Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner

Sajgiii0621 Shri Sudharma Gachha Pariksha

Shri Brahmas · 2011/07

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(u)
५ शनि रकाने माटे, सपा नायजीवो शुरु
4 पानी शरमाटे भाभी प्रमाणार्यजी रनिन
सम्प, प्राचीन रोमन प्रमाणयुक्त अमारा I
भावाची पमान ममपनी अदर अनि उपयोग
१३ रवाना साथी पणा (पुष्कळ)जीवोनु -
सभाशे ए ऐतुने पातमा सश्या प्रथ मुशित
(पापो) हासना समपनी अंदर मनुष्यो
भर्मनी शोध खोळ करी रक्षा थने जमानो पा जाए
पपायाळो घतो जाय ते तेथा जमानामा थानानिषद
पाति प्रमाणयुक्त प्रय प्रतिदिनी सास जरूरज !
अनन्य प्रक्षाळु थवं, पण अधयक्षाळु न घबु एज
श्रेयस्कर वे केमके अधश्रद्धालु नु मानवु पयु होय
ये के नसे साचु होय के जुलु होय पण थमाए तो जे
थगीकार फर्यु तेने कवी गेमनार नथी श्राम पकमेला
रामापुनी पेठे थाज कानो केटलोक अधबाटु--
हटिरागी वर्ग अज्ञानताना यशे करीने सत्यप्ररूपक साहुम
तरफ धिकारनी नजरथी जोतो थयो , के जे
सत्यवताना सर्टफ घचनोने इसी कहानमाला
Eरिपथमो पडना लाग्यो , ते वने श्राम
प्रत्युपयोगी घशेज, माटे शिवकी वाचकवर्ग इति
रामथी घर रही तत्वमाहिणी दृष्टिबडे आ
अथवी इति लगीरांची विचारी मनन करी

सफळज प तत्व संचय करवामा राग ऐपना फदमा न फसासो स्वपरना थारमानु कल्याण करशेज एवो अमने पूर्ण विश्वास । घने एम पशे तो अमारो प्रयत्न पण ठे-मतलय के "दक परीकक जो मळशे तो श्रम सफळ अमारो। श्रामथनो विषय शुठे ते तो वाचकवर्ग थायो- पान्त आ प्रधनु अवलोकन करतांज आपोधाप सम. 'जीज से तेम , जेथी नादक पिष्टपेषण करी कीमती काळनो व्यर्थ व्यय करयो ते अनुचित ठे प्रिय पाठक महाशय! था प्रथना कर्ता सौधर्म- गठीय शास्त्रविशारद मुनिमहाराज श्री ब्रह्माचार्यजी पके जेमनो जन्म मालवाना याजणोठ नगरमा मोखकी छत्रीवीर पद्मदेवराय पिता, संथा सीतादेवी HAIताने त्या उत्तम प्रहयोगें थयो हतो, धने जेमणे कि- "शोरवयमाज पूर्वसचित पुर्त्यप्रकृति सयोगवश पोताना ना साथे मातापितानी रजा मेळव्या शिवाय छार- काजीनी यात्रा करवा माटे प्रमाण कर्यु हतु "शुजात् "शुल जायते" एकदेवत मुजय एवु थयु के मार्गे चालता वालता गिरनार पर्वतना प्रदेशमा पूर्व पुन्योदय प्रनाव में जैनाचार्यनी तेमने नेट थई मुनीने पदना करी शुगोते तेमनी अगाडी घेता, एटले मुनिवर्षे इयुबाकर्मी तो

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योग्यजीव जाणीने शुद्ध धर्मापदेशनो मान थाये
एथी ते वचनामृत पान करता मनमा वैराग्यजात्र
जन्म मध्यो, एटझुज नहीं पण ते घेराग्ये सत्य वैराग्य
नी दीक्षा सेवानी तेमने फरज पाडी के तेमणे पर
ारका जवानु चार वध करी जन्मोहार करवानुं ।
खोखवा मन दोधु. पायें हतु शु अने थयु छु
"वाद! नवितव्या। तारी प्रबलता!" एटखे।
धार्यों इतोहारका दर्शननो लाज भने शुभ चारित्रन
खान थयो गुरुश्रीए नाम सरयु ब्रह्ममुनि, केमके
भविष्यमा परंबाशानना वा परब्रह्म ( वीतराग
जापित झानना ज्ञाता थनारा होरायी प्रयमयी
ज्ञानदृष्टिवळे ते नामनुज पट समप्यु तदनंतर गुरु
राजे पोताना यक्षता नामने सार्थक करया माटे मुनि
धर्म योग्य किया-धनुष्ठानना सूत्र (सिझात-तत्व
नो श्रन्यास कराव्यो, अने ते पठी तेमणे (पोते) अना
मदान् थाचार्य पासेयी पोतानी प्रश्न युधिना योग
घी घणाज तत्वज्ञाननो संग्रह कयों बने समर्थ शा
रिशारद बिरुदवंत यया एयी श्री पदापागाचा
श्री विजयदेवरिजीये तेमने सरिमन्न थी ब्रह्मा
चार्य नागची भारतभूपण तरीके गियानिमार्गम
स्थिर कर्या श्रीशिजयदेयसूरिना शिष्य श्री विनय.
सौर ते था अन्यकारला सप्तारिक सरधमा न
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सता, ए मार्गना प्रतापी मजकुर श्राचार्यजी परम
निमय राम्पधारक साक्षरोत्तम-विज्ञान, नीबडी
वैरागी जनोना मस्तकमाधि समान शोनापान
गणाया हता ए सरिजीए? दशाश्रुतस्कघसूत्रपत्ति,
जयूछीपपत्रनिसूत्रवृत्ति, पाखीसूत्रवृत्ति प्रनिमास्थापना
प्रध, सुमतिनागिलनोरास, सेझांतिक विचार, चउप:
व्याग्या, स्तवनो, सद्यायो, कुसक श्रने प्रस्ताविक
काव्य वगरे वगरे घणा रच्या ठे एम केटसाएकनी
तो भरणज साक्षी थापे ठे, (मान नेनो साक्षी थापे
एटलीज इछा ) मजकुर थाचार्यजी विक्रमनी
पदरमी सदीमा विद्यमान दता तेमणे करेली प्रणे
नियोने समर्थ गीतार्थोद्वारा सशोधन करावी श्री
सघमा प्रचलित फरेसी , थने अनेक गयपद्यात्मक
खेसो कापम फरी चतुर्विध सघने नारी कर्या
ए पोते सोधर्मगधना दता एम श्रने उपर खखेष सर्व
पिना एमना करेसा प्रयो उपरपीज प्रतीति मळे ठे
उधीमा ऐतिहासिक ज्ञान प्रशसनीय इतु एम पण
या प्रथ यादी थापेठे थने ते वाचवापीथदारश सत्यज
नासशे ए थाचार्यजी दास परसाकमा विराजमान
उता तेमना मधुरवचनो था सोकमा विराजमारदी
मटिजीयोने पाणपती रदेस थने इथे पत्री पर
सादा परे एवी घमारी शाले

या पुस्तक उपायतां मारी मतिना योग कंशधदार कानो मात्रा मामी या पवित्रमताना रही गपेक्ष होय तो ते विष समानो संग्त् गुणमा पर दोपने सुधारी वांधशे के जेथी अनेत वानर कारण के "संस्यज्य सकलान् दोषान् गुणान् राम साप " तपापि वाचकानी समक्ष दोपसंयधी विधे मियाऽष्कृत दन. असम् विस्तरेण शुनमः से १९६० माघ पूर्णिमा } प्रकाशक. ॥ शार्दूलविक्रीडितवृत्तम् ।। श्रीसिधार्थनरेजविश्रुतकुश व्योमप्रसादय सहोर्धाशुनिरस्तऽस्तरमहा-मोदान्धकारस्पिति हप्ताशेपकुवादिकोशिफल प्रीतिप्रणोदकमो जीपादस्खलितप्रतापतरणि श्रीवर्धमानो जिन। शान्ति ॥३॥ मा उपरनु काम्प प्रयना यतमाने, परतु गपामा क अमुचना यश् माथी हि मोग यक्षरा पुदित करे ॥ श्रीदरम्यान ॥ शाम्रनिगारद जैनाचार्य मुनिराजश्रीब्रह्मापकृत- श्री सुवर्मगच्छ परीक्षा॥ (थार्या ६) जयति जगदेव मगल- मपहत नि शेप ऽरित धन तिमिरम् ।। रविनिमिय यथास्थित,- यस्तु निकाश जिनेशवच ॥१॥ । घोपा ॥ र नमु कर थजति फरी, साधुतणा गुण मन सनरी, धर्म परिक्षानणी, गिति कटु कांश गछतणी ॥१॥ रनणा गणधर ग्यार, नर गछ तेहतणा शम धार, च गणधरना गव पच, पच पचप्सय मुग्गिवर मच ॥२॥ कातणा यदुर सय साध, सत्ताम गधरना हम साध, हमनवम गणधर ये मिति, साधु उत्तय नणारे पक्षी ॥३ थाठमो ए सुपिचार, नवमानो दिव कदु विचार, पम ग्यारम ये गणधार, उसय साधु नेहनो परिमाराध न इग्यारे गण वरतणा, नर गठनी जाणो सिरणा, एक गुरुनो परिवार, सनपाउथतर थरधार ॥५॥ चिा - -

श्री सुधर्मगध परीक्षा
थरथ एक गणधर सपि कहे, पके भावारे सकिरदे.
जूजुथा सूत्रपाउ गछ इथा, पुण याचारे नजिजुधा
वीरथका गणधर न मिस पछे गोयम केत्रस मिक,
थापापणा साधुसपिजेद, थाप्या सुधर्मसामिने तेद
सोधर्मगध एकज ते जाण, तेह्तणी सनि माने
सूत्रतणी एकज वाचना, अतर पुणु नदि भाचा
केमो जे साचा साधुनो, सघतो ते सोधर्मस्वामि
कल्पसूत्रना वचन विमास, सानसी श्री सद्गुरुन
यतः जे इमे अऊत्ताए समणा
विहरति ए एण सधे अऊ सुहमस्स 24
रस्स अवच्चिका अवसेसा गणहरा
बुन्निन्ना ॥
जानार्थ-भाजकालने निपजे श्रमण नियं
। प्रत्यक्ष पिचरे , ते तमाम नगवान् श्री सुधर्म
गारना शिष्य सतानीया जाणा, वाकीना गण
शिष्य सतान रहित जाणा
हिरणा जे दीसे ग नाम, सूत्र न दीसे तेहने उ
चता कदे तेहने पूर्वजो, मन सदेह सह टासजो
सामाचारिने श्रातरे, जो गह कद्देवास्ये पानरे,
घनदासयासतो

श्री सुधर्मगल परीक्षा पए तन पडित कदे, पाउ फेर जे गम सहदे, तरागनो मतले एक, जगवई वृत्ति जो पियक ॥१॥ पत ---"यदेवमतमागमानुपातितदेवसत्य- मितिमतव्यमितरत्पुनरुपेक्षायोयमथाऽबहुश्रुतेन नेतदवसातु शक्यते तदेव नावनीय, आचा- र्याणा समदायादिदोपादप मतलेदो जिनाना तु मतमेकमेवाविरुद्धश्च रागादिदोपविरहितत्वात्" भावार्थ:-जेनोज मत श्रागमने अनुसारे होप तेज त्य गणाय ठे पती रीते माना जोइए-अने तेथी वि. रीत जे होय तेने स्याग करवो जोरप ये थाई बहु- तरिना कोई निर्णय करी शके नदि, ते माटे थाती ते विधाखु जोइए के थाचार्यानी सप्रदाप थादि उप पडे करी था मानेद , परतु जिने परनो मत हज यहिक दोप , केमके रागपादि दोपरदित पायी तेयोनो गत निपिन गणाप , माटे तेज गीकार फरपो जोइए घने सेनाथी जे जिनागमपी पिरूकदोष पिन रमिकपणाची यतेनो स्प वेस्पाग

(४) श्री सुधर्मगछ परीक्षा
काउसग्ग चैत्यवदननो फेर, दीसे किदा कोई अधिक
सूत्रे जेहनी दाना नहिं, तिह एकात न करीएर
निरवद्यक्रिया सवेगीतणी, एक दीसे श्रापमति तणी
तिहपुणथाजविचारीकरी, सत्यागेकमु परिहरी ॥१४
सूत्र थर्थठे शुद्ध श्राचार, सौधर्मगच तेहनो अणुसार,
तेथी बार मततर जाण, सूत्रअर्थ तिणे करो प्रमाण
नवखा गष्ठ नवखा आचार, तिणे म राचो एक सगार,
सौधर्मगहनी पालो थाण, जेथी पामो परम कल्याण
एह परपर ठे निसदीस, वरस सहत ज्यालगी २
अर्थ आधार, जे पाले ते साधु विचार ॥ १७
नाम गठ ने सूत्र विरुष्क, परपरा तसुम गणो सुक,
सूत्रे विरु गठ जे श्रादरे, ते जिनथाण नग थानो
वणायेंगे एह विचार, सूत्र पथ गठ रीति धार,
चनगी यो जगदीस, ते जो मम परशोरीमा
यत-श्री मागे ॥ चत्ताग्पुिरिसजा
पन्नता तनहा-धम्मंणाममंगे जहति हो
दिति । गगहितिमेगे जइति णो धम्म
रदेशे सूत्र
धम्ममेगे जननि गाणनितिपि ३, एगे एं
गोगादिनि ४
नाराय-मटमे लोक तातो
२
कर

--
श्री सुधर्मगच परीक्षा (५).
, जिनाझाम्प धर्मप्रत्ये मुकी देचे, पण पोताना
मा करेखी मर्यादाने मूकता नथी, जेमके को
चार्य तीर्थकरनी श्राक्षाने एक बाजु राखी मर्यादा
धी के वीना गठबासा सावुने महाफदगदि पति-
राय श्रुत नणार नही, ए श्राचार्यनी मर्यादा माटे
श्रमो वीजाने काइपण जणावी नहि एम माने, पण
सजिनेश्वरनी आज्ञा नथी जिनेश्वरनीतो एवी श्राझा
में के जो योग्य होय तो सर्व पुरुषो जणी श्रुत थापवु
पण अयोग्यने थापवु नहि मतलनके जिनेश्वरनो उप.
देश योग्य पुरुषप्रते थापवाने मना नथी, उता गद्याध
थे जिनेश्वरनी थाणा उल्लघाय तो जले उल्लघो पण
समे तो गधनीज मर्यादा रासीशु, इम कहे ते पहेलो
गोजाणको अने वीजो नागोए ठे के गहनी मर्या.
ने मूके ते पण जिनेश्वरनी थाणा मूकता नथी, ए
जो जागो जाणवो भने त्रीजो योग्यायोग्यनो विचार
जिनयाणा तथा गहमर्यादा ए वनेने मूके, ते
जो जागोजाणवो भने चोथो तो विपकपूर्वक कार्य
रे, जेमरे जिनेश्वग्नी थाणा तथा गछनी थाणा बनेने
खिी कार्य करे, ते चौथो नागो जाणको
ण सादुणि श्रावक श्राधिका, मघचतुर्विध सूत्रज थका
थरथनी रिणुःपरपरा, जे दीसे ते म गणो खरा॥र
.

