Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Father Camil Bulke Ek Sant Sahityakar Ki Yad
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फादरकामिल बुल्ले एक संत साहित्यकार की याद - बाबा बुल्के : एक स्मृति मानरेसा हाउस रांची में बाबा कामिल चुल्के के साथ में तीन साल तक रहा । सन्यास-जीवन में वे मुझ से पूरे पतीस साल आगे थे। वह अक्सर कहा करते-'अब मैं बूढ़ा हो गया।' भोजनोपरान्त मानरेसा हाउस-संन्यास परिवार की गोष्ठी जमती और गपशप होती थी। मैं उनके साथ खूब चंचल स्वभाव करता था। कभी उनकी श्वेत दाढी पर मजाक छेड़ता, तो कभी उनके अस्त-व्यस्त परिधान की हसी उडाता। कभी उन्हें हंसी का पान सिद्ध करता तो, कभी खुद ही हंसी का पात्र बनता । मनोरंजन के इन क्षणों में वे मुझे 'बेटा' कह कर पुकारते थे । इससे अन्य धर्मभाई मुझे चिढाया करते। एक बार मैंने प्रश्न किया, 'पण्डितजी आप तो कहते हैं कि हिन्दी भारत की बहूरानी है और अंग्रेजी उसकी नौकरानी-तो लैटिन उसकी क्या लगती है ?' उन्होंने उत्तर दिया--'हाँ.. उसकी मौसेरी बहन की कोई वहन होगी।' तपाक से मैंने पूछा, 'तो आप लैटिन मे क्यों पूजा की प्रार्थना पढ़ते हैं ? वे पकड़े गए । झेंप मिटाते हुए उन्होंने कहा, 'क्योकि प्रार्थना-ग्रन्थ का हिन्दी अनुवाद अच्छा नही।' दमा की गोलियां पाते तो बड़ी हंसी आती थी ! मैं कहता, 'यह क्या, दवा की गोलियां आप गले से नीचे ऐसे उतारते हैं, मानों रही !' वे कहते, 'रात बहुत सराव बीती, कुछ भी आराम नहीं, अधिक काम नहीं कर सका । बाइबल का अनुवाद का काम बहुत वाकी है ।' मैं जोड़ देता, 'देखिए, वाइवल का काम पूरा किए बिना आपको स्वर्ग नही जाना है। वे कहते, 'मैं भी यही सोचता हूँ!' मैं कहता, 'इस दुनिया से जाते वक्त आप अपना बाइबल अनुवाद और अंग्रेजी-हिन्दी कोश लेते जाएंगे।' वे एक बच्चे को मरलता मे श्वेत दाढी के बीच हंस देते। मुगी पानी फादर अगापित तिर्को, एस.जे., सन्त स्तानिस्लास कालेज, सोतागद-हजारीबाग
फादर कामिल बुल्के
एक संत-साहित्यकार की याद
सम्पादक
शंकर दयाल सिंह
प्रकाशक
'मुक्तकंत'
डाकबंगला रोड,
पटना-१
PATHER CAMIL BULKE
EK SANT SAHITYAKAR KI YAD
Price: Rs. Fifteen Only
मुख्य वितरक
हिन्दी बुक सेन्टर,
आसफअली रोड, नई दिल्ली
तथा
पारिजात-प्रकाशन
डाकबंगला रोड, पटना-८००००१
प्रथम सस्करण : नवम्बर १६५
मूल्य : मान पन्द्रह रपये
।
प्रकाशक : 'मुक्तकंठ
डाक बंगला रोड, पटना-८००००१
सरस्वती प्रिटर्स, मेन रोड, गांधी नगर, दिल्ली-३१
अनुक्रम 6 7.-8 . 9-10 11--18 19-22 भूमिका-सम्पादकीय पहली और अंतिम मुलाकात : डॉ० कर्णमिह ‘स्व० बुल्के जी : डॉ. प्रभाकर माचवे राम मनेही ना मरे :प्रो० केसरी कुमार फादर, इस देश और भाषा की कृतघ्नता को क्या करें ? : श्रीमती शैल सक्सेना एक पुण्य स्मरण : डॉ. दिनेश्वर प्रसाद 'बाबा' के दो पत्र : श्री रघुनाथ प्रसाद 'विकल'. नही रहा वह हिन्दी का दधीचि प्रो० कृपाल सिंह फादर कामिल युल्के : मेरे मानस पिता : श्रीमती नीलम पाण्डेय “बाबा बुल्के : एक स्मरणांजलि मुधी नीलम फादर कामिल वुल्के : डॉ० कुमार मुरेश सिंह बावा धुल्के डॉ० श्यामसुन्दर घोप एक संत माहित्यकार की याद : शंकर दयाल सिंह 'मैं फूल और तुम सूर्य "ज्योति पुरुप कामिल बुल्के लिए : डॉ० अमर कुमार सिंह सन्दर्भ के लिए : एक पत्न. : 23-29 30-~-31 32--34 35--38 39-40 41-42 143-47 48-55 56-57 158-6i 62-64 : गजले -- .00 भूमिका प्रस्तावना सम्पादकीय 'फादर फामिल बुल्के : एक संत साहित्यकार को माद के बारे में विशेष कुछ" कहने की आवश्यकता नही समझता, क्योंकि उनके बारे गे इतना कुछ कहा गया है और आगे भी कहा जाता रहेगा कि वह सब मान नौपचारिकता न होकर, धरोहर है। वावा बुल्के, सत वुल्के, पिता वुल्के, फादर बुल्के और रामकथा के अमर. गायक बुल्के ! एक ही व्यक्ति के सन्दर्भ में इतने विशेषणों का एक साथ आना- किसी भी युग अथवा साहित्य अथवा साहित्यकार के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि है। 'एक संत साहित्यकार की याद' पुस्तक रूप में आपके सामने है. जिमको प्रेरणा मुझे डॉ० कर्ण सिंह द्वारा मिली, जो स्वयं साहित्य, अध्यात्म, संस्कृति और सामाजिक चेतना ने सजग प्रहरी है और जिन्होंने फादर कामिल बुल्के के वियोग को व्यक्तिगत क्षति के रूप में भी लिया है। 'विश्व हिन्दी प्रतिष्ठान' का योगदान इस पुस्तक के प्रकाशन मे अयाचित अनुराग है। और अन्त में उन लेखकों के प्रति विशेष कृतज्ञता ज्ञापन करना आवश्यक समझता हूँ, जिन्होंने मेरी प्रार्थना को अपने कर्तव्य के अन्तर्गत लिया। सरस्वती प्रिटर्स और दिल्ती प्रिंटर्स को सौजन्यता ने इसे स्थायी आकार देकर आप तक. पहुंचाया। फादर कामिल बुल्के के विशाल व्यक्तित्व पास में भी यह लघु-पुस्तिका नहीं है, लेकिन इसके पीछे हम सबों की श्रद्धाभाव का भादर आप अवश्य करेंगे, यह हमारी प्रार्थना है। सम्पादक मे वार्तालाप करने लगे। मैंने जब उसी बीच फादर कामिल वुल्के से पूछा मि आप "किस भापा में बातचीत कर रहे थे ? तो उन्होंने बताया कि यह मेरी माशुभा नेता था, तो वह भी शिष्ट मण्डल के एक मान्य सदस्य के रूप मे उस +4 मे 1976 में जब द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन में मैं भारतीय प्रतिनिधि Krt 2 'लगभग एक सप्ताह तक हम एकमाथ रहे और उस वीच फादर विद्वता, मोजन्यता तथा हिन्दी के प्रति उनके समर्पण-भाव को MR. किसी विदेशी व्यक्ति का भारत के प्रति, भगवान Nort कर हमारा रोमांचित होना स्वाभाविक था। हिन्दी १७ ... तुलमोदास के प्रति और राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति इम' +4 कामिल चलनअनास्यान केवल लेखन के बल * * * उसके बाद फादर बुल्के में मेरी अनेकों वार मुलाकात होती रही। म फादर कामिल वुल्के प्रथम और अंतिम मुलाकात -डा० कर्ण सिंह फादर कामिल बुल्के से मेरा प्रथम परिचय कुछ अजव परिस्थितियों मे हुआ, जबकि मैं ठीक से जानता भी नही था कि किनसे मिलने जा रहा हूं। 1967 में मैं जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल पद से सीधा केन्द्रीय सरकार में -पर्यटन मन्त्री मनोनीत हुआ और उसके दो-तीन महीने बाद बेलजियम के महाराजा बाद्वा का भारत आगमन हुआ और सरकारी परम्परा के अनुसार केन्द्रीय मन्त्री के रूप में मैं उनके साथ प्रभारी मन्त्री के रूप में नियुक्त हुआ। उनके विस्तृत कार्यक्रम मे रांची भी सम्मिलित था, जहां कई वर्षों से वेलजियम मिशन काम कर रहा है। रांची हवाई अड्डे पर उतरते ही अन्य गणमान्य नागरिकों तथा अधिकारियों के बीच मुझे एक दिव्य व्यक्तित्व दिखाई दिया-लम्बी दाढ़ी, धवल वस्त्र, आपाद मस्तक पवित्रता की मूर्ति, तावे और मोने का सम्मिलित रूप लिए चेहरा । उसी -समय यह परिचय कराया गया कि ये हैं फादर कामिल वुल्के । मैंने पहले से भी उनका नाम सुन रखा था। मेरा यह अनुमान था कि वेलजियम के शाह उनसे बेलजियम में प्रचगिरा “भापा फ्रांसीसी में बातें करेंगे, जिसे मैं भी समझ लेता। लेकिन वे किमी और भाषा 'फूलेमिश है। मौका मिला। कारण भी बना लिया था।
८ मुझे उनके साहित्य के विशद अध्ययन का मौका नहीं मिला लेकिन उनके द्वारा सम्पादित 'अग्रेजी-हिन्दी कोष' को मैं वरावर अपनी टेवुल की दराज में रखता हूं और प्रामाणिक रूप से जब कभी आवश्यकता होती है उसका प्रयोग करता हूं। फादर कामिल पुल्के से मेरी आखिरी मुलाकात इमी वर्ष 23 अप्रैल, 1982 को रांची में उनके निवास स्थान पर तथा एक अन्य समारोह में हुई। मैं 1957 के सुप्रसिद्ध स्वतन्त्रता मेनानी वायू कुंवर सिंह की जयन्ती के अवसर पर रांची में एक समारोह में भाग लेने गया था, हवाई अड्डे पर उतरते ही मैंने यह जिज्ञासा प्रकट की कि फादर कामिल बुल्के से मिलने जाऊंगा क्योकि मैंने सुना था कि वे अस्वस्थ हैं । आयोजको ने मुझे यह मूचना दी कि वुल्के साहब आज के समारोह में आने वाले है, अतः वहा मुलाकात होगी । लेकिन मेरा मन नहीं माना और मैं सीधा हवाई अड्डे में फादर कामिल बुल्के से मिलने उनके निवास स्थान पर गया जहाँ अन्य मिश्नरियों के साथ वे रहते थे । जहां तक मुझे स्मरण है उनके आवास के बगल में ही एक चर्च भी था। फादर कामिल बुल्के जिस उत्साह, प्रेम और अपनापन के साथ मुझसे मिले उसका वर्णन करना कठिन है । उन्होने मुझे बाहों में भर लिया और अपनी छाती से लगा लिया तथा उनकी सफेद दाढी मेरी पीठ पर झूलने लगी। उसके बाद लगभग आधे घण्टे तक मैं उनके पास रहा । हिन्दी के सम्बन्ध में ही अधिकांश बात होती रही । मुख्य रूप से उन्होने तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन तथा राष्ट्रभापा के सामने अन्य संकटो की चर्चा की और मुझे बार-बार कहते रहे कि मैं जो कुछ हिन्दी के लिए कर रहा हूं उसने राष्ट्र भाषा को बहुत अधिक बल मिल रहा है। मैने उस मुलाकात में यह पाया कि डाक्टर कामिल बुल्के अतिशय वृद्ध नजर आ रहे हैं और अस्वस्थ भी । मैंने उन्हें वार-बार यह भी कहा कि आप यहाँ से दिल्ली चले चलें जहाँ उचित उपचार की व्यवस्था होगी। मेरा ख्याल है कि यदि उमी समय मेरी प्रार्थना मानकर दिल्ली चले आते तो शायद उनके रोग पर काबू. पाया जा सकता था। 23 अप्रैल,1982 की सध्या समय यावू कुवर सिंह जयती में मैं मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुआ था और मुझे खुशी है कि उस समारोह का उद्घाटन फादर कामित बुल्के ने किया। जिस सौम्य, मर्यादित, गम्भीर और विषय के अनुरूप उन्होंने भाषण दिया था वह अभी तक मेरे कानों में गूंज रहा है। यही थी मेरी फादर कामिल वुल्के से आखिरी मुलाकात, जिस स्मृति को मैं कभी भूल नहीं सकता। मानसरोवर न्याय मार्ग, चाणक्यपुरी नई दिल्ली स्व. बुल्के जी --डा. प्रभाकर माचवे. मैंने एक बार इलाहाबाद में एक गोष्ठी में कामिल चुल्के को 'हनुमान' कह दिया था। वे लाल-लाल हो उठे थे । गोरे तो थे ही। केरल में हनुमान दाढ़ी वाले होते हैं, कथकलि में। यह विरद मैंने उन्हें दो कारणों मे दिया था। एक तो वे विश्व-विश्रुत राम-भक्त थे। दूसरे वे इस मूच्छित हिन्दो-शोध प्रदेशीय राम-कथा का पूरा पर्वत उठाकर ले आये। अब आप जो चाहो तो जड़ी-बूटी उसमें से खोज लो। 'हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता।' युल्के जी से मिलना अक्सर सभाममारोहों में ही होता था-क्या प्रयाग, क्या दिल्ली, क्या नागपुर, क्या कलकत्ता, क्या और कही। इधर तो सुनने की मशीन लगाकर बैठते थे । पर जब उनकी श्रवण शक्ति अच्छी थी, तब वे एकवार मेरे घर दिल्ली में पधारे थे । 'राम कथा का विकास' की एक संबद्धित संशोधित प्रति देने । तव मेरे श्वसुर पारनेरकर (जो गांधी जी के साथ आजीवन रहे) जीवित थे । वुल्के गांधी जी की रामायण में रुचि के बारे में बड़ी देर तक पूछते रहे। बुल्के जिज्ञासु थे, भक्त थे, आत्तार्ती थे, ज्ञान पथ के सहप्रवासियों के दिशा- दर्शक यन थे, सेवाव्रती थे, अत्यन्त सादगी-पमन्द थे । और अपनी आखें और कान बरावर खोले रखते थे। अपने धर्म में दृढ़ थे, पर असहिष्णु नही थे । और मव धो के विचारों को जानना चाहते थे । वे विलक्षण धुन के व्यक्ति थे । कोश जैसे कार्य अकेले संपन्न करना उनके बल-बूते का काम या विलक्षण 'निश्चयात्मिका बुद्धि' और संकल्प की शक्ति के साथ-साथ सौम्यता और शातीनता उनमें कूट-कूटकर भरी थी। एक वार कलकत्त को किसी गांधीवादी संस्थान ने उन्हें विमान से बुलाया। व्याख्यान उनका और मदर टेरेसा का रखना चाहते थे। जब वे आ गये और मेंट लेपियम सेमेनरी में ठहरे थे तो में मिलने गया। उक्त आमनमः मन्जन ने कहा- हमने तो तार भेज दिया या प्रोग्राम कन्सिल हो गया था। बाद में उन्हें किराया भी इस संस्थान ने नहीं दिया। ये बहुत दुखी थे। पर गांधी के तीन यन्दरों को बात कहकर बोले- मैं अब कान में मुनता कम है। भव मुंह पर भी दोनों हाथ र लूंगा। - - वुल्के जी हिन्दी के आग्रही थे। कई वार सम्मेलनों मे, सरकारी जमाखडा मे, और सब अफ्सर (हिन्दुस्तानी) अपनी-अपनी अंग्रेजी छांटते रहते तो वुल्के प्रखर वाणी मे केवल हिन्दी मे वोलते । आखिरी बार उनसे मिलना हुआ कलकत्ते में एक बडे रेलवे हिन्दी सलाहकारी समिति के समारोह मे। शिवसागर मिश्र ने उन्हे और मुझे विशेप वक्ता के नाते बुलाया था। वे नपा तुला वोले, पर उनका आशय यही था कि हिन्दी भारत के जन साधारण की भापा है। उसकी अपेक्षा भारत के जन-मन-गण की उपेक्षा है।' वुल्के जी पर एक अभिनन्दन ग्रंथ रांची में तैयार हो रहा था। मैंने उसके लिए एक लेख लिखा । वह डाक मे खो गया। दुवारा लिखा । रांची को लेकर वे खुद काफी मजाक अपने ऊपर करते.--"हां, पागलो के बीच रहकर मैं स्वय आधा पागल हो गया हू।" इलाहाबाद के विश्वविद्यालय के दिन उन्हें बहुत याद आते थे । धर्म- वीर भारती, रघुवंश, रामस्वरूप चतुर्वेदी, जगदीश गुप्त, गंगा प्रसाद पाण्डेय-ये सभी उनके साथी थे। तब 'परिमल' नया-नया जुटा था। मैंने उसमे कई निबंध पढ़े है। मैं बोलने जाता तो उसमे वुल्केजी अवश्य शामिल होते । उनकी बड़ी इच्छा थी कि मराठी के एकनाथी आचार्य-रामायण का अनुवाद मैं हिन्दी मे विहार राष्ट्रभाषा परिषद के लिए कर दूं। वह बड़ा श्रमसाध्य और समश्लाघ्य कार्य है। राष्ट्रभापा परिपद को कई बार लिखा वे मुझे कन्ट्रक्ट लिखकर भेजे । वे कहते हैं पहले मैं पूरा अनुवाद करके उन्हें भेजूं। उसके बाद वे चाहेगे तो छापेंगे या नहीं छापेंगे। चाहेगे तो पारिश्रामिक देंगे या नहीं देंगे। ऐसा किसी संस्थान ने मेरे साथ आज तक नहीं किया। मैंने वुल्केजी से कहा-वे हसे । वोले- 'अव मेरा वहां कोई जोर नहीं रहा। सब हिन्दी की साहित्य सस्थाए ऐसी ही हो गयी हैं। हिन्दी साहित्य सम्मेलन इलाहा- बाद और नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी का हाल बेहतर नहीं।' उनका ददं यही था कि हिन्दी को संस्थाएं खा गई। - भारतीय भाषा परिपद शेक्सपियर सरणी, कलकत्ता राम सनेही ना मेरे प्रो० केसरी कुमार उस दिन (8-8-82 को) अज्ञेय जी, इला जी, डा. विद्यानिवास मिश्र, श्री प्रफुल्लचन्द्र ओझा 'मुक्त' और हम फादर कामिल बुल्के को देखने कुर्जी होली फैमिली अस्पताल गये । मालूम हुआ कि तिमजिले पर है। हम लोगों के पाव बढ़े ही थे कि एक व्यक्ति ने बताया कि बीमारी को गम्भीरता के कारण अभी थोड़ी देर पहले सवेरे के हवाई जहाज से उन्हें दिल्ली भेज दिया गया है। हम लोग उदास पास की उमडती गंगा को देखते रहे। फादर कामिल बुल्के इमी गंगा की तरह पवित्र थे और इसी गंगा के तट से खुलनेवाली बस में उनसे मेरी पहली भेंट हुई थी। आज से लगभग तीस साल पहले । मेरा तबादला पटना कालेज मे रांची कालेज में हुआ था और वे वही संतजेवियर्स कालेज में हिन्दी और संस्कृत के विभागाध्यक्ष थे। हम दोनो रांची जा रहे थे और मेरी सीट उनकी बगल में थी। उनके हाथ में हिन्दी की एक ऐसी किताब थी कि मैंने अनुमान लगा लिया कि ये जरूर फादर बुल्के हैं । लम्बा कद, छरहरा शरीर, स्वच्छ सोने से भी अधिक सुन्दर सुनहरे वाल, आंखों में भूरा संन्यास, एक आदमकद सौम्य आकृति । बात मैंने ही शुरू की-फादर, मैं केसरी कुमार हूँ। उन्होंने हिन्दुस्तानी अन्दाज में, विना कन्धे उचकाये, हसने के अन्दाज में ओठ खोले, किताव रखी, छाती पर की जेब से सुनने का यन्त्र निकाल कर समा- योजित किया (वे तब भी यन्त्र के सहारे ही सुन पाते थे) और हमारे दोनों हाथों को अपने दोनों हाथों में लेकर इकझोरने लगे-केसरी कुमार, हमारे सहयोगी, राची में आये आपको इतने दिन हुए और हम लोग राची में न मिलकर बस में मिल रहे है, पर हम संन्यासियो को क्या, जैसा घर, वैमा बम । और जानते हैं, मिलने का समय भी निश्चित रहता है। तभी बस ने भोपू वगाया और आगे सरकी, पर कुछ हो दूर आकर रुक गई। एक चक्के की हवा रिस रही थी। अव चक्का बदलना पड़ेगा । मैंने विनोद से कला-घर और बम का फर्क देख लिया न । बस है बेबस । मेरे एक मित्र ने कबीर की ओर से एक पेरोडी वनाई है-चलती को गाडी कहे, बने दूध को खोया। बेबस को जो बस कहे देख कवीरा रोया। आसपास के सह- यानी हंस पड़े और फादर तो लोटपोट हो गये। बोले-कबीर दास हममे बड़े सत थे, पर परवाह मत कीजिए, हम इन्जीनियर होते-होते सन्यासी हुए है। हमनें, पान । - पाने को गरज से उतरने की इजाजत मांगी तो हाय दवाते हुए बोले-~-पान ही पोजिएगा, भोजन अगले पड़ाव पर होगा। मैंने भी छूटते हो कहा-हजारी प्रमाद द्विवेदी ने एक बार पटना रेल्वे स्टेशन पर जब यह लतीफा सुनाया या तव नलिन विलोचन शर्मा ने धीरे से कहा था-वे मज्जन शायद बतिया के घे थोड़ी देर बाद चम चली और फाई पड़ायों पर एकती हुई दोपहर के भोजन के लिए एक जगह सकी । एक छोटे-मे नाश्ता-डब्बे में बिस्कुट निकालते हुए बोले--- लेंगे एक, पलें या विस्कुट है । अच्चा है (तब वे छ' का उच्चारण 'च' को तरह फरते थे)। धन्यवाद देते हुए मैंने कहा कि घर से खाने का सामान ले आया हूँ, बल्कि आप ही कुछ लें, बहुत अधिक है। उन्होने एक हाथ को पेट पर रखते हुए कहा--ओ, आपको नहीं मालूम होगा कि मेरे पेट में अल्मर है। कान मे घाव, पेट में घाव । भगवान ने दो पहरेदार बैठा दिये हैं और हिदायत कर दी है कम सुनो, फम खाओ। और मुझे महासंत स्वामी शरणानन्द मे, जिनके सम्पर्क धया गिरफ्त में मैं रांची-प्रवाम में आ गया था, सुनी हुई भगवान के आशिकों की परि- भापा याद आ रही थी- इन्तजारी, बेकरारी, बेसवर आह सर्दो, रंग जदों, चश्मतर कम खुरो, फम गुफतनो, एवाबे हराम आशिफारा, नवनिशां, ऐ पिसर। हम फिर वम में थे और अव हजारीबाग के संत कोलम्बस कालेज के सामने थे। हवा ठंडी हो चली थी। कालेज की इमारत से कोई झांक नही