एफुटमधमकष्टादपि परम् ॥ १८ ॥ धनरूपी खारे जल से मन फी तृष्णा शान्त नहीं हुई, मदुत दिनों तक नीरस और सूरी भोजन से शरीर फी फान्ति भी जाती रही, राजा जल चोर पोर जल के भय से अनिता फा रोग और मन्दाग्नि का रोग होगया इस प्रकार पनों को जो कष्ट होता है, यह दरिदों के फाष्ट से भी पद पर है।
७७ फयिता-कौमुदी सरताजजिनः प्रसर भजते क्षेपय क्षपावलम,- स्वभ्र विभ्रमर्जितं च विनति धसे घनुमान्मयम् ॥ तस्याःपेलवरलवा तिमुण शोषाधरेणादित नून प्राप्य विरक्ततां धनमहो विम्य समालम्बते ॥ १९ ॥ उसके मुख मे हार फर चन्द्रमा साचारी से क्षीण हो रहा है, उसके भौहों के विलास से तिरस्कृत होकर कामदेव का धनुप नम्र हो गया है, उसके कोमल पल्लयों के समान सुन्दर लाल मोठों से पीड़ित होकर विश्वपाल यिरक्त होगया और उसने घन में आश्रय लिया, यह विलकुल सत्य घात है। जानेऽभ्यासहित विलोक्य कुटिल तंफूटवेपं त्वया प्रत्यक्षागमि निहवासहनया कोपेन दशोऽधरः । वासायासविसस्थुला न च कुचोत्कम विमुघल्यहो, मोहाद्दुःसहविप्लवे चलते कि पिता त्वं मया ॥२०॥ मालूम होता है कि तुमने कपट वेश धारण करने घाले उस (कुटिल हमारे प्रिय) को किसी दूसरी स्त्री के साथ देखा, इस प्रत्यक्ष अपराध को तुम छिपा न सकी और क्रोध से तुमने अपने होट काट डाले, श्वास की अधिकता से तुम ध्याकुल होगयी हो और इस समय भी तुम्हारे स्तन कांप रहे हैं, हे चञ्चले मैंने मूर्खता यश तुमको भेजा । यह नयिका की उक्ति अपराधिनी दूति के प्रति है। नखदशननिपातजर्जराङ्गी रतिकलहे परिपीड़िता प्रहारः । यदिह मरणमेव कि न यायायदि न पिवेदधरामृतं प्रियस्य ॥२०॥ 'नख और दातों के लगने से भङ्ग जर्जर हो जाते हैं, रति कलह में प्रहारों से पीड़ित हो जाना पड़ता है, ऐसी दशा में मृत्यु ही हो जाती, यदि प्रिय का अधरामृत पान न किया जाता।
क्षेमेन्द्र। जाने कोपतरहिताङ्गलतिका सेनाहमालिदिना मराटा कुषानिरगलाया हारपि पावें हमः। एतापरा, ससि मरामि यदत्तो यत' पर सम्पर धेयस्योदवलन शरीरशमन प्यात्यानि नो पेनि किम् ॥ २२॥ मैं यह जानती हूं कि फोर से कांपते हुए मेरे अहाँक उन्होंने आलिगन किया था, मेरे स्तनों को छुमा था और गई फेहार को भी एफ बगल कर दिया था, है ससि, इतना तं मुझे स्मरण है, इसके याद जो हुआ उससे धीरता छूट जाती है,शरीर शिथिल हो जाता है और ध्यान करने पर भी उसे में समझ नहीं सकती। मूम्छादितमीक्षते न नयन तापे तनुः पच्यते, कम्पः सूचयतीव जीवगमन मोहे मनो मजति प्रारजन्मार्जित कर्मणा पलवता कालेन कामेन वा को जानाति स केन मे एतिहरः कण्ठे भुजगोऽपितः ॥२३॥ मूर्जा से आँखें वन्द हैं वे देख नहीं सकती, शरीर अग्नि में पक रहा है, शरीर के कांपने से मालूम होता है कि अप प्राण ही चला जायगा, कुछ सुझायी नहीं पड़ता। पहले जन्मों के बलवान को से, काल से या काम से मालूम नहीं किससे, यह मेरी धीरता को हरण करने वाला साप मेरे गले में पड़ा । अर्थात् प्रिय का हाथ गले में पड़ा। ग्योम्नः श्यामा विरहिणस्तारका कणावलो। बालमित्रकरोन्मृष्टा जगामादर्शनं शनैः ॥ २४॥ । श्याम (रामि या स्त्री) के विरही आफाश के अनुरूप में ये तारा फैली हैं। बालमित्र (पालसूर्य या घाल्यकाल फा मित्र के फर (हाथ या फिरण) से पीछे जाने पर यह लुस कविता-कीमुदी। यवात्संगममिच्छतोः प्रतिदिन इत्तीकृताभासयो- रन्योन्य परिशुभ्यतीनंवरतिप्राप्तिस्यहां तन्वतोः।। संकेतोन्मुखयोः कथं कथमपि प्राप्ते चिरात्संगमे, यत्सीय नवरक्तयोस्तरुणयोस्तत्केन साम्य प्रजेत् ।। २५॥ यत पूर्वक संगम चाहने पाले को, प्रति दिन दृति से दादस चैधाए हुओं को, सूखते हुओं को, नवीन सुरत प्राप्तिकी 'आशा रखते हुओं को, भोर संकेत स्थान की ओर उन्मुखों को, यदि यहुत दिनों पर भी संगम प्राप्त होजाय, तो उन तरुण नयीन अनुरागी स्त्री पुरुषों को जो सुख होता है उसकी तुलना फिससे की जाय। विन येत्ति वेश्या स्मरसदृश कुप्टिन जराजीणमू वित्त विनापि वैति स्मरसदृशं कुष्टिनं जराजोर्णम् ॥ २६ ॥ येश्या धन के कारण कोदी और बूढ़े को भी कामदेव के समान समझती है और धन के बिना कामदेव के समान मनुष्य को भी यह फोही और बूढा समझती है । निन्य जन्म प्रमोहस्थिरतरतमा यम्मनुष्यत्वहीन धुन्दया हीनो मनुप्यः शुभफलविकलस्तुल्यचेष्टः पशूनाम् ॥ बुद्धिः पाण्डित्यहीना प्रमति सदसतोस्तत्वचर्चाविचारे पाण्डिन्यं धर्महीन शुकसद्गशगिरा निष्फलक्लेशमेव ॥ २७ ॥ ha जिनका मोह के कारण अज्ञान दूर होगया है उनका मनुष्यत्वहीन जन्म निन्दित है, निधुद्धि मनुष्य को कोई शुम.फल नहीं मिलते और यह पशु के समान है, विद्याहीन बुद्धि भी सत् और असत् के विचार में घूमा करती है यह कुछ निश्चय नहीं कर सकती। धर्महीन पाण्डित्य भी शुक को • पाजी के समान केवल निष्फल फ्लेश ही है। .
धर्मः शर्म पाय घे पण धोकार रविः
सर्वापतिशमशमः सुगनमा धमामिधानो निधिः ।
धमी मन्सुरवाधव पृथुपये धर्मः मुहरिश्चल:
संसारोऽस्मास्थले मुरतरनाल्येय धमारपरः ॥ २६
इस लोक में और परलोक में धर्म
यहान अन्धकार के लिए धर्म सूर्य है, यन्धुहीन
धर्म हो यन्धु है, धर्म दद मित्र है, संसार रूपी
भूमि में धर्म से यद कर पाल्पवृक्ष दुसरा नहीं है
माणाना परिरक्षणाय सतत सर्वाः क्रिया:प्रापिना,
प्राणम्योप्यधिक समस्तजगतां नास्त्येव किधिति
पुण्यं तस्यन शरयते गययितु यः पूर्णकारण्यवा
प्राणानामभयं ददाति सुकृतिस्ते पामहिंसा प्रता
'प्राणियों के सभी प्रयत अपने प्राणों की
लिप हो सदा होते हैं । समस्त संसार को प्राणे
प्रिय कोई दूसरी वस्तु नहीं है, उसके पुण्यों को
हो सकती, जो पूर्ण दयालु प्राणों को आप
पुण्यात्मा हैं और उनका अहिंसाग्रत है।
शील शीलया कुल कलयता सझावमध्यस्थता,
व्याज वजंयतां गुणं गणयतां धमें विवादाम
'शान्ति चिन्तयतां तमः शमयतां तत्वधुति शुण्यताम
संसारे न परोपकारसदृशं पश्यामि पुण्य सवार
शील रखने वाले,कुल के अनुसार चलने पार्ट
.अभ्यास करने घाले, छल कपट का त्याग करने
की मात्र माने जाते
. फयिता-कोमुदो। ८१ सुनने वाले सजनों के लिए इस संसार में परोपकार से यद कर दूसरा पुण्य नहीं है। कि जीवावधिवन्धनैगुणगणैराराधितरंन्युमि- ययान्त्यन्तदिने क्षयाश्रु पतनप्रत्यायनापात्रताम् । सम्माधिगमः क्रिया युपरमः सत्संगमः संयमः पर्यन्तप्वचला विरतमनसामेते सत्ता बान्धवाः ॥३॥ । मरण पर्यन्त पन्धनरूप इन गुणों से पया लाभ, बन्धुओं को धाराधना से भी क्या फल, जो अन्त समय में केवल भासू यहाकर विश्वास उपजा देते हैं। सद्धर्म की प्राप्ति, कार्यों से निवृत्ति, सज्जनों का सङ्गम और संयम, ये विरक मनुष्यों के अन्त तक भी अचल रहते हैं, ये ही सजनों के अन्धु हैं। विदेशेषु धनं विद्या व्यसनेषु धन मतिः परलोके धर्म धर्मः शील सवै धनम् ॥३२॥ विदेश में धन विद्या है, आपत्ति में धन बुद्धि है, परलोक में धन धर्म है, और शील सव स्थानों में भूषण है। दाता बलियांचनको मुरारिदीनं महो वाजिमखस्य मध्ये। दातुः फल बन्धनमेव जात नमोस्तु देवाय यथेष्टकन्ने ॥३३॥ अश्वमेध यज्ञ में दान देनेवाला वलि है दान लेने- थाले स्वयं विष्णु हैं, और दान दी जानेवाली वस्तु पृथिवी पर दाता को फल बन्धन मिला, अर्थात् इस दान का फल स्वरूप चलि को बन्धन मिला। उस भाग्य को नमस्कार, जो जैसा चाहता है वैसा करता है। मवति भिषगुयायैः पथ्यभुदिनत्ययोगी धनहरणविनिच्छिदगोसा दरिदः। .
वैद्य फे यतलाये उपायों के अनुसार पय्यपूर्वक रहने है यह बैसाही होता है उसमें कुछ परिवर्तन ८२ भनयचयविधायी निश्चलेश्वयं यः स्यवशनिशिवशक्तः शामनेनैव धातुः ॥३४॥ घाला सदा रोगी ही रहा करता है, जो सदा घर 3 धन कमाने में लगा रहता है और सर्च होने के मार्गों के देता है, यह दरिद होता है, अनेक प्रकार की अनीति करने सदा धनी और धीर बने रहते हैं। यह सब उसी ब्रह्मदेय इच्छा से होता है। भम्भोधिःस्थलता स्थल जलधितां धूलीलवः शैलता मेरुम॒तकणतां तृणं कुलिशता व तृणप्रायताम् । पन्हिः शीतलता हिम दहनतामायाति यस्यैच्छया स्वेच्छादुलंलितादुतव्यसनिने देवाय तस्मै नमः ॥ ३५ ॥ जिसको इच्छा से समुद्र स्थल हो जाते हैं, स्थल समुद्र जाते हैं, धूलि के कण पर्वत हो जाते हैं, और मेरु पर्वत 3 के कण के समान हो जाता है, तृण यन्त्र के समान घन तृण के समान जाता है, भाग शीतल है और धर्फ आग बन जाता है उस देव को नमर अपनी इच्छा से सोख होकर अनेक प्रकार की लं करता है। भ्रमसि कि मुधा कचन चित्त विधम्यता स्वयं भवति पद्यया भवति तत्तथा नान्यथा ॥ तमननुस्मरमपि च भाव्यसंकल्पय- प्रतिगमागमाननुभवामि भोगानहम् ॥ ३६॥ 5 व्यर्थ क्यों घम रहे हो, कहीं विधाम फरो, स्वयं जो :
. कविता-कौमुदी। नहीं होता, अतीत को भूल जाता है, भावी को कल्पना भी नहीं कर पाता , आकस्मिक आने जाने वाले भोगों का मैं अनुभव करता हूँ। पुत्राप्यधिक च विन्दति विभुत्वं हि भाग्योदये पश्चान्सोपि समेव निन्दति यथा शत्रु विरहे विधी। कि कष्टन दिवानिर्श विहितया भकया मर्श सेवया देवाधिष्टितमेव तिष्ठति फल जन्तोःशुभ वाशुभम् ॥ ३७ ।। भाग्योदय होने पर स्वामी को पुत्र से भी अच्छा भृत्य मिलता है और भाग्य के विरुद्ध होने पर उसी म्वामी को यही भृत्य शत्रु के समान देखता है, भक्ति पूर्वक दिन रात सेवा करने से क्या लाभ, जब कि मनुष्य को अच्छाया चुरा फल भाग्य के अनुसार ही होता है । जीवन्त्यर्थक्षये नीचा यातोपद्ववचनैः। कुलाभिमानमूकाना साधूनां नास्ति जीवनम् ॥ ३८॥ धन के नाश होने पर नीच मनुप्य भिक्षा डॉका और ठगी के द्वारा जीते हैं, पर कुलाभिमान के कारण चुप रहने. थाले साधुओं का जीना कठिन है। मडगेदे मशकीव मूषकवधूमू धीव मार्जारिका माओरीव शुनी शुनीव गृहणी वाच्यः किमन्यो जनः॥ हत्यापनशिशूनन्विजहतः संप्रेक्ष्य मिल्लीरवै- लूवात्तन्तुवितानसंवृतमुखी चुली चिर रोदिति ॥३९॥ मेरे घर में चूही मशकी के समान हो गयी है, विल्ली चूही के समान होगयी है, कुत्ती बिल्ली के समान और गृहणी कुत्तों के समान हो गयी है, और के लिए क्या कहा जाय, दुखी
No text on this page.
-
कविता-कौमुदी।
आप्रासनिक स्तुति के द्वारा कानों में शूल उत्पन्न करता
है, अपनी दरिद्रता कहता है, फटा वस्त्र दिखाता है, छाया के
समान चलता है, न आगे चलता है न पीछे और न बगल में,
इस प्रकार दरिद मनुष्य धनियों को दुश्चिकित्स्य व्याधि के
समान दुप देता है।
सत्ये शैकाचकितमनसोचकग्रामलीनाः
शैलस्थलोपकृतविलाः स्वल्पोपेऽतिकोपाः ।
मातोद्विमाः पिशुनवचसा धर्मनर्मोक्तिदुष्टाः
साधुद्विष्टाः प्ररालपुरुषाः सर्वथा भूमिपालाः ।। ४३ ॥
राजा लोग ठगों के समूह में रहते हैं इस कारण सत्य को
शङ्का को दृष्टि से देखते हैं, पत्थर के साथ किया उपकार
जिस प्रकार विफल होता है उसी प्रकार राजा के प्रति किया
उपकार भी विफल होता है, छोटे अपराध से भी ये यात
फोध करते हैं, युगली करनेवालों के बचा से सन्तुष्ट रहते हैं।
धर्म को दिल्लगी करनेवाले, साधुओं के डेपी और सलों के
साथी राजा लोग होते हैं।
द्वारे स्वमुपेक्षते कथमपि प्राप्त पुरो नेशते
विशती गमीलमानि कुरते गृहाति घावयष्टलम् ।
निर्यातस्य करोति दोपगणना स्वल्पापराधे यमः
सस्वामी पदि सेव्यते मरती दिनः पिशायः कृतम् ।।१४॥
द्वार पर रके हुए. की उपेक्षा करते हैं, यदि किसी प्रकार
सामने चला जाय ता उसकी ओर देखते नहीं, उसके निये-
दनों पर से पन्द करते है और इधर उधर की बातें करते
६.पले जाने पर उसके दोषों की गणना करते है, थोड़े अप.
पच पर भी यमराज पन जाते हैं, यह स्रामो यदि सेयनीय
है तोमरथल के पिशाचों ने हमारा फ्या पिगाड़ा है।
गायनाचार्य । गोवर्धनाचार्य पेगीतगोविन्द फना जयदेव फपि से प्राचीन है। जयदेव नेगीतगोविन्द में इनके विषय में लिखा है "लापत्तरसप्रमेय रचनैराचार्यगावधनस्पी फोऽपि न विश्वतः जयदेव कहते हैं किङ्गार रचना में माचार्य गोवर्धन की समानता करनेवाला कोई प्रसिद्ध न हुआ। इससे गोवर्धनाचार्य की जयदेव से प्राचीनता सिद्ध होती है । यङ्गाल के राजा लक्ष्मण सेन की सभा में गायधनाचार्य भी थे, यह पात नीचे लिसे लोक से विदित होती है। गोवर्धन शरयो जयदेव उमापतिः कविराजश्व रवानि समिती लक्ष्मणस्य च । लक्ष्मणसेन ई० सन् की ग्यारहीं सदी में हुए थे यह इति- ঘাষ জা ফালাই। आर्या सप्तसती नाम का एक ग्रन्थ इनका घनाया है। इसमें सात सौ आर्याछन्द के वृत्तों का संग्रह है। यह स्फुट लोको का संग्रह है, इसमें किसी एक विषय को लेकर घर्णन नहीं किया गया है । वर्णन मनोहारी है, सरस है और कान्य के उत्तम गुणों से युक्त है। शृङ्गार के वर्णन में ये सिद्धहस्त हैं, इनका वर्णन मनोरम और आस्वाद्य होता है। मा वम संवृश विपमिदमिति सात?' पितामहेनोक्तः प्रातर्जयति सलमा कमलमलिना घराशंभुः॥१॥ प्रातःकाल (पार्वती के) अक्षियुम्यन करने के कारण शिवजी के भोष्ठ पर फाजल लगा था,ब्रह्मा ने समझा किये काला हाला धिप उगल रहे हैं, इसलिपाडर फर उन्होंने कहा मत गिलो, निगल जाओ, यह सुनकर शिव लजित हो गये।
र कविता-कौमुदी। सभ्यासलिलाञ्जलिमपि कङ्कणफणिपीयमानमविजानन् । गौरीमुखार्पितमना विजयासितः शिवो जयति ॥२॥ • शिव ने सन्ध्या के लिए अञ्जलि में जल लिया था, और गर्वती के मुख की ओर उनका चित्त था,ये उधाती देख रहे थे, कङ्कण का सर्प वह जल पीने लगा, पर शिव को यह मालूम नहीं हुआ, यह देख विजया पार्वती की सखी हंसने लगी। ब्रह्माण्डकुम्भकार भुजगाकार जनार्दन नौमि । स्फारे यत्फयचक्र धरा शरायश्रियं वहति ॥३॥ ब्रह्माण्ड के कुम्भकार सर्पस्वरूप जनार्दन को नमस्कार, जिनके विशाल फण पर रखी हुई पृथिवी, शराय ( मिट्टी परई) के समान मालूम पड़ती है। विहितघनालंकार विचित्रवर्णावलीस्फुरणम् । शक्रायुधमिव वक वल्मीकभुवं कवे नौमि ॥ ४ ॥ जिन्होंने अनेक अलंकार बनाये हैं और अनेक प्रकार के धर्ण जिसमें हैं और जो इन्द्रधनुप के समान टेढ़े हैं, उन घाल्मीकि कवि को नमस्कार, इन्द्रधनुप भी बाल्मीफ से ही निकलता है, उसके भी अनेक प्रकार के रंग होते हैं, और यह मेघों का अलङ्कार बनता है। व्यासगिरा नियांस सारं विश्वस्य भारतं वन्दे। भूपपतयैव संज्ञा.यदलितां भारती वहति ॥५॥ प्यासदेय की वाणी के सार और विश्व के सार भारत नामक अन्य को नमस्कार, जिससे भूपित होने के कारण सरस्वती को मारती कहते हैं। .
गोरधनाचार्य। अतिदीपंजीयि दोषाढ़ प्यासन यशोऽपहारिन हन्त फरियेत गुणाः स गय जन्मान्तरापनः ॥६॥ दुःख फी यात है कि चिरजीवी होने के कारण व्यासदेव ने अपना यश खो दिया, यदि वे चिरजीवी न होते तो कौन नहीं कहता कि व्यासदेव ही दुसरं जन्म में गुणाढ्य हुए हैं। श्रीरामायणभारतवृहत्स्यानो कयौन मस्कुर्मः सिसोता इव सरसां सरस्वती स्फुरति यभिंघाः॥७॥ रामायण महाभारत और वृहत्कथा के कवियों को नमस्कार, जिनके कारण भिन्न भिन्न स्वरूप धारण करने वाली रसवती सरस्वती गङ्गा के समान हो गयी है। अकलितशब्दालं कृतिरनुकूला स्स्वलितपदनिवेशापि । अभिसारिकेव रमयति सूक्तिः सोन्कर्षशनारा ॥ ८॥ जिसमें शब्द नहीं, अलङ्कार नहीं, पदों का निवेश भी ठीक हीं, यह उक्ति भी यदि सरस हो, यदि उसमें उत्कट शृङ्गार 1, तो यह अभिसारिका के समान प्रसन्न करती है, क्योंकि ब्दों का न माननाही अभिसारिका के लिए अलंकार है, नके पैर नीचे ऊँचे पड़ते हैं, तथापि यह अनुफूल और पोपिका है इस कारण मन को प्रसन्न करती है। भयि विविधयचनरचने ददासि चन्द्र करे समानीय। -पसनदिवसेषु इति छ पुनस्त्वं दर्शनीयामि ॥९॥ दुति, तुम अनेक प्रकार की यात' चनाना जानती हो चन्द्र को लाफर हाथ में दे रही हो, पर दुःख के दिनों में तुम्हारे दर्शन मिलेंगे, जय अपकीर्ति फैलेगी, या दि तय तो तुम कोई उपाय न कर सकोगी।
कविता-कादी। भन्धत्वमन्धसमये वधिरत्वं यधिरकाल आलमय। श्री केशयोः प्रणयो प्रजापतिनाभिवास्तव्य ॥१॥ महरा, विष्णु के नाभिकमल में रहते हैं और यहीं लक्ष्मी और विष्णु भी रहते हैं। उनमें तरह तरह की बातें होती ही होगी पर ब्रह्मा पर विष्णु का द्वेप नहीं है किन्तु प्रेम ही है, इसका कारण यह है कि जब अन्धा बनने का समय आता है, तब ये अन्धे हो जाते हैं और जव घधिर बनने का समय आता है तब बधिर बन जाते हैं, अर्थात् न तो कुछ देखते हैं और न सुनते हैं। अपराधादधिक मा व्यथयति तव कपटवधनरचनेपम् । शस्त्रापाते न तथा सूचीव्यधवेदना पादक ॥१॥ दूति, तुमने जो अपराध किया है, उससे जितना फार होता है उससे कहीं अधिक कष्ट तुम्हारी इन बनावटी पासो से होता है। शस्त्र प्रहार से जितना फष्ट होता है, उससे फहीं अधिक कष्ट सूई की नोक से छेदने से होता है। तेप्टिनः क संप्रति शक्रयज यैः कृवस्तवोछायम् पापा मेदि पाधुनातनायो विधिरोति ।।१२|| इन्द्रध्वज, वे सेठ आज कहां है जिन्होंने तुमको खड़ा किया था, उस समय के लोग तो तुमको हल यनायेंगे या खूटा यनावेंगे। दलिते पलालपुञ्ज पृषम परिमवति गृहपती कुपिते । : निमृतनिभालितवदनौ हलिक बधू देवरी इसतः ॥३॥ पुआल घर उधर विखरा हुआ था, गृहस्वामी ने समझा कि इसी घेल ने पुमाल पिखेरा है, इसलिए यह उसे मार नाममा सरकोनी और पर मीभृत्य माण to गोवर्धनाचार्य। लगा, यह देखकर गृहस्वामी की स्त्री और उसके ने छिप कर आपस में देखा और वे हंसने लगे। निकारथापराध निफारणकलहरोपपरितोषम् । सामान्यमरणजीवनमुखदुश्य जपति दारयम् ॥1॥ जहां पिना कारण फा हो अपराध, बिना कारण कलह क्रोध, और प्रसन्नता साधारणतः मरना जी पुख मादि स्त्री पुरणों में होने रहते हैं यह दाम्पत्य सुस पूजा विना प्रति नातिन मन्त्र विना प्रविष्ठा। तदुमयशिप्रतिपयः पश्यतु पीयांगम् ॥५॥ बिना प्रतिष्ठा के पूजा नहीं और मंत्र के बिना मा महीं, जोइन दोनों पानी को न मानता हो यह पत्थर मूर्ति को देखें। भूतिमय इस्तेऽमिसयमपि संसामनेमपि मजतः । मेर मुग्ण दशा गरिमोरोपन ॥ ॥ संयोग होते ही भग्नि तृण को भस्म कर देता है, सुपर्ण, पपपि तुम रसको संशा कर रहे हो, तथापि तुम्हारी गी ऐसी दीपसा होने की सम्मायना, मी तर गुप्ता के कारण दारी पक्षा। भोगामस्य समाजवंतीमिमुमार। बिस्वममावि प्रीषिभूपस्य मोगा." पर मांग करने में असमर्थ मिला। साला और मममय होने के कारण उसकी मार दिए दादा।
कविता-कौमुदी। मलयद्गुमसाराणामिव धीराणां गुणाकोऽपि । जइसमयनिपतितानामनादरायैव न गुणाय ॥८॥ चन्दन के समान धीरों के गुण भी उस समय में । मूखा के धीच या जाड़े के समय में) भाकर, अनादर ही पाते हैं भादर नहीं। यन्मूलमादमुदकैः कुसुम प्रतिपर्व फलभरः परितः । द्रुम तम्माद्यसि सोचीपरिचयपरिणाममविचिन्त्यः ।। १९ ।। वृक्ष तुम्हारी जड़ जल से गीली है,प्रत्येक पर्व में पुष्प हैं, चारों ओर फल से लदे हुए हों इससे उन्मत्त मत धनों, तरङ्गो के परिचय का परिणाम साचा । “. रोगो राजायत इति जनवादे सत्यमदय कलयामि । आरोग्यपूर्वक त्वयि तल्पप्रान्तागते सुभगम् ॥२०॥ हे सुमग, तुम्हारे पलंग के समीप रोगी राजा के समान रहता है" इस जन-प्रयाद को भारोग्य रहने पर भी मैं सत्य समझती हूँ। वीक्ष्य सतीनां गयने रेसामेको तया स्वनामाहाय। सन्तु युवानो इसित स्वपमेवापारि नायरिनुम् ।।२।। उसने सतियों की गणना में अपने नाम की भी एक रेखा देखो, इससे युधक चाहे इसे चाहे न हंसे पर स्वयं यहो अपनी हसी न रोक सकी। सुगृहीतमशिनपक्षा लवत्रः परभेदिनः पर तोक्ष्याः। पुष्पा भपि विशिसा भपि गुपच्युताः कस्य म मयाय ॥२२॥ दूसरी ( अन्य पुरुप या शत्रु ) को भेदन करनेवाले मलिन पक्षा योनीच और तीखे मनुष्य तथा घाण, गुण (धनुष की च्या या गुण) से व्युत होने पर किसके लिए भयकारफ नहीं हैं।
है कि ये बहुत प्राचीन कवि थे।सुभापित ग्रन्थों में इनमें सोक
चन्द्रका
चन्द्रक।
ये कश्मीर के रहनेयाल ,इनफ नाम के विषय में मन
मेर है, कोई इन्दै चन्दय कहते हैं मोर फी चन्द्रका महानि
कल्हण ने इनके विषय में लिम्मा :-
नापसजनमेश्य समहाकविः।
पापनमुनेशमकाले पन्द्रको मया ।
जिस महाफयि ने सय लोगों के देखने योग्य नाइक को
रचना फी, उस समय घे द्वैपायन मुनि के अंशभूत चन्द्रफ
हुए। इससोक से इस यात का पता मिलता है, महाकवि
चन्द्रक ने कोई नाटक यनाया था, जिसमें सब प्रकार के मनु
प्यों के उपयोग योग्य सामग्री थी और इनकी फयिता व्यास
देय के समकक्ष होती थी।इनके समय के विषय में कुछ निधित
रूप से नहीं कहा जा सकता। पर लक्षण से मालूम पड़ता
उधृत किये गये हैं।
खगोवक्षिप्त रस्ताशिरसि दौलव रचितः ।
शिवा सप्ताहारा स्वपिति रतिखिद वनिता,
नृपातों गोमायुः सरुधिरमसिं लेदि बहुशो
विलान्वेपी सोक्तगजकराग्रे प्रविशति ।
पक्षि भतड़ियों को वृक्ष पर ले गये हैं, उनसे वृक्षों पर दोला
समान पन गया है, गाली तृप्त होकर रतिसिन्न स्त्रियों के
हमान सोरही है, गाल प्यासा है इस कारण यह रुधिर से
नी तलवार को यारयार चाट रहा है। सांप विल इंदता
मा हाथी के सूड में घुस जाता है । यह युद्ध समाप्त होने
युखक्षत्र का वर्णन है।
कविता-कौमुदी। कृष्णेनाम्ब गतेन रस्तुमधुना मृद्भक्षिता स्वेच्छया, सन्यं कृष्ण क एवमाह मुसली, मिथ्याम्ब पश्याननम्, ध्यादेहीति विकासितेऽथ बदने माता समस्त जगत, दृष्ट्वा यस्य जगाम विस्मयवर्श पायात्स वः केशवः । आज खेलने के लिए जाने पर कृष्ण ने खूप मिट्टी खायी है, कृष्ण, क्या यह बात सच है । कृष्ण ने पूछा ऐसा किसने कहा, माता ने कहा घलदेव ने, कृष्ण कहा, झूठी बात है, तुम हमारा मुंह देख लो, माता ने कहा, मुंह खोलो, कृष्ण ने मुंह खोल दिया, माता जिसके मुंह में समस्त जगत् देखकर विस्मित हो गयी, यह कृष्ण आप लोगों की रक्षा स पातु वो यस्य हता वशेषास्तत्तु व्य वर्णाजनरजितेषु । लावण्ययुक्तोम्वपि वित्रसन्ति दैन्याः स्वकान्तानयनोत्पलेषु ॥१॥ ये देव आप लोगों की रक्षा करें जिनके वर्ण के समान अञ्जन से रञ्जित और सुन्दर अपनी स्त्रियों की आँखों से भी ये दैत्य जो रण में मारे जाने से बचे हैं डरते हैं। प्युतामिन्दोले'खो रतिकलहभग्नश पलयं शनैरेकीकृत्य प्रहसितमुखी शैलतनया। भवोचच पश्येत्यवतु स शिवः सा च गिरजा सप कीड़ाचन्द्रो दशनकिरणापूरितनुः ॥२॥ गिरी हुई चन्द्रमा की कला और रतिफलह में गिरा हुआ घलय न दोनों को धोरे से एकत्रित करके हंसती हुई पार्वती ने जिसको कहा था कि यह देखो, यह शिव, यह पार्वती और दांतों की प्रभा से जगमगाता हुआ यह कीड़ाचन्द्र आप लोगों को रक्षा करे। त - मातीव किमेवदलिपुटे तातेन गोपाप्यते घन्स स्वादु फल प्रयच्छति न मे गत्या गृहाण स्वयम् ॥ मात्रै प्रहिते गुहे विघटयत्या कृप्य संख्या अलि शम्भोमियसमाधिरुन्दर भसो हासोदम परतुरः ॥३॥ कार्तिकेय और पार्वती का संवाद, फार्तिकेय ने पूछा, माता, पार्वती ने कहा बेटा, फा०-पिता ने यह हाथों में क्या छिपारपा है, पा०-घेटा मीठा फल है, का0-मुझको तो नहीं देते, पा०-जाफर स्वयं लेलो, माता, के भेजने पर फाति फेय महादेय की सन्याञ्जलि सोलने लगा जिससे उनकी समाधि टूट गयी और वे हंसने लगे। महादेव की यह हंसी भापकी रंसा करें। प्रसाई यस स्व प्रकटप गुर्व संस्थान रूप प्रिये शुप्यनय तान्यगृतमिव ते मियत ययः निधान सोयोन क्षणमभिमुखं स्थापय मुख म मुग्धे प्रत्येतु प्रमयति गतः कालिहरिणः ॥५॥ प्रसन्न होभो, हर्ष प्रकाशित करो, फोध दूर फरो, मिये मेरे मा सूख रहे हैं, अमृत के समान भने पचनों का रियन फरो, शुषी का निधान अपना मुग पोड़ी देर के लिए अभि. मुग स्थापित करो । मुग्ध, यह गया दुमा फालापी हरना सीटता नहीं। एनारियन पाटनास्य पश्चाप दुगुरविशनारेबाम्तम् । भारपितविरवाग्मिी गाडी बीपीणी रनिरसा और प्रगामा दिनल सासारण अपने पति कविही भाण्टा करनेवाली यायावी, घरी हाल पफ मापसे कविता-कौमुदी। भस्त जाते हुए सूर्य को देख रही है और कुमुद्र के समान श्वेत दूसरी आंख से अपने पति की ओर देख रही है, इस प्रकार यह नर्तकी के समान एक ही समय दो विरुद्ध रसों की रचना करती है। एपाहि मे रणगतस्य द्वदा प्रतिज्ञा मक्ष्यन्ति यन रिपयो जघन हयानाम् । युद्धपुमाग्य चपलेषु न मे प्रतिज्ञा देवं यदिच्छतिज यच पराजयश्च ॥६॥ रण में जाने पर मेरो यह दद, प्रतिज्ञा है कि मेरे शत्रु मेरे घोड़ों की पिछली टांग नहीं देखेंगे, युद्ध भाग्याधीन है, उसके विषय में मेरी कोई प्रतिज्ञा नहीं है, भाग्य जैसा चाहता है थैसा होता है, जय या पराजय । जगदुर। ये संस्थत नाटकों के प्रसिद्ध टीकाकार हैं, न्यायवैशेषिक और व्याकरण का इनका ज्ञान आगाध था। वेणीसंहार वासवदत्ता मालतीमाधव, आदि फई नाटकों की टीका इन्होंने लिखी है, इनकी लिखी टीफाएं आदरणीय समझी जाती है। इन्होंने अपना परिचय इस प्रकार दिया है, ब्राह्मणश्रेष्ठ चण्डेश्वर एक प्रसिद्ध पंडित थे, मीमांसा में उनका अगाध शान था, इनके पुत्र का नाम रामेश्वर था और ये भी मीमांसक थे, रामेश्वर के पुत्र गदाधर हुए और उनके पुत्र विद्याधर हुए । विद्याधर के पुत्र का नाम रक्षधर था । जगद्धर के पिता येही रत्नधर थे, पण्डित रामकृष्ण भाण्डार फर कहते हैं कि जगद्धर का समय १४ वीं सदी से पहले नहीं हो सकता।
----
पन्याःगुमीनि मुरभीणि गुगोम्मिनानि
पानीपः स्थानोश्वनोदगतापाः ।
पिस्य निगमानि मा रियिन--
पनि कम्युमिनेशनमयन्ति।
अपने मुगरूपी याग में उत्पन्न होनेवाले पचनरूपी, पी
से चुनफर सुन्दर मुरमित गुण और उत्तमयन युक्त क्तिरू
फूलों से सजनों के फानों को भूपित करने हैं वे धन्य है।
तेऽनन्तयारमपमहाणवटपाराः
सोपामिका इय महाकवयो जयन्ति ।
यन्यूकिपेलवलपङ्गलवैरवैमि
मन्तःसासु बदनाम्यधियामयन्ति।
अनन्त याङ्मयरूपी महासमुद्र के पार जानेवाले मह
फघि जहाज के व्यापारी के समान है और धन्य हैं, मैंसर
झता है कि उनकी सूकिरूपी उत्तम लयङ्ग के टुकड़े
सजनगण सभाओं में मुख को सुगन्धित करते हैं।
प्रैलोक्यभूषणमणिगुणिवर्गपन्धु-
रेककान्ति सविता कविता द्वितीया ।
शंसन्ति यस्य महिमातिशय शिरीमिः
पादप विदधतः पृथिवीमृतोपि।
घिलोक के भूपणमणि, गुणियों के यन्धु एक सूर्य प्रक
शित होता है और दूसरी कविता ।थियोधर (राजा या पर्व
भी जिसकी महिमा की अधिकता, उसके चरणों को मस्त
से ग्रहण करके यतलाते हैं। अर्थात् पृथिवीधर राजा
फचियों की चरण यन्दना करते हैं और पृथिवीध
पर्वत सूर्य की किरणों को मस्तक पर धारण करते हैं।
N
कविता-कौमुदो।
शब्दार्थमाममपि ये न विदन्ति तेऽपि
यां मूछनामिव मृगाः श्रवणैः शिवन्तः ।
संरुद्धसर्वकरणप्रसरा भवन्ति
चिस्थिता इव कवीन्द्रागिरं नुमस्ताम् ॥
जिनको शब्दार्थ का ज्ञान नहीं है वे मृगा भी जिस
कविता को फेवल कानों से गान के समान सुनकर तन्मय
हो जाते हैं, याक्य और इन्द्रिय ज्ञान से शून्य चित्र लिखित
के समान हो जाते हैं, उस कवीन्द्रयाणी को नमस्कार।
अस्थाने गमितालयं इतधियां वाग्देवता कल्पते
धिकाराय पराभवाय महते तापाय पापाय वा।
स्थाने तु व्ययिता सतां प्रभवति प्रख्यातये भूतये ।
घेतोनितये परोपकृत्ये प्रान्ते शिवावाप्तये ।
वाग्देवता का अनुचित स्थान में यदि संनिवेश किया जाय
तो वह मूखों फे धिकार तथा पराजय के कारण होता है। बड़ा
मारी ताप होता है या पाप होता है, पर उसीका यदि
उचित स्थान पर विनियोग किया जाय तो यह सजनों की
प्रसिद्धि के लिए, समृद्धि के लिए, चित्त की प्रसनता के लिए,
परोपकार के लिए और अन्त में फल्याणप्राप्ति के लिए
होता है।
स्कारेण सौरभमरेण फिमेना-
स्तद्धानसारमपि सारमसारमेव ।
सक्सौमनस्यपि न पुष्यति सौमनस्य
प्रस्थन्दते यदि मधुद्रवपक्ति देवी॥
कस्तूरी के बड़ी गन्ध से क्या ? वह कपूर भी निरर्थक
हो है, माला फी सुगन्धि भी मन को प्रसन्न नहीं कर सफती,
पदि पाणीदेवी मधु का स्रोत बहाये।
.
७
स हेमालंकारः क्षितिपतनलनन रजसा
तथा दैन्यं नीतो नरपतिशिरःशाम्यविमयः।
यया लोष्ठभ्रान्तिव्यवहिवविवेकम्यतिकरो
विलोक्यन लोकः परिहरति पादक्षतिभयात् ॥
: राजाओं के मस्तक पर शोभा पाने वाला यह सुवर्णका
गाभूपण पृथिवी पर गिर पड़ा और यह धूल लगने से इस
समय इतना विरूप हो गया कि उसमें लोगों को लोहे की
भ्रान्ति होने लगी। उस भ्रान्ति से उनका वियेफ नर हो गया
और वे उस सुवर्णालंकार को देखकर पैर फटने के भय ।
दूर हो जाते हैं।
भाहतेषु विहंगमेषु गशको नाया-पुरो पार्यते
मध्ये या धुरि वा यसस्तृपमधिधरी मणिना स्यम् ।
पचौतापि न कम्पते प्रचरितु' मध्येपि तेजस्विना ।
भिसामान्यमधेतनं ममुमिपानामृष्टवायान्तरम् ॥
पक्षियों के निमन्त्रण में आगे आगे मशक (क्योकि
उसफे भी होते हैं) आता है और पद रोका नही
जाता, माग या मध्य में यदि तृणमणि माता है तो उसे
भी मणियों की शोमा नाश होती है, कोई उसे हटाता मई
तेजस्थियों के मध्य में पर्यात भी उनके सामने पेपर
घला माना उमे कुछ भप नहीं होता, उस धचंतन पर
मारट पा भान ममभन पाले म्यामी को धिकार।
एवं गरगम्यगावपाता बार' रिमेतार्थ
पायव निपात: माताप्रियिमनशी।
मुर पेल्धुधि पहा धूनिलि आमा परमी
रिदिामिप ममाल भवनमभ्यामरे॥
"
कविता-कौमुदी।
हे मृणाल, (कमल की ईठी)तुम्हारा स्वभाव इतना सरस
है तो यह जड़ता, भज्ञान या सर्दी, कैसो, यदि तुम स्वभाव
से ही सरल हो तो ये गाउँ कैसी, यदि तुम्हारा मूल शुद्ध
है तो तुम्हारे कीचड़ से उत्पन्न होते की यात क्यों कही जाती
है, यदि तुममें गुण (सद्गुण ) हैं तो ये छिद्र क्यों ? भृणाल
तुम्हारा क्या तत्व है सो कुछ मालूम नहीं पड़ता।
स्वं भोगी यदि कुण्डली यदि भोस्त्वं गुजंगः सखे
धत्से घेन्मुकुट सरत्नमुरग सत्यस्तु ते कि ततः ।
भस्थाने यदि करचुकं त्यजसि तास्माकमत्रहा
किंतु क रविपोलकया दहसि यातः क एप ग्रहः ।
तुम यदि भोगी हो, कुण्डली हो या भुजंग हो,(ये सब सर्प
के नाम है) तो रहो, हे उरंग, यदि तुम रत्नजड़ित मुकुट
धारण करते हो तो यह भी तुम्हे मुवारक रहे, जहां तहां तुम
कंचुक छोड़ते हो तो छोड़ो, इस विषय में भी हमें कुछ नहीं
कहना है, पर तुम भयानक विप के द्वारा लोगों को जलाते
हो यह तुम्हारा फोन सा हट है।
विधताः पदैः सितकरमभोस'सकु सुमैः
निरस्सीपार्थिः शमयति चलनापरवशा।
प्रियेण प्रत्यक्ष प्रणिहितदृशा यासमिसे
कपकार सार परिहरति हार नववधूः।
प्रिय जय नयपधू के प्रत्यङ्ग पर दृष्टि डालता है और उसके
फपड़े खींच लेता है तर यह द्वार बन्द करके चन्द्रमा को
छिपाती है, लजित होकर यह अपने फनफूल से दीपक बुझा
देतीहि, यह सप तो करती है पर नववधू अपना यड़ा गले का
हार कैसे छोड़ती है।
कदा संसारजालान्तबंद्ध त्रिगुण ररजाभः ।
मात्माने मोचयिष्यामि शिव भक्ति शलाकया।
त्रिगुण को रस्सी द्वारा संसारजाल में बंधे हुए अपने
को शिवभक्ति शलाका के द्वारा फय मुक करूगा ।
पाहमनःकायकर्माणि विनिवेश्य त्वयि प्रभो!
न्वन्मयीभूय निद्वन्द्वः कशित्स्यामपि कहि चित।
हे प्रभो, वचन मन शरीर और फर्म तुममें लगाकर
निर्बन्द और त्वइगतप्राण क्या फी में हो सकगा।
मलतेलाक्तयमारवासनावर्तिदाहिना ।
ज्ञानदीपेन देव न्यो कदानु स्यामुपस्थितः ॥
मलरूपी तेल में भिगोयी हुई संसारवासना रूपी धरती
को जलाने वाले शानदोष के सहारे मैं आपके पास काय
उपस्थित होऊंगा।
एकाकी निस्पृहः शान्तः पाणिपात्रो दिगम्बर।।
कदा शंभी भविष्यामि संसारोन्मूलनक्षमः॥
हेशम्भो, पकाफी निस्पृह शान्त, पानिपार और दिगम्बर
में कय होऊँगा, और कप में संसार का नाश कर सरगा।
मुशान्तशाखायविचारचापल
निकृतनानारसकाध्यकौतुरन् ।
निरम्ननिःशेषविकल्पविष्ट
परतु मन्विष्यति चक्रिण मनः।।
मेरे मन से शाखा के विचार पो चपलता दूर होगयो.
भनेकप्रकार के सरसफाय कौतुक से भी मन नियत हो गया
समस्त तक यितर्फ भी दूर होगये, इस समय मेरा मन मग
मान को शरण जाना चाहता है।
.
No text on this page.
श्रीमजज्ञानेन्द्रमिक्षारधिगतसकलबह्मविद्याप्रपञ्चः
कामादोरक्षपादीरपि गहनगिरो यो महेन्दावेदोत् ।
देवा देवाध्यगोष्ट स्मरहरनगरे शाशन जैमिनीयः
शेषांकासशेषामल मपित्तिर भूतसर्व विद्याधरोयः॥
पेरुभट्ट ने ज्ञानेन्द्र भिक्ष से समस्त ब्रह्मविद्या सोसी,
महेन्द्र पण्डित से जिन्होंने न्यायदर्शन और वैशेषिक दर्शन
का ज्ञान प्राप्त किया। काशी में महादेव से पूर्व मीमांसा पट्टी
और अन्य समस्त विद्या नागो जी भह से पड़ी।
ये दिल्ली के बादशाह के यहां रहते थे, दिल्ली जाने के
पहले चोलराज के दरवार में भी कुछ दिनों थे, पर यहां इनका
मन न लगा और ये जयपुर आये, जयपुर के पण्डितों से इन्होंने
शाखार्थ किया वहां एक पाठशाला स्थापित की और भनेक.
विद्यार्थियों को अनेक शास्त्र पढ़ाये ।
इन्होंने फारसी पदो थी, मुसल्मानी धर्मग्रन्य का भी इन्हें
मीदशान था, इन्होंने दिल्ली के फाजी से शास्त्रार्थ किया धीर
उसे परास्त किया, पादशाह ने इन्हें दिल्ली का फाजी पनाया,
दिलो के पादशाह शाहजहां के ये आधित हुप । शाहजहाँ ने
ही इन्हें पण्डितराज की पदयी दी । इन्हींके समय में अपप
दीक्षित थे चोर अप्पय दीक्षित से इनका विरोध था, इन्होंने
अध्ययदीक्षिन फी चित्रमीमांसा नामफ प्रन्य फा पान
किया है।
दिलो जाने के पहले ये नेपाल भी गये थे, पर यदा हलका
मन नही रमा भोर यहां से चले माये, इस संपन्ध में एक
सोक प्रसिद्ध है।
पापिता-पीमुदी।
दिलीपवरो या जगदीशपरोया मनोरणन पिसमा
नेपाभूः परिदीपन शारापास्पात साप पारमाण
वितरियर या जगदीपर मनायों को पूराफर सफते हैं,
मंपाल के राजा ने दिया यह शाफया निमफ के लिए
हो सकता है।
स्याही नाम को फिसो मुसलमान पन्या सेन्होंने प्याद
फिया था। यह पात प्रसिद्ध दी। इस संबध में दोंने
फदा है।।
पवनीमनीन सौमसाडी शयनीयरी यदि पायनी करो"
मनीवरमेय साधु मन्यम बनो मापनी विनोदः ।
', मकान के समान फोमलाली पवनी यदि पलंग को पवित्र
करे तो गीतलही उत्तम ईद का नन्दनयन अच्छा नहीं।
पर यवनी परिणय के कारण इनकी जातियालों ने इन्हें जाति.
व्युत कर दिया पा मोर इन्होंने पृद्धावस्था फाशी में
पितापी थी।
--
इनके. घनाये प्रन्यों के नाम ये है:-
अमृत लहरी,
भासा पिलास,
करुणारहरी,
चित्र मीमांसा पण्डन,
। जगदामरण काथ्य,
पीयूप लहरा,
जगन्नाथ पण्डितराजे।
प्राणामरण फाध्य,
मामिनीषिलाग,
मनोरमाकुचमदन,
यमुनायर्णन घम्प,
लक्ष्मी लहरी,
सुधालहरी,
रसगडाधर,
फामरूप के राजा के वर्णन में इन्होंने प्राणामरण नाम
एक काव्य लिपा है। इससे सम्भय है कुछ दिनों तक
यहां भी रहे हों।
इनकी युक्ति सरस और चुमनेवाली होती है, इन्होंने के
महाकाव्य नहीं लिखा है, फाय उत्तम गुण इनकी फविर
में फम पाये जाते हैं, शब्दसीटय और उति चातुर्य इनर
कविता में फाफी है और इसीसे इनकी कविता को माद
है। ये घड़े ही अमिमानी थे। अपनी कविता के विषय
इनकी समझ थी कि मेरे समान कविता करनेवाला दूसरं
नहीं, फेवल समझ ही नहीं थी यह यात इन्होंने लिखी भी।
भासूलालसानोमलपवलपितादा च कूलापपोधे
यावन्तः सन्ति काम्य प्रणेन पुटवसो विश बन्नु
मृद्धीकामध्य निर्यन्माणका माधुरी माग्य जो
वाचामाचा तापा पदमनु भवितुं कोलि धन्धो माइन्यः ।
मेरु पर्वत से लेकर मलयाचल वेष्टित समुद्रतीर पर्यन्त
जो फायरचना में चतुर हैं ये निशङ्क होफर कह, दाप से
निफले कोमल मधुरता पूर्ण पचन का प्राचार्य होने की
योग्यता मेरे अतिरिक और किस धन्य मनुष्य में है।
.
कविता-कौमुदी । इन्होंने अपने विषय में कहा है- शास्त्राग्याकालितानि नित्यविधयः सर्वेऽपि सम्भविताः दिलीवल्लुम्माणिपल्लवतले नीत नवीन वयः सम्पत्युज्झितमासन मधुरीमध्ये हरिः सेव्यते सर्व पण्डितराजिराजतिलके नाकारि लोकोत्तरम् । शास्त्रों का अध्ययन पिया, सभी नित्य विधियों का अनु. छान किया, दिल्ली पति के हाथों के नीचे नयी उमर बितायी इस समय पद छोड़ पार मथुरा में हरि की सेवा होती है, पण्डितराज ने सभी अद्भुत ही किया। सोलहवीं सदी के प्रार• म्भ में ये थे। विद्वांस बसुधातले परवधःलाधासु वाचयमाः भूपालाः कमलाविलासमदिरोन्मीलन्मदापूर्णिताः भास्ये धास्यति कस्य लास्यमधुना धन्यस्य कामालस- स्वामधिरमाधुरीमधरयन् वाचा विलासोमम ॥१॥ पृथिवी के विद्वान दूसरों की कविता की प्रशंसा करने के विषय में इस समय मौन हैं, राजा लोग धन मद से उन्मत्त हो रहे हैं, ऐसी दशा में काम से अलसायी देवाङ्गनाओं की अधर माधुरी को तिरस्कार करने वाला मेरा क्यनविलास किस धन्य मनुष्य के मुख में नृत्य करंगा। विदाणैव गुणज्ञता समुदिती भूयानसूयाभरः कालोऽयं कलिराजगाम जगतीलायण्यकुझिम्भरिः इत्य भावनया मदीय कविते मौन किमालम्बसे ज्तु क्षितिमण्डले चिरमिह श्रीकामरूपेश्वरः ॥२ गुणशता तो चलो ही गयी, दूसरों के गुणों में दोष देखने की प्रकृति उत्पन्न हुई है, यह कलियुग है जिसने जगत् का
जगनाथ पण्डि
सौन्दर्य नष्ट किया है, यह सोचकर हे में
क्यों हो रही हो, इस भूमण्डल पर
दिनों तक वर्तमान रहें ! अर्थात् वे ही ह
क्षोणि शासति मय्युपद्रवलयः कस्यपि
प्रौद प्यादरतो दचस्तव कथं देवप्रतीमे
प्रत्यक्ष भवतो विपक्षनिवहर्यामुत्पतद्भिः
ययुग्मन्कुटकोटिमूलपुरुषो निमिंधने
मेरे शासन के समय किसी को भी धो.
हो थापको इस बात को हम लोग कैसे सत्य
यह प्रत्यक्ष है कि आपया शसमूह प्रोध
जाता है और यह आपके पुल के मूल पुरुष
फरता है।
पुरा सासि मानसे पिम्पमारमालिरमाला
परागमुरमीते पयसि पर यात पयः
स पबलजलेऽधुना मिलदनेम्भकारले
मरासकुलनायकः इथपरं क्यं यताम् ।
पहले गागमगंबर : विवामित मामलों के गिर
गुगन्धित जल में जिसने यी उमर शिवायी, यद
भारोटे तालाय में-जिममें मनमा महमारी
कहो तो।
भारदिय सरिता ना गुदा रगा गुरुणानिसमा
सांधमशि मावि दानो मौनी नु इन कर्मा गतिर
रांगर, नुम्मार दीन दान ।
गाउकार HIT
पाविता-कीमुदो ।
का आश्रय लिया पर विचारी गलियों को क्या दशा होगी,
ये कहाँ आश्रय पायेंगी।
पुरूत्व गहनेऽस्मिन् कोकिन कल कदाचिदपि कुषाः
सामान्पर्शमयामीन त्या प्रन्ति नियाः काकाः ।
हे कोफिल, तुम इस घर में अकेली हो, इसलिए कभी
योलना मत, नहीं तो पौओं को मालूम होजायगा कि यह
कौआ नहीं है और ये निर्दय तुम्हें मार डालेंगे। अभी तो
न बोलने से तुम्हें अपनी जाति का समझते हैं और इसीसे वे
तुम्हें नहीं मारते।
प्रीमे मीमत करीदिनहतो दग्धोऽपि यश्चातका.
वो ध्यायन् धन, वासरान् कथमपि दाधीयसो नीतवान् ।
'देवालोचनगोचरेण माना रिमनिदानीं यदि
स्थीचके करकानिपातनकृपा तत् कम्प्रति धमहे ।
हे मेघ, गर्मी के सूर्य की कड़ी किरणों से जला हुआ भो
जिस चातक ने फेवल तुम्हारा ही ध्यान करके उन घड़े दिनों
फो बिताया, अब तुम भाग्य से दिखायी पड़े तो उस विचारे
चातक पर नुमने पत्थर बरसाने की कृपा की, यह यात
किससे हम लोग कहें।
स्थिति नोरे दयाः क्षणमपि मदान्धेक्षण ससे,
गोपिनाथ त्वमिद जटिवायां धनमुषि,
असो कुम्भिधान्त्या सर नखर विद्रावितमहा.
गुरयावनामः स्तपिति गिरिगमें हरिपतिः।
हे मतवालो घाखो वाले गजराज, इस चोहड़ घन में एक
क्षण भी न रहो, यह देखो, हाथी के भ्रम से तोखे नसों द्वारा
२
है.
१०८
जगन्नाय पग्निराज।
पपई पथरी को चीर पर यही पर्वा की र
सिंद सो रहा है।
भम्पा जगदिनमयो मनमः प्रसिग्न्येय कापिरयना यदन
लोकोसरा पति विराधाविद्यायोमारमंत्र
पिढानों को सभी यात पिलसान होती है, उनका
सिफ प्रवृत्ति संसार का कल्याण परनबाली होती है,
योलने का ढंग पुछ विलक्षण ही होता है । उनके
लोकोत्तर होते हैं और उनकी आरति पीड़ितों को
मालूम होती है।
गुरमप्पगता मया नताली निहिता नीरवर रेण मन्दन,
दरकालसापड नत निलक मामलोग्य पूर्णितासीन ।
यह कोमलाङ्गी अपने बड़ों के बीच में बैठी थी, मैंने उन
फमल की फली से धीरे से मारा, उसने अपने कुण्डलों के
घोड़ा नचाकर भौहाँ फो टेदी कर मुझे शोधपूर्वक देखा।
तीरे तरुण्या पदनं सहाम नीरे सरोजनमिद्विवासम्
भालोक्य धावत्युभयस मुग्धा मरन्दलुब्धानिकिशोरमाला।
तीर पर युवती का हंसता हुआ मुख है और
खिला फमल है, दोनों को देख कर पुष्प-रस की लो
भ्रमरपंक्ति कभी इधर और कभी उधर दौड़ती हैं, 3
लिए इस यात फा निश्चय करना कठिन हो रहा है कि क
उपनिषदः परिपीता गीतापि च हन्त श्रुतिपय नोता,
तदपि न हा विधुवदना मानससदनादहियांति।
उपनिषदों का पान किया, गीता फोगी
वह चन्द्रमुखी
मन
कविता-कौमुदो।
लोभाद्वराटिकानां विक्रतु' तक्रमविरतमटन्न्या
लब्धो गोपकिशोर्या मध्यरथ्यं महेन्द्रनीलमणिः
कोई गोपकन्या कौड़ियों के लाभ से तक बैंचने के लिए
गलियों में घूम रही थी, गलो के बीच में उसे इन्द्रनीलमणि
मिल गया।
-
गुरुमध्ये हरिणाक्षीमाति कसकहनिहन्तुकाम माम्
रदयन्मित रसनाय तरलितनयन निवारयाचक
अपने बड़े के बीच में यह बैठी थी, उस मृगनयनी ने मिट्टी
के टुकड़ों से मारने की इच्छा रखने वाले मुझको, अपनी जीभ
के अग्रभाग को दांतो से दया कर और आंखें घुमाकर
रोका।
दैवे पराग्वदनशालिनि हन्त जाते,
पाते च सम्प्रति दिवं प्रतिवन्धुरत्ने,
कस्म मनः कथयितासि निजामवस्था
काशीतलःशयिता वनस्मवाधिम् ।
भाग्य के प्रतिफल होने पर और मित्र के स्वर्गगामी होने
पर हेमन, तुम अपनी अवस्था का वर्णन किससे फरोगे और
कौर शीतल पचनों द्वारा तुम्हारा दुःख दूर करेगा।
.' सर्वेऽपि विस्मृतिपय विषयाः प्रयाता
विद्यापि खेदगलिवा विमुखीवभूव,
सा केवल हरिणशावकलोचना मे
नवापयाति दयादधिदेवतेय ।
सभी पाते भूलगयी, विद्या भी दुःख के मारे कट गयी,
पर फेपल यही हरिणशावक लोचना अधिष्ठात्री देवता के
समान मेरे हृदय से नहीं निकल रही है।
aram ITI Tagiri Timi RR मा uirme गागामिनी मापन। मागि, ममिनार TET मनी फी नुमने दूम पुरा को नहीं देगा, ही म. सात निगुग परतुः (परम पुगर, परभर ) पोगाने मंदिर की कली हो पदो। एणतारिगरमी राम. ममा गुरगनुर्ग या पिता पिान. कानिन्दिगिरिनन्दिनीना गुप्नुमानिनी, मदी पमगिगुमिनो मागका बादमिती, स्मरण करने में भी जो मनुष्यों के फटार दुभा को हरप परती, पायर्या प्रभार पाली विलियों से जिसफा शरीर शोभित हो रहा है, यमुना के तीर के देवस पर लटकने पाली फोई मेघमाला ( कृष्ण ) मेरी बुद्धि का चुम्यन करे, अर्थात् मेरो पुद्धि उसका चिन्तन करे। वापा निर्मलया मुधामपुरया यो नाप शिक्षामदा- स्तो स्पमेऽपिन संस्मराम्पामहम्मावतो निसपः इत्यागःशवशालिम पुनरपि स्वीयेषु मां विभ्रत- स्वत्तो मास्ति दयानिधियंदुपते मत्तो न मतोऽपरः- नाथ, अमृत के समान मधुर निर्मल पचनों द्वारा शिक्षा आपने दी है, उसको स्वप्न में भी मैं स्मरण नहीं करता क्योंकि मैं अहफारी, निर्लज, इस प्रकार के अनेर मेरे अपराध हैं, फिर भी भाप मुझे अपनाये हुए हैं, हे या
कविता-कौमुदौ ।
पते, आपके समान दूसरा दयालु नहीं है और न मेरे समान
मतवाला ही कोई दूसरा है।
पाताल ग्रज, याहि या सुरपुरीभारोह मेरोः शिरः
पारावारपरम्परं तर तथाप्याशा न शान्ता तव,
भाधिव्याधिजरापराहत, यदि क्षेम निज वाञ्छसि,
श्रीकृष्णेति रसयन रसय रेशून्यैः किमन्यैः श्रमः ।
• पाताल में जाओ, देवताओं की पुरी में जाओ, मेरु पर्वत
सिर पर चढ़ो अथवा समस्त समुद्रों को पार करो, फिर भी
तुम्हारी आशा शान्त न होगी. हे मानसिक और शरीरिक
दुखों से पीड़ित, यदि तुम अपना कल्याण चाहते हो तो
(धीवाण) इस रसायन फामास्वादन करो,निरर्थक अन्य प्रयत्नों
से लाभ क्या
मृददीका रसिता सिता समशिता स्फीतं निपीत पयः
स्वर्यातेन सुधाप्यधायि कतिधा रम्भाधरः खण्डितः
सत्यं हि मदीय जीव भवता भूयो भवे भ्राम्यता,
कृष्णेत्यक्षरपोरय मधुरिमोदगारः कचिल्लक्षितः।
दाल तुमने खाया, मिश्री पायी, दुध पिया, स्वर्ग जाने
पर अमृत पिया, रामा के अधर का भी आस्वादन किया
हे मेरे जीव, सच कहो पारवार संसार में धूमने से तुम्हें
(कृष्ण) इन अक्षरों की मिटाई के समान मिटाई कहीं मिली है।
सपदि विलयमेतु राजलक्ष्मी रुपरि पतन्वयवा कृपाणधारा
अपरातुनरी शिलान्तोमम मनोन मनागपति धर्मात् ।
इसी समय राजलक्ष्मी का नाश हो जाय, अथवा मेरे
ऊपर तलवारें पड़े यमराज मस्तक ले जाय पर मेरा मन धर्म
से नहीं हटता।
स्पी कोऽपि न विधुतःथ नधरो धोयीकशि १ जयदेव। जयदेव। इनकी कविता बड़ी ही सरस और म गीतगोविन्द नाम का एक ग्रन्थ बनाया की स्तुति है, राधामाधय की केलि वर्णन सीमापार कर गया है, शृङ्गार की धारा है। यदि उस वर्णन से राधामाधव का संक देव की वाणी इतनी मधुर न होती, तो ले फहते। घंगाल के किन्दुविल्य नामक गांव में ये गांव वीरभूमि जिला में है। इनके पिता का और माता का नाम यामादेवी था। इनकी पद्मावती था। ये वैष्णव थे। ये बंगाल के राज की सभा में रहते थे, यह वात नीचे लिखे ग्लोष पड़ती है। गोवर्धनश्च शरणो जयदेव उमापतिः कविराजश्व रवानि समिती लक्ष्मणस्य हि । इस ग्लोफ की पुष्टि जयदेव ने अपने गीतगोविन्द म्भिक एफ श्लोक द्वारा फी है वाधः पलवपत्युमापतिधरः सन्दर्मशुदिगिराम, जानोते जयदेव एवं शरणः श्लप्यो दुरूहुतेः शरोमरसत्यमेयरचनैरायायंगोवर्धन- इनके अतिरित कविता-कौमुदी। पूर्व पत्र सम स्वपा रतिपतरासादिताः सिदम- स्तस्मिन्नेव निकुञ्जमन्मममहातीय पुनर्माधवः । प्यास्त्वामनिर्श जपमपि तवैवालापमन्याक्षर भूयस्त्वत्कुचकम्मनिर्भरपरीरम्भामृत वाञ्छति ॥ पहले तुम्हारे साथ जहां कामदेव की सिद्धि पायी थी उसी कामदेव के महातीर्थ कुज में माधय पुनः तुम्हारा ध्यान करता है और तुम्हारी ही बातों को मन्त्र घना कर जप रहा है, और पुनः यह तुम्हारे आलिङ्गन का अमृत चाहता है। रविसुखसारे गतमभिमारे मदनमनोहरवेशम् । न कुरु निम्बिनि गमनबिलम्पनमनुमर ते हृदयेशम् । धीरसमीरे यमुनातीरे वसति वने धनमाली। पीनपयोधरपरिसरमदर्दनचलकरयुगशाली ॥ ध्रुवम् अभिसार के लिए मदन का मनोहर धेश प्राप्त हुआ है, चलने में विलम्ब मत करो हृदयेश का स्मरण फरो। इस समय वनमाली यमुनातीर पर हैं जहां मन्द मन्द हवा चल रही है, और तुम्हारे स्तनस्पर्श के लिए उनके हाथ चञ्चल हो मामसमेत कृतसङ्कत वादयते मृदुवेणुम् । बहुमनुते ननु ते तनुमगनपचनचलितमपि रेणुम् । तुम्हारा नाम लेकर सङ्कत कर रहे हैं घेणु बजा रहे हैं, तुम्हारे शरीर को धूलि जो वायु के द्वारा लायी जाती है उसे भी वे बहुत समझते हैं । पतत्ति पतत्रे विचलति पत्रे शद्वितभवदुपयानम। रवि शयनं सचकितनयन पश्यति तव पन्धानम् ।। ८
हरिसेवक जयदेव ने यह परम रमणीय उति कही।
प्रविशति गुहा व गुजन गुर्वरतास्यति ।
जयदेय।
जप पक्षी उड़ने या पत्ता गटकता है तो उन्न
भाने का सन्देह हो जाता विधाना यना
चकित होफर तुम्हारा मार्ग दंगते हैं।
मुपरमधीर त्या ममोर रिपुमिय फेलिगु लोलन ।
पल पशि युगनिमिराशालय नोलनिदोलन -
फोडा में शत्रुरूप इस यसने वाले नृपुर को ओड
सखि, अन्धेरै कुक्ष की ओर चलो और काला कुता पहन
उरपि मुरारेपहितहार धन इव तालबला।
तदिदिय पीते रतिविपरीते राजसि मुस्वरिपाऊँ ।
हे पुण्यवति, माधय के उरस्थल पर माला पड़ी है, इस
यह चञ्चल धकपक्ति युक्त मेघ के समान मालूम होता है, उन
पर विपरीत रति में विद्युत के समान तुम शोभित होओगी
हरिरभिमानी रजनिरिदानीमियमपि याति विरामम् ।
कुरु मम वचन सत्दारचन पूरय मधुरिपुकामम् ॥
कृष्ण अभिमानी है, रात भी बीत रही है, मेरी बात मा
कृष्ण का मनोरथ पूरा करो।
श्रीजयदेव कृतहरिसेवे भपति परमरमणीयम्।
प्रमुदितहृदयं हरिमतिसदयं नमत सुकृतकमनीयम् ।
प्रसन्नचित्त
दयालु
और
पुण्य
के द्वारा सुन्दर हरि
नमस्कार करो।
विकिरति मुदः श्वामानाशा: पुरो मुहरीक्षते
फपिता-कौमुदी। रचयति मुहः शमी पप्पांमुळे गुदरीक्षते मदनकदनकान्तः कान्त प्रियस्तय वसते॥ भार यार चारो तरफ श्वास फेंक रहा है,धार धार आगे ी ओर देखता है, कुछ बोलता हुआ यार यार कुञ्ज में जाता । बहुत व्याकुल होता है, पारधार शय्या बनाता है, व्या. ल होकर वारवार देराता है, कान्ते, तुम्हारा प्रिय इस समय दिन के भय से व्याकुल है। विद्वाम्येन सय समप्रमथुना तिग्मांशासांगतो गोविन्दस्य मनोरथेन च समं प्राप्त' तमः सान्द्रताम् । कोकानां फरणस्यनेन सदृशी दीप मदभ्यर्थना तन्मुग्ये विफल विलम्बनमसी रम्योऽभिसारक्षणः॥ तुम्हारी चामता के साथ साथ यह सूर्य अस्त हो गया, नोबिन्द के मनोरथ के साथ साथ अन्धकार गाद हो गया। चकया की करुणप्रार्थना के समान मेरी यह प्रार्थना है, मुग्धे, अब विलम्ब व्यर्थ है, यह अभिसार का उत्तम अव- सर है। • मा पादनु चुम्बनादनु नसोलेसादनु स्यान्तज- प्रोद्वयोधादनु सम्भ्रमादनु रतारम्भादनु प्रीतयोः भन्याय गतयोमान्मिलितयोः सम्भाषणैजानवो- दम्पन्योरपि को न को न तमसि प्रीड़ाविमिश्रो रसः प्रेमी दम्पतियों को अन्धकार में लजायुक्त अनेक प्रकार के रस प्राप्त होते हैं। पालिङ्गन चुम्बन, नखोल ख, मानसिक उल्लास, घबड़ाहट भिन्न भिन्न मार्ग में जाने वालों का सम से -मिलना और बोली से पुनः पहचानना आदि अनेक. प्रकार के ,सुख प्रात होते हैं।
कष्टों से भाई हुई तुमको दंपकर तुम्हारा प्रिय
मणि, भाभूपण योग्य नीला रत्न, पृथिवी का भार उतार
माले, मजनारियों के मन को सन्तुष्ट पारने पाले, सकेमार
पानयाले थे। इनकी मामा का नाम सुमित्रा
दूसरामाम पक्षधर भी था भोर पक्षपरी मामकीपरपुर
जयदेव (२)।
समयचकित विन्यस्यन्तो दृशौ तिमिरे पमि
प्रतितरु मुहः स्थित्वा मन्द पदानि वितन्यतीम्
कथमपि रहः प्राप्तामनगतरङ्गिभिः
सुमुखि सुभगः पश्यन् स त्वामुपेतु कृताधताम
अंधेरै मार्ग में चकित होकर देखती हुई प्रत्ये
पास ठहर फर धीरे धीरे पैर रखती हुई इस प्रकर
अङ्गों से कृतार्थ हो।
राधामुग्धमुखारविन्दमधुपस्त्रैलोक्यमौलिस्थली-
नेपथ्योचितनीहरशमवनीभारायवारान्तरः
सद मनसुन्दरीगनमन सोपप्रदोषविर
कसभ्यसनधमकेतुरवतु त्वा देवकीनन्दनः ।
सुन्दर मुरा कमल के भ्रमर, पिलोकोशि
राधा के
के चिन्ह, देवकीनन्दन तुम्हारी रक्षा करें।
जयदेव (२)
न्होंने प्रमतरापथ गामफ, नाटक याया।यह गि
पिता का नाम महादश था। यह कौण्डिन्य गांव के थे
विलसन कायि होने प. अतिरित.मयापिश भी। वा
फपिता-कोमुदी।
न्याय की इन्होंने यनायी है और भी न्याय की पुस्तकें इन्होंने
लिखी है। चन्द्रालोफ नामफ अलङ्कार प्रन्थ भी इन्हींका
पनाया है । इस प्रन्य में इन्होंने अपना नाम पीयूपवर्ष लिखा
है। इनके निश्चित समय का अभी तक टीफ पता नहीं लगता,
पर ३५हवीं शताब्दी में इनफा होना अनुमान किया जाता है।
ये नैयायिक और कवि दोनों थे और सफा इन्हे अभि-
मान था, यह पात इन्होंने अपने प्रध में साफ लिखी मी है।
इनका कहना है कि विलासी भी वीर हो सकता और कवि
नैयायिक भी हो सकता है।
रेषां मोमलकाध्यकौशल कलालीलावती भारती,
तेषां का शतक धनयवनोद्गारेऽपि कि होयते,
यैः कान्ताकु यमण्डल कररहा, सानन्दमारोपिता-
स्तैः किमतकरीन्दकुम्भशिखरे नारोपणीयाः शराः।
इनकी न्यायशास्त्र में बड़ी, प्रखरगति थी, ये शास्त्रार्थ में
बड़े बड़े पण्डिता को परास्त कर देते थे। इनके विषय में
कह जाता हैं कि पक्षधर का प्रतिपक्षी कोई दीख न पड़ा।
"पक्षाधर प्रतिपक्षी लक्षीभूतो न च कापि"
येषो कोमलकाम्यकौशलकलालीलावती मारती।
तेषां कर्कशतर्कवक्रवचनोद्गारेऽपि कि हीयते ।
मकान्ताकुचमण्डले कररहाः सानन्दमारोपिता-
स्तैः कि मतकरीन्द्रकुम्भशिखरे मारोपणीयाः शराः
जिनकी पाणी काव्यपाला फोमल है, ये क्या कठोर तर्फ
शास्त्र के पचन नहीं कह सकते ? जिन लोगों ने आनन्द पूर्वक
फ्रान्त के कुचमएल पर हाथ रखे हैं, ये क्या मतपाले हाथी
के मस्तक पर याण नहीं छोड़ते ।
--
-
-- यह देखो, चक्रवाक दम्पती के हृदयों को आश्वासित करने के लिए. ताराओं का प्रास करने के लिए, प्रकाशित जयदेव (२)। मपि गुदमुम्पान्ती याग्विनामः सकीयः परमणिति सो यान्ति रान्तः पिता निजधनमकरन्दस्यन्दपणालयाला कलशसलिलमेक मेहत शिरगालः॥ अपनी याणी से प्रसन्न होने वाले भी कई सजन दुसरी की वाणी सुनकर प्रसर होते हैं । जिस रसाल वृक्ष का भाल पाल उसके अपने पुष्परस से पूर्ण होता है वह क्या प्रड़े के जल से सींचा जाना पसन्द नहीं करता। पातां च कौतुकयतो विमला च विद्या लोकोत्तरः परिमलव कुरगनाभः। तैलस्य विन्दरिय वारिणि दुर्निवार- मैतमय प्रसरवि स्वयमेव भूमौ ॥ आश्चर्यमयी याणी, निर्मल विद्या और और लोकातर कस्तूरी फी गन्ध ये तीन जल में तेलबिन्दु के समान मापही आप फैलते हैं, इनको रोकना असम्भव है। एतत्तय चक्रवाहृदयाश्वासाय तारागण- प्रासाय स्फुरदिन्द्रमण्डलपरीहासाय भास निधिः। दिकान्ताकुचकुम्भकुडमरसन्यासाय पर रहो- ब्लासाय स्फुटवैरिकरवदनभासाय विद्योतते ॥ होनेवाले चन्द्रमण्डल की हंसी करने के लिए, दिगणना स्तनों पर फुकुम का रस लगाने के लिए फमलों को विकसित करने के लिए, और खुल्लम खुल्ला शता करनेवाले कैप बन को भप देने लिए यह सूर्य प्रकाशित हो रहा है।
No text on this page.
Anas
१२०
जलहणं ।
रूपू रादपि कैरवादपि दलकुन्दादपि सणंदी-
कर लादपि केतकादपि बलत्कान्ताहगन्तादपि ।
इरोन्मुफकलदर्शकरशिरशीतांशुरण्टादपि
श्वेताभिस्तव कौति मिर्धवलिता सहाणेवा मेदिनी.
कपूर, कैरव विकसित होने वाले कुन्द, गङ्गा की तर
फेतक, स्त्री के चञ्चल आंसी के फोग, कलङ्क रहित महादेव
के सिर पर रहने वाले चन्द्रखण्ड से भी अधिक मुम्हारी
फीति श्येत है और उसने सात समुद्रों से घिरी पूधियो के।
श्वेत पना दिया।
-
जल्हण ।
ये कवि काश्मीर देश के निवासी थे। मसफपि में इनके
पिण्य में अपने श्रीफण्टचरित में जो लिया है, यह मीचे उगत
किया जाता है।
বা এনি প্রশ্ন বা মংহ অব
मारवाये विनिमांनुमुपोव इक्षिणम,
प्रविण मुरारिमनुधावतः
श्रीगिरानीकी यायाधिपाग
भीमामारीमधिधिमाल निपागिमम्,
यामिनियासिना
इन मासा में मादम ता कि पक्रोनि का
पनिणय रचना में मुरारिमयिकी परामरी
तिसराय की पत्रिता नवी मारणं थी, हामी
* मनांत पूर्ण राजा पं. मंत्री ने सोम
कविता-कौमुदी विलास नाम का एक काव्य यनाया था, इस कार की टीका राजानक रुप्यक ने बनायी थी, जिसका नाम अलंकारा- नुसारिणी है । इस काव्य में राजपुरी के राजा सोमपालका वर्णन है। स्वप्रया कुचिकयेव केचित्सारस्वतं वक्रिममनिमाजम् । कवीश्वरः कोपि पदार्थकोशमुद्धाक्ष्य विवाभरणं करोति ॥१॥ यता धारण करनेवाले सरस्वती के पदार्थकोश को कवीश्वर कुंजीरूपी अपनी बुद्धि से खोलते हैं और उसके द्वारा संसार को भूपित करते हैं। कपीश्वर कठिन तत्वों को अपनी बुद्धि से सुलझाते हैं और उससे संसार का उपकार होता है। देवीगिरः कोऽपि कृतान्ति ताः कुण्ठयन्त्येव पुनर्विदा ।। या विमुपः शुक्तिमुपेषु दैव्यस्ता एव मुक्ता नतु चातके ॥२॥ कुछ लोग देवी वाणी को हतार्थ फररी हैं और मूर्ख उसी को कुण्ठित करते हैं, जो दिव्य जलबिन्दु सीप के मुख में पड़ते हैं उन्हींसे मोती तय्यार होजाता है, चातकों के मुख में पड़े विन्दु से नहीं। परिश्रम जनमन्तरेण भीनमत विभ्रति वाग्मिनोपि ॥ पायमाः सन्ति विना वसन्त कोकिला पधमपधयोपि ॥३॥ परिश्रम जाननेवाला भगुप्य यदि न मिले तो धक्का भी घुप रहते हैं। पञ्चम राग गाने में चतुर फोफिल भी धसन्त के बिना घुपही रहता है। छ । ग्याला राहुबसुधाप्रसादानिहाशिरोनिप्रामुममापुः ॥ हतीद भौताः पिशुना भवन्ति पराइ मुखाः कालरसामृते ।। ५५ ले से फिस फिस धन को तोड़ फाड़ नहीं रहे हैं क्योंकि P ૨૨ जल्हण। हाथी और राहु फो अमृत के कारण जिहा और मस्तम फा फटिन दण्ड भोगना पड़ा है। इससे भीत होकर पिन मनुप्य काव्यरसामृत से अलग ही रहते है। माद्यन्मातमकुम्भस्थलबहलवसावासनाविधगन्ध- प्यासनग्यक्तमुताफलशकललसत्येसराली करालः॥ व्याधीवैधव्यवेधाः स्वभुजवलमतग्रस्ततेजस्विधामा विम्यत्सारङ्गसार्थः सतठमसहनः केसरी केन दृष्टः॥५॥ मतवाले हाथी के कुम्भ-स्थल की गादी ची से या होने के कारण कच्चे मांस के समान जो महकता है, हाथ कुम्भ-स्थल को अधिक खरोचने से निकले हुए मुका के टुप से जिसका फेसर भयानक होगया है, व्यात्रियों को विध बनानेवाला अपने भुजवल से अन्य तेजस्वियों के तेज नीचा दिखाने वाला, यह सिंह किसके दृष्टिपथ में भाग जिससे हिरनी का समूह डरा करता है । कः कः कुत्र न घुर्यु रायितपुरीपोरो घुरेन्सूकरः कः कः के कमलाकर विकमल कतु करी मोद्यतः॥ के के कानि वनान्यरण्यमहिपा नोन्मूलयेयुर्यतः सिंहीस्नेहविलासवधसतिः पञ्चाननो यतते ॥६॥ . किस किस सूफर ने धुधुराराप से भयङ्कर पनफर लोग भयभीत नहीं किया है, फोन कोन हाथी फिस किस नल घन को फमल हीन करने के लिए उत नहीं होते हैं, समय सिंह सिहिनी के प्रेम के कारण यिलासी बना है।
कविता-कौमुदी। १२३ मावास्यादपि यो विदारितमदोन्मत्तम कुम्भस्थली स्थालीमध्यक वोग्णरक्तरसामुक्तापुकारुप्रियः ।। इस्तस्तस्य कर्य प्रपर्यतु पुर कृष्छेप्यास्थान्तरे गावत विवर्तमानशाणापहारे हरेः ॥७॥ जिसने थाल्यावस्था से ही मतवाले हाधियों के कुम्भस्थल को तोड़ा है, और जिसे गर्म रक्त से सना हुआ मुक्ताफल प्रिय है, उस सिंह की चाहे कैसी ही धुरी अवस्था हो पर गढ़े में गिरे भय व्याकुल हरिण को मारने के लिए उसका हाथ कैसे आगे बढ़ेगा। रकालयमसरकोटिनिभा:दभाना था पलाशवनतोपि पलाय्य जग्मुः। सिंहस्प तस्य जरतो विषमा दशा यदुगोमायुवरवयवैरपि नास्ति धृत्तिः ॥८॥ पलाश के फल भी रक्तयुक्त सिंह के नखों के समान है, इसलिए हाथी पलाश यन को भी छोड़ कर भाग गये, उस पढ़े सिंह की आज धुरी दशा है, जो कि आज उसे शृगाल के मांस के टुकड़े भी जीवन के लिए नहीं मिलते। पर्जन्य प्रतिगर्जतः प्रतिनिधिचिन्भ्यस्य वातोद्धता- नम्भोधीनिव धावतः सरभर्स हत्वा रणे वारणम् ।। वृक्षावृक्षमुपेयुपोल्यपपुषा शाखा मृगस्योपरि अदः सेोपि भवानही बत् गतः पचास्य हास्यां दशाम् ॥९॥ हे सिंह तुम, मेघ को देखकर गर्जते हो, वाताभित मुन्द्रों के समान दौड़ते हुए विन्ध्याचल के समान हाथियों रण में शीघ्रता पूर्वक मारते हो, आप एक वृक्ष से सरे वृक्ष पर कूदने घाले अल्पकाय धानरों पर कोप करते ,सिंह, दुःख की बात है कि आपने अपने इस आचरण से पिनी हसी करायी।
सन्हण। गीत: शिलगानी गपोनिष: Te: गरपा:रममागमामिाण करेगुत्र था। गरिक भवनमा रमापरिमल मागापारपि दुमा पदय मदा परि म्यापितः 111 पद यिय पर्यत, उस पर फा पालु भीर पीपल तर उत्फण्ठा पूर्यफ शीघ्रगा में भापी ई यह हथिनी क्या प्रा. इन मया यह हाथी म्मरण करता है, माग्य सब यानी भुला देना है, यह नोमियम अधिर दुम की यात है कि- "मन्द" मागे फिया गया प्रयात् यह प्रधान पनाया गया। दापी फे एफ निशष्ट जाति को मन्द फहत है। मापे विम्यमुर्मिनामदनदीवातूलवातावली- हेलोदूलितमलिकाकिसलयेयों पृद्धिमम्यागत ।। सोय देववदिशाविरहितः शूकारकारो करी : निर्मदगजरग्नुपाशविवशः कष्ट किमाटताम् ॥1॥ विन्ध्य पर्वत में उतुङ्गेलहरी नर्मदा नदी के वायु के द्वार अनायास कम्पित मल्लिका की फोदियों से जो पदा है, यह आज भाग्य के फेर से हथिनी विहीन होकर धूरकार का रहा है,,विपशमाय से रस्सियों में बंधा है यह अब या कर सकता है। गम्भकुअर महागिरिकु राजि मपापि मा स्मर सलीलानिमीलिताः ।। मुशामिमानमधुना भग वर्तमान व विधैरपरि शामनमश च ॥१२॥ हे गन्धगज, अय मांखें यन्द फरफे पर्वत कुजो काम रण न करो, अय अभिमान छोड़ दो, इस समय की भवस्खा को भोगो, अय मग्य का शासन और अङ्कुश सहो ।
कविता-कौमुदाः पोपितोसि चिरकालमकि धनः सवर्णः प्रतिग्रहधनग्रहणाधर्मणः।। निलं गर्भसि समुद्रतटेपि तत्र एष्टोऽधमानव समो धन नैव दृष्टः ॥१३॥ 'हे मेघ, तुमने बहुत दिनों तक जहां दरिद रह कर घास किया है, उससे जल ग्रहण करके तुम उसके ऋणो भी यने हो, हे निलंज, तुम उसी समुद्र तट पर गजते हो, तुम्हारे ममान धृष्ट और अधम दूसरा नहीं देखा गया। बास्य निरस्य रसितैः सुचिर विहस्य गात्रान्तरेषु धन वर्षसि घातकस्य । च कोटि कुरिलायतकन्धरम्य प्राणान्ययोस्य भवतः परिहासमात्रम् ॥१५॥ हे मेघ, मुंह खोलकर गर्जकर और सूप हंसफर चातक के शरीर पर नुम, पानी बरसाते हो, लम्बी और टेदी गर्दन वाले उस चातक की मृत्यु तुम्हारे लिए फेवल एक हंसी की बात है। भह त्रिविक्रम । इन्होंने नलचम्पू नाम का एक अन्य बनाया है, इस ग्रन्थ का दूसरा नाम दमयन्तीकथा भी है । भट्टत्रिविक्रम के पिता का नाम देवादित्य था। ये नेमादित्य भी कहे जाते थे। इनके पितामह का नाम श्रीधर था और ये शाण्डिल्य गोत्र के थे । भोजराज रचित सरस्वतीफण्ठाभरण में और रुद्रटालं. फार की टीका में नलचम्पू के श्लोक,उद्धृत किये गये हैं। । कहाजाता है कि त्रिविक्रम कुछ पढ़े लिखे न थे, ये योही अपना समय इधर उधर खेल कूद में बिताया करते थे। इनके पिता किसी राजा के यहां राजपण्डित थे। एक बार किसी कार्यवश इनके पिता कहीं बाहर गये हुए थे, उस समय राजा
No text on this page.
कविता-कौमुदी। : पदन्यास (पैरों का रखना, अथवा पद्य में शब्दों का रखना) में निपुण नहीं है और जननीराग के (जनो के नीराग-चिराग सयया जननी के राग के) हेतु, यहुत बोलने वाले कुछ कवि बालकों के समान हैं। से पन्यारत महान्मानस्तेषां लोके स्थिर पश: निबद्धानि काव्यानि ये या काव्येषु कीर्तिताः ।।३।। घे चन्दनीय हैं, वे महात्मा हैं और उन्हींका यश इस संसार में स्थिर है, जिन लोगों ने काव्य धनाये हैं या जिनका फान्यां में वर्णन हुआ है। प्रसमा कान्तिहरिण्यो नानालेशविचक्षणः । भवन्ति कस्य चित्पुण्यसुखे वाचो गृहे स्त्रियः ११४ ।। प्रसन्न मनोहारी अनेक प्रकार श्लप ( अलङ्कार विशेष और आलिङ्गन ) से युक्त बड़े भाग्य से किसी पुण्यवान फे मुंह में ऐसी पात और घर में स्त्री होती है। रखान्यमूनि मकरालय मावमस्थाः कल्लोलवेल्लितद्वपत्परुपमहारैः॥ कि कौस्तुभेन विहितो भवतो न नाम याचाप्रसारितकरः पुरुषोत्तमोपि ॥ हे समुद्र, अपनी लहरियों के आधात से इधर उधर लुद- फयाले पत्थरों के कठोर प्रहार से इन रत्नों का तिरस्कार मत करो, क्या तुम्हें मालूम नहीं है कि कौस्तुभ के कारण पुस्पोत्तम को भी तुम्हारे सामने हाथ फैलाना पड़ा था ! भन्योन्यस्य लय भयादिव महाभूतेषु यातेप्दल कल्यान्त परमेक एवं स ततः स्कन्धोधमैम्भृते ॥ विश्यस्य सिजगन्ति कुक्षिकुहरे देवेन यस्यास्यते शाखाग्न शिशुनेव सेवितजलक्रीडाविलासालसम् ॥ ६॥. . .
१२८ मह त्रिविक्रम। -- जिस समय भय से सय भूत आपस में मिल कर होजाते हैं, उस प्रलय के समय केवल एफ उस वृक्ष की प्रशंसा करनी चाहिए जो अपनी शाखाओं के साथ खड़ा रहन है, जिसकी शाखा पर यालक के समान विष्णु तीनों लोक पर अपने में स्थापित करके आश्रय लेते हैं। सौपस्कन्धतलानि दीपपटलः कम्पेन पाण्डम्वना हंसाः पक्षविधूननेन मृदुना निद्रान्तनादन घ॥ सक्ष्यन्त कुमुदानिपटपदस्तैरन्सर्पिगन्धेन च क्षुभ्यत्क्षीरपयोधिपूरसदृशे आते शशाहोदये ॥ चन्द्रमा का उदय हुया, चन्द्रमा की किरणें क्षीर की लहरियों के समान फैल गयीं। उस समय किसी पहचानना कठिन हो गया, कुछ का परिचय इस प्रकार प्रकाश के द्वारा अटारी की छतों का कांपने के कारण, व का, पंख पटपटाने से और कोमल निद्रात्याग के पचात् शब्द से हंसों का और भौरे के शब्द तथा फैलनेवालो गर से कुमदों का परिचय उस समय होता था। कैलासायितमद्रिभिविंटपभिः श्वेतातपातापित मृत्पन दधीयितं जलनिधेदुग्धायित' पारिभि मुक्ता हारलतायितं प्रतातिभिः शतायित श्रीफले: श्वेतद्वोपजनायित जनपदैाते शशाहोदये ॥ ८॥ सय पहाड़ फैलाश के समान होगये, पृक्ष श्यतछ समान हो गये, कीचड़ दही के समान मालूम पड़ने । समुद्र जल दूध के समान हो गया, लताएं मुक्का के सम् हो गयो, श्रीफल शङ्ख के समान हो गये और मनुष्य श्येत । के मनुप्यों के समान हो गये, जय कि चन्द्रमा का उदय हुन पर्यात् चन्द्रोदय से सय पस्नु श्येत हो गयीं।
कविता कौमुदी।
-
दामोदर गुप्त।
कश्मीर के राजा जयापोड़ के ये मन्त्री थे, इन्होने कुट्टनी-
मत नाम की एक पुस्तक लिखी है । कुट्टनीमत को कोई कोई
शम्भलीमत भी कहते हैं। दोनों का अर्थ एक ही है। इस
अन्य में कुदृनियों के हथकण्डी का वर्णन है। यद्यपि इस
पुस्तक में अश्लीलता अधिक है तथापि, यह शिक्षा-जनक है,
इससे लाभ हो सकता है।
जयापीड़ यही पण्डित और विद्या प्रेमी राजा थे।इन्होने
उस समय के अच्छे अच्छे पण्डितों को अपने दरवार में
स्थान दिया था। दामोदर गुन को अपना मन्त्री बनाया था।
राजतरङ्गिणी में लिया है
" दामोदरगुतास्य कुहनीमतकारिणम्,
कार्य करियलिरिव पुर्य घीसविर्य ध्यधात् ।
दामोदर गुम ने इस अन्य यो अतिरिक्त और कोई अन्य
बनाया है कि नहीं इसका पता नहीं, यह ग्रन्थ भी फाग्यमाला
में अधूराही छपा है । सुना जाता है कि काशी के किसी सजन
के उद्योग से यहाय पूरा भी प्रकाशित हुभा है।
काव्य-प्रकाशकार मम्मदभा ने कुहनीमत के सोक
भपने फाप्य प्रकाश में उद्धृत किया है, क्षेमेन्द्र ने भी काय.