श्री सुधर्मगध परीक्षा सूत्र थरथ लोपीने जेह, परंपरा दाखे । तेद, जो सदहिये सूधा साध, तो निन्दवनोस्यो अपराध पद अक्षर जिनयागमतणो,अनिनिष धरी सोपे घो तेनिन्हव कहिये अजाण, वीतरागना बचन प्रमाण ॥२२ यत-पय अखरपि श्क । सधन्नहिं पवेश्य॥ नरोएकाअनहानासे। मिवदिहिसनिलया॥१॥ भावार्थ-सर्वज्ञ देवाधिदेवेपरूपेखाने । फनी परपराधी थावेखा जे पद तथा जे अक्षर तेर कोपण एक अक्षर तथा पद तेनी अझा करे । अने तेथी विपरित परूपणा करे ते जीव निधे मि' दृष्टि जाणवो पूस थाचारजनी थाण, के कदे करिये परमाण, तेदनको उत्तरमन घरो, आचारजनी परीक्षा करो । यत -पच विह आयार। आपरमाणातह जामता ॥ आपार दसता । आयरिया । बच्चति ॥१॥ ব্যাগ -বাৰ সদায় গান সানাখা दर्शनागर २, पारिवारार ३, तपाचार , वीर्याचार नपासना ताज यगार्य मर्यनीमा श्री सुधर्मग परीक्षा (७) [तेमग ते पचाचार प्रति मुनियोने देखाइता, 'हवामाचार्य जे होय भने विषयनी दुष्टना तया कपास हता तेश्री गेडावनारा ते हेतुथी आचार्य नगवान तुझ परुपणा करी नव्यजीवोना तारक तेनेज भाचार्य नावाचार्य) कहेवाय ठे चारज पुण तेहज जाण, जे नासे सुधी जिनवाण, रणविना श्राचारज जेह, कुपुरुषमाहे तेनी रेह ॥३॥ यत -तिचयर समोसूरीजो सम्म जिणमय पयासे॥आण अश्वमतो।सो-कानरिसो- न सप्युरिसो॥१॥ नावार्थ-जे थाचार्य जिनमतना रहस्य तथा तत्व दार्थ ज्ञानना रहस्य-मूल नूनसार प्रते सम्यक् जे पे,जे जावे जिनेश्वरे कह्या ते प्रमाणे प्ररूपे ते तीर्थकर मान गणाय वली जे परमात्मानी श्राणाने तोडता थी ते सत्पुरूप कहेवाय, अने पोतानी पूजा करवा टेज जेनी प्रवृत्ति रे ते कुपुरूप एटले नादान, पोते मे ने वीजाने मुनाडे ते नाममात्र याचारज जाणग मरस्थापना नेहव्य ३ नाम, श्राचारज विदुजेदेनाब, शुद्धत्रण जागा सूरिना, चउथे नाव धरो नावना ।।२५ रसूरिना सक्षण एद, सूत्राचारे बरते जेह, अपथ जे गर्ने नहीं, अशुरू त्रिनगी गणि ते ॥२६ - (6) श्री सुधर्मगई परीक्षा यत-से जयव किं तिचयर सति आप पाइकमेका उदाहुआयरिय सति गोयम" आयरिया चनविहापन्नता तजहा--शामाय- रिया १, ग्वाणायरिया ३, दद्यायरिया ३, लार परिया,तवा जेते नावायरियासिसनि 'यागाणाकमेका॥ जाचार्य -दे नगयन् । शु तीर्थंकर सयधी प्रोन उपधाय के याचार्य समधी थागान । पाप र गीतम! श्राचार्य चार प्रकारका गर-नामागार्य स्थापनाचार्य २,पाचार्य ३,. पायं ४ माजे नावाचार्य ते जिनेश्वरनी प्रमाणो धननार दाबायी मेयोगी थाणा शोरयाय सेनामामारी थाणा, नीशोर मकरशी गाण नाम मात्र भावान, में उर मा रागोनि सानातिनाचिगा, मूत्र गाजिया मत्र भगा कर, नागा त्राशर ॥ यत-नायरगान नावामग्यिा- पिन । यदा पावि या (asar RTH मानिने नावाय श्री सुधर्मगध परीक्षा जेवण वाससएविपचइए हुत्ताणं वायामितेणापि आगमन वाहिं करेंति ते-नाम-उवणाहिं पिंश्यो। जावार्थ -दे जगवन् । कोण नावाचार्य कहेवाय ? हे गौतम । जे याचारज पाजनो दीक्षित पण सिद्धांत विधिय करी पद, पदरमेथनुसंचरे( चाले) ते नावा. चार्य कहीये, अने जे सो वरसनो दीदित पण चश्ने धागमथी उसटो (भागमथी विपरीत) थागम बाह्य जे वर्ते ते नामस्यापनाचार्य साथे गणवो, पटले निर्गुण थाचार्य ते नामाचारज, स्थापनाचार्य जेवा तेनी थाणा पालवी कही नथी नवाचारज जे गच माद, ते सुधर्मगचं जो श्राराद Prममात्र गछगरज न सरे, जो परसी साचू नादरे ॥२॥ , कयाण पाखे जिनसायी, करे कल्पना एक आपणी, कारण गछपरलो साच, रनवरोंसे म मध्यो काच ॥३० नाना परि परसी करी, यो गठ साचो ने संबरी, 'डमेलारे गहन कदाय, आपसहित मोडे ग पाया।३१ न यत -एगो-साहु-एगावि-माहुणी। सावगो . 는

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श्री सुधर्मगध परीक्षा
य सढीवा ॥ आणा जुतो सघो । से सौ !
अधिसंघान. ॥
नापार्थ -एक साधु, तथा एक साध्वी, तया
भावक, एक श्राविका, पण जो जिनेश्वरनी थाणा
सनार होय तो सघ कवाय रे सम्यक् प्रकारे
हणे से सघ, तया मिथ्यात्न कचराथी रहित ये;
गते यस्तुनी अक्षा, परूपणा,प्रवर्तना, यथो
फारफ तथा पासक, स्पक्ष परपक्षने विपे
प्रनायक, सेगन याचार विचार, शोधार्य, धेर्प, गानी
चातुर्य, दाक्षिम्य, विनय, निकादि गुण जेमा होय
सप क्वाप रे ते गुणदीन होय तो सघन ५'
परतु दारांनो दगतो पदेयाय ने
मात्र मूगी ग थाहागाव, थापगतिमु सगगि टाल
थप मने सानु मागणी करे, तो पुणा नसायरनषित
-
पन -निगागा का तागण । ना [
कामुदापि सक्षिा सपना नियधा
नासा -प्रिनयानी याणा प्रमाण
नीना निना ति मापी शो
धनं ने प्राण नामनियामायनेनु मर्मा

श्री सुधर्मगह परीक्षा नमसार पधारनार ठे. का जजिने त्रस कास, जिनपूजा ममे सुविशाख नु पण फल पामे नहि, जुर्न साख विचारी सही॥ ३३ यत-आणा खडणकारी जावितकाल हा विजूए ॥ पुए वापरायं । सबपि नरलयं तस्स ॥१॥ नागार्थ-बखी जे जीव जोके त्रण काझे मोटी नूतिषमे वीतरागदेवनु पूजन करे उतां जिनेश्वर- नी'याणाखमन करे ठे थने वखी मान उघदृष्टिये दवाद कद्देवराववामाज थानद माने , तेनु सबै नुष्टान तुपखमनवत् निरर्थक ठे, एटजे जेम फोसरा मिनारने कमोदनो लाज मलतो नथी, म तेने पण नुष्टाननो लाज मलतो नथी 'जप संजम शीसविनाण, तसुफलपामे जो हुवे थाण; पविना पण ते न प्रमाण, याचारगे एह वखाण॥३४ यत-अणाणाए एगे सोवघाणा, ओणाए एगे निरुवठाणा, एयते माहोन एय कुसलस्स दसण इत्यादि. जावा-केटखाएक जिनाज्ञाथी विपरीत प्रवृत्तिमा . PAN

.
श्री सुधर्मगम परीक्षा
य सहोता ॥ आणा जुतो सघों । से सौ !
हिसंघान.॥
माया -एक साधु, तथा एक साध्वी, सया
मायक, एक श्राविका, पण जो जिनेश्वरनी थाणा
सनार दोय तो सघ कद्देयाय सम्पर प्रकारे
दणे से सप, तथा मिथ्यास कचराथी रहित ये
गते वस्तुनी अक्षा, परूपणा,प्रवर्तना, यथोचित
फारक तथा पासक, पद परपक्षने विषे ॥
प्रनारक, सेमजथाचार पिचार,ौदार्य, धर्य, गान।
चातुर्य, दाक्षिण्य, विनय, निकादि गुण जेमा ६
सघ कदेवाय ठे ते गुणहीन होय तो सघन कदा
परतु हाडकानो ढगलो कदेवाय .
मात्र सूरी गछ थाहापाल, श्रापमतिसु सगति टा-
श्राप मते ना जाणी करे, तो पुण नवसायर नति
.
यत-जिणाणाएकुण ताणं । नण
कारण॥सुदरपि सहिए। सब जव[ 14
जावार्थ -जिनेश्वरटेक्नी थाणा प्रमाणे जे
जीव वसे तो निश्चे ते प्राणी निर्माणपद साधी ।
घने जे प्राणी मनोमति थापमतीये वर्ते तेनुसन

श्रो सुधर्मगच परीक्षा न मप्तार वधारनार ठे ज्ञा नजिने त्रस कास, जिनपूजा ममे सुविशात; इनु पण फल पामे नहि, जुर्ड साख विचारी सही। इ यत-आणा खडणकारी जावितिकाल महा विनूश्ए ॥ पूएश् वीयरायं । सबपि निरचयं तस्स ॥१॥ । भावार्थ-सी जे जीव जोके त्रण काले मोटी विजूतिधमे वीतरागदेवनु पूजन करे ने उतां जिनेश्वर- चनी'याणाखमन करे थने वली मात्र उघडष्टिये इवाह कहेवराववामाज थानद माने , तेनु सबै पिनुटान तुपरवमनवत् निरर्थक ठे, एटले जेम फोतरा मनारने कमोदनो लाज मलतो नथी, म तेने पण उनुष्टाननो खान मसतो नथी जप सैजम शीलचिनाण, तसुफलपामे जो हुवे थाण; विना पण ते न प्रमाण, आचारगे एह वखाण ॥३ यत -अणाणाए एगे सोवटाणा, आणाए' घा- एगे निरुवघाणा, एयंते माहोन एय कुसलस्स दसण इत्यादि जावा-केटलाएक जिनाशाथी विपरीत प्रवृतिमा । ३ (१२) श्री सुधर्मगठ परीक्षा उद्यमी वर्ते ठे केटलाएक जिनाजानु फल प्र निरुद्यमीठे ए पन्ने वात, हे मुनि । तार म थाउँ, कुशल (वीरप्रज) नु दर्शन ने माटे जे पुरुप ६ गुरुनी दृष्टिमा वर्ततो होय, गुरु प्रदर्शित मुक्ति स्वी रतो होय, गुरुनु बहुमान करतो होय, गुरुपर धरतो होय, गुरुकुलवास करतो होय, ते पुरुष कर्म जीतीने तत्व जो शके ठे, अने यो महापुरुष मन लगार पण सर्वज्ञोपदेशथी बहार जतु न इत्यादि- थापमतिना सक्षण जाण, सूत्र सरतो न करे कान नवं करे जूनु थोखने, थापमति ते निश्चे दुवे ॥३५॥ न जाणेता नणी, विगत कहु काइ जे मुणी, नति कदापद टास, सुधा जिननी याज्ञा पास जिनेश्वर चपा केली, तेथी रस चौदमे पक्षी, लासिपहेलो निन्दप्रथयो, क्यमाणेरडे , ५ - के सोलम परसे पीजो जोय, तिप्यगुप्त नामे ते होप, ले जी प्रदेशे जीर, ए कीधी स्थापना सकी। पार यरतता यया ए ने, मुगति गया पवे कहीशु पारम परसे पामी मुगत, गौतम गणधरनी र जुगता पीरो पप तोमरगम, यार पडे गया शीवगम, -- , . श्री सुधर्मग परीक्षा (१३) हना चाल्या मुनिनापाट, जिणेदेखाडीसाचि वाट 10 उस वर्षे जघु सिक, बाजपणाजगे शील प्रसिद्ध छाणु वर्षे वीरथी, स्वयनव थयो धर्मसारथी ॥४॥ तिन्धो जिनप्रतिमादेव, शाशन दीपाव्यु सविशेष, मकशिष्यने काजे कर्यु, श्री दशकालिक नयु ॥४२ रथकी एकसो सित्तरे, नज्यादु गुरु गुणे अवतरे, वसग्गहर स्तवन करेव, मारी निवारी तिणखेव ॥४३ श नियुक्ति नी जिणे करी, सूत्र अर्थ युगता सनरी, पंचनदवर्षे वली जोय, त्रीजो निन्दव जगमाहोय ॥ प्यो अव्यक्तवाद विशेष, थासादाचार्य सुर देख, पनर वर्षे स्थुलिनन, शील प्रमाणे लहे बहुजन ॥४५ थकी पूरव जे चार, गया विविन्न तेथी धार, सुर म बसें वासे यवधार, चोथो निन्दव थयो विचार ॥४६ शुन्यवाद तिणे जाण, समुछेदनु सुणी वखाण, स वसे अहावीस थया, महावीरने मुगते गया ॥ ४ म निन्न थयो तेणे समे, वे किरिया तेहने मतिगमे, होर यकी श्रणसे पात्रीश, वर्षे श्रयो काजिकसूरीश ॥ 4g वनयवत शिष्य परिदरी, गयो मज्ज्यनीपुर निसरी, गोदनो जेणे करो विचार, फेरव्योवसतीद्वारा पचारसे प्रेपन प्रमाण, बीजो कालिकसूरीश'जाण, -- ज्ञा या उदी ए क.

-
.
(१४) भी सुधर्मगष्ठ परीक्षा
पेन सरस्वती वासी जिणे, गर्दनिज उद्यो तेणे ॥५
चिट्ठसय सीनेरे विक्रमराव, थयो उज्ज्पनी नयरी
सिझसेनगुरुश्रावककीयो, महाप्रनावकनोजशतीयो
बरस पचसय चलवातीस, निन्दव ठहो जाण
जीव अजीवथने नोजीव,राशीत्रण तेणे कही सदीव
गुरुसमजाव्यो पणनधि वस्यो, थापमते
बरस चोराशीने पापसे, वयरस्वामी सुरलोकें बसें ।'
वीरपकी घरसे पांचसें, चउराशी अधिके वसी हित
निन्हव जाण थयो सातमो, गोष्टामाहीस ते महातम
तेणे थाप्यो ए मत वसी, जीर कर्मयोग जेम .
घपरिमाण थाप्पा पञ्चखाण, जापजीयनु सोपे गण
परसें उसे श्री धीरया, ना थधिक जाणो शकि,
समणा नाम दिगंसरयया,
महसमझ पाया।
जिनकीनु सेवनाम, निणे माग्यो मनिपरिमाण,
नारीने व्या मुगनि, न वदे केरसीने यही जुगा
वीजा पोप चा फेरवा, पय कर्या थारे मति ली,
पदमा समे जे वामति, ते मादिनवि समकिन रनि
समस्त विचारिपाय, थागम परिसास
पत-मध्यिन्ति मम्मन विदणा।।

AL 1 । सुधर्मगठ परीक्षा स, जेम थिरसुवं समंकितवात | एवे, एक प्रकार सउ पुण हुवे। पश्वाण, न्यायरीति पाले ते जाण ॥१२ तीर, सतवाहन समामे धीर ॥ गुणी, बहु देसे थाझा ते तणी ॥३॥ गरी जोइ, यसमिन नाणुमित्र नप होश दीखीन,काषिकसूरियसमजलकिन पति केहनी, राये रीस करी तेदनी । दीप, सूरि विहार तिहाथीकीध ॥७५ जे, राये सनमान्यो तेदखे। नियमे हरख घणेरो धरे ॥३॥ न पाखी म जालने, जगतिनाव थाणिसविचार ||gg पार, वीर तीरथे ठे ए परिहार, iपुण लेता तेणि पुर रही10 प नांकडु, नोतिझालाग 1 दिन पंचमिसणो, । रुधरो| . यामनने में

श्री सुधर्मगई परीक्षा
पंथयो जेणे परिनामापी, मशिदे से बीमे ग
पप जे मुंता साधु अने, कमशाला नामे तातो
से सामानारी भागार, दे नशिबाजीपागार
वीरपही के मारगे, पररा पा पानी लागे.
reोगारे रखा, परे केटपाएकादया।
शारे,
नीति होगा
imarumमाण
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दीगो विमान
पदमा
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- श्रीधर्मग परीक्षा घग्याणुमाचीतास, जेम थिएवं समक्तिवार यकी नस प्राणथे, एक प्रकार सय पुष पुगे। पादनराप पुरपश्वगण, न्यापरीति पाते जाए ॥१२ सारीतपेपर तीर, सतयाग संग्रामे धीर; वो मोटो राजा गुणी, बटु टेमे थाहा सणी ॥३॥ बजेती नगरी जोइ, यसमित्र जागुमित्र नप हो नीमुनमेहनोदीखी,कासिफरिसमंजस७ि४ गीनविथनुमति फेदी, रापे रीस करी रोदनी । चार्यने विसद दीप, सूरि विहार तिदाधीकी ७५ तपुर पश्वाय जेटले, रापे सनमान्यो तेदखे, साजले थादर फरे, हियमे दरम्य घणेरो धरे ॥३॥ वरने नप कारये, थाउम पावी ग जासये, राचे पारणे थादार, नगतिनार थाणि सविचार || जोजो मन पद पिचार, घोर तीरय ए परिहार, "किनधि सेगोसदी, ते पुण सेतो तेणि पुर रही। पण थाव्यु दुगु, तो पमिठ एहयु सोकर मदिनजोगशजाग,नहीपज्मणनीतिहालाग ive 'राा कहे नगरन मुग्यो, नदि पसे दित पंचमिसयो, कोपाठ एक दिन करो, पद यचन अम्दारु घरी 100 रे २ ममान गर्नु ३ श्री माहारमापीना नामन सिं - - ॥ "

