Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Mane Kaha
Front matter
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मैं ने कहा लेखक की प्रम्प रचनाए प्रमी सुमो -- पृष्ठ १४ (सरा संसास), हिन्दी साहित्य में प्यासी कास्य रसातार' कहा जाता है। हिन्दी करिठा में पिप हास्म की परम्परा के बामदाता म्यासनी हो । उनका हास्य पारिवारिक होता है। कपि की पत्नी पगो की बौनीम में पाप मारत कपरबर में प्रसिर । भगी सूनों में पानी की पुरानी पमी प्रसिर कविताओं का संग्रह है। रचानाएँ कराची से कहकते पार काश्मीर से कम्पाकुमाएतक बनता के विमों में पर किए गए है। कदम कदम बढ़ाएमा (तीसरा संस्करण) प्यासपी पम्प बिनोर ही नही लिखवे, सनम पार प सिखने की मी प्र व समता है। प्रस्तुत पुस्तक में प्रोगपूर्व मापा में मेवाणी सभापता बोस कसरता संग्राम का पपपमपूर्ण ऐतिहासिक बर्षम प्रस्तुत किया गया है। हिन्दी में यह पीर रस पूर्वाप्प अपनी परम्परा में एकरम मौलिक पौर राष्ट्रीय भावनापों से मोत-प्रोत है। हमारे राष्ट्रपिता (इसरा संस्करण) स्व.२ गो पापीनी पर प्रमक पुस्ता लिदी गई है मकिन उमो पीपन पौर पनो एक ही जगह संमेर में प्राकक कपि-वाणी से प्यार करनेवासी यह प्रथम प्रामाणिक पुस्तक है। इस पुस्तक की सराहना सबने मुक्तक की। प्राचार्य विनोगा माने ने सम इसकी भूमिका निपी मार राबपि पुप्पोत्तमदासगी टेटन ने इसके सम्म सिरें। गोपी-परित पृह १२ मूम्म... मानक मार प्रायोमिए तरत और ऐसारा में मोटे याप, मांधीगी को मह प्रामाणिक जीवनी बाम-साहित्य में एक महत्वपूर्ण प्रशासन । * प्रास्माराम एण मंस, रिस्मी-६ .
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भवाप-मिगार की एष्टि में
गम
मैं ने कहा"
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य
गगन
मिम, सामाजिक एवं पुनते तर पाहिरिया
पौर राजनैतिक व्यंग-विलो परिपूर्त
तोगह मौतिक निवाबों का सविध सण
नि
गोपालप्रसाद ध्यास
भी मनदर महमद
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१९५८
प्रारमाराम एप संस
प्रकापक या पुस्त-विक्षता
कारमौरी मेट
रिली
पमतानपुरी
मात्माराम एम संस
काश्मीरी पेट
रिस्ती
fठीय संसरण १२१५
प्रस
पापी गागर
. - तो, मैंने कहा मेरा नम्म पाँ (परासीनी-मथुरा में) हुमा, जहाँ महाकपि महास्मा सूरदास ने हिन्दी का महाप्रव्य 'सूरसागर' रपा, मेरी जन्म तिथि (माप शुक्ला दशमी) मी पायी, जिस दिन बायापाद के प्रवर्वक महानाटककार प्रसादजी ने जन्म लिया और संप १६७२ को ईस्वी सनों में फैलाइए वो पाव पेगा कि इतिहास में उस महान पर्ष पिटना महत्व है! मेरी बीमी (मावानी) का करती थी कि जब मैं गम में दीपा, सब एक महास्मा उनके द्वार पर पाए थे और कर गए ये किरा यह पास पड़ा 'प्रवापी' होगा। भगवान मी कृष्ण की तरानब सात वर्ष का हुमा यो गोवर्सम पर्वत की तलाटी बोरकर मधुरामा पसा । पढ़ाई तो नही पास किये, सेफिन तैरने, ती सबने, पठी बनाने, चोपन सेसने और बाद में विच-सोये पड़ने में पास पास काफी माम कमा लिया । पिवाणी की इच्छा के अनुसार कम-से- कम 'मैट्रिक' मी पास न कर सका वो क्या, कड़ियों के मोबडे पाने नीव लिये पोर रामलीला में सीता, मदमस और राम के भमिमय कर करके मपुरावासियों से पर्पो सकराय उस्माता रहा, शीरा मुख्याता पा और जय-मयघर करयाता गा। रोजी र पप महीने की कम्पोपोटरीस प्रारम्भ की । मशीमों में स्पाही मोदी और ग्रन मी लगाया । सस्पनारायण की कया मी पाँची, नियों भी लिखी और यूशन से सेकर सशुल्क प्रपचन भी किए । आगरा में नप पागमनाना पा निता वो मैं मी यहाँ पहुंचा और यहाँ के मासिक 'सारिस्य सन्देश' से अपना साहिस्पिक जीपन प्रारम्भ किया। 'भारत प्रोमोमान्दोशन के साथ-साय मुझे मी भागरा छोपना पहा दमक महाने इटाया गाटापा में जमकर गायत्री मंत्र का पाप किया, महामारव, पाल्मीकि रामायण भोर मीमदभागवत के पारायण ध्येि । महामयि देव की इस मगरी में ही पिता मुझ पर मसन्म हुई। स्परस पही से गमा ।
स
ये हास्य रस को रपमाएँ ही मुझे "दिस्सी पडो' पायोमन के
जमाने में रिम्सी गई। इनकी ही बीमत एक कम्पोपीटर
('ए' ही सही) 'हिन्दुस्तान' का सम्पादक मना ।
पच में स्परस की कपिताएँ सिही ये 'प्रमो सुनो' में संग्रहीत
है। गए में बोम्म्य-विनोद लिखा, पर इस पुस्तक के रूप में मापके
सामने है।
इस प्रकार, अगर भई दुर्घटना महीं हुई तो समय मेरे सामो
'मतापी' पमन कहा है, प्रागे मर्गी मगपान की।
बस, इसके सिसाय भूमिका में मुझे मौर अब नहीं बना । म्यक्ति
का परिचय मैने रेदिया, ति भाप प्रामने है।
'दिम्दुस्थान', नई दिस्सी
-गोपालप्रसार व्यास
पूसरे सस्करण के सम्बन्ध में
सास पार जब इस संग्रह की रचनामों को मैंने फिर से पढ़ा हो
मुमे इसकी भापा घो-कहीं मोसी-टीसी मखरमाई । पारस्पों में
अनावश्यक शम्य मी रिसाई दिए । बीपी विधारों में भी सापट
को कमी मासूम हुई वटस्य सम्मावाडी र मोका निर्वाह करते
मैंने मापा पोर माय का यह परिमार्णत इस पार जहाँ-वहाँ कर
दिया है।
पकान भी पाया । चार मये पीर पोडे । माई रपीन्द्र ने
मेरा भी एक काम यना गमा। पं साइम संस्करण में मोड दिए।
इम सपा में 'स्वतन्य मम्मीपपार' नाम से पफ मया निपम्प और
मी जोकरे। या त सन् १ प्रथम भाम पुनामा समय मिला
गया था | इस प्रभर ५१ को मेर समी बिमोदपूर्ण निमग्प इस
संसद में भागर है।
११८.विस्सोमनालोनी
-~-गोपासप्रसाद व्यास
पानीपौर रिस्ती
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मम
२५
३१
विषय
१ मठपरावर उप मही
२. मेरी पत्नी मती तो है, लेकिन
३ 'उनके साबपाशार माना
४ मनन नही मित्रा
1. मेहमान से मगवान पाए
६ नौकर के मारे
. एक नया पम्मा
पसकी सवारी
८ वर की दुनिया
१० हिम्दो पालापको
२१ मुशामर मी एक कहा।
१२. मलेरिया महापन
१५ मुसीबत
१५ साहित्य प्राय
१५. पत्रपरी पापान
१६ स्वतन्त्र रम्मीदवार
८०
मूठ वरावर तप नहीं
'पास्मों में मिला है कि पर पान पाने का
बय न हो, तब तक भूठ माही बोलनी चाहिए । मगर
नई दुनिया का पास्त्र मुमें बनाने को कहा बाम तो
उसका पाहता याय यह हो- 'मतभी बोलना चाहिए,
बम कि पान बाती हो।"
भूठ बोने पौर पकरे यए तो शिकार है ऐसे
ति पिसमे पर ! झूठ बोमने का मजा तो यह है,
होशियारी तो इसमें है कि फूल योतो मपर भून
रिवाई।
पाप भूठ बोलिए पौर फिर बोमिए, लेकिन
माई मेरे, वनिक सारे साप ! इसीको दुनियारा
कहते इसी सफलता मिी है।
-
आपका पता नहीं, मैंने शो अपना यह सिदान्त बना रहा है - बराबर सप नहीं, सच बराबर पाप। पाने हिरवं भूर है, ताके हि पाप ।। पौर यकीम मानिए अपने इसी सुमहरे सिवान्त की बदोमत दिम पर दिन गोम हमा माता है और नगर म लग पाए किसीकी, बस, सब परह से पा चारह ही है। झूठ बोसने का मग महारम्य है । मगर माप मार के पैशानिक तरीके से झूठ बोसमा सीम मार्य तो विश्वास कीजिए कि फिर चिम्दगी में प्रापको कभी मायूस रहने की परत महीं पो। सतं नमाकर कह सकता है कि पन्द दिनों की ही कसरत के माद पापके पास ठाठदार बैंगसा, शानदार मोटर, महकता हुमा रेरियो मुमता हुमा पदली यदि खुद म पागाए, तो सम पापकी मैं भान से ही मूठ बोसमा योग सकता है। भूठ कौन नहीं बोमता ? हमारे पपिप धास्त्रों में मिला हुमा है कि यह सारा संसार ही मिप्या है । माता-पिता स्त्री, पुम-कला सब रिस्से मढ़े है। पग-म्पवहार सब मिथ्याचार है । दो-चार सन्त फकीर मोर गांधी-महारमानों को छोड़ दीलिए, दुनिया में इनका होमा-म-होना हम मठों के प्रपण बहुमत में कोई पर्व नहीं रमता । मेरा तो दावा है कि भूठ मार सब की विना पर प्रपर इस देश में चुनाव सर मिए पाएँ तो हिन्दुस्तान एक भी सीट पर पग्रेिसियों का अधिकार नहीं ए समता । हिन्दुस्तान क्या सारी दुनिया में हम मूों का हो सिका पसता है और वह दिन दूर नहीं पर भरठो के एप सोर से सेकर दूसरे तक हर जगह हमारी मगदूत मरकारें कायम हो पायंगी।
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पाम यानी मम मनमा पाम सम्परान ममापाय प्रसार मी भी मन माबोवा।" (पृष्ठ) | राशम ल परापर वप मही दर असम, दुनिया में पोर है भी क्या ? साने को टीम घटक गेहूँ पहनने को तीन सब कपड़ा पौरबोलने को पी-भर मठ पोर कण्ट्रोल के इस पिछले बमाने में अगर कहीं भूठ भी भोरवापार में पनी गई होती तो झूठ म मानिए, दुनिया से १६ प्रतिशत प्रावमी छठ गए होते। दुनिया का दस्तूर ही ऐसा है कि बिना झूठ के प्रापकी माली भागे बढ़ ही नहीं सकती। विस तरह पटनी के बिना भोजन में स्वाव नहीं पाता, स्प के विमा पौवन किरकिरा होता है, इरफ के बिना शायरी फीकी लगती है उसी तरह विना मूठ के भी जिन्दगी कोई जिन्दगी है ? मास्त्रों में मिला है कि पव तक बाम का खतरा न हो तब तक मूठ नहीं बोसनी चाहिए । मगर मई दुनिया का शास्त्र मुझे बनाने को कहा जाए तो उसका पहसा मामय यह हो-"सप सभी मोसना चाहिए, पर कि पान पासी हो।" मह विमकुप्त मूठ वास है कि पहले जमाने में मूठ बोमने वाझे मर पाया करते । कम-प में १५ साम का हो गया है तब से हगारों क्या, सार्यो पार मूठ मोलमे का सौमाम्म प्राप्त हमा होगा, पर मा मनाम, मरें तो मेरे दुश्मन, महाँ तो सर में दर्द तक नहीं हुमा ! सिफ मापसे कहता है कि बाहर की तो मया चसो, पर में, यामी 'उनसे, मतलम अपने लड़के की बम्मदातू से तो शायद भूम कर भी कभी सब महीं बोमता, लेकिन इस पर भी दावा मह है कि माम तक किसीने मुझे सरेपाम भूठा बताने का हाँसना नहीं किया। भूठ बोते मोर पको गए दो पिकार है ऐसे पात पिसने पर। भूठ बोलने का मजा तो यह है, होशियारी तो इसमें है कि मुठ बोनो, ममर छ् न दिसनाई दे। भाप मुठ मोमिए मौर फिर मोमिए, लेकिन माई मेरे, तनिक सफाई के साम । इसीको पुमियावारी कहते हैं इसीमें सफलता छिपी है।
मुह मोसना भी एक कसा है-एक महान पार्ट ! इसकी महा मता के पागे चित्रकारी के रग फीके हैं, संगीत का स्वर बेसुरा है पौर कविता के पद निरर्पक है। मोग कहते है कि जिसने सस्प को पा मिया उसने परमेश्वर को पा लिया । एकदम गम्मत । बात सही यह है कि निसने झूठ को पा लिया उसे कुछ पोर पाना सेष ही नहीं रहा ! मूठ परम तत्व है । यह पमरामर है। सनातन है। निर्विकम्प है । सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त है । यपि यह भेदाभेद से परे है फिर मी पम्पास या साधना के लिए मैंने इसके कुछ भेद किये हैं जैसे- (१) शुब मूळ (२) भगुर भूळ (३) सफेद झूठ (४) बे-सिर-पैर की, (३) मनमदस्त () गप्प मौर (७) पारसीबीसी । देशकाम अगस्पा और एमय-संयोग के अनुसार इनके फिर सैकड़ों प्रकार होते है। स्पान-सकोच से उनका पणन यहाँ नही किया जा सकता। फिर इस विषय पर हिन्दुस्तान के ३३ रोग देवी-देवता घर-घर में नित्य मये पनुसंधाम कर रहे हैं, इसलिए प्रमी से इस शास्त्र को सिपि पद करना ठीक नहीं। ऐसा करना इसकी बढ़ती को रोक देना है। मेरा मत है कि मायकल विना भूठ के मह शरीर रूपी गाड़ी पीवन स्पो सदम को पार नहीं पर सकती । उदाहरण पाहिए ? ता मान मीगिए कि पाप किसी दफ्तर में वादू है । माडू भी ऐसे कि नेकनीयती में सत्त में फाइसों पर झुकते-सुनते भापकी गर्दन सम का गई है। मेकिन पापको चाहिए चार दिन की छुट्टी । निहा मत पसरी काम मा पा है। काम भी ऐसा मही कि रिसे टाप्ता पा सके। पापकी पत्नी के भाई के मड़के को पकाम हुमा है । वह बचारा हरदम छीपता रहता है । प्रापकी उनके माई-मावर सर परेशान हैं। उनके मैके से माने वाले सप्त प्रसर छींकों से भरे रहते हैं । पत्नी का कहना है कि इस हालत में प्रगर 'हम' बच्चे को देखने नहीं गए तो रिश्तेदारी में नाक कट जाएगी। पावमी को मपनी नाम का खयाम नहीं तो पह प्रा-मी महीं !
गफ्टर मूळ परावर उप मही सेमिन प्रायमियत के इस सच्चे मसले को प्राप प्रपनो मर्मी में मिस फर परे वायू को भवता देसिए ? मत्य बोलने का मान म माघार हो सकता है मगर पर्षी इस जन्म में तो क्या अगले सात जन्मों में भी मन्धर होकर प्रागाए। एसी जगह पर पापको पुन खेमना ही पड़गा । बसा कि मासर में मौर मेरे साथी वायू किया करते है पड़ौमी शक्टर की मेर में दो स्पए का एक विना दस्तसती नोट चुपके से गलत हुए कहा जाए-'रियर गस्टर, एक सार्टीफिकेट तो बना दो। मी इस फम में कम होशियार न निकलेगा। वह लिनेगा ऐसा मासूम होता है कि वान् को जोर से सर्वी का अटेक' हुमा है । दोनों फेफड़े मरे हैं। पहेस इलाज पर एक सप्ताह के भाराम की सस्त जरूरत है। सीमिए पापने मैदान मार लिया। दुपन्नी किसी लरके को देकर मी को दफ्तर रवाना कोविए और भाप ससुरास पा टिकट कटाइए । प्रगर ससुराण का पानी मग पाय पोर स्वसुर-गृह निवास स्वर्ग-तुल्प नुणामाम् चक्ति सही सावित हो सो दो रुपए गस्टर के नाम और सही। फिर ममाइए एक और सप्ताह का गोता। कोई पनाम्मी भी भापको महीं बोच सक्ती पौर कोई प्रम का कना पानी सपा इस महान् सच को भूठ नहीं सिम कर सकया । मेरे अपने साप घटी एक घटना सोचिए । पिछले पून के महीने में पर में बच्चों के साथ घर से वापस दिल्ली मौट रहा पा तो मुझमे भा प्यादा किसी होशियार मे मेरी बेब से मनौवेग साफ कर दिया । टिकट स्सए सब-कुछ उसी पे । मई दिल्ली स्टेशन पर उतरा तो होग फास्ता ! कुमी सामान सकर गेट की पोर पस हा पा बीवी-बच्चे दिल्ली मौट प्राने से सुप पे पर मेरी पेंगुमियाँ गों को कुरेद रही पी पौर चेहरे पर हवाइयां उग रही पी कि हाय राम प्रव क्या होमा ? दो-तीन मिनट इसी सम में डूबा रहा कि टिकट का मार्ग तो.
४ भूठ बोसना भी एक कसा है-एक महाम मार्ट ! इसकी महा नवा के भागे चित्रकारी के रंग फीके है, संगीत का स्वर येसुरा है पौर पिता के पद निरर्पक है। मोग कहते है कि निसने सत्य को पा लिया उसने परमेश्वर को पा सिया । एकदम गमत । बात सही यह है कि जिसमे मूळ को पा लिया उसे कुष पार पाना शेप ही नहीं रहा ! मूठ परम तत्व है। यह प्रयरामर है। सनातन है। निफिस्प है । सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त है । यद्यपि यह मेदामेव से परे है फिर भी पम्पास या साधना के लिए मैंने इसके कुछ भेव किये हैं, पैसे- (१) गुरु मूळ (२) प्रमुख मूळ (३) सफेद मूठ, (४) ने-सिर-पैर की, (२) मनगदम्त, (९) गप्प पोर (७) पारसौरीसी । देशकात अवस्था पौर समय-संयोग के अनुसार इनके फिर सैकड़ों प्रकार होते है। स्पान-सकोष से सनका वर्णन यहाँ नहीं किया पा सकता । फिर इस विषय पर हिन्दुस्तान के ३३ कर देवी-देवता पर-पर में मित्य नये मनुसंधाम कर रहे हैं, इसलिए प्रभी से इस शास्त्र को लिपि गय करना ठीक नहीं। ऐसा करना इसकी बदती को रोक देना है। मेरा मत है कि प्रारम्स बिना भूल रे यह शरीर म्पी गाड़ी जीवन रूपो दमदम को पार नहीं कर सकती । उदाहरण पाहिए ? तो माम लीभिए नि प्राप किसी दफ्तर में गाई । बाबू भी ऐसे कि मेकनीयती क सबूस में फाइला पर मुफ्ते मुफ्ते भापती पर्पन सम सा गई है। लेश्मि भापको पाहिए पार दिन की छुट्टी । निहा पर पहरी काम पा पा है । पाम भी ऐसा नहीं कि पिस टामा पा सके। प्रापकी पत्नी के भाई के साके को पुकाम हुमा है। यह पाय हरदम छींकता रहता है । प्रापकी 'उनके भाई मावण सब परेशान है। उनके मैके से प्राने पासे खत प्रक्सर पीकों से भरे रहते हैं । परली का कहना है कि इस हालत में प्रगर 'हम' पये को देखने नहीं गए तो रिफ्तेदारी में माफकट गाएगी। मादमी को अपनी नापा सपास नहीं दो बह पादमी नहीं !
कच्चा यामी सम्मा इस महाम सबकोनी सिव कर सकता। ५ कोई पनामी भी प्रापको नहीं सोच सकती पर कोई प्रासपा में पर मैं बों के साम पर से वापस दिस्मी मौट रहा था तो मुझसे भी ज्यादा किसी होशियार मै मेरोबसे ममीवेम साफ कर दिया। टिकट रूपए सब-पुष उसी में ये । नास्सिी स्टेशन पर उतरा तो होश फास्ता 1 पुमी सामान मारमेरपोर बस हा मा बीपीचन्ने विस्मी मौट पाने में तुम पर मेरी अंगुमियाँ बैबों को कुरेद रही पी और पेहरे पर खासा राहीदी कि मूठ बराबर सप नहीं मेकिन पादमियत के इस सच्चे मसले को प्राप अपनी प्री में मिल कर वो बाबू को मज ता देखिए ? सस्य मोमने को पापग्म लाचार हो सकता है अगर पर्षी इस गम में तो क्या मगमे सात पमों में भी मन्सूर होकर पानाए। एसी जगह पर पापको न खेसना ही पड़गा । जसा कि पासर में भोर मेरे साथी वायू किया करते हैं पड़ौसी शक्टर की मेर में दो रुपए का एक विना वस्तसतो नाट चुपके से समते हुए कहा पाए- टियर गम्टर, एक सार्टीफिकेट तो बना दो। डाक्टर भी इस फन में कम होसियार न निकलेगा। वह सिधेगा एसा मामूम होता है कि मावू मो योर से सर्दी का प्रटर' हमा है। दोनों फेफो भरे हैं । परहेम इसान पोर एक सप्ताह के प्राराम की सस्त पसरत है। मीलिए मापने मैदान मार मिया । दुअन्नी किसी लाके को देकर प्रर्स को दफ्तर रवाना फीलिए पोर पाप ससुरास मा टिकट स्टाइए । भगर ससुराम का पानी मम पाप और 'एवसुर-गृह निवास स्वर्ग-तुल्य मृणानाम् उक्ति सही पारित हो ता दा रुपए गफ्टर के नाम और सही। फिर मगाइए एक और सप्ताह का गोता । मेरे अपने साथ घटी एक घटना सीलिए । पिछा पून के महीने हाय राम प्रब क्या होगा? दो-तीन मिनट इसी सम में का पानी ४ भूठ बोलमा भी एक कला है-एक महान भार्ट | इसकी महा नता के पागे चित्रकारी के रंग फीके है, संगीत का सर मेसुरा है पौर पमिता के छन्द निरर्थक है। लोग कहते है कि निसने सत्य को पा लिया उसने परमेश्वर को पा मिया । एकदम ममप्त । बात सही यह है कि जिसने झूठ को पा मिया उसे कुछ पार पामा क्षेष ही नहीं रहा ! मूठ परम सत्य है । यह अजरामर है। समावन है। निर्विकल्प है । सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त है । यद्यपि यह भेदाभेव से परे है, फिर मी पम्यास या साधना के लिए मैने इसके कुछ भेद किये है मैसे- (१) भुब भूल, (२) प्रमुख भूठ, (३) सफेद झूठ (४) बे-सिर-पैर की, (५) मनगढन्त, (६) गप्प पोर (७) पारसीवीसी । देशकाम प्रबस्पा और समय-सयोग के अनुसार इनके फिर सेकों प्रकार होते है। स्पाम-सकोप से उनका पनि यही नहीं किया जा सकता। फिर इस विषय पर हिन्दुस्तान के ३३ करोड़ देवी-देवता पर-भर में निस्य नये अनुसपाम कर रहे हैं, इसलिए अभी से इस शास्त्र को मिपि मद करना ठीक नहीं । ऐसा करना इसकी पड़ती को रोक देना है। मेरा मत है कि मानस बिना झूठ के यह शरीर रूपी गाड़ी जीवन रूपी दसवम को पार नहीं कर सकती। जवाहरण पाहिए ? वो मान मीजिए कि पाप किसी दफ्तर में बार है । पार भी ऐसे कि मेकनीयवीर सबूत में फाइमों पर मुझसे-मुकते मापकी गर्दन एम सा गई है। लेकिन भापको चाहिए चार दिन की छुट्टी । निहा- पत पररी काम मा पग है । काम भी ऐसा नहीं कि गिसे टामा पा सके। पापकी पत्नी के भाई के लाके को अकाम हुमा है। वह देवारा हरदम छींकता रहता है। प्रापकी 'ठमके भाई-भावज सप परेशान है। उनके मैके स पाने वाले खत पासर धीरों से भरे रहते हैं । परली का कहना है कि इस हामत में प्रगर 'हम' यम्मे को देसने नहीं गए तो रिश्तेदारी में माफ कट गाएगी। प्रादमी को अपनी नाम का पपास महीं वो बह मामी नहीं ! ।
५ मूह परापर सप नहीं मेकिन मादमियत के इस मुमसमे को पाप प्रपनो मनी में मिल कर बरे नापू को भर सो थिए ? मरय घोपने का माज म लाचार हो सकता हूँ अगर पी इस सम्म में तो क्या प्रगल साव जगमों में भी मन्यूर होकर पानाए । ऐसी जगह पर पापको फन खेतना हो पडेगा । जसा कि मासर में पौर मेरे साथी बार किया करते हैं पड़ोसी डाक्टर की मेव में दो पए का एक चिना दम्पसतो मोट चुपके से रासत हुए कहा बाए- 'स्मिर गफ्टर, एक सार्टीफिकेट तो बना दो। गफ्टर भी इस फन में कम होसियार न निकरेगा। वह सिस्नेगा 'ऐमा मामूम होता है कि वायु को जोर से सर्दी का मटेक' हुमा है। दोनों फमरे मरे हैं। परहेस, इलाज और एक सप्ताह के भाराम की सस्त बरूरत है। मीलिए मापने मैदान मार लिया। दुमन्नो किसी समे को रेकर भी का दफ्तर रवाना कीजिए और पाप ससुराल का टिकट कटाए । प्रमर ससुराम का पानी मग पाय और समुर-गह निवास स्वर्ग-तुस्य नृणानाम् रक्ति सही सावित हो तो दो रुपए गाटर के नाम और सही 1 फिर मगाइए एक और सप्ताह का गोता। कोई पमापी भी मापको नहीं हो सकती पर कोई प्रम का फमा यानी सजा इस महान् सब को भूल नहीं सिद्ध कर सकता । मेरे अपने साप घटी एक मटमा मीगिए। पिछले धन के महीने में पर मैं बों के साप पर से वापस दिल्ली सौट रहा पा तो मुझमे भी ज्यादा किसी होपियार मे मेरी पेज से मनीवेग साफ कर दिया। टिकट सए सर-पुष उसीमें थे । नई दिल्मी स्टपन पर तय तो होप फ्रास्ता ! कुमी सामान सेफर गेट की पोर पम रहा या मोवा-याने दिस्सी मौट पाने मे धुम पे पर मेरी अंगुलियां बेयों को कुरेख रही थी और बेहरे पर हवाइयां चा रही थी कि हाय राम पव क्या होगा ? दो-तीन मिनट इसी गम में दुबा हा कि टिकट का पार्म तो
६
।
दूर इम कुमी को भी पाखिर क्या दिया गापगा ? लेकिन जिन्दगा
भर मिस मू को गमे सगामा पा पासिर उसने उदार ही तो
सिया। मैं मागे-मागे हो मिया। गेट पर पाकर टिफट क्सक्टर
को सुनाते हुए धीमठीत्री से या अवम कहा 'भाइए, इमर से माइए।
क्यों माईसाहब साप में नहीं पाए ? मुझे तार तो तुम्हारा मिल
गया पा, रास्ते में कोई तकलीफ ग नही हुई।
भीमसीगी यह रग-रंग देसकर पहसे मगधरमचाई तो ऐकिम
मासिरकार मुझ प्रमाणित प्रसत्य मापी की धर्मपत्नी थी! फौरन
सेमलकर मुझसे भी सपाई होकर बामी 'उनके कोर्ट में पसरी
मुफ्यमा पापहने सगे--तार तो दे दिया है। स्टेशन पर पीनागी
पाही भाएंगे, पनी पाम्रो । पर गाड़ो में भामकान वही मीर
रहती है। मैकिण सास में भी पादमी का मुरसा बन पाता है।
टिफिट कमक्टर पारा रोब में पागया । उसमे समझा किसी
पण की पहन है और मुम काप्रसी एम० पी० को म्याही है। टिकट
मांगना तो दूर, बह पदय से एक तरफ बरा हो गया बाम यपी
और सालों पाए।
मेरा सयाम है कि पगर में सपाई से काम मेवा तो कहीं का
म रसा। यह मह वोममे का ही प्रताप पा कि धान वष गई।
इसीलिए तो पाहता फिमा वरावर तप नहीं।
।
२
मेरी पत्नी मली तो हैं, लेकिन
-
२ माखों ममी है मेक है पुरिन ह
पौर उरार पायत बासी भी है,मेकिन तमी तक जब
घक कि उनकी समझवापरे के मनर पिनाकान
पुंछ हिलाए बमना बाया है। अगर कही रनरी बीबी
मम्मण-रेखा (नहीं-नही पत्नी-रेपा) का प्रति
क्रमण करके में अपने पत्नीवठ धर्म से परा भी गिने
मयता है तो समझ नोरिए कि मेरी मी पुस्तंनी रिपासत
पर सरपार पटत की मार पड़ो। मम पी!!"