कण्टाभरण में दामोदर गुभ फे श्लोक उदृत किये हैं। महा.
राज जयारोड़ का समय आठवीं सदी में माना जाता है।
इन्होने ७१५ से ७.६ तक फश्मीर का राज्य किया है, दामो.
घर गुम का भी पदी समय मानना चाहिए ।
६
दामोदर गुप्त । भारोग्य विद्वता समनमैती महाकुले जन्म । स्वाधीनता सो महदेश्वर विनारयः ॥ आरोग्य विद्वत्ता सजन मंत्री उत्तम पुल में 3. स्वाधीनता ये मनुष्यों के लिए धन के बिना भी पा पेश्चर्य हैं। एकीभाव गवगांजलपपसोमिगतमा । पतिरंकहती शक्तिहमानो दुर्गनानी च ॥२॥ एफ में मिले हुए दूध और जल को तथा मित्रों के वि को अलग मलग कर देने में हस और पुर्जग पे ही दोनो राम ६।भयांत् जिस प्रकार मिले हुए दूध मोर अल को पृथक पृथक कर देते है उसी प्रकार मिले हुए मित्रों के विनि को दुमन मलग अलग कर देते हैं। भामारप पनमाकाहार रकमः। মারি গালি অরিস্থিনি থান্দা। कपूर हा लोहा मी दर परी, कमलों से पपा होगा, सति, पमल पाँटियां भी प्यासी प्रकार पनि पाहती है। विदिती फा भयम्या पो गीत पर्णन । तिसिंग निर्षिया मनि महिला माहित । प्रतिषियमा नारदमीना l दुस्सा होने पर दुमी, प्रान होने पर प्रग, मार रोने पर प्याल, मप्र प्रतियिाय . rand डायनं पर कंपल भरमांतता यादि। बामानिमुवाहादियोगा। Folution in कविता-कौमुदी। अमोष्ट सुरत के परिश्रम को सहनेवाली विपरीत संयोग करने वाली और चित्त का अनुवर्तन करनेवाली, भार्या पुण्यवान को ही प्राप्त होती है। कुमुदामोदो पवनः पिककूजितभूगसार्थरसितानि । इयमिति सामग्री घटिता देवेन तद्विनाशाय ॥६॥ कुमुद फी गन्धवाली हवा, पिक का गुजार और भ्रमर फा कार ये सब सामग्रियां भाग्य ने उसके नाश के लिए पनायी है। से कथन स्पृहणीयो विषयस्तैम्ससितम्वविन्यासः । शान्तात्मनापि विहितं विश्वसजा गौरव यत्र॥७॥ उसके नितम्य की रचना विषयी मनुष्यों के लिए स्पृह- जोय क्यों न होगी। जिसकी गुरुता शान्तचित्त स्वयं ब्रह्मा ने ही घदायी है। जीवन्नेव गृतोसी यस्य जनो वीक्ष्य पदनमन्योन्यम् । कृतमुखमङ्गो रात्करोति निर्देशमगल्या ॥८॥ पाह मनुष्य जीता ही मृतक के समान है जिसको देख. फर लोग आपस में मुंह पिवका फर दूर से ही अंगुली पताते हैं। उपयुक्तखदिरवीटकजनिताधररागमनभयात् । कुलटा पाटक निकटे तृप्यन्यपि यारिनो पिवति ॥२॥ उत्सम खैर के घोड़े से पनी हुई ओट की ललाई मष्ट हो जायगी, इस भय से पेश्या प्याऊ के पास प्यासे रहने पर भी जल नहीं पीती है। भविदग्धःश्रमकटिनो दुर्लभयोपिय पा विप्रः । अपएल्युरपकाता कामिप्पाजेन मे रातीमा .
रामाद गुप्ता यह ब्राह्मण युवा-जिसके लिए स्त्री दुर्लभ है, जो भूखं कठिन कामी है-वह कामी के रूप में मेरी अपमृत्यु ही मायो थी, जो टल गयी, एक वेश्या रात को बात अपनी साधिन से कहती है। पर्यः स्थास्तरणः पतिरनुहलो मनोहर सदनम् । नाईवि लक्षांशमपि त्यस्तिक्षणचौपंसुरतस्य ।।1911 पलंग, उत्समाविछोना, अनुकूल पति, मनोहर घर पे सर यमुरत के लाखयें हिस्से के भी यरायर नहीं है। एप विशेषः स्पष्टो यह त्यत्यतापवह। भास्करति तेन दग्ध दग्धस्यानेन न्तेनवो भूमः ॥१२॥ अग्नि और तुम्हारी प्रतापनि इनमें यही साफ साफ मेरे के उस अग्नि से जलाया हुभा पुनः अङ्कुरित होता है, पर अग्नि के द्वारा जलाया हुआ कभी अङ्कुरित नहीं होता। पितो पानिहतमय सदनुरल तव गृह' या ! चारलेन कोशिसमा गता कुकुमः ॥१३॥ आप पाश्मित अर्ध देने हैं और उसमें मनुएल मा पे यापफा घर छोड़फर आपकी फीति खोचापल्य परा देशामों में चली गयी। এ বিমলানিনায় মহা । दोषिमपननदन परिधरति यदुवम् ॥ पिननन्दन, ममची यो पर मैंने यही माधर्ष र पर देते हैं पर उग्रता की दर से ही पास कविता-कौमुदी । १३३ इदमपरमद्भुततम युवतिसहस्त्रविलुप्यमानस्य । वृद्धिर्भवतिन हानिर्यत्तव सौभाग्यकोषस्य ॥१५|| । यह और भी आश्चर्य है कि आपके सौभाग्य खजाने को हजारों स्त्रियां लूटती है, तथापि उसकी वृद्धि ही होती है हानि नहीं। प्रकृतिलधोयें न कृता जघन्यवर्णस्य गौरवापत्तिः। • "जपनचपला पदार्या स पिंगलस्तै कथं तुल्यः ॥१६॥ स्वभाव से लघु नीच वर्ण को आपने गौरव दिया, बड़ा पनाया, आर्या के जघन चपला बनाने पाला पिंगल आपकी परावरी कैसे कर सकता है। दिवाकर। इनका पूरा नाम मातङ्ग दिवाकर है । मातङ्ग चाण्डाल जाति को कहते हैं। दिवाकर भी चाण्डाल जाति में उत्पन्न हुए थे। इस कारण लोग इन्हें मातङ्ग दिवाकर कहते हैं। राज- शेखर ने इनके विषय में लिखा है- भहो प्रमायो पारदेव्या यन्मातदिवाकर श्री स्याभवत्सभ्यः समो पाणमयूरयोः । सरस्वती का प्रभाय आश्चर्य है, उन्हीके प्रभाव के कारण मातादियाफर धीहर्प फी सभा का पण्डित हुआ और पाण तथा मयूर के समान उसे सम्मान मिला। दिवाकर ने कोई अन्ध पनाया है कि नहीं, इसका पता महीं। सभापित प्रन्यों में इनके पनाये शोफ उद्धृत हैं, पदी दशा में ये चारों दिशाएँ प्रजा के लिए (पुत्रोत्पत्ति के लिए नदी रह सकता, दक्षिण पासियों का स्वभाव ही भधिक १३४ दिवाकर। कुछ श्लोक धुन फर पाठकों की सेवा में अर्पित किये जाते हैं। ये श्लोक ही दियाकर फी योग्यता यतलायेंगे, दिवाकर किस प्रकार की कविता करते थे इसके विषय में इन से बढ़कर दूसरा प्रमाण नहीं। पातु वो मेदिनीदोलावालेन्दुधु तितस्करी । दंष्ट्रा महावराहस्य पातलगृहदीपिका In घालेन्दु के समान शोभनेवाली महावराह की देश आपकी रक्षा करे, जो पृथ्वी के लिए दोला है और पाताल रूपी घर की दीपिका। याते शर्म रजसि जातजलामिपेका धौताम्बरा. स्फुरितपादुपयोधरान्ताः । पत्युः प्रजार्थमधुना तव पुष्पवत्यो वांछन्ति संगममिमाः ककुमश्वतस्मः ॥२॥ रज (धूलि या स्त्री का मासिक ) शान्त होगया, जल का अभिषेक होगया, (अम्बर) आकाश या वस्त्र, स्वच्छ हो गया, पीला पयोधर ( स्तन या मेघ ) प्रकाशित हुमा, ऐसी या प्रजा के कल्याण के लिए, आप का संगम चाहती है, क्यो कि आप इनके पति हैं। कि वृत्तान्तैपरगृहगतैः किंतु नाह समर्थ स्तूपणास्थातु प्रकृतिमुखरो दाक्षिणात्यस्वमा गेहे गेहे विपणिपु तथा चत्वरे पानगोट्या मुन्मनेव भ्रमतिभवतो वल्लभा हन्त कीर्तिः ॥३॥ दूसरे के घर फी यातों से कोई मतलब नहीं, पर मैं चुप फविता-कौमुदो। गेलने का होता है, आप की प्यारी कीर्ति घर घर बाजार पाज़र चौतरों पर और अट्टी पर उन्मत्त के समान धूम रही है। मनिःसरन्तीमपि गेहगभत्किीर्ति परेपामसती घदन्ति । स्वैर चरन्तीमपि च सिलोक्यां स्वत्कीतिमाहुः कवयः सी तु ॥४॥ घर के बाहर न निकलनेवाली दूसरों की कोति' असती हो जाती है, पर आपकी फीति इच्छा पूर्वक त्रिलोक में विचरण करती है और कवि लोग उसे सती कहते हैं। भासीवाय पितामही तव मही माता ततोदन्तर' संप्रत्येवहि साम्वुराशिरसना जाया जयोनुभूतये। पूणे वर्षशते भविष्यति पुनः सैवानवधा स्नुषा युक्त माम समस्तशास्त्रविदुर्पा लोकेश्वराणामिदम् ।।५।। नाथ, यह पृथवी भाप की पितामही धी पुनः माता हुई, इस समय यह जय के लिए समुद्र से घेष्टित आपकी स्त्री है, सौ पर्ष के बाद यही आप की पतोह होगी, सय शास्त्रों के जाननेयाले आप के समान लोकेश्यर के लिए क्या यह उचित है। धनजय। ये जैन कवि हैं, इन्होंने द्विसन्धान नामक महाकाव्य लिखा है, दिसन्धान को राघवपाण्डवीय भी कहते हैं । इसमें रामकथा और पाण्डधकथा दोनों एक साथ ही लिखी गयी है। इसके अतिरिक्त राघय पाण्डघीय नामक एक दूसरा भी फान्य है, जिसके पर्ता कविराज नाम के कवि हैं। पनअप ने एफ निघण्टु भी लिया है। ये मुंजराज फे सभा.
छयह जनक की सुता कब हमारे वश में होगी इस प्रकार
धनञ्जय।
सूक्तिमुक्तावली में राजशेखर का एक लोक लिखा
जिसमें धनञ्जय की स्तुति की गयी है।
द्विसन्धाने निपुणता सता धो धनधयः
यया जात फल तस्य सतां धक धनञ्जयः
इनफा समय नीं सदी बतलाया जाता है, दशरूपक
नाम के लक्षण अन्य के कर्ता भी धनञ्जय बतलाये जाते हैं,
कुछ लोग कहते हैं कि वे धनजय इस घनञ्जय से भिन्न है, पर
जैन परम्परा से यह यात मालूम होती है कि दशापक के का
भी ये ही, धनञ्जय हैं। इस प्रकार इन्होंने तीन अन्य बनाये
हैं । १ द्विसन्धानमहाकाव्य, २ नियग्टु ३ इदशरूपक ! इनके
अतिरिक्त और कोई ग्रन्थ इन्होंने बनाये हैं कि नहीं इसका
पता नहीं।
इनकी माता का नाम श्रीदेवी, पिता का नाम पा
और गुरु का नाम दशरथ था, यह यात इन्होंने अपने
द्विसन्धानकाव्य के अन्त के एक श्लोक में इशारे
बतलायी है।
अय कदा नु वशा नु परासुता पुरमुपेत्य सदुर्जनकस्य
क्रियत इत्यपमाकुलमानसः प्रभुरवोचत वीक्ष्य पयोनिधिम् ।। ।।
रायण अपनी नियास नगरी में पहुंच कर सय स्त्रियों में
भाकुल मन होकर और समुद्र को देखकर बोला (युधिष्टिर
पक्ष ) युधिष्ठिर हस्तिापुर पहुंचकर दुर्योधन की मृत्यु कर
हमारे वश में होगी इस प्रकार आकुल मन होकर और समुद्र
को देखकर धोले।
कविता-कौमुदी। अ यमगाधगमीरगुरुगुणैरुपगतो नियतावधिराई ताम् यतिरिवाखिलसत्वहितपतो जलनिधिः सकलैरवलोक्यताम् ॥२॥ यह समुद्र यगाध, गम्भीर और विशाल है। यह अपने गुणों के कारण पाद्र है। इसकी सीमा निश्चित नहीं है। यह समस्त प्राणियों का हित करता है । यह यति के.समान "मालूम होता है । यति का गाम्भीर्य अगाध है, यह सबका गुरु है। यह दयालु है, गुणों के द्वारा उसकी मर्यादा निश्चित है। उसको सब लोग देखें। असनुरी सुतरो स्थितिमुखतामसुमतां सुमतो महतां वहन् सरचित रचितैर्मणिराशिभिः स्वरुचितैरचितैरवभात्यम् ।। ३ ।। तरन के अयोग्य उन्नत, सत्पुरुषों और प्राणियों की इस्थिति को स्वभाव से धारण करने वाला, यह समुद्र ऊंचे सजाये हुए दीप्तिमान और राजाओं के योग्य मणि समूहों से अपनी स्वाभाविक शोभा धारण करता है। भनिधनेन रसातलवासिना विगलितो निबिड बड़वाग्निना। इस मुहुः शफरीपरिलहनम्यति करा इथतीव सरित्पतिः ॥ ४ ॥ रसातलयासी अविनश्वर बड़वाग्नि के द्वारा यह समुद्र पिघलाया गया है और यह चुराया जाता है, यह बात धीच चीच में मछलियों के फूदने से मालूम होती है । फलोलाः सपदि समुदरता मरुद्भिर्गण्डूषा इव करियादसां विभान्ति भौतानिज्वलनशिखाकलापशवा मेतस्मिन्धियति पम रागमासः ॥५॥ घायु के द्वारा उठायी गयी तरंगे जल हस्तियों के कुल्ला के समान मालूम पड़ती हैं इसमें कमल की लालिमा घड़वानल मप्ति की ज्यालाओं की भ्रान्ति पैदा करती है। . .
----AMA-~-and- गमन से माहुत तरंगों के द्वारा मानों सींच रहा है।समर्थ- धनञ्जय। मानस्येतस्मिनमणिकरिनामागस्त स्मा रख्यामिहततरडामोगा। पीडास्पानरपिरमही मामा दान्ताना मुधिरमहीनामु इस प्रदेश में रुचिर पृथ्वी के बहुत दिनों तक उगले हुर सपी की मणि के द्वारा रजित टूटी हुई लहरियां बहुत शोभती हैं। भपातु जलमिदमिन्दनीलजालम्याजेन व्यवतरतीय मेघजालम् । पक्षोभिः करीमकरविभिखमम्भा यात्युग्रन्मतिरुचिराचापमावान् । ये मेघों की पंक्तियां इन्द्रनीलमणि के व्याज से जल पीने के लिए उतरी हुई सी मालूम पड़ती हैं। हाथी और मगर के वक्षस्थल से टूटा हुआ और मणि की शोमा को प्रकाशित करने वाला जल इन्द्रधनुष के समान मालूम एताप्रपाल विटपास्वतीभिरूदारूदामिपिञ्चति हतैरुदधिस्तरङ्ग । र# रिहाम्बुरिणां निकटे वसन्त सन्त न सत्वसहिता साधारयन्ति । समुद्र अपने तटों से लाये गये और अपने तटों पर (पला) उत्पन्न हुए इन मूगों के वृक्षाको जल हस्ती के पड़ता है। 4 घान् मनुष्य पास रहने वालों का निरादर नहीं करते। मध्यासीना निचला निस्तरङ्गानेतानेतानीलनीलान्देशान् । भोलाप्राणां शङ्कया कि पलाका ने शहाना पकयस्ता विभान्ति ॥९॥ ये शड्डों की पंकिया नहीं मालूम होती है, किन्तु 'तरंग रहित नीले प्रदेश में नील आकाश की निश्चल चलाफा (धक पक्ति) मालूम होती है। .
कविता-कौमुदो। गोखुराहत इवायमेकतो वति को भिरिव वतितोऽन्यतः। मेघविभ्रम इवाम्बुधिः क्वचित्सकुलः स कुलपर्वतरिव ॥ १० ॥ यह समुद्र एक और गौ के खुर से आहत के समान मालूम होता है दूसरी ओर चित्र लेखिकाओं के द्वारा चित्रित मालूम होता है, कहीं मेघों के उत्पन्न होने का सन्देह होता है थोर फहीं कुल पर्वतों से सफचा हुआ मालूम पड़ता है। द्वयुक्तानामुदधिमहत्वस्तुत्या युक्त्यैतस्मिानुगुणभारत्यागः । स्थाने स्थाने भवित कवीनां कुर्वन्युक्त्यै तस्मिन्ननुगुणभारत्यागः ॥१३॥ समुद्र के महत्व की स्तुति में युक्ति पूर्वक उद्यत हुए कवियों की उक्ति में स्थान स्थान पर दोप हो जाते हैं। ये दोष शास्त्रीय शान के भार के त्याग से होते हैं। के' मर्यादामेप जलात्मा परिवारो लोलो भिन्द्यादित्युपपश्यन्निव कूलम् । या गत्वावृत्ति मुदम्वान्भजतेऽयं न प्रत्येति स्वाम्यनुवर्ग प्रतिकूलम् ॥१२॥ यह जड़ा (ला) त्मा समुद्र चंचल है, कहीं मर्यादा को तोड़ नदे यह देखने के लिरधार बार तीर पर जाता है और लौट आता है। प्रतिकूल चलने वाले अनुचर का विश्वास स्वामी नहीं करता। वेगोऽन्येति प्रतिदिशमापूर्णाना- मालोकान्त हिमकर विश्वस्तानाम् । वैलौढयान प्रतिदिशमस्मिन्नेपा मालोकान्त हिमकरविध्वस्तानाम् ।। १३ ॥ प्रत्येक दिशा में फैली हुई, चन्द्रमा के लिए फंकी गयी और मगरों के द्वारा तोड़ी गय इन तरंगों का वेग प्रत्येक रात्रि में सूर्योदय तक आंखों से दिखायो नहीं पड़ता। .
पद्मगुम ।
:
पद्मगुप्त।
महाकवि परिमल का दूसरा नाम पद्मगुप्त था।
इनको अभिनय कालिदास भी कहते हैं। इनके पिता का मान
मृगाइदत्त था, ये धारा नगरी के महाराज भोजराज के चाचा
या पति राजदेव के सभापण्डित थे। पारपति रामदेव की
मृत्यु के पधात् जय भोजराज के पिता सिन्धुराम धारानगरी
के राजा हुए, तब ये उनके साथ रहने लगे। सिन्धुराज ।
दूसरा नाम कुमारनारायण था और “नयसाहसार
उपाधि थी। महाकवि परिमल ने इन्हीं अपने मायाला
महाराज के नाम से नवसाहसाचरित नाम का एक काल
पनाया है, जिसमें उन्हीं का वर्णन है। नयसहसा पति
पदने पाले जानते हैं कि ये कितने सरस और स्यामाविक
फपि थे। ये १५ पीं सदी में उत्पन्न हुए । संग्रह प्रायो
में नफे कई शोष से पाये जाते हैं ओमयसाहसाए
में नहीं । इससे मनुमान किया जाता है कि मयसाहसा
धरितफेनिरिम.भार भी कोई काम्य इन्होंने पनाया
पर माज फेयल नएसाहसा चरित ही पापा जा
मपसादसा चरित फे चौध सग सेकतिपय मोक
उद्धृत किये जात.।
साम देवापानीपनि शशिममाडोमहौतावरणाम,
दुराणायग्नोर मागतो मुमणालीमिर
तदनन्नर.राजा ने अपने यित में शशिवमाया देखने।
बाकी, गरिमा को दंगना रातलिए एमा
पााजिम कार समुद्र माने तौर पर नयी निकाली हुई मुई
कविता-कौमुदी।
फन्दली के लिए स्पृहा करता है। यह फन्दली अनुराग
ती अथवा लाल रङ्ग को होती है।
शशिममाशा नलिनी मृणलतामुपागते मौक्तिकदामि सादरः
सदागते दूत इव न्यवेशयत्सदर्शितप्रेमलये विलोचने ॥२॥
राजा की आशा शशिप्रभा पर लगी थी, उस आशारूपी
मिलिनी का मृणाल बनकर यह मोतियों का हार राजा
मिला था, राजा उसको बड़े चादर से देखता था, राजा
सकी ओर प्रेमपूर्ण आंखों से देखता था, मानो यह अपनी
ग्या के यहां से आये दूत को देख रहा हो ।
पुनः पुनः पट पदराजिमेचका तदिन्द्रनीलाक्षरपंक्तिमैक्षत ।
स सन्क्षणान्मन्मथजातवेदसस्तनीयसी धूमलतामिवोद्गताम् ॥ ३ ॥
। घद्द यार बार नीलम की अक्षरपंक्तिको-जो भ्रमर के
मान फालो थी, देखने लगा, मानो वह कामदेवरूपी अग्नि
पतली
धूम
की रेखा निकली हो।
मुगन्धिहारादनुलेपन करे समुन्मिपत्स्येदलवे विलुम्पति ।
भसंगवाया भपिदीर्घ चक्षुषः पयोधरस्पेशमिवाससाद सः ॥ ४॥
राजा यह हार अपने हाथ में लिये हुए था, उसके हाथ
पसीना लगने से हार का अनुलेपन राजा के हाथ में
गता था। यद्यपि बड़ी आँखवाली शशिप्रभा राजा के पास
हो थी। तथापि राजा को उसके पयोधरस्पर्श के समान
नन्द मिला।
तदीयनामाइलिपि शनैः शनैः सलीलमावर्तयितु प्रचक्रमे ।
'परिस्फुरतपलवपाटलाधरो रहस्यवियामिव मन्मयस्य सः॥५॥
उसके नाम के मशर यह प्रेम से राजा धीरे धीरे मन हो
मन उच्चारण करने लगा। राजा के पलय के समान बाल
मोर उस समय फरक रहे थे। मानो राजा कामदेव के
इस पिया का जप कर रहा हो।
करेगसिगनगमपा भुनीषणमा यति कयैव चिन्ना
Raमनाह मदन पुरा लिलेश मित्त मुहुरम्ययान्यया ॥५॥
चिन्ता चित्र बनाने की एफ कलम है, यह भनेक प्रकार
केशि पनाने में पड़ी चतुर है। उसी चिन्तारूपी कलम से
भरने में बिना देसी और बिना परिचय पायी हुई उस
खोका राजाने अनेक प्रकार के चित्र बनाये।
भरापासपोरा शशिमनाविननदर्शनम्पति ।
परमम्बा पगारे पिलासिनस्तस्य च करवस्य च ॥
कामदेव के पण्ड सात से तपे हुए उस दिलासी राजा
को राशिमा को देखने को पड़ों उत्कण्ठा हुई। जैसे
मुदिती को सूर्य के पातर से करने पर जल में शशिप्रमा--
मा केरसारा-को देखने को उत्कण्ठा होती है।
दारिया हरक्षिदेव स्फुरता व वाहुना ।
लिभानुभानिन्दुमुसीममन्यत ।। ८१
स राज्ञाश दक्षिया फरका, जो विशाल
शक समान सुपरस पाहु के फरकने से राजा
को माया और
मोजो मुसो मन से भी दुर्ल
सलादेमसभा।
iratगानामहामोरे।
पालको रमाये शशिका कटामिर ॥९॥
कविता-कौमुदी राजा ने अपने सामने आगे की ओर तमाल वन में दृष्टि डालो, उसी वन में उन्होंने एक स्त्री को देखा, जो मेघ में चन्द्रमा की कला के समान शोमित होती थी। विमनचूलकतिकुवंतीविकीर्ण चूड़ामणिचन्द्रिक शिरः । मयानुभावेन निदेशितेव सा ननाम मानिन्यवशा विशाम्पतिम् ॥१० उसने राजा के प्रभाव की मात्रा से परवश होकर राजा फो प्रणाम किया। उसने अपने विखरे हुए वालों को पहले टीक किया, उसके मस्तक पर चूडामणि की शोभा फैल रही थी, ऐसी उस स्त्रीने राजा को प्रणाम किया। दशानन्द्रण निर्देशिते स्वयं शिलातले नातिविदूरवर्तिनि । पाविशत्या रशनामरिणत्विषा निपिप्यमानेऽमरचापशोभिनि ॥१५॥ राजा ने सांखों के इशारे से अपने पासवाली एक शिला पतला दी, उसी पर यह चैठ गयी, उसकी करधनी की मणियों की छाया पड़ने से यह शिला इन्द्रधनु के समान हो गयी थी। वयानिदोर्दशमानुपातिभिर्विकृष्णमायामिव भूपणांशुभिः । इति शितोगितयन्मंदीपिका मुदीरयामास गिर रमादः॥१२॥ राजा के इगित पाकर रमाङ्गद ने कहा, रमाङ्गद के चे पचन मानो उस स्त्री के भूगणों की प्रभा से पांच गये हो, क्योंकि यह भूएणनमा रमाङ्गद के दांतों को प्रभा से मिल गयी थी। भनेन कियादिविहारजन्मना भ्रमेण काम भवती कदाधिता। मसूत्राहिमुखानिलोप्मणा जटाविन्दुकलेव शूटिन ॥३॥ इस विन्य पर्वत में भ्रमण करने के कारण आप बहुत पफ गयी है, जिस प्रकार शिव के मस्तक पर सोये हुए सूर्य की गर्म पाप से चन्द्रमा की फला मुरझा जाती है।
उदित हुई है, मालुम होता है कि फुटज पुप्प के समान स्वच्छ पमगुना ममी सरोगप्रतिमे मुझे महुस्त्यातराताम्रपालभित्तिनि । समुम्मिपन्तिप्रम वारिधिन्दयो मतादि सारण्यसुधालवाहन हे फोमलानि ! तुम्हारा यह फमल के समान मुख लगने से लाल हो गया है, इसपर पसीने के बूद अमृतदि फे समान मालूम होते हैं। इतोऽयत सेोत्पललास्पदेशिक निरन्ना गन्धवहे वहत्यपि । म पूर्णते स्विमाललाटसगिना तवालकणिरिय मनागपिm घर तुम्हारे कर्णफूलों को नायना सिखाने वाला पायु यह रहा है, पर पसीने के साथ तुम्हारे ललाट पर सटे हुए तुम्हारे बाल कुछ भी चञ्चल नहीं होते। भनेन पीनस्तनकम्पादायिना निराप तेनोदहता कदुप्यताम् । भय प्रवालादपि पाटलच्छ विद्यते निश्चसितेनतेऽपरः ॥ यह तुम्हारे पीनस्तन को कंपाने वाली और लम्बी गरम गरम सांस निकल रही है, इस सांस से मूगे से भी लाल तुम्हारा यह मोष्ठ क्या फष्ट नहीं पाता? गदित्यपंक्तया चमवारि विग्रुपा निरन्तराज्यासित रेखयाजया। तवैप कण्ठः फुटजावदातपा विलासमुक्तालतयेव भूप्यते ॥1॥ पसीने के वूदों की पंक्तियां जो रेसा के समान लगातार मोतियों की माला है और उस माला से तुम्हारा यह कछ भूपित हो रहा है। इ महधित ममानुपं त्वया दिगाधूतं यदन मद्वितीयया । इमा कालियस्पभुवोति दुर्गमाः कराजवेश्याभरण भयाशी कविता-कौमुदी। यह तो और माधयं की यास है कि इस मनुष्यहीन धन में तुम अकेली यात्रा कर रही हो, कहां ये विन्ध्याचल के दुर्गम प्रदेश और राजमहलों के आभरण कहां तुम । नवोद्गताशोपलाशकान्तिना निकामनियंप्रखचन्द्रिकेण च । विभाति कस्पेदमनेन पाणिना पदावभूतेन्दुमरीचि चामरम् ॥ गये अशोक पलय के समान और जिसके नखों से प्रकाश फैल रहा है उस हाथ से चन्द्रमा की किरणों को भी नोचा दिपाने याला यह फिसेका चामर धारण करती हो कही। • भूपस्य कस्यापि परिष्टदालना यदित्वमुर्विभवो हि कोपि सः । मरल्पतिमें नकयेव सन्धि यस्त्वयापि वालव्यजनेन बीग्यते ॥२०॥ यदि तुम किसी राजा की परिचारिका हो तो यह समृद्धिमान कान है, जो मेनफा द्वारा न्द्र के समान तुम्हारे द्वारा चमर से घोजित होता है। अपधिमन्या परवत्यति खिया कयापि कासी जगदेकसुन्दरी। भवभु यस्याः स्मरचाप यष्टयो विधेयतो यान्ति भवविधा भपि mm यदि तुम फिसी खी पंधी हो तो पतलाशी सष्ट सुन्दरी यह कान है ! जिसको आशाफारिणी कामदेव के धनुपरुप तुम्हारी समान स्त्रियां हैं। परस्परस्पर्धिविलाससम्पदा भयं भवत्स्वामितया वि कम्प्यते । मरवतो का रमणी रमाथवा कलप्रमग्दुविभूषणस्य वा ॥१॥ ल्ही तीनों की परस्पर में विलास संपत्ति की स्पर्दा हो सकती है और इन्हीं तीनों में एफ तुम्हारी स्वामी भी हो सकता है, न्द्र को स्त्री अधया लक्ष्मी या महादेव की - खी। १० . पमगुप्ता मायादरे मनाय ते शनि कार्यगौरवम् । पश्यिया घरम्याप मिधीवनीतयः॥२॥ रतकीफन्दरामा में तुम्हारा घमना किसी बड़े भारी गुरुवार को सूचित करता है, नहीं तो तुम्हारी समान नीति, गुरमी या दिन जन्तुओं से पूर्ण पन में भ्रमण कर बनेन लिम्मदन्तिना यदायमागता पति तो दुरम्बना । रिवार विस पविशदमावयोः स्वकार्यनिष्ठ कथय यास्यमि ॥२२॥ इस मार्ग में मतयाले हाथी फ्रीडा करते हैं, यहां इस दुरे मार्ग से तुम फैसे आयी और हम लोग में वियोगरूपी मिपाद उत्पन्न फर के अपने कार्य के लिए कहां जामोगी। ..इति साभिहिता मृगायताक्षी समुरोदप्रणय पशोभटेन संसान जगाद लरजया न श्रमतः किन्तु नृपस्तु तामयोचत ॥२५॥ यहे प्रेमपूर्वक रमानन्द ने उस स्त्री से ये बाते कहीं पर उस सहसा कुछ उत्तर नहीं दिया, न मालूम लज्जा के कारण पाभम के फारण । पर राजा उससे योले। मन्तासि कौतुच्यतन कर्थिता सि प्रश्नरनेन विहितो न योपचारः । भातिपमेष कुरुते परमालेखासंवाहनकचतुरो निचुलानिलम्भे ॥२ तुम थक गई हो, कौतुक से यड़ी दूर आनेके कारण कुल होगा हो, इन प्रश्नों से तुम्हारा स्वागत नहीं हुम र की धपापट दूर करनेवाला यह निचुल का था: . सुभारसमनिम्पन्दिना फणिवधरप सा हसन्ती। दिनोप्मतमा धानमा नापतेचसा बभूवार
फविता-कौमुदी ।
स्वभावमधुर सुधारसनिस्यन्दी राजा के यचनों से पह
नागवधू हंसने लगी और उसकी थकावट दूर होगयी, जैसे
सूर्य की किरणों से तपी हुई कुमुदिनी चन्द्रफिरणों से पिल
जाती है।
32
पण्डित पाजक।
सुमापित ग्रन्थों में इनके श्लोक पाये जाते हैं, ये सरस
और सुन्दर हैं, उनसे इनके शियमक होने का पता लगता है।
इसके अतिरिक्त इनके विषय में कुछ मालूम नहीं।
कथं स दन्तरहितः सूर्य मूरिमिरुप्यते ।
पो मीनराशि भुक्त्वैव मे भो समुदतः ॥१॥
पण्डित लोग सूर्य को दन्तहीन क्यों कहते हैं जो
-सूर्य मीनराशि को भोग कर मेप का भोग करने के लिए
-उद्यत हुआ है।
कमोति परति क करोति वृत्ति वारि क नाम पिपतिस्वपिति का नाम ।
इत्थ मृग निरपराधमवाधमान प्याधीनु धावति घधाय धनुदधानः ॥२॥
फहां फोड़ा करता है, कहां चरता है, कहाँ अपना जीव
विताता है कहां जल पीता है यहां सोता है। इस प्रकार निर-
पराध किसी को पीड़ा न देनेवाले मृग को मारने के लिए
धनुष लेकर प्याध दौड़ता फिरता है।
'पन्द्रः सुधांशुरयमनिसुतो दिनेश: पुण्यैरवापि शरणाय मयेतितोषम् ।
मुग्यशाव भज मा त्यज पापमेन मीनं प्रमुज्य सहसा कृतमेपभोगम् ॥३॥
१४८ पण्डित पाजक । यह चन्द्रमा है, यह सुधांश है, यह द्विजराज है, य महर्षि का पुत्र है, बड़े पुण्यों से मैंने इसे शरण के लिए है, हे मूर्ख हरिण बालक, यह प्रसन्नता छोड़ो यह पापी छोड़ दो, क्यों कि इसने मीन का भोग कर शीघ्रही मे भी भोग किया है। हेमकार सुधिये नमोस्तुते दुस्तरेषु यहुशः परीक्षितुम् । कामनाभरणमश्मना सम पत्त्यैतदधिरोप्यते तुराम ॥४॥ हे युद्धिमान सुराणंकार तुमको नमस्कार, तुम पर करने के लिए सोने के भूषणों को पत्थर के साथ गुला' घड़ाते हो। पुत्त एव स पटोन्धाप परत्वत्प्रसादेमपनेतुमक्षमः । मुमित न्यधमटित स्पपा सग्गुलाम्वुकणिका प्रतीमाता ॥५॥ हे अन्धाप ! पद घड़ा तो हो ही घुफा जो तुम्हारे प्रगा का पदला नहीं घुफा सफता, पर तुमने तो भधा हग्यों को समात ही फर दिया, जो तुम उस घड़े के गुरु के थियो की छा रखते। शतपदी मति पाते क्षमा पनि म गोपरमप्यनिर्षितुम् । किमिपना द्विपाप मनो जलधिविश्मणे विषधाम ।। सौ पैरों के होने पर भी शतपदीरा (माम का कोटा) पदि गोपद को भी नहीं हांफ सपना, तो हम को दी पर चाल हनुमान के समुद्र माय. माने के पिण पियाद नहीं करना चाहिए। बगुलरियामागप्राणा परिधानस्यापिन मार्ग किमि मुम्याहा कविता-कौमुदी। हे व्याधतनय, बड़े वंश (वांस या कुल ) के ग्रहण करने की प्रवीणता नहीं, बड़े गुणों ( धनुष को रस्सी या गुण) के संग्रह करने का आदर भी नहीं है और वाण में फलर ( बाण के अग्रभाग में लगी लोहे की कील या फल ) लगाने की तो पात ही प्या, फिर इस गृह में क्या है ? तृणमणे नुजस्य च तद्वतः किमुभाविपुलाशयतीच्यते । सनु तृणामलवावयवैर्य योरवसिते ग्रहणप्रतिपादने । तृणमणि और उसके समान मनुष्यों के विशाल हृदय होने की बात क्या कही जाय, जिन दोनों का दान और ग्रहण तृण के सूक्ष्म अग्रावयव के द्वारा समाप्त होता है । अर्थात् ये मनुष्य तृण-मणि के समान हैं जिनमें दान देने और ग्रहण करने की शक्ति नहीं। प्रातः सुवर्णमयरूपकतारचित्रालंकारयनघटनासु सुवर्णकार । दूरी कुरुश्रम मिहाघसुवर्णपात्रे दुर्वणं योजयितु रस्ति महार्घलाभः ॥९॥ + भाई सुवर्णकार ! सुवर्ण के उत्तम अलङ्कारों के बनाने का तथा पञ्चीकारी आदि का काम करना छोड़ दो इसमें परिश्रम नफरो, फ्गेकि यहां तो उसी को लाभ होता है जो सुवर्ण. पात्र में दुर्वण ( चांदी या युरा रंग ) जोड़ता है। अर्थात् यह स्थान गुणियों के आदर का नहीं, यहां तो उसी गुणी का भादर होता है जो खुशामद करे। निनाश्याम्बरसोम्नि सूर्यशशभृत्ताराः पदप्राप्तये मेघो पोरवः पदाधिगमने दान प्रवृत्तस्ततः। पवातापवशा.दिवाशु धनुते सूर्य सन्द्रिोचिपा चन्द्र बालबलाक्या करया तारा: सम सर्वतः ॥1. .
पण्दिन पाजक।
पाकाश में एयं चन्द्रमा और तारा इनका पद महत
फरने के लिए घोरदार फरनंयाले मेघ ने इनका नाय
फिया, जय इनफा पद प्रान हो गया तर यह दान करने लगा,
अर्यात् शृष्टि करने लगा, पुनः शोधयश उसने शीग्रही विपुर
के प्रकाश से सर्प बनाया, बैंगलों के समूह से चन्द्रमा और
फरका-आकाश से गिरनेवाले फ्धरों द्वारा उन्होंने तारा
स्नाकर चारों भार फैलाया।
इन्दुतण्डुलमण्डलादि नित्यादिन जानु चि-
दुदर्भ मेवघायटनगल देह विधत्त विधिः ।।
नून लोकहितेच्या किरति यत्मतर्पज सर्वतः
शुनावप्रविशिष्टपिटहचिर भूनी नुसार दिव"
चन्द्रमा गोलाकार चावल की राशि के समान है, वह
प्रतिदिन उदय हाता है, किसी अमावास्या के दिन ब्रह्मा ने
मेघरूपी जाता में पीस कर उसे चूर चूर कर दिया, मालूम
होता है लोक कल्याण की इच्छा से सबको तृप्त करने वाले
उसो चूर्ण को ब्रह्मा आकाश से तुपार के रूप में गिरा रहा है,
जो स्वच्छ आटे के समान है।
राजन्यदपि ते याहू कान्तालिगनलालसो
तथापि समरे भेत्तुं शक्ती हस्तियाटयोः ॥२॥
हे राजन् यद्यपि तुम्हारे थाहु त्रियों को आलिङ्गन
करने
के लिए उत्कण्ठित रहते हैं, तथापि युद्ध में हाया और
फाटकों को तोड़ने में समर्थ हैं।"शक्ती हस्तिक यारयोः" यह
एक पाणिनि का मूत्र है।
भगम्यागमनारायः प्रायश्चिमयिते जनः ।।
भगम्य स्वयमो याति सर्वच पावनम् ॥५॥
कविता-फौमुदी। न जाने योग्य स्थानों में जाने से प्रायः मनुष्य पापी हो जाते हैं, उनके लिए प्रायश्चित्त फरना आवश्यक होजाता है। पर तुम्हारा यश अगम्य है (वह दूसरों को नहीं मिल सकता) फिर भी यह पवित्र समझा जाता है और यह सर्वत्र शोभित हो रहा है। पशमस्तव सौजन्यमहो विस्मयकारकम् । भामराहता नीतमयशो यिद्विपामपि ॥ १५ ॥ तुन्दारे यश की सुजनता देपफर थाश्चर्य होता है, क्योंकि सयुभी फे फराङ्क फो भी उसने अपने समान शुरु पना दिया है। . गुणवर समापि भेदोय युदयोमहान् ।। अनुति गुणछेदमविदगुषो भवान् ॥ ५॥ अनुप और आप दोनों ही गुणी है, (गुणवान् या रस्सी. पाला) गुणी होना दोनों का यरायर है, पर पनुप का गुण (रस्सी) टूट जाता है भोर थाप का गुण पामी नहीं टूटता। को गुणपरते शरायपुरदीपयत् । पसुधाम्बरपयंस विनिवारितगोषः RI 'परफेसम्पुट में हुए दीप के समान तुम्हार ये गुण समद क्या करें, क्योंकि पति और भाकारा के यव में इनको गति रोपदी गयी है, अर्थात् तुग्दार गुण समान पधिपी में पलहा सपिदिमानारपौषि पाणिनिः॥ पापायरीतमयमा मौशमीप १५२ पण्डित पाजक। पाणिनि सम्धि विग्रह और फाल (व्या सन्धि, समास प्रादि फा विग्रह, धनमान मादि जानते हैं और भाप मी इनको (सुलह, और विरोधक जानते हैं। पाणिनि ने पत्यप्रत्यय किया है और आप सत्यह, पर पाणिनि प्रत्यय को प्राति से परे करते हैं। प्रत्ययफारी (दूसरं फा विश्वास करनेवाले ) नहीं है आपसे उनकी तुलना नहीं हो सकती। सपसगाः क्रियायोगे पाणिरिति सम्मतम् ।। निस्क्रियोपि तवारातिः सोपसर्ग:सदा कथम् ॥14॥ पाणिनि कहते हैं कि क्रिया । व्याकरण की क्रिया योग में उपसर्ग होते हैं ( अव्यय विशेष) पर तुम्हारे निमित्य हैं, राज्यच्युत होने से उन्हें कोई काम नहीं, . भी उन्हें सदा उपसर्ग ( उपद्रव) लगे रहते हैं। तव शैभवाच ध य व्याकरणायते ॥ स निपातोपसर्गाभ्यां त्वं गुणागमदिभिः ॥९॥ आपके शत्रु और आप दोनों ही व्याकरण के समान भआपके शत्रु तो निपात और उपसर्ग से ( नाश और उपद्र 1) और माप भागम और वृद्धि से ( माय और उन्नति से घेरे हैं । निपात उपसर्ग आगम और वृद्धि ये व्याकरण रिभाषिक शब्द हैं। भसत्कविप्रणीतानो श्लोकानामिव ते द्विपाम् ।। लियासधिवृत्तीनां निपाता: स्युः पदे पदे ॥२०॥ कुफवि के धनाये श्लोकों के समान तुम्हारे शामी कार जनके अर्थ ( धन या शब्दार्थ) सन्धि ( व्याकरण की सहि बविता-पौमुदी। गा सुलह ) और वृत्ति में (जीविका या समास ) फठिनता उत्पन्न हो गयी है उनका प्रत्येक पद में निपात हो (नाश गच यादि निपात) पदस्ति सदददायीति नैतचित्रमवैम्यहम् ॥ भय स्वापि ते नास्ति दत्त तद्विद्विषो कथम् ॥२॥ जो तुम्हारे पास है उसका दान करते हो इसमें कोई भाधर्य नहीं, पर मय तो तुम्हारे पास स्थान में भी नहीं है, फिर नुमने शत्रुओं को भय फैसे दिया । भकलहोदरा मुद्धः परियारी गुणान्वितः। सशोहदयाहो पनः मुपदशस्तप ॥२२॥ सफल हद शुद्ध परियारी (स्वजनीयाला या म्यान पाला ) गुण युक्त शुद्ध यश में उत्पन्न हदय प्रहण करनेयाल राग तुम्हारे समान हैं। पारेगमपश्यन्ति विपरीत विनयरा। पन्य भागोरोपि काल एवामि विदिपाम् ॥२३॥ 'प्राय: नष्ट होनेवाले, सभी वस्तुओं को विपरीत ही दसा फरले है. तुम सुवर्ग के समान गारदा, पर शत्रु नुमको काला फाल, या यु ही समझते हैं। यया राह पिपानी कुतः शरता कुले । मारिनियताको पने पुराले १४२४॥ मुम्हारे साथ विरोध पारपाली यो थुल में पुशलता पसी, पुशलता से घिरे पन में ही उनका निधित पास होता है। विरोधारा शा antana॥ रिमोशलभाय सा पास
पण्डिन पाजकः ।
शाभी गं नगारा विगंधाने पर बीड दर
उत्पनि ,क्योकि नुगहार गनु गुर में भाग बड़े होते हैं।
सयांनशन्य हो जाता है। यौन दगंन पायों को क्षर
मानता दे और पारा पदार्थों को मत्ता स्वीकार नहीं कर
लक्ष्मीपमहिनाः परिमितमामापिटीमुजी
गप्रन्थिरिमाथुलेरययन पणापामृतः ।
एते कीहश ईश्वराः कुपतयः यिनापाया
परत्रलोग्य विलक्षण पहनु नः मत्य म प्रवेश्वरः ॥२५॥
जिनी लक्ष्मी पडू ( पाप ) से फलडित है, जो पारे
नियमित पृथिवी के टुकड़े फा भाग फरनेवाले है, गर्ष को,
ठो से जिनके अंग ऊबड़वायड़ हो गये हैं और जो गहने
आदि येश धारण करनेवाले हैं ये कैसे ईश्वर हैं, ये कुपति
पृथिवीपति या कुस्वामी हैं । यथा इस चर्चा से लामक
जो मिलोक से विलक्षण है, यह हम पर प्रसन्न रहे, वही ई-
है, यह यात सत्य है।
धाराणस्यामसीवारानीवाराशनमुस्थितः ।
मवारामनिषण्णस्य वारा स्नानस्य यान्त मे ॥२७॥
मेरे ये दिन वाराणसी में यौने, केवल तेनी के चावलों से
मैं
सुस्थ बना रद्ध नये वाग में मेरा निवास हो और स्नान
के द्वारा मेरे दिन बीते।
स्वजनवसनि:मृत्याराग्लेन वलेनवा
लघु विरचयान् गह भूमेस्तलेन दलेन वा।
विदितुल प्रायत्राणं फलेन जलेन वा
पनभुवि कदास्यां शून्योहं मलेन सलेन वा ॥२८॥
- पपिता-फोमुदी। छल या यल से अपने भजनों के साथ में निकल फर पृथियो फेसल से दल ( पी ) से एक छोटा घर यनाकर फल से या जल से प्रापरक्षा करना हुआ यन में मैं फय मल से या एल से शन्य होऊंगा। पूजापमपर पापुलकिती पापोः पर पेरपी पुण्यो पातकिपापपाटनपटू पृथ्वी प्रपना प्रथाम् । प्रायः पर्ववप्रिकारथुपरैः पत्येपुरा परिती पादौ पति पानकः पशुपतः मीन्या पुरः पश्यतुः ॥२९॥ जा पूजा के लिए अर्पित कमलसमूह सं पुलफित हुए है। जिनके दोनों याजू बड़े ही फोमल हैं, जो पवित्र है पापियों फं पाप दूर करने में समर्थ है, जिन्होंने पृथ्वी में प्रसिद्धि पाया है और जो पहले पार्वती के पत्र द्वारा पूजित है, पशु. पति के उन पादों का पाजयापण्डित प्रीतिपूर्वक अपने भागदेखें। पाणिनि । ये प्रसिद्ध येयाकरण है। आजकल पाणिनीय व्याकरण काही यहां पठन पाठन होता है। पाय के पशायर के पास शालातुर नामक एक गांव के ये रहनेवाले थे। भाज इस शालातुर गांव का नाम लाहोर है। पजाय की राजधानी लाहौर से यह भिन्न लाहोर है। इनके पिता का नाम दाक्षी था। पद्यपि पाणिनि का जन्म पक्षाय में हुभा था, परन्तु इनकी 'शिक्षा पाटलिपुत्र नगर में हुई। उन दिनों पाटलिपुत्र में पाणिनि। -+ WAR- धर्ष नामक एक धड़े विद्वान् रहते थे। पालिनि ने उन्होंसे अध्ययन किया है। आराधना से भगवान शिव को प्रसन करके पाणिनि ने व्याकरण कराने की योग्यता प्रा की थी। भ्याकरण सूत्रों के अतिरिक इन्होंने एक काव्य भी धना है, जिसका पाताल विजय अथवा जाम्यवतीविजय न है ।ये ईसवी सदी के पहले के हैं। भयाप्तसादास्तमनिन्धतेजा जनस्य रोग्मितमृत्युमीतेः त्पत्तिमददस्तु विनाश्याश्य यथाइमिन्येवमियोपदेष्टुम् ॥१॥ तेजस्वी सूर्य अस्त हो गये, इसलिए कि मृत्युभयय भूले हुए मनुष्यों को यह उपदेश दें कि उत्पर होनेयार पस्तुओं का विनाश अयश्यही होता है, जैसे मेरा पिना हुया है। भोगिरे.शीवएकदाम्धः पापनो गन्मभपाशा पोलमारी मधुराणि पूजन सवीना परापुटेन कान्लाम 111 पह कबूतर पर्यत की शीतल पदरा में बैठा हुभा है, पर कामिनोचित सुशामद फर में भी बड़ा पक्षधाम से अलसायी हुई मपनी फयूनरी पो मधुर बोलयर पो से हर गोग्याचे परिमन्दमन्द गति पाानि कालमेशाः अपरपती वसमिपिग्य ती गौरिय हानि पर्म का समय है, भाधी रात पीत गयी, मंच मालूम होता है कि चन्द्रमा कानदेश फर यह रानिहार कर रही है. जैग गाय पाने व को मार करती।
कविता-गोगुदी। सोराणि गिनीयनपारगे गो साउन मलिया, want दिसापि जगभरा पल प्रिपालोजनमे मेय ॥४॥ सूर्य पं. चले जाने पर नलिनी ने फमली भपनी आलं जो बन्द कर ली बद अच्छा ही किया, ( सन्ध्या के समय फमलों का बन्द होना दापि मानते हैं। क्योंकि पापों से पद्यपि समस्त जगत् देगा जाता है तथापि उनफा फल तो फरल अपने प्रिय को देना ही है। निरीश्य विशु अपने पसंदो गुन शिायामभियारिकायाः धारानियतः सह रिन्नु पान्तश्चन्द्रारगिल्यानं सर रास ॥५॥ रात पी यमिमारिका चली जा रही है, उसी समय बिजुली चमयी और उसी प्रकाश में मेघ में उस अभि. सरिका का मुंह देगा । उसको संदेह हुआ फि धारा यरसाने फे साथ साथ हमने चन्द्रमा को भी उगल दिया है क्या, इसीसे यह पड़े दुःप से चिल्लाने लगा अर्थात् गरजने लगा। शुदस्यमाचाम्यपि संहतानि निमाय भेदं कुगुदानि चन्दः। भशाप पृद्धि मलिनान्मरात्मा जो भयेन्याय गुग्याय भकः ॥६॥ शुद्ध स्वमाययाले भीर थापम में मिले हुए कुमुदों का चन्द्रमा ने मेद किया । अर्थात् चन्द्रमा ने फुमुदी को विक. सित किया । दुरात्मा फुटिल और मूर्य मनुप्य वृद्धि पाकर किसीफे कल्याण के लिए नहीं होते। मोदुरोगेण विलोलनारक तथा गृहीतं शशिना निशामुखम् यथा समस्त तिगिरीशुक तया पुरोनुरागाद गलितं न लक्षितम् ॥७॥ चन्द्रमा का राग ( अनुराग अथवा लाल रंग) बढ़ा हुया है, उसने बिलोलतारक ( चञ्चल आंखोवाला अथवा तारोंवाला) निशामुप ( सन्ध्या समय अथवा निशानामक किसी स्त्री का मुंह) को इस प्रकार ग्रहण किया कि फो मनुराग के कारण अपने अन्धकार रूपी कपड़े के जाने का भी शान न हुआ। प्रकाश्य लोकान् भगवान् स्वतंजमा प्राण दरिद्रः सवितारिज भहो चलाश्रीवलमानदाप्यहो रहशान्ति सर्वहि दशा विपर्यये. भगवान सूर्य अपने तेज से समस्त लोको को प्रका फरते हैं, पर अन्त में ये भी प्रभादरिद अर्थात् निस्तेज जाते हैं, दुःख है कि पल और सम्मान देनयाली लक्ष्म चञ्चल है। विपरीत अवस्था में सब को दुर्गति भोर पड़ती है। क्षमाःक्षामीकृन्य प्रसभमपात्याम्बु सरिताम्, प्रताप्योर्वी कृत्स्ना तरुगहनमुच्छोप्य सकलम, क सम्मन्युष्यांशुर्गत इति समालोकनपरा- स्तहिदीपालोकैर्दिशि दिशि चरन्तीह जलदा:।।९।। जिसने रात छोटी बनायो, जिसने जबरदस्तो नदियों। जल खींचा, जिसने समस्त भूमि को तपापा, और घनो। सुखाया, यह उपणांशु इस समय कहां गया इसी बात । देखने के लिए हाथ में विजुलीरूपी दीपफ लेकर समर देशामों में मेघ घूम रहे हैं। पाणो शोणतले सनूदर दरक्षामा कपोलस्थली, विन्यस्यानुनदिग्ध लोचनजल:म्लिानिमानीयते । मुग्धे चुम्बतु नाम चञ्चलतया भृङ्गः कचित् कन्दली- मुन्मीलनयमातीपरिमलः किम्नेन विस्मयते ॥1॥ हे तनूदरि, अंजन लगी आग के जल से थोड़ा दुर्घट : पोल और लाल इयेलो क्यों म्लान यना रही हो। - कविता-कौमुदी। भोली भ्रमर चञ्चलता के वशयी होकर यदि कन्दली का चुम्पन करता है, तो करने दो, इससे यह नयी मालती के फैलनेवाले सौरभ को नहीं भूल सकता। कल्हारपर्शगर्भः शिशिरपरिचयात् कान्तिमद्भिः कराः वन्देणालिङ्गितायास्तिमिरनिवसने स्त्रं समाने रजन्याः अन्योन्यालोकिनिभिः परिचयजनित प्रमनिस्यन्दिनीभि इंगरूढ़े प्रमोदे हसितमिव परिस्पष्टमाशासखीभिः ॥१९॥ चन्द्रमा का कर (हाथ या किरण ) कमलपराग से भरा हे और टण्डक के साथ से सुन्दर भी हो गया है, चन्द्रमा ने उसी कर से रामि फा थालिङ्कन उस समय किया जय कि उसके अन्धकार रूपी कपड़े गिर रहे थे, यह यात दिशाओं ने भी देखी, इनमें परिचय से प्रेम उत्पन्न हो गया है और ये परस्पर एक दूसरी को देख भी सकती है, चन्द्रमा और रात्रि का प्रेम जय बहुत ऊच चढ़ गया तब साफ़ साफ़ दिशाओं ने इस दिया। विलोक्य सङ्गमे राग पश्चिमाया विश्वतः त कृष्णमुत प्राच्या महिनायो विनर्यया nn सूर्य का पश्चिम दिशा में अनुराग देखकर ( सन्ध्या के समय सूर्य का वर्ण लाल हो जाता है) पूर्व दिशा ने अपना मुंह काला कर लिया। बिना वालो स्त्री नहीं होती।
। प्रकाश। प्रकारार्प। यसंमत के प्रसिद्धि करिया मगनहीं हैं। इनकायनाया फोई काव्य है कि नहीं दमका भी पता नहीं मिलता। हाँ सुभाषिन ग्रन्थों में इनके नाम में जो लोक संग्रहीत हुए यड़े ही मधुर और भावपूर्ण है। शिशुपालवध के टाकाकार रहमदेवा ने चौथे सर्ग अन्त में अपनी टीका में लिसा है शुन्या प्रशवपांनु ग्याख्यान नावदीदशम, विशेषतस्नु नौवास्ति योघोऽत्रानुवाहते । प्रकाशवर्ष से सुनकर मैंने ऐसी टीका लिखी है। ऐसे फाव्यों की टीका लिखने के लिए केवल योघ की आवश्यकता नहीं है। यहां तो केवल अनुमय से ही काम चल सकता है। इससे यह मालूम पड़ता है कि प्रकाशवर्ष एक अनुभ पण्डित थे। इससे अधिक इनके विषय में कुछ मालूम नहीं जगत्सिमक्षाप्रलयक्रिया विधौ प्रयन मुन्मेपनिमेरविम्रमम् । वदन्ति यस्येक्षणलोलपक्ष्मणां पराय तस्मै परमेष्ठिने नमः॥ जगत् की सृष्टि और :लय का कारण जिसकी आंखों की चंचल पपनियां का खुलना और बाद होना ही है, ऐसा विद्वान कहते हैं, उस परमेष्ठी ( ब्रह्मा ) को नमस्कार। पाधापद मरणदुःसमियानुभाम्य दत्त न कि सलु भवन्यतिभूयसानि। कम्पडमान्परिहसन्त इवह सन्तः संकल्पितरतिददत्यकदापित यत् ॥२॥ मरण दुःख क समान मांगने का दुःख सहवाकर यदि अधिक भी दिया जाय तो उससे लाम प्या? समन मनुष्य फल्पद्र मों का इसने हुप प्राधी के मनोरथ से अधिक देते हैं। ।
. कविता-कौमुदी। एवमेव नहि जीव्यते खलात्तत्रका नृपतिवल्लभे कथा। पूर्वमेव हि सुदुःसहोऽनलः किं पुन: प्रवलवायुनेरितः ॥३॥ खल यों ही प्रापनाशक होते हैं, उस पर यदि उन्हें राजा. प्रय मिल जाय तो क्या कहना ! एक तो योंही आग का ताप दुःसह होता है, उसपर दि उसे घायु फी सहायता मिल जाय तो कहना ही क्या। धन्याधिन्दति दुःखितानुपहसत्यावाधते वान्धवा- न्छूरान्द्वेष्टि धनच्युतान्परिभवत्याज्ञापयत्याश्रितान् । गुयानि प्रकटी करोति घटयन् यत्नेन पैराशय धने शीध मवाच्य मुभति गुणानगृहातिदोषान्खलः ॥ माननीयों को निन्दा करता है, दुःखितो की हसी उड़ाता है, पान्धयों को पीड़ा देता है शूरों से द्वेष करता है दरिदों का तिरस्कार करता है थाधितों को आज्ञा देता है, गुप्त बाते प्रकाशित करता है, द्वेप प्रकाशित करफे, न बोली जानेवाली पात योलता है गुणों को छोड़ देता है और दोषों को ग्रहण फरता है, यह खलों का स्वभाव है। कृपणसमदीनामपि भोक्तारः सन्ति केचिदविनिपुणाः । जलसम्पदोम्दुराशेर्यान्ति लयं शश्व दौर्वाग्नौ ॥५॥ पण धन के भोग करनेवाले भी कोई कोई निपुण मनुष्य .होते है, समुद्र की जलरूपी सम्पति यड्याग्नि में लीन हो जातो है अर्थात् घड़यामि समुद्र की जल सम्पत्ति का भोग करता है। भनवाहुख्यमहेतुः कोपि निसर्गगमुक्तकरः । माधि करपाम्बुगुधः सम्पतिः किधिकाम्बुनिः । प्रकाश। प्रकाशवर्प। यसंगन के प्रसिद्धि कपियां में में नहीं हैं। इनकाब कोई कार्य है कि नहीं इसका भी पता नहीं मिलता. सुभाषित प्रन्यों में इनके नाम से जो लोक संग्रहीत हुए है। बड़े ही मधुर और भावपूर्ण है। शिशुपालयध के दाकाकार यल्लमदेवा ने चौये सर्व अन्त में अपनी टीका में लिखा है। शुन्या प्रकाशवर्षानु व्याख्यान नावदीराम, विशेषतस्नु नौवास्ति वोघोऽप्रानुवाहते । प्रकाशवर्ष से सुनकर मैंने ऐसी टीका लिखी है। फाव्यों की टीका लिखने के लिए केवल योध की आवश्य नहीं है। यहां तो केवल अनुभव से ही काम चल सकता इससे यह मालूम पड़ता है कि प्रकाशवर्ष एक अनुभः पण्डित थे। इससे अधिक इनके विषय में कुछ मालूम नहीं जगन्सिसक्षाप्रलयक्रिया विधौ प्रयव मुन्मेपनिमेषविनमम् । वदन्ति यस्येक्षणलोलपक्ष्मणां पराय तस्मै परमेष्ठिने नमः ॥2॥ जगत् को सृष्टि और प्रलय का कारण जिसकी मांसों की चल पपनियों का खुलनाऔर बन्द होना ही है, ऐसा विद्वान हते हैं, उस परमेष्ठी ( ब्रह्मा ) को नमस्कार। धापदं मरणदुःसमिवानुभाग्य दत्तन कि खलु भवन्यतिभूयसापि। द्वमान्परिहसन्त इवेह सन्तः संकल्पितरतिददत्यकदायित: मरण दुःख के समान मांगने का दुख सहयाकर यदि अधिक भी दिया जाए तो उससे लाम पया? सजनः कल्पद्रमों का देखते हुए प्रार्थी के मनोरथ से । ।
कविता-कौमुदो। -~-- घाणभह। इन्होंने कादम्बरी और हर्षचरित नामक दो गद्यकाव्य लिखे हैं, ये हरवद्धन के आश्रित थे। ये सातवीं सदी के भारम्भ में हुए थे। इन दो अन्धों के अतिरिक्त पार्वती- परिणय नाम का एक छोटा नाटक भी इन्हीके नाम से प्रसिद्ध है । कुछ लोगों का कहना है कि हपंयर्द्धन के नाम से प्रसिद्ध नागानन्द आदि नाटक भी याणभट्ट फेही यनाये ६, पर इसमें कुछ पुष्ट प्रमाण नहीं है । चण्डीशतफ भी इन्होंने पनाया है। जैन पण्डित गुणयिनय गणि ने नखचम्पू की एक टीफा लिखी है, उसमें उन्होंने पाणमट्ट के "मुकुटताहि. तक " नामक एफ नाटक का भी उल्लेख किया है। क्षेमेन्द्र ने भीचित्य विचार चर्चा में यामह के कई लोक उद्धत किये हैं भोर उन श्लोकों को पद्य फादम्यरी का यतलाया है, इससे पाण की यनायी एक पर कादम्यरी भी थी यह मालूम पड़ता है, पर आजम तो यह पद कादम्यगे मिलती है और न मुकुटताण्टिक नाटफ । पाणम ने हर्ष चरित के प्रारम्भ में अपना परिचय इस प्रकार दिया है। ये पारस्यायन गोत्रोत्पन्न थे। इनके पूर्वज का माम कुवेर पा, पुथेर फे चार पुत्र हुए, ईशान, हप, पशुपति भोर भयुत । पशुपति के पुत्र अर्थपति हुए, अर्थपति के भृगु, दसशुचि, भादि पर पुत्र उत्पन्न हुए, इनमें एम. चित्रमानु भी थे, चित्रमानु फा प्याराग्यदेवी से हुमा, चित्रभानु मीर राज्यपी के पुत्र पाप हुए, पाल्यावस्था में ही इनकी माता का एवर्गपास हुमा इस कारण इनफा सारन पाटन दूसरों ने ।
प्रकाशवर्ष।
कार्यशाप्रष्टग्यो न प्रनान्यो मम प्रियो वेति ।
गुरुरप्यासनसेन्यः प्रियानितम्बः कदा मन्सी १५३
कार्यक्ष मनुष्य से किसी विषय में सलाह लेनी चाहिए,
यह मनुष्य हमारा मान्य है या प्रिय है इस कारण फिसोने
सलाह नहीं लेनी चाहिए। मान्य गुरु ( भारी) प्रिय खी।
नितम्ब पर क्या कोई मन्त्री का भार सौंपता है।
गुण्यानस्मि विदेशः क इव ममेत्येष दुरभिमानलयः।
भमनमणि विराजति विन्यस्तन पुनरधरमणी
मैं
गुणवान् । मेरे लिए विदेश क्या, यह फेयल पुरभि
मान मात्र है, भान आंखों में ही शोमता है, यदि यह भपर
मेगाया जाय तो क्या अच्छा लगेगा।
स्वम्मतिले बहुमानगुपैति मातिशयनमः।
एटमनोदाहरण पपोधरे कुपलयाक्षीणाम् Im
छोक में उसी का मान होता है जिसकी प्रकृति को
भार प्रतिवालों का मान नहीं होता। खियो फेलन म
उदाहरण हो सकते है।
समान विगतवाने सुमेरी माग्यगाधमिले गरितामपाये।
पापानिय निधता प्रनाले नित्यमायुगमा सानुबो मितिः ।
प्रया में कारपदमको योगा कोपीय मग दिपा,
जिन्हें किसी चीज की यागना महीं। उनम सो को समा
देमगाथ जल में उपत्र किया धीर पलों केलि में
सायटर रखा। सयां मरी की मांखों के सामने प्राय
मपिता, मतपय उनको पिरमही दाता।।
وم - किया । याण के चौदहवें यर्ष में इनके पिता का भी स्वयं हो गया। उसी समय से इनपर कुटुम्ब पालन का मार इत्यादि। इनके विषय में आचार्य गोवयंन ने अपनी पायर्यासार में लिखा है। जाता शिसकिनी माग यथा शिस्त्रानो व्या यगच्छामि । प्रागन्यमधिकमाप्त याणी याणा वभूति ।। जिस प्रकार शिखण्डिनी अधिक यल प्राप्त करने के लि. दूसरे जन्म में शिखण्डी हुई, उसी प्रकार अधिक प्रगल्मता प्राप्त करने के लिए याणी ने ( सरस्वती ) घाण का कम धारण किया। नमस्तुङ्गशिरश्चुम्विचन्द्रचामरचारवे । त्रैलोक्यनगरारम्भमूलस्तम्माय शंभवे ॥३॥ जिनके क'चे मस्तक को सुन्दर चामर के समान चन्द्रमा चुम्बन कर रहा है, जो लोभ्य रूपो नगर का मूल स्तम्भ उस शिव को नमस्कार । एकैकातिशयालवः परगुणज्ञान कवैज्ञानिकाः सम्त्येते धनिका:कलामु सकलास्वाचार्यचर्या क्षणाः। अप्येते सुमनोगिरा निशमनाद्विभ्यत्यहो छाघया। धूते मूर्धनि कुण्डले कपणतः क्षीणे भवेतामिति ॥२॥ . एफ एफ से यद फर दूसरों के गुण जानने में प्रयोग है, जो समस्त कलाओं में आचार्य बनने के योग्य है, ये गोरूपी फुसुम फोफानों में रखने से डरते हैं, क्योंकि कानों कविता-कौमुदी। में रखने से फुण्डल का धमा पाकर वे घिस जायेगी, इसलिए घे आदरपूर्वक उन्हें माथे पर ही रखते हैं। प्रोविन प्रकटीकरोति सुइदि द्रव्यध्ययाशङ्कया। मीतामत्युपकारकारणभपात्वना कृप्यते सेत्रपा । मिथ्या अत्पति वित्तमापभयात्स्तुल्यापि न प्रीयते । कौनाशो विभवव्ययव्यतिकरशस्तः कथं प्राणिति ॥३॥ धन पचं होने के भय से मित्रों पर प्रेम प्रकट नहीं करते, प्रत्युपकार करना पड़ेगा, इस भय से सेवा से भी प्रसन्न नहीं होते, धन हूँदने के भय से झूठ बोलते है, स्तुति से मी प्रसन्न नहीं होते, यमराज धनन्यय के डर से किस प्रकार जीते हैं। करिकलम विमुश होलतां घर विनयवतमानताननः । मृगपतिनखकोटिभ गुरो गुरुरूपरि क्षमते न तेक शः ॥४॥ फरिकलम, चञ्चलता छोड़ दो, सिर नीचा करके विनय. प्रत का पालन करो, सिंह के नय के समान टेदा इस अङ्कुश का तुमपर पड़ना उचित नहीं । नगृहाति समयरमल कि जल्किनि जले, न पर राहाद प्रति विसभवाशाले । शएम्ती प्रेमादार विपश्त नान्यकरिणी स्मरन्दावबसंहदय दयिता वारण पत्तिः ॥un नयीन फमल के रेणुयुक्त जल में प्रास ग्रहण नहीं करता फमल डटी के टुकड़ों से भी प्रसन्न नहीं होता, ममार्द दूसरी । इधिनी को भी सहन नहीं करता, क्योंकि यन में विधुड़ी हुई भपनी हदय दयिता को यह हाथो स्मरण कर रहा है।
धाणमा
लतान्तावाद शशिशसशीत नजर
भ्रमभासताः परिहरति कान्ताः कर्मालनी।
दघमाराधार' करमपि कसरी जातविरो
विम्यामागमपि यता नरम
लताओं को नहीं इता, चन्द्रखण्ड के समान शीतल जल
को भी नहीं छूता, सुन्दर कमलिनी को मी-जिसपर मौर
मुंज रहे हैं-दुरही से छोड़ देता है, शूड भी मार के समान
धारण करता है, विरही हायो उसासे रहा है और वन में
उसे एक क्षण के लिए भी चैन नहीं।
नदीपमान्भिरवा किसलयवदुत्पाट्य घनरू-
मदोन्मत्ताजिया करचरणदन्तः प्रविगजान् ।
जरांप्राध्यानायां तरुणजनविपजननी
स एवार्य नागः सहति कलभेम्यः परिभवम् ॥
जिसने नदी के तटों को तोड़ दिया है, फूल
के समान
जिसने वृक्षों को उखाड़ दिया है, फूड पैर और दातों से
जिसने अपने प्रतिद्वन्दी मतवाले हाथियों को जीत लिया है,
यही हाथी आज चूहा होगया है, युवक उससे देप करने लगे
हैं और वह छोटे छोटे वञ्चों से पराजित होरहा है।
परमियमा कुशक्षरिलक्षितमापतिता
विनयविधिन्सपा शिरसि तैगजपपते ।
म पुनरपश्चिमाकरजवशिखाभिहतिः
प्रसमसमुश्यितस्य निशिता बनकेसरिणः ॥
हे गजराज, तुमको सीधा करने के लिए तुम्हारे मस्तक
पर अलक्षित पड़नेवाला यह भडश का प्रहार भया है,
नहीं तो वन सिंह के तीखे और प्रज समान नौका
भापरिम माघात सहना पड़ेगा और यह अशा नहीं।
. कविता-फौमुदो। वरलयसि दश किमुत्सुकामकलुपमानसगसलालिते । भवतार कलहसियापिका पुनरपि पास्यसि पद्धजालयम् ॥१०॥ स्वच्छकान सरोवर में पास करनेवाली राजद्दसि तुम घर उधर क्या देख रही हो, इस पापी में उतरो, पुनः मान- सरोवर भी जाना। 'वियोगिनी चन्दनपपाण्दुमणालिकाहारनिवासोवा । वाला पलाम्मापदन्तुरेषु हत्तीय शिश्ये नलिनीदलेषु 30 चन्दन पंक के समान पीली, नृणालिका तार के सहारे वित रहने वाली वियोगिनी स्त्री छोटे छोटे जलकणों से एक कमलिनी के पत्तों पर हंसी के समान सोयी। दुःखदा प्रविशन्यास्तस्याः कण्ठ मुहर हुर्वाप्पः । स्वरूपावशेषजीवित निर्याणभियेय निरुणद्धि ।। १२॥ उसकी धुरी दशा है, गला वाप्प से भर आया है, मानो रोड़ा बचा हुआ प्राश जाने न पाये इसलिए यह गले को कि रहा है। साशारधि दग्धवीरूधि सदा सारङ्गवधि क्षाममारहि मन्दमुन्मधुरिहि स्वच्छन्दकुन्ददि । शुप्यत्स्रोतमि भूरितातरजसि ज्वालायमानासि नीमे मासिततातेजसि कर्य पान्य प्रजजीवसि ॥ १३॥ इस प्रीम मास ने सय दिशामों को भर दिया, विरवा ला दिये,मृगों पर सदा प्राध किया, वृक्षों को पतला बनाया, रों के आनन्द पो घटाया, स्वतन्त्रता पूर्वक कुन्द-पुष्प से प ज्या, सातों को सुखवाया, धूलि को गर्म किया, जल को रवि के समान बनायां, पान्थ, तुम इस श्रीष्म मास में व फि सूर्य का तेज फैल रहा है, कैसे जीते हो। .
२७०
याणमा
.
इरादेव कूनोचलिनं तु पुनः पानीय पानार्थिना
रोमायोपि निरन्ता प्रकटितः प्रीत्या न शैत्यादरात् ।
रूपालोकनविस्मितेन धलितो मूधा न शान्त्या तृपा-
मक्षुण्णो विधिरवगेन घटितो वीक्ष्य प्रापालिकाम् ।।
-
दूर से ही पथिक ने हाथ जोड़, पर पीने के पानी केटि
नहीं, रोमाञ्च हो आया, पर शीत के कारण नहीं, किन्तु प्रेम
कारण।रूप देखकर वह विस्मित हो गया था इस कारण उसन
अपना सिर हिलाया, प्यास शान्त होने के कारण नहीं, पापा-
पालिका ( पनसाला चलानेवाली) को देखकर पधिक ने
अपने भाग्य सफल किये।
स्वेदाम्भःकणिकावतेन वपुषा शीताःनलस्पर्शन
सपाकजुपा मुखेन शिशिरस्वाम्बुपानादरः।
द्वराभ्वष्ठमनिःसहेरवयवैश्ष्ट्रामासु विश्वान्तयः
कश्मीरान्यरितो निदाघसमये धन्यः परिभाम्पति ।।
यह मनुष्य धन्य है जो गरमी के दिनों में कश्मीर
भ्रमण करता है, क्योंकि वहां स्वेद विन्दुयुक्त शरीर
पीतलयायु का स्पर्श होता है, प्यास लगने पर दा
पलता है, और दूर चलने के कारण अंगों के थक जाने ।
शाम के लिए छाया मिलती है।
प्रीमोमप्लोपशुप्पत्पयसि बकभपोद्धान्तपाठीनभानि
प्रापः पङ्ककमा गतवति सरसि स्थलतोये खटिया ।
कृत्या कृत्वा जलादीहतमुपरि जरत्कपटानं पायां
तोय म्यापि पापा पथि पतिहरा देति फपि पाया
Ram कविता-फौमुदी। तलाव का जल ग्रीष्म के दाह से सूख गया है, यहां की मछलियां घगलों के भय से व्याकुल हो गयी हैं उसमें प्रायः फीचड़ ही रह गया है, उसके थोड़े-स्वल्प जल में लोट कर जीर्ण बस्त्र के टुकड़े को पथिक ने अपने ऊपर रखा, जब यह पनशाला में गया तब उसे जल मिला, पर वह प्यासा ही हाहा, फरता हुआ जा रहा है। लवणाम्युनिधेरम्म कृत्स्नमुहगीर्य वोयदाः । दधुचंबलतां भूयः पीत्त दुग्धार्णका इच ।। १८॥ मेघों ने लवण समुद्र के समस्त जल को गिरा दिया, तय ये श्वेत हो गये, मानों उन्होने क्षीरसमुद्र का पान किया है। नीलोत्पलवने रेजुः पादाः श्यामायिता रवः । धनयन्धनमुक्तस्य श्यामिका मलिना इव ॥ १९॥ नीलकमल के धन में सूर्य के प्रणाम यने हुए चरण (फिरणे) शोमते हैं। मानों मेघ के बन्धन के कारण ये श्याम हो गये थे और यह श्यामता मुक्त होने पर भी घर्तमान है। बारे गृहस्प पिहित शयनस्य पाश्य पन्हिवलत्युपरि मूकपटो गरीयान् । भानुलममुरागपशात्कलत्रमित्यं करोति क्मिसी स्वपतस्तुपारः ॥२.n घर का द्वार यन्द है, पलंग के पास आग जल रही है, पर मोहने के लिए भारी सई का मोदना है अङ्क में रागपती खी है, इस प्रकार सोने पाले फो यह जाड़ा क्या कर सकता है। एक्यनुषि वाहुशालिनि शेरा न ममन्ति यसदाश्वयंम् । रिश्माको गणना फैर परापुकामे --
ये संस्कृत साहित्य के एक धुरन्धर कवि हैं। कालिदास
विधाभ्यास कश्मीर में ही हुमा था। चिल्दण ने अपनी पिया
-
महाकवि विल्हण।
जप ये घनुप धारण करते हैं तो पर्यंत नहीं नयते यही
माधर्य है. रिपुनामक विचार फाफो की क्या गिनती ।
मङ्गणवीथी वसुधा कुण्या जलधिः स्थली च पातारम् ।
पन्मीकन सुमेरु कृतपयनस्य धोरस्य ।। २२ ।।
उद्योगी धीर पुरुष के लिए समूची पृथियो आंगन समुद्र
महर, पाताल मैदान, और सुमेरु पर्वत मिट्टी के ढेर के
समान है।
महाकवि विल्हण।
है
अश्वघोप परिमल आदि की श्रेणी के ये कवि हैं। इन
फविता सरस मनोहर और थोड़ा परिश्रम से मास्वाय
इन्होंने विक्रमाङ्कदेवचरित नामक अपने कान्य ग्रन्य में अपन
परिचय दिया है, वह यहां लिया जाता है।
ये काश्मीर के रहने वाले थे, काश्मीर के प्रधान नगरप्रघर
पुर (श्रीनगर) से तीन मील दूर सोनमुखनामक एक
माम था, यही ग्राम विल्हण के पूर्वपुरुषों को निवास भूमि
थी। चिल्हण तीन माई थे, इनके बड़े भाई का नाम इटराम,
और छोटे भाई का नाम आनन्द था। मझले ये स्वयं थे।
इनके पिता का नाम ज्येष्ठकलश और माता का नाम मागा.
देवीथा। इनके पितामह का नाम राज्यकलश और प्रपिता
मह का नाम मुकिकलश था। विल्दण ने लिखा है कि मेरे
पिता ज्येष्ठफलशने महाभाष्य पर एफ टोका लिपी है। पर
उस टीका का आज पता नहीं मिलता । विल्हण का
के विषय में यह लिखा है-
- । कविता-कौमुदो। सानो वेदः फणिपतिद्वशा शब्दशास्त्रे विचार माया यस्य श्रवणसुमया साहि साहित्यविद्या, को वा शकः परिगणयितु यता त्वमेतत् प्रज्ञादशे किमिव विमले नास्य सक्रान्तमासीत् ।। भट्टी के सहित वेद और शन्द शास्त्र में महा भाष्यकार के समान जिसका विचार था, श्रवणों के सुखदायी यह साहि- . त्य विद्या जिसके प्राण हैं, अथवा कौन गिन सकता है। यथार्थ बात यह है कि इनके स्वच्छ बुद्धिदपंण में कौन सी ऐसी बात है, जिसका प्रतिविम्ब न पड़ा हो। विद्याध्ययन के पश्चात् इन्होंने देश का परिभ्रमण किया, काशी से चलकर मार्ग में चंदीराज फर्णराज से इनकी मैत्री हुई, इनके यहां कुछ दिनों तक महाकवि विल्हण ने वास फिग था और यहीं उन्होंने अपना पहला कान्य रामचरित 'लिखा था। यह काव्य विल्हण ने चंदीराज कर्णराज को ही समर्पित किया था। वहां से चलकर गङ्गाधर नामक किसी कवि के यहां इन्होंने वास किया, यहां से ये कल्याण गये और वहां के राजा विक्रमराज की सभा के ये चुने गये। ये विक्रमदेव त्रिभुवन मल्लनाम से प्रसिद्ध हैं । सन् १०७६ से १९२७ ई. तक इन्हों ने राज्य किया। बिल्हण ने अपने विक्रमाङ्गदेवचरित में अनन्त और फलश इन राजाओं का उल्लेख किया है, उस समय अनन्त मर चुका था और कलश को राजगद्दी मिली थी। अनन्त- राज ने सन् १०२८ से १०८० ई. तक और फलश १०८० से १०८८ ई० तक काश्मीर का शासन किया। विल्हण के विषय में काश्मीर के इतिहास राजतरङ्गिणी में इस प्रकार लिखा है। मुख्य पण्डित १७६ महाकवि विल्हण। कर्णापति की यात रोद के साथ सुनकर कुमार सरस्वती के चञ्चल वस्त्र के समान सुन्दर दन्त किरणों की परम्परा प्रकाशित करते हुए उत्तर दिया। पाचालतेपा पुरतः कवीनां कान्या मदोय सविध सुधांशो। त्यत्सनिधी पाटवनाटन पत्तथापि भान्या किमपि प्रवीमि ॥ यह फयियों के सामने पम्याद करना , चन्द्र सामने अपनी सुन्दरता का गर्व पारना , घेरो ही म सामने अपनी पटुता दिसाना भी है, फिर भी भक्ति के का कुछ कहता विधारणातुर्षमपाकरांति तातस्य भूगम्मपि रातः | ज्येष्ठे तने सति मामदेये म यौवराज्यस्ति ममाधिकार ॥९॥ पिता का गुझ पर पड़ा प्रेम गी फारण इस मा पर गहरा विचार नहीं करते । पल रोगय के गां पीयराज्यपद के ग्रहण करने का मारा अधिकार नहीं है। पावशोपियदि पानिपात्रामाधारविषय पर। भोमाशममाः हिमपदनशीभूपतिरोयम् । चालुक्य पेश में भी यदि मयांदा का मनिकम हो। पद पर स पी पात:, और यया उस समय यही गाना चाहिए कि यह परिकली हाथी धनश हो गया। म्या: Stufiyोतातम्योपः समप्रमा। बामापन में भूपधीन " जी या चाहिए कि गगनल मा मयांदा प. नियम यादी हामी मान . कविता-फौमुदी। ज्येष्ठ परिम्लानमुख विधाय भवामि लक्ष्मीप्रणयोन्मुखश्चत। किमन्यदन्यायपरायणेन मयैव गोत्रे लिखितः कलङ्कः॥१२॥ बड़े भाई के मुंह को मलिन बनाकर यदि हम राज लक्ष्मी के प्रेम में उत्कण्ठित हो तो और क्या, अन्यायी होकर मैंने ही अपने गोत्र में कलङ्क लगाया। सातरि राज्यमलकरोतु ज्येष्ठ ममारोहतु यौवराज्यम् । सलीलमाकान्तदिगन्तरोऽहं द्वयोः पदातिव्रतमुद्रहामि ॥१३॥ पिता बहुत दिनों एक राज्य करें, मेरे बड़े भाई युवराज धनाये जाये और मैं अनायास दिशाओं पर आक्रमण करू' और इन दोनों का सिपाही बना रह। रामस्य पित्रा भरतोऽभिषिक्तः क्रम समुल्लहप यदात्मराम्पे । तेनोस्थिता प्रीजित हत्यकीर्तिरद्यापि तस्यास्ति दिगन्तरेषु A vu राम के पिता ने क्रम की परवा न कर भरत राज्य दिया, इसलिए स्त्री के यश में होने की उनकी अकीति फैली और आज भी यह ज्यों की त्यो वर्तमान है। सदेप विधम्यत कुन्तलेन्द्र यशोविरोधी मयि पक्षपातः । न कि समालोधयति क्षितीन्दुरापासशून्य मम यौवराज्यम् ॥१५॥ हे पुन्तलेन्द्र भाप अपने इस विचार के छा, क्योंकि इससे अयश होगा । क्या महाराज का ध्यान इस बात की और नहीं है कि मैं तो यिना परिश्रम से ही युयराज यना। पुसाहरा धोगपवित्रमेव श्रुत्वा धमत्कारमगानरेन्दः। श्व हिमीदि पांगुणानां या न घेतः कलुपीकरोति mul फानों को पवित्र फरनेवाली यात पुप से सुनकर राजा को माधर्य हुमा, क्योंकि यह लक्ष्मी तो दोरों को खान धीर सके लिए फिसका चित्त मसिन नहीं हो जाता।
में मानों मोतियों की माला पहना रहे हो, ये बड़े प्रेम से
मुंहम थोडी निकल सकती है। दयलोक के भ्रमरीकेलिर
जिसके लिए राजाओं के लापन मान्दम कितने
---
महाकवि विल्हण ।
पस्नेहमरे विनिवेश्य चैनमुवाच रोमाञ्चतरहिताः ।
क्षिपतियात्युज्वलदन्तकान्त्या प्रसादमुन्नावलिमस्य कपडे ॥ ""
राजा ने अपने
पुत्र
को गोद में बैठा लिया, उनका शव
पुलफित हो गया। वे उज्ज्वल दांतो को शोमा से पुत्र के गले
घोले।
भाग्यैः प्रभूनमगंधानसी मे सन्यं भवानीदायितः प्रसधः ।
चालुक्यगोत्रस्य विभूपण यन्पु प्रसादी कृतवान्भवन्तम् ॥१६॥
बड़े भाग्य से भगवान् शङ्कर प्रसन्न हुए हैं। यह यात पित
फुल सच है, क्योंकि उन्होंने प्रसन्न होकर ही चालुक्य गोरो
अलङ्कार स्वरूप आपको पुत्र के रूप में प्रसाद दिया है।
एतानि नियान्ति यमि पात्रात्कस्यापरस्प भरणामुनानि ।
मनि लेशानि मुरद्विरेनं पारिजातादपरा प्रश्ते ।।
कानों के लिए अमृत के समान ये पाते किसी दूसरे के
मधु पारिजान के अतिरिक्त दुसरं पक्षों से नहीं मिलता।
पस्याः हने भूमिभृतां कुमाराः के पा! मपविरहवानाम् ।
न्मत्तमातमध्यगुर्गा मा राज्यलक्ष्मीनापुरते ।।१०।।
पंई पाप फर सामने है, मलयाले हजारों हाथियों की
यजनदार यह गज्यलक्ष्मी मुम्हारे लिए ता के समान है
মর্মাঘিনিন নি ।
समीरसी म्यादा पाय भविती विनयप्रताप ॥ २१ ॥
कविता-कोमुदी । १७६ यह लङ्का के पास वाले समुद्र से निकली है, राक्षसियों के समान इसकी तृप्ति के लिए भी रक्तासव चाहिए, पर यदि, यह राज्यलक्ष्मी तुम्हारी भुजाओं में बांध दी जाय तो यह विनयों की पात्र अवश्य होगी। जानामि मार्ग भवतोपदिष्ट ममापि चालुक्यकुले प्रसूतिः । किन्वन लक्ष्मीगुणवन्धहीने निसर्गलोला कथमेति दादयम् ॥२२॥ तुमने जो बात कही हैं, वह मुझे मालूम है । मेरा जन्म भी चालुक्य फुलही में हुआ है, र पात यह है कि तुम्हारा घड़ा भाई गुणहीन है, उसमें स्त्रमायचञ्चल यह लक्ष्मी कैसे ढता प्राप्त कर सकेगी। किंचिक्ष मे दूपणमस्ति पृष्ठ देवचक्र' यदि कौतुकते। एतस्य साम्राज्यममन्यमानाः पापमहा एव गृहोतपापाः ॥२३॥ मेरा कुछ भी दोष नहीं है, तुम्हें यदि कौतुक हो तो ज्योतिषियों से पूछो, इसके पापग्रह ही इस विषय में अपराधी हैं जो इसको साम्रज्य देना स्वीकार नहीं करते। साधाग्यलक्ष्मीदयित' जगाद स्वामेव देवोपि भृगामौलि। लोकानुता में बहुपुत्रता तु पुसदपेन ध्यतनोत्परेण ॥२॥ भगवान् शङ्कर ने भी तुम्हीं को साम्राज्य का अधीश्वर पतलाया है, यद्यपि लोक में हमारे यहुपुत्र होने की प्रशंसा है, पर मैं पुप्रधान तो अपने छोटे दोनों लड़को हो से है, यह पात शङ्कर नेपाही हैं। सन्म प्रमाणीकुरु यस धाक्य' चालुयलक्ष्मीश्विरमुखता । निर्मन्सराः शाणिभृतः स्तुवन्तु ममाला गुयपक्षपातम ३२५ ॥
- १८० महाचि पिल्हन। घेटा, इस कारण मेरी बात मान लो, वालुस्य यंश को लक्ष्मी को सदा के लिए उन्नत होने दो, पक्षपात रहित राजा हमारे विशुद्ध गुण पक्षपात की स्तुति करें। मुत्वेति वाक्य पितुरादरेण जगाद भूयो विहसन्कुमारः। महाग्यदोषेण दुरामहोप वावस्य मत्कीर्तिकलंक हेतुः ॥२६॥ पिता की बात सुनकर पुनः हंसता हुआ कुमार आदर से बोला, मेरे ही भाग्य दोष से पिता का आग्रह । है और यह माग्रह मेरी कीति का कलङ्क है। यदि पद स्तस्य नाराज्यदूताः कारुण्यशून्यः शशिशेखरी वा। हरेक तातो भविता कृतार्थस्तवार्यता कीर्तिविपर्पयो मे ॥२०॥ यदि मेरे बड़े भाई के ग्रह राज्य प्राप्ति के अनुकूल नहीं और यदि महादेव भी उनके अनुकूल नहीं है, तो इसीर पिता जो चाहते हैं वह हो जायगा, इसलिए मेरा यह कला मार दूर करें। मशक्तिरस्पास्ति न दिग्जयेषु यस्यानुन शिरसा पता: । स्थानस्य एवाहमुतकार्यकारी विभतु रक्षामणिना समस्यम् ॥२८॥ मेरे पड़े माई दिग्विजय नहीं कर सकते, यह यात नहीं है, क्योंकि उनको आशा का पालन करनेवाला में उनका गोर भा। फेवल राजधानी में बैठ कर ही पड़े अद्भुत कर सफते है, फेषल रक्षामणि के समान उनकी उपा चाहिए । स्मादिमिभित्रायोमिः या पिठौनुस्मुस । मारपम्पेष्टासरशीसा स पौवराज्यातिपणिपात्रम् Ru कार्य .