(१७)
श्री सुधर्मगछ परीक्षा
विमासता नवि वेसे बंध, चोथतणी तो रासी सप,
प्रमाण की राय श्रादेश, कालिकसूरि चिननिवेश
यतः-आसाढे पुणिमाएच्यिा डगलादि
गेएहति, पद्योसवणकप्पच कहेंनि, ५पनि
ततो सावण बहुल पंचमीए पद्योसति, ४.
जाये कारणेण पणगेसु वुढे दसमीए पद्योस।
पर पाएरसीए, एवपणगढी तार काति-
सनीमति मासोपुणो सोय सवीसति मासो
यपसुद पचमीत पद्योसबैति.अह यासाठ
दममी यासापिते पयिता, अहना जत्य
माढमाम कप्पोकन, त यासप्पानग्ग
घ्यणाचगानि, ताहे तोप पद्योसतिया
गाढ प्राण परपादनं नाहे तर योग
पापी छाटोठ गयादित गाए
पदोमगार संनि, नाहे प्रामाद ,
मात्र पद्यामपति, पण मग्गो गेसकाल
मंगा, अयाना अमानवि मीमनि-
लोग प्रतिमन -ति.मी-

. श्री सुधर्मगठ परीक्षा (१५) राते मासे पुणे जति वासखेत-प्प-सन्नति, तो-रोक हेनावि-पडो-सवेयक, तं-पुसिमाए पचमीए एवमादि पव्वेसु पङोसवेयवं, पो-अप धेसु. सीसोपुवत्ति, श्याणिं कह चच्चाए अपचे पद्योतविद्यति' आयरिजनणति, कारणिया चही अद्यकालगयारिएण पवत्तिया. कह नयतेकारण कालगायरित विहरतो नये- णिगतो, तहवासाबासतरविन, तन्त्र गरीए बलमित्तोराया, तस्सकणियोनाया, नाणु मित्तो जुवराया, तेसि नगिणी नाणुसिरीणाम, तस्स- पुत्तो वललाणुणाम, सोयपगतिनविणीय- याए साहपशुवासति आयरोहिं से धम्मोकहि- तो, पडिबुझो, पवावितोय. तेहिय यसमित्तना हि ‘णुमित्तेहिं कालगयो पझोसविते णिधिसतो कतो केति आयरिया नणति, जहा-बनमित्त जाणुमित्ता कालग आरियाण नागेणिद्यान- वति, मानलेत्तिकान महत आयरं करेंति अप्न 'हाणादिय, त च पुरोहियस्सअप्पत्तिय, जणति -

णं वागरणो कतो, ताहे से पुरोहितो आरि
संपत रायाणं अणुलोमेहिं विप्परिणाम
(२०) श्री सुधर्मगष्ठ परीक्षा
ये एस सुह पासँडो वेत्तावि तोहिं रणो
पुणोपणो नलावेतो आयरिएण णिप्पट प्यान
एतेरिसतो महाणुनावा, एते जेणपहेण na
तेण पहेण जति रणागति एताणिवा अकम
तोसिवनवति, ते ताहेणिग्गता एवमादित
कारणाण पतमेण पिग्गता विहरता'
'हाण णगर तेणपन्तिा. पतिघाण ....।
स्सय अद्यकालगहिंसदिछ,जावाहं था।
तान तुप्लेहि पणो पद्योसवियद्य, तप स441
राया, सोपकालगद्य एत सोन णिग्गतोय
मुहो, समण संघोप महपापिजूतीए पान
कालगद्योपरिहि यनपिाय नवय सु
मी० पद्योमपिद्यति. सम सघेण पडियन,
.
रणानणिपं, तदिवस ममलोगाणुपत्तीत
याजाण्यायोदेहिति, माहचेतित -पर्क
संस्म तो नए पद्योगमा कडाना

- श्री सुधर्मगह परीक्षा हिंजणिपण वति अतिक्कामे, ताहे रणा ििणय, तो अणागय चनहीए पड़ोसविलति, मायरिएण नाणिय, एवंनवन, ताहे चनचाए जोसविय एव. (इति निशीयों) लावार्थ -थापाममासनी पुनमना दिवसे वर्षा- खसुधि वापरवायोग्य चीजो (उपकरण) तथा मगल, खविगेरे ग्रहण करी चोमासीपुनमें चोमासीपमिक- णु कर्यावाद, चौमासीखायक या क्षेत्र के केमा ते चारमा कोश्ये पुन्यु, तो ते साधु कहे के श्रावण वद चम पति वने ते सक, तेम करतां जणायु के क्षेत्रमा ग्यता नथी, एम विचारी पार पांच दिवसानी वृद्धि सुधि करे के यावत् एकमास थने वीस दिवस पटखे जवा शुदि पचमीये पर्युपणा करे शिष्यशका (प्रश्न) कहे ठेके वीसदिवसे करप तथा पाच पाच दिव- नी शिव कल्पस्थापनरीति सघनी आज्ञावमे वि. द पामी ते केम ? उत्तर --चूर्णिमातो विछेदनी वातन खाती नथी, विछेद एटसे फरी तेनी उत्पत्ति सनवे हिते,थने अद्यापिक्षेत्रादिकनीयोग्यता तथाविधन वापी तेमवनवासनवने, ने चर्णिकार पण एज विधि

--
-
(२२) श्री सुधर्मगठ परीक्षा
सखी उता विष्ठेद चै पम कडेवे, रूपे दे, ते
समीक्षकोये विचार करयोजोश्ये,जे को श्रा
तिधोगालीन नाम दे पण तेने लगती हकिकत
नथी, माटे मध्यस्थ (तटस्थ) पुरुषोये यथार्थ
विचारी सत्य स्वीकारबुं. माटे श्रापाढपुनमे रहा
मूख मार्ग , तथाविध योग्य क्षेत्रन मले तो
अपवादमां पण विहार करताकरता
हित महिनो (५० मो दिवस) उहंघाय नहि।
दोष न मले तोपण ठेवट माया शुद पाचमे तो
इस वृक्षदेचे पण पर्युषण करयु शिष्य प्रश्न का
रदेर्यु ? १० पूर्णातिप्रिये पूर्णातिथि पाचम तेमा
प्रमापरे ? उ० जुयो। निशीपसून मूलमा,
पांचममाज बराप 'पोसुपचोसयेयध पो
मु" पटो पर्वगाम पजुमण कराप.
4
N
.
'चाय' थप तेमा पशुसण राय नदि
यो दोष ? थाdग गिरे दोष प्रापानंग
प्रयशिन "पठगुरु पलिस " स्यारे शिष्य पूरे
अनुप्रायधिन सेतु जाये तोशामाटे तेवरयं
अने हमाचल में शोध करायठे थने धार
पानी पाना दिवमंशपाय.पा दिवस की
-

-
-
भी सुधभगड परीक्षा (२३)
ज सिकातमा कद्देल ले ते मुकी अपर्व चोथ
वाथी आणाविराधक चारगुरुप्रापधिन तो चोथ
पज केम? गुरु कहे के ना तहारी वात खरी
पण कारणथी सपमाय-बीजो उपाय न जडे तो
! कारणे करवु पडे तेवु शु कारण अने ते कारण
प्रसंगे वन्यु ते कद्दो गुरु कहे वे कारणिया (पटखे
कारणिक)जो होयतो कराप जेम थार्यकातिकमहा-
ने करी तेम ते था प्रमाणे. कालकथार्थमहाराज
हार करता उजोणीनगरी पचास्मा, त्या वर्षाकासमाटे
(चोमासामाटे रखा) ते नगरीने विपे बलमित्र
तेनो कनिष्ट जाता (नानोनाइ) युवराजपदनो
'भार जानुमित्र हतो, तेनी पहेन जानुश्री नामे इती,
Mनो पुत्र बलनानुनामे दतो ते घसजानु स्वनावधी
पथने विनयवान होवाथी साधुनी सेवा पर्युपासना
मो, ते जीव योग्य जाणी श्रादरपूर्वक ते प्रत्ये धर्म
थिने प्रतिबोध पामवाथी दीक्षा ग्रहण करावी ते
य पक्षमित्रराजाने रीस चापानी जे कालकाचारज
पासामाटे रहेला तेहने देशबहार (देशनिकालो)
एदवा कोपण सरस कारणथी ते घसमित्ररा-
पा राज्यमा चौमामी करी शक्या नहि ने त्याची

4
(२४) श्रीसुधर्मगड परीक्षा
विदार करी पठाणनगर पाल्या. ते पश्वाणनगर
पोताना सपामाना जे साधु इता तेने पण सदेशी कने
पराम्पो जे हुथावुरयासुधी तमे रहेवामाटे ना
करशोनदि सदेशानु कारण एज के एकेक राजाना सस
घधी (वली तीसरु पेदाथवाना संजपथी) दरकनसो
घीजा स्थानांतर जइशकाय ते नगरनो राजा जेस
वाहन तेणे सारु मान याप्यु, ने ते पश्चगणनगरनार
धुये पण थावकारसाये नगरमा प्रवेश कराव्यो, घर
ज समय काटकथायें कडं के नाजवा शुद पा
श्रीपर्व , ने ते वात पश्वगणनगरना साधुये कवूड
ते प्रसंगे राजाये का के ते दिवस तो माहरे
थपानो तेथी साधुचेत्यनु थाराधन करी शकाशे
माटे उन्नो दिवस राखो प्राचार्य कर्यु के पाचमन
पर्ध उलघाय नहीं क्यारे राजाये कद्यु, चोथ करो
कारखधी राजाना धामहवडे चोथ करी परतु
.
।
,
माटे करी नयी एम स्पष्टरीते चूर्तिकार कही
थने जे को सखे 2 के चोय भार्य
थाहायी करिये लिये, तो कासकसूरिये नगरमा
करतान फेम कधु के जावाशुद पाचमनां पजुत्तण
साधुषे पण तेवातमान्य मकरी. भागायतमा चूर्षि
पर

श्री सुधर्मगच परीक्षा . स्पष्टीते सखे ठे के, चोथनी वायतनो धादेश राजाएं कराव्यो , पण कासकाचार्यमहाराजनो आदेश तो पूर्णिकारे पाचमनोज सख्यो रे चूर्णिकारे कार्तिकपुन- मनी चोमासी कर्यायाद एकमना दिनसे विहार करवा. थाज्ञा आपेली या उपरथी सार समजवानों के शिकार पोते चोथने अपर्व कहे , ने अपर्वमा पजु- तण कराय नहि, थने करे तो प्रायश्चित कयु ने माटे गांज श्रीपर्व कराय एम खुजी रीते निशीथसूत्र १, तीवचूर्णि , कटपनियुक्ति तथा समवापाग टीका कटपचूणि ४, दशाश्रुतस्कंध ५, तथा तेनी चूणि ६, या पचासक हरिनासूरिष्कृत तेनी टीका ७ विगेरे- पर्वना दिवसे पजुसण पाचमनाज कहा ठे, वक्षी जीथ कस्यापठी पाचम न थाय, एन जे कहे ते ते खोटु कारण के जो फरी न कराती होय तो पचागीवा- मना केम करी नदि थने जे एक दिवस वधे वी कुयुक्ति करो वमन (ब्रम)मा नाखेडे, ते पुरुपेथदर बागाना बताडमा जोइए हवेथी चोथज करवी बने चिन नज करवी, एवा श्रदर कोइ स्थझे जनक "प्रने टीकार्ड पण सर्वमान्य होय तेज सत्य जाण सुत्त-जेलिस्कु पोमवणार ण पजोमये

(२६) श्री सुधर्मगष्ठ परीक्षा.
इत्यादि ॥ जेनिक अपङोसवणाए पङोसनेनि
इत्यादि।। दोसुत्ताजगव वच्चति । इमो सुतथ्योष
जोसवणा गाहा जेलिस्कुपडोसवणाकाले पर
गण पङोसवेना अपङोसवणएत्ति
वा जो पड़ोसवेति। तस्मआणादियादोसा
गुरु पचित्तं, एससमठो ॥ इति निशीथचुणों
श्रा सूत्रनो सारासए ठेके अपर्वमा पजुसण न
श्थने जो करे तो प्रायश्चित्त, श्रने पर्वमा न करे तो
चित, माटे मागस न थाय, तेम पाटल न थाय, पर
सपना दिवसे पजुसण थाय, एटले जाडवा शुद ।
मना दिवसेज पजुसण करवा न करे तो चार गुरु
श्चित था आज्ञा तीर्थकरदेवे तेमज थाचार्यजगा
पण थापेली
प्रभ १-पजुसणना दिवसोमा ज्यारे सजासमक्ष
थार्यकाक्षिकसरिमहाराजे पोतानाज मुमथी
परपसूत्र वाचा सनळाव्युदतुत्यारे तेत्री कटर
सत्रमा पेटमा व्यारयान (साण) -
तात्री ने कम
थना तो ते व्यायाननी मर्यादा चूर्णिकारे
हता
ब

श्री सुधर्मगष्ठ परीक्षा (२७)
उत्तर १-था वारत सबंधी चूर्णिकारे श्री कालिकाचा.
र्यजीने उद्देशाने कशीपण हकीकत दर्शावी नथी.
न श्-थार्यकालिकसूरिमहाराज एकज थया वे के
जुदा जुदा थया ?
उत्तर २-ए नामवाळा श्राचार्य एकज नथी थया, परतु
जुदा जुदा थया ठे, ते एके-एक कालिकाचार्य
दत्तपुरोहितना मामा तरीके थोळखमा श्रावे
एम योगशास्त्रनो वीजो प्रकाश साविती थापे वे,
थने ते कालिकाचार्यना जाणेज दत्तपुरोहिते तेज
थाचार्यने पूछयु के-'महाराजजी! यइनु शु
फस मले ठे?' थाना उत्तरमा गुरुए कयु के-
'यझना फसमा नरक मले ' इत्यादि इत्यादि.
वली पूर्वश्रुतसमृद्ध भार्यकालिकाचार्य के जे
थार्यश्यामाचार्यना नामथी पण ओलसमा श्रावे
ठे अने तेमणेज श्री पन्नपणा उरेख ठे एम श्री
पनवणानो टीकाज साविती श्रापी रहेस ठे।
वसी भार्यकाजिकाचार्य सूक्ष्म निगोद सवधी
व्यारया प्रकाशक तरीके श्रोससमा थारे ठे
एम श्री नियुक्किनो टीका तेमनो कथासहित
साक्षी थापे ।

(२०) श्री सुधर्मगष्ठ परीक्षा
वक्षी कालिकाचार्यजी गर्दनीलराजाना.
दक तरीके थोखरामा श्रावे , एम श्री निर्श
चूर्षि यतानी रहेन ।
पक्षी यश्चत कालिकाचार्य घणा
परिवारवासा बता पोताना शिष्यो अविनीत
वाने बीधे एक शय्यातरने जणावी पोते एकमा
विहार करी घीजे स्थले पधार्या, ए ताल
पोखख थापे ते श्रने एनी साविती श्री न
ध्ययन यत्ति थापी रद्देल ।
वली श्री कालिकाचार्य राजाना
सीधे सकारणीक चोथ करनार तरीके
ठे श्रने ए विषेनी साविती श्री निशीथर्षि
विद्यमान
प्रभ ३-केटलाक महाशयो जाहेर करे के
सोधी स्कदिसाचार्यजीए शरु करी भने
देवगिविक्षामाश्रमणजीए तेशचनाने पुर
रुख करेल , एम श्रात्मप्रबोध प्रथमा ठे?
उत्तर ३-हा, ते यात तेमा ।
प्रम-केटसाफ कहे के-चोथना पजुसण
सनासमक्ष श्री कल्पसून वाची शके एवीज
.

