Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Tees Din Men Saphalata

Pereira A.p. · 2011/03

PDF Proofread

Front matter

No text on this page.

No text on this page.

SUCCESS IX 345 DIY4;!
الي
iz
Selamat

दूसरा दिन . छठा दिन ४० क्रम पहला दिन : सफलता आपके लिए है : सफलता का मूल्य चुकाइए १४ तीसरा दिन : सुख को प्राथमिकता दीजिए १६ चौथा दिन आज का कार्यक्रम बनाइए २३ पांचवां दिन : शुरू में ही ध्यान दीजिए २९ : अपना आगय ठीक-ठीक रखिए ' ३२ सातवां दिन : पल-पल का सदुपयोग कीजिए ३५ आठवां दिन : हम तीन व्यक्ति हैं नवा दिन : दम्भ छोड़िए दसवां दिन : व्यवहारपटु वनिए ग्यारहवा दिन : मैं मूड में नहीं हू वारहवां दिन : मनोरंजन के लिए समय निकालिए ५५ तेरहवां दिन : आत्मविश्वास रखिए चीदहवां दिन : नेतृत्व के गुण अपनाइए ६३ पन्द्रवां दिन : कार्य की नीरसता दूर कीजिए ६६ सोलहवां दिन : पहले से श्रेष्ठतर बनिए ६६ सत्रहवां दिन : अपव्यय रोकिए ७२ ४४ ४८ ५१ ५४ ५

3
1
अट्ठारहवा दिन : ढुलमुलपन छोड़िए
उन्तीसवां दिन : निराशावादी मत बनिए
वीसवा दिन : पैसे कैसे कमाए
इक्कीरावां दिन : मुख्य कार्य को प्राथमिकता दीजिए,८६
वाईसवां दिन : कोरी आलोचना मत कीजिए ८६.
तेईसवा दिन : जंजीर की हर काही महत्त्वपूर्ण है ६२
चौवीसवा दिन : कार्यालय से आपका या स्थान है? ६५
पचीसवा दिन : समाज-सेवा कीजिए
छब्बीसवां दिन : अडिग रहिए
१०२
सत्ताईसदा, दिन : डीग मत हाकिए
अट्ठाईसवां दिन : अपने स्वास्थ्य का ध्यान रन्तिए १०८
उनतीसवां दिन : 'योन भावना को नियन्त्रित कीजिए ११२
तीसवा दिन
: सर्वश्रेष्ठ वनिए
११५
।

तीस दिन में सफलता
पहला दिन
सफलता आपके लिए है
-
सफलता आपत्री हे-आप लिए है, पर सफलता प्राप्त करने के
लिए तीन बाते ज़रूरी है।
(१) आपर सफलता पाने की इच्छा होनी चाहिए,
(0) आपको सफलता पाने की विधि मालूम होनी चाहिए;
(३) जन तक मफलता न मिले, आपको उसके लिए निरन्तर
प्रयत्न करते रहना चाहिए।
आग यह पुस्तक पढ़ रहे है, यही इस बात का प्रमाण हे कि आप
सफल होना चाहते हैं । किन्तु मिर्फ चाहना काफी नहीं है । आपको
सफलता का मूल्य चुकाने को तत्पर होना होगा।
यह गोचकर अपने-आपको धोखा मत दीजिए कि इन पुस्तक
के गटने-मात्र ने आरको धन और यन, उन्नति और समृद्धि पाने का
कोई गरल-गा ढग हाय लग जाएगा। आपको इन लब वस्तुओ का
आवागन दिया जा चुका है और सुख का भी; पर गर्त यह है
कि भाप नफलता और सुख न मार्ग पर हमारे नाथ कदम से कदा
मिलाकर चलने को तैयार होंगे।
यह मार्ग लम्बा और कठिन होगा, पर यह हमारा जिम्ना
नहा कि यह रास्ना कभी भी वकानेवाला या उबानेवाला नही होगा;
और हम स्पष्ट तथा निश्चित सूचना-स्तंभो एक मार्ग-संकतो जान
७

: Atm-4.- १६ . जीवन की इस भूलभुलैया मे से आपको मार्गदर्शन कराते हुए निकाल ले जाएंगे। क्या आप शिखर पर चढाई शुरू करने को तैयार हैं ? ऐसा है तो आइए, चले। पहले सूचना-स्तम्म पर लिखा हुआ है : बन्धन काट दीजिए एक द्वीप में बैठकर मद्यपान करनेवाले दो आदमियों के बारे मे मनोरजक कथा है। आधी रात के लगभग वे लड़खड़ाते हुए अपनी छोटी-सी नाव की ओर चले, चप्पू थाम लिए और लगे खेने । घटे के अन्दर उन्हे महाद्वीप पर पहुंच जाना चाहिए था, पर जब पौ फटी तो उस समय भी वे उसी द्वीप से सटे हुए थे और अभी तक नाव खे रहे थे। जिस रस्से के साथ नौका द्वीप से बंधी थी, वे उसे खोलना भूल गए थे। हममे से बहुत-से लोग इन दो आदमियों के समान है। हम काम करते है, करते ही जाते है, लेकिन हम कहीं पहुचते नही दीखते ! हम नशे मे तो नहीं, पर उदासीन ज़रूर होते है । आगे बढ़ने के लिए हम बेतहागा नाव खेते है, पर अपने दोपो और कमियो से बांध रखनेवाली रस्सी खोलना भूल जाते है । कोई आश्चर्य नहीं, हम कुछ भी प्रगति नहीं कर पाते। हम भविष्य के लिए महत्त्वा- व्हांक्षाओ वाली कई योजनाएं बनाते है, लेकिन अपने अतीत की जाच-पड़ताल करने से हिचकिचाते हैं। किसी भी बात को करने का एक सकारात्मक ढंग होता है,. दूसरा नकारात्मक । जैसे, अब से अधिक धनवान बनने के लिए या तो हमे अपनी आय बढानी होगी अथवा अपना व्यय घटाना होगा। इसी प्रकार उत्पादन बढाने के लिए हमे या तो अपने काम के घण्टे बढ़ाने होगे, या फिर काम मे पड़नेवाले विघ्नो, ढिलाइयों- अथवा व्यर्थ के घूम-फेरों को कम करना होगा। अधिक आनन्दमय होने के लिए हमे अधिक मुस्कराना होगा अथवा त्योरियां कम करनी होगी। ।

किसी भी प्रगति के कार्यक्रम में हमेगा यही अच्छा रहता है कि पहले वचत-पक्ष की ओर व्यान दिया जाए। इससे समय और मेह्नत की वचत होती है। यदि पीछे से नाव रस्से से बंधी रहे तो उसपर चढ़ने और अपनी पूरी गक्ति से उसे खेने मे तुक ही क्या है ? भविष्य की और नाव खेने से पूर्व हमे यह भली भांति देख लेना चाहिए कि कहीं कोई चीज़ हमें अतीत से बांधे हुए तो नहीं है । सुख और सफलता के प्रदेश की ओर यात्रा शुरू करने से पहले हमें अपने. दुर्गुणो, कमियों और वेकार के पछतावो को तिलांजलि देनी होगी। आपका जहाज़ सही-सलामत बन्दरगाह पर पहुंच जाए, इसके लिए हमें परमात्मा को अपना सहचालक मानकर चलना होगा। आपकी यात्रा शुभ हो! आगे चलकर हम अपने दोपों को दूर करने का तरीका मालूम करके, जीवन की योजना के बचत-पक्ष में सम्बन्धित साबनो और विधियो को खोजेगे। इस समय तो हमें उससे कहीं अधिक जरूरी बात की ओर ध्यान देना है, क्योंकि दूसरा सूचना-स्तम्भ हमारे सम्मुख आ खड़ा है : अपने लक्ष्य के प्रति सचेत रहिए यदि आप इस पुस्तक को अपने काम पर जाते समय गाड़ी या वस मे पढ़ रहे हों तो एक मिनट रुकिए और अपने आसपास निगाह दौताइए । सहयात्रियो के चेहरों पर आपको किस चीज़ की झलक मिलती है ? क्या वे प्रसन्न और उल्लसित दीख पड़ते है, या वे शान्त और सन्तुष्ट है ? अफसोस ! कोई विरला ही ऐसा मिलेगा। बहुत से लोगो के चेहरों पर आप वेचनी और घोर निरागा के चिह्न देखेंगे और कुछेक की आंखों से तो आप उत्साह के साथ जिन्दगी बिनाने की चमक ही गायव पाएगे, अथवा वे आखें अपने भ्रम टूटने की दुखद कथा सुनाती जान पड़ेंगी। आपके सामने बैठे व्यक्ति के नन में कौन-से भाव और कौन-से विचार दौड लगा रहे है, यदि यह उसकी भी पर या भाल पर अकित होता तो आपको यह पड़ने को मिलता: : ह - । Hel गर्ग उ बस पर, वम पार करती आली, कि नया ना कोई काम न रिता मिनार मकर मान अंसारमय और भविष्य में भी दिया शिवजनी के लिए कुछ नही 7 दिशामना मुस, क्या कल, मो में भी अधिक गुमना, पालक पदाह, ...' Hd-prem बनी अन्य लोग भी भयंकर मितिको कि उनकी बनना नया पता नहीं कि आमिर नाम : कब तनिक मन्दिा "या शुभ, गगनमामि गंवर दया है? ना मेरे पार जीवन को मारना आगामी मान, आगामीनार, आतेनाले राज, गगायनमा ?" यदि आपके पास अनी मनोई इनर, नागार पाना आपनो को आवश्यकता नी। येशन निरनी रह समाते गांजनि जनार्दन शानी नि समय रहते अपना गाने,जिस जनता र अनमोल मीना, या एक दिन की, बकाल जाए। हम नये साल का गाथे परन: नई प्रविनाएं करते है, पर पालन मायद ही कर पाये। कारण हि सोच-विक बिना, भावास की स्थिति में, को बात करने का निना है! किनी प्रकार का निचय अमवा प्रनिशा करने के निम्बर महीनेगा समय मांग-गम्मत । किन्तु यहनि उनकामाल को पर लागू होता है, जिन्हे छाप पाडार चलाना होता है. भार मे लोगों को तिए तो हरेक दिन महत्वपूर्ण है, और मानवाला एक एक दिन नई बाजाओं का दिन है। आप और हम दिलम्बर तक इन्तजार नहीं कर सकते। हमी रामय अपनी योजना को जराली जामा पनाएगे। तो भी हनानी योजनाएं न तो अवकाची होगी और न उनमें कोई पाबाजी की जाएगी। अच्छी योजना के लिए बहुत जरूरी है कि हमारे सामने गाई १० , निश्चित उद्देश्य हो, और लक्ष्य तक ले जानेवाले हर कदम का स्पष्ट उल्लखहा। सबसे पहले आपको यह जान लेना चाहिए कि जीवन में आपकी लालसा क्या है, उनसे आपको अपेक्षा क्या है। बस, यह जानकर आपको अपने अभीप्ट की प्राप्ति के लिए चल पड़ना चाहिए। यदि, सचमुन्न आपके जीवन का कोई ध्येय है, और उस व्येय को प्राप्त करने का आपमें दृढ़ निश्चय है, तो समझिए कि जीवन साहसिक. कार्यो मे भरपूर है और आपकी सफलता निश्चित है। योजना बनाइए यदि आपकी कोई अभिलापा नहीं है, तो आपकी स्थिति ठीक उस मान्नी के समान है, जो विना लेवल वाले बीजों के पैकेट से वीज बोता है। माली को यदि यही न मालूम हो कि आखिर उसे वोना क्या है, तो वह अपने काम की ठीक तैयारी नहीं कर सकता और न ही इस सम्बन्ध मे कोई समुचित योजना बना सकता है। आपमे महत्त्वाकांक्षा हो और कार्य करने का निश्चय---तो फिर आप आकाग से सितारे तक तोड़ ला सकते हैं। न तो आयु, न कोई आधि-व्याधि, न गरीबी और न दूसरी कोई बाधा ऐसे नर अथवा नारी को नफल होने से रोक सकती है। कोलम्बस एक जुलाहा था। फैकलिन दिहाड़ी पर काम करनेवाला एक मुद्रक था। कवि वर्ज़ एक किसान था। ईसय एक दास था। कप्तान कुक जहाज़ की कोठरियो में काम करनेवाला एक मामूली लड़का था। हरेक नल्लाह के पास एक दिशासूचक यन्त्र और एका मानचित्र होता है, और इसी प्रकार हरेक मार्गदर्शक के पास नी। यदि उनके पास यह नव न हो, तो वे चक्कर लगाते ही घूमते फिरे, और कभी अपनी मजित पर न पहुंच पाएं। यदि आप अपने जीवन को कुछ मल्य देना चाहते है तो आपकी कोई न कोई निश्चित अभिलाषा अवश्य होनी चाहिए और होना चाहिए अपने लक्ष्य तक पहुंचने का दृढ़ निश्चय। ११ . यदि जीवन में आपका कोई उद्देश्य नहीं है, तो थोडी देर के लिए इस पुस्तक को पढना छोड़ दीजिए। दस मिनट गम्भीर विचार को जिए और आज-भर के लिए कोई उद्देश्य निर्धारित कीजिए। तब मन से उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए जुट जाइए । सोद्देश्य कार्य करने से रात को आपको सुखद अनुभूति होगी; तब वैठकर आगामी सप्ताह का कार्यक्रम निश्चित कीजिए। विश्वास कीजिए कि इन महत्त्वपूर्ण 'तीस दिनों के बीतने से पहले ही आप जीवन की महान योजना को लेकर कार्य कर रहे होंगे। आइज़क न्यूटन अभी बालक ही था कि तारों ने उसका मन मोह लिया। अभी वह बारह वरस का ही हुआ था कि उसने अपने बगी। में एक धूपघड़ी बना डाली। उसने तारों के विषय में जानकारी प्राप्त करने के लिए हर अवसर का लाभ उठाया।पुस्तकों से, मिलने-जुलने- बालों से और यहां तक कि अजनबियों से भी उसने तारो के सम्बन्ध में जानकारी जुटाई। सुखी एवं सफल जीवन बिताने के बाद पचासी बरस की उम्र मे महान आइज़क न्यूटन का देहान्त हुआ। अपने प्रिय तारकों के समान ही उसके जीवन का एक अटल, ध्रुव उद्देश्य था। हममें से हरेक का कोई न कोई ध्येय होता है, जिसकी हम पूर्ति करना चाहते है । हमें अपनी प्रवृत्तियों, रुचियो-अरुचियों और अपनी पूजी अथवा योग्यताओं का अध्ययन करना चाहिए। व्यवसाय का चुनाव करने का समय स्कूल छोड़ने से पहले होता है; किन्तु यह बात केवल साधारण लोगो के लिए है, महत्त्वाकाक्षी व्यक्ति के लिए काल अथवा आयु की कोई बाधा नहीं है। जो कुछ जैसे हो रहा है, उसीपर सन्तोप करके बैठे मत रहिए। आप जीवन को जैसा बनाते हैं, वह वैसा ही बन जाता है । आज आपने जो कुछ किया है, आपके आनेवाले कल की स्थिति उसीपर आधारित है। जैसा आप वोएंगे, वैसा ही काटेंगे। अगर आप बीज यो ही बिखेर देंगे, तो हवाई परिन्दे आपको बहुमूल्य फसल से वचित कर देने। हमे अपनी शक्तियों को नियन्त्रित करके उन्हे अपने लक्ष्य की ओर लगाना चाहिए। अगर विजली नियंत्रण में हो, तो वह मानव की सबसे हितकारी सेवक है, पर यदि कही वह नियंत्रण से बाहर हो १२ . । Vo- 2 - तालियो की गड़गड़ाहट से भी प्रोत्साहन मिलता है। जब कोई और श्रोता न मिला तो पड्चुआ के एंथोनी ने मछलियों को ही धर्मोपदेश दिए थे और ऐसिसी के फासिस ने सूर्य ही को सम्बोधित करके आनन्दमय भजन गाए थे। "यह है वह मूल्य, जोकि आपके वेटो को चुकाना होगा।" मैंने अधिकारी महागय को आगाह किया। निराश होकर दे कमरे से चले गए। तव अधिकारी महोदय को मै एक नौजवान की कहानी सुना सकता था, जो नदी-किनारे बैठा-बैठा पकड़ में आ सकनेवाली स्वा- दिप्ट मछलियों के सपने ले रहा था। एक स्कूल के अध्यापक उस राह से गुजरे । उन्होने नौजवान को सताह दी कि वह कल्पना करना छोड़कर मछलियां पकडना शुरू करे। सो अगले दिन उस नौजवान ने नछली पकड़ने का सारा साज-सामान खरीदा-~-कील-कांटा, छड़ी, चारा ओर यहा तक आखो को धूप से बचाने के लिए टोपी भी। किन्तु जव आध घण्टे मे कोई मछली कांटे मे नही फंसी तो नौ- जवान बैठा-वैठा सो गया। जव जगा तो सूरज सिर पर चढ आया था, मछलिया अपेक्षाकृत धनी छाया में स्थित पानी में जा चुकी थी और वेचारे नौजवान का चारा तक गायव था। वह यह समझने ने चूक गया था कि यदि मठियारे का जग-विख्यात धीरज पास न हो तो वंसी-काटा खरीदना किसी काम का नहीं । सो मेरे प्यारे पाठक, यदि आपने यह कल्पना कर रखी है कि इस पुस्तक के खरीदने एव पढने-मात्र से आप सफलता प्राप्त कर सकते है तो आपका भ्रम भी बुरी तरह से टूटेगा। आप देखेंगे कि यश, ख्याति और धन की खोज मे जाना कठिन और दुष्कर है, पर अगर आप इस पुस्तक में दिए गए निर्देशों का पालन करेगे तो आपको यह यात्रा कभी भी नीरस या थकानेवाली नही मालूम होगी। पहले से अनुमानित कठिनाइयों के अलावा कुछेक ऐसी कठिनाइयो से भी आपकी मुठभेड़ होगी जिनकी आपको प्रायः आशा नहीं थी। अपने प्रतिद्वन्द्वियों से तो आप शत्रुता की अपेक्षा करेगे ही, इसके अतिरिक्त अपने साथियों की गलतफहमियो, अपने वन्धु-बान्धवो और छिछले या ईर्ष्यालु मित्रो के उपहास का सामना १५

༣ '} ༔ : , #*.༔ ༔ ༔ ༔ ༔ ༡༤
8
བ བྷ མ
k tཆ
ཨ་
,
མག
པས
༣
ན 1
ཚ
ཀ - : - : - : ་་ > > '' " “ F;
ཙྪ༔ ནཱ་
- :: ༈ - ; ཙ: ; ༴ དཔ
}
ས
ཅན
ܕܽ
Tayar
,
++++
༩༣
1 :;སཔ : { ༈ ་ ::་ ༈

तीसरा दिन सुख को प्राथमिकता दीजिए पिछले दो दिनों में हमने इस बात पर विचार किया है कि सफलता पाने की विधि क्या है और उसकी प्राप्ति का मूल्य क्या है । आज मैं आप लोगों को जता देना चाहता हूं कि सफलता का मतलब केवल कालं का खजाना जमा कर लेना नहीं, कोई बड़ी नौकरी हथिया लेना नहीं, कोई नेता अथवा लेखक बन जाना नहीं, और न कोई नई ईजाद कर लेना है, न एक स्पीकर अथवा पहलवान हो जाना है और न ही किसी मशहूर खिलाड़ी की तरह वाहवाही लूटना ही है । सफलता किसी लक्ष्य-विशेष की प्राप्ति-भर नहीं है, यह उसमें ऊपर है। उस भले आदमी का किस्सा लीजिए जो धन-संचय करने की खातिर अपने हर प्रकार के आराम, आमोद-प्रमोद और आनन्द को तिलांजलि देने पर तुल गया था। वह इतना पैसा इकट्ठा कर लेना चाहता था कि हर रात के दस्तरख्वान पर 'चिकिन' नोग फरमा सके । आखिर हुआ यह कि जब वह इतना अमीर हो गया तो उसने देखा कि उसकी तो भूख ही मारी गई है और चिकिन खाना उसके बस का नहीं रहा, और न चबाने को दांत ही सलामत रहे। क्या माप कहेंगे कि उस आदमी ने सफलता पाई ?-विलकुल नहीं ! कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो ख्याति के शिखर पर तो पहुंच जाते हैं, पर वहां पहुंचने की धुन में वे अपने सब मित्र-बन्धुमों को तो बैठते हैं। होता यह है कि जब दुनिया उनके चरण पखारती है, तब तक जीवन के प्रति उनका उत्साह जा चुका होता है। सार यह, कि मुख ही आपका परम लक्ष्य होना चाहिए। उसे १३ है कभी भी स्थगित मत कीजिए । यह मत समझिए कि उसे फिर प्राप्त कर लेगे। फिल्म-स्टारों, सृजनगील कलाकारों और अपने-अपने व्यवसायों में सफल होनेवाले स्त्री-पुरुपों को सदा इस बात का ग्वेद रहा है कि क्यो उन्होंने ख्याति, सत्ता और सम्पत्ति की बलिवेदी पर अपने सुख का वलिदान किया। जीवन की योजना कुछ इस तरह से तैयार कीजिए कि जब आप किसी बड़े लक्ष्य को पाने के लिए बढ़ रहे हों, उस बीच आपको छोटी-मोटी सफलताओं को हासिल करने का मौका मिलता रहे। छोटे-मोटे लक्ष्यों में अपने परिवार से प्रेम, अपने मित्रों में स्नेह और निप्ठा, अपने सहकर्मियों का आदर और अपने अधिकारियो के लिए प्रशंसा-भावना सम्मिलित है। मित्रों की संख्या बढ़ाइए मित्र बनाने के बहुत-से दंग है। पुस्तकें और पत्रिकाएं देकर अपने पड़ोसियों को, प्रतिदिन कार्यालय में आते और जाते समय उत्साह से अभिवादन करके अपने साथ काम करनेवालों को, तथा अवसर पर मैत्री-भरे प्रोत्साहन अथवा प्रशंसा के उचित शब्द कह- कर अपने साथियों को आप अपना मित्र बना सकते हैं। सुख के साथ-साथ सफलता प्राप्त करने का सबसे पक्का रास्ता यह है कि जैसे-जैसे आपका कार्यक्षेत्र विस्तृत होता जाए, वैसे-वैसे आपके मित्रों का दायरा भी बढ़ता चले। यदि आप अपनी सफलता को मिल-बांटकर ग्रहण करना सीख लें तो आपको कभी मित्रों की और मित्रता से मिलनेवाले आनन्द की कमी न रहेगी। अनेकों सफल लोगों को यह शिकायत रहती है कि वे अकेले पड़ गए है-लोग-बाग उनसे कतराते है। कई-कई क्लबों में जाने के बावजूद उन्हें सन्तोप नहीं मिलता। वे नित-नये मित्र बनाते है, लेकिन यह मित्रता बहुत थोड़े समय टिक पाती है। ऐसा क्यों? न्यूटन वाहा करते थे कि बहुत-से लोगो के अकेले पड़ जाने का कारण यह है कि वे आपसी खाइयों को पाटने के लिए पुल नहीं बनाते, चल्कि और दीवारें खड़ी कर लेते हैं। दूसरे, जिन लोगो के मित्र २० - ?

