Hindi Sahataya Samalayan
Kavittawali(pratham Prayas)
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NAGARIMARHAASinging अर्थात स्फुट विषयों पर कुछ कवित्तों का संग्रह लेखक- ० आर० "भक्त" विशारद प्रकाशक- - पं० राजागम त्रिपाठी, काशी मुद्रक- पं० आत्माराम राम जा प्रिंटिंग वल. कालभैरव, काशी। वित्रनारद प्रथमावृत्ति ] । मूल्य । ३
समा
मा तव पद- ये, भ्रमर-भक्त सह डाला।
अदिताव मिल करत, गायन प्रथम पाल ।।
इस छोटी सी पुस्तिका के लिखने का मन्र स यही है कि
इलले छोटे छोटे बालक-विद्यार्थियों को कु: शिक्षा मिले,
उनकी स्मरण करने की कुछ अविधा दूर हो तथा साथ
हो ला उनका मनोरंजन भी होता रहे। यदि पाठकों को यह
घोड़ी भी प्रिय हुई तो मैं अपना परिश्रम सफ समझंगा और
भाली समय-समय पर विविध छन्दों की ६ बलियाँ (दोहा-
बलो. पावली. सारावली, प्रकृति) लिख र उनकी तथा
मात माय मोनेवा करता रहूंगा।
นะ
भवदीय
श्रीगणेशाय नमः
कवितावली
गणेश-स्तवन
गरद मिलावत पलक माँझ पाप-नग,
दुःख-गढ़ ढाहत न लावत अवार है।
नेरे नहिं रखत कुकर्म-तरु बड़े धने,
सोखत अविद्या-सिन्धु रहत न सार है ।।
सरन गये पै भव-स्रम कर नहिं बस,
विद्या-कला-गुन सब होत कर-तार है।
जीने जम एकडू जो मोदक चढ़ावै रुजी
'भक्त' गज-मुख को प्रनाम बार-बार है || १ ||
सरस्वती-स्तवन
सब सुख रस गुन कला विद्या वाके पास,
निसि-दिन जाके बसौ बानी पर बानी जू :
रक्खौ जापै हाथ ताको लखि डरै हरि-हर,
विधि बिमोह जात नित्य-बीन-पानी ज॥
स्वबस रहनि सदा इच्छिन रखति विस्व,
रमा-उमा जोह मुख तेरो विधि-रानी जू ।
तीनों लोक जगै जस-दीप बिनु तेल-बाती,
'भक्त'-हिय बास करौ नित्य इंस-यानी ज॥९॥
२ * कवितावली विष्णु-बल एक मुखबारो पान करत जो बायु नित, एतो विष-धर होत हरि लेत प्रान को। तेरो सेज सेष है सहस-मुखवारो बड़ो, छीर-सिन्धु बास करै छीर ही है पा को ।। तापै कालकूट की भगिनि रहै संग नित, मधु-रस प्यावै जो बिनासती जहा को। एते पै है तनु-दुति नीलकंज के समान 'भक्त धनि चक्र-पानि ऐसो भागवा । को? ॥३॥ शंकर-शक्ति अंग अंग लिपटे भुजंग है विषैले ऐसे जाके साँस लेत सार हू भसम होइ जात । जग को जराइ छार करत जू कालकूट ताहि पान क्रियो मोद हिय में नहीं: मात ॥ एते पै अघायो नहीं पियो गाँजा-भाँग नि , खात हो धतूर विष-फल अरु आ पात । 'भक्त' धनि शिव तुम सम तुम समरथी आज लौ लखान कुन्द-इन्दु-करपून गात ॥४॥ श्रीगुरुदेव जू की बानी तम को तयारि जैसे गज को गजारि जैसे दीनन की दीनता को जैसे महान नी है। रोगन को औषधि औ कृषि कोतुषार जैसे
* कवित्तावली १
लोहन को जंग जैसे पावक को पानी है।
पापन को पुण्य जैसे जीवन को विष जैसे,
माखिन को घृत जैसे कविन बग्वानी है।
से शिष्य-जनन की मूढ़ता-कुबुद्धिना को,
नासिबे को 'भक्त' गुरुदेव ज की वानी है ।।
लोहन को पारस ज्यों आयुष को अमृत ज्यों,
सागर के सीपन को स्वाती कर पानी है।
बम्बन को साबुन ज्यों चाकर को स्वामिन ज्यों,
पत्रक पलाश को जो पान हीं मो मानी है ।।
राज्य को सुराय है ज्यों यश को पराक्रम ज्यों,
बाँसन के फाँसन को मिसिरी बखानी है।
भक्त त्या सुशिष्यन की बुद्धि को बढ़ाइवे को,
शंकर-समान-गुरुदेव ज की वानी है ॥६॥
गाँधी में दशावतार
