Sanmati Library, Jaipur
Geetamrittarangini
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यह पुस्तक खेमराज श्रीकृष्णदासने बम्बई खेतवाडी ७ वी
मी खम्बाटा छैन, निज "श्रीवेंकटेश्वर" स्टीम् प्रेसमें अपने लिये
धापन यही प्रकाशित किया ।
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: យយយយយយយយយយយ Mus गीतामूर्ति Belina ACHERE ভি ...... अथ श्रीमद्भगवद्गीतार्थवाङमयी मूर्तिः । वक्राणि पंच जानीहि पंचाध्यायाननुक्रमात् । दशाध्याया भुजाश्चैकमुदरं द्वौ पदांबुजे ॥१॥ एवमष्टादशाध्यायी वाङ्मयी मूर्तिरेश्वरी । जानीहि ज्ञानमात्रेण महापातकनाशिनी ॥२॥ इस मूर्तिम अंक ढालनेका मतलब यह है कि जिस जिस अध्यायके जो जो भंग है। उन उन अंगों में उन उन अध्यायोके अंक लिखे है, Ni अर्जुन HTTE E Ma दलानल নান, নন 'पाताल HT TO LIST S Te- --- भूमिका -07 हम बडे आनंदसे सर्व सद्धर्मावलंबियोंपर विदित करते है कि, यह "भगवद्गीता" ग्रंथ सर्व लोगोंको धर्मग्रंथ शिरोमणिरूपसे मान्य है प्रायः समस्त सनातनधर्माभिमानी विज्ञलोगोंको पाठ आता है. साधारणसभी साधारण क्यों न हो एक आध श्लोकका तो मुखसे उच्चारण करताही है. ऐसा इस ग्रंथका माहात्म्य है. यह क्यों नहीं हो कि, जो साक्षात् पद्मनाभ भगवान् श्रीकृष्णचंद्रजीने परम भक्त अर्जुनको श्रीमुखसे निरूपण करा है. जिसमें एकएक अक्षर तत्त्व ज्ञानसे भराहुआ है. ऐसा यह ग्रंथ है तो इसकी इतनी महिमा होना क्या आश्चर्य है। यह ऐसी गीता सर्व उपनिषदोंके साररूप है श्रीकृष्ण- जीने इसको निकाली है, अर्जुनजीने इसका प्रथम आस्वाद लिया है. इसके भोक्ता बुद्धिमान् लोग हैं. यह परम पवित्र और चतुर्विध पुरुषार्थको सिद्ध करता है. ऐसा यह तत्त्वज्ञान महाभारतके भीष्मपर्वमें श्रीव्यासमुनिने ग्रंथरूपसे निरूपण किया है, यह ग्रंथ संस्कृतभाषामें रहनेसे इसका अर्थ समझनमें साधारण लोगोंको पराधीन करता था. यह. न्यूनता देखकर मैंने इस ग्रंथकी "गीतामृततरंगिणी" नामक भाषाटीका.. निर्माण करी. इसको प्रथम आवृत्तिमें अन्यत्र छपवायाथा. वह आवृत्ति हाथों हाथ विकगई. इस वास्ते अब इस भाषाटीकाका रजि- ल्टरी हक सदाहीके लिये यथोचित पारितोषिक पाकर बड़े उत्साहसे श्रीमान सेठ खेमराज श्रीकृष्णदासजी "श्रीवेङ्कटेश्वर" नपाखानाके अधिपतिको निवेदन किया है. उन सेठ श्रीओमरान श्रीकृष्णदास- जीने यह ग्रंथ परम उत्साहसे अपने "श्रीवटेश्वर" छापाखानमें .
(४) भूमिका सुंदर मनोहर अक्षरोमें पुष्ट चिकने काग़ज़पर छापके प्रसिद्ध किया है यह उक्त सेठजीका परम उपकार है. अब हम आशा रखतेहैं कि, इस अलभ्य मनोहर भाषाटीकास- मेत पुस्तकको संग्रह करके भगवदुक्त तत्त्वज्ञानको पायकर परम मानंदका विद्वान् अनुभव करेंगे. मुकुल सीतारामात्मज- पण्डित रघुनाथप्रसाद.