नहीं है वे मित्र बना ही नहीं सकते सो बात नहीं है। असल बात तो यह है कि वे मित्रता को निवाह नहीं सकते। सुख की कुंजी धन-दौलत नहीं है, बल्कि उल्टे दौलत तो प्राय: परेशानी का कारण ही बनती है। दुःख के मूल कारण हैं-लोभ, चिन्ता, ईर्ष्या और सन्देह ; जबकि सुखी होने का बड़ा गुर है- उदारता। सुखी होने के लिए सन्तोपी होना अनिवार्य है क्योंकि सुन्न, आत्मनिष्ठ एवं सापेक्ष वस्तु है। यह वातं इस दृष्टान्त में अच्छी तरह स्पष्ट हो जाएगी। एक लड़का रोता-चीखता रहता था कि उसके पास जूते नहीं हैं। एक बार उसने एक अपंग वालक देखा जिसके पैर ही नहीं थे। उसकी आंख खुली और उसने जूते के अभाव के लिए मिनमिनाना छोड़ दिया। जब आप श्रेष्ठतर स्थिति प्राप्त करने का यत्न कर रहे हों तो इस बात का पूरा ध्यान रखिए कि कहीं इस सिलसिले में सफलता मिलने में देर-सवेर होने पर, या अस्थायी पराजय हाथ लगने पर आप निराश न हो जाएं, क्योंकि असन्तोप मनुष्य को कही का नहीं रखता, उसकी मिट्टी पलीद कर देता है। ईश्वर ने जो दिया है उसीको बहुत मानकर सन्तोपी जीव खुश रहते है, जबकि असन्तोपी व्यक्ति तार तोड़ने की फिराक में रहते हैं और जव हाथ उन तक नहीं पहुंच पाता तो वे झुंझला उठते हैं कि 'अंगूर खट्टे है। इसका यह अर्थ कदापि नही कि सन्तोपी लोगों की कोई अभि- लाषा ही नहीं होती। लेकिन हों, एक फर्क जरूर होता है : सन्तोपी लोगों के पास जो कुछ होता है उसके लिए पहले वे ईश्वर का आभार मानते है, और तब उससे अधिक के लिए मांग करते हैं। जबकि असन्तोपी लोग महत्त्वाकांक्षी और लोभी होते है; जो कुछ उन्हें प्राप्त होता है उसे तो वे ध्रुव मानकर किसी भी गिनती में नहीं गिनते और दुर्लभ चीजों के पीछे वावले हुए फिरते हैं। परमात्मा की शरण जाइए सफलता की खोज में परमात्मा को हमराही बनाइए--और २१ आपकी यह खोज सुखद होगी; क्योकि तब आपकी सफलता की योजना ईमानदारी और सच्ची निष्ठा की नीव पर टिकी होगी, दया, परोपकार और उदारता के भावों से सुरक्षित होगी; और नियन्ती की महान योजना में सहयोग देते हुए आप कभी भी विचलित और उद्विग्न नहीं होंगे, क्योंकि आप सफलता को फल से उतना नहीं नापंगे जितना कि कर्म से। इस प्रकार धैर्य आपमे सफलता प्राप्ति तक निरन्तर जूझने की जीवनदायी शक्ति प्रदान करेगा। निष्कर्प यह निकला कि यद्यपि निर्धारित किए गए किसी लक्ष्य में सफलता प्रायः देश, काल और स्थान की परिस्थितियों पर निर्भर करती है, किन्तु सुख सर्वथा आपपर अवलम्बित है। जब आप कुछ अन्यथा सोचने लगेंतो एक महान दार्गनिक की इस मूक्ति को दुहरा लें: "आप तभी सुखी हो सकते है, जवकि आप यह बात ठीक से समझ लें कि जिन्दगी में हमारी हैसियत इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं, जितनी कि हमारी मनःस्थिति है।" - - २२ चौथा दिन - आज का कार्यक्रम बनाइए चाहे हम किसी सुन्दरी को वरना चाहते हों, चाहे किसी युद्ध में विजयी होना चाहते हों, हमारी सफलता पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करती है कि हमने प्रेम अथवा विनाश के अभियान की योजना कितनी अच्छी तरह बनाई है। हमारे जीवन की सफलता हमारी योजनाओं पर निर्भर है। यदि वे पहले से अच्छी तरह तैयार कर ली जाएं और सावधानी से उनकी रूपरेखा बना ली जाए तो उनको अमली जामा पहनाना विलकुल सरल हो जाता है। विस्तार के साथ योजना तैयार किए बगैर, किसी भवन या किसी पुल के निर्माण की क्या आप कल्पना कर सकते हैं ? जिन्दगी तो फिर और भी ज्यादा पेचीदा है । इसपर भी कितने ही लोग बिना किसी योजना या कार्यक्रम के एक दिन से दूसरे दिन की ओर सर- कते चले जाते है। ३० दिनों में पूरे होनेवाले इस कोर्स के पहले दिन हमने जीवन की विशद योजना पर विचार किया था। वह किसी मकान का नक्शा बनाने के समान था। लेकिन जैसे मकान बनानेवाले के पास हरेक दिन का निश्चित कार्यक्रम रहता है, उसी तरह हमें भी अपने जीवन के हरेक दिन का कार्यक्रम निर्धारित करना होगा। अगले दिन का कार्यक्रम तैयार करने का सबसे अच्छा समय है रात को सोने से पहले का। इस समय बीते हुए दिन की छोटी-सी जांच से हमें विदित हो जाएगा कि हमने कितनी सफलता पाई है। हमारा कार्यक्रम छोटा हो अथवा बड़ा, एक अकेले दिन को पूरी २३ एक इकाई बनाकर चलना सर्वोत्तम रहता है । आज का दिन ही ऐसा दिन है जिसके लिए हमें सोचना है। बीते हुए कल की हम जांच- पड़ताल कर सकते है और आनेवाले कल की हम योजना बना सकते हैं; लेकिन काम करने का दिन केवल 'आज' है। केवल आज की चिन्ता कीजिए आज के दिन को अधिक से अधिक कर्मठ और फलदायक बनाने के लिए हमें अपना पूरा ध्यान इसपर एकाग्र कर देना चाहिए। शायद आप जानते होंगे कि टांगे में जुते घोड़े की आंखों पर 'खोप' चढ़ाए जाते हैं, जिससे सड़क पर आ-जा रही गाड़ियों की हलचल से वह डरे, विदके या घबराए नहीं । हमें भी अपनी आंखों पर 'खोप' चढ़ाने होंगे ताकि हम आज के काम पर अपना पूरा ध्यान एकाग्र कर सकें। में यदि हम ऐसा नहीं करते तो हमारे प्रत्येक सप्ताह में दो दिन ऐसे आते है जोकि प्राय. हमें परेशान किए रहते है-दो दिन, जिन्हें भय और आशंका से दूर रखने का यत्न करना चाहिए : इन दो दिनों एक है बीता हुआ कल-कल, जोकि बीत गया है, और सदा के लिए बीत गया है, अपनी गलतियों और आशकाओं के साथ, अपनी सावधानियों और चेतावनियों के साथ, अपनी परेशानियों और चिन्ताओं के साथ । 'कल' सदा के लिए बीत गया है और अब हमारी पकड़ के वाहर है। अब दूसरे दिन पर विचार करें। अब तक आपने अनुमान लगा लिया होगा। यह जानेवाला कल है। कल जोकि अपने अन्दर अर्थ- पूर्ण सम्भावनाएं लिए हुए है और लिए हुए है आशाए और आश्वा- सन। आनेवाला कल भी हमारी पहुंच से बाहर है, क्योंकि कल सूरज उगेगा और हम उसके साथ जागेंगे। पर उस दिन की उप- लब्धियां, और वह भावना जिससे हम उन्हें पाएगे-बहुत कुछ हमारी आज की तैयारियों पर आधारित है । इस प्रकार हमारे पास अपना एक ही दिन बच रहता है- 'आज'। अगर हम अपनी चित्तवृत्ति को केवल एक दिन-आज- २४ पर केन्द्रित कर सकें तो ज़िन्दगी और आसान हो जाएगी, सफलता और अधिक निश्चित हो जाएगी और उपलब्धियां और अधिक स्पष्ट हो जाएंगी। हम जो इतनी जल्दी निराश हो वैठने हैं और अपने हाथ का काम पूरा करने में असफल रहते हैं उसका कारण यह है कि आप और हम वीते हुए कल का बोझ और आनेवाले कल की चिन्ताएं आज के ऊपर डाल लेते हैं। इसलिए हमें आज केबल आज की ही चिन्ता करनी चाहिए। और जब हन बाज का दिन अच्छी तरह विताएंगे तो बीते हुए दिनों के लिए अफसोस करने का, अथवा आनेवाले दिनों के लिए बांका करने का कहीं कोई कारण ही नहीं रह जाएगा। तो आइए, आज की योजना बनाएं । हमें आज क्या पढ़ना है ? कौन-से नये मोड़ लेने हैं ? अपना पैसा कैसे खर्च करना है ? हमें अपना वह उकता देनेवाला काम कव करना है ? लालसा-भरी योजनाओं और भविष्य की उपलब्धियों के सुन- हले सपनों से अपने-आपको भ्रम में मत डालिए । बाज पर अपने- आपको एकाग्र कीजिए। अपने निश्चय ने कुछ मत उठा रखिए। बुंधली योजनाओं को भविष्य के लिए छोड़ दीजिए और हाथ के काम में जुट जाइए । यदि याप काम को स्थगित करने या रोकने का विचार रखते हों तो ये शब्द याद रखिए : "बीता हुआ कल सपने के अलावा कुछ नहीं है। आनेवाला कल कल्पना मात्र है। लेकिन अच्छी तरह बिताया हुआ बाज वीते हुए हरेक कल को सुख का सपना बना देता है और आने- वाले हरेक कल को आगा की कल्पना। इसलिए इस दिन का टीक इस्तेमाल कीजिए।" आज की योजना बनाइए और सफलता आपकी है। समय का विभाजन कीजिए जब से मानव समय को मापने में सफल हुआ है, हरेक व्यक्ति को बस यही शिकायत है, "मेरे पास समय नही है !" यह बिलकुल नेक है। लेकिन मिलता किसे है ? समय मिलता किसीको नहीं ! २५ वे यदि आप कार्यदक्ष व्यक्ति बनना चाहते हैं तो आपको प्रगतिशील नर-नारियो के स्तर तक पहुंचना होगा। जिन्होंने विस्मयजनक सफ- लता इसीलिए पाई, क्योंकि वे २४ घण्टों के दिन में २६ घण्टों का काम करना जानते थे । फालतू दो घण्टे उन्हें कहां से मिले ? वे उन्हें मिलते नहीं-उचित योजना बनाकर, समय के बजट का अनुसरण करते हुए और व्यर्थ जानेवाले समय को बचाते हुए फालतू समय पैदा कर लेते हैं। महान वैज्ञानिक एडीसन का कथन है, "समय संसार की सबसे अधिक मूल्यवान वस्तु है।" तो जितनी सावधानी आप पैसा खर्च करते समय रखते हैं, समय बिताने में भी उतनी सावधानी रखने का अभ्यास कीजिए। समय-सारणी बनाइए : समय पर नियन्त्रण रखने का सर्वोत्तम उपाय यही है कि समय-सारणी बनाई जाए। कल प्रातः जागने से लेकर रात सोने तक के सारे समय के हर पन्द्रह मिनटों को विताने का कार्यक्रम एक नोटबुक में लिख लीजिए । इसे काम के तीन साधा- रण दिनों तक के लिए क्रियान्वित कीजिए । दिन अच्छी तरह बीता हुआ लगे-~~-ऐसी चेष्टा मत कीजिए। फिर व्यतीत हुए दिन पर एक टिप्पणी लिखिए। इसके पश्चात् अपनी टिप्पणी की जांच कीजिए और विताए हुए समय की काम में आई अवधि और वेकार गई अवधि के सम्बन्ध में एक संक्षिप्त नोट तैयार कीजिए ; परिणाम अपने मुंह बोलने लगेगे। आपको समय के कुछ भाग ऐसे दीखेगे जोकि व्यर्थ चले जाते है या इन्तजार में बीत जाते है किसी व्यक्ति के आने के इन्तजार में या किसी बात के घटने के इन्तजार में। ऐसी अवधि का उपयोग गरीर का तनाव कम करने, आंखों को आराम देने, अथवा होने- बाली भेट के समय किए जानेवाले काम की मोटी-मोटी बातें लिपि- बद्ध करने, या फिर बाकी बचे दिन के कार्यक्रम सम्बन्धी टिप्पणी तैयार करने में कीजिए। यह भी जाच कर लीजिए कि जो समय व्यर्थ गंवा दिया गया है वह गप्पे हांककर, या वेकार की बहस अथवा तर्क-वितर्क मे २६ पड़कर, अथवा हानिकर आलोचना में उलझकर दूसरों का समय नष्ट करने में तो प्रयोग नहीं हुआ है। भले ही आप दफ्तर के समय का इस्तेनाल अच्छी तरह करते हो,लेकिन यदि आप वारीकी से जांच करेंगे तो आपको यहां भी थोड़ी- वहुत गुजाइश मिल ही जाएगी जहां आपका समय बेकार जाता है। हरेक काम दो तरह से किया जा सकता है। सफल व्यक्ति योजना- बद्ध तरीका इस्तेमाल करता है और उसपर सावधानी तथा दक्षता से कान करता है; असफल व्यक्ति बिना किसी योजना अथवा तैयारी के काम सुरू करता है, और परिणाम होता है. गलतियां, पुनरावृत्ति, समय का नाश, श्रम का अपव्यय, सावनों का दुपयोग, चिन्ता और पश्चाताप आदि । काम को पहली बार में ही अच्छी तरह करना लाभकर होता है । उचित योजना से यह संभव है। अपने डेस्क के लिए आप लन्त्र रुख का एक छोटा-सा पोस्टर अयवा कार्ड बनाइए, जिसपर यह लिखा हो : करने लायक काम पहली बार में ही अच्छी तरह करने लायक होता है। अवकाग के ननय का कार्यक्रम बनाना भी आवश्यक है। हमें अपने अवकाया का अधिकांश समय आगन के लिए निकालना होता है। लेकिन 'आराम' और 'आलस्य' को आपस में उलझाइए नहीं। आराम करने का अभिप्राय है तनाव कन करना। आप कोई काम करते हुए भी आरान कर सकते हैं । हां, यदि वह कान आपकी रुचि का हो। यदि हम अच्छी तरह योजना बना लें और समय का विभाजन मुस्तैदी से कर ले, तो हम समय को आत्मसुधार की गतिविधियों में लगा सकते है। अवकाश के घण्टों का उपयोग करने में सदा यही अच्छा रहता है कि किमी खेल या मन-बहलाव की किसी क्रीड़ा में निष्क्रिय दर्गक न बने रहकर उनमें स्वयं भाग लिया जाए। यदि आप दरअसल सफलता पाना चाहते हैं तो आप मनोविनोद की कोई ऐसी गतिविधि चुनिए जोकि आपको ज्ञानार्जन करने, व्यक्तित्व का विकास करने और आत्नविश्वास बढ़ाने में योग दे। २७ अगर आपके घर में, फैक्ट्री में या गोदाम में आग लगनी शुरु हो, तो एक छोटी-सी आग बुझानेवाली मशीन आग की लपट को शान्त कर सकती है। किन्तु जब एक बार यह बल पकड जाती है तो आध. दर्जन फायर ब्रिगेडो (आग बुझानेवाले इंजनों) को भी उसपर काबू पाने के लिए जूझना होगा। एक गलती को छिपाने के लिए आप एक झूट बोलते हैं; और गीघ्र आपको परस्पर-विरोधी अनगिनत स्पष्टीकरणों में उलझना पड़ता है। गलत शुरूआत से बचिए और फिर आपको डरने की कोई वात नहीं है। पहली गलती से बचिए और आप सदा ठीक चलते चले जाएगे। व्यवस्थित ढंग से काम करना अधिक आसान है। अपनी मेज़ पर का काम हाथोंहाथ करते चलिए और फिर वह कभी अस्त- व्यस्त नहीं रहेगी । अपने कागज-पत्र, कितावें, औजार और फुटकर सामान ठीक-ठिकाने पर रखिए और फिर आपको जब भी उनकी जरूरत पड़ेगी, वे चीजे आपको वहीं मिलेगी। कार्यक्षमता-विशेपनों ने हिसाब लगाया है कि किसी पुस्तक, फाइल, पेन, औजार या और किसी सामान को इस्तेमाल करने के बाद उसके ठीक ठिकाने पर वापस रखने में कम समय लगता है, वनिस्वत इसके कि उसे ऊलजलूल कहीं दूसरी जगह रख दिया जाए और फिर जव उसकी आवश्यकता पड़े तव उसे ढूढ़ना शुरू किया जाए। अगर आपका एक मित्र या साथी कोई गलती करता तो उसे तुरन्त ही टोकिए, क्योंकि समय वीतने पर वह गलती उसकी आदत में बदल सकती है। अगर आपको अपने अधिकारी को कोई सुझाव देना है तो उसे आप पहले ही अवसर पर दे डालिए। आपकी देर का एक-एक क्षण आपकी हिचकिचाहट को बढ़ाएगा। इस विषय में हम पृष्ठों के पृष्ठ भर सकते हैं; किन्तु इस समय आप जल्दी में है और संकेत-मात्र ही पाना चाहते हैं, सो हम आपसे यही कहकर बात समाप्त करेंगे कि प्रत्येक कार्य का 'श्रीगणेग शुभ हो'-इसका ध्यान रखिए। आपके प्रत्येक भावी दिन का सुख और सफलता इस बात पर आधा- रित है कि आप आज के दिन की शुरूआत किस प्रकार करते हैं । नो निश्चय कीजिए कि आप आगा और उम्मीद के साथ जागेंगे। इसका सबसे अच्छा उपाय यह है कि आप पिछली रात शान्त मन से सोइए। जिन्होंने आपके प्रति अनिष्ट किया है उन्हें माफ कर दीजिए और उनकी त्रुटियों के लिए उदारतापूर्वक छूट दीजिए। दिन-भर मधुर घटनाओं का स्मरण कीजिए और आनेवाले कल की उपलब्धियों का मन में साफ तौर से चित्र उतारिए। जब आपकी बड़ी का अलार्म बजे, तब नींद खुल जाने पर लेटे न रहिए और इस दुविधा में नं पडिए कि अभी उठू या नहीं; अथवा इस बात से कुढ़िए नहीं कि इसने आपकी नींद खराव कर दी है। फुर्ती से उठिए, संक्षिप्त-सी प्रार्थना कीजिए और अपने-आपको इस विश्वास से प्रेरित कीजिए : "आज का दिन मेरे लिए सौभाग्य का दिन है। मैं अपने समय और अपनी प्रतिभा का प्रयोग बहुत ही अच्छी तरह कदंगा, और अपने चारो ओर प्रसन्नता और आलाद विखेरने, दक्षता से काम करने और अपना ध्येय प्राप्त करने के लिए मार्ग में आनेवाले हरेक अवसर से लाभ उठाऊंगा । यदि मैं भरसक प्रयास करूंगा तो ईश्वर मेरी मदद करेगा।" उठकर दो-चार अंगड़ाइयां लीजिए और प्राणायाम की किस्म के कुछ व्यायाम कीजिए। इसके बाद दांतों की सफाई तथा स्नान आदि से निवृत्त हूजिए। अपना नारता पूरी एकाग्रता एवं रुचि से कीजिए। खाते समय तर्क-वितर्क में न पड़िए और समाचारपत्र मत पढ़िए। यदि आप अपने कागज-पत्र और हैंडबैग रात को सहेजकर तैयार रखेंगे लो आप समय पर बिना हड़बड़ाहट के घर से प्रस्थान कर सकते है । इसके अतिरिक्त,अपने राह-चलते साथियों से मुस्कराकर अभि- वादन कीजिए। उनसे उत्साह के साथ पेश आइए । इस प्रकार कार्य के प्रति असीम उत्साह लेकर कार्यालय में प्रवेश कीजिए। ३१ . छठा दिन अपना आशय ठीक-ठीक रखिए निर्देश को ठीक तरह से न समझने के कारण ही प्रतिदिन फैक्ट- रियों और वर्कशापों में अनेकों लोगों की जानें भारी संकट में पड़ जाती है, और समाज तथा राष्ट्र को टूट-फूट और नुकसान के जरिये हजारों रुपयों की चपत लग जाती है। वैसे जितना समय किसी अस्पष्ट निर्देश देने में लगता है उतना ही समय एक स्पष्ट और ठीक-ठीक निर्देश देने में भी लगता है; और अगर इसमें दुगुना समय भी लग जाए, तो भी ठीक-ठीक निर्देश से काम आखिरकार सदा अधिक सुरक्षा से, अधिक जल्दी और अधिक अच्छे ढंग से होता है। निर्देश देते समय अपनी तसल्ली कर लीजिए कि वह अच्छी तरह समझ में आ भी जाएगा या नही । निर्देश मे सरल भापा और छोटे-छोटे वाक्यों का प्रयोग कीजिए, जो हर किसीकी समझ में आ सकें। सर्वोत्तम यही है कि जो भी निर्देश आपको देना है, लिखकर दें और नीचे हस्ताक्षर और दिनांक डाल दे। दूसरे, इस बात को अच्छी तरह देख-भाल लें कि-निर्देश उचित व्यक्ति को दिया जा रहा है या नहीं; जिस व्यक्ति के हाथ उसे भेज रहे है वह विश्वसनीय है या नहीं; जिस व्यक्ति के लिए भेजा जा रहा है उसका पता पूरी तरह लिखा गया है या नहीं। यदि आपको दो या अधिक व्यक्तियों को दो या दो से अधिक निर्देश देने हों तो उन्हे सदा अलग-अलग फार्मो या चिटों पर दीजिए। दफ्तरो एवं वर्कशापों मे दैनिक निर्देश तथा फार्म भरने-भराने ३२ Fram

के चक्कर को कम करके आप उस मूल्यवान समय की बचत कर
सकते हैं जो लाल फीताशाही और वेकार की औपचारिकता में नष्ट
होता है।
इस पुस्तक को परे रखने से पहले अपनी टेवल-डायरी में आप
अपने विभाग के फार्मों की समस्या पर इस सप्ताह थोड़ा समय
लगाने के लिए नोट कर लीजिए।
जो आपका अभिप्राय है, वही कहिए
बहुत-से लोग निर्देश देते समय यह कहते हुए अपनी गलती
छिपाते हैं कि "मेरा अभिप्राय यह न था।" ऐसे लोगों के लिए हमें
एक ही बात कहनी है : “भविष्य में कृपया जो आपका अभिप्राय
हो वही कहिए और जो कहिए उसीका अभिप्राय निकालिए।"
अमरीका के भूतपूर्व राष्ट्रपति विल्सन जब एक छोटे बालक थे,
तब वे जो कुछ लिखा करते थे उसे पढ़कर अपने पिताजी को सुनाया
करते थे। प्रायः पिता उनसे पूछते, "इससे तुम्हारा क्या अभिप्राय
है ?" बालक विल्सन अपना आशय स्पष्ट करते। इसपर उनके पिता
कहते, "तब यही लिखो न।"
निर्देश देते समय ऐसी भापा का प्रयोग करना पर्याप्त नहीं है जो
समझी जा सकती हो, बल्कि ऐसी भाषा का प्रयोग कीजिए जो
निस्संदेह समझी जाएगी।
लिखित निर्देश देते समय एक बात और ध्यान देने योग्य है, वह
है संक्षेप । लम्बे निर्देश प्रायः उलझा देते है । महत्त्वपूर्ण यह नहीं है
कि आप कितने शब्दों का प्रयोग करते है, बल्कि यह है कि आप
उनका प्रयोग कितनी अच्छी तरह करते हैं।
बीच-बीच में शब्दकोष का प्रयोग कीजिए
एक और दोप है, जिसका परिहार करना चाहिए। वह है
द्वयर्थक, निरर्थक और. संदिग्धं शब्दों का प्रयोग । मेरा अनुकरण
कीजिए और जभी कुछ खटका हो, शव्दकोप का प्रयोग कीजिए।
नीन मिनट पहले मैंने पॉकेट डिक्शनरी से तीन बार परामर्श किया
262
३३