भी सुधर्मगध परीक्षा (ए) यादा से जो चोथन करेतोश्रीकल्पसूत्र सजानी अदर न वचाय ए पायतनो खुलासो केवी री. तिनो ? र ४ दे समीक्षक! तमारा कहेवा प्रमाणे श्रीकदर- सूधनी व्यारयानी अदर भने अतरवाच- नानी श्रदर 'एगग्ग चित्ताजिणासासणमि, पजावणा पूय परायणाजे॥तिसत्तवार नि- सुणति कप्प, लवएणव गोयम तेतरति॥॥ पटले के श्री वीरप्रजुजी गौतमस्वामीप्रत्ये फर. मारे ते के-'दे गौतम जे प्राणी,था कल्पसूत्रने पूजी श्रने प्रजावनायुक्त एकाग्रचित्तनी सावधानी सहित था जिनशासनने विपे विधिपूर्वक श्री गुरुमहाराजनी पासे एफवीश वस्त्रत सानले ने तो ते प्राणी अवश्य था ससारसमुक तरीने मोक्षाने पामे' पम श्रीजिनेश्वरे प्रथम गणधरदेवने का प फथन तथा कल्पसूचनी पूर्णाहुती समयनो श्रासावो (के जे अर्थसहित श्रागस कदेवामा धारशे ते) तहन सडित यर जाय माटे लक्ष- पूर्षक ए शकानु समाधान श्रवण कर.-उयारेश्री कापसून (श्री वीरप्रनु पी ए वर्षे) पुस्त- .

श्री सुधर्मगड परीक्षा.
कारूद कयों, ते पीथी एवो ठराव कया ।
कयों वे के चोय करे तेज कल्पसून बांची
थने ते शिवाय बांचे तो विराधक थाय. ते
विचारवानु . मतलय के उपर बतावेस
घीजाने संजलाववानी साविती स्पष्टपणे
रहेस वे के श्री कल्पसूत्र एकवीसार ।
कल्याण थाय (एम श्री जिनेश्वरेज प्र
धरप्रत्ये फरमावेलु ठे.)
भन्न ५-ज्यारे श्री जश्यानुस्वामीएज श्री ।
रच्युठे त्यारे ते पहेला पजुमणपनी थदर
रूपसूत्र रचाये न होवाथी)शु पापा
वतु इतु?
उत्तर ५-देवाधिदेर श्रीमहावीरधामीजीत श्री
परोना चरित्र तेमज श्री वीरप्रजुना
जय जे पोतानुज चरित्र जे प्रकाश कयु के
श्री गौतमादि गणधरोपरचेस थनेता
परपरागमना थाधारे श्रुतफेवजी श्री
स्वामीजीए कम्पमूचनी रचना परेन डे,
गौतमस्वामीने डरेशोनेज ते करूपसूत्रनु ।
रम्प भीमुपे वार्यव्यु रे पवाक्यनी ।
.

श्री सुधर्मगले परीक्षा सावितीमा खुद श्री कल्पसूत्रना अतिम थाला- वामाज पुरावो ठेके-तण कालेणं तेषां स- मरण समणेजगवं महावीरे रायगिहे नगरे गुण सिखएचेइए बहूण समणाणं बणं समणोण बहूण सावयाण बहूण साबियाण वहूण देवाण वहूण देवीण मग्गए चेव एवमाश्स्कइ एवं जासइ एव पन्नवेश एवं परुवेइ पङोसवणाकप्पो नाम अज्जपणं सम सहेन्य सकारण ससुत्तं सत्य सग्नय सवागरण लुकोजुको नवदसेत्ति- वेमि.' एटले के श्री जवाहुस्वामी पोताना शिष्यमडळने कहे के-में जे था कल्पसूत्रनी श्रदर त्रण अधिकार अर्थात् श्री जिनोना चरित्र २ थिचिरावली अने २ साधुसमाचारीरूपमा चना प्ररुपेल ठे, ते में मारी मनकल्पनाधी कहेल नधी, परतु श्री तीर्थंकरदेवना उपदेशथी में श्र. धिकार कडेलवे मतता के-ते काल चोथाया. राना थतने विपे, राजगृहानगरीना गुणशील पेस्यने रिपे वीरप्रनु समोमर्या ते समवे पणा ।

.
(३२) श्री सुधर्मगध परीक्षा.
मुनित, धणी साजिल, घणा श्रावको, ।
श्राधिका, घणा देवो थने घणी देवी, .
चतुर्विधसपनी सजा पञ्चे जेवी रीते था
अधिकारवालु पर्युपणाकल्प श्रीमुखथी
प्यु, तेत्रीज रीते हु (जस्यानुस्वामी)
शिष्यवर्ग थने चतुर्विधसघ श्रगामी का
तात्पर्य एज के श्री वीरप्रजुए का
कोइ एकति खूणानोधाश्रय सस्था
याची के कही नथी, परंतु चतुर्विधसंघ
दृष्टियंसनी सनामा विराजमान थश्वय
पडे प्रण थधिकार गोतमादिगणघरदेव,
प्ररूपेस वे तथा जेम ते गोतम तथा सुषमा
मीप जेवारीत ए प्रणे वाचनाचने श्रमसमा
तेयाज रीत दु (नयाहुस्वामी) पश।
বা কম ন অয হাফিং নমুনাথিক,
पिनाज कटु तु ते प्रण अधिकारमा ।
।
.
।
पहरनाम श्रध्ययन सथाह' कहेता
परतु निरर्थक नहीं 'सदेउप-कदेता हेतु
है, पटमे के जेम गुरुराजने अधरा 45
'
भाराका
.

-- श्री सुधर्मगड परीक्षा. (३३) नथा जेनी निभाये रखा होय तेवश्रीने व्या विना के तेश्रीना आदेश (दुकम-श्राझा) विना कश्पण काम करवु कटरे नहीं केमके श्राचार्य महाराज ते सयधी तपास करनार अथवा तेमनु हित चाहनार होवाथी जेम थापणु कल्याण थाय तेम करवाने समर्थ ठे, माटेज तेजश्रीने पूजी, तेउश्रीनीयाझा मेळवी दरेक क्रिया कार्य करवाधीज खान ने जो तेम करवामा श्रावे तो ते कार्य करनार दशविधिसावु चक्रास समान चारीनो पण भाराधक थाय 'सकारण- कदेता साधुने सुखे सयमयात्रानी धाराधना तथा समाधिना लायक तथाविध योग्य क्षेत्र न मले तो अपवादे थापाढी पुनम वीत्यानाद पण घीजाक्षेत्रनेमाटे तपास करतापाचपाच दिवसनी वृद्धि कहे यारत् पर्व दिवस जाप्रवाशुटी पाचमें वस्तीन मले तो काम नोवेरदेवु, पण एक डगा श्रागल नखुनहीं ए विगेरे घणा कारण बताव्या ठे, तेनु नाम सकारण, पुन 'ससुत्त सश्रत्य सन, जय'-कहेता सूत्रसहित, अर्थसहित, उनय सहित, 'सवागरण --कहेता पूजा यथा थप पूवेला पदार्थनी व्यापा तेणे करो सहित, .

भी परीक्षा
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से पीतीने पण
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श्री सुधर्मगष्ठ परीक्षा येष्वित्यर्थः ॥ एक्जूतेषु धर्मदिवसेपु सदतिश. पन प्रतिपॉप- पोपधोक्तानियह विशेपस्तं, तिपूर्णमाहारशरीरसस्कारब्रह्मचर्याव्यापाररूपं पधमनुपालयन्सपूर्ण श्रावकधर्ममनुचरति. । नावार्थ -चउदश, आवम, पुनम एटले चौमासा. त्रण पुनम (थापाढीपुनम, कार्तिकपुनम, फाल्गुण पुनम)एपविगेरे पुण्यतिथीयोने विपे,(इस्यादिक धर्मना दिवसोने पिप) थतिशय मनोहर थने सपूर्ण खोजे पोपधनत थनिग्रह विशेष, तेने सपूर्णरीते पट- थाहारनो त्याग, अने शरीरसस्कारनो त्याग, ब्रह्म- र्यपालन, व्यापारत्यागरूप पोपधवनने पालन करता संपूर्ण पातकधर्मने आचरण करे एवो राते चोमाप्ती कारण पुनमनी सूरहताग जगवती, उत्तराध्ययन थादि नोना पृत्तिमा क्तावेली के तेने मुको अने चोदशने दरवसे चोमासी करवानु कयु ए रीते त्रण पर्वतियो तोमासीनी फेरी इरस नवसें चोराणु दुप, फापकसूरी कालगत दुप, मनलागे चालचलावा राप, जेण ऋपिपवमी नबोलोपाया कदम फेरव्या पर्व शातता, श्रनही दोसे झोपता, संयम पुनिम थारन करे, तो किन ते बिन थानापन्य

--
-
.
(३०) श्री सुधर्मग परीक्षा
सहस बरसे पाम्पा विवेद, सत्यमित्रयो पहज गंद
सहस थहोतेर परसें जाण, वीर पछी पोपासमडाण,
वीरपकी वरसे चन्दसे, चसम अधिक जाणो रसा
घड हे वडगध थापिया, चराती श्राचारज किया,
ते चरासी गछ जाणवा, वडगछाना मन धावा.
तेहनी सामाचारी एक, तेढ महिना जेट थनेक,
वमपीपससीकातीजोष, योकाजा
हारेजा जीराउ नाम, एरमादि चउरासी ग्राम,
एक उपाध्याय अक्षगो हतो, कासें गुरुपासे पूहतो।।
तेहे पण आचारज कीयो, पीसीमो
तेथी केटसे का जोय, राजसनामा चर्चा होय
कस पात्र गाथी नीकली, खरतर नाम उल्यो ।।
बिहुनरथधिकारससयसोल, की!
घोन एकसान चोगीस, फेरे जिन
यमा अनेरा गम उत्तरास,
धर्मघोप नाणा पसिनाल, ये...।
वित्रावास
एहनी
गच यापोयो,
.
འ་
घरस
" पुनम

" श्री सुधर्मगठ परीक्षा रासीअधिके सोलसे, वरसे अचसगहमति वसें॥१ घोसना तर कर्या, ते पण घणे जणे श्रादर्या, हरण थने मुदपत्ति, श्रावकने नवि थापे यति॥११३।। कने पडिकलण न कहे, उ आवश्यक रवि साहे, बीयाउमगणत्रीकरे, इम अतरयतिघणधाचरे ॥२१५ ___यत -बारह चनदोत्तरये । अचलिया तहय आगमा जणिया ॥ इत्यादि. जावार्थ -विक्रम सवत ११५ वर्षे अचलगढ तथा नागमिगष्ठ धयो, इत्यादि स सत्तरसें वीले वाम, आगमगह धराव्यो नाम, प.धु गणत्रीए पर्व, पडिक्कम अतर ते सर्व ॥११५॥ सहमाहि अतर घणो, अधिकमासे पासण तणो, गविधिनादि फेर घणा, मन विमास जुन तहतणा॥१६ की अवधारो मने, वरस सत्तरसें पचावने, वासथकी नीकल्या, तपागछ नामे सालस्या॥११॥ यत.-यारस पचासीए । वडिय निय निय रूण मजाय॥ विजापुर नपरमिय। तवा मय वजदान॥१॥ जावार्थ - विक्रम संवत् यारसें पचासीमा (१२५) - " श्रायकने पण नदींचररसो, श्यादिक अतर सान परपरानु खेद नाम, लोकतणु मन थाणे गम।।११ परपरा तो तेज सरी, जे जिनपर गणधर थादरी यत-जा जिणवरेहि नणिया। गोयममा तसु समाचारी नपि करे, सूनपथ पण दासो धरे, परपरा मुप यापे धणी, न नाणीये ते किपदी तषी' सूत्रथर्थने कूमो देयी, जो कोई पूरे सविशेग्मी, लोक न जाणे ने परे इसी, परपरा दारये कीसी, पण जे थापे थापापणी, तेदने माथे कोइ न धणी, तेतो डाह्या माने केम, सूत्र पिचारी जुन एम ॥ ११ (10) श्री सुधर्मगा परीना पोनपोताना गुरुनी मर्यादा वामी, पटाने नेम ना जे पायो तेनो मर्यादा सोनीपत थसग यर विजापुर नगरने निप यकीन प्रगट पयो নি' বা বিজ্ঞান, নর মাদ্রাথ ? हिं धोरपुरिसेंहि ॥ सा-सच्चञ्चिय मेरा । पा सबा पयत्तेण ॥१॥ भावार्थ -जे मर्यादा जिनेश्वरोप कही अने ' चित्रारानगन रिणे २ विशेषे कराने श्री सुधर्मगच परीक्षा (१) दिक धीरपुरुपो (गणधरो) ए जाखी, तेज मर्यादा ची मानवी अने तेज मर्यादा प्रयत्ने करी यादर, वायोग्य (उपादेय), थने तेधीज स्व परर्नु क, माण थायले त पंदर पचाशीए, क्रियातणी मति आणी हिये; पीसर किरीयावत, वैरागी देखीता सत ॥१३॥ मत साचो कहे आपणो, धीजाने उथापे घणो, पाट देखा जणी, परपरा थापे श्रापणी ॥ १२ ॥ हे साधुपणानी विगत, पाट नामनी थापे युगत; ने जाण हुवे ते जोय, साधुपणाविणु पाट नहोया२५ मोपी पापी सदु कहे, तो का हामी अलगा रहे, तु माथा शिरु पोपाल, ते मंडी को पड्या जजाला१२३ कहे ते याचारे हीण, तो पाट नाम का थापोलीण, गुरु तो निंदो काइ तास, सेवो तेदनो गुरुकृपासा१२७ तणा विण दाखे पाट, तेज म जाणो सूधी वाट, ते सुधा गुरु जाणीया, तो लोपी को अलंगा थया।१२० लोपता पातिक बहु, श्म मुख लोक कहे ते सहु, तो प्रत्यनीकपणुयाय, तो केम जिनमनाराधायाए | समाचारिजे रहे, तेने निगुरा निगुरा कहे, पर सानको विचार, मनमाणो थामसो लगार ॥११९ .

(२) भी सधर्मग परीक्षा ने माने जिनवरना यण, रोदना पिपरे निर्भय सनीपरे ते सगुरामदि, जगगुरुनी जिणे पा गत -प्रागमं प्रायरं तेणं । अतो कगिणा ॥ नित्रनामो गुरुधम्मो । सो मनिया ॥१॥ 41 HTTA-art तिरागोर १mir शादी alim Tण तीirrjanा '' 48. In • Rimithani Him Trung 1.15 MAR, MERA ६. Itी, नशामा " * film, नाना + It, नया - ART +11 111msafar * * * . ड भी सुधर्मगह परीक्षा (४३) कथा करंडा वार, रायर शेउर गणिकार चर्मकार, समा श्राचारज कहा, सुगुरुतणे वचने सदया॥१३३ पत-चत्तारि करंडगा पन्नत्ता तजहा. राय रडगे', गाहानश्करडगे, वेसाकरडगे,सोवाग रडगे. एव मेव चत्तारि आयरिया पन्नता |जहा. राय करडग समाणे', गाहावश्करडग माणे, वेसा करडग समाणे', मोवाग करडग माणे॥ भावार्थ -हे जगवन् करमीया केटली जातना? गोतम । चार प्रकारना ते था प्रमाणे -प्रथम कर- यो राजानो-ते पाहारश्री रसियामणोधने थदर पण गोज उत्तम हीरा, माणक, पन्ना तथासोनाना थाजु- एची रसियामग्यो दोपत्रे वीजो करडीयो शेशीयानो- हारथी देवावमा ठिक ठिक, पण थदर सारा पदा- घिी सपूर्ण गरेपो होय ते तीजो करडीयो वेश्यानो- मा थानूपण यहारयो जपकाध घने श्रदरथी पोस, महोम न्यासी चाटयी सोकोने फदमाज पाहा रु होय ते अने चोयो करडीयो घडासनो-ते पहा- घी पण चाममानो थने थदर दाडका

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- श्री सुधर्मगठ परीक्षा (४५) हनो नाशथने सम्पम्वनो वास थाय ठे, बहुना. था महानिशीथसूत्रमा उपधानविधिनी हकीकत ते या कया सूत्रनी ठे, ते वीना सविस्तर त्या श्रापेली रे. । उपधान विधि करेठे तेमा करेमिनते तथा वादणा था वदितासूत्र तथा पक्षखार्णसूत्रना उपधान मूकी क नवकार १, शरियावही २, लोगस्स ३, शकस्तत्र नमोत्थुण), पुरखरवरदी ५, सिद्धाण चुहाण ६, प्राटलामा आवश्यकना उपधान थाय ठे, एम कोई ने ठे, परतु तेम मनाय नहि, कारण के तेमा सामा- क, (करेमिलते) वादणा, वदिनु, पञ्चखाण, आ चार प्रावश्यकना उपधानतप वह्याविना संपूर्ण श्रावश्यकना उपधान मनाय नहि भने मात्र चैत्यवदनविधिना पधान कहो तो मात्र 'चैत्यवदननी विधिना उप- न गणाय, पण थावश्यकना गणाय नहि विगेरे गेरे हकीकत योग्यगुरु गीतार्थ पासे समजवाथी प्रनिनवझान सान प्रगट थाय ठे चिटुंनो जाली सुविचार, कद्देवानो कीधो परिहार, करडा नवि उडाय, थशुधना झिम पाट कहाय॥१३० । कहे ते जाएया मरपति, क्रियादीप ने असयती, न कहे सूधा धर्म वाट, तो तेना का लाखोपाट||१३ए कहे सामाचारी,एक, तेथे देखाड्या पाट विवेक,