॥ श्रीः ॥ अथ श्रीभगवद्गीतामाहात्म्यमा भाषाटीकासमेतम् । ऋषिरुवाच। गीतायाश्चैव माहात्म्यं यथावत्सूत मे वद ॥ पुराणमुनिना प्रोक्तं व्यासेन श्रुतिचोदितम् ॥१॥ श्रीर्जयति ॥ नत्वा रामानुजं कृष्णं गीताचार्य जगद्गुरुम् ॥ गीतामाहात्म्यसव्याख्यां कुवै प्राकृतभाषया ॥१॥ अनेकप्रकारकी कथा सुनते सुनते शौनकऋषी सूतजीसे प्रश्न करतेभये कि, हे सूत ! जो श्रीमद्भगवद्गीताका माहात्म्य श्रीव्यास- जीने कहा है लो यथावत् मेरेको कहो ॥१॥ सूत उवाच ॥ पृष्टं वैभवता यत्तन्महगोप्यं पुरातनम्॥ केन वा शक्यते वक्तुं गीतामाहात्म्यमुत्तमम् ॥ २ ॥ शौनकका प्रश्न सुनिके सूतजी बोले कि, जो तुमने मेरेसे पूंछा . यह अतिगोप्य प्राचीन है. अति उत्तम यह गीताका माहात्म्य किसी करिके भी कहने में नहीं आता है ॥२॥ कृष्णो जानाति वै सम्यक् कचित्कौंतेय एव च ॥ व्यासो वा व्यासपुत्रो वा याज्ञवल्क्योऽथ मैथिल॥३॥ सम्यकप्रकारसे तो, कृष्णही जानते हैं और किंचित् अर्जुन तथा व्यासजी, शुकदेवजी, याज्ञवल्क्य अथवा जनक जानते हैं ॥३॥ अन्ये श्रवणतः श्रुत्वा लोके संकीर्तयंति च ॥ तस्मात्किचिद्वदाम्यद्य व्यासस्यास्यान्मया श्रुतम् । -
गीतामाहात्म्य ।
औरजल कानोंसे सुनिके लोकमें वर्णन भी करते हैं, परंतु जानते
नहीं हैं, इसते जैसा मैंने श्रीव्यासजीके मुखारविंदसे सुना है तैसा
कुछ थोड़ा कहूंगा ॥४॥
• सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनंदनः ॥
पार्थो वत्सः सुधीभॊक्ता दुग्धं गीताऽमृतं महत् ॥५॥
सर्व उपनिषदें तो गउरूप होतीभई; दुहनेवाले श्रीकृष्ण और
बछरारूपी अर्जुन प्रथम पान करतेभये. पीछे यह गीतारूप दूध
अतिमिष्ट लोकमें प्रवर्त करतेभये ॥५॥
सारथ्यमर्जुनस्यादौ कुर्वन गीतामृतं ददौ ॥
सर्वलोकोपकारार्थे तस्मै कृष्णाय ते नमः॥६॥
जो भगवान् प्रथम अर्जुनका सारथीपना करते करते सर्वलोकोंके
उपकारके वास्ते अर्जुनको गीतारूप अमृत देता भया ऐसे आप
श्रीकृष्णको मेरा नमस्कार है ॥६॥
संसारसागरं घोरं तर्तुमिच्छति यो जनः॥
गीतानावं समारुह्य परं याति सुखेन सः ॥७॥
जो संसारघोरसागर तरना चाहता होय, सो गीतारूप नावपर
बैठके सुखसे पार पाता है॥७॥
गीताज्ञानं श्रुतं नैव सदैवाभ्यासयोगतः ॥
मोक्षमिच्छति मूढात्मा याति बालकहास्यताम् ॥८॥
जिसने गीतासंबंधी ज्ञान सदा अभ्यासयोगसे नहीं सुना है और वह
मूर्ख मोक्ष चाहता है वह बालकोंकरिके उपहासको प्राप्त होता है॥८॥
ये शृण्वंति पठंत्येव गीताशास्त्रमहर्निशम् ॥
नते वै मानुषा ज्ञेया देवा एव न संशयः ॥९॥
मापाटीकासमेत! (" जो रातदिन गीता पढते और सुनते हैं वे मनुष्य नहीं, देवताही हैं, ऐसे जानना यहां संशय नहीं ॥९॥ गीताज्ञानेन संबोध्य कृष्णः प्राह तमर्जुनम् ॥ अष्टादशपदस्थानं गीताध्याये प्रतिष्ठितम् ॥ १० ॥ श्रीकृष्णभगवान् अर्जुनको गीताके ज्ञानसे प्रबोधिके बोले कि, इसगीताके एकएक अध्यायमें अष्टादशपद जो विष्णु उनका स्थान जो परमपद सो स्थापित किया है ॥१०॥ मोक्षस्थानं परं पार्थ संगुणं वाथ निर्गुणम् ॥ सोपानाष्टादशैरेवं परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ ११ ॥ हे अर्जुन ! सगुण अथवा निर्गुण स्वइच्छाप्रमाण मोक्षस्थानपर इन अठारह अध्यायरूप सोपानोंकरिके परब्रह्मको प्राप्त होता है।॥११॥ मलनिर्मोचनं पुंसां जलस्नानं दिने दिने ॥ सकृद्गीतांभसि स्नानं संसारमलनाशनम् ॥ १२ ॥ जो दिनदिनप्रति जलसान है सो शरीरमलका नाशक है और इसगीतारूप जलका सान संसारदुःखरूप मलका नाशक है ॥१२॥ गीताशास्त्रस्य जानाति पठनं नैव पाठनम् ॥ परस्मान्न श्रुतं ज्ञानं नैव श्रद्धान भावना ॥ १३ ॥ स एव मानुषे लोके पुरुषो विड़राहकः॥ यस्माद्गीतां न जानाति नाधमंस्तत्परो जनः ॥ १४ ॥ जो गीताशास्त्रका पढना पढावना नहीं जानता है, न दूसरेखे मना, न जिसके श्रद्धा है और न भावना है सो पुरुष इसलोकमें ग्राम:
- •. (८) गीतामाहात्म्य । सूकरके समान है; जिसते कि, वह गीता नहीं जानता है तिसीसे उसके सिवाय दूसरा अधम नहीं है ॥ १३॥ १४ ॥ धिक्तस्य मानुषं देहं धिग्ज्ञानं धिकुलीनताम् ।। गीतार्थ न विजानाति नाधमस्तत्परो जनः ॥ १५ ॥ जो गीतार्थको नहीं जानता है उसके मनुष्यदेहको, ज्ञानको और कुलीनताको धिक्कार है और उससे अधिक कोई अधम नहीं है ॥१५॥ धिक्सुरूपं शुभं शीलं विभवं सहाश्रमम् ॥ गीताशास्त्रं न जानाति नाधमस्तत्परो जनः ॥ १६ ॥ जो गीताशास्त्रको नहीं जानता है उसके सुंदररूपको, सुंदरशी.. लको, विभवको और श्रेष्ठगृहाश्रमको धिक्कार है और उसते अधिक अधम दूसरा नहीं है ॥ १६॥ धिक प्रागल्भ्यं प्रतिष्ठां च पूजा मानं महात्मताम् ।। गीताशास्त्रे रतिनास्ति तत्सर्वं निष्फलं जगुः॥ १७॥ जिसकी गीताशास्त्रमें प्रीति नहीं उसकी हिम्मत, प्रतिष्ठा, पूजा, पान और महात्मापनेको धिक्कार है और उसका सर्व निष्फल है ॥१७॥ धिक्तस्य ज्ञानमाचारं व्रतं चेष्टांतपो यशः ॥ गीतार्थपठनं नास्ति नाधमस्तत्परो जनः ॥१८॥ जिसके गीतार्थका पठन नहीं है तिसके ज्ञानको तथा आचार, बत, चेष्टा, तप और यशको धिक्कार है, उससे अधिक कोई जन अधम नहीं है ॥ १८॥ गीतागीतं न यज्ज्ञानंतद्विवयासुरसंज्ञकम् ॥ तन्मोघं धर्मरहितं वेदवेदांतगर्हितम् ॥ १९ ॥ जो ज्ञान गीताका गाया नहीं है उस ज्ञानको आसुरी. ज्ञान जा- ३ भाषाटीकासमेत। (९) नना; वह व्यर्थ और धर्मरहित तथा वेदवेदांतकरिके निंदित है।॥ १९॥ यस्माद्धर्ममयी गीता सर्वज्ञानप्रयोजिका ॥ सर्वशास्त्रमयी गीता तस्माद्गीता विशिष्यते ॥२०॥ ज़िसवास्ते कि, गीता धर्ममयी और सर्वज्ञानोंकी प्रवर्तकरने- पाली है और सर्वशास्त्रमयी है। ऐसा कहा है, तिससे गीता संवशा- रोसे श्रेष्ठ है ॥२०॥ योऽधीते सततं गीतां दिवा रात्रौ यथार्थतः ॥ वपन्गच्छन्वदंस्तिष्ठञ्छाश्वतं मोक्षमाप्नुयात् ॥ २१॥ जो निरंतर रातिदिन अर्थसहित गीताको सोते, चलते, बोलते, खडेभी पढते रहते हैं वे सनातन मोक्षको प्राप्त होते हैं ॥२१॥ शालग्रामशिलाग्रे तु देवागारे शिवालये। तीर्थे नद्यां पठेद्यस्तु वैकुंठं याति निश्चितम् ॥ २२ ॥ शालग्रामके संमुख देवमंदिरमें, शिवालयमें, तीर्थमें और नदी- किनारे जोगीताको पढता रहै सो निश्चय वैकुंठको जाताहै ॥ २२ ॥ देवकीनंदनः कृष्णो गीतापाठेन तुष्यति ॥ यथा न वेदैनिश्च यज्ञतीर्थव्रतादिभिः ॥ २३॥ जैसे श्रीदेवकीनंदन कृष्ण गीतापाठसे संतुष्ट होते हैं। तैसे वेद- पाठ, दान, यज्ञ, तीर्थ और ब्रतादिकोंसे नहीं संतुष्ट होते हैं ॥२३॥ गीताऽधीता च येनापि भक्तिभावेन चेतसा ॥ तेन वेदाश्च शास्त्राणि पुराणानि च सर्वशः॥२४॥ जिनने भक्तिभावपूर्वक चित्त लगायके गीताका अध्ययन किया उसने सर्व वेद, शास्त्र और पुराणभी पढचुका ॥२४॥ योगिस्थाने सिद्धपीठेशिष्टाग्रे सत्सभासु च ॥
(१०) गीतामाहात्म्य । यज्ञे च विष्णुभक्ताग्रे पठन्याति परां गतिम् ॥२५॥ योगीके स्थानमें, विंध्येश्वरी इत्यादि सिद्धपीठमें, श्रेष्ठपुरुषके संमुख, साधुसभामें, यज्ञमें और विष्णुभक्तके संसुख पाठ करनेसे मोक्ष पावेगा ॥२५॥ गीतापाठश्रवण के यः करोति दिने दिने । क्रतवो वाजिमेधायाः कृतास्तेन सदक्षिणाः ॥ २६ ॥ जो दिनदिन प्रति गीताका पाठ और श्रवण करता है तिसने सब अग्निष्टोमादिक और अश्वमेधादिक दक्षिणासहित यज्ञ करचुका ॥२६॥ यः शृणोति च गीतार्थ कीर्तयेच्च स्वयं पुमान् ॥ श्रावयेव परार्थ वै स प्रयाति परं पदम् ॥ २७॥ जो गीताका अर्थ सुने और आप कहै दूसरोंको श्रवण करावे खे परमपदको प्राप्त होताहै ॥२७॥ गीतायाः पुस्तकं नित्यं योऽर्चयत्येव सादरम् ॥ विधिना भक्तिभावेन तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ २८ ॥ जो आदरपूर्वक नित्य गीताके पुस्तकको विधिपूर्वक भक्तिभा- वसंयुक्त पूजेगा उसके पुण्यका फल सुनो ॥२८॥ सकला चोर्वरा तेन दत्ता यज्ञे भवत्किल ॥ व्रतानि सर्वतीर्थानि दानानि सुबहून्यपि ॥ २९ ॥ उस गीताके पूजनेवालेने यज्ञमें सर्व पृथ्वी दान देचुका तथा सर्वव्रत, सर्वतीर्थ और बहुतसे दानभी देचुका ॥२९॥ भूतप्रेतपिशाचाद्यास्तत्र नो प्रविशंति वै॥ भिचारोद्भवं दुःखं परेणापि कृतं च यत् ॥३०॥ जिस घरमें गीताका पूजन होता है तहां भूत, प्रेत, पिशाचादिक भाषाटीकासमेत। (११) और दूसरेके कियेभये मंत्रयंत्रादिक अभिचारज दुःखभी नहीं प्रवेश कर सकते हैं।॥३०॥ नोपसर्पन्ति तत्रैव यत्र गीतार्चनं गृहे ॥ तापत्रयोद्भवा पीडा नैव व्याधिभयं तथा ॥ ३१ ॥ जिसघरमें गीताका पूजन है तहां दैहिक, दैविक और भौतिक इन तीनों तापोंकी पीडा और गेगकृतपीडाभी नहीं होती है ॥३॥ न शापौ नैव पापं च दुर्गतिनं च किंचन ॥ देहेऽरयः षडेते वै न बाधते कदाचन ॥ ३२॥ वहां कोईका शाप और पाप और दुर्गति तथा देहमें रहे जो पांच ज्ञानेंद्रिय, एक मन ऐसे छः शत्रु वेभी पीडा नहीं करते हैं ॥ ३२॥ भगवत्परमेशाने भक्तिरव्यभिचारिणी ॥ जायते सततं तत्र यत्र गीताभिनंदनम् ॥ ३३ ॥ जहां गीताके अर्थका निरंतर विनोद होता है तहां भगवान्में अतिउत्तम अखंडभक्ति उत्पन्न होती है ॥ ३३ ॥ प्रारब्धं भजमानोऽपि गीताभ्यासे सदा रतः॥ सं मुक्तः स सुखी लोके कर्मणा नैवबध्यते ॥ ३४ ॥ . जो सर्वकाल गीताहीके अभ्यासमें निरत है वह प्रारब्धवासे संसारभी भोगता है, तोभी वह मुक्त और सुखी है, तथा कर्मसेभी बंधनका नहीं ॥३४॥ महापापादिपापानि गीताऽध्यायी करोति चेत् ॥ न किंचित्स्टशते तं तु पद्मपत्रमिवांभसा ॥ ३५॥ जो नित्य गीताका श्रवण, पठन, मनन करता होय और वह देव-
