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Thake Hare

Satish Jamali · 2011/03

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सतीश जमाली की कहानियों का दूसरा संग्रह थके-हारे चित्रलेखा प्रकाशन १४७, सोहबतिया याग, इलाहाबाद-६ LIKाला

प्रथम संस्करण : मक्तूबर १९७५
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--
।
मूल्य : आठ रुपये
प्रकाशक : चित्रलेखा प्रकाशन, १४७, सोहबतिया वाग, इलाहाबाद-६
मुद्रक : सुपरफाइन प्रिन्टर्स, १-सी बाई का बाग, इलाहाबाद-२

मार्कण्डेय जो के लिए

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"कहानियाँ
भावाज़ | ६
थके-हारे/३३
जन-साधारण | ५६
हातो/ ७७
नागरिक /16
बच्चे /१००

आभार
वाम
समारंभ (भावाज : मार्च ७२)
(बच्चे : भगस्त ७४)
उत्तरार्द्ध (हातो : नवम्बर ७३)
कहानी (जन-साधारण : अप्रेल ७४)
सारिका (पके-हारे : दिसम्बर ७१, नागरिक : नवम्बर ७२)

आवाज़ मुझे उम्मीद थी कि मैं पकड़ लिया जाऊंगा, चुपचाप मौर यूं ही एकदम । मेरे शत्रु इसके अतिरिक्त कुछ और कर ही न सकते थे। उन्होंने अकस्मात् वार किया था। मैं जकड़ लिया गया था, पूरी तरह से और निर्ममता से । मेरे शत्रुओं ने ऐसी कोई भी चीज़ न छोड़ी थी जिससे मुझे ढोल मिल सके । मैं बंध गया था। शत्रुनों ने ही मुझे दबोचा था, इसलिए मुझे माश्चर्य जैसी कोई चीज नही सूझी। मैं अपने शत्रुओं की चालों और हरकतों से पूरी तरह से परिचित था। मैं जानता था कि मुझे फंसाने के लिए वे सब-कुछ कर सकते थे, और अपने बचाव के लिए मैं कुछ भी न कर सकता था। वे मुझे जहाँ ले माये वह एक जगह थी। जगह इसलिए कि उसके चारों तरफ तारकोल पुती दीवारें थी। काली, भयानक मौर रहस्यमय । यह निश्चय ही कोई कमरा था, क्योंकि उसमें बिजली थी मोर भन्दर माने के लिए दरवाजा था। अपने शत्रुनों के बीच टंगे हुए, दरवाजा पार करते ही मुझे लग गया कि अब मैं यहां से लौटूंगा नहीं। सम्भवतः यह जगह मेरी अन्तिम सांस सुड़कने के लिए बेहद सशक्त थी। लेकिन मैं अपनी शक्तियों को पुनः वटोरने लगा। यह अद्भुत था। सिर्फ इतना मुझे ध्यान या कि अपने शत्रुमों के बीच मुझे निरीह मोर यतीम नहीं लगना चाहिए ।

१०]थके-हारे हालांकि प्राशा बिल्कुल नहीं थी लौट सकने की, न ही कुछ मौर की । मैं कृपाकांक्षी न था। यह जगह कहां थी, पहले मैं समझ नही पाया। जब उन्होंने मुझे पकड़ा था, उसी क्षण मैं अपने में डूब गया था, यह घटना कोई अप्रत्याशित नही थी, फिर भी मैं घोर यातना-जैसी स्थिति में से गुजरने लगा था । इसी कारण जिस रास्ते से मेरे शत्रु मुझे इस जगह लेकर आये थे, मैं उसे और इस मौत-घर को न पहचान पाया था। मुझे किसी प्रकार की सहायता की उम्मीद न थी। मैं इस मुकाबले में अकेला था। मैं यह भी जानता था कि मेरा यह मुकाबला मसाधारण था। मुझ अकेले से हो ही क्या सकता था ? यह एकदम नामुमकिन था। लेकिन कुछ पाखें मेरी तरफ़ करुण दृष्टि से देखती थीं। यह उनकी मेरे प्रति सहानुभूति थी, मैं समझता था कि वे अन्ततः मेरे काम में शामिल हो जाएंगे। उनकी नजरों की फातरता मैं समझ सकता था। मगर दूसरी मोर मलग प्रकार की मुद्राएँ थी जो उनकी कैफियत बताती थीं। वे सहानु- भूतिपूर्ण घेहरे खामोश थे, उदास । वे भातंक में फड़फड़ा रहे थे । और मुझे कोई उम्मीद न थी। मैं केवल उनकी सहानुभूति मौर मातंक को याद कर सकता था। मेरे हाय पहले ही बांध दिये गये थे। मेरे पास पैसे था ही क्या ? लेकिन एहतियातन उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे तक छान मारा था । मेरे सारे कपड़े उन्होंने उतार दिये थे, और जूतों के पमहे वफ को फाड़कर देस लिया था। उन्हें उम्मीद होगी कि मेरे पास छुरा, पिस्तौल या हयगोले जरूर होंगे। कुछ न मिलने पर उनकी मांखों की निराशा देखने योग्य पी। उन्होंने मेरे इस कदर पमुरक्षित रहने को माशा कतई न को पी। एडने पर मेरे पास मे मात्र उन्हें एक कलम मिली थी, जिसे मच्छी तरह से सोल- पाप कर देखने में बार उन्होंने उसे दीवार से दे मारा था। उस समय में मेरी तरफ इस वरण हिवारत भरी नजरों से देय रहे थे कि कही उन्होने निरोपमा तो नहीं मिया | उना स्त्र ऐणी निरीह परस्था ।

मावाज || ११ में होगा, उन्होंने कल्पना तक न की थी। उन्होंने मुझे बेरहमी से फर्श पर पटक दिया। मेरे बदन पर एक भी कपड़ा न था। परन्तु अपना नंगापन मुझे उस समय जरा भी महसूस न हो रहा था। मैं बिजली की रोशनी में उन पाठों व्यक्तियों के चेहरे गौर से देखने में व्यस्त था, जो मेरे चारों मोर खौफ़नाक 'चमकोली प्राकृतियां' लिये खड़े थे। मैं उनमें से तीन व्यक्तियों को पहचानता था, रामलाल को, वनी को, मिल्खीराम को। ये तीनों मेरे शत्रुभों के खास गुर्गे थे । उस समय उन तीनों के धड़ों के ऊपर मुझे उनके नहीं अपने शत्रुनों के चेहरे जडे हुए दोखे । बाकी पांच को में पहचानता न था, सम्भवतः वे किराये के हों या अन्दर के हो । उन पांचों के चेहरों पर कठोरता थी, जबकि वे तीनों गुर्गे अपनी सहज मुद्रा में थे, जैसे कि वह उनके लिए रोजमर्रे का काम हो । उसी वक्त मेरे असली शत्रु को मनेक प्राकृतियों में से एक प्राकृति दरवाजा खोलकर भन्दर भायी। यह व्यक्ति चेतनकुमार था। मेरा असली शत्रु । मैंने उसे घूरकर देखा। वह मुझे पहले से ही घूर रहा था। फिर ऐसा हुआ कि वह एकदम ठठाकर हंस पड़ा । मैंने समझा कि वह मुझे उस तरह नंगा और पस्त देखकर हंस रहा था भौर सच भी यही था । वह मेरे धारीर को बेतरह घूर रहा था और हंस रहा था। अब वे तीनों गुर्गे भी हँसने लगे। परन्तु वे पांचों चेहरे भभी कठोर थे। फिर जब चेतनकुमार चुप हो गया भौर संजीदा बन गया तो उन पांचों में से चार ने अपने लम्बे धुरे बटन दबाकर हाथों में थाम लिये पोर पांचवें ने पीतल का बना सख्त मुक्का अपने दायें हाथ के पृष्ठ भाग पर चढ़ा लिया । वर्मनी ने कहा-"शुरू करो!" -और एक छुरा मेरी पिंडली के मार-पार हो गया। मैंने अपनी दवा ली। खून की धाराएं दोनों तरफ से उछली। इसी क्षण पोतल का मुक्का मेरी छाती पर मा वजा । मैंने उसकी भारी चोट महसूस की, लेकिन अपने होश को गायब न होने दिया । मसह का सहना क्तिना कठिन होता है ! लेकिन मैं सह गया। अपने शत्रुभों को मैं यह मौका न देना चाहता .

१२ थके-हारे
था कि वे मेरी चीख-पुकार सुनकर प्रसन्न हों।
--गाड़ दो साले को यही फर्श के नीचे !--चेतनकुमार ।
-साला बदमाश बनता है हरामजादा!-बधनी ।
-मारो कुत्ते के पिल्ले को!-चेतनकुमार।
-बड़ा तीसमारखाँ बना फिरता था, सूपर की मौलाद !-रामलाल
--लक्कड़ लूंस दो साले के चूतड़ों में !-मिल्खीराम ।
-मजाक समझ रखा था कुत्ते के पुत्तर ने !-मिल्खीराम ।
-साले, बदमाशो तो हम तुम्हारे वाप की भी निकाल दें!-वनी
-प्रब देख लिया मजाक!-रामलाल ।
-प्यार से कहा, मान जामो तो लगे थे माँखें दिखाने !-रामलाल।
-काट लो साले का मौजार!-मिल्खीराम ।
-कान भी काट लो!-चेतनकुमार ।
-नाक भी काट लो!-मिल्खीराम ।
-आंखें भी निकाल लो!-बधनी ।
----तढ़ियां भी!-रामलाल ।
-मारो ठुड्ड साले को रीढ-हड्डी पर !-वर्धनी ।
--और खोपड़ी पर भी!-चेतनकुमार ।
--ौर पेट पर भी!-रामलाल ।
--और चूतड़ों पर भो !-मिल्खीराम ।
--साले की चमड़ी में नमक भर दो!-रामलाल ।
-नम्बर चार, इसके मुंह में पेशाय करो!-मिल्लीराम ।
नम्बर एक, इसके बाल उखाड़ लो!-रामलाल ।
-~-साले, मां फे यार, बड़े काबिल बनते थे!-चेतनकुमार।
--उकमाने पर तुले ये-चेतनकुमार।
-प्रय पामो जहन्नम में!-मिल्सीराम ।
-देसो, साले को अभी भी शर्म नहीं माती!-ययनो।
-माना, अभी भी मुस्करा रहा है !-रामलाल ।

भावाज || १३
।
-अभी भी माफ़ी मांगने को तैयार नहीं है !-मिल्खोराम ।
--कचूमर निकाल दो हरामजादे का!-चेतनकुमार ।
- मुंह में टट्टी भर दो साले के !-रामलाल ।
-पांव काट लो!-मिल्खीराम ।
--सर में कीलें ठोंक दो!-रामलाल ।
-जुबान काट लो मादरचोद की!-बधनी ।
अभी तक सिर्फ मेरी एक पिंडली मे छुरा प्रार-पार था और छाती में
पीतल मुक्के का दर्द । बाकी सब बातें ही थीं। अभी तक मेरे सभी अंग
सलामत थे। नाखून, दांत, हाथ-पांव तोड़े-उखाड़े काटे नहीं गये थे।
अंतड़ियाँ, भाखें वहीं थी । मौजार सलामत था । मुंह में टट्टी-पेशाब नहीं
किया गया था। चूतड़ों में लक्कड़ और सर में कीलें नही ठुकी थीं । वे सब
सिर्फ बातें थीं। शायद यह कुछ क्षण मुझे अपनी मात्महीनता की स्थिति
को
महसूस करने के लिए दिये गये थे। और यह सब मेरे लिए अत्यन्त
पावनापूर्ण था। मैं चाहता था कि वे मुझे एकदम से खत्म कर दें। ताकि
किस्सा पाक हो। सोचने, समझने और महसास करने की सीमाएं खत्म
हो जाएँ। यह सोचना तो सौ-प्रतिशत मूर्खतापूर्ण था कि वे मुझे शायद
छोड़ दें। यह असम्भव था।
वे फिर शुरू हुए । अब की उनकी बातें सीधी और साफ थों-
-साहब ने क्या कहा ?-रामलाल ।
-इसे खत्म करना होगा!-चेतनकुमार ।
-अगर बात निकल गयी तो?--रामलाल ।
-कैसे निकलेगी?-चेतनकुमार ।
-मान लें मगर निकल गयी ?-रामलाल ।
--कैसे मान लें, कैसे निकल सकती है ? निकल ही नही सकती!-
चेतनकुमार।
-लेकिन मानने में क्या हर्ज है ?-रामलाल ।
-भई, धयों मान लें ? ऐसा सोचना ही फिजूल है ! ऐसा कुछ नहीं

१४ | थके-हारे हो सकता!-चेतनकुमार । --अच्छा, ठीक है, न मानें, लेकिन पुलिस को अगर जरा भी सुराग मिल गया तो, तो फिर?-रामलाल । --तो क्या होगा ? अरे, हमारे पीछे मैनेजमेंट है। मैनेजमेंट के पास करोड़ों रुपया है । और पुलिस, तुम जानते हो, कुत्तों से भी बदतर है ।- चैतमकुमार । -तब ठीक है, तब हमें कोई चिन्ता नही !-रामलाल । -यह बताइए, क्या हमारा एक ही शिकार है ?-मिल्खीराम । - हाँ!--चेतनकुमार। और तो कोई वावेला नहीं कर रहा ?-मिल्खीराम ? ---नहीं । इसी का दिमाग मधिक खराब था !--चेतनकुमार । -साला वेवकूफ है, दो-चार हजार लेता, और शराफत से शहर घोड़ देता !-मिल्खीराम । -पांच हजार तक माफर किया गया था !-चैतनकुमार । --तो मरो माले, मब जहन्नुम में जाकर परोपकार करना!- मिल्खीराम। -क्या इसे भव कुछ अधिक माफर किये जाने की सम्भावना है ? बधनी। -~भव कोई चान्स नही, भब यह सिर्फ मरेगा!-चेतनकुमार । ---तो फिर देर क्यों ?-मिल्खीराम । देर कोई नहीं, मेरी तरफ से कोई देर नहीं, साहब को मालूम हो चुका है, मोर उनकी इजाजत है।-चेतनकुमार । -सब कैसे होगा?--मिल्खीराम । -पहले इसे कुछ फ़िजूल की यातनामों में से गुजरना होगा, बीस- पचीस मिनट तक। फिर रस्सी का फन्दा कस कर गला घोंटा जाएगा। उसके बाद शहर के बाहर सड़क पर फेंकार ट्रक से-चेतनकुमार । लेकिन एक बात है ?-रामलाल ।

आवाज़ || १५ --क्या ?-चेतनकुमार। -यह अन्दर वालों की तरह नहीं है। यह बाबू तबका का है । किसी को इसके गायब होने के बाद जरा भी शक हो गया तो बवंडर खड़ा हो सकता है, पुलिस-इंक्वायरी बैठ सकती है !-रामलाल । -तुम भी पागल हो । भरे, हमने कोई किसी का ठेका ले रखा है ! कोई चाहे मरे, भाग जाए, या शराब पीकर ट्रक के नीचे माता फिरे, कम्पनी का इससे क्या संबंध है ? और इंक्वायरी करने वालों को सबूत कहाँ से मिलेगा? लेकिन खैर, मान लो"अव्वल तो ऐसा होगा नहीं" लेकिन तुम मान लो, कि पुलिस को पूरा सबूत मिल जाता है, तो फिर उससे क्या होगा? कुछ भी तो नहीं । इंक्वायरी करने वालों को चांदी के चार-चार जूते पड़ेंगे और वे बकरी की तरह में में करते हुए मागे-पीछे घूमेंगे।-चेतनकुमार। -यह तो आपने विलकुल सही कहा-रामलाल । दरवाजा फिर खुला। एक रौबदार व्यक्ति अन्दर पा गया। यह परसनल माफिसर था, सिनहा । उसने मेरी तरफ देखकर अकस्मात् पाश्चर्य प्रकट किया। कैसा आश्चर्य ? उसने मेरी पिंडली के आर-पार छुरा देख लिया था। उसने पूछा-यह क्यों? -इसे चुप कराने के लिए। इसने हम पर वार करने की कोशिश की थी।-चेतनकुमार झूठ बोल गया । सिनहा ने एक इशारा किया। तीनों गुर्गे पोर पांचों दूसरे व्यक्ति वाहर चले गये। सिनहा ने कहा-मिस्टर चेतन, मैंने तुम्हें फोन किया था, तुम मिले नही, इसलिए सोचा तुम यहीं होगे। सुनो, पहले वाली स्कीम मैंने कसिल कर दी है। उसमें थोड़े खतरे की गुंजायश है। मैंने दूसरा प्रबन्ध कर लिया है। तीसरी शिफ्ट के शुरू में इसे सबसे बड़ी वाली फर्नेस में फेंक दिया जायगा । उसके लिए तुम्हें कुछ नहीं करना है। एक मादमी पाएगा , १६ || थके-हारे भोर इसे ले जाएगा। प्रभी तीसरी गिफ़्ट शुरू होने में साढ़े तीन घण्टे बाकी हैं। इस बीच तुम बाहर गये लोगों को समझा सकते हो कि समझौता हो गया है। और हम इसे छोड़ रहे है। समझ गये न मतलब ? मेरे ख्याल में इन लोगों को समझा देना ही ठीक रहेगा। क्यों कहीं कोई भी कमजोरी रह जाए ! तारकोल-पुती दीवारों का मतलब मब मेरे सामने था। भव मेरी समझ लौट मायी थी। एक ही शब्द फर्नेस ने इस जगह की सारी वास्त- विकता को मेरे सामने नंगा कर दिया था। ऐसे ही पांच-छः मौर कमरे इस कमरे के अगल-बगल में हैं। और यह जगह फैक्टरी से जुड़ी उसकी एडमिनिस्ट्रेशन विल्डिङ्ग के नीचे की बेसमेंट है, गोदाम, यहाँ रेकार्ड रखे जाते हैं। इसके सम्बन्ध में मैंने कभी पहले अपने एक साथी भाडिट क्लर्क से सुना था । दीवारों पर तारकोल शायद इसलिए पुती थी कि कीड़े या चूहे या दीमक कागज खराब न करें। इन दोनो ने बाहर जाने से पहले एक-दूसरे को भरपूर नज़रों से देखा। सिनहा ने कहा-यह छुरा पिंडली में से निकाल मौर बाहर जाकर जिसका हो उसे दे दो। चैतनकुमार ने छुरा खोच लिया। दोनों बाहर चले गये। अन्दर जैसे अंधेरा छा गया, जब कि बिजली जल रही थी। अब मैंने सोचा, फ़िलहाल मैं माजाद हूँ। अब मैं अकेला था। तारकोल-पुती दीवारें। बिजली की रोशनी । फर्श पर सून । दरवाजा बन्द । इन सब के बीच मैं भकेला या। अकेला होना माजाद होना नहीं होता। फिर भी मुझे एक मुक्ति, एक जबर्दस्त छुटकारे का महसास हुमा । उन लम्बी, मजबूत, ऊंची दीवारों के बीच मैंने अचानक अपने को भाजाद पाया । मैं खुश था। यह निश्चित पा कि यह भाजादी वाई-तीन घण्टे से अधिक समय के लिए नहीं थी। फिर भी यह मेरी भाखिरी माजादी थी । यहाँ से निकल पाना मसम्भव था, मैं जानता था!