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। श्री सुधर्मगध परीक्षा (४५) हुगधना जसु परिचय हशे, ते सांजळी अतरजाण।१५० होमाहे ममे वाद, एक एकनो उतारे नाद, क एकने खोटा उच्चरे, परदरशणी सखायत करे॥१५॥ हु सामाचारी घणी, तो का थापे थाप थापणी; प जोजो होमी मन राग, वीतरागनो एकज मागार५५ = यत -मूढाण एस विश् । चुक्कति जिणुत्त- चपण मग्गा हारति बोहिलानं। आय- हियं नेव जाणति ॥१॥ . नावार्थ:-मूढ पटले मूर्ख माणसनी एवीज टेव । के, जिनेश्वरे कदेव जे बागममार्ग तेथी चूकी वायचे थने घोधिवीजने हारे ते श्रारमहितने तो नाणताज नथी, केमके तेयोनी एवी स्थिति होय , नाटे मूढत्तिने त्याग करी जिनेश्वरनी श्राणाने श्रारा धवी के जेथी कल्याण धाय । यत.-जकिचि आधाण जिणद आणाए वह फल हो । जह बडतरुव बीय। पित्यार लह वुढते ॥१॥ जागर्थ:-जे कोइ अनुष्ठान (क्रिया) (जनेश्वरनी आशापूर्वक थाय, तो ते क्रिया धतु फळ थापनारी ---

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श्री सुधर्मगठ परीक्षा (एँ) : बहुमान करवाराला, एवा पुरुपरत्नोनो संग जेथी भाराधकपणो धाय परतु पुन्यना उदय ते जोगमखे. यत-चन्नाण विहियोगो।विहिपस्कारागा पा धन्ना ॥ विहि वहुमाया धन्ना । विहि परक दूसगा धन्ना ॥१॥ नावार्थ -जाग्यवान् पुरुपोने विधिमार्ग,थने निधि चालनारा पुरुष तेनो योग मळे ठे, वीजाने ते योग यो घणो दुर्सन , थने मळे तो विधिमार्ग तेने न करनार पुरुपो लाग्यवान् , केमके सेवन करवानी थिवी ते पण दुर्खन ठे थने ते जाग्यवान्ने चाव ठे, । विधिमार्गने वहुमान थापनारायो थने ते मार्ग- दुपण नहि लगाडनाराथो पण नाग्यवान् गणाय केमके केटलाएक पुरुषोघे अक्षर जणीथात्मज्ञानी. मोल करी पोताने ते मार्गे चालवु क्ड चरियाता { सागे, तेथी खोटी चमपामा जुलाइ जर जे पोता. श्रात्मा ने वीजा नमक स्वनाववाला नव्यजी. सरल मार्गश्री नष्ट करी नासनारा जगत्मा घणा ठे अथवा जगामिनदी जीवो थने पियान दि पण तेवीज रीते स्वपरने यासरी देठे जे मास , P

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श्रो सुधर्मगष्ठ परीक्षा (५३)
पुये मतपतिपणु करी मुकामनी ममता
"गगी थइ चीजाने योध करे के थमार
“पोते नित्य कजीया करे, थहंकार मम.
जव होय, अने गुरुकुखवासपी नष्ट पर
"धी कपायर्नु शरणु खे ठे, माटे सविज्ञ पुरु-
मेधावी१, श्रुतमेधावीर, मर्यादामेधावीर
* पोतानु कल्याण थाय पक्षी था स्य:
गनु के श्रढार. पापस्थाननो त्याग करी
जोयाविना, सानल्याविना करवी ते थच्या
उडो कसक) थापवा जेटा याय ठे, थने
हि पण ते माणसने वगर इथियारे सुन
सु पाप बहोरी सेवा जेवु यार ठे, माटे तेथी
थने थाचारसमाधि', श्रुनसमाधिर, तप
नियसमाधिनुध, थक्य ज्ञान मेखबवानी
वसी पक्रिया, गरसक्रिया तेनाथी दर
निगीथसूत्रना तप करवा, योग वदेवा,
बुषिद्दत पासे तेनो थर्य जो जा.
तो सत्यानसूर्य तमारा हृदया.
घर घशे, माटे
धिना करी नणयानी,
.
.
.

पनांगी मानता पणनगी, पायापणानेयतेमान
थाप, गीजाना देरामोन माप, मायापणार
राजा तथा पूलीपर्षसमान जाणा.पण "परकी तो
नहीं सूजे थाग मूरगा, रसु कहत तेरे सीरपे वजन
दे" ए न्याय पाद तो करो! सकस पांगीथमे माने
ये तीये!"शुगराम राम" माफक योसी मोर
यदेकानी नरमाया, वली साधु सपिझपद धान
उता क्षेत्र, पुर, पाटण तया देश तथा उपाश्रय, धर्मस
विगेरेमा ममता पोते करे थने श्रारक पासे करा
थापणी जग्यामां कोर त्यागी मदत पुरुष होय तार
वासो पसनादेशो नहीं, परतु साधु यतापिचार का
जोश्येके पोतानाघरवार कुटुरत्यागकरी चळी मुराम
ममताकरवी ते करवायीसपरिपदत्यागनामनापाचन
महानतनो जगयाप सीथतियवस्थपरिचय ते नि
स्वछाचार गुरुमोदी थ६, थाणा नग करी पो
श्री सुधर्मग परी.
(५०)
यांदना, वीजालीगमान तथा होईन
(मर्यादा) यी उपरान वरते तो प्रथम पदोर ।
नेवा प्रहरमा स्वाध्याय न शक नहीं,
छाए साधु साध्वी एकाकी विहार करे ते पण
धिनु कारण एक घर नोडी हजारो घरनी
फरती ते साधुनो थाचार नथी, माटे चाव

. गद राखवानु . श्रो सुधर्मगष्ठ परीक्षा (५३) अग्नी पेठे साधुये मतपतिपणु करी मुकामनी ममता करवी नहीं त्यागी थइ वीजाने घोध करे के आसार Tसार वे अने पोते नित्य कजीया करे, अहंकार मम- कारथी गरकाव होय, अने गुरुकुलवासथी नष्ट थर मअनतानुबधी कपायर्नु शरणु , माटे सविज्ञ पुरु- सोये प्रहणमेधावी१, श्रुतमेधावीर, मर्यादामेधावी बु, जेथी पोतानु कल्याण थाय पक्षी था स्थले ठे के अढार पापस्थाननो त्याग करी चात जोयाविना, सानल्याविना करवी ते अन्या, गन (कुडो कलक) आपना जेटलु थाप , अने दबुज नहि पण ते माणसने वगर इथियारे खुन रवा जेटनु पाप वहोरीलेवा जेवु थाय ठे, माटे तेथी टकवु, थने श्राचारसमाधि', श्रुतसमाधिर, तप माधि३, पिनयसमाधिनुध, थवज्ञान मेजवानी रुर ठे वली पियक्रिया, गरख क्रिया तेनाथी दूर हेवु, अने महानिशीथसूत्रना तप करवा, लोग बद्देवा, हीने ते सूत्र सुगुरु सुधिदत पासे तेनो थर्ष जो जा. शो या सानलशो तो सत्यझानसूर्य तनारा हृदया- समा उदय थवाथी मिथ्यात्र थपकार र शे, माटे स महानिशीथसूत्रनी थाराधना करी जवानी , .

पानो मार करशो, माटे गुणITTri
"नागशmmm"'
MAMMITr
(५४)
श्री सुधमंगर परी
कमी ममजा लेगानी जहर, सोनम
गन्तु शान प्रात घशे पने पोताना
नीनाकारी चीजमो017
F-161.
पारि द. पु गाणी 10 नेद
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श्री सुधर्मगध परीक्षा (५५) केकग्रथे जो विचार, तेहपण कुगुरु सग परिहार, व पाडवना समाम, साख एहनी ले तिण गम॥१६३ यत -गुरोरप्पवलिप्तस्प । कार्याकार्यम- नत ॥ उत्पथप्रतिपन्नस्य । परित्यागो कि. पते ॥१॥ त्यजेधमै दयाहीन । विद्याहीन र त्यजेत् ॥ त्यजेत्नोधमुखी जायां । न स्नेहान् वान्धवान् त्यजेत् ॥२॥ नावार्थ -जे गुरु मदथी वाकटा यनेला होय अने र्य अकार्यनु जेने जान नथी, वळी उन्मार्ग (थवळे ते.) पोते चाले अने वीजाने पण केवळीए परुपेला नथी भ्रष्ट करावे एडवा कुगुरुनो सग स्याग करवो, रण के दयारहित जे धर्म होय तेनो त्याग करवो ने विद्याहीन (अविद्यावान् ) गुरुनो त्याग करवो, धिमुखी जार्याने त्याग करवी, अने स्नेह वगरना, बुधोने त्याग करवा नशासन पण जोइ विमास, गुरुतणे नवि रहियेपास, गितज्यो शिष्यपचसे, झाताधर्म कथा जुधो रसे॥१६४ साधेपणतज्योजमाति, जिणे पाड्यो घणलोक जमाति, धारमर्दक नामे सूरि, सुसाधु शिष्ये कीधोइरि ॥१६५ .

जावार्थ-थनेक विद्यानो नडार होय, पण
भूढा नाति त दु॥१॥ सप्पो शक मरणं ।
नावार्थ -सर्पना जयथी माणस ज्यारे दूर नाका
प्राणी ऊगुरुरूप सापने त्याग करे तो मूढ प्राणीश
घोसे के ते तुडुथु, पण ते जाणता नथी के
मात्र एक मरण परे अनेकुगुरुतो थनतामरण
पाले क्रिया न साचू कहे, ते पण गुरु पदवी नविआहे,
क्रियापिसालिमराचिसकिममणिधरसपर्यानदिजिमा
तहावि मुत्तघो॥जहवर मणिवर जुत्तो। गि
भी सुधर्मगध परीक्षा
पर विपधर सेवीजे साप, गुरु सेवता ठे बहु पाप,
जोजो प्रथ विचारी करी, राग पनी मति परिहरी
यत:-सप्पे दोहे नासह । लोड नहु पाई
किपि अस्केश ॥जो चयइ कुगुरु सप्पं । हा!
कगुरु अणता दे मरणा॥ तो वलि ।
गहियो। मा कुगुरु सेवण जह!॥ ५॥
जायचे त्यारे लोक पप कहें के तें सारु कयुं, पर
यतः वह गुण विजा निसा नसुत्त
"
.
सास
करो रिप इरो लोए ॥१॥

विचार ॥१६७ श्री सुधर्मगठ परीक्षा. (५७) सूत्र परूपनार होय तो मणिभूपित पडतो पण साप म विनरूर Tणाय, तेम ते गुरु पण मोक्षमारगमा विप्न रिक जाणीवाडवो मजिम बहुश्रुत बहु परिवार, घणासोक वदे थविचार' पपनकदेथागमतार, शासननो ते शनु पत-जह जह वहुस्सुन समन्य। सीसगण पपरिवडोय॥ अविसार सोय पवयणे। तह वह सित पडिणी ॥१॥ : जावार्थ -जेम जेम बहुश्रुत-घणा शास्त्र जेणे सा. दिया ते एरो, अथवा जेणे घणा श्रुतनो अल्यास यो वे एयो, तथा घणा अज्ञानी सोकोने समत ट) एवो, वली शिष्यना समूहवडे (घणा साधुना रेगारे) परररेखो , उता पण जो ते साधुना हृदयमा शास्त्र रहस्यनो प्रवेश न थवाथी कोरोने कोरो रह्योतो चकर्तिनी खीरमा चाटको (तावितो) पज्यो तोपण वीरनो स्वाद न पामे' तेम वली जेम"न मा कगेर पथरो नेदाय नदि, पाणी श्रदर पेप्सी दुमा नहि " तेम शास्त्र वाचे पण तेनो रहस्य पामी • नहि, (एटले अनुनन रहित) ते सिझातनो दतर जाए .! जाणवो मनक्षत्र के तत्वज्ञाननो अनुनी थोमु .

श्री सुभर्मगठ परीक्षा भएयो होय पण इानथो यतो सान तेणे मेट या शरणागतनु शिर जे खुणे, ते संपाये पातक घणे, 1 मोक्षामार्गनाथाराधक जाणयो भने बहुश्रुन मनास्ल शाननोलानन मेलव्यो (न पाम्यो) ते पिराधकजाणो तिमश्राचारज पण जाणतो,उसूरनापी मन थाणको यतः-जह सरणमुनगयाण । जीवाण किंतए सिरे जोन ॥ एव आयरित विहु। नावार्थ -नयनीत प्राणी शरणागत थयो. शरणे न राखता तेज माणसनु जम, देशना देनार उत्सूत्र (सूत्र विरुरू) परूपणा शाचार्य पण तारवाने घटले चूडारनार भने धनन तथी गुनेहगार थवाथी, या सवल माणसधी घचार सारु उत्तम माणसना शरण जायके, ने तेज कोक प्राणी संसारदादानलथी बचा सारु नगरन् । संसारदारानलथी मने शीतल करो (प) एस पोतानु लान ली ते शरणागतनुज मात्र नासे तो "जेनी गाड तेनी धाड चार्यनु नाम सास ना जाने घरज कर नस्सुत पन्नवितोय॥१॥ कापे, गलु घमणमा नांखनार जाणो कोइपण माणस एन्याय थाप, श्री सुधर्मगध परीक्षा (पए) -- । सन्मार्ग वताडो, त्यारे श्राचार्य ते लोळाजीवने सन्मा र्गना बदले उन्मार्ग पताडी, पोताना वाडामा दाखल करवामाटे लालचमा नाखी देवाधिदेवनो रस्तो न पतायता सूत्रविरुझपरूपणा करे के हु कहु तु तेम कर' एम क्तानी सम्यक्त्वना बदले मिथ्यात्वमा नाखी धर्म- रूप मस्तक ठेदी नाग्वे तेवा श्राचार्यनो सग कदी फरवो नदि तो गुरुनामेशु राचीए, साधु सुगुरुना गुण वाचीए, गुरुनोप्याथी बीदे जेह, साचा साधु न मुझे तेह ॥१७॥ - साचे झिया, साचे सद्गुरू साचे दया, जगमते सूरि ॥१७॥ एटखा लगी, जाणवा॥१७२ 17 - . सो॥१७३ 1१७३

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0 श्री सुधर्मगछ परीक्षा (एए) सन्मार्ग वताडो, त्यारे श्राचार्य ते नोलाजीवने सन्मा ना बदले उन्मार्ग बताडी, पोताना वाडामा दाखल करवामाटे लालचमा नाखी देवाधिदेवनो रस्तो न पतापता सूत्रविरुद्ध परूपणा करे के टु कदु तु तेम कर' एम बतानी सम्यस्त्वना बदले मिथ्यात्वमा नाखी धर्म- रूप मस्तक ठेदी नावे तेवा श्राचार्यनो सग कदी करवो नहि. गुरुनामेशु राचीए, साधु सुगुरुना गुण वाचीए, रुनोप्याथी बीहे जेह, साचा साधु न मुके तेह ||१७t पाचे समकित साचे किया, साचे सगुरू साचे दया, नाचु कहे ते माचा सूरि, ते बदु उगमते सूरि ॥१७॥ तूना नवा तणी वानगी, ए देवाडी पटला लगी, ळी जे दीसे मत नवनवा, ते पण सून विरुधजाणशा१७५ गाचार तणी चौपाइ, गाया एकसो तिहुतेर थप, र सintil सोधर्मगमनजो, थापमतिनीसगति सजो१५३ म जोक्ने जिपर थाण, सूर्ण सरिकरो प्रमाम'; यनिनिवेशमनगोपरिहगे ना देगिमशिवाय।१७५ ॥ इति श्री शास्त्रविशारद जैनाचार्य श्री बर्दि कृत श्री सधमंगवपरीका मपा

