Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Laghukoimudi Vyakaran
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भो३म् ॥ लघुकौमुदी व्याकरम् ॥ नत्वा सरस्वती देवी शुद्धां गुण्यां करीम्यहम् । पाणिनीयप्रवेशाय लघुसिद्धान्तकौमुदीम् ॥ १ ॥ प्रथम इस ग्रन्थ के बनानेवाले वरदराज भट्ट जी ग्रन्थ प्रतिपाद्य श्री वाग्देवी की प्रार्थना करते हैं, कि मैं स्वच्छ वर्ण और शुभ गुणों से युक्त (बुधिस्थ अज्ञान को नाश करने वाली) जो सरस्वती देवी हैं, तिसे नमस्कार कर बालकों को पाणिनीय व्याकरण में प्रवेश के लिये लघुसिद्धान्तकौमुदी नामक ग्रन्थ बनाताई ॥ + ॥ महेश्वर सूत्राणि ॥ १ अउण । लुक् । एओङ । ऐऔच् । हयवरट् । लण् अमङणनम् । भभन् । घढधष। जबगडदश् । खफछठथचटतम् । कपम् । शषसर् । हल् ॥ इति माहेश्वराणी सूत्राणि अणादिसंज्ञार्थानि ॥ ये महेश्वर के १४ सूत्र अण् श्रादि ४२ प्रत्याहारों के बनाने के लिये काम पाते हैं। जिस से पाणिनिजी ने अष्टाध्यायी बनाया और जो उस में कुछ पल्प था, उसे कात्यायन ने वार्तिक बनाकर पूराकिया, और इन्ही दोनों के विचार के लिये पतन्जली भगवान ने महाभाष्य बनाया। यहां प्रत्याहार शब्द का यौगिक अर्थ नहीं लिया जाता यह परिभा- षिक शब्द है, प्रत्याहार उसे कहते हैं, जो सन्ना उस (५) सूत्र से बनाई जाती है ॥ 2. २ एषामन्ल्या इत: हकारादिष्वकार उच्चारणार्थः लणमध्ये त्वितसजक॥ इन १४ सूत्रों के अन्त्य अक्षर इत् है । जैसे घेउण् सूत्र में णकार इत् । ऋलुक् में ककार इत्यादि । इत् यह पाणिनी जीका पारिभाषिक शब्द है, इसी तौर अनेक शब्द इस ग्रन्थ में पावेंगे जैसा टि, चू, नदी, भू, इत्यादि इनके यौगिक अर्थ नही लिये जाते और फल भी पृथक २ होते हैं, जहा इन्हें लिखेंगे, वही उन के फल भी लिरखेंगे। पूर्वोक्त १४ सूत्रों के दो भाग हैं, एक अच्, और दूसरा हत् । अइ उण् से लेकर ऐ औच तक अचं और इयवरट् से हल तक हल है। जो इल वर्णो मे स्वर लगाये गये हैं, जैसी ह, य, व کار دهمین کار را به ترتر یه که م اشه . । .
! प्रामकरसम्। पौर र सत्यादिलों में पचार या पोरस नो मिचोर माने रिये परिंग पहारमोबिन्तु परोसगाने कातारपम्प या किना- हाये पावि बिना परमी का हरचारीमतीसमार पीर की महामाण्य कारने विणारे बिन रे सपारप में दूसरे पर्यों की सहायता की पण नरोसने पर करते स्वर्य राजन्त तिस्पर" ध्यान हमको कहते निगर सवारष पिना स्वर हे नही बसवता । "पन्चगभवतिम्मन्ननम् ॥ ३ चन्स्यम् । १।३।३ । उपदेशेऽयं सित् स्यात्। उपदे पायोचारणम् । सूष्वाष्टं पदं सूपान्तराद वतनीय समच ॥ उपदेष में वो पन्त्य र पाकिया पापिनी फास्यायन पोर परिपा को प्रथम उपचारप उसे उपदेम बहते रे । पाविनोमी ने बोभूषमनाये नेन को ऐसे सम से सिपा। विपरिता भून पगले पो महायता मेर। महात विपने की पावरसता मावि स पन्ध के पदने पाये जाप सूत्रों को पयों को दम सन्देश में न पर मेला समस्यम् मूष इस बी पत्ति में उपदेश फर दिया पातो, सूत्र में ही नही त्ति में से पापा पा पिसे भूध मे पाया और रस सेमागे भनुत्ति पाते। इसी मान्ति सम तूपी में नाममा । सब में बो भवारा हमारर विनहीं किन्तु उसनी मचा धोती। और इस वापर पामे सिगे' ४ पदर्षन दीपः । ११ ११५। प्रसवस्याऽदयन पोपस स्थात्। तस्म शोप १।। ८। तस्येतो वाम स्यात्। पादयो उपायौ । पो वस्तुसनराने को चोप पाते हैं। विस मी नुसंधापोती तिसका बीय जीव । वीपर वृक्ष सत्यादि शिव पूर्ण को पास्य में रमत्यादिपत्रे सो पर, परस्यादि प्रत्याहारी किये है। अब मरवाहार बनाने का मम पिपते । ५ पादिरगत्वेन सोता । १।१।०१। भगत्येनता सहित पादिमध्यगामा स्वस्य च सघा स्मात् । यथाऽपिति पर वर्णानां संभा, एपमा पणिस्वादय ॥ प्रत्येष प्रत्याहार पनय मन परे मरित पादि पर्चा पेमभ्यम्बका कामोष जीता। सा पम् (१) पूष से एपी रसचा होतीरे पिर (0 पनय र एम साब पादिर उस मम्मस्व परपोत पपनाने से परहवा गोरमवा रवा सीप होमाता (0) सो रीति पर पास्याधि प्रवाशारोंसो मारना ये पाहार- ६ ३ साधुकीमुचाम् । भण् १, अण्२, भक् ३, पच्४, पट् , प्रमद, अश्य, पत् ८, रक्ट, १०, ११, एक १२, एच् १३, एङ् १४, ऐच् १५, स्वय् १६) खर् १७, डम् १८, घर् १८, घय् २०, बब् २१, जश् २२, मल् २३, भष् २४, भर २५. भय् २६, अम् २७, मय २८, भष् २८, यण् ३०, थय् ३१, यञ् ३२, यम् ३३, यर् ३४, रत् ३५, धर् २०, यक्ष ३०, वथ् ५८ बश् २८, वल ४०, इस् ४१, इश् ४२ ॥ उ ३ कालोऽभास्वदीर्घप्लुतः। १ । २ । २७ । उश्च ऊश्च उ ३ श्च व. वां काल इव कालो यस्य सोऽच् क्रमाङ स्वदीर्घप्लुत- सन्ना स्यात् । स प्रत्येकमुदात्तादिभेदेन विधा ।। अनुष्ठ के मूल की नाडी की गति जितने काल में एकबार होती है, उतने काल में इस्व, उस से दुने काल में दीर्घ, और उस से तिगुन काल में प्लुत् का उच्चारण करना चाहिये । उदात्त, अनुदात्त और स्वरित भेद से प्रत्येक स्वर तीन प्रकार के हैं। ७ उचैरुदात्तः । १। २ । २६ ॥ सास्वादि स्थान के ऊपर के भाग में जो अच निष्पन्न होता है, उसे उदाप्त पाहते हैं। ८ नोचैरनुदात्त: । १ । २।३० ॥ साल्वादि स्थान के अधोभाग में जो अच् निष्पन्न होता है उसे अनुदात्त कहते हैं। ६ समाहार म्वरित । १ । २ । ३१ । स नवविधोऽपि प्रत्ये- कमनुनासिकाऽननुनासिकत्वाभ्यां विधा ॥ उदात्तत्व और अनुदात्तत्व ये दोनों वर्ण धर्म जिस में मिले हो उसे स्वरित पाहते हैं। उदात्त, अनुदात्त और स्वरितये स्वर के गुण हैं, और इन का काम केवल वेद में पता है। अनुनासिक और अननुनासिक भेद से स्वरों की संख्या द्विगुण होती है । १० मुखमासिकावचनोऽनुनासिकः । १।१।८। मुखसहि- तनासिकयोच्चार्यमाणों वर्णोऽनुनासिकसंजः स्यात् । तदित्यम् पदू उ ऋ एषां वर्णानां प्रत्येकमष्टादश भेदाः लवर्णस्य द्वादश तस्य दीर्घाऽभावात् । एचामपि हादश तेषां इस्वाऽभावात् ॥ मुख सहित नासिका से निस वर्ण का उच्चारणा होता है, उसे अनुनासिक पौर जिस का नही होता उसे निरनुनासिक कहते हैं। पूर्वोक्त अच् अर्थात् अ, इ, उ, ऋ.ये १८ प्रकार के हैं। जैसे एक अ, के उदात्त, अनुदान, स्वरित ये तीन भेद हैं। जब इन प्रत्येक के इस्व, दीर्घ और प्लुत भेदी से नव भेद हुए, तब नव पनुनासिक पोर सपना - - मंत्रामसरपम्। पौर स्यारिणी में पवार यात नोचारर सिये पौराति लिये अपिम पहा महोबिन्तु स्वरसगाने कानास्पय्य याहिहन का सरकार होये मोंकि बिना सरोपा हरचाररीमतीमधार पर यही स महामान्य पारने विपारे बिन चार में दूसरे परों की सहायता की चपे मोनेस्वर कातेरे "स्वयं रामम्त तिस्वराजन हनको बाते यिन पारप पिना स्वर ने नहीं समता । “पन्यामपति व्यन्जनम" । नत्यम् । १।३।३ । उपदेशेऽन्त्य हलित् स्यात्। उपदे पाणचारणम् । सचेष्ववष्ट पदं सूचाम्तगदनुषतमीयं सवच ।। उपदेश में वो पन्त्य पासनकोय । पापिनी वास्यायन पीर पर पसिनाको प्रगम उच्चारण उसे सपोग मारे। पापिनीमी ने गोमूममनाये रे ने उन को ऐसे सम से किया कि परिवा मन पगल की महामता परे । परिस विरमे वो पापरयता या वि स पन्ध पदने वाचारों से पर्यो बो देव सन्दी में म प सा रसास्यम् मूबरे इसकी पत्ति में उपदेश पद दिवारे पातं सूप में नहीं बत्ति में से पाया पापिले मन से पाया और इस पाने अनुमति पाते हैं। इसी मान्ति सब सूमो न मानना । समूब में बो पतारी का हापार सियेमी विन्त सवीर संघाती। धीर सप्ताफम पागे बिचेंगे ४ पदम लोपः।।14। प्रसवस्याऽदशन वापस स्यात्। तस्य बाप १।३।८। तस्येतो खोप स्वात्। पादयो उपायर्या । मो पस्तुरे उस कराने को लोप पाते हैं। निमको संचारोती तिसप सोपोप । वोपरचममायादि गिध सूर्णो पन्त्य में प्रत्यादिर में प पायादि प्रत्यारोपेसिया पब मायाहार बनाने काम लिखते ५ पादिरग्स्येन सहेता । १।१।०१। पन्त्येनेता सहित पादिमध्यगामा म्वस्य च समा स्यात् । ययाऽपिति पार पनि संभा, एपमा इम् पलित्यादय । प्रत्येक मत्याहार पास्य रामनवमीत पादिबों में मध्यस्य वर्ष बायोपोगा। मा भए (३) र म एपी रमा तोरे पिर () पत्य म. एस के साप पादि पर पडसले मायबर पखात् पप्पाने मे प१०पा पोष भवा एका मोप होगातारे।() मोरोति पप इस पररपरि प्रत्यारों को माना ।ये प्रत्याहार सधुकीमुपाम् । पण १, अप, पक् ३, पच्४, भट ५, पम्६, अश्व, मल् ६, रक्ट, प. ११॥ उका १२, एच् १३, एङ् १४, ऐच १५, स्वय् १६, रखर् १०, लम् १८, चर् १८, घय २.. छ २१, जम् २२, भल २३, भष् २४, भर २५, भय २६, भम् २०, मय् २८, भष् २९, यण् ३०, शय् ३१, यञ् ३२, यम् ३३, यर् ३४, रत ३५, भर २६, थल ३७ व १८ पश् ३८, वल् ४०, इस् ४१, हश् ४२ ।। ६ उ ३ कालोऽझस्वदीर्घप्लुतः। १ । २ । २७ । उश्च आश्च ७ ३ श्च व. वा काल व कालो यस्य सोऽच् क्रमार स्वदीर्घप्लुत- सन्ना स्यात् । स प्रत्येकमुदात्तादिभेदेन विधा । अङ्गुष्ठ के मूल की नाडी की गति जितने काल में एकबार होती है, उसने काल में इस्व, उस से दुने काल में दीर्घ, और उस से तिगुन काल में प्लुत् का उच्चारण करना चाहिये । उदात्त, अनुदात्त और स्वरित भेद से प्रत्येक स्वर तीन प्रकार के हैं। ७ उचैमदात्तः । १ १ २ । २६ ॥ साल्वादि स्थान के ऊपर के भाग में जो अच् निष्पन्न होता है, उसे उदात्त कहते हैं। ८ नौचैरनुदात्त: । १ । २।३० ॥ साल्वादि स्थान के अधोभाग मे जो अच् निष्पन्न होता है उसे अनुदान कहते हैं। ६ समाहार. स्वरितः । १ १ २ १ ३१ । स नवविधोऽपि प्रत्ये- कमनुनासिकाऽननुनासिकत्वाभ्यां विधा ॥ उदात्तत्व और अनुदात्तत्व ये दोनों वर्ण धर्म जिस में मिले हो उसे स्वरित काइते है। उदात्त, अनुदात्त और स्वरित ये स्वर के गुण हैं, और इन का काम केवल वेद में पता । अनुनासिक और अननुनासिक भेद से स्वरों को सख्या दिगुण होती है। १० मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः । १ । १।८। मुखसहि- सनासिकयोच्चार्यमाणों वर्णोऽनुनासिकसंजः स्यात् । तदित्यम् प इ उ ऋ एषां वर्णानां प्रत्येकमष्टादश भेदाः लवर्णस्य हादश तस्य दीर्घाऽभावात् । एचामपि द्वादश तेषां स्वाऽभावात् ॥ सहित नासिका से जिस वर्ण का उच्चारण होता है, उसे अनुनासिक और जिस का नहीं होता उसे निरनुनासिक कहते हैं। पूर्वोक्त अच् अर्थात् अ, इ, उ, कं, ये १८ प्रकार के हैं। जैसे एक अ, के उदात्त, अनुदात्त, स्वरित ये तीन भेद हैं। जब इन प्रत्येक के इख, दीर्घ पौर प्रस्तुत भेदों से नव भेद हुए, तब नव पनुनासिक पोर पना १ ।
. - - समापवरपम् । मासिक रस मेद से १८ भेद हुए । नृपर्ष १२ प्रकार कारे पो विरस को दी नसी ई नही प, पो ऐ, पो. ये भी १२ प्रचार के दिन पा इस्व नहीं होता। ११ तुझ्यास्यप्रयत्न सवर्णम् । १ । १ 121 तारखादिस्या माभ्यन्तरप्रयत्नरत्येतद्यं यस्य येम तुल्यं तन्मिय सवपस स्यात (पा.) मनुषर्पयोमिय सावरयं वाच्यम् ॥ मिन बाँचेतास्वादियान पर पाम्यता मान ये दोनों समान में की परस्पर सपए संभा होती है। बार्तिब कार को मत में पोर हरन होगी परीकी परस्पर सब संत्रा तो १२ अकुरुविसबनीयाना करठ । इधुवणाना ताणु । शटर पायां मा। तृतुष्वसाना दन्ता । उपूपध्मानीयानामोष्ठौ । अमर माना नासिका च । एदेतो वण्ठताछु । गोदीतो करठोष्ठम् । वका रस्य दम्तोष्ठम्। विशामसीयम्य विधामलम् । नासिकाउनुस्वारा पपापप गापौर विसगरम वर्षों का मठ स्पाम। एमय पोर सरन पर्षी कातामु स्थान । पौर पनप का भूर्ण स्थान है। ममता बनर और माल पर्चा वा स्थान।जप प म म पोर उपम्मानीय नवर्षों का पोष्ठस्थामा चममा पपने वर्गों में पधिन क मामिमा स्मान। पऐ बा बापट नानु स्पान रे। पोपी वा पपठ पोर पोष्ठ स्मान। पका दन्त पोर पाठ बान गि भूमी या स्पान बिहामा मूमरे। पनुस्वार मा रमान नापि ॥ १९ प्रयत्नो निधा। पाभ्यन्तरो पाचच । पायः पञ्चधा। स्पृष्टपदस्पृष्टपतिवितहतभेदातातच स्पृष्टप्रयत्न स्पर्गानाम्। परस्पृष्टमगत म्यानाम् । पिहितमप्मपाम् । पितं स्वराणम् । मरस्याऽरपस्य प्रयोगे संहतम् । प्रक्रियादगाया तु विहतमेष पोरयादगधा । विचार: मंपार पामो नादो पोयोऽधीपोऽल्प पाणी ममाण उदात्तो ऽमुदाता परितापेति । परो विधारा सामा पीपारप । गः संपारा मादा पीपाश्च । वर्गापा प्रथम । - . -- - . लघुके मुद्याम् । तृतीपञ्चमो यणश्चाल्यप्राण्याः । कादयी मावसानाः स्पर्शा ! यणाऽन्त स्था. शल उष्माणः अचः स्वराः। काख इति करखास्यां प्रागईविसर्गसदृशी जिह्वामलीयः जिह्वामलीयः ।प-फ इति पफाभ्यां प्रागविसर्गसदृश उपध्मानीयः । अं अः इत्यचः परावनुस्वारविसर्गौ ॥ प्रयत्न दो प्रकार के हैं। प्राभ्यन्तर और बाय। प्रथम प्राभ्यन्तर प्रयत्न पांच प्रकार का है। स्पृष्ट, ईषत्स्पृष्ट, ईपहिहत, विकृत और सहत । स्पर्श वणीका स्पृष्ट प्रयत्न है। अन्तस्थ वर्णो का ईपस्पृष्ट प्रयत्न है। उष्मा वर्णो का ईषतदित प्रयत्न है । स्वर वर्णो का विकृत प्रयत्न है । इस्व प्रकार के प्रयोग में राहत प्रयत्न होता है। परन्तु साधनिका दशा में वह विकृत कहाता है। बाय प्रयत्न ग्यारह प्रकार का है। जैसे विवार, सवार, श्वास, नाद, घोष, अधीष, अल्प-प्राण, महाप्राण उदात्त, अनुदात्त, और स्वरित । घर. प्रत्याहार में जितने अक्षर हैं (क, रख, च, छ, ट, ठ, त, थ, प, फ, श, ष और स) तिनका विवार स्वास और अघोष प्रयत्न है। हश् प्रत्याहार मे जितने अक्षर हैं। (ह, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड और द) तिनका सवार नाद और घोष प्रयत्न है। वगा के पहिले तीसरे और पाचवें वर्ण (क, ग, ड,च, न,ब, ट, ड, ण, त, द, न, प, ब और म और यण् (य, व, र, और ल) का अल्प-प्राण प्रयत्न है । वर्गों के जो दूसरे और चौथे अक्षर है अर्थात् (ख, घ, छ, झ, ठ, ढ, थ, ध, फ, भ) और शल् श, ष, स और ६ का महा प्राण प्रयत्न है। ककार से लेके मकार पर्यन्त जो अक्षर हैं, तिन्हे स्पर्श कहते हैं। (यण य, व, र, ल) को अन्तस्थ कहते हैं। शल् (श, प, स और ह ) को उष्म कहते हैं, अच् (अ, इ, उ, ऋ, लु, ए, ओ, ऐ, और ओ) को स्वर कहते हैं, । ककार वा खकार से पूर्व जो प्राधा विसर्ग के समान चिन्ह हैं, वह जिनामूलीय कहाता है। प्रकार वा फकार के पूर्व जो आधा विसर्ग के समान चिन्ह है, वह उपध्मानीय कहाता है। स्वर के ऊपर नो एक विन्दु • यह अनुस्वार और उस के आगे जो दो विन्द : है वह विसर्ग कहाता १४ अणुदित् सवर्णस्य चाप्रत्ययः । १।१ । ६६ प्रविधीय- मानो ऽणुदिच्च सवर्णस्य सज्ञा स्यात् । अत्रैवाण् परेगा कारेण । कु चु टु तु पु एते उदित' । तवदेस इत्यष्टादशानां जिस समुदायो- कारोकारौ। ऋकारस्विशतः । एवं लकारी. अन्त्य में संगोग (१५) अनुनासिकाननुनासिकभेदेन- यवला हिनिर्दिष्टोऽन्त्यस्यादेशः . . प्रयोईयोः संज्ञा ॥
संचारवरपम्।
मोबायं पठन्त से महागया होय वा अन्य पत् पो होम। स भि
धुदयू के यचारी का बोप पाया।
२५ (पा.) यण प्रतिषेधीवाच्य । सुपुयपास्य' । मवरि ।
धारुपालावति।
पत्यापन मुनि ने इस (२९) सूत्र पर यहा कि यदि मेयोनान्त पर
प्रमस्य पर या प्रत्याहार का पे तो सवा लोप न होय । स लिये पवार मागे
न भया । तब- सुपुत्र पस्य' मा+पति-मदम्परि' । पात+य भारत
1+पाहत-बाबति।
२६ एचोऽयवायाव 1416। एषः क्रमादय् पद् पार
पाव एते स्थरचि
पम् परे रो तो एप स्मान में श्रम मे पर पत् भार भाव पारेम चोय ।
२० यथासंएवममुदेश समानाम् । १।३।१०। समसम्बन्धी
विधिर्यमा संस्यं स्यात् । परये । विष्पपे। नायक । पावकः ।
'समसम्मम्मी को कार्य का यथा सस्या से होय वसा वैसा महा ए प्रत्याचार
मेंर पर ए, भो, ऐ पोर पोलणे पार पादेय पोन् पय् पत् पाय और पार
सो बम से री मा पो पर भो भो भए ऐ पो भार पोर पोको पारे+
प+रखें। शिमोxए-बियो ।+ar-मावस । पो+प-पापक।
२८ वाम्तो वि प्रत्यये ।।१। ७ । बारादी प्रत्यय
परे पोदोतोर पाव एगो स्त । गम्यम् नाष्यम् ।
पति ऐसा प्रत्य परे पि बिसमा परिक्षा पर पधारो तो पोबारको
चा और पोबार पो पाप पादेम चोय । उदा
। मो+यम्- मध्यम मो+यम मायाम्।
२६ पध्वपरिमाचेच । गम्यूति ॥
बब मो बस पाने मृति प्रष्ट मार्ग वे परिमात्र पर्व में मिट्टो तो ये
बोकार मे पापादेय होप । पेग गाx युति-मश्थति (ो बोय)
२ पदे गुप । १ । १ । २ । अत् एच गुपसनः स्वात्।
अस्व पसार एबार पोर पोचार नुवभ होय ।।
.२१ तपरस्त बासस्य । १५११० तारमो यस्मात् सच
तात् पररपोचार्यमाचा ममवालस्यैव संमा स्यात
। लघुकौमुद्याम् जिस स्वर से परे तकार हो, वा तकार से परे जो स्वर हो, सो उसी काल के सवर्ण का दोधक होय। ॥ ३२ ॥ आगुणः । ६ । १ । ८७ । अवर्णादचि परे पूर्वपरयो रेको गुणादेशः स्यात् । उपेन्द्रः । गगोदकम् ।। अवर्ष से अच् प्रत्यहार परे हो, तो पूर्व पर के स्थान में गुण एकादेश होय । उप--इन्द्रः = उपेन्द्रः । गोदकम् ।। ॥ ३३ ॥ उपदेशेऽजनुनासिक इत् । १।३ । २। उपदेशे ऽनुनासिको ऽजित्संजः स्यात् । प्रतिज्ञानुनासिक्याः पाणिनीयाः। लण् सत्रस्थावर्णन सहीच्चार्यमाणो रेफो रलयोः संज्ञा ॥ उदेश में अनुनासिक अच् इत्सनक होय । पाणिनी के छात्र उसे अनुनासिक जानें जिसे पाणिनी जी ने अनुनासिक माना है। लण् सूत्र में जो अनुनासिक इत्सजक प्रकार है, तिस के साथ रेफ मिलकर र और ल का बोधक भया अर्थात् र कहने से र, ल का बोध भया । ॥ ३४ ॥ उरण रपर, । १ । १ । ५१ । ऋ इति त्रिंशतः संन्जे त्युक्तं तत्स्थाने योऽण् सरपरः सन्नेव प्रवर्तते। कृष्णहिः। तवल्कारः। ऋ तीस का बोधक पहिले कहा गया है, उस के स्थान में जो अण् आदेश सो रपर होय अर्थात् ऋ को र और लू को ल होय । जैसा कृष्ण + ऋद्धिः । यहा (३२) से गुण पाया तब इस सूत्र से प्रकार और ऋकार मिलकर अर् गुण भया कृष्णर्दिः । ऐसे ही तव+लकार. = तवलकार. ॥ ॥ ३५ ॥ लोप. शाकल्यस्य ।८।३ । १८ । अवर्णपूर्वयोः पदान्तयोर्यवयोर्वा लोपोऽशि परे ॥ प्रकार से परे जो पद के अन्त में यकार वा वकार तिसका लोपं विकल्प से होय यदि उस के आगे कोई अश् प्रत्याहार का वर्ण रहे। हरे+इ = (२६) हरय् + इह- हर इह वा हरयिह । विष्णो+इह(२६) विष्ण+इह विष्ण इछ ।। वो विष्णविह ।। ॥ ३६ ॥ पूर्वत्रासिद्धम् । ८ । २ । १ । सपादसम्ताध्यायौं प्रति त्रिपाद्यसिद्धा त्रिपाद्यामपि पत्र प्रति परं शास्त्रममिदम् । हर इह । हरयिह । विष्ण इह । विष्णविह ॥ सात अध्याय और एक पाद के शास्त्र की अपेक्षा अन्त्य अध्याय के तीन पाद के - । मंत्रामबरणम्। बोवार्य पाठपात हे पागया होय या पनय पत् को होम । पर मिने सुदर में यकारी का सोप पाया। २५ (वा.) यप प्रतिषेधीवाश्य । सुपुयपास्य' । मध्वरि । धाहधालासति । पात्यायन मुनि ने रस (२१) मूत्र पर या बासि यदि संयोगान्त पर परस्य वर्ष यम् प्रत्याहार या हवे तो उसका सोप न होय । इस दिये यक्षार मात्र न भया । तब- सुष पास्य मधु + परि-मम्परि । भात+म पाल स+पाति-पाति P २६ एषोऽवषायाव ।।१।८। एच अमादय् पद पाय पात् एते स्थरचि। पर परेसेतो पच् यो स्थान में कम से पय् पद पा पा पादेस होय ॥ २० यधासस्यममुदेव समानाम् । १।३११ । समसम्मम्मी विधिर्ममा संस्य स्यात् । हरये । विष्चये। गायक । पायक । 'सममम्बन्धी भो वाय मा यवा संपया से होम वैसा बसा यहाँ पर प्रत्यार में पर परे ए पो ऐ पोर पोरन को चार पादेय पर्मात् पर पप् पार पीर बार सो कम से रो पैसा पको भर पो को पम् पे को पार पोर पोको पारे परवे । विपीxप-विषो । मै+प-नाय । पो+पा-पापक. ८ बातो यि प्रत्यये ।।१। २ । यकारादी प्रत्यये परे पोदीतोर पा एयौ स्त । गव्यम् नाम्यम् । परि ऐपा प्रत्य परेमो दि मिसभा पहिला पदर यबारहोतो पोबारधी पत् पोर पोबार को पार पादेव जोव । उदा ।गो+यम् - गम्यम् मी+यम -नाबमा २९. पवपरिमाणे च । गम्यूति ॥ भर मी पम्प से पाने यूति पद माम के परिमाप पर्ष में मिले तो पोहारपा पादेयताबा गाx पूति-मयति (दो बोय) २ प्रदेश गुब।१।१२। पत् एप गुणसनः स्यात् । जप पार पबार पोर पोचार मुनमय होय ॥ । ११ तपरस्तावालस्य । १११10. तारपो यस्मात् स च तात् परापोभायमापः ममदासस्येव समा स्यात, - 1 ११ -- लघुकीमुद्याम् । ॥ ४१ ॥ (वा०) प्रादूहोढोढेयषैष्येषु । प्रौहः । प्रौढः । प्रोटिः । प्रेषः । प्रेष्य. ॥ प्र शब्द (४५) से जह, ऊट, ऊटि, एप वा एण्य शब्द परे रहे तो दोनों मिलकर वृद्धि होवे प्र+ऊह' - प्रोह' । प्र+ऊट' = प्रौढ. । प्र+अदिः -प्रौटि । ग्र+एष = प्रेषः । प्र+एण्यःज्य.॥ ॥ ४२ ॥ (वा.) क्रते च तृतीयासमासे । सुखेन टतः सुखातं । तृतीयेति किम् परमतः । यदि तृतीया मसास से प्रकार वा श्राकार से परे ऋत शब्द हो तो दोनों मिलकर वृद्धि होवे । मुख + ऋत' = सुरवात । तृतीया वाइने से परमर्त. यहा हि न हुई क्योंकि यहा कर्मधारय ममाम है। परम् + ऋत = (३२) परमर्त । ॥ ४३ ॥ (वा०) प्रवत्मतरकम्बलवसनार्ण दशानामृगणे । प्रार्णम् इत्यादि। प्र । वत्सर । कम्वल । वसन । ऋण । दशन। इन शब्दों के आगे ऋण शब्द रहे तो वृद्धि होय । प्र+ ऋ णम् = प्राणम् । वत्सनर + ऋणम् = वत्सतरार्णम् । इसी प्रकार औरों को भी जानना। ।। ४४ ॥ उपसर्गा क्रियायोगे । १।४ । ५६ । प्रादय. निया- योगे उपमर्गसंज्ञाः स्यु । नब प्र इत्यादिकों का योग क्रिया से हो तब वे उपसर्ग कहावें ।। ॥ ४५ ॥ प्र । परा । अम् । सम । अनु । अब । निस् । निर् । दुम् । दुर्। वि। आड्। नि। अधि । अपि । अति । मु। उत् । अभि । प्रति । परि | उप। एते प्रादयः ॥ ये वाईस प्रादि कहाते हैं । ॥ ४६ ॥ भूवादयो धातव । १ । ३ । १ । क्रियावाचिनो स्वादयो धातुसंज स्युः ॥ जो शब्द क्रिया को प्रतिपादन करवावे और भू आदि दश गणों में से किसी गण मे पढा हो सो धातु कहावे।। ॥ ४७ ॥ उपसर्गादृति धातौ । ६ । १ । ६१ अवर्णान्तादुप- सर्गाकारादी धातौ परे वृदिरेकादेशः स्यात् । प्राच्छति ॥ - 4 'पसम्धि। गाँस्न पसिा। इसी भाति तीनों पादों में भी पुष शास्त्र की अपेक्षा पर धारण पसिारे। से सोय' यावन्यस्य (२५) पियादि या सूत्र में उस से वो सोपा तो पर ऐसा सि मया । अब यहां प्रकार और प्रकार को मिसायर पाप सूच (५२) से एकार गुप माप्त भया परन्तु वा सपादसप्ताभ्यायी मा सूप पिादी से सब ने पार्व को नमी देख मचता इस लिये उस खूष की पुष्टी में यचार का पीनरी दुपा तो फिर गुपादेश पेसा इस गरम गुपादेग म मया ॥ ॥ ३० ॥ वसिरादेच् । १।१। भादग्ध पहिसः स्यात् ।। पाचार, ऐनार पोर पोकार का नाम दधिरे ॥ ३८॥ धिरेचि । ६।१।८८ पादेचि परे तिरेकादेश स्यात् । गुणाऽपवादः । वष्यकत्वम् । गतीघ । देवरषर्यम् । क्ष्मी स्थरठभम् । पपा पा से परे यदि एच (ए पो ऐ पा पो) सेतो दोनी मिसवर से या नियम निरपवाग बोवर गुरु वा पाषण योनि बिस विषय में या प्राप्त गोतासी विषय में गुरु सर्वदा प्राप्त रहता है। यदि इस विषय में गुम होये तो पपि की मां मफसता होगी। रण सिये या अपने विषय में गुरु को पाता है। "निरपवायो पिपिरपवाद" a+एकस्वम् -प्राजस्वम् । महा+पीच - मनीष देव+पवावयम् -मेरपर्यम् । सप+ पोस्वायम् -सामोत्थरबम् । ॥ ३८ ॥ एल्येषत्यठम् । ६।११८८ । पददेवाघोरेत्ये धल्योरुठि च परे वृदिरेकादेश स्यात् । उपेति उपेधते । प्रष्ठौर । पवाद्यो किम् । उपेत । मा भवाम् प्रेर्दिधत् । पवा पा से परे यदिए वा एप पात पे ऐसे कपको विनिमा वम पर्व ए गोपाषट् मम्द परे को तो दोनों मिवर यि । से । प+ एमते-पंधते । चट-पठ+ar-प्रष्ठोर यदि परमा पर पातु भादि वर्ष पहले ऐसा न करते तो मी भी परि बाती इस सिवे प्रबमपए हो ऐसा कहा तम उपेत बना उपेत' । +दिवत्-ऐरिषत् ।। ४• ॥ (पा ) पचाइष्म्यिामुपसंख्यामम् । पौरिसी सेना । पच मद से यदि वरिषी गाद परे रातो दोनों मिलकर विजोग या पातिकमा मत रे। परियो-पोरिची-सेना। उप+त- -- नघुकीमुद्याम् । ११ ॥ ४१ ॥ (वा०) प्रादूहोढोढेयषैव्येषु । प्रौहः । प्रौटः । प्रौढिः । प्रेष । प्रेष्यः ॥ प्र शब्द (४५) से ऊह, ऊढ, आदि, एष वा एप्य शब्द परे रहे तो दोनी मिलकर वृद्धि होवे प्र+ऊहः प्रौह. । प्र+ऊट = प्रौढ । प्र+जढिः पौढि । प्र+ एष -प्रेषः । प्र+एण्य = प्रेयः ॥ ।। ४२ ॥ (वा०) ऋते च तृतीयासमासे । सुखेन ऋतः मुखार्तः । तृतीयेति किम् परमर्तः । यदि तृतीया समास मे अकार वा आकार से परे ऋत मन्द हो तो दोनों मिलकर हदि होवे । मुख +टतः = सुरवातः । तृतीया वाइने से परमतः यहा वृद्धि न हुई क्योंकि यहा कर्मधारय ममाम है। परस+ऋत =(३२) परमर्त. । ॥ ४३ ॥ (वा०) प्रवत्मतरकम्बलवसनार्ण दशानामृणे | प्राणम् इत्यादि । प्र । वत्मर । कम्बल । वसन । ऋण । दशन । इन शब्दो के आगे ऋण शब्द रहे तो वृद्धि होय । प्र + ऋ णम् = प्रार्णम् । वत्सनर + ऋणम् = वत्सतरार्णम् । इसी प्रकार औरों को भी जानना। ॥ ४४ ॥ उपसर्गा क्रियायोगे । १ । ४ । ५६ । प्रादय. क्रिया- योगे उपसर्गसंज्ञा. स्युः । जब प्र इत्यादिकों का योग क्रिया से हो तब वे उपार्ग कहावें ।। ॥ ४५ ॥ प्र। परा । अम् । सम । अनु । अब । निस् । निर् । दुम् । दुर् । वि। आड । नि । अधि। अपि । अति । मु। उत् । अभि । प्रति। परि । उप। एते प्रादयः ॥ ये बाईस प्रादि कहाते हैं ।। ॥ ४६ ॥ सूवादयो धातवः । १ । ३। १ । क्रियावाचिनो स्वादयो धातुमंज स्यु ॥ जो शब्द क्रिया को प्रतिपादन करवावे और भू आदि दश गणो मे से किसी गण मे पढा हो सो धातु कहावे ।। ॥ ४० ॥ उपसर्गादृति धातौ । ६ । १ । ६१ । अवर्णान्तादुप- सर्गाकारादौ धातौ परे हदिरेकादेशः स्यात् । प्राच्छति ॥ । ~ - पच्सन्धिः । शिम उपमग पन्त में पधारो उम से परे एक ऐसा धातु रो कि बिस में पादि में सवार होवे तो पूर्व पर के स्थान में दिएकादेश होय सा! प्र+पति- प्राति॥ ॥ ४८ ॥ एरि पररूपम् ।।१।६४ | पादुपसर्गादेडादी धाती परे पररुपमेकादेग स्यात्। प्रेवते । उपोषति । पवर्षान्त उपसग १५ स परे मी एकापदिपा पोबारादि पातु रोनी पूर्व पर स्थान में पररूप एकादेशीय । R+एक्ते-प्रेमते । सप+पोषति-सपोपति। ॥ ४६ पचो ऽस्यादि टि।१।१।४। पर्चा मध्येयोऽगल्य स पादिर्यस्य तट्टि संघ स्यात। पक्षों में ही पस्य पच् भो बिसने पूर्व हो उस से सहित उसकी रि संचा रोष । ५. ॥ (पा ) शकन्भ्वादिषु परकम वाच्यम् । तपटे । गबन्धु । कर्कन्धु । मनीषा चाइलोषा। पावतिगयोऽयम्। मातरः। भवन्धुपादि गप पठित गदोपी मोटि उसे परम्प एकादेय होय । पम्म-साम्पु । वर्ष+पन्धु+वपन्। मनस् +r-मनीपा। we+in+ पानीपा । म सबके सदसपी देखने मेवाने जाते रहिये वनवादि मीधि किसी मुनि ने सगरमी पुगे मनमानीची से मात + भएक -मात ५१॥ पोमाछोरप।।१६५ । पोमि भाटि चात् पर- उपमेकादेश स्यात्। । गिवायोम्मम । शिवेति। पटिस भग्द से पर थीम् पा पार याद से भिसरे पूर्व में पतारो तो पर कप पकाडेम सोय । मिवाय + पोम् + गम-विषामोन्मम । गिप+पार +nि- भिव+पषि-शिरा ५२ प्रक' सवर्ष दीर्घ ।।१।१.१। पक सवर्षे चिपरे पूर्वपरयोर्दीध एकादेशः स्यात् । दैत्यारिः । यौथ । विरुदम' कोतवारः । पण प्रत्याचार से सपन प्रमत्वापार परे से तो पूर्व पर पो स्मान दी एबारेमकोय ।रत्य+परि-हेस्पारिश्री+म-बीय। विप्पुरम-विम्यू पमा बोत+पवार -पोतकार (११) - १३ लघुकौमुद्याम् । ॥ ५३ ॥ एडः पदान्तादति । ६ । १ । १०६ । पदान्तादेडीति परे पूर्वरूपमेकादेशः स्यात् । हरेऽव । विष्णोऽव ॥ यदि पदान्त १७ एकार वा प्रोकार मे परे हुस्व प्रकार रहे तो पूर्वरूप एकादेश होय । हरे+अव हारेव । विष्णोऽव । ऐसे स्थान में यह चिन्ह लिखा जाता है जिसका नाम मर्दाकार है॥ ॥ ५४ ॥ सर्वत्र विभाषा गोः । ६ । १ । १२२ । लोके वेदे चैङन्तम्य गोरति वा प्रकृतिभावः पदान्ते । गी अग्रम् । गोऽयम् । एङन्तस्य किम् । चित्रग्वग्रस् । पदान्ते किम् । गोः ॥ वैदिक वा अवैदिक प्रयोगों मे यदि पदान्त एडन्त (ए वा प्रो अन्त में निसके) गोशब्द से परे ह्रस्व प्रकार रहे तो विकल्प से प्रचतिभाव होय । जैसा का तैसा ही रहने को प्रकृतिभाव कहते हैं, गो अग्रम् वा गोऽग्रम् यदि एडन्त नही कहते तो। चित्रगु+ अग्रम् । यहा प्रतिभाव होता क्योंकि गो शब्द एडन्त नहीं है। चित्रगु+ भग्रम् = चित्रग्वग्रम् । पदान्त क्यो कहा । गो+अस् = गो. । यहा गो शब्द का भोकार पदान्त नही है इसलिये पूर्वरूप होता है ॥ ॥ ५५ ॥ अनेकाल शित् सर्वस्य । १ । १ । ५५ । इति प्राप्ते । जो अनेकाल् वा शित् प्रादेश है वह सपूर्ण स्थानी के स्थान में होवे ॥ ॥ ५६ ॥ ङिच्च । १ । ११ ५३। डिदनेकालप्यन्यस्यैव स्यात् । वह अनेकाल् आदेश अन्त्य अल्ही के स्थान में होवे जिसका उकार इत् है। ॥ ५७ ॥ अवड् स्फोटायनस्य । ६ । १ । १२३ । पदान्ते एक- न्तस्य गोरवड वाचि । गोऽयम् । पदान्ते किम् । गवि ।। अच् परे रहे ती पदान्त एडन्त गो शब्द को स्फोटायन प्राचार्य के मत में अपड्भादेश होवे। गोऽयम् वा गवाग्रम् । पदान्त क्यों कहा । गो+गवि । यहा गो शब्द का प्रोकार पदान्त १७ नहीं है, इस लिये यह सूत्र २८ लगा ॥ । ५८ ॥ इन्द्रे च । ६ । १ । १२४ । गोरवङ् स्यादिन्द्रे। गवेन्द्रः। गो शब्द को प्रवड प्रादेश होवे इन्द्र शब्द परे रहते । गो+इन्द्र' =गवेन्द्रः । || ५८ ॥ दूराते च । ८।२।८४ । दूरात् सम्बोधने वाक्यस्य टेः प्लुतो वा॥ जो दूर से पुकार ने में वाक्य है उसकी टि ४८ विकल्प से प्लुस र होवे ।।
-
प्रमाधि।
1६ ॥ प्नुतप्रगमा पषि मित्यम् । ६ । १ । १२५ । एतेऽपि
नित्यं प्रवत्या स्यु । पागच्छ वष्य , पप गौश्चरति ।
पनुन और प्रग मा बासेमा रोयदिप परे तो।।कन पत्र।
॥ ६१ ॥ईदेदविचनं प्रगमम् । १ । १ । ११ । ईदन्त
शिवपन प्रगत म्यात् । परी एतौ । विष्य यमौ । गई पम् ।।
सवा प बिनय पस्य में से पेमा सो विधन सो प्रमाण सेना कोय पचात्
असे का तसा से। हरी एतो। विभूमी । मरे प्रम् ॥
॥ भदमो मात् ।।११।१२॥ पस्मात् परावीहती
प्रगौस्त । पमी पंगा | रामक्तव्यापम् पामाते। मात् किम् ।
भमुवोऽध ।।
अरस् गाद मकार मै परे भो । वा मो प्रगृध मनका कोय ।
रामपावमू पासाते । मकार से परे क्यों पहा । अमुकेष (१) यदि मबार या पाप
जो न करते तो पुषसूत्र (६१) घे एशार को पनुराप्तिको लाती तो पमान संत्रा की जाती
मलिये मबार पाप पिया तो पमुर+पर यह प्रतिभाष म एपा ।
।। ६३ ॥ पादयोऽमत्वे । । । ४ । ५७ / पदव्याश्चादयी
M
निपाता स्थु ।
पत्यारिलो पम्प व्यो नापन नी सो निपात बा । द्रव्य उसे करते
विनका पामय सिम सत्या सापको।
॥६४ ॥ नादयः । १।४।५८। एतपित्तथा ।
प्र पादि ३५ भी पूर्गेख प्रकार से निपात पाहावें॥
॥५॥ निपात एकाबनार ।११।१४ । एकोऽननिपात
पारवन' प्रगधः । इन्द्र । ४ उमेध | पाक्मस्मरणयोरस्ति ।
पा पूर्व न मन्यसे । पा एवं किल तत् । अन्य रिस् यदुव्यम् ।
पोष्पम् ।
पारबो बोरकर जी निपात एकाच रे मो प्रगम पारद । रमेश
पाम पोर स्मरण पब से पन्या प्रकार जित होता पर्वात् ति मानो मोवार्य
पानावास से भी रोपे । मा एवं नुमत्यमे । ममा भर पाय पसा मानते रोपा
- । लघुकौमुद्याम् । किल तत् । हां वह ऐसा होता है। अन्यत्र आ निपात डित् है इसी कारण प्रगृह्य नहीं होता । पा+उष्णम् ३२= ओष्णम् अर्थात् थोडा गरम ॥ ॥ ६६ ॥ श्रोत् । १ । १ । १५ । श्रीदन्तो निपातः प्रगृह्य । अहो ईशाः॥ ओ है अन्त में जिसके ऐसा जो निपात सो प्रगृह्य ६०कहावे । अहोईथा:अहोईशाः ।। ॥ ६७॥ सम्बुद्धौ शाकल्यस्येतावनार्षे । १ । १ । १६ । सम्बु- दिनिमित्तक अोकारो वा प्रगृछोऽवैदिके दूतो परे। विष्णो इति । विष्णविति । विष्णा इति ॥ लौकिक इति शब्द परे रहे तो जो सम्बुधि निमित्त प्रोकार सो शाकल्य आचार्य के मत मे प्रगृह्य कहावे । विष्णो इति । अन्य के मत में विष्णविति (२६) भया । जब लोप. शाकल्यस्य ३५ से वकार का लोप मया तव । विष्ण इति ॥ ।। ६८ ॥ मय उजो वो वा । ८।३ । ३३ । मयः परस्योजो वो वाचि । किम्वुक्तम् ॥ मय प्रत्याहार से परे जो उन का उकार तिस को विकल्प से व आदेश होय यदि अच् परे रहे तो । किमु+उक्तम् = किम्युक्तम् । वा विसु उत्तम् (६५) । ॥६६॥ इकोऽसवर्ण शाकल्यस्य स्वश्च । ६ । १ । १२७ ! पदान्ता इकोइस्वो वा स्युरसवर्णेचि । इस्वविधिसामर्थान्न स्वर- सन्धिः । चक्रि अत्र । चक्रयत्र । पदान्ता इति किम् गौ ॥. जो पद के अन्त में वर्तमान इक् तिसको विकल्प से इस्व होय यदि असवर्ण अच् परे रहे उ.। चक्की+अत्र-चकि अब । यदि सन्धि १८ हो जाती तो इस्व करने का कुछ फल न होता इस लिये सन्धि नही होती । जब इस्व न हुआ तब १८ सूत्र से चक्रयन होता है । पदान्त दूक कहने से । गौर्यो । गौरी+ो यहा स्व नहीं होता (१८)। ॥ ७० ॥ अचो रहाभ्यां दे । ८ । ४ । ४६ । अचः पराभ्यां रेफहकाराभ्यां परस्त्य परोहे वा स्त. गोर्यो । अच् से परे जो रेफ पा हकार तिस से परे जो यर् तिसको विकल्प से हित्व होय । गौय्यौँ वा गोर्यो। ।। ७१ ॥ वा. न समासे वाप्यश्वः ।। समास में इस्व विधि ६८ नही लगती ।।
व्यम्जनसम्मि। ॥ ०२॥ परत्यक ।।१।१२८ । पति परे पदान्ता पर प्राग्वहा । ब्रह्म ऋषिः ब्रह्मर्पिः । पदान्ता किम । पाचईत् । पदान्त प विकल्प से प्रस्व होय यटिमबार परे सेना+रिपि समबपि पा समर्षि १२ पौरपदान्त पाने से । पावत् यहां पनपाम रति स्वरसम्॥ि ॥ अथ व्यजनसन्धि ॥ n०२ ॥ स्तो चुमा श्चु 1८1४ । ४. । सकारतवर्गयो शकारपवर्गाया योगे शकारचवा स्त । रामरते। रामरिचनोति । सन्धित । शाब्जियम बब गार वर्ग के साम सवार पा तवर्ग का योग हो र सबार वो अपार पौर तवर्ग पो बर्ग प्रादेस गोय। रामस्+चिनीति-रामरिचनोति । सत्+चित्- सञ्चित् विपत्+भातम्-पिपग्जातम् । usan यात्।८।४ । ४४ । गात् परस्यो म । विग्न । प्रश्नः। पवार मे परे भो तवर्ग इसको चपम पादेय नमो। विम् +7-विष्य। मम्+म-प्रमा ॥ 6 ॥ ष्टुना ष्टुः । ८ । ४ । ४१ । स्तो ष्टुना योगेष्टुः । रामष्षष्ठ । रामष्टीकते। पेष्टा । तडीका । पक्रिपठीवसे । पर पवार वर्गो साब सबार पा तवग प्ा योग होय तब सवार को पचार पोर सवर्ग चो मर्म पारेय चोय ! रामम् + पाठः-रामम्पस पे+ता-प्रेष्य । तत्+ टीवातहीका । नु+ा-पुष्ट । me ॥ न पदाम्ताहीरनाम् । ८18 | ४२ । पदाम्ताहवर्गात परम्यानामः स्तोः ष्टुन स्यात । पट सन्त । पटते। पदान्तात् दि रे । टो विम् । सर्पिष्टमम् ॥ माम् समये नबार को शेरवे पदान्त (१०) टवर्म से परे वो सब पौर तरन तिनको पचार पोर ठवर्ग पादेश नीव । प+सन्त पट्सम्स' पद्+त-परत ।।
D लघुकौमुद्याम् । पदान्त कहने से ईटे यहां टवर्गका निषेध न हुआ इट् + ते ईट्टे टवर्ग कहने सर्पिष्टमम् में पटुत्व हुआ सर्पिष् + तसम् -सर्पिष्टमम् ७५ । ७७ अनाम्नवतिनगरीणामिति वाच्यम् । परणाम् । षरण- वति षर गागर्यः॥ यिछिले निषेध सूत्र मे जो नाम शब्द ही को ष्टुत्व निषेध किया है, सो उचित नहीं है, किन्तु वहां नवति और नगरी इन शब्दों का भी प्रहण करना चाहिये पट् + नाम पयास् । षट् +नवतिः षमवति । पट् + नगर्यः = षस्यगर्यः ॥ 11 ७८ | तोः पि । ८ । ४१४३। न ष्टुत्वम् । सन्षष्टः ॥ पकार परे रहते तवर्ग को टवर्ग आदेश न होय । सन् + षष्टः = सन्पष्ठ । || ७६ ॥ माशां जशोऽन्ते।८ २ ३६ । पदान्ते भालां जश स्युः। वागीश ॥ पद (१७) के अन्त में जो झल् प्रत्याहार के वर्ण तिनके स्थान में जश् प्रादेश होय । वाक् + ईश = वागीशः चित् + रूपम् = चिद्रूपम् । १८० ॥ यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा । ८ । ४ । ४५ । यरः पदान्तस्याऽनुनासिक परेऽनुनासिको वा स्यात् एतन्मुरारिः। एतमुरारि यदि अनुनासिक परे रहे तो पदान्त (१७) यर् के स्थान मे अनुनासिक प्रादेश विकल्प से हो । एतद् +मुरारि = एतन्मुरारिः वा एतमुरारिः ॥ ८१ ॥ वा० प्रत्यये भाषायां नित्यम्। तन्मात्रम्। चिन्मयम् । प्रत्यय का अवयव अनुनासिक परे रहे तो पदात (१७) यर के स्थान मे नित्यही अनुनासिक आदेश होता है। तद् +मात्रम् =तन्मात्रम्। चिद् + मयम् =चिन्मयम् ॥ ॥ ८२ ॥ तोलि १८ । ४ । ६० । परसवर्णः । तल्लयः विहाँ- ल्लिखति । नस्यानुनासिको ल. लकार परे हो तो तवर्ग के स्थान में परसवर्ण अर्थात् लकार धादेश होय तद+लय = तल्लय' । विद्वान् + लिखति-विधालिखति यहाँ अनुनासिक न को अनु- नासिक ल आदेश मया ॥ ॥ ८३ ॥ उदः स्थास्तम्भो. पूर्वस्य । ८ । ४-६१ । उदः परयोः स्थास्तम्भो पूर्वसवर्ण ॥ ॥
१८ व्यन्जनमन्ति। । परस्य भरी हद उपमन से परे नो रबा पौर स्तम्म तिनवी पूर्वसवर्ष होय । । ८४ ॥ तस्मादित्युत्तरस्य । १।१।६० पञ्चमौनियन नियमाण कार्य वर्णान्तरेषाऽव्यवस्तिस्य परम्य ज्ञेयम् । पाचा कारक ही विमपिम्त में बिसय ऐसा बो पर तिस निर्देग से बो कार्य विधान हो सो उसी पोगे वो उससे परे से पोर पा किसी दूसरे वर्ष से या तिमय। ॥८५ ॥ पादे परस्य । १।१।५४ । परस्य यक्षिरित तत् तस्यादेवोध्यम् । इति सस्य व ॥ बाबार्य उसके प्रथम वर्षको होय वो पर को किया जाता है। उद+स्मानमें पा स्मानम् को सबार को पूष साप से पवार मवा ताकि मक्षार के विवार, स्वास पोप पीर महापार (१३) प्रयत्न तो शिवार पास पयोष महामार प्रयत्मवान् सवार का सप वारपोरेस बार बार पादेय मया तमगदम्मामम् ऐमा मया । ।८६ ॥ मरी भरि सवर्षे।८।४।५।ल वा लोपः सवर्षे झरि॥ पर से परे जो भर तिसका सीप विकारप से ओम वर सवीं भर परे रहेतो। सव+बानम्-उदबानम्। ॥८० ॥ सरि । ८ । ४ ५५ । परि मा पर इत्युदी दस्य त छत्यामम् । उत्तम्भनम् । बर् परे हो तो मर वे स्थान में पर पारेय पोय द +बानम- उज्यानम्॥ ॥ भयो ऽस्यतरस्याम् । ८४ 14२ । भाय परस्य स्य वा पूर्वसवर्थः । नादम्म घोषस्य संवारस्य महाप्रातस्य स्व तादयी वर्गचतर्य वागरिः । वागारि । मय प्रत्याहार से परे मोबार तिसबी पूर्व सपर विचस्प से होपमा परि यहा पूर्वसपर्व से बार बो पवार मवा क्योंकि पार से संवार, नार, चीप और मार प्राय (१३) प्रयत्न तो संवार नाद चोप महापाच प्रयत्नवान् पवार बोमबारच पादेय मया। बा+परि -(क)जाग्वरि । ।
१८ नघुफौमुद्याम् । ॥ ८८ ॥ च्छोऽटि । ८।४१६३ । भयः परस्य शस्य छो याs टि । तद् शिव इत्यत्र दम्य चुत्वेन जकारे हाते खरि चेति नका- रस्य चकारः । तच्छिवः । तशिवः ॥ पदान्त (१७) भय प्रत्याहार से परे जो कार सिसको छकार प्रादेश छोय विकल्प मे अट् प्रत्याहार परे रहते। तद+गिव' - तद+धि - (७३) तज् + दिय (८०) तच्छिय वा (७३) तज् + शिव. =() सक्रिय, ॥ ५६० ॥ वा० छल्वममीति वाच्यम् । तच्छलोकेन । वार्तिककार के सत में प्रम् प्रत्याहार अम् प्रत्याहार परे रहते भी पदान्त (१०) झय से परे प्रकार के स्थान मे छकाग देग होता है। तद्-अलोकेन तद् । छम्नीकेन (७३) तज + छलोकेम-(८१) तच्छन्नीकेन ।। ।। ६१ ॥ मोऽनुस्वारः । ८३ । २३ । मान्तस्य पदस्याऽनुस्वा- रो इलि । हरि वन्दे ॥ हल परे रहते मकारांत पद (१०) के मकार को अनुस्वार आदेश हो । हरिम् + वन्दे - हरिवन्दे ।। ॥ १२ ॥ नश्चापदान्तग्य भनि ।८।३१२४ानस्य मस्य चा. पदान्तस्य भल्यनुस्वारः । यशांमि । आक्रस्यते ॥ झन् परे रहते अपदान्त नकार और मवार को अनुस्वार आदेश होय ।। ॥ ६३ ॥ अनुस्वारस्य ययि परमवर्ण ।८।४।५८। शान्तः । यय परे रहते अनुस्वार को परसवर्ग होय शाम् + त = शान्त ।। ॥ ६४ ॥ वा पदान्तस्य । ८।४।५६ । त्वङ्करोपि।त्वकरीषि ।। यय् परे रहते पदान्त (१७) धनुस्वार को विकल्प से परसवर्ण होय । स्व + करोषित्वारोषि वा त्व करोषि॥ ॥ ६५ ॥ मोराजिममः क्वौ । ८ । ३ । २५ । क्विवन्ते राजतो परे समो मस्य म एव स्यात् । मनाट् ॥ क्विवन्त धातु परे रहे तो सम् गन्द के को भकार ही भादेश होय सम् +राट्सम्घाट" । ६६ ॥ हे मपरे वा । ८।३ | २६ । मपरे हकारे परे मन्ध मी वा । कि वलयति । कि ह्यलयति । मकार }
ध्यम्जनसन्धि
निस मकार से परे कारो पेसाबार परे हे तो विकम्प सेम की मबारसी
पीय किम् +प्रसयति-पिम्सयति वा ५ बिअचयति ।।
॥ ८ ॥ पा• यवलपसे यषखा पा । किम् च । किं ।
कि यति । विप्रलयति । कि भादयति। कि सपादयति ।
विमरचार से परे यकार पवार प्रवाहबार हो पैमासबार परे तो मको
सम से य प न पादेश रोम । किम् +म फिय*मवा (८१) बिना किम् +
पचयति-हि बयति वा विजयति विम् + हादयति-फिर शादयति वा
विज्ञादयति।
॥ ६८॥ नपरे न 1८।३ । २७। मपरे प्रकारे मस्य नोवा ।
किन् गुते फि मुते॥
मवार मिस से परे हो ऐसा सवार परेराहते मवार को विकल्प से महार पादेय
होय । विम् +हते-विनते पा (८१) बिन्ते ।
॥ ८८ 3 सि घुट । ८।३ । २८।डात् परम्म सस्य धुवा।
उस स को पुट भागमीय बिस के पूर्व पार रो॥
॥ १ ॥ पापम्ती टकिती।१।१।४६। टिरिकती यस्यो
ली तस्य क्रमादायम्तो स्तः । षट् स्न्त । पटसन्त ॥
मिसबाट वाक स्मन सो बिमकी का सम प्रादि पोर पन्त में
पयामश्य मेरोय पर्वात् टिन पादि और वित् पन्त में होय । पट् + सात-पद
धुर सन्त रवा चोप होता है। और तब पट + सन्त-०८ पदा+मन्त'
८०पदस्मन्त ।
॥१.१॥ यो कुमार गरि । ८ । । २८ वास्त । प्रार
पष्टः प्रषष्ठः । सुगए पष्ठ । सुगपट्पष्ठ ॥
रचार पोर पवार यो क्रम स विषय पर नुव पौर म्ण पागम रोय यहि
गर परे सेतो।मार+पाठ-प्रार+व पर पा सीप भया १४ मारचण्ठ
मुमुपष्ठ-मुगुप स्पर।
॥ १.२ ॥ माप।८।३।। भाग्तात् परस्य सस्य धुवा।
सन् त्स । सन् स
सबार को रिस्प से धुर् पामम गेम। यदि उसके पूर्वमहारान्त पर से
२१ - लघुकौमुद्याम् । सन् +स' =सन् धुट् सः = उट् का लोप होता है, ३-४ और ३३ तब सन्ध् + स. = ७८ सन्दु+स.-८७ मन्त्स। ॥ १०३ ॥ शि तुक् । ८।३ । ३१ । पदान्तस्य नस्य शे परे तु- ग्वा । शञ्च्छरभुः । सञ्शम्भुः सञ्चशम्भुः । सञ्छम्भुः ॥ यदि शकार परे रहे तो पदान्त नकार को विकल्प से तुवा पागम होय । सन् + शम्भु = सन् तु शम्भु. उक् का स्लोप भया ३-४ और ३३ तब सन्त - शम्भु+८८ सन्त् + छम्भु = ७३ सञ्च् + छम्भः वा शब्च्छम्भुः जब छत्व ८८ नहीं भया तब सञ्च शम्भु. तुक नहीं भया तव सचम्भु ॥ । १०४ ॥ डमो इस्वादचि डसुनित्यम्।८।३।३२। स्वात् परो यो उम् तदन्तं यत् पदं तस्मात् परस्याची नित्यं ङमुट स्यात् । प्रत्यङ्ङात्मा । सुगरणीश. । सन्नच्युतः ॥ इस्व से परे जो ङकार प्रकार और नकार तदन्त जो पद तिस से परे जो अच् उस को क्रस से डुट, गुट और नुट् अागम होय। प्रत्यड् + श्रात्मा =३-४ और ३३ प्रत्यङ्डात्मा सुगग्ग् + ईश =सुगरणीश' सन्नच्युतः ।। ॥ १०५ ॥ सम, सुटि । ८।३ । ५ । समी रुः सुटि । सम शब्द के सकार को रु प्रादेश हो सुट के परता । सम् + स्कर्ता । ॥ १०६ ॥ अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा। ८।३।२।अत्र रुप्रक- रणे रो पूर्वस्यानुनातिको वा ॥ इस प्रकरण में र को पूर्व जो स्वर तिसको विकल्प से अनुनासिक होय । सरु+ स्कार्ता सरुस्कर्ता । ॥ १०७ ॥ अनुनासिकात् परोऽनुस्वारः।८।३। ४ । अनुनासिक विहाय रो पूर्वस्मात् परोऽनुस्वारागमः ॥ निस पक्ष में अनुनासिक होता है, उस से पूर्व जो स्वर उससे परे अनुस्वार का पागम होय । सरु+स्कर्ता सरस्कर्ता ॥ १०८ ॥ खरवसानयोर्विसर्जनीयः । ८।३।१५-१ खर्यवसाने च पदान्तस्य रस्य विसर्ग. ॥ स्वर् परे रहे वा अवसान तो पदान्त में विद्यमान जो रेफ तिसको विसर्ग होय । सरु+स्क्रर्ता = ३ और ४ सर + स्कर्ता-स.स्कर्ता इसी प्रकारसँ+ स्कर्ता=सस्कर्ता । ।
भ्यम्बममन्दिा १.८ (वा) सम्पुरमा सो वसाव्य ।संस्म्बर्ता संस्स्वतां । सम् माय पुम् पम्ट पोर कान् गट विसर्म को सबार प्रादेम पोष। +स्वार्ता सप्रस्वार्ता में +स्वार्ता-सस्कर्ता । ११ पुम सम्यम्परे । ८।३।। पम्परे स्वयि पुमो र पुस्फोकिण पुस्कोकिल ॥ विस भय से परे पम् हो ऐसा पम् परे ते पुम् गम्द मकार मो - भारत कोय । पुम् + वोषित -पुर+कोविस' '-११०॥४१रपोर १८ पुंस्वोषित पुस्मोदित १११ ॥ नरव्यप्रशान्।८।७पम्परे छविमान्तस्य पदस्थर ।। विस क स परे पम् को ऐमा ए परे गाते प्रमान् मम्द के नबार कोर पर पदाना १० मे वो नकार तिम पार पादेश होय । पशिम् + पायस्व ।। १०. पौर । पवि+पायस्व चर्ति +वायत्त । ११२ ॥ विमवनीयम्य स १८९३४ । खरि।चम्मिायस्थ चर्विस्त्रायस्व । पप्रधान् किम् । प्रगाम् तनोति ! पदस्येति किम - विसरे स्थान में मनार प्रादेगोय+यटिस मे परे पर रोती। पति चायस्प-परिचायस्व । पर्वि+पायस्व-परिचायव । अपमान कामे से मवान् तनोति यह र पारिवाये नये इसी प्रकार पट कामे मे पति में मी न एमा। २१३॥ नन पे । ८।३।१ । नमिल्यस्या पे । पकार परे सतेनन् मम्मो नमारको विषल्प से रपादेभोर गन्न-पाधि- र+पनि+पाधि-+पाहि। १ ११४६ कुप्योः- करपी च । ८।२ । ३० । मवर्गे पवर्गे विसर्गस्य क पी म्त । पारिसर्गः । न पाहि । पारि नं पाहि पाहि! वान परमर्म मा पर्न परे रोतब विपर्य के खान में सम से निजामूनीय पोर पम्मानीय पादेयरों पर पर में पितर्म भी प। न पाहि-मxपालमा मुंपादि। न+पाधि-पारिवा पारिबबरमही मया तब नुन्धारि। ॥ ११५ तस्य परमायेजितम् ।८।१२। पिकास्यपर मामेति स्यात्।
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सघुकौमुद्याम् ।
विरक्त शब्द (अर्थात् एक गध्द जो दोबार कहा गया हो) की दूसरी भाग का
पामेडित सजा होती है।
११६ ॥ कानामेडिते । ८।३ । १२ । कान्नकारस्य करामे-
डिते । कास्कान् कांस्कान् ॥
यदि पामेडित परे रहे तो कान् मम्द के नकार के स्थानमे र प्रादेश होय ।
कान्। कान् =कार--कान् = का:- कान् = कांस्कान् ।
॥ ११७ ॥ छेच । ६ । १ । ७३ । इस्वस्य छे तुक। शिवच्छाया ॥
इस्व को तुक पागम होय यदि उस से परे छकार रहे। शिव-1-छाया-शिवच्छाया ।
११८ ॥ पदान्ताहा । ६ । १ ।७६ । दीर्घात् पदान्ताच्छे तुगे
या। लक्ष्मीच्छाया॥
छकार परे रहते पदान्त दीर्घ को विकल्प से तुक् भागम होय । लक्ष्मी-न-छाया
लक्ष्मीच्छाया वा लक्ष्मी छाया।
॥ इति हलसन्धि ॥
११६ ॥ वा शरि । ८।३ । ३६ । शरि विसर्गम्य विसर्गो वा।
हरिःशेते। हरिश्शेते ॥
शर परे रहे तो विसर्ग को विकल्प से विसर्ग ही होय। हरिःशेते वा हरिश्शेते ११२, ७३
१२० • ॥ समजुषो रुः। ८।२।६६ । पदान्तस्य सस्य सनुषश्च
रु' स्यात्
पदके अन्त में रहने वाला सकार को और सजुष् शब्द के षकार को रु पादेश
होय । शिपम्-।-अर्च्यः = शिवरुअर्घ्य ।
॥ १२१ ॥ अतोरीरप्लुतादप्लुते । ६ । १ । ११३ । अप्लुतादतः
परस्य रो रु. स्यादप्लुतेऽचि ॥ शिवोऽर्यः ॥
अप्लुत प्रकार से परे जो रु तिस को उकार प्रादेश होय यदि अप्लुत प्रकार परे
रहे तो । शिवरा-अर्च्य. शिव-न-उ--अर्च्य ३२ शिवो-|-अर्च्य ५३ - शिवोऽर्य ।
१२२ ॥ हशि च । ६ । १ । ११४ । तथा । शिवी बन्दाः ॥
हर परे रहते अप्लुत प्रकार से परे जो रु तिसके स्थान में उपादेश होय ।
शिवरुन-बन्ध = शिव-|-उवन्ध ३१ ॥ शिवोवन्यः ॥ -
१२३ ॥ भोभगीअघोअपूर्वस्य योऽशि। ८।३।१७।एतत्पूर्वस्य
जिसर । व्यम्जममम्मि। रोर्यादेशोऽगि। देवायिह। देवादा। भोस् भगोस् अघोस् इति सान्ता निपाताः । तेपो रोयस्वे क्वते । में पूर्व भो मगो अघोपा प्रपन हे तिमको यशर पादेय होय पर पो रहते । देवास्ता-गरमा-देपासका। १२४ ॥ इलि सर्वेपाम् । ८ । ३ । २२ । भोभगोपघी पर्वस्य यस्य खोप स्यादति । भो देवा । भगो नमस्ते। पधो यापि । सब पाचाया चे मत में स् परे रहते उस यक्षार वा सोपही विस यकार से पूर्व भो भगो पचो वा पपप से। भोनदेवा' - भोरमदेवा - भोय+देवा - मोदे। ममोस+नमस्ते-भगोर+नमस्ते-ममोय ।-नमस्ते -मगोनमस्ते । पचोम्+याधि-पीर यारि-अधोयनयाशि-प्रचोयाति । देपाम्नम्या -देवार+नम्या-वार+सम्मा- देवानम्या | r१२५ ॥ रोऽसुपि।८।२।६८ । पनोरेफादेयो न तु सुपि पारा । पहर्गय ॥ मुप् प्रत्यार परेन सेतो पान् गम्म नक्षार को रेफ पादेय पोय । पान पान्-पारा।पान्मप-पगए । १२५ ॥ रोरि ।८।३।१४। रेफस्य रेफे परे लोप : रेप का चोप होय यदि रेप परे रो तो। पुनर--रमते-पुनारमते । १२७ ॥ तृणोपेपर्वस्य दोर्षोऽवः ।। ३ । १११। ठरेफयोष्ठीप निमित्तयो पूर्वस्याणी दोधः । पुना रमते । रो रम्य । शम्भ रावते पपा किम् । ततः। ठ । मनसय पुस्यन रुल्वे कृते पषि पेत्युपे रीरीति सोपे च माम्से। बदि चोप का निमित्त कार पा रेप परे हो तो उसको पूर्व पन कोटी होय । पुनरमते-पुनारमते हरिस्- रम्य । परि+म्य-परिनतम्य रीसम्म सम्मुस्करामते-मम्मूराबते । १२८॥ विप्रतिषेधे पर कार्यम् ।। ४ । २ । तुल्यवाविरीधे पर कार्य स्यात् । इति प्राप्त पूर्वपासिमिति रोरोत्यस्यासिहस्वाद त्वमेव । ममीरव । तुरमवषारी पूनों को विशेष उप में पाटाभ्यापी समानुसार पो परे होती २९ सधुकौमुद्याम् । कार्य करे । मनस्--रथ - १२०, ३६, ४ मनरा-रथः = यहा १२२ इशिच उस सूत्र से उत्व प्राप्तभया, और गेरि १६ इम से लोप भी प्राप्त भया तो विप्रतिषेधे पर कार्यम् । इस से लोप प्राप्त भया, क्यों कि १२२ छठे अध्याय का सुत्र है, और यह १२६ पाठवें अध्याय का है, इस कारण यह १२६ पर है, परन्तु पूर्वत्रासिहम् ३६ इस मे रोरि प्रसिद्ध है, क्यों कि जब लोप करने लगेगे तब जो १२० समजुषोरुः मे र किया है, वह असिद्ध हो जायगा रेफ के स्थान में सकार प्राय जायगा, इस कारण लोप नहीं भया, उत्व १२२ भया मन-।-उ-रथ =३२ मनोरयः । १२७ मूत्र में भण् प्रत्याहार पूर्व प्रकार तक लिया जाता है (अउग) इस लिये तृढः वृढः यहा दीर्घ न हुआ । १२६ ॥ एतत्तदो सुलोपोऽकोर नसमासे हलि । ६ । १ ।१३२ । अककारयोरेतत्तदोर्यः सुस्तस्य लोपो हलि न तु नसमासे । एष विष्णु । स शम्भुः । अकोः किम् । एषको रुद्रः । अनसमासे किम् असश्शिवः हलि किम् । एषोऽत्र । हल परे रहे तो उस सु के स का लोप होय जो ककार रहित एतद् शब्द वा तद् शब्द का है, परन्तु नञ् समास में न होय । एषस्-'-विष्णु = एषविणुः सस्-।-शम्भु = सशम्भु । ककार रहित कहने से एषको रुद्र में लोप न भया नञ् समास में न होय ऐसा कहने से यहा नही भया, प्रसस्।-शिव. ७३ = असशिव । हल कहने से एषोऽत्र में न हुआ । १३० ॥ सोऽचि लोपे चेत् पादपूरणम् । ६ । १ ।१३४ । स इत्यस्य सोर्लोप. स्यादचिपादश्चेल्लोपे मत्येव पूर्येत । सेमामविड्ढिप्रभृतिम् । सैष दाशरथी राम ॥ अच् परे रहते यदि लोप के विना श्लोक का वा मत्र का चतुर्थाश ठीक न बैठे तो तद् शब्द के सकार का लोप होय। सम्--इमा अबिड्ढिप्रभृतिम् = ३२ सेमा अविढिप्रभृतिम् स स्-।-एष दाशरथी राम' =३८ सैष दाशरथी राम ॥ ॥ इति विसर्गसन्धि - । . पुल्लिङ्गाः ॥ Pा अथाजन्ताः १३१ ॥ अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् । १ । २ । ४५ । धातुं प्रत्ययं प्रत्ययान्त च वर्जयित्वार्थवच्छब्दरूप प्रादिपदिकसंजं स्यात् ।। धातु, प्रत्यय और प्रत्ययान्त से भिन्न जो अर्थवाम् शब्द सो प्रातिपदिक संजक होय। ।
२४ ध्ययनसम्धि। रोर्यादेशोऽगि। देवायिा। देवास। भोस् भगोस् भघोस् इवि साम्ता मिपाता । तेषां रोयत्वे करो । लिस प से पूर्व भो भगी पचो वा पवई हे तिसको यत्नार पादेय होय पर परे रहते । देवास्ता-देगा-देवास्ता। १२४ ॥ हलि सर्वेषाम् । ८।३ । २२ । भीभगोपघो पपूर्वस्य यस्य खोप स्यादसि । भी देवा । भगी नमस्ते। पघी याहि सब पाचार्यों को मत में हर परे हते उस पवार का चोपड़ी मिस यबारे पूर्व भी मगो धो वा पपर्ष से। भोस्+देवा - मो+देवा' - मोयरेषा - मोदेमा । भमोस+नमस्ते -मगो+नमस्ते - भगोय् । नमसी-ममोनमरते । प्रचोम्+यारि-पोल यारि-पघोप्नयाहि-प्रवोयाधि । देषाम् +नम्या -देवाहन नम्या-रेवाय+सम्मा- देवानम्या॥ ॥ १२५ ॥ रोऽसुपि।८।२।दा पडी रेफादेशो न तु सुपि पारा । पर्गिय ॥ मुप् प्रत्याशार परे नसेतो पान् मम्म नकार बी रेप पादेयकीय । पान+ पान्-पासापान् मिर-पागल। १२६ ॥ रोरि । ८।३।१४ । रेफस्य रेफे परे खोप । रेप का सीप गोय यदि रेफ परे सेतो। पुनर+समते-पुनारमते । १२७ ॥ लोपेपर्वस्य दोषोऽथ । ६।३।१११।ठरेफयोलोप निमित्तयो पूर्वस्याणी दीर्घ । पुमा रमते । परी रम्प । गम्भ रावते पए किम् । तठः। ठ । ममस्रण पुल्या सारखे जाते एथि पोल्युले रोरोति लोपे च प्राम्रो । बरि सोप का निमित्त व्यार पा रेफ परे हो तो उसके पूर्व प्रप्पो कोय । पुमन रमते-पुनारमते परिम् । रम्य । परिर मम्म'-रि । रम्म परीरम्प मम्मुस्न-पम-सम्मूगवते। १२८॥ विप्रतिषेधे पर कार्यम् ।। ४ । २ । तुल्यवतगिरीधे पर कार्य स्यात् । इति प्राप्ते पर्वचासिमिति रीरीत्यभ्यासिहावाद त्यमेव । मनोरय। तुरुपवरपासे मूत्रों के विरोध उस में अध्यायायो प्रमानुसार जो पो होसी ।
२९ भया मन-1-उ-रथ': लघुकीमुद्याम् । कार्य करे । मनस्-न-रथ' = १२०, ३२, ४ मनर--रथः = यहा १२२ इशिव इस सूत्र से उत्व प्राप्तभया, और रोरि १२६ इस से लोप भी प्राप्त भया तो विप्रतिषेधे पर कार्यम् । इस से लोप प्राप्त भया, क्यों कि १२२ छठे अध्याय का सुर ई, और यह १२६ पाठवें अध्याय का है, इस कारण यह १२६ पर है, परन्तु पूर्ववासिडम् ३६ इस मे रोरि प्रसिद्ध है, क्यों कि जब लोप करने लगेगे तब जो १२० समजुषोरु' मे रु किया है, वह असिद्ध हो जायगा रेफ के स्थान में सकार प्राय जायगा, उम कारया लोप नहीं भया, उत्व १२२ ३२ मनोरथः । १२७ मृत्र मे भण् प्रत्याहार पूर्व गकार तक लिया नाता है (मउग) इस लिये तृढ, दृढ' यहा टीर्घ न हुआ। १२६ ॥ एतत्तदो. सुलोपोऽकोरनञ्समासे हलि । ६ । १ ।१३२ । अककारयोरेतत्तदोर्यः सुस्तस्य लोपो हलि न तु नसमासे । एष विष्णु, । स शम्भु. । अको किम् । एषको रुद्रः । अनसमासे किम् असश्शिव. हलि किम् । एषोऽत्र ॥ हल परे रहे तो उस सु के स का लोप होय जो ककार रहित एतद् शब्द वा तद शब्द का है, परन्तु नञ् समास में न होय । एषस्--विष्णु. = एषविणु' सस्--शम्भुः = सशम्भु । ककार रहित कहने से एषको रुद्र में लोप न भया नञ् समास में न होय ऐसा कहने से यहा नही भया, अमस्-।-शिव. ७३ = असरिशयः । हन् कहने से एषोऽत्र मे न हुआ। १३० । सोऽचि लोपे चेत् पादपूरणम् । ६ । १ । १३४ । स इत्यस्य सोर्लोप. स्यादचिपादश्चेल्लोपे मत्येव पूर्यत । सेमामविडिप्रभृतिम् । सैष दाशरथी राम. ॥ अच् परे रहते यदि लोप के विना श्लोक का वा मत्र का चतुधीश ठीक न बैठे तो तद् गन्द के सकार कालोय होय। सस्-।-इमा अबिड्ढिप्रभृतिम् = ३२ सेमा अविड्ढिप्रभृतिम् मस्--एष दाशरथी राम =३८ सैष दाशरथी राम ॥ --।। इति विसर्गसन्धि - ARCHII अथाजन्ताः पुल्लिङ्गाः II १३१ ॥ अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् । १ । २ । ४५ । धातु प्रत्ययं प्रत्ययान्त च वर्जयित्वार्थवच्छन्दरूप प्रादिपदिकसनं स्यात् ।। धातु, प्रत्यय और प्रत्ययान्त से भिन्न जो अर्थवाम् शरद सो प्रातिपदिक संजक होय। । --
।
।
प्रशस्तपुरिन ।
१२२ ॥ कृत्तहितसमासाश्च।१।२।४६ कृत्तहितान्ती समासारप
तथा स्यु ॥
सत्प्रत्ययान्स तरितमत्ययान्त और समास को भी प्रातिपटिव मनावे ।
१३३ स्वौषसमौट्छष्टाभ्याभिस्म्यांभ्यस्फसिम्याभ्यस् सो
साम्योम्मुप् । ४ । १ । २ । मु पो बस् इति प्रथमा । पम् चौट प्रस
पूति हितीया । टा भ्याम् भिम् इति तृतीया। से भ्याम् म्यम्
प्रति चतुर्थी । सि भ्याम् भ्यम् इति पञ्चमी । उस पोस् पाम्
इति षष्ठी । रि भोस् सुप् इति सप्तमी ॥
ये २१ स्वादि मस्यय रे। मुभी बम् प्रममा । प्रम पोट् यस रितीया।
टा भ्याम् भिम् ततीया । २ म्याम् म्पम् चतुर्षी । सि म्याम भ्यस् पञ्चमी ।
उस पोस माम् पष्ठी। पौर डि पोन् मुप् सप्तमी ।
१३४ ॥ ग्रापप्रातिपदिकात् । ४ । १।१ । प्रायय । ३ । १ ।।
पररच । ३।१।२। स्यधिकृत्य । ग्यतादावग्तात् मातिपदिकाच
परे म्वादय प्रत्यया स्यु ॥
(सीपी बासीन् ) पावनत (टाप् गप् वा पाप्) और प्राप्ति
पदिक म पर स्पादि प्रत्यय ।।
॥ १५ ॥ मुप । १।४।१३। मुपम्त्रीणि पौणि वचनान्ये कग
एकवचनतिषचनववधनमंधानि भ्यु ॥
मप् प्रत्याहार में बाबमा पादिले तीन तीन मागरे मोसम मे एकाचन
पिन पौरबारचम मनमानी।
॥ १३६ ॥ इधकारिवचनेकवचने । १।४। २२ । स्विकावयरिते
-
बाबा को दो पदाची बीकानेको र पिता विषम और पक्ष की
पाप तो एकवचनमा प्रयागता।
4000 वर पावचनम् । १। ४ । २१ । पात्वषिषचार्या
बहुपपने म्यात् ॥
भम बात पनपा का कानोसा तो बहुपपन वा प्रयोग ता ।
. लघुकौमुद्याम् । ॥१३८॥ विरामोऽवसानम् । १ । ४ । ११० । वर्गानामभावोऽवमान- सजः स्यात् । सत्वविमा राम ॥ वा के अभाव को अवमान कहते हैं। गम शब्द की माधन प्रक्रिया लिखते हैं। शब्द दो प्रकारके हैं, व्युत्पन्न और अव्युत्पन्न व्युत्पन्नपक्ष मे प्रातिपतिकसजा इस १३२ से और अव्युत्पन्नपक्ष मे इम १३१ ने होती है, फिर मातो विभनिया पाई १३४ उन से प्रथमा का एक वचन सु १३६ अाया राममु मु मे के उ का लोप भया ३३, ४ तब गमम् (१२०) १०८ गस । ॥ १३६ || मरूपाणामेकशेष एकविभक्तो। १ । २ । ६४ ॥ एकवि- भक्ती यानि सरूपागयेव दृष्टानि तपामक एव शिष्यते ॥ किमी एक विभक्ति के पूर्व जितने एक समान के रूप दिग्नाई पडे उन में से एक का शेष हो और औरों का लोप होय । जैसा राम गम औ = राम । ॥ १४० ॥ प्रथमयो. पूर्वमवर्ण । ६ । १ । १०२। अकः प्रथमाहिती- ययोरचि पर्वसवर्गा दीर्घ एकादेश स्यात् । इति प्राप्ते ॥ यदि अक् प्रत्याहार मे परे प्रथमा वा द्वितीया सम्बन्धी अच् रहे तो पूर्व पर के स्थान में पूर्व का सवा दीर्घ होय । राम+ौ यहा दीर्घ पाया । ॥ १४१ ॥ नादिचि । ६।२ । १०४ । आदिवि न पर्व मवर्गा दीर्घः। बहिरचि । रामौ ॥ यदि अवर्ण से परे प्रयसा या द्वितीया मम्बन्धी इच् रहे तो पूर्व सवर्ण दीर्घ एका देश न होय । राम + श्री ३८= गमौ। || १४२ ॥ चुट । १ । ३ । ७ प्रत्ययाद्या चुट इतो म्त ॥ प्रत्यय के श्रादि से नो चवर्ग वा टवर्ग मो इत्मज्ञक होय । ॥ १४३ ॥ विभक्तिश्च । १ । ४ । १०४ । मुप्तिङौ विभक्तिमजी स्त सुप् और तिड् प्रत्यय की विभक्ति मज्ञा होती है। ॥ १४४ ॥ नविभतो तुम्मा । १। ३ । ४ । विभक्तिस्थास्तवर्गसमा नेत । इति कास्य नेत्वम् । गमा ॥ विभक्ति के जी तवर्ग, स् और म तिन की इत्सना न होवे । गम+नस् १४२४० गम् + अस् अस् के स की इत्सना पाई, पर १४४ ने दबाया राम्+अस 138 - १२०, १०८ रामा ।
२८ प्रान्सम्मिान १४५ एकपचन सम्बुदिः १२१४६ । सम्बोधने प्रथमाया एक- पचनसम्वविसस्थात् सम्बोधन पे विषे वो प्रपमा वा एकापचन सो सम्मुषिसंजय । रामम् यहाँ मुफी मम्युरि समा भर। १४६ ॥ यस्मात् प्रत्ययविधिम्सदादिप्रत्ययेशम् ।।१४।१३। य प्रत्पनी यस्मात् क्रियते तदादि भन्दस्वरूपं तस्मिन् प्रत्यये परेशासंच स्वात् । वो प्रत्यय विस प्रगति में विधान परें यदि पी प्रत्यय इस से परे तो उस पसति की प्राममाये । ॥ १४७ ॥ एम्वात् सम्मुरे । ६।१।८ । एजन्तास्वान्ता पचानाइएलुप्यते सम्परचेत्। हे राम रामी रामा । एसम्ममा स्वान्त पा मे परे वोपन तिसका मोपी पति वा सम्युषि का पश्यप होय तो। राम सु २५ ५-रामम् पा संघा १४६ तब सपा मीप राम विपापियों को याद रखना चाहिये दिसम्बोधन मे मम्द का प्रयोग मोता। १४८॥ पमिपूर्व ।।१।१७। प्रकोऽम्याघ पूर्वरूपमे कादेग । रामाम् । रामो॥ पञ् प्रत्याशार मे परे पम् मम्बन्धी पच हो तो पूर्व पर को स्थान में पूर य पादेयीय । रितीवा में राम + पम् -रामम् । दो पचन में रामो। १४९। सगवतरिते ।१।३।८। तखितवा प्रत्ययाद्या लगवावर्गा पतः स्वः सरित भिन्न प्रत्यय वेपादि में मोम्पा बारम मोसंबीव । राम+ मम् । तम्माच्छमो म पमि । ६ । ३ । पूर्व सरपदीर्घात् परी यः गमम्सस्तम्यनः म्यात् पुमि । पुषसपथदीर्ष मे परे भी सम प्रत्यय वा म तिमयो नवार रोय पुगिना में। राम+पम् १.-रामाम्-रामान्। ।। १५१ ॥ पटास्वादनम् व्यवायेऽपि । ८।४। २ पट् वावगः पवग पार नुम् एतव्यस्तयथासम्भवमिशितग्ध व्यवधानऽपि रपाया परस्य नस्य प समानपद । इतिप्राप्ते ॥
२८ लघुकीमुद्याम् । प्रट प्रत्याहार के वर्ण, कवर्ग, पवर्ग, आड् और नुम् ये पृथक् पृथक् हो वा यथा संभव मिले हों तो समान पद में विद्यमान् जो रेफ वा षकार तिमसे परे जो न तिस को ए भादेश होय । रामान् यहां गत्व पाया। ॥ १५२ ॥ पदान्तस्य । ८ । ४ । ३७ । नस्य णो न । रामान् पद के प्रत में वर्तमान जो न तिस को ण प्रादेश न होय । इसलिये रामान् में न भया। ॥ १५३ ॥ टाङसिङसामिनात्स्याः । ७ । १ । १२ । अदन्ता- हादीनामिनादयः स्यु गत्वं । रामेगा ॥ इस्व अकारान्त अङ्ग से परे जो टा, डसि और डस् तिन को क्रम से इन, प्रात् और स्य आदेश होवें । राम+टाराम इन ३२, १५१ = रामण ॥ १५४ ॥ सुपिच । ७ । ३ । १०२। यादौ सुप्यतोऽङ्गस्य दीर्घः। रामाभ्याम् । यन् प्रत्याहार के वर्ण प्रादि में है जिन के ऐसा मुप् प्रत्यय परे रहे तो पदन्त भङ्ग को दीर्घ होय । राम+भ्याम् = रामाभ्याम् ॥ १५५ ॥ अतो भिस ऐस् । ७।१।६ । अनेकाल शित् सर्वस्य राम । भिस् को ऐस् आदेश होय, यदि उसके पूर्व प्रदन्त अङ्ग रहे तो ऐम् में अनेक अल् है इस कारण सम्पूर्ण भिस् को ऐस् भया, तब राम + ऐस् ३८, १२०, १०८ रामैः अब चतुर्थी के रूप लिखते हैं गम+डे तब ॥ १५६ ॥ डेयः । ७ । १ । १३ । अतोऽङ्गात् परस्य उर्यादेश: ॥ डे को य आदेश होय यदि उसके पूर्व प्रदन्त अन रहे । राम + य ऐसा भया तब । ॥ १५७ ॥ स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ । १ । १ १ ५६ । आदेशः स्थानिवत् स्यान्न तु स्थान्यलाश्रयविधी। इति स्थानिवत्त्वात् मुपि चेति दीर्घः । रामाय । रामाभ्याम् ॥ आदेश स्यानी के समान होय अर्थात् जो धर्म स्थानी में है वह आदेश पर भी पाये यदि स्थानी के अवयव वा तद रूप अल् के धर्म को मान कर कार्य करना होय तो न होय । समाय यहां डे के स्थान में जो यकार भया है, सो भी इस सूत्र से अर्थात् डे में लो सुप् है, वह पाया । सब सुप् को मानकर दीर्घ १५४ भया रामाय । रामाभ्याम् । ॥ १५८ ॥ बहुवचने झल्येत् । ७। ३ । १०३ । झलादी बहुवचने अमरतपुगिना। सुप्यतोऽस्यकार । रामभ्य । मुपि किम् । पचध्वम् ।। मार प्रत्याहारे पादि में मिम व एमा पचम मुप् परे) नो पदस्त पा को एकार पादेश हो । राम +म्यम - रामम्य' म सूत्र में सुप् पाप मे पचापम् गह एवार न पा । क्योंकि पतिए प्रत्यय विसा वयम भाग सिपा वार्यया प्रब पम्पमीप सिपसेगम+रमितब ॥ १५८ ॥ वावमामे । ८।४ । ५६ । प्रथमाने झसांची वा। रामात् रामाद् गमाभ्याम् । गमेभ्य । रामम्य । मार को विकल्प स पापीय यदि पवसान पर गोतो। राम+सि१५-राम + पात् ५२-रामात् वा रामाद गमाभ्याम् रामेम्य पष्ठी का एक वचन । राम+ए- ५५राम+पा-मस्य । ॥ पोमि च 10 । ३ । १ ४ । प्रतोत्रम्बकार । रामयो । यदि पोम विभति परे पर तो जम्प पकारान्त पाको एकारय । राम+ पोस पामे पोम् -रामया ॥ ११ ॥ स्वनद्यापी मट । ७।।। ५४ । इस्पाताम्माम्ता दावन्ताचाहात् परस्यामी मुडागम ॥ पाम को नुट् पागम य यदि उस स पूर्व स्वान्त नपन्स वा पापात पारे। राम+पाम् ताराम+नाम् ॥ १५२ ॥ नामि । । ४ । ३ । भवन्ताः स्यदीघ । रामाधाम । रामे । रामयो । एल्व धसे | यदि नाम् (नुट पागम से षष्ठी पाइपवन पाम् का नाम भया को) परे सेतो पमा पाकोटीपीय । गम+माम् -गमानाम् १५१-रामानाम ! ॥ १६३ ॥ पादेयप्रत्यययो ।८।३।५८ । एपकुभ्या परस्यापदा मतस्यादेश प्रत्ययाषयरचय मम्तम्ब मईन्यादेग । पहिवतस्य सस्य ताहय एव च । रामेषु । पूर्व कृष्णादयोऽप्यदरता ॥ पर मत्वाधारमा मग से परेमो पपदान्त पादेश म्प मबार वा पपटान्त पस्यम मा अवयप समार तिसको मूल्य पवार सावे । गममु+१५ रामेसु पतित प्रयत्नवान् रम्य मजार प्ले समान मन्यि पचार रे म किये पवार की पदेय मया तब रामेषु मिा मया । ऐसोबष्य, देव मुकुन्द वयोन्द्र मुनीम गरि पवाराम्त गम्दी। ।
लघुकीमुद्याम् । रूप भी जानौं । विद्यार्थियों को यह अवश्य स्मरण रखना चाहिये कि जिस शब्द मे र पाप रहे उस को णत्व १५१ होता है और में नहीं। ॥ १६४ ॥ सर्वादीनि सर्वनामानि। १ । १।१७। सर्व विश्व उभ उभय डतर डतस अन्य अन्यतर इतर न्वत त्व नम सम सिम । पर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थायामसजायाम् । स्वमन्नाति- धनोख्यायाम । अन्तरं बहिर्योगोपसंव्यानयो । त्यद् तद् यद् एतद् इदम् अदस् एक हि युष्मद् अस्मद् भवतु किम ॥ सर्व आदि जो शब्द स्वरूप हैं मो सर्वनाम सजक होय । सर्व सपूर्ण । विश्व सपूर्ण वा ससार । उभ दो । उभय दो अवयव विशिष्ट । उतर, डतम, ये दोनों प्रत्यय हैं इन से वे शब्द लिये जाते है जिन के अन्त्य में पूर्वोक्ता प्रत्यय होय जैसे कतर कतम। अन्य दूसरा। अन्यतर दो मे एक । इतर दुसरा । त्वत् दूमरा । त्व दूसरा । नेम आधा । मम सपूर्ण । सिम सपूर्ण । यदि पूर्व पर अवर दक्षिण उत्तर अपर अधर ये सात शब्द व्यवस्था से हो पा सजा में न हों तो सर्वादि गण में इनका पाठ जानो । उस स्व शब्द का सर्वादि गण मे ग्रहगा है जिसका अर्थ आत्मा वा आत्मीय है यदि ज्ञाति वा धन अर्थ हो तो नही । अन्तर शब्द का अर्थ जो बहिर्योग वा उपसच्यान हो तो जानो कि वह सर्वादिगण का है। त्यद वह । तद् वद । यद् जो । एतद यह । इदम् य ह । अद वह। एक एक । हि दो। युष्यद तू । अस्सद में । भवतु पाप । किम् कौन् । दून को भी सर्वादि गण में जानो। ॥ १६५ ॥ जस शौ । ७ । १ । १७ । आदन्तात् सर्वनाम्नो जसः शो स्यात् ॥ अनेकाल्त्वात् सर्वादेश । सर्वे ॥ अदन्त सर्व नाम से परे जो जस् तिसको शी (ई) आदेश होय । सर्व + जस् सर्व+६३२- सर्वे १६६।। सर्वनाम्न मै ।७।१ । १४ । अतः सर्वनाम्नो डे स्मै। सर्वस्मै । अदन्त सर्व नाम से परे जो डे तिसको स्मै आदेश होय । सर्व+ ए = सर्वस्मै । ।। १६७ ॥ डमिडयो. म्मात्म्मिनो १७११ । १५ । अतः मर्वनाम्न एतयोरेतो म्त । मर्वम्मात्। अदन्त सर्वनाम मे परे जो डमि और डि तिन को क्रम से स्मात् और स्मिन् पादेश होय । मर्य + उमि - सर्वस्मात् ।
- पजन्मपुस्सिा। १५८ ॥ पामि सर्वनाम्नः सुट 101 ११५२। पवर्षान्तात् परस्य सर्वनाम्नी विहितस्यामः सुडागम । एत्वे पस्ते सर्वेषाम् । सर्वस्मिन् । शेष रामवत् । एवं विश्वादयोऽप्यदम्ता । उभगादो नित्य विच नाम्त। समोर । उभाम्याम ३ । उभयो । तस्या पाठोऽकवर्थः । उत्तरडतमी प्रत्ययो प्रत्ययग्रहरे तदन्तयाणमिति तदम्तायामाः । मेम प्रत्यर्वे । सम सर्वपर्याय , तुल्यपर्यायस्तु न, समानामिति सापकात् । पपर्यन्त सर्वनाम से परे मो पाम तिसको बुट (म् ) पागम होय । सर्व+ धाम - मव+साम्१५ - सर्वे+साम्१५-सपाम् । सर्व+fro-मस्मिन् सर्व गम्मक पेपरूप राम सम्म समान वानने। इसी तौर निरव पादि परत सर्वनाम भाट के पोते हैं। हम सम्मका प्रयोग सदा शिवचन में होता है।उभी ठमी माम्योर उभयो २ । सपनाम का पत एनपचन पोर पाषषन ही में होता है तो शिवनान्त उम गम्भ या पाच मर्यादि मच में मानने का तात्पर्य याविरम की रि यो पूर्व पाच प्रत्यय होता रे पदिसम गम्द पर्वनाम में परिमषित न होता तो उसकी टिके पूर्व भक भी नही की समता रसतिये सांटिमप में पाठ मानागया । इतर पोर मम प्रत्यय रे। प्रत्ययका पारोमा बित गरेपलमें पा प्रत्ययताम मस्ययोत मम्द का पापोतास कार सर्वादिगण में हार पोरम सारान्त पोरसमान्त गम्दापाता। म मद का पर्व पापा। सम गाद सर्व पर्ष में सपनाम रे पर तुस्य पर्म में नहीं बोवि सुस्व पर्थ में समानाम् ५० पेमा मूषकार ने सियारे यदि होता तो समयाम् गे वाता। १५८ । पूर्वपरावरदचिणीत्तरापधरात्रि व्यवस्थायामसंसायाम् १ । १ । ३४ । एतेषां मवस्थायामममायां सपनामसंना गपसपात् मच या प्राप्ता सा वसि वा । पूर्वे। पर्वा । पसंञायां किम् । उत्तरा । कुरव । म्माभिधेयापेवावधिनियमो व्यवस्था । व्यवस्यायो किम् । दधिषा गायकाः । कुगला प्रत्ययः । मन भूत्र में पाटि सदोषी मात मावी मर्प नाम मंशा मो धम् परे पहले किय राय परि पुपादि भन्द प्यधामा अत्रा पर्ष में से। पूर्व पूर्ण परिया में भिन्न ATM ता रा प वहां मी गे च पर्यात् नारा जाने र ३३ और धन लघुकौमुद्याम् । यह उत्तर शब्द कारुदेश का वाचक है । व्यवस्था उसे कहते हैं जो पूर्वादिशब्दों के अर्थ से अपेक्षित सामान्य नियत का निश्चय है। व्यवस्था कहने से दक्षिणा गाथका' यहां दक्षिणे दक्षिणा । न भया, क्योंकि दक्षिण ही देश के गानेवाले कुशल होते हैं यहा व्यवस्था अर्थ है। १७० ॥ स्वसज्ञातिधनाख्यायाम् । १ । १ । ३५ । जातिधनान्य- वाचिन. स्वशब्दस्य प्राप्ता संज्ञा जमि वा । स्वे स्वा. ॥ अात्मीया आत्मान इति वा । जातिधनवाचिनस्तु स्वाः जातयोऽयी वा ।। वन्धु धन अर्य को छोड अन्य अर्थ में वर्तमान स्व शब्द की सर्वनाम सजा विकल्प से हो यदि जस् परे रहे तो वे स्वा' अर्थात् आप वा अपना । बन्धु धीर धन अर्थ में एकही रुप होता । स्वा जाति वा अर्थ। १७१ ॥ अन्तर बहिर्योगोपसंव्यानयो. । १ । १ । ३६ । बाह्ये प- रिधानोये चार्थेऽन्तरशब्दस्य प्राप्ता संज्ञा जसि वा । अन्तरे अन्तरा वा गृहाः । वाह्या इत्यर्थ । अन्तरे अन्तरा वा शाटकाः । परिधा- नीया इत्यर्थ ॥ बाहिर और वस्त्र के धारण करने अर्थ मे अन्तरगब्द की सर्वनामसज्जा विकल्प से होय जस् परे रहते । अन्तरे वा अन्तरा यहा बाहर के घर वा पहरने के योग्य वस्त्र अर्थात् (मारी) में अन्तर शब्द है ॥ १७२ ॥ पूर्वादिभ्यो नवस्यो वा । ७ । १ । १६ । एभ्यो डसिङग्री: स्मात्स्मिनौ वा स्त । पूर्वस्मात् । पर्वात् । पूर्वस्मिन् । पूर्वे । एवं परादीनामपि ।। शेष सर्ववत् ॥ पूर्व आदि नव शब्दो से परे जो डसि और डि तिन को कम से स्मात् और स्मिन् 'प्रादेश विकल्प से होय । पूर्वस्मात् । पूर्वात् । पूर्वस्मिन् । पूर्व इस प्रकार पर आदि शब्दो को जानना जो शेष रूप बचे उन को सर्व शब्द को समान जानना । १७३ ॥ प्रथमचरमतयाल्पाई कतिपयनेमाश्च । १ । १।३३। एते जम्युक्तसजा वा स्युः। प्रथमे । तयः प्रत्यय । हितये । द्वितया: । शेष रामवत् । नेमे । नेमा । शेष सर्ववत् ॥ यदि प्रथमादि शब्दों से परे जस् विभक्ति रहे तो उन शब्दो को मर्व नाम मन्त्रा विकल्प मे होय । प्रघमे, प्रथमा । यहा प्रथमादि शब्दो मे तय को प्रत्यय जानना। - प्रथमा. । - । प्रमन्तपुस्तिा। इस खिये यहां उस मम्द का पार विस के समय में वह प्रत्यय तिये पा रितया सणे प्रेषरूप राम मद साप । नेमे वा नेमा । इस पोषप सर्व मद सागरे। १०४ ॥ वा तीयस्य सिसु पा। हितीयस्मै । रितीयायेत्यादि। एव तृतीयः । निर्वर ॥ परि हिस्सप् प्रत्यय परे हे तो तीय प्रत्यगत गन्दवी सर्व भाम सभा विषय से पोय । रितीयस्मै ५। रितीयाय । ऐसे ही कुतीय मद को मानना । नियर भियतो बराम्या १७५ ॥ वराया वरसम्यतरस्याम्।७।२।११। पखादी विभती। पदाहाधिकारे तस्य तदन्तस्य च । मिदिश्यमामस्यादेशा मवन्ति । एकदेगविकृतमनन्यवदिति नरागम्दस्य परस्। मिर्वरसी निर्वरस इत्यादि । पधे सादी च रामवत । विश्वपाः । यदि प्रजारि विमति परे रहे तो बरा गम को बास् पादेश विवरप से होय । अष्टाम्यायी में पहपौर पामोनी को अधिकार में दो बार्य बिस को काम तदन्त को भी होता पस लिये परा भन्द पो पादेश बो बरम् पाया नियर गम वो मी पाया परन्तु पदिम नमी को कोतारे मिस को सूत्र में कहा मिदिरममानस्यादेगा भवन्ति" तो सूत्र में पग गम्द कहा गया स तु निर्भर सदमा पपयव दो पर तिस पो परम् एषा। यदि या कहो कि निर्वर गण्ड में बरा नीरे चिन्तु जर तो यह नहीं कर सकते क्योंकि वो कुछ विवार को प्रापा को मातारे भो पौर के समान नहीं होता “एदेशविनतमनम्यवत्" मिर्जरसो मिर्जरम' इत्यादि । जिस पत्र में बरस् पादेय नही होता हममें और सावि मिममि में राम बम्ब के समान रूप वानो। विश्वपा' पपात् विश्व की रक्षा करनेवाला 'विश्वं पातीति"। १०६ ॥ दीर्घाजसि च ।।१।१.५ । विश्वमो । विश्वया । विश्वपाम् । विश्वपी। दीच परेबी बम्पापले तो पूर्णमपए टीम होय। विश्वपा+श्री १८-विश्पपौ। १०७ ॥ मुठनपुसकम्य । १.११ ४३ । स्वादिपञ्चवचनामि स बनामम्यानमसानि म्युर मोवस्य । मपी, बम् पम् धौर सपा वचनों को मबनामस्मान समाय नम ३५ - लघुकौमुद्याम् । १७८ ॥ म्वादिग्वसर्वनामस्थाने । १ । ४ । १७ । कप्रत्ययावधि- षु स्वादिष्वसर्वनामस्थानेषु पर्व पद स्यात् ॥ सर्वनामस्थान को छोड कर अष्टाध्यायी में जो मु प्रत्यय कहा है, वहां से लेकर क प्रत्यय पर्यत जितने प्रत्यय मिलते हैं, तिनमे नो पूर्व है, तिसकी पद सजा होवे । १०६ ॥ वचि भम् । १ । ४ । १८ । यादिष्वजादिषु च कप्रत्यया- वधिषु स्वादिध्वसर्वनामस्थानेषु पूर्व भसंज्ञं स्यात् ॥ सर्वनामस्थान को छोडकर मु प्रत्यय से लेकर क प्रत्यय पर्यन्त जितने यकारादि वा प्रजादि स्वादि प्रत्यय मिलते हैं, तिन से जो पूर्व तिमकी भसजा हो। अव यहा यह शड्डा हुई कि पद सजा और असज्ञा दोनों प्राप्त भई तो कौन होय । तब १८० आकडारादेका संज्ञा। १ । ४ । १ । इत जर्व कडागः कर्मधारय इत्यत. प्रागेकस्यैव संज्ञा जेया । या पराऽनवकाशा च । अष्टाध्यायी में इस सूत्र से “कडाराः कर्मधारय” इस सूत्र पर्यन्त यदि एक शब्द की अनेक सज्ञा प्राप्त हो तो नो सज्ञा अष्टाध्यायी के क्रमानुसार हो और जिसके दूसरे कही होने का अवकाश न हो वही सज्ञा हो । अनवकाश उसे कहते है निस की और कही प्राप्ति न होवे । जैसे पदसजा के विषय को छोड भसज्ञा की प्राप्ति और कही नही है, इस लिये जादि विभक्ति परे रहते पद सना को वाधकर भ सन्ना ही हुई। १८१ ।। आतोधातोः। ६ । ४ । १४० ! आकारन्तो यो धातुस्तद- न्तस्य भस्याङ्गस्य लोपः । अलोऽन्तस्य । विश्वपः । विश्वपा । विश्वपाभ्यामित्यादि । एवं शङ्खमादयः । धातो. किम् । हाहान् । हरिः हरी॥ अकारान्त जो धातु तदन्त भसनक जो अङ्ग तिसका लोप होय । विश्वपा शब्द के अन्त अर्थात् प्राकार का लोप भया, २४ विश्वपा+शस् = विश्वप । विश्वपा+टा- विश्वप! विश्वपाभ्याम् इत्यादि । ऐसे ही शहध्मा श्रादि प्राकारान्त शब्द जानने । धातु कहने से । हाहा+शस्= हाहान् । यहा लोप न हुआ । हरि शब्द के रूप लिखते हैं । हरि “दुख हरतीति" हरि+ौ १४० = हरी। १८२॥ जसि च । ७।३।१०६ । स्वान्तस्याङ्गस्य गुणः । हरयः इस्वान्त पन को गुण होय यदि जस् परे रहे तो। इरि+लम् १४२, २६ = हरयः - अव इकारान्त पातपुस्तिा। १८३ । स्वस्य गुण । ७।३।१८। सम्पुको परे।रिम परी। रीन् । स्वान्त पर वो मुवीय सम्मुरि परे तोहरे १४ । रिम् १८ । परीन् १५ १८४ ॥ शेषो ध्यसखि । १।४।७। शेष इति स्पष्टायम् । इस्यो याविदुती तदम्त सखिवज घिसंसम् ॥ मपि मम्द को होरपर बोरवारान्त पा सकारात पादरे तिन भी पिसना बोय। १८५ पानास्त्रियाम् ।।३। १२ ।धे परस्याडो मास्वाद स्त्रियाम् । भारिति टासंभा प्राचाम् । हरिणा । रिभ्याम् । परिभिः सीमित हो बोषवर पार पर्यात् टा को ना पादेम होय यदि उस से पूर्वधिसंचया सम्परे। प्राचीन सोम ठाको पारसहते रेरि+रा-परिचा रिम्वाम १८६॥ रिति । ७।३ । १११ । घिसनकम्य सिति सुमि गुण । हरये ॥ यदि जित मुप् परे हे तो पि मनन गम्द को गुपोय। ठित उसे बहते है। जिम कात्य रि+--रये । १८० ॥ रसिम्सोश्च । ।। १ । ११ । एडो सिरसोरति पूर्व वपमेकादेश । हरे र्यो हरीणाम् ।। पर से परे यदि उसि वाम् पा प्रकार रहे तो पूष मा एप पोय । रिमि १५-परे+पम् -रेरि+ पोस् १८-गा। हरि+पाम् -२ रीमाम् । १८८ ॥ पश्य थे 101 ३ ११८ पदुद्भ्यामुत्तरस्य रीत घेरत । हरी। रिपु । एवकण्यादय ॥ यदि टिप पृप कार या ठवार तो। रिकी पौ पौर धि संचय गाट को पकार पादेग होप हरि+fr-R+पीए-से। परिषु । रमी रीति से पपि परि पापि मुभि पादि पद। १८८॥ पनए सौ।७।१।६। सस्युरणम्यामादेगोऽमम्बुद्धी सो॥ सम्पुति भिन्न मु पो सेतो मणिप पाया धमार पादेग पोय । सपम् + मु॥ १८ ॥ अलोम्त्यात् पूर्व उपधा। १।१ । ६५ । भगयादल पूर्वी यो वर्णः स उपधासेनःस्थात् ॥ - - 39 . लघुकीमुद्याम् । उपधा उसवर्ण का नाम है, जो अन्त्य अल् से पूर्व हो। सखन् + मु यहा ख में प की उपधा सजा हुई। १८१ ॥ सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ । ६ । ४ । ८। नान्तस्योपधा- या दीर्घोऽसम्बुद्धौ सर्वनामस्थाने ॥ .यदि सम्बदि भिन्न सर्व नामस्थान परे रहे तो नकारान्त की उपधा को दीर्घ होय । सखन्+सु-सखान्सु १६२ ॥ अपृक्त एकाल प्रत्यय | १ | २। ४१ ॥ उम प्रत्यय का नाम अपृक्त है, जिस मे एक ही अल रूप हो। १६३ ॥ हल्याभ्यो दौघात् सुतिस्यपृक्तहल। ६ । १।६८। इल- न्तात् पर दी| यौड्यापौ तदन्ताच्च परं सुतिसीत्येतदपृक्त हल् लुप्यते । इनन्त वा दीर्घ डी (डीप, डी, डीन् ) वा प्राप् ( टाप् डाप् चाप् ) जिनके अन्त में हो उन से परे जो सु वा ति अथवा सि प्रत्यय रूप अपृप्त इल् सो लोप होय । महान्सु ३३, ३ = दसरहान्म -सखान् १६४ ॥ न लोपः प्रादिपदिकान्तस्य । ८ । २ । ७ । प्रातिपदिक संजक यत् पद तदन्तस्य नस्य लोपः । सखा ॥ प्रातिपदिक सजक जो पद उसके अन्त में वर्तमान जो न तिसका लोप होय । सखान्सरशा १८५ ॥ सख्युरसम्बुद्धौ । ७ । १ । ६२ । सख्युरङ्गात् पर सम्बु विज सर्वनामस्थानं णिहत् स्यात् ॥ सरिख रूप अङ्ग से परे वह सर्व नामस्थान णित् के समान होय, (णित् मानके जो कार्य होता है वह उस को भी मानकर होय) जो सम्बुद्धि से भिन्न है। १६६ ॥ अचोज्णिति । ७ । २ । ११५ । अजन्ताङ्गस्य वृद्धिर्जिति णिति च परे । सखायौ । सखायः। हे सखे। सखायम् । सखायो सखीन् । सख्या । सख्ये ॥ अजन्त अङ्गको वृद्धि होय, यदि वह प्रत्यय परेरहे जिसका प्रकार वा णकार उत्सजक हो। सखि+नीसखायौ। सखाय. । हे सखे १८३, १४५-७ । सखायम् । सखायौ । सखीन् । सख्या १८ । सख्ये । १६७ ॥ ख्यत्वात् परस्य । ६ । १ । ११२। खितिशब्दाभ्यांखीती- - पान्तमिला। गन्दाम्या कृतयणादेथा परस्य सिम्सीरत उ । सरयु ॥ गिस को यादेम १८ बिया शे ऐसा बोस दिपा ति यद अथवा दोर्ष यो वा ती प्राद (स्य् पास्य् ) तिस से परे वो सि वा उम् का प्रकार सिमको हधारीय समि-रसि+सखि सम् १८-सक्यु । १८८ ॥ पौत् । ७ । ३ । ११८ । पूत परस्य रौत्। सख्यो । पेष रिवत् ॥ रिको पौ पादेय होय यदि उस स पून रहार रहे। मणि+सि-सरि+पौर सक्यो। पपरि मम्द पो ममान बानमे । १८६ || पति समास एव । १।४।८। घिसन । पल्या पस्ये । पन्यु २ पल्यौ येष परिवत् । ममासे तु भूपतये । कतिगग्दो बहुवचनान्त ॥ पति गम्ट की धिमंशा समासी में होती. स से या मित्र मया दिवस पति पद की धिर्मा मान पर बोर कार्य होता सो पत्र मी न होगा पति - भा १८-पस्या पति+मि वा स् - पस्यु । पति+रि-पत्यो । प प परि गम्प के समान बानने । समाम में तो। भूपतये इस तौर नरपति गणपति पादि बागने । पम पति पद के प निपते है। यह भण्द गावचनान्तरे। पहुगणवहति संख्या । १।१।२३ ॥ बा पद पीर मप यन्ट और बिन पो अन्त में पतु वा प्रति प्रत्ययो वे संस्था बहावें । कति गम्य रति पत्यातरम सिये उसकी मारा संचा २१ । इति च । १ । १ । २५ । हत्यन्ता संख्या पसजास्यात । पति प्रत्यय रे पन्त म जिमचे पेसा को माया पाच गद मो पर मनकाशेपे । इस स घोत याद को पर संघा मर।। २ २ पड्क्यो लुक् । ०।१।३२ । अामी । पर संनया से परेवो वम् पागम् तिममा सोपीय पति+बम् -पति। २३ प्रत्ययम्भ जुकरमुलुप । १ । १ । ११ । लुकलुखुम्गग्दै कत प्रत्ययादर्गम क्रमाग तत्तासंसं स्यात् ॥ गुर गनु पऔर नुप सदों से प्रासप वा यो पदयन पपात म दिपाई पदमा सो माम मे नुम्नुपीर नु मनवीय ॥ २४ । प्रत्ययलोपे प्रत्ययमवणम् । १।१।२ प्रत्यये गुप्तेऽपि २८ तदाश्रित कार्य लघुकौमुद्याम् स्यात् । इति जसि चैति गुणे प्राप्ते ॥ प्रत्यय का लोप होने पर भी प्रत्यय मानके जो जो कार्य होते हों वे होवें। के कति यहां इस सूत्र के २०२ लुक् होने पर भी इस सूत्र अनुसार जो जस् को मान कर गुण होता है १८२ सो प्राप्त भया । तब २०५ ॥ न लुमताङ्गस्य । १ । १ । ६३ । लुमता शब्देन लुप्ते तन्नि- मित्तमङ्गकार्य न स्यात् । कति २ । कतिभिः । कतिभ्य. २१ कती- नोम् । कतिषु । युष्मदस्मदपट्सनकास्त्रिषु सरूपाः । विशब्दो नित्यं वहुवचनान्त । वय. । त्रीन् । त्रिभिः । त्रिभ्यः २ ॥ जहा लुमता प्राब्द से लोप हो वहा लोप निमित्तक अन कार्यन होय । तब गुण न भया लतिर, कतिभिः, कतिभ्य २, कतीनाम् , कतिषु, युष्मद, अस्मद् और पट् सनक शब्दों का तीनों लिङ्गी में समान रूप होते हैं। २०६ ॥ स्त्रय: । ७ । १ । ५२ । आमि त्रयाणाम् । त्रिषु । गौणत्वेऽपि प्रियत्रयाणाम् ॥ आम् परे रहे तो वि शब्द को वय प्रदेश होय । त्रि+श्राम् = त्रयाणाम् १६१-२ । त्रिषु जहा त्रिशब्द की मुख्यता नहीं है, तहा भी (बहुव्रीहि समास में) जय आदेश होता है। प्रियत्रयाणाम् । २०७ ॥ त्यहादीनामः । ७१२। १०३। एषामकारी विभक्ती हि पर्यन्तानामवेष्टिः । हौ २ । हाभ्याम् ३ । योः २ । पाति लोक- मिति पपीः सूर्य ॥ पप्यो । पप्य. हे पपीः पपीम् । पपीन्। पाया। पपीम्याम्३ । पपीभिः । पप्ये । पपीभ्यः २ । पप्यः २ । पप्योः २ । दीर्घत्वान्न नुट । पप्पाम् । डौ तु सवर्णदीर्घ । पपौ । पपौषु । एवं वातप्रम्यादयः । बद्धा श्रेयस्यो यस्य स बहुश्रेयसी । विभक्ति परे हो तो त्यद आदि शब्दों को प्रकार आदेश होय । महाभाज्यकार को यह इष्ट है, कि हि शब्द तक यह सूत्र लगे । दि+ो हो । हाभ्याम् ३ । हयो २ जो लोक की रक्षा करता है, उसे पपी, अर्थात् सूर्य कहते हैं। "पातिलोकम्" पपी+ औ= पप्यौ । पप्य' हे पपी' । पपीम् । पपीन् । पप्या । पपीभ्याम् । पपीभि । पप्ये । पपीभ्याम् । पपीभ्य' २ । पप्य' २ पप्यो २। दीर्घ होने से नुट १६१ न भया। पप्याम् । पपी+7-पपी। पयोषु एसी भाति वातममी आदि शब्दों के रूप होते हैं । पत्रतपुस्ति। विस पाम गात मी कम्याष परमेवाती स्त्री रों बहुशेयसी करते रे गाय अयस्यो यस्य । २.८ ॥ यस्पाण्यो नदौ । १। ३ । ४।प्रदन्तौ मित्यस्पीलिको नदीमा स्त' । प्रथमलिया च । पूर्व स्वास्यस्योपसर्जनस्वेऽपि मदीप पलध्यमित्यर्थ । वारेचस्य मे बिसवे ऐसा मो नित्य स्पीति मद मो नदी संजय । वातिय चार ने कहा चि पेस गादों में परियेसी सिा का पाप भोपे पमान मम्द परिये स्त्री सिबा बाचको पौर समास होने पर विशेष शेकर पुस्सिा को वायनो भी पे नदी संभ्रकही क्योंकि प्रथम ये स्पीति मे । से चयसी प्राद परिसे स्त्रीति या फिर बहु गाट के साथ समास होने में पुरितामा को भी रसपी नदी पंजा मई । या समपन्त रे रस से पायसी+सु-बायसी १८ भया । २१. ॥ पम्बाथमयोईस्व । ७।१।१०। सम्बुहो। हेपाश्वे यमि सम्मुरि परे से तो सन सादी को इस्प होप वो गम्द नही पत्र पा माता बेपारोगायेयपि २११ पायनद्याः । ०।३।११२ । नद्यन्तात् परेपा सितामाडा गम' ॥ इस रित् प्रत्यय को पाट भागम होय बिस के पूर्व मपन्त गम्द रहे। २१२॥ पाटरच ।।१।.। पाटोऽचि परे पहिरकादेग । वायेयस्य । पात्रेयस्या । श्रेयसोनाम । पार से परे परिप से तो सोनी मिनयर हरि होय एवेयमो+पाट+रे १८-गवेवस्य । बहुचेयस्या । गहुयेयसीनाम् । २१३ ॥ राम्नद्याम्नीभ्य 101३। १६ । नयनतादावरता म्नौगग्दात् परम्य राम् । पायेयस्याम् । गेष पयौवत पड्यन्तस्या ग्म सुलोप । पतिलक्ष्मी । गेपं गायेयसीवत । प्रधी । हिको पाम पादंग रोय। गायस्वाम २१ ११८। पेष पपपी शाद - ममान । पतिनामी गार पम्त मरे म निये मुबा मोप न भया । पतिनामी मामीमनिक्रान्त " गेप कप गुरमी मे ममान । पा भी गरपबिपने प्रभा 1 ४१ 1 -- -- लघुकौमुद्याम् २१४ ॥ अचि श्नधातुवां वोरियडुबडौ । ६ । ४ । ७७ । श्नुप्र- त्ययान्तस्ये वर्गोवर्णान्तस्य धातीभ्रं इत्यस्य चाङ्गस्येयडुबडी स्तोऽ- जादौ प्रत्यये परे । इति प्राप्ते ।। अजादि प्रत्यय परे हो तोश्नुप्रत्ययान्त अगइवर्णान्त वा उवर्णान्त जो धातुऔर न्यू जो अ है ति के इकार को इाइ और उकार को उबङ् आदेश होय। यह सूत्र प्राप्त भया। तब २१५ ॥ एरने काचोऽसयोगपर्वम्य 1६1४1८२ । धात्वश्ववसंयोग पर्वो न भवति य दूवर्णस्तदन्तो यो धातुस्तदन्तस्यानेकाचोऽङ्गस्य यण ऽ जादौ प्रत्यये । प्रध्यौ । प्रध्यम् । प्रध्यौ । प्रध्य. । प्रध्यि । शेषं पपीवत् । एव ग्रामणी. । डौ तु । ग्रामग्याम् । अनेकाच, किन् । नौ । नियो । निय । अमि शसि च परत्वादियङ् । नियम् । शम्। नियाम् । अमयोगपर्वल्य किम् । मुथियौ । यवक्रियो । धातु का अवयवसयोग पूर्व में नहो ऐसा जो वर्णान्तधातु वह जिस्र अनेकाच् 'प्रग के अन्त मे हो, तिसको बग्ण आदेश होवे, अजादि प्रत्यय परे रहते। अनेकाच् अङ्ग है, प्रधी तिमके अन्त में इवर्णान्त धातु है, धी तिस के इकार से पूर्व धातु का अवयव सयोग १६ भी नहीं है, और अजादि प्रत्यय परे है, और ती प्रवी शब्द क इंकार को यण् मया । प्रधी+औ= प्रध्यौ । प्रध्य, । प्रध्यम् । प्रध्यौ। सप्तमी का एक- वचन प्रध्यि । शेष रूप पपी शब्द के तुल्य हैं। इसी रीति से ग्रामणी अर्थात् ग्राम का सरदार "ग्रामं नयतीति" नी अन्त्य में हैं इस से ग्रामणी+डि = ग्रामण्यास् २१३ । भने- काच् कहने से। नी नियो। निय । यहा यण् न हुआ, क्योंकि यह एकाच शब्द है । १४८, १४० इन सूत्री की अपेक्षा इयङ् विधायक सूत्र २१४ परहै इस लिये नी+ अम् = नियम । दिनीया बहुवचन निय । सप्तमी का एक वचन नियाम् । सयोग १६ पूर्व मे न हो ऐसा कहने से सुश्री+औं = मुन्थियो । यवक्री+ औ= यवक्रियो यहा या न हुआ। २१६ ॥ गतिश्च । १ । ४ । ६० । प्रादय क्रियायोगे गतिसज्ञा. स्यु । गतिकारकेतरपर्वपदम्ब य नेष्यते । शुचधियो । जब प्रादि उपसगा का योग क्रिया के साथ हो तब वे गति समक होवें। भाष्य कार को प्राज्ञा है कि गति वा कारक से अन्य पूर्वपद जिस श्रङ्ग का होय तिन को यण् न होय । जैसे । शुकधी शब्द मे धी शब्द से पूर्व जो शुद्ध शब्द है वह न तो गतिमन्जक है, न कारक है, इसी से शुचधियो मे सही भया, क्योंकि प्राचीन के मत में प्रयमान्त कारक नही कहाता । शुद्धधी+ग्रौ = मुधियी - .