मावाज || १७ वे निश्चित समय पर पाएंगे, और मुझे ले जाएंगे। मैं उनकी कौम को जानता था। मचानक यह विचार मेरे पन्दर पैदा हुमा कि मैं अब इस संसार में नही रहूंगा। यह एक ऐसा झटका था जिसे मैंने अपने प्रत्येक अंग में मह- सूस किया। दुःख की एक स्थिति मेरे चारों मोर फैल गयी, बल्कि मेरे मांस पर चिपट गयो । परन्तु यह क्षणिक था। इस दुख का प्रभाव धीरे- घोरे नही, एक झटके से ही गायब हो गया। यह शायद इसलिए हुमा कि मेरे दिमाग में एक बार फिर यह बात मायी कि इस समय तो मैं माजाद हूँ। फिर सारी बातों का विश्लेषण करने लगा । यह जो कुछ हो गया था, उसको मुझे बिलकुल उम्मीद थी। लेकिन वे मुझे यों भट्टी में झोंक देंगे, ऐसा मैंने न सोचा था। लेकिन एक तरह से यह प्रच्छा ही होगा, मैंने सोचा, मुझे मरने में कितना समय लगेगा? सिर्फ एक सेकंड, हद-से-हद तीन सेकंड। मैं बडी मासानी से अपनी मौत के बारे में सोच गया । मुझे कोई डर नही लगा। मैंने सोचा, यह कैसी मजीव स्थिति है। यानी मौत का डर न लगना । जव कि सब कुछ तय है । सब-कुछ । ढाई या तीन घण्टे का समय, और मुझे मरना है ।....मैंने सोचा, मैं कोई महापुरुष नहीं हूँ, देश- भक्त भी नहीं हूँ, पागल कुत्ता भी नही हूँ, किसी भी तरह से मसाधारण भी नहीं हूँ .....इसलिए इस भयावह धक्के से मेरा दिमाग सुन्न हो जाना चाहिए था या खाली....लेकिन मैं तो सोच रहा था। फिर ? फिर क्या ? यदि मैं डर नही रहा, तो....तो बेहद प्रसाधारण सही, अच्छा तो है । कारण-वारण के पीछे पड़ने से क्या फायदा.कि मैं क्यों नही डर रहा? वस नहीं डर रहा। अच्छा ही तो है । तो मैंने वल्व की तरफ देखा । बल्ब वैसे ही जल रहा था । मुझे एक बार फिर लगा, मैं भाजाद हूँ। अचानक मैं बैठ गया। इसलिए कि पड़े-पड़े में बेहद थक गया था। मेरी उस टांग से अभी तक लहू बह रहा था। टांग में दर्द भी था । भोर ज्यादा लहू बह जाने से ही शायद थकावट मौर सारे शरीर में कमजोरी १८॥ थके-हारे भर गयी थी। मैंने देखा, कमरे में जगह-जगह, बल्कि हर जगह खून था। कुछ जम गया था, कुछ अभी भी नम लगता था। मुझे लगा, मेरी मां ने मुझे पैदा करते वक्त भी इतना खून नहीं गिराया होगा। ....एक प्रश्न तभी मेरे अन्दर पैदा हुमा । अचानक मैं सोच गया, मेरा यह खून क्या बेकार चला गया ? मुझे मफसोस हुमा। यह भी लगा, मेरे अन्दर का असली मैं खत्म हो गया है और जो वचा है वह व्यर्थ है, फिजूल है, वह सिर्फ सजा भुगतने के लिए बचा । मैं हीन भावना में घिर गया । मैंने सोचा, मेरी मावाज क्या लुप्त हो गयी ? आवाज क्या यूं पलक झपकते गुम हो जाया करती है ? मुझे अपने कुछ साथी याद आ गये । हो, उन्हें मपना साथी ही कहूँगा। लेकिन दर्द कम न हुआ। दर्द बराबर था । मैंने पीठ दीवार से टिका ली और टांगें पसार दीं। जब मैंने सामने देखा तो मैं हैरान हुमा। जिस दीवार से टेक लगाये मैं बैठा था, दरवाजा ठोक उसके सामने था। अब तक मैं दीवारें-ही-दीवारें या बल्ब को देखता रहा था। दरवाजे को मैंने देखा ही न था। उसे मैं शायद देख हो न पाया था। या उसे देखा भी था तो उसने मुझे इतना प्राकर्षित नहीं किया था, चौंकाया नहीं था, जितना भव । वह वैसे ही बंद था। बाहर उसमें ताला भी लगा होगा, में जानता था। मैं एकटक उसे देखे जा रहा था। मुझे बार-बार ऐसा लग रहा था कि मैं उठ कर उसे मन्दर की तरफ खोचूंगा तो वह खुल जाएगा, और मैं यहां से भाग जाऊँगा। हालांकि ऐसा हो, तो अच्छा ही होगा। लेकिन मुझे यह सब अजीब लग रहा था । बेहद अजीब । डर की तरह मजीव । यह सब बेवकूफी है , यह हर या माश्चर्य । मूर्खता है। मैंने मांखें बन्द को तो एक दृश्य सामने उभर माया.... .....मैंने दरवाजा खोला मोर मन्दर चला गया मोर कुर्सी पर बैठ गया। पर्सनल मफसर सिनहा ने सिर नहीं उठाया। यह उसकी मादत थी। किसी को यह बात करने के लिए बुलाए या खुद कोई उससे बात करने उसके पास जाए, तो वह इस सास वक्त कागज पर कुछ-न-कुष आवाज || १६ - - जरूर खींचने लगता था। मुझे गुस्सा मा गया, परन्तु मैं शांत रहा। लगभग एक मिनट बाद उसने कलम नीचे रखी मोर मुस्कराया। फिर लगातार मेरी आँखों में और मेरे चेहरे पर गौर से देखता रहा। सुना था कि एम० ए० में उसने मनोविज्ञान लिया था। फिर उसने कहा- मिस्टर सक्सेना.... मुझे धक्का लगा। मैंने प्रांखें खोल दी। मैं हैरान था। अचानक ही पीछे की बातें याद आनी शुरू हो गयी थी। मैंने दरवाजे की तरफ देखा। सोचा, अब इन बातों को याद करने से क्या होगा, जब कि अब वक्त इतना कम है । और अचानक ही यह ख्याल आया कि जोवन का यह इतना कम पौर आखिरी समय दुखी होकर क्यों बिताया जाए? इस वक्त कुछ याद करना शायद बेहतर हो । इस ख्याल मैं माश्वस्त हुआ । मैंने फिर मांखें बन्द कर लीं- ....पर्सनल भफ़सर सिनहा ने कहा-मिस्टर सक्सेना, कैसा चल रहा है? मैंने कहा-जी, ठीक है, सर । उन्होने फिर कहा-सब ठीक है ? -जी! -पापको कोई दिक्कत तो नहीं ? -जी, नहीं सर। -कोई भी शिकायत नहीं। -जी, नही सर! सिनहा ने फिर मेरी मांखों में घूरना शुरू कर दिया। मैंने नजर मुका ली। वह मुझे घूरता रहा। मेरे माथे पर पसीना मा गया। उसने कागज काटने वाली प्लास्टिक की छुरो हाथ में ले ली थी और उसे शीशे के पेपरवेट से बजाने लगा-टक-टक । उसने कहा-मिस्टर सक्सेना, इधर मैंने कुछ सुना है ? -किस सम्बन्ध में? - २०॥ थके-हारे -मापके सम्बन्ध में । -यया? -क्या आपको नही पता? - मुझे तो नहीं पता। सिनहा चुप हो गया। फिर तुरन्त ही शुरू हुमा--पापको कोई शिकायत है ? -तो फिर मैं क्या सुन रहा हूँ ? -क्या? मापको नहीं पता? -~-मुझे तो पता नहीं है। ~मेरे पास शिकायत पहुँची है। -क्या? -क्या आपको पता नहीं? -मुझे तो कुछ मालूम नहीं। माप कुछ गड़बड़ करने की कोशिश में हैं ? -मेरे पास पक्का सबूत है। -पाप लोगों को भड़का रहे है। -भार यह मापके हक में बिलकुल अच्छा नहीं होगा। मेरे माथे पर जो पसीने को बारीक तह थी, वह एकदम हो गायब हो गयी। इसलिए कि अब कुछ भी छिपा नपा, और अब मिझकने या संकोच करने की कोई जरूरत भी न थी। सिनहा जोश में था। उसने कहा-माप जो चाहते हैं वह यहाँ हर- गिज न होगा, कम-से-कम मेरे रहते हुए । मैं तो समझता था, माप सायल भावाज || २१ है, लेकिन मेरा ख्याल गलत निकला। मुझे मापसे ऐसी माशा विलकुल न यो। पौर अब दो ही बातें हो सकती हैं, या तो माप अपनी हरकतों से बाज माएं या इस्तीफा देकर यहां से चले जाएं। मुझे सुद भापकी इज्जत का खयाल है, वरना पापको निकालने में जरा भी देर नहीं लगेगी।.... अव कहिए, आप क्या चाहते हैं ? मुझे मापका फैसला. ममी चाहिए। मैंने सोचा, पर बात को खत्म ही कर लेना चाहिए। अच्छे मौके पर वार करना ही बुद्धिमानी कहलाती है। मैंने अपनी बात एक छोटे भाषण की शक्ल में उसके सामने रखी-सिनहा साहब ! मुझे लगता है कि आपको कोई बहुत बड़ी गलतफहमी है । मैं भापको पता हूँ, मुझे जो काम करना है वह करना ही है ! मुझे माप या कोई मौर रोक नहीं सकता, दवा नहीं सकता । मेरी नौकरी लेने की जो मापने धमकी दी है, तो उसे माप अपने चूतड़ों में घुसेड़ लीजिए ! माफ कीजिए, मैं ऐसा ही कहने पर मजबूर हूँ। भोर पापको बता दूँ, मुझे आपकी इस डेढ सौ रुपल्ली वाली नौकरी की कोई चिन्ता भी नहीं है ! आप चाहें तो लायल बनते फिरिए ! मैं ऐसा नहीं बन सकता ! मुझे क्या जरूरत है ? जब मालिक मेरे या हमारे प्रति लायल नहीं है तो मुझे या हमें उनके प्रति लायल बनने की क्या जरूरत है ? यह लायलटो दोनों भोर से होनी चाहिए ! समझे माप ? एक बात मैं पापको और बता दूँ, मेरी नौकरी लेना इतना आसान नहीं है, जितना आप सोच रहे है । मैं एक-एक की मां की....और मैं देखता हूँ, तब भाप भी कैसे नौकरी कर पाते है। और मैं उठकर बाहर मा गया । शाम को छुट्टी होने से आधा घण्टा पहले ही शार्ट लीव लेकर मैं शर्मा के कमरे पर चला गया। तब तक स्टाफ के लगभग सभी लोगों में यह किस्सा फैल 'चुका था, यह मैने जान लिया था । जरूर कोई सज्जन या दुर्जन पर्सनल अफसर के कमरे के बाहर खड़ा सारी बातें सुन गया था। छतरी . स14 २२ ॥ थके-हारे दाखिल होते ही उसने गहरी नजरों से सब तरफ देखा। फिर कमरे में वह चक्कर लगाने लगा। वह कुछ बोला नहीं। वह बहुत बेचैन लगता था। मैंने अनुमान लगाया, वह अपने कमरे में मेरी उपस्थिति से ज्यादा परेशान था। उसकी यह वेचैनी-परेशानी की स्थिति काफी देर तक बनी रही। फिर वह बोला--तुम मेरी बात का बुरा न मानना । मैं तुमसे जो कह रहा हूँ उसे तुम ध्यान से सुनो! तुम यहां से अभी चले जामो, भौर काफी दिनों तक यहां मत माना। फैक्टरी के आस-पास कभी मुझसे कोई बात भी न करना । मैं बहुत गरीब मादमी हूँ। मुझसे जरा ही छोटी मेरी एक बहिन है, मुझे उसकी शादी करनी है। घर पर बूढ़े बाप है जो बहुत बेचारे हैं और कुछ नहीं करते । मुझे उन सबके लिए खर्च भेजना होता है । यह मेरे लिए जरूरी है। मगर मेरी यह नौकरी चली गयी तो मेरे साप ही उन सबकी भी बुरी हालत हो जायगी। मैं पहले ही समझ गया था कि वह कुछ ऐसी ही बातें करेगा । वह कुछ ऐसे ही मूड में कमरे में दाखिल हुआ था। उसने फिर शुरू किया-तुम मेरी इन बातों से मुझे कमीना, दब्बू, डरपोक समझने सगे होगे । तुम्हारा ऐसा समझना सही भी है । लेकिन.... लेकिन मैं क्या कर सकता हूँ ? क्या कर सकता हूँ? यह भी सही है कि मेरो माज की इन बातो से मेरे पिछले तमाम विचार रद्द हो जाते हैं । लेकिन मैं क्या कर सकता हूँ? मुझमें समझ है, मैं तुमसे भी कहीं ज्यादा तेज है. तुम जानते हो। लेकिन मैं विवश हूँ। निहायत विवश । मेरी परिस्थितियां हो ऐसी है । मेरी इन्ही परिस्थितियों ने मेरी मात्मा को हत्या कर दी है । और भव में इस सच्चाई पर पहुँच चुका हूँ कि मैं कुछ नही कर माता, बुध नही । मैं कोई काम नहीं कर सकता, मैं मर चुका हूँ। शर्मा रोपा मैकिन यह माटफ नहीं था। यह रोने में सच्चा था। मुप देर म चुप रहा । मुझे मगा कि मेरे लिए मद यहां कुछ नहीं -- 'भावाज,॥ २३ है । मुझे वहाँ बैठा रहना मुश्किल लगा। तब मैं बाहर चला पाया । थोड़ा मागे माने पर मुझे खाली रिक्शा मिल गया, जिसमें बैठकर मैं अपने कमरे तक पहुंच गया। कमरे में खाने के लिए कुछ न था। अंधेरा होना शुरू हो गया था। मैंने बत्ती नहीं जलायी और ऐसे ही चारपाई पर लेट गया । इस समय मैं इस बात की खोज कर रहा था कि शर्मा की भाज की बात से मुझे कुछ तकलीफ या अफसोस हुमा है कि नही । लेकिन उसकी बात का मुझ पर कोई विशेष असर नहीं हुमा था। यह स्वाभाविक था। हालांकि इस सारी खुराफ़ात की शुरूपात शर्मा के कारण ही हुई थी। बल्कि एक तरह से उसी ने इसे शुरू किया था। इस सब की जड़ में वही था। वही मुझे कोंचता, उकसाता, समझाता रहता था । बार-बार, बार- बार, बार-बार । वह जवर्दस्त कन्वेसर था, जब कि मैं भी अपने को किसी से कम न लेता था। लेकिन मैं मान गया था कि वह वह ही है, मैं उसे नही पा सकता । शर्मा फैक्टरी के स्टाफ़ क्लब का संयोजक था, स्टाफ़के लोगों में काफी प्रिय और रोब वाला और काफी मिलनसार भी । मैं इस फैक्टरी में भभी नया हो था, इसलिए अपने मतलब से मतलव रखता था, शान्त रहता था, कम बोलता था। अधिकतर मैं क्लब नही जाता था। यदि जाता भी था तो किसी से खास सरोकार नही, दो-एक समाचार-पत्र या पत्रिकाएं उलटी-पलटी और वापस । बाद में अपना यह रवैया मुझे खुद ही भद्दा- सा लगने लगा । यानी अपना इतना शान्त रहना और किसी से न बोलना। क्लब द्वारा तिमाही या छमाही कोई-न-कोई विशेष कार्यक्रम मायोजित होता ही रहता था। शर्मा इस माने में बहुत मेहनती मोर दिलचस्प भी पा। कभी फैन्सी ड्रेस का कार्यक्रम, कभी-कभी कोई नाटक, कभी सिर्फ डिनर- र साथ में संगीत, कभी कविता-प्रतियोगिता, कमी वाद-विवाद-प्रति- योगिता, कभी हंसी-मजाक का रंगारंग कार्यक्रम । मैं जब कालेज में पढ़ता या तो अक्सर वाद-विवाद प्रतियोगितामों में भाग लिया करता था मौर लगभग हर बार इनाम भी जीत लाता था। मेरा गला भी बहुत साफ मोर प्रच्छा था और मैं फिल्मी गाने, ग़ज़लें या गीत गाकर सड़कों को खुश 1 २४ || थके-हारे करता रहता था। इस क्लब में भी ये चीजें मेरी सहायक बनी। मतलब कि थोड़ी जानकारी बढाने के लिए, थोड़ा रोब गालिब करने के लिए। अबकी बार क्लब की भोर से जो वाद-विवाद प्रतियोगिता का मायोजन हुमा, तो उसमें मैंने भाग लिया मोर जैसी मुझे उम्मीद थी, उसमें मैं मन्वल रहा। मैं खुश हुआ । इसका जो विशेष फायदा मुझे हुमा वह यह कि मैं स्टाफ के साढे-छः सौ लोगों में एकदम मशहूर हो गया । प्रतियोगिता में भाग लेने का मेरा सबसे बड़ा मकसद था भी यहो । मशहूर होना । मशहूर होना, ऐसे ही । परन्तु इससे जो सबसे बड़ा फायदा हुभा वह यह कि शर्मा ने मुझे पहचान लिया । वह मेरे बहुत करीव आ गया । मुझे भी सुशी हुई। एक अच्छे व्यक्ति को अपने करीब पाकर खुश होना स्वाभाविक ही था। शर्मा फैक्टरी में तीन-चार साल पुराना था। उसकी तनख्वाह इस समय एक सौ नब्बे थी। यकीन नहीं होता था कि आज की स्थितियों में इतने पैसे में कोई अपने-मापको इस ढंग से ठीक-ठाक रख सकता है। वह पढता भी खूब था । हर समय व्यस्त दीखता । मोटी-मोटी पुस्तकों से जूझता रहता। माप उससे किसी भी विषय या समस्या पर बात कर लीजिए । उसे लिखने-विखने का शौक नही था, मगर वह एक साहित्यिक संस्था का सदस्य भी था। इस संस्था में फैक्टरी के दो-तीन कवि-शायर-लेखक पे भौर दो-तीन शहर के भी ऐसे ही लोग । ये सब तोकल प्रतिभाएं थी । शर्मा ने मुझे भी इस संस्था का सदस्य बनया दिया, पता नहीं क्या सोचकर । संस्था को बैठकें हर पन्द्रह रोज़ में बाकायदा होती थी । शर्मा जरूर जाता। वहाँ यह ऐसे बोलता, जैसे वाकई हो यह एक मजा हुमा लेसक हो । यही तो उसमें खासीयत थी । वह जहाँ या जिस विषय पर भी धोलता हमेशा ठीक मुहावरे से ही बोलता। इसो संस्था की बैठकों में वरावर जाने से मैं शर्मा के अन्दरूनी विचारों से पूरी तरह से अवगत हुपा । वह प्रगतिवादी या, सर से पांव तक । भोर फिर उसने मुझे भी न छोड़ा। तब पहल भी उसी ने की । एक दिन उसने सप्ट कह दिया--देखो आवाज || २५ सक्सेना, एक काम हम लोगों को करना है। वह यहां आज तक नहीं हुमा । नही हो पाया । कुछ तो स्टाफ के लोगों की कमजोरी और कायरता के कारण और कुछ मालिकों और उनके गुर्गों तथा जासूसो के अधिक सतर्क होने के कारण । हम स्टाफ के साढ़े छः सौ लोग लगातार मर रहे है । यह काम जिसे हमें करना है वैसे अधिक कठिन नहीं है, लेकिन योजना- बद्ध ढंग से यदि यह पूरा हो जाए तो कोई बात बने । देखो, फैक्टरी के चार हजार मजदूरों की एक यूनियन होने से इन मजदूरों की शिकायतों की सुनवाई हो जाती है । इसी तरह से यदि स्टाफ के लोगों का भी एक संगठन बन जाए तो हमारी शिकायतों की भी सुनवाई होने लगे। देखो, एकदम अनपढ और जाहिल मजदूर मापस में एकट्ठा होने का महत्व समझ सकते है । स्टाफ के लोग तो खासे पढ़े-लिखे है, उनके बुद्धि है, समझ है, काब- लियत है । अगर तुम साथ दो तो और हमने काम शुरू कर दिया था । हमें जल्दो नहीं थी। हम चाहते थे कि काम चाहे बहुत धीरे-धीरे हो, चाहे इसमें एक वर्ष लग जाए या दो वर्ष या तीन वर्ष, लेकिन काम ठोस हो, पक्का हो, सही हो, किसी गड़बड़ी का अंदेशा न रहे । हमने काम योजनाबद्ध ढंग से शुरू किया था । हम भीड़ इकट्ठी न करते थे, मीटिंग न बुलाते थे, किसी जलसे या हजूम का आयोजन न करते थे । हम एक-एक व्यक्ति के पास जाते थे । उससे अलग-अलग बात करते थे। बातें अधिकतर मैं ही करता था, लेकिन शर्मा मेरे साथ रहता था। इसलिए लोग समझते कि मेरी बात के पीछे वह भी है । इससे दुगुना असर होता। इस तरह कुछ ही दिनों में हमने दो-चार साथी भोर भी तैयार कर लिये, जो स्टाफ के दूसरे लोगों से भी इसी मकसद से बातचीत करने को तैयार हो गये । हमारी योजना थी कि लगभग पचास लोग भी पूरी तरह से हमारे साथ मा जाएं तो एक बड़े हल्ले के बारे में सोचा जाए । तब कुछ पर्च-वर्चे छपवाकर भी बांटे जा सकते थे। लेकिन हमारा काम जोखम और मुश्किलों से भरा था। क्या पता, स्टाफ में कौन-कौन मैनेजमेण्ट के जासूस थे । स्टाफ में कम-से-कम पालीस व्यक्ति तो मालिकों २ २६ || थके-हारे के अपने थे ही, यह हमें पता था। भोर इन लोगों से बच पाना या इनसे छिपकर कोई हरकत करना बड़ा ही कठिन था। स्टाफ में मैनेजमेण्ट के ये जासूस सबसे अधिक सुखी थे। चाहे ये लोग मपना दफ्तर का काम करें या न करें, हर साल इनको पालीस-चालीस, पचास-पचास रुपये की तरक्की जरूर मिलती थी। ऊपर से इनाम-इकराम अलग। पकड़ाई-धकड़ाई का मुभावजा अलग । मोर भी कई तरह की सहूलियतें । ये लोग हर वक्त इसी फ़िराक में रहते थे कि पकड़ाई-धकढ़ाई का कोई मौका मिले । लेकिन हम भी कोई वेवकूफ या कमजोर न ये। हमारी सबसे बड़ी शक्ति हमारी सच्चाई थी, जिससे हम अपने साथियों को अच्छी तरह प्रभावित कर सकते थे। हमारे पास भाषा थो, हमारे पास अपने उद्देश्य को लेकर ठोस बातें थी और सबसे बड़ी चीज कि हम लोगों में कोई घर- राहट न थी, मोर हम अपने इस काम के लिए अधिक से अधिक परिचम करने को तैयार थे। यह तो हकीकत थी कि स्टाफ का हर व्यक्ति दवा हुआ था, नाउम्मीद था, भाग्य पर माश्रित था । हमने उन्हें उनको कमियाँ बताकर उन्हें झटका देकर सचेत करना शुरू किया। हमने उन्हें बताना शुरू किया कि इस तरह से तो हम मर जाएंगे, हमें कम-से-कम एक कोशिश तो ज़रूर ही करनी चाहिए । कुछ लोगों ने हमारी बातों को ध्यान से सुना । कुछ ने हमें शक की निगाह से भी देखा कि शायद हम मैनेजमेण्ट के मादमी हों भौर उनका भेद ले रहे हों। ऐसे लोगों को हम पर किसी प्रकार भी यकीन ही न होता था। इनके दिमागों में जंग लग चुका था। इन लोगों की सहन-शक्ति भी कमाल की थी। ये सालो से ऐसे ही घिसटते चले मा रहे थे। लेकिन महंगाई-भत्ते के लिए भी कुछ कहने को तैयार न थे। वे मकान अलाउंस की बात नहीं उठा सकते थे। वे बेसिक सैलरी को बढाने की मांग नही उठा सकते थे। वे वार्षिक तरक्की की धांधली के विरुद्ध कोई प्रावाज नहीं उठा सकते थे-कि क्यों मैनेजमेण्ट के जासूसों को वार्षिक तरक्की के चालीस या पचास रुपये मिलते है भौर इन जैसे घिस्सू, मेहनती भौर शरीफ लोगों को दस रुपये भी नहीं मिलते । "यही तो हमारी भावाज || २७ शिकायतें थी। हम कौन-सा फैक्टरी को मल्कियत में हिस्सा चाहते थे। परन्तु ऐसे लोगों का हमारी बात के विरुद्ध एक बड़ा तर्क यह था कि फैक्टरी की तरफ से स्टाफ को पहले ही बहुत-सी सुविधाएं प्राप्त है । जैसे, हायर पर्चेज-सिस्टम के तहत प्राप सिवाय औरत के, अपनी तनख्वाह की हद में, कोई भी चीज खरीद सकते थे। फिर कैण्टोन को सुविधा, फेपर- प्राईस-शाप की सुविधा, और फिर एडवांस प्राप्त करने की सुविधा । और क्या चाहिए? ये क्या कम सुविधाएं थीं ? ऐसी दलीलें देने वाले लोग वही थे, जो कि मन्दर से निहायत कायर, दब्बू और कमजोर थे मोर वे हमें इस- लिए समर्थन देने को तैयार न थे कि कहीं कुछ गड़बड़ हो गयी तो उनकी ये न्यूनतम सुविधाएँ, ये छोटे-छोटे सुख भी छिन जाएंगे। इन लोगों को इस असलियत की समझ न थी कि ये सब सुविधाएं मैनेजमेण्ट' के जाल थो, मजबूत फंदा । ये सुविधाएं न थी, ये ऐसे टुकड़े थे, जो पालतू कुत्तों के सामने फेंके जाते है, ताकि वे गुलाम बने रहे । मैनेजमेण्ट तो चाहता ही था कि ये लोग हमेशा उधार और किस्तों को चुकाने के चक्कर में ही फंसे रहें ताकि स्वतन्त्र रूप से कुछ सोचने की उनकी शक्ति ही क्षीण हो जाए मोर वे कभी भी यह समझ न सके कि मैनेजमेण्ट उनका शोषण कर रहा है। हम अपने साथियों को अपनी यथार्थ स्थिति और कमजोरियों के बारे में बताते । यानी कि हम लोगों को हमेशा उल्लू पौर मूर्ख नहीं बने रहना चाहिए । कुछ लोगों ने हमारी बातों को समझना शुरू कर दिया था और वे तैयार हो रहे थे। इसी तरह लोगों में काम करते हुए तीन-चार महीने बीत गये। मगर अचानक"मचानक बीच में ही कुछ गड़बड़ा गया । किसी जासूस को हमारा कार्यक्रम मालूम हो गया और उसने मैनेजमेण्ट को मागाह कर दिया । चेतनकुमार, जो कम्पनी की तरफ से स्टाफ क्लब का स्थायी सेक्रेटरी था, मुझे कनखियों से पूरने और होंठों में मुस्कराने लगा।" मुझे शर्मा के शब्द फिर याद मा गये। जब शर्मा ही पीछे हट गया तब दूसरे लोगों से क्या उम्मीद की जा सकती थी? परिस्थिति तो किसी की भी ठीक नही थी। विवश तो हर कोई था । जब सबसे भागे बढ़ा .

२८ || थके-हारे हुमा शर्मा हो अपनी व्यक्तिगत समस्यामों को लेकर ठण्डा हो गया था, अपने तमाम विचारों को एक सेकण्ड में बदल दिया था और रो भी दिया तो बाकी लोगों के बारे में क्या कहा जा सकता था ? फिर भी उनसे मिल लेना मैंने जरूरी समझा। मैं झट से बिस्तर से उठ खड़ा हुमा। भव कुछ तो करना ही था। या तो अपना यह काम करना था निडर होकर, सीना तानकर, या सुबह माफी मांग लेनी थी या बिना किसी को बताये, बिना इस्तीफा दिये दूसरे शहर चले जाना था। सबसे पहले मैं रामकुमार पंगासा के घर पहुंचा । वह घर पर ही था। उसने मुझे बैठाया भौर मपनी पलो से चाय के लिए कहा। मैंने शुरू किया तुम्हें प्राज की घटना का पता.... -हो-उसने सीधे मोर तुरन्त कहा-मेरी सलाह है कि तुम माफी मांग लो। इसके सिवा और कोई रास्ता नहीं है। तुम्हें सिनहा साहब से इस तरह बात नही करनी चाहिए थी। मैंने तो जब से सुना है, परेशान हूँ कि कहीं तुम्हारे साप मैं भी न पीस दिया जाऊँ। तब क्या होगा? भाजकल नौकरी कहाँ मिलती है ? भभी थोड़ा-बहुत मिल तो रहा है, किसी तरह गुजारा तो हो रहा है, दिन तो कट रहे है । भाई, मैं तो तुम्हें भी यही राय दूंगा कि तुम.... माधा घण्टे तक मैं रामकुमार से बहस करता रहा । मगर सब फिजूल. रहा। फिर मैं कुन्दनलाल साहनी के पास पहुँचा। उसने कहा-सुम ऐसी चैवकूफी कर सकते हो, मैं तो सोच ही नहीं सकता था । तुम खुद तो भरोगे हो, साथ में हम लोगों को भी मार दोगे। तुमने क्या समझकर सिनहा साहब से ऐसी बातें की ? तुम्हारी क्या ताकत है? क्या तुम समझते हो कि यापू सबका अपनी नौकरी खतरे में गलकर तुम्हारा साथ देगा ? फिर ममी तो तुम्हारा कोई संगठन भी नहीं बना है, कोई यूनियन भी नहीं है । तुम्हें ऐसे दुस्साहस से काम नहीं लेना चाहिए पा, तुमने यह यह भारी गलती भावाज || २६ की है । तुम सिनहा साहब के पास जाकर माफ़ी मांग लो। शायद वे तुम्हें माफ़ कर दें। और कोई चारा नहीं है । अमरनाथ सीकर के यहाँ भी मुझे ऐसी ही बातें सुनने को मिली। फिर मैं किसी के यहाँ न गया। किसी से भी मिलना वेकार था। अब कोई भी मेरे साथ न था । बल्कि वे तो यह भी चाहते थे कि मैं खुद भी अपना साथ छोड़ दूं, अपना काम मौर विचार छोड़ दूं, शून्य हो जाऊँ, और अपनी नौकरी बचा लूं। याने कि मैं सीधे माफी मांग लूं। मेरे लिए अब सोचने को यही बात थी कि मैं क्या करूं? माफी मांग लूं या लई ? काफी देर तक सोचने के बाद पाखिर मैंने निर्णय लिया कि मैं लई गा, चाहे जो हो । दरअसल मैं ऐसी स्थिति का मुकाबिला करने की बात सोच ही न पा रहा था कि मैं माफी मांगकर, सिर झुकाकर अपने उन सहकर्मियों के बीच चलू, जिनके साथ मैंने संगठन को वातें की थी, मैनेजमेंट से लड़ने की बड़ी-बड़ी बातें की थीं, जिन्हें बार-बार यह माश्वासन दिया था कि मैं उनके हित के लिए अपनी जान दे दूंगा । फिर उसी सिनहा के सामने सिर झुकाना, जिसे मैंने तिनके की तरह फूंक कर उड़ा दिया था, मेरे लिए मौत से भी बदतर चीज़ होती। एक बार जब मैंने लड़ने की बात तय कर ली तो पता नही कैसे मैंने अपने अन्दर एक ताक़त महसूस की । यह ताकत वैसी ही थी जो आदमी में उस समय आती है जब वह लड़कर मरने के लिए तैयार हो जाता है। एक बात और भी मेरे दिमाग में थी। वह यह कि वे लोग मुझे मासानी से निकाल नहीं सकेंगे। मुझे निकालने के लिए उनके पास कोई ठोस वजह न थी। संगठन बनाने का जो काम मैं कर रहा था, वह कोई जुर्म नही था । वे कोई और वजह पैदा कर सकते थे, उनके लिए कुछ भी मुश्किल नहीं । वे मुझे फांसने के लिए कुछ भी कर सकते थे। हो देखा जाएगा, मैंने सोचा, मब मैं खुलकर संगठन का काम करूंगा, मिटिंगें करूंगा, पर्चे बाटूंगा.... दूसरे दिन में अपनी मेज पर बैठा हो या कि चपरासी ने मेरे पास भाकर साहब का सलाम बोला।

३०॥ पके-हारे सिनहा हमेशा की तरह एक-डेढ मिनट तक घुप रहा। फिर उसने कहा-आपकी कल की बातों के बावजूद मैंने फिर मापको बुलाया है, क्योंकि मेरा ख्याल है कि कल माप किसी कारण गुस्से में थे। मैं क्या कह सकता था? मैं चुप रहा । वह कुछ देर कुछ सोचता रहा । फिर कहा-अब मापका पया इरादा मैंने कहा-माप मुझसे हरते क्यों हैं ? पाप मुझे मासानी से निकाल सकते हैं ! उसने कहा-इससे क्या फायदा होगा? इसी बात को लेकर तो मैं कल गौर करता रहा । भापकी रोजी छीनकर हमें क्या मिलेगा ?....पाप कल रात कुन्दनलाल साहनी, रामकुमार पंगासा, पमरनाथ सीकर, देवेन्द्र- पाल शर्मा के पास गये थे न? उन्होंने मापसे क्या कहा ? मैं हैरान नही हुमा । सिनहा के लिए एक-एक बात जान लेना सम्भव था। यह मैं जानता था। मैंने सिर्फ इतना कहा-आपको तो इस खबर से खुश होना चाहिए। सिमहा ने धीरे से कहा-इसमें मेरे लिए खुश होने की कोई बात नही है । हो, मापके लिए सोचने की कुछ बात जरूर है । आप एक बहुत अच्छे कर्मचारी है । आप में दूसरे भी गुण है । मैं जानता हूँ कि मापकी योग्यता को देखते हुए पापको तनख्वाह बहुत कम है। इस विषय पर सोचता रहा हूँ। कल भी मैंने मैनेजमेंट से बात की थी । भापको यह जानकर खुशी होगी कि मैनेजमेंट ने मेरी सिफारिश मान ली है और मापको तनख्वाह पचास रुपये बढ़ा दी गयी है । अब भाप जाकर काम कीजिए । धन्यवाद ! मैं चला पाया। मैं चकित था कि ऐसा कैसे हुमा। मेरे लिए एक रास्ता निकल पाया था। लेकिन मेरे मन्दर तो एक चीज छिपकली की तरह उलटी होकर बिछ गयी थी। यह कोई कर्तव्य-भावना नहीं पी, कल्याण- भावना भी नही थी, यह केवल अपना सिर उठाये रखने की बात थी। मैं जानता था कि अगर मैंने अपना सिर झुका लिया मोर पचास रुपये की भावाज़ || ३१ तरक्की स्वीकार कर ली तो सब यही कहेंगे कि मैं अपना उल्लू सीधा करने के लिए ही यह सब कर रहा था। यह मुझे किसी भी हालत में सह्य न था। मैं तो सब की भलाई के लिए काम कर रहा था। सारी दुनिया मुझे वेवकूफ कह सकती है। महा-महा-महा बेवकूफ ! भला ऐसा अवसर किसे मिलता है ? मुझे तो सिनहा का शुक्रगुजार होना चाहिए था कि उसने मेरी गालो के वावजूद मुझे तरक्की दी थो । मुझे तो खुश होना चाहिए था। मैं अपनी मेज़ पर बैठा काम करता रहा और सोचता रहा । पास- पड़ोस का कोई भी मुझसे आंखें न मिला रहा था । शायद मेरी तरक्की की बात किसी को मालूम न थी। लेकिन मैं चाहता था कि उन्हें मालूम हो जाए और वे मुझसे पूछे और मैं उनसे कहूँ कि मैंने उसे ठुकरा दिया है। मैं स्वार्थी और मक्कार नहीं हूँ। शाम को छुट्टी हुई तो फाटक पर पाकर मैंने अचानक भाषण देना शुरू कर दिया। मेरी इस योजना के पीछे सिर्फ एक ख्याल था कि मेरी निडरता और साहस देखकर शायद कुछ भोर लोग भी निडर और साहसी होकर मेरे साथ मिल जाएँ, चाहे भावुकतावश, चाहे और किसी भावना से प्रेरित होकर । लेकिन मेरो इस योजना से कुछ भी फायदा हो, इसके पूर्व हो एक नयी चीज़ पैदा हो गयो । मैंने देखा कि मेरे चारों मोर मैनेजमेंट के जासूस ही मा खड़े हुए, मेरे उन साथियों में से कोई भी न माया, जिनसे मैंने पहले बातें की थी । एक तरह से मेरे दुश्मनों ने मुझे घेर लिया था। वे मुझे पूर रहे थे। लेकिन मैं बोलता रहा, बोलता रहा। मुझे विश्वास था कि लोग डर के मारे मेरे साथ भले ही खड़े न हों, मेरी मावाज जरूर उनके कानों में पड़ेगी मार प्रसर करेगी। भादमो इतना बहरा तो कभी भी नहीं हो सकता कि वह मपनी भलाई की मावाज न सुने । मैं बोलता रहा, बोलता रहा, जब तक कि फाटक पर सन्नाटा न छा गया । रात को मैं अपने कमरे में पड़ा पा। मुझे नोंद न भा रही थी। हर ।

३२ || थके-हारे क्षण मुझे लगता था कि मेरे दुरमन किसी भी क्षण प्रा धमकेंगे मौर मेरी टांग, बांह या सिर तोड़ देंगे। मैं किसी भी तरह बच नहीं सकता था। लेकिन यह....यह तो मैं सोच ही न सकता था, कि वे मुझे जकड़कर यहाँ लाएँगे और मेरे साथ इतनी भयंकरता से पेश माएँगे और मुझे जिन्दा फर्नेस में झोंक देंगे.... मैं बैठा-बैठा थक गया था। मैंने प्रांखें खोल दी। सामने दरवाजा था। उसके ऊपर का बल्ब जल रहा था। मैंने दीवारों को फिर देखा । थे उतनी ही काली थी । भयानक रूप से काली । भौर चमक रही थी। मैंने सोचा, अभी तो करीब पौन घण्टे के करीब वक्त गुजरा होगा। अभी तो काफी समय बाकी पड़ा है । अब क्या किया जाए ? क्या सोचा जाए? अब कुछ भी सोचने का क्या मतलब हो सकता ?....कि अचानक ही मुझे ख्याल माया, मैं बोल तो सकता हूँ, मावाज तो दे सकता हूँ, मेरी मावाज को गूंजने से कौन रोक सकता है ? मैं खडा होकर बोलने लगा। मेरे शरीर में पोड़ा भरी थी लेकिन मेरो मावाज़ में ज़िन्दगी को धड़कन थी। मेरे सामने जैसे हजारों का हुजूम खड़ा था और मैं बोल रहा था, बोलता जा रहा था कि अचानक मेरा पांव जमे हुए खून के एक लोदे पर पड़ गया । खून के उस बड़े लोंदे के चारों भोर चीटियां इकट्ठी हो गयी थीं। मुझे हैरानी हुई कि मेरा खून इतना मीठा कैसे हो गया। मेरा खून भगर इतना हो मीठा होता तो क्या मैं सिनहा की वात न मान गया होता? नहो-नही, यह मेरा खून नही था । भन्छा हुमा, यह मेरे शरीर से निकल गया । इस विचार से मुझे बेहद खुशी हुई। वास्तविक खुशी । मौर मैंने फिर दूने जोश से बोलना शुरू कर दिया ।

थके-हारे - सुबह-सुवह ही यह खबर सव लोगों में फैल जाती है कि इस एरिया में एक नयी लड़को पायी है । तब वह वहीं था । उसने होटल के बेरा शम्भू से सुना । शम्भू दूसरे बेरा को यह खबर दे रहा था । तब उसे रोमांच हो पाया। इस वक्त दस बजे थे। इस वक्त दस बजे थे, यह केवल उसका अंदाज था। वजने को कुछ भी बज सकता था, लेकिन यह सच है कि इस वक्त दस ही बजे थे । उसने किसी से पूछा नही था, उसके पास अपनी रिस्ट-वाच भी नही थो, बल्कि तब उसने होटल की दीवार-घड़ी की ओर देखा था। वह अपने इस अंदाज के ठीक निकलने पर प्रसन्न नही हुआ था। वह किसी बात पर प्रसन्न कभी नहीं होता, बल्कि प्रसन्नता के नाम पर हमेशा उसे हलका-सा रोमांच हो आता है। रोमांच का हो माना कोई बुरा नही, परन्तु प्रसन्नता की बजाय रोमांच का हो भाना अजीब जरूर है । ऐसा सिर्फ उसी के साथ है। और हर बार की रोमांच-चेतना पर वह चकित भी होता है । ऐसा क्या है, वह प्रसन्न होने की बजाय केवल रोमांचित हो हो पाता है ! क्यों ? प्रेम कहता है, सोचना मना है। इसलिए वह प्रश्नों के चक्कर में नही पड़ता और कुछ नहीं सोचता । प्रेम कहता है, खामो- पिनो और भौज उड़ामो।