(१२)
गीतामाहात्स्य।
योगसे जो भूलमें ब्रह्महत्यादिक महापापभी करे तो भी जलकरके
कमलपत्रवत् लिप्त नहीं होता है ॥ ३५ ॥
स्नातो वा यदि वाऽस्नातः शुचिर्वा यदि वाऽशुचिः॥
विभूति विश्वरूपञ्च संस्मरन्सर्वदा शुचिः ॥ ३६॥
स्नान किये होय अथवा न किये होय, पवित्र होय अथवा अप-
वित्र होय, विभूतियोग और विश्वरूपदर्शन अध्यायको पढताभया
सदा पवित्र होता है ॥३६॥
अनाचारोद्भवं पापमवाच्यादिकृतं च यत् ॥
अभक्ष्यमक्षजं दोषमस्टश्यस्पर्शजं तथा ॥ ३७॥
ज्ञाताज्ञातकृतं नित्यमिद्रियैर्जनितं च यत् ॥
तत्सर्वं नाशमायाति गीतापाठेन तत्क्षणात् ॥ ३८॥
जो अनाचारसे और जो निंदितशब्द बोलनेसे, जो अभक्ष्यभक्ष-
जसे जो न छूने योग्यके छूनेसे, पाप भये हों तथा जो जान और
अजानमें नित्य पाप भयेहों और जो इंद्रियोंसे पाप भया हो सो सर्व.
गीतापाठसे तत्काल नष्ट होता है ॥३७॥ ३८॥
सर्वत्र प्रतिभोक्ता च प्रतिग्राही च सर्वशः॥
गीतापाठं प्रकुर्वाणो न लिप्येत कदाचन ॥ ३९ ॥
जो सर्वत्र भोजन करता हो सर्वप्रतिग्रह लेताहो उसके भी
पापों करके गीतापाठसे लिप्त नहीं होता है ॥ ३९ ॥
रत्नपूर्णी महीं सर्वा प्रगृह्यापिविधानतः ।।
गीतापाठेन चैकेन शुद्धः स्फटिकवत्सदा ॥४०॥
विधिहीन रत्नपूरित पृथिवीका दानभी लेके. एक. गीतापाठसे
शुद्ध स्फटिकमणिवत् निष्पाप होताहै ॥१०॥
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भाषाटीकासमेत।
(१३).
यस्यांतःकरणं नित्यं गीतायां रमते सदा ॥
सर्वाग्निकः सदाजापी क्रियावान्सच पंडितः॥४१॥
जिसका अंतःकरण सदा गीतामें रमता हो सो. सर्वअग्निहोत्री,
सदा जप करनेवाला, सो कियावान और सोई पंडित है ॥४१॥
दर्शनीयः स धनवान्स योगी ज्ञानवानपि ॥
स एव याज्ञिको ध्यानी सर्ववेदार्थदर्शकः॥४२॥
सोई दर्शनयोग्य है, सोई धनवान्, सोई योगी, सोई ज्ञानवान्, सोई
याज्ञिक,सोई ध्यानी और सोई सर्ववेदोंके अर्थका देखनेवालाहै ॥४२॥ .
गीतायाः पुस्तकं यत्र नित्यं पाठे प्रवर्त्तते ॥
तत्र सर्वाणि तीर्थानि प्रयागादीनि भूतले ॥४३॥
गीताका पुस्तक जहां नित्य पाठमें प्रवर्त्त हो तहां पृथिवी-
परके सर्व प्रयागादितीर्थ सदा रहते हैं ॥४३॥
निवसति सदा गेहे देहदेशे सदैव हि ॥
सर्वे देवाश्च ऋषयो योगिनः पन्नगाश्च ये॥४४॥
और यहां घरमें और देहमें भी सर्व देव, ऋषि, योगी और पन्नगभी
सदा वसते हैं॥४४॥
गोपालवालकृष्णोपि नारदध्रुवपार्षदैः।
सहायो जायते शीघ्रं यत्र गीता प्रवर्तते ॥४५॥
जहां गीता प्रवृत्त होती है तहां नारद, ध्रुव और सर्व पार्षदनस-
हित गोपाल-बालकृष्ण शीघ्रही सहाय होते हैं ॥४५॥
यत्र गीताविचारश्च पठन पाठनं तथा ॥
तत्राहं निश्चितं पार्थ निवसामि सदैव हि ॥ १६ ॥
: गीतामाहात्म्य।
श्रीकृष्ण अर्जुनसे कहते हैं कि, हे पार्थ! जहां नित्य गीताका.