रहा था पर मुझे वरवस लग रहा था मानो उस प्रशस्त भवन की सुरुचि और सादगी के हर पहल से एक व्यक्ति का समर्पित कृतित्व झाँक रहा है और वह व्यक्ति है प्राचार्य मारखम । उनके शरीर और वस्त्र के रग हिन्दुस्तानी होकर भवन में एक हो गये हैं। प्रिंसिपल मारयम और फादर कामिल बुल्के, दक्षिण विहार में कार्यरत ये दोनों विदेशी हिन्दी के निश्छल हिमायती थे। मारखम साहब को हिन्दी बोलने में कष्ट होता था पर विश्वविद्यालय को अधिपद मे जहां अनेक बिहारी भोजपुरिया या दरभगिया लहजे में विद्रूप अंग्रेजी बोलते थकते न थे, वे हिन्दी में हो बोलना पसन्द करते थे। फादर बुल्के यदि 'छ' का उच्चारण 'च' की तरह करते थे तो मारमन साहव दीर्घ को प्राय: लुप्त कर देते थे, खास फर हूँ का उच्चारण लम्बा और तान कर करते थे। मारखम साहब गृहस्थ होकर संन्यासी थे। धाम की रस्मी से बुनी खाट पर सोते थे। फादर बुल्के सन्यासी होकर गृहस्थ थे। लड़को का पता-ठिकाना रखते थे, किस लड़के को फीम चुकाने में दिक्कत हो रही है, कि किस किताव की जरूरत है. सबका हिमाव रखते थे। - - १ , रांची पहुँचते-पहुँचते बस एक बार फिर खराब हुई। बुल्के साहब ने मेरे कान में कहा-अब मैं इंजीनियर बनने का अभिमान नहीं करूंगा। मैंने सड़क के नीचे बह रही एक पतली नदी के किनारे बने आश्रम की और उनका ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि इस आश्रम मे पागल वाया रहते हैं। वे भी कभी एक अच्छे मैकेनिक थे। इसलिए आप कप्ट न करें तो भी काम चल जायेगा। फादर बच्चों की तरह हँसे-~अरे, तब तो वे हमसे वरीय इजीनियर है, चलिए उन्हें नमस्कार कर आया जाय । पागल बाबा राम-प्रेमी है न ? मैंने कहा-तभी तो बाबा पागल बाबा हुए। कवीर ने तो कहा ही है-- राम वियोगी ना जिवं, जिव तो बोरा होई । फादर कुछ गम्भीर हो गये-वे यहाँ भी हममे वरीय हैं। मैं तो न मुक्त हुआ, न पागन । पर मैं राम-स्नेही हूँ जो कभी नही मरता । रांची पहुँचकर हम लोग अलग-अलग हुए पर तवसे अधिक पास-पास रहे। उनकी 'राम-कथा' मैं पढ़ गया था और चमत्कृत भी हुआ था कि जो काम आदि- काल के लिए महापंडित राहुल सांकृत्यायन कर गये वही काम रामकथा के प्रसग में डा. बुल्के ने कर दिखाया, पर बहुत जगहों पर मुझे शंका और आपत्ति हुई थी। कई बार मुझे लगा था कि यह इसाई दृष्टि से, औपनिवेशिक पकड से ग्रस्त है। राधाकृष्ण (प्रेमचन्द के प्रिय और अपने समय के मुप्रसिद्ध कथाकार जो घोप-बोस-बनर्जी-चटर्जी के नाम से भी कहानियां लिखकर धूम मचा चुके थे), सुरेशप्रमाद (जो राची महिला महाविद्यालय के संस्थापक अग्रणी तथा एक समाज- वादी चिन्तक थे) और हम तीनो हर शाम कही-न-कहीं मिल बैठते थे प्रायः विनोदाश्रम के पास निताई वाबू के चाय-घर मे । ढेर सी बातें होती, साहित्यिक- गैर-माहित्यिक । इस गोष्ठी मे 'रामकथा' भी अनेक बार चर्चित-परिचित हुई थी। कई-कई बार यह गोष्ठी स्वयं फादर बुल्के के अध्ययन-कक्ष मे या. उनके सामने वाले बरामदे में बैठी थी और यही समाधान हुआ था कि रामकथा, पूर्व निश्चित की खोज नही, सत्य के संधान की एकांकी यात्रा है तथा जहाँ हम पूर्व- नियोजन देख रहे थे, वहाँ हम ही अतिरंजित एव असहज दृष्टि बनाये हुए थे। फादर बुल्के के साथ अनेक गोष्ठियो और सम्मेलनों में भाग लेने के अवसर मिलते रहे है और हर सम्पर्क मुझे पवित्रतर कर गया है। वे तुलसीदास के विपक्ष मे आलोचना सुन नहीं सकते थे। उन्हें लगता ही नहीं था कि कोई विवेकशील आदमी तुलसीदास के विरुद्ध कुछ कह सकता है। सो एक बार राची कालेज की तुलमो-जयन्ती में जब हमारे एक कनीय सहयोगी श्री नागेश्वरलाल (अब डा० और वरीय रीडर) ने तुलसीदास पर कुलीन अत्याचारों के अनेक आरोप लगाए, डा० . फादर कामिल बुल्के दोनों हाथ कानों पर रखकर सिर घुनते रहे और चलते समय . नाटकीय ढंग से बार-बार सभा-भवन को प्रणाम करते हुए बोले--यह भवन धन्य है जहां ऐसा भापण मुनने को मिला। पटना में वे संतजेवियर्म स्कूल में अन्य फादरों के साथ अपने ढग से ठहरते थे, इसलिए यहाँ समारोही में उनको ठहराने की चिन्ता किसी को नहीं होती थी। इसके कारण उन्हें अमुविधा भी हो जाती थी। वे विहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थायी समिति के मनोनीत सदस्य थे। एक बार तुलसी जयन्ती समारोह में आये । सम्मेलन ने बदस्तूर उन्हें रेल यात्रा का भत्ता दिया। यह तो बाद को पता चला कि कारणवश वे हवाई जहाज से आये थे। 1975 के विश्व हिन्दी सम्मेलन नागपुर मे, फादर बुल्के एक विशेष हैसियत से सम्मिलित हुए थे। वे एक साथ ही दो देशों, बेलजियम और भारत का प्रति- निधित्व कर रहे थे। मैं भी गया था। उसमें सात विचार गोष्ठियां हुई थीं । एक विचार गोष्ठी के अध्यक्ष मंडल में फादर बुल्के थे और एक गोष्ठी मे मैं था, पर मुझे फादर बुल्के वाली गोष्टी में भी वोलने को आमन्त्रित किया गया था। यह गोष्ठी पूर्ण अधिवेशन के प्रातःकालीन सत्र में 12 जनवरी को हुई थी, मुख्य पंडाल में। इस गोष्ठी के अध्यक्ष मंडल में थे श्री पी० वी० नरसिंहराव, डा० फादर कामिल बुल्क तथा प्रो० अली एहसान (बंगला देश)। सचालन भगवतशरण उपाध्याय ने किया था। वक्ता थे सर्वश्री गुलावदास व्रोकर, एन्जोतुधियानी, (इटली) डा० श्री शिवमंगल सिंह सुमन, जैनेन्द्रकुमार, श्रीमती निर्मला देशपाडे, केसरी कुमार, बशीर अहमद मयूख, कमला प्रसाद मिश्र (फीजी)। अध्यक्षीय भाषण में फादर बुल्के ने कहा था कि भारत एक धर्म-प्रधान देश है किन्तु धर्मपरायणता के कारण उसके साहित्य मे एकांगीपन नहीं आया है वरन सर्वत्र उच्च मानवीय मूल्यो का संतुलन ही पुष्ट हुआ है । उदाहरण के लिए रामायण मे जीवन के प्रति उदासीनता नहीं है, उसमे मानव मूल्यों का सुन्दर समन्वय है, धर्म और भौतिकता का वह सुन्दर संतूलन है जो भारतीय सस्कृति की विशेषता है । इस प्रमग में एक बड़ी बात उन्होंने यह कही थी कि संतुलन और समन्वय की विशेषता रखनेवाली भारतीय संस्कृति को हिन्दी के द्वारा ही विश्व तक पहुंचाया जा सकता है क्योंकि आज की हिन्दी भारत की सामाजिक संस्कृति के लिए अधिक उपयुक्त है किन्तु भारतीय सस्कृति विश्व मे तब तक प्रतिष्ठित नहीं हो सकती जब तक हिन्दी अपने देश में प्रतिष्टित नहीं होती। इसमें बड़ी बाधा भारत के अधिकाश बुद्धिजीवियों और उच्च मध्य वर्ग के लोगो को अग्रेजीपरस्ती तथा प्रादेशिक वोलियों को अनावश्यक अधिक महत्व देना है। भापण समाप्त हुआ था, उन्होंने चिकाटी काटते हुए कहा था-"खूब अच्छा कहा", मैं तो उनके उस दिन के भाषण से अभिभूत हो गया, हालाकि जब मेरा पर सच बात यह थी कि उस दिन सबमे प्रभावकारी भापण बुल्के का था।
वमे, वे सर्वाधिक भावविभोर होकर वोले दो रोज वाद यानी 14 जनवरी को उस दिन वर्या का कार्यक्रम था--राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के प्रागण में विश्व- हिन्दी विद्यापीठ का शिलान्यास और गोस्वामी तुलसीदास को प्रतिमा का अनावरण तथा इसके बाद पवनार के ब्रह्मविद्या मन्दिर में आचार्य विनोबा भावे के तथा तदनन्तर सेवाग्राम में गांधी जी को कुटी के दर्शन एवं प्रार्थना। तुलसी-प्रतिमा (तिलक राष्ट्रीय विद्यालय के आचार्य कलाकार श्री पधे गुरू जी द्वारा निर्मित) का अनावरण करते हुए फादर बुल्के ने एक लिखित भापण पड़ा था कि हरि की तरह तुलमी की महिमा भी अनन्त और शब्दातीत हैं- सब धरती कागद कही, लेखनि सब बनराय । सात समुद को मसि करूं, तब गुन लिखा न जाय ॥ पूरे कार्यक्रम में वे एक औपनिषदिक ऋषि की तरह लग रहे थे। कितना पवित्र अनुभव था उनके मंग में रहना । एक वार हनुमान जी की बात चली जिन्हें वै पर्वतीय, छोटा नागपुरियों को जाति के आदिवामी मानने के पक्ष में थे। मैंने बात की गम्भीरता को तरह देने की गरज में कहा--फादर-मैं केसरी कुमार हूँ जिसका एक अर्थ होता है हनुमान । फादर कुर्मी छोड़कर खड़े हो गये-अरे हनुमान जी। आप तो मेरे गुरू के राम के भक्त हनुमान, हनुमान के भक्त तुलसीदास और तुलसीदाम का भक्त बुल्के । आज मोचता हूँ तो लगता है कि यह छोटानागपुर भी खूव है जिसे देखकर चैतन्य महाप्रभु को वृन्दावन का भ्रम हो गया था और जिसमें फादर बुल्के को किष्किन्धा दिख गई थी। हम लोगों के बीच विनोद का एक और विषय था--नई कविता । वे मानते ही नहीं थे कि कविता नई या पुरानी होती है। कहते-कविता अच्छी या खराब हो सकती है, नई-पुरानी क्या। एक बार लक्ष्मीकान्त वर्मा की पुस्तक "नई कविता के प्रतिमान" लेकर वे मुझे ढूढते रहे और इस हिदायत के -साथ पुस्तक देकर के ही रहे कि अगर कुछ समझिए तो बताइयेगा। नई कविता पर होने वाली बहस में पहले तो मैं उनका पक्ष लेता, जैसे, यह कहता कि फादर, आपका कहना भी एक प्रकार से ठीक है। देखिए न, मानव का एक शाब्दिक अर्थ होता है वह जीव जो नया नहीं होता अर्थात् सनातन होता है। पर फादर, कागज नया होता है, रोशनाई नयी होती हैं, कलम नयी होती है, शब्द नये होते हैं, रोज नये नाम से आदमी पैदा होते हैं, तो कविता नयी क्यों नहीं हो सकती ? वे इन्हे अतुलनीय कहते और मैं योजनावश इन्हे. परम तुलनीय मानता हुआ - फुत- झड़ियों छोडता रहता। रेवरेण्ड फादर डाक्टर कामिल बुल्के एस० जे०, विशारद, एम० ए०, डी० फिल०. का जन्म 1 सितम्बर 1909 ई. के बेलजियम को वेस्ट-क्लेण्डर्स नामक प्रान्त में 'कैरेम्स चंपल' नामक स्थान में हुआ। लुदेन विश्वविद्यालय में, जो वेलजियम का सर्वप्ट विश्वविद्यालय कहा जाता है, इन्जीनियरिंग से स्नातक हुए, 1930 में और 1930 में ही कयलिकों के जिसिविट संघ में जो विद्याव्यसन और कठोर अनुशासन के लिए विख्यात है सम्मिलित हो गये। इनके अन्तंगत वर्षों तक शिक्षण-प्रशिक्षण चला। जर्मनी में तीन वर्ष रहकर विभिन्न दगंनों का शास्त्रीय अध्ययन किया और फिर सपेक्षवाद को समझने के लिए उच्चगणित पढ़ा। तदनन्तर संघ के नियमानुमार उन्हे अध्यापन कार्य करना था। इसी नियम के तहत वे अपने मनपसन्द वैश भारत भेजे गये । यहाँ आकर सर्वप्रथम दागितिंग और गुमला में अध्यापन किया। मन में हिन्दी और सस्कृत जानने का अनुराग जगा और फिर तो अध्यापन के साथ अध्ययन का वह सिलसिला चला जो जीवनपर्यंत चलता रहा। भारतीय धर्मशास्त्र के अध्ययन हेतु चार साल कुसियांग मे रहे । धर्म की शिक्षा समाप्त कर लेने पर पुरोहित के रूप मे इनका अभिषेक किया गया। 1940 में विशारद हुए : फिर कलकत्ता विश्व- विद्यालय से संस्कृत लेकर बी. ए. किया तथा 1945 मे इलाहायाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम० ए० । 1949 मे इसाहाबाद विश्वविद्यालय ने आपके रामकथा उत्पत्ति और विकास विषयक शोध प्रवन्ध पर डी० फिल० की उपाधि दी। तदोपरात संतजेवियर्स कालेज मे हिन्दी विभागाध्यक्ष हुए और स्थायी तौर पर राची मे रह गये। आपकी लिखी किताबों में प्रमुख हैं-~(1) मुक्तिदाता, (2) संतलुकस के अनुसार येशु श्रीस्त का पवित्र सुसमाचार, (3) रामकथा, (4) नील पंछी (मेटर लिंक के प्रसिद्ध नाटक ब्लू बर्ड का रूपान्तर), (5) अग्रेजी-हिन्दी कोश, (6) द हिन्दी साल्टर। इस अन्तिम पुस्तक की बहुत याद आ रही है। फादर बुल्के के सम्मान मे एक अभिनन्दन ग्रन्थ निकालने की राची के कुछ साहित्यिक मित्रों ने एक योजना बनाई थी। मुझे उक्त ग्रन्थ के लिए एक लेख लिखना था। तब तक यह पुस्तक' प्रकाशित हो चुकी थी। फादर बुल्के ने उसकी एक प्रति मुझे डाक से भेज दी थी। बदस्तूर उस पर उनके बडे-बडे अक्षरो मे लिखा था-प्रो० केसरी कुमार को सप्रेम का० 20-1-82 ! यह पुस्तक वाइविल के स्त्रोतों का हिन्दी अनुवाद है और मुख्यत उन पादरियों और धार्मिक व्यक्तियो के लिए तैयार किया गया है जो हिन्दी में प्रार्थना करना चाहते है। यह पुस्तक जैसे फादर बुल्के के उस वादे की स्वर्ण-जयन्ती स्मारिका हैं जो उन्होंने राची के आर्क विशप पी० करकेटा के साथ जिसस संघ में पचास साल पहले किया था। इस पुस्तक की शब्दावली में मैं उनका अभिनन्दन करना चाहता था। पर तभी वे बीमार पड़े, गग्रीन हुआ और अचानक यह दुखद समाचार मिला कि 17 अगस्त को दिल्ली स्थित भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में उनका देहावसान हो गया। आज उसी की शब्दावली मे तर्पण कर रहा हूँ। विधि का विधान ।
इंधर वे कहने लगे थे कि वाईविल के अनुसार उत्तर की आयु के बाद आदमी का जीना अनिश्चित है। मैं तो तिहत्तर का हो गया। और, जमे अन्तिम याता की वे 'पूरी तैयारी कर चुके थे । उपर्युक्त पुस्तक के अनूदित स्तोत्रों मे से उनकी अत- यात्रा की धीरे-धीरे गुम होने वाली पदचाप सुनाई पड़ती है, ते कोई संगीत मभा उठ जाय और वातावरण में संगीत की झनकार, आलाप की अनुगूज, मादकता बनी रहे, जमे अधेरे में कोई ट्रेन गुजर जाय । खाते-पीते घर में पैदा हुए। माता-पिता का स्नेह मिला। माता को बड़ी श्रद्धा से याद करते । कहते, वह अब भी हमे मच्चा ममझकर मामान और नसीहत भेजती रहती हैं। उनके मरने पर वे गांव गये थे और लोटने पर बताया था कि भारत की तरह वेलजियम में भी श्राद्ध के अवसर पर दरिद्रनारायण के लिए मोटी- मोटी रोटियां बनती थीं पर इस वार कुछ नहीं बना। पूछने पर मालूम हुआ कि मिखमंगे रोटी लेने नहीं जाते, मिसमगे है ही नहीं। सर्वश्रेष्ठ विद्यालय में शिक्षा पाई। इन्जीनियर हुए। पर उनका मन तृप्त नही हुआ। इससे आगे के जीवन की अन्तकया की कल्पना मैं इस प्रकार करता हूँ-जिन्दगी सन्तप्त भूमि की तरह फैली रही। ऐसे मे प्याम जगी उपकी जो मरु को बादल बनाता है। तगा-- मनुष्यों पर भरोसा रखने की अपेक्षा प्रभु की शरण जाना अच्छा है। उसी ने अब तक मुझे संवारा है.--- कारीगरों ने जिस पत्थर को निकाल दिया था, वह कोने का पत्थर बन गया है। यह प्रभु का कार्य है। इन्जीनियर बुल्के तत्क्षण धर्म-संघ में प्रवेश करते हैं। तनाव विश्राम पाता मे लेटकर निश्चित सो जाता और सकुशल जगता हूँ क्योकि प्रभु मुझे संभालता है। यह नवयुवक पादरी रोगी है, पर मरना नहीं चाहता, प्रभु के काम के लिए. जिन्दा रहना चाहता है, बल्कि यही मनोबल उसे जिन्दा रखना चाहता है, बल्कि यही मनोवल उसे जिन्दा रखता है- मैं नहीं महंगा, मैं जीवित रहूंगा और प्रभु के कार्यों का बखान करूंगा प्रभु ने मुझे दण्ड दिया, किन्तु उसने मुझे मरने नहीं दिया। पादरी बुल्के जीवन के हर काम को भगवान की पूजा समझ कर करते रहे। साहित्य को साधना को, प्रभु प्रदत्त साधन और क्षमता के कारण, उसके प्रति अपना 1 -सबसे बड़ा दायित्व मानते हैं। अपना पूरा जीवन उमे अर्पित करते हैं। बहुत यश और सम्मान पाते हैं। पर, उनकी महजता में अन्तर नही आता । कालक्रम से शरीर क्षीण हो गया है, वाल पक गये हैं पर साधना अखंड चल रही है । अगर प्रार्थना है तो यही कि- ईश्यर मुझे युवावस्था में तेरी शिक्षा मिली है, मैं अब तक तेरे महान कार्य घोषित करता रहा। प्रभु अव मै बूढ़ा हो चला, मेरे केश पक गये, फिर भी मेरा परित्याग न कर, जिससे मैं इस पोढ़ी के लिए तेरे सामर्थ्य का, भावी पीढ़ियों के लिए तेरे पराक्रम का बखान करूं । मनीपी पादरी याइविल की औसत आयु से अधिक जी चुका है। कुछ और कृश हो गया है। ऐसे में मृत्यु के संत्रांस का प्रकोप होता है । पर ज्यों-ज्यों बीमारी बढती है इस सत को अनुभव होना है कि- जिस तरह वर मौर बांध कर और वधू आभूषण पहनकर सुशोभित होते हैं, उसी तरह प्रभु ने मुझे मुक्ति के वस्त्र पहनाये और मुझ पर मार्मिकता की चादर डाल दी है। वह आश्वस्त है कि जब वह प्रभु के पास जायेगा, प्रभु उससे मुंह नहीं मोड़ेंगे- यदि तुम ईश्वर के पास लौटोगे, तो वह तुम से अपना मुंह छिपाये नहीं रखेगा। आखिरी रात की उसकी प्रार्थना है-- यही प्रार्थना हम करते हैं, पावन स्वामी, आज रात तुम हम सब को रक्षा करना, हम तुममे विश्राम करें, तुम शान्तिमयी घड़ियां दो हम को। अन्तिम समाधि लग रही है । आँखें बन्द हो रही हैं भीतर प्रार्थना चल रही है, अजपा-- भले हमारे नेत्र बन्द हों, हृदय हमारा रहे जागता तेरे लिए, मसीह हमारे। प्रो० केसरी कुमार १, राजेन्द्रनगर, पटना फादर, इस देश और भाषा को कृतघ्नता को क्या करें -श्रीमती शैल सक्सेना भारतीय संस्कृति, दर्शन के अध्येत्ता, रामकथा के मर्मज्ञ विद्वान, बाइबिल के अनुवादक, अंग्रेजी हिन्दी कोश के प्रणेता, हिन्दी के मूर्धन्य साहित्यकार फादर डॉ० कामिल बुल्के मेरे लिए गुरु, पिता, मित्र के समान श्रद्धेय तथा स्नेही थे। 12 जून, 1982 को वह जब घर से गए थे तब ध्यान नहीं आया था कि अब वह कभी घर न आएंगे और उनसे होली फैमिली असताल, दिल्ली मे भेंट होगी। 8 अगस्त, रविवार फादर पटना के होली फैमिली अस्पताल से दिल्ली होली 'फैमिली अस्पताल में लाए गए । पटना मे वे 16 जुलाई से अस्पताल में दाखिल थे। 31 जुलाई को गंगरीन के कारण उनके दाहिने पैर की 3 अंगुलियां काट देनी पड़ी। पटना मे उन्होंने बीमारी की सूचना न फैलने देने के लिए विशेष आग्रह किया था। शारीरिक स्थिति बिगड़ने से वे दिल्ली लाए गए। अस्पताल में 3-30 बजे दोपहर के दाखिल हुए, आते ही दूरभाष पर मुझसे संपर्क करवाया। "फादर बुल्के होली "फैमिली, 322 नम्बर कमरे में हैं, I" स्पष्ट था कि कोई विदेशी सप्रयाम हिन्दी बोल रहा था। 