किसी और की बात मैं नहीं जानता लेकिन मैं तो सचमुच अपनी परती का प्रत्यम्त कृतज्ञ हूँ। यों बम मुझे अपनी मा से मिमा, पालन-पोपण पोर सम्कार भी शायद उन्होंसे प्राप्त हए होंगे पर इस पात को मार सबके सामने स्वीकार करने में मुझे परा मी हिपक नहीं होती कि जहाँ तक मेरे पापभी बनने का प्रश्न है, वह मुझे मेरी 'बहूमाता' ने ही बनाया है । मैं उन्हीं का (बनाया) 'भावमी है। 'व' म होती तो मैं पार कहीं का होता ? भाव उम्हींकी कृपा से मैं एक मम्ये चौरे कुटुम्ब का बीमा और फैस-पूरे पने-वसे हुए एक मुहल्ले भर को सासा नमाने योग्य हुमा है। इसमें तनिक भी सन्देह महीं कि अगर मेरे पूम्य पिताजी ने मेरी शादी न करने का फैसला विना मुझसे पूये ही कर लिया होता तो कमि मेखक पौर पत्रकार बनना तो दूर, में तो स्वयं अपने बच्चों का पिता भी बममे से रह जाता ! यह सब-कुछ उन्हींका प्रसाद है कि समाज में प्रार मेरे लिए भी पैर रखने को बमह है सोसाइटी में कमी-कभी मुझे भी सम्प समझ मिया पाता है और सबसे बड़ी बात यह कि दिल्ली में रहने को एक टीन भी मिसी कपर किराए पर मिमी हुई है। पमा बात कह में उनकी ? भगवान हमारी उम्र करे, मत्रमुच इतनी मनी है कि सबसे हर ने हमारे पर को रोमक- मफरोज फरमाया है, हमें तो सिर्फ प्राराम के करने को कुध काम ही महीं रह गया । मा-बुहारा पर, पुसे-पुप्साए कपड़े, पका-पकाया खाना पिधीविधाई पाट और बिना मांगे पानी-मा मादमी को मनापास ही मिसमे सगे तो उसे महामवि पान के परामों में "उहाँ पारि ईहिब मुष्ठा' नबर प्राने सगता है। हमारी सीम-वेग सूख सगी-मारी देह और एमी के पपड़ों को दवार मित्र मोग हैरान 7 मेरी पत्नी मही तो है, लेकिन होते हैं कि इस विक्ष्यिा के वार्ड में इतनी मक्स कहां से प्रागई मगर उन्हें यह नहीं मालूम कि यह तो पिसी पोर का ही परद इस्त है जिसने हमारे उपर गिरमे वाले गिरि गोबदन को पपर ही में पाम रखा है। उनके धी-परणों का सुम्पर्प पाकर, सब गई इस घर को दुनिया ही पदम गई है। पर के पत्तम, कपड़े, फर्नीचर षि, फिवा-यह समझिए कि पूरे-से मगने वासे इस घर का सारे-का- सारा वातावरण ऐसे दमक उठा है, मानो मुह से बात करने लगा हो । पब हमें म तो स्मास की सातिर सारी मलमारी उसट देनी परती है पोर म कविता के कागजों की तलाश में ताक से लेकर करे के कनस्तर तक की दौड़ ही मगानी होती है। हर एक भोग कायदे से, अपने समय पर, इस सफाई और सुन्दरता के साप स्वय होती चलती है कि हम तो अपनी होम गवनमेंट' की इस शासन कुधमता पर दग र पाते हैं। शादी से पहले जब हम इन्हें पसन्द करने मये पे (हामारि यह हमारी हद दर्दे की बेवकूफो पी) वय सपने में भी यह सयान नहीं पाया पा कि इस सीधी-सावा दुनसी घरहरी गऊ-सी सड़की में इसनी 'एमिनिस्ट्रेटिव पावर' मौर ये गुन मरे होंगे! परन्तु, पाप पानत है कि प्रादमी प्रपनी प्राति से बैस भौर माकार नाम का प्रारणी वास्तव में विसकुम पहले के समान होता है । दुर्भाग्य से यह कहीं हिन्दी का कवि भी हो तो बस, खैर नहीं । समझो फि करेसा है और नोम बड़ा इस बिना सींग के पशु को, यह समझिए, वपन बरा भी नहीं सुहाते । उसे घेर-बेरफर दूरी की पोर माइए, यह उपम-उपसकर उससे बसे ही दूर भागता है पैसे 'महावीर विक्रम पररंगी का नाम सुनते ही सूत्र भाग उठते हैं। यही हाल कुछ मेरा भी समझ सीगिए । यह पेर-फेर कर माती है पौर में विदक-विदककर भाग सड़ा होता है। उन्होंने मेरे माठ पहर पौसठ पड़ी का एक निश्चित 'टाम मैने कहा १० । टेवुम' बना घोड़ा है कि ६ मवे उठो । और यह भी कोई बात है कि रोज नहामो इस बक मलबार पढ़ो और इस वक पाय पियो। साना ठीक साढ़े नौ बजे, फिर १५ मिनट का 'रैस्ट' और फिर सीधे बनो अपने काम पर ! और देखो दफ्तर से ठीक शाबजे म मोटे तो खैर नहीं। भूस हो या न हो पाते ही नाश्ता, फिर गपशप, रेडियो पौर म्याम् । ववरदार भो रात को १ बजे बाद पर से वाहर पैर भी रखा सो ! नींद पाए न पाए, घड़ी पर १० गिरी का ऐगिम बनते ही मार्स वन्द कर मेनी पड़ती है। पाप ही यताइए कि विपवत रेखा की पूंछ से वषे इस पर्म देश में क्या कहीं रात को अस्वी सोया जा सकता है? या अब सुबह ताके भीनी-भीनी ठरी बयार बह रही हो तो कहीं उठने को दिम करता है? अपनी पात तो मैं कहूँ कि सुबह-सबेरे गय में तीन तीन तकियों को पाप, पगस भौर सिर के नीचे दवाए सोता हमा बागवा, या जागता हुमा सोता हूँ सब मेरे पास प्रोर की तोचमी क्या, स्वय नेहमी भी मायें पौर सुद भपने हार्यों से मुझे उत्तर प्रदेश का गवर्नर बनने का निमन्त्रण मेंट करमे ममें तो यकीन मानिए उस समय घटिया छोड़ने पर मैं किसी भी तरह रागी महीं हो सकता। उस वक या दो में बवाब देना ही पसन्द नहीं करमा, मगर लाचारी से कुछ कहना ही पड़ा तो पिना मा पोसे, यही कहूँगा-याइए, पाइए महाशय, पापी उम्र पेस में गुजारने बामे तुम इस सैया-सुन को क्या पहमानो? परे 'सो मुन राम में म पार में जो सुन पाए चाट में ! लेकिन माप जानते हैं कि नेहमी को माराम करना प्रारकस पासाम है, पर अपनी सरकी के भावी सरके पी, होने बाप्ती नानी को नाराज करना हेसी-सेम नहीं। क्योंकि एक तो मेहस्पी भासानी से म्हने वाले महीं पौर स्टे भी तो अधिक से अधिक एक अन्तर्राष्टीय (इन्टरमेशनम) स्पीच दे देगे। मगर ये जो हमारी दिन में १६ बार मैहर की तुम पमान बासी नदेसी है, यदि कहीं सबेरे-सवेरेस्ठ गई, वो समझ मीमिए, दिन । मेरी पत्नी मढी तो है। लेकिन ११ भर की खैर नहीं। भगवान् मूठ न बोलवाए, पहले हम बहुत सन पौर नेक पावमी थे। सेफिन प्रय उनकी रोज-राज की सम्बी और समय की पारन्दी ने नाहक हमें गुनाह करना और मूळ वोमना सिक्षा दिया है। पाप ही पाहिए कि वफ्तर से रोज-रोज कहीं सीधे घर पाया बाता है? कभी नहीं गाने को मन करता है कमी कहीं। कभी रास्ते में यह मिस जाते हैं, कभी वह । सव गोष्ठी समाज और रेस्ट्री की तो बात ही घोड़िए। कभी-कमी तो सोधे पर जाने के बगाय कवी या गिल्सीपालने को ही मन कर पाता है। हेकिन एक हमारी 'ये है कि हमें महीने में दो-पार दिन भी ऐसी एट देने को तैयार नहीं । परिणाम यह है कि हमें मामिर अपनी सदा सहायक मूठ का ही सहारा लेना पड़ता है। कमो रहते है कि दफ्तर में काम प्रषिक था, कभी कहते हैं कि रास्ते में साइकिल पपर हो गई और कभी कहना पड़ता है कि हे मम्मो की पीजी पार तो मस तुम्हारे ही पुण्य प्रताप से मीसा बपाबरना वह 'एक्सीडेंट' हुपा होता कि इस वछ तो हमारे कारनामे पर्मराज की प्रदासत में तुम रहे होते । ऐसी बात नहीं कि स्वय उनमें इन बातों को सोरमे-समझने की पक्त न हो । पर-पाहर पास-पगैस का बो भी उनसे मिसता है, म्नकी सूक्ष्म सुदि की तारीफ करता नहीं प्रभावा । हमें भी उनके पीठ पीधे यह मान लेने में कोई एतराज महीं कि यहाँ सक तुमना का प्रश्न है, यह मो बुदि नाम की वस्तु है दरअसम, उनके हिस्से में स्विर के पक्षपात से, हमसे पपिक ही माई है। लेकिन, इसका मवसर यह तो नहीं कि हम निरे गुर ही है। पर क्या कहें, '' मेह से वो कभी इस मनाइस सम्म का प्रयोग नहीं करती, मेकिन अपने पाचरण और इशारों से मुझे इस बात का मामास करावी ही रहती हैं कि मैं इससे कुछ अधिक या पृपक भी नहीं है। पाप ही सोधिए, में पका-सिसा, पदा-सासा सम्पा-सन्दुरुस्त मैने का ? , पादमी, कहीं वकूफ हो सकता है? मेक्नि उनसे कोई इस बात को कह तो देते ? ने मुझे पक्ममन्द मानने को तः वैयार नहीं। उनका पक्का विचार है कि मैं सचमुच ऐसा भौमि मासिर्ने मौर कुमरिन मुझे प्रासानी से ठग सकती है वर्मी मेरा कपम मये में ला सकता है हर दुकानदार मुझे पायम से सूट सकता है सफ़र में मेरी मेव काटी जा सकती है और मेरा जामे क्या-क्या नहीं हो सकता है उनके विचार से, घर से बाहर मकेसे में कहीं मो निरापद नहीं है । न माने कब मुझे, और कुछ नहीं किसी पी नगर ही सग गाय ? न माने कर मुझे कहीं कोई पहमा ही से ? पता नहीं कर मुझे बुखार ही हो पाय दो और जी भागास मिसी का कोई ठिकाना है-कोई कहीं मुझ पर पावू-टोना कर मैठे तो में वस बठी ही रह जायेगी कि नहीं ? इसमिए वह सपा घाया को सरह मेरे साप मपी रहती है। मैं गृहस्थी की गाड़ी का गईबर भने ही हाऊ, मगर यह गाड़ी बिना नमकी बिसिस के हरगिम नहीं रेंग सकती। खुद मैं अपने पापको कोई कम होशियार पार किसी से कम फितना नहीं समझता, सकिन 'ब' मुझे सिर्फ मोमा मोर मुलका ही पह कर स्वाप करती है। कभी-कभी तो मैं उनसे मजाक में कह भी देता है-सुमो, तुम तो नाहक ही मुझसे शादी करके पछवाई। इस पर पर 'वे' मा परेरने मगती है वो उनसे पूछा !-पन्या बदामो मुझमें और तुम्हारे यो माके में तुम्हारी समझ से क्या मासिक प्रस्तर है ? सकिन मुस्किल यह है कि इन बुद्धिमानी के प्रस्नों से मेरी प्रक्समम्दी उनको निमाह में कभी भी सही मही उतरती। कमी-कमी पब कुछ सिरफिर प्रसबारा में नारियो की मागावी के प्रान्दोमन का समर्थन देसता है मुझे या साम होता है। इन मस्म के मारे सम्पादकों पत्रकारों पर मेक्षकों से पोई पूणे कि मार नारी परात्र है या मर? कौन कहता है कि मारी पात्र 7 मेरी पस्नी मनी तो है, लेकिन १३ है ? परतन्त्र दो बेचारा प्रादमी है । दूर क्यों पाते हैं, सुव मुझे ही देखिए न? मुझसी सशिक्षित, समझदार, भसे पर की सबका मान-सम्मान करने वासी, सद्गृहस्थ परली हर एक को मुश्किल से ही मसीर होगी । लेकिन मैं ही मानता है कि अपने घर में अपनी सहेलियों का सत्कार करने में वे कितनी स्वतन्त्र है और अपने ही पर में अपने मित्रों की भावमगत करने में में कितना परतन्त्र है कहने का मतलब यह कि 'वे' लासों से भसी हैं, नेम है, सुदिल है पौर उदार प्रकृति की भी हैं लेकिन मी तम, जब तक कि में उनकी समझ के दायरे के मम्दर विना कान-मूंछ हिसाए पमा पाता हूँ । मगर कहीं उनकी सीधी हुई मक्ष्मण रेखा (मही-नहीं पत्नी-रेसा) का प्रतिक्रमण करके अपने पत्नीव्रत धर्म से मैं रा भी हिगने सगसा हूँ तो समझ लीजिए कि मेरी भी पुरतनी रियासत पर सरदार पटेम की नगर पड़ी ! प्रव पठी !! मैं शौक से बाबार गाउँ, ठाठ से सिनेमा देसू मजे से सैर करता रहूं लेकिन मेरा पप तभी तक सुरक्षित समझिए कि बव तक या तो वे सुद साप हों या उनकी माता की लासटेन मेरी राह के अपकार को दूर कर रही हो ! क्योंकि विना माझा के मासार माना-पावारागर्दी सिनेमा देखना--पाप, पोर सैर करना- महान् मूखता है ! इन अपरामों का रंट भी कोई साधारण महीं मिलसा । मासुमो के महासागर में गरियो सगाने से मेकर तमहाई तक की प्रशा उमके पीनम कोर में दर्द है। इतना ही नहीं जुर्म समीन होने पर कभी-कभी तो तनहाई के साथ-साप राशन-पानी भो बम्द कर दिया जाता है। ममी-अभी एक पौर एटम बम होग निकासा गया है। अब तो मारार-सिनेमा की पोर रस करते ही हमारी पाकेट मार मी जाती है और यह धरणार्थी बनाकर छोड़ा माता है कि हमारी वेब में ट्राम तक को पैसे नहीं होते। उनकी मसार्यो मीर उनके पाप सगे हुए इस मेकिन के किस्से का कहाँ तक बयान कई ? हाम यह है कि पर में भोजन मधे से १४ मन्या बनता है, मगर वह होता है सब-कुछ उनकी रुपि का। कपड़े मुझे मच्छे से अच्छे पहनने को मिलते है मेकिन मेरी पसन्द के बारे में मुझसे कभी एक शब्द भी नहीं पूधा पाता । मेरे घर में पहिया-से-वड़िया करी है एक-से-एक प्रामा पिम है, भगवान की कृपा से सब-कुछ है, लेकिन कसम मे मीजिए कि रेरियो से मेकर मामू धीमने की मशीन तक में मेरी समाह पोर समझदारी का रत्ती भर भी सामा नहीं। सही बात तो यह है कि कभी विवाह के समय पर हम दोनों ने सप्तपदी के फेरे मयाए थे, उनमें मैं भले ही पोड़ी देर को भागे रहा हो, मान तो मुझे पागे निकमने ही नहीं देतीं। अब तो खरीदे हुए घोड़े की तरह बिना कान-पूछ हिसाए मुझे उनके पीछे-पीये ही चलना है। रामी से पर्चे या नाराजी से पसना मुमे उनके पीछे ही है क्योंकि मेरी मेरी उनके ही हाप में है।
पब मरीर दए पाहे ही तय रिना फान-यूछ हिसाए मुझे उनके
पीए ही परमा है
पाकिसरी मेरी उनके ही हाथ में है !"
(पृष्ठ१४)
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'उनके साथ बाजार जाना
'एक दिन कामको भोजन न मिले- साया
हूँ रात को पर्वम पर विस्तर महो-कोई बात नही
परपीमतीबी के पाप याबारबामा नाबमा ।
महतो पर पाई मुसीबत मोनना है"
१८ मैनि का सरम होने की सूचना देणाया करता है । अब प्रगर पापको पनि पार की शाम पोर रविवार के पूरे दिन की खैर मनानी है तो पहले पुपचाप विना कान-मूंछ हिमाए इन प्रमानों की पूर्ति करनी होगी पौर फिर यह मनाना होगा कि हे भगवान इन्हें मम-से-कम इतनी सुबुद्धि तो दो कि पर बसवे-बलते किसी प्रपनी सहेली के यहाँ वो मेरा पार्सम मकरदें कि "परा पामा भी मैंने धीमा से भी गाजार साप बमने को कह रहा है।' हो, पगर प्रापके ज्यादा पान-गन्धे महीं है और मेरी तरह मापके भी एक मुम्ना मौर एक ही मुन्नी है तो कोई बात नहीं । पैसा अक्सर में करता है वैसा ही पाप करें कि उन्हें मकेसे पर घोड़ें । एक को कम्पे से ममाम पौर दूसरे को मयुमी पकड़ा। मेपिम भगवान की पा और पूर्वजों के पुण्य प्रताप से प्रापकी फुमवारी फूमी हुई है और मापकी पासपर सेना में हमारे पगैसी की तरह पूरी 'इमगिन' में मदि केवम पार की ही कमी रह गई है वो सप मामिए, मैं पापको कोई समाह देने के माया नहीं है ! सब तो भगवान हो पापका मालिक है | बस यह समझ मीजिए कि पाप किसी कस्से पी भरी सरक में टहलते हुए एक मुगियों के काफिले के समान है ! सड़क पर चलते हुए इसके से, पांगे से, गमगाड़ी से, मोटर से--पिन्स-किसका क्या हाल होना है यह कोई ज्योतिषी भी नहीं बता सकता ! मुसीयट एक हो तो यही पाप पोर उसका इमान भी किया पाय 1 ये थोमतीगी, जिनसे घर में यह कहा जाय कि सरा उठकर पानी ही पिसापो, तो नौकर को पावा देने मगती है, या उसके भमाप में एसे उठती है कि न जाने दिन भर इन्हें मिस पाकी में मुठना पड़ा है ! वही बाजार में पहेपठे ही इतनी पुस्त मौर चम होजाती है कि मौसत हिन्दुस्तानी पति उस वक्त उनका मुपायता महीं पर सकता ! एक दुकान से दूसरी पर इस भपाटे से पहुँपती है कि पापको इसका पर तक कि वह वहाँ से मुद भापार म , पता ' निसार बावार जाना १४ महीं पस सकता । और, यह सो दुकानों की बात है कि भीड़ भाड़ में पता नहीं पता कि कहाँ गह मोर क्या हुपा ? मेकिन मेरा तो मनुमय यह है कि सरे वासार मौर मुमी सरफ पर भी भाप चमने में उमका साप नहीं दे सकते । मार के रिमेकी तरह पापका स्थान पीछे ही सुरक्षित है। पनिक प्राप उस दणको कल्पना कीमिए कि पय भाप मुन्ने को कन्धे से सगाए, मुन्नी का हाप पाम अपनी वगम में पीनों का पुमदा निये, भीमतीगी के पीछे-पीछे भिसट रहे है पोर पापके मिसमे वाले है कि प्रापसे नमस्ते का फर्ज मिर्फ उसी समय पया करना चाहते हैं ! नमस्ते करके ही वे टस पाएँ पो भी ग्रमीमत समझिए । मेकिन क्या बताएँ, उनमें से कुछ महापय मो इस कदर हमदर्द होते हैं कि उनकी ममममसाहत पा सुले धम्दों में बयान नहीं किया था सकता । के कुछ देर ठहर-हरा कर हमारी हामत पर सरस साना चाहते है मौर माचारी यह है कि पत्नी के साममे भसभ्य व्यवहार के दोषी म मम पाने के कारण समझिए या अपनी ममममसाहस पौर स्पिप्ति के सकाये से निवा हमें कुपित होने के पनाय ग्न पूर्वो से मुस्कराकर ही बातें करनी पड़ती है। तस्वीर का एक पौर मी पहसू है । हम बरे भादर्शवादी है, पहले के समान सुधारक, स्वदेशी का व्रत भरी समा में मे पुके हैं लेकिन एक हमारी में है कि इन सब पीरों को वाहियात पौर मेरी समझती है । हम समझते हैं कि भारतीम मौरतों की सारी परा मोटी पौर हापकते सूप्त की होनी चाहिए, मैफिन उनको ठेठ रिमापत की पारी वापस पसन्द है । हम सौन्दर्य और गगार के लिए पाउसर, कीम और सिपिस्टिक को विस्कुम भाव स्पक नहीं समझते । यही नहीं, हमारा एसा स्पाम है कि इन दोनों प्रपोग से स्वामायिक सौंदय मष्ट होजाता है। ऐकिम भाइ मेरे, परा पाप इस तर्क को पर में प्रयोग करके तो देखिए, तीसरा महा- । २० युर पहले ही शुरू न होगाय सो मेरा नाम नहीं ! हम फामतू चीजों के एकत्रीकरण के सस्त सिमाफ है । मेफिन श्रीमतीवी का हास यह है कि पगर उनका पश वसे मौर पर में पमह हो, तो ये सारे वागार को अपनी सन्दूकों और प्राप्तमारियों से भर में। गरण यह है कि हमारी रुपियाँ ममग हैं, उनकी अलग ! मुसीबत यह कि वे अपनी पसन्द हम पर पाहिर कर सकती है, मेकिन हम मरे बाजार में उनमी रषि, गुमाव मोम्पता और पसन्द कोको धुनौती नहीं दे सकते । क्योंकि पर मुट पाय, इसकी कोई मिन्ता महीं, सिद्धान्तों का मांसों मागे सूम होता रहे, इसका भी कोई महत्व नहीं, महत्व सिर्फ इस बात का है, पिन्ता सिर्फ स्वनी है कि कहीं कोई ऐसी वारा म होगाय जिसे सम्प-समाज में 'एटीकेट' के बाहर यताया जाता है । तो उनके साप बाजार जामे में होता यह है कि हमें अपने पन को घोड़ार प्रपने तम पौर मन दोनों पर संयम रखना पड़ता है। भभी एम दिन हुए, कहीं एक लेस भी पढ़ा था। इसमें सिमा मा कि पति की प्राति बन्दन में समान होनी चाहिए और परनी की प्राति दियासमाई की तरह । पत्नी की प्रकृति से तो हमारा कोई वास्ता नहीं । मुझे भी कोई मेख सिसमा परे तो में दिया- सलाई मोर उन्हें मारदी सुरंग पी उपमा दे ग सेकिन यहाँ तक पति की प्रतिमा सवास है, हमें पन्दन की उपमा फी कद्र करनी पाहिए। सेफिन पाों पोर पम्वन मनपर रहने से ही काम पस पाप तो कोई मुमीवत समे न हो । यहाँ तो मुसीबत यह है कि मामदनी प्पनी सीमित है पौर दग्छाएँ उमफी मसोमिन ! पास-पड़ोस में निसनी औरतों पर गितने मपे स्लिापन फी सादिया ये ऐसती है, उन सबको सरी सेमा पाहती हैं । इस पर पतुर दूकानदार भी पतियों की हारात पर कोई सास रहम साने पाले महीं होते। उन्हें एर मामूली-सी धीट का टुकड़ा दिखाने के लिए कहिए, ये रंग-बिरंगे ।
"मगर सनका बस बसे प्रौर पर में जमा हो तो यह सारे बाजार को मा पौर प्राममारियों में भर में!" (पृष्ठर.)