.-
(६०) श्री सुधर्मगठ परीक्षा
॥ (श्रोता परीक्षानी) सजाय ।।
(राग कालगडी)
परसे पुष्करावर्त सुमेहा । तन पृथ्वी जेदाये नीर।
पण एक मगसेलीन नेदाय ।थति न्द्वानो ने कठिन
शरीर ॥१॥तिम गुरुवचने किमें न जेदाय । जे प्राणी
होय नारी कर्म। कन (थुक) शोप जो थति घपो
कीजे । तोय न पामे सूधो धर्म ॥ तिम० ॥२॥षावना
चदन गध तजीने । कसमत ऊपर मासी जाय ।
परिमल कमसतणो ठमीने । मेमामो नित कादव
साय ॥ तिम० ॥३॥ काले कारख गुलियसि कापन।
घोलतणो नगि बेते रंग। वायस कानन थाये धोसो।
जो नित मोहे यमुना गग ॥ तिमः॥४॥ चिगटे कुजे
जल नदिनेदे। न रद काणे नाजन नीर। रवि वेग्मी
बनाए
अधो
। पान न सहे सन परीर ॥ तिम०॥
॥ ५ ॥ मूंग कागडू कण मादे जेदतो । पाणी
थगनि न पीपे थस । जप केसव्या न दोगे तंमुस ।
घग सीगच्या न थाये इस ॥ तिमः ॥ ६ ॥ मृगमद
अंगर कपूरे गस्यो। ससण न पामे रुमो गध । सूरज
राशिदर दीवानोंने किमदी नविटेवे जारपंधानिमा
॥9॥ जग्यो चट चोरने न गमे मे जयामोगी

श्री सुधर्मगह परीक्षा (६१) जाय । खीर खाम घृत मागे जोजन । पेट कूतराने न समाय ॥ तिम॥७॥ मी प्राख न वायस चाखे। श्वानपुनमी न समी चाय । बागानु वन (करहो), कट चरे नही । श्रन्याश्ने न गमेन्याय ॥ तिम० ॥ ए॥ साय न सनिपातियो साकर। पापीने धरमी न सुहाय। रुचे नही चपो मधुकरने । घुण नित सूको लाकम खाय ॥ तिम॥१०॥ गाम समीप नदी मूकीने । रासन राखें खरमे अंग । कुसवती कामिनी तजीने । नीच करे पर रमणी सग । तिम० ॥११॥नल फीटीने सेलडी न थाये। छु तणे जो वाधे सग। दूध गुलें जो सीन, सींचाये। तोहे मीगे नवि थाय प्रसग ॥ तिम० ॥१५॥ खीर सर्पमुख न दुवे अमृत । काच कमायो रतन न होय । खारो न दसे समुनो नदीयें। मोटे वम फर्न नीरसज होय ॥ निम ॥ १३ ॥ माथे मपि नितु वहे नुजगम । तोहे ते नवि निरविष दुत । रामनणी सेवा करे हनुमत । खगोटी थधिकोन सह्त ॥ तिम॥१४॥ (ढास-श्री सद्गुरुवचन करे शु तेइने ए राग) इम लौकिक साथ विचारी लोकोत्तरनी सुणजो वाता. चित्रे ब्रह्मदत्त बहुसमजाव्यो। विरतिनणी नविशml धांत ॥श्री सदगुरुवचन करे शुतेदने ॥१५॥ महावं (२) श्री सुधर्मगच परीक्षा शिष्य जमाती। तिदने नमिटागो उपदेश । कालिग- सूरीयो कपिसाटासी गोसासो पामशे कसेस ।। श्री॥ ॥१६॥ विष्णुकुमारना वचन सुणीने । नमुचि न मानी काई सीख । मारणहार उदाई नृपनो । चार वरस सगि पाती दीख ॥ श्री ॥१॥ शिष्य पाचसें केरो नायक । श्रगारमर्दक नामें सूरि । श्रावक परख्यो थनव्य दया- विण् । निर्गुण जाणी कीधो हरी ॥ श्री० ॥१७॥ सनेगी सायद्याचारज । सूत्र विरुध तिणे कयो विचार । नागिल पधव बहु समजाव्यो । सुमतिए कुगुरु न तज्या लगार ॥ श्री० ॥ १ ॥ शीलसनाद रिपिये प्रतियोधी। रूपीये नवि काल्यो सास । बरस पचास तरे तप सरक- णा! तसु फस न थयो एके पाज॥ श्री० ॥२०॥ ईसरने भन धर्म न नेयो । रजा महासतीने थयो रोग । फासू जलथी काया पिणसे । म नामें घाख्या घटु सोग ॥श्री ॥ २१॥ पालक्कुर नेमि जपया कडरीक पाल्यो चारिश । कुषग साथै चीरे जश्वद्या । फळे फेर थति थयो विचित्र ॥ श्री० ॥ २२ ॥ सगति पहने हुति रूडी । पुण नतिप्रीम्यो सार रिचार । कर्म निकाचित जेहने पोते । तेप्रतिरोध न खदे सगार ।। श्री० ॥२३॥ टिरागें नर जे हुए रानो। ने दुइ दोप। यति घण- श्री सुधर्मगह परीक्षा. (६३), घोर । मूढ वचन परमारथ न सहे। विग्रह पमिया वदे क्गेर ॥ श्री० ॥ २ ॥ ए चिहुने धर्म कहेवा वेसे। ते नवि जाणे श्रागम रीत । करसदनें कपूरज घावे ।' जे उहपणने न धरे चित्त ॥ श्री० ॥ २५॥ लोह वषिग, जिम करे कदाग्रह । सूत्र न साचो प्रीठे जेद । सोक प्रवाहे मूम मेव्हाने । साचो धर्म न जाणे तेह ॥ श्री ॥२६॥ नारी कर्म घपाने ए परें। हवूकर्म प्री तत.. कास । सनतकुमार चिलातीनदन । थापञ्चासुत गय. मुकमाल ॥ श्री० ॥ २७ ॥ पर्पद पुरुष जोश्ने कहियो। धर्म कयो ऽम धाचारग । नदीसूत्रे सीप सनारी। ब्रह्म कहे ज्योज्यो मनरग ।। श्री० ॥७॥ . ॥अथ श्री गीतार्याववोध-कुलकम् ॥ ॥शी-सलोकानी ॥ ॥नमनी मेरो कहु सलोको, एक चियी सनिलनोलोको ॥ सघता पनपाउन चीर जीणदद दुप सहतर, निरतो परते धर्म निरतर। तेह्तणो विछेट पयपे, धागम वयणथको नविकपे॥॥ पचमकाले पड्या प्रवाहे, केश कुगुम जण जपने वाहे । पाप्या झोध सोनकल्लोख,थपिचिन्नेति कीधो इसनोशार है श्री सुभमंगल परीक्षा आकिपमुह परिगद ममता, मी यदु वीसे गुण गमना। निजगुरुजिमरहिये, परिधिमूरापदेशोएकहीये. निमशिनमूमोधर्म, कायरतनमिसिया जिमनर्म। पावनिम परतीने सीने, पर्मतणो पण ठेदन कीजे॥४ कि कुपगे काम धागो, पीतनने मूले काइ मागो। ३प गेम तट ना पिप है, जैसा डोदे उस म गडे ॥५ जे धजाय समु सग न कीजे, गहरि पुढे केम तरीजे । अंपगाणपग्रफिमदाखे, तिमसुगुरुविण धर्मकुपजाखे धरह पद तूने सधार, लोकमांहि पण इसो विचार । रोग धनाएपे उखध कदे, रूपिदत्याफा ते नर आहे॥ सो जाणि परखी योजाण, धर्मतणो जिमलहोप्रमा' शब्द नेद जाणे जे थर्थ, ते गीतारथपदे समर्थ ॥७॥ धागम पोम्यो शब्दविचार, दसम अगे जाणो सा तसु विशेष अनुयोगदुगर, जाणीलेजोयागम' नाम पमुहपद जाणे पनर, कूम सत्यपद सहे कूमो अर्थ कहे जाणतो, अनिनिसि नव जमे एद नेदनिरतानविजाणे, ते थजाण किम दृष्टिराग उपजे प्रतीत, धर्मतणी जजना तहुँ नेमीविणु परधन व्यवहार, परप्रतीति तिम थापणजाणपणो णकारण, चरणमूल समरथ 71 .

श्री सुधर्मग, परीक्षा (६५) कियावत पाहेंगीतारथ, श्रधिको नविपणतारणसमरथ। धीर प्रकास्यो पचम श्रगे, जोखेज्यो चटनगे ॥१३॥ करे क्रिया मत्य नवि जाणे, श्रापण उदे सूत्र वसाणे। देसघकी धाराधक कहिये, तासु सगेधर्मनजना लदिये जाणे सत्य कहे जे साचो, क्रिपातणी थाचरणा फाचो। तेहने टेसविराधक जाणो, तासगगुणहाणिम जाणो १५ एक थजाण झिपानापाले, साधुवेस जिनधर्म विटाले। सोद यान पूडनो पोसे, सर्वपिराधक मुनिने तोसे॥१६॥ सगी गीतारथ साचो, तसुदसण गुरु जाणी राचो। थापण तरे अनेराने तारे, साराधक वीर विचारे ॥१७॥ शाादीन सिग्यिा थायर, ममी मूढ मुसे सेयनर । थररे मूरत किरिया न दोप, विणु मूसे नरूडास भजोप नारायण न सम्योपोग, जाइसरण सुयनाणिविहीणा मयदत्त अनयन जे पीने, इणि चोरी कांकाज नसीजे पुरार पोवीपर्ष विमामे, थापण दे मन उहाले । एटीपा गुना अधिकारि,फहो कवणपरिए विचारि२० मुनिपोमादीधो, पपजाणितेणे मन टन कीयो (13THE नागोयाय, प्रमयोपासक योल्यो राय॥ MATA परमे, पीपली सयोगमन। गतिविधि र पह, पररा उसग न प १२२ सागमनधितापरिक्सी, पुसारितु नपता किम गेदी श्री सुधर्मगध परीक्षा .0P मुनितमीप एवापसता थाधे नदु जाएयानुननणना सोशाटिक क्रिया विशेष, वायण तयणतर सबिसेप ! फासपदण पूजक ए कीजे, इम थागम अनुजोग सहीने। जो विधियागमनपिये, तो निचे मुनिजतागणिये। श्रुत थाराधी पहोंचे पार, चोये थगे वे श्रुन घधिकार १५ जिदने जे थाव्यो अधिकार, ते जतो नदु सद्दे धिकार । म उनी उपराग चासे, साल जेम चिरकाज ते सारे" पीपक्षीयाधी कां तुम्हे नाणो, ज्यामेक त्या रायम साधुसमीपे सनक्षि भुत थर्थ, श्रारक योल्या तरण सा थप्यो यदी थजाण्यो, जजणसासे थर्थवसायं ते नर दुस्ये वनुस ससारी, पचमभगे सेतु विचारी॥ जे पागम जयवता सप, तासु जार सनक्षि मन कप यविधिनणी कूडो जेन्नाखे, विदुमाहि नव एक नराखे। जेनिय उद पडे न पाते, वसे सुगुरुगीतारन पासे। पंचमहायनिरता पासे, ज्ञानतणी भाशातन टासे ॥३ मुगुरु सग सनसि सकेगी, विधिशुवत नणी अनुयो। गीतारथ पदवी आराधे, निशे ते परमपद साधे ॥३२॥ कलश-म थागमराणी जरियण जाणी, सांगी जीपश्य पद । सूत्रारथ साचो सनक्षिराचो, जिणधर्म जेम बहो सुद ॥३२॥ ॥ इनि गीतार्थ पदारयोध पुक्षकम् ॥ ,

श्री सुधर्मगध परीक्षा (६७)
॥ अथ श्रीविजयदेवसस्कृित सद्याप ।।
॥धारती सर रे करी ॥ए देशी।
होर जिलेश्वर पप नमी, कहिम्युं सूनाचार, एक मने
परता सदी, पालदिये दो नवसागर पार ।।२।।
सूब राहना करी सहो॥ मन राघो दो गाडरीए प्रवाह'
पुननि पदापद पटनो, थालोचो हो निज हीयडामाद
। सूप ॥२॥ एप विरुड जे दाविपो, पासध्यान।
रो सानळीने टाळजी, जिनशासने दो वे जेदने
जी ॥ ० ॥ ३॥ जीसवनी राजीती, सका
महामाधार, सामु न दे तेदने, थाराधे हो कोई
वामिनार ।। मूब० ॥ ४॥ पदिकमायामाह किम करे,
गाधु टेनी लापार, दाया फाइटोनो तुमे, पनो पहि-
सोहो गवार मूत्र० ॥५॥ पक्ष देवीनी घुश्पदी,
पाप मागे जोप, निउपाधोरटे, जिनशामनी
रोगाणु नहोर ॥६॥ देपोतो बाउसग्ग
मानिनामापतिमी चारोजीमा
सोए पापा Tan 31 sोगापि
40. I शिनापाक गामे मुगदापिनी,
than सगुमाए 10 परि.
पा. मिरान, विदा

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श्रो सुधर्मगा परीक्षा (पए) ॥ सून० ॥ १७ ॥ खोटे मूसमे मठपती, लोक मुसे निसदीत, ते हित कारण में कह्यो, मत थाणो हो को मनमें रीस ।। सूत्र ॥१॥ गटाचार अनेक , ते जाथे समु कोइ,श्री जिन सूत्र थाराधज्यो, जीम तु- मो दो अविचल सुख हो ॥ सूत्र॥२॥ श्री विजय देवसूरी म कहे, पालो धागम प्रमाण, सूत्र विरुष आहज्यो, जीम पामो हो शिवपुर गण | सूत्र ॥१॥ शनि सातिशय शक्तिधारक श्रीमहिजप- देवसूरीणा विरचिता स्वाध्यायैफ- विंशतिका ॥भेयसे भवतु ।। . ॥ दृष्टिराग कदाग्रह परिहार हिनशिक्षा ।। ॥राग प्रजाती॥ दृष्टिरागे नरिसागीये, पली जागीये चिचे। मागीए शीय दानीसणी, पनागीये निये ॥१॥ जे ठता दोष देये नहि, जिदा जिदा थनि रागी । दोप घठना पण दाग्ववे, जिदापी रुचि नागी ॥२॥ दृष्टिरागे चले चित्तश्री, फरे नेत्र विकराले ॥ पूर्व उकार न साजरे, पमे tram ||३॥ ना॥ .