- अनन्तपुरिया। ११७ ॥ न भूसुधियो । १४ । ८५ । एतवीरचि सुपि वा न । सुधियो। सुधिय इत्यादि । मुखमिच्छतीति, सुणी । सुतौ । सुम्यो । सुल्यो । सुश्मा मुत्युः। शेष प्रधौवत् । गम्भुरिषत्। एवं माम्वादयः भू पौर सुधी मन्द को या न होय यदि अबादि सुप् परे से तो पुषियो। पुषिय' रत्यादि । सुख चाहने पाने यो सुणी "मुखमितीति और मुत बी पा पाने को सुती 'सुतमिन्नति पारे । सुखी । भुती । सुस्यो। मुत्यौ। मुरी+ खि वा स्-मुस्युः । मुत्यु । ०। भेव कप प्रधी सम्दो पमान जाये। मम्मु समारि पद से तुल्य है। ऐसे मी मानु साधु स्वानु सपालु मारिए पादिदम्दान॥ २१८ ॥ तन्यत् कोष्टुः । 01 ११२५१ पसम्वुको सर्पमामस्थाने मोष्टुगम्दस्य श्रीष्ट प्रयोलण्य इत्यर्थ । सम्बधि से भिन्न मनामस्वान परे रो तो मोष्ट सम्द तुबन्ना ने समान होग पर्वात् ग्रीस गद को खोज पादेय होय । २१८ तो सिर्वनामस्वामयोः । ७।३।११.तीस गुपो सर्वनामस्थाने च । इति प्राप्ते । पवारान्त पापो पुष होवे यदि कि पा सर्वनामस्थान परे से तो। पा २२ ॥ पादुशमस्मुरुदयोऽने ।।१।१४। पदम्तामा मुगनसादीर्मा पामर स्यादसम्मुपो सौ ॥ परि पधि से भिन्म मु परेसेतो वारान्त उसनस् पुरवमम् पोर पाम् न को पनर पादेय होय । २२१॥ पस्तम्त चस्वसमस्तनेष्टत्वष्ट्रपतकोतपोतृप्रशाम्तचाम् । ।।४।११। पवादोमामुपधाया दौर्षी सम्धुपीसवमामस्थाने। क्रोष्टा। मोटारी । ग्रीष्टारः । श्रोष्ट्न् । पप सप पीर प्रत्ययात पाना पाययान्त भी गम और स्वस भया मेटा स्वत बात होत पोत प्रमाम्त म पो उपधा को दीम यति उम्मुख भिन्न मर्वनामस्मान परे से तो । सो+मुपिरोग+म्। फिर नोरन्+। तर बोष्टन् । बोगन् १८१ । तर मोटा।बोग+यो। तर प्रोग+यो। प्रारोमोनार। सप्ट+मम् (१५ र १५६)-प्रोग्रा. माप्त भया । तब ४३ .. - लघुकौमुद्याम् । २२२ ॥ विभाषा तृतीयादिष्वचि । ७ । १ । ६७ । पजादिषु क्रोष्टुर्वा तृज्वत् । क्रोष्ट्रा। क्रोष्टुना । क्रोष्टे ॥ यह तृतीया प्रादि विभक्ति परे हो जस के प्रादि में अच् हो तो क्रोष्टु को क्रोध पादेश विकल्प से होय कोष्टु + मा १८= क्रोष्टा वा, क्रोष्टुना (१८५) कोष्टे ॥ २२३।। ऋत् उत्। ६ । १ । १११ । ती ङसिङसोरतिउदेकादेशः । रपरः ऋ है अन्त में जिसके तिस से परे यदि उसि वा उस् का प्रकार रहे तो दोनों मिलकर रपर उकार, अर्थात् उर् एकादेश होय । क्रोष्ट+अस् = क्रोष्टुर+स् ।। २२४ ॥ रात् सस्य । ८ । २ । २४ । रेफात् संयोगान्तस्य सस्यैव लोपी नान्यस्य । रस्य विसर्ग. । क्रोष्टः । क्रीष्टीः ॥ रकार से परे उसी सकार का लोप होय जो सयोग १६ के अन्त में है परन्तु और का नही । क्रोष्टुस् ११८ क्रोष्ट' । क्रोष्ट+भोस् १८ क्रोष्ट्रीः । २२५ ॥ नमचिरतृत्वदायेभ्यो नुट् पर्वविप्रतिषेधेन । क्रीष्टूनाम् । क्रोष्टरि। पक्षे हलादौ च शशंभुवत् हट हन्नौ। हाम् । इत्यादि। अतिच- मशब्दे तु नदीकार्य विशेषः । हे अतिचमु । अतिचम्वै । अतिचम्बाः । अतिचमूनाम् खलपू ॥ विप्रतिषेधे परकार्यम् १२८ सूत्र में जो विधान किया है कि पर कार्य होय उस पर पार्तिककार का विचार है, कि नुम् अच् परे रहते र भाव और तृम्वद्राव इन तीनों को वाध कर पूर्वविप्रतिषेध से नुट् ही पागम होवे क्रोष्ट + पाम् यहां तृम्वद्भाव चौर नट् दोनों पाया पर विप्रतिषेधे पर कार्यम् इस से तृन्वताव पाया क्योंकि अष्टाध्यायीके समानुसार वही पर है तब इस वार्तिक ने दबाकर पूर्वविप्रतिषेध से नुट् पागम विधान किया तब नुट् १६१ भागम भया फिर तृष्यद्राव की प्राप्ति नही क्योंकि पच् परे नहीं है। क्रोष्टूनाम् । क्रोष्टरि। पक्ष में और हलादि सुप् परे रहते इस के रूप शम्भु मब्द के सदृश है। नुम् और अच् परे रहते रभाव के उदाहरण भागे लिरहेंगे। दूह. । छूटी। इहूम् इत्यादि । परन्तु प्रतिचमू शब्द में चमू शब्द नित्य स्त्रीलिङ्ग है इस लिये नदी सभाका कार्य उस में विशेष है । हे अतिचमु चमूमतिकान्त पतिचम्यै । पतिचम्बा' । अतिचमनाम् । अव रहलपू शब्द के रूप लिखते हैं । खलपू । २२६॥ श्री. सुपि । ६ । ४ ।८३ । धात्ववयवसंयोगपूर्वो न भवति य उवर्णस्तदन्ती यो धातुस्तदन्तस्यानेकाचोऽङ्गस्य यण् स्यादचि सुपि । खसप्वौ । खलप्व । एवं सुल्वादय । स्वभूः । स्वभुवी। स्वभुव. वर्षाभूः - BB - अनन्तपुमिला। धातु का अवयव मयोग पूर्व में नहो ऐसा वष बिस भातु के अन्त में को प्रसा वो पातु मो विस पनेकाप पाने पन्त में हो तिस को यह पादेश शेम प्रमादि सुप् प्रत्यय परे रो तो पनपी । उत्तप्प पर पुनातीति पसपू । मुस पादि गद भी पर के मध्य मुष्टमुनातीति । स्पम् । स्पमुवी। स्वमुप । वर्षायो भवतीति वर्षाभूः । २२० ॥ वर्षाम्वरथ ।। ४।८४ । प्रस्य यश् स्यादधि मुपि । वर्याभ्वावित्यादि । हम्भ । वर्षाभू गम को यम् पादेय पोय यहि पजादि मुख परे से तो। वर्षाम्दी प्रस्थादि । २२८॥ वा हुम्करपुम पवस्य भुषो यप यक्लव्य । हस्थी । एवं परभ । पुनम । धाता । धाते । धासारी। धातार ॥ पातिक पार का पर मत है कि वो पर्यावरच इस में फेवर भू मम्प वा पाप दिया रे उस माय एम् कर पीर पुन मम्द पा पार करना चाहिये । पर पात पट । पाता। रे पातापातागे। धातार। २२८॥ या परवान्मस्य पत्वं षाच्यम् । धातृणाम् । एवं नप्तादयः मप्तादियएवं व्युत्पत्तिपचे नियमाघम् । तेनान। पिता । पितगे। पितर । पितरम् । शेष धातृवत्। एष लामाधाय । मा । मरी ।। वाधिकार का या मत विचार स पर वो नकार तियको पठार पादेगी धातूपाम् एग नप्त धादि गदा यो बानमा प्युत्पत्ति पप में नरवादि पाप मे या गिध पोता कि उमादि (जो जदम्तम सिया मापगा) तृन पा तृप प्रत्यय सी ममा गर पनात एस मे मदेवन यो मूष २१ में नियरे उनी का दोषोता पोतेको नी पटि पोरी को होता तो म तप्त पादि सातो मग्दों का गुष में मियमा ग्ययीभाता रानिये hि मदीप न दुपा पाकिया समान से बना २। पिता । पितरी। पितर । पितरम्। गपप्प पात एक समान बामन । एमीत्रामात पारिनाममा । पान पद क प बिखत । ना। नगर ०३१ । न च । ६ । ४ । ६ । अस्य मामि वा दीघ । ममाम्। नमाम्। नाम पर रतन या की विकम्प मदीप य । मृणाम् पानाम् । 980 गोतापित् ।।१।६। पोकागनादिहित मबनाम स्थान पित्। गी परमप नामरपान नित् क्षेपमान पाय (चिन्मानमा कायोताराम मी कोप) ऐसा पाकात मटर मोगो मार समाग रे गो. गारा मार - - । । गाशी - ४५ लघुकौमुद्याम् । २३३॥ ौतोऽस्शसोः। ६ । १ । ६३ । श्रोतोऽम्भसोरचि आकार एकादेशः । गाम् । गावी । गा.। गवा । गवे । गो: २ । इत्यादि । प्रो है अन्त्य में जिम के ऐसा जो शब्द तिस से परे नो हितीया का एकवचन वा बहुवचन प्रत्यय सबन्धी प्रकार रहे तो दोनों अर्थात् प्रो और श्रमिलकर पा होवे । गो+ अम् = गाम् गो+श्री यहां गो को णित् मान के (२३२) वृद्दि १८६ भई = गौ+ औ २६ = गावौ । गो+अस =गा गो+अस् पञ्चमी या षष्टी १८७ = गो' इसी तौर सब रूप जानने ॥ २३४॥ रायो हलि । ७ । २१८५ । अस्याकारादेशो हलि विभक्तो। रा। रायो । रायः। राभ्यामित्यादि । ग्लो. । ग्लावा। ग्लाव. । ग्लो-यामित्यादि ॥ ॥ इत्यजन्ता' पुल्लिङ्गा ॥ के धागे हलादि विभक्ति परे रहे तो उम के ऐ को श्रा आदेश होवे । + सरा रै+औ६ = गयो । गय । रे+भ्याम् = राभ्याम् इत्यादि प्रोकारान्त ग्लो शब्द रस्तो+सु =ग्लो । ग्लावी । ग्लाव । ग्लोभ्याम् इत्यादि । ॥ अजन्त पुलिङ्ग समाप्त भया । ar शब्द 1 Kell अथाजन्ताः स्त्रीलिङ्गाः ॥ रमा ॥ 4 २३५ ॥ ौड आप । ७ । १ । १८ । आवन्तादशात् परस्योङ शी स्यात् । श्रीडित्योकारविभतो संज्ञा । रमे । रमा. ॥ रमा (१८३) भावन्त (टाप डाप् वा चाप् प्रत्यय है अन्त्य में जिस के ऐसा जो) अङ्ग से परे जो औङ् तिस को भी (ई) प्रादेश होवे । श्रीङ् यह नाम भी पौट इन दोनों विभक्तियों का है। रमा+श्री = रमा+ई ३२ =रमे । रमा ॥ २३६॥ सम्बुद्धौ च । ७।३ । १०६ । आप एकार. स्यात् सम्बुद्धा। एड्स्वादिति सम्बुद्धिलीपः । हे रमे । हे रमाः । रमाम् । रमे। रमाः । सबुद्धि परे रहे तो भाप के पा को ए आदेश होवे । हे ,रमे १४७ हे रमे २३५ रमाः धितीमा में रमाम् । रमे रमा ।। - 4- हे ४ । । पत्रमा स्थीसिगा। २२७॥ पाहि पाप 101। १.५ । पारि पोसि चाप एकारः । रमया । रमाभ्याम् । रमाभि । पार (य) या भास विभति पो रहे तो पाप के पा को प पादेश हो । रमा पा-रमे+पा २५ -रमया रमाम्यामा रमामि॥ ॥२३८॥ याहाप ।। ३ । ११ । पापी हितो याट । हर्षि । रमाये । रमाभ्य २ । रमाया छ। रमयोः २। रमापाम् । रमायाम् । रमासु । एवं दुर्गाम्बिकादय ॥ 'यदि निमुप (त् बिसवा ऐसा नो सुप् प्रत्यय ) प्रत्यय के पूर्व पारी तो प्रत्यय को याद (पा) पामम होवे । रमा+प (1)-रमाया+ए 15 -रमा माम्य' । रमा+ पम् (करिवार) -रमामाश्रमयो समान पाम एमाराम रमा+२१५ रमान पाम्-मायाम् । रमासु सो रीति से दुर्गा पम्बिका पमा ममा यमुना नर्मदा तनया शादियानने : २३९सव माम्न स्वास्वरच । ७।३।११४ । पावतात सर्वनाम्नो जित स्याहापश्चस्व ।सवस्य । सर्वम्या २ । सर्वासाम् । सर्वस्याम् । मेष रमावत् पामन्त सपनाम मद से परेमो जित सुप् प्रत्यय तिमको स्वाट (सा) भागम होने पर उपमे पूरगती पानो पसोपे । सर्वा+प ()-सर्वस्म । सस्था । पर्वासाम् ॥ सर्वस्याम्मे परमा मम्मो समान वामने ॥ २४ । विभाषा दिवसमासे गाग्रीती । १।१ । २८ । सर्वनामता वा । उत्तरपूर्वसी । उत्तरपूर्वाये । तीयस्येति वा संभा । रितीयस्व । रितीयाये। एवं तृतीया। पम्मातिस्थ Iो पम्पको पहरे परल । बरा । बरसी। बरे। इत्यादि पचे रमावत्। गोपा, विश्वपावत् । मतिः । मती । मत्या इन पारि पमों की विवाप से पनाम चामेबो दियापापीयर पातीती समास मरे । उत्तरपूर्वस्प २५८ मा उत्तरपूर्य २५८ दिन सुप् सत्यम परे राते भी तीय प्रत्ययान्त यमी बी सर्वनाम संचा विवरपरे । रितीयस्यै गतिीया ऐसेही कुतीया पद को भी मानना । सम्मुधि परे सते इस भया २१ पम्म। २बारे प्रसाबरा पिपरसो १० बरे भरम' प्रवादि पत्र में रमा शार भमान बानने । मोपा मम्द के रूप विश्वपा के समान बान । मति तिीया n ।
। ४७ लघुकौमुद्याम् । बहुवचन मती. स्त्रीलिङ्ग होने से न पादेश नभया १५. मत्या यहां भी ना प्रादेश न भया १८५ ॥ २४१ ॥ डिति इस्वश्च । १ । ४ । ६ । इयवस्थानी स्त्री- शब्दभिन्नी नित्यस्त्रीलिङ्गावीदती प्रस्वी च वर्णोवर्णी स्त्रियां वा नदीसंती स्तो डिति। मत्यै। मतये । मत्याः २ मतेः २ ॥ स्त्री शब्द को छोड कर इयङ् वा उवङ् पादेश होते है, जिन को ऐसे जो इंकारान्त वा ऊकारान्त नित्यस्त्रीलिङ्ग शब्द और स्त्रीवाचक स्व इकारान्त पा उका- रान्त शब्द तिनकी नदी सभा विकाल्प से होवे यदि ऐसा सुप् प्रत्यय परे रहे जिसका इत् है । मति-1-ए =२१११२१२ = मत्यै वा मतये १८६ इसी रीति से मत्या'२ वा मतेः । २४२ ॥ इदुझ्याम् । ७ । ३ । ११७ । इदुइयां नदीसंज्ञकाभ्यां परस्य डेराम् । मत्याम् । मतौ शेषं हरिवत् । एवं वुद्ध्यादयः ॥ उन नदी सनक शब्दों से परे सप्तमी के एकवचन डि को पाम् पादेश होये जी हस्व इकारान्त वा उकारान्त के हैं । मत्याम् नेदी सजा न भई, तब मती १८८ शेष रूप हरि शब्द के समान जानने। ऐसे ही बुद्धि, प्रतिपत्ति, उक्ति प्रादि को जानना ।। २४३ ॥ त्रिचतुरोः स्त्रियां तिसृचतसृ । ७ । २ । ६६ । स्त्रीलि- योरेती स्तो विभती ॥ विभक्ति परे रहते स्त्रीप्रतिपादक त्रि और चतुर् शब्द को क्रम से तिस और चतसृ पादेश होवे ॥ २४४ ॥ अचि र ऋत । ७।२। १०० । तिसृ चतसृ एतयो- की कारस्य रेफादेशः स्यादचि । गुणदौर्बोन्वानामभाव । तिम्र. २ । तिसृभिः । तिसभ्य २। आमि नुट ॥ अच् परे रहते तिसृ चतसृ शब्दों के कार को र प्रादेश होवे । यह र प्रादेय गुण दीर्घ और उत्व को बाध कर होता है । तिसस्तिष्ठन्ति यहां गुण, १८२ को बाधकरर भादेशभया। तिस पश्य यहादीर्घ १४ को बाधा। प्रियतिस स्वम् यहां उत्व २३२ को दवाया। तिसार तिसृभिः । तिसृभ्यः २ तिसृ--आम् यहां नुट् आगम भया, तब दीर्घ पाया ।। २४५ ॥ न तिसृचतसृ । ६ । ४ । ४ । एतयोर्नामि दी? न॥ तिसृणाम् । तिसृषु । हे २। होभ्याम् ३ । हयोः२। गौरी। गार्यो गौर्य । हे गोरि। हे गौर्यावित्यादि । एवं नद्यादयः । लक्ष्मी शेष - 86 - प्रसन्ता पीलिया। गोरोवत् । एवं तरोतन्मादय । स्त्री के मित्र । माम् परे रहते तिम चतस गम्दो पो दोघ न होवे । तिमधाम् (२८) तिसपु ३२, PLभ्याम् । प्योर (३०) गौरी १५ गौयों यहां दीघ १४ को वापसार १५ या पशुपा । गोर्य रे मोरि २१ गौग्या रस्यादिमो रीति स नदी पारी शदिनी पो चाममा । परमो गयीण प्रत्यय में नहीं बना रे रस सिये मु मा साप १८ मी मया सरमी पौर पप रूप गोरीवे माग रे । इसी रीति से तरी तन्धी पारि गमी को भी बामना । स्त्री १८ रिच ॥ २१ २४६ ॥ पिया || ४ | | पस्येयवादी प्रत्यये परे । स्पियो। म्पिय ॥ प्रमादि प्रत्यय परे से तबस्सी पहबो गया (इय) पाटेम होवे । स्वी+पो- थियो । पिस २४० ॥ वाम्सोः ।।४ । ८. स्त्रिया अवर। स्त्रियम् । स्त्रीम् । स्थिय । स्त्री । स्पिया। स्थिये । स्थिया २ । परत्वाम्मुट । बीणाम् । स्त्रीषु । यो । थियो । श्रिय । वितीया का एनपचन वा बहुवचन परे सेनो, स्त्री साद को विकल्प से इयर (य) पादेश चोवे । स्त्रियम् वा स्त्रीम् ॥८ स्थिय वा स्त्री स्त्रिया ततीया रिचय स्थियार स्त्री-पाम् यहा रयर को प्यावर परत्व से १२८ नुर पागम मया स्त्रीचाम् । एपीपु । यो यियो चिय'। ॥ २४८ ॥ नेयपदस्थानावस्ती। १।४ । ४ । पूराठवणेः स्थिति ययोन्ताधौदती नदीसंजौ न तो मतु स्त्री। रे श्रीः। थिये । थिये। थिया । प्रिय p परी गम्दको कोर कर हमारवागन्त वारान्त गम्दों पी नदी ममा नये जिन को सर पर सवार प्रादेम होते हैं। पीसो वारप यहां शाप नहीं भया। श्रियै पा बिये बिया या बिय: २४८ ॥ पामि । १ । ४ । ५ । इयरपट म्यानीम्याग्यो पामि वा मदीसन्नी स्तो मत सो। योपाम् । थियाम् । यियि । थियाम् । धनुमतिवत् । सी गम को बोर बर उन शान्त वागत गप्ता को विप न पाम् परे से मनी मचा सोपे भिनमोरया पार पादातर। नही मचा भा नयर भया पीनामा दिपाम् । विपि का चियाम् धनु या प प मलिक - - - ४६ लघुकीमुद्याम सष्य जानने ॥ २५० ॥ स्त्रियां च । ७।१।६६ । स्त्रीवाची क्रोष्टस्तृजन्तवद्रूपं लभते। स्त्री वाची क्रोष्टु शब्द को क्रोष्ट आदेश होवे ॥ २५१॥ ऋन्नेभ्यो डीप । ४ । १।५। ऋदन्तेभ्यो नान्तेभ्यश्च स्त्रियां डीम् । क्रोष्टी गौरीवत्। भूः श्रीवत् । स्वयम्भूः पुम्वत् ॥ कारान्त और नकारान्त शब्दों के आगे स्त्रीलिङ्ग अर्थ में डीप (ई) प्रत्यय लगाया जाय । क्रोष्टर-डीए (ई) १८= क्रोष्ट्री इसे गौरि शब्द के समान जानना । भूशब्द श्री के समान है स्वयभू शब्द पुल्लिङ्ग स्वभू के समान जानना ॥ २५२ ॥ न षट्स्वस्रादिभ्यः । ४ । १ । १० । डीप्टापौ न । स्वसा तिस्रश्चतस्रश्च ननान्दा दुहिता तथा। याता मातेति सप्तैते स्वसादय उदाहृताः ॥ स्वसा । स्वसारौ। माता पितृवत्। शसि मातः । द्यौर्गोवत् । रा. पुंवत् नौग्लोवत् ॥ ॥ इत्यजन्ता स्त्रीलिङ्गाः ॥ षट् सज्ञक और स्वसू आदि शब्दों को प्रागे डीप और टाप् प्रत्यय जो स्त्री प्रत्यय के सो न लगाये जायें। ये सात शब्द स्वस्रादि के हैं । स्वसू, तिसू, चतसृ, ननान्द, दुहित, यातृ और मातृ । स्वसृ + सु २२० । १ । स्वसा । स्वसारौ । मातृ शब्द को पितृ के समान मानना । परन्तु हितोया बहुवचन में मातृ होता है। गोशब्द के समान द्यो को जानना । रे शब्द के रूप वैसे ही जानो जैसे पुलिङ्ग में हुए है ।। ।। अजन्त स्त्रीलिङ्ग समाप्त भया ।। ॥ अथाजन्ता नपुसकलिङ्गाः ।। २५३ ॥ अतोऽम् । ७ १ १ । २४ । अतोऽङ्गात् क्लीवात् स्वमोरम् । जानम् । एस्वादिति हल्लोपः । हे ज्ञान ॥ प्रकारान्त नपुसक अङ्ग से परे जो सु और अम् विभक्ति तिनको प्रम् घादेश होय । भान+सु = ज्ञान+अम्१४८ ज्ञानम् । हे जान ।। २५४॥ नपुंसकाच्च। ७।१ । १८ । क्लीवादौडः शी । भसंज्ञायाम्। नपुसक प्रा से परे जो प्रोड विभक्ति तिस को भी (ई) पादेश होता है। शो पादेश होने से जान गब्द की भ सज्ञा ७८ मुई सय ॥
।
पवम्तनपुंसकविता।
२५५ ॥ यस्येति च ।। ४ । १४८ ईकारे तरितेच मसे
वर्णावर्णयोलीप त्यसोपे प्राप्ते।
वारान्त वातरित प्रत्यय परेसेतो मसनव वर्ष पर पवबा चोप होय भान
+ यही पकार का तोप पाया। तब
२५६ ॥ पोडया प्रतिषेधो वाच्यः। नाने ।
पासिंधकार की या पाना कि पारंपरे तो पूर्व विधि त सगे सो पोको
मो पादेममयास सियेशन प्रकार का सोप न मया शाम+९५ पाने ।
२५७ ॥ वरयसी पि । ७।१।२०। क्लीवात् ।
नपुंसक पा से परे मोबस् पोर पम् पिमति तिनको वि () पादेव गोवे ।।
२५८ाथि सर्वनामस्थानम् । १।१।४२
थिवी सपनामस्मान जाये।
२५६ । नपुंसकस्व झखचः । ७।१।०२ 1 मालम्तस्पावतस्य
च वखीवस्य नुम् स्यात् सर्वनामस्याने।
सर्वनामस्वान परेराते नपुंसक पाको नुम् (1) पायम होवे ।
२६ ॥ मिदघोऽम्त्यात् पर । १३११४७पांमध्ये बोऽन्त्य
स्तस्मात् परस्तस्येवास्तावयवी मित् स्यात्। उपधादी । नामानि ।
पुनस्तहत् । शेर्ष पुवत् एव धनवनवादय ।
पिस पायम कामबार र सोधे सो प्रची में से दो पस्य पप तिस से परे होय
जान+रया कोशामचो नुम पामम विधान विया पर भान पवार से पाने
भवानीवि पनप पर भारी तब सामन् +१दी मया तब पानानि
अव कप राम मम्द से समान पानने । सी रीति बम बन पर पाति सम्म मानने।
२६१ पदातरादिम्य पञ्चभ्य TOU२५ । एभ्य वीवेभ्यः
समोरगादेगः स्यात् ।
भार माम पन्य पायतर पोर इतर न पांच नपुंसक पड़ों से परे बोनु पौर पम्
तिन यो पदर (पद) पादेय होये । यहांत पर तम् प्रत्यय पर्वात् स्तरान्त
पोर मतमानत पदों का पापबरला ॥
२६२ ॥ टे ।। ४ । १४३ । डिति मस्य टेझेप' । मतरत् ।
पातर । कतरे। कतराथि। रे मतरत। गेष पुपत्। एवं कतमत् ।
५१ -- -- लघुकीमुद्याम् । इत्येव ॥ इतरत् । भन्यत् । पन्यतरत् । अन्यतमस्य त्वन्यतमम, उहै रत् जिस का ऐसा नो प्रत्यय सो परे रहे तो भसजक १७८ शन्द की टि ४८ का लोय होये । कतर+मुकतरद् १५८ वा कतरत् । कतरे । कतराणि ई कतरत् भेष रुप राम शब्द के समान जानने । इसी प्रकार कतमत् । इतरत् । अन्यत् और अभ्यतरत् अन्यतम शब्द का रूप भन्यतमम् यही होता है अर्थात् भान शब्द के समान है। २६३ ॥ एकतरात् प्रतिषेधः । एकतरम् । वार्तिककार की प्राज्ञा है कि एकतर शब्द में पूर्वोक्त विधि का प्रतिषेध होवे अर्थात् सुपौर पम् को भड् आदेश न होवे। एकतरम् । २६४ ॥ स्वो नपुसके प्रातिपदिकस्य । १ ।२।४७ । अजन्तस्ये- त्येव । श्रीपम् ज्ञानवत् ॥ नपुंसक लिङ्ग में निस प्रतिपदिक के अन्त मे टीर्घस्वर होवे उसे इस्व प्रादेश- होवे । श्रीपा+सु= श्रीपम् यह धान गब्द के समान है ।। २६५ ॥ स्वमोनपुसकात् । ७ । १ । २३ । लुक् स्यात् । वारि ॥ नपुसक अङ्ग से परे जो सु और भम् तिन का लुक् ( लोप ) होवेवारि+सुवारि । २६६ ॥ एकोऽचि विभतौ । ७ । १ । ७३ । इगन्तस्य लीवस्य नुमचि विभक्तौ । वारिणी। वारीणि नलुमतेन्यस्यानित्यत्वात् पचे सम्बुद्धिनिमित्तो गुणः । हे वारि । हे वारे। घेडितौति गुणे प्राप्ते । वृदयौत्वतृन्वद्भावगुणेभ्यो नुम् पूर्वविप्रतिषेधेन । वारिणे । वारिण.२ । वारिणो. २ । नुमचिरेति नुट् वारीणाम्। वारिणि । हलादो हरिवत् । उस नपुसक पङ्ग को प्रजादि विभक्ति परे रहते नुम् (न् ) आगम होवे जिसके अन्त में उक्त प्रत्याहार के वर्ण होवें बारि+ौ २५५ वारिणी वारि+जस् वा शस् वारीणि । नलुमताइस्य २०५ यह निषेध पनित्य है, इस कारण पक्ष में सम्बुहि निमि- तक जो कार्य है, सो होगा, तब वे वारि। हे वारे । १८२ भया । वारि+3 यहां घेर्डिति- १८५ से गुण और नुम् दोनों पाथे, तब विप्रतिषेधे पर कार्य १२८ इस से गुण ही पाया, सो नहीं भया, क्योंकि इस पर वार्तिककार कहते हैं, कि वृधि भौत्व तृल्याव और गुण की अपेक्षा नुम् होये पूर्वविप्रतिषेधसे। तब नुम् भया, वारिणे ।, वारिण २ वारियो. श्राम परे रहते नुट होता है, १६१ वारीणाम् । वारि+Eि = वारिणि । इलादि विभल्लि परे - - - - - प्रान्तमपुंसकरिता। राते रस के मी पारिसमान वानी। २६०। पस्थिदधिसकष्यपणामनगुदात्त 101810माटादावधि। परिप दपि सरिय पौर पपिल को उदात्त पनर (म) पादेमय रा पादि पमादि विभमि परेराते। २९॥ पश्खोऽपोन 141४11३४। पहावयवोऽसपनामस्थानमवा दिस्वादिपरी योऽन् तस्याकारस्थ खोप दना दनादन २। दध्मो र परवा अपयप सर्वनामस्थान से भिन्न सकारादिया पवादि स्यादि विमति परेरो तो मचक पन्ने पवार का चोप होवे । इन्+पा-दना । दो। सानो । २४८ विभाषा सिरयो ।418 | १६ । पााषयवीऽसर्वनाम स्थानपरी योऽन् तस्याकारस्य खोपो वा स्यााियो परयो । दधिना दधमि । गेष पारिवत् । एवमस्यि सक्य्यधि। सुधि सुधिमी । सुधौनि। सुधे । सुधि। सुधिनेत्यादि । मधु । मधुनी। मपनि । मधी। मधु । सुलु । सुझुनी । सुनि। मुख्नेत्यादि । धाता धातणी । धातृषि । धातणाम्। ।२ धात एवं प्राचादय । सर्वनामस्थान को बोर कर दिया मी पिमणि परे सेतो पाया पायव पम् हे पवार हा सोप विकल्प से होवे। पिन बारपनि । प प पारि सम के समान मानने । ऐसे ही पस्थि मपि पोर पधि को भी मानना । मुषि मधु सुनु भात, चात पादिबोरिकी समान वानों। २०० ॥ एष इग्नस्थादेगे।१।१ । ४८ । प्रयु । प्रपुनी। प्रनि । प्रयुनेल्यादि। परि । परिणी । प्ररोपि। प्ररिणा। एपदेयविकृतमनम्यवत् प्रराभ्याम् । परोपाम् । सुनु । सुनुगौ। सुननि । सुभुनेस्यादिति ।। एच् यो प्रस्य पादेय विधान बरने में प ऐ मोर, पोर पो पोकोमोपे। इसलिए प्रपो को पपु मया सतो मी मारि साप बानी परेको प्ररि मया महो ऐ कोर प्रादेय होने पर भी रस नियम से १५४ पा पादेस ममा बोलिनिवार शेने से एक बम्त दूसरी नहीं हो सकती इसलिए प्रराम्याम् मया स्पाति म पूर्णब गोसम्म यो इस से सुनु भया समीप पारिने पार । पवम्तनपुंसकलिा समाप्तमया । - ५३ लघुकीमुद्याम् । Keअथ इलान्ताः पुल्लिङ्गाः ॥ २७१ ॥ होढः । ८ । २। ३१ । झलि पदान्ते च । लिट। लिड् । लिहो । लिह. । लिड्भ्याम् । लिट्स । लिटत्सु ॥ झल परे रहते वा पदान्त में वर्तमान जो ह तिस को ट प्रादेश होवे । लिड्+सु- लिट् + ७८। १५८ लिट् लिङ् । लिही। लिहः। लिड् भ्याम् (७८) (६८) लिट्सु वा लिटसु २७२ ॥ दादेर्धातीर्घः । ८।२ । ३२ । झलि पदान्ते चीपदेशे दादेर्धातीईस्य घ.। झल् परे रहे तो वा पदान्त में वर्तमान उस धातु के ह को घ प्रदेश होवे, जो उपदेश में दकारादि हैं।" २७३ ॥ एकाची बशी भए झषन्तस्य स्ध्वीः ।८।२ । ३७ । धात्ववयवस्यैकाचो झषन्तस्य वशी भए से ध्व पदान्ते च धुक् ।धुग। टुहो । दुहः । धुग्भ्याम् । धुक्षुः धातु का अवयव जो एकाच झषन्त तद पवयव जो वश् प्रत्याहार के वर्ण तिन को भष् प्रत्याहार के वर्ण हो, स वा ध्व प्रत्यय परे रहे वा पदान्त में वर्तमान होय । तव दुइ + सु = धुक् वा धुम् । दुहौ । दुहः । धुग्भ्याम् । ७८ | १६३ । धुक्षु २७४ ॥ वा द्रुहमुहष्णुहष्णिहाम् । ८ । २ । ३३ । एषां हस्य वा घो झलि पदान्ते च । ध्रुक् । ध्रुग।ध्रुट । ध्रुड् । द्रुहो । द्रुहः । ध्रुग्भ्याम् । ध्रुक्षु । ध्रुट्सु ध्रुट्न्सु । एवं मुह् । झल् प्रत्याहार के वर्ण परे रहे वा पदान्त में वर्तमान जो द्रुङ्, मुङ्, 'ष्णु और ष्णिइ तिन के ह को ध आदेश विकल्प से होय । दु+सुध्रुक् वा 1 ध्रुग् जब ध न भया, तब ध्रुट वा ध्रुड् ७८ । १५८ द्रुहो दुइ' ध्रुग्भ्याम् ७८ ध्रुवु १५३ वा ध्रुटत्सु। इसी रीति से मुह आदि के रूप जानने । २७५ ॥ धात्वादे. षः स.। ६ । १ । ६४ । स्नुट । स्नुड्। स्नुक। स्नुम् । एवं स्निह् । - 18 - माता पुनिया भातु को पादि में मोतिस को स पादेय पोये । परपी स्तुर भया तबस्सुम स्तुम् स्मुट मुरासी रीति स टिपरको स्मिा। २०५ ॥ ग्यप सम्प्रसारणम् । १।१।४५ । या कोमोर पारेग होता सम्पधारप महाता २०० वा जठ्।। ४ । १२ । भस्य वार सम्प्रसारसमट म संत्रक मो वा सम्म तिस लेप को जद (ज) सम्प्रसार हो । २९८ ॥ सम्पसारवारच।।१।१८। सम्मसारपादधि पूर्व- रुपमेवादियः । हरि । विश्वोर । त्यादि। सम्पपारप के पागे पसे तो दोनों मिस कर पृषमा पोय । विश्वमा + अस्-विर+मा+पम्-विवजा ५८-विश्वी स्यादि । २९८ ॥ चतुरनोरामुदात्त । 01१1८८ । सर्वमामस्वाने । चतुर पौर पगार यम पोदात पाम् पारेच वे परिजन से पर सर्वनाम- स्थान पक्ष रिमतिरोतमा पागुरमु-पनपार। २८॥ सामना ।७।१।८२ । नुम् । पनड्वान्। मु विमति परे पते पगार यम्प को गुम् (1) भाममोरे । भारसारम- पमानामु रा५- भगवान्। २८॥ अम् संबुद्धी ।७।१६ पनड्वन् । पनड्वाहोर। पनः । सम्बधि परे खते पनडर हो भम् पामम शोता है।म बिगेरे पनसन् भया अमहवाहो। मनमा अमर ॥ वसुमुध्वसन दः।८।१ । ०२ । सान्तस्म वस्त्र- मतम्य संसादरच द स्यात् पदान्ते । पनडुयामित्यादि । साम्तेति किम् । पिताम् । पदागतेति किम् प्रस्तम् । मस्तम् । सरे पन्त में मिस ऐमा जीपमु प्रत्यय मोरे पन्त में जिसके ऐसा भी सद पार पसु बनु, पमपुर गम्दी में प्राप्य पप हो र पादेन ये फसाना की विषयता में। पनाह म्याम-पनवामित्यादि १०८ । सवापत पटिन पाते तो विरान् यहां भी बारोमाता जी शिवमु प्रत्ययांत तो परमा सबारान्त नहीं २ यानो बारान्तरे।पदात पाने में मरतं महापारादेवन भया पाकि पत पदान्त मानी।
-- लघुकौमुद्याम् । २८३ ॥ सहेः साड. सः 1 ८1३ 1 ५६ । सापस्य सहेः सस्य मूईन्यादेशः । तुरापाट् । तुरापाड् । तुरासाहौ । तुरासाहः । तुराषाङ्- भ्यामित्यादि। उस सकार को षकार आदेश होवे नो साडू रूप सह धातु का है । तुराबाट तुरापाड् । तुरासाही । तुरासाहः । तुरापाड्म्यामित्यादि । २८४ ॥ दिव पौत् । ७ । १ । ८४ । दिविति प्रादिपदिकस्यात् स्यात् सौ । सुद्यौः । सुदिवौ ॥ प्रादिपदिक सञक दिव के व् को पौत् (प्रौ) पादेश होवे सु प्ररे रहवे । सुदिष् + सुसुद्यौः । सुदिवौ ॥ २८५ ॥ दिव उत्। ६1 १ 1 १३१ । पदान्ते । सुदाभ्याम् इत्यादि। चत्वारः । चतुरः चतुर्भिः । चतुभ्यं.॥ पदान्त में वर्तमान दिव् शब्द के व् को उपादेय होवे । सुदिक्+भ्याम् १७८ = सुद्युभ्याम् ! सुधुषु इत्यादि । चत्वारः । चतुरः । चतुर्भिः । चतुभ्यं २। २८६ ॥ षट् चतुभ्यंश्च । ७ । १ १ ५५ ॥ एभ्य भामो नुडागमः ॥ षट् सजा भई है, जिस की ऐसा जो शब्द ३१८ पौर चतुर्शद तिन से परे जो आम् विभक्ति तिस को नुट (न) भागम होवे ।। २८७ ॥ रषाभ्यां नो णः समानपदे । ८।४।१॥ यदि एक पद में र धाप रहे तो उससे परे जो न तिस को ण प्रादेश होवे ।। २८८ । अची रहाभ्यां हे । ८ । ४ । ४६ ॥ चतुर्माम् ॥ यदि रेफ या इ से पूर्व पच् रहे पौर परे यर् प्रत्याहार के वर्णी में से कोई वर्ण रहे तो उस वर्ण को हित्व होवे । चतुर्-- पाम् = चतुर्माम् ।। २८८ ॥ री:सुपि । ८।३ । १६ ॥ रोरेव विसर्ग सुपि । षत्वम् । षस्य हिल्वे प्राप्से ॥ सप्तमी बहुवचन विभक्ति परे रहे तो उसी रेफ को विसर्ग होवे जो होने से भया है, अन्य को न होवे । चतुर्-सु यहा विसर्ग म भया तब १६३ षत्व भया तब ५ को धित्व पाया॥ २६०॥ शरोऽचि । ८ । ४ 1४६ अचि परे शरो न दे स्तः। चतुर्ष ।
सम्ता पुस्तिका
उस पर को रित्व नहोवे विस पागे भरोस रिवेपतु में सिप न मया,
२८१ ॥ मो मो धातो 1८।२।६४ ॥ पदारते प्रगान् ।
भातु के पायव म को न पादेय होपे यदि वा मदान्त में वर्तमान रे तर ।
मयाम्+सु-प्रमान्।
२८२ ॥ विमः क 10/२ । १२ ॥ विमती । क । की। के
इत्यादि सर्ववत्॥
विमति से पूर्व बो विम् भष्ट तिस को पास होवे । विम्+
सुकी
अस्यादि मेष पसर्व पदी समान बामने।
२८३ ॥ इदमो म।। २११.८॥ सो । त्यदायत्वापवाद ।
मु परे रोसो दम् शाम को मारी से। या नियम स्वादीनाम'
२०वा पपवार॥
२८४ । दोऽर पुसि । । २१ १११ । इदम दोऽय् सौ पुंसि ।
भयम् । त्वदायत्वे
मु परेसतेसम्मेरदमाम वो पय् पादेय हो । सम्मु-पबम् दम्
पो.से-++पी
२८५ ॥ पती गुरे । ६।१।८७ पपदान्तादतो गुपे पररूप
मेकादेश
पपदान्त स्व प्रकार से परे मुष संजय पर्वात् ५ ए पा पोहे तो दोनों
मिरबर पर या कप होवे ।द+प+मोद+पो-दो।
२६ । दरच । ०।२१.६ दमो दस्य मः स्यामिती।
इमो। इमे । स्यदादेः सम्बोधन नास्तीत्युत्सर्ग ॥
विमणि परे राते दम् सपो मबार पाडेग होवे। रो-मी। रमे १५५।
स्वदादि यमी या यह स्वमायोपिये सम्बोधन नहीं रखते पति उन्ने सम्बोधन
होता भी
२८०० पनाप्यक । ०।२।११२: पपवारस्य इदम दोऽ
मापि विमली। पापिति प्रत्यार। पनेम।
बमार रहित वो दम पर तिपदमागबो पम् पादेमीप य भादि
पत्रादि विधि परे रोतो+पा-पन-पार५-पम+मन मुचार-पनेन ।
- साधुपौमुद्याम् २८॥ हलि लोप । ७।२ । ११३ ॥ अक्षाकारस्येदर दो लोप चापि हलादी । नानकोडलोऽन्त्यविधिरनभ्यासविवारे ॥ भ्याम् ३ भिम् भ्यम् २ वा नुप् परे रहे तो वाकार रहित इदम् शब्द के घटु भाग का लोप होवे । अलोत्यरय २४ यह सूत्र अभ्यास विवार (जो धातु प्रकार मे आयेगा) को छोड कर और दूसरे अनर्थक में नहीं लगता । समुदाय को अर्थवान् कहते हैं और उस का जो एक देश है, यह अनधक कहाता है । “समुदायोऽर्थवान् समुदायस्यैकदेशो ऽनर्ध" इस कारण इद--भ्याम् यहां जो इटु का लोप विधान किया है, वह अनर्थक है, क्योंकि पद का एक भाग इट है, इम लिये केरल द्, का लोप न अया किन्तु संपूर्ण इद का भया । तब नोष रहा अ जैसे उदाभ्याम् = श्र--स्याम् । २६६ ।। आद्यन्तरदेकस्मिन् । १ । १ । २१ ॥ एकस्मिन् क्रियमाणं कार्यमादाविवान्त इव स्यात् । सुपि चेति दीर्वः । श्राभ्याम् ।। जैसा कार्य आदि और अन्त में लिया जाता है, वैसा ही एक वर्ण से होवे । पूरा कारण सुपिच १५४ से जो दीर्घ श्रदन्त अङ्ग मे होता था, वह इस प्रकार में भी हुआ तब श्र--भ्याम् = आभ्याम् भया। ३०० ॥ नेदसदसोरको । ७।१। ११ ॥ अककारयोरिदमद- सीर्भिस ऐल् न । एभि । अस्मै । एस्य । अस्मात् । अस्य। अनयो २ । एषाम् अस्मिन् । एप ॥ उस भिस् को ऐस् आदेश न होव जिस को पूर्व ककार रहित इदम् वा प्रदत् शब्द है। अभि १५८ = एभि । अस्मै १६६ । एभ्य.। पस्मात् १६७ । अस्य १५३ । धनयोः १६० । एपास् १५८ । १६८ । १६३ । अस्मिन् । १६७ । एषु १५८ । १६३ । ३०१ ॥ द्वितीया टोस्स्वेन । २ । ४ । ३४ ॥ इदमेतदोरन्वादेशे। किञ्चित् कार्य विधातमुपात्तस्य कार्यान्तरं विधातु पुनरुपादानम- न्वादेश । यथा । अनेन व्याकरणमधीतसेनं छन्दोऽव्यापयेति। अनयोः पवित्र कुलमेनयो, प्रभूतं स्वसिति । एनम् । एनौ । एनान् । एनेन । एनयो २ | राजा ॥ द्वितीया टा वा प्रोस् विभक्ति परे रहे तो इदम् वा एतद् शब्द को एन प्रादेश होवे अन्वादेश के विषे । अन्वादेश उसे कहते हैं, जिस का एक वाक्य में प्रयोग होकर कार्यान्तर के लिये पुन उसी का वाक्यान्तर में प्रयोग होना । जैसा इस ने व्याकरण पदा है, इसे वेद पढायो “मनेन व्याकरणमधीतमेन छन्दो ऽध्यापयेसि" यहा इदम् शब्द - ॥ - - 15 सन्ता पुसिया। का प्रयोग प्यावरष पदने में छुपा और एमी का दुवारा प्रयोग वेद पदने में मया पप नरेदम् को एन पादेम भया । य दोनों पवित्र कुसवेरे इन दोनों का धन भी धषित "धगयो पनि दुख पनयो' प्रभूत स्व मिति" यहां भी पादेममया । राजमन मुरा-रावा। ३.२ मरिसम्वुधी' ।८।२८॥ मस्य खोपो न गै सम्वुको राजन् तस नकार या सोप न होवे विस को प्रामे रिवा सम्बधि परे है। राजन् । ३.३ ॥ सावुत्तरपदे प्रतिपेध । मनिष्ठ । राणानी । राजान बीघ्र । रान ॥ पातिक-पार पीयर पाधारे चियदि सत्तरपद परपति विममि परे रहे तो पूर्णाव निषेध का प्रतिपेप गोपे। इसी से प्रमिष्ठ यशोशि परे रहते न वा सोप भया मपि निष्ठा यस्य स बनिष्ठ" । राजन्न पी१८१-राजानी । राबान' । मम्मि सदरच सपरित होता. रात्र 10 ३ ४ । मझोप सुप्म्वरसंचातुग्विधिघु क्षति। ८ । २ । २४ । सम्बिधी स्वरविधी सनाविधी कृतितुग्विधी नलोपोऽसिहो नाग्य च । तेन राजाश्व स्यादौ न । पूत्यसिदत्वादास्वमेवमेस्त्वं च न । राव भ्याम् । यन्या । यन्यानो । यग्यानः । सुपिषि स्परविधि मचारिधि पौर अतितविधि (सत्प्रत्यय परे से तो तुक पागम होता ) करने में मसीप पसिामोतारे पन्या नहीं। इसी से पवम् परप यहां नपार पा खोप पमिस न भया कोंकि यहां मुविधि पादि में से पोर भी नहीं । राम+परप२-रामारप' । राबन्+म्याम यहां भोप १८४ मया तप रामभ्याम् मया पर यहां का नमोप पसिनरी पोनि मुनिधि नीतिय राज पदन्त न मया लिये रात्रभ्याम् में दी ५ रामि' में । म पैम् रामम्प में १५ से पायन मया। यम्पन् गम्द मे यग्या १८१14। यग्वामी यम्पान । १५ । म संयोगाइमन्तात् । । । ४ । १३० । वमान्तमयोगादनी जारस्य लोपी न। यम्यम । यण्वमा। यध्वम्याम्। ब्रह्मणः । ब्रमणा । ग पनपसार या मोपन होणे २८ मिमल पर सारान्त पा महारान्त संयोग रायबम यही पन्चका मे मोप पाया मा पानी भया। यादमा याराभ्याम् मन् म मा प्रभावीसनप । मप्रपा ।
॥ लघुकौमुद्याम् । ५८. ३०६ ॥ इन्हन्पषार्यम्णां शौ। ६ । ४ । १२ ॥ एषां शायेवोप- धाया दीर्घो नान्यत्र । इति निषेधे प्राप्ते ॥ इन्, इन्, पूषन और अर्यमन् इन शब्दों की उपधा को दीर्घ हीवे यदि केवल शि परे रहे तो अन्यत्र नही। ३०७ ॥ सौ च । ६ । ४ । १३ ॥ इन्नादीनामुपधाया दी? ऽसम्बुद्धौ सौ । बत्रहा । हे वहन् ॥ इन्, हन्, पूषन्, और अर्यमन् की उपधा को दीर्घ होय सम्बुद्धि भिन्न मु परे रहते। वृत्रहन्-।-सु = वृत्रहा। हे वृत्रहन् । ३०८ ॥ एकाजुत्तरपदे ण ।८) ४ । १२ ॥ एकाजुत्तरपदं यस्य तस्मिन् समासे पूर्वपदस्थान्निमित्तात् परस्य प्रातिपदिकान्तनुम् वि- भक्तिस्थस्य नस्य ण । वृत्रहणी ।। जिस समास में एकाच शब्द उत्तरपद होवे और उस के पूर्वपद मे र वा ष रहे तो तिस से परे जो प्रातिपदिकान्त नुम् वा विभत्तिस्थ नो नकार तिस को ण आदेश होवे । चत्रहन्--ौ यहा का नकार प्रातिपदिकान्त है, वहणी ।। हो हन्तेञ्जिन्नेषु ।७ । ३।५४ ॥ जिति गिति प्रत्यये नकारे च परे हन्तेर्ह कारस्य कुल्वम् । अल्लोपोन. । वचन दूत्यादि । एवं शामिन यशस्विन् । अर्थमन् । पूषन्॥ जित् वा णित् अथवा नकार परे रहे तो इन धातु यो ह को घ आदेश होवे । हवहन्-।-शम् २६८ वृत्रघ्न इत्यादि । इसी रीति से शाटिन् यशस्विन्, धर्यमन् पीर पूषन् शब्दों के रूप जानने । ३१० • || मघवा बहुलस् । ६ । ४ । २२८॥ मघवनशब्दस्य वा तृ इन्यन्तादेश । ऋ इत् ॥ मघवन् शब्द के अन्त्य नकार को विकल्प से त अादेश होवे । त का ऋ इत्सनक है। ३११ ॥ उगिदचां सर्वनामस्थानेऽधातोः । ७।१ । ७० ॥ अ- धातोरुगितो नलोपिनोऽञ्चतेश्च नुम् स्यात् सर्वनामस्थाने । मघवान्। मघवन्तौ । मघवन्तः । हे मघवन् । मघवयाम् । तृत्वाभावे । मघवा ! सुटि राजवत् ॥ धातु से भिन्न ऐमा जो उगित् (उ ऋ घा ल जिस के पत् हों) घम्ट और लिस के ८
।
सान्ता पुस्सिा।
मबार का सीप मया ऐमा पन धातु तिन पो नुम (न) भामम होवे । मपनामम्बान
परे रासे । मवन्य-मानस-मघवन्स । १८५।२६। १८५ । मवान् । मघवन्ती
मपन्तः । मघवन् । मघापाम् । तपादेय भव नही भया तव प्रथमा पोर रितीमा
पे विपन पर्यन्त रागन् गम्य पो समान रूप बानमे ।
३१२ ॥ श्वयुवमघोनामरहिते । । । ४ । ३३ ॥ पन्मम्तामा
भामामेपामतरिते मनमाग्यम् । मघोन मघवभ्याम् एष श्षम् मुक्न्।
पन् जिम यो पन्त में ऐस जो भर्सनम रमन् युवन् पोर मध्यन् मम
तिनको सम्ममारप रोपे यदि हम से सरित प्रत्यय परे गीतो। मघवन्+पम् -
मधोन' । मधषम्याम् इमी रीति से सम् पौर युवन् मप्दा रूप भी जानने ।
२१३ प्रम सम्पमारसे सम्प्रसारणम् । ६।१ । ३७ ॥ सस्पदीघ ।
यून । यना । युवभ्याम् प्रत्यादि । पर्षा । पवन ॥
सम्पसार परे से तो पूर्व या यो सम्ममारप न सोये। युव+शस-१२ यून'
यूना । युवम्याम् स्यादि। पवन+मु-पगारे पन् ।
२१४ ॥ परमास्भसाषन ।६।४।१२०। मा रातम्या
पंम्मतानस्य त प्रत्यन्तादेशो न तु सी। पर्यन्ती। पषन्त । पवधा
मित्यादि।
माहित(मो)परम् भार (पा पा पा गा) पन्त में मिम प पमा बी पा
तिमको न ममतादेशय यदि म परे हेमोन । पाती। पान्त पाणम्
त्यादि।
०१५ ॥ पयिमय्यभूधामात् । ०। १।८५४ मी
पपिन् मपिन पार समुचिम् गाणे को पाभार पादेमीय म मिति परेराते।
B१ पत्तोऽत् सरगारतामे ।।१।८६ । पम्यादै ।
मगाम स्थान पर गत पयिम् मपिन् पोर मुषिन्सार को पार
भादेगरोच।
२१॥ यो व 101१100 म पधिमयोः म्यम्य म्यादेग मर
नामम्मान । पन्याः। पन्या
० पाप पपिन् गपिन् पाप गरम पे पा मरममापान का।
-
। - लघुकौमुद्याम्। पन्या' पन्थानी । पन्धान । ३१८ ॥ अस्य टेलीप । ७।१।८८ । भम्य पथ्यादेष्टिलोप । पथ पथा। पथिभ्याम् । एव मथिन ऋसचिन । पथिन्, मथिन् और ऋभुनिन् के भ मजिक टि का लोप होवे। पथिन्। शस् पस पथः । पथा। पथिभ्याम् ऐसे ही मथिन्, ऋभुतिन् को भी जानना । ३१६ ॥ नान्ता षट् । १ । १ । २४ । षान्ता नान्ता । सङ्ख्या षट सज्ञा स्यात् । पञ्चन् शब्दो नित्य बहुवचनान्त । पञ्च । पञ्च । पञ्चसि । पञ्चस्य २ । नुट । उस सख्या वाचक शब्द की पट् सना होवे, जो षकारान्त वा नान्स है। पचन् शब्द सर्वदा वहुवचन का वाची है। पम्चन--जस् या शस् २०२ = पम्चन् १८४ पन्न पञ्च । पञ्चभि पञ्चभ्यः२ । पञ्चन्-।-आम् यहां नुट पागम भया तब । ३२० नोपधायाः । ६ । ४ । ७ ॥ नांतस्योपधाया दी? नामि । पञ्चानाम् । पञ्चम ॥ न है अन्त में जिस के ऐसी जो उपधा तिस को दीर्घ होवे, यदि उस से परे षष्टी का बहुवचन नाम् परे रहे तब । पद सन्ना होने से पष्चन् के म का लोप भया १८४ पञ्चानाम् । पञ्चसु। ३२१ ॥ अष्टन या विभत्तौ । ७ । २ । ८४ ॥ हलादी वा स्यात् । हलादि विभक्ति परे रहे तो अष्टन् शब्द को पा पादेश विकल्प से होवे । ३२२ ॥ अष्टास्य श्रीश् । ७ । २ । ८५ ॥ कृताकारादष्टनो ज- शसोरीश् । अष्टस्य इति वक्तव्ये कृतात्वनिर्देशो जश्शसोर्विषये आत्व जापवति,। अष्टौ २ । अष्टाभ्य ३ । अष्टानाम । अष्टासु । पात्वाभावे घष्ट पञ्चवत् ॥ किया है आकार जिस को ऐसा जो अष्टन् शब्द तिस से परे जस् शस् को प्रीश् पादेश होय । अष्टभ्य और ऐसे लघु निर्देश से नस् शस् को श्रीश् प्राप्त होता अष्टभ्य ऐसे गुरु निर्देश से ज्ञापन किया कि प्रात्व विधायक "अष्टन् आ विभक्ती" यह सूत्र इस्लादि विभक्ति के अतिरिक्त अनादि नहां उस की प्राप्ति नहीं थी ऐसे जस् (प्रस्) शस् (अस्) विभक्ति में भी प्रवृत्त होकर भात्व किया, तब प्रौश् (भौ) प्रादेश भया अष्टा पौ २८ अष्टौ २ अष्टाभ्य. ३ अष्टानाम् अष्टासु विकल्प होने से नहा पास्व (प्रा) नहीं भया तथा पञ्चन् शब्द की तरह रूप जानने यथा अष्ट२ मष्टभ्यः २ अष्टानाम् अष्टसु ।
एममता पुमिका ३२३ । परिवग्यधृतम्रगदिगुपिगम्युजिकुष्यो च। ३।२। ५८ ॥ एभ्य विषम । पञ्चे सुप्युपपदे । युनिघोः केवषयो । स्वेनलोपाभावाच मिपास्यते । कनाधिप्ती अस्विक दया मग दिग् सपिना प्रम्प युति कुशुम के पागे पिपन् प्रत्यय जगाया वाय इम में से दो पम्पु भातु म म तो तब होमे जब इस से पूर्व कोर मुमन्त र युषि और अब म तो तब होवे भयानक पूर्व कुछ म र प्रधात् कपम यही है। जो न के खोप वा निपातन करते हैं । पिवम् प्रत्यय के ए और नगरे । ३२४ ॥ सदतिश् । ३।११८२ ॥ अथ धास्वधिकारे तिर भिन्न प्रत्यः कृहमन स्यात ॥ धातो' । ३।। स म क पधिकार में जो प्रत्यय तिर मे पन्य उनकी या मना होवे। २०५ ॥ वेरपृश्यस्य । ६ ।। 401 खोप । परख मनवमी व जिसका मोय होय । ३२६ ॥ क्विन्प्रत्ययस्य कु । ८।२। ६२ । वियम्प्रत्ययो यस्मात् तस्य कवर्गोऽन्तादेगः पदान्से। इत्यस्यासियत्वाच्चो करिति पुत्वम् । पारिवग । पहिषक । परथिमी । एस्विगभ्याम || लिम प्रद म विवन् प्रत्यय पिधान किया गया ग क पन्यवन सो करन पादेश भोपे पास में यह नियम पी ए ३२८ पी पपेचा प्रगिस पागम पारण गोतारे १८ सात्मिण विन्यप की गधा १४८ मवीर को भी ॥ भई तम बोल गेप राम की पात २८२ मा धोम स प पता भी माप १२५ भया । कास्विम् । परिवाचविमोरिपत्र । परिवान्याम् । ३२० ॥ युओरसमामे । 01110॥ युने मपनामम्याने मुम् स्यादम मासे । सुलोप । संयोगासनोप । कुरवा गस्य सः । युर। युयी। युम । युगभ्याम् ॥ सबमाम परेरानो युत्र गाद का नुम् (२) पागम हवे यदि समास में काम सेतो। युम+मु युग्न या युए। पुत्रो । युन्न । युग्म्पाम् । २२८ ॥ चोःषु ।।२।। । घवगम्य फयग म्यामलि पदारते च। मुगुक । सुयजी मुयगभ्याम् । ग्घुम् । खजी। सश्च । पन्भ्यां - ६२ - . लघुक मुद्याम झल प्रत्याहार के वर्ण परे रहे वा पदान्त में वर्तमान हीय ऐसा जो चवर्ग तिसको कवर्ग प्रादेय होवे । सुयुग् । सुयुजौ । सुयुग्भ्याम् । रतुङ्ग-।-सु२३ = छन् । सम्जौ। खुम्जः सन्म्यास् २३॥ ३२६ ॥ प्रश्चनस्जसृजलजवजराजमाजच्छशां ब।८।२।३६ । झलि पदान्ते च । जशत्वचा । राट् । राड् । राजौ। राड्भ्याम् एवं विचाट । देवेट् । विश्वसृट ॥ प्रश्च, स्वस्ज, सज्, नज् , यज्, राज्, वाज, और छ या भ जिस के अन्त में होवें तिन को ष आदेश होय, यदि उन के आगे झल् प्रत्याहार के वर्ण परे रहें वा वे पदान्त में हो । राज्-i-सु =राष् यहा प को जश्त्व करके ७८ ड भया, उस को भी चर्ष ट् । विकल्प से भया, १५८ तब राट् । राड् । राजौ । राड्म्याम् । इसी प्रकार विभाट । देवेट और विश्वसृट के रूप जानने । ३३० ॥ परी ब्रजे षः पदान्ते । परावुपपदे ब्रजेः क्विा स्यात् दीर्घश्च पदान्ते षत्वमपि । परिबाट । परिव्राजी ॥ जव ब्रज धातु के पूर्व परि उपसर्ग उप-पद रहे तब उस से क्विप् प्रत्ययं लगाया नाय और उस के स्वर को दीर्घ और पदान्त में ष श्रादेश भी होय । सर्व परित्यज्य बजतीति परिबाट । परियज्--सु परिबाट = ड् । परिव्राजौ ॥ ३३१ ॥ विश्वस्व वसुराटो । ६ । ३ । २८ । दीर्घ । विश्वाराट विश्वाराड् । विश्वराजी । विश्वाराड्भ्याम् ॥ वसु वा राट् शब्द परे रहे तो विश्व शब्द को दीर्घ होवे । विश्वाराट्, विश्वारा विश्वराजी । विश्वाराड्भ्याम् । ३३२ ॥ स्कोः सयोगाद्योरन्ते च १८१२ { २६ ॥ पदान्ते झलि च व सयोगस्तदाद्यो स्लोलपि । भृट। सस्य श्चुत्वेन भ । झलांजश् झशि इति सस्थ न । झज्जी । भृड्स्याम् । त्यदाद्यत्वं पररूपत्वम् । पद के अन्त में वा भल प्रत्याहार परे रहते जो मयोग तिस के आदि मे जो म वा क् तिस का लोप होवे । अकार भया २०७ फिर पर रूप भया, तव ३३३ ॥ तदो स सावनन्त्ययो । ७ । २ । १०६ ॥ त्यादीनां तदयोरनन्त्ययो स स्यात् सो । स्य । त्यो । त्ये । स तौ। ते। य. यो। ये । एष । एती। एते ॥ -
।
हमन्ता' पुग्विा
सु परे रहते उस तवार पोर दबार पो म् पादेमधे पोस्यदादिक यदि
पेसन के पन्त में न तो त्यह+पु २ . स्य' । त्यो । त्य । तद+मु-स । तो ।
से। यत्न-सु-य । यो।ये एतद+सु-१५-एप । एतो । पत ।
२२४ प्रयमयोरम 101१।२८। युष्मदस्मो परस्य ।
पुस्येतस्य प्रयमाहितीययोश्चामादेश ।
उस विममि को अम् पादेय हो वो चतुर्षी का एपावचन पा पबमा प्रयवा ।
रितीया पीके, पदि दस के पूर्व युष्मद अस्मद साद तो।
३३५ ॥ स्वाही सौ । ७।२।८४ ॥ पनयोम पर्यन्तस्य स्वामी
पादेगी स्त ॥
सुपो वे उस युधम् पोर अपम को यम से स्व पोर पर पादेव दे बो
युम्मद पोर पस्मदो।
३३६ ॥ शेषे चोप 1 0 1 212 । एतयोष्टिलोप हवम् ।
युप्मा पौर पस्मद पर वोटि का सोप धोये । युप्मद+मु-युष्मद+पम
स्वपापम् -स्व+पम् -स्वम् इसी रीतिस प्रस्मद -पहम् ।
३३७ ॥ युवाषी हिवचने । ७ । २ । ८२। दयोरुलापनयोमपयन्त
स्य युवावी स्तो विभयो ।
विभति परे रहते युष्म पोर पस्म को ग्राम रे युव और पार पादेश ये हो
युष्मत् परमद गम्द पारे पीर पे गाद नर दो पोषक यो।
२३८ ॥ प्रथमायारच हिय चमेभापायाम् । ०।२।८८ पौग्रायो
राव जोशे । युवाम। पावाम् ।
पर युष्मद पोर पस्मद गद पामे प्रपमा विमति वा पिपनसपीर पर
सोका पागेपे (पपात् पेट विषय का नहाये) तब उनमें पापा म सोधे । पुम्मद+पो-
युवाम् । इसी प्रकार पस्मद+पी-पानाम् ।
२३८ । ययवया वसि । 01 २ । ८३ ॥ पमयोम पर्यन्तस्य ।
यू यम पयम॥
नम् विभलि पर राते युष्मद् पौर पम्मद ने मपन्ति मा को एप पप् पादेम
with। पुम्म+लम् (पम्) परम धाम (पम् ) २५५ पूपम् पयम् ।
मधुकीमुद्याम् ३४० ॥ त्वमावेकवचने । ७ / २१६७ । एकस्योक्तादनयोर्म पर्य- न्तस्य त्वमौ स्तोविभती। विभल्लि परे रहते एक वाचक युष्मद और प्रस्मद गन्द के मपर्यन्त भाग को नाम से त्व, म, आदेश होवें । युष्मदा-अम् त्वद-न-अम् । ३४१ ॥ द्वितीयायाञ्च ।७।२।८७ । अनयोरात्स्यात् । त्वाम् । मास् द्वितीया विभक्ति परे रहते पूर्वोक्त शब्दों को भा पादेश होवे । त्वद्न-प्रम् = त्व- प्रा- अम् (५०) (१४८)= त्वाम् इसी प्रकार माम् । ३४२११ शमी नः (न) {७११।२६आभ्यां शमो नः स्यादमोऽप- वाद । आदः परम्य । संयोगान्तलोप. । युष्मान् । अस्मान् ।। पूर्वोक्त शब्दों से परे जो शस् अर्थात् द्वितीया बहुवचन तिसको न्-मादेश हो । नकारादेश (८५) से श्रादि को भया, तब सकार का लोप (२३) भया, जैसा युष्म--स् - युष्मद् + न् स् - युष्मद + न् =(३४१) युष्मदान् (५२)-युष्मान् । अस्मान् । ३४३ ॥ योऽचि । ७१ २ १८८ । अनयोर्यकारादेश स्यादला- देशेऽजादौ परत. । त्वया । मया । पूर्वोक्त शब्दों को य, भादेश होवे, यदि उन के आगे ऐसी प्रजादि विमति रहे जिसको कुछ आदेश न हुआ होय तो।युष्म-न-य--पा। अस्मद--य--आ =३४०त्वया। मया। ३४४ ॥ युष्मदस्मदोरनादेगे । ७ १२१८६ । अनयोरात्स्यादना- देशे हलादौ । युवाभ्याम् । आवाभ्याम् । युष्माभिः । अस्माभिः । पूर्वोक्त शब्दों को प्राभादेश होवे जब उन के धागे ऐमी हलादि विमति रहे जिसको कोई आदेश न भया होय । युष्मद-भ्याम् (३३७)= युवद-भ्याम् ३३१ युव-:- घा--भ्याम् (५२)-युवाभ्याम् पावाभ्याम् । युष्मद--भि' ३४४ - युप्म-न-धा मि' (५२) युष्माभि. 1 अस्माभि । ३४५ ॥ तुभ्यमयौ डयि । ७ । २ । ६५ । अनयोस्मपर्यन्तस्य । टिलोपः । तुभ्यम् । मह्यम् । पूर्वोक्त शब्दों के मकार पर्यन्त भाग को क्रम से तुभ्य और मह्य भादेश होवें, नव कि उनके पागे चतुर्थो का एक वचन रहे । युष्मद -।--तुभ्य--डे (३३४) तुभ्यद पम् (२६६)-तुभ्यम् । मह्यम् ।
- । पता पुस्तिका २४६॥ भ्यसोऽम्बम् ।७ | १ | ३ • । पाभ्याम्परस्थ । युष्मभ्यम्। अस्मभ्यम्। पूर्वोह सम्मों से परे वो चतुर्या का बहुवचन म्यस तिस पो अभ्यम् पादेस गोवे । मुष्मद+म्यम् - मुष्मदन पम्यम् (१५५)-युष्मभ्यम् । परमम्यम् । २४० एकवचनस्य च । 01१1३२। पाभ्यो न्सेत् । त्वम्। मत् । पूर्णा पम्दों से परे बो पन्चमी का एपवन सि तिस को पत् पादेम पावे युग्मद समि-मुष्मद+पत् (१४ ) (१२५) स्पत् मन् । ३४८ ॥ पठचम्बा पत्। ७।१ । ३१ । पाभ्याम्पञ्चम्याभ्यसो उत्स्यात् । युष्मत् । पस्मत् । पूोल गादी से परे वो पम्पमी का बहुवचन म्यस् तिस को पत् प्रादेम को। युष्मद+म्पस् - युष्मद् + पत् (३५)- युष्मत् । अस्मत् ॥ २४८ ॥ तयममी एसि।७।२।१५। पनयोम्म पर्यन्तस्य ! पष्टी विमहिमा एवचन परे रो तो पूर्वोत मम्दों को मपर्यन्त माम को ग्राम से तप मम पादेगरि युष्मद् +म्-तवद+स् । २४ म युष्मदस्मार्धा उसोऽय ।।१ । २० । तव। मम । युवयो । पाषयो। पूर्वी मम्मी से परे मो पायी वा एबम स् तिस को पग (प) पावस नीचे व+म् -तपद+प्र१५-तव । मम । युष्मद + धीम् ५.-युपर . + पोस् २५-पुषयो पापमो । २५१ ॥ साम पापम् । ०।१ । १२ । पाभ्याम साम पाकम् । युष्माणम् । अम्माकम् । त्वयि । मयि । युवयो । पापयोः । युष्मासु। पम्मामु पूर्णत सम्हा से परे का माम् (१६८ मुद् मिस बोहोने पासा)पाम् तिपको पाकम पादेगह पम्म+पाम् -गुमान पाकम २६-मुष्माकम् । प्रामाकम् । युप्मर (0)-स्पद+५-पयि । भामद-मथि। युष्मद+पीम् (२५०) ५)-युगयो । परमा-पारयो । युप्मद+म ४-युम्मामु भामद+मु-पामामु। ।
॥ नघुक.मुद्याम ३५२॥ युष्मदस्मदोः षष्ठीचतुर्थीहितीयास्थयोन्निावो 1८।१ २० । पदात्परयोरपादादी स्थितयो षष्ठयादिविशिष्टयोन्निावी इत्यादेशी स्त। किसी शब्द से परे रहे और पाद के यादि में न रहे, ऐमा पष्टी, चतुर्थी वा हितीया विभक्ति के सहित जो युष्मद और अस्मद् शब्द तिनको काम से वाम् और नौ आदेश होवें । इस सूत्र की प्रकृति केवल द्विवचन मे होती है । ३५३ ॥ बहुवचनस्य वस्नमौ । ८ । १ । २१ । उत्तविधयोरन्योः षष्ठयादिवहुवचनान्तयोर्वस्नसौ स्त. ॥ पूर्वोक्त (३५२) विषय मे षष्ठी आदि विभक्ति के माहित युष्मद् वा अस्मद् हो तो उसके स्थान में कम से वम् और मस् प्रादेश होय ।। ३५४ तेमयावेकवचनस्य ८ । १ । २२ । उत्तविधयोरनयोः पष्ठी- चतथ्येकवचनान्तयोस्तमे एती स्तः। पूर्वोक्त ( ३५२ ) विषय में षष्ठी वा चतुर्थी विभति के एकवचन सहित युष्मद वा अस्मद हों तो उनके स्थान मे क्रम से ते और मे यादेश हो । ३५५ ॥ त्वामी हितीयाया 1८।१ । २३ । हितोयेकवचनान्त- योस्त्वामा इत्यादेशौ स्तः ॥ श्रीशस्त्वाऽवतु मापोह दत्तात्तेमे ऽपि शर्म स । स्वामी ते मे ऽपि स हरि पातु वामपि नौ विभु । १ । सुखम्बान्नी दहावीश पतिमिपि नौ इरि: । सोव्याहो नशिशवल्बो नो दद्यात्सेव्यो ऽत्र व स न. । २ ॥ पूर्वोक्त ( ३५२ ) विषय में वर्तमान द्वितीया विभक्ति के एक वचन सहित युष्मद् वा अस्मद हो तो उसको क्रम से त्वा और मा प्रादेश होवें। थी श लक्ष्मी के पति त्या (स्वाम् ३५५) तझ को, मा-(माम् ३५५ ) मुझ को अवतु-पाले। इह = इहा ते (तुभ्यम् ३५४ ) तुझ को, मे ( मध्यम् ३५४ ) =मुझको शर्म = सुख दत्तात् देवेस हरि -वह ईश्वर ते (तव ३५४ ) तेरा, में ( मम ३५४) मेरा स्वामी प्रभु है । विभु = ईश्वर धाम (युवाम्३५२ ) तुम दोनों को, नौ (आवाम् ३५२ हम दोनों को, पातु = पाले। १ । ईश' = ईश्वर वाम् (युवाभ्याम् २५२ ) तस दोनों को, नी ( धावाभ्याम् ३५२ ) हम दोनों को सुख ददातु-सुख देवे इरि = ईश्वर वाम् (युक्यो ३५२ तुम दोनों के, नौ प्रावयो. ( ३५२) हम दोनों का पति = स्वामी है। व. (युष्मान्३५३) तुमको न (अस्मान् ३५३ ) हमको भव्यात् = पाले । यः (युष्मस्यम् ३०३) तुम को 40 बन्ता पुसिता म (परमम्यम् ॥१)मयो गिवम् -बरया, स्यात् देवे । पर यहा (युम्मानम् २११) तुमारे ग (परमाबम्५५) हमारे स-सपर मेक-सपतुम योग्य सेवा फरनको योग्य २५८ (वा) एकवाक्ये युष्मदस्मदादेगा वखध्या एकतिर पवित्रम्। तेनेशन भोदर्म पचतव भविष्यतिापते वाग्मावास्य पमन्यादेगे पा वलव्याः, पन्वादेगे तु मित्यं स्यु । धाता ते मतोऽस्ति धाता तब भगोऽस्ति तस्मे ते नम इत्येव । सुपात् । सपाद् । सुपादौ । एका पाक्म में युष्मद पीर पस्मद गम्दों को पानी पाटि पादेगा। वाव पावसावताबिसम एकातिशत पद हो । रस से यह पोल्न पर नव मरिष्यति मे ५७ से भादेय न दुपा मोवि या तिहस्त पद दोरे पच और भविष्यति । ये वाम्मागादि १११ से पादेम प्रनम्पादेय में पिवस्य बीते (मम्पादेम ।। से वो भिन्नमा पम्पादेय पाहाता) पौर पम्पादेश मे नित्य मा भातासे (118) भमोऽस्ति पा पाता तब मातोऽस्ति-मना तुमारा प्रेम करने पासातस्मते नमावे यहां नप को पैकल्प से पादेम न मया तुम बो नमस्कार ।। मुपात्-९५८ । सुपारी। २५५ पाद पत् ।।४ | १२ माछम्दान्तं यदाम्भमतद वयवस्य पाएछन्दस्य पदादेगः । सुपद । सुपदा । सुपासमाम् । पग्निमत् । पग्निमयो । पग्निमयम् । पादगम्दान्त वो मसय १८ मा तक मो पार गम्य निस को पर पार्दम मेरे पितीया गावचम में। मुपाद+प-मुपद । मुफ्दा १ मुपादम्माम् ।।।।। पी प्रकार सब रूपों को बानो । पग्निमम्+मु-१८५- पग्निमम -पग्निमय १८-पग्निमत्-२ । पग्निमयो । पग्निममम् । ३५० ॥ पनिदिता व उपधाया मिति ।। ४ २४ । भानाममिदितामझामामुपधाया मस्यः लोप फिति सिति । मुम् संयोगान्तस्य लोप । मस्य कुत्वेन । प्रार प्राची। प्राच॥ बिम यात्रामनवमीय ऐमा जोसमन्त पा तिरा पी पधा १८ म सामान मो नमार तिममा गोपगोप बिन पा जिसम्मश्री प्रापय परे राते प्रवृषा म् पातु मिन् प्रत्यय नारे पर हम वामीप भी बातार दोष रोगे पे प्रान्दपुपा तदनन्तर पूड मूष ॥ नमार से भोप लेने में पाप बमा नयतमाम प्रातिपदिक ११५ मे भर मा दनन्तर म सधुकीमुद्याम्। ६५ हुआ = पाञ्च् + सु १८३ = प्रान्च् २३ = प्रान् ३२६ से न को ड भया = प्राङ् (पूर्वदिशा ) प्रान्चौं ७३ = प्राञ्चौ। प्राच. । ३५८ ॥ अचः । ६ । ४ । १३८ । लुप्तनकारस्याञ्चतेभस्या- कारस्य लोपः। लोप होगया है नकार जिसका ऐसा । जो अञ्च् धातु तिसका जो भसजक १७८ प्रकार तिसका लोप होवे । द्वितीया बहुवचन में ॥ प्र+ अन्च् + अ. ३५७ = प्र+अच् + अप्र+च+यः । ३५८ ॥ चौ । ६ । ३ । १३८। लुप्ताकारनकाराञ्चतौ परे पूर्वस्या णो दीर्घः । प्राचः । प्राग्भ्याम् । प्रत्यङ् । प्रत्यञ्चौ । प्रतीच । प्रत्य- ग्भ्याम् । उदङ । उदञ्चौ ॥ लोप होगया है अकार और नकार जिसका ऐसा जो अम्च् धातु सो परे रहे तो पूर्व में स्थित जो अण् प्रत्याहार के वर्ण तिसको दीर्घ होवे । प्र+च+अ. = प्राच । इसी प्रकार प्राच् + भ्याम् १७८, ३२६ और ७८ = प्रारभ्याम् इसी प्रकार और रूपों को बनायो । इग्मी प्रकार प्रति+अन्च् से प्रत्यङ् । प्रत्यञ्ची । द्वितीया बहुवचन में प्रति+ अच्-।- अ' = प्रतीच' प्रत्यग्भ्याम् । उद- अम्च् से उदङ् । उदम्ची। ३६० ॥ उद ईत् । ६ । ४ । १३६ । उच्छब्दात्परस्य लुप्तनकारात ज्चतेर्भस्याफारम्य त् । उदीचः । उदग्भ्याम् ॥ उद-।- उपसर्ग के उत्तर लुप्त नकारक ( लोप हो गया है नकार जिसका) अष्च धातु के अ को ई आदेश होय । उदा-अच्-।-4 = उदीच ।उदीचा उदग्भ्याम्। इत्यादि। ३६१ ॥ ममस्समि । ६ । ३ । ६३ । अप्रत्यान्तेञ्चती । सम्यङ् । सम्यञ्चौ । समीच । सम्यग्भ्याम् ॥ जब अञ्च् धातु के अन्त में कोई प्रत्यय न रहे.तब सम् शब्द को समिप्रादेश होय । समि--अच् = सम्यञ्च =सम्यङ् । सम्यम्ची । समीच. । सम्यग्भ्याम् इत्यादि । ३६२ ॥ सहस्य सधि । ६ । ३ । ६५ । तथा । सध्यङ् ॥ नब अञ्च् धातु के पागे कोई प्रत्यय म र तब सह को सध्रि प्रादेश होवे। सह-प्रन्च = सध्यङ्। ३६३ ॥ तिरसस्तिय॑लोपे। ६ । ३।६४ । पलुप्ताकारे ऽञ्चती t . .
0 माता पुस्ति। पप्रत्ययान्ते तिरमम्तियदिशः। तिर्य। तिय॑चौ। तिरश्च । तिळग्भ्याम् ॥ नही मोप मया पकार मिम का ऐमा वो भास्ययान्त (विस अन्त में कोई प्रत्यय न रो) भन्न पातु मो परे राते तिरम् को तिरि पादेश हरे । तिरस्+पमा तिर तिर्यन्चो रितीया बहुपपन में तिराच' । तियग्भ्याम् । प्रत्यादि। ३६४ माम्चे पभावाम् । ६ J४ ३. पूनाय स्यापतेपधाया मस्य लोपो न । प्राह । प्रायौ । मसोपाभायादलोपो न । प्रायः । माल्भ्याम् । प्राइधु । एवम्पूनायें प्रत्यादय । अछ । कुचा। अभ्याम् । पयोमुक् । पयोमुग्। पयोमुघौ । पयोमुग्भ्याम् । उगि त्यान्नम् । पूजा पये में अन्य बात पत्तमान रो नप उसके उपचा १८ में रहने वाला मो नकार तिसवानापन हो । प्रा २५ पाम् ५५- मा। माम्पोन बीप वन सोने से पवार का चोप न मया तब पाम्ध' भया । प्राच+म्याम् १०८ २१- मान्+याम्प-प्रारम्वाम् । मान-मु-२०-प्राम्+मु १५. प्रामु १- पारद+मु १५५-माधु । सो रीति पूजा पप में प्रत्यापाटि गादों को जानना । शुन्-र । मोरम्बाम् । पयोमुच्+स १८५- पयोमुच् ॥१८ :- पयोमुच १५८- पनीमुख-ग् । पयोमुची । पयोमुच म्याम् १०८ । ११८ पार - पयोमुगुम्बाम । मात् यम मित्रस बारष मुम् १५ोता है। ३६५ । सान्तमस्तस्सयोगस्य ।६।४।१ । मान्तसंयोगस्य मातरच यो मकारस्तम्योपधाया दौर्षी सम्बुची सवनामस्थामे। महान् । महाम्ती। मशम्त । ई महन् । महाशम् ।। पम्स में मिपणे ऐसा मो सयोग तिम पी पचवा मात् मम्द का जीनबार तिस को अपना १८ को दो को समविभिन्न सपनामस्थान को परे पते । मात+म m-मात+मु १५-मान्त-महान्त ५-महान्। मान्ती। महान्तमाम । मात्म्याम् १० भोर-मााचाम् । ६६॥ प्रत्पसन्तस्य चाऽधायरी ।। ४ । १४ । पावनतस्वी धाया गपों धातुभिग्नासन्तस्य रासम्मुखी ।। धीमाम्। धीमस्ती । - - ७१ लधुनीमुद्याम्। धीसन्त । हे धीमन् । शमादौ महद्दत् । भातेडवतु , डिस्वसाम- दिभस्यापि टेोप । भवान् । भवन्तौ । शवन्तम्य भवन् । यदि सम्वुद्धिभिन्न सु परे रहे तो अत्वन्त (अतु प्रत्यय है अन्त में जिस के ) और धातु भिन्न जो असन्त तिरको उपधा १८० को दीर्घ होवे । धीमत्-।-सु ३११ = धीमन्त्-।-सु १८३ = धीमन्त् = धीमगन्त् २३ = धीमान् । मयोगान्त लोप २३ के प्रसिद्ध होने से नलोप (१८४ नहीं होता) द्वितीया के बड़वचन से लेकर सप्तमी के बहुवचन का रूप महत् शब्द के समान जानना । साधातु मे डवत (अवत्) प्रत्यय हुआ तब भा-:- अवत् इस दशा में भा धातु की भ १७८ सना नही है तो भी डवतु प्रत्यय मे जो ड किया है उसी कारण से भा धातु को पा का लोप २६२ से भया तव भवत् इसको साधने की रीति धीमत् के समान जानो । सवान् । भवन्तौ । जब भ धातु से शतृ प्रत्यय लगा कर भवत् भी बनाया जाता है इसका रूप भवत् होता है अत्यन्त न होने से दीर्घ ३६६ से नही भया । ३६७ ॥ उभे अभ्यम्तम् । ६ | १ | ५ | पाष्ठहित्वप्रकरणे ये हे विहिते उभे समुदिते अस्वस्तसंज्ञे स्त. । अष्टाध्यायी के छठे अध्याय के हित्व प्रकरण मेजो दो विदित हैं उन दोनों इकाहीं की अभ्यस्त सज्ञा हो। ३६८ ॥ ना ऽभ्यस्ताच्छतु । ७ । १ । ७८। अभ्यस्ताच्चतुर्नम् न। ददत् । ददती ॥ - ३ - जिन गब्दों की अभ्यस्त सज्ञा ३६७ और ३६८ से होती है उन शब्दों से परे जो गत का अत् तिसको प्राप्त भया हुआ जो नुम ३११ मो न होवे । ददत् यह शब्द दा धातु के प्रागे शतृ प्रत्यय लगाने मे बनाया जाता है । ददत् । ददतौ । ३६६ ॥ नक्षिल्यादय षट् । ६ । १ । ६ । षड् धातवोऽन्ये जनि- तिश्च सप्तम एते अभ्यस्तसंज्ञा म्यु । जचत् । नक्षतो। नक्षत । एवं जाग्रत् । दरिद्रत्। शासत् । चकासत्। गुप्। गुपौ । गुप. 1 गुब्भ्यास्। नायत, दरिद्रत, गामत्, चकामुत्, दीध्यत्, वेव्यत् और सातवा नचत् इन की अभ्यस्त सन्चा होवे । इमी कारण ३११ से नुम् न भया । अक्षत् । अन्नती । नक्षत. । इसी रोति दरिदत् इत्यादि रूपों को जानना चाहिये । पकारान्त गुप् यब्द को लिपुत्ते है। -- । माता पुरियो। पप्रत्ययान्ते तिरसम्तिम्यांदेग । तिर्य। तियेची। तिराम । तिर्यग्भ्याम् ॥ नही मोप भया पकार निम का ऐमा जो पप्रत्ययान्त (बिसवे पम्त में कोई प्रत्यय नसे) पम्प पातु मो परे ते तिरम् को तिरि पादेश रोवे । तिरम्+प -तिएयर तिर्यो रितीया पपवन में तिगच' । तियगम्याम् । इत्यादि। ३६४ माञ्चे पायाम् ।६ । ४ । ३ । पूजाय स्याम्यतेमपधाया मभ्य खोपो न ! प्राए । प्रायौ । मलोपामावादलोपो न । प्रायः । प्राभ्याम् । प्राचु । एवम्पूनार्ये प्रत्यादय । छ । कुचो । कुरभ्याम् । पयोमुक्। पयोमुगा पयोमुची। पयोमुग्भ्याम् । सगि- त्याम्नम् जा पूजा पय में पम्प बात पत्तमान सब उसके सपषा १८ में रहने वाला भो नसार तिसका मीप न थे । मान्२५ - मान् १९५- प्राए । प्रान्चौर बोप कोने से पकार का सीपक मया तब प्रान्च मया । प्रा+भ्याम् १०० २५- मान्+म्पाम् -प्राइम्याम् । प्रा+मु-२३-प्रान्+म २५ मारमु - माद+मु 41 ५-प्रार । सो रोति पूजा अय में प्रत्या पार पप्दी को मानना । हुन्- मुर। मुम्ची। म्याम् । पयोमुन्नस १८५- पयोमुच - - पयोमुन् । १८- पयोमुमा-ग। पयोमुची । पयोमुच ।म्याम् १०८ । १२८ पोर - पयोमुग्भ्याम । मात् सर गित रस कारण नुम् ॥ोता। २६५ ॥ मामतमातस्सयोगस्य ।६।४।१ । मान्तसयोगस्य मातश्च योमबारम्सम्योपधाया दौर्षो सम्वुहौ सवनामस्याने। महशम्। महाम्ती । महाम्त । मान् । मगम् मरे पन्त में मिरा एमा वा ममोग निम को प्रथया मात् गम्द का वा नकार निस पी रुपमा १८ को दोषरे मम्बुधिभिन्न सपनामरमान परे । महत्+मु १५-मान्त+मु १५-मान्त-महान्त २५-महान् । महान्ती। महान महा। मात+भ्याम् १०८ और -महावाम् । BACL पत्थमन्तम्य चाऽधारो।।४।१४। पावरतस्यो या गर्यौ धातुभिन्नासम्तस्य चासमुही। धीमान्। धीमन्ती। ॥ - - ॥ । लघुकीमुद्याम् । 'पौर १५८ = पट्-ड् । पभिः ३ षड्भ्यः ४,५ षष्--आम् ३१८,२८६,७,७८ और ८० पखास् । पट्स वा ६८ पटत्सु । अव पिपठिष् शब्द के रूपों को साधते हैं । पिपठिष् के पकार को र प्रदेश १२० के करने मे षत्व १६३ । २६ से प्रसिद्ध है इस कारण रु पादेश होकर पिपठिर् भया ।। ३७४॥ ऊरुपधाया दीर्घ इकः । ८।२ । ७६ | रेफवान्तयोरुप- धाया इको दीर्घः पदान्ते । पिपठीः । पिपठिषी । पिपठीया॑म् । पद के अन्त में वर्तमान नो रकारान्त वा वकारान्त धातु तिस की उपधा १८० से रहनेवाला जो इक् तिस को दीर्घ होवे । पिपठिर् = पिपठीर् १०८= पिपठी. । पिपठिषौ । पिपठीया॑म् ३७५ ।। नमविसर्जनीयशर्व्यवायेऽपि ।८।३ । ५८। एतैः प्रत्येकं व्यवधाने ऽपि इण्कभ्याम्परस्य सस्य मईन्यादेश.। ष्टुत्वेन पूर्वस्य षः । पिपठोष्ठ । पिपठौः षु । चिकौः। चिकीर्षों । चिकीाम् । चिकीर्षु । विद्वान् । विहांसी । हे विद्दन् ॥ नुम् विसर्ग और शर् प्रत्याहार के जो वर्ण इन में से किसी एक के बीच में रहते भी इण् प्रत्याहार के वर्ण वा कवर्ग से परे जो स् तिस को मूर्धन्य अर्थात् ष् पादेश होवे । पिपठिष्-।-सु १७८, १२०, ३७५, १०८ अोर११८ = पिपठीःषु - पिपठीष्षु इसी तरह चिकीर्ष बन्द को भी जानो । विहस्--सु = १६३,१७७,३११, २३, १८१ पब १८४ से न् का लोप २३ को ३६ से भसिद्ध होजाने से न भया विद्वान् विहांसी हे विहन् । ३७६ ॥ वसीस्सम्प्रसारणम् । ६ । ४ । १३१ । वस्वन्तस्य भस्य सम्प्रतारणं स्यात् । विदुषः । वसुसंस्विति द. । विज्ञहयाम् ॥ जिस के अन्त में वसु प्रत्यय होवे ऐसा जोभसजक १०८ मङ्ग१४६ तिसको सम्प्रसारण २७६ होथे। विद्दस्- अस् = विदुस् + अस् १६३ = विदुष । विश्वस्--भ्याम् १७८, २८२ = विदभ्याम् ।। ३७७ ॥ पुसीऽसुङ् । ७ । ११८६ सर्वनामस्थाने । पुमान् । पुमन् । पुमांसौ । पुस । पुम्भ्याम् । पुसु । ऋदुशनेत्यनङ् । उशना उशनसी॥ पुस शब्द के आगे सर्वनामस्थान सजक १७७ प्रत्यय परे रहते उस को भसुङ् (पुंस् के स को अस्) प्रादेश होवे । जब स को प्रमुङ प्रादेश भया तब अनुस्वार अपने रूप म में प्रागया क्योंकि स को निमित्त मान कर अनुस्वार भया था तो अब निमित्त स् का हे -- । 7 सम्ता पुरिया। गुप् -गु १८-गुप् म् । गुपो । गुप' । मुफ्+भ्याम् १० और ०८-मुभ्याम् । ३० ॥ यदादिषु हमी ऽनाणीचने कञ्च ।३।२।। ।त्यदा दिष्पपदेषु पनानार्थहशे कम्। चात् क्विन् । त्यादि उपपदों पर भान पव मिम्म पर्व में पर्तमान बीग पातु तिस यो पामे हम् प्रत्यय समाया माय पोर पत्र में (पाक्षिक) विन् प्रत्यय भी होवे । २०१६ पा सर्वनाम्न । ।३।८१ ग्रहण्वत्पु । ताम् तादगी । ताहग । ताहग्भ्याम् । वश्चेति प । ववधर्वे । विट् । विद । वियो । विग । पिग्भ्याम् । हम् वाम् पवा पतु प्रत्यय पोरो तो सर्वनाम की पापादेय होवे। तर पूर्वब म धातु से विवन् प्रत्यय दुपा पर उप वा गोप २२५ होने पर सन्त मान ११२ 'मातिपदिक संभाजोतीरे तब तमामु-ताम्मु १५ ताहम् ३२५-ताप ८. और १५- तासग । ताइयो। ताहय । ताइग्म्याम् । रत्यादि । पिए १८ - विप् र -बिट्-२ । वियो । विग । विड्म्याम् इत्यादि। ३०२ ॥ नगेर्वा । ८।२।६३ नगे कवर्गोऽग्तादेगीवा पदारते नक् । मट् । मशी। नगः । नग्भ्याम् । नड्म्माम् । पटो पन्त में राने पामा बो मम् काम तिसवी पच में पपादेय होवे। मग-नए पोर १८-मकना । वर पादेमन भगा तब बिम् २०१ मे समान मानो-मानयो । मय' । नम्म्याम् पा नरम्याम् । २०१॥ स्पृगोऽनुदके विवम् । ३ । २।५८। पमुदके सुप्युप पदे स्पृगे विवन् । घृतस्पृक् । घृतस्पृगौ। घृतस्पृगः। दक्।ि दधृषी। दग्भ्याम् । रत्नमुट् । रत्नमुपौ। रत्नमुहम्यान् । पट । पति पड्भ्यः । पखाम । पट्सु । रुत्वम्प्रति पत्पस्याऽसिहरयाससजुपो- पौर - - रिक्ति कपम्म पदम् माद को बोरकर और कोर मम्द पर नो रग धातु पे पाग शिगन् पश्यप सगापा माप बिन बाप को देयो १०२ पाएम् -तासमा पतरामी। धमापन । तरपन्म्याम् । धप् १११-६पर और १८ पुरम् । पापी । पापाम् । रस्ममुप् ०८ पीर -राममुररानमुपो। राममुहम्याम् । पर पाषरमाल पम् मम्द सो विपते २ । बामा १८और ३१-पम् ०८ १५ से लघुकीमुद्याम् । पश्चादुत्वमत्वे। अमुम्। अम् । अमून् । मुल्वे कृते घिसंज्ञायां नाभावः। बहुवचन में पदस् शब्द के द से परे जो ए तिस को ई और उस पूर्व द को म पादेश होवे । अदे - श्रमी अद--अम् यहा विभक्ति कार्य अर्थात् पूर्व रूप १४८ और ३८० इत्व मत्व भी पाया तो दोनों में कौन तब पूर्वासिचम् २६ से विभक्ति के कार्य के प्रति उत्व प्रसिद्ध हुआ क्योंकि वह त्रिपादि का सूत्र है। इस कारण इस प्रकरण में प्रथम विमति कार्य करके तव उत्द मत्व होता है । अमुम् । अमू । प्रमून् १५० । तृतीया के एकवचन में अमुना होता है, उसकी प्रक्रिया यों है भद-|-प्रा३८८ असु-|-आ हिसन्ना १८४ होकर पा को ना श्रादेश १८५ भया - अमुना । पर यहां यह सन्देह होता है कि जब धिमा १८४ से करने लगे तब ३६ से मुभाव३८. ग्रसिद्ध हो जायगा, और उस के असिङ्ग होने से घिसना न हुई तब घि सन्जा सान कर जो ना १८५ पादेश होता था यह भी न भया तव अमुना कैसा इस के लिये भागे नियस लिखते हैं। ३८२ ॥ न मु ने । ८ । २ । ३ । नाभावे कर्तव्ये कृते च सुसावी नामिधः । अमुना । असभ्यां । अमौभिः । अमुस । अमीभ्यः । अमुष्मात् । अमुष्य । अमुयोः अमीषाम् । अमुष्मिन्। अमीषु ॥ इति । ना आदेश १८५ से करने को हो वा किया हो तो मुसाव ३८० प्रसिद्ध न होये अमुना । अमूभ्याम् । १५८ और ३८० अमीभि. । १६६ और अमुष्मै । १६७ अमुष्मात् । समुष्य । अमुयो १६८ । अमीषाम् । प्रमुष्मिन् । अमीषु ।। । इति हलन्ता पुल्लिङ्गा ॥ अथ हलन्ताः स्त्रीलिङ्गाः ३८३ ॥ नहो ध ।८।२।३४ । झलि पदान्ते च ।। नह धातु के इ को ध आदेश होवे जव कि उस के पागे मल प्रत्याधार के वर्ष रहें वा वह पदान्तसे होवे ।। ३८४ ॥ नहितिवृषिव्यधिसचिसहितनिषु क्यो । ६ । ३ । ११६ । क्विवन्तेषु पूर्व पदस्य दीर्घ. 1 उपानत् । उपानही। उपानत्सु। क्विन्न- न्तत्वात् कुन्वेन घ: उष्णिक। उष्णिहो । उष्णिभ्याम् । धौ. । दिवो । दियः । द्युभ्याम् । गौ. । गिरौ । गिरः । एवं पू. । चतस । चराणाम् । का । के । का । सर्वावत् । - - 1
पता ऍशिक्षा।
गाय भया तो मैमित्तिय का नाश तो पानी निमित्तापाये मैमित्तिवस्याप्यपाय"
पुस्+सु-पुमम् +९११ -पुमनम् सुर-पुमान् स+सुरय-पुमान् प २५ - पुमान् ।
पुमासी । पुंस' । पुंस+भ्याम् १०पीर २५-पुमभ्याम् पुंसु । उपमम् + सुर -प+
पन्न-सु २५-उपगन्+सुथरासना+सु १५-४-साना । हमनसी।
१० । अस्व सम्पुदी या मर नलोपश्च पा पाच्य । हे उपन
२ उगमन । अयन । अयगसो । उगनोभ्याम् । उमगस्सु। भने।
पनासी । हे प्रमेघ । षेधा । वेधसी । रे वेधः । वैधीभ्याम् ।
सम्मुषि पर्यात् मपमा बा पवचन सु विमति परे सेतो ज्यनस् बम्प को पनर
और उसनवार का चोप दोनों विकल्प से हो । अनार (पन्) और न पा पोप धुषा
तको काम । अनरपा पौर मोप न ममा तमो ग्यनन् । बय दोनी न पुए तब २
बसन रे हमनसो। उसनस्+भ्याम् १०८ । १२
१ और २५ उयनोम्याम् । उपमस्तु ।
पोस् गम प २१ -प्रहा। पासो । पनेर। पने होम्याम् । वर पण
वेप पेपा पसी । बोम्याम् ॥
३०८ पदस पी सुखोपश्च ।। २।१०। पदस पोहस्यात्सी
सुखोपरच तदोरिति स । पसौ त्यदायत्वम् परस्पत्यम् छिपि ।
मयमा पा पक्ष पचन सुपिमति परे सेतो पपस् मम्द को पो (स् पो )
पारंग पर उसके मुका डोप होगे। पदस्+मुर. २४५-पा+पौर-भदौ २५-
पसी॥
२८. पदमोऽसेर्दाद दो म ।८।२।८। पदसोऽसारतस्य
दाम्परस्य उद्ती दस्य मरच । पामतरतम्याइस्वस्म ए. दीर्घस्य ।
पम् । नसरणी गुपः ॥
सवार रहित परस् पम्म बेटबार से परे भो स्वर तिम बोस पोर (जीजाब
पर सेतोप पौरपीई सेतीदो) पादेव पीरमरीम प्रादेस गये।
परम्+पो. ०,१८५ पोर १८-पदी-पम् । पदमा - पदे-
३८१ ॥ पत इद् मावचने ।८।२।८१ । पदसोदारूपरस्येत
नस्य मो पदयोंली। पमी । पर्वपासिबमिति विमलिकार्य प्राम
७५ लघुकीमुद्याम्। पश्चादुत्वमत्वे। अमुम् । अम् । अमन् । मुत्वे कृते घिसंज्ञायां नाभावः। बहुवचन में श्रदस् शब्द के द से परे जो ए तिस को ई और उस पूर्व द को म पादेग होवे । प्रदे-अमी अद--अस् यहा विभक्ति कार्य अर्थात् पूर्व रूप १४८ और ३८० से उत्य मत्व भी पाया तो दोनों में कौन तव पूर्वधासिकम् ३६ से विभक्ति के कार्य के प्रति उत्व प्रसिद्ध हुआ क्योकि वह त्रिपादि का सूत्र है। इस कारण इस प्रकरण में प्रथम विभक्ति कार्य करके तव उत्व सत्व होता है। अमुम् । नमू । अमून् १५० । तृतीया के एकवचन में अमुना होता है, उसकी प्रक्रिया यों है प्रद-प्रा३८८ असुन-मा घिसन्ना १८४ होकर पा को ना श्रादेश १८५ भया -अमुना । पर यहा यह सन्देह होता है कि अब धिसजा १८४ से करने लगे तब ३६ से मुभाव ३८० प्रसिद्ध हो जायगा, और उस के प्रसिद्ध होने से घिसन्ना न हुई तब घि सज्ञा मान कर जो ना १८५ पादेश होता था यह भी न भया तव अमुना कैसा इस के लिये आगे नियस लिखते हैं। ३८२ ॥ न मु ने । ८ । २ । ३ । नाभावे कर्तव्ये कृते च सुसावी नामिधः । अमुना । अमभ्यां । अमीभिः । अमुष्मै । अमीभ्यः । अमुष्मात् अमुष्य । अमुयोः अमीषाम् । अमुष्मिन्। अमीषु ॥ इति ।। ना आदेश १८५ से करने को हो वा किया हो तो सुभाव ३८० . प्रसिद्ध न होये अमुना । अमूभ्याम् । १५८ और ३८० अमीभि । १६६ और प्रमुष्मै । १६७ अमुष्मात् । भमुष्य । अमुयो १६८ । अमीषाम् । अमुष्मिन् । अमीषु ।। ॥ इति हलन्ता पुल्लिङ्गा ॥ ा अथ हलन्ताः स्त्रीलिङ्गाः ॥ ३८३ ॥ नहो ध. । ८।२।३४ । झलि पदान्ते च ॥ नह धातु के ह को ध आदेश होवे जव कि उस के आगे झल प्रत्याहार के वर्ण रहें वा वह पदान्त होवे ॥ ३८४ ॥ नहितिवृषिव्यधिशचिसहितनिषु क्यो । ६ । ३ | ११६ । क्विवन्तेषु पूर्वपदस्य दीर्घ । उपानत् । उपानही। उपानत्सु। क्विन्न- न्तन्वात् वाल्वेन घ: उष्णिक । उष्णिहो । उष्णिग्भ्याम्। धौ । दिवौ । दियः । द्युभ्याम् । गौः । गिरौ । गिरः । एवं पू: । चतस. । चतस्तृशान् ! का । के । का । सर्वावत् । - -- - २। विम्- पशान्ता स्त्रीमित्रा मरि (पोधना) जति (होना) अपि (वरममा ) व्यधि (तारन करना ) पषि (पमकमा) मशि (साना) पौर तनि (पंचाना) म भातुओं के पन्त में बम विषप् प्रत्यय चमावा पाय तम इनसे परे राते रन से भो पूर्व पदरे तिसदीयोवे । + मरविवप् -रुपानामु१५-सपाना - १२ पान और १५८-सपामत-६। छपाना चपाना+सु-पान +स-पामत्सु । समिर भय क्विन् प्रत्यय बनाया वातास कारण उसको ध पादेश दुपातम पम्पिए ८ पोर १८- सपिर-गायिो।पि+भ्याम् १०८ पौर ०८ -अडिपम्म्याम् । दिम् २८1- पो दियो । दिप' । रिभ्याम् । पोर -पुण्याम । पुषु। निर् १08-मी निरो मिए । सी रीति पुर से पू । पुरी। पुर। प्रबमा पोर रितीया के पाचन में पास चतुर पम् २५-चता । साचतपणाम् । नीति में किम् गरबा पकापोत्य -माका+पो २१५-से गरम में का । मेवप सो पम पमान बामने। १८५ ॥ य सौ।। २।११ । पदमी दस्थ य । इयम् त्वदा यत्वम् । पररूपत्वम् । टाप् । दरति म । प्रमे। पमा । इमाम् । पमया । इणि खोप । पाम्याम् । पाभि । पस्य। भस्था । पनयो । पासाम् । प्रस्याम । पासु । सम । अव । सग्भ्याम् । स्यदायत्वम् । टाप् । स्था। ये । त्या । एवं तद् । एतद् । पाक् । पाचो। वाच । भप शम्दो नित्यम्बावधनारत । सप्तग्निति दी । पाप । प्रथमा के परवचन में वर्तमान मोसम अम्य निसरीय पादेयो। -२८९यम् । प्रबमा के पवन वो घोषवा और चिडि परेरात प्रथम र पो २२० से पवार मया पिर २८५ से पररूप कोबर स्त्रीलिमोने कारण टप्प्रत्यय सगावर रदा पारद+पो २५-मा+पो २-इमे । रमा'माम् । तृतीग रिममि के पचपन में+पा-२८०-गापा २५०+म+पाप-प्रनया । साहि विमति परेराने समाजोप २८८ होनारे । दा+पा-चाम्याम् पामि । पस्य १८ । पस्या । इदा+पोए २८० । २५० और १५-पनयो । रा+पाम् १५८ पौर १८८-पासाम् । रा+२१ पोर २१८ परणम् । पामु २८८ । म+सु १५५-पण १९८-पन् १५८ पौर ११८-मच-मम मगम्याम् १२० पोर २५८। बेटे राम से पदा बनाया गया. ही रीति स्परेत्या १५-स्या।मे। त्या । तर से पाने । ताः। यन्ये यामे।मा ।बाप १८१८-पान । पाची। पामम्माम् १०८ १८ और 99 लघुकीमुद्याम्। ७८ १६३ । वादु । अप् शब्द सर्वदा वहुवचनान्त है प्रथमा के वहुवचन में दीर्थ होता है २२१ प्राप । दि० मे अपः । अय-न-भिः । ३८६ ॥ अपो भि । ७।४ । ४८। अपस्तकारी भादौ प्रत्यये । अनि. । भयः । अपाम् । अप्सु । दिक् । दिग् । दिशः । दिग्भ्याम् । त्यदादिष्विति दृशेः क्विन् विधानादन्यत्रापि कुल्वम् । दृक् । दृग् । दृशौ । दृग्भ्याम् । त्विट त्विड त्विषो विड्म्याम् । ससजुषोरिति रुत्वम् सजः । मजुषी सजाम् । पाशी । आशिषौ। आशीाम । असौ उत्वमत्वे अम् । अमः । अमुया । अमभ्याम्। अमभि । अमुष्यै । भमभ्य. । अमुष्याः । अमुयोः। अमूषाम् । अमुष्याम् अमूषु ॥ इति ॥ अप् शब्द के प् को त् पादेश होवे, अब कि उसके पागे ऐसा प्रत्यय रहे जिस के आदि में भ रहे । अप्--भिः = अत्-न-भि. ७८= अनि. । पहा. २ । प्रपाम् । अप्सु दिश ३२३,३२६, ७८ और १५८ - दिक्-ग् । दिशौ । दिश' । दिग्भ्याम् १७८ । दृश् धातु से क्विन् प्रत्यय ३२३ भया इस कारण इस के पन्त्य श् को ३२६ से कुत्व होकर ग् हुमा । दृक् म् । दृशौ । दृग्भ्याम् । त्विष् । ७८ और १५८ = त्विट-ड् । त्विषौ त्यिड्भ्याम् । सजुष्--सु १८३ सजुष् १२० = सजुर् ३७४ = सजुर् १०८ = सजू ( मित्र ) सजुषो। सजूाम् १७८ । इसी रीति आशिष् = आशी । आशिषौ । पाशोाम् । पदस् ३७८,३३३ = असी । और विभक्तियो में उ ओर म भया ३८० प्रमू । पम् । प्रमुया २८७। प्रमूभ्याम् । प्रमूभिः । अमुष्ये २३८ । प्रमुस्य. । प्रमुष्या. । प्रमुवोः २३७ । प्रमूषाम् १६८ । प्रमुष्याम् २१३ । - । । अमूषु । ॥ इति इलान्ताः स्त्रीलिङ्गा ॥ ॥ अथ हलन्ता नपुंसकलिङ्गाः ॥ स्वमोलुंक् । दस्वम् । स्वनडुत्। स्वनी। चतुरनडुहोरित्याम् । स्वनड्वांहि । पुनस्तहत् । शेषम्पुम्वत् । वाः । वारी । वारि। वारा। वााम् । चत्वारि । किम् । के । कोनि । इदम् । इमे इमानि ॥ नपुसक लिङ्ग के जो शब्द रे तिन से परे जो सु और पम् हो तो उम कालोप होवे २६५ स्वनडर शब्द को द माने अच्छाईस जिस जगह - सम्मा नपुंगवरिना। पर रेवा विस पुर में ) समदुरी २७ । स्वनाधि २८० १८ शेर २५ । रसी रीति रितोया के मीप सिहते रे। सेप रोसोमित २८ समान चानने । पार । (मस) वा १ सवारी 18 । वारिसका पारा । वायाम । पावारि । मरण पाचन सपनाम बिम् माप लिखतरे । धिम् २५५ । के २४ पौर २८२ । बामि २१८ पीर २८२ । सपनाम इदम् पम्म क प लियते शरदम् ५५ पौर २८५ मे २. २८और सामामि २४० २५८॥ २८० (वा) पवादेगे नपुसके एमहताम्य । एनस एने। एमानि एमेन। एनयो । ब्रहा। पह । विमाषा न्श्यिो । पड़ी। पामो पहानि । पवादेय१पी विधा में पने पासा पो एतद गट तिस पो नपुसमाथि में एमत् पादेय होवे । एनत् २५ । एने २ ८ । २८५ । पौर २५४ । पनेन। पनयो । अम २५१ पोर १८४ापा से पमो पा पानी २५८। पहानि २१०। १८ - चौर १९॥ - - २८८ पान् । ८ । सापडम्निन्यस्य रु पदान्त। पहोम्याम् । दरिया दरिम्नी दरडोमि। दरिउभ्याम् । सुपयि । टिषोप सुपयौ । मुपग्यानि । सक । उर्जी । उनि मरमानां संयोग तत् ते। तानि। यत । ये । यानि । एतत् । एते । एतानि । गवाक् । गोची । गर्वाचि। पुनस्तहत् । गोचा । गयाग्भ्याम् । यतत् । महतो । गम्ति । ददत् । पदान्त में वर्तमान बोपान् सम्द तिनकार तोर पादेय होये। पा+ भ्याम् -पार+म्पाम् १२१-पा+सम्याम् १९-पोभ्याम् । दपिए से सरि २५॥ पौर सरिनी शारीनि। १७ पोर ११ दपिन्+म्माम् १० भोर १८ इपिसम्याम् । सुपरिन् से मुपपि । शिवचन में रिका सोप भया १८ -मुपची। मुपरमागि २५०८।२५ और सब से बाँसिन्दाहरणम् र पीर बन तीन वर्षों बा संपोगरे। भवनाम तापे तत् सर पर सातानि र से यत् ।ये। याति । एतद से एतद । एते एतानि । गोपूर्वक पन्न् पातु गाय मेगा गो-ए-मो पच् २० और १-गवा-मार मोरी १०८ पौर सागवान्दोमान्चिरितीमा विमति में मी ऐसी एप होते । गोगा। भवाम्पामित्यादि । महा (रिमा) मातीमारित ददत् (देवाचा)।
७८ । - - ॥ सवुकौमुद्याम् । ३८८ ॥ वा नपुंसकस्य । ७1 १ । ७६ | अभ्यस्तात्परो य. शता तदन्तस्य लौवस्य वा नुम् सर्वनामस्थाने । ददन्ति । ददति । तुदत् ॥ नपुंसकस्ति में वर्तमान अभ्यस्त सनक जो यतृप्रत्ययान्त शब्द तिसको विकल्प से नुम् होवे जयकि उसके बाद सर्वगामस्थान संभक प्रत्यय परे सें। ददन्ति वा ददति । सुदत्-सु= २६५ तुटत् ।। ३६० पाच्छीनद्योर्नुम् । ७ । १ । ८० । अवर्णान्तात्परो यः शतुर- वयवस्तदन्तस्य नुम् वा शीनद्यो । तुदन्ती । तुदती । तुदन्ति । भात् । भान्ती। भाती । भान्ति । पचत् ।। थी २५४ नदी २०८परे रहते प्रकारान्त पद से शतृ प्रत्यय का अवयव जो त् खी जिस के अन्त रहे तिसे नुम् आगस होवे विकम्प से । तुदन्ती वा तुदती तुदन्ति । भात् । भान्ती वा भाती । भान्ति । पचत्-।-सु २६५ ॥ ३९१ ॥ शपश्यनोनित्यम् । ७ । १ । ८१ । शपश्यनोरात्परो यः शतुरवयवस्तदन्तस्य नुम् शौनयोः। पचन्ती । पचन्ति । दीव्यत् । दीव्यन्ती। दीव्यन्ति।धनुः। धनुषो। सान्तेति दीर्घ । नुम् विसर्जनौयेति षः। धनूषि । धनुषा । धनुाम् । एवं चक्षुई विरादयः । पयः । पयसी। पयांसि । पयसा । पयोभ्याम् । सुपुम् । सुपुसी । सुपुमांसि । अद. । विभत्तिाकार्यम् । उत्वमत्वे । अमू । अमूनि । शेषपुवत् ॥ सप् (यह प्रत्यय भ्वादि गण के धातुओं के प्रागे लगाया जाता है) वा श्यन् (यह दिवादिगण को धातुओं के आगे लगाया जाता है) के प्रकार के प्रागे जो शतृ का त् सो है पन्त में निराके तिसको नुम होवे । परन्ती। यहां शप् के प्रकार से परे तकार है। पचन्ति इस रीति दिव्यत् यह श्यन् को आगे भतृ लगाकर बना है। दीव्यन्ती। दीव्यन्ति धनुष से धनुः २५५ । १२० और १०८ । धनुषी १६३ । या सकारान्त शब्द है इस कारण दीर्घ भया २६५ से । नुम् के व्यवधान में भी ३७५ से स को ष भया तब धनूंषि । धनुषा । धनुष्--भ्याम् १२० = धनुर्ध्याम् । इसी रीति चक्षुष् विष् पादि शब्दों को भी जानना। पयस्-।-सु-२६५ । १२० और १८० पयः पयस्-भ्याम् १२०, २ और ३२ = पयोभ्याम् २६५ पौर २३ । सुपुम् २५४ सुपुसी । सुपुमांसि ३०८,३११ और २६६ अदस्-श्रद । प्रथम विभक्ति कार्य होकर उत्व मत्व होता है, ३८० अमू । अमूनि । शेषरुप पुस्लिन के समान जानो। ॥ इति हलन्ता. नपुंसकलिगाः ।।
.८ पर - यता नरबसिया। वा जिस कुल में ) वमपी २५५ । स्वनाधि २८० १८ घोर ८२ । इसी रीति वितोया से भी प सिहोते हैं। मेप रो सो पुमित २८ के समान मानने वार । (मस) पा १ ८ पारी ४ वारि २२० । पारा । वायाम् । चापारि। २०४ । प्रान पाचन सपनाम बिम् गम्द से कप विषते । किम २० । वे पोर २८३ । बामि २८ पौर २८१ । सरमाम सम् यादव पसियते ।रदम् २५४ पौर २६५ मे २० २८५ पीर सामामि २२० २१८॥ ३८० ( वा) भग्वादेगे मपुसके एमहत्वध्य । एनत्। एने। एनामि एमेन । एनयो । ब्रहा। पा। विमाषा मिश्यी । पी। पानी पानि । पन्वादेपवी विषचा में रहने पाखा वो एतद पद तिमो नपुमबति में पनत् पदिय रोपे । यमत् २१५ । एने २ ८ । २८ । पोर २१ । पर्नेन। पनयो मन्। नम्र २५९ पीर १८ । पान से पद्रो वा पानी २५८। पहामि २४०। ५८ पौर १८१ - २८८ पान् । ८।२।८ापाम्मिायस्य पदान्ते। पहोम्याम् । दरिस । दरिनो दण्डोनि। दरितभ्याम् । मुपवि । टिशोप सुपयो । सुपग्यानि । उक । सन्नी । उर्खि । नरवाना सयोग तत् ते। तामि। यत् । ये । यामि । एतत् । एते । एतामि । गधाक । गोची । गाधि। पुनस्तछत् । गोचा । गषाग्भ्याम् । यतात् । महतो । मठन्ति । ददत् । पदान्त में वर्तमान मी पान् पद तिपय नकार को भाग हो। परन्+ म्याम् -पार+म्याम् १२१-पा+म्माम् १२-शोभ्याम् । पिरन् मे सरिसर पौर सिमी पातीनि । १० और १८१ परिसन्न भ्याम् १०८ भोर १८ दरिसम्पाम् । सुपपिन् मे मुपपि पिचन में टिपा टोप मया - •मुपपी।मुपग्मानि २५०८।१५।११ भोर १०। जोगाई १८ वर्मा।भिपदारप में न् र और नतीन पर्चाबा योग भवनाम तद मे तत् ५५ पौरपान मे यत् । ये । यानि । पतद से पतद । एते पतानि । मोपुषका पम् पातु रे गाव वेग मोन पम्प ०-गो पप ५० पोर ५-पाप-गवान गाची । और १४ागमचो।मगलिस रितीपा पिमति में भी ऐमसी पोतेर गोगा। गवामयामियारिमन् (रिम) महती सहन्दि गदिदत् (नाडा)। - ।
७८ माफीमुद्याम् । ३८८ ॥ या नपुंसकस्य । ७ 1 १ 1 9६ | अभ्यस्ताल्परो यः शता तदन्तस्य लीवस्य का नुम् सर्वनामस्थाने । ददन्ति । ददति । तुदत् ॥ नपुंसकलिङ्ग में वर्तमान अभ्यस्त संज्ञक जो यतृप्रत्ययान्त पद तिसको विकल्प से नुम् होवे जयकि उसके वाद सर्वनामस्थान संभक प्रत्यय परे से । ददन्ति वा ददति । तुदत्-।-सु-२६५ तुटत् ।। ३९. आच्छौनयोर्नम् । ७ । १ । ८० । सवर्णान्तात्परो यः शतुर- वयवस्तदन्तस्य नुम् वा शीनद्यो । तुदन्ती । सुदती । तुदन्ति । भात् । भान्ती । भाती । भान्ति । पचत् ॥ भी २५४ नदी २०८परे रहते प्रकारान्त सटद से यत प्रत्यय का अवयय जो त् सो जिस के अन्त रहे तिसे नुम् भागस होवे विकल्प से । तुदन्ती वा सुदती तुदन्ति । भात् । भान्ती या भाती । भान्ति । पचत्--सु २६५ ॥ ३८१ ।। शपश्यनोनित्यम् । ७ । १ । ८१ । शपश्यनोरात्परों यः शतुरवयवस्तदन्तस्य नुम् शौनद्योः । पचन्ती । पचन्ति । दीव्यत् । दोव्यन्ती। दीव्यन्ति। धनुः। धनुषी। सान्सेति दौर्ष । नुम् विसर्जनीयेति प.। धनूषि । धनुषा । धनुाम् । एवं चक्षु विरादयः ।पय. । पसी पयांसि । पयसा । पयोभ्याम् । सुपुम् । सुपुसौ । सुपुमांसि । अद. । विभतिकार्यम् । उत्वमत्वे । अमू । अमूनि । शेषपुंवत् ॥ शप् (यह प्रत्यय भ्वादि गण के धातुओं के आगे लगाया जाता है) वा श्यन् (यह दिवादि गण के धातुओं के प्रागे लगाया जाता है) के प्रकार के भागे जो शतृ का त् सो होवे । पचन्ती। यहां भा के प्रकार से परे तकार है । पचन्ति पन्त में जिसके तिसको नुम इस रीति दिव्यत् यह श्यन् को धागे शतृ लगाकर बना है। दीव्यन्ती। दोव्यन्ति धन धनुः २५५ । १२० और १०८ । धनुषी १६३ । यह सकारान्त शब्द है इस कारण दो में भी ३०५ स को ष भया तब धनूंषि । धनुषा से । नुम् के व्यवधान धनुष्--भ्याम् १२० - धनुर्ध्याम् । इसी रीति चक्षुष् इविष् भादि शब्दों को भी जानना पयस्-।-सु-२६५ । १२० और १८० पयः पयस्-भ्याम् १२०, २ और ३२ = पयीभ्याम् २१ पौर २३ । सुपुम् २५४ सुपुली। सुपुमासि ३०८,३११ और २६६ पदस्-अद. । प्रथम विभा कर्य होकर उत्व मत्व होता है, ३८० अमू । अमूनि । शेषम्य पुझिङ्ग के समान जानो। ॥ इति हलन्ताः नपुसकलिङ्गाः ।। - से से । भया ३६५ - पश्यामि। । II अथाव्ययानि ॥ ३८२ ॥ म्बरादिमिपातमध्ययम । १।१ । ३० ॥ वो गर स्वरादि गप में पदे पोर बिनवी निणात मा होती रेबोनी पव्यमबहारे। परिये स्वरादिनामा पर्ष शिपतेरे सा स्वमसीक वा परोष । पन्तर मोच में। प्रातर मात सात। पुनर फिर मा निाचय। मनुतन विपाना । जस् । चा। निरंस नीषा। शर्मस् हीरे धीरे । भाषा पचित पा स्वीबार माते बिमा । युगपत् एसकास में। परात् दूर पा समीप । पमा पतग । प्रम को दिन तगमा (शाब)। खस को दिन पविमा (स)। रिमा दिन में। पपी रात में । सायम् भावाब में। चिरम् देर में । मनाम् अपत् पत्य । बोषम् पानसमा पुपचाप । तूप्पीम् चुपचाप । परिम् परस् मार की पोर समया । मिसपा, समीप । स्वयम् पापणी पाप । एबा निम्पर । नाम् रातमें । नम् नहीं। रेती निमित्त वि। साचात् । पहा साचात् वा स्वीकार । सामि पापा वा निन्तित बत् प्रत्ययान्त मो अादमी स्परावि गर में दिये गये रे। मानपात् पासपो ममान । पिववत् पनी यो समान। समा सनत् सनात् सदा पपा दिमाग । तिरम् रेवा विपना मा पराबित होना पम्तरा बीच में से वारवापर अन्तरेष वर्मना । ज्योष विषम् । मरन मी वापस समय बम्बर सुध निन्दा या मस्तक गम् सुप मासा पास्मात् वा पपिचारसे बिना शेषपर माना। पनेष वा पोपपर, स्वस्ति मारा स्वचा इसका प्रयोग पितृसंबंधीपान में पाता । परम् भोमा । मरपूर यति पा रोकना । पर जोपर बोपर ये तीमी प्राय देव को दान में पाते पन्यत् दूमरीरीति से पस्ति रेठांमु परगट से पमा पामा । विहायसा पाहाय से दोषा रात । मया मिथ्या भूम मुषा म्यर्ष पुरा निरन्तर परिये से पा पातन्नमबिम (श्री भविष्य के ममीप) मिपो, मिवम् पशान्त वा साम प्रायम् पियेप बरसे माम् अनेक बार पपारिया मगाएवम् समान बाद पा चपर। पापस्तम् बहात्मार (पोराबरी परना) पामोरम् पारम्बार, सावं साम् गर गमत् प्रपाम पारिलिए पर्मना । पिन् भिवारा बमनाना । पम धमतर। पम् गीतापापा पाम स्वीपार। प्रताम् मानि (चीमहोना) प्रगान् यात, प्रतान बदामामा पामा निमेष नाममा मेवादिगार पर पर प्रपिता पा पादर पष मिाया कपल, ठीक । शश्वत्, - . - दिखाना, खलु, है अध्ययानि । एवम्, ऐसा ननम्, निरन्तर, युगपत्, एगही समस, भूयस् बारा चार वा अधिक, कूपत्-प्रश्न, कुवित्, अधिक । नत, सदेह, चेत् चण, यदि याच्चित्, पावश्यक । कामो का पूछना । यत्र, जहाँ । तत्र, तहा। नह, नही , इन्त, हर्ष वा शोक, (माकि माकिम् । नकिम्, नकि :) रोकना । वायत् तावत्, जितना वा तितना। त्व है, न्वै वितर्क देना वा अनादर । शौषट, वौष्ट, घी का दान, स्वाहा, देवताओं के लिये देना। स्वधा, पितृ के तिये देना । तुम, तु, तथाहि, निषेध वा सचमुच । किल, लोकवार्ता वा झूठा । अथ, मङ्गल । सुष्ट, अच्छा स्म, भूत, आदह, धिकार उपसर्ग, विभक्ति वा स्वर के समान जिनका रूपही और वे उपसर्ग विभलिव स्वर न रहें तब अव्यय कहावे । यहा उपसर्ग और विभक्ति के प्रर्य का ग्रहण परन्तु स्वर के शब्द ही का ग्रहण होता है क्योंकि उनका केवल कुछ अर्थ नही होसकता ।। (विदत्तम्, अबदाम् ) यहां वि, और अब, डपसर्ग नहीं हैं यदि होते तो “अच उपस्वर्गात्तः” से ( दित्तम् ) ( श्रवत्तस् ) हो जाता, इसी प्रकार और भी जानो । (अयु') मृद्यु' ( अस्तिशीरा ) (अस्ति) । अ, आ, इ, ई, उ, ज, ए, ऐ, श्री, और श्री, पशु-सुख शुक्रम्, तुरन्त यथा, कथा, तिरस्कार, पाट् प्याट्, अङ्ग, है, हे, भो' वा अये केवल विषु, इनका प्रयोग सम्बोधन में होता है । द्य-इसका प्रयोग प्रलोक के पाद पूरण में पाता है अनेक, एकपदे, एक काल युत्, कुत्सित्, आत इस से भी ।। चादिरप्याहतिगणः ॥ इस गण को भी प्राकृति गण ( श्राकार से जो लिया जाय ) कहते हैं। तसिलादय प्राक् पाशमः । शस् प्रमृतव प्राक्ष समासान्तस्य. अम् । आम् । कृत्वोर्था तसिवती । नानाजी एतदन्तमप्वव्ययम् । अत इत्यादि ॥ "जिस् तषित प्रत्ययान्त शब्द के आगे कोई विभक्तिया न आवे उन्हें अव्यय कहते "वे प्रत्यय ये हैं अष्टाध्यायी से पञ्चम्यास्तलिल् । ५ । ३ । ७॥ से लेकर वाप्ये प्रत्यय है और वद्वल्पार्थाच्छश् कारकादन्यत रस्याम् । ५ । ४ । ४२ ॥ से लेकर समासान्ना । ५ । ४ । ६८ ॥ इस सूत्र पर्यन्त नितने प्रत्यय हैं और अमु च छन्दसि । ५ । ४ । १२ ॥ से घम् प्रत्यय, किमेतिडव्ययघादाम्द- द्रव्यप्रकर्षे 1 ५ । ४ । ११ । से पाम् । प्रत्यय । सत्याया क्रियाभ्यात्तिगाने कृत्यमुच् । ५ ४॥ १७ ॥ एकास्य साच्च । ५ । ४ ॥ १८ ॥ इन तीनों से जो प्रत्यय होते हैं और तसि वत् ना और नन् यै प्रत्यय निनके अन्त में ही उनकी अध्यय मन्ना मोये । । - पागम् । ५ । ३ । ४७ ॥ पय॑न्त जितने पव्ययामि। ४८ कन्मेजन्स । १।१ । २८ ॥ एतदन्समध्ययम् ॥ स्मारम् । स्मारम् जीवसे । पिबध्ये जो सस्प्रत्यय मान्त पा पनन्त भिनको पात में हम सम्दों की पव्यय! समा होती है। स-समुद-स्मारम् स्मारम्। वीव-से-दीवसे । पिप-ये-पिवम्यै ।' ४८१ पत्यातोसुनकसुमः । १११।४ । एकदन्तमव्ययम् । साया! उदेतो ।विसप । एन गम्दी की भी अय्यय संना होतीरे विनये पमय में जाना तीसुन् एमवा बसन् प्रत्यय रो।व-स्वा-तत्वादे-तोमुन्-उदेतो । विसप्-यमुन-विसय । ४८२ भव्ययीभाषश्च । १।१।४१ । पधिारि ।। पध्ययीभाव समास से बो गम बनतेसमबी भी पध्यम संघामोतीरि पि-प्रधि-पपिारि।। ४८३ पव्ययादामसुपः । २।४।८२पव्ययादापस्सुपश्च खका तच पाचायाम् ॥ पग्यय सेमेष गम्द से परे वो पाप वा सुप् प्रत्यय तिस का नुका कोय । तत् कि पत्-तर+पा (टाप् )- गाशायाम् (तिस मासा में)॥ " सर्ग चिपु शिषु सर्वासु च विभयिषु । वचनेषु सर्वेषु यन्नग्येति तदव्ययम। तीनो निजी (पुमित नीति: पौर नपुंसमिा) म चीर मप रिमझिया में एबमा रोपौर सब वचन ( एक रिब) में विकार को मी न प्राप्त पीया पध्यय ४८४ पष्टि भागरिरमशीपमधाम्योरुपसगयोः । पापञ्चैव माता यथा वाघा निगा दिया। पगाइ । पगार । पपिधामम् । पिधामम्। मागुरिपाचाप्य (पर) पीर (पपि) उपमम पपार का मोप और मम्त पीमिा गादा पामे राए बी ए परते हैं। उदाहरण बानपा-पाचा। निम पा-निगा ।गि पा-दिगा ॥ २॥ पवन गा-पगार पगारापपि+गानम्- पपिपानम् पिधानम्। ।स्यग्ययानि
॥ ओ३म् ॥
॥ लघुकीमुद्युसरार्धम्॥
श्रीमहरदराजप्रणीतम्
श्रीमत्पञ्चनदीयमहाविद्यालयाध्यापकगोस्वामिपण्डित
गङ्गाविष्ा शाखि सङ्कलित हिन्दी भाषा
विवरणसहितम्
प्राय॑ धौपदेशक
श्रीयुतपण्डित कपारामधार्मणामाजया
पञ्जाब एकोनोमीकल वन्त्रालये
लालालालमनाधिकारेण
मुदितम् ।
सन् १८८७ ई.