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'उनके साय वाचार पाना २१ पानों के प्रम्बार सगा देंगे और इतनी तरह-तरह की दिम-पसन्द पीलें पेश करेंगे कि मापकी 'उनके मन में विभ्रम पैदा होवाए कि क्या तो में और क्या घोड़े ? गरज यह है कि विना मांठ कटे भापकी गति नहीं । मेकिन सोपिए, मासिर मापकी गांठ कहाँ तक कटेगी ? कोई कुबेर का ससाना सो मापके यहाँ गढ़ा है महीं ? अक्सर होता यह है कि 'पर्स बेचारामाचार होकर मुंह फार देता है, मगर उनकी तमन्नाएँ पूरी नहीं होती ! मासिरी मक्त कभी-कभी तो ऐसा भी प्रा जाता है कि मौटने के लिए मांगे के पैसे तो पर-किनार, मुन्ने के गुम्बारे के लिए भी एक माना वेव में नहीं रहता। सब यह बसरी है कि पाप पग-यात्रा को महत्व दें। यह भी पस्री है कि माप मुन्ना, मुन्नी पौर सामान के भार से पक जाएँ भोर मापको सहायता के लिए श्रीमतीगी से भपील करनी पड़े पोर उस मपीस के प्रत्युसर में बो सर्टीफिकेट पापको इनायत फरमाया बाय, उससे प्रापकी मारमा हरी होचाय पोर मागे से प्राप कभी उनके साप बासार न पाने का सकल्प कर बैठे। मेकिम भापका सकल्प कितना टिकाक है, पोर मापकी मुसीबतों का सिमसिमा कितना छोटा है-यह हम मच्छी तरह जानते है !
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दिमी मैं मकान सोबसे-सोनसे माज तीन सात होगए, मगर मकान क्या हमा एक मुसीबत होगई है। नई दिस्ती भोर कनाट प्लेस के पे उप महसों से लेकर शहर को सीमा में स्थित जितनी भी गन्दी पौर उजसी गलियां हैं, उन सबकी परण रन हम सीश पर कहा युके हैं, लेकिन सकदीर कुछ ऐसी मोटी है कि सब जगह से एक ही टका-सा उत्तर मिलता है-"मी, अभी तो कहीं कोई मामी नहीं है।" कभी-कभी हम सोचते हैं कि इतनी सगन यदि कहीं हमने पिछले पो-एक स्वदेशी मान्दामनों में दिखा दी होती तो भान कैसा मकान कहीं के एम. एस० ए० होगए होते । सर हम तो क्या, हमारे रिश्तेदारों तक को यह कोठिया 'एमाट' हई होती कि मोग माचके रह पाते ! मा गोसाई सुमसीदासबी की तरह हमें भी अपनी पत्नी पायेग-वाण मग गया होता (हामांकि उनकी तरफ से इस काम में कभी कोई बानपूझकर पूक नहीं हुई) पौर हमने भी पग- पारी घोरकर 'हरि से हेत' किया होता तो विश्वास मानिए कि पिर्यों के भी ध्यान में न माने वामा वह परमारमा भी हमारे ऐसे पक्षण तप से पिघल गया होता और मकान की तो क्या घमी, हम निमोकी का राग्य भी पागए होते । फिर हमें घर-गिरस्ती बसाने के लिए यों किसी दरवे की जरूरत ही नहीं पाती । पापसे क्या क्षिाएँ, मितने भी अपने रिश्तेदार है या प्रासानी से बि रिश्तेदार बनाया जा सकता है, सच मानिए, उन सबके पर दस-दस पन्द्रह-पन्द्रह दिन ठहरकर हमने अपनी नई और पुरानी सब रिश्तेदारियां मरम कर गमी है। अब तो हाम यह है कि भूमे मटके अगर किसी दिन हम कहीं उनसे मिसने भी मा निकमते है तो उनकी पलियां पति को गंटकर अन्दर से ही कहलवा देती
मैने का
"वे तो माहर गए हैं !'
पर तो सहर की धर्मशालाों के मुन्सी मेहतर और पोकी
वारों पर ही हमारी दिल्ली बसी हुई है ! जिस दिन इनकी मां
मी फिर गई स उसी दिन हमारे लिए समार सूना होगाएगा !
इन मोर्गों से पैसे हमारे ताल्लुक है वसे प्रापको सगे भाइयों में भी
नहीं मिमगे । हो भी क्यों मही? अय एक-एक पमतामा में
तीन-सीन दिन नियम से और दस-दस दिन घोषमी से हम रेरा
डाम धुके हैं तो ये मुन्सी, मेहतर प्रौर पौकीदार, ममा हमें महीं
पहचामेंगे तो पौर किसे पहचानेंगे ?
कितनी ही मार सो ऐसा हमा है कि दिन-भर दफ्तर में काम
करके हम रात को गुछारे में पा सोए है पौर सुबह 'सद भी
भकाम' कहकर वहाँ से 'काइ प्रमाद' प्राप्त करके सिसक भाए हैं।
हाँ ममी फुटपाप पर सोने की नीयत नहीं पाई! पर हमारी
तकदीर का अमर यही हाल रहा मौर भगवान को ऐसी ही पा बनी
रही कि दिल्ली में इसी तरह माम भरती होती पसी गई तो यह दिन
मो दूर नहीं समझना पाहिए कि अब हम विस्तर बगल में दवाए
किसी फुटपाप की तमाम में मपेरे में निकल पड़ेंगे।
यह नहीं कि हमने मकान की तलाश में कहीं कसर छोड़ दी
हो या अपनी-सी करके न रहे हो । सच तो यह है कि कोई माई.
सी० एस० या पी० सी० एस० के इम्तिहानों में भी कमा सैयारी
करके पता होगा कि जिस सम-पूम पौर तत्परता से हम मकान
की सोच में निकलते हैं।
दोस्तों की बात तो घोर वीगिए, मिसने-चुमने पार्मों भौर
जिनसे पोड़ी-सी भी राम राम या दुमा-मसाम बाकी है उन सबसे
हम दिन में तीन बार पूछ सेठे हैं "कहिए, कहीं कोई सुराग
मोर पसे ही नहीं हमें अपनी तकदीर ध पुस
मुसाती मरर प्राती है यानी पता चलता है कि कहीं कोई मकान
माली हुमा है या होमे गाना है हम उसके पास-पास बसे ही
मिमा ?"
मनन नही मित्रा - मैग्य उसे कि पुनावों के दिनों में हमारे माई-वन्द पोव के अन्धे पौर गांठ के पूरे उम्मीदवारों के पास मा मगराते हैं। शायद भारतीय पुमिम के सो० माई. गेपाने मी प्रपने फर्सी मुबरिम का पता इस होशियारी भोर मुस्तैदी से नहीं लगाते होंगे कि जिस लगन मोर सफाई से हम खामी मकान के मासिक का ही महीं उसके भाई भतीचे, माले-सुसरों सए की सोच-सवर के पाते हैं और तरह-तरह से अपनी बातों पौर सिफारिशों का नाम उस पर विद्या देते हैं। मेपिन साहब क्या वताएँ ? ऐसे-ऐसे भीम प्रयत्मों के राद भी हमारा मोक्ष प्रमो तक कहीं पम नही पाया है मौर हमारी गोली हर वार माली ही गई है। उस समय की हमारी हासस का पाप मन्दामा सफ नही मगा सकते कि जर मझान-रपी संका की शोग में हम न जाने किन- किन सुरसामों के मुंह से निकलकर पिट पर्वत पर पहेचते है पौर इससे पहले कि हम मद्यक समान रूप धारण करें हमें पता पससा है कि यह सोने की पुरी तो पहले ही मुट गह-माद मकान हमारे पाप-पहुँबवे पिर गया है और इसे को अफसोस के साप कहा गया है, "वी, पाप कम नहीं पाए, नहीं तो बह भापका ही पा । हमने उसे अपने साके के, सासे के, माई के, भधीये को प्रमी-प्रभी उठा दिया है।' तो मैंने कहा, दिप्मी में सब कुछ है, पर मकान महीं। यहाँ पार प्रहर मश्मी बरसती है, पर गृहसक्ष्मी को टिकाने के लिए पार हाय अपह नहीं। पाप भगर गाल है तो दिल्ली पाणाइए, चोर बागार से मामामास होयाएंगे । यदि पैसा बहुत है और उसके मर्च करने की कोई मूरत मबर नहीं प्रारही तो वारड्सम के पासार में सिर्फ एक पकर काट मीनिए, सूर-ही-सूरखें नगर पाने मगेगी। इस दोनों में से भी माप किसीके सामक नहीं तो नौकरी यहाँ दिन में तीन की रा सकती है और छ: छोरी मा सकती है। सब कहता है कि मैनेजों के समाने में रायबहादुरी का मिलना भी २६ " इतना कठिन नहीं पा, विसना इस समय एक मोटे-से मकाम का मिलना कठिन होगया है! अभी तागी परसों की बात है। हम एक नई बस्ती में पामी मकान का सुराग पाकर पहुंचे । किवाड़ों पर बार-बार दमने पौर पीमने-पिल्लामे पर मकान-मामिक मुस्किस से निफसे पौर बिगड़ते हुए से वोमे 'पों क्या काम है? 'ची मैंने कहा-"कोई मकान साली सुना है मकान मामिक पिपिगार योमे, 'सुबह से शाम तक मकान मकान ! यहाँ कोई सानी नहीं है।' सेपिन से चिकने पड़े पर पानी की पूर्व नहीं ठहरवी पसे ही इन उत्तरों को सुनते-सुते हम भी एक ही पक्के होगए हैं। हमने पौर भी बिनम्र होकर कहा "जो ठीक है मही होगा । पर यह मो अपने माता पवामीमस है म ? उन्होंने भेजा है और कहा है कि मामा पदामीमम से मेरा नाम मेना । मामापो बरी मेहरवानी होगी !'' सामागी ने बरे ध्यान से हमें ऊपर से नीचे तक देता । मानो पहर कोतवाली में दीवान साहम किसी नामी गुणे की शिनास्त कर हे हों ! फिर पोड़ी देर सोपकर बोमे 'मन्दर माइए !' सतयुग में जन गर को प्राह मे प्रसा पा पोर उसने सूर केपी करने हरि भगवान से टेर सगाई पी किहे मधरण भरण, भक्त बस्सस प्रमो तुम्ही हो बोमानाम-पर तेरे सिवा कौन मेरा पप्प कन्हैया ! ठीक इसी तरह ही मैने सस्ट मोचन नाम तिहारी' का पाठ करते हुए कहा कि हे पवमपुत्र 'भव ही बचा साप मेरी' मौर मठ इमभाना के पट में । प्रन्दर सेवापर मामा मे हमें अपनी ललाइम के सामने सड़ा पर दिया । योसे 'यह मकाम पाहते हैं, बात करतो इनसे !' सपूर से गिरा तो दूस में प्रटका! माप्सानी से तो हनुमानगी विनय दिला भी सपते थे, पर समाइन के सामने तो हमें उनकी भी मानी प परती दिपाई दी ।
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VA मगार मातरिम बोगी "श्री पानी पारी होपई? (पृष्ठ २७)
मकान नही मिक्षा
पूंभट सरफापर मकान मासकिन योनी, "जी मापकी शादी
होगई है?'
प्रश्न सुनकर में सन्नाटे में भागया । प्रामिर समाइन का मतसर
क्या है? कुछ देर बाद बव भक्म ठिकाने भाई तो मासूम हमा
कि मलाहन ने तो पहले ही वार में हमारी धरती जिसका दी
होती पर बह तो यो कहिए कि हमारे पिताजी परे मुखिमान पे,
उन्हनि पान के पतरेको १६ साल पहले ही अनुभव करके हमारी
पाई-माई वचपन में ही कर दी पी!
हमने सीना तानफर कहा, 'मी भगवान की कृपा से दो
बम्मे भी हैं।
फिर पूछा, "भापको पहू मारा तो नहीं है
हमने मन में कहा कि साफा तो वह ऐसी है कि उसके मारे
मन्धा-सासा पर घोरकर दिल्लो देखनी पड़ी है । पर प्रकट में
मसाइन से कहा 'वी, विस्फुम गक है गऊ ! भम पर की परकी
है, सीधे मुंह उठाकर वात भी महीं करना माता !
लेकिन, यहीं तक गनीमत महीं पी । सेठानी के प्रश्नों की बौधार
भारी पीने ऊपमी तो नहीं है ? भाप प्यार तो नहीं पाते ?
पंगावी सा नहीं है ? यहाँ काम करते है ? कितनी मामदनी हो
बाती है ? अव तक कितने मकान वदसे है ? मेहमान तो मापके
यहाँ नहीं पाते ? प्रादि-आदि।
फिर कहा, "मी, महू-बेटियों का भर है । हम वो भले पादमी
को ही अपने यहाँ वसाते हैं। मोर देखिए बापूगी, यह बात पहले से
सुन में-पते सब झाड़नी पांगी, पलाना रोग पुमाना होपा, बीमा,
मांगन सब मापके पिम्मे है। पौर रेझिए, मकान की मरम्मत हम
मही पराएंगे फि पीछे माप यह कहें कि यह मगवादा, यह सगपादो,
यह टूट गया वह फट गया
पाप मानते हैं कि गरष सावनी होती है। जैसा कि तय था
इन सब बातों का उत्तर 'हो में ही दिया गया। हम समझते कि
।
२८ बस मैदान मार लिया ! लेफिन हमें यह क्या पता पा कि अभी इस्दी-बाटी का संग्राम बाकी है । सासावी यो ममी तक गुम बने बठे पे प्रम उनकी पोच सुमी । कहने लये, 'देखिए चार साहप, हम किसी बाहर के मादमी को मकान नहीं देते, पर क्योंकि पाप मामा पदामीमम के मेगेहए है हो ऐसी बात है कि प्रापको इन्कार भी महीं किया जा सकता !" हमने समझा कि शायद हमारी गृहस्पत मोर मार रही है। मेकिन कुछ ही क्षण बाद लामा बदामीमम ने फिर कहा 'देखिए पी हम सगाई भगवामे भादमी महीं है। पो पात तय होमाती है उस पर बाद में झगड़ा-रटा नहीं करते ।' हमने पदानु भक्त की मौति गर्वन मुकामी पौर उनके प्रवचम को प्राकठ पान करने गए । फिर उन्होंने पमकों को दो-तीन बार पकाकर पोठों को पहने सिकोड़ा और फिर प्रागे फैसाकर अपने पारों मोर देखते हुए पीरे से पहा, 'हम कोई मिना-पड़ी महीं करेंगे। किराए की रसीद भी नहीं देंगे। मकान पर चाहेंगे सब सासी करा मेंगे।' मसा मैं चाहकर भी इस पर कोई पापत्ति कैसे कर सकता था? मामानी कहो गए, 'सर दो कमरे हैं, किराया भी मामूमी है, यही-६०६० स्पए । माटर टैक्स पसग बिरामी टैक्स प्रमग मंगी का महीना पसग, फिनाइम के दाम ममग । प्रापको छामीमात में मेगा है, महीं वो एक-एक कमरे के १००.१..पए मम पुके हैं। पाप से मसे भादमियों से अधिक सेना पोमा भी नहीं देता! मकान माप पानठे है सगाई में पनपापा है । २५.००) टूट गए है! कोई और काम तो अपने यहाँ होता नहीं । यस १०.) ही पौर दे दीजिए। गुम्बारे की मेरी गुम गाने पर से उसकी ह मराा प्राली है वैसे ही मामानी की महाप्राण पातों को सुनते-सुनते हमारी पाठी गई पी । फिर भी हमने गोर मगाकर पूछा, "बी यह
मकान नहीं मिला
२००) क्या किराए के पेश्वगी है
वोमे, मजी मापसे क्या पेशगी झेंगे ? भले मादमी किसी
का पदाम नहीं रखते । भावफल ५००) होते ही कितने है ? इस
सड़ाई में सो रुपए की कदर भभेमे की रह गई है।
मैने परते-गरते पूछा, "तो पापका मतलब पगरी से है ?'
तो वोले, 'माप इसे पगरी कहते है-राम राम ! प्रची यह
तो नए मकान की मुंह-दिखाई है बागी ! वह भी प्रापकी खातिर ।
नहीं तो इतने कम फिराए का भौर ऐसा मासीशान मकान दिल्ली
में पापको दूसरा नहीं मिल सकता !"
उस पासीशान मकान की वावत कुछ न कहना ही पञ्चा
होगा । मण्या फर्श टूटी त । कमरे ऐसे मासीवान कि जिनमें
कोई ताफ नहीं, पाममारी नहीं, मंगसा नहीं। सम्मेबोरे इतने कि
दो वाटें मुश्किल से बिछ सके। मोरी नहीं, परनामा नहीं, रसोई
नहीं, परहरी नहीं।
दमी पिस्सी बसे हों से कान पटाती है, वैसे ही हम यहाँ से
उठकर चले पाए हैं और अपनी सारी झूमर कसम के सहारे बेकार
कागजों पर उतार ऐ है। पाप इसे पढ़कर हेसंगे, एष को शायद
हमारे हाम पर हमदर्दी भी होगाय मेकिन मर्मशामा में मौटकर
अपनी श्रीमतीजी को हम क्या उत्तर देंगे, यह अभी तक समझ में
महीं भाया है।
।
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श्रामकर स्रो हाल कुछ एसा होगया है कि मा पर पौर क्या 'बाहर, कहीं कोई गास बनाए ही नहीं बनती। एक हमारे महा- महिमामय पूग पे कि उनके पर यदि कमी कोई प्रतिषि भाजाठा तो समझते पे कि जैसे स्वयं भगवान ने ही उन पर रूपा की हो । परिवार-भर में मामन्द का सागर हिमोरें मेने लगवा । दूर से ही मर्य देखें पौर पसक पावर विसासे प्रतिपि महोदय का सुस्वागत किया बासा। भौति भौतिके पेय-पकवानों नकी रसना तृप्त की पाती। भांति-भांति के मामन्ददायक व्यवहार परते पाते । इस प्रकार क- फूंक कर कदम रखा गावा कि प्रतिषि को कोई ठेस म सग जाय । यह समझिए कि सारा पर मेहमान के मुंह की पोर वाकता रहता। इससे पहले कि श्रीमान् कुछ कहें उनकी फरमावर्षे पूरी कर दी पातीं। तो मैंने कहा एक तो वह युग पा पार एक माम है कि मेहमान का पर पाना सो दूर, अगर कहीं से किसीको चिट्ठी मी मानाती है कि हमारा विचार वित्मी देखने का है तो सब मानिए, नाही प्रपना नियत स्पान छोड़ देती है मौर दिस की घरकन कम- से कम चार गुनी अवश्य ही बढ़ पाती है ! हम विश्वास भी नहीं कर पाते कि यह सन्चन सम सिख रहे हैं या मसाक कर रहे हैं ? दिम सम्पर-हो-अन्दर मनाता है कि हे भगवान यह मजाक ही हो । मोर माप मानते ही है कि भगवान् हमेशा मनुष्य का साथ नहीं दिया करते । इसलिए केवल भगवान पर ही भरोसा न करके हम अपनी विद्याम पाहिनी मुमा में घो पौष प्रेमियो है उनमें स्वये देवी 'पार्कर' सम्हाम लेते है और मित्र को मिसते!- "भाई, तुम्हारे विस्मी प्रामे के निणय से हमें खुशी हुई। तुम्हें २२ मेने का देखे बहुत दिन भी तो होगए हैं ! माते तो मड़ा ही पित्त प्रसन्न होता । लेकिन मुझे दुपा है कि मैं स्वयं तुम्हें यहाँ न माने की सलाह देरहा हूँ । मैं अपने पर-से-बड़े स्वाद में लिए भी तुम्हारा महित नहीं सोच सकता । बात यह है कि यह मौसम दिस्सी पाने मा नहीं । सफर में जो परेशानी होती है और रेलगाड़ियों में मो मुसीयत है यह तो दर-किनार, उसे तो तुम पय भागोगे पुव मुगत पर समझ ही सोगे मगर इतकी दिक्कत के बाद जब दिल्ली पहुंपोगे सो यहां का हाम दपकर तुम्हें भारी निराशा होगी । एक तरफ पेषक घस रही है तो दूसरी तरफ हैना फैम रहा है ! म कहीं पाने के प्रौर न कहीं पाने के 1 विन-मर पर में कै पर रहो पौर बाहर निकमो तो पागल न यहाँ कोई पियेट्रिकम कम्पनी है न सिनेमामों में प्रच्छे सेम ही पसरहे हैं । फिर पासकम समय भी पाहर मिपसमे का परा कम ही है । मेरी वो तुमसे मिलने की बड़ी इमा है, मगर क्या पताक ? परिस्पितियां मेरी मावनाों का मापार दिये देरही है मौर मैं तुम्हें फिलहाल यहाँ म माम की ही समाह देने के लिए विवश है। पक्सर मेक प्रादमी हमारी इस समाह को मान लेते हैं। पर माई, पापों मैगुनियाँ एफ-गी तो होती महीं ? पुष हमारे मी गुरु होते है कि बिना चिट्ठी-पसी के ही दुर्भाग्य को तरह मा पमकते हैं। गगन में पर की दहाा सुनपर वमो के प्राण या न सूप गाते होंगे जैसे मेहमान की नमस्ते गे हमारे हो। हिरन हो पाते है। इस मुसीबत में बपने मिए हमने पुष्पम पेराबन्दिया नहीं की। पसे, मकाम छोटगर उस जगह लिया है पहाँ न तामा पढेप सकता है म रिस्था । म पातकी म दृट्ट । गमी के अन्दर सनी इस कदर गाती है निमोई भूसमुनयां मनाने पाप्ता पाकर मेरे मरान के नारे को देख कि यहाँ तक पहुँचना कितनी बहादुरी की बात है ! पौर मकान तक पहुंचने से ही कोई हम तक पहुंच पाता हो, ऐसो महमान से भगवान पवार बात नहीं । सीने के उपर बीमा मौर कमरे के बाद कमय, इस करर बना पाता है कि नब तक कोई म्युनिसिपैसिटी के माप की सीमावार में ही हमारे नाम का उच्चारण न करे, हमारे कान पर नहीं रेंग सकती I फिर समकर हम पवार हे ही देगे इसकी क्या गारण्टी है ? पहले सरके को भेगे कि देसो कौन है? कैसा है ? फिर सरके की रिपोर्ट पर श्रीमतीवी खिड़की से उमा-वाफ कर मुमायना फरमाएंगी कि कहीं सामान तो साम में नहीं है? बों-करनों की पसटन वो पीछा नहीं कर रही । इस प्रकार पर श्रीमतीनी सिगनस दे देवी है मार हम समझते हैं कि 'माइनक्तिपर है वो पहले हम विसने से झांकते हैं मोर जब तक बहुत ही हानि नुकसान का प्रस्न न हो, हम ६५ प्रतिशत कहलवा देते है बागी पर सारी पक्ल का ठेका, सोमिए, हममे ही पो से रखा है। भगवान ने एक-से-एक विचित्र घोपड़ियो, यानी महापुरुप, इस पर पाम पर पुन-चुन कर उतारे है ! माग यह पामकर कि किसे में यानी पर में तो हम भयेय है, बाहर सड़क पर, पानी खुले में, हम पर हमला करते है ! दफ्तर में सीधे पहुंचते है। सेकिन इससे पहले कि यह हम कुछ कहें हमने भी कृष पुर पाद कर रखे हैं। हाप मिमाते हो हम तमसे प्रदम करते है- 'पहिए, कहाँ टिके है ?' भौर उनके उत्तर की प्रतीमा किये विना परकाम ही दूसरा पार कर बैठते हैव पायदे है ? प्रमर इन दो तीरों से भी कोई यहादुर बब माता है तो फिर हम मपमा ममोप ब्रह्मास्त्र माते है-मारता मारता तो कर पाये हैन? मानना पड़ेगा कि दुनिया में ममी घरीफ भादमियों की कमी महीं है । मगर भने प्रादमी न हो तो परती-पासमान से टिके रह एक है, मैंने कहा, हमारे इन प्रलों को सुनकर विरमा ही मसा प्रारमी हमारे यहाँ टिकने की हिम्मत कर पाता है ! प्रक्सर मोम पायकर कह ही वो बैठते है-'बी, सब कुछ ठीक है प्राप , मैने का तकसीफ न करें। मेदिन उनके लिए क्या किया पाय जिन्हें हमने गलती से, प्रमगाने में ही, पचपन में पोस्स मान लिया नहीं, यह दिया पा ! को हमारे राव को रोक नहीं प्रमझते, प्रतिष्ठा को प्रतिष्ठा महीं मामते मार हमारी मुसीबत में हेस-सपर माते है । पराल में हाप हम पन्हीं मोर्गों के पाते हैं ! पो म चिट्ठी देसे है, म जिन्हें हमसे घ पूछने की परत है पोर हम चाहे पावास में छिपकर पमा मह पाएं, वे हमारी खोज निकालने में एकदम घेतान की तरह समर्थ है। हमको तो पता पसेगा पीछे, इससे पहले ही अटक पर पल-पल उनमा फरश होका होगा। उन्हें रोक भी कौन सकता है ? कम्मस्त, पर में जुसते ही हमारे बमों को अपना मठौरा बता मेंगे हमारी मा के पहले ही मुशार परण छू संगे और मौकर को इस प्रपिवार से हम देंगे, पं यह तनख्वाह हर महीने इन्हीं से पाता है। इन लोगो का इमाम सच पूधिए, हमारे पास महीं । इनरी एका दरपसम हमारी देवीजी के पास है। मेहमान के घर में पाते हो 'वे यह रूप धारण करती है कि कभी-भी तो हमको भी यह परपामने में देर सग माया प्रती है कि भाग्निर यह हमारे ही मम्मे की माहै या पोई मोर? मक्सर मेहमान के पर में दानिस होते ही 'वे' पीमार होगाया पता है । उनके स्वभाव में सापन भी उन निों प पपिक पा माता है। प्रोसतम हमारे पर मैं यम्मे उन दिनों ग्या- पियरने है मन पपिक टूटा परखे हैं और दाम-दार में मि अपनी उप स्पिति जोर-शोर से मूर्षित किया परली है । मेहरी को इन दिनों प्राय याय दे दिया जाता है और हमारी श्रीमती मी पो भाये दिन पर पी देहमी के बाहर पैर महीं निकापी तीन-गोन, पार-मार पटे महेमियों के यहाँ मार तास एमने में अपने येफार मममा. म पपोग निमा करती है।
।
"पापको तो पशबनेपा पागे। इससे पहले ही पापभी बैठा पर सरस-पस
रमका कसा होश होपा (एल ३४)
मैन का तकलीफ न परें।' मेकिन, उनके लिए क्या किया पाप जिन्हें हमने गमती से मनमाने में ही, मषपन में दोस्त माम मिमा, नहीं, कह दिया पा! पो हमारे रोमाको रोग नहीं समझते, प्रतिष्ठा को प्रतिष्ठा नहीं मानते और हमारी मुसीबत में हैस-हंसकर मना लेते हैं। प्रसम में हाय हम इन्हीं मोगों के माते है ! यो म चिटठी देते हैं, न चिन्हें हमसे पुम पूछने की पसरत है और हम चाहे पाताम में फिर नयों म बैठ पाएँ, ये हमारी सोन निकालने में एकदम तान की तरह समर्प है। हमको तो पता पसेमा पीछे, इससे पहले ही मैठक पर सवल-यम उनका फमा होचुका होगा ! उन्हें रोक भी कोन सकता है ? कम्बस्त घर में पुसते ही हमारे बों को अपना मसीमा मना मंगे, हमारी मा के पहले ही मुकार परण छू लगे पौर मौकर को इस प्रधिकार से हुनम देंगे ये वह तनस्वाह हर महीने इन्हीं से पाता है! इम मोगों का इमार सप पूपिए, हमारे पास नहीं । इनकी या दरमसम हमारी देवीगी के पास है। मेहमान के घर में माते हो 'वे' यह स्प पारण करती हैं कि मी-कभी सो हनको भी यह पहपानने में देर मग मामा नसी है फि पाग्निर यह हमारे ही पच्चे की मा है या कोई पौर? मासर मेहमान के घर में दाखिल होसे ही वे यीमार होगाया परती है । उनके स्वमान में समापम भी उन दिनों पुप पमिक मा पाता है। पासवन हमारे घर में पन्ने उन दिनों पापा पिटा करते है घर्तन मपिक टूटा करते है और वास-द्याक में मिर्षे प्रपनी उप स्पिति पोर-शोर से सूचित किया करती है । मेहरी को इन दिनों प्रायः पवाय हे दिया पाता है और हमारी यीमतीजी जो प्राये-दिन पर पी देहत्ती बाहर पर नहीं निकासी, तीन-तीन, चार पार पटे सहेलियों के यहाँ पाकर ताश रोसने में अपने पेगार समय का सदुपयोग किया करती है।
"पापको तो पता चलेगा पीछ। इससे पहले ही रंग मापा
उनका प्मा ऐप होगा!"