है, जबकि मैं बी० ए० और बी०टी० को अपनी जित्रियों के लिए गर्व कर सकता हूं और फिर मैं बीस बरसों से पत्रकार और सम्पादक भी रहा हूं। जो लोग शब्दकोप को बार-बार देखने में अपनी हेठी समझते हैं वे लोग अज्ञानी और वेहूदा हैं । ऊपर के अनुच्छेद को पढ़ते समय यदि आपने शब्दशोप की आवश्यकता महसूस की है तो आप इस पुस्तक को पढ़ने से पहले ही इससे लाभ उठा रहे हैं। यदि आपने दरअसल गन्दकोप की सहायता ली है तो आप ठीक सफलता के मार्ग पर हैं। यदि आपको वैसी कोई आवश्यकता महसूस नहीं हुई तो आप अपनी इस खतरनाक आदत पर निगरानी रखिए। प्रमाण मांगिए मनुष्य की यह प्रवृति है कि वह छपी हुई वात पर अधिक जल्दी विश्वास कर लेता है। लेकिन आप प्रचलित छल-कपट पर टिकी पत्र-पत्रिकाओं के लेखों से पथभ्रप्ट न हूजिए। जो कुछ आप पढ़ते हैं उसके बारे में जालोचनात्मक दृष्टिकोण अपनाए और अपने मन में सदा सचाई जानने का आग्रह रखिए । झूठा प्रचार करनेवालों की कोटि में जाते है-वेपर की उड़ाने- वाले, शेखचिल्ली टाइप लोग । ख्याति और प्रतिष्ठा को नष्ट होने से तभी रोका जा सकता है जबकि लोग झूठी वात, उड़ानेवाले स्त्री- पुरुषों से दो टूक यह पू.: "ये जो बातें आप कह रहे हैं, क्या आपके पास इनके सच्चे होने का प्रमाण है ?" ३४ सातवां दिन पल-पल का सदुपयोग कीजिए सभी सफल व्यक्तियों में एक अद्भुत लक्षण सचमुच समान रूप से पाया जाता है। उनके आचार-विचार से यौवन टपकता है, और उनके हृदय में युवकों-सी उमंग रहती है। इसका कारण यह है कि उन्हें ज़िन्दगी कभी नीरस नहीं लगती-वे पल-पल का मानन्द उठाते हैं। आपने देखा होगा कि उनके चेहरे किसी अदृश्य भावना से दमकते रहते हैं, जैसेकि आनेवाला हरेक क्षण उनके लिए किसी नये विचार, नये मित्र, नये रुचिकर कार्य और नये व्यवसाय के रूप में तिलस्मी पिटारा खोल देगा। और जव उनके पास अवसर आता है तो फिर वे चूकते नहीं। दुनिया को स्तम्भित कर देनेवाली वहुत-सी ईजादें आविष्कारक की क्षणिक प्रेरणा के स्फुरण का परिणाम हैं; यद्यपि इससे पूर्व बरसों धैर्यपूर्वक श्रम एवं परीक्षण करने पड़े। पल-पल के महत्त्व को पहचानिए : वहुत-सी साहित्य की अमर कलाकृतियां अपने अस्तित्व के लिए कुछेक सुप्रयुक्त क्षणों की आभारी हैं जवकि हममें से लाखों व्यक्ति कोई श्रेष्ठ कार्य कर पाने में इसलिए असमर्थ रहते हैं, क्योंकि हम काल के एक क्षण का सम्मान नहीं करते। सफलता को गीव्र ही अपनी चेरी वनाने के लिए आपको हरेक क्षण का लेखा-जोखा रखने की आदत डालनी होगी। काल कब रुका है ! उसके कदम कब पलटे हैं ! हर्बर्ट कैसन कहते हैं : "काल की इकतरफा सड़क पर कोई व्यक्ति उलटे कदम 1 { . । लीट नहीं सकता। यदि किसी आदमी ने जवानी को योंही गंवा दिया है तो उसके वे जवानी के बरस हमेशा के लिए लद गए । तीस वरस का होते-होते ज़िन्दगी के सभी चौराहों को बेखवर पार करने के वाद कोई युवक कुछ अधिक सावधान, विवेकशील एवं महत्वाकांक्षी तो हो सकता है, लेकिन वेकार में गंवाए हुए जवानी के वरसों के लिए उसे सदैव खेद बना रहेगा।" बस, एक मिनट ! आपने उस आदमी का किस्सा तो सुना ही होगा जो अपनी पत्नी को एक पार्टी में ले जा रहा था। उसने शेव की, मुंह-हाथ धोया और विलकुल तैयार हो गया। तभी उसकी पत्नी ने दूर से चिल्लाकर कहा कि वह नाक पर पाउडर लगा रही है। वह बोली, "डियर, मैं एक मिनट में आई !" आखिरकार जब वह अपने कमरे से बाहर निकली तो उसका पति अपने कमरे की ओर लौटने लगा। पत्नी ने वेसब्री से पूछा, "कहां जा रहे हो तुम ?" इसपर पति ने कहा, "मुझे दुवारा शेव करनी होगी।" इन्तजार वहुत लम्बी हो गई थी। खैर, आप इसी वक्त यह प्रतिमा कीजिए : "जब कभी मैं 'वस एक मिनट' कहूगा, तब मै उसे पूरी तरह निभाऊंगा।" समय का अन्दाज़ा न रख पाने में केवल महिलाएं ही बदनाम नहीं है। बीसयों वार मुझे अपने मित्र की प्रतीक्षा में सिनेमा के बाहर चहलकदमी करनी पड़ी है। यह और बात है कि हमने प्रतीक्षा को मन से निकाल फेंकने का ढंग निकाल ही लिया। प्रतीक्षित मित्र की टिकट गेटकीपर को थमाकर मैं भीतर घुस जाता था। इस प्रसंग में जीवन का एक सफल मार्ग इस उक्ति में निहित है : "अपनी छोटी-मोटी सफलताओं के लिए प्रस्तुत परिस्थितियों और लोगों का पूरा-पूरा उपयोग कीजिए।" थोड़ी-सी समझ-बूझ के साथ आप ऐसी बहुत-सी समस्याओं को हल कर सकते है, और समय बचाने के साथ-साथ काया-कष्ट से भी बच सकते हैं। इसकी परीक्षा करके देखिए। 1 परोपकार कीजिए जीवन का अधिक से अधिक सदुपयोग करने के लिए आप अधिक मित्र तो बनाइए ही, इसके अतिरिक्त भी और कुछ करने की आवश्यकता है। आपको अखिल विश्व से प्रेम करना होगा, मैत्री करनी होगी। मित्र बनाने का सबसे अच्छा तरीका है कि आप परोपकार- भावना से दूसरों का हित कीजिए। यहां यह बात इतना महत्त्व नहीं रखती कि आप दानी कितने वडे हैं जितना यह कि आप दयालु और दरियादिल कितने हैं। आज आपने जो व्यवसाय खड़ा किया है वह कल की एक गलती से नष्ट हो सकता है । लेकिन आप जिन लोगों को प्रोत्साहित करते है, जिन कर्मचारियों को प्रशिक्षित करते हैं, जिन साथियों के कार्यो की प्रशंसा करते हैं और जिन आश्रितों को प्रेरित करते हैं-वे सभी स्थायी निधि सिद्ध होंगे । और फलस्वरूप आप भी इनसे लाभान्वित होगे, क्योंकि ठीक ही कहा गया है : “उपकृत हुए विना कोई उप- कार नहीं करता।" अगर आप जीवन में सफल होना चाहते हैं तो आप दूसरों का हित-साधन करने की आदत डालिए । अगर आप प्रसन्न रहना चाहते हैं तो आप दूसरों को प्रसन्न रखिए। किसी दिन आपकी विक्री बाजार में अधिकतम हो सकती है, या आप कोई नया सौदा पटा लेते हैं या आप अपने प्रतिद्वन्द्वी से बाजी मार ले जाते हैं तो इन सब बातों से, सायंकाल दिन का काम निपट चुकने पर, आपको प्रसन्नता और सन्तोष की अनुभूति तो होगी; किन्तु यदि आप किसी आकुलहृदय को प्रफुल्लित नहीं करते, किसी खिन्न कार्यकर्ता को सान्त्वना नहीं देते, किसी निराश को आगा नहीं बंधाते, किसी ढुलमुल व्यक्ति को उत्साहित नहीं करते, या किसी असहाय की सहायता नहीं करते- तो रात के समय जब चारों ओर शान्ति का साम्राज्य छा जाता है और कारखानों के घरघराते पहिये निश्चल हो जाते हैं, आप अन्त- रात्मा में सन्तोपजनित सुख की अनुभूति न पा सकेंगे। हां तो प्रिय पाठक महोदय, क्या आपको यह विचित्र नहीं लगता कि हम सफलता-प्राप्ति के उपाय जानने में तो इतना अधिक समय लगाते है, लेकिन सुख-प्राप्ति की विधि जानने के लिए उतना ही कम । आइए, हम यह महीना आत्मनिरीक्षण में लगाएं। आज से नहीं, इसे अभी से शुरू कीजिए। शीघ्र ही आप पाएंगे कि यदि आप संसार को अधिक दान करेंगे तो उसका प्रतिदान भी आपको अधिक से अधिक मिलेगा। जवान बने रहिए जब ऐलसाइड डि गैस्परी प्रधानमन्त्री वने तो एक स्विस पत्र- कार ने उनसे भेट करते समय कहा, "यह मेरा अन्तिम प्रेस-इण्टरव्यू है । मैं पैंसठ वर्ष का हो गया हूं और रिटायर होने जा रहा हूं इसपर असहमत होते हुए गैस्परी ने उत्तर दिया, "कितने दुःख की बात है ! मैं भी ६५वें मे हूं लेकिन मैं अब एक नया पद संभालने जा रहा हूं।" 1 उम्र का सफलता के साथ कोई सम्बन्ध नहीं। अगर आप सोचते है कि आप अभी छोटे हैं और ख्याति व सफलता नहीं पा सकते, तो याद रखिए कि ३३ साल की उम्र में सिकन्दर महान ने संसार को जीता था, २१ साल की उम्र में पील पालियामेंट के सदस्य वने थे, ११ साल की उम्र में बॉउनिंग ने उत्कृष्ट कविता रच डाली थी, और ७ साल की उम्र में हैण्डेल हर हफ्ते ३ वाद्य बजा लेता था और एक संगीत-रचना तैयार कर लेता था। और वर्तमान काल में हमारे देश के रामानाथन कृष्णन ने २३ साल की उम्र में विम्बलडन के चैम्पियन अलेक्स ऑल्मीडो को टेनिस में हरा- कर 'टेनिस-जगत्' में नाम कमाया। आयु मन की एक अवस्था है न कि तन की। बढ़ने के दो तरीके हैं-बड़ा होना, या बूढा होना । ८० बरस की उम्र में, ग्लैडस्टोन राजनीतिक सत्ता पाने की ओर बढ़े थे, और कैटो ने ग्रीक पढ़ना शुरू किया था। ६० बरस की उम्र मे, माइकेलैंजलो पहले की तरह पेटिंग की अमर कलाकृतियां तैयार करते रहे। ३८ हमारे युग में भी, जीवन के सभी क्षेत्रों में ६० से ऊपर की उम्र के ऐसे स्त्री-पुरुष मिलते हैं जोकि अपने से आधी उम्र वालों की अपेक्षा अधिक उत्साही और अधिक तेजस्वी हैं । वे आपसे कहेंगे : "अगर आप इतने बूढ़े हैं कि कुछ सीख नहीं सकते तो आप वस्तुतः इतने बूढ़े हैं कि आपको जीने का भी कोई अधिकार नहीं।" स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमन्त्री पंडित जवाहरलाल नेहरू अपनी ७४ वर्ष की आयु तक विना माराम किए लगातार काम में जुटे रहे। ये लोग कोई अपवाद नहीं हैं। सारा संसार ऐसे लोगों से भरा पड़ा है। यदि आप इस धारणा पर अमल करें कि आयु मन की एक अवस्था है, कुछ बरसों का योगफल नहीं, तो आप भी इन लोगों की तरह बन सकते है। हम जैसा महसूस करते हैं और जिस चित्त- वृत्ति से काम करते हैं हम उतने ही तरुण हो जाते हैं । जितनी मात्रा में हमारे अन्दर उत्साह और उल्लास रहता है, हम उतने ही तरुण रहते हैं। और हम जितनी मात्रा में सिड़ी, रूखे अथवा चिड़चिड़े होते हैं उतने ही हम बूढ़े हो जाते हैं। यदि आप अब तक सफल रहे हैं तो अपना 'रिकार्ड' वनाए रखिए ! अगर सफलता आपके मार्ग में नहीं आई तव उसके आने की प्रतीक्षा में बैठे मत रहिए । उसकी ओर चल पड़िए और उसे वीच रास्ते में जा पकड़िए। यदि आपके कुछ सपने हैं, तो केवल जाग-जागकर भाग्य को कोसिए नहीं। उन सपनों को साकार करने के लिए काम शुरू कर दीजिए। बीता हुआ कल एक सपना है; भानेवाला कल एक कल्पना । लेकिन 'भाज' एक यथार्थ है। बीते हुए कल को कोसिए नहीं। आनेवाले कल की प्रतीक्षा मत कीजिए। आज-वल्कि अभी काम गुरू कर दीजिए । प्रत्येक 'आज' अच्छी तरह बिताइए। और फिर भाग्य आपका है। ३६ । पृष्ठ उलटने की, मेज़ पर पांव फैलाने की और पैरों को हिलाते रहने की बुरी आदतों से बचिए। दूसरों की कमियों को सहन कीजिए, लेकिन उनको अपने अन्दर कम करने का भरसक प्रयास कीजिए। व्यक्ति का अपना महत्त्व है मदियों से शिक्षाशास्त्रियों का मत रहा है कि शिक्षा से अभिप्राय बच्चों में ज्ञान का समावेश करने-भर से है। आगे चलकर शिक्षा को अपना ठीक अर्थ मिला, अर्थात् बालक की अन्तःप्रवृत्तियों को प्रकाश में लाना अथवा उसका विकास करना । इसी प्रकार, किसी युग में व्यक्तित्व को भी वेशभूपा की ही तरह कोई वस्तु समझा जाता था ।---जब चाहे पहन लो, जव चाहे उतार फेंको। शिष्टाचार, वनी-ठनी छवि, स्वच्छ और सुरुचिपूर्ण वस्त्र आदि वेश-भूपा के अन्त- र्गत आते थे। किन्तु अब हमें ज्ञात हो गया है कि व्यक्तित्व का अभिप्राय बाह्य छवि से नहीं है-व्यक्तित्व से आशय है विकसित आत्म । साधु-संन्यासियों की सूक्तियों के गान-मात्र से, अथवा समाज के तथाकथित नेताओं के दूषित दृष्टिकोणों को अपने मुंह से वधारने से तो आपका व्यक्तित्व बनने से रहा; यदि आप ऐसा करते हैं तो आप 'हिज मास्टर्स वायस' के रिकार्ड-मात्र बन जाएंगे। आपको खुद सोचने-समझने की आदत डालनी चाहिए और अपने विचारों को प्रतिपादित करके उन्हें अभिव्यक्त करना चाहिए। फिल्म-स्टारों के फैशन की नकल मारकर और पत्र-पत्रिकाओं में छपे मॉडलचित्रों की सुन्दरता का बन्दर की तरह अनुकरण करके आपका व्यक्तित्व नही बनेगा। आपको वही वस्त्र धारण करने चाहिए जो आपके रंग, कद और वातावरण के अनुकूल हों-और आपके अन्तर् में जो आकर्पण है, जो मोहकता है, उसे वाहर लाप्रकट करनेवाले हों। व्यक्तित्व के तीन घटक व्यक्तित्व के तीन आवश्यक घटक है : निश्छलता, ज्ञान और सेवा। यदि आप किसी दूसरे का अन्धानुकरण १. ग्रामोफोन रिकार्ड बनानेवाली एक प्रसिद्ध कम्पनी ४२० ..

। करें तो आप व्यक्तित्व प्राप्त नहीं कर सकते। आपको वहीं होना चाहिए जो 'आप' वस्तुतः हैं । इसमें कोई सन्देह नहीं कि आप जिनके प्रशंसक हैं उनके अनुकरण से बच नहीं सकते अथवा अपने माराव्य के गुणों को अपनाए बिना रह नहीं सकते। किन्तु अन्धी नकल अनु- करण नहीं है । सीखने की बात होतो दूसरों से खुशी ने सीखिए, लेकिन उसे अपना बना लीजिए। जैसा वे करते हैं वैसा कीजिए, लेकिन उसे अपने ढंग से कीजिए। जिनके आपप्रशंसक है उनके गुणों का अध्ययन कीजिए और उन्हें अपने अन्दर विकसित करने का प्रयास कीजिए। निश्छलता अथवा सरलहृदयता व्यक्तित्व का मूल आधार है। यह सुन्दरता और पवित्रता से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। व्यक्तित्व का दूसरा अंग है नान । मनान से भय उत्पन्न होता है और ज्ञान से विश्वास । अधिक से अधिक एवं बुद्धिमत्तापूर्वक अध्ययन कीजिए । अध्ययन का वास्तविक उद्देश्य ज्ञान का संचय करना नहीं है, बल्कि इसका प्रयोग करना है। व्यक्तित्व का जल्दी से जल्दी विकास करने का तरीका नमाजसेवा। इससे आत्माभिव्यक्ति के असंख्य अवसर प्राप्त होते ; व्यवहारकुशल होने में मदद मिलती है और सहनशीलता बढ़ती है; यही चाटुकारिता की व्यर्थता सिद्ध करती है और छल-कपट के ढोल का पोल भी खोलती है। आप पड़ोसी की सेवा कीजिए और आप राष्ट्र का नेतृत्व करना सीख जाएंगे। यदि आप असीम उत्साह के साथ अपने व्यक्तित्व के निर्माण और विकास के पथ पर अग्रसर होते है, और इस अन्वेपण में अपने निश्चय से विचलित नहीं होते तो आपका व्यक्तित्व भी आपके प्रिय मिने-स्टार की तरह ही चमक सकता है। ४ ४३ + हैं, तो ऐसी भावना के निवारण का सबसे अच्छा उपाय यह है कि आप अपने-आपको आभ्यन्तर से विकसित कीजिए। ऐसी पुस्तकें पढ़िए जो आपके हृदय का विकास करें, आपकी वाणी को प्रशिक्षित करें और आपको मनःशान्ति अथवा आत्मसन्तुलन प्रदान करें। मनः- शान्ति प्राप्त कीजिए किन्तु उसका ढोंग मत रत्रिए । सद्भावना के द्वारा ही सफलता तक पहुंचा जा सकता है स्थायी सफलता तक। प्रतिदिन अपने-आपका जायजा लीजिए। याद रखिए कि अधि- कार जताने की इच्छा प्रत्येक स्तर के कर्मचारी में विद्यमान होती है-अधिकार के लिए तरसते तुच्छ क्लर्क से लेकर और अधिक अधिकार पाने को लालायित उद्धत मैनेजर तक। दूसरों से डाह मत कीजिए हममें से बहुत-से लोगों की सफलता की राह में ई- आड़े आती है। श्री कोलमैन कॉक्स का कथन है : "जब तक आप अपने किसी मित्र अथवा किसी सहयोगी की उन्नति पर ईमानदारी और निश्छलता से उसे उचित श्रेय देने की उदारता नहीं बरतेंगे तब तक आप सफलता के सोपान पर ऊंचे नहीं चढ़ पाएंगे।" जब आपके साथी या सम्बन्धी विपत्ति में होते है तव तो आप उनकी सहायता को दौड़ पड़ते हैं। लेकिन यदि वे कोई सफलता प्राप्त करते हैं तब क्या आप उनको वधाई देने में भी उतने ही सजग रहते है ? देखिए, ईमानदारी से जवाब दीजिएगा। ईया के फलस्वरूप असहयोग की भावना पनपती है। आज आप अपने अन्दर झांकिए और देखिए कि आपने कितनी बार दूसरे के किसी विचार या प्रयास को इसलिए तुच्छ कहा है क्योकि वह पहले आपको नहीं सूझा, यद्यपि आप कहते यह हैं कि यह क्रियात्मक नहीं है, बहुत खर्चीला है अथवा असामयिक है। संशय से पिंड छुड़ाइए कुछ लोग इसलिए सफल नहीं होते क्योंकि वे दूसरों को मदद करने से डरते है। वे कल्पना कर लेते हैं कि हरके व्यक्ति उनकी ४६ दयालुता, उदारता या सहानुभूतिशील प्रकृति का लाभ उठाने की फिराक में है। अतः वे किसी भी व्यक्ति को अपनी ओर से कुछ भी देना स्वीकार नहीं करते। यदि आप इस भ्रम के शिकार हैं तो शीघ्र ही इससे पिंड छुड़ाइए । सीना तानकर, सिर ऊंचा करके दुनिया की नजर से नजर मिलाइए। क्योंकि "जब आपके दिमाग में यह विचार घर कर जाता है तभी वस्तुतः वह आपके विद्ध हो जाती यदि हाल ही में आपकी पदवृद्धि हुई है तो देखिए कि कहीं यह नई शराव की तरह आपके दिलो-दिमाग पर हावी न हो जाए। दूसरे, बनिए मत, मोर मुखौटा मत लगाइए । आप कुछ लोगों को कुछ समय के लिए तो बोखा दे सकते हैं, लेकिन आप सभी लोगों को सदा के लिए मूर्ख नहीं बना सकते। तुच्छ अधिकारी असली काम- धन्वे में अभिशाप सिद्ध होते हैं, जवकि चतुर सेल्समैन आमने-सामने बात करके लोगों से निवटना खूब जानता है। कॉक्स महोदय ने इस ढंग के दो मनोरंजक दृष्टान्त दिए हैं। वे कहते हैं : जब कोई व्यक्ति आफिस के भीतरी कक्ष से आपके कार्ड पर यह लिख भेजे कि वह व्यस्त है, तो आप कार्ड की पीठ पर लिखिए "यही कारण है कि मैं आपसे मिलना चाहता हूं। मेरे पास वेकार लोगों के साथ वर्वाद करने का वक्त नहीं है। पुनश्च : निश्चय जानिए कि वह आपसे मिलेगा। और जब कोई व्यक्ति कहे कि वह आपके प्रास्ताव से सहमत नहीं है, तो मुस्कराते हुए कहिए : "मैं जानता हूं कि आप सहमत नहीं हैं। यही कारण है कि मैं इतनी दूर से आपके दर्शनार्थ आया हूं। यदि आपकी इसमें दिलचस्पी होती तो फिर आप मुझे मिलने आते।" ku ..

दसवां दिन १ - - व्यवहारपटु वनिए एक जूता-विक्रेता एक सहायक को नौकरी पर रखने जा रहा था । वार्तालाप के दौरान उसने प्रत्याशी से कहा : "मान लो, तुम किसी महिला को सैडल का जोड़ा पहना रहे हो, और वह कहती है, 'क्या आपके ख्याल में मेरा वायां पैर दायें से बड़ा नहीं है ?' तो इसपर तुम क्या कहोगे ?" "मैं कहूंगा, 'देवीजी, उल्टे आपका दायां पैर वायें से छोटा है।" प्रत्याशी ने तुरन्त उत्तर दिया। और उसे नौकरी मिल गई। सेल्समैनों का वर्ग अपनी व्यवहारपटुता के लिए खूव प्रसिद्ध है। उनकी सफलता अन्य गुणों की अपेक्षा इसी एक गुण पर अधिक आश्रित है। लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि व्यवहार- पटुता किसी भी आजीविका या पेगे में महत्त्वपूर्ण योग देनेवाला एक गुण है। आप डॉक्टर हों या दरवान, साइंसदान हों या सर्जन, प्रचारक हों या पोलिटीशियन अथवा राजनीतिन, और व्यापारी हों या व्यवस्थापक-आपमें व्यवहारकुशलता नितान्त अपेक्षित है और वह भी पर्याप्त मात्रा में । विक्टोरियाई युग में शिष्टाचार को भी एक ललितकला माना जाता था, और वीरोचित विनम्रता समाज में व्यक्ति का एक आव- श्यक गुण समझा जाता था। हमारी शताब्दी तक आते-आते शिष्टता और शालीनता को समय के अपव्यय के रूप में अथवा प्रवाहमय गतिविधि के मार्ग में बाधा के रूप में हेय माना जाने लगा। डेलकार्नेगी, नैपोलियन हिल, हर्बर्ट कैसन और अन्य अनेकों कार्यक्षमता-विशेषज्ञों का कहना है कि मात्र 'कृपया' शब्द का प्रयोग ही अपने-आपमें लाख रुपये की एक बात है। भले ही व्यापारिक पटुता में कृत्रिमता और छिछलापन झलकता है, किन्तु फिर भी हम इसके महत्त्व को कदापि नजर-अन्दाज नहीं कर सकते। बहुत-से लोग इतने विवेकहीन होते है कि व्यवहारपटुता उन्हें छु तक नहीं गई होती। वे अपनी अशिष्टता और उद्दण्डता को स्पष्टवादिता कहकर नजर-अन्दाज कर देते हैं। अगर आप मीठी या कड़वी बात को खरा-खरा कह डालने पर इतने ही तुले हुए हैं तो आपको कोई अदना-सा राज-मजूर वनकर ही सब कर लेना होगा- तब आपको राजनीति और सार्वजनिक जीवन से सम्बन्धित कोई महत्त्वाकांक्षा नही पालनी चाहिए। चाहे कोई भी व्यवसाय, व्यापार या उद्योग-धन्धा हो, उत्पादन और सहयोग की हर गतिविधि का मूलतत्त्व व्यवहारपटुता है। प्रतिभा महत्त्वपूर्ण ज़रूर है, पर व्यवहारपटुता तो अनिवार्य है। व्यवहारकुशल बनिए : जहां बल प्रयोग से काम नही बनता, वहां वही काम तनिक-सी चतुराई से निकल आता है-यह बात समझने के लिए आपको कोई मनोवैज्ञानिक होने की आवश्यकता तो है नहीं। सीधी-सी बात है। मनुष्यों को, और विशेषतया महि- लाओं को, जवरदस्ती अपने साथ घसीटने की अपेक्षा अधिक सरलता से अपना अनुगत बनाया जा सकता है। माना कि आप थोड़ी देर के लिए कुछ लोगों को अपनी ओर आकृष्ट करने में सफल हो जाएंगे, किन्तु यदि आप तनिक-सी चतुराई से काम लें तो आप लगभग उतने ही प्रयास से अपेक्षाकृत अधिक लोगों को देर तक के लिए अपने पीछे लगा सकते है। व्यवहारपटुता की परिभापा यों की जा सकती है : “उचित समय पर उचित कार्य करने या उचित बात कहने की योग्यता ही. पटुता है।" वार्तालाप के दौरान आप कभी यह कहने की कोशिश मत कीजिए कि आप स्वयं ठीक हैं और दूसरा गलत । ऐसा कहकरें 262. ४३ ॥ उनके विशाल कृत्यों को देखकर बहुत आश्चर्यचकित रह जाते हैं। पर यदि हम इन महापुरुषों में से किसी एक की भी दिनचर्या पर दृष्टि- पात करें तो हम पाएगे कि चाहे वो रही हो या कड़कती धूप, वे काम में जुटे रहे; और उन्होने इस बात की परवाह नहीं की कि उन्हे 'मूड' कब आएगा। सो, आप आस्तीन चढ़ा लीजिए और काम पर पिल पड़िए । अपने आलस्य, अज्ञान या उदासीनता को छिपाने के लिए किसी बहाने की तलाश मत कीजिए। काम, काम, काम!-निरन्तर काम कीजिए । बुद्धिमान व्यक्ति केवल एक ही विराम जानता है, और वह है चिरविराम । 'यह काम करने लायक नहीं है', बहुत-से लोग यह कहकर भी 'मूड मे नही हूं' वाला बहाना बनाते है । इस किस्म के लोग करने योग्य महत्त्वपूर्ण कामों की राह देखा करते हैं । वे बड़े काम करने को अधीर रहते है और छोटे कामों से घृणा करते है । पर दुख इस बात का है कि वे दोनों में से कोई-सा भी काम नहीं कर पाते । अच्छे काम की प्रतीक्षा में बैठे रहना उतनी ही मूर्खता की बात है जितनी कि काम के लिए अच्छे मूड की प्रतीक्षा मे रहना। पास आनेवाले छोटे- मोटे कामों को अपने हाथ में लीजिए और निस्सन्देह बड़े काम उनके पीछे आते चले जाएंगे। जब आप उदास हों कुछ लोग उदासी का मूड दूर करने के लिए सप्राण संगीत का सहारा लेते हैं। कुछ लोग इसके लिए प्रेरक कविताएं पढ़ा करते हैं; कुछ तरोताजा करनेवाली हवाखोरी किया करते है, या शीतल जल से स्नान करते हैं। पर मुझे ऐसी स्थिति में चाय का एक गर्म प्याला बहुत अनुकूल रहता है, क्योंकि इस तरह के लेख आदि के लेखन में 'मूड' की नहीं, बल्कि इस सम्बन्ध में दूसरों की लिग्वी सामग्री की जरूरत होती है। अपने मित्रो से पूछिए कि उदासीनता से पिंड छुड़ाने के लिए वे क्या किया करते है। उनके बताए उपायों में से कोई-सा एक उपयुक्त ५२ उपाय चुन लीजिए; और आवश्यकता पड़ने पर अमल में लाइए। और भी अच्छा हो यदि प्रेरणाप्रद पुस्तकों का पठन-मनन करें जिससे उदासीनता वीर खिन्नता आपके पास तक फटकने न पाए। www कुछेक सृजनात्मक कार्य ऐसे हैं जो अन्त:प्रेरणा के आवेग में सर्वश्रेष्ठ रूप में हुए हैं। लेकिन आप प्रसिद्ध साहित्यकारों, चित्रकारों और नाटककारों से पूछिए, और वे आपको बताएंगे कि यद्यपि अवि- कांग उत्कृष्ट कृतियों की कल्पना के मूल में प्रेरणा के कुछेक क्षण रहे हैं, किन्तु उन्हें अन्तिम रूप नी मास से भी अधिक समय के अन- थक परिश्रम और परिमार्जन के फलस्वल्प मिल पाया । उसमें प्रेरणा से कहीं ज्यादा पसीने' का योग रहा । ससार की साहित्य, संगीत और कला-सम्बन्धी सृजनात्मक अमर कृतियों में से दस प्रतिशत रचनाएं ही ऐसी हैं जो नात-भर के अल्पकाल में लिखी गई-शेप नब्बे प्रतिशत रचनाए सतत एवं घोरश्रम का परिणाम हैं। आजकल बहुत-से सृजनगील कलाकारों को एक चीज़ बहुत आड़े आती है, जिसे 'मीनार कहते हैं। उन्हें अपनी कृति किसी निर्धारित तिथि या समय तक देनी होती है। मेरे सामने जव कोई बावश्यक कार्य पड़ा होता है, और मैं उसे करने के मूड में नहीं होता तो मैं ईश्वर से भावमयी प्रार्थना करता हूं और अपने टाइप- राइटर पर जम जाता हूं। पहले कुछेक वाक्यं तो धीरे-धीरे वनते हैं और उनमें वह आवेग भी नहीं रहता; पर थोड़ी ही देर में विचारों का तांता लग जाता है और वाक्य के वाद वाक्य विना किसी अवरोध के वह निकलते है और देन्त्रते-देखते मूड बन जाता है। मुझे विश्वास है कि दूसरों का भी कुछ ऐसा ही अनुभव रहा होगा। आप भी इसे आज- माइए और फिर देखिए इसका परिणाम। अन्त में यह कहना चाहूंगा कि यह बात पल्ले बांध लीजिए : मूडी अथवा चिड़चिड़ा होना, और मूड में न होना अर्थात् किसी कान को करने की इच्छा न करना-दो अलग-अलग बातें है इनमें पर- स्पर बहुत अन्तर है। यदि आप मूडी अथवा आवेग में भरे रहते हैं तो उसका कारण जानिए और उसे दूर कीजिए । अगर आपके जीवन છે ?