No text on this page.
(अग्नि निकालने के फाप्ठ) में बंधा हुआ युधिष्ठिर के शोधका
मैं राक्षस नहीं है और न भूत है किन्तु शत्रु के राषि
जल से मेरा समस्त शरीर लिप्त है, मैने समुद्र के समान
१८४
महनारायण
कि प्रोष से युद्ध में मैं सो फौरयों को मयश्य व्यथित कर
दुशासन के फल का रुधिर भयश्य पोऊँगा, अपनी गद
से दुर्योधन की गदा ज़मर तोड़गा, माप के राजा चाहे पैसी
पर सन्धि फरले।
यन्सत्पयतममीहमनमा पन्नेन मन्दीरत
यविस्म मपीडित शमता शान्ति कुलस्यग्टता
सधूतारणिभृत नृपसुताशाम्यराकर्षण:
मोधण्योतिरिद महनकरुवने यौधिष्ठिर जम्मते ।
सत्यग्रत के भङ्ग के भय से जो यलपूर्वक कम कर दि
गया था, शम प्रधान और कुल का मंगल चाहने वाले राज
ने जिसको भूल जाना भी चाहा था, यह जुए को मरन
प्रकाश द्रौपदो के केश और वस्त्र के आकर्षण से माग
कुरुवन में फैल रहा है। ( भीम की उक्ति)
नाह रक्षो नभूतो रिपुरुधिरजलाहादिताः प्रकामम्
निस्वीरूपविज्ञाजलनिधिगहन कोधन क्षत्रियोस्मि
मो मो राजन्यवीरा समरशिबिशिखादग्धशेषाः कृतव.
खासेनानेन लोनकरितुरगान्तहि तैरास्यते यत् ।
गहन प्रतिज्ञा का पालन किया है, मैं क्रोधो क्षवियो
रणाग्नि की ज्याला से जलने से बचे हुए चीर राजागणाम
प्यर्यही मरे हुए हाथी और घोड़ों की ओट में छिप रहे हो।
(भीम की उकि)
"
कविता-कौमुदो।
नायुधो यावदह तावदन्यैः कियायुधैः
यद्वान सिद्धमस्त्रेण मम तत्केन साप्यताम्,
जव तक मैंने अस्त्र धारण किया है तब तक दूसरे किसी
के अस्त्र से क्या, जो काम मेरे अस्त्र से सिद्ध न होगा, वह
कौन दूसरा सिद्ध कर सकता है । (कर्ण की उक्ति)
पदि समरमपास्य नास्ति मृत्योर्भपमिति युक्तमितोऽन्यतः मयातुम्
अथ मरणमवश्यमेव जन्तोः किमिति मुधा मलिन यशः कुरुवम्,
यदि रण से हट जाने पर मृत्यु का भय न रहे तब तो
रणस्थान से भाग जाना ठीक है, पर प्राणियों को तो अवश्य
मरना पड़ेगा, फिर भाग कर तुम लोग अपने यश को मलिन
क्यों करते हो। ( अश्वत्थामा की उकि)
युस्मान् ह पयति क्रोधालोके शत्रुकुलक्षयः
न लजयति दाराणां सभायां केशकर्षणम् ।
क्रोध से शत्रुओं के नाश करने में तुम लोगों को लजा
मालूम होती है । पर सभा में अपनी स्त्री के केशों के खीचें
जाने से तुम लोगों को लजा नहीं आती । ( भीम की उक्ति)
यो यः शस्त्र विभर्ति स्वभुजगुरुमदः पाण्डवीनां चमूनो
दो यः पाशालगोने शिशुराधिकवया गर्भशरणं गतो वा
यो यस्तकर्मसाक्षी चरति मयि रणे यश्चयश्च प्रतीप:
कोधान्धस्त तस्य स्वयमिह जगतामन्तकस्थान्तकोऽहम् ।
पापडचों की सेना में जो जो शस्त्र धारण करते हैं जिस
जिसको अपनी भुजाभी का गर्व हो, पाञ्चाल गोत्र में जो कोई
यालक जवान या गर्भ में हो जो उस कर्म के (द्रोणचार्य के
मारे जाने के ) साक्षी हो और युद्ध में जो मेरा सामना कर,
---
भट्टनारायण।
क्रोधान्ध होकर मैं उनका (फ्रोध से धास्यपूर्ति करना
भूल गये ) यमराज का भी यमराज (भश्वत्थामा
उक्ति)
लाक्षागृहानलविपाशसभाप्रवेशः प्राणेषु वित्तनिधयेषु च मः प्रात्य।
भाकृष्य पाण्डववधूपरिधानकेशान स्वस्था भवन्ति मयि जीपति धाता
लक्षागृह में आग लगाकर, भोजन में विष मिला कर में
सभा में ले जाकर प्राण और धन का जिन लोगों ने अपहर
किया, पाण्डयां की स्त्री का जिन लोगों ने पेश सावा.घे धृत
राष्ट्र के पुत्र मेरे जीते स्वस्थ होवे अर्थात् कभी नहीं, ये मरे।
(भीमसेन की उक्ति)
प्रहद पर मम गलु शिशोरेय कुरुभिः
न समायों तुर्न भवति किरीटी म प युवाम्
जरासन्धस्योरःरपलमिव विरूप'पुनरपि
कुधा सन्धि भीमा विधटयति पूर्व धरपत।
थाल्यावस्था से ही फौरयों के साथ मेरा पर पदाहु
और उस पर का कारण युधिष्ठिर अर्जुन पा तुम दोनों में।
फाई नहीं है, इस कारण जरासन्ध के उर:स्थल केरामा
जाडी दुई मन्धि को भीम प्राधायंफ तोड़ता है, मुम लोग
उसे जाडो (फांधी भीम फी उनि)
निर्वाणाना प्रशमान
नम्न पाएननया समाधवन
শাবিপ: ভিন্ন
सम्मा भगनुशराजमुना माया।
राओं कनारामगिंधा युभ. गावगी,माएर पार
साथ मनाया, रत.सं भागको मिल
कषिताकौमुदी।
करनेवाले क्षत शरीर कुरुराज के पुत्र अपने भृत्यों के साथ
स्वर्गस्थ हो (भीम की उक्ति )
निवार्य गुरुशापभाषितवशात् कि मै तवेवायुधाम्
सम्प्रत्येव भयावहाय समर प्राप्तोऽस्मि किन्वं यथा
जातोऽद्ध स्तुवित्र शकीत नविदां कि मारधीनो कुले
क्षुद्रारातिकृताप्रिय प्रतिकरोम्यस्त्रेण नास्त्रेण यत्
गुरु के शाप के कारण तुम्हारे ही समान क्या मेरे अरम
निर्याय हैं, भय से रण छोड़ कर तुम्हारे ही समान में भी
भाग आया है, स्तुति करने में निपुण सारथियों के घंश में मैं
भी जन्मा है एक क्षुद्र शत्रु के किये अनिष्ट का क्या मैं
ही अस्त्रों से नहीं, किन्तु आंसुओं से प्रतीकार कर रहा हूँ।
(अश्वत्थामा की उक्ति कर्ण के प्रति ।)
भप्रियाणि करोत्वेष घाचा शक्तीनकर्मणा।
इतभ्रातृशतेदुः"त्री प्रलापरस्य का व्यथा ॥
यह शब्दों के द्वारा अप्रिय करता है करने दो, क्या करे
विधारा कार्य से तो कुछ कर नहीं सकता, इसके सी भाई
मारे गये हैं, इसके यकने का दुःख क्या (अर्जुन की उक्ति)।
कर्ता च तच्छलानां जतुमयशरणोद्दीपनः सोऽभिमानी
राजा दुःशासनादेगुरनुजशवस्याङ्गराजस्य मित्रम्
कृष्णाकेशोसरोयध्यपनयनपटुः पाण्डवा यस्य दांसा.
कास्ते दुर्योधनोऽसौ कथयत न रुपा द्रष्टुमभ्यागतौ स्वः ।
यह अभिमानी राजा कहां है, जिसने कपट द्यूत किया
था, लाख के घर में आग लगवाया था, दुःशासन आदि सी
भाइयों का जो राजा था, कर्ण का जो मित्र था, द्रोपदी के
4.
भनागया।
पेश मोर पस्न गांचने में जो पड़ा निपुण था और पाइप
जिसके दास है, यह दुर्योधन फहीं है। मैं क्रोध में नहीं
पूछना, हम दोनों ( भीम और अर्जुन ) देखने के लिए आर्य
हैं।(मोम की उति)
यंन्यावासाहतानां रणशिरसि जना वन्दिमाईदेहभारान्
भन्मिन का दददा जलनमो बान्धग वायवेम्यः
मार्गस्ता मानिदेहान हननरगहने मण्डितान गृत्रा-
रस्त भास्थान प्रयातः महरिपुभिवं मंद्वियना वठानि ।
सगे सम्बन्धी रण में मरे हुओ का शरीर दाह
करें,
पान्धय अपने अपने पान्धयों को आंसू युक्त जल किसी
प्रफार दें, मरे हुए मनुष्यों के वन में अपने स्वजनों के शरीय
जो गृद्ध और फटो द्वार सण्डित किये गये हैं-१ दे, सूर्य
अस्त हुआ, अब अपनी अपनी सेना हटा लो (युधिष्ठिर
की युति)
चममुजमिठपद्धगदामिधात
संचूर्णितोरुयुगलस्य सुयोधनस्य
त्पानावनधनशोणितशोणपाणि
रुतसपिप्यति कांस्तव देवि मोमः।
फटकते हुए भुजाओं से धुमायी गयी प्रचण्ड गदा के
माघात से दुर्योधन का जजा में तोड़ दूंगा, उसके गाढ़े
रधिर से भीम तुम्हारे फेशों को सोरेगा। (भीमसेन को
प्रतिहा)
कविता कौमुदी ।
मह भल्लट।
यह बहुत प्राचीन कवि हैं “भल्लट शतक" नाम का एक
नन्थ इनका पाया जाता है, जो कि इनके स्फुट श्लोकों का
ग्रह है। जगद, कैयट, उवट मम्मट के समान भल्लट नाम
जो है । इस नामसाम्य के कारण इनका कश्मीरी होना
माना जाता है । यह कब उत्पन्न हुए थे इसका कुछ पता नहीं
बलता । ग्यारहवी सदी के मम्मट भट्ट ने अपने ग्रन्थ “काव्य
प्रकाश' में इनके कई श्लोक उद्धृत किये हैं। लेखशैली से यह
भातृहरि से पोछे के कषि मालूम होते हैं । शदालङ्कार पर
इनका अत्यधिक प्रेम है। जिससे पालिदास के पीछे के ये
कपि मालूम पड़ते हैं। इनके स्फुट श्लोक प्रायः अन्योक्ति
प्रधान हैं और वे बड़े ही मार्के के हैं, नीचे के पद्यों से यह
पात प्रमाणित होगी।
।
दानाधिना मधुकरा यदि कर्णतालद्रीकृताः करिवरेण मदान्धबुध्या
तस्यैव गमयुगमपानहानिरेगा भूताः पुनर्विकचपनवने वसन्ति ॥u
दान (प्रतिग्रह या मद) चाहनेवाले भ्रमरों को यदि गज-
राजने मदान्ध होने के कारण अपने कानों को फटफटा फर
दूर कर दिया तो इससे उसी गजराज के ही कोपोलों की
शोभा न होगी, इससे उसीकी हानि भी होगी, भ्रमर तो बिले
पामलों पर जाकर आश्रय ले ही लेंगे।
मातीशि धितयर पिपासितेयः संरक्ष्यतेम्बुधिरपेयतथैव दुरान् ।
दंष्ट्राकरालमगराष्टकरालिताभिः कि माययत्यपरमूर्मि परम्पराभिः ॥२॥
स्त्री बच्चे सभी इस बात को जानते हैं कि प्यासी
भय से समुद्र अपने जल को खारा यना लेता है और इस
प्रकार उसकी रक्षा करता है, फिर भी भयानक मकरों
कारण विकराल अपनी लहरियों में लोगों से क्यों भयमा
करता है।
भावनिमम टागटिलोसभित्तिरारोपितो मृगपतेः पार्टी सदिया।
मरोभकुम्भनदपाटनलम्पटस्य नाद करिष्यति क हरिणाधिपस्य ।।
यदि कुत्तं फे कन्धं पर सटा यना कर यह सिह
मासन पर बैठा दिया जाय तो यह मताले हाथियों के
मस्तक फाड़ने वाले गृगराज फा गर्जन फैमे फरेगा।
रगया दिशः प्रविनताः मलिल विपेण
पाशेमंही हुममुना
आलिता बनान्ता
याधाः पदाम्यनु मनि गृहीत चापा:
देशमाभपतु यूथपति मुगाणाम.nl
सप दिशामों में रस्मी फैल गयी है, जल में गिरा मित्रा
दिया गया है और पाश संयी पर दोगपी मोर
भाग मे जल रहा है पाप लेकर प्याप पीछा कर रहा है,
म समय मृगरात किम देश में जाकर गपनी रक्षा करें।
विशाल शाश्मानगुमर बीश गुर्म
गुडम्यापोटविरामपि भोग्य माराम
इतिपादीपा समशिनारियल
शिटीम: मारा गया Ielt
कविता-फौमुदी। सेमल के यई और मनोहर फल देखकर शुक ने समझा कि इसका फल भी अति ही सुन्दर होगा यही समझकर सने उस वृक्ष की सेवा की,भाग्य से फल भी हुआ पर पकने र उसमें से ई निकली और उसे भी वायु उड़ा ले गया। पथि निपतितां शून्ये दृष्टा निरावरणानः नपदधिधी गमद्ध समुद्धतकन्धर निज समुचितास्तास्ताश्वष्टाविकारशताकुलो। यदिन कुरुते काणः काकः कदा नु करिष्यति ॥८॥ शून्य मार्ग में खुले मुंहवाली दही की हड़ियां देखकर भी दि काना कौआ गर्व न करे, अभिमान से अपना शिर ऊंचा । फरे, मनोविकारों से व्याकुल होकर अपने अनुरूप चेष्टाए करे तो फिर यह कय करेगा। कि जातीऽसि चतुष्पये घनतरुच्छायोऽसि किं छायया । युक्तश्रेत् फलितोऽसि किंफलभरैराग्योऽपि किं सवतः ॥ हे सदवृक्ष सहस्त सप्रति सखे शाखाशिखाकर्षण- शोभामोटनमञ्जनानि भवतः स्वैरेव दुश्चेष्टितैः ॥ चौरास्ते पर क्यों हो, घनी छायावाले क्यों हो, छाया से युक्त हुए तो फलवाले क्यों हो, यदि फल से युक्त हुए तो नय क्यों गये, हे मित्र अच्छे वृक्ष, अपने ही कमी से अप डालियों का तोड़ा जाना, टहनियों का खींचा जाना सहो। प्रावायो मण्यो हरिजलचरो लक्ष्मी यो मानुपी, मुनौधरः सिकता प्रवरूतिकाः शैवाल मम्भः सुधा,
भवभूति ।
तीरे कन्य महोरहाः किमपरं नमापि रत्नाकरो
दूरे कर्णरसायन निकटस्तृप्यापिनो शाम्पति
जहां के पत्थरमणि हैं, जलचर विष्णु भगयान है, ल
जल फी स्त्री हैं, मोतियां याल हैं मृगों को लता शेवात
जल अमृत है, तीर पर कल्पवृक्ष है और क्या, नाम भी रख
कर है । भाई दूर से तो मगुद्र की सभी पाते कानों को ह
करती हैं, पर समीप जाने से तो प्यास भी दूर नहीं होती।
भैकन क्यणता सरोपपरुप यकृष्णपानने
दातु कर्णचपेट मुग्मितभिया हस्तः सुमुल्लासित
पघाघोमुखमक्षिणी पिदधता नागेन तर स्थित
सत्सर्वयिष मन्तिपो भगवतः कस्यापि लीलायितम्
क्रोध से फटोर योलता दुमा इस मंत्रफ ने रुम्जा
गाल में चपत लगाने के लिए निर्भयोफर जो 3
है और सांप ने नीचं मुंह फरफे जो अपनी भारों पर
है, यह सय विएफ मन्त्र जानाया किसी भगार
खेल है।
-
कविता-कौमुदो।
ज्ञाननिधि था। किसी किसी का कहना है कि भयभूति
कुमारिल भट्ट के शिष्य थे, पर इस उक्ति में कोई पुष्ट प्रमाण
नहीं है।
ये यशोवर्मा के आश्रय में रहते थे, काश्मीर के राजा
मुक्कापीड़न जर यशोवर्मा को परास्त किया, तय भवभूति
आदि कवि भी मुक्तापोड़ के यहां चले गये । राज तरङ्गिणी में
लिखा है-
कविवर्वापतिराजश्रीभवभूत्यादिसेवितः
जितो ययौ यशोवर्मा यत्पदस्तुतिवन्दिताम् ।
मुक्तापीड़ का समय सातवीं सदी का अन्तिम काल
माना जाता है, इससे भयभूति का भी समय अची सदी ही
मानना चाहिए।
आचार्य गोवर्धन ने भवभूति के संबन्ध में लिखा है-
भवभूतः संबन्धाधरभूरेव भारती भाति,
एततकृवकारण्ये किमन्यथा रोदिति प्राधा
ये करुणरस की कचित्ता बनाने में मिद्धहस्त समझ जाते
। इनकी करुणरस की कविता सुनकर पत्थर भी रो देता
था, यही यात आवार्य गोवर्धन ने भी लिखी है।
स्वयं भवभूति भी सय रस में करुणरस को ही मुख्य
समझते थे। ये समझते थे कि अन्य रस इसी करुणरस के
भेद हैं। भयभूति कहते हैं:-
एको रसः करुण एवं निमित्तभेदादु
भिन्नः पृथक् पृथगिव धयने विवान्
आवतंदु दतरह मयान विकारान्
अम्भो यथा सलिलमेव हि सत्पमस्नम् ।
-
थे
मरभूति । ( उत्तर राम चरित से) सवंण पानंम्ये कुनो हपयनीयता, यपाम्रो तया यार्घा माधुवं दुजंनो जनः । मिसफा व्ययहार सादा होता है उसकी शुद्धता समझी जाय, स्त्री और वाणी की शुद्धता के विषय में प्रा लांग सन्देद करते है। किमपि किमपि मन्द मन्दमामतियागा- दपिरलितपोल' जनतारकमेण, भशिथिलपरिरम्मम्यागृतककदोगा- रविदितगतयामा रात्रिरेय व्यरसीन । प्रेमवश हम दोनों का मुंह पास पास था और क्रम रहित धीरे धीरे हम लोग कुछ कुछ बोलते थे, दद आलिंगन में "एक एक हाथ व्यापून धे, इस प्रकार हम लोगों को मालून ही नहीं हुआ और रात ही बीत गयी । हे राम दक्षिण, मृतस्य शिशोदिंजस्य जीवातवे विमुत्र शूदमुनी कृपाणम्, रामस्य वाहुरोमि निर्भरंगभंखित- सीताविवासनपटौः करुणा कुतस्ते । रामचन्द्र शद मुनि का वध करने के समय अपने हाय कहते हैं - हे दक्षिण हस्त, मरे हुए ग्राह्मण पुत्र केजीने के बद्र मुनि पर तलवार चलाओ, तुम तो राम के हाथ हो, तुर -गर्भयती सीता का निर्वासन किया है, तुमको दया -आ सकती है। परिपाण्डुदुर्वलकपोलसुन्दर इधती क्लिोस्कररीकमाननम -~ कविता-कौमुदी। करणस्य मूर्तिस्या शरीरिणी, विरहस्यथैव वनमेति जानकी। जानकी के सुन्दर कपोल पीले और दुर्बल होगये हैं, फेश. पाश विखरे हुए हैं, यह करुणा की मूनि मालूम पड़ती हैं अथवा शरीरधारिणी चिरह व्यथा मालूम पड़ती हैं, वह जानकी वन में आरही हैं। गको रसः करण एव निमित्तभेदाद- भिः पृथक्पृथगिव अपने विधान, आवर्तबुवुदतरङ्गमयान् विकारान् भम्मो यथा मलिलमेत्रहि तत्समस्तम् । रस एक ही है आर यह करुणरस है, वही भेद के निमित्त । अनेक रूपों में प्रतीयमान होता है, जिस प्रकार जल एक ही है, पर रूप भेद के कारण घद्द आयत, धुवुद, तरङ्ग आदि नाम धारण करता है। मन्तानवाहिन्यपि मानुषाणां दुःखानि सेवन्धिवियोगमानि, दृष्टे जने प्रेयसि दुःपहानि स्रोत सहस्ररिव संप्लवन्ते ।। मनुष्यों के सततरूप से बहनेवाला भी सम्बन्धियों के वियोग से उत्पन्न दुःख, प्रिय के दर्शन से और बढ़ जाता है यह दुःसह हो जाता है, उसकी हजारों धाराएं रहने लगती हैं। पश्चात पुच्छ वदति विपुल तच धूनोत्यजत्र' दीधग्रीवः सभवति सुरास्तस्य चत्वार एवं शम्पायत्ति प्रकरति शकृत् पिण्डकानाग्रमात्रान् कि व्याख्यानै जति सपुनद्रमे इयेहि यामः । .
No text on this page.
No text on this page.
बनायाधि को बदनतिर पान्त चौकारग्न्यः
गृदयजा रहामृदा या शन्द मुन कर कार्तिके
में घुसने लगे, गणेश चिल्लाने लगे और अपनी पारने
गानी wimma Tगना भाना
पारनी की कमाई भीर रस का नारा
पाँगा पदमा किनुमा पानी मासों की मान
। मारनी माप में)
•मतिमरजानमार
पापाप्रापा कि शिशोभोगनमावि।
गणीनालीमागामुमतिरभरमा पारी.
महादेय साध्य नृत्य कर रद नदी बड़े भानन्द
मयूर भाया, उसफो दमकर सांप और ये गपेश को
कविता-कौमुदी ।
ओ, इससे उनके कपालस्थल पर बैठे हुए भौरे उड़ने लगे
र ये उड़कर दिशाओं में फैल गये, गणेश का यह चिल्लाना
र सूड़ का पटकना आप लोगों की रक्षा करे ।
व्यतिपजति पदार्थानान्तरः कोऽपि हेनु-
नं
विलु
बहिरूपाधीप्रीतयः संध्रयन्ते ।
विकमति हि पतङ्गस्योदये पुण्डरी
द्रवति च हिमरश्मावुदगते चन्द्रकान्तः ।
भीतर रहनेवाला कोई कारण विशेष ही प्रेम का कारण
, याहरी याते प्रीति के कारण नहीं हो सकती, सूर्यादय के
IT कमल विकसित होता है और चन्द्रमा को उदय होने के
समय चन्द्रकान्त मणि द्रवित होता है।
प्रेमादाः प्रणयाशा परिमयादुद्गादागोदया--
स्तास्ता मुग्धशोनिसर्गमधुराश्चेष्टा भवेयुमयि ।
यास्वान्तःकरणस्य पापकरणब्यापाररोधी क्षणा
दासाररिकल्पितास्वपि भवत्यानन्दसान्दो लयः॥
प्रेम में धाद प्रणय को ( श्रेप प्रेम को ) स्पर्श करनेवाली
पीर परिचय के कारण जिसमें गाद राग का उदय हुमा है,
रसी स्वभावसुन्दर उसकी चटाएँ यदि मेरे प्रति हो, जिनकी
सम्भावना पारने पर भी आनन्दमप विमोह उत्पन होजाता
है, और बाहरी इन्द्रियों का मान जाता रहता है।
ग्लानस्प जीवकुशुमार विकासनानि
संतपणानि सन्द्रियमोहनानि
भानन्दनानि ददर्यकरसायनानि
दिया माध्यधिगदानि वयोमृतानि ।
-
भर्तृहरि। मुरझाये जीरपुष्प को विकसित करनेवाले, सृत करने वाले और सव इन्द्रियों को मोहित करने वाले हृदय के प्रसिद्ध रसायन और आनन्द देनेवाले वचनामृत मैने भी सुनें, यह प्रसन्नता की बात है दलति हृदय गाढोडेग द्विधा तु न भिद्यते वहति विकलः कायो मोह न मुशति घेतनाम् । ज्वलयति तनमन्तदाहः करोति न भरमसा- प्रहरति विधिमर्मच्छेदी न कृन्तति जीविनम् ॥ हृदय विदीर्ण हुआ जाता है, उद्वेग बढ़ता जाता है पर वह दो टुकड़े नही होजाता। इन्द्रिय-हान सून्य यह शरीर मोह प्राप्त करता है, पर प्राण नहीं जाते, अन्तर्दा शरीर को तपा रहा है, पर जला नहीं देता। भनियतरुदितरिमत विराज- कतिपयकोमलदवकुमलामम् । पदनकमलक' शिशोरमरामि सपलदमम अम मुग्ध बलियत ते॥ जिसफे रोने हंसने का कोई ठिकाना ही नहीं था, फल, की फील के समान छोटे छोटे दांत थे, तुम्हारी यान्यारत्या के उस मुख फा मैं स्मरण करता है और स्पष्ट मुम्दारी मोदी भाली पोली को स्मरण करता है। भर्तृहरि। शतपत्रय यास्यपदी और महीफाय ये तीन प्रग मा हरि के माम से प्रमिदापर नसानों के का एकमा रिनहाँ। महरि मी तीन मीर उन लोगों में एक एक कविता-कौमुदी। अन्य बनाया है। शतकत्रय के कर्ता भर्तृहरि विक्रमादित्य के भाई थे। इनकी स्त्री का नाम पिंगला था। पिंगला के दुव्यंव- हारों से दुःखी होकर इन्होंने संसार का त्याग किया। इनका फाल सधी सदी के ५७ वर्ष पहले है । यास्यपदीप व्याकरण का एक बहुत प्रमाणिक और माननीय ग्रन्थ है । शतकत्रय में नीति शृङ्गार और पैराग्य का वर्णन है और भट्टीकाव्य में व्याकरण के प्रयोगों की प्रधानता रखकर रामचरित का वर्णन किया गया है। शतकत्रय के फर्ता राजा विक्रमादित्य के भाई हैं जो कि ईसवी सदी के पहले हुए थे, वास्यपदीप के कर्ता भर्तृहरि छठी सदी के अन्त और सातवीं सदी के प्रारम्भ हुए थे। भट्टीकाव्य के कर्ता भर्तृहरि नहीं किन्तु भट्टी है। उन्होंने स्वयं यह बात भट्टीकाव्य के अन्त में लिखी है। नीच शतकत्रय के कुछ श्लोक उद्धृत किये जाते हैं:- अज्ञः सुखमाराध्या सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः सज्ञानलय दुर्विदग्ध ब्रह्मापिचत नरं न रज्जयति । मूर्ख मनुष्य परिश्रम के बिना ही समझाया जा सकता है और जो विद्वान् है वह और भी बिना परिश्रम के सम- झाया जा सकता है, पर थोड़ा जाननेवाले मनुष्य को ब्रह्मा भी नहीं समझा सकते। ग्याल बालमृणालतन्तुभिरसा रोहुँ समुजृम्भते, छा, वजूमणीन् शिरोपकुसुमप्रान्तेन सनराते, माधय मधुविन्दुना रचयितु' क्षाराम्बुधेरोहत नेतु वाग्वाति यः खलान् पथि सतां सूक्तः सुधास्पन्दिभिः । यह मनुष्य हाथी को कोमलकमल के सूत्रों से बांधना चाहता है। शिरीप कुसुम के द्वारा हीरे को छेदना चाहता है और मधुविन्दु के द्वारा क्षार समुद्र के जल को मीठा बनाना .
मनहरि।
चाहता है जो दुनों को अमृतमयी याणी से सन्ननों में
पर ले जाना चाहता है।
माहिल्यमहोतकलाविहीनः
साक्षात्पमुः पुरविहीनः
जनतादपिजीयमान
स्त भागधेय परम पशनाम् ।
साहित्य सङ्गीत और कला से बिहीन मनुष्य पूछ सी
रहित साक्षात् पशु है, यह यिना घास खाये हो जाता है और
यह उसका बड़ा भारी भाग्य है।
अम्भोजिनीवननिवामविलासमेव
हैसस्य हन्ति नितरां कुपितो विधाता
नत्यत्य दुग्धजलभेदविधौ प्रसिद्धाम
वैदग्भ्य कीतिमपहनुमसौ समर्थः ।
यदि भाग्य हंस पर बहुत अप्रसन्न हो जाय तो उसका
कमल पन में रहना छुड़ा सकता है, पर दूध और ३
अलग करने की जो उसकी निपुणता को फीति है, उ
नहीं छीन सकता।
जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्धाः कधीश्वराः
नास्ति येषां यशाकाय जरामरण भयम् ।
च
पुण्यात्मा और रसों को वश में रखनेयाले की
विजयो होते हैं, जिनके यश के शरीर में जरा और मरण क
भय नहीं रहता।
राजन दुधुक्षसि यदि शितिधेनुमेना
तेनाय वन्समिव लोकममु पुपाण,
कविता-कौमुदी।
२०१.
तरिम सम्यगनिर्श परिपोष्यमाणे
नानाफलैः फलति कम्पलतेव भूमिः।
राजन्, यदि तुम इस पृथ्योरूपी गी को दूहना चाहते
हो तो बछड़ारूपी इस प्रजा का पालन करो, जय तुम प्रहा
का पालन करोगे तो यह भूमि कल्प वृक्ष के समान अनेक
प्रकार के फल देगी।
रत्नमहास्तुतुपुर्न देवा
न भेजिरे भीमविपेणमीतम्,
सुधा विना न श्ययुर्वि राम
ननिश्चितार्थादिरमन्ति धीराः।
देवता अमूल्य रत्नों को पाकर तृप्त न हुए भयङ्कर विष से
भी ये न डरे, जब तक अमृत न मिला तब तक उन लोगों ने
दम न लिया, समुद्र मथन करते ही रहे, धीर मनुष्य अपने
उद्देश्य को विना सिद्ध किये विश्राम नहीं लेते।
उरसि निपतितानां स्नस्तधमिलकानाम्
मुकुलितनयनानां किंचिदुम्मीलितानम्,
सुरतजनितखेदस्विनगण्डस्थलीना-
मघरमधु वधूनां भाग्यवन्तः पिवन्ति ।
जिनके विखरे हुप केश आकर छाती पर पड़े हैं, जिनकी
आलें थोड़ी थोड़ी खुली हैं और वन्द हैं, सुरत की थकावट
से जिनके कपोलों पर पसीना आगया है, ऐसी स्त्रियों का
अधरमधु भाग्यवान् पीते हैं।
मधुरय मधुरैरपि कोकिला-
कलकलमलयस्य च वायुभिः
अलग करने की जो उमी निपुणता को फीति है, उमेश
विजयां होने हैं, जिनके यश पं. शरीर मेंजरा और मता
और रमों का यश में बनयाले
A
भतृहरि।
चाहता है जो दुष्टों को अमृतमयी वाणी से सजनों के म
पर ले जाना चाहता है।
साहित्यमगीतकलाविहीनः
साक्षात्पशुः पुच्चविषाणहीन:
तृण न ग्वादसपिजीवमान
स्तद् भागधेयं परम पश्नाम् ।
साहित्य सङ्गीत और कला से बिहीन मनुष्य पूरा सा
रहित साक्षान् पशु है, यह विना घास पाय हो जाता है और
यह उसका पड़ा भारी भाग्य है।
अम्भोजिनीवननियामविलासमेर
इसस्य हन्ति नितरां कुपितो विधाता
नत्यस्य दुग्धजलभेदविधी प्रसिदाम्
वैदय कीतिमप ममी ममयः ।
यदि भाग्य हम पर यहुन अप्रसन्न हो जाय तो 10
यमल यन में रहना छुड़ा सकता है, पर दूध और जल।
नहीं छीन सकता।
जयन्निने मुनिनी रमशिनाः स्यीश्वराः
नास्ति ये शाकाय जरामरण भयम् ।
भय नहीं रहना।
राजन पनि परिशिनिमेशा
नाय शामिलोम्मगु माग
कविता-फौमुदी।
२०१
तस्मिन सम्यगनिर्श परिपोश्यमाणे
नानाफलैः फलति कपलतेव भूमिः।
राजन, यदि तुम इस पृथ्वीरूपी गौ को दूहना चाहते
हो तो बछडारूपो इस प्रजा का पालन करो, जब तुम प्रजा
का पालन करोगे तो यह भूमि कल्प वृक्ष के समान अनेक
प्रकार के फल देगी।
रत्नैर्महास्नुतुपुर्न देवा
न भेजिरे भीमविषेणभीतम्,
सुधा विना न प्रययुर्वि राम
ननिश्चितार्थादविरमन्ति धीराः ।
देवता अमूल्य रत्नों को पाकर तृप्त न हुए भयङ्कर विप से
भी ये न डरे, जय तक अमृत न मिला तब तक उन लोगों ने
दमन लिया, समुद्र मयन करते ही रहे, धीर मनुष्य गाने
उद्देश्य को बिना सिद्ध किये विश्राम नहीं लेते ।
उरसि निपतितानां स्नस्तधमिलकानाम्
मुकुलितनयनानां कि चिदुम्मीलिवानम्,
सुरतजनितखेदस्विन्नगण्डस्थलीना-
मधरमधु वधूनां माग्यवन्तः पिबन्ति ।
जिनके विखरे हुप केश आकर छाती पर पड़े हैं, जिनकी
आते थोड़ी थोड़ी खुली हैं और चन्द हैं, सुरत की थकावट
से जिनके कपोली पर पसीना आगया है, ऐसी
मधरमधु भाग्यवान् पीते हैं। ..
; मधरप' मावि
h-4
महरिश
विरहिणः प्रणिन्निशरीरिणो
विदिइन्त गुपापि विगयने ।
पद यसन्त ऋतु
फोफिल के
मधुर शब्द और मलयाचल
फे घायु से भी विरहियों को मार रहा है, दुःस की बात है कि
विपत्ति के समय अमृत मी विष बन जाता है।
सावदेय कृतिनामपि फुण्येर निर्मलविवेकदीपक:
यावदेव न कुरंगभुषो वास्यते घपललोचनाशलैः ।
पण्डितों के भी हृदय में तभी तक विवेक का नि
दीपक प्रकाश फगता है, जय तक ये मृगनेत्रों के चद
फटाक्षों से तड़ित नहीं होते।
मतेभकुम्मपरिणाहिनि कुइकुमा
कान्तापयोधरतो रसखेदसिन्नः
वक्षो निधाय मुजपञ्जरमध्यवर्ती
धन्यः क्ष क्षपयति क्षणलग्धनिद्रः।
जो मनुष्य थक फर मतवाले हाथी के मस्तक के समान
पड़े कान्ता के स्नानतट पर वक्षः स्थल रखकर भुज पंजर से
बंधा हुआ शीघ्रही सोकर रात यिता देता है, यह धन्य है।
यह यस्य गस्ति रुचिर' तस्मिस्तस्यास्पृहा मनोऽपि।
रमणीयेऽपि सुधांशी न मनः कामः सरोजिन्याः ॥
जो जिसफो सुन्दर नहीं मालूम होता वह उसको नहीं
बाहता है, चन्द्रमा सुन्दर है पर कमलिनी उसपर प्रीति नहीं
करती।
सत्खात निधिशया क्षितितल माता गिरेधातिवो
निरतीर्णः सरितां पति पतयो यत्नेन सन्तोपिताः
कविता-कोमुदो।
२०३
मन्नारापनतस्परेप मनपा मोठा श्मशाने निशा:
प्रातः कारागारकोऽपि म मया तृष्णेऽभुना मुममाम् ।
धन प्राप्ति को लालसा से पृथ्मो को सोदा, पर्यत की
धातुओं को का, समुद्र पार किया, पहें यदा से राजामा
फो सन्तुष्ट किया, मन्वाराधन करने के लिए श्मशान में रात
चितायो, पर एक फूटो फोहो भो न मिली, देहणे, भय तो
मुझे छोड़।
नपातं पदमीश्वरस्य विधिवसंसारविष्टितये,
स्वर्गद्वारकपाटपाटनपटुमेोऽपि मोपार्जितः
नारीपीनपयोधरोरयुगल स्वप्नेपि नालिङ्गित
मानुः देवसमेव योनिदरम्छेदे कटारा वयम्,
संसार के कारों को दूर करने के लिए ईश्वर के चरणों का
विधिवत् ध्यान नहीं किया, स्वर्ग के कपाट खोलने के लिए
धर्म भी उपाति नहीं किया, स्त्री का स्थान में भी थालिङ्गन
नहीं किया, हम लोग फेयल माता के यौवनछेदन करने के
लिए कुटार हैं।
अजान-माहात्म्य पतनु शलभस्तीबदहने,
समीनोऽप्यशानादिशयुतमश्नातु पिशिनम ,
विजानन्तोऽप्येते वयमिह विपजालजटिला-
नमुयामः कामानहह गहनो मोदमहिमा ।
पतंग विना जाने अनि में फूदता है, मछली भी अज्ञान
से ही धनसी का मांस खाती है, पर हम लोग जानबूझ कर
विपत्तियों के प्राफर विषय सुख को नहीं छोड़ते, यह मोह की
हो महिमा है।
.
.
व राजा पयमप्युपासितगुमशाभिमानोन्नता:
त्यातल्व विभवेशांसि करयो दिशु प्रतन्यन्ति ।
इत्य मानद नातिदरमुभयोरस्त्यावयौरन्तर
पस्मासु पराइ मुखोऽसि वयम कान्ततो नियम
नुम राजा हो, तो हम भी गुरु की उपासना से प्राप्त भाग
फारण उन्नत अत्माभिमान रखते हैं। तुम धन के द्वारा
सद्ध हो. और हमारा यश विद्वान् लोग दिशाओं में फैलाने
इस तरह हममें और तुममें कुछ पहुत भेद नहीं है, परशा
म हम से परामुग हो तो हम भी बिलकुल तुम्हारी मोर
लापरवाह हैं।
पपमिह परितु पाकल स्त्वं दुषलेः
समा परितोचो निर्विशेषगवशेष:
स भवतु दरिदो यस्य तृष्णा विशासा
मनसि पारितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिमः।
हम लोग यल्कल से सन्तुष्ट होते हैं और तुम्हारे लिए
कपड़े चाहिए, पर हमारे तुम्हारे मन्तोर में कई और मी
दरिद तो यह है जिसकी तृष्णा यही , जय मन सन्तुर
तो पनी कौन मोर दरिद फोन !
मारवि।
किराना गोर काय का महाकधि मागि
सही में अपनप थे। यह पात एक शिक्षा
विसोबएसमापित दोती है।
कविता-कीमुदो।
येनायोजिमवेश्म
पिरमरिधी विपिनाशिनरम,
मपिज़पता रविहीति।
कविताधितकालिदास भारविकीति।।
महाकयि दण्डी ने फिरातार्जुनीय फे १५ये सगं फेको
लोक अपने काव्यादर्श में उद्धृत किये हैं। किरातार्जुनीय
अतिरित और कोई अन्य इन्दोंने लिखा है कि नहीं, इसका .
ना नहीं मिलना।
इण्यास वपनोयगर्शन
नेश्वर परपना सखि माथी।
भानयैनमनुनीय कथं वा
विनिपाधि जनयन्ननुनेयः।
उसकी निन्दा चाहे जितनी फरो, पर स्वामी के विषय में
कठोरता भन्छी नहीं, किसी प्रकार अनुफल पनाकर लेमामो
तिकूलाचरण से अनुकूल न बनाना ।
द्वारि चतुरधिपाणि कपोलो
जोचित न्वयि कुतः करहोस्पाः।
कामिनामिति वचः पुनरक्त
प्रीतये नवनवत्वमियाय ॥
"द्वार की मोर सांखे हैं, हाथ पर कपोल है, और
जीयन तुमपर भयलस्थित है यह यारवार फलह क्यों करेगी।
कहा हुआ यह पचन कामियों की प्रसन्नता के लिए नयाही
मालूम पड़ता था।
प्रयच्छतोचःकुसुमानि मागिनी
विपक्षगोत्र दयितेन लम्मिता ।
4. Annanon- --more A. किरातार्जुमीय काव्य फे फर्ता महाकधि भारषि सारी सदी में उत्पन्न हुए थे। यह बात एक शिलालेखीये. २०४ व रामा यमप्युपासितगुमशामिमानोन्नताः गपातत्व विभयंशामि कवयो दिशु प्रतन्वन्ति नः इत्य मानद नातिदरमुभयोरम्त्यावयोरन्तर पद्यस्मासु पराङ मुखोऽसि वयम कान्तती निस्नाः तुम राजा हो, तो हम मी गुरु की उपासना से प्राप्त मात्र के कारण उन्नत अत्माभिमान रखते हैं। तुम धन केदार प्रसिद्ध हो, और हमारा यश विद्वान् लोग दिशाओं में फैलते हैं, इस तरह हममें और तुममें कुछ बहुत भेद नहीं है, पर जब तुम हम से पराङ्मुख हो तो हम भी बिलकुल तुम्हारो मोर से लापरवाह है। वपमिह परितुष्टा वस्कलस्त्वं दुकूलैः सम इह परितोरो निर्विशेषावशेष: स तु भवतु दरिद्रो यस्य तृष्णा विशाला मनप्ति परितुष्टे कोऽर्थवान को दरिद्रः। हम लोग घल्कल से सन्तुष्ट होते हैं और तुम्हारे लिए कपड़े चाहिए, पर हमारे तुम्हारे सन्तोष में कोई भेद नहीं, ददि तो यह है जिसकी तृष्णा बड़ी है, जब मन सन्तुष्ट तो धनी कौन और दरिद्र कौन ? भारवि। लिसेसोफखे प्रमाणित होती है।
कविता-कीमुहो।
येनायोजिम वेश्म
स्विमिश्धिी रिपेक्निागिनोरम,
मविजया रवित्रीति
करिताधिशामिदास भारधिकीतिर।
महाकयि दण्डी ने फिरातार्जुनीय फे १५ सग के मई
लोक अपने फाव्यादर्श में उदृत किये हैं। फिरातार्जुनीय
को अतिरिक्त भार कोई अन्य इन्दोंने लिखा है कि नहीं, इसका .
पता नहीं मिलना।
टप्यतो स बचनीयमशेने
नेवरे परपना सखि मायी।
मानयनमनुनीय कय वा
विप्रियाणि जनयन्ननुनेयः।
उसकी निन्दा चाहे जितनी फरो, पर स्यामी के विषय में
कटोरता अच्छी नहीं, फिसी प्रकार अनुकल पनाफर लेामो
प्रतिकूलाचरण से अनुशल न पनाना ।
दारिशुरधिपाणि कपोलो
जोषित स्वयि कुतः कलहोस्याः।
कामिनामिति : पुनरुत
प्रीतये नवनवत्पमियाय॥
"द्वार की भोर यांखे हैं, हाथ पर कपोल है, और
जीयन तुमपर भयलम्यित है यह यारयार फलह क्यों करेगी"
कहा हुआ यह पचन कामियों की प्रसन्नता के लिए नयादी
मालूम पड़ता था।
प्रयच्छतोःकुसुमानि मामिनी
विपक्षगोत्र दयितेन सम्मिता।
.
No text on this page.
फपिता-कोमुदी।
किसी स्त्री की ओष में पुष्पधूल पर गयो थो, मुह से
फेंक कर पति उसे निकाल रहा था, पर यह निकाल न सका,
अतपय उस स्त्री ने पति को स्तन से घमा मारा, उसके
स्तन कंचे और मटि।
.
प्रियकरमहिताम्युझपरण्या-
रपुरणमीलितलोधनपाप्यहो।
ददिकयाचिदमहप मनोभव.
ज्वलनतापरता जगृहेतराम् ।
पति अपने हाथों से जल के छोटे देरहा था और उन
छोटो से स्त्री की आप यन्द होजाती थी, पर इससे उसस्त्री के
हदय में सहन करने के अयोग्य फामाग्नि उत्पन्न होगपी ।
करी धुनाना सवपासवाकृती
पयस्यगाधे किल जातमभ्रमा।
सम्वीवनिर्वाग्यमधाप दूषित
प्रियाइसलपमयाप मानिनीn
अगाघ जल में कोई स्त्री घयड़ा गयी और यह नवपत्तर के
1 समान अपने हाथों को पाने लगी, तब उसे प्रियतम का
थालिङ्गन प्राप्त हुआ, यह सखियों से कहने योग्य भी न था
और धृष्टता से दूषित मी न था।
प्रियेय संमध्य विपक्षनिधा-
वुपाहिता पक्षसि पीवरस्तने ।
सजेन काचिद्विजही जकाविला
घसन्नि हि प्रेम्णि गुणा न वस्तुनि ।
--
करने के कारण उसके बाल बिस्तर जाने
भ्रमर,समूह से छिपे हुए कमल के समान उस समय सितं
भारवि।
२०८
।
सौत के सामने ही गूथ कर प्रिय ने उसके गले में माटः
पहना दी, यह माला जल के कारण खराव होगयो है, तो में
वह छोड़ती नहीं. गुप प्रेम में रहता है, किसी वस्तु में नहीं
तिरोहितान्तानि नितान्तमाकुलै-
रपां विगाहादलकै प्रमारिमः ।
पयुर्वधूनां वदनानि तुल्यता
द्विरेफ्वृन्दान्तरितः सरोव्हः॥
हैं और फैल जाते हैं, जिससे उसका मुख ढक जाता
के मुखामालूम पड़ते थे।
७
रम्यतामुपगते नयनाना
लोहितायति सहसमरीची।
भाससाद विरहय्य धरिसी,
चक्रवाकमिथुनान्यभितापः
सूर्य जय मांखों को प्रिय मालूम होनोलगा और
यह लाल हो गया, उस समय चक्रयाक फी दम्पती ने १
का त्याग किया और उसे ताप होने लगा।
ददये दयितेन हते वपुषि सवेप युनि पथि निरालोके ।
भपि कयय कयमन मियगृह ममि सारिको नयसि ।।
हदय प्रिय ने हर लिया, शरीर फांप रहा है, रा
अन्धकार है, कामदेय, अभिसारिका के पति के घर
कैसे ले जा रहे हो।
.
फयिता-कौमुदी।
दुर्दिननिशीथतिमिरे निधारा नगरपीपी।
पत्पी विदेशयाने पर सुप जपनपालायाः .
दुर्दिन को अन्धकारमयो अर्धरात्रि में, नगर के मार्गों के
एनसान होने पर और पति के विदेश जाने पर, जघन चपला
खिपों को बहुत पुरा होता है।
शस्तरेश्म या सदिशतीभि-
यांननेय रतये रमणीमिः।
मम्मधेन पग्लुिप्तमतीनां
प्रायशः स्पलितमप्युपकारि ।
प्रिय पो यारचार सन्देश भेजनयाली स्त्रियाँ रति के लिए
चलो हो गयी, काम फे यश होने के कारण उनकी युद्धि ए
हो गयी थी। देा जाता है कि कहीं कहीं विचलित होने
से भी उपफार ही होता है।
कामिनीवदननिजिसकान्तिः शोभि नशिशाक शशाङ्कः।
रजपेव विमल पुरान शीपूर्णघर ममम ।।
चन्द्रमा शोभित न हो सका, क्योंकि उसकी शोभा के
त्रियों के मुख ने जीत लिया था। इससे लजित होकर
सुन्दर शरीर प्राप्त करने के लिए यह मदिरा से भरे प्याले
हूब गया।
यदा विगृहाति तदा हत यश:
करोति मभीमथ दुषितागुणाः
स्थिति समीक्ष्योभयधा परीक्षक:
करोत्ययशोपहत पृथग्जनम् ।।
यदि उससे विरोध करें तो यश नष्ट होता है, यदि मित्रत
की जाय तो सब गुणों पर ही पानी फिरता है, इस प्रका
.
है
.
उठती है और पुनः दूसरी कोई अंगुली नहीं उठती, उसके
जलती हुई आग को कोई नहीं इता, पर मस्मराशी
भारथि
चारों ओर विचार कर युद्धिमान मनुष्य छोटे आदमियों का
तिरस्कारही करते हैं।
तावदाधीयते लक्ष्म्या तावदस्य स्थिर पशः।
पुरुषस्तावदेवासी यावन्मानान्न हीयते ।।
तभी तक इसके पास लक्ष्मी रहती है, तभी तक इस
यश स्थिर रहता है। और पुरप भी तभी तक है जबता
इसका मान बना हुआ है।
सपुमानर्थवजन्मा यस्य नाग्नि पुरः स्थिते।
नान्यामद गुलिमम्येति सख्यायामुद्यताइ गुलिः ॥
उसी मनुष्य का जन्म लेना सार्थक है, उत्तम मनुष्य
की गणना के समय जिसके नाम के लिए पहले अंगुतो
समान दूसरा नहीं है । अर्थात् न तो कोई उसके बराबर हो
और न उसके ऐसा ही है।
ज्वलित' न हिरण्यरेतस
चपमास्कन्दति भस्मना जनः ।
अभिभूतिभयादसूनतः
सुसमुन्ति म घाम मानिनः॥
सभी छते हैं। इसी कारण पराजय के डर से मानी मनु
सुख सं प्राणछोड़ते हैं, पर अपना तेज नहीं छोड़ते ।
सहसा विदधीत न किया-
मदियेका परमापदा पदम् ।
गृणुने हि विष्यकारिख
गुण्लुम्याः
स्वयमेव सम्पदः।।
पविना कौमुदी।
जल्दी में कोई काम न करना माहिए, पाकि अश्विक
सथ आपत्तियों का मूल है. गुणों
में अनुराग रानवाली
सम्पत्तियां विचारपूर्वक फम फरनेवालों को म्य'
चुनती हैं।
मांधा स्याइनमाधरणाप
कि करिष्यति नो यजयः
विद्यते नहि म भिषायः
पर्वलोकररितोपरी यः॥
सय प्रकार से अपना हित करना चाहिए, पहुन बोलने
पालों से कुछ भी नहीं होता, संसार में ऐसा फोई भी उपाय
नहीं है जिससे सय टोग प्रसस किये जा सफें।
मुनिरस्मि निरागसः कुतो में
भयमित्येव न भूनयेऽभिमानः।
परवृद्धिषु बदमत्सरार्ण
किमिव पस्ति दुरात्मनामसाधम् ॥
मैं मुनि ह', निरपराध है, मुझे क्या भय है, इस प्रकार
का अभिमान टीक नहीं, क्योंकि दूसरों के उदय से जलने
वाले दुरारमाओं के लिए कुछ असाध्य नहीं।
प्रान्ति.ते महधियः परामर्थ
भवन्ति मायाविपु ये न मायिनः
प्रविश्य हिन्ति शठास्तथा विधा.
नसताना निशिचा.इपधः।।
उन मनुष्यों का पराजय हो जाता है, जो छलकपट
करनेवालों के प्रति छलकपट नहीं करते । जिस प्रकार
.
---
मदाधि भास ।
--
"
खुले अंग के मनुष्यों के शरीर में धुम फर वाम उन्हें भार
देते हैं उसी प्रकार धूर्त मनुष्य भी।
जिनेन्द्रियय विनयस्य कारण
गुषप्रकों विनयादवाप्यते।
गुणाधिके पुसि जनोऽनुरज्यने
जनानुरागप्रमवा हि संपदः॥
जितेन्द्रिय होना विनय का पारण है, गुण से विनय गं
वृद्धि होती है, अधिक गुणवान् मे मनुष्य प्रेम करते हैं और
मनुष्यों के प्रेम से ही सय सम्पत्तियां प्राप्त होती है।
।
६
महाकवि भास।
ये संस्हत के बहुत बड़े कवि हैं। कहा जाता है कि इन्हीं
ने २२ नाटक बनाये थे। भास के बनाये नाटक अय तर
अनुपलब्ध थे, पर महामहोपाध्याय . गणपति शास्त्री की
रुपा से दायकोर संस्थत सोरीज़ में इनके फतिपय नादर
प्रकाशित हुए हैं । यह प्रसरता की यात है। इनके विषय में
एफ श्लोक है जिससे संस्थत साहित्य में इनका क्या स्थान है
इसका पता लगता है।
"मासो हासः कविकुलगुरुः कालिदासो विलासः"
भास फयि फपिता कामिनी के हास हैं। ये कवि कालि.
दास से भी प्राचीन है। फालिदास ने अपने मालविका
मित्र में लिखा है।
"प्रथितयशसमाससौमिविषादीनां प्रदायानवि.
हम्प वतमानको कालिदासस्य कुतो मान!"
फायना-फौमुदी। २१३ मास फे नाटकों में समगमादत्त पा ही प्रसिद्ध पटक है। इसके विषय में राजशेपर में सिमा है। मामनारायपि भिस परीधिनम्, स्वमपासबसस्य दाहकोऽभूध पारमः। महाकवि पापमह ने भी हपंचरित में भास फा उल्लेग कया है। - सलधारकनारम्भनरियं भूमिक सपताशो लेभे भायो देवचुलरिवः । इन बातों में चोर इनफे श्लोकों से इनके महामविहीने का परिचय मिलता है। दये मनोभव तरी यालायकुम्भमंगतरमनः । शिवलीतालयाला जाता रामविली पली फाम वृक्ष के जल जाने पर स्तनों में एक्रो हुए अमृत फे द्वारा वियली के आलवाल में रोमावली रूपी पाली उत्पन्न हुई ! या भुरा प्रियतमामुखमीक्षणीय प्रायः स्वभावलितो विक्टव येपः।। येनेदमोदशमदृश्यत मोक्षवम दोघीयुरस्त भगवान्स पिनाकपाणिः ॥२॥ शराय पीना चाहिए, स्त्री का मुंह देखना चाहिए, स्वभार सुन्दर और विफटरोप ग्रहण करना चाहिए, जिसने मोक्षका मार्ग ऐसा यतलाया है, यह पिनाकपाणि भगवान् शिव चिरजीवी हो। तीक्ष्ण रविस्तपति नीच इयाचिरान्यः जरास्त्यजति मित्रमिवाकृतज्ञः। .
ग.- २१५ महाकयि भाम तोय प्रसीदति गुनेरिव विनमतः कामी दरिद इस शोपमुपैति पा३" सूर्य तीपा तप रहा है, जैसे हाल का धन पाया हुआ साई नीच । मृग अपनी सींग छोड़ रहा है जैसे अलज मित्र। इन स्वच्छ हो रहा है जैसे मुनि का अन्तः करण और दरिद कामी फे समान पङ्क सूख रहा है। याला च सा विदितपयशरपडा, तन्वी च मा स्तनमरोरचिगनयष्टिः। लजां समुदहति सा सुरतावपाने हा कापि सा किमिव किं कथयामि तस्या वह याला है, पर कामदेव के प्रपञ्चों का उसे ज्ञान है, वह तन्वी है पर स्तनों को याद से उसका शरीर भी बढ़ गए सुरत के अन्त में यह लजित हो जाती है। यह सीन है फैसी है, यह बात मैं कैसे कहूं। काले मारः पयइति करोल्लेदि शशिन- तरुच्चिदमातान्टिसमिति बरी संकलयति । रत्तान्ते तत्पस्वान्दरति वनिताव्यशुकमिति प्रमामसरदो जादिदमहो विप्लवयति ॥५॥ चन्द्रमा को स्वच्छ किरणे कटोरे में पड़ी है, यिही उसे दुध समझ कर चाट रही है । वृक्षों के हित में पड़ो किरमों को फमल तन्तु समझ कर हाथी सोचता है, विडीने पर पर हुई किरणों को त्रियां पल समझती है इससे रतात में उसे खाँचती हैं। इस प्रकार प्रमा से मत्त होकर चन्द्रमा जगत को पागल पना रहा है।
AARI. ----- कविता-कौमुदी। कठिनहृदये मुन्ज क्रोधं सुखप्रविघातक लिखति दिवप्त यातं यातं यमः किल मानिनि । वयसि तहणे नैतद्युक्तं चले च समागमे भवति कलहो यावत्तावरं सुभगे रतम् ॥ ६॥ हे फठोर हृदयवाली क्रोध छोड़ दो, क्योंकि यह सुख का नाशक है, हे मानिनि, बीते दिनों की संख्या यमराज लिखा फरता है । नयी उमर में यह बात अच्छी नहीं, हाथ भी तो चञ्चल है इसका क्या ठिकाना । जिस समय तुम कलह कर रही हो उस समय में तुम्हें प्रेम करना चाहिए । कृतककृतकैर्मायासख्यै स्त्वयास्यतिवन्जिता निभृत निभृतः कार्यालापैर्मयाय्युपलक्षितम् । भवतु विदित नेष्टाह ते घृधा किमु खिद्यसे, यहमसहना त्वं निःस्नेहः समेन समं गतम् ॥७॥ बनावटी व्यापारों से तुमने हमको ठग लिया है, तुम्हारे छिपे हुए कार्यों से मुझे इस यात का ज्ञान हो गया है। अच्छा, मालूम हो गया, तुम्हें हम प्रिय नहीं है, व्यर्थ खेद क्यों करते हो, तुम स्नेह रहित हो और इममें सहन करने की शक्ति नहीं, चलो दोनों वरावर हुए। विरहिवनितावनौषम्य विभर्ति निशापति- गलितविभावस्याशेवाच दुयुतिर्मसणा रवेः अभिनववधूरोपहादुः करीपतनूनपा दसरलजनाश्लेषक रस्तुपारसमीरणः ॥ ८॥ विरहिणी स्त्री के मुख के समान चन्द्रमा हो गया है, नष्ट विभय की माता के समान सूर्य की द्युति चिकनी हो गयी है, । मेरे क्रोध के समय जो फोमल यात करती है, समय समझतो करती है, यह एकही खी भार्या, मन्त्री, सपा, नौकर अनंग महाकाय भास । नयी बहू के शोध के समान भूसी की भागमनोहर हो गयी दुष्ट पुरुषों के आलिङ्गन के समान ठण्डी हवा चल रही है। यदपि वियुधैः सिन्धोरन्तः कथाशिदुपार्जित तदपि सफल चार वीर्णा मुखर विलोक्यते । सुरसुमनसः श्वासामोदे शशीच कपोलयो- . स्मृतमधरे तियंग्भूने विष च विलोचने ॥९॥ देवताओं ने बड़े कठों से समुद्र में से जो वस्तु पायी है, चे सब सुन्दर स्त्रियों के मुख पर देखी जाती है । धासकी सुगन्धि में सुरसुमनस ( देवता या देवताओं का फूल दोनों गालों पर चन्द्रमा, ओष्ठ में अमृत और दो मामलों में विप है। दुःखाते मयि दुःखिता भवति या हार प्रहटा तथा । दोने देन्यमुपैति रोपपहपे पप्यं यचो मापते ॥ काल वेत्ति कथाः करोति निपुणा मत्स स्तबे रश्यति भार्या मन्सिवरः सखा परिजना सैका बहुत्य गता ।। ७॥ मेरे दुःखित होने पर जो दुःसित होती है और प्रसव होने पर प्रसन्न होती है, मेरी दीनता में जो दीन होजाती है, है, समझदारी की बात करती है और मेरे मित्रों पर अनुराग हो गयी है।
फपित्तागोमुहो।
भिक्षाटन।
यभिक्षाटन नामक एक सा काय फे फना है। इनका
दूसरा नाम शिम्भी है। इन्होंने आने कार में फालिदास
सौरयाण का उदरेर किया है । इनकी कविताए यी सास
। त्रिपुरदाद के याद शिव ने जो मिक्षा की है, उसी यथानक
को लेकर इन्होंने अपना भिक्षाटन कान्य यनाया है। भिक्षाटन
फाय के कर्ता होने के कारण ये भी उसी नाम से प्रसिर है।
गिज्ञानेन पुरहूराजनाना-
माकस्मिशेल्मयविधायिनि धन्दमौली।
तापामाहारमानसानां
नानाविधानि चरिवानि वयं पदामः॥
अमरावती नगरी में भिक्षाटन के लिए निकले,
उससे देवादनाएं आकस्मिक उत्सव करने लगी, अन पाण
से जर्जर उन ख्रियों के अनेक प्रकार के चरित मैं कहता है।
काचिसिवारितवदिगंमना जनम्या
इष्ट प्रियं भवनज्ञालयमामनगर।
तस्या विलोचनमदृश्यत दाशदत्त'
यात्रीपरुद्धशफरोपमित क्षणेन ।।
किसी की माता ने उसे बाहर जाने से रोक दिया, अत.
एव यह प्रिय को देखने के लिए घर की खिड़की पर चली
गयो, उस समय उसकी आखें पंशी में फसी हुई मछलो के
समान मालूम होतो थीं।
काचिग्निवारितवहिर्गमना जनन्या
द्रहर भवनजालकमा प्रसाद ॥
भिक्षाटन । तस्या विलोचनयुग धनजालयन्त्र- मखमीनमिथुनोपमित बभूव ।। फिसी खी को माता ने उसे बाहर जाने से रोक इसलिए यह महादेव को देखने के लिए घर की खिड़क गयो, उस समय उसकी आखें जालयद्ध दो मछलियों समान मालूम होती थीं। कृच्छंण कापि गुरुणैव जनेन रोध- मुल्लहप नायकसमीपभुवे प्रतस्थे । . हा इन्त शीघ्रगमनप्रतिरोधहेतु- स्तस्याः पुनः स्तनभरोपि गुरुवंभूव ।। कोई स्त्री बड़े फों से भीड़ को डॉक कर नायक के प पहुंचने के लिए प्रस्थित हुई, पर हाय, उसका स्तनमार उस शीघ्र गमन का वाधक हुआ, वह शीघ्र न चल सकी। प्राणेश विज्ञप्तिरिय मदीया तत्रैव नेया दिवसाः कियन्तः । संप्रत्ययोग्यस्थितिरेप देशः करा यदिन्दोरपि तापयन्ति ।। प्राणेश, मेरा यह निवेदन है अभी कुछ दिन आप य विता, क्योंकि इस समय यह देश रहने के योग्य नहीं क्योंकि यहां चन्द्रमा की किरण भी ताप देती हैं। अस्थानगामिभिरकरणरूपेता भूयः पदस्पलननिन्हुतिरप्रसा। वाणीव कापि कुम्वेगहस्पमान्त दाहिनता निजगृहादनिता माग्धा कविता-कोमुदी। जल्दी के कारण किसी स्त्री ने गहनों के पधास्थान नहीं ना था, यद अनुराग से अन्धी हो गयी थी, पद शीघ्रता. कि घर से निकली, उसके पर फिसल गये, यह उनको पाने लगी, रन कारणों से यह देखने में भी अच्छी नहीं लूम होती थी, कुफत्रि की पाणी पो समान पह लोगों की की पात्र हुई। खलेषु सत्सु नियांना अयमय गुणान् यमा तस्कामामे रखापविम्वना । खलों की वर्तमानता में हम लोग गुण अर्जन करने पले, हम लोगों का यह मयता चारों के गांव में रन खरी- का उपहासाद प्रयत के समान है। वन येवोमी सरदाशतशासया। भइ कुरोवस्करीभूतः पचाकुलोद्भवः । हा से ये दोनों अनेक प्रकार की सम्पत्तियों द्वारा है, फूड़े करफर से उत्पन्न अङ्कुर और दुष्कुल में उत्पन्न । . प्रश्यन्ति यानि विरद्धे विदलन्ति यानि योगे प्रियेण सखि कि वलयैः फूल से: मैवास्ति येविषदि संपदि धोपयोग- स्त: मंगम नबलु वाति कोपि मर्यः। जो घलय विरह की दशा में गिर जाते हैं और प्रिय से की दशा में टूट जाते हैं. हे सखि ! ऐसे इन कंकणों से लाम, जिसका सम्पति और विपत्ति में कोई उपयोग उसका साथ कोई मी मनुष्य नहीं चाहता।
No text on this page.
फरिता-कीमुद्रो । २२१ आदिःशामोशिस्वान्नैपनन्दनदुमकर्षणा। एकोदकनभोमार्गदिमादियमेश्वराः ॥ दिखायो पढ़नेवाली शाया और पलगों के द्वारा जिसके नन्दन वन के वृक्षों के फापित करने की पान मालूम पड़ती है, जिसके जलमे आकाश मार्ग के दब जाने के कारण दिशाओं का ज्ञान जाता रहा। भावनं गतंभ्रान्तविमानष्टव विप्लया। नीलजीमतशेवालकृतरेगाहरित्तटा जिसके आवत रूपी गढे में भ्रमण करनेवाले विमान डूबते उतराते हैं, नीले मेघम्पी शेगालों में जिसने अपने तटी को भूपित किया है। भवलेपभराकान्ता सुरलोकतर गिषी। पारात पार्वतीकान्तजटाकान्तारगहरे । गर्व के भार से युक्त देवलोक की वह नदी शिर की जा के गहर में गिरी है। दुःखे सुखे च रज एवं बभूव हेतु- स्नाग्विधे महति गीतमधर्मपरल्याः । यस्माद्गुगेन रजसा विकृति गतामा रामस्य पादरजमा प्रकृति प्रदे॥ गौतम की स्त्री अहल्या को बड़े दुःख और सुख का कारण रज ही हुआ। रजोगुण के द्वारा उसे पत्थर की योनि मिली और रामचन्द्र के चरणरज से पुनः उसे अपना स्वरूप मिला। भावालवृद्धमनुगच्छति रामभद्र- मेषा पुरी तदिह मा खलु निगुणा स्याम् ।
भोजदेव।
इत्यादरादिव धरा बहुधा विधाय
लिच्छन्दान्निजतनु तमनु प्रतस्थे ।
न्द्र के साथ वालक वृद्ध आदि सभी जारहे।
'तो मैं निर्गुण समझी जाऊंगो, यद समा
की भूमि ने आदर पूर्वक धूलि के व्याज से
अनेक बनाया और वह रामचन्द्र के साथ च
:पसुखविमुखेन स्वेन कान्तेन साठ
हितरि विधिराकान्फाननाय यजन्स्याम् ।
कुशलमिति मत्वा वनमन्दाय धायी
जनमुलामांशुभिः पहात् ।
राजसुख छोड़ दिया है, उसके साथ भाग्यफ
न को जारही है । इस समय यह मकुराल
पृथ्षों ने लोगों के मुंह पर फा आस् धूलि से
बानुमाररसनिग नपौरवर्गा
यानमालाचत्वरराजमाग।
कभोगभुमगन्वमिव क्षणेन
ची बभूव रघुपुगराजधानी
अनुमरण करने के प्रेम में पोर वर्ग राजधानी
। भय यहां पर द्वारसा भादि पर रही
हुए सर्प फे समान रघुष्ट पो राजधाना
गयी।
- पविता-कामुदी। २२३ "यह कैसे रह सकेगा, इस प्रकार सोच कर वन देय. ताओ ने रामचन्द्र को मासुमरी आँसो से देखा और राम. चन्द्र सूनी पर्णशाला को देखते रहे, उनकी चेतना लुम होगई और वे विलाप करने लगे (सीताहरण के समय की यह यात है) हा कष्टमा नहि सा कामद प्रवृत्त- मालोच्यामि धदुलामिह पादमुद्राम् । मां वीक्ष्य सूनमगृहीतमग' मुहूर्त- मन्तहिता तरूपु रोपवतीव सोता। हाय, यहां सीता नहीं है यह क्या हुआ, मैं यहां उबड- खाड़ पैर के चिन्ह देखता है, मैं मृग को विना लिये चला भाया यह देखकर क्यारह थोड़ी देर के लिए कोध से यहीं किसी वृक्ष की ओट में छिप तो नहीं गयी है। त्वभिलाषितपूया वशितः पळवद्या- मचरमचरमोद महिभाज्ञां जानाम् । तदिन सरलबुद्धे नैप रोपप काल: सुमुखि मम मुख कि साढतीतावियोगम् ॥ हे भोली, जानकी, तुम्हारे ही मनोरथ की पूर्ति के लिए ठगा जाकर अज्ञानी मनुष्यों का प्रगामी होकर मैं पञ्चवटी धूम आया । सुवर्ण मृग को ढूदना अज्ञानी का काम है.पर तुम्हारी इच्छापूर्ति के लिए मैंने यह भी किया। यह समय क्रोध करने का नहीं है, हे सुमुखि, क्या राम के मुख सीता का वियोग देखा है। यद्यप्ति कौतुकमपूर्वमृगे मृगाक्षि चान्द्र हरामि हरिण मम सन्निधेहि।
भोजदेव।
यावन्न मुञ्चसि मया हतमेणमेन'
तावद्वधातु तव पकतुलां मृगाः"
हे मृगाक्षि, यदि तुम अद्भुत मृग लेना चाहती हो तो
चन्द्रमा का हरिण मैं ले आता है, तुम मेरे पास आओ, मेरे
द्वारा लाये हुए इस मृग को जब तक तुम न छोड़ोगी सर
तक के लिए चन्द्रमा तुम्हारे मुख को समानता करे । अर्थात्
हरिण के निकलने से चन्द्रमा भी निष्फल हो जायगा।
सप्राया चेजनकतनया किन तिरेत मह'
हिस्र: सत्वैर्न सल निहता रक्तसिता न थी।
गोदावयां पुलिनविदति रामशून्या न कुर्या-
द्युक्त मक्क घरकवलनात्सस्थिता सर्वथा सा ।।
यदि जानकी जीती है तो मेरे सामने क्यों नही मातो,
हिंन जन्तुओं ने उसे मारा भी नहीं है, क्योंकि पृथ्वी
रुधिर सेरगी नहीं है. राम के विगा गोदावरी के तीर पर
यह ममने भी नहीं जानी । इससे राक्षसों में उसे भारत
लिया।
मोकान्तरणयिन धरमणन्तु-
माशतकालमनिलय यदि प्रयामि।
विज्ञाप्य मामपि समाद्य सावि सम्म
मौमितिरव भाने निदबानु राम्"
स्वगं गये हुए श्यनर को प्रणाम करने के लिए नगा
फे नियत समय को हॉफ कर यदि तुम जाती हो मा दंगा:
उनसे कहफर मुझको भी पुलामी, लामण दी गाला राय
सोपदेगे।
कविता-कौमुदी।
nan.
महक
ये कश्मीर निवासी थे। इनको लोग कापिकार मख
और पण्डित मखक भी फहते थे। इन्होंने धीकण्ठचरित
नाम का एक महाकाव्य और मखकोश नाम का एक कोश
बनाया है । डा. प्यूलर ने काश्मीर के कवियों संबन्धी अपने
रिपोर्ट में लिखा है कि महक का श्रीफण्ठचरित ११३५१० से
१९४५ ई. तक के बीच के समय में बना है। इनके विषय में
इससे अधिक भार पुन्छ मालूम नहीं।
इनके कुछ श्लोफ सुनिये-
भशातपाण्डित्परहस्यमुदा ये काव्यमार्ग दधतेऽभिमानम् ।
से गारुडीपानन घीय गन्यादालाहलावादनमारभन्ते 11
जिन्हें पाण्डित्य रहस्य का कुछ भी ज्ञान नहीं है, उन्हे
फाव्यमार्ग में अभिमान नहीं करना चाहिए । यदि कोई ऐसा
करे तो उसका करना गाद मन्त्रों को न जान कर विष
खाने के समान होगा।
सरस्वतीमातुरभूपिरन यः कविरायपारिस्परनस्तन --
कर सर्वाष्ट्रमनासमोष्टयो हिनादिन प्रीदिविशेषमरनु ।
जिसने सरस्वती माता के कपिरत और पाण्डित्यसपी
स्तनों का पाहुन दिनों तक पान नहीं किया है उसके समस्त
मा फैसे सुन्दर हो सकते भीर दिनोदिन उसको पुटिही से
दोसकती है।
तिी शिक्षा मास्त्रीशनरामदासः ।
क्षीरनीररिभादानी को बाधि३॥
PARA में पास करनेवाली सरस्वती के वाहन राजहंसों से शिक्षा पाये हुए के समान जो विवेफी क्षार नीर को विल- गाने में समर्थ है, वे ही कवि विजयी होते हैं। काव्यामृत दुर्जनराहुनीत प्राध्य भवेन्नो सुमनोजनस्य । सचकमव्याजविराजमानतक्ष्ण्यप्रकर्ष यदि नाम न स्यात् ॥धा दुर्जन राहु के द्वारा चुराया हुआ काव्यामृत की सजनी फेो प्राप्त न होता, यदि उसमें अधिक तीक्ष्णता न होती। विगमसाहित्यविदापरत्र गुणः कथंचिचथते कवीनाम् । भालम्यते तन्क्षणमम्मसीव विस्तारमन्यत्र न तैलविन्दुः ।। साहित्यशों को छोड़ कर कवियों के गुण अन्यत्र प्रसिद्ध नहीं होते। तत्क्षण जल में हो तैलविन्दु विस्तार पाता है। अन्यत्र नहीं। अत्यवकत्वमनर्यक' या शून्या तु सर्वान्यगुणैर्यनक्ति । अस्पृश्यतापितया तया कि तुच्छश्वपुच्छपण्टयेव वाचा ॥६॥ फविता की अनावश्यक अधिक कठिनता उसको अन्य 'सब गुणों से शून्य बतलाती है, जो छूने योग्य नहीं । जिसका रसास्वाद होना कठिन हो उस वचन से लाभ क्या? वह तो कुतं की पूछ के समान है। नीचस्तनोत्वभु नित्तान्तकापण्य पुष्णातु साधम्र्य भृदजनेन । विना नु जायेत कथं तदीय क्षोदेनसारस्वतद्रुक्प्रसादः ॥३॥ नीच अच गिरावें, यह अत्यन्त काला भी हो और अञ्जन के साथ समानता भी प्राप्त कर ले, पर बिना उसके रज के के) सारस्वत इष्टि की प्रसनता नहीं प्राप्त होतो।
ययिता कौमुदी। भोलि पेज परशुद्धिरणारित सापि मोरीतिरतिपदिसा घटना बुतस्तमा । साप्यरित पेषनागविप्नदेव स्य निा एपमदी गहन' कवित्यम् ॥ आहे तो पशुद्धि नहीं: पदि परशुद्धि तोगनि नदी है। यदि रीति मी मोशन्दों या विन्याम भजीय सरह था. यदि पद भी। ती नणं फल्गार नहीं है, रस के पिना पद पाटिन पधिनाफा माग व्यर्थ ही है। তা অমোবিল বাক- कविश्रानिधनुमायाः । कसम भाति गुण पदीये पिमरसर मर्शित पुरम्चिा पापीयरी की उतिको धनुष की एकता और भष्छी तद का दर पाचन प्रशमीप ही है। भान् अपियों की पपिताही कठिनता प्रशसनीय हो , याणि उराणे गुण (धनुर की रस्सी या गुण) कानों तक पहुंचने पर मत्सरी मनुप्पो ावित शीदी दूर जाता . मान समय में मान कारण मरवारी मनुने र सरकार मरी जाता। पारगरपातचिकिमये Tagो पुरानिये तान्दारे। घेदुरामारोतराममनोमmom हो सो सकी जिद पर माके सार आप मातार inा पाने बनाते थे, बारम माम २२८ AA- चले गये। इस समय तो ऐसे फवि उत्पन्न होते हैं जो प्रास और फठिन चित्र यमक श्लप आदि के फाट एक करते हैं। परलोकास्तोकाननुदिवसमभ्यस्य ननु ये। चतुष्पादी कुयुष इह ते सन्ति कायः ॥ भविच्छिनोदगछसलधिलहरीरीतिमुहदः । मुहपावैशघ दधति किल केयन गिरः | प्रतिदिन दूसरों के कुछ श्लोकों को कण्ठस्थ कर के चार पद के लोक यना देनेवाले फरियां की कमी नहीं ये यहुल हैं। समुद्र की लहरी के समान सतत निपलने पालो, हृदय को हरने वाली किसी किसी की फयिता होती दिमीर घही उज्यलता धारण करती है। वियोगिनी-मला। मालि कल्पय पुरस्करदी पदमालमिनि प्रथिनेन। मन्बनेन पिहित' मम मं पाण्डुरतमोगुष्ठरेन ॥ हे ससि, हमारे यागंदाय का दीफ ले मामी, सोयि चन्द्रमण्डल नाम में प्रसिद्ध पाले भग्यकार डारा मेरी मानक गयी है। कोटा निमिरमर माना पतिलाशा। पत्कारित विनुमति रिमांदशा दागिनोरियोगे | यद चन्द्रमा फलपं.च्या गं माघार धारण करता है, निसर्फ छ कम में भी निशानी दरपियो दशा में हम लोगों की योक जाती। वामित सिदनिकी र मुरामा जय शिहिदी मुलमुलमirism Awn कविता-कौमुदो । २२६ विप की लोग निन्दा करते हैं, पर विष पाने से ही शिव अजरामर होगये है। विरहिणियों के यमराज इस चन्द्रमा की लोग स्तुति करते हैं, इस न्याय के लिए क्या कहा जाय ? कालकूटमधुनापि निहन्तु हन्त नो वहसि लाच्छनमाम्य । यद्यादिव निगीणमयित्वामानु मुपति सुधाकर राहुः ॥१५॥ हे चन्द्रमा, हम लोगों को मारने के लिए तुम इस समय भी फटङ्क के व्याज में विप धारण करते हो उस विष के भय मे राहु तुमको निगल फर भी छोड़ देता है। श्वस्तय निशाकर नून कल्पितास्तरणकेतकखण्ट। येन पाण्डुरतरत्रु नयो नः कण्टकैरिव सुरलि शरीरम् ॥१६॥ हे निशाकर, तुम्हारी किरण प्रीद केनफ के टुकड़ों से मनायी गयी है, जिनकी यान्ति पीली है, पर फाटे फे समान हम लोगों के शरीर को पे छेदती हैं। भारदगद्विधुभाया नूनमौवंशिसिमास्तनपितः । पत्किलास्य घटते महि सृप्तिः सम्विाजनदूगम्दुसरिदिः ॥ पद पड्यानल का भग्निपिण्ट समुद्र से चन्द्रमा के हर में निफला है, पह सच पाता है। क्योंकि पण्डिता खियों की भोपों से निकली हुई नदियों से इसकी सृमि नहीं होती। रापिसमुहमारmar नाम मयूखान् । स्पर्शमाप्य सहर पदीय पदकाम्तहपदौरि गलानि ll देराधिराम, फोन कोमल शरोर का मनुष्य तुम्हारी किरणों को सहसाता है। जिन सोने से चन्द्रकान्त नामक पत्थरमो गल जाते हैं। --
युहमार पितोमम' रवि बारपासु।
संविभिराप हिमांशी मान्य कामपि रुने यदुपति !