(ट)
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मेहमान से भगवान पाए ३५ हमारे पर में बहाय देसने सायक होता है कि वर मेहमान महाने के लिए सोटा मांगते हैं तो उन्हें कटोरी मिलती है ! मगाने को साबुन मांगते हे तो उन्हें कपड़े धोमे का रंग पका दिया माता है ! पोछने को तौलिया मांग है को सरसों के तेल की बोतल बड़ा दी जाती है। कहते है कि भगवान शिव समुद्र में से निकले विप को कठ में सवार गए थे लेकिन वे दिस्सी में हमारे मेहमाम बनार पाएँ, मेरी पुनोती है कि विष तो दूर, वे हमारी यहाँ की ममृतोपम पाम तक को गले के नीचे महीं उतार सकते ! न जाने किस वपरी से धान-शान कर भीमठीनी इसमें मेहमानों के लिए कृटकियाँ मिसाती है कि माने वाले को छठी का दूध याद मामाता है और पागे से मेरे यही माना तो दरकिनार भमे भादमी दिस्सी की रानी पैर करके सोने की हिम्मत नहीं कर पाते। माप पायद मुझे और मेरी भीमतीबी को कोसे मोर को दि हम मी मा मनहूस मादमी है जो मेहमान से यो विदकते है। यह तो प्रसामाणिकता है। फूहापन है । सुदगर्जी है । ऐसा मादमी ममा समान में सभ्य कहसाने मायक है। वो मैं मापसे विनम्रतापूर्वक निवेदन करना चाहता हूँ कि पपनी सम्पता भाप अपने पास ही रहने में हरगिप भी इन बातों में माने वाला प्रासामी नहीं है। हो, में यह पाना है कि मेहमानों को शातिर कर-करके मोम मोहरे पर्यों पर पहुंच गए हैं। अपनी मेहमाननवाजी के कारण ही माग बहुत-से साधारण मादमी नेता यमे हुए है । मोर्गो को बाय पिसा-पिताकर कीमों में अपनी कामत बमा मी, गस्टरों के रोमो पढ़ गए है, मेखकों की रचनाएं सपार्को को पसन्द पाने मगी है। यही नहीं बेकार पाकार होमए है केदारों की चादी-हो-पावी है। कहाँ तक कई पोरवागार करने पासों ने भी अपनी मिममसारी भौर मेहमाननवासी से सालो के बारे-न्यारे कर मे है। ने क्या पाप समम्त हैं कि मेरे मन में ऐस कोई प्ररणाम ५६ मही है? है । पर है । पर भाई मेरे, मैं व मपनी, और एप अपनी 'उनकी पकी हुई, मामी सुनहमी भादतों से मजदूर है ! ही ऐसे नुस्ने को तमास में प्रपश्य है जिससे बिना शारीरिक और मापिक कष्ट उठाए, मेहमान की जाति का पूरा-पूरा फायदा उठाया जा सके। माम मानते हों तो बताएँ । नहीं तो भगवान कमी-म-भी सुनेंगे ही।
नौकर के मारे
चतुर युवा ने इस कमाम से परम पपनी
पौगीधन मरबूत की है कि अगर हम उससे कसे
है पो रसकी बानगी हमारे सिर होगाती है, और
बोयीचीही कमी उसे गटने सपवी है वो बच्चे पर
पर पासमान उद्यादेव। कमी-कमी सोचता है कि
पागोरो युग में पिछले मानोगों में भाप
नहीं लिया ! सब करा!कि समर कहीं राक
नीति में पड़ गया होता तो पार कहीं का "मिनिस्टर
हमा होता!"
हमको ता भगवान् मे नाहरु ममुप्प वनामा ! यह भटकी हुई पीवारमा तो किसी भी पशु-पक्षी के पोसे में प्रासानी से फिट हो समन्ती थी। भमा यताइए, मम मिले मनुष्य का पौर सामना करमा परे मुसीबतों का ! यह भी कोई वात हुई ? पर सर, पर सातवें प्रासमान पर बैठे हुए प्रस्सासामा पार कमस पी पतनी सी पर पासन पमाए हुए पूढ़े ब्रह्मा गागा मे बिना विमान-शास्पियों से समाह सिमे हुए भावमी बना ही गला वो कम-से-कम उन्हें इतनी पा तो करनी ही चाहिए पी कि इस ५ पट ६के विना पंस-पूध वामे प्राणी को भौर सव नियामतें स्वाते पर मेहरबानी करके उसे पास तो नहीं ही देनी पाहिए पी। इस गरीब को प्रक्स क्या मिमी, यह समझिए कि सब-कुछ पौपट होमया ! पद मास के मारे इस भावमी की कोई एक मुसीबत हो तो बयान की माय । कोई एक परेशानी हो तो उसका पिझ भी हो। इस समय तो हाम यह है कि इस मामवर ने अपने ऊपर बुद्धिमानी का सिंहाफ इस कदर मपेट मिया है कि उसकी सही सूरत कहीं मगर हो महीं पाती। एष पुग पा पय वह गुफाओं में माराम से रहता, विकार फरसा और ठाठ से पड़ा पड़ा मुर्राटे मरा परता मा—न पी पा मैन न मापी का ईन ! पर पाम पो पाई सो सब गुजगोबर हो गया ! सभ्यता माई, सोसाइटी पाई, समान बना मोर वय मायाको बाह होमे सगी । इस सब का परिणाम हुमा कि मकही अपने पाठ में पुद ही उसझ गई! भर तो हाम यह है कि मादमी समार से परेशान है, सम्पदा से परेशान है पीर सोसाइटी से मौर के मारे - परेशान है मौर-तो-और अपने बीवी-बच्चों से मो उसे पैन नसीब नहीं। परेशानी को इस कहानी का सिससिला यहीं समाप्त नहीं होता । माप हैरान हगि कि जिसे मान रक्षा पौर फल निकाला पा सकता है, उस नौकर के मारे भी प्रादमी की माफ में बम है। मौपर पोर नाक में दम ! पाप भी कहेंगे-मा यह मी एक ही रही ! पर यकीन मानिए इसमें दिन-भर भी मुठ नहीं है। मौकर की परेशानी माम सबसे बड़ी परेशानी है। हामोकि महापौर मॅहगाई मे मोगों का कपूमर निकाम रमा है पोर हान पतमा मा कहूँ, करीब-करीव सस्ता होनसा है मगर मटा हापी भो, माप जानते है विटौरा होता है। पुफ्तैनी रसी भावमी की क्या कभी पाती है ? कुछ भौर म हो पर में कम-से-कम एक नौकर तो होना ही पाहिए ! पौर साहब, भाप कुछ भी कहें विना नौकर के मान के हम 'जेन्टिसमैन' काम भी तो नहीं बता सकसे। मामा कि शाक मामी पाप मुव ही से पाते हैं, पौर माना कि पापको मुद ही पापार से सौदा-सुमुफ करने का शौक है, मेकिन यह तो बताइए कि पाप कोट-पैन्ट पहनने वाले नकर १२५) मापार के पार, क्या पक्की पर पुर पाटा पिसामे पाना मडूर करेंगे ? मान लिया कि यह काम भी भाप साइकिस के कैरियर पर कनस्तर टिगाकर, परा गर्दन मुशाफर प्रासानी से कर सेते है और मान सिमा कि फ्लाप राशन की दुकाम से कपण मापकी श्रीमतीमी पुद हो मापसे मास प प्रग्या मे पाती है, और यह भी माना कि हफ्ते का राशन मी पाप नमक-मिर्ष की तरह प्रासानी से मोठे में दवा माते हैं, लेनिन यह वो यताइए, उस एप मोतम मिट्टी के सेस के लिए कनस्सरी परकर पाप दोनों में से कौन तीन घंटे एक मान में मगने को तैयार है ? यहाँ तक मेरा सवाल है में दो पन्धेरे में राम माम पपना प्यारा पसम्प करूंगा, बजाय इसके कि श्रीमतीनी से इसकी पर्चा करें और अपनी शामत को हुद ही दावत दू! मेरे बारे में तो पाप हमेशा के लिए ध्यान रसिए कि मैं तो १०.पों फूट पाने पर ही किसी काम के करने को राजी होता है नहीं तो मपना मावश तो यह है परपर रैम चारी पंपी रन काम । पास (मही प्यास) मतकाहपए सब पता राम ॥ फिर पाप ही बताइए कि हम-से दो-पार यार-दोस्त पर पापके यहाँ वर्धन देने खुद ही तशरीफ से पाएं तो ममे पादमी होने के कारण पाप कुछ म सही, उन्हें गरम पानी पिनाना वो अपना फ्रने समझी ही ? प्रब बताइए कि उस समय प्राप क्या सुद ही काकरी माफ करेंगे और पूप मस्म होगया वो मेहमानों पर सूना पर घोड़कर सुद ही पोर-दोरे बाजार पाएंगे? कभी नही। उस समय वो पापको मेरी ही तरह मेग पर टाँगें फैसाकर 'सुटा' को ही भावार पेना अधिक पसन्द पाएमा । या घोड़िए, इस २०ीं सदी में दोस्तों को प्राप फ्यावा मुंह मगाना पसन्द नहीं करते, मेकिम मुझे पूरा विश्वास है कि भापकी थीमतीनी पापके इस प्रादर्भ के पीछे अपनी सहेलियों को मही छोड़ सकती। वे उनके यहां ठाठ से पाएंगी और उन्हें अपने यहाँ सादर मुमाएंगी भी ! यहाँ तक थीमतीगी का सम्बन्ध है, पाप पना से फटे-हाम रहें मगर' पर से बाहर, सास तौर पर सहेसियों या रिस्तेदारों के सामने प्रपने 'स्टैमा' को तनिक भी गिरा हुपा बर्दाश्त नही कर सकतीं। प्रय माप मुद पसन्द कर मीजिए कि पर '' प्रपनी सहेमियों क यहाँ पाने मयें तो फस-मिठाई की टोकरियों के साप घाटे मुन्ने को सभामने के लिए प्राप एक सेवक की मावश्यकता अनुमष करते है या ऐस मामुक मौके पर मुव स्वपसेवक बन सकने की हिम्मत माप में है? वो पम्ही महासकटों से पार पाने के लिए हमने अपने पहा बा दिसेन बनाम पुरा पो, मौकर गया पहें, मामिक रस
नौकर के मारे
छोग है!
युवा साहब मम भाए पाए थे तो इनकी सेवाज्याकरी का क्या
कहना ? पहने उठना, बाद में सोना कम खाना और जो दे दे
सीमें मगन रहना ! कोई एक सूनी हो तो कही भाय ? काम
करने में पुस्ती पोर मुस्तैदी वो इस कदर पी कि कहे पर काम
किया तो क्या किया? इशारों पर माचवे पे, श्वारों पर ।
कुछ ही दिनों में हसरत हमारे परिवार के मंग बन गए। हम
उम पर प्रसन्न रहने मगे । उनकी 'बीबीजी' का पुसार उन्हें प्राप्त
होगया। पम्मे उनसे हिल गए। हमारे पर-बाहर की कुंजी
उन्हें मिम गई।
यह समझिए कि हम युवा के भरोसे निश्चिन्त होगए । मेकिन
मिस दिन से हमारी निश्चितता की बात सुद्धा की मुखि में भी
भागई बस,
उसी दिन से वह भी हम से निश्चिन्त होगया।
एसा ने घोती घोटकर पापामा पपनाया तो हम सुध हए,
पौर पर उसने हमारी प्रघबरसी पवसून पर भी एक दिन हाप
साफ किया तो हमने सिमा नहीं किया लेकिन अब उसने एक दिन
यह कहा कि गागी २.) में मेरा काम नहीं पाता या ठो ३५)
कीलिए, नहीं मुझे किसी मोर को वाणी कहना पड़ेगा सो हमारे
कान एकपम परगोश की तरह बरे होगए ।
पर क्योकि पुसा के बिना हम अपंग थे, इसलिए पैसे मीमी
बिल्सी पहों से कान पटाती है, से ही हमने पुपचाप २०) पर
समझौता कर लिया पीर पुष्य मूटने की खातिर अपने मन में यह
सोच लिया-आमिर २०) से पायकम होता मी क्या है?
मेकिन युवा कोई मुम् तो है नहीं ! वह फौरण हमारी नस
पहपान गया ! मप तो यह कम्पस काम के पाप से ही नहीं
प्राता । दो-दो, तीन-तीन पावाचे पीनाना तो उसके पाएं हाप का
मेस है। पोपी-पापी मावाज पर भी सपियस हुई वो हागिर
हमा, पोर नहीं हुई तो जैसे हमारे परों में स्त्रियां फकीरों को
४२
'हाप तामी नहीं है' कहकर टाम देती है, वैसे ही बानी में
भावाम दी तो 'वीवीपी का काम कर पहा , और बीबीसी ने
पावाग दी तो 'वाबूजी का काम कर रहा हूँ कहार वह टाम
बताता है कि कुछ कहते नहीं बनता !
चतुर बुढा मे इस कमाल से भर में भपनी पोजीशन मजबूत
की है कि प्रपर हम उससे कृष कहते हैं तो उसपी 'वीपीनी हमारे
सिर होजाती हैं और भीवीजी ही कभी उसे गटने लगती है तो पन्चे
सर पर भासमान उठा मेते हैं । कभी-कभी मैं सोचता है कि वह तो
मेर हई, बो उदा मे पिछले पान्दोमनों में भाग नहीं लिया। सघ
कहता है कि अगर वह कहीं राजनीति में पड़ गया होता तो पार
कहीं का मिनिस्टर' हुमा होता ।
अभी पिछले दिनों की बात है पार दोस्त पर पर मागए ।
हमने गुखा से कहा, “वा, पानी मरम करमे को रस रे पीर अपनी
बीपीमी से मोम कि साप के लिए कुछ फर्वी से तैयार कर दें।"
बुखा को शायद उस वक सिनेमा पाना पा । उसे मे-पल की
यह खातिरदारी पसन्द महीं पाई। पोना, "वागी, पानी दो प्रमी
रखे देता है पर बीबीसी की तबियत पार कुछ ठीक नहीं है।"
में जानता पा कि उनकी तबियत को कुछ भी नहीं हुमा । पर
दुसरा से क्या रह समता पा बोसा, "जा, देव सो सहो, वरियत
टीक है।
तो दोस्तों की तरफ मुंह करके निहायत ममा भादमी-सा बन
कर पोसा, "यादूगी तो घरपी बिमास परवाह नहीं करते। कई
दिन से उनकी तबियत खराब पन रही है। पर यह तो यों कहो
मिमीबीजी साक्षात् मदमी पापपवार है, पो किसी से कुछ कहती
मुमती महीं । पान पर विसकुन तबियत गिर गई है तो क्या परें?
इस कदर सिर में दद पोर हपरत है कि मैं कुछ कह नहीं
सम्वा ।
दोस्त सोग पाप को नम गए मोर उमटा मुझे ही समस-सुम्स
AT
वट
पाइए या पुरसेन प्राप यो वस्तीफ करते है। यहाँ विरामिए !
मारिए, रत पीरिए।' (पृष्ठ १२)
मेनका 'हाप सामी नहीं है कहकर टास देती है वैसे ही बाहगी मे पानाम वी तो 'पीयोगी का काम कर रहा है पोर मीमीगी ने प्रावार दी सो 'पानी का काम कर रहा है रहकर वह टाम बताता है कि कुछ कहते नहीं बनता । चतुर पुरा मे इस कमाप्त से घर में अपनी पोजीशन मजपूत की है कि मपर हम उससे कुछ कहते हैं सो उसकी 'यीयीगी हमारे सिर होगाती है मौर बीमीगी ही कभी उसे गटने समठो हैं तो पम्प सर पर प्रासमान उठा मेते हैं। कमी-कमो में सोचता है कि यह तो सर हुई, मो बुद्धा ने पिछले प्रान्दोलनों में भाग महीं मिया। सप कहता है कि अगर वह कहीं राजनीति में पर गया होता तो पाय कहीं का 'मिनिस्टर' इमा होता । मभी पिछले दिनों की बात है, चार दोस्त पर पर पागए । हमने गुदा से कहा, "का पानी गरम करने को रस दे पौर प्रफ्नी भीगीमी से बोल कि साप के लिए कुछ फुर्ती से तयार पर दें।" पुरा को शायद उस व सिनेमा पाना था। उसे ये-पल की यह सातिरदारी पसन्द नहीं पाई। गोसा, “नानी, पानी तो प्रमी रमे देता है, पर बीगीगी की तबियत मान कुछ ठीक नहीं है।" मैं मानता था कि उनकी तबियत को कुछ भी नहीं हुमा । पर दुखा से क्या कह सकता या, गोमा, "या, बेस तो सही, तबियत ठीक है।" तो दोस्तों की तरफ मुंह करके मिहापत मसा मादमी-सा बन कर गोमा, "पादूगी तो पर फी बिलकुम परवाह नहीं करते। कई दिन से उनकी तबियत खराब प्रम रही है । पर यह तो मों कहो किबीपीगी साक्षात् सक्ष्मी का प्रयवार है जो किसी से कुछ कहती सुनवी नहीं । मार जब विसकृत तबियत गिर गई है तो क्या करें? इस कदर सिर में दर्द मौर हपख है कि मैं कुछ कह नहीं समता ।" दोस्त लोग चाय को भूल गए भौर उलटा मुझे ही सस्त-सुस्त "भाइए पाडू पुरमेन भाप या तकलीफ करते है। यहाँ विरागिए ! नीलिए, गत पीमिए ।" (पृष्ठ ४२) मैन कहा 'हाप सामी नहीं है कहकर टास देती है, वैसे ही बानी में पावाग दी वो 'धीमीषी का काम कर रहा है, पौर बीबीसी मे प्रावाय दी तो 'वानी का काम कर रहा हूँ, कहकर वह टान बताता है कि कुछ कहते नहीं बनता । चतुर मुद्धा ने इस कमाप्त से भर में अपनी पोमीशन ममत की है कि मगर हम उससे कुछ कहा है तो उसकी 'बीवीपी हमारे सिर होगाती है पौर मीबीसी ही कमी उसे गटने सगतो है वो बधे सर पर पासमान नठा मेते हैं । कभी-कभी मैं सोचता है कि यह तो सैर हुई, यो कुरा ने पिछले मान्दोमनों में भाग नहीं मिया । सब कहता है कि अगर वह कहीं राजनीति में पड़ गया होता तो पात्र कहीं का मिनिस्टर' हुमा होता ! प्रभी पिछले दिनों की बात है, चार दोस्त पर पर भागए। हमने युवा से कहा "मा पानी गरम करने को रचरेमौर अपनी बीपीजी से बोम कि साप के लिए कुछ पी से तैयार कर दें।" घुया को शामद उस बक सिनेमा पाना पा । उसे यह की यह सातिरदारी पसन्द नहीं पाई। बोला, 'बाजी, पानी सो ममी रहे देता है, पर वीवीपी की तबियत प्राय कुछ ठीक नहीं है।' मैं मानता था कि उसकी तबियत को कुछ भी नहीं हुमा । पर दुता से क्या कह सकता पा, बोसा, "चा, देश तो सही, तबियत ठीक है।" तो दोस्तों की तरफ मुंह करके निहायत भमा प्रादमी-सा बम कर बोसा, "बामी तो पर की बिमकुम परवाह नहीं करते । कई दिम से उनकी तबियत खराब चल रही है। पर यह तो यों कहो कि बीवीपी साक्षात् मक्ष्मी का अवतार है, मो किसी से कुछ कहती सुनती नहीं। पार पर बिलकुल मियत गिर गई है तो क्या करें ? इस कदर सिर में दर्द और हरारत है कि मैं कुछ कह नहीं सकता ।" दोस्त लोग मायाको सूम गए पौर उमटा मुझे ही सस्त सुस्त
बयल
"माए बाबुरमेन पाप क्यों तकनीफ करते है। यहां विरारिए !