5 बजे मैं, मेरे पति-श्री कृष्णप्रसाद सक्सेना तथा पुत्री संगीता उनके पास पहुंच जाते हैं । फादर की हालत देखकर हम लोग स्तब्ध रह गए । सहमा आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। फादर कह रहे हैं "मैंने सोचा अपने परिवार को सूचित कर दूं।" फादर परिवार का हाल, मेरी साहित्य साधना उनके आदेश तथा योजनानुसार लिखा 'वैदेही खण्डकाव्य समाप्ति पर है। दिल्ली को साहित्यिक, तथा राजनीतिक गतिविधियों के बारे में प्रश्न करते हैं, अपना हाल विस्तार से बताते हैं साय ही "पूछते हैं- "सच बताओ क्या मैं बहुत दुवला हो गया ?" फादर को वैवाक दृष्टि का सामना कर सकने में असमर्थ, मैं स्वीकृति मे सिर हिला देती हूं1 "लेकिन भयो ?" मुझे उत्तर सूझ जाता है --"फादर, आपने अभी बताया था कि पटना अस्पताल का खाना आपको इतना बुरा लगता था कि आप खा नहीं पाते थे शायद इमो मे दुबले हो गए है। आप वहाँ ठीक सेखाइए आप जल्दी से स्वस्थ हो जाएंगे।" फादर शिशु वत मान लेते हैं । थोड़ी देर बाद मेरे पति ने उन्हें अपने हाथ से खाना खिलाया, शत २० शत आशीप फादर के मुख और आकृति ने झर रहे हैं-"तुम्हारे घर होता तो तुम मयके माय भोजन करता, यहाँ तुम खिला रहे हो।" (1978 से दिल्ली में फादर के आतिथ्य का सौभाग्य मेरे परिवार को ही मिलता था।) बाहर निकलकर डॉक्टर से पूछताछ की। चिकित्साशास्त्र को छाना मेरी पुत्री विस्तार से पूछती है और सारी रिपोर्ट देखकर निराशापूर्वक डाक्टर के स्वर में स्वर मिला देती है-"अब कुछ नहीं है । फादर का हृदय और गुर्दे भी जवाब दे रहे हैं, गगरिन का अगला ऑपरेशन वे सह ही नही सकते ।" दमा और हाई ब्लड प्रेशर पहले में है ही। अपने को मुस्थिर कर, कमरे मे पहुंचकर फादर को बहलाया कि कोई विशेष समस्या नहीं है । वे उत्सुक हैं-"मेरा पर कल ही काट दें तो अच्छा है ।" फिर लौटने तथा कुछ मित्रों-विजयेन्द्र स्नातक, विष्णु प्रभाकर आदि तथा बेल्जियम के राजदूत महोदय को दूरभाष पर अपने बारे में बताने का आदेश देते है। 9 अगस्त, मुबह में अस्पताल में उनके साय थी। फादर अधूरे कर्मों के प्रति चिन्तित हैं, जल्दी से ठीक होकर कोश के संक्षिप्त मस्करण और ओल्ड टेस्टामेट का अनुवाद पूरा करना चाहते है । फादर तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन में भाग लेने को अत्यधिक इच्छुक थे। तब तक टोय होने के प्रति आशान्वित भी थे। सितम्बर तक वे मेरे घर बसायी लगाकर लौट आना चाहते थे। में बच्चों की तरह उन्हें यहलाती रही । फादर. की भयकर बीमारी तथा हिन्दी सेवा के लिए जीने की उत्कट लालसा- मेरे निराश मन को आशा बघती है शायद फादर अपनी प्रबल इच्छाशक्ति के सहारे टीन हो जाएं। ये कहते हैं-"तुम बैठी हो मुझे बहुत आराम मिल रहा है । लगता है कोई अपना बैठाहै।......मैं अभी हिन्दी को मेवा 10 साल तक और करना चाहता हूं।" उसी रात जय दुयारा पहुंची तो उन्हें ज्वर बढ़ा हुआ पा। बोसे "श्रीमती गांधी को मूगित कर दी में इसान के लिए यूरोप में वैलियम जाना चाहता हूं।" मिगनरी तपा राजदूत महोदय मे मिल मरने याने सहयोग तथा आश्यामनी के बारे में भी मुझे बताया। 10 सारीप-पादर की गंपर्ष नास्ति साग हो रही है, ये अपने में गिमट रहे है।पष्ट या गया है जो देगा नहीं जाता मग गा है पयंत गियर विरवार पर यह पाहै।"पर पयों नहीं काटा जा रहा है।" जानने कोरमुक है । अन्ततः यताना पाला fr-आपरे गुटीर शाम नहीं पर । गुपी यीमारी मुद्दा रंगेहै? गुनगर म धाममा हर माह रोपी में अपना दौपटरी परीक्षण करवाना पा,रिणी ने पुप गरीरहा... तो भाने को तुमाल समाता पा।" आगामी दिनों में पर गलामा, मति ीग होती गई। वारीय वो मानो मिमिमी-पर में गर मेरा प्यार और भागीरना। 1 बहुत कष्ट दिए हैं, माफ कर देना।" फादर ने हाथ जोड़ दिए थे। उमड़ते आंसू रोककर हमने आशा बंधायी थी --आप डायलिसिस से ठीक हो जाएंगे और ऑप- रेशन भी हो सकेगा। "तुम कहती हो तो हो जाऊंगा"- मानो उन्हे मुझ पर, दया आ गई थी। 14 तारीख सुबह 8-30 वजे उन्हें डायलिसिस के लिए अखिल भारतीय आयु- 'विज्ञान संस्थान लाया गया। 8-30 बजे से 11-30 बजे तक राजकुमारी अमृतकौर बहिरंग रोगी विभाग के बरामदे मे स्ट्रेचर पर पड़े रहे । अस्पताल में दाखिले की खानापूरी की जा रही थी। ग्लूकोस चढ़ रहा था लगातार, नर्स वोतल लटकाए हुए थी, पेशाब की बोतल स्ट्रेचर पर बंधी थी । बेहद गर्मी थी, फादर अत्यधिक थके हुए, निर्बल थे और हम लोग कुतूहल प्रिय जनता को स्ट्रेचर में दूर रखने की अमफल कोशिश कर रहे थे। बोले "लगता है यहां कोई देखने वाला नहीं है। हम दोनो ने फिर खोखले आश्वासन दिलाना चाहा। हम लोग लगभग 12 बजे उन्हे 'डायलिसिस जनरल वार्ड' में पहुंचा सके । असताल के अनुशासन के अनुसार केवल एक व्यक्ति रोगी के पास रह सकता है । जेसुईट संघ के फादर और ब्रदर अन्तिम -समय में उन्हें पूर्णतया अपने संरक्षण में ले लेना चाहते है--निश्चित होता है एक बदर हर समय साथ रहेंगे। उन सबका सेवाभाव अवर्णनीय है। आशा थी डायलिसिस उसी दिन होगी किन्तु पता चला कि इस अस्पताल के डाक्टरों की राय के अनुसार आवश्यकता ही नहीं हैं । खेद होता है होली फैमिली से व्यर्थ लाए। रविवार-सोमवार के मध्य की रात्रि से मंगलवार सुबह तक उन्हे हृदय के तीन दौरे पड़े । उस बीच डॉक्टरों ने प्रत्येक सम्भव उपचार किया- हृदय मे इजेक्शन मालिश, कृतिम प्रयास । अन्तिम समय निकट देख पादरी महोदय भी बुला दिए गए। तीसरे दौरे के उपरांत भी वे चुप, किन्तु होश में थे। मानेरस हाउस रॉची में कई दर्शकों से उनके पड़ोसी, फादर CLARYSSE ने डॉक्टरो के आदेश पर श्ररणयंत्र 'चालू करके पूछा था-"Are you on the air?" उत्तर मिला "of course' "Are you in pain ?" "No, No", और यही फादर कामिल बुल्के के अतिम 'शब्द थे। कुछ क्षण वाद 17 अगस्त सुबह 8-15 बजे वहुत गहरी लम्बी साँस आई, नर्स चीख उठी-डॉक्टर, डॉक्टर, आधे घंटे तक डॉक्टर निरर्थक प्रयास करते रहे। 'किन्तु सब धर्य । फादर चिरनिद्रा में सो चुके थे। उनका पार्थिव शरीर 225 जोरवाग नई दिल्ली ले जाया गया। अंतिम दर्शन करने पहुंचती हूं : फादर शांत अनन्त निद्रा में निमग्न है, किसी कप्ट की रेखा मुख पर नहीं है, मुखमंडल दिव्य आभा से दीन है । मन होता है माथे पर छलूं तो शायद हमेशा की तरह चौंककर उठ बैठेंगे-"फिर कुछ ले आई हो।" फादर क्लेरिसि मेरी मनोस्थिति तथा भावना समझते है । फादर बुल्के की दाढ़ी में सिर पर बंधी पट्टी खोलकर दाढी लहरा देते हैं-श्रीमती सक्सेना आप " .
२२ फादर को वैसा ही देखिए जसा देगने की आप अभ्यस्त हैं।" वे मुझे धीरज देते-देते स्वयं विचलित हो उठते हैं "आप मुझे देगिए 30 वर्षों में साथ पा, मूना पड़ोस देग. कर मुझे कमा लगेगा ! हम प्रभु के प्रति कृतज्ञ हों कि उसने फादर बुल्के को इस धरती पर भेजा और हमे उनका मंमगं तथा मन्त्री प्रदान की।" मैं स्मृति चिह्न स्वरुप स्वर्गीय फादर का कलम लेने का अनुरोध करती हूं। 18 अगस्त 1982 सुबह मेक्रेड हार्ट कंपडल-अशोक प्लेस पर फादर के अतिम संस्कार पर हुई गभा में एक अदर पूछते हैं-"और लोग नहीं आए ?" मैं चौकी -"आपका अभिप्राय मममी नहीं" उत्तर मिला "मैं चाहता पा हिन्दी के साहित्यकार आते, फादर ने बहुतों को याद किया था।" मैं ग्लानि से सिर झुका लेती हूं, चोर दृष्टि ने उपस्थित जनसमुदाय का निरीक्षण करती हूं। मंत जेवियर स्कूल के अध्यापक गण, विद्याज्योति के सदस्य तथा मिशनरियों के अतिरिक्त दो-चार चेहरे ही दृष्टिगोचर होते है। 10 बजने के कुछ बाद मत जेवियर को एक बस, एक मेटाडोर जिसमें पादरी गण तथा फादर का ताबूत था, दो-तीन निजी कारी तथा दो, तीन स्कूटरों का छोटा सा काफिला निकल्सन सिमंट्री, काश्मीरी गेट पहुंच जाता है। वहाँ हिन्दी के 7-8 साहित्यकार उपस्थित है- कुछ दिल्ली, कुछ बाहर के। वृक्षों के झुरमुट तले खुदी कद्र पर फादर का ताबूत रखा है। अंतिम बार चरण-स्पर्श करती हूं, मन हाहाकर कर उठता है-फादर, वचन तो वैसाखी लगा कर मेरे घर आने का दिया था, बिना वैसाखी के कहाँ जा रहे हैं आप ! संस्कार, प्रार्थना तथा भाषण आदि के उपरांत ताबूत धरती माता की चिर विश्रामदायी गोद में उतार दिया जाता है। मैं कब्र पर अन्य लोगो के साथ मिट्टी डालकर अतिम प्रणाम निवेदित करती हूं--पहली बार स्नेहिल हाथो ने चिपटाकर आशीर्वाद नही दिया, धवल दाढी के बाल मेरे मस्तक पर नही लहराए । मेरे मुडते ही गाजियाबाद से फादर के अतिम संस्कार में सम्मिलित होने आए मेरी पुत्री तथा बगाली भाषी जामाता लगभग साथ-साथ बोल उठते है- "मम्मी, आपके हिन्दी वाले कहाँ है, मव मिशनरी ही दिखाई दे रहे है ?" सहस ध्यान आता है-~-8 ता० से 11 ता० तक (वीमारी का हाल समाचार पत्रों मे छपने तक) मैंने तथा मेरे पति ने बहुत-से साहित्यकारों तथा हिन्दी प्रेमियों से स्पष्ट अनुरोध किया था कि फादर का अतिम समय है, हम चाहते है कि वे जाते समय हिन्दी वालों तथा भारतीयों को कृतघ्न न समझे । किन्तु साहित्यकार के भाग्य की विडम्बना मिटाना हम दोनो के सामर्थ्य के बाहर था! मैं प्रश्न को टालकर कद्र की दिशा में हाथ जोड देती हूं। मेरे जुड़े हाथ इस वार क्षमा माग रहे हैं - फादर इस देश और भाषा की कृतघ्नता को क्षमा कर दें।" एस---402, ग्रेटर कैलाश ! नई दिल्ली-48 1 ..
एक पुण्य स्मरण v --डा. दिनेश्वर प्रसाद सोचने पर नहीं लगता कि आज फादर बुल्के नहीं हैं, लेकिन यह भी मच है कि वे पिछले 17 अगस्त को अपने प्रभु ईसा के प्यारे हो गये। 18 अगस्त को 10 बजे दिन में दिल्ली के जोरवाग अवस्थित निकॉलसन कब्रगाह मे उनको दफन कर दिया गया। दफन के समय हिन्दी के बहुत से साहित्यकार और प्रशसक उपस्थित थे। यद्यपि गैगरीन से पीड़ित होने के बाद से लेकर मृत्यु के कुछ घण्टे पूर्व तक उन्हें इम बात का दुःख सता रहा था कि उनका ओल्ड टेस्टामेट का हिन्दी अनुवाद अधूरा रह गया है, लेकिन जैसे मौत के समय उन्होने अपने प्रभु की इच्छा के रूप में इसे पूर्ण समर्पण भाव में स्वीकार कर लिया था। मरने के बाद उनके मुख पर अपूर्व शाति और प्रसन्नता विराज रही थी और प्रार्थना की मुद्रा मे उनके दोनों हाथ उनकी छाती पर पड़े थे । उनके चेहरे में कही कोई विकृति नहीं आयी थी। लेकिन, फादर बुल्के ने जिस मृत्यु को आदर्श भक्त की तरह ईश्वरेच्छा के रूप में स्वीकार कर लिया, वह भारत-विद्या और हिन्दी की दुनिया की कोई साधारण घटना नहीं है। उनके निधन से एक विश्व प्रसिद्ध भारतविद्, महान् कोशकार, हिन्दी का धर्मयोद्धा, भाषान्तरण को सृजनात्मक चुनौती के रूप में स्वीकार करने वाला अनुवादक और कट्टर राष्ट्रवादी ईसाई हमारे बीच में उठ गया है। वेजियम से सन्यासी के रूप में आकर 1935 ई० में भारत में बसने वाले फादर बुल्के भारतीयों से भी अधिक भारतीय थे। उन्होंने देश के स्वतन्त्र होने के बाद. 1950 ई० में भारतीय नागरिकता स्वीकार कर ली थी और उनकी इच्छा यही थी कि मृत्यु के बाद उनका दफन इसी देश मे हो । वे वारम्बार यह कहा करते थे कि मैं एक छोटे देश बेलजियम से एक महान और विशाल देश भारत आकर बस गया हूं और यहाँ के लोगों ने मुझे जिस स्नेह तथा आत्मीयता से अपनाया है, मैं उसका आभारी हूं। वे अपने को भारतीय से भिन्न और कुछ नहीं मानते थे। उन्हें अपने - ईसाई होने का उतना ही गर्व था, जितना भारतीय होने का, क्योंकि वे ईसाइयत और भारतीयता में कही कोई विरोध नही देखते थे। वे प्रायः यह कहा करते थे कि जो पक्के ईसाई और पक्के जमन या पक्के ईमाई और पक्के फ्रेंच में कही कोई भेद नहीं है, वैसे ही पक्के ईमाई और पक्के भारतीय मे कोई अन्तर नहीं होना चाहिए.।, परम्परागत भारतीय विश्वासों में इतनी उदारता है कि ईसाई धर्म उनमें से एक बन सकता है २४ लेकिन, उन्हें इस बात का पपा कि हमारे देश के लोग, मुग्यतः ईसाई धर्मावलम्बी ग यान पर बहुत ध्यान नही देश और के पश्चिमी जीवन पद्धति मो ईगाइयत से जोडन लगते हैं। उनके अनुसार इसका मुख्य कारण यह है कि ईसाई धर्म भारत में अग्रेजो के राजत्नकाल में फैला और उग समय में मिशनरी यूरोप फे मामाजिक जीयन मूल्यों के अनुप धर्म प्रचार करने लगे। उन दिनों जो लोग ईगाई बने, उनमें में उच्च वर्ग के लोग "अग्रेजी सभ्यता अपनाकर अग्रेज बन गये।" निम्न वर्ग की जो जनता इस धर्म में दीक्षित हुई, यह अंग्रेजी नही जानती थी लेकिन मिशनरी उनगे टूटी-फूटी हिन्दी में बात किया करते थे और हिन्दी या लोकभाषा मात्र को बहुत महत्त्व नहीं देते थे। यह यात फादर युलो को यहुन आश्पयंगनमः लगती रही और ये अपने भाषणो और निवधा में यह पहते रहे कि अधिकांश विदेशी धर्म- प्रचायः निन्यानवे प्रतिशत शिक्षित भारतीयों के माय वात-चीत करने में असमर्थ है।" इगलिग ईसाई धर्म के प्रचारको और विश्वामियों से यह अपेक्षा करते थे कि वे हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं को महत्त्व दें-यही नहीं, भारतीय मस्कृति को महान् और उदार परम्पराओं को भी । इलाहाबाद में एम० ए० करते समय वे भारतीय मन्यागियों के अनुरूप पाभी कभी गैरआ वस्त्र भी धारण किया करते थे। उनका विचार था कि जिस देश में हिन्दू, बौद्ध, मूफी आदि विभिन्न मतों के सन्यासी गेरुआ वस्त्र पहनते हैं ; उस देश के ईमाई सन्यामियो को भी अपने लिए निर्धारित वेप-भूषा के रूप में गेरए कपडे का उपयोग करना चाहिए। यद्यपि वे अभ्यासवश ईमाई सन्यामियो के बीच प्रचलित श्वेत-वस्त्र पहनते थे, लेकिन चे केवल इस रग आग्रह को उचित नही मानते थे । इसी तरह ये भारतीय ईमाइयो के लिए संस्कृत या भारतीय भापाओ के नामों का आग्रह रयते थे। लेकिन, ईसाई भारतीयता से पूरी तरह जुड़ सकें इसके लिए वे उनका हिन्दी या भारतीय भापाओं से जुड़ना अनिवार्य मानते थे । भारत आते ही उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि देश की जनता को जानने और उसमे आत्मीयतापूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने का सबसे बढा माध्यग जाधु- निक भारतीय भाषा, मुख्यत हिन्दी है । इसलिए उन्होंने यहां आने के एक वर्ष बाद ही, 1936 ई० मे, हिन्दी सीखना आरम्भ किया। वे गुमला के सन्त इग्नाशियुस उच्च विद्यालय में जिन विद्यार्थियों को गणित पढ़ाते उन्ही की कक्षाओं में सबसे मिछली पक्ति में नैठकर हिन्दी शिक्षक पी० बाड़ा में हिन्दी पढते । उन्होने 1938 ई० में पूरे वर्ष भर हजारौवाग के समीप सीतागढ में उन्होंने हिन्दी और संस्कृत का -अभ्यास किया तथा 1940 ई० में विशारद की परीक्षा पास की। कसियांग में धर्म- विज्ञान के अध्ययन के वर्षों में भी वे समय निकालकर प्रतिदिन हिन्दी और संस्कृत पढा करते थे। वे भारत आने से पहले, 1930 ई० मे वेलजियम के लुवेन विश्वविद्या- 'लय से बी० एम० सी० (इन्जीनियरिंग) बहुत ऊंचे अको से पास कर चुके थे तथा सन्याम-ग्रहण करने के बाद रोम के ग्रिगोरियन विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में - २५ सर्वोच्च अंकों के साथ एम० ए० कर चुके थे । इसलिए उनके लिए यह जरूरी नहीं था कि वे एक लम्बे समय के बाद, छत्तीस की उम्र में, फिर किसी भारतीय विश्व- विद्यालय के नियमित छान के रूप में नाम लिखाकर पड़े, लेकिन उन्होंने इलाहाबाद 'विश्वविद्यालय में 1945 ई० में एम० ए० (हिन्दी) में नामांकन कराया; क्योंकि वे जिम हिन्दी भाषा के माहात्म्य से अभिभूत थे और जिसके माध्यम मे काम करने का संकल्प ले चुके थे, उसमें दक्षता प्राप्त करने के लिए, स्वयं उसके अनुसार, परीक्षार्थी छान की तरह हिन्दी पढना आवश्यक था। जब उन्होंने डी० फिल० के लिए रामकथा पर शोध आरम्भ किया, तो उनके सामने हिन्दी को प्रतिष्ठा का प्रश्न अचानक "उपस्थित हुआ। उन दिनों अन्य भारतीय विश्वविद्यालयो को तरह इलाहाबाद विश्व- विद्यालय में भी यह नियम लागू था कि भारतीय भाषाओं से सम्बन्धित शोध-प्रबन्ध अंग्रेजी में ही प्रस्तुत किए जा सकते हैं । यद्यपि फादर बुल्के फ्लेमिशभापी थे, लेकिन उनका अंग्रेजी पर भी पूरा अधिकार था। वस्तुतः वे कई यूरोपीय भापाओं के जानकार थे । उन्होंने वेलजियम की एक अनिवार्य भापा के रूप में फ्रेंच पढ़ी थी, धर्म भापाओं के रूप में ग्रीक और लैटिन का अध्ययन किया था, यूरोप में धर्म-शिक्षा ग्रहण करते समय जर्मन सीखी थी तथा भारत आने पर दूसरे यूरोपीय मिशनरियों की तरह अंग्रेजी में विशेषज्ञता हासिल की थी। इसलिए अंग्रेजी भाषा में हिन्दी विषय का शोध-प्रवन्ध लिखना उनके लिए बहुत सरल था; किन्तु उन्हें यह नियम न केवल अमंगतिपूर्ण लगा, वरन हिन्दी भाषा के प्रति उपेक्षा और अपमान मे पूर्ण भी। उन्होंने विश्वविद्यालय से आग्रह किया कि उन्हें हिन्दी में शोध-प्रवन्ध प्रस्तुत करने की अनुमति प्रदान की जाय । उन दिनों विश्वविद्यालय के कुलपति डा० अमर नाथ झा थे। बहुत वाद-विवाद के पश्चात् विश्वविद्यालय में शोध को माध्यम भापा के सम्बन्ध में प्रचलित नियम का सशोधन कर उन्हें हिन्दी में प्रवन्ध प्रस्तुत करने की अनुमति दे दी । यह बात बहुत कम लोगों को मालूम है कि फादर बुल्के को 'राम- कथा' हिन्दी विषय को डाक्टरेट के लिए हिन्दी में लिखित प्रथम शोध प्रवन्ध है और यह भी कि शोधोपाधि को माध्यम भाषा के रूप में हिन्दी को पहली बार प्रतिष्ठित कराने का श्रेय उन्ही को हैं। फादर बुल्के तुलसी के दरवाजे से हिन्दी में आये और हिन्दी के दरवाजे से तुलसी के अधिकाधिक समीप पहुंचने के लिए जीवनभर प्रयत्नशील रहे। उन्होंने भारत आने से पहले विश्वसाहित्य सम्बन्धी किसी पुस्तक में तुलसी की इन पक्तियों का अनुवाद पढ़ा था | "धन्य जनक जगती-तल तामू । पितुहिं प्रमोद चरित सुनि जासू।" उमी समय से उनके मन में इस महाकवि के प्रति आकर्षण उत्पन्न हो गया था और उन्होंने इसके साहित्य को पढ़ने के लिए हिन्दी का अध्ययन भारत आते ही आरम्भ कर दिया । तुलमी को भक्ति के मर्म को समझने के लिए उन्होंने रामकथा के रहस्य को जानना चाहा । उनके शोध-विषय का मूल शीर्षक था "तुलसी की २६ a रामभक्ति ।" जिसके प्रथम अध्याय के रूप में उन्होंने रामकथा के ऐतिहासिक विक फा निरूपण किया था। जब उन्होंने इस अध्याय की सामग्री को पूर्णता पर ले ज के लिए ममस्त भारतीय राम-माहित्य के अतिरिक्त फ्रेंच और उच-फ्लेमि में उपलब्ध दक्षिण-पूर्व एशियाई राम-साहित्य का अवलोकन किया, तो वे इस कथ की महिमा से अभिभूत हो उठे। उन्होंने यह निश्चय किया कि वे "तुलसी की राम भक्ति" पर वाद में कार्य करेंगे और मवसे पहले शोध-विषय के रूप में रामकथा विश्वव्यापी प्रसार के रहस्य तथा ऐतिहासिक विकास-कम का निरूपण करना चाहेगे अतः उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष डा० धीरेन्द्र वर्मा से शोध-विपय का शीर्षक बदलकर "रामकथा : उत्पत्ति और विकाम" कर देने का अनुरोध किया और उन्हे इसकी अनुमति मिल गई। "रामकथा" जिस पर उन्हें 1949 ई० में डी० फिल् मिली और जिसका प्रकाशन स्वयं इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने 1950 ई० मे किया, उनकी विश्वव्यापी कीर्ति का आधार-स्तम्भ है। इसमें संस्कृत, पाली, पांकृत,अप्रन'श, हिन्दी, बंगला, तमिल आदि समस्त प्राचीन और आधुनिक भारतीय भाषाओं में उपलब्ध राम-विषयक विपुल साहित्य का ही नही वरन् तिव्यती, वर्मी, सिंहाली, इंदोनेसी, मलय, थाई आदि एशियाई भाषाओ के समस्त राम-साहित्य की सामग्री का, इस कथा के अध्ययन के विकास की दृष्टि से, अत्यन्त वैज्ञानिक रीति से उपयोग हुआ है। इसका महत्त्व केवल हिन्दी या साहित्य तक सीमित नहीं है, वल्कि यह भारतविद्या के क्षेत्र में फादर बुल्के को अद्वितीय उपलब्धि है । यह भारत- विद्या और एशियाई साहित्य के अध्ययन की आधारभूत पुस्तकों में है, जिसे पढने और समझने के लिए हिन्दी नहीं जानने वाले विद्वानो को या तो हिन्दी मीखनी पड़ी है या हिन्दी जानने वालो की सहायता लेनी पड़ी है। 