मच्छे प्रभु नैनन में कच्छपे जू मिर राजें,
वानी में बराह जने गेह को बनायो हैं ।
पन में नृसिंह 'भक्त' बामने मु-इच्छा महँ,
पाप-नृर-नासन परसु-धरं भायो हैं ।
गमै रहैं मन माँह करन में काई नित,
बौद्धं-रूप व्रत-हित जेल में गवायो हैं ।
आस जो भविष्य की सो कल्कि रूप रोम-रोम,
याही विधि गाँधीदमौ रूप आयो-युत हैं ॥७॥
४ * कवित्तावली Navare * * अनय का अन्त नय के बड़े ते जिमि उपज को नास । त, भय के बढ़े ते जिमि साहस पति को ! रबि के बढ़े ते जिमि रजनी को नास त, तप के बढ़े ते जिमि सुख काम इति को ।। त्याग के बढ़े ते जिमि स्वारथ को नास होत, आलस-बढ़े ते जिमि जीव-द्रुत- ति को। रोग के बढ़े ते जिमि सु-तनु को नास होत, 'भक्त' त्योंही अनय बढ़े ते नः पति को १८ मांझा के बढ़े ते जिमि जल-जीव नास होत, बय के बढ़े ते जिमि इन्द्री-द्रुत गति को तोप के बढ़े ते जिमि लालच को नाः होत, क्रोध के बढ़े ते जिमि भक्ति-ज्ञा । जति को। प्रेम के बढ़े ते जिमि भेद-भाव नास होत, पति सों अरुचि बढ़े जिमि सत् सति को । फूट के बड़े से जिमि सु-कुल को नास होत, 'भक्त' त्योंही अनय बड़े ते न पति को ॥९॥ सूर्यदेव तेज को निधान है कि गोला बड़ो आग को कि, हरि को सुचक्र है कि इन्द्र जू को ढाल है चच है विराट जू को गगन-सुरंग है के, स्वर्ग को कपाट है कि रस्मिनो जाल है ।।
* कवित्तावली
The
गोल बायु-यान है कि तम-स्वर्ण-कूट है कि,
प्रभु को पदक कि धरम-सिर-पाल है।
प्रकृति को कन्दुक कि ज्याला-मुग्वी-मुख है कि,
'भक्त' सूर्यदेव पिण्डरूप इहि काल है ||१०||
सूरसागर के पद
कविन-कुमुदन को काव्य-कला-निधि पूरी,
'भक्त'-न भ्रमरन रसाल-कोकनद हैं ।
ग्यानिन को ज्यान-गुच्छ माधुन को सिद्ध-फल,
सत्य-गुरु उनके जो बुद्धि के वरद हैं।
मृहन-विमूढ़ता-तिमिर के तमारि-नेन,
दीन-दुख-गिरि बज्र सों करें गरद
ऊख सु-मयूख औ पियूख अधरामृत सों,
अमिन मधुर सूर-सगर के पद हैं ॥११॥
तुलसी की चौपाई
जीह को सवादु मिलै मनहुँ बतासा चस्वै,
ज्यों-ज्यों पढ़े त्यों-त्यों रस वाढ़े अधिकाई है ।
मृढ़न सुगम अति, अगम सु-पंडित को,
ज्यों-ज्यों आगे बढ़ त्यों-त्यों अन्तर सवाई है ।।
सबै निगमागम पुरानन को सार यामें,
शिव-चतुरानन के मन अति भाई है।
अपने समान आपु राम-नाम स्वर-स्वर,
काव्य-कोष-कुञ्जिका तुलसी की चौपाई है ॥ १२ ॥
६ * कवित्तावली* दीपावली गृह-द्वार स्वच्छ देखि हिय अनुमान हो । जनु सुभ्र रूप धरि सुभ्रता र हायो है। थल-थल दीप की अवलि तहँ राजे आ जाहि लखि मों मन अनेक मौज आयो है ।। हसन की पाँति है कि हीरक जराऊ : रो, 'भक्त' कंधों घन घन मोती बरायी है। चन्द झन्यो अमिय कि राजत खद्योत. ज्य, कैयौं नभ-तारे विधि महि मैं नि छायो है ।। १३१ हास्यानुराग की प्रत्यक्ष मृते देखो आजु नौल-धौल बसन सुसाजिरू ग, फाग-अनुराग बस कहूँ न स ात हैं। गुलाल औ अवीर मलि-म ले, कोऊ निज पदिन तें हँसि बता त हैं । बहु लाल रंग में नहाइ भंग पीके खूब झूमि-झूमि गावत सु-झूमर-जम । हैं । मानों हास्य-अनुराग धरिकै अनेक रूप इत-उत मंडली बनाइ दरसात ॥१४॥ सोचती हैं राधिका दिवाभिसारिका के साज, आके आज ब्रजराज खेलिहैं की मु-फाग नाही छिन नौल-धौल वसन मुसाजि- जि, ग्वाल-बाल संग लेके आयो हरि सानुराग । भाल-गाल .