५RY. r में एक पखवाड़े में एक से अधिक बार ऐसे अवसर आते हैं जब आपकी चित्तवृत्ति काम में नहीं लगती, तो फौरन किसी डॉक्टर, वैद्य, हकीम अथवा किसी सम्मोहन-विशेषज्ञ से परामर्श कीजिए। पुस्तकों ने रेरा कायाकल्प किया मान लीजिए कि मैं आपको बीस रुपये देता हूं और पूछता हूं कि भई, आप इनका क्या करेंगे, तो आप फट से मुझे खरीदी जाने- वाली कुछ वस्तुओं की सूची गिना डालेंगे। किन्तु यदि मैं पूछ बैठू कि आप जिन्दगी के आगामी २० महीनों में क्या करने जा रहे हैं, तो मुझे सन्देह है कि आप इसका तुरन्त और इतने आत्मविश्वास के साथ कोई उत्तर दे पाएंगे। अधिक संभावोना यही है कि आप हिच- किचाएंगे अथवा हकलाने लगेगे और आखिरकार सोचने के लिए कुछ समय मांगकर इस बात को टाल जाएंगे। यह आश्चर्य करने की बात नहीं तो क्या है कि हमें जीवन के भौतिक पदार्थो का तो ज्ञान है, लेकिन जो बातें हमारे भविष्य को बनाएंगी या बिगाड़ेंगी उनकी हमें कतई जानकारी नहीं है। क्योंकि आपने इस पुस्तक में अब तक मेरी विचारधारा का गंभीरता से अनुसरण किया है, इसलिए आज मैं आपसे एक रहस्य की बात कहूंगा : संसार में ऐसी बहुत-सी श्रेष्ठ पुस्तकें भरी पड़ी है, जो जीवन के बारे में आपका दृष्टिकोण ही बदलकर रख सकती हैं। उनमें से कइयों की कीमत तो केवल एक सिनेमा टिकट जितनी है। ऐसी वहुत-सी पुस्तकों ने मुझे जीवन में सुख और सफलता प्राप्त करने में अत्यन्त सहायता और संबल प्रदान किया है। हां, तो मेरे प्यारे पाठक, मैं चाहूंगा कि आप भी उन्हे चुनकर, अपनाएं, और शीघ्र ही अपनाए । ५४.

वारहवां दिन मनोरंजन के लिए समय निकालिए योवन को बनाए रखने का नवसे अच्छा तरीका यह है कि आप अपने समय के एक-एक पल का समुचित प्रयोग कीजिए। इसका मतलब यह नहीं है कि काम ही काम कीजिए। सफल व्यक्ति काम और खेल-आराम का समन्वय ठीक अनुपात में कर लेते हैं। दूसरे, एक और बात है-वे जानते हैं कि कैसे और कब आराम करना चाहिए। यदि आप शक्ति से बढ़कर काम किए जाते हैं और आवश्यक अवकाश और उचित विश्राम को टालते जाते हैं, तो इस बात की पूरी संभावना है कि स्वास्थ्य गिरने के समय आप सफलता के अनेक मौकों से हाथ धो बैठें। अतः यह निश्चय कीजिए कि वर्ग में कम से कम दस दिनों के अवकाश का उपभोग अवश्य करेंगे। तीस दिनों की इकट्ठी छुट्टी की अपेक्षा दस से पन्द्रह दिनों की दो छुट्टियां बेहतर हैं। जव कमी आपको लगे कि माप मानसिक अथवा शारीरिक रूप से थके हुए हैं, अपने में कुछ, चिड़चिड़ापन-सा महसूस कर रहे हैं, अपने अधिकारियों से तर्क-वितर्क करने लगते हैं अथवा अपने सहका- रियों पर झंझलाने लगे हैं तो बस समझ लीजिए कि आपको : अवकाश की जरूरत है। ऐसी स्थिति में काम-धाम छोड़िए और यात्रा पर निकल जाइए चाहे यह यात्रा सप्ताह भर की ही क्यों न हो। हड़बड़ी का क्या काम ! वन-विहार करते समय या छुट्टी मनाते समय विश्राम करने का ५५ प्रयास कीजिए और किसी चीज़ को हड़बड़ी में मत कीजिए। ऐति- हासिक स्थानों, मन्दिरों और गुफाओं-कन्दराओं को देखने के लोभ में अपने कार्यक्रम को व्यस्त मत कीजिए । यदि कार आपके साथ है, और आप उसे स्वयं चला रहे हैं तो सुखकर मार्ग ही अपनाइए चाहे वह कुछ लम्बा ही क्यों न हो। लेकिन जो बात सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण । है, वह है नये सम्पर्क बनाना । लोग-बागों में और उनकी गतिबिंधि में रुचि लीजिए। यदि कोई लड़का आपका सामान उठाए तो उससे बातचीत कीजिए। उसके परिवार, पढ़ने-लिखने और खेल-कूद के विषय में प्रश्न पूछिए । चाय पीते समय चाय वाले से भी वोलिए-चालिए। उससे पूछिए कि भई, सिग्रेट का कौन-सा मार्का ज्यादा विकता है । अवकाश की अवधि में हंसमुख, गिप्ट और मैत्रीपर्ण रहिए । फिर कोई कारण नहीं कि आपको आनन्द-लाभ न हो। शायद आपको किसी आलीशान होटल में ठहरकर भी इतना लुत्फ न आए, क्योंकि वहां आपको एक प्रकार का मुखौटा चढ़ाए रहना पड़ता है और यह आडम्बर रचना पड़ता है कि मैं इतना शिप्ट हूं और वहां हर व्यक्ति अपने-आपमें ही सीमित-संकुचित रहता है । इसलिए, जब भी छुट्टी मनानी हो, कहीं दूर निकल जाइए, और व्यर्थ के बन्धनों से मुक्त हो, स्वच्छन्द आचरण कीजिए। सुरक्षा का सदा ध्यान रखिए ऊपर हमने कहा कि अवकाश के दौरान स्वच्छन्द आचरण कीजिए। इससे हमारा अभिप्राय है कि सामान्यतया उठने बैठने, खाने- पीने और वेगभूषा आदि के सभी औपचारिक नियमों में बंधे-बंधे मत रहिए । किन्तु कुछ नियम ऐसे है जिनका पालन आमोद-प्रमोद और अवकाश में भी उतना ही आवश्यक है जितना कि कार्य करते समय-और वे है सुरक्षा के नियम । आप वर्कशाप में काम कर रहे हों या छुट्टी मना रहे हों, आप कहीं भी दुर्घटनाग्रस्त हो सकते हैं और ज़िन्दगी से हाथ धो बैठ सकते हैं या कोई हाथ-पांव ही तुड़ा वैठ सकते हैं । इस प्रकार की -- - प

No text on this page.

जिनमें लोगों के अवकाश के समय का उपयोग उन कुछेक व्यापारियों के लाभार्थ हो सके। इस प्रकार, अवकाग का समय अवकाश की तरह नहीं बिताया जा रहा है । लोग किसी क्रिकेट मैच, टेनिस मैच का अथवा सिनेमा या संगीत-सभा का प्रवेश-टिकट खरीदने के लिए लाइन में खड़े होकर घण्टों व्यर्थ गंवाते हैं, और एक प्रमोदगृह से दूसरे की ओर दौड़ते हैं। इसपर वे पैसे खर्च करते हैं, समय वर्वाद करते है, किन्तु इसमें वे बहुत कम आनन्द अथवा वहुत थोड़ा लाभ प्राप्त कर सकते है। सो मेरे प्यारे पाठको, आप अपनी गतिविधि का निरीक्षण कीजिए । खोई हुई शक्ति एवं बुद्धि, शरीर अथवा मन के रुद्ध चेतना- स्त्रोतों के पुनः संचार के लिए चित्ताकर्षक विज्ञापनों और भ्रम में डालनेवाले विचारों के चक्कर में पड़कर यह मत भूल जाइए कि अवकाश के क्षण मनोविनोद के लिए है। हमारी सफलता का अनुपात हमारे काम करने की विधि पर अवलम्बित है, लेकिन हमारे सुख के अनुपात का निश्चय इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपने अव- काश के क्षणों का प्रयोग किस प्रकार करते हैं। . ५६

No text on this page.

या आप अपनी योजनाओं के बारे में बहुत-से लोगो से चर्चा करने है; या फिर आप कायर लोगों से सन्देह और भय की बातें सुनकर बहुत जल्दी ही अपना इरादा छोड़ देते हैं। यदि आप सफलता प्राप्त करना चाहते है तो आपको अपने लिए कोई लक्ष्य निर्धारित करना होगा; फिर उसकी खोज में कमर कसकर निकल पड़ना होगा। सफलता-प्राप्ति के लिए तीसरा अनिवार्य गुण है-उत्साह नॉर्मन विन्सेट. पील उत्साह को 'सफलता का इंधन' कहते है। वे एक बड़ी कम्पनी के एक चेयरमैन का उदाहरण देते हैं, जिनका कहना है . “यदि मुझे समान योग्यता वाले व्यक्तियों में से एक को चुनना पड़े तो मै उसे चुनगा जो ज्यादा उत्साह से काम करेगा: क्योंकि मैं जानता हूं कि वह दूसरे आदमी से आगे बढ़ जाएगा। इराका कारण यह है कि उत्साह आत्मप्रकाशक गक्ति है, और हाथ में लिए हुए किसी भी काम के ऊपर व्यक्तित्व की पूरी मक्ति लनाने में सहायता करता है । इसके अलावा उत्माह संक्रामक होता है और यह अपने आसपास के व्यक्तियों को प्रभाव में ले आता है।" आप समझ गए होंगे कि उत्साह से मेरा अभिप्राय क्या है। यह उत्तेजना अथवा उछल-कूद का प्रयास-मात्र नहीं है; यह एक प्रेरक शक्ति है जो आपको आगे, और आगे बढ़ने को उकसाती है। आप यह तर्क कर सकते है कि उत्साह ही पर्याप्त नहीं है, क्योंकि आपकी सफलता आपके साथ काम करनेवाले लोगों की सहकारिता पर आधारित है। यह ठीक है; पर यह भी ठीक है कि आपका उत्कट उत्साह उन्हें उत्साहित करने में क्रियाशील होगा। यह वात अनुभव-सिद्ध है कि विश्वास से विश्वास उपजता है। और यदि आपमें आत्मविश्वास है तो दूसरे शी-त्र-ही-आपमे विश्वास करने लगेगे। क्या आप पराजय से डगमगा जाते हैं ? सृष्टि के आरम्भ से लेकर आज तक मानव एक लक्ष्य को बड़ी उत्कंठा के साथ खोजता आया है और वह लक्ष्य है सफलता। हम सफलता को न केवल उपलब्धि की पराकाप्ठा मानते हैं, बल्कि इसे ६०

No text on this page.

? हममें से ऐसे कितने लोग हैं जो असफलताओं की इतनी लम्बी 'शृंखला में डटे रहेंगे ? यह ठीक है कि लिंकन में बहुत-से प्राकृतिक गुण विद्यमान थे, लेकिन सबसे बड़ा गुण, जोकि ईश्वर ने उन्हें प्रदान किया था, वह था पराजय के सामने घुटने न टेकने की भावना। इसी प्रकार महानता और सफलता हरेक ऐसे व्यक्ति की प्रतीक्षा में रहती है जो अपनी पराजयों से ऊपर उठेगा और पराजय को विजन की ओर ले जानेवाले सोपान के रूप में प्रयोग करेगा। असफलताएं महत्त्वपूर्ण है । केवल असफलता ही हमारे अन्दर निहित शक्ति को बाहर ला सकती है। ठीक वैसे ही जैसेकि ताप कच्ची धातु मे से विशुद्ध धातु को अलग कर देता है। कोई भी व्यक्ति, जिसे सहज में सफलता हाथ लग जाती है, कोई बहुत ऊंचा नहीं उठ पाता । वह असफलता ही है जो निहित सर्वोत्तम गुणों को प्रकाश में लाती है । असफलता अपने-आपमें एक चुनौती है जो हमें भरसक प्रयत्न करने में प्रवृत्त करती है और हमारे अन्दर निहित ऐसी शक्ति को बाहर लाती है जोकि सरलता से सफलता प्राप्त होने पर कभी क्रियान्वित न हो सकती। जब असफलता आपके पीछे पड़ जाए तो समझ लीजिए कि आप सफलता के महान पथ पर जा रहे है । यदि आप असफलताओं से हार न मानें तो फिर केवल एक ही रास्ता बच रहता है और वह है उन्नति का । यह अजीब बात है कि हममें से अधिकांश लोग अपनी सफलताओं का श्रेय तो स्वयं लेते हैं और अपनी असफलताओं को दुर्भाग्य के मत्थे मढ़ देते हैं, और उन्हे यह विलकुल स्वाभाविक लगता है। यह गलत है। सफलता का भाग्य के साथ कोई सम्बन्ध नही, बल्कि वह तो योजना, धीरज और अध्यवसाय का परिणाम. है। यदि आप ठीक से योजना बनाएं, यदि आपमें अपनी योजना को चलाते रखने का धीरज है, और यदि आप बाधाओं के आगे डटे रहते हैं, तो केवल एक ही परिणाम होगा, और वह है-~सफलता। संकल्प कीजिए कि आप अग्रसर होंगे और अपने ध्येय तक जा पहुंचेंगे । मुख्य बात यह है कि दृढ़ सकल्प कीजिए कि आप पराजय के सामने घुटने नहीं टेकेंगे। ६२

No text on this page.