1978 ई० में केरल नय अकादमी ने इसका मलयालम अनुवाद प्रकाशित किया है और आस्ट्रेलिया केनबरा विश्वविद्यालय के हिन्दी-उर्दू विभागाध्यक्ष डा० रिचर्ड वार्ज इसका अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित कर रहे है। रामकथा के अध्ययन ने उनके मन मे रामचरितमानस की रामकथा के मर्यादित स्वरूप के प्रति और भी आकर्षण उत्पन्न किया वे तुलसी-साहित्य का अध्ययन आजीवन करते रहे । तुलसी उनके उतने ही प्रिय थे, जितने अपनी मातृभापा फ्लेमिश के महाकवि गजेले या अंग्रेजी के महाकवि शेक्सपियर । वे फ्रेंच, जर्मन आदि भापाओ की कविता के रसग्राही पाठक थे और हिन्दी भाषा पर अपनी पकड मजबूत करते रहने के लिए हिन्दी में प्रकाशित नये-से-नये उपन्यासो के तत्पर पाठक थे, लेकिन प्रायः पिछले दो दशकों से तुलसी ही उनकी आत्मा के कवि थे। जब वे गैगरीन के इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती हुए तो न केवल मांडर के मिशन अस्पताल में, बल्कि जैसा कि डा० अमर कुमार सिंह ने बाद में बतलाया, कुर्जी अस्पताल मे भी उनके सिरहाने दो ही पुस्तकें थी-चाइबिल और रामचरितमानस । वे जीवन भर रामचरितमानस पर देश भर २७ की सभाओं और गोष्ठियों में व्याख्यान और प्रवचन देते रहे । उन्होंने तुलसी के संबंध मे न केवल हिन्दी में लिखा, वरन् अंग्रेजी, फ्रेंच और फ्लेमिश में भी। 'रामकथा और तुलमीदास' (1978 ई०) तुलसी के विषय में प्रकाशित उनको एकमात्र पुस्तक है किन्तु इससे वे संतुष्ट नहीं थे । वे तुलमी की भक्ति और उनके कवित्व पर एक विस्तृत पुस्तक लिखना चाहते थे । वे पिछले कुछ वर्षों से यह कहा करते थे "वाइविल' का अनुवाद पूरा होने पर अपने कोश का परिवद्धित संस्करण तयार करूंगा। इसके वाद तुलसी पर एक बड़ी पुस्तक लिखूगा और स्वर्ग जाऊंगा।" काश, वे यह सव कर पाते। वे अपने धर्म-सघ को हिन्दीमम देखना चाहते थे। भारत के विभिन्न ईसाई धर्म-संघों में जो हिन्दी प्रचलित थी, वे उससे बहुत असंतुष्ट थे । वाइबिल के उपलब्ध हिन्दी अनुवाद अपने भद्देपन, कृत्रिमता और अनावश्यक संस्कृत शब्दों के प्रयोग के कारण उनको बहुत पीड़ित करते थे। उन्हे तव और भी दु.ख होता, जब उन्हें बाइबिल के आधारभूत ग्रीक और लैटिन पाठो की नासमझी से भरे हिन्दी अनुवादों के नमूने, हर उपलब्ध हिन्दी बाइबिल मे, सैकड़ों की सख्या में मिल जाया करते । उनकी इच्छा थी कि ईसाई धर्म-संघ परिनिप्ठित किन्तु सरल स्वाभाविक हिन्दी का प्रयोग करें । इसलिए उन्होंने सबसे पहले दर्शन, धर्मशास्त्र आदि विषयों की पारि- भापिक शब्दावलि का एक लघु कोश "ए टेक्नीकल इंगलिश-~-हिन्दी ग्लोसरी". (1955 ई०) के नाम से प्रकाशित किया। इस लघु कोश का इतना व्यापक स्वागत हुआ कि उन्होंने एक वृहत् अंग्रेजी हिन्दी कोश का निर्माण करना चाहा । पाँच वर्षों के कठोर परिश्रम के बाद उन्होंने 1967 ई० मे जो "अग्रेजी-हिन्दी कोश" तयार किया, उसका प्रकाशन रांची के कैथोलिक प्रेस ने अगले वर्ष 1968 ई० मे-गणतन्त्र दिवस के अवसर पर किया। कैथोलिक प्रेस ने इसके तीन संस्करण प्रकाशित किए। गत वर्ष यह कोश नई दिल्ली की एस० चांद एण्ड कम्पनी से छपा है । अब तक इसकी लगभग डेढ़ लाख प्रतियाँ विक चुकी है । यह अब तक प्रकाशित अग्रेजी हिन्दी कोशी में सबसे श्रेष्ठ और उपयोगी है। रामकथा की तरह उनका कोश भी प्रसिद्ध हुआ है और यह अंग्रेजी सीखने वाले लोगो के लिए ही नहीं, अनुवादकों के लिए भी वरदान सिद्ध हुआ है । फादर वुल्क इस कोश का परिवर्द्धन करना चाहते थे। वे अगले वर्ष इसके परिवर्तन का कार्य आरम्भ करना चाहते थे और उन्होने यह हिसाव लगा लिया था कि इसमे उन्हें चार सौ पृष्ठो मै मुद्रण-योग्य नई प्रविष्टियों का समा. वेश करना होगा, किन्तु यह अपने वर्तमान रूप में भी इतना वैज्ञानिक और उपयोगी है कि यह अगले अनेकानेक वर्षों तक महत्त्वपूर्ण बना रहेगा। कोश पूरा करने के तत्काल बाद उन्होंने मूल ग्रोक से न्यू टेस्टामेंट (नया २८ विधान) के हिन्दी अनुवाद में हाथ लगाया। नया विधान ईसाइयों का धर्म-ग्रन्य है और पुराना विधान मूलतः यहूदियों का । इन्हें क्रमश: ईसाई बाइविल और यहूदी बाइबिल भी कहा जाता है । हर ईसाई "पुराना विधान" को भी श्रद्धा की दृष्टि से देखता है । इसलिए वह इसे अपने धार्मिक साहित्य के अग के रूप में देखता है। फादर बुल्के सबसे पहले "नया विधान" का अनुवाद करना चाहते थे । अनुवाद उनके लिए कोई नया काम नहीं था। उन्होंने 1942 ई० में ही अपनी 'दे सेवियर" नामक पुस्तक का हिन्दी मे अनुवाद किया था तथा 1958 ई० मे विहार राष्ट्रभाषा परिषद् के अनुरोध पर मेटरलिंक के विश्व प्रसिद्ध "द ब्लू वर्ड" नामक नाटक का मूल फ्रेंच से "नील पंछी" के नाम से अनुवाद किया । उन्होने नया विधान के "संत लूकस का सुसमाचार" का अनुवाद 1963 ई० में प्रस्तुत किया था। उन्होंने इसके "पर्वत- प्रवचन" (1959) और प्रेरित-चरित (1973 ई०) नामक अशों का अनुवाद स्वतंत्र रचनाओं के रूप में प्रकाशित किया था। यह सब उन्होंने सम्पूर्ण ईमाई बाइबिल के अनुवाद की तैयारी के रूप मे किया था और यह तयारी इतनी लंबी थी कि अपने कार्य की सफलता मे उन्हे कोई संदेह नही रह गया था। उनकी "हिन्दी वाइविल : न्यू टेस्टामेट" जो 1977 ई० मे प्रकाशित हुई, इसका सबसे बड़ा प्रमाण है । ग्रीक भाषा की अच्छी जानकारी के बावजूद उन्होंने इस अनुवाद पर जो परिश्रम किया, वह वही व्यक्ति कर सकता है, जो हिन्दी की सम्भावनाओं के प्रति पूर्णतः आश्वस्त हो। वे उन लोगों मे थे जो अभिव्यक्ति की दृष्टि से हिन्दी को अंग्रेजी भी बडी मानते थे और अक्सर यह कहा करते थे-"हिन्दी में सब कुछ कहा जा सकता है।" भापा को समृद्ध करने वाले रचनात्मक कार्य के रूप में अनुवाद को देखने की परंपरा हमारे यहाँ अब तक नहीं बन सकी है । नहीं तो हमारे समीक्षको ने फादर बुल्के की हिन्दी बाइबिल को हिन्दी भाषा की एक श्रेष्ठ उपलब्धि के रूप में देखा होता । यह · हिन्दी की जातीय शैली मे प्रस्तुत अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रचना है । फादर वुल्के पिछले कुछ वर्षों से पुराना विधान या ओल्ड टेस्टामेट के हिन्दी अनुवाद में संलग्न थे। वे इस वृहत् ग्रन्थ के लगभग नौ सौ पृष्ठों का अनुवाद पूरा कर चुके थे और इसके वाकी डेढ सौ पृष्ठों का अनुवाद उन्हें करना था। इसलिए रुग्ण होने पर वे बहुत उद्विग्न थे। फादर बुल्के का साहित्य बहुत विस्तृत है। हिन्दी और अंग्रेजी में उनकी पुस्तकों की कुल संख्या उनतीस है और उनके शोध निवधों की संख्या साठ से भी अधिक है। इसके अतिरिक्त उनकी लगभग एक सौ प्रकाशित छोटी-बडी टिप्पणिया और लघु निबंध हैं जो मुख्यतः नागरी प्रचारणी मभा के हिन्दी विश्वकोप के विभिन्न खपगे में मुद्रित हैं । उन्होने हिन्दी और भारतविद्या के लिए जो कुछ किया, वह उनकी कीर्ति को अक्षण बनाये रखने के लिए पर्याप्त है । लेकिन, अपनी जिस
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विशेषता के कारण वे पूरे देश में इतने सम्मानित और पूज्य हुए, वह थी उदार और
सेवाप्रवण मानवता, जो जाति, भाषा, धर्म और सम्प्रदाय से बहुत ऊपर उठ चुकी
थी और उनके सम्पर्क में आने वाले हर व्यक्ति को निश्छल स्नेह और प्रसन्न उजली
हंसी से नहला देती थी।
प्रोफेसर, हिन्दी विभाग
रांची विश्वविद्यालय, रांची
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बाबा के दो पत्र -~-श्री रघुनाथ प्रसाद विकल फादर कामिल बुल्के अव नही रहे-यह कहने की इच्छा नहीं होती। और अगर कह भी दूं तो उससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा । आज हिन्दी-संसार "रामकथा" और "कामिल-वुल्के"-आपस मे एक दूसरे के पर्याय बन गये हैं। फादर कामिल बुल्के को इधर लोग प्यार से बाबा कामिल बुल्के कहने लगे थे। कलकत्ता और प्रयाग को अपनी हिन्दी-संस्कृत की पढाई ममाप्त कर, अपनी शोध पुस्तक "रामकथा" पर "डाकटरेट" ले वे बिहार में आ बमे । और यहां वे ऐसा रम गये थे कि बेल्जियम-वासी होते हुये भी अपने को "विहारी" कहने लगे थे। 1950 ई० की बात है । वे पटना आये हुए थे। पटना में उनके ठहरने का स्थान “संत जेवियर्स" स्कूल होता था । दैनिक "प्रदीप" के सहायक सम्पादक श्री रामचन्द्र वर्मा जो "परिमल-पाटलिपुत्र" के सयोजक भी थे वावा को "परिमल-गोष्ठी" में आने का निमंत्रण दे आये । वे नियत समय पर गोष्ठी में पधारे भी। महाकवि "प्रभात" उस गोष्ठी में पधारे थे। उन्होने अपने महाकाव्य "कैकेयी के कुछ अश वहाँ सुनाये थे। उसे सुनकर वावा बुल्के ने कहा था-"रामकया" के अगले सस्करण मे मैं कैकेयी" की भी चर्चा करूँगा।" गोष्ठी के दूसरे दिन मैंने उन्हें "सेंट जेवियर्स" के पते पर पत्र लिखा था। "परिमल" का ह्वाला देकर उनसे मिलने के लिए समय मांगा था। करीव पन्द्रह दिनों तक पन का कोई उत्तर नहीं मिला । मैं निराश हो चला था कि उनका एक कार्ड आ गया। पत्र कलकत्ते से भेजा गया था। पत्र पढकर मैं गदगद हो गया। पत्र में भी वे "राम" को नहीं भूले थे । पन यों हैं- कलकत्ता 14-10-50 प्रियवर, नमस्ते। रामबाण को तरह मेरा पीछा करता हुआ आपका स्नेहपूर्ण पत्र पटना और रांची होकर कलकत्ता पहुंच गया है । आशा है आपको पत्रोत्तर के विलम्ब के कारण अधिक निराशा नहीं हुई होगी।
. हाँ, आप ठोक लिखते हैं भवितव्यता को कोई नही जानता। अस्तु दुनिया छोटी और गोल है । अर्थात् हम फिर मिल सकेंगे। हम दोनों तो विहारी है । और "परिमल की गोष्ठी में आने का सौभाग्य मुझे फिर प्राप्त होगा। ऐसी आशा है । अत: अगली बार आप मुझसे मिल लीजिए। दर्शन के अतिरिक्त वातचीत में- साहित्यिक वातचीत में मिठास है न । विकल जी "शिवास्ते सन्तु पन्थानः" आपका- का० बुल्के उसके बाद जब मैं रांची गया तो वही सेंट जेवियर्स कालेज में उनसे मुलाकात हुई । उन दिनो वे 'अग्रेजी-हिन्दी कोप' के निर्माण में लगे थे। इधर जनवरी 82 में मैंने अपना कविता संग्रह "स्वप्न और सत्य" भेंट स्व- रूप उन्हे भेजा था। उसके उत्तर में उन्होंने मुझे निम्नांकित स्नेहपूर्ण पत्र भेजा रांची 16-2-82 प्रिय विकल जी, चार-पांच दिन पहले मुझे आपका कविता संग्रह मिला। शीर्षक देखकर सोचा- कितने दुर्भाग्यशाली हैं वे लोग, जो स्वप्न नहीं देखते । और कितने सौभाग्यशाली हैं वे, जिनके स्वप्न सत्य बन जाते हैं । आपका का० वुल्के इधर बरावर सोचता था कि रांची जा उनसे फिर मिल आऊं, पर मिलना संभव नहीं हुआ और अब तो वह असम्भव ही हो गया है । राष्ट्रकवि "दिनकर" की बापू विषयक कविता के निम्नांकित पंक्तियों में "वापू" की जगह पर "बाबा" करके अब तो इमे ही दुहराते रहना है अब नहीं मिलेंगे कहीं नयन दर्शन को व्यर्यन आस करो। "बाबा" सचमुच ही चले गये भोली श्रुतियों विश्वास करो। ९, किदवईपुरी पटना :- नहीं रहा वह हिन्दी का दधीचि -प्रो० कृपाल सिंह - डॉ. कामिल बुल्के का पार्थिव शरीर 17 अगस्त 1982 को हिन्दी संसार से उठ गया । अब 'मनरेसा हाउस' में उन ऋपि कल्प चरणों की धमक नहीं सुनाई पड़ेगी, जिस धमक ने कई दशकों से यहां की हरीतिमा को आन्दोलित कर रखा था। एकदम उजाड़ पड़ गया है 'मनरेसा हाउस' का वह कोना जहां डॉ० कामिल बुल्के रहते थे । सारे शहर के हिन्दी प्रेमियो के सामने यह समस्या गहराती जा रही है कि कल से वे अपनी शोध-जिज्ञासा के समाधान के लिए किस वट वृक्ष के नीचे जाकर निश्चित होगे। कल तक जो भव्य व्यक्तित्व हिन्दी सभाओं में अध्यक्ष का आसन सुशोभित करता था, आज उसकी तस्वीर शेष रह गयी है । कल तक जिस हिन्दी- प्रेमी का जीवन हिन्दीवालो की अन्यतम सम्पदा था, अब उसी की स्मृतियां धरोहर रह गयी हैं। उस दधीचि का अब केवल स्मरण हम कर सकते हैं, जिसने अपना सारा जीवन हिन्दी के लिए होम कर दिया। लेकिन उनका काम अभी पूरा ही कहा हुआ अंतिम क्षणों तक उन्हे अपने अधूरे कार्यो की चिन्ता थी । न तो वे बाइबिल के अनु- वाद को ही अतिम रूप दे सके और न तुलसी-कथा को पूर्ण कर सके । 1 सितम्बर 1909 ई० से आरम्भ हुई रचानात्मक संघर्ष और आध्यात्मिक उदात्तता की यात्रा जिस दिन समाप्त हुई, उस दिन हिन्दी मे अध्ययन और शोध के एक भास्वर इति- हास का समापन हुआ। आज कोई कल्पना भी नही कर सकता कि बेल्जियम के वेस्टफ्लैर्डस प्रान्त में जन्मे डॉ० कामिल बुल्के ने लुवेन विश्वाविद्यालय से 1930 मे अभियानिकी स्नातक विज्ञान को उपाधि प्राप्त करने के वर्षों बाद 1945 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से संस्कृत में स्नातक की उपाधो ली। फिर वे 1947 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम० ए० हुए और 1949 में वही से डी० फिल । अभियांत्रिकी से हिन्दी के वीच की याना उन्होने दर्शन और धर्मशास्त्र के विभिन्न क्षेत्रो मे की । 1932 में जर्मनी के येसुइट कॉलेज मे दर्शनशास्त्र में एम० ए० और कसियांग कॉलेज द्वारा 1939-42 में धर्मशास्त्र की प्रवीणता प्राप्त करने के बाद डॉ० वुल्के का पदार्पण भारतीय भाषा-साहित्य के क्षेत्र में हुआ।
उन्होने 1930 में ही सन्यास ग्रहण कर लिया था और 1935 में वे पहली बार भारत आए । बार-बार वे स्वीकारते रहे हैं कि उन्हें गंगा और यमुना के इस मैदान में खोंच लाने का सारा श्रेय गोस्वामी तुलमीदास को है। रामचरितमानस की जिन चौपाइयों ने डॉ० बुल्के को हिन्दी पढने को प्रेरणा दी। उन्हीं चौपाइयों के रचयिता तुलसीदास का गुणगान वै आजीवन करते रहे। उनका शोध-प्रबन्ध 'राम' कथाः उत्पत्ति और विकास' ने सम्पूर्ण विश्व-साहित्य में रामकथा के उद्भव और प्रसार के विश्वकोश का रूप धारण कर लिया था। रचनाकार, अनुवादक, कोशकार और सम्पादक के रूप में डॉ. बुल्के का जीवन मील का पत्थर बन चुका है । दि सेक्यिर के हिन्दी अनुवाद मुक्तिदाता (1942), दि थिम्स ऑफ न्याय वैशेपिक (1947), रामकथा (1950), टेक्नीकल इंगलिश हिन्दी ग्लॉसरी (1955), नील पंछी (1958), अंग्रेजी हिन्दी कोश (1968),. सुसमाचार (1970), पाठ संग्रह (प्र० भा० 1972, द्वि० भा० 1973, तृ० भा० . 1974), प्रेरित चरित्र (1973) एव मानस कौमुदी (1979) में ही डॉ० बुल्के को प्रतिभा सिमटी हुई नहीं रही। उनके अनेकानेक शोधात्मक एवं हिन्दी प्रेम से सरा. बोर निबन्ध हिन्दी, अग्रेजी, फ्रेंच और फ्लेमिश भाषाओं में प्रकाशित हुए हैं । उनके सामने अनेक योजनाएं थीं । सम्पूर्ण वाइबिल के अनुवाद में संलग्न डॉ० बुल्के को मरण शय्या तक यह चिन्ता सालती रही कि उन्होंने 'ओल्ड टेस्टामेन्ट' के 930 पृष्ठों का अनुवाद तो कर दिया है, शेष 150 पृष्ठ अनूदित नहीं हो सके । वे रामकथा शीर्पक अपने प्रख्यात शोध प्रबन्ध के तीसरे सस्करण की तैयारी में भी लगे थे। अंग्रेजी हिन्दी कोश का नया संशोधित परिवर्तित रूप प्रस्तुत करने की योजना भी उनके सामने थी। उनके देहावसान ने इन सारी योजनाओं को अधूरा छोड़ दिया है, हमारे सामने हिन्दी के एक स्वयंभू मनीपी का आसन रिक्त कर दिया है। अपने हिन्दी विद् होने के कारण डॉ० बुल्के को देश-विदेश में समान आदर और सम्मान प्राप्त था। वे 1950 से ही बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् को कार्यकारिणी के मदस्य थे। वे 1972 से ही भारत सरकार की केन्द्रीय हिन्दी समिति के सदस्य थे । उन्हे 1973 मे वेल्जियम की रॉयल अकादमी का मदस्य बनाया गया था। उनकी हिन्दी-सेवाओं के लिए 1974 में उन्हें पद्म भूषण की उपाधि दी गयी थी। नागपुर और मारिशस में आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलनों में उन्हे लगातार ऊंची जगह दी गयी और दिल्ली में इस वर्ष आयोजित होने वाले तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन की संचालन समिति के वे वरिष्ठ सदस्य मनोनीत हुए थे। दिसम्बर में यह सम्मेलन तो आयोजित होगा, लेकिन हिन्दी का ऋषिकल्प व्यक्तित्व वहाँ उपस्थिति न होगा। काल के फर हाथों ने हमारे बीच से हिन्दी के एक ऐसे पक्षधर को छोन" लिया है, जिसकी समता शायद किसी से नहीं की जा सकती। उनकी स्मृतियां । .