३४ ॥ यके-हारे लिए प्रभावित परन्तु कई बार ऐसा होता है कि, कुछ भी न सोचने के बावजूद जब वह किसी बात से कभी रोमांचित होता, तो मुसकराता भी नहीं। यानी म तो वह प्रसन्न हो पाता है और न ही रोमांचित । यानी वह कुछ नहीं हो पाता । मौर हर बार ( जय भी, ऐसा होने पर भी ) वह चकित रहता है । वक का अंदाजा ठीक निकलने को उसको रोमांच स्थिति बहुत कम देर के लिए रही । बहुत सारी वात उसे बहुत ही कम समय मथवा उत्तेजित कर पाती है। बात सुनते ही एक सेज किस्म की उतावली उसके पेट से ले कर गले तक जरूर फैल जाती है, लेकिन कुछ ही क्षण पश्चात् उसको उस बात के प्रति प्रतिक्रिया होती है, यानी अपनी खुद की सोच से वह तुरन्त ही अघटित-सा बन जाता है । ऐसा हमेशा ही हुमा है । कुर्सी पर बैठे रहने के कुछ सेकंड पूर्व तक उस नयो लड़की को देख लेने की तीव्र इच्छा उसके मस्तिष्क को मथ रही थी, लेकिन उठने-उठने तक फिर सब कुछ शांत था। उसे पता नहीं, इस बात से शुरू से ही क्यों विरोध है कि जिस चीज को सभी सोचें, वह माम भापा वाली चीज होगी, यानो कॉमन, और उस भवस्था में खुद को भी झोंकता हुमा यह नाचीज नहीं होना चाहता। मतलब कि जैसा सभी सोचें, या जिस वस्तु को सभी एक साथ ग्रहण करें, वह बात उसके लिए उतनी महत्त्वपूर्ण नही बन पाती, जब तक कि उस वात को वह एक हो कर अपना न कर ले । यह उसका अपना सिद्धांत है । यह गलत और दूसरों को नापसंद भी हो सकता है। अपने इस सिद्धान्त से वह सिनिक भौर पागल भी कहा जा सकता है। लेकिन उसे यह पसन्द है। मोर उसकी पसन्द केवल उसको पसन्द है। मोर वह एक व्यक्ति है। उसे पता था कि जब उस नयो लड़को के इस एरिया में माने की खबर फैल गयी है, तो बहुत सारे लोग उसे देखने पा रहे होंगे मौर. उस सड़की के इर्द-गिर्द और यहां-वहां खड़े होंगे। वह जब होटल से बाहर निकला, तो ठीक ऐसा ही था। इस एरिया के रिक्शा चालक, माप-पास के होटलों मौर रैस्वरामों के बेरा लोग भौर नौकर, कुली, रेलवे क्लीनर, भंगी, मोची, पके-हारे || ३५ कुछ निठल्ले लोग, जरायम पेशा लोग, परस पीने वाले, शराबी, चोर, स्मगलर, जेबकतरे, सब किस्म के अच्छे बुरे व्यक्ति वहां खड़े थे। वे सब खड़े इस ढंग से थे, दो-दो तीन-तीन के ग्रुपों में, कि कोई उन्हें इशारा नहीं कर सकता था कि तुम लोग उस लड़की को देखने पाये हो....पानों को थूकते हुए, सिगरेटों के लम्बे-लम्चे कश खींचते-फेंकते हुए, हंसते और बातें करते और गाली-गलौज करते हुए। उसका खयाल था कि यह सब लोग बड़े भाटिस्ट है । वह हलका-सा मुसकरा दिया । वह जानता था कि इस एरिया में इस नयी लड़को के माने से यहां के ऐसे ही लोगों में बेहद प्रसन्नता छा गयी है । उसे भी याद पड़ता है कि जैसे काफी दिनो बाद कोई नयी लडकी इस एरिया में भायी है। उसका खयाल था कि रात साढ़े ग्यारह बजे वाली बम्बई एक्सप्रेस से यह मायी है, क्योकि रात साढ़े दस तक वह खुद भी यही पर था और तब तक इस लड़की की इस एरिया में कोई खबर नहीं थी। गाड़ी क्योकि वाया-अमृतसर पाती है, हो सकता है, यह अमृतसर से ही प्रायो हो, या यह भी सम्भव है कि सीधी बम्बई से ही मा रही हो । उसका खयाल था, यानी यह निश्चित था कि यह लड़की बाहर से इस शहर में पहली बार ही पायी है, नही तो शहर में घुसने के बजाय यही न रुक जाती, यानी इन लोगों के चंगुल में । वह जानता है कि इस एरिया में कोई भी नयी लड़को मा कर बिना भारी पेट लिये वापस नहीं जा सकती। वह जानता है कि हर नयी लड़की का सभी इस्तेमाल करेंगे। लेकिन बारी-बारी । एक बार तो वह भो....खैर, वह चीज बहुत अच्छी थी । इस एरिया के ऐसे ही लोगों में इतना संगठन है कि कोई झगड़ा नहीं होगा। सबकी तसल्ली होगी। पुलिस वाले भी.... उसे होटल से बाहर आया देख कर होटल का मालिक, उसका मित्र शामलाल उसकी तरफ देख कर मुसकराया। उसका मित्र उसी की उन्न का था, बीस-इक्कीस का। उसके मुसकराने का मतलब था कि देखो, यह उस भोर ३६ ॥ पके-हारे इतने सारे लोग कितनी ऐक्टिग से उस लड़की को देखे जा रहे हैं । इसका मतलब था कि जैसा इन लोगों को भाटिस्ट समझता हुभा वह सोच रहा पा, शामलाल का विचार भी ठीक वही है । शामलाल की मुसकराहट के उत्तर में वह भी मुस्कराया। अभी तक वहाँ कुछ लोग उस लड़की को देखने मा रहे थे। हां, इतना जरूर या कि कुछ लोग, जो वहाँ काफी देर से खड़े होंगे, साथ-साथ वापस भी जा रहे थे, शायद अपने-अपने कामों पर, शायद जल्दी ही फिर वहां लौट पाने के विचारों के साथ। कुछ लोग ऐसे भी जरूर थे, जो वहाँ पर शुरू से ही बैठे या खड़े हुए होंगे और वे इस मुद्रा म थे कि भभी मौर भी काफी देर तक वहां जमेंगे। होटल के साथ वाली सड़क पर ट्रैफिक वैसे-का-बसा था । कारों, स्कूटरों, मोटरों, रिक्शामों, साइकलों, ट्रकों के अलावा भी जो लोग सड़क पर पैदल आ-जा रहे थे, वे भी नहीं जान सकते थे कि सड़क वैठी लड़की को सड़क के इस मोर बैठे या खड़े इतने सारे लोग देख रहे होंगे । यह इन पार्टिस्टों की तारीफ थी। उसने होटल के शेड में ही खडे. खड़े सड़क के उस तरफ फुटपाथ पर देखा । गमियों की धूप में जीप-फ्लैश- लाइट के बड़े विज्ञापन-चोर्ड की थोड़ी-सी छाया में पैतीस-छत्तीस साल की वह लड़की बैठी थी। उसकी गोद में एक-डेढ़ साल का बच्चा भी था । वह पैंतीस-छत्तीस की होगी और वह बच्चा एक-डेढ़ साल का ही होगा, मह सिर्फ उसका अन्दाजा था। उसका यह अन्दाजा गलत भी हो सकता था। इस वक्त वहाँ जब काफी लोग उसे एक साथ देख रहे थे, उसने तय किया कि जब इनको तादाद बहुत कम रह जायेगी, तब वह करीब खड़ा हो कर इस लड़को को उम्न ठीक तरह से जान लेगा । मभी वह इन लोगों में अपने को खड़ा करके उस लड़की को गौर से नहीं देख सकता, यह वात नहीं। वह सारे दिन इन्ही लोगों में खाता-पीता उठता-बैठता है, परन्तु खुद के अध्ययन में वह किसी के भी वजूद को क्यों अपने पर हावी होने दे। परन्तु ऐसा उसका खयाल था कि इस लकड़ी की उम्र पैतालिस से किसी भी हालत मैं मषिक नही, मोर पैतालिस तक के ऐसे जीव को इस्तेमाल के लिए जायज थके-हारे || ३७ माना जाता था, यह इन लोगों का मापस में मौन समझोता था मौर इसीलिए इस उम्र तक के जीव को औरत न कह कर लड़की ही बताया जाता था, यह इन लोगों की अपनी तसल्ली हो सकती है। शामलाल उससे पूछता है-तुमने चाय वगैरह पी लो क्या ? -हाँ । मैंने तुम्हें देखा, तुम पता नहीं कहाँ गये हुए थे, फिर मैंने पी ली। इसके पश्चात शामलाल मन्दर चला गया और माधे ही मिनट पश्चात् तेल-साबुन-तौलिया लिये लौट माया और बिना कुछ कहे स्टेशन के रेलवे स्नान-गृह की भोर तेजी से भाग गया। उसने यही ठीक समझा कि शाम- लाल के माने तक होटल के अन्दर जा कर बैठे। वाहर धूप भी काफी तेज थी। एक बार फिर उस लड़की की तरफ नजर दौड़ा कर वह होटल के अन्दर या गया मोर बेरा शम्भू से कहा कि एक चारमीनार का सिगरेट ले माये । इसी वक्त रेलवे का एक ट्रेन-क्लोनर अन्दर माया और उससे पूछने लगा-क्या नम्बर निकला माज? यह किशन था । उसका मित्र । तीस-बत्तीस की उम्र । जेट-ब्लैक रंग । किशन के साथ उसकी मित्रता ऐसे ही कुछ ज्यादा हो गयी थी। शायद इसका यह कारण रहा हो कि वे इकट्ठे ही बैठ कर चरस पिया करते थे और रेलवे लाइनों के परे, जहां किशन का झोपड़ीनुमा घर है, जुमा भी खेला करते थे। परन्तु दूसरे कुछ लोग कहते हैं कि किशन की पत्नी के कारण ही उसने उससे मित्रता बढा रखी थी, जोकि गलत है। वैसे यह जरूर सच है कि किशन की पत्नी बहुत खूबसूरत है और उसका चेहरा भी काफी सेक्सी नजर आता है । वह सोचता है कि यदि वह चाहता, तो किशन की पत्नी को फांस भी सकता था। एक दिन उसी की झोपड़ी में जुमा खेलते हुए झगड़ा हो जाने पर रेलवे के कुछ पड़ोसियों ने बाद में वहाँ अफवाह भी फैला दी थी कि किशन की पत्नी से उसका नाजायज सम्बन्ध है और इसी लिए वह बार-बार वहां आता है भौर ज्यादा टाइम लगाता है । लेकिन वह बाद में भी वहाँ बरावर जाता रहा है और किशन को कभी इस पर ३८ || थके-हारे ऐतराज नहीं हुमा। वे दोनों अभी तक एक-दूसरे को अपना मित्र मानते मा रहे हैं। लेकिन इस वक्त वह क्रोधित हो उठा-मैंने सबको बता रखा है, तुम्हें भी कई बार कहा है कि जब मैं इस होटल में बैठा होऊँ, तो नम्बर-वम्बर जैसी कोई भी बेहूदा बात यहां नहीं कही जानी चाहिए ! किशन पास की कुर्सी पर बैठ गया। बोला--तुम मुझ पर भी नाराज होने लगते हो....! -किशन, तुम बात को नहीं समझते । अगर तुम मेरे मित्र हो, तो शामलाल भी तो मेरा मित्र है, और मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण उसके बिजनेस में कोई नुकसान हो । इस नम्बर-वम्बर के सिलसिले में मैं कभी भी पकड़ा जा सकता हूँ। होटल के बाहर मैं पकड़ा जाता हूँ, तो कोई बात नहीं, लेकिन अगर होटल के अन्दर पुलिस मुझे पकड़ती है, तो इससे लोग समझेंगे कि होटल में यह विजनेस होता है और खुद शामलाल इस काम में शामिल है। खामखाह उसको वेइज्जती और बदनामी क्यो हो । इसीलिए मैंने सबसे कह रखा है कि होटल के अन्दर मेरे साथ कोई ऐसी बात न करे। शम्भू सिगरेट ले माया था । उसे उसने जला लिया और शम्भू से एक सिगरेट किशन के लिए ले माने को कहा। किशन इस दौरान चुप था, तब उसने कहा-किशन, तुम शायद नही जानते, शामलाल से मेरी दोस्ती आज की नहीं, जब में सातवो जमात में पढ़ता था, तब की है । उसके बाद तीन साल में मोर स्कूल में रहा, मैट्रिक तक। उसके वाद चार साल कालेज में रहा, बी० ए० तक । उसके बाद भी हेढ़ साल भोर हो गया है भोर मैं सभी से इस होटल में लगातार मा रहा । यह गंदा काम तो मैंने बड़ी मजदूरी की हालत में छह-सात महीने पहले शुरू किया है, तुम जानते भी हो। वर्ना जिस अच्छे खानदान से मैं हूँ मौर जिस मच्छे खानदान से शामलाल है............मेरे खानदान में तो कोई सिगरेट तक नही पीटा।

परे हारे नतिन पद दे काम से रोज को तीस-पास सरेको पानी हो बता है। ऐसे गन्दे कानों में पैसा बहुर होता है. पर मैं मान गया है. मोर इसरि समोर मान्ति भी हुमाया। लेकिन किशन, तुमने भी तो एक बार कहा था न कि मेरे इस काम के शुरू करने के पहले भी तुमने मुने इसी होटल ने कई बार देखा पा मोर हर में सना मरमार न ससा पा। किन, तामो, कामय मैं बहुत बड़ा पदमाग समता है। यह हेज दिया। किन मी मुकरा दिया। उसे शायर अन्दी पो। शापर यह ड्यूटी पर था। वह उठ खड़ा हुमा । शम्भू इसी समम सिगरेट से माया, जिसे मुंह में रखते हुए उसने उसके जतते सिगरेट के साथ सुलगा निमा । एक- दो का खींच-छोड़ कर उसने कहा-तुम मा रहे हो कासिगरेट भर कर रखू ? -हो, भभी दस मिनट में मैं भाता हूँ। -तो मैं नम्बर दो प्लेटफार्म पर हूँ माग । सुम मा अर बागा। समझ गये न.... किशन चतता-चलता फिर रुक गया मोर मुसकराता हुमा माहिस्ता-रो बोला-जिस काम से भाया था, यह तो भूल ही गया ! पतामो ग, गया नम्बर निकला माज? वह भी मुसकरा दिया मौर किशन की सफेद गांवों में देराता हुमा दोला -अठहत्तर। किशन का जेट-उलैक पेहरा मोर भी जेट-सक हो गया। फिर धीगी मावाज में उसने कहा--किसी का निकला भी माग? किसी का नहीं । अपरार (पक्षर ) निकाला है भीमे, सेलो, रापद और नौ-दस दूसरे लोगों का । हमने तो अक्खर सात लगाया था, सासा एक पड़ गया। इसी वक्त शामलाल गुनगुनाता हुमा मन्दर पा गया। किशग उराको 'बाबूजी नमस्ते' कहता हुमा बाहर निकल गया ।

४०॥ थके-हारे शामलाल ने अपनी काउंटर वालो दराज से शीशा और कंघा निकाल लिया और उन्हें लिये लिये उसके पास वाली कुर्सी पर बैठ गया। शीशा मेज पर टिका दिया, जिसमें अपने बालों को देख कर उनमें कंधा फेरने लगा। कंधा कर धुकने पर कंधे को भी मेज पर रखते हुए अपने बालों में निचुड़ पाये पानी को शामलाल ने अपने दोनों हाथों से पोंछ दिया भोर फिर हाथों में लगे पानी को नोचे झटकते हुए कहा~यार, इस रेलवै स्नान- घर का बडा सुख है। शामलाल ठीक कह रहा है, वह जानता है। उसने कहा-'हाँ, तुम्हारी बात ठीक है ।' केवल स्नान-घर ही नहीं, लैट्रिन वगैरह की भी इन लोगों को बहुत सुविधा है । जिस एरिया में शामलाल का होटल और कुछ दूसरी दूकाने तथा पांच-छह रेस्तरों और कुछ चाय के स्टात है, यह एरिया रेलवे स्टेशन के मास्टर गेट के बिल्कुल वाहर पडता है। रेलवे के सभी कुली, क्लीनर, भंगो तथा मैकेनिक लोग इन्हीं कुछ दुकानों और स्टालों पर मा कर बैठते है, इसलिए दोनो तरफ के लोगों का मापस में खूब परिचय है । इसी कारण इस माउटर गेट वालों को ही केवल रेलवे स्नान-गृह मौर लेट्रिन वगैरह की खुलो माजादी है । इसके अलावा भी स्टेशन पर वे जहाँ मरजी हो, जार्य-मायें। यह सुविधा इनर गेट के बाहर वाली दुकानों के लोगों को नहीं । इसका स्पष्ट कारण यही है कि उन दुकानों पर रेलवे का कोई मादमी बैठता नहीं। बैठता इसलिए नही कि वहां उन्हें चरस पोने, या जुमा खेलने, या हंसी-मजाक करने, या दड़ा का नम्बर लगाने, या दूसरी वदमाशियां करने की कोई भाजादी नहीं । उस गेट के सामने एक तो मिलेट्री हेडक्वार्टर का गेट है, दूसरे जम्मू-कश्मोर पोर डल्हौजी कुल्लू जाने वाली बसों का अड्डा है, तीसरे यहाँ पर रेलवे के वायू और अफसर लोग हर वत पूमते रहते हैं। इसके अलावा महर के तमाम जेबकतरे, बदमाग, जुपारो माउटर गेट पर ही बैठते हैं । (और इसीलिए माये दिन महर को पुलिस यहाँ पापे भी मारती रहती है ।) रिक्शा चालकों को भी थके-हारे || ४१ वही जगह ज्यादा पसंद है, क्योंकि रिक्शे खड़े करने के लिए गेट के अंदर काफी खुली जगह भी है, जहां बहुत सारे साधु भी बैठे रहते हैं, भिखारी लोग भी पौर नाई भी। इसीलिए रेलवे के चतुर्थ श्रेणी के वर्कर भी अपने जैसे ही इन्हीं लोगों में बैठना अधिक पसंद करते हैं, जहां वे अपनी बात आराम से कह सकें और किसी को ऊंच-नीच का वहम न हो। शामलाल को शायद भूख मधिक लगी थी। वह सामने पड़े मर्तबान में से पांच-छह बड़े बिस्कुट उठा लाया । बोला-खाप्रो । उसने एक बिस्कुट को प्लेट में ही भाषा करते हुए मामूली-सा अपने दांतों में काट लिया। उसने कहा-शाम, पता नहीं, बिस्कुट खाते ही हमेशा मेरे दिमाग में यह विचार क्यों मा जाता है कि मैं बहुत अमीर हो गया हूँ ! वह थोड़ा-सा हंसा भी। -यह चीज है तो ममीर लोगों की हो। और फिर अब तुम भी तो ममोर हो! चालीस-पचास रुपये तुम रोज बना लेते हो! वह चुप रहा पोर जिस बिस्कुट को उसने माघा प्लेट में तोड़ दिया था, उसे भी उठा कर खाने लगा। शामलाल फिर बोला-ईश, अब कब तक तुम यह धंधा करोगे? तुम्हें देख कर मैं बहुत दुखी रहता हूँ। -मैं खुद भी दुखी हूँ ही, इस गंदे काम से चालीस-पचास रुपये रोज बना लेने से मैं सुखी नही हूँ। इस काम के लिए और आपस में मेल. जोल बनाये रखने के लिए मुझे कुछ लोगों के साथ चरस पीनी पड़ती है, जुमा भी खेलना पड़ता है, भंगियों में बैठ कर खाता-पीता हूँ, सारे दिन अनपढ लोगों में घूमता रहता हूँ । मैं सचमुच ही कोई कम दुखी नहीं हूँ। लेकिन अब कुछ महीने और रह गये है । मैंने जब यह गंदा काम शुरू किया, तो तुम्हें तो पता ही है कि यह सोच कर किया था कि एक साल से अधिक इस काम में न पड़गा, तब तक जितना पैसा इकट्ठा हो जायेगा, उसी से फिर कोई ढंग का काम शुरू कर दूंगा। और भब इस काम में पड़े हुए मुझे छह महीने बाईस दिन हो गये हैं, यानी पांच महीने भाठ दिन मभी भौर है।

४२ ॥ थके-हारे शामलाल कुछ नहीं बोला । वह फिर कहने लगा-जिसके पास दडा के पैसे जमा होते हैं, वह चरस का भी नाजायज कारोबार करता है । उसने मुझे पहले भी कहा था कि तुम फिफ्टी परसेंट पर चरस की गोलियां अपने इलाके में बेच लिया करो। अब मैं सोच रहा हूँ कि आज या कल से वह काम भी शुरू कर हूँ। तुम्हें पता ही है कि इस स्टेशन पर ही लगभग दो सौ आदमी होंगे, जो रोज चरस पीते है, बाकी दूसरे भासपास के लोगों की बात अलग है । साधू लोग और रिक्शे वाले भी चरस पीते ही है। एक गोली चार पाने की पाती है। मतलब कि हर गोली में से मुझे दो माने वचेंगे । इस तरह से तीस-चालीस रुपये मैं रोज और बना सकता हूँ। इस तरह भगले पांच महीनों में मेरे पास डवल रकम हो जायेगी और मैं भासानी से कोई पच्छा घंधा शुरू कर सकूँगा। शामलाल कुछ नहीं बोला। वह फिर कहने लगा-मैं तुम्हारे चेहरे पर आये भाव को पढ़ सकता हूँ। यह बात तो सच ही है कि मैं कभी भी पकड़ा जा सकता हूँ। लेकिन उम्मीद है, तुम मेरी जमानत तो करवा दोगे। लेकिन शाम, अगर मैं एक बार भी पकड़ा गया, तो फिर इस शहर में मैं न रह सकूँगा। अभी तक तो किसी को भी पता नहीं है, फिर कालेज में मेरे साथ पढ़े लड़के और लड़कियां, प्रोफेसर लोग, बाऊ जी के यार- मित्र, शहर के दूसरे लोग, जो मुझे या बाऊ जी को जानते है...मोह, में उस वक्त की कल्पना नहीं कर सकता ! एक अजीब किस्म का हॉरर महसूस होता है। शामलाल के सोचने की पता नही क्या पृष्ठभूमि थी, मगर उसने इतना ही कहा-यह साला मुल्क कमी तरक्को नही कर सकता ! वह होटल से बाहर माया, तो वह लड़की भव भी वही बैठी थी और सडक के इस तरफ उस लड़की को देखने वाले लगभग उतने ही लोग खड़े थे, वैसी ही नाटकीय मुद्रामों में । उसे उस लड़की की उम्र अब भी उतनी ही लगी। पंतीस-छत्तीस की। उसका चेहरा वह अब भी यहाँ से मच्छी तरह से न देख सकता था, लेकिन उसके बट्स और फीचर्स दढिया है. ।

थके-हारे || ४३ ऐसा उस लड़की को दूर से ही देख कर वह अंदाजा लगा सकता था। -हे बाबू ! हे दाता ! हे मालिक ! इस बच्चे की कसम, दो टिकड़े दे जा! बच्चा दो रोज से भूखा है, मालिक ! हे वाबू ! हे साइकिल वाले बाबू ! है पेंट वाले बाबू ...! उस लड़की की मावाज वह यहाँ सुन नही रहा था, लेकिन इतना वह समझ सकता था कि हर गुजरते व्यक्ति को देख कर वह यही कह रही है। उसने सामने चिरंजी की दुकान से सिगरेट लिया और उसे एक जलती लटकती रस्सी से सुलगा कर प्राउटर गेट में दाखिल हो गया । - माज धूप काफी तेज यो। धूप को महसूस करते हो उसे मराठी, बंगालो, मलयाली, मद्रासी, गुजराती, उड़िया, यू० पी० वाले भोर तमाम बड़े शहरो के और विदेशों के वे टूरिस्ट याद आ गये, जो यहां से गुजर कर कश्मीर, डल्हौजी, कुल्लू मादि पहाड़ी स्थानों की ओर जाते हैं रोज, भौर वह ऐसा है कि पड़ोस में होते हुए भी वहां नहीं जा सकता और यहाँ धूप में मर रहा है। इस्माईल जमादार उसके पास से गुजरते हुए पूछता है-आज की खबर? -अठहतर। थोड़ा और मागे जाने पर फुटपाथ पर एक छोटे-से पेड़ की छाया में बैठा मौजी नाई उससे कहता है-बाबू, बाल बनेंगे ? लेकिन वह उसको 'मठहत्तर' कह कर मागे बढ़ जाता है । दो-चार कदम आगे जाने पर उसे करमा भंगी की भावाज सुनायी देती है-ईस । बाबू ! वह रुक जाता है ! करमा भंगी दीवार के साथ लगा पेशाब कर करमा को कुछ दिन पहले सूजाक था। संभव है, भव भी हो । उसे उसके पास लगने से बचना चाहिए। लेकिन अभी कुछ दिन पहले उसने उसके साथ बैठकर चाय पी थी मौर फिर चरस पी थी। जो हो गया, सो । ४४ ॥ थके-हारे हो गया, भव वह फिर ऐसा नहीं करेगा। करमा उसके पास मा गया-- क्या दड़ा निकला भाज? --अठहत्तर । --मेरा है क्या ? --नही। --मक्खर भी नहीं ? -तुमने तो भक्खर पांच मोर छह लगाया था। करमा भंगी निराश हो कर मुंह लटकाये आगे चला गया । तभी ढम- ढम-ढम-ढम ढम-ठम-ठम-ढम की तेज मावाज उसे सुनायी पड़ी । गाड़ी जर प्लेटफार्म से बाहर होती है, तो उसकी मावाज छक छक-छक छक छक-एक । छक-छक की होती है। प्लेटफार्म पर भाते ही उसकी यह मावाज क्यों बदल जाती है ! मुसाहिब उससे कहता है-सुना है, माज अठहत्तर निकला है? -हाँ ! कह कर वह स्टेशन के वेटिंग हॉल में पहुंचा, तो स्यालदा से भाने वाली गाड़ी प्लेटफार्म पर लग चुकी थी भौर सवारियां उतरनी शुरू हो गयी थीं। टिकट-कलेक्टर उसे जानता था। वह उसके पास से गुजर कर प्लेटफार्म पर मा गया । उसका लक्ष्य नंबर दो था, जहां किशन चरस पीने के लिए उसका इंतजार करता होगा, लेकिन खड़ी गाड़ी से उतरती अजीब-अजीब शक्तों को देखने में वह खो गया । कितने ही किस्म के लोग थे, जिनमें कुछ विदेशो भी थे। एक डब्बा मिलिटरी के जवानों से पूरा• का-पूरा भरा हुमा था। वे सब मद्रासी थे। मद्रासी लोग वहादुर होते है, ऐसा उसने भारत-पाक युद्ध के दौरान सुना था। मौर भी कई तरह के लोग थे, जो उसके पास से गुजरते जा रहे थे। बंगाली, मराठी, यू० पी० वाले, गुजराती, विदेशी । यह समझ सकता था कि ये लोग माज इसी शहर में रुक कर कल कश्मीर, डल्हौजी, या कुल्लू की तरफ चले जायेंगे । उसे लगा कि उसके शरीर में कही कुछ टूट गया है भौर सब तरफ विसर रहा है।

थके-हारे || ४५ उसकी समझ के अनुसार इतनी महंगाई के जमाने में भाषा प्रतिशत लोग भी ऐसे नहीं हैं, जो अपनी ईमानदारी की कमाई की वजह से इतने महंगे पहाड़ी स्टेशनों पर जा सकते हो । मकस्मात उसे लगा कि वह बहुत- से ब्लैक-मार्केटियों, मुनाफाखोरों, चोरों और डाकुमों में फंस गया है । लेकिन फिर सोचा कि यदि उसे भी ब्लैक-मार्केट, मुनाफाखोरी, चोरो, डाके भौर भारी रिश्वत के चांस मिले होते, तो क्या वह खुद भी ऐसा न करता? वह अपने अंदर में इतना ईमानदार तो है ही कि उसे 'हाँ' शब्द तुरंत मिल गया । उसने निश्चय किया कि उसे इन जैसे लोगों से चिढ़ना नहीं चाहिए और एनजॉय करना चाहिए । सिगरेट वाले वेंडर ने कहा-ईश बाबू, मेरा चार माने का मक्खर माठ निकला है, पैसे कब दोगे? -मुझे पता है । पैसे थोड़ी देर बाद ले लेना। तब सिगरेट वाला फिर कहने लगा-ईश बाबू, यह मक्खर कल मुझे साई बाबा ने बताया था। उन्होंने तो दड़ा भी प्रठाईस बताया था, लेकिन निकला पचास बढ़ा कर । फिर वह रहस्य के-से ढंग से बोला—साई बाबा ने इसके बाद का भी एक दड़ा बताया था। --क्या? -तुम किसी से कहना नहीं और तुम खुद भी भाज लगा लेना.... नंबर छब्बीस है । हो सकता है, जैसे प्राज पचास बढ़ा कर निकला है, कल भी पचास बढ़ा कर छिहत्तर निकले । मैं तो माज तुम जितने पैसे दोगे, दोनों नंबरों और मक्खर छह पर लगा दूंगा। -तब ऐसा करना, दोनों नंबरों को उलटा कर भी कुछ पैसे लगा देना । क्या पता, छब्बीस मौर छिहत्तर की बजाय बासठ या सड़सठ ही निकल माये। मक्खर दो और सात पर भी कुछ पैसे लगाना ।

४६ || थके-हारे सिगरेट वाला कुछ सोचने लगा। फिर बोला-हाँ, तुम्हारी वात ठीक है। फिर वह बुक-स्टाल पर पड़ी पत्रिकामों पर भपनी दोनों कुहनियाँ टिका कर खड़ा हो गया। उसने बुक-स्टाल वाले दयानंद से कहा-माज कोई चटपटी चीज नही मायी! --अभी तो बहुत सारी सवारियां गाड़ी से उतर रही हैं । देखते रहो, फोई-न-कोई बढ़िया चीज प्रवश्य नजर मायेगी! इसी वक्त रेलवे के सिपाही शिवमंगल ने पीछे से उसके कंधे पर हाप रखते हुए कहा-चाय-वाय पी लो क्या ? वह सीधा खड़ा हो गया-मामो, पियें । ये बुक स्टाल के दायों तरफ वाले टी-स्टाल पर पा गये । छोकरे से उसने कहा-चार विस्कुट मोठे मौर दो चाय! सिपाही शिवमंगल पाय पीते हुए वोला-सुमने बहुत दिनों से पिलामी नहीं ! किसी दिन पिलामो भौर साप बैठ कर पियो ! वह कुछ सेकंड चुप रहा । फिर उसने कहा-यहीं पानेदार साहय को तो.... -उसको बहन को....! तुम उसकी फिकर न करो ! यह साला है तो कमीना, लेकिन जब तक हम है, तुम्हें डरने की कोई जरूरत नहीं । --तो इसमें पूछने की या यात है ! जब चाहो, पियो ! सप पसे तुम्हारे ही है! यह सोचता है, यह कैसे ऐसे वारप बोलना सीरा गया! यह कितना पटिया हो गया है । यह सारा दिन ऐसी गम्दायमी इस्तेमाल करता है, निगपा मोई पं महीं होता। सामे, मुझमे रिश्वत साते हो, पोर.... हरामी....जेदातरे ! मेक्नि, सर पसा है ! वह पौर कर भी कर समता है! गिपगम सिपाही रहता है-गर, भार पोड़ो। पान तो मैं बाहर पा रहा है ।रिमी हो! कप, या परमों!