T ? हममें से ऐसे कितने लोग हैं जो असफलताओं को इतनी लम्बी शृंखला में डटे रहेंगे ? यह ठीक है कि लिंकन में बहुत-गे प्राकृतिक गुण विद्यमान थे, लेकिन सबसे बड़ा गुण, जोकि ईश्वर ने उन्हें प्रदान किया था, वह था पराजय के सामने घुटने न टेनने की भावना । इसी प्रकार महानता और सफलता हरेक ऐसे व्यक्ति की प्रतीक्षा में रहती है जो अपनी पराजयों से ऊपर उठेगा और पराजय को विभ की ओर ले जानेवाले सोपान के रूप में प्रयोग करेगा। असफलताएं महत्वपूर्ण है । केवल अगफलता ही हमारे अन्दर निहित शक्ति को बाहर ला सकती है। टोग बैंग ही जमकि नाम कच्ची धातु मे से विगुद्ध धातु को अलग पार देता है। कोई भी व्यक्ति, जिसे गज में सफलता हाथ लग जाती है, कोई बहुत जना नहीं उठ पाता। वह अगफलता हो है जो निहित सर्वोत्तम गुणो को प्रकाश में लाती है । असफलता अपने आपमे एक चुनौती है जो हमें भरसक प्रयत्न करने में प्रवृत्त करती है और हमारे अन्दर निहिन ऐसी शक्ति को बाहर लाती है जोकि मरलता से सफलता प्रान्त होने पर कभी क्रियान्वित न हो सकती। जब असफलता आपके पीछे पड़ जाए तो समान लीजिए कि आप सफलना के महान पथ पर जा रहे हैं। यदि आप अनकलताओं से हार न माने तो फिर केवल एक ही रास्ता बच रहता है और वह है उन्नति का । यह अजीब बात है कि हममें से अधिकां, लोग अपनी सफलताओं का श्रेय तो स्वयं लेते है और अपनी असफलताओं को दुर्भाग्य के मत्ये मढ़ देते है, और उन्हें यह विलकुल स्वाभाविक लगता है । यह गलत है । सफलता का भाग्य के साथ कोई सम्बन्ध नहीं, बल्कि वह तो योजना, धीरज और अध्यवसाय का परिणाम है। यदि आप ठीक से योजना बनाएं, यदि आपमें अपनी योजना को चलाते रखने का धीरज है, और यदि आप बाधाओं के आगे डटे रहते है, तो केवल एक ही परिणाम होगा, और वह है-सफलता। सकल्प कीजिए कि आप अग्रसर होगे और अपने ध्येय तक जा पहुंचेगे । मुख्य बात यह है कि दृढ़ संकल्प कीजिए कि आप पराजय के सामने घुटने नहीं टेकेगे। ६२ Smeme- चौदहवां दिन नेतृत्व के गुण अपनाइए नेताओं को दो प्रमुख कोटियों में बांट सकते हैं-एक वे जो प्रभुत्व जमाते हैं, हांकते हैं. और दावा जाहिर करते हैं; दूसरे वे जो अपने अनुयायियों के जीवन को अभिवृद्ध करते हुए और उनके व्यक्तित्व का विकास करते हुए उन्हें कर्म की ओर प्रेरित करते हैं। हम केवल दूसरी कोटि के नेताओं के बारे में ही विचार करेंगे। एक बात गांठ में बांब लीजिए : सफलता पाने के लिए आपको नेता होने की कोई आवश्यकता नहीं। आपको केवल पराबलम्बी होने से बचना है । सो हम नेतागिरी के केवल उन गुणों के बारे में संक्षेप में चर्चा करेंगे जो सफलता की ओर आपके प्रयाण में बहुत सहायक होगे। वे ये हैं : (१) उत्साही बनिए । (२) विनोदी अनिए, जिससे आप झेपे वगैर अपनी त्रुटियों को स्वीकार करने में समर्थ हो सकें। "मुस्कराइए, और दुनिया आपके साथ मुस्कराएगी। पर आप हंमिए तभी, जव दुनिया आपपर हंने।" यह एक..अच्छी राय है। (३) सीखने को उत्सुक रहिए-यदि आप समझते हैं कि आपकी उम्र इतनी अधिक हो गई है कि अब आप कुछ सीख नहीं सकते, तो जान लीजिए कि आपकी उम्र इतनी अधिक हो गई है कि आप जी भी नहीं सकते। और निस्संदेह आप नेतागिरी तो कर ही नहीं सकते। विलियम जेम्स ने कहा है कि हममें बहुत कम लोग ही ऐसे हैं जो छन्वीस साल की उम्र के बाद कोई नई बात सीख पाते है। ६३ , क्या यह बात आपको विचलित करती है ? यदि आप अपनी गणना उन 'कुछ लोगों में करते है तो आपके लिए विचलित होने का कोई कारण नहीं । दूसरे, आप कोई नई बात तो सीखना चाहते ही नहीं। आप तो केवल वे काम करना चाहते है कि जिन्हें आप इस पुस्तक को उठाने से पूर्व नजर-अन्दाज करते रहे है । (४) प्रशंसा को बांटिए लेकिन आरोप को अपने ऊपर लीजिए। दूसरों की प्रशसा करने में तत्पर रहिए । जिन्होंने आपकी किसी भी रूप में सहायता की है उन्हें सदा श्रेय दीजिए । सभी जानते है कि वे लोग वहुत सफल है जोकि अपना काम दूसरों से करवाने का ढग जानते है। जो भी हो, जब कोई काम गलत हो जाए तो उसकी पूरी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लीजिए। यह नेता का एकाधि- कार है। (५) अन्य लोगों का जीवन समृद्ध बनाइए। विश्वासपात्र और उत्तरदायी होने का प्रशिक्षण देकर दूसरों के जीवन को सम्पन्न कीजिए । महत्त्वपूर्ण काम सौपकर उन्हें व्यक्तित्व का विकास करने सहायता कीजिए और इस प्रकार उन्हें महत्त्वपूर्ण वनने में सह- योग कीजिए। ऐसा करने से आप अपने सहायको का विश्वास प्राप्त कर लेगे, और नये लोगो को अपनी ओर आकर्षित कर लेगे। अपने सहायको के सुझावों को स्वीकार कीजिए । अगर वे अच्छे हों तो प्रशंसा भी कीजिए। यदि उनके सुझाव मामूली किस्म के हों तो तर्क से समझाकर उन्हें सुधारिए। और जब किसी सुझाव को आप अस्वी- कार करने पर विवश हों तो हमेशा कारण स्पष्ट कर दीजिए। (६) किसीका उपहास मत कीजिए, दोष मत निकालिए, और न ही किसीपर झुंझलाइए। बहुत-से लोग सोचते है कि दूसरों के साथ उग्र व्यवहार करने से या दूसरों को मूर्ख समझकर उपहास करने से वे बड़े कहलाएगे। इस प्रकार वे केवल अपने ओछेपन को प्रकट करते है। दूसरों की मीन-मेप निकालने से आपका कुछ बनने से तो रहा । इसलिए दोपी-पक्ष के साथ बैठिए और बुरे व्यवहार, कम उत्पादन, अथदा काम के प्रति सतत उदासीनता के कारणो को तलाशिए। ६४ में चीखना-चिल्लाना अधिनायकों को तो सुहाता है। नेता चिल्लाते- चीखते नही । वे तो दृढ़ता और निश्चय के साथ आदेश देते हैं। (७) लोगों के मन में अपनी विश्वसनीयता बढ़ाइएलेन गाडिनर कहते है कि विश्वसनीयता का सबसे अच्छा लक्षण है, "अपेक्षा से अधिक एवं अपेक्षा से पूर्व काम करना।" उस कार्यकर्ता को कोई महत्त्व नहीं देता, जिसे कई वार काम के लिए याद कराना पड़े; और फिर यह देखना पड़े कि काम विधिवत् और निर्धारित समय पर हुआ है या नहीं। अगर आपकी यह मनोवृत्ति रहेगी कि- "मैं काम तभी अच्छा और जल्दी करूंगा जवकि वे मुझे अधिक पारिश्रमिक देने लगेंगे," तो आप कहीं पहुंचने से रहे ! (८) या तो वायदे कीजिए नहीं, और कीजिए तो उन्हें निभा- इए : यदि आप अपना वचन नहीं निभा सकते तो लोग आपमें अपना विश्वास खो बैठते हैं । या तो वायदे कीजिए नहीं, अगर कीजिए तो आस्था और निष्ठा से उन्हें निभाइए। जब आपको यह निश्चय न हो कि आप यह काम कर सकेंगे या नहीं, तो वात कुछ इस प्रकार से कीजिए कि जिससे आप बंधे नहीं : "मैं देखूगा कि क्या कुछ किया जा सकता है।" "वैसे समय तो थोड़ा है, पर मैं अपना पूरा जतन करूंगा।" और जो आपके अधीन काम करते है उनसे उल्टे-सीधे वायदे कराने से बाज आइए। उन्हें अपने वायदों को गंभीरता से लेने को कहिए, क्योंकि एक बार किया हुआ वायदा अवश्यमेव निभाया जाना चाहिए। (६) उद्देश्य को लेकर काम कीजिए। प्रवर्तक लोग कैसे असंभव कार्य कर पाते है ? मिशनरियां कैसे अप्राप्य लक्ष्यों तक पहुंच जाती हैं ?--क्योंकि वे किसी विशिष्ट उद्देश्य को लेकर काम “करते है--धन, जाति अथवा शासकों के लिए नहीं। वे जानते हैं कि परमपिता परमात्मा परिणाम की अपेक्षा परिश्रम को पुरस्कृत करता है। आप अपनी ओर से कोई कसर न उठा रखिए और शेप ईश्वर पर छोड़ दीजिए। है ६५ 262 पन्द्रहवां दिन कार्य की नीरसता दूर कीजिए जब हम फिल्म-अभिनेताओं, ऑपेरा-गायकों और लेखकों की सफलता की कहानियां पढ़ते है तो हमें उनसे ईर्ष्या होने लगती है, क्योंकि वे अपना सुरुचिकर कार्य करते हुए धनोपार्जन करने में सफल हो सके। हम उस दिन की बाट जोह रहे हैं जवकि हम भी अपनी रुचि का कार्य कर सकें, अर्थात् जो कुछ हम करना चाहते है वह कर सकें, बजाय इसके कि जो काम हमें करने पड़ते हैं उन्हें विवश होकर चाहने लगें। लेकिन उन सफल व्यक्तियों की जीवन-कथाओ को ज़रा गौर से देखिए । आपको यह जानकर हैरानी होगी कि उन्हें सफलता प्राप्त होने, और वह कार्य, जिसके लिए वे बने थे, मिलने से पूर्व उनमें से लगभग सभीको अपनी जीविका जुटाने के लिए नीरस और वेढव काम करने को मजबूर होना पड़ा था--जैसेकि बर्तन मांजना, काउंटर पर खड़े होकर विक्री करना और यहां तक कि ट्रक चलाना आदि । ऊंचे पदो पर आरूढ़ होकर भी वे सफलता का मूल्य चुकाते रहते जैसेकि संगीतकार एक दिन में कई घंटों तक स्वर-साधना करते है जबकि वे संगीत-गोष्ठियों में रात-रात-भरगाते-बजाते रहते हैं। फिल्मी अभिनेता फिल्म के निर्माण के दौरान कठोर संयम का पालन करते हैं । व्यापारी अपने प्रतिद्वन्द्रियों से होड़ लेने की धुन में नासूर पाल लेते हैं । लेखकों को लीजिए। वे अपने को कोठरी में बंद करके प्रति- दिन अध्यवसाय के साथ सहस्रों शब्दों की साधना किया करते हैं। उदाहरण के रूप में, इस पुस्तक को लिखते हुए मुझे पुलक तो ६६ अवश्य हो रही है, किन्तु इसके सृजन में महीनों के मव्यवसाय एवं अतिशय एकाग्रता का भार भी मुझपर पड़ा है। यह काम नीरस तो कभी नहीं रहा, किन्तु वोभिल अवश्य रहा है। यह बात पल्ले वांव लीजिए कि कोई भी व्यक्ति काम किए वगैर जी नहीं सकता। जीवन में सफलता या सुख प्राप्त करने की युक्ति का प्रमुख घटक है 'कार्य', अतः काम से जी मत चुराइए, लेकिन काम मे से नीरसता निकाल फेंकने का भरसक प्रयास कीजिए। इन छ: प्रधान दशाओं में कार्य नीरस हो जाता है : (१) रुचि का अभाव, (२) ज्ञान का अभाव, (३) दक्षता का अभाव, (४) अनुरूप साथियों का अभाव, (५) प्रशंसक अधिकारी का अभाव, (६) कार्य करने के अनुकूल जगह का अभाव । यदि आपको अपना वर्तमान कार्य पसंद नहीं तो पता लगाइए कि ऐसा क्यों है । तव इस सम्बन्ध में कुछ कीजिए। उपर्युक्त पहली दशा के कारण तो ऐसा नहीं है ? यदि उत्तर 'हां' है तो अपने भीतर झांककर देखिए कि क्या काम रुचिकर नहीं है अयवा क्या आपमें रुचि का अभाव है। औद्योगिक मनोविज्ञान इस बात पर जोर देता है कि काम को रुचिकर बनाने का सर्वोत्तम ढंग है काम में रुचि लेना। यदि आपकी अरुत्रि का कारण जान व दक्षता का अभाव है, तो इसका समाधान अत्यन्त ठोस व क्रियात्मक है किसी अच्छी लायनेरी के सदस्य बन जाइए और अपने काम से सम्बन्धित विषय की पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएं पढ़िए । कार्य के प्रति अपनी मनोवृत्ति में परिवर्तन देखकर और कार्यक्षमता में इसके फलस्वरूप हुए विकास को देखकर माप चकित रह जाएंगे। अनुकूल साथियों को पाने की समस्या का समाधान आपके हाय में है । और आपके काम करने की जगह का परिवर्तन कुछ हद तक आपके पूरे विभाग के सहयोग एवं उद्योग से हो सकता है । इस बारे- में कुछ न कुछ कीजिए। और जहां तक आपके अधिकारी का सम्बन्ध है, उसके साथ आदर से पेश आइए; उसका काम खुशी-खुशी कीजिए; वार-बार घड़ी देखना बन्द कीजिए; मिल-जुलकर काम करने की भावना को ६७ । -- बढ़ावा दीजिए; जब वह किसी बात में ठीक हो तो उसका पक्ष लीजिए; और वह सख्ती से पेश आए तो उसकी कठिनाइयों को समझते हुए उदार दृष्टिकोण अपनाइए। दो ही सप्ताह में आप देखेंगे कि आपके प्रति उसका तख कितना बदल गया है। काम रुनि से कीजिए यदि आपका वर्तमान कार्य अचिकर है और आप कोई दूस काम करने को लालायित है तो इस काम से नजात पाइए । शुरू-शुरू में जब मैंने व्यावसायिक परामर्नदाता के रूप में कार्य आरम्भ किया था तो मैं लोगो को प्रायः यही मनाह दिया करता था। लेकिन जल्दी ही मैंने देखा कि कुछ लोगों को दूसरा काम भी पहले काम में अधिक रुचिकर न लगा। यही हाल उनके तीनरे काम में हुआ। मूल बात यह नहीं थी कि वे अपने काम से असन्तुष्ट थे, बल्कि यह थी कि वे काम करना ही नहीं चाहते थे। यदि आप करना ही न चाहें तो पेशा बदलने से कुछ नहीं होने का। आप कुछ भी क्यों न करें, आप काम करने से बच नहीं सकते। सो मैंने अपनी राय में सुधार कर लिया : "यदि आप कोई दूसरा काम करने की लालसा रखते है जोकि आपके अधिक अनुकूल पड़ता है तो आप इस काम को छोड़ दीजिए और सितारों की ओर प्रयाण कीजिए।" पर यह कहने में भी खतरा है। जो लोग अपने मनोनुकल काम खोजने में समर्थ नहीं होंगे वे लम्बे अरसे तक बेकार रह जाएंगे, और तारों तक पहुंचने की बजाय खाई में जा पड़ेंगे। काम करनेवाले अधिकांश लोगो के लिए बेहतर सलाह यही है कि वे अपने वर्तमान कार्य पर ही बने रहे, बशर्ते कि तह कान उन्हें अरुचिकर न हो, और दफ्तर से बाहर के कार्यो और मनबहलाव के साधनों से अपनी गतिविधि को सरस बनाए रखिए, और इन्हीं में आत्माभिव्यक्ति के अवसर निकालिए । यदि आय बढ़ाना अनिवार्य हो तो मनबहलाव के ऐसे काम चुनिए जिनसे आर्थिक लाभ हो । बहुत-से प्रतिभावान लोगो ने अपने मनवहलाव के कामों को व्यवसाय में परिणत कर दिया है। ६८ - सोलहवां दिन 1001 पहले से श्रेष्ठतर वनिए हमारा यह संसार बड़े विचित्र अन्तविरोवों एवं असंगतियों से परिपूर्ण है। आत्मविश्वास के अभाव के कारण बहुत-से प्रतिभावान व्यक्ति उद्यन और प्रयान ही इतना कम कर पाते हैं कि वे बहुत-से सुखों एवं सफलताओं मे वंचित रह जाते हैं, अन्यथा जिन्हें वे प्राप्त कर सकते थे । वहुत-से, श्रेष्ठतर कार्य करने में समर्थ व्यक्ति इस भय के कारण कि कहीं वे हाथ का साधारण कामही न गंवा बैठें,अपने अन्दर इतना भी आत्मविश्वास नहीं जुटा पाते कि थोड़ा मैदान में आकर वे अपने अनुकूल काम खोज पा सकें। मापको कुछ व्यक्ति ऐसे भी मिलेंगे जो मात्र इच्छा या आकाक्षा के बल-बूते पर रातोंरात कोई बहुत बड़ी उपलब्धि प्राप्त कर लेना चाहते हैं। किन्तु उननें वह साहस एवं सामर्थ्य नहीं रहती जो उनकी उम आकांक्षा को साकार कर सके । दृढ़ संकल्प के विना इच्छा या कामना किस काम की! वह तो केवल शेखचिल्ली का सपना सिद्ध होगी। यह एक आम कहावत हो गई है कि "जिस वस्तु की हम कामना करते रहते हैं वह हमें कभी प्राप्त नहीं होती और जो पदार्थ हमें प्राप्त होता है उसकी हमें कामना नहीं होती।" किन्तु कार्यदक्ष व्यक्तियों के मुख से यह वात कभी सुनने को नहीं मिलती। यदिहम कार्यदक्ष होने का पक्का इरादा कर लें और ठीक विधि से इसपर चलना शुरु कर दें तो हममें से हरेक व्यक्ति कार्यदल बन सकता हैं। हमारे जीवन के ढरे में कोई ज्यादा परिवर्तन नहीं आया है। ६६ आज भी यह आश्चर्यों से पूर्ण है। किन्तु सबसे बड़ा आश्चर्य आपको तब होता है जब आप अनुभव करते हैं कि आपके अन्दर ऐसी अद्भुत शक्ति विद्यमान है जिसका अब तक प्रयोग नहीं हुआ-जैसाकि- आपसे पूर्व हजारों व्यक्ति कर चुके हैं। यदि आप अपनी योग्यता और प्रकृति के अनुकूल काम करने का प्रयास करें तो सफलता आपकी होकर रहेगी। आप जितना और जैसा प्रयास करते हैं, जीवन में आपकी उपलब्धि उसीके अनुकूल होती है उससे अधिक कभी नहीं। आप कोई भी काम क्यों न करते हों और किसी भी पद पर क्यों न आसीन हों, सदा अधिक से अधिक मनोयोग से काम करने की आदत डालेंगे-ऐसां दृढ़ संकल्प कीजिए। इस उक्ति को सदैव स्मरण रखिए : "संसार को आप अपनी शक्ति-भर सर्वोत्तम संश- दान कीजिए-और संसार की सर्वोत्तम सम्पदाएं आपपर न्यौछावर होंगी।" यदि आप संसार को अपने-आपका सर्वोत्तम अंश समर्पित किया चाहते हैं, तो पहले आपको अपने-आपसे सर्वोत्तम काम कराने की युक्ति निकालनी होगी, जिससे आपको ज्ञात हो जाए कि क्या करना है और किस प्रकार करना है। दक्ष कार्यकर्ता अपने काम से सम्ब- न्धित हर प्रकार की जानकारी प्राप्त करता है। वह ऐसी पुस्तकें एवं पत्र-पत्रिकाएं पढ़ता है जो उसके काम में सहायक होती है। वह उन लोगों से सम्पर्क बनाए रहता है जो कहीं अन्यत्र अथवा उसी संस्थान में उसी प्रकार का कार्य सम्पादित करते हैं. और इस प्रकार वह अपनी कार्यदक्षता में सुधार करने की नई-नई और दूसरी-दूसरी विधियां ढूढ़ निकालता है। सबसे बड़ी बात यह कि दक्ष कार्यकर्ता प्रत्येक काम विचारपूर्वक करता है। वह अपने हरेक काम को कसौटी. पर कसता है और यह जानने का प्रयत्न करता है कि क्या वह उसे पहले वाले तरीके की अपेक्षा अधिक अच्छे ढंग से अथवा अधिक तेजी से कर सकता है या नहीं। यदि आप अपने संस्थान के श्रेष्ठ कार्य- कर्ता हैं-तो अव श्रेष्ठतर वनने का प्रयास कीजिए। आज और अभी अपने कार्य का अध्ययन कीजिए और जैसीकि आपसे अपेक्षा की जाती है, उससे श्रेष्ठतर काम करने की कोशिश कीजिए। यह हिसाब लगाने के लिए मत किए कि आपको इससे मिलेगा क्या । कार्य को इच्छा और उत्साह से कीजिए। कोई न कोई व्यक्ति, कोई न कोई स्थान या कोई न कोई समय आपके कार्य का मूल्य डालेगा और उसे पुरस्कृत करेगा-इसे समय पर छोड़ दीजिए। इसलिए अपनी वर्तमान उपलब्धियों के रिकार्ड पर ही सन्तुष्ट होकर न बैठ रहिए । हर समय अपने को अच्छा से अच्छा बनाने का यत्न कीजिए। कार्यालय में प्रतिदिन यह दृढ़ निश्चय लेकर प्रवेश कीजिए कि आप आज का काम कल से कही अच्छी तरह करेंगे और उसमें भर- सक सुधार करेंगे। हमें सदा काम करने के आधुनिकतम तरीकों और बेहतर विधियों की तलाश में रहना चाहिए। हमें नये-नये मैत्री सम्बन्ध स्थापित करते रहना चाहिए और पुरानी मित्रताओं को निरन्तर निभाते चले जाना चाहिए । हमें चाहिए कि हम सदा हंस- मुख बने रहें। और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हमें यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए कि हममें इससे कहीं अधिक सामर्थ्य और कार्यक्षमता अन्तनिहित है । आज तक कोई भी आदमी अपने शक्ति- स्रोतों के अन्त तक नहीं पहुंचा । प्रकृति का भण्डार असीम है जिसका हम जब चाहें, उपयोग कर सकते हैं। सो, अपने-आपको अधिक कार्यदक्ष बनाकर आप संसार को अपेक्षाकृत अधिक सम्पन्न बना सकते है। हरेक उगते दिन का उत्साह और उमंग के साथ स्वागत कीजिए। प्रातःकाल इस उक्ति को स्मरण कर लिया कीजिए: "अधिकतर मौद्योगिक संकटों का कारण या तो वे कार्यकर्ता हुआ करते हैं जो कुछ सोचते-समझते नहीं, या फिर वे विचारक होते हैं जो कुछ करते-बरते नहीं।" तदुपरान्त, कदम बढ़ाइए और उपर्युक्त दोनों प्रकार के दुर्गुणों को दूर करने के मार्ग पर निकल पड़िए अर्थात् सोचिए भी, और काम भी कीजिए। हम आपकी सफलता की कामना करने नहीं जा रहे, क्योंकि हमें विश्वास है कि उसे तो आप प्राप्त कर ही लेंगे। ७१ सत्रहवां दिन - 4 अपव्यय रोकिए हममें से सबको कभी न कभी अपव्ययों से वास्ता पड़ता है। यदि हम अपने चारों ओर ध्यान से खोजें तो हम अपनी गतिविधि के प्रत्येक क्षेत्र में एक दिन में एक न एक फिजूलखर्ची अवश्य पाएंगे। करोड़पती की परिभाषा यह दी जाती है कि वह ऐसा व्यक्ति होता है जो अपनी पत्नी के व्यय की सानी मे अधिक धनोपार्जन कर सकता है। और यदि हमारी पत्नी सरफेदार नहीं है तो खर्च और आमदन की खीचतान का सामना हमें घर अथवा दफ्तर दोनो जगह करना पड़ता है। आज प्रत्येक व्यक्ति बचत के उपायों के बारे में सोच रहा है। घर पर गृहस्वामिनी तथा व्यापार में संचालक दोनों व्यय को घटाने तथा लागत को कम करने के उपायों एवं सावनों की तलाश कर रहे है। एक बात पर दोनों सहमत हैं : उपायों की तलाश का आरम्भ अपव्यय को रोकने से अथवा रोक के साधनों से किया जा सकता है। चीजों को व्यर्थ गंवाने से उनकी लागत बढ़ जाती है, यह बात हरेक जानता है। लेकिन हममें थोड़े-से लोग ही यह जानते हैं कि दक्षताहीन ढंग से घर-गिरस्ती अथवा व्यापार चलाना अव्यवस्थित ढरे का परिणाम है। धन और शक्ति का अपव्यय अव्यवस्थित योजना का परिणाम है। हममें से कितने थोड़े लोग हैं जो मासिक बजट बनाते हैं या अपव्यय को दूर करने के विचार से अपने मासिक व्यय की देख-पड़ताल करते है ? यदि आप ऐसा नहीं करते तो इस मास से शुरू कर दीजिए । शुभ काम में देरी क्यों ? ૭૨ 2 आप घर चलाते हों या कोई क्लव, कोई संस्था या कोई व्यापार --आपको यह जानने के लिए किसी अर्थशास्त्री की आवश्यकता नहीं है कि वजट को सन्तुलित करने का सरल ढंग यह है कि फिजूलखर्चियों को रोककर खर्च घटा लिया जाए, वजाय इसके कि आय की बढ़ोतरी के नये उपाय खोजे जाएं। इस प्रसंग में दो बातें स्मरण रखिए : (१) अधूरे उपायों से सन्तुष्ट न हूजिए; (२) अव्यवस्था (अपव्यय) को स्वयं रोकिए । यह कार्य इतना आवश्यक है कि किसी दूसरे पर नहीं छोड़ा जा सकता। यह देखना भी आवश्यक है कि संस्था का हरेक व्यक्ति लक्ष्य और उसकी प्राप्ति का उपाय जानता है या नहीं। हरेक से योजना में सहायक होने का अनुरोध कीजिए। ढुलमुल तौर-तरीके तथा अस्तव्यस्त व छुटपुट प्रयत्नों से कुछ भी प्राप्त नही किया जा सकता। एक व्यवस्थित योजना के अनुसार चलिए। और स्मरण रखिए कि समय का अपव्यय सभी अपव्ययों से बड़ा अपव्यय है। फिजूलखर्ची की जड़ उखाड़ फेंकिए : प्रतिदिन आयात पर नई-नई पाबन्दियां लगती जा रही है । और यह बहुत आवश्यक होता जा रहा है कि मशीनें, घड़ियां, कपड़े और कुकिंग का सामान--कुछ, भी क्यों न हो, हमारे पास जो कुछ भी है उसे बनाए रखा जाए। "हरेक चीज़ की बाजार में कमी है और उसे प्राप्त करने में कठिनाई होती है और कीमतों में बढ़ोतरी होती जा रही है ।"--यह कहकर इस वात को इतने सहज में टालिए नहीं। यह नज़रिया निस्सदेह आपको कहीं का नहीं छोड़ेगा। अतः दुरुपयोगों की रोकथाम के लिए अभियान शुरू कीजिए- वर पर, स्कूल में, दफ्तर में, कारखाने में। घर या दफ्तर में दुरु- पयोगों के रोकने के सर्वोत्तम सुझावों पर छोटे-मोटे इनाम आश्चर्य- कारी परिणाम दिखा सकते है। एक कारखाने के मैनेजर ने एक नया तरीका अपनाया । उसने ऐसे सुझावों पर पुरस्कार देने के लिए एक सूचनापत्र (सरकुलर) निकाला। पत्र के साथ एक छोटा-सा ७३ ..

, सम्बन्ध मे अपनी युक्ति का वर्णन करता है : “जब भी कोई मिलने- वाला आता है तो उसके ठीक दस मिनट बाद मेरा चपराती आता है और यह कहता है कि एकाउंटेंट मुझे अभी बुला रहे है । यदि बात करने के लिए दस मिनट भी पर्याप्त नहीं होते तो इसका मतलब यह है कि आगन्तुक ही सुस्त है।" लेकिन मुझे यदि किसीसे विदा लेनी होती है तो मैं 'अलविदा कभी नहीं कहता-~बस, मैं उठ खड़ा होता हूं और चल देता हूं। यदि आप विदाई के समय का कोई अच्छा-सा हास्य-विनोद करना जानते हैं तो विदा लेना सरल हो जाएगा। विनोदी बात कहने के वाद लौटने में किसी प्रकार का विलम्ब अपना प्रभाव खो बैठेगा। किशोरो को मैं एक राय देता हूं, जिसपर अमल करने से ग्रुपको को भी लाभ हो सकता है, वह यह है : "अन्दर जाकर अपना निरादर करने की अपेक्षा तो यही अच्छा है कि बाहर ही रहिए।" "जो लोग अपने घर लौटने का ठीक समय नहीं जानते, उनसे आप क्या कहना चाहेगे ?"--इस प्रश्न का उत्तर एल्मा व्हीलर इस प्रकार देते है~~(अ) अव क्या वजा है ? (आ) सुबह काम पर कितने बजे लगते हैं ? (इ) कितने बजे उठते हैं ? हम यह राय देते, "आप नौ बजे की बस पकड़ें तो लेट नहीं होंगे।" अथवा "दस बजे के बाद गाड़ी चलाते हुए आपका सिर भारी नही हो जाता ?" या "क्या आप चलने से पूर्व कॉफी का एक प्याला लेगे?", "मुझे अपने मित्रों में असमंजस की स्थिति में नहीं पड़ना पड़ता । वे मेरी स्पष्टवादिता पसंद करते है; क्योंकि वे जानते है कि वे कभी भी मेरे घर में जाने-अनजाने ऊधम नही मचा सकते। और जब मेरे स्वाभिमानी प्रतिभा-मण्डल' की हर सोमवार रात नो बजे बैठक होती है तो क्लॉक घड़ी के ठीक दस वजे का अलार्म बजाने के पश्चात् 'अच्छा विदा' कहने की आवश्यकता कतई नहीं रहती। सदस्य सीधे-सादे ढंग से चल देते है। यदि आपमें साहस है तो कभी इस तरीके को आजमा देखिए। ७६ 'नहीं' कहना सीखिए बहुत-से लोग केवल इनीलिए 'हां' कह देते हैं, क्योंकि वे 'नहीं' कहने से घबराते हैं। बाद में वे अपने किए पर खेद प्रकट करते हैं। और वायदे का पालन न कर सकने पर उसके लिए वहाने ढूंढ़ते हैं। कितना अच्छा होता यदि वे लोग कहते, "मैं इसपर विचार करूंगा, ना "मैं आपको कल बताऊंगा।" अच्छे व्यवसायी ऐसी नाजुक परि- विनियों में यों कहते हुए अपने-आपको बचा लेते हैं, "जरा में अपने हमरे वायदों को देख लू, कल मैं आपको बताऊंगा।" जब आप इन्कार करने पर मजबूर हो जाएं तो कुशलतापूर्वक कीजिए। लेकिन लदा दृढ़ता और निश्चय के साथ ऐसा कीजिए। अस्वीकृति में कभी सन्न-मुस्त और कठोर न बनिए । यह कहा जाता है कि निपुण व्यक्ति आपको कुछ इस ढंग से इन्कार करते हैं कि आप नोचने लगते हैं कि आप ठुकराए नहीं जा रहे, बल्कि उनकी मेवा प्राप्त कर रहे हैं । 'दुत्कारे विना नी इन्कार किया जा सकता यदि आपको कोई ऐसा काम करने को कहा जाए जिसे आप नहीं करना चाहते तो सीवा 'नहीं' में उत्तर दीजिए । तव आप व्यर्थ के बार-बार के तकाज़ों और आग्नहों से बुरी तरह परेशान होने से बच जाएंगे। यदि कोई ऐसा काम हो जिसे आप भविष्य में करना चाहेने, पर जिसे आप फिलहाल नहीं कर सकते, तो आप विनम्रता- पूर्वक कहिए : “मैं इसे करना चाहूंगा, पर अभी-इसी वक्त मैं ऐसा करने की व्यवस्था नहीं कर सकता। इस काम को यापके लिए फिर कभी करने में मुझे खुशी होगी।" लेकिन 'नहीं' कभी स्वीकार न कीजिए यदि आप सफलता पाना चाहते हैं तो आप दूसरों से 'नहीं' मत सुनिए। क्यों? क्योंकि सेल्समैन लोगों का कहना है कि 'नहीं' के अनेक अर्थ हैं। बहुत-सी स्थितियों में यह अनिश्चयसूचक होती है। इसका अर्थ होता है : "मैं अभी पूरी तरह सहमत नहीं हूं।" तव पाएंगे । इस तरह के व्यक्ति या तो कहेंगे : "मैं इसे कल करूंगा।" या फिर यह कि “जब मेरे पास अधिक समय होगा तो मैं इसे जरूर करूंगा।" उन लोगों के साथ यह तर्क करने का कोई लाभ नहीं कि 'आज' में जितने घण्टे विद्यमान है, 'कल' में भी उत्तने ही घण्टे हैं; और यदि आज समय नहीं है तो कल भी समय नहीं रहेगा। उनको यह बताने का कोई लाभ नहीं है कि कल ठीक आज की, तरह ही एक दूसरा दिन है और उसमें अगर अन्तर है तो यही कि आनेवाला 'कल' ईश्वराधीन है, और 'भाज' हमारे हाथ में है। ज्योंही आप यह पृष्ठ पढ़ चुके, एक कागज का टुकड़ा ले लें और पिछले सप्ताह या मास से लटकते चले आ रहे दर्जनों वन्धों और कष्टकर कार्यो को लिपिबद्ध कर लें। जब आप सूची पूरी कर ले लो दृढ़ता से निश्चय करें कि आप उन सबको कल तक अवश्य कर डालेंगे; तब अपनी आस्तीनें चढ़ा लें और उन्हें आज बल्कि अभी करना शुरु करे । मेरी शुभ कामना आपके साथ है। अपने-आपको छोटा समझने का महत्त्व यह एक प्रेरणाप्रद पुस्तक का शीपंक है जिसकी लेखिका हैं मैरी बेनन रे (हार्पर)। वे वीसियों ऐसे व्यक्तियों के उदाहरण प्रस्तुत करती है जोकि कठिन वाधाओं के बावजूद नहीं, बल्कि उन्हीं के कारण अभिनय में, शारीरिक शक्ति के विकास में, वक्तृत्व में तथा कला में विश्वविख्यात हो गए। उन्होंने उल्लेख किया है कि अल्फ्रेड ऐडलर ने इसी प्रकार के सैकड़ों लोगों के नाम जुटाए हैं जिनमें "अनेक विख्यात लौहपुरुप थे, जोकि अपनी जवानी मे बहुत कम- जोर थे; लम्बी दौड़ में रिकार्ड तोड़नेवाले व्यक्ति थे जोकि किसी समय लंगड़ाकर चलते थे, प्रमुख नर्तकियां थीं जो कभी पक्षाघात से पीड़ित थीं; महान गायक थे जो कभी टी० बी० से ग्रस्त थे। अपनी कमियो पर काबू पाने के लिए उन्होंने घोर संघर्ष करते हुए अपने अन्दर एक उच्चतर क्षमता का विकास किया था। यह अन्ध-प्रकृति का काम नहीं था-~~~यह था मानवीय संकल्प। लेकिन यहां भी खतरा है!