-
~~~
लाहौर
प्रथमवार १००० प्रति
मुन्य २)
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॥ चोम् ॥ teel लधु कौमुद्याम् ॥ ॥ समोर २॥स्वादयः॥ ३८८ ॥ लट् । लिट् । लुट । लृट् । लेट् । लोट् । लङ् । लिङ् । लुड् । लुङ् । एषु पञ्चमो लकारश्छन्दोमात्रगोचर ॥ टीका-अब भु भाटि में है जिनसे उन (धातुओं) झियावाचकों का वर्णन किया जाता है। और क्रिया काल में होती है। तो इस व्याकरण शास्त्र में काल लकार से प्रकाशित ( विदित ) होता है । जैसे वर्तमान काल का प्रकाशक लट् लकार है । " परोक्ष घनद्यतन भूत" काल का प्रकाश्यक लिट् है । अनद्यतन भविष्यत् काल का प्रकाशक लुट है। सामान्य भविष्यत् काल का प्रकाशका लूट है। इन दश लकारो मे से पञ्चम (लेट) वेद में ही मेरणा अर्थ में प्राता है। प्राशीर्वाद और प्रेरणा अर्थ में लोट् पाता है। पनद्यतन भूतकाल का प्रकाशक लङ् है । विधि और * निमत्रणादि अथों में लिड् । सामान्य भूत काल का प्रकाशक लुड् है । कार्यकारणभाव और क्रिया की प्रसिद्धि के विदित होने भूत और भविष्यत् काल में लुङ् होता है ।। ३८८ ॥ ३६६ ॥ ल. कर्मणि च भाव चाकर्मकस्य । ३ । ४ । ६६ । लकारा. सकर्मकेभ्यः कर्मणि कर्तरि च स्युरकर्म केभ्योभावे कर्तरि च॥ ऊपर लिखे लकार कर्ता वा कर्म अर्थ जतलाने के लिये सकर्मक धातु से होवें और कर्ता वा भाव अर्थ जतलाने के लिये अकर्मक धातु से होवें। "व्यापार जिस के अधीन रहता है उसको कर्त्ता कहते हैं" जिया के पाल का जो आश्रय है उसको कर्म कहते हैं। उदाहरणम् (जैसे) देवदत्त चावल पकाता है । यहा पकाना देवदत्त के प्राधीन है। इस लिये देवदत्त कर्ता है। चावल कर्म है, क्योंकि पाकक्रिया का आश्रय है। यदि इसी वाक्य में कर्मवाच्य करना हो तो, देवदत्त से चावल पकाया जाता है, ऐसा लिखना । परन्तु यहा भी चावल ही कर्म हैं । इन दोनों का सस्कृत में रूप एकसा नही रहेगा। जैसे (पचति) पकाता है। यहां कर्ता का ही अर्थ प्रकाशित होता है । और कर्म में (पच्यते) पकाया जाता है, यहा कर्म का अर्थ ही प्रकाशित होता है, अकर्मक क्रिया में, * "४५३, सूत्र की व्याख्या में टेस्हो । पर - २ म्यादय। - ४ n पर्म नहीं होता इस पिवे सहार, दूसरी अवस्था में उसके (भाव) जिया को प्रयोग तरता से (मूयते) होना । वर्तृवाच्य में तो समर्मत ये तुल्य प्रवर्मन शिया मी हर्ता पच को प्रवास करती है।बसे (मपत्ति) होता ॥३॥ .। वर्तमाने खट । ३।२ । १२३ वर्तमामनियारत्तेर्षा गोष्ट स्वात्। पटावितो । उच्चारणसामर्थ्यात्मस्य नेत्यम्। सत्ता याम् । वर्तृविवक्षायाम् म+ प्रतिस्थिते । वर्तमान कार में होने बारे कार्य के प्रवास करने में बन पातु का प्यार हो तर उस से परे पर सवार हो। चट् में पपौर दत संभकरें। संक्यप सूत्र से की मी रत् संत्रा पाई, तब उसमे निवेष को सिवे या युधिरे मिस व्याकरण पारण में पोर मी पर निरव मी चारप किया या पदा पाता और पपीत् मंत्रा करने से सो सम्पूर्ण वर प्रत्यय नष्ट गोमातारे तो उस पो उच्चारष सा पुडमी पर न होना इस खिये मी स्पना नहीं होती। भूपातु निसचा पर्ष रोनास मी माघम पशिया सियते। पर उससे फर्तमाचा प्रयोग बनाने बोरमा होती रे तव भू+र ऐसा पहोने पर। ४ १॥ तिम् तस् मि सिप् घस् मिम् पस् मस् ता साम यासाचारध्वमिडवधि महिए । ४ 10८ । एतेऽष्टादन लादेया स्युः॥ मीचे हिरोए पठारा प्रत्यय रे स्थान में पास होवे। Ke परस्मैपद । का पात्मनेपद का प्रथम पुरुष मध्यम मध्यम प्रथम पु उत्तम पुरुष एक -तिम् सिम् मिप् थास् वितस् यस् वस् पाताम् मायाम् वधि मस् एवम् महिर ४ २ ॥ यः परस्मैपदम् ।। ४ । ६८ । खादेशा परस्मैपद संभ्रा स्यु । नक स्थान में भी पादेम होते। बानम् । पपम् । मत। पन्चे परस्मैपर पापाते। उतम पु ॥
३ सघुकीमुखाम् । ४०३ ॥ तडागावात्मनेपदम् ११४ । १०० त प्रत्या- हार' शानचकानचौ चैतत्सना' स्युः । पर्वसंजापदादः ॥ जो प्रत्यय समूह तड् प्रत्याहार से विदित होता है अर्थात (४०१) सख्यक सूचका दूसरा ममूह त मे लेकर महिङ् पर्यन्त सो और दो प्रत्यय जिनका केवल धान अवशिष्ट रहता है अर्थात् शानच् और कानन् ये सभ आत्मनेपद कहलायें, तङ्की नो परस्मै पदसजा समझ पडतीथी सो इस सूत्र से निवृत्त भई और यह निश्चय हुआ कि पररमैपद के कहने से केवल पाइले समूह के (८) नौं प्रत्यय तिप् से लेकर मस् पर्यन्त और श्वसु और भतृ जाने जाते हैं। और आत्मनेपद से दूसरे समूह के नौ (९) प्रत्यय त मे लेकर महिङ् पर्यन्त मानच् और कानच् जाने जाते हैं ॥ ४०३ ।। ४०४ ॥ अनुदात्तडित् पात्मनेपदम् १ ३ । १२ । अनुदात्तो डितश्च धातीरात्मनेपद स्यात् ॥ जिस धातुका अनुदात (८) अथवा इत् हो उससे परे प्रात्मनेपद प्रत्यय अर्थात् तड़ और शानच् कानच् होवे ।। ४०४ ॥ किस धातु का क्या इत् है इस का ज्ञान धातुपाठ में होता है। ४०५ ॥ स्वरितजित कर्वभिप्राये क्रियाफले १ । ३ । ७२ । स्वरितेतो जितश्च धातोरात्मनेपदं स्यात् कर्तृगामिनि क्रियाफले । जिस धातुका स्वरित () अथवा ज् इत् हो, "और जव (क्रिया) व्यापार का फल कर्ता को पहुचता हो" तब उक्त धातु से श्रात्मनेपद सञक प्रत्यय होवें ॥ ४०५ ।। ४०६ ॥ शेषात्कर्तरि परस्मैपदम् १।३ । ७८ । भात्मनेपद- निमित्तहानाहातो कर्तरि परस्मैपदं स्यात् ॥ जो धातु भात्मनेपदके (स्थापक) कारक निमित्तों से हीन हो उससे परे परस्मैपद प्रत्यय कर्ता पर्थ में होवे ।। ४०६ ॥ परस्मैपद कर्मको कभी नहीं दिखाता। ४०७॥ तिडस्त्रीणि त्रीणि प्रथममध्यमोत्तमा १।४११०१ तिङ उभयोः पदयोस्त्रयस्त्रिका क्रमादेतत्संज्ञाः स्युः ॥ तिप् की ति और महिङ् के ङ् से बने हुए तिङ् प्रत्याहार में जो प्रत्यय अन्तर्गत हैं उम्के परस्मैपद और अत्मनेपद दोनों समूहों की जो तीनर वेयीये हैं नो नाम है प्रथम पुरुष, मध्यम पुरुष, भौर उत्तस पुरुष, कहलायें ॥ ४०७ ।। १ ४ स्यु । म्वादय। ॥ ४ ८ ॥ तान्येकवधनहिवधनबहुचनाम्येकश १.९। वधप्रयमादिसंघामि तिम्स्पीणि पीणि प्रत्येकमेकवचमादि सम्रानि बिन तीनर पीयों की प्रथम प्रादि (10) संत्रा ब्रमानुसार तिनले प्रत्येक पिव में वो तीनर प्रत्यय मेसे तिप् तस झिरत्यादि उन यो बम एकवचन विचन पोर बहुवचन संत्रा होवे ॥ ४ ॥ ४.८॥ युष्मधुपपदे समानाधिकरणे स्थानिन्यपि मध्यमः १।४।१५ तिवाच्यकारकवाधिभि युष्मद्यप्रयुज्यमामे प्रयुज्यमाने चमध्यम । जिस कारण यो पथात् वर्धा वा नर्म (ILS) को बधार पथात् तिर (..) दिखाता होवे उसी पारव को बो युम्मद याद दिखाये पोर पा युष्मद सपरितो पा न हो तो सवार के स्थान में मध्यम पुरुष (१०) चोय । उदाहरण 'तुम मुमा को देखते हो' पवा पेपश्च स्तनापी करें कि (मुम को देखते ) तो मी शिवा का पन्त माग वर्ता कारतबोपी दिशाताई पर तुम पम्द मी बर्ता बारबडी को दिखाता सधिये संस्मत में ऐसी अवस्था राते बार के स्थान में मध्यम पुरुप योगा। पौर यदि पेमा यो वि 'मैं तुम को देसता है तो इस उदारप में लिया मा अप भाग बोसो तो वर्ता कारण यो प्रवास करता है तुमको या पर्म चारण को प्रताप परता मरेतु म ऐमी पवस्था में सवार पे स्थान में मभ्यम पुरप सभी नगरी (पाता) गोगा विन्तु पत्यमाप रीति से उत्तम पुरुष होता ॥८॥ ४१ ॥ भस्मयुत्तम १।४।१०। तषाभते ऽस्मगुत्तम । अप पस्मदमी पपरवा युष्मद तुभ्य (.)ो तब कार के रवान में उत्तम पुरुष ४२.होये ॥ १ ॥ ४११ ॥ शेये प्रथम' १ । ४ । १८। भति सि खाते । बिन के विषय में युष्मद् पौर परमद (०६) (1) मिनेटमबो बोपवर पिक पवस्था में सवार (४१)ो स्थान में प्रथम पुरप (100) गोवे +. पे पोर भू+ति १स से होता है ॥ ११ ॥ ४१९ तिर थित् सार्वधातुकम् । ३ | 8 | ११३1 तिर वितरण धारपधिकारीला एतासंसाः स्यु ॥
५ लघुकीमुद्याम् । धातो' ८१० इस सूत्र के अधिकार में उह जी तिङ् प्रत्यय ४०७ और जिसका शकार इत् सजक होवे सो प्रत्यय सार्वधातुक कहलावे ॥ ४१२ ॥ ४१३ ॥ कर्तरि शम् । ३ । १ । ६८ । कर्बर्थ सार्वधातुके परे धातोः शम् ॥ जब कर्ता अर्थ (वाची) वाचक सार्वधातुक ४१२ परे रहे ती धातु से परे शप प्रत्यय हो १४८ और ३ से श् + प् इत् हैं, इस से श का केवल अ बचता है, और भू+अ +ति ऐसा रूप होता है ।। ४१३ ॥ ४१४ ॥ सार्वधातुकाईधातुकयोः । ७।३। ८४ । अनयोः परयोरिगन्ताङ्गस्य गुणः । अवादेशः । भवति । भवतः ॥ सार्वधातुक ४१२ वा श्राई धातुक “ ४३० " परे रहते निस अन के अन्त में इक् हो उसको गुण ३० आदेश होवे, इस सूत्र से भू का भी होता है, और २६ से त्रो के स्थान में अव् करने पर भवति ऐसा पद बन जाता है, इसी रीति से भवतः बन जाता है, भवति= वह होता है, भवतः = वे दो होते हैं।। ४१४ ॥ ४१५ ॥ भोऽन्तः 1७1१।३ । प्रत्ययावयवस्य सस्यान्ता- देश. । अतोगुणे । भवन्ति । भवसि । भवथ' | भवथ ।। प्रत्यय का अवयव जो झ उसके स्थान में अन्त श्रादेश होवे, 'अतोगुणे' से भव के व में जो भ है, उसके और अन्त के प्रकार के स्थान मे अर्थात् दोनों को मिला कर एक अ हुआ तब ‘भवन्ति' यह पद सिद्ध भया, भवन्ति =वे होते हैं। भवसि =तू होता है। भवधः = तुम दो होते हो । भवय -तुम होते हो ।। ४१५ ।। ४१६ ॥ अतो दी| यजि । ७।३ । १०१ । अतोङ्गस्य दी? यजादौ सार्वधातुके । भवामि । भवाव । भवाम । स भवति । ती भवतः । ते भवन्ति । त्वं भवसि । युवां भवथः । यूय भवथ । अहं भवामि । आवां भवाव । वयं भवामः ॥ यजादि सार्वधातुक परे रहते इस्व प्रकारान्त अन को दीर्घ आदेश होवे, इस प्रकार से भव+मि-भवामि-मैं होता हुं । भवाव' =हम दो होते हैं । भवाम. = हम होते हैं ॥ ४१६ ।। - प्रथम पु तो भवत मध्य पु तूोता है। में होता। . म्पादय। सपनाम के साये में बतमान पास इस प का होता. यवा- एक पपन। ॥ विषयम बहुवचन समपति हे भवन्ति पर होता है। वेदोरे। स्वमसि युवा भवय यूपे मश्य तुम दोनो। तुम होते। परं भवामि पी भवाब वय भवाम हम दो पोते। ४१० ॥ परोधे खिट ३ । २ । ११५ । भूतानघतनपरोधार्य इत्तेर्धातीलिए स्यात् । लस्य तिवादयः । भूतानपतन मृत धान २८८ में बो बात (पा) जिया बिना देषीहीम मवाय मरने की सिये निम धातु का प्यार किया जाय चम मे परे नि । ग्दि में रपोर हात्रे पोरो स्थान में तिय पाटि प्रत्यय । १० ४१८॥ परस्मैपदानां पालतुसुस्यलयुमपएपमा ३।४।८२ । लिटस्सिवादीनां पलादय स्युः मन प तिम्यिते । परामपद में तिप्पादिनी प्रत्यय वो मिट्ये ग्यान में पाप किये रगान में बन रयादिसरा पर्यात् ॥१८॥ एकवच॥ : सिम ॥ परमपम ॥ प्रथम पुरुष माधम पुरुष पन् तम पुरुष पन् परम परिमारते २ पोरनमापतार परम+प माता- हानगरर पपास और पमपमन पोत पाn मरमरानीrarमपपलमा परिणत परेणिfever VOfrमा पार समान पनी - ARTHATARोमानी म . सधुकौमुद्याम् । ४१६ ॥ भुवो बुग्लुड्लिटोः ६१ ४ १८८ { पचि १ जिस के आदि में अच् है ऐसा नव लुड् वा लिट् का प्रादेश परे रहे तब भू धातु को बुक् का पागम होवे ।। ४१८ ॥ बुक् का उ और क् दोनों इत् हैं, इस भाति से भू+भूव्+अ॥ ४२० । लिटि धातोरनभ्यासस्य ६।१।८। लिटि परे अन- भ्यासधात्ववयवस्यैकाचः प्रथमस्य हे स्त आदिभूतादचः परस्य तु द्विती यस्य । भूव भूव अ इतिस्थिते । लिट् लकार के परे होने पर अनभ्यास (नहीं द्वित्व हुआ जिसको) धातु के एकाच (एक स्वर वाले) प्रथम अवयव (भाग) को द्वित्व होवे परन्तु यदि उस प्रथम भाग के आदि में अच् होतो दूसरे एकाच भाग को द्वित्व होवे, इस रीति से, भूव यहां धातु का द्वितीय (दूसरा) भाग एकाच् है ही नहीं तो भूत् ' के हित्व होने पर भूव + = मूव भू+भ, यह स्वरूप हुआ तब ।। ४२० ॥ ४२१ ॥ पूर्वोऽस्यास । ६ । १ । ४ । अत्र ये हे तयोः ॥ ४२० सें जो दो रूप हुए हैं, उन में से पहिले की अभ्यास सभा होवे ।। ४२१ ॥ ४२२ ॥ हलादि शेषः ७ १ ४ । ६० । अभ्यासस्यादिहल शिष्यते अन्ये हलोलुप्यन्ते॥ अभ्यास कर '४२' श्रादि (पहिला) हल रह जावे और शेष हलो का लोप होय, इस सूत्र के लगाने से 'भूव भव् + ५' = 'भू भूव+अ' हुआ ॥ ४२२ ॥ ४२३ ॥ स्व: ७।४ । ५६ । अभ्यासस्याचः ॥ अभ्यास ४२१ के अच् (स्वर) के स्थान इस्व भादेश होवे, तब इस रीति से भू भू +=भु भत् + अ हा ॥ ४२३ ॥ ४२४ ॥ भवतेर. । ७) ४ । ७३ । भवतेरभ्यासोकारस्य या स्याल्लिटि॥ भू धातु के अभ्यास के उ को पहोवे, जब लिट् परे रहे तो तब = "भु भूव + " ='भ भू+अ' हुआ तब ४२४ ॥ ४२५ ॥ अभ्यासे चर् च । ८।४ । ५४ । अभ्यासे झलां चरः स्युर्जशश्च । झशांजश खयांचर इतिविवेक' । बभूव बभवत. बभबुः ।। - ८ म्याटय। पागम हो। से 1 पभ्यास के भम् के स्थान में पर और बम् भी वे पर्मात् माम् पो रवान में बग और पयों को स्थान में चरस में इतना विचार तब स को जगाने मम मू+प -बभूव (सपा) बभूवतु ४१८-ये दो धुए । बमपु-ये हुए ॥ ४२ ॥ ४२६ ॥ लिट् च । ३ । ४ । ११५ । विहादेगस्तिमार्धधातुक संघ स्यात् । सिर कार को स्थान में पादेश दुपा को तिर ४ १ उसपी पाचातुष साहो ॥ २० ॥ ४२९॥ अर्धातुकस्येवलादे 01 २ । २५। वमविय । वभूषय वभव । वभव । वमविद । वभूषिम ॥ पर प्रत्याहार पारि में निम के ऐसे पार्ष धातुम ४२ मो ट्मा पनुमार इट् का वो सो पायातुव प्रापप के पाटि में धरा जावेगा। इस लिये पभूपिप-तू पा । बभूवपु तुम दो हुए । बभूप तुम गुप। बभूव में एपा। बभू- विव १२०ाम दो हुए । बमूपिम म प ४२० ॥ ४२८ ॥ पमयसने लुट । ३ । ३ | १५ | भविष्यत्यनद्यतनेऽर्ये धातीचुट ॥ पनपतन मरिष्यत् १८८ वार में हाने गये पार्य के प्रयास करने में चात परेबुट ८ ॥२ ४२८ । स्यतासी लुलुटो ३ । १। २३ । धातोरेती स्तो लुलुटो परत । गायपवाद ल इति लुम्लुटीग्रश्यम् । नए सपोर मुटु परेल तो बात को स्य और ताम पत्यय बम से शर्षि । था मूष सप् ४१० पौर श्यन् पादि का पपगारे यहांल मसर पोर नट होना सवारीमा पापीमाRER ४३. ॥ पाधधातुकं शेषः । ३ । ४ । ११४ । तिट गिमोऽभ्यो धातीरिति विपितः प्रत्यय एतत्संभ्र' स्यात् । हिर पौर मित् प्रत्यय वोएपर मेप पोर प्रत्यय यो पाली ऐमा सार पर विपो पातु में निहित रोपे व पाच भातुम मंना पाचेगी । यहा :२० सेट का पागम होगा पार सपोर ८ मे मपिता महता ॥ म लघुकीसुद्याम् । ४३१ ॥ लुट प्रथमस्य डारौरसः २ । ४ । ८५ । डिल्य साम- झंदभस्यापि टेलीप. । भविता ॥ लुट् लकार के प्रथम पुरुष ४०७सन्जक प्रत्यय के स्थानमें डा रौ और रस् आदेश नम से होवे । जब डित् (ड् है इत् जिसका) प्रत्यय परे रहताहै तब पूर्वले म १७८ सजक की टि २६२ का लोप होता है । परन्तु यहा सवितास्। की स सजा नहीं हैं इस लिये उस की टि का लोप ४८ मी न होगा, पर कोई वर्ण निरर्थक इत् नही होता तो यहा सी डकार की इत् सजा निष्फल (निरर्थक) न हो जावे इस लिये भवितास् जिस की अ सज्ञा नही हुई उस की भी टि का लोप होगया। तब भवितास् = अवित्, और डा कोमा में मिलाने से "भविता" सिद्ध भया । भविता वह होगा ।। ४३१ ।। ४३२ ॥ तामस्त्योोप । ७ । ४ । ५० । सादी प्रत्यये ॥ तास् प्रत्यय और अस् धातु का लोप होवे सकारादि प्रत्यय परे रहते । यहा प्रकरण में इस सूत्र का कुछ फल नहीं है, विना अगले ४३३ सूत्र में अनु. वृत्ति के इस लिये इस की अगले सूत्र ४३३ में अनुवृत्ति होती है ।। ४३२ ।। ४३३ ॥ रिच । ७ । ४ । ५१ । रादी प्रत्यये तथा । भवितारी। भवितारः । भवितासि । भवितास्थ. । भवितास्थ । अपितास्मि । भवि- तास्व । भवितास्म ॥ नास् प्रत्यय और अस् धातु का लोप होवे जव उन से परे गदि (रेफ है आदि मे जिस को) प्रत्यय हो इस रीति से यह पद सिद्ध होते है ४३१ जले भवितारी दे दो होंगे भवितार. =वे होंगे। भवितासि =तू होगा । भवितास्थ. = तुम दो होगे। भवितास्थ तुम होगे, भवितास्मि । मै होजगा । भवितास्व । हम दो होगे। भवितात्म. हम होगे ।।४३३ ४३४ ॥ तृट् गेपे च । ३।३। १३ । भविष्यदाहातोलट क्रियार्थायां क्रियायां सत्यामसत्यां वा । इट । भविष्यति । भविष्यत । भविष्यन्ति । भविष्यसि । अविष्यथ । भविष्यथ । भविष्यामि । भत्रि- ष्यावः । भविष्यासः | ॥ - भविष्यत् अर्थ मे नो धातु लगाया जावे उम से परे लुट३८८होय पर दूसरी किया जो भविष्यत् कार्य के फल के लिये एक कार्य प्रकाश करती हो सो रहे वा न रहे ८८७ 'वह पढने जाता है' इस उदाहरण में पढना नो शिया है, सो भविष्यत् काल्त की है, क्यों कि पढना अब तक हुआ नहीं है, किन्तु होने वाला है, दून कार्य के का का म्वादया। चिये पाना एक दूसरी क्रिया पाईरे रा दूमरी क्रिया को किया किया वाते रे ८८० संस्था सूत्र में या नियम विया शिवव ऐसी प्रियाया बिया से तब मविष्यत् पब में पातु से परे तुमुन् पोर रपुर दो प्रत्यय स्थापन निये ना परन्तु इस सूप का पभिप्राय या कि ऐसी निया रोपानरो पर मविष्यत् पब में धातु से परे सद होवे अव प्रियाची जिया रहेगी तब एक भविष्यत् निया के दो कप हो सकते में एक तो हद पौर मरा तुमुन् पोर रपुर परसे परन्तु युट् वा फर्म पोर माव इन तीनों पयों में प्रोता और 'तुमुन् पोर एयुत् प्रत्यय 'पश्यय तो माथे और बत्तरि खत् इन दोगी फे पनुसार भाव पोर बता पो मनी तेरे मुट् सवार ४२८ पौर पद सकार ४१४ दोनो भविष्यत् पत्र में (जोते) पाते रेन में तमा रीमेवर भेट । पपतन भविष्यत् में लूट सकार होता है और पनपतन भविष्यत् में पुद् पोता मेसे पाणी रव' प्रयातासि बार पारी वायमा पोर जब मुह पधि नरो और पषत भविष्यत् काच प्रनाय मारना हो तो वृद पवार का प्रयोग होता है "रविस्त यति नि' -सूर्य निस्सन्देश तपैगा+इस बार में शोर ऐसी पपधि नही से कि करा को भवधि पूर्पोदार में दी गई है। १२८ मे स्पको पीर ४१० से रद को होने से पोर १५से म्रपान में ष् पादेय सीने से ऐसे पद बन पातेवैसे 'मनियति"-बागा भविष्यत - दोनोगे भषिमन्ति-वेगे भविष्यसि-तोमा भविष्य -तुम दो गोगे भविष्यय - तुम शेगे भविष्यामि में ना भविष्याप' -मटोरोने मपिण्यामा-मामे ॥ २०॥ ४३५ ॥ खोट् च । ३ । ३ । १६२ । विध्यार्थेषु धातोपोट ।। विधि पादि पों मे ५ पातु से पर नोट् १८८ सवार सोवे ॥ ५ ॥ ४३६ ॥ पाणिपि विसीटो। २ । ३ । १०।। पाणीद पर्ष में पातु से परे सिर ४५ पोर सोरमबार होवे ॥ ॥ ४३०॥ एक । ३ । । । लोट पूजारम्य छ । भवतु ॥ भोट ४.५ रखाम में जो प्रत्यय पादेश रोडमवार को रवान में होवे । यातनाबाममा पित्त किस तिप् पौर भिकारो स्थान में चार होता रे तब भपति-१५० से भरतु सिाहुपा । भपतु पापे ४१०॥ ४३८ ॥ तुधोस्तातहागिष्यम्यतरस्याम् । ७।१। ६५ । प्राणिपि तुमास्तातर था। परस्वारसदेग । भवतात् ।। पामिप् (पागोबाद) पब में और शिको नातापादेग विवरप मे गि। माता पादेय पापि हित में पास्यप को रोना चाहिये तो मी मकान पर लघुकौमुद्याम् । हि के स्थान मे होता है क्योंकि "अनेकाल शित् सर्वस्य" यह सूच पर है "डिच्च पस सूत्र से तो इस हेतु से (विप्रति०१२८) यह नियम लगकर, सम्पूर्ण धादेश को करता है, "भवतात्" ईश्वर करे वह होय ॥ ४३८ ॥ ४३६ ॥ लोटी लडवत्।३।४।८५ । लोट स्तामादयः सलोपः। लङ् के सदृश लोट को भी तामादि (ताम् आदि है जिन के) ४४० पादेश होवें और उस के स् का लोप भी होवे ।। ३३८ ।। ४४० ॥ तस्थस्थसिपांतान्तन्तास. 1३। ४ । १०१ । उितरच- तुणी तामादयः । भवताम् । भवन्तु ॥ ङित् लकार अर्थात् लड्, निङ्, लुड् और लुड् के आदेश जो तस्, थस्, थ पौर मिप् हैं उन के स्थान में कम से ताम्,तम्, त और अम् होवें । तब इस रीति से भवसस् = भवताम् = वे दो होय । भवन्तु =वे होय ॥ ४४० ॥ ४४१ ॥ सेद्यपिच्च । ३ । ४।८७ । लोटः सेहि सोमिच्च ॥ लोट के स्थान में जो रि उस को हि होवे सो पित् न होय ॥ ४४१ ॥ ४४२ ॥ अतो हे । ६ । ४ । १०५ । लुक् । भव । भवतात् । भवतम् । भवत ॥ झरव प्रकार से परे जो हि ४४१ उसका लुक् २०३' होवे, तब भव+हि ४४२ से भव अथवा ४३८ से भवतात् =तू हो वा होव, भवतम् = तुम दी होवो, भयत - तुम होवो ॥ ४४२॥ ४४३ ॥ मेनि । ३ । ४ । ८८ । लोटः ।। लोट् लकार के स्थान में नो मि आदेश है, उसके स्थान में नि होवे ।। ४४३ ।। ४४४ ॥ आडुत्तमस्य पिच्च । ३ । ४ । ६२ । लोकुत्तमस्थाट पिच्छ । हिन्योरुत्वं न इकारीच्चारणसामर्थ्यात् । अवानि ॥ लोट के स्थान मे जो उत्तमपुरुष सभक प्रत्यय आदेश होवें उनको पाट का भागम होवे, और वह प्राट् पित् मानना चाहीये, हि ४४१ और नि '४४३' के इकार के स्थान में ४३७ से उ नहीं होता, क्योंकि यदि उकार करना हो तो उन दोनों में कार का उच्चारण व्यर्थ हो जावेगा, तब भव+मि = ४४३ से भव+नि = " से भवानि, मैं होयु ॥ ४४४ ॥ ४४५ ॥ ते प्राग्धातो. । १।४।८० । ते गत्युपसर्गसजका धातोः प्रागेव प्रयोक्तव्या ॥ " ४४४ - ४॥ HI म्यादया। सिन की गति और + उपसर्ग मा वे पात पूर्व ही पगार खादे ॥ ४ ॥ 880 || पानि खोट । ८।४।१६ । उपसर्गस्थाग्निमित्तास्य रस्थ लोठादेशस्यागोत्यस्य मम्य प स्यात् । प्रभवाणि पपरागस्व वा प् से एरे बोगोट् वा पानि सोमबार को भकारो तव प्रभवानि-समवाधि-में समर्थ हो || ४४० दुर षषयल्पयोरुपसगल्मप्रतिषेधोषमध्य । दु स्थिति । दुर्भषामि ॥ जय म् नो प पोरन को प करने को तो दुर पद को ४४ उपसर्म संचामा प्रतिष (निषेध) घामा चाहिये इस पार्तिच ये बस से यहां आपसर्ग संना वेपमाव में दुस्थिति-दुरवस्था यहां पत्व नहीं भया पौर दुर्भमानि मे नही मया में दुपी शेख ॥ MOR ४४८ ॥ भन्त गन्दस्या विविधिणावेषपसर्गत्वं वाच्यम् । पन्समपाणि ॥ पन्तर पन्दको उपसम ममा कामी पाशिये परन्तु यदि पापौर जि प्रत्यय या विधान पोर न सोए परना तो इस से पन्तभवापि में पाप पा । अन्तममावि मे भीतर ४.८॥ ४४८ ॥ मित्य स्ति । ३। 81८८ । सकारान्सस्य न्दुिस मस्य नित्य खोप । पलोग्त्यस्येति सलीमः । भवाप । भवाम ॥ टिरा मकार में जो सकारान्त उत्तम पुष्प पावेग तिसता नित्य ही भोप सोपे २४ से पाय (पम्त में सोने वाला) बोम् सम का मोप धोता। (पोटोहरपत) रस देवनगे या नोट् म भी शगता म लिये भव+पम् -:१८ से पीर ४८ से मवाय म दोज । पसीनी पूर्ववत् प्रक्रिया से ही भवाम नम TRA BHe IN ४५ ॥ धमदातमे पट । ३ । २ । १११ । पनद्यतनभूतार्यरत्ते धातील पगपतग मत (प्रतीत) पप में प्रो धातु तिम म मरमकार रोपे xn ४५१॥ मुलासह यहुदात्त । (1810१ । एवमस्याट । ° । १९ । Int . - लघुकौमुद्याम् । लुङ् लकार ४६२ लड् ४५० चौर लङ् ४७७ लकार परे रहते अङ्ग को अट का पागम होवे (और) उस अट् को उदात्त जानना ।। ४५१ ॥ ४५२ ॥ इतश्च । ३।४।१०० । डितोलस्य परस्मैपदमिकारान्तं यत्तस्य लोपः । अभवत् । अअवताम् । अभवन् । अभवः । अभवतम् । अभवत । अभवम् । अभवाव । अभवास ॥ डित् लकार के स्थान में जो इकारान्त परस्मैपद ४०२ आदेश हैं। अर्थात् ति, झि (अन्ति) मि तिन का लोप होवे इस से यहा "२४” अन्त्यवर्ण "" का लोप भया तब ये पद सिद्ध होते हैं, जैसे अभवत्, वह हुआ । अभवताम् ४४० वे दो हुए । अभवन् २३ वे हुए। अभवः १२० और १०८ तू हुआ । अभवतम् ४४० तुम दोनों हुए। अभवत, तुम हुए। अभवम् ४४० में हुआ। अभवाव, हम दोनों हुए। अभवाम हम हुए ॥ ४५२ ॥ ४५३ ॥ विधिनिमन्मणामन्त्रणाधीष्टसम्प्रश्नप्रार्थनेषु लिड । ३ । ३ । १६१ । एष्वर्थेषु धातोलिड ॥ विधि अर्थात् प्रेरणा वा आज्ञा। "निमत्रण" भोजन श्रादिक काराने के लिये दोहत्र आदि का प्रवर्तन (निदेश) “आमत्रण" किसी को उस की इच्छानुकूल मम्मति देनी । “अधीष्ट" सत्कार पूर्वक 'व्यापार' (प्रेरणा) “सम्प्रश्न" पुछना । प्रार्थना मागमा। इन भयों में धातु से परे लिङ् लकार होवे ।। ४५३ ।। ४५४ ॥ यासुट परस्मैपदेषदात्तो डिच्च । ३। ४ । १०३ । लिङः परस्मैपदानांयासुडागमी डिच्च ।। लिङ् के स्थान में जो परस्मैपद सजावाले आदेश तिन को यासुट का आगम होवे सो यासुट उदात्त और डित् होवे ॥ ४५४ ॥ ४५५ ॥ लिड: सलोपोऽनन्त्यस्य । ७ । २ । ७६ | मार्वधातुक- लिडोऽनन्त्यस्य सस्य लोप: । इति प्राप्ते ॥ लिड् दो स्थान में जो सार्वधातुक श्रादेश ४१२ तिन के अवयव अनन्त्य (अन्त्य से न होने वाले) स् का लोप होवे । यह प्राप्त हुआ तब ॥ ४५५ ।। ४५६ ॥ अतो वे य. । ७ । २ १८०। अतः परस्य सार्वधातु- कावयवस्य यास् इत्यस्य इय् । गुण ॥ इस्त्र प्रवर्ण से परे जो सार्यधातुक का पवयव याम् ४५४ उस को इय् हो । इम म्वादया। से (भव + यास् + ) के स्थान में (भव+य् + ) पा तमगुण पिया तो मवेय+ पेण पात ४५० ॥ छोपो व्योर्वजि ६।१।१६ ॥ भवेत । भवेताम् । पन् प्रत्याशार (१) परे ते पोर य् पा थोपवे परीति से वे दो पद मिड भए" वैसे मवेत् गावे। मवेताम् वे दोनों शेषे ॥ ४५० ।। ४५८ ॥ झेबुस । ३ | ४ | १.८ । लिए । भवेयु । भवे । भपेतम् । भवेत् । भवेयम् । भवेष । भवेम । विरसमार की रपान में वो मितिम को सोये ॥४॥ तप भवेय् + गुडपा १४२ ॥ १२ ।पौर १ ८ भवेयुः पेलावे। भये गये भवेयम में कोई । भव' BBe Tम होगी जोवे । मोम म हो। ४५८ ॥ विधिषि । ३ । ४।११६ । पाथिपि सिसस्तिका धधातुकसं स्यात्॥ पामीर्वाद पर्ष में वो सिर सधार, सपो स्थान में बोनस तिवादिय प्रत्यय (ति) पादेपर उनकी पाषातुन संज्ञा सोवे ame! 8६ । सिंदायिपि । ३।४।१४। पाणिषि लिगे यासुट फित् स्यात् । स्कोः संयोगायोरिति सखीय । पामीर पर्व में एपा पो पिर सवार उसबोबो यामुर पापम ॥ीय पावित्गेचे स्वो सीमापोरनोच । स सूत्र से यासुर पो याए में वो उसबा बोप होता ॥ १५ ॥ ४६१ मिति च १।१।५ । गिस्फिन् निम्निमित्ते ग्य चये गुबहवो न स्त । भयात् । भवास्ताम् । भूयास | भया । स्तम् । भवास्त । भयासम् । भूयास्व । भूयास्म ॥ बिम निमित्त प्यो मानकर इन्वर गुपपाधि वी प्राप्ति होम सो निमित्त यदि गित (म लिपवा पत् गया ) वित् (विसका इल) पपा रित् (-विसमा पत् मया )को तो गप पवा दिन वे स्पषमा पमिमाय या वि मिस पुष में गुप पा सपि वा धिान हो उस में पपरयो "सोनुपाती पर से उपस्थिति जीती गे से मूसा चोरन् । प्रत्यापार में सवे स्थान में मुष ॥ पाया पोकि यामत् पार्षभानुस ५६ प्रत्यय पर है परन्तु यासु ४५ से बित् माना गया है - । भया - , ॥ लघुकीमुद्याम् । १५ इसी हेतु से गुण नही होता, तब भूयात् यह पद सिद्ध हुघा भूयात् - ईश्वर करे कि वह होवे, भूयास्ताम् = वे दो होवे, भूयासुः ४५८ १२० १०८-घे होवें, भूयाः तूं हो, भूयास्तम् तुम दो होवो, भूयास्त - तुम होवो, भूयासम् = में होवु, भूयास्व - हम दो होवे, भूयास्म : इम होवें ॥ ४६१॥ ४६२ ॥ लुङ ३ । २ । ११० भूतार्थे धासोलुंड स्यात् ॥ सामान्य अद्यतन भूतकाल के प्रकाश करने अर्थ में धातु से परे लुट् लकार ३८८, होये, यहा इतना विचार है, कि अद्यतन भूत अर्थ में तुड् ही होता है, और जब परोक्ष, अपरोक्ष, अद्यतन, वा भनद्यतन का विचार नही रहता किन्तु केवल भूतकाल का प्रकाश करना हो तो भी लुङ् लकार होता है, नही तो परोक्ष भनद्यतन भूत में लिट् और अपरोक्ष अनद्यतन भूत में लङ् ये दोनों कम से बाध लेते हैं ।। ४६२ ।। ४६३ ॥ माडि लुङ । ३ । ३ । १७५ । सर्वलकारापवादः ॥ माड् उपपद रहते लुड् लकार होये । यह लड् सभ (घ) लकारों का अपवाद है। ऐसी अवस्था में वर्तमान थादि काल का निश्चय प्रसग से होता है ।। ४६३ ।। ४६४ ॥ स्मोत्तरे लङ् च । ३ । ३ । १७६ । स्योत्तरे माडि लङ् स्याच्चाल्लुङ॥ जब माङ् से उत्तर (परे) स्म होय तव (स्म है परे निसके ऐसे माइ रहते) लङ् लकारहोवे चकारसें लुड् लकार भी होघे, इन लड् और लुङ् में से निसका प्रयोग इष्ट हो उसीका प्रयोग करना चाहिये यह उदाहरण में ४६८ देख लेना ॥ ४६४ ॥ ४६५ ॥ चिल लुङि । ३ । १ । ४३ । शवाद्यपवाद ॥ लुङ् लकार परे रहते धातु से चिल प्रत्यय होय । यह चिल शप् ४१३ आदिका भपवाद है ॥ ४६५॥ ४६६ ॥ च्ले मिच् । ३।१।४४ । इचाविती ॥ चिल. ४६५ के स्थान में जो सिच् हो * उस सिच के दू की ३३ इस से और च् की (३) से इत् सन्ना होती है ।। ४६६ ॥ के उपपद * कोई कहे कि यदि च्लि को सिच् करना था तो पहिले ही एक सूत्र पढ़कर सिच् करलेते च्लि का क्या फल हुआ, तो इस का यह समाधान है कि फिल को सिच् से विना "अयादि" आदि में चिण् भादि आदेश भी होते हैं तो इस लिये फिल का पृथक करण किया है।
१५ म्वादय। । । । H ~ ४६७ ॥ गातिस्थाघुपाभूभ्य सिच परस्मैपदेषु । २ 181001 शुक् । गापाविखणदेशपियती गच्छेते ॥ गाति (ग) स्या (प्ठा) घु समय (दावाप्पदाप्)स से मिर्दिष्ट पोर पा पोर म् इन धातुपों से परे परस्मैपद में सिच् ४३५ का सुपीय यर्था गमन पर्य में बो रन् चातु उस खो जो गा पादेय होता पोर पीने पर्थ में वो पा धातु मिस बो पिय पादेश तारे हम पा पापोता ॥ ४५० । ४६८ ॥ भसुपोस्तिरि । 01 ३1८८ । मम एतयो सार्वधातु के तिरि गुणो न । पभत् । पताम् । अमवम् । भभू । पभूतम् । पभत । पभवम् । पभव । पभम भू और सूरन दो वातुपों को गुर ४१४ नोय यदि सार्वधातुम तिर पस्वय परे से तो। तब मू+तुर ४१२ 1 8 18 से प्रभूत् पापा। प्रमूताम् पे दो गुए। 8. प्रभूषन् ४१८ पुष । पम् तशा । पभूतम् तुम दो एप । अमृत तुम हुए । पमूषम में पा । पम पम दो हुए । प्रभूम म प ४८n ४६८ ॥ न मावोगे । (18198। पहाटी न स्त । मा भवाम् भत् । मास्म भवत् । मास्म मत् ॥ कर पातु प्ले पूर्व पर पोर पार १०१ नोवें जब धातु का मार माप योग रो पर्षात् पातु माद के साथ से। मा भान भूत् तूम चोपे (पाप नसोप) मास्ममयत् ५५ पोर मास्म भूत ) पान tel ॥ मिनिमित्त पर क्रियातिपत्तो। ३ । ३ । १३८ । हेतु तुमहावादि लिनिमित्त तत्र भविष्यत्यर्थे तर क्रियाया पनिष्पत्ती गम्यमामायाम् । प्रमविष्यत् । पभषिष्यताम्। भविष्यन। प्रभविष्य । भविष्यतम् । पमषिष्यत । भविष्यम्। पभविष्याव। पभविष्याम ॥ सुप्टिरचेदाविण्यपदा सुभिषमाविष्पत्य पूत्यादि प्रेयम् । पत सातत्यगममे २ पतति । पहा निरनचार मिमित्त (बायकारणभाष-विधि निमनपामार ४॥ ४७ धातु पाठ मे लघुकीमुद्याम् । धादि) से से कोई हो तहां भविष्यत् अर्थ मे लुङ् लकार "३८२" स्थापन करो परतु जब क्रिया की गसिद्धि समनी नाय ।। तव भू धातु से परे इस लकार के होने पर यथा क्रस इमप्रकार के रूप होते है जैसे भू+लङ्-भू+ल होने से ४०१ । ४५२ । ४१४ 1 ४२८ । ४२७ । १६३, ४५१ । इन से प्रभविष्यत्, जो वह होय । भविष्यताम् ४४० जो वे दो हो अविष्यन् ४५१ । ४५२ और और २३ जो वे हो । अभविष्यः, जो तू हो । अभविष्यतम्, जो तुम दो होवो । अभविष्यत् जो तुम हो। अभविष्यम, जो मैं होवु । अभविष्याव,जो हम दोड़ो । अभविण्याम, जो हम हों। अब दूसरा श्रत धातु जिस का निरन्तर गमन अर्थ है उस का वर्णन (लकारों में साधन प्रक्रिया) लिखते हैं श्रत् का रूप अत है अन्तिम "" अनुबन्ध कहलाता है । प्रत् ३८८ । ४०० । ४०१ । ४१३ । से अतति वह निरन्तर जाता है ॥ ४७० ।। ४७१ ॥ अत प्रादेः । ७।४। ७० । अभ्यासल्यादेरती दीर्घः स्यात् । आत । आततु । श्रातुः । आतिथ । आतथु. । आत । आत । आतित्र । आतिम । अतिता । अतिष्यति । अततु । अततात् ।। अभ्यास के ४२१ आदि इस्व अकार को दीर्घ होय । इस से लिट् मे पात ४१८ बह गया। प्रातः वे दो गए। आतिथ ४२७ तू गया। प्रातः, तुम दो गये। श्रात, तुम गये । भात, मैं गया । आतिव, हम दो गए । प्रातिस, हम गये । लुट् लकार में प्रतिता ४२८ । ४२८ और ४३१ १ ४२७ से सिद्ध भया अतिता वह जायगा । इत्यादि जानने । और लृट् लकार में प्रतिष्यति ४३४ यह जायगा । और लोट लकार में अततु । ४३७ वह जावे ॥ ४७१ ॥ ४.७२ ॥ प्राडजादीनाम् । ६ । ४१ ७२ । अनादरम्याट तुए ललक्षु । आतत् । अतेत् । अत्यात् । अत्यास्ताम् । लुडि सिचि इडागले छाते ॥ - . यह लुड् लकार भूत अर्थ मे भी दीख पडता है, जैसे अजी बारस होती बहुत धान भी हो" अथवा " जो अछी धष्टि होती तो बहुत धान भी होता " दून उदाहरणो मे कार्य की प्रसिद्धि प्रकाय की गई है, और पहिले वाक्य मे दृष्टि होने का नक्षण नही दीख पडता इस लिये बहुत धान का होना,असम्भव है, दूसरे का हप्टि प्रछी नही हुई, धूस लिये बहुत धान भी नही हुआ" यह आश्य है, इस लिये वृत्ति में जो भविष्यत् काल में कहा है, वह अनित्य है ।। - म्वादय'। प्रमादि पा को पार का पागम होय जब दुर मा बाम में से कोई पत्र परे होय रस पिये नर में प्रातत् पहमया । सिर में पतेत ४५० पासाये । पापीर्वाद पर पो प्रयास करने में प्रत्यात् ५८ वर करे पि पावावे। जब सुर १२ पाये तर सिप ४५५ परेको पौर पद पा पामम ४२० मी ही एका तप ॥ ४० ॥ ४०२ ॥ पस्तिसिचोऽपृत्ो । 0 | ३ २। विद्यमानासिपी ऽस्तेश्च परस्याऽपृत्वस्य सह ईडागम ॥ विधमान मिच् पयवा पिपमान पस् पातु से जो पपुस १५ (१) स सोपा पागम होये ॥ ४० ॥ 808॥ इट ईटि । ८।२।२८।इट परस्य सस्य लोप म्वादोटि। सिखोप एकादेथे सिहो वाच्य । पातीत् । पातिष्टाम् । पद ११० से परे जो प उसका चोप होय परन्तु बाद परेरो तो यह सिम् गोप् (मिच् पो मा 808 से सोप) पपादेय के परने में सिमामा पापिये। इस ता या फरमा जि पातिस्+ई" यहा सिच को स् का सोप परने के पनन्तर पाति+ त में यदि कोई से पिपादो कोम चोप पा १२ दी एकादेम विशयक सूप की इष्टि में पसिर होने पर सन्निका निषेध को तो हम को या समाचामना दिएका देव से करने पर सिमा तोप मित्र याना" तबास से मना सोप सिर मान ५२ सेसी बोने पर "पासीत्" सिख मया । पातीत पा गया । पातिष्याम् -88 । ११ । न बोगये | ॥ ४७५ ॥ सिवभ्यस्तयिदिभ्यश्च । ३।४।१८। सिचोऽम्य स्तादिदेरच परस्य न्तिमम्बन्धिनोमर्दुम् । पात्तिषु । पातीः । पातिष्टम् । पातिष्ट । पातिषम् । पातिष्य । पातिष्म । पातिष्यत । षिध गस्याम् । ३ ॥ सिपमा पम्यम्त मंधव पातु पबवा विद पातु ल से परे रित् पवार हेरमान में दो पादेशभि उसको मुस्कोथेतब पाति वे भय । पाती र 10 मया । प्रातिप्रम् तुम दो गये । पातिष्ट तुमन्ये । पातिवम् में नपा । पाति उमदो गये। पातिम रम गये । परबार में पातिव्यत् ० बोपा वाव । उत्पादि पीरमी मानी। पब ममम (चनना) पर्पयाचे पिएप साधने की महिमा विपसे।
लधुकीमुद्याम् । १८ ४७६ | इस्वं लघु । १ । ४।१०। इस्व अच् की लघु सजा होवे ।। ४७६ ॥ ४७७ ॥ सयोगे गुरु । १ । ४ । ११ ॥ सयोग १६ परे रहते जस्व स्वर (अच्) की गुरु सजा होवे ॥ ४७७ ।। ४७८ ॥ दीर्घ च । १ । ४ । १२ ॥ दीर्ध अच् की भो गुरु मजा होवे ॥ ४७८ ॥ ४७८ ॥ पुगन्तलघूपधस्य च । ७।३।८६ | पुगन्तस्य लघु- पधस्य चाङ्गस्येको गुग्ण. सार्वधातुकार्धधातुकयो । धात्वादेरिति सः। सेधति । षत्वम् । सिषेध ॥ जो अन पुगन्त अर्थात् जिस के अन्त में पुक् ७४३ मे भया हो अथवा लघूपध (जिम की उपधा में १८० लघु ४७६ हो) उस के इक को गुण ३० होवे परन्तु उस को परे सार्वधातुक वा आर्धधातुक प्रत्यय रहे तो इस में गुण किया तब २७५ से विध धातु का प्रथम अक्षर जो प् है उस को स् हुा । सेधति, वह जाता है । आदेश रूप म को १६३ से ष् हुधा इस लिये लिट् लकार में सिषेध = वह गया ४१८ ॥ ४७८ ॥ ४८० ॥ असंयोगाल्लिट कित्। ११२ । ५ । असंयोगात्परोऽपि- ल्लिट् कित् स्यात् । सिषिधतुः । सिषिधु । सिषेधिथ । मिषिधथुः । सिषिध । सिषेध । सिषिधिव । सिषिधिम । सेधिता । सेधिष्यति । सेधतु । असेधत् । सेधेत् । सिध्यात् । असेधीत्। असे धिष्यत् । एवं चिती सज्ञाने । ४ , शुच शोके । ५ । गद व्यक्तायां वाचि । ६ । गदति ॥ लिट ४१७ के स्थान में यह आदेश जो सयोग में परे नही और पित् भी न हो मी कित् होवे (माना जाय) इस लिये ४६१ से सिविधतु यहा गुण न भया । सिपिधतु', वे दो गये । सिषिधु , तुम गये। मिषेध, मैं गया । सिषिधिव, हम दो गये । सिपिम, इमगये। और लकारो में। लुट् लूट लोट लिङ वि.। सेधिता, मेधिष्यति, सेधतु, मेधेत्, अर्थः वह जायगा । वह जावेगा। वह नावे। यजनाये। लकार-आशिषि लिङ् । रूप०-- मिध्यात्, असेधीत्, असेधिष्यत्, जो वह जाये। . - लकार अमेधत्, वह गया। लुड्। लड्। अर्थ-वरकरे कि यह जाये । वह गया।
२ -- . चित् (चिती) चेतकरना। और मुच् (मुच्) मोष वा खेद परना ये दोनों पातु मी पिथकीतरामानने। गद (गद) पातु स्पष्टवोसने पर्व में है उसके सर में “मदति" १८८18 १५ पार स्पष्ट वोचतारे॥४८ ॥ ४८१ ॥ नेर्गदनदपतपदधुमास्यतिान्तियातिवाप्तिद्रातिप्मा तिवपतिवतियाम्यतिधिनोतिदेग्धिषु च। ८ । ४ । १७ । उपसर्गस्या म्मिमित्तात्परस्य नेर्यो गदादिषु परेषु । प्रचिगदति । उपमर्म में स्थित भो निमित्त (गको पपरने यो रपा प्प धारण) तिन में परेमो नि का न् तिस के स्थान में होने परन्तु व मद पादि पातु परे से तम । गद पादि धातु ये रे पद पा पब पावा रे। नद का अर्थ (नाद बरमा) (पव्या मप्दै) वा पत गिरना । पद गमन (वाना) घुमनावाने १५ में यो भातु । मा माफ्ना । यो मार गोमा । मारना वा गति । या जाना । वा पाना असे वायु वादा जाना मागना प्मा खाना । वप् योगा । पा सेत्राना । मम् याम्त होना । पि पुनना । दिप उपय (हरि)। तब रस सूत्र में प्रपिगदति" में च मया पासर्प से स्पष्ट मोचतारे 8८१५ ४८२ कुटोग्चु । ७ । ४ । ६२ । भभ्यासकवगाकारयोग्य वर्गादेश ॥ पम्याम २१ सपर्म (व ग्र) अयमारवार (को) (वर्ग) (१र म्) पादेगरोय ॥४८॥ ४८२ ॥ पत उपधाया । 01 २ । ११६ । इधि स्यात् अिति पिति प प्रायये । अगाद । बगदा । वगटु । जगदिय । जगदयु । अगद ॥ पातु की पपा यदि पफार की तो हम बोरियोय पप ति या पित् प्रत्यय परे र तप । गद गद + सन् १५ मे गमद+in म पोर ५ स जगाद मिश पष्ठ पोता। जगदतु वे दो स्पष्ट बोने । जगदु, र स्पष्ट होने । नादिय ४२० । स्पार बोना। बगस्य तुम दो पर मोना मगद तुम रपर मोमे ॥४॥ ४८४ ॥ पसुषमी पा। 01१।११। पित् भ्यास । बगाद । बगद । अगदिय । अगदिम । गदिता । गदिप्पति । गदतुः । पगदत् । गदेत् । गद्यात्॥ ।
मैं स्पष्ट बोला । लधुकौमुद्याम्। उत्तम पुरुप का गल् ४१० का एल् ४१८ विकल्प से णित् माना जाय । अर्थात् वहा वृद्धि आदि कार्य विवाल्प से होवें। इस से जगाद वा जगद, जगदिव, हम दो स्पष्ट बोले । जगदिम, हम स्पष्ट वोले । लुट् लकार में गदिता ४२७ १ ४३१ । वह स्पष्ट बोलेगा। लुट में गदिष्यति, वह स्पष्ट बोलेगा। लोट में गदतु ४४५ । ४३७ वह रपष्ट बोले । लङ् में अगदत्, वह स्पष्ट बोला । लिड मे गदेत, वह स्पष्ट बोले । प्राशीलिड् में गद्यात् ४६० ईश्वर करे कि वह स्पष्ट बोले ॥ ४८४॥ ४८५ ।। अतो हलादेलंघोः । ७ । २ । ७ । हलादेल घोहधिवे. डादी परस्मैपदे सिचि। अगादीत् । अगदीत् । अगदिष्यत्। णद अव्यक्त शन्दे ॥ ७॥ हलादि (जिस के आदि में हल हो) ऐसे धातु के लघु ४७६ संज्ञक प्रकार को विकल्प करके वृद्धि होय परन्त जब इडादि इट् ४२७ है आदि में जिस के ऐसा सिच् और परस्मै पद सज्ञा वाले प्रत्यय परे रहें तब लुड् लकार मे अगादीत् वा अगदीत् ४७४ वह स्पष्ट बोला । लुङ् लकार में अगदिष्यत् ४७० जो वह स्पष्ट बोले । अब रणद, (द) धातु जिम का अस्पष्ट बोलना अर्थ है, उस के रूपों के साधन का प्रकार लिखते हैं ।। ४८५ ॥ ४८६ ॥ गोनः । ६ । १ । ६५ । धात्वादेगस्य नः। गोपदेशा- स्त्वनर्दनाटिनाथ्नानन्दनवन मृत ॥ धातु के श्रादि मण् को न् होवे । नर्द,शब्द करना । नाटि, दीर्घ के योग्य चौरादिक नाचने अर्थ में नट् धातु नाथ् मागना। नाध्, मागना। नन्द, समृद्ध होना। नक, नाश होना । नृ, लेलाना । नृत्, (नृती) नाचना इन पाठ धातुओं को छोड कर और जितने धातु नकारादि (न् है आदि में जिन के) है उन सब को गोपदेश कहना। गोपदेशा. (उपदेश में एकार वाले) जानी ॥ ४८६ ।। ४८७ ॥ उपसर्गादसमासेऽपि गोपदेशस्य 1८।४ । १४ । उपसर्गस्थान्निमित्तात्परस्य णोपदेशस्य धातोर्नस्य ण । प्रणदति । प्रगिनदति । नदति । ननाद ।। समाम ८५५ न हो तो भी उपसर्गस्थित निमित्त (र वा ए ) से परे गोपदेग- धातु ३८६ के न् को ण् ४४६ होवे । प्रपदति, वह अच्छी रीति से शब्द करता है। प्रमिानदारी - म्पादय' पा बहुत अच्छी मांति से पद परता है। उपसर्ग रहित पर धातुक कप पेसे पोसे मेसे "मदति या पयत गम्द परता। ममाट एसमे शरद पिया । Bou ४८८ ॥ पत एकहलमध्येऽनादेशादेलिटि । । । ४ । १२. । लिरिममित्तादेगादिक न भवति यहां तदषयवस्वाऽसंयुक्तरुपमध्यस्य स्यात एल्वमम्घासबोपरच किति सिटि। जित् ४८ संजय सिट परे रहते सिद् मिमित्तमानकर बिस पाने पम्मास में पारि भचर का स्थान में पादेय ४८५ म एए उसले अपयव पसंयुहीच में वत्तमान नो प्रकार सबो ए होय पार पम्वाम पागोपीय ।। ४८en ४६८॥ यखि च सेटि। ६ । ४ । १२१ । प्रागुव स्यात् । मेदिष । नेदयु । नेद । ममाद । मनद । दिव । नेदिम । मदिता । नदिष्यति । मदतु । भमदत् । गदेत् । नयात् । प्रमादीत । अनदीत् । पनदिष्यत् । टुमदि। समृती ॥ ८॥ पोर जब पेट् (पर सहित) + पक्ष प्रत्यय पोहो तो भी पूोल पार्य (पत्वाम्वासनोप) ४८८ मा । तव मेदिय तूं ने बम बिया । मेरा तुम रोगों ने माह बिया। मेद तुम मोसे से नमार पानमद मैंने प्रम बिया । मेखि ८ सम दोनी ने मम्द लिया। मेरिम-मने मम्द विमा । पागे हमारी टेप इस क्रम में देवी- नयारपुर सर सोर पिनि पाणिसित मदिता मरिष्यति मन्तु अमदत् मठेत् मपात बागदपा पम्द वा मम्द उसने पम्द पा सम्पबारे। परनरेगा विया। करेगा। करेगा। यम्दहरे। रूप पथ पमाटीत् १८५ पनदिष्यत् । उसने टशिया। बोबा याद करे। पय मन धातु जिस व्य पनि परे उसपो का साइन मिचो - पारिचार में इस पातु पाप हुनदि । Be ॥ पादिभिटुहव । ११ । ५ । उपदेगे धातोराया एते पता स्युः ॥ १९०11८14 पातु पाठ में।
वह समृह- वह समृद्ध- वहसमृध- वह समृद- वह सह- हुप्रा। हुआ। रूप लघुकौमुद्याम् उपदेश (आदिम उच्चारण) में धातु के आदि मे जो जि, टु, और हु, सो इत् होये ।। ४८० ।। ४६१ ॥ इदितो नुम् धातीः । ७।१।५८ । नन्दति । ननन्द । नन्दिता । नन्दिष्यति । नन्दतु । अनन्दत् । नन्देत् । नन्द्यात् । अन- न्दीत् । अनन्दिष्यत् । अर्च पूजायाम् ॥ ६ ॥ अर्चति॥ इदित् धातु (निस धातु का इकार इत् सन्जक हो) उस को नम् का पागम होय नन्दति २६० वह समृद्ध होता है। और लकारों के रूप नीचेदेखो.- लकार लिट लुट लुट् लोट लड् नन्दिता नन्दिप्यति नन्दतु भनन्दत् अर्थ होगा। होगा। होवे। सकार वि० लिड् आशिर्लिङ लुड लुङ नन्देत् नन्द्यात् अनन्दीत् अनन्दिप्यत् अर्थ वह समृद्ध होवे। ईश्वर करे कि वह वह समृध हुश्रा। जो वह समझ हो। समृद्ध होवे। (म, अर्च धातु पूजा करने अर्थ मे है । अर्चति, वह पूजा करता है। ४६२ ॥ तस्मान्नुदिहल. ! ७ । ४ । ७१ । दिहलो धातोर्दी- धौभूतात् परस्य नुट् स्यात् । बानर्च । आनर्चतु । अर्चिता। अर्चि- ष्यति । अर्चतु । आर्चत् । अर्चेत् । अात् । आर्चीत् । आर्चिष्यत् । ब्रज गतौ ।१०। व्रजति । बजाज । व्रजिता ब्रजिष्यति । व्रजतु । अबजत्। व्रजेत् । व्रज्यात् ॥ जिस धातु में दोर हल हो उस के अभ्यास के ४७१ दीर्घ किये गये अच् से परे मो अक्षर हो उस को नुट का आगम होवे । पानर्च १००। ४७१ और ४८२ वह पूना करता हुश्रा । पानर्चतु वे दो पूजा करते हुए । “और लकारों मे रूप नीचे देखो":- लुट लुट लोट स्लङ् अर्चिता अर्चिष्यति अर्चतु आर्चत् (४७२) अर्थ वह पूजा करेगा वह पूजा करेगा वह पूजा करे । उसने पूजा की वि० लिट पाशिलि. लुड् लुड अर्वत् अर्ध्यात् आर्वीत् आर्चिष्यत् अर्थ पूजा करे ईश्वर करे कि वह वह पूजा करता जो वह पूजा करे । १ लकार . लकार वह पूजा करे। त्रा।
२४ ६प पमाम मतु - 'म्पादय । प्रा(मम् ) पातु गति ( पसन) पप में है। उसने पनी सिये जाते हैं- सट् हिट बोर प्रति मजिता प्रजिष्यति वा बातावा गया (३२२)। पाजावेगा। बाबायेगा। वाम पनमत वा गया । वि विर में प्रजेत् । जावे । पामिसिह पर में प्रग्यात् रपर पर किया बापे । ४६३ ॥ वदामासान्तस्याच' । ७।२।३ एषामचीहरि सिषि परम्मैपदेषु । पवाबोस् । अग्रजिष्यत् । कटे वावरण्ययी । ११॥ कटति धकाट । कटिता । कटिष्यति । कटतु । पकटत् । कटेत् । कटपात् । पद स्पष्ट बोसमा । प्रत्र, बाना । पौर सिम्त घातु रन के पप् (स्वर) की निस्य हरि पादेगरीय पातु परस्मैपद मस्पयरे पर मिस + ऐधा • सिम्परे रोती। पनामीत् पा गया। पाणिभ्यत वो पा जाये। पठे (माट् या पातु वर्षा ( परसने ) और पवरप (घेरने) पम में परति-पाता.पा मेघ बरसतार।चवार-१८१ मेव परमा । करिता १२० मेव पास बरसेगा। पाटिम्यति-मेव बरमेया। कारतु-मेव परमे । पपाटस्-मेव बरसा । घटेत-मेच बरसे। बटमात्-पर बरे धि मेघ बरसे || ४८४ ॥ म्यस्तषपश्वस्वागुपिण्ये दिसाम् । २।२।५ समयान्तस्य सकाटे पर्यन्तस्व श्षयतेरे दितरच तदिदंडादौ सिदि। पकटीत् । पकटिध्यत् । गुपूरक्षसे । १२ ॥ विन चातुओं के पन्त में 'मम् "M मे से बोई पब पर- मारमा और पिस्-सांस देगा बाग-बामना और + बिस पास में भि ०४१ मा ५ सेके। पीर शिव-बठना पा पाना और एवित् (निसका एजार पर भया गे) बात न सब ची िपादेय गोयादि.२० मि पर राते। पवाटीत- मेष गरमा । अपरिष्यत्-मरि मेघ बरसे । गुप् (मुप) पातु रचा बरने पर्व में है। उसकी पाचन प्रक्रिया ऐसी 1108॥ ४८५ ॥ गुपधपविष्टिपणिपमिभ्य पाय 1३।११२८/स्वार्थे । चि प्रत्यय - "प्रत्यय ! + भात लघुकौमुद्याम् । गुपू, रक्षा करना । धूप, सताय करना । विच्छ, गमन । पए, स्तुति वारना । पन, स्तुति करना , इन धातुधी से परे र स्वार्थ में प्राय् प्रत्यय होवे । ४६५ ॥ ४६६ ॥ सनाद्यन्ता धातव ।३।१ । ३२ सनादयः नामेणिन्ता प्रत्यया अन्ते वेषां ते धातु संज्ञकाः । धातुत्वाल्लडादयः । गोपायति ॥ सन् से लेकर कमेर्णिड ( ५५४ ) सूत्र को णिड् पर्यन्त जो बादश १२ प्रत्यय हैं। उन में से कोई एक जिन के अन्त मे हों वे प्रत्यय विशिष्ट धातु सना वाले होवें, उनको धातु सजक होने पर ४०० श्रादि से उन से परे लट् आदिक लकार होते हैं, उन बारह सनादियों में से एक पाय् सी है, परन्तु वह प्राय गुप् के अन्त में है, इस लिये यहां प्राय के पाने से और उपधा गुण मादि कार्यों में गोपाय की धातु सना दुई फिर लट हुआ गोपायति ( वह रक्षा करता है ) सिद्ध हुआ 18 8८६ ॥ ४८७ ॥ आयादव आर्धधातुके वा । ३ ११ । ३१ । आर्धधातुक- विवनायामायादयो वा स्यु ॥ जब पार्धधातुक की 'विवक्षा' (कहना इष्ट ) हो तव श्राय श्रादि बारदी विकल्प से होय । यहा इतना विचार है, कि केवल वारहो में से प्राय गिड् (५५४) ईयङ् ये तीनो विदाल्प करके होते हैं ।। ४८७ ॥ ४६८ ॥ कास्यनेकाव आम् वक्तव्य । लिटि । आस्कासोराम् विधानान्मस्य नेत्वम् ।। कास् और अनेकाच। (सिस में अनेक अच् हैं) ऐसे (वा इन) धातुओं से लिट् परे रहते धाम् प्रत्यय होघे ऐसा कहना चाहिये । पार, बैठना । श्रीन कास् चमकना इन से परे धाम् म. विधान करने से पाम् के म् की इत् सजा नही होती। इस में ऐसी पा- लोचना (विचार) है कि यदि पाम मित् हो तो (मिदचोन्त्यात्पर.) इस सूत्र के बल से श्रा- के अन्त में होगा। फिर दीर्घ होने से भास और कास् का रूप वैसा ही रहेगा, पार कच फल क्या हुअा कुछ नहीं व्यर्थ होने से नापन करता है, कि (आस् ) मे मदार को इत् सज्ञा नहीं होती ।। ४९८॥ . और कई एक" णिच्, सन् " श्रादि प्रत्यय ऐसे हैं कि उनके आगे आने से धातु का अर्थ बढ़ जाता है जैसे पिपठिषति ( पढन की इच्छा करता है ) यहां केवल धात का अर्थ पढन है, सन् के पाने से इच्छा अर्थ बढा, परन्तु "आय " को आने से कुच्छ भी तो यर्थ नही बना यह स्वार्थ का आगय है ।।
२५ H ऐसे चातु म्यादय । BEL तो खोप ।। ४ । ४८ । पार्धधातुकोपदेगे पददम्य तस्यातो जोप पार्धधातुके ॥ वप पार्धचातुब (1)ोने पाताहो तप पदन्त (पवार रे परत में विपक) ऐसा नो पातु उस के पवार या पापातुव परे पते ठोप होता Been ५ • ॥ पाम । २।४।८१ । पामः परस्य नुम् । पाम् ४८८ से परे वो प्रत्यय उस का मुन होवे n५ ५.१ ॥ स पामुप्रयुज्यते मिटि ३।१।४. । पामन्ता पिलटपरा कृभ्वस्तयोऽनुप्रयुज्यन्ते । तेषां हिस्वादि । पाम् (124) विस मे पन्त में से परे सप् (छ परना। भू होना । पम् होना) ये एम स्थापित किये जायेंगर नपा सिर बोय । न पो पित्य (४१) सूत्र से पोर सिद के एम काय होते ॥५॥ ५ २ ॥ ठरत् । ४ । ६६ । पाम्घासवर्षस्यात् । छवि गोपायाम्पकार । मिल्वाल्परत्वाणि प्राप्ते : पम्यास अपने स्थान में पपार हो।पत् कोसे परपा पीर ५२१ से पशप B२ पौर १८५ से घधि करने पर पौर मोपायाम् को साथ मिलाने से भोपायाम्यवार (स रक्षा की) सिपा। प्रथम पुरुष के शिवधन में गो + तुम् ऐस एप के पनाने पर १२८ सेपबार में स्थान में १८ से या पाया, आषि बित्व में यर पर। रिस्व २ विधायक सूत्र या पारव से पूर्व ॥५२॥ ५ . हिवचनेऽचि। ११५८ । पिस्वनिमित्तेऽधिपच पादेशीम विस्वे कर्तव्ये । गोपायाचक्रतु । गोपायाचनुः । हित्यको निमित्त प्रमादि सत्यमो परेराते पूर्ववे पच् को कोई भी पादेश न ोये जब हग पिस्व न पाहो परन्तु उसने सोने की अपेक्षा से हित्य के होने पर तो पादेम होता की ससिये-मोपायान्तु किन दोनों ने रचा कोमोसमापन। उमरपाबी। सिप nan ५ ४ ॥ एकाच छपदेशेऽनुदात्तात् ।।२।१ । उपदेणे यो धातुरेशाजमुदात्तरष सत पाधधातुवस्येएन । अदम्तयातिहरपुगी २७ लघुदौमुद्याम् । स्नुनुक्षुश्विडीश्रिभि । वृड्भ्याञ्चविनकाचोऽजन्तेषु निहताः स्कृताः॥ १ ॥ कान्तेषु शल्लोकः । चान्तेषु पच् मुच् रिच् वच् विच् सिचः षट् । छान्तेषु प्रच्छेकः । जान्तेषु त्यज्, नि, भज्, भज, भुज, भ्रस्ज्, मस्ज्, यज्, युज्, उज्, र, विमिर्, स्व, सम्ज, सृजः पञ्चदश । दान्तेषु भद् क्षुद खिद छिद तुद् नुद् पय भिद विद्य विनद विन्द शद् सद् स्विद्य स्कन्द इदी षोडय । धान्तेषु क्रुध् चुध् बुध्य् बन्ध् युध् रुध् राध् व्यध् शुध् साथ् सिध्य एकादश । नान्तेषु मन्यहनी हो । पान्तेषु श्राप चिप कुप् त तिम् तृप् दृप्य लिए लुप् बप् शप् स्वप् सृपस्ययोदश। भान्तेषु यभ् रम् लभस्नय । मान्तेषु यम् नम् गम् रमश्चत्वारः । शान्तेषु क्रुश् दथ् दिश् दृश् म रिश् रुप लिश् विश् स्पृशो दश । पान्तेषु साव, त्विष्, तुष् द्दिष् दुष् पुष्य् पिष् विष् शिष् राष्ट्र श्लिष् एकादश । सान्तेषु धर वसती हौ । हान्तेषु दह दिइ दुइ नह सिह रुह लिह् यहोऽष्टौ। अनुदात्ता हलन्तेषु धातवस्च्यधिक शतम् । गोपायाञ्चकर्थ । गोपा- याचक्रथु । गोपायाचक्र । गोपायान्चकार । गोपायाचकर। गोपायाञ्चकव । गोपा- याचवम । गोपायाम्बभूव । गोपायामास । जुगोप । जुगुपतुः । जुगपुः । उपटेश (श्राद्योच्चारण ) में जो धातु एकाच् (एक स्वर वाला) और अनुदात्त हो तो उस से परे जो प्रार्धधातुक ४२६ । ४३० । प्रत्यय उस को इट् ४२७ का प्रागस न होवे । जिन धातुपी का ऊ, वा ऋ, इत् सन्जका हो उन से और यु, मिलाना, आदि।क, शटद करना । क्ष्णु, तीक्ष्णकरना । शीड्, सोना । स्नु, पहना । णु, स्तुतिकरना । क्षु, छींकना (छेकनो)। शिव, सधि वा गमनकरना डीङ्, उडना । शि, सेवाकरणा। ह, (ब) सेवाकरना । ह, (ह) स्वीकारकरना । इन से विना और सब एकाच् और अजन्त धातु अनुदात्त हैं। और नो एकाच हलन्त धातुओं में से ककारान्त एक ही शक्ल १ (अ) समर्थ होना अनुदात्त है । और चकागन्त धातुओं में से पच् १ पकाना । मुच् २ छोरना। रिच् ३ अलग करना, वा जुलाब देना । वच् ४ कहना। विच् ५ अलग करना । सिच् ६ छिडकना । ये छै ६ धातु अनुदात्त हैं। और छकारात धातुओं मे सें, प्रच्छ १ पूछना यह एक ही अनुदात्त है, और जकागत धाओं में से, त्यज १ त्यागना। निज २ शोधना वा पुष्ट करना । मज ३ सेवाकरना । म ४ तोडना । भुज् ५ भोगना । नत्ज् ६ सुन्नना। मस्ज् ७ शुधि वा डूबना। यज् ८ यज्ञ करना आदिक । युन ८ नोडना । रुज् १० रोग। रम् ११ रङ्गना । विनिर् १२ (अलग करना) । स्व १३ सङ्गकरना वा गले लगाना। सम्ञ् १४ मिलना । सृञ् १५ त्याम करना । ये १५ पचदश धातु अनुदात्त हैं। और दका- गन्त धातुओं मे से, अद १ स्वाना । चुट २ पीसना । खिद् दुखी होना । छिद ४ काटना। - ।
- - १ म्यादयः । तुदर पोगदेना । मुख र प्रेरप वरना। पप ० (प) गती (चमना)। मिदम तोड़ना। विष (२)ोना। विनदा(१)१ विचारमा।विन्द(५) ११ माम मा । थद १२ एम् चामा । सद १५ जाना पादिका स्विप (१) १४ पपीना पाना । स्वन्द १५ लाना या पूषना । स १५ मच त्याग करना । ये सोचा १५ पनुदात्त है। पकारान्त पातुपों में से चुप कोष परना । पुप् २ मूष पमना । (क) मुष्य १ जानना । बन्ध् । पान्मना । यु बनाएरमा । राप सिरि । प्यम् ताडनबरमा । गुच् ८ स्पोना । साथ् । सिाबरना । (0) सिभ्य ११ पूर्वशोना। वे ग्यारा ११ पातु अनुदात्त । नवारान्त धातुओं मेस (6) मभ्य १मानमा । पम् रमारमा ये २ धातु पनुदात्त । पान्त धातुपों में से पाए १ व्याप्त होगा। चिप् २ फेबना । इप् रोना । तप 8 राम्ताप । तिप् । धोना । तप व तृप्ति। (हप्प • गर्म करना पाप । विप् ८ खेपमा । मुप् ८ पाटना । बा १ दोन बोना । गप् । मापदेना । मप १५ मोना । म १५ पदमा । ये तेरए १५ पातु अनुदात्त । भवारान्त पातुओं में से यम् । मयुन परमातरम् ग बारमा बम् चाम। ये तीन पातु अनुदात्त । मकारान्त पाती म से गम् । पाना । मम् । नमस्कार फरमा । यम् १ (१) मित्त होना । पीर रम् सीडाबरमा । ये चार पातु पनुहशत पचारान्त धातुपा में में गुस् । पुजारमा पा रोगा। देर रसगा। दिग् वाम भरना था दिपामा।हम ५ देना । मृप । स्पग करना 1 रिम् । धीर पण ० (रिमा परना) । सिा पत्राना । पिय पोय करना । स्पा । पूना । ये दम १ धातु पनु सात पवागतों में स अ । उचना। हिप्प् २ पमपना । सुम् । तृप्त होना । दिप (११)प करना । दुप् । पिमना । (१२)पुष्य । पुष्ट पारना । पिप्पोपमा। पिप् प्यात शेगा। पिप ८ पिगिष्ठ वरना । गुप् । मृषना। ग्विषु ११ पानिटन पारला। ये ग्मा ११ पातु पन दाशरे। मायम्त पातु में में घम १ पाना । पम् २ बाम परमा । मै (१३)ो २ अनुदाप्त । सकाराग्त पातुपी में में दर बनाना । दि २ पोचना गादि। दुरपयोगा। (१)दिवादिगणना । (१) चिद् दिवादिगा पातु । (३) विद पाहिमप का धात । () विद् तुदादिगर या पातु । (1) स्विद् दिवादि गलमा मातु । (३) युग विरानि गन का पातु। (0) मि दिवादिगम या भानु(कमन् दिवादिगा। (८) दिदि पातु । (१)रमाना। (१) दुभमनी। (११) पुप दिगदि गा का धातु (1)PI (पीप पातु)।
२९ है . " " - लघुकीमुद्याम्। नह ४ वान्धना । मिड् ५ सिचना । रह ६ उगना । लिङ् ७ चाटना । यह ट लेजाना । ये आठ ८ धातु अनुदात्त । इस प्रकार से (१) इनका योग एक सौ तीन हैं १०३ ॥ जिस लिये हा धातु एकाच और अनुदात्त है, इस लिये उक्त सूत्र से (५०४) सम्बन्ध वाला है, परन्तु लिट् परे रहते "ल" को "५०८" सू० नियम से (२) इट का पागम नहीं होता। गोपायाञ्चकर्थ (तूंने रक्षा की गोपायाञ्चकार, गोपायाञ्चकर ( मैने रक्षा की ) गोपायाचक्रथुः (तुम दोने गोपायाञ्चकव (हम दोनें रक्षा की)। गोपायाम्चक (तुमने गोपायाम्चतम (हम ने रक्षा की)। इसी अर्थ में "गोपायामास, गोपायाम्बभूव' (उसने रक्षा की)। और “४८७" नियम से विकल्प से प्राय हुश्रा तो, जुगोफ, जुगुपतु', जुगुपु' । अर्थ पूर्ववत् जानों ॥ ५०४ ॥ ५०५ ॥ स्वरतिसूतिसूयतिधूदिती वा । ७ । २ । ४४ । स्वरल्यादेवदितश्च परस्य वलादेरार्धधातुकस्येड्वा स्यात् । जुगोपिथ । जुगोप्य । गोपायिता । गोपिता । गोप्ता । गोपायिष्यति । गोपिष्यति। गोप्स्यति । गोपायतु । अगोपायत् । गोपायेत् ।। स्ह (शब्द करना) । (३)पू (उत्पन्न करना)। धूञ् (कापना)। इन सें और ऊदित् धातुओं से परे बल् १ प्रत्याहारान्तर्गत वणों में से कोई एक है आदि में जिस के ऐसा आर्धधातुक हो तो उस को इट का आगम विकल्प करके होवे ॥ गुपू धातु भी अदित् है इस लिये “थल में" जुगोपिथ जुगोप्य (तुमने रक्षा की) भौर लुट में ४८७ "गोपायिता, गोपिता, गोप्ता" (वह रक्षा करेगा) लुट मे भी वैसे ही गोपायिष्यति, गोपिष्यति गोप्स्यति" (वह रक्षा करेगा)। लोट् में, गोपायतु (वह रक्षा करे) । लड् में अगोपायत्, (उस ने रक्षा की)। वि० लिङ् में, गोपायेत् (वह रक्षा करे)॥५०५ ॥ ५०६ ॥ नेटि । ७।२। ४ । इडादौ सिचि हलन्तस्य वृद्धिन अगोपायीत् । अगोपीत् । अगोप्सीत् ॥ इट् है भादि मे जिस के ऐसा सिच् परे रहे तो हलन्त धातु को (४८३) से प्राप्त (१) हलन्त धातुयो का । (२)"४२७" में जो पाया था इस का विस्तार पूर्वका वर्णन "५११ " इस नियम में लिखा जावेगा। (३) सूति, सूयति, अदादि और दिवादि गण का पूड धातु है ।।
म्यादय । - गरिमोय । पाय पोर इद दुपा तो पयोपायीत् । पाय मापा पीर पर छुपा तो प्रमोपोत् । और बब पाय पोर र दाना नए तव भगोप्सीत् । डम ने रचा की। ५ ७॥ मसोमणि।८।२।२६ माण परस्य सम्म सोपी झखि । पगी प्ताम्। पगौप्सु । गोप्सी । गौपाम् । पगीतापगोप्सम्। पगोप्स्व । भगोप्स्म । गोपायिष्यत्। पगोपिध्यत्। भगोप्स्यता विषये १३ भवति विधाय। पिचियतुः। विधियुः । यलिएकाध इति निषेधे प्राम्से । यदि परे भरली तो मार से परेको तिप या पिकाचे पगोप्ताम् (पन होने रमाबी। प्रगोप्मु-उनमें रचा की। प्रमोप्सी तूने रचा हो । पमीप्तम् - तुम होने एषा की। पगोप्त-तुम ने रचा पो । पगोप्सम् - मैंने रचा की। पगोप्य पम दामेरपा की। पोस्मामने रखा पी। सा में। पगोपायिष्यत् पगोषिष्यत् भगोप्स्यत्-बो पा रचा परे । पि पटना पा नाम । चयति पा घट 'वा" तारे। विधाय-या पटा। चित्तियतु मे दो गाराए। विषिमु'- वे मार पुए । यद में ४२० मा से मिषष पाया तो ॥10॥ ५ ८॥ कसमृतस्तुद्रुमुथुवो चिठि । ७।२ । १३ । क्रादिभ्य एष बिट इट न स्यादन्यस्मादनिटोऽपि स्यात् । पजाना। पसना । भू पाहन पोपए परमा। सीवार परमा । स्तु (द) स्तुति बरगी। टीना। म पाना पा चूना । पु पुनमा । म पाठक धातुपों मे परेसी मिद को • नशेये। परन्त और मोर पातु पनिट भीगे तो भी उप से परे सिट पो दीवाये। ५.८ पपस्तास्वत् यएपनिटो मिल्यम् । 01२।११। उपदेशेऽसतो यो धातुस्तासौ नित्यानिट् ततम्यल बो धातु मम पन्त रे पोर ताम् में नित्यती पनि ठप में पो भी पत्को मोपे • ॥ उपदेशेऽवस 01 २ । १२ । उपदेंगेऽकारवान् यस्तामो नित्यामिट तत परस्य यल इट 7 स्यात् ॥ एप प में पगारवान् श्रीमान पातु पोर हाम् में नित्य पनि एम में परे भी पन् धग को रद का पागम मरे ११ ॥ • (१९०) म पोमम पोतारमा पालमुर नमार का। म।
लवुकीमुद्याम् । ३१ ५११ ॥ तो भारद्वाजस्य । ७ । २ । ६३ तासौ निन्यानिट दन्तादेव थलो नेट ( ड्) भारद्वाजस्य मते तेनान्यस्य स्यादेव ॥ ॥ अयमच संग्रहः ॥ अजन्तोऽकारवान् वा यस्तास्यनिट् थलि वेडयम् । घटदन्त ईदुङ नित्यानिट क्राद्यन्यो लिटि सेड्भवेत् । चिषियिष । चिक्षेथ । चिक्षियथु । चिक्षिय । चिक्षाय । चिक्षय । चिक्षियिव । चिक्षियिम । क्षेता। क्षेष्यति । क्षयतु । अक्षयत् । क्षयेत् ॥ भारहाजजी के मत में तास् में नित्य अमिट ऋटन्त धातु से परे थल को इट् को आगम न होये । इस से ऋदन्तों से भिन्न धातुश्री से परे घल् को इट् का आगम हो जाये। क्योंकि यह निषेष ऋदन्तों का ही है औरों का नहीं, इसी हेतु से ५०८ और ५१० सूत्री से भी अट का विकल्प ही प्रतीत होता है। इन ( १ सूत्रों) का यहा ऐसा सनाह (२) है । अच् है भन्तमें जिसके ऐसा धातु वा ऐसा हलन्त धातु कि जिप्त के (३) उपदेश में प्रकार हो वह धातु यदि तास् में नित्य ही अनिट् हो तब वह घल् । में विकल्प कर के इट वाला होता है, परन्तु यदि ऐसा (8) ऋदन्त धातु हो तो वह नित्य ही अनिट् हो परन्तु क (५०८) आदि धातुओं को छोड और धातु लिट् में सेट हो जाते हैं, (५)चिक्षयिष वा चिक्षेथ (तू घटा) चिधियथु (सुम दो घटे) चिक्षिय (तुम घटे) चिक्षाय वा चिक्षय (मै घटा) चिक्षियिव (हम दो घटे) चिक्षियिम (हम घटे) लुट में, क्षेता ( वध घटेगा) लूट में, क्षेष्यति ( वह घटेगा ) लोट मे, 'क्षयतु ( धद घटे ) लङ् में, भक्षयत् ( वह घटा ) वि० लिड् मे, क्षयेत् (वह घटे) ॥५११॥ ५१२ ॥ अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घ १७ । ४ । २५ । अजन्ताङ्ग- स्यदौर्षी यादी प्रत्यये नतु कृत्सार्वधातुकयो । चीयात् । छत् प्रत्यय ( ३२४ ) और सार्वधातुक इन से भिन्न जो (६)यादि प्रत्यय उस के परे होते, अजन्त अङ्ग को दीर्घ हो जावे, सव प्रा. लिङ् में क्षीयात् ईश्वर करे कि वह घटे । ५१२॥ कर, (१) इट् आगम सम्बन्धीय । (२) सक्षेपार्थ । (३) प्रायोचारण । (४) ऋ जिस के अन्त में है । (५) यहां विकल्प कारक विधियों को भी स्मरण करना चाहिये । (६)यकार है, भारि में जिस के ऐसा।
म्यादयः । - - हरि नहोय । पाय् पौर पद दुपा तो पगोपायीत् । पाय् म पा र दुपा तो भगोपीत् । परिव पाय पोराट् दोनी न हुए तप पगोप्नोत् । उस मे रचानी॥५ ५ ०। झणोझस्ति।८।२।२६ भिख परस्य सस्य लोपो झखि । भगी पताम्। पगोप्सु । पगोप्सी । पगोप्तम्। भगोप्ता पगोप्सम्। भगोप्स्य। पगोप्स्म । भगोपायिध्यत्। प्रगोपिष्यत्। गोप्स्यत्। विधये १३ घयति विधाय। पिक्षियतु । चिषियुः। यलिएकाच इति निषेधे प्राम्से। यदि परे महो तो मर से परेमो म् तिस का चोपचापे पगीमाम् (सम रोने रघा क्षो। पगोप्सु -सनमें रचा की। पनीप्सी' तूने रचा फो । पगोप्तम् - तुम होने रमा पी। पमोप्त-तुम ने रचा की । पगोप्सम् - मैंने रचा की । पगोस्व. म दाँनेरपा फो। पमीप्सम पम पापी। सर में। पगोपायिष्यत् पमोविष्यत् पमोप्स्यत् -जोपागचा करे । चि घटना पा नाय । चयति बापट 'मा" तारे। विधाय-पा घटा। चिचियतु होनाए । विधियु'- पे नष्ट हुए। पद में ४२०२ रद पा से निषध पाया तो ॥५.० ५ ८॥ ससृभूवस्तुद्रुमधुवो चिटि । 01२ । १३ । क्रादिभ्य एष घिट इट् न स्यादन्यस्मादनिटोऽपि स्यात् । पपरना। पू पचना । म पाहन पोषच बरना। स्वीकार परमा । स्तु (द) सुति करनी। दोरना। सपाना पा चूना । भु सुनमा । न पाठ ८ पातुमा से परेपी सिट बो 'नरोपे । परन्तु पोर पोरं पातु पनिर मी हो तो मी सस से परे पिद को दोही माये ॥१८R ५.८ ॥ पचस्तास्वत् षषपनिठी नित्यम् । ७।२।१। उपदेशेऽनम्तो यो धातुस्तासौ निस्यानिट ततस्यत्व इद् न । वो पातु उपदेश में परन्तरे और 2 तास् में मित्यही प्रनिद उस में परे भी दबोनसोपे 11 ५१. ॥ उपदेशेऽवत 0। २ । १२ । सपदेशेऽकारवान् यस्तामो नित्यामिट तत परस्थ यस इट् न स्यात् ॥ उपदेय में प्रचारवान् बोबत पातु पोर तार में नित्य भनिरहो उस से परे वो या तो पद वा पागम न होवे।।१ ॥ * (०२०) से पागम होता है। बिमाटि पाधातु का। मुद्रामार का।
लघुकीमुद्याम् । कामतु (वह टहले) । लङ् में भकाम्यत् वा अक्रामत् (वह टहला)। वि० लिङ् में काम्येत् वा कामेत्। वह टहले) (१)झम्यात् (ईश्वर करे कि वह टहले) लुड में अकमीत् (वह- टहला) लुङ् में अक्रमिव्यत् वह जो टहले । १६ “पा" धातु का पीना अर्थ है ॥ ५१५ ॥ ५१६ ॥ पाघ्राध्मास्थाम्नादाण्दृश्यर्तिसर्विशदसदा पिबजिघ्र धमतिष्ठमनयच्छपश्यधिौशीयसौदाः।७।३।७८ । पादीनांपिवादयः स्युरित्संज्ञकशादौ प्रत्यये । पिवादेशोऽदन्तस्तेन न गुणः । पिवति । पा पादि ग्यारह धातुओं को पिब आदिक ग्यारह आदेश क्रम से होते हैं यदि इत् है आदि जिस के ऐसा (२)प्रत्यय परे रहे तब वह क्रम ऐसा है, कि १पा, पिब (पीना) रघा, जिघ्र (सूचना)। ३ मा, धम (फूकना)। ४ स्था, तिष्ठ (खडाहोना) ५ म्ना, मन (अभ्यास करना)। ६ दाण = यच्छ (देना)। ७ दृश् = पश्य,(देखना)। ८ऋ, ऋच्छ (गमन)। ८ स, धौ (दौडना) । १० शद शीय (मुरझाना) । ११ षद, सीद (पीडा) । यहा पिव आदेश अकारान्त है इसी लिये ४७८ में गुण (३) नही होता। पिबति, वह पीता है ।। ५१६ । १५१७ ॥ प्रात अौ णल. । ७।१ । ३४ । पपी । आकार के अन्त में जिसके ऐसे धातु से परे जो गल उसे भी होजावे पा+एल(४) = पपी (उसने पीया) ॥ ५१७ ॥ ५१८ ॥ आतो लोप इटि च । ६ । ४ । ६४ । अजाद्योरार्धधा- तुकयोः डिदिटोः परयोरातोलोपः । पपतु । पपुः । पपिथ, पपाथ । पपथु । पप । पपौ । पपिव । पपिम । पाता । पास्यति । पिबतु । अपि- बत् । पिवेत् ॥ (५) कित् वा डित् जो "(६)अजादि आर्धधातुक प्रत्यय" सो परे हो वा इट् परे हो तो धातु के (७) श्राकार का लोप होय । पपतु (में ४८० में लिट् को कित् मान था का लोप ५१८ से हुआ पपतु सिद्ध भया = उन दोंने पिया । पपुः = उनने पिया । पपिथ, पपाथ तूने पिया । पपथुः-तुम दोंने पिया। पप = तुमने पिया । पपौ ५१७ = मैंने पिया। पपिव मह दोंने पिया । पपिम= हमने पिया ।। ५१८ ॥ -- (१) भाशीर्लिङ् में। (२) सार्वधातुक और गतृ, शानच् । (३) क्योंकि प्रकार के पूर्वले वकार की ही उपधा सज्ञा है गुण किसे हो। (४) णल् को ५१७ सें भी हुआ पुन., वृद्धिः (५) क् है इत् जिस का । (६) अच् (स्वर) है भादि में जिस के । ४३० से हुई है सना। (७) आकारअन्त का ।।
- म्पादय। ५१३ । सिधि इति परम्मैपदेषु । ०। २ । १ । इग न्साङ्गस्य हदि स्यात् परस्मैपदे सिधि। पषिौस। पचेष्यत् । तप संतापे १४ । सपति । तताप । तेपतु । तेषु । तेपिय। ततम्य । तेपयु । तप्ता। तप्स्यति । तपशु । मतपत् । तपेत् । तस्यात् । प्रताप्सीत् । पताप्ताम । पतप्स्यत् । १५ क्रमु पादविचेपे ॥ सिच् परे होते परस्मैपद में (१)रगन्त पार यो पवितीय । पपीत्। पा घटा। पद में पोष्यत् (पो वा घटे) तप (तप) बचना (वा तपमा) तपप्ति पा बसता है। तताप (वा तथा पा)। तेपतु १८८ ये दो तये । तेपु ४८८ वे पसे । सेपिय ८८, ११ वा ११ से ततप्प (तू तपा पा)। सुद में तप्ता (वा तपेगा) तप्यति या तपेगा । तपतु (पा तपे) । पतपत् (पा तपा) तपेत् (वासपे) तप्यात् (रपर परे वि पातपे)। पाताप्मीत् ४८५ (वा तपा) पाताप्ताम् (वे दो तपे)। पातप्स्यत् जो पार तप । मामु (कम् ) पिरषा (टाबमा १५)॥१५॥ ५१४ ॥ वाभाशम्याथममुनमुक्तमुपसिचुटिवष । ३ 1 एम्य श्यम्वा कयें सावधातुके परे पचे गम् । माय म्याम् (चमकना) भमु (पिरना) प्रमु (सामना) मम (दुपी रोमा) पम् (रना) पुर (टूटना) सप् (चाहना) न पाठ पातुपों से परे स्वम् ५५ विषय बरले पे परन्तु जब (१)काज सघातक परे हो तब (१)पच में पप् ४१५ पोता॥१४॥ ५१५ ॥ क्रम परस्मैपदेषु । ०1३ 10६ क्रमो दोष परम्म पदे मिति । क्राम्यति। क्रामति । चक्राम। मिता। ऋमिष्यति । प्राम्यतु। काम । पक्राम्यत् । पक्रामत् । काम्येत् कामेरा । अम्यात्। पनमोस् । पक्रमिष्यत् । पा पाने ॥ १६॥ पारमैपद पर परे बिस ऐ । यित् प्रत्यय परे से तो कम धातु रेप को दीघो। काम्पति (११४।१) पाहामति मागसता है। बाम (१८२१४-१) पा टायता पा । नुर में प्रमिता । सर में अमिप्यति (पा गोमा । मीट में साम्यतुमा (१) .1 प्रस" २ अन्त में मिसके। (५)दर्ता परको जतचान वाया का पोषा)। (३) बिम में श्यन् न होगा। .
लघुकीमुद्याम्। कामनु (वह टहले) । लङ् में प्रक्राम्यत् वा अक्रामत् (वह टहला)। वि. लिङ् में काम्येत् वा कामे वह टहले) (१)कम्यात् (ईश्वर करे कि वह टहले) लुङ् में अक्रमीत् (वह- टहला) लुङ् में अक्रमिव्यत् वह जो टहले । १६ “पा" धातु का पीना अर्थ है ॥ ५१५ ॥ ५१६ ॥ पाघ्राध्मास्थाम्नादाण्दृश्यर्तिसतिशदसदां पिबजिघ्र धमतिष्ठमनयच्छपश्यर्छधौशीयसौदाः।७।३। ७८ । पादीनांपिबादयः स्युरित्संज्ञकशादौ प्रत्यये । पिबादेशोऽदन्तस्तेन न गुण. । पिवति । पा आदि ग्यारह धातुओ को पिब आदिक ग्यारह आदेश क्रम से होते हैं यदि इत् श् है आदि जिस के ऐसा (२)प्रत्यय परे रहे तब वह क्रम ऐसा है, कि १पा, पिब (पीना) २घ्रा, जिघ्र (सूधना) । ३ मा, धम (फूंकना)। ४ स्था, तिष्ठ (खडाहोना) ५ म्ना, मन (अभ्यास करना)। ६ दाण = यच्छ (देना)। ७ दृश् = पश्य,(देखना)।८३, ऋच्छ (गमन)। सू, धौ (दौडना)। १० शद शीय (मुरझाना)। ११ षद, सीद (पीडा)। यहा पिव आदेश प्रकारान्त है इसी लिये ४७८ से गुण (३) नहीं होता। पिबति, वह पीता है ।। ५१६ । '५१७ ॥ आत यो गल ।७।१ । ३४ । पपी । आकार है अन्त में जिसके ऐसे धातु से परे जो पल उसे औ होजावे पा+एल(४) = पपी (उसने पीया) ॥ ५१७ ॥ ५१८ ॥ आतो लोप इटि च । ६ । ४ । ६४ । अजायोरार्धधा- तुकयो डिदिटो परयोरातोलीपः । पपतु । पपुः । पपिथ, पपाथ । पपथु । पप । पपा । पपिव । पपिम । पाता । पास्यति । पिबतु । अपि- वत्। पिवेत् ॥ (५) कित् वा डित् जो “(६)अजादि आर्धधातुक प्रत्यय" सो परे हो वा इट् परे हो तो धातु के (७) आकार का लोप होय । पपतु (में ४८० में लिट् को कित् मान आ का से हुआ पपतु सिद्ध भया- उन दोंने पिया । पपुः = उनने पिया । पपिथ, पपाथ तूने पिया। पपथु. - तुम दोंने पिया। पप = तुमने पिया । पपी ५१७ =मैंने पिया। पपिव मह दोंने पिया । पपिम= हमने पिया ।। ५१८ ॥ - लोप ५१८ -- . है (१) पाशीलिड् में। (२) सार्वधातुक और गतृ, शानच् । (३) क्योंकि प्रकार के पूर्वले वकार की ही उपधा सजा गुण किसे हो । (४) गल् को ५१७ से औ हुना पुनः, वृद्धि' (५) क् है इत् जिस का । (६) अच् (स्वर) है आदि में जिस के । ४३० से हुई है सना। (७) पाकारअन्त का ॥
" म्वादय। - - J मोट में (१) पिबतु- -वा पिये। तुद् मे पाता वह पियेगा। पर पपिबत् -उसने पिया। घट में पास्पति पि हिरमें पित्-पापिये। ५१८ ॥ एर्थिसिर ६ । ४ । ६0 1 घुसंधकामां मास्यादीनां च पत्वं स्थादाधधातुके किति लिडि । पेयात् । गातिस्थेति सिधोजुक् । चपात् । भाषाम् ॥ बित् पार्षचातुब सिर परे से तब दुमत्रावासे ६५ पोर मा स्पा पाटिका ११८ भातुपों के पत्र को ए होवे पेयात् पर पा पिये । ४५० में सिमा सुफ होता. तर पपात्-उस ने पिया । अपाताम् - हम दोन पिया ॥ १८ ॥ ॥ भात । ३।४।११• । सिमुपधाइन्सादेव झेवुस्। मि के तुन्थे (840 में ) होने पर पाचाराम्त धातु सेती परे भि को पुराये ।। ५म ५२१ । उस्यपदान्तात् ।।१। ६६ । पपदान्तादकारासि पररूपमेकादेश । पपु । पपास्यत् । ग्ले पचये । १० । ग्यायति (२) पपदान्त पवार से परे हो तो दोनों के स्थान में परमा रूप होता। अपा+मि१२ -प्रपा+उम्-२१ उसने पिया दृा में। प्रपात्यत् वी पर पिये। पा १०-ग्वानि करना । रसायति २५ पाहामि बरतारे ॥२१॥ ५२९ ॥ पादेष उपदेशेऽगिति ।।१।४५ । उपध्ये एक न्तस्य धातो रात्वं मत गिति । बग्लो । रसाता । ग्लास्यति। ग्लायतु । परकायत । रसायेत उपदेग में (१) पत्रम्ह पातु को पाकार सोपे परन्तु (8) मित् माय परे हो तो नीता । (१) माती, पागमानि बरता मा । मुद में माता सागि परेगा सद में ग्वास्यति । पप पूरबत् । सान्तु वा बानि बरे। नर में पामायत् । ग्मामि परता नुपानिधि निर में ग्नापेत् पथ कीट वात् । १११॥ (१) पर पम्त मे मधोने बामा (२) एप (एपीपी) पन्त म बिम ये। (३) गारधानुक में म । (७) मिर में मप नही पाता रमी में ऐसी मा दुधाता ११.को पोषा। (७) १५ प मधीग समाजाती॥
१५ १८ । हरति । लघुकौमुद्याम् । ५२३ ॥ वान्यस्य संयोगादे. । ६ । ४ । ६८ । धुमास्था- देरन्यस्य संयोगादेर्धातोरातएत्व वार्धधातुके किति लिङि। ग्लेयात्। ग्लायात् ॥ घुसजक और मा स्था आदि धातुओं से भिन्न जो हैं, पीर (१) सयोग है, भादि में जिन के ऐसे धातुओं के आ को विकल्प करके ए होता है, जब वित् लिङ् के स्थान में धार्धधातुक प्रत्यय परे रहे । ग्लेयात्, ग्लायात्, ईश्वर करे शि, वह ग्लानि करे ।। ५२३ ॥ ५२४ ॥ यमरमनमातां सक् च । ७ । २ । ७३ । एषां सक्- स्यादेश्यः सिच इट् स्यात्परस्मैपदेषु । अग्लासीत् । अग्लास्यत् । बृ कौटिल्ये यम् = निवृत्त होना । रम् = क्रीडा करनी । नम् = नमस्कार करनी। इन को और आकार है, अन्त में जिन के ऐस धातुओं को सक् का आगम होय । और उस से परेजो सिच् उसको इट् का आगम होवे जब परस्मैपद परे रहे तो । अग्लासीत् ४७३ = उस ने ग्लानि की। अग्लास्यत् जो वह ग्लानि करे । ऋ = कुटिलता करनी । १८ । हरति ४१४ -- वह कुटिलता करता है ।। ५२४ ।। ५२५ ॥ तश्च संयोगादेर्गुण । ७ । ४ । १० । ऋदन्तस्य संयोगादेरङ्गस्य गुणो लिटि । उपधाया बृद्धि । जह्वार । नवरतुः । । जहथ । जह्वरथुः । जह्वर । जह्वार । जङ्घर । जह्वरिय ! जछ- रिम । हर्ता॥ सयोग है पाटि मे निस के ऐसे ऋदन्त अङ्ग को लिट् पदे हो तो गुण होवे । उपधा को (०) वृद्धि हुई तब नद्वार =उसने कुटिलता की ॥ ५२५ ॥ मतरतु, ( उन दों ने कुटिला की) निसर्थ = (तेने कुटिदसा की) नहरु (उन में है) जबरथु ( तुम दो ने (तुमने .) नद्वार, नहर ( मैंने कुटिलता की) ) नरिव (हम दो ने लुट लकार में वर्त्ता,वह कुटिलता करेगा नवरिम (हम ने )) जहरु ال( ,و मध्यम नद्वर ) उत्तम (१) ५१६ में पित्र प्रादेश हुआ। (२) अत उपधायाः (१८३) में ।।
. म्पादय । ब्द में पास्यति तव पपात् । मोट में (१) पिबतु-या फ्येि । खुद में पाता वा फ्येिमा । हर पपिवत्- -उस ने पिया। वि घिर में पिपेत् -या पिये। ५१६ ॥ एपिसि ।।8। ६० । घुसंज्ञवामा मास्थादीनां च एत्वं म्यादाधधातुके किति जिनि । पेयात् । गातिस्थे ति सिधीशुक् । पपात् । थपासाम्॥ कित् पार्थधातुब सिर परे से तब दुचावाय पोर मा स्या पाटिक ११८ पातुओं के अच् को ए होवे पेयात् रपर पा पिये । ४३० से मिच् का नुक होता. -उस ने पिया । पपाताम् -न दोन पिया U1१८॥ ५२ ॥ भात । ३।४।११• । सिन्युवमादम्तादेव मेवुस् । सिवनुष (१० में ) होने पर पामारान्त पात से भी परे मि को नुस् सोये ॥ ५५ ५२१ ॥ उस्यपदान्तात् ।।१।२६ पपदान्तादकारासि पररूपमेकादेश । पपु । पपास्वत् । ग्ल षषये । १० । ग्लायति । (२) पपदान्त प्रकार से परे हम् हो तो दोनों के स्थान में पर का पता। पपा+नि १२ - पपा+म् -५२१ से "मपु' उसने पिया ना में। पपास्यात् को कर पिये।ा 1012-तानि परना। सावति वा ग्हामि वरतारे॥५२१ ।। ५२२ ॥ पादेच उपदेगेऽशिति ।।१।४५ । उपदे एव भतस्य धातो राहवं नतु मिति बिग्ली । ग्लाता । ग्लास्यति। ग्लायतु। परजायत । ग्हायेत उपदेग में (1) एमन्त बातु को पावार वे परन्तु (७) मित् मत्य परे हो तो नहीं होता। (३) बासी, पा ग्वानि करता था | मुर में ग्माता पा ग्लागि नरेगा पद में पतास्यति । पम पूर्वपत् । ग्वायतु या सानि करे। घर में भग्वायत् पा ग्वाभि परता पानि सिर में ग्लायेत् पा सोट् वत् ॥ ११ ॥ (१) पद पन्त मे न होने पाना (२) एच् ( ए पो ऐ पो) पन्त में खिम है। (३) मानधातुम में मप् । (१) निद में मप् नीता मी मै ऐ को पापा तो 1. को पीपा । (.) १५ पयोम संघाती ॥ - । - । शृणुथ, तुम सुनते हो -- - . प्रथम पु० म० पु० लघुकीमुद्याम् । (शृशोपि =तू सुनता है शृणुधः = तुम दो सुनते हो शृणोमि, मै सुनता हूं ५३१ ॥ लोपश्चास्यान्यतरस्यां म्वोः। ६।४।१०७। असयोग- पर्वस्य प्रत्ययोकारस्य लोपो वा म्वोः परयोः । शृगवः । शृणुवः शृगमः । शृणुमः । शुश्राव । शुश्रुवतुः। शुश्रुवुः । शुश्रोथ । शुश्रुक्थुः । शुश्रव शुश्राव । शुश्रुव । शुश्रुम । श्रोता। श्रोष्यति । शृणोतु।शृणुताम्। शृण्वन्तु || नही है सयोग पूर्व जिस के ऐसा जो प्रत्यय का "उ" तिसका म् वा व् परे रहते विकल्प करक लोप होवे । शृण्व , शृणुव', हम दो सुनते हैं । शृण्म', शृणुमः, हम सुनते हैं। || एकवचन ॥ ॥ हिवचन ॥ ॥ वहुवचन ॥ १ शुश्राव, उसने सुना । शुचवतुः,उन दोंने सुना। शुश्रुवुः, उनने सुना। २ शुश्रोध, तूने सुना । शुश्रुवथुः, तुमदोने सुना। शुथव, तुमने सुना। उ. पु. ३ शुश्राव, ३ शुश्राव, मैंने सुना।। शुश्रुष, इम दोने सुना।' शुश्रुम, हमने सुना । ) लुट में "श्रोता" । लुर में "श्रोष्यति" वह सुनेगा । लोट् में शृणोतु, वह सुने । शृणुताम्, वेदो सुने । शृण्वन्तु, वे सुने ॥ ५३१ ॥ ५३२ ॥ उतश्च प्रत्ययादसंयोगपूर्वात् । ६ । ४। १०६ । असंयोगपूर्वाल्प्रत्ययोतो हेनुक् । शृणु । शृणुतात् । शृणुतम् । शृणुत । गुणावादेशौ । शृणवानि । शृणवाव । शृणवाम । अशृणोत् । अशृणुताम् । अशृण्वन् । अशृणो | अशृणुतम् । पशृणुत। अशृणवम् । अशृण्व अशृणुव । अशृण्म । अशृणुम । शृणुयात् । शृणुयाताम् । शृणुयुः शृणुयाः । शृणुयातम् । शृणुयात । शृणुयाम् । शृणुयाव । शृणुयाम । श्रूयात् । अश्रौषीत् । अश्रोष्यत् । गम्लु गतौ ॥ २० ॥ सयोग पूर्व नहीं है जिसके ऐसा जो प्रत्यय का उकार तिस से परे (१) हि हो तो उस हि का लुक् होवे । शृणु, तुम सुनो । गृणुतात्, ईश्वर करे कि तू सुने । शृणुतम्, तुम दो सुनो। | शृणवाणि, मैं सुनू । शृणुत, तुम सुनो। शृणवाव,हम दोसुने। यहां ४१४से गुण और २६ से अव होते हैं शृणवाम, हम सुने। (१) (४४१) से जो-सि को होवे ।। - - ५ म्यादय। ५२६ । चमो स्ये । ०१२।७•। तोरष स्यस्वेट। परिष्यति । रतु । पारत् । मरेत् । प्रसारान्त पातु और सन् धातु से परे बो (१) स्य तिसको रद का धामम हो । परिष्यति अथ पुर पत् । पारन् वा पुटिलता बरत (पा पुटक्षता कर) बरता थुपा ।। १२॥ परेत् । ५२० ।। गुपोर्तिसयोगाद्योः । ७ । ४ । २८ । पर्तेः सयोगा दे दन्तस्य च गुणो यकि यादावार्धधातुके लिए प । र्यात् । पार्षीत् । पचरिष्यत् । शुश्रवणे । १८ ॥ - चचना पर संमोगादि भदन्त धातु पो गुण जोवे बम (२)यक पा () यादि (४) पाषषातुन लिए परे हो तो। र्यात् पर परे सिपाटिलता परे । कात्ि -उसने जुटिसताबी। पारिष्यत्-लो या पुरिक्षता करे। पु-मुममा १८ ॥ २२० । ५२८ ॥ शुव च । ३ । १। 08 । शुष गृ प्रत्यादेश स्यात् रनुप्रात्ययश्च । गुषोति धु धातु सो म पादेय गोरे और हम से परेनु प्रत्यय मी थे। गृपोति २५८ पर मुनता २८॥ ५२८ । सावधातुफमपिन् । १ । २।४ । पपिल्सावधातुक भिवत् । गुतः। (२) प्रपित् गो सापपातुब प्रत्यय सो रित मध्य पस पे मत में मुखन भया नुत पे दो मुनते हैं । १२८॥ ५३ पुरनुवोः साधातुपो । ६।४।८०। पुरमुधीरनेका घोऽसंयोगपवस्यौवयस्य यः स्यादचि सार्वधातुके । गुगवरित । गृणोपि । गणुमः । यचुथ । चोमि ।। -(रवि वीजाबमा) पौर "गु प्रत्यय पन्त म जिम ऐमा श्री पनेव पर्वा पाना पाम फ(६) पसंयोग पूर्व पर वो यन् शेष पगादि मास भात पर रेतर। यूएपन्ति- मुनते २५ । (1) ".२८* पाता । (२) में होगा। (०) २ पादि में जिम में (७)पामिनिट (G)निम का पनी गाये। (मेयोन मिमरे पनि नही।
BE लघुकौमुद्याम्। तष्यति, यह जावेगा । लोट् में ५३३ से छ हुआ, गच्छतु, वह नावे । लङ् में अगच्छत्, { गया । वि० लिङ् में गच्छेत्, वह जावे । प्रा. लिङ् में गम्यात्, ईश्वर करे वह जावे ।। ५३५ ॥ ५३६ ॥ पुषादिद्युताय्लु दित. परस्मैपदेषु । ३ । १ । ५५ । श्यन्- वेकरणपुषादेयंतादेनुदितश्च परस्य च्लेरङ् परस्मैपदेषु । अगमत् घगमिष्यत् ॥ ॥ इति प्रस्मैपद प्रक्रिया ॥ श्यन् ६६३ विकरण ( दिवादि गण के ) पुष् ( पृष्ट करणा) आदि धातुओं से परे और द्युत्, ( दीप्ति करना ) आदि से परे और जिनका ल (१) इत् गया है, उन से परे जो च्लि तिस को अङ् होवे परस्मैपद मे । अगमत्, वह गया । अगमिष्यत्, ५३५ जो यह जावे ॥ ५३६ ॥ ॥ भ्वादिगण के परस्मैपदी धातु समाप्त हुए । . ॥ एध बुद्धौ ॥१॥ ५३७ ॥ टितआत्मनेपदानां टेरे । ३।४ । ७६ | टितोलस्यात्म- नेपदानां टेरेत्वम् । एधते ॥ श्रात्मनेपद में १-एध धातु बढना अर्थ में है, उस की साधन प्रक्रिया ऐसे है। टित लो लकार ३८८ उस के स्थान मे जो आत्मने पद सजक (२) प्रत्यय उनकी टि को ए होवे (एध् +त) = ४१३ से = (एध+त) ४३७ ए हुा । तब एधते, वह बढता है ।। ५३७ । ५३८ । अतोडित. 1 ७ २ । ८१ । अतः परस्यडितामाकारस्य- इय् स्यात् । एधेते । एधन्ते ॥ प्रकार से परे जो डित् प्रत्यय उसके आकार को इय् होवे। (३)एधेते, वेदो बढते हैं एधन्ते, (४१५) वे बढते हैं ।। ५३८ ।। ५३८ । थास से । ३ । ४ । ८० | टितोलस्य थासः से स्यात् । एधसे । एधेथे । एधध्वे । अतोगुणे । एधे । एधावहे । एधामहे ॥ टित् लकार के स्थान में जो थास् तिसको से प्रादेश होवे । एधसे, तू बढता है। एधेथे, तुम दो बढते हो । एधध्वे, तुम बढते हो। एध+ ए (8)अतोगुणे सें पर रूप, एधे, में बढता हू। एधावहे, ५३७ । ४१५ हम दो बढते । एधामहे, हम बढते हैं ॥ ५३८ ॥ (१)इत् सजक । (२) श्रादेशरूप (३) यहा “एध+इय् ताम्" (एधेय् ताम्) "लोपो व्योर्वलि" में य् का लोप होने पर पोर ५३७ एधेते सिच हुआ। (४)यहा पहिले एध+६) =एध+ए।
१६ म्पादयः । " २ पताम् समदाने ५ परवन् सनने H ।। प्रथम पुरुष । मध्यम पुरुप ॥ ॥ उत्तम पुरुष ॥ १ पात्रोत् उसने मुना | भयो. तूम सुना, पपषम् मेने मुगा खर में | प्रगतम् तुमदोंने (१) पमरप हम दोने | पमृत तुमने मुगा (२)पमपम पम में गुबुयात् पर सुने | गपुया' तू मुगे | गायाम् मे सुन पि सिर में याताम पदो मृनुयातम् तुमदो ययाव इमदो मुने गृमयात तुम | गनुयाम म मुने भागिर्मि में धूयात (११२.) पर करे कि या सुने चुर सवार में पयोषीत् (११) से हरि उसने सुना । पृट में प्रयोप्यत् पो पा सुने । गम् (गम्ब) बाना (.) २ ५३३ ॥ पूर्णगमिया छ । ७।३।०७ । एपो छ शिति गच्छसि । बगाम ।। पुरमा परनी । पम् जाना। यम् मिगत होना । पुन घातपा से परे मित् प्रत्यय होष तोरम तीनी पन्त में होमे पासे पचर को पादेश होवे । मतिया जाता। सिट में १८२, ४८५ जगाम पा मया ॥५॥ ५३४ गमानमनखनघा पीप नित्यमरि।।४।९८) एपामुपधायातोपो ऽनादो मिति नहवरि। बग्मतुः । बग्मु । गमिष, नगग्य । अग्मयु । बग्म । बगाम । मगम। मग्मिय। बग्मिम। गगता। गम् नाना । 7 मारना । वान् (१) उत्पन्न नापन् पोदगा । घम् पाना न पातुपों की उपपा का चोप होवे बा पवादिवित् पा रित् प्रत्यय परे संतो परन्तु पर परेको तोरी । (७) बामत टोमये । बाम प गये। बगमिष वमन्य गया। बामधुन तुम दो मप । बग्म तुम गए । बगाम बमम में मया था। बग्मिय समदी गए। बग्मिमम मप । नुर में गन्ता ! । सेर निषेप पोर ८२ प से पनुस्वार पर सवय पुपापासावया ॥ ५॥ ५३५ ॥ गमेरिट परस्मैपदेषु । ०। २।५८। गमे मादेराधधातु पस्पेट परम्मपदेषु । गमिष्यति । गच्छतु। प्रगत । गच्छेत्। गम्यात्। मम् मे पररमपर में () मादि पापनातन परे हो तो रद पा पागम चोवे । (पच म पगार । (१)चम म पनुम । (१)पदा । (क)मनम् पतुम तब गबारो पतमान पवार बासोप एपाराम बाम मिर मया। (1) पानिममें निमक। . - - BE लघुकौमुद्याम् । गमिष्यति, वह जावेगा। लोट में ५३३ से छ हुआ, गच्छतु, वह जावे । लङ् में अगच्छत्, वह गया। वि० लिङ् में गच्छेत्, वह जावं । प्रा. लिङ् में गम्यात्, ईश्वर करे कि वह जावे ॥५३५ ॥ ५३६ ॥ पुषादिद्युताय्लूदित परस्मैपदेषु । ३ । १ । ५५ । श्यन्- विकराणुषादेषुतादेनुदितश्च परस्य च्लेरङ् परस्मैपदेषु । अगमत् अगमिष्यत् ॥ ॥ इति प्रस्मैपद प्रक्रिया ॥ श्यन् ६६३ विकरण ( दिवादि गण के ) पुष् ( पुष्ट करणा) अादि धातुओं से परे और द्युत्, (दीप्ति करना ) आदि वे परे और जिनका लु (१) इत् गया है, उन से परे जो चिल तिस को अङ् होवे परस्मैपद में । अगमत्, वह गया । अगमिष्यत्, ५३५ जो वह जावे ॥ ५३६ ॥ ॥ भ्वादिगण के परस्मैपदी धातु समाप्त हुए - ॥ एध बुद्धौ ॥१॥ ५३७ ॥ टितआत्मनेपदानां टेरे | ३ | ४ 1 ७६ । टितोलस्यात्म- नेपदानां टेरेल्वम् । एधते॥ अात्मनेपद में १–एध धातु बढना अर्थ में है, उस की साधन प्रक्रिया ऐसे है। टित जो लकार ३८८ उस के स्थान मे जो आत्मने पद सजक (२) प्रत्यय उनकी टि को ए होवे (एध् + त) = ४१३ सें = (एध+त) ४३७ ए हुआ। तब एधते, वह बढता है ।। ५३७ । ५३८ । अतोडितः । ७ २ | ८१ । अत परस्यङितामाकारस्य- इय् स्यात् । एधेते । एधन्ते ॥ अकार से परे जो डित् प्रत्यय उसके आकार को इय् होवे। (३)एधेते, वेदो बढते है एधन्ते, (४१५) वे बढते हैं ।। ५३८ ॥ ५३८ । थास से । ३ । ४ । ८० । टितोलस्य थासः से स्यात् । एधसे । एधेथे । एधध्वे । अतोगुणे । एधे । एधावहे । एधामहे॥ टित् लकार के स्थान में जो थास् तिसको से आदेश होवे । एधसे, तू बढता है। एवेधे, तुम दो बढते हो । एधध्वे, तुम बढते हो। एध+ए(४)श्रतोगुणे से पर रूप, एधे,मैं बढता हू । एधावहे, ५३७ । ४१५ हम दो बढते हैं। एधामहे, हम बढते हैं ॥ ५३८ ॥ (१)इत् सजक । (२) घादेशरूप (३) यहा “एध+इय् ताम्" (एधेय् ताम्) "लोपो व्योवैलि" में य का लोप होने पर ओर ५३७ एधेते सिद्ध हुआ । (४)यहा पहिले एव+इ) ५३७ से एध+ए। - .