• इसलिए भी तीव्रतर होती जा रही है कि अपने विशाल मानववादी हृदय द्वारा उन्होंने छात्रों और शोधाथियों की एक लम्बी कतार को उपकृत किया था। पीढ़ियों से लोग उनके निजी पुस्तकालय का उपयोग मदाशयता पूर्वक करते आ रहे थे। अब 'मनरेसा हाउस' का वह पुस्तकालय अपने अधिपति के बिना वीरान हो गया है । वह सुगन्ध उड़ गयी है जिससे यह गिरिवन प्रान्तर मुवासित होता, था। --हिन्दी विभाग, संत जेवियर कालेज बावस--9 रांची--834001 : मेरे मानस पिता फादर कामिल बुल्के : मेरे -श्रीमती नीलम पाण्डेय 17 अगस्त 1982 । प्रातः का सूर्य जाने क्यों आज निस्तेज था। किरणों में अवगुंठित शाश्वत उज्जवलता आज कुछ धूमिल लग रही थी। कहते हैं प्रकृति अपने -विविध आयामों में शकुन अपशकुन की सूचना दर्शाती है, शायद तभी तो नित्य ही काफी दिन बढ़े खुलने वाली मेरी नीद अजीव वेचनी से सुबह साढ़े तीन बजे ही खुल गयी थी। पूरा वातावरण मामान्य होने के बावजूद जाने वह कैसी वेकली थी, जो "मन-प्राण को मथे दे रही थी। इतनी मुबह उठ कर क्या करू', यह तय नहीं कर पा रही थी, न पुस्तकों में मन लग रहा था, न देव अर्चना में । बार बार मन में एक अज्ञात आशंका जन्म ले रही थी-जरूर आज कुछ ऐसा होने वाला है, जो नहीं होना चाहिए। बुझे मन में ही उस दिन आफिस गयी थी, नित्य की दिनचर्या थी । अकारण व्यवधान आता भी कसे । मन चूंकि काफी वेचैन था. अतः तुलसी की यह पक्तियां . मन ही मन कई बार दुहरा चुकी थी-"जीवन न लह सुख, हरि प्रतिकूला".."कभी “यही पक्तिया फादर ने अमृत वाक्य के रूप, घोर निराशा के क्षणो में सबल प्रदान करने के लिये मुझे सिखाई थी । उफ ! इम पक्तियों को दुहराते समय मन में कभी वह ख्याल तक नहीं आया कि प्रकृति के ये दर्शाये अपशकुन उस महामानव को विदाई "बैला के हैं। कौन जानता था, जिन पक्तियों के सहारे मैं अपने को सामान्य रखने की कोशिश कर रही थी, उसी को सिखाने वाला आज जा रहा है हमेशा-हमेशा के लिये। शाम झुक आयी थी, और अपने को व्यस्त रखने के लिये मैं चाय के प्याले के •साथ कार्यालय के दूरमुद्रक कक्ष तक गयी थी और दूरमुद्रक से छपकर निकलते समा- चारों पर नजर पड़ते ही चाय छलक गयी-फादर बुल्के नहीं रहे। फादर वुल्के अस्वस्थ हैं, उनके गैगरीन के कारण उनके हित में उनके दाये -पैर की तीन उगलिया काट दी गयी है । यह सब कई दिनो से समाचार-पत्रों में पढ़ रही थी और पढ कर मन ही मन बेचैन हो रही थी, कैसी अभागी थी मैं, फादर इसी पटना में कुर्जी मिशन अस्पताल में थे, और मैं उनकी दुलारी विटिया---जिसे वे हमेशा तीन वर्ष की नन्ही मुनिया की तरह देखा करते थे, उन्हे देखने तक के सुग्न से मुझे ईश्वर ने वचित कर रखा था-मैं स्वयं राजेन्द्रनगर अस्पताल मे. एक दुर्घटना के कारण जीवन-मृत्यु के झूले मे झूल रही थी, और जैसे ही इम लायक हुई कि कुर्जी अस्पताल तक जामा, फादर दिल्ली जा चुके थे।
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फादर दिल्ली चले गये, उन्हें बेहतर स्वास्थ्य लाभ होगा, यह मोचकर मन फो गांत्वना दी थी मैने । पर यह कहां सोचा था कि वे दिल्ली जा कर हमेशा हमेशा के लिये हमे छोड़ जायेंगे। ईश्वर इतना ऋर होगा कि उन्हें हम सब से छीन लेगा, इसकी कल्पना तो मैंने नहीं की थी। यह भो भान हुआ कि अभी जो स्थिति मेरी है, यह मुख में उनके करीब रहने वाले हजारों हजार रॉची के अनाम छाव-छात्राओं की हो रही होगी। मानसिक दृष्टि से मैं फादर बल्क के कितने करीब रही हूं, यह मैं नहीं जानती किन्तु फादर हमेशा करीव रहे हैं, इतने करीब कि हर क्षण माथे पर मैंने उनका वरदहस्त पाया है। इन्टरमीडियट के अबोध अल्हड़ दिनों से लेकर एम० ए० की परिपक्वता तक हर क्षण मैंने अपने माये पर उनकी वात्सल्य रस में भीगी उंगलिया महसूस को है। आज जब फादर नही रहे, उनकी वही स्मृतियां तो भाव विह्वल किए दे रही हैं । उनका घर, उनको लाइनेरी, मान घर और लाइग्नेरी ही नहीं, रांची के युवाओं के लिए एक मन्दिर था जहां हम पन्टों बंटकर मां सरस्वती की आराधना किया करते थे, उनके निर्देशन में। उनका व्यक्तित्व एक विद्वान का नहीं, एक संत का था। छ साढ़े ६. फुट की लम्बो काया। सफेद लम्बी दाढ़ी और दुग्ध धवल गाउन उन्हें देवदूत की सी भव्यता प्रदान करते थे। एक ऐसा व्यक्तित्व जिसे देखते ही उसके चरणों की धूल माथे पर लगाने को अदम्य इच्छा स्वतः उत्पन्न हो । मुझे याद है, जब मैंने उनका चरणस्पर्श किया था, हर बार उन्होंने स्नेह विगलित स्वर मे "मेरी बेटी आ गई" कह कर मेरे माथे पर अपनी परम्परानुमार स्नेह चुम्वन अकित किया था और मैं बेटी के अधिकार से ही उनसे झगडती रहती थी-फादर आप इतना काम मत किया कीजिए आप बोलिये ''मैं लिखूगी....." ..."फादर आपने दवा अब तक नहीं. खाई... । फादर पहले दमा से आक्रान्त रहा करते थे और स्वास्थ्य के विषय में इतने लापरवाह कि उन्हें दवाइया खाने तक की याद नहीं रहती थी। काम, काम और केवल काम, यह उनके जीवन का लक्ष्य था। मैंने उस वृद्धावस्था और रुग्णावस्था में भी अहनिशे कर्म की उपासना करते उन्हे देखा है । हिन्दी के इतने सवल पक्षधर थे कि सामान्य बातचीत में भी अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करना उन्हें जरा भी पसन्द नहीं था। इसी मे संबंधित एक घटना याद आ रही है मुझे। उन दिनो एम० ए० प्रीवियस मे मैं थी। रांची विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग की कक्षाए 11 बजे से होती थी उन दिनों। फादर वाइविल का नये ढंग मे हिन्दी अनुवाद करने में लग थे। सुबह 9 बजे मैं उनकी लाईटेरी पहुंचती थी। फादर से सबंधित कोई काम करके मुझे असीम सुख मिलता था। फादर बोल रहे थे और मैं लिख रही थी। तभी मेरे मामा जी किसी आवश्यक घरेलू काम से मुझे लेने लाइब्रेरी पहुंचे और घर चलने को कहा। फादर ने उनका परिचय पूछा और सामान्य स्वर मे ही उन्होंने कहा- मैं नीलम का अंकल हूँ" अंकल शब्द सुनते ही 'फादर ऋद्ध हो गये । यो फादर को गुस्से में आते मैंने कम ही देखा था। फादर गुस्से में बोल रहे थे--अंकल । अंकल का अर्थ क्या होता हैं, आप यह बताइये । आप उसके 'चाचा हैं, मामा है, मौसा है, फूफा हैं और मेरे मामा का मर शर्म के मारे झुक गया था। मुझे भी शर्म आ रही थी, अपने मामा जैसे हिन्दी भापियों के खोखलेपन पर जो हर चार शब्दों के बाद अंग्रेजी शब्दों को जोड़ना आवश्यक समझते है । जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण कितना आशावादी रहता था, उससे संबं- 'धित भी एक घटना याद आ रही है मुझे । मेरी एम० ए० की परीक्षा समाप्त हो ‘चुकी थी और मैं पटना आने वाली थी। जल्द ही विवाह भी होने वाला था और इसी संभवना से कि पता नहीं फादर में फिर कब मिलना संभव हो, मैं उनका आटोग्राफ लेने गई थी। उन्होंने मेरी आटोग्राफ बुक मे रामायण की यह पक्ति लिखी थी-- "जीवन न लह सुख, हरि प्रतिकूला।" लिखकर उन्होंने उनका विश्वलेपण यह किया था-"बेटा जीवन में कितनी भी प्रतिकूलतायें, आयें उनसे कभी घबराना नहीं चाहिए। यह इसलिए कि ईश्वर जो करता है, वढिया करता है। जीवन में इस सिद्धांत को लेकर चलो तो तुम्हें कोई दुख नहीं होगा।" इन पंक्तियों को मैंने अपने जीवन में उतारने का प्रयल किया है। सचमुच उनकी इन पक्तियों ने मुझे हर डूबती निराशा को घड़ियो मे अदभुत बल प्रदान "किया है । पर आज जब फादर नहीं रहे तो इच्छा नही होती कि यह मान "ईश्वर 'जो करता है अच्छा करता है" फादर को हम सबसे छीन कर ईश्वर ने क्या अच्छा किया है। फादर जव भावुकता में आते थे तो अक्सर अपने बचपन की वात बताने लगते थे। नाविक परिवार में । सितम्बर, 1909 को अपने जन्म से लेकर अपने तेरह भाई-बहनों की कहानी--जिसमें सिर्फ एक बहन ही वच गई थी जो उन दिनों वेल्जियम में थी । हिन्दी के लिए इतना करने के बावजूद फादर हिन्दी भापियों को "हिन्दी की उपेक्षा करते देखते थे तो उन्हें आन्तरिक दुख होता था। धैर्य को फादर जिन्दगी का एक महत्त्वपूर्ण संबल मानते थे । इन्टरमिडियट के दिनों में उपन्यास पढ़ने का मुझे नया-नया चस्का लगा था। मैं उनकी लाइब्रेरी से एक दिन चार कितावें पढ कर दूसरे दिन लौटने पहुंची थी। उनके यह पूछने पर कि क्या पढा, मेरे उत्तर मे चारों पुस्तकों के विषय गड़बड़ हो गये । वे अक्सर मुझे कहा करते थे-बेटे तितली नहीं मधुमक्खी बनो, हर पुस्तक को तितली की तरह 'छूकर छोड़ देना अच्छा नहीं, मधुमक्खी की तरह उनसे सार ग्रहण करना चाहिये । ऐसे क्षणों में फिदर के मुह से रजनीगंधा के फूलों की तरह जीवन में सफल होने के लिए पवित्रता से आतलावित शब्द टपकते थे और मेरा रोम-रोम कान बन- कर उन अमृत वाक्यों को सुनता रहता था।
इतना कुछ मिखाया है उन्होंने मुझे मेरे जैस सची के उन हजारों-हजार अनजान छात्र-छात्राओ को, कि उनको स्मृतियां से कभी चाहकर भी हम कभी दूर नहीं हो सकते। फादर विद्वान, रामकथा के मर्मज्ञ ज्ञाता और तपस्वी ही नहीं वात्सल्य से परिपूर्ण मुझ जैसे असख्य हिन्दी के छात्र-छात्राओं के पिता भी थे, एक ऐसे स्नेही पिता जो बच्चों को डॉटता भी है. ताउना भी देता है पर इतने मीठे शब्दों में कि कभी रोप उत्पन्न नहीं होता। फादर जय नहीं रहे और मेरा उतरा चेहरा देखकर लोगो ने कारण पूछा तो एक ही शब्द निकला मेरे मुंह से---"अपने परिवार के सगे नाना-दादा को भी कुछ हो जाता तो इतनी तकलीफ मुझे नहीं होती।" जानती हूं मेरे इन शब्दों से, मेरी इस भावना से मेरे स्वजनों को दुरा होगा, पर ये शब्द मेरे मुंह से ही नहीं मनः से निकले थे। दुख इस बात का नहीं कि फादर नहीं रहे । उनकी उम्र हो आई थी। दुनिया में अमर होकर कोई नहीं आया। लोग-बाग कहते है कि स्णावस्था की यंत्रणादायी पीडा में उनकी मुक्ति हुई है। इस सब को मैं भी अस्वीकार नही करती पर दुख तो इस बात का है, फादर से अब कभी नहीं मिल पाऊंगी। जीवन में जब जव हारती थी उनके पास दौड़ती थी। उनके आशावादी अमृत वाणी से मुझे ताकत मिलती थी । जव जीवन में हारूगी, कहां कौन साहस बंधायेगा इस बेटी को। कहाँ पाऊंगी अब उनका स्नेह सिक्त वात्सलय । मुझ में तो इतना साहस भी नहीं रहा कि ईश्वर से यह भी प्रार्थना कर मक कि ईश्वर उनकी आत्मा को चिरशान्ति प्रदान करें। क्यों कि मेरा विश्वास है कि जैसे तपस्वी वे थे, कर्म की अहर्निश उपासना जैसी उन्होंने की थी, जाने-अनजाने व्यक्तियों के बीच स्नेह उन्होंने बांटा था, उनकी सारी जिन्दगी, उनके कर्म इस बात के साक्षी है कि उनकी आत्मा की शांति के लिये ईश्वर को किसी व्यक्ति की परवी या प्रार्थना की आवश्यकता नहीं। निश्चय ही उन्हे ईश्वरत्व मिलेगा। बिहार जनसम् 8 -" बाबा बुल्के-एक स्मरणांजलि ~~सुश्री नीलम पहले रेडियो से सुनी, फिर समाचार पत्र में पढ़ा और आँखें भर आई। बावा बुल्के का देहान्त मेरे लिए अविश्वसनीय परन्तु कठोर सत्य था। ज्यादा दिन तो नहीं हुए थे उनसे मिले, जैसे कल ही की तो वात थी। उन्हें बहुत पहले से ही देखा जाना है जब कॉन्वेंट मे पढती थी पर जिसे प्रौढ़ मुलाकात कहते है वह आठ वर्ष पूर्व की कही जा सकती है। उस दिन सुबह के आठ बज रहे थे। हवा वादलो की बोझ से घुट-घुट कर बह रही थी। वातावरण कुछ ठडक लिए थी। मैं पुस्तको की सूची लिए उनके 'मानरेसा आवास' में पहुंची थी। मैं झिझक रही थी, थोड़ी झेंप थी। अपनी उस किशोरी प्रेम यात्रा को अचानक इतनी वडी-सी देखकर क्या कहेगे । पर जब वे सामने आए तो दोनों हाथो से मेरे कंधे पकड़ ले जाकर पुस्तको भरी लोहे की आलमारी के पास खडा कर दिया और मधु जैसे स्वर में बोले "कितनी पुस्तकें लेनी है, ले लो।" मैं उनकी ओर देखती हुई जन आलमारी के लोहे के कपाट खोलने में असफल रही तो हँसकर स्नेह से एक चपत मारकर बोले-'तुम कभी एक अच्छी , शातिर चोर नहीं बन सकती हो।" और उन्होंने खीचकर कपाट खोल दिया। मैं पुस्तकें लेकर चलने लगी थी तो उन्हें बहुत ध्यान से देखा था। जव. छोटी थी तो उनकी काया मे सिवाय स्नेह के कुछ न नजर आता था। पर आज उन्हे देखा तो उनके सुंदर्शन छवि को देख चकित रह गइ थी। वे मेरी टकटकी से थोड़ा परेशान होकर वोले-"क्या देख रही हो?". मैंने हंसकर कहा, आपको और सोच रही हूँ आपका व्यक्तित्व आज किसी को मिले तो वह हीरो बनने फिल्मों मे भाग जाये पर आप तो सब कुछ होते भगवान की शरण मे भाग गये फिर दूसरी बार मिली। उनसे मिलने के निश्चित समय से मैं कुछ करके पहुंची थी और सोचा था शायद वे नहीं मिलेंगे। मैं लौटने लगी थी कि वे अन्दर कमरे से झट वाहर आए और मेरा लौटने का कारण सुनकर एक चपत लगा कर कहा-मूर्ख कही की, पढा लिया खाक है क्या, यह प्रतिवन्ध लड़कियों पर नहीं लड़कों के लिए है।" मेरी आँखें स्नेह में डूब गई थी। उसी समय पुस्तक खोजते हुए मैं उनसे बातें कर रही थी तभी एक महिला भी मा पहुँची। जो वाती ही बातों में बाबा को अपनी नौकरी की :- इतना कुछ सिखाया है उन्होंने मुझे- मेरे जसे रांची के उन हजारो-हजार. अनजान छात्र-छात्राओं को, कि उनको स्मृतियाँ में कभी चाहकर भी हम कभी दूर नहीं हो सकते । फादर विद्वान, रामकथा के मर्मज्ञ ज्ञाता और तपस्वी ही नहीं वात्सल्य से परिपूर्ण मुझ जैसे असख्य हिन्दी के छात्र-छात्राओं के पिता भी थे, एक ऐसे स्नेही पिता जो बच्चो को डाँटता भी है, ताड़ना भी देता है पर इतने मोठे शब्दो मे कि कभी रोप उत्पन्न नहीं होता। फादर जद नहीं रहे और मेरा उतरा चेहरा देखकर लोगों ने कारण पूछा तो एक ही शब्द निकला मेरे मुंह से-"अपने परिवार के सगे नाना-दादा को भी कुछ हो जाता तो इतनी तकलीफ मुझे नहीं होती।" जानती हूं मेरे इन शब्दो से, मेरी इस भावना से मेरे स्वजनो को दुख होगा, पर ये शब्द मेरे मुह से ही नही मन से निकले थे। दुख इस बात का नहीं कि फादर नही रहे । उनको उम्र हो आई थी। दुनियां में अमर होकर कोई नहीं आया। लोग-बाग कहते है कि हरणावस्था को यनणादायी पीड़ा से उनकी मुक्ति हुई है । इस सच को मैं भी अस्वीकार नही करती पर दुख तो इस बात का है, फादर से अब कभी नहीं मिल पाऊंगी। जीवन में जब जब हार थी उनके पास दौडती थी। उनके आशावादी अमृत वाणी से मुझे ताकत मि थी। जब जीवन मे हारूगो, कहां कौन साहस बंधायेगा इस वेटी को । कहाँ । अब उनका स्नेह सिक्त वात्सलय । मुझ मे तो इतना साहस भी नहीं रहा कि से यह भी प्रार्थना कर सकें कि ईश्वर उनकी आत्मा को चिरशान्ति प्रदान व कि मेरा विश्वास है कि जैसे तपस्वी वे थे, कर्म की अहनिश उपासना जर की थी, जाने-अनजाने व्यक्तियों के बीच स्नेह उन्होने बाँटा था, उनकी उनके कर्म इस बात के साक्षी है कि उनकी आत्मा की शांति के लिंग किसी व्यक्ति की पैरवी या प्रार्थना की आवश्यकता नहीं। नि: . ईश्वरत्व मिलेगा। । सम्पादक: सूचना एवं फादर कामिल बुल्के -~डा० कुमार सुरेश सिंह फादर कामिल बुल्के में मेरा प्रथम परिचय 1961 में हुआ था। मैं उस वक्त मुण्डा क्षेत्र खूटो मे पदस्थापित था । मुण्डा भाषा सीख रहा था और मुण्डा लोकगीत एवं लोक साहित्य में रुचि जग गई थी। इमो मिलनिले में मुण्डा विशेषज्ञों के सम्पर्क मे माया जिनमें कई मिशनरी थे। इनमें फादर वोनेट और फादर एपसम के नाम 'उल्लेखनीय है । इनसे विचार-विमर्श के लिए में मनरेसा हाउस" जाता था। वही एक दिन फादर कामिल बुल्के से मुलाकात हुई। वे अपने कमरे में अपने शोध में डूबे हुए थे । लोक साहित्य एवं लोक गीतों के बारे में बातचीत हुई । उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह उनके शोध क्षेत्र के बाहर का विपय है, लेकिन उन्होंने एक बात बात पर विशेष जोर दिया, यह यह कि जो भी सामग्री एकत्रित की जाय वह हिन्दी मे ही, चूंकि ज्यादातर लोग हिन्दी जानते हैं । छोटा नागपुर में आदिवामियों के बीच हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि के प्रचार में मिशनरियों का वडा हाथ रहा है और "इसके पीछे यही भावना काम कर रही है। फिर कई कारणों से तोक साहित्य में शोध का सिलसिला टूटा और मैने बिरसा मुण्डा पर एक शोध ग्रन्थ लिखा । बिरसा मुण्डा मिशनरियो में उन दिनों लोकप्रिय नहीं थे। चूंकि इस मुण्डा नेता ने सिर्फ-ब्रिटिश शासन के विरद्ध ही नहीं बल्कि मिशनरियों के खिलाफ भी वगावत की थी। मेरी किताब कुछ इन लोगों के बोच आलोचना का विषय बन गई। 1967 मे एक नवयुवक मिशनरी पादरी ने महुआडाड में कुछ गलत काम किये और उन्हें देश के बाहर भेज दिया गया जो अपने ढंग की पहली घटना थी। मिशनरियों की इस कार्यवाई की ऊंचे स्तर पर समीक्षा की गई और इममै मुझे भी लेना पड़ा। मैंने कहा कि कुछ मिशनरियों का भारतीय संस्कृति एवं आदिवासियों भाग के प्रति पूर्णतः समर्पित व्यक्तित्व है, उनका जीवन ऋपितुल्य है और मैने इनमे में फादर कामिल बुल्के का नाम लिया । यह देखकर पर्याप्त सन्तोप हुआ कि इस विचार मे सभी सहमत थे । 1978 में मैं पुनः छोटा नागपुर लौटा, इन विद्वानों से पुनः सम्पर्क स्थापित किया और सोचा की विसरी-भूली कड़ियां फिर जुड़े। इस दौरान डा० कामिल वुल्के और मैं फिर नजदीक आये । उन्होने मेरी विरसा पर लिखी पुस्तक के हिन्दी अनुवाद करने पर जोर दिया ताकि लोग इस आदिवासी नेता के बारे में जाने और समझें।