* कवित्तावली
।
चलन लगी जू पिचकारी दुहुँ दिसि खूब,
सुर-सुर-वधू लखि मन में सिद्दान लाग।
मानों दुहुँ अंगन तें निकस्यो है फूटि-फूटि,
जीरन भयो जो मन हास्य अरु अनुराग ॥१५॥
सत्याग्रह का एक दृश्य
बलकि-बलकि सब बालक कहन हम,
बार-बार अव न अबार लौं विचारिहौं।
नरुन-तरनि तें तरुन हो तरल-मुख,
गाजिके कहत चिन-दुचित न धारिहौं ।
जरठ कहत हठ हमहूँ न करि-करि,
बार-बार स्वान-इव जाइक पुकारिहौं ।
अबला कहति बला एकह रहेगी नाहि,
हौंहूँ कर ले कृपान देस-हित बारिहौं ॥१६॥
सत्य-स्वराज
अन्न-जल-वस्त्र निज करके अधीन जब,
भारत-निवासी स्वावलम्बित रखेंगे ताज ।
पालेंगे अहिंसा-धर्म तन-मन-धन से व,
वर्ण और आश्रमानुमार ही करेंगे कान ।।
छुत
औ
अछूत
से भी शुद्ध-सत्य प्रेम कर,
रखेंगे स्वदेशी व्यवहार सभी साज-बाज
देश में सुराज राम-राज के समान होगा,
'भक्त' जी मिलेगा तब शीघ्र ही गया स्वराज ॥१७॥
* कविसावली श भारत कब उन्नत होगा 'राजनीतिः 'धर्मनीति' सफल 'समाजीति', मृत्तिका समान रहै हिन्द-जा कर में। असन-वसन-यान निज के सभी ही क ज, कारवार-व्यवहार देसी प्रति र में ।। विद्या-कला-प्रेम' 'देशप्रेम, 'धनप्रेम' र, 'जाति-प्रेम देख पड़े सभी नारं नर में । पाप-गिरि गाज गिरे दुःख-बन आग : गे, 'भक्त' शत्रु होवें सब छार पल- र में ॥१८॥ मुक्ति-साधन कछु कारीगरन ने दो सौ बरिसों में मिले, सूतन को जाल एक रुचिकै बा यो हैं । करिके जुगुति कूट ताहि तेरे बन डारि, तेरी सिरी-सिंहिनी को खूब ही सायो हैं । वीर वर मूषन अछत, बिनु दाना-पानी, बन-महारानी जू के प्रान कंठ अपो हैं। दन्त करि तेज मिलि काट सबै एक बार मुक्ति को उपाय यही 'भक्त' तोधायो हैं ॥१९॥ चेतावनी कहत पुरान बेनु चलिकै कुचाल नस्यो, 'देसभक्ता-राजभक्त' प्रजन के र ते । इमो दिसि दसौ सिर दससिर को न बरो, केवल कुनीति ही ते रामचन्द्र-३ ते ।। है * कवित्तावली कस-सिसुपाल से नृपाल को गोपाल बधे, कितने कुचाली अन्त पायो हलधर ते करिये अनीति नाहि पाइ प्रभुता को कोऊ., 'भक्त' कर जोरि कहै सभी नारी-नर ते ॥२०॥ बिगड़ी वात दखि देस दीन दीनता को दूर करिबे को, तपत सुसाधु सब कारागार दिन-रात । नासिन पानी पी-पी पान को जिगावे नित, गलक विचार देखु द्वार-द्वार विललान ।। अजहूं भलो है चेतु सीख सुनि महराज, रावन-सरिस जनि करु वर-उतपात । काँच को कलम चूर-चूर करि जोरै कौन, गनाराम भाख साँच विगरी बनै न बात ॥२१॥ हठ नात सुनि नात भये भाई के न भाई मन सुत मूत गयो जाइ आलस-भवन में। पतनी कहति चाहे पत नीक रहै नाहिं, जान देही, नहिं जान देहों तोहिं रन में ।। कर में करक चख फरकन में फरक, हत्थियार हत्यि-यार छूटे एक छन में ! धन घिरि आये घन-रिपु दौरि आये पास, पान को प्रयान आज देख्यो हठपन में ||२२|| १० * कवितावली धर्म-महत्त्व छबि बिनु चन्द जैसे तेज बिनु भानु जैसे, जल बिनु सरि-मीन-मुक्ता र घन है। जैसे मनि-सुण्ड बिनु ब्याल बिनु भक्ति मूर्ति, साइस-सुसक्ति-सत्य-बल वित पन है ।। सिंह बिनु बन जैसे राजा बिनु राज सेि, दान-दया-देव-सेव विनु जैसे धन है । प्रान बिनु तनु जैसे सुगति को प्राप्त है त, 'भक्त' त्यों घरा पै बिनु धर्म नृ. नीवन है।।२३।। बैर-फूट परम प्रतापी परतापी दससिर जैसो, रह्यो तैसो जानत जहान सुबहा । है। कंस हू को बिरद बड़ाई सम वियो ना है, गाई गुन-गाथा जाको पूरा न पु नि है । कुरु-कुल कहै को जाहि ऐन-मैन-तनु-- न, भूति-नीत-धनु-बल-विद्या-किरव न है । सबही सँहास्यो है बरन चारै "बैर-फूट 'राजाराम' ताहि तजु तनिको जो ज्ञान है ॥२४॥ पातिव्रत का प्रभाव बन ते दुखित एक बालम पतिव्रता के, अंक में असंक सोयो सुखित स र सों। ताही छिनु वाको बाँको बालक विनोद-प, अगिनि-अगार आनि पस्यो बिनु पर-सों।।
* कवितावली
१२
.....
सोचती सती न हों पैहों नहिं पृत-प्रान,
प्रान-पति जाग उठिहैं जो जहां पीर सों
लखि दुचिताई वाकी शीनल कृशानु भयो,
नव जलजात जनु 'राजाराम' नीर सो २५
होनहारी
कूप ते निकालती हैं दो जल-वैभव को,
सूखे-रंक थल-ना पानिप बहावतो ।
दोऊ ले रहट-भाग्य यंत्र-नरकृत-फल,
एकै करै नीचे एक अपरै चढ़ावनी ।।
एक को अधार बैल एक निराधार रहे,
एक कहि देत काल एक न वतावतो।।
एक मोल मिलै एक नित अनमोल रहै.
याने छीनहारी होन-हारी सों जतावतो ॥२६॥
त्रिकोटि
सते रज तम औ परशुराम रामचन्द्र,
बलराम सीतले सुगंधै मन्द मानिये
संचित प्रारब्ध क्रियमान आधिदैविक पे,
आतमिक और आधिभौतिक को जानिये ।।
विधि हरि हरे और सुरसती रमा उमा.