म्यादया। ५४ ।। वादरच गुरुमतोऽनृच्छ ।३।१६। वादि-धा तुर्गुम्मानरुत्यन्यस्तत पाम् स्वालिटि। र प्रत्याहारान्तगत दरों में से कोई एक र पादि में मिसके और Better साप स्वर पावा मो “म यो औषपर पौर शो शतु एस से चिद में पाम् प्रत्यय जीवे 18 ५४१ । पाम्प्रत्ययवावलोऽनुप्रयोगस्य । १ । ३ । १३ । भाम् प्रत्यवो यस्मात् पुल्यबसंविधामोगानीतिः । पाम्पठल्या तुष्यमनु प्रयुज्यमानारोऽध्यात्मनेपदम् । ८८ ॥ से पाम् प्रत्यय विमान लिया। बिस से उसे (1)पाम् प्रत्यय पाते। (यहा (२)चतापसमिधान मनीषि) पर्यात पाम् भी मातियो समान सम् पातु मे मी पात्मनेपद पोरे इस बा या 'भाप"वि"पिस पातु से पाम् पाया रे यरिया पात पात्मने पी तो श से भी पात्मने पर वे नहीं तो की भाम् पाने से उसमे पामे में प्रत्ययपा। मे दुधोता ॥४१. ५४२ ॥ खिटस्तझयोरेपिरेच् । ३।४।८१ । खिहादेश्योस्ता योरेगिरेपीस्तः । एषाम्चने । एधाम्चनाते । एधापकिरे । एघारूप वृषे । एधाञ्चक्राधे विद् पो स्थान में चादम बोत और म तिनको पम और दर पाटेप बाम से होते. पाण्याचे परवठा । एमापातरोपो। एमालहरे पे बढे । एषाम्प अपेतू बहा । पपासामे तुम दो बा ॥ ४॥ ५४३ 11 पौध्व मुखिटा मोहात्। ८।३ । कावादशा- स्वरेषा पौष जुनिटापस्य ट ।एषाचछाये। एषाकरो। एमाञ्च सायो । एधाञ्चकमरे । एविमव। एधामास । एधिता । एपितारी । एधितार । एधिता। एधितासाधे (१) भाम् पत्पपात (२)बहुदीषि समास दो प्रकार का म ताल संविधान ( विवरण पे पटाका बोध हो सो प में दो भौर तरिगिर पदार्यमा पीप प्रमोरी) वा (बम्सवर्ष मानय सम्मे कान बागेसा पर दसग पता समिधाम परिसासागर मामय (मिसने सागर रेणषसेवा ।। - लघुकीमुद्याम् । ४१ (१) इशन्त अद्भ से परे जो “पीध्व और लुङ्, लिट" इन के धकार को ढकार होवे, एधान्चक्षद्वे, तुस बढे । एधाञ्चक्र, मैं बढा । एधाञ्चकवहे, हम दो बढे । एधाञ्चकमहे, हम दढे। एषाम्बभूव, ५०१ और एधामास ये भी इसी काल के रूप हैं। लुट में, एधिता, बह बढेगा । एधितारो, वे दो बढेंगे+ एधितारः, वे बढेंगे। एधितासे ५३८ तू बढेगा । एधितासाधे, तुम दो बदोगे । ५४३ ॥ ५४४॥ धि च । ८।२। २५ । धादी प्रत्यये सस्य लोपः। एधि- ताध्ये ॥ ध् है, भादि में जिसके ऐसा प्रत्यय परे रहे तो स् का लोप होवे, एधिताध्ये, तुम बढोगे ॥ ५४४॥ ५४५॥ह एति।७। ४ । ५२ । तासस्त्योः सस्य ह.स्यादेति परे । एधिताहे। एधितास्वहे । एधितास्महे । एधिष्यते । एधिष्यते । एधि ध्यन्ते । एविष्यसे । एधिष्येथे। एधिष्यध्वे । एधिष्ये । एधिष्यावहे । एधिष्यामहे । तास् प्रत्यय को और अस् धातु के स् को इ होवे, परन्तु जब एकार परे होय तो एपिताहे, मैं बढूगा । एधितास्वहे, हम दो बढेंगे । एधितास्महे, हम दढेगे। लूट में एधिष्यते । एधिष्येते ५३८ । एविष्यन्ते । एधिष्यसे, ५३८ । एधिष्येथे, ५३८ । एधिष्यध्वे । एधिष्ये । एधिष्यावहे । एधिष्यामहे । अर्थ इन सभ के लुट् के समान हैं ।। ५४५ ॥ ५४६ ॥ आलेत. । ३ । ४ । ६० । लोट एत आम् । एषताम् । एधे ताम् । एधन्ताम् । लोट् लकार के स्थान में जो आदेश तिसका अवयव जो एकार ५३७ तिसको पास होवे । एधताम्, वह बढे । एघेताम्, ५३८ वे दो बढें । एधन्ताम्, वे बढ ।। ५४६ ।। ५४७ ॥ सवाभ्यां वामौ । ३।४।६१ । सवाभ्यां परस्य लोडेत. क्रमाद्वामी स्त । एधस्व । एधेथाम् । एषध्वम् । स् और व् से परे जो लोट का एकार तिस को कम से व और पम् होवें । एधस्व, त बटें । एषेधाम् । ५४६ । तम दो वढो । एधध्वम् (५३०) तुस वढो ।। ५४७ ।। ५४८ ॥ एत ऐ। ३ । ४ । ६३ । लोडुत्तमस्य । एधै । एधावहै । - - . (१) एण् प्रत्याहारान्तर्गत वर्ग में से कोई एक है, अन्त में जिस के 11 B. । भ्पादव। ५४. ।। वादेोच गुरुमतोऽनुच्छः ।।१६इपादियोधा तुगुरुमामल्यम्यस्तत पाम् स्यारिखटि। ए पत्यापापम्तमत वन में से कोई एक भारि में विसवे पोर ver से मुरव स्वर पासा को 'प्रच" बोशेवर और कोई बातु उस से सिट में पाम् प्रात्ययहोवे ॥४॥ ५४१ । पाम्प्रत्ययवान्यानोऽनुप्रयोगस्य । १।३ । ६३ । पाम् प्रत्ययो यस्मात् पुस्यद्गुणसंविधानोबमोति । पाम्प्रचल्या तुष्यमनु प्रमुग्यमानाकृमोऽम्यात्ममेपदम् । 865 16 से पाम् प्रत्यय विधान किया है। जिस से उसे (१)पाम् प्रत्यय पाते। (यह (२)प्रतापविन्नान वानीधि) पर्वात् पाम् पी प्रतिवेभमान जन भातु से भी पात्मनेपद सोये रस का या "माव" "मिस तु में पाम् पाया' यदि या बात पात्मने पढी हो तो सबसे मी पात्मने पट होये नही तो नहीं पाम् पाने से उसको पाम के प्रत्ययका मेनुक्र गोता. ५४२ ॥ घिटस्तझयोरेपिरेन् । ३।४।८१ । विहादेशयोससम्म योरेभिरेचीस्त । एषाम्चने । एधाचनाते। एषाम्चक्रिरे । एधाम्प कृपे । एषाञ्चकाये ॥ विदो स्थान में पारंग बोत भौर म तिन को एम् पोरसर पाडेग कम से होते रे पपान्यतो पाबठा । एमाहाते सोमठे एवाबहिरे, पे पडे । पाम्प अपेतू बम । पपासाये तुम दो बठे ॥ १४ ॥ ५४३ । पए पौध्वलिटो घोडात्। ८ ।। मारपस्तावना त्यरेषां पीध्वंसुनिटांधस्य ठः । एधापाठये। एषाम्चो। एधाच कायो । एमाञ्चकमो । एघोषभव 1 एधामास । एधिता । एधितारी। एधिताः । एधितासे । एधितासायम () पाम् प्रत्ययान्त (१)वामीधि समास दो प्रकार का म र मरिधान (मिस पप से पदाप वा दोष हो मी हा में भी पौर तरिमिष्ट पदावा बोपमोमो)यपा सम्बनच मानप सम्मेवान बाबोबा पौर दसग भाष पपिमान मम पिकापमा पचापर मानस (बिपने सागरणकोचस सा ४१ लघुकौमुद्याम्। (१) इशन्त अङ्ग से परे जो " पीध्व और लुङ्, लिट" इन के धकार को ढकार होवे, एधान्चलढे, तुस बढे । एधाञ्चक्र, मैं बढा । एधाष्चक्नवहे, हम दो बढे । एधाञ्चकमहे, हम बढे । एषाम्बभूव, ५०१ श्रीर एधामास ये भी इसी काल के रूप हैं । लुट में, एधिता, बह बढेगा । एधितारौ, वे दो बढेंगे+ एधितारः, वे बढेंगे। एधितासे ५३८ तू बढेगा । एधितासाधे, तुम ५४४॥ धि च।८।२। २५ । धादी प्रत्यये सस्य लोपः । एधि- दो बदोगे । ५४३॥ ताध्वे || . . ६ हो, . - ध् है, आदि मे जिसके ऐसा प्रत्यय परे रहे तो स् का लोप होवे, एधिताध्ये, तुम वढोगे ॥ ५४४॥ ५४५॥ह एति।७। ४ । ५२ । तासस्त्योः सस्य ह स्यादेति परे । एधिताहे। एधितास्वहे । एधितास्महे । एधिष्यते । एधिष्येते । एधि ष्यन्ते । एधिष्यसे । एधिष्येथे। एधिष्यध्वे । एधिष्ये । एधिष्यावहे । एधिष्यामहे । तास् प्रत्यय के और अस् धातु के स् को परन्तु जब एकार परे होय तो एधिताहे, मैं बढूगा । एवितास्व हे, हम दो बढेंगे । एधितास्महे, हम वढेगे । लुट् मे एधिष्यते । एधिष्येते ५३८ । एविण्यन्ते। एधिष्यसे, ५३८ । एधिष्येधे, ५३८ । एधिष्यध्वे । एधिष्ये । एधिष्यावहे । एधिष्यामहे । अर्थ इन सभ के लुट के समान हैं ।। ५४५ ।। ५४६ ॥ आमेतः । ३ । ४ । ६० । लोट एत आम् । एधताम् । एधे ताम् । एधन्ताम् । लोट् लकार के स्थान में जो आदेश तिसका अवयव जो एकार ५३७ तिसको बास् होवे । एधताम्, वह बढे । एघेताम्, ५३८ वे दो बढें । एधन्ताम्, वे बढें ।। ५४६ ।। ५४७ ॥ सवाभ्यां वामौ । ३।४।६१ । सवाभ्यां परस्य लोडेतः क्रमादानी स्त । एधस्व । एधेथाम् । एधध्वम् । स् और य् से परे जो लोट् का एकार तिर को कम से व और प्रस् होवे । एधस्व, त बटें । एषेधाम् । ५४६ । तुम दो वढो । एधध्वस् (५३७) तुम वढो ।। ५४७ ।। ५४८ ॥ एत ऐ। ३ । ४ । ६३ । लोडुत्तसस्व । एथै । एधावहै । । . (१) पूण प्रत्याहारान्तर्गत वा में से कोई एक है, अन्त में जिस के॥
- एधामई । (पाटग्य) ऐधत ! ऐधैताम । ऐधन्त । ऐधया । ऐधेयाम् । ऐधनम् । ऐधे । ऐपावति। ऐधामहि । सेट् महार में जाम पुरष के ए को ऐडीया पर मे पधाम दोबठे। पपानरम रठेकर में ४०१ मे पाट पा+पत मे हरि रोने पर ऐपत ग । ऐषेतम् पे दो बडे । ऐपन्त वे बटे। ऐधया बटा । एश्याम् नुमोबठे। पारम् तुम ठे। पंधे मेरठा । पेशागरिकम दो बटे | पंथामहिम बठे || un ५४८ लिटः सौयुट् । ३ । ४ । १.२ । सलोपः । एधेत । एधेया ताम्। हिल पो मोपुर का पायम पिm मेम्बा मोपरपा पोर 10 पा सोरोने पर पतामोपयाताम वेटो बटेa ५५. । मस्य रन्। ३।४।१.५ | नि: एधेरन् । एधेयाः । एधे यायाम् । एधेयम। निरभको । परन् । diver..पहा पाम् राम दोगे। पाम तुमको । ५५१॥ स्टोता४।१।मिसागस्य। एधेय। एधेवाला एमति। सिरोम पुरपा र EिI TET परंप ने परे परमार ५५९" मुट तियोः ।। ४।१०। लिम्पोमुट ।। पाप गारात मनोपोगा एपिवीप्टाभिधीयासागर पाला पिपिपीयानाम् । भिनीम् पीप । पपिचार। एपिसीताधिष्टा एधिपानाम् । Arrar Rafrint marn mmmuviinfer .rr.1 मा eatin- (Ratnant.ma. - ४३ मध्यम पुरुष प्रथम पु. उत्तस पुरुष तु बढ़ तुमदो वढो " नघुकोसुद्याम्। BS एधिषीयास्ताम्, ईश्वर करे कि वेदो वटे एधिषीय ईश्वर करे में ढूं। पधिपीरन् ५५० थे एधिपीवहिईश्वरक० इमदी वो एधिषीष्ठाः एधियीमहि ईश्वरक. हमव । एधिपीयास्थाम् एधिषीध्वम् तुम खुड मे ऐधिष्ट (४७२) (४६५) (४६६) (४२७) वह बढ़ा ऐधिपाताम् वेदो वटे । ५५३ ॥ आत्मने पदेष्वनतः । ७।११५ । अनकारात्परस्यात्मनेप देषु झस्यात्स्यात् । ऐधिषत । ऐधिष्ठाः । ऐधिषाधाम् । एघिट्वम् । ऐधिषि ॥ ऐधिष्वहि । ऐधिष्महि । ऐधिष्यत । ऐधिष्येताम् । ऐधि ष्यन्त । ऐधिष्यथाः। ऐधिष्येथाम् । ऐधिष्वध्वम्। ऐधिष्ये । ऐधिण्या- वहि । ऐधिष्यामहि ॥ कमुकान्तौ ॥ २ ॥ पात्मनेपद में यदि म अकार मे परे न हो तो उसे अत् हो।ऐधिषत वे बढे। ऐधिष्ठा., तू वढा। ऐधिषि, मैं घढा । ऐधिपाथाम्, तुमदो वढे ऐधिष्वहि, हम दो बढे (१)ऐधि, तुम बढे । ऐधिन्मदि, हम बढे मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष FERHIT लुङ ॥ लुङ् में ॥ AL- -- ॥ प्रथम पुरुष ॥ मध्यम पुरुष ।। ॥ उत्तम पुरुष ॥ (ऐधिष्यत, यदि वह बढे । ऐधिष्यथा , जो तू बढ) ऐधिष्ये, जो मैं वटू। (२)ऐधिप्येताम् वेदोबढे । ऐधिष्येथाम्, तुमदो वढो ऐधिष्यावहि, जो हमदी वटे (ऐधिष्यन्त, वे दो बढे ) ऐधिष्यध्वम्, तुम बढो) ऐधिष्यामहि, हम बढे । २। धा० कम (काम) इच्छा करनी ।। ५५४ ॥ कमेर्णिड् । ३ १ । ३० । स्वार्थे । डित्वात्तड् । कामयते। कम् धातु से परे पिड् प्रत्यय स्वार्थ में होवे । “४८६" से गिड् प्रत्ययान्त (कम्) की धातु सजा हुई । णिड् प्रत्यय डित् है, इसी लिये ४०३ से प्रात्मने पद होता है। कामयते, में ४८३ से वृद्धि, और ४१४ अय् होते हैं वह इच्छा करता है । ५५४ ।। ५५५ ॥ अयामन्तात्वाय्येन्विष्णुषु। ६ । ४ । ५५ । एषु ओरय् कामयाञ्चक्रे । आयादय-इतिणिड् वा। चकमे । चकमाते। चकमिरे । (१)"५४४" (५४३) (२)५२८, ५२८, ४५७, ॥
म्पादय। एधामई । (पाटरच) ऐधत । ऐधेताम । ऐधम्त । ऐधया । ऐधेयाम् । ऐधनम् । ऐथे। ऐवावरि । ऐधामपि। सोर मकार को उत्तम पुरुष ने ए को ऐसोय। पधै मे बहूँ। एमास मदोपहें। पधानरे म ठेवा में 80 से पार पा+एषत २१२ सेपिरोने पर ऐपत पा पठा। ऐघेताम् पे दो रठे। ऐपत ४५ वे बठे। ऐपयाः पठा। पेषेषाम् तुमसेबठे। पापम् तुम मठे। पंधे में बटा । ऐधापरि म दो बटे । ऐधामहिम बठे | un ५४६ ॥ खिर सौयुट । ३।४ । १.२ । सनोपः । एघेत । एधेया ताम् । सिख को पोयुट का पागम पे 11 मे म् का मोप छुपा पोर १० से एका भोप होने पर । एता पठे। एपेयाताम् पे दोबठे १४८ ५५ । मस्य रम्।३।४।१५ । लिः। एधेरम् । एधेया । एधे यायाम्। एधेष्यम् । नि भको रन् रे। परन् में ब31 पपा बठ । पयायाम तुम रोबो। पाम तुम बहो । ५५१ ॥ इटोऽत्। ३।४।१ । लिगदेगस्य । एधेय। एधेयहि । पधमधि सिस् गर में भी हम पुरुष बाद तिमी पवार । पश्य में। परे पर मदोबठे। परेमाराम HD ५५९ ।। मुट् गियो।। ।। ४।१०। निम्तयोः मुट् । यगोपा। पाधवाकस्मात मालीपोम । एधिषीप्ट । पधिपायाताम् । पधिपीरन् । पपिष्ठिा एधिषीयाम्पाम् । एधिपोत्रम् । पधिषीय । पधिषोपरि। एधिपीमाहाधिष्टाधिपाताम् । परपुर नपामाप परिय(म) निस्देमपात mपजीपुर -मेमनपminet गिप्प मfer पीnि.nar HIRA परिपी+m- (Ofroire tition ४५ लघुकीमुद्याम् । ५५८ ॥ णौ चापधाया स्वः । ७ । ४ । १ । चड्परे यो यदङ्गं तस्योपधाया स्वः। ५५६ चङ परे है जिसके ऐसी यि परे हो तो अङ्गा की उपधा को स्व होता है। से "कास्+घत" = "कम्+घत" ।। ५५८ ॥ ५५६ ॥ चङि । ६ । १ । ११ । अनस्यासधात्ववयवस्यैकाच. प्रथ मस्व हे स्तोऽजादेहितीयस्य । "चड् परे होतो" (१)अनभ्यास धातुका जो अवयव एकाच (२) प्रथम भाग उसे हित्य होवे परन्तु यदि (३) घजादि हो तो द्वितीय (दूसरे) एकाच भाग (अश) को हित्व होवे। इसते और ४२२ “कम् + अत" = "ककम् + प्रत" । ४८२ सें"चकम् +अत" हुया।५५८ ५६० ॥ सन्वल्लघुनि चपरेऽनग्लोपे। ७ । ४ । ६३ । चपरे णौ यदङ्ग तस्य योऽभ्यासो लघुपरस्तस्य सनीव कार्य स्थामावग्लोपेऽसति । चड् परे है जिमके ऐसीणि जिस अट्न से परे हो उसका(४) जो "लघुपरे है जिसके" ऐसा अभ्यास उसको (५) “सन् ७४६ परे होते जो कार्य होता है" वैसा कार्य होवे परन्तु यदि णिको निमित्तमान किसी अक् प्रत्याहार सम्बन्धी वर्ण का लीप न हुआ हो तब ॥ ५६० ॥ ५६१ ॥ सन्यतः । ७।४ । ७६ । अभ्यासस्यात इत्सनि । सन् परे रहते अभ्यास के प्रकार को इकार होवे । इससे "चकम् + अत" चिकम् + प्रत ॥ ५६१ ॥ ५६२ ॥ दीर्घोलघो । ७।४ । ६४ । लघोरभ्यासस्य दीर्घ सन्व सावविषये । पचीकमत। गिडावपक्षे । "सन्वद्भाव ५६० के विषय में" (जिसमें ५६० से सन्वद्भाव हुआ हो) अभ्यास के लघु को दीर्घ होवे । तब "चिकम् +अत" = "चीकम् + अत" ४५१ से अट अचीकमत उसने इच्छा की जिस पक्ष में गिड़ नही होता ४८७ उस पक्ष में अगला वार्तिक लगता है ॥ ५६२ ।। ५६३ ॥ कमेश्वश्चङ् वाच्यः । अचकमत । अकामयिष्यत। अक मिष्यत । अयगती ३ । श्यते । (१) जिस को दित्त नही हुआ । (२)एक स्वर वाला । (३)अच् (स्वर) है प्रादिमें जिस के । (४) अङ्गका १४६ । (५) अभ्यास को ।
है" म्यादय । । - पकमिषे । चकमाये । चकमिध्ये,धकमिट्ये । चकमे। चयमिष हे । घकामिमहे । कामयिता । कामयितासे । कमिता । कामयिज्यते । कमिष्यते । वामयताम् । पकामयत। कामयेत। कामविधीष्ट । कमिषोष्ट। अब पाम् ४१८ | पन्त । पाषु । पाग्या मु पोर राम प्रत्ययों में से कोई प्रत्यय पातु से परे हो तप पि को पप् होवे।पामाचो उसने राजा पी। (१)पार्धधातुम में ८० के नियमानुसार पिर विकल्प पर होता है। तप पचमें। पमे उसमे रचा की॥1॥ ॥ प्रथम पुरुषा ।। मध्यम पुरुष । ॥ एतम पुरुष चयमिपे तूने इन्का की। चकमे मने पच्चा की। चकमाते उनदो ने रच्या वी चममावे तुमहोने पापी पकमिरे, उनमें पच्चा भी चयमितुमने रचावी पमिमहे जमने की विपमिपरामदीने रचाकी चमिम्बे कामयिता सामयितासे तपा परेगा । पारमा परेमा पमिता । पोट में पामयताम् वाचा परे । बामयिष्यते। रमिप्यते।। पापच्छा करेगा सर में प्रवामयत उसनेरचा की। पिधि सिर में पामयेत् पा चा परे ॥ सामयिपोष्ट। पा पिरमे परपर जो भी वाच्छा परे । कमिपीष्ट। ५५६ । मिश्रिद्रुसभ्यः कर्तरि पत् । ३।। ४८। एयन्तात् शादिभ्यरच रखेश्चर कपचे मुछि। कामि पत प्रतिस्विते। (३) एयन्त से परे पौर थि (चिम्)-सेवापरनी। तु-दोरना जाना । - पहना । ल पातुपी मे परे वो छि (41) तिस को 'मार्ता पर्व में शुमो नो" पर चोपे। (कामि+ पत) पेमे रिवत होमे पर: ॥ ५५० ॥ रनिटि।।8। ५१ । पमिठादावाषधातुके पेीप । पद१० पाटिमें नहीं जिम ऐमा पाचपातुब परेको सो सिपाहोपोता। पम मे पिकामोपोने पर “वामि+पत", काम् पात" .. (१) मिरपुर नृर पा निनुका ये एबार पापपातुब। यहां (२) भिम पच में पटवीटर प्रत्याहार मिया रोपपमिध्ये पोर त्रिम पप में सामान्य पत्यार का पारेमा पमिदे। (३) विपत में विषये। . - - ४५ लघुकीमुद्यान्। ५५८ ॥ गौ चडापधाया स्व. । ७ । ४ । १ । चपरे णौ यदङ्ग तस्योपधाया अस्वः। ५५६ चङ् परे है जिसके ऐसी गि परे हो तो प्रङ्ग की उपधा को स्व होता है ।। इस से "काम् +अत" = "कम्+घत" ।। ५५८ ।। ५५६ ॥ चङि । ६ । १ । ११ । अनल्यासधात्ववयवस्यैकाचः प्रथ सस्य हे स्तोऽजादे द्वितीयस्य । "चङ् परे होतो" (१)अनभ्यास धातुका जो अवयव एकाच (२) प्रथम भाग उसे हित्व होवे परन्तु यदि (३) अजादि हो तो द्वितीय (दूसरे) एकाच भाग (अश) को द्वित्व होवे। इससे और ४२२ “कम् + अत" = "ककाम् + प्रत" । ४८२ सें"चकम् +अत" हुया ।५५८ ५६० ॥ सन्वल्लघुनि चपरेनग्लोपे। ७ । ४ । ६३ । चपर गौ यदङ्ग तस्य योऽभ्यासो लघुपरस्तस्य सनीव कार्य स्यामावग्लोपेऽसति । चङ् परे है जिसके ऐसीचि जिस अन से परे हो उसका(४) जो "लघुपरे है जिसके" ऐसा अभ्याम उसको (५) “सन् ७४६ परे होते जो कार्य होता है" वैसा कार्य होये परन्तु यदि णिको निमित्तमान किसी अक् प्रत्याहार सम्बन्धी वर्ण का लीप न हुआ हो तब ।। ५६०॥ ५६१ ।। सन्यतः |४ | ७६ | अभ्यासस्यात दूत्सनि । सन् परे रहते अभ्यास के प्रकार को इकार होवे । इससे "चकम् + अत" चिकम् + त ।। ५६१ ॥ ५६२ ॥ दीर्घोलघीः । ७। ४ । ६४ । लघोरभ्यासस्य दीर्घ सन्व झावविषये । अचीकमता गिडावपक्षे । "सन्वद्भाव के विषय में" (जिसमे ५६० मेस सन्वद्भाव हो)अभ्यास के लघु को दीर्घ होवे । तब "चिकम् + अत" = "चीकम् +अत" ४५१ से अट अचीकमत उसने इच्छा की जिस पक्ष में गिड़ नही होता ४८७ उस पक्ष में अगला वार्तिक लगता है ।। ५६२ ॥ ५६३ ॥ कमेश्वेश्चङ वाच्यः । अचकमत । अकामयिष्यत। अक मिष्यत । अयगती । ३ । अयते ५६० 1 । (१) जिस को दित्त नहीं हुआ । (२)एक स्वर दाला । (३)अच् (स्वर) है घाटिमें जिस के 1(४) अजवा १४६ । (५) अभ्यास को ।
म्वादय। पम् मे परे चिमो पर ही ऐसा पाना चाहिये । प्रचकमत १८ उसने रमा की पसामयिण्यत पक्षमिष्यत । यटि पापमा परे । ।। भम् (पय) भातु गमन पर्य में उसका सर में ५०पयते या माता॥ ५५ ॥ ५६४ ॥ उपसर्गस्वायतो। ८। २ । १८ । पयतावपसगस्वरे फास्य खत्वम् । प्लायते । पजायते । प्रय धातु परे हो तो (१) उपसर्गस्थ रेप को समारोवे । + पयते (२)प्यायते पामागता। परा+प्रयते-पबायते-पच मागतारे 40 ५६५ ॥ दयावासरच | ३ | १ | २० । एभ्य पाम् खिटि । पया ऊपर। पयिता । पविष्यते । पयताम् । पायत । भयेता पयिषोष्ट ॥ य- देना । पय-बाना । पास-बेठना । इन तीन चातुओं से पर पाम् होये विट में। पवाया-पामया । बुद् में पयिता-पावावेगा । चूट में पयिष्यते -वर जावेगा। बोर में पयताम्-परवापे । सर में पावत-पा गया । वि सिर में भवेत पाबारे। पपिपीट पर पापावे ॥३॥ ५६ विभाषेटः । ८।३।७८ दुपः परो य इट् तत परेषा पौध्वजिटा धस्य वा ठः । पयिषोठ्वम् । पयिषोऽवम । पाविष्ट । पायिट्यम् । पायिध्वम् । पायिष्यत । द्युत, दीप्ती । ४ । योतते। पए प्रत्यासर से परे बोससे परे को 'वीम्मम् चौर खुरपा सिट नपे एप्पो पिम्प पर दशाये। विपीठम्" पविषीभ्वम-वर बरे मि तुम बापो । में पायित पा मया। (१)पायितुम् पाविषम् तुम मए । पायिभ्यतमोसी वाये।। पुत् (पत) पातु पीपित (मपाम) पर्व में। (४)पोतते पा घमकता|uta ५६० ॥ पुतिम्वाप्यो सम्प्रसारणम्।। ४ । ६० । पनयोरम्या सस्य सम्प्रसारणं स्यात् । दिद्युते । - चमाना। । स्वापी-मोचाना। इन हो पातुपों मे पम्पास १२१ पो सम्प्रसारण यो दिपुते - चमका १० (१) पसम में गो पर्तमान है। (२) पर से पीर्ष परना । (१) ये होमी सद मध्यम वरन वे परे। () ५५ यप् पौर में ( या मिष्यप् पुत- पा पिएमप।
लघुकीमुष्णाम्। ५६८ ॥ द्युयीलुङि । १ । ३ । ६१ । द्युतादिभ्य. परस्मैपद वा लुडि । पुषादित्यड् । अद्युतत् । अद्योतिष्ट । अयोतिष्यत। एवं श्यिता, वर्णे। ५ । जिमिदा, स्नेहने । ६ । जिविदा, स्नेहनमोच- नयो. 1 9 1 मोहनयोरित्येको । अिक्ष्विदा, चेत्येके । रुच, दीप्यावभि प्रीतीच । धुट, परिवर्तने । ६ । शुभ,दीप्ती । १० । क्षुभ, सचलने । ११ णभ तुभ हिंसायाम् । १२ । १३ । स्रसु, वर, ध्वसु, अवसूसने, । १४, १५, १६ । वसु, (१) गती। १७ । सम्भु विश्वासे ।१८। वृतु वर्त्तने । १८ । वर्तते । ववृते । पर्त्तिता । (२) द्युतादि धातुओं से परे लङ् लकार में परस्मैपद विकल्प करके होवे ५३६ वें सूत्र में च्लि ४६५ को अड् हुआ । अद्युतत्, अद्योतिष्ट (४६६, ४२७, ४६३) वह चमका। भद्योतिष्यत जो वह चमके । इसी तरह (प्रकार) से आगे लिखे धातु सिद्ध किये जाते हैं। ५। शिवता (शिवत्) = प्रवेत होना । ६ । जिमिदा (मिद) =चिकना करना । ७ । निष्वदा- (विद्) - चिकना वा त्याग करना। कई एक आचाया, के मत में यह धातु चिकना करना वा मोहित करना अर्घ में है। कई श्राचार्य जिवदा के स्थान में विधिवदा धातु कहते है ८। रुच (रुच्) =दीप्ति वा प्रीति करना । ८ । घुट (घुट) घोटना । १० । शुभ (शुभ) शोभित होना । ११ । शुभ (शुभ) = घबरा के कापना । १२ । णभ (गभ) मारना । १३ । तुम (तुम्) = हिसा करनी । १४ । ससु (स्रस्)= गिरना । १५ । वसु (मस्) - गिरना । १६ ॥ ध्वसु (ध्वस्) = गिरना । १७ । और ध्वसु (ध्वस्) = चलना । १८। सम्भु (सम्भ) = विश्वास करना । १८ । वृतु (हत्) = होना । लट् में वर्तते वह है। लिट् मै वहते ४४२, वह था। लुट में वर्तता "४२०, ४७८" वह होगा ।। ५६८ ॥ ५६६ । वृा. स्यसनोः । १।३। ६२ । तादिभ्य. पञ्चभ्यो वा परस्मैपदं स्थे सनि च। वृत् (तु) इत्यादि ५ पाच धातुओं से परे परस्मैपट विकल्प से होवे स्य और सन् ७४६ परे (३)होतो ॥ ५६८ ॥ ५७० ॥ न बहाश्चतुभ्यं । ७ । २ । ५६ । वृतुवृधशृधुस्यन्दूभ्यः सादेरार्धधातुकस्येट् न तडानयोरभावे । वय॑ति, वत्तिष्यते। वर्स (१) "च" इत्यधिका, क्वचित्पाठ (२) द्युत धातु है भादिसें जिन को । (३) स्य, वा- सन् स्थापन करने का विषय होती। - ४२८ म्पादय। - पाम् से परे चि को पर ही ऐसा पाना चाहिये । पचकमत ५५८ उसने रमा पी पकामवियत प्रकमिध्यत ४८५ यदि पारमा परे । । । पय् (पय) पातु गमन पई में सपा सर में १५५०पयते वा पातारे॥ ९ ॥ ५६४ । उपसर्गस्यायतो।८।२।१९ । पयतावपसर्गस्परेफस्य लत्यम् । प्सायते । पञ्चायते। पम् पातु परेको तो (1) उपसर्मस्व रेफ पो बफारशेपे । प+पयते (२)प्यायते पामागता। परा+पवते-पसायते-पर मागतारे ५६५ ॥ दयायासाच । ३ । १ । ३० । एभ्य पाम् खिटि । पया चक्रे । पयिता । प्रयिष्यते । पयताम् । पायत । अयेत । पविपोष्ट ॥ दय-देना । पय-बाना । पास-बैठना । नतीन पातुणों से परे पाम् सोचे सिद में। प्रपाम्पो-पागवा । चुद में पयिता-पावावेगा। घर में प्रयिष्यते -मा बायेगा। पद में प्रपताम्-वाचावे । सद में पायत वा मया । वि सिर में पधेत पाबापे । पपिपोष्ट पर पाबा AR ५६६ ॥ विभाषेटः।८।३ 102 1 पूष परो य इट तत परेषा पौध्वंसुपिटा वस्य वा ठ । पयिषोठ्वम् । पयिषाध्यम । पायिष्ट । पायिवम् । प्रायिध्वम् । भायिध्यत । युत, दीप्ती । ४ । योतते। एप प्रत्यार से परे जो उससे परे वो 'पोम्पम् चीर मुरमा बिनो यो शिवप करके दोरे । यिवोम्ठम् पचिपीमम्-वर परे बि तुम नायो। बुर में पाविष्ट ३२ १५ पा गया। (पायिवम् पापिम्पम् तुम गए । पामिप्यतमो पड़ी पामे।। पुत् (पुत) पातु रीप्ति (मकाम) पप में रे। (४)ोततेा धमकता ५६७ ॥ युतियाप्योः सम्प्रसारपम्। 01 ४ । ६० । पनयोरभ्या सस्य सम्प्रसारणं म्यात् । दिद्युते । पुन-पमाना। स्वापी-मीनाना। लदो धातुपों से पम्यास ११को सम्ममारप ये रिपुते -बाबमका n ton (उपसम में जो पर्तमान () पर में दीर्च करना । (0) ये दोनी दर मम्पम मधुपरन से परे। (0) १५ सप् और यम गुप। ( या विप्प - ४८ . । लघुकौमुद्याम् । तु, पार करना । फल, फलना । भज, सेवा करनी । त्रप्, लज्जा करणी । इन 8 चार धातुओं के प्रकार को एकार होवे और अभ्यास का लोप भी होवे, जब कित् लिट ४८० धौर सेट (इट युक्त) थल परे होतो। तब लिट् में त्रेपे वह लज्जित हुआ था। लुट्से ५०५ से इट इट् विकल्प से हुआ तब त्रपिता “वा" चप्ता, वह लम्जित होगा । लट् में भी ५०५ बपिष्यते, वा त्रप्स्यते वह लन्जित होगा ।। लोट में वपताम्, वह (१) लज्जित होवे लङ् मे अत्रपत, वह वि. लिङ् में अपेत= वह लज्जित हुश्रा । प्रा. लिङ् में पिषीष्ट ५०५ त्रप्सीष्ट ईश्वर करे कि वह लज्जित होवे । लुङ् में अत्रपिष्ट वा अत्रप्त (५०५) वह लज्जित हुत्रा । लुङ् में ५०५ अत्रपिष्यत, वा अत्रप्स्यत यदि वह लज्जित होवे । लघु कौमुदीमें,भ्वादिगण के आत्मनेपदी धातुसमाप्तहुए ५७२ ।। ५७३ ॥ थिञ् सेवायाम् । १ । श्रयति, यते । शिवाय, शिश्रिये । श्रयिता । श्रयिष्यति, श्रयिष्यते । श्रयतु, श्रयताम् । अश्चयत्, अश्रयत । थयेत, श्रयेत । श्रीयात, शयिषीष्ट । चङ् । अशिनियत, अशिश्रियत । अश्रयिष्यत, अश्रयिष्यत । भृञ् भरणे । २। भरति, भरते । बसार । बभ्रतु । बचु । बभयं । वझव, वमृय । वधे । बभूषे । भर्तासि । भर्तासे । भरिष्यति, भरिष्यते । भरतु, भरताम् । अमरत, अभरत । भरेत, भरेत। अब निन धातुओं कि साधन प्रक्रिया लिखेंगे उन में ४०५, ४०६ इन सूबो से आत्मनेपद ओर परस्मैपद दोनों प्रकार के प्रत्यय होते हैं।१। थिज, सेवा दारणी। इस का लट में श्रयति, श्रयते ४१३, ४१४, और २६, वह सेवा करता है। लिट् मे मियाय, वा शिभिये, वह सेवा करता हुआ । ॥ परस्मैपद ॥ ॥आत्मनेपद ॥ लुटो वयिता, अयिता, वहसेवाकरेगा। लुट में, श्रयिष्यति, श्रयिष्यते लड् म अश्रयत् वा अप्रयत लोट, में श्रयितु, श्यताम, करे (वि. लिमें श्रयेत्, नयेत, आ० लिङ् में, श्रीयात् ५१२, वा श्रयिरीष्ट ५५२, ईश्वर करे कि वह मेवा करे । लुङ् (१) शासिन्दा। । . वह सेवाकरता हुआ।
B म्यान्य । -- ताम् । भवर्तत । वत्तत । वर्तिपोष्ट । पत्तिष्ट । पवस्य॑त्, पवत्ति भ्यत । दद दाने । २ । ददते । (१) तर पोर (१)पान के पमाप में पतु होना। एए-पटना। यधु-मुस्सित मय परना । भोर स्यन्-पाना। इन चार धातुओं से परे (२)मादि पाधधातुक कोर पा पागम ४२० नोवे । स शिये तद् (8)(परस्यति पतिप्यतेपारोगा।सोट में पत्तताम् भावापे । पर में पपर्तत पा चा वि निद में वर्तत -पापे । प्रामिसिर में पर्तिपीट-१५१ रवर करे कि दावे। दुश में पर्तिष्ठ पाया। घर में ५८ ५० परस्पत् पर्तिप्यत परि पा चोवे । २ । दद (इद्) देना पदो परते का देतारे ॥५॥ ५०१ ॥ न घसददवादिगणामाम् । ६।४।१२६ । शोददेव कारादीनां गुणगग्देम विधितोयोऽपारस्तस्य एस्वाभ्यासयोपो न । दददे । दददाते । दददिरे । ददिता । ददिष्यते। ददताम् । पददत । ददेताददिपोष्टर पददिष्ट प्रददिष्यता पप खायाम्।२१। चपते। स-किसा करनी। दद-दमा । और १ बादि धातु । पौर पुर पग्द करने विहित बी पवार "10"। इन सभ वो पवार पोर अभ्यास वा पोप न होवे । (८) उदारे-एमने दिया । दददाते -नरोगो में दिया। दवदिरे-उनमे रिया १० ॥ (चद् में पिता-वा देगा चिोद मे पदताम् -पारे। हर मे पददत देतापा। पामि सिर में ददिपोष्ट पर मुर में पदादिष्ट उसने दिया । दि देत परविष्यत यदि पाये। २१ । पपूर (प) चन्या बापी । चपते पाचवा वरतारे 101 ५७२ ॥ तफसमवषपाप ।। ४ । १२२ । एषामत एल्वम भ्यासलोपरच वितिविटिसेटियलिच । चेपे । पिता, पता। बपि ध्यते, पास्यते । पपताम् । पचपत । पपेत । पिषौष्ट, पप्सीष्ट । पथमिष्ट, पत्रप्त । पपपिध्यत, परप्स्यत । प्रत्यात्ममेपद प्रक्रिया। (१) प्रत्याहार पास्मनेपद सब प्रत्ययो वा (१) मानन् पौरपान वा । (पारिनिस (8) से परस्मैपद ५० में रमिपेष। - N M . ॥
-- लघुकीसुद्याम् । भृषीष्ट, ईश्वर करें वह पाले । भूषीयास्ताम्, वे दो पालें । लुङ् में अभार्षीत् ५५१, ४६५, ४६६, वह पालता हुा ।। ५७५ ।। ५७६ || ह्रस्वादशात् । ८ । २ । २७ । सिचोलोपोझलि । अमृत । अमरिष्यत्, अमरिष्यत । हृञ् हरगो (३) हरति, हरते। जहार, जथे। जहर्थ । जहिव । जहिम। जज्ञिरे । हो । हरिष्यति, हरिष्यते। हरतु, हरताम् । अहरत, अहरत। हरेत्, हरेत । हियात, हृषीष्ट । हिषीया- स्ताम् । अहार्षीत् । अछुत। अहरिष्यत, अहरिष्यत ॥ धृ धारणे । ४ । धरति, धरते। ग्रीज् प्रापणे ५ नयति, नयते । डुपचष् पाके ६ पचति, पचते । पपाच, पेचिथ, पपक्य । पेचे पत्ता । अज सेवायाम् ७ भजति, भजते । बभाज भेजे । भला भक्ष्यति, भक्ष्यते अभाक्षीत्, असक्ता । अभक्षाताम् । यज देवापूजासङ्गतिकर पा- दानेषु ८ । यजति, यजते । माल् परे हो तो इस्व अङ्ग से परे जी सिच तिसका लोप होवे । असत, उसने पाला । लङ से अमरिष्यत्, अमरिष्यत जो (यदि) वह पाले । हृञ् (ह) हर- लेना । हरति, हरते, वह हर लेता जहार, जई, उसने हर लिया। जहर्थ,तृने हर लियाथा जद्भिव, हल दोनें हर लिया । जहिम, हमने हर लिया था । जहिले, तूने हर लिया था। हर्ता हरतु, हरताम्, वह हर लेवे हरिष्यति वह हर लेगा अहरत्, प्रहरत, वह हरता हुआ हरिष्यते वि० लिङ् मे हरेत्, हरेत वह हरले । हियात् (५७४, ३३१) वा दृषीष्ट (५४८ ५५२) ईश्वर करे कि वह हरले । हषीयास्ताम् ईश्वरकरे कि वेदो हरले। अहार्षीत्, अहत ५७६, वह हरता न्या । अहरिप्यत्, अहरिष्यत यदि वह हरले । ४ । धृञ् (ध) धारण करणा धरति, घरते, वह धारए करता है । ५ । गीञ् (णी), लेजाना । नयति, नयते, वह लेजाता है । ६ । डुपचप (पच्), पकाना । पचति, पचते, वह पकाताहे। पपाच, उसने पकाया पेचिय, पपक्य, तूने पकाया । पेचे पृ८८, उसने पकाया । पक्ता, वह पकावेगा । ७ । भज (भज), सेवा वारणी । भजति, भजते, वह सेवा करता है । वमाज ६८३, भेजे ५७२,उसने सेवा करी । भक्ता, भक्ष्यति, भक्ष्यते, वह मेवा करेगा। अभाक्षीत, ४८३ अमन, ५०७, वह- मेवा कारता हुा । अभक्षाताम्, उन दोनें सेवा को ॥ ८ । यज (यन्), देवताओं की करणी वा सग कारणा वा दान करणा। यजति, यजते, वह पूजा करता है ॥ ५७६ ।। पूना ५७७ ॥ लिट्यत्म्यासस्योभयेभाम् । ६ । १ । १७ । वच्यादीनां ग्रयादीनां चाभ्यासत्त्व सम्प्रसारणा लिटि। इयाज । वच्याटि (वच् श्रादिका ५७८) और ग्रह श्रादि ६८ धातुओं के अन्यास को ४२१ सम्प्रसारण होवे परन्तु जब लिट् लकार परे हो तव । (५७०, २७८, ४८३, इयान, उसने पूजाकी ।। ५७६ ॥ 1 . । म्वादया। भरत। में ५५ से ति को पद बिया तब पमिथिपत् पगियियत वा सेवा परता एपा । मर में पथयिष्यत् प्रययिष्यत यदि पा मग करे || 10२॥ १। मुम् (म) पासना परमी । इस वोप धन में देणे- ॥ परस्म पद । ॥ पाहममे पद ॥ भरति। भरते वर पानता। मिर (१)वमार। (२)पके पर पासतापा। मुद (२)मसासि। मासे त पासेमा। सूट मग्व्यिति । मरिष्यते वा यासेमा। पोट मरताम् वा पाये। अमरता हसने लगा। मरेत् । मरण या पाते। ५०४ ॥ रिट शयरिख । ७।8। २८/शे यकि यादावार्थ- धातुये लिहि सतोरिन् । रोहि प्रकृते रिविधामसामाहीन । भियात् ।। कार को रिहो वयप २८०" वा यत् ०८५ परेरा पववा यादि (पवार पादिमें प्रिम को ऐसा 'पाधचातुन का सिर" (पा सिद) परे से तब । (४) मत सर कोने पर पुन रिसके विधान करने की सामर्म स ५१२ से दो नही पोता । मियात् पर मरे कि बर पासमा परे । २० । ५०५ ॥ उश्च । १ । । । १२। भवन्तिात्परी झवादी घिर सिची फिती स्ताहि । मृषीष्ट । भषीयास्ताम् पभापीत् । अपपात मे परे मम्रे पाटि म घिस को ऐसा को सिर और सिप पे बित् व तर (मायाार) पर कोतव मप कित् होम पर BIT से गुष का निपप किया (१) (रस के पाने) पम्मतु हम दो ने पाममा बरी । बयु - हमने पारना थी। पमम -तन पनमा यो पभप-म टोने पानमा की। पमम -जमने पासना की। मामी जामने । (२) इस पो पागे बम्प - तूने पासना करो। (१)म पुर मे मा वा पायेमा। (४) रसका यह भावयति पोर यहां फिर १५ से ठीचको पोतो हम पति या समाधान है।वि पाण्यायी में प्रम से रस ये पूषस भूत में १८१८ मीर की पाति इस भूष में कर नेते पोरदोष विपि को स्मरप भी न करना पाता पोर म रिदम पठन मे माधव भी होता पुन सिथिन का किया हममा मिधानी मामय बन्पना परतावियां दोध नहीं होता।
लघुकीसुद्याम् । ५१ भृषीष्ट, ईश्वर को वह पाले । भृषीयास्ताम्, वे दो पाले । लुड् मे अभार्षीत् ४५१, ४६५, ४६६, वह पालता हुआ ।। ५७५ ॥ ५७६ ॥ ह्रस्वादङ्गात् । ८ । २ । २७ । सिचोलोपोकलि । अभृत । अभरिष्यत, अमरिष्यत । हृञ् हरणे (३) हरति, हरते। जहार, नथे। जहथ । जहिव । जहिम। जझिये । हर्ता । हरिष्यति, हरिष्यते। हरतु, हरताम् । अहरत, अहरत। हरेत, हरेत । जियात, कृषीष्ट। हिषीया- स्ताम् । अहार्षीत् । अहत । अहरिष्यत, अहरिष्यत ॥ धृज पारणे । ४ । धरति, धरते। णीज् प्रापणे ५ नयति, नयते । डुपचष् पाके ६ पचति, पचते । पपाच, पेचिथ, पपक्थ । पेचे पहा । अज सेवायास् ७ भजति, भजते । बभाज भेजे । भत्ता भक्ष्यति, भक्ष्यते अमाक्षीत्, असक्ता । अभक्षाताम् । यज देवापूजासङ्गतिकरण- दानेषु ८ । यजति, यजते । झल् पने हो तो इस्व अङ्ग से परे जो सिच तिसका लोप होवे । असत, उसने पाला । लङ मे अमरिष्यत्, अमरिष्यत जो (यदि) वह पाले । हृञ् (कृ) हर- लेना। हरति, इरते, वह हर लेता है जहार, जई, उसने हर लिया। जहर्ष,तुने हर लियाथा जनिव, इन दोनें हर लिया । जङ्गिम, हमने हर लिया था । जनिषे, तुने हर लिया था । हर्ता हरतु, हरताम्, वह हर लेये। हरिष्यति वह हर लेगा अहरत्, अहरत, वह हरता हुधा हरिष्यते वि० लिङ् मे हरेत्, हरेत वह हरले । जियात् (५७४, ३३१) वा दृषीष्ट (५४८ ५५२) ईश्वर करे कि वह हरले । हृषीयास्ताम् ईश्वरकरे कि वेदो हरले। अकार्षीत्, अहत ५७६, वह हरता हा । अहरिष्यत्, अहरिष्यत यदि वह हरले । ४ । धृञ् (धृ) धारण करणा धरति, धरते, वह धारण करता है । ५ । णीञ् (णी), लेजाना । नयति, नयते, वह लेजाता है । ६ । डुपचष् (उच्), पकाना । पचति, पचते, वह पकाताहै। पपाच, उसने पकाया पेनिथ, पपक्य, तूने पकाया । पेचे १८८, उपने पकाया । पत्ता, वह पनावेगा । ७ । अज (भज्), सेवा वारणी । भजलि, भजते, वह सेवा करता है । वमान ६८३, भेजे ५७२,उसने सेवा करी । भक्ता, भक्ष्यति, भच्यते, वह सेवा करेगा । अभाक्षीत, ४८३ अमन, ५०७, वह. सेवा करता हुअा। अभक्षाताम्, उन दोने सेवा की ।। ८ । यज (यज्), देवताओ की पूजा करणी वा मग करणा वा दान करगा। यजति, बजते, वह पूना करता है ॥ ५७६ ।। ५७७ ॥ लिट्यस्थासस्योभयेषाम् । ६ । १ । १७ । वच्यादीनां ग्रह्यादीनां चाभ्यासत्व सम्प्रलार लिटि। इयाज । वच्याटि (वच् श्रादिक ५७८) और ग्रह आदि ६६८ धातुनी के अभ्यास को ४२१ सम्प्रसारण होवे परन्तु नव लिट् लकार परे हो तव । (५७७, २७८, ४८३, दयाज, उसने पूजाकी ।। ५७६ ॥
भ्वादया। भरति। पापासमा। भरत। पापाम। में १५५ से सि को वा किया ता प्रशियियत् पणियियत या रोषा करता एपा। सह में प्रत्रयिष्यत् प्रवयिष्यत यति पा सेवा करे ।। 10२ ।। २ । भृम् (म) पासमा बापी।स के कप चम्म में देसो- ॥ परस्म पद ।। ॥ पास्ममे पद सट भरते या पानता। सिद् (१)वमार। (२)वभे पर पासतापा। मुद (२)भतामि। भत्तासे तु पाचमा। सूट भरिष्यति । मरिष्यते, चोट भरताम् प्रमरत् । अमरत इसम णसा। वि सिह मरेत् । मरेत् पा पाने । ५०४ ॥ रिट शयग्लिन्छु । ०। ४ । २८/ गे यकि यादापाध धातु सिधि मतोरिन् । रोडि प्रकृते रिविधामसामाशो!म । भियात् ॥ पापा पो रिवर 420 पा या ८५ परे हे पथमा यादि (यकार पादिमें प्रिम में ऐसा 'पापचासुध का नि" (पा सिस) परे रीतम । (४) मत रीठोकान पर पुनरिएप विधान करने को घामप्य से ११२ से टोच नहीं जाता। मियात् पसर परे वि वा पासमा रे ॥ १०४ ॥ ५०५ ॥ उरच । १।२।१२। सम्पर्धा तात्परी झलादी बिह सिधी किती स्तमराठि । भृषीष्ट । भूषीयास्ताम् पभाषीत् । परमारत म परे भी पाटि में निरा पे एसा जो निट और मिथ् वे वित् सीप ता (म यार) पर तब । न शित् मे पर 1 में गुष का निपप किया तय (१) (परा का पामे) वनाउन हो मे पानना बरी । पपु'-उनमें पालमा पी। बमप -तने पमना की बभव -म होम पानना की। पमम-मन प्यमना की। यह भी बामन । (२) म के भाग पाप-तने पालना करी। (म पुर में मत्तामा पानेगा। (1) सप्पा या भाव पटि पोर यह पिर ५१२ मे दीपकको तो समझे पति यामाधान । बि पटाध्यायी पेम मे रम पूबने मूष में की अनुमति र मूत्र में रमते पोरा दीप विपि को स्मरण भी हाना पाता पोर द्वार रिदम पान म माघर भी हो पुननि पा दिया मग मिपानी मामध्यपना प्रारमा कियघमीता।
। लघुकीमुद्याम् । जहे । बोढा । वक्ष्यति । श्रवाचीत् । अवोटाम् । अवाचु । अबाचीः । अवोढम् । अवोढ। अवाक्षम् । श्रावक्ष्य । अवाक्ष्म । अवोढ। अवक्षाताम् । अवक्षत । अवोढाः । भवक्षाधाम् । अवोढम् । अवक्षि। अवक्ष्वहि । अवक्ष्महि । ॥ इति स्वादयः॥ सङ्, सहना । वह (लेनाना)। इन दो धातुओ के अवर्ण को श्रोकार होवे अब द का लोप ५८१ से । हो चुका हो । उवोढ, तू लेगया था। ऊहे, वह लेगया वह +ता-२७१, ५८०, ७५, ५८१, ५८२, वीटा, वह ले जाएगा । वह + स्यति = (२७१, ५७८,१६३) वक्ष्यति, वह लेनावेगा । अवाक्षीत्, वह लेगया । अवोढाम्, ५८२ वे दो लेगए। अवाक्षु , वे लेगए। अवाक्षीः , तू लेगया । अवोढम्, तुम दो लेगए । अवोढ, तुम में लेगा। अवाक्ष्व, हम दो लेगए। अवाक्षम, हम लेगए। आत्मनेपद के लुङ् मे (२७१, ५८०, ७५, ५८१, ५८२) अबोढ वह लेगया । अवक्षा- ताम् (२७१,५७८,) वे दो लेगए । अबक्षत (५५३) वे लेगए । अवोढा., तू लेगया । अवक्षा- थाम्, तुम दो लेगए । अवोढम्, तुम लेगए । अवक्षि, में लेगया । अवक्ष्वहि, हम दो लेगए । अवक्ष्महि, हम लेगए । लघुकौमुदी में भ्वादिगण के धातु समाप्त हुए। ५८२ ॥ ॥ भ्वादिगण समाप्त हुआ। . लेगए । अवाक्षम्, ESI अथ-अदादयः ।। + अद अक्षये ॥ १॥ ५८३ ॥ अदिप्रभृतिभ्यः शप. । २ । ४ । ७२ | लुक् स्यात् । अत्ति । अत्त. । अदन्ति । अत्ति । अत्ध । अत्य। अनि । अहः । अझ । अब, अद् है आदिमें जिन के उन धातुओं का वर्णन किया जाता है । १ । अद् = झाना । अट् आदि धातुओं से परे जो शप् ४१४ तिस का लुक होवे । श्रद+सप्+ति (५८३) अद+ति ८७ से टु को त् पुनः, “अत्ति" वह स्वाता है। अत्त. (वेदोखाते है)। (१) प्रदन्ति, वे स्वाते हैं। अत्सि ८०, तू खाता है। अत्थ', तुम दो खाते हो । अत्य, तुम रहाते हो । अनि, में खाता हु । अहः, हम दो खाते है। अन', इस खाते हैं ॥ ५८३ ॥ - -- (१) ४१५॥
म्यादय । ५७ ॥ पधिस्वपियजादौमा विति ।।।।। १५ । वधिस्व प्योर्यबादीनां च सम्प्रसार किति । ईजतु ई । यषिय, श्यष्ठ । वे यष्टा । व मोखमा पप सोमा । और य पाटि वो धातु समको सम्ममारष होने कित (१) प्रत्यय परे होय तब इस से (२) मतुन टोमे पूना की । ' हमने पूमा भी। यभिम श्यष्ठ तूने पूमा परी। (३) र उसने पूजा की। मष्ठा १२८ सेप पौर मे मिहा ने से वष्ठा पायन परेगा । ५०० ॥ ५०६ ॥ पठी कसि । ८।२।४१। पस्य ठस्य च क स्यात्सफारे परे । यत्यति, यक्ष्यते। पृथ्यात्, यचोष्ट। पयाधीस, पयष्ट । वा प्रापरे ।। वाति, याते उषाशाजाहतु । जहुः । उपश्यि । मवार परे रोतो. प् पोर छ यो कारोवे । प्रथम ३२८ से प् पुन १०८ से उसको - (१५१) यश्यति यश्यते वा पन करेगा। रण्यात् ५०८ २०८, पायचीष्ठ पर परे सिमा पूना को । पयाचीत् (४८५ १२८, १०८) वा भयष्ट । . उसने यम पिया। ।पा (प) माना। पाति बात पर से पाता । सिद् सपार में सवार (100 २४ ४३) पा गया था। जातु १०८ वे दो से गये थे। बाये ओमए । उहिम तू से गया था ।। ५०८ ॥ ५८. ॥ भषस्तयोर्धोऽध ।।२।४ । झप परयोस्तयोधः स्पाग्मतु दधातः ॥ (४) 'पा धातु के अवयव से मिग्न बो भए तिस से परे प्रत्यय का पवयम मोत् वाम् तिस पोहोवे पा+1-() मे पद का प्रभाष । २०१ सेरमोद और १८ मे बोए पोर उसे ०५ मे दधा तब ॥ ५८१ ठोठे चोप | ८ | ३ | १३॥ जाह परे हे तप पूषन इसा सोप होता॥ ५८२ ॥ सपियोरोदयवस्य । । । । ११२। ठलीप । सवीठ (१) से चित् होता। (१) इसवी साधन प्रम्निया ऐसो . प्रमय पा+तुम् - (१०८ २०८ ४२२१) तु । (३) पात्मनेपद में (1०८ २०८, पारि चोर ग म मेर। (७) तुषाम् पारण करता पमना ।
५३ लघुकीमुद्याम् । जहे । वोढा । वक्ष्यति । अवानीत् । अवोढाम् । अवाक्षुः । अवानी । अवोढम् । अवोढ। प्रवासम् । यावच्च । अवाक्षस। अगढ। अवक्षाताम् । अवक्षत । अवीढा । अवक्षाधाम् । अवोढ़म् । भवति । अवक्ष्वहि । अवक्षसहि। ॥ इति स्वादयः ॥ सह, सहना । वह (लेजाना)। पुन दो धातुश्री के वर्ग को ओकार होवे लव ट् का लोप ५८१ मे ' हो चुका हो । उवोढ, तू लेगया था । ऊहे, वह लेगया वह् + ता = २७१, ५८०, ७५, ५८१, ५८२, वीटा, वह ले जाएगा। वह + स्यति = (२७१, ५७८,१६३) वक्ष्यति, वह लेजावेगा । अवाक्षीत्, वह लेगया । अवोढाम्, ५८२ वे दो लेगए । अवाक्षु., वे लेगए। अवाली. तू ले लेगया । श्रवोढम्, तुम दो लेगए । अवोढ, तुम लेगए । अवाक्षम्, मैं लेगा। अवाक्ष्व, हम दो लेगए । अवाश्म, हम लेगए। आत्मनेपद के लुड् में (२७१, ५८०, ७५, ५८१, ५८२) अबोट वह लेगया । श्रवक्षा- ताम् (२७१,५७८,) वे दो लेगए । अवक्षत (५५३) वे लेगए । अवोढा , तू लेगया । अवक्षा- थाम्, तुम दो लेगए । अवोढम, तुम लेगए । अवनि, में लेगया । अवक्ष्वहि, हम दो लेगए । अवक्ष्महि, हम लेगए। लघुकौमुदी में भ्वादिगण के धातु समाप्त हुए। ५८२ ॥ ॥ भ्वादि गय समाप्त हुआ। . अथ-अदादयः -com-incor-- +॥ श्रद भक्षये ॥ १॥ ५८३ ॥ अदिप्रभृतिस्य शपः । २ । ४ । ७२ । लुक् स्यात् । अत्ति । अत्तः । अदन्ति । अत्सि । अत्य. । अत्थ । अछि । अहः । प्रमः । प्रव, अद् है श्रादिमें जिन के उन धातुओं का वर्णन किया जाता है । १ । अद् = रहाना । अदु धादि धातुओं से परे जो शप् ४१४ तिस का लुक होवे । श्रद+प् + तिप् (५८३) अद+ति ८७ से टु को त् पुन , “अत्ति" वह खाता अत्त (वेदोखाते हैं)। (१) अदन्ति, वे खाते हैं । अत्सि ८०, तू खाता है। अत्थ , तुम दो खाते हो । अत्य, तुम रद्वाते हो। अभि, में खाता हु। अह., हम दो खाते हैं। अध, हम खाते हैं ।। ५८३ ॥ %D - . - (१) ४१५ ।
५४ ( पदादय। ५८४ ॥ लिटम म्यतरस्याम । २ । 818.। पदो घस्स्यात्। जघास । उपधालोप | घस्य पल्वम । सिट सकार में पद धातु को घस् (धम् ) पादेश विकल्प करणे रोवे । इस से पद-चम् - धम् +ग-(४२ ४२२ ४२ ४८३) बवास-उसने पाया । रिवचन में ५॥ स घर की उपधा केप का चोप होता तब घ को ८० से होता ॥ ५८४॥ ५८५ ॥ गासिवमिघसीमां च ।८।३।६ । पुण्फुभ्यामेषी मम्य प । अचातु । वधु । अघसिथ । बक्षयु । मध। वघास । अघस । मक्षिध । बधिम। भाद । पादतु । भादु ॥ पर प्रत्याहाराम्तगतवर्ष या कबय ( प ग ) से परे मास् (भिचावरची) वम् (सना) वस (खाना) इन तीन धातुओं के स् को पसोपे । बचतु- दो पागए । पघु पात हुए । अपसिब-तूने पाया । बध (तुम दो ने पाया) पच (तुमने पाया) बवास ४२ वक्षस 8८ -मने गाया । बचिव (हम दोने पाया) बधिम (इमने पाया) १८8 के अनुसार दूसरे पच मे पाट (४०) पातु पाद परनमे पूर पत् वामने। ५८६ ॥ त्यत्तिव्ययतीमाम् । ७ । २ । ६५ । पट्या व्येश् एभ्यस्यसो मिल्यमिट् स्यात्। पादिय । पत्ता । पास्यति । पशु । पत्तात् । पत्ताम् । भदन्त पद (पाना) र (चसना) व्ये (पच्चादन करना) म तीन धातुपों से परे श्री मन् उस को नित्यही र (1) होवे। पादिय-सूने पाया। दुर् में पत्ता ८०-पा पायगा । सद् मे पास्यति-पापायगा। सोद में (८. १०,८०) पतु-गा पाय । पत्तात् ।।८ रवर परे वा पाय । पताम् -वे दो पापे भदन्त-वे पायें | ५८० ॥ भत्भ्योहेधि ।। ४ । ११ । पधि। पत्तात् । पत्तम् । पत्त । पदानि । पदाव । पदाम । तु-(रोम बरपा या पाना) पात पौर + भवन्त बातों से परे हो IBBE तिसबो विधये । पहि-तणापे । पत्तात् ४०वा करे कि तू जाये । पातम् (सम को पायो) पत्त (तुम पापो) पदानि मे पास । पदाब (मठो पारे) पदाम (मपा)। ५८. यो होता।मस प्रत्याहारामतगतबरी में कोई पय अन्त में विस ।।
- - लघुकौमुद्याम् । ५८८ ॥ अद. सर्वेषाम्। ७ । ३ । १०० । अदोऽपृक्तताबंधातुक- स्याट् स्यात् । अादत् । आत्ताम् । आदन् । प्राद.। आत्तम् । आत्त । आदम् । आह । आझ । अद्यात् । अद्याताम् । अद्यु. । अद्यात् । अदास्ताम् । अद्यासुः ॥ सब व्याकरण के आचार्यों के मत मे, अढ़ धातु से परे (१) अपृक्त सार्वधातुक होतो उसे अट का आगम होवे । श्रादत् ४७२ = उसने खाया । (२) आत्ताम् = उन दो ने खाया । श्रादन् = उनने खाया । श्राद (४७२, ५८८, १२०, १०८)=तूने खाया। आत्तम् = तुम दो ने खाया। प्रात्त = तुमने खाया। आदम् = मैंने खाया । आह ४४८- हम दोने खाया । आध= हमने खाया । या वि. लिड् से अद्यात् ४५५ वह खावे । अद्याताम् = वे दो खावें । अद्यु. (४५८, ५२१) = वे खावें । अद्यात् ३२१ । ईश्वर करे वह खावे । अद्यास्ताम् = ईश्वर कारे कि वे दो खावें । अद्यासु' = वे खावें ॥ ५८८ ।। ५८८ ॥ लुङ्सनोर्घ स्लू । २ । ४ । ३७ । अद । अङ् । अधसत् प्रात्स्यत् । हन हिंसागल्यो । २ । हन्ति ॥ जब लुड् और सन् ७४६ । परे हो तो अटु धातु को वस्ल (घस्) प्रादेश होवे । च्लि ४६५ को ५३६ से अड् हुआ। तब । अघसत् = वह खाता हुअा। प्रात्स्यत् = यदि वह खाये । २ । हन् (मारना) वा (जाना) हन्ति (५८३, ८२, ८३) = वह मारता है । ५८८ ॥ ५८० ॥ अनुदात्तोपदेशवनतितनोत्यादिनामनुनासिकलोपी भालि कङिति ।६।४।३७। अनुनासिकान्तानासेषां लोप किति डिति। यमिरमिनमिगमिहनिमन्यतयोऽनुदात्तीपदेशा तनुक्षणुक्षिणुक्रगुतृणु- घृणुवनुमनुतनोल्यादय हत । घन्ति । मुसि । हथ , हथ । हन्मि । इन्व । हन्म । जधान । नष्लतु । जघ्नु । (२) अनुदात्तोपदेश जो धात और वन् (मागना) तन् (फैलाना) इत्यादि जो धातु, हैं ये यदि (४)अनुनासिकान्त हों तो इन के अनुनासि क का सोप होता है। जब भलादि वित् वा डित् प्रत्यय परे हो तो। यम् (निवृत्त होना) रम् (क्रीडा करणी) णम् (नमस्कार करणी) गम् (जाना) हन् (चलना, मारना) और (५) सन्य (मानना जानना) ये छः (१) एक अल रूप वाले प्रत्यय को अपूत कहते हैं (१८२ में देखो। (२)४७२, ८७॥ (३) उपदेश में अनुदात्त जो धातु है। (४) अनुनासिक वर्ग है अन्त में जिन के ॥ (५) दिवादि गण का मस् धातु ।।
पदादय। - पातु पनुनासिकान्त पौर-उपदेश में पनुदात्त । ४। तन् (ना) पषु (मारना) चिम् (मारना) लघु (च)-वामा । तर पाना । घम् (चमकना) वन् (मांगना) मन (बानमा) ये पाठ ८ धातु तन् इत्यादि मुनासिमान्त है।तब इन्+तस्-१२८ से रित् पौर ८ से यहाँन् वा सोप वाने पर । रत' सिबा पे दो मारते है। मम्सि (१२९ १५४१ ५८२, ३)-पे मारते हैं। सि ८२ तू मारतारे । पय १८.-तुमदोमारते हो। -तुम मारते हो। पम्मि-में मारताम दो मारते रे। हम्म' -म मारते । जवान (१८४८२ ४८)-हमने माप । मानत १४-इन दो ने मारा। बानु (हमने मारा)||१८ ॥ ५६१ ॥ पभ्यासाच्च । ७।३। ५५ । पन्तस्य कुन्यम्। वघमिय । जघन्य । वष्मयु । मम। बघान। सधन । अग्निव । बनिम । इन्ता । हनिष्यति । पन्त । एतात । ताम् । नग्तु । पम्पास से परेशम् पातु केरमो कार्ग भाये । पचनिष (१९५१ ) जम्म ने मारा। मामयु' (५१४ ) तुम दोन मारा । वन तुमने मारा। धान बा (१) बधन (मने मारा) मप्निाम दाने माप । पटिनम १४ हममें मारा। में पा मारेमा चुर में इमिप्यति ५२॥ चोद में । साताम् (१८२८) एवर करे पा मारे। ताम् ५८ वेदी मारे । एनन्त (११४ १८८२ ८५) वेमारे॥१८॥ ५८२ ॥ तेज ६18 | २६ । हो । जबकि परे हो तप "म् धातु को ", प्रादेग होवे । +fr-a+fr प.18 मे शिवासीप पाया तर ५८३ ५८३ । पमिषदमाभात् ।। ४ । २२ । इत उहमापाद समाप्तेराभीयम्। समानायये तस्मिन् कत्तव्ये सदसिदम् । इति नस्या मिल्वाम्म लुक् । अधि। इतात् । इतम् । एत। नमामि । नाप । प्रमाम । पान् । महताम् । अनन्। परन् । पातम् । पातापानम् । पान्य । पान्मान्यात् ।। (१) () - - - - लघुकीमुद्याम् । इस सूत्र से लेकर ६ छठे अध्याय के ४ चतुर्थ पाद की समाप्ति पर्यन्त जितने सूत्र हैं वे सभी भाभीय सन्जा वाले हैं। जव एक आभीय का कार्य किसी निमित्त को मान कर प्रयोग में हो चुका हो और दूसरे भाभीय का कार्य उसी निमित्त को मान उसी प्रयोग में होने लगे तो प्रथम भाभीय का कार्य प्रसिद्ध हो जावे । (१)इस से ज ५८२ के प्रसिद्ध होने पर हि का लुक नही होता । जहि, तु मार । इतात् ४३८, ५८० ईश्वर कारे तू मारे । इतम्, तुम दो मारो। इत, तुम मारो। इनानि, मैं मारू । हनाव, हम दो मारें। इनास, इम मारें। लड् में, अइन् (४५२, १८३) उसने मारा। महताम् ५८० उन दो ने मारा। घघ्नन् = उन ने मारा । अइन् - तूने मारा । अहतम् = तुम दो ने मारा । महत ५८० तुम ने मारा। महनस् ( मैं ने सारा) महन्व- हम दोने मारा पहन्म । हमने मारा । दन्यात् ४५५ = वह मारे । ५६४ ॥ आर्धधातुके । २ । ४ । ३५ । इत्यधिहात्य ॥ सभव के होने पर (२)जिनकार्यों का आर्धधातुक निमित्त हो वहा इस का अधिकार है। ५६५ ॥ हनो वध लिङि । २ । ४ । ४२ ॥ (३) पार्धधातुक लिड् परे हो तो इन् धातु को वध आदेश होवे ॥५९५ ॥ ५६६ || लुङि च । २ । ४ । ४३ । वध्यात् । वध्यास्ताम् । भवधीत् । अहनिष्यत् । यु मिश्रणामिश्रणयो.। ३ ॥ और जब लुङ् लकार परे हो तब भी इन् को वध ५८५ धादेश होवे । अध्यात् । (३३२) = ईश्वर करे कि वह सारे। वध्यास्ताम् = ईश्वर करे कि वे दो मारें। अवधीत् (४७३, ४७४) उसने मारा। प्रहनिष्यत् “५२६" नो वह मारे । ३ यु (मिलाना या अलग करणा)॥ ५८६ ॥ ५८७ ॥ उती धिटुंकि हत्ति । ७ । ३ । ८८ । लुग्विषये उती वृद्धि. पिति हलादी साबधातुके नत्वस्यस्तस्य।योति । यत । युवन्ति । यौजि । युथ । युथ। यौमि । युवा युम । युयाव । यविता। यविष्यति। यौतु । युतात् । अयोत् । अयुताम् । अयुवन्। युयात्। इहद्दिन । “भाष्ये" (१) नहि, ऐसे स्थित होने पर, हि, का तोहे से लोप नहीं होता क्योंकि ज ५८३ से प्रसिद्ध है । जैसे कि ५८२ सूत्र ६ । ४ । ३६ । प्रकृति प्रत्यय को निमित्तमान जिस प्रयोग में हुआ है उसी प्रयोग में वही निमित्तमान ४४२सूत्र ६ । ४ । १०५ से हि का लुक पाया तो (ज) ५८३ से प्रसिद्ध होगया तब अकारान्त के अभाव से हि का ४४२ से नही होता । (२) घा सूत्रों का । (३) आशिष् में लिड् ।। तुक -- 1 ।
६ पादय'। - - १८० से पिपच हिन्न टिश्च पिम्मेति व्याख्यानासायुयाताम । युयु । ययात् । यूयास्ताम् । ययासु । पयापीत । पयविष्यत् । या प्रापये। ४। याति । यात । यान्ति । ययो। याता । यास्यति। यातु । पयात । प्रयाताम् ।। पुष्प वे विषय में ()(जम है) पादि में बिस यो ऐसे पित् (प्रीत विसया) सार्व पातुब के परे रहते प्रकार को दिलो परन्त पम्यस्त संचयको नहाये।यु+गपु+ति (१८५ १८०) योति वा मिखातारयुत वेदो मिसाते युपन्ति २१४ से सपर ये मिपाते रायोपिति मिशाता) युथ तुमदोमिवाते हो युग तुम मिलाते हो।योमि में मिलाताई। युप' जमदो मिखाते हैं। युम हम मिचाते हैं। युवाप (१५)वा मिशाता उपा" (पा)। यपित (४२० ४१५२५) पामिवावेगा(ऐसेडी) यविष्यति वा मिसापेमा। यौतु (1८11८)वा मिसापे। युतात् पर करे बिवा मिपाये । प्रयोत् (१५ । ८१ । ०५२)-एने मिखाया। पयुताम् -उन दो ने मिलाया (२)पधुवन् -हमने मिलाया । २१४ । विधि सिरम "युयात्' (8५५ ५8 B५५, ४३२)-पर मिथाये। यहां युयात् में पिनहीं होती क्योंकि महाभाष्य में पतम्बसि बी ने 'पिच निरिच पिन्न" (पित् मोरेमो रित नहीं होता और रित् जो सो पित् नहीं होता) या पाठारे तो इस महर्षि के पचन से यासुट वो ४५४ मूत्र में रित्यारे पुनापित् नी सकता पौर पित् प निमित्त को मरोने से १८० सूत्र की प्राप्ति की मनी रे पति किस से हो। रयाताम् ४४ ४५५ (पे दो मिबाब) युयु' (8५८ १२१)- मिसावे। यूयात् ५५ दीर्घ पीर ११ स्या सोप)-रमा करे कि परमिबापे । यूयास्ताम् -रपर, परे वि दोमिलाये।यूयासुरवर बरे विवे मिनाय परम प्रवामीत् (१५१ २५) उसमे मिलाया। पापयविष्यत् (४२०,४१४ २५) यदि पामिनामा (नामा)पाति५५ वा वातारे यात वेदो बाते।यान्तिपे गाते रे।ययौ। (०२ १२१, ११०)पामया। याता (बाबायेगा) यास्पति पानावेगा। पातु (बाबाये भयात्वा नवा । प्रवाताम्-पे दी मये ॥ १०॥ He ॥ र शाक्टायमस्वैष । । । ४ । १११॥ पादम्तारण सोमोर्तुम् वा ! पयुः । पयान्। यायात् । यायाताम् । यायु । यायात् । यायास्ताम् । यायासु । भयासीत् । पयास्यत् ।। एवं 'बा" मतिगमनयो । । मा दीपोराम मोपे।। चा पाये ।। छा भुरमायां गतो। ८ । प्सा मधये ।१ । रा हाने ।११। पापादाने । १२ पाप सबने।।। रया प्रबपने ।।।पर्य सावधातुम पप प्रयासम्म विधाने।। (१)अन् प्रत्यारान्तमत प्योर एक पपरे (९॥ - -- ५८ लघुवोमुद्याम् । केवल गाकटायन आचार्य के मत में आवारान्त धातु से परे जो लङ् के स्थान मे झि, उस को विकल्प करको जुस् होवे । अया+झि= प्रया+जुम् १४२ से = अया+ उम् ५२१ से = अयुस् १२०, १०८= अयुः = वा अयान् (४१५, ४४२, २३) =वे गये। वि० लिङ् से यायात् ४५५, ४५२) = वह जावे । यायाताम् = वे दो जावे। यायुः (५२१) वे जावें यायात् ३३२ ईश्वर करे कि वह जावे । यायास्ताम् = ईश्वर करे कि वे दो जायें । यायासुः = ईश्वर करे कि वे जावे । अयासीत् (५२४, ४७३, ४७४) = वह गया । त्रयास्यत् (जो वह नावे) इस "या" धातु की साधन प्रक्रिया के तुल्य इन. आगे पाने वाले श्राकारान्त धातुओं की भी साधन प्रकिया नाननी, वे धातु ये हैं यथा- ५ वा (जाना वा सूचन) ६ भा (चमकना) - ७ ष्णा (पवित्र होना =नहाना) ८ वा पकाना) ८ द्रा (बुरोगति) १०८सा (खाना) ११ रा (देना) १२ ला (लेना) १३दा (काटना) १४ ख्या कथन, वा, वर्णन करणा। ख्या धातु का केवल सार्बधातुक में ही प्रयोग होता । १५ । विद (विद), जानना ॥ ५८८ ॥ ५६६ ॥ विदोलटोवा । ३ । ४।८३ । वेत्तेलट. परस्मैपदानां णलादयो वा । वेद । विदतुः । विदु । वेत्थ । विदथु । विद । वेद । विछ । विह्म । पचे । वेत्ति । वित्त । विदन्ति | विद् धातु से परे जो परस्मैपद के तिवादिक ४०१ उनको गालादिका ४१८ प्रत्यय विकल्प करके होते हैं । विद + तिप् = विद्+णल्(४७८, ८७) वेद, वह जानता है ॥५८८।। ॥ प्रथम पुरुष ॥ ।। मध्यम पुरुष ॥ ॥ उत्तम पुरुष ॥ (एकव० वेद, वह जानता है। | वेत्थ तू नानता है । वेट, मै जानताहु । वर दिवविदतु. वे दो जानते हैं विदधु , तुम दो जागते हो । विद्द हम दो जानते हैं। (बहुव० विदु, वे जानते हैं | विद तुम जानते हो विझ इस जाते हैं। ॥ दूसरे पक्ष में ॥ (वेत्ति ४७८, ८७)। वित्त , ४६१ । विदन्ति ४१५ ।) ६ ० ० ॥ उपविदजागृभ्योऽन्यतरस्याम् । ३ । १ । ३८ । एभ्यो लिट्याम् वा । विदेरदन्तत्वप्रतिज्ञानादामि न गुगा । बिदाञ्चकार । विवेद । वेदिता । वेदिष्यति ॥ उष ( जलाना) विद ( जानना) नाग (जागना) इन तीन धातुओं से आम् प्रत्यय हो वे लिट् परे हो तव । इस सूत्र में विद की अकारान्त प्रतिज्ञा करणे में धुन के अर्थ पहिलो के सदृश हैं। ।
पदादया। २,४२ ॥ (विद वो पधारान्त पठने से ) से गुर (१) नहीं होता। विदाम्पचार (... ४र और १८५) पा विवेद ४८, उसने नाना । सुर में वेदिता (४२००४) पोर सद में पेदिष्यति (पाजाम सेमा) ut २.१ ॥ पिदार्षनिवत्यन्यसरस्याम् । ३ । १ १ ४१ । वेते छैटभाम् गुणाभावो छोटो लुष लोडस्तफरौल्यभुप्रयोगश्च निपात्यो । पुरुपवचने म विधि । विदारोतु ॥ विद पातु से सोट में भाम् विकरप करणे सोवे गुम ४८ का प्रभाव पर्वात् । उपपा को गुपनोवे पौर सीट का नुम् को पापे पोर चोट मिस के पन्त में ऐसे परोति (छ) पर्षात् परोतु पादियों का उस के अनम्तर प्रयोग गोवे (या सम वार्य निपात से होते ३)। पुरुष पोर बचन पी यहां (२) विवधा नहीं है। विदारोतु पा जाने॥१॥ ६.२ ॥ तनादिकम्य उ ।। १ २८ । पोऽपवाद । तन् (विस्तार करपा) पारिपातु ०१५, पो से पौर ५ पातु मे परे प्रत्भव होवे । मह सूप गप्पा पपवाद ॥२॥ ६३ ॥ प्रतसत् सार्वधातुो । ६ । ४ । ११. । प्रत्ययाम्सस्य वोऽत उत् सावधातुके छिति । विदारुतात् । विदारुताम् । विदाऽवस्तु। विदाएस। विदारवादि । भवेत्। पवित्ताम् । पविदु । () प्रत्यय । २१ पन्त मे बिस के पेस मम् (क)धातु पेपार पोसवार होंगे। मिदार+तात्-विदाहुपतात् । पर करे वि वा माने। विदापुस्ताम् वेदो पाने। बिदागन्तु (११) खाने । विदा (१।२४५२)तू बाम । (१) मामिपमा में घुमी गुष पिसेको। (२) सवा या भागय । वि (विशान्त ) प्रमति प्रयोग बहुत स्थानों में गेर पाते हैं परन्तु इनके पापने के लिये बिना इस सूष । १ पौर को पापिनि बी ने युधि नहीं मिली पीर यह भी सिपी बिप दिया और पद में (पेत्त) पारिव पानिय भी पिया. पौर विवाररोट पिदारतात् विताएषताम् विदादुर रत्यारि पी पापनार्य या पूर्व पी युधिरे। तो या सिएषा वि में प्रो मनम पुरुष पौर नियम भारपमही पविषयात सोने से पर्धान् पोर पुराणों में पोर पोर वचनों में भी पापभी मिपात में पाते। ॥ यहो लघुकौमुद्याम्। विदारवाणि (४४२, ४४४, ४१४ ) मै जान । भवेत् (४५२,४७८, १८३) उराने जाना। पवित्ताम्, उन दोने नाना । अविद : ( ४७५ ) उन ने नाना ।। ६०३ ॥ ६०४॥ दश्च । ८।२ । ७५ । धातोर्दस्यपदान्तस्य सिपि का । भवेः । अवेत् । विद्यात् । विद्यास्ताम् । अवेदीत् । अवेदिव्यत् । अस भुवि । १६ । अस्ति ॥ धातु के “पद के अन्त में होने वाले" (पदान्त) द को विकल्प करले रु होवे यदि सिए परे हो तव । अवेः १०८ वा अवेत् (तूने जाना) प्रा. लिड् में विद्यात्, ईश्वर करे कि वह जाने । विद्यास्ताम् ईश्वर करे कि वे दो जानें । लुङ् में अवेदीत् ४२७, ४७३, ४७४ और ४७८ से गुण करणा उसने जाना । लुङ् में अवेदिष्यत्, यदि वह जाने । १६ अस (अस्) होना । अस्ति, वह है ॥६०४ ।। ६०५ ॥ श्नसोरल्लोप । ६ । ४ । १११ । श्नस्यास्तेश्चातो लोपः सार्वधातुके डिति। स्तः । सन्ति । असि । स्थ । स्थ । अस्मि । स्वः । स्म.॥ एनम् ७०८ प्रत्यय के और अस् धातु के 'म' का लोप होवे जब कित् वा जित् सार्वधातुक परे हो तब । (स्तः) में ५२८ सें तस् डित् हुश्रा और ६०५ सें अलोप हुभा स्त', वे दो हैं । सन्ति (वे हैं) असि ४३२ (तू है) स्थः (तुम दो हो स्थ (तुम हो) अस्मि मैं हु) स्व. (हम दो हैं) स्मः (हस हैं) ॥ ६०५ ॥ ६०६ ॥ उपसर्गप्रादासस्तियंच्परः । ८।३ । ८७। उपसर्गेणाः प्रादुसश्चास्तेः सस्य षो यकारेऽचि च परे । निष्यात् । प्रनिषन्ति । प्रादु षन्ति । यच्पर. किम् । अभिस्तः॥ (उपसर्गस्थ इण्) (१) के आगे वा प्रादुस् अव्यय के धागे जो अम् धातु उसके स् को ए होवे जब य् (वा) अच् परे रहे तब । निष्यात्, यहो उपसर्गस्थ इण् के आगे ष् हुआ । निण्यात्, वह निकल जावे । प्रनिषन्ति, वे बाहिर जाते हैं। यहाभी उपसर्गस्थ इण् यो भागे ष् हुआ प्रादु षन्ति, के आगे प हुश्रा है। ( । (वे प्रकट होते हैं) यहां (इस सूत्र में) "य् वा अच् परे हो" यह क्यों कहा । इस प्रश्न का समाधान यह है। कि (यच् पर) न करते तो (अभिस्तः) में भी 'अभि' उपसर्गस्य इण् के आगे स् कोप हो (२) उपसर्ग में स्थित जो पूण् प्रत्याहारान्तर्गत वर्षों में से कोई एक वर्ण । है यहा प्रादुस् प्रदादय 1 n (पिद को पसारान्त पडने से ) 800 से गुष (१) नहीं होता । विदाम्पबार (1AR ११,४२ ४२ पोर १५) वा विपेट ४०५, उसने चाना । बुद् में वेदिता (१२०,82) और बट में वेदिप्यति (वा वान सेगा)॥ ६.१ ॥ विदार्यनित्यत्यभ्यतरस्याम् । ३ । १ । ४१ । वेत्ते ोटमाम् गुणाभाषो खोटोमुक् लोडन्तरोत्यमुप्रयोगरथ निपास्यते । पुरुपवचने म विषधिते । विदारोतु ॥ पिद पातु से चोट में पाम् विकल्प करके सोवे मुष ४८ का पभाव पर्वात् । सपा पो गुपन सोपे पोर सोट् पा सुपो पापे पोर पोट विस के पन्त में ऐसे परोति (स) पर्यात् परोतु पादियों का सस वे प्रनम्तर प्रयोग, वे (या सम पार्य निपात से होते ३)। पुष्प पीर बपन वो यहाँ (२) विवधा नहीं है। विदाहरोतु पा भाने॥१॥ (२॥ तनादिकृभ्य | | शपोऽपवाद । तन् (विस्तार बरपा) पाटि धातु १५ पो से पौर कपातु से परे र प्रत्यय पे। यह सूप मप् ४१५ का अपवाद ॥ २॥ ६३ ॥ पतसत् सार्वधातुय । । । ४ 1 ११ | प्रत्ययाम्सस्य छात्रोऽत उत सावधातुके क्छिति । विदारुतात् । विदाहुमताम् । विदाऽवम्सु। विदाएका विदारयाणि । भवेत् । पषिताम् । पषिदु: (6) प्रत्मय । २२ पम्त मे घिम ने ऐस बाप (क)मात पोपकार सोमवार हो। पिदार+तात्-विदाहगतात् । पर करे कि पा बाने। विवाहुपताम् पेटी माने । गिदादुर्वन्तु (१२) पाने । विदाग (११ । २... २) मान । (१) पोंकि उपपा में मीनही गुन पिसे हो। (२) रस या या पागयी वि(विसामन्त) प्रमति प्रयोग बहुत स्पाना में ठोप पम्तेरे परन्तु न पो मापने के लिये बिना रस मगर । मे पोर कार पाणिनि वो मे युधि नही तिषी और यहां भी मि पनि दिया पीर पच में (वेत) पादिवाभिम भी बियाचौर विटारोट विदाहुस्तात् पिदारताम् मिसाएर स्यादि का ये पापनाम या पूर्व से युतितो या मिाापा बिब में बो प्रमम पुरुष पौर यापन या कोई नियम पारख नहीं रेपपिपपत ने स पर्पात् पोर पुरुषों में और पौर सपनों में मो या पभी मिप्यत में वायोतेर।
. लघुकीमुद्याम् । ६११ ॥ दीर्घण किति। ७।४ । ६६ । इणोऽभ्यासस्य दीर्घः किति लिटि । ईयतु । इयुः । ययिथ । इयेथ । एता । एष्यति । एतु । ऐत् । ऐताम् । आयन् । इयात् । ईयात् ॥ कित् ४८० लिट् परे होतो इण् धातु के अभ्यास को दीर्घ होवे । ईयतुः, वे दो गए, ईयुः = वे गए । इययिथ (५११) वा येथ (५०८, ४१४, ६१०)तू = गया। एता (वह जावेगा) एष्यति (४१४) = वह जाएगा। एतु (४३७ वह जावे) (१) ऐत्, वहगया । (ऐताम् वे दो गए) श्रायन् (२६) वेगए । वि. लि. इयात्,वह जावे । आ० लिङ् मेंईयात् (५१२) ईश्वर करे कि वह जावे ।। ६११ ।। ६१२॥ एतेर्लिङि । ७। ४ । २४ । उपसर्गात्परस्य इणोऽणोजस्व आर्धधातके किति लिङि । निरियात् । उभयत आश्रय नान्तादिवत् अभीयात् । अण. किम् । समेयात् ॥ उपसर्ग से परे इण् धातु का नो अण् उसको ह्रस्व होवे, धातुक सजावाला कित् ४६० लिङ् (२)परे हो तो। निर्+ ईयात् =निरियात्, ईश्वर करे कि वह निकल जावे । किसी कार्य के लिये जब प्रयोगमें पूर्वभाग, और परभाग, का आश्रयण एक में किया जावे वहा (३) ( अन्तादिवच्च ) नही लगता है। इसी कारण से "अभीयात्' में इस्व नहीं होता क्योंकि अभि+ईयात् यहां जब ५२ से दीर्घ एका देश किया तब अभीयात् के ईकार को पूर्व और पर का अवयव एक समय ही नहीं मान सकते, तो ६१२ की प्राप्ति भी नहीं हो सकती ६१३ ॥ इणो गा लुङि । २ । ४ । ४५ । गतिस्थेति सिचोलुक् । भगात् । ऐष्यत् । शीङ स्वप्ने । १८ ॥ लुङ् लकार में इण् धातु को गा आदेश होता है । ४६७, से सिच्४६६, का लुक् होता है । अगात्, वह गया । लुङ् में ऐष्यत् ( ४७२, २१२) यदि वह जावे । १८ । भीड् (सोना) सोजाना ।। ६१३॥ इस सूत्र की हत्ती मेंअण् क्योकहा ? ऐसा कोई प्रश्न करे तो उस को उत्तर देता है, (समेयात्) अण् ग्रहण न करें तो सम् + पा+ईयात् यहा प्रथम गुण करने पर सम् + एयात् = ऐमे रूप में इस्व हो जावेगा तो समेयात् नहीं बनेगा । परन्तु भण् ग्रहण करने से समेयात्, में अस्व नही होता ।। ६१२ ।। परन्तु जब प्राध - (१) इण् का, लङ के प्रथम पुरुष एक वचन में (४०२, २१२) ऐत् । (२) आशिष् में जो लिङ् है । (३) एकादश पूर्व के अन्त के सदृश और पर के भादि के महश होता है ।।
पदाच्य। सवार पस्तु पापे । । - वावेगा। यही दोष पठेमा परन्तु (पन् पर) पाने से तो यहा "मिस्त " पागे न तो 'य् हैन भन्ने सीरिये प नहीं होता। पमिरत पे दो सम मबार पर। ६ ॥ अस्तेभ् । २ । ४ । ५२ । पार्धधातुके । बभूष । मषिता । भविष्यति। प्रस्तु । स्तात् । स्ताम् । सन्तु। भाषपातुष्प परे हो तो पस् पो भू पादेय हो जावे । (१) बभूव का मा। मविता पा होगा। सोट में भविष्यति पामा । स्तात् ४१८ परोये। स्ताम् वे दो हो । सम्तु (के होवे ) ॥1॥ ६.८ ॥ वसोरेपावभ्यासजोपरच ।। ४ । १८ । घोरस्तेरपेत्व म्यात् ही पभ्यासबोपश्च । एधि । स्तात् । स्तं । सत । पसामि । पसाव । पसाम । पासीत् । पास्ताम् । पासम् । स्यात् । स्याताम । स्यु । भयात् । पभूत् । प्रभविष्यत् । दूण गती। १७ । एति । एत । " (४४१) परे होते' धु सभव पातुपों को और पम् पातु मो एबार सोचे पौर अभ्याम का चोप रोपे । १८० में हिमो पिपा पधि तू । स्तात् (154) परपर पर कि तू हो । स्त तुम दो चोवो । स्त ८, तुम होपो । प्रसागि मेषु । पसाव (सम दो जोवे ) असाम (म)।पर में पासीत् (१०२ ०१) वाया। भारताम् (चे पो) पामन् (वे घे)। पि पिर में स्यात् (माये । स्याताम् । दो रो स्पु (ये होवे )। पा लिा मे (40) मूयात् पर परे पावे । बुर में (40) से भू पादेम । प्रभूत् पाएमा मा । पृष् म पमविष्यत् यदिया गये । १०।ए (पसमा बामा) पति (४१४) पापातातदोवाते ॥८॥ (८॥ पूणो यण् । ६ । ४।८। पवादी प्रत्यये परे । यन्ति । मिस प्ले पादि में पच् (सर)को पेसा प्रत्यय परेको तोरको यो । यन्ति बाते॥ ११ ॥ पभ्यासस्यासवर्षे ।। ४।७८ । बुटवणयोरियावजी स्तोऽसवर्षेऽचि ।। याय ॥ पम्पास से पच पीर उपप बो नम पे पर पौर पर होते हैं। (२)पक्ष पर पच् परे ोती। याय (१ २५)पा गया nAR (१) रस पी मिरिममम विष पाए रे मू भातु परी। (२) मा समान पर पाता (विषमपी)।
। लघुकीमुद्याम् । ६११ ॥ दीर्घणः किति। ७ । ४ । ६६ । इणोऽभ्यासस्य दीर्घः किति लिटि । ईयतु । युः । इययिथ । इयेथ । एता । एष्यति । एतु । ऐत् । ऐताम् । आयन् । इयात् । ईयात् ॥ क्त् ि४८० लिट् परे होतो इण् धातु के अभ्यास को दीर्व होवे । ईयतु', वे दो गए, ईयु' =वे गए । इययिष (५११) वा इवेध (५०८, ४१४, ६१०)तू = गया। एता (वह जावेगा) एष्यति (४१४) वह जाएगा। पतु (४३७ वह जावे) (१) ऐत्, वहगया । (ऐताम् वे दो गए) प्रायन् (२६) वेगए । वि. लि. इयात्,वह जावे । श्रा० लिड में ईयात् (५१२) ईश्वर करे कि वह जावे ।।६११॥ ६१२॥ एतेर्लिडि । ७।४ । २४ । उपसर्गात्परस्य इणोऽणीस्व प्रार्धधातुके किति लिङि । निरियात् । उभयत आश्रयणे नान्तादिवत् अभीयात् । अणः किम् । समेयात् ॥ उपसर्ग से परे इण् धातु का जो अण् उसको इस्व होवे, परन्तु जब प्रार्ध धातुक सजावाला दित् ४६० लिङ् (२)पने हो तो। निर्+ईयात् = निरियात्, ईश्वर को कि वह निकल जावे । किसी कार्य के लिये जब प्रयोगमें पूर्वभाग, और परभाग, का आश्रयण एक में किया जावे वहा (३) (अन्तादिवच्च) नही लगता है। इसी कारण से "अभीयात्' में इत्व नहीं होता क्योकि अभि+ईयात् यहा जब ५२ से दीर्घ एका देश किया तब अभीयात् के ईकार को पूर्व और पर का अवयव एक समय ही नहीं मान सकते, तो ६१२ की प्राप्ति भी नही हो सकती ६१३ ॥ इणो गा लुङि । २ । ४ । ४५ । गतिस्थेति सिचोलुक् । अगात् । ऐष्यत् । शीङ स्वप्ने । १८ ॥ लुङ् लकार में इण् धातु को गा आदेश होता है। ४६७, से सिच्४६६, का लुक् होता है। अगात्, वह गया । लुङ् मे ऐप्यत् ( ४७२, २१२) यदि वह नावे । १८ । शीड् (सोना) सोनाना।। ६१३ ।। इस सूत्र की हत्ती मेंअण् क्योंकहा ? ऐसा कोई प्रश्न करे तो उस को उत्तर देता है, (समेयात्) अण् ग्रहण न करें तो सम् +आ+ईयात् यहा प्रथम गुण करने पर सम् + एयात् = ऐमे रूप में इस्व हो जावेगा तो समेयात् नही बनेगा। परन्तु अण् ग्रहण करने से समेयात्, में इस्व नहीं होता ।। ६१२ ॥ (१) पूण् का, लङ के प्रथम पुरुष एक वचन में (४०२, २१२) ऐत् । (२) आशिष् में नो लिङ् है । (३) एकादश पूर्व के अन्त के सदृश और पर के भादि के सदृश होता है ।।
। ६१४ ॥ मौर सार्वधातुके गुण 1018। २१ । ते ययाते । मीरधातुकोगए होवे पर साधातुब प्रत्यय परे हे तप । येते (१०) पापोता । मयाते (५०-२५) वे दो सोते रे ॥१॥ ६१५ ॥ घोटी रुट ।७।१।६ । गोडगे झादेशस्यातोरुट्। गेरते । घेणे । पयाचे शेने गये । षो। शेमहे। शिश्ये। शिश्याते। शिपियरे। ययिता। शयिष्यते। शेताम्। गयाताम्। शेरताम् । पशेत । प्रथयाताम्। पोरत । शयीत । गयीयाताम् । भयोरन्। ययिषीष्ट । पथयिष्ट । पयिष्यत । पर पध्ययने १८ इस्किावध्युपसर्गतो न व्यभिधरत । पषीयते । पछीयाते। पधीयते ॥ मोर धातु से परे म् वे स्थान मे पादेय बी पत् (५५) उस को पद (२) हा पागम रोये । येरते (५५ १५०) वे सोते हैं। मेषे (तू सोता रे ) २४ गया तुम दो सोते हो ( गये ६१४-२५-में सोता । म्ये मेपर-४-२०मदोमातेर तुम दो मातेची गेमो म सोने सिट में गिरये (४२ १२) पा सोया था। गिरयाते वे दो पीये घेसिरियरे में सोये ११२ । मुद मे गयिता (१० ४१४ २५) मर में शयिष्यते पा सोधेगा। चोर मे येताम् ११४ ॥४॥ पा मोरे । गयानाम बदी सोवे । गेरताम् (१५ ५ ५) वे सदि। र में प्रगेत १० वा सोया। पमयाताम् (२५) पे पा सोये । पमेरत ( 1 ) माय । वि मि मे 'गयोत' (१४८, १०, २५) मा सोधे। मयीयाताम् वे दोमाय । गयीरम् () पे मोवे । पा सिर में मयिपीट (४.०) पर करे विभो । म पगपिट (HU AUR०२) या मोगया । पद मे प्रपयिष्य (१४.२० २५ ) यदि पा साझापे । १८ । ए (३) पम्पयन (पठन) पप में रिपोर ष (स्मरप) ये दो भातु पषि उपसग पे भिम्म नरीही समते (इनपा प्रयाग 'प४ि महिती पाता)। सर मे पyि+r+त (५१)पपीते (पा पम्पयन करता )(पटना)। पपीयाते (130) पापयन बरते। पधीयते (२७) पाययन करते । .