४० • परेशानियां बताने लगी। और तब मैंने देखा था स्त्री के कप्टों के प्रति उनकी चेतना। उन्होंने जब उस महिला से सुना कि वह दस घटे प्रतिदिन एक लेडीज शॉप में काम करती है तब उनके माथे की सिलवटें और गहरा गई, माथे पर हाथ मारकर बोले "ओफ क्या हो गया है इस देश को, जहाँ सीता और द्रौपदियो पर यह अत्याचार हो रहा है।" मेरे आगे जैसे उनका कुछ विराट प्रकट हो गया। मुझे एक बार लगा पूछ्रे "बाबा, जब स्त्री से आपको इतना स्नेह है. इतनी चिन्ता है फिर स्त्री संग नकार क्यों दिया।" पर यह प्रश्न मेरे होठों पर ही आकर रुक गया। शायद झिझक से या यह सोचकर कि वे हँसकर कहेंगे सन्यास लेकर मैं कितने पुत्र-पुत्रियों का पिता बन गया, देखती नही। फिर बीच-बीच में कई मुलाकातें हुई । कभी कुछ वडी कभी छोटी। इतनी भी छोटी कि मुझे लगता मैं सिर्फ उनके दर्शन को ही उन तक चली जाती हूँ। और कुछ बड़ी मुलाकाते वस कितावें चुनने के भाग-दौड़ मे ही खत्म हो जाती थी। ऐसी ही छोटी-बड़ी मुलाकातो के दौर में एक दिन उनके हाथों से बनी कॉफी भी पी थी और उनका शैशवी गर्व से भरा प्रश्न सुना था "बोलो, कैसी बनी है कॉफी ?" - मैंने हसकर कहा, "अगर आप बावर्ची होते तो वहाँ भी साहित्य जमी ख्याति पाते..." और बडी मोह में फंसी मन ही मन सोचती जा रही थी काश ! मैं शिव होती तो इसे कठस्थ कर लेती। और अन्तिम मुलाकात याद आती है जब मैं पुस्तक खोजती एक पुस्तक उठाकर देखने लगी थी । पुस्तक का नाम था “मौत का पजा"। पुस्तक निवन्धी का एक सकलन था, लेखक आचार्य चतुरमेन शास्त्री। वे मेरी ओर देखकर हँसते हुए बोले, "यह तो अब मेरी ओर बढ़ा आ रहा है।" उनके ऐसा कहने पर मैं बुझ-सी गई। पर, मैंने तुरत कहा, "तो इमे मैं अपने साथ ले जा रही हूँ।" इस पर उन्होंने गम्भीर होकर कहा, "इमके पजे बहुत लम्वे होते है, वहीं से भी चली आएगी।" जब उनकी मृत्यु का समाचार सुना तो बरबस यह घटना और वह पुस्तक आँखो के आगे आकर ठहर गई और एक प्रश्न दिमाग में कौधने लगा "क्या उन्हें मौत का आभास पहले से ही होने लगा था।" द्वारा जे० एन० वर्मा अधिवक्ता मोरहाबादी रोड करमटोली, रांची-8 फादर कामिल वुल्के -डा० कुमार सुरेश सिंह 1 फादर कामिल बुल्के मे मेरा प्रथम परिचय 1961 में हुआ था। मैं उस वक्त 'मुण्डा क्षेत्र बूंटी में पदस्थापित था । मुण्डा भाषा सीख रहा था और मुण्डा लोकगीत एवं लोक साहित्य में रुचि जग गई थी। इसी सिलसिले में मुण्डा विशेषज्ञों के सम्पर्क मे आया जिनमें कई मिशनरी थे। इनमे फादर वोनेट और फादर एक्सेम के नाम ‘उल्लेखनीय है । इनसे विचार-विमर्श के लिए मैं "मनरेसा हाउस' जाता था। वही एक दिन फादर कामिल बुल्के से मुलाकात हुई। वे अपने कमरे में अपने शोध में डूबे हुए थे । लोक साहित्य एवं लोक गीतों के बारे में बातचीत हुई। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह उनके शोध क्षेत्र के बाहर का विषय है, लेकिन उन्होंने एक बात बात पर विशेप जोर दिया, वह यह कि जो भी सामग्री एकत्रित की जाय वह हिन्दी में ही, चूंकि ज्यादातर लोग हिन्दी जानते हैं । छोटा नागपुर में आदिवासियो के बीच हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि के प्रचार में मिशनरियों का वड़ा हाथ रहा है और इसके पीछे यही भावना काम कर रही है। फिर कई कारणों से लोक साहित्य में शोध का सिलसिला टूटा और मैने विरसा मुण्डा पर एक शोध ग्रन्य लिखा । विरसा मुण्डा मिशनरियों में उन दिनों लोकप्रिय नहीं थे। चूंकि इस मुण्डा नेता ने सिर्फ-ब्रिटिश शासन के विरद्ध ही नहीं बल्कि मिशनरियो के खिलाफ भी वगावत की थी। मेरी किताब कुछ इन लोगों के बीच आलोचना का विषय बन गई। 1967 में एक नवयुवक मिशनरी पादरी ने महुआडाड में कुछ गलत काम किये और उन्हें देश के बाहर भेज दिया गया जो अपने ढंग की पहली घटना थी। मिशनरियों की इस कार्यवाई की ऊंचे स्तर पर समीक्षा की गई और इसमे मुझे भी लेना पड़ा। मैंने कहा कि कुछ मिशनरियों का भारतीय संस्कृति एवं आदिवासियों भाग के प्रति पूर्णतः समर्पित व्यक्तित्व है, उनका जीयन ऋपितुल्य है और मैंने इनमें में फादर कामिन बुल्के का नाम लिया। यह देखकर पर्याप्त सन्तोप हुआ कि इस बिचार मे सभी सहमत थे । 1978 में मैं पुनः छोटा नागपुर लौटा, इन विद्वानों में पुनः सम्पर्क स्थापित किया और मोवा की विसरी भूली कड़ियां फिर जुड़े। इस दौरान डा० कामिल बुल्के और मैं फिर नजदीक आये । उन्होंने मेरी बिरसा पर लिखी पुस्तक के हिन्दी अनुवाद करने पर जोर दिया ताकि लोग इस आदिवासी नेता के बारे में जाने और समझें।
४२ पुस्तक की कुछ कमियों की ओर भी उन्होंने मेरा ध्यान दिखाया । 1979 मे अनुवाद पूरा हुआ और हिन्दी पुस्तक प्रकाशित हुई। वे बड़े प्रसन्न हुए। इसी बीच फादर पो० पोनेट और मैंने "मुण्डारिका एनसाईक्लोपीडिया" के दो अपूर्ण ग्रन्थों के जो 1942 से अप्रकाशित थे, प्रकाशन का कार्य पूरा किया और इस सिलसिले में एक समारोह का भी आयोजन हुआ जिसमे फादर बुल्के उपस्थित नहीं हो सके चूंकि वे अस्वस्थ थे, लेकिन उन्होंने अपनी शुभकामनाएं भेजी थी। फादर बुल्के से मेरी अन्तिम मुलाकात कुछ महीने पहले रांची हवाई अड्डे पर हुई थी। मुझे देखकर वे लपक कर आये और बड़े ही स्नेह एव आत्मीयता पूर्ण शब्दों में मेरा कुशल-क्षेम पूछा। मैंने कहा कि यह तो मुझे आपसे पूछना चाहिए। उन्होंने कहा "वृद्ध हो चला हूं और अस्वस्थ हूं।" मैंने कहा "आप अस्वस्थ नहीं दिखते हैं।" कुछ बाद उनकी मृत्यु समाचार पाकर मर्माहत हुआ। फादर वुल्के के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता हिन्दी और भारतीय संस्कृति के प्रति उनकी निष्ठा-प्रतिवद्धता थी। वे शोध मे डूबे रहते थे और विषय की गहराई मे पैठने के लिए शोध-कर्ताओं को वरावर उत्साहित करते रहते थे । एक महान शोधकर्ता के रूप मे वे अपने विषय पर ही चिन्तन किया करते थे। अन्य विषयों की ओर ध्यान नहीं देते थे । इधर कई वर्षों से उन्होंने अपना पूरा समय और अपनी शक्ति 'अंग्रेजी हिन्दी कोश' और 'बाईबल' के हिन्दी अनुवाद पर केन्द्रित कर रखी थी। पहली पुस्तक बड़ी लोकप्रिय हुई है। दूसरी पुस्तक अधूरी पडी है । इमे पूर्ण करनी चाहिए। यह एक चुनौती है, जिसे फादर बुल्के के नजदीकी और उनके प्रशंसक शोधकर्ता पूरा करेंगे, ऐसी मेरी आशा है । फादर बुल्के का शोधकार्य एक बहुमूल्य विरासत है जिसे और समृद्ध बनाया जायगा, यह मेरी कामना है । -~-सरकार के विशिष्ठ पदाधिकारी 000 वावा बुलके --डा० श्याम सुन्दर घोष बावा बुलके आ रहे है । मैं जब उन्हें देखना तो मित्रों से यही कहता। मित्र टोकते-बुलके क्यों कहते हो ? उनके नाम का सही उच्चारण है- बुल्के। मैं वुलके खान वजह मे कहता हूं। मैं बताता । मेरा मतलब है वाया वुलके अर्थात् पैदल चलकर आ रहे है । इसके बाद मैं उनके मूल नाम की व्याख्या करता-कामिल को लोग लेटिन शब्द मानते है और इसके दो अर्थ वताते है-एक तो फूल और दूसरा वेदीसेवक । ये आशय भी वावा के नाम पर सटीक उतरते हैं। पर मैं तो कामिल का उर्दू अर्थ लेना ही पसन्द करता हूं। फिर मित्रों को मुहम्मद मुस्तफा खां 'मद्दाह' का उर्दू-हिन्दी शब्द-कोश दिखाता जिसमें कामिल का अर्थ है-पूरा, समूचा, सम्पूर्ण, बिल्कुल, मुकम्मल, स्वगिपूर्ण, निपुण, दक्ष, होशियार; चमत्कारी साधु या फकीर। और फिर मैं मित्रो से पूछता कहिये, बावा के मामले में कौन अर्थ लेना ज्यादा ठीक है ? क्या वे एक फूल मात्र हैं ? मा केवल वैदी सेवक है ? या उससे भी बढ़कर कुछ और है मेरे अधिकांश मिन मुझसे सहमत है कि बाबा के नाम का उर्दू अर्थ लिखा जाना हो ठीक है। केवल यही नहीं, मैं बाबा के नाम की एक नयी व्याख्या करता हूं-कोई- कोई सर्वांगपूर्ण, दक्ष, निपुण, होशियार चमत्कारी साधु 'फकीर यदि बुल के अर्थात पैदल चलकर सामने आये तो वह कैसा, कितना सहज और आत्मीय लगेगा। पैदल चलने मे सहजता और आत्मीयता का भाव है, शनैः-शनैः और सहज उपलब्ध होने का बोध है । जो पैदल नहीं चलता, या पैदल चलकर किसी के पास नही, आता, न जाने उसके प्रति मेरे मन में क्यो वैसा आदर भाव नहीं होता । सवारी पर बैठा हुआ पुरुप न जाने क्यों मुझे महापुरुष नहीं लगता। इसलिए मैं बरावर बाबा बुल्के को बुलके ही कहना मानता था। बाबा के चलने का ढग था भी कुछ वैसा ही मोहक और निराले अन्दाज का । उनको दूर से पैदल आते देखना अच्छा लगता था। वे जब भी मनरेसा हाउस के अपने कमरे से यही थोड़ी देर के लिए भी बाहर जाते थे, तो एक तख्ती लटका जाते थे, जिस पर इस आशय का वाक्य लिखा होता- "मैं अभी थोड़ी देर में वापस आता हूं। तब तक आप वैठिये ।" या ऐसा ही कुछ । वापस आते ही वे तख्ती समेट लेते और आगन्तुक से बातें करने लग जाते । ये तस्तियां बताती थी कि बावा को हरदम किसी का इन्तजार रहता । वे अपना पामरा बन्द कर शायद ही कभी जाते थे। हमे उनके कानरे में इन्तजार करना अबरता नहीं था, क्योकि वहाँ ढेर मारी पत्र-पत्रिकाएं और पुस्तकें पड़ी रहती थी-बिगुल नयी-में- नई किताव और छोटी से छोटी अव्यवसायिक पत्र-पत्रिकाएँ। चमे तो लोग अधिकतर न्हें फादर ही कहते थे। पादरियों के लिए प्रयुक्त होने वाले इस पवित्र और गरिमायुक्त गयोधन को वे मना को नकारते। रोपिन इस शब्द से उनके व्यक्तित्व की गरिमा और स्नेह का वैसा बोध नहीं हो पाता जितना उनके लिए प्रयुक्त वावा शब्द में होता है । वे सही में वाया थे-हिन्दी अर्थ मे भी और अंग्रेजी अर्थ में भी~एका साथ ही बूढे और शिशु । और फिर इसका बुल्के के साथ अनुप्रास भी ठीक बैठता था। बाबा अग्रेजी शब्दों के प्रयोग के पक्षपाती नहीं थे। यह उनको अखरता भी था। इसलिए भी उनको फादर कहने की अपेक्षा बाबा कहना अधिक सहज और सुविधाजनक था। दूसरे अग्रेजी शब्दो पर तो वे तुरत आपत्ति करते । लेकिन वेचारे फादर शब्द के प्रयोग पर आपत्ति करते भी तो कैसे करते? । वावा से मेरी पहली मुलाकात इलाहाबाद में तब हुई थी जब चीनी आक्रमण के बाद महादेवी वर्मा और बालकृष्ण राव ने लेखकों का एक सम्मेलन इलाहाबाद में बुलाया था। उसमें मैं भी आमंत्रित था और हिन्दी-साहित्य सम्मेलन के अतिथि-निवास 'सत्यनारायण कुटीर' में ठहरा था। तब यह जानकर कि विहार में भी कोई श्याम सुन्दर घोष नाम के व्यक्ति आये है बावा खोज करते हुए मेरे कमरे में आ धमके थे और यह जानकर कि मैं बिहार में संताल परगने का वासी हूं, कहा था--देखिये, आपसे यहां इलाहावाद मे मुलाकात हो रही है । मतलव यह उनका एक प्रकार का उपालम्भ या कि आपसे तो राची में मुलाकात होनी चाहिए थी। मैने तभी उनकी बात नोट की थी और रांची जाने पर यदा कदा उनके दर्शन कर लिया करता था। राची में उनसे मेरी अंतिम मुलाकात मन 1980 के अक्टूबर माह में हुई थी जव उन्होंने अपनी दो पुस्तकें न्यू टेस्टामेंट का अनुवाद 'नया विधान' और बाइबिल की प्रार्थनाओं का हिन्दी अनुवाद The Hindi Psaltor of the Breviary की प्रतियां मुझे दी थी। ये दोनों पुस्तके आज भी मेरे पास हैं और उन पर लिखा 'श्री श्याम मुन्दर घोष को सस्नेह और उनका हस्ताक्षर आज भी स्नेह की अमूल्य धरोहर के रूप मे मेरे पास सुरक्षित हैं । उस मुलाकात में डा० बालेन्दु शेखर तिवारी भी साथ थे और वे यह कहने से नहीं हिचकिचाते कि वादा का आप पर स्नेह है। वे किनी को अपनी पुस्तके, अपने हस्ताक्षर सहित, नहीं देते। इस बारे में मुझे पता नहीं । इसलिए तब मैंने यही कहा था-पता नही, संघको देते रहे हो, तभी तो मुझे भी दिया । संत स्वभाव के व्यक्ति हैं, सभी इनमे कुछ न कुछ पाकर ही लौटते है-- ४५ चाहे. पुस्तक रूप में, या ज्ञान रूप में, या मिलने से प्राप्त होने वाले आनन्द रूप में। बाबा को हिन्दी के लिए बड़ा प्रेम और दर्द था। वे इसकी अवहेलना नहीं सह सकते थे । वैसे तो वे चौदह भाषाओ के पंडित थे पर कुछ भाषाओं-फ्लेमिश, फ्रेंच, लैटिन, ग्रीक, जर्मन, अंग्रेजी, संस्कृत और हिन्दी पर तो उनका अधिकार ही था। लेकिन इनमें भी हिन्दी के लिए उनके मन में जो मोह-छोह था वह अद्भुत अपूर्व ही कहा जा सकता है। इसका कारण सम्भवत: यह रहा हो कि हिन्दी की उपेक्षा उन्हें सहन नहीं होती थी। हिन्दी हिन्दुस्तान में जिस ढंग से उपेक्षित है सम्भवतः वह उसकी पानी नहीं है । इसी के कारण शायद हिन्दी के प्रति उनका विशेष पक्षपात रहा हो । या यह भी हो सकता है कि हिन्दी की अवमानना उन्हें अपनी मातृभाषा फ्लेमिश की अवमानना का स्मरण हो आता हो। वे वेलजियम में जिस वातावरण में पढ़े-लिखे उसमे फेच की तुलना में फ्लेमिश का वही महत्त्व और स्थान था जो अंग्रेजी, की तुलना मे हिन्दी का, भारत में है। बावा को अपनी मातृ-भापा फ्लेमिश की अव- मानना अपने देश मे खटकती थी। सम्भव है वैसा ही भाव वे भारत मे आकर हिंदी के प्रति अनुभव करते रहे हो। हिन्दी को वावा का प्रेम मिला यह हिन्दी के लिए गौरव की बात ही कही जायगी । अन्य भाषाओ की तुलना मे हिन्दी से वावा का सम्पर्क भी कितने दिनों का था। वे सन् 1935 मे भारत आये । यहाँ आने पर हिन्दी सीखी। पहले कलकत्ता विश्वविद्यालय से सस्कृत मे वी० ए० किया, फिर एम० ए० हिन्दी पढ़ने इलाहाबाद पहुंचे । लेकिन मन् 1950 में वहाँ से रामकथा पर डा० धीरेन्द्र वर्मा के निर्देशन मे सर्वोच्च उपाधि में पी० एच० डी० प्राप्त कर कर ली। फिर उसी साल रांची के सेन्ट जेवियर्स कालेज में हिन्दी-संस्कृत के प्राध्यापक नियुक्त हो गए । उसके बाद तो वे हिन्दी के ही होकर रह गये । वावा असल में हिन्दी को हिन्द का पर्याय मानते थे । उनके व्यक्तित्व की सरलता, सहजता और निष्कपटता का मेल हिन्दी से ही हो सकता था। मिशनो में अंग्रेजी का जो वातावरण रहता है, उसमे वे कैमे हिन्दी की धुनी रमाये रहते थे, यह सोचकर कभी-कभी बड़ा आश्चर्य होता है। शुरू-शुरू में उन्हें इसके लिए कितना कुछ न करना-सहना पड़ा होगा। माना जाता है कि माया भारत आकर ही रामकथा में रमे। लेकिन नहीं, इसके उत्स उनको जन्मभूमि मे-विशेषकर उनके गांव में प्राप्त है। उनका जन्म वेलजियम के जिस छोटे से गांव मे हुआ था उसका नाम था राम्स कैपल जिसका हिन्दी अर्थ यावा राम का मंदिर बताते थे । तो जिसको जन्मभूमि ही राम का मंदिर हो वे आगे चलकर रामकथा के ममंश और विशेषज्ञ क्यों न होते ? वैसे तो रामकथा के बारे में वारा के पहते भी भारत में काफी जानकारी थी लेकिन वह देश की सीमाओं के अन्दर की जानकारी थी। रामकथा के व्यापक विस्तार और वैविध्य के बारे में प्रमाणिक ज्ञान भारत के लोगों ने यात्रा के अनुसंधान के याद ही प्राप्त किया। फिर तो विश्व भर की समस्त भापाओं में प्राप्त रामफयाओ यो गूची और साराश तैयार करने का काम भी विश्व स्तर पर गुरू हुआ और इम अन्तर्राष्ट्रीय समिति को भी सदस्य के रूप में याचा फा गयोग प्राप्त करना आवश्यक प्रतीत हुआ। क लेकिन बहुत बाबा के पाहित्य और रहन-सहन को देखकर ऊपरी तौर पर उनके बारे में यह धारणा बनती थी कि वे मूलतः धार्मिक माम्प्रदायिक पंहित हैं कम लोगों को मालूम है कि ये मूलत: भौतिक शास्त्र और उच्च गणित के विद्यार्थी थे और उन्होंने पहली डिग्री धी० एम० मी० को सी पी । दर्शन शास्त्र तो उन्होंने बाद में पढ़ा और फिर एक वर्ष के बाद आंइस्टिन को भी विशेष रूप गे पढा । उनका यह वैज्ञानिक प भाषाओं को प्रकृति को समझने में यहा सहायक हुआ। उनका अग्रेजी हिन्दी शब्द कोश जो इतने कम पृष्ठों का होकर भी इतना उपयोगी हो पाया उसके पीछे उनकी कार्य करने की वैज्ञानिक पद्धति ही है । उन्होने बडे नपे तुले ढंग से कोश का यह कार्य किया है । ऐमे मंतुलित कोश और यह भी ऐसी दो भापाओ से सम्बन्धित, जो विश्व की वडी विशिष्ट भापाएँ हैं-कम हो पाये जाते है। वाया ने वाइविल के न्यू टेस्टामेन्ट के अनुवाद के बाद ओल्ड टेस्टामेन्ट के अनुवाद का भी चीड़ा उठाया था और इसमें प्राण पण मे जुटे थे। इमका बहुत-सा प्रारम्भिक काम उन्होंने कर लिया था। यदि यह काम हो गया होता, तो संसार उन्हें सम्पूर्ण बाइविल के समर्थ अनुवादक के रूप में याद करता। लेकिन शायद यह विधाता को मंजूर नही था। नया विधान के अनुवाद में उन्होंने एक जगह लिखा है..."सफल अनुवाद की विशेषता यह होनी चाहिए कि उसमें अनुवाद की गंध नही मिले.."वाइविल के अनुवादक को अन्य अनुवादकों की अपेक्षा मूल की रक्षा करने के सम्बन्ध में अधिक मतर्क रहना चाहिए।" यहाँ उन्होने 'मूल की रक्षा के साथ 'अनुवाद की गंध नहीं मिले दोनो शतों को रखकर अनुवाद को जाचने की कसोटी प्रस्तुत की है। कहना न होगा कि वावा का अनुवाद इस कसौटी पर खरा उतरता है। पर वे इसका थे य खुद न लेकर लिखते हैं-"यदि मुझे इस दिशा मे कुछ मफलता मिल सकी तो उसका श्रेय डॉ. दिनेश्वर प्रसाद (हिन्दी रनातकोतर विभाग, राँची विश्वविद्यालय) को है।" यह है यावा का संत स्प और उनकी उदारता। वाइविल के अनुवाद मे दिनेश्वर जी के सहयोग को भुलाया नही जा सकता। लेकिन उसका जितना श्रेय और जिस रूप में बाबा उन्हें देते हैं वह वे ही दे सकते थे। वावा आचार और विचार से कितने सात्विक थे इसका पता उनकी एक स्वीकारोक्ति से लगता है जिसमे उन्होने कहा है-"कभी स्त्री प्रसग नहीं किया। ।