विचार होता है। तहां मैं निश्चय सर्वदा रहता हूं॥ १६ ॥
गीता मे हृदयं पार्थ गीता मे सारउत्तमः ॥
गीता मे ज्ञानमत्ययं गीता मेज्ञानमक्षयम् ॥४७
हे अर्जुन ! गीता मेरा हृदय है, गीता मेरा उत्तम सार है, गीता
मेरा अतिअग्रज्ञान और अक्षयज्ञानभी है ॥४७॥
गीता मे चोत्तमं स्थानं गीता मे परमं गृहम् ।।
गीताज्ञानं समाश्रित्य त्रिलोकी पालयाम्यहम् ॥४८॥
गीता मेरा उत्तमस्थान है और गीता मेरा उत्तम सार है, गीता-
के ज्ञानको धारण किये भये तीनों लोकोंका पालता हूं॥४८॥
गीता मे परमा विद्या ब्रह्मरूपा न संशयः॥
अर्द्धमात्राक्षरा नित्या त्वनिर्वाच्यपदात्मिका ॥४९ ॥
गीता मेरी उत्तम विद्या है, गीता ब्रह्मरूप है, इसमें संशय नहीं।
अईमात्रा, नाशरहित, सनातन, अनिर्वाच्यपदरूप ऐसी परावाणी-
रूप मेरी यह गीता है ॥१९॥
गीतानामानि वक्ष्यामि गुह्यानि शृणु पांडव ॥
कीर्तनात्सर्वपापानि विलयं यांति तत्क्षणात् ॥ ५० ॥
हे पांडव ! गीताके जो गुप्त नाम हैं सो मैं तुमसे कहता हूं
जिनके कीर्तनसे तत्काल सर्वपापक्षय होते हैं ॥५०॥
अथ गीतानामानि।
गीता गंगा च गायत्री सीता सत्या सरस्वती ॥
ब्रह्मविद्या ब्रह्मवल्ली त्रिसंध्या मुक्तगेहिनी ॥ ५१ ॥
भाषाटीकासमेत। (१५) अर्द्धमात्रा चिदानंदा भवानी भयनाशिनी ॥ वेदत्रयी पराऽनंता तत्त्वार्थज्ञानमञ्जरी ॥५२॥ इत्येतानि जपन्नित्यं नरो निश्चलमानसः॥ ज्ञानसिद्धिं लभेच्छीघ्रं तथांते परमं पदम् ॥ ५३॥ अब गीताके नाम कहते हैं-गीता १ गंगा २ गायत्री ३ सीता सत्या५ सरस्वती ६ब्रह्मविद्या ७ ब्रह्मवल्ली ८ त्रिसंध्या ९ मुक्तगेहि- नी १० अर्द्धमात्रा ११ चिदानंदा १२ भवन्नी १३ भयनाशिनी १४ वेदत्रयी १६ परा.१६ अनंता १७ तत्त्वार्थज्ञानमंजरी ॥ १८॥५१॥ ॥५२॥ गीताके. इन अठारह नामनको नित्य मन स्थिर करके जपता रहै तो शीघ्रही ज्ञानसिद्धिको प्राप्त होके, अंतमें मोक्षको प्राप्त होताहै ॥१३॥ पाठेऽसमर्थः संपूर्ण तदर्द्ध पाठमाचरेत् ॥ तदा गोदानजं पुण्यं लभते नात्र संशयः ॥ ५४॥ जो संपूर्ण पाठ न करसके तो आधीगीताका याने नव अध्यायन- का पाठ करे, तो एक गोदानका धुण्य पावै, इसमें संशय नहीं ॥५४॥ षडंशं जपमानस्तु गंगास्नानफलं लभेत् ॥ त्रिभागं पठमानस्तु सोमयागफलं लभेत् ॥ ५५ ॥ छठे अंशको याने तीन अध्यायोंका नित्य पाठ करे तो गंगास्ना- नका फल पावै. तीसरे भागका याने छः अध्यायनका नित्य पाठ करनेसे सोमयागका फल पावै॥५५॥ तथाऽध्यायद्वयं नित्यं पठमानो निरंतरम् ॥ इंद्रलोकमवाप्नोति कल्पमेकं वसेद्धवम् ॥ ५६ ॥ दो अध्यायोंका नित्य पाठ करता रहै तो इंद्रलोकको पात होके, वहाँ एककल्प वास करै॥५६॥ .