- - करेगा । ल्टट् लघुकौमुद्याम् । ६१६ ॥ गाङ् लिटि । २।8। ४६ । इङ. । अधिजगे । अध्येता। अध्यष्यते । अधौताम्। अधौयाताम् । अधीयताम । अधीष्व । अधीया- थाम् । अधीध्वम् । अध्ययै । अध्ययावहै । अध्ययामहै । अध्यैत । अध्य- याताम् । अध्ययत । अध्येथाः । अध्यैयाथाम् । अध्यध्वम् । अध्यै यि । अध्यैवहि। अध्यै महि। अधीयीत अधीयौयाताम्। अधीयोरन्। अध्येषीष्टा लिट् परे हो तो इड् को गाङ् आदेश होवे । (१) अधिजगे (५४२, ५१८) उसने अध्ययन किया था । लुट से अध्येता ( ४१४ में गण और "१८" से यण् ) = वह अध्ययन में अध्येष्यते (४१४ गुण और “१८" से यण्) = वह अध्ययन करेगा । लोट में अधीताम् (५४६) वह अध्ययन करे । ॥ प्रथम पुरुष ॥ ॥ मध्यम पुरुष॥ एकब० अधीताम्, ५४६ वह अध्ययन करे अधीष्व, (५३८, ५८७) तू पढे र वि. अधीयाताम्,५४६,२१४,२६वेदो अधीयाथाम्, तुम दो अध्य. बहु०.अधीयताम्, ५५३,२१४, २६ वे अधीध्वम्, ५४७ तुम मध्यय० ॥ उत्तम पुरुष ॥ (२) अध्ययै, में अध्ययन करू अध्ययावहै, हमदो अध्ययन करें अध्ययामहै, हम अध्ययन करे का लड् में अध्येत = (४७२, २१२, १८) उसने अध्ययन किया प्रथम पुरुषर अध्ययाताम् (४७२,२१२,१८) उन दोनें अध्ययन किया अध्ययत,५५३ (४७२,२१२,१८) उनने अध्ययन किया अध्यथा (४७२, २१२, १८) तूने अध्ययन किया मध्यम पुरुष अध्ययाथाम् = (४७२,२१२,१८) तुमदोने अध्ययन किया अध्यध्वम् = (४७२, २१२, १८) तुम ने अध्ययन किया (अध्ययि = (२७२, २१२, १८) मैंने अध्ययन किया उत्तम पुरुष अध्यवहि = (२०२, २१२, १८) हम दोने अध्ययन किया अध्येमहि = (२७२, २१२, १८) हमने अध्ययन किया विधि लिड में (अधीयीत ५४८, ४५५, ४५७, २१४, ५२) वह अध्ययन करे, (१) यहा गाङ् (गा) को ४२० से हित्त्व, और ४२३ से अभ्यास को इत्व, और ४८२ से उसको ल, ये भी कार्य करलेने । (२) ५३७, ५४८, ४१४, २६, १८ ॥ लोट में पदादय' ॥ दुग्धे पषीयीयाताम् -वेदो अध्ययन करें। पधीयोरम् (५ ) पम्ययन करें । पापिए सिर में पम्येपोन-(11८९ ४३०) ईश्वर बरे शिवा पम्पयन करे । ११०॥ विमाषा मुलगे । २।४ । ५. । इटी गार तुर और सर परे होतोरपातु वोगार (११६) पादेम विद्याप करप्ले होवे ॥१०॥ ६१८ । गाडुटादिभ्योऽपिरित् ।१।२१ । गाडादेशात्कु टादिभ्यरचाम्वितः प्रत्यया स्ति स्यु । गार १५ १० पादेश से पार "कुटादियों से परे जो प्रत्यय वित् पा चित् नहीडित् होवें ॥ ११८ ॥ घुमास्थागापावशतिसां पणि । ६ । ४।६६ । एपामात पत् स्वाइखादी हिन्यार्धधातुके। पभ्यगौष्टा पध्ये ष्ट। अध्यगौष्यत। पध्येष्यत । दुइ प्रपरणे । २ । दीग्धि । दुग्ध । दुान्ति। घोधि । 1 दुहाते । दुाते । धुचे । दुपाये । धुरध्वे । दुहे । दुाो। दुई। दुदो । दुदुो । दोग्धा । धोक्ष्यति । घोश्यते। दोग्धु । दुग्धात् । दुग्धाम् । दुहन्तु। दुग्धि । दुग्धात्। दुग्धम् । दुग्ध । दोशनि । दुग्धाम् । दुखाताम् । दुस्ताम् । धुर। दुशयाम् । धुरध्वम् । दी। दोषावर। दीशामथे। अधीक । पदुग्धाम्। पान् । भदोषम् । पदुग्ध । पहाताम् । भात । अधुग्ध्वम् । दुधात्। दुशीत ॥ घु (१४) संधा पार पातुओं के पोर मा (मापना) स्था (प्ठा) (मोना) गा (पायपन भरपा) पा (पोना) बाति (1) शेषना । यो (नाम करना) पुन धातुपों के पावार को चार होणे नव पत्रे पादि में बिस ने ऐसा बित् मा रित् पापातुन परे हो तो । बरपुर में ११० ते मा पपा तो (पम्पगोष्य) दूसरे पक्ष में पम्येप्ट (४०२, २११ १८)मा भम्पयन करता एपा। यू में पप्यगोप्यत (Aror १८)मा पम्पयत ( १०१ २११. १८) यदि या अभ्ययन बरे।५ । दुरु (पुराना) (दुर+गप् + तिप्) (०५ २०२१८ २२) रोधि पर दुराता है। दुम (१) () दो दुरते रे। दुरित, ये दुरते हैं। पीधि 1 से (गुब) २०२ (२० (क)बो शे+भि-पुन ५५ ८० बोधि (तूपुरता)। (९) दुग्धे १५० (Outबा (नम् ) में मिति ने गुष निपेच की रिपोर सभी पार्य पान पीते(२) परमने पद के रूपों के पथ परस्मैपरे समान मानने - से गुग्य -- लोट प्र० । %3D मध्यम पु० - तुम दी दोहो । लधुकीमुद्याम् । (टि को एकार और गुणा भाव ) अन्यत् पूर्ववत् । दुहाते ५३७ । दुहते ५५३ से झ को प्रत् धुक्षे ( २७२, २७३, १६३, ८७) । दुहाथे, तुम दो दुहते हो। धुग्ध्वे (२७२, २७३, २२) तुम दुहते हो । दहे ( मैं दोहता हूं) । दुरहे हम दो दुहते हैं । दुह्महे, हम दुहते हैं। ॥ परस्मैपद ॥ ॥ प्रात्मने पद में॥ लिट्-दुदोह (४२०,४२३) ४७८ (उसने दहा) ददुहे ( ४२०, ४२३, ५४२) लुट-दोग्धा, (२७२, ५८०, २२) वह दोहेगा दोग्धा, (४२०, ४२३, ५४२) यह दोहेगा। लट्-धोक्ष्यति, (४७८,२७२,२७३,१६३, ८७)| धोक्ष्यते, वह दो हेगा। १-दोग्धु (१)दाधात् ) (४७८, २७२, ५८०, २२) २-दग्धाम् ( २७२, ५८०, २२ ) =वे दो दुहें ३–दुहन्तु (४१५, ४३७) वे दुहे। दुग्धि, दग्धात् ( २७२, ५८७ । ४३८) तू दुहले ईश्वर करे तूदी हे। दग्धम् (२७२, ५८०, २२ ) -तुम दोहो । दोहानि में दोहूं । दुग्ध २७२, ५८०, २२) पात्मने पद में लोट् के रूप नीचे देखो.- । प्रथम पुरुष॥ ॥ मध्यम पुरुष || उत्तम पुरुष॥ (दग्धाम् (५४६, २७२, ५८०, वह दुहे) धुक्ष्व २०३,८७,६३ तू दुह। दोहे ५४६ मैंदोई। दुहाताम् (वे दो दोहें) ५४६ । दुहाथाम् ५४६, तुम दो दोहो | दोहावहै हमदो. दुहताम् ( ५४६, ५५३, ) वे दुहे। धुग्ध्वम् २७२,२७३ तुम दोहो| दोहामहै हम. । परस्मैपद लङ् में । अधोक् ( ४७८, ४५२, १८३, २०२, २७३, ८७ ) वह दुहता हुआ । प्रदुग्धाम्, उन दोने दुहा भदुहन्, उनने दुहा । प्रदोहम्, ४७८, ( मैं ने दुहा)॥ ween भात्मने पद के लड् में । अदुग्ध, (२) ( २७२, ५८०, २२.) अदुहाताम्, (४५१) अदत, (५५३) अधुरध्वम्, (४५१, २७२, २७३, २२) तुमने दुहा । वि० लिङ्में (दुधात्, (वा) दहीत, वह दुहे ५४८ ॥६१८॥ ६२० ॥ लिड्मिचावात्मनेपदेषु । १।२ । ११ । इक्समीपावलः परौ भलादी लिङ्सिची किती स्तस्तङि । धुनीष्ट ॥ इक के समीप जो हल उस से परे जो 'झलादी' (२) लिङ् लकार और सिच् वे (१) वह दुहे, ४३८ ईश्वर कदे कि वह दुहे । (२) इनके, अर्थ, परस्मैपद को समान हैं । (३) झल् है आदि में जिन के ऐसे। ॥ ।
4८ पदादय। । कित् होवे (1) तापरे तो। धुचोट ५२ मे वित् पोर ५१ से मुर निपेय एषा (२०१ २०६८०)पर पर लिया दुहे. १२१ ॥ यख गुपधादनिटः क्स । ३।१ । ४५ । गुपधो यः पणन्तस्तस्मादमिटरच्छे क्सादेशः । अधुचत् ।। पा (6) उपधा में जिसके ऐसा वो गसरत पद (पपर)२ पन्त में विस में ऐसापातु उससे परे वो पनि रिस उसको (क्स) पादेय चोपे । अपुषत् (२०२, २०५ ०५१५२)सनेमा ||२१॥ १२२ ॥ लुग्वा दुइदिइतिहगुहामात्मनेपदे दनये ।।३।०३। एषां पसत्य लुग्वा दन्त्ये तसि । पटुग्ध । पधुचत । दुध (दुराना)।दिश रामि बरपा । सिर (चाटना) पौर गुष बना । म पातुओं के पस (१२१) का विकल्प परदे पुष गोपे परन्तु मब दमयादि समय (२) (सतु र स् ) परी में से कोई एक पादि में विसने ऐसा तर (पात्मने पद) मत्यय परे हो तो प्रदुग्ध (२०२, ५८ ) या पधुचत ५२१ उसने दु॥ १२३ ॥ सस्याधि । ०1३1०२ | पक्षादीतहि सस्य चोप । अधुघाताम् । पधुचम्त । पटुग्धाः । अधुचयाः। प्रघुमायाम् । पधु रनम् । पक्षध्वम् । अधुधि । पधुधाषिपधुचामलिपधोश्यत । एवं दिापचये ।२१॥खि पाम्वादने । २२ । खेटि। खोट । खिइस्ति । चि । लोठे । विति। विते । लिचे । विहाये । योव्वे । विखे । खिखिो। खेठासि। सेठासे । वेश्यति। वेदयते। सेठाशीठात्। वोठाम् । सिकन्तु । खोठि । हानि । बोठाम् । पसेट । प्रले । पलिचत् । पलिचत । पीठ । पश्यता पक्ष्यत । মুম্ व्यवायां पापि। २३ ॥ बजारि ( पपादि म बिसका ऐसा) तर पर हो तो बस का सीप होता है। पधाताम् (२०५, २०५ ८०) हम दोन दुलो पपुषन्ता दशा प्रदुग्बा (३२५ १०२ ८ २२) मा “पपुषवा (१९) तूने दुरा । अधुधावाम् -तुम दोने दुष। पभुगम्यम् "पा" अनुचनम् । ५२२ तुमने दुरा। अधि १२५ से क्स वा लोप पोर (r, ५८ २०५ ८०) मैने दुमा । प्रचालिम दोन दुरा । पपुवामति मने दहा । पास्मने पर में। (२) तु (त् दरम्)। - - - - ६६ - चाटू . लघुकौमुद्याम् । तृङ् में । अधोक्ष्यत्, अधोक्ष्यत, नो वह दोहे। ऐसीरीति से, २१। टिइ (हदि, राशिकरणा) धात की भी साधन प्रक्रिया जाननी ॥ २२ । लिङ् ( चाटना) लेढि ( ४७८, २७१, ५८०, ७५, ५८१ ) वह चाटता है। लोढ. ( २७१,५८०, ७५, १८१, १२७ )वेदो चाटते हैं। लिहन्ति, वे चाटते हैं। लेक्षि ( २७१, ५७८, १६३ ) तू चाटता है । (१) लीढे ५३७, लिहाते, लिहते ५५२, लिक्षे ( २७१, ५७८) लिहाथे, तुम दो चाटते हो । लीदे (२०१, ७५, ५८१, १२७) तुम चाटते हो। लिट् में प० लिलेह प्रा. लिलिहे = वह चाटता (या) हुआ। लोट में, (२) लेढामि (३) लेढासे, तू चाटेगा । लुट में, प० लेच्यति । श्रा० लेक्ष्यते, वह चाटेगा। लोट् में प० लेढु, लोढात्, वह चाटे । लोढाम्, वेदो चाटें। लिहन्तु, वे चाटं। स्लीढि (४४१) ५८७ तू चाट । लेहानि (४४३, ४४४) मैं । आ० लोट में लीढाम् ५८८, ५८१, १२७ वह चाटे । लङ् में, अलेट् २०१, १८३, १५८ वा अलेड्, वह चाटता हुआ । लुङ् में प०६२१ अलिमत् ६२२ प्रा. अलीढ, अलिक्षत २७१, ५७८ उस ने चाटा । लुङ् में प० अलेक्ष्यत् प्रा० मे अलेक्ष्यत २०१, ५७८ यदि वह चाटे । बञ् (ब) =स्पष्टबोलना ।। ६२४ ॥ ब्रुवः पञ्चानामादित अाही ब्रुवः ।३ । ४ । ८४ । ब्रुवी- लटस्तिवादीनां पञ्चानां गालादयः पञ्च वा स्युर्बुवश्चाहादेशः । आह । अाहतुः । आहुः॥ ब्रू धातु से परे जो लट् के स्थान में तिवादि पांच (१ तिप्, २तस्, ३झि ४ सिप्, ५ थस् ) इन को पलादि पांच (१ गल्, २ अतुस् , ३ उस्, ४थन्त, ५ अथुस्-) आदेश क्रम से होवें, और बृ को आह आदेश होवे । ब्रू+तिप् (आह+णल्) तो आह = यह कहता है । पाहतु , वे दो कहते हैं । आहु., वे कहते हैं। ६२५ ॥ आहस्थः । ८।२ | ३५ । भलि । चत्वम् । श्रात्य । आहथुः ॥ जब झन् परे हो तव आह ६२४ के अन्तिम वर्ग को घ, छोये । पुनः हरि च से य् को त् किया आत्थ, तू कहता है । आहथु', तुम दो कहते हो । ६२६ ॥ ब्रुव ईट् । ७।३। ६३ । ब्रुवो हलादेः पित ईट्। ब्रवीति। बत. । ब्रुवन्ति । ब्रूते । ब्रुवाते । ब्रुवते ॥ (१) आत्मने पद में "अर्थ' परस्मैपद के ममान जानने । (२) परस्मै पद में मध्यम पु. एकवचन मे ५८०, ५८१ । (३) आत्मनेपद में मध्यम पु० कण्यचन में ५८०, ५८१ ॥
प्रदादसा हुम् () घानु से परे यो रसादि (१) पित् पत्थय एस ओ का पानम हो । अवोति ॥ १५पा पोसतारे भूत' ५२८ पे दो बोसते है। मुवन्ति (२१७) पोरते। पात्मने पद में बद कई मूते ११० मुवाते मुक्ते एवं पूर्ववत् । १२० ॥ दोषचि । २। 81 ५३ । पाधधातुफो । उवाघ, अपत, जचुः, उपचिय, उवषय, “ज” “वा" "वश्यति" पश्यते, ब्रवीत, तात्, व्रताम्, अवन्तु, वृष्टि, प्रवाधि, “यूताम्" "ब्र" "पप्रषोत, पत" | "व्यात, ब्रुवीत" "उच्यात, वचोष्ट" ॥ पार्धधातुब प्रत्यय परे सेतो दूबो व पादेग कोय । सिन में अपाच (०५ ४२९, 10०, २०८, ४०३) वा बोसा । कचतु' (1०८) पेरो यो । अपु वे गाये । एपधिप ५१ (पा) म (100) (१५८)तू मोठामा । पात्म शिर मेमो 100 १०८ । बुर में पमा १२८ मृद में पश्यति । भा में पश्यते १२८ पापोरगा । बोट में अपीतु १२५ ४१४२५ ४१०(पा) भूतात् पामोरे जूताम पाहो बोले सुमन्तु २१० १० बोयें। भूचि मूतात् तुबोखे । बाषि में बोवू । पात्मने पद में भूताम् (२) बसे ।तर में प्रमपीत् १२५ पा में पडूत पापोता। वि सिर में चूयात् (भा में) गुपीत पायो । पाभि पिर मेहन्यात १०० (पा में) मधीष्ठ १२८ रवर! पर बोरे। १२८ ॥ पम्यतिपतिस्मातिभ्योऽन् ।।१।१५ । च्थेः । पम् पेगना । पच बोलना।क्या पाना।म तीन पातुओं से परे भो रिव उसको परोवे ॥ (२८॥ वचम्।।४।२ । परि परे । भवोचत, 'पवक्ष्यत्, पपक्ष्यत ।। प२८ परे हो तो पम् पातु पो उम् का पागम होम । मुर में प्रपोचात् । पर पोसावर में पपश्यत् ८ (पा में) पपश्यत यदिपायो । २३ । चर्करीतं च। चर्वरीतमिति यहागतं तददादी पोध्यम् २४ जम् । पारवादने ॥ परीत यह यर (९) सुमन्त की प्राचीनी मा में संचार सबो भी पारि १८ परमदान सेना। २॥ अधुन (बई) भासदन (बना। १९१ मोंतेर्विमापा । 0 1 2 18. चादी पिति सार्व • (१)तिविप मि । (२) प ताम् । पमरे (३)100ोगा।
लघुकीमुद्याम्। धातुके । ऊोति, जोति, जणुंतः। जवन्ति । अणुते, जणुवाते, अणुवते ॥ जब हलादि पित् मानधातुक परे हो तो जणु धातु को विकल्प करके वृद्धि होवे । लट् में ऊरौति वा ऊर्णोति ४१४ वह ढकता है। ऊर्युत वे दो ढ० ऊर्युवन्ति, वे ढकते हैं पात्मनेपद के लट् में प्रथम पु० ए० जणुते हि० अणुंवाते, अर्थ परस्मै० की तरह है ॥६३१ ॥ ६३२ ॥ जोतेराम्नेति वाच्यम् ॥ * ॥ ऊर्यु धातु से आम् ५४० न हो ऐसा कहना चाहिये ॥ ६३२ ॥ ६३३ ॥ नन्द्राः संयोगादयः। ६ । १।३ । अचः पराः संयोगा- दयो नदरा दिन भवन्ति । नुशब्दस्य हित्त्वम् । अणुनाव । अणुंनुवतुः, जर्ण नुवु ॥ पच् से परे सयोग के आदि में "न्, द्, र" इन में से कोई एक हो तो उसे हित्व न होवे । इस नियम के लगने से ऊ से परे र् को हित्व न हुआ किन्तु 'नु' मात्र को ही हित्व हुआ। तो तिट के प्र० ए० ऊर्णनाव, १८६, २६ उसने ढका था। ऊर्यु नुवतुः, उन दो ने ढ० । ऊर्जुनुवु., उनने ढका था ।। ६३३ ।। ६३४ ॥ विभाषीर्णो । १ । २।३। इडादिप्रत्ययो ङित् ऊM नुविथ, ऊर्जुनविथ। अMविता, जर्णविता। जर्म्युविष्यति, जगविष्यति । जर्णोतु जर्णोतु । अर्णवानि । अर्णवै ॥ इट है आदि में जिसके ऐसा प्रत्यय ऊर्गुञ् (जणु) धातु से परे हो तो वह विकल्प करके डित् होवे । जहां डित् हुअा वहा २१४ से उवड् हुआ, तो ऊर्जुनविथ सिद्ध हुआ। और दूसरे पक्ष में गुण हुआ तोऊ नविथ सिद्ध हुआ तूने ढका था । लुट में (९) अणुविता, ऊर्णविता । लुट्में ऊर्तुविष्यति, जर्णविष्यति, वह ढकेगा। लोट् में जीतुः (२ अर्णोतु, वह ढके । लो० उ० ए० में अर्णवानि, ऊर्णवे, मेंढकु ॥ ६३४ ।। ६३५ ॥ गुणोऽपृक्ते । ७ । ३ । ८१ जोतेर्गुणोऽपृक्त हलादौ पिति सार्वधातुके । और्णोत् और्णोः । अणुयात् । ऊर्जुयाः। ऊर्गुबीत । अणू- यात्, अणुविषोष्ट । उगविषीष्ट ॥ कर्ण धातु को गुण होवे जब अपृक्त हलादि पित् सार्वधातुक परे हो तो । लड् में (१) लुट में अर्थ लूट के समान है । (२) ६३१ से वृद्धि विकल्प हुआ ॥ -- हो २६ से अव 1 -- मुहोत्यादयः । पागात (४५१ ४०२, २१२) उसने ठसा । पोर्णीतू ने उपा। विधि सिह में तनुयात् पाउले । कर्पया तू का लघुपात वा टके। पा सि में ऊर्षयात ११२ तविषीष्ट १४ हरदिपोष्ट रपर परे बिवाव्ये ॥ १५ ॥ (३४ मर्पोर्विभाषा । ० । २।६। बडादौ परस्मैपदे सिपि ऋषिः । पझे गुण । मोर्यायीत्, भोपवीत, भौर्युवीत्, पौषिष्टाम, पौष विष्टाम्, पौणुविष्टाम् । पौरविष्ट, पौर्युषिष्ट, पौषिष्यत्, पौयुविष्यत॥ पित्यदादय ॥ पद् ४२०१ पादि में निम से ऐमा मित् परे होतो 'वर्ष भातु को चि विवाप पर हो । दूसरे पच में ४१४ गुण हाता रे पोचायोता-४॥ ०४ पौषधीन (eu 88 पोएंगेत् ११४ उसने ठवा । पोर्चाविष्टाम् भोप पिष्टाम् पोर्पविष्टाम् उम दोगे तया । पारम में सुरके पीनविष्ट ३४ पोमुपिष्ट उसने ठया । मर में पोषि- प्यत्रए यदि वा ठोगम ॥ ५॥ पदादिगप समाप्त भया ।। रा| अथ जुहोत्यादय. In ॥१॥ दानादमयो । ६३० । नुहोत्यादिभ्य रतु । २ । ४ । ०५ । गयः । 'पप (पन्न करना) २ पादिमे दिन उनका पचनक्षिण वाता (विधि पूषक रवि को पग्नि में बना पा खाना )रे पाटि म जिम क हम चातुपी पागे जो मप् तिमारपुसावे ॥१५॥ ५३८ । नी । ।२।१ । धातो म्त । चुरोति । नुत । भारती विषयता नीता भात पिवे । एरोनि-02-१४ पर यन्त्र करता है। गुहत पेदा यन्त्र पारते ॥१८॥ ६३८ पदभ्यसतात ०१/४ । मत्स्यानुषोरिति यम्। प्रति। पम्यम्तमा म परेमको पन् पे । १ ते यन् एपण । नुमति परवाते. ५४.: भौशीमापा रसुवरप।।।1८ एभ्यो लिटयाम्बा म्या दामि तापिय फायंच। बुवाञ्चकार धुशवा गोतामध्यति। पुरोतु तात् । नाताम् । नुसतु । धि। अम्मानि। पपीत्। पताम - - । । लघुकौमुद्याम्। भी, डरना । ही, लम्जा करनी ।भ, पालना । हु, यज्ञ करना । इन धातुओं से परे श्राम होता है लिट् ल० मे विकल्प करके । और आम के होने पर प्रलु के परे होने से जो कार्य होता है वह भी होवे अर्थात् ६३८ से द्वित्व हो। जुहवाञ्चकार (५०१, ४२० में होष्यति ५०२, ४२२, ४८२, १८६ ) वा जुहाव उसने यन्न किया । लुट् मे होता, । लुट लोट् मे जुहोतु, जुहुतात् । जुहुताम् । जुद्धतु । ६३८ । ५३० (हि का ) जुहुधि ५८७ जुहवानि मैं यन्न करूं । लड् में अजुहोत् ६३८ । बिच० में अजुहुताम् ॥ ६४० ॥ ६४१॥ जुसि च । ७।३।८३ । इगन्ताङ्गस्य गुणोऽजादौ जुसि । अनु हवुः । जुहुयात्। स्यात् अहौषीत् । अहोष्यत्। जिभौभये। २ बिभेति ॥ इक् ( इ उ ऋ लु) हे अन्त में जिस्के ऐसे अङ्ग को गुण हो, अच है आदि जिस के ऐसा जुस् ४७५ परे ही तब । अजुहवुः उनने यज्ञ किया। वि. लिड् में नुहुयात् प्राधि र्लिङ् में ड्यात् ५१२, ईश्वर करे कि वह यन्न करे । लुड् मे अहोषीत् ५१३ उसने यन किया लुड् में अहोष्यत्, यदि वह यन्न करे । २ । बिभी (भी) डरना लट् प०. ए. में बिभेति । (६३८, ४२३, )४२५ वह डरता है ।। ६४१ ।। ६४२ ॥ भियोऽन्यतरस्याम् । ६।४ । ११५ । इ. स्याइलादौ डिति- सार्वधातुके । बिभित.। विभीत । बिभ्यति। विभयाञ्चकार । विभाय । भेता। भेष्यति । बिभेतु । बिभितात् । बिभौतात् । अबिभेत् । बिभियात् । विभीयात् । भौयात् । अभैषीत् । अभेष्यत्।३ । ही लज्जा- याम् । निहेति, जिहीत. । जिझियति । निड्याञ्चकार, जिज्ञाय । हेता । रेष्यति । जिहेतु । अजिहेत् । जिहीयात् । डीयात् । अद्वेषीत् अङ्गेष्यत् । ४ प पालनपरणयोः ॥ भी धातु को इकार हो जब इलादि कित् वा डित् सार्वधातुक प्रत्यक परे हो विभितः, विभीतः, वे दो डरते हैं। विभ्यति, वे डरते हैं। लिट् में बिभयान्चकार, बिभाय ६४०से भाम् का विकल्प हुअा । वह डरा । लुट् में(१)भेता, लुट में भेष्यति । लोट में बिभेतु बिभितात् ४३८ से तातङ् और ६४२ से इकार, पक्ष में बिभीतात्, ईश्वर करे वह डरे । लड् में अविभेत् । वि. लिङ् मे बिभियात् ६४२ बिभीयात्, वह डरे । प्रा. लिङ् में भीयात्, ईश्वर करे कि वह डरे । लुड् में (२) अभैषीत् ( ४७३, ५१३ ) नृड् में अभेष्यत् यदि वह डरे । ३ । ही, लम्जा करणो । - (९) लुट भऔर लुट में यह डरेगा। (२) अर्थ लिट के समान हैं।
प्रद ॥ बुहोस्यादय "प प ॥ प्र हि ॥ वर-भिडेति पाया करतारेनिङ्गीत दो मिशियति ३१८ सम्माकरता सिद में। विजयाम्यवार, विडाय पा सम्वित दुपात देता रेम्पत्ति, वितु पविजेत् मिडीयात् जीयात् चरम पपीत् ॥५, ४०१ ११५पा सण्वित दुपा। सर में पडेप्यत् यदि पर सम्बित गोरे। पासमा भरपी पा पूरा करपा ।। ५४२॥ ५४३॥ पत्तिपिपरिष। 01 8100 । पभ्यामस्य ः स्यात् । रणी। पिपति । र ११० परे सोनोश भोर पातु से पच् को रोपे। पिपर्ति १०, ११८ पापासता॥ ६४४ ॥ उदीष्टयपूर्वस्य । ७।१।१२। पहावयषीष्ठमपूर्षीय पत्तदम्तस्वास्य ठ॥ पा का अषयप जो पोष्ठ स्थानीय (१) वर्ष पार पूर्व विप ने ऐसा करे पन्त में मिसभेस परको ७१४॥५५॥ ५४५ ॥ इति ।८।२।००। रेफवास्तस्य धातोरुमधाया को दो! इति । पिपत्तः । पिपुरति । पार ॥ (रेफ) बार 'पा पार पन्त में जिस को ऐसे पातु पी उपधारा पो दीच होये । पिपूर्त ॥ ये दो (पाहते ) पूरा परते २ । पिपुरति ११८, ये पूरा करते है। निट में पपार (१२२ १२२ १८८ १०) सपने पूरा पिया ॥ १४ ॥ ६५६ मगदप्रांडस्पो वा ७।४ । १२ । फिति सिटि पातु । भू मारना । पारना । पासना । म पातुपी को विकरप करके उससे पाकित सिर परे रोय तर । (५) पप्रत उन दो ने पूरा किया ॥५॥ ६४०n सशस्यताम्। 01 ४।११। तीदादिकलछेन धाती पर दन्तानां च गुणो शिटि। पपरतु ! पपमः ।। (१)नक पद मन्त्रित पद पधिक सगा पर पूषपत् पर सेने। (२) (५) मम्मी का पाप होता रे पोर में मम्मरोगी (१) यहां पर १८ मे परना।
- सधुकौमुद्याम् । तुदादि गण की ऋच्छ धातु को और 'ऋ' धातु को और ऋदन्त धातुओं को गुण होवे जब लिट् परे हो तब । अतः जिस पक्ष में ६४६ से । इस्व न दुमा वहा इस से गुण हो पपरतुः सिद्ध हुआ पपरः, उनने पूरा किया ॥ ६४७ ।। ६४८ ॥ वृतो वा । ७ । २ । ३८ । वृञ्भ्यामृदन्ताच्चेटो दी! वा स्यान्नतु लिटि । परिता, परीता । परिष्यति, परीष्यति । पिपर्तु । अपिपः अपिपूर्ताम् । अपिपरुः । पिपूर्यात् । पूर्यात् । अपारीत् । बङ्, सेवा करणी । वृञ्, स्वीकार करणा। और ऋदन्त धातु । इन से परे जो इट ४३७ तिस को विकल्प कर के दीर्घ होवे । परन्तु यह दीर्घ लिट् में न होवे । लुट में परिता, परीता । लुट में परिष्यति, परीष्यति, वह पूर्ण करेगा ।। लोट में पिपर्तु, वह पूरा करे । लड् में अपिपः ४५२, ४१४,। १८३, । १०८ उसने पूरा किया अपिपूर्ताम् ६४३-६४४-६४५, उन दोनो ने पूरा किया । अपिपरः, उन ने पूरा किया । वि० लिङ् में पिपूर्यात् ६४३, ६४४, ६४५, वह पूरा करे । आशिर्लिङ् में पूर्यात् ईश्वर करे की वह पाले लुङ् में अपारीत् ५१३ उस ने पूरा किया ॥ ६४८॥ ६४६ ॥ सिचि च परस्मैपदेषु । ७ । २ । ४० अत्र वृत इटी न दीर्घ । अपारिष्टाम् । अपरिष्यत्। अपरीष्यत्॥ोहाक त्यागे। जहाति ॥ 'हङ्' 'हन्' और जदन्त जो धातु इनको दीर्घ न हो परस्मैपद के सिच् परे होते। पपारिष्टाम्, उन दोने पूर्ण किया । लुङ् मे अपरिष्यत्, अपरीष्यत् ६४८, यदि वह 'पालना' था 'पूर्ण' करे । ५ । ओहाक् (हा) त्याग करणा । लट् में जहाति ६३८, ४२३, ४८२, वह त्याग करता है॥६४८ ॥ ६५ ० ॥ जहातेश्च ६ । ४ । ११६ । बदास्याइलादौ डिति हलि सार्वधातुके । जहितः। कित् वा ङित् सार्वधातुक परे हो तो हा धातु को इ विकल्प करके होवे । जहितः वे दो त्याग करते हैं ॥ ६५० ॥ ६५१ ॥ ई हल्यो । ६ । ४ । ११ । श्नाभ्यस्तयोरात इत् सार्व- धातुके कङिति हलि। नहीत.। १ घु ६५६ सन्नको से भिन्न जो अभ्यस्त सन्नक धातु उस के और एना,०२४ के मुधोत्पादयः । म प ॥ सर-निति पासम्बा वरतारे। मिडीत वेदो ॥ निझियति ८ वे सन्चाकरते है। मिट में। विजयामबार विज्ञाय पार चम्वित पा । पुर में सूट में सोद में घर में सिर में या सिर में] देता यति, वितु पनिडेत् विडीयात् डीयात् तुम् में पपीत् ५५ 8 ५५वा सम्बित दुपा। सर में पोयत् यदिपा पन्धित रोवे । प पासमा पररी पा पूरा करण ॥ ५४२ ॥ १४२॥ पर्तिपिपयोश्च । 0 1 816। पभ्यासस्य पू. स्यात् । एली। पिपत्ति ॥ स्तु १२० परे हो तोच पोर पृ धातु पेप को रोपे । पिपर्ति 101% पापासता १४४ ॥ उदोष्टयपूर्वस्य । 01१1१.२ । पहावयषौष्ठवर्गीय सत्तदन्तस्यास्य ठ ॥ पा पा अवयव को पोष्ठ स्थानीय (२) वप या पूर्व मिस को ऐसा करे पन्त में भिमस पापो हो ॥५४॥ ६४५ ॥ इति च ।८।२1001 रेफवास्तस्य धातीरुपधाया पूको दो! इति । पिपत्तः । पिपुरति । पार ॥ (रेफ) एवार वा पकार रे पम्त में विस थे ऐमे पातु वी उपधारक को दीर्घ रोपे। पिपूत ६४॥ वेदो (पासते ) पूरा करते हैं। पिपुरति २५८वे पुप परते हैं। हिर में पपार (५२ १२.४२५ १५५ ३७) उसने पूरा पिया | ६४६ ॥ पदमाशस्वी वा ०।४ । १२ । फिति लिटि पप्रतु । मू मारना । फाइना । प पासमान पातुपों को विकरप करने की पर वित् मिट परे होय तप । () पप्रतु, उन दो ने पूरा पिया । Bu ६४०॥ सत्यताम्। ०। ४।११। सौदादिकारच्छेप धासी स दन्तानां च गुणो लिटि। पपरतु । पपरुः ॥ (१)नले पप सन्त्रित पद प्रतिसगा पर पूरगत् पर सेन। ()() - भ म न पा पार रोता रे पीर में मम्भोगी (0) यह हार पर १८ पेपरपा मगा।
%D - उन ने लधुकौमुद्याम् । तुदादि गण की ऋच्छ धातु को और 'ऋ' धातु को और ऋदन्त धातुओं को गुण होवे जब लिट् परे हो तब । अतः जिस पक्ष में ६४६ से । इस्व न छुपा वहा एस से गुण ही पपरतुः सिद्ध हुआ पपरुः, उनने पूरा किया ।। ६४७ ।। ६४८ ॥ वृतो वा । ७ । २ । ३८ । वृड्भ्यामृदन्ताच्चेटो दी? वा स्यान्नतु लिटि । परिता, परीता। परिष्यति, परीष्यति । पिपतु । अपिपः अपिपर्ताम् । अपिपरुः । पिपर्यात् । पर्यात् । अपारीत् । वृड्, सेवा करणी। बञ्, स्वीकार करणा । और ऋदन्त धातु । इन से परे जो इट् ४३७ तिस को विकल्प कर के दीर्घ होवे । परन्तु यह दीर्घ लिट् में न होवे । लुट में परिता, परीता । लृट् में परिष्यति, परीष्यति, वह पूर्ण करेगा ।। लोट् मे पिपर्तु, वह पूरा करे । लड् में अपिपः ४५२, ४१४,। १८३, । १०८ उसने पूरा किया अपिपूर्ताम् ६४३-६४४-६४५, उन दोनो ने पूरा किया। अपिपरु., पूरा किया। वि० लिङ् में पिपूर्यात् ६४३, ६४४, ६४५, वह पूरा करे । आधिर्लिङ् में पूर्यात् ईश्वर करे की वह पाले लुड में अपारीत् ५१३ उस ने पूरा किया ।। ६४८ ॥ ६४८ ॥ सिचि च परस्मैपदेषु । ७ । २ । ४० अत्र वृत इटी न दीर्घः।पारिष्टाम् । अपरिष्यत्। अपरीष्यत्॥ोहाक् त्यागे। जहाति ॥ '' '' और गरदन्त जो धातु इनको दीर्घन हो परस्मैपद के पिच परे होते। प्रपारिष्टाम्, उन दोने पूर्ण किया । लुड् मे अपरिष्यत्, अपरीष्यत् ६४८, यदि वह 'पालना' घा 'पूर्ण' करे । ५ । श्रोहाक् (हा) त्याग करणा । लट् में जहाति ६३८, ४२३, ४८२, वह त्याग करता है ।। ६४८ ॥ ६५ ० ॥ जहातेश्च ६ । ४ । ११६ । इहास्याइलादौ डिति हलि सार्वधातुके । जहितः । कित् वा ङित् सार्वधातुक परे हो तो हा धातु को ६ विकल्प करके होये । जहितः वे दो स्याग करते हैं ॥ ६५० ॥ ६५१ ॥ ई. हल्यघोः । ६ । ४ । ११ । श्नाभ्यस्तयोरात ईत् सार्व- धातुके कङिति हलि। जहीतः। घु ६५६ सन्जको से भिन्न जो अभ्यस्त संजक धातु उस के और श्ना:०२४ मुसोत्यादयः। पामार पोवार होवे वन साटि फित् पा गित् प्रत्यय परे से तब । बहीत (1) दो स्याग करते॥११ ।। ६५२ ॥ उमाभ्यस्तयोरात ६४।११२ । खोप मिति सार्वभा तुके। वहति । महो। ता । पास्यति । अहातु । मश्तिात्, वीतात् । पर वित् वा रित मावातुन प्रत्यप परे रो तब रमा १२४ मस्यय ये पोर पस्य स्त संप्रम धातु पाकार (पा) का चोप होवे । माति ११५ १५२ पे त्यागते २ सिट में पी४२. 8२१ २५ ४२, १०उसने स्यामा ।। ॥ युद् में ॥ घट में ॥ चोट में। ॥हाता पात्यानेगा। हास्यति (२)॥ नहातु का त्याग करे ।। परिसात् ५५ बहीतात् ५१ वर परे विमा स्याग परे ।। ११H १५३ ॥ पा च ।।8। ११७ 1 बातेः । चादिदौसी । वारि, महिषि, बोशिश पवात, प्रवा। जबकि परेको तब पातु पावार को पावार होवे पवार से चार पारबार होरे । वापि शिविपीमित स्याम पर । सरपबशात् वा त्याम ता तुपा । पना, उममे स्यामा । ६५४ । खोपो यि।।४।११८ । वाराधोपो, यादी साप धातुके । वन्मात् । एछि हि ।यात् । प्रशासीत् । पाास्यत् ॥ ६॥ मार माने गग्दे च ॥ यर पदि में बिस वे ऐसा सापपातुब परे हो तब (पोहाय) पातु पामा सीप हो । पि सि में 'पपात्" पामिविर में विधिपा को पतार पा तोीयात् (सवर बरे सिवा त्यागे) सिपा । पुर में पासीत् १२४ १०:08 एस ने स्पाग बिवा । सर में पहास्यत् यो पात्याग करे ।।। माद (मा) मापमा पा 1 । मण्दरमा R4u - । १५५ ॥ भूमामित्। 01 8 ।। मृञ् मा पोसार एपामभ्या सस्यत्स्यात् रखो । मिमौते 1 मिमाते। मिमते । ममे । माता । मास्यते मिमीताम् । पमिमीत। मिमीत । मासोष्ट । पमास्त । पमास्यत101 (१) मा ५ नेपघातर का पप तस में। (२) पब पुरसत् ।
- लघुकीमुद्याम् । पोहाङ् गती । जिहीते। जिहाते । जिहते। जहे । हाता हास्यते। जिही- ताम् । अनिहीत । जिहीत । हासीष्ट । अहास्त । अहास्यत ॥ ८॥ डुभृञ् धारणपोषणयोः। बिभर्ति । बिभृतः । विभति । विभृते। बिभ्राते । बिभते । बिभराञ्चकार । बभार । वभर्थ वभृव । बिभराञ्चक्रे । वभ्रे । भर्ता । भरिष्यति । भरिष्यते । बिभर्तु विभराणि। विभताम्। भविभः अबिभृताम् । अविभः । बिभृयात् । विभीत। भियात् । भृषीष्ट । धभार्षीत् । प्रभृत। अभरिष्यत् । अमरिष्यत। डुदाञ् दाने। ददाति । दत्त । ददति । दत्ते । ददाते। ददते । ददौ । ददे । दाता । दास्यति । दास्यते । ददातु॥ भृन् (भृ) पालना । माड् (मा) मापना । श्रोहाङ् (हा) जाना । इम धातुओं के अभ्यास के अच् को इकार होवे, जब शप् को रलु हुआ हो, लट् में = मिमीते ६५१. वह मापता है । मिमाते ६५२ वे दो मापते हैं। मिमते ६३८, ६५२ वे मापते हैं । लिट् में ममे ५४२, ४२०, ५१८ वह मापता था। लुट में माता, वह मापेगा लुट में, मास्यते = वह मापेगा । लोट में मिमीताम् (६५१) वह मापे । लङ् में श्रमिमीत = उस ने मापा । वि. लिङ् में मिमीत =६५२ वह मापे । पाशीलिङ् में मासीष्ट = ईश्वर करे कि वह मापे । सुड में अमास्त ४६६ उस ने मापा । लुङ् में अमास्यत यदि वह मापे । श्रोहाड् (हा) जाना = लट में (१) निहीते, निहाते, निहते = वेजाते हैं। लिट् मे, जहे = वह गया। लुट में, हाता । लुट मे हास्यते यह जाएगा। लोट्में जिहीताम् = वह जावे। लङ् में, प्रनिहीत = वहगया विधि लि. में जिहीत । प्रा. लिड् मे हासीष्ट = वह जावे । लुङ् में महारत - वर गया लुङ् में अहास्यत= यदि वह जावे । डुभृञ् (9) धारण करना वा पालना । लट् मे (२) बिभर्त्ति विभत' विभ्रति = वे पालते हैं। प्रा० लट् प्र० पु० में (३)बिभृते, बिभाते, बिधते = वेपालते हैं। लिट् प्र० पु. एक वचन में ६४० से पाम् विकल्प हुआ = बिभराञ्चकार, यभार ५०२ और १८६ से वृद्धि हुई । उस ने पाला । बभर्थ = तूने पाला । बभूव = हम दोंने पाला। (१) यहा ६३०, ६३८, ६५५, ४८२, ६५१, वह कार्य कर लेने यह जाता है। (२) यहा ६५५, से अभ्यास को दूकार और अभ्यासेचर्च से अभ्यास के भ को ब कर लेना और प्र० पु. बहु बचन मे ६३८ से मि के झ अत् और एकोयणचि से या कर लेना । और वह पालता है इत्यादि इन के अर्थ जानने । । 1 . को - सूट में दास्यते- - नुहोत्यादयः । पात्म म पु एक वचन में विमराम्याने पम्मे १४१ उसने पासा । पुर में मां सद में मरिष्यति १२१ वा मरिष्यते - या पासेगा। सीट में विमत्तुं । पिमरापि में पान। पा सोद में विमृताम् । सर में पषिमा १४ से गुष-१८५ त् का चोप और १ ८ से रमी विसर्ग हुर-वा पाचता हुपा । प्रविमताम् -उन होने पाया । पविमर-यहां 81 से "बुस पोर ५४१ गुण दुपा। उनने पासा । (पिभूयात् (१) मा विनीत) पापिम् में लिए यमा मियात् ॥पा पोष्टमारपर परे विपा पाये। मुग में पमार्फत् १५५ पा (२) अमृत-समने पाया । स में पमरिष्यत् वा अमरिष्यत-या पापाचे । चुदाम् (दा)-देना। बाद में ददाति १८१ ४२१ वह देता।का यहाँ १५ से पापा चोप पीर परिच में दो त कर लेना । (ददति १२८, १२)-देते हैं। पा तन में दत्ते ददाते दस्ते । चिट् में दो ५१० वा ददे ५१८ ४२ उसने दिया। खुद में दाता -पा देगा । वोट में ददातु-पा देगा। १३५ ।। ६५६ ।। दाधापदाम् । १।१।२०। दारूपाधारपारध धातवी धुसंसा स्युर्दाप्देपो विना ध्यसोरित्यत्वम् । देशि दत्तम् । पददात्। पदत्त । दद्यात् । ददीत । देयात् । दासीष्टा पदात् । पदाताम् । पदुः (दाप) पाटनापौर दे -गोपनबरनाल से विमा (१) दा रूप और पापेप पारे पातु दु संचा वासेो । चुमचा पाने से परे बम पितो। ८ से पकार और पन्यास पा सोप भी होता है तो देहि-तू । दत्तम् - तुम दो देवो । सर में पददात् 'बा" पदत्त १२ वा देता तुपा । विधि सिर में दपात पा ददीत पापा देवे। पा सिर में रेयात् ५१८ वा दामोष्ट-रपर बरे जिवा देवे । बुर में प्रदात् ४५० र ने दिया। पदाताम् -हम दोने दिया पदु' । (११०-१२१) सन ने दिया। ६५० ।। स्थाघ्योरिपच १।२।१०। पमयोरिदम्तादेश सिच विदात्मनेपदे । पदित । पदास्यत, पदास्थत ।१ हुधा धारपपी पपयो । दधाति । पात्मनेपद में स्थापोर घु संवो को पस्थवर्षको कार होवे पोर पिच चित् पे । पदित-उसने दिया । नरम पदास्पत् वा पदास्यत यदि पा देवे ।। ।दुधाण (पा)-पारपरनामा पोपण भरमा । वाति-वर धारण करतारे॥ ६५८॥ दधस्तथीम्प।८।२।२८ बिरुतस्य झपम्तस्य धामी (Oविधि सिमा पाने । (२)मनी मिहिमादिगप में पा पुषीरे। (कादा-देना। दो -पपरम परमा। -प्रत्यपषबरमा भा-पारप मारमा । धे-पीमा ।
०८ लघुकौमुद्याम् । वशी भष् तथोः सध्वोश्च परतः । धत्तः। दधति । दधासि । धत्थ. धत्ते । दधाते । दधते । धत्से । धदध्वे ध्वसोरेद्धावस्यामलोपश्च । धेहि पदधात् । अधत्त । दध्यात्। दधीत । धेयात् । धासीष्ट । अधात् । भधित । अधास्यत् । अधास्यत । ११ णिजिर् शौचपोषणयोः ॥ हित्व किया गया झष प्रत्याहारान्त जो धा धातु तिस के वर को भष् होय जब त्, थ्, स्, ध्व इन में से कोई परे रहे तब । धत्तः ६५२ से आलोप् और परिच से त् हुपा=वे दो धारण करते हैं । दधति = वे धारण करते हैं। दधासि =तू धारण करता है। धत्थ. = तुम धारण करते हो। । आत्मनेपद में लट् ॥ धत्ते = वह धारण करता है। दवाते =वे दो धारण करते हैं । दधते वे धारण करते हैं । धत्से तू धारण करता है। धध्वे । तुमधारण करते हो। ६०८ एकार और अभ्यास का लोप हुआ । धेहि =तू धारण करता है। लङ् (१)में प्रदधात् “वा" अधत्त उस ने धारण किया। वि. लि. में दध्यात् “वा" दधीत् = वह धारण करे । प्रा. लि. मे धेयात् “वा" धासीष्ट, ईश्वर करे कि वह धारण करे । लुड् में प्रधात् वा अधित = उस ने धारण किया। लुड् में अधास्यत् वा अधास्यत यदिवह धारण करे । ११ णिजिर् (णिन्) शुद्ध करना वा पोषण करना ॥ ६५६ दूर इत्संज्ञा वाच्या ॥ इर् की इत्सझा कहनी चाहिये ।। ६६० • ॥ निनां त्रयाणां गुण. श्ली ।७। ४ । ७५ । निजविनविषा- मभ्यासस्य गुणः श्लौ । नेनेति। नेनित । नेनिजति। ननित । निनेन निनिने । नेता । नेक्ष्यति । नेदयते । नेनेता । नेनिग्धि । प्रस्तु को विषयता में १णिज् = शुद्ध करना । २ विज=भिन्न करना । ३ विष् - व्याप्त होना । इन तीन धातुओं के अभ्यास को गुण होवे । नेनेप्ति ४७८-३२८= वह शुश्व करता है। नेनित' =वे दो शुद्ध करते हैं। नेनिजति =वे शुद्ध करते हैं । नेनिशो = वह शुष्ट करता है । लिट में निनेज वा निनिजे = वह शुद्ध करता हुधा । लुट में नेता, लुट में नेक्ष्यति, नेक्ष्यते यह शुद्ध करेगा । लोट में नेनेहु ६६०-४७६-३२८ वह शुद्ध करे । नेनिग्धि ५८७-३२८ तू शुद्ध कर ॥६६०॥ (१) इन में दा को तुल्य सूत्र लगाने।
+ दिपादयः । ॥ नाभ्यस्तस्यापि पिति सार्वधातुओ 01 ३1८० । लघुप- धगुणो न । नेमिवानि। नेमिक्ताम् । पनेनेक। अनेनिलाम् । पनेमिनु । पोनिलम । पने निक्क । नेनिग्यात् । नेनिमीत। निन्यात्। निक्षोष्ट । प्रामादि फित् सार्वधातुफ परे हो तो पम्यस्त मंत्रावास धातु की उपधा के अघु को गुबनी। निमामि में गुरुवार। नेनियाम् ५५ या मुत्र परे। ता में पनेमक। पोनिमाम् पनि -सन ने गोवा । पनेनियम् - में ने मुरबिया । प्रा सिर में पनेमिन-उसने पुलिया वि चि नेनिग्यात् “वा' नेनिमीत।पा चि में मिन्यात् "वा" निधीष्ट-२५१ पौर ११ से गुप निषेध-रिपरबरे पिपा मुग परे ५१ म १६२ ।। इरिती वा । ३ । १ । ५० प्ररितीधासोश्वेरर या पर- स्मैपदेपा पनिवत्। पनेचीत्। पमिय। पनेच्यत, पक्ष्यत॥ ॥ इति मुसोत्यादय ॥ मिस पातु पार ८ से हो उसबो दियो पर हो परस्मैपद में । मुर में पनिषत् पनचीत् 'वा" पनित -पस ने सुरक्षिमा । बरमें भनेत्यत् "म" पनेरयत मरि पा पुष्करे । ॥ इति दुखोस्यादि गप ममाप्त हुभा ॥ । - real भथ दिवादय' II (१) दिनक्रीडाविजिगीषाव्यवहारयुतिस्तुतिमोदमदस्वप्नवामितगतिषु १ रिपु टि-पेतना मीतने को रफा बरी व्यापार परषा मबाग स्तुति बराबरपा अम्मत होना । रोना रसाबरमा पहना । 4६३ ।। दिवादिभ्य ग्मन् ३१ गयोऽपवादः । खिचेति दोष । दोश्यति । दिदेव । देविता । देविष्यति। दोध्यतु। पदीष्यत् । दौम्येत् । दोव्यात्। पदेवोत् । पदेषिध्यत्। एवं २ पिवु सन्तुसम्ताने। २ नृतो गाविषेपे । नृत्यति। नमत्त । मत्तिता। दिवादिगातुओं से एयन् नेया गप्पा १५ का अपवाद।। 1 से उपषा को (१) व ५ सपरिपर देनी।
लघुकीमुद्यान्। दीर्घ हुभा । दीव्यति = वह ब्रीडा करता है । लिट में दिदेव ४७८ = उस ने क्रीडा की लुट में, देविता । लुट, मे देविप्यति = वह क्रीडा करेगा। लोट् से दीव्यतु ६४५ वद ब्रीडा करे । लड् में अदीव्यत् ६४५-४५१-४५२ उस ने क्रीडा की । वि. लिड् में दीव्येन्या लि. में दोव्यात् = ईश्वर करे कि वह क्रीडा करे । लुङ् में ४७३-४७४ अदेयोत्, उसने क्रीडा करी । लुड् में, प्रदेविष्यत् = यदि वह क्रीडा करे, इसी रीति से २ पिवु (पिब् ) सीवना-धातु के रूप साधलेने । ३ नृती (नृत् )= नाचना । लट् में नृत्यति, यह नाचता है । लिट् मे नन ५०२, ४७८ वह नाचताथा । लुट में, नर्त्तिता = वह नाचेगा। . ६६४॥से ऽसिचि कृतवृतच्छुदतृदनृतः 1,91 २५७ । एल्वः सिन् भिन्नस्य सादेरार्धधातुकस्येड्वा । नतिष्यति । नस्यति । नृत्यतु । धनृत्यत् । नृत्येत् । नृत्यात् । अनौत् । अनतिष्यत् । अनस्य । ४ बसी उद्देगे । वा भाशेतिश्यन् वा । त्रस्पति । इमति । तबास । तत् = काटना । चुत् -मारना । कृद = चमकना । तृ=मारना का अनादर करना। नृत् = नाचना। इन धातुओं से परे सिच् को छोड़ सकारादि आर्धधातुक प्रत्यय हो तो. उसे इट् विकल्प वारके होवे । लुट में, नतिष्यति 'या' नय॑ति = वह नाचेगा । (१) लोट् में नृत्यतु । लङ् में, अनय॑त् । वि. लि. में नृत्येत् । श्राशीर्लिङ् में नृत्यात् । लुङ्गे अनर्तीत् ४७३-४७४ । लुङ् मे अनर्तिष्यत् 'वा' अनय॑त् । इसी (वस् ) घबराना 'वा' डरना । ५१४ से इस धातु को श्यन् का विकल्प हुआ। लट् में वस्यति 'वा' त्रसति ४१२ = वह डरता है। लिट् में, तत्रास = ४८३ वह डरा। ६६५ ॥ वा जनमुत्रसाम् । ६ । ४ । १२४ । एषां किति निटि मेटि थलि च एत्वाभ्यासलीपो वा । सतुः । तत्रसतु. । सिथ । त्रसिता। ५ । शो तनुकरणे ॥ तृ-पुरागा होना। नम फिरणा। एस् = उरना। इन धातुओं के आकार को एकार विकल्प करके होवे जब कित्, लिट् वा इट् युमा थल परे हो तब। वेत्ततु 'या' तत्र- सत. वेदो डरते थे । वेसिव 'या' तसिथ = त डरता था । सितावह ठरेगा। ५ शो -- . . पतला करना। - ६६६ ॥ ओतः श्यनि। ७१।७१ । लोप: स्यात् श्यनि । श्यति। श्यत । श्यन्ति । शशौ । शतुः । शनः । शाता । शास्यति ॥ (१) यहा से लुङ् पर्यत ये सभी प्रथम पुरुष को एवा वचन के रूप जान लेने ।
- रिवारय। भोकार का कोप को बबरयन् परोप । बद में-(यति सत', वन्ति । चिट में (१) यो १५१.५० । पम ८। मुट में यासा ॥११॥ स में मारयति -वर पतसा बरेगा। १६० ॥ विभापा प्राधेट्शाहासः २181 8८। एम्य सिचोग्या परस्मैपदेषु । भगात् । पगाताम् । प्रयुः ॥ धा-सूचना । घेद-पीमा । शा मो -पतसा करपा । वो-चारमा । और धा-पो- माय फरपान बातों से परे बो सिप तिस पा विधम्प पर मुत्रे। पुर में मात्-उस में पता किया। प्रमाताम् - हम दो ने पतना पिया। पगु १२५ ५१. उनमे पतबा किया। १८॥ यमरमममातो सक् च 10/२ । । एषां सक् एभ्य सिघ पट परस्मैपदेषु । एट्सकी। पशासीत् । पयासिष्टाम् । । । की छेदने । वति। । षी पम्सकमाथि । स्यति। ससौ।८। दो पक्ष खएउने । यति। ददौ । देयात्। पदास् । ६ । मध ताउने । यम् -नित होना । रम् -बीचा फरपी। पम् नमस्कार घारपी। बातपी को पोर पावारान्त भावों को सब का पामम होवे पौरन से परे बोसिन् तिस की गये। परस्मैपद में पासीत्। -उस ने पत्ता किया । प्रमासिष्टाम्-हम हमे पतता पिया ।।बो-पाटना। बट में पति वा पाटता- 10। पो-नाम सरना । बट में स्यति-(२०१५) (५५) वा नाय परता। सिर में ससी १९९४१ सस ने नाम पिया दो-चाटना-पति (110) - वाटता। सिद् में दो-हस नेपाटा । भागीर में देशान्-(C)पर बरे विमा बाठे । दुर में प्रदात् (10) उस मेकाटयच-तान करना। 44 ॥ यहिण्यापयिष्यधिषष्टिविपतितश्चतिपृच्छतिभग्वतीनो रिति च ।।१।१६। एषां संमसार स्यात् किति मिति च। विध्यति विव्याध । विविधतु । विविधुः । विष्यधिय । विष्यह । पहा । व्यत्स्यति विध्येत् । विध्यात् । पव्यासीत्। १ । पुष पुष्टी। पुष्यति। पुपोप। (१) या तीनो रो पबम पुरुष मेम्परे, (२) यहां से तीन कम सिट प्रपम पुषपने। ।
-- । लघुकीमुद्याम् । पुपोषिथ । पीष्टा । पोक्ष्यति । पुषादीत्यड् । अघुषत्। ११ । शुष गोषणे शुष्यति । शुशोष। अशुषत् १२ णश अदर्शने । नश्यति। ननाश । नेशतः ॥ प्रड्= लेना । ज्या=बूढा होना । वय् = बुनना । व्यध् - ताडन करना। वश् = इच्छाकरणी । व्यच् = ठगना । वश्च = काटना। प्रच्छ पूछना । घरज सुनना। पून धातुओं को कित् वा डित् प्रत्यय परे रहे, तो गम्प्रसारण होवे । ५२८ से श्यन् भी डि है तो व्यध को सम्प्रसारण हुआ । लट् में-विध्यति = वह विन्हता है। लिट् में विव्याध ५७७ उस ने ताडन किया। विविधतुः = उन दो ने ताडन किया। विव्यधिथ 'वा' विव्यद ५१७-५८० तूने ताडन किया । लुट में व्यदा ५८० । लुट् में व्यत्स्यति = वह ताडन करेगा वि० लिङ् में विध्येत्, आशिष् में विध्यात्, ईश्वर करे कि यह ताडन करे । लुड् मे अव्या- त्सीत् । ४७३, ४८३ उस ने ताडन किया, १० पुप्-पुष्ट करणा । लट् मे पुष्यति वह पुष्ट करता है । लिट् में पुपोप ४७६ = उस ने पुष्ट किया । पुपोषिथ = तूने पुष्ट किया । लुट में पोष्टा । लुट में पोक्ष्यनि । ५७८ वह पुष्ट करेगा। लुड में ५३६ से इस धातु की च्लि वो अड् हुश्रा, अपुषत् उस ने पुष्ट किया । ११ युष् = सूखना। बट में शुष्यतिवह सूखता है। लिट् में, शुशोष ४६८ वह सूखण्या १२ । (१) णश् = नष्ट होना । लट् में नश्यति = वह नष्ट होता है। लिट् में ननाय - ४८३ वह नष्ट हुआ था। नेशतु ४७८ वे दो नष्ट हुए थे । ६७० ॥ रधादिभ्यश्च । ७ । २। ४५ । बलाद्यार्धधातुकस्य वेट । नेशिथ ॥ र = आदि धातुओं से परे धार्धधातुक यदि बलादि होतो उ इट् विकल्प करके होवे । नेशिय (४८८)तू नष्ट हुआ। ६७१ ॥ मस्जिनशीझलि । ७ । ११६० । नुम् । ननंष्ठ । नेशिव । नेश्व। नेशिम । नेश्म । नशिता । नंष्टा । नशिष्यति । नक्ष्यति। नश्यतु अनश्यत् । नश्येत् । नश्यात् । अनशत् । १३ । फूङ प्राणिप्रसवें । सूयते सुषुवे । क्रादिनियमादिट् । सुषुविषे । सुषुविवहे । सुषुविमहे । सोता। सविता । १४ । दूङ् परितापे । दूयते। १५ । दोङ्क्षये। दीयते ॥ मस् सूबना । नण् इन दोनों को झल् परे होतो नुम का चागम होवे तो६७० को पक्षांतर में ननष्ठ ३२९ से और ७५ से हुआ वह नष्ट हुआ था। नेशिव ४८८ वा (१) यहां ए को न् ४८६ से प्रथम ही करलेना। -- दिपाय। नेवाइम दो नष्ट हुए थे। नेपिम १० ४८८ वा मेरम म नष्ट प । तुद् में पिता वा मटा सूट में ममिप्यति पा न स्यति५८-१० पा नष्ट गोगा । बोट में नरमतुगए में पगरयत । विधि सिम मरयेत् । भा विस में नस्यात् पर बप नष्ट होवे । धुर में पनयत् वाम र पुषा । ए पूर (पू-प्रापि को पत्पन्न करमा । पट में मूयते -पर पम्म करता है। निट् में सुषुपे २१४ उस ने पत्पन्न शिवा या। मादि नियम रो र कोट दुपा तो सविधे-तू ने उत्पन्न बियावा । मुविराम टोने सत्पम्प पिया पा । मुपुषिमरे-हमने उत्पन्न बियाया। खुद में सविता का पोता- उत्पन्न परेगा। १४ । दर (दू)-दुपी शेना । सर में -दूपते पर दुरी या। दोर (दो)-चयोमा । द में-दीयते-वह पीपीता। ६०२ ॥ दीडगेयुडचि पश्चिति ।। ४ । ६३ । दौर परस्यामादेः दिाधधातुस्य युट् ॥ प्रमादि नित् पा जित् पापपानुष परेनो तो दीर भातु को युर का पागम् गोवे । २०३ ॥ वा । बुग्युटावुषड्यपी सिही पलभ्यो। दिदीये ।। omपा यम् परना रो, तो पोर युद्ध सिर काने चाहि (दिदी- पोप पा॥ - यमो प्रादुर्भाव। ६०४ ॥ मीनातिमिनोतिदोषयपि च ।। १।५ । एषामात्वं चापादगित्ये निमित्त । दाता । दास्यवे। पदास्त । १६ । हीट बिहापसागरी। डीयते । डिहा। हयिता । १७ । पोत्यामे । पोयते पेता । पपेष्ट । १८। माठ माने । मायते । ममे । १८ मोम् - परली । माकना पोर पोरान धातुओं को (क)न्यप् परे जोनी पाफारोपबार राति पनि योर एम्पाने का निमित्त परेकोमद में दाता र मनायते-पापोनोगा। दर में प्रदात पाचपापा, ५ोर (1)- पदम ठोयी-सा है। विमति-पाया। मद में पिता १० (पो) पोना सद में पोगते-पोतारापुर में सेरम गिपरे। - पोदेगा। पर मेर-मने पिया। मनमा)-मापना। सामगो-मापना सिगे मन अपने माग enter)- प्रमा (१) पर पांगारामा भर पति को पपीमार पर angratनि पा(6) मा।
पू । सधुकीमुधाम्। ६७३ ॥ ज्ञाजनोर्जा । ७1३191 शिति । जायते । नन्नेजनिता ननिष्यते ।। 'जा' जानना । और जन् इन धातुओं को शित् प्रत्यय परे होते 'जा' होवे । लट में जायते वह प्रगट होता है । लिट् मे (४२०, ५३४, ७३) जन्जे-वह प्रगट हुआ था । लुट् मे, जनिता। लर् मे, जनिष्यते = वह प्रगट होगा। ६७६ ॥ दीपजनबुधपूरिताविप्यायिभ्योऽन्यतरस्याम् ३ । १ । ६१ एभ्यश्ले शिवण वा एकवचनेतशब्दे परे ॥ दीप = चमकना । जन् = उत्पन्न होना । वुध् =जानना । पूर्भरणा ताय फैलाना । प्याय् = बृद्धि इन धातुओं से परे जो च्लि तिसे चिण् विकारप करके होवे जव एकावचन का त प्रत्यय परे होतो ।। ६७७ ॥ चिणीलुक् । ६ । ४।१०४। चिण: परस्य लुक ।। चिण् ६७६ से परे जो प्रत्यय तिस का लुक् होवे । ६७८ ॥ जनिवध्योश्च । ७।३।३५ अनयोन वृद्धिश्चिणि गिति कृति च । अजनि । अजनिष्ट । २० । दीपी दीप्ती। दीप्यते। दिदीपे। भदौपि । अदीपिष्ट । २१ पद गती । पद्यते । पेदे । पत्ता । परसौष्ट । जन् =प्रगट होना। और वध = सारना । इन को हधि न होवे, जब चिण् अथवा भित् वा णित्, कृत् प्रत्यय परे हो, तब लुङ् में, अजनि वा अजनिष्ट = वह प्रगट हुआ। २० । दीप् = दीप्ति । लट् मे दीप्यते = वह चमकता है। लिट् में = दिदीपे= वह चमका । लुङ् में, प्रदीपि ६७६ वा अदीपिष्ट =वह चमका । २१ पट (जाना) लट् में पद्यते वह जाता है। लिट् मे =पेदे ४८८ वह गया । लुट में, पत्ता=वइ जावेगा । प्राशिः लि. में पत्सीष्ट हे ईश्वर वह जावे । ६७६ ॥ चिण् ते पदः ।३।१।६० | पदश्च्ले श्चिण ते परे । २२ । विदसत्तायाम् । विद्यते । वेत्ता। अवित्त । २३ । बुध अबगमने । बुध्यते। वोडा। भोत्स्यते । भुल्सौष्ट । अबोधि । अवुद्ध । अभुत्साताम् । २४ । युध संप्रहारे । युध्यते । युयुधे । योहा । अयुद्ध । २५ । सृन विसर्गे। सृज्यते । ससृजे । ससृजिषे ॥ एक वचन के 'त' परे होने पर पद धातु की च्लि को चिप होवे । लुड् में पपादि ६७७ = वह गया अपस्माताम् =वे दो गये। अपत्सत =वे गये २२ । विद होना। - -- - ।
स -- - । दियादव। सद म 'विपते । सुट में वेत्ता । सुर में पारित-पापा। २५ दुष् - मानना । सट में, म्यते । भुट में योग =पा समझेगा। तृट् में मोत्स्यते २५ ८० वा बानेगा । पा सि में मुस्सीष्ट-वर पाबाने । मुर में पयोधि (4100) वा पर। १२. पा समझता एमा। प्रमुत्सताम् -उन दोने समझा । २४ यु-सगर करनी। शट में युभ्यते -पापदता है। पिट में युएरे -वापरावा । शुद् में घोडा मडेगा । पर में पयुर-पासदारा सत्-त्यागना। हद में पग्यते-पात्यामतारे। सिद में समृगे- इस नेत्यागा । मसविषेतूने त्याग किया था। ६८. ॥ सुनिहगोमत्यमकिति।।१।५८ । प्रमयोरम् मतादा वकिति । स्रष्टा । सध्यते । सचीष्ट । पसृष्ट । प्रसघाताम् । २६ । मृप तितिक्षायाम् । मृष्यति । मृष्यते । ममप । ममपिथ । समषिये मपि तासि । मपितासे । मपिण्यति। मपिप्यते । २० पापग्धमे । नाति । नद्यते । मनाइ । ममद । नेपिय । नेो । नहा । मत्स्यति । पमासीत् । पद। ॥ इति दिषादयः॥ मन-शेडना । म् -देना । ल भातुर्मों को पम् पागम मेरे भव भवाति पोर वित् ररित प्रस्वप परे म तब । बुर में मारा १२८ र में सत्यते १२८ १०८ पर स्यामेगा । पर मिल में मोट-रेसर पारे।पुर में प्रमुष्ट । -दात्यागता दुपा। प्रम पाताम-उन होने त्याग किया । २५ सप ( गम् ) सहारना । सद् में पश्यति वा पच्यते पापहारता है। सिर में ममप ४०८ उसने महा। ममपित वा मपषिये तू ने पहा । मुरम ए मे (मपितामि मपितासे । तू महारेगा । सट में मपियति 'ar मपिध्यते। -रामलेगा । १० पा(पाबाम्पना । बम प मधति मनते ५। हिद मनमा-हमने बाधा । (१) ममा बाशिष प्रा लि प्र ए मेरे । सुर में नासद में नरपति पा गांगा । मुह में पास्मीत् (बा) पना-पाधता एमा। दिवादिगण समाप्तमया ॥ . । - (१) यहां नहीच पेरकी पोर म यो ए बामेमा माया कधुकीमुद्याम् । - ॥ । - KETI स्वादयः ॥ १॥ षु अभिषवे॥ ६८१॥ स्वादिभ्यः श्नु । ३। १ । ७३ । शपोऽपवादः । सुनोति । सुनुत । हुश्नुवोरिति यण् । सुन्वन्ति। सुन्वः। सुनुवः । सुनुते । सुन्वाते । सुन्वते । सुन्वहे । सुनुवहे । सुषाव । सुषुवे । सोता। सुनु। सुनवानि । सुनवै । सुनुयात् । सूयात् ॥ १ । षुञ् (सु) रनान करणा, सोमलता को कुटना । और मद्य बनाना । सु आदि धातुओं से परे ऽनु होवे यह शप का अपवाद है । लट् में सुनोति-वह स्नान करता है। सुनुतः वे दो स्ना० । सुन्वन्ति =वे स्ना०, यहा ५३० से यण् कर लेना । सुन्वः, सुनुवः, ५३१ हम दो स्ना० । श्रा० लट् में प्र० ए० सुनुते वि० अन्वाते । वह ७० मुन्वते =वे स्ना० । सुन्वहे, सुनुवहे ५३१ । लिट् मे 'मुषाव' 'वा' सुषुवे वह स्नान करता था। लुट में मोता वह सोम को पीडेगा । लोट् मध्य० ए० में सुनु ५३२ । लो० उत्त० सुनवानि 'वा' सुनवै में नहाउ । वि० लिङ् में सुनुयात् । श्रा० लि. में सूयात् ५१२ हे ईश्वर वह नह लाए । ६८२॥ स्तुसुधअभ्यः परस्मैपदेषु । ७ । २ । ७२ । एभ्यः सिच इट असावीत् । असोष्ट । २ । चिञ् चयने। चिनोति। चिनुते ॥ स्तु = स्तुति करणा। सु-स्नान । धूञ् काम्पना । इन धातुओं से तिच् को इट पागम होय जब परस्मैपद प्रत्यय परे रहे। असावीत् 'या' असोष्ट =वह स्नान । २। चिन् (चि) इकठ्ठा करणा । लट् में चिनोति 'वा' चिनुते = वह इकट्ठा करता है। ६८३ विभाषा चेः। ७।३१५८। अभ्यासाच्चे। कुत्वं वा सनि लिटि च । चिकाय । चिचाय । चिको । चिच्ये । अचषोत् । अचेष्ट। ३ स्तृञ् आच्छादने । स्तृगणोति । स्तृणुते ॥ अभ्वास से परे जो चि तिसके च के स्थान में (१) कुत्व विकल्प करके होवे जव सन् 'वा' लिट् परे होवे तव । चिकाय 'वा' चिचाय । प्रात्म० में चिको 'वा' चिच्ये उस ने एकहा किया । लुङ् मे अचैवीत् 'वा' अचेष्ट । ३ । स्तृञ् (स्तृ) ढकना । लट् मे स्त गोति 'वा' स्तृणुते वह ढकता है ॥ ६८४॥ शपूर्वाः खयः ७।४।६१ । अभ्यासस्य शपूर्वा खय. शिष्यन्ते - (१) कवर्ग ( क् ख् ग् घ्ड) गुदाया। ऽन्ये । नीलुप्यन्ते।तस्तार तस्तरतु तिस्तरे। गुसीऽतीतिगुक्षः स्तोत्। पर पूर्व मिस पो पेसा जो अभ्यास का प्य मोबचे पौरों पायोपोरे। तस्तार १८५-उसने डा तिस्तरतु' २४ हम दोमे ठका । तरतरे-उसने टमा। पा. सिंह सतर्यात् ५३०-वर पर विधाये। ६८५ ॥ तरच सयोगादेः।।२।४३ । पदन्तास्सयोगादे लिसिचीरिउवा । स्तरिपीष्ट । स्तुपीष्ट प्रस्तारिष्ट । अस्तृत। ४ । धूम् कम्पने । धनोतिधूमुते। दुधाव । परयोति। पेट् । दुधविधादुधीय। विरा घात पन्त में भी पोर प्रादि में मोम चोम से परे जो रिपोर सिप तिमपी पद पा पागम हो विकल्प भरत। स्तरिपीट तपोप्टरवर वाट मुर में पस्तरिष्य, परतत एन-१०५ उस ने उमा ।।। पू-साम्पमा सर में खूनीति धनते -4 पिता । चिट् में दुपार या पाम्या पा। 1 से ट् पिबरपा तो दुपरिव दुधीष-तापा था , ॥ श्राफ किति ०।२।११। भित्र एकाप उगन्ताच्च गित्तिोरिट् म प्रति प्राप्से । मार्दिनियमारिनस्य मिट । दुधुवे । अधावीत् । प्रविष्ट । पधोष्ट । पविष्यत् । पोष्यत् । पविष्य ताम् पधोष्यताम् । पधविष्यता अधीष्यत ॥रति स्वादयः ॥ चिपात पा एक प्रत्याहारामा पत्राच् धातु से परे सब मित् वा वित् प्रत्यय तमन्स को परमापागम म होवे । रस से पद्मा निषेप पायाती। ८ के अनुसार नित्य पीपा तब विषम दो साप । एपे-पाकापा । मुर मे पपावीत ८८५ चौर पोष्टमा पापा । पुर में अपविष्यत् पणेप्यत् । १पा पविण्यत् पभोग्यत-यदिापाप ॥ स्वाटिमा समाप्त वा । KI तुदादय ॥ १॥हुदअपने १८७॥ तुदादिम्य श ।। १ । 00 । शपोऽपवाद । तुदति। तुदते । तुतोद।तुतीदिय । तुतुदे। तोता । पतीत्सीत् भतुत्त।२।पुर प्रेरणे । मुदति मुदते नुमीद । नीता। ३ । मस्य पाके । यज्येिति संग्र सारपम्। सस्य पुत्वेन यःमस्या रत्येम वः। मृम्मति मुज्यते । पपविष्ट té - 7 लघुकीमुद्याम् तुदादि गण के धातुओं का वर्णन । १ । तुद् = पीडादेनी । तुद् आदि धातुओं से परे श प्रत्यय होवे यह शप् ४१३ का अपवाद है। लट् मे (१) तुदति, तुदते वह पीडा में देता है । लिट् में तुतोद उस ने पीडा दी। तुतोदिय = तू ने पीडा ही 'वा' तुतुदे । लुट् तोत्ता = वह पीडा देगा। लुङ् में भतीत्सीत् ४८३ 'वा' अतुत्त उसने पीडा दी । २ । णुन प्रेरणा करणी । लट् में नुदति वा नुदते = वह प्रेरता है। लिट् में नुनोट ४७६ = उसने प्रेरणा की । लुट में नोत्ता= वह प्रेरेगा । ३ । नस्ज-भुन्नना (भूनना ) । यहा ६६८ ले सप्रसारण (र् को क्य) ओर ७३ वे से ‘स् को म्' २२ वें से 'श् को ज्' किया तो भृज्जति 'वा' भृज्जते वह भूनता है ॥ ६८८ ॥ भस्जो रोपधयोरमन्यतरस्याम् । ६ । ४ । ४७ । मस्जी- रेफस्योपधायाश्च स्थाने रमागमो वार्धधातुके । मित्वादन्त्यादच. परः स्थानषष्ठीनिर्देशाद्रीपधयोनिवृत्ति । बभन । कभर्जतः । बभर्जिय ।। वभठं । बधज्ज । बधज्जतु । बञ्चन्जिथ । स्कोरिति सलोप. । ब्रश्चेति षः । बभ्रष्ठ । बभर्जे । बभ्रज्जे । भग । खष्टा । भक्ष्यति । वक्ष्यति। डिति रमागमं वाधित्वा संप्रसारणम् । पूर्वविप्रतिषेधेन। भृजज्यात् । भृन्ज्यास्ताम् । भृन्ज्यासु.। भर्तोष्ट। भक्षीष्ट । अभार्थीत्। अक्षाक्षीत् अमष्टं । अनष्ट।8। कृष विलेखने । कति । कृषते । चकर्ष । चकले। बस्न धातु के रेफ और उपधा के स्थान में रम् आगम विकल्प से हो जव च्यार्ध धातुक परे हो तब, यद रम् २६० के अनुसार अन्त्य अच् से परे होता है ।स्थान (२) षष्ठी निर्देश से रेफ ओर उपधा को निहत्ति हुई । इस लिये लिट् में वमर्ज-- उसने भूना । यस बंतु = उन दो ने भूना। बभर्जिथ 'वा' बभर्छ -तु ने भूना।दूसरे पक्ष में बच्चन्ज, वभ्रष्नतु' वश्वज्निथ षट् के अभाव पक्ष में ३३२ से स् का लोप और ३२८ से अन्त्यवर्ण को ष् हुधा तो बभ्रष्ठ तूने भूना । आत्म० लिट् प्र० ए० में बभने 'या' बनण्ने । लुट में भष्र्टा, भ्रष्टा स्तृट् में भय॑ति, वक्ष्यति = वह भूनेगा । जब कित् वा ङित् प्रत्यय परे हो तब रमागम को बाध कर ६६८ से सप्रसारण होता है पूर्वविप्रतिषेध से । भूरुच्यात् = ईश्वर करे कि (१) यहा श को अपित् सार्वधातुक होने से गुण का निषेध हुन्ना । (२) यहा यह विचार है कि ६७८ सूत्र में धातुमात्र के उन्चारण से रम् आगम हो सकता था पुन' षष्ठी युक्त रेफ और उपधा के निर्देश से यह सिद्ध हुआ कि रम् आदेश है इसी से रेफ और उपधा को टाल कर हुआ क्योंकि स्थान षष्ठी का यही प्राशय है कि किसी के स्थान मे दूसरे का होना।
तुदाय। - से पद विवरण ऽध्ये। लीलुप्यन्ते।तस्तार तस्तरतु तिस्तरे। गुपी तातिगुवः स्तोत्। परे पूर्व मिस पे ऐसा बोपन्यास का पय् धो बचे पौरों फासोपीये। तस्तार १८५-उसने हवा तस्तरतु' १२४ उन दो का । तसरे-उसने टका। पा हि में स्तर्यात् ११०-वर परे विवाह ।। ८५ ॥ तरच सयोगादे । ७ । २।४३ । पदम्तास्सयोगादे लिम्सिघोरिसषा । स्तरिपीष्ट । स्तुपौष्ट प्रस्तरिष्ट । अस्तृत। ४ । धूम् वाम्मने । धनोति धनुते। दुधाघ । स्वरतीति। पेट् । दुधविधाधोध । विस पातु पो पात में चरी पार पादि में मंग्रेग होम से परेको गिरीर सिच तिन पोष्ट ना पागम से विकरप परयो । स्तरियो स्तषीप्टरवर पाठ सुर में पस्तरिष्ट, परतात - उस ने रखा । ४ । धू-काम्पना सर में धनोति अनुते - पिता। चिद में दुधाप पा पाम्मा पा।।। पा तो दुपपिच दुधी-तूपापा था । ८॥ बुक किति ७।२।११। श्रिम एकाप उगन्ताच्च गिणितोरिट् म प्रति प्राप्ते । कादिनियमाग्नित्व मिट् । दुधुषे । अधावीत् । पधविष्ट । प्रधोष्ट । पविष्यत् । अयोध्यत् । भविष्य- ताम् पधोष्यताम् । प्रधविष्यता अधीष्यत ॥ इति स्वादयः ॥ घि पातु वा उ प्रत्याहारान्त पत्रा धातु से परे पर मिल पा वित् प्रत्यय तब इस को रमाभागम मा । स ये रद का निषेध पायातो। के अनुसार नित्य पीद पा तब दुषिव सम दो थापे । पुपुणे-पाण। मुर में पपाषीत ६८. और पापिष्ट । मोप्ठ मा बापा । सूर में पपरिष्यत् पणेष्यत् ५५ पा पविम्यत् प्रपोष्यत-यदिपा पाप ॥ स्वाठिमप समाप्त हुया । । तुदादय ॥ तुदश्यमने ६८०॥ तुदादिम्य गः।। १ । ०० । थपीऽपपादः। तुदति। तुदते । तुतोदात्तोदिय । तुतुदे। तोता । पतोत्सीत् चतुत्त।।पुद प्रेरणे । गुइति मुदते नुनोद । गोसा।। यस्य पाके । परिन्येति संग्र सारणम्। सस्य रघुवन यः। गस्य रावेम वा। मुन्नति मन्यते ॥
८१ -- १ लचुकीमुद्याम् लट् में मुम्चति 'वा' मुञ्चने वह त्यागता है । 'लुट में मोसा । प्राशीलिंड् में, मुच्यात् 'वा' मुक्षीष्ट हे ईश्वर वह कोडे । लुड् में, प्रसुचत् ५३६ 'या' भमुक्त = उसने त्यागा । अमझाताम् उन दोनों छोडा । ७ । लुप्ल (लुप) काटना । लुम्पति 'वा' लुम्पते = वहकाटता है। लुट में लोप्ता ४७८ = वह काटेगा। लुङ् में, अलुपत् ५३६ वा अलुप्त-उसने काटा ८।विद्ल (विद्) =लभना । लट् में, विन्दति वा विन्दते = वह लभता है लिट् में, वि- घेद ४७८ वा विविदे = वह पाता हुआ। व्याघ्रभूति के मत में यह धातु सेट है तव लुट में, वेदिता । महाभाष्यकार के मत में अनिट् है, तब परिवेत्तावह बडे भाई से प्रथम स्त्री लभेगा। ८ । पिच् । सिच् =सोचना । लट् में सिन्चति वा सिन्चते वह सींचता है। ६६२॥ लिपिसिचितश्च । ३।१ । ५३ । एभ्यश्च्लेरङ् । अनिषत् लिए, सिच्,और वेञ्= स्पर्धा करणी। इन से परे जो च्लि तिसे अङ् होवे लुङ् में । सिचत् = उस ने सींचा। ६८३ || आत्मनेपदेष्वन्यतरस्याम्।३। १ । ५४ । लिपिसिचिह्नः परस्य च्लेर वा। असिचत । असिक्ती १० लिप उपदेहे । उपदेहो हड्छि । लिम्पति । लिस्पते । लेप्ता। अलिपत् । अलिपत । अलिप्त ॥ ॥ इत्युभयपदिन ॥ प्रात्मने पद में, लिप्, सिच्, और हेज्, इन धातुओं कि च्लि को अड् विकल्प से होवे । पसिचत वा भसिता = उसने सींचा । १० । लिप् = पोचना । उपदेह का अर्थ हदि है। लट् में, लिम्पति या लिम्पते = वह लेपता है। लुट में, लेप्ता वह लिपेगा । लुङ् में, बलिपत् ६८२वा भलिपत । अलिप्त ६८३ =उसने लिपा।(१)उभयपदि धातु समाप्त हुए। ६८४ ॥११ कृती छेदने । वान्तति। चकतं । कार्तिता । कार्तिष्यति कस्य॑ति । चकीत् । १२ । खिदपरिघाते । खिन्दति। चिखेद । खेत्ता १३पिश अवयवे। पिंशति।पेशिता। १४ श्रीवश्च छेदने। वृश्चति। वद्रश्च बद्रश्चिय । वव्रष्ठ । ब्रश्चिता। ब्रष्टा । व्रश्चिष्यति ब्रक्ष्यति। श्च्यात् । अवश्चीत् । १५ । व्यच व्याजीकरण । विचति। विव्याच । विविचतुः । व्यचिता।। व्यचिष्यति। विच्यात् । अव्याचीत् । अव्यचीत् । व्यचे कुटादित्वमनसौतितु न प्रवर्तते । अनसीति पर्युदासेन कृन्माव- (१) नो परस्मैपट और धात्मने पद में धातु ही।
८ तुदादय पर भूने । मृण्म्यास्ताम् । मृग्यामु । पात्म म ए भीष्ठ 'या' भवीष्ट पर बरे शिपा मूने । नुर में पमाचीत् पमाधीत् 'पा पमष्ट पपष्ट उस ने मूना 181 पर भोतना पा चना । उट में पति अषते पिट में वर्ष पनवे-उसने । पर ॥ पनुदानस्य पर्दुपधस्यान्यतरस्याम् ।। १ १ ५८ 1 उप देगेऽमुहाती य पादुपस्तस्याम् वा मावादावकिति कष्टा, कष्ठा । शाषीष्ट। जो धातु उपदेश में पनुदात्त हो और कादुपध (बिसपी पपा च) निसको पम् पागम पिपरपोबर चित् से मिन्न भसादि पार्धभातुम परे । तप पुर में अष्टा 'पचमें पटापायी प में पदीष्ट पर बातचे। ६८. ॥ वा• । म्पृथमनसषतपरपरले सिम्या वाच्य । पळा पीत् । पका/त् । पठापत् । अवष्ट । पठादाताम् । पकवत । ५ मिथ सामे । भिवति । मिलते। मिमेख । मेक्षिता ! पमेलीत् । । । मुलमोचमे। स्पा-मा। नागना । सप्-वेचना । तृप्-तृप्तहोना । इप्-पभिमान परपान पातुपी से परे वो पिच से सिन् विपाप करतो ऐसा पाना चाहिये। पुर में म ए पापीत् अवार्षीत् ५५ मताचा सपा पाटी में पापाताम न दोने पंचा । पात ५-हमने चामिन् -मिना । स में मिति मिलते । सिद् में मिमेत । पुर में मेसितादुर में प्रमेसीत् । 8.40 पर मिपा । मम्स (मुच्) पोरना। ६८१॥ गे मुपादीनाम् ।।।। ५९ । मुलिपिनुप्सिच् कृत्खिपियो नुम् । मुमति । मुध्यते । मोला । मुण्यात् । मुघीष्ट । प्रमुपत्। पमुख । प्रमुधाताम् । ७ । लुप्त छेदने । लुम्पति । सुम्पते । लोप्ता।पसुपत्। पषुम्त ।८ । विदल लामे। विन्दति। विन्दते। विवेद । वियिदे । व्याघ्रमतिमते सेट् । पेदिता । भाष्यमतेऽनिट् । परिवेता। पिचर धरणे । सिध्यति। सियते॥ मु-शेवगा । चिप्-वेपना। विद - पाना । गुप-चाटना। रिप-सोधमा । हा-बाटना । पिद-पोवादेना । पिम्-पीमना । म पातुभो यो परे कोने मुम्ही -- लचुकौमुद्याम् ६९५ ॥ तोपसहलुभरुपरिषः ७।२।४८ । इच्छत्यादे. परस्य सादेरार्धधातुकस्येड्वा स्यात्। लोभिता।लोधा। लोभिष्यति। २०, २१ तृपतृम्फ तृप्तौ । तृपति। ततर्प । तर्पिता। अतर्पोत्। तुम्फति ॥ इष् = इच्छा करणी, गड् = सहना, लुभ = लुभाना, रुष = मारणा, घिमारणा । एन धातुओं से परे तादि आर्धधातक को इट् विकल्प करके होवे । बुट में, लोभिता । लोधा = वह नुसावेगा। लूट में, लोभिष्यति =वह लोभावेगा । २०, २१, तृप, तृम्फ = तृप्त होना । लट् में, तृपति = वह तृप्त होता है। लिट में, ततर्प ४७८ = वह तृप्त हुआ था। लुट मे, तर्पिता = वह तृप्त होगा। लुड् मे, प्रतीत् ४७८ = वह तृप्त हुा । ( ऐसे ) तृम्फति वह तृप्त होता है ।। ६८६ ॥ शे तृम्फादीनां नुम् वाच्यः। आदिशन्दः प्रकारे तेन येत्र नकारानुषक्तास्ते तृम्फादयः। ततृम्फा । तृफ्यात् २२, २३ मृडपृड। सुखने मृडति पृडति। २४ । शुन गतौ । शुलति। २५ ।दूपु इच्छायाम् । इच्छति । एशिता एष्टा एषिष्यति । इण्याता ऐषीत् । २६ । कुट कौटिल्ये। गाल- टादीति डित्वम् । चकुटिय । चुकोट । चुकुट कुटिता।२७। पुट संश्ले- षणे। पुटति । पुटिता । २८ । स्पट विकसने । स्फुटति । स्फुटिता। २६,३० स्फुर स्फुल संचलने ।स्फुरति स्फुल ति ॥ जब श (६८७) परे हो तव तृम्फादि धातुओं को नुम् होवे। यहां मूल भष्ट प्रकार का वाचक है, इस लिये तृम्फ के सदृश प्रकार वाले वे धातु हैं जिनकी उपधा में नकार है । लिट में, ततम्फ = वह तृप्त हुआ। प्रा. लिड् में तृफ्यात् = हे ईश्वर वह तृप्त हो ।। २२-२३ । मृड् पृड् = सुखीकरना । लट् में, मृडति, पृडति = वह सुखी करता है २४ । शुन् -नाना । लट् में, शुनति = वह जाता है । २५ । इष् = इच्छा करणी । लट् मे, इच्छति ५३३ - वह इच्छा करता है। लट में, एपिता वा एण्टा ६६५ = लूट में, एषिष्यति वह इच्छा करेगा। प्रा. लिङ् मे, इष्यात् । लुङ् में,(१) ऐषीत् = उसने इच्छा करी । २६ । कुटकुटिलता करणी । इस धातु से परेजो प्रत्यय मित् वा णित् न हो वे ६१८ से डित माने जाते है । लिट् म° पु० ए० में, चुटिथ = तूने कुटिलता की। यहां ही उत्तम पु. ए. में. ४८४ से पित्य विकल्पहुआ तो चुकोट वा चुकुट = मैने कुटिलता की। लुट में (१) यहा ४७२ से भाट और (प्राटश्च से हदि करलेनी। में आदि - - ८२ तुदादर -- । । विषयत्वात् । १६ । उच्छि चन्छ । एन्छ । कृपश पादान काषिगाय जन शिक्षमिति यादव ।१छ गतीन्द्रियप्रलयमत्तिभाषेषु। ति । अचछत्यतामिशि गुपा । शिव्यावस्यानेफालुपलचपरवान्म। पामच्छ । पानसईतु । पच्छिता । १८ । उम्म उत्सर्गे । उन्मति। १८ शुभ विमोग्ने । सुभति । ११खती (वर) -काटना ।सट में वन्तति ५-या चारतारे । चिद में पवर्त-उसने बाटा । सुट में पतिता-या बाटेगा। बट में बार्तिण्यति वास्यति पर काटेमा दुध में पकत्तात् ४०-उसने काटा। १२ विद पीना देनी। पर म ए में सिन्दति । सिर में चिरेद-उसने पीग दी । मुद् म प्र में खेत्ता ११ पिम् -पीसना ।ट् में पिंपति-पा पोसता सुद में पेभिता-पा पोखेगा । १४॥पोज रचू (जर)-पारमा । सद् में हरति ।१८-या काटता है। सिद् में वरच ३१ । २०० ५२ पोर २२-उसने वारा। पश्चिम परष्ठ । -तूने माटापा। चुद में प्ररिचता प्रष्टा ५ । ।सद में प्ररिचष्यति प्रत्यत्ति २१९ ३२८ ०८ पुन-पा काटेगा। पागीबिर में हरयात् ५५८ । नुर में पवावीत् - इसमे काय १५ व्यच - ठगपा । पर में विचति ५८ २०८-पाठमता है। दिन में विष्णप 10 -लस ने ठगा । विविधतु १८ उन दो में ठगा । बुद् में प्पचिता । मृद में व्यचिष्यति -पर ठगेगा । पापी में विच्यात् १६८-वर परे विकाठम। गुरमें पम्मानीत् ४८, पम्पचीत् -हस में ठमा । व्यच् पातु पम् पप या प्रत्यय शेष पम्म प्रत्यय परे चोरो कुटादि माना पाये। इस पातिब वो पात्ति यह पि निषेध वेरिये नहीं होती पयों विवो 'मनसि' में नम् पर्युदास ( ठप्त से मिन उस तुस्य वा पास पिये प्रस्म स्वयं मात्र ही इस बार्तिक वा विषय है। सरिक (-)-दापार चुलना । या यादव कोष में ऐसा हिरा किन्न पर्व दारा २ कर पुमना । पौर बरिणादिमी पापा पररा सिसा पुगचा ये रे । १० पाच-बाना इन्द्रिवी से विपितरोना और सपत होना । बाद में पति-पापाता है। सिद् में 410 में गुष दुपा । पोर ४८२ में लिए पार को भनेवाची या पाच होने पररार से (1) नुन पान-पा मया । पानन्या -पेदा गए। नर में पिता-पा बापमा हम्मा-त्याम परपा । बाद में उन्मति- शेतारे । १८ तुम्-तुमाना मोहपारसद में सुमति-पागोमाता। (1) तस्मान्नुनि स मूत्र में सीमों में प्रमेवर मी पमिमत।
- - । =वह तृप्त - लवुवोमुद्याम् ६८५ ॥ तोषसहलुभरुपरिषः ७। २। ४८ । इच्छत्यादेः परस्य तादेरार्धधातुकस्येड्वा स्यात्। लोभिता। लोब्धा। लोभिष्यति। २०, २१ तृपतृम्फ तृप्ती। तृपति। तत । तर्पिता। अतीत्। तस्फति ॥ इम् = इच्छा करणी, मह = सहना, लुभ = लुभाना, रुष =मारणा, रिष = मारणा। पून धातुओं से परे तादि आर्धधातक को इट् विकल्प करके होवे । लुट में, लोभिता । लोब्धा-वह लुभावेगा। लुट में, लोभिव्यति = वह लोभावेगा । २०, २१, तृप, तृम्फ-तृप्त होना । लट् में, तृपति = वह तृप्त होता है । लिट् में, ततर्प ४७८ = वह तृप्त हुआ था। स्लुट् मे, तर्पिता = वह तृप्त होगा। लुड् मे, प्रतीत् ४७८ = वह तृप्त हुाँ । ( ऐसे ) तृम्फति होता है। ६६६ ॥ शे तृम्फादीनां नुम् वाच्यः। आदिशब्दः प्रकारे तेन येत्र नकारानुषतास्ते तृम्फादय । ततृम्मा । तृफ्यात् २२, २३ स्मृडपृड। सुखने मृडति पृडति। २४ । शुन गतौ । शुनति। २५ ।दूषु इच्छायाम् । इच्छति । एपिता एष्टा एषिष्यति । इष्याता ऐषोत् । २६ । कुट कौटिल्ये। गाड- टादौति डित्वम् । चकुटिय । चुकोट । चुकुट कुटिता।२।७। पुट संश्ले- षणे। पुटति । पुटिता । २८ । स्फुट विकसने । स्फुटति । स्फुटिता । २६,३० स्फुर स्फुल संचलने ।स्फुरति स्फुल ति॥ जब श (६८७) परे हो तब तृम्फादि धातुओं को नुम् होवे । यहा मूल में आदि शब्द प्रकार का वाचक है, इस लिये तृम्फ के सदृश प्रकार वाले वे धातु हैं जिनकी उपधा में नकार है । लिट् में, ततम्फ = वह तृप्त हुआ। श्रा. लिड् में तृफ्यात् = हे ईश्वर वह तृप्त हो ॥ २२-२३ । मृड् पृड्= सुखीकरना । लट् में, मृडति, पृडतिवह सुखी करता है २४ । शुन् =जाना । लट् में, शुनति = वह जाता है । २५ । इष् = इच्छा करणी। लट् में, इच्छति ५३३ =षह इच्छा करता है । लट् में, एषिता वा एष्टा ६६५ = लुट में, एषिष्यति वह इच्छा करेगा। श्रा. लिङ् मे, इष्यात् । लुङ् में,(१) ऐषीत् = उसने इच्छा करी । २६ । कुट कुटिलता करणी। इस धातु से परे जो प्रत्यय अित् वा णित् न हो वे ६१८ से डिस् माने जाते है । लिट् म° पु० ए० में, चुकुटिथ -- तूने कुटिलता की। यहां ही उत्तम पु. ए० में ४८४ से पित्व विकल्प हुआ तो चुकोट वा चुकुट = मैंने कुटिलता की। लुट में (१) यहा ४७२ से आट और (पाटश्च से वृद्धि करलेनी। ।
८४ । तुदादय बुटिता । २० ।पुर-पाणिनबरनासिद में पुठति । मुट्में पुटिता१८-पापानि परेगा । २८ । स्मुट-पूराना सद् में स्पुटति-मामूबता है।तुर में स्पुटिता-पा पूसेना । १८१ ।रपुर स्पुत्-पुरकाना। सद् में स्परति स्णुचनि-पापरवता रे १८७॥स्फुरतिस्फुरत्योमिनिविभ्यः।८।३।०६षत्वंया। मिष्फु रति । मिस्फुरति ३१ ए स्तवने । परिपतगुणोदयः । मुवति । नुनाव । मुषिता । ३२ । टुमस्वो गुदी। मन्जति। ममज मस्मिनथीरिति नुम । मिर नि पोर वि उपसर्ग से परे स्पौर स्पुत् पातु पोस् को प् पिवरप से शेये।ट में निष्पुरति निस्पुरति 1-47 पहा पुरवता २।११। पूस्तति परपी । यहादी ही बारवेसे परिपूत मुबोदय-जिसके गुरों का पदय रतुत गरस सदा परप में यदि कस्य होता तो शन्द टूट जाता । सर में नुपति । सिद् में नुनाए । बुद् में गुविताः पास्तुति सरेगा।१२।मस्मो-मस्वभुमरपाासट्में (९)मबति-पायुरुष रता है। सिर में ममन्न-वा मुश्परता पाएनसे परे होते रस धातु को नुमगोता। ६८८॥षा। मस्बरमत्यापर्वोमुम् वाध्यः। संयोगादिषोप ।ममध्यय ममम्मिय । मया । मध्यति । माचीत् । पारधाम्। प्रमार । २३ । रुषो भो । रुषति। रोला । रोक्ष्यति। परीधीत् ॥ २४ । मुजो की टिक्ये । कवियत् । ३५ : विग प्रवेशने। विशति । R( । भय पामगमे । पामर्गम स्पर्थ । पनुदात्तस्य चर्दुपधस्याम्यतरस्याम् । प्रमाचीत् । घमारीत् । पमधत्। २० । पदयू विधरणगत्यवसादनेषु । सौदती त्यादि । १८ । गदल गाने। म धातु पाप पपरम पूष नुम् री ऐमा काना चाहिये। पौर एक चोप दुपा। तब ममस्यय २५ ११८पा ममन्त्रिप-तने गुप धिमा । नुर माग 4014८८५११ १२८ ८१.५-पायोधेमा । मद में मारति । कुम्मे (१) पमाणीत् -पमानाम् । पमार पापम् -तोरमा । तद् में जति बा तोता। मुद्र पु प म रोमासर में रोस्यति । सुर में परीचीत् र उस ने गोशा। मुन्- पुरिन करता सिवे पपत्र ममान धारे बाते ।। पिम् -प्रम बरामद में नियति- म परमारे। मुम-पूना-सरस धम् विप से दुभाता (1) यह स्तोरनारपु से पुरण पोरममात्र ममि म अम्बर सने। (१) बमोतीमी गुस्से मम पुश्पक परे। । म ह . लघुकीमुद्याम् लुड में भम्नाक्षीत् ३२८, ५७८, या अमाक्षीत् वा ६८० अमृक्षत् ६२१ = उसने छुधा ।। ३७ ॥ पदल (सद) - विशीर्ण होना वा जाना वा दुःखी होना । लट् में, ५१६ सीदति इसी प्रकार के और रूप भी जान लेने ॥ ३८ । सद् विशीर्ण होना ।। ६८६ । शदेः शितः। ११३१६० । शिनाविनोऽस्मात्तडानौ स्तः । शीयते । शीयताम् । शीयेत । अशीयत। शाशाद । भत्ता। शत्स्यति अवदत् । अशत्स्यत् ॥ ३६ । क विचेपे ॥ शद् धातु से जब पित् प्रत्यय होने वाला हो तब तड्, और भान, होवे = लट् में शीयते, ५१६ वह विशीर्ण होता है। लोट् में, (१)शीयताम् । वि, लिड् में,शीयेत लिड् में, प्रशीयत । शित् प्रत्यय के अभाव मे, लिट में ४८३(२)गपाद । लुट मे शत्ता ५०४ । लूट में, मत्स्यति । लुङ् में, प्रशदत् ५२६ । लुड में, प्रात्स्यत् ।। ३८ । कृ = फेंकना ।। ७०० त इद्धातोः। ७ १ १ १ १०० । किरति । चकार । चकरतुः चकरुः । करिता करीता । कीर्यात् ।। कारान्त धात को एकार होवे । लट् में, फिरति ७००, ३४ = वह फैकता है। लिट में, चकार ६४७, ४८३ =उस में फेंका । चकरतु' - उन दोने का । चका. =उन में फेंका । लुट मे, करिता, करीता ६४८ = वह फेंकेगा। पा० लिङ् में, कीर्यात् ७०० ६४५ हे ईश्वर वह फैके॥ ७०१ । किरती लवने । ६ । १ । १०४ । उपात् किरतेः । सुट छ- दने । उपस्किरति॥ काटने अर्थ में उपसे परे जो कृ धातु उसे सुटमागम होवे । उपस्किरति= वह काटताह ७०२ | अडस्यासव्यवायेऽपि । ६ । १ । १३६ । जब भट् वा अभ्यास का व्यवधान हो तो भी ७०१ में सुट हो । ७०३॥वा।सुटकात्पूर्व इति वक्तव्यम् । उपास्किरत्। उपचस्कार। धातु के क् में पूर्व सुट् हो यह कहना चाहिये, उपास्किरत् ७०१, ७०२ । उपचस्कार -उस ने काटा। ७०४ । हिंसायां प्रतेश्च । ६ । १।१४१ । उपात्प्रतेश्च किरतेः (९) यहा से तीनों प्रथम पुरुषों के रूप है (२) यहा से लुङ्ग पर्यन्त प्रथम युरुषों के एक वचन के रूप है। । १ - य तुडादय सुट हिंसायाम् । उपस्किरति । प्रतिस्किरति ॥ 8. ग निगरसे पिसा पर्व में उप पोर प्रति परेन धातु को सुट हो। पस्किरतिमा (१)मतिस्वि रति ।ग-नियम सेना : ७.५ । पधि विभाषा । ८।२।२१ । गिरते रेफस्य खोऽबादी प्रत्यये । गिणति । गिरतिबगाख । नगार। बगलिया बगरिय। गलिता। गलीता । गरिता । गरौता । ४१ । प्रच्छ जीप्सायाम् । अभिव्येति ! सम्प्रसारणम् । पृच्छति । पप्रच्छ । पप्रच्छतुः । पम छुः प्रष्टा । प्रक्ष्यति पमावीत् ॥ ४२ । मह प्रावस्यागे ॥ पत्रादि प्रत्यय परे हो तो ग पातु के रेप पो पो पिकल्प परो । मद् में गिर ति-पा निगसतारे। चिद में पस पा चमार-पा निगसता मा। पर में बक्षिण पानगरिख । नुन में गलिता गीता ॥८ वा गरिता गरीता -दा निगगा । प्रव-पूना । चद में से सम्मधारप पा तो पति-पा पूजता है । छिट में पग-उसने पूछ । पातु उन दोने पूश । पम-हनने पूछा । दुद में प्रप्टा ३२८ नपा पूरेगा। सट् में प्ररपति । तुर में पपासीत् - उसने पूर्ण । ४२ । प-मरना। ०६ । मियते विगेरच । १ । ३ । ६१ । लुम् विडो गितरच प्रतिमतान्महस्तानी नाग्यचारिन् । पूयम् । मियते ममार। मा मरिष्यति । मपोष्ट । पमत। ४३ । पर व्यायामे । प्रायेणार्य व्यार पर्वः । व्याप्रियते । व्यापले व्यापप्राते । व्यापरिष्यते । व्यापूत । व्यापू पाताम् । ४४ । जुपी प्रीतिसेवनयो । नुषते । नुनुपे। ४५ । पोषिबी भयचनमयो । प्रायेय सत्पूर्व । उहिलते । ए पातु से पात्मने मद मस्यय गे बब मर सि पोर मित् प्रत्यय की विपप तारो तब सम्पर नहीं। सर में 100 से रिए (रि) पोर २७ से रसद (य) हुए। मियते-पामातालिम ममार- मग पाामुद में मताराबाद में मरिष्यति। 1॥-पा मरेगा। पा, लिए में, पपोम लोमर या मरे। मु में प्रयत Kor nामराप(उपम परता) स क पूरी विपीर पार माय बने ततेरे में प्याप्रियते । निद में प्यापपे । प्यापपाते हम दान हम पिया बा (१)मा किमापरता - - 1 लघुकौमुद्याम् लुट में व्यापरिष्यते । लुङ् में, व्यापृत = उसने उद्यम किया। व्यापाताम् - उनदो ने उद्यम किया ।। ४४ । जुष् = प्रेम और सेवा अर्थ से है। लट् में, जुषते लिट् प्र० पु, ए, में जुजुषे = उसने सेवा की ॥ ४५ । ओविनी (विज्) = डरना वा काम्पना । प्राय. वह धातु १ (उत् पूर्व ) ही रहता है । लट् में उहिजते = वह डरता है ।। ७०७॥ विज इट १ । २ । २ । विजे पर इडादि. प्रत्ययो डिहत् उद्विजिता॥ ॥ इति तुदादयः ॥ इट् है आदिमें जिसके यदि ऐसा प्रत्यय विज धातु से परे हो तो वह प्रत्यय डित् के सदृश हो । लुट में, उविजिता=वह काम्पेगा । ॥ तुदादिगण समाप्त हुभा ॥ Pal अथ धादयः ॥ १। रुधिर आवरणे। ७०८ ॥ रुधादिभ्यः श्नम् । ७ । १ । ७८ शपोऽपवाद. । रुणद्धि ! श्नसोरल्लोप । रुन्छ । अन्धन्ति । रुणसि । रुन्छः । सन्छ । सदाध्मि। सन्ध्वः । सन्स. । रुन्छे । रुन्धाते । सन्धते । सन्त्से । कन्धाथे । सन्ध्वे रुन्धे। सन्ध्वहे । सन्ध्महे। रुरोध । रुरुधे । रोद्धा । रोल्स्यति । रोत्स्यते रुणधु । सन्धात् । रुन्डाम् । सन्धन्तु । सन्धि । समाधानि । रूणधाव । रुणधाम । सन्ताम् । रुन्धाताम् । रुन्धताम् । सन्त्स्व । रुग्णधै । रूपाधा- वहै । रुणधामहै । अरुगत् । अरुणद् । अरुन्ताम् । अरुन्धन् । अझन्छ । अरुन्धाताम् । अरुन्धत । सन्ध्यात् । सन्धीत । रुध्यात् । सत्सी- ष्ट । अरुधत् ! अरौत्सीत् । अरोत्स्यत् । अरोत्स्यत । २ भिदिर विदा- रणे । ३ । छिदिर् वैधीकरणे । ४ । युजिर् योगे । ५ । रिचिर् विरेचने । रिणक्ति । रिते। रिरेच । रेता । रेक्ष्यति । अरिणक् । अरिचत् । अरचीत् अरिक्त । ६ । विचिर् पृथग्भावे । विनक्ति । विते । ७ । नुदिर् संपेषो । क्षुणत्ति। क्षुन्ते । क्षोत्ता । अक्षुदत्। अक्षौत्सीत्। अक्षुत्त । ८ । उच्छृदिर् दीप्तिदेवनयोः । कृणत्ति । छन्ते । चच्छदं । सेसिचौतिवट । चच्छृत्से (१) उत् है पूर्व जिम के ॥ - - ८८ २१८ तुम दो । धादया पदिये। छर्दिता । शर्दिष्यति। छरय॑ति । पच्छदत् । मच्छर्दीत् । पदिष्ट । १ तृदिर् हिंसामादरयो । तृणति । राते। १• कृती मेष्टमे । आपत्ति । ११, १२ ता हिसि पिसायाम् ॥ अव रुषादि मप की पातुओं का वर्णन किया जाता है। पपिर (ब) पापरण परपापा घेरना()वादि धातुपोंसे परेमम होगा गप्पा पपपासमट में कपि १५५ ५८ २२ बा घेरता । पवार का सीप हुपा तो सम्म १८ ५ पेदो घेरने रे । सम्पन्ति मेरेरते । पत्सि तू घेरता घेरसे से। तुम घेरते हो। पचम्मि मे घेरतापनवम दो घेरते रे माम, म घेरते हैं। (२) बमो८ । पन्धाते ८२,५पते ५१५। पनसे ८०। रुम्पाये। बन्ने । सम्धे । इम्पो । सन्मो। सिद् में रोष पा र उसने मेरा । पुर में रबि १०८८ २२ । सर में रोस्स्मति ८० वा रोस्पते पर घेरेमा । नोट में दा १५ २२. वाघेरे । बलात् ४१८ पर करे कि पा धेरै । पन्नाम् । ( सम्धन्तु । परिवार पतूंवर बियानि १५१ मेवर पाय Tम दो चरें। उपधाम पमधेरे । बा(हायो ५८ ८२, ५पाताम् । एस्पताम् ५५१। सरस्व ८० पधै ४ावावी। धामो में परपत् पा परषद् ५८ उसने धेग । परम्वाम् ।।१८ २८५ हम ने घेरा । पन्धन बनने घेग वा पा में पहना परुन्धाताम् । परापत उगने घेरा। पि सिर में इन्स्यात् मा पम्मीत पारे। पाणी िमे सम्मान पाए सीट वर पा परे। सुर में परवत् १२ । भरोस्पीत Vा, उसने घेरा । मा में पगेत्स्यत् वा परोस्स्थत यदि पारे। १ भिदिए (भिद)-तोडमागिर-दि दो टुबरे करने ।। युधिर (दुष)-मिखाना । इन भातुपों को (पिए) ने गमान माग देना।। रिषिर (रि)-पाटीपरपा सिर में रिपति पा रिदये - पाती भरता । सिर में रिरच-हमने पासो लिया। मुद में रेणा ०८ पद में रेस्पति -यह पानीवरेगा । सर में परिक्षण १८५ सुर में परिषत् ५५ पा परवीत् पात्मने। पद में पति (१२ १०) उसने पीषिया । पिचिर (वि) -भिन्न होना। सर में दिनति पाणि-मा मिन तारे। . चुदिर (धुर) पीएमा सम् पति पा घुम्ते - पीमतामुर में पोत्ता-या पोसगा। नुम् में पदत् र (१) पेरला रे प्रादिमें बिनो। (९) यहां स मप रूप पात्मनेपद में नए र।(१) या दोनी सोट् प्र पि मापन रूप में पात्मने पर मनोरथे प्रपम पुरुष पुग१ मायम क पकापन गपुन: तीन उत्तम दे करें। - म te - 1 लघुकोमुद्याम् अक्षौत्सीत् ४८३ दा अक्षुत्त५०७ - उसने पीसा । ८ उदिर् (च्छुद)- चमकना वा खेलना लट में कृणत्ति वा छुन्ते = वह खेलताहै । लिट्में चच्छर्द = उसने खेला । स् परे होते ६६४ से इट् विकल्प करके हुआ तब । चच्छृत्से, चच्छृदिषे-तूं चमका । लुट्में छर्दिता । लुट्में छर्दिष्यति, छर्त्यति ६६४ =वह खेलेगा। लुड़ मे अच्छुदत्, अच्छर्दीत् वा अच्छर्दिष्ट । उतृदिर् (तृद) =मारणा वा अनादर करना । लट् मे =तृणत्ति वा तृन्ते = वह हिसा करता है। १० कत्ती सत्-घेरना (लपेटना) लट् मे कणत्ति = वह लपेटता है । ११, १२ तह (तृह) और (हिस्)= हिसा करणी। ७०६ ॥ तृणह इम् । ७।३ । ६२ । तृह. श्नमि कृते इम् हलादौ पिति । तृणेटि । तृगढः । ततह । तर्हिता । अतृणेट । श्नान्नलोपः । हि: नस्ति । जिहिस । हिंसिता १३ । उन्दी लेदने । उनत्ति उन्तः। उन्दन्ति उन्दाञ्चकार । औनत् । औन्ताम् । औन्दन् । औनः । औनदम् । १४ अञ्ज व्यलिस्लक्षणकान्तिगतिषु।अनक्ति। अतः। अञ्जन्ति।आनज्ज । आनजिथ । आनङ्थ । अजिता । अङ्खा। अधि। अनजानि आनक ।। हलादि पित् प्रत्यय परे हो तो तृड् को इम् का आगम होवे, जब श्नम् ७०८ से स्थापन किया जावे (१) तब लट् मे तृणेढि (७०८, ७०८, ३२, २०१, ५८०, ७५, ५८१) = वह मारता है। तृण्ढः (६०५, २७१, ५८०, ७५, ५८१, ८२, ८३) =वे दो मारते हैं । लिट् में ततह ४७८ = उस ने हिसा की । लुट में तर्हिता = वह हिसा करेगा । लड् मे अतृणेट ३२ -उसने सारा । हिसि धातु को ने नुम् हुआ । और उसका लोप हुआ तो लट् से हिनस्ति = वह हिसा करता है । लिट् में निहिस ४८२ = उसने सारा लुट में हिसिता- वह हिसा करेगा । १३ उन्दी (उन्द) गीला करणा (भिगोना) लट् में उनत्ति ७११ वह भिगोताहै। उन्त. ७११, ६०५, ८६, ८२, ८३= वे दो भिगोतेहै । उन्दन्ति ७११, ६०५ =वे भिगोते हैं । लिट में उन्दाञ्चकार ५४० उसने भिगोयाथा । लड् में प्रौनत् ७११, ४७२, २१२ उसने भिगोया । औन्ताम् ०११, ६०५, ८६, ८२, ८३ - उन दो ने गीला किया । पौन्दन् ६०५ = उनने गीला किया । श्रीन - तूने भिगोया । प्रौनदम्-मैने गीला कियाथा। १४ अम्जू (अ) प्रकाश करणा, तैलादिमर्दन, सुन्दर होना, और गमन करणा । लट् में अनक्ति ७११, ३२८ वह जाता है। अतः ७११, ६०५ वेदो जाते हैं। घम्जन्ति =वे प्रकाश करते हैं । लिट् में आनम्न ४२०, ४२१, ४७१, ४८२ = उसने प्रकाश किया । श्रानजिथ वा थानङ्कय ५०५ तूने प्रकाश किया। लुट में अन्जिता वा अङमा (१) अर्थात् जब तृह का (तृण) ऐसा रूप हो जाये तब । १८३, २०१, ०८ ४८१ ७११ से ।
धादय ५-पा प्रवास करेमा । चोर म पु ए में पधि १८०-तू महाग पर पगबानि- में प्रवाग पर। सम्में पान ०११-उसमे प्रयास किया। ७१.॥ पञ्खे सिधि। ७।२।०१। पञ्चेः सिची नित्यमिट् । पाबीत्। १५ तञ्च संकोचने। तमति 1 तया, समिता । १५ पोविजी भयचपनयो । विति। विश । विनइडिति रित्वम् । विविधिय। वि जिता । पधिमा । पविवीत्। १० मिष्ण विशेषपे। दिनष्टि : पिष्ट शिपम्ति । शिमधि । विशेष । शिपिय । गेष्टा। गेष्यति। देधि । शिरिठ। गिमषापि । पगिनट् । मिंध्यात् । शिष्यात् । पशिषत् । एवं १८ पिष्त सञ्चर्णने। १८ भञ्यो पामर्दने । पन्नू पातु से परे बो मिउसको र पागम नित्य होये । नुर में पान्त्रीत् (101) (eer)-उसने पाय लिया । १३मन्यू (सन् )-साधित रोना । सर में ०११ १२८ तनशि -पा समुचित सोता है। सुर में ताला 'वा' तस्चिता पर मुख ठेगा। १५ पोविमी (वि)-मय करपा 'बा' काम्पना । सट में विनति-या पाम्पता पिन- दो पाम्पो रे।1 में रस घात से परे बोर वा पागम पा मित् पोता तप पिविषिष (न पाम्पा बा) में गुण निषेप हुआ। तपा मद में विमिता -पाबाम्पेमा सर में पपिनक- सपने मम किया। मुर में परिमीत्-हमने मपबिया । १० मिन (मि)-विमेष हरपा ।सद में गिमप्टि-4 विगेप करता २। विष्टः।। 1, ८२-वे दो पिगेप करते हैं। मिपन्ति-ये पिणे । पिनधि १०८ १५-1 विगेप करता है। सिर में गिगेप-या विरोप परता दुपा। गिपिव-तूने पिप चिया था। तुर में गेष्टा । चुर में पश्यत्ति (१०८,१५)-पा विपेप करेगा। ५८० से (वि) को (घि) पुमा पुन ०.५८.५ मिपि (पिरोपकार) गिर पा । गिनपानि में पिगेप कर । ता में अमिनट (0) इसमें विशेष दिया । रि ति में गिध्यात् ०११ पा हि परे। पामोर निद में गिप्यात पर पा पिगेप परे। मुरम पमिया २५-छस में पियेप किया एसे १८ पिस्तु (पिप)- (पोसना) पातु भी मापसेना१८ मन्यो (म)-तोडना । ०११मान्मलोपः । ४ | ३३ रनम परस्य नस्य खोप स्यात् । भनति। यमनिय । वमस्यय । भता । भरधि । प्रमादीत् । । भुन पालनाभ्यपणारयो मुक्ति । भोला । भीक्ष्यति । पमुमा - . ॥
लघुकौमुद्याम् १०१ एनम् ७०८से परे जो न् उसका लोप होवे । लट्में भनक्ति ३२८ = वह तोडताहै। लिट म०पु०ए० में वसब्जिय 'वा' ५११ वभड्तथ - तूने तोड़ा था । लुट्में भड्सा ३२८,८२,८३ = वह तोडेगा । लोट् म०ए०में =भङ्ग्धि ५८७ =तूं तोड । लुङ्में आभाड्क्षीत् ४८३,३२८, ६२,८३, ४७३ - उसने तोडा । २० । भुज् पालना 'वा' खाना। लट्मे सुनक्ति = वह पालताहै। लुट में, भोक्ता ३२८ = वह पालेगा । भोक्ष्यति ४७८ । लङ् में प्रभुनक् = उस ने पाला । ७१२ ॥ भुजोऽनवने । १ । ३ । ६६ । तडानी स्त. । श्रोदनं भुते । अनवने किम् । महौं भुनक्षिा । २१ जिइन्धी दीप्ती । इन्डे । इन्धाते। इन्धते । इन्त्से । इन्ध्वे । इन्धाञ्चक्र । इन्धिता। इन्धाम् । इन्धै । ऐन्छ । ऐन्धाताम् । ऐन्दा । २२ । विद विचारणे । विन्ते । वेत्ता ॥ ॥ इति धादयः॥ पालन अर्थ को छोड अर्थात् ग्वाने अर्थ में भुज धातु को तड् और (१) आन होथे। श्रोदन भुतो = वह चावल खाता है । ( पालन अर्थ में न हो ) यह क्यों कहा। इसका उत्तर देता है, 'कि' यदि ऐसा न कहोगे तो, (महीं (२) भुनन्तिा ) इस उदाहरण में भी आत्मनेपद हो जावेगा । २१ । इन्ध = चमकना । लट् में, इन्। ७११, ६०५ =वह चमकता है । इन्धाते = वे दो चमकते हैं। इन्धते = ०११, ६०५ = वे चमकते हैं। इन्त्से = तू चम- कता है । इन्दू ०११, ६०५ ८६, ८२, ८३ -तुम चमकते हो। लिट् में इन्धाञ्चक्र, ५४० = वह चमका । लुट में इन्धिता वह चमकेगा । लोट में इन्दाम ७११, ६०५ = वह चमके। इन्धाताम् = वे दो चमझें । इन्धै ७११, ५४८= मैं चमकू । लङ् में, ऐन्द = वह चमका था। ऐन्धाताम् =धे दो चमके। एन्धाः = तूं चमका । २२ । विद्-विचार करणी। विन्ते = वह विचारता है । लुट में, वेत्ता में, वेत्ता =वह विचारेगा ॥ रुधादिंगण समाप्त हुा ।। ॥ अथ तनादयः॥ १ तनुविस्तारे। अब तनादिगण की धातुओं का वर्णन किया जाताहै १ तनु (तन्) - विस्तार करणा। ७१३ ॥ तनादिभ्य उ. ३।१।१७ शपोऽपवादः।तनोति। तनुते।ततान तेने। तनितासि।तनितासे । तनिष्यति। तनिष्यते। तनुताम्। अतनोत्। तनुयात् । तन्वीत । तन्यात् । तनिषोष्ट। अतनीत् । अतानीत् ॥ (९) ये दोनों श्रात्मने पद के प्रत्यय हैं (२) पृथ्वी को पालता है। ।
तमादय । तम् प्रादि धातु पोरस बात से परे प्रत्यय होवे । या मूष १५ वा पपाव २।सद में तनोति ४१४ वा तनुते -4 पिस्तार बरता। सिर में ततान वा तेने १८८ पर विस्तार परतावा । खुद बेम ए में तनितासि पा तमितासे । घर में तनिष्यतिमा तमिप्यते -वा विस्तार परेगा। खोट् पात्मने में तनुताम् । १५ वा पिसार परे । पर में पतनोत् । एमने विस्तार किया । विधिसिर में तनुयात् वा तन्वीत- विस्तार गरे । पा हिरमें तम्यात् वा तनिपोष्ठ-1 पर या विस्तार करे। बुर परस्म पद में पतमीत् वा (1)पतानोत् 801 Box-उसने विस्तार किया । ०१४। तनादिभ्यस्तयासो । २ 181८८ तनाद सिची वा। सुक् तयासी । पतत । पतनिष्ट । पतया । पतनिष्ठा । पतनिष्यत् । पतनिध्यत। ॥ २ । पषु दाने। सनोति । सनुते । तमादिपी से परे सिप का विकल्पर दुदहोरे मब “त' और बास् प्रत्यय परे हो। पात्मने पद से दुरीम पु एक पचन में पतत १८ वा पतमिष्ट । पौर म पु प पतवा' या पतनिष्ठा । घर में पतनिष्यत् वा पतनिध्यत-यदि वा विस्तार पारे । २ पषु (प)-देना । २०२, ४१४ सनोति वा मनुते -पा देता है। ०१५। ये विमाषा। 181 8३ । वनसभसनामात्वं वा यादी मिति । सायात् सग्यात्॥ वन्-उत्पन्न रोना । सन्-देना। प-योदना । म पातुषों को (१) यादि बिगडित् प्रत्यय परे होती पास्य विकल्प पर होता है। पा सिर में सायात् ११ पा मुश्यात्-परमारे दिपावे। ०१६ । बमसनखना सन्मायोः ।। ४ । ४२ । एपामकार समि झचादी रिति । पसात । पसनिष्ट । पसायाः प्रसनिष्ठा' ।। णु हिसायाम् । चोति। पयुते । श्यन्तेति न दि । पचपौत् । पचता प्रचपिष्ट । पचयाः। भवधिष्ठाः । ४ । विगुच । उप्रत्यये वधूपधस्य गुपोषाधियोतिाणोति।णिता। पपीत्। पधितापवेषिष्ट ।। तृण पदने । तृणोति । वर्णोति । तयुते। तयुते ॥ ६॥ मुक्त करणे । बन् मन् पोर बन्न पातुओं को पाचरो। भय मन् वा भवाति वित्दा (स) यहाँ (२) से हरिमा विवाप। () बार रेपादि में मिसके। - १०३ - लघुकोमुथाम् डित् प्रत्यय परे हो तव । असात ७१४ या असनिष्ट उमने दिया । असाथाः ७१४ वा अस निन्ठाः =तूने दिया था । ३ क्षणु (क्षण) = हिसाकरणी। लट् में क्षणोति वा क्षणुते = वह मारताहै, लुड् में ४८४ से हधि का निषेध इा (तब) अक्षणीत् वा अक्षत ७१४, ५८० और अनगिष्ट = उसने हिसा करी ४ । क्षिणु (क्षिण) हिसाकरणी। "जब 'उ' ०१३ प्रत्यय परे हो तब लघूपधधातु को गुण ४७८ विकल्प करको होवे"। स्लट मे क्षियोति । णोति =वह हिमा करता है । लुट् मे क्षेगिता = वह मारेगा। लुड् मे अक्षेणीत् 'वा, अक्षित, ७१४-५५० अक्षेणिष्ट = उस ने मारा । ५ । तृण = खाना । लट् मे तृणोति । तर्णोति वा तृणुते । तणुते = वह खाता है । ६ डुकृञ् (क) = करना । ७१७ । अत उत्सार्वधातुके । ६ । ४ । ११० । कुरुतः ।। उ प्रत्ययान्त छ धातु वो अकार को उकार होवे कित् वा डित् सार्वधातुक परे हो तो । कुरुत. ७१३, ७१७ वे दो करते हैं। ७१८ । न भकुछ राम् । ८ । २ । ७८ । भस्य कुर्छरोरुपधाया न दीर्घ. | कुर्वन्ति ॥ 'भ' सन्जक, और क्व और छुर्=काटनाइन की उपधा को दीर्घ न होवे (१) कुर्वन्ति घे करते हैं। ७१६ । नित्यं करोते । ६।४। १०८ । करोतः प्रत्ययोकारस्य नित्यं लोपोम्वोः । कुर्व. । कुर्म । कुरुते । चकार । चक्रे । कर्ता । करि- प्यति । करिष्यते। करोतु। कुरुताम् । अकरोत् । अकुमत ।। म वा व परे होते क धातु के प्रत्यय रूप उकार का नित्य लोप होवे । कुर्वः०१७ हम दो करते हैं । कुर्मः - हम करते हैं। वा कुरुते ७१३, ७१७ = वह करता है । लिट् में चकार वा चक्रे = उस ने कियाथा । लुट् मे कर्ता । लुट में करिष्यति । वा करिष्यते । ५२६ वह करेगा। लोट में करोतु =वा कुरुताम् = वह करे । लड् मे अकरोत् वा अकुरुत ७१७ = उसने किया। ७२० । ये च । ६ । ४ । १०६ । कृञ उलोपो यादौ प्रत्यये । कुर्यात् कुर्वीता क्रियात्। कृषौष्ट । अकार्षीत्। अकृत। अकरिष्यत्। अकरिष्यत। धातु से परे जो (उ) प्रत्यय तिस का यादि प्रत्यय परे होते लोप होवे । वि. लिङ् मे कुर्यात् वा कुर्वीत ७१७ इस से उकार हुआ । प्रा. लिड् क्रियात् ५७४ वा वषीष्ट (१) यहा ६४५ से दीर्घपायाथा। पुनः ७१८ से निषेध हुआ। । - क तनात्य- । १०५ रिवर बरे किया परे ।पुर में पनापीत पा पहत २५ एव मे किया । घर में परिष्यतया परिभ्यत-यदिवासरे। ०२१ । संपरित्या करोगी भूषणे । ६ । १ । १३७ ॥ सम् वा परि उपसर्ग से परेश धातु की मूपच प्रय में सुद सोपे । ७२२ । समपायेच।।१।१३८ । सुट् ॥ संस्करोति । पखर रोतीत्यर्थ । संस्कुर्मम्ति | सकोभषन्तीत्यर्थ । संपूर्वस्य पवषिद पपेपि सुट् । संस्कृत मचा इति प्रापकात् ॥ धमू पर्भ में मी छ यो मुर् पागम होपे । संस्करोति ०२१ पदचत करता है। संस्नुपम्ति ०२२-पठे सोते हैं । सम् उपसग पूर्व होते छ धातु पो की पमूषण पर्व में मी सुट होता रे (समान (१) मचा) १९१५ स मूष पे भापक होने से । ०२३ । उपाष्प्रतियत्नवेशताषयाध्याहरिषु च ।।१।१८। का सुट् । पाहप्रागुवयोरर्ययो । प्रतियत्नो गुषाधामम् । विकृतमेष धकृत विकार । वाफ्याध्याशार पावाहितकदेशपरपम् । उपस्वता कन्या । उपधाता ब्राधमा । एधीदफस्योपस्फुरते। उपस्कृतं मुझे। उपस्वतं ते । ७ । वनु याचने। वनुते । यवने।८। ममु अषयोधने । ममुते । मेने। मनिता। ममिष्यते । मनुताम् । पमनुत । मम्मीत । मनिपीष्ट । पममिष्ट प्रमनिष्यत ॥ ॥ प्रति तनादयः॥ (प) उपसग से परे च धातुको प्रतियत्न 'पत' पीर वाक्याम्यातार इन पों में मुद् भागम पोये चम्बार ये बस में भूपच पोर पकाना न पी में भी मुर जोता। किमी पदार्थ में नूतनगुष देने की प्रतियान पातेरे खत-रिलतमा। पपात् पिबार । पाप का पम्पासर पचात् बातयते वो भूल गावे छन पो कहा गे पूरा परवा भूपन में मेसे उपकता कन्या पक्षात पी मा सबको र समय से सपना माप्रमाणेषुए मामपयोग मतिमत्तम मेरो पपोटकस्योपस्कुरते -सपी पानीको नया गुन देतोरे पिया में मेसे पम्मत मुखे -पा पित पम्न को पाता। (१) १९९२ मूष में पाणिनिधी र (पम्हल) पेग बहार पोर सफा भूपर पर्व भी मरी विन्तु मरवार पारे -रम में मिला निमुपचाप मे विना भी संपृषक । भानु को मुर बाजारे।
१.५ - - । - - लघुकौमुद्यार दघाक्याध्याहार मे जैसे उपहात ते = वह पदों या पाव्याहार करके कहता है । ७ बनु (वन्) - सांगना । लट् मे वनुनेवह मागता है। लिट मे। वयने = उसने याचना कोधी। ८। मनु (मन्) मानना । लट् में मनुते वह मानता है। लिट् में । मेने ४८८= उम में मानलिया था। लुट में मनिता वह मानेगा । लुट् में मनिष्यते । लोट में मनुताम् । लड्में अमनुत । विधितिङ् में । मन्वीत । प्रागीर्लिड से सनिषीष्ट = हे ईश्वर वह माने । लुङ् मे धमनिष्ट - उस ने माना । लुड्में अमनिष्यत-यदि वहसाने ॥ तनादिगण ममाप्तहुधा ।। ॥ अथ मायादयः ॥ १॥ डुक्रौञ् द्रव्यविनिमधे ॥ अब 'की' है आदि जिन के उन धातुओं का वर्णन किया जाता है ॥ १॥ धुझी (मो)- ट्रव्यों का वटाना (अपना द्रव्य देकर दूसरे का दव्य लेना) ७२४ । क्रमादिभ्यः श्ना।३।१ । ८१ । शपोऽपवादः। क्रोणाति ईहल्यघो। क्रीगीत । श्नाऽभ्यस्तयोरातः । कोगन्ति । नौगासि ।नी- णोथ । क्रौणीथ । क्रोणामि। क्रीग्रीवः। क्रीणीमः। क्रीगीते। क्रौद्याते। क्रीयते । कोणीषे । कोणाथे। कोणीध्ये। क्रौरे । नीगीवहे । क्रीमीमहे । चिनाय । चिक्रियतु.1 चिनियुः । चिक्रय । चियिथ । चिनिये क्रेता। क्रेष्यति। क्रेष्यते कोणातु। क्रीगीतात्। क्रौद्योताम्। अनीणात् । अक्रो- गीत । क्रोणीयात् । क्रौणीत क्रीयात् । क्रोषीष्ट । अौषीत् । अक्रष्ट । अक्रेष्यत् । अध्यत ॥ २१ प्रौञ् तर्पणे कान्तो च। प्रोणाति प्रौगोले ३ । श्रीपाके। श्रीशाति। श्रीगीते ॥ ४ । मौञ् हिंसायाम् ।। क्रयादि धातुओं से परे श्ना प्रत्यय होवे, यह श का अपवाद है। लट् मे कीपणाति. १५१ वह खरीदता है। ६५१ से आकार को ईकार होने से जीणीत.वे, दो मोल लेते हैं । ६५२ में प्राकार के लोप होने से, कोणन्ति = वे मोल लेते हैं। क्रीणासि = तू रखरीदता है। क्रीणीथ = तुम दो मोल लेते हो। क्रीणीय = ६५१ = तुम खरीदते हो । (१) क्रीयामि। क्रीणीव । क्रीणीम. । श्रात्मने पद के लट मे, (२) मीणीते ६५१ क्रीणाते । ६५२ । नीयते । क्रीणीषे । जीणाथे । क्रीणीधे । क्रीणे । क्रोणीव ६५१ । फ्रीणीमहे । लिट में, चिकाय, ४२० 1 ४२२ । ४२३ । ४८२ । १८६ । २६ - उसने सोल लिया था। चिक्रियतु. - उन दोनें मोल लिया। चिक्रियु - उन ने मोललिया। चिक्रोथ 'वा' चिक्रयिय = ५१२ = तूने मोललिया। (१) ये तीनो लट के उत्तम के रूप हैं। (२) यहां से नौ प्रात्सने पद के लट् केरूप है। - । - + समादय 7 ५०१ रवर पर विपक्षरे। तुम में पार्षीत् या पळत ५०५ उमगे किया । वृर में पपरिष्यत वा परिष्यत-यदिया करे॥ ०२१ । संपरित्या करोसी मपणे ।। १ । १३७ ॥ सम्पा परि उपसर्ग से परे धातु को भूपर पर्य में सुट् होथे। ०२२ । समवाये ।।१।१३८ । सुट । संस्करोति । प्रखर गेतीत्यर्थ । संस्कुर्वन्ति । सहीमवन्तीत्यर्थ । संपूर्वस्य पवचिद पवेपि मुट् । संम्वत भक्षा पति चापकात् ॥ समूष पम में भी वो मुद् पागम पोवे । संस्करोति ०२१ पचत परमा। संस्तुति ०११-वे पठे होते हैं । सम् व्यसगे पूर्व कोते व पान को पी पभूपप' में भी मुद् बोतारे (मसन (१) मचा) १९१५ स सूत्र में प्रायन होने से । ०२३ । उपास्पतियामवेतवाफ्याध्यारिषु च ।।१।१८ शाम सुट । पाल्पागुरुयोर्ययो । प्रतियस्मी गुणाधामम् । विकृतमेष वकृतं विकार । वाक्याध्याहार पावास्तिकदेशपरपम् । उपस्कता कम्या । उमस्सा माधवा । एधोदकस्योपस्कुरुते। उपमहतं मुर। उपक्षतं ते । ० । पमु याचने। वनुते । यवने । ८। ममु चषवोधने। मनुते । मेमे । मनिता। मनिष्यते। ममुताम् । पमनुत । मन्दीत । मनिपीष्ट । पमनिष्ट पमनिष्यता प्रति तमादय ॥ (प) उपसग से परेश धातु की प्रतिमान वैधत' पऔर पाक्याम्याहार ग पयों में मुद् भागम चबार के मन में भूपण और माना न पी में भी सुर शैता। किमी पाय में तनमुष टने को प्रतियत्न पहरेत-विक्षत होना। पमात् विकार । वासपा पम्याहार पर्यात बातकात वो मूब जा न प्यो यहा से पूरा पराभूपच में मैसे उपहता बन्या भयंजत मी गाएको र समयमें से एपसमता मामा-रकोप मापनसीम प्रतियात्ममें बेणे एथोटकास्योपस्नुषते-सबरी पानी को नया गुण देतीमित में मेमे पधात भुरे -पा पिटत पम्म यो पाता। (1) मूत्र में पानिमिमी ने (मस्तन) ऐसा पहा पोरस का भूपर पर्य भी नहीं बिन्तु मस्चार पपमम मिया विमुपसाय मे पिमा भी पूरा पानुषो मर राना।
लघुकौमुद्याम् ( स्तन्भ, स्तुन्भ, स्कन्भ, स्कुन्भ् ) = रोकना । पौर । स्कुञ् (स्क) = उछल जाना । इन बातों से परे 'श्नु' ६८१ प्रत्यय, होवे । (और 'श्ना' भी होवें ) यह सूत्रस्थ चकार में विदित हुधा है। लट् में स्कुनोति 'वा' स्कुनुते । स्कुनाति 'वा' स्कुनीते ६५१ = वह उछल २' कर जाता है । लिट् में, चुस्काव ६८४ वा चुस्कुवे उसे ने कूदा । लुट में, स्कोता = वह उछल कर जावेगा । लुङ् में, अस्कौषीत् ५१३ 'या' अस्कोष्ट =वह कूद २ कर गया । ये, स्तन्भु प्रादि चारों धातु सूत्र ७२६ में ही लिखे हैं, पाणिनि जी के धातुपाठ में नहीं हैं। और एन चारों का रोकना अर्थ है। और इन से परस्मै पद के प्रत्यय होते है। ७२७ । हल. श्न. शानज्झी।३।१।८३ । स्तभान ॥ हि ४४१ परे हो तोहल्से परे 'श्ना' को 'भानच्' होवे ।स्तभान ४४२,३५०, तूने रोका। ७२८ । जुस्तम्भुम्रचुम्लुचुग्रुचुग्लचुग्लुञ्चुश्विभ्यश्च । ३ । १ । ५८ । च्लेरङ् वा = वृक्ष होना। स्तम्भु-रोकना । (मुच्, पौर म्लुच् ) - जाना । (गुच्, ग्लुच् । चोराना । ग्लुम्च् = नाना । और श्वि = गमन करणा । इन धातुओं से परे च्लि को अङ् विकल्प करके होवे ।। ७२६ । स्तन्भे । ८।३।६७ । स्तन्भेः सौत्रस्य सस्य षः स्यात् व्यष्टभत् । अस्तम्भीत्॥ ७। युञ् बन्धने । युनाति । युनीते। थोता। '८ । नञ् शन्दे । कनाति । नीते । कविता । ६ । दृञ् हिंसायाम्। दृणाति । दृणीते । १० । द्रुञ् हिंसायाम्। द्रूणाति । द्रूणीते ॥ ११ । % 3D -- । पञ् पवने ॥ । उपसर्गस्थ निमित्त से परे सूत्र पठित स्तन्म धात के स् को प होवे । लुङ् में, व्यष्टभत् 'वा' अस्तम्भीत् ८२,८३ = उसने रोका । ७। युञ् (यु) = बान्धना । लट् में, युनाति 'वा' युनीते = वह बान्धता है । लुट में, योता = वह बान्धेगा। ८ । नञ् (सू) शब्द करणा। लट् में तनाति 'वा' नीते ६५१ -- वहशष्ट करता है। स्तुट में । कविता वह शब्दकरेगा । । दृञ् = मारणा । लट् मे दृग्याति'वा, दणीते। यह मारता है । १० । दू मारणा । लट् में = द्रूणाति 'वा' द्रूणीते- वह मारता है । ११ पूर (पू) पवित्र करणा ॥ ७३० । प्वादीनां स्व. । ७।३।८० । पञ्लस्तक्रवध- शृपृवभमजघनध्कृतगुज्यारोलीब्लीप्लीनां चतुर्विशते. शिति । स्वः । पुनाति । पुनीते । पविता । १२ । लञ्छेदने। लुगाति । लुनौते - (1) चिकिये । सुर में नेता । भूट में प्रोष्यति पानोप्यते - मीत लेया सीट में श्रीपतु-पा मोस देवे । प्रीपोतात व होताम्-पा मोरसर में (२) पाटीपात् मा पनीपोता विधि विए में श्रीरोयात् 'पा' कोरीत-पा घिर में ही चात् पापीठ । बुर में पीपात् ५१५ या मोर। हर में प्रमेष्यत् 'पा' भोरत। २४ मीणा मी)-तृप्त करपा (पा) रमा परपी । बट में प्रोपासि वा पीपीत।।। चीन (चो) -पाय पराम में चीपाति ११ मा बीपीते १-मा पाता। । मीमी)-माया। ७२५ । शिनुमीना।८।४।१५। उपसर्गस्यानिमित्तात्परम्यै तयो स्थ पा स्यात् । प्रमीपाति । प्रमोपीते । मौनातीत्यारुषम् । ममी। मिम्यतुः । ममिय । ममाघ । मिम्ये । भाता। मास्यति। मीयात्। मा सौष्ठ । घमासीत्। पमासिष्टाम् । अमाम्त । ५ । पिथ् मन्धमे । सि माति । सिमाते । सिपाय । सिष्ये । सेता ।। स्यु पाम्बवने ॥ पसर्गस्प निमित्त से परे 'रिनु पौर मीना गम्दी में (न्) को (ए)ो । म में पमीपति 'या' प्रमीपीते मा पात पिसा करता ऐ पावार पादेय होने पर घिर में ममो १०-हमने पिसा परी। मिम्बन-उन दोन लिसा की । ममिय MILLIt'ब' ममार तूने रिया की। या चिद में मिम्ये । हुद में, माता ५०० । घर में मास्यति-या मारेगा। पा विद में मोगात् 'पा' मापीट-पर करे किपा मारे। बुर मे पमापीत् २०४१४-पने हिंसा की । पमासिटाम्न दोन मिसा पी। 'पण' पामास्त५० । विश् (वि) -मान्धमा । सिनाति 'पा मिनीते- पान्यताविर में सिवाय 'पा सिम्ये उसने मामाभा । युर में पेता २.५, १५- बाबारेमा ।। स्तुम (स्व)-बसर करवाना। ०२६ । स्तम्भस्तुग्मुसन्मुस्कुम्मुस्कुश्म्य मनुश्च । ३।१२। चात्।रमा। स्मोति। स्वनुते । स्कुनाति। म्यागीते। स्थाप। चुस्कुवे स्वोता। पस्कोपीत्। पस्योष्ट। सम्पादयरवार सौचाः सर्वे रोधमार्याः । परस्मैपदिन । . (१) २४-ठसन मोब दिया था। (१) मा पर्वत मधम पुषपों के पर १ लघुकौमुद्याम् ( स्तन्भ, स्तुन्भ, स्कन्भ, स्कुन्भ् ) =रोकना । और । स्कुञ् (स्कु) = उछल माना । पून धातुओं से परे 'ग्नु ६८१ प्रत्यय, होवे । (और 'धना' भी होवें ) यह सूत्रस्थ चकार से विदित हुआ है। लट् में स्कुनोति 'वा' स्कुनुते । स्कुनाति 'वा' स्कुनीते ६५१ = वह उछल २' कर नाता है। लिट् में, चुस्काव ६८४ वा चुस्कुधे उसे ने कूदा । लुट में, स्कोता = वह उछल कर जावेगा । लुड् में, अस्कोषीत् ५१३ 'घा' अस्कोष्ट- यह कूद २ कर गया । ये, स्तन्भु प्रादि चारों धातु सूत्र ७२६ में ही लिखे हैं, पाणिनि जी के धातुपाठ में नहीं है। और इन चारों का रोकना भर्थ है। और इन से परस्मै पद के प्रत्यय होते हैं। ७२७ । हलः श्नः शानज्झौ। ३।१।८३ । स्तभान ॥ हि ४४१ परे हो तोहल्से परे 'ना' को 'शान' होवे।स्तभान ४४२,३५७, तूंने रोका। ७२८ । जस्तम्भुम्रचुम्लुचुयुचुग्लचुग्लुञ्चुश्विस्यश्च । ३ । १ । ५८ । च्लेरङ् वा ॥ न = वृद्ध होना । स्तम्भु-रोकना । (मुच्, भौर म्लुच् ) =जाना । (ग्रुच्, ग्लुच् । चोराना । ग्लुम्च् =जाना । और शिव = गमन करणा । इन धातुओं से परे च्लि को भङ् विकल्प करके होवे ।। ७२६ । स्तन्भे । ८।३ । ६७ । स्तन्भेः सौत्रस्य सस्य षः स्यात् व्यष्टभत् । अस्तम्भौत्॥ ७। युञ् बन्धने । युनाति । युनीते। योता। '८ । नञ् शब्दे । क्रूनाति । नूनौते । नविता । ६ । दृञ् हिंसायाम् । दृशाति । द्गीते । १० । द्रू हिंसायाम्। दूणाति । द्रूणीते ॥ ११ । पञ् पवने ॥ - उपसर्गस्थ निमित्त से परे सूत्र पठित स्तन्म धातु के स् को ष् होवे । लुङ् में, व्यष्टभत् 'वा' प्रस्तम्भीत् =८२,८३ = उसने रोका । ७। युञ् (यु) = बान्धना । लट् में, युनाति 'वा' युनीते = वह बान्धता है । लुट में, योता = वह बान्धेगा । ८ । ञ् (क्ल) शब्द करणा। लट में यूनाति 'वा' क्रूनीते ६५१ = वहशब्द करता है। लुट में । कविता- वह शब्दकरेगा । ८ । दृन = मारणा । लट् में दृग्णाति'वा, दगीते। वह मारता है । १० । द्रूप मारणा । लट् में = द्रूणाति 'वा' टूणीते वह मारता है । ११ पूञ् (पू)- पवित्र करणा ॥ ७३० । वादीनां ह्रस्व. । ७।३।८० । पूलजस्तक्रवधञ्- शृपवभमझधनध्वगन्यारीलोन्लीप्लीनां चतुर्विशते. शिति । हस्व. । पुनाति । पुनीते । पविता । १२ । लूञ् छेट्ने। लुनाति । लुनौते मादर्य । - १३। स्तम् आच्छादने । स्तुणाति । शाः खय । तस्तार । तस्तरतु । तस्तरे । स्तरिता । स्तरोता। स्तणीयात् । स्तणीत । स्तीयात् ॥ पू-पुर करता । तू-काटना । स्तु-प्राशनपरपाव-मारना । - स्मीवार बरपा । -पाम्पमा । -मारा। पू-पासना I-सोबार करना ।म- मय देना । मृ-मारणा-यूडा रोना ।म-ना। घ-बदना। न-प्राप्त करना। पु-ठेठा रोना। -मारा।-चसना । ग-मद परवान्या-होना।री मारना । ची-मिशाना।म्ही-स्वीकार करपााप्ती-माना। ये जो पौधीस पातु तिन को उस रोपे मित् प्रत्यय परे होते। उन में पुनाति 'या' पुनीते-पा पविष करम ।दुर में पपिता-पा गुरुकरेगा। १२ । (यू) -पाटमा । बद में चुनाति वा सुनीते पा काटता ।१५। स्तम् (स्तु) पाच्छादन करपा । सर में तृपाति। चिद् में तस्तार ५८४-आसने पावादन किया था। तस्तात -तन दोने पावादन किया । 'वा' तस्तरे 4.-उसने पावादन किया था। शुट में स्तरिता 'मा' सरीता का पापा। विधि हि में तबीयात् 'या' स्तृचीत ॥२।पा मि में 'स्तीर्यात् (० )- सवर पाठये।। ०३१ । पिसिधापास्मनेपदेषु । ७।२। ४२ । बम्बम्या मदम्सारच परयोलिसिघोरिया स्यातहि॥ हर-मेबनानम् -मोजार बरना। पौर पदन्तमो धातु रेन से परे लिए घोर निको पारमने पद में ट (पायम ) विकम्प सोये ॥ ०३२ । न लिहि।।२।३८ । वृत स्टो नदीघः । स्तरिपीट। उरच धनेन किल्वम् । म्तीपीप्ट । सिपि च परस्मैपदेषु । प्रस्तारीत् पस्तारिष्टाम् । पस्तारिपु । प्रस्तारिष्ट । पस्तोष्ट । १४ । पञ् हिसायाम् । कृयाति । गीते । चकार चकरे। १५ । व वरणे । उपाति पपीते । वधार। ववरै। यरिता ! वरीता। उदोष्टेमल्युत्पम् । पुर्यात् । परिपोष्ट । पूष्टि । पवारीत् । पवारिष्टाम् । पपरिष्ट । पपरीष्ट । पवप्ट । १६ । धम् कम्पने । धुनाति । धुनौते। धोता। धविता । पधा पीत् । पचविष्ट । प्रधोप्ट । १०॥ या उपादामे । गृहाति। गमोते। जयामागी। - १०८ । - । लघुकीमुद्याम् सह, वृन्, और ऋदन्त धातु को लिड् परे होते (१) दीर्घ न होवे । प्रा० लिङ् में स्तरिषीष्ट ७३१ ५७५ वे से कित्व हुआ तो स्तीढुष्ट ७००, ६४५ हे ईश्वर यह ढके । लुड़ के ६४८ से इट् को दीर्घका निषेध हुआ तो प्रस्तारीत् ५१३ उस ने ढका। (२)अस्तारि- प्टाम् । प्रस्तारिषु । 'वा' अस्तरिष्ट, अस्तीट ५७५ १७००। ६४५ ।।१४। वृज् (कृ)मारना लट् में सणाति ७३० 'वा' क्षणीते वह मारता है। लिट में चकार 'या' चकरे ५४७ - उस ने मारा था। १५ । वृञ् (वृ)स्वीकार करणा । लट् मे वृणाति वा वृणीते ७३० = यह स्वीकार करता है। लिट् में ववार 'वा' ववरे ६४७ = उस ने स्वीकार किया था । लुट में वरिता वरीता-६४८= वह स्वीकार करेगा । ६४४ से उत्व किया तो (भा० लिङ में) पूर्यात् ६४५ 'या' वरिषोष्ट ७३१ वूर्पोष्ट । लुङ् में अवारीत् ५१३ अवारिण्टाम् = 'या' अवरिष्ट ७२१ प्रवरीष्ट ६४८ अयूट ६४४ उस ने स्वीकार किया १६ । धूञ् (धु) = काम्पना । लट में-धुनाति 'वा' ६३० धुनीते वह कम्पाता = वह कम्पाता है। लुट में-धोता 'वा' धविता ५०५ वह कम्पावेगा। लुङ् में अधावीत् ६८२ 'वा' अधविष्ट अधोष्ट = उस ने कम्पाया । १७ ग्रह (ग्रह) = लेना । लट् मे ६६८ गृहाति 'वा' गृहीते = वह लेता है । लिट् में जग्राह 'या नगृहे = उस ने लिया था । ७३३ । ग्रहोलिटि दीर्घ । ७।२।३७। एकाचीग्रहेविहितस्येटो दी/न तु लिटि । ग्रहोता । गृहातु ॥ एकाच (३) ग्रह धातु से परे विहित जो इट उस को दीर्व होवे । लिट् मे न होवे लुट में प्रदीता=वह लेगा। लोट् में - गृह्णातु ६६८ = वध लेवे ।। ७३४ । हलः श्नः शानञ्झी । ३ । १ । ८३ । हल. परस्य श्नः शानजादेशो हो। गृहाण । गृधात्। ग्रहीषीष्ट । ह्मान्तेति न वृद्धिः । अग्रहीत्। अग्रहीष्टाम् अग्रहीष्ट । अग्रहीषाताम् । १८ । कुष निष्कर्षे कुष्णाति । कोषिता । १६ । अश भोजने । अश्नाति । पाश । पशिता भशिष्यति । अश्नातु । अशान । २० । मुष स्तेये । मोषिता । मुषाण । २१ । जा अववोधने । ननौ । २२ । वृड् सम्भक्तौ । गीते । ववृषे । व- ट्वे । वरिता । वरीता । अवरिष्ट । अवरीष्ट । प्रवृत ॥इति क्रयादय. ॥ (१) दीर्व नो ६४८ से पाया था (२) मे दोनो लुङ् प्र. पु. हि वचन और बहु बचन के रूप है। (B) एक स्वर वाला। । - .