४७ विवाह का ध्यान ही नहीं आया ।"विश्वविद्यालय में चार हजार विद्यार्थी थे, वेश्यालय भी थे। मैं कभी नही गया। नग्न चिन भी नही देखे, समय ही नहीं था। सेक्सी फिल्म कभी नहीं देखी। समुद्र किनारे वोटिंग सूट में स्त्री को देखकर ‘भी मन में दुर्भाव नहीं आया । सेक्स अनिवार्य है मैं नही मानता । भूख प्यास की तरह कामभावना मच नहीं।" ये उनके जीवन के शुरू के भाव हैं। वे स्त्री मात्र को आसानी से मां का दर्जा दे देते थे,। अपने से कई गुणा छोटी स्त्री के मां कहते अन्हे संकोच नहीं होता था। वे सही अर्यों मे संन्यासी थे। । गोड्डा कालेज संताल परगना (बिहार) एक संत साहित्यकार की याद -शंकर दयाल सिंह मेरी समझ में फादर कामिल युल का उठ जाना औरों के उठने मे सर्वथा भिन्न है । वे वेल्जियम होते हुए पूर्णतया भारतीय थे और पादरी होते हुए भी भार- तीय परम्परा के हो मंत, जिन्होंने न केवल अपने आपको इम मिट्टी में आत्ममात कर लिया था, परन भारतीय कन्य धर्म के लिए अपने को ममपित भी कर दिया था। जायसी, कावीर, रसपान आदि को परम्परा में यदि हम फादर कामिल बुन्के को लें, तो यह कोई अत्युक्ति नहीं होगी। कसी विचिन्न नियति एक महीने के अन्दर तीन ऐसे विदेशी मिट्टी में पैदा, लेकिन भारत को ही अपना घर मानने वाले विभूतियों का देहावसान हुआ, जिसकी पूर्ति अब संभव नहीं है । मीरा वहन, सरला वहन और फादर कामिल बुल्के-ये तीनों पैदा हुए. विदेश मे, लेकिन इन तीनो ने अपने आपको भारत के लिए समर्पित किया और अंत-- अंत तक भारत को अंतश्चेतना के साथ जुड़े रहे। मीरा वहन और सरला वहन गाधी जी की अनन्य भक्तिन थी और उन्होने अपना सारा जीवन बापू को अर्पित कर दिया था, वही फादर कामिल वुल्के ने अपना सारा जीवन भारतीय साहित्य के मनन-अध्ययन में लगा दिया था और उनकी पहचान ही हो गई थी-राम कथा के अनन्य विद्वान । इन तीनो महान विभूतियों के सहसा उठ जाने से भारत-- भू को. एक अलग किस्म की क्षति हुई है, जिसकी तुलना किसी और से कर पाना संभव नहीं है। फादर नहीं : पिता फादर कामिल बुल्के से मेरा पहला परिचय आज से 30-32 साल पूर्व हुआ था, जब मैं 12-14 माल का किशोरपूर्व वालक था। मेरे पिताजी स्व कामता प्रमाद सिंह 'काम' जिनका अधिकांश समय छोटा नागपुर में ही बीतता था और जिन्होंने उम क्षेत्र पर कई पुस्तकें भी लिखी, उनकी मित्रता उस क्षेत्र के सभी साहित्यकारों से तो थी ही, लेकिन विशेष रूप से मैंने यह पाया था कि कई विदेशी पादरी भी उनके घनिष्ठ मित्रों में थे, जिनमें फादर कामिल बुल्के का स्थान सर्वोपरिः ४६ कहा जायेगा । उतने दिनों की स्मृतियां धुंधती हो जाती है, लेकिन आज भी मुझे याद है कि फादर डिमोल्डर, फादर स्लिप. फादर टक्कर आदि कई थे, जो पिताजी से काफी संबंध रखते थे और पिताजी भी रानी-हजारीबाग में उनसे मायः मिला करते थे और उनमें से भी कई पटना आते थे तो इनगे मिलते रहते थे। फादर कामिन युले उनमे से एक होते हुए भी उन सबों से अलग थे और यही कारण था कि पिताजी के देहावसान के बाद यदि उनमे से किसी एक के साथ मेरा अंत तक संबंध रहा तो फादर कामिल युतं मे हो। मैं जय कभी उन्हें फादर कहता था, तो वे मुझे टोक दिया करते थे-फादर नहीं, पिता, तुम मुझे पिता कहा करो। यह स्नेह मिलना कठिन है। पिलक्षण अध्ययनशील फादर कामिल बुल्के से जिन लोगो को प्रायः रांची में मिलने का मौका मिलता होगा, ये इस बात को अच्छी तरह जानते है कि ये विलक्षण अध्ययनशीरा व्यक्ति थे। सेंट जेवियर्स कालेज के पास जिस घर्च के साये में उनका नियारा था जहां और भी फादर्स रहा करते थे, वहां बिल्कुल किनारे पारो अंश मे फादर पामिरा वुल्वे का निवास था और गाने पर ऐसा लगता था कि किसी बड़े से बड़े पुस्तकालय मे हम आ गये है । वे स्वयं पुस्तको से घिरे रहते थे। सागगे की मेग, पाराशी कुरसियां, बगरा यो आलमारियां, तिपाई-हर जगह पुस्तके ही पुस्ता । उन्हें अपने मिशन की और से इस बात के लिए विशेष सुविधा भी किये चाहे जितने भी रुपयों की पुस्तके यरीद गते है । य-यई प्रमाशी और पुस्तका- विक्रताओं का भी आवागमन उनके पास इसके लिए बना रहता था। और कभी- कभी तो एक-एक महीने में ये पाच-सात हजार रुपयों को पुरसके भी परी --- ऐसा मेरा व्यक्तिगत अनुभव है। और उन पुस्तको का जैसा सदुपयोग फादर कामिल बुल्लो पारो थे पैसा शायद ही कोई करता हो। उनके यहां शोध-कत्ताओ, छात्रों तथा अध्ययन अध्यापन में रुचि रखने वालों का ताता लगा रहता था। ये राभी उगगे पुस्तफै रो जाया कररी थे, जो फादर एक रजिस्टर में दर्ज करके देते थे और हजारों लोगों को इस प्रकार are होता था। शुरु में जब उनके पास पुस्तकों की संख्या पाग भी सब शो ऐग ही गरी पे, वाद में मैंने पाया कि पुस्तकालयों के समान ही विषययार थिरिमा प्रणाली अनु. सार ये पुस्तक रयते थे, जिसमें किसी को भी नहरत हो तो यह धागानी से निकाल सके।
२० - मिलने गया, बराबर यही पाया कि अपनी मेज पर मिर झुकाये टेबुल लंप के सहारे वे काम में डूब हुए हैं। अद्भुत संवेदनशीलता प्रायः जो मिशनरी या पादरी है, उनका सामाजिक जीवन अपने ही परिवेश में रहता है, लेकिन फादर कामिल बुल्के ऐसे मवेदनशील और सामाजिक थे कि अपने आसपास के लोगों की मदद करने हेतु प्राय: तैयार रहते थे । कई बार कई लोगो की मदद के लिए उन्होंने मुझे पत्र लिखा, जिनमें एक पत्र और घटना का उल्लेख करना आवश्यक मानता हूँ। एक लड़को एम० ए० करने के बाद उनके अधीन शोध कार्य कर रही थी। भली-कुशाग्र और निरीह-सी लडकी और वह किसी गुंडे के आतंक में आ गई । हुआ यह कि उम आदमी ने झूठ-मूठ यह दावा कर दिया कि इस लड़की ने मुझसे शादी की है और मैं इसे अपने घर ले जाऊंगा । और अपनी रंगवाजी तथा पुलिस की मदद में वह उस लड़की को तंग करने लगा। वह लडको किसी प्रकार अपने को मुक्त करके फादर कामिल बुल्के के पास रोते हुए पहुंची और उसने सारी बातें रोते हुए उनमें बताई। पादर भी इम पर बहुत रोये और उन्होने मुझे इस संबंध मे एक पत्र लिखा । मेरे लिए यह मामला अप्रत्याशित था तथा उससे भी आश्चर्य की बात थी फादर कामिल बुल्के द्वारा लिखा जाना । मैं उस बच्ची को तथा उसके परिवार को भी जानता था तथा वे लोग मेरे ऊपर भी काफी भरोमा रखते थे । अमूमन इस प्रकार के कामौ से मैं अपने को अलग रखता हूं, लेकिन उस लड़की का मामला और फादर कामिल बुल्के का पत्र, अतः मैंने उम क्षेत्र के एस० पी० से इस मामले में मदद की अपील की और सारी बातें बताई। उन्होने इस पर अविलम्ब कारवाई की, तब कही जाकर उस लड़की की इज्जत बची। फादर कामिल बुल्के को जब इन बातों की सूचना उसी लड़को से मिली, तव वे बड़े प्रसन्न हुए और जव अगली बार उनमे मेरी मुलाकात हुई तो उन्होंने मेरे सिर -- पर हाथ रखकर बहुत-बहुत आशीर्वाद दिया। 'मोरिशस की वह याद मौरिशस मे जव द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन हुआ तो भारतीय प्रतिनिधि मंडल में फादर कामिल वुल्के भी एक सदस्य थे और मैं भी एक सदस्य था। पोर्ट- लुई में जहाँ प्रतिनिधि मडल के ठहरने की जो व्यवस्था थी, उसमें मेरा और उनका कमरा आसपास ही थे। दोनों प्रायः सवेरे ममुद्र किनारे घूमने निकल जाया करते थे। मेरे साथ ही श्री चन्दूलाल चन्द्राकरजी भी थे, जो साहित्यकार और पत्रकार के अतिरिक्त एक बहुत अच्छे छविकार भी है। उन्होंने उस अवमर पर कई चित्र लिए, जो आज भी मेरे लिए बहुत बड़ी धरोहर है ।
. : ऐसे ही एक दिन हम लोग जब समुद्र किनारे घूम रहे थे तो एक लड़का कई तरह के पत्थर और सीपी लेकर हमारे पास आया कि इनमें से हम चाहें तो कुछ खरीदें । वह हमसे टूटी-फूटी अंग्रेजी-हिन्दी फ्रेंच और भोजपुरी में बातें कर रहा था, जिसे वहाँ क्रिओल कहते हैं। उसको वातें हमारे समझ में नहीं आ रही थी और फादर को देखकर वह और भी मच या अंग्रेजी मे वातें करने का प्रयास कर रहा “था, क्योंकि वह यही समझ रहा था कि यह भला हिन्दी क्या जानते होंगे । फादर कामिल बुल्के ने उमे शुद्ध हिन्दी में कहा-हिन्दी मे बोलिए ! हमार हिन्दी समझ में रऊआ के आई ?-लड़के ने शुद्ध भोजपुरी में अपनी बातें कहीं, जो उसके घर-संस्कार की भाषा थी। काहे न आई, रउआँ एही मे वोली।-इधर से फादर कामिल बुल्के ने भोजपुरी में ही कहा। इम वात से उधर लडका भी चकित और हम भी चकित ! फादर कामिल बुल्के का भाषा-ज्ञान विचित्र था। और अन्त-अन्त तक वे एक विद्यार्थी के समान "भाषाओं का अध्ययन करते थे। राम का नहीं : तुलसी का भक्त रामकया के उद्भव और विकास पर उन्होंने विशेष काम किया था और रामकथा के उद्भट विद्वान के रूप में ही उनकी ख्याति भी थी। लेकिन बातों के क्रम में बरावर वे यह कहा करते थे कि मैं राम का नहीं तुलसी का भक्त हूं। मेरा अपना ख्याल है कि जितने मनोयोग पूर्वक उन्होंने तुलसी-साहित्य का अध्ययन किया था, उस तरह का अध्ययन देश में कुछ ही और लोगों का होगा। हाताकि तुलसी संवधी उनका अध्ययन धार्मिक न होकर विवेचनात्मक था और तुलसी जयन्ती के अवसर पर लोग जब उन्हें बुलाते थे, तो प्रायः उन्हें निराश ही होना पड़ता था, क्योकि किसी रामायणी के समान डा० कामिल बुल्के न तो धर्म का मर्म बताते थे, न राम-वन-ममन और सीता-स्वयंवर की राग-ध्वनि के साय पाठ शुरू करते थे, वल्कि उनकी शुद्ध और सात्विक दृष्टि गोस्वामी तुलसीदाम के विपुल साहित्य की ओर ही होता था। जब कभी मैंने उन्हे गोस्वामी तुलसीदास जी पर बोलते हुए देखा तो भाव- विभोर हो जाते थे, एक वाक्य जब तक समाप्त हो या नहीं, तब तक दूसरा वाक्य उनकी जिह्वा पर फुदक आता था। वे किसी भक्त के समान न तो रामायण का रोज पाठ करते थे और न किसी कथा-वाचक के समान रामायण को कथा का 'पारायण करते थे, लेकिन वे एक ऐसे संत-तुल्य व्यक्ति थे, जो रोज मानस-सरोवर में स्नान भी करते थे तथा महात्मा तुलसीदास के प्रति समर्पित थे ठहरिए, मैं अपना कान ले आता हूँ फादर कामिल घुल्के आत्मीय और अनौपचारिक के साथ-साथ बड़े ही मनोविनोदी भी थे। इधर दम-पन्द्रह वर्षों से उन्हें कम सुनाई देता था और वे ५२ मननशील इतने थे कि इसे भी एक देव का वरदान ही मानते थे कि शोर-गुल से दूर अपने अध्ययन में ही लगे रहते है, वेकार बातें कानों में नहीं जाती है । लेकिन हम सब जब उनसे मिलने जाते थे और बातचीत शुरू होती थी, तो वे प्रायः बीच में ही कह उठते थे-ठहरिये, मैं जरा अपना कान ले आता हूँ। और तव अपना इयरफोन लगाफर आते थे। बातों में काफी रस लेते थे तथा- जब कभी मूड में हो तो स्वय काफी बनाकर पिलाने लगते थे। वे कभी भूले नहीं जायेंगे रामकथा के अतिरिक्त सामान्य पाठक, विद्यार्थी या रोजमरे के कामकाज के लिए उनकी मबसे बडी देन है 'अग्रेजी हिन्दी शब्दकोश'। उनके पहले अंग्रेजी- हिन्दी की जो भी डिक्शनरियां थी, ये आधी-अधूरी या व्यवसायिक गुटका या फिर काफी बोझिल । उनमें से एक भी ऐसा कोश नहीं था, जिसके सहारे संतुष्टि- पूर्वक आदमी रोजमर्रे का काम कर सकता था। डॉ० कामिल बुल्के ने उस अभाव. की पूर्ति अपने कोश के द्वारा की और कम समय मे ही उनके द्वारा सम्पादित कोश को जो मान्यता हुई, जो यश मिला तथा जितने सस्करण उसके हुए उसमें उन्हे. काफी संतोप था। कोश-सम्पादन के क्रम में उन्होंने देश के अनेक विद्वानो और मित्रों से काफी सहायता ली। एक बार मेरे पास उनका एक कार्ड आया जिसमे उन्होने पूछा था- हिन्दी में गदहवेर के लिए और कौन-कौन शब्द है ? मैं समझता हूँ कि ऐसे ही जिज्ञासा भरे पन उन्होंने न जाने कितने लोगो को लिखा होगा । जब कभी उनके कोश का नया सस्करण होता था वे उसमें कुछ-न-कुछ जोड़-. घटाव किया करते थे। यह उनकी निरन्तर शोध-वृत्ति का ही द्योतक था। स्वयं भो सम्मानित : दूसरों का भी सम्मान फादर कामिल वुल्क एक सच्चे इसाई पादरी थे और उनके जीवन का आचरण भी उसके अनुरूप होता था। दया, करुणा, भक्ति, सत्य आचरण तथा दूसरो का सम्मान उनके संस्कारों में घुलमिल गया था। विनयशीलता ऐसी थी कि. छोटे-से छोटे लेखक के प्रति भी नतमस्तक होते थे । कई लोगो को चर्चा वे प्रायः किया करते थे, उनमै एक डॉ० धर्मवीर भारती भी हैं, जिनकी बातें वे बराबर करें और हंसते हुए कहा करते थे--तुम्हें मालूम है, हम दोनो गुरुभाई है। कैसे ?- जब मैं पूछता, तो बड़े प्रेम से बताते हम दोनों सहपाठी रहे हैं। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से एक साथ हिन्दी मे एम० ए० किया है। इस तरह से दोनो गुरुभाई हुए। ।
५३ उनके मुंह से आज तक किसी की आलोचना मैंने नहीं सुनी। हर किसी के प्रति उनके मन में सम्मान था। स्नेह तो उनके रोम-रोम मे टपकता था। उनके उठ जाने का दुखद समाचार पाकर हजारों छात्रों, शोधवर्ताओ उनके परिवेश में आये लोगों को सच में ऐसा ही लगा होगा कि उनके बीच से उनका पिता उठ गया। अभी बहुत काम करना बाकी है जब भी मैं उनसे मिला, प्रायः उनमे यही सुनने को मिला-देखो, अभी बहुत काम करना बाकी है। इन दिनों वै वायविल' का सरत अनुवाद कर रहे थे। वायबिल के जो भी हिन्दी संस्करण उपलब्ध है, उनके अनुपाद से वे संतुष्ट नही थे । उनका कहना था कि ये शुष्क हैं और ठीक से इन्हे पाठक ग्रहण नहीं करते है। पता नहीं उनका वह कार्य पूरा हुआ कि वह भी अधूरा ही है। आप हिन्दी नहीं जानते ? एक बार एक सज्जन, जो बडे अधिकारी हैं मेरे ही गाय उनसे मिलने रांची में उनके आवास पर गये। उन्होंने फादर को बताया कि बहुत पहले सेंट जेवियर्स कालेज मे वे उनके शिष्य रह चुके है। फादर कामिन बुल्के हिन्दी मे बाते करते जा रहे थे, लेकिन वह सज्जन अग्रेजी मे । जब फादर से यह स्थिति अमह्य हो गई तो उन्होंने उनकी बात बीच में ही काटते हुए कहा-आप हिन्दी नहीं जानते ? उन सज्जन ने पुनः अंग्रेजी मे ही इसका भी उत्तर दिया। फादर को इसमें और भी झझलाहट हुई-मैंने आपको हिन्दी ही पढ़ाया होगा और में जब विदेशी होकर आपसे हिन्दी में बातें कर रहा हूँ, तव आप अपनी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा मे बातें क्यों नहीं करते ? यह शर्म की बात है। वह मज्जन इस पर झेंप गये और अंगूठे से जमीन कुतरने लगे, उनका झुका माया फिर ऊपर नहीं हुआ। वह आखिरी मुलाकात विगत 23 अप्रैल 1982 को रांची मे बड़े ही भव्य रूप में 1857 वीर सेनानी धावू कुंवर सिंह की जयन्ती का आयोजन किया गया, जिसमें मुग्य अतिथि के रूप में डॉ० कर्ण मिह राची पहुँचे और साथ मे मैं भी था। मुग्य गमारोह का उद्घाटन आयोजको ने फादर कामिल बुरके द्वारा ही रखा था। म आयोगन का सभापतित्व कर रहा था। जद मैंने उनका परिचय देते हुए कहा कि फादर भामित्र बुके द्वारा इस अवसर पर कहा हुआ एक-एक वाक्य हमारे लिए इतिहाम होगा, तव में यह कहां जानता था कि मच में इसके बाद फादर हमगे इस प्रकार विदा है जायेंगे और उनकी बातें मत्र में हमारे लिए ऐतिहामिया धरोहर हो जायेगी।
। लेकिन उसमें पहले की बात न भूलने वाली हैं, न भुलाने वाली। डॉ. वर्ग: सिंह जी जय हवाई अड्डे पर उतरे तो उन्होंने कहा कि यहाँ में मैं मीधा डॉ० कामित बुल्के में मिलने जाऊंगा। आयोज्यो ने जब उन्हें इस बात की सूचना दी कि वे समारोह में आयेंगे ही, लेकिन डॉ० कर्णमिह ने कहा कि नही रांची आकर यदि मैं उनसे मिलने उनके निवास पर नहीं गया तो, यह सर्वथा अनुचित होगा। और डॉ० साहब सीधे फादर कामिल चुल्कै मे मिलने उनके निवास पर गये। दोनो में लगभग एक घंटे तक विभिन्न विषयों पर वार्त होती रही, जिसमें मुश्य रूप में हिन्दी की ही बात थी । फादर कामिल वुल्वे अपनी स्वाभाविक चिन्ता ऑ० कर्ण सिंह से व्यक्त कर रहे ये-हिन्दी का क्या होगा? राष्ट्रभाषा के मार्ग में अनेक रोडे है, उन्हें आपके समान तेजस्वी व्यक्ति ही दूर कर सकता है । मैं तो अब बहुत बूदा हो गया। और दूसरी और डा० कर्ण सिंह उस महान मनीपी के सामने चार-बार यही दुहरा रहे थे-आपको अभी बहुत दिनो तक हम लोगों के बीच रहना है तथा मार्ग.. दर्शन करना है। हिन्दी के लिए समर्पित दोनों व्यक्तित्वों के विचारों का साक्षी बना मैं आज सोचता हूं कि काश उन क्षणी को टेप कर लेता तो वह कितनी बडी धरोहर होती। मतोप है तो यही कि उस समय की तस्वीर मेरे पास सुरक्षित है, जिसे वहा दे पा - दुख है कि आखिरी दर्शन नहीं कर सका 6.7 और 8 अगस्त 1982 को पटना में रायकृष्णदास व्याख्यान माला' का आयोजन था, जिसका सयोजक मै था, अत. व्यवस्तता स्वाभाविक थी । उसी बीच मुझे 7 की शाम को बधूवर अमर कुमार सिंह का स्तिप मिला कि फादर कामिल वुल्के काफी बीमार है तथा कुर्जी के होली-फैमिली अस्पताल में भर्ती है। मैंने यह सूचना सर्वश्री गंगा वाबू, अज्ञेय जी, विद्यानिवास जी आदि को दी, जो उन दिनों व्यास्मान- माला के अन्तर्गत पटना मे ही थे । गगा बाबू, अज्ञेय जी, विद्यानिवास जी और डा० आनन्दकृष्ण पटना के कुर्जी अस्पताल में उन्हें देखने गये, लेकिन आयोजन में फसे रहने के कारण मैं उस दिन नहीं जा सका। आयोजन समाप्तकर तीसरे दिन मैं जब कुर्जी अस्पताल में पहुंचा तो पता चला कि फादर की हालत ज्यादा खराब थी और वे दिल्ली भेजे गये हैं। मेरा अपना अनुमान है कि दिल्ली जाने वाला हर आदमी सही-सलामत वापस लौटकर नहीं आता। और फादर कामिल बुल्के भी न लौटे और वही आयुर्विज्ञान सस्पताल में 17 अगस्त को वै सदा के लिए हमसे विद्युड गये । अब वह काया-जिसे हजारों-लाखों लोग दूर से ही पहचान जाते थे और जिसका अनहद ऋण है हिन्दी के पर वह सदा के लिए सो गया। हम यह भी जानते हैं कि जिस आदमी ने विगत' 50 वर्षों तक भारत में रहकर इस देश के लिए, इस देश की तथाकथित राष्ट्रभाषा के लिए, रामकथा के लिए, भक्ति के लिए, तुलसी-साहित्य के लिए, शिक्षण के लिए, हजारो अनाथों के लिए बहुत कुछ किया, उसके लिए शायद हम कुछ नही कर पायेंगे, क्योंकि फादर कामिल बुल्के का कोई कुनया नही था, जो ममय-सदर्भ के लिए- स्वार्थ सिद्धि में कोई काम दे सके। वे तो ऋषि-परमरा के अकेले व्यक्ति थे, जिसका दभ होता है इतना ही कि वह बिना किसी को एहमास दिलाये औरों के लिए जीता है। इसीलिए फादर कामिल वुल्के का उठना औरों की तरह उठने से भिन्न है । अब उस कद-काठ का, उम पादरी लिबास मे, वह तांबवर्णी चेहरा, मुस्कराती आंखें, बातों मे स्नेह टपकाती स्वर-तरणी तथा सहज-मुलभ व्यक्तित्व अश्मानी से हमें उप- लब्ध नहीं होगा। संतोप है तो यही कि एक बार भो जो फादर कामिल बुल्के से मिला होगा" वह उन्हे कभी भी भूल नहीं सकता । और मैं दो उस महान तपस्वी को और भी नही विसरा सकता हूं, जिसने अपने अग्रेजी-हिन्दी कोश को यह लिखकर मुझे भेट किया--पितृ-भक्त शंकर दयाल को!-पिताजी से उनका अभिप्राय स्वम से था, जिसे मैं स्वीकार करता हूं। कामता-सदन, बोरिंग रोड, पटना--1.