भूते वर्तमान औ भविष्य पहचानिये ।
तीन गुनै रामै सु-समीरे कर्म ताप देव,
देवि और काल-भाग 'भक्त' ज बवानिये ॥२७॥
१२ * कवितावली चतुर्कोटि सन्य त्रेता द्वापर औ कलि द्विजे क्षेत्री श्य, शूद्रं ब्रह्मचर्य औ गृहस्थ बानमा जान । सनयासै साम दाम दंड भेद हये गये, रथे पदचर जागरित स्वप्न पहर 'न ॥ 'भक्त' जू सुषुप्ति औ तुरीय विश्व तै । औ, पाझे ब्रह्मा पिंड औ अंडजे स्वे जै मान । उदमिन महँ चार युग वर्ण आश्रम औ तृपर्गुन-सेनाभागाँवस्था विभुं स स्वानं ॥२८॥ काव्य-नवरस करुणो श्रृंगार हास्य वीर रौद्रे शान्त अर अद्भुत भयानकै बीभत्स रस : निये । शाक रति हास उतसाहै क्रोधे निरवेद, अचरज भयं ग्लोनि थाईभाव माये ॥ वरुण मुरारि शिव इन्द्र रुद्रे नारायण, विधि काल महाकाल देव उर आये। चिनर-कपोते स्याम स्वतै कुन्दै रक्त शुक्ल, पीत केला नील रंग 'भक्त' पहचा ये ॥२९॥ हिन्दी-नवग्रह। नम-अरि-तुल्य 'तुलसी' औ 'सूर' ससि सम 'भक्त'-कंज-कुमुद परमहितू मानिय देवः कुज, बुधैं सों विहारी रसिकन-पान, 'केसौदास' कवि-कुल गुरुं उर आनि ॥
* कवितावली
१३
‘मतिराम' सवहीं सुखद मुक्र के समान,
'भृखन' शनैश्चर यवन-हित जानिये ।
'चन्दः राहु, केतुं 'हरिचन्द ब्रजभाषा कहूँ,
ये ही हिन्दी-नभ-नव-ग्रह पहचानिये ।।३०१
वसु, धातु और अष्टछाप
घरे ध्रुर्व अनल अनिल सोम सावित्रं पै,
गिनिकै प्रत्यूष औ प्रभाम बर्मु मानिये।
सोनों चाँदी तामा राँगा सीसा काँसा लोहाँ महँ,
पीतल मिलाइ अष्टधातु को बखानिये !!
सूरदासे नन्ददास छीतस्वामी कृष्णदास,
कुंभन-चतुरभुज दास उर आनिये।
मलिक गोविन्दस्वामी परम+अनन्ददास,
ब्रज-बासी-भक्त: 'अष्टछाप कवि जानिये॥३१॥
षोडश संस्कार और कर्म
गर्भाधाने पुंसवन सीमन्त औ जातकर्म,
शिशुनामकरणे निष्क्रमण बखानिये ।।
'भक्त' जू भनत अन्नप्राशन औ चूडाकर्म,
कर्णवेध उपनन वेदारंभ जानिये ।
ब्रह्मचर्य व्याह गृहस्थाश्रम द्विरागमैन,
बानप्रस्थं महावाक्यपरिअन्त मानिये ।।
सनयासँविधि सब संस्कार होमविधि,
मृत कर्म संस्कार-युत उर आनिये ॥३२॥
* कवित्तावली षोडश दान और रुद्र महि जल अन्नै बर्खे फले पुष्पमाल से 1, आसन रजतं सोने पनि छैन । निये । दीप पत्रान गो" सुगंधित सुवस्तु द न, विद्या-दान इन सोरहों में बड़े निये ।। त्र्यम्बके अजैकपाद रुद्र अपराजि भ बहुरूप विरूपाक्ष अहिवुन जा ये । मावित्रं सुरेश्वर जयन्त हेरे हर-काल, एकादश रुद्र-'भक्त' उर-महँ आ ये ॥३३॥ दिशा, दिग्पाल और पंचत व परेब में 'इन्द्र' आगनेय में ‘अगिनदेव', दक्षिण में 'यमराज मित्र ! अनुम निये ॥ नैऋत्य में 'नैऋत' औ पश्चिम-वरुणदेः वायव्य में 'वायु' घट-घट वारोज नये ।। उत्तर में 'धनपति' 'शंकर' ईशान कोन, ऊपर 'विधाता नीचे विष्णु' उ आनिये । डिति जले अनल अनिल नभै 'भक्त' भर दस दिग्पाल, पंचतत्व पहचानिये ३४॥ दिन, मास और ऋतु चैन बइमारव में 'वसन्त' की बहार आवे, जेठे औ असाढ़े 'ग्रीष्म-दाह दुखदा नेये । सावन औ भाद में 'पावस' प्रमोद देत, 'सरद' कुआर और कार्तिक बखानिये ॥