। पुरादयः पर से परे ना को मान होवेल के परे होते । गृहाच ४२ तू से । पाथीति में-मृमात् पा' पडीधीप्ट ०५-रेवर पा पाप पारे । मुर में 10 से तरिका नियबापा तो पलीत् । पमहीष्टाम् ०२५-वे दो चेते हुए । 'या "पपशीर" ०५ अपनीपाताम् । १८ जुनिचोदना । बट में। कुपाति-सुदम-कोषिता-पा निचोरे मा ॥१४ापा-बाना । सर में प्रश्नाति । सिद् में- पाम । गुट में प्रमिता । चूट में- पगिध्यति-या पावेगा । सोट में-पानातु-वा पाये । पयान-तू या ॥२ मुम (मुप्) पुराना । युद् में-मोविता -पागवेमा । बोट् म ए में मुपाप ou+nt १५-पुरा ॥ २१ । ना-बानमा । सिट में नमी १०-पाजामता पा ।। २५ र (1) सेवा परपी।पट में-पीते १५-वर सेवा परताचिद् म ए में- परपे- पेषा परी घो। (१) पहो । सुट में-परिता परोता '-पा सेवा परेमा । मुर में-पपरिष्ट ०१ पवरीष्ट ८ पछत 10 14-उस में सेवा की । ॥मादि गर समाप्त पा Kel अथ चुरादयः ॥ ।१।पुर स्तेये ॥ अब पुरादि मर का पपन विया बाता।।९।। पुर (पुर)-पोरी करपी । ७३५ । सत्यापपामरूपयोपातलरचोकसेमाखीमत्वधर्मपर्ण पर्व धुरादिभ्योधि । ३ । १ । २५ । स्याः । मुगन्तेति गुण । सनापन्ता इति धातुल्यम् । तिप्पयादि । गुषायादेगी। चोरयति । सत्याप पाम ८प पीपा नून खोक सेना बोमन् प बमन् वर्ष पोर चूप रन गादों में पीर पुपदि भातुपों में स्वाब में पिच प्रत्यय ये । 8. 'गुष पर सेना। पीर यहां मे धातु पंजासोती । पुन तिप् पोरयप् पारि प्रत्ययकातरे। गुप पोर पायावापान में (भय्) पुपातीपर में चोरयति-पापुराता। OB | पिचरय । १।१।७४ विवरतातात्मने पदं कतगामि नि क्रियाफले । घोरयो । चोरयामास । चोरयिसा । चोर्यात् चोरथि पोष्ट । यिनीति पर। योधनोति उस्या पनि स्विम् । हलादिगेपः दौर्बोधघोरित्यभ्यामम्य दोघः । पपरता पच्चुरत । २ । कवायम प्रपन्धे। परलोप ।। (1) मे अपीता:-तुम पेशा की थी।
skܕ लघुकीमधाम् णिजन्त से पात्मने पद हो परन्तु जब क्रिया का फल कर्ता को पहुंचाता हो। चोरयते- वह अपने लिये चुराता है। । लिट् मे-चोरयामास ४८८= उस में चुराया। लुट में में-चोरयिता - वह चुरायेगा । मा. लिङ् मे चोर्यात् ५५७ 'वा' चौरयिषीष्ट । ५५६ से घुि वो चङ्, ५५८ से उपधा को अस्व, और ५५८ से हित्व, ४२२ से अभ्यास में (७) रहा, और ५६२ से अभ्यास के लघु को दीर्घ तो हुया अचूचुरत् 'वा' भचूचुरत २। कथ = कहना । ४८८ से इस के अन्त्य प्रकार वा लोप होता है। ७३७ । अब परस्मिन्यर्व विधौ । १ । १ । १७ । परनिमित्तोऽजा देश- स्थानिवत् स्थानिसतादच. पूर्वत्वेन दृष्टस्व विधी कर्तव्ये इति। स्थानिवस्वान्नोपधाद्धि । कथयति । अग्लोपित्वाद्दीर्घसन्त्रावो न। अचकथत् । ३ गण संख्याने । गणवति ॥ पर को निमित्त मान, अच् के स्थान में यदि कोई प्रादेश हो तो वह आदेश निस्त अच् के स्थान में हो उसी के तुल्य माना जावे, परन्तु जब कोई सूच उस अच् से पूर्व वर्ण में लगने वाला हो। इस से यहा प्रकार के लोप को स्थानिवत् मानने से (१) उपधा को ४८३ से हदि न हुई । लट् में कथयति-वह कहता है ॥ भगोपि (२) होने से लुङ् में दीर्घ ५६२ और सन्याय ५६० न हुए-श्रच कथत् ५५८ वह कहता हुअा ॥ ३ । गण (गण्) - गिनना । लट् में-गणयति ।। ७३८ । ईचगण. । ७ । ४ । ६७ । गणय तेरभ्यासस्य ईत्स्याच्चा- दच्चपरे हो। अनीगणत् । अजगणत् ॥ इति चुरादय. । धातु के अभ्यास को इंकार होवे। सूत्र के पठन से यह ज्ञात होता है कि, अकार भी पक्षान्तर में होवे, जब चपरक णि परे होवे तब । स्लुङ् में घजीगणत् घा अजगणत् ५५६, ५५८, ४२२, ४८२= उस ने गिना ॥ चरादि गण समाप्त हुआ ।। Pा अथ ण्यन्ताः ॥ भब पिजन्त धातुओं के साधने की प्रक्रिया (णिजन्तप्रक्रिया) का वर्णन किया जाता है। ७३६ । स्वतन्त्र. कर्ता । १।४ । ५४ । क्रियायां स्वातन्त्र्येण वि- वक्षितीर्थ. कर्ता स्यात् ।। (१) जब कथ के प्रकार को स्थानि यत् माना तो उपधा रूप (थ्) भागया प्रकार नही वृद्धि किसे हो । (२) कथ के अकार का ४८८ से लोप हुआ है और भकार अक् प्रत्याहार में है इस लिये कथ् भरलोपि है॥ गण में चकार ।
विप्रक्रिया क्रिया में स्वतन्त्रता में जिस को विवश हो (हि या प्रिया करणे यासार) पापा कापाता॥ ७४.। तत्प्रयोभको ताप ! १४ ! ५५ । प्रयोवयो तुसंस फातृसनष ॥ कर्ता को प्रेरणा करपे माग रेतु संचा पासा' और कत्तुं समाये ७४१ । रेतुमति छ । ३ । १ । २६ 1 प्रयोवकण्यापार प्रेषसादी षाच्ये धातोपिच । भवन्त प्रेरयप्ति भावयति ॥ प्रेरणा पर पाये को ध्यापार पर्वात् प्रेरपादिकों को नव प्राण वरना होता धातु पिच् ॥ोवे। दूसरा पाहोन पाने को प्रेरच करता चे (भाषयति) 1 ०४२ । पो पुयज्यपरे । ०। ४।८ । सनिपरे यदा तदवस वाभ्यासोत पूत् स्यात् पत्रगय नकारेष्षषण परेषु परतः। पवीमवत् । ष्ठा गतिमिवृत्ती बिस घम से परे सन् (९) हो उस का पपयव जो पभ्यास इस यो मार को रसार होघे परन्तु जब पपपपरष (१) पवर्ग (प्पम् म्) वा पम् (वर) जवार परे से तव । सुर में पबीमवत् १५५० ५५ ष्ठा-ठारना ०४३ पत्तिौम्लोरोम्कयोल्माय्यातां पुरुणी । ७ । ३।३।। स्थापयति॥ मा-बानाजी-मण्या करपी । म्बी-मानना Iरी-शिमा परपी। गरी -नार बरपा । रमायो-काम्पना । एन पातुपी पौर पाबागमत भातुपों को कि पीते (पुष) रोपे । स्पापयति-या उसे ठहराता॥ ७४४ । तिष्ठतेरिस । 01 ४ 1 ५ ॥ उपधायारचपरे । पति प्ठिपत् । घट घेष्टायाम् ॥ स्था पातु मी पपा पे स्थान में प्रकार सोवे बप परपरक वि परेको हो। पतिष्ठिपत् १ घट (चर)-चेष्टा करो। (१) पहा मादि पद में पश्येपपा (मत्वार पाच गुणाति प्रेरचा) पौर विनापमा वा मी पा(6) (01) मेसोमा (पौर) मुम्बाप पा भी प्राप परसेगा । (0) पचार से परे जिनके । रम पदपार में (पुमुपति) में प्रकार गएमा । ।
+ लघुकौमुद्याम् ७४५ ॥ मितां स्वः । ६।४।६।घटादीनां जपादीनां च स्वः। घटयति । जप जाने जापने च । जपयति । अजिनपत ॥ ॥ इति श्यन्तप्रक्रिया । (घट) श्रादि और (जम्) श्रादि धातु जो मित् हैं उन को इम्व होवे । घटयति । जय (जए ) =जानना 'या' जनाना । लट् में जपयति = वह जनाता है । लुड् में। अजि- जपत् । ५६०, ५६१ ॥ णिजन्त प्रक्रिया ममाप्त हुई ।। || सनन्ताः ॥ ॥ सन् हैं जिन के अन्त मे उन का वर्णन ॥ -७४६ ॥ धातो. कर्मा समानकर्तृकादिच्छायां वा । ३ । १ । ७ । इषिकर्मणोधातोरिपिगैककतकात्सन्वेच्छायाम् । पठ व्यक्तायां वाचि ॥ इच्छा क्रिया का कर्म जो धातु उस से यदि उस वा और इच्छा रूप क्रिया का कती एक हो तो इच्छा अर्थ में सन् विकल्प करके होवे ।। १ । पठ = पढना । ७४७ । सन्यडो ॥६।१।६ ॥ सन्नन्तस्य यडन्तस्य च प्रथम- म्यैकाचो देस्तोऽजास्तु द्वितीयस्य । सन्यत । पठितुमिच्छति पिप- ठिषति । कर्मण किम् । गमनेनेच्छति । समानकर्तृकात् किम् । शिष्याः । पठन्त्वितीच्छति गुरुः । वा ग्रहणादाक्यमपि । लुङ्सनोधस्ल । सन् प्रत्ययान्त और यड् प्रत्ययान्त धातु के प्रथम एकाच (एक स्वर वाले ) भाग को हित्व हो, परन्तु यदि उस प्रथम भाग के आदि में अच् ही तो द्वितीय एकाच भाग को हित्व होवे । ५६१ से अभ्यास के प्रकार की इकार किया तब पिपठिषति-वह पढ़ने की इच्छा करता है । ७४६ सूत्र में "कर्सण." यह पद क्यों कहा? इस का यह उत्तर है कि गमनेनेच्छत्ति = यहां गमन रूप करण से न सन् हो जावे । पुन' यदि कोई कहे कि वहा ही "ससान कर्तृकात्" यह पद क्यों कहा? तो इस का यह उत्तर है कि-शिष्या पठनिस्व- तीच्छति गुरु. -शिष्य पढे यह गर चाहता है । यहा पढने वाले शिष्य इच्छा करणे वाला गुरु कर्ता भिन्न है यहा पठ धातु से सन् न हो लावे । उसी सूत्र मे (वा) ग्रहण से टूमरे पक्ष में (१) वाक्य ही पडा रहता है । सन् परे होते ५८८ से '(पद) धातु को (वस्तृ) आदेश होता है। (१) पठितुमिच्छति ।
यन्त प्रक्रिया
७४८॥ स स्यार्धधातुके । 0 1 ४ । ४६ । सस्य त स्यात्सादा
वार्धधातुको । प्रत्तुमिच्छति विघासति । एकाच इति नेट ।
पादि पार्वधातुच परे तो स् पो त् चोवे । विषत्सति-पापाने पी रमा
परता से यहां का निषेध पा
०४८ । पम्भनगा समि ।। ४।१६। पलम्सामा पोरवादेन
गमेश्ष दी| झखादी सनि ॥
पवन्त धातु को पोर सन् पीर प्रमादेय मम् (पप्प के स्थान में मम्) तिण
बोदरीष ही भासादि सन् परे हो तब।
७५ को झम् । ११२।८। गन्ताम्मवादि सन् चित् ।
पात पूसातो । कतुमिच्छति । चिकीपति ।।
गम्त धातु से मचादि सन् वित् सोपे। . से पद्म चिकीपति-१४ा
करने की परता
०५१ ।। समियागुरप । ७ । २ । १२ । गोगुरुगश्ताच्च सम
पुरम स्यात् । पुषति । इति सनम्ताः ।
पा-बगा। गुरु-हा सेना। और समस्याहार पन्ना में विमोन से
परे सन् को पद नको। सर में मुभूपति ०४३। ०।१५। ४२५ -पा होने पी
रसा करता समन्स मनिया समाप्त पुरा
॥ अथ यडन्ता ॥
। पर यात प्रतिया का वचन विया माता।
७५२॥
तोरेवाची यादेः क्रियासममिहार यर । १५२२
पीमापुग्ये मृगार्थे च द्योल्ये धातीरेकाचो धनादेयम् ।
किया या पारंपार करणाबा क्षिया का पतिमय प्रयाग भरपातोमादि
(१) पदाच पातु मे या
७५२ ॥ गुणोयलको ०1४1८२ । मभ्यासस्य गुणोयरिमर
लकि च। ग्दिन्तस्वादात्मनेपदम् । पुन पुमरतिययम वा मपति ।
मोमयते । योभयाचक्रे । योमयिष्ठ ।
(१)रे पाटि में निम पार पाप मिस म।
लघुकौमुद्याम् यड् परे हो 'वा' यड् का लुक् भया हो तब अभ्यास को गुण हो । यड को डित् होने से यडन्त धातु से आत्मनेपद (१) होता है । वोभूयते वह बारबार 'वा' अतिशय करको होता है। लिट् मे बोभूयान्चो । लुड में प्रवीभूयिष्ट वह वारवार हुधा । ७५४ ॥ नित्यं कौटिल्ये गती ३ । १ । २३ गत्यर्थात्कौटिल्ये एव यड ल तु क्रियासमभिहारे । गति अर्थ वाले धातु से सर्वदा कुटिलता अर्थ में यहो। मिया सममिहार में न हो। ७५५ ॥ दीपोऽकितः ७ १ ४ । ८३ अकितीऽस्वासस्य दी! यङ् लुकोः । कुटिलं ब्रजति । वाव्रज्यते । अकित अभ्यास को दीर्घ होवे, जब यङ् वा उस का लुक् होवे तव । वा बज्यते- वह टेढा जाता है । ७५६ ॥ यस्य हलः ६ । ४।४६ हलः परस्य यस्य लोप अाधधा- तुके ॥ आदेः परस्य । अतोलीपः । वाव्रजाञ्चके । वानजिता । पार्धधातुक प्रत्यय परे होते हल से परे (य) का लोप होवे । लिट् मे श्राम के परे होते ८५ के अनुसार य् का लोप हुा । पुन. ४८८ से 'घ' का लोप हुश्रा । वा बनान्चके -वह टेढा गया । लुट में वावनिता वह टेढा जावेगा ।। ७५७ ॥ रौदपधस्य । ७ । ४ । ६० । दुपधस्य धातोरभ्या- सस्य रोगागमो यडलकोः। वरीयते । वरीहताञ्चक्रे । वरीहतिता ॥ यङ् और यड़ के लुक में ऋदपध (२) धात को अभ्यास को 'री' का प्रागस होता है । लट् में वरीसत्यते वह वारवार रहता है । लिट् में-वरीताम्चो ७५६ लुट मे वरोतितावह बारबार रहेगा। ७५८ ॥ क्षुम्नादिषु च ८।४ । २८ गत्वं न । नरीनृत्यते । जरी- गृह्यते ।। ॥ इति यडन्त प्रक्रिया ।। क्षुम्नादियों में न् को ण् न हो । नरीतृत्यते ०५७- वह बारबार नाचता है। जरीगृह्यते ७५७ ॥ । यडन्त प्रक्रिया समाप्त हुई ।। l यङलगन्ताः ॥ । यङलुगन्त प्रनिया का वर्णन ॥ ७५६ ॥ योऽचि च २।४।७४ यडोऽचि प्रत्यये लक्ष स्याच्च- (१) ४०४ से होता है । (२) निस की उपधा मे 'र' होवे ।। -- यम्भुगता कारात पिनापि क्षचित्। पनैमित्तिकोऽयम् । पन्ससस्वादादी भवति सत प्रत्ययणक्षणेम यस्तस्वाहिस्षम् । पभ्यासकार्यम् । धातुस्या रबडादय । नेपालकत्सरीति परस्मैपदम् । पर्वरौतम्धेत्यदादो पाठा पछपोलुफ् ।। जब पर प्रत्यय परेको तव यह वा मुक हो। सूत्र में चार पाप से या जात दुपा शिसम के बिना मी काही होतास सिये या (१) यरवा सुन पौमित्तिण क्यों कि विमो भी निमित्त को मान बर नहीं पा । अन्तरागोगे से या यरका दुध ममम होता। पुन २४ से प्रत्यय अक्षर मान यडम्सीने से ०४० से रिस्परा । पौर प्रभ्यास कार्य भी होते हैं। ४५ से यहन्त की धातु संसा होने से सद पादि प्रत्यय होते. परस्मैपद को प्रत्यय किये जावें ।५ में विष पिया पियानुयन्त फा पाट पदादि गप में रेस रेतु से अप का सुबसे एमा। ७६ ॥ यठो वा ७।३ । ६४ यलगन्तास्परस्य बाद पित सार्यधातुकस्यैड्वा स्यात्। भसुवोरिति निषेधो यरकि भापायां न वीमतु तेति प्रति छन्दसि निपातनात्।वीमवीति। वीभोति । बोमत भदभ्यस्तात् । पोभुषति । वोभवाञ्चकार । बोमपामास । बोभविता । वीभविष्यति । षोभवोतु । योभीतु । पोभतात्। वीभताम् । पोभुपतु । पोभषि । वोभषामि। पयोमपीत् । पवोभोत्। पीमताम् । अवोभवु पोभूयात् । वीभयाताम । योभयु । बोमयात् । योभयास्ताम् । वीम। गाप्तिस्येति मिची नुक् । यगेवेतीट्पक्षे गुर्य बाधित्वा निस्म स्वामुक । अमीभवीत् । भयोभोत् । पयोमताम् । पयोमयः। प्रवीभषि ॥ पुति यमगन्ताः ॥ या (0) गुगल मे पोनादि पित मानधातुब हो तो उसे घर का पानम शिपबरो॥ ॥८प भो म पातु वो गुन का निषेभरेमा मापा पुरतुक में नहीं ममता (१) नमार पानगे मषित 1 (.) भिम बानु पए का ८ मे एमा। - या। प्यत् ॥
लघुकोमुद्याम् वोभतु" ऐसा वेद मे निपातन (१) करने से । लट् में-वोभवीति, बीभोति ७५८-७५३ = वह बारबार होता है । वोभूत' =वे दो बारबार होते हैं । ३६८ से झ को अत् हुश्रा, बोभुवतिवे बारबार होते हैं । लिट् में-वोभवाञ्चकार (वा) बोभवामास । लुट मे बो- भविता । लूट में बोभविष्यति = वह बार२ होगा। लोट् में धोभवीतु । बोभीतु ७५८, ७६०, ०५३= वह बार२ होवे । बीभूतात् ४३८ । बोभूताम् । बोभुवतु ६३८ । बोभूहि-तूं बारवार हो। बोभवानि ४४३, ४४४ मैं बारबार होवू । लङ् में प्रबोभवीत् (वा) अबोभोत् = वह बारबार हुआ। अवोभूताम् वेदो० । अबोभवुः =वे० । विधि लिड् प्रथ० पु में बोभूयात् १ व० । बोभ्याताम् २ व० । बोभूयु' ३ व० । श्रा. लिड् मे-बोस्यात् । बोभूयास्ताम् । योभ्यासु = हे ईश्वर वे बारबार होवे । लुड् में ४६७ से सिच् का लुक हुआ। और ७६० में जिस पक्ष में ईट पाता है वहा ४१४ गुण को बाध कर नित्य (२) होने से ४१८ से वुक होता है । अयोसूवीत् (वा) अबोभोत् = वह बारबार हुआ। लुङ् में-अबोभविष्यत् = यदि वह बारबार होवे । ॥ यङ्लुगन्त प्रक्रिया समाप्त हुई ॥ ॥ अथ नामधातवः॥ । अब नामधातुओं का वर्णन किया जाता है । ७६१॥ सुप आन्सनः क्यच् ३।१।८ दूषिकर्मया. एषितु. संब- न्धिनः सुबन्तादिच्छायाम क्यज्वा । इष् का कर्म और इच्छा करणे वाले का प्रात्मसम्बन्धी जो सुबन्त उस इच्छा अर्थ में विकल्प करके क्यच् प्रत्यय होवे ॥ ७६२ ॥ मुपोधातुप्रातिपदिकयोः२, ४,७१ एतयोरवयवस्यसुपो लुक् धातु (वा) प्रातिपादिक का अवयव जो सुप उस का लुक् होवे ॥ ७६३ ॥ क्यचि च ७ । ४ । ३३ । अवर्णम्यई । आत्मन. पुत्र मिच्छतिपुत्रीयति॥ क्यच् परे होते अवर्ण को ई होवे। पुत्रीयति वह अपने लिये पुत्र की इच्छा करता है। (१) “वोभूत" इस वैदिक रूप में गुण न हो इसी लिये "बोभूतु तेतिक्तो" इत्यादि सूत्र में 'बोभूतु ऐसा प्रयोग निपातन किया है। परन्तु यदि ४६८ से गुण निषेध वेद मेंन होता तो पुन' निपातन क्यों किया, इस से यह सिद्ध हुआ कि येद में वह निवेध लगता है तो निपातन सार्थक हुआ। और वेद से विना अन्य शास्त्रों के यलक मे वह निषेध नही लगता है । (२)जो अपने विरोधी के लगने पर भी होजाये वह विधि नित्य कहलाती है। - । - । मामातव 9480 न क्ये १।४।१५ क्पचि क्वचि नामसमेव पदं माम्यत् मखोप । रावीयति । माम्तमेषेति किम् । वाध्यति। इणि च । गौर्यति । पयति । धातोरित्येव ने दिवमिच्छति दिष्यति बारपा पार पोहोता नशारामत योगी पद मामा बाप । पोरकी पद संचा नगे। १८४ स नकार का चोप दुपा । रामोयति-पा रामा की इन्हा परता। "माग्तमेब" यायों का उत्तर देता (1) वायति-पा बापी की पचा परता 01 से दोष बरने पर मोर्यति-पावाची बीरा पाता है। पूयति-गापुर पीरमा करता । से दो पातु मोहतास से दिय्यति (२) (या सर्व बीरापरता ) में दीपक एपा । ०६५ ॥ वक्षस्य विभाषा 41 ४।५• गल परयो षयच्क्यापी पार्धधातुको। पादेः परस्यापतोलोप । तस्य स्थामिवल्यामघषधगुयोग। समिधिता। समिध्यिता। पाश्चातुफ परे होते पर से परे स्थन् (बा) पपरो तो इस मा सीप हाये । से पा सोप पोर १८ से पवार या सोप होता पवार घोपमोम्बानिया मान कर ४०८ मे गुबन पा । समिधिता(पा)ममिभ्यिता-दामादी फोरणाबरेमा। ७६८ काम्यश्च ।। १।८ । उतविषये याम्यम् । पुषमात्मम पुष्यति । पुत्रकाम्यति पुषकाम्विता ॥ विषपनामबाम्यच् प्रत्यय मोसो। बद में पुषयाम्पति ।मुट् मयुनमाम्यिता ०५०॥ उपमानादाचारे ३,१,१• उपमामात् कमणः पारेऽर्थे पाच । पुषमिवाचरति पुचीयति छात्रम् । विष्प्पयति विषम । अपमान पाचन पम संजय मुरत से पाचार प्रप में पपच् हो। पुषीगति का क्षारम् -पा विधार्थी वो पुत्र को समान मानता है। विपत्ति १५ शिवम् या प्राण बो विप्नु यो तुम्य मानता है। न८॥ पा• । सवमातिपदिनोभ्यः विवम्पा यतथ्यः । पतोगुणे । कृप्य वाचरति कृप्यति। स्व पाचरति स्वति । स्वस्थी। (1) पदि नारत मेव यामापरते तो पाच्यति म १८ से पुरम होमाता पर जापानान्त की श्री पद संधापरी तो पापी पर सेना म पु ता पुरप भी , एमा । (२) यो दिन सम्म स्वमवाचा मातिपदिय पातु नहीं। सुपन्तादा 1 - ११८ लघुक्रोमुद्याम् सभी प्रातिपदिकों से क्विप् विकल्प करके हो ऐसा कहना चाहिये । २८५ से.पर रूप कर लेना । अत्यति-वह साष्ण के तुल्य कार्य करता है । स्वति = वह अपने सुल्य कार्य करता है। लिट् स्वस्वी ५१७ = उसने अपने समान कार्य किया। ७६६ || अनुनासिकस्य विझली. डिति ६ । ४ । १५ अनुना- लिकान्तस्योपधाया दीर्घ स्यात्क्वी भलादी च कङिति । इदमिवाच- रति इदामति । रानेव राजानति। पन्था दूब पथौनति। अनुनामिकालत की उपधा को दीर्घ ही जब क्विप् (वा) भलादि कित् वा डित् प्रत्यय परे हो इदामति-वह इस के तुल्य काम करता है । राजानति-वह राजा के तुल्य काम करता है। पथीनति = वह मार्ग के तुल्य प्राचरण करता है ७७० ॥ कष्टाय क्रमणे ३, १, १४ चतुयन्तात्कष्टशब्दादुत्साहे क्यङ् । काष्टाय क्रमते ! कष्टायते । पापं कर्तुमुसहत इत्यर्थः । चतुर्थ्यन्त कष्ट शब्द से उत्साह अर्थ मे क्यङ् प्रत्यय हो। कष्टायते ०६२, ५१२ - वह पाप करणे को उत्साह करता है। ७७१॥ शन्दवैरकलहाभकरवमेघेभ्य. करणे । ३।१।१७ । एभ्यः कर्मभ्य करोत्यर्थे क्यङ । शब्दं करोति शब्दायते ।। भन्द । वैर । कलह-कराडा। अन-मेव । करव-पाप । मेघ । जब ये कर्म हो तो इन से करणे (ने) अर्थ में क्यड् प्रत्यय होवे । शब्दायते ५१२-वह शब्द करता है। ७७२ ॥ तत्करोति तदाचष्टे । इति णिच् । वह उस काम को करता है वा उस को कहता है इन अथों में णिच् प्रत्यय होवे । इस से णिच् हुआ। ७७३ । प्रातिपदिकारात्वर्थे बहुलमिष्ठवच्चा प्रातिपदिकाद्धात्वर्थे णिच् स्यात् इष्ठे यथा प्रातिपदिकस्य पुवावरभावटिलोपविन्मतुब्लो- पयशादिलोपग्रस्थस्फाद्यादेशभसंज्ञास्तहमावपि स्यु । इत्यग्लोप । घट करील्याचष्टे वा घटयति ॥ इतिनामधातवः ॥ प्रातिपदिल से धात्वर्थ में णिच् प्रत्यय होवे । और उस के परे होते इण्ठन् प्रत्यय के तुल्य कार्य हो। अर्थात् जब इष्ठन् १३०० परे होता है तब जैसे पुषद्भाव ऋ को र प्रादेश टि का लोप, विन् और मतुप का लुक, यणादि का लोप, मिय को म, स्थिर को स्थ, भादेश 1 --- १३ १ -पा पुरवता।यारि पात्मनेपदम्। पोरम मेघा तीरे वसती पि परेरीतष मी ये समी कायो । रस से पासोप (घट की टि का सोप) मा । तब पठयति-पा घड़े को वमता वा घर पो काता। ॥ नामधातु प्रक्रिया समाप्तहुई ॥ Kel अथ कण्ड्वादय ॥ कंपादियों का पक्षमा ७७४ ॥ करड्यादिभ्योयक् । एभ्यो धातुभ्यो नित्यं यक् स्यात स्वार्थे । १ । फरह गावविधषणे। करड्यति । करड्यरो । इत्यादि । पाएपाटि घातुपों से परे स्वार्य में यक्ष प्रत्यय नित्य हो । कपएम् (आरए) -युबमामा-पुग्कमा। सद में करयति वा पाएयते। और भी वानसेने। म करमादि प्रक्रिया समाप्त । Rell अथात्मनेपदम् ॥ पात्मनेपद प्रक्रिया का वचन । ०७५ । कत्तरि कमव्यतिहारे । १।३।१४। क्रियाविनिमये । धोत्ये कत्तयात्मनेपदम् । ध्यतिलुनीते । पन्यस्य योग्यं सवन करीतीत्ययः॥ नय क्रिया या विनिमय पदस बदन प्राग मना हो तरकता प में प्रात्मने पराप्यतिमुनीते -पद या योग्य पाठमा बीबम से आप परता। ०७॥न गतिहिसायभ्यः। ११ । १५ । व्यतिगच्छन्ति । व्यतिममिता गति पोर रिमा पप पाने पातु से पात्मनेपद नशेपे । यतिगच्छन्तिी परस्पर विका वाते २ । यतिनमित-ये परस्पर राि मारते। 0991 नेविगः । १।३।१०। मिवियते। मि पृषक गिय पातु मे पात्मनेपदो। निविमते -पा भीतर प्रयाता। ००८॥ परिव्यदेम्य किय ।। ।३ । १८। परिक्रोयति । विक्रीपति। परीचीत। परिमारिमा पन उपमग में परवी पातु मे पारमनपरे । परिमीनीत । ताकिनीने पानता। पासोमाने पर ममता .
सधुनीमुद्याम् । ७७६ । विपरास्यां जेः। ११३ । १६ । विजयते । पराजयति ।। घि वा परा उपसर्ग से परे जि धातु हो तो उसे प्रात्मने पद हो । विजयते, यद जीतताह। पराजयते, वह हार करता है। ७८० । समवप्रविभ्यः स्थः । ११३। २२ । सन्तिष्ठते अवति पठते । प्रतिष्ठते । वितिष्ठते ।। सम् वा अव वा प्र वा वि इन से परे ष्ठा धातु मे श्रात्मनेपद हो । सन्तिष्ठसे, वह अच्छी रीति से स्थित होता है। श्रवतिष्ठते, वह क्षमता है। प्रतिष्ठते, वह प्रकप से उहरता है। वितिष्ठते, वह विशेष से स्थित होता ७८१ । अमहवे न । ११३।४४ । शतमपज्ञानीते। अपनपतीत्यध। छिपाने अर्थ में जा धातु से आत्मनेपट ही शतमपानीले । वह मी रुपये के कर्जे से मुकरता है। ७८२ । अकर्मकाच्च । १।३। ४५ । सपिषोजानौते। सर्पिषो- पायेन प्रवर्तत इत्यर्थः ॥ भकर्मक जा धातु से आत्मनेपट हो। सपिंपोजागोते, वृत उपायसे वाटत होबा है। ७८३ । समस्तृतीयायुतात् । १ । ३ । ५४ । रथेन सञ्चरते ।। सम् पूर्वक और तृतीयान्त से युक्त चर धातु से प्रात्मनेपद हो । रथेन सम्धरते वह ग्यसे नाता ॥ ७८४ । दागाश्च सा चेच्चतुर्थ्यर्थे । १ । ३ । ५५ । समोदाणस्त- तीयान्तेन युक्तादुक्ती स्वात्तृतीया चेच्चतुर्थ्य र्थे । दास्या संयच्छते कामी । सम् पूर्वक दाण् (दा) धातु यदि तृतीयान्त से युक्त हो तो उस से परे आत्मनेपद हो परन्तु यदि तृतीया चतुर्थो के अर्घ मे हो तव । दास्या मयच्छते कामी, कामी दासी को देता। ७८५ । पूर्ववत्सनः । १ । ३ । ६२ | मनः पूर्वोवोधातस्तेन तुल्यं सन्नन्तादप्यात्मनेपदं स्यात् । एदिधिषते ॥ सन् प्रत्यय से पूर्व जो धातु जैमा हो उसी के तुल्य सन्नत से भी प्रात्मनेपद ही होता है। ७८६ । हलन्ताच्च । १ १ २ १ १० । इक्समीपाचल परो भालादि. सन् कित्। निविविधते॥ ।
परस्मैपदम् । पए पो समीप बोरम सिस से परे (१)भवादि सन् वित् मंत्रो । निविषिरते 000 ०५ वा प्रमहरमी याबरता। ७८० । गग्धनाषक्षेपासेवमसाहसिक्यप्रतियत्नप्रणवनोपयोगेषु धामः । १ । ३ । २२ । गम्धम सघनम्, उत्फुरुते सघयतीत्यर्थ । पध घेपर्य भत्स मम्, श्येमो वत्तिकामुस्कुरुते । भसयतीत्यर्थः। हरिमुप- कुरुते । सेषत प्रत्ययं । परदाराम् प्रकुरुते । सेषु सासा प्रवर्तते । एधोद यस्योपस्युरुते । गुषमाधत्ते । कथा प्रकुरुते, कथयतीत्यथ । गतं एकु सते। धर्मा विमियुक्तो। एषु किम् । पाटं करोति। मुखोऽनवने। पोदन भरतो । पनवने किम् । महाँ भुनलि स्यात्मनेपदप्रक्रिया ॥ गन्धनादि प्रों में पातु से पात्मने पद हो। गम्पन चुगयो बरनी (से) पापुरते पागची परता है। प्रक्षेपण मापन म्येनो पत्तियामुत्युको पात्र बटेरीका भय देता है। रिमुपपुरते पहारिकी सेवता । परदारान् मनुरुते पह पर सीपेशाम पणास्थार करता है । (२)एचोदवास्योपस्कुरते पानी पानी को अपनागुपदेतीमा प्रभुरते पापया परता। मत प्रचुरते पायाम मोपया बाटतानी पामें पी व तर देसाई शिनकरोगे तो (करीति) यहां भी पात्मनेपदोभाषेमा । ०१५ को स्मरण गराता। भोदन मुबो । उस ०१२ मूत्र में 'पमवने स्वीकार देवा रे मी मुगमि" पहा पात्मनेपद न होबाये ॥ पात्मनेपद प्रतिमा समाप्त हुई। RAIL परस्मैपदम् ॥ परस्मैपदमबिया बा पवन। 1 पमुपराभ्या कामा।।।३।७। कर्तगे च फारमे गम्भ मादौ च परस्मैपद स्मार। पनुबरोति । परापरीति । पर लियापर (0) पतमामि हो तब गधनातिका पया में अनुपा पा से परास परामेपर । पनुपरोति पारवा है। परापरोति मा नियमाप (रिमा र सन् मचादि गीता । (२) मा प्रतियान वा पप मुधपाप (३) कता को पहुंचाता ।
१२३ साघुकीमुद्याम् ७८८ ॥ अभिप्रत्यतिभ्यः । क्षिपः ।१।३। ८० | क्षिप प्रेरणे । स्वरितेत् । अभिक्षिपति। अभि, प्रति घोर अति उपसर्ग से परे जो क्षिप धातु तिस से परस्मैपद होवे । दिप, फेंकना । यह धातु स्वरितेत् है। अभिचिपति, वह सभ प्रकार से फेकता है। ७६० ॥ प्रादहः । १।३।८१ । प्रवहति । म से परे वह धातु से परस्मैपद हो । नदी प्रवहति, यह नदी वहती है। ७६१ ॥ परे चः । १ । ३ । ८२ । परिषति । परिपूर्वक मृष से परस्मैपद होवे । परिमृपति, वह सहता है। ७६२ ॥ व्यापरिभ्यो रमः । १। ३ । ८३ । रमु क्रीडायाम् विरमति ॥ वि प्राड् परि, से परे जोरम् धातु तिम से परस्मैपद प्रत्यय होवें। रमु (रम्) मीडा करणी । विरमति, वह निवृत्त होता है। ७६३ । उपाच्च । १ । ३ । ८४ । यजदत्तमुपरमति । उपरमयती- त्यर्थः । अन्तर्भावितण्यर्थोऽयम् । इति पदव्यवस्था । उप उपसर्ग पूर्वक रम् धातु से परस्मैपद होवे। यज्ञदत्तमुपरमति,वह यज्ञदत्त को नित करता है (१) यहा णि का अर्थ अन्तर्गत है ॥ (२) पदव्यवस्था की प्रक्रिया समाप्त हुई । ॥ भावकर्मप्रक्रिया। भावकर्म प्रक्रिया का वर्णन । ७६४ । भावकर्मणोः । १ । ३ । १३ । लस्यात्मनेपदम् ।। भाव (वा) वार्म अर्थ मे लकार के स्थान में धातु से परे आत्मनेपद सजक प्रत्यय होवें ॥ ७६५ । सार्वधातुके यक् । ३ । १ । ६७ । भावकर्मवाचिनि धातो- यक् सार्वधातुके । भावः क्रिया सा च भावार्थ कलकारेणानद्यते । युष्म- दस्मयां सामानाधिकरण्याभावात्प्रथम पुरुष । तिङ्वाच्यक्रियाया (१) यहां उप पूर्वक रम का निवृत्त होना अर्थ नहीं किन्तु निवृत्त करणा अर्थ है। (२) श्रात्मनेपद और परस्मैपद इन दोनों की व्यवस्था (गति) । (३) यहां लकार का अर्थ भाव है औरयुष्यदीर अस्मद से कर्त्ता का बोध होता है,यही एकाधिकरणत्व का अभाव है। ॥
- भाकमप्रक्रिया पद्रभ्यरूपत्वेन हिल्पाद्यप्रतीतम विधमादि । पिधेकयचनमेवोल्स गत । त्वया मया भन्याच भूयते । वभवे ॥ माव 'पा कम का मारक सावधातुम परे को तो धातु मे या प्रत्यय होये । माष किपा को पाते पोर पर मिया माव पथ के सकार से पनुपाद की नाही है। (१) युष्मद पीर परमद वे शाष (भाष पी) पवाधिकारपतापमाव से मात्र प्रत्य पाना से प्रथम पुरुप होता है। तिर पाच्य शिया ध्यरुप नसीरमी में रिस्पादियों की मतीति के प्रभाव से शिवचन पोर बहुवचन नही बीते जिन्तु स्वभाव में एसवचा की जिया जाता है। चद् में षण मया पन्येश्च भूयते तुम रम भोर तर योग होते हैं। विर में पभूपे ४१८ पापा मा। ४। स्यसिसोयुटतासिपु भावकमोरुपदेशेऽमानयागा था पिएपदिट् च ।। ४ । १२ । उपदेशेयोऽथ तदन्तानांमादीनां च चिदीवार कार्य वा स्यात् स्यादिषु भाषकम योगम्यमानयो स्यादीगा मिठागमश्या विरवहावपश्यमिट । विरवहावाइति भाविता। मविता। भाविष्यते । भविष्यते । भ्यताम् । पभयत । भाविषीष्ट । भविषीष्ट । सपार के भाव वा वम मनोने पर उपदेम में बो पच् तदन्ता को (उपदेश में पान्त चातुपा तो) पौरन पाय | धातुपों को चिप् प्रत्यय होते से भी कार्य होता पेसामीपा मचा निमित्तव ताय विधम्प पर होपरातुमय स्य सिप पीयुत् ताम् परेगे तब पौर स्य भादिक्षों बोर भी होवे । मिस पच मे पिपाप पानी माद भी होता है। चिराप से होने से १५ दि होती।चुद मे माविता मपिता नृद में भाषिध्यते मविध्यते । गेट में मूणताम् । सर में प्रभूषत । पा लिद में मापि पोष्ट भधिषोष्ठ । 8201 चिप भावफमगो । ३।१।६६ | पश्चिम् स्याापक माचिमि से परे । मभावि । प्रभाविष्यत । पभविष्यता पवर्मकोऽप्यु पसगषशासक्षमक । पनुभयते पामग्दा परेक त्वया मया चा अनुभ्यरते खममुभूयसे । पामनुभये । पम्वभावि । पम्वभाविपाताम् । अन्वभषि पाताम् । पिसीप । भाज्यते । भावयायो । भावयाम्पमधे । मावया मासे । चिरपदिट । माविता। भाभीयत्वेमासिदत्वामियोप भावयिता । । लघुकौमुद्यार १२५ भावयिषीष्ट । अभावि । अभावयिषाताम् । अभाविधाताम् ।बुझ्ष्यते । बुभषाञ्चक्रो। वुभूषिता । वुभूपिज्यते । वोभव्यते । वीभविष्यते । अकत्सार्वधातुकयोर्दीर्घ । स्तयते विष्णुः । स्ताविता। स्तोता। स्तावि ष्यते । स्तोष्यते । अस्तावि । अस्ताविघाताम् । अस्तीपाताम् । ऋ गतौ । गुणोति गुण. 1 अर्यते । स्मृ स्परणे । स्वयंते । सस्मरे । उपदेशग्रह- साच्चिरवदिट् । आरिता । अतः । स्मारिता । स्मर्ता । अनिदितामिति नलोप. । सस्यते । इदितस्तु । नन्द्यते । सम्प्रसारगाम । इज्यते ।। भाव वा कर्म का वाचक 'त' परे हो तव च्लि को चिण होवे । लुड् में अभावि ६७७, १८६ लुड् में प्रभाविष्यत ७८६ (वा) अभविष्यत । अकर्मक भी उपसर्ग के सयोग से सकर्मक (१) होजाता है । अनुभूयते अानन्दश्चत्रेण त्वया मया च । (२) चैत्र से तुम से और हम से प्रानन्द अनुभव किया जाता है। बहुवचन में (३) अनुभूयन्ते । त्वमनुभूयसे, तू विासी से अनुभव किया जाता है । अहमनुभूये, मैं अनुभव किया जाता है । लुड में अन्व- भावि, अनुभव किया गया । अन्वभाविपाताम् दा अन्वभविषाताम् । ७८६ वे दो अनुभव किये गये। णिजन्त को कर्म में लाने पर ५५७ से णि का लोप हुआ । लट् में भाव्यते वह उस से हो पाया जाता है, लिट में । भावयाञ्चक्रे । भावयाम्बभूवे वा भावयामासे । ७८६ से चिगवद्भाव और इट के होने पर भाविता, यहा प्रामीय (8) होने पर ७८६ को अमिद मान कर णि का ५५७ से लोप हुत्रा है। वा भावयिता, वह किसी से हो पाया जायेगा।श्रा.लिङ् में भावविषीष्ट । लुड् में प्रभावि अभाविपाताम् । ५५७ (वा) अभावयिषाताम्, किरी से वे दो होआये गए । सन्नन्त में जैसे लट में (५) बुझ्ष्यते । लिट् में बुभूषाम्चक्रे । लुट में वुभूषिता । लुट में बुभूषिष्यते । यङन्त से जैसे लुट में बोभूय्यते । लुट में बोभूयिष्यते । ५१२ वे से दीर्घ करने पर (६) स्तुयते विष्णु. भक्त से विष्णु स्तुति किया गया । लुट में स्ताविता ७८६ वा स्तोता । लुट में स्ताविष्यते ७८६ वा स्तोष्यते । लुङ् में (१) क्योंकि उपसगा से धातुओं के अर्थ का परिवर्तन हो जाता है, जैसे भू का अर्थ होना है, अनु के लगाने से अनुभव करणा हुआ । (२) किसी पुरुष की है, (३) बहुते मानद) अनुभव किये जाते हैं और सभ पूर्ववत् । (४) यहा ५८३ के अनुसार, ५५७ की दृष्टि में ७८६ वा प्रसिद्ध है । (५) इन के अर्थ सन्नन्त के समान जैसे, लट् में, उस से होने को ईच्छा की जाती है ऐसे और भी धान लेने । (६) यहा । ष्टु (स्तुति करणी) धातु है । “भलोविष्णु स्तौति'' यह रूप कर्तृवाच्य मे है ।। - सजा मासमप्रक्रिया पद्रध्यरूपलेन बियाधमलौतेन विपनादि । फिन्स्पावधनमेयोत्स गत्त । त्वया मया अन्याच भूयते । वभूषे ।। माप वा पम का पाचक गावधातुम परे भो तो धातु से यक प्रत्यय हो । मान त्रिया को काले रे और बर प्रिया भाप पय के बार से पनुपाप की मारी। (6) पुष्मद पोर परमद फेछाप (भार को) पक्षाधिकारपता के प्रभाव से मार प्रत्ययान्त से प्रथम पुरप होता है। सिह पाच्य शिया ध्यरूप नही दमी स्वादियों की प्रतीनि प्रभाव में दिपचन पर पहुवा मही पोते बिन्तु स्वभाव मे पाचन की लिया जाता है। सट् म त्वया मया पम्याच भूयते तुम म पोर इतर सोम होते है। खिर म गभूषे १८ पाएपापा । sxe स्यसिसीयुटतासिषु भारफमयोपदेशेऽञ्झनयहाँ या चिरवदिट् च । ६।४ । ६२ । उपदेगेयोऽप तदन्तामा मादीमा छ चिरीवास कार्य षा स्यात् स्यादिषु भावफर्मपागम्यमामयोः स्यादौना मिठागमश्चापिएपहावपधेयमिट पिपवहावाषि भाषिता। मविता। भाविष्यो। भविष्यते । भूयताम् । पमयत । भाषिषोष्ट। मविषीष्ट । सवार के माप वा कम में होने पर उपदेम में मो पप तदन्तीको (उपदेश में पजत धातुपी बो) पोरम पर हम ITI पातुर्मा को चि प्रत्यय होते बस वो पार्य पोतारे साकी पड़ सभा निमित्त काय विकल्प पर हो परन्तुमय स्य सिप्सीयुट् ताम् परेको तप पोर स्य पादिकों को बट् भी होवे । बिस पच में पिपाप पहा की यार भी शेता। चिरणावो रोने से १५५ पवि रोती। मुट में भाविता भपिता चूद में भाषिष्यते भविष्यते । गोद में भूयाताम् । सर में भभूमत । प्रा सिर में भाषि पोष्ट मधिवीन। ४८० । पिण् भावकमयो । ३।१144। रिचव स्याहावका मवाचिमि ते परे । भभावि । प्रमाविष्यत । पविष्यतापकमकोऽम्यु पसगवयासकमा । अनुभवते भाभन्दा चनेर त्वया मया था प्रमुभूयन्ते वममुम्यसे । पाममुभये । भम्बमावि । भम्वभाविपाताम् । अभ्यभवि पाताम् । पिशोप । भाज्यते । भावयाम्पो । माक्याम्पमये । मावया मासे । चिपदिट् । भाषिता। पाभीयत्वेनासिवस्वामियोपः भावयिता - १२७ लधुकौमुद्याम् ८०२ ॥ विभाषा चियामुली । ७ । १ । ६६ । लभेर्नुम् । अलम्भि। घलासि ॥ इति भावकसैप्रक्रिया || चिम् 'या' णमुल् परे हो तब लभ धात को विकल्प करके नुम् धागम होवे । अलम्भि ८२१६३ 'या' अलामि, किसी से वह पाया गिया ॥ भावकर्म प्रक्रिया समाप्त हुई। ॥ अथ कर्मकत्त प्रक्रिया ॥ - ॥ अव कर्म (१) कर्तृ प्रक्रिया का वर्णन ॥ ८०३ ॥ यदा कर्मैय कर्तृत्वेन विवक्षितं तदा सकर्मकाणामप्य- कर्मकत्वात्कर्तरि भावे च लकारः ।। जव कर्म को ही कर्ता कहने की इच्छा हो तब सकर्मक धातुओं को भी अकर्मक होने से उन से कर्ता वा भाव अर्थ से लकार होते हैं ।। ८०४ ॥ कर्मवत्कर्मणा तुल्य क्रियः ।३।१।८७) कर्मस्थया क्रियया तुल्यक्रियः कर्ता कर्मवत्स्यात् । कार्यातिदेशोऽयम् । तेन यगात्मनेपदचिचिण्वदिटः स्यु । पच्यते फलम् । भिद्यते काष्ठम् । श्रपाचि । अमेदि । भावे भिद्यते काष्ठेन ॥ इति कर्मकर्तृप्रक्रिया । कर्म स्थित क्रिया (२) के तुल्य क्रिया (३) वाला कर्ता कर्म के तुल्य माना नावे । अर्थात् कर्म के कार्य उस को होवें । यह कार्यातिदेश है । इह लिये या ६५ प्रात्मनेपद २८४ लि को चिण् ०८७ । और चिरावद्भाव और इट् ०६६ होते हैं। (४) पच्यते फलम् । फल पाप से पकता है । भिद्यते काष्ठम्, लकडी पापसे फटती हैं । लुङ् में अपाचि, अमेदि ७६७ । भाव ले, भिद्यते काष्ठेन, लकडी भाप से फटती है। कर्मकर्तृप्रक्रिया समाप्त हुई । ॥ अथ लकारार्थः॥ ॥ अब लकारों के अर्थ की प्रक्रिया का वर्णन किया जाता है। ८०५ ॥ अभिज्ञावचने वृट् । ३1२ 1 ११२ । स्मृतिबोधिन्युप- (१) निस में कर्म ही कर्ता माना जावे । (२) यहा क्रिया से किया फल इष्ट । है। (३) यहा भी क्रिया फल ही जानना । (४)यहां पक नाना क्रियाफल जैसे कर्तृ प्रत्य- चान्त में कर्म में था। वैसे ही कर्मकर्ता का भी है। इसी से कर्मस्थ क्रिया के फल के समान कर्मकर्तस्थ क्रियाफल है। - ।
भावामप्रक्रिया पस्तावि २०० परताविपाताम् । ०५ पापस्तोपाताम। माना गट में पर्यते १० किसी से पा गमन पिया गया है। रम स्मरण करणा। सर में स्मर्यते ११० विमो मे पा स्मरण किया गया। चिद् में मस्मरे १४ || Sat वे मूधम उपदा प्राच बरस से पिषमाप पोर स्ट्रोने पर मुद् में पारिता या पार्ता । मारिता पा रनर्ता २१० मे न खोप के होने पर मंस (नोचे मिरना) मा मस पुपा तो सट् में मस्यते । परन्तु इदित (भिम का (१) प्त् मया ) पातु मे मदि (पानन्दित बोना) ने तो न् का सोप नहीं पता । घर में मान्यते । यम् पाण्यते यहाँ १०८ से सम्ममारप होता। ८८॥ तगेतेर्य कि । । । ४ । ४४ । पादन्तादेशो पा । सायते । तम्यते॥ तनु पातु फोगकार पो पकार विद्याप से रोवे बव एसले परे यन् पाये तक। घट में तायते 'वा' तम्यते उस मे पापसाया गया । २८८ ॥ तपोऽनुतापे च ।। १ । ६५ । तपश्च्णेश्चिम् न स्यात् पाममार्तर्यनुतापे छ । पन्वतप्त पापेम। घुमास्येतीत्वम् । दीयते। धीयते। ददे। पार्मपात में। या पश्चाताप पर्व में तप धातु को ति को पिप न कोये सुर में। पन्वतप्त पापेन पापी ने परचानाप लिया । यह कारण अनुताप मेरे।।१८ घे विनोने पर (दा) दीयते । (पा)का धीयते । सिर में पदे गा दिया गया । ८.. ॥ पातो युक् विष्कृतोः 101 ३ 1 २३ । पादम्तामा युगा गमरिचदि नियति कति च । दायिता । दाता । दायिषीष्टादासीष्ट । पदायि । पदायिषाताम् । मन्यते । पाबारामत पातुओं को 'युवा भापम ही सब पि मित् पा चित् यत् मत्यय परे गोरे। खुद में दापिता 4 वा दाता पा सिर में गायिषीष्ट 'पा पासीर मुरम पदायि ५ पदायिषाताम् वे दो रियेमए । भन्न तोपगा। चट् में मन्यते पर बिपी से तौबा बाता॥ ॥ मम्शेरच चिपि।।४।१३। म बोपो षा।पभावि। पभम्बि। सम्यते।। चिप परे चोते मन्य भातु ये नबार या खोप विकल्प से होवे । वुद में प्रभाषि बाघमम्मिाम्बाम्पते । - - १२८ लघुकोमुद्याम् भृत्यादेः निकष्टस्य प्रवर्तनम् । यजेत । निमन्त्रणं नियोगकरणम् । पावश्यके थाइभोजनादौ दौहित्रादः प्रवर्तनम् । वृह भुजीत। पाम- न्त्रणं कामचारानुज्ञा । इहासौत। धौष्टः सत्कारपर्वको व्यापारः। पुत्रमध्यापयेझवान् । सम्प्रश्नः सम्प्रधारणम् । किं भी वेदमधीयीय उत तर्कम् । प्रार्थनं यात्रा 1 भो भोजनं लभेय। एवं लोट । इति लका- रार्थप्रक्रिया | तिङन्तप्रक्रिया समाप्ता । कार्यकारण भाव के प्रकाम करणे में लिइ विकल्प करके होवे । जैसे छष्णं नमेच्चत्सुख यायात् (वा) कृष्ण मस्यति चेत् सुख यास्यति, यदि श्री कृष्ण जी को प्रणाम करे तो सुख पावे । यह विधि भविष्यत् काल में ही इष्ट है इस से, इन्तीति पत्ता: यते, वह मारता है इस लिये दूसरा भागता है यहां नहीं हुआ। (१) ४५३ सूत्र को स्मरण कराता है विधि, प्रेरणा जैसे यजेत, वह पूजा करे। निमन्त्रण में जैसे, (२) मुम्जीत, वह यहा खावे । आमन्त्रण में जैसे हासीत, पापकी इच्छा होती या बैठे। अधीष्ट में जैसे, पुत्र मध्यापयेगवान्, पाप पुत्र को पदावें । सम्मश्म, कि भो वेद मधीपीय उत तर्कम्, में वेद पटु वा न्याय। प्रार्थना में जैसे, भो भोजन लभेय, मुझे भोजन मिलेगा। इन अयों में लोट् का प्रयोग भी इसो प्रकार पाता है ।। लकारार्थप्रक्रिया समाप्त हुई। ॥ तिडन्तों की प्रक्रिया समाप्त हुई ।। ॥ अथ कृदन्ताः ॥ अब क्वदन्तों का वर्णन किया जाता है। ८१० ॥ धातोः । ३ । १ । १ । आतृतीयान्तं ये प्रत्ययास्ते धातोः परे स्युः । कृदतिङिति कृत्संज्ञा॥ इस सूप से तृतीयाध्याय की समाप्ति पर्यन्त जिन प्रत्ययों का प्रसग है, वे प्रत्यय धातु से परे होवें । २२४ में इन प्रत्ययों की कम सजा होती है । ८११ ॥ वाऽसरूपोऽस्त्रियाम् । ३ । १ । ६४ । अस्मिन्धात्वधिकारे ऽसरूपोऽपवादप्रत्यय उत्सर्गस्य वाधको वा स्यात्। स्च्यधिकारो विना। ८१० सूत्र के अधिकार में जो किसी प्रत्यय का असदृश कोई प्रत्यय अपवाद की तो वह सी के अधिकार वालों को छोड उत्सर्ग (वाध्य) को विकल्प करके बाध ले । (१) इस सत्र से भी लिङ् होता है। (२) इनका अर्थ ४५३ सूत्र में लिख दिया है - १२८ माराम । पदे भतामद्यतने धातीलट् । सोऽपषाद । यस मिवासे।म्मरसि कृष्य गोकुले वस्याम । एवं 'युष्यसे' 'पंतपसे पूत्यादि प्रयोगेपि । अब स्मरण पाच गम्द पातु ने उपपद हो तब पनपतन मृत पर्ष में पातु से परे बसोवे । यह सर का अपवाद ।। पर निवास परणा । स्मरसि समय मोरे पास्यामः कप तुम को स्मरण बिम गोकुल में निवास करते थे। यहां पवसाम"बाम में “वस्यामः एमाले ऐसे पुण्यसे पौर पतयसे इत्यादियों के योग में भी जान सेना पपीषिमता मी स्मरण प॥ ८। न यदि । ३ । २१११३ । यद्योगे तवं न । पमिनामासि यहने मभुमति॥ पद के साथ स्मरण पाचच गप्प हो तो उसने योग में पातु से परे उस पर न हो । अभिजानामि यामे पमुमहि तुम को याद मोसम न वन में मोजन किया था। ८ ७ । पट म्मे । ३ । २ । ११८ । लिटोऽपवाद । यजतिस्म युधिष्ठिर ॥ स्म में उपपद होने पर पातु से खद् होगे। या चिट् वा अपवारयतिस्म युधिष्ठिर रामा यचिप्ठिर ने यम दिया । ८८। वत्तमानसामीप्ये पत्तमानषदा । ३ ।।१३।। । वर्तमामे ये प्रत्यया उत्तास्ते यत्तमानसामीप्ये भूते भविष्यति प पा स्यु । कदा गतोऽसि । पयमागशमि । पागम वा कदा गमिष्यसि।पप गच्छामि। गमिष्यामि पा ॥ पतमान पत्र में मो मत्यर स्माफ्न किये जाते २ रे पर्तमान के समीप मृत पौर मविण्यत् पर्व में भी सा। पदागतोपि तू कप पाया। (रम या उत्तर या कि) परमा गच्यामि वा (पागमम् ) प्रभी पाया परा गमिप्यसि तू पर वायेगा । (इसका तर याशि) एप मामि 'वा गमिष्यामि प्रभो वाताjn ८तुतुमतीर्लिए । १।३ । १५४ । पा स्यात् । कप नमेश्येत्सुखं यायात् । कृष्ण नस्यति चेत्सुखं यास्यति । भविष्यत्यये प्यते । मेहन्तीति पखापते । पिधिनिमम्मतिबिम्। विधि प्रेरणम्। - १२८ ॥ संधुकीमुद्याम् भृत्यादेः निकृष्टस्य प्रवर्तनम् । यजेत । निमन्त्रणं नियोगकरणम् । पावश्यके श्राइभोजनादौ दौहिवादेः प्रवर्तनम् । इह भजीत । पाम- न्त्रणं कामचारानुजा । यहासीत। अधीष्टः सत्कारपर्वको व्यापारः । पुत्रमध्यापयेझवान् । सम्प्रश्नः सम्प्रधारणम् । किं भी वेदमधीयीय उत तर्कम् । प्रायनं यात्रा । भो भोजनं लभेय । एवं लोट् । इति लका- रार्थप्रक्रिया | तिङन्तप्रक्रिया समाप्ता ॥ कार्यकारण भाव के प्रकाय करणे में लिइ विकल्प करके होवे। जैसे कृष्ण नमेच्चत्सुख यायात् (वा) कृष्ण नस्य ति चेत् सुस्व यास्यति, यदि श्री कृष्ण जी को प्रणाम करे तो सुख पावे। यह विधि भविष्यत् काल में ही इष्ट है इस से, इन्तीति पला; यते, वह मारता है इस लिये दूसरा भागता है यहां नही हुआ। (१) ४५.३ सूत्र को स्मरण कगता है विधि, प्रेरणा जैसे यजेत, वह पूजा करे । निमन्त्रण में जैसे, (२) इस भुम्जीत, वह यहां खावे । पामन्त्रण में जैसे हासीत, पापकी इच्छा होतो यहा बठे । प्रधीष्ट में जैसे, पुत्र मध्यापयेद्वान्, पाप पुत्र को पदावें । सम्मश्म, कि भी वेद मधीपीय उत तर्कम्, मैं वेद पटु वा न्याय। प्रार्थना में जैसे, भो भोजन लभेय, मुझो भोजन मिलेगा। इन अयों में लोट् का प्रयोग भी इसी प्रकार पाता है । लकारार्थप्रक्रिया समाप्त हुई। ॥ तिडन्तों की प्रक्रिया समाप्त हुई । ॥ अथ कदन्ताः ॥ अब सदन्तों का वर्णन किया जाता है। ८१० ॥ धातो. । ३ । १ । १ । आतृतीयान्तं ये प्रत्ययास्ते धातोः परे स्युः । वदतिङिति कृत्संज्ञा ॥ इस सूप से तृतीयाध्याय को समाप्ति पर्यन्त जिन प्रत्ययों का प्रसग है, वे प्रत्यय धातु से परे होवें । ३२४ में इन प्रत्ययों की क्वत् सना होती है । ८११ ॥ वाऽसरूपोऽस्त्रियाम् । ३ । १ । ६४ । अस्मिन्धात्वधिकारे ऽसरूपोऽपवादप्रत्यय उत्सर्गस्य बाधको वा स्यात्। स्च्यधिकारी विना। ८१० सूत्र के अधिकार में जो किसी प्रत्यय का असदृश कोई प्रत्यय अपवाद से तो वह सी के अधिकार वालों को छोड उत्सर्ग (वाध्य) को विकल्प करके बाध ले ।। (१) इस सब से भी लिङ होता है । (२) इनका अर्थ ४५३ सूत्र में लिख दिया है। - n कदन्ता 1 ८१२ ॥ वस्या । ३ । ११८५ । एतचाविस्यतः प्राक् कस्य सजा स्युः॥ इस मुष से सेकर २८ सूत्र तक विन प्रस्थयों का प्रसम, पेजस्य संभव हो । ८१५॥ कत्तरि कृत । ३।४ । ६० । पूति प्राप्ते । बत् १२४ सनक प्रत्यय वर्ता पर्ष में हो । ऐसा पा (पा) या ॥ ८१४ ॥ तयोरेव कल्यावखना । ३ । ४ । .. । एसे भावफर्मयो रेव स्यु ॥ 'सस्य १५.पा पोर 'पसर्च में नेपासे नो मस्यय ८२० सो माप पीर पामी पर्व में ८१५ ॥ तव्यत्तध्यानीयरः ।। १ । ८५ । धातोरेते स्युः । एधितव्यम् । एधनीयं त्वया । माथे पौत्सर्गिफमेकवचनं नीवाय । पेतम्यर चयनीयो 'पा' धर्मस्वया । पातु से 'तव्यत् 'सय्य' और 'पनीया ये मरयम होते हैं। एषितम्यम ॥ ४२० 'वा' पपनीय त्वया- तुम्हें बदना पिता या मात्र में उदाहरपती सिये स्वाभाषिया पवचन धीर नपुपम बिन हुए रे पवावि माव में मदोनों माली सम्भव । पार्म में से बतष्य' पा पवनीय' १२० बर्मस्पया । तुभ में म एकर (पा) परवा पापिये ८१ पोलिमर सपसरवानम् । पसिमा माषाः । पत्रमा त्ययः । भिदेखिमा सरखा । मेत्तम्या । कर्मणि प्रत्यष । में केषिमा प्रत्यय मामी परश्यान (अवना) परमा। परेहिमा भाषा (पकाने योग्य माप)। मिदेविमा' सरा-पारने योग्य "दियार' पापा पर्म में प्रत्यय ॥ ८१०५ कल्यस्युटो पहुखम् । ३।३१ ११३ । पवधित्पत्तिः पषिदमहत्तिा पवचिरिभाषा क्वचिदम्पदेव ॥ विधेर्षिधानं बाधा समीक्ष्य चतुर्विध पाहुखर्क पदन्ति ॥ १ ॥ स्नात्यनेन स्मानीयं चूपम् । दोयतेस्मे दानीयो विमः । - . लघुकीमुद्याम् १२१ छत्य ८१२ और ल्युट् प्रत्यय अनेक प्रकार से होते है। कहीं इन की विधि सूम से बिना प्रवृत्ति, और कहीं सूत्र से विधान के होने पर भी न लगना । और कहीं विकल्प से प्रवृत्ति । और कहीं इन प्रकारों से भिन्न प्रकार से व्यवहार होना । इस सें-विधि के विधान को बहुत प्रकार का देख इन के चार भेद कहते हैं। जैसे (१) स्नानीयम् जिस में स्नान किया नावे बटना आदिक । (२) दानीयः-निस के ताई दिया जावे-बामण ।। ८१८ ॥ अचो यत् । ३ । १ । २७ । चेयम् ।। अजन्त धातु से परे यत् प्रत्यय होवे । (३) चेयम् = इकट्ठा करये के योग्य ॥ ८१६ ॥ ईद्यति। ६ । ४ । ६५ । यति परे भात ईत् स्यात् । देयम् । ग्लेयम् ॥ यत् ८१८ प्रत्यय परे होते पाकार को ईकोर होवे । देयम् ४१४ (दातुं योग्यम्)। ग्लेयम् - ग्लानि के योग्य ॥ ८२० ॥ पोरदुपधात् । ३ । १ । १८ । पवर्गान्ताददुपधाद्यत् । एयतोऽपवादः । शप्यम् । लभ्यम् ॥ जिस पवर्गान्त धातु की • धा अकार हो उसे यत् हो । यह ८२५ का अपवाद है ।। शप्यम् = शप्तुं योग्यम् । (४) लभ्यम् = पाने योग्य ।। ८२१ ॥ एतिस्तुशास्वजुषः क्यम् । ३ । १ । १०६ । एभ्यः क्यम्। इण् = गति । ष्टु । शास्-शासन करणा । - स्वीकार । = आदर करणा। जुष्- प्रीति । इन धातुओं से क्यप् प्रत्यय होवे ।। ८२२ ।। हस्वस्थ पिति कृति तुक । ६ । १ । ७१। इत्यः स्तुत्य } शासु अनुशिष्टी॥ पित् तत् प्रत्यय परे होते इस्व को तुक्का पागम होवे। (५) इत्य. माने योग्य। स्तुत्यः-स्तोतुं योग्य. । शास् -शासन करणा ॥ ८२३ ॥ शास दूदहलोः । ६ । ४ । ३४ । शास उपधाया इत्स्यादङ् िहलादौ डिति च । शिष्यः । वृत्य । आहत्यः । जुष्यः । पास् की उपधा को इत् होवे जव घड परे ही वा इलादि कित् वा डित् प्रत्यय (१) यहा स्ना धातु से अनीयर् प्रत्यय करण अर्थ में पाया है । (२) यहा हुदा (दा) धातु से अनीयर् प्रत्यय सम्प्रदान में हैं। (३) चेतु योग्यम् । (४) लन्धु योग्यम् । (५) यहां क्या कित् है इमी लिये गुण नही हुश्रा । ।
परे। मिष्य १८५ सिरहाने योग्य नास्य' २२-सीबार भोग्य । पारप- पापर के योग्य पुष्य'-सेवा में योग्य : २४ ॥ मवेर्विभाषा । ३।१।११३ । मवे क्यम्मा । मन्य । मन्-(पुरापाषा) पातु से परे पिवत्प भरणे व रे। य-शुद्ध परमोग्य ॥ ८२५ ॥ खोरयंत् । ३। १ । १२४ । पवारतासम्ताप पयत् । कार्यम् । कार्यम् । धार्यम् ॥ अपनत ' वासना भातु से रयत् प्रत्यय होये।।+पमत्-मार्यम् १५ बात योग्यम् । पारणे योग्य | T+रयत् गर्यम् र योग्य । पार्वम् - भारत के योग्य : ८२६ । चषो कुषिक्षातो ०1३।५२। चवोः कुत्वं स्याहिति यति च। पौर वो वपर्ग होरेवर (1) पित् वा यत् प्रत्यय परे तब ।। ८२० । मृर्वधिः । २ । ११४ मवेरिकोदि सार्वधातुकार्ध धातुकयो । मार्यः । पर सावपातुब मा पाचातुक प्रत्यर परेको तर बम् पातु सपो हति हो । मार्य २५, ८५-मुषवारपीग्य । ८२८॥ मोम्म भरये ७।३।६८ भोग्वमभ्यत्। इति कृत्य प्रलिया। पाने योग्य रस पत्र में मुन् पातु वा 'भोग्यम्' ऐसा पाता रे पोर पम्य पर्य में भोग्बम् ऐसा पाता त्वमबिया समाप्त ई R ८२९॥एफुल्तची ३।१।१३२ धातीरेती स्तः पर्तरि वदिति कप पातु परे एजुन पोर तप प्रत्यय होरे । २५ अनुसार या प्रत्यय पत्तो पर्व में होते। ८२ । युवीरनाकी ०।११। युवएतयोरनापी ताप कारवाया। 'यु' पोर हुने स्थान में पनपौर पर पादेश प्रम मोरे। वारक-+८ एन १५-परवा पार्ता (a+7)-परणे पाता। ८१ मन्दियहिपचादिभ्यो प्युणिग्यष ३।१।११४ मम्या (१) लिमका () गया । । - १३३ सधुकौमुद्याम् । देल्युह्यादेर्णिनिः पचादेरच् । नन्दयतीति नन्दनः। ननार्दनः । लवणः । ग्राही । स्थायी । मन्त्री । पचादिराकृतिगणोऽयम् ॥ नन्द प्रादि धातुओं में ल्यु प्रत्यय होवे और ग्रह आदि धातुओं में णिनि होवे । और पच् भादि धातुओं से अच् प्रत्यय होवे । नन्दनः (नन्द+ल्यु) ८३० = प्रानन्द करणे वाला । (१) जनार्दनः (जन, उपपद, अर्द-पीड़ा देनी+ल्यु)- विष्णु. । (२) लवणः (लू+ ल्यु)-लूणाग्रह + णिनिः- (३)ग्राही(गृजातीति)४८३ लेने वाला।स्थायी(ष्ठा+णिनिः) ८०० ठहरने वाला । मन्त्री (मत्रि+णिनिः)-मन्त्री। पचाटि (४) भासतिगण है ॥ ८३२ इगुपधज्ञापौकिरः क. ३ । १ । १३५ एभ्यः कः।बुधः कृशः जः। प्रियः । किरः। निन धातुओं की उपधा में इक् (इ, उ, ऋ, तृ) हो उन में भौर भा, प्री, कृ, इन धातुओं से क प्रत्यय होवे । बुधः १४८-पण्डित । कगः दुबत्ता । मः (धा+.) १४८, ५१८ आनने वाला। प्रियः = मित्र । किरः (क+कः) १४८, ७०० = फेंकने वाला ॥ ८३३ ॥ भातश्चोपसर्गे ३१ ११ १३६ प्रज्ञः । सुग्लः ॥ उपसर्ग उपपद रहे तब भाकारान्त धातु में 'क' प्रत्यय होवे । प्रमः- परिडत । बड़ी ग्लानि करणे वाला ।। ८३४ ॥ गेहे कः३ । १ । १४४ गेहे कर्तरि ग्रहे कः स्यात्। गृहम्॥ अब गृह कर्ता हो तब मह धातु से 'क' प्रत्यय हो । गृहम् ६६८ (गृहाति धान्यादिकमिति) घर ॥ ८३५ ॥ कर्मण्यण ३ । २ । १ कर्मण्युपपदे धातीरण । कुम्भ- करीति कुम्भकारः। जब किसी धातु का उपपद १.१५ कर्म हो तब उस धातु से भण् प्रत्यय होये । कुम्भकार १०१६, ०६२, १५६ - कुम्हा(म्भा)र ॥ ८३६ ॥ पासोऽनुपसर्गे कः३।२।३ भणोऽपवादः । गोदः । धनदः कम्बलदः । अनुपसर्ग किम् । गोसम्प्रदायः । (१)यहा "जनान् अर्दयति" ऐसे विग्रह में १.१६ से समास और ७६२ में विभक्ति का लोप कर लेना । (२) यहां एकार निपात से है। (३) यही याहिन् मन्द में प्रथमा के एक वचन में १८१,१८३, १८४ इन सूत्रों से पाही, की सिद्धि कर लेनी । (४)इनको स्वरूप में गणना ३, सख्या में नहीं । (५) यहा ग्लै को भाकार ५१८ से कर लेना पुनः 'का' प्रत्यय ॥ ३ (५) सुग्लः
१५४
बब कोई उपमय उपपद नसे और बम उपपदरता पावारान्त पातु से 'क'
मस्यय होये का प्रपपाद । गोद (गा ददाति) १८।भमद-पन देनेगाता।
कम्बखद १८ (वामन ददाति) स सूत्र में अनुपमर्गे या क्यों कहा? बत्तर देता
यदि न करते तो 'गोसम्प्रदाय" सख्दाहरप में मी ''माता पन होता।
८३७ ॥ मनधिमुजादिभ्य र । मलागि षिमुषति भूलषिभुषो
रय । पावतिगयोऽयम् । महीनः । कुन ।
मूसविमुनादियों से '' मत्यय होता है। श्री बा को ठेवा पर
बाथा 'मूषविभुम -रष। मूतविमुबादि भारतिमपी मही परति । (0)
म
8
८३८ ॥ चरेष्ट ३ । २ । १५ । पधिकरणे उपपद । कुरुधर ॥
पर पधिवरष उपपद वो तब पर पातु से ' प्रत्यय हो। पुरषर (पुरुषु
परति) १ १५ ॥२ र देश में पाने पापा की बोधुराचरो काते रे।।
८८ मिधासेमादायेषु पर ३१२११७ भिचाघर । सेनापर
पदायेति षयवतम् । पादायघर ।
'मिया' मा 'सेना'पा पादाय' उपपद हो तो पर पातु से 'र' प्रत्यय हो।
भिवापर १ भर-मिपारी । सेनापर-बो सेना को जापे । 'भादाय' सो पम्त
पोता।पादायपर-वेकरमाने पाहा।।
८४• || माओ तुताच्छील्यामुखोम्येषु ।।२।२. एषु घोत्येपु
फरीतेष्टः ।।
तु (बारब)मा 'ताजील्य पा पनुपूर्वता पचास परनीती' पातु से
'४' प्रत्यय तीवे॥
८४१॥ पता ककमिसकुम्भमाकुणाकर्णीष्वनव्ययस्य ८९
४६ । पटुत्तरस्यामध्ययस्य विसगस्य समासे नित्यं सादेगः करीत्या
दिपु परेषु । यास्करी विद्या । याकरः । पपनकरः ।
बमि सम्म पाप वुमा नीलम से यदि कोई पद पर तम
(१) या नु उपपद धातु हे प्रत्यय और १८ में यप्पा ।
. नघुकीमुद्याम् १३५ प्रकार के उत्तर (९) अनव्यय की विसर्ग को सपादेश नित्य होवे समास में। यशस्करी ८४०, १०१६, ७६२, १३३० यश देने वाली (विद्या) । श्राधकरः - जिस का स्वभाव थाध करणे का है। वचनकरः-आज्ञाकारी ।। ८४२ ॥ एजे. खश् । ३ । २ । २८ । ण्यन्तादेनेः खश् ।। एयन्त ७४२ एम (काम्पना) धातु से 'ख' प्रत्यय होवे ॥ ८४३ ॥ अरुर्दि पदजन्तस्य मुम्। ६ । ३ । ६७ । अवोद्विषतोऽज- न्तस्य च मुसागम. खिदन्ते परे नत्वव्ययस्य । शित्वाच्छबादि ।जनमे- जयति । जनमेजयः॥ खिदन्त (२) परे हो तो अरुष् (मर्म), द्विषत् (शत्रु), और भजन्त, इन को मुम् का भागम होवे परन्तु यदि अव्यय उपपद हो तो नहीं होता । खथ् शित् है इस लिये शप ४१३ आदिक होते हैं। जनमेजयः (३) १०१६, ७६२ = मनुष्य को कम्पाने वाला ॥ ८४४ ॥ प्रियवशेः वदः खच । ३।२।३८ । प्रियंवदः वशंवदः । 'प्रिय' वा 'वश' उपपद हो ती 'वद' धातु से 'सच्' प्रत्यय होवे । प्रियवदः प्रिय वदति ८४३ मीठा बोलने वाला। वशवदः अधीनता को मानने वाला ॥ ८४५ ॥ आत्ममाने खश्च । ३ । २ । ८३ । स्वकर्मके मनने वर्त- मानान्मन्यते सुपि खश् स्याच्चास्मि निः। परिडतमात्मानं मन्यते पण्डितंमन्यः। पण्डितमानी ।। सुवन्त के उपपद होते, 'स्वकर्मक मानने अर्थ में वर्तमाम' जो 'मन्' धातु उस सें 'स्व' प्रत्यय होवे । सूत्रस्थ चकार से णिमिः प्रत्यय भो इसी अर्थ में हो। पण्डित मन्यः ८४२, ६६३ वा पण्डितमानी = अपने को पण्डित मानने वाला ॥ ८४६ ॥ अन्येस्योपि दृश्यन्ते । ३१२ ७५ । मनिन् वनिम् विच् एते प्रत्यया धातोः स्युः ॥ मनिन्, कनिम्, वनिम्, और विच्, ये प्रत्यय भौर (४) धातुओं से भी दीख पडते हैं। ८४७ ॥ नेड्वशि कृति । ७।२।८। वशादः कृत इट् न शू हिंसायाम् । सुशर्मा । प्रतरित्वा । । क्वनिम् (१) यदि वह विसर्ग किसी भव्यय का अवयव न हो, इस विशेषण के देने से 'स्व' करोति' में "स्" न हुभा । (२) खित् ( जिस का इत् हो) प्रत्यय जिस के पन्त में हो। (३) किसी राजा का नाम है । (४) आकारान्त को छोड । - () वादि शत् प्रत्यय योद ४५० पामम नाम (मारना)। सुम+मनिन् (मुपर्मा)-पायो रीति से पाप का नायब ! मातरिया (मात+र-बाना+भूमि) २५ मातबार में बानेपाना । ८४८॥ विपनोरनुनासिकस्यात् ।। ४।४१। मनुमासिक म्यात्स्यात् । विवायते इति विनावा । पोप पपनयने । पवावा। गि रुप रिप सिायाम् । रोट् । रेट् । सुगए। जब पिट 'या' प्रत्यय परे रहे तम पनुनासिक स्थान में पाचार होवे । (वि-बन्+सन्)-विनापन् १८१ ।१५। १४-विजावा) बो निमेष से जल्पाल हो। पवावा (परभरा+वन्)-प्रवाषन् १५१८१९८४-प्रयाग-परमा माम न करने बाटी बाप्रपो। रिप (सिसा करनी) रन से पिच मस्यय पाबा तो। पए+विच (रोर ४०६१५८) मा पर पाया । ऐसे ऐद । सुमए (मुप ममपति) पची रीति से मिपने वाहा। ८४८॥ निवप् च । ३।२। ०६ । पयमपि हरयते। उणामत् । मरध्वत् । वाइबटम पातु से परे दिप प्रत्यय दीप प्रदता। उणामत् (मास्+विप) १०१ १४८,१५ १९२२ पणामत्-णा से मिरने बाता। पर्वपत् (पम्पी पंचते) 10 २८२, मानर (बारम्+पिप) १२८ । बोटे से मिरने याचा ८५• ॥ सुप्रजाती पिनिस्तान्छोषये । ३ । २ । ७८ | पचात्य सुपि धातोर्णिनिस्ताछोल्ये गोत्ये ! उष्णभीवी । मीच (स्वमाय) प्रवास करने पर्ष में पाप मुफ्त से उपपद होते मातु तिमि मस्ययी।पमोभी-गरम मीबम करणारे स्वमाप मिया ८५१॥ मम । । । २ । ६२ । सुपि मन्यतेपिनि स्यात् । दर्म- नोयमानी ॥ मुपगत उपपर राते 'मन् पातु से 'पिनि प्रत्यय नीयमानी पर्यनीयमात्मान मन्यते ॥ २५२ ॥ पिल्पमध्ययस्म । १३ । ६ । पूर्वपदस्य असा कासिमम्या । (१) बम् प्रत्याातमत सोई परे पारिम मिनर P सधुकोमुखाम् रिहत् प्रत्यय परे हो तो धातु के पूर्वपद (उपपद) को इस्व होय परन्तु यदि यह पव्यय न हो तब 1 कालिमन्या ८४५, ८४३ जो अपने को काली मानती है। ८५३ ॥ करणे यजः।३। २ । ८५ । करणे उपपदे भतार्थयजे- पिंनिः कर्तरि । मोमेनेष्टवान् सोमयाजी । अग्निष्टोमयानी ॥ करण (तृतीयान्त) के उपपद रहते भूत काल में यज् धातु में कर्ता अर्ध में णिनि प्रत्यय हो। सोमयाजी ४८३, १८१, १८३, १८४ =जिस ने सोम करके यज्ञ किया। पग्निष्टोमयाजी- जिस ने अग्निष्टोम करके अपने इष्ट की पूजा (भावना) की। ८५४ ॥ दृशे. क्वनिम् । ३ । २ । ६४ । कर्मणि भूते । पारं दृष्ट वान् पारश्वा ॥ कर्म के उपपट होते भूत अर्थ में दृश् धातु से कृनिप् प्रत्यय होवे । पारदृश्या १८१, १९३, १८४ पार देखने वाला ॥ ८५५ ॥ राजनि युधि कृञः । ३ । २ । ६५ । क्वनिम् । युधिरन्त- र्भावितण्यर्थः । राजानं योधितवान् । राजयुध्वा । राजकृत्वा । राजन् शब्द उपपद रहे तो यध्, और कन् धातु से परे 'कृनिप्' प्रत्यय होवे। यहां युध् में णिजर्थ (प्रेरणा) अन्तर्भूत है । राजयुध्या-राजा को लडवाने वाला । राज कत्वा=राना को करने वाला ॥ ८५६ ॥ सहे च।३।२।६६। सह योधितवान् सहयुध्वा । सहकत्वा। जब 'सह' (साथ) उपपद हो तब भी युध् और क्व धातु से परे 'कनिम्) प्रत्यय होवे । सहयुध्धा । सहकृत्वा ८२२ =सहायता करने वाला ।। ८५७ । सप्तम्यां जनेड. । ३ । २ । ६७ ॥ सप्तम्यन्त उपपद हो तो जन् धातु से परे 'ड' प्रत्यय हो । ८५८ ॥ तत्पुरुषे कृति बहुलम् । ६ । ३ । १४ । खेरलुक् । सरसिजम् । सरोजम् ॥ सत्पुरुष समास में कत् प्रत्ययान्त उत्तरपद रहे ती सप्तमी का सुक् न होवे । ८१७, सरसिजम् २६२ 'वा' सरोजम् - कमल । । ८५८ ॥ उपसर्गे च सज्ञायाम् । ३ । २६ प्रजा स्यात्सन्तती नने।। उपसर्ग के उपपद होते भी जन् धातु से परे 'ड' प्रत्यय होवे प्रत्ययान्त किसी की मंशा हो तब । प्रजा, १३३५ मन्सान वा प्रमा लोग ॥ परन्तु । यदिइ .
सदस्ता
ब्द • अषत निष्ठा ।११।२६।एती निष्ठा संत्री स्त ।
व पीर सपान दो प्रत्ययों को निष्ठा साये
८६१ ॥ मिष्ठा । ३ । २। १२ । भूतार्यहत्तेर्वासोनिष्ठा । तत्र
तयोरेवेति भाषार्म पो लोकतरि कदिति कर्तरितवतुः। स्नार मया
स्तुतस्त्वया विष्णु । विश्व वासवान् विष्णु ।
भूत पय में धातु से परे निष्ठा सेना प्रत्यय हो । तिन में से छ
अनुसार मात्र पोर कर्म पम में पातारे धौर सपतु ८१ ले पनुसार पाता पर्थ में की
ताए । 'रमात मया" मेने नाग लिया। 'स्तुतस्त्वया विष्णु" हम से विष्णु मुक्ति
लिया गया । “विरवंतवान् विष्णु"परमेश्वर ने संसार को रचा।
८६२ ॥ रदाम्यां frष्ठातो मः पूषस्य च दः । ८।२।४२ ।
एदाभ्यो परस्य निष्ठातस्य नोमिष्ठापेक्ष्या पूर्वस्य धाताईस्म च ।
हिंसायाम् । गोर्थः । भिन्न । छिम्मः ॥
'पौर हरन से परे वो निष्ठा ५ स तु पो पौर निष्ठा से पूर्व को
पातु तिस कदमो मो 'न्यो । म (मारना) मो.
1-माराममा भिन्न
(मिद+) अमेदि । विन्म (विद+)-मोबाठा गया ।
८६॥ संयोगादेरातोधागीयपवतः 1८।२ । ४३ | मिष्ठात
स्य ग स्यात् । द्राप । सामा।
प्रयोगादि (मयोग र चादि बिसको) और पावापतकोपातु यन् पाताको
उस से पर मिष्ठान के त्यो नसोपे । दार (A+) १२५ बिस ने मुस्मित
गति को । ग्यान (1) १५ जिप ने मानि पी।
८५४ ॥ एवादिभ्य ।८।२।४४ । एकर्षिगरोसूमादिभ्य प्राग्वत्
एमः । ज्या धातुः । यहिण्येगि सम्प्रसारपम् ।
पादिमीम " पातु पो से परे निष्ठा को परवी पिभिराम
(बोचाटा गया)।पा (पदा कोना) prict मम्प्रसारण करमेना।
८५५ ॥ स ।६।४।२। पापयपावलः पर यत्सम्प्रसार
पदगास्य दोप।बीग ।
पापा पापको निममे परे भी माम्पमाप लो।
बोम (न्या-8)-पागे गया।
लधुमीमुयाम् १२ ८६६ ॥ गोदितश्च।८।२।४५ । भुजी, भुग्नः टुप्रीशिव उच्कूनः- जिस धातु का बोकार इत् हो उस से परे निष्ठा के “त्" को "न्” हो । भुजो (टेढा होना)-1-: । भुग्न =टेढा किया गया । टुओशिव (गति 'वा' बटना) उत्-।-शिव-. त: (उच्चनः) ८८० फूला ॥ ८६७ ! शुपः कः। ८।२ । ५१ । निष्ठातस्य । शुष्कः ॥ शुष् धातु से निष्ठा के त् को क् होवे । शुष्कः सुखा ।। ८६८ ॥ पबोव.।८।२ । ५२ । पक्व. । हर्षक्षये ॥ पच् धातु से निष्ठा के 'त्' को 'व्' होवे । पकः = पका । - हर्ष का बय होना। ८६८ ॥ क्षायोमः।८।२ । ५३ । क्षामः ॥ वै धातु से परे निष्ठा के 'त्' को 'म्' होवे । क्षाम. ५२२ - आश ॥ ८७० ॥ निष्ठायां सेटि। ६ । ४ । ५२ । रोपि. । भाक्तिः। आवितयान । हह हिंसावास् ॥ जब सेट् (१) निष्ठा परे हो तो गि का लोप होवे । भापितः होने को प्रेरया किया गया । (२) भावितवान् । दृह हिंसा करणी ॥ ८७१॥ दृढ़ः स्यूलवलयो।७।२।२० । स्थूले वलवति च निपात्यते ।। ६ धातु का निष्ठा में रथूल और लवाला अर्थ में "दृढ" ऐसा निपात से रूप होताहै। ८७२ ॥ दधातर्हिः । ७ । ४ । ४२ । तादौ किति । हितम् । त् है आदि में जिस के ऐसे कित् प्रत्यय के परे होते धा (धारण करना) धातु को हि प्रादेश होता है । हितम् (धाज-- हा) धारण किया गया ।। ८७३ ॥ दोदरो. । ७ । ४ । ४६ । घुसंजकस्य दा इत्यस्य दथ् तादी किति । चत्वम् । दत्तः ॥ तादि कित् प्रत्यय परे हो तो घु ६५६ सन्ना वाले दा को दथ् आदेश होवे ८७ से थ् को त् किया तो, दत्त = दिया गया । ८७४ ॥ लिटः कानज्वा ।३।२ । १०६ । ८७५ ॥ क्वसुश्च ३ । २ । १०७ । लिट. कानचक्वस वा स्त.। सडानावात्मनेपदम् । चक्रागा. ॥ (१) इट् महित । (२)भू । णि -- तवतु (भावितवत्) पुनः ३३६,३११, २३ लगाने ।
दता,
पिट् पे स्थान में 'वान पोर कसु विद्याप भरपेचाते । वानवी
मात्मनेपद संभास से पात्मनेपदी शतुषों से गीगाहा..
१२१, २१ ॥१-चिस ने किया था।
40 ॥ मोश्च 1८।२। ६५ । माम्तस्य धातोनी म्योः
परत 1 अगम्बाम् ॥
म् 'वा परे तो मान्त पातु पो ग् हो । (गम् + समु)-बनवत् (१)पुन
१८२९१ २५-जगत्वाम् (बाचुका)।
८७७ ॥ जटः शतृयामधापमयमासमानाधिकरणे। ३।२।१२४ ।
भप्रथमान्तेन समानाधिकरणे पट एतौ वा स्तः । अयादिः । पचम्त
र्ष पश्य ॥
नब पापमान्त सामसद वा समानाधिकरण (एक पब)ो हम बरसे
स्थान में 'प] और 'गान प्रापय विकल्प से हो। येसीको शित् मे अपू
१५ पाकिमस्यय कोवे । (२) पचत वर्ष पश्य (दूसरे को सिवे पश्चात यो १०)
40 पाने मुक । ०१२।८२ पदन्तास्य । पचमान
पश्य । पहित्यमुक्त्तमाने मुनखड्यापार प्रथमासामानाधिकररयेऽपि
मवपित् । सन् शिव ।
पानसे परे होते पदात पाको मुत्र का प्रामम । पचमान पे पाय अपने
सिमे पातेपो देशी । ६०. में। से बद को पनाति को समती पी पुममा
c00 में सर पाप में या सिएमा वि कमी परमासामानापियारण्य में भी सर
वे स्थान में गत मान से सन् । १. १११ ॥fम-पिपमान पाच
Cer || विदेः गतवसुः । ०।१।१६ ते परस्य मतुर्वसुरा
देगी वा । पिदन् । विद्वान् ।
विद् पातु से परे गत कोतु पादे विपरप बरोथे। विदन् (विद+यत) १५ ।
२५ (पा) विहान् (विदन वमु) परिमा
॥ ती सत्। ३ । २ । १२० । तो यतृगामचो सासनीस्त ।
की सत मंचा।
(महा मी रित्वादि पर मने। (१) या सद् बता मेरे पौर उममा
भापतिीवाला
चौरमाग
१४१ ॥ सधुकीमुद्याम् । ८१॥ लुटः सदा।३।३।१४। करिष्यन्तं करिष्यमाणं पश्य । स्तृट के स्थान में सत् सनक प्रत्यय विकल्प से होवे। करिष्यन्त करिष्यमाण ४२६ पश्य = उस को देखो जो करने को है। ८८२ ॥ श्रावस्तच्छौलतधर्मतत्साधुकारिषु । ३।२। १३४ । क्विपमभिव्याप्य वक्ष्यमाणास्तच्छोलादिषु कर्तृषु बोध्याः ॥ इस सूत्र से लेकर ८८० तक जितने प्रत्यय उच्चारित होंगे वे उन कर्ताओं मे ही, जिन में किसी प्रकार का स्वभाव 'वा' वैसा धर्म 'या' किसी क्रिया की सुन्दरता प्रकाश करनी होती।। ८८३ ॥ तृन् । ३।२ । १३५ । कता कटान् । तच्छीलादि अों में धातु से परे 'तुम्' प्रत्यय होवे । 'कर्ता (१) कटान्' ।। ८८४ ॥ जल्पभिक्षकुटलुण्ठसङः पाकन् । ३ । २ । १५५ ॥ जल्प -बड २ करना । भिष्मागना । कुट-कूटना । लुपट् = लटना । बड सेवना । इन धातुओं से तच्छोलादि अधों में षाकन्' प्रत्यय होवे । ८८५॥ ष. प्रत्ययस्य।१३।६। प्रत्ययस्यादि. ष इत्संन. स्यात्। प्रत्यय के आदि का ष् इत् सना वाला होवे । जल्पाकः = बकवासी । पराकः- विचारा, कगाल। ८८६॥सनाशंसभिक्ष उ.।३।२।१६८।चिकीर्षु । आशंसुः ।भिक्षुः । सन्मन्त ७४६ से और आइपर्वक शस् धातु से और भि धात से परे सच्छील पादि अर्थो में "उ" प्रत्यय होवे । (२) चिकीर्षु = करने की इच्छा के स्वभाव वाला । पाशसुः स्तुति करने वाला। भिक्षुः भीख मांगने के स्वभाव वाला। ८८७ ॥ भ्राजभासधुर्विद्युतोनिपजग्रावस्तुव. विवम्।।२।१७७। विभाट । भाः ॥ भाज, भाम, (३) पूर्व, इत्, अज, पृ, जु, और ग्रावन पूर्वक ष्टु धातु इन से परे तच्छी लादि अया में विप् प्रत्यय होवे । विश्वाट ३२८ प्रकाशने वाला । भा. = दीप्ति । ८८८ ॥ राल्लोपः। ६ । ४ । २१ । रेफाच्छवी प. क्वौ झलादी १ (१) जिम कर चटाई बनाने का स्वभाव को। (२) ७५० को देखो (३) हिसा करनी।.
मिति च। धः । विद्युत् । ज । म । हधिग्रहवस्थापकर्षामनवते दर्घ । । ग्रावस्तुत रेप से परे जी ए का) व तिस का सीप वे परन्तु बम वि प्रत्यय को (क) मचादि बित् (वा) गित पत्यम परेको । ५ का प पू 48 - मार। विभुत्- विनी-१ पासा -नगरो । में 'एयर पद पनुवर्ष ''भातु पो टोध (१) होता।-गपाम् । प्रावस्तुत् (२) । र ॥ विव पचिमच्छमायतस्तुकटमुज़ौधा दीर्घोऽसंप्रसार च । वप्तोति वा ।। पम् मच पायत पूषा 'प्टु पातु और परपु. चिरल धातुपी से परे लिए मत्यय होय पोरमको दोधाये। पीर सम्प्रसारute मोपे। पाप-बारी। ॥ पचो गृहनुमासिको च । ६।४ । १८ । सतुबस्य इस्प षस्य च क्रमात् म् कठ् एतावादेगी सत पावनुनासिकादी झखादी सिसि च । पृच्छतीति प्राट् । पायत स्तोति पायतस्त । कर्ट प्रवते पटमः । वरख । अषति हरि श्री नुको सस्तिया और यो प्रम से म् भोर छट पादेशी कि (पा) पर नामिवादि प्रत्यय (पा) भावादि चित् चित् प्रत्यय पर पर रेत । प्राट् (पति) २५५ पूराने वाचा । पावतात-सम्मी स्तुति करने वाला । कटपू - बीमा ८८ में का दियाधी-सश्मी' । २१॥ दाम्नीयसयुयुवस्तुतुदमिसिथमिकपतदयमा करपे। ५।२।१८२ । दामादेः ष्टन् स्मारकरऽ । दास्यनेन दाधम् ।। पाप पाटना । पोन् । गठ मारा। यु । युम् । ष्ट । तुर । पिए पानाना । विपर-बिगाना । मिा मूतना । पर मिला । दम् हाम्तों से पारना । पोरा पाम्पमा धातुपों से पर भरष पव में दन् प्रत्यय प्रत्यय । सम् ५ मिस सेवादारी ८८२ तितुषतयसिसुसरणसेपु च ।।२।८ । एपो दशामा या मामाभ्यो मत से। (१) पहा ८१९ तुमसर मेगा । परमर की पतिमारने माना।
१४२ लघुकीमुद्याम् मिड न । शत्रम् । योत्रम् । योताम् । स्तोत्रम् । तोच्चम् । सेवम् । सेताम् । सेठम् । पत्रम् । दंष्टा। नही । ति (क्लिन्, तिच्) तुन्, प्टन, तन्, क्थन्, विस, सुच, सरन्, वान्, और स इन दश १० प्रत्ययों को इट न होये । शस्त्रम् ८८१, ८८५ योत्रम् यु--ष्ट्रन् = जूले की रस्सी। योत्रम् (जूला) स्तोत्रम् (प्ट- ट्रम्) तोत्रम्, कोटला । सेत्रम् (वन्धन, मेन्तम् - मिच्-। ष्ट्रन् छिनकाव का पात्र । मेट्रम् । (निन) (मिह । ष्ट्रन्) पत्रम् (वाहन) दप्ट्रा (दाढ) नद्री (न-- ष्ट्रन) २८३, ५८०, १३, ४२ चाम को रस्सी । ८६३ ॥ अति लधसख नसहचर इत्रः । ३ । २ । १८४ । अरित्रम् । लवित्रम् । धविनम् । सवित्रम् । खनित्रम् । सहिवम् । चरित्रम् ॥ र, लू, धू, मू, रहन्, पड्, सहना और चर् इन धातुओं से परे (१)"इत्र" प्रत्यय होवे परिचम् ४१४ = लवित्रम् ४३०, ४१४ दाबी। पवित्रम्, पखा। सवित्रम्, उत्पति हेतु । खनित्रस् - कही । सहित्रम्, धीरज । चरिषम्, चरित्र । ८६४ ! पुवः संज्ञायाम् । ३।२ । १८५ । पवित्रम् ॥ सजा अर्थ में 'पू' धातु से 'इन' प्रत्यय हो पवित्रम् ४१४, २६ ॥ Pall अथोणादयः ॥ अब उणादियों का वर्णन । ८८५ ॥ कृवापाजिमिस्वदिमाध्यशभ्य उण् ॥ करोतीति कारुः । वायुः । पायु गुदम् । नायुरौषधम् । मायुः पित्तम् । स्वादुः । सानोति परकार्य मिति साधुः । आशु शीघ्रम् ॥ स, वा, पा, जि, मि= फैकना । स्वद्, स्वादलेना! साध्, और अशू, व्याप्त होना। हुन धातुओं से परे 'उण्' प्रत्यय होवे । कारु १८६ शिल्पी । वायुः (वातीति) ८०० । पायुः पिवति तैलादिक मनेनेति) ८०० = गुदास्थान । नाय' (जयति गेगान्) ८०० औषध । माय (मिनोति देहे उष्माणमिति) पित्त । स्वादु (स्वदते) मीठा । साधु भला मनुष्य (वा) सीव । श्राशु ४८३ (प्रश्नुते) शीघ यह अव्यय है । ८८६ ॥ उणादयो बहुलम् । ३।३।१ । एते वर्तमाने संज्ञायां च ॥ - - (8) इत्र म इकार इसलिये पढा है कि अरित्र आदिकों में इकार का श्रवण हो। नही तो जो ४२७ से इट् पाया उस का ८८२ से निषेध हो जाता है। । " बहुखं स्युः। योचिदपिहिता प्रायदा त संचासु धातुरुमाणि प्रत्ययारण तत परे । कार्याविद्यादनुवग्यमेतशास्त्रमुपादिषु ॥ १ ॥ पतमान पास में पोर मंत्रा पर्व में न 'सादि प्राण्यी वा अनेक प्रकार से ध्यपहार होता है। एक हिसी उपादि सब से परिक्षित मी प्रत्यय बागधने । पर दियों में या (१) विधि विधारण में बो सिसी की संभाएं (पापा सद) हन में भातु पीर प्रत्यय ऐमे हम परने को उन में हो सरें। और गुणादि माया से म प्रत्ययों के पनुबन्द बापना करने। ८६७ ॥ तुमखुली क्रियायां क्रियायाम् । ३।३।१• बिरा यो क्रियायामुपपदे भविष्यदर्ये घातोरेती स्तः।मानास्वादव्ययत्वम् । कृष्य द्रष्टु याति । सायं दशको याति। शिवार्य किया प्रयोजन बिसमा) बिया उपपद से तब भविष्यत् पर्ष में मातु से परे तुमुन् पोर पवनु प्रत्यय हो । मान्त होने से १८ पनुसार तुमगन्तबी पम्पय संचाइ (+तमन्) याति वा बार वर्षको ४०८ याति बाप देवन को जाता है। २८ कालसमयवेलासु तुमुन् ।८।३।१५० । कालः सममी देखा वा मोलम् । बासापक सदी में से दो पपद की ती पातु से परे 'तमन्' प्रत्यय हो। माचोमीम् ।। ८१८ मोजन पारने याबाब भने हामीम्' इत्याहि मी बाम देने। 22 मावे ।।३।१८ सिहावस्यापम्ने धारवये वाच्ये धातो घं । पापः। पाणचा पप मम सिगावस्या को प्राप्त हो तब उस धातु से बन पायम हो । पाव ०२ ८२। ८ •॥ अवतरिय कारके संचायाम् ३।३।१८ कर्तुमिम्मे कारके धम् । पंजा मेंपो से मिन्मपारत में मे परे (यानि में वो किसो प्रकार से नया नाम पिसी मी मना रे पोर रिनामादियों ने पाया नहीं पाता। तो रस में "" धातु से परे Far स्पम बम्पना लिया और मुषामाचा प्रत्यय बाचित माना .