मोविए, गत पौगिए ।' (पृष्ठ १२)
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नौकर के मारे कहने मगे। बेचारे अपना-मा मह मेपर मौट गए । मुझे ऐसा गुम्सा पाया कि युवा को प्रभी गोमी मार दूं। ठमी श्रीमतीजी कहने षगी रहने भी दो मातिर अपना क्या बिगड़ा मंहगाई के समाने में कुछ मचाया ही तो!" कुंभमाकर कई बार सोप चुका है कि इसे जवाब दे दिया वाम । पर सव-मय यह ममाल उठता है तब-तब अक्सर पर की केबिनेट' में फूट पा पाती है। पर कभी पति होने के माते में अपने 'बीटो का प्रयोग करना चाहता हूँ वो सोचता है कि पाखिर मौकर के बिना भी तो काम पस नहीं सकता । म गाने कौन सा पाए पौर माए-ही-माए इसकी क्या मारण्टी है। फिर युवा की सूपियों का भी स्थान पाता है। वह सब-कुछ हो, पोर नहीं है। उसे ऐतरास दो धू भी नहीं गया। पीर, बावर्ची, मिती सर' वाली को कहावत है, सोपता:-यह गुदा से लोगों को देखकर ही गिर हुई होगी। पर क्या कई प्राजरस टाके पर निकम पाए है। कामचोर तो क्या वह मौगी होगया है। विमाम ऐसा जैसा हिन्दी का कसाकार ! उसके मन में पाए तो कोलू के पल पी ए दिन मर मगा ऐ पोर मन में म पाए तो बुखार का महाना करके यह सम्मो ताने म्भिकरण भी माठ सा बाए । कहो तो उससे पाहे गो कहे जामो गीता के स्थितप्रश की वह सुनता हे पोर पेहरे पर एक शिकन भी म प्राने दे मोर न कहो तो यह कम्युनिस्ट' मन पाय कि मारे तन-कुतों के पापना मोम यद कर रे। कभी तो मापको बह रजत यो नि माप पोड़ी देर के लिए तुद को दूसरा पाहवाह समझने सर्गे पौर कभी ऐसी किरकिरी करे कि पापको कहीं मुंह दिखाने की भी गुंजायश म रहे। पर मापसे क्या हूँ? हाल यह है कि न उसे मिकासे पन है, म रखे पन है। और यह भी भला मादमी न गाने का नाम टेवा है पार नग से रहमे को ही बाठ करता है। शायद यह गो महायव है कि 'मुमयो और न तुमको ठौर', यह हमारे बुद्धा के मामरे में सोतहों मामे सही है।
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धरेरोगार मापने बहुत देले-सुने होंगे, लेकिन जिस प्रसूळे ध्ययसाय की तरफ में इशारा करना चाहता है, यह ऐसा भावार है कि दुनिया में उसकी मिसाल नहीं मिल सकती। सोने-मादी के राष्ट्र से लेकर नमामि की कामपारी तक नितमे भी पन्ने भान प्रथसित हैं, उन सब में पोड़ी बहुत पूंगी की मावश्यकता होती ही है। सकिम पिस रोजगार के बारे में मैं अभी पापसे निक करेगा, उसमें पूरी की शिक्षकम हो भावश्यकता नहीं। सचाई तो यह है कि पूजी का होना ही स रामगार को उलटा हानि पहुंचा सकता है। कोई काम लेकर बेटिए, एक ठीया दो पाहिए ही पाहिए। मत मम यह कि दूकाम मा गोदाम हो, प्राफिम या कमरा हो। मेकिन पाप मानते हैं कि पारस सूरमे पर मान मिल सकता है, भागने पर महापुरी मिल सकती है, मपर रहने को मकान कहीं नहीं मिम समता । पर बाह रे मेरे मए रोजगार ! इसमें भापको किसी किस्म के मकाम, दूकान या साइनवोर को कई मावश्यकता नहीं । विमा किसी 'भेटरहेर' या मिफाफे के, प्रापकी सदो-किताबत मारी ए सकती है और बिना 'फैछमीमो काटे, भाप इस नए वापार में साइकार हो सकते है। यहाँ इस बात की भी मावश्यकता नहीं कि माप टीमटाम से ऐं पौर कुछ पढ़े-मिले से भी दिखाई ! यह पेजगार को बन्द पतुएँ मे हम्मात का निकासा है कि भाप नियने अधिक फटे-हाम होम, गितमे मभिक मस्तन्यस्त रिसाईणे पार जितनी पर्षिक परपटी या बेतुकी बात कर सकेंगे, उठते ही भधिक मुनाफे में रहेंगे। माफ नहीं करता। मेरी बातों को पाप सपिस्लीपमन मैनेस गीत सिखें तव पह प्रवस्य समझ से कि इसे पड़ने पाले सर-के-सब मज्ञानी महीं तो कम-से-कम मापसे तो कम-पक्स पर ही है, और इच न सही, उनके पाशानान्धकार को दूर करने के लिए ही प्रापका मिसते रहना बड़ा जरूरी है। पावश्यकता इस बात की भी है कि जब पाप प्रपनी अनमोत रचनाएँ सुनाएँ तो सुनमे पासा पाहे एक हो या हमार, पापके हाव-भाव और स्वर में फर्क नहीं पटना पाहिए । यही नहीं, मापको हर समय यह पोप रहना चाहिए कि सारा समान तापद है पोर यदि किसी पीर की अहमियत है तो बस अपने महम् की। कपिसा मिलने के लिए यह बिसएस भावश्यक नहीं कि माप पिंगम पढ़े हों या मापने रीति-प्रकारादि का प्रम्ययन किया हो अपवा मये-पुराने कवियों की सोहमत ही उठाई हो । प्रावश्यक सिर्फ पह है कि ऐसी पंक्तियाँ, चाहे वो प्राप स्वयं मोर को हों, या पपर सुमीता पौर पकड़े जाने का खतरा म हो तो दूसरों की भी से सकते हों कि जिनसे वामिया वर सके। वस, तालियां पिटना ही मापकी सफलता को परम कसोटी है ! वह मेसा ही क्या कि जिसके भापण में वासियों की गड़गड़ाहट से शामियाने न उखा पाएँ, वह नर्तकी हो क्या बो पिटावे-पिटाते पक्षकों के हाप माम म करदे पौर मह कपि भी क्या जिसकी कविता पर भूषाम म माए, गामा न होजाए ! तानियां वषबाने का मी मपना एक मतग 'मार्ट होता है। कवि-सम्मेसनों में तामिया वही मषिक पिटना सकता है, जिसने राम पा से कसा से भधिक गसा पाया हो, बो कवि से पधिक यो एक्टर हो, पाश्वत से अधिक सामयिक हो पौविक से मभिक रसिक पनने की कोधिध में सफल होपया हो ! पया कमा मौर क्या गप्ता ! हम वो यह मानते हैं कि ये सब भी पारमविश्वास के वसीमूत है। मेरे पास कसा पोर गमा मानमे का एक रामबाण उपाय है ! वह पह है कि प्राप
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४८ मेने का पीव मि तर पह भवस्य समम में कि इसे परमे मासे सबके सब मशानी महीं तो कम-से-कम मापसे तो कम-परम वस्र ही पौर कुछ न सही, उनके पाशानाम्पकार को दूर करने के लिए हो पापका सिमते पहना बड़ा परी है। पावसकता इस बात की भी है कि या पाप अपनी मनमोल रचमाएँ सुनाए तो सुनने वाला चाहे एक हो मा हबार, भापके हाव भाव भोर स्वर में फर्क नहीं पड़मा पाहिए । यही नहीं, पापको हर समय वह मोष रहना चाहिए कि सारा समाज परावद है और यदि किसी पीर को भाइमियत है तो बस मपने पाहस की। कविता मिलने के लिए यह दिसम पावश्यक नहीं कि माप पिंगत पड़े हों या प्रापमे रीति-समकारादि का सम्पयन किया हो, मनपा मये पुराने कलियों की सोहबत हो उठाई हो । पावश्यक सिर्फ पह है कि ऐसी पक्तियो, बाहे तो माप स्वयं शोर सकते हो, या अमर सुभोता और पको पाने का हवरा म हो तो दूसरों की भी से सकते हो कि जिनसे तासिया बन सकें! बस, वासियां पिटना ही प्रापकी सफलता परम कसोटी है। वह मेवा ही गया कि जिसके भाषण में वासियों की गड़गड़ाहट से शामिमाने न रखा पाएँ, यह मर्तकी ही क्या का पिटाते-पिटासे पकों के हाप माम न करने पोर बह कपि भी क्या जिसकी करिता पर सूधालन भाए, हगामा न होगाए । तामियां वषबामे का भी प्रपना एक भमग 'मार्ट' होता है। कवि-सम्मेमों में सामियां नही अधिक पिटया सकता। निसने राम रूपा से कमा से अधिक पसा पाया हो, पो कमि से अधिक यो एक्टर हो, शाश्वत से अधिक सामयिक हो, मासिक से मभिक रसिक पमने की कोशिश में सफल होगमा हो! क्या कमा पार पपा गमा! हम तो यह मानहे हैं कि ये सब पी पात्मविश्वास के समीपूत है। मेरे पास कमा प्रौर ममा मांगने का एक रामबाण उपाय है ! यह पह है कि प्राप
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'पाप मेरी व एक पारमा पााना अपनी 4 में समाए, कविता
मेकर चसके सामने ही धान से जोहो पाइए मोर सममनोचिए कि पर
ही कवि-सम्मेलन होया है । (पृष्ठ १)
४६ एक नया पन्या दूर किसी बगम में, एक परके कुंए में, पैर सटकाकर बैठ जाइए। सिर मुकाकर पस देवता को प्रणाम कोपिए और कहिए मा ! बस, उत्तर में कुंमा भी प्रापसे कहेगा, "मा : प्यारे भाई, मा s!'' इस प्रकार मगातार 'ए में मुंह देकर माप स्वर-सषान किए पाइए और उस प्रमे कुए को अपने स्वर-वाणों से भर दीजिए। पोड़ी ही देर में यकीन मानिए, पापको विश्वास हो भाएगा कि सचमुच प्रापकी प्रावास में भी पड़ा दम है पौर सहगल तो मर ही गए अब दूसरा कौन है गो मापसे बासी से सके ! पापको लगेगा कि कए की भावानों से सगीस की सहर-सी फूट रही है उन महरों से ऋषाएँ-सी निकल रही हैं, उन ऋचामों से कुछ प्रर्य से प्रतिभासिस होरहे हैं और उन पर्यों को म्यप करने की सामप्प किसी भी कर्महीन मालोचक में नहीं है। अपर प्रापके पासपास कोई मा म हो और उसमें डूब मरने का बरा भी मापके सामने हो तो फिर पाप मेरी तरह से एक भादम-कद पीधा अपमी बैठक में मगाइए । कविता सेफर उसके सामने बड़ी पान से बरे होगाइए और समझ लीमिए कि घर में ही कवि-सम्मेलन होरहा है। इस प्रकार की सापना के बाद निश्चय ही प्रापतो यह विश्वास होगाएमा कि भापमें पवि बनने की यह सव सूचियाँ हैं जो वास्मीकि या म्पास में पी, मास या कालिदास में पी सूर या तुमसीदास में पी । माप मानते ही हैं कि भारमविश्वास दुनिया में बहुत बगे पीर है । मिस दिन मापको मह विश्वास होगया फि पाप करि । बस सौ दिन समझ मीजिए कि दुनिया की कोई शक्ति प्रापको करि बनने से महीं रोक सकती । एक महीं सास बनारसीदास या रामविलास प्रापके पीये परें करोड़ों कासिम के माके भापका मयाक बनाएँ, हवार ािसु मापको तुक्का करें मगर कोई पापका कुछ नहीं विगार सकता। हो, पापको नयेपन के पीछे अवश्य दौड़ना पड़ेगा ताकि मोग यह कह सकें फि यात कुप सुन्दर और अभूतपूर्व तो है, मेक्नि यह सुन्दरता पौर नयापन दूरदीन से देखने पर भी दिखाई न परे। तो मैने कहा तिनी भी पटपटी चमत्कारिक बेतुकी पौर मुक्त पाणी पाप कह सकते हैं, माप उतने ही गरे पनि करार दिए पा सकते है। प्रय माप शायद यह कहने लगे कि यह तो बड़ा प्रासान है। मान मीजिए हम कवि यम गए, मगर इसमें रोमगार कहाँ है ? यह तो बेकारी का पम्पा है, जनाब ! सो मैं कहूंगा कि थीमानगी वह पमामा तो सब गया कि पर मसीमसा फ्रास्ता उगया पर पे पर तो कवियों की चांदी-ही चांदी है । इस पिएमी सड़ाई में जो बहुत से उपोग-धयों का विकास हुपा है उनमें एक पवि-सम्मेमन मा रोजगार भी है जो बड़ो तेषी से फैल रहा है और पनप रहा है, भौर क्योंपि इस पोर प्रभी भारत के घरे-पा उद्योगपतियों को मिगाह नही गई है इसलिए पभी इसमें छुटमइयों को मुमाझा-ही-मुनाफ़ा है। पानरल यह रोजगार पूरी वेपी पर है। किसी की जयन्ती हो या कोई कहीं स्वर्गलोरमा पहुँचा हो। कही किसी वीर प्रसविनी नेपामर को जम्म दिशा हो या फिसी नानकद के नार-कान देगा रहे हो। मारवारी मित्र-मयम का बससा हो या धर्मारों ने अपनी पौवस मनाइ हो-नायक्रम में पापको कवि-सम्मेसन अवश्य दिमाई दे पाएगा। पवि-सम्मेमनों सिए पापो चाहिए भी क्या ? बस एक पोरी पोशाक और एक गोड़ी कविता। इन्हीं दो गोलियों के पस पर पाप कवि-सम्मेमन का दगम मह कर सकते हैं । दमन फलाह होगया तो ठीक है ही मही पीस-पिराया पो पिट बामे पर भी मिल माता है। मगर नहीं तासिया पोर से पिट गई तो फिर इनाम पराम लीजिए, मैरम-दुधासे मीगिए और अगर कोई पनि फा पंया पौर गांठ का पूरा फंस गाय तो बस, उनम-भर मौन किए एक नया पम्बा माए। अगर कोई तकदीर का मन्दा न भी फसे सो भी क्या हर है ? पाप दूसरों के नाम से कविता मिसिए, फरारे पसे मिलेंगे। धादियों के सेहरे बनाइए, मामा पाएगा। कविता पुस्तकों को दानियों को समर्पित कीथिए, मच्छी रकम हाप मगेगी। सबसे ऊपर यह कि एक मिताव पापर सिनेमा या रेडियो में स दोरिए, बस स्टार वन पाएंगे और मौसिसियों से रुपया ऍने का एक प्रख्या साधन प्राप्त हो सकेगा। मेकिन एक बात याद रखिए । करिए चाहे कुछ, रोजगार मापका समी फूसे-फसेमा, कि पाप कहते यह रहें हम सो सर- स्वती के सेवक है हमें ममी से क्या सना | फिर देखिए, चांदी पापके पास स्वय सिंनी पनी प्राती है या नहीं ?
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बस की सवारी
"नाम ही इसका अस हिसाने घटकर 'बस'
पोगा।बानी भारपार ! सई पाए,
पर्से साइन में सपे रहिए, फिर भी इस बात का कोई
भरोसा नहीं किठने को तो क्या सरहने को मी
पया मिन ही बाएपौ।'
नाम ही इसमा बस किसीने छांटकर बस रख धोड़ा है । यामी घस समचार } पोहेदौरे पाइए, यष्टों मान में सगे रहिए, फिर भी, इस बात का कोई भरोसा नहीं कि बैठने को सोझ्या, मटकमे को भी पगह मिम ही बाएगी। हर वक्त इस बात का मारा सिर पर सवार रहता है कि म मालूम कब कमाक्टर' महोदय भंगुली ठार कह मै- 'बस इस' में जगह नहीं रही ! यह समझ लीजिए कि राम-पा से कोई १४३५ वर्ष की उम्र होमे भाई हममे तो ऐसी कोई वेसनी की सवारी देसी नहीं । एचपन में अपने गांव से यही को दो-दो माने में बैठकर पौवह पौदह मीन दूर पहर पाया करते थे। इसके की सारी भी क्या रांसी सवारी होती पी~~ परं-j, छुम्न-धम्म धुन्न-सम्म । एमी मस्तानी पाम से इसका पता पा कि यदि मायाम के किसी कपिको पन्येरे में उसमी प्पनि मुनाई दे जाती वो सचमुच यह यही समझ बैठता किमो विषुपरमी मगावर मोचनी, कहीं पनघट पर हो महीं पाही ? और सिर्फ दो पाने में, उस इक्के पर पपमा एकाधिकार कितना होता था कि रास्ते में यही कही कोई कुंभा मा प्याऊ मेग्री तो फौरन हुरम धरा दिया 'इसके वामे परा रोकना भाई ।' बने का खेत देखा तो उतर पड़े। गागर-ममी या पाए तो इसका कवा मिया । कोई मधु-वीर्ष शंका हुई तो वह भी निवारण की । सेफिन भव ? माय इस नए समाने में एक पापको 'बस' की सबारी है कि हम मष्टों उसके इन्तसार में 'माइन' में मगे में इसका वो कोई एहसान महीं, ममर बदकिस्मती से 'बस' के सर्राटे में अगर हमारा देग मिसकमाता है, या सोप्ता केप उपाती है, मा, भगवान म करे, हम इपाते है मीर हमारी देवीजी बैठ पाती हैं. वोकगफ्टर की पाप साम मुशामद कीजिए, वह महासय साने टर-टमाटर मवर ,
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“हम ए पाते है पर हमारी देवीगाठ पाती है !" (पृष्ठ १४)
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पस की मदारी का नाम भी लेने वामे महीं। इसीलिए सो कहता हूँ कि मोर की तो नया पतो हम बेछ भने प्रादमियों के लिए तो 'वस' पकरना मी एक मुसीमत का काम है ! मी हाँ, मुसीबत का काम है । वह इस तरह कि क्या हुमा कि हमारी गांठ में टके नहीं है और हम एक दफ्तर में कस जैसी कोई नौकरी करते हैं, लेकिन फहमासे तो वायू है ! भोर हम न सही इमार सानदान वाले तो रस पे ही और हिन्दुस्तान में ऐसा कोन है मा सामदानी रस न हो ? सो श्रीमानभी हम सरेरे उठते उस समय है मा श्रीमतीमी पतीनी में दास वा देती है, और महाचे उस समय बम पामी की रोटियां ठगी होने लगती है। इसी तरह पाप सोप सकते हैं कि 'बस-स्टर' पर हम कर पहुंचते होंगे ? अमर हमें गो मान की पुरको का कोई खतरा न हो ता पहली से म सही वूमरी से दूारो से न मही तीसरी से मागिर लप टाइम' तक बरामा सरापा दफ्तर पहुँम ही सकसे है मकिन पता नहीं हमारे बरे वापू पाम-मधे वाले नहीं है, या भगवान ने पाराम उनकी तकदीर में ही नहीं मिला कि यह न बाने हमारी तरह से मयों नहीं सोचते, और हम जैसे परीफ मोगों को प्रकारण ही पूर पूरफर क्यों देखते रहते हैं ? तो यह समझ सीमिए कि उसी वष्टि का खयाल रखते हुए ही 'मस' बालों का मुंह मोहना पता है कि माई सरा टाइम पर प?पा दिया करें। हो, दूर से माठे देखें वो रुक पाया करें पोर सीट म होने पर भी हमें कहीं-न-कहीं टिका-सटका मिया फरें। मेदिन ये वस' मामे से मुरम्मत का पाठ इन्होंने पदा ही नहीं । हम मिन्न पार पार करते ही रह पाते हैं, मेकिन 'बस' है कि पैसे सटे में सक्ष्मी विसफ गाया करती है बस, उसी तरह 'बस' भी हमारे देखते-देखते माखों के प्रागे से सरक पाया परतो है। प्रमी कम की बात होगए थे। अपने राम अपनी सुस्ती भोर मस्ती पर सीम्ले-मिले 'बर की भोर मपक रहे पे।
मैने कहा 1 वहाँ पर पहुँचते ही क्या देखते हैं कि कोई वीम भाषमी एक साप प्रकरे दरवाये के मन्दर पुसमे की पी-तोर कोशिश कर रहे हैं। मन्या गामा एक मस्तपुर-मा होरहा है । किसीमी पगरी उप्तर पर लम्बी होगई है तो किसीका मोट सीवन से पटप रहा है। नौजवान पूढ़ों को रस रहे है मौर रूटे यह रहे है, 'वेसो हमारा भी पानी । हमने जितना पी पिया है छोकरो उतना तुम्हें पानी भी मसीय नहीं हुमा होगा।' कोई नीचे से घुस रहा है तो काई उपर से एमांग मारने की कोशिश में है और कोई पतरा बदम पर बमस से हाप मारना चाहता है । उस दर्शनीय दृश्य का ठीक-ठीम वर्णन मही किया जा सकता। पापने शायद एक सम देना होगा । मोग बन्दरों के बीच में एक गुर की मेसी रस देते हैं और उसके पास- पास १०-२० रणे विस्नेर देते हैं । तो निस तरह उम प्रफेमी गुरु की ममी के पीछे पम्दरों में दतकिटाकिट होती है ठीक नही हास उस 'बस' का पा। पपर कोई प्रसनवी देसता तो यही सोचता कि वायद इसमें कोई चांदी की सिम या रुपए बिसरे पड़े हैं कि जो पहसे पहुँच जाय वही हाथ मार मे । अगर पहर में नहीं देगा होगया होता या 'कफ्यू मगने बामा होता और यह मासिरी 'बस' हाती तो मा इस प्रक्कम-भरके की बात कुछ समझ में माती, मेकिन सरे-वापार, विम के १०॥ पये पुलिस स्टेशन के पास पौराहे के सिपाही से पार कम पर पर यह पटना पटती है तो वताइए, प्राप क्या सोच सकते हैं? मेकिम पाप जानते हैं कि कहने की बात मौर होती है और करने की पौर | हापी के खाने के दौत पर होते हैं, दिखाने के पौर । हमने मी सोचा कि कोरी पावशवादिता में क्या मोगे प्रगर पद १०॥ बजे पानी निकस गई तो दूसरी से ११॥ बजे दफ्तर मगोगे । मा बावा ! हम भी मकर बरगवनी का माम पिम पो और अपनी प्रादर्शवादिसा को यह कहकर पुप कर दिया कि इस 'यस' से जाने का पहमा अधिकार हमारा है । हमें अपने अधिकारों .