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(30) श्री सुधर्मगध परीक्षा
जिन करी जगजने यादों, इदा गोद यति धूनोमा
रहिनडार रमणी तजी, नजी भाप मति रागो।।
हटिरागे जमासी सरो, नयी जाजत तागो ॥५॥
पसी प्राचार्य सावध जे, दुधगत ससारो॥
दृष्टिरागे समतो पण थयो, महा निशीथ विचारो ॥६॥
हुए जिनधर्म याशातना, बनाएयु कदे रगे।
मड थागळे जिनपरे, वदी नगर थगे॥४॥
गामना नटने मूर्सनो, मिल्यो जेदनो जोगो॥
दृष्टिराग मिल्यो तेदनो, कथक सेवक लोगो॥७॥
आपण गोठमी मीठमी, दीने मन लागे ।
झानी गुरु पचन रखीयामणा, कटुक तीरसा यागेाए।
दृष्टिरागे घ्रम उपजे, ज्ञान वधे गुणरागे ।
एहमा एक तुमे थादरो, नतो होय जे धागे ॥१॥
हटिरागी कदा मत हुयो, सदा सुगुरु अनुमरजो।
पाचक जशविजय कहे, हित शिख मा धरजो ॥११॥
॥अथ कुगुरुनो रवाध्याय॥
॥डो नाजी॥ ए देशी ।।
शुरु सवेगी किरिया धारी, पण कुटिलाइन मूके।
चाह्य प्रकारे किरिया पाले, अश्यतरची चूके ॥१॥

PHAALA श्री सुधर्मगष्ठ परीक्षा (१) कपटी कहिया पद जिणदे, दुग्नु नाम न लीजे ॥ ए चाकणी॥पीता कपडा खने धावती, काख देखाडी घोले ॥ तरुणी सुदर देखी विशेपे, पुस्तक वाचवा खोले ॥क० ॥२॥ पंडा देखी काढे पडयो, पडघा मान करावे ॥ खाजा यहोरे खात करीने, पूरीने वोनि रावे ॥ ७ ॥ ३॥ ज्ञान मि उपदेश दश्ने, सूक्ष्म परिग्रह राखे ।। ए कपटीनु नाम न लीजे, इम नसूत्र जे नाये || क० ॥ ४॥ तारा कूटवा साथें हीडे, श्रा. विका वे दश चार ॥ यात्राने मिप एणी परें विचरे, र रखा थाचार ॥ कण ॥ ५॥पाशेर घीश्री करे पारण, वली खावे श्रधशेर ॥ तोही ताजा इणिपरें योछे, उपवासे यावे फेर ।। क० ॥६॥ बगलानी परें पगला माडे, भाडु डोटु जोवे ॥ महिला साथै चोले मीठ, साधुवेप वगोवे ॥ क० ॥ ७॥थाचारागे वस्त्रनो जारयो, श्वेतने मानो पेनें ॥ तेतो मारग रे मूस्यो, कपडा रंग इते ॥ कण्॥ ॥ वाजीगर जेम चाजी खेले, धीरे माडी जास ॥ ते सवेगी सूधामत जाणो, ए सदु बाख जजाल ॥२०॥ए । उंचु घर थगोचर होवे, मासक- हरतिहा कीजे ॥ सुग्व सातायें पडिसेहण चाभे, साधु जन्म फल लीजें ॥ २० ॥ १० ॥ रात जगारे महिला ' 1 (७१) श्री सुधर्मगह परीक्षा मसीने, गावे गीत रसाल चार कयाना कर्मज बाधे, मनमा थ उजमा करा ॥११॥ मध्यान्हें महिला- ने तेडे, इसीने पूरे मात ॥ अदारमो उपधान यहोतो, श्रम तुम माशे धात फ॥१२॥ तर ते कामिनी हसीने घोसे, साचु कहो वो साम ॥ गरासी गुरु भावीने वढशे, तर तुम जाशे माम ! फ॥ १३ ॥ नीचु जोड्ने इणि परें जांसे, नपानो सप कीजे ॥ नानी वय वे इजीय तुमारी, एक एक गाथा लीजे ॥ ० ॥ १५ ॥ घोटकनी परे पथें चाले, शहरमा नीचू जोवे ।। गमयम गाडानी परें चाले, जिनशासनने वगोके ॥०॥ २५ ॥ रुमाल पाता रुहां वेचे, जूना हाश्रमा झाले ॥ तृष्णा तोये किमहिन मूके, वखी जाणे को शाले ॥ क० ॥१६॥ काय जीवनो दाह करारे, नगम मम पाप बधाये । शारिस तपनु थोतु राइने, कार अमने वहोराचे ॥ क० ॥ १७ ॥ कदाप्रहगा पड़े। प्रतनो, पहने लागे दोप ॥ मृपावाद तो पग पग बोले, तेहनो न करे शोष ॥ ॥ १७॥ यदत्त वस्तु थजाण थश्ने, साधारण सीरावे ॥चोथा प्रतनी वात मोटी, तेदमा काम जगाये ॥ कण्॥१॥ विधवा पामे विट स यइने, काम कुसगी मागे वायसनी परें मेधुन से, भी सुधर्मगह परीक्षा. (३) चोपा व्रतने भागे ॥क० ॥ २०॥ मैथुन सेवे परिग्रह मांदे, प्रोढा पातक पांधे । रासननी परें लोट्या हीडे, बसी उघाहे खांधे ॥०॥ १ ॥6 अहमादिने घाइ, नाम धरावे तपसी ॥ महिमा कारण राखावे, प्रगटे तव होय हांसी ॥क ॥२२॥नगर पिंडोलीया परने विरलज, पासण्या थर से ॥ घोराशी गठ घदोरी खावे, महोटा घरमा पेसे ॥क० ॥ २३ ॥ मुखें मुहपत्ती राखी योसे, यांत करे ने चाखा ॥ मांदोमांदे साने समजे,घाखे करे टाषा | क॥॥ एकपटी नो सग निवारो, जेणे प नेख पगोगो नेख उपापी महा ए नूडो, मनुष्य जन्म फल खोयो । ० ॥१५॥ थादि यकी धरिहत धाधारज, उपाध्याय ने साधु ॥ धोले नेखे सहु एम योखे, वाहने धारा ॥॥२॥ मूल पथ मिप्यार चाले, समजतो नदी खेश ॥ जिन मतनो मारगें ठामीने, कखको करे विशेष ॥क ॥२ श्रापमतीनो संग तजीने, साधु क्यने रहियें ॥ वार्ण। वाचकजस एम बोले, जिनाझा शिर वड़िये ।कारण ॥अथ श्री साधुगुण सद्याय ॥ ॥ विनय करीजेरे नवियण नावसुं-ए देशी ।। ॥पांचे शीरे बहनिस वस करें, पाले नवविधि - -- - - श्री सुधर्मगह परीक्षा मसीने, गावे गीत रसास । चार कथानां कर्मज बाधे, मनमा य उनमाल || का ॥११॥ मध्यान्दै महिला- ने तेडे, हसीने पूढे पान ॥ श्रढारमो उपधान यहोतो, श्रम तुम मसशे धात ।। का ॥२५॥ तर ते कामिनी इसीने बोले, साचु कहोगे वाम ॥ गहरासी गुरु याधीने बढशे, तर तुम जाशे माम || क० ॥ १३ ॥ नीचु जोड्ने इणि परें नासे, जणवानो सप कीजे ।। नानी वय ठे इजीय तुमारी, एक एक गाथा सीजे ॥10॥१॥ घोटकनी परें पथे चाले, शदेरमा नीचू जो ॥ गमयम गाडानी परें चासे, जिनशासनने वगोरे || 20॥ १५ ॥ रुमाल पागं रुहा वेचे, जूना हाथमा फाले । तृष्णा तोये किमदिन मूके, वसी जाणे को आले । क० ॥ १६ ॥ काय जीवनो दाद करारे, वाम गम पाप वधाचे ॥ थापिस तपनु श्रोतु राश्ने, काइ अमने बहोरावे ॥ १० ॥ १७ ॥ फदामहमा पहे। बतनो, पहने लागे दोप ॥ मृपावाद तो पग पग या), तेहनो न करे शोप ॥ क० ॥ १७ ॥ यदत्त रस्तु थजाण थइने, साधारण सीरावे ॥चोथा प्रतनी वात वे मोटी, तेदमा काम जगारे । क०॥ १॥ विधवा पासे विष्ट स घदने, काम कुसगी मागेवायसनी परें मेथुन से, - भी सुधर्मगठ परीक्षा (७३) चोया वतने नागे । क॥ २०॥ मेथुन सेवे परिपह, मदि, प्रौढां पातक वांधे ॥ रासननी परें लोट्या दीडे, पली उघाडे खांधे ॥ ॥ १ ॥ अहमादिने घना, नाम धरावे तपसी महिमा कारण रात्रे खावे, प्रगटे तव होय हांसी ॥ क० ॥२॥नगर पिंडोलीया परने विरमज, पासण्या यह घेसे ॥ घोराशी गष्ठ घहोरी खावे, महोटा घरमा पेसे ॥का ॥ २३ ॥ मुर्खे मुद्दपत्ती राखी बोले, भाल करे चाला || मांदोमांद साने समजे,पाखे करे टासा ॥ कराए कपटी नो सग निवारो, जेथे १ नेम्व गोमो नेख उपापी महा ए जूडो, मनुष्य जम्म फल खोयो । ॥२५॥ श्रादि यकी अरिहत प्राचारज, उपाध्याय ने साधु ॥ घोले लेखे स एम बोले, पारने बारा फ॥२॥ मूल पथ मिध्यावें चाक्षे, समजतो नदी खेश ॥ जिन मसनो मारग ठामीने, कलहो करे विशेष ॥ ॥२॥ धापमतीनो संग तजीने, साधु वचने रहियें ॥ पाणी वाचकजस एम योसे, जिनामा शिर वहिये ॥कारण ॥अथ श्री साधुगुण सद्याय ॥ ॥विनय करीजेरे नवियण नावसुं-ए देशी॥ ॥ पांचे शीरे अनिस वस करें, पाले नवविषि .

(७१) श्री सुधर्मगध परीक्षा नलीने, गावे गीत रसास | चार कथानां कर्मज वाघे, मनमा थइ उजमाल || का ॥ १५ ॥ मध्यान्हें महिला- ने तेडे, इसीने पूठे पान ॥ बढारमो उपधान यहोतो, अम तुम मनशे धातक ॥२२॥ तर ते कामिनी इसीने योले, साचु कहो तो साम ॥ गणवासी गुरु श्रावीने वढशे, तब तुम जाशे माम || का ॥ १३ ॥ नीचे जोक्ने इणि परें जासे, मानो सप कीजे ।। नानी वय ते हनीय तुमारी, एक एक गाथा लीजे ॥ क॥ १४ ॥ घोटकनी परें पथें चाले, शदेरमा नीचू जोवे ।। गमयम गाडानी परें चाले, जिनशासनने वगोरे in०॥ १५॥ रुमास पान रुहा वेचे, जूना हाश्रमा फाखे ॥ तृष्णा तोये किमदिन मूके, वही जाणे को आले ॥क० ॥१६॥ उकाय जीवनो दाद कराने, नाम वाम पाप धधाये । श्राविस तपनु यो राश्ने, काइ श्रमने बहोरावे ॥ ३० ॥ १७ ॥ कदामहगा पदेना बतनो, पढ्ने लागे दोप ।। मृपाबाद तो पग पग योरे, तेदनो न करे शोष ॥०॥१७॥थदत्त वस्तु थजाण घने, साधारण सीरा चोथा प्रतनी वात वे मोटी. तेदमा काम जगावे ॥०॥रए ॥ विधा पास रि सथश्ने, काम कुसगी मागेवायसनी परें मेधुन में - - श्री सुधर्मगठ परीक्षा (७३) चोया व्रतने नागे । क० ॥ २०॥ मैथुन सेवे परिग्रह, मांदे, प्रौढां पातक बांधे । रासननी परें सोव्या ही, पसी उघाडे खांधे ॥ ॥ १ ॥ अहमादिने घाइ, नाम धरावे तपसी ॥ महिमा कारण रात्रै खावे, प्रगटे तब होय हांसी ॥ क ॥२२॥नगर पिंडोलीया परने विरसज, पासण्या थइ घेसे ॥ घोराशी गठ बहोरी खावे, महोटा घरमा पेसे ॥ क०॥ २३ ॥ मुखें मुहपत्ती राखी थोले,यांन करे चाला ॥ मांदो मोदे साने समजे,घाखे करे ठे टाखा || का एकपटी नो सग निवारो, जेणे एवरगोयो लेख उमापी महा ए चूढो, मनुष्य जम्म फाड खोपो॥०॥" धादिपकी थरिहत थाधारज, उपाध्याय ने साधु ॥ घोले खे सहु एम बोले, वारुने धाराक्षु ॥१०॥६॥ मूल पथ मिथ्यावें चाले, समजनो नदी पेश ॥ जिन मसनो मारग टोमीने, कसाहो करे विशेष ॥ ॥२७॥ श्रापमतीनो संग तजीने, साधु वचने रहियें ॥ वाणी वाचकजस एम योसे, जिनाझा शिर पहिये कारण ॥ अथ श्री साधुगुण सद्याय॥ ॥ पिनय करीजेरे जत्रियण नावसुं-प देशी ।। ॥पांचे धीरेथ - , (३५) श्री सुधर्मगष्ठ परीक्षा मसीने, गावे गीत रसास || चार कथाना कर्मज बाधे, मनमा थर जमाल | क० ॥१२॥ मध्यान्हें महिला- ने तेडे, इसीने पूरे मात ॥ श्रढारमो उपधान यहोतो, थम तुम मतशे धात ॥20॥१२॥ तर ते कामिनी हसीने बोले, साचु कहो तो वाम ॥ गमवासी गुरु श्रावीने वढशे, तब तुम जाशे माम || क० ॥ १३ ॥ नीचं जोश्ने इणि परें जाखे, नणवानो सप कीजे ।। नानी वय वे इजीय तुमारी, एक एक गाथा सीजे. ॥ ३० ॥ १४ ॥ घोटकनी परे पर्थे चालेदोजी ॥ सूर जोवे ।। गमयम गाराची सियाराापना, उची कर ये यादोजी का परपायावेजी मेसा कापमा, रमिर वरसे निरोज ॥ मांस मसादिक परिसद थति घणा, सहे ते सा- ५ सधीरोजी ॥ ०६ ॥ समकित मानसरोवर मिलता पारिन पनराम वासोजी ॥ तपनप सजम स्था १ निरगपा, पाले पाले मनने जलाप्तोजी ॥ ०७ पापिस परिसदारे विपमा जे सहे, महीयस करे रिहा रोजी ॥ खिमाखमग से मुनियर कर धरे, उपसम रस समारोजी ॥ ॥ मधुकरनी परें मुनिवर गोचरी, रिहरे विहरे सुजतो थाहारोजी ॥ ते पण निरस में यली, पोमलो दीये वीयें देद बाधारोजी। प

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भी सुधर्मगह परीक्षा (७३)
चोपा मतने नागे ॥ कण् ॥ २०॥ मेथुन सेवे परिपह
मांदे, प्रोढा पातक बधेि ।। रासननी परें खोट्या हीडे,
चमी उघाडे खांधे ॥ ॥ १ ॥ अहमादिने
घना, नाम धरावे तपसी ॥ महिमा कारण रात्रै खावे,
प्रगटे तब होय हांसी ॥ कण्॥२२॥नगर पिंडो लीया
पाने रिसज, पासण्या पर से ॥ घोराशी गठ
घदोरी खावे, मदोटा घरमा पेसे ॥ कण्॥ २३ ॥ मुर्खे
मुद्दपनी राखी पोखे,थान करे ने चाला ॥ मांदो मदि
करे टाखा ॥ १० ॥४॥ एकपटी
॥ खरे उतारो राजा भरोसो ॥ न चपापी
पचमहायत जे घरे । टाखे पाप थदारोरे॥विविध
परिसर जे सदे ॥ नर फटप करे बिहारोरे ॥ एडवा
मुनियर पदिये। जिम सदिये जानो पारोरे ॥ केसी
तुम परदेशी जिम ॥ जय पमना दिये थाधारोरे ॥
थोरणी ॥ एदया ॥१॥ पारे नेदे तप तपे ॥ पाने
पपाचारोरेंनिंदक पूजक सम गिणे ॥ जोस न फदे
बिगारोरे । एदया०२॥ कोइ वेदे यांसः ॥ चदन
पोइ पगारे ॥ पिपर समता मा परे, पापा पारे
सारे ॥ पदा०३॥ पाठीत पिटु परी घागला,
दोपसभि से थाहारोरे ॥ संपिनाग मुगिने परे।

+
मननो, पहने खा ---
(३५) श्री सुधर्मगह परीक्षा.
मतीने, गावे गीत रसास ॥ चार कथाना कर्मज बाधे,
मनमो यश् उजमाल || क० ॥ ११॥ मध्यान्हें महिला-
ने तेडे, इसीने पूढे पात ॥ श्रढारमो उपधान बहोतो,
श्रम तुम मलशे धात ॥ का ॥ १२॥ तव ते कामिनी
इसीने वोसे, साचु कहोगे स्वाम ॥ गधवासी गुम
आवीने वढशे, तर तुम जाशे माम || क० ॥ १३
नीचं जोश्ने इणि परे नाखे, जणवानो खप कीजे
नानी वय २ हजीय तुमारी, एक एक गाथा सी
|| का ॥ १४ ॥ घोटकनी परें पथें चाले, शदेरमा
जोवे ॥गमयम गाडानी परें चासे, जिनशाम
।। क ।। १५ । रुमास पागं
हार
फासे ॥ तृष्णा तोये कि
शाले ॥क० ॥१६
गम पाप यधाये॥
धमने पहोराने ।
तेदनो न करे शो
घश्ने, साधारा
तेरमा काम
सपने,
.
-
.
r:-राजे
FARो
मोगरे।