? - से लघुकीमुद्याम् । १४५ ६०१ ॥ घजि च भावकरणयोः ६ । ४ । २७ रञ्जनलोपः स्यात् । राग. अनयो.किम् । रज्यत्यस्मिन्निति रङ्गः । जब रन्ज, धातु से परेभाव (वा) करण अर्थ मे घञ् हो तो इस के न कालोप हो । राग. ४८३, ८२६ = रङ्गने का साधन प्रादि । इस सूत्र में "भावकरणयो." यह क्यों कहा ? उत्तर देता है । रङ्गः (नाट्यशाला) इस मे न् का लोप न हो जावे। ६०२ ॥ निवासचितिशरीरोपसमाधानेष्वादेश्च कः ३ । ३ । ४१ एषु चिनोतेघञ् आदेश्च कः । उपसमाधान राशीकरणम् । निकायः । काय । गोमयनिकाय.। निवास, चिति, शरीर और उपसमाधान (राशिकरना) इन अर्थों में चि धातु परे घञ्' प्रत्यय होवे और आदि के च् को क् होवे । निकायः, निवास । कायः, १८६, २६ शरीर । गोमयनिकाय', गोवर की ढेरी ।। ६०३॥ एरच् ३ । ३ । ५६ वर्णान्तात्। चयः । नय. । पूवर्णान्त धातु से परे अच् प्रत्यय हो । चयः, समूह । जय ४१४ १ २६ जय ६०४ ॥ ऋदोरम् ३।३ । ५७ । वर्णान्तादुवर्णान्ताच्चाप् । करः गरः । यव । स्तव. | लव.। पवः । ऋकारान्त (वा) उकारान्त धातु से परे 'अप्' प्रत्यय होवे । कर (कृ-1-अप् ) छिडकना । गर. ( गृ। अप् ) विष । यव. (यु--अय् ) ४१४ २६ जोडना । स्तव. =स्तुति । लव. (लू--अप) ४१४ १ २६ काटना । पब (पू-1-अप् ) पवित्र करना ।। ६०५ ॥ घञर्थे कविधानम् । प्रस्थ. । विघ्न । घन् के अर्थ मे 'क' प्रत्यय भी होवे। प्रस्थः ५१८मापविशेष । विघ्न ५३४, ३०८ विघ्न ६०६ ॥ ड्वित ति ३ । ३ । ८८ । जिस धातु का डु इत् हो उस से परे "क्ति" प्रत्यय होवे ।। ६०७॥ तेर्मम्नित्यम् । क्तिप्रत्ययान्तात् महिनवृत्तेऽर्थे । पाक्षे निवृत्तं पक्तिमम् । डुबम् । उत्रिमम् । क्ति प्रत्ययान्त से परे निवृत्त (सिइ) अर्थ में मप् प्रत्यय होवे । पक्तिमम् = पाक रे सिंह हुा । डुवप् (वाना) उप्तिमम् = ५७८ बोने से जो सिद्ध हुश्रा ।। ६०८॥ ट्वितोऽयुच् ३ । ३ । ८८ । टुवेपृ कम्पने । वेपथु ॥ । 4 ।
१११ 01 प्रताप । प्ररम' मानारपसरचा। धित धातु का (८) पत् गया हो तिम पातु मे परे प्रषुच्" प्रत्यय वि । दुषेप (पाम्पना) मेपमुकम्प ॥ 2. यनयाचयतविश्वप्रच्छरची न३ । ३।६ यन्नः। याज्ञा। यहमः। विश्म । प्रश्न । रक्ष्य ॥ यम्-देव पूमा यात्-मांगना यत्-यत्न करपा विह-गति प्रम-पूम्बना पीर पप-रवाकरना न धातुपों से परे 'नर' मत्यय होवे । यम यम । याचना-मानना। यत्म-पम । विनर ८१० • ॥ स्वपो नन् ३ । २।८१ स्वप्म । स्वप् (विष्यप) पातु से परे मन् प्रत्यय होगे । स्वप्न'-निद्रा । ८११॥ उपसर्गे धोः कि । ३।६२ प्रधिः। उपधि । उपसम पूरन घुसेक पातु से परे 'कि प्रत्यय हो । मधि (मा+मि ५१८)-चन की पारा। उपधि-बच ॥ ८१२ ॥ स्त्रियां लिम ३।३ । ८४ स्रोशित भाषे हिन् । घओ उपपादः । कृति स्तुतिः ॥ वीगि में भाव को प्रवास वरना तो पातु से 'तिम्' प्रत्यय बोरे या का पपपादति । स्तुति । ६१३ ॥ पापवादिभ्यः लिम्निष्ठावहान्यः । तेन मत्वम् । कोर्षिः पनि धनि । पूनिः ॥ पचारान्त पातुषों से परे और पूपादि। पातुपी पे परे मिन् का निष्ठा समान व्यवहार भागना । बीपि (हिन्). 14। दूनि । धूमि ५४ पूनि ५४-परिचता n ८१४ ॥ सम्पदादिभ्य विषम् । सम्पत्। विपत् । पापत्। हिन्न पौष्पते । सम्पत्ति । विपत्ति । पापत्तिः ।। सम्पद पादि से 'विप् प्रत्यय हो। सम्पद (सम्पद विप) पम्पस् -धन विपत् -विपदा । पापत्-पकी सगा । ल से खिम् प्रत्यय भी होता सम्पति (सम्-पद्+चि)-सम्पदा । विपत्ति । पापत्ति ॥ ८१५ ॥ जतियतिवृतिसातितिकोत्तयाच । ३ । ३ । 201 एते निपात्यन्ते ॥ ।
१४9 % 3D 4 - . लघुकीमुद्याम् =रक्षा । यूतिः = जोडना । जूतिः = वेग । सातिः = नाश । हेतिः = शस्त्र । कीर्तिः = यश । ये (१) निपात से सिद्ध होते हैं। ६१६ ।। ज्वरत्वरसिव्यविमवामुपधायाश्च । ६ । ४ । २० । एषा- मुपधावकारयोरुठ् अनुनासिके क्वौ भलादौ डिति च । जतिः । क्विप् । ज. । तः । स्व । जः। म.॥ ज्वर् = सन्ताप । त्वर् = शीघ्रता करनी। सिब् = गति । अव् = रक्षा । और, सन वान्धना । इन की उपधा और व् को ऊठ हो जब अनुनासिकादि 'वा' कृिप् 'वा' मलादि कित् 'वा' डित् प्रत्यय परे हो तब । जतिः (अव्-'-प्तिन्) । कृिप के आने से (२) जू. = ज्वर वाला । तू' =शीघ्रता करने वाला । सू-सुवा । ऊः रक्षक । मू: = बान्धने वाला ।। ६१७ ॥ इच्छा । ३।३। १०१ । इषेनिपातोऽयम् ॥ इष् धातु का(३)इच्छा यह रूप निपात से होता है। ६१८॥ अप्रत्ययात्।३।३।१०१ प्रत्ययान्तेभ्यः स्त्रियामकारः प्रत्यय. स्यात् । चिकीर्षा । पुत्रकाम्या । प्रत्ययान्त धातु से स्त्रीलिङ्ग में प्रकार प्रत्यय होवे । चिकीर्षा ७५० में चिकीर्ष बन चुका है उस से अकार प्रत्यय किया पुनः ४६८, १३३५ = कर्तुमिच्छा = करने की प्रच्छा । ऐसे पुत्रकाम्या ७६६ =पुत्र की कामना ।। ६१६ ॥ गुरोश्च हल । ३।३। १०३ । गुरुमतो हलन्तात् स्त्रियामप्रत्ययः । ईहा ॥ गुरु वाला और हलन्त जो धातु उस से 'अ' प्रत्यय हो जीलिङ्ग में। ईहा ८८१८ चेष्टा करणी॥ ६२० ॥ ण्यासश्रन्थो युच् । ३ । ३ । १०७। अकारस्यापवाद । कारणा। हारगा ॥ 'एयन्त' धातुओं से और 'आस्' और 'अन्य' इन धातुओं से परे 'यच्' प्रत्यय (१) ऊति में अन्तोदात्तस्वर निपातन है यूति', और जूतिः, यहां दीर्घ निपातन है। साति., में षो धातु के आकार को द्यतिस्यति. इत्यादि से इकार नही हुआ यही निपा तन है। हेति में हन् के न् को इकार निपातन है। कीर्ति से ८२० नही लगायही निपातन है। (२) यहा से मू प्रयोग पर्यन्त के धातु ८१६ सूत्र मे निर्दिष्ट हैं । (३) यहा पृष् धातु से परे भाय अर्थ में ग प्रत्यय और यक्का प्रभाव यह निपातन है।
११८ छदाता -गरपाना। - होवे । या पौर ८१८ का पपपाद रे। पारणा (+पि+युच्) ८१ भारपा (परि+युच्) रखाना है ८२१ ॥ नपुसके माये ।। ३ । ११४ ॥ पब सिवायद नपुंसक पोतभाव में प्रकाग करने में पातु से परे ' प्रत्यय होये। ६२२ ॥ क्युट च । ३ । ३ । ११५ । एसितम् । सगम् । पा सूपये विषय में युद् प्रत्यय भी ये सितम्।सनम् ५ स । ६२३ ॥ पुसि संचायाँ ध प्रायेष। ३ । ३ । ११८ ॥ दरबनने वाग याद सभा और पुगि तब माय धातु से परे च प्रत्ययौवे । १२४ । पहादेऽडपसर्गस्य ।। ४ । ८६ । हिप्रभुत्युपसग होमस्य शदेशस्तो घे । दम्तादः । पाकुर्वन्त्यस्मिन्निति पाकर ॥ दो पादिपसर्ग से रहित को पद पातु उसको प प्रत्यय से परे होते स्प ोये । दन्तगाद-पोष्ठ। पावर-पान ८२५ मवेतस्रोर्ष ३ । ३ । १२ अवतारः। पवस्तारो नवनिया ॥ पण पपन व सपएर रोते 'तु पर स्तू भातुको 'घम् प्रत्ययो । पपतार' १८५-मसामय में हारने का म्यपादिपास्तारय-बनात। ८२६ खरच । ३।३ । १२१ । सन्ताम् । घाऽपवाद । रमन्ते योगिनो यस्मिमिति रामः। पपमन्यतेऽमेम ज्याध्यादिरित्यपामाग । रसन्त पात से परे पण प्रत्यय पाने। या ८५ वा अपवाद। राम १५ विम में योमी रमे पत(भगवान्)। पपामार्ग ८६९०-बिस से व्याधि दूरी पुगरण ८२० ६ पहुस्सुषु कछालछार्येषु सल् । ३ । ३ । १२६ । पपु दुखसुखार्थेषपपदेषु षण् । तयोरेवेति भावे कम्मपि च । मान्छे । दुष्करः कटो भपता। पाछे । इपरकर । सुकरः । बर(१) दुप और मुए पथ में पद र (ग) मु पपरसे तर पातु से परे 'पस प्रत्यय गोपे १० से या पत माप पा वर्म में पाता।एप पर्म में दुसरा (२) मयता । मुपप में पत्थर मुबर १ ॥ (1) योग्यता में ()पपा मे" पौर मुपद मुख में पानी । (२) पापस पठाईया बमामाठिन। - १४८ १ लघुकीमुद्याम् ६२८ ॥ आती युच् ३।३।१२८ खलोऽपवादः । ईषत्पानः सोमोभवता । दुष्पानः । सुपानः ॥ आकारान्त, धातु से 'युच्' प्रत्यय होवे । यह सूत्र ८२७ खल् का अपवाद है। ईषत्पानः ८३० सीमो भवता = तुम से सोमलता का रस अनायास से पिया जा सकता है। दुष्पान' । सुपानः । ६२६ || अलं खल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां तवा ३।४ । १८ प्रति- षेधार्थ योरलंखल्वोरुपपदयोः तवा। दो दद्घो। अलं दत्वा । धुमा- स्थेतीत्वं । पौत्वा खलु । अलं खल्बोः किम् । माकार्षीत् । प्रतिषेधयोः किम अलंकार ॥ "निषेधार्थक, अल और खलु" उपपद रहे तो प्राचीनो के मत में धातु से 'क्वा' प्रत्यय होता है।८७३ से 'दा' के स्थान में दथ् हुआ। अल दत्त्वा ८७ मत दो। ६१८ से 'पा को 'पी' तब । पीत्वा खलु मत पियो । ८२८ इस सूत्र में "अलखल्वो.” यह क्यों कहा उत्तर देता है, न कहोगे तो 'माकार्षीत्' में 'मा' के योग में भी क से का हो जावेगा। पुनः यहा "प्रतिषेधयो" क्यों कहा ? उत्तर देता है, न कहोगे तो 'अलकार.' में अल के योग में क से वा हो जावेगा। ६३० ॥ समानकर्तृकयोः पूर्वकाले ३। ४ । २१ समानकर्तृकयो- र्धात्वर्थयोः पूर्वकाले विद्यमानादातो. तवा । स्नात्वा ब्रजति । हित्व- मतन्त्रम् । अतवा पौत्वा ब्रजति ॥ जिन धातुओं का कर्त्ता एक हो उन में से पूर्व काल अर्थ में जो धातु तिस से 'वा' प्रत्यय हो । स्नात्वा ब्रजति-स्नान करके जाता है। यहा दित्व (१) अविवचित है, इस से, भुक्त्वा पीत्वा ब्रजति (खाकर पीकर जाता है) यहाँ दोनों से परे क्या हुआ ।। ६३१ ॥ न तवा सेट १।२। १८ सेट तवा किन्न स्यात् । शयित्वा। सेट किम्। कृत्वा ॥ सेट क्वा कित् न माना जावे । शयित्वा =सोकर । "सेट" क्यों कहा ? उत्तर देता है 'कृत्वा' में गुण न हो॥ .. ~ (१)८३० सूत्र में (दोनों में से पूर्वकालार्थक धातु में वा हो) यह कोई नियम नही भनेको के होने से जितने पूर्व काल में हो उन सभ में क्या हो । यह विवक्षा है हदासा - ८३२ ॥ रची व्युपधादलादे संश्च ११२ । २६ वर्णवोंपधा चलादे रखतात् परौ तपासनी सेटी वा किती स्त । युतिरुवा । योतिरुवा । लिखित्वा । लेखित्वा । व्युपधात् किम् । वत्तिरुषा । रख किम् । सेवित्वा । लादे पिम् । एषित्वा । सेट् किम् । भुतपा । मिस धातु को उपधा में स्पष'पा' उपपो पोरगरपादिमेको पौररत् पन्त में ही तिस से परे सेट मी 'ब' और 'सन् वे वितस्प से वित्। पुतिस्ता पोमिस्वा ४०८-चमककर । सिपिस्वा सेपिस्वा ४०८-सिण कर । रस सूप में 'प्युपधात्" की का ? उत्तर देता रेवत्तिस्या में विकल्प न हो। पुन "रह" पपों का जत्तर देता २ पेपिस्वा' में गुष विकल्प से नगे माये । पुन "पखादे "म्पों का सत्तर देतारे 'पपिस्या में पचान्तर में गुष रषित न हो जाये । पुन 'सेट" या महा! उत्तर देता २ 'मुबा' यहां दूसरे पक्ष में गुरु गोवा ।। ८.३३ ॥ अदिती पा 01 २ । ५६ उहितः परस्य तप ड्वा । गमिषा । गारवा । देषित्वा । गुल्या । दधात । हिल्वा । बिस पातु माहात् हो तिस से परे बा को पिपरप मेंगे। मिस्वा पा मानस्या (भमु+मा) ८-यान्त को कर । रेपिस्या (बा) पूस्पा (दिपु+मा) e - रेख पर । ८०१ रोपाचे स्थान में किताब हिला-पार परn ८३४ ॥ महारष । ४ । ४३ पिल्या ।स्तु । हाम्वा ।। का प्रत्यय परे हो तो 'ता' (त्यागना) पातु वोलिना जिस्वा (वीरकर)। परन्तु (गमन) पा तो हास्या बनता है। ८३५ ॥ समासेऽनपूर्व तपो स्यप् । १ । १७। मध्ययमवपदे ऽनङ्समामे तवो एयवादेशः । सुक् । प्रकृत्य । पनन् किम् । पक्रया। पव्ययपूर्वपदै किम् । परमतत्वा । पप समाम में न भिम्म पाएय पूषपद से तापवा बोम्यप् पादेस गोरे २९ मे नुकता। प्रखत्यारस सूत्र में 'पनम् पयों मार देतारे'परवा' पहास्य ममापे । यह मय प्युदाम (मा मिन ममे समान पान पम्यय) at माना । उत्तर देशा 'परमस्या' या म्प मोजावे । ८३८ । भीरपये पमुल् घ३।४।२२ पाभीपये घोत्ये पत्र विपये पमुल् मवा ध।
- लघुकौमुद्याम् १५१ जब भाभीक्षाय (बार २ करना) प्रकाश करना हो तब ८३५ सूत्र के विषय में तवा और णमुल्' प्रत्यय होवें। ६३७॥नित्यवीप्सयोः८।११४ अभीक्ष्ण्ये वीप्सायाञ्च द्योत्ये पदस्य हित्वं स्यात्। भाभीदण्यन्तिडन्तेष्वव्ययसंजकदन्तेषु च।स्मारं स्मार- न्नमति शिवम्। स्मृत्वा स्मृत्वा। पायम्पायम्।भोजम्भोजम्। श्रावं श्रावम् अाभीक्ष्ण्य वा वीप्ता प्रकाश करनी हो तव पद को हित्व होवे भाभीक्ष्ण्य तिङन्तों में और अव्यय सजक हादन्तों में होता है। स्मार स्मार १८६ नमति शिवम् धार २ स्मरण करके शिव को प्रणाम करता है। पाय पायम ८०० वार २ पीकर भोज भोजम्, वार २ भोजन कर । भाव यावम् १८६ वार२ सुन कर। ६३८ ॥ अन्यथैवंकथमित्थंसु सिद्धाप्रयोगश्चेत् ३।४ । २७ । एषु कृजोगामुल्स्यात् सिधोऽप्रयोगो यस्य एवम्भतश्चेत् काव्यर्थत्वात्प्रयोगा नई इत्यर्थः । अन्यथा कारं । एवं कारं । कयं कारं । इत्थं कारं भुते । मिद्देति किम् । शिरोऽन्यथा कृत्वा भुते ॥ इति कृदन्तप्रक्रिया ।। अन्यथा, एव, कथम्, और इत्थम्, इन में से कोई शब्द उपपद रहे तब 'कन्' धातु से परे ‘णमुल्, प्रत्यय होवे, परन्तु यदि क्वन् धातु का अप्रयोग सिद्ध हो अर्थात् क न व्यर्थ हो, इसी लिये उस का प्रयोग करना व्यर्थ हो । जैसे (१) अन्यथा कार भुतो, वह अन्य प्रकार से खाता है। एव कार भुते वह इस प्रकार से खाता है । कथ कार भुक्त वह किस प्रकार खाता है । इत्थ कार भुङ्क्ते, वह इस प्रकार खाता है। यहां सिह ऐसा पद क्यों कहा १ उत्तर देता है, यदि न कहो तो, शिरोऽन्यथा कृत्वा भुक्त = थिर को फेर कर खाता है, यहा क धातु सार्थक है। यहा भी णमुल हो जावेगा (यही दोष पडेगा परन्तु सिद्धपद के होने से यहा णमुल नहीं हो सकता ॥ क्वदन्तों की प्रक्रिया समाप्तहुई ॥ अथ कारकम् ॥ अब कारकों (विभक्तियों के अथा) का वर्णन किया जाता है। ६३६ ॥ प्रातिपदिकार्थ लिङ्गपरिमाणवचनमाने प्रथमा २।३ । ४६ नियतोपस्थितिक प्रातिपदिकार्थः । मात्रशब्दस्य प्रत्येकं योगः । (१) "अन्यथाकार भुक्तों' इत्यादि उदाहरणों में कब् का प्रयोग व्यर्थ है, क्यों कि 'भन्यथाकार भुतो' का जो अर्थ है, वही अर्थ " अन्यथा भुत्तो का है। इस लिये क्व से णमुल् किया पुन १८६ से वृदिः और ३८३ से णमुलन्त को अध्ययों के कार्य किये तो अन्यथा कारम्, यह सिच हुप्रा ॥ - १५२ । कारक्षम् प्रातिपदिकार्यमाचे शिामाषाद्याधिक्ये सख्यामागे च प्रथमा स्थात् प्रातिपदिकार्यमाचे । उच्चैः । नीधे । वष्यः । श्री । मानम् । लिए माथे। तट तटी। तटम् । परिमाणमा । द्रोपोहोधि । पधनं सख्या एकः । दी। वाद । (मिस्) मातिपश्चिम्पारण से विस पर्यवी नियम से उपस्मिति (प्रतीति) हो पा मातिपदिचार्य (प्रया) पाचाता है। भर में वो मान गदरे ससमा प्रत्येक प्ले साय सम्बन्ध है। समास पे पन्त में सुनावाने से सेवा प्रतिपरिवार्य में और सिजमाप पाधिप में पौर परिमाप माष पे पाधिक्य में पीर बस संख्या. पाचन सम्द से परे प्रवमा होवे। प्रातिदिवाय में से तज्चे (पा)नीर या विमान्तकी पद संचाकीने पर पस्व पौर पिसम एए । द्वाप (पासुदेव) बी (सश्मी) जानम (नान) इस ये पौर मी पक्षिा नियतसिटारो समते २ । विमान में से (१) तर तटी तरम् नदीका तीर। ऐसे पोर भी पनियतनित पद इसके उदाहरण होपकते है। परिमाप मान में वैसे द्रोपी ब्रीशिदीप प परिमाप से नपा दुपा भनाज (द्रोचमर पापस) मूत्र में वो बचन पदोसचा पई () संख्या है। उदाहरप से एक ही पाप पक दो गहते। ८४.। सम्बोधनेच २ । ३ । ४० प्रथमा । राम । सम्बोधन पप में प्रममा पेरेराम । ८४१॥ कर्तुरोप्सिततमहर्म । १।४।४८ कत्तु निययातुमि प्टतमधारकरम्मसनं स्यात्। वर्तामोनियामम्य फससाय भिमना मम्बराने बीपस्यन्त ज्या रोमो धारण कर्म संघा माता हो। ८४२॥ कम्मपि रितीया। २।३।२। पनुले कम्मपिहितीया।हरि- म्भवति । पभिहित तुकादो प्रयमा।रिस्सेव्यते । पदम्या सेवितः । (१) यो तीर पी प्रातिपदिवाब तो नियम परिमत तारे परन्तु होम जिमी रस निये नि मात्र या पापियो। (१) पाध्य पाप या पभेद मान वा प्रापीमों के यहार मे । यहा को पत्रमा पमी मुबा भारती "वार्थानामप्रयोग* सापो का प्रयोग मसीता । म नियम से यहा एवाहि मासी ने विधिको मासिनी पो म दोष के निवारण के लिये मर में मदया माद। - ।
- लघुकौमुद्याम् १५३ अनुक्त (किसी प्रत्यय से न उत्ता) कर्म में द्वितीया होवे । हरि भजति, वह हरि को भजता है। यहां प्रत्यय कर्ता में है इस लिये कर्म अनुक्त है। परन्तु उक्त कर्मादि को मे सो प्रथमा ९३८ से हो जाती है। जैसे इरि' सेव्यते (हरि सेवा किया जाता है) लक्ष्म्या सेवितः (लक्षमी से सेवा किया गया) यहा 'सेव्यते' और सेवितः, दोनों कर्म प्रत्ययान्त है, तो कर्म उक्त हुआ इसी लिये प्रथमा हुई। ६४३ ॥ अकथितञ्च १ । ४ ! ५१ अपादानादिविशेषैरविवक्षित झारककर्मसङ्गं स्यात् । अपादान ८५० आदि (अपादान, सम्प्रदान, करण, अधिकरण आदि) जब विवक्षित न हो तब ये भी कारक कर्मसंजक हों। ६४४ ॥ दुधाचपच्दण्डसधिप्रच्छिचिशातुनिमन्थनुषाम् । कर्मयुक् स्यादकथितं तथास्यान्नीकृष्वहाम् १ गां दोग्धि पयः। बलि- याचते वसुधाम् । तण्डुलानीदनम्पचति । गर्गान् शतन्दरड्यति । ब्रजमवरुणद्धि गाम्। माणवकम्पन्थानम्पृच्छति। वृक्षमवचिनोति फलानि माणवकन्धस्म ते । शास्ति वा । शतं जयति देवदत्तम् । सुधां क्षीरनि- धिस्मथ्नाति। देवदत्तं शतम्मुष्णाति। ग्रामसजान्नयति। हरति कर्षति वहति वा । अयं निवन्धनेयं सज्ञा । वलिं भिक्षते वसुधाम् । साझव- कन्धर्मम्भाषते । अभिधत्ते । वक्ति । इत्यादि । दुइ, दोहना। याच, मांगना । पच्, पकाना। दण्ड, दण्ड देना । रुधिर्, ढकना। प्रच्छ, पूछना । चि, सचय करणा। ब्रू,बोलना।शास्, शिक्षा देनी। जि, जीतना । मन्थ् मघना । मुम् चुराना । इन धातुओं के और 'गी, लेजाना। ह, हरना । अष्, बँचना । वह लेजाना, इन धातुओं के मुख्य कर्म के साथ क्रिया सम्बन्धी, जो अपादानादि विशेषों से विवचित न हो तो वह कारक कर्मसमा वाला हो । गा दोग्धि पय (वह गौसे दूध दुहता है । बलि याचते वसुधाम् (वामन वलराजा से धरती मागता है) तण्डुलानोदन पचति (धह तण्डुलों से भात पकताहै । गर्गान् शत दण्डयति (वह गगी से सौ रुपये दण्डलेताहै। ब्रजमवरणधि गाम् (वह व्रज में गौ को घेरता है) माणवकं पन्थान पृच्छति, वह वच्चे से मार्ग पूछता वृक्षमवचिनोति फलानि (वह वृक्ष से फलों को इकट्ठा करता है) माणवक धर्म ब्रूते पारित वा वह बालक को धर्म कहता है, वा सिखलाता है। शत जयति देवदत्तम्, वह देवदत्त से सौ मुद्रा जीतता है। सुधां क्षीरनिधि मन्धाति, वह क्षीरसमुद्र से अन्त को मथता है। । - है ११४ A देवदर्स गत मुख्याति देवदत्त से सो मुश पुराता। पाममा नयति रति वर्षति पाति वा-या पाम में प्रबा(बकरी)नो सेवाताल (रत्यादि) यात्रा) निमपना २स से 'माष के समानार्थक 'भिच् पारसे। बदि मियते वमुधाम् । वहा भी बसिम में पितीया दुई। ऐसे मारी धमे भाषते पभिपते पनि इत्यादि मी पान ने। ८४५ ॥ साधकतम करपम् ।।४।४२ क्रियासिही प्रकष्टोपका रई करणसभ स्यात् । स्वतन्त्र इति कर्तसधा। दिया पी सिरिमबो पत्यास अपवारवरी मोबारक्ष पर संहा मार पौर । १८ से मत माहीती ८४६ कातकरपयोस्तृतीया २। ३ । १८ । पनमिहिने कर्तरि करणे च तृतीया स्यात् । रामेण वाम तो वालो । अनुप्त (मो तिद्पादि मत्ययों से नही) कर्ता और परप से परे तृतीग पिमधिरामेच बागातो माटो -राम से वार करयेबाही मारा मया । यही राम बारे पोर पाच परप परन्तु दोनी पनुपरेमोवि प्रत्यय पर्म में ऐसी खिये तृतीयान्त हुए। ८४७ ॥ कर्म या यमभिप्रेति स सम्प्रदानम् ।। ४ । ३२ दामस्म फार्मणा यमभिनेति स सम्मदानसम्म स्यात् । स्वता विस को दाग लिया दे धर्म के साथ संयुगपरने बीमा परे धो पारया सम्मादाम संना पाहाये ।। ८४८ ॥ चतुर्थी सम्प्रदागे २ १३ । १३ विनाय गां ददाति । सम्पदान कार में चतुर्षी सोधे । पिप्राय गां ददाति-विम को मौ देता। ८४६ ॥ ममः स्वस्तिस्यास्वधालवपड्योगाश्च २।३।१४ एभिर्योगे धतुर्थी। परयै नमः।प्रवाभ्य स्वस्तिापग्नये स्वाहा। पितृभ्य स्वधा । पसमितिपर्याप्त्यय ग्राणम् । तेम देरयेभ्यो रिरलं प्रभु समयः शत्यादि। ममम् बस्ति माह सभा 'पबम्' और 'बयर इनसे योग में चतु। (ए महाबो पर्षनिमयना मानने मे (एन दुइ पारिभातुषों की बेममान पर पापौर भी शतु सिये पा) अपोदि "चनियमनाका या भाषर विधा पादिधातुमही शिस्त न के पर्व या वर्म त्रिा में कारपरे। - लघुकौमुद्याम् हरये नमः (हरि को नमस्कार)। प्रनाभ्यः स्वस्ति-प्रना का कल्याण । अग्नये स्वाहा अग्नि में हवि देना । पितृभ्यः स्वधा-पितरों को देना । यहां "अलम्" का अर्थ पर्याप्ति है, इस लिये पर्याप्ति जिन का अर्थ है उन के योग में चतुर्थी होवे, जैसे "दैत्येभ्यो हरि- रख, प्रभुः, शक्तः, समर्थ., इत्यादि दैत्यों (दिति के पुत्रों) के लिये हरि परिपूर्ण है समर्थ है शक्तिमान् है ॥ ८५० ॥ ध्रुवमपायेऽपादानम् । १ । ४ । २४ । अपायोविश्लेषस्त- स्मिन्साध्ये यद्धृवमवधिभूतकारकन्तदपादानसन्नं । स्यात् । अपाय का अर्थ विभाग है उस के साध्य होने पर जो ध्रुव (अवधि भूत) कारक (निस अवधि से विभाग हो वह कारक) अपादान सज्ञा वाला हो । ६५१ ॥ अपादाने पञ्चमी।२।३।२८। ग्रामादायाति। धावती- ऽश्वात् पतति । इत्यादि ॥ अपादान में पञ्चमी होवे । ग्रामादायाति-वह ग्राम से आता है। धावतोऽश्वात् पतति =वह दौड रहे घोडे से गिरता है। इत्यादि और भी उदाहरण जान लेने ॥ ६५२ ॥ षष्ठी शेषे २।३।५० कारकप्रातिपदिकार्थव्यतिरिक्तः स्वस्वामिभावादि सम्बन्ध.शेषस्तत्र षष्ठी। राज. पुरुष.।कम्मादीनाम पिसम्बन्धमावविवक्षायां षष्ठेयव । सताङ्गतम् । सर्पिषो जानौते मातु स्मरति । एधोदकस्योपस्कुरुते । भजे शम्भोश्चरणयोः । कारक और प्रातिपदिकार्थ से भिन्न नो स्वस्वामिभाव (स्वत्व स्वामित्व सम्बन्ध) प्रादि सम्बन्ध यहा शेष है उस में षष्ठी होवे । “राज्ञः पुरुषः" = राजा का पुरुष । कर्म आदिकों में भी सब सम्बन्ध मात्र की विवक्षा हो तब षष्ठी ही होती है। "सता गतम्" =सन्जनों का गमन । “सर्पिषो जानीते" = वह घृत सम्बन्ध करके प्रवृत्त होता है। "मातु स्मरति" वह माता का स्मरण करता है। "एधोदकस्योपस्कुरुते" लकडी पानी को नया गुण देती है। "भन्ने शम्भोश्चरणयो" मैं शिव के चरणों को सेवता हूं। ६५३ ॥ आधारोऽधिकरणम् । १ । ४ । ४५ । कर्तृकर्महारा तन्निष्ठक्रियाया प्राधारः कारकमधिकरणं स्वात् ॥ कर्ता और कर्म के द्वारा कर्ता और कर्म की क्रिया के आधार कारक की अधि- करण संन्चा होवे॥ ६५.४ ॥ सप्तम्यधिकरणे च । २ । ३ । ३६ । चकाराद्दूरान्तिका- - । - समास' भ्य । पीपरप्लेषिको घेषविकोऽभिध्यापकाश्चन्याधारस्थिधा । पटे पास्ते। स्थास्याम्पचति । मोघेच्छाम्ति । समेस्मिन्मात्मास्ति। वनस्य रे । पन्तिके वा। । इति विमलयस्था ॥ पधिकरण विषे सप्तमी रोपे । सूपरम पवा या भाषय विर पौर,समीप के पापा मम्दी से भी परे सप्तमी सोपे । (पीपासेपिक (पेपपिक, पौर(१)पमित्रा पक्ष ये पापार के तीन मेद । पास्ते-याचदाई पर बैठता है। स्मारयो पति- पावरसोली में पकाता रे । मोरास्ति-उसमी रमाबाषिय मोच (मुति)। सर्वस्मिन्नास्मास्ति- सम में पारमा व्याप्त है। पनस्य दूर पन्ति पा-बनमो दूर पा निमार॥ । विभापय (कारक) समाप्त धुए। ॥ अथ समास । समास पञ्चधा ॥ 1ब पमास वा पर्यन विया माता। समास याच प्रचार था। ८५५ ॥ तब समसन समास । स च विशेषसमजाविनिर्मुल केव जसमास प्रथम ! मायेप पर्षपदार्यप्रधागोऽव्ययीभावोहिताय । प्राये पोत्तरपदार्षप्रधानस्तापुरुषस्तृतीयः । तत्पुरुषमेदः कार्मधारय । वर्मधारयभेदी हिगु । प्रायेखाम्यपदार्थप्रधानी बहुमोरिचतुरर्ष । प्रायेवोभयपदात्यप्रधानी महः पञ्चमः ।। समसन (पने पदीया एक पद सोमा) रामास वाचाताचिस की कोई विगेप संमा (नाम) नही पा म फेवरु समास पाहातारे। प्राय विस में पूर्व पद पा प्रब प्रधान पर रतीम' पम्पयीभाम पाता।प्राम' बिस में पर पदका पर्व मपानोपारतीय तत्पुरुप कापाता। तत्पुरुष का ही मेद वर्मगर बमषारय बा एस बिऐप मेद विगु माय मिस में (0) पन्यपद का पर्व प्रधान गर्म पानीधिवासाता माय बिस में दोनों पदो काप प्रधान मोवाम पाहता पदविधिः । २।१।११ पदसम्बन्धी यो विधिास समस्यायिती वीण्य । बोविधि पद (पा) पदी से सम्बन्पपासामये (पवाीमा)ोपाधीन हो। (१) बिबिसी पश्यप से संयोमपा पोपरगापिका । (२) मिस से विषय का बीपी पियिक () विस में पायेय पूषप पेप्यास्तापमियापक । (6) समासपदी पोपीरनोपन्यायासमीनदारी में बाबा रामदारपरगी। ८५६॥ समर्थ १५७ लधुकौमुद्याम् । ६५७ ॥ प्राक् कडारात् समासः।२।१।३। कडाराः कर्म- धारय इत्यतः प्राक् समास इत्यधिक्रियते ॥ यहा से “कडाराः कर्मधारये" इस सूत्र के पूर्व समास' इस शब्द का अधिकार है। ८५८ ॥ सह सुपा।२। ११ ४ । सुप् सुपा सह वा समस्यते। समासत्वात् प्रादिपदिकत्वेनसुपोलुक् । परार्थाभिधानं वृत्तिः । कत्त- हितसमासैकशेषसनाद्यन्तधातुरूपाः पञ्च वृत्तयः। दृश्ययाववोधक वाक्यं विग्रह. स च लौकिकोऽलौकिकश्चेति विधा। तत्र पूर्वम्मत इति लौकिक । पूर्वम्भूत सु इत्यलौकिकः। भूतपूर्वः। भूतपूर्व चरडितिनिर्देशात् पर्वनिपातः ॥ सुबन्त का सुवन्त के साथ विकल्प करके समास शेवे । समास की १३२ से प्राति- पदिक सना होने पर ७६२ से सुप् का लुक् होता है । भिन्न २ अवयवों में जो अर्थ रहे उस से भिन्न (एक रूप से) अर्थ के प्रकाश करने वाली शक्ति को हत्ति कहते हैं। बत्ति के पाच भेद हैं १ क्वत्, २ तचित, ३ समास, ४ एक शेष, और ५ सनाधन्त धातु । त्ति के अर्थ के जनाने वाले वाक्य को विग्रह कहते हैं। लौकिक, और अलौकिक, ये दो विग्रह के भेद हैं । 'भूतपूर्वः' इस का लौकिक विग्रह जैसे 'पूर्व भूतः' अलौकिक जैसे 'पूर्व + अम् + भूत + सु । “भूतपूर्व." इस में भूत शब्द का "भूतपूर्व चरट्" इस सूत्र में 'भूत' शब्द के पूर्वनिपात के निर्देश से पूर्वनिपात होता है ।। ६५६ ॥ दुवेन सह समासो विभत्त्यलोपश्च । बागों दूध वाग- ॥ इति केवलसमास. प्रथमः ॥ इव (सहश) के साथ सुवन्त का समास होवे और सुप् का ७६२ से लुक् न होये। "वागर्थाविव" वागौं+इव (वाणी और पर्थ के सदृश)। प्रथम केवल समास समाप्त हुधा । ॥ अथाव्ययीभावः ॥ पब अव्ययीभाव का वर्णन किया जाता है ८६० ॥ अव्ययीभावः । २ ! १ ! ५ । अधिकारोऽयस्।प्राक् तत्पुरुषात् । 'अव्ययीभाव' इस का अधिकार ८०६ सूत्र के पूर्व पर्यन्त होवे । ६६१ ॥ अव्ययं विभक्तिसमीपसमृद्धिव्यद्धयर्थाभावात्ययासम्प्रति- शब्दप्रादुर्भावपश्चाद्यथानुपध्ययोगपद्यसादृश्य सम्पत्तिमाकल्यान्तवच- र्थाविव ।
'भमास' मेषु । २ । १ । ६ । विभत्तयर्यादिषु पत्तमानमध्ययं सुषम्तेन सा निस्वं समस्यते। प्रायेखाषियहो नित्यसमासः । प्रायेवास्वपदवियती या विभती। हरि भिधि इति स्थिते ।। विमति पप समीप समाधि प्यूरि-पटतो पर्ष (वस्तु) या अमाप प्रत्यय (स) पसम्मति पद बा मादुर्भाव (प्रवास) । परमात् यथा यो पर्भ मम योगफ्य पारय सम्पत्ति पाकस्य (सम्पूर्णता), पन्त इन पदों में वर्तमान अध्यय का सुषमा भाव समास नित्य हो । माय विपा रहित नित्य समास होता।पा प्राय' समस्य मान पदों से भिन्न पदों के पाव विपासाता विमत में पध्यप का से परि+fu+(१)पषि' ऐसे स्थित होने पर । ८५२॥ प्रथमानिदिष्ट समास उपसम्मम् ।। २।४३ समास मार प्रथमानिर्दष्टमुपसर्जन स्यात् । समास विधायक (पारणे पास) मार में जो प्रयमानत प से निर्दिष्ट की पा उपसर्वन सभा पाता हो । यर पूर्व में पप्यय मपमानत रेस से यहा पाउपसर्वनरे। 24३ ॥ उपसयन पर्षम् २ । २ । ३. ममासे उपसर्जन प्राव प्रयोग्यम् । प्रत्यधे प्राक् प्रयोगः । सुपोलुक् । एकदेशविकृतस्यानग्य षात् प्रातिपदिकसम्मायो स्वायुरूपत्तिः । पम्ययीभावरस्यव्यस्मात् सुपोलुक् भधिहरि। समास में उपसमैन पर पूर्व परा भावे। इससे परिवा पूर्व प्रयोग हुपा । तो 'भधि+रि+हि ऐमा पहुआ तो, पुन बार से मुप का मुक होने पर अधि+रि' ऐसा पप । मिस का एवरेस (कोई पपयर) चित (पान्तरको माप्त)ी भावे मी पम्पक भाय नहीं होता। इस बार मे मुप्पो हुन् भने पर भी प्रातिपरिक होने से पुम मुपादि प्रत्यय हुए। उनका श्य मे पुन मुक पोजिस पम्पयीमा पे पाययीभाष को पम्पय मंमापपिहरि (हरि विषे) मिा एमा। ८६४ ॥ पव्ययीभावरष 218। १८ । पयं मपुंसक स्यात् । गाः पातोति गोपाः । तस्मिन्नित्यधिगोपम् । पाययीभार ममाष मनशक्षिा रे । मोपा-गोषों की रपा कर पाता। उम में "परिगोपम्" या (म पधिपायय पा लिभप में पारा।
१५८ . २ मधुर्कोमुद्याम् १६५ ॥ नाव्ययीभावादतोऽम् त्वपञ्चम्याः २१४।८३ पदन्ता- दव्ययीभावात् सुपी न लुक् तस्य पञ्चमों विना अमादेशा । भदन्त भव्ययीभाव समास से परे जो सुप् तिस का लुक् न होवे । किन्तु पञ्चमी को छोड कर अन्य (और) विभक्तियों को “अम्" घादेश होवे ॥ ८६६ ॥ तृतीयासप्तम्योर्व हुलम् २ । ४ । ८४ अदन्तादव्ययीभा- वात् तृतीयासप्तम्योबहुलमम्भावः। उपकृष्णम् । उपकृष्णेन । मद्राणां समृधिः सुमद्रम् । यवनानां व्यधि?य॑वनम् । मक्षिकाणामभावो निर्म. क्षिकम् । हिमस्यात्ययोऽतिहिमम् । निद्रा सम्प्रति न युज्यत इत्यति निद्रम् । हरिशब्दस्य प्रकाश इतिहरि । विष्णोः पश्चादनुविष्णु । योग्यतावीप्सापदार्थानतित्तिसादृश्यानि यथार्था ।रूपस्य योग्यमनुरूपम् अर्थमर्थम्प्रति प्रत्यर्थम् । शक्तिमनतिक्रम्य यथाशक्ति । अदन्त अव्ययीभाव से परे जो तृतीया पीर सप्तमी उसे अम् पादेश पनेक प्रकार से हो । उपतष्णम् 'वा' उपकृष्णेन = कृष्ण के समीप । मुमद्रम् ८२५ = मद्र देशियों की वृद्धि । दुर्यवनम् ८६५ = यवनों की घटती । निर्मक्षिकम् ८६५ = मक्खियों का प्रभाव। पतिहिसम् -हिस का नाश । प्रतिनिद्रम् = नींद नहीं आती (लगती)। तिरि-परि शब्द का (१)प्रकाश । अनुविष्णु = विष्णु के पीछे । योग्यता, वीप्सा, पदार्थानतिकृत्ति (किसी पदार्थ को न उलन करणा), और सादृश्य, ये ४चार यथा के अर्थ हैं। इमको क्रम से उदाहरण देता है । अनुरूपम् (रूप के योग्य), प्रत्यर्थम् =सभ पदार्थो में । यथाशति अपनी शक्ति को अनुसार ॥ ६६७ । अव्ययीभाव चाकाले ६ । ३ । ८१ सहस्य सः स्यादध्ययो- भावे न तु काले। हरे. सादृश्यं सहरि । ज्येष्ठस्यानुपर्येणेत्यनुज्येष्ठम् चक्रेण युगपत् सचक्रम्। मदृशः सख्या सस खि। नत्रागां सम्पत्ति सक्ष-' त्रम् । तृणमप्यपरित्यज्य सतृणमंत्ति । अग्निग्रन्यपर्यन्तमधीते माग्नि अव्ययीभाव समास में सह को स आटेश होये, जब उत्तरपद काल वाचक महो तव । सहरिहरि की तुल्यता । अनुज्येष्ठम् = बडे के क्रम से । मचक्रम् = चक्र के समान (१) जैसे वैष्णवों के गृहों में इरि २' शब्द छुआ करता है। 1 -
समामा
1
प्यास । ससधि-मिप के सदय । सचम-धषियों की सम्पत्ति । मतपम्-पात तक
भी या नाता रे (मुष भी नहीं होता)। साग्नि-प्रग्नि अन्य पर्यन्त वेद पदतारे
१८॥ भदौभिरष २१११२. नदीभि सा संस्था वा समम्यते
समाहारे पायमिष्यते । पञ्चगाम् । डियमुमम् ।
मटी वाचन मद साग संख्या वापय मादका समास पिवस्प करणेसोये।
पा पूर्ण समाचार में ही सपे या माध्यमार की परे। पन्चगहम् -पान गडाभों
का समाहार । यिमुनम् -योर्यमुनयो समाहार' ॥
८६८ ॥ तषिताः ४ । १ ।। पापञ्चमसमाप्तेरधिकारोयम् ।
इस भूष से सेकर पष्टाभ्यायो ५ पन्चम अध्याय की समाप्ति पर्यन्त तरित
इस पद पा विधार॥
८७• ॥ पव्ययोमावे यरत्नमतिभ्य । ५ । ४।१० । परदा
दिभ्यष्टच स्यात समासाम्तोऽव्ययीभावे । परद समीपमुपशरदम् ।
प्रतिविपाथम् ॥
पम्पमीभाव समास में मरद प्रादि से परे "टच्" प्रत्यय समास का पन्ताववव
सी । उपयरदम् -सद के समीप । प्रतिबिपायम् -पिपाण के पास ।
८०१॥ वराया वरस् च । उपवरसम् । पूम्यादि।
बरामद हे स्थान में परम् हो । उपबरसम् ८० हावस्या के समीप।
इत्यादि पर भी पानसेमा ।
८०२ ॥ अमर । ५ । ४ । १८। पगम्तादध्ययीभाषाहच् ॥
बिय पव्ययोमारने पन्त में पन्दो स प परे 'रच् प्रत्यय सोये ।
८०३ ॥ साहिते।६।४ । १४४ । नाम्तस्य भस्य टेखापस्त
हिते। उपराजम् । पध्यात्मम् ॥
वातरित प्रत्यव परेप मामान्त पदवी रिसाप होवे। उपपभम्
(राम समीपम्)। पम्यात्मम् परमारिये।
208 मपुसकादम्पतरस्याम्। ५ । ४ । १.८। पम्मरतं यत्
कावं तदन्तादण्ययीभामाहत्या । उपचर्मम् उपचर्म ॥
निबने पन्त में पन ऐसा नपुमन मिशी गाद मिन पग्ययीभाव समाप के
१६१ लघुकौमुद्याम् मन्त में हो तिस से परे टच् प्रत्यय विकल्प करके होवे । उपचर्मम् ८७३ (वा) उपचर्म, घामके ससीया ६७५ ॥ मयः । ५ । ४ । १११ । भयन्तादव्ययीभावाट्ठन्वा । उप- समिधम् । उपसमित् ॥ इत्यव्ययीभावः ॥ जिस अव्ययीभाव के अन्त में भय प्रत्याहारान्तर्गत वर्ण हो तिस से परे 'टच' प्रत्यय विकल्प करके होवे । उपसमिधम् । था । उपसमित् । समिधः समीपम् ॥ {{ अव्ययीभाव समास समाप्त हुप्रा EX ॥ अथ तत्परुषः। ॥ अव तत्पुरुष समास का वर्णन किया जाता है ।। ६७६ ॥ तत्पुरुष. २ । १ । २२ अधिकारोऽयम् । प्राग्वीहेः ॥ तत्पुरुष इस का अधिकार १०२८ सूत्र के पूर्व पर्यन्त है। ८७७ ॥ हिगुश्च २ । १ । २३ तत्पुरुषसंजकः ।। दिगु समास भी तत्पुरुष सज्ञा वाला हो। ६७८॥ द्वितीया श्रितातीतपतितगतात्यस्तप्रास्तापन्न. २११ । २४ द्वितीयान्तं श्रितादिप्रकृतिकः सुवन्तैः सह वा समस्यते । कृष्णं श्रितः । कृष्णश्रितः । इत्यादि । (१)चित, प्रतीत, पतित, गत, प्रत्यस्त, प्राप्त, और पापन्म, पुन प्रसातियों से परे जो 'सुप्' तदन्त के साथ द्वितीयान्त का विकल्प करके समास होवे । कष्णश्रितः १६२-लिस ने कृष्ण का आश्रयण किया । इत्यादि और भी जान लेने । जैसे दुखातीत , आदिक Le || तृतीया तत्कृतार्थेन गुणवचनेन २ । १ । ३० तृतीयान्तं तृतीयान्तार्थकृतगुणवचनेनार्थेन च सह वा प्राग्वत् । शङ्खलया खण्ड. शङ्खलाखण्डः धान्येनार्थः । धान्यार्थ । तत्कृतेति किम् । अहणा काणः । तृतीयान्त के अर्थ से सपादन किये गए गुण के वाचक शब्द के साथ और अर्थ (१) यहां से प्रापन्न पर्यन्त सातों के ये पर्थ है। १ थित जिस ने पाश्रयण किया । २ प्रतीत-अतिक्रमण कर पागे गया। ३ पतित- गिर पडा। ४ गतगया। ५ अत्यस्तउला गया। प्राप्त पहुंच गया १० पापम्म प्राप्त हुभा ॥ -- ..
- तत्पुरुष । पद मे पाय तृतीयान्त का विवस्प करके समास हो । यसापा-पता () मे दिया गया वो सारी का दुका। पान्या-चाम्य से जो पम भग । इस सूत्र में मत" याकों महा! उमर देता 'परतामाप में पमासमीनावे पोषि या पाखापत्यकी सम्पादक नही ८८• ॥ कर्तकरणे आता पालम् २ | १ | २२ कर्तरि कररेप तृतीया कृदन्तेन वपुर्ण प्राग्वत् । परिपात । नसभिम्न । कद्वारे गति कारकपूर्वस्यापि पापम् । नवनिर्मिन्न । बर्ता 'या'बरपर्य में भो ततीयात सो नाना पवार से हत् मत्यतारत के माम समस्यमान होवे। हरिभाता (परिवा पाता)-हरि से रक्षा लिया गया। मभिन्न (नर्मिन) नसों से पाहा गया। इस सूप में यत् के पाप से गति वा बारष बिस परन्त के पूर्व को उस का भी पाप हो । मचामिर्मिम्मी से सम्पूर्ण पाया गया। यहा निर या गति सजवतरपूर्ण सादात (निर्मिन) को साप बरर पापड (नरे) का पमास मुभा ८८१ ॥ चतुर्यातदोर्षपविहितसुसरचित । २। १ । १६ चतुर्य- मतार्याय यत्तचिमा पर्यादिभिश्च चतुष्यन्तं वा प्राग्वत्। यूपाय दारू यूपदारु । तदर्येन प्रतिविलतिमाव एवेष्ट तिमानारधनाम स्याती। चतुर्दान्त पोसिये बोनो तिस से पाचन सम्दथे पाच पोर पर्व बपि पिता मुष पोर रचित इन पदों के साथ चतुर्म्यन्त पिकल्प करने समेस्यमान र यूपदार १२-या स्तम्भ के लिये समी। तदर्य से यहां पहति (चतुर्यन्त के लिये भी सम्म चम) का बुध (१)विवार ठरेस सिये "धनाय स्वाती" यहाँ ममास म एपा ८८२ ॥ भन नित्यसमासो विषेष्यमिता पेति वक्तव्यम् । दिवा- ववाग पय । मतपशिः। गोभितम् । गोमुखम् । गोरपितम् ॥ चतुर्पन्त का पर्व सम्द वे साप मिस्व समासो पोर (२)विमेव ने अनुसार शिवे । रिमा-ग्राम के लिये दास । रिवायी (शिवायवम्) यापू-सपी। (१) से स्तम्मोमिनेसारी का पिछत माप (सम्पानार) रतम्भनी। ऐसे रीन्धने लिये परसोडीपा सम्पान्तर नसीहोता। (२) मिस का मुष पारि मवाय बिया बाये या विशेष और ग पाचव, पिगेपर कोते । . यायम् । हिवादः सप । हिवार्या । हिवार्य --- । लघुकीमुधाम् दिनार्थम् (हिनायेदम्) पयः-दूध । भूतबलिः (भूतेभ्यो वलि ) ८८१, ०६२ । गोहितम् (ग हितम्) ८८१,७६२ । ऐसे गोसुखम् = गो के लिये सुखदायक । गोरक्षितम् (गवेरचितम्)। ६८३ ॥ पञ्चमी भयेन। २ । १ । ३७ । चोरामयं । चोरभवम् ।। पञ्चम्यन्त का भय शब्द के साथ समास होवे । चोरभयम् ०६२ = चोर से भय ।। ९८४ ॥ स्तोकान्तिकदरार्थवाणि तेन । २ । ११३८ ॥ स्तोक = घोडा, प्रन्तिक समीप, दूर इन शब्दों के पर्थ मे जो शब्द हो सो और कच्छ शब्द ये यदि पञ्चभ्यन्त हों तो तान्त के साथ समस्यमान होवें।। ६८५॥ पञ्चम्याः स्तोकादिभ्यः६ । ३ । २ अलुगुत्तरपदे । स्तोकान् मुक्तः । अन्तिकादागतः । अभ्यासादागतः । दूरादागतः । कृष्छादागतः । उत्तर पट परे हो तो स्तोक आदि शब्दों से परे पञ्चमी का लुक्.७६२ न होवे । स्तोकान्मुक्तः ८८४ =घोडे से मुक्त हुआ । अन्तिकादागत' ८८४ | अभ्यासादागतः ८८४ = निकट से पाया । दूरादागत' ८८४ । नादागतः ६८४ दु.ख से पाया ।। १८६ ॥ षष्ठी । २ । २ । ८ । सुबन्तेन प्राग्वत् । राजपुरुषः ।। सुबन्त के साथ षष्ठ्यन्त विकल्प से समस्यमान हो । राजपुरुषः (राजः पुरुषः) ७६२, १८४ (राजा का पुरुष) ॥ ६८७ ॥ पूर्वापराधरोत्तरमेकदेशिनकाधिकरणे-। २ । २- १ । अवय- विना सह पूर्वादय. समस्यन्ते एकत्वसंख्याविशिष्टश्चेदवयवी । षष्ठी- समासापवाद. । पूर्व कायस्थ पूर्वकायः। अपरकाय । एकाधिकरणे किम् । पूर्वरछात्राणाम् ॥ पूर्व, अपर, अधर, उत्तर, ये शब्द एकत्व सख्या विशिष्ट अवयवी के साथ विकल्प करके समस्यमान हो । यह सूत्र ८८६ का अपवाद है। पूर्वकायः ७६२, ८६२, ६६३-शरीर, का अगिला भाग । अपरकायः = काया का पिछला भाग । इस सूत्र में "एकाधिकरणे" यह. क्यों कहा ?. उत्तर देता है न कहते तो "पूर्वछात्राणाम्" यहां भी समास हो जाता परन्तु यहा समास नहीं हुआ क्योंकि 'छात्राणा' या बहुवचनान्त है ।। ९८८ ॥ अर्धे नपुसकम् । २ । २ । २ । समांथवाच्यर्धशब्दो नित्यं लौवे प्राग्वत् । अधं पिप्पल्या अर्धपिप्पली ।। आधे का वाचक जब अर्ध शब्द हो सब वह नित्य नपुंसक लिङ्ग होता है उस का षष्ठयन्स के साथ विकल्प करके समास होये । अर्धपिप्पली-आधी पीपल ।। .. .
१५६ तत्पुरम Le || सप्तमी गोरडे ।२।१1४. सप्तम्यम्तं गोरडादिभि प्राग्यात् । अचेषु गौरड । पक्षीरसा इत्यादि। हितीयातीयेत्यादियो गविमागादग्यपापि द्वितीयादिविभक्तीनां प्रयोगवयासमासो सेय , सौरमदिगप पठित गदी के साथ सफाम्यम्त का विवश्य परके समास हो । पवयीपर २-पागों में चतुर । स्यादि पीर मी मानने । ८०८,८०८८८१८८५ म मूगों में ग्राम से 'दितीया तृतीया पतुर्वी पन्चमी सप्तमी म पदों को योग विमाम पारने से परिगचित पदी से भिन्न पदों के साथ भी ममा मयोम वा से समास पानना 22 ॥ दिक्संख्ये संज्ञायाम् । २।१।५ । सनायामेवेति निय माघे । पूर्वेषुकामगमौ । सप्तफापय । सप्तर्षयः। तेमे ना उत्तरा हबाः। पचतामणा बिनपा पडाधिकरणको मसाप मंत्रा पर्व में दिपा पाचक 'या' संपया पाचक पदों का समास सोपे। मंचाती में यह समास होस नियम खिये या सूची । पूर्वपुवामसमो'-पून पारपुत्रामममी प्राम विशेष । सप्त चपप वा सप्तपय' पसिष्ठ भादि सात चषि । नियम का यह पसरवि उत्ताचा, उत्तर पाये। पीर 'पन्न बाधा नदोनों में संघा महोने से पमाप नही पा । ६८१ तषितार्थोत्तरपदसमानारे प२।१।५१ तबितायें विपये उत्तरपदे च परतः समाहारे च वाच्ये दिसंख्ये प्राग्वत् । पूवस्या गाखायां भव पूर्वागाचा इति समासे बाते । सर्वनाम्मो हत्तिमा पुवहाव ॥ आप "तषितार्यती विषयता 'या' 'उत्तर पद परे'बा'"समाचार वाच्य को' तब दिगा पाचव वा संस्था वाचक मम्द वियरप बरये समस्यमान 'पूर्वस्या मादाय भव" ऐसे विषा में 'भव पतरितापी विपपता में समाम होने पर र से "पूर्वयासा" ऐसा पापा । पुन "पर्मनाम मोति मात्र में पुवार " सभाष्य परनाम से "पूर्वमाया ऐसा पहुधा ८२ ॥ दिवपूर्वपदादसंभायां म । ४ । २।१०। पस्माइवा वर्षे म स्मादमनायाम् । । n लघुकौमुद्याम् १६५ : समस्त पद किसी की सजा न हो तब उस से परे भव धादि श्रया में 'ब' प्रत्यय होवे, परन्तु पूर्वपद दिशा वाचक हो तब । तव “पूर्वशाला+ब" ऐसा हुआ ॥ ६६३ ॥ तहितेष्वचामादेः। ७ । २ । ११७ । जिति णिति च तद्धि- ते परेचामादेरचो वृद्धिः स्यात् । यस्येति च । पौर्वशालः । पञ्च गावो धनं यस्येति त्रिपदे, बहुव्रीहो।। अचों में पहिले अच् को हदि होवे, जब बित् 'वा' णित् तदित प्रत्यय परे रहे । इस से वृद्धि के होने पर २५५ से अन्तिम अच् का लोप तब “पौर्वशालः" (पूर्वशाला में होने पाला) सिद्ध हुआ। “पञ्च गावो धन यस्य" इस विपद बहुव्रीहि में ॥ ६६४ ॥ इन्हतत्पुरुषयोरुत्तरपदे नित्यसमासवचनम् ॥ उत्तरपद परे रहे तब बन्द 'वा' तत्पुरुष समास नित्य होवे ऐसा कहना चाइये ।। ६६५ ॥ गोरततितलुकि । ५ । ४।६२ गोन्तात्तत्पुरुषाच् स्यात् समासान्तो न तु तद्धितलुकि । पञ्चगवधन || जिस तत्पुरुष के मे गो हो उस से परे 'टच्' प्रत्यय (१)समासान्त हो परन्तु यदि तदित का लुक् न हुआ हो तव । पञ्चगवधन. =निस की पांच गाय धन हो। ६६६ ॥ तत्पुरुष. समानाधिकरण. कर्मधारयः। १ । २ । ४२ ॥ जो तत्पुरुष समानाधिकरण हो अर्थात् जिस के पद समान अधिकरण वाले हों तिस की कर्मधारय सन्ना हो । ६६७ ॥ संख्यापर्वो विगु । २ । १ । ५२ । तहितार्थत्यत्रोक्तखि- विध संख्यापूर्वी हिगुसंज स्यात् । जिस समास का पूर्वपद संख्या वाचक हो और वह ८८१ में निर्दिष्ट तीनों में से कोई एक हो तो हिगु सजा वाला हो। ६६८ ॥ द्विगुरे कवचनम् २ । ४।१ विग्वर्थ समाहार एकवत् स्यात् । नो समाहार हिगु से प्रवाश किया जावे तो एकवचन हो। ६६६ || स नपुसकम् २ । ४ । १७ समाहारे हिगुईन्दश्च नपुं- सकं स्यात् । पञ्चानां गवां समाहारः । पञ्चगवम् । समाहार में द्विगु "वा" इन्द नपुत्सकलिङ्ग होवे । (पञ्चगवम् ६८५ पञ्चाना गवा समाहार)। (१) समास का अन्तावयव ।। अन्त शब्द ॥ है तुश्य वाया। तत्पुरुष १...॥ विशेष विमेष्येण पहुखम् । २।१।५७। भेदर्ष मेडोन समानाधिकरऐन वाल प्राग्यत् । मौसमुल्पच मोलोत्पलम् । बाखया पाल्पवचिन्नित्यम् । कृष्णसर्प । क्वचिग्न । रामी बामदग्न्य । समानाधिक्षरप पासे विशेष्य के साथ वियेपरवानाना प्रकार से ८१० समास होवे । नीलोत्पलम (नीसबमस) पर पार से भरी निस्य रोवे वैसे सपस जाप चासो सर्प) मता माप । कही नही होता वे "रामो वामदग्न्य राम बो धमदग्नि का पुष (परपुराम). १.१॥ उपमानानि सामाग्यवधः । २।११५५। धमावाम । (१) सामान्यबम के वाचक पदको साध सपमान वाचक पद या समास होवे । घनश्याम (घन पश्याम) मेघ के १०.२ ॥ थाफपार्थिवादीमामुत्तरपदखोपो पक्षम्य । याकप्रियः पाथिय । शाकपाथिव । देवबाप्रप। मालपार्विवादियों पी सिवि के लिये उत्तरपद का गोप पाना चापिये। पापा पिव बिस यबा को माम प्रिय 01 वा प्रिय पद का चोपापा देवमामय (देव पूर्वको माप) को बाअप देवों को पूजने वाला है। यह पूना याद का खोप पारे। १ २ ॥ मम् २।२।६ नञ् सुपा पारवत् । मुमत के साथ नम्बा पिकाप परवे गमास १ •४ ॥ नखोपो नमः। ६ । ३ । ७३ । ममओ नस्य लोप उत्तर पदे । पनाम । उत्तर पद के परे होते म प " का नोपशोपे । पवार (वो बामपनी)। १ .५ ॥ तस्माम्मुडचि । ६ । ३ । 08 । जुप्तमकाराम्मम सर पदस्याबादेमुट् । अनरव । मैकधेत्यादौ तु नगन्देम सा सुम्सुमति समासः ॥ (१) बो पम पमान (बिस की उपमा दोबाती) में परम्पर्मय (बिस की पमा बोबाती) में सामान्य पप से गहेगा सामाग्यधर्म भासातासे पचन स्पाम सम्पास उदार में वन उपमानाबापडपमेयर शामीबा धामान्य धर्म मामस्य ।
१ लघुकौमुद्याम् जिस नञ् के नकार का १००४ से लोप हुश्रा हो उस से परे अजादि पद को नुट का पागम होवे । अनश्वः, जो घोडा नही । नेकधा (जो एक प्रकार से नहीं) इत्यादियों में "म" मम्द के साथ ८५८ से सुबन्त का समास है नञ् अव्यय का नहीं इसी लिये इस में १००५ की प्राप्ति नहीं। १००६ ॥ कुगतिप्रादयः । २ । २ । १८ । एते समर्थन नित्यं सम- स्यन्ते। कुत्सितः पुरुषः कुपुरुषः। कुशब्द, और गति संचक शब्द २१६, १००७ पौर प्रादि शब्द ४५ समर्थ के साथ निस्य समस्यमान होवें। कुपुरुषः (कुत्सितः पुरुषः) बुरा मनुष्य । १००७॥अर्यादिविडाचश्च १।४।६१ अर्यादयश्च्यन्ताडाजन्ताव क्रियायोगे गतिसंज्ञा स्यु.।जरीकृत्या शुक्लौहल्य । पटपटाकत्या सुपुरुषः ऊर्यादि, और यन्त, और डाजन्त क्रिया को योग में गति सज्ञा वाले होवें। करीत्य, अङ्गीकार करके । च्वि प्रत्ययान्त जैसे शुक्लीष्ठात्य (श्वेतकरके) डाच् प्रत्ययान्त जैसे पटपटाकत्य, पटत् २ ऐसा शब्द करके । सुपुरुषः १००६, ४५ (भला मनुष्य)। ००८॥प्रादयो गताद्यर्थे प्रथमया । प्रगत आचार्यः प्राचार्यः। प्रादिक उपसर्ग जव गत शब्द के अर्थ में हो वा गत के तुल्य शब्दों के अर्थ में हों तब इन का प्रथमान्त के साथ समास होवे । प्राचार्यः (कुलपरस्परा प्राप्त प्राचार्य)। १००६ ॥ अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयया । अतिकान्ती माला- मिति विग्रहे ॥ कान्त (उमा जाना) आदि-शब्दों के अर्थ जब अति वा अति के सदृश कोई उप- सर्ग रहे तब उन का द्वितीयान्त के साथ समास होवे "अतिक्रान्तो मालाम्" ऐसे विग्रह . करने पर। १०१० ॥ एकविभक्ति चापर्वनिपाते। १ ।२।४४ । विग्रहे यन्नि- यतविभक्तिकं तदुपसर्जनं न तु तस्य पूर्वनिपातः ॥ विग्रह में जिस को विभक्ति नियत हो उस की उपसर्जन सजा होवे, परन्तु उस का पूर्व निपात न होवे। १०११ ॥ गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य ।। १।२ । ४८। उपसर्जनं यो गोगन्दः सीप्रत्ययान्तं च तदन्तस्य प्रातिपदिकस्य स्वः। तिमाल. जिस प्रातिपदिक का अन्त अवयव उपसर्जन १०१० सजक गो घटट हो वा स्त्री ... - १५८ तत्पुर प्रत्ययान्त हो उस को उस्स होवे । प्रतिमास' (बो सुन्दरता रे मावा को पतिशम पर गया। 1 - -- स १.१२५ पवादयः क्रुष्टाद्यर्थे तृतीयया । पवकुष्टः कोकिणया । घषकोफिल । अष्ट पादि पर्व में भव पादिको पा ततोगत के प्राव समास दे। अबषीवित बर १११ पो फोबिया से पवनुष्ठ (पाडून) पा । १.१३ । पर्यादयो ग्वामावर्षे चा । परिग्सानोऽध्ययनाय पर्यध्ययम । ग्वाम पादिकों ने धर्म में परि पादिलों का चसुय॑न्त पाप समास होवे पयध्ययग पदने को दिये ग्वागियुत । १ १४ निरादय क्रान्ताद्यर्थे पठनम्या। मिष्माना कीगाम्या मिष्कीगाम्बि ॥ कान्त (नया) पादियों के पर्व में परि पादिको पा पम्पम्यात ये पाप समार पोये । नियोयाबिनोगाम्बी नगरी से निवस गया। १.१५॥ तपोपपद सप्तमोस्यम् ३।१।१२ सप्तम्यन्ते पदे काम पीत्यादी वाच्यत्वेन स्थित यत्कुम्भादि तवाचई पदमुपपदसनं स्यात् । सप्तम्यम्त बो कर्मविशत्यादि पद उन में पाध्याय (गोभ्यता) भरपे मित भो जुम्मादि पर्ष तिन को वाचक पम्द उपपद काया। १.१६॥ उपपदमति । २।२।१८। उपपदं समन मिल्य समस्यतेऽतिग्न्तरच समास । अम्भ फरोतीति कुम्भकारः । पतिए पिम् । माभवाम् भत्। मारि खुछिप्ति सप्तमीनिर्देशान्माउपपदम् । गतिकारकोपपदामा वनि सा समासवचनं माफ सुपुरुपत्ते । व्याघी पश्वनीती कछपीस्यादि। उपपरका ११५ समय (एबा भाव के योग्य)ो पाप नित्य समास हो । चीर या ममास तिसत के सामनसोचे । (१) कुम्मबाट स भूष में "पति ऐसा पो पातर देता "मामपान मूत्" पदारर में दूध में 'मारि" पेशे (म की सिर में सिपदी।
१६८ लघुकौमुद्याम् उप्तम्यन्त के निर्देश से १०१५ से माड् उपपद तो है, परन्तु यदि यहां अतिङ् न ग्रहण करते तो समास होजाता । हादन्त से परे सुप् की उत्पत्ति के पहिले गति, कारक और उपपद इन तीनों का कदन्त के साथ समास होवे। व्याघ्री ८३३, ५१८, १३६७ (विशेषेया प्रासमन्ताज्जिति) वाधिन । अश्वक्रीती (अश्वेन फ्रीता) १३६२ घोडा देकर जो मोल लीगई है। (१) कच्छपी (कछुई) इत्यादि और भी जानने । १०१७ ॥ तत्पुरुषस्याङ्गुलेः संख्याध्ययादेः । ५।४।८६ । संख्या- व्ययादेरङ्गुल्यन्तस्य तत्पुरुषस्य समासान्तोऽच् स्यात्। हे अङ्गुली प्रमाणमस्य हयगुलम् । निर्गतमगुलिभ्यो निरङ्गुलम् ॥ सख्यावाचक शब्द (घा) अव्यय है आदि में जिसके और अङ्गुलि शब्द है अन्त में जिस के ऐसे तत्पुरुष समास का पन्तका अवयव अच् प्रत्यय होता है । साङ्गलम् २५५ दी अङ्गुल प्रमाण का । निरगुलम् २५५ अङ्गलियों से निकास गया । १०१८ ॥ अह सर्वैकदेशसंख्यातपुण्याच्च रात्रः । ५ । ४ । ८७ । एभ्यो रात्रेरच् स्याच्चाल्संख्याव्ययादेः । अहहणं इन्वार्थम् ।। अहन्, सर्व, एकदेश (अवयव) सख्यात और पुण्य इन शब्दों से परे जब रात्रि शब्द आवे तब उस से परे 'अच्' प्रत्यय होवे । इस मूत्र में जो 'च' शब्द है, उस का फन यह है कि सख्यावाचक शब्द का अब्येय जिस रात्रि शब्द के आदि में हो उस से भी अच् हो । अहन् का ग्रहण यहा इन्द समास के लिये है, क्योकि "अहन और रात्रि" इन दोनों मे तत्पुरुष का सम्भव ही नहीं। १०१६ ॥ रामानाहाः पुंसि । २।४ । २६ । एतदन्ती बन्द तत्पुरुषौ पुस्येव । अहश्च रात्रिश्चाहोरात्रः । सर्वरात्र । संख्यातरान ।। जिस इन्ह वा तत्पुरुप के अन्त में रात्र १०१८ वा, अङ्ग 'वा' अह १०२१ हो वह पुलिङ्ग ही होवे । अहोरात्र १०१८,३८८, १२१ (दिन और रात) सर्वराः १०१८ सभरात सख्यातरात्र १०१८ (गिनोरात) ॥ १०२० ॥ संख्यापूर्व रात्रं क्लीवम् । दिरात्रम् । विरात्रम् ॥ जिस रात्र १०१८ के पूर्व सख्यावाचक शब्द ही सो नपुंसक लिन होवे । विरात्रम् (योरान्यो समाचार')।चिरात्रम् (तिसृणां राचीणा समाहार.) १०१८ तीन रात का समुह । (१) कच्छपी, मे सुपि स्य ३।२।४ इस सूत्र के 'सुपि' इस के योग विभाग करने से 'क' प्रत्यय और ५१८ से पा को आकार का लोप और १३६७ से डी होते हैं। -
१.
समामा'
१.२१ ॥ रामा सखिभ्यष्टच् । ५ । । । ८१ । एतदन्तात्
तत्पुरुषाच् । परमराव ।
रामन् महन् सरि ये गम्द विस तत्पुरुषपात में हो तिस का पत्तापयर
"८"पीये । परमराब मान रावा :
१.२२॥ पाम्मइतः समानाधिकरवातीवयो ।६।३।४।
महारावः । प्रकारवचने वातीयर् । महाप्रकारो महावातीयः ॥
'मात्' स मम्द बी पाबार गोवे व समानापिपरष पासा पा पातीवर परे
कोतव । महाराण १२१८०३ । प्रसार पर्व में पानीमर' गोता महापातीय -बरे
प्रगारमाना॥
१.२२ ॥ यष्टम संख्यायामयामोगीस्मोः ।।२।४७ ।
पात् स्यात् । हादय । प्रष्टाविगति।
संख्या वाचब सम्म उत्तरपद हो तो 'शि और 'पष्टन् गम्द को पाप्यारोप
परन्तु यदि मधुमीहि समास और प्रशीति सम्म परे तो नहीं। बादा-बारा।
पष्टाम्पिति-पठारस
१.२४ । परवरिख इन्दतत्पुरुषयो । २।४ । २६ । कुखुटम
याविमे । मयूरोकुशुटाविमो । पई पिम्पयौ ।
मग पोर तत्पुरुष समास में उत्तरपद के शिसमान थिये। पुपुरमा
पूर्वी (धुपुररच मयूरी प ) मयूरी गविमी (मयूरो च पुष तो) पपिप्पसी
(पिप्पण्या पर्य) पीपरबा पापा ।
१.२५ ॥ रिगुप्राप्तापन्नाखम्पूर्वगतिसमासेपु म । पञ्चकपाणः ।
पुरोराण । प्राप्तो बोषिको प्राप्तबीविकः । पापग्नजीविका । पर्ण
समाम्य । पर्णकुमारिः । पत एव प्रापक्षात् समास । निष्कीयाम्पिः।
"हिंगु - समास में" पोर 'विस समारा पूषपर प्राप्त 'मा' पापम्म 'या'
पतम् ती तिस में और मति १ समास में तर पद साग मिशन(पम्प
मपास पर 'पन्चमु चपारेषु खत* (पुरोगग) प्रामाजीविष (1) पान
(१) या ११११ सेमो प्रायय पाया वा एका शिगोगनाये |
नभर नपा-यन भाग ।
मधुकीमुद्याम् १७२ सीविकः = जीविका पाने वाला । अलकुमारिः १०११ = जो कुमारी के लिये समर्थ है। इस उदाहरण में "अलम् पूर्वक समास में उत्तरपद के अनुसार लिन के निषेध विधान सामर्थ्य से" समास होता है। निष्कौशाम्बिः १०१४ ॥ १०२६ ॥ अईर्चाः पुंसि च । २ । ४ । ३१ । अईर्चादयः पुंसि लोवे च स्युः । अईः। अचम् । एवं ध्वजतीर्थशरीरमगडपयूष- देहाचकुशकलशपात्रसूत्रादयः ॥ अर्धर्च आदि शब्द पुलिङ्ग और नपुसक लिङ्ग हो । अर्धचः 'वा' अर्धर्षम् = १०५७ चा का प्राधा । इसी प्रकार, ध्वन, तीर्थ, शरीर, मगडप, यूष, देह, अनुश, कलश, पाप और सूत्र, आदि भी जान लेने ॥ १०२७ ॥ सामान्ये नपुंसकम् । मृदु पचति । प्रातः कमनीयम् ॥ ॥ इति तत्पुरुषः ॥ सामान्य अर्थ की विवक्षा (कहने की इच्छा) मे नपुंसक लिङ्ग होवे। (१) मृदु पचति । प्रातः कमनीयम् - प्रभात काल रमणीय है। तत्पुरुष समास समाप्त हुभा ॥ ॥ ॥ अथ ॥ अब बहुव्रीहि समास का वर्णन किया जाता है ।। १०२८ ॥ शेषो बहुव्रीहिः २।२। २३ अधिकारोऽयम् प्रागहन्हात्॥ यहा से इन्द के पूर्व २ इस सूत्र का अधिकार है ।। १०२६ ॥ अनेकमन्यपदार्थे । २।२ । २४ । अनेकम्प्रथमान्तम- न्यस्य पदस्यार्थे वर्तमानं वा समस्यते स बहुव्रीहिः ॥ अनेक प्रथमान्त शब्द अन्य (हितीयान्तादि) पद के अर्थ में वर्तमान हो तो थे. विकल्प करको समस्यमान होवें और वह समास वहुव्रीहि सज्ञा वाला होवे ॥ १०३० ॥ सप्तमौविशेषणे वहुव्रीहो । २ । २ । ३५ । सप्तम्यन्तं विशेषणञ्च बहुव्रीही पूर्वं स्यात् । कण्ठेकाल. । अत एव जापकाध्य- धिकरणपदो बहुव्रीहिः ॥ । (१) यहा मृदु शब्द किसी विशेष लिङ्ग वाले शब्द का विशेषण मही मामान्य है, पसी कारण नपुंसक हुमा है ।। -- १०२ समासा पशुमीहि समास में सप्तम्यन्त और विशेषष पूर्व घरे बावें । बठेकाव't (पप्ठे पाली यस्य स) मिव । स धूप में सप्तम्यन्त पो पूर्व निपात कापन से बात पोता फिकीर प्रथमान्त से मिम्मर विमान्त पदीवामी मीनिमास होता है। १.२१ ॥ श्चदम्तात् समतम्या संज्ञायाम् ।।३।। मताददाताच सप्तम्या पलु । स्वपिसार । प्रान्तमुदकां यम्प्राप्ती दको याम । जठरयोऽनवाम् । उपरतपय रुद्र । उहतीदना स्थायी। पीताम्बरो परि । वीरपुरुषको ग्राम । मिस अन्त में पा' पवार पो उस से परे संत्रा पर्व में सपामी मा दुर मजोवे । स्वधिसार (स्वचि सारो यस्व) बांस । माप्तोदय-ब पाम । जठरा ( रथो येन) मेर। सपासपमु' (उपात पर्यस्मै )-पद्र। तोवमा (नता पोदना वस्या)-पद्रोही । पीताम्बर' (पीताम्यम्परारि यस्य)-विष्यु । बीरपुरबन (पीरा पुरवा यष)-पार॥ १.३२ ॥ प्रादिभ्यो धातुषस्य वायी वा चोत्तरपदशीप । प्रपति सपर्ण । प्रपर्ष । म ४५ पादि से परे जो धातुज (भातु से उत्पन्न मया बो पद) को उसका पिवस्प परके समास होवे पौर समास में विवरण परखे उत्तर पद का चोपवे पेसा गाना पापिये। पतितपर्व (मपर्व -विस समी पत्ते गिर पड़े। १ ३३ ॥ नमोऽसयांना वाच्यो वा पोत्तरपदगोपः । पविध मानपुपोऽपुषः॥ मम् से परे पस्त्वम् (विद्यमागता पाचव)वी वा विषय पर धमास सोपे पौर पमास पथ में भिवास्प तरो उत्तरपद का मोप की । प्रविधमानपुपो () पुष-जिस (मा में) पुष नहीं १ ३४ । स्चियाः पुम्थापितपुस्कादर समानाधिकरणे स्त्रि यामपूरणीमियादिषु ।। ३ । २४ । सहपुस्वादमूह जगेऽमावो या (१) यहां पतित मम्द वा सोप पारे । रस समास का या पत कि पतित माद भी उतर पदबानाया नहीं तो इसका चोपनीता (२) यह "विपमान" गद का पोप पारे।
१७३ लघुकौमुद्याम् तथाभूतस्य स्त्रीवाचकशब्दस्य पुंवाचकस्येव रूपं समानाधिकरणे न तु परण्या प्रियादौ च । गोस्त्रियोरिति इस्वः। चित्रगुः । रूपचद्भार्यः। अनूकिम् । वामोरूभायः॥ निस शब्द का भापित (१) पुंस्क प्रवृत्ति निमित्त है यदि उस शब्द से परे जड़ १३७० प्रत्यय न रहे तब वह शब्द स्त्री वाचक हो तो उस का पुवाचक के तुल्य रूप हो जाये अब समान अधिकरण वाला स्त्रीलिङ्ग उत्तर पद रहे तब । परन्तु पूरणार्थ प्रत्ययान्त स्त्री वाचक 'वा' प्रियादि गण पठित शब्दों में से कोई एक परे रहे तो नहीं होता। १०११ से गो शब्द को ह्रस्व किया तो। (२)चित्रगु' (चित्रा गौर्यस्य स)=जिस को गौ चित्र वर्ण की है" सिध हुा । रूपवनार्य. (रूपवती भार्या यस्य सः) १०३४, १०११ जिस की स्पी सुन्दरी है । इस सूत्र में "अनू" यह क्यों कहा? उत्तर देता है “वामोरूभार्यः" यहाँ १३०४ से नड् आया है तो यहा पुंवद्वाव न हो जाये ।। १०३५ ॥ अप् पूरणीप्रमाण्योः ५ । ४ । ११६ पूरणार्थप्रत्ययान्तं यत् स्त्रीलिङ्गन्तदन्तात् प्रसारयन्ताच्च वहुद्रौहेरप् स्यात्। कल्याणी पञ्चमी यासां रात्रीणां ता. कल्याणीपञ्चमा रात्रयः । स्त्री प्रमाणी यस्य स्त्रीप्रमाणः । अप्रियादिषु किम् । कल्याणीप्रियः । इत्यादि ॥ जिस बहुव्रीहि का उत्तरपद पूरणार्थ प्रत्ययान्त स्त्रीलिङ्ग हो 'वा' प्रमाणी शब्द हो उस का अन्तावयव 'अप' प्रत्यय होवे । (३) कल्यापी पञ्चमाः. जिन रातों की पा. चमी रात मङ्गल देने वाली है । स्त्री प्रमाणः ३५५ जिसे स्त्री प्रमाण है। १०३४ में "अप्रि- यादिषु" यह क्यों कहा ? उत्तर देता है "कल्याणी प्रियः" (वाल्याणी प्रिया यस्य सः) । प्रस में "कल्याणी" शब्द को पुंवशाव न होजावे । इत्यादि और भी जानो। १०३६ ॥ बहुव्रीही सक्थ्यक्ष्णोः स्वाङ्गात् षच् । ५ । ४ । ११३ । स्वाङ्गवाचिसक्थ्यक्ष्यन्ताहाब्रीहे.षच । दीर्घसक्थ । जलनाक्षी। स्वा- ॥ ॥ (१) शब्द के जिस प्रकृत्ति निमित्त के रहते कभीर पुलित विशिष्ट भी अर्थ कहा जावे सो निमित्त ॥ (२) यहाँ विधा को १०३४, से पुंवद्भाव कर लेना ।। (३)यहा पच्चमी शब्द १२५२ से पूरणार्थ प्रत्ययान्तहै उसके उत्तरपद होमे से कल्या. पी' में १०३४ की प्राप्ति नही और भए के गाने पर २५५, और १३३५ भी लगा लेने ।
१०॥ । समास जात् विम् । दीर्घसविय शकटम् । स्थलाचा देषुपष्टिः परयोऽदर्भ नादिति वश्यमाचीऽच । रबार १५५ पाचन को सरिख वा "पधि सम्म बिस बमोशिये अन्त में से इस से परे पच प्रत्यय (समासान्त) भी।दीपसपा-विसकी राम सम्पीसमाधी २१५, १३४२ मिस बी पी पनि समसी पे तुमस पूर्व में 'साहात् याबों दासत्तर देता है। दीर्वसनिय (बरम् मापी) पौर स्पूनाचा (पेयरि) मोती 'माठ बासी मांस को बाठी। यहा पच्नहोत्रीषिये स्मानी पूचाना' में। १८ से पच् प्रत्यय परिंग १.३० ॥ हिचिम्या ष मूर्खः । ५ । ४।११५। धिमः। पिम् । कि 'पा' पिसे परे जो “मून्”ि मन्द पाविस मनीशिये पन्त में हो यसमा पन्त का पमयप 'यो। रिमू (ो मूनो यस्यम) ६०॥नि (यो मूगो यस्य स) ८०२-बिसतोन पिरो । १.३८ ॥ अन्तर्वरिभ्याम्प खोम्नः । ५ । ४ । ११०। पप्म्यात् पम्तीमः । पहिलीम। पतर् 'पा परिम्से परे बोसोमन् सम्दा विप बहुप्रीति में उसका पता समय पप् प्रत्यय रोवे । पम्तीमा ८० रितीमा बिसपाहियोग। १.३८ ॥ पादस्य खोपोऽस्त्यादिम्पः। ५ । ४ । १२८ स्या- दिवन्विंतापमानात् परस्य पादस्य खोप । व्याघ्रस्येव पादावस्थ व्याघ्रपात् । पास्यादिभ्यः विम् । इस्तिपाद । फुगलपादः । परित पारिमर में उपरित मदो मोवोदपमानसे परेबो पाद गद उसकी पन्त मा तोप ()ोरे। प्यानपात् मियोपोर म्याप को पार समान नीरसी सूप में "पारस्यादिम्य' या वितिर देता स्तिपाद (हरितन पादाविध पादी पायस) और 'गुमसपाद (भूमस्येव (५) पादो पस्य ) म में गोपनी बापे । १४. । संसयासुपूर्वस्य । ५१४१ १४.। लोपः स्यात्। हि पात् । सुपात् (१)यामोप भी ममामान्त रेस सिये. विषय में 1.0 में बप नहीता। (१) पमरे स्थापन मिबो (मोगा)।
१७५ -- T ॥ लघुकीमुधाम् जिस पाट शब्द के पूर्व मझ्या वाचक शब्द 'वा' 'सु' शब्द हो तो उस के पन्त का लोप होवे । विपात् (हौ पादावस्य ) दुपाया । सुपात् शोभनौ पादावस्य पच्छे पांउ वाला ॥ १०४१ ॥ उदिभ्याङ्काकुदस्य ५ । ४ । १४८ लोपः स्यात् । उत्का- कुत्। विकाकुत् ॥ उत् (वा) वि जिस काकुद मरद के पूर्व हो उसके अन्त का लोप हो । उत्काकुत् ऊचे तालु वाला। विकाकुत् (विगत काकुद यस्य) । १०४२ ॥ पूर्णा द्विभाषा । ५ । ४ । १४६ 1 पूर्णकाकुत्। पूर्णकाकुदः पूर्ण शब्द से परे काकुद के अन्त का विकल्प से लोप होवे = पूर्णकाकुत् 'वा' पूर्णकाकुदः = जिस का तालु पूर्ण हो। १०४३ ॥ सुष्टुहुँदो मित्रामित्रयोः । ५ । ४। १५० । सुहृन्मि- घम् । दुहृदमित्रः॥ 'मुहद' और 'दुईट' ये दोनों यदि क्रम से 'मित्र' और 'शत्रु' के वाचक (१) होतो सु' और 'दुर्' के परे हृदय को 'हद' आदेश निपात से हो। सुहद् (मित्र) । दुईद (शत्रु) । १०४४ ॥ उरः प्रभृतिभ्यः कम् । ५ । ४ । १५१ ॥ उरस् (२) प्रभृति गण का कोई शब्द समास के अन्त में हो तो उस से परे 'क' प्रत्यय होये॥ १०४५ ॥ कस्कादिषु च । ८।३।४८ एविण उत्तरस्य विसर्गस्य षोऽन्यस्य तु सः इति । सः । व्यूढोरस्कः । प्रियसर्पिष्कः ॥ कस्कादि गण में इण् प्रत्याहार से परे जो विसर्ग उसको ष् प्रादेश होवे (३) अन्य विसर्ग को सो स् होवे । इस सूत्र से विसर्ग को स् हुआ। व्यूटोरस्कः (व्यूट =विशाल उरो- यस्य सः)=निसकी छाती चौडी हो । प्रिय सर्पिष्क.-निस कोसर्पिस् (घी) प्रिय हो । १०४६ ॥ निष्ठा । २ । २ । ३६ । निष्ठान्तं बहुबीही पूर्व स्यात् युक्तयोगः ॥ - (१) मित्र और शत्रु के जहां वाचक नहीं वहां, 'सुह्रदयः' और 'दुदयः ऐसे रूप भाते हैं। (२) "उरस्,सर्पिस् उपामह, पुमान्, पनड्वान्, पयः, नौः, लक्ष्मी, दधि, मधु, शालि, प्रर्थान्नन" इस्युर' प्रभृतय' ॥ (३) जो पण से परे न हों ।।
समा 'मिम मम्द के पम्त में निन्दा यो सागीरि सगस में पूष पप जाये। युतरोगादो योग में सया॥ १.४० ॥ गेपादिभाषा । ५ । ४१५४१ पमुछसमासाम्तामो कम्माामाययस्थः । महाया। ॥ इति वाबोधि ॥ गिस से परेघोरं समासान्त भिनन विया ऐसे समाधिकार(२८) मनीशिपमास में परेमप् प्रत्यय विवरप पर । महापगरमः (वा) माया (मापयोगस्य स.) १.२२- बिहीमोनि पोहो । गमीहि समार समाप्त पा । ॥अथ बन्द ॥ पप समास पाचन क्षिया बाता॥ १.४८ ॥ चार्थे हन ।२।२।२९ । पनेक सुवम्तचार्ये वर्त मान पा समस्यते स हरहः । समुषयोन्याचयेतरेतरयोगसमारा- ग्वार्या । तपेश्वर गुरुञ्च मनस्वेति परस्परनिरपेषस्थानेफस्य कस्मि भमन्षय समुच्चयः । मिधामटगाम्चानयेत्यग्यतरस्यामुपमिफावना स्वयोऽभ्वाचयः । पमयोरसामात् समासीन धवपदिरी रिम्धीति मिलितानामन्वय पूतरेतरयोग ।संभापरिभापमिति समा समाहारः ।। 'चने पक्ष में मत्तमान को पीक मुरगत समजा समास दो उप समास पीएम समारो। समुपय पम्पापय तिरेतर योन पोर सम्पहाये चार परे। पर स्पर निरपेध मो पनन पदानमा एक पाप में गो सम्पन्न गयो समुच्चय करते हैं। बेसे "पर गुमनस्व" (रपी पौर युरपी मी) यार और मुष दरोगी परापर निराधार रनका मजन किया में सम्पन्न । एका मुफ्य रूप से पोरदूमरे का प्रमुफ्प (गौष) कप से जो किमी वरे में पनपती नो" इस यो पम्याचय पातर से 'मिषा मर मापामय मिपाको धापा पोरगी वो चापो) यहां प्रधान पाये मिया या तो मुश्यप में पन्नगरपोर गौ मा पमुख्य (१) पल दोनों में सामप्य। मेलन में समानही तासपदिरी (पवरच परितोषिधि-पाची और सभी नीरस में "मिक्षितीबासीन में पायो' (दिमाग मती गी मिनी नो से पानी नही तीमी गगो का या बागपशपीतु मे हम का प्रमुपप एप से सम्म - १७७ । २ लघुकौमुद्याम् "इतरेतरयोग" है । 'समूह' को 'समाहार' कहते हैं, जैसे, “स ज्ञापरिभाषम्” संज्ञा और परिभाषाओं का समूह ।। १०४६ ॥ राजदन्तादिषु परम् । २ । २ । ३१ । एषु पर्वप्रयोगाई- म्परं स्यात् । दन्तानां राजा राजदन्तः ।। रानदन्तादि ("राजदन्त" शब्द है आदि में निस के उस) गण में पूर्वप्रयोग (पूर्व निपात) ८६३ के योग्य शब्द का पर निपात हो। अर्थात् राजदन्तादि गण में जिस को ८६३ से पूर्व रखना चाहिये उस को पीछे रखना । राजदन्तः ८८६ = दान्तों का राजा ।। १०५० ॥ धादिष्वनियमः। अर्थधम्मौ । धर्मार्थो। इत्यादि । धर्मादि गण में १०४८ सूत्र के लगने का कोई नियम नहीं। अर्थधर्मी 'वा' धर्मार्थी = अर्थ और धर्म । इत्यादि और भी जान लेने ।। १०५१ ॥ इन्हे घि । २ । २ । ३२ । पूर्वं स्यात् । हरिहरौ ॥ इन्ध समास १०४८ में घि १८४ सना वाले शब्द का पूर्व प्रयोग हो। हरिहरी- विष्णु और शिव ।। १०५२ ॥ अनाद्यदन्तम् । २।२।३३ । ईशकृष्णौ ॥ हन्द समास में अनादि (अच् (स्वर) है आदि में जिस के) और अदन्त (धकार है अन्त में जिस के) जो शब्द उस का पूर्व प्रयोग हो। ईशकृष्णौ = शिव और वासुदेव ॥ १०५३ ॥ अल्याच्तरम् । २ । २ । ३४ । शिवकेशवी ॥ जिस शब्द मे पल्प (थोडे) अच् हो वह भी इन्ह समास में पूर्व धरा जावे। शिव केशवो-शिव और विष्णु ॥ १०५४ ॥ पिता मात्रा । १ ।२।७० । मात्रा सहोती पिता या शिष्यते। पितरौ । मातापितरी ॥ मातृ शब्द के साथ पितृ शब्द का इन्द्द समास हो तो पितृ शब्द विकल्प करके पेष रह जाता है । पितरी (माता च पिता च) वा (१) मातापितरौ, माता और पिता ॥ १०५५ ॥ इन्दश्च प्राणितर्यसेनाङ्गानाम् २ । ४ । २ एषां इन्ह एकवत् । पाणिपादम् । माईङ्गिकपाणविकम् । रथिकाश्वारोहम् ॥ प्राणी (शरीर वाला चेतन), तुर्य (बाजा), और सेना इन के अङ्गों का इन्हसमास (१) यहा पितृ शब्द के परे होते मातृ शब्द को । प्रानड् ऋतो इन्हे ६ । ३ । २५ से मान होता है। ॥ ।
समासा "मिस मम्द के पन्त में निष्ठा ५ " पानीहि समास में पूर्वपरा भावे । युभयोमा । जो योग में समा । १.४०॥ पाहिभाया । ५ । ४।१५४ा प्रमुखसमासान्ताहामोरे कथा। महायशस्काः। महायशा। ॥ इति बहुमोहि बिस से परे पोरं समासान्त विधामन दिया ऐसे रोपाधिकाररप (१२७) पानीपि समास से परे सप् प्रत्यय विमाप पर हो । माययस्थ (4) माय (मायोपस्य), २९-विसकी घीति पोहो" । यानीहि समास समाप्त पा । ॥ अथ बन्द ॥ nपमानसमास यापन दिया जाता १.४८ ॥ चोर्ये हमः । २।२। २६ । पने सुवरसञ्चार्ये पत्त मानं वा समस्यते स इन्हः । समुन्योम्बाचयेतरेतरयोगसमाहारा- चार्या । तपेश्वरं गुरुच मनस्वेतिपरस्परनिरपेक्षस्थानेवस्य कस्मि मम्पयः समुच्चय । मिधामटगाम्चानवेत्यम्यतरस्यानुपरिवाना वयोऽम्वाचयः । पमयोरसामात् समासीन वादिरी दिग्धीति मिखितानामन्वय इतरेतरयोग । संजापरिभापमिति समा समाचार ! 'च के पर्व में पत्र्तमान वो भनेक भुवमा उनका धमास ही उस समास की मना हो। समुन्वय पम्पापय स्तरेतर वोप, पौर समाचार ये चारचो पर्व "पर स्पर निरपेषभो भनेक पदार्थ नया एप्त पदार्थ में मोसम्बन्ध उसको समुच्चय चाहते हैं। से "मर गुरं च मबस्व" (बर भी पोर गुरषो भयो) पगियर पीर गुरु दोनों परस्पर निपचीनका मबम मिया में सम्मा'पक्षमा मुम्प रूप से पौरपूसरे का प्रमुम्प (गौर)प से बो सिसी एसरे में पन्पयही तो" उसपो पम्पाचम पाहते से "मिषा मरमांधामय (मिचाये जाने पर मौकोपाग) यहां प्रधान कार्य भिक्षा का तो मुख्य रूप से पधापौर गोमा पमुस्य (१)रूप से। इन दोनों में सासम्बर मेमोने से समापनीतापपरिरी(पापपदिरापनीविनि-पाप पौर रायो पापीबार" एस में मिचितीबासीन में बनायी (१) यदि मार्ग में भी मी मिसीहोरेपानीमही मोमी गुपनीमा या भावपपीतुसे रस का मुख्य रूप से सम्॥
१७८ लघुकौमुद्याम् १०५८ ॥ अक्षणोऽदर्शनात् । ५ । ४ । ७६ । अचक्षुःपायाद- दणोऽच स्वात् । गवामक्षीव गवाक्षः ॥ जो श्राख का वाचक अक्षि शब्द न हो उस से परे समास में 'घच्' प्रत्यय हो। गवाक्षःगौ की आंख के समान (झरोखा)। १०५६॥ उपसर्गादध्वनः ५।४।८५ प्रगतोऽध्वानं प्राध्वो रथः। उपसर्ग से परे जो अध्वन् शल्द उस से परे समास में अच्' प्रत्यय होवे । प्राध्वः ८७३ (रथ जो मार्ग पर पहुंच गया हो)। १०६० ॥ न पूजनात् ५ । ४ । ६६ पूजनार्थात् परेभ्यः समासा. न्ता न स्युः । सुराना । यतिराजा ॥ इति समासान्ता. ॥ पूजन अर्थ वाली से परे समासान्त प्रत्यय न होवें । (१)सुराजा (अच्छा राजा), अतिगना (सब से उत्तम राना)॥ । समासान्त प्रकरण समाप्त हुभा ।। ॥ अथ तद्धिताः॥ ॥ श्रव तषितों का वर्णन किया जाता है। १०६१॥समर्थानां प्रथमाहा ४१११८२ इदमधिक्रियते प्राग्दिश इति यावत् ॥ इस सूत्र के तीनों पदी (समर्थानाम~-प्रथमात्५~वा अ०) का १२७८ सूत्र को पूर्व पर्यन्त अधिकार है। इस का अर्थ १०७१ आदि सूत्री में स्पष्ट हो जायेगा । १०६२ ।। अश्वपत्यादिभ्यश्च । ४ । १ । ८४ । एभ्योऽण् स्यात् प्राग्दीव्यतीयेष्वर्थेषु ॥ अश्वपत्यादि गण से परे माग्दीव्यतीय (११८७ सूत्र के पूर्व को प्रत्ययों को अर्थ) में 'भण्' प्रत्यय होवे ॥ २०६३॥ तहितेष्वचामा ७ । २ । ११७ जिति णिति च तद्धिते परेऽचामादरचो वृद्धि. स्यात् । अश्वपतेरपत्यादि । आश्वपतम् । गाणपतम् ।। (१) यहा १०२१ से 'टच्' समासान्त पाया था उस का १०६० से निषेध हुश्रा, ऐसे ही "अतिराना" में जानना । परन्तु यहाँ सु 'वा' प्रति ये दोनो ही लिये हैं इस में "परमराज.' में पूजनार्थ को पूर्व होने पर भी टच प्रत्यय हो ही जाता है !!
समासान्त एक्पषमान्त फे तुम्यो। पापियादम् साप पोर पेर। मादीपावमित्रम् - पदा नमाने पाये चीर ठोस बनाने पाते। रविवारवारोहम् -री पर पोर घोड़ी पर चरने वाले १.५६ ॥ न्हापदषहाम्तात् समाधारे। ५ । ४।१।पष- र्गाम्नाइपाताच हरहाच् स्यात् समागरे । वाक्वधम् । वक् समम् । भमौरपदम् । वाशिमपम् । छपोपानम् । समाचार किम् । प्राचारदो। प्रति इम्ह ॥ पु (चवम) 'हवा' प्'मा विपन समास के पन्त में उस से परे "र" प्रत्यय समू में। पापात्पपम् -पानी (पामिन्द्रिय) और त्वचा (स्वमिन्द्रिय) पा समूह । स्वयम्-जिसने पोर माण वा सभा । ममीस्पदम् -गरी पौर पत्थर पा समुदाय । वारिपषम् - पानी पौर मशाग पा समुदाय । नोपानम् -बतरी पौर भूती का समुदाय । इस सूत्र में समाहारे" या पर क्वी का? तर देता है 'पावर परदी" (वर्षा तु पौर परद जत) यहा र न हो जावे : निसमास समाप्त पुपा। ॥ अथ समासान्ता ॥ पब समाधानतीमा बर्षन किया जाता॥ १०५७ ॥ परग्ध पयामामधे । ५।४।७४ । फागाद्यमास्य समासस्म पप्रत्ययोऽस्तावयवः । पचे या धस्तदन्तस्य न । भईर्ष । विष्णुपुरम् । विमखापं सर । रावघुरा । परे तु । पक्षधू ठधरपः । सहिपयः । रम्यपधोदेय । का पुर भम् पुर पौर पणिन् न पदों में से कोई पद पन्त में मिलने उस समास का पम्तापयव 'घ' प्रत्यय हो (हम से परे 'च' प्रत्यय हो) परन्तु परिये की धुरी वा पाप धुर मद को तो नी (जोशम्) १ २॥ विष्णुपुरम् (विष्यो' पू) विषुवी पुरी। पिमहापम् (विमचा पापो मस्य तत्) सरोवर बिस बाबत निर्मल यो। रामपुरा (पो) ११०.१५॥- राजा का मार। पचम तो "पवा -परिये पुरा। '(प्ठा पूयस्य) पहिया मिस की धुप हो। या 'प' प्रत्यय नी पुपा । परिसपा (मसाबायन) रम्पपब (म्प पंचायत्र) मिरा देय का मार्म रम्यकी। ।
लधुवोमुद्याम् १७८ १०५८ ॥ अक्षणोऽदर्शनात् । ५। ४ । ७६ । पचतुःपायाद- क्ष्णोऽन् स्यात् । गवामक्षीव गवाक्षः ॥ जो आख का वाचक अक्षि शब्द न हो उस से परे समास में 'अच्' प्रत्यय हो । गवाक्ष-गो की आंख केसमान (झरोखा)॥ १०५६ ॥ उपसर्गादध्वनः ५।४।८५ प्रगतोऽध्वानं प्राध्वो रथः । उपसर्ग से परे जो अध्वन् शस्ट उस से परे समास में 'अच्' प्रत्यय होवे । प्राध्वः १७३ (रथ जो मार्ग पर पहुच गया हो) । १०६० ॥ न पूजनात् ५। ४।६६ पूजनार्थात् परेम्व- समासा- न्ता न स्यु । सुराजा। पतिराजा ॥ इति समासान्ता. ॥ पूजन अर्थ वालों से परे समासान्त प्रत्यय न होवें। (१)सुराजा (अच्छा राजा), अतिगला (सब से उत्तम राजा)॥ ।। समासान्त प्रकरण समाप्त हुमा ।। ॥ अथ तद्धिताः॥ ॥ अव तदितों का वर्णन किया जाता है । १०६१॥समर्थानां प्रथमाहा ४॥ ११८२ इदमधिक्रियते प्राग्दिश इति यावत् ।। इस सूत्र के तीनों पटों (समर्थानाम--प्रथमात्५~~वा भ०) का १२७८ सूत्र को पूर्व पर्यन्त अधिकार है। इस का अर्थ १००१ आदि सूत्रों में स्पष्ट हो जावेगा । १०६२ ॥ अश्वपत्यादिभ्यश्च । ४ । ११८४ । एभ्योऽण् स्यात् प्राग्दोव्यतीयेष्वर्थेषु ॥ अश्वपत्याटि गण से परे प्राग्दीव्यतीय (११८७ सूत्र के पूर्व को प्रत्ययों को अर्थ) में 'अण्' प्रत्यय होवे॥ १०६३॥ तहितेष्वचामादे. ७ १२१ ११७ जिति गिति च तद्धिते परेऽचामादरचो वृदि. स्यात् । अश्वपतेरपत्यादि । आश्वपतम् । गाणपतम् ।। (१) यहा १०२१ से 'टच्' समासान्त पाया था उस का १०६० से निपेध हुआ, ऐसे ही "अतिगाना" में जानना । परन्तु यहा सु 'या' प्रति ये दोनों ही लिये हैं इस से "परमराजः' में पूजनार्थ के पूर्व होने पर भी टच् प्रत्यय हो ही जाता है । ।
२८. में रस सूत्र या पय सिप दिया है। पारवफाम् । ३ १५॥ पाया पति पमा का सन्तान पादि। गारपतम् (गपपतेरपस्यादि)-गवेग पी सन्तान पादि। १.६४।। दिल्यदित्यादिस्यपत्युत्तरपदापयः ।।१।८५ प्राग्दी व्यतीयध्वर्येषु । दितेरपत्त्य देख्य । पादितेरादित्यस्य षा पादित्यः प्राजापत्य ॥ दिति पदिति पादिम पीर पत्युत्तरपद (पत्ति सदर उत्तरपद जिस पा) म से परे 'एय प्रत्यय ११८० मूष वे पूर्ण पर्यन्त पाने वाले प्रत्ययों के पत्रों में सोये । देस्य १५ ॥-दिति मी सन्तान भादि (पपुर)। (१) पारिस्म पदिति को सन्तान पादि (देवता)। प्राजापत्य २५ (प्रमापतेरपत्यम्) । १६५ ॥ देवायसी । देव्यम् । देवम् ।। देव मम्द से परे यम् वा पम् प्रत्यय होवे। दम्पम् (देव+यम) मा पम् (देव+पम्) २५५ - मे बो उम्पन्न भया । १.६६ ॥ वरिपष्टियोपो यश् च । पाना पका च । पपिम् यम्द पी रि ४८ का कोप पौर यत् प्रत्यय रोवे गाम (बधिभर) भो बार। (३) बपि ममपी रि का चोप पौरपा प्रत्यम भी थे। १.६७ ॥ किति प ०। २ । ११८ पपामादेरपी अधि स्वात् । माडीक ॥ परों में पादि पच् कोपिसोपेब शित् तषित प्रत्यय पर हो।बासीक दाधिरो। १८॥ गौरवादिप्रसंग्गे यत् । गोरपत्यादि । गव्यम् । मी गाद से परे पनादि प्रत्यय प्राप्त हो तो बनयो बाप 'भत्' प्रत्यय हो। मव्यम् २८ गौकी सन्तान पादि। १५८ ॥ उत्सादिभ्योऽम् ४।१।८द पोल्स ॥ ॥स्थपत्यादिविक्षारामतार्याः प्रत्ययाः । (1) मा 'पदिति' पर "पाधिय' दोनों भादी से परे 'रए प्रत्यय पाने से पारित्य पेसामीप बनाता है। परन्त पदिति मम्द बारा से पोप। पौर प्राक्षिण पद से 'एम'बरने पर स से पसार कासोप पर रोवमा वमि सोप'. ।। यवार गोप कर सेना । (२) "वन् । वा भी एक मिनी पातिव।
लघुकौमुद्याम् १८१ उत्स आदि से परे 'अम् प्रत्यय होवे । श्रौत्सः (१०६३) २५५ (उत्सस्यापत्यादि)। प्रत्ययाः अपत्य १.११ (सन्तान) से प्रारम्भ कर बिकार १९८८ पर्यन्त अर्थों वाले प्रत्यय समाप्त हुए। १.७० ॥ स्त्रीपुंसाभ्यां ननौ भवनात् ।। १ । ८७ धान्यानां भवन पूत्यत. प्रागर्थेष्वाभ्यामेतो स्तः । स्त्रैणः । पौंस्नः । इस सूत्र से लेकर १२४३ सूच पर्यन्त जोनसे अर्थ गिने गए उन त्रयों में स्त्री और पुस् शब्द से परे क्रम से 'न' और 'स्न' प्रत्यय होवें । बैण. १०६३, १५१ (स्त्रीषु- भव.) पौस्नः १०६३, २६ (युसु भवः) पुरुषों में जो होवे ॥ १०७१ ॥ तस्यापत्यम् ४ । १।६२ षष्ठान्तात् कृतसन्धेः सम- थांदपत्येऽर्थे उता वक्ष्यमाणाश्चप्रत्यया वा स्युः ॥ (९) करदी है सन्धि जिस में ऐसे समर्थ ( तषित प्रत्यय के साथ एकार्थीभावरूप से मिलने वाले) षष्ठयन्त से परे अपत्य सन्ताम अर्थ में उक्त (जो कहे गए हैं) और वक्ष्यमाण (जो कहे जायेंगे) प्रत्यय विकल्प से होवे ।। १०७२।। ओर्गुण ६ । ४ । १४६ उवर्णान्तस्य भस्य गुणस्तद्धिते । उपगोरपत्यमोपगव । आश्वपतः । दैत्यः। औत्स. । खैण । पौंस्न.॥ तहित प्रत्यय के परे होते उवर्णान्त 'भ' सजा वाले को गुण होवे । औपगव. १०६३ २६ उपगु का सन्तान । आश्वपतः २५५ (अश्वपतेरपत्यम्) दैत्यः २५५ "दितेरपत्यम्" प्रोत्स. २५५ (२) (उत्सस्यापत्यम्) खैणः । पौंस्नः = पुरुष का सन्तान । १०७३ ॥ अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम् ४ । १ । १६२ । अपत्यत्वेन विवक्षितं पौत्रादि गोत्रसंचं स्यात् ॥ सन्तानत्व रूप करके वक्ता को इष्ट जो पौत्र (पुत्र का पुत्र) आदि सो गोत्र सजावाला होये, (१) यहा १०६१ सूत्र की अनुत्ति करने से यह अर्थ हुश्रा में प्रथम (पहिला) पद तस्य जो है वह षष्ठ्यन्त मात्र का उपलक्षण है और आध्याहार से पञ्चमी का अर्थ मिला है। इस लिये षष्ठ्यन्तात् यह वृत्ति में लिखा है। कोई कहे कि यहां कृतसन्धेः, क्यों कहा तो इस का यह उत्तर है कि सु+उत्थित यहा सन्धि करके सूत्थित मन्द से १०८१ लगे नही तो प्रत्यय के पीछे सन्धि करने पर सावुत्थिति । ऐसा अनिष्ट रूप हो जावेगा। (२) उत्स (नल का झरना) इस का सन्तान के साथ योग "गानेन्यो भीष्मः" एम के समान है। है क्योंकि १०७१ सूत्र १२ सरिता १.०४ ॥ एको गोघे ४ | १ | ६३ प्रत्यय स्यात् । उपगोर्गोत्रा पत्यमोपगव ॥ पव गोष१०५ संचाबारे प्रत्यय श्री विषधाहोत्तप एक तो मस्ययी। पौष- ग'-उपगुपा पोष का प्रपोच पादि सम्तान ॥ १ ०५ ॥ गर्गादिभ्यो यश् ४ । १ । १५ । गोचापत्ये । गगस्य गोचापत्यंगाग्यः । पारस्य । गोष १ ०१८प पफ्स्य (सन्तान) पर्व में गर्मादियों में परे "यम्" प्रत्यय सोपे । गाग्य' ११ २९५ (मास्य गोपापत्यम् ) पात्स्य' १५ २५५ परम था पोष मा प्रपोच पादि सन्तामा १.०५ ॥ यजमोरच २।४ । ६४ गोत्रे याअम्तममन्तञ्च तद षयषयोरेतयोर्मुक तस्कृते बहुत्ये न तु स्त्रियाम् । गर्गाः वहसा ॥ गोप १०२ में खो यम् प्रत्ययान्त पोर पञ् प्रत्ययान्त गम्द तिन पे पश्यप यम् पौर भए का जुरोपे यम् वा पन् प्रत्यय निमित्त गावचन में परन्तु गोत्र प्रत्ययान्त बोशिश तो नी । मर्गा-पर्ग पौष मा प्रपोच पादिसन्तामामा-पत्स को पोष वा प्रपीच पादिमन्ताम || १ ७७ ॥ वीवति तु पश्ये युवा ४।११५३ वरये पिचादी नीवति पीनादेयंदपत्यम्चतुर्यादि तापसंनमेष स्यात् । पिता पितामा प्रपितामा इम में सोई बीता हो तो चतुष पीठी से रोवर की पफ्स्य (सन्तानोपा पर 'युषन् पंचा वाहा । १.९८ ॥ गोवायूम्यस्त्रियाम् । ४।१।१४ यम्पपत्ये गोषम त्ययान्तादेव प्रत्ययः स्यात्। स्त्रियान्तु म युवसंचा। युवन् । ०० मय सन्तान पर्व में बो मत्यय बरमा हो पा परि गोप १ ०१ संभव प्रत्यय को पुधा मिस से उस से परे युवरूप सन्तान पर्व में होवे दी मिल में मुषन् संभा नहीं होती। १.९॥ यमिओएच ४।१।१ १ गोचे यी यभित्री तदम्सात् फक्। मोघ १.०५ प सन्तान पर्व में बो यम् पा र तदन्त से परे मुष प मन्नान पर्व में 'पर' प्रत्यय हो। १.८ पायनेवीमोयियः फठमवर्षा प्रत्ययादीनाम्।७।११९ १८३ लघुकीमुद्याम् प्रत्ययादेः फस्य आयन् ढस्यैय् खस्य ईन् छस्य ईय् घस्य य् एते स्युः । गर्गस्य युवापत्याग्र्यायणः । दाक्षायण ॥ प्रत्यय के आदि में जो फ्, द, ख्, छ्, और व् इन को क्रम से आयन्, एय, ईन्, ईय् और इय् होवें। गाायणः १०७५, १०७८, २५५ गर्ग का प्रपौत्र भादि सन्तान । दाक्षायगः-दनका प्रपौत्र आदि सन्तान ।। १०८१ ॥ अत इञ्। ४ । १ । ६५ । अपत्येऽर्थे । दाक्षिः ॥ अपत्य (सन्तान) अर्थ में अकारान्त से परे एञ् प्रत्यय होवे । दाक्षिः २५५ (दक्ष- स्यापत्यम्) दक्ष का सन्तान । १०८२ ॥ वाह्वादिभ्यश्च । ४ । १ । १६ । वाहविः । औडुलोमिः पालतिगणीयम् ॥ बाहु आदि गण से परे इञ् प्रत्यय होवे । बाहविः १०७२, २६ (वाहोरपत्यम्) बाहु का सन्तान । औडुलौमि १०६३, ८७३ उडुलोमन् का सन्तान । यह बाहादि गण धाशतिगण है ॥ १०८३ ॥ अनुष्यानन्तर्ये विदादिभ्योऽञ् । ४ । १ । १०४ । ये त्वत्रानृपयस्तेभ्योऽपत्येऽन्यत्र तु गोचे । विदस्य गोत्रं वैदः । वैदौ । विदा । पुत्रस्यापत्यं पौत्र. । पौत्रौ । पौत्राः । एवं दौहित्रादयः ॥ जो शब्द ऋषि याचक नहीं और उन का विदादि गण में पाठ हो तो उन से अव्यवहित रूप सन्तान अर्थ में अन् प्रत्यय होवे । और यदि वे शब्द ऋषिवाचक हो तो उन से परे गोध १०७३ रूप सन्तान अर्थ में अन् प्रत्यय होवे । वैदः २५५ विद ऋषिका गोष रूप सन्तान इस का दि० में वैदो, और बहु० मे विदाः १०७६ पौत्रः १०६३,२५५ पोत्रा (पोत्ता) दि. में पौत्रौ बहु० में पौत्राः ऐसे ही दौहित्रः (दुहितुरपत्यम् ) १०६३, १८ (दोहतरा) इत्यादि जानना। १०८४ ॥ शिवादिभ्योऽण् । ४ । १ । ११२ । अपत्ये । शैव ।गाङ्ग। शिवादिगण से परे अपत्य अर्थ में 'अण्' प्रत्यय होवे। शैवः (शिवस्यापत्यम्) १०६३, २५५ गाङ्गः १०६३, २५५ गङ्गा का पुत्र ।। १०८५ ॥ ऋष्यन्धकष्णिकुरुभ्यश्च ॥ ४ । ११११४ । ऋषिस्यः वासिष्ठः । वैश्वामित्र. । अन्धकेभ्यः । श्वाफल्क । वृष्णिभ्य. वासुदेवः कुरुस्यः । नाकुलः साहदेव. ॥ .
१८४ तषिता चपियों को पौर 'पम्पयस सम्बन्धी पौर राष्णि पंग सम्बन्धी धीरपुरम सम्यम्मी माक्षियों " नाम से परे सन्तान पम में पप मत्यय पोवे । अषियों के नाम से वेसे पासिष्ठ १६१ २५ (पसिष्ठरवापत्यम्)-पसिष्ठ का सन्तान । बरवामित्र १५ २१७ विश्वामित्र की सन्तान । पन्धयों से वेसे वापरब १५ सपपत्ता स्याफ्त्यम्)- वपस्त को सन्तान स्थियां से वेसे पासुदेव' ।। २ (सुदेव स्थापत्यम्) -अप । कुष्यों से पैसे मापुस १३ २५ (मनुषस्यापत्यम् ) सारदेव १५५ २॥ (सहदेवस्यापत्यम्) पादेवी सन्तान । १२८८ ॥ मातुरुत् संस्यासम्मट्रपूर्वाया ।४।१।११५ । संख्या दिपूर्वस्य मातृमग्दस्य उदादेश स्यादव प्रत्ययश्चामातुरः । पारमा तुर साम्मातुर । भाद्रमातुरः । संस्था पापा मम्द वा सम् 'पा मद्रन में से । कोई एका पूर्व विस पो ऐसे मात मार पो बार पादेम और पप् प्रत्यय सन्तान पर्ष में सोवे । मातुः २४ ॥ १.१५ (गरेस)। पाएमातुर ३४।११ स्वामिनातिन् । सामातुर'-भती माता पाया। माइमातुर ३४।१५ मिस बी पत्याए परने वाली माता। १.८० स्पोम्यो ठक् । ४।१।१२• स्वीप्रत्ययाम्तेभ्यो ठन् । वैमत्तय ॥ ती प्रत्यय १५ प्रगत में बिन बम परे सन्तान में '' प्रत्यय जोवे । वेनतेय' (पिनताया अपत्यम्) १०१८ 11-गरम।। १.८८ कम्याया कमोन च ४।१।१३६ चादर । पानीनो व्यास कर्णश्च ॥ भन्या परमो बनीम' पादेयोचे पसार से 'पा प्रत्यय भी वे वानीम १५ (अन्याया पपत्यम्)-नुपारी वा पुष (ग्यास 'मा' कर्ष) १८2॥ रावश्वगुरादात् ४।१।१०। पवन गारगर मम्द से परे पपाय पर्थ में 'यत् प्रत्यय होवे ॥ १८ ॥रानो वातावेव। मातिमी प्रतीति तो रामन् गप्प से "यत्" प्रत्ययो । १.८१ ये घामापवर्म पोः ।।। ४ । १६८ । यादी गहितेऽन्म कल्या म्याग्न तु भाषकर्मयोः । रावम्य । वातावेति किम् ।
- " लघुकीमुद्याम् १८५ य है आदि में जिस के ऐसा तहित परे रहे तो (१) अन् जैसे का वैसा ही रहे। परन्तु भाव 'वा' कर्म अर्थ में प्रतिभाव नहीं होता। राजन्यः १०८८ (क्षत्रिय)। १०८० में "जातादेव" यह क्यों कहा ! इस का उत्तर अगले १०८२ सूत्र के उदाहरण में विदित होगा । अर्थात् "राजन." मे यत् न ही जावे ।। १०६२ ॥ अन् । ६ । ४ । १६७। अन्प्रकृत्याणि परे।राजनः। श्वशुर्यः॥ अण् प्रत्यय के परे रहते अन् प्रततिभाव को प्राप्त हो । रामनः (राजोऽपत्यम्) राणा का पुत्र जो विवाही हुई क्षत्रिया से उत्पन्न नहीं हुअा । श्वशुर्यः (श्वशुरस्यापत्यम्) १०८८,२५५साला ॥ १०६३ ॥ बचाद् घः । ४ । १ । १३८ । क्षत्रिय.। नातावित्येव । क्षानिरज्यः ॥ क्षप शब्द से सन्तान अर्थ में "" प्रत्यय होदे । घत्रिय १०८० १ २५५ । वषिय जाति का जो हो । जाति मे ही ऐसा रूप प्राता है। और में (२) 'धाथिः' १०८९, १०५३, २५५ (क्षत्रिय का पुत्र)॥ १०६४ ॥ रेवल्यादिम्यष्ठक । १ । १ । १४६ ।। रेदती भादि गगा से परे सन्तान अर्थ में 'ठक्' प्रत्यय होये ।। १०६५ ॥ ठस्येकः । ७।३।५० । अङ्गात्परस्य ठस्येकादेशः रेवतिक || अङ्ग से परे नो () उसे (इ) पादेव होवे । रैवतिक' १०६० । २५५ (रेवल्या अपत्यम्) रेवती का सन्तान । १०६६ ॥ जनपदशब्दात् क्षत्रियादञ्। ४ । १ । १६८ । जनपद- क्षत्रियवाचकाच्छन्दादअपत्ये । पाञ्चाल. ॥ जो जनपद (देश) वाचक शब्द क्षत्रिय वाचक हो उस से परे सन्तान पर्थ में, "अम्" प्रत्यय होवे । पाञ्चालः =पाञ्चालदेश के क्षत्रियों का सन्तान । १०८७॥ क्षत्रियसमानशब्दाउजनपदात् तस्यराजन्यपत्यवत् । पञ्चालानां राजा पाञ्चालः ॥ देशवाचक शब्द नो, क्षचियसमान (क्षत्रिय वाचक) हो उस से परे "उसदेश का राजा" इस अर्थ में (३)अपत्यवत् प्रत्यय होवे। पाञ्चाल. १०६३ । २५५ = पाञ्चाल का राजा। (१) यह अन् शब्द का अन्तावयव हो तो, इस का ८७३ से लोप पाया था १०८१ से इस को प्रकृतिभाव हुआ ।। (२) इस का पिता क्षत्रिय हो चाहे माता किसी ही जाति को हो। (३) अपत्य अर्थ में १०९६ जैसे प्रत्यय होता है धैसे यहां भी होवे ।
। तषिता १.८८ ॥ पूरोरम्। पौरव ॥ पूर मद से परे पूर्वोच१५१८० चर्चा में "प" प्रत्यय हो। पौरम । १०१ पूरा देश का रामामा पूर्व का सन्तान । १.८८ ॥ पारडोई भए । पाडमः । सन्तान पा राबा पर्व में पारण मम्द से पराए प्रत्यय होवे । पारण १५- पाप रेस का राया। ॥ पुरुनादिम्यो रय ४।१।१७२ । बोरव्यः । नैषध्यः । "गुर" मम्द और (१) नादि सम्दी से परे सन्तान "या" राजा पर्व में "स्व" प्रत्यय हो । वीरष्य'११११पुरका सम्तान वा रावा। पम्म १५२॥ नियम देश पापमा पादि। ११ १॥ तेतदावा ४ । १।१०४ भादयस्तद्रावसंचाः स्युः । पम् १यपादि प्रत्ययों की "तदाब जावे॥ ११.२ ॥ तद्रावस्य बहुषु तेनैवास्त्रियाम् २ १ ४ । १२ पाषर्येषु तद्रावस्य लुक् तस्यते पाल्वे न तु स्थियाम्। पम्घाखा । इत्यादि । बम पद पापचनागतो तो तद्राम ११ १ संज्ञापाले प्रत्यय पा सुपोपी सिट मेंनी पम्पास १०८०पन्यास रामे 'या' पन्चास पधियों वी पन्तान। रसी मबार पौर मी बाम हो । ११ ३ कम्पोवारसु । ।। १ । १७५ पस्मात् तद्रावस्थयुक् । फम्पोजः । कम्बोगी। सम्बोष मम्द से परे को नाम मचा बावा प्रत्यय इस पा सुमधोये । सम्बोर- पम्मोपदेपरेरामा वा सन्तान पापम्बोगरेप का रामा।शिवचन में बमोनी ११.४॥ कम्पोवादिभ्य इति वक्तव्यम् । चोखः । शक । केरखा याना॥ इस्यपत्याधिकारः॥ "मम्मोगादियों में परेनदान ११ । प्रत्यय का नुको पेण पाना चाहिये । पोर-पाच पधियों का पम्तान पा पोषदेप का पमा । मबरमा, यवन' रन पेपर भी (पोस) के समान रेवी दिपक और यहन पा भी देगरे। ॥ पपत्य (मग्तान) मा परिवार समाप्त एपा। (१) नवारपादि में मिन। - लघुकौमुद्याम् १८७ ११०५ ॥ तेन रतं रागात् । ४ । २ । १ । अण् स्यात् । कषायेण रक्त वस्त्रकाषायम् ।। "रजा गया” इस अर्थ में तृतीयान्त रङ्ग याचक शब्द से परे "अण्" प्रत्यय होवे काषायम् १०६३, २५५ (गेरी करके रङ्गा हुमा कपडा) । ११०६ । नक्षत्रेण युक्तः कालः। ४ । २३ । अण् स्यात् ।। युक्त अर्थ में तृतीयान्त नक्षत्र वाचक शब्द से परे "अण्" प्रत्यय हीवे यदियुक्त पदार्थ कालवाचक हो तब ॥ ११०७ ॥ तिष्यपुष्ययोन्नक्षत्राणि यलोप इति वाच्यम् । पुष्येण युक्त पौषमहः ॥ "नक्षम वाचक तिष्य वा पुष्प से परे जब ११०६ से भण् प्रत्यय हो तव पून के 'य" का लोप होवे" ऐसा कहना चाहिये । घोषम् (पुष्प+ अण्) ११०६, १०६३, २५५ - जिस दिन पुष्य नक्षत्र हो । ११०८ ॥ लुबविशेषे । ४ । २ । ४ । पूर्वेण विहितस्य लुप्पष्टि- दण्डात्मकस्य कालस्यावान्तरविशेषश्चेन्न गम्यते । अद्य पुष्यः जब साठ घड़ी के (१) अवान्तर कोई विशेष विदित न हो तब ११०६ से हुए पण् प्रत्यय का लुप् होवे । भद्य पुष्यः (२)(पाम पुष्य है) । ११०६ ॥ दृष्टं साम ४ । २ । ७ तेनेत्येव । वसिष्ठेन दृष्टं वा- सिष्ठं साम ॥ "देखागया" इस अर्थ में तृतीयान्त से परे "मण्" प्रत्यय होवे, परन्तु (यदि) जो देखा गया वह साम वेद हो तब, वासिष्ठम् १०६३ । २५५ (सामवेद जो वसिष्ठ मुनि से देशागया हो)॥ १११० ॥ वामदेवायड्यौ ४ । २ । ६ वामदेवेन दृष्ट साम वामदेव्यम्।। तृतीयान्त वामदेव शब्द से साम " देखामया" इस अर्थ में ड्यत् वा "डा" प्रत्यय हो, वामदेव्यम् =नो सामवेद वामदेव मुनि करके देखा गया हो। (१) पाठ पहिर से थोडा (२)यहां पान के कहने से दिन विशेष वा रात्रि विशेष का बोध नही होता॥
१८८ तधिता ११११ ॥ परित्तो रयः ।। २ । १. पस्मिन्मर्येऽप् प्रत्ययो भवति वस्थ्य परिक्षतो पास्पोरयः॥ "दया गया रम पर्व में तृतीयान्त पे पर पप् मत्यम से; परंतु मोठया मना पारपोतमा वास्त्र १५ २५-पापडे से ठया पुपा रप ॥ १११२ ।। तपोवृतममषेभ्य ४ । २ । १४ परावे छहतः गाराव पोदन । हम में परामया ए पर्य में पाच पाचव मप्तम्यम्त से परे "प" प्रत्या सेवे। पाराव पापक्ष (भात) वो पियास में धरागवा ॥ १९१३ संस्कृतं भवाः ४ । २ । १६ सप्तम्यम्तादण् स्यात् संस्कृते ऽर्थे यत् संस्कृत भधारयेत् ते स्युः । भाष्ट्रेषु संस्मता भाण्टा भया । जिस पा संस्कार दिया गया था यदिखाने के योग्य होतो "संस्कार विवा मया" इस पर्व में सप्तम्यन्त से परे पर प्रत्यय बोरे माम्दा १ १२॥ सब (बी) बी मा (भाठ) में भूना गया । १११४ ॥ साऽस्य देवता ४ । २ । २४ पून्द्रोदेवताऽस्येति ऐन्द्र हविः । पाशुपतम्। वारस्पत्यम् ॥ "पाप पारेवता" स प में रेषता वाचव प्रममानतपद से 'प' प्रत्यय होता। ऐन्त्रम् १ ३१ विस का ऐपता ऐसी पवि। पायुक्तम् -सिब पता बीपि । पारिपत्यम् (स्पतिर्देवताऽस्य) १ १ २५५ । १११५ ॥ गुवाद धन् ४ । २१ २६ युक्रियम् । १९१० सूपये पई में प्रवमानत मुख पद से परे 'प' मत्वम होवे । मुभियम् (मुमो देवताऽस्य) १८ सगुन बिस वा देवता ऐमी पिता १११६ ॥ सोमायण ४ । २ । ३ सीम्यम् । प्रथमाना सोम मम्द से परे बाप का देवता एप में 'स्पर प्रत्यय बोये पोम्पम् । एसा (सोमी रेपता स्म)-पनमा विसका देवता ऐसी पि॥ १११७ ॥ पाम्मतुपिघुषसोयत् ४ । २ । २१वायम्यम् । पातम्यम् । गयु पातु पितृ पौर पर न पम्दी से परे १० सूत्र ने पर्व में “यत्' प्रत्यय बोये। पायव्यम् (पापुरेषतास्म) (पायु+यत्) १.०१.२०-बायु देवता की पिशा प्पम् १.५ प्ररेषताण ॥ ।
१८८ - " लघुकोमुद्याम् १११८ ॥ रीछ दत्तः ७।४ । २७ अकृयकारे सार्वधातुले यकारे वीप परे तोरीडादेशः । यस्येति चा पिच्यम् । उषस्यम् । "छत् से भिन्न यथार वा सार्वधातुक से सिन्न यकार या "च्चि" परे रहे तो घर को रीयादेश हो । २५५से इंकार वा लोप किया तो। पिश्यम् १९१७-पितृदेवता की इविः उपस्यम् १९१७ उपः (प्रातः क्षाल) रूप मिस का देयता ऐसी पविः !! १११६ ॥ पितृव्यमातुलमातामहपितामहाः । ४ । २ । ३६ । एते निपाल्दन्ते । पितुर्धाता पितृव्यः । मातु ता सातुलः। मातुः पिता मातामह. । पितुः पिता पितामह. ॥ पितृव्य, गातुल, मातामह और पितामह ये ४ मन्द निपात से सिर चोसे हैं । पितृव्यः पिता वा आई (चाचा) यहां पितृ भब्द से परे "पितु तरि व्यत्" इन वार्तिदा से "व्यत्" प्रत्यय हुआ है । मातुलः = माता का भाई (मामा) यहा मातृ शब्द से परे “ मातुर्दुराच् इस वार्त्तिक से "डुलच्" प्रत्यय होता है । (१) मातामहः = माता का पिता (नाना) यहां मातृ भब्द से परे और पितामहः पिता का बाप (दादा) यहा पितृ शब्द परे "मातृपितृभ्यां पितरि डामहच्" इस वार्तिक से "डामहच्" प्रत्यय होता है। ११२० ॥ तस्य समूहः ४ । २ । ३७ काकानां समूहः काकम् ।। पष्ठयन्त से परे समूह भ में पय् आदि प्रत्यय होवें। काकम् १०६२ २५५ (कोषों , मा समूह)॥ ११२१ ॥ भिक्षादिभ्योऽण् । ४ । २ । २८ । भैक्षम् । गर्भिणीनां समूहो गार्मिणम् । इह भस्याटे तचित इति पुंवद्भावे कृते । षष्ठ्यन्त भिक्षा आदि ओं से परे "समूह" अर्थ में अण् प्रत्यय होवे । भैक्षम् १०६३, २५५ (भिक्षाणां समूहः) भीखों का समूह । गार्भिाम् (गर्भवाली स्त्रियों का समूह) यहा (२)"भस्याढे तहिते" इस से गर्भणी, शब्द को पुवराव ( गर्मिन् ) करने पर। ११२२ ॥ इनगयनपत्ये ६।४ । १६४ अनपत्यार्थेऽणि दून् प्रकृत्या । तेन नस्तहित इति टिलोपो न । युवतीनां समूहो यौवतम् ॥ (१)भाष्यकार के मत से यहां और पितामहः, में "प्रानआदेश और 'मह' प्रत्यय नियातित हैं। (२) इसका "ढ से भिन्न तधित के परे होते भ सना वाले की टि का लोप हो" यह पर्थ है।
१८.
सरिता
सन्तान से भिन्न पर्भ में पाने वाले पर परे होते या पक्षतिमावो । रस
से “गाभिषम्" में 200 से मर्मिन् पी हि वा सोप मा एमा। यों कि पैसे वा सा
रानागी प्रतिमा का पामय । योपतम् ११२१ १ १ २५ युवतियों का समूह ।।
११२३ । ग्रामवमबन्धुभ्यस्त ४ । २४३ तवन्तं स्थियाम् ।
चामता । जनता । बन्धुता ।।
पाम का पोर मा म प्रमों से परे समूह में "तस्' प्रत्यय गरे। तान्त
(तच प्रत्यय विसरे पन्त में को) स्वीवित होता है। पामता १५ मामी ला समू
बनता (बनाना मूर)बनाता (पन्ना समू)।
११२४ ॥ गवसायाभ्यां चेति पछष्यम् । गवता । सावता ।
मन पर सहाय इन दो सम्दों से भी समूह पर्व में तत् प्रत्यय होवे । गमता (मबार
को पमू) विमी का समूर पहायता (सहायाना अमूप) सहामी का बमूर।
११२५ ॥ पत्रः पती। पहीनः॥
अब यन पायो तब पमूगा पर्थ में पठन्त पान् मद से परे प्रत्ययसोचे
पशीम १८.८०१-पने दिनों की पम्प (प).