पस की सबारी को नव रक्षा करनी चाहिए। यो प्रपने अधिकारों की सुद रक्षा नहीं कर सकता वह कायर है। हम दगल में हर तो परे लेकिन बसा कि गुसाई सुनसीदासजी हानि-साम नौवन-मरण बत-अपमत विधि हाम। इस 'महासमर' में विजयी होना कोई हमारे वश की बात योरे ही पी। हम सो फत्तम्प करने के अधिकारी पे फल हमारे भाग्य में कहाँ पा? अपनी पराजय पर हमें अफ़सोम तो कम न पा मेकिन ससस्मी इतनी पर पी कि इस मो से सफलतापूर्वक वापस हटने पाम हम प्रमेने ही न थे। हमारे साथ कई सम्बी मूछों वाले उप पुर्दो मासे पारी खाती वासे भौर टेदी टोपी पासे भी थे। हमें तो सिफ ग्रम इस बात का पा कि भाग ही जो नए मुसे कपर निकाले पे उनका इस्तरो-कमफ मप मम होगया हाप की बड़ी का शीशा पटक गया मौर बह सो मगबान में और की नहीं तो हमारा मनी बेग (हासाकि उसमें पैसे कुप्त दस-बारह माने के ही थे) माते-बाते बच गया। भाप पायद यह कहें कि यह तो सवारियों का पुनर है कि ये साइन लगाकर क्यों नहीं सड़ी होती ? प्रगर क्यू (माइन) में सरे हों तो एक भी दिक्कत न उठानी परे। मी हो, 'क्यू' की भी सुनिए। यह हिन्दुस्तान है भाई ! यहाँ 'क्यू' का 'पू' रार से समझ में प्राता है। फिर मियम पृष्ठ मी हो मापमिकता पौरतों को हो वी पाती है। रेस में टिकट इन्हें समय से दिया जाता है। रिम्ने हमके प्रसग और सुरक्षित होते है, 'बस' में इन्हें पहले स्थान मिमता है और मागे बिठाई बाठी है। यह सब देखकर कमी-कमो यह सोचने को मजबूर होना ही पाता है कि हमने तो यह मर-वह यों ही धारण की ! कम-से-कम 'बस' में स्पान पाने के लिए तो इमें पुरुष की देह की कई पाय- * आपने सास दक्षिण के मदिर और सत्तर देवता देख रामे हो हजार महस मकबरे, किसे मीनार भौर प्रजायवपरों में मासे फाड़ी हो पसकत्त की चौरंगी बम्बई की चौपाटी विस्मी का बौनी चौक और मागरे के ताजमहम पर पाहे प्रापकी मासे फिसम-फिससकर ही क्यों न रह गई हों किन मगर मापने एक पार भी कभी दफ्तर की दुनिया के दशम नहीं किए, तो समझ मीजिए कि पापका दुनिया देसमा नेकार ही गया। कहते है कि ममुप्यों की यह पुमिया विषावा की बुद्धिपी उपर कस्पना है सुनते हैं कि विश्वामित्र की महान सोपरी में भी रहे मसिप्ठ से उलझकर एक नई पुनिया बमा गमी भी दौसत की रोपनी में प्रन्ये अमरीका को भी प्राजकन कुछ मोग नई पुनिया पहा परते हैं, कपि-लसा पार पत्रकारों की तो दुनिया निरामी होती ही है-मेक्नि पह मो हमारे हर शहर प्रौर कस्बे की छोटी बड़ी इमारतों में एक पब ही दुनिया बसी हुई है पवा महीं वह फिस नये विश्वामित्र की छायावादी बहक का परिणाम है कि उसने सारी दुनिया पर और उसके विपि-विषाम पर पानी फेर रखा है। वेद, उपनिपर पौर धर्मशास्त्रों में मासों करोड़ों पर्प के प्रयत्न से मिस परम तत्व प्रारमा का सूक्ष्म अनुसंधान किया मया पौर जिसके लिए भूपि मुनि योगी पी-पीकर मरे पोर मर-मरकर गिए उसे यहाँ के छोटे-छोटे मसको ने तारों में पाहों में, रजिस्टरों और भाममारियों में ऐसे सम्हासकार बन्द कर रखा है कि प्रारमा क्या परमारमा मी पाजाय तो पड़ा अस्पता रहे। मास फीते से चारे का सार ही म हो। परी-बी शाबत माननाएँ, रस, एन्द पौर प्रकार-जिनके सिए महाकपि मोग मगरपन्ची करनेकरखे मर गए, यहाँ हबारों पौर या एश्वर की दुनिया मालों की तादाद में 'पिम' पौर 'टैग' किए हुए परे है। पालकम कहानी उपन्यास पौर नाटक मिसने वालों को चाहे रात राठ भर पागठे रहने के बाद भी कमानक पर पाम न मिसते हो, पर यही पग-पग पर कथानक मौर कदम-पदम पर पात्रों और कुपापों की यह भीर मरी है कि बिना पढ़े ही प्रेमपन के उपन्यासों का मका प्रा जाता है। मी हाँ, बहा के सोग मौरतों की तरह भरें, वहाँ के पूरे दयों की तरह टुसकने सर्गे, यहाँ के मूर्ख पंडितों को मात दे पार पहाँ के दुष्ट देवताओं की तरह सिंहासन पर बैठकर उन्हींकी तरह या मौर ट्रेप में पारङ्गत हों तो बताइए, पाप इनमें रिमा इसाचन्द्र पोशी के मनोज्ञानिक उप मामों से सिर फोकी? बताइए गर्मियों में गुसूबन्द सगाए, पर पर बन्द गमे का कोट गटे उपर्ट के नीचे पोती पहने या कुर्त पर हैट मोर पामों में मोटा-मोटा कापस भगाए देशी गातुर्मों की त्रिसुवम-मन-मोहनी सौन्दर्य घटा का प्रवलोकन करेंगे या वेग येषा, बेसार देगरर, अमरख बेहरम, बेघरम मादि महाकवियों की रस से हाहाती रचनाएँ सुनना पसन्द करेंगे? गपे पोर पोरे कैसे एक-साप मोठे जाते हैं ? मैस पार भैसे की जोड़ी कितनी प्यारी सगसी है? कुत्त बिल्ली हे पौर सतर एक साय कैसे रप पा सकत है-पदि यह देखना है तो पाप हिन्दी साकार छायावादी महाराव्य म पाकर मेरे साप दफ्तर में पाइए, बेसी पसगतिया भापको यहाँ मिसँगी पसी नेम कुमार के उपन्यासों में भी एने से न पाइएगा! हिनस्थान और उसकी समस्यामों को देखना-समझना है तो नाहक पापी मेहरू की पुस्तकों में सर सपाटे हो? दफ्तर को देखिए-से मगधाम मे भयो-बरों मनुष्य पृथ्वी पर पैदा पिए है, मगर क्या मशाल कि कोई एपट वासी प्रधेरे में मौ अपने पति को पहचानने में पत्तती पर टेसर सूरत, स्वमाष पौर पबहार में एक दूसरे से अलग ! क वैसे ही दफ्तर की दुनिया में दस-बीस महीं सपनों पायें पादमी एक जैसा काम करते हैं, एक जगह उठते-बैठते हैं, एक-सा वेतन पाते है, एक से क्वार्टरों में भी रहते हैं, मगर मा मनाल कि वे किसी एक भी बात पर एकमत हो सकें। कहीं भी उनमें एका हो । सब एक-दूसरे से मिरामे पोर प्रबीच ! पही पसली हिन्दुस्तान है न ? कोई हामी जैसा भारी-भरकम पो कोई बिल्कुस ऐसा जैसा रेगिस्तान का ऊँट । कोई घोड़े-सा चपम तो कोई ट२ पैसा परियस ! कोई भेरिए-पैसा सूधार सो कोई इसे-जया पालतू । कोई पैस की घर पुतमे गामा तो कोई बिमाई की तह ममाई साफ़ करमे वामा । कोई चपरासी की खास में मेर तो कोई पफसर की साप्त में गमा । को ऐसा तो काt मटमैसा । को पुष्प तो पोई पापाल । गरब यह कि विधाता मे अपनी फैक्टरी में पापमी की पाति के जितने भी मॉग्स तैयार किए हैं, रफ्तर के प्रयापपर में तम सबके नमूने पापको तैयार मिलेंगे। हमारे कहने का मतलब यह नहीं कि दफ्तरी मोग हर बात में एक-दूसरे से पृथक् ही है। इस बातें उनमें प्रसाभारण म से धामाग्य भी हैं, जैसे सब हर सप्तरों से ग्रो है, अफसरों से जापत है, गालियो का सिसा नहीं मामते पौर मुशामद करने में २५) के चपरासी से सेकर २५००) तक के सेक्टरी तर समान रूप से सनद प्राप्त किए हुए हैं। यह ठीक है कि सुपरिम्टे रेट या मैनेजर के मारे उमकी पोती डीमी होने मगसी है और पेस्ट बिसस्ने समता है, मगर दफ्तर में उनकी कुर्सी के सामने काम पड़ने पर अपना से मदमा सर्क भी जरा मरे होकर वो देखिए, भापके होश डीसे न परदे तो नाम नहीं । मौर मर्यो म कर ? माप सास समाएँ कीजिए, प्रस्ताव पास करिए, पसूस निकामिए, सरकार पर पोर मलिए, वह मानते हैं कि राम की कुंगी मार नेहरू के हार में नहीं उनी कसम की मोर में है ! यह शक है कि घर में योगी के मारे
मोई झापी मा भारी भरकम तो कोई विमुम ऐमा बसे रेमिस्तान
का! मोमो मेमा पपस नो को ट्रमा प्रशियन को मेपिए
बसा गार पो को कुत्ते नेसा पामतू !" (पृष्ठ १२)
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दम्वर की दुनिया और बाजार में साहूकारों के मारे उसका रहना-निकलना दूभर हो रहा है, मगर यह उनकी घरेलू बातें, इनमें दखल देने का मापको कोई हक महीं हो, बाहर भगर पैन्ट की कीष वीसी हो शेव म मनी हो पास के हों न चमकसे हों तो पाप शिकायत कर सकते है। शनिवार को प्रगर सिनेमा न बाएं, रविवार पी भाम का मोचन बाहर न करें, १५ तारीस से पहले ही वनस्वाह समाप्त न होनाए तब पाप पाहें ठो यह सोच सकते हैं कि बार अपने धर्म से रिग गया । नहीं तो वह सरप सनातन धर्म का प्रयाध रूप से पालन करता दुनिया में बार-बार युख क्यों होते हैं, यह मेरी समझ में नहीं पाता । इसे रोकने के लिए ही परोहरों समर म. एम. मो. पर खप किए पा रहे हैं। दुनिमा को महमधीमता भीर समन्वय का पाठ माज बी० एन० गय की स्पीच से नहीं, रपवर के वातावरण से मेना चाहिए । यहाँ गांधी के शिष्य, मेमिन के नावी पपिम में पिटू और गुल्मी के पेले एक ही कमरे में पाठ पप्टे रहते हैं, मगर कैसी शान्ति, उनमें नमी पापाई की भी मौवत महो माता । यह महीं कि ये तुप गते हो, या हम न करते हों, प्रथा कोई किसी की बात मानने को तैयार होजाता हो । ये सिर्फ यहस के लिए बहस करते हैं । इसमिए वहस करते हैं कि बहस करना पंचम पार गरप्पन की निशानी है। पापने कभी शालिग्राम की बटिया के दर्षन किए है ?--गोल, मुधिकार और मयनानन्द से परिपूर्ण । बस, दफ्तर के बाबू को मी पाप एकदम पामिग्राम को ही बटिया सममिए । पैसा ही कोने, किनारों से हीन, मोग-सिसपट । साही पिकमा बिस पर नाम को पानी नहीं ठहरता। पैसा ही देवता रिसे मुख सताती है म प्यास । पैसा ही परपर कि ससार में कुछ भी होता हे नमक कार्मो परमही रंगती। वह भला पौर उसका कुर्सी पो सिंहासन ममा। पी मे नठामा, उठा । बीबी से दे दिया, सो मा मिया । काम मिला,
कर दिया । मिमा, बैठा रहा।गट मगादी, कापमे ममा । निकाम
दिया तो रो पड़ा । साहब की सीभी नपरे हुई, तो फूल मया । बीबी
ने परा ईस कर देख मिपा वो गा उठा-
पक्षिा मिला लिया गरमा बसेमही बाबर हो ।
१०
हिन्दी के आलोचको
"तुमने पालोचना बिखने के लिए दो सौ-
पचास पद पपनी गरी में मोट कर मेर पर रह
रेम पाहता कि तुम हम सबका एक बार ही
मेरी पुस्तक पर प्रयोग कर बैठो 1
मैं 'हास-परिहास की कविताएँ पञ्ची मिसमे लगा है। पश्वी ही नहीं बहुत प्रधी लिखने लगा है। इसके प्रमाण में मैं पापो सम्पादों के पत्र कवि-सम्मेलों के निमन्त्रण पार छपी हुए कपि पापों के वे सब 'कटिंग' पो मने सम्हासकर एक रजिस्टर में चिपका लिए पय पाहे तब दिसा सकता है। मेरी सफलता का इससे बड़ा प्रमाण पर क्या हो सकता है कि परिवा बिना सुने ही मोम मेरी एक्स पर हंसते हैं, सुनने के बाद तासी पीटसे है मौर बाहर निकसने पर मंगुसी उठाते हैं। इसीलिए पर हिन्दी साहित्य का इतिहास मिस पाने वाले प्राचार्य रामचन्द्र शुक्म के प्रसामयिक निपन पर दृष्टि समता तो कभी-कभी मुझे बड़ी मिराशा हो पाती है। हाय ! पर शुक्सबी के बिना कौन मेरे स्थान को हिन्दी साहित्य में स्पष्ट कर सकेगा? वर ऐ हिन्दी साहित्य के नवीन इतिहास लेसको । विधाता की इस सूम को यो उसने असमय ही शुक्मी को अपने पास गुसापर की है अपने इस उत्तरदायित्व को पो मनायास तुम्हारी पसम पर पा पा है क्या तुम निवाह सकने में समर्थ हो सकोगे ? दुधिमानी सीमें है कि तुम इस अवसर से माम उठामो। तुम्हारी मेखनी मेरे विषय में मिसते हुए पय हो उठे। तुम मिसो "यासमी जैसी प्रमर शक्तियां साहित्य के इविहास में कभी-कभी ही उवित होती है । हिन्दी में इतिहास में तो इने-गिने दो-पार ही म्पमित है, जिमका नाम पर य म्यासमी के साथ मिया जा सकता है। इस घोटी-सी उम्र में ही उनकी कसम मे पो पौहर पिपाए हैं, ऐसे उदाहरण हमें तो हिन्दी-साहित्य में देखने को नहीं मिले। कोई मसे महे कि गुस्मनी मबीन मेवों के यधगान में बड़े
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हिनी के पानोपको मानो में तु रास्ता बनाना (पृष्ठ १०) रिम्पी भागोचने ही पण मे पर भाव कहीं यह होते भौर मुझे देख पाते वो विश्वास मामिए कि वह मेरे अन्तर को सोमकर रख देते मौर लिखते "मासीको विद्वापों में हमें मिप माप की दुना मांडी मिनी । पम्होंने प्रपम्प पस्तुमा में से हास्य गमावनाम पर बीवन की हास्पोमधीति का गमान मिया है। प्रमिभ्यग्नावार पापापार (प्रेशनिग्म) पुरकर वामयिक लहरियों से सम्मानित म्यात्तनी की हास्य-मृधि पूर्ण हो रही है। पर शोक } बह रलपारसी न गा ! तब ए नए युग के उदार समापापको ! तुम अब मा लियो "व्याप्ती ने हिन्दी के सारे परिहास बों को .. मम पया १... मौत पीछे छोड़ दिया है। एक प्रकार होते तो रोतों समे अमृती रग भावे । 'हास्यर के पुराना और माता परिचयों। सपेराम्य होता है पर हास्य गे पिम्प और बस्तुओं में बांगना या कार्य है । म्पसनी ने त महत्वपूर्ण कार्य को पपने। हाथ लोगों के मस्तक को चारठाया है।पर को गए रस, तुनधी की सद मापौर पिदा मेसए मर प्रिय रहेपे।" पौर ए मेरे पासोमक दोस्तो। तुम्हारी मित्रता यदि पाल के रिम काम नहीं माई तो फिर किस दिन काम पाएगी? अपनी पुस्तक पी पहमी प्रति मैं तुम्हारे पास मेज रहा है। तुम हिन्दी के पदों में रह प्रशान बरपा कर दो कि कहर मच पाय ! मेरी कविता में दो पुण नहीं है उन्हें मोग मिकासो। पाठापो सोप न सके, वह सिख गमोहे हिन्दी के मामोपको प्रायो, मैं तुम्हें रास्ता बताता हूँ। तुमने पासोपना सिखने के लिए वे मो सौ-पपास सम्म प्रपमी गपरी में मोट कर मैप पर रस मोहे हैं, बाहता है कि तुम उन सब का एक मार ही मेरी पुस्तक पर प्रयोग कर मंगे। तुम मिलो "प्यातीधीपासका प्रमूक सेवा भावासोप्यरत पो पापौर प्रमको मेयर पनी मतवाल हमारे पास का पता पो नही सकते।" यही नहीं, तुम यह मी मिसी "सर पमोत पर हिन्दी में ऐसी कोई । पुस्तक नहीं निकली, इम अपेक हिनी सनम प्यान इ3 पुस्तकको पोर पावरमा बम है।" भाप क्या हिन्दी के पाठकों की भारत से परिचित नहीं किये किसी भमे भारमी की कद्र नहीं करते। भले न करें। परिहम मापस में संगठित है तो पाठक हमारा कर ही क्या सकेंगे। पाप मेरीना कीजिए, मैं पापको दाद दूंगा। मै कपि ही नहीं भासोचक भी है। पाप मेरी प्रासा कोरिए, मैं पाएको वारी के पुस बांध दूंगा। यदि कवि , तो पास पौर वास्मीकि से बड़ा दूंगा। मदि भाप इतिहासकार है वो विसेम्ट स्मिक से भी ऊँचा उठा दूंगा। पदि पाप विधारक है जो परिक्षा पौर मिनोगा से भी दस हजार मीम (मायकम के वायुपानी युग में काम क्या पीर है) पागे बड़ा दूमा-मनतुरा कानी दिगोयम तो मरा हामी विगो । मियो } में चाहता है तुममें से तुप पान-मकर मेरे पिक सिवमा गुरु करदें। पर्योकि मुझे बताया गया है कि ये विषय पालोरमाएँ प्रचार में बड़ी सहायक होती है। हो, तो पनारसीरास बतुर्वेदीजी, एक पान्दोमम मेरे नाम पर भी सही ! माई एम विसास में प्रगतिवादी नहीं है-एक तमापा मेरे गाम पर भी। मेरी कविता के अन्य प्रकार और भ्याकरण किशोरीमासमी कहाँ हो, तुम्हें पुकार रह है। मैं कममणिमा नहीं है मेरे पूरवी मियो । कहा सो रहे हो? तुम मिलते क्यों नहीं.. " मिजो मान बही विमनने पापा है। हास्य मिरे मोयों ने मितीमा समस्यामा म्याध माप महाभयमे एक पुस्तक बनेकी मिनी । लेबर पर पावसाने या धमकम है पर पतन ऐसे हास्यसममा हमें तो अम्पा रिमाही पर। बनावको मतीताय तरी बाग में हास्प ही नहीं करता। रुकि तामापाप एमपुराना है और विधारमात मी है।मारीको पालत शिक्षित किया गया है। मारीयोगामारी नित मोडी लिपीत तर विलाई रती है। ऐसा माना है हिनिया को भी वि भावना ही ममी के प में मुबार हिन्दी के प्रावोषधे ६६ हो रही है। अमिताभ कवितामों को पड़ा समा किमह भारतीय पा कालिमही, स्वयं स प रा पहन है। इन कवितामों मनी की एसामता है। सुरधि, पिपता और सामाविता की प्रक हेनता को पा । विकास कविताएँ प्रमतीनाममी पापात्मनों मुकामे हमारा मिोम साहित्य कितना और मयप्प है कि प्रसकी तुलना नहीं की जा सकती । यात पनर प्रेग्रेजी नही जानते तो मन्हें अपने पड़ोसी गाली, मराठी साहित्य होहोरेख बाना चाहिए । तब गई अपना स्थान ठीक से रिवाईबापना कि जिनके पास में गरकी रचनाएँ, नियनी हा विनो बोबो पार एयन तुमी।।" इसके बाद तुम पास मूदकर मेरी किसी एक कविता को उठा सो पौर उसमें मगह-जगह छन्द मा पुनरावृत्ति प्राम्यप्रयोग मौर पस्तीमता की बारीकी से तमाध करो। प्रयत्न करमे से वासू में भी तेम निकम माता है । पुस्तक के गेट-अप कागज मौर मूल्य पर भी सुम्हारी टिप्पणी रहमी पाहिए । प्रेम की प्रदियों को वषा पाना सही मामोचना नहीं है। पौर देसो चलवे-ममते मेरे प्रकाशक पर भी अपनी स्याही की दो ऐसी सिरकमा कि प्रगमी पुस्तक छापने से पहले उसे दस गार स्रोपना पर वाय । मतलब मह कि मेरी पविता को हर प्रकार से तुम्हें दो कौड़ी की सिय करके ही दम सेना है, समझ गए म? यह मेरी पहली पुस्तक है । मुझ पर बड़ी-यगे किवा वो वाद में लिसी भाएंगी पर कुछ घोटी पुस्तकें यदि मभी निकल माएँ तो कोई हर्ष न होगा । मवमव मेरा कहने का यह है कि यदि 'व्यास की कसा (गुप्तजी की कमा) 'भ्यास एक मभ्ययन' (साकेत एक अध्ययन) मेसी मिन्दावें भभी नहीं मिमी पा सके तो पनाव प्रभाकर मापये तुम गस्दी-से-बल्ली दिस्सी पसे प्रामो । मैं प्रामकल यहीं है । मुझ से माकर दो-बार 'इन्टरभू से सो पौर पस्दी ही "व्यास के विपार' (जनेन्द्र के विधार) माम से एक पुस्तक तैयार फर दो । क्षवाने का सव प्रबन्ध हो पाएगा। भौर पाठको, ऐ मांगकर पुस्तक पाने वाले साहित्य के शौकीना.