मैं फूल और तुम सूर्य -~-~गले (1830-1899 ई.) अनुवादक : डा० दिनेश्वर प्रसाद फादर कामिल बुल्के के सबसे प्रिय कवि थे पलेमिश फवि गजले । गजेले फादर बुल्के को तरह हो जेसुइट सन्यासी थे और इन्होंने फ्लेमिश भाषा को यही ऊंचाई दी जो तुलसी ने अवधी, सूर ने ब्रजमापा या गेटे ने जर्मन भाषा मो। प्रस्तुत कविता का फ्लेमिश से अंग्रेजी अनुवाद स्वयं फादर बुल्के ने किया था। फादर के ही आग्रह पर डा. दिनेश्वर प्रसाद ने इसका अनुवाद हिन्दी में किया था। डा० दिनेश्वर प्रसाद का कहना है कि ये कविताएं उनको मानसिकता के बहुत समोप थीं। मैं फूल और मैं तेरी आंखों के सम्मुख होता विकसित ओ प्रखर सूर्य-आलोक ! चिरन्तन अविकृत ! जो मुश नगण्य कृति को जीवित रखने की अनुकम्पा करता और इस जीवन के पश्चात् मुझे शाश्वत जीवन प्रदान करता। मैं फूल और मैं ऊपा में खिल जाता हूँ अपनी पंड़ियाँ सन्ध्या में मुद्रित करता ऐसा ही बारी-बारी से तब तक होगा जब तक ओ सूर्य ! उदित हो कर तू मुझे अनुज्ञा देगा यह फिर एक बार मैं जग जाऊ या मेरा शीश नींद से अवनत हो जाये। तेरा प्रकाश मेरा जीवन- मेरी सक्रियता--निष्क्रियता. मेरी आशा मेरा उल्नास, अनन्म और सर्वस्व वही। तेरे अभाव में मैं ५७ - . मरने के सिवा और क्या कर सकता? .तेरे अतिरिक्त और क्या जिसको प्यार करूं? 'मैं बहुत दूर तुमसे, यद्यपि "तू मधुर स्रोत सब जीवन का,, “उन सब का जो जीवन देते, सबसे समीपता से तू ही मुझको छूता प्रीतिकर सूर्य ! मेरे अन्तर के अन्तर तक निज सर्वभेदनी ऊपमा संचारित करता। ले चल ! ले चल ! खोल दे सभी पार्थिव बन्धन मुझको समूल उत्पाटित कर' धरती से कर उच्छिन्न मुझे जाने दे मुझको वहां, जहाँ हर घड़ी ग्रीष्म औ' सूर्यातप । -जल्दी ले चल तू वहां जहां शाश्वत अप्रतिम सर्वसुन्दर भो ! फूल ! स्वयं तू विद्यमान । वे हो समाप्त, परित्यक्त, शेष जो हमें परस्पर विलगाती, जो गहरा गतं बनाती है। "ऊपा, सन्ध्या- वे जो होजाती व्यतीत, हो जाये विदा: अपने स्वदेश में देखू में तेरा सीमा-विरहित प्रकाश ! तब मैं सम्मुख" ना! नहीं केवल तेरी आंखों के सम्मुख, बल्कि एकदम निकट पाश्व में, बल्कि स्वयं तुझ में ही विकसित हो जाऊंगा यदि तू मुझे, तुच्छ कृति को जीवित रखेगा यदि देगा प्रवेश निज अविनश्वर प्रकाश में . सब.
ज्योति पुरुष कामिल बुल्के के लिए . --डा० अमर कुमार सिंह मेरे देश ! वह कौन था जिसकी नीली आंखों में सतरंगे वादल के टुकड़े सुलगते थे जब वे धरती पर बरसते थे तो पूरा भारत लहर जाता था..... वह किसकी हंसी की गूंज थी जिससे रांची की सघन ठंडी पहाड़ियों हरे भरे ऊंचे दरखतों पर उजले कबूतरों के झुंड मंडरा जाते थे...... वह किसके दूधिये पारदर्शी चेहरे की लहक थो जिससे ताजे फूल सकुचा जाते थे.... वह कौन था जिसके उजले पटुए सी दाढ़ी से सूरज को मात करने वाला नूर टपकता था.... कमी जिस रेशम सो मुलायम दाढ़ी से अगणित बच्चे खेलते थे...... उनकी किलकारी उसमें समा जाती थी और वह तिहत्तर वर्ष का बूढ़ा प्यार में सिमटकर तीन वर्ष का बच्चा हो जाता था..... 0 मेरे भारत! वह कौन था जो कहता था मेरे प्रभु को अंग्रेजी में प्रार्थना पसंद नहीं इसलिए हिन्दी में करता हूँ.... वह कौन था ५६ जो कहता या महादेवी मेरी बहन है क्योकि यह भी मेरो स्वाभिमानो बहन की तरह कमी विदेशी भाषा नहीं बोलती... यह कोन था जो कहता था . मेरी मां भी सुमित्रा की तरह सोचती थी "पुत्रवती जुबतो जग सोई, रघुपति भरतु जासु सुत होई' उसने इसी भाय से मुझे संन्यास के लिए विदा दिया था उसकी छवि मुमित्रा जैसी थी वह कौन या 'जिसने इस युग में भी 'एक संस्कार सम्पन्न भारतीय शिष्य की तरह नयी रामकया सुनाकर गुरू को सर्वोतम दक्षिणा दी यो... वह कौन था 'जो आजीवन ' 'तिग्गा, हलमान, बजरंग और गड़ी की सेवा करता रहा और समाधि भी तो तो उसी कमिस्तान में जहां तिग्गा,हलमान, बजरंग और गड़ी हैं... मृत्यु के बाद क्या वह उनके और निकट हो गया"? मेरे भारत ! वह कौन या जो कहता था एक छोटा देश मुझसे छूट गया और एक विशाल देश का प्यार मुझे मिला मेरे देश वह कोन था
जिसके मां-बाप
बेलजियन थे,
लेकिन, तुम्हारा जो अत्यन्त आत्मीय या
जिसके लिए अन्तिम प्रार्थना
उसके इच्छानुसार हिन्दी में की गई
अगर यह विदेशी या
तो भारतीय कौन है ?
मेरे भारत ।
उसने तुम्हारी सेवा को
तुमने उसे प्यार दिया
यह तुम्हारे प्रति कृतज्ञ था
तुम उसके प्रति विनत...
वह तुलसी का संत समोरा' था
उसने तुम्हारी रामकथा
के चंदन तर की गंध गरिमा को
सर्वन बिखेर दिया
और स्वयं भी किन्हीं मुट्ठियों में
बंद नहीं रहा"
एम० आई० जी० 108
कंकड़ बाग, पटना-20
वह कालजयी क्षण - कभी मैं भूल ही नहीं सकता 18-8-82 को यह उदास और बोशित सुबह संख्या में बुल्के जी के आत्मीय जन उपस्थित थे। दिल्ली के निकलसन कवि- न में उनके अंतिम दर्शन के लिए, दस बजे ताबूत आया। जव खुला तो उनका प उस दिन को तेज धूप को मात करने लगा। प्रार्थना की मुद्रा में माला- हाय जोड़े वह मित्रों से भी विदा ले रहे थे। उन पर पड़े ताजे फूल उनके ये पारदर्शी चेहरे की लहक से रहे थे। वहीं खड़े, करील को ठंडी छांह गा कि उस छायादारम हावृक्ष का छत्र नहीं रहा जिसके तले आतप, अंधड़, धूप, सात, गर्मों से मैं और न जाने मेरी तरह कितने लोग बचते थे । करील को वह अब ठंडी नहीं रह गयो यो। ऊपर तवा सा तपता आकाश था। और नीचे को स्नेहिल छाया के बिना मै और मेरी तरह झुलसते अनेक लोग । मैंने साहस रकर देखा जहरयाद का अपार कष्ट देने के मावजूद उन पर मृत्यु अपनी पीड़ा निशान नहीं लगा पायी थी । अमृत पुत्र को सुदिव्या मुक्ति ने अपने वात्सल्यमय * में भर लिया था। उनके चेहरे पर स्थिर शांति और प्रसन्नता से यह प्रकट । उस दिन लोगों के वहां से जाने के बाद भी घंटों अकेले में वहां बैठा रहा ।। से कभी उस अकेलेपन को बंदरों की धमा-चौकड़ी तोड़ देती थी । उनको "राम " का यह प्रसंग मेरे सामने था 'छोटा नागपुर में रहने वाली उरांव तथा मुण्डा' तियों में तिग्गा, हलमान, बजरंग और गड़ी नामक गोत्र मिलते हैं, इन सबका विंदर ही है । कैसा विचित्र संयोग था ! न केवल अपने जीवन काल में वह रतीय समाज के पिछड़े वर्ग आदिवासियों को सेवा उनको जन्म भूमि वी में रहकर करते रहे बल्कि समाधि भी ली तो कब्रिस्तान में जिसमें तिग्गा, मान, बजरंग और गड़ी यानी बंदर बड़ी संख्या में है। मैने उसी क्षण वहीं कविता लिखी थी जो आपको भेज रहा हूं। यह इतनी निजी है कि आपके तरिक्त और किसी को दे नहीं सकता। - संदर्भ के लिए: --(एक अपरिचित बहन का पन परिचित माई को) 'अक्टूबर अंक' 'मुक्तकंठ' की विशेष परम्परा में स्व० श्रद्धालु फादर बुल्के अंक है । 'मुक्तकंठ' निष्पक्ष पत्रिका के रूप मे सवो के समक्ष है । अपने को रोक नही पा रही हूं, और आज पुनः भ्रष्टाचार अनीति के विरुद्ध लेखनी उठ पड़ी है। आज तक मैं यही समझती थी कि राजनीति मे ही भ्रष्टाचार व्याप्त है-किन्तु लेखक, साहित्यकार उस सीमा को भी लाघ चुके है। स्वर्गीय मेरे फादर बुल्के -सबधित कुछ ऐसी बातें हैं. जो आपके समझ प्रस्तुत कर रही हूं ! -: फादर बुल्के 16-7-82 से 8-8:82 की सुबह तक कुर्जी अस्पताल में रहे । :20-7-82 से लेकर 8-8 82 रविवार सुबह सात बजे तक प्राय: हम लोग फादर के पास थे। पारिवारिक परिस्थितियां कुछ ऐमी रही कि मै आपको मूचित नहीं कर सकी यहां तक कि राखी वाले पत्र में भी सूचित करना चाहा- जवकि मैने न जाने 'कितने लोगों को पत्र द्वारा मूचित किया होगा। क्षमा किस मुह से मागू ? 5 सितम्बर वाले हिन्दुस्तान पत्रिका मे जो बातें आई, वे कितनी सत्य है, इसका निर्णय आप स्वय कर लेगे । उस क्रम में जितने लोग फादर के पास रहे, जो मेरे परिचित और अपने है, उनकी रोज-रोज की तानाशाही ने मुझे आज आपके पास पत्र लिखने को मजबूर किया-आपमे ज्यादा भी फादर के संबंध में कोई लिख सकता है । आप चुप क्यो हैं, लिखती क्यों नही-क्यो लोग गलत बातें पत्र-पत्नि- काओं में देते है इत्यादि। अपने नाम के आगे डा० लिख लेना आज के युग बड़ी बात है, चाहे वह डा० डिग्री कमे प्राप्त -हो गई हो। 'हिन्दुस्तान' मे सर्वप्रथम बात आई कि फादर 8-8-82 की सुबह दिल्ली गये । फादर के.साथ जाने वाली नर्स विदेशी है । कुर्जी अस्पताल शहर से बहुत दूर है । यातायात की सुविधा -नही है । इस सूचना को पोशीदा रखा गया, ऐसी फादर की आज्ञा थी । इस संबंध में मैं क्या कहूं--फादर बुल्के रविवार 8-8-82 की सुबह अस्पताल से मात बजकर दस मिनट पर निकले । सुबह 6 बजे से मैं, मेरे परिवार के लोग, बच्चे, नोट्रेडम की सिस्टर्म, सीता, उनके पति, ब्रदर इमानुराल, फादर डेलपोट, सिस्टर जान, सिस्टर ऐन आयरीन रोज 254 नं० कमरे मे थे । तदुपरान्त लिपट से उन्हे नीचे तक लाया गया, उसके बाद एम्बुलेन्स में स्ट्रेचर से चढ़ाया गया। रविवार का दिन था। अतः उस दिन ईसाइयो की विशेष प्रार्थना होती है। अश्रु पूर्ण विदाई बेला । गाड़ी में मैं बहुत ६३ फादर डेलपोट (जो दिल्ली तक साथ गये, ऐन आपरीन वह भी) प्रशासिक कुर्जी अस्पताल (सिस्टर जान), बदर इमानुएल हवाई अड्डे तक गये। गाड़ी को धीरे- धीरे ले जाना था, अतः वे सभी 7-30 बजे अस्पताल छोड़ दिये। कमरे से निकलते वक्त मुझे पकड़ कर फादर कितना फूट-फूटकर रोये वह वर्णनातीत है। 250, 253: और 254 न० के कमरे मे फादर रहे । तीन बार उनका कमरा वदला गया। ऐन आयरीन विशुद्ध भारतीय परिचारिका है, उन्हें भी आश्चर्य है कि वे विदेशी कैसे बन गयी। कुर्जी अस्पताल शहर से कितनी दूर है, आप जान सकते है। यातायात की- अमुविधा इतनी है कि प्रत्यैक दस मिनट पर वहां के लिये वस सेवायें है और फिर फादर वुल्के के परिचित संबंधी अपने वेटे-बेटियाँ उनसे दुर्गम पहाड़ पर भी मिल आते । कुर्जी की वात क्या है ? सुबह सात बजे से लेकर 9-30 बजे तक मैं फादर के साथ होती। शाम का प्रतिदिन का खाना मेरे घर से जाता और 5 बजे शाम से लेकर 8 बजे रात तक मेरे घर के लोग फादर को खाना खिलाकर लौटते । अस्पताल का खाना बहुत कम खाते। सूचना का जहां तक प्रश्न है, कुर्जी अस्पताल से कम से कम पचास पन मैंने अवश्य लिखे होगे और उन व्यक्तियों में से कुछ को तो आप अवश्य जानते होगे । जैसे -~-यशपाल जन सस्ता साहित्य मंडल, कनाट प्लेस, नई दिल्ली-J10001, उपा अरोडा जयपुर, विजयेन्द्र स्नातक दिल्ली, डा० रघुवंश कुंकुम द्वारा आर० एस० सिंह, 288 पा० कालोनी, पटना-13 पत्र मिला होता तो मुझे विश्वास हैं वे जरूर आती । राची, योरप जिन पनों को मैंने डाला उनका उत्तर भी मेरे पास आया। पन फादर स्वयं लिखवाते-और कहते लिख दो-वो देखो मेरी कापी है, उसमे पता लिखा है- सबों को सूचित कर दो, ताकि वे मुझे दोप न दे सके । उन्हें पता था, वे बचेंगे नहीं। तव भी उनसे मिलने कोई आता ये फूट पड़ते, कहते--मृत्यु से मैं डरता नहीं, मृत्यु निर्विवाद सत्य है, किन्तु मेरा अधूरा अनुवाद वाइबल कार्य ? कुछ लोगों ने क्षणिक समय का लाभ उठाया। सारी दुनिया जानती है या जान रही है वे लोग फादर के बहुत करीव रहे परन्तु उन लोगो को जवाब देना दुष्कर है-जिन नोविसों ने अपने पठन-पाठन, पूजा-प्रार्थनाएं छोड़कर फादर की सेवा में लीन रहे ओर प्रतिकार में अपना नाम भी प्रकाशित नहीं करवाना चाहते ? कभी दुनियां जान सकेगी? वे लोग जो इस प्रसंग से बहुत जुड़े हुए है, इलाज कर रहे डा० बी० आर० सिन्हा, डा० आर० जी० रमैया, नाटंडम सिस्टर्स, फादर डेली (नवज्योति निकेत्तन), एन आयरीन, ब्रदर ज्वाय, जोसफ टी० डी०, संत माईकल फादर्स, इनकी आंखों में एक प्रश्न चिह्न निरन्तर है और अपने बिहारी होने पर मिन्दा। -
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मैंने कई लेख लिखे-'अस्पताल के वीस दिन'--'हिन्दी ही मूल मंत्र', सागर
सेभी गहरे, हिमालय से भी विशाल'- प्रकाशित करवाने की इच्छा न हुई क्योंकि
-उन सभी पाठको को पत्र-पत्रिकाओं के विश्वास को तोड़ देगी । वात ठीक वैसी ही
है, 'नमय परोमने वाला अमलो रमोइया' गिना जाता है। यह युग है, आप जितना
झूठ, लूट और फूट कर सकते हैं ।
आपकी
.........राव
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फादर कामिल बुल्के की प्रतिम
इच्छा दो थी-मृत्यु के पहले बाइबिल
का अनुवाद पूरा कर लेना तथा यदि
मृत्यु अनिवार्य है तो बेलजियम स्थित
अपने गांव में पहुंच कर अंतिम सांस
लेना।
दोनो अमिलापाए पूरी
सकी। बाइविल के 150 पृष्ठ अनूदित
होने से रह गये और वेलजियम के
राजदूत महोदय ने हवाई जहाज का
प्रयध वेलजियम के लिए करने की
तैयारी शुरू की, लेकिन वह भी अंतिम
स्थिति में।
जिन लोगो ने फादर बुल्के के
पार्थिव शरीर को देखा था उनका
कहना है कि लगता था कि वह महा-
निद्रा में नहीं सोये है, झपकी ले रहे
है और किसी भी क्षण उठकर बैठ
जायेगे।
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