११२६ ॥ पचितास्तिधेनोष्ठ ४।२180॥
पपित्त (पवेतन) स्तिन पर अनुल पम्दी से परे समूहब में उन्' प्रत्ययकोने
११२० । सुसुखाम्तात् प०।३।५१। इससस्तपताम्तात्
परस्य ठस्म कः । सानुकम् । शास्तिकम् । अनुवम् ।
पम् वय (
उपरत्नमें कोई पापत मनियम से परे
(१) र पोको सानुभम् ११२५.१ ५० (साना समू) मतुपी मा समूत्र । स्तिवाम
(तस्तिनापमा) १५.१०।मुवम् ११२.१ ५० अनूनां पर मोनों वा समू।
११२८॥ तदधीते तोद ४ । २।५८ ॥
पपीते (पा पता) पोर (दाबानता) न पा में तिीयान्त मरे
भरपादिमत्मा
११२ । न ग्वाभ्यां पदाताम्या पूर्वी तु ताम्यामेच् । ३ ।।
(१) या (२) प्रत्यय का पारे।
-
सधुकोमुद्याम् १८१ पदान्ताभ्यां यकारवकाराभ्यां परम्य न इधिः किन्तु ताभ्यां पूर्वी क्रमा देचावागमो स्तः । व्याकरणमधीते वेद वा वैयाकरणः ॥ "पद के अन्त में होने वाले यकार 'या' धकार से परे" अच् को दधि न होवे किन्तु उस यकार वा वकार से पूर्व ऐकार और श्रीकार, का पागम (१) कम से होवे। वैयाकरण: १९२८, २९५ व्याकरण शास्त्र को पढ़ ने वाला (वा) उस के जानने वाला ॥ ११३० ॥ क्रमादिभ्योवुन् ४ । २१६१ क्रमकः। पदकः । शिक्षकः। मीमांसकाः ।। ११२८सूत्र के अर्थ में क्रमादियों से धुन् प्रत्यय होवे । क्रमकः (क्रममधीते वेद वा) ८३०, २५५ (२)क्रम के जानने वाला पदकः ८३०, २५५ पद (वेद का प्रथम विकार) पदपाठ के मानने वाला शिक्षकः, (२)शिक्षा के जानने वाला । मीमांसक'मीमासा के जानने वाला। ११३१ ॥ तदस्मिन्नस्तौति देशे तम्नाम्नि ४।२।६७ उदुम्बराः सन्त्यस्मिन् देशे पीदम्वरो देशः ॥ "इस में है" इस अर्थ में प्रथमान्त से पण भादि प्रत्यय होयें, परन्तु यदि प्रकृति (प्रथमान्त) और प्रत्यय (अण् पादि) के समुदाय से तन्नामकदेश का बोध होतो। औदुम्वरः १०६३, २५५ जिस में गूलर के वृक्ष हों वह देश । ११३२ ॥ तेन निवृत्तम् ४ । २।६८ कुशाम्वेन निर्वृत्ता नगरी कौशाम्बी। "बनाया गया" इस पर्थ में तृतीयान्त से परे 'अण्' आदि प्रत्यय होयें। कौशाम्बी १०६३, २५५, १३३७- कुशाम्ब राजा से बनाई गई जो मगरी। ११३३॥ तस्य निवासः ४१२१६६ शिवीनान्निवासो देशः शैवः। "नियास" अर्थ में पष्ठयन्त से परे अण् आदि प्रत्यय होवें । वः (शिवि+भा) १०३३, २५५, १३३, १३४, १२०, १०८ (४) (शिविमों के रहने का देश) ।। ११३४ ॥ अदूरभवश्च ४ । २१७० विदिशाया अदूरभयं वैदिशम् । "दूर नहीं है" इस अर्थ में षष्ठयन्त से परे पण भादि प्रत्यय होयें । वैदिशम् १०६३ २५५ (नगर जो विदिगा के ११३५ ॥ जनपदे लुम् ४ १ २ १८१ जनपदे वाच्ये चातुरधिकस्य लुम् । नव जनपद (देश) बाध्य हो तब (५) चातुरर्थिक प्रत्यय का लुप् होवे ।। (१) यहां "यकार से पूर्व ऐकार, और वकार से पूर्व भौकार का आगम ही यह क्रम है । (२) कम भी वेद का दूसरा विकार है। (३) शिक्षा वेदान है। (४)किसीचत्रिय जाति वानों का नाम है । (५) ११३१ सूत्र से ११३४ सूत्र पर्यन्त ४ चार सूत्रों से उता कहे हुए चारों प्रयों की चातुरर्थिक मजा है। - ॥ दूर नही)।
तषिता
११३६ ॥ जुपि युतावद् व्यखि वने। १।२।५१ । सुपि पति
प्रकृतिषषिक्षप्रवचने स्त । पञ्चासानाम्मिवासो ममपदः पम्पामा।
कुरवः । पाहाः पिता । कविताः॥
मुस् ११३७ के बोने पर प्रतिमा की मिापौर अपनपना से। पम्चामा १m
१५ (पचास बम वासी रामे का देस) पुरष ११५५ १५५ पुरुषों का रेल ।
पा-पों मा दे। यहा ११५ ११६॥ (पहार) पशिश (पासियों या देय)।
११३७ ॥ वरपादिभ्यश्च ४ । २।२। पवनपदार्य प्रारम्म ।
परपानामदूरभषग्नगरं यर ।
परवा पादि गब यो पन्तगरा मम्मी से परे चातुरर्षिक प्रस्पयवा सुप् । पीर
मति की सिम बगे हैं। वो सम्ए बगपद (देय) पाच महीनो रिये
रसमा पारम्म बिवा है। परषा ११ १९९०-यो मार परषा से दूर नहीं ।
११३८ ॥ कुमुदमडवेतसेम्बो ड्मतुप् ४ १ २ १८०
मुर ना और बेतस लगादी से परे जमतुप्' प्रत्यय चोये ।
११३८ । झयः ८,९,१० मायम्ताम्मतोम॑स्य वा । कुमुपान । मवान्।
मय ( भ प प प ग स प पहचतच प) प्राधान्त
र्गों में से मोर पक र पन्त में मिस ने उस को परे यो रतु' १५८ प्रत्यय र म
सो पोवे पुमान् २१२ १११ १२५ २६ १८ विस देश में बुमुद बात की। ऐसे
"गान २५२ २११ १८५ २२ १८१ या नछे बहुत ।
११४ ॥ मादुपधायाश्चमतोर्षोऽयवादिभ्यः ८।२।८ मवी
वर्यास्ताम्मषर्यावर्षीपघातच यपादिवन्जितात् परस्य मतोम्मस्ययः ।
पतस्वान् ।
'यबादि गोरवर मिस का 'पना पश्यप पक्षका रुपमा में गवारा
अपर तिम मे परेको मतुप ठमकेम की गोपे । चेतावान् २०१४॥ १८॥ २५
१८५ मिस देश में बन (1) पहुन ।
११४१ ॥ नहगादावण ।। २।८ मङ्गलः ।।
मद पोर माव (पास) न पो मदों मे परे "न" प्रत्यय पोये । नाम पर
(Rst मे मराएपा देम)
१८० मधुकोमुद्रयाम् ११४२॥ शिखाया वलच् ४ । २ । ८६ शिखायल. ॥ ॥ इति चातुरर्घिका.॥ गिरता पद से परे "वलच्" प्रत्यय होये । भिवापन्न (जर) । ॥ चातुरर्विक प्रत्यय समाप्त हुए ॥ ११४३ ॥ शेष ४।२।१२ अपत्यादिचतुरन्तादन्योऽर्घ शेषस्त त्राणादय. स्यु.। चक्षुपा गृछते चाक्षुपं रूपम् । श्रावणः शब्दः। चोपनि- पदः पुरुषः । दृषदि पिण्टा दार्पदा सतावः । चतुभिद्यते चातुरं शक- टम् । चतुर्दश्यां दृश्यते चातुर्दशं रक्षः। तस्य विकार इत्यतः प्राक् शेषाधिकारः॥ पपत्य १०७१ प्रर्य से लेकर चातुरर्थिक ११२४ पर्यन्त जितने अर्ध , उन से भिन्न जो अर्थ है ये शेप कहाते हैं उन में भी अगा प्रादि प्रत्यय होते हैं। चाक्षुषम् १०६३ ८ जो पारख से जाना जाये (रूप) श्रावण. १०६३, २५५, जो कान से सुना जाने (गन्द) पीपनि- पदः १०६३, परमेश्वर । दार्षदा. १०६३ दृपद (पत्थर) पर नो पीसे जाये (सत्त) । चातुरम् १.६३, २५५ जो चारोकरके उठाया जावे (गडा) । चातुर्दयम् १०६३, २५५ जी चौदस में देखा जाये (रायस) यहा से ११८८ पर्यन्त शेषका अधिकार है। ११४४ ॥ राष्ट्रावारपाराद् घखो। ४ । २ । १३ राष्टे जातादिः राष्ट्रिय. । अवारपारीण राष्ट्र और प्रवारपार न दो शब्दों से परे नाम से 'घ' और '' प्रत्यय होते हैं। राष्ट्रिय. (१०८०, २५५) = राष्ट्र (देश) मे जो उत्पन्न भया है। अवारपारीगाः १०८० २५५, १५१ । नो उरार पार हो। ११४५ ॥ अवारपाराधिगृहीतादपि विपरीताच्चेति वक्तव्यम्। अवा- रोण । पारीण । पारावारीण.। इहप्रकृतिविशेषाद घाट्यष्ट्यटुयल- न्ता उच्यन्ते तेषां जातादयोऽर्थ विशेषा समर्थ विभक्तयश्च वक्ष्यन्ते । ॥ । अलग किये अवारपार (शवार' और 'पार') और विपरीत (पारावार) से परे 'रस' प्रत्यय होवे ऐसा कहना चाहिये । अवारीण (श्रवार +ख) १०८० । २५५ = उगर का। पारीयः (पार+ख) १०८०, २५५ -पारला 1 पारावारीप. (पारावार+रख) १०८०, २५५ । पार उरार होनेवाला। इस प्रकरण में प्रकृति विधेप से परे घादिक (घ, से लेकर) टुघ, ट्यत् १८४ तषिता १५ पर्यंत मी प्रत्यय को जाते हैं हम जातादिपर्व पिमेव और समर्व पिपियें कीबायेंगी। ११४६ ग्रामायखो। ४ । २ । १४ । ग्राम्यः । यामीप । पाम मम्द से परे य या'लम् प्रत्यय होवे। पाम्य' ५५ (पा) पामीप 1. १५, १५बो पाम (पिर) में पता हो। ११४०॥ नखादिम्यो टप ४ १२ १६० नादेयम्।माहेयम्। वारापसेयम् । मपादि मप से परे 'म मस्यय हो । नादेयम् (मण भवम्) १८१५०५ जो नदी में पा रो। माीयम् (मही (पम्बी) तब ममम्) १८ १-40 २१५ वापर सेयम् (पारावस्या मषम् ) १८ १५-बो बनारस में ११४८ ॥ दधिवापरचात्पुरसस्त्वक् । ४ । २।८८ । दापि यास्या। पाश्चात्यः । पौरस्त्य दपिका परचात् और पुरस न ले परे 'त्यक' प्रत्यय होवे। दारिचालय' (दधि पस्या मप) १० दधिष दिगा में होने वाला। पारपास्य परिचम में मोनोरे। पोरस्य' ११०-8ो पूर्व में कही। ११४६ ॥ धुप्रागपागुदमतीचो यत् । ४ । २ । १.१। दिव्यम् । प्रायम् । भपाभ्यम् । उदीयम् । प्रतीच्यम् । दिम् मा पपा उपप पौर प्रती ल पम्दों से परे 'यत् प्रत्यय होवे। विम्यम् (दिवि भवम्) को पानाव में । प्राच्यम् -बो पूर्व में हो। पपाच्यम् (जो दधिष में) दीच्यम् (बोचर में ) प्रतीयम जी पश्चिम में उत्पन्न मया ॥ ११५• " पठ्ययात् त्यम् । ४ । २ । १.४ । प्रमेहपतसिषेभ्य पव। प्रमात्य ।त्यः । क्वस्थाात्ततस्त्यः। तपस्या। पव्यय से परे त्यप् प्रत्यय होये। परन्तु “पमा ' "" और तप (पा) पन्तिम में जिगोली पम्पयी से परे स्पपी. पोर से परे म पे । पमाय (पमा (पर) मप) बी साध रो पनीर त्य' (समय) परम (बव मप) तताय (ततोमप) पाया (सब भब)। ११५१ ॥ स्यम्ने(वे । नित्यः । पुष (घिर) पर्ष म नि पप्यम से परे "त्यप् प्रत्यय । मित्म-बी सग बिपमानतो.
१८५ - लघुकीमुयाम् ११५२ ॥ इडिय॑स्याचामादिस्तवदम् । १ । १ । ७३ । यस्य समुदायस्याचां मध्ये आदिव॒विस्तदृसंजू स्यात् । "निस समुदाय के अचों का प्रथम (पहिला) पथ् (स्वर) हधि सजा याला होवे" वर समुदाय हद सजा वाला होवे । ११५३ ॥ ल्यदादीनि च १ । १ । ७४ चसंज्ञानि स्युः ॥ त्यद धादि शब्द भी हसा वाले होयें । ११५४ ॥ वृहाच्छः ४ । २ । ११४ शालीयः । तदीयः ॥ दि ११५२, ११५३ सनक शब्दों से परे "छ" प्रत्यय होवे । गालीयः (शालायां भवः) १.८०, २५५ नो शाला मे हो । तटीय' (तस्यायम्) -गो सिस का हो इत्यादि । ११५५ ॥ वा नामधेयस्य वृहसना । देवदत्तीयः । देवदत्तः ॥ नामधेय (नाम) याचक प्रव्द की हर सवा विकल्प फरक होवे । देवदत्तीयः (देय- दत्तस्यायम् ) १०८०, २५५ वा देवदत्सः १०१६, २५५ (जो देवदत्तका हो) । ११५६ ॥ गहादिभ्यश्च ४ । २ । १३८ गहीयः ॥ (१) गहादिओं से परे 'छ' प्रत्यय रोवे । गदीयः (गहे भव') १०८०, २५५ ।। ११५७ ॥ युष्मदस्मदोरन्यतरस्यावञ्च । ४ । ३ । १ चाच्छः । पक्षेऽण् । युवयोयुष्माकंवायं । युष्मदीयः । अस्मदीयः ।। युष्मद् भोर भस्मद से परे विकल्प करके 'ख' प्रत्यय होवे । सूत्र में नो 'म्' है उस का यह प्रयोमन है कि 'छ' भी होवे, विकल्प के पचान्तर में अण् प्रत्यय भी होवे । युप्मदीयः १०८० लो तुम दो का 'वा' तुम सभ का हो । परमदीयः १०८० (आवयोरस्माकं वायम् ) जो हम दो का (वा) हम सभ का हो । ११५८ ॥ तस्मिन्नणि च युष्माकास्माको ४ । ३ । २ युष्मदस्म दोरेतावादेशी स्तः खभि अणि च। योष्माकोणः । पास्माकीनः । वीष्माकः । श्रास्माकः ॥ युष्मद् पौर अस्मद शब्द को 'युष्माक' और भस्माक प्रादेश क्रम से होवें, जव 'राष्ट्र वा अण् प्रत्यय परे होवे तव । यौष्माकीणः (युवयोयुप्माक वायम्) युष्मद् + खन् १०८० १०६३, २५५, १५१ । प्रास्माकीनः (श्रावयोरस्माक वायम् ) १०८०, १०६३, २५५, हम, दो का वा हम सभ का जो हो। (१) गहादि देश वाचक है, और यह गण मारुति गण है ।। ॥ .
१८५ तषिता ११५६ ॥ तवाममयावेकवचने ४ । ३ । ३ एफार्थवाचिमोर्युष्म दस्मदोस्तवकममको स्त रखभि अखि च । तापकोन | सावक । माम सीन । मामक । छेतु॥ 'शम् वा पप प्रत्यय परे तो पकायमारव युष्मद और परमह वो ग्राम से तपक्ष पीर ममव पादेयतापपीन १५ २५५ (तवायम् ) पा तापम' १५ २४५-तेरा। मामबीन (ममायम्) १८ १. २.पा मामन ५० मेरा । '' प्रत्यय परे गोते तो (पग भूष का दारिए देंगे) ॥ ११५ ॥प्रत्ययोतरपदयोश्च ०।२।२८ मपय॑न्तवोरनयोरे पायपाचिनोस्त्वमी स्तः प्रत्यये उत्तरपदे च परत । पदीय । मदीयः वापुष । मत्पुष । प्रत्यय 'वा' उत्तरपद के परे होते एमावाचल म् पर्यन्त युप्मद (मुम्म् ) और पस्मद (पाम् ) को त्व पौर म पादेय मम से हो । प्रत्यय ये परे से त्वदीय' (तवायम् ) १८ तेरा । मदीय' (ममायम) १ ८ मेरा । पत्तरपद के परे होते असे (स्वत्पुष) (सम पुष ) -"युष्मद+पुष" ५५ - 'स्व+पद+पुष २५ "स्वद+पुष' ८७ (स्वत्पुम)-तेरा पुष। ऐसे मस्पुष (मेरा पुष) सिर पर ना ११६१ मध्याम्म ४।३।८ मध्यमः ॥ मम्प सम्म से परे 'म प्रत्यय होपे । मध्यमः-विचधारणा (बीचका)। ११६२॥ कालाहम् ४।३।११ कालिकम् । मासिकम् । सापासरिकम् । पास मापक पम्द मे परे ठम् प्रत्यय होये । बाविषम् । १५ (बासे मषम् ) भी समय में हो। मासिपम् १५.५५ (मासे मरम् ) । सांवत्सरिखम् १८.१५ (संवत्सरे मम् ) भी परस में। ११५२॥ पव्ययाना भमारे टिखोपः। सार्यपातिक । पौनःपुमिकः । म मंशावाले पय्यया पीरिया सोप होथे। सार्यपातिक १२, १८ बो सामसर हो। पोम पुनित वो फिर पिरीम ११६४ ॥ प्राय एपयः ४ । २ ११० प्रासपण्य ॥ मााप गादम परे "एण्य" प्रत्यय पोरे प्रापेएय' (मायपि मा) वो बर्षाचन में की ११६५ ॥ सायं चिरंमाक्षेप्रगेष्ययेम्यष्टुघटुमली तुटप ४।३।२३ सायमित्यादिभ्याधतुर्योऽव्ययेभ्यः कासवाचिभ्यप्ठ्ध ष्टुमणो स्तसत लढुकीमुद्याम् १८० योस्तुट् च । सावन्तमम्। चिरन्तनम्। प्राणे प्रगे भनगोरेदन्तत्वं निपा- त्यते । प्राहणेतनम् । प्रगेतनम् । दोषासनम् ॥ सायम, चिर, प्राले और प्रगे दून ४ चारों से और काल वाचक अव्ययों से परे 'टुर' और "टुल्" प्रत्यय होये । और उन को तुट पागम होवे । सामन्तनम् ८३० (साय भवम्) जो सन्ध्या में होवे । चिरन्तनम् ८३० =जी चिर से होवे । प्राध्ये, और प्रगे, इन का अन्त में एकार निपात से है । प्राधेततम् (नो पूर्वा काल मे हो । प्रगेतनम् =ो प्रातः काल से हो । दोषातमम् ८३० जो रात्रि में हो। ११६६ ॥ तच जात. ४ | ३ । २५ सप्तमीसमाग्जात इत्यर्थ- ऽणादयो धादयश्च स्युः । सुन्ने बातः । सोध्न । उत्से जात. पोत्सः। राष्ष्टे जातः । राष्टियः । मदारमारे जातः। अवारपारीण. ॥ इत्यादि। वहां "उत्पन्न हुआ" इस थर्थ में समर्थ सप्तम्यन्त से परे पण् धादि और घ आदि प्रत्यर हो । सोध्न' १०६३, २५५ (त्रुघ्ने जास') जो मुघ्न देश में उत्पन्न भया हो। प्रोत्सः १०६३,२५५ (उत्से जात ) को करने में उत्पन्न भया हो। राष्ट्रियः (राष्ट्र+घ) १०८०, २५५ जो किसी देश में उत्पन्न भया हो। अवारपारीणः १९४४ १०८०, २५५ जो उरार पार उत्पन्न हो। इसी प्रकार और भी जान लेने ।। ११६७ । प्राषष्ठम् ४ । ३ । २६ एण्यापवादः। प्राषिकाः ॥ ११६६ सूत्र के अर्थ में प्राइष् शब्द से परे ठप् प्रत्यय होवे । यह ११६४ का अप- वाद है। प्राषिका १०८५ प्रापि जात. = लो वर्षा ऋतु में उत्पन्न हो । ११६८ ॥ प्रायभाव. ४ । ३ । ३६ तत्रेत्येव । सुघ्ने प्रायेण वाहु- ल्येन भवति सीन. "मायः होता है" उस अर्थ में समर्थ सप्तम्यन्त से परे अण् आदि प्रत्यय होवें। सोध्नः १०६३ । २५५ जो प्राय सुघ्न देश में होवे । ११६६ ॥ सस्मते ४ । ३ । ४१ खुध्ने सम्भवति । सौन. ॥ सम्भूत (सम्भव) अर्थ में सप्तम्यन्त समर्थ से परे अण् प्रादि प्रत्यय होयें। सीनः १०६३ । २५५ । जिस का खुघ्न देश में सम्भव हो। ११७० ॥ कोशाञ् ४ । ३ । ४२ कौथेयं वस्त्रम् ।। सप्तम्यन्त (१) कोश शब्द से परे ढञ् प्रत्यय होवे । कौशेयम् १०८० । १०६३ । २५५ (कोशे सम्भवति) रेशमी कपडा ॥ (१) कोध = जिस से रेशमीकीडे रक्षा करसे हैं। । ।
तचिता ११०१ ॥ तत्र भवः ४ । ३ । ५३ सोनः । पौत्सः । राष्टियः ॥ "तब भग" इस पर्व में समय धपाम्यन्त से परे पापादि प्रत्यय । मीण (पुग्ने मर) १५५ मुग्नदेन में भो।पोरम (लस्से मवा) राप्दिा ११ml १८ साराष्ट्र मब' ॥ ११०२ ॥ दिगादिभ्यो यत् ४ । ३ । ५४ दिश्यम् । वय॑म् । ११ पूषो पब में दिम् पादि गादी से परे यत् प्रत्यय पीये। दिश्यम् (दिति भवम् ) वो दिगा में हो। मार्यम् (धर्म ममम् ) १५-घोसा में। ११०३ गरीरापयवारच ४।३ । ५५ दम्त्यम् । करठभम् । पध्यात्मादेष्ठअिध्यते । पध्यात्म भरमाध्यात्मिकम् ॥ ११०१ सूप में गरीर को पषयप पापन गम्दी से परे 'मत्" प्रत्यय पोरे। पापम् ५५ (दन्तेषु भपम् ) वो दातों में ही परमम् २ (पणे भवम्) बीट महो। पम्मात्मादिलों पे परे ठय् प्रत्ययो" या भाष्यकार पीरमा। प्रामा तिमवम्-११५२४४वो पारमा विषे॥ ११०४ ॥ प्रमुगतिवादीनाम्ध । ३२ एपामुभयपदाधिः मिति चिति किति च । पाधिदैविकम् । पाधिमौतिकम् । ऐशलीवियम् पाकृतिगपोयम् ॥ 'मित् वा वित् पौर वित् प्रात्यम परे को तव अनुमतिवादियों को दोगी (पूर्वघोर उत्तर) पदों के पादिप पीपिडीये। पाधि विषम् ११०वीरष्टि से ठन् परमय हुपा । पोर १ का ११५५ -को देव में रो। ऐसे प्राधिभौतिवाम् । ऐसतीविषम् (स होने मपम् )ोप सोच में दो या पम्पम्मादि पाछति गर । ११७५ ॥ विध्यामलाए । ४ । २ । १२ । मिवामूलीयम् । अस्वीयम्। विनामून पीर पामिन सप्तम्यन्त सम्दों से परे ' प्रत्यय होये । विद्रामसी यम् (मिहामने भवम् ) १. वो बिहार में हो । पातीयम् १ ८. ॥ भाति म बोको ११०६ ॥ वर्गाश्ताप ४ । ३ । १२ कर्गीयम् । (१) वर्गात मन्द पे परेच प्रत्यय शेरे । बर्गीयम् । २५ (फापम भवम्) अपगमेमोनो॥ (१)वर्ग गदरपन्तम बि। - १८८ सधुकौमुद्याम् ११७७ ॥ तत आगतः ४ । ३ । ७४ जुध्नादागतः सोध्नः ॥ "तहा से आया" इस अर्थ में पष्चम्यन्त से परे अण् प्रादि प्रत्यय होवें । सौनः १०६३, २५५ स्रुघ्न देश से आया । ११७८ ॥ ठगायस्थानेभ्यः । ४ । ३ । ७५ । शुल्कशालाया पागतः शोल्कशालिक.॥ 'तत आगतः' इस अर्थ में प्रायस्थान (राना के कर 'मामला' लेने के स्थान) के वाचक पञ्चम्यन्त शब्दों से परे 'ठक' प्रत्यय होये । गोल्कशालिकः १०८५, १.६०, २५५ (९) शुल्ल शाला से नो पाया ॥ ११७६ ॥ विद्यायोनिसंवन्धेभ्यो बुझ् ४ । ३ । ७७ भोपाध्यायकः पैतामहक.॥ विद्यासम्बन्ध वाले और योनि सम्वन्धी पञ्चम्यन्त शब्दों से परे "बुञ्” प्रत्यय होवे । श्रीपाध्यायकः (उपाध्यायादागत:) १०६३, ८३०, २५५ उपाध्याय से जो पाया हो। पैतामहक' (पितामहादागत) १०६३, ८३०, २५५ ।। ११८० ॥ हेतुमनुष्येभ्योऽन्यतरस्यां रुप्यः । ४ । ३ १८१ समा- दागतं समरूप्यम् । पचे गहादित्वाच्छः । समीयम् । देवदत्तरूप्यम् । देवदत्तम् ॥ हेतु और मनुष्य वाचक पञ्चम्यन्त शब्दों से परे विकल्प करके 'रूप्य' प्रत्यय होये समरूप्यम् (समान हेतु से जो आया) दूसरे पक्ष में ११५६ सूत्र से 'छ' प्रत्यय होता है। समीयम् १०८०, २५५ देवदत्तरूप्यम् वा देवदत्तम् =देवदत्त से जो पाया हो । ११८१ ॥ मयट् च ४ । ३ । ८२ सममयम् । देवदत्तमयम् ।। ११७७ सूत्र के अर्थ में ११८० सूचकी प्रकृतियों से परे 'मयट्' प्रत्यय भी होवे । सममयम् (समादागतम् ) देवदत्तमयम् (देवदत्तादागतम् ) ॥ ११८२ ॥ प्रभवति ४ । ३।८३ हिमवतः प्रभवति हैमवती गना। प्रभवति (प्रकाशित होता है) इस अर्ध में पञ्चम्यन्त से परे अण् प्रादि प्रत्यय होवें। हेमवती १०६३, १३३७ हिमालय से जो प्रकाशित हो (गङ्गा)। ११८३ ॥ तगच्छति पथिदूतयोः ४ । ३ । ८५ सुघ्नं सङ्गच्छति सौधनः : पन्धा दूतो वा ॥ (१) राजा को कर लेने का स्थान ।
२
तरिता
तापति (उस स्थप पो जाता है) इस पर्व में रितीयान्त मे परे पप् प्राधिपय
सो यदि बाने वासा मागे पादत तप । सोण १५-बो मार्ग पासून मुम्म
देश को बाता॥
११८४ ॥ पभिनिष्क्रामति हारम् 81 ३1८६ सुन्नमभिनिष्का
मति सीनहाग्यकुष्जहारम् ।।
अभिनिसामति (मम्मुख ()मिकसता ३)स पम में रितीयारत मे पर पप
पादि प्रत्यय दें। यदि मिन्सने पापा रीतपासोमम(वामीत्रका दार (फाटक))
११८५ ॥ पधिकृत्य कृते यग्ये ४ | ३ |८० भारीरकमधिकृत्य
सती ग्रन्य गारीरकीयः ।।
बिमी पियय पा ममा पारये बियागया" स पप ने तिीयान्त मे परे पर
पादिमत्यय होते है। यदि जो मिया गया वा पन्य होतोगारीरबीय 10tE.
नो अन्य (१) बीच मे विषय में पनाया गया रे॥
११८६ ॥ सोऽस्य निवासः ४ार सुन्नी मिनासोऽस्य वीष्म ।
"मोरे निवास स्थान इसका रस प्रम में मवमानत से परे पप्पादि प्रत्ययो ।
स्रोम (पुग्न+प)११।२५-जिसका निवास स्थान मुनो।
११८७ ।। सेन प्रोक्तम् ।।३।१ १ पाणिनिमा प्रोवं पाणिनीयम् ।
तृतीयान्त मे परे "कहा गया" इस पर्व में पच पादि परयय होवे । पारिनीयम्
१८ । पापिनि करने को पाहा गया।
११८८ ॥ तस्येदम् ४ । ३। १२• उपगोरिदमौपगरम् ॥
इति चैपिका ॥
'तस्पेदम' (यह उसका 1) प म परमात से परे पर पापि प्रत्यय हो ।
पोपमपम् । १५।१०।२५ जो उपगु वा गोरे । ऐप ११४५काधिकार समाप्त पान
११८८ ॥ तस्य विकारा ४ । २ । १३४ ॥
पम्पमत से परे विकार धर्म में पम्पादि प्रत्यय में ।।
११८ ॥ पश्मनी विषारे टिवीपः । पाममो विकार भारमः ।
मास्मन । मात्तिकम
(१)महा सम्मुख निवसने बा (दीच पाता) वा । (२) निरिक्त
मगर वो "मरीरष" पाते उठवा मम्बन्धी नीव 'मारीर माता
-- - लघुकौमुद्याम् २०१ विकारार्थक प्रत्यय के परे होते अश्मन् शब्द की टि का लोप होवे। आश्यः १०६३ पत्थर का विकार । सास्मनः (भस्मनो विचार:) १०८२-भस्म का विकार । मार्तिकः । १०६० १ १०८५ । २५५ (मृत्तिकाया विकार.) मिट्टी या विकार ।। ११८१ ।। अवयवे च प्रारयोषधिस्यः ४ । ३ । १३५ चाहिकारे मयूरस्यावयवी विकारोवा सायरः । मौर्वम् । काण्डम्भस्म वा। पैप्यलम् । प्राणी, ओषधि, और वृक्ष वाचक शब्दों से परे अवयव अर्थ में अण् श्रादि प्रत्यय होते हैं। चकार से विकार अर्ध में भी । मायूरः १०६३ । २५५ मोर का अवयव वा विकार । मौर्वम् (१) (मुर्वाया अवयवो विकारो वा)। पैप्पलम् (२) (पिप्पलस्यावययो विकारो वा) ॥ ११६२ ॥ सयड्वैतयोाषायामभक्षाच्छादनयोः ।।। ३ । १४३ । प्रकृतिमात्रान्मयड् वा स्यादिकारावयवयोः । अश्ममयम् । आश्मनम् । अभक्षेत्यादि किम् । मौद्गस्सूपः । काप्पासमाच्छादनम् ॥ भाषा में (३) (वेद से सिन्न) संस्कृत ग्रन्थों में प्रकृति (प्रातिपदिक) मात्र से परे विकार और अवयव अर्थ में अणू धादि प्रत्यय होवें, परन्तु यदि विकार मौर अवयव भक्ष (खाने योग्य ) और वन वाचक न हो तव । अश्ममयम् वा पाश्मनम् पत्थर का विकार वा अवयव । ११८२ इस सूत्र में "अभक्षाच्छादनयोः" वह पद क्यों कहा ? उत्तर देता है, मोहः (मुहस्य विकार) मुंग की दाल । और कार्पासम् (कर्पासस्य विकार) कपडा एन दोनों उदाहरणो मे मयट न हो जावे ॥ ११६३ ॥ नित्यं वृद्धशरादिभ्यः ४ । ३। १४४ आचमयम् ।। सध ११५२ । ११५३ सना वाले शब्दों से परे और भरादियों से परे विकार और प्रव- यव अर्थ में मयट प्रत्यय नित्य होवे । आममयम् ( आत्रस्य विकारोऽवयवो वा) प्राम का विकार वा अवयव ।। ११६४ ॥ गोश्च पुरीले ४ । ३ । १४५ गोमयम् ।। 'गाय का गोवर' इस अर्थ में गो शब्द से परे मयट् प्रत्यय होवे। गोमयम्, गौ का गोहा। ११९५ ॥ गोपयसोय॑त् ४ । ३ । १६० गव्यम् । पयस्यम् ॥ ॥ इति प्राग्दीव्यतीयाः ॥ गो और पयस् इन शब्दों से परे विकार अर्थ में यत् प्रत्यय होवे । गव्यम् २८ गोविं- कारः) पयस्यम् (पयसो विकार)-दृव का विकार ॥ प्राग्दीव्यतीय समाप्त हुए । (२) विमी लता का नाम है। (२) पीपल के वृक्ष का नाम है । (३) अवैदिक।
। । १.२ तद्धिता ११९६ ॥ प्राग्यस्तेष्ठका ४ । ४ । १ सतीत्यतः प्राक् ठगधिनियते । यहां से कर १२५२ मून पर्यन्त ठप का पधिकार है। ११८७ ॥ तेन दीव्यति खनति अयति वितम् ।।४।२ पर्यो भ्यति खनति जयति बिल या पाक्षिकम् । (उस पर) "ऐसा दोदनारेबीतता पर बो पदार्य बीतामया' ल प्रया में ततीयास्त से परे 'क' प्रत्यय रोवे।पाधिवम् । १०१ पासपी को पंचतारेस्पादि।। ११८८ ॥ संस्मतम् ४ । ४ । ३ दध्ना संस्कृतं दाधिकम् । मारोधिवम् । "संस्कार बियागका" इस पर्व में ततोयान्त से परे ठप प्रत्यय होपे। पाभिवम् १०१८२५ दधि (दही) पर विस का संस्कार दिया गया । मारीपिकम् - मरिचसे मिमका संस्कार किया गया । ११८८ ॥ तरति ४ । ४ । ५ उडुपेम तरति । पौडुपिक । 'तरता स पब में ततीयान्त से परे ठपा प्रत्यय ये । (३) पीपिका १० १८.२५॥ १९..। घरति ४।४।८स्सिना परति शस्तिपाः। दमा परति दाधिका (२) 'बाता मा पातारे इन पत्रों में तृतीयात से परे ठम् प्रत्यय ली। सास्तिक 100 हाथोकरको पो जाता है। पापिन १०१॥ जोशी मारने पाता १२ १ ॥ संसृष्टे ४ । ४ । २२ दध्ना संसृष्टं दाधिकम् ॥ समप्टम् (मिचाया गया) रस पप में तृतीयारत से परे ठपण प्रत्यय सोपे । साधि मम् । १०।१८ । सही सेलो मिटाया गया। १२.२ ॥ उञ्छति ४ । ४ । २२ वदराएयुन्छति पादरिका । "उम को दुमता"म पब में रितीयान्त से परे ठप प्रत्यय जोवे । पादरिष 10LIोरी को महारे। १२ ॥ रघरि ४।४।१३ ममा रपति मामालिफ: (१) मा पर मारता ४ । (२) यहां पर पानु पो गति पोर मपर दीनी पापा लघुकौशाम् "रक्षा करता है" इस अर्थ में द्वितीयान्त से परे ठक् प्रत्यय होवे । छात्साजिकः १९६७ १ १०८५ । २५५ जो समाज का रक्षका को ।। १२० ४ ॥ शन्ददररोति ४ । ४ । ३४ शब्दहरोति धादिकाः। दर्दुरखरोति दार्दुरिक ॥ "करता है" इस पर्व में द्वितीयान्त शव्द वा 'टर्दुर' शटदों से परे ठया प्रत्यय होवे । शान्टिकः १०६७ { १०८५ । २५५ = जो जन्ट वारता है । दार्दुरिक. १०६० । १०८५ । २५५ - जो डडुश्री को करे (पइसी बारम) ॥ १२०५ ॥ धर्सचरति ४। ४ । ४१ धार्मिमाः ।। "धर्म को प्राचरण वारता है" इन अर्थ मे धर्म शब्द से परे ठक् प्रत्यय होवे।धार्मिक १०६०। १०८५ ! २५५ जो धर्म को श्राचाय करता है। १२०६ ॥ अधर्माच्दतिवन्तव्यम् । आधनिकाः ।। अधर्म शब्द मे भो ठक् प्रत्यय होवे ऐमा वा हना चाहिये । आधर्मिक (अधर्म चरसि) पापी ।। १२०७ ॥ शिल्पम् ४ । ४ । ५५ दशवादन गिल्पसभ्य माईनियाः ।। "एस का शिल्प" इस पर्थ में प्रथमान्त से परे ठक् प्रत्यय होवे । मार्द निमः १०६७ । १०८५ । २५५ - मृदन वजाने से जिस वा हस्त कुशल है । १२०८ ॥ प्रहरणम् ४ । ४ 1५७ असिः प्रहरगमभ्य बासिक धानुका । "इस का (१) प्रहरगा (आयुध)?" इस अर्थ में प्रथसान्त से परे ठम् प्रत्यय होवे ॥ पासिका' १०६७ । १०८५ । २५५ (राधारी) । धानुष्कः ११२७ (धनु, प्रहरणसभ्य) धनुषधारी॥ १२०८ ॥ शीलम् ४ । ४ १६१ | अपूप्रभक्षणं शीलमन्न्य आपूपिकः । "दस का स्वभाव है" इस अर्थ में प्रथमान्त से परे ठक् प्रत्यय होथे। आपूपिदक्ष १०६७ । १०८५ । २५५ - जिसका पूडे खाने का स्वभाव है। १२१० ॥ निकाटे वसति ४ । ४ । ७३ लेकटिको भिक्षुकः । ॥ इति ठगधिकार ॥ "निकट (ने.) यमता है" इस पर्व में सप्तम्यन्त निकट शटद से परे ठक् प्रत्यय होवे । नकटिका(निकटे वसति) १०६० । १०८५ । २५५ - भिचारी नो निकट बसे । ठक ११९६ प्रत्यय का अधिकार समाप्त इबा । (१) गिस करके सामने हैं। . ।
तरिता १२११ ॥ प्राग्घितायत् । ४ । ४ । ०५ । तस्मै शितमित्यत प्राग्य दधिक्रियते। इस सूत्र से सवर १२२ मूष पपन्त यत् प्रत्यय पा पधिकार है। १२१२॥ तातिरययुगप्रासाम् । ४ । ४।०६। रथं वाति रथ्यः । युग्यः । प्रासण्य ॥ 'हस को से वाता" रस पर्व में द्वितीयान्त रप युग और प्रासान मग्दा से परे यत् मत्य होवे। रम्प-नो रथ को रेबाने । युग्य' (युग पाति) २५५ को पो से थापे । पासाप जो (१)प्रासाको विजाये । १२१३ ॥ धुरोयको । ४ 1 8 109 1 धुयं । धौरेय ॥ पितीयान्त र पद से परे "इस तो रोजाता" रस पर्थ में 'यत् वाम् प्रत्यय चोरें । पूर्व पारियः १०१८ (पुर पाति)--खो पुरा को सेवाये। १२१४ नोपयोधर्मविषमखमलसोतातुशाभ्यस्तार्यतुल्यमाप्य पध्यानाम्यसमसमितसम्मितेषु । ४।४ । २१ मावा तार्यभाज्यं वजम् । पयसा सुण्यो वयस्य । धम्र्मेष प्राप्यं धर्म्यम्। विषेप वध्यः पिष्यः । मुखेम पानाम्यम्मश्यम् । मलेन समो मण्यः । सौतया समित सौल विचम् । तुलया सम्मिततुल्यम् । मो.वयम् मम विष मून मूत पीता और तुमा रल तृतीयान्त पाठ गन्दों से परेशम से तार्य (तरने योग्य) तुल्य (समान) प्राप्य (प्राप्त होने के योग्य) गम्य (मारने के योग्य) पनाम्य (मुबाने के योग्य) सम (समान) समित(समषिया गवा)पौर समित (तोमागा) लप में यत् प्रत्यय कोरे। या नाव्यम २८-येषो से पार होने के योग्य (ब) पमस्य-उमर करने को तुरव (मिथ) धम् ससा (धर्म पर प्राप्त होने के योग्य) विष्य' ॥ (पिष करके मारने योग्य) मूल्यम् २।५ (पद से गोमुखाने योग्य) मध्य मोड नगर बस्तु से वो समान से दाम (मीच) सीयम् सीता (असी पनीर) से बो अमित पा (n)। तुस्वम् - तबदी से तोबा गया (समान)। १२१५ तच साधु । ४ । ४१२८ । सामसु साधुस्सामभ्यः । - - पम्मएम पिररयः॥ (१) बी पाठ नपान बाादी माथे पर परी मारे।
सामन्य:- नधुवोमुखाम् २०५ "उस में निपुण है" इस अर्थ मे सप्तम्यन्त से परे यत् प्रत्यय होवे । सामवेद में जो निपुण हो । कर्मण्यः (कर्मसु साधुः) शरण्यः २५५ (शरणे साधुः) । १२१६ ॥ सभाया य 1818। १०५ । सस्य.॥ इति यतोऽवधिः॥ १२१५ सूप के अर्थ मे सभा शब्दसे परे 'य' प्रत्यय होवे। सभ्य' २५५ (सभायां साधु.)। {। यत् १२११ प्रत्यय का अधिकार समाप्त हुधा ।। १२१७॥ प्राक्क्रीताच्छः।५,१,१। तेन क्रौतमित्यत. प्राकछोऽधिक्रियते। यहा से १२२५ सूत्र पर्यन्त छ प्रत्यय का अधिकार है। १२१८॥ उगवादिभ्यो यत् । ५ । १ । २ । उवर्णान्तागवादिभ्य- श्च यत् । छस्यापवाद । शङ्कव्यं दारु गव्यम् उकारान्त से और गवादिओं से परे यत् प्रत्यय होवे । यह सूत्र, १२१७ सूत्र का पपवाट है। शझव्यम् (शङ्कवे हितम्) १०७२, २६ लकडी जो कीले की हितकारक (उस से कीला वनसके) हो । गव्यम् २८ (गवे हितम्) नो गौ के लिये हित कारक हो । १२१६ ॥ नाभिनभञ्च । नभ्योऽक्षः। नभ्यमञ्जनम् ॥ "नाभि" शब्द को नम आदेश और उस से परे १२२० सू०अर्थ में 'यत्' प्रत्यय होवे। नभ्यः २५५ = अक्ष (धुरी) रथ के पहिये की नाभि के केक में रहता है। (१) नभ्यम् २५५ (नाभये हितम्)-अन्जन (तैलाभ्यङ्ग)॥ १२२० ॥ तस्मै हितम् ।५ । ११५ । वत्सेभ्यो हितो वत्सीयो गोधुक् । तस्मै हितम् (उस के लिये हित) इस अर्थ में चतुर्थ्यन्त से परे छ प्रत्यय होवे । वत्सीयः १०८०, २५५ जो वछडेनों को दूध छोडे ऐसा गोधुक् (गौ चोने वाला) ।। १२२१॥ शरीरावयवाद्यत्।५।१।६ । दन्त्यम् । कण्ठयम् । नस्यम् । चतुर्थ्यन्त शरीर के अवयव वाचक शब्द से परे 'यत्' प्रत्यय होवे । दन्त्यम् २५५ ( दन्तेभ्यो हितम् ) जो दान्तों को हित हो । कण्ठयम् २५५ ( कण्ठाय हितम् ) गले को जो हित हो । नस्यम् (नासिकायै हितम् ) जो नाक के लिये हित कारक हो। १२२२ ॥ आत्मन् विश्वजनभोगोत्तरपदात्खः । ५ । १ । ८ ॥ आत्मन् शब्द से परे और विश्वनन शब्द से परे और भोग शब्द जिस का उत्तर पद हो उस से परे रख प्रत्यय हो। (१) यहा रथ की भाभि में ही ऐसा प्रयोग भाता है, शरीर की नाभि में तो (नाभ्यम्) १२२१ ऐसा होगा।
- - - afhar १२२३ ॥ पास्माध्वानी से । ६४ | १६६ । एती से प्रत्या स्त । पात्मने हितमात्मनीमम् । विश्वमनीनम् । मातृमोगीय ॥ इति छयतो पर्पोऽवधि । प प्रत्यय के परे पोते पात्मन् पोर पालन् म दो पदों का (१) मधतिमा। पारमनीनम् । ८ नो पपने लिये हितो। विश्वन नीनम् { ८ २५५ जो संसार भर से बना पो रित हो। मातभोगीप (मातृमीगाय पित) १८ २२५ माता के मरीर पे गिये स्तिकारको प्रत्यय और पत् प्रत्यय पो भवधि समाप्त पुर। १२२४ ॥ प्राग्वत्तेष्ठम् । ५ । १ । १८ । सेन तुष्यमित्यत प्राक् ठअधिक्रियत॥ यही से १९५५ सूत्र पयन्त ठन् प्रत्यय या पषिवार । १२२५ ॥ तेम कोतम् ।५।१। २७ । सप्तल्या मौत साप्ततितम् । प्रास्थिकम् । 'हम परयो खरीदा गया' म पर्थ में गतीति से परे टप् प्रत्यय गोवे। साप्ततिम् १५५१PL-सातर परयो भो मोड लियागया हो। मास्पियाम् (प्रस्बेनक्रीतम)। १२२६ ॥ तस्येश्वर 1५ । १ । ४२। सर्वममिपृथियोभ्यामपनी तः । पमुथसिकादीनाञ्च । सर्षममरीश्वरः सार्वभौमः । पार्थिव । "चम का पर' नस पम में पप्ठभन्त सर्पभूमि पर प्रपिषी म दो पदों से परे प्रम से पर भोर पम् प्रत्यय गो। ११० से पूर्व चौर छत्तर पद पो हवि कानी । सामोम' ५५५-मारी थी का पति । पाविप'११ २॥ (एपिम्पारपर)-राया। १२२० ॥ पद्धिविंशतिपिंगच्चत्वारिंशत्पञ्चायस्पष्टिसप्तस्य गौतिमवतियतम् । ५ । ११५८ । एते हठयम्दा मिपास्यन्ते। (२) पति (ar) गिति (बीस) पिंगत् (तीस) चत्वारिंगत् (चालीम) पम्चामत् (1) मे रेसेपीरी पर्मात् ८० पूर्व पेरिया पोप गणे॥ (२) यो 'पन्च पदानि परिमापमस्य" ऐसे विधायन्नन्सदको टिकाबोप पोर ति प्रत्यय पुन (गे) से गुप्त करने में पल ऐसा दम मिामोतारण या पप भी बन्दोभियेपरेमा वाणिवाकार का मतरत ने पापिया पर या पण पार ऐसे पोर्ग योगिय पर्थ तो है। परन्तु जब इनको पनि मद माना ती पति मम्द दा मगपा का मापक भी एपा। ।
। लघुकोनुमान २०१ (पच्चास) षष्टि (साठ) सप्तति (सत्तर) अशीति (मस्सी) नपति (नब्वे) और शत (सी) ये रूढ शब्द निपात से सिद्ध होते हैं। १२२८॥ तदईति । ५ । १ । ६३ । श्वेतच्छचसहति वैतच्छत्रिक ॥ हितीयान्त से परे "तदईति" तिस के योग्य है उस अर्थ में ठम् प्रत्यय होवे । श्वैत- छविनः १०६३, १०९५, २५५ जो गुहा च्छन के योग्य हो। १२२६॥ दर डादिभ्यो यः।५।१।६६ । एभ्यो यः। दाडमहति दरडयः । श्रव्यः । वध्यः॥ १२२८ सूत्र के अर्थ में दण्डादियों से परे 'यत्' प्रत्यय होवे । दएडयः २५५ जो दण्ड को योग्य हो । अर्घ्यः २५५(अर्घमर्हति) = पून्य।वध्यः २५५ (वधमईति)नो मारने योग्य हो। १२३० ॥ तेन निवृत्तम् । ५ | ११७६ । बङ्गा निवृत्तमाह्निकम् ॥ ॥ इति ओवधिः॥ "उस धारको निष्यन्त हुआ" इस अर्थ में तृतीयान्त से परे ठञ् मत्यय होवे । (१) माडिकम् - १०६३,१०८५,२६८-जो दिन करके निष्पन्म हुआ। ।। ठ १२२४ प्रत्यय की अवधि समाप्तहुई ।। १२३१॥ तेन तुल्यं निया चेहतिः५। १ । ११५ ब्राह्मणेन तुल्यं ब्राह्मण- वदधीते । क्रिया चेत् किम् । गुगतुल्ये माभूत् । पुत्रेण तुल्यः स्थूलः । "उस करके तुलना किया गया" इस अर्थ में तृतीयान्त से परे "वति" प्रत्यय होवे । परन्तु निस धर्म से तुलना करे वह क्रिया हो तब । ब्राह्मणवत् ३८२ अधीते (वह बानग्य के तुल्य पढता है) इस सूच मे "किया चेत्” यह क्यों कहा? उत्तर देताहै "पुत्रेण तुल्यः स्थूलः" (पुष के तुल्य मोटा है) यहां गुण तुल्यता में पुत्र शब्द से वति प्रत्यय न हो जाये। १२३२।। तब तस्येव । ५। १ । ११६ । मथुरायामिव मथुरावत् खुध्ने प्राकार । चैत्रस्येव चैत्रवन् मैत्रस्य गाव. ॥ "उस में सदृष्य वा "उस के सदृश" इन अथा में सप्तस्यन्त और षष्ठयन्त शब्दों से परे वति प्रत्यय होवे। मथुरावत् = मथुरा मे जैसा कोट वैसा मुघ्न देश का कोट । चैत्रवत् = चैत्र बी सी मैत्र की गाए ॥ (१)यहां 'अगष्टमोरेव' इस नियम से ८७२ सूच से टि का लोप नही होला ।
तषिता १२२३ । तस्य भावस्पतली ।५।१।११८ प्रकृतिघन्यवोध प्रकारी भावः । गोर्भावो गोल्पम् । स्यान्तं मीयम् । उसका भाप रस पप में पष्ठपन्त से परे 'स्व' मा प्रत्यय वि । (१) प्रति जन्य वोध में प्रकार (विशेष रूप से प्रतीयमान) को माप पाते। 'गोल्पम् -गी पा जो धर्म स्व मिस से पम्त में हो यामपुंसक विजोता है। १२२४ ॥ पा च स्वात् ।५।१। १२. । अनपरस्य इत्यता प्राक् त्यतशावधिक्रियेते। पपवाद। सह समावेशार्थमिदम् । चकारी नमस्मभ्यामपि समावेगाः। सिया भावस्पैषम् । पौत्वम् । बीता। पौंस्मम् । पुंस्त्वम् । पुंस्ता । 'बामरस्य समूत्र के पूर्व व पीर तर प्रत्यय पा पधिकार। 'भपवादों पे सावन प्रत्ययों का ध्यपहार हो इस लिये या मूब दिया नया नम् पौर नाम् १. वे साथ समादेय पिये सूत्र में चार पदाचिम्, चीत्वम् पीता (पीपा धर्म) पोस्नम् पुंसवम् पुंस्ता (पुरुष या धर्म) ।। १९३५ ॥ पृष्वादिभ्य पूममिन्या । ५ । ११ १२२ । वावचनम पादिसमावणार्धम् ॥ पष्ठमन्त पशु पादिमम्दों से परे पिसप पर 'मनि' प्रत्यय जोवे । पूर्व में पापा पार पम्पादियों को समापेमको सिये. १२३६ ॥ र तोइबादेषो । ६ | 8 | १५१ प्ठेमेयस्सुम ष्ठन् मन् पोर यस् रन प्रत्ययों से परे होते सादिया वीज इसकी रपादेग॥ १२३० ॥ टे।।३।४।१५५ । टेखोप पूष्ठेमेयस्सु। पृयुमदुमणक्षमत परिवठामामेवरत्वम्। पृषोर्मावः प्रधिमा । पाथवम् । मदिमा। माईवम् ।। रष्ठन्पा 'मिनिम् पवा 'यमुन् प्रत्यय बम परे से तबाटिका चोपगोवे । पपु पद मृग धम र परिम, (मम्) पनी मन्दीबार को २५ पादन सोपे। प्रविमा १२ १२५० (पा) पापम् १ सयामाव(पगा)। मदिमा (पा) मादवम् -पदु (पोमस) या माम-पोमसता । () मति (गो सम्प) में मोरे बोध होने में पिपरम्प से प्रतीयमान मोत्यमको माप पाते।
. लघुकौमुद्याम् १२३८॥ वर्णदृढादिभ्यः ष्यञ् च । ५ । १ ११२३। सादिममिच् । शौक्ल्यम् । शुक्किमा। दार्टयम् । द्रढिमा ॥ वर्ण (रङ्ग) बाचक और दृढ श्रादि षष्ठ्यन्त शब्दों से परे भाव अर्थ में ध्य प्रत्यय होवे चकार से इमनिच् भी होवे । शौलयम् १०६३ १ २५५ (शुक्तस्य भाषः) 'मा' शुक्रिमा (चिटयाई) । दाढयम् (वा) ढिमा (दृढस्य भावः) दृढता ॥ १२३६ ॥ गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च । ५। १ । १२४ । चानावे । जडस्य भावः कर्म वा जाड्यम् । मौढयम् । ब्राह्मण्यम् ॥ प्राकृतिगणोऽयम् ॥ गुणवाचक षष्ठयन्त शब्द से परे और ब्राह्मणादि षष्ठयन्त शब्दों से परे 'व्यम्' प्रत्यय होवे, क्रिया और भाव अर्घ से । जाड्यम् १०६३ । २५५ वा मौट्यम् (मूढस्य कर्म भावो वा)- मूर्खता वा सूर्ख का कर्म । ब्राह्मण्यम् (ब्राह्मय का भाव वा प्राचार) ॥ ॥ यह ब्राह्मणादिगण प्राकृतिगण है ॥ १२४० ॥ सख्युर्यः । ५ । १ । १२६ । सख्यम् ।। भाव और क्रिया अर्थ में षष्ठ्यन्त सखि शब्द से परे य प्रत्यय हो । सत्यम् २५५ (सख्युर्भावः कर्म) वा मैत्री॥ १२४१ ॥ कपिजात्योर्टक् ।५ । १ । १२७ । कापेयम् । ज्ञातेयम् ॥ भाव और क्रिया अर्थ में षष्ठयन्त कपि और जाति शब्द से परे ढक् प्रत्यय होवे । कापेयम् १०८० । १०६७ । २५५ (कापेर्भाव' कर्म वा) कपि (बानर) का भाव वा प्राचार । नातेयम् १०८० । २५५ जाति का आचार वा भाव ॥ १२४२ ॥ पत्यन्तपुरोहितादिस्यो यक् । ५ । १ । १२८ । सैनाप- त्यम् । पौरोहित्यम् ॥ इति ननजीरधिकारः ॥ भाव वा क्रिया अर्थ मे षष्ठयन्त पत्यन्त और पुरोहितादि शब्दों से परे या प्रत्क्य होवे। सैनापत्यम् (सेनापतेर्भाव) १०६७ । २५५ । पौरोहित्यम् १०६७ । २५५ (पुरोहितस्य भावः कर्म वा) पुरोहित का भाव वा कर्म ॥ ॥ नम् और स्नन् प्रत्यय का अधिकार समाप्त हुआ । १२४३ ॥ धान्यानाम्भवने क्षेचे खञ् । ५ । २।१ । मुगानाम्भवनं क्षेचम्मौद्दीनम् ॥ धान्य जिस में उत्पन्न हो ऐसा खेत नववाच्य हो तब षष्ठयन्त धान्यार्थक शब्द से परे खञ् प्रत्यय होवे । मौहीनम् १०८०,१०६३,२५५ खेत जिस में मुगी उपम्ग हो। । .
तषिता १२४४ ॥ श्रीशियाक्योठक् । ५ ।२।२1 मेयम् । शालेयम् । १२४५ सूत्र के पर्व में प्रीपि पीरशाहिरन पष्ठभात मग्दों से परे उपप्रत्ययहोवे। मीयम् १ १०।२५ यासेयम् ॥ (गासीना भवन रेषम्) पानवी पत्तिया बो पता १२४५ ॥ जयनवीनं संज्ञायाम् ५ 1 २ । २३ नवनीते निपातितोऽयम्। (१) 'याणीनम्" (मएन) या पद संभ्रा में नियात से सिद्ध होता। १२४६ तदस्य सजातन्सारकादिभ्य इतम् । ५ । २ । ३।। तारकास्सवाता पस्य तारकितम्नभ । परिडत । पाकृतिगणोऽयम् । 'पारसको अत्पन्न दुपा" इस पर्व में प्रथमास्त तारकादि पदों से परे रत प्रत्यय होवे । तारवितम् २५ (पावास)। परिस २५ (पए संबाताऽस्य) सत् पोर पसत् में पान वासी बुधि तो परम पाते हैं या स्पन्न हुई विसको। या हारकादिमपपासतिगपरे॥ १२४० ॥ प्रमाणे इयसन्दष्मज्माषच ।५ । २।३०। जद प्रमा एमस्य अरुण्यसम् । बरुदनम् । अरुमाघम् ॥ 'ममात्र पर्व में प्रथमान्त से परे इयमच 'दमच पा 'मावन् प्रत्यय हो । जगायनम् (पा) जहटनम् (बा) नरमात्रम् -बाप मितना ॥ १२४८ ॥ यत्तदेतेम्य परिमाणे वतुम् । ५ । २ । ३८ । यत् परि मासमस्य यावान् । तावान् । एतावाम् ॥ मयमान्त यत् तत् पौर पतर् इन गम्दों से परे पतुप् प्रत्यय होवे परिमाच पर्व में। यावान् २०१-वितमा । तावान् २०१-हतमा । एतावान् ०१-इतना ।। १२४८ ॥ संख्याया पवयवे तयप् । ५ । २ । ४२ । पञ्चावया पम्य पञ्चतयम् ॥ संख्यावाचन प्रथमान्त पम्द से परे तयप् प्रत्यय होपे प्रयव पथ में। पम्वतयम् ॥ विमो पानपवयव सोवें। १२५ • ॥ पिचिभ्यान्तयस्यायन्या ।। ६।४३ । इयम् । श्तियम् । पयम् । चितयम्। हिपौर पिरन से परे तय हो श्य विधात्य हरण हो । इयम् २१५ गास्तिमम् (२) मोगोरोषस्य पिकार ।
॥ लधुकौमुद्याम् (झाववयवावस्य) =जोडा । भयम् २५५ वा त्रितयम् । (अयोऽवयवा अस्य) तीन निस के अवयव हों। १२५१ ॥ उभादुदात्तो नित्यम् । ५ । २।४४ । उभयम् उभ शब्द से परे तयप को नित्य ही उदात्त अयच् होवे । उसयम् २५५ जोडा ।। १२५२ ॥ तस्य पूरणे डट् । ५ । २।४८ । एकादशानाम्पूरण एकादशः }} "उस के पूरण करने वाला" इस अर्थ में प्रथमान्त से परे षट् प्रत्यय होवे । एका दशः २७३ ग्यारवां। १२५३ ॥ नान्तादसंख्यादेमट् । ५ । २ । ४६ | मडागमः । प- ञ्चानां पूरण पञ्चस । नान्तात् किम् । विंश. ॥ जिस नकारान्त सख्यावाचक शब्द के आदि से कोई सख्यावाचक नहीं है उस से परे डट को मट का पागम होवे । पञ्चमः १८४ पांचवां । यहा "नान्तात्" यह पद क्यों कहा ? उत्तर देता है "विशः" १२५४ यहा मट् न हो जावे ॥ १२५४ ॥ तिविंशतेर्छिति। ६ । ४ । १४२ । विशर्मस्व तिशब्दस्य लोगो डिति परे । विंशः । असंख्यादेः किम् । एकादशः !! डित् प्रत्यय पर हो तो भ सज्ञावाले विशति शब्द के अवयव "ति" का लोप होवे । विशः १२५२ (विशतेः पूरणः) वीसवां । १२५३ में "असख्यादे." यह पद क्यों कहा? उत्तर देता है। एकादशः १२५२ यहां डट् को मट न हो जाये । १२५५ ॥ षट्कतिकतिपयचतुरां थुक्।५ । २ । ५१ । डटि । षणां परण. षष्ठ. । कतिथः। कतिपयशब्दस्यात एव डट। कतिपयथ । चतुर्थः । षट्, कति, कतिपय, और चतुर, इन शब्दों को डट के परे होते थुक् का प्रागम होवे । षष्ठः ७५ छठा । कतिथः (कितनी की सख्या का पूरक) । कतिपय शब्द से परे (१) इसी लिये डट १२५२ प्रत्यय भी हुा । कतिपयथः = कितने एकों की संख्या का पूरक। चतुर्थ. (चतुणी संख्या पूरक.) १२५६ ॥ देस्तोय ५। २ । ५४ डटोऽपवाद । यो पूरणो द्वितीयः । षष्ठ्यन्त हि शब्द से परे पूरण गर्थ में तीय प्रत्यय होवे, यह डट् का अपवाद है। हितीय. (दूसरा)" ? - (१) कतिपय शब्द सख्यावाचक नहीं है, इस कारण १२५२ सूत्र की प्राप्ति नहीं है, परंतु १२५५ सूच से इस को थुक् विधान किया है, और धुक् का उट् निमित्त है विना डट् से थुक् का पाना असभव हे तो इस थुक् के विधान के लिये कतिपय शब्द से भी उद धुआ। ।
तद्धिता
१२५० । सम्प्रसारमठध । ५ । २१५५ । तृतीयः ।
वि सम्पको सम्मसारप पर तीय प्रत्यय भोपे पूरष पर्ष में । तृतीय (पयाची
पूरल)-तीसरा
१२५८ ॥ योपियंरक्षम्दोऽधीते।५।२।८४ । श्रोधिय विस्वनुष्ट
श्शन्दस ।
“वेद पडतास पर्व में "घोषियन्' यानिपात से सिधोता। (१) बोषिय'
बन्दोऽधीते (को पेद पदे) यहाँ मा की पनुत्ति से दूसरे पच में "शन्द" १५ (र
पाठी) ऐसा रूप भी होता।
१२५८ ॥ पूर्वादिनि 1 ५ । २।८।। पूर्व जातमनेन पर्छ ।
"मनेनइस पसे पर पता विवक्षित हो तब प्रथमान्त पूर्व मन्द से परे पनि
मत्यय पोये । पूर्वी २५ पुन पूर्विन् मम्द से प्रममा के एक वचन में 2014u
लसे पूर्वी । मना-जिसने परिवाना ।।
१२६ • ॥ सपर्वाच । ५ । २।८० । सतपर्वी ।
विधमान से पूर्वपद मिपये ऐसे पूर्वयम्द से परे भी शनि मस्मय शेष। बतपूर्वी-
बिपने पूर्व पाय में पिया ।।
१९५१ । पूष्टादिभ्यरच।५।२।८८ष्टममेन पूष्टी पधीती।
सप्टादियों से परे पनि प्रत्यय हो। रो-बिस ने रवि (य) किया । भीती
(पपीतमनेन) मिसने पदा।
१२६२ ॥ तदस्यास्स्यस्मिम्मिति मतुम् । ५ । २ । ८४ । गागी
ऽस्यास्मिम् पा सम्ति गोमान् ॥
'हप का 'या' सम में पारस पर्व में प्रबमानत से परे मतुप् प्रत्यय रोये ।
गोमान-मीषा पासा
१२६३ । तसो मत्यर्थे । १। ४ । १८ । ताम्तसाम्ती मसची स्तो
मत्वमें प्रत्यये । सम्प्रसारणम् । विदुष्माम् ।
मतुप १९६१२ अर्थ में कोई प्रत्यय परे रोतवन (स) पन्तम दिन
परम भाषा पुन १० मे मम्ममारपपा (पिदुमान् ।
(१) यह योषियन् बान (नबार) र (३) या गिलास पायारिमारित
पेपेरियामेन नि ऐसा रे पपीता
२१३ - लघुकौमुददाम् १२६४ ॥ गुणवचनेभ्यो मतुपो लुगिष्टः । शुक्लो गुणोऽस्यास्तीति शुलीः पटः । कृष्णः॥ पतञ्जलि महाराज को गुणवाचक शब्दों से परे मतुम् का लुक् इष्ट है । मुक्तः पटः (चिट्टा कपडा), कृष्णः (कालः) । १२६५ ॥ प्राणिस्थादातो लनन्यतरस्याम् ।५ । २।८६ । चूडालः। चूडावान् । प्राणिस्थात् किम् । शिखावान् दीपः । प्राण्यङ्गादेव । नेह । मेधावान् ॥ प्राणी में नित्य सम्बन्ध से रहगे वाले पदार्थ के वाचक श्राकारान्त शब्द से परे विकल्प करके लच् प्रत्यय होवे, मतुप के अर्थ में। चूडालः वा चूडावान् १२६२ (चूडा- ऽस्यास्ति) चूडा जिस को होवे। यहा "प्राणिस्थात्" यह क्यों कहा? उत्तर देता है "शिखा- वान् दीपः" यहां दीप प्राणी नहीं इस लिये यहा पक्ष में लच् न हो जावे । “यह लच् प्राणी के अङ्ग से परे ही होवे' इस लिये "मेधावान् यहां पक्ष में लच् न हुमा । १२६६ ॥ लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः शनेलचः ५। २ । १०० लोमादिभ्य. शः । लोमशः । लोमवान् । पामादिभ्यो नः । पामनः । लोमादि, पामादि, और पिच्छादि शब्दों से परे क्रम से श, न, और इलच् प्रत्यय होवें। लोमन् श्रादि से परेश हो, उदा० लोमशः १८४ (वा) लोमवान् १२६२ जिस के शरीर पर बहुत बाल हो । पामन् आदिकों से परे न प्रत्यय हो। उदा. पामनः खुरक वाला ।। १२६७ ॥ अङ्गात् कल्याणे । अङ्गना ॥ कल्याण अर्थ में अङ्ग शब्द से परे 'न' प्रत्यय होये । अङ्गना १३३५ । (कल्याणानि अप्रानि यस्याः)= जिस के अङ्ग कल्याण वाले हों। १२६८ ॥ लक्ष्म्या अच्च । लक्ष्मण. । पिच्छादिभ्य दूलच् । पि- च्छिल. । पिच्छवान् ॥ लक्ष्मी शटद को प्रकार और न प्रत्यय हों। लक्ष्मणः (कल्याण चिन्ह वाला)- पिच्छ आदिकों से परे इलच् प्रत्यय हो। उदा. पिछिल' वा पिछवान् १२६२ दहीं। १२६६ ॥ दन्त उन्नत उरच ५।२११०६ उन्नता दन्ता भस्य दन्तुरः॥ उचे अर्थ में प्रथमान्त दन्त शब्द से परेउरच् प्रत्यय होवे। दन्तुरः-उचे दान्तों वाला। १२७० ॥ केशाहोऽन्यतरस्याम् ५। २! १०६ । केशवः। केशवान्। । 1 २१४ 1 तषिता प्रथमान्त क्षेय मम्द से परे शिकरप करके व प्रत्ययमिक (कमा समयाय) 'या यशान १२४१-मी यो पासा १२०१॥ अन्येभ्योऽपि हरयते । मणिवः । पन्य (पौर) गम्दी से परे भी ' प्रत्यय दोष परतारे।मनिषा-(मपिरस्यास्ति) मा। १२०२० पर्यसो खोपश्च । पषव । परम् गम्द से परे व प्रत्यय हो । पौर के का होप गरोदे । पचप' (पर्योऽस्स्यस्य) (सागर)। १२०३ ॥ पत इनिठमी । ५ । २ । ११५ । दरडी। दरिटन्न । १९५२ सूत्र पे पम में पवारान्त गम्दी पे परे पनि पा ठम् प्रत्ययो । दरणी () दणि १५ (दारी स्यास्ति) दरगा। १२७४ ॥ ब्रीधादिभ्यश्च । ५ । २ । ११६ । नौही। ग्रीहिक । मोरि पाटि गादी से पो नि (या) ठन् प्रत्यय ये । गोही (आ) मीडिय- (पीरिरस्थास्मिन्पारित) पिस में वापसोn १२०५ ॥ पस्मायामेधासजो विनि । ५ । २ । १२१ । वयस्थी । मायाषी । मेधावी । सग्यो । पम् मिस पन्त में पद से परेपौर माया मेभा पोर मन इन पदों में परे 'विमि" प्रत्यय रोवे । यामी (यमोऽस्यास्ति) । मायापो-रसिया (मापास्यास्ति)। मेषापी (मेपास्वास्ति)। परिमापानी (सगास्पारित) बिट माता। १२०६ ॥ पापो मिनि 1५1१।१२४ । वाग्मी । पाप मद से परे ग्मिनि' प्रत्ययो । बाग्मी (प्रयस्ता पागस्य) प्रपरत पानी पाया। १२७७ ॥ पयपादिभ्यो ऽन् । ५ । २ । १२०। पशस । पाकृति गणोऽयम् ॥ इति मत्वर्षीया ।। पर्यम् पादिपी मे परे मनु ने पर्ष में 'पा प्रत्ययो । पर्यस' -भर्म (बमासीर) रोग वासा । यह पर्गर पारिगर पाबतिमय है। मनुप् १९५९२ प बारे प्रत्यम धमाप्त हुए । १२७८ प्राग्दिगो विमछि.। ५।३।१। दिक्यम्देश्य रायत प्राग्यश्यमाचा प्रत्यया विभतिसंघा स्यु ॥ पा से "दिन सम्म मूष पर्यत बितने प्रत्यय २ पिमणि पंचाया।
२१५ लघुकीमुद्याम् ॥अथ स्वार्थिकाः॥ ॥अब स्वार्थिक प्रत्ययों का वर्णन किया जाता है। १२७६ ॥ किंसर्वनामबहुभ्योऽयादिभ्यः । ५। ३ । २ । किमः सर्वनाम्नो बहुशब्दाच्चेति प्राग्दिशोऽधिक्रियते ॥ किम्, सर्वनाम, और वहु, इन से परे विभक्ति सजक १२०८ प्रत्यय होवें । परन्तु जिन सर्वनाम सनक शब्दों के आदि में वि शब्द है उन से परे नही होवें । इस. मूत्र का "दिक् शब्देभ्यः” इस सूत्र के पूर्व पर्यन्त अधिकार ई ॥ १२८०॥ पञ्चम्यास्तसिल । ५। ३ । ७ । पञ्चम्यन्तेभ्यः किमा- दिभ्यस्तसिल वा स्यात् ॥ पञ्चम्यन्त किमादि शब्दों से परे तसिल प्रत्यय विकल्प करके होवे ॥ १२८१ ॥ कु तिहोः । ७ । २ । १०४ । किमः कुस्तादौ हादी च विक्षती । कुतः कस्मात्॥ तकार है आदि में जिस के और इकार है आदि में निस के ऐसा विभक्ति सम्भक १२७८ प्रत्यय परे हो तो किम् शब्द को कु आदेश होवे । कुतः १२८० (वा) कस्मात् कहा से। १२८२ ॥ इदम इश् । ५ । ३।३। प्राग्दिशीये । इतः ॥ प्राग्दिशीय प्रत्यय के परे होते इदम् को इश् होवे । इत' १२८० (अस्मात्) ।। १२८३ ॥ एतदोऽन् । ५ । ३ । ५ । प्राग्दिशीये। अनेकालत्वात् सर्वादेश । अतः । अमुतः। यत.। ततः । बहुतः। व्यादेस्तु । हाभ्याम्॥ प्राग्दिशीय प्रत्यय के परे होते एतद् शब्द को अन् होवे । अन् अनेकाल लिये सारे एतद को हुआ । अत' १२८० । अमुतः १२८० । यतः १०८० । तत' १२८० । बहुतः १२८० - बहुतों से । धि आदि सर्व नाम का तो "हाभ्याम्" ऐसा ही रूप होता है । १२८४ ॥ पर्यभिभ्याञ्च । ५ । ३ । ६ । तसिल। परितः सर्वत इत्यर्थ । अभितः उभयत इत्यर्थः ॥ परि और अभि से परे तसिल् प्रत्यय होवे । परितः (चारों ओर से) पभितः (दोनो ओर से)॥ १२८५ ॥ सप्तम्यास्त्रल् । ५ । ३ । १० । कुत्र । यत्र । बहुच ॥ । इस .
।
तषिता
मणम्पम्त लिम् भादि १२०० से परे पम् प्रत्यय विकरप पर रे पुष (मस्मिन्)
१२८१ कहां पर १०(यस्मिन्) वाया (प) बदुती में।
१२८ ॥ इदमीए ।५।३।११। पक्षोऽपवादः।।
सप्तम्यम्त दम् मम्द से परे । प्रत्यय विकल्प करणे रोवे । यापन या
पपवाद १२२ या
१२८० ॥ विमोऽत् । ५ । ३ । १२ वा स्यात् ।।
किम् माद से परे पत् मत्यय विक्षस्प पर सोधे ।
१२८८ ॥ पवाति। 01२।१.५ । किमः । षय । कुध ।
अत् प्रत्यय के परे होते बिम् वो भव पादेमसोवे।श्व २५ (पा) पुष १२२ १२५
(बस्मिन्) यहाँ
१९८८ ॥ पूसराभ्योऽपिश्यते ।५ । ३११४ । पम्पमौसप्तमी
तरविभक्तमन्तादपि तसिखादयो हरयसे । इमिग्रमा भवदादियोग
एव । स भवान् । ततोभवान्। तत्रभवान्। ततोभवम्तम् । तबमवरतम।
एवं दीर्घायु । देवानां प्रियः । भायुष्मान् ॥
पन्चमी पौर सपामी मरे पम्य विमतिपत में बिना परमी
तसिए पादि प्रत्यय दीप पढ़ते हैं। इस पूष में हमि पद पे पार से 'भवत् पारिभदो
के योग में ये प्रत्यय रोते रे। प्रथमान्त से प्रेसेस भवान् (वा) ततो मवान् (को भाप)
तर मान्-पूग्य पाप। रितीयास्त से पैसे ततो भवन्तम्-सोबो पाप तिएको। तर
भवन्तम् (पूम्म बो भाप तिस पो) ऐसे की दीर्घायुः पौर देपानामियः प्रायुम्मान
हम योग में भी तसिवादि प्रत्यय ते॥
१२९ ॥ सर्वेशाम्यर्षियत दः पायेदा । ५ । ।। १५ । समान
गतेभ्यः काक्षायें दा स्वात् ।।
पाचार्य में " एक पन्य पिम् यद तद बन पाम्यन्त मम्दी से परे दा
मस्यय वि।।
१२९५॥ सर्वस्य सोऽम्यतरस्यां दि । ५ । ३।६ । दादी माग्दि
गोये सर्वस्य सो पा। सर्वस्मिन् काखे सदा । सर्वदा। अन्यदा। पदा।
यदा । तदा । बाये पिम् । सर्वच देणे॥
।
- लघुकीमुद्याम् द है आदि में जिसके ऐसे प्राग्दिपीय प्रत्यय को परे होते सर्व शरद को स प्रादेश विकल्प करके होवे । सेदा (वा) सर्वदा "सर्वस्मिन् काले" एकदा (एक समय) अन्यदा (अन्यस्मिन्काले) कदा (कस्मिन् काले) यदा (यस्मिन् काले) तदा (तस्मिन्काले) तव । १२८० सूत्र में "काले" यद क्यों कहा १ उत्तर देता है "सर्वत्र देणे" यहा देश की प्रतीति के होने पर 'दा' न हो जावे ॥ १२६२ ॥ इदमोहि ल । ५ । ३ । १६ । सप्तम्यन्तात् ॥ सप्तम्यन्त इदम् शष्ट से परे हिल् प्रत्यय होवे ॥ १२६३ ॥ एतेती रथो ५।३ । ४ इदम एत इत् एतौ स्तो रेफादी थकारादौ च प्राग्दिशीये परे। अस्मिन् काले एतहि । काले किम् ।। इह देशे॥ रकार है प्रादि में जिन के (वा) यकार है यादि से निस के ऐमें प्राग्दिशीय प्रत्यय के परे होते कालार्थ में वर्तमान और सप्तम्यन्त इदम् पशब्द को छत, वा इत् होवें। एसई इस काल मे । वहा "काले" क्यों कहा ' उत्तर देता है, "इह देशे" यहां देशार्थ में वर्त- मान होने पर १२८३ सूत्र की प्राप्ति न हो जावे ।। १२६४ ॥ अनद्यतने हि खन्यतरस्याम् !५। ३।२१। काहि । कदा । यहि । यदा तर्हि । तदा ॥ अनद्यतन ४१७ काल मे "हिल्” प्रत्यय विकल्प करके होये । कहिं २८२ वा कदा ( क्स्मिन्कान्ले ) कत्र । यईि वा यदा २०७ (यस्मिन्कान्ले) जव । तईि २०३ या नदा । "तस्मिन्काले" (तब)॥ १२८५ ॥ एतदः।५।३ । ५ । एत इत् एतौ स्तो रेफादो घादी च प्राग्दिशीये । एतस्मिन् काले । एतहि । रेफादि वा घादि प्राग्दिशीय प्रत्यय परे हो तो, एतद् शाद को एत (वा) इत् पादेश होये । पतईि-इस काल में । १२६६ ॥ प्रकारवचने याल । ५ । ३ । २३ । प्रकारहत्तिभ्यः किमा. दिभ्यस्थाल । तेन प्रकारेण तथा ॥ "प्रकार" पर्य में किमादि १२०८ शब्दों से परे "घान्" प्रत्यय हो । सया २०१ सिस प्रकार से॥ १२६७ ॥ इदमम्थमः । ५। ३ । २४ ! थालोऽपवादः ।। :- , तपिता पदम् मद में परे पम् प्रत्यय होये । या वाद वा पपवाद ॥ १२८८ ॥ एतदोऽपि पाभ्यः। पनेम एतेन प्रकारेप वा इत्यम् । गतोयानत पतद से परे भी बमु प्रत्यय होये ऐसा करना चाहिये । यम् (१) (रम् +यम) १९८५।। १२८८ । किमरप । ५ । ३ । २५ । केन प्रकारेच कायम् ।। ॥ इति प्राग्दिशीवा || निम् मार से परे भी 'चमु' प्रत्यय होये। वयम् २८५-विरा प्रकार से। । माग्दियीय समाप्त हुए। १३.. ॥ पतियायमे तमषिष्ठनौ । ५ । ३ । ५५ । पतिमयवि पिण्टापत्ते स्थाय एती स्तः । भयमेषामतिमयेनादम पाठभतमः । खघुतम । अधिष्ठ । पतियम विशिष्ट (पाटा)कोप उस में समान की प्रामात माद उस से परे स्पार्च में तमप् पोर ठन् प्रत्यय रोवें। पालभतमः -सब से बड़ा पनी । सयुतम' (पा) अधिष्ठ १२५० (पतिमयेन सघु) सब से सवा || १२.१॥ तिरच 1५1१५६॥ तिस्तादतिशये पोत्ये तमप्स्यात् ॥ पतिमय पर्व प्रकाश परने पर तिनत से परे तमप् प्रत्यय ये ॥ १३ २॥ तरफ्तमपी धः । १।१।२२ ॥ तरप पीर तमप् मत्पदव सेना पाते हो । १९.६ किमेपिस्व्ययपादाम्बद्रम्यमवर्षे ।। ४ । ११ । धिम पदम्तात् तिरोऽग्मयाच योपस्तदन्तादामुः स्याग्न तु द्रभ्यप्रवर्षे । विरतमाम्। पचतितमाम्।उस्तमाम्।ट्रव्यमवर्षे तु। सस्तमस्तक बिम् एमाराम्स, निरन्त और समय ल से परेको छ १५ २ मा प्रत्यय पर (च) अन्त में बिस केस से परे पामु (पाम) प्रत्यय रोवे परन्तु अप्य वर्ष को प्रबास बरने में नये । बिन्तमाम् () सामवर्ष परो । पचति तमाम- पति (१) पतद मरवा मी 'सत्यम् ऐसा पती होतारे बीवि (एलए+यम) १९८५-(रत् + पमु)-त्पम् - TV प्रसार से। (२) मदारी में विमी जिया का प्रयाहार परना। "पितमाम् में पति का। पौर (तमाम्) में 'पदति बा।
सधुकोमुखाम् २१६ भय करके पकाता है । उच्चस्तमाम् । द्रव्य के अतिशय में तो "उच्चस्तम" सरः (बश- स्रो पत्यन्त जचा हो। १३०४ ॥ दिवचनविभन्योपपदे सरबीयसुनौ । ५ । ३। ५७ । योरेकस्यातिशये विभक्तव्ये चोपपदे सुप्तिङन्तादेतौ स्तः । पूर्वयोर- पवादः। अयमनयोरतिशयेन लघुर्लधुतरः लघीयान्। उदीच्यः प्राच्येभ्यः पटुतराः । पटीयांसः। "जब दिवचनान्त वा विभय (विभाग के योग्य ) उपपद रहें, तब दो में से एक (१) के अतिशय में 'सुबन्त' और 'तिङन्त' से परे तरप् और ईयसुन् प्रत्यय होवें। यह सूत्र पूर्व ले दो सूत्रों का अपवाद है। लघुतरः (वा) लघीयान् १२३७ इन दो में से यह बडा होला है। पटुतराः (वा) पटीयांसः उदीच्य प्राच्यों से बड़े पण्डित होते हैं ।। १३०५ ॥ प्रशस्यस्य श्रः । ५।३।६० । इष्ठेयसीः परतः ॥ प्रशस्य शब्द को 'न' प्रादेश होवे, जब इछठन् वा इयसुन् प्रत्यय परे हो तब ।। १३०६ ॥ प्रकृत्येकाच् । ६ । ४ । १६३ । इष्ठादावेकाच् प्रत्या स्यात् । श्रेष्ठः। श्रेयान् ॥ इष्ठन् वा ईयमुन् परे ही तो एक स्वर वाला प्रकृतिभाष को प्राप्त हो । येष्ठः (वा) श्रेयान् (अतिशयेन प्रथस्यः) । १३०७ज्य च। ५१३१६१ प्रशस्यस्य ज्यादेश इष्ठेयसो. ज्येष्ठः।। इष्ठन् और ईधसुन् के परे होते प्रथस्य को 'ज्य' भादेश भी होवे । ज्येष्ठः (प्रति- भयेन प्रशस्य.) सब से बड़ा ।। १३०८ ॥ ज्यादादीयसः । ६।४।१६।भादेः परस्य। न्यायान् ।। ज्य १३०७ से परे ईससुन् को 'पा' आदेश होवे । यह ८५ के पनुसार ईकार को हुपा तो "ज्यायान्" (अतिशयेन प्रशस्यः) । १३०६ ॥ वहोर्लोपो भूच वहो. 1 ६ । ४ । १५८ । वहीः परयोरि- मेयसोर्लोपः स्याइहोश्च भूरादेशः । भूमा बहु भट्द से परे जो इमन् और ईयस् उनका लोप होवे । और बहु को 'भू' पादेश होवे । यहा भी ६५ से प्रथम अक्षर का ही लोप होता है । मूमा (बहुताई)॥ (१) नो पम्लग किया जादे।
तपिता १२१. ॥ इण्ठस्य विट् च ।। ४ । १५८ यही परस्य पुण्ठस्व खोपः म्याधिडागमरच ॥ भूयिष्ठ ॥ पा से परे ष्ठा के पादि पवा सीप रे। और यिद हा भागम हो । भूयिष्ठा (पतिमयेन ॥ १३११ ॥ विम्मती क् । ५ । ३ । ६५ । पुण्ठेयसोः। पविगयेन सावीषनिष्ठ ।सबीयाम्। पतिथयेनत्त्वग्वान्। त्वषिष्ठ स्वचीयान्। रमन् पोर यमुन् प्रत्यय परे तो विन चौर मत मा लोप गये। पविक 'वा' बीयान् (पतिययेग मापी)। स्वषिष्ठः, 'पा' त्वषीयान् (पतिययेन स्वग्मान्)। १९१९॥ पदसमाप्ती करमग्देश्यदेगीयर । ५ 1 ३11०। ईप दूनो विहान् । विस्करपः । विहेश्य । विहशीयः। पचतिकरूपम् । पत् (पोरी) पसमाप्ति पर्य में वर्तमान गम्द से परे "वर' "रेश्व" पोर देमीयर ये मत्यय हीरे । पिस्वप' वा गिग्य' 'पा विमीय (विस विहान् होने में योगी सरो)। पति करपम्-पवाने में बोबी पर रपतारे १९१९ ॥ विभाषा सुपो पहुथ् पुरस्तात् तु । ५ ।३।६८ । ईप दून पटुः । बाहुपटुः । पटुकरपः । सुपः किम् । पचतिकरुपम् । पत् पसमाप्ति पर्व में शिपमान मुबन्न पो पूर्व मागमें "बाप" प्रत्यय पिकाप बरहो । पापड पा" परमाप (निस वे पर होने में योगी सी बया)। यहां 'पुम पारवी पातर देतारे पचतिक्षापम्" urt 'पति' रस तिहमा पूर्व पनोबारे १३१४ ॥ प्रागिवात् कः । ५। ३१७. वेप्रतिक्षतावित्यता मात् काधिकार यह मे ११९ पर्यन्त मत्यमा परिवार १२१५॥ पध्ययसर्वनाम्नामक मात् टे।५।३।०१। कापवादः। पम्पय पौर मनाम रनको सिरे पूर्व पाए पत्थयो। याका पपपाद है। १३१ । पसाता५ । ३।०२१ स्यायमश्वोऽपका। उसके। नौपदमा - लघुकीमुद्याम् २२१ मनात (जो विदित न हो) इस पर्थ में वर्तमान मद से परे क प्रत्यय हो । प्रश्यकः = यह घोडा किसका है। उच्चकैः १३१५ क्या यह जचा है। नीधः क्या वह मीषा। सर्वकैः नहीं विदित वेसब कितने है। १३१७ ॥ कुत्सिते । ५ । ३ । ७४ । कुत्सितोऽश्वोऽश्वकः ॥ निन्दत अर्थ में विद्यमान शब्द (मातिपदिक) से परे क प्रत्यय होवे । पश्वका बुरा घोडा 3 १३१८ ॥ किंयत्तदोनिर्धारणे योरेकस्य उतरच् । ५ । ३ । ८२] भनयोः कतरी वैष्णवः । यतरः । ततरः । दो में से एक को निश्चय पर्थ मे किम्, यत्, और तद, से परे स्वार्थ में उतरच् प्रत्यय होवे । कतरः (इन दो में से वैष्णव कौन है) ऐसे "यतरः" वा "ततर." ॥ १३१८ ॥ वा बहूनां नातिपरिप्रश्ने डतमच।५ । ३ । ६३ । जाति परिप्रश्न इति प्रत्याख्यासमाकरे । कतमो अवताकठः। वतमः। ततमः। वाग्रहणामकजर्थम् । यक. । सक. ॥ ॥ दूति प्रागिवीया.॥ बहुतों में से एक के निश्चय करने पर जाति के प्रश्न में किम् प्रादिको से परे उतम प्रत्यय होवे । पाकर (महाभाष्य) में "लातिपरिप्रश्ने" यह निमित्त खण्डन किया है। कतमो भवतां कठः (भाप में कठ शाखा के पदने वाला कौनह) ऐसे यतमः । ततमः । यहाँ 'या' पण पंच में भकच् के होने के लिये है। 'यकाः' और 'सकः ॥ प्रागिषीय प्रत्यय समाप्तहुए। १३२० ॥ इवे प्रतिकृती । ५ । ३१६६ । कन् स्यात् । अश्व दूब प्रतिकृतिः अश्वकः॥ प्रतिक्षति (प्रतिनिधि) रूप पर्थ में विद्यमान प्रातिपदिक से परे स्वार्थ में कन् प्रत्यय हो। पश्वक (लकडी का घोडा)। १३२१ ॥ सर्वप्रातिपदिकेभ्यः स्वार्थे कन् । अश्वकः । सब प्रातिपदिकों से परे स्वार्थ में कन् प्रत्यय होवे । पश्वकः (पश्व एव) घोडा । १३२२ ।। तत् प्रकृतवचने मयट्। ५ । ४ । २१ । प्राचुर्येण प्रस्तु- तम्प्रकृतन्तस्य वचनम्प्रतिपादनम् । भावेऽधिकरणे वा ल्युट् । आये प्रकृतमन्नमन्नमयम् । अपूपमयम् । द्वितीये तु ।भन्नमयो यजः । अपू. पमयं पर्व ॥ ॥
सरिता १२१ ॥ पूष्ठस्व यिट् च ।। ४ । १५८ को परस्य पूण्ठस्थ लोपः म्याबिठागमरच ॥ भूयिष्ठः बासे परे ष्ठा प्रादि पर पाबोप गरे । पोर यिद वा पामम सोये । भूयिष्ठ' (पतिमयेन पर)। १२११॥ विन्मतोर्मुक्। ५ । ३ । ६५ । पुष्ठेयसीः। पतियोग मरवी षधिष्ठः सतीयान्। पतिगयेम त्वग्वाम् । वषिष्ठः स्वपीयान् । एण्ठन् पीर यमुन मत्यय परे गे तो विन् पोर मत पा सोपीये। भविष्ठ पर भनीवान् (पतिमयेन पापी)। स्पषिष्ठः, 'पा' स्वचीयान् (पतिययेन त्वग्वान्) । १३१९॥ पदसमाप्ती कल्पग्देश्य देगीयरः । ५ । ३१६० ईष दूनो विधान् । पित्कारपः । विहेश्यः । विहगीयः। पचतिकरूपम् । का (बीपी) पसमाप्ति की पर्व में पर्तमान शम्द से परे पत्यप्" "२ण्य" और मीवर ये प्रत्यय हो । विश्वप' या पितरोग्य पा विपीय (मिस के निदान होने में मोदी कसर ) । पचति परपम् - पकाने में बारी बसर रखता। १२१३ ॥ विभाषा सुपो बहुप पुरस्तात् ।। ५ ।५।८।य दूमा पटुः । पापटुः । पटवरप । सुपः किम्। पपतिकापम् । पत् पसमाप्ति पर्ष म पिपमान सुबन्त के पूर्व माम में गए प्रस्थय विकरप परणे बापह' 'पा पटुकल्प' (बिस की चतुर होने में बीपी सी मसरो)। य "मुप समोर देता "पचतिकापम् या 'पति' र तिहत पे पूर्व बारमोबा १९१४ ॥ प्रागिवात् क । ५। ३१०. वेप्रतिकतापित्यता मान माधिकारः॥ महत मे १९९ पर्यन्त प्रत्यय का प्रधिवारो। १३१५॥ पध्ययसपनाम्नामक प्राक् टे।५।११०१ कापवादः । पम्पय पीर मर्पनाम रनबीरिक पूर्व पर प्रत्ययकोयामा पपमाद। १२१पनात।५।२।०३१ स्वायमस्वोरमका उपचन। मौष । सवा २२२ । लघुकीमुद्याम् यहां "प्रभूत तहावे" यह कहना चाहिये। विकार (रूपान्तर=और रूप) को प्राप्तभई प्रकृति में वर्तमान प्रातिपदिक से परे क, भू, अस् पून तीनों में से किसी एक के योग के होते विकल्प करके स्वार्थ में 'वि' प्रत्यय होवे ।। १३२७ ॥ अस्य च्यौ । ७ । ४ । ३२ । अवर्णस्य ईत् स्याच्च्चो । अकृष्णः कृष्ण. सम्पद्यते तकरीति कृष्णीकरोति । ब्रह्मीभवति । गङ्गीस्यात् ॥ च्चि प्रत्यय के परे रहते अवर्ण को ईकार होवे । कृष्णीकरोति (जो काला न हो उस को पीछे कोई काला करदे) ऐसे । ब्रह्मी भवति (१) गङ्गीस्यात् ।। १३२८ ॥ अव्ययस्य च्वावीत्वन्नेति वाच्यम् । दोषाभूतमहः । दिवाभता रात्रि. ॥ च्चि प्रत्यय के परे होते अव्यय को ईकार १३२७ न हो ऐसा करना चाहिये। "दोषाभूतमहः" (दिन जो रात हो गया) "दिवाभूता रात्रिः" रात जो दिन होगई ।। १३२६ ॥ विभाषा साति कास्न्ये ।५ । 81५२। विविषये साति- र्वा स्यात् साकल्ये॥ • जहां चि की प्राप्ति हो वहां विकल्प करके साति प्रत्यय होघे साकल्य का बोध हो तो॥ १३३० ॥ सात्पदाद्यी.।८।३ । १११ । सस्य षत्वन्न । दधि- सिञ्चति । कृत्स्नं शस्त्रमग्निः सम्पद्यतेऽग्निसाद्भवति ॥ साति के स् को और पद के प्रादि के स् को प न होवे "दधि सिञ्चति" यहां सिञ्चति के स को ष् नहीं हुआ। अग्निसागवति-सारा शस्त्र अग्नि होजाता है। यहां साति के स् को ए नहीं हुआ। १३३१ ॥ च्वौ च । ७ । ४ । २६ । दीर्घः स्यात् । अग्नीभवति ।। च्चि प्रत्यय परे हो तो अच् को दीर्घ होवे । अग्नीभवति =वइसारा आगहोजाताहै। १३३२ ॥ अव्यक्तानुकरणाद्दयजवरा दनितौडाच।५ । ४।५७ । यजवरं न्यूनन्न तु ततो न्यूनम् । अनेकाजिति यावत् । तादृशमई यस्य तस्माडाच् स्यात् कृम्वस्तिभिर्योगे ॥ - - (१) वह नद जो गड़ा हो जाये ।।
२२९ तषिता प्राय (ता) परवे प्रारम्भ की गई परतु वो प्रबत पाते है। मतिपादन (पन) पो पचन बाते। 'चनम्" यहां भाव में या पपिवरष में सुर मत्यय पाया है। इस दिये 'प्रवत पाने में समर्थ प्रश्मान्त से परे मयर प्रत्यय होगे। पा। प्रत का वचन मिस में ही उस पर्व में वर्तमान मममान्त परे मन्द प्रत्यय होवे । ये दो पर्व सूष के होते हैं। पाप (प्रथम) में मे-पम्ममयम् (पन्ममा पनि पार) । अपूपमयम् (प्रस्ततोऽपूप) (प्रेमा पषिकार) रितीय में वेसे पन्नमय (मन- मम्मामुच्यते ५) (विस पत्र में पाग का परिवार हो)। अपूपमयम् (पर्व नियम पूरे का प्रधिमार॥ १३२३ ॥ प्रभादिभ्यरच। ५। ४ । २८ । पय् स्यात् । प्रन एप मान । देवत। मनादिनों से परे स्वार्य में पप् प्रत्यय हो । मान १५। २४५ (विहान ) मत १ (खतेष)-देवता । १३२४ ॥ पाल्पाच्छस् कारकादम्यतरस्याम् । ५ । ४।४२ । पनि ददाति पाथः । परपया "बो भारत माता पोडे पा में विपमान की इस से परे गम् प्रत्यय विवरण परपोरेप-दुत देता। अस्पय' (मापानि ददाति) बोरा देतारे। १३२५ ॥ पायादिभ्यस्तसेमसंख्यानम्। पादौ पादिवः। मध्यतः पन्ततः। पृष्ठतः। पारपतः। पाकृतिगपोऽयम्। स्वरे स्वरता।वषतः ॥ पाणधिों से परे तपित् प्रत्यय हो। ऐसा माना गये।पादित (पादिमें) मम्पत (मम्ये ) मम्ममें। पन्त (पन्त) पातमें। पठा' (ए) पो । पार्वत (पारर्पयो) दहिने मा बाप पारे। पापापादिगम पासतिगतः-रकार। परत (वन) १२२६ ॥ (कम्पस्तियोगे सम्पदावर्तरि पि ५१४ १५.11 भूततदाब इति वलण्यम् । विकारात्मताम्माम्नुषस्याम्मलती वर्तमाना शिकारगादात् मा विर्वा म्यात करोत्यादिभिर्योग । (१) TH मानो एमा प"भूत (प्रमाय) सरगम्यमान - मानतीन पापी में में सिपी पर योगरोने पर पम् पूर पर भानु Emमान पातिपस्विरे परम पिपरनि प्राय* - । लघुकीमुद्याम् २२५ चटका । मषिका । वाला । वल्मा । होडा । सन्दा । विलासा । सेधा । इत्यादि । गगा। सर्वा ।। श्रज आदि गण का और अकारान्त का पाच्य जो स्चीत्व उस के प्रकाश करने में "टाय" प्रत्यय होवे । उदा० मजा १३४, १८३ बकरी। एडका भेड । अश्वा (अश्व+टाप्) चटका - चिडिया। मूषिका (ही) । बाला (लडकी) । वत्सा (पच्छी)। होडा, वा मन्दा पा विजाता=लडकी। इत्यादि और भी जानलेने । गङ्गा (भागीरधी)। सर्वा (सब खी) १३३६ ।। उगितश्च । ४ । १ । ६ । उगिदन्तात् प्रातिपदिकान्डीम् । भवन्ती। पचन्ती उक् है इत् जिस का ऐसे प्रातिपटिक से परे चीत्व की विवक्षा में "डीय" प्रत्यय होये । भवन्ती भिवतृ+डीप्) । पवन्ती (पचति) पचतृ + डीप् ॥ १३३७॥ टिड्ढाणञ्यसञ्दनमात्रच्तयाठकठकञ्चवरपः । ४ । १ । १५ । अनुपसर्जनं यहिदादि तदन्तं यददन्तन्ततःस्त्रियां डीप। कुरुचरी। नदट् नदी । देवट देवी । सौपर्णायौ । ऐन्द्री। औत्सी । अरु- यसी । जरुदनी । अरुमात्रौ। पञ्चतयो । मानिकी। प्रास्थिकी । लावगिकी। यादृशी। इत्वरी ॥ अनुपसर्जन (प्रधान) जो "टित् आदि" (टित्, ढ, पण, श्रम, ६यसच्, दनच्, मारच्, तया, ठक, ठन्, कञ्, और क्वरप्) प्रत्यय (१) "दूनमें से कोई एक है, अन्त मे लिस के ऐसा जो अकारान्त" प्रातिपदिक उस से परे स्त्रीत्व की विवक्षा में "डीप" प्रत्यय होवे। दुरुचरी । (कुरुषु चरति या सा) ८३८ । २५५ । पचादि गण में 'नद' के स्थाम में नदट् और 'देव' का देवट लिखा है इस से उन से परे खीम् छुआ तो क्रम से नदी । देवी। उनके रूप हुए। सौपपेयी (मुपर्णाया अपत्यम् नी चेत्) १०८७ । ऐन्द्री (इन्द्रो देवताऽस्या:) १११४ श्रौत्सी १०६६ उत्स वो वय की लडकी । जायसी, 'वा' अरुघ्नी, वा जरमाची १२४७ जाधमगप्रमाण वाली। पञ्चतयी १२४८ । पाक्षिकी ११८७। प्रास्थिकी १२२५ । लावणिकी, लवण येचने वाली । याशी ३०० जैसी । इत्वरी, नानेवाली। १३३८॥ ननजीकक्ख्यस्तरुणतलु नानामुपसंख्यानम् । स्त्रैणी पौंस्नी । शातीको । आढयसरगी तरुणी। तलनी । नज, स्नन्, ईकक और ख्युन्, इन प्रत्ययों को और तरुण और तलुन इन प्राति (१) इन का अवयव प्रकार पम्त में जिस के ऐसा जो प्रातिपदिक" ऐसा भी पर्य यहां हो सकता है ।। --
१२४
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सरिता
व पीर पम् के योम के होते (1) भव्य वा पनुपरसबी पमेवा मिलने
पाधे में दो पदों से पमनों उस से परेच प्रत्यय विकाय करयचोवे । परन्तुति
मम परे हो तो नही॥
१९२३ ॥ अचि पहुधमोभवत इति हाचि विवचिते हित्वम् ।।
मच् प्रत्यय ये गाने पर पाप पर विस्व पाये । रस से गा विवचित होने पर
१९३४ ॥ नित्यमापेस्तेि डाचौति पलष्मम् । डापर यदाये
हितगतस्मिन् परे पूर्वपरयोर्वर्षयोः पररूपं स्यात् । इति तकारपकारयो
पषार । पटपटाकरीसि । पष्यवानुकरणात् किम् । इषत्मरोति ।
ववरात् िकिम् । अत्करोति । पपरेति किम् । स्वग्टहरटायरोति ।
पनिती किम् । पटितिकरीसि ।। सि तद्धिता
पाप परे है बिस के ऐसे पामेषित यो परे होते पूर्व पीर परपर, स्थान
में परम्प नित्य सेवे। ऐसा करना चाहिये। इस से तकार चौर पवार में स्थान में पचार
हमा (पठत् + पट +अ+परोति) ११-पठपठाबरोति (स पटत् पेची अगदपरता
२) १९५५ सूत्र में "अभ्यतानुवरात्" या यों का उत्तर देतार-पत्रोति
यहागनोभावे । पुन' व "धवराति" ऐमा पनी तर देता
"बत् परोति" यावत् से परेशान को वाये । पुन' १में 'पपर पैसा पो
गा! उत्तर देतारे-पाटपरराबरोति पहा दो से परिपपरेभ्यून मी रस लिये
यहां भी मच पा । पुन' पहारी पमिती" या या वहा तर देता।
(५) 'पठिति परोति" ( परत् मद करता ) या न हो।
॥ तषित प्रत्ययों कि प्रक्रिया समाप्त हुई।
॥ अथ स्वीप्रत्यया.॥
॥ पब स्पीमत्यवीमा पवन पिया माता॥
१२३५ पलायतष्टाम्।४।१।।पवादोनामवारामतस्व
वाम्यं यत् स्मीस्वगतष योत्ये टाप् स्यात् । पला । एडवा | परवा ।
(१) पहा पम्यादा मनुष्य वी पापी समिम मम्द" मा परे।
(२) 'पटितिमरीति" यह ("परत+पति+रोतिस पसिरप में-
पायमानुबरचस्पात पती"cारय मूत्र से भत् पो पर प धुपारे।
सौमुद्याम् २२५ चटका । मषिका । वाला । वत्सा । होडा । सन्दा । पिलाता। मेधा । इत्यादि । गङ्गा । सर्वा ।। अज आदि गण का और प्रकारान्त का पाच्य जो स्चीत्व उस्त के प्रकाश करने में "टाप्" प्रत्यय होवे । उदा० अजा १३४, १८३ बकरी। एडका - सेड । अश्वा (अश्व+टाप्) चटका-चिडिया। मूषिका (चुही) । बाला (लडकी)। वत्सा (यच्छी)। होडा, वा मन्दा घा पिलाता-लडकी । इत्यादि और भी जानलेने । गङ्गा (भागीरथी)। सर्वा (सव सी) । १३३६ ।। उगितश्च । ४ । १ । ६ । उगिदन्तात् प्रातिपदिकान्डीम्। भवन्ती। पचन्ती॥ उक् है इत् जिस का ऐसे प्रातिपटिक से परे भीत्व की विवक्षा में "डीय" प्रत्यय होये । भवन्ती (भवतृ + डीप्) । पश्चन्ती (पचति) पचतृ + डीप् ॥ १३३७॥ टिड्ढाणञ्यसञ्दघ्नमाञ्च्तयाठकठकवरपः । ४ । १ । १५ । अनुपसर्जनं यट्टिदादि तदन्तं यददन्तन्ततःस्चियो डीप। कुरुचरी। नहट् नदी । देवट देवी । सौपर्यायो । ऐन्द्री । औत्सी। जस- यसी। ऊरुदनी । अरुमात्री। पञ्चतयी। पानिको। प्रास्थिकी। लावगिकी। यादृशी। इत्वरी ॥ अनुपसर्जन (प्रधान) जो "टित् भादि' (टित्, ठ, भण्, श्रम, यसच्, दनच्, मात्रच्, तयम्, ठक, ठन्, कञ्, और क्वरय्) प्रत्यय (१) "इनमे से कोई एक है, अन्त में जिस के ऐसा जो प्रकारान्त" प्रातिपदिक उस से परे स्त्रीत्व की विवक्षा में "डीप्" प्रत्यय होवे । कुरुचरी। (कुरुषु चरति या सा) ८३८ । २५५ । पचादि गण में 'नद' के स्थान में नदट् और 'देव' का देवट लिखा है इस से उन से परे डीप हुया तो कम से नदी । देवी। उनके रूप हुए। सौपर्णेयी (मुपर्णाया अपत्यम् स्त्री चत्) १०८७ । ऐन्द्री (इन्द्रो देवताऽस्याः) १११४ श्रौत्सी १०६८ उत्स के वय की लडकी । कायसी, 'वा' जस्टघ्नी, वा अरमाची १२४७ नाघभरप्रमाण पाली। पञ्चातयी १२४८ । प्राक्षिकी ११८७ । प्रास्थिकी १२२५ । क्षावणिकी, लवण येचने वाली । यादृशी ३७० जैसी । इत्वरी, जानेवाली। १३३८॥ नमजीककख्युस्तरुणतलुनानामुपसंख्यानम् । स्त्रैणी पोस्नी । शाप्तीको । बाढयसरगी । तमणी । तलनी । नम्, स्नन्, ईकक और ख्युन्, इन प्रत्ययों को और तरुण और सलन धन प्राति (१) धन का अवयव प्रकार है मस्त में जिस को ऐसा जो प्रातिपदिक' ऐसा भी - - अर्थ यहां हो सकता है।
। बीमत्यवा पदियों को भी यहां गिन रोमा।पी१. पोस्नी मासीवी (शशि' मारप मस्था) परवी पासी। (१) पाठपारपी (बोरी गरीब को पनी परे)। तरी वा तनुनी-बुवान पी॥ १२२८ ॥ ययश्च । ४ । ११ । यअम्तान्छीम् । पकारखापे शति । यमन्त से परे पीस्प की विधा में जीप चोवे । २५ मे प्रकार वे चोप में परने पर॥ १२४ • खस्तधिसस्य ।। ४ । १५ । पच परस्य सवित यकारस्य लोप ति परे। गार्गी ॥ के परे होते पर से परे तक्षित के यबारमा सीप सोपे। गार्गी १ ० | १५८ गम केचपी सरपी। १९४१ ॥ प्रार्चा फास्तषित । ४ । १।१०। यअम्तात् ष्फो पा स्यात् स प तषित यमन्त से परेप प्रत्यय विपरप करीये पोर पातषित मामा पाप । १३४२ ॥ षिद्गौरादिभ्यश्च । ४ । १ । ४१ ष् स्यात् । गायिपी। नत्तकी । गौरी। पनडी। पनड्वाही। पाकृतिगोऽयम् ।। षित् मस्मयान्त से परे पीर मोपदिषों से परे सीम् प्रत्यय ये । पर्यायची २०११ ८ गर्ग पपि कम की समी। (२)नतंकी (नाचने वसी)। मौरी (गिषा)। भारी वा (अनुपाती (म) या गोपदिगप पाठतिमी । १३४३ ॥ वयसि प्रथमे । ४ । १।२ । प्रथमवयोवाचिनोऽदम्ता गप् । कुमारी॥ परिसी पय (ज्मर) पाषष पवारान्त से परेरी मामय जोवे । कुमारी (कुवारी) समी।। १३४४ ॥ दिगोः।४।१।२१। पदम्ताहिगोरीप् । पिस्तोसी। पजादित्वात् भिमक्षा ज्यनीका ॥ पवागत हिगु से परेसीप् प्रत्यय ये। नियोषी (पयाडोबाना समाचार) तोमोसोवों का समय 'चिप' मा भनीवा' ये दो पद तो पनादि होने से समस्त रे। (१) यहा 'पागमुभगाबपरितनानान्धप्रियेषु व्यापमोचम परम्मुन् । ११ समूष बरने स्पुना। (१) यहाँ 'मिस्पिनि प्यन् । स पर पुन प्रत्यय पारे। (6) गोपरि गप में अनुहर सम्म पाम् पहित मी पठारे॥ । - २२७ - सधुकीमुद्याम् १३४५ ॥ वर्णादनुदात्तात् तोपधात् तीनः । ४ । १ । ३६ । वर्णवा- ची योऽनुदात्तान्तस्तोपधस्तदन्तादनुपसर्जनाहा डीप तकारस्य नः । एता । एनी। रोहिता। रोहिणी ॥ जिस के अन्त में अनुदात्त और उपधा में त् हो ऐसे वर्ण वाचक अनुपसर्जन से परे विकल्प करके डीप् प्रत्यय होवे, और त् को न होवे । एता 'वा' (एत+डीप) एनी (चित्तरमितरी हरिणी)। रोहिता (वा) रोहित+डी रोहिणी नक्षत्र विशेष वा लालमृगी।। १३४६ ॥ वोतो गुणवचनात् । ४ । १ । ४४ 1 उदन्ताद्गुणवा- चिनो वा डीए । मृद्दी । मृदुः ।। उकारान्त गुणवाचक शब्द से परे विकल्प करके डीए प्रत्यय होवे । मृद्दी (वा) मृदुः= कोमल स्त्री। १३४७ ॥ वतादिभ्यश्च । ४ । १ । ४५ । वा डीए । वत्री। बहुः । बर्ड आदि शब्दों से परे विकल्प करके डीष् प्रत्यय होवे । बद्धी (बा) बहुः ।। १३४८ ॥ कृदिकारादतिनः । रात्री । राषिः ।। लिन् मत्ययान्त को छोड कर कृत् प्रत्यय का इकार है, अन्त में जिस के उस से परे विकल्प करके डीष् प्रत्यय होवे । रात्री 'वा' रात्रि (रात) १३४६ ॥ सर्वतोऽतिन्नादित्येके । शकटी। शकटिः। कई प्राचार्य ऐसा कहते हैं कि अतिन्नर्थक कत् (वा) असत् सव के पूकार से परे डीप् प्रत्यय होवे । शकटी (वा) शकटि' (गाडी) ॥ १३५० ॥ पुंयोगादाख्यायाम् । ४ । १ । ४८ । या पुमाख्या पुंयो- गात् स्त्रियां वर्तते ततो डीए । गोपस्य स्त्री गोपी। नो पुवाचक शब्द पुलिङ्ग वाले पादार्थ के सम्बन्ध से स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान हो तो उस से परे डीप् प्रत्यय होवे । गोपी २५५ (गोपस्य स्त्री) ग्वालिन । १३५१ ॥ पालकान्तान्न । गोपालिका। अश्वपालिका। 'पालक' है अन्त में जिस के उस से परे डीए १३५० न होवे । गोपालिका १३२५, १३५२ ग्वालको स्त्री । अश्वपालिका १३५२ सहीस की स्त्री। १३५२ ॥ प्रत्ययस्थात् कात् पूर्वस्यात इदाप्यसुप [७१३। ४४। प्रत्ययस्थात् कात् पूर्वस्याकारस्येकार, स्वादापि स ाम् सुप. परो न २३८ प्रत्यया चेस्। सर्विका। कारिका । अतः किम्। मौका। प्रत्ययस्थात् पिम् । शक्नो सोति सका। पसुपः किम् । पछुपरिवाषका नगरी। "भुप् से परे नमो ऐसा नो पाप उस के परे होते" प्रत्ययस्थित पार से पूछे पसारको कारोवे । सर्विवा-निन्दित ची। पारिता-करने पारी। यहां "पत" पेसा को कहा। उत्तर देतारे-गोवा' या पीकार पो नोमाये । पुन' यहां "प्रस्व यस्यात् पेसा क्यों कहा ! उत्तर देता~गवा या धातु के अवयव कमार से पूछे भवार को रबार मी नावे । पुन' ११५५ में 'पसुप" या रोगा। उत्तर देता "परिमानवा" या पवार पेठतर पकार को कारको मापे । १३५३ ॥ साहेवप्तायामाप् । सय॑स्थ स्पी देवता सूरया । देवतायारिम् । देवता पर्व में सूर्य मद से परे चाप् प्रत्यय हो । सूर्या (बो सूर्य पी स्त्री देवता ) यहां देवतायाम् या पद क्यों कहा ! तर देता। "११५४ । सूर्य्यागस्त्ययोरछेच ज्याच यशोपः। सूरी कुम्ती॥ सूर्य और अनन्य लयम्दी के यहार छोप गोरे बम (1) प्रत्यय पारी प्रत्यय परे हो तब । 'पूरी ॥ (मानुषी-मुन्ती) यह पाप न हो पावे ॥ १३५५ ॥ इन्द्रवरुपभवमर्षरुद्रमहधिमारएययवयवममातुखाचा- यांचामानुक् । ४ 1१1 ४८ । गेष ध। इन्द्रस्य स्पी। पूम्द्रागी। वरु पानी । भवानी । पर्यापी । रुद्रापी । मानी। पन्द्र, पर मन पर्ष छ पर किम भरण्य पप यमन मातुन पोर पाचार्य ल पम्दों से परे गोप् मत्पय होये पोर सो सामनी पानुए का पागम भी होवे । इन्द्रापी (दिपीपी)।परचानी (परभीत्वो) मपानी (मपकी रची) पेमेथ पी द्वारी पानी (गोरी)। १९५६ ॥ निमाररययोर्मल्वे । माधिमं हिमानी । मादायमर एयानी। हिम पौर परपयन सादी यो पानुम्बा पामम पौरम् प्रत्यय होने पर 'मात्व" पर्ष में। शिमानी (पदी शिम)। पररयानी (बना पास) १९५० ॥ यवाहोथे। दुष्टो यवी यवानी ॥ दोष पर्व में यर याद से परे जीप मत्पप पोर पानुपा शगम हो । यानी- परापबी. १३५८ ॥ यवमाफ्लिप्याम् । यवनामा लिपिम्यं वनानी। 1 २२८ लघुकौमुद्याम् लिपि अर्थ से यवन् प्राब्द से परे डीष् प्रत्यय और आनुक्का पागम हो । यद- नानी म्लेच्छों की लिखत ।। १३५८ ॥ मातुलोपाध्याययोरानुग्वा । मातुलानौ । मातुली । उपाध्यायानी । उपाध्यायौ ।। मातुल, और उपाध्याय इन दो शब्दो को अनुक का पागम विकल्प करके होवे । मातुलानी 'वा' मातुली १३५० (मातुलस्य स्त्री) मामी। उपाध्यायानी "वा" उपाध्यायी (उपाध्यायस्य स्त्री) =गुरु की स्त्री ।। १३६० • ॥ आचार्य्यादणत्वञ्च । प्राचार्यानी । प्राचार्य शब्द से परे भानुर १३५५ के नकार को एकार न होवे। प्राचार्यानी (धाचार्य की स्त्री)॥ १३६१ । अयंचत्रियाभ्यां वा स्वार्थे । पाणी । प्रा । चत्रि- याणी। चचिया ॥ अर्य और क्षत्रिय इन शब्दों से परे स्वार्थ में डीप और आनुक् इकडे ही विकल्प करके होवें भार्याणी (वा) चयाँ (वैश्य की स्त्री)। इंत्रियाणी (या)नंधिया-छतगनी ॥ १३६२ ॥ क्रौतात् करणपूर्वात् । ४ ।१।५०। डीए । वस्त्रनीती। क्वचिन्न । धनकीता। करण वाचक शब्द पूर्व है जिसके ऐसा जो क्रीत शब्द वह है अन्त में जिसके उस से परे डीप् प्रत्यय होवे। वस्त्रमीती (वस्त्र से जोखरीदीगई स्त्री)। कही नहीं भी होता। धनकीता-धन से खरीदी गई। १३६३ ॥ स्वाझाच्चीपसर्जनादसंबोगीपधात् । ४११। ५४ । असंयोगोषधमुपसर्जनं यत्स्वागन्तदन्तान्ढीप वा। केशानतिक्रान्ता। भतिकेशी प्रतिकेशा । चन्द्रमुखी। चन्द्रमुखा । असंयोगोपधात् किम्। सुगुल्फा । उपसर्जनात् किम् । सुशिखा ।। निसकी उपधा सयोग नहीं ऐसा नो उपसर्जन स्थान (शरीर के-घन का वाचक) यह जिस प्रतिपादिक के अन्त में हो उस से परे विकल्प करके ङीष् प्रत्यय होवे । प्रति- केशी (वा) प्रतिकेया । चन्द्रमुखी (वा) चन्द्रमुखा (चन्द्रवन्मुखं यस्याः) । इस सूत्र में "असयोगोपधात्" यह पद क्यों कहा ? उत्तर देता है--"मुगुल्फर" यहा पक्ष में डीप न हो जावे । पुन' यहा "उपसर्जनात्" यह क्यों कहा उत्तर देता है "मुशिया"यहा यिस्खा उपसर्जन नहीं इस से परे पक्ष में भी मचावे ।। - १ प्रत्यया १३६४ ॥ न मोडादिवाषः । ४।१।५६ । मोडादेवावरच स्वाहान्न गैम् । कण्यायक्रोडा । पाकृतिगयोऽयम् । सुनघना । मोगादिस्णा वाचक पदों से परे, पौर पमेवाच स्वाा वाषण गादी परें पोप न होथे। करयाचारोग-लिस स्त्री की शाती मुन्दर । या मोगादिगा पातिगए। "सुजवना" या पनेकाका उदाहरण १३६५ ॥ नखमुखात् सम्मायाम् । ४ । १ । ५८ । न गैष् । सैमा पब में नए पौर मुख इन गादी से परे प् प्रत्यय नोवे । १३६६ ॥ पूर्व पदात् सनायामग ।८।४।३ । पूर्वपदस्याम्नि मित्तात् परस्य नस्य प स्यात् सनायाम्म त गकारव्यवधाने। यर्प एखा। गौरमुखा । समायारिम् । ताममुखी कम्या। पूषपद में स्थित यो निमित्त (पाप) उस से परेन् को पहोचे सभाप में परन्तु गवार पा व्यपान तो नहीं । सूर्पणा (राब की भमनी)। नीरमुपा । यहां संसायाम्" ऐसा क्यों का उत्तर देता “ताम्ममुखी (विस पाल्या का मुप ताम्मे के समान हाचो) यानी वा निषेष को वाये। १३६० ॥ मातेरस्त्रीविषयाइयोपधात् । ४।१।६३ । वातिवाचि यम्न च स्त्रियाग्मियतमयोपधन्ततो डीप् । तटी। चपली। पाठी। वहसची । नाते किम् । मुएडा। एस्पीविषयात् किम् । वलामा । भयो पधात् किम् । पषिया ॥ 'वाप्ति पापको मिपम करके स्त्रोणि न पीर समीठपक्षा में पवार मी न हो ऐसा नो मम्द उस से परे स्वीविपी पिवधा हो तो सीप प्रत्यय होपे । तरी सा (तीर) पदी (सादी स्त्री) कठी कठ शाम पदने वालों की सी। कापी (चपदीयों की समी)।यहां पाते" या यों कहा ! र देतारे 'मुपा' (पिरमुन्नी) यही नही बापे । पुन यहाँ परचोषिपयात्" या क्योंवा त्तर देतारे मसाला (मुनों पी पदम) या सदा स्पीति में रातारे इस से परे रोपनी माये। पुन यहारी'पपोपमात्' पा पदवी पहा! उत्तर देताई पिया" यहांची नाबाये। १९६८। योपधप्रतिषेधे गषयायमुकयमत्स्यमनुष्याणामप्रति पेध । गवयो। यी। मुक्षयो। खस्तदितस्येति यस्खोपः। मनुपी । मत्स्यस्य ड्या यलोपः । मत्सी।।
। सधुकौमुद्याम् २३१ १३६७ योपधो के प्रतिषेध में गवय, हय, मुकय, मत्स्य, मनुष्य, इन पांचों से ङीष् का प्रतिषेध नहीहै । इयी (घोडो)। मुकयी-मुकय (जन्तु विशेष) की स्त्री । १२४० से यकार का लोप हुआ तो 'मनुषी' सिद्ध हुआ तो 'मनुषी' सिद्ध हुआ । मत्स्य शब्द के यकार का डी के परे होते लोप होता है मत्सी(मच्छी)। १३६८ । डूती मनुष्यजाते. । ४ । १ । ६५ । ङीष् । दाक्षी। मनुष्य जाति वाचक जो इकारान्त शब्द उस से परे डीष् प्रत्यय होवे । दाक्षी१०८१ । १३७० ॥ जडुतः । ४ । १ । ६६ । उदन्तादयोपधान्मनुष्यजाति- वाचिन. स्त्रियामूङ् । कुरूः । अयोपधात् किम् । अध्वर्युर्ब्राह्मणी । जिस मनुष्यजाति वाची उकारान्त शब्द की उपधा में य् न हो उस से परे स्त्रीलिङ्ग मे जङ् प्रत्यय होवे । कुरूः (कुरुवश की स्त्री)। यहां "अयोपधात्" ऐसा क्यों कहा ? उत्तर देता है । “अध्वर्युः" यहां जङ् न हो जावे ॥ १३७१ ॥ पङ्गोश्च । पङ्गः ॥ स्त्रीत्व के कहने की इच्छा मे पगु शद से परे भी अङ् प्रत्यय होवे । पन: (पहली स्त्री)॥ १३७२ ॥ श्वशुरस्योकाराकारलीपश्च । श्वश्रः ॥ श्वशुर शब्द के उकार और प्रकार का लोप होवे और ऊङ् प्रत्यय भी होषे । श्वः (श्वशुर+जङ्) श्वथू १३७३ जरूत्तरपदादौपम्ये । ४ । १ । ६६ । उपमानवाचि पूर्व- पदमरूत्तरपदं यत् प्रातिपदिकन्तस्मादूङ् । करभोरुः ॥ उपमान वाचक कोई शब्द है पूर्व पद जिस का और कर शब्द है उत्तर पद जिस का ऐसा जो प्रातिपदिक उस से परे स्त्रीत्व की विवक्षा में ऊङ् प्रत्यय होये । करभोरूः (करभवदूरू यस्या) करम (मणिवन्ध (बीपी) से लेकर पीची के मूल तक हाथ का बाहर का भाग) के समान ह जाघ जिस स्त्री की। १३७४ ॥ मंहितशफलक्षणवामादेश्च। ४ । १ १७० । अनौपम्या- सूत्रम् । संहितीरुः । शफोरु. । लक्षणोरुः । वामोरूः । सहित, थफ, लक्षण, और वाम, इन में से कोई एक है आदि में जिस के और ऊरु शब्द है उत्तरपद जिस का ऐसे शब्द से परे भी अङ् प्रत्यय होवे स्त्रीत्व की विवक्षा में । जहा उपमान पूर्व पद नही इसी लिये यह सूच है । सहितोकः (सहितापूरू यस्या.) सास ॥ दै } बीमत्यया' मिसी पुराव पाटी) गपोका (जपो (पुरी) ता विवो प्यस्या)। सोम (निएकी नधि तिस रो)। वामोर (पामापूफ यस्या) मुन्दर पांच पाती ।। १३०५ ॥ पाईरवाद्यमओडीन् ४।१।०१ गारवायो योऽकार स्तदन्ताच्च जातिपाचिमो जीन् । गारवी । घेदी । नाझवी । मार पादिभाति पाचक पादों से परे और पम् वा पकार लिम से पन्त में एस वे परे स्त्री सिज में 'गेन्' प्रत्यय गोवे । मारपो (मृटरोरपत्य स्पी) पुत्र सपि के चमकी पाया । दी। ८१-विद यो मोरपी सरकी । मानपी (माधवनातिकीपी)। १३०६ ॥ ननरयोर्वविरच । मारो॥ गेन् परे को तो और मर न दो सम्दी को हरियो । मारी (पी)। १३७७ ।। यूनस्ति ।४।१।०७। युषन्मदात् स्त्रियां तिः स्यात् । युषति ॥ ति स्पीप्रत्यया ॥ युषन् सम्द जब पी पाचन हो तब उस से परे ति' प्रत्यय रोपे । युगति पथ- ॥ स्त्रीमत्यय समाप्त पुए। अपान स्वीप मास्चार प्रविष्टानां पाखामा पोपकारिका। क्वता वरदराखेम लघुसिहाम्तकौमुदी॥ पूप्ति श्रीवरदराबकृता लघुसिहारतवीमुदी समाना । परराव ने जो प्यार से बिना अन्य मास्त्रों में प्रमिपोर व्याकरप मोनीबानते उनके और वापसी के उपचार परने वाली या "पुसित कीमुदी बनाई। ॥ श्री वरदराब मामी बनाई दुई वधुपिताम्तकीमुदी समाप्त पुर। मुषमूतपोगदम्दे गहाविष्णुखता सयो । वीमुपाचोसस्य विशति पूर्णताममात् ॥१॥ यस्मादिय पिगुषिता साविषारूप(महापरतते । पत एव सताबारयानूपाविषमतुम्टये।२ पत्रपषम्युति तामन्त पोषयन्तु ताम्।मार्थये तानिति चमाभाषोऽयाचितनम्वनान् । इति श्रीमानस्वामिजमूपच पीयुतपरितममवानदासात्मक पन्चमीमममारिया- हवाभ्यापम परिमाविष्णुमारिकता मुखीमपुतरार्धमापा पितिसमाप्ता। ॥ सपुषीमुरी पेजतरा सी भाषा का समाप्त हुई।
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