गीतामाहात्म्य । एकमध्यायकं नित्यं पठते भक्तिसंयुतः ॥ रुद्रलोकमवाप्नोति गणो भूत्वा वसेच्चिरम् ॥५७॥ जो एकही अध्यायका निरंतर नेमसे भक्तिपूर्वक पाठ करतारहे तो रुद्रलोकको प्राप्त होके वहां शंकरका गण होके, बहुतकाल- पर्यंत याने कल्पपर्यंत रहिके मुक्त होताहै ॥२७॥ अध्यायाई च पादं वा नित्यं यः पठते जनः॥ स प्राप्नोति रवेलोकं मन्वंतरशतं समाः॥५८॥ जो मनुष्य गीताका आधा अथवा पाव अध्यायकाभी नित्यने- मसे पाठ करता रहै, तो वह सूर्यलोकमें सौ मन्वंतरके वर्षांपर्यंत वास करै ।।५८॥ गीतायाः श्लोकदशकं सप्त पंच चतुष्टयम् ॥ त्रिकद्रिकैकपर्द्ध वा श्लोकानां च पठेन्नरः॥ चंद्रलोकमवाप्नोति वर्षाणामयुतायुतम् ॥ ५९॥ जो गीताके दशश्लोक अथवा सात पांच चार तीन दो एक अथवा आधे श्लोककाभी निरंतर पठन करे, तो अयुतायुतवर्ष याने दशकोटिवर्ष १०,००,००,००० चंद्रलोकमें वास करेगा ॥१९॥ गीतार्थमेककालेपि श्लोकमध्यायमेव च ॥ स्मरस्त्यका जनो देहं प्रयाति परमं पदम् ॥ ६ ॥ जो एककालभी गीताके एकश्लोकका अथवा अध्यायका अर्थ स्मरताभया देहको त्याग तो मोक्षको पावै ॥६० ।। गीतार्थ वापि पाठं वा शृणुयादंतकालतः॥ महापातकयुक्तोपि मुक्तिभागी भवेज्जनः ॥६॥ .
माषाटीकासमेत ।
(१७)
जो अंतकालके समयमें गीताका अर्थ अथवा पाठ सुनता दे .
त्यागे, तो महापातकीभी मुक्त होय ॥६॥
गीतापुस्तकसंयुक्तः प्राणांस्त्यक्त्वा प्रयाति यः॥
स वैकुंठमवाप्नोति विष्णुना सह मोदते॥६२ ॥
जो गीताके पुस्तकयुक्त प्राणोंको त्यागे, सो विष्णुलोकको
प्राप्त होके विष्णुके समीप आनंद करै॥१२॥
गीताध्यायसमायुक्तो मृतो मानुषतां व्रजेत् ॥
गीताभ्यासं पुनः कृत्वा लभते मुक्तिमुत्तमाम् ॥६३॥
जो मरणसमयमें गीतापुस्तकका एक अध्याय भी समीप होय
तो मनुष्यजन्म पायके फिर गीताभ्यास करके मुक्त होय ॥ ६३ ॥
गीतोच्चारणसंयुक्तो म्रियमाणो गतिं लभेत् ॥
यद्यत्कर्म च सर्वत्र गीतापाठं प्रकीर्तयेत् ॥
तत्तत्कर्म च निर्दोषं कृत्वा पूर्णमवाप्नुयात् ॥६४॥
मरनेपरभी जो गीता ऐसा उच्चारण करके मरे तो भी मुक्त होय
जो जो कर्म कर उस उसमें गीतापाठ करे तो निदोषकर्मका
संपूर्ण फल पावे ॥६॥
पितृनुद्दिश्य यः श्राद्ध गीतापाठं करोति वै ॥
संतुष्टाः पितरस्तस्य निरयाद्यांति सद्गतिम् ॥६५॥
जो श्राद्धमें पितरनके निमित्त गीताका पाठ करे तो वे पितर
संतुष्ट भयेहुये नरकसे मुक्तिको जॉय ॥ ६५ ॥
गीतापाठे तु संतुष्टाः पितरः श्राद्धतर्पिताः ॥
पितृलोकं प्रयांत्येव पुत्राशीर्वादतत्पराः ॥ ६६ ॥
गीतापाठसे प्रसन्नं पितर पुत्रको आशीर्वाद देतेभये पितृलोकको
माते हैं॥६६॥
(१८) गीतामाहात्म्य । लिखित्वा धारयेत्कंठे बाहुदंडे 'च मस्तके । नश्यंत्युपद्रवाः सर्वे विनरूपाश्च दारुणाः॥६७॥ गीताको लिखके गलेमें, भुजापर अथवा मस्तकमें धारण करे तो उसके विघ्नरूप दारुण उपद्रव नाश होय ॥६७॥ गीतापुस्तकदानं च धेनुपुच्छसमन्वितम् ॥ दत्वातत्सद्विजे सम्यकतार्थों जायते जनः॥६८ ॥ गोदान देनेपर गाईकी पूंछसहित हाथमें गोताका पुस्तक लेके जिसने दान दिया वह सर्व करचुका ।। ६८॥ पुस्तकं हेमसंयुक्तं गीतायाः शुद्धमानसः॥ दत्वा विप्राय विदुषे जायते न पुनर्भवे ॥६९॥ सुवर्णसंयुक्त गीतापुस्तकका दान जो शुद्धमनसे विद्वान ब्राह्मण- को देय, सो फिर जन्म न पावै ।। ६९॥ शतपुस्तकदानं च गीतायाः प्रकरोति यः॥ सयाति ब्रह्मसदनं पुनरावृत्तिवर्जितम् ॥ ७० ॥ जो गीताके सौ पुस्तकोंका दान करे, तो जिसलोकसे फिर इहां नहीं जन्मता है। उस वैकुंठको जाता है।॥ ७० ॥ गीतादानप्रभावेण सप्तकल्पावधीः समाः॥ विष्णुलोकमवाप्नोति विष्णुना सह मोदते ॥७१ ॥ गीतादानके प्रभावसे विष्णुलोको सात कल्पपर्यंत विष्णुसंयुत रहके आनंद करे॥७१॥ सम्यक् श्रुत्वा च गीतार्थ पुस्तकं यः प्रदापयेत् ॥ तस्मैप्रीतोस्मि भगवान्ददामि मनसेप्सितम् ॥७२॥ . .