A हमने पहले कहा है कि अभिलाया को सना योग्यता के जुए तले लाना चाहिए। दौड़ में भाग लेनेवाले दो घोड़ों की तरह दोनों को एकही दिशा में चलना होगा, और एक ही स्थान में घूमना होगा। यह आवश्यक है। यदि आप एक ऐसे लक्ष्य को चुनते हैं जोकि बिना इम विचार के कि आप उस तक पहुंचने में सक्षम भी हैं या नहीं, आपने 'अहम्' को तुष्टि प्रदान करता है तो आप समझिए कि आप चिवांश की ओर जा रहे हैं। इससे आपकी हीनता की भावना गहरी हो जाएगी और निरागा तथा पराजय की भावना में बदल जाएगी। बीजिए, उदाहरण के जरिये स्पष्ट करता हूं। जब डेल कार्नेगी छोटे-में वालक थे तो वे एक फुटवाल-हीरो बनने का स्वप्न दखा करते थे। कालेज के एक शिक्षक ने उन्हें सम- भाया कि न केवल वे उस लक्ष्य तक नहीं पहुंचेंगे, बल्कि पहुंच भी न सकेन । डेल ने अपनी यह अभिलापा छोड़ने से इन्कार कर दिया। लेकिन उन्होंने अपनी समस्या का विश्लेपण करना शुरू किया। उन्होंने अपने उद्देश्यों को लिख डाला और उन्हें प्राप्त करने के उपायों का अध्ययन किया। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उन्होंने पाया कि जो कुछ वे चाहते थे वह वस्तुतः फुटवाल का खिलाड़ी होना नहीं या बल्कि वैसी वाहवाही और लोकप्रियता पाना था जोकि फुटबाल के खिलाड़ियों को मिलती थी। तब उन्हें ज्ञात हुआ कि यदि वे सावं- जनिक भापणकर्ता के रूप में अपने गुणों का विकास करें तो वे अपेक्षा- कृत अधिक स्थायी अथवा भूरि-भूरि प्रशंसा प्राप्त कर सकते हैं।- इन्ने अधिक सफल हुए कि उन्होंने भाषण-कला पर एक किताब लिखी, और सार्वजनिक भाषण-कला के प्रशिक्षण के लिए एक प्रसिद्ध संस्था खोलकर उन्होंने लाखों लोगों को भाषण-कला में पारंगत किया। आपको डेल कार्नेगी के इस उदाहरण का अनुकरण करना चाहिए और अपने लक्ष्यों का अध्ययन करना चाहिए। आपका इप्ट क्या है उसे लिपिबद्ध कर लीजिए और फिर अपने से पूछिए कि आप इनके आकांक्षी क्यों हैं। योजना में थोड़ा-सा परिवर्तन करने से और या फिर कार्य-पद्धति में कोई बड़ा परिवर्तन कर देने से आप दुर्लभ को भी सुलभ बना सकते हैं। ८१ 2 बीसवां दिन - - -- - पैसा कैसे कमाएं सफलता-प्राप्ति के लिए बहुत-से गुण अनिवार्य कहे गए है, जिनमें प्रतिभा, चतुराई, उद्योग और अनथक प्रयत्न सर्वोपरि हैं। निस्सन्देह ये अत्यावश्यक है; लेकिन एक ऐमा गुण है जिसे कम लोग जानते है, और वह है पर्यवेक्षण की क्षमता। एक सफल व्यापारी ने कहा है : पर्यवेक्षण+कल्पना-धन शिक्षा और प्रशिक्षण का मूल उद्देश्य है पर्यवेक्षण और विश्लेषण करने की शिक्षा देना। शिक्षा का स्थान केवल कक्षा का कमरा ही नही है। आजकल प्रत्येक अच्छी संस्था के अपने प्रशिक्षण केन्द्र होते है जहां कर्मचारियों और नौसिखुओं को पर्यवेक्षण और विश्लेषण की कला का विकास करने की शिक्षा दी जाती है। पर चुकि कल्पना के प्रयोग की शिक्षा देना कठिन है,अथवा उसका मूल्य ठीक से आका नही जाता-इसलिए प्राय. उसे भुला दिया जाता है। कल्पना के प्रयोग के कुछ एक उदाहरण यहा प्रस्तुत हैं : एक सावुन-कम्पनी ने घोषणा की कि ऐसे लड़कों को पुरस्कार दिए जाएगे जो साबुन की टिकिया पर लपेटे हुए रैपर सबसे अधिक संख्या में इकट्ठा करेंगे। गिरजे के एक पादरी के एक महत्त्वाकांक्षी किशोर बेटे मैक्स एटीकन ने अपनी बचत की सारी राशि एकत्रित की और फैक्टरी से साबुन की एक पूरी पेटी खरीद लाया, और उसे थोक के लागत दाम पर इस शर्त पर बेच दिया कि वह हरेक टिकिया से रैपर उतार लेगा। और उसने प्रथम पुरस्कार जीत लिया। ८२ सावुन-कम्पनी ने उसे एक साइकल इनाम में भेंट दी । उस समय वह केवल दस बरस का था। यह कल्पनाशक्ति का ही परिणाम था कि वह किशोर एटीकन आगे चलकर लार्ड बीवर ब्रूक के नाम से कई एक ब्रिटिश समाचार- पत्रों का प्रतिष्ठित स्वामी हुआ। सप्ताह में एक बार अपने चारो ओर नजर दौड़ाइए और देखिए कि कहां क्या कुछ किया जा सकता है। जैसे पुराना पड़ गया फार्म या छपा सकुलर, अपने डेस्क या कमरे की सेटिंग आदि । संसार को चौंकानेवाले परिवर्तन करने का प्रयास न कीजिए। निरीक्षण, विश्लेपण और कल्पना के द्वारा किए गए छोटे-मोटे परिवर्तन आपको अपने मस्तिष्क को दैनिक रूप से क्रियात्मक चिन्तन का प्रशिक्षण देने में सहायक होगे। एच० जी० वेल्स का कथन है : "प्रकृति में स्थिरता या जड़ना ही एक अक्षम्य दोप है।" कार्यदक्षता के विजेपन कहते हैं : “व्यवसाय को अकेला छोड़ दीजिए और इसमें सिवाल और काई पट जाएगी। और वह नदी के प्रवाह में तैरती हुई मृत मछली की तरह हो जाएगा।" सो अपने चारों ओर देखिए । पर्यवेक्षण कीजिए, विश्लेषण कीजिए और तदनुसार काम कीजिए। लेकिन काम सभी कीजिए। बहुत-से लोग ऐसे मिलेंगे जो धनोपार्जन के पुराने पड़ गए इन उपाय पर हसेंगे और मापसे पूछेगे कि आप सरल तरीके का प्रयोग क्यों नहीं करते । वे कहेंगे : “क्या हुआ, यदि उसमें थोड़ी-बहुत बेई- मानी करनी पड़ती ?-- हरेक व्यक्ति आज यही कर रहा है।" जो कुछ आप और हम जानते है, ये लोग नहीं जानते कि सहज प्राप्त धन नहीं टिकता । और यह कि बेईमानी से प्राप्त की हुई वस्तु के लिए अपराध, गर्म या वेह्याई के रूप में उससे कहीं अधिक मूल्य चुकाना पड़ता है, जितना कि पसीना वहाने, श्रम करने और समय लगाने में देना पड़ता है। आज, व्यवसाय के कायदे-कानूनों का स्थान, कितने बड़े पैमाने पर, व्यावसायिक वेईमानी ने ले लिया है कि हमें इस विषय पर गंभीर 1 ; सुनकर अचरज नहीं होता। क्या ईमानदारी के दिन लद गए? आप बीसवीं गताब्दी-आधुनिक ऐटम युग--का इन्सान होने के नाते आत्मगौरव का अनुभव कर सकते है। लेकिन मैं तो इससे नितान्त लज्जा का अनुभव करता हूं। इनके माथ ही आपका कहना है कि हमारे बाप-दादा के जमाने की दकियानूनी बातें इस दौर में नहीं रहीं-और हमने पहले की अपेक्षा उन्नति कर ली हे तथा हम पिछली सदी से कहीं आगे बढ़ आए है, लेकिन मेरा दावा है कि हमने उन्नति नही की है, बल्कि हम केवल बदले है और वह भी सिर्फ बुराई की दिशा में। मैं प्रायः इस कल्पना में डूब जाता हूं कि जब हमारी पुरानी पोढ़ी खत्म हो जाएगी और अपने नाथ संयम, सत्यवादिता और सच्चरित्रता आदि के महान गुण सहेज ले जाएगी तो हमारी दुनिया 27 रूप क्या होगा! ईमानदारी बहुत तेजी से हमारे जीवन से लुप्त होती जा रही है। प्रतिदिन हम सुवह जव समाचारपत्र खोलते हैं तो दुनिया भर से होनेवाले गवन, अनाचार, छल-कपट से पूर्ण काण्डों पर हमारी दृष्टि जाती है; उनमें से बहुत-सी घटनाओं का सबन्ध तो ऐसे पार्वजनिक नेताओं, समाज एवं उद्योग के प्रमुख व्यक्तियों से होता है जिन्होंने गत पचास बरसों से दुनिया को चकाचाँध कर रखा है। आज, हम प्रायः धीमी आवाज़ में टिप्पणी सुनते हैं : "तो क्या हुआ ? उसने ऐसा क्या काम किया है कि अवसर मिलने पर किसी दूसरे ने न किया हो?" वेईमानी आज सार्वजनिक हो गई है । यदि बात सिर्फ इतनी-सी होती तो आधुनिक समाज को अब भी बचाया जा सकता था। लेकिन वईमानी तो आज एक कला बन गई है। आज लोग आवेश में अथवा बहकावे में आकर बेईमान नहीं होते। आज की बेईमानी बहुत सोच- विचारकर की जाती है। वेईमानी आज आधुनिक व्यापार का एक गुग समझी जाती है। - ५४ अपने-यापसे प्रारम्भ कीजिए यह उल्लेखनीय है कि व्यक्ति में सुधार करके ही व्यावसायिक नतिकता में सुधार किया जा सकता है। यदि हममें से हरेक यह निश्चय कर ले कि वह कथनी और करनी में सीधा और ईमानदार रहेगा, अपने वायदों का सम्मान करेगा और व्यक्ति, समाज व राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व को निभाएगा, तो हम अब भी असत्यता और भ्रष्टाचार के स्थान पर अपने आपको सचाई और ईमानदारी के नये युग में प्रविष्ट करा सकते हैं। गेक्सपियर ने ठीक ही कहा है : “अपने प्रति सच्चे बनिए और रात-दिन इस बात का पालन कीजिए, तब आप किसी व्यक्ति के प्रति झूठे नही रहेंगे।" यदि आप अपने प्रति, अथवा अपनी अन्दर की आवाज़ के प्रति सच्चे हैं, तो आप अपने सबसे अच्छे प्रतिस्पर्धी और सबसे अच्छे आलोचक और विश्लेपक हो सकते हैं। यदि ईमानदार बने रहने का और कोई मार्ग न हो, तो दकिया- नूसी बनने में हित्रकिचाइए नहीं, क्योंकि ईमानदारी सुख और सच्ची सफलता की नींव है। , इक्कीसवां दिन 11 मुख्य कार्य को प्राथमिकता दीजिए बम्बई के एक प्रमुख व्यापारी ने 'मेरी सफलता का रहस्य' विषय पर वार्ता सुनाते हुए बतलाया कि अपने जीवन के आरम्भिक दिनों में उसने संकल्प लिया था कि सफलता प्राप्त करने के लिए वह सब कुछ त्योछावर कर देगा। इसके लिए उसने खेल-कूट, फिल्म शो, इधर- उधर का पढना-लिखना, पार्टियां और पिकनिक सब कुछ त्याग. दिया। उसने अपनी सारी जवानी सिर्फ एक काम-सफलता-प्राप्ति पर एकनिष्ठ होने में लगा दी, और इस कथन में यह कहकर वह गर्वित हो रहा था कि उसने पैतीस बरस की उम्र तक आते-आते अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया था। वार्ता की समाप्ति पर अपनी टिप्पणी देने में मैं संकोच कर रहा था। लेकिन जब उन्होंने उसके लिए आग्रह किया, तो मैने कहा कि प्रवक्ता ने गलत ढंग से सफलता प्राप्त की है। मैंने समझाया कि प्रवक्ता महोदय की तरह किसी भी ऐसे व्यक्ति के लिए सुख की प्राप्ति कर पाना कम ही सम्भव है, जो केवल एक लक्ष्य के लिए हर तरफ से काम वन्द करके जुटा रहा। मैंने कहा कि जवानो जीवन में एक ही बार आती है। राग-रंग, कविता-गान, सौन्दर्यो- पयोग, भाव-प्रवणता तथा जीवन की सच्ची आनन्द-प्राप्ति के लिए यही सबसे उपयुक्त समय है। मेरे दृष्टिकोण से वक्ता की सफलता खोखली थी। इसपर मुझे एक किस्सा याद आया। एक व्यक्ति ने यह लक्ष्य निर्धारित किया कि वह इतना धन-संग्रह करेगा जिससे वह जीवन-भर एक भुना हुआ ८६ J चूजा प्रतिदिन खा सके। इसके लिए उसने कई बरसों तक अपने- आपको इस प्रकार की सुख-सुविधा से वंचित रखा और जब उसने पर्याप्त धन-राशि इकट्ठी कर ली तो उसे गहरी निराशा हुई, क्योंकि तब उसके मुह में एक भी दांत न रहा था, जिससे वह अपना मन- चाहा भोजन खा सकता। , अपने पाठकों को, विशेषकर पचीस वर्ष के नीचे की आयु वालों को, मेरी यह राय है कि वे सन्तुलित जीवन बिताएं। अपने कार्यो की आप ऐसी योजना वनाएं कि जीवन की अच्छी वस्तुओं के आनन्दलाभ के लिए पर्याप्त अवसर मिल सके। आपने पढा है कि अपने धन में वृद्धि या तो आप आमदनी बढ़ा- कर कर सकते है, या फिर खर्च घटाकर । बहुत-से लोग अधिक धन कमाने की समस्या पर तो काफी जोर देते है, जबकि वे बचत के तरीकों की नितान्त उपेक्षा करते है । सो पहला काम, जिसे आपको करना है वह है अपने व्यय की निगरानी रखना। खर्च हुए प्रत्येक रुपये की विस्तृत तालिका बनाइए-और प्रत्येक मद को आलोचना की दृष्टि से परखिए। शृंगार-सामग्री और कपड़ों में पर्याप्त छंटनी की जा सकती है। इन बचतों के कुछ अश ऐसी पुस्तकों पर व्यय कीजिए जो आपका ज्ञानवर्धन करे, और क्योंकि यह जाना-माना तथ्य है कि व्यक्तित्व आपकी वेशभूपा पर उतना निर्भर नहीं करता जितना आपकी मुख- मुद्रा पर; अथवा वह आपकी ध्वनि की लाक्षणिकता पर उतना अवलम्बित नहीं है जितना कि इसपर कि आप कितना प्रभाव- शीलता से इसका प्रयोग करते है; अथवा वह आपके प्रवेश करने के साथ के प्रभाव पर उतना आश्रित नहीं है जितना कि आपके अपने पीछे छोड़े गए प्रभाव पर। महत्त्वपूर्ण कार्यो का ध्यान रखिए, लेकिन उनमें मुख्य कार्यो कों उनसे भी पहले कीजिए। आवश्यक बनाम अनिवार्य : चाहे वह समय के विषय में हो, या धन के अथवा शक्ति के विपय में हो, यह निर्णय करना सीखिए कि कौन-सा व्यय मात्र आवश्यक है और कौन-सा अनिवार्य । ८७ एक बार में 'ईसा के सिद्धांत : जीवन का मार्ग' विषय पर व्याख्यान के लिए बुलाया गया था। सभा-भवन में नवयुवकों का अभाव देखकर मुझे आश्चर्य हुआ। मुझे बताया गया कि गाव के नवयुवक एक दान-फण्ड को बढ़ाने के लिए उस दिन पुराने अखबार जुटा रहे थे। , मैने कहा, "इस तरह के सब कार्य बहुत आवश्यक हैं। लेकिन यह काम किसी भी दूसरे रविवार को आसानी से किया जा सकता था । यह वार्ता दुहाई नहीं जाएगी, और विषय ऐसा है जो भविष्य में ऐसी बहुत-सी अखवारें जुटाने की प्ररेणा देगा। खेद की बात है कि नवयुवक आवश्यक और अनिवार्य में अन्तर नहीं कर सके।" जब मैं अपर का अनुच्छेद लिख रहा था तो कालेज का एक विद्यार्थी मुझसे दवा लिखाने आया जिसके प्रभाव से वह सोलह घंटे रोज़ जगकर पढ़ सके। मैंने उससे कहा कि यदि उसने इन घंटों में कमी न की तो वह शीघ्र ही बीमार पड़ जाएगा। लेकिन उसने ज़ोर दिया कि वह रोज़ सोने के लिए चार घण्टे से अधिक नहीं दे सकता। उसने बताया कि वह वायुसेना-प्रदर्शन देखने के लिए शहर जाकर एक दिन जाया कर चुका है। उसने इस प्रकार की गौण इच्छाओं को पूरा करने के लिए तो समय निकाला, लेकिन अपनी अत्यावश्यक शारीरिक और मानसिक आवश्यकता~भरपूर नींद-को वह पूरा न कर सका। कुछ लोग कितने नादान हो सकते हैं 1 बाईसवां दिन 6% कोरी आलोचना मत कीजिए करूंगा; यदि आप जीवन में सफल होना चाहते हैं तो आपको अवश्यमेव सकारात्मक अथवा व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना होगा। "यह मन करो,” यह कहने के बाद रुकिए नहीं, बल्कि चलने लिए, और वनाइए कि उसके बदले क्या किया जाना चाहिए। आज हम आपके अपनाने के लिए यह संकल्प प्रस्तुत करते हैं : "जब तक आवश्यकता का आग्रह नहीं होगा, मैं आलोचना नहीं और वह भी केवल तभी करूंगा जवकि मरी आलोचना रचनात्मक होगी।" एक बी०टी० कालेज में एक प्रशिक्षणार्थी से कहा गया : "आप विद्यार्थियों से बहुत तेज़ बोलते हैं। आप भाव अभिव्यक्त करने के लिए बहुत अधिक हाथ नचाते हैं। बोलते समय आप चहलकदमी करते हैं।" उसने जवाब दिया : "मैं अपनी अध्यापन की इन त्रुटियों को यहां आने से पहले ही जानता था । केवल इन्हें मुझे बताने मान से कोई लाभ नहीं; इसके साथ ही आप यह भी बताइए कि इन त्रुटियों को दूर कैसे किया जाए।" नये काम पर लगे व्याक्तियों को अथवा हाल ही में नियुक्त लोगों को ऐले ही अनुभव होते हैं। यदि हम सुधार नहीं कर सकते तो आलोचना करने में कोई लाभ नहीं। ऐसे आलोचक उस छिद्रा- न्वेषी व्यक्ति की तरह है जो प्रत्येक वस्तु का दाम तो जानता है पर उसका महत्व नहीं पहचानता। दोपात्वेपी भी आलोचना करने में इतना खो जाता है कि उसके पास सुधार के लिए समय और शक्ति पह A शेष नहीं रह पाती। यदि आपकी आलोचना रचनात्मना नहीं, तो विश्वास मानिए, आप भी उन्ही लोगों में से एक है जो अपनी कमजोरियों को ढकने के लिए दूसरों के दोप निकालने में रस लेते हैं। दूसरों का सुधार कैसे करें ? जब आप किसी व्यक्ति को सुधारना चाहते है तो आप उसे नाराज किए बगैर उसकी इन बातो की प्रशंसा करके उसे सुधार सकते हैं : (१) उसके किसी प्रयल के लिए; (२) उसके कुछ हद तक सफलता-प्राप्ति के लिए; (३) कोई कार्य जो कठिन हे पर अच्छा है, उस दिशा में उसके प्रयत्न के लिए। सुधार करते समय या सिखाते समय, विशेषकर प्रौढ़ी के नुधार- कार्य में कभी बड़प्पन का भाव ग्रहण न कीजिए। सुधार का आदर्श मार्ग यों बताया गया है: "लोगों को इस प्रकार मिखाइए जैसे आप उन्हें सिखा नहीं रहे; और जो बातें वे नहीं जानते, उनके सामने वे ऐसे रखिए जैसे वे उनको भूल गए थे, और आप उन्हें स्मरण-मात्र करा रहे हैं मालोचना कोई भी पसन्द नहीं करता : उत्साही और ईमान- बार कार्यकर्ता सुधारों का स्वागत तो करता है किन्तु आलोचना का स्वागत करने को कोई भी तैयार नहीं । यह दूसरों को सदा बचाव- पक्ष में लगा देती है। इसलिए जब आप आलोचना करने लगें तो मावधानी से काम लीजिए। इसपर भी आपको स्वयं रचनात्मक आलोचना एवं सुधारात्मक सुझावों-दोनों का स्वागत करना चाहिए तथा खण्डनात्मक आलो- चना को नज़रअन्दाज़ कर देना चाहिए। कटु आलोचना ने संवेदन- गील अंग्रेजी उपन्यासकार टामस हार्डी से कहानी-उपन्यास तक लिखना छुडवा दिया और अंग्रेजी कवि चैटर्टन को आत्महत्या करने पर विवश कर दिया। खैर, आप उनकी गलतियां नहीं दुहराएगे, क्योंकि आप अना- वश्यक छिद्रान्वेषी एवं अशिष्ट आलोचकों तथा रचनात्मक, ईमान- १ दार एवं सहानुभूतिपूर्ण आलोचकों का अन्तर समझते है। आलो- चना अथवा दोप-सुधार पर कभी बौखलाइए नहीं। याद रखिए, जब आपकी आलोचना की जाती है तो आप समझिए कि आप कुछ महत्त्वपूर्ण होते जा रहे है। अथवा जैसा कि यह लोकोक्ति है : 'सोइ तरुवर पाथर सहै, फल झारति जे नमि रहै।' अपना सुझाव दीजिए सफलता की अन्तिम सीढ़ी पर शीघ्र ही पहुंचने के श्रेष्ठतम मागों में से एक है 'सुझाव-पेटिका' का प्रयोग करना । भले ही आपकी संस्था सुझाव देने में प्रोत्साहित न करती हो, तो भी आप समय, श्रम, माल अथवा व्यय की बचत करनेवाले परिवर्तनों एवं संशोधनों को प्रस्तुत करने में हिचकिचाइए नही। लकीर का फकीर मत वनिए। काम करने का कोई तरीका केवल इसीलिए ठीक न हो जाएगा क्योंकि बरसों से हर कोई उस काम को इसी तरीके से करता आ रहा है। पुराना तरीका गलत भी तो हो सकता है। अतः आखें सदैव खुली रखिए और उपयोगी सुधार करने की ताक में रहिए। यदि आप नेता अथवा निरीक्षक हैं तो मन में विठा लीजिए कि कोई भी विचार निरर्थक नहीं होता। कुछ अच्छे और कुछ अपेक्षा- कृत कम अच्छे हो सकते है। लेकिन निम्नकोटि के सुझाव भी आपको उस व्यक्ति को उत्साहित करने का अवसर देते है जो इन्हे प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त, आप जानते है कि आपके साथियों में कौन-से सक्रिय दिमाग के हैं। अपने विचारों के बारे में परामर्श कीजिए, और इस प्रकार आप अपने विचारों में यथेष्ट परिवर्तन एवं प्रगति लाइए। किसी विचार को ऐसे ही मत छोड़िए, और अपने विचार को कार्य रूप देने मे विलम्ब न कीजिए। कर्मठ व्यक्ति आगे बढ़ते है, जवकि हिचकिचानेवाले लोग पीछे रह जाते हैं। अस्पष्ट अथवा अपरिपक्व विचारों को मत प्रस्तुत कीजिए। जितनी जल्दी हो सके, व्यावहारिक विचारों को अपना लीजिए। ४१ .