मपाक नहीं सुपामद करना भी एक कसा है। और कमनस्त, ऐसी कसा है कि सारी दुनिया इसमें माहिर होना चाहती है भेकिन बदकिस्मती भी ऐसी है कि मानमेगाने पौर भयवाम पाने झूठ या सब किसी-किसी सम्म देश में दो चोरी सिमामे सक के सूल-कासेब सुस गए है पर सुसामद पैसे सुशनुमा मौर दिन रात बहार में भाने वामे परम उपयोगी 'पार्ट पर न तो कहीं कोई रिग्री कामेज है भौर म किसी यूनिवर्सिटी में इस विषय पर श्रीसिस' ही स्वीकार की पाती है। मतीमा मह है कि योपियों के लिए भी परम धर्मम इस महम तस्प का विविवत मध्ययन नहीं हो पाता मौर इस पिया का सा शास्त्रोछ पौर सुसमात प्रचार होना चाहिए पैसा नहीं होरहा। प्रमी पो हास यह है कि पादमी की ममल मे अपने-अपने समय मप्सम हुरी-कोटे बमा रमे हैं कि सेक-सेककर टोस्ट पर मक्खन लगामा पारहा है पपने-अपने पाष पार कटि है कि परन्द पस रह, मसियो पटक ही है अपना-अपना मोगा पौर करािमा है कि पवर्म साई पारही है और पेच-पर-पेच सलमा दिए गए हैं और इस तरह अपनी-अपनी किस्तिया है कि पार में मोर की गई है कि किनारे सम पाएँ तो राम मालिक पौर दूब मरें तो मी भयमाम की। भाई मेरे, पितापी की फामत कमाई पर मोटे सा-बाहर की. ए., एम. ए. होगामा भीर गाव है मार पोरन में बिना कौड़ी से सफलता माम करना मनग मात है। पापने पाह पनीस पर्ष तक समात् ब्रह्मचर्य पाप्सन परके पैसे-तैसे विधासकारिता मने ही हासिल कर भी हो, किन पर तक सुनामद का कोर्स मेकर मापको विकदम' की समय नहीं मिलती, अब तक किसी ममगार phal "माफ नही नपामर रमा भी एक कला है !" (पृष्ठ ७२)
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शामर मी पफमा की सम्पादकी तो क्या, मापको श्रीमाननी, कहीं चपरासीगीरी भी नहीं मिल सकती भी हाँ पपरासीगीरी ! विश्वास न हो तो अपने शहर में जो म्युनिसिपम कमेटी है उसके सके से ऐकर सैक्रेटरी तक स एकान्स में पय पूम मीजिए कि हपूर, को-कुछ पान पाप दिखाई देते है यह सब किसकी बदौमत है ? हर ईमानदार भावमी मापसे यही कहेगा-प्रजी, हम किस कापिस है, यह सो महामहिमामपी परम भगवती मुबामर देवी का ही परम प्रसाद है। यही क्यों, माप किसी भी दफ्तर के मैनेजर क्या है सई तक के हाप पर गगाजसी रसकर ईमान से पूध मीजिए कि महाराण, हम किसी से भी मिल नहीं करेंगे, न भसवारों में ही छपने देंगे, पर पाकर यह वो बताइए कि बिस कुर्सी पर पाम हमें बैठना पाहिए भा, वहाँ पाप से गिराममान है? वाक्या उसर देंगे यह वो में महीं मामता मेकिन इतना प्रमश्प बवावं कि जितने भी ये पोबरे पर, कोस्टर, तहसीलदार पोर पानदार है, इन सबकी नीव में कही-म-कहीं मुशामद का पानी प्रवक्ष्य पड़ा हुमा है । पोर मर्यो म हो, सुशामद कोई भाष की या भनहोनी पीज हो है महीं। हम सबका सिरममहार, असिम विस्म का मिमन्दा, परमेश्वर ही पन महा सुग्रामवपसन्द है तो हम भरती के सुन्छ मनुष्य की क्या पसाई । वेद-शास्त्र, पुरान-कुरान गीता-बाइविस सब एक स्वर से कहते है कि उसकी प्रार्पना करो, उससे दुपाएँ मापो, उसके सामने नाक रगड़ो, अपने को तुम्ब समझो उसे सर्व अधिमान हो । यही नहीं, उनका यह भी कहना है कि पाप लास पापी हों, मेकिम सारे पीपन में यदि एक बार भी प्रापकी मुसामद- मरी टेर उस तक पहुँप पाय, तो बस फिर पनम-जनम के पाप स्वर्म ही कर पाते है। प्रवामिम, गीव, व्याप, मएिका पोर यमराज की पमर पाएँ, हमार मुख से सुपामद की ही महान पति का पय पोप कर रही है।
यह कहिए कि तकवीर हमारी कुछ प्रन्धी पी मो भीघ्र ही हमने सुमामद के महत्व पौर महारम्य को हयगम कर मिया । सम्तायों की चिलम भर-भरकर हजारों नई-पुरामी कविताएँ याद कर गमी। पचासों जगह उन्हें अपनी महाकर सुमागमा । तिकाम से मकस कर परके विशारद मोर साहित्यरत्न पास कर गरे । कषियों की सुधा मद करके कुछ तुर्के मोड़ना सीस सिपा। महान कलियों पौर केसों की नई-पुरानी कृतियों पर प्रसंसात्मक मेज सिसे । सुशामद कर-करके उन्हें पनों में पाया। इस पर समकम से साममा करने पर मान यह दिम भी पाया कि मोम सूम गए कि हम पहले स्या थे? पर तो हम है महामहिम सनाम पम्प भी कषि मेशक और पत्रकार तो भाई मेरे, इसीलिए कहा है कि शाम से भागो मत । इस दुनिया में सब कुछ मसत्य है । सत्य केवल दो वस्तुएँ है यह यह कि अगर नामायक हो तो वृक्षामर करो पार मायक हो तो सुशामर करामो । प्रसार मार सफलता का रहस्य, बस इसीमें विपा है। इतनी भूमिका मौर सुधाम के इस महामहिमामय माहात्म्य के बाद भाप शायद इस कसा के कुछ तौर-तरीके मवश्य पानना पसन्द करें। यों तो यह विपर योगिरों के लिए भी दुतम पौर तपस्वियों के लिए भी परम महम है, पर मोंकि मपनी पत्नी के पुण्य प्रताप से मैंने इसमें मस्किषित सिरि लाभ की है, इसलिए, अपने बीमाई पानी के कुछ अनुभूत प्रयोग भापती सुविधा के लिए यहाँ देहा है। माना है मेरे इस परमार्य से पाठकों का स्वार्थ प्रवस्य ही सिर हो सकेमा । वो सुनिए, सुशामद की कता में सबसे बड़ी पौर महत्वपूर्ण बात यह है कि पाप खुशामद हो कर, मेकिन सुशामदी न समझे पाएँ। पानी, जिसकी तुणामद भाप करना चाहते हैं, उसे महम मासूम हो कि उसकी खुशामद की पारही है। माप में से शायद कृष मेरी इस बात से सहमत न हों भोर
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महामहिम, पाप के लिए प्रगम और गटरों के लिए धर्मम है होमियोपैच भापके भागे पाने से हिपको है और हकीम चारों की तो बस हिचकी ही वेष बाती है। तीन मोक में मापके उतारे का कोई पौर उपाम संभव म समझकर, हम सब मापकी ही धरण पाए है, पाहिमाम प्रभो । रमा कीजिए, क्या कीगिए । हेनराधीश, प्रपमे महाधनु कुनैन को चारों कोने वित्त पधारकर, पापने जो परम पोल्प प्रदर्पित किया है, उससे बेचारी फुटकी के प्राण पुटकी में निकम गए है । तर चिरायता, ज्वरनाशक और पूड़ी-ताप ममा प्रापका मा विगार सकेंगे? पर पस्पूरीन मौर नेपाशीन की कुछ नहीं चमती तो बेचारे तुलसी के पत्ते प्रनी पढ़ाए उन्हें शामिग्राम पर! हे महाकाम कौन ऐसा है जो मापके प्रबम प्रताप से परिपित न हो ? मरे पगस में घर से बचा जा सकता है, बरसती रात में टूटी छत के नीचे टपके से पपा पा सकता है, पोर वार करते हुए सना से बचा मा सकता है, दफ्तर में बड़े बाबू की पुाकी से भी निजात मिम सकती है पौर पर में मीमतीधी की मम्तरानिमों से भी वनमे के तरीके ईजाद होगए है । मेकिन है परि-मद-मर्म ! जिस पर बीवन में प्रापकी एक पार कृपा होमाई, उसकी दबा तो धायद फिर पन्वन्तरि के पास भी नहीं है। हे प्रसयंकर, मारतवर्ष में वास करने वाले तीस करोग देवताओं की (पर ननकी जनसस्या मीर मई है) मापदे पातक से पिम्पो ष पुकी
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"उनाने लिहाफक मार गाई रवाई उमर कमत समय के सर
गहा रेम्मर दरी और के सार चारर प्रोककर मिस पैया-मूल का
प्रपर्णन किया कि
।" (पृष्ठ १)
मसेरिया महाराण है। मई दिमसी में वास करम बाले बरेन्यो विलासी इन्द्र वाटर वास के सुपरिटेरेन्ट मानी वरूप, विषमी कम्पनी के मैनेजर यानी सूर्य और ममवारों के सम्पावक मानी नारदों के पात पापकी छाया मात्र से किटकिटाकर वर रहे हैं। रोयो गुडे पार पानेदार मापके गर के मारे कम्मत रवाई, सौर और गहों में बचा हि । यही नहीं, इन सबसे भी परम दुर और परमनीय हमारी 'उन पर यो उस दिन मापकी कृपा हुई दो में हराम होगया! उन्होंने मिहाफ के मर रजाई रजाई सर कम्मम, कम्पस के ऊपर गदा, गरे के उमर दरी और दरी के मर वापर भोड़कर विस चैमा-नृत्य का उस दिन प्रदर्भम किमा मा, उसे मपि रविवार देख पाते तो निश्चय ही वह भपनी शांतिनिकेतन की कमा-कस्पना पर दीन हो उठते ! नवपकर के उपर मस्तिष्क में भी इस प्रकार के मृस्य को कोई समावमा मभी तक पैदा नहीं हुई होगी। पहह ! सा पपूर्व रस्म पा! माट हिस रही है, कि देवीनी हिम रही है, कि पास सहा मैं हिल रहा है कि हम सबको हिलाने वामी परती हिम रही है-कृष समझ में ही म माता पा ? ऐसा मगता था कि अपने पूरे बेग पर महापिनाको का तारय मुरू होगया है और परम भगवतो अपने लास्य के लिए अपनी सैया पर से उठने ही वामी है। हे प्रमो, प्रगर हमारी ससार पाकिस्तानियों से फुर्सत पागई होती या कम्बस्त गस्टरों ने कुनैन में पायरोट म घोला होता और वैचनो की पुरानी पुस्तकों को दीमक म पाट गई होती तो हम पापको इतना कष्ट म देते। मेकिन पप तो हाल यह है कि पनाही गटरों में दे-देकर हम मेरी बांह को धमनी कर दिया है, मेरी पत्नी के गले में पीपल का पता मास कपड़े में पा सटकता रहता है मेरे दमे एक प्रौन में कामस ममाए फिरसे मोर उनकी दादी ने पाक पर मनौती के इतने पैसे पढ़े कर रहे हैं कि पमर रहें से सकने की हिम्मत मुझे होगावी तो सघ समझिए कि कम से कम एक महीने की साफ-मानी का काम तो बस ही जाता है। प्रवर्यामिन, कास पौर कपार का रास्ता ससरे में है, इसलिए मुनमकार्मों का मोप होगया है, पेय पौर प्रमार के दर्शन दुश्वार होरहे हैं, मौसमी बेमौसमी होगई है मौर मिट्ठे पट्टे निकलने लगे हैं। तब, पानी मरी गोलियां और पानी पानी दूध ही तो इस १२५ पौष, ५ फुट एप पाझे शरीर का प्राधार है। परम पुर्व पारे परमुरामबी तो केवम २१ वार ही मकेसे क्षत्रियों का नाश करके पक गए, लेकिन प्राप पस-सहनों पो से विमा पके दृष्टि के दीम-हीन मटके प्राणियों के लिए मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करते पसे मारहे है । मेरी दावी जिसे जीवन में ५६ बार हाट से मौने नहीं उतार सके, वह पापकी तीन पामियों में ही पाराशायी होगई। मेरी अभागी जो मुइस्मे-भर के झमड़ों में सहन ही विवय-पी प्राप्त कर सेती पी, प्रापसे उमझ कर पाम बसीं । यही क्यों, पड़ोसी भनुमा, मोदी सालिगराम पीसा मोनी गएर हसवाई मगू पहम मान बिन पपको मैं अपने मैमे-कृषसे कपड़ों में सांसते-संसारते देखने का अभ्यासी होगया था, वे सब पापकी सेवा के लिए यहाँ से विदा होचुके है । पपीसी कॅनडिन पौर सांवरी मामिन भो प्राहकों के एक पाने पर भी अपने प्रमन्त भगों को बड़ी ही सुखद मागरिक भापा में पुकाया करती पी पेसता है कि पिछसे सप्ताह से उनकी सुमधुर पमि भी लिएकी की राह मप-मंपर गति से मेरे कमरे में प्रवेश नहीं कर रही । पौर हो, मापके प्रताप से अपरिपित उस गगोमी गफ्टर का पह मगोमी कम्पाउर, पो ग्टकर मिस्पर में पानी मिसाया करता पा, कम से रिसपेम्सरी से गायब है! हे हे मलेरिया महाराज इसमें तिस-मात्र भी सन्देह नहीं कि हम संसारियों पर पापकी कपा हित की हप्टि से ही होती है । यदि प्रति वर्ष हजारों-मासों महेरिया महागण बीवों पर भाप यो पार करते रहें, तो हिन्दुस्तान की पावादी भमा कही समा सकती है ? मोग मापस में ही कट-कट कर मरमें ममें निगम नमे महामारतों की सप्टि हो प्रति वर्ष एक विश्वयुर की सभाममा वमी रहे पोर म पाने क्या-क्या होने मगे ? प्रस्तु, हम संसारियों को प्रकाम मृत्यु से बचाने के लिए, गरीबी बेरोजगारी पौर दूसरी ममों से मुक्त रसने के लिए प्रौर सति-निग्रह एवं ब्रह्मचर्य जैसी भ्यर्य पीचों के प्रभारनिषेप के लिए ही मापने परा पाम को सुशोभित किया है। पाप मशरण मरण हो ! पाप रीमा हो !! भापकी जय हो जय हो, भय हो !!! हे पशरण शरण भय कुनैन मही पाई पाती । कान मनमना रहे है दिमाग पिनपिना उठा है और तबियत-उसकी न पूछो प्रमो ! अपने ही घर में अपनी शरसापियों की सो हासत होरही है । हिन्दुस्तान पहले से ही प्रापमिक मिकित्सा में दस होगाम यह सोचकर मापने पर पर को अस्पताल में पलट दिया है । प्रनार का रापन है। कन्टोल टूटने पर वह भी गायर होने वाना सुनते हैं। इन सबका मापने पेद्यमी उपाय कर दिया है कि पहले वो मापका पापात्र कुछ खाने- पीने के मायक ही न रहे, फिर प्रगर माने-पोमे पर उतर ही पाए तो ज्यादा सापा ही म बाप और पो मी साए, वह पा म सके। बहुतहमा प्रमो दीपावती बीत गई। उस प्रमेर दीपराशि में निश्चय ही पापमो माहों (मधरों) का प्रमाण होगया होगा। इसलिए प्रापफो कहीं पाने-बाने में बड़ी ममुषिमा होती होमी । फिर जिस काय के लिए पापने परती-सस पर अबतार धारण करके भारसवर्ष में प्रथम किपा पा से हममे हिन्दू-मुसलमानों के भगो में स्पष्ट हो पूर्ण कर सिमा है । प्रा पाप प्रपर मोगों को प्रस्थान करें तो पा शुभ हो । ६लिए, सुदूर पदिषम प्रापको पुलोसो देहा है, पर
१
प्रमीका मापका मातरम कर रहा है । लेकिन मरतसर की महा
महिमा से प्रभावित होकर यदि पाप इसे छोगमा ही न पाहसे हों
तो हे कूटनीतिम माप अपना हरक्वाटर करावी में क्यों नहीं सोस
मेते?
प्रो३म् पान्ति शान्ति शान्ति ।
मुसीवत है "मग मुसीबत । प्रमिशान शान्तन पा मेवात पाने वा! तो फिवाब डीम मेती है कि पब तुमारी उम्र ऐसी पुस्ता पाने की मी रही।एम्प- पतक या भपवीता मेकर बैठा हूँ वो सिर पाकर धम्म से बैठ पापी है कि हाप पप । रहवाकर कमी सिनेमा में गाठता होमीटने पर घर में एक नया विटर पार मिलता है। मोर पा सबचे मार तुलसी रामापण गाने समता जो कहने कगती है किर रात में ठोबएमाराम कर देने दिया करो।
कोई एक-दो बार की बात नहीं हजारों यार अपनी 'उम' से 'कहकहकर हार गया हूँ कि देशो पाय-यास में दसत देना मन्था नहीं होता । पर है कि उसे अमरीका की भमनियों की इस चिन्ता नहीं करता, या से हमारे देशवासी नेताों के भापमों को इस काम से सुनकर उस कान से निकाम दिया करने । पसे ही हमारी श्रीमतीबी हमारी पात पर कोई ध्यान महीं देती। मरे माई, पाक-भानी में रसोई-पानी में कपा-सप्त में बेबर बाद में, मन-प्पबहार में पौर पर-गृहस्थी की दूसरी घोटी-मरी पीपों में भगर पाप सन रजती है तो ठीक है। दमों की पढ़ाई में घर के प्रबम में, मेहमानों की खातिर में प्राप दिसपस्पी मेती है तो उसे कौम पुरा सताता है । मेकिम मुझे कुर्ता खोडकर सप्सर्ट पहनना चाहिए भोर भोवी को मूंटो पर टांग टोगों में पदसून तटका सेनी चाहिए यह समाह भमा माप माँ देती है। मेरी सम्पी सम्बी मूर्षे रसमा, परा सजीवनी से पमना, सनिक कम बाते करला या बाहर भरी मेकर निकममा-समझ में नहीं पाता समको क्यों नहीं मुहावा? ठीक है, भाप मसमम पोड़कर बायस परीदिए, मायप फेंककर सिल्क मोमिए, गाउँट घाटिए, समबार पहनिए, गरारा पहनिए- और सब मवाळ, मुझे तो उनके पेट पहनने पर भी कोई मास एसरार महीं है परन्तु, भगवान के नाम पर मेरे बारी के मोती पुते को तो रोजाना मत कोसिए। माया, बादी के दोप-पुरण मैं तुम ममिक पामता है। कमी पर सूत निकास मिकामठे प्रेमियों में बम पड़ गए हैं। बादी के पादी को यह कहना कि यह मत्ती फटती है, फटकर सिम नहीं सकती, दो पटे बार मैती होवाती है, मोटी होती है, मोटी होती
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LAPAN
(पृष्ठ ८५)
हुई कि कौन रेय नीम ।
"प्रबाभी कोई बात
मुसीबत है है, यह होती है, वह होती है-कोई बात हुई ? वैर, मेरे रहन-सहन पोर कपड़ों में यह दिसबस्सो सेती है पोर उनमें मपनी रुषिका परिवतन करमा पाहती है तो करो माई। वेद-ग्रास्त्रों के अनुसार इस शरीर प्रशंग पर तो उनका अधिकार है हो । मेकिन यह क्या बात हुई कि सुबह उठते ही सानातसाठी मुरु होगाती है कि यह बिटो किसकी है, यह पूर्मा कहाँ से माया है, म नोट कैस है भौर पठ-रात में यह स्मास किसका उठा साए हो? मरे मई, एक तुम न मानो वो क्या, दुनिया ता मुझे भसा मा मी मानवी ही है । कपि है पत्रकार सुबह से लेकर शाम वक २. माठे हैं और .गाते हैं । अब यह भी कोई मास हुई कि यह कौन पे यह कौन है ? भाय यह फिर क्यों पाए ? सुम बार- बार इन यहाँ क्यों बामा करते हो? मुझे इनका यहाँ पाना पसन्द नहीं । यह पम्छे मादमी है। यह उरे प्रादमी है। यह चतुर हैं। यह मोन है। इन्हें देखकर मेरा मन बनाने को कखा है । इनके सामने मैं चार रेकर नहीं भागी। मैं कहता है कि जब पूछा जाय मौर पापसवा हो तब तक के लिए भाप इन पुम सम्मतियों को क्या अपने पास महीं रम सकती? रामन कम होगया प्राटे में सकरकन्द मिसा है। चावल ऐसे माते हैं, मूबी नहीं मिसती, मैदा कहाँ गई-ठीक है, पूछिए इन बातों को कौन टोकता है ? किन कृपा करके यह तो बताइए कि मेहमानों के साप सोने के मानों का क्या सम्बर है? साड़ियों रिगानों का क्या रिश्ता है ? पप्पों के सैटों को मा तुरु है ? में तो ग पागमा हगार तरह से कह देखा, मगर उनका हर बात में दसम देना बम्द ही नहीं होता । प्रजर मुसीबत है। अभिमान शाकुन्तम या मेपर्स पड़ने वैठता है दो किताब हाप से हीन ऐसी है कि अब तुम्हारी उम्र इन पुस्तकों के पाने की नहीं रही। राप गवक या भगवद्गीता मेकर बैठता है वो सिर पकाकर
Lo
धम्म से बैठ पाती हैं कि हम राम! उकनाकर किसी सिनेमा में
पा बैठता है, तो मौटने पर घर में एक मया पियेटर पार मिमता
है। मौर पर सबसे ज्यकर तुलसीकृत रामायण गाने मगता तो
कहने लगती है कि अब, रात में तो पाराम कर मेने दिया करो।
मैम्प गुमाकर सोने मगता है तो कहतो हैयह क्या किया,
उसे नसा दो । पमता हुमा घोर देता है तो पटदी है-भरा कम
कर दो। बल्दी सोमे मगता है तो कहती है-प्रभी ह परे से ही
हर्राटे लेने लगे } देर तक नींद नहीं पाती हो हर मिनट पर
रहोती है-पाहुपा भाव नींद क्यों महीं पारही ?
एक दिन मैं उन्हें गफ्टर के पास गया । गण्टर देखकर
मुस्करा दिए ।
मैने हैरान होकर पूषा 'करों ?"
बोमे 'हसार की परत इन्हें महीं, प्रापको है।"
मैने पाश्चर्य से अपमे घरीर पर निगाह गती। कहीं कोई रोम
दोष दिखाई नहीं दिया !
सस्टर बोते, “माप क्या काम करसे है?'
मैंने पहा 'काम ? पनी पाप मुझे नहीं मानते ? -मैं 81"
मोसे, 'बस, यही बीमारी है इसीका माग कापाइए !
मैंने हरान होकर पूछा, "क्टर, क्या कहते हैं पाप ? पिता,
लेखन, पत्रकारिता- ये सब बीमारी है ! में समझा नहीं ?"
“भौर नहीं गया? ऐसी बीमारी निमका कोई इनार मही,'
आपटर कहने सगे।
फिर भी गफ्टर, मुधबताइए, प्सीप !" मैमे पवपकर कहा
तो बोले, "इसका इसार यही है, पाप इन्हें पीमारी मान में।
निस दिन ऐसा समझ लिया, सममनो, बीमारी पसी मई।"
साहित्य का उद्देश्य
'यहाँ तक मेरा संप, मास प्रारंर पर
समाई करता हूँ। मै रोज पत्रों की मांग पर मिले
नाटक परीक्षाओं में सपने को पार किये है और
अब पार पर उपन्यास सिख पाई। साहित्य का
इसमे मौ पषिक कोई पार गेम है क्या
साहित्य का भी क्या कोई उद्देश्य होता है ? मेरी समझ में तो प्रभी पक प्राया नहीं। पर होता कुछ अवश्य होगा। क्योंकि अगर सचमुष कोई उप प्य न होता, तो तारों भरी रात की मद होशी में नय ससार सुस की मीद में बेसुध पड़ा रहता है, ये कषि सोग जलती मानों से पन्द्रमा को म ताफा करते तारों से तार न मिमाया करते, वायु की सिसकियाँ न सुना करते मोर पकारण ही ये पुरिमोनी अपने देश नगर, मुहले पोर पड़ीस क्या पास सेटी पामुनी परनी को भूमकर कमी चौदनी की याद म करते कभी निशा की साड़ी महीपते कमी स्वर्मगा में बिहार न करने पौर मी उपा के परिणाम पोसों पर उनकी मनचाई नपरें न फिसलती। रोय न होता तो क्या कहानीकार स्वयं अपनी कहानी को सूमकर बस के स्टैरों कॉफी हाउसों क्सयों नापपरों और वेश्मा मर्यो तक मैं पौर-दीकर बार-बार पहुंचते ? मावारों की तरह बाबारों में भूमवे ? पार्को में फिरते ? प्लेटफार्मों पर ताकते ? गमिर्यों को मापवे ? सिमियों को झांकते ? उद्देश्य न होता तो यो पार के नाटककार वर्तमान को भूत कर भूव का नाटक रचा करसे? भविष्य के पर्व उठाया करसे ? उपयासकार इस काग्रप की तंगी में भी पोपेपर-पोये रपते-विरपते पछे पाते? रपय न होता तो पासोपा इतना पता श्यों फाइते ? साहित्य क्यों एपवा ? पयों बिकता? सपमुष, कुष-म-कुध उदय तो साहित्य का होना ही चाहिए। पर सप बताऊँ, पब तक इसका सप्प मेरी समझ में नहीं माया ? माँ, मेरी साहित्य की सापना किसीसे कम नहीं । अपने साहिरियक पोवन में प्रवेश करने की रणत पयती मनाने में पब केबस एम्ममुण्मयी मारिया होना चाहिए।" (पृप २)
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सास्स्यि का रेय ५ मर्प की ही देर बाकी है। इस बीप मैंने यह नहीं कि सिर्फ दिल्ली में रहकर मारही भूजा होसूमों के मोट्स पौर कितार्यों की कुत्री से लेकर साहित्य और दान पर बोयो प्रयों को बम दिया है ! स्फुट कविताएं मिली हैं, संरकाष्य छपाए हैं, गल्प मिसी है, नाटक मिसे है, पौर उपन्यास लिम रहा है। टनों काप, प्रका एक लोग, मेरी कृतियों पर प्रप तक गमा पुके है। और यह मी नहीं कि पुस्तकें धस कर ही रह गई हों। वे विकी है। उनके सस्करण मी हुए हैं। ममता ने उन्हें किस हद तक पसंद किमा है, मह तो मैं नही पानता, मगर समासोचकों के शानदार सर्टिफिकेट उन्हें प्रवक्ष्य प्राप्त होगए हैं। लेकिन भगर पाप मुझसे पूर्षे कि मिसने के पीछे मेरा क्या उद्देश्य है, तो बात मापको भाहे निराशाजनक प्रतीत हो, में भाप से कुछ छिपाउँगा नहीं। माप्त यह हुई कि बचपन में पाना-तिमना कुछ कम नहीं पाया। सोहबत-सोसाइटी भी नहीं मिमी। स्वास्थ्य और सलीका भी नहीं पा। परवासे निकम्मा कहते थे और परिवार वाले भावारा। मावार माने विश्वास नहीं करते थे पर समाज बासों से यद्यपि ममी सीमा वास्ता नहीं पड़ा था, मगर पूत के पांव पालने में ही देखकर, पढ्से से ही नमके काम-yष स होगए थे ! अपने पापको यों चारों भोर से घिरा पाकर मै विक्षिप्त-सा हो उठा। यह मेक है कि मैंने हाप-पैर महीं फेके, कपड़े भी मही फा, साना-पीना भी नहीं होग, पर हा, मैं माने गोममाने प्रवश्य सगा। रा में से १२ घटे मेरे बायपाते पीतसे । मेरी मां को विश्वास होपया कि अब यस, कपडे फाड़ने की माबत प्राने ही पासी है। लेकिन पमी अषकमाकर एक दिन देखता क्या है कि मेरी इसी बाबसाहट को मोग कविता कह उठे है ! पहले तो मैने लोगों ने इस कपन पर स्वयं विश्वास नहीं किया ममर पर मित्रों से प्रारम्भ होकर उत्सयों पौर समा-सम्मेसनों तक में मेरी । A किया करते है। साहित्य को सक्ष्मी की झंकार म कहकर, पावसे मनोवेगों की झकार कहते हैं। सीधे स्वहित की सामना न मानकर, उसे लोकहित का साधन बताते है । साहित्य को भौतिक सत्वों में सहायक न समझ कर उसे मोकोत्तर मानन्द का दाता समझ बैठे हैं। क्या समझ है इन समामापकों को कि यो मन की विकृति से, मस्तिष्क की अस्वस्मता से पौर शारीरिक हास भोर त्रास से पम्म सेवा है उसे भोगों में मानवता का उसारक समझ लिया है। साहित्य पोर मानवता का भी कोई सम्बन्ध है, यह मैं पाण तक नहीं समझ सका? मैं पूछता है कि रिप-अपीरिस यक्ष ने मादलों द्वारा अपनी प्रियतमा को सन्देश भेजकर मानवता का फस्याण किया ? दुप्यम्त ने कम के मामम को सकृन्तमा से विवाह करके मनुष्य जाति पर कोम-सी रूपा की? राम मे अकेली अपनी सीता को पाने के लिए करोड़ों पर-वानरों को कटवा दिया सोने की मका को समाद फेंका, इन छल्पों के बयान के लिए बोयो पोपे रचना-क्या वास्मीकि पौर तुमसीदास की मनुष्यता पी? पण ने भारत भर के सेजस्वी-बीरों को मग-महाफर मरवा गमा, क्या व्यासजी महाराज 'साएों का परिमाण इसी प्रकार करना पाहते थे? तीन पर पुम्दामन से मपुरा पीर पंगदास, विद्यापति एवं सूरदास बेचारी रापा को स्मा-माकर मारते रहे, गोपियों की बीवन-भर तरसाते रहे और उनके प्रसिक मानवता की इस निर्मम हस्पा पर वाह-वाह करते रहे । प्रभा हा कि इस महानुभावों की परिपाटी पसी पोर । सिनेमाई कलाकारों में उस भूम मी देसते नहीं, कसे से मिम पाते है। की ममा माने मासानी सुद ही से
नाहित्य का गम निको पाना पोर मात मामा पार
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(पृष्ठ ११)
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साहित्य का रस
रार है, मगर पीघ्र ही या सो पदासत के कटपरे में या किसी के
माणिक मासूमों की दूदों से उनका धमन होमाता है पौर घट्ट
मगनी पट्ट म्याह' की शहनाई गगने लगती है।
भब बताइए, साहित्य का उद्देश्य यह होना चाहिए या बह?