एफान्त की पातचीत में मेरे पति मेरे मुख को कमल
फदा करते थे। उनका यह कहना टीकही है, क्योंकि वा
चन्द्रमा के प्रकाश से सम्पफ होने पर एक पिलसर पीड़ा
या अनुभर करता है।
पनाम करणां कुरु भयो विप्रदेण परिपूरय राहुम् ।
येन तजठरकोटाशाची जात्यविधुरया विधुनः॥२०॥
हेपानाम, पुनः माप दया फर, राहु का शरीर जोड़ई
जिससे चन्द्रमा राहु के पेट में चला जाय, और फिर हम
लोगों को यह कभी पीड़ा न दें।
मन्कार्यसि तव हन्त कान्स्या मागे पुरोऽभूत्प: समीः।
पगाहतेय लुलिवालकत्वं पर्यस्तवन्धः कबरीनिवेशः ॥२॥
मेरे कार्य की सिद्धि के लिए तुम्हे मार्ग में मयङ्कर म
का सामना करना पड़ा था यह मालुम होता है । क्य
तुम्हारे केश विखर गये हैं और चोटो भी खुल गयो
सापराधिनी सखी के प्रति उक्ति।
संरटश्य त दुरितक धन्यु सखि त्वया कि विहितोवर
भादणि मासाणि तपासते यत्स चयबिस्तिल ललाटम् ।
हे सखि, उस पापी फो छूकर क्या तुमने स्नान किर
है क्योंकि तुम्हारे शरीर भीगे हैं और माथे का चन्दन ।
नहीं है।
के रकमेपस्विदपादितीया तेनाधि सुन्दरि मायिताः ।
पशाम्पति म्याकुलितभयाण नानापि ते कम्पकलानुपयः ॥२५॥
vane कविता-कौमुदो। २३१ हे सुन्दरि, फिसी कारण विशेष से अथवा अकेली होने कारण तुम बहुत डरी हुई सी मालूम पड़ती हो । तुम्हारी खें घबड़ायी हुई सी हैं और तुम इस समय तक भी कांप ही हो। स एव कास्तूरिकपंकजम्मा दीपं ध्रुवं ते व्यधिताङ्गरागः। विभर्षि यत्सौरभसनिभूतदेशवणैर्भड गुरमहमदम् ॥२॥ उसो कस्तूरी के पन अङ्गराग ही ने तुम्हे यहुत कष्ट दया उसके सौरभ से भारे आ आकर तुम्हे काटते हैं, जिससे तुम्हारा अङ्ग अङ्ग छिद गया है। भखानखि प्रस्तुत भास्त तस्य केनापि साधं किमु संग्रहारः । पदारणार्थ सहसा विशन्ती व समतोन्लेख पयं गतासिा२५॥ क्या जब तुम गयो उस समय किसीसे वह युद्ध कर हा था ! नसों की लड़ाई यही हारही थी? जिसको छुड़ाने के लिए तुग पीच में गयो भोर तुम्हे नन लग गये ? मयूर मह संस्थत के प्रसिद्ध कवि राजा हर्षवर्धन के सम. कालोन भीर उनकी समा फे ये पण्डित थे। पाणमहने अपने पंचरित में उनके लिए लिया ई- सं विभुमहामो गदा भरपगोचरम्, Fomरिंदमापूरी माशीवार नियन्तति"
।
૨૩૨
मयूर महा
मयरमह फी फयिता जय फयियों के प्रयगोचर होती
उस समय उनका अभिमान चूर चूर हो जाता है। जि
प्रकार मयूर संबन्धी विष विद्या से सपों का अभिमान चून
हो जाता है।
जैनकयि मानतुगाचार्य ने अपने भक्तामरस्तोत्र में मयूर
फो घाणमट्ट का श्वसुर यतलाया है। इसीके संबन्ध में
एक किंवदन्ती भी प्रचलित है । वाणभट्ट और मयूर में यह
संयन्ध तो था ही, इनमें मंत्री भी थी । एक दिन वाणमट्ट की
स्त्री उनपर किसी कारण से नाराज़ थी । उसको मनाने के
लिए याणमट्ट प्रयत कर रहे थे, अन्त में हार कर वाण ने एक
लोक यना कर पदा, उस समय मयूर भी द्वार पर खड़े थे।
घाण ने श्लोक के तीन चरण तो बना लिये, पर चौया चरण
मयूर ने यना दिया। यह देख कर याग को खोलन्चित हुई
और उसने मयूर को कुष्ठ होने का शाप दिया।
वह लोक नीचे लिखा जाता है।
गतमाया रात्रिः कृशतनु शशी शीर्यत इब,
प्रदीपोऽय निद्रावशमुपगतो पूर्णत इव,
प्रणामान्त मानस्तदपि न जहासि धमहो,
हुच प्रत्यासत्या हृदयमपि ते चण्डि कठिनम् ।
उसी
करने के लिए सौ श्लोकों से मयूरभा
ने सूर्य की स्तुति की है, जो सूर्यशतक के नाम से प्रसिद्ध है।
ह आदरणीय ग्रन्थ समझा जाता है । इसके अतिरिक्त
नका और भी कोई ग्रन्थ है कि नहीं, इसका पता नहीं।
'कुष्ठ को
-
navrrr-n - फविता-कौमुदी। २३३ विजये कुशलत्यक्षोन क्रीडितुमहमनेन सहाशका। विजये कुशलोस्मि नतु भ्योऽक्षद्वयमिदे पाणी ॥ पार्वती फहती हैं-त्र्यक्ष (महादेव तीनआँखवाला) निपुण है, इसके साथ मैं खेल नहीं सकती। शिव ने उत्तर दिया- हे घिजये, मैं कुशल तो अवश्य है, पर व्यक्ष (तीन पास घाला) नहीं; क्योंकि मेरे हाथों में ये दाही अक्ष ( पासे ) हैं। कि मे दुरोदरेणयातु यदि गणपतिनं तेभिमतः । का प्रष्टिविनायकमहिलोकः किन जानासि ॥२॥ पार्यती-मुझे दुरादर (जुभा ) से क्या लाम ? शिय ने दुरोदर का अर्थ समझा युरा पेटयाला, इससे ये कहते हैं गणेश यहाँ से चले जाय, यदि ये मच्छे न हो। पार्यती ने कहा- विनायक (गणेश) मर फोन करता है। शिव ने विनायक का अर्थ समझा गण्ड़, और ये उत्तर देते हैं- विनायक से द्वप करने वाले प्लॉप हैं, क्या मालूम नहीं? पन्यप्रदणे बिना नास्मि रमे कि प्रवतंयस्येवम् । देग्यै यदि रचितमिद भन्दिनापतो राहुः ॥३॥ चन्द्रग्रहण के ( जय तक चन्द्रमा दांय पर नहीं लगाया जाय) विना मैं मरोलूगी, नुम पयों सङ्ग करते हो। शिने उसर दिया, यदि देवी को यही अच्छा मालूम होता है, तो नन्दी राहु को युलाभो। पार्यती मे चन्द्रमण फा भर्य चन्द्रमा का दांप पर लगाना समझा पामीर शिव ने इसका मर्यसमझा चन्द्रमहा। हरदो निहामिद भयहाति रतिः परयः । पदि ममि हर रिस्पेवपहारा: VR पाद पेसा २३४ मयूर भेटे। हा, राहु पास है, इसके दांत सफेद और भयानक है। इस पर कौन अनुराग करेगा? शिव ने उत्तर दिया, यदि तुम नहीं चाहती हो तो लो इसी समय में हाराहि (सर्पहार) छोड़ता है। भारोपयसि मुधा कि नाइमभिशा त्वदस्य । दिश्य यसहस्र स्थित्वैवं युक्तमभिधातुम् ॥५॥ पा.-मुझे अपने अङ्क में क्यों लेना चाहते हो, मैं इस अनभिज्ञ शि०-देवताओं के हज़ार पर्ष तक इस अङ्क में रहने के कहना अयश्य शोभा देता है। भनुदिनमम्पास से दीपि शक्यते विरः। मस्यासपसमागममुहूते विशोषि दुपिंपदः । प्रतिदिन अभ्यास फी हदना के कारण यहुत दिनों का भी विरह सहा जा सकता है। पर समागम के समीप मा जाने पर एक मुदत का भी विप्न असहनीय होता है। प्रामाणमंगतंन भवना चापसमापित देवाय येन येन सहा याममामादितम् । कोदन शरा: शोररिशिास्तेनापि भूमगार तेन ग्यं भवता र कासिमला कीयां चोकम् ॥ महाराज, भाप रणक्षेत्र में आये और मापन पर घढ़ाया, उस समय शानद शिम जिसको जी जी परण मिली सो मुनिए । घनुप फो याण मिलें, पागों को शत्रुमागिर शत्रु शिरों को भूमण्डल, भमण्डल को भाप मिसे, मारो कीति मिली और हानि पोनीनी लोग मिले। शायनाहिना भूिमोमो मानिरा. कापम्पमा म्याग्निचर।।
कविता-कौमुदी। तन्मय न वभूत नास्ति भविता तादान नौती नतो। कान्तौ काव्यरतौ नतो रिपुइती कीतौ च यस्तै समः ॥८॥ महाराज, सुनिए, देवलोक में, मर्त्यलोक में और नाग- लोक में कोई थे। कोई है और कोई रहेंगे । पर उनमें कोई भी पैसा नहीं हुआ,म है और न होगा, जो नीति में, नम्रता में, कान्ति में, फायप्रेम में, स्तुति में, शत्रु मारने में और कोति मैं तुम्हारी यराबरी कर सके। भूपालाः शशिभास्करान्वयभुवः के नाम नासादिता । भार पुनरेकमेव दि भुवस्त्वां देव मन्यामहे॥ येना परिमय कुन्तलमयाकृष्य म्युदस्थायत । घोल प्राप्य च मध्यदेशमधुना कारयांकरः पातितः ॥९॥ भूर्यवंश योर चन्द्रघंश के कितने राजा पृथ्वी के स्वामी नहीं हुए, पर हम तो तुम्ही को पृथिवी का एक स्वामी मानते हैं । जिसने अङ्ग ( इस नाम फा देश ) को मर्दन कर कुन्तल (इस नाम का देश अधवा चोटी ) को खीच कर चोल (इस नाम का देश अधया जनानी कुरती)को हटा कर, मध्य देश (देश पा कमर ) में पहुंच कर इस समय फाञ्ची (एक नगर अथवा करधनी ) में हाथ लगाया है। महाकवि माघ । महाकवि भाय ने शिशुपाल-बध नामका एक काश्य पनाया है। इनकी रचना यड़ी प्रौद है। एक प्राचीन श्लोक है, जिसमें माघ की कविता की प्रशंसा की गयी है।
गिएनपुररूपी राजहंस पड़े दुःख से चिल्लाने लोगो २३॥ महामति माय। गमावामिया मारणेलंगौराम् । गरपाnि मा मनियो गुणाः मायने माना परिचय इम:कार दिया माम फे राजा के प्रधान मापी गुमनर थे। सुः पास हुए मोर दमक के पुत्र माघ ने यह काम मांसपम्प में मोहन विषय में थोड़ा लिमा इन दानी भोर दानी होने के कारण दीदरिद्र होन लिपी है। माघ के दो तीन सोर इंजिनमें इन उल्लेप। भयो म सानिमच गुगलमा दुराशा, पागाव साकयति दुलंलिन मना मे। पाया पसापरकरी स्वयये चपा। प्रायाः स्वयं मजत किन्नु विलम्बिनेन। दुभक्षितम्यांकरण न मुग्यते, नपीयते कान्यरसः पिपातितः म विषया केनसियरत कुल, हिरण्यमेवाग्वंय निफलाः इन सोकों से माघ ने अपनी अवस्था दिखायी है. पिधा से ऊय गये थे। इनके कुछ मनोहर श्लोक मागे लिखे जाते हैं। मारीनितम्बफल प्रतिपमाना इसीव हेमरशना मथुर रात। त मोधनार्थमिव नूपुरराजहंसा अमन्दुरात्त मुखर धरणावलानाः ॥ ॥ नारी के नितम्य पर पंधी हुई सोने की करनी हसिनी के समान धीरे धीरे योल रही है। उसका यन्धन छुड़ाने के । पैरों पर भी पड़े।
MA कविता-कीमुदो। मुहुरुपहसितामिवालिनादेर्चितरसि नः कलिको किमर्थमेताम् । वसतिमभिगमेन धाग्नि तस्याः कलिरेच महासययाच दत्तः ॥२॥ कोई खण्डिता नायिका अपराधी पति को, जो उसे पुष्प देकर प्रसन्न करना चाहता है कहती है-इस कलिका का उपहास ये भ्रमर अपने शब्दों से कर रहे हैं। गैकि इसके द्वारा तुम मुझे उगना चाहते हो । मुझे यह कलिका क्यों देते हो, हे शट (छिप कर अपराध करने वाले ) तुम अपनी प्रिया के घर पर जाकर बहुत बड़ा कलि (फलह) दे चुके हो । अब दूसरी कलि (पुष्पकलो) को ज़रूरत क्या है ? भवचितकुसुमा विहाय वल्लोयुवती कोमलमालभारिणीषु । परमुपदधिरे कुलान्यलीनो न परिचयो मलिनात्मनो प्रधानम् ॥३॥ भ्रमरों के समूह में उन लताओं को छोड़ दिया, जिनके पुष्प त्रियों ने तोड़ लिये थे।चे फोमल माला धारण करने घाली युवतियों पर जाकर बैठे। जिनकी मारमा फाली है। ये फ्या परिचय की परवा करते हैं? विनयति मुहशो दशः पराग प्रणयिनि कौसुममाननानिलेन । सदारिचयुवतरमाणमा यमपि रोपराभिरापुरे nen एक स्त्री की शासों में फिसी फूल फी धूलि पड़ गयी थी। उसे उसका प्रियतम मुंह से पक कर निकाल रहा था। पद देख कर उसकी सोत की दोनों मासे शोध की गयो । संधीभ पयसि मुहुर्महेभस्मीभाना स्तनयुगलेननीयमाने । विरले युगमगमधार मानोरकर मुखावहः परेषाम् ॥ से भर
विप नपुररूपी राजहंस पड़े दुःख से चिल्लाने लगे और
२३६
महाकवि माया
पमा कामिधामण मारयेसंगौरवम् ।
दगिनः परसासिन्द माघ मन्नि प्रयो गुमाः।
माय ने अपना परिचय इस प्रकार दिया है-श्रीयम
नाम के राजा के प्रधान मन्त्री मुममदेव थे। सुप्रभदेव केश
पत्तफ हुए और दत्सक के पुत्र माघ ने यह फान्य यनाया।
भीमप्रयन्ध में भी इनके विषय में थोड़ा लिया है। जिससे
इनफे दानी और दानी होने के कारण ही दरिद्र होने की बात
लिपरी है। माघ फे दो तीन लोक है जिनमें इन बातों का
उल्लेख है।
भयो न सन्ति नय मुपति मां दुराशा,
भ्यागाध सा कति दुर्ललितं मनो मे।
यामा चलायव करी स्वयधे च पाप।
प्राणा: स्वयं प्रजत किन्नु विलम्बितेन।
धुमक्षितम्यांकरण न मुग्यते, नपीयते कायरसः पिपासितः ।
म विद्यया फेनचिदुदरत कुल, हिरण्यमेवारय निष्फलाः कलाः।
इन लोकों से माघ ने अपनी अवस्था दिखायी है, वे
विद्या से ऊप गये थे।
इनके कुछ मनोहर श्लोक भागे लिखे जाते हैं।
नारीनितम्बफलके प्रतिवध्यमाना
इसीव हेमरशना मधुर रास ॥
मोधनार्थमिव नूपुरराजहंसा
भन्दुरात्त मुखर धरणावलग्नाः ॥॥
नारी के नितम्य पर पंधी हुई सोने की करनी हरि
के समान धीरे धीरे बोल रही है। उसका पन्धन छुड़ाने
रों पर भी पड़े।
- कविता-कीमुदो। पहसितामिवालिनादेवितरसि नः कलिको किमर्थमेत्ताम् । नमभिगमेन धाम्नि तस्याः शठकलिरेष महांस्त्वयाच दसः ॥२॥ नई खण्डिता नायिका अपराधी पति को, जो उसे पुष्प प्रसन्न करना चाहता है फहती है-इस फलिका का ये भ्रमर अपने शब्दों से कर रहे हैं। क्योंकि इसके तुम मुझे टगना चाहते हो । मुझे यह फलिका क्यों देते शठ ( छिप कर अपराध करने वाले ) तुम अपनी प्रिया पर जाकर यहुत बड़ा कलि (फलह) दे चुके हो । अय कलि (पुष्पकलो) को ज़रूरत क्या है ? कुसुमा विहाय बलोयुक्तीयु कोमलमालमारिणी। दधिरे कुलाम्पलीनोम परिचयो मलिनात्मनो प्रधानम् ॥३॥ नरों के समूह ने उन लताओं को छोड़ दिया, जिनके नयों ने तोड़ लिये थे। ये फोमल माला धारण करने पतियों पर जाकर घंटे । जिनकी मारमा फाली है। ये रचय की परपा फरते ६। नति मुहशो दशः पराग प्रविनि कोमुममाननानिस्टेन। तयुक्तरमोश्यमाणापमपिरोपरजीभिरापुरे ॥४॥ खोकी भागों में पिसी फूल को धूलि पर गयी थी। का प्रियतम मुद मे फफ पर निकाला था। यह उसपी सोत की दोनों भारी कॉपी :--- -- महाकवि माघ । स्त्रियाँ जलमोड़ा कर रही हैं। गजराज के मस्तक के समान विशाल उनके स्तनों से जल हिल उठा और इससे चक्रवाक दम्पती का वियोग हो गया। उच्छुड्सल से क्या किसी को सुख हो सकता है? आनन्द ति मुखे करोदकेन श्यामाया दयिततमेन सिच्यमाने । ईत्या वदनमसितमप्यनल्यस्वेदाम्मास्नपितमवायतेतरस्म ॥१॥ प्रियतम नवयौवना के मुख पर अपनी अंजली से ज सींच रहा था और उस नवयौवना का मुस प्रसन्न हो रहा । क्योंकि प्रियतम उसका सम्मान कर रहा है। पर दूसरी मुख पर जल के छोटे नहीं पड़े, इमसे ईया के कारण उस मुंह पर इतना पसीना आया कि वह मांग गया। कान्तानां कुवलयमप्यपात्तमदणी शोभाभिन मुम्बरपाइमेकमेव । महादलिविस्तरितीय गायलोलोमीपति महोत्पल मन m जल में चचल लहरियों उठ रही हैं। उनमें फमल नाय रहा है। उसके नाचने का कारण यह है, यह ममताकि त्रियों के मुख को शोमा से मैं ही परास्त नहीं हुमा किन घाँखो की शोभा से अवलय भी ( रत. फमल ) परास्त हा है। इसी हर्ष के कारण यह भौरों फेशद मे गाता मा नाय रहा है। उसको एक नयासाथी मिल गया, सीमे यह भरान होगया। प्रविष्यतामुपगतंदि विधी विषयरवमैति परमानना। भवटम्पनाय दिनमामबानियतःकरगयनि- माम्य के प्रतिकुल होने पर प्रनक मापन भी पिani जाने है।जय यं गिरने ( मान होने ) मना है, नरस हाय मी उसको सदायना नहीं पर मले।
ALA कविता-कौमुदी। मनुरागवन्तमपि लोचनयादधत वपुः सुसमतापकरम् । निरकासपद्रविमपेतवसुवियदालयादपरदिग्गणिका ॥ ९ ॥ अनुरागो है, माखो को सुख देनेवाला उसका शरीर भी अर्थात् सुन्दर भी है। पर उसके पास वसु धिन या किरण) ही है,अतएव पश्चिम दिशा रूपिणो वेश्याने सूर्य को साफाश पी घर से निकाल दिया। हचिधाम्नि मर्तरि भृश विमला: परलोकमभ्युपगते विविशुः । मलन विषा कथमिवेतल्या मुलभान्यजन्मनि स एवं पतिः ॥1॥ तेजानिधि पति के परलोक जाने पर अस्त होने पर या मरने पर-कान्ति भग्नि में प्रविर हुई। यदि यह ऐसा न करती तो दूसरे जन्म में यही पति उसफो. कैसे मिलता। भरिमारयतारमरहिम तिविसमस्तमितभानुनमः । विरतोस्तापमतमिसमभादपदोपद विगुणस्य गुणः ॥1॥ तारामी का उदय नहीं हुआ है, चन्द्रमा भी दिखाया महीं पड़ता, सूर्य अस्त हो चुका है, ताप शान्त हो चुका है भीर धकार नहीं है, ऐसा भाकारा शोभितहो रहा है क्योफि गुणहीन के लिए दोपों फा न रहना ही गुण समझा जाता है। परोऽपि भारकरस्यादिः सती हमाभिरधिगम्प सवाम। तिमाही मागदो सपष, भयन्ति महिनाधपःn आ प्रदगण दिन में एवं प्रकाश में दिखायो नहीं पाते थे,दी माधकारमयी रानिपावर प्रकाशित होगमीच मलिना या माप पार चमकने हैं।
महाकवि माघ।
प्रथम कलामवदशमयो हिमदीयोठिमंहदितः ।
दनि ध्र कमन एव ननु चुतिशालिनौषि सहमाम्युद
चन्द्रमा पहले फलाम्गर था, पर यही उदित
महान हो गया। तेजस्वी भी धोरे धीरे भन्युश्य पात
भारदी नहीं, यह निश्चित है।
उदमनिटभजितः शयनाइयनिदादुरमरोजरुचा ।
प्रथमबुद्धनदराजमुनावदनेन्दुनेर नुहिन विना men
विकसित श्वेत कमल के समान चन्द्रमा विक
शयन से अर्थान् समुद्र से उदित हुआ। मानों विष
पहले जागो हुई लक्ष्मी का मुखचन्द्र ही उदित हुआ।
भय लक्ष्मणानुगत कान्तरपुजलाधि व्यवीय शशिक्षाशापिः।
परिवारितः परित ऋक्षवलैस्तिमिरोयराक्षसकुलविभिदे १५॥
उदित होने पर लक्ष्मण ( फल या लक्ष्मण ) जिस
पीछे चल रहा है, और अक्षी ( नक्षत्र या माद ) की सैना
जो घेरित है, यह चन्द्रमारूपी राम समुद्र लांघ कर अन्ध
फार रूपी राक्षसां का नाश करने लगा।
रगनोमवाप्य रुपमाप शशी सपदिमभूषपदसापि ताम् ।
भविलम्बितक्रममहो महतामितरतरोपकृतिमचरितम् ॥
रात्रि ने चन्द्रमा को कान्ति दिया और चन्द्रमा ने भी
उसी समय उस रात्रि को भूपित किया। पड़ों का यह परित
धन्य है, जिसमें शौच ही परस्पर उपकार करने की रीति है।
दिवस भृशोषणरविशदाता दतमिवानवालिस्त।
मुहुरामशम्मगधरोगहरे सदशिश्यसकुमुदिनीयनिताम् ॥
दिन में सूर्य ने चरणों ( किरणों से कुदिनी को मार
इस कारण सतत होगा।
कविता-कौमुदी। है, इस कारण चन्द्रमा अपने अप्रकर से ( हाथ से या किरणों से ) पोंछ रहा है और उसे आश्वासन दे रहा है। अम्बर विनयतः प्रियपाणेोषितश्च करयोः कलहस्य । वारणामिव विधातुमभीक्षण कश्यया च वलयैश्च शिशिजे॥ प्रिय का हाथ वस्त्र खींचता है, और स्त्री के दोनों हाथ उसे रोकते हैं इस प्रकार इन दोनों में कलह हो रहा है। इस कलह को मिटाने के लिए स्त्री की करधनी और कङ्कण थार यार बोल रहे हैं। उदयति विततोवरश्मिरजावदिमरुची हिमधाग्नि याति चास्तम्। वइति गिरिरय विलम्बिघण्टादयपरिवारितधारणेन्द्रलीलाम् ॥ १६॥ सूर्य का उदय होता है, और चन्द्रमा अस्त होता है, इस प्रकार. यह पर्वत हाथी के समान मालूम होता है जिसके दोनों ओर दो घंटा लटके रहते हैं। सपदि कुमुदिनीमिमीहत हा क्षपापि क्षयमगमदपेतास्तारकास्ताः समस्ताः इति दयितालसश्चिन्तयन्ननमिन्दु- वहति शमशेष भ्रष्टशोभ शुचेव ॥२०॥ कुमुदिनी मुकुलित होगयी, रात्रि का भी अन्त होगया और समस्त तारकाई नष्ट हो गयीं, इस कारण अपनी स्त्री से रात्रि से प्रेम रखनेवाला चन्द्रमा रश होगया है, वह शोक से शोभारहित अङ्ग धारण कर रहा है । नवनवपदम गोपयस्य केन स्थगयसिमुहुरोष्ठ पाणिना दन्तदष्टम् प्रतिदिशमपरस्सीसहर्शसीविसर्पन्नव परिमलगन्धःकेन शरयोपरीनुम् ॥२१॥ -
२४२
महाफगि माघ ।
नधीन नग का चित्र यन्त्र से घिरा रहे हो दोनों से
काटा गुमा मोड हायों में विशद पर दूसरी स्त्री के संग
फा सूचफ, पारी मार फलनवाले इस परिमल गाय के लिर
क्या फरोग ! सफा फैमे मियामोगे?
पामगर पालाशस्य मता हिलार
पर चकित पाद पौरपागिरदार।
विदितमितिमागीम्यो रात विचिन्त्य
व्यपगतमदपालिमोहित मुग्धाका २२॥
मैं उन्मत्तायस्था में उसके सामने बहुत थोलती रही क्या!
प्रोदा खियों के समान मैंने उसके सामने व्यवहार किया
पया? ससियों के द्वारा रात की यातं जानकर नशा उतरने
पर मुग्ध यधू को पड़ी लना मायी।
हस्ताकासाः भितवैशाखशैले
दधति पनि धीरानारवान्वारिणीय ।
शशि मय सुरोधाः सारमुदनु मेते
कलशिमुदाधिगुवी पालना लीडयन्ति ॥२३॥
शीघ्र हाय चलाने में निपुण इन अहीरों ने दही में मयानी
रूपी पर्यत डाला है। इससे उसमें से गम्भीर पनि निपल
रही है। जिस प्रकार जल को मथकर देवताओं ने उसका
सार चन्द्रमा निकाला था, उसी प्रकार ये भोसमुद्र के समान
कलश को मथ रहे हैं।
भनुनयमगृहीत्वा स्याजसुधा पराधी
स्तमय हकवाकोस्तारमाकण्यं कन्ये।
कतपिपरिवृत्ता निद्रयान्धा फिल श्री
मुकलितनयनवाझिायति शायनायम् ॥२४॥
कविता-फौमुदी।
२४३
उसको बहुत खुशामद की गयो, पर उसने कुछ भी न
दुना और करवट बदल कर सो गयी । परप्रातः काल मुर्गे की
-गि जब उसने सुनी, तय निद्रितरहकर ही जंभाई के यहाने
सने पुनः करवट बदली और आँखें बंद किये ही पति का
मालिंगन किया।
परिशिधिलितकर्णनीदमामीलिताक्ष:
क्षणमयमनुभूय स्वमसूलशुरेव ।
रिरसयिपति भूयः शष्पमने विकीर्ण
पटुतरचपलौष्ठमस्फुरन्पोथमश्वः ॥२५॥
कान और गर्दन सोधी करके आँखें बन्द करके ।
अश्व ने को ऊपर करके थोड़ी देर तक शयन किय
अब इसके घास खाने में निपुण ओठ चञ्चल हो रहे हैं, में
कड़क रहा है । यह आगे रखी घास को खाना चाहता है।
उदयमुदयदीप्तिर्यातियः संगती में
पतति न वरमिन्दुः सोपरामेप गत्वा ।
स्मितरुचिरिव सद्यः साम्यसूर्य प्रति
स्फुरति रुचिरमेषा पूर्वकाष्ठाङ्गनायाः ॥२॥
जो सूर्य मेरे साथ उदय होता है, वही अपरा (पश्चि
दिशा या दूसरी स्त्री) के यहां जाने से पतित ( अस्त :
पतित ) हो जाता है। यह समझकर पूर्व दिशारूपी ली।
प्रमा मुस्कुराहट के समान दिखायी पड़ती है।
दधदसकलमेक खण्डितामानमद्भिः
थियमपरमपूर्णामुच्छ्वसद्भिः पलाशैः।
कलरपमुपगीते पटपदोघेन धत्तः
कुमुद कमलखण्टे हुत्यरूपामवस्याम् ॥२॥
महाकधि माघ । एफ-कुमुदयन मुकुलित होनेवाले पत्तों से बाधा होगया है, अतएव नष्ट होनेवाली शोभा को यह धारण करता है।मोर दूसरा-कमल विकसित होनेयाले पत्तों से अपूर्ण अर्थात् प्रढ़ने वाली शोभा को धारण करता है। दोनों के पास मारे मधुर गम्भोर गान कर रहे हैं, इस प्रकार कुमुदयन और कमलवन दोनों समान अवस्था धारण करते हैं। বিথমঘশ্বশ্বমাঃ मुरभितमकरन्द मन्दमावाति यायु।। प्रमदमदनमाय चौवनोददामरामा। रमणरभसरदस्वेदविपक्षः ॥२६॥ विकसित कमल की गन्ध से भारी को अग्धा नाता हुमा, सुगन्धित पुष्परेणु को धारण करनेयाला पायु धीरे धीरे पहता है। यह हर्ष और मदन से उन्मत्त, योयन के फारण उच्छल त्रियों के रमण को धफायट से उपर पसीने को दूर करने में समर्थ है। नवकुमुदवशीहास लिसा- दधिकसविशेषामा सागरिया । भयमारदिशो मुमति पाता शिपिपरिव रानमारमानमिपुर ॥१४ ঘিজ মোৰী ঘ শামা মশন তুসী ও हास को कीड़ा में लगे रहने के कारण गधी रात रहा. अब पधिम दिशा के भर में सोने की कामे एप सपने को रहा है। उसके हाथ (किरण शिपिड हो गये.मयां यद मसदी रहा।
--- फयिता-कोमुदो। विगतनिमिरपा पश्यनियोग पाय ध्रुपति विरहमियः पनी पायर। रपपराममानादीगुरनुपा मारिदपरवान्तादागता पायी ॥३॥ यह चायाक जय मक माफाश को अधिकार हीन देशता है और जय सा. यह अपने पंवों को भाहता है, सभी तक नदी के उसपार से उत्सुकता से प्रेरित होकर बाकी चली आयी। तदविठयमवादीयम्ममत्व प्रियेति प्रियजनरिमनः यददुकल' दधानः । मदधिवमतिमागाः कामिनी मनधी. नजति हिसफ्टत्व पाठमालोक्नेन ॥३॥ तुम मेरी प्रिया हो, यह जो तुमने कहा है यह बिलकुल सच है। क्योंकि प्रियजन के द्वारा मोगा हुमा यख पहन कर तुम मेरे यहां याये । कामियों के पहार की शोमा पलमा फे देखने मे ही सफल होती है। कुमुदवनमपधि श्रीमदम्भोजप स्यजति भुदमुरकाप्रीतिमांश्रयाकः उदयतिरविरश्मियोति शीर्ताभुरस्त' हतविधिष्ठसिताना ही विधिो विपाकः ॥३२॥ कुमुदवन शोमाहीन हो गया और फमलयन ने शोभा धारण की। उलूफ को प्रसन्नता गयी और चफयाक प्रसन्न हुए। सूर्य उदित हो रहा है और चन्द्रमा यस्त, । दुर्भाग्य फा परिणाम अनेक प्रकार का होता है।
२५६ मुरारि मा जीन्यः पराममापदग्धोपि जीयति । सत्यानननिरवान्नु जननीशमारिणः ॥३३॥ जो दूसरां के द्वारा होनेवाले निरस्कार के दुःख फर भी जीत, येन जीये। उनका न जीना ही अच्छा है क्योंकि उनसे फेवल माता को कर ही होता है। सुभ्यपराधे रथमांनुमानुमन्त चिरेण यत् । हिमांशुमान प्रमने तन्यदिनः शुट फलम् ॥३॥ दोनों का अपराध यरायर है, पर सूर्य को देर से और चन्द्रमा को शीघ्र शोघ्र राहु प्रसता है। यह कोमलता कर पादाहत यदुत्थाय मूर्धानमधिरोहति । स्वस्थादेवापमानेपि देहिनस्तर रवः ॥३॥ पैर से आहत होने पर जो उठती है और शिरपर जाती है, यह धूल अपमान होने पर भी जो चुपचाप हैं उन मनुष्यों से अच्छी है। मुरारि। इन्होंने अनघराधब नाम का एक नाटक इनके पिता का नाम भट्ट श्रीवर्धमान था और तन्तुमति था। हरविजय प्रणेता रजाफर सेरे रताकर ने अपने हरविजय काव्य में इनफा स्म "महोत्थनाटक इवोत्तमनायकस्य - नाश कवियंधित यस्य मुरारिरित्यम् ।
- कविता-कौमुदी। अतएव ये रत्नाकर से प्राचीन हैं । मुरारि ने अपने विषय में इस प्रकार लिखा है- देवी पाचमुपासते हि वहवः सारं सु सारस्वत जानीते नितरामसौःगुरुकुलक्लिष्टो मुरारिः कविः । भब्धिलं हित एवं वानरभट। किम्त्वस्य गम्भीरता- मापातालनिमनपीवरतनुर्जानाति मन्याचला । सरस्वती की आराधना करनेवाले बहुत हैं, पर उसका सार गुरुकुल के फ्लेशों को सहनेवाले मुरारि कवि ही जानते हैं । यानर समुद्र लांघ गये, पर उसकी गहराई का पता मन्थाचल ही को है। इनके कुछ मनोहर लोक आगे लिखे जाते हैं- अभेदेनोपास्तेकुमुदमुदरे या स्थितवतो विपक्षादम्भोजादुपगतवतो धा मधुलिहः ॥ भपयांत कोपि स्वपरिपरिचर्यापरिचय- प्रवन्धः साधूनामयमनभिसंधानमधुरः ॥ १॥ कमल शत्रु के यहाँ से आया हुआ भ्रमर और अपने फोश में रहने वाला भ्रमर इन दोनों को एक प्रकार से देखता 'है । उसकी इनमें भेद-दष्टि नहीं है । यह अपना है यह दूसरा है, इस बात का विचार किये बिनाही सजन सव का समान रूप से सेवा-सत्कार करते हैं। भविनयभुवामा मानांशमाय भवरपि । प्रकृतिकुटिलाद्विधाभ्यास सत्ववृदये। फणि भयभृतामस्तुच्छेदशमस्तमसामसी। विषधरफवारलालोको भय तु भूशायते॥२॥ स्वभाव से कुटिल मनुष्य से विद्या के अध्ययन करने से यद्यपि अधिनयी अहानियों को कुछ शान्ति मिलती है, पर -
मुगरिं।
उससे उसकी खेलता की वृद्धि होती है। सर्प की फणा
रहने वाले मणि के प्रकाश से सौपसे डरने वालों के लि
अन्धकार का नाश अवश्य होता है, पर मय तो कम नह
होता, यह तो बढ़ता जाता है।
स्ववपुषि नखलक्ष्म स्वेन कृत्या भवत्या
कृतमिति चतुराणां दर्शयिष्ये सखीनाम्
इति रहसि मयाते मीपिताया स्मरामि
स्मरपरिमलमुद्रामा सर्वसहायाः ॥
स्थय अपने शरीर में अपने नषों का चिन्द पनाया और
यह तुमने ( स्त्री ने ) किया है, यह मैं चतुर सतियों को
दिखाऊंगा, यह कह कर मैंने तुमको डरयाया भोर तुमने
इसफे प्रकाशित होने के भय से सय सह लिया।
কানাঃ বাহুবালুভাকাঙ্কিনাে?
प्राषामारयन्ति किंचन रचो रामीयजीयातपः
एमाशमुविनानतुलमिद कि परशुम्विति
प्रात: प्रोपित रोचिरम्परतलास्ताचल पत्रमा! ||"
साराधों की प्रभा पके पलाण्डु के समान पीली होगी
है। कमलो को जीवित करनयालो मयि पूर्व दिशा में आग
हो रही है। मकड़ी के जाला के ममान यिम्यधारण करनेयान
पह चन्द्रमा प्रात:फाल यायाशरी अस्ताचल पर जारहा।
इसकी गामा हान हो गया है।
भोगीन्दः प्रमागरमुरगीसंगीतगोटीने
कोषिक शशीनु विनिती मी
मिरगुमामिमिती गीर्वाणकर्ण यो
दुम्यः श्रोयदि मामसिदिपायाशीन.
कगिता-मोगुदी।
देवभागामापी गहममा में भागदगदगद
पा र मुम्हारी पनि गुना क्योंकि उनके दोहार
AMIT गुण देवानामी थे.शारा गाधी पुन्हारी
irlनगगा।पनि.गावापान।
पतिमी सारा पाने पर उनमे सी एम को
.
ये पश्मीर के नियासी कयि धे। नफा पूरा नाम २५० महाकवि राजानक रत्नाकर। जा रहा हूँ यह इच्छा हृदय में उत्पन्न हो सकती है, स प्राणप्रिया के सामने निर्दय होकर यह कहा कैसे जा सकत है ? पर यह कहा गया । अविरत अश्रु प्रवाहयुक्त प्रिया मुख देख कर भी लोग विदेश चले जाते हैं। स्वल्पधन प्राप्ति की इच्छा तुम लोगों के हृदय में ऐसी मज़बूत है ? लिखति न गणयति रेखा निर्भरयाप्पाम्बुधौतगण्डतला। अवधिदिवसावसान माभूदिति शङ्किता वाला ॥३॥ आंसू से उसके दोनों गाल भीग गये हैं। यह अवधि दिन बीतने की शङ्का से न तो लिसती है और न भयधिक लिए लगायी रेसा को ही गिनती है। प्रियतमस्त्वमिमामनघाईसि प्रियतमा च भान्त मिहाति। महि विभाति निशारद्वितः शशी न परिभाति निशापि यिनेन्दुमा ।। हे निष्पाप, तुम इसके प्रियतम होने योग्य हो भोर या तुम्हारी प्रिया होने के योग्य है । रात्रि के पिता चन्द्रमा मई शोमता और चन्द्रमा के यिना रानि भी नहीं शामती। महाकवि राजानक रत्नाकर । राजानफरदायर यागीर है। परमार पं.रामायनिप के समय में ये हुए थे। यह यात रागरहिणी में मिली है। मुचाकणः शिवस्वामी विशामपाना स्याहारगान मानायगिरगंगा .
A.. कगिताकोमुदी। भनि पापा ममय मेनपमाना जाता परापर भी जमीसमय येथे, यह समझना माहिए। समाचार पतिाना मनमा गा धोरगांग. माम पान म मरे रिप में हिना- मानामागरमे। पापा THEm. पाहतार(REmभोरमी परराए। PiritrRIES.मराय मापापर पाप व riTari न दिना मोर Emain m. में पता। - rrrrrrrrfatarranand, infrarents arntune runninterior मरा Tawr और Plermittimareitem. mmeners writy ये कश्मीर के निवासी कवि थे। इनका पूरा नाम राजानकरताकर वागीश्वर है। कश्मीर के राजा अवन्ति वर्मा महाकवि राजानकरदार। जा रहा यदइया हदय में उत्पन्न हो सकती है, माणमिया के मामन निदय होकर यह फहा फैसे जा सर है । पर यह फाहा गया। अविरत मा प्रवाहयुक्त प्रिया मुन्न देश कर भी लोग विदेश चले जाते हैं। स्वल्पयन प्राप्ति की इच्या नुम लोगों के हदय में ऐसी मजबूत है ? लिपति म गणयति रेमा निमंयापारयुधौनगण्डतला। भवधिदियमायसान'मामदिति शहिता वाला ॥३॥ आंसू से उसके दोनों गाल भीग गये हैं। यह अवधि दिन पीतने की शङ्का से न तो लिसती है और न अवधिक लिए उगायी रेसा को ही गिनती है। निपतमस्त्वमिमामनघाईसि प्रियतमा घमान्त मिहाति महि विभाति निशारदितः शशीम य विभाति निशामि विन्दुना ॥१॥ हे निष्पाप, तुम इसके प्रियतम होने योग्य हो और यह मुम्हारो प्रिया होने के योग्य है । रात्रि के पिना चन्द्रमा नहीं शोभता और चन्द्रमा के बिना रात्रि भी नहीं शोमती । महाकवि राजानक रत्नाकर । के समय में ये हुए थे। यह बात राजतरङ्गिणी में लिखी है। मुक्ताकरणः शिवस्वामों कविरानन्दवर्द्धनः मयां रवाकरश्चगात् साम्राज्येऽवन्तिवर्मणः। . ।
अपिता-पोमुटी। ग. नागर गांव, जाने पर भीर पिन उदयादि जिगर परामधारण मायाग riter यार .. माप पं.लिए मार लिये हुए mपमान मारन पाता। SETTETamittiemE mfree famri rimar fear orry TrAER. एम. में nिar Introl inmमात्र stoar.nापी दिन और nfriniti.fmii Sering tamforture There Arransit inferitTMmarrfanitil.in memurrfor AREरामों ritumn in female Mornारिया infri grimarMFREE AIRTEपर। ruarragariks, .mnerate mmortrait." hir Irrrrrrrrr furnimari
२५२
महाफवि राजानक रताकर ।
दिन एफ कमल का फूल है। फैलने वाली स्त्र
उसफी केशर हैं। और सूर्यविम्व बड़ा सा फर्णि
दिशा अष्टदल हैं, सार्यकाल के प्रदोष के कारण
अंधकार भौरे हैं। यह कमल बन्द हुआ, 3
भस्तादिगोचार रुरुचे चिराय
गोरोचनारुचिमरीचि विरोचना
विम्य दिनान्तपवनाहतपुण्डरोक.
पर्यस्तपदमरजसेव विलापमानम् ॥
सूर्यविम्य की किरणं गोरोचना के सम
हैं। यह सूर्यविम्य अस्ताचल पर जाता हुआ
मालूम होता है। सार्यकाल के पवन के दा
फी विसरो हुई धूल मानो उसमें लिपट गर्य
सिन्धौ कुमुम्भकुमुमस्तयकामिता
मानिझकास्तितपनः प्रतिविम्बित
संपरपतिस्म निजमण्डलमस्तर
संघहमनरभकामनराही।
समुद्र में प्रतिविम्बित होने पर सूर
पुष्पों के गुच्छों के समान लाल और कु
अस्ताचल के शियरी के घजा लाने के
फेरप के पहिये टूट सो महीं गये,
फो समुद्र में देपता है।
प्रस्तावशिविशिवदयादिवनिमय
नहरवापणीनस्पतालपेर सम
कविता-कामुर्दी। यहखायड़ होगये थे और इसीसे कमलयन के गईन उठाने की यात समझी गयी। भाकृष्य मायमित्र पश्चिम दिग्विभाग, वद्धापदद्विरददीर्घकालेन, ताराग्युदवुदकरालनमस्लटार- रक्ताम्बुज सपन दिम्दमलम्बतारात् ॥ आकाश एफ तालाय है जिसमें तारायें घुयुद के समान हैं। और सूर्य फमल है । उस कमल फो मानों पश्चिम दिशा के हाथी ने अपनी सूड से पीय लिया है। अतएव सूर्यविम्य स समय पश्चिम को ओर दिखायी देता है। पर्यस्तमस्तगिरि सानुनि सान्दसांध्य- रागाध्यठविसहरामरीचिविम्मम् । कदकोपित इरफुरितानलाधि- रूप्याक्षितारकतिरोहित भेदमासीत् ।। १२॥ अस्ताचल के शिखर पर सध्या के कारण सूर्य लाल सूर्य पा पिम्य फैल गया है । यह फामदेव पर कुपित महादेय के तृतीय नेत्र से निकले हुए अग्नि सुलिग के समान मालूम होता है। माविर्मदतिमिरसग्लनानुद्धि, संध्यांमुश्मरविराटलान्यासः । भाति स्म निःश्वसिगनशिखारकीर्ण- विस्तीशायरउविधि विम्बम् .. सूर्य फा पिम्प फैलनेवाले अंधकार से मिलने से और सार्यकाल के प्रधाश मिलने से थोड़ा काला लिये टाल- पर्ण का यदादी गुन्दर मालूम होता है । यह साप के पुरु- महाकधि राजानक दादियों को अंजली बनाकर घयराहट के साथ संध्या को प्रणाम किया। मध्यातपारणिपातटावलम्बि- विम्यकदेशालदःक्षणमस्तशैलः । वजयणाननगलनक्षतजोक्षितार्थ- विडिनविसयातर इवाबमासे १८॥ यज़ के आघात लगने के कारण मुख से यहनेवाले रुधि से जिसका आधा अङ्ग लाल होगया है और जिसके 4 शिथिल और विखरे हुए हैं, उस पक्षी के समान एक क्षण लिए अस्ताचल मालूम होने लगा।व्योंकि उसके एक माग लटकनेवाले मेघ का प्रान्त भाग संध्या के सूर्य की किर से लाल हो गया था। अभ्येयुपः परिपति समयक्रमेण, सायनभःसरमि वासापहनस्य । स्वस्तांशुपक्ष्मरविमण्डलबीजोपचक्र वभार परियूसर पोवरत्वम् ॥९॥ आकाशरूपी तालाय का दिन रूपी कमल सार्यकाल में पक गया और उस कमल का वीजरूरी रविमडल पीला और मोटा होगया। तुङ्गावकाश रचितस्थितिमातपस्य, शे समुत्सुकतयेव दिद्वक्षमाणाः । तत्कंधरा इव सरोजभुवोवभू- उसनकोरक करालित पुण्डरीका: ॥ ऊंचे स्थान में सूर्य की स्थिति देखने के लिए उत्सुक हो कमलवन ने मानो गर्दन उठायी है। क्योंकि उस स फमलयन में ढोंदियों ऊपर उठ गयी थी, जिससे फ कविता-कामुर्दी। २५५ ऊयड़खाबड़ होगये थे और इसीसे कमलवन के गर्दन उठाने फी यात समझी गयी। भाकृष्य माणमिव पश्चिम दिग्विभाग, बद्धास्पदद्विरददीर्घकरार्गलेन, साराच्छयुद्बुदकरालनमस्तटाक- रक्ताम्बुज तपन विम्बमलम्बतारात् ॥ आकाश एक तालाय है जिसमें तारायें धुवुद के समान हैं। और सूर्य कमल है । उस कमल को मानों पश्चिम दिशा के हाथी ने अपनी सूड से सींच लिया है। अतएव सूर्यविम्ब इस समय पश्चिम की ओर दिखायी देता है। पर्यस्तमस्तगिरि सानुनि सान्द्रसभ्य- रागारुणच्छविसइयमरीचिविम्यम् । कंदर्पकोपित हरस्फुरितानलार्चि- रूभ्याक्षितारकतिरोहित भेदमाप्तीन् ॥ २॥ अस्ताचल के शिखर पर सध्या के कारण खूब लाल सूर्य फा पिम्प फैल गया है । यह फामदेव पर फुपित महादेव के तृतीय नेत्र से निकले हए अग्नि स्फुलिंग के समान मालूम होता है। भाविभवत्तिमिरवलनानुविद्ध, संध्यांशुसरविपाटलगुष्णधानः । भाति स्म निःश्वसितधूनशिखाकीर्ण- विस्तीर्णशेएफपरवविवि दिम्बम् ॥३॥ सूर्य का विस्य फैलनेवाले अंधकार के मिलने से और सार्यकाल के प्रकाश के मिलने से थोड़ा फाला लिये लाल- पर्ण का यहा ही मुन्दर मालूम होता है । यह सांप के फुफु- महाकवि राजानक रताफर । कारों से कुछ मलिन हुए सर्प की मणि की शोभा इस समय धारण कर रहा है। मुक्ताम्परस्तिमिरतस्करलुप्यमामलक्ष्मीमलीमसरुचिः प्रस्टोपधातः । भहाय यासरद्वितस्फुटलोहितश्रीरुप्यारस्तगिरिकाननमम्यविक्षत सूर्य ने अम्पर ( आकाश या यत्र ) छोड़ दिया; अंधकार रूपी चोरों से लूटे जाने के कारण उसको शोभा मलिनो गयी है। उसपर प्रहार पड़े हैं, यह लाल हो गया है भोर याम रहित (पासर हित, यास-रहित ) यह सूर्य अस्ताचस घनों में चला गया। तेजःप्रकर्षपरिवानिपपेपिासमाराप्रदोरतमप्ताभियुभूपगाणम् । मम्भानिधीतपनमन्यपवद्विदनधीरेकारमता विभतामिदमेव पुनम पास सूर्य फा समस्त तेज नष्ट होगया। यह म'ध्या के माध फार से भूपित होरहा है यह दंग फर दिनधी रागन में गयी, क्योंकि एकात्मता - मोदराने पालों के लिए पी उचित है। धारामाग्मगधिशम्बमानविय कमेण निवितरित। उहामितत्सलिलामीमा मातरिमेयमार रो॥ अन्तरिक्ष से धीरे धीरे गिरता दुगा सूर्य का किया फे भासपास पहुंचा, नय पद फोमल होगया। मनी ऊपर उछलनेपाली समुद्र की किरणों पं गमग थे. कात उसका तंज कामट हुमा है। विधमानग्लिा शिपायात विन्दिमान विसति शिवम | हिसानिधी निकाम- समितिमन HAIMER कविता-कौमुदी। २५७ सायकाल होगया है सूर्य की किरणें एक एक गिर रही है, मानों सूर्य-विम्य से रुधिर की धारा बह रही है। यह सूर्य- विम्व मानो दिन का मस्तक है और हालरूपी खड्न से कट गया है, वह समुद्र में गिर गया। ते साधवो भुवनमण्डलमौलिभूना ये साधुता निरुपकारिषु दर्शयन्ति । भात्मप्रयोजनवशी कृतयिनदेहः पूर्वोपकारिषु खलोपि हि सानुकम्पः ॥१८॥ पृधिधी मण्डल में वे Jष्ठ साधु हैं जो निरुपकारियों पर भी अपनी साधुता दिखाते हैं। अपने स्वार्थ के लिए व्याकुल रहनेवाला खल भी अपने पूर्वोपकारी पर दया दिखाता है। हेतोः कुतोप्यसदृशाः सुजना गरीयः कार्य निसर्ग गुरुवः स्फुटमारभन्ते । बन्याय कि करुशतोपि न सिन्धुनाथ- मुदीचिमालमपिवद्गवानगस्त्यः ॥१९॥ स्थभाय से गुरु सुजनगण किसी कारण प्रश यड़ा ही फार्य प्रारम्भ करते हैं। अगस्त्य ने घड़ों से उठा कर तरंगों पाले समुद्र का पान किया था। पाति या गुणाम यान्ति गुणिनस्नप्रादरः स्यान्कुतः । कि कुर्याद्वहुशिक्षितोऽपि पुरुषः पापाणभूने जने । प्रेमारूदविलासिनीमदपशध्यात्तकण्ठस्वनः सीतारो हिमनोरोपि धिरे कि नाम कुर्याद्वगुणम् ॥२०॥ जहां गुणों की प्रसिद्धि ही नहीं होती, यहाँ गुणियों का भादर क्या होगा ? पत्थर के समान आदमियों में पहुत पढ़ा लिखा भी मनुष्य क्या कर सकता है ? प्रेमाकुल पिला. .
२५८ महाफवि राजाना सिनी के गला टेदा करने से निकला होता है। पर यह यहरों पर क्या प्रमा पदय शशिशेखरो हरो हरिरप्येप यदीरि- अमरा अपि यत्सुरा ममी तदिमास्तस्य Eि जो मस्तक पर चन्द्रमा धारण क ये लक्ष्मी के स्वामी विष्णु हैं और जो ये सय उस समुद्र की विभूति के विन्दु है भास्वा मापहरण जलधेर्जलेन दुरे दवाग्निपरिदी एतावदस्तु यदि वोयकणैनं जिह्वा दन्दलते द्विगुणता दवाग्नि से जिनका मन सन्तप्त हो गया घट यदि समुद्र के जल से दूर नहीं होती इतना ही होना चाहिए कि उसके जल से प्यास दूनी न यद जाय। मच्चानुवन्धरवसितालापप्रजागरोतकम्पविजृम्भणा- फलान्ययाप्सानि तया सुखार्थमात्माचत्वस्यपि म दूती फहती है, उसने सुस के लिए पाप फिया था, पर उसका फल उसे मूच्छा, श्यास, ग, फम्प और जम्भाई मिल रहा है। पदयरगतमादधाति कृष्णा दिशति नपश्चरकोपलरय निदान कमपि सदन सकोपि चन्द्रो वदनमयः प्रियमातनोति त- जो अधर के समीप माने " RROR Tr फायिता-फौमुदो। ranwrnama काधिनविरचिता जपने लक्ष्मी- छंन्धा स्थितिः स्तनवटेषु च रम्यहारे । नो भूषिता पयमितीव निम्बिनीना काश्य' निरर्गलमयायंत मध्यभागः ॥२५॥ करधनी के द्वारा जघनों की शोभा बढायो गयो, स्तनों पर उत्तम हार पहनाया गया। पर हम को कोई भूपण नहीं मिला, इसी दुःख से स्त्रियों का मध्यमाग दुर्वल हो गया। ध्यकोपकारममुना स्थगितासु दिक्षु प्रेयोगृह मुखमलक्षितमेव यामः। धम्मित वन्धरधिरैरभिसारिकाभिः प्रेम्णातमश्विरमितीव शिरीमिरूहे ॥२६॥ इसने दिशायों को छिपाकर सट उपकार किया है। अब हम लोग छिप कर अपने प्रिय फे घर जायगी। इसी कारण प्रेमपूर्वक अभिसारिकाओं ने गये हुए फेशों के कारण सुन्दर सिरी से अन्धकार को धारण किया है। भाषद्धपभमुकुलामलियाचितोसा- प्रत्सृज्य संप्रति गतः कथमशुमाली। अन्तर्विदमधुएकवितरितीव स्वमायतिस्म नलिनी निशि पद्धनिद्रा ॥२७॥ टौदीरूपी अंजली बांधकर हमने प्रार्थना की थी। इस समय छोड़कर चन्द्रमा कहाँ चले गये। रात को सोयी हुई । कमलिनी, कमलपुट में यन्द भ्रसर के शब्दों से यह स्वम देख रही है। -- है भी पीलिया क्योंकि उनके हृदय मपैठ कर पदमा महाकवि राजानक रत्नाकर । प्रस्ताद्विपाश्वं मुफ्त्रमुपि तिग्ममामि जानीत शीठकिरणोम्युदितो न वेति । घारा इवाय रजनीतिमिरपयुवा-- श्चेरुश्विर चरणभूमिपु चञ्चरीकाः ॥२८॥ सूर्य अस्ताचल के पास चले गये, देखो चन्द्रमा उरिक हुया कि नहीं, रात्रि के अन्धकार से यह याज्ञा पाकर का (दूत) के समान मारे घूम रहे हैं । निष्ठ्य नकवलकरालशिखाभिमुण्ड-- स्त्मवृत्तिमधिगम्य निननानाम् । स्नेहानुवन्धिमिरदीपि दिनावसाने संध्याकरिव सरागकरः प्रदीप ॥२९॥ जिन्होंने कजल का भयानक मस्तक हटा दिया है और तो घरों के गोद में वर्तमान हैं । ये स्नेह (प्रेम या तेल) मनुसरण करने वाले लालकर ( हाथ या किरण) के दांत देन के अन्त में प्रकाशित हुए, मानों ये सन्या के पुत्र हो। पीठस्तुपारकिरणो मधुनैद साघ-- मन्तःप्रविश्य चरकप्रतिविम्बवती। मानान्धकारमपि मानयतीजनस्य नून विभेद यदसौ प्रससाद सदपः १०॥ चपक में (मदय पीने के पात्र में) चन्द्रमा का प्रतिदिन पड़ा था, मालूम होता था फित्रियों ने शराय के साथ चलन पी अधिकार का नाश कर दिया और ये शौरत 1
पिता-पोमुसा
बदारिताशीपुमदेन न.
मानिम्मिन:।
मालीप्रनगनुहो
मनु' परिपम् ॥
पुरा. नशा पं. फारल पदपालने के लिए उत्साहित
दुपरभाषा पाहन पर पह समित होपार गुए रद गयो।
उसने थाना यापन समाग नहीं किया. समं पति का कुल
दल भोर पद गया।
.
राजशेखर
इन्होंने फारमंजरी, पाल रामायत, पिशाल ममिका
पीरपाल भारतमाम फे नाटक पनाये हैं। ये महाराष्ट्र देश
के निवासी थे। इन, पिता का नाम ठीय. ठीक मालम नहीं
होता। इन्होंने अपने को पप जगह दीदेफि लिया है एक
जगह दोहफि, सम्भवतः इनके पिता का नाम दुफिया
दुर्दकि दोगा। ये माम सुनने में ज़रा पिचित्र मादम पड़ते हैं।
इनकी माता का नाम शीलयती था। महाफपि भफालगलन
इनके पितामद थे। पायाएर फुल में ये उत्पन्न हुए थे।
पालरामायण की प्रस्तायना में स्वयं राजशेखर यदयात
कहते हैं-
समस्या पत्रारीद्वगुणगण हवाकाल जप्टकर
मुरानन्दः सोऽपि प्रयणपुरपेयेन पचमा
मचान्ये गण्यम्ने सरहकविराजमृतयो
महाभागस्तस्मिनयमजनि पापावरपुर।
-
।
মা
कुछ मांग राजशेगर फोर सम.
प्रज्यों में प्रापः शिकोही नमस्कार।
इन शेय दान की प्रसिदि लोगों में
रचित पस्तिलक गम्पू में राजयोगर के
के लिए प्रपा करने की पात लिमीस
पर दूसरदा।
भयन्तीमन्दरी नाम फी चनुमान कु-
इन्होंने म्याद किया था। ये कान्यकुम्ज के र
के गुर थे। यह यात विशालभंजिका में स्थ
लिपी
रपुकुलतिलको महेन्द्रपाला
सकसकलानिलयःस यस्य शिष्यः।
महीपाल का शिलालेख प्राप्त हुआ है, जो
संयत् का लिखा हुआ है। यह महिपाल मा
पुत्र था। इससे राजशेसर का समय नीं सदी
समझना चाहिए । दशरूपक, औचित्य विचार के
प्रन्यों में इनके श्लोक उद्धृत हुए हैं।
राजशेखर को कविता पड़ी ही मनोहर है। इनक
की प्रशंसा में शङ्करवर्मा ने एक श्लोक लिखा है,
लिखा जाता है-
पातु' प्रोरसायन स्वपितु' वाचः सतां सम्मता,
ग्युत्पत्ति परमामवाप्नुमवधि सम्धु रसस्रोतसः
भोक्तु स्वादुफलश जोविततरोयस्ति ते
तन
कविता-फौमुदी। २६३ इनके कुछ श्लोक सुनिये पर्ण नागरखण्डमा सुभग पूगीफलैलास्तथा । करस्य च तत्र कोऽपि चतुरस्ताम्बूलयोगक्रमः । देशः केरल एप केलिसदन देवस्य शृङ्गारिण- स्तद् दृष्ट्वा कुरु कोमलादि सफले दाधीयसी लोचने ॥१॥ हरा और अच्छा पान सुपारी और इलायची और इनमें कपूर फी सावधानी से योग यहाँ होता है। यह फेरल देश है, यह कामदेव का क्रीड़ास्थान है । हे कोमलाङ्गि, इसको देखकर अपनी आँखों को सफल करो। धाकसत्वाङ्गसमुद्भवरभिनयनित्यं रसोल्लासतो, यामागपःप्रणयन्ति यत्र मदनक्रीडामहानाटकम् । भयास्तव दीक्षणेन त इमे गोदावरी घोतसा सप्तानामपि वानिधिप्रणयिना द्वीपान्तराणि धिताः ॥२॥ पचन मानसिक भाव और शरीर के द्वारा उत्पन्न होने पाले अभिनयों से जहाँ स्त्रियां हर्षपूर्वक कामदेय का महा- माटक खेलती हैं, समुद्र में मिलनेवाली गोदावरी की साती धाराओं से द्वीप के समान यना हुआ यह देश है। कावेरी कवरीव भामिनि भुवो देश्या: पुरो दृश्यतां । नांगलताधितरुपदिशत्पारपचिपामिव । कर्णाटीजनमननेषु जयनैर्यस्याः पयः मावित' । पोत्या नाभिगुहाभिरात्तचिभिःप्राची दिर्श नीयते ॥३॥ हे देषि, कावेरी नदी पृथ्यी देवी के केशपाश के समान मालूम होती है। यह आगे देखो, लताधित सुपारी के वृक्षी के द्वारा यह आलिङ्गन विद्या का उपदेश दे रही है । कर्णाट की खियाँ के स्नान के समय उनके जयनों से उछाले जल को पीकर पूर्व दिशा की ओर जारही है।
राजशेखर। यत्क्षेम त्रिदिवाय वम निगमस्या च यत्मतम' स्वादिएश यदेशवादपि रसायनश्च पदामयम् तद यस्मिन् मधुरप्रसादि रसवत् कान्तच काव्यामृत' सेोऽयसुन, पुरोविद विषयः पारस्वतीजन्मभूः। जो कल्याण है, जो स्वर्ग का मार्ग है, जो श उत्तम अङ्ग है, ईक्ष रस से भी जो स्वादिष्ट है जो य वन्द्र है वह मधुर प्रसन्नयरनेशाला सरस और काव्यामृत जिसमें है यह यह विदर्भ देश है । हे सुत्र विधाओं की जन्मभूमि है। पढयोनिः किल संस्कृतस्प सुहशा जिल्हासु यन्मोदते पर श्रोसपथावतारिणि कटुभापाक्षराणा रसः । गद पूर्णपदपद रतिपतेस्तत्माकृत पदच- स्नोब्लाटल्लिलितानि पश्य नुक्ती दृष्टेनि मेरमतम् । जो संस्थत भाषा का मूल कारण है, मिसे खिया पोला है, जिसके सुनलेने पर अन्य भाषा के अक्षर पटोर मादून पड़ते हैं, जिसफा मसमस्त पद गय कामदेय फा म्यान है. या मारत जिनकी योली है । हे ललितादि, उस लाट देशको रेखो, उसफे देखने के लिए आगों का निमेष प्रत भूल सेव प्र.पुरः करिदतनपागोवांगणियोःमगो, पामः कालियपनगरा यमुना गोपी बने, मन्दागमणीमिर्मा दुरिता वैम्पायानुन पस्या स्वर्गपरीभगक्षमरतापी सणा मोदी हे पत्र , यह गला की गयी कमिन्दतनया पगुनाग जहाँ पालिय मांग रहता है।गगुर्गवी फम्या । राज को डोटी यहिन को मगरकार पहिराकी गो कविता-कौमुदी। वहिन तापी है, जहां सुवर्ण की परीक्षा करने योग्य पत्थर होते हैं। यतायें न तथानुरज्यति कविप्रामीणगीगुम्फने । शास्त्रीयासु च लौकिकीषु च यथाभभ्यासु नव्योक्तिपु, पमालास्तव पश्चिमैन न इसे वामा गिरा भाजना- तद्रष्टेरतियो भवन्तु यमुनां त्रिस्रोतस चान्तरा ॥ आयें, जहां का कवि ग्रामीण कविता करना नहीं चाहता, किन्तु शास्त्रीय लौकिक सुन्दर और नयो उक्तियों में ही वह अनुराग प्रकाशित करता है, तुम्हारे पश्चिम के ओर वही यह पाञ्चाल देश है, जहां यक उक्ति का बड़ा आदर है, उस यमुना और गङ्गा के धीचवाले पाञ्चाल देश को देखो। यो मार्गः परिधानकर्मणि गिरी यः सूक्तिमुद्राक्रमो भनीयों कवरीचयेषु रचन' यदुभूपणालीपु च दुष्ट' सुन्दरि कान्यकुब्जललनालोकैरिहान्यच्च य- च्छिमन्ते सकलासु दिक्षु तरसा तत्कौतुकानि स्त्रियः ॥८॥ कान्यकुब्ज स्त्रियों के कपड़े पहने की जो रीति है, बोलने का जो ढंग है और देशाश बनाने की तथा गहने पहनने की जो विधि है उसको अन्य देश की स्त्रियां कौतुक पूर्वक सीखती हैं। इन्दोलंदम त्रिपुरजयिनः कण्टमूल मुरारे- स्त्वनागानां मदजलमपीभांजि गण्डस्थलानि, भद्याप्युबिलयतिलक, श्यामलिनानुलिप्सा- भ्याभान्त्येव पद धवलित कियशोभिस्त्वदीयः॥ चन्द्रमा का कलङ्क शिव का कण्ठमूल, श्रीकृष्ण और तुम्हारे हाथियों के कपोल स्थल जिनमें काला मदजल ,
लगा हुमा हे, हे पृष्पातलमूगा ये सब माज मी का
फिर भाप यश ने फिसको श्वेत यनाया।
यजिया भूः समातिर योजनशतम्,
मदा पाग्यः या गगनपरिमाण कथयति ।
इतिवापो मायाः स्फुरदयघिमुद्रामलिताः
सो प्रशोन्मेरः पुनरपममीमा विजयते ॥
पृप्यो समुद्र से घिरी हुई है और यह समुद्र सौ योजन
परिमाण फा है, याकाश में सदा परिन्नमण करने वाला यह
पथिक सूर्य आफाश का भी परिमाण बतलाता ही है, इस
प्रकार जितने पदार्थ है, उन सब को कोई न कोई अवधि है,
पर सजनों के पुद्धिविकास की सीमा नहीं, वह असीम है।
दानुर्वारिधरस्पमूर्धनि तद्विद्गार यशहारिवा,
पृक्षेभ्यः फलपुपदायिनि मघौ मत्तालिन्दस्तुतिः।
भोतमातरि वृत्तिदातरि गिरी पूजामरधामरैः
सत्कारोऽयमचेतनेष्वपि विधेः कि' दातृपु शातृषु ।।
देनेपाले मेघ के मस्तक पर सुवर्ण शृङ्गारित विद्युत
होती है, वृक्षों को फलपुष्प देनेवाले घसन्त के मतवाले
भौरों का समूह स्तुति करता है, डरे हुओं की रक्षा करनेवाला
और वृत्ति देने वाला पर्वत झरना रूपी चामरों से पूरि
होता है । अचेतनों में भी दाता का इस प्रकार का सम्म
देखा जाता है, फिर चेतन दाता के विषय को तो या
ही क्या।
दाहोम्भः प्रतिपयः प्रत्यवान् धापा प्रणालोचिता
श्वासाहितदोपदीपलतिकाः पाण्डिनि मम पपुर
--
कविता-कौमुदो। किचान्यत् कथयामि रात्रिमखिलावन्मार्गवातायने हस्तच्छसनिरुद्धचन्द्रमहसस्तस्याः स्थितिवर्तते । जल गर्म मालूम पड़ता है, भोजन पसर भर होगया है, आतूं चढ़ता जाता है, यह नालो में वहने के योग्य होगया है, श्वास उज्ज्वल दीप ज्वाला के समान अविराम निकल रहे हैं, समस्त शरीर पीला होगया है, और क्या कहूँ, समूची रात तुम्हारा मार्ग देखने के लिए वातायन पर बैठी रहती है और हाथ को छाता बनाकर अपने पर पड़नेवाली चन्द्रमा की फिरणों को रोकती है, पैसो दशा उसकी हो रही है (यह दूतो का नायक से कथन है) लीलाशुकः। इस कवि का कुछ परिचय नहीं मिलता। इनके विषय में केवल इतनाही कहा जा सकता है कि यह दक्षिणी थे, शिव- भक्त थे और श्रीकृष्ण में इनकी अटल भक्ति थी। यह कोई महाकवि नहीं थे; किन्तु पण्डितराज जगनाथ फुलशेखर और भल्लट आदि के समान मधुर भोर भावपूर्ण श्लोकों के निमार्ता थे। इनके श्लोकों का संग्रह "कृष्णकर्णा- मृत" नाम से प्रसिद्ध है। यह तीन शतकों में विभक्त है। इनके प्रबन्ध से कुछ चुने हुए लोक नीचे दिये जाते हैं। मुलापमाननयनाम्बुजविभो मुरलीनिनादमकरन्दनि रम् । मुकुरायमाणमृदु गइमाइस' मुन्नपंकज मनसि मे विजाभारम् ॥
लीलाशुकः । श्रीकृष्ण का मुखकमल मेरे मन में प्रकाशित हो, हि आँखरूपो दो कोढ़ियां लगी हैं, वंसी का निनाद जिर मकरन्द है, जिसका कोमल कपोलमण्डल दर्पण के सा चमकता है। मदशिखण्डिशिखण्डविभूपर्ण मदनमन्धरदिग्ध मुखाम्बुजम् । प्रजबघूनयनायलयाश्चित विजया मम घाट मयजीवितम् ॥२॥ मस्त मयूर के पूंछ को जिसने भूषण यनाया विलास के कारण जिसका मुखकमल सुन्दर होगया है. प्र फी स्त्रियों के कटाक्ष सेना ठगा गया है, उस मेरे माम जीवित की जय हो, अर्थात् उसकी जय हो जिसका मैं वर्णन फरना चाहता। पुनः प्रसन गुखेन्दुतेजपा पुरोऽयतीर्णस्य कृपामदायुः । तदेव लीलामुरतीरपामृत समाधिविनाय का नु मे भये फर यह एपासागर मेरे सामने उपस्थित होगा पहकर अपने असम मुषचन्द्र से मुरली यतायेगा और पद मुरली ध्वनि कय मेरी समाधि का विन होगी । मात हिरा लिए समाधि लगायी जाती है उसोपो मुरलो पनि गुनायी पड़े तो समाधि को सायश्यकता हो क्या यह कि समाधि की पूर्ति है। पराश्य दूरे परिवरमुनी प्रम- Trt पर शशिभुवनमनोहमी माम्। भनाएर वाचामविमुत्पानामविश सदरचे देव दाकिनी सोलरपि A कविता-कौमुदी। २६६ मुनियों की परिपन जिसका केवल विचार करती है, प्रज की स्त्रियाँ जिसको अपनी आंखों से घशमें करती हैं, जिसका शरीर त्रिभुवन में सुन्दर है, वचनों से जिसका वर्णन नहीं होता, उस देव को मैं कव देखूगा, जो थोड़ा विकसित नील- कमल के समान कान्तिवाला है। मुष्णानमेतत्पुनरुक्तशीभमुष्णेतरांशोरदय मुखेन । तृष्णाम्बुराशि शिगुणीकरोति कृष्णाद्वयं किंचन जीवितं मे ॥५॥ चन्द्रमा का उदय पुनरुक है; क्योंकि उसीके समान श्रीकृष्ण का मुष है, इस कारण चन्द्रोदय को अपने मुख की शोभा से अमर्थक बनानेवाला और जिसके दर्शन से तृष्णा ( अतृप्ति ) का समुद्र बढ़ जाता है, वह एक कृष्ण ही मेगजीवन है। शुश्रु पसे यदि वचः शृणु मामकीन पूर्वरपूर्वकविभिनं कटाक्षितं यत् । नीराजनक्रमधुर भवदाननेन्दोनियाजमहति चिराय शशिप्रदीपः ॥६॥ यदि कुछ सुनना चाहते हो तो मेरी यात सुनो, जिसे पहले के महाकवियों ने भी नहीं कहा, जो एकदम नयी है। घह यह है-यह चन्द्रमारूपी दीपक आपके मुखचन्द्र की भार्ती के ही योग्य है। दृष्ट्वा यमुनो पिपासुरनिर्श म्यूहोगा गाहते। विद्य त्वानिति नीलकण्टनिवहो इष्टु समुन्कपठते । वसाय तमालपल्लवमिति च्छिन्द ति.यां गोपिकाः । कान्तिः कालियशासनस्य वपुषः सा पावनी पातु वः प्यासे गौओं का समूह जिसको देखकर जमुना में पानी पीने जाता है । मेघ है, यह समझकर मयूर जिसको देखने के ।
२१०
लीलागुफः।
लिए उत्कण्ठित होते हैं, यह तमाल का पत्र है यह जा
गोपिकाएं जिसको तोड़ना चाहती है, उस कालियद
फरनेयाले श्रीकृष्ण के शरीर की पवित्र फान्ति तुम्हा
रक्षा करें।
भयि मुरलि मुकुन्दस्मेरवारविन्दश्यमनमधुरसज्ञ त्वां प्रणमाप पारे ।
भघरमणिसमी प्रावत्यां भवन्या कथय रहसि कनें मददशा न
हे मुरलि, हे कृष्ण के हंसते मुखकमल के श्वास का।
रस जानने वाली, तुमको प्रणाम कर मैं यह प्रार्थना क
है। जय तुम नन्दपुत्र के मुंह के समीप जाना तो एकान्द
उनके कानों में मेरी दशा अवश्य कहना।
भमुनाखिलगोपगोपनार्थ यमुनारोधसि नन्दनन्दनेन ।
दमुनावनसंभवः पपे नः किमुनासौ शरणार्थिनां शरण्यः ।
इस नन्दनन्दन ने यमुना के तीर पर सब गोपों की रक्षा
करने के लिए कालियदह का मथन किया, क्या यह शरण
चाहने यालों को शरण न देगा।
पृन्दावनदुमतलेषु गर्वा गणेषु वेदावसानसमयेपुध दृश्यते यद।
सबैणुनादनपर शिसिपिच्छनई यह स्मरामि कमलेक्षणमभ्रमीलम्।।
वृन्दावन के वृक्षों को छाया में, गाओं के समूह में, वेदो
की समाप्ति में, जो दिखायो पड़ता है, उस यशो धजानेवाले
मयूर पुच्छ धारण करने वाले कमल के समान मांसों
चाला और मेघ के समान नीले ग्रह का मैं स्मरण
फरताई।
देवकीतनयपूजनतः, पूतरारि-चरणोदक धूतः।
यह स्मृतधनायसूतः किं करिष्यति स मे यमदूत114
कविता-कौमुदो । यदि हमने अपने को देवकी तनय के पूजन से पवित्र किया है, यदि हम पूजनादि के चरणोदक से प्रक्षालित हुए हैं, यदि हमने अर्जुन के सारथि का स्मरण किया है तो वह यमदूत हमारा क्या कर सकता है। भाताम्रपाणिकमल प्रणयि प्रतोदमालोलहारमणिकुण्डल हेमसूत्रम् । माविमाम्बुकणमम्बुदनीलमण्यादाद्य धनञ्जयरचाभरणमहोनः ॥१२॥ जिसका हस्तकमल लाल है, क्रीड़ा जिसको प्रिय है, हार तथा कुण्डल जिसके हिल रहे हैं, परिश्रम से जिसके पसीने निकल रहे हैं जो मेघ के समान नीलवर्ण काहे वह अर्जुन के रथ का भूपण दिव्यप्रभा हम लोगों की रक्षा करे । कालिन्दीपुलिनादरेपु मुसलो यावद्गतः खेलितु' सावत्क रिकापयः पिव हरे धर्धिप्यते ते शिखा। इत्थं वालतया प्रतारणपराः शुन्य यशोदागिरः पायाद्वः स्वशिखां स्पृशन्प्रमुदितः क्षीरेऽधं पीते हरिः ॥१३॥ पलदेव जय तक यमुना के तीर खेलने गया है तब तक हे कृष्णा कलोर का दूध पीलो, तुम्हारी चोटी पढ़ेगी । कृष्ण वालक था इसलिए उसे ठगने के लिए यशोदा ने ये बाते फहीं। कृष्ण आधा दूध पीने पर अपनी चुटिया देखने लगा, यह कृष्ण तुम्हारी रक्षा करे । लावण्यवीचीललिताङ्गभूपां भूपापदारोपितपुण्यवहाम् । कारुण्यधाराच्छकटाक्षमालो वासों भजेवल्लववंशलक्ष्मीम् ॥१४॥ लावण्य परम्परा ही जिसके शरीर का सुन्दर भूपण जिसने भूपण के स्थान पर पचित्र चहं ( मयूर पुच्छ ) धारण किया है, जिसको चितवन फरुणा फी सुन्दर धारा है, उस गोपकुल की लक्ष्मी, वाले को मैं भजता हूँ।
૨૭૨ वाररुचि। मातःस्मरामि दधियोपविधूतनिद्र निद्रावसानरमणीयमुखारविन्दम् । हवानदययपुप नवनीतचोर- मोलिताउंजनपन' नयनाभिरामम् १५५ प्रातःकाल दही मथने की आवाज़ से जिसकी निद्रा र गयी है, निद्रा खुल जाने से जिसका मुपकमल उम होगया है जिसका शरीर सुन्दर और मनोहर है जिस फमलरूपी आंखें खुल गयी हैं उस नयनाभिराम फो। प्रातःकाल स्मरण करता हूं। घररुचि राजा विक्रमादित्य के समय में पक परचिपापना मिलता है । पयको मुदो नाम पो पर पुस्तक पररचिती पनायी है, जिसमें पत्र लिने की विधि पालापी गयी है। उस पुलक के प्रारम्म में लिया है। विमादिस्यभूपस्य कतिमिनियोगः धीमान् पाविध मनोति परीमदीम राज्ञा मन्त्रिीमा पनिाना , गुरुमा स्वाभिमाया तय ति पुगयो: मन्यागिम्यामां तथैवान्यविनाम, पतामपि मांगो पापिया। इस पुस्तक में पत्र लिखने का प्रकार पाया , किसको किम प्रकार का पत्र दिखता था मा ri इस पुस्तक में पनलागीमांकाR Fr कवितां-कौमुदी। था जिन्होंने यासवदत्ता नाम का गद्यकाव्य लिखा है। सुबन्धु ने वैद्यशतक नाम का एक और ग्रन्थ बनाया है। व्याफरणवाति ककार कात्यतयन को भी घररुचि कहते हैं . पर वे इन वररुचि से भिन्न हैं । उनका समय लगः भग ई० सदी के चार सौ वर्ष पूर्व माना जाता है, जिस समप महानन्द का राज्य था। यह यात भविष्य पुराण में लिखी है । पतञ्जलि मुनि के पहले कात्यायन हुए थे और पत- अलि का समय ई० सदी से १५० सौ वर्ष पूर्व है। इसलिए घररुचि का पूर्वोक्त समय ठीक जान पड़ता है। प्रारुतप्रकाश नामक एक प्रारत व्याकारण के कर्ता घर- रुचि का भी पता मिलता है। बहुत संभव है कि ये घरचि विक्रमादित्य के समय बाले हों और पालिव्याकरण के कर्ता कात्यायन हो, इसप्रकार वररुचि नामक दो पंडितों का पता मिलता है, कौन प्रथ किस का बनया है, इसके निश्चय करने का इस समय कोई उपाय नहीं। सूक्तिमुक्तावाली में महाकवि राजशेखर ने इनके लिए एक श्लोक फहा है- यथार्थता कथं नाम्नि भाभूदररुचेरिह। व्यधत्त कण्ठाभरणं यः सदारोहणप्रियः ।। इस श्लोक से मालूम होता है कि फण्ठामरण नामक एक और अन्य इन्होंने पनाया था। दानोपभोगवन्या या सुहृद्रियां न मुग्यते । पुसा यदि हि सा लक्ष्मीरलक्ष्मीः कतमा भरेत् परच। . जो धान भोर मोग के काम में न आये, जिसका उम्- मांग मित्रगण भी न कर सक, यह यदि पुरुषों के लिए लामा है तो मलक्ष्मी कान कही जायगी। पादुपाप क्षाम या कमलमुनि ललिनमल करे शिवमान शून्यालोश दीना दृष्टिः शिमरमभिावितरपना तनुस्तनुतां गता भ्यानगप्रामन्दा युधिमंदजननि रहमि रममें करोपि न सत्का को नामार्य रम्यो ग्याधिस्वर सुननु कथय किमिदं न सन्चमि नानु हे फमलमुसि, तुम्हारा पीला मुख दुर्यल हो गया, ह फेशपासाला मुरा तुमने हाथ पर रखा है, दुःसी नेत्र मानों देखने की शकि जाती रही, शरीर दुर्यल हो गय जिससे करधनी मस्तक की ओर चली गयी है। हे मदजा तुम्हारी प्रखर बुद्धि सदा ध्यान में लगी रहती है, मले रहना तुम्हें पसन्द है, तुम यातचीत तक नहीं कर सुतनु, तुम्हारा यह कौन सा विलक्षण रोग है, कहो यह क है, जिससे तुम आतुर नहीं हो । हस्ते कपोलममल पथि चक्षुर्मनस्वपि । ध्यस्तमास्ते चिरतस्या मानस्यावसरः कुतः ॥३॥ सुन्दर फपोल हाथ पर है. आंखें मार्ग की ओर। हुई है और मन सदा तुममें लगा हुआ है, ऐसी दश मान करने को अवसर कहां है। बहुनास किमुक्तन इति मरकार्यसिद्धये। स्वर्मासान्यपि दत्तानि वस्तुध्वम्येषु का कथा ॥४ हे दूति, अधिक क्या कहा गाय, मेरे कार्य को सि के लिए तुमने अपने मांस तक दे दिये, यन्य वस्तुओं की। पातही पया.?
anemama -woman कविता-कौमुदी। इन्दगोपर्वमौ भूमिनिवितेव प्रवामिनाम् । भनङ्गवाणे दभेदस्त्रुतलोहितविन्दुभिः ॥५॥ इन्द्रगोप (इस नाम का एक कीड़ा) भूमि में - समय कामदेव केवाणों से छिदे प्रवासियों के हुप रुधिरविन्दु मानो भूमि पर फैले हैं ऐसा मालू_ सान्द्रनीहारसंवीततोयगर्भगुरूदरा । सततस्तनिताप्राली निषसादाद्रिसानुयु ॥६॥ सयन कुहरे से ढंकी हुई, गर्म में जल रह मारी पेठवाली और सदा योलनेवालो मेघों की के शिखर पर बैठी। योनि नीलाम्वुदच्छन्ने गुरु टिभयादिव । जप्राइ प्रीपममसेतापो हृदयानि वियोगिनाम् ।। आकाश में काले काले बादल छा गये, बई होगी, इसी भय से ग्रीष्म ऋतु का सन्ताप कि हृदय में चला गया अर्थात् काल में भाग वियोगियों का हृदय जलने लगा। भालोहितमाकळयक दलमुल्कम्पित' मधुकरेण संस्मरति पथिषु पथिको दयिता गुलितर्जनाल- थोड़ा लाल औरभ्रमर के द्वारा पाया हुआ पथिकों ने मार्ग में देखे और उससे उन्हे अपन उन भगुलियों का स्मरण हुआ, जो कि तर्ज समय भी सुन्दर मालूम पड़ती हैं। प्रसादपस्या शिरसा चन्द्रमन्तर्मलीमसम् । सीमतापः कृतो भास्वानुषेवायोरिता तिसरा घररुचि। कमलिनी सिर नया कर भीतर से फाले चन्द्रमा फोम रही है, यह देखफर सूर्य क्रोध से लाल हो गया और उस कड़ा ताप या क्रोध किया। कलम फलभारातिगुरुमूर्धतया शनैः । विननामान्तिकोदभूत ममानानुमियोत्पलम् 11.। फलम नामक धान का मस्तक फल के भार से पान भारी हो गया था इस कारण यह नत गया मालूम होता था मानी अपने पास ही फूले हुए फमल को गूधने के। उसने थोडासा सिर नयाया है। मयेवामन्मसमदः संपन नु यास्पति । शालेवियोगमीत्येव क्षेत्रामाकृशता पो दम्हीं ने उसे जन्म दिया और यहाया, भय तयार होका म मालूम कहाँ जायगा, मानो धान फेयियोग होने के भय सेही खेतों का अल सूपने लगा। मम्युनेश का प्रोमै पशु मदिनामिर । शाल्मसाइमनयशाल निशानाम् ॥११॥ माना काय से प्रीम पातु में चन्द्रमानी रात्रि मामी जोखी होगयी थी और पर्षाकाल में जारोती थी, उसे शपातु में प्रसन्न फिया, अर्थात् शरदकाल मान से रावि गुन्दर दुई। पारिगि विश्लीगेशन मारवारिधि। मानुजीरावपा शाहिराभलारवा गुतः ॥ मपने उपकार करने वाले अंत मद व पीर पर रखने ग, तप पांय पान पीला गया और उसने पना मुरमीयामररिया।
--- कविता-कौमुदी। यायनाभिजायेयं यदि दुःखाकुले कुले। तर ताक्षय मेऽस्तुमाधवाराधन धनम् ॥१४॥ जहाँ जहाँ मैं उत्पन होऊ, चाहे दुःख से व्याकुल कुल में ही मेरा जन्म क्यों न हो, यहीं वहीं मेरा माधव का थाराधन रूपी धन सदा बना रहे, उसका नाश न हो। . -- वाल्मीकि ( आदिकवि) ये आदिकपि कहे जाते है। इन्होंने ही प्रसिद्ध रामायण फाव्य यनाया है, लौकिक छन्दों में इसी काव्य की रचना पहले पहल हुई है, इस कारण यह काव्य भी आदिफाय्य कहा जाता है। रामचन्द्र लङ्का विजय फरफे अयोध्या चले आये, राज्य. शासन करने लगे। किसी लोकापवाद फे भप से उन्होंने लक्ष्मण को भाशा दी फि सीता फो कहीं बगल में ले जाफर छोड़ भाभो । लक्ष्मण ने सीता को तमसा नदी के उस पार जाफर छोड़ दिया। उसी समय पाल्मीकि ऋषि से सीता को भेट हुई। उसी समय पाल्मीकि ऋषि की कविता शक्ति जाग उठो और ये पाल्मीकीय रामायण पनाने लगे। क्याफि रामजन्द्र के भादर्श पुरुष होने की बात ये पदले नारद मे सुन पुणेये। रामायण के पनाने में शरि फे१०,१२ लगे । अब रामचन्द्र मे अश्यमेघ यस प्रारम्स फिया पा, उस समय राम. के पुत्र लय भोर कुश ने याल्मीय रामायण का गान फिण या स्प बुरा को शल भोर शारर विपा की शिक्षा
वाल्मीकि
रामचन्द्र के विना हमलोगों को लौटा देखकर
अयोध्यानगरी सभी याल और वृद्धों के साथ आन
हो जायगी।
नियांतास्तेन धीरेण सह नित्य महात्मना ।
विहीनास्तेन ध पुनः कथं पाम at पुरीम्
हम लोग उस महात्मा के साथ नगरी से निप.
आये है, पर भय उम महात्मा के बिना हम लोग उस
को कैसे देख सकेंगे।
इटीव बहुधा वाचणे राहुमुपम्य ते जनाः ।
विलपन्तिस्म दुःखाताहवरमा इवाग्रगाः ॥r
इसी प्रकार के अयोध्यायासी हाय उठा कर दिल
करते थे, ये उस गो के समान दुःपी थे, जो अपने पड़े।
पिहुड़ गया हो।
सती मागांनुसारेण गत्वा किविता क्षणम् ।
मार्गनाशादिपादन महता समभिप्नुमा
कुछ दूर तफ तो ये टीक रास्ते से लौटे, परमागे जाकर
ये मार्ग भूल गपे और इसमें उन्हे पहा पर हुमा ।
रपमागांनुसारंग ग्यवतन्न मनविश्नः ।
हिमिद किरियामा विनोगता इतिmm
जिस मार्ग से एक लोटा था, उसी मार्ग भी हर
पह क्याथमागी हमलोग पया कर रहे६, पदपाल उसी
समझ में आयी।
हमा पयागनेर मागेनहानतमा।
भावामगमम्मोपता
.
कविता-कौमुदी। २८१ उनका चित थक गया था, वे उसी मार्ग से लौटे, जिस मार्ग से आये धे, ये उस नगरी में लौट आये, जहाँ के वासी दुःखी थे। भालोक्य नगरी तां चक्षयव्याकुलमानसाः। आवर्त पन्त तेऽणि नयनैः शोकपीदितः ॥६॥ अयोध्या नगरी फी दशा देखकर ये बहुत प्याकुल हुए, शोक पीड़ित मांखों से घे पुनः आँसू यहाने लगे। पा रामेण नगही रहिता मातिशोभते । भाएगा गरनेर इदादुदरतनगा ॥१७॥ राम के बिना याज इस नगरी को शोभा जाती रही, जिस प्रकार गार के हारा मर्प के उठा ले जाने के पश्चात् किसी तालाय को शोभा नष्ट हो जाती है। चन्द्रहीनमिराकाश'तोयहीनमिवार्णवम्। अपश्यनिहतानन्द नगर ते विधेतmal चन्द्रमा के बिना आकाश को, जल के बिना समुद्र की असे शोभा नर हो जाती है, उसी तरह राम के पिना मानन्द- गम्य शोभाहीन उस नगर फो उन लोगों ने देखा। सेवानि घरमानि महाधनानि दुग्न दुःखीरहता विरान्तः । मेष ममामुः वचन पर का निरीक्षमाणाः प्रदिना पुरयासो दुःप से पीड़ित घे. घे यई दुःप से अपने अपने पर पड़े मकानों में गए । उन टोगों ने स्यजन पा परिजन की मोर पसर भी उधर पी मोर नहीं गोक्योंकि उनमें उत्साह मही पा, हर्ष महीं था।
पाल्मीकि तेपामेवं विषण्णानां पीडितानामतीव ध। वाप्पविप्लुवनेत्राणा सशोकानो मुसूया ॥ २० ॥ इस प्रकार वे दुःखी थे, पीड़ित थे, उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे, शोक से वे मर रहे थे। अभिगम्य निवृत्तानां राम नगरवासिनाम् । बहुगतानीव सत्यानि यमपुरमनस्विनाम् ॥२१॥ रामचन्द्र को पहुँचा कर लोटे टुप नगरवासी ऐसे मालूम पड़ते थे, मानों उनके प्राण ही निकल गये हों। स्वस्व निलयमाभ्य पुसदारः समावृताः। अभणि मुमुचः सबै पाप पिहिताननाः ॥ २२ ॥ अपने अपने घर आफर स्त्री पुर आदि के साथ ये रोने लगे, उनका मुषमण्डल आंसू से भीग गया। नचाहत्या घामादन्वयितन प्रसारयन् । म चाशीभन्तःपण्यानि नापगृवमेधिनः ॥ २५॥ कोई हर्षित नहीं था, कोई प्रसन्न नहीं था, पनियों में दूकान मही सोली पाजार मगा मालूम पड़ता था और गृहस्यों के घर में चूल्हे नहीं जलाये गये। नामानन्दन्तिपुर या पनायमम । पुर' प्रथम मापा जननी नायमदर 11 फिमी भूली हुई चीज के मिलने पर भी को प्रसव अधिक धन मिलने का मौ किमी को महीमा और पहले पहल पुत्रनमय करने का भी मार माला की महीया romruuN कविता-कोमुदी। २८३ गृहे गृहे ब्दस्यय भार गृहमागतम् । ध्यापन्त दुःशात चाम्भिरतोरिव द्विपान् ॥२५॥ प्रत्येक घर में रोती हुई लियो घर में आये हुए पति को दुःस के कारण वचनों से कोसती थीं, जिस प्रकार अङ्कश से हाथी कोसा जाता है। किं नु तेग गृहः कार्य किदार: कि धनेन या। पु वापि सुसंवापि ये न पश्यन्ति राघवम् ॥२६॥ उनको घर से क्या करना है, स्त्रियों से भी क्या प्रयोजन, पुर या पुरुठ भी उनको किस काम के, जो राम याद को नहीं देख पाने। एक: सत्पुरुप लोके लक्ष्मणः सरसीदया। योऽनुगमति काकुररथ राम परिघरम्बने १२on संसार में एक लक्ष्मण ही सत्पुरुष और सीता, जो रामचन्द्र की सेवा फरने हुए पन में उनका अनुगमन करते हैं। भापगाः कृतपुण्यावा: पनियरासि । थे पारपति कारस्पो विगाम सलिल शुचि ॥२८॥ नदियां पुण्यवती है, ये फमलिनियां, ये सालाप पुण्य- पान ६, जिनका अल रामचन्द्र पायेंगे। शोषितसारसनामी रामाननाः। भापगारच महातपाः सानुनम्वत्र एमाः ॥२५॥ घे भटपी जिनमें मुन्दरया है, ये नदियां पे पर्यंत राम चन्द्रको प्रसन्न करेंगे।
1 २८४ पाल्मीकि कानन वापि शेर' वा य समोऽनुगनिध्यति । प्रियातिथिमिव प्राप्त नैनं शक्ष्यमनचितुम् ॥३. चन या पर्वत जिस किसीके पास रामचन्द्र जायंगे, प्रिय अतिथि के समान विना उनकी पूजा किये नहीं सकता। विविभकुसुमापीहा बहुमनुरिधारिणः । राघव दर्शयिन्ति नगा प्रमरशालिनः ॥३॥ पुष्पों का विचित्र शिरोभूषण और अनेक प्रकार मा धारण करनेवाले ये वृक्ष अपने को रामचन्द्र को दिखायें जिन पर भार शोभित हा रहे हैं। स्पकाले धापि मुपानि पुपाणि च फटानि । दर्श विस्थापनकोशाहिगरयो राममागतम् ॥३॥ पर्वत वृक्षों के द्वारा रामचन्द्र का स्वागत करेंगे, अनगढ़ का पुष्प और फल आये हुए रामचन्द्र को समर्पित करेंगे। प्रविष्पत्ति तोपानि विमलानि महीया। विशंपतो विविधा भूगधिमाधनिमंग ॥१॥ रामचन्द्र के लिए पर्यन पिमल जल पहायगे भौर भनेफ भद्दत झरने उनको दिखायेंगे। पादपाः पर्वताम्रयु रमविश्य रापरम् । मत्र रामो म मात्र प्राचितरपामा पृक्ष पर्वतों पर रामचन्द्र को प्रसनना सम्मान करेंगे। जहां रामयहां भय नहीं और यहां पराप भी मदी। मार शूरो मागः पुगे । परामपति कोइराइप्याम राधरम् ॥
२८५ कविता-फौमुदी । यह महायाहु और शूर है, वह दशरथ का पुत्र है। यह हम लोगों से दूर चला जायगा, हम लोग उसका अनुग. मन करें। पाद छाया सुखमस्तादृशस्य महात्मनः । महिनायो जनस्यास्य स गतिः स परायणम् ॥३५॥ से महात्मा स्वामी के चरणों का याश्रय यड़ा सुख है, येही हमारे स्वामी है, ये ही गति हैं और वे हो हम लोगों की प्रतिष्ठा है। पप परिचरिष्याम: सीतां यूय च राघवम् । इति शोपियो भन्दुश्वास्ति सदय वन ॥३९॥ दम लोग सीता की सेवा करेंगी और आप लोग राम की, इस प्रकार नगर फो खियां दु:पित होकर अपने अपने पति से कहने लगीं। पुष्माक' रापोऽरण्ये पोगक्षेम विधास्यति । सीता मारीअनस्यास्य योगक्षेम करिष्यति ॥३॥ पन में तुम लोगों का योगक्षेम रामचन्द्र करेंगे और लियों का योगक्षेम सीता जी करेंगी। कोपेनाप्रतीतेन सोरकन्टिनमनेन च । संप्रो येतामनोशेन वासेन हमपेसा ॥३॥ उस पास को फोन चाहेगा, जिसमें पाई मुख नहीं, जहां मनुप्प उत्पण्ठित हो जो भसुन्दर भोर चित्त फो नए करने पाला दो। सिग्मा परिपाय साइपम्य मनापकर । महिमा गीतिनाः तातो धनः शाल्माका -AR यदि यह राज्य कैफेयो का हो तो यहां अधर्म का राज्य होगा, और प्रजा अनाथ के समान हो जायगी, वैसी दशा में हम लोगों को जीना भी उचित नहीं है, फिर पुत्र और धन आदि लेकर क्या होगा। यया पुतश्च मा च त्यक्तावैश्वय कारणात् । के सा परिहरेदन्य कैकेयी कुलपसिनी ॥mon जिसने पुत्र और पति को ऐश्वर्य के लिए छोड़ दिया, यह कुलनाशिनी कैकेयी और किसको छोड़ सकती है। कैकेरया न बय' राज्ये भृतका हिवसेमहि । जीवन्त्या जातु जीवन्त्यः पुनरपि शपामहे || कैकेयी के जीवनकाल में उसके द्वारा पोषित होने पर भी अपने जीवितकाल में उसके राज्य में हम लोग रहना नहीं चाहती. इस यात के लिए हम लोग अपने पुत्र की राज्य फरती हैं। या पुन पार्थिवेन्द्रस्य प्रयासपति निष'था। कस्ता प्राप्य सुख जवेदधाया दुष्टचारिणीम् ॥ जिस निर्दयी ने महाराजा के पुत्र को धन में भंग दिया, उस दुष्टा और अधर्मों के आश्रय में फोन गुणपूर्वक जी सकता है। स्पतमिद सर्वमनायाममनापम्म । स्यारत ते मा रिनाशगुरपास्पति ॥३॥ इस राज्य में यव उपद्रय होंगे, यश मदोंगे, इसका यामी भी नहीं है, इस राग्य का भय नाश होगा और रात कारण फेयो दी।
कविता-फौमुदी।
नप्रिनजिते रामे जीविष्यति महीपतिः ।
मृते दशरथे व्यक्त विन्टोपस्तदनन्तरम् ।।४।।
रामचन्द्र के पन जाने पर राजा जी नहीं सकते और
इनके मरने पर राज्य का नाश निश्चित है।
ते विर पिचतालीय क्षीण पुण्याः सुदुःखिताः।
रायर' पानुगरमध्वमभुति दापि गच्छत ।।४।।
अब हम स्त्री पुष्पों को पुण्य क्षीण होगये हैं, हमारे दुखों
का ठिकाना नहीं, अय हम लोग विर घोलकर पीले, अथवा
रामयन्द्र का अनुगमन करें।
मिथ्या प्रवाजितो रामः सभायः सहलक्ष्मणः।
भरते संनिवदाः स्म सौनिके पशवो यथा ven
ध्यर्थ ही लक्ष्मण भोर सीता के साथ रामचन्द्र पन में भेज
दिये गये, अब हम लोग भरत के हवाले किये गये, जैसे
कसाई को सौंप दिये जाते हैं।
पूर्णचन्दाननः श्यामो गुजरिदमः।
भाजानुपातुः पभाशो रामो लक्ष्मणपूर: uvon
रामचन्द्र का मुख पूर्णचन्द्र के समान है, ये श्याम,
राभों के दमन करने वाले मोर
६ भाजानुयाह
भीर पवार, ये लक्ष्मण के यड़े भाई राम पन में घूमकर
उसे सुशोभित करेंगे।
पूभिभाशी मधुरः सत्यपादो महाबलः
सौम्या सर्वतोस दरियनःvel
२८८ घे पहले ही योलनेवाले, सुन्दर, सत्यवादी, महापल, सौम्य और चन्द्रमा के समान सयके प्रिय है, ये घूमकर यन शोमा पदायेंगे। मून पुस्पशाईलो मत्तमातविक्रमः शोभयियस्यरण्यानि विचाम्स महारथः ॥१९॥ पुरुषसिंह मतगाले हाथी के समान पराकमयासे पन में घूमकर भयरप ही उसको शोमा पदायेंगे। नासपा विलपराया मगर नागरप्रियः गुरुयशा ग्रयोरिव मयागमे ५.. गयु के भागमा गय से जिस प्रकार मनुष्य प्रस्त होकर रोता है, उसी प्रकार थे मगर कोरिया दुगोपीकिन होकरराती थी। हस्पेलिनीना पीना येश्मगुरापरम, अगामास्न दिनारमनी rinrn इस प्रकार रामचन्द्र के लिए विलाश परनंगामी स वियों का शमकर गूगं मालायत को शहा गया और रातमागी। नहानागारमा निमिामालियामा मगोपा दाम धादिर भाग नदी जलायी गयी, माय गया मायावदाहों, उस गरी पर पोलीगीमानली थी। पियाmfuTI riRTrrrrrrrfaram कविता-कौमुदो। २८६ पनियों की दूकान पद थी, आनन्द चला गया था, धाश्रय नट हो गया था, अयोध्यानगरी ताराहीन आकाशके समान होगयी थी। सदा विरामनिमितमातुरा या मृो प्रातरि वा विवासिते. शिलप्य दोना हरु दुर्विधेमिः मुदि तामामधिकोऽपि सोऽभवत्॥५॥ उस समय स्त्रियां राम के लिए आतुर होकर मानो उनका पुत्र या पति ही निर्वासित किया गया हो - पे दुःखित दोफर मिलाप करने लगी, रोने लगी; क्योंकि रामचन्द्र उनके पुत्र से भी यदकर उन्हें प्रिय थे। प्रशान्तगोसोत्सवनृत्य वादना विमष्टा पिहिता पणोदया। तदा पयोधानगरी धभूा सा महापविःपितोरको यया | गीत उत्सर नृत्य और याना यन्द हो गये थे, हर्ष दूर हो गया था, दुकानें चन्द थीं, उस समय अयोध्यानगरी अल्प जल समुद्र के समान हो गई थी। वासुदेव। इन्होंने युधिष्ठिर विजय नामक पफ फाय लिया है. यह काम्य फठिन है, उसके प्रत्येक स्लाक में यमब. ६. कविता पीधि से न हो शन्द चमत्कार पी दि से यह फाय्य भेछ । प्रत्यकार में भरना परिचय लिया है जिससे मालूम होता है कि येरावा पुलशेखर के समय में यतमान थे और इनके गुर का नाम भारत गुरु था। सरप प पमुपामा कासे पुलशेवरस्य मुधामदतः दानासायी मारमगुरभरडायनामापादा, -
ममजनि कमित्तस्व प्रयणः शियोडनवर्त कधितरण,
कारपानामालोके पटुमनसा वासुदेवनामा लोके ।
यासुदेव का समय निर्णय करने के लिए अपराल.