थके-हारे || ४७ वह अपनी जेब से पांच का एक नोट निकालता है, क्योकि वह सम- झता है कि बाहर जाने का मात्र वहाना है और शिवमंगल को नकद पैसे चाहिए-तुमने मब कह ही दिया है, तो यह लो, जब चाहे पी लेना ! शिवमंगल पांच का नोट ले कर कहता है-एक बोतल के पैसे तो पूरे दो! वह तीन रुपये और दे देता है । इसी बीच दूसरा सिपाही रामरतन भी वहां आ पहुँचता है। वह समझ जाता है कि दोनो योजना बना कर माये है कि एक पहले जायेगा और दूसरा ऐन मौके पर पहुंचेगा । खैर, कोई फर्क नहीं पड़ता । हिंदुस्तानी सिपाही मुजरिमों के सहारे ही तो पलते है । इस महंगाई के अनुसार उनकी तनखाह है ही कितनी ! वह जेब से पांच का एक और नोट निकाल कर रामरतन को दे देता है। रामरतन शिवमंगल की ओर देखता है। शिवमंगल कहता है-ठोक है, बेचारे के पास इतने ही होगे ! एक रुपया लो मेरी तरफ से ! शिवमंगल रामरतन को अपनी जेब से एक रुपया निकाल कर दे देता है। शिवमंगल ने किये-कराये पर पानी फेर दिया, वह समझता है, इसीलिए जेब से तीन रुपये और निकाल कर उनमें बांट देता है। रामरतन वापस जाता हुमा कहता है-ईश बाबू, कोई काम हो तो बताना। वह मुसकुराता हुमा कहता है-जब भाप जैसे मच्छे दोस्त मेरे साथ हैं, तो मुझे किसी चीज की चिंता नहीं ! चाय मादि खत्म करने के पश्चात् यह शिवमंगल से कहता है-शिवमंगल यार, जरा उस सिगरेट वाले को बलामो, सिगरेट पी लिया जाये। शिवमंगल वेंडर को जोर से मावाज देता है-दो पनामा लेते पामो ! सिगरेट जलाने के पश्चात् शिवमंगल वहां से चला जाता है, लेकिन दो मिनट पश्चात् फिर लौट कर कहता है-ईश बाबू, माज नयो लड़को देखो ? -हो, लेकिन नजदीक से नही देख सका। बसे मुझे पैतीस-छत्तीस की लगी।

४८ || यके-हारे -हो, इतनी ही उमर की है वह । फिर शिवमंगल मुसकराता हुमा बोला-करीब एक बजे दुलो भंगी के क्वार्टर में पा जाना । इतना कह कर वह चला गया। वह समझ गया कि उस लड़की को दुलो भगी के क्वार्टर तक पहुंचाने में किस तरह शिवमंगल सिपाही उन कुछ लोगों की मदद करेगा । फिर यह महसूस करके कि वह लड़की दुलो भंगी के क्वार्टर में पहुँच गयी है और वह भी उन पांच-छह लोगों में शामिल है, जो कि बारी-बारी से मंदर जायेंगे, उसे अपने अंदर हलकी-सी गर्मी मौर कुछ उत्तेजना मालूम पड़ी। उसने वेंडर से एक पौर सिगरेट मंगवा लिया था और टी-स्टाल वाले काउंटर के साथ पीठ टिका कर खड़ा हो गया था। इसी समय उसे बारह-पंद्रह लड़के दिखे और उनके पीछे बीस-पच्चीस लड़कियां । सबकी उम्र सोलह से इक्कीस बाईस के बीच लगती थी। लड़कियों ने या तो पैटें पहन रखी थी, या स्कर्ट्स । कुछ लड़कियां और कुछ लड़के भी बीटनिक स्टाइल में थे । शायद वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के छात्र रहे होगे । उनके पीछे-पीछे दस-बारह कुली ठेलों पर उनका सामान लादे, ठेले खीच रहे थे। अब सारे प्लेटफार्म की नजरें इस गुट की तरफ थीं। अधिकतर लोग लड़- कियों को ही धूर रहे थे। यह कोई नयी बात नहीं, वह जानता है । माजकल पहाड़ जाने का मौसम है भौर रोज ही बंबई, दिल्ली, कलकत्ता या दूसरे बड़े शहरों के छात्र-दल यहां से गुजरते रहते हैं । कई बार तो ऐसा भी होता है कि छात्रों का कोई गुट रॉक-एन-रोल या शेक मादि डांस शुरू कर देता है । रिकार्ड- प्लेयर उनके साप होते हैं। फिर लड़के मौर लड़की का कोई भेद नहीं होता पौर इस तरफ के पिछड़े हुए लोग, या निम्न तबके के लोग उन छात्रों को नाचता हुमा देख कर ऐसा महसूस करते हैं, जैसे यह नाव देस कर उन्होंने बहुत कुछ प्राप्त कर लिया हो मोर वे धन्य हैं। उससे यह सब बरदारत नही होता। उसकी छाती के न जाने किस - थके-हारे || ४६ हिस्से में एक नामालूम-सा दर्द उठना शुरू हो जाता है और वह एकदम निराश भाव से सारे वातावरण से अपरिचितता महसूस करने लगता है। उसे कालेज के अपने दिन याद आने लगते है और अपनी प्रेमिका टी० अग्रवाल याद माने लगती है, जो उससे इसलिए शादी करने को तैयार न हुई थी कि उसका भविष्य संदिग्ध था और जिसने फिर एक सेंट्रल एक्साईज के इंस्पेक्टर से शादी कर ली थी और भाजकल शिमला में है। उसे इन जैसे छात्रों को देख कर वह घटना फिर याद हो पाती है कि जब उसके कालेज के छात्र बंबई जाने वाले थे, तो उसे घर से पैसे नहीं मिल सके थे । पैसे तो खैर टी० भग्रवाल ने दे दिये थे, क्योंकि वह डाक्टर की लड़की थी और बहुत अमीर थी, लेकिन उसके पास बंबई जैसे शहर के काबिल कपडे भी नहीं थे और वह वहां नही जा सका था। टी० अग्रवाल चली गयी थी। लड़के और लड़कियां उसके सामने से गुजर रहे है । उसे महसूस होता है कि वह नपुंसक है और इनमें से किसी के साथ मांख नहीं मिला सकता । उसे यह भी महसूस होता है कि उसे तुरंत एक ऐसी चीज चाहिए, जो उसके प्रतीत को एकदम समाप्त कर दे । उसे किशन याद माता है, जो चरस के लिए उसका इंतजार कर रहा होगा। वह तेजी से नंबर दो को भोर बढ़ने लगता है । हालांकि वह वहां देर से जा रहा था, परंतु किशन ने कुछ नहीं कहा और उसके फर्श पर बैठते ही चरस से भरे हुए सिगरेट को भाग दिखा दी। वहाँ किशन के अलावा भी तीन व्यक्ति मौर थे, जो किशन के साथ ही काम करते थे। भव वे फर्श पर एक दायरे की शक्ल में मालथी-पालपो मारे बैठे थे, परंतु ये सब बिल्कुल पास-पास । हर कोई सिगरेट का एक कश खीचता और फिर उसे अगले व्यक्ति को बढ़ा देता। दो चक्करों में ही सिगरेट खत्म हो गया। फर्श पर से उठा कर एक पौर सिगरेट जला लिया गया। इसके अलावा भी चरस से भरा एक मौर सिगरेट फर्श पर पड़ा था। एक लंबा कश खोचने भौर सिगरेट को दोपू को भोर बढ़ाने के पश्चात् किशन ने कहा-ईश, मैं देखना चाहता हूँ कि . ५० ॥ थके-हारे किसी इमर-कंटीशिन मकान में गद्देदार कुसियों पर बैठ कर चरस पीने में कितना मजा आता है । साथ में एक लौंडिया भी हो, तो कितनी बड़ी बात है ! मेरे लिए तो वह स्वर्ग होगा! दीपू ने सिगरेट आगे बढ़ा दिया था। वह बोला-चरस के साथ लौंडिया का बड़ा जोड़ रहेगा ! साली को चबा-चबा कर खा जायेंगे ! इतना कहने के साथ ही दीपू हंसने लगा था। वह चुप रहा । उसे याद माता है, इसी ममीरी ठाट के लिए एक बार उसने दो-चार मित्रों के साथ किसी बड़े मादमी के घर डाका डालने की योजना बनायी थो । वे ऐसा जरूर कर बैठते, अगर उन्हें पिस्तौलें मित जाती। वह माज भी सोचता है कि यदि उन्हें कुछ पिस्तौलें मिल जायें, तो बड़े वैज्ञानिक ढंग से वह डाके डालने का काम शुरू कर सकता है, क्योंकि यह पढ़ा-लिखा है मौर जल्दी से काबू में नहीं मा सकता । वह भी किशन की तरह कई बार कल्पना करता है कि एयर-कंडीशंड कमरा होगा, एक- दो खूबसूरत लड़कियां होंगी मोर इसके साथ ही याकी सब कुछ भी होगा। यह कल्पना कितना सुस देने वाली है ! किशन फिर कह रहा या-माला कोई माठ-दस रुपये का दा ही निकल भाये, तो पांच-छह सौ रुपये मिल जायें ! तव गूंगी-मड्डे (वरयालय) हो चला जाये ! मरने के पहले कुछ तो मजा उठाया जाये ! फिर दंडे में नंबरों की बात शुरू हो गयो । उसको इसमें रुचि नहीं है । दीपू मंबर बत्तीस पर इसरार कर रहा था कि यह नंबर पिंडोरी वाले याचा ने किसी को मार्फत उसे भेजा है। यह समझता है, यह सब यावा-यावा हरामी हैं पौर ठग है। किसी एक का नंबर कभी अचानक निकल माता है, तो उसका दोसान महीने का मचं निरस पाता है। दोपू ने दोसरा सिगरेट भी असा मिया पा। उसे चाय पीने को या हो रही यो। परम के बाद पार पोने से मना एप तेज हो पाता है और राब दुध मोग-मोटा मगमे पता है । ठर या मरा रहता है। उसने एक बया निराकर रिमन को दिया शिटीस्टाम या को थके-हारे || ५१ पांच गिलास चाय के लिए कह माये । दोपू ने कहा कि वह चाय नहीं पियेगा, क्योंकि चरस के बाद चाय पोने से उसकी के करने जैसी हालत हो जाती है । किशन चार कप चाय के लिए कह पाया और सिगरेट का भरपूर कश खीच कर उसे ईश की तरफ बढ़ा दिया । अब चरस का भरा और कोई सिगरेट शेष नहीं रह गया था, इसलिए उसने दो लंबै फश एक साथ खीच डाले । इसके बाद किशन वगैरह लोग अपने-अपने काम में जुट जायेंगे, इसलिए उसने सोचा कि वह चाय पी कर होटल में चला जायेगा । खाना भी खाना है और जिन-जिन लोगों का दड़ा या अक्खर माज निकला है, उन्हें भुगतान भी करना है । किशन वगैरह लोग भी उठ खड़े हुए, तो वह भी स्टाल से एक पनामा का सिगरेट जला कर होटल की तरफ चल पड़ा। प्लेटफार्म से बाहर निकलते-निकलते उसे थानेदार मिल गया। उसने उसे नमस्ते की, तो यह मुसकरा दिया। हर बार ऐसा होता है कि जब वह मुसकराता है, तो उसकी फिक्सो लगी दाढ़ी मौर मूछे कुछ अधिक ऐंठ जाती है । वह इस सिस यानेदार के मुसकराने का मतलब समझता था कि फिलहाल वह प्रसन्न है । तब उसे खयाल भाता है कि हिन्दुस्तानी पुलिस के सभी लोग निहायत कोरप्ट है मोर परिणामस्वरूप इस हिंदुस्तान का जितना भी बेड़ा गर्क हो जाये, कम है । ये भगर थोड़े भी ईमानदार हो जायें, वो हिंदुस्तान क्या-से- क्या हो सकता है, लेकिन हिन्दुस्तान की परवाह किसी को नहीं है । इसी समय उसे बायीं तरफ से किसी के हंसने की भावाज मायो। पार्क वाले छोटे-से वृक्ष के नीचे बैठे एक साधू-महात्मा जोर-जोर से हंस रहे थे। उनके इर्द-गिर्द पांच-छह लोग बैठे थे। सब साले नम्बर पूछने वाले होंगे, उसने सोचा । उनसे कुछ दूर हट कर चार-पांच लोग ताश या जुमा भी खेल रहे थे। उनमें एक रिक्शा-ड्राइवर विल्ला भी था, जो माना हुमा यकतरा भी था। कई बार मौज में होने पर वह उसे जेब कतरने के कई कई ढंग बताया करता था। विल्ला उसको तरफ देख कर मुसकराया, तो वह भी मुसकरा दिया, साथ में उसने उसे गाली भी दे डालो---मादर..... जूपा ५२ ॥ थके-हारे खेल रहे हो ? -हां, मादर....! वे दोनों भव जोर से हंस दिये । वह और शामलाल लंच के लिए बैठे हुए थे कि होटल के बेरा शम्भू ने मा कर उससे कहा-बाबूजी, मापको कोई बाहर बुला रहा है । -कौन है ? कहने के साथ ही उठ कर वह बाहर पा गया । हरि था। रेलवे का कुली। -ईस बाबू, सुना, सरना अभी एक घंटा हुआ, भर गया! -ओह ! उसे पता था कि वह काफी दिनों से बीमार था। हरि चला गया । उसने शामलाल से कहा-वह है न रेलवे का भंगी सरना, अभी एक घंटा हुआ, वह मर गया। मैं अभी वहां जा रहा हूँ। शामलाल ने कहा-लेकिन खाना तो खा लो। --नहीं, अब दिल नहीं कर रहा, तुम खामो, मुझे वहाँ देर लग सकती है। वह होटल के बाहर आ गया । - अंधेरा अब मोटे काले रंग का हो गया था। लकड़ियों पर जहाँ शरीर जल रहा था, काफी रोशनी थी । पन्द्रह-सोलह लोग थे और वे सब-के-सब वहीं बैठे थे । अधिकतर सरना के मित्र भंगी ही थे भौर एक-दो कुली तथा एक-दो क्लीनर । वह भी उनके बीच में था, चुप, भौर ऐसे, जैसे कोई उसका अपना मित्र मर गया हो । सरना से उसका कोई विशेष परिचय नहीं था, बस, इतना भर कि वह उसके पास पाकर दड़ा का नम्बर लगाया करता था। पिछले ढाई महीने से बीमार रहने के कारण वह उसके पास मा भी न पाता था । बस, सिर्फ तीन-चार महीनों का परिचय । यह बाद वहाँ आये सरना के भन्य मित्रों को भी मालूम थी और वे उसे बड़ी इज्जत की निगाहों से देख रहे थे। हो, और कोई क्यों नही पा गया सरना के मरने पर ? जब वे लोग सरना की मरथी उठा कर चले थे, तो सबसे पहले कंधा भी उसी ने दिया था। यह भी एक विशेप घात थी, जिससे वहां उपस्थित रोप लोग उसे अधिक मपना समझ पा रहे थे।

थके-हारे || ५३ एक 'चटाख' की भावाज हुई, तो उसने जलते शरीर की तरफ देखा। शरीर माधे से अधिक जल चुका था मोर भाग को लपटें अब और भी तेज हो उठी थीं। वह समझ रहा था कि वह सिर्फ इसीलिए सरना के मरने पर नहीं पाया कि वह उसके पास मा कर दड़ा का नम्बर लगाया करता था, बल्कि इसके अतिरिक्त भी कुछ है । मोर वह क्या है, यह वह समझना पौर सोचना नहीं चाहता था। किसी की जेब में शायद चरस बच रही थी। उसने उसे सिगरेट में भर कर सिगरेट उसे दे दी थी कि शुरुमात वही करे । उसने सिगरेट जला कर एक कश स्वींचा मोर फिर सिगरेट अगले व्यक्ति की मोर बढ़ा दी। उसने जलती माग की तरफ देखा और फिर अपने पास बैठे इन सब लोगों की तरफ । वह सोच सफता था कि ये जो उसके पासपास हर वक्त उठने-बैठने वाले लोग है, ये स्पॉइल्ड जेनेरेशन के लोग है और बिना किन्ही महत्त्वाकाक्षाभों के बड़ी शांति से मरने वाले लोग है । उसे इनमें रहते हुए बड़ी प्रसन्नता होती है कि ये लोग जिन्दगी को सच्चे अर्थों में समझने वाले हैं भौर सीधी-सादी परिस्थितियों में भी आराम से गुजर करने वाले हैं। परन्तु इन सब लोगों को देख कर उसके दिल में हमेशा एक तीव पीड़ा-सी उठती है भौर वह रो-सा देता है । यह सब व्यवस्था के व्यावहारिक पक्षपात के कारण है, वह समझ सकता है । परन्तु उसे इतना भी मालूम है कि ऐसी स्पॉइल्ड जेनेरेशंज मादि काल से चली मा रही हैं और इस चीज को क्या रोका जा सकता है ! सिर्फ चीखा जा सकता है, चिल्लाया जा सकता है। साथ वाले ने सिगरेट उसकी तरफ बढा दिया, तो कश खींचते हुए उसने जलती माग की तरफ फिर देखा । सिगरेट मागे बढाते हुए उसने यह भी सोचा कि वह मोर नहीं पियेगा, क्योकि अधिक चरस पीने से उसे फिर चाय की इच्छा होने लगती है मौर यहां चाय मिल नहीं सकेगी । उसने फिर उस भाग की तरफ देखा । मब उसे वह भाग बहुत परिचित जान पड़ी । इस वक्त मंधेरा मोर भी घना हो गया था और सिवा माग के मास-

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थके-हारे || ५५ - --कुछ हम लोगों को भी करना चाहिए, नहीं तो बेचारी कैसे जिंदा रह पायेगी! -हां, यह ठीक है । क्यों मही, तुम्हारा क्या ख्याल है ? वह थोड़ा मुसकराना चाहता है। वह जानता है कि जब तक इस चिता की आग ठंडी नहीं होगी, सहायता के झूठे आश्वासन हर दिशा से प्राप्त होंगे, लेकिन बाद में कुछ नहीं होगा और कोई कुछ नही करेगा । वह खुद भी कुछ नहीं कर पायेगा। होटल के करीब पहुँचने पर उसे पनजाने ही लगा कि वह श्मशान घाट से भाग कर आया हुआ जीवित शव है । शायद दस बज गये थे, या बजने को थे । वे श्मशान भूमि से कब लौटे थे, उसे अंदाज नही, परन्तु लौटने पर उन्हें पांच-दस मिनट के लिए सरना के घर पर भी बैठना पड़ा था । उन सबको मकेले लोट पाया देख कर सरना की पत्नी और भी अधिक चीख उठी थी । परन्तु अब कुछ नही हो सकता था। फिर सरना की पत्नी को उसी अवस्था में छोड़ कर वे चुप और शांत वहाँ से खिसक पाये थे। उसे कुछ खीज और कुछ थकावट, दोनों एक साथ महसूस हो रही थी । मभी वह होटल से कुछ इधर था कि उसे तिलका मिल गया । तिलका पहले थोड़ा मुसकराया, तब बोला-पाज कहां रहे, भाई ? -एक काम मा पड़ा था....जरूरी। -भरे क्या यार, तुमने तो माज हमारा बेड़ा गर्क कर दिया ! प्रव उसको मावाज तेज थी-माज हमारे पास एक बहुत अच्छा नम्बर था बाया सेखों का बताया हुभा। माज वह साला लगाने से रह गया ! मव देखना, कल को वही निकलेगा। --तो तुमने लगाया नहीं ? बाजार जा कर किक शाह के पास सगा देते। --परे षया यार, बहुत देर तक तुम्हें ढूंढते रहे ! जय नही मिले, तो भागे-भागे किक शाह के पास गये, लेकिन तब तक टंम हो चुका था, किक गाह ने इनकार कर दिया। वह नाराज लगता था।

५४ | थके-हारे पास का कुछ भी दिखाया न दे रहा था। उसने सोचा, मृत्यू के पूर्व सरना की पत्नी यदि किसी जरूरी काम से अपने गांव न चली गयी होती, तो वे लोग मृत शरीर को श्मशान घाट जल्दी ले भार्य होते। जिस यक्ति को उसकी पत्नी के पास दौड़ाया गया था वह सवा पांच के करीब उसके साथ लौटा था। यही शुक्र है कि वे दोनों पूरज डूबने के पहले लोट माये थे । सूरज डूबने के बाद पहुंचे होते, तो और मुसीवत होती । तब मिट्टी को कल तक के लिए रोकना मावश्यक हो जाता और इसका मतलब होता कि उसकी पत्नी सारो रात रोतो-चोखतो रहती। पत्नी के अपने मृत पति के दर्शन करते हो उन लोगों ने मिट्टी उठा ली थी। सूरज डूबने-डूबने को भा। वह सोच रहा था कि सरना की पत्नी के कारण ही उसका माज का अपना बिजनेस चौपट हो गया था। दड़ा लगाने वालों को जो परेशानी हुई होगी, वह भलग । न तो माज वह पिछले दड़ा का भुगतान कर सका है और न अगले दड़ा के लिए पचियो काट सका है। पांच बजे से दहे का काम जोरों से शुरू हो जाता था। उसने सोचा, जब सम लोग बैठे हैं, तो उसका अकेले का चले जाना उचित नहीं है । माज का दड़ा नही तो न सही, सिर्फ तीस रुपये की ही बात है न । परन्तु वह महसूस कर रहा था कि आर्थिक दृष्टि से भाज का दिन निश्चय ही बहुत मनहूस है । मुवह सिपाही लोग पैसे मार ले गये। सरना के कफन मादि के लिए पैसा नहीं था, तो लगमग बाईस-तेईस रुपये उसके भी खर्च हो गये और माज को जो भामदनी होनी थी, वह भी गयी। लेकिन उसे किसी बात का अफसोस नहीं है। तीसरा सिगरेट जब उसकी भोर बढ़ाया गया, वो इनकार करने की बजाय उसने एक कश फिर खीच लिया। इसी वक्त तारा शिवलाल से कह रहा था-अब इसको पत्नी का क्या होगा? सर्व कैसे चलेगा? दो छोटे-छोटे बच्चे हैं ! -~-हो, यार, यह बात तो सोचने को है ! -~-जो पेंशन मिलेगी, वह भी तो बहुत कम होगी।

थके-हारे || ५५ - -कुछ हम लोगों को भी करना चाहिए, नही तो बेचारी कैसे जिंदा रह पायेगी! - हाँ, यह ठीक है । क्यों मही, तुम्हारा क्या ख्याल है ? वह थोड़ा मुसकराना चाहता है। वह जानता है कि जब तक इस चिता की भाग ठंडी नहीं होगी, सहायता के झूठे माश्वासन हर दिशा से प्राप्त होंगे, लेकिन बाद में कुछ नही होगा और कोई कुछ नहीं करेगा । वह खुद भी कुछ नही कर पायेगा। होटल के करीव पहुंचने पर उसे मनजाने ही लगा कि वह श्मशान घाट से भाग कर पाया हुमा जीवित शव है । शायद दस बज गये थे, या बजने को थे। वे श्मशान-भूमि से कब लौटे थे, उसे अंदाज नही, परन्तु लौटने पर उन्हें पांच-दस मिनट के लिए सरना के घर पर भी बैठना पड़ा था । उन सबको अकेले लौट माया देख कर सरना की पत्नी भोर भी अधिक चीख उठी थी । परन्तु अब कुछ नहीं हो सकता था। फिर सरना की पत्नी को उसी अवस्था में छोड़ कर वे चुप और शांत वहाँ से खिसक माये थे । उसे कुछ सीज मोर कुछ थकावट, दोनों एक साथ महसूस हो रही थीं । अभी वह होटल से कुछ इघर था कि उसे तिलका मिल गया। तिलका पहले थोड़ा मुसकराया, तब बोला [-माज कहाँ रहे, भाई ? --एक काम मा पड़ा था....जरूरी। -भरे क्या यार, तुमने तो प्राज हमारा बेड़ा गर्क कर दिया ! प्रव उसकी भावाज तेज थी-माज हमारे पास एक बहुत मच्छा नम्बर था चावा सेखों का बताया हुमा । माज वह साला लगाने से रह गया ! भद देखना, कल को वही निकलेगा। -तो तुमने लगाया नही ? बाजार जा कर किक शाह के पास लगा देते। -परे क्या यार, बहुत देर तक तुम्हें ढूंढते रहे ! जब नहीं मिले, तो भागे-भागे किक शाह के पास गये, लेकिन तब तक टम हो चुका था, किक माह ने इनकार कर दिया। वह नाराज लगता था।

५६ ॥ थके-हारे परन्तु वह चला गया। जिधर वह मुड़ा, उसी तरफ सामने जोप फ्लेशलाइट का बड़ा बोर्ड था, जहां सुबह वही छत्तीस-सतीस को लड़की बैठी हुई थी पौर जिसे फिर लगभग एक बजे सिपाही शिवमंगल को देख- रेख में रेलवे क्वार्टर्स की तरफ ले जाया गया था। उस लड़की को महसूस करके उसे अपने शरीर में साधारण-सी गर्मी चुमतो लगी। उसे ऐसा लगा कि वह लड़को पर भी उसी विज्ञापन बोर्ड के नीचे बैठी हुई है । शामलाल ने उसे शायद होटल के अन्दर से देख लिया था। बाहर आते ही उसने कहा-बहुत देर लगा दी तुमने ! तुम्हारे बहुत से ग्राहक यहाँ बड़ी उतावली में बहुत देर तक चक्कर लगाते रहे। कुछ लोग तो गालियां भी दे रहे थे। -खैर ! जरा शम्भू को बुलाभो । शामलाल ने शम्भू को मावाज दी । उसने पांच का एक नोट शम्भू को दे कर कहा-जरा भाग कर एक भद्धा तो ले मामो। फिर शामलाल से कहा-तुमने अभी खाना तो नहीं खाया न ? -तुम्हें ही इतनी देर से देख रहा था। शम्भू मद्धा ले कर कुछ देर से प्राया। तब तक साढ़े दस बज चुके थे। फिर हालांकि वे उसी वक्त पीने बैठ गये, तो भी खाना खाते-खाते मोर उठते-उठते सवा ग्यारह बज चुके थे। उसने शामलाल से कहा-पान मैं घर नहीं जाऊँगा । यहीं सो रहूँगा। देर बहुत हो गयी है, इसलिए । -घर वाले फिकर नहीं करेंगे? ---करेंगे तो जरूर, लेकिन भद क्या हो सकता है ! उसने बाहर देखा, तो तारा खड़ा था । तारा ने उसे संकेत से बाहर बुला लिया। वह समझा कि सरना की पत्नी से संबंधित कोई सूचना तारा लाया है । तारा ने कहा-ईश बाबू, चलना है । वह मुसकरा रहा था। -कहाँ ? वात क्या है ? तुम मुसकरा क्यों रहे हो ? -ईश बाबू, वह लोडिया जो सुवह यहां बैठी थी....इस वक्त हमारे कम्जे में है । पलो, मजा रहेगा।

थके-हारे || ५७ शायद शराब का असर था। उसने सोचा, वह उत्तेजित तो नहीं हो रहा । परन्तु कहा-और कौन-कौन है ? जिन-जिन लोगों का तारा ने नाम लिया, वे कुल मिला कर छह व्यक्ति थे और सब-के-सव उसके साथ ही अभी कुछ देर पहले श्मशान भूमि से लौटे थे । अकस्मात उसने तारा की पत्नी को महसूस किया । एक सेकंड के लिए उसे ध्यान भाया कि ये लोग उस भिखारिन लौंडिया को नहीं, बल्कि सरना की पत्नी को फांस कर पाये है और अब ये सरना की मृत्यु पर उसकी पत्नी के साथ सम्मिलित जश्न मनाने वाले है। तारा पब भी मुसकरा रहा था। उसने महसूस किया कि जो उत्तेजना उसके भीतर कही उभरी थी, एकदम से लुप्त हो गयी है । परन्तु वह निर्णय ले चुका था। उसने सोचा कि क्या वह नैतिकतावादी हो रहा है, या नैतिक प्रावेश जैसा कुछ महसूस कर रहा है, लेकिन कुछ भी हो, वह जायेगा नही । इतने लोगों में वह कुछ नही कर सकता, वह समझता था। ऊपर से उसने कहा-पच्छा ठीक है, मैं ममी पाऊँगा। -तो नम्बर सत्तावन में पा जाना फिर । -यह किसका क्वार्टर है? -गोजरे का । फिर कुछ झिझक के बाद तारा ने कहा-ईश बाबू, दो रुपये उधार दे दो, फल लौटा दूंगा । तारा अब भी मुसकरा रहा था। -इस वक्त क्या जरूरत है ? -थोड़ी-सी देसी लानी है । कुछ मौर मधिक मुसकराते हुए फिर बोला-बिना पिये बिल्कुल मजा नही पाता ! -तुम कुछ पहले पा जाते, तो थोड़ो मैं ही पिला देता। हमने ममी- मभी बोतल खाली की है। फिर कहा-अभी तो मेरे पास पैसा नहीं हैं । माज जितने पैसे थे, सब खर्च हो गये । तुम जानते ही हो, माज कोई काम भी नहीं हुमा, ऊपर से भुगतान के सारे पैसे भी खत्म हो गये । उसके पास कुछ पैसे थे जरूर, लेकिन मचानक उसके दिमाग में पाया कि नहीं देने ४ ५८ ॥ थके-हारे है । दिमाग में भा जाता कि देने ही चाहिए, तो वह ये भी देता । मब तारा मुसकरा नहीं रहा था, उसका मुंह लटक गया था। उसने कहा-तारे, कल से चरस वगैरा मुझसे मिल जाया करेगी । अपने सब दोस्तों से कह देना । -~-हो-हो । तारा ने पैसों के लिए दोबारा नहीं कहा मोर लौट गया। वह शामलाल को साथ ले कर सिगरेट के कश लगाता हुमा प्लेटफार्म पर मा गया । कुछ टूरिस्ट कश्मीर या डल्होजो की तरफ से मायद अभी थोड़ी देर पहले लौटे थे । इस वक्त दिल्ली, या कलकत्ता, या बम्बई के लिए गाड़ी मिलने का कोई प्रश्न ही नहीं था, इसलिए वे लोग प्लेटफार्म पर हो सोने की तैयारी कर रहे थे । वे दोनों उन टूरिस्टों के पास से हो कर भाग की भोर निकले, तो एक लड़की उसे टी० अग्रवाल की तरह लगी। टी० भग्रवाल ! वह उस लड़की की तरफ कुछ देर तक गौर से देखता रहा, फिर उसने टी० अग्रवाल का खयाल झटक दिया और उसके मुंह से निकला-साली....हरामजादी....कमीनी ! उसने सिगरेट के दो-तीन कश खींचे, तो जिस शराब का नशा वह महसूस नहीं कर रहा पा, मब उसे यह कुछ-कुछ महसूस हुमा । तब एक- दम से वह कुछ भोर सोच गया। उसने शामलाल से कहा कि वह सैर करके होटल पला जाये, वह क्वार्टर्स की तरफ जा रहा है मौर देर बाद सौटेगा। क्वार्टर्स की तरफ जाते हुए उसने एक मोर सिगरेट जला लिया भोर उससे उसके पेट को शराब तेजी से फूलने लगी। लगभग सात-पाठ मिनट बाद यह नम्बर सत्तावन पर पहुंचा, तो भद्दी उसे दरवाजे पर सड़ा मिला । यह से देस कर मुसकराया । कमरे में घुसने पर उसे वही लड़की सामने बैठी नजर मा गयो। भव से वह दोपहर रो भी मधिक सूबसूरत पौर कुछ कम उम्र की, यानी धम्बोस-सत्ताईस को संगी। उसने सुगो महमूस की कि अभी सेस शुरू नहीं हुमा था। महो मे उसके नजदीक मा कर पाहिस्ता-रो कहा कि याफी लोग साप पाले क्वार्टर में हैं, मगर उसको भी पृय पीनी हो तो वह भी यही पता जाये। ।