तेईसवां दिन -- जंजीर की हर कड़ी महत्त्वपूर्ण है एक सुव्यवस्थित संस्था में कार्य की योजना इस प्रकार बनाई जाती है कि हरेक काम का दूसरे काम से सम्बन्ध जुड़ा रहता है, जिससे कार्य दक्षतापूर्वक होता है और समय एव श्रम का अपव्यय नहीं हो पाता। प्रत्येक काम एक विभाग की श्रृंखला की एक कड़ी है। और प्रत्येक विभाग एक पूरी संस्था की शृंखला की एक कड़ी हैं । हरेक कड़ी महत्वपूर्ण है-चाहे छोटी हो या बड़ी; क्योंकि शृंखला की मजबूती उसकी प्रत्येक कड़ी की मजबूती पर निर्भर है। यदि हम इस तथ्य को किसी संस्था पर लागू करे तो हमें पता चलेगा कि संस्था का प्रत्येक व्यक्ति उसके लिए महत्त्वपूर्ण है । न्यून- तम वेतन पानेवाले कर्मचारी भी अपने क्षेत्र में उतने ही महत्त्वपूर्ण है जितने कि उच्चतम वेतन पानेवाले अधिकारी लोग । अपना काम करते हुए आप अपनी पूरी संस्था की समग्र कार्यक्षमता को अत्य- धिक बढ़ा भी सकते है और घटा भी। एक दिन एक किशोर टाइपिस्ट लड़की ने मुझसे शिकायत की कि वह ग्रेजुएट है, पर उसे दफ्तर में साधारण टाइप का काम दिया गया है। वह स्वतन्त्र पत्रव्यवहार का काम अथवा अन्य महत्त्वपूर्ण काम करने की इच्छुक थी। इस वात को उसे समझाने में घण्टों लगते । दफ्तर में किस प्रकार का काम किया जाए, यह महत्त्व नहीं रखता, वल्कि महत्त्वपूर्ण यह है कि कार्य कैसे किया जाता है । जिस प्रकार मशीन का प्रत्येक दांता छोटा होते हुए भी पूरी मशीन को ૨૨ अच्छी तरह चलाने में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है, उसी प्रकार संस्था का प्रत्येक कर्मचारी संस्था की उन्नति में एक विशिष्ट स्थान रखता है-चाहे किनी व्यक्ति को अपना काम देखने में कितना ही छोटा अथवा अनाकर्षक क्यों न लगे ! इस कथन की सत्यता एक छोटे-से उदाहरण से समझी जा सकती है। यदि हम टाइसराइटर मगीन में से 'इ' वर्ण निकाल दें, और किमी ड्रॉफ्ट में उसकी जगह 'अ' वर्ण टाइप करते जाए, तब हन देखेंगे कि लेखन विचित्र-सा हो जाएगा। यह वर्ण कोई अपवाद नहीं है । मशीन में सभी वर्ण महत्त्वपूर्ण हैं। मुझे आगा है कि वह मेरा कथन कभी नहीं भूली होगी। विश्वास है, आप भी न भूलेंगे। एक समय में एक हो काम कीजिए एक मजाकिये ने कहा है कि जो व्यक्ति कार चलाते हुए एक हाय स्टीयरिंग पर रखता है और दूसरा हाथ बगल में बैठी हुई लड़की की कमर में डाले रहता है, वह उस लड़की की ओर उतना ध्यान नहीं दे सकता जितना कि उसे मिलना चाहिए। यदि शव्दयाः कहा जाए तो एक पत्थर से दो शिकार कभी नहीं मारे जा सकते। यही बात जीवन के हरेक क्षेत्र में चरितार्थ होती है। यदि एक लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए आपका ध्यान किसी दूसरे विन्दु पर टिका है तो सम्भावना यही है कि आप दोनों को गवा बैठेंगे। जो लोग दो काम एकसाथ करते हैं वे उसी तरह के मूर्ख हैं जैसे गली में या सड़क पर चलते-चलते अखबार पढ़नेवाला व्यक्ति। वह दोनों में से किसी भी काम को ठीक अंजाम नहीं दे रहा, वल्कि अपने लिए मुसीवत खड़ी कर रहा है । सबसे अच्छा तरीका यही है कि जो कार्य हाथ में हो, उसी में पूरा व्यान केन्द्रित किया जाए। जो काम आपके हाथ में है पहले उसे कीजिए और तब दूसरे काम को हाथ लगाइए। हो सकता है कि इस प्रकार आपका थोड़ा समय खराब हो जाए, किन्तु यदि आप काम को दक्षता से और उचित रूप से समाप्त करेंगे, तो अन्ततः आपका समय, व्यय और श्रम बच जाएगा। कुछ क्षणों की १३ 'शार्ट कट' मत अपनाइए जिस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति का काम किसी योजना की सफलता में सहायक होता है, उसी प्रकार हरेक व्यक्ति पूरे काम को बना भी सकता है और विगाड़ भी सकता है। प्रायः जन हमें देर हो जाती है, और हम दैनिक कार्यों में पीछे रह जाते हैं, तो 'शार्ट कट' अपनाते है बम्बई में रेलवे लाइन पार करते हुए प्रतिदिन औसतन छ, व्यक्ति कट जाते हैं। कोई व्यक्ति सोच सकता है कि लाइन पार करना सुरक्षित है, क्योंकि गाड़ी कोई ऐसी चीज़ तो है नहीं जो नांप की तरह रेगती हुई आपपर चढ़ आएगी; तो भी सचाई यह है कि इन्सान बहुत ही जल्दी विचलित हो जाता है एक और भी जल्दी घबरा जाता है। इसलिए हने 'शार्ट कट' और 'सीधा मार्ग' का अन्तर समझ लेना चाहिए। आपने विद्यालय में पढ़ा होगा कि 'शार्ट कट' सदैव सीधा या आसान मार्ग नहीं है। वह केवल आंशिक रूप में सत्य है; क्योंकि शार्ट कट प्रायः सबसे आसान रास्ता है नुसीवत की नंवर में डालने- वाला |मार्ट कट किसी काम को आखिरी समय में करने का निजी और विना आजमाया हुआ तरीका है। क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि यह प्रायः कितनी मुसीवत ढहाता है ? यदि कोई काम या कोई तरीका वस्तुतः अच्छी तरह नियोजित हो, तो हड़बड़ी या शार्ट करें करने की कतई गुजाइश नहीं रहती। ये उतने ही खतरनाक हैं जितना कि बिजली का शार्ट सर्कट । और यद्यपि इनसे समय बचेगी, तो भी इनसे उत्पन्न असुविधाएं और कठिनाइयां दचे हुए समय का हिसाव पूरा कर देती हैं। सो निश्चय कीजिए कि आप अपने दैनिक जीवन में विशेषकर अपने नियमित कामों मे शार्ट कट नहीं अपनाएगे। इसका अर्थ यह नहीं कि आप काम करने के बेहतर उपायों की ओर ध्यान ही न देगे। यदि आप शार्ट कट की जगह सीधा नार्ग अपनाएंगे तो सुविधाजनक रहेगा। १४ चौवीसवां दित . कार्यालय में प्रापका क्या स्थान है ? जीवन लोह के बर्तनों की एक दुकान मे क्लर्क था। वहां उसकी कोई स्थिति नहीं थी। वहां उसकी महत्त्वाकाक्षाएं घुट रही थी। वह कभी भी रस लेकर काम नहीं करता था, बल्कि जीविकोपार्जन- मात्र के लिए आवश्यक समझकर इसे ढोए जा रहा था । एक दिन सुनने में आया कि जीवन का देहान्त हो गया। दूसरे दिन बहुत-से युवक उसकी जगह नौकरी पाने के उद्देश्य से दुकान पर गए। उन्होंने दुकान के मालिक से व्यग्र होकर पूछा, "क्या आपने जीवन के रिक्त स्थान की पूर्ति कर ली है ?" दुकानदार ने सिर हिलाया और धीरे से कहा, "जीवन तो कोई रिक्त स्थान छोड़ ही नही गया।" शायद आपने यह यह प्रसंग पहले भी सुना हो। किन्तु यह कहानी उस समय और भी निराशाजनक हो जाती है जब हमे मालूम होता है कि आज कितने ही जीवन हमारे अन्दर विद्यमान हैं जोकि उद्यम, महत्त्वाकांक्षा और नई सूझ-बूझ की प्रवृत्ति से रहित है। इस संसार में प्रत्येक नर-नारी का उस सर्वोच्च सत्ता की योजना में एक विशिष्ट स्थान है; परन्तु उनमें से अनगिनत लोग उस लक्ष्य तक के लिए जीने में असफल रहते हैं। यद्यपि यह सत्य है कि संसार में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होता जिसका अभाव पाटा न जा सकता हो, तो भी यह स्मरणीय है कि कुछ व्यक्तियों का वदल मिलना वस्तुतः कठिन होता है। क्या आप ऐसे ही व्यक्तियों में से एक हैं ? ६५ + - .. जब हम महान नर-नारियों की जीवानियां पढ़ते हैं तो हम मन ही मन कहते है : "उनके जीवन में कितनी रोमांचकारी घटनाएं हुई ! मेरी जिन्दगी क्यों बोझ बनी जाती है ?" यह चिन्तन लगभग वैसा ही है जैसेकि कोई अकेला पड़ जाने- वाला व्यक्ति अपने पड़ोस के किमी लोकप्रिय व्यक्ति से ईर्ष्या करता है। वह यह नहीं समझ पाता कि उसके अकेलेपन का मुख्य कारण उमका रहन-सहन या वातावरण नहीं है, बल्कि उसके चरित्र के अन्दर का कोई दोपपूर्ण पहलू है जो उसे दूसरे लोगों से घुलने-मिलने और मित्र बनाने से रोकता है। मैत्रीपूर्ण बनिए, और आपके अनगिनत मित्र वन जाएंगे। हमारे हाथ मे प्रतिदिन अवसर आते हैं, लेकिन हम जाने या अनजाने उन्हें खो जाने देते हैं। अवसर की ताक में रहिए बहुत-से युवक कोई अच्छी-खासी नौकरी पाकर सन्तुष्ट हो बैठने है। वे अपनी स्थिति को श्रेष्ठतर बनाने के लिए अपने अन्दर योन्यता नहीं बढ़ा पाते । वह केवल इसीलिए कि उन्हें अपने सम्मुख कोई विशेष अवसर नहीं दीखता। यह बात तो वैसी ही मूर्खतापूर्ण हुई जैसेकि लेखक बनने का इच्छुक कोई व्यक्ति यह कहे : "मैं तव तन लिखना शुरू नहीं करूंगा, जब तक कि मुझे वैसा प्रकाशक नहीं मिल जाता जो मेरे भावी उपन्यास को प्रकाशित करने पर राजी हो जाए।' महान और ख्याति प्राप्त करनेवाले व्यक्ति ऐसा नहीं करते। अत्राहम लिंकन कहा करते थे : "मैं अध्ययन और तैयारी करूंगा; और एक दिन मेरा समय आएगा।" फैनी हर्स्ट का किस्सा लीजिए। वह नब तक कहानियां लिखने में निरन्तर जुटी रही, और उनमें से एक के बाद एक तिरासी कहानियां वह 'सैटरडे ईवनिग पोस्ट' में भेजनी चली गई जब तक कि उसकी एक कहानी उस पत्रिका में छप नहीं गई! समय को हाथ से मत जाने दीजिए। इसका अभिप्राय यह है कि जब अवसर आपके मार्ग में आए तो उसे घेर लीजिए । यूनानी संग- तराम लिसीपस ने एक मूर्ति का निर्माण किया, जिसके माथे पर वालों की एक लट बनाई और सिर के पीछे कोई बाल नहीं रखा। उस मूर्ति को नाम दिया उसने-अवसर'। वह मूति इस बात को चरितार्थ कर रही थी कि जिस समय अवसर आपके सामने से गुजरे, तव आप उसपर पटने को उतारू रहिए, अन्यथा वह आगे बढ़ जाएगा और आप पीछे से पकड़ने में समर्थ नहीं हो पाएंगे। अपने काम के बारे में अध्ययन एवं मनन करके आप कार्यदक्षता और आत्मविश्वास दोनों में अभिवृद्धि कर सकते हैं । भावी पदोन्नति के लिए तैयार होने का यह एक उत्तम उपाय है । आंकड़ों से पता चलता है कि अवसर उन्हीं लोगों के पास ही बहुत अधिक बाते हैं जो उनके लिए तैयार रहते हैं। जान, अनुभव और नई कलाओं को प्राप्त करना, जिनका आपके वर्तमान काम से सीधा सम्बन्ध नहीं है, बैंक में रुपया-पैसा जमा करने के समान है ! सो नये काम अथवा नई जगह के लिए तैयार रहिए और आप देखेंगे कि आपकी तत्परता पदवृद्धि में सहायक होगी। आपका समय आपका अपना है जयलाल को उसके मुपरिटेंडेंट ने वुलाकर सूचित किया कि मारमैन ने उसके योग्यतापत्र पर टिप्पणी दी है कि वह बवनति की ओर जा रहा है। इसका कारण पूछे जाने पर जयलाल ने उत्तर दिया, "मैं अपने काम में पूरी मेहनत करता हूं। नादमी और क्या कर सकता है ? रही वात अवनति की ओर जाने की; सो जवकि मेरा हक होते हुए भी मेरे एक जूनियर की पदवृद्धि की गई है तो आप मुझसे और क्या अपेक्षा करते हैं ?" सुपरिटेंडेंट ने कहा, "यदि तुम्हारा मतलव रमण से है, तो मैं तुम्हें उसका कारण बताता हूं। लेकिन इससे पहले मैं चाहूंगा कि तुम एक तालिका बनाओ, जिसमे छुट्टी के बाद विताए हुए घण्टों का विवरण हो ।" इसपर जयलाल ने जो सूची बनाई उसमें इस प्रकार के काम थे, जैसे--सौदा-औदा लाना, विज खेलना, नॉवल 262 पढ़ना, रेडियो सुनना, घर की मरम्मत कराना, बच्चों के साथ खेलना और उन्हें पढ़ाना-लिखाना । सुपरिटेंडेंट ने टिप्पणी की, "यह ठीक है कि तुम्हारा सनय तुम्हारा अपना है, और उसमें तुम क्या करोगे क्या नहीं, यह देखना तुम्हारा काम है। लेकिन तुमने शिकायत की है कि तुम्हें छोड़कर रमण की पदवृद्धि की गई है। इसका कारण सुनो-रमण का भी परिवार है, और वह भी छुट्टी के बाद पर्याप्त समय पत्नी और बच्चों में विताता है । लेकिन साथ ही उसने अपने फालतू समय में कुछ बातों की व्यवस्था की है। उसने भापणकला के एक कोर्स में प्रवेश लिया है। केवल वही एक आदमी है जो दफ्तर की लायब्रेरी में ने फोर- मैनी पर पुस्तके इश्यू करवाता है। और प्रायः उद्योग-पत्रिकाओं के लेखों के बारे में मुझसे तथा दूसरे फोरमैनों से विचार-विनर्वा करता रहता है।" तब सुपरिटेडेंट के कमरे से लौटने से पूर्व जयलाल ने अपने अधिकारी के साथ मिलकर एक योजना बनाई जिससे जयलाल सप्ताह में तीन घण्टे आत्मसुधार में लगा सके, ताकि वह पदोन्नति के आगामी अवसर को पाने के लिए तैयार हो जाए। आप भी आज से वैसा ही कर सकते है।

पचीसवां दिन समाज-सेवा कीजिए समाज और राष्ट्र की सेवा करना प्रत्येक व्यक्ति को अपना कर्तव्य समझना चाहिए। इसके दो मुख्य कारण है : पहला तो यह कि हम इस प्रकार उपलब्ध नागरिक-सुविधाओ के लिए आभार प्रकट करते है; भीर दूसरे, इससे नेतृत्व का उत्तम प्रशिक्षण प्राप्त होता है । बहुत-से लोगों का यह विश्वास है कि जनता की सेवा का पूरा दायित्व नगर-अधिकारियों पर है; और अधिकांश लोग सोचते हैं कि समाज-कल्याण के प्रति उनकी रुचि एवं कर्तव्य की इतिश्री तो तभी हो जाती है जब उन्होंने चुनाव में वोट डालने का अपना नाग- रिक दायित्व पूरा कर दिया। लेकिन वोट डाल देना मात्र पर्याप्त नहीं है। आपको हरेक उम्मीदवार के बारे में ठीक जानकारी प्राप्त करके और पार्टी के कार्यक्रम की जांच-पड़ताल करके सूझ-बूझ के साथ अपना वोट डालना चाहिए। इसे स्वयं कीजिए अनेक बार हम किसी सार्वजनिक असुविधा अथवा कठिनाई को चुपचाप सह लेते है । और इस प्रतीक्षा में रहते हैं कि दूसरा व्यक्ति नगरपालिका को इस सम्बन्ध में लिखेगा। इस पुस्तक के बहुत-से पाठकों में अधिकांश मेहनती और उद्यमी हैं। लेकिन क्या आप कह सकते है कि पिछले छह वरसों के अन्दर समाचारपत्रों या नागरिक अधिकारियों को जो स्थानीय दिक्कतों के प्रति वेखवर अथवा उदासीन बने रहते हैं-इस सम्बन्ध में शिकायत करने अथवा चेता- वनी देने के लिए आपने छत् पत्र भी लिखे हैं ? क्या आप गदा यह अपेक्षा नहीं करते कि इसे कोई दूसरा व्यक्ति करेगा ? चलिए, इसी समय आप निश्चय कीजिए कि आप इसमें जहां आवश्यकता होगी, अवश्य सुधार करेंगे । जब वैसी परिस्थिति पैदा हो, तुरन्त समुचित कार्रवाई कीजिए । अपने मित्रों और पड़ोसियों के सामने ऊंचे-ऊंचे आलोचना करके संतुष्ट मत हूजिए। बुराई को दूर करने में पहल करके आप उनमें आगे आइए। सार्वजनिक सभाओं में उन बुराइयों के विरुद्ध आवाज उठाकर भी आप समाज-सेवा कर सकते हैं। आम जनता में भाषण करना उतना कठिन नहीं है जितना कि आप सोचते हैं। यदि कुछ कठिन है तो वह है अपने पैरों पर खड़े होकर मौलिक ढंग से सोचना । सार्व- जनिक भापण-कला का प्रशिक्षण प्राप्त करके या वाद-विवाद-गोष्ठी बनाकर आप इन दोनों गुणों को अपने अन्दर विकसित कर सकते हैं। समिति के अच्छे सदस्य बनिए क्या आप उन लोगों में से हैं जो समितियों या सभा-सोनाइ- टियों के द्वारा सेवा करना चाहते हैं ? या कि आप उन लोगों में से हैं जो हमेशा सभा-सोसाइटियों अथवा उनके सदस्यो के लिए घृणा- सूचक शब्दावली प्रयोग करते हैं ? मेरे एक मित्र समिति को परि- भापा इन शब्दों में करते है : "अनावश्यक कार्य को सम्पादित करने के लिए अनिच्छुक व्यक्तियों द्वारा नियुक्त अयोग्य व्यक्तियों का समूह।" लेकिन यह बात वह अपने लिए मजाक के रूप में कहता है, क्योंकि वह ऐसी संस्थाओं का सदस्य है, और वैसे उसकी राय अपने बारे में अथवा उन सभा-सोसाइटियों में किए गए काम के बारे में निस्सन्देह अच्छी है। सभा-सोसाइटियों की अन्य परिभाषा कुछ इस प्रकार है : "समिति एक ऐसा समुदाय है जो मिनट बचाता है और घण्टे विनष्ट करता है।" यह बात बहुत-सी सभा-सोसाइटियों के बारे में विलकुल ठीक है। लेकिन आम तौर पर इनमें समय का यह थोड़ा-बहुत अप- व्यय तो अनिवार्य-सा है। यह ध्यान रखना पड़ता है कि प्रत्येक १०० .

सदस्य को बात सुनाई दे; प्रत्येक विचार और प्रत्येक सुझाव पर विचार-विमर्श किया जा सके; और निर्णय लेने से पूर्व सभी सदस्यों की राय पर विचार किया जाए। यह ठीक है कि सभी सभा-सोसाइटियों में एक या दो सदस्य ऐसे होते हैं जो बोलने के लिए बोलते हैं, रुकावट डालने के लिए आपत्ति करते हैं, और व्यक्तिगत शत्रुता, दम्भ एवं ईर्ष्या के कारण सोसाइटी की प्रगति की राह में रोड़े अटकाते है । कुछ भी हो, ऐसी सभा-सोसाइटियां आश्चर्यजनक परिमाण में काम करती हैं। वे हमारे इलाके को सक्रिय रखती हैं, हमारे नागरिकों को प्रगतिशील बनाती हैं और हमारे समाज को जिन्दा रखती हैं। वे शिक्षणात्मक कार्य- क्रम का संचालन करती हैं, नाटक-प्रतियोगिताओं का आयोजन करती हैं, व्यक्तिगत हितों अथवा समाजगत धार्मिक अधिकारों में सरकार या म्यूनिसिपल द्वारा किए गए व्याघात के विरुद्ध आवाज़ उठाती हैं, व समाज-विरोधी गतिविधियों पर नियन्त्रण रखती हैं। किसी सभा-सोसाइटी में सक्रिय योग देना समाज-सेवा का एक मादर्श प्रकार है। इस प्रकार के संगठन से अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए इन बातों का ध्यान रखिए : (१) मीटिंग में समय के पावन्द रहिए और नियमित रूप से उपस्थित हूजिए। (२) तैयारी करके कुछ सृजनात्मक विचार लेकर जाइए। (३) गुटबन्दी में सम्मिलित न हूजिए। (४) प्रत्येक समस्या को ठीक परिवेश में रखकर देखिए। (५) दूसरे के विचारों के प्रति सहनशील बनिए। (६) न तो स्वयं कानाफूसी कीजिए और न उसमें योग दीजिए। ये सभी बातें आवश्यक है; लेकिन पहली बात परमावश्यक है। किसी सभा-सोसाइटी से सम्बन्ध रखने से, नेतृत्व का शिक्षण पाने और समाज-सेवा करने के दुर्लभ अवसर हाथ आते हैं। दोनों का पूरा-पूरा लाभ उठाइए। एक ओर तो आपके प्रयास लोकहित में पर्याप्त योग देंगे, दूसरी ओर उनसे प्राप्त अनुभव एवं सम्पर्क आपके लिए मूल्यवान होंगे। १०१ .

छब्बीसवां दिन
043015
अडिग रहिए
सफलता हमेशा उसी व्यक्ति का वरण करती है जो कभी भी प्रयत्न
नहीं छोड़ते। यदि उस व्यक्ति को सफलता नहीं भी प्राप्त होती तो
भी कम से कम उसे यह सोचकर सुख तो प्राप्त होता ही है कि उसने
सफलता पाने के लिए भरसक प्रयास किया है।
असफलताओं को सफलता की सीढ़ी कहा गया है । तो भी
हममें से बहुत से लोग पहली पराजय के वाद उद्देश्य की प्राप्ति के
लिए प्रयत्ल करना ही छोड़ देते है। स्मरण रखिए कि अध्यवसाय
अन्ततः लाभदायक रहता है। यदि आप पहले प्रयास में असफल रहे
तो दुवारा कोशिश कीजिए। आप और अधिक उपयुक्त समय, और
अधिक अनुकूल अवसर, और अधिक सहायक वातावरण की तलाश
में रहिए। यदि फिर भी आपको सफलता न मिले तो अपना ढंग बदल
दीजिए या सम्बन्धित विपय के बारे में और जानकारी जुटाइए और
तव अपने प्रयास दुगुने कर दीजिए।
इसपर भी यदि सफलता आपको धोखा दे जाए तो कृपया
अपना प्रयास मत छोड़िए।
विजय पाने का संकल्प
सेना के एक सर्जन ने पादरी से कहा कि एक सैनिक की हालत
खराव है । इसपर पादरी गोलियो से छलनी उन सैनिक के पास
गया और उसके मुंह के पास तक झुककर बोला, “वेटा, तुम बहुत
वुरी तरह से घायल हो। क्या तुम कुछ कहना चाहते हो अथवा
१०२
१

. अपने परिवार को कोई सन्देश आदि भेजना चाहते हो?" "मेरे कोट के अन्दर की जेब में..." सैनिक कराहते हुए बुढ- बुदाया । पादरी ने पाकेटबुक टटोली और उसे बाहर निकाला। "क्या यही ?" "हां, इसे खोलिए।" "इसमें तो दस डालर का नोट है। क्या तुम इसीकी वात कर रहे थे ?" "हां" सैनिक फुसफुसाया, और फिर उसने मुस्कराते हुए कहा, "दस डालरो की शर्त लगा लो। मैं नहीं मरूंगा।"-और उसने गर्त जीत ली। पूर्व और पश्चिम के युद्धस्थलों में ऐसी सैकड़ों कहानियां हमें सुनने को मिलती हैं, जिनमें मृत्यु के रक्त-सने हाथ को चुनौती देने- वाले नाहस और अपराजित संकल्प के किस्से विद्यमान हैं। प्राकृ- तिक विनाग और विघ्न-बाधाओं के ऊपर मनुष्य की विजय मे एक महत्त्वपूर्ण तथ्य निहित है कि उसमें जीने की अत्यन्त लालसा है। जीने की लालसा के बाद जीतने की लालसा का नम्बर आता है । सप्टा द्वारा दी गई इस गक्ति के कारण कितने ही आविष्कार हुए हैं। विजय-प्राप्ति का संकल्प, पराजय स्वीकार न करने का निर्णय, असंख्य विघ्न-बाधाओं को वश में करके उन्हें सफलता का सोपान बनाने का दृढ़ संकल्प-इन नब गुणों ने ही नर-नारियों को कीनि,प्रतिष्ठा और सफलता को प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया है। जब हमारी राह में विघ्न आते है अथवा जव हमारे मित्र, साथी या सहकारी हमारे किसी काम में हमें प्रोत्साह्न या सहयोग नहीं दे पाते,तब हम वहुत जल्दी हौसला खो बैठते हैं। हम अपनी अकर्मण्यता की प्रवृत्ति पर यह कहकर पर्दा डालते हैं कि मेहनत को देखते हुए यह काम करने योग्य नहीं है, अथदा यह कहकर कि यह काम संभव ही नहीं है। हम प्रतिजाएं करते हैं और उत्साह के पहले आवेग के समाप्त होते ही हम शिथिल पड़ जाते है। और ज्योंही हमारे मार्ग में कोई बड़ी नकावट आती है, हम काम को ही छोड़ वैठते है । यही कारण है कि हम ऐसा कुछ भी हासिल नहीं कर पाते जिससे हम गर्व १०३ अनुभव कर सकें। यही बात आपके काम या आपके व्यवसाय पर भी लागू होती है। यदि आप असफलता को स्वीकार न करें और हाथ के कान को छोड़ न दें तो आपकी पराजय कभी न होगी। प्रत्येक मूल्यवान सफलता का भवन असफलताओं की आधारभूमि पर ही खड़ा किया जा सकता है। अनेकों स्त्री-पुरुष केवल इसलिए कला, विज्ञान और उद्योग के शिखर पर पहुंच सके हैं, क्योंकि उन्होंने पराजय को स्वी- कार करने से इन्कार किया है। बढ़ते रहिए आपको याद होगा कि इस कोर्स के तेरहवें दित आपको प्रेरणा दी थी कि पराजय के सम्मुख घुटने मत टेकिए । अब, सफलता को निश्चित रूप से प्राप्त करने के विविध उपाय सुझाने के पश्चात् म अध्यवसाय के विषय पर लौटते हैं। आपका कार्य-विपयका जान कितना भी अधिक क्यों न हो, अथवा आप कितना भी कठिन श्रम क्यों न करें, तो भी आपको सदा सामयिक प्रतिरोधों का नामना तो करना ही पड़ेगा। अतः उनके लिए पहले से तैयार रहिए। और उन्हें तीव्रगति से पार करते हुए इस कहानी में वर्णित घोंघे की तरह निरन्तर चढ़ाई जारी रखिए। वसन्त ऋतु का एक ठंडा दिन था। हवा चल रही थी। एका घोंघे ने चेरी के एक पेड़ पर चढ़ना शुरू किया। कुछ गौरैयां उसपर हंसने लगी और उसे तंग करने लगीं, "अरे घोंवा बसन्त) नहीं जानते कि इस पेड़ पर अभी चेरियां नहीं लगी हैं ?" नन्हा घोंघा नहीं रुका, बल्कि चढ़ना जारी रखते हुए उसने उत्तर दिया, "लेकिन जब मैं वहां पहुंचूंगा तव तक वे उग आएंगी।" विसी भी विषय में सफलता प्राप्त करने के लिए हमें लक्ष्य की ओर बढ़ते रहना चाहिए, भले ही हमें उसका परिणाम सामने दिखाई न दे रहा हो। यदि आप महान व्यक्तियों में अपनी गणना कराना चाहते है तो आप उनका अनुकरण कीजिए । जव तक आप सफलता के शिखर तक न पहुंच जाएं, तव तक अपना अभियान जारी रखिए। १०४ ध्या तुम सत्ताईसवां दिन डींग मत हांकिए एक प्रसिद्ध ईसाई-धर्म-प्रचारक को एक शहर में व्याख्यान देना था। उस शहर में वह पहली बार गया था। गाड़ी से उतरकर उसने एक छोटे-से बालक से पूछा, "वेटे, डाकखाना किधर है ?" वालक ने डाकखाने का रास्ता बता दिया। भटके हुए धर्म-प्रचारक ने धन्यवाद किया और पूछा, "तुम जानते हो कि मैं कौन हूं?" "नहीं।" लड़के ने उत्तर दिया। "मैं धर्म-प्रचारक गैबेल डायल हूं। तुम आज रात मेरे व्याख्यान पर आना । मैं तुम्हें स्वर्ग-प्राप्ति का मार्ग दिखाऊंगा।" "जाइए अपना रास्ता नापिए," वालक ने मुंहतोड़ जवाब दिया, "डाकखाने का रास्ता तो आपको मालूम नहीं; और मुझे आप दिखाएंगे स्वर्ग का मार्ग!" छोटे बच्चे वयस्क लोगों या उनकी क्रियाओं के, संसार के सबसे अधिक विश्वसनीय आलोचक हैं। यदि आप सचाई जानना चाहते हैं और आपके समीप बच्चे नहीं है जो आपकी आलोचना कर सकें, तो आप अपने प्रतियोगियों अथवा शत्रुओं की नुक्ताचीनी पर कान दीजिए । बुरे मित्र की अपेक्षा अच्छा शत्रु भला है-यह लोकोक्ति आज भी सच है। बेपर की उड़ाना ठीक नहीं जब कभी हम अपनी उपलब्धियों को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत १०५ कर रहे हो तो यह बहुत अच्छा होगा यदि कोई हमारी शैली भाइ दे। प्रायः हम अपने बारे में ऐस-नगगे दावे करते हैं जो इतने मुर्खता- पूर्ण और निरर्थक होते हैं कि दूसरे लोगों को आश्चर्य होता है कि हम उन्हें गम्भीरतापूर्वक कैसे कह लेने हैं। इनलिए इस बात का ध्यान रखिए कि कहीं आप अपने बारे में कुछ बढ़ा-चढ़ाकर तो प्रस्तुत नहीं कर रहे, अवत्रा अतिशयोक्ति ने तो काम नहीं ले रहे, जैसे कि आजकल कुछ मुर्ख विजापनदाता समा- चारपत्रों में करने में लगे है। उन्हे शायद इस बहावत पर गशीन नहीं है कि कोई व्यक्ति कुछ लोगों को गदा के लिए और सभी लोगो को कुछ समय के लिए तो मूर्ख बना नयना है, लेकिन मनी लोगो को सदा के लिए मूर्ख नहीं बना सकता। वे सर्वन है आप अक्सर ऐसे लोगों ने मिले होंगे जो यह प्रकार करते है कि वे सब कुछ जानते है; पर जो मानते कुछ नहीं। इस वर्ग के अन्त- गंत प्रायः विक्रेता, अव्यापक या छोटे-मोटे अधिकारी आते है। कभी कोई बात नहीं पूछते, क्योकि वे समनत है कि वे सभी प्रश्नों के उत्तर जानते हैं। ऐसे लोगो के विचार में किसी प्रनंग अथवा विषय के बारे में अनानता स्वीकार करना तो मनार का एक अक्षम्य अपराध है। वे मैम्युएल जाननन जैसे बुद्धिमान वृद्ध व्यक्ति को घृणा की दृष्टि ने । देखेंगे, जिन्होंने अज्ञानता स्वीकार करने को श्रेष्ठ बतलाया है। एक भोज के अवसर पर उनके दाई ओर बैठी एक महिला ने उनसे पूछा कि उन्होंने अपने प्रसिद्ध शब्दकोप में अमुक शब्द की परिभाषा में ऐनी हास्यास्पद अशुद्धि कसे कर डाली। उन्होंने विना हिचकिचाए उत्तर दिया, "अज्ञानता के कारण धीनतीजी, विशुद्ध अज्ञानता के कारण।" हमारे सर्व मित्र इस प्रकार की किसी हानिकारक स्वीकृति के फन्दे में नहीं पड़ना चाहेंगे ! वे सब कुछ जानते है, और जो वे नहीं जानते वह जानने के काबिल ही नही है।