पोखर का समय जानना चाहिए । राता कुलशेयर सिंहल
द्वीप से निकाले गये थे और उन्होंने भारत में आकर भाभर
प्रहण किया था, उनका माय या सरी है. यह पाए।
देय के कुलशेगर ये होता इनका मी १२ वीं सदी मानना
चाहिए।
यासुदेय विजय नामक एक फाय भी पार के माम
से प्रसिद्ध है, ये दोनों यासुदेय एफ या दो इसका निर्णय
करना सदा नहीं है।
परमसेनानीकमसरियनुना समेगानीकम् ।
पुरका शौर्यामरणास्नादापशमला
इसके पधान् मीरा ने मेनाति फे. महित गंगा
म्यूह यनाफर मनाया. शर कुरुगण युद्ध के लिए तयार हुए,
उनका पाह युदद मोर उपेन्द्र के रज के समान था।
गाभिनुमाव ततः मनमानानमः ।
मzer कुन्नीपुत्रालोरमी कुन्नी
युधिष्ठिर की मेना में जिगक रोमानियन पोर
जिसमें सारा फाशदोरहा था .गीतों पर शासन
गिया । युधिष्ठिर की मंशा से मांग पत्र के प्रतिकार
रानों का प्यार कर, पान नीर भीर माले
उममेगा में।
भामिर पुषिमीरmgणः।
कोपामिनामाकरमनना- भिवानार...
कविता-फोमुदो। ૨૨ जिस प्रकार विभीषण रामचन्द्र के आश्रय में गया था, उसी प्रकार भाइयों से युद्ध करने की इच्छा रखनेवाले युयुत्सु ने (दुर्योधन का भाई) शत्रुओं पर आक्रमण करनेवाले पाण्यों के पक्ष फा आश्रय लिया, पर डर से नहीं किन्तु नीतिमे। माम्यानमितान्पायों योदधु कुरूतमान्यानमितान् । भमुषमा करतः कृष्णेनाश्वामितः स वापरतः ॥४॥ अर्जुन ने सयारी पर बैठे हुए पूज्य भनेक फौरवों को के लिए उपस्थित देखकर हाथ से धनुष छोड़ दिया, तब श्रोष्ण ने अर्जुन को समझाया कि तुम यह पाप नहीं कर रहे हो। पुदारम्भेशी मादः समदुम्मदम्बा भैरीणाम् । बता दे धुप सुरजन्म रजोऽपि रहितवैधुयाणाम् ॥५॥ युद्ध के भारम्भ के समय शत्रुओं को भेरी का नाद हुआ जो आकाश तक फैल गया और घोर घोड़े मादि के चलने से उड़ी हुई धूलि भी आकाश में फैल गयो। अनितारा शह धारणाशि चक्र राखे । शिवभावभामाजः समः सर्वदिशुराम राम युद्ध की घोषणा के लिए जप रा पजा, तप चारणों (देययिर) का समूह भाकाश में चला गया, भाकारा में देषताओं तो भी एकहो होगया, भौर दिशामों में धूलि फेल गयी। यापपरापानामा सदेत पदापानमा अनुमतबन्दिम्पसनः समागमतारमा रिमनः ..॥
. वासुदध । बड़े लोगों के द्वारा बनाये जानेकाले पणव आदि बाजों शब्द से ताड़ित के समान देवगण युद्ध देखने के लिए आकाश में आये और बन्दि और चामर उनके साथ था। नागनागोऽऽधावदायिन च रथी नां च ना गोधावत् । तुरगवां च तुरङ्गः प्राप वलीयः परस्पर चतुरद्गः ॥८॥ हाथी हाथी से रथो रथी से पैदल पैदल से और घोड़े घोड़ों से मिले, अर्थात् उनमें युद्ध प्रारम्भ हुभा, इस प्रकार सेना के चारो अङ्ग आपस में मिले • भवनिमृदाहवहोत्रव्यापारे जीवव्यदाह वहीऽत्र । धुतपांसावलपदसिः स्फुटमग्निशिखर वयमा वलमदसि ॥९॥ धूलिरहित सेनारुपी समामे राजाओं का युद्धहरी भाग्न- होत्र प्रारम्भ हुमा, वहां जोगी आहुति के जलानेवाली तलवार तेज से अग्निशिखाफे समा शोमने लगी। भजनि तु भूरिभराजौ चलितायां नगेन भूरिभराजी। लघुतो स्याहाम्नम्योमस्थितपासुपदि कारवाहात mon रणके लिए हाधियों के चलने पर पृथियो भारपती होगी और रथ भोर घोड़ों के द्वारा आकाश में फैलायी गयी धूलि ने अपनी लघुता छोड़ दी अर्थात् माकाश में धूलि सघन जम गयी। .. .... सन विशेदम सारचौदा पति मुजविवेद मनाया। भारनिशितमहारथम प्रहमपंधिकतमहापE AM शशु फेतीण सलवार से की हुई अपनी भुमा पापा को तय तफ मालम म दुई, जर तक उसे पीड़ा मालूम हुई भोर भुजा के पर जाने पर भी उसने मनु पर प्रहार करने -- कविता-कीमुदो । की इच्छा को जिससे उसकी बड़ी हंसी हुई, क्योंकि उसकी भुजा तो कट गयो थी। सिनोपरि करिणा रथेन गगनादपातिनो परिकरिणा । पायुपु म गलता धु स्त्री सत्रात इतर खेऽगलता ॥१२ हाथी ने रथ ऊपर फेंक दिया, पर वह नीचे न गिर सका, क्योंकि भाकाश में वायु था जिसपर यह रुका रहा, फम्युफण्टो देवाङ्गनाएं उस रथ को पाकर घहुन प्रसन्न हुई। सत्र धनप्रासारिपुरिके रोगगेन म प्रासारि । तशहाबन्न स्थितमममक्षणेन कावन्धेन ॥३॥ उस युद्ध में माले चक और पूरी मारियन शस्त्र चल रहे थे, जिनके डर से राक्षस यहां न आये, पर रुण्डी का समूह यहां निर्भय होकर स्थित रहा। ममत' मामानेन प्राति नहत पेन मुहतिना मानेन । मावतीक्षामासेरागनिरसिपाणिना मतीक्षामा un जो पुण्यामा सम्मान पूर्यफ युद्ध में पहले मारा गया, भपश्य ही उसका मरना मरना नहीं है। एक योद्धा की तलयार टूट गयो, उसके प्रतिद्वन्दी ने तयतक उसकी प्रतीक्षा की जपतक पद नयी सलवार लेकर न भाया। गुरमामरसादकः पतिताः रिता सरमादरूपः। दुश्वः पादानमति स्म हतवपादाना श्वा ॥ घोड़े भारी मत्सर कर भार फ्रोधसे भरे , रुधिर पह दाइकर्ष धाप के कारन ये गिर गपे और पर फेरने लगे और कुता पर्चा पाने के हर संभूआपदा है।
विनितम्या।
।
विकटनितम्या।
ये संस्थत की फति होने का पन्ध पनाया है।
मही इसका पता नहीं। सुभाषित पन्या में इनकी कापित
पायी जाती हैं। जिनसे इनकी कविता फीगरसता in
होती। महापयि शंगर में विटामिया विषय में
लिगा है
कनिनम्न गिर गुना
नितिनियमान मोम |
पिफटनितम्या की पाणी गे महाकर की मार
अपनीखी पी पानी की निन्दा नहीं करता, पदपाणी मां
दो मौली दी, मधुर
गोविन्द स्वामी के गाश फगिता पती
गमपविर में मान. धीर परिया
मान्दम मदी।
मुमारामपाममा
को मिला मुमनोकाम
मुग्धामात्रामा
मामी alaftarreraIt
भ्रमर, नर नुम मिरी मार गयोग
लापरबाना मनानिांदया, म मलिनाtri
पीनाममा RIPi
दीपले(
Man प्रमर प्यार
रिम बाटिका पा. प्रागटार की infe
कविता-कौमुदी। २६५ घाला तन्वी मृदुरियमिति न्यजतामाशङ्का दृष्टा काचिभ्रमरमरनो मतरी भानपुप्पा, तस्मादेपा रहसि मरता निदंय पीनीया, मन्दाक्रान्ता विसृजति रस नक्षुष्टिः कदाचित् ॥२॥ यह पाला है दुघली है, कोमल है इस प्रकार की शङ्काएं छोड़ दो, क्या ऐसी कोई मक्षरी देखी गयी है जिसका पुष्प भ्रमरों के मार से टूट गया हो। इस कारण एकान्त में तुम इसको निर्दय होकर दयाना, क्योंकि बिना ज़ोर से दबाये स्थ से रस नहीं निकलता। भयपि माइमकारिणि कि' तव घड कमणेन । टमदिति भङ्गमापयपि कुधयुगमारभरेण ॥ ३ ॥ अरे साहस करनेवाली, तुम क्यों चकर लगा रही हो, सम्भल जा, नहीं तो स्तनों के भार से टस से हट जाओगी। द्विारि देवहति सहकारण संबधितेन विपक्षक पुष पापः । पत्मिन्मनागपि विकामविकारभाजि घोरा भवन्नि मदनावरानिपाता: nen द्वार पर इस भमागे धाम के वृक्ष को घढ़ा रखने से क्या साभ, यह पानी निधय विप वृक्ष है, जिसके थोड़ा भी यिक- सित रहने के समय काम का सनिपात उपर भयानक दोकाना है। पिनमुग्धि वर्ष या दोष सम्मानि दिरा भव यशः । रमिंगः पपौधरोगमलेन मारि परिसम्पने विला. फिी राजा की स्तुति ई-दिन में भी मापका यश दिशापोरवी पामुरा मना है, इस पाव मे उसने भी यापूर्वक भने यो लन दिखला दिये (मथात् सूर्योदय ।
श्री) पर माप यरा ने उस समूची का मालिङ्ग
भामिरिताभियोगरा: मुशी प्रामविमासनकुनी।
रिमें पुपापिनुमनमा नागरिक शत्रुतान्तिी ॥॥
कहने पर भी जो माफमण करना नहीं चाहती जाप्रकार
7 से अपने ग्रहों का शिलाम नहीं दिलाती, नई स्त्री के
नान तुम्हारे शत्रुओं की मेना तुमपर पुरुषार्य नहीं
विज्जका
ये संस्थत की फपि , संस्कृत साहित्य में इनकी बड़ी
छा है। ये सरस्वती का अवतार समझी जाती हैं। इनका
रा नाम विजा भो है, इनकी कवितायें पड़ी मनोहर और
पूर्ण होती हैं।
करभिमायमरान्दगोचर स्फुरन्तमादपु पदेषु केवलम् ।
बदभिरही कृतरोमविनिय जनस्य तू योग्भवतोपमञ्जलिः ॥1॥
शब्दों के द्वारा प्रकाशित न किया जा सकनेवाला केवल
ल शन्दों में दिखायी पड़ने वाला कवि के भाय को जो
रोमाश्चित अङ्गों के द्वारा कहता है स्वयं चुप रहता है
पुरुष को यह अञ्जलि है अर्थात् उसको नमस्कार है।
गते प्रेमावन्धे हृदयबहुमानैपि गलिते
निवृरो समाये जन इव जने गम्हति पुर।
तथा चोरप्रेक्ष्य प्रिपसखि गतांताश दिवसात
जाने का हेतुलनि शतधा या हदयम् ॥२॥
No text on this page.
बिजका। समण गामामा गुति प्रियाने हत्या ममेश बदनालालीन गिन पनि मानातीनाम् र पालों को पकड़ कर मुंह ऊपर की ओर उठाकर ज पति पुण्यन करता है, उस समय मुंह में ही धमता हुआ नदी" यह माननियों के पचन बड़े ही अच्छे मालूम होते हैं रिपसति विपासातपातपापा- परिचयपले चिताच निघाय विधिःमला। मृदमिव बसारिपरिरीकृन्दा प्रगम्मदुलालवन भ्रमयति मनोनो बानीमा किमा विधास्यति जो चिन्ताचक विपत्ति के दण्ड के फोर के अनवरत परिचित है, अर्थात् जो चिन्नायक विपत्ति के दण्ड से चलाया जाता है, उस चक्र पर मिट्टी के समान पिण्डा बना फर यह दुए भाग्य मेरे मन को रखता और चतुर कुम्हार फे समान उस चक्र को घुमाता है, मालूम नहीं मेरे मन को यह क्या बनाना चाहता है। पिरम विफलापासादस्माद्दुर यधपापतो विपदि महतो धैर्यभ्रशं यदीक्षितुमीहसे। भयि जडविध कल्पापायव्यपेतनिजक्रमाः कुलशिखरिणः धुदा नेते नवा जलराशयः ॥७॥ हे मूर्य भाग्य, तुम विपत्ति के समय महान मनुष्यों को ला का नाश देखना चाहतं हो. इस धुरी यात को मत इस युरं काम को छोड़ दो, क्योंथि इसका कोई फल । क्या प्रलय के समय जिन्होंने अपना काम बदल दिया चे कुलपर्वत छोटे नहीं हैं और न समुद्रही छोटे हैं। - किये उप काम कयिता-कौमुदी। नीलोपलश्यामा धिम मामजामना । धर पिटना प्रोपांगुएला सरस्वती ॥८ में पिजामा नीलशमार के ममान श्यामहे इम यान को मजान कर दण्डी ने मोदी सरम्पनी को पर्यशुमला फह दिया मर्धा में भी सी एम सरस्थनी ।। Freetमिकामगंममिन्दुकमाधिमा भाति । रमिला परिष जमिनमाय un पलारापीपलि के भीतर पाइयला के ममान यम- फरारहाल, पाली में ए पीर मार से पन्न धनुर समान शमिता। मारतापितामि मामरामरतमानियाकायाम् । या प्रामापिलोमा- हुगोरापनीवियोगि-100 पर पर, गुमम फिरने पहा पुरे गांय के मर्ग मनुप्प की पारिका के पाप ! पद मा मदी भाग भाग में जर म गाग उगंग १ उनणे, पदने के Imर, उनको साहिर पार गरा) लगायी जायगी, उस पारपयोगी भादिनोगा, यमुम्हारे पा मोर पर पदपार मनमो जागी। यह सम्पादि। पिचिनी भरीपसमामी की पहा | सोमो पापा मारran + ग दिपाये: भारी माप, मामा मामा मामहीमा IFR६.पर भागेदाग हामेगा! !
विजका। मायदिग्गादानलिसकरपक्षालनशोभिता योनः मोरि विदेरपनिहता पस्योमयो निमंराः। कष्ट' भाग्यविषय येसरमः कमातरम्यापिन- मम्याध्येवायचारमगुर कारुन जातं जाम् ॥ मतवाले दिग्गजों के मददिन कपोलम्पल के घोने से क्षमिन जिस नदी फी निर्मल तरङ्ग नियांध कर भाकर में पिचरती थी, दुःस है भात भाग्य के दौर से उमी फरमान्त तक म्पिन रहने वाली नदी का जल एफ. यगुन्दर चलने में गंदला हो जाता है। यह भी भयानि । फिमी धनपात्र मनुष्य को घनिक और दरिद दोनों यम्भ का पनि है। मिलामममोतपरमुगलोदोकदली- परस्परपरिस्पनालयनि.मनोभारा । लमनि परिरममागिताम्य- उनुपमकर्मष्टाः मनीगोन धान कटनेगलियों का गान पहा ही मनोहर मान होता है ! पड़ी माफ गाए गूगल दाय में लिया मसल के उठाने नया गिराने पं. पार पहिया यादी उन चूड़ियों के राद में यह गान भार भी मनोहर ।जब ममल गिराना मुंगा निकटताभार गितहासाना पदी गाना गमापन हो।
कविता-गोमुदो।
३०१
--
विचारण्य ।
इनका दूसरा नाम माधवाचार्य भी है, ये अपने समय के
पर गिरगान पनि अनेक अन्य पनाये है।
१ दिध प्राधों का माया,
२ पराशर धर्मशारर धी टीका,
जमिनीयम्गायरवाधिारण मादा,
४ ताधिकरण हामाला,
५ गदर पिजय,
६ पाल माध,
भापार मापन,
८ परदार मापर,
१ माघार धानुरागि,
१. पवन
१५ वरदशी,
१२ प्रमाना,
१ रनपाल्पनियता
१४ तलाको रीस,
जापुर. पान में होने पाया किया था,
पापी गरी में मान लो माता का नाम
Uniमाम माम भार भागों के माम मापन
नमा दोरगारागari, भगुपामा मासी।
गरीमिय
WITERTAIT OPEगर।
rarenTr
मारे rltrain
-
३०२ विद्यारण्य । -- के तदन्तर भगवान उस मण्डन पण्डित को जीतने के लि प्रयाग से शीव्र प्रधिन हुए, आकाश मार्ग से जाने हुए उन्हीं दूर ही से माहिष्मती नगरी देखो, जिसमें मण्डन मि रहते थे। भवातरदयविचिवां विलोस्व तां चिम्मितमानमाऽमौ। -पुराणवन्पुष्करवतं नीतः पुरोरकष्टम्यवने मनोजे ॥२॥ जहां की यटारियों में अनेक प्रकार के रन उड़े हुए उस नगरी को देखकर ये विस्मित हुए, और नगर के पास के एक सुन्दर उद्यान में आकाश मार्ग में उतरे। प्रफुल्लराजीयवने विहारी तरङ्गरिङ्गत्पशोकरादः। रेवामरुकभितमालमाल: मारहदायत मिपे ॥३॥ विकसित कमलवन में बिहार करनेवाला, तर छोटे छोटे जलरुप से जो था है और जिसने सालवन को कंपाया है, वह नर्मदा का वायु थकावट दूर करनेयाला भाध्यकार की सेवा करने लगा। तस्मिन्स विश्रम्य कृताहिकः सन्तस्वतिकारोहणशालिनीने । गच्छन्नसो मण्डनपण्डितोको दासीनदोपाः स ददर्श मागे. उस उद्यान में रहकर उन्होंने दिन का सत्य समान किया और मध्यान्ह के समय मण्डन पण्डित के घर की और जाते हुए रास्ते में मण्डन पण्डित की दासियों को देखा। कुत्राऽऽक्षयो मण्डनग्निस्येत्येता स परछ जलाय गत्री। तामापि हमाझुवर्णका' यसोपवत्यो पदुरुनर रम १ जल के लिए जानेवालियों से उन्होंने 'छा कि मण्ड पण्डित फा घर कहां है, ये मी उनको बहुत और जानकर सन्तार पूर्वक उत्सर देने लगीं। सुराकर --- कविता-कौमुदी। ३०३ स्त प्रमाण परतः प्राण कीराङ्गमा यस गिर' गिरन्ति । द्वारस्थनीवास्तरनिरुदा जानीहि तन्मण्डनपण्डिनीकः ॥६॥ घेद स्वतः प्रमाण हैं या परतःप्रमाण हैं, यह पात जहाँ द्वार पर विजड़े में येटी हई शुफानना कहती है वही भण्डन पति का घर है। फलमद कम फलप्रदोऽन: फौराद्गना या गिर' गिरन्ति । दाररथमोहान्तरमनिरुद्धा जानीहि तन्मण्डनपण्डिवोकः ॥७॥ फर्म स्वयं फल देनेवाले हैं या परमात्मा कर्म फल देता है, जहां द्वार पर पिंजड़े में बैठी हुई शुकाङ्गना यह धात फहती है पही मण्डन पण्डित का घर है। जगभर स्यामगरभु य स्यात् पोराङ्गना पत्र गिर गिरस्ति। द्वारस्पनीमातरमंनिरुद्धा मानीहि तन्मण्डनपतिकneu जगन् नित्य है या अनित्य जहां हर ये बिजड़े में बैठी दुई गुफाड़ना यद धात फाहती है यही मण्डन पण्डित फा पीया सक्तिरथ मस्य गेहात गन्या पहिः सम कचारगुप्तम् । दुशमालोयम मोगशपया स्पोमा पनामातरणास्तः ॥९ उनको धान सुनकर ये मण्डन मिन फे घर फे यादर पहुँच, यहां उन्होंने किराड यन्द देने, घर में प्रवेश करना यटिन देराफर उन्होंने योगशक्ति के द्वारा भाकाश मार्ग से परमातर प्रवेश किया। - नाम रोन्ननिमा फरमाननाभम् । ममममाशेषतमानस्य निपेशन' भूतनमान ..
भीतर जाकर भगवान ने भूलोक के अलङ्कार
मिश्र का समस्त घर देखा, यह घर इन्द्र के घर के सा
और यायु उस घर की पताका कंपा रहा था।
मीधाप्रपंजनभोरकाश प्रविश्य तन्प्राप्य कयेः सहाशम् ।
विद्याविशेषारायशःप्रकाश ददशं तपमानिकाराम "
भाकाश से पान करने वाले घर में भगवान में
मण्डन मिश्र को देपा, जिसने अपनी निया की अधिष
यरा का प्रकाश पाया है और जो प्रत्या के समान है।
सोमग्नि व सोनिधान समिनि मत्यपनीमूगम् ।
पथाविधि भावविधौ निमपत पार पमाण्याने जपला 1
उस समय मण्डन मिध श्राद्ध कराने के लिए।
भीर जैमिति को निमस्थित फरफ उन चरण कमल
रहे थे।
सामरिक्षारीय पापियामाम्यवाईमेरः ।
पायन मिनिम युमाया माया गर्न निyिan
पहां ये पांगीराज माफाशमार्ग गे मा भार
और जैमिनि में इनका पूर्वक स्वागत किया।
अपच मागोममि, मुग्यो: निशियोति।
मयारापिगम्य गामाdिershuram
धारामा गे माये हुए भी उनकी निगा
मायितनको गलानी M का
ग्राओं का अनुपाया होने पर भी प्रमा।
farminभाभा
Kangar-prtainm
anwrwww कविता-कौमुदी। गृहस्थ मण्डन मिश्र रुट होगये थे और यतीश्वर को भो कौतूहल था इस कारण उन दोनों पडितष्ठों में नीचे' लिखे अनुसार प्रश्नोत्तर हुए। कुतोमुण्ड्यागलामुण्डी पन्थास्ते पृश्यते मया। किमाइ पन्यास्त्वन्माता मुन्देत्याह तथैव हि ॥१६॥ मण्डन-मुण्डी कहां से? शङ्कर-रास्ते ने तुमसे क्या शङ्कर-गले के उपर से। मंडन-में तुम्हारा रास्ता मण्डन-तुम्हारी मातामुण्डा है, पूछता। शङ्कर-ठीक है। पन्थान' त्वमपृच्छस्त्वां पन्थाः प्रत्याह मदन । स्वन्मातेन्यत्र शब्दोऽयं न मां न यादपच्छकम् ॥१७॥ शङ्कर रास्ते से तुमने पूछा, रास्ते ने तुम्हें उत्तर दिया। ऐसी दशा में नहीं पूछनेवाले "तुम्हारी माता" के तुम्हारी से मेरा याध नहीं हा सकता, क्योंकि मैं पूछनेवाला - भदो पीता किमु सुरा नैव श्वेता यतः स्मर । कि स्वजानामि तद्वर्णमई वर्ण भवारसम ॥१८॥ मण्डन-पया तुमने सुरा ( मय) पीता (पी है ? शङ्कर-नही यह पीना ( पीली ) नहीं, श्वेत है। भण्डन-क्या तुम उसका रङ्ग जानते हो ? शङ्कर-मैं रङ्ग जानता है और तुम रस । मत्तो जातः कलञ्जाशी विपरीतानि मापते । सस्य प्रवीति पितृवापसो जातः कलाभुक ॥१९॥ मण्डन-यह निषिद्धमांस सानवाला मत्त हो गया है, क्योंकि भगर्थक योल रहा है। ។ ३०६ विद्यारण्य । शङ्कर-टीक है। पिता के समान चोल रहे हो, जैसे तुन निपिद्ध मांस सानवाले हो उमी तरह तुमसे निपिद्ध मांस खाने वाला उत्पन्न हुआ है। कन्यां वहगि दुवुदै गर्दनापि दुहाम । शिखायज्ञोपवीताभ्यां कस्ले मारो मविन्यति ॥२०॥ मएडन -मृसं कपड़ी ढो रहा है, जो गधा मी कटिनठा से दो सकता है। पर शिखा मोर यनोपवीत भार था, जिससे उसका त्याग किया। कन्या महामि दुबै व पिप्राऽपि दुर्मराम् । शिवायज्ञोपवीताम्या यु तेभारो भविष्यति ॥२॥ शङ्कर - मूर्ख, फन्या ढो रहा है, जिसे तुम्हारा पिता मी नहीं दी सकता। शिखा और यज्ञोपवीत से ध्रुति का भार होता। त्यक्त्वा पाणिगृहीती स्वामशस्या परिरक्षण । -शिष्य पुस्तकभारेप्टो ग्यास्याता प्रक्षानिएना ॥२२॥ मण्डन-रक्षा न कर सकने के कारण अपनी स्त्री को छोड़ दिया, अय शिष्य और पुस्तक का मार लिये फिरते हो, इसीस तुम्हारी ग्रहह्मनिष्ठता मालूम पड़ती है। गुरुशुश्र पणासस्वारसमावार्य गुरोः कुष्ठान । विपःशुभ पमाणस्य म्यानपाता कर्मनिष्टना ॥२॥ शहर-गुम को मेया में भालम्य के कारण गुप्लुस में समायन'म कराकर नियों की गया गरयाल को कम निष्टता मालूम पड़ती है।
कविना कौमुदी ।
थितोऽसि योपितों गर्भ ताभिरेव विवर्धितः ।
अहो कृतमता मूख कर्थ ता एव निन्दसि ॥२॥
मण्डन-स्त्रियों के गर्भ में रहे हो, सियों ने ही तुम्हे
बढ़ाया है, मूर्ख यह कितनी कृतानता है कि तुम उन्होको
निन्दा करते हो।
यासो स्तन्यं त्वया पीत' यासा जातोऽसि योनितः।
तासु मूर्खतम स्त्रीषु पशुबद्भमसे.कथम् ॥२५॥
शङ्कर-जिनका दूध तुमने पीया,जिनसे तुम उत्पन्न हुए।
मूखं, उन्हीं स्त्रियों में पशु के समान तुम रमण कणे
करते हो?
धीरहत्यामवप्तोऽसि वाहीनुद्वास्थ यवतः ।
आत्महत्यामवाप्तस्त्वमविदित्वा पर' पदम् ॥२६॥
मडन--ज्ञानबूझ कर अग्नि का त्याग करने के कारण
तुमको वीर हत्या लगी है।
शङ्कर--तुम्हे तो आत्महत्या का दोष लगा है, क्योंकि
नुमने परमपद का ज्ञान नहीं पाया।
दौवारिकान्वञ्चयित्वा कथं स्तेनवदागतः ।
भिक्षुभ्योऽनमदत्वा त्वं स्तेनवगोश्यसे कथम् ॥२७॥
मडन-द्वार-रक्षकों को तुम उगकर चोर के समान
कैसे चले आये?
शङ्कर-मिक्षकों को अन्न पिना दिये तुम चोर के समान
खा कैसे रहे हो?
कर्मकाले न समान्य अहमूर्खण संपति।
अहो प्रकटित ज्ञान पतिमान भाषिणा ॥२८॥
No text on this page.
कविता-कौमुदो। ३०६ न मण्टन सस्मितजैमिनीक्षिन, ध्यासाऽनघोजल्पसि वत्स दुर्वचः । भावारणा नेयमनिन्दिनात्मना, भातात्मतरव' यमिन' धुतैपणम् ॥३३॥ मण्डन को जैमिनी स्मित पूर्वक देख रहे थे। उस समय ध्याम ने कहा कि तुम धुरे वचन कह रहे हो । सजनों की यह रीति नहीं है कि यह आत्मतत्त्या वासना-रहित योगी के प्रति ऐसे दुर्वचनों का प्रयोग करे । अभ्यागतोऽसौ स्वयमेव विष्णुरित्येव मन्याऽऽशु निमन्त्रय स्वम् । इत्याभय ज्ञाननिधि प्रतीन, सुध्यप्रणीः साध्यशिपन्मुनिस्तम् ॥३४॥ विद्वानों के अणि मुनि ने अपनी बात माननेवाले तथा शास्त्रज्ञ अपने शिष्य से कहा-ये स्वयं विष्णु आये हैं, ऐसा समझो और यही समझकर इनको निमन्त्रित करो। अयोपसरपश्य जल सशान्तः ससंभ्रम मपद्धनपण्डितोऽपि । यामाक्षया शाम्रविचंयित्वा न्यमन्त्रयह यकृते महर्पिम् ॥३५॥ अनन्तर आचमन करके शान्त मण्डन परिस्त ने भी प्यास फी थाज्ञा से शङ्कराचार्य को भोजन के लिए निम. त्रित किया। मचायीरसौम्य विवादभिशामिउम्मवन्सनिधिमागतोऽस्मि । 'पायोन्यशिष्यत्वपणा प्रदेपा, मास्स्यादा प्राकृतभकभक्ष्ये ॥३६९ शङ्कर ने पदा-सौम्य, विवादभिक्षा की इच्छा से में भापफे पास भाषा यही मापदं और उसकी शन' यद रहे कि जो हार जाय यह जीतनेवाले का शिप्य यन जाय । इस साधारण भोजन में हमारा पुछ मी बार नहीं है। ममम हिदिपि भुषमीसित, भुतिशिरपपवितृतिमन्तरा। पहिठन मोवीरितः समन्ता भवतारहिमपतिःणा
No text on this page.
- ३ १ कविता-कौमुदी। भवतु संमति वादकयाऽऽदयोः, फलतु पुष्कलशान परिश्रमः । उपनवा स्वयमेव न गृह्यते, नवसुधा धसुधावसथेन किम् ॥४२॥ अब हम दोनों का शास्त्रार्थ हो, अनेक शास्त्रों का परि- श्रम सफल हो । यदि स्वयं मचीन अमृत आवे तो क्या पृथियो पासो उसे ग्रहण नहीं करता। ध्यासदेव। ये कृष्णद्वैपायन व्यास के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनके पिता का नाम पराशर था । इन्होंने ही वेदों का सम्पादन भीर विषय विमाग के अनुसार क्रमबद्ध किया है । महाभारत तथा हरियश आदि ग्रन्धों में इन्होंने पाण्डयों का इतिहास लिया है। इनके अतिरिक्त इन्होंने अन्य १८ पुराणों का भी निर्माण किया है। घेदान्तसूत्र जी व्याससूत्र के नाम से प्रसिद्ध है ये भी इन्हीके पनाये हुए हैं। पाणिनि के एफ सूत्र में ये सूत्र भिक्ष-सूत्र भिक्ष-सूत्र के नाम से भी फह गये हैं। पाणिनि फा यह सूत्र "पाराशर्यशिलालियां भिक्षुनट सूत्रयो इनको पादरायण भी कहते हैं। इनका समय ई० सदी से १२६३ पर्ष पूर्व पतलाया जाता है। सय फपियों के ये उपजीम्य कहे जाते हैं अर्थात् अन्य कवियों ने इन्हींको भपना आदश पनाया है। इन्हींकी फपिता की सहायता से अपने काम में सफल हुए हैं। भनुगम्नुस म रस्न पदिशक्यते। कसमप्यनु भन्तय मार्गरमो मारपीदनि
No text on this page.
कविता-कौमुदी। भवतु संप्रति वादकया ऽवयोः, फलतु पुष्कलशास्त्र परिश्नमः । उपनवा स्वयमैव न गृह्यते, नवसुधा वसुधावसथेन किम् ॥४२॥ प्रय हम दोनों का शास्त्रार्थ हो, अनेक शास्त्रों का परि- श्रम सफल हो । यदि स्वयं नधान अमृत आवे तो क्या पृधिया पासो उसे ग्रहण नहीं करता। व्यासदेव। ये कृष्णद्वैपायन व्यास के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनके पिता का नाम पराशर था । इन्होंने ही वेदों का सम्पादन और विषय विभाग के अनुसार फमय किया है । महाभारत तथा हरिवंश आदि ग्रन्धों में इन्होंने पाण्डवों का रतिहास लिया है। इनके अतिरिक्त न्होंने अन्य १८ पुराणों का भी निर्माण किया है। घेदान्तसूत्र जो व्याससूत्र के नाम से प्रसिद्धये भी इन्हीके बनाये हुए हैं। पाणिनि के एक सूत्र में ये सूत्र भिक्ष-सूत्र के नाम से भी कह गये हैं। पाणिनि का यह सूत्र है पाराशर्षशिलालियां भिक्षनट सूत्रयो" इनको पादरायण भी कहते हैं। इनका समय ई० सदी से १२६३ पर्ष पूर्व यतयापा जाता है। सय पषियों के ये उपजीय्य कहे जाते हैं अर्थात् अन्य कवियों ने इन्हींको अपना आदश पनाया है। इन्दीकी कविता की सहायता से पं अपने काम में सफल हुए हैं। भनुगमनुसता दामन यदिम शक्यते । कामप्यनु मन्नण्य मार्गस्यों मारपीदनि ।
प्यासदेव । समनों की राह पर यदि तुम पूरी तरह नहीं चल सम् तो थोड़ा भी उम राद पर चलने का प्रयत्न करी। क्योंकि रास्ते का मनुष्य एक न एक दिन ठोक स्थान पर पहुंच ही । उपकारः पो धर्मः परोयः कर्मनपुरम् । पायदान पर कामः परी माशो वितृष्णता ॥२स! उपकार प्रधान धर्म है। कर्म-कुशलता प्रधान घन है: सुपात्र को दान देना प्रधान काम है और तृप्पाहीन होना प्रधान मोक्ष है । यही श्रेष्ठ चतुवर्ग है। म धर्म या निरुपधः सायों या न विरुध्यते । । स कामः सङ्गहीनो यः स माशो यो पुनर्भवः ॥३॥ धर्म यह है जिसमें छल न हो, धन यह है जिसमें प्रति योगिता न हो, फान वह है जो आसक्तिरहित हो और मेर घह है जिसमें पुनर्जन्म न हो। भविद्यानाशिनी विद्या भावना भवनाशिनी। दारिघु नाशनं दानं शील दुर्गतिनाशनम् ॥४॥ अज्ञान को नष्ट करनेवाली विद्या है, संसार के दुःखों को नाश करनेवाली भावना है। दान दरिदता को नष्ट करने घाला है और दुःखों को दूर करनेवाला शील है। गतेपि वयसि प्राशा विद्या सर्वात्मना बुधैः । इह चेत्रपारा फलदाफलदा सान्य जन्मनि ॥ अधिक उम्र के बीत जाने पर भी बुद्धिमानों को विद्या ग्रहण करना चाहिए। यदि इस जन्म में उससे फल न हो सकेगा, आग के.जन्म में अवश्य नद फलदायिनी होगी।
tun कविता-कौमुदी। भत्यापमतिदातारमनिशरमतियतम् । प्रजाभिमानिन व धीमपानोपसपंति ओ अत्यन्त सजन है, जो अत्यन्त दानी है, जो अधिक पस करने वाला है, जिसे अपनी युद्धि का अमिमान , लक्ष्मी इन लोगों के पास जाने से पुरतो है। माष्टमाः प्राप्नुवन्स्पा क्लीपा म च मानिनः । अप होकरवाडीता शरदत्यतीक्षिणः ॥७॥ पालसी धन नहीं पाते ६,पुसफ भीर अभिमानियों को भी धन गदी मिलता।लोकापवाद से डरनेवाले और धन की संदा प्रतीक्षा करनेवालों को भी धन नहीं मिलता। पारमुपनि सोध मानापिरियति । सभिभो मानपुमा पश्रापमान मुसति new जा उत्पन्न दुप कोप को रोक लेते ६मोर विपत्तियों के समय में मीमही घराने है, पहीलामी के पात्र ६ स्पेनिजिवामान बिरिषु । पौरकारित धीरमत्यम्न धीनि पेने जिसने अपनी इन्द्रियों को पश में कर रया, जिमने भपनी मामा जीत हो, जो पपने विरोधियों को देना जानताको समापून काम करता मोर ओ पीर हामी सोमपा बरती। जमानापममममममेपनम् । PिOLARोतlaml पिनियों मान के पदिल दी जार.दूर करने पर साय वा मागापान नगर, पनपने - - प्यासदेय। सजली किसी काम कोन प्रारम्म फरनेवाले, अपनी पीनाम दियानंयाले मनुष्य को लक्ष्मी सेवा करती है। जीपम्ना दुपा देवरिपरभराक्ष्यः । नितेनु से सोमेष मनु कस्नस्त्वया नितः . भाग मादि इन्द्रियों शरीर में यतमान है, ये दुर्जय है, उनको जीतो । उनफे जीतने से तुम समस्त संसार जीत सफोगे। पदीपसि वशीक जगदेन कर्मया । परापवाद शस्योम्यो गो चरन्ती निवारपास यदि तुम एक ही काम से समस्त संसार को अपने व में फरना चाहते हो तो दूसरों की निन्दा में लगी हुई अपर पाणी को रोको । अर्थात् यदि तुम दूसरों को निन्दा करन छोड़ दो तो समस्त संसार तुम्हारे घश हो जाय । मुहरप्यरयस्तस्य यस्यात्मा दुरधिष्ठितः । भजीणे पथ्यमय व्याधये मरणाय वा ॥३॥ उस मनुष्य के मित्र मी शत्रु ही हैं, जिसकी आत्मा अन्ययस्थित है। अजीर्ण में पध्यान भी रोग उत्पन्न करता है, पा मार डालता है। भीरुः पलायमानोपि नाम्वेष्टायो वरीयमा। कहाधिरतामेति मरणे कृतनिश्रयः डरपोक मनुष्य भी यदि सामने से भाग जाय तो बल. यान को पाहिए कि उसका पोछा न करे क्योंकि सम्भव है, यह अपनी मृत्यु निश्चित जान फर पैरी बन जाय। तेशस्विनि क्षमोपेते नातिकाश्यमाचरेत् । जायते ॥
कविता-कौमुदी।
३१५
तेजस्वी मनुष्य यदि अपने ऊपर किये गये अपराधों को
क्षमा करता जाय तो उसको अधिक सताना नहीं अच्छा,
क्योंकि अधिक रगड़
से शीतल चन्दन में भी आग की
लपटें निकलने लगती हैं।
असहाय:समर्थापि तेजस्वी कि करिष्यति ।
निवाते वलिवोप्याग्निः स्वयमेव प्रशाम्यति ॥१६॥
शकिमान तेजस्वी मनुष्य भी यदि सहायहीन हो, तो यह
क्या कर सकता है ? धधकती हुई मो भाग यदि बिना हवा
की जगह में रपषी जाय तो यह आप ही आप धुझ जाती है
कृत्वा घलवता वैरमात्मान' यो न रक्षति ।
अपथ्यमिवतद्गुक्तं तस्यानय केवलम् ॥१७॥
जो मनुष्य घलवान से शत्रुता करके अपनी रक्षा का
प्रयत नहीं करता, अपथ्य भोजन के समान उसके लिये यह
यड़ा अनर्थ करता है।
कारणाधियतामेति देप्यो भवति कारणात् ।
भार्थी जीवलोकोयन कधिकस्यचित्प्रियः ॥१८॥
कारण से मनुष्य प्रिय होता है और कारण हो से शत्रु भी
गेता है। यह स्वार्थ का संसार है, यहां कोई फिसी का
प्रिय नहीं।
मास्ति जात्या रिपु म मिस वापिन विपते ।
सामथ्र्य योगामायन्ते मित्राणि रिपरस्तथा ॥१९॥
स्वभाव से कोई किसीका शत्रु नहीं और न कोई किसीका
मित्र ही है। समय के अनुसार मित्र और राघु हुमा फरते हैं।
महावा परसंतापमगन्या अलु नम्रताम् ।
भनुगमप सतो मार्ग पत्स्वयमपि ॥२०॥
३१६
यामदेव ।
दुसरं फोन सता फर, दूसरों के सामने दीन न यनक
सजनों के मार्ग न छोड़कर यदि थोड़ा भी मिले तो उ
यहुन समझना चाहिये।
मनामितानि पानि पर्यायान्ति देहिनन ।
मुखानि र सपा मन्य दन्यत्रानिारयते ॥२॥
जिस प्रकार विना चाहं मी मनुष्यों के पास दुःरा माता
फरते हैं उसी प्रकार सुग भी आरंगा मा मैं समझता हूँ।
फिर दुल से यबहाना और सुख के लिए व्याकुल होना
फेवल अपनी दीनता दिखाना है।
यदमावि ननदादि यादि न तदन्या।
इति चिन्ता विपनोरमगदः रिपोयते ॥२२॥
जो नहीं होने वाला है यह न होगा, इस कारण क्या
औषधि नहीं पी जाती।
भागमिष्यन्ति ते भावा ये भावा मयि माविनः।
भाई तानुगन्तभ्यो न तेगमन्यतो गतिः ॥२३॥
जो घटनायें मेरे जीवन में होनेवाली हैं वे अवश्य !
वे मेरा अनुसरण करेंगी, क्योंकि उनके लिए दूसरी कोई
नहीं है।
धनमस्तीति वारिपश्य किंचिदस्तीति कर्पयम् ।
सेवा न किंचिदस्तीति नाहमामीति साहतम् ॥२॥
धन हों तो वाणिज्य करना चाहिए, कुछ थोड़ा सार
हो तो खेती, कुछ भी न हो तो नौकरी, और अपनी सत्ता
समझ कर साहस (चोरोमादि)।
नोदशनधितामेति नचाम्मोमिन पूर्यते।
मात्मा तु पात्रता : पात्रमायान्वि संपदः ॥२५॥
- कविता-कौमुदी। समुद्र फिसी के यहाँ मांगने नहीं जाता, पर यह जल से पूर्ण रहता है। मनुष्य को स्वयम् योग्य बनना चाहिए, क्योंकि योग्य को ही सम्पत्ति मिलती है। मनपा मानसं दुःस हन्याच्यारीरमौषधः । एतदिशाय सामन दालेः समतामियात् ॥२६॥ युद्धि से मन के और दवा से शरीर के दुःखों को फरे, इस प्रकार मानसिक और शरीरिफ दुःखों को दूर करने की अपनी शचि समझे; पालकों की तरह घबड़ान जाय। पुतमिगृहवारि वियुगस्य धनेन पा। मनप ध्यसने कृष्ण प्रमः यस्करी एतिः ॥२७॥ पुत्री से, मित्रों से, घर से, भयया धन में यदि मनुष्य फा पियोग हो या यह किसी यही विपत्ति में फसे तो उस समय एफ धैर्य दी उसका फल्याणकारी होता है। दुप्पी दुःखाधिपश्येस्सुखी परयेस्मुसाधिकान् । भाग्मान पंशोकाम्पो शवम्यामिव नायेत् ॥२८॥ दुपो मनुष्य अपने से भधिक दुग्गी को देखे और सुखी अपने से मधिरु मुपी को दुग मुग से शोफ घर्ष करने की जरूरत नहीं । यह दोनों शत्रु है। इनफे हापों मात्म-सम. पंज करना पुरादा मुपशमपिएरपदिदियते नरम । माग पुणे सदा मादेनीति मतिर्मम् ॥२९॥ बुद्धिमान मोर पोर मनुष्य को भी सम्मति मोहित परती है। पुली मो मनुष्य अपने को एगी नहीं समझता, ऐसी मेरी समझ है। .
व्यासदेव ।
येयाः क्शेन देहस्य धर्मस्यातिक्रमेण ।
भरवां प्रणिपातेन माम तेषु मनः कृथाः३०७
जो धन शरीर के कट से मिले, धर्म के अतिशमक
से मिले, अथवा शत्रु के पैरों पड़ने पर मिले तो उस धन ।
इच्छा मत करो।
गुगेषु यायित किमाटो प्रयोजनम् ।
विधोपन्ते न घाभिगांवः क्षारविता
गुणों प्राप्त करने के लिए प्रयाना फरो, भाडम्यते ।
लाम ही क्या ? पिना दूध की गाय घन्टा पापने से र
शिफती।
गुयाःबल गुणा एवं न गुणा धनतकः ।
मयसंचयकतणि माग्यानि प्रयोग हि ॥
गुण गुपदी है, गुणों से घन नहीं मिलता। धन संयप
फरनेयाला भाग्य अलग हो है।
गुणाःबलु गुथा एवम गुणा महेवः।
सगुणी निरन्नापोनिया सामसः शर॥
गुण गुपही है, उनसे फल का कोई साया नहीं।
सगुण (धनुष फीरी) धनुर निपल होता है, मौर
निगु (शरीरहित)माण सफल पाण का मनमाग)
दोता है।
भारमापनं गुलादाने मैगुनीया।
gujा माम बाmam
गुणों का मन मरना सपने मपीसलर गुणी
का अर्मन न करना निक्षाको माल है। पनी होना माप
भधान , सलिए पाहीन पुर निदा पारदी है।
कविता-कौमुदी। अजुनस्य क्षयं दृष्ट्वा वल्मीकस्य संचयम् । भवभय दिवस कुय्यादुदानाभ्ययनकर्मभिः ॥३५॥ असुन का क्षय देखकर और वाल्मीक का संचयं देखकर मनुष्य को चाहिए कि दान अध्ययन आदि सब कर्म को प्रतिदिन किया करे, क्योंकि प्रतिदिन का थोड़ा थोड़ा भी सत्कर्म बहुत होता है। यो यमर्थ प्रार्थयते यमर्थ घटते च यः । सोवरयतमवानोति न घेदान्तो निवर्तते ॥३६॥ जो जिस बात की प्रार्थना करता है, और जिस बात के लिप प्रयत करता है, यह उसे अवश्य प्राप्त होती है। यदि प्राप्त न हुई तो पह मनुष्य थकित होकर अपने प्रयत्न से नित हो जाता है। गच्छपिपीलको याति योजनानां शतान्यपि । अगष्यन्वैनतेयोपि पदमेक म गच्छति ॥३७॥ चलता हुआ चीटा भी सैकड़ों योजन चला जाता है, और बैठा हुआ गरुड़ भी एक पैर नहीं जाता। चिन्तनीया हि विपदामादावेवप्रतिक्रिया। नपणनन पुन प्रदीले बहिना गृहे ॥४॥ विपत्ति फेभाने के पहिले ही उसके प्रतीकारका उपाय निश्चित करना चाहिए । घर में भाग लगने पर कुआं खादने की तय्यारी अच्छी नहीं। मिसरवशनमधूना बुधेयस्य धान्मनः । विपषिकापाषाणे मरो जानाठिसारताम ॥३९॥ मित्र, स्वजन, यन्धु, धुद्धि और अपनी धीरता , परीक्षा मनुष्य अपनी विपति को सौटी पर करता है व्यासदेव । अर्थात् विपत्ति के समय इनका सरापन मनुष्य को मार सर्वः पदस्यस्य सुहन्धरापदि दुलंमः । ये यान्यापदि वन्धुत्वं सुहृदो बघाच ते non घने के सब साथी है. बिगड़े का कोई नहीं। जो बिग का साथी है, वही मित्र बन्धु आदि हैं। स सुहृयो विपधार्थदीनमम्यवपयते । न तु दुरितातीतकांपालाम्मपण्डितः ran चही मित्र है जो विपत्ति से दुःखित मनुष्य का साथ दे वह नहीं, जो पोती हुई बातों के उलहना देने में अपर विद्वत्ता दिखावे। शिरसा विस्ता नित्य स्नेहेन परिपालिता। देशा भापि विरज्यन्ते' कोन्त नगयाति विकियाम ॥४२॥ सदा सिर पर रखे हुए, और बड़े स्नेह से पालित बाल भी रङ्ग यदल हो देते हैं, एक रङ्ग कोई नहीं रहता । मन्त में सवही रंग पलट देते हैं मृदोः परिभवो नित्य र सोपणस्य नित्यशः उत्सम्यतय तस्मान्मध्यां पृत्ति समाश्रयेत् ॥ फोमल मनुष्य सताये जाते हैं, और कठोरों के शव पदते हैं। इसलिए फोमलता और कठोरता छोड़फर घोच की पृत्ति का प्रहण करना ही उचित है। मृदुनापि हि साध्यन्त कमया स्वार्थसिदयः । भरुपियतितम्पनी अलीश स्वान्मतृप्तये ।
P-AAAAAA- कषिता-कौमुदी । फोमल कमी के द्वारा भी अपने स्वार्थ की सिद्धि की जा सकती है। (कोमल) जॉफ अपनी तृप्ति के लिए रुधिर पीती है। महीदश संयनन शिपु लोकेयु विद्यते। दान मैत्री च भूनेषु दया व मयुरा चपा ४५॥ सीनो लोक में इससे पदकर मनुप्य को प्रसन्न करनेवाली भीर दूसरी बात नहीं है-दान, मित्रता, प्राणियों पर दया और मोठी पोलो। मातवरत पलिना दुःख सपिति मदा। भनित न मनमा समय पश्मनि nuru पलवान के साथ विरोध हो जाने पर मनुष्य सुखपूर्वक सो नहीं सकता। उसे यह गुरा से अपना समय व्यतीत फरना होता है। पाह हमेशा शफिन बना रहता है, जैसे सर्प पालं घर में रहने पाला मनुष्य। कर्मया मनमा बाधा पणा च चतुर्विधम् । प्रमारयति यो सो सोमप्रीति कर्म, मन, पचन भोर या फे द्वारा जो लोगों को प्रसन्न करना चाहता है, उससे रोग प्रसन्न नहीं होते। सभीजन' समान नांप समागमा। शातिभिः परमपविन विरोध. Vries भपन जाहि भाइयों के साथ भोजन करना, प्रेमपूर्वक पाटार बार कुशल-प्रश्न पूछना पादिए । उनके साथ कभी विरोध करना उचित नही.
No text on this page.
पिता-कौमुदी। ३२३ अपने स्वजनों द्वारा सतत मनुष्य का आदर दूसरे भी फरते हैं, और स्वजनों के द्वारा तिरस्त मनुष्य का निरादर दूसरे भो करते हैं। जातोनो पक्कामाना कटूनि पराणि च । मको उदय याचा लक्षणया शमपेतुयुधः ॥१५॥ जो अपने भाई याधुओं को कठोर और परप पोलना पाद तो युधिमान मनुण उनके कुपित हृदय को फोमल पचनो से शान्त करे। पोपिहिताभिरष्यहितः परः । भहिती देहजो माधिहि समारण्यमोषधम् ॥५६॥ दिन करनेवाला शव भी मित्र है, और अहित करने पाला मित्र भी शत्रु है। शरीर से उत्पन्न व्याधि शत्रु होता है, भीर जगल में उत्पन्न हानेवालो दया मित्र । मुरकी प्रजातापि हन्तप्या पकारिणी। पत्तपदानमांजरोहितहरप्राध्यतेभ्यतः ५७n घर में उत्पन्न हुई चूड़ी मार डालो जाती है, क्योंकि पद मुकसान पहुँचाती है मीर हित करनेवाली दिल्ली घी देकर परवाई जाती है। मौदन पनि मिल्ने खाटमुरम् । मोद भानामपि रिमुवा पाउनम् ॥ मान्य (स्नेह रहित ) पल का स्याग करना उचित पिसा सोदर माई, मी हो तो भी उसे त्याग करना अधिकारी पोशात क्या।
३२४ प्यासदेव । पूर्वोपकारी यस्तुस्यादपकारे गरीयसि । उपकारेण तत्तस्य क्षन्तायमपराधिन। rem पहिले के उपकारी व्यति द्वारा यदि अपकार होजाय। उपकार के यदले उसका अपराध क्षमा करना चाहिए। अय घेवुदिनं कृत्वा व युम्नेतदबुद्दिनम् । पापास्वल्पेति तान्हम्पादयराधे तथानुजन् ॥१०॥ जो मनुष्य जान बूझ कर पाप करें और कहे कि गलती से होगया है, तो उसको मार डालना चाहिए और जो अप राध भी फरे और अपनी शेखी होके उसे मी मार डालना चाहिए। भजातयतमूोम्यो मृताजाती व मुतौ। तो किचिन्छोकदो पिसोम संस्त्वत्यन्त शोकदः ॥६॥ अजात, मृत और मूर्ख इन तीन प्रकार के पुत्रों में से पहिले के दो अच्छे हैं, अन्तिम नहीं। पुत्र के म उत्पन्न होने से या उत्पन्न होकर मर जाने से एक ही बार दुःख होता है और मूर्ख पुत्र तो जीवन भर तक सताता रहता है। भपुत्रत्व भने यो नतुस्याद द्विगुणः सुतः। जीवाप्यविनीतामा मृत एवं नाशयः ॥२॥ विना पुत्र का रहना ठीक है, पर निगुण पुत्र नहीं अच्छा । यह अशिक्षित पुत्र जीवन मृत के समान है। एकोपि गुणवान्पुत्रो निगुणेन शतेन किम् । एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति नच सारा सहयशः ॥१३॥ गुणी एक भी लड़का यहुत अच्छा है, और निगुन सो भी अच्छे नहीं, एफ चन्द्रमा मायफार का नाश करता है, हज़ारों वारे महीं।
कविता-कोमुदो । ३२५ दाने तपसि शायदा यस्य न प्रधित पशः। विद्यायामलाभे या मानुष्यार एव सः ॥१४॥ दान, तपस्या और शूरता में जिसकी प्रसिद्धि न हुई, पहभपनी माता का पुत्र फेवल कहने के लिए है। पानी वा निरापास स्थान वा भयोत्तरम् । विधायं बलु पश्यामि नमुन यस नितिः॥६५॥ बिना प्रयता के मिला हुमा जल और जयजनक स्वादु भोजन इन दोनों के विश्य में जय मैं विवार कर देपता है तय मालूम देता है कि जहाँ सृमि है यहाँ सुप है। दुःन लिप्यते मिशिष्ट दुःन भियते । भिसिरानुथा प्रीटिना स्नेहेन पुरते ६६० दुख मे भिन्न ( फटा हुमा ) तुड़ जाता है, धीर दुख से शहादुमा फर भी जाता है, पर भेद पाफर जुड़ी हुई प्रीति में स्नेह नहीं होता। देवपोगापनमा प्रतिमादीनमापदः। भामाश्यन्ति मसानामिव महतम् ॥९ भाग्य से मिली हुई सम्पत्ति भयानर दी नष्ट हो जातो ६,जैसे दुजनों को मंत्री। समिति मंदिप पोपोगमात्माम् । मगुपोगेर निलेम्प प्रानु महति हमारे प्रपनों का फल भाग्याधीन है, इसलिये उद्योगों को देना महों भाविना उद्योग से कोई भी मनुष्य तिरोनल नहीं पा सकता ।
व्यासदेय। पहवो पल नेवार:सर्व पण्डितमानिनः। सवें महत्वमिच्छनि त नमवसीदति ॥६९ जिस दल में यदुत नेता हो. सभी वपने को पति- झनेवाले हो, भौर समी यड़ायनना चाहते हो तो शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। ज्येष्ठो माता पितृममा मृते पितरि मारत। ससपा वृत्तिदातास्यात्सम तापरि पालपेद 1 पिता के मरने पर बड़ा माई पिता के समान है यही अपने छोटे भाइयों की देख रेस रखता है और करता है। कनिष्ठासनमस्येरन्सचन्दानुवर्तिनः। तमेव चोपजीवेयुर्य व पितर' तथा छोटे भाई बड़े भाई का आदर करें, उनके कहने के सार चलें और उन्हीं के अधीन रहें, बड़े भाई के साथ फे समान बरताव करें। सपा गवा हि कियने या न दोग्नोन गर्मिली। कोर्थः पुत्रेण यातेन यो न विद्वान्न धार्मिकः ॥३॥ उस गाय को लेकर क्या होगा जो न दूध देती है, मा न यच्चे? उस लड़के से क्या लाम जो न धार्मिक न विद्वान् ? किनु मेस्यादिद' कृत्वा किनु मे स्यामः । इति संचिय मनपा प्रात: कुवि वान वा इस कार्य के फरने से क्या होगा और न करने से क्या मीण! इस यात का विचार कर लेने पर मनुष्य को पाहिर काम करे या न करे।
૨૨૭ कविता-कौमुदी। कार्यमालोचतारायं मतिमद्धिविवेचितम् । म फेवल हि सम्पत्तो विपत्तायपि शोभते ॥७॥ जिस कार्य की धुराइयां मालूम हो चुकी हैं और जिस कार्य के विषय में धुद्धिमानों ने अपनी सम्मति प्रकाशित रदी है पद कार्य भच्छे समयों में ही नहीं, किन्तु विपत्ति समय में भी लाभदायक होता है। पदकों मिटने मन्त्र कस्तु भाचित । दिकस्य गुमन्यस्य प्रज्ञाप्यन्त म गति ७५॥ फेोई गुप्त पात छः कानों में पहुंचने पर फैल जाती है. पार फानों में पहुंचने पर फमो फभी फैलती है,पर जो सलाह तोफानों में ही रहती हैं उसका पता ग्राहा को भा नहीं मेलता। सुमगितमुधिनाते मुरतेमुविचारित । प्रारम्भ हतबुदीना सिदिरयभिचारिणी ॥७॥ उस फाम में पुद्धिमानों को अवश्य ही सिद्धि मिलती है जिसी प्रारम्भ करने के पहिले पूय साच विचार लिया जाता है, जिसके माधा में नपरता दिलाई जाती है जो भनी साह फिया जाता है। भफलानि दुरन्नानि समभ्ययफनिश्च । भायानिष पनि नारभर विषust बुद्धिमान उन कामों का प्रारम्भ न करे मिलकर पुछ फलमदो, जिनका परिणाम दुपदा हो जिनमें हानि लाम परायर हो भौर जोमपने किये मराम्य हो। पसार पुरोहमाया सवा। सहमतिm II व्यासदेव। उद्योगो सजन पुरुष का जो कर्तव्य है, उसका पाटर निर्भय होकर करना चाहिए सिदि मान्याधीन है। भगुपूर्ण पृहत्यमाद्वन्याय'यु संगतम् । विपरीतमनायेंषु यथेच्छमि तथा कुरु ॥३९॥ सजना को मैत्री पहिले छोटी पीछे बड़ी होती है दुर्जनो फी मंत्री इससे विपरीत होती है। सद्भिरेव सदासीत सद्धिः कुर्वीत मंगतम् । सद्धिविवाद मैगी च मंसद्भिः किंचिदाचरेत् 161 सजनों के साथ पैठना चाहिए और उन्हीं का फरना चाहिए, यदि विवाद हो तो सजनों के साथ मैत्री हो तो भी उन्हीं के साथ। दुर्जनों से कुछ भी सम्द न रखना चाहिए। विरुखैरपि यस्ताय साधुभिधर्मदर्शिभिः । दोपा अपिहि साधूनामसतां च गुणैः समाः ॥m अपने से मतभेद रखनेवाले धर्मात्मा सजनों के सा रहना उचित है, क्योंकि धर्मात्मा के दुर्गण भी दुर्जनों में गुणों से बढ़कर होते हैं। प्रेक्षणीयः प्रयत्नेन स्वभावो नेतरे गुणाः । भतीन्यहि गुणान्सर्वानस्वभावो मूनि तिइति ॥४२॥ बड़ी तत्परता के साथ अपने स्वभाव की देखरंत रसना चाहिये, दूसरे गुणों की नहीं। क्योंकि स्वभाव सब गुणों पर थपना प्रभाष जमा लेता है। मियं प्रयादकृपणः शूरः स्याददिकत्यनः। पाता मापाप्रवर्षी स्याप्रगल्भः स्यादरिष्दरः |
कविता-कौमुदी।
उदारता के साथ प्रिय बोलना चाहिए, शूर होना चाहिए,
पर आत्मश्लाघी नहीं। दाता होना चाहिए पर अपात्र को दान
देना ठीक नहीं । प्रगल्भ होना अच्छा है, पर कर नहीं।
न विश्वस्वेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् ।
विश्वासानुभयमुत्पन्न मूलान्यपि निकन्तति ॥ ५॥
अविश्वासी पर विश्वास न करे, और विश्वासो पर भी
अधिक विश्वास न करे। क्योंकि विश्वासी से जो भय
उत्पन्न होता है, यह जड़-मूल से नाश कर देता है।
प्रशाशीय निवृद्धा भृत्येषु शठवृत्तिषु ।
स्वामी विश्वासनिद्रालुः प्रतारयति तप्यते ॥८॥
थुद्धि और घल से बढ़े हुए शठ भृत्य पर जो स्वामी
विश्वास करता है वह ठगा जाता है, और दुख उठाता है ।
पस्य कार्यममार्य वा सममेव भवत्युत ।
कस्तस्य विश्वसेत्याज्ञो दुतेरकृतान्मनः ॥ ८ ॥
जिसके लिए अच्छे और घुरे दोनों प्रकार के कार्य घरायर
हैं, उस मूर्प और हतभी का विश्वास फोन बुद्धिमान कर
सफता है?
अपराधो न मेस्तोति नैनदिरवासकारणम् ।
विद्यते हि नृशसभ्यो भयं गुणवतापि ॥८८.
मेरा अपराध नहीं है, इसी विश्वास से निर्भय नहीं हो
जाना चाहिए । योकि कार मनुष्यों द्वारा गुणवान् भी सताये
जाते हैं।
चिन्मृगमुन्ना म्यामाः केचिद पामुमा मृगाः ।
तत्स्वरूपविपर्यासादिश्वासोश्याप पदम् ॥ ८९॥
और गुण भादर करने वाले ३३० व्यासदेव । कोई मनुष्य मृगमुस व्याघ्र होते हैं कोई ध्यानमुस म होते हैं । अर्थात् कोई तो ऊपर से यच्छ दीखते हैं पर- भीतर के फर होते हैं, और कोई ऊपर से कर दीखते हैं, श्री भीतर से अच्छे होते हैं। इस स्वरूप भेद के घाख में आक जो अपना विश्वास स्थापित करते हैं, ये विपत्ति में फंसते हैं। परनिन्दापु पाण्डित्य स्वपु कायें 'प्दनुधमः। प्रपश्च गुणमेपु पन्यानो वापदां पयः ॥ ९ ॥ दूसरों की निन्दा में अपनी निपुणता दिखाना, अर' कार्यों में उदासीन रहना के द्वैप रखना, ये तीन आपत्ति के मार्ग हैं। याटस्य ग्रसितु'मास प्रस्व परिणामि यत् । हितंच परिणामे यत्तदाब भूतिमिच्छता ३९॥ जो ग्रास निगला जा सके,पच सके और जिससे परिणाम में लाभ हो, अपना कल्याण चाहने वाले को उसी वस्तु का सेवन करना चाहिए। तिष्ठत्येकेन पादेन चलत्येऊन पण्डितः। नापरीक्ष्य पर स्थान पूर्वमायतनं त्यजेत् ॥ १२ ॥ धुद्धिमान मनुष्य एक पैर से चलता है और एक पैर से खड़ा रहता है। दूसरा नया स्थान बिना देरी पहिला स्थान नहीं छोड़ना चाहिये। बहुनामप्यसाराणां समवायो दि दुर्जयः। मृगैरायटयत रग्नुमया नागोपि वश्यते ॥१३॥ यहुत सी दुर्पल यस्तुमों का समूह दुर्जय होता है, तृणां से रस्सी घटी जानी है, जिससे हाथी भी घंध सकता है।
फविता-कौमुदी।
पहुनामप्यमित्राणां य इच्छेत्कमप्रियम् ।
आत्मातेन गुणैाज्यस्तरोर्श महदप्रियम् ॥ ९४ ॥
जो अपने
शत्रु
मंडल को
दुख पहुँचाना
चाहता हो, तो
उसे चाहिए कि अपनी आत्मा को गुणवान बनाये। क्योंकि
उसके शत्रुओं के लिए इससे बढ़कर अन्य दुखदाई कार्य
नहीं है।
प्रशागुप्तशरीरस्य किं करिष्यन्ति संहताः।
गृहीतच्छन्त्रहस्तस्य वारिधारा इवारयः ॥ ९५॥
युद्धि के द्वारा जिसने अपने शरीर को सुरक्षित कर रखा
है, उसकी सम्मिलित शत्रुओं के दल द्वारा कोई हानि नहीं
हो सकती। जिसने छाता लिया, उसका वृष्टि क्या कर
सकी है?
या शक्य न तच्छक्य सुशीममपि धावता ।
भन्दबुद्धिस्तु जानीते मुहूर्त नास्मि वंचितः ॥ ९६ ॥
जो काम भशक्य है, यह मशम्य ही है, चाहे उसके लिए
फितना ही क्यों न प्रयत किया जाय । परमूर्ष मनुप्य सम.
झता है, कि मेरो भोड़ो गलती से यह कार्य नहीं हुआ।
भक्षिपश्म दा लुप्त टिप्यन्ते हि शिरोहाः।
पमानात्मनामेव भवन्ति हिविपञ्चपः ॥१७॥
आँख के यार फमो नहीं काटे जाते, पर माथे के यार
हमेशा फाटे जाते हैं। बात यह है कि विपत्तियों का सामना
उन्हींफो करना पड़ता है जिनकी वृद्धि होती है।
मातात साहस कापाविमवैविप्रलम्भितः।
स्वगावापयपि माराप भवन्ति दिविपतये ॥९॥
HA अङ्ग - ३३२ व्यामदेव । माई, घन मद से भूल कर यहुन साइस मन के क्योंकि अपने भी भार होजाते हैं और ये विपति समान मालूम होते हैं। मा तात प्रमरामीति वाधिष्ठाः कृपणं जनम् ।- मात्यां कृपणचधुपि धाधुरग्निरिवेन्धनम् ॥ ९९ ।। भाई ! तुम प्रभावशाली हो, इसलिए दुर्यलों को मत दो । नहीं तो तुम दुर्वलों को आंखों से जल जानोगे जैसा अग्नि लकड़ी को जलाती है । मा तात सम्पदाममयमारूदोऽस्मोति विश्वसीः । दुरारोहपरिभ्र शविनिपातो दि दारुपाः ॥१०॥ भाई ! तुम सम्पत्तियों के शिखर पर चढ़े हो, इस बात का विश्वास मत करो। क्योंकि अधिक ऊंचे चढ़ने वालों का पतन बड़ा भयानक होता है। प्रशसन्ति कितवा प्रशंसन्ति चारणाः। प्रशंसन्ति वन्धक्यो न स जीवति मानmom धूर्त लोग जिसकी प्रशंसा फरें, खुशामदी चारण जिसको प्रशसा करें और रडियो जिसफी प्रशंसा करें, यह मनुष्य अधिक काल तक नहीं जीता। पैरमादौ समुत्पाद्य यः कश्चिन्सधिमिच्छति। . मृण्मयस्येवभारप संधिस्तस्य न विद्यते ॥१०॥ शत्रुता करके मिट्टी के बड़े के समान उसकी संधि महीं होती। कौमसंकोचमादाय प्रहारानपि मर्पयेत् । काले काले छ मतिमानातिकायमस्वन १.३ . जो मनुष्य पहिले पुनः संधि करना चाहता +
फपिता-कोमुदो ।
पादुए के समान नम्रता धारण कर मारों को भी सह
लेना चाहिए । पर समय थाने पर बुद्धिमान को चाहिए कि
पहस के समान उठ सड़ा हो ।
पमित्र मधेन पावरकालाप पपंपः ।
भवनमागने का जिम्दपादमिवाश्मनि mom
फा तय सष पन्धे पर रखना चाहिए जय तक
प्रपना भयसर ग पाये । समय माने पर इसका पटक फर
डाले, जैसे पत्थर पर परफ पर घड़ा फोड़ दिया
पाता है।
तापाय भंवार पारमयमनागतम् ।
भाग मय पप्पमभीलवत...
भय से सभी सफरना पादिये गप तक पद सामने न
भाभय समीप माने पर निर्भप होकर उसका सामना
करना चाहिए।
घोरिया सहपार गुम पपिति विश्वमन् ।
र गुमाप पनिमः प्रमिप्यते
रामों में संधि काम पियामपंक शुग से साता
पद पद के भप्रमाग में सोये हुए के समान, मरर
हामरता है।
माभिमभामिनि।
समुपयामिर प .es
पापार निमम पिहो गमनुष्य पुनः
धिकारने बोराला, पद मानी गादी
मातानिस बार यरी गम' धारण करती है।
मात्यन्तपालमाय गत्वा पश्य बने तस्न । विचम्मरलार कुम्जाः सन्ति पदे पदे १०९॥ अत्यन्त सरल नहीं होना चाहिए, यदि अत्यन्त सरलता के दोषों को देखना चाहते हो तो यन में आकर वृक्षों को देखो। वहां सरल वृक्ष काटे जाते हैं और देदे में फैले यस्य चाप्रियमान्विच्छ पाम्नस्य सदा प्रियम् । व्याधा मृगवध कर्नु दा गायन्ति सुस्वरम् ॥20॥ यदि तुम किसी को अप्रिय करने की इच्छा रखते हो, तो सदा उससे मीठी बाते बोला करो क्योंकि हिरनों के मारने के लिए व्याध चंशी यजाया करते हैं। ऋणशेषोऽमिशेषश्च शत्रुशेषस्तथैव च। पुनः पुनः प्रवत्तन्ते तस्माभिःशेग्माचरेत् ॥11॥ मृण का शेप, अग्नि का शेष और शत्रु का शेप यह पुनः पुनः यदा करते हैं । अतएप इनका शेष न छोड़े। नहिश्चित् कृतेकायें कतार समवेक्षते । तस्मासर्वाणि कार्याणि सावशेषाणि कारयेत् ॥११॥ फाम के हो जाने पर कोई भी फर्ता को ओर नहीं देखता। अतपय फार्यों को समाप्त न करना चाहिए, कुछ थोड़ा भी रखना चाहिए। नोपेक्षितव्यो विधिः शत्रुरपोष्णवज्ञया। पहिरायोपि वृद्धः कुरतं मरमसाहनम् ॥91n तिरस्कार को दृष्टि से छोटे शत्रु को भी उपेक्षा विद्वानी को नहीं करनी चाहिए। धाग की एक चिनगारी भी यहकर समूचे जंगल को जला देती है।
vniww- कविता-कौमुदो। भादरासंगृहीतेन शत्रुणा शत्रुमुद्धरेत् । पादलग्न करस्थेन कण्टकेनेव कण्टकम् ॥१४॥ आदर पूर्वक अपने शत्रु को वश में करके उसके द्वारा दूसरे शत्रु का नाश करना चाहिए । जिस प्रकार पैर में गड़े काँटे को, निकालने के लिये दूसरा फाँटा हाथ में लिया जाता है। केचिदज्ञानतो नधाः केचिन याः प्रभादतः। केचिज्ञानावलेपेन केचिशष्टस्तु नाशिवाः ॥१५॥ कुछ लोग अशान से नष्ट हुए और कुछ लोग प्रमाद से, और कुछ लोगों को नष्टों ने नष्ट किया। पण्डिते न विरुद्धः सन्दुरेस्मीति न विश्वसेत् । दी बुद्धिमतोवाहू याभ्यां दूरे हिनस्ति सः ॥१६॥ पंडितों से विरोध करके इस बात के विश्वास से नहीं भूलना चाहिए कि मैं अपने विरोधी से दूर रहता है, क्योंकि बुद्धिमानों को बांह लम्बी होती है जिनसे ये दूर से भी मार गिराते हैं। चतुरः मुजताराजन्नुयायोस्नेन वेधसा । म सूष्ट:पंचमः कोपि गृहन्ते येनयोपितः mmm महाराज ब्रह्मा ने फेवल चारही उपाय बनाये हैं। उसने 'पाचयों कोई उपाय नहीं बताया जिससे खियां घश में की जांप। अपि दुजरकरणांपादपि पिपलपलवात् । अपि विधु दिलमितादिलोल ललनामनः ॥१८॥ हाथी क कानों से, पीपल के पत्तों से और बिजली की चमक से भी पद कर खियां का मन चस होता है। - . . ३३६ च्यासदेव। सा भायां या प्रिय म ते स पुसो यत्र नितिः । तन्मित्र' याविश्वामः स देशो या जीवति ॥१९॥ भायां यह है जो प्रिय योलती है, पुत्र यह है : कार्यों से पिता को सन्तोष हो, मित्र यह है जिस विश्वास हो और देश वही है जहाँ जीविका हो । निन्य प्रहृष्टया मान्य गृहकार्य' च दक्षपा। मुसस्कृतोपतेकरया नित्य चामुकद्दस्तया ॥२०॥ स्त्रियों कोसिदा प्रसन्न रहना चाहिए, अपने गृहका सावधान रहना चाहिए, अपने घर की पस्तुओं को स्व रखना चाहिए और समझबूझ कर खर्च करना चाहिए। खिया सेवेत नात्यन्त मिट गुज्जीत नाहितम् । अस्तब्धः पूजयेन्मान्यान्सेवेतामायया गुरून् ॥१२॥ स्त्रियों का अधिक सङ्ग नहीं करना चाहिए, मधि मिठाई खाना भी हितकारी नहीं. तत्पर होकर माननीयाँ सेया करे और छल, रहित होकर गुरुओं की सेवा करे । नया स्त्रीपु कर्तम्या दारारक्ष्याःप्रययतः। भनायुत्या भवेदीऽध्यां तस्मानो परिवयेत् ॥२२॥ स्त्रियों सेईयां न रखे, बड़े प्रयन से उनको रक्षा करे ईर्ष्या से आयु क्षय होता है, इसलिएईयां छोड़ देना चाहिए सूक्ष्मेम्योपि प्रसाभ्यः खियो रक्षहि सर्वदा। द्वयोहिं कुलयोपमावहेयुररक्षिताः॥२२॥ थोड़ी थोड़ी यातों को भोर से भो त्रियों की रक्षा करतो चाहिए, क्योंकि विना रक्षा किये वे दोनों कुलों को फलनि फर देती हैं।
कविता-कौमुदो । यदेव भतां जानीयान्मन्त्रमूलपरां स्त्रियम् । रद्विजेत तदेवास्याः सपोदेश्मगतादिव ॥३॥ पति को जिस समय यह मालूम होता है कि मेरी स्त्री मेरे घश करने के लिए मन्त्र और चौपधियों का प्रयोग करती है, उसी समय यह घघड़ा जाता है, जैसे घर में के साँप से गृहवासी धवड़ा जाते हैं। नास्ति यज्ञः नियः कश्चिम वसं नोपवासकः। पति शुश्र पते यत्सा तेन स्वर्ग महीयते ॥१३॥ त्रियों के लिए कोई यज्ञ नहीं, कोई व्रत नहीं और न कोई उपवास ही है । स्त्रियाँ अपने पति की सेवा करती हैं इसलिए उन्हे स्वर्ग मिलता है। पानमक्षास्तथा नार्या मृगयागीतवादिते । एतानि युक्तया सेवेत प्रसङ्गो ह्यत्र दोपवान् ॥१३५॥ शराय, जूमा, स्त्रियां, शिकार, गाना, वजाना, बुद्धिपूर्वक इनका उपयोग करें, क्योंकि इनमें अधिक आसक्ति से हानि . प्रसादो निष्फलो अस्य क्रोधश्वापि निरर्थकः। नते भतारमिच्छन्ति पद पतिमिव स्त्रियः॥३६॥ जिसकी प्रसन्नता का कोई फल न हो और जिसका क्रोध भी निरर्थक हो; उसको कोई भी अपना प्रभु नहीं बना सकता। जिस प्रकार स्त्रियां नपुंसक को पति बनाना नहीं चाहती। प्रजत्यधोधो यात्युच्चैर्नरः स्वेरैव कर्मभिः । खनित्रेव हि कूपस्य प्रसादस्येव कारकः ॥१३॥ 1 शारी मनुष्य माने कमी में ऊ नाना है और नीचे माता मा प्रोदने याला मी र अटारी बनाने व कारजाता भगता न परनिरगिट बन् । ममतामामा चलन १३८ पिना भयमर को पान यदि युहरूपनि भी कहे तो लोग जा को मर्म समझते है और उनका तिरस्कार करते हैं। पिरणामुरदेश मुनागरि। उपयतोः इसरोरिदमणि विदम्यते ॥ १॥ मुन्दर यचन घोलनेशला भी उपदेशक, अनधिकारियों के सामने क्या कर सकता है ? यहुत तेजमी कुठार लकड़ियों को नहीं फार सकता। पदयुताधमां वै प्रमाठि न तन्छलम् । धर्म एवापसन्धानां यत्रखतन्ति सलेष्वपि . धर्म तत्व न जाननेवाला आदमो यदि गलती * यह उसका उल नहीं, क्योंकि न देखना ही अधों का धन शिवस्वामी। ये कधि याश्मीरवामी थे। कशमीर के राजा अब धर्मा के राज्य समय में ये धे। मुक्तारण: शिवस्वामी शिनन्दनः । प्रयो रवाकरश्चागात् माघ्राध्येऽवन्तिवर्मयः।
। फयिता-कीमुदो। ३३६ राजा भवन्ति वर्मा के समय में मुक्काकण, शिवस्वामी, नानन्दवर्धन और रत्नाकर ये कांच वर्तमान थे। राजा यन्ति वर्मा ने ८५५ ई. से ८८४ ई. तक काश्मीर का राज्य किया था। राज-तरङ्गिणी से इसका पता मिलता है। शिव यामी का भी यह समय मिलता है। शिवस्वामी के किसी अन्ध का पता नहीं मिलता,पर इनका कोई प्रन्थ होगा अवश्य । इनकी कविता बडो अच्छी है, उसमें फाथ्य के गुण वर्तमान हैं । सुभाषित ग्रन्थी से उरत कर शियस्यामी के कुछ पद्य यहां लिखे जाते हैं। रक्ष विरोति परिकुप्पति निनिमित्त र्शन दुपयति वारयति प्रवेशम् । हसार दशति नैव च तृप्यनीति कौलयकस्य परालस्य चको विशेषः ।। पुसा थोर पल इनमें क्या भेद है? दोनों की बोली कठोर है, दोनों हो यिना कारण काय करते हैं, दोनों के सश करने से दोपहाता है, दानो हो रास्ता रोकने हैं, युरो वरह काटते हैं और तृप्त नहीं हाने । मुकामानि पयोगि भङ्गविलमहदुग्धा विसमन्वयः रफीतास्तामरमासा विहरयशोदामह सकतम् ।। सम्प प्रतिरेशमा विपमेहेरस पहाद्विते टीएष जरस्परमिने.कोप निवासासह ॥२॥ देस, प्रत्येक दिशा में मुक्ता के समान स्वच्छ जल है, तोरने पर दूध के समान प.मल नाल , उत्तम फमल फा मधु विहारमोड़ा के लिए रेतीला मैदान दे फिरस,
No text on this page.
. कविता-कौमुदी। सूर्य अस्त हो गया, अय तुम भी अपनी सहचरी के पास प्रो । भाई आनन्द पूर्वक सोओ, हे काम, तुमने सजन का किया। जब मैं रो रही थी स्नेह से मेरी आंखें जब भायी थी, उस समय जो निर्दय चला गया वह तुम्हारे लार के समय फैसे भा सकता है। वडापयन्न्या दयितस्य दुती वना विभू ध निवेशयन्त्याः। प्रमत्रता कापि मुग्वस्य यो वेषधिया नु प्रिय पार्नया नु ॥६॥ प्रिय फी दूनी से बाते भी करती धी और अपना ङ्गार कर रही थी, उस समय उसके मुख पर प्रसन्नता दिखायी मो, पह प्रसन्नता ङ्गार के कारण हुई या प्रिय की यातों के रण हुई, मालूम नहीं। भो भन त्या मुले टिलपिसलताकोटिमिन्दोर्वितर्ग साराकारास्तृपातों न पिवयि पयसः स्यूलविन्दुन्दलस्थान् । पापा सध्यास्तसन्ध्येम्पलिकुलशवली वेत्ति पाम्भोरुहाणां काम्ता तिश्पभीरूदिनमपि रजनी मन्यते चक्रवाnon टेली कमलईडी को साने के लिए तोड़ता है, पर दमा समझ कर उसे छोड़ देता है, यद्यपि प्यासा है तथापि मल पत्र पर पड़े हुए नल के पड़े पड़े बिन्दुओं को तारा मझकर नहीं पीता है, समर समूह युनः फासल की छाया अन्धकारमयो सन्ध्या समभता है, इसी प्रकार कान्ता के योग से डरनेपाला चायाफ दिन को भी रात समझता है। समानि मतम पकपदासीय या स्मरसमावी मायावी पिना करन या, बालुलापोम्याद पः प्रसादनत ममनविधिनासो वाला पेन विलिक्षिरे
No text on this page.
।
-
.
कविता-कौमुदी।
३४३
शोला भट्टारिका।
ये स्त्री कवि हैं। इन्होंने कोई ग्रन्थ बनाया है कि नहीं,
इसका पता नहीं। पर इनकी प्रशंसा में राजशेखर ने जो श्लोक
कहा है उससे ये कवि थीं, इनकी कविता उत्तम होती थी,
यह यात मालूम होती है। राजशेखर ने लिखा है-
शादायोः समो गुम्फः पापाली रीतिरप्यते।
शिला महारिकावाचि वाणोतिषु च सा यदि ।
शब्द और अर्थ दोनों का यरायरी विन्यास करना
पाश्चालीरीति कही जाती है, वह यदि शिला भट्टारिका के
पचन में या याणभट्ट की उक्ति में हो। इस लोक से मालूम
होता है कि महाकवि राजशेखर इनको किस दृष्टि से
देखते थे।
साधर पद्धति में एक लोक इनके और भोजराज के
नाम से उमृत है, वह लाक इस प्रकार है-
एमनुचिनमश्मरस पुरेसा
पदिइजरास्वरि माम्मथा विकारा,
पदापि मत नितम्तिीनां
स्तनपतनावधि जीवित रन वा।
इममोक के पहले दो चरण शोलामट्टारिका के ईधीर
दूसरे धरण भोजदेव के इमसे ये भोजराज के समय में
धी, यह निधिन होता है।
इनका नाम फेयल शोला है. रिसी राजकुल में उत्पन्न
होने के कारण या राजोगित सम्मान पाने के कारण महारिफा
- ३४६ धीह। १ स्थैर्य विचार प्रकरण, २ विनयप्रशस्ति, ३ खण्ड खण्ड खाय,४ गोडोयोशकुल प्रशस्ति, ५ अर्णय, वर्णन ६ छन्- प्रशस्ति, ७ शिवशक्तिसिद्धि; ८ नवसाहसांकचरित चन मादि। डा० व्यूलरने श्रीहर्ष का समय ११६३ से, १९७४ ता यतलाया है। यह यात ठीक भो मालूम पड़ती है, क्योंकि इन्होंने गण्डराज विशेषकर विजयसेन को प्रशस्ति लिखी इनफा भी यही समय है। श्रीहर्ष के पिता का नाम श्रीहीर और माता का नाम मामलदेवी था। नैपधीयचरित के अन्त में इन्होंने अपने विषय में ताम्बूलद्वयमासनं च लभते यः कान्यकुम्भेश्यरात्' लिखा है, अर्थात् जो कान्यकुब्जेश्वर से दो घोड़ा पान और भासन पाता था। यह इनकी प्रतिष्ठा की बात थी। राज. शेखर कहते हैं कि धीहर्ष जयन्तवन्द्र के समकालीन थे । ये बड़े ही बुद्धिमान और विद्वान् कवि थे। भाग पर इनका एकच्छत्र भधिकार था। इनका नैषधीयचरित एक मान्य काव्य समझा जाता है, इसका संस्थतहों में अच्छा आदर है। द्विजपतिप्रसनाहितपातकाभव कुष्ठसितोकृतविप्राः। विरहिसोवदनेन्दुजिघन्सया स्फुरति राहुरयन निशाकरः ॥३॥ विरहिणी का प्रलाप । दमयन्ती चन्द्रमा को देखकर फहती है, यह चन्द्रमा नहीं है, यह राष्ट्र है। चन्द्रमा का प्रास करके जो पाप इसने अर्जन किया है, उसासे इसके समस्त शरीर में कुष्ठ रोग उत्पन्न हो गया है, जिससे इसका शरीर । फाधिता-कौमुदी। श्वेत हो गया है। अब यह वियोगिनी स्त्रियों के मुखवन्द्र को प्रसना चाहता है। पद विधुन्तुदमालि मदीरितस्त्यासि कि द्विजराजभिया रिपुम् । किमु दिव' पुनरेवि यदीशः पतित एप निपेय द्वि घारुणीम् ॥२॥ हे सखो, मेरी ओर से जाकर तुम राहु से कहो कि तुम शत्रु फो द्विजराज समझ कर फ्यों छोड़ते हो ? क्या यह पुनः स्वर्ग में जा सकता है ? क्योंकि यह वारणी के सेवन से पतित हो रहा है। यारणो शगय फो कहते हैं और पच्छिम दिशा यो । चन्द्रमा पच्छिम दिशा में अस्त होता है, सो यात फो फपिने पारणी के साथ से चन्द्रमा का पतित होना पत. लाया है। पतित के मारने में डर क्या? दमयन्तो ने इन उकियों से चन्द्रमा को मारने के योग्य सिद्ध किया। परिपुतीपणसुदर्शनविभ्रमाकिमु विधु प्रसते स विधुतुदः । निपतित' पदने कयमन्मथा वलिकरम्भनि निजमुम्झति ॥३॥ मालूम होता है कि राहु विष्णु के सुदर्शन चक्र के धोखे में माफर चन्द्रमा को नहीं निगलता अतएव । यह अपने मुंह में भाये हुए को भी छोड़ देता है। पुरुरे पुख्नेकमयोधन' पहिरितो मुकर पुरुष्व मे । विशति तत्र देव विभुमदा सखि मुखादरित' जहितहतम् ॥ सपिभपने दाय मेंहयादा लो और सामने एक शोशा रक्यो । जय उस शीशे में चन्द्रमा घुसे तय उसको सूप माणे, क्योंकि यह गहे। परामपुर पुष्पवा दिनहर पुर्यदिशम् । रममा विशस्ति थपिया सिमरासुमुरासिमुदरा II
No text on this page.