१ जन-साधारण सड़क के दूसरी तरफ मारा है, जिसमें दिन-रात लकड़ी चिरती रहती । हालांकि बीच में इतनी चौड़ी सड़क है, फिर भी लकडी के एकदम महोन कण उस तरफ से उड़-उड़ कर चाय प्यालों और गिलासों में लगातार गिरते रहते हैं। पहले-पहल गनेशे ने जब यह जगह शुरू की वो उसे खासी परेशानी हुई थी। तब वह दिन भर अपने ही प्राप में कुढ़ता रहता मोर मुंह-ही-मुंह में पारे वाले सरदारों को गाली-वाली देता रहता। पौर जब कभी कोई गाहक भी इस बात की शिकायत कर देता तो वह कुछ ऊंची आवाज में भी गाली-वाली देने लगता। लेकिन फिर धीरे-धीरे उसने हालात से समझौता कर लिया। इस किस्म का समझौता उसकी मजबूरी थी। क्योंकि इसके मलावा कोई और चारा नहीं था। पहले ही कई तरह की उलटी-सीधी जिन्दगी बिताने के बाद उसकी समझ में चाय का यह काम करने की बात आई थी, और अब उसका मन इस काम को छोड़ने का बिलकुल नहीं था। इसलिए वह हर नुक्स को प्रासानी से टाल देता था। इस जगह पर मारे की तरफ से उड़-उड़ कर पाने वाले लकड़ी के हजारों-लाखों महीन कणों की दिक्कत ही केवल नही थी, उसे खासी दिक्कत उस लगातार को Y को भावाज से भी होती थी जो पारे में लकड़ी चिरने के साथ हर वक्त भासपास बनी रहती थी। यह शू की भावाज दिन . ६०॥ थके-हारे में सड़क के ट्रैफिक के कारण तो कुछ कम परन्तु रात को असहनीय हो जाती थी। गनेशे के वीवी-बच्चे नहीं थे, न ही उसका घर पा । वह रात को भी इसी जगह पर सोता था। लेकिन धीरे-धीरे इस मावाज को सहन करने को भी उसने मादत डाल ली थी। मगर कई बार अवश्य ही, रात को जब वह हड़बड़ाहट में उठता, तो उसे लगता कारीगर लकड़ी को नही बल्कि उसके शरीर को लगातार चीरता चला जा रहा है । अपने धन्धे में दरपसल उसे इस मुसीबत को बर्दाश्त करने की मादत न पड़ती, लेकिन यह शायद सौभाग्यवश ऐसा था, कि उसकें तमाम गाहक एकदम छोटे तबके से सम्बन्धित थे। यानी, इसी सामने वाले भारे के वर्कर, पारे के एक तरफ ट्रक तुलने की मशीन लगी होने और उसी के बगल की खुली जगह में ट्रकों के खड़े रहने से उनके ड्राइवर मौर क्लीनर, तथा पीछे को टिम्वर-मार्केट के मजदूर । मे तमाम धूल फांकने वाले लोग कभी उससे एतराज या शिकायत न करते थे और ये लोग अपने हर चाय के प्याले के साथ लकड़ी के हजारों महीन कणों को निगल जाते थे । हाँ, कभी जब कोई दूसरा राह चलता गाहक उसके पास भाकर चाय पीता पा तो उसकी तरफ से एतराज जरूर उठता था। पहले-पहल तो वह ऐसी शिकायतों से झल्ला जाया करता था कि उसका धन्धा चौपट हो जायेगा, परन्तु बाद में जब उसकी भामदनी पर कोई फर्क न पड़ा तो उसने ऐसी शिकायतों को गोल करना शुरू कर दिया । मोर एक बार जब किसी गाहक सख्त शब्दों में कहा कि 'चाय के साथ इस लकड़ी के बारूदे को पीने से तो टी० बी० हो जायेगी' और वह अपना वाय का प्याला छोड़ कर चला तो तब भी गनेशा केवल मुस्करा कर रह गया था। यह बात गनेशा समझता था कि पांच प्रतिशत के ऐसे गाहकों से उसके धन्धे का कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। मौर बाकी के जो उसके इतने सारे पक्के गाहक थे, उन्होंने तो कमी इस बारे में एक शब्द तक नही कहा । वे सब बड़े मजे से यही चाय हंस-हंस कर पी डालते थे। गनेशे के दिमाग में तो अब एक और धात भी थी, कि इस चाय के गया था, जन-साधारण || ६१ धन्धे के साथ अब रोटी का काम भी शुरू कर दे। लेकिन अड़चन यह यो कि वहाँ भोर जगह न थी। शुरू में गनेशे का ध्यान जब इस जगह को पोर गया था तब सड़क के इस किनारे पर केवल एक खोखा था, जिसमें एक नाई की दूकान थी। उसने भी इसी दुकान को बगल में अपना खोखा वनवा लिया था। तब वहां धन्धे के चल निकलने की कोई गारंटी न थी। मोर तब यह भी डर रहता था कि म्यूनिसिपल कमेटी वाले कहीं खोखे को उध्वा न दें। मगर उसके धन्धा शुरू करने के बाद देखा-देवी और भी दस-बारह खोखे यहां खड़े हो गये थे और उनमे तरह-तरह के काम होने लगे थे। वहां पर इतने खोखों की मौजूदगी से अव यह डर तो काफी कम हो गया था कि म्यूनिसिपल-कमेटी वाले उन्हें यहाँ से उठवा देंगे । क्योकि इतने ज्यादा लोगों को एक साथ जबर्दस्ती बेरोजगार बना देना इतना मासान नहीं होता। और अब यह भी सम्भावना थी कि यदि यहाँ से खोखों को उठवाने की बात उठी भी तो म्यूनिसिपल-कमेटी वाले इतनी- इतनी जगह पर उन्हें पक्की दूकानें बनवा देंगे। क्योंकि रेलवे-रोड के उन पचपन-साठ खोखो में उस रात जब भयानक माग लगी थी, तो उसके पन्द्रह-बीस दिन बाद ही म्यूनिसिपल-कमेटी वालों ने यहां पर पक्की दूकानें बनवाने का काम शुरू कर दिया था। बेरोजगार होने जैसी तो अब गनेशे को कोई विशेष चिंता न थी। मगर इस बात से वह काफी परेशानी महसूस करता था कि अब वह अपने धन्धे को और ज्यादा नहीं बढ़ा सकता । वह सोचता था कि उसने शुरू में ही गलती की। शुरू में ही उसे ज्यादा जगह घेर लेनी चाहिये थी और बड़ा खोखा बनवाना चाहिये था। लेकिन तब क्या पता था । तव तो यही चिंता यो कि धन्धा यदि न चला तो वह सात- पाठ सौ रुपये के नीचे मा जायेगा। वैसे तो, सामने वाली लाईन में खाली जगह पर जहां ट्रक खड़े रहते ये, उस स्थान के पास ही एक छोटा-सा ढाबा था जहाँ पर ट्रकों के ड्राइवर- क्लोनर तथा दूसरे लोग रोटी खाया करते थे। लेकिन उस ढाबे को रोटी बहुत निकम्मी होती है, वह जानता था। वह भी कई बार वहाँ से खाना ६२ थके-हारे मंगवा कर खा चुका था । दिन के वक्त तो वह अपनी अंगीठो पर ही खाना बना लेता था। लेकिन अपने लिये रात की रोटी तैयार करना उसके लिये बेहद मुश्किल काम था। रात को जब वह देसी का पौमा चढ़ा लेता पा तो रोटी जैसा झंझट उससे न हो पाता था। तब वह उसी सामने वाली लाईन के ढाबे वाले को कहलवा भेजता था। दरमसल इसी ढावे की रोटी खा-खा कर ही उसके दिमाग में यह ख्याल समा गया था कि उसे भी चाय के साथ-साथ रोटी का धन्धा शुरू कर देना चाहिये । क्योकि वह ढाबे वाला इतनी निकम्मी सब्जियां बनाता था कि तबीयत रोटी का कोर उगल देने की होती थी। दाल उसकी एकदम बेहूदा होती थी, सिर्फ पानी । पौर वह मांस भी बनाता था तो एकदम लद्धड़ किस्म का। भौर गनेशा यह जानता था कि जब वह बढ़िया सब्जियां और शानदार दाल अपने ढाबे में बनायेगा तो वह सामने वाला एक दिन में ही अपना बोरिया-बिस्तर ले भागेगा । और पाये बनाने में तो वह इतना माहिर है कि क्या कहने । बस स्वाद मुंह से चिपक कर रह जायेगा । लेकिन उसकी सोच वही खतम हो जाती थी जब वह पाता था कि धन्धे को फैलाने के लिये उसके पास जगह की मत्यधिक कमी है । तब वह बहुत दुःखी हो उठता था। वह यह भी सोचता था कि वह अपने पास वाले नाई के खोखे को या दूसरी तरफ वाले दर्जी के खोखे को किसी तरह से हथिया ले । उसके पास कुछ पैसा जमा होता तो उसने इन दोनों में से एक खोखे को लेने की बात चलाई भी होती । मगर उसके पास तो एक बहुत ही हल्की रकम के अलावा मौर कुछ नहीं था। वैसे वह कभी-कभी यह भी सोचता था कि अपने पहले के दिनों को फिर जिंदा कर ले मौर इस नाई या दर्जी का खोखा बदमाशी से मोर जबर्दस्तो से छीन ले। ऐसा नहीं था कि गनेशा इसी बात को लेकर हर समय ही सोचता रहता था। मगर जब भी उसके दिमाग में यह ख्याल मा जाता था तो वह भल्ला पडता पा मोर चिन्तित हो जाता था। तव या तो वह अपने यारों-मित्रों से इस यात की चर्चा करके अपना धोम हलका कर सेवा पा । . -- -- - जन-साधारण || ६३ पौर या वह एकदम से मौन धारण कर लेता था । एक बात उसको समझ में मोर भी माती थी, कि वह इस जगह को ही छोड़ दे। जैसे, यहां से लगभग तीन सौ गज दूर, शहर की तरफ बहुत सारी पक्की दूकाने थीं। वहाँ एक सिनेमा भी था, देसी का ठेका भी था, तथा दूसरी कई तरह की दूकाने थीं और वहां खूब रौनक और भीड़ रहती थी मोर वहाँ गाहक भी खूब पाते थे। वहां एक-दो ढाबेनुमा दूकाने पहले से थी, मगर वह जानता था कि वहां पर एक-दो ऐसी ही और दूकानों की गुंजायश भी है। और फिर वह अपनी बनाई चीजों से गाहकों का दिल बहुत जल्दी जीत सकता है, ऐसा उसे पूरा विश्वास था। लेकिन झंझट वहाँ भी वही था। यानी उन दूकानों में से कोई भी एक दूकान लेने का मतलब था, गांठ में काफी पैसा होना चाहिए। क्योंकि वहां से किसी को उठाने के लिये पगड़ी ही काफी देनी पड़ती। और किसी ऐसे अतिरिक्त खर्चे के बारे में सोचते ही उसके दिमाग़ में सनसनाहट होने लगती थी। उस दिन गनेशे के पास सरनाम बैठा था तब भी यही बात चल निकली थी। सरनाम सामने वाले भारे में कारीगर-मिस्त्री था। इन दिनों घह बीच की शिफ़्ट में चल रहा था । उसको मशीन का ब्लेड टूट गया था, जिससे उसे कुछ देर के लिये छुटकारा मिल गया था और यह गनेशे के पाम भा बैठा था। गनेशा उसके दोस्तों में से था और वह मक्सर उसके पास गप्पें होकने मा जाया करता था। इस समय रात के लगभग साढ़े ग्यारह बजे थे। गर्मियों के दिन थे, लेकिन आज कुछ हल्की-हल्की ठंडी हवा चल रही थी। गनेशा अपने खोखे के बाहर दो बेंचों को जोड़कर उस पर लेटा हुमा था। इससे लगभग माघ घन्टा पहले वह देसी का पौमा पढ़ा चुका था और खाने से भी फारिग हो चुका था। वह लेटा हुमा सिगरेट के कश खींच रहा था कि तभी मारे को लगावार Y की भावाज एकदम बन्द हो गई थी मोर इसके कुछ देर बाद सरनाम उसके पास माकर बैठ गया था। बातें जब चल निकली तो सरनाम ने मुस्कराते हुए गनेशे से कहा, - ६४ ॥ थके-हारे 'तुम ऐसा क्यों नहीं करते....किसी दिन इन सब खोखों को माग लगा दो।' गनेशे ने कहा, 'इससे क्या होगा यार ।' होगा क्या, उसके बाद तुम झगड़ा-वगहा करके ज्यादा जगह घेर लेना, ढाबे के काबिल खुली जगह वनवा लेना।' 'लेकिन भाग लगने से मेरा भी तो बहुत नुकसान हो जायेगा न ।' सरनाम ने फिर मुस्कराते हुए कहा, 'तो मैं तो तुम्हें पहले से ही कह रहा हूँ कि सन से काम लो, जितना कमा रहे हो उसी में गुजारा करो और खुश रहो, ज्यादा कमा कर कहां ले जाभोगे ।' अब गनेशे ने कद्रे ऊंची मावाज में कहा, 'तुम मुझसे तो सब करने के लिये कह रहे हो, मगर तुम खुद तो हर वक्त अपना रोना रोते रहते हो कि मालिक बड़ा हरामी है, मालिक तुम्हें मार रहा है, तुम्हारी कोई बात पूरी नहीं करता, तुम्हें कोई सुविधा नहीं देता, वह इतनी कम तन्खाह देता है, और अगर उसके प्रारे को माग लग जाये तो तुम इससे बहुत खुश होगे....।' सरनाम को ख्याल नहीं था कि बात उसी के माथे मा पड़ेगी। इससे वह थोडा गम्भीर-सा हो गया। पोर इसी मुद्रा में उसने कहा, 'हो, तो क्या मैं गलत कहता हूँ, तभी तो इस मालिक के बच्चे को पता चलेगा। सालों ने इसी मार से अपना इतना बड़ा मकान बनवाया है, दोनों भाइयों के पास दो कारें हो गई हैं, साले मजे मारते हैं....जवकि हम वही के वही है, न हमारी तन्खाह बढ़ती है और न किसी शिकायत की तरफ ध्यान दिया जाता है....मम यहां काम करने वाले हम दो-तीन मिस्त्री ही तो है, हमारी यूनियन भी नही बन सकती, हम दोनों-तीनों लोग मिल कर मान लो एक-दो दिन काम बन्द भी कर दें तो इन साले मालिकों को इससे क्या फर्क पड़ेगा, ये हमें फौरन निकाल देंगे मोर दूसरे प्रादमी पकड़ लायेंगे, लोगों की कोई कमी थोड़े ही है....तभी तो हम कुछ कर नहीं पाते पौर मजबूरी में सन्न करना पड़ता है....मगर यह जगह बड़ी होती और हम भी कुछ ज्यादा लोग होते तो हम भी इन मालिकों को दिखाते, सभी म सही जन-साधारण | ६५ । भपनो कुछ शतें तो जरूर ही मनवा लेते....।' वह कुछ देर रुक कर उसी संजीदा आवाज में फिर बोला, 'गनेशे, तुम भी भभी उस घटना को नहीं भूले होगे जब लकड़ी के साथ-साथ हुकमे का हाथ कंधे तक कट गया था.... वह तो बेचारा जिंदगी भर के लिये नष्ट हो गया और इन पारे वालों ने उसके लिये क्या किया, उसके घर में कुल सौ रुपये तक भी तो नही दिये, बल्कि दूसरे ही दिन राममूर्ति को उसकी जगह रख लिया ।....साले ऐसे मालिकों से क्या हमदर्दी । माग लगे चाहे ....। यह तो साली अपनी मजबूरी है कि सब करना पड़ता है । आदमी पाखिर जाये भी कहां....।' गनेशे ने सिगरेट का टोटा सड़क के बीचोंबीच फेक दिया था और • भव वह उठ कर बैठ गया था। उसने कहा, 'यही तो बात है सरनाम, अपनी कोशिशों से तो कुछ हो नही पाता, कुछ भी करो कोई फर्क नहीं पड़ता । मेरा वह यार न दर्शन, जो दिन यही बैठा रहता है, यह उसी का कहना है । वह कुछ पढ़ा-लिखा है न । उसका तो यही कहना है कि माज को राजनीति ने आदमी को ऐसे शिकंजे में कस दिया है कि भादमी विलकुल लुजपुंज होकर रह गया है। वह कुछ भी करे कोई फर्क नहीं पड़ता, इसीलिये वह लगातार घिसट रहा है और मर रहा है । दर्शन का तो यह भी कहना है कि आज को ऐसी हालत में ऊपर उठने के लिए सिर्फ चालाकी और बदमाशो का ही सहारा लेना चाहिये ।' सरनाम मुस्करा दिया, 'इसीलिये तो मैं तुम्हें कह रहा था कि किसी दिन चुपके से इन खोखों को माग लगा दो....।' गनेशे ने भी मुस्कराते हुये कहा, 'तुम अपने मारे को माग क्यों नही लगा देते? सरनाम जैसे जबरी मुस्कान के साथ बोला, 'मैं तो यार वाल-बच्चों वाला हूँ, किसी तरह से दो वक्त को सूखी रोटी चल रही है, तुम षयों इसे भी खत्म करवाने पर तुले हो ।' 'बस यही हालत मेरी भी है सरनाम । मान लो मैं इन खोखों को भाग लगा भो देता है, मगर उसके बाद कुछ पक्का नहीं है न। मान लो ६६ || थके-हारे म्यूनिसिपल-कमेटी वालों की निगाह इस जगह पर पड़ गई और उन लोगों ने यहां फिर से खोखे नहीं बनवाने दिये तब....तब तो जैसा गुजारा अब चल रहा है वह भी फिर कुछ नही मिल पायेगा और तब न इधर के रहेंगे न उधर के।' दूसरे दिन दर्शन जब वहाँ पर पाया तो गनेशे ने सरनाम की रात वाली सारी बातें उसे सुना दी। दर्शन गनेशे से काफी छोटा था, अठाईस-तीस साल का। जबकि गनेशे की उन बयालीस से कम की न थी। दोनों की दोस्ती आज से लगभग छः-सात साल पहले हुई थी। तब इन दोनों के साथ कृपाल भी था। इन तीनों का एक छोटा-सा ग्रुप था, और यह लोग शहर में मौर शहर के पास-पास छोटी-छोटी चोरियां किया करते थे। यह तीनों ही अपने इस काम में होश्यार और बहादुर थे, और इनको मापस में निभती भी खूब थी। इसलिये जितने भरसे भी इनका काम चला, खूब ठीक-ठाक ढंग से चला और यह कभी पकड़े नही जा सके। लेकिन इन दोनों को अचानक बीच में ही छोड़ कर कृपाल एक दिन किसी दूसरे मादमी के साथ किसी दूसरे शहर में चला गया। कृपाल के यूं चले जाने से इन्हें कुछ धक्का-सा लगा, और यह दोनो फिर कभी चोरियां करने जैसा काम जारी न रख सके । तब एक दिन ऐसे ही देसी की बोतल के दरम्यान दर्शन को यह बात सूझी कि अपने लोगों का कोई धंधा-बंधा भी होना चाहिये । मोर नतीजे के तौर पर गनेशे वाला यही चाय का खोखा खड़ा हो पापा था। यह खोखा और यह सारा धंधा गनेशे का हो था, हालाकि शुरू में प्राधा पैसा दर्शन ने भी इसमें लगा दिया था। मगर दर्शन न ही तो कमी भपना हिस्सा लेता था, मौर न ही कभी किसी से इस धंधे को अपना धंधा बताता था । वस वह जब चाहे यहां पर पाकर बादशाहों की तरह बैठ जाता था। एक तरह से यह उसका 'मड्डा' ही पा। दर. मसल, इस धंधे के शुरू होने के कुछ ही दिनों बाद दर्शन इसमें कपि सना घोर पुका था। उसने इस धंधे के शुरू किये जाने की यात हो कर जन-साधारण || ६७ दी थी, मगर वह इस ख्याल के साथ टिक नहीं पाया था। वह थोडी खुली तबीयत का आदमी था और एक जगह बंध जाने में उसे दिक्कत होती यो । उसने तव शहर में कुछ दूसरी तरह के गंदे-मंदे काम प्राज्ञादाना तौर पर शुरू कर दिये थे, जिनसे उमे रोज की पन्द्रह-बीस रुपये की आमदनी हो जाती थी। और इतने पैसे उसको अपना परिवार चलाने के लिये एक- दम काफी होते थे। मगर गनेशे से उसका याराना अभी भी कायम था। मोर उसके खोखे पर वह रोजाना नियमित रूप से प्राता था। दरमसल यह विचार भी उसी ने गनेशे के दिमाग में भरा था कि मब उसे चाय के काम के साथ-साथ रोटी का काम भी शुरू कर देना चाहिये । गनेशे ने सरनाम की रात वाली वातें अभी खत्म की ही थीं कि उसी वक्त दर्शन का कोई मिलने वाला वहाँ भा गया था। तब दर्शन अपने उस नये साथी से बातों में मशगूल हो गया था, और गनेशा वहाँ से हटकर अंगीठी से पास आ खड़ा हुमा था। गनेशा इस नये व्यक्ति को शक्ल से पहचानता था। इसका नाम रघुपति था, और यह भादमी जोधामल टिम्बर वालों के मैदान वाले डिपो का इंचार्ज था । गनेशा हैरान था कि इसका कोई भी सम्बन्ध दर्शन से कैसे हो सकता है । खैर, उसे क्या, उसने सोचा। उसने चाय के तीन गिलास बनाये, और एक वहीं अपने लिये छोड़कर दो गिलासों को दर्शन के पास ले गया । दर्शन उस समय सिगरेट सुलगा रहा था। उसने गनेशे को भी एक सिगरेट दो मौर उसे सुलगवा दिया। गनेशा सिगरेट का कश खीचता हुमा फिर अंगीठी के पास मा खड़ा हुमा। इसी वक्त दो गाहक वहाँ मा गये जिनके लिये वह चाय बनाने लगा। गमियो के दिन थे, इसलिये उसके गिलास की चाप अभी तक गर्म यो। उसने सिगरेट का टोटा जलती अंगीठी में फेंक दिया और चाय का पूंट भरने से पहले गिलास में फू मारने लगा। चाय पीते वक्त यह उसकी विशेष मादत पी। इसी वक्त उसने दर्शन को परफ़ देखा, रघुपति दर्शन को पाच-यः दस-दस के नोट दे रहा था। दर्शन नोट पामते हुये कह रहा ६८ ॥ थके-हारे था, 'शाम चार-पांच बजे तक मैं मा जाऊँगा।' गनेशा सोचने लगा, यह रुपये पता नहीं किस सिलसिले में दर्शन को दिये गये हैं। खैर, उसे क्या, उसने सोचा । दर्शन जाने । वह गिलास में फू मारता हुमा चाम के चूंट भरने लगा। कुछ देर बाद रघुपति जब खोखे से बाहर चला गया तो गनेशा दर्शन के पास आ बैठा । उसको चाय भभी भी खत्म नहीं हुई थी। बेंच पर दर्शन की सिगरेट की डिब्बी पड़ी थी। उसने उसमें से सिगरेट निकालकर जला ली। तब कहा, 'यह बात तो यार बीच में ही रह गई, जरा उस पर तो सोचो।' दर्शन हंसने लगा। भोर कहा, 'तुम तो गनेशे बेवकूफ हो । सरनाम ने तो वह बात मजाक में कही होगी, और तुम लगता है उसी पर लगातार सोच रहे हो।' गनेशा जैसे संजीदा था, बोला, 'मजाक भी हो तो क्या, ऐसा क्या हो नहीं सकता। ऐसा कुछ भगर हो जाये तो उसमें हमारा फायदा हो फायदा है।' अब दर्शन ने भी एक सिगरेट सुलगा लो, मौर फिर बोला, 'छोड़ो यार उस बात को, उसमें कुछ नही रखा, वह सब मामूली बात है....।' 'मामूलो' शब्द से गनेशा जैसे थोड़ा-सा चौंका । उसने चाय का पाखिरी धूंट भरा भौर खाली गिलास को बैंच पर रखते हुये दर्शन के चेहरे की तरफ देखने लगा। दर्शन ने कहा, 'अब दरमसल इस धंधे में कुछ नहीं रखा । लोगो को बना-बनाकर चाय पिलाते जाम्रो या रोटी खिलाते जामो, यह भी कोई धंधा है साला।' गनेशा बड़ी हैरानी से बोला, 'क्या बात कर रहे हो यार ! तुम्ही ने तो यह धंधा खुलवाया था, मोर यह भी तुम्हारी ही सलाह थी कि मव इसमें रोटी का काम भी शुरू कर देना चाहिये। 'वह तो सब ठीक है, यह सब अपनी जगह है। मगर यह भी तो जन-साधारण || ६९ सोचो इस जूठे वर्तन मांजने वाले काम में तुम्हें क्या मिल जाता है या मागे मिल जायेगा । इसमें कुछ भी बनने से रहा....।' फिर वह कुछ धीमे स्वर में बोला, 'मैं दरअसल भाज तुमसे एक बहुत जरूरी बात करने पाया था। यह बात ऐसी है कि तुम समझो हमारे बारे- न्यारे हो जायेंगे।' इससे गनेशे का चेहरा भी कुछ चमकने लगा, और उसने एक साथ सिगरेट के दो लम्बे कश खीच डाले । दर्शन ने कहा, 'एक पार्टी से कल मुलाकात हुई थी। उनका काम है । भौर बहुत बड़ा काम है । तुम्हें अब यह धंधा चलाने की भी कोई जरूरत नहीं। उनसे बात हो गई है। मौर वे हर बार के हमें दो-दो हजार रुपये दिया करेंगे। जो दो गाहक बैठे चाय पी रहे थे, उनमें से एक ने कहा, 'गनेशे, यह पैसे पड़े है, और वे उठकर खोखे से बाहर चले गये । इतनी बड़ी रकम के नाम से गनेशे को मांखों में खुशी तर गई थी। मगर उसने पूछा, 'यह काम कैसा है ? हम क्या करना होगा ?' दर्शन ने कहा, 'काम ज्यादा मुश्किल नहीं है। दरअसल वह पार्टी स्मगलिंग का धंधा करती है। हमें सिर्फ पाकिस्तानी बार्डर तक जाना पड़ा करेगा। इस काम के लिये हमारे साथ एक जीप भी रहेगी । बस वहाँ से माल लेना है और लेकर चले माना है। बार्डर पर भी खास खतरा नही होगा, क्योकि बार्डर-पोस्ट के इंचार्ज को यह लोग मिलाये रहते हैं.....' इस चाय के धंधे से पहले गनेशे ने छोटी-छोटी चोरियों का काम जरूर किया था और उस काम में उसे इतना डर भी न लगता था। डर लगता भी था तो वह उन छोटे-छोटे डरों का अभ्यस्त ही था । मगर दर्शन को जवानी अब इतने बड़े काम, और स्मगलिंग, बार्डर जैसे शब्दों को सुनकर वह मपने अन्दर ही मन्दर बौखला गया। दर्शन पभी कह ही रहा था....'और हर बार के इतने से काम के हमें दो-दो हजार रुपये मिला करेंगे.....'

७० || थके-हारे 'मगर दर्शन, यह काम इतना मासान नहीं है जितना तुम इसे समझ बैठे हो । इसमें तो जान जाने का भी खतरा है....और मगर कही पुलिस के हाथों पड़ गये तो ऐसे कामों में लम्बी सजाएँ होती है....यह काम तो बड़ा ही मुश्किल है....।' गनेशा जैसे अपने अन्दर ही अन्दर डूबने लगा था। उसे भव सरनाम की बात भी याद मा रही थी कि सत्र से काम लेना चाहिए । यही ठीक रहता है । वह अब सोचने लगा था कि उसको कोई इतनी बड़ी इच्छा भी तो नही है कि जिसके पास बहुत पैसा हो जायेगा और वह अमीर भादमी हो जायेगा। दो वक्त की रोटी तो उसे मजे से मिल हो रही है, मोर रात को पीने को देसी का पौभा भी मिल जाता है । इसके अलावा उसे और क्या चाहिये । यह ठीक है कि वह कुछ तरक्की जरूर करना चाहता है, मगर इसके लिये वह किसी बड़े खतरे में नहीं पड़ना चाहेगा। भव तो इसी चाय के धंधे के साथ जो तरक्की हो जाये सो हो जाये । वह दूसरा कोई ऐसा-वैसा काम नहीं कर सकता। उसने दर्शन की पोर देखते हुये कहा, 'मेरा तो दिल बिल्कुल नही मान रहा। यह काम मुझसे नही हो सकेगा...। इसमें तो मुसोबत ही मुसी- बत है...।' दर्शन हंसने लगा, 'लगता है तुम पहले ही बहुत डर गये । मार, मैं भी समझता हूँ यह काम इतना मासान नहीं पोर इसमें कुछ खतरा भी है, मगर सतना रातरा नही है जितने पैसे इसके बदले में मिलेंगे, जरा यह भी तो सोचो । एक बार काम करने के हमें दो-दो हजार रुपये मिलेंगे....मोर फिर तुम इतना हर किस लिए रहे हो, मरना तो एक ही दिन है न । मगर लगता है जब से तुमने यह चाय का धंधा शुरू किया है तुम तो एकदम से मुस्त हो गये हो....' 'यह बात नहीं दर्शन। कोई दूसरा घोटा-मोटा काम होता वैसा हम पहले करते रहे हैं तो मैं फौरन तयार हो जाता । मगर यह काम हमारे लिये बहुत बड़ा है । मुमसे तो यह हो ही नहीं पामेगा । मेरा दिल विल.