कवित्तावली अगहन पूंस में 'हेमन्त' सीसी करै लोग, माघे और फागुन ‘सिसिर' अन्त मानिये । रवि सोम कुनै बुध गुरु शुक्र शनि वार, वार-वार मास ऋतुं करें 'भक्त' जानिये ॥३२॥ दिज-गुण रन और भक्ति कोमल दयालु तैप तो क्षमा सर्वज्ञता, दान-देन-लेन जितेन्द्रियता; यज्ञोपवीत । हीरा पन्ना पुष्पराग नीलम गोमेद मोती, मानिक माँ औ लहसुनियों को मानों मीत ।। सबने सु-कीरतने सुमिरने पद-सेवा, अरचने बन्दर्न ससत्य अरु सुसप्रीत । आनमनिवेदन सुदास्यं सख्यं सुनु 'भक्त' नव द्विज-गुर्न रत्नं भक्ति करिबे की रीत ॥३६॥ अंग्रेज़ी महीना जनवरी' फरवरी मार्च अपरैल मई, जून औ जौलाई पै अगस्त को बताइये । 'भक्त' जू सितम्बर अक्तूबर नवम्भेरे पै. जोरिक दिसम्बर को ईसवी गनाइये ।। ज. मा. म. जौ. अग. अक. दिस. एक-तीस कर अ. जू. मि. न. तीस दिन-वारी समझाइये । फरवरी होत है अट्ठाइसै को हर साल, किन्तु चौथे वर्ष एक दिवस बढ़ाइये ॥३७॥ .
* कवितावली मुसलमानी महीनों के नाम और प्राभरण 'नपुर' मुहर्रम में 'कंकण' सफर माँझ, रबी-उल-अव्वल में अव्वल हो । नबन्द' । रबी-उस-सानी महँ 'सीसफूल फूलदार, जमादी-उल-अव्वले में 'हार' देवै । अनन्द ।। जमादी-उस-सानी में 'बिरीया' 'चुरी? 7 ब में, 'बेसर' शाबान में औ 'टीका'-रम न-फन्द : 'कंठ-श्री' शव्वाल में औ 'किंकिणी' जी दि में औ, भेजौ जिलहजे मह 'मुंदरी' को खु विन्द ।।३८१ वेद, शास्त्र, पुराण और वेर्दा । ऋके सामै यजुरे अथर्व सांख्य पातंजले, वैशेषिक न्याय पै वेदान्त औ मी सा जान बामने बराह अग्नि नारद गरुड़ें गौं, लिंग ब्रह्माण्ड कूर्म ब्रह्मवैवरत मान । 'भक्त' ज भविष्य भागवत मत्स्य मारकण्ड ब्री विष्णु शिव स्कन्द वेर्दै शास्त्र में पुराने । ज्योतिष निरुक्त छन्दै व्याकरण शिक्षा कर वेद के षडङ्ग निज हियरे में पहचा ॥३९॥ रत्न, विद्या और लोक शशि धेनुं धनं विर्षे बाजे रंभां रमा वैद्य, मय मैणि संखें सुधौ गज कल्प-तर जान । चार वेदै छै वेदांग सुपुराणे धर्मशास्त्र, न्याय औ मीमानसो को याद करु तिमान !
* कवितावली रसातले नितले महानले तलानल औ. सुनलं विनल औ अनल भ भवे जान । वर्ग महजे- नए मान्य 'मन्त भनन, चौका रतन विशेोके हिट पहचान ।।४।। पोश भृङ्गार अंगमुधिजने औ अमन-मन-मचि. व सुकन की सवारियो वानिये ! माँग में सदर पाल निलम देनी. विक दैनिक मेंहदी लगान मानिये ।। भागना-अंग-ले भने सुगन्ध-लेत्र. मुलगा दन्न को गन पहचानिये काजर लगानी अधोग वित्त' भने, नरवामिनार भक्त कामिनी को जानिये ॥४१॥ SAMARRISERITASOOMHING सम दे अश्वनी पै भन्न क्लिक पै गहिनी है, मृगशिरा आदी पुनरव पहचान पुष्य आशले ए मा पूर्वाफालगुनी, उत्तम-सु-फागुनी हस्त चित्रा अनुमान ! म्बाती र विशाली पर अनुमा ज्येष्ठ मूल. गाई उत्तर- हे निज उस मान : श्रद, इलिट मानद भाद्र उनुभवरा तो नत्र जान ।।४।।