कविता-कौमुदी। नी आंखों को प्रसन्न करो, अर्थात् खान के समान सुन्दर हारे नेत्रों को ऐसी ही अच्छी चीज़ देखनी चाहिए। एतस्य सावनिभुजः कुलराजधानी काशी मवीत्तरणधर्मतरिः स्मरारे। यामागता दुरितपूरितचेतसोऽपि पाप' निरस्प चिरज' विरजीभवन्ति ॥on इनकी कुल- राजधानी काशी है, जो महादेव की संसार. ने के लिए धर्मनीका है, जहां पापपूरित मनुष्य आकर पाप-रहित होकर रजोगुण-रहित हो जाता है। भालोक्य भाविविधिकतृ'कलोकसृष्टि- कष्टानि रोदिति पुरा कृपयैव रुगः । मामेच्छयेति विषमागमधत या संसारतारणतरीमस्जपुरी सः ॥१८॥ पहले के समय महादेव ने ब्रह्मा को लोकसृष्टि में होनेवाले वों का विचार करके रोदन किया था-रुद्र नाम प्राप्ति की च्छा से उन्होंने रोदन किया था, यह केवल यहाना है, क्योंकि न्होंने संसार से तारण करने वाली नौकारूपी पुरी उन्होंने नायी। पारायसी निविशते न वसुधरायां तत स्थितिमखभुजां भुवने निवासः । तत्तीर्यमुतवपुषामत एव मुक्तिः स्वर्गात्पर पदमुदतु मुदे तु कीदक् ॥१९॥ काशी में रहनेवालों का निवास पृधियों में नहीं, किन्तु देवताओं के लेाक में उनका वास है; अतएव वहां शरीर आड़नेवालों को मुकि होती है, यदि स्वर्ग से पदकर पद मिलता है, तो इससे पदकर समता की यात क्या होगी।
३५२ श्रीहर्ष। सापुग्यमृग्छनि मनस्य मयाम्धिराद- नो पन्युरेत्य नगरी नगराजपुश्याः भूताभिधानपटुमपतनोमवाप्य मोमो भवति मावमिवाम्रधानुः ॥२०॥ हे भैमि, संसार समुद्र का जन्तु पाती के पनि महादेव की नगरी में आकर उनमें मिल जाता है, क्योंकि यह तारा ब्रह्म का उपदेश देती है, जिस प्रकार भूतकाल कहनेवटी विभकि में अस धातु का कप मय हो जाता है। निर्विश्य निर्विशति काशिनिवासिमोगा- निमाय नर्म च मियो मिथुन यथेच्छन । गौरीगिरीशघटनाधिकमेकमा शर्मिक कितमवति पशतायाम् ॥२॥ काशी में रहनेवाला दम्पती परस्पर इच्छापूर्वक भागों को भोगकर और यथेच्छ क्रीड़ा करके देहान्त के समय गौणे और महादेव के एकीमाव से भी अधिक कल्याण परमत से युक अभेद भाव का अनुभव करता है। म भरधासि यदि तन्मम मौनमस्तु काया निजामतमयैव तवानुभूत्या । न स्यात्कनीयसितरा यदि नाम कारमा राजन्वती मुदिरमानधन्वना भूः ॥२२॥ यदि नुम मेरी बातों पर विश्वास नहीं करती हो तो में चुप हो जाती है, तुम्हारा अपना अनुमय ही तुम्हें फहे, त्य के द्वारा पालिन होनेवाली अमरावती काशी से छोटी है कि नदों।
कविता-कोमुंदी। शानाधिकामि सुकृतान्यधिकाशि कुर्याः कार्य किमन्यमयनैरपि या मृत्योः एकजनाय सतताभयदानमभ्य- दुये यहत्यमृतमशमवारितार्थि ॥ २३ ॥ तुम शानी हो, तुम्हारा ज्ञात अधिक है, तुम काशी में पय कमी फो करो। अधिक क्या कहा जाय जहाँ मृत्यु से दा मनुष्यों के लिए अभयदानरूपी मोक्षसत्र दानशाला) 'लता है, और दूसरा जहां से अधों विमुख होकर नहीं दिने धसी अमृत जल की 'गङ्गा पहनी है। । सुबन्धु । पासवदत्ता माम की एक याख्यायिका इन्होंने गध में सपी है। संस्थत में गद्यकाव्य लिसनंबाल कवियों का यहा ममाय है। दो ही तीन गद्यकान्य लेखक संस्थत में पाये ति है, उन्हीम एक सुशन्धु भी हैं। सुबन्धु पाणभट्ट से पहले पविभाधयं होता है इस यायि के साहस पर, क्योंकि पन्धु जिस समय थे, उस समय गद्यलेखकों का पिलकुल माय दी था। उस समय सस्त फाम्य बनाये जाते थे, र पच में, गय में नहीं। ऐसे समय में गय लिखना यि हो पाहम को पात है। महाकपि मुयन्धु सरस्थती य? मत थे। इनकी समझ थी कि मेरी कविताराति स्वती के प्रमादमे पहुई है। यह बात इन्होंने स्वयं मी घासताको मालागना में तिला है-
मुग।
परततोलामा सुमधुः गुग्नकः |
प्ररपर पनिाममधिनियाधम ।
गुमना मित्र गुमान ने मरम्मती के दिये हुए पर
से पप नियम्पकमाया जिमका प्रत्येक मार श्लपमय
सपमुनमुपशु ने माने नियन्ध के लिए जैसा लिगा है।
साही। इनफे विषय में यापमह ने माने हवाद
नामफ गपकाभ्याम लिया है-
च्चीनानगरमा नून यायपदया,
शरपेर पाशुगण गनग कांगोयम् am
यासयदत्तारो अवश्य ही कवियों का अभिमान नष्ट हो
गया, मिस प्रकार शक्ति के कार्य के अधीन होने पर पाण्डो
फा गर्य नष्ट हो गया था। मुबन्धु ने अपनी वासवदत्ता में
पौद्धसगति नामफ इग्य का उल्लेख किया है, इस प्रन्यो
का धर्मफीति नामक एक यौद्ध पण्डित थे। ये धर्मकीर्ति
५.०० फेलगभग हुए थे, इससे इनफा समय भी पांव
‘सदीका प्रारम्भ भाग मानना चाहिए । पर इस विषय में म
'भेद है, कुछ लोगों का कहना है कि वासवदत्ता कीय
पुस्तक में "यररुचिभागिनेय महाकवि सुबन्धु विरचिता
लिखा है। इससे यह सिद्ध होता है कि ये कवि घररुचि
'भांजे थे।ये यररचि विक्रमादित्य के समकालीन थे। पास
यदत्ता में विक्रमादित्य का उल्लेस भा मिलता है। इनके
पुछ ग्लोक सुनिये।
• भवति सुभगत्वमधिक विस्तारितपरगुणस्य सुजनस्य ।
बहति विकासितकुमुदो दिगुणरुचि हिमरोद्योतः ॥
जो दूसरों के गुणों को फैलाते हैं, जो खुलकर परगुण
कोतन करते हैं, वे सुजन हैं, उनकी रमणीयता और भो
.
-~~-~- कविता-कोमुदी। घक होती है, इस कारण-दूसरों के गुण वर्णन करने के रण अपनी छोटाई होगी इस प्रकार की शङ्का निर्मूल है। द्रमा को किरण फमली ( कुमद) को विकसित करती इससे उनको शोभा और बढ़ती ही है । गुधिनामपि निजरूपप्रतिरत्तिः परत एव संभवनि । समहिमश नमक्षणोकुरतले जायते यस्मात् ॥२॥ गुणियों को भी अपने रूप का झान दूसरों के द्वारा हो ता है। ये स्वयं अग्ने गुणा को नहीं जान सकते, नेत्र पने गौरव का अनुभव तय तक नहीं कर सकते, जय तक उनके सामने दर्पण न रखा जाय । विग्घरतोप्यतिविपनः खत इति न मृपा पदन्ति विद्वांसः । पर मलद्वेषो सकुल पो सदा पिशुनः ॥३॥ विद्वानों का यह कहना झूठ नहीं है फि पल स से भी फर भयानक हैं। क्योंकि सा नकुल द्वेपो है (कुलसे न फरनेवाला, भथया नेपले से द्वेष करनेवाला है)पर धुगल- र कुल पो है। यह भरने कुल का हो नाश परता है। प्रतिमहिने ये भवति सकानामतीर निपुणा धीः। तिमिरे हिकोशिकामा प्रतिपद्यते दृष्टिः पा नोचकर्म भरने में पलों की युद्धि पड़ी ही तेज हुमा रती है। देखिए न उल्लुमों को माखे मधेरे में ही रूप बरा करती है। शिणलरगुजामा मतियानामतीर मलिमत्वम् । भरिकाशियामपि सलिम्मुखा मनिनिमाम्चधिका
।
गामदेव मः।
मन पर ही मशिन होत है. ये दुमरों के गुणों पर
कामिगता पर चन्द्रमा की मग्न परमजिता
निपा मारता..पर इम उमी फालिमा घटतो नहीं हिनु
बदनी ही है।
इनम भूमिमरिनो पति या पया मरः सुग्नम् ।
गमित नपुग्नं सपा नया निमरमाणम् ॥
दुर्जन मनुष्य मन्ननों को यदनाम करने का-उनको नीचा
दिगाने फा ज्या ज्या प्रयता करता त्या त्या ये अधिक
उयल होने जाते है, जिस प्रकार दर्पण पर राम लिस्टा
दुमादाय ज्या ज्या फरा जाय, न्या त्या
यह अधिक उम्म्बल
हो जाता है।
सुरागो पातामोस पुनरतिपुष्पैकरमिको,
प्ररस्तश्याम्याने गुरुरुधितमार्ग' म निानः
करस्तस्याम्स्यन्न' स्पशतिशतकोटिप्रणपिता
स सर्वस्व दाता नृणमिव मुरेश विजयते ॥
यह देवताओंकी रक्षा करता है, यह नितान्त पुण्य का
प्रेमी है, उसको सभा में वृहस्पति है, यह सदा उचित मार्ग
में निरत है, उसके हाथ करोड़ों से प्रेम करनेवाले हैं, वह
भपना सर्वस्यदान करता है। इस प्रकार यह इन्द्र को भो
जीत लेता है।
सोमदेव भट्ट
इन्होंने "कथासरित्सागर" नाम की एक पुस्तक लिसो
है। यह कथासरित्सागर गुणात्य को वृत्कथा के माधार
-~- कविता-कौमुदी। पर लिखा गया है । गुणाढ्य की वृहत्कथा पैशाची भाषा में लिखो गयी थी और वह सात लक्ष लाकों में समाप्त थी। उसका पढ़ना और समझना कठिन था इसलिए सेग्मदेव ने संस्कृत भाषा में कथासरित्सागर बनाया { अनुष्टुप छन्द में यह ग्रन्थ लिखा गया है, यड़ा है, यह कथा-ग्रन्थ है, काव्य के लक्षण इसमें नहीं मिलते। अतएव संस्कृत के कवियों की श्रेणी में इनका कोई ऊंचा स्थान नहीं है। ये कश्मीर के निवासी थे और कश्मीर के राजा अनन्त देव के दरबार में रहते थे, अनन्तदेव की रानी का नाम सूर्य- पता था और सूर्य वती की प्रसन्नता के लिए ही इन्होंने कथा- सरित्सागर का निर्माण किया है। राजतरङ्गिणी से मालूम होता है कि १५५ शक के पश्चात् अनन्तदेव कश्मीर का राजा हुआ मतपय सोमदेव का भी यही समय मानना युक्तियुक्त प्रतीत होता है। इनके कुछ श्लोक नीचे उद्धृत किये जाते हैं। उन्मुक्तमानकलहा रमच दयितान्त्रिता इतीव मधुगलापा कोकिला जगदुर्जनान् । 'मान फलह का छोड़कर प्रिय के साथ रमण करो, यही पात फोफिल मधुर शब्दों में लोगों से कह रही है। विथुरप्यति धन्दनमनहति मित्राध्यपि रिपवन्ति। विधुरे वेसि खिन्ने घेतसि विपरीतानि भवन्ति । भाग्य के विपरीत होने पर, हृदय के खिन्न होने पर चन्द्रमा सूर्य के समान हो जाता है, चन्दन अग्नि के समान । हो जाता है और मित्र शत्रु के समान हो जाते हैं। पूरा नदीनो पुष्पाणि वृक्षाणि शशिनः कलाः क्षीणानि पुनरायान्ति गौवनानि न देहिनाम् ।
को सूचना दी है, और ऊंट उन्हें ले आया है। अब सूचना
नदी को पारा पुनः मा है. शो में कुल मी डाले
रहनं है, मद्रमा की पता न होकर पुनः महती है,
शरीर पारियों की गयी जानी न लौटनी।
पारम
मुमः:पेन पुरा निप्रितम मुके।
प्रभाषितानि गुमन्ययामाः |
पूर्व जन्म में जिगनं जमा कर किया है अवश्य
उसको उसका फल भोगना पड़ता है, पूर्व जन्म के फर्मों में
प्रया मी उलट नहीं मकने ।
मतोमाशा तयाः हिलनुभिरायता
दुरारापाशविरमा धराः पर्वतार।
धनी पयंत के समान होने है, दोनों ही यई कठिन और
स्तब्ध (अचल) होते है, दोनों ही हिंस्र प्राणियों ( कर मनुष्य
या पशु) से युक्त होते है और इनकी आराधना मी बडो
ही कठिन होती है।
भागममूचितो येन येशानीनो गृह प्रनि
प्रयम सति कः पूरयः किं काकः किंमेलकः ।
हे सखि, घतलाओ, पहले किसकी पूजा की जाय, कौर
को या ऊंट की, क्योंकि कौए ने पहले घोलकर पति के माने
देनेवाले को
पूजा
'की जाय या घर पर ले आनेवाले की।
हर्पदेव
ये राजा थे और कवि थे। नागानन्द, प्रियदर्शिका और
रनावली ये मन्थ इनके बनाये हुए हैं। माण मयूर मौर
।
कविता-कौमुदी।
माता दियाफार इनके सभा-पपिहन ये यह यात राजशेखर
के मोचे लिपे लोक से प्रमाणित होती है।
भहो प्रभावो वादग्या पम्मानदिवाकरः
श्रीरस्मभवलपम्पः समो वाणमयूरयोः ।
पागदेवो फा प्रभाय विचित्र है, मातङ्ग (चाण्डाल )
दियाफर धीहर्ष की समा फा सभ्य हुमा सो भी पाण और
•मपूर को परायरी का।
राजा धीहर्षदेव के विषय में कहा जाता है कि पे स्वयं
फपि नहीं थे, किन्तु धन्य पारियों से अन्य धनवाकर इन्होंने
अपने नाम से प्रकाशित किया है। इसके प्रमाण के विषय में
एक शोक उद्धन किया जाता है।
रेनोभारतमानि वा मरमुख पदानि वा एन्निनाम,
धीरगममपितानि गुणिने रागापडलाच तर
पारानुसार मिनिहारेररिता कोतप.
मा कम्पपेऽपि पानिजम मनाए मम्मे परिम्लामताम् ।
भयान राजा धीर ने जी पाण को सोने के सोभार
रिय पपया मतवाले हाधियों का दल दिया पदभार कहां
पर पाण में सुन्दर उत्तियों से धोइपका कानिगान किया
पदनो प्रसारक भी ग्लान महीं होगा।
एक मोर सोमजोरम पात के प्रमाण में उपस्थित
प्पिा amt. सोरुपद है।
रामोनमारगशिमा शानिनो मामिला
रागिरायोमीराराधिना
रिसादार सोच्लम,
जापानमरि missी ।
.
हम भोर में मां गति पान को प्री के बार पिता का न होने का उन्लेम है। इन साका मापार पर धार या अभियोग लगाया जाता है कि उहाँन फपियों का प्रययनयाहर उनका प्रचार माने नान मंफिया, पर जिन प्रमागों के आधार पर यह भनिन मगाया जाता है. प्रमाण इतने पुष्ट नहीं है, जिनमें इस अनि यांग पी पुष्टि हो। कार निमें मामी में फेल यही मंत्र लिपी गांकि याणमट्ट का राजा यांहदेव ने अपने की गान के उपलक्ष में पारितोषिक दिये यात ठीक है। व भह ने श्रीहर्षयरित नामक गय काव्य बनाया है जिर धाहर्ष फा गुणगान है और उमौके उपलक्ष में उनको पार तोपिक भी मिला। डा. ग्युलर ने रामाश्रीहर्षदेव को याण और मयूर भाश्रयदाता लिसा है । इनको रतायली नाटिका एफ'लोक- बदामोत्कलिक विपाण्ररचं प्रारम्भा क्षणा- दापास रवमनोनुगमैरविरलैरातनतोमात्मनः अपोपानलतामिमो समदनां नारी मिवान्या भ्रूवम पश्यन् कोपविण्दुरण ति मुन तस्याः करिष्याम्यहम् । भानन्दवर्धन ने अपने ध्वन्यालोक नामक अन्य उद्धृत किया है। इससे ये मानन्दवर्धन से पहले के सिर होते हैं। ६०८ से ६५० के बीच इनका राज्यकाल है। हुपन संग और यूरोपियन मिशनरी इनसे मिलने आये थे। दक्षिण प्रान्त फी इन्होने यात्रा को थी और द्वितीय पुलकेशो को जोता था।
कविता-कौमुदी। कुछ लोग कहते हैं कि धायक नाम के कवि सेरल्होंने रक्षापली बादि ग्रन्थ यनचाये थे। पर यह कहना नितान्त भशुद्ध है,क्योंकि धायक कालिदास से भी प्राचीन हैं। कालि.. दास ने अपने मालायिकाग्निमित्र नाटक में धावक कवि फा नाम लिया है। ऐसी दशा में धावक का श्रीहर्प के लिए अन्य यनाना फैसे सम्भव हो सकता है ? भराटमलोलमजिझ न्यागिनमनुरागिण विशेषज्ञम् । यदि नाशयति नर' श्रीः श्रीरेवहि वनिता ता ! जो शट नहीं, चञ्चल नहीं, फुट्रिल नहीं, जो दाता है, अनुरागी है और विशेषज्ञ है, उस मनुष्य का यदि लक्ष्मी माश्रय न करें, तो समझना चाहिए कि यह लक्ष्मी का हो दुर्भाग्य है। विधायापूर्व पूर्णेन्दु पायामुखमभूभुवम् । धाता निजासनाम्भोगविमिमीलनदुःस्थितः ॥२॥ प्रहर स नायिका का मुप अपूर्व पूर्णचन्द्र के समान पनाकर पड़ा ही दुःपो हुआ, क्योंकि उसे भय था कि कहीं पद फमल जिस पर मैं घेडाई' चन्द न हो जाय। चन्द्रमा के उदय से कमली का यन्द होना ससार में प्रसिद्ध है। मसीदेनिय यामिदमसति कोपेन घटने करिष्याम्ये मो पुनरपि मोदण्युपगमः। ममे दोस्तीति पमिदमपि हि शासि मरा किमेतस्मिन्य शमगिति म यदि प्रियतमे ॥३॥ भामिनी नायिका के प्रति काई यह पहा है-पदि में कई कि तुम पुरा हो जाभो तो यह अनुचित है क्योंकि तुमने तो को नहीं किया है। पिना पोप फेबमा फहना अच्छा नहीं। ।
No text on this page.
फविता-कौमुदो।
३६३
विरहिणी खियों ने धान फटाक्षणी भंगारौ से चन्द्रमा को
जलायाह योर उसो प्रण फा यह चिन्ह है।
अमुक औराय प्रतिनियतमृत्युप्रतिभिये
ममुःप्रीतः प्रादादुरस्तिपादस्य कृते ।
गुmil कोटी देशदशनकोरिक्षतगिरी
हिन्दन यष्टी मदादिगुगन् मधुलिहः ॥
इस घोर को- जिसके लिए मृत्यदण्ड नियन था-श्लोक
के दो पर पाने के कारण प्रसन्न होकर महाराज ने दस
जटि गुri, माठ ही दिये। ये लोग भोज प्रबन्ध में
भाजायधीर जोर फे. यागारमयन में उड़त है, पर मुमा-
दिमागली में धीहद और चोर के नाम से लिये गये हैं।
मुम्पे पानुचना फेयमार र दृश्यनं ।
पानिपनि गामि गुगैरेव ग साया
गुग्ध, धनुष चलाने की नुम्हारी यद निपुणता अपूर्ण है।
जिगणे गुणा दोरी, या उसम गुण) से दो चित्त पिप जाता
P.पापी नदीं।
गुम पामे रामदत मोरनिति।
भस्यानु पौगिर परमविति
गुप, गुमना गहीं पानी, घार पिता दिये प्रास नहीं
मापदपीगग भी बल है, यह पोहा।
प्रतिमि भिमा निगानिमि।
विमालिकिन
पया तुम्हारे अंगों में पर दोजा या नुनकर निगल
आपनदिनी पर गुमानी, माटम नदी पड़नागि
मात
No text on this page.
कौमुदी-कुञ्ज
( वक्रोक्ति)
sin' ही मृगप भिर मीसकरात्रि
कामेको वर पशुपतिनक दृश्यं विराणे।
मुग्धे पाणु:स परति 'सीरितेशः शिवाया
गाडारम्पामिनि तरवार पातु वभन्दा ata
शिष मोर पायंती की उनि प्रन्युक्ति । शिर जी की यातों
पापपरीत मयं समझ पार पायंती जी उनका उत्तर देती है।
पानी में पूछा, नुम पीन दोशिय ने कहा, मैंगलोर (शूल
पारण परमेवाला) । पापंता में मालरोगयाला भर्प समझ
करदा, फिर पंच मोहदिए । शिव ने पादा, प्रिये में
भीलम पानी में भीलपट बामपुर मपं समझकर
बादा, एक के. ( मेरी पोली) पोसिपाशिने
मैं
पशुपति पापंती में पगुपति का पल मपं समझकर पदा,
सांगतो दिखायी नहीं पहनी शिष ने पदमा
पापीलातुराम पिना टालरातका पूरा समझार
पहा. परपल पर एगोनियम पदाम गिरा (पार्षदी)
परिवानी में शिरा का रिपारिणम मममसर
पहार अंगल में जाए। म उत्तर में शिवजी मुर
तर पिर भारी परें।
इपदेय।
सदयगिरिम'गोर्य बदनापहत्तकान्तिसवस्वः।
परक मिवोचकर स्थितः पुरनानिशानायः ।।
तुम्हारे मुखमण्डल से कान्ति चुरा कर यह
उदय गिरि के मस्तक पर बैठा है और आगे से फत्व
के लिए ही मानो इसने अपने कर (किरण था हाय
किये हैं।
प्रणयविशदा दृष्टि' वक्त्रे ददाति न शहिता
घटयति धन घण्टाश्लेपन सान्द्रपयोधरा ।
पति बहुसो गच्छामीति प्रयाएताप्यहो।
रमयतितरां संकेतस्था तथापि हिकामिनी
शडित होने के कारण प्रेमपूर्वक सामने नहीं
और न हद पालिडन ही करती है, प्रयक्षा पूर्वक
जाने पर भी धारचार "जाती है, जाता है"कहाच
फिर भी सङ्केत स्थान में आयी हुई कामिनी प्रस
उत्पन्न करतो है।
द्राष्टिमधोददाति कुरुने नालापमाभापिना।।
शम्यायो परिवृत्यतिष्यति बलादालिगिता येपते।
निर्यान्तीपु मनीषु वासभरनानिर्गन्गुमेहते।
जाता पामतपेव मेच सुप्रीम नपोड़ा APRIL
देखने पर मां नीची कर संती है. पाने कर
बोलती नही, शयन में फरपट यदल पर सानी है, पल ।
मालिंगन फरने पर फांपने लगती है, जब उसकीस
घर से बाहर जाने लगती है, तो यह भी उनके साप
जाना चाहती है, इस प्रकार नवी धूमपनी प्रतिमा
ही मेरी प्रसन्नता पदारही है।
.
कौमुदी-कुञ्ज
( वक्रोक्ति)
'शूली मृगप भिपज मीलकण्ठः प्रियेट
कामेको वद पशुपतिनय दरप दिया।
मुग्धे पाणुःस परतिक जीवितेशः शियाया
गटारापामिति हतरा: पातु बन्द
शिर और पापंती की उनि. प्रत्युक्ति। शिव जो की यातों
का पिपरीत भई समझ फर पायंत्री जी उनका उत्तर देती है।
पापंती में पा.तुम फोन दो शिर में फदा, मैंगलोर (शूल
पारल पारनेपाला)। पापंती में ग़लरोगपाला मर्य समझ
फिर पंप को दिए । शिप ने कहा, प्रिये में
मालकपट । पापंती में नीलकण्ट का मयुर मयं समझकर
द, एक का ( मारपी पोली) पोलिए । शिर ने पदा, में
पशुपति, पानी में पगुनि पल पप समारं पादा,
गदिमादी नहीं पाती।शिष पदम पातु।
पार्वती मातुनमा पिना दालान का पृक्ष समझकर
कहा पर पान पो लगागिरमकदा मशिरा (पाती)
पापापाती में शिगा रिपारित भई समझकर
पार गत में जार।ग उत्तर शिप जो चुप
तपसि पिर भारी पाकरें।
No text on this page.
कविता-कौमुदी। थात है यदि तुम ईश्वर हो तो नंगे क्यों रहते हो और धूलि में सने हुए क्यों रहते हो? पण्डितवादस्ता यदि लोकेद' ऽयम्बको विदित एपः। अम्बा कापि न ते प्रजल्पसि त्वं कुतस्विरः ॥५॥ यदि तुम पण्डितों के समान वोलती हो, प्रकृति प्रत्यय के दिमाग से अर्थ करतो हो, तो समझ लो मैं स्यम्यक है। पार्वती ने समझा किध्यम्बक का अर्थ है तीन सम्बक (माता) घाला, भौर यही समझकर उन्होंने कहा, क्या यकते हो, तुम्हारी तो एक भी मा नहीं है, और तुम कहते हो तीन, यह फैसी यात! कि मैं दुरोदरेण प्रयातु यदि गणपतिनं तेभिमतः । का प्रष्टि विनायकमदिलोकः किं न जानासि ॥६॥ शिव ने कहा, मुझे दुरोदर (जूया) से कोई मतलय नहीं । पाय ती ने दुरोदर का अर्थ समझा, युरे पेटवाला अर्थात् गणेशधीर यही समझकर उन्होंने कहा, गणपति पसन्दन हो, सो यह यहां से चला जाय। शिय ने कहा, यती,विनायक (गणेश) से पान द्वेष करता है ? पार्वती ने विनायक का अर्थ समझा गरड़ और उन्होंने कहा, गरड़ से ट्रेप करनेवाले सर्प, क्या यह भी मालूम नहीं है? चदमरणेन विना नास्ति रमे कि प्रयतपस्येयम् । देश्य यदि रचितमिद मन्दियाहयतां राहः ॥ शिप भीर पार्यतो भूमा मेल रहे थे। शिवने चन्द्रमा फो पाजी परस्पा, पार्वती जीत गयी । शिने कहा, फिर गेलो। तब पार्वती ने कहा, पिना चन्द्रमा को लिए मैं न सलूगी,
No text on this page.
neminarAmARM कचिता-फौमुदी पोदारो मत्सरमस्ता विभपः स्मपदूषिताः। भयोधोपहताश्चान्ये जीर्णम सुभाषितम् ॥२॥ समझदार मनुष्य मत्सर से मरे जाते हैं, घे हसरे को प्रशंसा सुन नहीं सकते और धनी दर्प से चूर हो रहे हैं, अन्य मनुष्य अज्ञानी हैं, उनको समझ नहीं है, ऐसी दशा में सुभाषित सूकियों को शरीर में ही पच जाना चाहिए, इनके उपयोग का कोई म्यान नहीं है। पहूनि नरशीर्षाणि लोमशानि वृक्षन्ति ध। प्रीवासु प्रतिवद्धानि किचित्तेपु मकर्षणम् ॥३॥ बड़े पड़े और बालबाले अनेक मस्तक लोगों के गले से जड़े हुए हैं। पर उनमें धाई हो ऐसे हैं जिनमें माफ- पंकता हो। ते बन्धास्ते महात्मानस्ते लोके स्थिर यशः । पनिषद्धानि काम्यानि ये वा काम्येषु कीर्तिताः ॥४॥ घे पन्दनीय हैं, वे महात्मा है और संसार में उम्हीफा परा पिर है, एक तो पे जिन लोगों ने काव्य पनाये हैं और दूसरे ये जिनका वर्णन कायों में किया गया है। .पारयति समतहस्त रमपिनातिन भवेध निदेश। स्पादितयादि कविस्तापनि कथया दुरिव १५५ भजनों के हाथ में जायगो, उनको प्रसन्न करेगी, भौर निदोष सायित होगी. इसी प्रकार की चिन्तानी से कविता करनेवाला फधि कन्या के पिता के समान सदा घुला दुर्जनहुनाशत कायमुवा विशुदिगुण्याति। शेषितम्य समाम्मतपरिमनपः प्रयत्नेन PER
No text on this page.
कविता-कौमुदो। शब्दों से प्रकट होनेवाला अभिप्राय -जो फेयल कोमल पदों में स्फुरित होता है उस अभिप्राय को शरीर के रोमांच के द्वारा जो कहते हैं पर शद के द्वारा नहीं, मुंह से एक शब्द तक नहीं निकालते ऐसों को केवल हाथ ही जोड़ना चाहिए। घेतः प्रमादजनन विवुधोत्तमाना- मानन्दि सरसयुक्तमतिप्रसन्नम् । काव्य खलस्य न करोति हृदि प्रतिष्ठा पीयूषपानमिववक्रविधर्ति राहोः ॥१०॥ सय रसों से युक्त और प्रसादगुणपूर्ण काव्य उत्तम विद्वानों को प्रसन्न करता है तथा श्रानन्दित करता है। पर दुर्जनों के हृदय में उस काव्य को स्थान नहीं मिलता, जिस प्रकार अमृत राहु के मुँह हो तक जाता है और मुंह ही में घूमा करता है । शरीर नहीं इसलिए और जाय कहाँ। हे राजानस्त्यजत सुकविप्रेमअन्धे विरोध शुदा कीतिः स्फुरति भवतां ननमेतन्प्रसादात् । तुष्टद्ध तदलघु रयुस्वामिनः सच्चरित्र हटनांतधिभुवनजयी हास्यमार्ग दशास्यः ॥११॥ हे राजागण, फपियों को प्रेमपूर्ण कविता के प्रति आप लोग अपना विरोध छोड़ दें। आप लोगों की यह उज्ज्वल कीर्ति जो फैल रही है, यह कवियों ही की कृपा है । देखिए प्रसन्न होकर कवियों ने एक छोटे रघुकुल के स्वामी का यड़ा । भारी चरित्र निर्माण किया और क्रोध करके त्रिभुवन को जीतनेवाले रावर को तुच्छ यना दिया है। -
No text on this page.
कविता-कौमुदो। शब्दों से प्रकट होनेवाला अभिप्राय -जो केयल कोमल पदों में स्फुरित होता है उस अभिप्राय को शरीर के रोमांच के द्वारा जो कहते हैं पर शन्द के द्वारा नहीं, मुंह से एक शब्द तफ नहीं निकालते पेसों को केवल हाथ ही जोड़ना चाहिए। चेतःप्रसादजनन विबुधोत्तमाना- मानन्दि सर्वरसयुक्तमतिप्रसन्नम् । काय खलस्य न करोति हृदि प्रतिष्ठा पीयूषपानमिववक्रविवर्ति राहोः ॥१०॥ सय रसों से युक्त और प्रसादगुणपूर्ण काव्य उत्तम विद्वानों को प्रसन्न करता है तथा श्रानन्दित करता है। पर दुर्जनों के हृदय में उस काव्य को स्थान नहीं मिलता, जिस प्रकार अमृत राहु के मुंह हो तक जाता है और मुंह ही में घूमा करता है। शरीर नहीं इसलिए और जाय कहाँ। हे राजानस्त्यजत सुकविप्रेमबन्धे विरोध शुदा कीर्तिः स्फुरति भवतां नूनमेतन्प्रसादात् । तुष्टदं तदलघु रयुस्वामिनः सचरित्र रुष्टैनीतस्त्रिभुवनजयी हास्यमार्ग दशास्यः ॥330 हे राजाराण, कपियों को प्रेमपूर्ण कविता के प्रति आप लोग अपना विरोध छोड़ दें। थाप लोगों की यह उज्ज्वल कीर्ति जो फैल रही है, यह कवियों हो की रूपा है। देखिए प्रसन्न होकर कवियों ने एक छोटे रघुकुल के स्वामी का पड़ा मारो चरित्र निर्माण किया और क्रोध करके त्रिभुवन को जीतनेवाले रावण को तुच्छ बना दिया है।
---
।
परलोकान्दोकाननुदिवरमभ्यस्य ननु ये
धतुपादी कुयु यंहब इह ते सन्नि कवयः ।
अविरिलोडगडलाधिदरीरीतिसुहर
मुद्या देशव दधति शिपांचन गिरः ॥2
दूसरों के कतिपय श्लोकों को कण्ठस्प करके वार ५
फेलोफ बनानेवाले कवियों की कमी नहीं, वैसे कवियर
यहुत हैं। निरन्तर निकलनेवाली ममुद्र की लहरियों ।
समान हृदय का वश करनेवाली और स्वच्छ पाणी किस
फिसो को ही होती है।
हेम्ना भारशतानि वा मइमुचा वृन्दानि वा दन्तिना
श्रीपसमर्पितानि गुपिने वायाय कुत्राच तत् ।
या वाणेन तु तस्य मूक्तिविसौराहिताः कोतंय.
स्वा: कपप्रलयेपि यान्ति न मनाइमन्ये परिम्लानताम् ।
राजा श्रीहर्ष ने गुणी याण करि को सैकड़ा तोलें सुप,
मतवाले हाधियों का समूह दिया था, पर सर भाजपा
हैं, उनका पता नहीं। पर यापमह ने अपनी पापो के द्वारा
उनकी फीतियां गुफित को तो प्रलय होने पर भी
मलिन नहीं हो सकती। धनियों को अपने धन दान फागर
नहीं करना चाहिए, क्योंकि उनका धन पुछ दो दिनों के लिए
है और फरियों को कविता चिरस्थायी है।
पम्मीरप्रभवेण रामनरतिष्पसिन धर्मात्मनी
ग्याल्यान: किल्लकालिदापकदिना श्रीपिकमान,
भोजधित्ताविहारभृतिभिः गोपि विचारते:
याति यान्ति मोरा पिरफार भारत
कविता-फौमुदी। ३७३, याल्मीक कवि ने रामचन्द्र का वर्णन किया है, व्यासदेव ने युधिष्ठिर का वर्णन किया है, कालिदास कवि ने राजा विफमदेव का वर्णन किया है चित्तप और विल्हण आदि कवियों ने मोजदेघ का वर्णन किया है, विद्यापति ने राजा कर्णदेय का वर्णन किया है। इस प्रकार राजाओं की प्रसिद्धि फवियों के द्वारा होती है, नगारा पीटने से नहीं। परिश्रम जनमन्तरेण मौनवतं विम्रति घाग्मिनापि। पायमाः सन्नि विना महन्तं पुस्कोकिलाः पद्यमशदोपि ॥१५॥ परिधम समझनेवाला मनुष्य यदि न मिले तो यका भी मीन धारण कर लेते हैं। देविए पंचमराग गानेवाली कोयल भी जय तक घसन्त नहीं आता तय तक चुप रहती हैं। सुमापितेन गौतेन पुक्नीको चसीलया। मनोन भियते यस्य स योगी हाथदा पशु:॥६ सुभाषित से, गान से, खियों के हापभाव से जिसका मन चंचल नहीं होता, पहायोगी है या पशु । सिचापि मुभापिनेन रमने स्वीयः मन' सदा भूपाम्पस्य मुमारित रानु मनः धोनु पुनर्वाग्मति। महामानवतोयनेन दिवशीतुं ममयों भवे- वयोति गुभाषितम्य मनुजैरावश्यक संमत.n मन दुखी होती भो यह गुमापित से प्रसन्न हो जाता है। दूसरों का मुमापित मुन पुनः मन सुनना चाहता है, मूर्ख भौर परिजन दोनों इसके द्वारा यश किये जा सकते हैं।
मिश्रा - अयों गिरामपिहितः पिहितः कश्चि- सौमायमैति महत्वपुकुचामः। नान्धीपयोघर इवानितरां प्रकाशी नो गुजरीस्तन इवातितरां निगः १८t शन्नों का अर्थ कुछ छिपा और प्रकाशित होने प राष्ट्रस्त्रियोंकि कुच के समान प्रशंमा पाता है। मा के स्तन के समान विलकुल प्रकाशित रहना भी भरण- और न गुजरी स्त्रियों के समान नितान्न छिपा ही हुभा मित्रा हेमशार मुधिये नमोस्तुते दुसरे दुराः परीक्षितम् । कायनामरयमश्मना मम' पापयेतदधिरोप्यते नुदाम 10 हे सनफार, मोने के माभूषणों की परीक्षा करना कठिन था, इस कारण आपने उसे पत्थर के साथ रामू पररण दिया, मापकी इस थुद्धिमानी के लिए मापको नमस्कार। मुगार मातापितानि वनि विमिनोनि। भचारमाधारिया या पहीपनि मन्दिर हे सुवर्णकार, तुम कानों में पहनने के गहने लेकर यहाँ चने आये हो । मालूम होता है कि तुमने आज तक यह पात नहीं सुनी है कि इस गांव के ठाकुर के कान अभी तक नहीं छेदे गये हैं। काकः स्वभावचपलः परिशुद्धवृत्ति- लंदा यहिं स्वजनमाह्वयने परांश्च । धर्माश्चिमांसवति हनिकलेवरपि चाटिन्ति च परान्कृपवस्वभावः ॥३॥ कीमा स्यभायतः यशल होता है पर उसका स्वभाष अच्छा होता है, यह जय थोड़ी सी बलि पाता है तव अपनी जातिवाला तथा दूसरों को बुलाकर उसमें शामिल कर लेता है। पर कुत्ता यदि हाथि का शरीर भी पाये, जिसमें चमड़ा इडियां और काफी मांस हो, तो भी यह मपने भाई यन्धुमा को नहीं धुलाता, यदि घे भाजाय तो उनसे इंप करता उन्हें मारता है। इसका कारण स्वमाय की कृपणता । गृह श्मशान गजधर्म चाम्बर पिलेपन' भस्म पृपश्च वाहनम् । कुवेर दिसपते न हमसे प्रियस्य ते सख्युरियं दरिद्रता ॥४॥ कुपेय, तुम्हे लत्रित होना चाहिए कि तुम्हारे मित्र शि जी ऐसी ददिता मोग रहे ६ । श्मशान को उन्होंने अपन पर पनापा, हाधी के चमटे का पे घर धारण करते है शरीर में भस्म लपटने गार घट की सारी करते हैं कितनी दयनीय ददिता है और नुम धनपति कह जाते हो।
३
मिश्र
आवदकृत्रिमसराजटिल समित्ति-
रारोप्यते मृगपतेः पदवी यदिपा।
मचेभकुम्भतटपाटनलम्परस्य
नादं करिष्यति कर्थ हरिणाधिपस्य ॥५||
यदि कुत्ते के गले पर धनावटी सटा यनाकर लगा।
जाय और वह सिंह के आसन पर बैठा दिया जाय तो
वाले हाथियों के मस्तक फाड़नेवाले सिंह के समानर
कैसे कर सकता है ?
कितेन हेमगिरिणा रजताद्रिया वा
यस्थाधयेण तरवस्तरवस्त एच ।
मन्यामहे मलयमेय यदाश्रदेश
शाहोदनिम्यकुट जान्यपि चन्दनानि l
उन सुवर्ण और चांदी के पर्वतों से क्या लाम, पयों
इनके भाश्रय में रहनेवाले वृक्ष, वृक्ष ही पने रहते हैं, उ.
कोई परिवर्तन नहीं होता। हम लोग तो चन्दन वृक्ष को
सर्या समझते हैं, जिसके आश्रय में रहनंयाले निम्य कुट
भादि वृक्ष भी चन्दन हो जाते हैं।
कार
पाविम्योपचिन' विदुममणिः स्थापितो दृष्टया-
हामधीः महशस्तपोभिरपि कि गुनाफलैः प्राप्यते ।
सस्कान्तिः शतशॉपि विपतनम्नः युतः मैरपति
যাধা মা মহাবি বি কম অন্যথায় ?
को धन के लिए निदेश जा रहाउत्तरा कोई पून
है कि किम घर के लिए नुम विदेश जाने हो। तुम्हारा
के मोठों की कान्ति, मी मूगों को महीं मिल रावती
।
उसकी हंसो की शोमा तपस्या करने पर भी मुक्ताफल नहीं पासकते,सोना चाहे हजारों यार याग में कृदे पर उसे वैसो शरीरफान्ति नहीं मिल सकती, फिर ऐसी रतमयी दयिता को घर में छोड़कर तुम किस धन के लिए जा रहे हो। विरहिणी का प्रलाप भवापि हि नृशसस्य पितुरते दिवसा गतः । तमसा पिहितः पन्था पहि पुत्रक शेवहे ॥१॥ विरहिणी पुत्र को संयोधन करके कहती है, आज फा भी दिन योन गया और तुम्हारे निटर पिता नहीं आये, मार्ग अन्धकार से छिप गये, अब क्या भायेंगे, भाते भी होंगे तो कहीं ठहर गये होंगे, येटा, अब चलो हम लोग सो रहें। पशुः किकम्पस मूठ स्वयि दीनेऽध्रु वाहिनी । पोमा स्यावा गोऽच कथमेष्यति सस्फुरे ॥२॥ भरी मूर्य आँख, तुम क्यों फॉप रही है, जिस समय तुम दीन थी, भासू यरमा रही थी, उस समय जो मुझे छोड़कर चला गया. यह पया आत तुम्हारे फरफने में चला भायेगा। स्वपमजात दुःखोयगनोनीति न विस्मयः । व पुनः प्राप्तदाही याहसीनि किमुप्पताम् ॥ विरहिणो कामदेय को सम्बोधित करके कहती है- जिसने कभी दुःख नहीं उठाया है, यह यदि तुःस्त देनीसमें कुछ भाधर्य नहीं होता। पर पामदय तुम्हारा शरीर तो अलाया जा चुका है, फिर मुझे क्यों जलाते हो। पारोपित परिवाया कामरितुः माथि पुगनिन ।
AM सत्यमडगतमभंकमायताझ्या पायनिया प्रादित करण दिनान्त ४ा सन्ध्या का ममय था, पनि विदेश या सामने ही धूलि घाफर से लिपटा हुआ उसका पुत्र था, उसने कहा, क्यो थेटा तुम्हें अपने निटुर पिता की याद आती है ? गोदी में बैठे यालक से इस प्रकार कहकर सन्ध्या के समय पथिक की स्त्री फूटकर रो पड़ी। ससि म सुभगो मन्दस्नेहो ममेति न मे व्यया विधिविरचित यस्मात्सर्यो जनः सुम्बमश्नुते । मम तु सतत सन्तापोयं जने विमुखेपि य- क्षणमपि हती तो न याति विरागताम् ॥५॥ सखि, मेरे प्रिय मुझ पर कम प्रेम करते हैं इसका मुझे। तनिक भी कष्ट नहीं है, क्योंकि सभी मनुष्य अपने भाग्य के अनुसार सुख भोगा करते हैं, मुझे सबसे बड़ा कष्ट यदि कुछ है तो यही कि वे तो मुझसे इतने विमुख रहते हैं, पर मेरा निर्लज मन उनकी ओर से तनिक भी विरत नहीं होता। तैलाक्तानलकाकपोलपतितानुत्क्षिप्य कान्ति वखान पिलग्विना सरभस प्रभाव पीनी स्तनौ । वाला वायसमेग्माहरुदतो दास्यामि यो प्रियं मूनागरपादप मज शनैर्य मि में वछमः ॥६॥ तेल से सुपड़े केशों को जो उसके गाल पर मा गये थे समेट कर कानों के पीछे उसने कर दिया, लटरते हुए आंचर से अपने मोटे स्तनों को उसने शीघ्रता पूर्वक छिपा लिपा,फिर रोती हुई कोप से योली, काका, नुमको जो विय है यादी तुमको मैं दूगी, यदि नुम भाम के पद से धीरे से फरार के " पेड़ पर चले जाओ और इस प्रकार मेरे पति के आने को मुझे सूचना दी। प्रस्थान घलयः पृत प्रियससम्परजस्त्र गत एत्यान क्षणमाप्सित सामिन चिरोन गर्नु पुरः । गन्तु' निश्रित चेतसि वियत सवे मन प्रस्थिता गन्तव्ये सति जीवितप्रियमुदस्वार्थः किमुपज्यने ॥७॥ पति विदेश जा रहा है, नायिका अपने प्राणों से कह रही है, फंकणों ने प्रस्थान किया अर्थात् विरहवेदना के कारण हाथ पनले हो गये और इससे कंकण गिर पड़े, प्रिय मित्र भासू भी चले गये अर्थात् रोने गेने भांग सूख गर्यो। धैर्य ने एक क्षण भी टारना उचित नहीं समझा, यह मन के साथ ही चला गया, इस प्रकार जय प्रिय ने प्रस्थान करना निधित किया, तय समी ने साथ हो प्रस्थान किया, प्राण, तुमको भो तो जाना ही है, फिर इनका साथ क्यों छोड़ते हो। निधासाः वदनं दान्ति पदय निमूलमुन्मप्यते निदा नैति न दाते प्रियमुख नत दिन मते । भर शारमुपैति पादपतितः प्रेयस्तिदोपेक्षितः सहयाक गुणमाकलप दयिते मान वर्ष कारिनाnen सांस मुंह को जला रही है, हृदय मानों पक रहा है, नींद नहीं भाती, प्रिय का मुस भी फहीं दिपायो नहीं पड़ता, रात दिन रो रही है, शरीर सूख रहे हैं। उस समय निय हमारे पैरों पर पड़ा था भीर हमने उपेक्षा की थी। समियो, किम गुण के भरोसे तुम लागों ने हमें प्रिय पर मान करने के लिए कहा। भय तो यह भाता नहीं, हमारो यह दशा है, भर उपाय? । - यावतो ससि गांचा नयनयोरायाति सावन गस्वा यदि ययाद्य ते इयतयां मानः ममालम्बितः । दूप्टे धूत विचेष्टिते तु दयिते तस्मियवश्य मम स्वेदाम्भः प्रतिरोधनिभरतनाः स्मेर मुन जायते ॥९॥ सखी ने नायिका से कहा था कि आज तुम अपने प्रिय के विषय में मान करो। उसी का उत्तर नायिका इस प्रकार देती है। जब तक ये (नायक: मेरी आंखों के सामने न आतमी तक जाकर तुम उनसे कहो कि तुम्हारी स्त्री ने आज मान किया है, क्योंकि जय मैं उनको सामने देख लूंगो, जय घे तरह तरह के मज़ाक करने लगेंगे उस समय मेरा समस्त शरीर पसीना पसीना हो जायगा और हंसी आ जायगी। इदानी शीयामिदहन इव भाभिः परिवृती ममाश्रय सूर्यः किमु ससि रजन्यामुदयते, अयं मुग्धे चयः, किमिति मयि ताप प्रकटय- त्यनाथानां वाले किमिव विपरीतम भवति ॥ सखि, मुझे यड़ा आश्चर्य है कि मग्नि के समान तीमी फिरणों से युक्त यह सूर्य रात को उदित होने लगा है। सखी ने कहा, मरे भोलो, यह सूर्य नहीं चन्द्रमा है। नायिका ने कहा, फिर यह मुझे तपाता क्यों है। सखी ने कहा परी, अनापों के लिए सभी विपरीत ही होता है। पात्रामङ्गलमविधानापनापन ममीना जने, वास्याम्म:विहितेक्षणे गुरुजने तनमुहम्मगा। भाशय महीक्षणारिता कृयापि कामतः । हिमनगा मया मुमनापाशो न काटेऽपिताam
जिस समय सखियाँ यात्रा के लिए मङ्गल घस्तुओं को
'एकत्र कर रही थीं, बड़े लोगों को आँखें आँसू से ढंक गयी
थीं, मित्रों की भी वही दशा थी, प्राणेश भी पृथिवी की ओर
देख रहे थे, उस समय अभागिन लज्जा के कारण मैंने क्यों
नहीं अपनी लनारूपी भुजाओं को उनके गले में डाल दिया।
दूतीप्रेपण।
जीवामीति वियोगिनी यदि लिखेदत्रैव वृत्ता:कथाः
भय श्वोय मरिष्यतीति भरणे कालात्ययः किंकृतः।
आगन्तव्यमिति सम्प्रति सखे संभावना निष्फला
भ्रातः सम्प्रति याहि नास्ति लिखितं तदबूहि यक्षमम् ॥
नायिका अपने विदेशी पति को सन्देश भेज रही है, पर
क्या कहना चाहिए यही उसकी समझ में नहीं आता। मैं
क्या कहू', यदि कई कि मैं अभी तक जीती हैं तो यह बात
थियोगिनी के कहने योग्य नहीं, यदि थियोगिनी ऐसी यात
कहे तो समझिए सय यात ही खतम हो चुकी। यदि यह
कह कि एक दो दिनों में मर जाऊंगी, तो मुझसे पूछा जा
सकता है कि मरने में इतना विलम्य क्यों किया। यदि
कहूँ कि आप यहाँ आय, तो यह यात झूठी ही होगी, इसकी
तो संभावना भी नहीं है। फिर भाई अब आप जाय, मैं क्या
लिखू सो कुछ समझ में नहीं आता, जो आप उचित समझ
यह कह दीजियेगा।
--
- अपूजितवास्ति गिरोन्द्रकन्या कि पक्षपातेन मनोमवस्य । यद्यस्ति दुती मरमोक्तिदक्षा दासः पतिः पादतले वधूनाम् ॥२॥ पार्वती की पूजा न भी की जाय तो कोई हानि नहीं, कामदेव पर अनुराग करने की भी आवश्यकता नहीं है। यदि दूतो मधुर वचन बोलने में निपुण है तो पति स्त्रियों के चरणों के पास दास के समान हो सकता है। पृथागाथाश्लोकेरलमलमलीको मम स् कदाचिद धूतोऽसौ कविवचनमिन्याकलयति, इद पाश्वें तम्य प्रहिणु परिलग्नायुनचय- सबाप्पोन्पोडथगितलिपि तायुगलम् ॥३॥ स्तुति के श्लोक बना कर भेजने से क्या लाम ? मेरे दुःख की चर्चा से मो कोई लाभ नहीं, सम्भव है वह धूत इन सप पातों को कविकल्पना समझे। उसके पास ये ही दोनों कर्णफूल भेज दो, जिस पर के अक्षर अञ्जनयुक्त मांसू से भोगने के कारण मिट गये हैं। पाच्य तस्मै महरि भवभूरिवि पवाही, स्नेहरिद्ध मम वपुरिद कामहोता जुहोति । प्राणा तस्मै तदिहमुचितां दक्षिणा दामीहे, धनादेशो भवतु भवतां पत्त्यमेगमधीश ४ सखि, उससे कहना कि आपको वियोगरूपी मग्नि उसके शरीर का फामीहोता इयन करता है, यह स्नेह के द्वारा सूर्य बदायो गयो है । भय मैं उस हयन कर पाल को अपने प्राण दक्षिणा में देना चाहती हा माए माशा क्योंकि मापन सयके स्थामी है।
. कविता-कौमुदी। उहह पापि सस्तीवरः समुचितांमुलहाय लमामल भिन्वामीतिभर निरस्य च निज' सौभाग्यगर्व मनाक् । आज्ञा केवलमेव मन्मथगुरोरादाय नून मया वं निःशेषविलामिवर्गगणनाचूडामणि. संभूतः ॥५॥ सखियों की बात न मानकर लज्जा का त्याग कर भय छोड़कर अपने सौभाग्य के गर्व को भी हटाकर केवल काम. देवगुरु की आज्ञा को ही मानकर मैंने तुमको सय विला. सियों का चूडामणि बनाया है। इति स्व तरुणी युवा स चपलः श्यामास्तमोभिर्दिशः सन्देशः सरहस्य एव विपिने सतकावासका भूयो भूय इमे वसन्तमरुतश्चेतो हरस्त्यन्यतो गच्छ क्षेमसमागमाय निपुणे रक्षन्तु ने देवताः ॥६॥ इति, तुम युवतो हा, जिसके पास जाती हो वह भी युया और चञ्चल है, दिशाएं अन्धकार से छिप गयो है, सन्देशा भी गुप्त है, धन में जाना है जो सङ्केत-स्थान के समान है, यह पसन्त की हवा वारयार चित्त को सोच लेती है, अच्छा मङ्गल-समागम के लिए जाओ, तुम स्वयं चतुर हो, देवता तुम्हारी रक्षा करें। न च मेऽवगच्छति यथा लघुतो करुयां यथा च कुरुते स मयि । निपुण तथै नमभिगम्य वदे- रभिति काचिदिति सन्दिदिशे ॥७॥ किती नायिका ने दूती से कहा, जिससे मेरी लघुता प्रकट न हो और वह मुझ पर दया भी फरे, इस प्रकार चतु. रता पूर्वक जाकर उससे कहना। .
विरहो का प्रलाप ।
हारोपि नापितः कण्ठे संमोगस्पर्शमीरया
आवयोरन्तरे जाताः पर्वताः सरितो दुमाः॥
बिरही कहता है पहले मैंने गले में एक हार मी नहीं
रहने दिया था, क्योंकि उसके और मेरे शरीर के मध्य में
थोड़ा भी अन्तर मुझे असहा था। आज मेरे और उसके
बीच में बड़े बड़े पर्वत नदिया और वृक्ष हैं, आज हम उससे
पहुत दूर हैं।
प्राणानां च प्रियायाश्च मूढाः सादृश्यकारिणः ।
प्रिया कण्ठगता रन्य प्राणा मरणहेतवः।
प्राण और प्रिया इन दोनों में जोसमानता करते हैं ये मुह
है। उनको मालूम नहीं कि प्रिया जय कण्ठ में लगती है।
उससे मानन्द होता है और प्राण जय फण्ठ में आते हैं।
मृत्यु हो जाती है। फिर
इनका सादृश्य
कैसा?
द्वरस्था यस्य दयिता नवा पीनपयोधरा।
सस्प संतापशमने न वापी पयोधराम
नवीन और पीन पयोधर ( स्तन ) पाली जिसको दूर
उसके ताप शान्त करने के लिए न तो यापी (नालाय)
न पयोधर मेघ ही समर्थ होते हैं।
मपु'समिति जारवा वा प्रति प्रेपित मया।
मनम्नत्रय रमते इताः पाणिनिमा वयम् ॥
याकरण पाणिनि ने मन शद को नपुसक पर
६,मने इस सच समझा और नपुंसक समझ कर है
।
1
कविता-बीमुदी।
उसे पिया के पास भेज दिया, पर मन तो वहीं रम गया।
हाय, पाणिनि ने मुझे धोखा दिया।
मुखेन चन्द्रकान्तेन महानोले: शिरोर है।
पाशिम्या पपरागाम्बा रेजे रयमयीव सा॥
यह तो रसमयी के समान मालूम पड़ती है, उसका मुंह
चन्द्रकान्त है । चन्द्रमा के समान मुन्दर है, केश नीलमणि के
समान अर्थात् काले हैं, उसके दोनों हाथ पद्मराग मणि के
समान लाल है।
सापदेयाश्यमयी पारलोचनगोधरे।
पशुपयादतीता गु विपादयतिरिप्यते ।
दयिता तभी तक धमृतमयी रहती है, जय तक आँखों के
t. सामने है, भांषों के ओझल होने पर तो यह पिप से भी
पदफर हो जाती है।
मूसा संयोगमिष्यन्नि वियोगरतु मयेप्यते ।
एकच गमे वाला दियोगे तन्मयं जगत् ।
जो मूगई ये दयिता के साथ संयोग चाहते हैं, तो
पिपोग चाहता हूँ क्योंकि संयोग के समय पर फेपल एक
दी रहती है, पर पियोग फे. समय समस्त जगत् उसके रूप
फा हो जाता है।
एचपामे वागवियोगे मन्मयं जगत् ।
मोरकार एवाप वियोगः न निन्यते ।
सहम के समप फेयल एफ. यही दपिता रहती है, पर
वियोग समय समस्त मंमार तन्मय हो जाता है। इस
प्रकार वियोग उपफार दो करता है, फिर उसकी निन्दा
क्योंपी जातो?
--
L
पिरहो का प्रसार।
---
मेनमामो मागंगा में नापममा यमा।
को पानामानि यायायायालया सपा
उगमा मेरा बीनता यह महीने के सस
मोर उमपिना महीना पीनना यह य के सम
tionोगेश माने दीरनाम।
मदिरापमाणमुरपांग याम्पनि ।
पदिरिया पं. वियोग के ममय भी दीनतापूर्वक रो-
जाय तो म ममागे मरण का उपयोग कहां होगा। प्रिया
पियांग के म्यागत के लिए मृत्यु ही उपयुक है।
कामिनीकापकतारे कृषपर तदुर्गमे ।
मा सयरमनःपायपाति स्मरतस्कर.
कामिनी का शरीर एक पन है, यहां स्तनरूपी दुर्गम
परत है। हे पधिक मन, तुम उम यन में विचरण मत करो,
पयोंकि यहाँ फामदेय नाम का एक चोर है।
मनः शुक निरतं स्व कामिनीगणदादिमाद ।
कामध्यान विन्यस्त वप्रास्त्यसक्जालकम।
हे मनरूपी शुक, कामिनी के कपोलरूपी दाड़िम (अनार)
तुम हट जाभो, पोंकि फामरूपी व्याधने पहां केशों का
जाल फैला रखा है।
त्यागोनिसायसनानि हन्ती-
न्यलोकमेत दुवि संप्रतीतम् ।
जातानि मर्दम्पमनानि तस्या-
स्यागेन मे मुमक्लिोपनायाः ।
कविता-कौमुदी। लोग कहते हैं कि त्याग करने से सव दुःख दूर हो जाते । पर मुझे मालूम होता है कि यह झूठी बात है। मैंने तो जिस दिन से उस सुन्दर नेत्रयाली का त्याग किया है उसी दिन से सभी दुःख मेरे सिर आपड़े हैं। निराधमीलितदशो मदमन्थराया नाप्यर्थवन्ति न च यानि निरर्थकानि । भद्यापि मे मृगढ़शो मधुराणि तस्या- म्नान्यक्षराणि हृदये किमपि ध्वनन्ति ॥ निद्रा के कारण जिसकी आँख झपी हुई हैं, जो मद के कारण अलसायी हुई है, उस मृगनयनी के ये मधुर यवन- जनके न तो कुछ अर्थ ही हैं और न जो निरर्थक ही अाज भी हृदय में गूंज रहे हैं। हर हर करुयापराड मुखोय गणयति तान्यपि वासराणि वेधाः । कुवलयनयनास्तनान्तरेषु क्षणमपि मेषु न शेरते युवानः ।। शिव, शिव, यह ब्रह्मा बड़ा ही निर्दय है जो यह उन दिनों को भी आयु में शामिल करता है जिन दिनों में युवक एक क्षण के लिए भी कमलनेत्रा दयिता के स्तनों के मध्य में नहीं सोते केश: सामाक्षिकामपिचिर'पा विनती विधति या गानेषु धन विलेपनमपि पस्त म सोई क्षमा । दीपस्यापि शितान दासमवने शमोति या दीक्षितु सा ताप विरदानहरप मासः सोर्ट्स कप शयति ।
जोkarinainो
है,Attitratmaram
केकीको!
HERE ITriमाधीmre:
Yam mamme TEE IT'
Arthamir nा।
पर. muniमी
₹म पर मr: भो नी का
मार पाल , माद उसकेकी
t.रममग पर
प्रपात
गणे मार्ग पर पनीर शाही है।
warmya THEATRITI पा
मामा पानि विकतो मन जाता।
गोपाल परापासपामिदिया
मारला निधिना विवाधिनः
विही माने मित्र में माने स्वर का वृत्तान्त कह रहा है।
मादम पहलागि मैंने मात्र स्थान में मानी नियनमा को
देखा, पद गुममें फिरी हुई थी। नहीं: मुझेन मुमो, पेसा
कहती भोर रोना दुई यह पड़ा में जाने लगी। प्रालिगन
परफे सिर पचनों के द्वारा जप तक मैं उसे प्रसन्न कर, मा,
समी तक राउ विपाता ने मुझे निदा-दरिद कर दिया अर्थात्
मीद खुल गयी। इस शोक यनाने के कारण इस कवि का
माम निदादादि पड़ गया था।
.
YUYUM
------
कविता-कौमुदो ।
३८६
दूतिवाक्य
मौने निषपणा कृतभरिरक्षा
खदानलीना देधती जटाश्च ।
सात्वत्कृते भ्यानपरा वराको
चतं महापाशुपत प्रपत्रो ॥
दूती नायक से कहती है-उसने (नायिका ने ) मौन
धारण किया है, अनेक प्रकार से उसकी रक्षा की गयी है
अथवा उसने राख लपेटो है, खाट पर उसके अंग पड़े हुए हैं,
अथवा खटिया का पाया धारण किया है, उसने जटाधारण
की है, सदा ध्यान में मग्न रहती है, इस प्रकार यह विचारी
तुम्हारे लिए पाशुपत प्रत कर रही है।
खे खेदमन्दा विनिवेश्य दृष्टि-
मालोक्य शोभातिशय घनानाम् ।
नेदीयसा सा मरणेन किश्चि-
दाश्वासिता प्राणिति मास्म भैषीः॥२॥
दुःख से मन्ददृष्टि से आकाश को भोर उसने देखा, मेघों
को अलौकिक शोमा उसे दिखायी पड़ी। इस कारण अय
शीघ्र ही मरना है, इस आश्यास से यह अभी तक जीवित है,
डरो मत।
कि पृष्टेन हुततरमितो गम्यतो सा प्रिया ते
दृष्टा मातदिवसमखिल सायमेक मयैव ।
पान्धे पान्थे त्वमिति रभसोप्रीवमालोकयन्ती
इष्टदरे न भवति भवानित्यु दर पलन्तो ॥३॥
TITE Timran Tituttamil itam Title माननी wit. matattrimilar HTTE firmIIT. PITITIAttr anी arreratent matt fattha. witter.mar आमा, गुमाश्रीको देवा है, या मार गुनने के लिए arnाली पीपी प्रमिरमानों पी. ram m. सपनाही ना थी, या मुंफारमर तोगहलो पो। म परिमेयार पहाभली रिमायमरी पाfromमिना Trnमायोग्यमानी मानी मा मागिर: मामा काटा के समान है, घर को पुफरिणी का नुवाग्नि के समान है, सताए तो माले के समान हैं, की पापी मी ताप देनेगली है. पायु तोगे पागों के मार के समान है।पति वियोग के समय नायिका के लिए, मी प्रहार फेममान है। सारा महाशिशिमालार- स खिोपित सवर विपापाः ।
M M कविता-कौमुदी। मालेयशीकरसमे हृदि सा कृपालो वाला क्षण वसति नैव खल त्वदीये ॥६॥ तुम प्रिया के उस हृदय में सदा वर्तमान रहते हो, जिसमें विरहाग्नि की ज्वाला सदा धधकती रहती है । पररूपाला,यर्फ के समान शीतल तुम्हारे हृदय में उस बाला को एक क्षण के लिए भी स्थान नहीं मिलता । चिसोत्कीर्णादपि विषधराद भीतिभाजी निशायां किन्नु घ मस्त्वदभिसरणे साहसं नाय तस्यः । ध्यान्त योन्या यदतिनिभृत बालयात्मप्रकाश- सासात् पाणि पधि फणि फणारबरोधी व्यधायि ॥७॥ नाथ, जो सर्प की तसवीर देख कर भी डरती है उसीका तुम्हारे लिए अभिसरण करने में जो साहस देखा गया, वह - मैं क्या कह । अंधेरे में यह जारही थी, उसने साँप के सिरके रन का प्रकाश देखा और डर गयी। पर, शीघ्र ही उसने अपने हायों से उस प्रकाश को छिपा लिया। न हार नाहार कलयति विहार विपमित्र, स्मरन्नी सा रामा सुभग भवतश्रागमदिनम् । पर क्षीणा दीना परमसुखहीना सुबदना, ऋतपक्षग्लौवचपलनयनाङ्गीकृतगतिः ॥ ८ ॥ हार और भादार कुछ भी नहीं लेती, बिहार को विष समझती है,सुभग तुम्हारे आने के दिन का सदा स्मरण किया करती है, इससे यह सुबदनाक्षीण दोन और सुखहीन होगी है। अमावास्या के चंद्रमा के समान उसकी दशा हो गई है। सखो के प्रति प्रश्न । किम्व इति गता गतारिम सुभगे तस्यान्तिक कामिनः कि सुरिर करोति किममौ बीणाविनोदक्रियाम् । . ..
सपी के प्रति प्रश्न।
--
सौभाग्योदयगर्वित: किमपदवीना दत्तवा-
कि गायिदि वापगद्गदतया पूर्नस्थ मायादिमा Um
सखी और नायिका का कथोपकथन । इति, क्या नु
उनके पास गयी थी! सखी ने कहा हां, मैं उस कामी के पा...
गई थी । नायिका ने पूछा, क्या तुम ने उन्हें देखा। उसने
कहा, यड़ी देर तक मैं देखती रही । नायिका ने पूछा, ये क्या
करते थे? उसने कहा- चीणा बजा कर मन यहला रहे थे।
नायिका ने पूछा, अपने सौभाग्य पर गर्व करनेवाले उन्होंने
क्या कहा ? दूती ने कहा, नहीं, कुछ भी नहीं । उन्होंने कुछ
उत्तर हो न दिया । नायिका ने पूछा--क्या अहङ्कार के कारण
उचर नहीं दिया ? उसने कहा, नहीं, उनका गला भर आया
था। नायिका ने कहा यह उस धूर्त की चाल है।
मर्मणि स्पति मापते शिय'
प्रेम संस्मरति रन्ध्रमीक्षते ।
ईदृशस्य बहुचितकारिणी
विक्रियापिन शठस्य लक्ष्यते ॥२॥
अवाजे फसता है, और प्रिय योलता है, प्रेम का स्मरण
करता है, पर श्रुटिण दा करता है। इस प्रकार अनेक तरह
को माया करनेवाले उस धूत का फ्रोध भी मालूम नहीं
पड़ता।
भलमलमरणस्य तस्य नाम्ना
पुनरपि सेव करा गतः स कालः ।
कथय कथय वा तयापि दति
असिक्यन द्विषतोऽपि माननीपम् ॥५॥
+---- --- कविता-कौमुदो । ३६३ उस पापी का नाम न लो। फिरचही यात, उसका समय चीत गया { अधया दुति, य हो यहो, शत्रु का भी उत्तर पुन लेना चाहिए। क्थय निपु कस्मिन् नुए। कय सकियसिर किमपि लपित कि तेनोन कदा स इहपति। इति यहुविध मालापप्रकल्पितयिस्तराः प्रियतमकथा स्वप्नेऽप्यर्थे प्रयान्ति न नेताम् ॥ ४॥ ठोक ठीक कहो, कहां और फैसा देखा? कितनी देर तक देखा? ये क्या चाहते हैं ? उन्होंने प्या कहा है ? का ये आवेंगे? इस प्रकार के प्रियतम सवन्धी विविध प्रेमालाप यदि स्वप्न में भी हो तो अच् ही है, इसमें फाई अनिष्ट नहीं। स्त्री एकान्तसुन्दरविधानजनक धाता सर्वाङ्गकान्तिचतुरकरूपमस्याः। मन्ये महेश्वरभयान्सरजेन प्राणाधिना युवतिरूपमिदं गृहीतम् ॥१॥ ब्रह्मा सर्वाङ्ग सुन्दर वस्तुओं के निर्माण में अनभिE और इसका रूप सर्वाङ्ग सुन्दर है। मालूम होता है, शिव भय से अपनी रक्षा करने के लिए कामदेव ने ही स्त्री का कर धारण किया है। कितारुण्यतरोरिय रसभरोनिया नया मनरी शोलाप्रोकिदत्य बिहारिका कारण्यवारा निः।
No text on this page.
कविता-कौमुदी
स्त्री-प्रशंसा।
जये धरियाः पुरमेव सार
पुरे गृह समनि चैकदेशः।
तगापि शय्या शयने वरखी
रखोग्वला राज्यसुखस्य सारम् ॥1॥
पृथिवी जीतने का जो सार है यह नगरों पर अधिकार
होना है, नगरों का सार घर और घर का सार यहाँ की थोड़ी
सी भूमि है, उस भूमि का सार पलंग है, पलंग का सार
उत्तम स्त्रो है, जो रनों के समान उज्ज्वल हो, यह राज्य-मुख
का सार है।
ऋतु धनानां फलमप्यमाहुः
फलं ऋतूनामविवादि पुण्यम् ।
पुण्यस्य पूर्ण फलमिन्द्रलोको
द्विरष्टवर्षा स्त्रिय एवं नाकः ॥२॥
धन का प्रधान फल यह है, यम का फल पुण्य है, पुण्य
का फल इन्द्रलोक है और सोलह वर्ष की अवस्थाचाली खियाँ
ही इन्द्रलोक हैं।
स्त्री-रूप
केश
स्नेह परित्यज्य निपीय धर्म
कान्ताकचा मोक्षपर्थ प्रपत्राः।
नितम्वसङ्गात् पुनरेव वदाः
भहो दुरता विषयेषु सकिः॥1॥
No text on this page.
AAAAAAMA MARAAAAAA-.- । कविता-कौमुदी। भयमुश्म जहामि कि स्वशोभा दयितावकामिदम पम चन्द्रः। अयि नालिक किदिापि भाति स्वयमप्यस्य किमति वा कलङ्कः ॥२॥ कमल, भय छोड़ दो। अपनी शोभा क्यों छोड़ते हो ? यह प्रेया का मुख है चन्द्रमा नहीं है। जानते हो क्या दिन में भी चन्द्रमा होता है, अथवा इसमें क्या कलङ्क है। चित्र यदेव गुणयन्दविमददक्ष पुसः सखे निखिलदोपवितानधाम, मौरभ्य सदेव दयितावदने नितान्त' थात विभूषणमनेक्गुणातिशायि ॥३॥ यह आश्चर्य की यात है कि जो भोलापन सय गुणों को नष्ट भ्रष्ट कर देता है तथा जो अनेक दोषों का स्थान समझा जाता है, पर यही भोलापन मायिका के मुखमण्डल' पर भूपण हो गया और पैसा भूपण जिसने अनेक गुणों को छिपा लिया। पी जेध्यामि पदः प्रतिदिषसमसौ कान्तिमभ्येति गंधा' मेगच्यायो हरिप्याम्यहमिति विकसन्धुत्पर दीपिकायाम, कुर्वाणे ते तथापि श्रियमधिकतरी धोक्ष्य लोरक्षणा लक्ष्यात क्षीण एको विशति सदपर मन्सरे मास्तिभद्रम् ॥४॥ चन्द्रमा प्रतिदिन नायिकामुप को जीतने के लिए अधिक अधिक शोमा धारण घरता है। नयनों की शोभा हर करने की इच्छा से फमल प्रतिदिन सरोयर में पिक- सित होता है। ये ऐसा फरफे भी जप देखते हैं कि नायिका
No text on this page.
३९९ -- कविता कामुदा अरे वाहु, क्यों व्यर्थ फरक रहे हो । हे चामलोचन, तुम भी स्थिर होभो, फरकना बन्द कगे। क्योंकि वह अपराधी यदि मेरे पास आवे भी, तो न तो मैं उसका आलिङ्गन ही कर सकती हूँ और न उससे घोल हो सकती है। तहकाभिमुख मुख विनमितं दृष्टिः कृता चान्यत-- मनस्यालापकुतूहलाकुलतरे श्रोप्रे निरुद्ध मया । हमताभ्यां विनिवारितः सपरकः स्वेदोदुगमो गण्डयोः सख्यः कि' करवाणि यान्ति शतधा यत्कशु के सन्धयः ॥२॥ मैंने उसके मुंह की ओर से अपना मुह हटा लिया, आँखें भी दूसरी ओर कर ली, उसकी बात सुनने के लिए व्याकुल अपने कानों को भी मैंने बन्द कर लिया, शरीर का रोमांच और फपोलो का पसीना भी मैंने हाथों से छिपा दिया। पर सखियो, यतलाओ मेरी चोली में जो सैकड़ों छेद हो रहे हैं. उनके लिए मैं क्या करू । एकत्रासनसंस्थितिः परिहता प्रत्युद्गमाद्दरत- स्ताम्बूलानयनच्छलेन रभसाश्लेपापि संविष्ठितः । भालापोपिन मिश्रितः परिजन व्यापारयस्यान्तिके कान्न' म्युपचारतश्चतुरया कोपः कृतार्थी कृतः ॥३॥ प्रत्युत्थान के व्याज से एक स्थान पर बैठना उसने रोक दिया, पान लाने के बहाने आलिङ्गन में भी उसने विन डाल दिया, नौकरों और दासियों को कान में लगाने के व्याज से उसने याते भी न की । इस प्रकार उस चतुरने प्रिय के प्रति आगत-स्वागत के बहाने अपना मोघ सफल किया। प्राणेशे सहसा चिरादुपगते रुदै मया लोचने प्रोपले वागपि प्रिपापंपरा हवा चलादाकुला।
No text on this page.
कविता-कौमुदी।
४०१
पहले हम दोनों का यह शरीर एक हो था कोई भेद न
था, फिर आप प्रिय हुए और मैं मियतमा हुई। इस समय
भाप गृहपति हैं और मैं गृहिणी, इन घज़ के समान कठिन
प्राणों का फल मैंने पाया, मैं जीती हूं इसी कारण यह अप.
माम सहना पड़ा है।
प्रसादे शतं व प्रकटय मुदं संत्यज हर्ष
प्रिये शुष्यन्त्यङ्गाम्यमृतमिव ते सिशतु बचः।
निधान' सौख्यानां क्षणमभिमुख स्थापय मुख
न मुग्धे प्रत्येतु' प्रभवति गतः कालहरियः ।
मानिनी का प्रसादन । प्रसन्न होओ, क्रोध छोड़ो, मेरा
शरीर सूख रहा है तुम अमृत के समान अपने वचनों का
सिंचन करो, सब सुखों का मूल अपना मुँह मेरी ओर करो।
तुम भोली हो, कालरूपी यह हिरन जब चला जाता है तय
यह पुनः लौटकर नहीं आता।
1
वसन्त
वयस्य पूर्वियोगविधुरा भनु स्मरन्ती यदि
माणानुमति कस्य सत्पलु महत्संजापते पातकम् ।
पावनो कृतमनगेन हृदय तावत्तरो धनि
प्रोदय परिपुटया तव सवैत्युस्चैवंचोनेश
पथिक कोखो थियोग से दुःसी होकर पति का स्मरण
'करती हुई यदि प्राण त्याग करें तो इसका पाप किसको
होगा ! पधिफ ने हृदय में ही कहा नहीं अर्थात् इसका पाप
No text on this page.
1
कविता-कौमुदी ।
४०३
यह घसन्त काल हनुमान के समान आया, हनुमान के
शरीर के बाल वायु के द्वारा चुम्बित है । वसन्त काल में भी
पुष्पों के फेशर यायु द्वारा चुम्बित होते हैं । हनुमान प्रसन्न
चन्द्र मण्डल के आगे चलते हैं, बसन्त काल में चन्द्रमा
अधिक सुन्दर हो जाता है, हनुमान को वियोगिनी सीता ने
देखा था, वसन्त काल भी बियोगिनी स्त्रियों के द्वारा देखा
जाता है
दो जनोऽसौ खलु विद्यमानमविद्यमान सुन कोऽपि तावत् ।
वियोगिनां पुष्पनमधशोकः शोम्प्रदोऽभूदति चित्रमेतत् ॥
जो रहता है वही मनुष्य देता है, जो नहीं रहता यह कोई
किसी को नहीं देता। पर पुष्पभार से नवा हुआ अशाक
थियोगियों के लिए शोकदायी हुआ, यह बड़ा आश्चर्य है।
अशोक के पास तो शोक नहीं था।
जगी विवाहावसरे वनस्थली-
वसन्तयोः कामहुताशसाक्षिणि।
पिकद्विजः प्रीतमना मनोरम
मुहुमुहुर्मगलमन्त्रमादरात् ।
बनस्थली और वसन्त फा विवाह हो रहा था, कामदेव.
रूपी अग्नि उसका साक्षी था, इसी उपलक्ष में पिकरूपी
ब्राह्मण यड़े आदर से मङ्गल मन्त्र पढ़ता था।
No text on this page.
कविता-कौमुदो।
यह यसन्त फाल हनुमान् के समान माया, हनुमान के
शरीर के याल वायु के द्वारा चुम्बित है । वसन्त काल में भी
पुष्पों के केशर घायु द्वारा चुम्बित होते हैं। हनुमान प्रसन्न
चन्द्र मण्डल के आगे चलने हैं, वसन्त काल में चन्द्रमा
अधिक सुन्दर हो जाता है, हनुमान को रियोगिनी सीता ने
देखा था, पसन्त काल भी चियोगिनी त्रियों के द्वारा देखा
जाता है।
दो जनोऽसौ खलु विद्यमानमविद्यमान'तुन कोऽपि तावत् ।
वियोगिनां पुष्पनमनशोकः शोम्प्रदोऽभूदति चित्रमेतत् ।
जो रहता है यही मनुष्य देता है, जो नहीं रहता यह कोई
किसी को नहीं देता । पर पुष्पमार से नया हुआ अशाफ
वियोगियों के लिए शोकदायी हुआ, यह बड़ा आश्चर्य है।
अशोक के पास तो शोक नहीं था।
जगी विवाहावसरे वनस्थली-
घसन्तयोः कामहुताशसाक्षिणि।
पिकद्विजःप्रीतमना मनोरम
मुहमुहुर्महलमन्त्रमादरात् ।
पनम्बली और घसन्त का विवाह हो रहा था, कामदेव.
रूपी अग्नि उसका साक्षी था, इसी उपलक्ष में पिकरूरी
प्राह्मण पड़े मादर से महुल मन्त्र पढ़ता था।
४०४
प्रीम।
ग्रीष्म
रवेर्मयूखैरभितापितो मृर्श
विदयमानः पथि तप्तपासुभिः ।
अवाकफणोऽजिह्मगतिः श्वमन्मुहुः
फणी मयूरस्य तले निपोदति ।
ऊपर से सूर्य की किरणों से सूर्य तपाया गया है, मार्ग
फी गरम धूल से जल रहा है, ऐसी दशा में उसांसे लेता
हुआ सर्प सिर नीचा करके और अपनी टेढ़ी चाल छोड़कर
मयूर के नीचे विश्राम करता है।
सर्वाशारुधि दग्धवीरुधि सदा सारङ्कपद्धक।
घि
क्षामक्ष्मारूहि मन्दमुन्मधुलिहि स्वच्छन्दकुन्ददुहि।
गुप्यन्योतसि भूरितसरजसि ज्वालायमानासि
प्रोप्मे मासि ततातेजसि कय पान्य प्रजञ्जीवसि ॥
जिस ग्रीष्मऋतु ने सय दिशाओं को रोक दिया है, पी
को जला दिया है, मृगयूथ पर जिसने फोध किया है, पर
फोक्षीण यना दिया है, भ्रमरा के भानन्द को क्षीण यना दिय
है, जो स्वच्छन्दता पूर्वफ कुन्द पुष्प से द्वेप करता है, जिस
सोतों को सुखा दिया है, धूल को गर्म यना दिया है, जल को
तप्त कर दिया है और जिसमें सूर्य की फिरणं फैल रही है
उस ऋतु में तुम यात्रा करके कैसे जी सकते हो।
इरादेव कृतोऽनलिन पुनः पानीपानाधिना
रोमामोवि निरन्तर प्रकटितः प्रीत्या न शैल्याइपाम् ।
रूपालोकमविस्मितेन धलितो मूर्धा नशाम्पा तृषा-
ममुग्यो विधिरवगेन परितो पोश्य पापालिकाम् ।
unnnn LA कविता-कौमुदो। पथिक ने दूर से ही हाथों को अंजलि पना ली पर यह पानी पीने के लिए नहीं । शरीर में रोमाञ्च भी हुआ पर प्रेम से, जल की शीतलता के कारण नहीं । रूप देखने के ही कारण मस्तक हिल गया, जल पीने की तृप्ति के कारण नहीं। प्याऊ पर जल पिलानेवाली को देखकर पथिक के ये सब आप ही आप हुए। गन्तु सत्वरमीहसे यदि गृहं ब्यालोलवेणीलता दष्टु व स्वकुटुम्बिनीमनुदिन कान्तां समुत्कण्ठसे । सत्त व्ययपि मुग्धमन्थरबलन्नेत्रातरुद्वा वगा- मेतो दूरत एव हे परिहर भ्रातः प्रपापालिकाम् ॥ माई, यदि तुम यहां से जल्दी जाना चाहते हो, यदि तुम बिखरी घेणोपाली अपनी कान्ता को देखने के लिए उत्कण्ठित हो तो प्यासे होने पर भी उस प्रपापालिका (प्याऊ पर जल पिलानेवाली ) को दूर से ही बचाकर जाना, जो सुन्दर और मन्द मन्द चलनेवाली आँखों के इशारे से पथिकों को रोकती है, उन्हें रास्ते ही में चिलमा देती है। वर्षा कि' गतेन पदिसान जीवति प्राणिसि प्रियतमा सथापि किम् । इत्युदीक्ष्य नवमेघमालिका म प्रयाति पथिकः स्वमन्दिरम् ॥ वर्षा ऋतु में आकाश में मेघमाला को देख पथिफ उत्क- ण्ठित होता है । यदि जाने पर प्रियतमा जीवित न मिले तो
No text on this page.
कविता-फौमुदी। ४०७ या चक्रादपहृत्य रोपितवती कण्ठे ममैवानन सा द्रक्ष्यत्यधुना कथनु विरहे वाला पयोदावलीम् ॥ हरिण के बच्चे के समान चञ्चल आँखोवाली यह पहले मेघों का शब्द सुनकर डर गयी और मेरे वक्षस्थल पर स्थित होने पर भी भय से उसने और द्वद आलिङ्गन किया और मेरे भले पर उसने अपना मुख रख दिया, वही आज इस विरह दशा में मेघों की पंक्ति कैसे देखेगी। मेधैव्योम नवाम्बुभिर्वसुमती विद्युल्लताभिर्दिशी धाराभिर्गगन धनानि कुटजैः पूरैता निम्नगाः । एकां घातयितु वियोगविधुरा दीनां वराकी स्त्रिय' मायूट काल हताश वर्णय कृत' मिथ्या किमाइम्बरम् ॥ मेघों से आकाश भर गया, नये जल से पृथियो भर गयी, बिजली से दिशा व्याप्त हो गयीं । धारा से गगन, कुटज पुष्प से बन, प्रवाह से नदियाँ व्याप्त हो गयीं। यह सब आड- म्वर फेवल एक वियोगिनी दीन विचारी स्त्री को मारने के लिए अभागे वर्षा-काल ने किया है, पर इन सबकी ज़रूरत क्या थी। भद्रास ग्रामके त्व' वससि परिचयस्तेस्ति जानासि वाता- मस्मिनध्वन्यजाया जलधररसितोका न काचिद्विपन्ना। इत्य पान्थः प्रवासावधिदिनविगभापायशी प्रियाया: पच्छन्वृत्तान्तमारास्थितनिजभवनोप्याकुलो न प्रयाति ॥ भद्र, तुम क्या इस गाँव में रहते हो? तुम इस गाँव फी बातें जानते हो? क्या तुम जानते हो कि इस गांव में एक पथिक फी स्त्री मेघ गर्जन से उत्कण्ठित होकर मर गयी है? इस प्रकार प्रयास से लौटने की अवधि के समाप्त हो जाने से
No text on this page.
कविता-कौमुदी।
४०७
या वक्रादपहृत्य रोपितवती कण्ठे ममैवानन
सा दक्ष्यत्यधुना कथन विरहे पाला पयोदावलीम् ।।
हरिण के बच्चे के समान चञ्चल आँखोचाली यह पहले
मेघों का शब्द सुनकर डर गयी और मेरे वक्षस्थल पर स्थित
होने पर भी भय से उसने और दृढ आलिङ्गन किया और मेरे
गले पर उसने अपना मुख रख दिया, वहीं आज इस विरह
दशा में मेघों की पंक्ति कैसे देखेगी।
मेधैव्योम नवाम्बुभिर्वसुमती विद्युल्लताभिदिशा
धाराभिर्गगन बनानि कुटजैः पूता निम्नगाः।
एका धातयितु वियोगविधुरी दीनां वराकी स्त्रिय'
माद काल हताश वर्णय कृत' मिथ्या किमाडम्वरम् ॥
मेघों से आकाश भर गया, नये जल से पृथिवी भर गयी,
बिजली से दिशा व्याप्त हो गयी । धारा से गगन, कुटज
पुष्प से वन, प्रवाह से नदियां व्याप्त हो गयी। यह सब आड.
म्बर फेवल एक वियोगिनी दीन विचारीखी को मारने के
लिए अभागे वर्षा-काल ने किया है, पर इन सबकी ज़रूरत
फ्या थी।
भद्राख प्रामके त्व वससि परिचयस्तैस्ति जानासि वाता-
मस्मिषध्वन्यजाया जलधररसितोका न काचिद्विपन्ना।
हत्य पान्यः प्रवासावधिदिनविगमापायशङ्की प्रियायाः
छन्वृत्तान्तमारास्थित निजभवनोप्याकुलो न प्रयाति ॥
भद्र, तुम क्या इस गाँव में रहते हो। तुम इस गांव को
बातें जानते हो? क्या तुम जानते हो कि इस गांव में एक
पथिक फी स्त्री मेघ गर्जन से उत्कण्ठित होकर मर गयी है ?
इस प्रकार प्रवास से लौटने की अवधि के समाप्त हो जाने से
४०८
पूछता था मौर
पद अपनी प्रिया के अमद्दल फा सन्देह करता था।
अपने घर के पास ही था पर यह
नहीं जा सकता था।
रतु जलघर:पतन्तुधारा:
फुरतु बहिन्मस्तीपि वान्नु शीताः।
इप मुरसि महौरधीव कान्ता
सालमपतियातिनी स्थिता मे।
मेघ गर्जे, पानी यरसे, बिजली चमके, शीतल वायु रहे,
सय प्रकार के भयों को दूर करनेवाली यह महीपधि के समान
फान्ता मेरे पक्षस्थल पर वर्तमान है।
शरद
नीतोस्मि येन महती सलिलेन वृद्धि
संयोजित सतत गुरुग्णा फलेन ।
तरछोप्यते दिनकृतेन्यतिचिन्तयेव
शोकानत कलमशालिवन विपादु।
जिस जल ने मुझे बढ़ाया, जिसने बड़े फल से
सयन्य कराया, उसको ही सूर्य सोख रहा है। मानो!
चिन्ता के कारण धान पीले पड़ गये और शोक से नव ग
भय प्रसन्दुमुखी सिताम्बर,
समाययावुत्पलपत्र लोचना,
सपहजनीरिव गां निषेविदु
सहसवालव्यसना शरद्वषः।
. यह शरद् ऋतुरूपी चधू भायी, इसका मुख प्रसन्न है, या श्वेत हैं, कमल इसके नेत्र है, हंस पंखे के समान है, उन्हींको लेकर यह पृथियो की सेवा के लिए आयी है। कचिनुसत्यै रादया वचनविकचैन रजवनैः कचित्स्वास्सोयः क्वचिदपि रतः सारसकृतः । चिट्योमाभोगः सुभगशशद्विारधवल- रहो चेतः पुसा हरति बहुरूपा शरदियम् ॥ फहीं धान लहलहा रहे हैं, कहीं कमल खिले हुए हैं, फही स्वच्छ जल है, कहीं सारस घोल रहे हैं, कहीं चन्द्र विम्य के समान स्वच्छ आफाश को शोभा दीख पड़ती है, इस प्रकार अनेक रूप धारण करनेवाली यह शरत् पुरुषों का चित्त हरण करती है। हेमन्त ननाः सदा शीतमहा जटाधरा विमुल्य पनि पलानि सांपतम् । मुखप्रद माधवमा मुन्मुका- सपा प्रताः किमु सन्ति पादाः ॥ पृक्ष मानो तपस्या कर रहे हैं, ये नंगे , शीत सहन कर रहे, जटा उन्होंने धारण फी है, पसं भोर फलों को उन्होंने इस समय स्याग कर दिया है। मालूम होता है मुखदायी माधय ( पसन्त ) को पाने के लिए मानो ये तपस्या पर
.