जन-साधारण || ७१ . कुल नहीं मान रहा । मौर में तो तुमसे भी कहूँगा कि ज्यादा पैसों का लालच छोड़ दो और भपने दिमाग से यह बात निकाल दो....' 'मगर गनेशे, मव कुछ नहीं हो सकता । मैंने यह काम करने का फैसला कर लिया है । मैंने उस पार्टी वालों से हां कर दी है मौर तुम्हारी तरफ से भी हो कर दी है....' गनेशे की मौखें एक क्षण के लिए क्रोप से उबल ही पड़ी। उसने घर कर दर्शन को देखा। मगर दूसरे ही क्षण यह ढीला-सा पड़ गया और गर्दन घुमा कर बाहर सहक की तरफ देखने लगा। लेकिन एक-दो मिनट बाद ही यह फिर क्रोध से भर उठा और दर्शन की मोर मुड़कर जोरदार पावाज में कहने लगा, 'तुमने मेरी तरफ से हो क्यों कर दी....मैं यह काम नही कर सकता....मैं यह काम नहीं करूंगा....।' दर्शन ने मुस्कराते हुये कहा, 'तुम गुस्से में क्यों बोल रहे हो।' उसने बेंच पर से सिगरेट की डिब्बी उठाई मौर उठ खड़ा हुमा, 'तुम जरा ठंडे दिल से सोचना । मैं भब जा रहा हूँ। मुझे एक जगह पहुँचना है ।' दर्शन खोखे से बाहर भा गया और शहर की तरफ वाले रास्ते पर चल दिया। वह वहीं बेंच पर गुमसुम बैठा रहा । उसका सर भन्ना रहा था। वह समझ नहीं पा रहा था कि उसे अब क्या करना चाहिए । उसका दिमाग एकदम भारी हो गया था मौर वह कुछ सोच न पा रहा था । दर्शन तो - वहाँ से चला गया था, और उसके लिये अब यह उलझन पैदा हो गई थी कि वह भव क्या करेगा। क्या वह भपने इस धंधे को छोड़ने को तैयार हो जायेगा, और क्या वह दर्शन के साथ मिलकर उस पार्टी का स्मगलिंग का देगा? उसके रोटी के काम शुरू करने वाली बात का क्या होगा? यह सब चीजें उसके दिमाग में एक साथ घूम रही थी और उसका सर दर्द करने लगा था। फिर वह यह भी समझ रहा था कि दर्शन जल्दी हो दोबारा यहाँ, मायेगा, तब वह उसे क्या जवाब देगा। क्या वह उसे इनकार कर सकेगा? इनकार कर देगा तो दर्शन क्या सोचेगा? लेकिन वह काम शुरू ७२ ॥ थके-हारे अपना यह धंधा भी छोड़ना नहीं पाता । इस काम से भी तो तरक्को का जा सकती है। जैसे प्रगर वह साय में रोटी का काम शुरू कर दे । मगर जगह कहाँ है ? उसके पास रोटी का काम शुरू करने के लिये जगह भी तो नही है.... जब इन्हीं सारी बातों से उसका सर और ज्यादा भानाने लगा तो उसने गिलासों के पास रखी पैसों वाली संदूकची में से बीड़ी का बंडल निकाला और उसमें से एक थोड़ी सोच कर उसे सुलगा लिया। इसी पक्त उसके खोखे की लकड़ी की दीवार को पीटते हुये बगल के छज्जू नाई ने जोर से कहा, 'गनेशे, वाबूजी के लिए चाय बनाना, फस्सक्लास ।' इसके तुरन्त ही वाद छज्जू नाई फिर बोला, 'चीनी जरा ठोक डालना ।' गनेशे ने बोड़ी पर कश लगाते हुये चाय के वर्तन को अंगीठी पर रख दिया और केतली में से उसमें पानी उंडेलने लगा। सडक के पार से आवाज माई, 'मो गनेशे ।' गनेशे ने उघर देखा। ट्रक तोलने वाली मशीन के बगल में तीन-चार ड्राइवर लोग बैठे थे, जिनमें से एक ने अपने हाय को चार उँगलियों सीधी तान रखी थी। गनेशे ने जोरदार भावाज में कहा, 'भभी लाता हूँ।' उसने चाय वाले बर्तन में चार चाय का पानी और उडेल दिया। चाय जब बन गई तो एक गिलास उसने नाई के खोखे में पकडा दिया मौर चार गिलास सड़क के पार उन ड्राइवरों को दे पाया। चाय वाले बर्तन में कुछ चाय अभी बची हुई थी। इसे उसने अपने लिये गिलास में भर लिया । चाय वाले बर्तन में अक्सर थोड़ी-बहुत चाय बच जाया करती थी, प्राधा गिलास या चौथाई गिलास, भौर इसे फेकने की बजाये हर बार वह खुद पी लिया करता था। इस तरह से दिन में यह लगभग चालीस- पचास बार चाय पीता था। मपने गिलास में फू मारते हुए वह बैच पर भा बैठा। माज गर्मी बहुत ज्यादा थी। गर्मियों के दिन तो थे ही। भगर माज सड़क जैसे जस जन-साधारण || ७३ । सड़क रही थी। सड़क पर से जब कोई ट्रक, मोटर या कार गुजरती तो गर्म हवा के साथ घूल भी उड़ती । इस घूल का कुछ हिस्सा उसके खोखे में भी चला माता । सामने वाले मारे के कारण पहले ही लकड़ी के हजारों महीन- महीन कण उसके खोखे में भरे रहते थे। गर्मियों में इन महीन कणों से एक यह भी परेशानी थी कि वे पसीने के साप चेहरे हाथों पर चिपक जाते थे । मोर अव यह सड़क की गर्म हवा मौर घूल । इससे और भी ज्यादा परेशानी थी। वह इसी परेशानी के कारण कई बार सोच चुका था कि मगर उसके पास पक्की दूकान होती तो वह उसमें छत वाला पंखा जरूर लगवावा। उस तरफ से भारे का कारीगर बिशन लाल पा रहा था। वह शायद उसी के पास मा रहा था । विशन लाल ने अपने मुंह मोर नाक पर बारीक कपड़ा लपेट रखा था। जब वह पास माया तो गनेशे ने देखा वह कपड़ा लकड़ी के यारूदे से भरा हुमा था! विशन लाल के सर पर बंधा कपड़ा और दूसरे कपड़े कमीज-पाजामा अादि भी बारूदे से भरे थे। विशन लाल ने खोखे से थोड़ा बाहर ही अपने कपडे झाड़े, मुंह-नाक पर से कपड़ा खोला और उसे भी भाड़ा, फिर वह खोखे के अन्दर मा कर गनेशे के पास वेंच पर बैठ गया । गनेशे ने कहा, 'कैसे हो बिशनू, चाय बनाऊँ क्या ?' विशन लाल बोला, 'अरे छोड़ो यार चाय, गर्मी से तो पहले ही जान निकल रही है। साला गर्मी के दिनों में मारे में काम करना भी एक मुसीवत है, एक मिनट भी वहां खड़े रहना मुश्किल हो जाता है...' फिर दूसरे क्षण बोला, 'अच्छा, अगर तुम्हारी मर्जी है तो बना दो एक गिलास, मगर पहले थोड़ा पानी जरूर पिला दो यार.... तुम्हारे खोखे में भी वो बेहद गर्मी है....' गनेशा उसे पानी पिला कर उसके लिये चाय बनाने लगा। विशन लाल फिर बोला, 'गनेशे, तुमने सुना कि नहीं, आज सुबह रामकृष्ण-प्रेमकृष्ण वालों के डिपो में एक मादमी मर गया ।'

७४ | थके-हारे 'न, मैंने तो नहीं सुना, गनेशे ने कहा, 'कैसे हुमा, कोन भादमी था वह । . 'प्रभी पारे में एक ठेला पाया था, उन्ही लोगों से पता चला। वह आदमी उसी डिपो में स्लीपर ढोने का काम करता था। वह एक ढेर पर चढ़ा हुमा था कि वहां से फिसल गया, और उसके साथ ही पांच-सात स्लीपर फिसलते हुये उसके ऊपर गिर गये। वह दूसरी सांस भी न ले पाया बेचारा । सुना है उसके चार-पांच बच्चे है....' गनेशे का चेहरा जैसे कमजोर पड़ गया। वह अफसोस करने लगा। फिर दो-तीन क्षण बाद बोला, 'डिपो वालों को उसके घर वालों की मदद करनी चाहिए.... 'वे क्या मदद देंगे। ज्यादा-से-ज्यादा तीन-चार सौ रुपये उन्हें दे देंगे। मगर उससे क्या होता है। बच्चो की पूरी जिन्दगी मागे पड़ी है....' 'हां, यह तो है । यह तो वाकई बहुत बुरा हुमा !' इतना कह कर गनेशे ने चाय गिलास में उडेलो और गिलास विशन लाल को पकड़ा दिया । बाहर तेज धूप और धूल थी। उस भोर देखते हुये गनेशे ने विशन लाल से कहा, 'विशने, तू चाय पी, मैं जरा सामने से खाली गिलास ले पाके।' ड्राइवर लोग चाय पी चुके थे। उसने जमीन पर रखे खाली गिलास उठा लिये। एक ड्राइवर ने उसके हाथ में दो का नोट पकड़ा दिया। उसने अपने खोखे की भोर मुड़ते हुये कहा, 'मैं बाकी पैसे लेकर अभी माता हूँ।' दो-तीन मिनट बाद जब वह लौट कर वहाँ माया तो उन चारों ड्राइवरो के पास खड़ा एक सिक्स ड्राइवर पास में पड़े एक रिक्शा की मोर इशारा करके कह रहा था, 'सूपर का पुत्तर, रेलवे रोड मे यहाँ तक का सथा रूपया मांग रहा है, हरामो समझता है जो मांगेगा मिल जायेगा, हम क्या उल्लू है, हम कुछ नही जानते....' रिपगा याला मह रहा था, '....यह इतना भारी टापर भी तो पाप जन-साधारण || ७५ लाद कर लाये हैं । मैंने तो मापसे पहले ही कह दिया था कि यहाँ तक का सवा रुपये से कम नहीं लूंगा....' वह सिक्ख ड्राइवर कड़क कर बोला, 'और मैंने कहा था कि बारह माने से ज्यादा एक पैसा न दूंगा।' फिर एक क्षण बाद बोला, 'अब बारह भाने लेते हो तो लो नहीं तो भागो यहाँ से....' 'भागो कैसे, मेहनत की है, कोई हराम के पैसे तो नही मांग रहा, मैं सवा रुपये से कम लिये बिना नही जाऊंगा....' सिक्ख ड्राइवर फिर कड़क कर बोला, 'अव तू झगड़ा कर रहा है.... तेरी बदमाशी तो मैं एक मिनट में निकाल दूंगा....ऐसी जोरदार झापड़ दूंगा कि जिन्दगी भर याद रखेगा।' रिक्शा वाला बोला, 'मार कर तो देखो....' तभी उन बैठे हुये चार ड्राइवरों में से एक गुस्से में उफनता उठा और 'हरामखोर, बदमाशी दिखाता है, और फिर आगे से बकवास करता है' कहते हुये तेजी से उस रिक्शा वाले की भोर लपका और उसने उस रिक्शा वाले के चेहरे पर एक ऐसा जोरदार झापड़ मारा कि वह लड़खड़ाता हुमा दूर जलती सड़क पर जा गिरा । गनेशा एकदम से तिलमिला उठा। लेकिन तुरन्त ही फिर वह संभल भी गया। वह कुछ कहना चाहता था, मगर उसने अपने को रोक लिया था। उसने पैसे वापस किये और अपने खोखे की तरफ चल पड़ा । सड़क पार करते हुयं उसने देखा, वह रिक्शा वाला सड़क पर से उठ गया था भौर अपनी एक टांग को सहला रहा था, शायद उसका एक घुटना बुरी तरह से छिल गया था। खोखे की अन्दर वाली बेंच पर बैठा विशन लाल चाय की चुस्कियाँ ले रहा था । गनेशा जाकर अंगीठी के पास खड़ा हो गया। बिशन लाल बोला, 'उस रिक्शा वाले को भला मारने की क्या जरूरत थी....वह तो पहले ही बेचारा गरीब-दुखी भादमी है....तुमने भी....' गनेशा मुस्कराते हुए बोला, 'छोड़ यार विशने, कोई दूसरी बात कर....

७६ || थके-हारे जगह-जगह तो यही हाल है...कौन किसी को बचाने माता है मोर कोन किसी की परवाह करता है....वह रिक्शा वाला गरीब-दुःखी मादमी है तो तुम कोन से धन्ना सेठ के पुत्तर हो....या मैं....तुम्हारा मारे वाला मालिक भी तो तुम्हारे डंडा किये रहता है, भोर कौन माई का लाल तुम्हारे साथ हमदर्दी दिखाने भाता है....विशने, बस....', वह कुछ मौर कहना चाहता था, लेकिन इतना ही कह सका, '....लो बीड़ी पिनो.....' और यह संदूकची में से बीड़ी का बंडल निकालने लगा।

हातो 1 सदियों की पहली बारिश शुरू होते ही सारा कश्मीर खाली होना शुरू हो जाता है। बड़े-बड़े व्यापारी, गजटेड आफिसर मोर अन्य अमीर लोग सीधे दिल्ली तक पहुंचने लगते हैं और सैर-सपाटे की खातिर इससे भी आगे बम्बई-कलकत्ता की तरफ निकल जाते हैं। काश्मीर एसेम्बली के दोनों ग्रुप अपने खेमे जम्मू में तानते हैं और वही पर एक-दूसरे पर फब्तियां कसते हैं । मौर कश्मीरी मजदूर ! वे पहले पठानकोट पहुँचते है, कश्मीरी होटलों में अपनी कुछ जमा रकम उड़ाते है मौर फिर धीरे-धीरे सारे पंजाब में फैल जाते है । कुछ एक दिल्ली तक भी भाते हैं। हर साल ऐसा ही होता है। इन कश्मीरी मजदूरों में कइयों के साथ उनकी बीवियां मोर जवान लड़कियां होती है । इनके छोटे-छोटे बच्चे सारे शहर में भीख मांगते नजर भाते हैं, स्टेशन पर, बस-स्टेशन पर, बस-स्टेण्ड पर, रेस्तराओं के बाहर, बाजारों में । और ये खुद मजदूरी करते है, मंडियों में, लकड़ी की टालों में, कोयला डिपुओं में । कुछ सिर्फ ठेले चलाते या कुली का काम करते हैं। हर साल ऐसा ही होता है। सर्दियों के शुरू होते ही पंजाबी मजदूर यह कहते सुने जाते है, "भव हातो मा जायेंगे, मब मरे।"

७८ || थके-हारे "बस थोड़ी देर है, हातो पाने ही वाले हैं। शहर के व्यापारी लोग भी वार-बार यही कहते हैं। हातो! यह इन्हीं कश्मीरी मजदूरों का पंजाबोकरण है। कोई इन्हें मजदूर नहीं कहता । बल्कि सिर्फ हातो ! यह नाम क्यों मोर कैसे पड़ा इसके इतिहास के बारे में हमारी जानकारी बिलकुल नहीं है। "खुश-मामदीद ।" पंजाब के व्यापारी पौर स्टाक होल्हर इन कश्मीरी मजदूरों के माने पर यही सब कहते हैं। "भो तेरी बहन........ पंजाबी मजदूर इन कश्मीरी मजदूरों के माने पर इनको पौर इनकी मामों-बहनों को हजारों क्या लाखों गालियां दे डालते है। वे इन कश्मीरी मजदूरों से बैर रखते है और इनसे भिड़ जाने को हर समय तैयार रहते है । लेकिन ये कश्मीरी मजदूर, चाहे अपनी लड़कियों, बीवियों मोर अपने बच्चों से भीख मंगवाते हैं, किसी से भी तल्खी या बदजबानी से कभी पेश नहीं माते, कभी किसी से झगड़ते नही, कभी किसी को गाली नही देते, कभी चोरी या ऐसी कोई गन्दी हरकत नहीं करते । बात यह है, कश्मीरी मजदूरों के इघर माते हो मजदूरी के रेट बहुत गिर जाते है । पंजाबी मजदूर तीन रुपये से कम कभी नहीं कबूलते, परन्तु ये हातो सवा या हेढ़ रुपये दैनिक पर ही हंसी-खुशी काम करने को तैयार हो जाते हैं। पंजाब के व्यापारो पौर बड़े-बड़े आढ़ती इन हातोमों को हाथों-हाथ लेते है क्योकि ये हातो पंजाबी मजदूरों के बजाय काम भी ज्यादा करते है । उनकी तरह ये सुस्ती नहीं दिखाते । इन हातोमों के माने से इधर के लोगों को केवल एक नुकसान होता है, यह कि बहुत से स्थानीय मजदूर बेकार हो जाते हैं। इन्हें फिर या तो रिक्शा चलाना पड़ता है या फिर चोरियां करनी पड़ती हैं । हर साल ऐसा ही होता है। स्थानीय व्यापारियों मोर मादतियों को खुश करके मौर यहाँ के मजदूरों की गालियां सह-सहकर ये करमोरी मजदूर हातो || ७६ , सर्दियों के खत्म होते ही वापस चले जाते है, कश्मीर । इस साल भी ठीक ऐसा ही हुमा । कश्मीरी मजदूरों के टोले के टोले, बंजारों की तरह या शरणार्थियों की तरह, स्टेशन पर, बस-स्टेण्ड पर, कश्मीरी होटलों में और जगह-जगह पर लदे पड़े हैं। इनमें से बहुत से दूसरे शहरों में चले जायेंगे ! कुछ यहीं रह जायेंगे। ममदू भी इस बार फिर यहाँ भाया है। पाठक नोट करें कि इस कहानी का कहने वाला ममदू से पहले का परिचित है। ममदू पहले भी इस शहर में पाया है और इस कहानी का कहने वाला लोकल है। ममदू के साथ उसका एक छोटा लडका भी है ममदू की बीबी तीन साल पहले कश्मीर में मर गई थो, बीमारी से । ममदू के साथ उसके टोले के पन्द्रह-बीस भादमो मौर भी हैं, तीन-चार बच्चे भी, औरत कोई नहीं। ममदू के टोले में इस बार कुछ नये चेहरे भी है । कुछ परिचित चेहरे नजर भी नही मा रहे । शायद वे किसी दूसरे टोले के साथ मिल गये होंगे। ममदू का मसल नाम मोहम्मद लतीफ है, लेकिन सभी उसे ममदू कहते है और उसे इस परिवर्तन पर कोई ऐतराज नही । इस टोले के पाते ही पहले की तरह मन्दरून-बाजार में एक छोटी-सी दुकान किराये पर ले ली गई है। उसमें से मकड़ी के जालों और अन्य गन्दी भौर सोलन की वू को धो डाला गया है। अपनी-अपनी बोरियों में भरा अपना निजी सामान एक कोने में ढेर को शकल में लगा दिया गया है । अब चूल्हा इकट्ठा ही जलेगा।- टांगा-एजेन्सी में शहर के बड़े-बड़े माढ़तियों की दुकानें है । टांगा एजेन्सी, जब इस शहर की भावादी सात-पाठ हजार के लगभग पी कुल, तब यह टांगा-स्टेण्ड ही था। पार्टीशन के बाद मौर मब इस शहर की मावादी सवा लाख सक बढ़ गई है, इसलिए इस टांगा स्टेण्ड को पाड़- तियों ने घेर लिया है, बहुत-सी नयी दुकानें बनवा ली है।

८०॥ थके-हारे
भी वही है, टांगा-एजेन्सी ।
टांगा-एजेन्सी में भालुमों के एक थोक व्यापारी की दुकान का नाम है,
बालकराम-शोरीलाल । कश्मीर से पाकर ममदू इसी पादत की दुकान पर
काम किया करता था, तीन-चार साल से लगातार । कश्मीर से माता,
सीधा इसी दूकान पर जाता । काम मिल जाता । दूकान के मालिक ममदू
की ईमानदारी मोर मेहनत से काफी सुश रहते थे।
इस बार भी ममदू सीधा इसी दूकान पर गया ।
"सलाम बाबूजी।"
"मा गये ममदू," आढ़ती बड़ी खुशी से बोला, "मा, ले वह बोरी
विद्या ले, उस पर बैठ । ठीक तो रहा न ?"
"अल्लाह का फजल रहा बाबूजी।"
"ममदूतू इस बार देर से क्यों माया ?"
"एक-दो दिन की भी कोई देर होती है, बाबूजी।"
"मच्छा ममद, मुझे बहुत काम करना है मभी, तू सुन, तेरे जल्दी न
भाने से हमने सोचा शायद तू इस बार न भाये, इसलिए हमने दूसरे हातो
ले लिये हैं।"
"बाबूजी, मापको मेरी ईमानदारी पर शक तो नही, भाप ऐसे हो तो
नही कह रहे।"
"हट, बेवकूफ, जा तू गोदामों में जाकर खुद देख ले और सुन, तुम्हरा
तो मन्दरून बाजार में ही होगा। इन मजदूरों में से कोई चला गया या
कोई बीमार हो गया तो हम तुम्हें खुद बुला लेंगे, तब तक कहीं और गुजारा
कर ले।' इसके बाद माढती ने उसको पन्द्रह पैसे देते हुए कहा, चाय पी
लेना, सर्दी बहुत है।
मादती ने अपने चारों तरफ लाल इमली का. मोटा कम्बल कस कर
लपेट लिया।
ममदू इस बार कुछ ही देर से माया या कश्मीर से, और इसका नतीजा
उसे भुगतना पड़ा, सब तरफ से उसे कोरा जवाब ही मिला।
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हातो || ८१ मम यह शहर छोड़ना नहीं चाहता था, जाने क्यों ? काफी जगहों पर काम के लिए कोशिश करता रहा । परिणाम स्वरूप तीन दिन की बेकारी के बाद उसे एक नई तिमंजिली बन रही बिल्डिंग में इंटें ढोने का काम मिल गया । कड़ाके की सर्दी में इस कहानी का कहने वाला सुबह के नौ बजे तक सोया रहता। लेकिन ममदू और उसके सभी साथी सुबह छः बजे उठते । चूल्हा जलाया जाता । शौच जाने वाले जाते, वाकी हुक्का गुड़गुड़ाते । रोटियां बनाई जाती, चाय रखी जाती। मौर विना नहाये, बिना हाथ-मुंह धोये सभी लोग, नमकीन चाय में अपनी मोटी-मोटी रोटियां हुबो कर बड़े मजे से साते, जल्दी-जल्दी खाते, गप्पें हांकते हुए खाते, एक दूसरे को छेड़ते हुए खाते । माठ बजे तक दूकान बन्द हो जाती। सभी भपने-अपने काम पर चले जाते । ममदू का लड़का शरीफा (शरीफ मोहम्मद), कोई कहता सलीफा, भीख मांगने निकल जाता, नंगे पांव, ठण्डे-मैले कपड़े पहने । खुद ममदू नयी बन रही बिल्डिग की तरफ चला जाता, ठण्डे-मैले कपड़े पहने, पायों में मोटी रस्सियो का बना जूता पहने भोर मुंह से भाप निकालता हमा। ममदू का काम था, दूसरी मंजिल से तीसरी मंजिल तक इंटें उछालना, जहाँ पर बैठा हुमा कोई दूसरा मजदूर उसे थाम लेता । दोनों थक जाते तो पुछ देर सुस्ता लेते। नहीं तो फिर, इंटें उधालना। इंटे यामना । साढ़े बारह बजे तक यही रहता। फिर माधे घण्टे को छुट्टी। राज भोर मजदूर रोटी खाने बैठ जाते। उसके बाद पाय पोते । फिर सिगरेट पीते । साप-सोप हंसी, साप-साथ गप्पें । ममदू को इस वक्त रोटी खाने की पादत नही यो, वह एक माने के भुने हुए गर्म धने या गर्म मोमफली सेता, पवाता, कार से पानी पी सेता यदि रेवस घने सापे होते। फिर घोटा-सा हुक्का गुहगुहाता मोर मकेसा बैठा रहता । यहुत बात नहीं, बहत गप्प नहीं । अकेले में ही कोई करमोरी ॥षक हार लोकगीत गुनगुनाता, अपने मुंह हो मुंह में । फिर काम शुरू होता। इंटों का उछालना, ईंटों का थामना । और शाम के पांच बजे तक रहता यह सब । उसके बाद दूकान, मपना घर । कोई छः बजे आता, कोई सात बजे, कोई माठ बजे । लेकिन जो भी पहले पाता, साथ वाली बेकरी की दुकान से चाबी लेता, चूल्हा जलाता, पतीलो में दाल रखता, फिर चावल उबालता । रात को सब वैठकर इकट्ठे खाते । साने के बाद दूधवाली नमकीन चाय एक बार फिर चलती । हुक्के गुड़गुड़ाये जाते । भौर फिर पन्द्रह-बीस भावाजें एक मावाज बनकर कश्मीर का कोई लोकगीत ऊंची भावाज में गाती । फिर कोई मोर गीत । उसके बाद कोई भौर गीत । एक डेढ घण्टे तक यही सब चलता। इस कहानी का कहने वाला कश्मीरी जबान नही समझता, इसलिए यह कह सकना बहुत कठिन है कि उनके जोर-जोर से गाये गये लोकगीतों का क्या अर्थ है । हाँ, उनके भावों मोर चेहरों से यही प्रकट होता था कि वे हर्ष-गीत या नई उम्मीदों के गीत गा रहे है । दस-साढ़े दस बजे तक वे सव लोग उसी छोटी-सी दूकान के अन्दर इकट्ठे ही सो जाते। किसी का सर किसी के पांव पर टिका होता, किसी की टॉग किसी के पेट पर पड़ी रहती, किसी का हाथ किसी की जांघों पर होता और कोई उल्टा पडा होता, कोई एक बल ही पड़ा रहता। वे सब लोग मापस में इतने सटे हुए होते कि सर्दी उनमें से गुजर ही न पाती । वे एक-दूसरे का हीटर इस्तेमाल करते, मोर जोर से सांसें छोड़ते। सुबह छः बजे तक सब ऐसे गुमसुम रहते, जैसे किसी गन्दे गढ़े में लावारिस लाशें एक- दूसरे के ऊपर फेंक दी गयी हों मोर वे स्थिर इस कहानी का कहने वाला, जहाँ ममदू की दुकान है, उसके सामने वाले मकान में रहता है। एक दिन ममदू सुबह-ही-सुबह उसके पास माया, उसे सोते से जगाया। चुप हों।

हातो || ८३ . ममदू के सर पर पट्टी बंधी थी और उस पर खून जमा था । ममदू का चेहरा पीला पड़ा था, कुछ ठण्ड की वजह से, कुछ खून बह जाने के , कारण। "ममदू, यह क्या हुआ, यह पट्टी कैसे बांध ली।" "बाबूजी, सवाल मेरा नहीं, शरीफा का है।" "शरीफा को क्या हुमा ?" "शरीफा कल सुबह का गया हुमा अभी तक नहीं पाया । रात को भी नहीं पाया बदमाश । पता नहीं इस सर्दी में कहाँ मर गया। बहुत फिकर लग रही है बाबूजी।" "अच्छा, बात तो फिकर की है ही। मच्छा, मैं उसे देखूगा । लेकिन तुम्हारे क्या हुआ यह ।" ममदू वही ठण्डी जमीन पर बैठ गया । "माजकल एक नये बन रहे मकान पर काम करता हूँ, बाबूजी । इंटें ऊपर तक पकड़ाने का काम मेरे ही जिम्मे है। तीन दिन हो गये, मैंने इंट कपर उछाली, ऊपर वाले प्रादमी का ध्यान जरा-सा चूका, ईंट मेरे सर पर मा गिरी । मैं तो दो दिन तक बेहोश रहा बाबूजी। कहते है बहुत-सा खून निकला। अस्पताल में ही पड़ा रहा। भौर पर से यह कम्वस्त शरीफा, पता नहीं कहां गायब हो गया है।" हमारा कथाकार नौ बजे अपने मकान से निकला मोर ढूंढते-ढूंढते बारह बजे शरीफे बदमाश का पता चला। यह रेलवे पुलिस स्टेशन में बन्द था। लगभग माठ-नौ वर्ष का शरीफा बदमाश । गोरा, सेव के रंग जैसा जिस्म, साकी वाल पौर बिल्लोरी माखें। बदमाश! जमानत देकर उसे छुड़ाया गया । बाद में उसने बयान दिया, "माप जानते हैं, मैं भीख मांगता हूँ, बाबू भी। इसी सिलसिले में कस एक साहब मिले, उन्होंने मुझे बहुत दुत्कारा ! कहने लगे, तुम मभी बच्चे हो मोर बच्चे भोस नहीं मांगा करते । इस बात - ८४ | थके-हारे की आदत पड़ जाती है और मादमी का अपने पर का हक जाता रहता है। फिर मेरे कहने पर कि भीख न मांगूं तो और क्या करूं, कहने लगे, मेहनत । मेहनत, कैसे, किसी तरह से ? कहने लगे, और कुछ न सही, रेलवे यार्ड से कोयला उठाकर वेच लिया करो। और लोग भी तो ऐसा करते है । वाबूजी, मैं यार्ड में गया । कोयला चुनता रहा और सन्तरी मुझे पकड़ कर ले गया।" घर माने पर पता चला, ममदू बुखार से तप रहा है और दूकान में भकेला पड़ा तड़प रहा है। सरीफा को देखकर ममदू उसे पीटना चाहता था, लेकिन बुखार ने उसे खुद मजबूर कर रखा था। मकान वालों ने किसी दूसरे हातो को ईंटें ढोने के लिए रख लिया था । ममदू छः दिन तक बीमार रहा, सातवें दिन काम पर जब गया, तब उसे इस परिवर्तन का पता चला। फिर बेकारी। ढांगू रोड पर एक नया कोयला-हिपो खुला था। भाघे दिन की मेहनत बाद ममदू को इस बात का पता चला। वहां गया और उसे काम मिल गया। भव उसका काम था, बोरियों में कोयला भरना, पीठ पर रखकर उन्हें तराजू पर बोलना, फिर पीठ पर रखकर उन्हें ठेले पर ढोना, ठेला कोयला खरीदने वाले के मकान तक ले जाना, यहां से फिर वोरी को पीठ पर झेल कर घर के अंदर सगाना। सरीफा मव फिर भीख मांगने जाता था, सुबह ही । मब उसने फिर मेहनत करने की कोशिश नहीं की, पुलिस के हर ममदू इस कोयले के डिपो में केवल एक राम-शोरीलाल फर्म के मालिक माला ने उसे गोदामों से दो-तीन हातो किसी दूसरे टोने में शहर को चले गये थे। दूसरे हातो || ८५ मब फिर गतिविधि वही हो गई थी। ममदू सुबह उठकर गोदामों की तरफ चला जाता । दौड़धूप, सर्दी में पसीना, बोरियों को पीठ पर लादना, ट्रकों में भरना, ट्रकों से उतारता । दूकानें साढ़े सात बजे शाम को बंद होती थी। ममदू माठ बजे गोदामों से लौटता। फिर साढ़े आठ-नौ बजे चावल और दाल, फिर नमकीन चाय और हुक्का, और ऊँची-ऊंची मावाज में सबका मिलकर कश्मीर के लोक गीत गाना भौर गपशप । फिर गढ़े में पड़े मुर्दो के समान सब का एक-दूसरे से सटकर सो जाना। दिसम्बर की बात है। इस कहानी का कहने वाला, नरेश सक्सेना, काम से कहीं बाहर गया था। वापस आने पर और रात को सोते समय वह इन हातोमों के लोक- गीतो और हँसी-ठट्टे के इन्तजार में रहा, लेकिन कुछ नहीं, कोई अावाज नहीं । एक दिन, दो दिन, पूरा एक सप्ताह । कोई भावाज नही । ममदू भी वही था। शेष सभी वहीं थे। फिर ? उसने ममदू को बुलवा भेजा। उसके पाने पर कहा, 'क्यों भाई, क्या बात है, कोई आवाज नहीं, कोई गीत नहीं- ममदू ने कहा-'बाबूजी भाप तो यहां पर नहीं थे, पापके पीछे एक मौर नये किरायेदार साथ वाले मकान में मा गये है, हमारे गाने और हंसी- ठट्टे पर उन्होंने ऐतराज किया है, कहते थे हमारे काम में खलल पडता है । सो उनकी मर्जी, बड़े लोग है, हमने सब बंद कर दिया।' दूसरी सुबह को हमारा कथाकार नये किरायेदार से मिलने गया। वे स्थानीय कालेज में नये प्रोफेसर नियुक्त हुए थे। वे कहने लगे, "माप कश्मीरियों की साइड लेकर माये हैं । ये कश्मीरी बड़े चापलूस और कमीने होते हैं। सामखाह जोर-जोर से हाथ हिला कर ऊँचो मावाज में बात करते हैं। मैं इनसे सस्त नफरत करता हूँ । भला रात को भी गाने मोर हो-हल्ला करने का कोई तुक है । यह शरीफों का मुहल्ला ८६ || थके-हारे है । भौर फिर हमने काम...." हमारे कथाकार ने दलील दी, 'मुझे इससे सरोकार नहीं कि कश्मीरी कैसे होते हैं, बुरे या मच्छे । शेप मापको यात ठीक है कि गाने बजाने का समय, विशेषकर मुहल्ले में, उनके लिए उचित नही । लेकिन प्रश्न यह है कि उन्हें केवल यही समय तो मिल पाता है सारे दिन में । इतनी कड़ी मेहनत के बाद यह गरीब मजदूर यदि दो घड़ी अपने मनोरंजन के लिए........' 'नही साहब । उन्हें चाहिए कि वे जगह बदल लें। हमारे कथाकार ने प्रागे बात नही बढ़ाई। लेकिन पता चला कि प्रोफेसर साहब रात के वक्त कोई काम-वाम नहीं करते । उन्हें इस वक्त "विविध-भारती" से गाने सुनने होते है और अपने इस काम में वे किसी भी प्रकार का कोई खलल बर्दाश्त करने को तैयार नही। 'ममदू, तुम लोग पहले की तरह अपना गाना-बजाना जारी रखोगे। नया किरायेदार फिर ऐतराज करे तो हम उससे बात करेंगे।' हमारा कथाकार सोचता था कि वह इन हातोमों की तरफदारी क्यों कर रहा है। उनकी ऊंची-ऊंची आवाजों से उसके काम में भी कई बार विघ्न पड़ जाता था। फिर वे लोग कश्मीरी जबान में बोलते थे, जिसके बारे में वह क-ख भी नहीं जानता । तो भी, वह सोचता है, उनकी आवाज, उनके बात करने का मजीव ढंग और कश्मीरी लोकगीतों की अलग-अलग धुनें, यह सब उसे बहुत मच्छी लगती थी ? लोक-गीत, हंसी-मजाक, गप-शप, सब फिर शुरू हो गया था। दूसरी हो सुबह मुहल्ले में झगड़ा हो गया। मुख्य विरोधी थे हमारे कथाकार पोर प्रोफेसर । काफी लें-दे हुई, काफी बक्वास हुई, गालियो तक नौवत मा गई। हमारे कथाकार की एक ही जिद थी, "अगर मापके रेडियो की ऊंची मावाज गली में और दूसरे घरों तक जा सकती है, तो ये हातो भी अपने , हातो ] ७ . कमरे में बैठकर गा सकते हैं, इनकी मावाज भी चाहे जहाँ तक जाये ।" इसके कुछ दिन बाद प्रोफेसर ने मकान बदल लिया था। दिसम्बर की सर्दी शवाय पर थी। ऊपर से जनवरी को सर्दी के मागमन का एहसास । वारिशें । कई बार भोले भी पड़ जाते थे । शरीफा प्रद फिर सुबह हो सुवह भीख मांगने निकल जाता । नंगे पांव, खुला सिर, कमीज के बटन टूटे पौर मुंह से भाप निकालता हुमा । ममदू का भी यही हाल । पांव में मोटी रस्सियों को पहाड़ी जूती, घाती नंगी, सर खुला भोर मुंह से भाप निकालता हुआ । सर्दी के कारण एक दिन ममदू के पांव बुरी तरह सूज गये । दर्द मौर चलना नामुमकिन । तीन दिन तक लगातार वह अपने अंधेरे कमरे में पड़ा रहा। दुकान के 'लाला' ने इतनी मेहरबानी की, जब वह फिर काम पर गया, उसे जवाब नही दिया काम से, मलबत्ता उसके तीन दिन के पैसे अवश्य काट लिए। दो दिन को लगातार बारिश माज रुकी थी। धूप भी दिल खोलकर निकलो था। शरीफा सुबह ही सुबह अपने काम पर चला गया था। माज इतवार था, मतलब कि दूकानों का काम बन्द था । ममदू अपनी दूकान पर बैठा मपनी फटी कमीज में से जुयें बीन रहा था । दूसरे हातो भी बैठे थे, कोई रजाई से जुये निकालता था, कोई कच्छे से, कोई बेकरी के बाहर गली में कुर्सी बिछाकर नरेश भाज का अखबार देख रहा था। लगभग साढे दस बजे के करीब एक हातो दौड़ा-दौड़ा माया । "मो ममदू, मो ममदू ।" "क्या है ?" "सरीफा ट्रक के नीचे माकर कुचला गया।" वह हाफ रहा था। "क्या?" "मर गया।" पायजामे से।