-
--
श्री सुधर्मग परीक्षा (१)
कपटी कहिया पद जियदे, दुपर्नु नाम न सीजे । ए
थारणी॥पीता कपडां मने धायती, कास देखाडी
पोखे ॥ तरुणी सुदर देनी विशेपे, पुस्तक वांचया
खोसे ।क० ॥२॥ पंटा देवी का पडघो, पढया
गान फरावे || माजा दौरे सात करीने, पूरीने घोमि
राये ॥२०॥ ३ ॥ ज्ञान मि उपदेश दइने, सूक्ष्म
परिषद राम्ये । प रपटीनु नाम न खीजे, इम उरसूत्र
जे नाये || फ० ॥ ४ ॥ ना कूटया सायें हीडे, प्रा.
पिया दश यार || यामाने मिप एणी परें विचरे,
र रहा थाचार ॥ क० ॥५॥पाशेर पीत्री परे पारणं,
पपी पारे थपशेर ॥ तोही साता इथिपरें योडे,
छपगामे घाये फेर।।क० ॥६॥ पगमानी परे पगला
गाडे, घाटु बोटु जोये ॥ मदिसा सा पोसे गोवं,
सापुरेप पगोये ॥ १०॥ ॥यारागे पत्नो नाग्यो,
गोमागी ॥ मारगोमूल्यो, पराग
ऐ॥१०॥७॥पानीगर जेम पानी मे, पीपर
मांगा सेमगीमामा नापो, प
पमा
जगार ॥utnपर पर
हा तिला की मुसापादिप
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--- (30) श्री सुधर्मगध परीक्षा जिन करी जगजने श्रादयों, दामोद यति धूलोमा हिनडार रमणी तजी, जी श्रापमति रागो॥ टिरागे जमाती समो, नी नाजस तागो ॥५॥ पली श्राचार्य सावध जे, दु अनत ससारो॥ दृष्टिरगे समतो पण थयो, महा निशीथ चारो ॥६॥ सुप जिनधर्म थाशातना, अनागयु कदे रगे। मड थागळे जिनपरे, पदी नगर थगे ॥७॥ गामना नटने मूर्सनो, मिल्यो जेदयो जोगो दृष्टिराग मिल्यो तेइमो, कथक सेवक लोगो ॥ ७॥ थापण गोठमी मीचमी, इडीने मन लागे। ज्ञानी गुरु बचन रखीयामणा, कटक तीरसा गाए। दृष्टिरागे भ्रम उपजे, ज्ञान वधे गुणरागे॥ एहमा एक तुमे थादरो, जसो होय जे धागे ॥१॥ दृष्टिरागी कदा मत हुयो, सदा सुगुरु अनुमरजो । पाचक जशविजय फदे, हित शिख मन परजो ॥११॥ . . ॥ अथ कुगुरुनो रवाध्याय॥ ॥डो नाजी। ए देशी॥ शुरू सवेगी किरिया धारी, पण कुटिलाइन मूके। बाह्य प्रकारे किरिया पासे, अच्यतरपी चूके ॥१॥ -

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श्री सुधर्मगच परीक्षा (१)
कपटी कहिया एह जिणदे, दुग्नुं नाम न सीजे ॥ ए
धाकणी पीता कपडा खने धावसी, काख देखाडी
घोले ॥ तरुणी सुंदर देखी विशेपे, पुस्तक वाचवा
खोले ।क० ॥२॥ पेंडा देवी काढे पडघो, पडया
मान करावे ॥ खाजा यहोरे सात करीने, पूरीने वोणि
रावे ॥ २० ॥ ३॥ ज्ञान मि उपदेश'दइने, सूक्ष्म
परिषद राखे ।। ए कपटीनु नाम न लीजे, इम मसूत्र
जेनासे । रु० ॥ ४ ॥ ताउ कूटा साथै हीडे, श्रा.
विका ठे दश पार || यानाने मिप एणी परें विचरे,
र रहा श्राचार ।।
कपाशेर घीश्री करे पारणु,
पक्षी खावे श्रधशेर ॥ तोही ताजा इणिपरें बोले,
उपगसे थावे फेर। का॥६॥ वगवानी परें पगसां
माडे, थाडु डोटु जोवे ॥ महिला सायें बोले मीतु,
साधुवेप वगोरे।
कथाचारागे वस्त्रनो नारयो,
ने मातो पेनें । तेतो मारग पूरे मूस्यो, कपडा रंगे
हेने । क G॥ वाजीगर जेम घाजी खेले, धीरे
माडी जाय ॥ ते मोगी सूधाम जाणो, ए सदु याख
जजाय ॥ २०॥ए । उचु घर थगोचर होवे, मासक
हातिहा कीजे ॥ सुप सातायें पडिलेडण चासे, साधु
जन्म का सीने ॥ २० ॥ १० ॥ रात जगारे महिसा
.
.

(10) श्रीसपर्मगध परीक्षा. जिन फरी जगजने यादों, दामोद यति धनोरा रनिडार रमणी सजी, जजी थाप मति रागो॥ टिरागे जमाली समो, नयी नाजस तागो ॥५॥ पक्षी श्राचार्य सावध जे, दुधगत ससारो॥ घटिरागे समतो पण थयो, महा निशोथ पियारो हुए जिनधर्म थाशातना, अनाण्यु कदे रगे। महथागळे जिनपरे, पदी जगई थगे॥७॥ गामना नटने मूर्यनो, मिल्यो जेदनो जोगो॥ दृष्टिराग मिल्यो तेहगो, कथक सेवक लोगो ।।।। आपण गोठमी मीचमी, दीने मन लागे । हानी गुरु पचन रखीयामणां, कटुक तीरसा यागाया टिरागे भ्रम उपजे, ज्ञान यधे गुणरागे। एहमा एक तुमे थादरो, नसो होय जे धागे ॥१॥ दृष्टिरागी कदा मत हुयो, सदा सुगुरु अनुमरजो।। वाचक जशविजय कहे, दित शिख मन परजो ॥११॥ ॥अथ कुगुरुनो स्वाध्याय॥ ॥ठेडो नाजी॥ए वेशी। शुरु सवेगी किरिया धारी, पण कुटिलाइन मूके। ' घाम प्रकारे किरिया पाले, थरयतरपी चूके ॥१॥ - S A -- MAL श्री सुधर्मग परीक्षा (७१) कपटी कहिया एह जिणदे, दुनु नाम न सीजे ॥ ए धाकणी पीसा कपडा सने धावसी, काख देखाडी घोले ॥ तरुणी सुदर देखी विशेपे, पुस्तक वाचवा खोले । क० ॥२॥ पेंडा देखी काढे पडघो, पडया मान करावे ॥ खाजा बहोरे खात करीने, पूरीने वोनि रावे ॥ २० ॥ ३॥ ज्ञान मियं उपदेश'दइने, सूक्ष्म परिग्रह राखे । ए कपटीनु नाम न लीजे, इम नसूत्र जे जाये । क० ॥ ४॥ नाउ कूटवा साथें हीडे, श्रा. विका वे दश पार || यात्राने मिप एणी परें विचरे, दूर रहा आचार ॥ क० ॥५॥पाशेर धीश्री करे पारणु, पती खावे अधशेर ॥ तोही ताना इणिपरें बोले, उपवासे थावे फेर । क०॥६॥ वगनानी परें पगला माडे, श्राडु डोदु जोवे । महिला साथै वोले मी, साधुवेप वगोवे ॥ ३०॥ ॥याचारागे वस्त्रनो जारयो, श्वेतने मातो पेनें । तेतो मारग रे मूस्यो, कपडा रंगे ने । कण्॥७॥वाजीगर जेम बाजी खेसे, धीरे माडी जाम ॥ ते सगी सूधामत जाणो, ए सटु श्राक्ष जजाय ॥०॥ ॥ उंचु घर थमोचर होवे, मासक- हातिहा कीजे । सुग्य सातायें पडिहण चाले, साधु न्म फल लीजें ॥ २० ॥ १० ॥ रात जगावे मदिखा 7

(30) श्री सुमंग परीक्षा
जिन करी जगजने श्रादपों, नामोद यति पूनम
रहि नडार रमणी तजी, जी भार मति रागो।।
दृष्टिरागे जमाती लामो, नवी नाज तागो ॥ ५ ॥
पली याचार्प सावध जे, हुश्रगत ससारो॥
दृष्टिरागे समतो पण थयो, मदा निगीय पियारो ॥६॥
हुए जिनधर्म याशातना, अनागयु कहे ग्गे।।
मद्ध थागळे मिनररे, पदी जगवर थगे ॥ ७॥
गामना नटने मूर्यनो, मिल्यो जेदो जोगो ।
हटिराग मिल्पो तेदयो, कथक सेवक लोगो ।।।
थापण गोठमी मीचमी, इनीने मन लागे।
झानी गुरु पचन रसीयामणा, कटुक तीरसा यागे॥णा
दृष्टिरागे भ्रम उपजे, ज्ञान वधे गुणरागे॥
पदमा एक तुमे थादरो, नसो होय जे धागे ॥१॥
घटिरागी कदा मत दुयो, सदा सुगुरु यनुपरजो ॥
पाचक जाविजय कहे, हित शिख मन परजो ॥१९॥
.
-
।। अथ कुगुरुनोरवाध्याय॥
डोनाजी। ए देशी॥
शुरू सवेगी किरिया धारी, पण कुटिलाइन के ।।
पाह्य प्रकारे किरिया पाले, थत्यतरपी चूके ॥१॥

- . श्री सुधर्मग परीक्षा (१) कपटी कहिया पद जिणदे, दुष्टर्नु नाम न खीजे ।। ए थाकणी पीता कपडा पने धावली, काख देखाडी घोले । तरुणी सुंदर देसी विशेपे, पुस्तक वाचवा खोसे ।क० ॥२॥ पेंडा देवी काढे पडघो, पडया मान करावे ।। खाजा पहोरे खांत करीने, पूरीने वोमि रावे ॥ २०॥ ३ ॥ ज्ञान मि उपदेश दश्ने, सूक्ष्म परियह राखे ।। ए कपटीनु नाम न खीजे, म उत्सूत्र ने नावे ।। क० ॥ ४॥ तास कूटवा साथें हीडे, श्रा. विका दश पार ॥ यात्राने मिप एणी परें विचरे, राधा याचार ॥ कपाशेर घोश्री करे पारण, पक्षी खावे श्रधशेर || तोही ताजा इणिपरें वोझे, उपगसे थावे फेर || क० ॥६॥ वगनानी परें पगलां माडे, धाडु डोदु जोवे । महिला साथै वोले मी, साधुवेप वगोरे । क०॥ ॥याचारागे वस्त्रनो नारयो, श्वेनने मानो पेनें ।। ततो मारग रें मूस्यो, कपडा रंग हेने।क० ॥७] बाजीगर जेम चाजी खेले, धीरे माडी जास ॥ ते सवेगी सूधामत जापो, ए सदु थाप जजाल । ० ए | उचु घर थगोचर होवे, मासक- तिहा कीजे ॥ सुग्व सातायें पडिलेहण चाटे, साधु जन्म फल ली ॥ २०॥ १०॥ रात जगावे महिला .

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(30) श्री सुधर्मगध परीक्षा
निन करी जगजने श्रादयों, इदा गोद सिनोमा
रनिंडार रमली सजी, नजामति गगो।।
दृष्टिरागे जमाती समो, नयी नाजस तागो ॥५॥
घसीधाचार्य सावय जे, हुई भगत ससाणे॥
दृष्टिसगे समतो पाप पयो, मदा निशीथ निारो ॥६॥
हुए जिनधर्म थाशातना, बनाएयु कह रगे।
मह थागळे जिनयरे, यदी गई थगे ॥७॥
गामना नटने मूर्यनो, मिल्यो जेदो जोगो।।
घटिराग मिस्पो तेदनो, कथक सेवक लोगो॥७॥
थापण गोठमी मीठमी, दीने मन लागे ।
झानी गुरु पचन रखीयामणा, कटुक तीरसा यागेका
दृष्टिरागेत्रम उपजे, ज्ञान वधे गुणरागे ।
पहमा एक तुमे थादरो, जसो होय जे धागे ॥१०॥
घटिरागी कदा मत हुयो, सदा सुगुरु अनुमरजो।।
पाचक जशविजय कहे, हित शिख मन धाजो ॥१९॥
॥अथ कुगुरुनो रवाध्याय॥
॥डोनाजी ॥ ए देशी ॥
शुभ सवेगी किरिया धारी, पण कुटिलाइन मुके।
पास प्रकारे किरिया पाले, थपतरपी चूके ॥१॥

. श्री सुधर्मगध परीक्षा (१) पपटी कहिया पद जिणदे, दुग्नु नाम न खीजे ॥ ए थाकणी पीता कपडा सने धावली, काख देखाडी घोखे ॥ तरुणी सुंदर देसी विशेपे, पुस्तक वाचवा खोसे ||क० ॥२॥ पेंडा देवी काढे पडघो, पडया गान करावे ॥ साजा यहोरे खात करीने, पूरीने वोमि राधे ॥ २० ॥ ३॥ ज्ञान मि उपदेश दइने, सूक्ष्म परिमद राग्ये ॥ ए कपटीनु नाम न लीजे, श्म उत्सून जे नामे । फ० ॥४॥ नार फूटवा साय दीडे, श्रा. रिका दश पार ॥ यात्राने मिप एणी परें विचरे, र रहा थाचार ॥ कण्॥५॥पाशेर धीश्री करे पारण, पसी सावे थधशेर ॥ तोही ताशा इणिपरें घोसे, उपमासे थावे फेर ।। फ० ॥ ६॥ घगमानी परे पगला माहे, थाडु लोदु जोये ॥ मदिया सा योसे मौतु, साधुषेप पगोवे ॥१०॥॥थाचारागे वस्त्रनो नांग्यो, साने मातो नै । तो मारग इरें मूस्यो, कपड़ा वर्ग में ॥१०॥6॥ पाजीगर जेम पाजी सेसे, धायरे मोटी नास ॥ ते मयेगी मुथामरा जापो, एस थार जगाधon॥ तुपा श्रमापर होणे, गासफ- Princi की। मुप सागायें परिसदप घा, साधु Teli 14101 रान जगारे महिमा +

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(30" श्री सुशर्मगध परीक्षा
निन करी जगजने घाटयों, इदा गोद अति पूनोमा
रनिहार रमणी सजी, नजो घार मति रागो।।
दृष्टिरागे जमाली सामो, नीना तागो ॥५॥
पली श्राचार्य सावध जे, दुधात ससारो॥
इटिरागे समती पण थयो, मदानिशीथ गिारो ॥६॥
दुए जिनधर्म थाशातना, अनागयु कहे रंगे ॥
मह थागळे जिनपरे, यदी नगर थगे ।।७।।
गामना नटने मूर्यनो, मिल्यो जेहतो जोगी।
दृष्टिराग मिल्यो तेदयो, कथक सेवक लोगो ॥७॥
थापण गोठमी मीमी, दीने मन लागे ।
हानी गुरु पचन रसीयामणा, कटुक तीरसा यागाला
दृष्टिरागेत्रम उपजे, ज्ञान यधे गुणरागे।
पदमा एक तुमे थादरो, नसो दोय जे थागे ॥१०॥
दृष्टिरागी कदा मत हुयो, सदा सुगुम अनुमरजो।।
पाचक जशविजय कहे, दित शिव मग घरजो ॥११॥
॥अथ कुगुरुनो रवाध्याप॥
॥डो नाजी ॥ ए देशी॥
शुरु सवेगी किरिया धारी, पण कुटिलाइन मूके।
पाय प्रकारे किरिया पाले, थरयतरची चूके ॥१॥

-NN
.
श्री सुधर्मग परीक्षा (१)
पपटी यहिया पद जिणदे, दुष्टनुं नाम न खीजे ॥ ए
चारणी॥वीमा कपडा सने धायसी, फाख देखाडी
पोख ॥ तरुणी सुदर टेनी विशेपे, पुस्तक वाचवा
सोश।क० ॥२॥ हा देगी काढे पडघो, पडया
गान फरावे । ग्याजा दौरे सात करीने, पूरीने बोमि
रावे ॥ ५० ॥ ३॥ शान मि उपदेश दइने, सूक्ष्म
परिपद राम्ये ।। ए कपटीनु नाम न खीजे, मसूत्र
ले जाये ॥ १० ॥ ४॥ नान कूटया सायें हीडे, श्रा.
शिरा दश पार ।। यात्राने मिप एणी परें विचरे,
भर रहा थाचार ॥ २० ॥५॥पाशेर घीधी करे पारणु,
पसी यो घमशेर ॥ तोदी ताशा इणिपरें योसे,
छपमेघा फेर ।। 20 ॥६॥यगानी परें पगलां
गाहे, पाटुं दोदु जोये ॥ मदिक्षा सा पोसे मीतु,
सापुरेप पगोये ॥ १०॥ थानारागे पस्सनोजाग्यो,
आमा ॥ रोगो मारगहरे भूम्यो, कपडा र
६॥4॥पाजीगर जेग पानी मेसे, धीरे
नही नामे मांगी मामा जाप, पसार यात्र
सना Conny पर रहो, मासप.
दि। मुरसाना सिहागाई,
साधु
Air In 2007 जगार मदिसा

Sajgiii0621 Shri Sudharma Gachha Pariksha

Author
Shri Brahmas
Title
Sajgiii0621 Shri Sudharma Gachha Pariksha
File name
Sajgiii0621 Shri Sudharma Gachha Pariksha
Text
OCR done
Citation
1912
Published
2011/07
Publisher
Kachha, Shrawak Deshji
Language
Sanskrit
Pages
98
Library
Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
DLI number
314448
Barcode
99999990313201.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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