हमन्नम्मरियामि पाते स्वयि गुपदयर
अपयशीतल वारि निशान सुरतशमा:
है हेमन्न, नुम्हारे चले जाने पर भी तुम्हारे दो
स्मरण रहंग, एक तो बिना प्रयत के ही शीतल
दूसरी सुरत के योग्य रानि।
लघुनि तृपकुटीरे धोत्रकोणे यवाना
नवययमपलालम्रस्तरे साग्धाने ।
परिहरति मुगुप्त शालिकरन्दमारात्
कुचालशमहोभावदरखस्तुगरः।
जीफे खेत के कोने में फुसको छोटी कुटिया है, नये पुर
फा बिछौना और तकिया है, यही किमान और उसकी
सुरक्षित है, इस जोड़े को शीन का कुछ भय नहीं है।
है पान्य प्रियविप्रयोगहुतभुगज्वालानपिज्ञोऽसि किम्
किवा नास्ति तवप्रिया गतपणः कि वासि हीनौधिया,
येनास्यियात्रा कुमारपरुचिन्यासद्यमोचिते
कुन्दानन्दितमत्त पटपदकुले काले गृहानिर्गतः ।
माई, क्या प्रिया-वियोग की अग्नि की ज्याला फा
तुम्हे ज्ञान नहीं है, अथवा तुम्हारे घर में प्रिया नहीं है,
अथवा तुम निर्दय हो या वुद्धिहीन हो, जिससे इस र
जय कि सूर्य के घाम सेवन करने का अवसर है, और
समय फुन्दपुष्प में भ्रमर मग्न हो रहे हैं, तुम अपने घर
याहर जा रहे हो।
कपिता-फौमुदी। शिशिर करचरणनासमादी कणीं गृहाति रक्ततां गमयन् । शीत गुरुकृतपी: पश्चादनानि कूर्म इव । शीत पहले हाथ पैर नाक और कान को पकड़ता है, इनको लाल करता है, यड़ी पीडा देता है, पुनः समस्त अंग को फच्छर के समान सङ्कुचित करता है। फेशानकुलयन् दशी मुकुलयन् वासो वलादाक्षिप- जातन्वन् पुलकोपम' प्रश्नाचेगकम गतेः धार पारमुबारसीकृतरवैईनच्छद पीडयन् प्रायः शैशिर एप सम्पनि मस्कानामु कालायते । फेशों को उलझा देता है, अग्नेि बन्द कर देता है, यन्त्र जयरदस्ती खोंचता है, रोमाञ्च फराना है. गति को फम्पित कर देता है, पारयार ज़ोर मे सोन्कार कराता है, ओष्ठों को पोहित करता है, प्रायः यह शिशिर फा यायु स्त्रियों के प्रति काल का सा प्ययहार फरता है। . चन्द्रमा पतेदान्तलदलवलीला भकुरते सदाचाटे लोडशशक इति मो मा प्रति तपा। मा' रिवन्दु मम्ये स्वदरिविदाक्रान्त तरयो- राधोनापावपक्षिासाहिततनुम् । चन्द्रमा के मध्य में मेघ के टुकड़े के समान ओ दिसायी पड़ता है, उसे लोग राशय फाहते हैं, पर मैं इसे टीफ नहीं
५.२
चन्द्रमा ।
समझना। महाराज, इस यिग्य में मैं तो यह समझना
पिरहिणी तुम्हारी शत्रु स्त्रियों के जलने हुए कटाक्ष से चन्दन
के शरीर में यह पाय हो गया है।
मा मेरि शाहिरं जलनिः प पर मेनिरे
मार तिथिच मंजगदिरे भूमेश बिम्ब परे।
दो पददसितेन्द्रनोलगनश्याम दीदृश्यने
मम्मन्ये रविभीनमन्धतमर्म कुशिम्यमालक्ष्यने ।।
चन्द्रमा में जो काला चिन्ह है, उमं कोई चिन्ह समझते
हैं, कोई उमं ममुद्र का पंक यनलाने हैं, कुछ लोग उसे हरि
यतलाते हैं और कुछ लोगों का कहना है कि यह भूमि की
छाया है । यह चन्द्रमा के मध्य में इन्द्रनीलमणि के टुकड़े
के समान जो काला दिसायी पड़ता है, मेरी समझ से तो वह
सूर्य के मय से छिपा हुमा अन्धकार मालूम पड़ता है।
पश्य चन्द्रमुन्ति चन्द्रमण्डल
ग्योममार्गसरमीसरोरुदम् ।
यामिनीयुवतिकर्णकुण्डल
मारमार्गयानिघणोपलम् ।
चन्द्रमुखी, चन्द्रमा को देखो, यह आकाश मार्ग
तालाय फा फमल है, रात्रिरूपी युवती के कानों का कुण्डर
अथवा यह कामदेव के घाण तीखा करने के पत्थर क
-फड़ा है।
।
कविता-कौमुदी।
Aasman
चाटु
अन्यतो नय मुहूर्तमानन
चन्द्र एप सरले कलामयः।
म कदाचन कचोलयोर्मल
संक्रमस्य समतां न नेप्यति ।
थोड़ी देर तुम अपना मुंह उधर कर लो, नहीं तो कला-
धारी यह चन्द्रमा कहीं अपना मल तुम्हारे कपोलों पर लगा
कर तुम्हारे मुह से समता न करने लग जाय ।
शिखरिणि क्व नु नाम कियञ्चिर'
किमभिधानमसावकरोत्तपः ।
तरुणियेन तवाधरपाटल'
दशति वियफल शुकशावकः ।
इस शुकशायक ने किस पर्वत पर कितने दिनों तक और
किस नाम की तपस्या की है, जिस कारण यह तुम्हारे ओष्ठ
के समान लाल विम्य फल चुग रहा है।
विसृज दयिते हासज्योत्स्ना निमीलतु पर्ज
विकिर नयने भ्रष्टच्छाय भवत्वसितोत्पलम्,
वद सुवदने तमामूका भवस्वपि कोकिला
परपरिभवो मानस्थाने नमानिनि साते।
दयिते,हँसो, जिससे फमल बन्द हो जाय। तुम्हारी हंसी
को चन्द्र प्रकाश समझ कर वे मुकुलित हो जाय । आँखें
फेरो, जिससे नीलकमल को शोभा नष्ट हो जाय, बोलो,
जिससे कोयल मूक हो जार, मानिनि, सम्मान के ध्यान से
शत्रु का पराजय नहीं सहा जाता।
.
विग बागमन ।
प्रमोद गनिमरतो मनु राजा सी मुगम,
स्मिन परिमुग्यतो रसुर नाममा ।
निमीनय दिलोपने भवतु हारि कपिल
करम्यगिनमानन कुरु रिभानु बद्रोदयः ।
प्रसादोमो, अपनी गनि यन्द करो जिससे राजहंसी
सुग पूरक चले, हसना छोड़ दो जिससे कुन्दपुष्प के
शोभा यढ़े। मांग पन्द कर लो जिससे कान पर के समय
फो शोभा दीग पड़े, मुदहाथों से घिरा लो, जिससे चन्द्रमः
प्रकाशित हो।
प्रिय आगमन
भामाते दयिते मरुस्पलभुगमीप दुलंहयता
तम्याया परितोरगापतरलामासस्य दृष्टि मुखे ।
दावा पोलशमीकरीरकपल स्वनाशलेनादरा-
दुसष्ट करमस्य सरसटा भारावल रजः।
प्रिय भाये हैं, मारवाड़ की भूमि से माने की कठिनाई
समझ कर सुन्दरी ने प्रसन्नता के आंसू के कारण चल
आँखों से उस ऊंट फा मुंह देखा, पोलु शमी फरीर आदि
की पत्तियों का फचल यनाफर उसे दिया और अपने आंचल
से उसके कन्धे पर फी धूल साफ की।
आपाते क्षयिते मनोरपशनोंते कयचिदिने
वैदगपागमा परिनने दीर्घा को कुर्वति।
दरपास्मोन्यभिधाय सत्वरपद प्याधूम चीनांमुई
तन्वद्रपा रविलालसेन मनसा कम: शमम्
कविता-कौमुदी। प्रिय आये, अनेक प्रकार के मनोरथों से किसी किसी प्रकार दिन बिताया, मूर्ख परिवार वालों ने लम्बी बातें छेड़ दी, उसी समय में जल गयी" कहती हुई सुन्दरी उठी, उसने अपने कपड़े झाड़े, इस प्रकार प्रिय-समागम की इच्छा से उसने दीपक बुझा दिया। . - प्रभातवर्णन। चन्दन स्तनतटेधरविम्वे यावक घनतरं च सपत्न्याः। -मातरीश्य कुपितापि मृगाक्षी सागसि प्रियतमे परितुष्टा ॥ सुन्दरी अपने अपराधी पति पर अप्रसन्न थी, क्योंकि यह उसके पास नहीं आया था, पर प्रातःकाल होने पर जब उसने अपनी सौत के स्तनों पर चन्दन, ओठों पर महावर ज्यों के त्यो देखे,तब यह प्रसन्न हो गयी, इससे उसने समझा कि मेरे यहाँ न आया तो सौत के यहाँ भी न गया। दम्पत्योनि'शि जल्पतोहशुझेनाकर्णित' यदच- स्वत्मातगुरुसन्निधौ निगदतस्तस्यातिमा वधः । कोलम्वितपद्मरागशकलं विन्यस्य चम्चवाः पुटे घोडाता प्रकरोति दाडिमलव्याजेन वाग्वन्धनम् ॥ रात को स्त्रीपुरुष ने जो बाते की वे घर के शुकने सुन ली थी। प्रातःकाल होने पर यह सब के सामने ये याते' कहने लगा। स्त्री यहीं थी, वह लजित हो गयी, उसने
--
মানান।
मपने कान के पराग मणिको उतारा और अनार के
उस शुक्र के मुप में देकर उसकी योलो बन्द कर दी।
বিম্বিসীমানাঃ কবি না
मन इस मुनेः मयंव प्रसन्नमभूनमः।
म्यपमरनि च प्यान्त चित्तात्मतामिव दुनो
विगलन निशा शिन लक्ष्मीनियमिनामिका
फलियुग में जिस प्रकार सजन थोड़े रह जाते हैं, उस
प्रकार आफाश में तारा थोड़े रह गये, मुनि के मन के समान
समस्त आकाश स्वच्छ हो गया, सजनों के चित्त से जिस
प्रकार दुर्जन हट जाते हैं, उसी प्रकार अन्धकार हट गया है,
और निरद्योगियों को लक्ष्मी के समान रापि नष्ट हो गयी,
अभून्प्राचो पिला रसरतिरिव प्राश्य कनक'
गतप्कायश्चन्द्रो वुधजन इव प्राम्य सदसि ।
क्षणाक्षीणास्तारा नृपतय इवानुपमपरा
नदीपा राजन्ते द्रविणरहितानामिव गुणाः ।
पूर्व दिशा पीली हो गयी, जिस प्रकार सोना साकर
पारा पीला हो जाता है, चन्द्रमा की शोभा जाती रही, जिस
प्रकार दिदातियों की सभा में पण्डित निष्प्रभ हो जाते हैं।
क्षण ही में तारा क्षीण हो गये, जिस प्रकार अनुद्योगी राजा
क्षीण हो जाते हैं, दीपक भी अच्छे नहीं लगते, जिस प्रकार
दरिद्रों के गुण ।
.
कविता-कौमुदी। मिश्र सत्य जना परिमन पक्षपाता- लोकेषु सप्तस्वपि तथ्यमेतत् । नाम्यन्मनोहारि नितम्बिनोम्यो दुःखैकहेसुनच कश्चिदन्यः ॥ मैं सच कह रहा हूँ, पक्षपात से नहीं, सांता लोकों में यह यात सच है, स्त्रियों से बढ़कर न तो कोई मनोहर यस्तु है और न उनसे बढ़कर दुःख-हेतु ही कोई दूसरा है। एकाकिनी यदवला तरुणी तशाह- मस्मद्वगृहे गृहपतिश्च गतो विदेशम् । के याचसे सदिद पासमिय पराकी अथ ममान्धवधिरा ननु मूढ़ पान्य । मैं अकेली अपलाई और युवती.., मेरे घर के मालिक विदेश गये हुए हैं, फिर तुम ठहरने के लिए जगह किससे मांगते हो, जानते नहीं कि मेरी सास विचारी भी सो अन्धी औरयहरो है। संसारस्मिंघसारे कुनृपतिभवनहासेवाला- ग्यामापस्तधैर्य कथममलधियो मानम संविपुः। पता: प्रोदिन्दुए तिनिधयभूतोमरपुरम्मोजनेती मेहुस्कामीकलापाः स्तनभरविममन्मध्यभागस्तरयः। इस भसार संसार में सजनों का मन पुरे राजामी के मारको सेया के फल लगने से अधीर हा जाता, पदि उदित चन्द्रमा के कान्तिसमूह धारण करनेयाली कमल
मित्रा
।
A
है,फिर मी शरिरहित मामय ममस्त पिलाक को जीत
लेता है। इसमें मादम पड़ता है कि महान् मनुष्य अपने.
पल से कामिद करने हैं, सामग्रियों में नहीं।
शुदा मन्त्रासमे जिहन रयो भिषशकमकुम्मा
पुम्मदपुमा दधति परममी पायका निश्पनन्तः ।
मोमिनेवि मपियां नवद मेयनारः
रिमिगम रामसीनियमितजलधि राममन्वेग्यामि ।
मेघनाद कहता है, परेशद्रो, क्या तुम लोग डरते हो?
न्द्र के हाथी के मस्तक नोड़नेवाले हमार याण तुम लोगों
के शरीर पर गिरते लजित होते हैं । लक्ष्मण, तुम भी ठहरी.
तुम भी हमारे ग्रोध के पात्र नहीं हो, क्योंकि मैं मेघनाद
मैं उस राम को इंट रहा है रिसने थोड़ा क्रोध करके समुद्र
को पांधा है।
पातालतः किम मुधारसमानयामि
सन्द' निपौत्य किमुनामृतमाहरामि ।
चण्डचण्डकिरण किमु बारयामि
कीनाशलोकमयवा ननु पूर्णयामि ॥
हनुमान कहते हैं, पाताल से अमृत ले माऊ, चन्द्रमा
निचोड़ कर अमृत ले भाऊ, प्रसर किरण सूर्य को रोक
या यमराज की नगरी को तोड़ फोड़ दूं।
काकुत्स्थस्य दशाननो न कृतवान्दारापहार यदि
काम्मोधिः कप सेनुसन्धघटना कोत्तीयलाग्यः ।
-: पार्थस्यापि पराभवं यदि रिपुर्नाधारक ताहा नपः
मोयन रिपुभिः स अतिपदं प्रायः पर मानिन ।
--------
रामचन्द्र की स्त्री का हरण यदि रावण न करता तो क्या
पास चे जाते, या सेतु बांधते, अथवा समुद्र पार
जाकर लंका जीतते ? अर्जुन को भी शत्रु यदि तंग न करता
तो क्या ये चैसी तपस्या करते ? यात यह है फि शत्रु ही
मानियों का उत्कर्ष बढ़ाते हैं।
चन्हि शीतयितु हिम ज्वलयितु वात निरोधु पयो
मूतं व्योम विधातुमुन्नमयिनु' नेनु नति वा महीम् ।
बत किल भूपृतः स्थलयितु सिन्धु' च संभाव्यते
शक्तिर्यस्य जनः स एव नृपतिः शेषराः परपार्थिवाः॥
भाग फो शीतल करने की, घर्फ को जला देने की, या
को रोकने फी, जल फो टोस यनाने फी, आकाश को उठाने
को, पृधिधी को पनाने की, पर्वतों को उखाड़ने की, समुद्र
फो समतल और समतल को समुद्र पनाने की जिसमें शक्तिः
रहती है, उसे ही लोग नृपति कहते है, और लोग तो पार्थिव
है अर्थात् मिट्टी फेघौधे हैं।
हास्य
प्रायधिस' मृगपने यः प्रियापादताडितः।
क्षालनी शिरस्तस्य कान्तागापशीधुभिः ॐn
जो मनुण प्रिया के परों से ताड़ित होकर प्रायश्चित्त
हुँदता है, उसका मस्तक फान्ता फे मुंह में की शराय से घो
देना चाहिए।
-- ४२२ প ি সলঙ্গল নাম বিদ্যা। शिरिया गृहिणी न जानानिx ज्योति जी माकाश चन्द्रमा का विशाखा के साथ समागम का समय गणना द्वारा जानने पर उनके घर पी गृहणी मनेफ हुरदंगों के साथ प्रोड़ा करती है, यह उन्हे मालूम नहीं। मदा या मदारसमदामानधनापहा। कन्यागम्यतो मिस्यामावादशमी प्रमः ॥३॥ जामाता (दामाद ) दशांग्रह है, यह सदा कन्याराशि पर पत मान रहता है, यह सदा दा, सदाफूर और सदा मान धन का अपहरण करने वाला है। यमः शरीरगोधार'सचितार' वसुन्धरा । दुशोला सीप हसति भतार पुगवन्सलम् । शरीर की रक्षा करनेवाले को यमराज हंसता है, धन संचय करनेवाले को पृथिवी हसती है और व्यभिचारिणी स्त्री अपने पति को पुत्र पर प्रेम करते देखकर हंसती है। “परान्न पाय दुयु'दै मा प्राणेषु दया कृयाः। दुल मानि परान्नानि भाषा जन्मनि जन्मनि ॥५॥ हे दुयुद्ध, यदि दूसरों का अन्न मिले तो प्राणों का माह छोड़ दो, क्योंकि पराप्न का मिलना दुर्लभ है, प्राण तो प्रत्येक जन्म में मिलते हैं। निदायकाले विशस्य प्रसुप्तस्य तरोरधः । शूना समुत्रित इसे देवत्सस्वेति सानदीत म नाथ कविता-कौमुदी। ४२३ गर्मी के दिनों में एक ब्राह्मण किसी पेड़ के नीचे सो रहा था, कुत्ते ने उसके हाथ पर मृत दिया, उसने कहा यह देवता का है। वैद्यनाथ नमस्तुभ्यं क्षपिताशेषमानध । त्वयि सन्यस्तभारोय कृतान्तः सुखमेधते ॥७॥ समस्त मनुप्यों को नष्ट करनेवाले हे वैद्यराज, आपको नमस्कार। यमराज, आप ही पर अपना प्राणवध का भार सौंपकर निश्चिन्त हो रहा है। काकाल्लोल्य' यमाक्रौर्य स्थपतोर्नेन्यपातिताम् । आयक्षराणि संगृहय कायस्थः केन निर्मित कौप से लोलता, यमराज से करता और स्थपति (व्याध) से प्रति दिन हिंसा का काम कायस्थी में विद्यमान है, इन नीनों के पहले अक्षरों को लेकर कायस्थों का निर्माण किसने किया? लेखनी कृतकर्णस्य कायस्थस्य न विश्वसेत् । विश्वसेन्कृष्णसर्पस्य बने व्याघ्रस्य विश्वसेत् ॥९॥ काले साँप का विश्वास किया जा सकता है, यन में पाघ का भी विश्वास किया जा सकता है, पर कान पर फलाम ररानेवाले फायस्थ का विश्वास नहीं किया जा सकता। वापयति माग्यलिसित लिखितमनेनापि वादयति नान्यः । भयमपरोस्य विशेषः स्वपमपि हिग्विन स्वयं न वाचवि०॥ ये दूसरों का लिखा नहीं यांच सकते और इनका लिखा दूसरा भी नहीं यांच सकता । खूची यह कि ये अपना लिखा भी नहीं यांच सकते। ।
हास्यम् ।
गादया निगान्नरगुण शिपिनमनाना
मेरमापति:मच निरन्नरचण्ठमारी।
तत्रापि देशतिकालु माराग्यो
हामनता कममध्यपनपघ31
पाट पड़ी छाटो है उसके याने दाले हो गये हमारवा
पश्या से प्रेम रसनेयाला पति प्रायः गायब रहता है, इस पर
मोदय की मारी मात्र की रात है,मला ये का फैसे रहे जर
सकते हैं?
धेरण्ययन चिरन्तनच्या मोभिः सहालापन
तासामर्मलाने रतिरपी तत्पामि पास्तुतिः।
पिरमातुजनाशिषः सुमगतायोग्यत्वपंकीतने
सामुडानयाभिवादनविधिभिक्षा'या द्वारा १०
भिक्षुफ के यारह गुण हैं । ये ये हैं ज़ोर से पढ़ना, पुरानी
पाते कहना, त्रियों के साथ बातचीत करना, उनके बी
फे खेलाने में प्रेम रखना, उनकी पनायी रसोई की भो
तारीफ करना, उनके पिता भाई आदि को आशीर्वाद
उनमें पति प्रिय होने की पूरी योग्यता का वर्णन करना,
अनुष्ठान कथा अभिवादन मादि की योग्यता यखानना ।
क्षार रादमिद थिमच दयिते राभोपि किन
मा: पापे प्रतिजल्पसे प्रतिदिन पापस्त्वदोषः पिता
धिक न्वा कोषमुखोमलीकमुखरस्त्वत्तोपि कः क्रोधनो
दमत्योरिति नित्यदसमलव शान्तयोः कि मुखम् ॥
'खो पुरष से याद-पु० - प्रिये, यह कमा आज कडु
फंडुआ धनाया है ? स्त्रो - तो तुम स्वयं क्यों नहीं यनी लेते
पु-ओह पापिन, तू प्रतिदिन उत्तर दिया करती है, खो-
.
कविता-कामुदा । तुम्हारा पाप पापी है, पु०-तू तो बड़ी कोधिन है, तुझे धिकार । स्त्री-तू व्यर्थ का यकता है, तुझसे बढ़कर प्रोधी कौन है ? इस प्रकार प्रति दिन कलह करने वाले स्त्रीपुरुषों को क्या सुख है ? स्वायत्तमेकान्तहित विधात्रा विनिर्मित डादनमज्ञतायाः। विशेषतः सर्वविदा समाजे विभूषणं मौनमपण्डितानाम् ॥१४॥ बहा ने मूर्खता छिपाने के लिए अपने वश का एक उत्तम उपाय यनाया है। वह यह है कि सवंश पण्डितों के समाज में मूर्चा का चुप रहना। • नाम अन्यकृतां गृहाण विवुधोपाध्यायचा कुरु प्रन्धानां भव सत्परिग्रहकृनी स्प,स्व सार्क बुधैः । नानास्तविचित्रचालनपरश्वोच्चः सशब्दं हस-- मिच्छश्चेवुधां पुरो जड़धियामन्यन्तमूर्खापि सन् ॥१५॥ अत्यन्त मूखं होने पर भी तुम मूखों की सभा में पण्डित यनना चाहते हो, तो इन बातो को फरो मन्थकारों का नाम लिया करा : विद्वान् पण्डितों की चर्चा करो, ग्रन्थों का संग्रह करा, विद्वानों की बराबरी करो, खूप जोर से हंसते हुप अनेक प्रकार की हस्तमुद्रा दिखाओ । निःशE" यत्तदुचवद कुरु विकट स्वामन ज्ञानगवां-- श्लाघस्वात्मानमन्याम्मबहस सहसा किंचिदश्लील मुरका । सापग्य खण्डखाद्य पर विवद समुन्कयन्मूर्ख लोका:- निश्चेत्सरिभा जहाजनपुरतो मूर्खन्दारकोपि ॥९॥ मुर्ख शिरामणि होने पर भी मूों के सामने विद्वान् बनना चाहते हो, तो यह करो । जो मन में आये, निःश हो . । ।
- ४५६ हास्या कर पोलो,अपने प्रानी होने का अहकार मुंह पनाकर दिखाया। मानी प्रशंसा करा मार दूसरों की निन्दा। कुछ युरी मार्ट कर कर हंसी । तपाक के साथ सण्डनसाय पढ़ो, मूली को उत्ते- जित करते हुए विवाद फरी। पामाइक्रयिपुडयाननुपितराय सलीलमर-- पुश निमोन्य लोचनयुग श्लोकानमगवं पठन् । काय स्वीकुर यत्पांविरचितं सधस्व सा युध- यंधम्म से शुलन रहितः पापियमाप्नु दलात son स्यास आदि कवि श्रेष्टी अनुचित शब्दों से निन्दा फरो, आँखें मद फर जोर जोर से बोली, अहंकार के साथ श्लोक पढ़ी, दूसरों के बनाय कायों को अपना यतलामो विद्वानों की बराबरी गरा, यदि शास्त्र - ज्ञान के विना विद्वान बनना चाहते हो ता इन कामों को करो। नास्माई जननी तपोवलकुला सोभिपाणां कुला- दूदा काचन कन्यका खलु मया तेनास्मि ताताधिकः। भस्मस्यालकमागिनेयमगिनी मिथ्याभिशला पर- स्तत्संबन्धरशान्मया स्वगृहणी यस्यपि मोजिझता men मेरी माता उच कुल को नहीं है, पर मैंने श्रेष्ठ श्रोत्रियों के फुल को कन्या व्याही है, इससे मैं अपने पाप से पड़ा। मेरे साले के भांजे की यहिन पर मिथ्या कलङ्क लगा है, उसी संबग्ध का विचार करके मैंने अपनी प्यारी स्त्री का परित्याग कर दिया। मसारे सलुसंसारे सारश्वर मन्दिरम् । हरी हिमालये शेतं विष्णु शंत महोदी १२॥ .
। कविता-फोमुदो। इस असार संसार में वसुर का घर हो एक सार है इसीसे महादेव हिमालय में रहते हैं और विष्णु समुद्र में। कमले कमला शेते दर शेने हिमालये। क्षाराम्भव हरिः शेने मन्ये मत्कुणशया ॥२०॥ लक्ष्मी कमल में शयन करती हैं, शिव जो हिमालय में शयन करने हैं और विष्णु क्षीर समुद्र में शयन करते हैं, मालूम होता है कि इसका कारण खटमलों का भरही है। स्वयं पञ्चमुखः पुगी गजाननमहाननी दिगम्बरः कथं जीवेदपूर्ण न दगृहे ॥२१॥ दिगम्बर -महादेव स्वयं पांच मुख्याले हैं, उनका एक पुत्र गजानन-हाथो का मुखवाला है और दूसरा पडानन- छः मुख थाला है, ये दिगम्बर जैसे जीते, यदि उनके घर भन्न- पूर्ण न होतीं। भंप पटो मे पितुराभूषणः पितामहाचरपमुनायोपनः भरिप्यायध पुत्रिपोगान् मयानाः पुष्पवदेव धार्यते ॥२॥ यह पल मेरे पिता के शरीर को भूपित कर चुका है. यह पत्र जप मया पानी मेरे पितामह यादि ने इसका उपभोग किया था, यह हमारे पुत्र और पौत्रों को भी शोमित परेगा, में पुष्प के समान ही इसको धारण करता। भारप पाथिमशुषि मम मूमिदेश्या शाम्भा प्रतिपर ः पविगे। -
----------
ant पिनामदार
तोमिनि रानि विगु शमा २३॥
मंत्र जल के सीटों से निम
मस्तक पर धेश्याने मले
भपयित्र हाय रखें, यई जोर से थूका और मारा, इससे
विण शमां हाय हाय करके रोना है।
भापायुराः शिरसिजापिरलोकपोले।
रत्नावली विगलिना नर मे विवाद
प्रमोशी पुतयः पघि मा विलोक्य
नातनि भाग्य इति में विवाद: रा
मेरे सिर के बाल मोट हो गये है, गालों पर झुरियां
पर
गया है. दोन गिर गये हैं, पर इनके कारण मुझे कट नहीं
है। मुझ सय से यहा कट इममे है कि रामदे में खिर्ग मुझे
देख कर पापा कहती हैं।
मित वारयति वाहन गथपतरानु शुधातः कणी
तर क्रोधपत: शिखी च गिरिजासिंहोऽपि नागाननम्
गौरी जन्दुस्तामसूयति कलाना कपालानली
निर्विष्णः सपपी कुटुम्ब कलहादीशोऽपि हालाहलम् ॥२॥
भूखा सांप गणेश के चूहों को पाना चाहता है, उस
सांप को कार्तिकेय का मयर साना चाहता है. पार्वती का
सिंह गजानन को खाना चाहता है . पार्वती गड्डा से द्वेष
रखती है और चन्द्रमा से अग्नि द्वेष रखता है, इसी गृहकलह
से दुखी होकर महादेव ने भी विष पीलिया है।
दृष्ट्वा पडानमजनुमुदिनान्तरंच
पचाननेन सानुमाननाम
भाई सधर्मभुजगाभपन सभस्म,
दर निशम्य गिरिजाहसित पुनातु ॥२६॥
--- कविता-कौमुदो । पहान - कार्तिकेय के जन्म से प्रसन्न होकर पंचानन- महाहेब ने चतुरानन - ब्रह्मा को अपना व्याघ्रचर्म और सर्व का आभूषण दिया, यह सुन कर पार्वती हंसने लगी। रामाधाचय मेदिनी धनपतवीं वलाल्लाङ्गल प्रशान्महि तवास्ति वृषभः फाळशिशूलादपि शक्ताई तव चासदानकरणे स्कन्दोऽस्ति गोरक्षणे बिस्नातव याचनात् कुरु कृषि भिक्षाटन मा कृथा ॥२६॥ पार्वती ने शिय से कहा-तुम्हारा भीख मांगना देखकर बहुत दुःग्यी है, इस कारण तुम अब खेती करो, भीख मांगना छोड़ दो, परशुराम से पृथिवी ले लो, कुवेर से योज, बलदेव से हल, यमराज से भैंसे, बैल तुम्हारे पास हैं ही, त्रिशूल का फार वनवा लो, हम तुम्हें अन्न देंगी, कार्तिकेय मुम्हारे पशुओं की रक्षा करेगा। फिर भीख क्यों मांगते हो? " . जाति भायातो भवतः पितेति सहसा मातुर्निशम्योदिन धूलोधूसरितो विहाय शिशुभिः क्रीडारसान्प्रस्तुनान् । - दुरातस्मेरमुखः प्रसार्य ललित बाहुद्वयं गलको नाधन्यस्य पुरः परैति परया प्रीत्या रणन्धर्धरम् ॥ तुम्हारे पिता आये यह माता की बात सुनकर धूल में लिपटा हुमा अपने साथी पालकों के साथ का खेल छोड़कर दूर ही से हंसता हुमा दोनों हाथ फैलाकर कुछ बोलता हुआ बालक पड़े प्रेम से किसी अन्य मनुष्य के सामने नहीं
२.
युका महमा प्रवादिनीवारन निमंत्मिनः
सम्पन्नमालालमुष्टिविमतः पान्यः पुनःप्रस्थितः
धमा माई,#यका विदेशी है मुझ पर दया करो, द्वार
के चीफ के फोन में गनर सोकर में प्रातःकाल चला
आऊंगा। इतना कहने पर यह गृहिणी के द्वारा दुनफारा
गया यह पथिक जो कन्धे पर एफ मुडो पुपाल लिये हुमा
था, यह यहां से चला गया।
गापति सति च नृन्यपि हृदयन एतां मियो विचिन्नयति
समविपम नच विन्दति गृहगमनममुन्सकः पथिक ३a
पथिक घर जाने के लिए उत्सुक है, उस उत्सुकता में वह
गता है,हसता है, नाचता है, हृदयस्थित प्रिया का ध्यान
करता है और उसे ऊंच नीच का ज्ञान नहीं है।
भद' ते सहरी यदध्वग नै कीर्तिस्तवोधुप्यते
स्थाने रूपमनुत्तम मुकृतिना दानेन को जितः
इन्यालोक्प भृश दशा फरुपया शीतातुरे च स्मृतः
पान्धेनैक पलाल मुष्टिचिना गर्वायते हालिका
पथिक गण तुम्हारो फीति का वर्णन करते हैं, यह तुम्हारे
ए सर्वथा उचित है, सुन्दर रूप मी तुमने पाया है, दान
तुमने फर्ण को भी जोत लिया है, शीत से ठिठुरा
पथिक ने एक मुट्ठी पुआल लेने की इच्छा से किसान की
ति की और अपनी स्तुति सुनकर वह अपने को बड़ा सम.
लगा
कयिता-कौमुदी।
कलिकाल
प्रा िकलो रानि सार्थलुन्ध
धनेन कि जीवितमेव रक्ष्यम् ।
कि नैव लाभो यदि सोनिकेन
मुध्येत मपो हवसर्वलोमा ।
कलिकाल पाया, राजा धन के लोभी हुए, ऐसे समय में
धन का इच्छा कीन करें, प्राणों की ही रक्षा करनी चाहिए,
यदि फसाई भेड़ के बाल काट फर उसे छोड़ दे, तो क्या यह
उसका लाभ नहीं है।
गध प्रपे विरम धैर्य धियः किमत्र
मिथ्या कदयसि कि पुरुषाभिमान ।
दूरादपास्सगुणमपितशेषसैन्य
दन्य यदादिशति सद्यमाचरामः॥
लज्जे, जामो, धैर्य ठहरी, बुद्धि यहां क्यों ? पुरुषार्थाभि-
मान, तुम प्यर्थ या तंग कर रहे हो इस समय हम यही
कर रहे हैं जो दीनता कहती है जिस दीनता ने सर गुणों को
दूर हटाया है और दोपों की पूजा की है।
भातलितोऽसि धामि कटक किसम सेवाशया
का न्यो नृपतिः व्यं निमगुणैः क से गुणा ये सताम् ।
बितरच तो परे मन वन किवा त्वयाम भुतम्
पूज्यन्ते शटमसरित्सरिप्रभृतयः गणेजपा सेवा
भार, कहां चले ! राजधानी जारहा। किस लिए!
सेषा के लिए यहां किसी संश करोगी राजा की स!
भपने गुणों से फोन गुण जोसजनों के होते हैं। इस
समय उनसे क्या होगा ! क्यों ग, यन में जाया क्या
.
--
भापति।
तुमने नहीं सुना है फिर शठ, मत्सरी मोर युगळ संरकों क
यहाँ मादर होता है।
शील शैलतापायमिना निदहपता वहिना
मा र नगति सुनस्य विकलालेशस्य नामाप्पाम् ।
शौर्य रिथि बमाशु निश्तवास्तु मे सदा
पनै न यिना गुणास्तुणयुपमायाः सममा इमे ।
पर्यत से शील गिर जाय, कुल आग से जल जाय, उस
शान का नाम भी भय मैं न सुनू जिसके लिए व्ययं परिश्रम
फिया है, इस रिन शूरता पर शात्र ही यज़ गिरे, सिर्फ एक
धन होना चाहिए, जिसके यिना ये समस्त गुण घास भूसे के
समान है।
धर्मः प्रयजिततपश्व चलित मत्यं च दुरं गतं
पृथ्वी मन्दफला जनाः कपटिनो मौदा स्थिता माझणाः।
राजा दण्दपरो विचाररहितः पुत्राः पितृदैषिणो
भार्थामत'विरोधिनी कलियुगे धन्या अना ये मृताः ।
धर्म ने सन्यास ले लिया, तपस्या भो चला गया, सत्य
तो पहुत दूर गया, पृथियों की उपजाऊ शक्ति घट गयी,
कपटी होने लगे, ब्राह्मण मूर्स हा गये, राजा विना विचार के
इण्ड देनेवाले हुए पुत्र पिता से द्वेष करने लगे, मायां पति
वरोधिनी हुई, इस कलियुग में जो मर गये, वे ही धन्य है।
आपत्तिः
पापबालश्च दरिदश्च द्वाविमा पुरुष समो।
चाण्डालश्च न गृहन्ति दरिदो
न
कविता-कौमुदी ।
४३३
चाण्डाल और दरिद ये दोनों घराबर हैं, चाण्डाल प्रहण
नहीं करता और दरिद देता नहीं।
एहि गच्छ पतोत्तिष्ठ वद मौन समाचर।
इत्यमाशाग्रहप्रस्तः क्रोडन्ति धनिनोथिभिः ।
'भाओ, जानो, गिरो. उठो, बोलो, घुप रहो, इस प्रकार
आशा ग्रह से ग्रस्त याचकों से धनी लोग खेलते हैं।
शीतमध्वा कदन्न'च वयोतीताश्च योपित्तः
मनसः प्रातिकूल्य घरायाः पल हेतवः।
बुढ़ापे के पांच हेतु है, ठंढा लगना, युरा अन्न खाना,
अधिक उमर की स्त्री और मन के प्रतिकूल स्थिति का
सामना।
दान न दरों म तपश्च सप्त'
नराधिती शङ्कर पासुदेवो।
भग्नी रणे वा न हुतश्च कायः
शरीर कि प्रार्थयसे मुखानि
दान नहीं दिया, तप नहीं किया, शंफर और घासुदेव की
भाराधना भी न की, अग्नि में या रण में शरीर का हवन भी
नहीं किया शरीर, फिर तुम सुख की आशा क्यों करते हो?
भर पाणि कुरुष्व सायदमलो पर्णानुपूर्वी मुखे
घेतः स्वास्थ्यमुपैहि याहि गुरुते प्रज्ञ स्थिरत्वं मन ।
हज्जे तिष्ठ पराहमुखी क्षणमहो तृष्णे पुरःस्थीयता
पापो यावद प्रवीमि धनिम देहीति दीन पचा।
भद्रे याणि, सुन्दर शब्दों को मुंह में सजा रखो, चित्त
स्वस्थ हो जाभो, यहप्पन तुम जामो, घुदि स्थिर होमो,
।
सेयक मुख मीरमानोस
४३४
सेवा पनि ।
लग्जे मुंह फेर कर ठहरो, तृष्णे तुम थोड़ी देर के लिए
आ जाओ, जय सक पापी में धनियों के सामने "दो"
दीन बचन कहूं।
महगेहे मराकीव भूपयधूमपोय माजारिका
माजोरीव शुनी शुनीव गृहणी वाप्यः किमन्यो जनः ।
इत्यापनशिशूनसन्वितहतः मप्रेक्ष्य झिल्लीरवै-
लतातन्नुवितानसंवृतमुखी मुली चि रोदिति ।
मेरे घर को चूहिया मच्छर के समान हो गयी है, मिली
यूहिया के समान हो गयी है. दिल्ली के समान फुत्ती मोर
कुत्तों के समान गृहिणी हो गयी है, पेसो दशा में दूसरों के
लिए क्या कहा जाय ? इस प्रकार दुःखी लड़कों को प्रार
छोड़ते देख कर मकरी के जाले से मुंह छिपा कर मिती ।
शब्द के द्वारा चूल्ही रो रही है।
तृषादपि लघुस्तूलस्तुलादपि च पापः।
पायुना किन भीती सीमामय प्रायेदिति ।
र्ग तृण से भी हल्की है और याचक हण से भी हला
है।फिर भी वायु उसे उड़ा फर नहीं ले गण, यह सर से
कि कहीं यह मुझसे भी मांगने न लग जाय।
सेवा-पद्धति
दहाति सेण्टः गुरु मानमेव ।
पर्षमयमीहतं तदेव ताय होय.
कापता-कौमुदी। ४३५ एसावजन्म साफश्य यदनायससिता। पे पराधीनजन्मानस्ते घेजीवन्ति के मृताः॥ किसी के अधीन रहना न पड़े, यही जन्म की सफलता है, जिनका जन्म पराधीनता में घीतता है वे यदि जीवित हैं तो मरा कौन है। सेवकादपरो मूर्ख शैलोक्मे पि न विद्यते। दिने दिने नमन्मोहादुमति योभिवाञ्चति ॥ सेयक से बढ़कर मूर्ख इस त्रिलोक में दूसरा नहीं है, जो दिन दिन नवता जाता है पर उन्नति चाहता है। काके शौच च तकारेषु सत्य लोबे धैर्य मद्यपे तत्वचिन्ता । ज्ञाने भ्रान्तिः खीषु कामोपशान्ती राजा मिर्श केन दृष्ट भुत वा ॥ कौए में शुद्धता, जुआरी में सचाई, नपुंसक में धीरता, शगवी में विचार, ज्ञान में भ्रम, स्त्रियों में कामशान्ति और राजा का मित्र होना किसने देखा या सुना है। है पहेलो भपदोतरगामी घ साक्षरो न च पण्डितः । भमुखा स्फुटवक्ता च यो जानाति स पण्डितः ॥१॥ वरनहीं है, पर बहुत दूर तक चला जाता है। साक्षर है पर पण्डित नहीं, मुंह नहीं है, पर साफ़ साफ़ योलता है, इसको जो जानता है यही पण्डित है । उत्तर-पत्र ।
३६
पहेली।
-
धने जाता पन त्यत्तवा वने तिष्ठति नित्यशः।
पण्यत्री न तु सा वेश्या या जानाति स पण्डितः ।
धन में उत्पन्न हुई है, यन में ही रहती है, यह बाजार को
पर वेश्या नहीं। इसे जो जानता है यह पण्डित है।
नोका।
।
.
गोपालो नैव गोपालः मिशूली नैव शंकरः ।
धक्रपाणिः स नो विष्णुयोजानाति म पण्डितः ॥
गोपाल है पर गोपाल ( कृष्ण ) नहीं है, त्रिशूली है ।
शंकर महादेव नहीं है, चक्रपाणि है, पर विष्णु नहीं है।
जो जानता है, यह पण्डित है । उत्तर- सांड।
अच्छष्ट शिवनिर्माल्य वमन शवकपट ।
काकविष्टा समुत्पसः पचैतेति पविकाः ॥en
जूठा, शिय का निर्माल्य, चान्त किया हुआ, मुर्दे का
फपड़ा, कौए की विष्ठा से उत्पन्न ये पांच वस्तु पवित्र हैं।
कम से उत्तर-दूध, गंगाजल, मधु. रेशम और पट ।
काचिन्मृगाक्षी प्रियवियोगे गन्नु निशा पारमपारपन्ती ।
बगानुमादाय करेणवीयामेयाडमालोक्य शनैरहासात य
एफ खी पति विरह के कारण रात काटने में असमर्थ
हो गयी। मतपय गाने के लिए उसने हाथ से घोणा उठायी,
पर चन्द्रमा को देखकर उसने योणा धीरे सेपर दी। घीणा
रसने का कारण यह है कि मृगाः (चन्द्रमा) के गोद में रहने
घाला मृग, यदि मेरा गाना सुनने के लिए चन्द्रमा फोर
फर आये, तो चन्द्रमा निष्कल हो जायगा भौर यह मेरे
मुष की परायरी फरने लगेगा।
-
. - फयिता कौमुदी। वरुण्यालिङ्गितः कण्ठे नितम्बस्थलमाश्रितः। गुरूणां सविधानेपि कः कूजति मुहुमुहुः ॥६॥ तरुणी ने गले में आलिङ्गन किया है, जो नितम्म ( कमर के पीछे का भाग) पर सित है, गुरुओं ( भारी वस्तु) के समीप भी कौन यारवार बोलता है। उत्तर--आधा भरा घड़ा। - वृक्षा प्रवासी न च पक्षिराजत्रिनेत्रधारी न च शूलपाणिः । त्वग्वनधारी न च सिद्धयोगी जलप विभूम घटो न मेघः ॥७॥ वृक्ष के अग्रभाग में रहता है, पर गरुड़ नहीं है, त्रिनेत्र है पर शिव नहीं है. छाल का.वस्त्र धारण करता है पर सिद्ध था योगी नहीं है, जल धारण करता है पर न घड़ा है या न • मेघ । उत्तर--नारियल। एकपक्ष नंकाकोऽयं बिलमिच्छम्न पन्नगः । क्षीयते वईते चैव न समुद्रो न चन्द्रमाः ॥८॥ उसको एक आँख है पर वह कौवा नहीं है, बिल हूंदता है, पर सर्प नहीं है, घटता बढ़ता रहता है, पर न समुद्र है और न चन्द्रमा । भस्थि नाऽस्ति शिरो नाऽस्ति वाहुरस्ति निरगुलिः । नास्ति पादय गाढमंगमालिंगति स्वयम् ॥९॥ हहियां नहीं है. सिर नहीं है, बाहु हैं पर अंगुलि नहीं है, दोनों पैर भी नहीं हैं, पर समस्त अंगों को यह स्वयं मालि- गान करती है। अंगरखा। भरनारीसमुत्पन्ना साम्री देवि ता। भमुखी कुरुते शन्द जातमात्रा विनश्यति ॥१०n ४३८ पहेली। स्त्री और पुरुषों से यह उत्पन्न होती है, वह स्त्री है पर उसके शरीर नहीं है, उसके मुंह नहीं हैं, पर यह शब्द करती हे और उत्पन्न होते हो नष्ट हो जाती है। उत्तर-चुटको। दन्तहीनः शिलाभक्षी निर्जीवो बहुभाषकः । गुणस्यूविसमृद्धोऽपि परपादेन गच्छति ॥ उसके दांत नहीं है, पर वह पत्थर साता है, उसके - नहीं हैं पर यह बहुत बोलता है, गुण ( सूत ) से युक्त है। दूसरों के पैरों से चलता है। उत्तर--जूता। न तस्याऽऽदिन तस्योऽतो मध्ये यस्तस्य विधति तवाऽप्यस्ति ममाऽप्यस्ति यदि जानासि ER | न उसकी आदि है और न अन्त, (यःमध्ये तिष्ठति)। मध्य में रहता है । वह तुम्हारे भी है और हमारे भी। यदि जानते हो तो यतलाओ।नयन भनेकसुपिर बाघ कान्त ऋपिस शिवम् । चक्रिणासदाराम्य यो जानाति स पण्डितः ॥३॥ जिसमें अनेक विल हैं, जिसकी भादि में ध है और मन में कहै और यह ऋपि का नाम है, सांप उसकी आराधना करते है, जो इसको जानता है यह पण्डित है। उत्तर-पाल्मीक बने वसति को वीरो योस्थिर्मासविवर्जितः । मसिदत्वरने कार्य कार्य कृत्वा वन गतः ॥१४॥ पह फोन यीर वन (जल) में रहता है, जिसके हाई मांस नहीं है, मा तलयार के समान काम करता है और काम करोय न (जल) में चला जाता है। बुहार . पा AAAAAmAR . कषिता-कामुदी। ४३६ अपूर्वोऽयं मया दृष्टः कान्तः कमललोग्ने । शोऽन्तर' यो विजानाति स विद्वान्नात्र संशयः ॥१५॥ मैंने यह अपूर्व जिसके पहले हो), फान्त (जिसके अन्त में"क" हो) देखा, जिसके मध्य में"शो" है इसको जो जानता है यह पण्डित है, इसमें सन्देह नहीं । उत्तर-अशोक । भायन होन जलधापदृश्य मध्येन हीनं मुवि वर्णनीयम् । अन्वेन हीन वनते शरीर हेमाभिधः सश्रियमातनोतु ॥ आद्य अक्षर से हीन होने पर यह समुद्र में अदृश्य होता है। मध्यहीन पृथिवी में रहता है, अन्त से हीन होने पर शरीर का एक अंग होता है यह हेम नाम वाला तुम्हारा कल्याण करे। उत्तर--करज। सदारिमायापि न वैरियुक्ता नितान्तरतापि सिरीव नित्यम् । पोक्तवादिन्यपि नैव इती का नाम कान्तेति निवेदयाशु ॥७॥ जो सदारिमध्या अर्थात् सदा अरियों के मध्य में है अथया जिसके मध्य में सदा "रित है, पर यह पैरियुक नहीं है, नितान्त रक्त है पर सिता (श्वेत या स अक्षर से युक्त) कही पान कहती है, पर दूती नहीं है, फान्त, शीघ्र पतलामो यह कौन है। उत्तर-सारिका। पको त्रिशूली न हरो न विष्णुमहावलिप्टो न च भीमसेनः । स्वछन्दचारी मृपतिन' योगी सीतावियोगीन चरामधन्यः men घफ और मिशूल धारण करता है पर न तो विष्णु है और नशिप, यहुत यलबान है पर मीमसेन नहीं है. इच्छा पूर्वक चला करता है, पर न रामा हैन योगी, सीता (जानकी या हल)का वियोगी है, पर रामचन्द्र नहीं हैं। उत्तर-सांड़ा -- मघाटा। नवोढा । कांची दामनि वेशयन् वितनुते वासः श्लय सुभ्र वो- हा यक्षसियोजयन् करतल धो कुचामोरहे। जम्पन् सादु बचोधर धयति यत्प्रेयान् कुतो विस्मय:- पांशु चक्षुपि विक्षिपन् यदि धन गृह्णाति पाटघरः ॥१९॥ प्रियतम करधनी ठीक करते हुए नायिका का पत्र ढीला कर देता है, हार पहनाते हुए अपने हाथ स्तनों पर रखता है, मीठी मीठी याते करता हुआ अधरपान करता है, इसमें क्या आश्चर्य है, चोर तो आंखों में धूल डालकर धन उठा ले जाता है। पलान्नीता पाय मुखभिमुख नैव कुरुते धुनाना मर्धन हरति बहुशश्चुवनविधिम् । हदिन्यस्त हस्त क्षिपति गमनारोपितमना नवोदा वोहार सुस्सयति च संतापयति च ॥२०॥ पलपूर्वक जब यह पास लायी जाती है तय सामने मुंह नहीं करती, मस्तक कंपा फर चुंबन में यिन डालतो है, लय पर हाथ रखते ही यह जाने के लिए तैयार हो जाती है, इस प्रकार नवोढ़ा पति को सुपी भी करती है और सन्तापित भी करती है। मातः केलि गृहम पामिशयितुरमातु मानने जामाता व निर्दयो निज मुजापाशेन मा पाइति । भवानि क्षतते निजैः करदनदेशापोटके गोवीराविमोक्षच कुस्त नियमो नित - फयिता-फौमुदी। ४४१ मा, अध में फेलिगृह में सोने न जाऊँगो । उसने पूछा, क्यों ? नवोदा ने कहा, तुम्हारा दामाद बड़ा निर्दयी है, यह मुझे अपने भुजपाश से दबाता है अपने नखो से वह मेरे अंगों को क्षत विक्षत करता है, ओंठ काटता है, घस्त्र भी......मैं रात सो न सकी। धैर्य धेह मुते हतेनशरते भतु भंय मा कृथा- श्चेष्टास्तस्य सहस्व यौवनवतो नावावधाः कामदा।। वाच्य नैव कदापि कस्य निकटे रीतिस्त्वय' वतते- खोपामीहशमाकरोत्तवपिता जानीह पूर्वहि मां ॥४॥ माता ने उत्तर दिया. येरो धैर्य धारण करो, पति का भय न करो, उस युवक की अनेक प्रकार की चेटामों को सहो, यह यात किसी दूसरी जगह न कहना, स्त्रियों की ऐसी ही रीति चली आयी है, तुम्हारे पिता ने भी पहले मुझसे ऐसा ही किया था। दीपाकुरः स्फुरति पश्यति केलि कोरो जाले निवेशत मुग्यीय सत्री पकास्ति । इस्य विचित्य पचतानशशांक वाला नाथ निषेधुमनिपेहधुपित्रधामः ॥५॥ दोएफ जल रहा है, फ्रीड़ा शुक दस रहा है, सिरकी में मुंह लगाये सखो भी सही है, इस प्रकार सोचकर लजा के कारण याला पति को न निषेध ही फर सकी और न নিয়।
६
u-on-Mere--
प्रोक्तिमत्का।
प्रोपित भर्तृका
रोखो मधुपापिकः परमतो भानुपासीमार
हीरोभाषितापमाप्रपउनौ पोरोगना
संतापक्षपात निरततरमारपामिमा
मुलगा प्रहिणोमिन कठिन stram
ग्रमा मधु पीने पाला है, पिफ दारो के बारा नीति
हमा है, वायु एप (मासर) पाना, शुभम
को कहने में हो चतुर । मेघ जस स स पर
करने में लगा रहतात.किरम पनी परमपणा लगाया
कटिन यित पियतम के पारा फिगर भए ।
मानानुमानमपी मौearn
कामपति मुभमगि।
अयनमा हिमपानी वालि
पानुबाहोर पागि प्रकाशित
कममहही पानी गामा भीर मानियो ।"
दोनों की मापनी बन
गया !
उसकी माड़ी बल दी frati. या जाती
लिए हार का पालनला गया।
हुम्वांगमरमपी गयी।
wr मा भूकमी
ANMARATHI
Kratrimmer fal 140
Marwarfitfalafaaman
+
-
कविता-कौमुदी। मेरे हृदय में दारुण कामवेदना देकर मेरे स्वामी इसी हुम्हारे मार्ग से गये। कौआ, उस समय तुम उनके सामने कि क्यों नहीं ? अरे घर की तोती, तुमने छींका क्यों नहीं ! खंडिता जातस्ते निशिजागरोममपुनेने त्रांबुजेशोधिमा- निस्पीत' भवता मधु प्रविततव्यापूर्णित मे मनः । भ्राम्यद्वभृगंधनेनिकुजभवने लब्ध स्वया श्रीफल- पंचेषुः पुनरेपमा बहुनरैः करैः शरैः कृतति 10 श्री फहती है, रात को आपने जागरण किया है, और रेरी माखें लाल होगयी है, आपने रात को खूप शराय पी मोर मेरा मन घूम रहा है । भ्रमर गूंजनेयाले लतागृह में मापने फल पाया है, पर यह कामदेव फठिन शरों से मुझे सता रहा है। माता मातरूपागनोसिजनितानिनि दिता चतुषो- मैदायामम गौरव पपहत प्रोन्यादितलाय । कितपत्र कृत दिपारमणमीमुकामपागम्यते दुःख तिपति यतपय मधुनाकतांरिमवायो यति ॥२॥ इस समय पड़े प्रात:काल भाये हो, रात भर नुमने मुझे जगाया, मुझ मूर्स का तुमने गौरब नए किया, मुझे दलका एनाया, क्या तुमने नहीं किया? प्यारे, अप मैंने भी भय छोर दिया, जाती है और अपने हित की जो बात में करगी, यह तुम सुनोगे।
No text on this page.
कविता-कौमुदी।
स्वाधीनपतिका
भस्मासखि वाससी न रचिरे वेयक नोजवल'
नो वक्तांगतिरुद्धत न हसित नैवाक्षिकधिम्मदः ।
किन्वन्येपिजना वदतिसुभगोप्यस्याः पतिनान्यतो-
दृष्टि निक्षिपतीति विश्वमियतां मन्यामहेदुःखित ।।।।
सखि, तुम्हारे कपड़े अच्छे नहीं हैं गले का हार भी
सुन्दर नहीं है तुमारी चाल भी पेंट की नहीं है हंसी भी
रसोली नहीं है और किसी बात का भी अहंकार नहीं है।
पर दूसरे भी यह बात कहते हैं कि इसका पति दूसरी और
नहीं देखता । मैं इसीसे सय की अपेक्षा अपने को भाग्यवान्
समझती हूँ।
रवा : परपति नैव पश्यति यदि न मग वकक्षणा-
स्ममंछेदपटु प्रतिक्षणमसौय तेन नादावयः ।
मन्यासामपि कि पीमि चरित' स्मृम्या मनो पेपते
कांतः स्निग्धदशा पिलोकयति मामेतावदागः सखिः ।।२।।
सास मेरी ओर देखती ही नहीं, देखती भी है तो मांखे
रदी फरफे। ननद प्रतिक्षण हृदय पर जलाने पाली पात
पोलती है, भौरों की पात क्या कह', उनके चरित का स्म.
रण के ही हृदय फाप जाता है । सपि. मेरा अपराध यही है
कि प्रियतम मुझपर प्रेम फरते हैं, मुझे प्रेम की दृष्टि से
.
अभिसारिका
सिरसीयांदपि विपधरामीतिभाजो निशायो-
'तमस्वाभिमरले साहस नाप तस्याः ।
No text on this page.
कविता-कौमुदो। इति इमार स्मारं दरदलित शीतयु तिरुचौ सरोजाक्षी शोण दिशिनर्यनको विकिरति ॥४॥ क्या यह मार्ग मैं डांक आयो जो कुपित सर्पिणी के कारण भयानक हो गया है ? कुल के नियम पालन करनेवालों कितने कठोर घचन मैंने न सहे। इन बातों का स्मरण करके कमलाक्षी उस दिशा की ओर लाल आँखों से देखती : जिस दिशा में चन्द्रमा थोड़ा उदित हो रहा है। सित यसनमीयतंवपुरिनीलचोलभ्रमा- न्मयामृगमदाशयामलयजादवः सेवितः । करणे परियोधितः स्वजन किया दुर्जनः पर परम पुण्यतः सखि न लंधितादेहली ॥५॥ नील वस्त्र के भ्रम से मैंने श्वेत वस्त्र पहन लिये, कस्तूरी के भ्रम से मलय चन्दन का उपयोग किया। स्वजन समझ कर दुर्जन को हाथ से जगाया । पर सखि! भाग्य की पात है कि उस समय तक भी मैं दहली के बाहर नहीं गयी थी। इस जगति रतीशप्रक्रियाकोशलिम्याः कति कति न निशोथे मुभ्र वः संचरन्ति । प्रमतुविधि हताया जायमानस्मितायाः सहचरि परिपथीहंतदंताशुरेव ॥६॥ इस जात् में फामकला में कुशल कितनी खियो रात को नहीं घूमती है, पर मैं ऐसी अभागी हूं कि मुझे हंसी था जातो है, मीर मेरे दातों की प्रभा ही मेरा दुश्मन हो जाती है। २६
No text on this page.
. कविता-कौमुदी। सामान्य वनिता स्पोरादपिशकसैहिमरुधोरप्याच'पोलमसे- भोगीद्रादपिचेद्विभेपितिमिरस्तोमाद पिप्रस्थसि । घेत्कुंजादपियसे जलधर वानादपिश्युभ्यकि प्रायः पुत्रिहवास्मिहत भविता त्वतः कलंकः कुरु ॥७॥ यदि तुम नागरिकों से शङ्कित होती हो, चन्द्रमा की किरणों से भी लजित होती हो, सांपों से भी डरती दो, अन्धकार से भी भयभीत होती हो, नताकुज से भी घबड़ाती हो, मेघ गर्जन से भी क्षुभित होतो हो, तब तो बेटी, मैं मारो गयी, तुमने कुल में कलंक लगाया। वयं याव्ये बाला तरुणिमनियूनः परिणता- नपीछामो वृद्धापरिण विधान स्थितिरिति । स्वयारम्ध जन्मक्षपयितुमनेन काविना न मे गोगे पुनि कचिदपि सती लांछनमभूत ॥२ "हम लोग बाल्यावस्था में यालको से, यौवन में युवकों प्रौटी और वृद्धों से भी.व्याह करती हैं, यही रीति चली भायो है। पर तुमने इस एक ही पति के साथ जन्म बिताना निश्चय किया है। येटो! यह तुमने क्या किया? हमारे कुल में माज तक सती होने का कलंक नहीं लगा है। हमारे कुल में भाजतक कोई भी सतो नहीं हुई है। 'दिवसे घटिकास्त्रिंशत्रिशटिकाः पर रजनी। ।
No text on this page.
3 . कविता-कोमुदी। सामान्य वनिता घेस्पौरापिर्शकसैहिमरुचोरप्यचि पोलजसे- भोगीद्रादपिचेद्विपितिमिरस्तोमाद पित्रस्यसि । घेत्कुनादपिदयसे जलधा घानादपिक्ष्युभ्यकि मायः पुत्रिहवास्मिहत भविता स्वतः कलंकः कुले ॥१॥ यदि तुम नागरिकों से शङ्कित होती हो, चन्द्रमा की किरणों से भी लजित होती हो, सांपों से भी डरती हो, अन्धकार से भी भयभीत होती हो, लताकुंज से भी घबड़ाती हो, मेघ गर्जन से भी क्षुभित होतो हो, तब तो येटी, मैं मारो गयी, तुमने कुल में कलेक लगाया। वयं वाज्ये वाला तरूपिमनियूनः परिणता- नपीठामो वृद्धान्परिणय विधान थितिरिति । स्वयारम्ध जन्म क्षपयितुमनेनवपतिना । न मे गोगे पुनि कचिदपि सती लांछनमभूत् ॥२॥ हम लोग याल्यावस्था में यालको से, यौवन में युवकों मोदी और वृद्धों से भी.च्याह करती हैं, यही रीति चली भायो है । पर तुमने इस एफ ही पत्ति के साथ जन्म विताना निश्चय किया है। येटी ! यह तुमने क्या किया? हमारे कुब में आज तक सती होने का फलंक नहीं लगा है। हमारे,कुल में भाजतक कोई भी सतो नहीं हुई है। 'दिवसे घटिकास्त्रिंशशिदटिकाः पर रजनौ। कक्षनगर युपानस्तातविधात: किमाचरित ॥३॥ दिन में तीस घड़ियां होती हैं और रात में तीस; मगर में लाखों युवक है। हाय, विधाता में यह क्या किया ? T .
No text on this page.
कविता-कौमुदी।
४१
भपरीक्षितलक्षणप्रमाणैरपराभृष्ट पदार्थसार्थतत्त्वैः ।
भवशीकृतजेसयुक्तिजालेरल मेतैरनधीततर्क विद्या॥
'नसे क्या होनेवाला है। इन्होंने लक्षण और प्रमाणों को
परीक्षा नहीं की है, पदार्थ तत्वों का इन्होंने ज्ञान नहीं प्राप्त
किया है. जय की युक्तियों को इन्होंने घश में नहीं किया है ।
शानाधिरक्षि धरणः कणभक्षकश्न
श्री पहिलोप्युदयनः स च वधमानः ।
गगेपरः शशधरो वहवश्व नव्या,
प्रधळधव इमे ददर्याऽधकार' ।
शान-समुद्र गौतम, कणाद, पक्षिल स्वामी, उदयन, थर्घ
मान, गंगेश्वर, शशधर तथा और भी अनेक नवीन ग्रन्थकार
अपने अम्पों से हदय का अन्धकार दूर करते हैं।
नैयायिक-निंदा
कर्मब्रह्मविचारणाविजहतोभोगापवर्ग प्रदा-
घोष 'चन क'शोष फलक कुवैत्यमीताकि काः ।
प्रत्यक्ष न पुनाति नापहरते पापानि पीलुच्छटा-
ग्याधिनावतिनैव पान्यनुमितिनों पक्षता रक्षदि ।
ये मैयायिक फर्म और ब्रह्म के उस विचार का त्याग
करते हैं जो भाग और मुक्ति देता है । फेवल गला सुखाने
घाला गर्जन करते हैं। प्रत्यक्ष पवित्र नहीं बनाता, पीलुबाद
पापों को दूर नहीं करता, अनुमति भी रक्षा नहीं करतो,
पक्षता की भी यही दशा है।
.
नयायिक निदो। हेतुः कोऽपि विशिष्टधीरनुमिती म शान युग्म मर- द्वाचोनेति च मावादमुसरा नेपायिकाश्चेदुयुधाः। .. मेश्याडमियत्पल' वलिमुनी दन्ताः कियतस्तथे- त्येव संतत चिन्तनैः अमजुरी म स्युः कय पहिताः ॥२॥ अनुमान में विशिष्ट युद्धि हेतु है, दो ज्ञान नहीं, इस प्रकार की व्यर्य को याने जो यका करते हैं वे नैयायिक यदि पण्डित समझे जाय तो भेड़े का अंडकोश कितने पल का है, कौर के कितने दांत होते हैं, इस प्रकार की निरर्थक यातें जो करते हैं ये भी क्यों न पण्डित माने जाय! म जिप्रत्याम्नायराति न तदंगान्यपि सकृत- पुराण' नादृते न गणयति कि पस्मृतिगणम् । पठन शुष्क त परपरिमायोक्तिभिरसौ नयन्यायुः सर्व निहतपरलोकार्य यवनः ॥३॥ नैयायिक वेदों को सूघते तक नहीं, वेदांगों को छूते मो नहीं, पुराणों को एक बार भी नहीं देखते, स्मृतियों को तो कुछ समझते ही नहीं, चादी फो परास्त करने के लिए केवल शुष्क पाठ पढ़ते रहते हैं । इस प्रकार अपनी समस्त आयु नष्ट कर देते हैं, परलोक को भूल जाते हैं। प्रयव रस्तोकै परिचितकुतकप्रकरणाः पर पाचोवश्यान्कतिपयपदीयान् विदधतः सभायां वाचादाः ध्रुतिकट रटतो घट पटान् न लडते मदाः स्वयमपि तु जिहूति विबुधः ॥४॥ यड़े प्रगतों से इन्होंने कुतर्फ प्रकरण का परिचय प्रा किया है, कतिपय शब्द समूहों का ये प्रयोग करते हैं, कार फाड़नेवाले घट पट आदि शब्दों का प्रयोग ये साथ में लग . ..
कविता-कौमुदी । करते हैं। पर ये भूखं हैं इसलिए लजित नहीं होते, क्योंकि लजित तो विहान होते हैं। - : गणक-प्रशंसा मदेव न पिश्यं च कर्माऽवसियेन यत्राऽम्ति देशे मनुज्योतिषसः । म तारा न घारा नवानां ग्रहाणा न तिथ्यादयो वा यतस्ता युद्धाः ॥१॥ जहां ज्योतिष विद्या जानने वाले नहीं हैं वहाँ देवता और पितर सम्बन्धी कोई कार्य सिद्ध नहीं होते। फ्णकि यहां पालों को तिथि नक्षत्र आदि का ज्ञान नहीं होता। भानोः शीतकरस्यवाऽपि मुजगनासे पुरो निश्चिते- तीर्थानामटन' जनस्य घटते सापमयोचाटनम् । इप्टे प्रागवधारिते सति एतेस्तुष्टेश्वलाभो भरे- दृष्टे तु प्यसनेऽन तत्परि हतिः कन' जपाय: क्षमा ॥२॥ सूर्य या चन्द्रमा का प्रण पहले से मालूम हो जाने पर ही मनुष्य तीर्थयात्रा के लिए जा सकता है, जिससे उसके प्रिताप नष्ट हो जाय। हमारे अमुफ मनोरथ की सिद्धि होने. पाली है यह यात पहले से मालूम हाने पर मनुष्य को धैर्य होता है धीर घह प्रसन्न होता है। दुःप मानवाला है यह 'पात जय पहले मालूम हा काय, तभी जप भादि के द्वारा उसका प्रतीकार किया जा सकता है। वृद्विाली मुरमुरादापुपवतो परागः शुकादीनामुपविलपाविस्यमी सदृष्टाः । मादित्पत्रिसवचनेषर भोपुलाक- पापानिपनिया मायभारम् ॥
यद्य प्रशंसा। विलिपति सदमदा जम्मा जनाना फलनि गदि नदानी दर्शयत्यान्मदाश्यं । में फलति यदि ल दरवाऽहमाई- हरति धनमिहवं हत देवापाशः ॥३॥ ये ज्योतिरी मनुष्यों का झूट सच जन्मपत्र बनाते हैं, यदि फल टीक, उतरा नय ये अपनी विद्वत्ता दिखाते हैं, यदि फल न घटा तो लग्न देपनेवाले का अज्ञान चलाते हैं, इस प्रकार ये मूग लोगों का धन हरते हैं। प्रमेादे खेदे वाऽप्युपनमतिपु सो विधिवशा- म्मयैवं प्रागेवाऽभिहितमिति मिथ्या कथयति जनानिष्टाऽनिटमलन परिहारकनिरना- नसौ मैपादीनां परिगणनयैव भ्रमयति ॥४॥ भाग्यवश मनुष्यों को दुःस सुख होता है। पर ज्योति जी कहते हैं देखा मैंने यह पहले ही बना दिया था, पर उन यह बात झूठी होती है। अपने इट अनिष्ट ज्ञानकर उसे करने की इच्छा रखनेवाली को ये मेप वृप आदि की ग से माह में डाला फरने हैं। -- वैद्य-प्रशंसा गुरोरधोताऽखिलवैद्यविद्यः पीयूषपाणिः कुशलः किया। गतःस्पृहा पंधरः कृपालुः शुद्धोधिधारी भिषगीदृशः स्थान ata जिसने गुरु से विद्याध्ययन किया है जो अमृतपाणि क्रिया में कुशल है, निस्पृह, धीर, कृपालु, शुद्ध और अधिका है, यही चैद्य है । वैद्य में इन गुणों का हाना आवश्यक है।
-- कविता-कीमुदो। ४५ रागादि रोगान् सततानुपानशेषकायरमृतानशेषान् । भीन्सुक्योहारनिदान जघान योऽवं वैद्यायनमोऽस्तु तस्मैः ॥२॥ राग आदि रोग सदा लगे रहते हैं, ये समस्त शरीर में हुए हैं। इनसे उत्सुकता, मोह, अरति आदि उत्पन्न होते हैं। इनको जिन पूर्व वैद्यों ने दूर किया है, उनको नमस्कार । मस्ते दुःसहवेदनाकवलिते मग्ने स्वरतर्गल-1 तप्तायो स्वरपावकेन घ तनी ताने हपीकरजे। इने यधुजने कृत प्रलपने धैर्य विधातु पुनः कः शक्तः कलितामयप्रशमनो वैवात्परो विद्यते ॥३॥ सिर में भयानक वेदना हो रही हो, स्वर पड़ गया हो, ज्वर से शरीर जल रहा हो, इन्द्रियां शिथिल होगयी हो, बन्धु दुःखीकों और रो रहे हो उस समय वैद्य के अतिरिक्त धैर्य देने पाला दुसरा कोन समर्थ हो सकता है। मावोधिधामथाऽपिमहाऽमये प्राप्त पु यो भिगिनि प्रथितस्तमेव । भाकारयत्यग्गिल एवं विशेषदी लोकोऽपि तेन भिषगेष न दुपणोपः ॥४॥ घेद्यक न जानता है। पर वैद्य के नाम से जो प्रसिद्ध हो घीमारी के समय में लोग उम को युलाने हैं, सभी युलाते हैं जिन लोगों को पहुन अनुमय है ये भी युलाने है इसमें उस घेद्यका क्या दाप है । उसे दोष न देना चाहिए। निसाध्यरकृत्य ऋविजमहोतीणांगीनाविक- धुद्धोते सुमर धमिद विजयो योहारमाप्तम्थलः ।, वृक्ष वारजन किसे निरस्तावनी वस्ताऽनयश्चिकित्मामपिवष्टि प्रदेपापिनम् ru पर समाप्त होने पर धन को, नदी पार जाने पर माधिक को, युद समान होने पर सैनिकों को, स्थान पर पहुंच .
. कुवैद्योपहास । आने पर ढोने वाले को, वृद्ध। वेश्या को, रोग के दूर होने पर वैद्य को और जिसको देना है वैसे अर्थी को, लोग देखते तक नहीं। उनसे दूरही रहते हैं। भ्रांता चेदांतिनः किं पठय शठतयाऽपि चाऽद्वैत विद्या- पृथ्वीतत्वे लुठंतो विमृशथ सततं कर्कशास्त्राकिंकाः किम् । चेदैनानागमैः किं ग्लपयय हृदयं भोशियाः श्रोशूल- वैद्य सर्वानवद्य विचिनुत शरण' प्राणप्राणनाय ॥५॥ भाई वेदान्ती, क्या तुम पागल होगये हो ? आज भी मौत विद्या पढ़ रहे हो । नैयायिको, आजमी पृथ्यो तत्वका विचार करते कर्कश तकशास्त्र का विचार कर रहे हो? वेदों से क्यों हृदय सुखा रहे हो ! सबसे उत्तम वैद्य-विद्या की शरण जामा जिससे प्राणों की रक्षा हो। कुवैद्योपहास वराज नमस्तुभ्यं यमराज सहोदर । ": f पमस्तु हरति प्राणान् वैद्यः प्राणान् धनानि च ॥ हेयमराज के सहोदर भाई वैद्यराज! आपको नमस्कार यम तो फेवल माण ही हरता और पैच पाण तथा धन दोनी हरते हैं। मिप्योपचईत गुपाकपापैरमाले यथार्थतः । बेचा इमे वंचित ग्यवां पिघमा परिपूरयति ॥२॥ झूटी दयायों से मूठे काही से भसहनीय पी मौर झूट तेलों में ये पैध रोगियों को ठगने हैं मोर मपनी मुही गरम करते हैं।
- -- -- फयिता-कौमुदी। न धातोविझाम' न च परिचयो वचकनये न रोगाणां तत्वावगतिरपि नो वस्तुगुणधीः । तयाऽप्येते वैया इति तरलयंतो जड़ जमा- नमून्मृत्योभुन्या इव वसु हरते गदडपाम् ॥३॥ धातु से परिचय नहीं, वैद्यक का ज्ञान नहीं, रोगों के विषय में कुछ मालूम नहीं, औषधी के गुण का ज्ञान नहीं, फिर भी ये वैद्य मूों को मोहित करते हैं । यमराज (मृत्य) फे समान रोगियों के प्राण हरने हैं और माथ ही धन भो । कपायरुपवासश्च कृतामुल्लापता नृणाम् । निजीकृतो घेद्यो निवेद्य हरने धनं ॥४॥ उपवास आदि के द्वारा मनुष्य नीरोग हो जाता है, येच जी कहते हैं कि मेरो दद्याइयों के द्वारा ऐसा हुभा है, और लोगों से धन लेते हैं। महातशाखपदावान् शाखमात्रपरायणान् । स्यजेदाभिरापाशानुपाशान्वैवस्वतानिव MAn जिन्होंने शास्त्रीय रहस्यों को नहीं जाना है अथवा जो फेवल शानही जानने हैं वैसे पैद्यों को दूर हो से नमस्कारः करे,, ये यमराज के पाश हैं, उनका दूर ही रहना अच्छा। . वैयाकरण प्रशंसा और निम्दा) वैयारणदिरावादपदमृगाः कयोति संप्रधा। ज्योति विगायकभिषगाननगहराणि यदि म स्युः । -- ४६२ वैया करण। . श चैयाकरण रूपी किरात से इरफर गे प्रशुद्ध शब्दरूपी मृग कहां जाते, यदि ज्योतिषी, नर विट, गायक और वैद्यों की मुखरूपी गुफा न होती। कुप्वोरकरपीच शेषोयमग्रिमस पोहविरामोऽवपान शश्लोटीत्यादिशपदसि यदिशाः शादिकाः पहिताः स्युः। तेरों को चाऽपराधः कथयत सतन ये पटती थोम्न- ताथस्याधरपपरपाधिमधिधिगधिगयरपस्टयेति कुप्रोः कः पौव, शेषोध्यसखि, ससनुपोरुविरामी वसानम्, शश्छोटो आदि कटिन कठिन शब्दों को रटने वाले वैयाकरण यदि पण्तित कहे जाय तो जो लोग ताथैया ताथेया धिम् धिग् मादि शद कहो हैं उा लागों का क्या अपराध है ? टिड्ढाण द्वयसरचुइसिटसो स्तिप्तझिमिप्यस्पमि. वस्मसाहशिचष्टुनाष्टुरतइन शश्लोसोन्यादितिः लोपोन्योलिदिरेचियचिभदाधाबदाप्ठेचदै रित्यन्दानखिलानयंति कतिचिच्छन्दान पदंतः कटून ॥३॥ टिड्ढाणञ् ङसिङसो आदि कर्णकटु शब्दों को रटते रटते वैयाकरण अपना जीवन समात कर देते हैं। सूत्रैः पाणिनिनिर्मितैबहुतनिपाद्य शब्दाऽऽटि- वैकुठस्तवमक्षमा रचयितु मिथ्याश्रमाः शाब्दिकाः पका विविध प्रमेण विविधा पूपाग्यपाऽन्वित मंदाग्नीननुरु धते मितबलानामातुमरक्षमाम् ॥yn पाणिनि के कमाये सूत्रों से अनेक शुद्ध शद बनाकर वैया. करण भगवान् की स्तुति-पद्य घनाने का व्यर्थ परिश्रम का रहा है। यहुत परिश्रम से यमाया पवार या मन्दाग्नि थाले मनुष्य के काम का होता है ? वे तो उसे संघ तक नहीं सकते।
१ कविता-कौमुदी। कृतदुरितनिगकरणं ध्याकरण चतुरधीरधीयानः । बुधगणगणनाऽवसरे कनिष्टिकायां पर जयति ॥ अशुद्धियों को दूर करनेवाले व्याकरण का अध्ययन युद्धिमान करते हैं । जब विद्वानों की गणना होती है तब पहले नाम उन्हीं का भाता है। पातंजले विष्णुपदाऽऽरगाया: पातंजले चापि नयेऽवगाह । माचक्षते शुद्धिदमा प्रसूनेराचक्षते रागमधोक्षजेच ॥६॥ गंगा के जल में जिसने अवगाहन किया है। थोर व्याफ- रण फा जिसने अवगाहन किया है उसी का विष्णु में अनुराग समझा जाता है और उसी की शब्द-शुद्धि समझी जाती है। नृणामनभ्यस्तफणाभृदोभगिरा दुगा बुधराजगांधी। भवदचापश्रु तिपद्धतीनोयुद्धक्षमेवोदतपरिमार्था ॥७॥ जिसने व्याकरण का अध्ययन नही किया है उस पद्धिती को समा नहीं जाम हो सकती है । जे वाण यिद्या नहीं जानता यद पा युद्ध में योद्धाओं का साथी हो सकता है ! नांगीकृतामाकरजोरधानामपाट धाति मुगाटमास्ने । करिमविदुक्के व पद कपलिया यपुः स्थिति पसेका जिसने व्याकरण या औपच नहीं पाया है उसके पचन में सदा पटुना रहती है. यदि किसी कार कोई सन्द पहा भी जाय तो शरीर पसीना पसीना हा ज्ञाता है और कौन लगता है। सुपाणिनिय कलयनपुरः यमुनाति मुभम् । पर्णादीनां घमानपुरया विधिमधुनोमी १९३ !
- M- ४६४ चौर प्रशंसा। पाणिनि के सूत्रों का ज्ञान प्राप्त करने से मनुष्यों को अच्छी आँखे मिल जाती हैं, वे वर्णों के धर्म जान जाते हैं और उनका उचित प्रयोग करते हैं। शब्दशास्त्रमनधीत्य यः पुमान् वक्तुमिप्रति वधः सभातरे । वन्धुमिच्छति धनेमदोत्कट हस्तिन कमलनालतंतुना ain जो मनुष्य बिना घ्याकरण पढ़े सभा में योलना च है यह धन में फमन के सूत से मतयाले हाथी को घाँ चाहता है। वीर प्रशंसा को वीरस्य मनस्विनः स्वविषयः को पा विदेशम्तथा । य देशप्रयते उमेर कुरने याप्रताऽजितम् । परंतामसलाम गुलपहरण: मिहो वन गाहने- सम्मिन्नेव इत द्विपेय धिरैस्तृष्णा नित्यारमनः ॥ मनस्य और के लिए न कोई अपना देश है भीर मदिर। यह जिस देश में जाता है या के प्रताप से अपने अधीनक लेना है। दांत नग्य और पूंछ का आत्रों को धारण का पाला मिंद जिस यन में जाता है यहीं हाधिकारभिः अपनीणाम मिटाता है। विनायवीरतिमानोनित ममायुतीय। परिवार पातितः । विमाकादमता गुण यमुश्याम्यात faal नमितारामानमाRifi.
- कविता-कौमुदी। धीर धन के बिना भी ऊंचे पद पाते हैं। रुपण धनवान् होने पर भी तिरस्कृत होते हैं। सोने की माला पहनने याला कुत्ता क्या सिंह को पा सकता है? एकेनोऽपि हि शूरेण पदाऽऽक्रान्तं महीतलम् । कियते भास्करस्येव स्फारस्फुरति तेजसाः ॥३॥ एक धीर भी समस्त पृथिवी तक को अपने पत्र में पर सकता है। जिस प्रकार एक सूर्य अपनी किरण समस्त संसार में फेला देता है। उसी प्रकार धीर भो अपना प्रताप सब जगह फैला सक्त है। पछवतः कल्पतरोरेप विशेषः करस्य से वीर। भूपयति कर्णमेकः परस्तु कर्ण तिरस्कुरुते ॥४ घीर, तुम्हारे हाथ और कल्पतर के पल्लय में थोड़ा भेद है। कल्पतर का पल्लव कर्ण (कान) को भूपित करता है, और तुम्हारा हाथ कर्ण (इस नाम के राजा) का तिरस्कार करता । जिहा हेजित समारशे सर्वदा मधुरपिये। भगवग्रामपीयून पिवत्येमनिशं ससे.. जिह! रसों को पहचानने घालो हो, तुम्हें मधुर वस्तु मिय, इस कारण भगवान का नामामृत तुम सदा पिपा करो। अंगेमुल्या दिवमापसंस्था सामानुपानपराऽमि नित्य । अंधस्थिर प्रेमरपारसई मरम्मुनिया स्वरवं. - मूर्ख-निन्दा। जिहे, तुम शरीर के अंगों में प्रधान हो, द्विजो (दातों) के बीच में रहती तो, तुम मनुष्यों को स्तुति करना छोड़ दो। रसने चितोऽयभंजलिस्ते परनिंदापरुपैरल वचोमिः। नरकापहरं नमः शिवायेत्यमुमादि प्रणव भजस्व मंत्र॥३॥ जिई, मैं तुमको हाथ जोड़ता हूं, परनिन्दा करना व्यर्थ है, नमः शिवाय, तथा प्रणव आदि मन्त्रों को जपो, इससे नरक का भय छूट जाता है द्वात्रिंशद्वदशनपिमध्ये भ्रमसि नित्यशः । तदिदंशिक्षिता केन जिह्व संचार कौशलम् ॥ ४ ॥ बिहे, बत्तीस दांतों के बीच में तुम सदा रहती हो, धूमती हो, वे तुम्हारे शत्रु हैं, महान् कुशलता तुमने कहाँ सोपी। मूर्ख-निन्दा यस्य नास्ति स्वयं प्रशा शान तस्य करोति किम् । लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ॥1॥ जिसको स्वयं बुद्धि नहीं है, उसके लिए शास्त्र या है। आंखों के भन्यों को दर्पण से लाभ नहीं होता। शिवरवि गुरु: प्राई विद्या सव यश जड़े। म तु खलु सपोर्शने शक्ति करोग्युपहति या ॥२॥ • गुरु, बुद्धिमान और निथुद्धि दोनों प्रकार के शिष्यों को समान भाव से पढ़ाता है। उनमें एक का ज्ञान यदा देता है भौर दूसरे का ज्ञान नए कर देता है, ऐसा नहीं करता।
- कविता-कौमुदी। ४६७ भवति च पुनभूयान्भेदः फल प्रति तद्यथा । प्रभवति रुचाविम्बोदप्रामणिन मृदा चयः ।।३।। पर फल में बड़ा भेद हो जाता है एक विद्वान् हो जाता और दूसरा मूर्ख का मूर्ख ही रह जाता है। लभेत पिकतासु तैलमपि यवतःपीड़य-- पिबेच्च मृगतृष्णाकासु सलिलं पिपासादितः। कदाचिदपिपर्यटन्शशविषाण मासादये- पतु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् ॥ * ॥ प्रयत करने पर चालु से भी तेल निकल सकता है, प्यासे स्नुष्य को मृगतृष्णका मैजल मिल सकता है, घूमता पृमता भी मनुष्य खरहे की सींग भी पा सकता है, पर मूर्ख मनुष्य समझाया नहीं जा सकता। प्रसा मणिमुद्धरेन्मकरवक्तूदंष्ट्रांकुरा- समुदमपिसंतरेप्रचलदुर्मिमालाकुलम् । मुजंगमपि कोपितं शिरसि पुष्पवद्धारये- पतु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् ॥५॥ मगर के मुंह से भो बलपूर्वक मणि निकाला जा सकता है, लहरियों वाला समुद्र भी पार किया जा सकता है, क्रुद्ध सांप भी फूल के समान माथे पर रखा जा सकता है, पर मूर्ख मनुष्य समझाया नहीं जा सकता। भूखों हि जम्पत पुसा श्रुत्वादापः शुभाशुभाः । भशुभ वाक्यमादचे पुरोपमिद शूकरः॥६॥ मूर्ख मनुष्य लोगों को अच्छी बुरी यातें सुनता है, पर मच्छी पाते छोड़ देता है और बुरी बातें ले लेता है, जिस प्रकार हमर सय चीजों को छोड़ कर विष्टा ही लेता है। ।
In मूर्ख निन्दा सपदेशो हि मूखांणां प्रकोपाय न शांतये । पयःपान मुजंगानां केवलं विषवर्धन ॥७॥ उपदेश से मूर्स मनुग्य क्रुद्ध होते हैं प्रसन्न नहीं होते प को दूध पिलाने से उसका विपही यढ़ता है। भज्ञः सुखमाराध्यः मुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः। झानग्यदुर्विदाधं ब्रह्माऽपि तं नरं न रंजयति ॥ ८ ॥ जो कुछ नहीं जानता, वह समझाया जा सकता है, भौ यहुत कुछ जानता है यह तो आसानी से समझाया ज कता है, पर जो मनुष्य थोड़ा जानता है उसको ब्रह्मा में समझा सकते। व्यालं वालमृणालतंतुभिरसौ रोदधुभमुग्नुंगते. छेनुं वजूमणी शिरीपकुसुम प्रांतेन सह्यते । माधुर्यं मधुबिंदुना रचयितु क्षारांवुधेरौहते. नेतु वाइति यः खलान्पथि सतां सूक्तः सुधास्य दिभिः ॥९॥ यह मनुष्य हाथी को मृणाल सूत्र से यांधने का प्रयत्न फरता है, होरे को शिरीप के फल से छेदना चाहता है, और के विन्दु डाल कर क्षार समुद्र को मीठा बनाना चाहना है, जो मनुष्य अमृनस्यन्दी पचनों से सलों को सन्ननों के रास्ते में ले जाना चाहता है। मधु यदा किंचिाहोऽहं द्विप इव माधः समभवं. तदासपंशोऽस्पीत्यमवदव लिप्त मम मनः। यदा किंचित्किंचि धननसकाशादवगन- बड़ा सोस्मिति माइव मदो मे ग्यपगतः ।। 1.॥
-ArAmanna कविता-कौमुदी। ४६६ जिस समय मैं थोड़ा जानता था उस समय मैंने अपने को सर्वज्ञ समझा और इससे मुझे बड़ा अहंकार हो गया।पर सज्जनों के साथ से जब मुझे थोड़ी थोड़ी समझ हुई, तब मैंने समझा कि मैं मूर्ख हूँ और मेरा सय अहंकार दूर हो गया। कृमिकुलचलितं लालाक्लिन्न विगंधिगुप्सितं. निरुपमरसं प्रीन्याखादन्नराऽस्थिनिर्भयं । सुरपतिमपिश्वापाश्वस्थ विलोक्य न शकते. नहि गणयति क्षुदोर्जतुः परिग्रहः फल्गुतां ॥११॥ कुत्ता विना मांस का एक हड्डी का टुकड़ा जय पा लेता है, उसमें कीड़े पड़े रहते हैं लार से सना रहता है यहुत बुरी गन्ध उससे निकलती है वह उस टुकड़े को बड़ा ही सरस और स्वाद समझता है तथा बड़े प्रेम से खाता है उस समय इन्द्र भी उसके पास आ जाय तो वह किसी प्रकार का भय नहीं करता। छोटा आदमी यह बात नहीं समझता कि उसं को यात में कितना सार है 'शिरः शा स्वर्गात् पशुपति शिरस्तः क्षितिधरं महीधाहदुगादवनिभवनेश्चाऽपि जलधिम् । अधोऽधो गंगेयं पदमुपगता स्तोकमधुना. विवेभ्रष्टानां भवति विनिपातः शतमुखः ॥ १२॥. गङ्गा खर्ग से गिर कर शिव के मस्तक पर आयो, शिव के मस्तक से पर्चत पर, पर्वत से पृथिवी पर और पृथिवी से यह समुद्र में गयी, इस प्रकार गङ्गा ऊपर से गिरती गिरतो बहुत नीचे चली गयी। वियेक-भ्रष्टों की यही गति होती है। शश्यो पारयितुं जलेन हुतभुक्छोण सूर्याऽतपा- नागेंदो निशिताकुशेन समदी दंदेन गेगर्दभी । । .
४७० मूर्ख निन्दा। प्याधिर्भ पनसंग्रहश्चशिविधैर्मगप्रयोगविपं. सर्पस्यौषधमस्ति शास्त्रविहितं मूनस्य नाऽस्यौप ।।३॥ जल के द्वारा अग्नि शान्त किया जा सकता है, से सूर्य-ताप से रक्षा की जा सकती है, हाथी तोपे माग से घश में फिया जा सकता है, गो और गधे दण्डे से यश लिये जा सकते हैं, रोग अनेक प्रकार की दयाइयों से दूर किया जा सकता है मंत्रों के द्वारा विप भी उतारा जा सकता इस प्रकार सय का औषध है पर शास्त्रहीन मूर्य का भी नहीं है। साहित्यसंगीतकलाविहीनः साक्षम्पनुः पुण्मविपाणडीनः । पूर्ण म खादपि जोषमानम्तमागधेयं परम पशूनाम् ॥ जो मनुष्य साहित्य सङ्गीत से दीन है उसे पूछ भोर रहित साक्षात् पशु समझना चाहिए। यह पण विनात भी जीता है, यह पशुमो का भाग्य है । वर पवंत दुर्गेषु प्रति वनचरे सर। कमजन संपामुरेग्यमवनेष्यपि ॥५॥ पर्यंत मीर अंगलों में मां के साथ भ्रमण करना मत परद्र-मरन में भी मूर्ग का माय होना महामही । देशीम विधा मनवानजान शीधर्मः। में पन्युगो शुरिमारमना मनुष्यग मारate जिन्दम विधान सामा, मदान, महान, मो, गुण धार म प, पिपी मार और मनुष एपर पारी मृग की नरम प्राय स्टोर में पूम।
कविता-कौमुदी। मुखोऽपि मूर्य दृष्ट्वा च चंदनादपि शीतलः । यदि पश्यत्ति विद्वान मन्यते पितृघातकम् ॥१७॥ मूर्ख मूर्ख को देख कर बहुन प्रसन्न होता है यह चन्दन से भी अधिक शीतल हो जाता है। पर जब यह विद्वान् को देखता है तय यह उसे अपना पितृयाती समझता है। गुणिगणगणनाऽऽरंभे न पतति कठिनी सुसंभ्रमावस्य । तेनोऽया पदि सुतिनी बद वस्या कीदृशी गवति ॥१८॥ गुणियों को गणना के समय जिसके नाम के लिए मादर से कलम न उठे ऐसे पुत्र को उत्पन्न करने से यदि माता पुत्र- घतो हो सकती है तो कहो यन्ध्या फैसी होती है । अंतःसारविहीनस्थ सहायः किं करिष्यति । मलपेऽपिस्थितो घेणुवे गुरेव न चंदनः ॥1st जो स्वयं दुर्यल है, जिसके भीतर कुछ नहीं है उसको सहायक मिलने का क्या फल हो सकता है, मलय-पर्वत पर का यांस यासह रहत है यह चन्दन नहीं हो जाता। मुक्ताफलैः कि' मृगपक्षिा र मिष्टानपान किमु गर्दभानाम् । भवस्य दोपी पधिरस्पगीत मूर्षन कि धर्मकथासंगः ॥२०॥ पशु-पक्षियों को मोतियों से क्या लाम, गधे के लिए मिठाई निरर्थक है, अंधे के लिए दीपफ, यहरे के लिए गीत पार मस्र के लिए धर्म-कथा ये सय म्यर्थ हैं। ये सस्मुविवादिनः परयशःशम्येन गुलाऽऽकुलाः पुर्वतिरषगुणस्तवेन गुणिनां यवानगुणामादन। तेरी रोगापितोदरदा कारोष्णनिःश्वामिना- दीक्षा रशिव कृष्णकणो दिया जनो जिनी ३२॥
४१२ मूर्ग निन्दा। जो ममा में विवाद करते हैं दूसरों के यश मे यहुन ग्या होते हैं अपना प्रशंसा करते हैं अपने गुणों का वर्णन करते और दूसरों के गुणों को दिगते हैं, जिनकी आंखें क्रोध लाल रदती है आर गर्म माम निकला करती है। मनुष्यों को विद्या प्ण सर्पमणि के समान मनुष्यों । ध्यथित फरने लायी है। प्रीयास्तममृता परोन्नतिझ्यामाने शिरःशूलिनः सागभूमगमलापविपुलोमामिभूनस्थितेः । अंत पविषप्रयेशविपमक्रोधोरण निश्वासिनः- कटा नूनमपंडितस्यविकृतिमीमवरारंभभूः ॥२२॥ जिनका गला स्तम्मित हो गया है, यह हिलडुल नई सकता, अन्य मनुष्यों की उन्नति की यात सुनते ही जिनक सिर में शूल उत्पन्न हो जाता है, वे उद्विग्न होकर भ्रमण करने लगते है वकने लगते हैं और बहुत हो क्षमित होते है, द्वेष विप के अन्तः प्रवेश होने के कारण विषम क्रोध से सांस लिया करते हैं मूखों की दुरी दशा है, उनके ये विफार भया. नक ज्वर के कारण हैं। मूर्खत्वं सुलम भजस्व कुमते मूर्खस्य चाऽष्टौ गुणा- निश्चिंता बहुभोजनोऽतिमुखरो रात्रि दिवास्वमभा । का कार्यविचारणांधवधिरोमानापमाने समः प्रायैणामयवर्जितो दवपुखः सुखं जीवति ॥२३|| मूर्ख होना आसान है इस लिए मूर्ख होने का यत करो, उसके आठ गुण होते हैं। निश्चिन्तता. बहु भोजन, अधिक पोलना, रात दिन सोना, कर्तव्य अकर्तव्य के विचार में भाधा वधिर होना, मान भोर अपमान फो समान समझना, .