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नागरिक मदन को हम लोग मद्दी कहते थे और प्रकाशचंद को प्रकाशो या प्रकाश कौर । प्रकाशो या प्रकाश कौर हम उसे मजाक में कहते थे। लेकिन उसके साथ का यह मजाक सिर्फ हम दो-तीन लोगों तक ही सीमित था। मेरे, मही भौर साइंदास तक हो । वरना प्रकाशो जैसे चक्कूबाज से किसी अन्य को मजाक करने की हिम्मत ही नहीं हो सकती थी। मद्दी पौर प्रकाशो व्यापार में पार्टनर थे। वे गांधी चौक में अपने ठेले के साथ बारी-चारी से छह-छह घंटे खड़े होते थे । अधिकतर अपने ठेले पर फूट ही लगाते थे, जैसे माम, लीची, केला, संतरा, नाशपाती, खूबानी, सेब, । उनका एक दिन का प्रोसत मुनाफा पंद्रह से बीस रुपये तक का था। । लेकिन इतना जरूर था कि हर बुरे- गंदै मौसम में ठेले के साथ खड़ा होना पड़ता था। और यह काफी बड़ी मुसीबत थो। मगर कोई चारा नहीं था, और यह सब ऐसे हो चल वे पंगूर । जिंदगी कुछ बुरी नहीं कट रही रहा था। प्रकाशो से मेरा पहले परिचय नही था। मद्दी की मार्फत उससे जान- पहचान हुई थी । मद्दी मेरा सहपाठी था। मद्दी हिन्दुस्तान-पाकिस्तान बनने पर जिला लायलपुर से अपने बाप के साथ यहाँ माया था और फिर वे लोग यहीं बस गये थे। मद्दी की मां को ६ १०|| थके-हारे वहां से भागते समय कुछ लोगों ने देख लिया था मोर वे उसे फांस कर अपने साथ ले गये थे। मद्दी जव यहाँ पाया तो नौ-दस साल का था । तीसरी कक्षा में हम दोनों ने म्यूनिसपैलिटी के स्कूल में इकट्ठे पढ़ना शुरू किया था। उसके बाप को कोई और काम नही मिला तो उसने गांधी चौक में ठेला लगाना शुरू कर दिया था। हालांकि उन दिनों भी शाम के समय भद्दी अपने बाप के साथ ठेले पर खड़ा होता था, फिर भी तव उसे बहुत शर्म लगती थी और बाजार से गुजरने वाले अपने हर परिचित से वह मुंह छिपाने की चेष्टा किया करता था । परन्तु जब उसके बाप की लंबी बीमारी के बाद मृत्यु हो गयी, तो पंद्रह-बीस दिन के सोच-विचार के बाद उसने अपनी शर्म को जूता मारा था और अपने बाप के ठेले के साथ गांधी चौक में डट कर खड़ा हो गया था। यह वह समय था, जब हम दोनों माठवी कक्षा में ये और उसे अपनी पढाई वीच में ही छोड़ देनी पड़ी थी। वैसे भी, मेरी तरह, पढने में वह अधिक तेज नही था। और यदि उसे ठेला न भी लगाना पड़ता, तो मैट्रिक के बाद वह मधिक-से-अधिक सवा सौ-डेढ़ सौ वाला क्लर्क बन जाता। लेकिन मद्दो के अब खुद ठेला लगा लेने से मुझे इतना जरूर मजा हो गया था कि मौसम के अनुसार मुझे अच्छा फूट खाने को मिल जाता । वैसे भी मद्दी मेरा खास मित्र था मोर पहले की तरह पर्व भी समय मिलने पर यह हमारे घर माया करता था। मेरी मां उसे बहुत चाहती थी, शायद इममें उनका यह भाव भो रहा हो कि उसको मपनी मा नही है । पौर दीवाली, दशहरा पादि त्यौहारों पर वो वह मुझसे उसे अवश्य घर बुलाने के लिए कहती थी। परंतु उसके प्रति मेरे पिता का ख मब काफी बदल गया था। उसका बाप जीवित पा, तव तो कोई बात नहीं थी। परंतु पिता मय उसके हमारे घर माने पर ऐतराज करते थे भोर मुझे डांटते थे कि तुम एक यद. माश मौर लोफर सड़के के साप न घूमा करो, उसको तो मागे पढ़ना- सिखना है नहीं भोर तुम भी उसके पोधे चौपट हुए जा रहे हो । पिता की नजरों में, जय से मद्दी ने खुद ठेला लगाना शुरू किया था, वह गिरे हुए .

नागरिक ॥ ६१ चरित्र वाला हो गया था। जबकि मेरे लिए वह एक संघर्षशील चरित्र था और मैं उसको कद्र करता था । कद्र-वद्र भी क्या, बस वह मेरा दोस्त था। पिता के डाँटने-डपटने के बावजूद मैं उसे घर पर बुलाता था । और पिता की सोधे उससे या उसके सामने मुझसे कुछ कहने की हिम्मत न होती थी ।मैं तो मद्दी कभी-कभी वातचीत के दौरान मचा- नक कह बैठता था-यार, मेरे वाऊजी भभी न मरे होते तो मैं मभी योड़ा भोर पढ़ना चाहता था। इतना कहते ही वह कुछ उदास हो जाया जब नौवी कक्षा में पढ़ता था, करता था। मद्दी मोर मैं भव भी इकट्टे ही सिनेमा जाया करते थे। परंतु अब वह पहले जैसा तरीका न था। पहले तो हम 'इधर-उधर से पैसे मार कर' और 'घर से भाग कर' सिनेमा जाया करते थे। दरमसल पहले की बातें ही कुछ मौर थी। सारा-सारा दिन मटरगश्ती करते रहना, बिना मतलब आवारा धूमते रहना, खेतों और बागों में चोरी से घुस कर गन्ना, मूली, प्राम मोर अमरूद तोड़ते रहना, सिनेमा हॉल के बाहर घंटों बैठ कर डायलॉग- गाने सुनते रहना, छुट्टी के समय लड़कियों के स्कूल के सामने खड़े हो जाना, और कई प्रकार की धमा-चौकड़ी। उन्ही दिनों कभी मद्दी ने बताया था कि हिंदुस्तान-पाकिस्तान बनने पर जब वे लोग यहां आये ही आये थे, तो तब उसके बाप ने अभी गांधी चौक में ठेला लगाना शुरू नहीं किया था, और उसे बस-स्टेशनों मोर गाड़ियों पर मीठी गोलियां मौर बिस्कुट एक ही पाली में सजा कर बेचने पड़ा करते थे। यदि मैं उस काम में ही लगा रहता तो तब तो बिल्कुल ही कुछ न पढ़ पाता, लेकिन मेरे बाऊजी ने ठेला लगाना शुरू कर दिया तो पता नहीं क्या सोच कर उन्होंने मुझे स्कूल में दाखिल करा दिया। मही को जब ठेला लगाते लगभग डेढ साल हो गया था तो उसका परि- चय प्रकाशो से हुआ । प्रकाशो की आयु मद्दी से पाठ-नौ साल अधिक थी। यह खूब जमानासाज पादमी या मोर लड़ाई-झगड़े में बहुत तेज था। एक- दो बार पुलिस वालों की भी पिटाई कर चुका था। लेकिन उसमें एक १०॥ थके-हारे वहां से भागते समय कुछ लोगों ने देख लिया था भौर वे उसे फांस कर अपने साथ ले गये थे। मद्दी जव यहाँ पाया तो नौ-दस साल का था। तीसरी कक्षा में हम दोनों ने म्यूनिसपलिटी के स्कूल में इकट्ठे पढना शुरू किया था। उसके बाप को कोई और काम नही मिला तो उसने गांधी चौक में ठेला लगाना शुरू कर दिया था। हालांकि उन दिनों भी शाम के समय मद्दी अपने बाप के साथ ठेले पर खड़ा होता था, फिर भी तब उसे बहुत शर्म लगती थी और बाजार से गुजरने वाले अपने हर परिचित से वह मुंह छिपाने की चेष्टा किया करता था । परन्तु जब उसके बाप की लंबी बीमारी के बाद मृत्यु हो गयी, तो पंद्रह-बीस दिन के सोच-विचार के बाद उसने अपनी शर्म को जूता मारा था और भपने बाप के ठेले के साथ गांधी चौक में डट कर खड़ा हो गया था। यह वह समय था, जब हम दोनों पाठवी कक्षा में पे मोर उसे अपनी पढ़ाई बीच ही छोड़ देनी पड़ी थी। वैसे भी, मेरी तरह, पढ़ने में वह अधिक तेज नहीं था । और यदि उसे ठेला न भी लगाना पड़ता, तो मैट्रिक के बाद वह अधिक-से-अधिक सवा सौ-डेढ़ सौ वाला क्लर्क बन जाता। लेकिन मद्दो के मब खुद ठेला लगा लेने से मुझे इतना जरूर मजा हो गया था कि मौसम के अनुसार मुझे अच्छा फूट खाने को मिल जाता । वैसे भी मद्दी मेरा खास मित्र था भौर पहले की तरह मवै भी समय मिलने पर वह हमारे घर माया करता था। मेरी मां उसे बहुत चाहती थी, शायद इसमें उनका यह भाव भी रहा हो कि उसकी अपनी मां नहीं है। पौर दीवाली, दशहरा मादि त्योहारों पर तो वह मुझसे उसे अवश्य घर बुलाने के लिए कहती थी । परंतु उसके प्रति मेरे पिता का रुख अब काफी बदल गया था। उसका बाप जीवित था, तब तो कोई बात नहीं थी। परंतु पिता भव उसके हमारे घर माने पर ऐतराज करते थे और मुझे डाटते थे कि तुम एक वद. माश भोर लोफर सड़के के साथ न घूमा करो, उसको तो मागे पढ़ना• लिखना है नहीं मोर तुम भी उसके पोधे चौपट हुए जा रहे हो। पिता की नजरों में, जब से मट्टी में खुद टेला लगाना शुरू किया था, वह गिरे हुए नागरिक || ६१ चरित्र वाला हो गया था। जबकि मेरे लिए वह एक संघर्षशील चरित्र था मौर में उसकी कद्र करता था। कद्र-वद्र भी क्या, वस वह मेरा दोस्त था। पिता के हॉटने-डपटने के बावजूद मैं उसे घर पर बुलाता था। और पिता की सोपे उससे या उसके सामने मुझसे कुछ कहने की हिम्मत न होती थी। मैं जब नौवी कक्षा में पढ़ता था, तो मद्दी कभी-कभी वातचीत के दौरान प्रचा- नक कह बैठता था-यार, मेरे वाऊजी भभी न मरे होते तो मैं मभी योड़ा भोर पड़ना चाहता था। इतना कहते ही वह कुछ उदास हो जाया करता था। . मद्दी पौर में भव भी इकट्ठे ही सिनेमा जाया करते थे। परंतु अब वह पहले जैसा तरीका न था। पहले तो हम 'इधर-उधर से पैसे मार कर' और पर से भाग कर' सिनेमा जाया करते थे। दरमसल पहले की बातें ही पुष और पों। सारा-सारा दिन मटरगश्ती करते रहना, बिना मतलब भावारा पूमते रहना, खेतों और मागों में चोरी से घुस कर गन्ना, मूली, पाम भौर पमरूद तोड़ते रहना, सिनेमा हॉल के बाहर घंटों बैठ कर डायलॉग- गाने मुनते रहना, छुट्टी के समय लड़कियों स्कूल के सामने खड़े हो जाना, भोर कई प्रकार को धमाचौकड़ी। उन्ही दिनों कभी मद्दी ने बताया पा कि हिंदुस्तान-पाकिस्तान बनने पर जब वे सोग यहां माये ही पाये थे, पो तब उसके बाप ने ममी गांधी चौक में ठेला लगाना शुरू नही किया था, पौर उते बस-स्टेशनों पौर गाड़ियों पर मीठी गोलियां भौर बिस्कुट एक ही पाली में सजा कर बेचने पड़ा करते थे। यदि मैं उस काम में ही लगा हता तो सव तो बिल्कुल ही कुछ न पढ़ पाता, लेकिन मेरे बाऊजी ने ठेगा मगाना शुरू कर दिया तो पता नही क्या सोच कर उन्होंने मुझे सून में दासिल करा दिया। महो को पद ठेला लगाते लगभग डेड साल हो गया था तो उसका परि- सागो से हुमा । प्रकाशो को प्रायु मद्दी से मारनौ साल अधिक थी। यह पूछ पमानामात्र मादमी था और लड़ाई-झगड़े में बहुत तेज था, एक- दो दा पुलिस वालों को भी पिटाई कर चुका था। लेकिन उसमें एक ६२ || थके-हारे सिफ्त थी कि व्यापार-व्यवहार में वह बहुत ईमानदार था, विशेषकर मित्रों के सामने तो वह सर झुकाये रहता था। मद्दी शुरू-शुरू में उसे अपना पार्टनर बनाते हुए डरा था कि कही यह सारी रकम ही तबाह न कर दे, लेकिन जैसा उसने सोचा था, वैसा कुछ हुमा नही । और मव तो सात-पाठ सालों से वे साथ थे। मैं जब कालेज के पहले साल में ही था, तो घर में कुछ ऐसे अजीब हालात हुए कि पिता ने मुझे स्पष्ट कह दिया, वह मेरा कालेज का फीस मादि का खर्च बरदाश्त न कर सकेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि मुझे कहीं कोई नौकरी या कोई दूसरा काम ढूंढ लेना चाहिए और उनकी भी मदद करनी चाहिए । पिता एक पाढ़ती के पास मुनीम थे और उनकी मामदनी कुछ ज्यादा नहीं थी। उनकी यह नौकरी भी ऐसी थी कि किसी से कह- कहलवा कर वह मेरा कही काम भी नही लगवा सकते थे । इसका नतीजा यह हुआ कि मैं एक तरह से निठल्ला हो गया। शहर में कही नोकरी या कोई दूसरा काम भी नहीं मिल रहा था, और तब मैं या तो आवारा घूमता रहता या फिर जामूसी और रूमानी उपन्यास किराये पर ले कर दिन-रात पढता रहता । शहर अधिक बड़ा भी नही था, इसलिए काम मादि मिलने की भी बहुत कम प्राशा थी। शहर में मुझसे भी पहले कई लड़के बेकार घूम रहे थे। कभी मैं यह भी सोचता था कि मद्दी की तरह ही मैं भी बाजार में ठेला लगा लूं । इसमें बुरा भी क्या है ! अगर रोज के पांच-छह रुपये या तीन-चार रुपये भी मिले तो यह काफी रकम होगी। लेकिन पता नहीं क्यों, मैं यह सब सोचता ही रह जाता, मुझसे यह काम कभी हो नहीं पाया । इस नकार में मेरी शर्म शामिल नही थी, परंतु मंदर से इसके लिए इच्छा ही नहीं होती थी। और इन्ही दिनों में एक व्यक्ति के संपर्क में पाया जो मुझे खतरे वाले कामों की ओर ले गया । ये काम कानून की निगाह में नाजायज थे और पुलिस वा खौफ बना रहता था। ये काम इतने यह भी नहीं थे, परंतु नाजायज तो नाजायज है, ऐसा काम चाहे छोटा हो या बड़ा। .

नागरिक !! ६३ जैसे एक मुख्य काम यह था कि शहर से दो-ढाई मील बाहर सांसियों के डेरे से ठरें की बोतलों का शहर में लाना । यहाँ से एक बोतल सवा रुपये की मिल जाती थी और वह शहर में तीन रुपये की बिकती थी। मैं रोज छह-सात बोतलें ले पाता था । कुछ सीधै खुद बेच लेता था, कुछ प्रकाशो को मार्फत । जी बोतलें प्रकाशो की मार्फत विकती थी, उनके लिए उसे प्रति बोतल माठ माने 'दलाली' देनी पडती थी। लेकिन कुल मिला कर मुझे काफी पैसे बच जाते थे । इस तरह से मैं घर वालों की मदद भी करने लगा था। हालांकि मैं घर में बताये बिना यह नाजायज काम करता था, फिर भी उन्हें पैसे देते समय कोई-न-कोई वहाना लगा देता था । सबसे बड़ी बात थी कि मैं पुलिस को नजरों में नहीं आ पाया था, नहीं तो अपनी कमाई में से पुलिस वालों को भी उनका 'हिस्सा' देना पड़ता । इस काम के लिए सबसे बड़ा भाकर्षण मेरे लिए यही था कि इसमें बहुत कम खर्च होता था और पैसे प्रच्छे बन जाते थे । इसके साथ ही मैं अफीम, चर्स, गांजे को इधर-उधर होने का काम भी करने लगा था। इससे भी कभी. कभी अच्छे पैसे बन जाते थे। परंतु यह काम मुझे बहुत कम मिल पाता था, क्योंकि 'मालिकों की नजर में मैं इतना होशियार नहीं था। शुरू-शुरू में मद्दो ने मेरे इस काम पर मुमसे नाराजगी जाहिर की यो । लेकिन फिर जब मुझे इस काम का चस्का ही लग गया और मैंने यह काम नहीं छोड़ा तो वह भी धीरे-धीरे नर्म पड़ गया । मौर इसीलिए कभी- कभी मद्दी को देख कर और अपने बारे में भी सोच कर मुझे हंसी मा जाती थी भोर मुझे अपने स्कूल के हिंदी वाले मास्टर पाद पा जाते थे। उनका नाम पंडित नित्यानंद था । चाहे कोई बच्चा शरारत करे या स्कूल का काम न करे, वह किसी को डांटते या मारते नहीं थे, क्योंकि उनका कहना था कि पता नहीं इनमें से कौन बच्चा मागे जाकर सुभाष निकल भाये, या नेहरू निकल आये या गांधी। इसलिए बच्चों को डॉट कर या मार कर वह पाप के भागीदार क्यों बनें ! मब कभी-कभी मैं और मद्दी उनकी बातों ९४ || थके-हारे को याद करके हंसा करते थे। मद्दी ठेला लगाने लगा था, मैं नाजायज कामो में पड़ गया था, साइंदास अस्पताल में कंपाउंडर बना हुआ था, मुल्खराज अपने बाप की बजाजी की दुकान पर बैठता था, गुरांदित्ता एक प्राइमरी स्कूल में मास्टर हो गया था, बिहारी लाल म्यूनिसपैलिटी में क्लर्क था, राजेंद्र ने सोडावाटर का काम खोल लिया था, दलजीत सिंह ने साबुन की दुकान कर ली थी, शिवकुमार अपने बाप की दुकान पर दाढ़ियों बनाता था, हंसराज ने तीन-चार भैसें रख ली थीं, जग्गी एक साइकिल-रिपेयर की दुकान में बैठा सारा दिन साइकलें ठीक करता रहता था। हमारे साथियों में से पाठ-दस प्रतिशत लड़के ही मुश्किल से कालेज में भरती हो पाये थे, पौर उनमें से चार-पांच ही बी० ए०, एम० ए० करके छोटी-मोटी नौकरियों में लग पाये थे, या एक-दो कहीं अफसर लग गये थे। परंतु हम में से या नेहरू कोई नहीं बन पाया था। लेकिन अपने हिंदी वाले मास्टर पंडित नित्यानंद की बात याद माते ही मैं मही को सुभाष कह कर मजाक किया करता और वह मुझे नेहरू कह कर पौर हम लोग खूब हंसा करते थे। या हम किसी सहपाठी से भी मिलते तो उसे सुभाष, नेहरू या गांधी, कुछ भी कह कर उसका खूब मजाक उड़ाते । सुभाष, यही दिन थे जब एक सुबह प्रकाशो हमारे घर सुवह-ही-सुबह पाया। इससे पहले वह हमारे घर कभी नही पाया था । मैं मभी सो कर उठा हो या भौर बिस्तर में बैठा चाय पी रहा था। मैंने उसे अपने पास ही बुलवा लिया और उसके लिए भी चाय मंगवा दी। मैंने सोचा, कोई जरूरी काम हो रहा होगा, तभी यह मेरे पास इतनी सुबह-सुबह भाया है। मद्दी तो इस समय मा नही सकता था, उसने इसे भेज दिया होगा। मद्दी को सुबह के समय माल खरीदने के लिए मंडी जाना पड़ता था, और ऐसा रोज ही होता था। मद्दी का खुद मंडो जाना इसलिए भी जरूरी होता था कि यहां हमारा एक मित्र जुगल किशोर था, जो कि पांचवीं भौर छठी कक्षा में हमारे साथ ही पढ़ा था। जुगल किशोर नागरिक || ६५ वहाँ अपने बाप के साथ काम करता था, और वे लोग फूट मौर सब्जी के बड़े मालती थे। जुगल किशोर मद्दी को माल दिलवाता हुआ पैसे में तो कमी नहीं करता था, परंतु पुराने दिनों के लिहाज की खातिर वह मद्दी को माल मच्छा दिलवा देता था। और यह बहुत बड़ी बात थी। जुगल किशोर को प्रकाशो से पता नहीं क्यो कुछ घृणा-सी थी, इसीलिए जुगल किशोर ने मद्दी से स्पष्ट कह रखा था कि वह प्रकाशो को न भेज कर खुद हो माया करे। मेरी चारपाई के बगल ही मेरा छोटा भाई और छोटी बहन बैठे थे, इसलिए प्रकाशो कुछ बोला नहीं और चुपचाप बैठा चाय पीता रहा । मैं इस बात पर हैरान भी हो रहा था कि प्रकाशो को इतनी समझ कैसे है कि कौन-सी बात कहां करनी चाहिए और कहां नहीं। मैं चाय पी चुका था। मैंने प्रकाशो से कहा कि अभी चलते हैं, और यह कह कर मैं वाथरूम की तरफ चला गया। दस-पंद्रह मिनट बाद हम दोनों मकान से बाहर मा गये। तब प्रकाशो ने कहा-रात को, यार, बहुत झगड़ा हो गया । पाश्चर्य से मेरे मुंह से निकला-परे ! -हाँ यार, प्रकाशो बोला, मद्दी को भी चोटें चोटें भायी है । मैं हैरान या-प्रच्छा! और हम चलते रहे । फिर एक-दो क्षण बाद मैंने उससे पूछा-तो तुम प्राज मंडी नही गये ? -नहीं यार, अब दो-तीन दिन में भी माराम करूंगा, काम-वाम तो होता ही रहता है। फिर उसने अचानक पूछा-तुम अब कहां चल रहे हो? वह चलता-चलता रुक गया। मैं भी रुक गया । मैंने हंसते हुए कहा-क्यों । चलो, कहीं बैठते हैं, मैं जरा मद्दी को भी देख भाऊँगा। इसके बाद वह कहने लगा--जो खास बात मैं तुम्हें बताने आया था, वह तो रह ही गयी । वह यह कि माज से तुम घर से बाहर नही निकलोगे और 'सासियों के डेरे' तो नहीं हो जामोगे। .

६६ || थके-हारे - लेकिन क्यो ? ऐसा पया हो गया? प्रकाशो कहने लगा-जो नया थानेदार गुरमीतसिंह दो महीने पहले माया है, उसने परसों से अचानक बहुत सख्ती शुरू कर दी है। वह सब लोगों को पकड रहा है और उन पर जबरदस्त मार पड़ रही है। अब तक, तुम यह समझो कि उसने तकरीबन सभी छोटे-बड़े लोगों को घेर लिया है, अफीम-गांजे वाले, सट्टे वाले, शराव थाले, यहाँ तक कि माता गली वाली रंडियों को भी बुलवा कर उसने खूब पिटवाया है। वह उनकी खूब मरम्मत कर रहा है । ऐसा लगता है कि किसी बड़े आदमी ने या तो पुलिस वालों की नालायकी की शिकायत चीफ मिनिस्टर से या बडे अफसरों से कर दी है और या यह बिल्कुल ही धर्मात्मा और सच्चा मादमी है । इसलिए गलत काम करने वाले सभी लोगों को मार-डपट कर शहर में शाति कायम करना चाहता है। मैंने कहा-अरे नही प्रकाशो, तुम्हारी ये दोनों बातें गलत है। मम्वल तो किसी ने शिकायत की नहीं होगी। और अगर को भी होगी तो सख्ती करने से क्या हो जायेगा ? कौन-सा ऐसा शहर बचा है जहाँ ये काम न होते हों ? और ये काम तो सस्ती करने के बावजूद भी होते रहेंगे। और किसी थानेदार का सच्चा और धर्मात्मा होना एकदम व्यर्थ-सी बात है, ये लोग सात जन्म लें, तब भी ऐसे नही बन सकते । दरअसल बात यह होगी कि यह थानेदार अधिक सख्ती दिखा कर दूसरे थानेदारों से अधिक रकम खाना चाहता होगा। समझे कि नही ? मुझे तो इस सख्ती के पीछे और कोई कारण नजर नहीं पाता । मैंने एक-दो क्षण बाद मुसकराते हुए कहा–लेकिन तुम मुझे बाहर निकलने से मना क्यों कर रहे हो? मैं तो पुलिस की नजर में भी नही हूँ ! प्रकाशो ने मुसकराते हुए कहा- यह तुम्हारी खामखयाली है कि तुम्हें मोर तुम्हारे काम को पुलिस न जानती होगी। यह तो कभी हो ही नहीं सकता। ये लोग गिद्ध जैसी निगाहें रखते है और मोका माने पर एकदम से नोंच लेते है। ये लोग तुम्हें अब तक छोड़े रहे, इसका मतलब यह न नागरिक || ६७ समझना कि मैं तुम्हें हमेशा के लिए छोड़े ही रहेंगे मोर अब तो इनके हाथ में एक मौका है। मेरा खयाल है ये लोग तुम्हें ढूंढ ही रहे होगे। अब मैं निश्चय ही डर गया । मेरे चेहरे पर हलका-सा पसीना भी जम गया। प्रकाशो ने कहा- अब तुम यहाँ से वापस चले जामो, मेरे साथ बाजार में न प्रामो । पोर घर पर ही रहना । जब यह खतरा टल जायेगा तो मैं तुम्हें बता दूंगा। मैंने कहा-लेकिन मैं मद्दी को देखना चाहता था। उसने कहा-मद्दी को मिलने की कोई जरूरत नहीं है । और उसको पता है कि मैं यह बात तुम्हें बताने तुम्हारे पास आया हुआ हूँ। वह दो- चार रोज में जब ठीक हो जायेगा तो खुद ही तुम से मिलने घर पर मा जायेगा। इसके बाद प्रकाशो चला गया। मैं घर लौट आया। , 4 और ये मेरे लिए वाकई घडी घोरियत के दिन थे। मैं घर में तबीयत खराब होने के बहाने से पड़ा रहता। सारा दिन किराये के जासूसी उपन्यास पढता रहता। या फिर सारा दिन खाता-पीता रहता, या सोया ही रहता । लेकिन अभी दो ही दिन तक ऐसा कार्यक्रम चला था, कि घर में पड़े रहने से दिमाग में उलझन बढ गयो और हर समय मूड उखड़ा- उखड़ा लगने लगा था। इसी बीच में पता चला कि हमारे सामने के पड़ोसी का लड़का सोमी बदल कर यहाँ पर आ गया है । पता क्या चला, वह अपने घर पहुँचते ही फिर सीधा मुझसे मिलने पा गया। मुझे बड़ी खुशी हुई कि एक साथी बात करने को मिल गया । सोमो ने बताया कि वह दस मील दूर माधोपुर वाले कंप में बदल कर पाया है। सोमो मुझसे ढाई साल बड़ा था। स्कूल में भी मुझसे वह दो साल सोनियर था। मोहल्ले में हम इकट्ठे ही गिल्ली-डंडा और पिल्ले गोली १८ ॥ थके-हारे खेलते रहे थे। ये सव जिंदगी के शुरू दिनों की बातें थी। सोमी पढने में बहुत तेज था, और उसके घर वालों की माली हालत भी अच्छी थी। इसलिए वह मागे-मागे पढ़ता रहा था और बी० ए० करने के बाद वह मिलिट्री में सेकंड-लेफ्टिनेंट लग गया था। सोमी काफी देर तक मेरे पास बैठा रहा और फिर तरह-तरह की बातें होती रहीं। वह भब कश्मीर से बदल कर पाया था मौर मेरे लिए वहीं से अखरोट लाया था। वह जब चला गया तो पचानक मुझे एक खपाल भामा भौर अपने इस खयाल से मैं काफी खुश हुआ । मैंने सोचा, सोमी भव पावर में है, वह मेरी मदद कर सकता है। मैं अगर उसे सारी बात सच-सच बता दूंगा तो वह मुझे न नहीं करेगा। फिर मैं देर तक इसी विषय पर सोचता रहा और खुश होता रहा। मैं यही बात प्रकाशो को बताना चाहता था। लेकिन भय मुसीवत यह थी कि मैं घर से बाहर नहीं निकल सकता था। पुलिस का बहुत डर था। पौर पुलिस का नाम याद आते ही मेरी कंपकंपी छूट जाती थी और मेरे चेहरे पर हलका-सा पसीना उभर माता था। लेकिन प्रकागो से मिलने को मुझे बहुत जल्दी थी। उससे मैं तुरंत मिलना चाहता था। इसलिए रात के जब माढ़े सात-माठ बज गये तो मैं घोडा साहम बटोर कर घर से निकल पड़ा। मेरा विचार था कि प्रकाशो साइंदास के यहाँ जरूर मिल जायेगा। साईदास मस्पताल में कंपाउंडर था, भौर से रहने के लिए जो मवाटर मिला हुमा था, वहीं शाम के समय से लेकर रात के ग्यारह बारह बजे तक जूमा चलता रहता था। वहीं सिर्फ चार-यह दोस्त सोग ही माया करते पे और जूमा भी ज्यादा बड़ा नहीं होता था। पुलिस का यहां कोई पतरा नहीं पा, क्योकि दोस्तों में ऐसा कोई नहीं पा जो यहाँ को बात बाहर बठामेगा। प्रकागो और मद्दी भी मकमर शाम को यहाँ पठे रहते थे। साईदास जहा सूर जुए का रसिया था, प्रकायो को भी जूए का यहुव शोर नागरिक | te था। मैंने सोचा कि प्रकाशो यदि वहाँ न भी मिला, तो मैं साइंदास को उसे ढूंढ़ने के लिए भेजूंगा मौर खुद उसी के क्वार्टर में बंग रहूँगा। प्रकाशो को मैं बताना चाहता था कि मेरा दोस्त सोमी यहां कैप में मेजर होकर मा गया है, इसलिए अब शहर में रम सप्लाई करने का धंधा बड़े मजे से किया जा सकता है, क्योंकि मिलिट्री में रम की एक बोतल नौ रुपये बारह पैसे की मिलती थी और वह शहर में साढ़े तेरह-चौदह रुपये की विक जाती थी । यह खासे अच्छे मुनाफे का काम था और इसमें ठरी बेचने से खतरा भी काफी कम था। शहर में पहले भी एक-दो लोग मौर थे जो किसी-न-किसी मिलिट्री वाले या कैटीन वाले से मिल-मिला कर यह धंधा कर रहे थे। मैं प्रकाशो को यही बताना चाहता था कि वह यह काम शुरू करने के लिए कल से ही तैयार हो जाये । और बोतलें लेने के लिए पहले-पहले उसे ही कैप में जाना पड़ा करेगा, क्योंकि जब तक पुलिस का खतरा है, मैं तो बिल्कुल घूम-फिर नहीं सकता। मैं जानता था कि सोमी के लिए रोज तीन, चार या पांच बोतलें कैप से निकलवा लेना कोई मुश्किल काम न होगा। मैं जब साईदास के क्वार्टर में दाखिल हुआ तो जैसा मेरा खयाल था प्रकाशो मुझे वहीं मिल गया। उसके पास ही मद्दी भी बैठा हुआ था। मद्दी के सर पर पट्टी बंधी थी।