, । हो सकता है कि आप दूसरी कोटि के लोगों ने भी मिले हों जिनके अन्तर्गत संसार के सफल व्यक्ति, सच्चे महान वैज्ञानिक, वानिक नेता अथवा उद्योगपती आते हैं। क्या आपको उनकी सर- लता और स्पष्टवादिता पर हैरत नहीं ? तनिक भी हिचकिचाहट अथवा व्यग्रता के बिना वे कहते हैं : "मुझे इसका ज्ञान नहीं।" वे अनेक विषयों के बारे में बहुत कुछ जानते हैं, लेकिन वे इस गलत- फहनी के निकार नहीं है कि वे सर्वन है। फिर भी प्रत्येक संस्था मे ऐने लोग होते हैं जो इतने नासमझ हैं कि 'अनानता' को अपराध मानते हैं । और यह मानते हैं कि किसी पढ़े-लिखे आदमी को इस दोष से ग्रस्त नहीं होना चाहिए। यह एक साधारण बात है कि व्यक्ति जितना किसी विषय के बारे में अध्ययन करता जाता है, उतनी ही उसकी यह धारणा पुष्ट होती जाती है कि इस विषय में उसे और अधिक जानने की आव- श्यकता है। केवल कालेज के अवकचरे छात्र अथवा नौसिखिया लोग सोचते है कि किसी कल्पना या अनुमान को किसी सिद्धान्त में बद- लने के लिए केवल कुछ महीनों का गोव अथवा दस-पन्द्रह सफल प्रयोग पर्याप्त है। हममें से बहुत-से लोग जितना ज्ञान प्राप्त करना चाहेगे उसके लिए जिन्दगी बहुत छोटी है। लेकिन कम से कम समय में अधिक से अधिक जानकारी जुटाने का एक ही छोटा रास्ता है, और वह इन तीन शब्दों में निहित है, जिन्हें सफलता की ओर बढ़नेवाला प्रत्येक व्यक्ति व्यवहार में लाता है : "मुझे जात नहीं।"--और तब आप इतना और जोड़ दीजिए, "क्या आप बता सकते हैं ?" ८ १०७ अट्ठाईसवां दिन - अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखिए । यदि आप अपने उत्तराधिकार में खासी सम्पत्ति छोड़ जाने के लिए अपनी सारी जिन्दगी को प्रतिवन्वों एवं नियन्त्रणों में कस दें और परमावश्यक सुख-सुविधा से अपने को वंचित रखें तो आपका यह प्रयास मूर्खतापूर्ण होगा। यदि आप अनुचित साधनों के द्वारा सम्पत्ति का ढेर लगा लें और इस प्रकार अपने मन की शान्ति खो वैठे तो आपकी दौलत आपको सुख नहीं दे सकती। और इसी प्रकार यदि आप अपने स्वास्थ्य को हानि पहुंचाकर सफलता अथवा सम्पत्ति प्राप्त कर भी लें तो यह कहना ठीक होगा, "यह सौदा महंगा है !" इसलिए अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखिए । स्नान करने से पूर्व नियमित रूप से व्यायाम करने के लिए प्रतिदिन दस से पन्द्रह मिनट तक अवश्य निकालिए । शरीर का तनाव दूर कीजिए। और दिन में कुछेक बार, जव भी संभव हो, विशेषतया आंखों को हथेलियों से ढांपकर अथवा अन्य व्यायामों से आंखों को आराम दीजिए। जब आप थक जाएं अथवा उकताए हुए महसूस करें तो खिड़की के पास खड़े हूजिए और गहरे सांस लीजिए। आप देखेंगे कि इससे आपको बहुत ताज़गी मिलेगी। व्यवसाय या उद्योग से होनेवाली बीमारियों से बचिए। अप- स्फीत नाड़ियां देर तक खड़े रहने या काफी समय तक चलते रहने से मूज जाती हैं- जैसाकि सिपाहियों, नर्स, विक्रेतामों, वेटरों और अध्यापकों के साथ होता है। हाजत होने पर भी मूत्रालय जाने में विलम्ब करने से पेशाव की बीमारी हो जाती है, क्योंकि ठीक समय १०८ पर मूत्र-बिसर्जन नहीं हो पाता। वातानुकूलित कमरों में काम करनेवाले व्यक्तियों को चाहिए कि ठंडे कमरे से गर्म कमरे में अथवा तपती सड़क पर जाते समय जल्दबाजी न करें, और बार-बार न बाएं जाएं। जहां काम अथवा जगह का दुष्प्रभाव आपके स्वास्थ्य पर पड़ता है, वहां ने यदि आप स्थायी रूप से स्थानान्तरित नहीं हो सकते तो छोटे मोटे अस्थायी वायु परिवर्तन ही करते रहा कीजिए। हानि- कारक वूल, रंगों अथवा तेजावों से बचिए। और उत्तेजना अथवा आवेगों की मूचित करनेवाले लक्षणों पर निगरानी रखिए। अपने मालिक को समझाइए कि कर्मचारी स्वस्थ होंगे तो उत्पादन में वृद्धि होगी और अनुपस्थिति कम होगी। अच्छे स्वास्थ्य की रक्षा के लिए चुकाए हुए मूल्य का प्रतिफल अच्छी प्रवृत्ति और अच्छे काम के रूप में प्राप्त होता है। अच्छे आसन में बैठने-उठने का महत्त्व-व्यक्तित्व को बच्छा बनाए रखने के लिए अच्छे आमन में बैठना-उठना अनिवार्य है, क्योंकि इससे दियं में अभिवृद्धि होती है। बंगों का समुचित पोषण एवं विकास होता है, शरीर स्वस्थ बना रहता है और वह गीत्र थकने नहीं पाता। दूसरी ओर, टीक आसन में न बैठने-उठने से पीठ- दर्द हो जाता है, अथवा भरीर थका-थका-सा रहता है, नाड़ियों में खून ठीक दौरा नहीं कर पाता, श्वास-प्रक्रिया ठीक नहीं हो पाती, पेट में ऐंठन होती है तथा रीढ़ की हड्डी पर जोर पड़ता है । अपनी पीठ दीवार की ओर करके और अपनी एड़ियां उससे चार इंच परे रखकर आप खड़े होने के ठीक आसन का अभ्यास कर सकते हैं । आपका सिर, कन्चे और पूरी की पूरी पीठ दीवार से सटी रहनी चाहिए । इस अभ्यास को प्रतिदिन पांच मिनट व्यायाम के रूप में कीजिए और अपने खड़े होने और चलने के ढंग को संवारिए । काम वैठकर कीजिए । बेंत की बुनी सीट वाली कुर्सी का प्रयोग कीजिए, या फिर ऐसी कुर्सी कान में लाइए जिसकी सीट में छेद हों। रुई-भरे गद्दों का प्रयोग मत कीजिए, क्योंकि वे वायु और रक्त के प्रवाह और संचार में बाधक होते हैं । १०१ - असावधानी का मूल्य आदमी को अस्त करनेवाली अस्सी प्रतिगत मुलीबतों के पीछे भी एक ही बात है। ये मनी मनुष्य की अपनी अपनी-----उसकी कसावधानी का परिणाम हैं। बीमारी को ही ले लीजिए । जरा देखिए कि कौन-जोन पिछले माह गैरहाजिर रहा । आप देगे कि गैरहाजिर रहनेवाले लोगों में से अधिकतर वे कार्यकर्ता है जिन्होंने नूरता से अपनी सेहत का सत्यानाग कर डाला है। उन्हें जुकाम हो जाए तो वे उनको उपचार में कुछ नहीं करते । वे कह देते हैं. "यह मुद ही टल जाएगा। जब नीवत खांसी और बुवार तक आ पहुंचती है. तब भी दे डाकटर पास नहीं जाते । वे छूटने ही कहते हैं, "पहले नी ऐना हुआ था, यह खुद ही टल जाता है।" इस प्रकार बात बढ़ते-बढ़ते गलगाय अपना फेफड़ों के प्रदाह तक जा पहुंचती है और उसके पदचिह्नों पर आ धमकता है न्यूमोनिया । वे अब यह नहीं कहते कि, "यह खुद ही टल जाएगा।" क्योकि वे स्वयं अब जिंदगी मे सदा के लिए टल जाने को होते हैं। हम इन लोगों की मसावधानी पर हंस भी तो नहीं सकते, क्योकि ऐसी असावधानी का परिणाम प्रायः अत्यन्त दुःखदायी होता है किसी घर का कोई कमाऊ व्यक्ति मर जाता है; पीछे भूखों मरने के लिए रह जाते हैं उसके बाल-बच्चे। यह सब निपट मूर्वता और नितान्त असावधानी के कारण ही होता है। कारखानों और फैक्टरियों में हुई वटनाओं का ब्योरा भी यही दुःखद कहानी दुहराता है। पहले तो प्रवन्धकर्ता ही प्रत्येक के लिए पूरे यन्त्र-रक्षक नहीं जुटाते, और फिर रही-सही कसर कार्यकर्ता निकाल देते हैं। किसी मशीन में कोई नुक्त होने के कारण तो एकाध ही दुर्घटना होती होगी, जबकि फूहड़ और उजड्ड कार्यकर्ताओं के कारण सैकड़ों दुर्घटनाएं होती हैं। हम पहले ही कह चुके हैं कि हमें लाल रंग में और अधिक सावधानी के संकेत अंकित कराने की इतनी आवश्यकता नही है, जितनी कि उन्हें पढ़ने की। और क्रिया- न्वित करने की वास्तव में समस्या तो यही है। ११० m - नीतिन इस चेतावनी पर जोर देते हैं : “पाप ने दूर रहकर पाय से वचना अथवा बचने का प्रयत्न करना व्यर्थ है; आपको पाप के अवसरों को दूर करना चाहिए।" दुर्घटना-रोक अभियान पर भी यही वात लागू होती है। यदि आप दुर्घटनाओं से बचना चाहते हैं, तो दोपपूर्ण मोडारों, फटे-पुराने दस्तानों की या तो मरम्मत करवाइए मीर, या फिर उन्हें 'कंडम' कीजिए । और उन खतरनाक मगीनों में आप जो भी काम लेते हैं, उसके लिए उन्हें पूरी तरह से तैयार रखिए, अथवा जरूरी साजो-चामान से हमेगा लैस रहिए। यदि आप खतरा नोल लेंगे तो वह किसीकी जिन्दगी ले लेगी-वह जिन्दगी आपकी भी हो सकती है या आपके किसी सह्योगी की भी। क्या आप अपने किसी सह्योगी की विधवा के पास जाकर शर्मिन्दगी के साथ यह कहने का साहस कर सकेंगे, "मरी अनावधानी की वजह से आपके पति की जान चली गई है, लेकिन मैं उन्हें मारना नहीं चाहता था।" यदि ऐसे मोटर चालकों को जो सड़क पर चलनेवाले दूसरे लोगों को जख्मी कर डालते हैं, इस बात के लिए मजबूर किया जाए कि जिन्हें वे जख्मी कन्तं हैं उन लोगों का हाल-चाल पूछने उनके पास जाएं, उनके विस्तर के पायंताने बै, उनकी आहे और कराहें सुनें और उनके सगे-सम्बन्धियों और बाल-बच्चों के कटु वचन महें-तो हमारे यहां एक बस के ही अन्दर दुर्घटनाओं की संख्या कम हो जाएगी। लेकिन कानून का पालन करानेवाले अधिकारी लोग ऐसा करने का दुःसाहन कभी नहीं करेंगे । इसलिए, हम इस प्रकार अपनी असावधानी का मूल्य चुकाते रहो । भय, सकेतों, और लाल लेवलों के प्रयोग को तो हम बढ़ाते जाएंगे, किन्तु वे पढ़े भी जाते हैं या नहीं अथवा कहीं उनकी अवहेलना तो नहीं की जाती, यह देखने की हम तनिक भी कोशिश नहीं करेंगे। १११ उनतीसवां दिन , CO०४७ - - . AL यौन भावना को नियन्त्रित कीजिए आज आपको उपन्यास या मनोविज्ञान, डाक्टरी अथवाजीवन-निर्माण के विपय की कोई पुस्तक ऐसी नहीं मिलेगी जिसमें हमारे दैनिक जीवन में यौन भावना का महत्त्व न वखाना गया हो। इसलिए, यौन भावना के बारे में-इसके कार्य-व्यापार, उद्देश्य एवं इसकी सम- स्याओं के बारे में सन्तुलित विचार रखना आवश्यक है। यदि यौन भावना को नियन्त्रित कर लिया जाए तो यह वीरतापूर्ण साहस एवं आत्मत्याग के अच्छे कार्यों को प्रेरणा दे सकती है। लेकिन अगर यह विकृत हो जाए तो मर्मभेदी भ्रष्टाचारों, अनियन्त्रित इच्छाओं, हिंसापूर्ण मृत्यु एवं लम्पटता तक घसीट ले जाती है। इस यौन भावना को या तो एक सफल एवं सन्तोषजनक विवाह करके पूर्ण कर लेना चाहिए या फिर मानवता की सेवा के साथ इसका ताल-मेल बैठानेवाली शुद्ध आध्यात्मिक मित्रता के द्वारा इसपर नियन्त्रण करना चाहिए । स्थायी उद्विग्नता, व्यंग्य-प्रहार, छिद्रान्वेषण एवं कटुता के लक्षणों से बचते हुए व्यक्तित्व को विकसित करने के यही सर्वोत्तम उपाय हैं। बहुत-से झूठे मनोरोग-चिकित्सक यौन भावना का उपशमन करने की आवश्यकता के बारे में ऐसी-ऐसी बेहूदा बातें लिख रहे है कि आज का पाठक यह विश्वास करने लगा है कि इन्द्रिय-निग्रह असम्भव ही नहीं, हानिकर भी है । आज यौन चर्चा बहुत ही आम और व्यापक हो गई है। अजीब बात है कि आज का उपन्यासकार अपनी पुस्तक के ११२ 1 .

. प्रत्येक अन्याय में योन या काम की पुट देता है, क्योंकि प्रकाशक इसे लाखों पाठकों की मांग कहकर उसे वैया करने का आग्रह करते हैं। हमारी पुस्तकों और फिल्मों में जितना अधिक यौन भावना का समावेश रहता है उतना ही हमारी नई पीढ़ी नेवस में पयत्रप्ट होती है। युवक पाठक अथवा दर्गक के मन में यह विश्वास घर कर गया है कि यौन अभिव्यक्ति नितान्त आवश्यक है। अपने उपन्यासों से अश्लील एवं अमंगत विश्लेषण करनवाले नीम हकीम और अनाड़ी लेखकों के मुले दर्शन में आज का पाठक बुरी तरह से डूत्र गया है। अब उसे वास्तविक मनोरोग चिकित्सक के इस कयन पर विश्वास करने पर कठिनाई होती है कि "मेक्स की अभिव्यक्ति नितान्त जरुरी नहीं है, इन्द्रिय-निग्रह व्यक्ति के शारीरिक या मान- मिक स्वास्थ्य पर विनागकारी तरीके से दुष्प्रभाव नहीं डाल सकता, और इस प्रकारका प्रभाव जहां हम देवते हैं उसका कारण यह है कि उन व्यक्ति के मन में यौन भावना व्यापक स्तर पर रहती है।" क्या बौन अयवा काम भावना से आप परेशान है ?-यदि आप सामान्य व्यक्ति हैं तो आप अवश्यमेव यौन समस्याओं से ग्रस्त होने । यद्यपि आदिकाल से आदमी के सामने यौन अथवा सेक्स की समन्या एक प्रमुख समस्या रही है तो भी यह आवश्यक नहीं कि यह आपको भी परेशान करें। इस प्रसंग में, एक प्रसिद्ध डाक्टर का कहना है : "वहुत-से लोग सेक्स से परेशान क्या हैं ?—इसके प्रमुग्न कारणों में से एक कारण यह भी है कि वे अपने को इससे परेशान होने देते हैं। यह ठीक है कि यौनेच्छा एक नैसगिक भावना है और यौन ग्रन्थियां अपनी उद्विग्न अभिव्यक्ति के लिए प्रयत्नशील रहती हैं तथा मस्तिष्क को प्रभावित करती है, किन्तु ज्यादातर योन मावेश एवं काम-आवेग मस्तिष्क में ही उदित होते हैं और तत्पश्चात् शरीर को आलोडित करते हैं।" आगे वे एक और चेतावनी भी देते हैं जिसे हमने सुना तो अक्सर होगा, पर जिसपर ध्यान बहुत कम दिया है : “यदि आप अश्लील अथवा कुत्सित भावना वाली पुस्तकें और कहानियां पढ़ते हैं। यदि आप अश्लील व कामोत्तेजक मजाक सुनते मार करते है। यदि आप अधिकतर सिनेमा, नाटक अथवा नाच के ११३ 262 कार्यक्रमों को देखते हैं जो कामुकता पैदा करते हैं तो ये सब निःसंदेह आपकी पाशव वृत्ति को उत्तेजित एवं विचलित कर देंगे।" यह तो ठीक है कि यौनेच्छा या काम-भावना जन्मजात है, पर यह स्मरणीय है कि प्रकृति हमें स्वस्थ बनाए रखने के लिए इनमें प्रवृत्त होने को वाध्य नहीं करती। दरअसल आंकड़ों से हमें पता लगता है कि अधिक यौन आसक्ति अत्यन्त हानिकर है, जबकि दृष्ट संयम से लोग शान्त और प्रसन्नचित्त हो जाते हैं। बगत किले अपनी यौनेच्छा को उदात्त बना लें। यह वात प्रचलित धारणा से विपरीत भले ही दीवती है पर मनोरोग-चिकित्सा ने इसे गत्य सिद्ध कर दिया है। प्यार और प्रशंसा के वाद साधारणतया लोगों को अधिकार सहानुभूति पाने की लालसा होती है । शीला कॉसिन्स नामक एक नगरवधू ने अपनी आत्मकथा में निस्सकोच होकर वर्णन किया हेकि किस प्रकार परिस्थितियों ने उसे एक वेश्या बनने पर बाध्य किया। किस प्रयोजन के लिए लोग वेश्यागामी होने को आकर्षित होते हैं- इसका विश्लेपण करते हुए वह एक रोमांचक कारण प्रस्तुत करती है : "मेरे फ्लैट में आनेवाले वहुत-से लोग ऐसे थे जो अपनी यौनेच्छा शान्त करने के लिए नहीं, बल्कि सहानुभूति प्राप्त करने के लिए आते थे। मैं उन्हें सहानुभूति और आदर दिया करती थी। मैं इतनी कठोर न थी कि उनकी इस कमजोरी अथवा उनकी इस विवशता पर कि उनके पास मुझ तक आने के सिवाय और कोई चारा न श्रा, उनसे घृणा करती।" कहा जाता है कि हॉलीवुड में पहले विवाह की प्रतिज्ञा यों थी-'प्यार करना, आंख का तारा समझना और आज्ञा में रहना।' अब इसे बदलकर इस प्रकार कर दिया गया है-'प्यार करना, आंख का तारा समझना और सराहना करना ।' यदि इसे सारे संसार में अपना लिया जाए, तो बहुत कम विवाह असफल हों। बहुत-सी पत्नियां यह धारणा बनाकर कि पुरुष तो मात्र कामतृप्ति चाहते हैं, अपने पतियों की प्रशंसा अथवा सराहना प्राप्त करने की इच्छा को सन्तुष्ट करने में उपेक्षा कर जाती हैं। यह दृष्टिकोण अस्वस्थ है। ११४ तीसवां दिन 54010- सर्वश्रेष्ठ बनिए "जीवन को आप जैसा वनाएंगे, वह वैसा ही बन जाएगा।" यह कोई साधारण उक्ति नहीं है। यह सफलता, सुख और स्वर्ग की कुंजी है। डगलस मैलाच नामक कवि ने निम्नलिखित इन काव्य-पंक्तियों में एक युक्ति प्रस्तुत की है : "यदि आप राजमार्ग नहीं बन सकते, तव पगंडडी ही बन जाइए; यदि आप सूर्य नहीं बन सकते तो सितारा ही वनिए; सफलता और असफलता आकार पर आश्रित नहीं होती- आप जो कुछ भी हों-इसमें कोई बात नहीं, पर हां, आप उसमें सर्वश्रेष्ठ वनिए।" ऑकस्ट्रा में, प्रत्येक संगीतकार का उतना ही महत्त्व होता है जितना कि उनके अगुआ का। दूसरे नम्बर पर वायलिन पर धुन निकालने वाले व्यक्ति पहले नम्बर वालों से किसी भी कदर घटिया नहीं होते। संगीत के करतब की सफलता के लिए यह परमावश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति का योगदान सर्वोत्तम रहे। यही वात कार्यालय पर लागू होती है। यदि आप मात्र एक टाइपिस्ट है तो आज ही मंकल्प कर लीजिए कि अपने सारे संस्थान में सर्वश्रेष्ठ टाइपिस्ट बनेगे। कोई भी काम क्यों न हो-चाहे वह खाने-पकाने का हो, चाहे वह नकली फूल बनाने का हो, अथवा वेशभूपा के डिज़ाइन तैयार करने का हो-आप सर्वश्रेष्ठ वनने का प्रयास कीजिए । आप अध्यापक, स्टेनोग्राफर या टेलीफोन-ऑपरेटर हों, अथवा रेडियो ११५ मिस्त्री, पैकर या वायुयानचालक-निश्चय कर लीजिए कि बाप अपने काम में पूरी शक्ति लगा देगे और अपनी चेष्टा में कोई कोर- कसर नहीं छोड़ेगे। पारिश्रमिक, प्रशंसा अथवा आशंसा के आधार पर अपने उद्यम का मूल्यांकन मत कीजिए-बस, अग्रसर रहिए, और समुचित रूप से किए गए कार्य से प्राप्त होनेवाले आनन्द का उपभोग कीजिए। अपने-आपसे उच्च स्तर के काम की अपेक्षा कीजिए और उस स्तर को बनाए रखिए । शिथिल न पड़िए। यह बात मन में अच्छी तरह बैठा लीजिए कि अपनी उन्नति अथवा प्रतिष्ठा पर सन्तोप करके बैठ जाने से पहले की ख्याति जाती रहती है । अतः प्रत्येक विजय को नये साहसिक कृत्य की आधारभूमि बनाइए। जब आपको ऐसा लगने लगे कि आपकी शक्ति चुक गई है, आपके प्राकृतिक स्रोत सूखने लगे हैं और अन्तिम सीमा तक आप अपनी प्रतिभा का प्रयोग कर चुके हैं,तो महान अमरीकी दार्शनिक इमर्सन के इस अमूल्य उपदेश को स्मरण कर लीजिए : "प्रत्येक व्यक्ति में निहित शक्ति निजी प्रकृति में नवीन है, और उस व्यक्ति के अतिरिक्त और कोई नहीं जानता कि वह क्या कर सकता है; और वह व्यक्ति भी तब तक नहीं जानता जब तक कि उसने प्रयत्न करके देख न लिया हो।" इसलिए पाठकवृन्द, याद रखिए कि एक नवीन और विस्तृत संमार आपके सामने खुला पड़ा है; और विजित होने की प्रतीक्षा कर रहा है । परमात्मा ने आपमे जो प्रतिभा छिपा रखी है उसके परीक्षण के लिए आपको केवल कल्पनाशक्ति का प्रयोग करना होगा। केवल एक ही विधि सर्वोत्तम है छतरी लेकर चलने के, नाक साफ करने के अथवा कार चलाने के वीसियों ढंग हो सकते हैं। उनमें से कुछ ठीक होंगे और कुछ गलत ! किन्तु सर्वोत्तम विधि एक ही होगी। अतः आपको जो कुछ भी करना हो, उसको उसी एक विधि से करने का यत्न कीजिए। ११६

No text on this page.

Tees Din Men Saphalata

Author
Pereira A.p.
Title
Tees Din Men Saphalata
File name
Tees Din Men Saphalata
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2011/03
Publisher
Delhi, Hind Pocket Books Pvt,ltd,
Language
Sanskrit
Pages
102
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
550716
Barcode
4990010031529.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
x0C1OjGpdUJ
Download PDF

Tees Din Men Saphalata