कविता कौमुदी। ४७३ प्रायः नीरोग रहना, पुष्ट शरीर होगा। इस प्रकार मूर्ख घरे सुख से जीता है। सूर्य चिन्हानि पहितिगर्वा दुर्वचन मुये । विरोधी विषवादी च कृत्याऽकृत्यं न मन्यते ॥२४॥ मूर्य के छ चिन्ह हैं, अहंकार, दुर्घचन पोलना, विरोप रखना विप के समान योलना और कर्तव्य-अकर्तव्य का छान नरखना। भरण्य गदित कृत शवशरीरमुक्ति म्पले जमदरोपित मुधिरमूपरे पर्षितम् । स्वपुछमवनामितं वधिरंकणंजापः कृतो एतोधमुपाणी यउधोजन सेवितः ॥२५॥ ओ मैने मर्ग मनुष्य को सेश को यह निष्फल हुई। पहथरण्यरोदन के समान हुई. मुर्दे के शरीर में उपटन लगाने के समान । जमीन में फमल रोपने के समान हुई। ऊपर में पृष्टि के समान निर्थक हुई, येसी सेया करके मन कुरा की'छ सोधी करने का प्रयास किया, यहरे से पावें की और मां के सामने दर्पण रसा। निगुण इन माइति पायेकाभिधायिनी पिरि। परर धनुगम्य निजी पदिहमति ३५. निगुप मीर गृनयन दोनों शब्दों का म एकही है। देवो गुणहीन पर मिजोर हो जाता है। गनुर को एसी सभी गुण कदने । पेटीपीपरपरागरा- शारीपरमारोवार गुम्ब ममः। .
दरिद निदान पेनानभरभयोपिजगतः कुर्वति समता. भूति ये म बिना तुहर पदवी संतोपिक गताः IA पंटो, मच्छे रेशमी पन, श्येत छन, हार, घोड़ा आदि . माधम्य को नमस्कार । इनके द्वारा मुप मनुष्य मी संसार में अपने फो सयंश यना लेता है, और इनके बिना विद्वान् सजन मी युरी दशा मेोगते हैं। कश तक विचार व्यप्रः कि वेत्ति काव्य हृदयानि । माम्य इव कृषिविलनश्चलनयनावचोरहस्यानि ॥२८n कठोर तकशास्त्र के विचार में जो व्यग्र हैं ये काव्य-रहस्य पया समझ सकेंगे? जिस प्रकार खेती करने वाला-ग्रामीण चंचलाक्षी बंचनों का तत्व नहीं समझ सकता। दरिंद्र निंदा उत्थाय हदि लीयते दरिदाणा मनोरयाः। बालवैधव्यदग्धानां कुलनीणां फुधादिव ॥.. घालविधवा कुलस्त्रियों के स्तनों के समान दद्धिों के मनोरथ हृदय ही में उठते हैं और यहीं विलीन हो जाते हैं। हे दारिद्रय नमस्तुभ्यं सिद्धोहं त्वत्प्रसादतः। पश्याम्यहं जगत्सर्वं न मां पश्यति कश्चन् ॥२॥ हे दारिद्र, तुमको नमस्कार, तुम्हारी कृपा से मैं सिद्ध हो गया हूं। मैं तो समस्त संसार को देखता है पर मुझे फाई नहीं देखता।
. , कविता-कौमुदो। इह लोकेपि धनिना परोपि स्वजनायते । स्वजनोऽपि दरिद्राणां तत्क्षणाद्दुर्जनायते ॥३॥ इस लोक में दूसरे की धनियों के स्थजन बन जाते हैं, और दरिद्रों के स्वजन भी दुर्जन हो जाते हैं। रोगी चिरप्रवासी पराबभोजी परावसस्थायी। यजीवति तन्मरण यन्मरण सोस्य विश्रामः॥४॥ रोगी, सदा प्रवास में रहने वाला, दूसरे का अन्न खाने घाला, दूसरे के स्थान में रहने वाला जो जीता है उसका जीवन मरण है और उसका मरण विश्राम है। परीक्ष्य सन्कुल विद्या शील शौर्य सुरूपताम् । विधिददाति निपुणः कन्पामिव दरिद्रताम् ॥ ५॥ उत्तम कुल, विद्या, शील, शूरता, सुन्दरता भादि देख फर कन्या के समान ब्रह्मा दरिद्रता प्रदान करता है । अर्थात् गुणवान् दरिद्र होते हैं। दारिद्रयानल संतापः शांतः संतोषवारिणा । याचकाशाविघातां तदुदाहः केनोपशाम्यति ॥६॥ दरिद्रता की अग्नि का सन्ताप सन्तोप के जल से शान्त हो गया, पर याचकों को आशा नए करने से जो दाह उत्पन हुभा है यह कैसे शान्त होगा। अयों न संति न च मुचति मा दुराशा दानाच संकुचति दुललितं मनो मे। याचा हिहायवकरी स्वदधे च पार्य प्राणाः स्वयं प्रजन कि प्रविलंबितेन ॥७॥ धन नहीं है, पर दुराशा मुझे नहीं छोड़ती, दान करने से भी मेरा दुलारा मन सङ्कुचित नहीं होता, मांगने से .
mirat artiran.k
भर
गुमनाम !
IRITY निता-
WITH AFTritinो।
Halfa fast titो-
PिAN TATTITTTTTTIMES
writin, या मोरि मामी तुम्हारे
FASTERT मांगी मंगा देगे तो ये
परमारग काहाग। उनका पति मो मानी
mmmको पात सुनकर
परणालीमा सोनाम उमली, मांग में उम
कादमींग गपा प्रौर पुनः गरमोद गगा।
माम प्रपश्य पPिri.
कि मालमत्राय मा परे पलाझोपः।
एमोनिवि अमोनि-शिक्षा पर विद्यमा
Bा मतपरि शिवा महिना ९०
पंपरी का यह टुकड़ा मुझे दो या यशों को तुन्हीं ले
सो, यहां की ज़मीन सालो है आप के नीचे पुमाल है। रात
कोसी पुरुप इस तरह की यात करते थे उमो समय उनके
घर में घोर माये । उनको पान सुन फर दूसरी जगह
पुरा फर जो यख ये ले माये थे यह उन पर डाल कर
चले गये।
पृयोमः पतिरेप मचगतः स्थूणारशे गृह
कालोम्पर्णजलागमा मुशलिनी यत्सस्य पातापि मो। “
से
वे
Amnna Aru- --- कविना-कौमुदो । ४99 यवासंचिततैलविंदूघटिका भग्नेति पयर्याकुला दृष्ट्वा गर्भभराकुलां निज वधूव थिा रोदिति ॥5॥ मेरा पति बूढा है वह खाट पर पड़ा है, छोन में थून भी नहीं है, परसात के दिन आगये, यच्चे का कुशल सम्वाद भी न मिला, बड़े प्रयत से मिट्टी की कुल्हिया में जो तेल मैंने रखा था, यह कुल्हिया फूट गयो, इससे यह वृद्धा बहुत दुःखी हुई, और अपनी यह का पूर्ण गर्भ देखकर वह रोने लगी। - अंवा तुष्यति न मया न स्नुपया सापि नाम्बयान मया। अहमपि न तया न नया दद राजन् कस्य दापोयम् ॥११॥ माता मुझ से प्रसन्न नहीं रहतं और अपनी यह से भी प्रसन्न नहीं रहती, और वह वह न माना से प्रसन्न रहती है और न मुझ से । मैं भी न माता से और न वह से प्रसन्न रहता है। महाराज ! कहिए, इसमें दाप किसका है । चांडालश्च दरिद्रश्च द्वावेती सदा सदा । चांडालस्य नगृह ति दरिदो न प्रवरति ॥१२॥ चाण्डाल और दरिद्र दोनों बराबर है। चाण्डाल की कोई वस्तु कोई छूता नहीं और दरिद्र किसी को दे नहीं सकता। नो सेवा.विहिता गुरोरपि मनाइनो वा कृत पूजन- देवानां विधिवत वा शिव शिव स्निग्धादयः सेविता। किन्तुन्वचरणौ सरस्वति रसादाजन्मनः स्तिो तस्मान्मा विजहाति सा भगवती शंके सपनी सर १३॥ देवी सरस्थती, मैंने गुरुओं की सेवा न फी, विधि पूर्वक देवताओं की पूजा भी न की, अपने घजन संयन्धियों की भोर भो न देखा, पड़े प्रेम से आजन्म तुम्हारे ही चरणों . दरिद्र निंदा । की मैंने सेवा की। मालूम होता है इसी कारण वे देवी मुझ से रुप हो गयी हैं जो तुम्हारी सात हैं, अर्थात् लक्ष्मी । दारिद्रय शोचामि भवन्तमेवमस्मछरीरे सुदिन्युपित्वा।। विषय देहे मयि मन्दभाग्ये ममेति चिंता क गमिष्यपि त्वम् ॥१॥ दारिद्रय, मैं तुम्हारे ही लिए चिन्तित हूं, आज तक मित्र समझ कर तुमने मेरे यहां चास किया, अब मेरे मर जाने पर तुम कहाँ जानोगे? दग्ध खांदवमर्जुमेन बलिना दिव्यदु मासेवित दग्धा यायुसुतेन रावणपुरी लंका पुनः स्वयंभूः। दग्धः पंचशरः पिनाकपतिना तेनाऽध्ययुक्त कृत'. दारिद्रय जनतापकारकमिदं केनाऽपि दग्ध नहि ॥14॥ घलयान अर्जुन ने खाण्डय वन को जला दिया, जिसमें अनेक उत्तम वृक्ष थे, वायुपुत्र हनुमान ने सोने की लंका में जला दो, महादव ने कामदेव को जला दिया, इन सब बुरा ही किया । पर जिस दरिद्रता से जनता को हानि होती है उसको किसी ने भी न जलाया। द्वाविमावंभसि क्षेप्यो गाई बवा गले शिलाम् । धनिनं चाप्रदातार दरिद चाऽतपस्विनम् ॥६॥ गले में मजबूत पत्थर वाँध कर इन दोनों को जल में डुया देना चाहिए, जो धनी दाता न हो और जो दरिद्र तपस्वी न हो। उत्तिष्ट क्षणमेकमुबह सखे दारिद्रय भारं गुरु प्रांतस्तावदहं चिरान्मरण सेवे स्वदीयं सुखम् । इन्युखवं धनवजितेन सहसा गत्वाश्मशाने शव दारिद्रयान्मरण परवरमिति शास्वैव सूक्ष्यीस्थितम् ॥up .
कविता-कामुर्दा। ७t एक दरिद्र ने मुर्दे से जाकर कहा, भाई उठो, एक क्षण के लिए उठो, यह दरिद्रता का भार थोड़ी देर उठाओ, मैं थक गया है। मैं थोड़ी देर मरने का सुख भोगू। 'यो गंगाम तरसधैव यमुना यो नर्मदा शर्मदा का घार्ता सरिदंबुलधनविधी यश्वाण वास्तीर्णवान् । सोऽस्माकं चिरमास्थितोऽपि सहसा दारिद्रय नाम सखा त्वदूदानांऽसरित्प्रवाहलहरीमग्नो न समाय्यते ॥१८ जिसने गंगा पार किया, यमुना पार किया, और शर्मा (कल्याण देने पाली नमदा पार किया, अन्य नदियों को फोन चलाये, जिसने समुद्र भी पार किये, पर दारिद्रय नाम का हमारा मित्र सदा साथ रहा । अब यह आपके दान-गल के प्रवाह में डूब गया है, दिखायी नहीं पड़ता। दारिद्रयान्मरणादा मरण सरोचते न दारिद्रयम् । पक्लेश मरण दारिदपमनंतक दुःखम् ॥१९॥ दरिद्रता और मृत्यु इनमें मुझे मृत्यु ही अच्छी लगती है, दरिद्रता नही । मृत्यु में थोड़े कष्ट होते हैं और दरिद्रता के कष्टों का ठिकाना नहीं। भन्यत विमुखे दैवेभ्यर्थे यत्ने प पौरुषे । मनस्विनो दरिद्रस्य वनादन्यत्कुतः सुखम् ॥२०॥ भाग्य प्रतिकूल हो जाय, सब प्रयन और सामर्थ्य निष्फल हो जाये, उस समय मनस्यो दरिद्र के लिए धन के अतिरिके और कहां मुख हो सकता है। दारिदमादिद्यमति द्वीपरिगतः सत्वात्परिभ्रश्यते निःसत्वः परिभूयते परिभवानिवेदमापद्यते । .
१८० दरिद्र निंदा । निविपणः शुचमेति शोकनिहता युदण्या परित्यज्यते निर्बुदिः क्षयमेत्यहो निधनताः सर्वापदामारसदम् ॥२॥ दरिद्रता से लजा आती है, लजित मनुष्य पलहीन हो जाता है यलहीन का पराजय होतो है पराजय से ग्लानि हाती है, ग्लानि से शोक होता है, शोक से युद्धिं नए होती जाती है और निर्बुद्धिता से नाश हो जाता है । यह एक दद्धिता सय विपत्तिों का मूल है । भये लाजानुरचैः पधिपचनमार्ण्य गृहिणी शिशोः कण यवासुपिहितवती दोनवदना । मयि क्षीणोपाये यकृत दशावध्रुशयले तदन्तःशल्य मे त्वमिद पुनरुतमुचितः ॥२२॥ सरते में किसी ने जार से लाया इस शब्द को सुनकर बडे यत से पच्चे के पान पन्न कर दिये, जिसमें मूग यया लाया का नाम न गुन सके, महस तो पद मांगने लगेगा । मैं निमाय था यह जानकर गृहिणी की मां भर भागे, इस ममय यह फांद के समान मेरे हदय मघुम रहा है। पेयता पीप मगि कतिम । मतः परं पर ये मणि कणनितम् ॥२५॥ मति जहित कप हाय नी का हाथ दंप पर यहुन दुःगी। इसमें भी भधिया दुधी माणीक (मिt का यहा यनन निममें मग्न रम भाताको पालो रंग कहा, गृहिणी रे - पोलिद गुगलियाने नियति यो मारे। नरकविना समनदारिदमे गुजटिहारिक ।
कविता-कौमुदी। ४८१ अनेक गुणों में एक दोर छिा जाता है, जिस प्रकार चन्द्रमा का कलङ्क छिर जाता है ऐसा कहने वाले उस फयि यह यात नहीं जानी है कि एक दरिद्रता का दोष सय गुणों को नष्ट कर देना है। रात्री जानुर्दिका भानुः कृशानु' मंध्ययोईयाः पर शीत मयानीत जानुभानुकशानुभिः ॥ २५ ॥ रात में जानु, दिन में मानु (सूर्य) प्राता और सार्य सानु ( मग्नि । इस प्रकार सानु भानु और एशानु से मैंने शीत पिता दिया। शुरक्षामाः शिशः शवा इथ भूश मदाशया यांधा लिया जर्जर की जनुना मा तथा बाघते । पेरिम्या शुटिना शुकं घयितुं कृपा सका स्मित। कुप्यम्नी प्रतिवेशिकोरगृहिणो सूची या पाचति ॥२९॥ लड़के भूप मे व्याकुल होकर मुर्दे के समान हो गये पांप निराश हो गये हैं। घड़े के मुह पर मकड़ी में जाला धुन दिया है पर इन पासा फेो देखकर मुझे दुख नहीं होता । गृहिणी अपना फरा फरक्षा सीने के लिए पोसिन से मांगती है और पद ताने से हंसकर झोप करती पहो हमारे दुःख पर प्रधान कारण है। दारिदय मोमद परम विकि गुलाधिक मि महानुर। रिचालित गुणानि च मुहूर्तमा म.सिरोपि।१० दारिदय ! तुम पवियेको हो । गुणयान् मनुष्यों से दो तुम्हारा मधिक महता है, पूर्ण, निर्गुन मनुायों से ही दरिद निन्दा। मा वाणि मसाऽऽनने कुरु दयां गर्णानुपूज्या शित घेतः स्वास्थ्यमुपैहि पाहि करणे प्रशस्थिरत्वं मन । लमे तिष्ठ पराइ मुखी क्षणमहो तृष्णे पुरः स्यीयता पापी यावदई प्रवीमि धनिना देहीति दीन वः ॥२८॥ भगवती सरस्थती, कृपा करो, सुन्दर सिलसिलेया पाप के रूप में मेरी जिता पर थास फरो। चिसस्पस्य! जामो, करपो चली जाभो, बुद्धि, तुम अचल हो जाम लग्जे मुंह खोलो, तृष्णे. तुम आगे आगो, जप सफ में पापी पनियों के सामने "देहि" यह दीन पचन करें। भय पटो मे पिवानभूपण पितामहा पगुरुयोरमः । भल करिष्यत्यप पुप्त पोरकान मपाधुना पुषवतेव पाते। पद पर मेरे पिता के शरीर का भूपण रहा है, मया पातय पितामह ने इसका उपयोग किया था, भय पर मेरे पुत्र भीर पात्रों को मलंगत करेगा। पुल समान ही रखता। सचम धनदानकिया पायरय शिवपारिश्पपा। देव दयवसमा सास्वती माय वरितिगमया.. हृदय में मातम को धन देने की गिता मशिया समान जल रही है-महाराज, उमी मग्नि में देवी पत्र जल गये हैं इस कारण यह थियारी गुर मही निकलती। गयेन समीरिनास समालो arent यदि मामला गरीरिने वित्तिमापिम्पही बारा प्रारमिनारीनिमि..
। कविता-कौमुदी। दरिद्रता के द्वारा उत्तेजित होकर हृदय से फण्ठ तक घह भायी, कट से बड़े पड़े कष्टों से किसी प्रकार यह जिहा तक आयो । लज्जारूपी फोल से वह जिद्धा में ही अड़ दिया गया। इससे बाहर नहीं निकलता। भले आदमियों के मुंह से माण जाने पर भी "दो"और"नहीं"ये दो शब्द नहीं निकलते। संगनैवहि कश्चिदस्य कुरुते संभाष्यतेनादरा- संप्राप्तो गृहमुन्सवेषु धनिना सावज्ञमालोक्यते । इरादेव महाजनस्य विहरत्यल्पच्छदो लजया- मन्ये निर्धनता प्रकाममपर पष्ठ' महाशतकम् ॥३१॥ कोई इसका साथ नहीं करता, आदरपूर्वक कोई लता मी नहीं। उत्सव आदि में धनियों के घर जय यह जाता तो निरादर से देखा जात है। इसके पास थोड़े पल हैं इस फारण धनियों से यह दूर ही रहता है । मैं समझता हूँ फि दरिद्रता छठा पाप है। कि करोमि क गच्छामि कमुपैमि दुरात्मना । दुर्मरेणादरेणाई प्राणैरपि विवितः ५३३॥ पया करू १ कहां जाऊ ? किसके पास जाऊ ! सन भरने थाने दुरारमा पेट से प्राणों पर मा पनी है। हयातो विश्वोरण विधिना नाय विश्वमरस्व. मन्येमा दुग्जठरपिटरी पूरणे कुठ शक्ति। शकिस्मेरे विबुध सदसि प्रेक्ष्यमा मास्नु सजा- पद्विश्वेभ्योत्यहमिहयहि भावभंगी करिष्ये ॥३४॥ नाय, माप विश्व-संसार-का मरण करते हैं इस कारण भाप विश्यम्मर कहे जाते हैं। पर मालूम होता है कि हम
8
राजनीति ।
लोगों का पेट मरने में भाप को मी शक्ति कुण्ठित है। मार
देवतामों की सभा में मुझे देश लज्जित न हों, क्योंकि मैं
सद दूंगा कि मैं विश्य से याहर है।
राजनोति
राजास्य जगतो देह तुदाभिसंगतः।
मयमानंदजननः गोरु इव पारिधः ॥
गजा इस संसार के कल्याण का कारण है, यह यात
बूढ़े भी मानते हैं। उसे देख कर प्रजा प्रसन्न होती है, जिस
प्रकार चन्द्रमा फो देखफर ममुद्र प्रसन्न होता है।
धार्मिक पालनपरं सम्यक्परपुरंजय।
राजानममिमन्यते प्रजापतिमिव प्रजाः ॥२॥
जो राजा धर्मात्मा है, प्रजा का पालन करने वाला
शत्रुओं के नगर जीतने वाला है प्रजा उसको प्रजापति के
समान मानती है।
पर्जन्य इव भूतानामाधारः पृथिवीपतिः ।
विकलेपिदि पर्जन्ये जीज्यते न तु भूपती ॥३॥
राजा मेघ के समान प्राणियों का आधार है मेघ पानी
घरसा फर प्राणियों को सुखी करता है और राजा पालन
पोपण के द्वारा उसे सुखी करता है। मेघ के टूटने पर भी
प्राणी जी सकते हैं पर राजा के टूटने पर उसका जीना
सम्भव नहीं।
मना संरक्षति नृपः सा वर्धयति पार्थिव ।
वर्धनादक्षणं श्रेयस्वनाशेयत्सदप्यसद ॥४॥
कयिता-कोमुदो राजा प्रजा की रक्षा करता है, और प्रजा राजा को दाती है। यढ़ाने की अपेक्षा रक्षण का अधिक महत्य ।, फ्योंकि रक्षण के बिना बढ़ाना रहने पर भी नहीं के मान है। भात्मानं प्रथम राजा विनये नोपपादयेत् । सवोमायस्तितो भृत्यस्तितः पुत्रास्तता प्रजाः ॥ ५॥ सब से पहले राजा को स्वयं धिनयी यनने का प्रयत करना चाहिए, तदनन्तर यह अमात्य फो, पुनः नौकरों को सके पश्चात् अपने पुरों को फिर प्रजा को यह धिनयी नाये। राशि धर्मिणि मिंटाः पापे पापा समे समाः। लोकास्तदनुस्तै ते पथा राजा तथा मजा ॥ राजा यदि धर्मारमा दो तो मजा मी धर्मात्मा होती जा पापी हुआ तो मजा भी पापी हो जाती है, लोक राजा हाही अनुयतन परते हैं। जैसा राजा होता है प्रजा मी सीही होती है। मुषाणां च मराणा परमयायमूहिता। माधि शमा पैमाशा दानं पराक्रमः॥ राजा मी दूसरे मनुषों के समान ही होता है। दोनों के rयर मुद मादि समान ही होते हैं पर क्षमा, पीरता, क्षा देने की शक्ति और पराकामय राता में अधिक होते हैं। सहानुरनयति पानपरः। बिनीतारमानरपति भूपिको भिरनुते ॥
। ४६ राजनीति । जिस राजा में दीवान सेना आदि का प्रेम रहता है, जो सदाप्रजा का पालन करने में तत्पर रहता है, और जोविनयी होता है यह विशाल लक्ष्मी का अधिकारी होता है। प्रजो न रञ्जयेद्यस्तु राजा रक्षादिभिगुणः । अंजामलस्तनस्येव तस्य जन्म निरर्थक ॥९॥ जो राजा रक्षा मादि गुणों के द्वारा प्रजा को प्रसन कर सके उसफा राज्य व्यर्थ है। जिस प्रकार घकरी के गले फा स्तन निरर्थक होता है। भजामिव प्रजर्जा हन्यायो मोहात्पृथिवीपतिः । सत्यैका जायते तृप्तिद्वितीयस्य कथंचन ... जो राजा अशान के कारण यफरी के समान अपनी ममा को मारता है, इससे फेवल उसी की तृप्ति होती है, इससे फेवल यही प्रसन्न होता है । प्रजापीड़न संतापात्समुम तो हुताशनः । राज्ञः कुल धियं प्राणायादग्याविमिवर्तते प्रजापीडन के ताप से जो माग उत्पन्न होती है यह राजा फा कुल, लक्ष्मी और प्राणों को जलाफर पुझती है। पया पीकुरा सुबमा प्रयत्नेनामिवदितः। फलमदो भवेकाले सोका सुरक्षिवा .. जिस प्रकार एक छोटे यीज की यतापूर्वक रक्षा की जाप तो यह समय पाकर फलता फलना है उसा प्रकार प्रजा को रक्षा की जाय तो यह समय पर फल देती है। रिपधाभ्यायानिमियों पारण वाधिनः। अपाम्यपि पलिसियाम्यः स्याम्महीपते" HAR कविता-कौमुदी। सोना, मन्न, रत्न, स्त्री, हाथी घोडा तथा और भी सव चीजें राजा को प्रजा से मिलती हैं। सत्खातान्प्रतिरोपयन्कुसुमितांश्चिन्वंलघूनवर्धय अकयासमयपृथश्चलधयन्विश्लेषयन् संदतान् क्षुदान्क'टकिनोवहिनियमयन्स्वारोपितान्पालय- न्मालाकार इवप्रयोग निपुणो राजा चिर तिष्ठति ।।४।। जो राजा याग के माली के समान उखड़े हुओं को रोपता है, फूले हुओं से फूल चुनता है, छोटों को बढ़ाता है, बढ़े हुओं 'को नचाता है. बढ़े हुओं को छोटा बनाता है मिले हुओं को अलग अलग करता है छोटे छोटे फटोलों पेड़ या छोदे शत्रु) को बाहर निकालता है अपने रोपे हुओं का पालन करता है, इस प्रकार प्रयोग निपुण राजा यहुत दिनों तक राज्य करता भकृत्वा निजदेशस्य रक्षा यो विजिगीपते । सनृपः परिधानेन वृत्तमौलि: पुमानिव ॥ १५॥ जो राजा अपने देश की रक्षा विना किये ही दूसरे देशों पर चढ़ाई करता है यह उस मनुष्य के समान है जो धोती को माधे पर लपेट लिये हो । र्थात् धोतो न पहन कर धोती का साफा बांध ले। विजिगीपुररिमित्र पार्णिमाहोय मध्यमः। सदासीन्नेतरांतधिरित्येषा नृपतेः स्थितिः ।। राजा का शत्र, उसके मित्र, सीमा पर के राजा, अपने और शत्रु के घोच का राजा उदासीन दूर का राजा, यही राजा की स्थिति है, इन्हीं से उसका सम्बन्ध है ।
राजनीति निविंगपि यथा सणे फवादोपभयंकरः। तथा परवान् राजा न परैरभिभूयते ।।७।। जिस प्रकार विपहीन सर्प फण फैलाकर मयंकर बनता है, लोगों को मयमोत करता है, उसी प्रकार आडंबर रखने पाला राजा शत्रु से पराजित नहीं होता। पुष्परपिनणेदव्य किं पुनर्निशितैः शरैः। जये भवति संदेहः प्रधान पुरुपक्षयः॥८॥ फूलो के द्वारा युद्ध काना बुरा है, तीखे धानों के द्वारा युद्ध की तो बात ही अलग है क्योंकि युद्ध में जय का निश्चय नहीं और अच्छे अच्छे वीरों के नाश का भय बना रहता है। भूमिर्मिरे हिरण्यंदा विग्रहस्य फलगाये। नास्न्येकमपि यद्यपो न तु कुर्यात्कथंचन ॥१९॥ भूमि, मित्रता और सोना (धन) ये तीन युद्ध के फल है। जिस युद्ध में इन तीनों में का एक भो न हो, पैसा युद्ध कमी न करे। . - 1. साम्नैवहिनयोक्तव्यमादौकार्य विजानता। साम्ना सिद्धानिकायोपि विक्रिया गति न कचित् ॥ २०॥ साम के द्वारा ही कार्य सिद्ध करने का प्रयत्न करना चाहिए, क्योंकि साम के द्वारा जो कार्य सिद्ध होने पे नष्ट नहीं होते। नविश्वसेदमित्रस्य मित्रस्यापि न विश्वसेत् । विश्वासानयात्पन्न मूलान्यपि निहतति ।। २७॥ ...
कविता-कौमुदी। शत्रुओं पर विश्वास न करे और मित्रों पर भी विश्वास पन करे । क्योंकि विश्वास से जो भय उत्पन्न होता है यह जड़ मूल से नाश कर देता है। शपथैः संधितस्थापि न विश्वास यूजेद्रिपोः । राज्यलोभाधतो वृत्रः शक्रेण शपथैर्हतः ।। २२ ।। शत्रु शपथ करे तो भो उसका विश्वास नहीं करना चाहिए, पयोकि राज के लोभ से शपथ के कारण ही इन्द्र ने वृत्र को "मारा था। उपकारगृहीतेन शत्रुणा शत्रुमुद्धरेत् । पादलग्न करस्थेन कटफेनैव कटकम् ।। २३ ॥ किसी शत्रु को उपकार के द्वारा अपने पक्ष में करले, पुनः उसके द्वारा अपने दूसरे शत्रु का नाश करे। 'जस प्रकार पर में लंगा एफ फांटा ह य में लिये हुये दुसरे कांटे के द्वारा 'निकाला जाता है। मोपेक्षितव्यो विद्वद्भिरामयोरिरषज्ञया। धन्दिरष्पोपि संवृद्धः कुरुते भरमसावनम् ॥ २४ ॥ विद्वान् को चाहिए कि यह तिरस्कार की दृष्टि से शत्रु और रोग की उपेक्षा न करे । आग का छोटा टुकड़ा मी यढ़ ... कर समूचे धन का नाश कर देता है । कौम शेषमास्थाय महारानपि मर्षयेत् । काले काले च मतिमानुत्तिष्ठन्कृष्यसपंवत् ॥२५॥ समय प्रतिकूल होने पर फाप के समान अपने बड़ों को छिपाफर राजा शत्रु की मार भी सहले । पुनः समय माने पर पुद्धिमानी के साथ फण सर्प के समान उठ खड़ा हो। तस्माइयादिभेतम्य पारद्यमनागत । भागत भय दृष्टा महतग्यमभीवत्रत ॥२६॥ :
राजनीति। भय से तभी तक डरना चाहिए जय तक भय सामने न भावे। जय भय सामने आ जाय तो निर्भय हो कर प्रहार करना चाहिये। परोपि हितवान्यधुर्याप्यहितः परः। भहितो देहजोग्याधिहितमारण्यमौर ॥२०॥ दूसरा भी यदि हितकारी हो तो यह मित्र है, भौर मिर भी यदि भहितकारी है तो यह शत्रु है। शरीर में उत्पन्न रोग अहित है और जङ्गल में उत्पन्न दया हित है। पटश्य ग्रसितु प्रास प्रस्तं परिणमेधपत् । दित परिणामस्वासदधभूतिमियाना ॥२८॥ भपना फल्याण चाहने याली को चाहिए कि यह वही प्रास उठाये जो निगल जा सके निगलने पर पच माय मोरो अन्त में हितकारी हो । राजा को पदी काम हाथ में मेना साहिए जो पे फरस तथा जिसका भन्न उनके लिए कल्याम कारी हो। मा ताठ साहस कामियगंधमागतः। स्वगात्रापयरिमाराप भवनिहिदिया मेया, इस समय नुम्हारे पाम पन दुमाइस कारण साहस मत करो, क्योंकि धन के चले जाने पर माना शरीर भी मारी हो जाता है, मर्यात् उस समय तुम्हें दूसरों को प्त होगी। मात्वं बाल विवागविडा दुख कर। महिमा सिमिरमरवि कविता-फौमुदो। भैया. तुम पलवान होकर दुर्यलों को दुःख मत दो, क्यों कि दुर्घलों के द्वारा जलाये हुओं के कुल में कुछ भी नहीं होता। यानि मिथ्याभिभूतानां पतस्य णि रोदता । तामि संतापकान्न ति सपुत्रपशुर्वाधवान् ॥३॥ विना फारण सताये हुओं के रोने से जो आंसू गिरते हैं ये आंसू सताने वाले को पुत्र पशु तथा बन्धुओं के समेत मार डालते हैं। माह्मणेषु च ये शूराः स्त्रीपु जातिषु जोषु च । वृतादिव फले पक' पृतराष्ट्र पतंति ते ॥३२॥ धृतराष्ट्र, जो ब्राह्मणों के संबन्ध में धीरता दिखाते हैं, स्त्रियों, अपनी जाति वालों नथा गौमों के प्रति जो धीरता ‘दिखाते हैं, ये पके फल के समान अपने गुच्छे से गिर जाते हैं। देव प्रझस्व पुष्टानि सैन्यानि पृथिवीपते। पुरकाले विशीय ते सैकते सेतयो यथा ॥३३॥ जो सेना देवता और ब्राह्मण के बल से एकत्रित का जाती है अयथा जो स्वयं एकत्र होती है यह युद्ध के समय फिसल जाती है, जिस प्रकार याल पर का यांध फिसल जाता है। पपीतापणीतच ययाग्निदेवतं महत् । एवं विद्वानविधि वाहणे देवत पर ३० अग्नि का संस्कार किया गया हो या न किया गया हो, पर अग्नि महान् देव है, इसी तरह घिद्वान हो या भषिवान हो, ब्राह्मण महान् देव है। .
-- .. राजनीति । , 2. मदैवं दैवतं कुर्यादुदैवत वाप्यदेवत' । ग्राह्मणा लोकपालाश्च सूजेपुरनिकोपिताः ॥३५॥ क्रोध करने पर ग्राह्मण देवता को अदेवता और मदेवता फो देवता बना देते हैं, नये लोकपालों की भी ये सरि करते हैं। • युगे युगे च ये धर्मास्तेषु धर्म पु ये विजाः । तेषां निंदान कया युगादि ये द्विजाः ॥३१॥ जिस समय जो धर्म हो और उस धर्म के पालने वाले जो प्राक्षण हो उनको निन्दा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि समय का प्रमाय उन पर भी पड़ता है। ये भी समपरे मनुरूप ही होते हैं। भारम्प ग्राहगेमुक परिशीगैरव बोधयः । गोभिरच नृपशाईस राजसूयाद्विशिष्यते ॥३॥ ग्राह्मण यदि जयरदस्ती मी साजाय, यांधयों के पालन पोषण करने के कारण जी नष्ट हो गया, जो गोधा से, तो इनका राजसूय यश से यहकर पुण्य होता है। गनधीगगारि गतायुश्च चिकिमहान् । 'गधीरच गनापुरच मामला भारत . जिसफो लक्ष्मी जाने याली होती है यह ज्योतिपिपीते ३र करता है, जिसकी मायु थोड़ी रह गया है पह पंचो ३प करता है, धार जिसको लक्ष्मी सगा भायु जाने वाली होती है यदी ग्रामों संप करता है। पदरा मनाया विकार पुरियन। भनयानयास समागमति॥९॥ . 7 ..
कविता-कौमुदी।
जब बुद्धि विपर्यय हो जाती है, जब सब याते विपरीत
दिखायी पड़ने लगती हैं, तय अन्याय भो न्याय के समानत
मालूम पड़ता है और वह मन से दूर भी नहीं होता।
न कालः खामुद्यम्य शिरः कृति कस्यचित् ।
कालस्प बलमेतावद्विपरीतार्थदर्शन ॥४०॥
'काल तलवार उठाकर किसी का सिर नहीं काटता
काल का यल केवल इतना ही है कि मनुष्य उलट। समझनेर
लग जाय।
जानपिजना दैवाप्रकरोति विगर्हित' ।
न कर्म गहिंत' कोके कस्यचिद्रोचतेकृत ॥४॥
मनुष्य जानता भी है पर यह निन्दित काम करता है..
निन्दित काम संसार में किसो को भी प्रिय नहीं है।
मा तात संपदामन मा रूदोस्मीति विश्वसीः ।
दूसरोह परिबंश विनिपातोति दारुणः ॥४२॥
'भाई, मैं बहुत अधिक धनी हो गया है इस यात पर..
पिण्यास मत करो, क्योंकि जो यहुत ऊंचा चढ़ता है उसका
गिरना भी बड़ा ही भयानक होता है ।
कितवा य प्रशंसति प्रशसंति धारणाः ।
प्रासंति वंधश्यः स पार्थ पुरापधमः ॥४३॥
धूर्त जिसकी प्रशंसा करें, चारण जिसकी प्रशंसा करें
मोर दुराचारिणी स्त्रियां जिसकी प्रशंसा करे उसे नीच,
मनुप्प समझना चाहिए।
राजानी यशसंति य प्रशंति यै द्विजाः।
साधको प्रशंसति स पार्थ पुरपोक्तमः ॥४४॥
४६४
.
राजनीति ।
राजा जिसकी प्रशंसा करे, ब्राह्मण जिसकी प्रशंसा करे
और सन्नन जिसको प्रशंसा करें, यह श्रेष्ठ पुरुष है।
प्रशागुठशरीरस्य किं करिष्यति संता।
गृहीतहत छत्रस्य वारिधारा इदारयः ॥४५३
जिसने बुद्धि के द्वारा अपने शरीर की रक्षा कर ली है,
उसका दलबद्ध होकर भी कोई शत्रु क्या करेगा, जिसके
हाथ में छाता है उसका वृष्टि क्या करती है।
बहूनामप्यसाराणां समुदायो हि दारुणः ।
तस्याभूत्या प्रकर्तव्यास्तेहि सर्व क्रियाक्षमाः ॥४॥
अनेक निर्वलों का समुदाय भी बड़ा भयानक होता है।
राजा को वैसे नौकर रखने चाहिए जो सब काम कर सकें।
सृणैरावेष्यते रज्जुस्तया नागोहि वध्यते ।
एवं ज्ञात्वा नरेंद्रेण मृत्या कार्या विचक्षणा: ॥४॥
तिनकों से रस्सी बनायी जाती है जिससे हाथी मी
घांध लिया जाता है यह समझकर राजा को नौकर रखने
चाहिए।
ताड़ितोपि दुरुशोपि दंडितोपि महीमुना ।
नचितपति यः पापं स मृत्योही महोभुजो nen
राजा मारे गाली दे दण्ड दें फिर भी जो उनके विषय में
पुरी पातेन सोचे, उनके अपकार करने का विचार न करे,
घही राजा का भृत्य होने के योग्य है।
योनाहूतः समभ्येति द्वारे तिष्ठति सर्वदा।
पृहः सत्य मितं व ते स मृत्योहामहीमुजां ॥१९॥
कपिता-कासुदो। ४१५ जो बिना धुलाये आये, और सदा द्वार पर खड़ा रहे, पूछने पर सत्य भौर घोड़ा घोले, बहो मनुष्य राजा के भृस्प होने के योग्य है। सालस्य मुखर कर स्तम्ध म्यसनिन शर्ड। भसंतुष्टममर्क छ त्यजेदमस्यं भराधिपः ॥५॥ जो पालसी है ययादी है, फर है. जड़ है, व्यसनी है राठ है, असन्तुष्ट है, जो राजा का मन नहीं है, ऐसे भृत्य का राशा त्याग कर दे। रिक्ताः कर्मणि पटवस्तृसादलमामनि भूत्या पे। से अलोकमामिव पूषांना रिक्तताकार्या.॥ जो जय तक पाली रहते हैं तय नक पड़े प्रम से कम करते हैं, पर पूर्ण होने पर बालसी हो जाते हैं, राजा ऐसे भृत्यों की जांफ के समान पूर्णता दूर कर दे, उन्हें पाली कर ग्यसनिन लुम्भमप्रगम भयाकुल । सूखमन्यापedit माधिपत्येन पोमयेत् ॥ ५॥ क., सनी, लोभी, फायर, सरपोक, मू, मन्यायफारी मनुष्य के हाथ में अधिकारन। अपोगिभिधिना राज्य मामिल भूहिषले। तामामीविधातापारक्षितम्या प्रपातः०५५. पोगियों के बिना कोयल राजाभी से ही राज्य महीं पलतास कारण पर यम से योगियों की रक्षा करनी पाहिए। बोगितामोजोमपरापयः। भारदारो मिलमेर रामपुरोहितः ५४.
Lu
राजनीति ।
सोयेद वेदांग फे सश्यों को जाने जा जर मम
करे, प्रतिदिन राजा की कल्याण-कामना करे, यही =
पुरोहित होने के योग्य है।
हमागतो हितमतिः सांभा।
भारो पोशाच पोधिोin
-गरम्परा मे जोमागाहो. हित पारने पता
झोगों के माल परगने पाला हो, पीर हो. in a tet
पारने पाला हो देगे मगुणको पनामा मारिए ।
मीमा स्माभि निम्।
अनुष्का शमनxnn
प्रवीण, गना, मामी, माहामी भर.
सा मनुष्य का गागम संग ( मीरशी) होना
बारिश
माहीमाEिmples
मामिभाती..।
पनि मोर Her aur aer बनाना
एपरम प्रसारमा
PATTERI..
#yrmer मा FIRamrat
कविता-कौमुदी । शूरोर्थशास्त्रनिपुण कृतशास्त्र कर्मा संग्रामकेलिचतुरश्चतुरंगयुफः। भतु नि देशवशगोभिमतश्वतंगे, सेनापतिनरपतेदि जयागमाय ॥ ५९॥ घोर, अर्थशास्त्र का ज्ञाता, शस्त्र प्रयोग में चतुर, स्वामी की आज्ञा मानने वाला और राज्य में प्रतिष्ठा रखने पाला सेनापति राजा को विजयी बनाता है। अर्थात सेनापति में उक्त गुण होने चाहिए। काणाः कुब्जाश्च वढाच तथा वृद्धाश्च गवः। एतेवांतःपुरे नित्य नियोक्तव्याः क्षमाभूता ॥६॥ फाना, कुबडा, नपुसक बूढ़े और पंगु रनिघास में मुफ. र करने चाहिए, क्योंकि ये लोग क्षमाशील होते हैं। सिद्धाधमिव राजेंद सर्वसाधारणात्रियः। परोक्षे च समक्ष च रक्षितव्याः प्रणवतः॥६॥ पकाये हुए अन्न के समान स्त्रियाँ सब के उपणेग में मा सकती हैं। इस कारण परोक्ष या प्रत्यक्ष सपंदा इनकी रक्षा करनी चाहिए। सूक्ष्मेम्यापिप्रसंगेभ्योदयानार्याहि सर्वदा। हयोहि कुलयोः शोकमावहेयुररक्षिताः ॥ १२॥ छोटी छोटी बातों से भी स्त्रियों की रक्षा करनी चाहिए। क्योंकि विना रक्षा किये पतिकुल और पितृकुल दोनों को दुःखी बना सकती हैं। महिन्या हृष्टया भाज्यं गृहकार्येषु दक्षया। सुसंस्कृतोपरकरया व्यये चामुक्तहखया ॥१३॥ ३२
राजनीति ।
६
M
महारानी को सदा प्रसन्न रहना चाहिए, घर के कामों
में प्रवीण होना चाहिए, अपने सय सामान स्वच्छ तथा
सुन्दर रखने चाहिए, और हाथ सोल कर व्ययन करना
चाहिए।
धर्मशास्त्रार्थ कुशला: कुलीनाः सत्यवादिनः ।
समाः शत्रौ च मित्रे च नृपतेः स्युः सभामद
जो धर्मशास्त्र जानते हों, कुली न हो सत्यवादी हाँ गए
और मित्र दोनों को एक दृष्टि से जो देखें, घे ही राजा फेसमा
सद यनाये जाय।
म सा सभा पत्र न सत्ति यदा वृद्धा न ते येन वदति धर्म ।
मासी घी पत नैवास्ति मत्य न तत्सत्यं पाउलेनानुविद ॥
घह समा नहीं है जहां अनुमपी वृद्ध न हों, ये पूरा नहीं
हैं जो धर्मानुकूल न योलें । यह धर्म नहीं है जहां सत्य न हो
मोर यह साय सरय नहीं है जो कपटहीन न हो।
सभावाम प्रवेष्टम्या वडय मामर्मजये।
भाववियु षम्पापि मरः किविषमभु ॥१
सभा में जाप ही नहीं, यदि जाय तो टीक ठोक काहे,
पाकिममा में जाकर पिना योने या उल्टा पोले मनुष
पापमागी होता है।
मम्माम्मायः मा गम्या राग विति।
पचम्नया विधयाग्राम पर प्रा.
इस कारण गम्य माण ममा में गाय, राग
का वह यगी यात पशिसम नरगामी दाना ।
-~- nha . कविता-कौमुदी । ४६ माता पिता गुरुनांना भार्या पुत्रः पुरोक्तिः। म दंडयो नाम राशोस्तित्वधर्म योनुतिष्ठति ॥ ६॥ माता, पिता, गुरु, भाई, स्त्री, पुत्र और पुरोहित ये राजा के, जो अपने धर्म का पालन करते हैं, दण्डनीय नहीं हैं। अवध्यो ग्राह्मणो याल: खी तपस्वी च रोगवान् । क्रियते व्यंगताहप पी ततो दोषैर्म लिप्यते ॥ १९ ॥ ग्राह्मण, यालक, स्त्री तपस्वी और रोगी, इनसे कोई घड़ा भारी अपराध भी हो जाय ती भी राजा ही चाहिए कि यह इनका यध न करे, के.चल कोई अङ्ग काट ले इससे उसे पाप नहीं होता। नहन्याम्महीपालो त कस्यो चिदापदि। . इताम्हत्वातु मरमाविशेयचिवैः सह ... पड़ी भारी यापत्ति की सम्भावना रहने पर भी राजा 'फोन मारे, दून का यध करने से राजा अपने दीवानों के साथ नरफगामी होता है। विशोधपेन्महीपालो मंत्रिशालामशेषतः । भयुकोनाईतिस्थानुमस्या में रहस्यथित ॥on पिचार फरने के समय राजा मन्त्रिशाला को खूप दुई पाले, बिना सायधान हुए यह मन्धिशाला में न येठे। मंहगांतर घोतिर्दशकासोचितरिघतिः। परराश्मिवेदः सीमाम्पः एपिवीपतेः.. ओमप्र-तार में प्रेम रखता है, देशकाल के अनुसार इसकता है, मोर जो राजा में प्रेम रखता हो, यह राजा का मान्य हो सकता है .
राजनीति।
मानला गाणी।
भिषामे ना.
सीकर में पनपान साप म्नटी मोर गुप परीप्ति
nfranaहीराजिम प्रकार मा
परमकामगा।
माnिt यानि
लिमुस्कान।।
समातिमा ममाने.
नियमः rioriaarn
राजाकाहिल याने पाला मनुष्य प्रजा का शव
মাধ্য, ফানি গান থালা বা দা বিমােন
जाता है राता उसे निकाल देना है। इस प्रकार दोनों
मोर फेयिकट विवाद में यसा मनुष्य
मिलना पड़ा
सोराश और प्रज्ञा दोनों का पल्याण फरे।
घरको भिपतमवरचतुःकग:स्थिरोभवन।
दिप मंगस्य बलाप्यत म गति । ०५.
छ फानों में पहुचने पर मंत्र प्रकाशित हो जाता है, चार
फानों में यह स्थिर रहता है, कोई तीसरा नहीं जानता, और
जो मन्त्र दो ही कानों में रहे, उसका पता ब्रह्मा को भी नहीं
हो
कठिन
एक दम्याच वाइन्यादिषुमकोधनुष्मता ।
बुदिषु'दिमतायुक्ता हवि राज्यं सनापर्क 2010
धनुर्धारी का छोड़ा हुआ थाण एक मनुष्य को मार
सकता है या न भी मार सकता है। पर बुद्धिमान को पुरि
कविता-कौमुदी ५०१ का यदि विनियोग किया जाय तो यह समूचे राज्य तथा राज्य के अधिपति का भी ना कर देती है। न तद्धैन नागेंद्रनयनंच पत्तिभिः । कार्य ससिद्धिमभ्येति यथा बुध्या प्रसाधितं ॥ ७ ॥ रथों हाधियों घोड़ों और सैनिकों से भी जो कार्य सिद्ध नहीं होता, वह बुद्धि के द्वारा सिद्ध हो जाता है। दुर्योधनः समपि दुर्भगी प्रलयं गतः । राज्यमेकश्चकारोः सुमभी चन्द्रगुप्तकः ॥ ७८॥ दुर्योधन समर्थ था, पर बुरे मन्त्री के कारण उसका नाश हो गया। एक चन्द्रगुप्त ने ही राज्य किया जिसका मन्त्री श्रेष्ट था, योग्य था। भण्वपिबोद्धव्य मत्रिभिः पृथिवीपतिः। पथा स्वदोषनाशाय विदुरेणाविकासुतः ॥ ७९ ॥ राजा न सुने तो भो मन्त्रियों को राज्य की याते उससे कहनी चाहिए । जिस प्रकार स्वयं दोपमुक्त होनेके लिए विदुर धृतराष्ट्र को समय समय पर समझा दिया करते थे। पृष्टो व ते मितं व ते परिणामे सुखावह । मंगी स्त्रियवकास्यात्केवल स रिपुः स्मृतः॥ ८०॥ पूछने पर बोले. थोड़ा बोले और वैसा घोले जो परिणाम में सुखफारी हो । जो मन्त्री केवल प्रियवक्ता हो य शत्रु है, वह राजा और राज्य का नाश कर देता है। सुलभाः पुरुषान् राजन्सततं प्रियवादिनः । मप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ताओता च दुर्लभः ॥ ८॥ ।
५०२ राजनीति । ---- 'सजल और महाराज प्रिय बोलने वाले मनुष्यों का धारा नहीं है पर अप्रिय किन्तु हितकारी य त का योलने और सुनने वाला दोनों ही दुर्लभ है। दुर्गाणि राज्ञ कार्याणि सबलानि गुदानिच । मुख्यमन्त्र च तेष्वेव स्थापनीयं प्रयवतः ॥ ८२॥ राजा को मजबूत किला बनाना चाहिए, और धन अन्न उसी में यत्न पूवक रखना चाहिए। दुर्गं बहुविध ईय पर्वतस्य जलस्य च । माकारस्य घनस्यापिभूमेरपि भवेत्कचित् ॥ ८३॥ फिला अनेक प्रकार का होता है, पर्वत का किला, जल फा किला, चार दीवारी का किला, वन का किला और कहाँ कहों पर जमीन का भी किला होता है। न गजानां महण न रथेनै घ वाजिना। तया सिध्यति कार्याणि यया दुर्ग प्रभावतः .. ' हजारों हाथियों रथों और घोड़े से जो कार्य नहीं होता, घहफाम फिल से हो जाता है। विपहीनो यथा नागो महीनो यथा गजः। सर्वेषां पश्यतो याति दुगहीनश्च भूपतिः ॥ ८५० यिषहीन साप,मदहीन हाथी जिस प्रकार सयके देखते देखते हो अपमानित हो जाते हैं, उसी प्रकार दुर्गहीन राजा भी। शतमेकोहि संधत्तं दुर्गस्थोरि धनुरा। वरमार्ग पसंमति नोविशाखविदोजना. 44 कविता-कौमुदी। .५०३ किले में रहकर एक धनुर्धारी भो सौ वीरों से युद्ध कर सकता है, इसी कारण नीतिशास्त्र जाननेवाले दुर्ग की प्रशंसा 1 : एकः शतंयोधयते प्राकारस्थौधनुर्धरः । शत सहस्राणि तथा सहस्र लक्षमेव च ८७॥ : - किले के चार दीवारी पर से एक धनुर्धारी मौ आमियों को लड़ा सकता है. सौ मनुष्य हज़ार को और हजार लाख 'फो लड़ा सकते हैं। विविधाः पुरुपा राजनुचमाघममध्यमः। नियोजयेत्तथैवैतांत्रिविधेष्वपि कर्मसु ॥ ८८ ॥ उत्तम मध्यम और अधम तीन प्रकार के मनुष्य होते हैं, इनको उत्तर मध्यम और अधम तीन प्रकार के कार्यों में लगाये। हुण्या तुल्यसामर्थ मर्मज्ञ व्यवसायिन। अधराज्यहरं भृत्य यो न हन्यात्स हन्यते । ८९॥' जो धन और पराक में चराचर हो, रहस्य जानना हो, उद्योगी हो और आधे का हिस्सेदार हो, ऐसे को जो नहीं ,मरया डालता, यह खुद मारा जाता है। निशेिष दा राजा सम मृत्यैपु तिष्ठति। तीचमः सपर्यानामुत्साहः परिधीयते ॥ ९॥ जो राजा अपने सब भृत्यों को समान देखता है, उसके उद्योगी भृत्यों का उत्साह कम हो जाता है। प्रसादो निम्मलो यस्य यस्य कोयो निरयंक। नते भतारमिष्टुति पति यूनिवागनाः । ९..
०४ राजनीति 4-41. जिसकी प्रसन्नता निष्कल हो, जिसका मोघ निरर्यक हो, येसे स्वामी को लोग नहीं चाहते, जैसे स्त्रियां वृद्ध को पति पनाना नहीं चाहती। स्यजेसामिनमत्युप मत्युमाकृत स्यजेत् । कृपणादविशेषशनस्माघ कृतनाशकं ॥१२॥ जो स्वामी यड़ा क्रोधी हो उसका त्याग कर दे, उसकी अपेक्षा भी जो रुपण हो उमका त्याग करे, कृपण को अपेक्षा जो भृत्यों के कार्यों का अन्तर न समझे उसका त्याग फरे, उसकी अपेक्षा भी उसका त्याग करे जो भृत्य के कार्यों को भूल जाय। भविवेकिनि भूषाले नश्यति गुणिनां गुणाः । प्रवासरमिक कांते यथा साज्यास्तनोग्रतिः ॥९॥ जहां का राजा अविवेकी रहता है यहां गुणियों के गुण नष्ट हो जाते हैं। जिस प्रकार प्रयासो पति को स्त्री के स्तनों का बढ़ना रुक जाता है। किंशुके किं शुकः कुर्याफलितेपि बुभिक्षितं । भदातरि समृद्धपि कि कुयु रुपनीविनः ॥९॥ शुक भखा होने पर भी फलित पलाश वृक्ष पर क्या । लाभ उठा सकता है ? इसा प्रकार मालिक धनी भी हो पर रूपण हो तो भृत्यों को क्या लाभ हो सकता है। 4 सेवया धनमिच्छद्भिः सेवकैः पश्ययत्कृत। स्वावध्य यच्छरीरस्य मुस्तदपि शारित ॥९५।। सेवा के द्वारा धन चाहने वाले सेवकों ने क्या किया है। उसे देखो। मूखों ने अपने शरीर की स्वतन्त्रता भी पॅच दी।
-AAR Al- कविता-कौमुदी। पर धन फलं भक्ष्य' घरं भारोपजीवन । सो विवेकहीनाना सेवया न धनार्जनम् ॥ ९ ॥ वन का यास अच्छा,फल भोजन भी अच्छा, भार देकर जीना भी अच्छा, अथवा जीपन को भार होना भी अच्छा, पर विवेकहीन पुरुषों को सेवा द्वारा धनार्जन अच्छा नहीं। जीवतोपि मृताः पञ्च व्यासेन परिकीर्तिताः। दरिद्रो व्याधितो मूर्खः प्रवासी नित्यसेवकः ।। ९७ ॥ च्यासदेव ने इन पाँच मनुष्यों को जीते हुए भी मृत यत. लाया है, दरिद्र, रोगी, मूर्ख, प्रवासी और सेवक । न कश्चिच कोपानामात्मीयानामभूभूतो। होतारमपिजुव्हतन्दहत्येव हुताशनः॥९॥ कोचों राजाओं का कोई भी अपना नहीं होता। हनन करनेवाले होता को भी भग्नि जलाता ही है। इसी प्रकार कोधी राजा भी अपने सेवक को जला सकता है। गृधाकारोपि सेटयः स्यादेसाका सभासदैः। हंसाकारोपि संन्याज्यो गृध्राकारैः सभासदैः ॥ १९ ॥ राजा चाहे गीध के आकार का हो और समासद इस के आकार के हो, फिर भी घे राजा को सेवा कर ही गे। इसके आकार का भी मनुष्य यदि निर्धन है तो गीध के आकार वाला भी उसका त्याग कर देगा। चक्र सेव्य नृपः सेम्यो न सेव्यः केवलो नृपः। पश्य चक्रस्य माहात्म्य मृतिका पात्रांगतः। 100॥ ।
५०६ राजनीति । राजा के चक्र ( नौकर चाकर आदि ) की सेवा घ चाहिये, फेवल राजा की नहीं । चक्र का यडा महत्व है, चक्र के कारण मृत्पिण्ड पात्र बन गया। गंतव्या राज्यसभा दृष्टव्या राजपूजिता लोकाः। यद्यपि न भवत्पर्यास्तथाप्यनर्थी विनश्यति ॥1010 राजसभा में जाना चाहिए, राजसम्मानित मनुष्यों देखना चाहिए । यद्यपि इनसे कोई फल नहीं होता है. विपत्ति का नाश भचश्य होता है। अत्यावन विनाशाय दूरवशफलप्रदाः । मध्यभावेन सेश्य ते राजा पहिगुरुः स्त्रियः ॥२॥ बहुत पास जाने से नाश हो जाता है. दूर रहने से फल नहीं होता। इस कारण राजा, अग्नि, गुरू और स्त्री। सेवा मध्य भाव से करनी चाहिए। भासयमेव नृपतिभंजते मनुष्य विधाविहीनमकुलीनममंगत था। प्रायेण भूमिपतयः प्रमदा छतात्र यः पाश्यता भवति ते परिवेष्यति 10. राजा पास पाले मनुष्य पर ही असम रहता है. यह या मूग हो, सकुलीन हो या अयोग्य हो । प्रायःरामालियां भी समाए उसी का लिंगन करती जा उनके पास रहता यस्मिन्नेवाधिई चारारापयति पापिया। कुलीनी पाकुलीनीयायध्रियो मानन भ.." रामा जिमकी ही भार अधिक ध्यान दे, यह पुसीन ही या पटीन यह सन्नी का भाजग हो जाता है।
कविता-कौमुदी। ५०७ धवलान्यातपात्राणि वाजिनश्च मनोरमाः। सदा मत्ताश्च मातंगाः सन्ने सति भूपतौ ॥ १०५॥ राजा जव प्रसन्न हो जाता है तब श्वेत.छत्र, सुन्दर घोड़े, और मतवाले हाथी मिलते हैं। राजामानरि देव्यां च कुमारो मुग्न्य मन्त्रिणि । पुरोहिने प्रतीहारे मन बने त राजवत् ॥ १०६ ॥ राजमाता, महारानी, राजकुमार, प्रधान मंत्री, पुरोहित और प्रतीहार इनका राजा के समान आदर करे। पनाहचेषु यध्यं ते सामयमपराइ मुखाः । विकटैरायुधैर्याति ते स्वर्गः योगिनो यथा ॥ १७ ॥ जो युद्ध में बिना पीठ दिखाये भयानक अस्त्रों के द्वारा मारा जाता है वह स्वर्ग जाता है, जिस प्रकार योगी लोग स्वर्ग जाते हैं। पदानि तु तुव्यानि आहवेवनिवत्तिनो। राजा सुकृतमादसे हतानां विपलायिनां ॥ १०८॥ जा लाग युद्ध में नहीं मुडने, आगे बढ़ते जाते हैं, उनका .एक एक पैर यदना यश के समान है। जो युद्ध से मात्र आते हैं, उनका पुन्य राजा ले लेता है। तवाहंवादिन क्लीय निति परागति। नहन्याद्विनिवृस युद प्रेक्षणमागतं..१ इतने प्रकार के मनुष्यों को युद्ध में न मारना चाहिए, जो कहे कि में आपको शरण है, जो नपुसक हो, जो थत्रहीन हो, जो युद्ध से लौटा जाता हो और जो युद्ध देसने माया १
राजनीति ।
राजा के चक (नोकर चाकर मादि) की सेश
चाहिये, फेयल राजा की नहीं । चक्र का यहा महत्य है
चफ के कारण मृत्पिण्ट पान यन गया।
गंतव्या रास्पषमा दृष्टम्या राजनिता लोकाः।
यद्यपि न भरस्पांस्तथाप्यना विनश्यति.in
राजसमा में जाना चाहिए, राजसम्मानित
देखना चाहिए । यद्यपि इनसे कोई फल नहीं-
सिरानिकानावयताई।
कविता-कौमुदी ५०६ नृपः कामासक्तो गणयतिन कार्य न च हित. यथेष्ट स्वच्छंदहति किल मत्सोगन इव । सतीमानामातः पतति यदा शोक गहने तदामात्ये देोपाक्षिपति न निज घेत्य विनयं ॥१५॥ फामी राजा कोई कार्य नहीं कर सकता, और यह हिता. हित भी नहीं समझता, मतवाले हाथी के समान जो चाहता है, यही फरता है । मभिमान में फ़लकर जय यह पलो विपत्ति में फंसता है, तय सारा दोष मन्त्री को दे देता है, पर अपनी पुराइयों को नहीं समझता। गुणवगुणवता कुवंवा कार्यजान परिणतिवधापा ययतः परितेन । भनिरमसताना कर्मणा मा विपत- भवति हरयदाही शम्पयो विपा. अच्छा या युरा कोई भी कार्य करने के पहले उसके फल का निश्चय कर लेना चाहिए, जल्दी में किये हुए काम विपत्ति के लिए होते है, उनसे सदा कष्ट उठाना पड़ता है। भापायदुर्थ भागेन पय कर्म भरतपेत् । प्रभून सैलदीपोति चिरं भवाणि पश्यतिma भपने चौथे हिासे का प्यय करना चाहिए, जिस दीपक में अधिक तेल रहता है यह पहुन देर तक जलता। अपांगमन कार्य चं रक्षण तथा। मदपमाणो निरादापा मुमेरपि दीपने cm भधका मन फरमा सानिमाय के पिना केवल गयं करने से सुमेरका भी मारा दो सकता है, यह भी पतम हो सकता है।
OF गजनीति । द्विजा अपि न गच्छतियां गतिं नारियोगिनः। स्वाभ्यर्थ संत्यजन्प्राणांस्तां गतिं याति सेवकः ।.. ब्राह्मणों को भी जो गति नहीं मिलती, योगियों को भी जो गति नहीं मिलती, संरक स्वामी के लिए प्राण संग कर के उस गति को पाता है। राजा तुष्टोपि मृत्याना मानमात्र प्रयच्छति । वेपि संमान मात्रेण प्राणैः प्रत्युपकुर्वते ॥". राजा प्रसन्न होकर अपने भृत्यों को केवल सम्मानित फरता है, और ये भी मम्मानित होने के कारण प्राणों से उम उपकार का प्रत्युपकार करते हैं। सारामारपरिष्ठेत्ता स्वामी भृत्यस्य दुलंमः । अनुकूलः शुचिर्दक्षः प्रभात्याहि दुर्लमः ॥ २॥ यथार्थ और अयथार्थ का ज्ञान रखने वाला स्वामी मृत्य को दुर्लभ है और अनुकूल शुद्ध तथा दक्ष भृत्य भी स्वामी को दुर्लभ है। पान भक्षास्तथा नार्यो मृगया गीत वादिने । एतानि युक्त्या सेवेठ प्रसंगो यश दोपवान् ॥ ३॥ शराय, भोजन, स्त्रियां, आखेट,गाना यजाना इनका निय- मित उपयोग करे, क्योंकि इनमें आसक्ति से हानि होती है। अतितेजस्वपिनृपः पानासको न साधयत्यर्यान् । तृणमपि दग्धुमशक्तो वडवाग्निः स पियधिM. शायी राजा चाहे घड़ा तेजस्वी हो, पर वह कोई काम सिद्ध नहीं कर सकता । घड़याग्नि एक तिनके को भी नहीं जला सकता। क्योंकि यह समुद्र पान करता है।
an 1 कविता-कौमुदा ५०६ मृपःकामासको गणयति न कायमच हित- यथेष्ट सम्छंदश्वनि किल मसोगज इव । सतो मानामातः पति र यदा शोक गहने सदामात्ये दोपाक्षिपति न निज येत्य विनयं ॥५॥ फामी राजा कोई कार्य नहीं कर सकता, और यह हिता- हित भी नहीं समझना, मनवाले हाथी के समान जो चाहना है. यही फरता है । अभिमान में फलकर जय यह पड़ो विपत्ति में फंसता है, तब सारा दोष मन्त्री को दे देता है, पर अपनी घुराइयों को नहीं समझता। गुणवदगुणवदा कुवंता कार्यात परिणतिस्पधाया पयतः वडितेन। भनिरभसतानां कर्मणा मा विपत्ते. भवति यदाही शम्प मुल्यो वि. अशा या पुरा कोई भी कार्य करने के पहले उसके फल का निश्चय कर लेना चाहिए, जल्दो में किये हुए काम विपत्ति के लिए होते हैं, उनसे सदा पट उठाना पड़ता है। भावाचतुर्य मागेन व्यय कर्म प्रातपेत् । प्रभून लदीपोजिपिर भाशि परतिama भपन चौधे हिस्से का ध्यय करना चाहिए, जिस दीपक में भधिक सेल रहता है यह बहुत देर तक जलता। भानामन कार्य रक्षण तथा । भापमाणी निराहाया सुमेरवि दीपने .. अपका मन करमा नादिमाय के पिना बगल सर्च करने से सुमेरका भी नाश हो सकता है, यह भी पतम दो ५१० राजनीति । कर्मणा मनमा याचा च पांच चतुर्दिछ। प्रमादयति लोकं यस्त लोकांनुमपीदति ॥ १९॥ फर्म मन ययन और चक्ष इन चारों के द्वारा जो लोक प्रसन्न कर सकता है उसी पर यह लोक प्रसन्न होता है। संमोजन संश्यन मंप्रश्नोधयमागमः। शातिमिः महाणि न विरोधः कदाचन ॥१२॥ जाति वालों के साथ भोजन, पातालाप, कुशल प्रश्न- आना जाना करना चाहिए, विरोध कमी नहीं करना चाहिए संहतिः | यसो राजन्विगुणेष्वपिबंधुषु । तुपेनापि परित्यक्तान प्ररोहति तंडुलाः॥ १२ ॥ बंधु गुणहीन भी हो पर उनकी संहति अच्छी होती है, चावल जव भूसो को छोड़ देता है तब उसको आंकुर उत्पन्न करने की शक्ति नष्ट हो जातो है। मृदोः परिमवोनित्यं धैरं तीक्ष्णस्गनित्यशः। उत्सृज्य तय तस्मानमभ्यां वृत्ति समाश्रयेत् ॥ २२॥ फोमल प्रकृति वाले मनुष्य का पराजय होता है, तीखी प्रकृति वाले का लोगों से विरोध हो जाता है । इस कारण इन दोनों का त्याग करके मध्यम वृत्तिका अवलम्बन करना चाहिए। अबुद्धिमाश्रितानां चक्षतव्यमपराधिनी । नहि सर्वत्र पांडित्य सुलभं पुरुषे क्वचित् ॥ २३ ॥ मूर्ख मनुष्य के अपराधों को क्षमा कर देना चाहिये, क्यों फि सप मनुष्यों में पाण्डित्य होना सम्भय नहीं है।
कविता-फोमुदो। तेजरिव निक्षमापते नातिशमाचरेत् । अति निमंधनादग्निदनादपि जायते ॥ क्षमाशील तेजस्वी मनुष्य के प्रति कठार व्यवहार नहीं करना चाहिए, क्योंकि अधिक रगड़ने से चन्दन से मा अग्नि उम्पन्न हो जाती है। किमयसाद महता सिद्धिमेतिलघीयो । प्रदीपो भूमिगेहातभ्याम्नति न मानुमान् ॥ १२५ ॥ पुछ कार्य ऐसे होते है गोपड़ा से सिद्ध नहीं होने, फिन्तु ये छोटों के द्वारा ही सिद्ध होते हैं। घर के भोतर का अन्धकार दीपक दाता है, सूर्य नही। अदावायुचित कामानि गृहमागने । समप्यागनेरठायो मोपमहरतेनुमः ॥ .. घराये हुपानु फा भी उचित अनिधि-सत्कार करना पाहिए पिंड उसफो भी लाया देते हैं जो उन्हें काटने भाता एमे पोपपरतिएगापायपि। पुद्धिमतः राहने पनिधाय ददि चिन.. मारने वालों को देगका भेडा भाग जाता है, भीर सिंह समा जाता है. पुदिमान मनुष्य मन में कुछ विचार कर विपत्ति का सामना करते हैं। मानि से सूचिपा पाग भवनिमाया निमाविमा। प्रविधि विधान मांगा निशिना NRN ये मूग मनुष्य गराजित होते हैं जो मायायियों के प्रति मापायी महीने में मनुष्यों के भीतर घुमकर शर उनका राजनीति। eHARA यध करते हैं, जैसे, नङ्गे बदन वाले मनुष्य का बध तीखे वाग फरत है। कोई को देशकाली समधिपम गुणा केरय: के सहाया: का शक्तिः कोम्युपायः फलमिहक्रियत्कीदशीदेवसंपद । संपत्ती को नियधः प्रविदित वचनस्वोत्तर किंनुमेस्या- दित्येवं कार्यसिदाचवहितमनसोहस्तगाः संपदः स्युः ॥२९॥ मैं कौन हूँ, कैसा देश काल है, अच्छे बुरे गुण वाले कितने शत्रु हैं और कितने सहायक हैं, मेरो शकि क्या है, उपाय क्या है, इसका फल क्या है, माग्य अनुकूल है कि नहीं, सम्पत्ति में रुकावट क्या है, मेरा रह य प्रकट होने पर मैं क्या उत्तर दूंगा, इस प्रकार कार्य-साधन में जो सावधान रहते हैं सम्पत्ति उनके हाथ में रहती है । स्वधर्म राघवश्चैव ह्यधमे दशकंठका। एवं वदति लोकाश यतो धर्मस्ततो जयः॥३०॥ स्वधर्म में रामचन्द्र थे और अधर्म में रावण । लोग कहते हैं कि जिधर धर्म रहता है उधर विजय रहती है । रामचन्द्र विजयी हुए, और रावण पराजित । धर्मः प्रागेवचित्यः सचिवगतमतिः सर्वदा लोकनीयो प्रच्छाद्यौरोपरोगी मृदु कठिन रसौ योजनीयौ व काले। ज्ञेयं लोकानु वरचयनचरैमहलं वीक्ष्यणीय. मात्मायनेनरक्ष्योरण शिरसिपुनः सोपिनापेक्षणीयः १m धर्म का विचार पहिले करना चाहिए, मन्त्री को अपना मत पतला कर सब राज्यकार्य सदा देखना चाहिए, क्रोध और रोग छिपाना चाहिए, समय पर कोमल या फठिन रस की योजना करनी चाहिए । प्रजासंबधी बातों को विश्वसनीय फविशे-कौमुदी। घरों के द्वारा जानना चाहिए, अपने राज्य का निरीक्षण करना चाहिए, यता पूर्वक अपनी रक्षा करनी चाहिए, पर रण में उसकी भी उपेक्षा कर देनी चाहिए, ऋतौ विवाहे व्यसने रिपुक्षये यशस्करे कर्मणि मिगसंग्रहे। प्रिया सुनारीवधनेषु धुप धनव्ययस्तेषु न गण्यते बुधैः ॥ १३२॥ यश, विवाह, दुःस, शत्रुनाश, यश बढ़ाने वाले कार्य, मित्रों का संग्रह, प्रिय स्त्रो, गरीव बन्धु इनके लिए धन का खर्च होना बुद्धिमान नहीं गिनते । स्वाम्यमान्यश्च राज्य च कोशो दुर्ग पल मुहत् । एतावदुग्यते राज्य सन्व मुदिव्यपाधव ॥ ३३॥ राजा मन्त्री, राज्य, पाना, किला, सेना और मित्र ये को राज्य कहे जाते हैं। यह राज्य पराक्रम और युद्धि पर स्थित संधि विग्रह यानानि सस्थितिःसंश्रयस्तथा। देधोभावश्चभूपाना पागुणाः परिकोतिताः ॥ संधि, विग्रह, साफमण, घेरा, शरणागत, भेद ये राजाओं के छः गुण कहे जाते हैं। उत्साहस्य प्रभौमवस्यैव शक्तित्रय' जगुः । भागमनः सुवरपेक्षतम्मित्रस्योइयात्रयः ॥ १५॥ राजा फी तीन शक्तियाँ होती हैं, उत्साह शक्ति,प्रभु शतिः भौर मन्त्र शक्ति । उसका उदय भी तीन प्रकार का होता है, भपता उदय, मित्र का उदय और मित्र के मित्र का उदय।
राजनीति
यध करते हैं, जैसे, नङ्गे बदन वाले मनुष्य का पथ तीसे
करते हैं।
कोई को देशकालौ समविषम गुणा करणः के सहायाः
का शक्तिः कोम्युपायः फलमिहचकियस्कोदशीदेवमपर ।
संपत्ती को निवधः प्रविदित वचनस्वोत्तर किंनुस्या-
दित्येवं कार्य सिद्धाववाहितमनसोहस्तगा: संपदः ।
मैं कौन हूँ, फैसा देश काल है, अच्छे पुरे गुण घाले कि
शत्रु है और कितने सहायक हैं, मेरो शक्ति पता है, उपाय
है, इसका फल पा है, माग्य अनुकूल है कि नहीं, सम्मान
में रुकावट क्या है, मेरा रह य प्रफट होने पर मैं क्या उत
दंगा, इस प्रकार फायं-साधन में जो सायधान रहने
सम्पत्ति उनके हाथ में रहती है ।
स्वधर्म राघवरचैव सधमे दशकंटका।
एवं वदति लोहाच यतो धर्मस्ततो गा..
स्वधर्म में रामचन्द्र थे और मधर्म में रायण । लोग
हैं फिजियर धर्म रहता है उधर विजय रहती है। रामायण
विजयी हुए, भोर रायण पराजित ।
धर्मः प्रागेवर्षियःधिवगतमतिप्रशासकीय
प्रयाचौररांगी गृह रूटिन रमो योरोपीरा।
यहाहानुपाचपनचरमास पीपगीय.
मारमायग्नेनरयाण शिरमियमा मोमिनाक्षणीयाm
धर्म फा विचार पहिलं करना चाहिए, मन्त्रीकामाना
मत पतला कर मय राम्य कार्य मानना चाहिए, और
और रोग सिराना चाहिए, समय परामल या टिनस
को योजनाबरनी चाHिALमाधीवातावाविवार
कपिल कौमुदी। घरों के द्वारा जानना चाहिए, अपने राज्य का निरीक्षण करना चाहिए, यन पूर्वक अपनी रक्षा करनी चाहिए, पर रण में उसकी मी उपेक्षा फर देनी चाहिए, प्रती रिवाहे व्यसने रिपुक्षये यशस्करे कर्मणि मिगसंग्रहे। प्रिया मुनारीवधनेषु यधुप धनग्ययस्तेषु न गम्यते बुधैः ॥ २२॥ यह, यियाह, दुःख, शत्रुनाश, यश बढ़ाने वाले कार्य, मित्रों का संग्रह, प्रिय स्रो, गरीव यन्धु इनके लिए धन का ना होना युद्धिमान नहीं गिनते । स्वाम्पमात्या राज्य चकोशो दुर्ग बलं सुहत् । एतावदुष्यते राम सन्व बुद्धिग्यपाय॥ राजा मन्त्री, राज्य, समाना, किला, सेना और मित्र ये ही राज्य कदे जाते हैं। यह राज्य परामम और पुद्धि पर स्थित . संधि विग्रहपानानि संस्थितिःसंभयस्वपा। देयोगावरभूपाना पाषा: परिकोतिता : मपि, पिप्रह, बाफमण, घेरा, शरणागत, भेद ये राजाभों गुण कहे जाने। आत्मारप प्रभामा शत्रिय' अणुः । भारमनः मुरारतमित्रस्योपासपः .. राजाको तीन रानियाँ हप्ती है, उत्साह राशि,प्रभुपाति भीरमानटिसका उदय भी तीन प्रकार का होता, भपता नप, मित्राय और मित्र के मित्र का उदय ।
राजनीति। माम दाने भेद देश विन्युपाय धनुष्टयं । हस्पधरयगदानासेनांगत्याच्चतुष्टय - ३॥ साम, दान, दण्ड और भेद य चार राजा के उपाय है हाथी, घोड़ा, रथ और पैरल ये चार सेना के अंग है। दुष्टाविनीन शनणां भयकृदधुपधिम । शस्त्रधारणमौग्यस्य रक्षो विद्यु द्वमहापह ॥ ३ ॥ शस्त्र धारण करना दुष्ट और विनयी शत्रु को भयमी करता है, यह एक मित्र के समान है, बल का द्योतक है तर राक्षस, विद्युत् और प्रह के दोषों को दूर करनेवाला है। वानिलरजोधर्म हिमादिना निवारणम् । राज्यलक्ष्मी गृहं वयं चाप्य एनधारणे ॥३॥ छत्र धारण करना यर्पा, हवा, धूल, धूप, शीत आदि रक्षा करता है. राजा की लक्ष्मी का वह आश्रय है, वर्ण पदा घाला और नेत्रों का तेज बढ़ाने वाला है। चामरं श्रीकर दिव्य राज्यशोभाकरं पर । सिहासन सुखैश्वर्य का लोकानुरंजनं ॥ ३९ ॥ चामर धारण करने से शोमा होती है, उससे राज्य की भी शोमा होती है, यह दिव्य है। सिंहासन से सुख ऐश्वर्य बढ़ता है और लोग प्रसन्न होते हैं। सुमनो पर रवानां धारण दिव्य रूपकृत् । पापलक्ष्मीप्रशमनंदनाद्यनुलेपन ॥ १४॥ फूलों की माला और रतों की माला धारण करने से हो जाता है। चन्दन आदि के अनुलेपन से पापहर है, शोभा बढ़ती है। और 7 H - कविता कौमुदी। स्नान माम मना प्रसाद जनन दुस्वप्न विध्वंसने- शौचस्यायतन मलापहरणं संवर्धन तेजसा । रूपोद्योतको रिपुप्रमथन' कायानि संदीपन. नारीणां च मनोहर श्रमहर स्नाने दशैतेगुणाः ॥१४॥ स्नान करने से मन प्रसन्न होता है, बुरे स्थान नहीं आते वह शुद्धि का स्थान है, मल स्वच्छ करता है, तेज बढ़ाता है, रूप यढ़ाता है, शत्रुओं को नष्ट करने वाला है. शरीर की अग्नि को दीप्त करने वाला है, स्त्रियों के लिए मनोहर है थकावट दूर करने वाला है । स्नान में ये दश गुण हैं । सवूल मुखरोगनाशिनिपुणं सवर्धन तेजपो निन्य जादरवहिवृद्धिजनन दुर्गंध दोषापा । यत्रालंकरणं प्रहर्षजनन विद्वन्नृपाप्रेरणे कामस्यायतन' समुद्भवकर सक्षम्या सुखस्यास्पदं । १४२॥ ताम्बूल (पान) मुह के रोगों को नष्ट करता है, तेज घटाता है, जठराग्नि को बढ़ाता है और दुर्गन्ध नष्ट करता है मुंह की शोभा बढ़ाता है, मन प्रसन्न करता है. कार पद्धक है, लक्ष्मी पहाता है, और सुखी करता है। देवता तिथि विप्राणो पूजनं पापनाशन । लोकरयेपि शुभकृतुदान धर्म यशस्करं ॥ १४ ॥ देवता अतिधि और ब्राह्मण की पूजा से पाप नष्ट होता है, दान से धर्म होता है यश यढ़ता है और इससे दोनों लोकों में कल्याण होता है। सुत भृत्य सुरिस्वामि सदगुरुदेवते। एकतरनो वृद्धपा श्रीकराः पत्रमूधिनि ४४. --
राजनीति
यामी गुरु
पुर भूप मित्र रात्र
मोरदेवता नको पर
निगं मी एक एक प्रोपदा । भान पुत्र को एक प्री, मृत्य
कोदो, मित्र यासीन, शत्र
को यार, स्वामी को पांच गुरुको
मोरयता को माता
रामान अपम विततो मापा ततोपन ।
रम्मतिमि जो गातो धन-11
पहले रामा को मान कर तप रो मोर पुनः धन राजा
के बिना ली पदां मिलेगा मोर घन पदा मिलेगा।
पः कुलाभिमातिगुमः प्रतापगन् ।
पार्मिको गीतिकुशलः स मी पुश्यने मुवि ।।
जो कुलीन आचारयान शुद प्रतापी, धार्मिक और नीति
निपुण हो यही संसार में स्वामी हो सकता है।
नाम मसेम्यते पवनः परमेश्वराः।
मधिरेनैव पे तुष्टाः पूरन्ति मनोरया ..
परमेश्वरों (धनियों) को क्यों न सेया की जाय, जो शोध
हो प्रसस होकर मनोरथ पूर्ण करते हैं।
सुहामुपकार कारणात द्विपत्रामध्यपकार कारमाद ।
नूप भय इप्यतेबुपैर कोन विमति केरल
मित्रों के उपकार करने के लिए और शत्रुओं के भपकार
करने के लिर विद्वान् राजाध्य वाहते है। फेघर पेट तो
कोई भी पाल लेता है।
वालोऽपिनासमतम्यो मनुष्य इति भूमिपः ।
माती देववारपा नररूपेग विति ।
फपिता-कौमुदी। बालक राजा का भी मनुष्य समझ कर तिरस्कार नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह मनुष्य शरीरधारी एक पड़ा देवता है। यस्य प्रसादे पद्याऽस्ते विजयश्च पराक्रमे। मृत्युश्च वसति क्रोधे सर्वतेजोमयोहि सः॥५०॥ जिसकी प्रसन्नता में लक्ष्मी रहती हैं, पराक्रम में विय, और शोध में मृत्यु, यह राजा सतेजोमय है। यस्मिन्नेवाऽधिकं चक्षुरारोहयति पार्थिवः । सुतेऽमात्येप्युदासीने सलक्ष्म्याऽऽश्रीयते जनः ॥ १५ ॥ राजा जिसकी ओर प्रेम से देखें, यह पुत्र हो, मन्त्री हो या उदासीन हो, यही लक्ष्मी का भाजन होता है। राजा दुधुक्षसि यदि क्षितिधेनुमंता- तेनाऽघवत्समिव लोकममुं पुपाण। तस्मि श्रसम्यगनिर्श परितुष्यमाणे नाना फलैः फलति कपलतेव भूमिः॥ १२ ॥ राजन् यदि तुम इस पृथिवी रूपी गौ को हो तो पछड़े के समान मपनी प्रजा को पुष्ट करो, उसके अच्छी तरह पुट हो जाने पर यह भूमि कल्पलता के समान अनेक फल देगी। सन्याऽनृता च परुषा प्रियवादिनी च हिंसा दयालुरपिचाऽयंपरा वदान्या। नित्यम्यया प्रचुर नित्यधनाऽऽगमा छ धेश्योगनेव नृपनीतिरनेकरूपा । १५३ ।। राजा की नीति वेश्या के समान अनेक रूप की होती है। कहीं सत्य, फहीं झूठी, कहीं फठोर, फहीं प्रियवादिनी, कहीं दूहना चाहते .
५१८ राजनीति। , हैं। हिंसफ कहीं दयालु, कहीं लोभी, कही दानी, और कहीं सु खर्चने यालो और कहाँ खूब धन बटोरने वाली। राजस्त्वदर्शनेनैव गलति त्रीणितत्क्षयात् । रिपोः शस्त्र कदैन्यं नीवीबंधोमृगीदृशां ॥ ५४॥ राजन् आपके दर्शतमात्र से ही तीन चीजें गिर जाती है शत्रु का शस्त्र, कवि की दीनता, और स्त्रियों का वस्त्र, अयोद आप धीर, दाता और सुन्दर आज्ञा कीतिः पालनं ब्राह्मणानां दान भेगा मित्र-संरक्षण । येपामेते पड्गुणा न प्रवृत्ताः कोऽधीतेपा पार्थिवापाश्रयेण ॥ ५५ ॥ जिसका हुक्म न चला, कीर्ति न हुई, जिसने ब्राह्मणों का पालन न किया, दान न दिया, भोग न किया, मित्रों की रक्षा न की, ये छः गुण जिसके न हुए, उसको राजा का प्राधित होने का क्या लाभ हुआ। बहुधा राज्यलाभेन यस्तोपस्तव भूपते । वहुधाराऽज्य लाभेन यस्तोपो मम भूपते ॥ १५ ॥ राजन् अनेक राज्यों के लाभ से जो प्रसन्नता आपको हुई यही प्रसन्नता मोटी धार से घी मिलने के कारण मुझे हुई। राजसेवा मनुष्याणामसिधाराऽवलेहन । पंचाननपरिष्वंगो व्यालीवदनचुंबनं ॥ १५ ॥ राजा की सेवा मनुष्यों के लिए तलवार फो थार चाटना है, सिंह का आलिंगन करना है. और सर्पिणी का चुम्यन करना है। इधस्तु मुख निवस्तु भवनौगात स राज्ञासा कल्याणी गिरमेव संमदिवदेवाय विभ्यास्कती।.in
.
कविता-कौमुदी।
भालेशाधनमयेदधिपतेरावर्जयेद्वतमान्-
कुतारकृति जनम्य जनयेस्कस्यापिनापकियां .५८
जो मुखपूर्वक राजाभा में रहना चाहे, उसे राज ममा
शाना चाहिए, उस पिहान् की सभा में उत्तम पचन योलने
चाहिए, और अपना कार्य सिख फरना चाहिए, पिना परिश्रम
के मालिफ से धन कमाय, मित्रं प्रमन फरे, लोगों फा
उपकार कर, पर अपफार पि.मी का न करें।
अयुत पुरवा पक्षिमिहिसमर्शम विमुना.
शुयादभिस्य जमपि गुरुनाय दिनपात ।
विवापि समापाममिनये.
रस्सा शितिमनिरास्पेय स्पन । १५९ ॥
मां स्वामी योग्य भयोग्य जो पुछ दे उसकी स्तुति को,
उसके मुर्ग-गुरु की भी मसला कर, समा में अपनी निएमा
कामभिनय पर, इस प्रकार सप VAL प्रमाप, ती
सास में माना गाभिमाय पाद सुनाये।
नियमित गुमाएपशि परिधारा:-
भारमा गुपनलिमीati
५२. राजनीति। जिस शत्रु ने शीघ्रही राज्य पाया है, प्रज्ञा पर उसका दय दया अभी नहीं बैठा है वह थोड़े ही परिश्रम से उखाड़ा जा सकता है। क्योंकि वह शीघ्र रोपा गया है इसलिए जड़ जमो सप्रतिबंध कार्य प्रमुरथिगनु सहायवानेव । दृश्यन्त्यपि न पश्यति दीपेन विना स चक्षुरपि ॥२॥ जिस कार्य में विघ्न है वैसे कार्यों की सिद्धि विना सहा. श्क के नहीं होती। आंख याला भी मनुष्य अन्धकार में विना दीपक की सहायता के नहीं देख सकता। मित्रं स्वच्छतया रिपुनयवलैलुब्ध धनरीश्वर कायेण द्विजमादरेण युवति प्रेम्गाशनैवाधवान् । प्रस्तुतिभिगुर प्रणतिभिमूखे कथाभिध. विद्यामिरसिकरसेन साल शीलेन कुर्याद्वरी ॥३॥ शुद्धता से मित्र को, नीति से शत्रु को, लोभी को धन से भु को कार्य से, ब्राह्मण के आदर से, युवती को प्रेम से जन से पधुओं को, स्तुति से गुरु फो, खुशामद से मू को, विद्या से विद्वान् को, रस से रसिक को और शील सब को यश फरे।
No text on this page.