वच्चे यह अभी तक वैसे ही रो रहा था। लगभग दो घण्टे हो गये थे। दूसरा शो भी शुरू हो चुका था । वह वैसे ही गुमसुम एक पिल्ले-सा सिकुडा-सिमटा बैठा था और बराबर सिसकियाँ भरे जा रहा था। गुरु ने भी फिर उसे कुछ नहीं कहा था। न ही फिर उसने उसकी तरफ देखा था, मोर न ही उससे कुछ बोला था। यल्कि वह अपने काम में मस्त हो गया था, और उसका ध्यान पूरी तरह से माने-जाने वाले गाहकों की तरफ था। मब बारिश एकदम बन्द थी, मौर कहीं-कही से यादल फट जाने से काफी उजाला हो गया था। हालाकि धूप मभी भी नहीं निकल पाई थी। जिस दूसरे नये लड़के को उसने पापड़ों की टोकरी के साथ दूसरे गो के शुरू में हाल के अन्दर भेज दिया था, वह भी अब लौट मा चुका था। वह लड़का सुश था, मोर चल रही फिल्म का कोई गीत धीरे-धीरे गुनगुना रहा था। पापड़ों की टोकरी उसने एक किनारे सम्भाल कर रख दी थी, भोर गुरू के कहने पर मय वह फिल्मी-गीतों की कापियों को सफड़ी के सम्बे सस्ते पर सजा-फैला रहा था । जय शो घटता था, तो गुरु यड़े गेट के पास युद सड़ा होकर नई-पुरानी फिल्मों के फिल्मी गीतो की कापियां बेचा करता था । मोर यह उसकी बड़ी घुरी मादत थी फि लौटने पर वह सारी बच्चे || १०१ । । कापियों को एक ढेर की शक्ल में पटक देता था। गुरु के पास मुख्यतः दो माइटमें थीं, पापड़ मौर फिल्मी गीतो की कापियो । पैसे मौसम होने पर वह केले या कच्चे नारियल की फांकें भी बेचा करता था। उससे भी थोड़ी-बहुत बचत हो जाती थी। लेकिन कुल मिला कर फिर भी हालत खस्ता ही थी। दस-बारह रुपये रोज बच भी गये तो इससे क्या होता था। सिनेमा-माहौल में रहने के कारण रंडी, शराब मौर सौ तरह के ऐव भी थे और इसी तरह के लोगों में अधिकतर उठना-बैठना था। घर पर भी थोड़ा-बहुत देना पड़ता था। यानी कुल मिला कर मामला फटे-हाल ही था। जब से शहर की भावादी बढ़नी शुरू हुई थी मौर महंगाई ने जोर मारा था, शहर के इस सबसे पुराने न्यू-एम्पायर सिनेमा की कोठरीनुमा दुकानों के ठेके भी बढ़ गये थे। वैसे तो मालिक नाजायज फायदा उठा रहा था, यह सब जानते थे, परन्तु दूकान न ली जाये तो दो जून की रोटी से हाथ धोना पड़े। इसलिये बढ़े हुए ठेके को भी मानना ही पड़ता था। महाते के अन्दर ही सिनेमा-हाल की बगल में चार छोटी-छोटी दूकानें थी, एक पान-सिगरेट के लिये, दूसरी चाय का स्टाल, तीसरी पकौड़े वाले की, और चौथो दूकान गुरु की थी। गुरु इसी पकौड़े वाले की कड़ाही से अपने पापड़ तल लिया करता था, उसका उससे तय था, इसीलिये उसे अलग से अंगीठी का प्रबन्ध न करना पडता था। वह इस समय उसी पकोडे वाले की अंगीठी के पास उकड़ बैठा था और सिसक्यिों की आवाज बराबर नया छोकरा मब तक फिल्मी गीतों की कापियां सजा चुका था और अव वह वही गुरु के बगल में बैठ गया। अपनी जेब से उसने एक बुझे हुए सिगरेट का टोटा निकाला और गुरु के जलते सिगरेट से छुमा कर उसे सुलगा लिया। गुरु ने उससे कहा, 'काले, हिसाब तो दे।' काले जब जेब से पैसे निकाल रहा था, तो गुरु ने फिर कहा, भी सुनाई दे रही थी।

१०२ ॥ थके-हारे बात को सुन ले काले, मैं हरामजदगी पसन्द नहीं करता, तुम्हें माते ही सबसे पहले पैसे मेरे हाथ में देने चाहिये थे....मुझे यह अच्छा नहीं लगता.... यह क्या तुम्हारे बार का माल है....।' काले अब पैसे गिन रहा था। गुरु ने उस रोते-सिसकते छोकरे की तरफ इशारा करके कहा, 'यह सूअर का तुलम बिल्लू आज मुफ्त में मार खा गया....इस सूभर के पुत्तर मे बात भी तो ऐसी ही की....लेकिन सुन काले, इम बिल्लू के बच्चे से कभी कहने की जरूरत न पड़ती थी, हाल से बाहर आते ही सारे पैसे मेरे सामने घर देता था ...पोर तुम किसी गुमान में मत रहियो, कभी तुमने गड़बड़ को सोची तो मो के पेट से भी टांग पकड़ घसीट लाऊँगा.....' विल्लू थोड़ी देर के लिये सिसकना भूल गया था। गुरु ने सचमुच में उसकी तारीफ की थी भोर इजित की थी। और वह भी काले के सामने, जो कि नम्बर एक का पोट्टा पोर बदमाश है । उसने सोचा, कि वह तीन साल से गुरु के पास काम कर रहा है, उसने कभी कोई ऐसी-वैसी बात भी तो नहीं की। तभी उसने सोचा, कि वह गुरु को काले की सारी बद- माशियों के बारे में बता दे, कि यह छोकरा बड़ा ही बेईमान, बदमाश मौर लफ्फड़बाज है, इसलिये गुरु को उससे बचना चाहिये । लेकिन फिर उसने ख्याल किया कि उसे गुरु को मागाह करने की क्या जरूरत है, काले चाहे जितना मर्जी उसे लूटे मौर चमका दे। उसने सोचा कि उसे गुरु से कोई हमदर्दी नहीं दिखानी चाहिये । माखिर गुरु मे भी उसे सामसाह इस दुरी तरह से पीटा है....मौर इतनी-सी बात के लिये.... विल्लू उस मार को याद करके फिर सिसक पड़ा । काले गुरु को हिसाव समझाने सगा या । बिल्लू ने सोचा, प्रभो गुरु काले को फंसी गंदी-गंदी गालियां दे रहा था....जब गुरु उसको पीट रहा पा तब भी तो यह बेहद गंदी-गंदी गालियां दे रहा था....विस्मू ने सोचा, गुरु की काले से निम न पायेगी, मोर एक दिन उमे भी यह सूप पीटेगा मोर गंदी-गंदी गालियां देगा....काले गुरु के पास पा ही क्यों गया, बिल्लू बच्चे ॥ १०३ ने सोचा । काले वैसे इस जगह के लिये नया नहीं था। विल्लू उसे खूब भन्छी तरह जानता या, और वे दोनों कई बार इकट्ठ सिगरेट फूंक चुके थे। सिनेमा हाल के महाते के बाहर सड़क पर जो दूकानें है, उन्हीं में से एक चाय की दुकान पर काले काम कर रहा था। दस रुपये माहवार और दो वक्त रोटी । गुरु उसे फुसला कर ले माया होगा। गुरु का काम अकेले भी तो नहीं चल सकता न । उसे एकाध छोकरा तो चाहिये ही जो सिनेमा- हाल के अन्दर जा कर शो शुरू होने से पहले मौर इन्टरवल के समय पापड़ बेच सके। लेकिन, बिल्लू ने सोचा, गुरु ही उसे क्यों फुसला लाया, वल्कि गुरु की बात सुनते ही काले उसके साथ पाने को तैयार हो गया होगा । यह लालच क्या कम है कि सिनेमा हाल में काम कर रहे हैं मौर पापड़ वेचते हुये हर शो मे दो-चार सीन मुफ्त ही देख लेते हैं । उसने सोचा, उसे खुद भी तो यही लालच बराबर रहा है। हर नई- नई फिल्म के कुछ सीन बार-बार मुफ्त देखने को मिल जाते हैं, गेट के पास खड़े हो कर कुछ पसंदीदा नाच-गाने देख-सुन लेते है, और मंतिम शो मैं तो भक्सर अगले दर्जे वाला गेट-कीपर साधूराम उसे पूरी पिक्चर देख लेने देता है.... लेकिन माज तो भारी गड़बड़ हो गई। जब से वह यहाँ माया है पहले कभी ऐसा नही हुमा था....। उसका चेहरा फिर पतला पड़ गया भोर वह गुरु की तरफ देखकर फिर सिसकियां लेने लगा ।....लेकिन अब गुरु से कोई उम्मीद करना फिजूल था। गुरु ने तो साफ कह दिया था, 'जामो मरोजाकर, भागो यहाँ से....।' उसे बारह बजे वाले शो के इन्टरवल का फिर ध्यान भा गया ।.... यदि वह भादमी उससे न टकराया होता और उसको पापड़ों वाली टोकरी न गिरी होती....। इन्टरवल होने के समय सब छोकरे चाय, पकौड़े, पापड़ मादि चीजें लेकर गेट के बाहर खड़े थे, गेट-कीपर ने जब दरवाजा खोला तो सबसे पहले अन्दर जाने वालों में यही था, लेकिन मन्दर से बाहर पाने वाला एक प्रादमी उसकी टोकरी से ऐसे टकराया कि टोकरी उसके हाथ , . १०४ | थके-हारे से नीचे गिर पडो, पौर वह सोचे-सोचे कि क्या हो गया है तब तक नीचे बिखरे पापड़ों पर से कई लोग गुजर चुके थे। पूरे बीस पापड़ थे....दो रुपये के । उसकी दो दिन को मजदूरी। वह हैरान खड़ा रह गया था, गुमसुम ! उसकी प्राखें भी गीली हो गई थीं। चेहरा भद्दा पड़ गया था मौर देह कमजोर लगने लगी यो ।....मगर कुछ देर बाद गेट-कीपर ने जब उसे समझाया था कि गुरु को चार-चार माने रोज करके दो रुपये कटवा देना, तव वह कुछ सचेत हुमा था। लेकिन फिर भी उसे बेहद मफसोस होता रहा था। .....मगर गुरु ने उसकी जरा न सुनी थी ! और उसे एकदम से पीटना शुरू कर दिया था.... हालांकि उसे इस बात से पाश्चर्य भी हुमा था कि इतने कम नुकसान के लिये गुरु ने उसे इतना पीटा और इतनी गालियां दी, जब कि वह चार- चार माने करके गुरु के सारे पैसे चुकता भी कर देता। मगर गुरु तो जैसे एकदम से गरज पड़ा था और उसने उसे काम से निकालने का निर्णय तुरन्त सुना दिया था...। बिल्लू ने गुरु के पांव पकड़ लिये थे....काम से न निकालो, माफ कर दो, पहली बार गलती हुई है....! हालांकि, विल्लू सोचता था, यह गलती भी कहां है, अचानक ऐसा हो गया, मेरा इसमें क्या कसूर था ...। दूसरा शो शुरू होने से पहले तक उसे उम्मीद थी कि गुरु उसे माफ कर देगा मौर उसे काम पर रख लेगा, परन्तु गुरु जब काले को बाहर की दुकान से पकड़ लाया....मौर काले जब पापड़ बेचने हाल चला गया....तब उसको सिसकियां तेज हो गई थी....और फिर वह सोचता रहा था अब उसे कहाँ काम मिलेगा, पकौड़े वाले भौर चाय के स्टाल पर पहले ही तीन-चार छोकरे काम कर रहे थे....। भाकाश पर फिर काले-काले बादल इकट्ठे हो गये थे। इससे रोशनी काफी कम हो गई थी। 'मन्दर भी बच्चे || १०५ गुरु काल से हिसाब ले चुका था। अब दोनों के चेहरों पर कुछ-कुछ राहत थी। काले ने गुरु से कहा, 'उस्ताद, एक सिगरेट तो देयो।' गुरु का चेहरा एकदम गुस्से से भर गया। उसने आँखें फाडकर काले को देखा । लेकिन दो क्षण बाद ही वह नर्म पड़ गया, और अपनी जेब में हाथ डालकर उसने एक मुड़ा-तुड़ा सिगरेट निकाला और उसे काले को देते हुये बोला, 'ले, मर जा कर....और मेरी इस बात को समझ लियो, यह पहली और आखरी बार है, फिर कभी मत मांगना....मुझे यह बातें अच्छी नही लगती। पाखिर मैं तुम्हें पैसे देता हूँ....पूरा एक रुपया....और तुम करते ही क्या हो....चार शोमों में दो-चार मिनट के लिये हाल में जाकर पापड़ ही तो बेचना होते है....और तुम क्या करते हो....मौज करते हो.... अपने रुपये से चाहे तुम बोड़ी-सिगरेट फूंको या कुछ खामो-पिमा मुझे इससे कुछ नही लेना-देना....समझे....अब जामो मरी जाकर, लेकिन मागे से खबरदार रहना....' काले ने लगता था गुरु की बातें सुनी हो नहीं । उसने बगल की जलती मंगोठी से कागज जलाकर सिगरेट सुलगा ली थो, और अब वह सिगरेट फूंकता हुमा टट्टियों की तरफ चला जा रहा था.... गुरु भी अपनी सिगरेट जलाता हुमा जैसे हवा को सुनाता हुमा कह रहा था, 'साले इतने-इतने छोकरे है....अभी से इनकी यह हालत है.... सिगरेट पिए विना इनकी टट्टी ही नही उतरती....' इसी वक्त गुरु को विल्लू के वहां होने का जैसे ताजा महसास हुमा । उसने सिगरेट का जल्दी से कश खीचते हुये गरजकर कहा, 'तेरी क्या मां मर गई है जो अब रोये ही जा रहा है....चल उठ, भाग यहाँ से....उठ, उठ, उठ, चल....उठता है कि नही....अब कभी मत माना मेरी दुकान पर .....कुत्ते का प्रत्तर, साला....मां का यार....अब भागता है कि हूँ एक भोपड़....' विल्लू ढीली चाल से चलता हुमा गुरु की दुकान से दूर मा गया । . ७ १०६ || थके-हारे लेकिन उसने सुना, गुरु मब भी यके चला जा रहा था। हल्की-हल्की बूंदें फिर पड़नी शुरू हो गई थी। टट्टियों के पास जहाँ शेड है, वहां पेन्टर घरम सिंह बोर्ड लिख रहा था। परसों नई फिल्म लगने वाली थी। बिल्लू वही माकर खड़ा हो गया। वहाँ छोटे-छोटे और भी कई लड़के खड़े थे मोर पेन्टर धरम सिंह को बोडौं पर फिल्मों और फिल्मी सितारों का नाम लिखते हुये देखने में मशगूल थे । बगल में एक लड़का अभी भी कुछ बोडों को धोकर साफ कर रहा था। पौर उसके बगल में एक और लड़का धुले हुये बोर्डों पर फिल्मी-पोस्टर चिपका रहा था। वह पोस्टरों को चिपकाता जाता और फिर उन बोडौं को पेन्टर घरम सिंह के पास रखता जाता । बिल्लू भी पेन्टर परम सिंह को छोटे-बड़े बुरशों से लिखता हुमा देखने में लीन हो गया। बिल्लू पहले भी कई बार पेन्टर धरम सिंह को ऐसे ही काम करते हुये देख चुका था । वह काफी काफी देर तक उसके पास खड़ा रहा करता था। और भी कई लड़के पेन्टर धरम सिंह को ऐसे ही धेरै रहते थे । बिल्लू को बोहों पर लिखने का यह काम बहुत अच्छा लगता था। इस काम में बहुत इज्जत थी । सिनेमा हॉल में सभी लोग पेन्टर घरम सिंह को उस्ताद कह कर बुलाते थे । उस्ताद को काम करते हुये देखकर माज विल्लू के दिमाग में यह ख्याल माया कि उसे भी यह काम सीख लेना चाहिये । इसमें रोटी भी पाराम से मिलेगी और वहुत इज्जत भी। यह ख्याल उसके दिमाग में एकदम से भड़क उठा था। फिर उसने सोचा कि उसे उस्ताद से इस बारे में कहना चाहिये । परन्तु वह कहे कैसे ? मोर कह देने से क्या उस्ताद मान जायेगा? यदि न माना तो? क्योकि उस्ताद के पास पहले भी तीन-चार लड़के शागिर्दी कर रहे हैं। उसने सोचा कि इन लड़कों की अच्छी किस्मत है। विल्लू का चेहरा इस विचार से घुझ-सा गया था। वह पहले से भी मधिक निराश लग रहा था। इसी समय उस्ताद ने बोर्ड घोने वाले लड़के से कहा, 'ऐ सुक्खी, जा बच्चे १०७ के एक चाय तो ले मा। बिल्लू ने सोचा कि अगर उस्ताद ने उससे चाय लाने के लिये कहा होता तो वह भागा-भागा चला जाता । कितना मजा भाता। इसी वक्त उसने टट्टियों वाले दरवाजे पर काले को खड़े देखा । काले भी उसकी तरफ देख रहा था और इशारे से उसे अपने पास बुला रहा था। बिल्लू ने सोचा पता नहीं षया बात है, परन्तु वह शेड में से निकल कर काले के पास चला गया। अब बूंदाबांदो तेज हो गई थी। काले ने उससे पूछा, 'तुम्हारे पास सिगरेट है ?' वह कुछ बोला नहीं, उसने न में गर्दन हिला दी। काले ने कहा, 'मेरे पास वीड़ी है, तू यहीं रुक, मैं भाग कर सुलगा लाता हूँ।' काले जब लौटकर माया तो उसके हाथ में सुलगी हुई दो बोड़ियाँ यो । एक उसने बिल्लू को दे दी। वीड़ी का कश लेते हुये काले ने कहा, 'अब तू क्या करेगा।' विल्लू के पास कोई जवाब नही था। उसने अभी कुछ सोचा ही नहीं या । सोचने भौर तय करने का उसके पास कोई जरिया भी नहीं था। उसने,मपना उदास चेहरा लटका लिया । काले ने कहा, 'तू प्यारे के टो-स्टाल पर क्यों नहीं चला जाता । मेरे वहाँ से पाने के बाद उसने भभी किसी को रखा नहीं होगा। तू उससे जा 'के कह दे।' बिल्लू ने कहा, 'मैं वहां काम नही करना चाहता।' काले ने कहा, 'अरे, उसमें हरज क्या है, दस रुपये महीने के मिलेंगे, दोनों वक्त का खाना, चाय-वाय, बीड़ी-सिगरेट तू ऊपर से मार सकता परन्तु बिल्लू कुछ और ही सोच रहा था। वह सिनेमा-हाल की नौकरी नहीं छोड़ना चाहता था। यहां कितने मजे रहते हैं। ऊपर से बाहर के १०८ || थके-हारे लड़कों पर यह रोब कि हम सिनेमा-हाल में काम कर रहे है.... काले ने उसे चुप देखकर फिर कहा, 'उस्ताद तो मब तुम्हें फिर से रखेगा नही....' परन्तु बिल्लू चुप हो गया था। वह समझ नहीं पा रहा था कि वह क्या कहे या उसे क्या कहना चाहिये । मगर वह चिन्तित अवश्य हो गया था कि अब वह क्या करेगा। मौर यदि कुछ नहीं करेगा तो बड़ी मुसीबत हो जायेगी। उसने एक लम्बा कश लेकर बीड़ी दूर फेंक दी। वह पेन्टर धरम सिंह की मोर देखने लगा था। काले कुछ उत्साह में नजर मा रहा था। वह यह कहकर वहां से चल दिया कि 'उस्ताद मुझे ढूंढ रहा होगा, मैं चलता हूँ- बिल्लू उसे जाते हुये देखता रहा। फिर वह मन्दर पेशाब करने चला गया। यही उसे ख्याल माया कि उसे गुरु के बगल वाले मालिकों, पकौड़े वाले रामरखे और चाय वाले मुरली से बात करके देख लेनी चाहिये । शायद वे उसे रख लें। उन्हें जरूरत तो रहती ही है। लड़के आते-जाते रहते है । अपने इस ख्याल से दो क्षण के लिये उसे खुशी हुई। परन्तु बाद में उसे घ्यान माया कि गुरु के पड़ोसी होने के कारण वे उसे बिलकुल न रखेंगे । और जब गुरु उसे कितनी ही देर तक पीटता और गालियां बकता रहा था तो इनमें से कोई उसे बचाने नही माया था, न ही इनमें से किसी ने गुरु को उसे पीटने से मना किया था । बल्कि ये लोग कैसे बेशर्मी से उसे पिटता देखकर हँस रहे थे। उसने सोचा, यह सब मालिक एक जैसे होते है । उसने सोचा, वह इनके पास काम मांगने नही जायेगा, न ही रामरखे के पास, न ही मुरली के पास । तब ? जब वह बाहर माया तो बूंदाबांदी वैसे ही हो रही थी। पेन्टर घरम सिंह अपने काम में मस्त था मोर लड़के उसको वैसे ही पेरे खड़े थे । वह भी पेन्टर धरम सिंह के पास भाकर खड़ा हो गया।

बच्चे || १०६ - तोमा, छोटे वाले सभी बोर्ड धोये जा चुके थे। सुक्खी ने कहा, 'उस्ताद, बोर्ड तो सब खत्म हो गये।' उस्ताद ने कहा, 'इसमें पूछने की क्या बात है वे ।' फिर कहा, 'तुम अब उन पर चूना लगा दो। बस, दो बोर्ड छोड़ देना, वे लाल रंगे जायेंगे।' विल्लू ने देखा, सुक्खी उस्ताद की हलकी डॉट के बावजूद कुछ अधिक खुश हो उठा था और वह चूने वाले डिब्बे में कूची चलाने लगा था । उस्ताद ने सुक्खी से फिर कहा, 'जा, जा के बाकी बोर्ड कब प्रायेंगे । माज या कल ।' सुक्खी यह सुनते ही तुरन्त मैनेजर के कमरे की तरफ भाग गया । सभी लड़के उसे बूदाबांदो में से लापता हुभा देखने लगे थे । सुक्खी दो मिनट में ही वापस आ गया, 'उस्ताद, बाकी बोर्ड कल सुबह भायेंगे।' यह कहने के साथ ही उसने चूने वाली कूची फिर हाथ में पकड़ ली थी। इसी वक्त वहां पर बीस-पच्चीस साल का एक लम्वा-सा लड़का माया मोर 'आदाव मर्ज' कहते हुये उस्ताद के पास बैठ गया। यह इरशाद था, उस्ताद का पुराना शागिर्द । इरशाद शहर में अव मलग से काम करता था, परन्तु विल्लू ने उसे पहले भी कई बार यहाँ उस्ताद के पास आते देखा था । उस्ताद इरशाद को देखकर बहुत खुश हुमा करता था। उस्ताद के दोनों छोटे शागिदों ने इरशाद को 'शाद भाई, नमस्ते' कह कर फिर अपना-अपना काम शुरू कर दिया था। उस्ताद ने बुरश रंग के डिब्बे पर रख दिया था, भोर मब वह इरशाद के साथ हंस-हंसकर बातें करने लगा था। एकाध मिनट बाद ही उस्ताद ने फिर सुक्खी को दो चाय लाने के लिये कह दिया था। बिल्लू को यह सव बड़ा अच्छा लग रहा था । उसे महसूस हो रहा या कि वह खुद भी उस्ताद के इन सारे कामों मौर बातों में शामिल है । उसे एक मजानी सी खुशी मपने मन्दर भर गई लगती थी। उसने एक बार फिर सोचा कि वह उस्ताद से काम के लिये कहे । एक दिन वह भी इरशाद *a ११० ॥ थके-हारे की तरह अपना भलग से काम-धन्धा चलाने लगेगा। मौर कितनी इज्जत है इस काम में..... मगर उस्ताद क्या मान जायेगा? मौर वह कहे कैसे ? उस्ताद के पास तो पहले ही शागिद लोग काम कर रहे हैं.... बिल्लू अपने-आप में फिर दब्बू-सा हो गया। उसका चेहरा पीला हो गया था। इरशाद मौर उस्ताद को बातों में लगा देखकर सभी लड़के वहाँ से छिटक गये थे। कुछ बूंदाबांदी में भीगते हुये बाहर के गेट की ओर चल दिये थे, और कुछ उस तरफ चले गये थे जहाँ 'चल रही' और 'शीघ्र मा रहो' फिल्मों की तस्वीरें लगी थी । विल्लू भी इन्हीं लगी तस्वीरों के बगल में पा कर खड़ा हो गया और कई बार पहले देखी हुई फोटोमों पर नजर दौड़ाने लगा। फिल्मी तस्वीरों को देखते-देखते उसी की बगल में खड़े दो लड़के तरह- तरह की गन्दी-मन्दी इधर-उधर की बातें करने लगे थे। बिल्लू उनको वातों को सुनकर मुस्कराने लगा था मौर उसका दिल कर रहा था कि वह भी उनकी बातों में शामिल हो जाये । परन्तु वे लड़के पता नहीं कौन थे, थे तो उसकी उम्र के, दस-बारह के, मगर वह उन्हें जानता नही था, वैसे वे भी उसी की तरह के थे, नंगे पांव और मले-फटे कपड़ों में । इसी क्षण उसने सुना, इन्टरवल की घन्टी बज रही थी। इसका मतलब था, पांच बज गये थे। घन्टी को इस आवाज के साथ ही उसका चेहरा एकदम-से लटक गया था। मगर उसका पूरा ध्यान अब सिनेमा हाल के गेटों की तरफ था। गेट भभी खुले नहीं थे, परन्तु हाल के अन्दर अलग- मलग चीजें बेचने वाले लड़के भाग-भाग कर गेटों पास इकट्ठे हो गये थे। चाय वाले, पकौड़े वाले, सिगरेट-पान वाले, पापड़....। काले भी पापड़ों पाली टोकरी मपने दोनों हाथों में पकड़े हुये वहां खड़ा था। यह देख कर बिल्लू के मन्दर पता नही एकदम से क्या हुमा कि वह अपने ही भाप में बेहद कमजोर महसूस करने लगा। जैसे किसी ने उसकी दोनों टाँगें काट ली हों, या उसके दोनों हाय टूट गये हों । कमजोरी को इस भवस्था में भी बच्चे || १११ वह लगातार उसी तरफ घूरे जा रहा था। उसकी नजरें काले की तरफ कम पोर पापड़ों वाली टोकरी पर अधिक अटकी थी । जैसे उसके सामने कोई और वजूद न होकर केवल पापड़ ही पापड़ फैल गये थे। इसी दौरान में उसने देखा था, कि वह एकदम भयानक गुस्से में भर गया है और उसने पापड़ों की टोकरी को जोर का ठुड्ड मार कर उसे उलट दिया है और पापड़ चारों ओर बिखर गये हैं। काले जोर-जोर से रोने लगा है, भौर गुरु वहीं पर पा कर काले को बुरी तरह से पीट रहा है....। परन्तु काले का यूं रोना और पिटना भी उसे जरा अच्छा नहीं लगा।....बल्कि तब उसका दिल किया कि वह गुरु को पकड़ कर कस कर उसके दो लातें लगा दे.... गेट खुल गये थे और चीजें बेचने वाले लड़के झम झम करते हाल के भन्दर गायब हो गये थे । हाल के अन्दर से काले की मद्धम-सी भावाज उसे यहाँ तक सुनाई दे रही थी....पापड़....दस पैसे.... हाल में से निकल कर कुछ लोग फिल्मी तस्वीरें देखने इघर मा गये थे। बिल्लू अब वहाँ अधिक देर खड़ा नहीं रह सका । उसको हिचकियाँ फिर शुरू हो गई थी, और उसकी मांखें भीग गई थी। ढोले कदमों से चलता हुमा वह बड़े गेट को मोर मा गया। चौरी- छिपे उसने गुरु, रामरखे मोर मुरली को भी देखा, वे अपने-अपने कामो में व्यस्त थे भौर गाहकों को जल्दी-जल्दी निबटाने में लगे थे.... बड़े गेट से बाहर भाकर उसने काले की बात को याद करते हुये सोचा कि उसे टी-स्टाल वाले प्यारे की दुकान पर चले जाना चाहिये.... रुपये....मोर दो वक्त की रोटी....ऊपर से चार बाप बाहानामा and-

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Thake Hare

Author
Satish Jamali
Title
Thake Hare
File name
Thake Hare
Text
OCR done
Citation
1975
Published
2011/03
Publisher
Chitra Lekha Prakashan Allahabad
Language
Sanskrit
Pages
118
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
550940
Barcode
4990010031731.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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x4GI0zp98HR
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