मनुष्यता इसमें है, या उसमें ? मनोवेग इसमें अधिक मोझिम होते है
या उपमें ? कहिए "सारमप्पा" अधिक गाया माता है या "मो-सम
कौन कुटिम सस कामी' ? वताइए साहित्य प्रस्पमत के कुछ के
परितों के लिए है, या स्वतम्म भारत के, कोटि-कोटि संवेदनशीस
पुषक-पुतियों के लिए?
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पत्रकार की पहचान
"उसकी भेदती-कुरेती-सी पार पाने-
पीने से
कान मोर के पंगों-सी सिपहुई ममी-संगी गुमियाँ
पौर बम बाई की गर से ही पुकार
पुकारहवी-परेपो में पाया।
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पत्रकार की पहचान
"नसकी मेरती-दरेदती-ही पारें पम्ने मौकने से
काल मोर पंगा-सी हितरी हुई बीवी कामिया
पौर समाई ही हर से ही पुर
पुकार समी-अरे, यो में पार
मू समाज में भाले परितको म पाहताना पा सके और चाहे
-
व परितों के समाप में सूर्य की पहपाम म हो छेकिन भाषाम
के सम्य समाज में पत्रकार चाहे पैसे कपड़े पहनकर पाए, उसे
पहचानने में कोई गमतफहमी नहीं हो सकती।
मुंह मुममे पर तो बो से सेकर पाय बेभन शर्मा उग्र सकपी
पहभान होजाया करती है, लेकिन यह पो पत्रकार नाम का प्राणी
है उसे पास कान नाक, हाय की अंगुलियों पौर रीड़ की घी से
प्रपरे में ही माप लिया जा सकता है।
उसकी मेवती-कुरेदती-सी पवि, पन्ने चौकने से काम, मोर के
पों-सी हितरी हुई लंबी-मनी अगुलियो पौर बम साई हुई री
की ही दूर से ही पुकार-पुकार कहती है-परे, पचो मैं
पत्रकार है।
भो दुनिया की परर रसता हो, मगर विसे मुद अपनी अपने
पर की, परवासी की कोई सोम-समर म हो जो दुनिया की सबर
मेवा हो, मगर मुद उसकी सवर लेने वाला दुनिया में कोई म हो,
जिसके पास न पपना पप हो न अपनी कार हो, मगर फिर भी को
पत्रकार कहलाता हो-उसे तो सूझता क्या प्रभा भी दूर से ही
पहपान सकता है।
कपियों के सम्बध में जो यह कहावत है कि पमनात होते
है, पनाए महीं पा सकते उसे तो इस नई पनपणना में, कवियों
की महती जनसस्या में ग्रसत सिद कर दिया है, मेकिन, पत्रकार
पत्म से ही पत्रकार होते हैं, यह मात एकदम सब है।
बचपन में जो गामक सबसे पपिक दंगा करखा हो निर्भय
गानिमा वमया हो दिन-भर घर से बाहर घूमता हो, पिता की
पटमार मौर मास्टर की मार का भी रिसे विस्कुम मम म हो-
-
पत्रकार की पहचान एकदम समझ ना पाहिए कि महका वस पत्रकार बनकर हेगा । यह भविष्यवाणी १०० में १५ जगह सही उतरेगी। एक प्रति थत गलती की संभावमा सिर्फ तभी हो सकती है जबकि ऐसा सस्कारी मासा १६ वर्ष से भी कम उम्र में किसी मरकी को बिना सूपित किए ही, प्रेम कर उठे और सूषित होने पर यह लरकी उसे पुस्कार दे, सो समझ मीलिए कि माका हाप से गया यानी पद पत्रकार नहीं बन सकता । इस पेचारे के करम में तो केवन कवि होना ही लिखा है। पपि म मुझे गुर हिन्दी माती है, म प्रती । म वी० ए०१ म विद्याफार । एक-एक करके १७ पत्रों को छोड़ने के अतिरिक्त पौर कोई सनद या रिप्लोमा' मेरे पास महीं है, सटिमाने में भी प्रभी पूरी एक रजत जयन्ती पाकी है, मालिकों या मगदूरों की किसी यूनियम से भी मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है फिर भी मैं पत्रकार है। क्या पाप मेरे पत्रकार बनने की कहानी सुनिएगा ? में पत्रकार कैसे बना, इसकी कहानी कम रोभक नहीं । वह इस प्रचार प्रगतिशीस है कि मास्को गासे भी उस पर गर्व कर सकये है। वेकार मोग उसमें से सार ग्रहण कर सकें, इसलिए उसे महाँ दे बात यह हई कि वमपम में में बेहद घेताम पा । भर से सस की कह पाता मोर दिम-भर गलियों में गिस्मी-उग उड़ाकर ठीक पार बजे वापस मौट माता । इम्तिहान के दिनों में बीमार पन पावा पौर दुट्टियों के दिनों में खुट्टा फिरा करता। १७ वर्ष की अवस्था तक सरामा-भरामा प्राराम से ये दर्जे तक सो पहप पमा, मेकिन उसको उप्लोपने का परमिट साप हनुमान धामीसा पढ़ने और शिवगी पर रोज शाम को दीपक जसाने के बार भी नहीं मिला। पर एक, दो सीम पौर सगातार चार साल तक की कड़ी मारपती के पाप भी मैट्रिक पा मोर्पा सफल होता दियाई महीं दिया और ब्रह्मपम पानम करने की अवधि भी धन पनै समाप्त होने लगी मैने कहा तो मैं सफलतापूर्वक मोर्चे से वापस हट पाया । सवाल हुमा फि पब क्या किया पाए? कुछ दिन का समय वो परवार्मो ने सेहत सुमारने के मिए सुविधापूर्वक प्रदान कर दिया ऐकिन जैसे ही गधा-पच्चीसी समाप्त हुई (पच्चीस वर्ष की उम्र पूरी हुई) उन्होंने साफ कह दिया कि मेटे भव तुम जानो और तुम्हारा काम । नमामो-सामो, मौन करो। तब मैंने इसी से मेकर ट्यूधों तक की तमाश में गती बाजारों के परकर मगाने प्रारम्भ कर दिए। जब उस पर कोई रापी महीं हमा तो बाप से लेकर हसवाई तक की दूकान पर मौकरी के लिए मोर्गों से सम्पर्पना की। मगर कोई मुझे प्रधिक बुद्धिमान पताकर इन्कार कर देता तो कोई कममात कहकर परपागा दिसा देता । कोई कहता कि काम करने की तुम्हारी उम्र निकम गई पर कोई कहता कि बामो फिर से पाठयामा में भरती हो पामो। गुम्गुरू में कुछ दिनों तक तो मावानी धोबी की घुसाई ठोड़ी की पिसाई पौर हाप-सर्व के लिए पुपके-चुपके पुष पैसे देती रही, मगर जब उनके धर्म मे भी पवाय रे पिया मोर बाजार से परिवार के नाम पर मार मिसमा भी यम्द होगया तो हमने सोचा कि इस भूठी कुम की मान-मर्म में क्या मोगे? पौर, एक दिन हिम्मत करके हममे पान-बीसी का सामना मगाना प्रारम्भ पर ही तो दिया ! मेरे इस परम प्रगतिशीम कार्य से मेरे परिवार वालों का मस्तक गव से ऊँचा उठना पाहिए पा, मगर पह धर्म से नीचे झुक मया । उनकी नाक बड़ती नहीं तो कम-से-कम स्पिर तो रहमी ही पाहिए पी, मगर उनके कहने से मासूम हमा कि वह कुछ पोटी होने लगी है। जो भी हो, मुझे यह पेशा छोड़ने के लिए महार किमा पाने नपा । पर मैं टस-से-मस महीं हुमा । क्यों होता? ६-७ पप्टे की फेरी से न केवल मेरा हाप-सर्व ही सीपा होमे मगा, परन् मेरे पापम के पर्चे की पैर में हर पेन
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पत्रकार
चाहिये
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किसी एक दिन एक दूसरी-सी रिलिय के एक छोरी परम
अपर मोटिस-रिमा रिया । निपा बा-बार वहिए!" (पृष्ठ ११)
पत्रकार की पापान सिनेमा के लिए भी पैसे सनको सगे थे। पान-बीड़ी के सामने से सबसे बड़ा माम यह हुमा कि मुझ में भी मर पारम-विश्वास प्रगने सगा। में, पोपों से बातें करते सभाता पा, प्रब उनसे बहस करने समा। मैं वो भव तक मूसों के समुदाय का ही एक विशिष्ट सरस्प समझ पाता पा, भव समझ- दारों को भी उपदेश देने सगा। पान-बीसी के प्रताप से मेरी पहुँच तांगेवालों से ऐफर कोठी बालों तक होगई। स्कुस के चपरासी से मेमर दरोगावी तक को मैं समाम करने लगा। जैसे मेरी बीड़ियां ममता के हर पग के मुंह मगी पी, वैसे ही बनता के हर मर्म की पर्चा मेरे मुंह मग उठी थी। विवारशून्य इस मस्तिफ में प्रव भाति माधि के तूफान उठने मगे। मैं पमपाड़ी की दुकान से लेकर होटम चलाने वक के स्वप्न देखने मगा। पर तत्काल हो एक दिन एक घोड़ी-परम बेपटे बेचते एक घहरी मैता को देखकर मेरे मन में शान का उदय हुमा । मन में सोचा, दोना तो सव कमाते है, मुझे तो बन-सेवा का कोई मार्ग अपनाना चाहिए ! मैंने मुंगी की मेम्बरों से सेकर मसेम्बमी की 'एमेतेगोरी' तक की पावत गौर किया। यह भी सोचा कि कांग्रेस में जगह न हो तो सोशलिस्ट पार्टी में ही पुस पर, । साम रो सास में अपनी-पराई सेवा के द्वार खुम ही भाएंगे। लेकिन मन कहीं स्पिर नहीं हो पारहा पा। तिमी एक दिम, एक टूटी-सी विस्मि के घोटे-से द्वार के बगन मैं एक चिपका नोटिस-पोरं दिखाई दिया । लिचा पा- पत्रकार पाहिए। वैसे भगवान् गुम को प्रायवट के नीचे एक दिन मुक्ति का रहस्य एकाएक बात हुमा था, जैसे गांधीनी के समम एक रात एकाएक भसहयोग का मस्त्र प्रकट होमया पापौर पैसे सैनौं वर्ष गुलाम भारत में एक दिन मागावी टपक पड़ी पी, ठीक वैसे ही मेरी सफलता के बम्द तामे में मार तासी सग ही दो गई। पाय ऐसा मताप, प्रपना पान-बीड़ी का पस्मा राह पस १०४ मैनपत्रा भाई को टिका में एक सांस में बिलिंग की २७ सीढ़ियां चटासट पार कर गया और चपरासी की है, की परवाह न करता एमा सीधा सायरेक्टर के सामने पा दन्नाया। उन्होंने प्रश्न-सूचक सिर पर उठाया। मैंने कहा, 'पत्रकार बनने की तमन्ना है।' प्रपन हुमा 'मय तक क्या करते रहे हो? कहा "केवम ज्ञान-सषय ।' पूछा, 'क्या मतमय?' "यही कि ममता के प्रत्येक बर्म से उसकी समस्पार्मों की एक- एक कर पूम-घूमकर पानकारी प्राप्त करता रहा हूँ।" 'पढ़ाई-मिसाई किसमी ई है?" पहा पच्चीस साप्त तक सब-कुछ छोड़कर पाता ही रहा है। हाँ रिपियों का मोह कभी नहीं पिया । हिन्दी-अंग्रेजी मिस-पड़ सेवा । उर्दू-फारसी बोम-समझ मेता पंजाबियों का पड़ोस है, मदरासियों से दोस्ती है।' प्रश्न हुमा "बेसन पिसना मोगे? तो कहा "मैं इस 'माइन' में बेतन के लिए नहीं पाहा को दोगे, से मूंगा। हुकम हुमा, "पापो पार से ही काम करो। दिन-भर पूमो मार शाम को सबरें माकर मुझे दिसामा। भमा इस काम में मैं कभी प्रसफर हो सकता था? सास की मगई से मेपर तांगा-मोटर-मिरम्त तक के समाचार रंग रंग कर दने भगा और ये बड़े-धीपकों से ममगार में बाहर भीतर छपने सगे। मुस्-गुरू में सहकारी सम्पादकों के दम मुझ नीसिसिए मर मबी को देसकर काटने पौर, मगर स्वस्थ शरीर पौर मेरे गसे में गपरेपटर का पट्टा देशकर गुर्राकर ही ए गए ! धीरे-धीरे पटरी बैठ गई।
पत्रकार की पहचान १०॥ प्रब मने तांगा-मोटर-भिगम्तों को छोरफर युवक-युवतियों के पैठमे-मागने मौर रहस्य के भमाफोड़ों में दिलपस्पी भी। दस-पांच माममे ऐसे मापे कि शहर में मसमती मच मई, मसवार की मिकी भौगुनी होमई पौर मगर का प्रतिष्ठित समाज मुम्से भय माने मगा। सब ममे एक मई रीति अपनाई। सिनता कि पार प्रमुक बाजार के एक प्रतिष्ठित सेठ के यहाँ की मर्यफर सबर हमारे पास माई है। उसका पूरा विवरण कल के मंक में परिएगा। प्रसवार हाप में भाते ही सेठ की फूक सरफ पाठी । मोगों में चर्चा फैमती सौवा होता और १०० में से ५० मामले पर पसे । इसमें सपावक की भी पत्ती रहती। भीरे-धीरे मैं सिटी रिपोर्टर से विशेष सम्वाददाता हुमा भौर फिर विशेष प्रतिनिधि । एक पन से दूसरे में मया पौर दूसरे से सीसरे, चौपे पौर पांचवे में । काँग्रेसी प्रबगार में कांग्रेस के गुण गाता पौर महासभाई पत्र में पहुँचता तो कांग्रेस को स्टकर कोसता । सेठों के प्रमगारों में पाता तो हावालों की निन्दा करता और सोश मिस्टों के मसबारों में मगारों को हड़ताल के लिए उकसाता । यही नहीं, एक ही पसगार में एक ही कमम से मैं प्रप्रसेम में सरकार का समर्थन करता और समाचारों में उसकी कई मोमता । इन्हीं गुणों के कारण पत्रकार मुझे महाम् मानने मगे सरकारी अधिकारियों में मेरा सम्माम होने मगा पौर सेठों की मोटरें मेरे दरपाने पर खड़ी रहने नगीं । दुनिया सूम गई कि मैं पाम-चीही फरोग है। अभी कुछ दिन हुए पत्रकारों में मेरी मयंती मनाई पी। उस प्रवसर पर जो मैंने मापण दिया पा, उसके कुछ ऐतिहासिक स्पस भापके शान-नईम के लिए यहाँ मिस हाई- "पाइपो पार बहनो। "पार की दुनिया में प्रेम का मितना महत्व है यह पाप मानते हैं। दुलिपा की व्यवस्था, सही पाम्ति पोर पनि मन पर ही निरास बात प्रेता युग की है । सब बिना रामराग्य परिषद् के भारत में रामराग्य पा पौर विमा पनसम के कोम भीस, किरात क्या वानर तब प्रपम भारतीय ससति का निर्माण कर रहे थे। हमा यह कि पूरे राजा दधारय मे अपनी सबसे छोटो रानी के कहने पर रामचन्द्र को १४ वर्ष का बनवास दे दिया । उन दिनों भाग का सा प्रनाउन महीं पा फिर भी पयोध्या की प्रगा को रामा की यह यात पसन्द नहीं पाई। उन दिनों समाजवादी पौर साम्य वादी भी नहीं पे महीं तो हरवास होगई होती, पाने सूट लिए गए होसे पौर राणा के महमों में अवश्य ही प्राग मगाने की पेप्टा की गई होती । परमा देने की कमा भी मोर्गों ने सब महीं पानी थी। नहीं तो राबमहम के पप्पे चप्पे पर प्रयोप्या नगर की मारियां धागा होतीं। लेकिन फिर भी प्रमा कलियुग के सवत् २००८ की तह पकर्मण्य नहीं पी, उसने भविषारी रागा के राग्य को रामचन्द्र के साप-साय छोड़ना तय कर लिया। जैसे ही राम का रप बन की मोर पमा सारी प्रयोम्पा उसके पीछे उमड़ पड़ी। वात-की-पात में पारप की राजधानी सानी होगई। रामचन्द्रजी प्रभी रुपमानीजी की तरह बरे नहीं हुए पे, महीं तो यह भी प्रवा रे मसंतोप से पूरा माम उठाते पीर रावमामी के बाहर ही कहीं झोपड़ी गमकर प्रमा पार्टी की स्पापना कर मेते। पारकस के परसरवादी चाहे उन्हें मतिमन्द ही पयों न कहें, उन्होंने वसा पुष महीं किया और मदी के तौर पर पहुँचकर स्वयं तो नाव में सवार हुए पौर पनता को संबोपित करते हुए कहा भरपोर मारियो, मैं तुम्हारे स्नेह से पम्प हुमा । सेफिन रागा के है । भरस पर पर महीं है। रामपानी सूनी है। तुम सम मौट पापो । में पपपि समाप्त हो ही मषष मौट पाऊँमा ।
स्वतंत्र हम्मीदमार १०६ राम पान के मेतामों की सरह प्रभागे नहीं थे कि जिन्हें बनता की मनुशासनहीनता के लिए 'सैपचर' देने परते। प्रजा ने उनके उपदेश का मर्म समभन्न पोर उनकी प्राज्ञा का प्रक्षरस पालन किया गया । समस्त नरनारी अयोध्या पुरी को वापस लौट गए। छेकिन दुर्भाम्प से उस पनता में कुछ ऐसे भी पीव पेजो न मर पे पौर म मारी। फिर २०वीं शवाम्दी में गिस "कामन सेम्स" का मचानक विकास हुमा है, वह भी उनके पास महों पी। उन मकीर के फकीरों ने सत्काल वय किया कि रामामा केवल नर और नारियों पर मागू होती है, हम पर नहीं । मौर वे सब प्रयोम्या न लौट कर बहाँ-के-तहाँ गम गए । पौदह वर्ष बाद अब रावण विमय करके रामचनमी पुष्पक विमाम द्वारा भयोप्या मौटने सगे तो उसी मदी सट-पर उन्हें बहुत से सोग माम रूमाल हिनते दिखाई दिए । तव के हवाई यहाग कोई पान की सरह तो पे नहीं कि बिना हवाई स्टेशन उतर ही म सके। वे पम-अंगम, खेत-मलिहान, पहार-मपान कहीं भी विना दुषटना के उतर सकते थे। राम मे पाहा पार पुप्पक विमान परती पर पामगा। प्रयोप्या म मौटने वाले इन सत्यापहियों की वेपमूपा १४ वर्षों में पुष भगव ही भम्प हागई पी । नार्यों के प्रभाव में इनकी दादियों मे नाभियों की सीमा को पार कर लिया था और बालों की मटाएं चतुर्दिक पृप्पी को पूममे मगो थी । वस्त्रों के माम पर सिर्फ कोपीन ही इनके तन पर बपी पी पौर मन्द मुम फल के सेवन से इनके परीर सहन ही योगाचस्पा को प्राप्त कर गए थे। भगवान राम ने जब इन पि मुनियों को यों रिदम देसा तो करणा हो उठे मोर प्रणिपात करते हुए पोसे-"है मुनिसत्तमो, पृथ्वी के सभी निशाचरों का नाश होगया अब तुम निर्भय होकर पम-यागादिक फरो, ससम्म पनों में पिघरो, तुम्हें भवनहीं कोई मय नहीं, पोर पो कुछ कष्ट तुम्हें हो वह कहो । मैं दाशरथी राम विनय ।
येने का पूर्वक प्रापकी मामा का पासम काँगा।' रामचन्द्रगी के मुंह से यह सब निकमसे ही मे ऋषि-मुनि बने हुए अयोध्यावासी पूम में मोटने मगे, बटाएँ भौर पादियां नोपने लगे। ममवान राम की समझ में कुछ म पाया । उन्होंने हनुमानी को पता सगाने के लिए इशारा किया। हनुमानषो का चपर पहना ही पा कि उनमें से बीसियों पुकार उठे- 'इस मुए बन्दर को हमारी तरफ क्यों भेजते हो? हए हए, महाराण, हमें नहीं पहचानते ? हम तो हार की रियामाएं है।" पार के इस्य पौर प्राश्य हन्मामों के पूर्वजों की वाणी- सुनते हो हनुमानगी पीठ मोड कर बरे होगए । लक्मणगी ने कंधे पर से धनुप उतार कर कोने में रस विया । सीतागी मुंह में पंचम पवाकर मुस्कराने सगीं। चन्द्रजी भौंचक्के रह गए ! वमी उनमें सिंधी हुई सप्र का एक पन बाहर माया मोर वामियां फटकार कर कहने ममा-'भए हए, सरकार हमें सूत गए । याद नहीं माता हमारे हरर को ? (तामियां) हमारे रामा, पर भाप यहाँ से माव में बैठने मगे पे तो सरकार को बड़ी उम हो यही वो फर्माया पा कि सब नर-नारी वापस प्रयाप्या पसे बाएँ ? सनिक सोचिए तो सही, यह हम हम पर कब मान होता पा? हमने सोपा, प्रपोम्पा गाएं हमारे दुश्मन ! हम तो ससार यही बस गए ! और क्या हुजूर ! फिर मांसा-सा हार योप्सा--"सरकार, पुष ही देख लीजिए न कि मापकी प्यारी रिपाया की मया दुर्दशा होगई है?" राम मातिर भगवान राम ही थे। अपने भक्तों की इस दुर्दशा पर प्रमित हो पाए । कठसे उन्होंने कहा-"प्यारे मगर निवा सियो, मैं तुम्हारी भक्ति पर, तुम्हारी मावानुमतिता पर, तुम्हारे स्याग पौर साहस पर बहुत ही प्रसन्न हुमा । सकोप वरकर कहा- "तुम्हें क्या चाहिए ? मो तुम्हें गमे, पर माय मो।" भगवान राम के इस कपन, पर समिपर पास में हसयस मन गा। सोचने मगे क्या मापा बाप? पिसीने कहा पमीन मांगी
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“मानो तुम स्वतम रम्नीपार होना । (पृष्ठ ११.)
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स्वसंम्मीदवार
वाम । मेकिम दूसरे में प्रतिवाद लियाविना संग्राम के षमीन को
कौन भोगेगा ? पिसीने सुम्याहापी-बोरे मांगे पाएँ । सेकिन
कौम के दोनों मे दसन दिया कि हाथी-घोड़ों पर चढ़े फिरोगे तो
रोजी से चलेगी? किसीन कहा-इन-दौमत मौसी बाय । मगर
फौरन ही विचार उठा कि विवश ही सही पर प्राति मे हमें हपि
मुनियों का बाना पहना दिया है ता पन-दौलत मांगकर इसकी हेठी
तो नहीं ही करानी पाहिए।
पन्ध में जाति के मुखिया ने कहा-"मैं गारी वाऊँ सरकार!
पर पाप पागए वो हमें सि पीर की कमी है? भए हए, हमें
सब-कुछ मिल गया, हपूर ! बाम कसम, भव कृष मही पाहिए।
रामचन्द्रनी गोते.-देसो रघुशियों के वपन की पाम तुम
जानते ही हो । को दे दिया सो दे दिया। मन तो तुम रुपन-कृष्ठ
मांगमा ही पड़ेगा।'
कोम के नेता ने कहा-"अब पप सरकार नहीं मानते, जो हषर
की यो समम में प्राए बहदै गमिए म ?"
पारी कौम में इसका समर्थन किया।
पर पगा राम के प्रसमस में पड़ने की पारी मी कि इन्हें क्या
दिया पाप ? उन्होंने लक्ष्मणजी से पूछा । सुग्रीव मौर विमीपण
से समाह मी। बड़े आमवत को भी बुलाया । मगर कोई फैससा
एकमव से नहीं हो सका।
भगवान कृपक्षण के लिए मौन होगए । समाने पोड़ी देर को
मा माप मी पीर पष्टि के सूप भरिप्यत् एवं वर्तमान पर अपने
अन्तर्वा रोगामे मगे।
सहसा उम्हनि रुष निदषय कर लिया और बोले- हे पस्सिमो,
कमियुग में ईसा की बीसी सवानी के १ वर्ष में इस भावित
में पहरे माम धुनाव होंगे । हार-जीत का फैससा तुम्हारे कर्मों पर
है पापो तुम उनमें स्वतम्ब उम्मीदवार होना।
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११२ मैने कहा तो माइयो और बहनो, मार के स्वतन्त्र उम्मीदवार कोई साधारण पुष्प नहीं भगवान राम के माशीर्वाद प्राप्त विशिष्ट पन है। अपनी प्राचीन परम्परा के अनुसार म ये कांग्रेसी है, न प्रवा समाजवादी । म सपी है, न परिषदी । न मम्वेवकरी है, न समानवादी, न साम्यवादी । म इनका कोई धर्म है न भाति । न इनके कोई विचार है न समठन । हमके धारासमामों में माने से और कोई माभ होगा या नहीं यह तो ठीक से नहीं कहा जा सकता, मगर इसना निश्चित है कि पारासमामों और ससद में मास-बात पर ही नहीं ये बात पर भी सामिया बारबार प्रबम बमा करेंगी।
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