, . भाषाटीकासमेत। (१९)" श्रीकृष्ण कहते हैं कि, जो गीताका अर्थ सुनिके पुस्तकका दान करे, उसको मनवांछित फल देता हूं ॥७२॥ देहं मानुषमाश्रित्य चातुर्वण्र्येषु भारत ॥ न शृणो ति पठत्येव गीताममृतरूपिणीम्॥७३॥ हस्तात्त्य- क्त्वाऽमृतं प्राप्तं कष्टात्क्ष्वेडं समश्नुते ॥ पीला गी- तामृतं लोके लब्ध्वा मोक्षं सुखी भवेत् ॥ ॥ ७४ ॥ जो मनुष्य देह पाइके इस अमृतरूपिणी गीताको नहीं पढताहे और नहीं सुनता है सो हाथमें आयेभये अमृतको त्यागके विषको कष्टसे पीता है। इस गीतारूप अमृतका पान करके मोक्षको प्राप्त होके सुखी होता है ।।७३ ॥ ७४॥ जनैः संसारदुःखात्तैर्गीताज्ञानं च यैःश्रुतम् ॥ संप्राप्तममृतं तैश्च गतास्ते सदनं हरेः ॥ ७५ ॥ संसारदुःखकरके पीडित जिन मनुष्योंने इस गीताके ज्ञानको सुनां वे अमृत होके विष्णुलोकको प्राप्त भये ॥ ७५ ॥ गीतामाश्रित्य बहवो भूभुजो जनकादयः॥ निर्धूतकल्मषा लोके गतास्ते परमं पदम् ॥ ७६ ॥ इस गीताका आश्रय करके, बहुतसे जनकादिक राजा पापरहित होके परमपदको गये हैं।।७६॥ गीतासु न विशेषोस्ति जनेषूच्चावचेषु च ॥ ज्ञानेष्वेव समग्रेषु समा ब्रह्मस्वरूणी ॥ ७७ ॥ गीतामें नीच ऊंचका विशेष नहीं, आत्मा सबमें; समान है। इससे यह ब्रह्मस्वरूपिणी है ।।७७॥ योभ्यसूयति गीतां च निंदां वा प्रकरोति च ॥
" (२०) गीतामाहात्म्य । प्राप्नोति नरकं घोरं यावदाभूतसंप्लवम् ॥ ७८ ॥ जो गीताको ईर्षा और निंदा करता है सो प्रलयपर्यंत. नरकमें रहता है । ७८॥ अहंकारेण सूढात्मा गीतार्थ नैव मन्यते ॥ कुंभीपाके स पच्येत यावत्कल्पलयो भवेत् ॥ ७९ ॥ जो अहंकारसे गीताके अर्थको नहीं मानता है, सो प्रलयका- लपर्यंत कुंभीपाक नरकमें पचता है॥ ७९ ॥ गीतार्थ वाच्यमानं यो न शृणोति समीपतः॥ श्वसूकरमवां योनिमनेकां सोऽधिगच्छति ॥ ८० ॥ जो गीता बचतीमईको नजदीक जाके नहीं सुनता है सो कुत्ता और सूवरके अनेक जन्म पाता है ॥ ८॥ चौर्यं कृत्वा च गीतायाः पुस्तकं यः समानयेत् ॥ मतस्य स्यात्फलं किंचित्पठनं च वृथा भवेत्॥८१ ॥ जो गीताके पुस्तक चोरीसे लाइके उसपर पाठ करे तो उसको पाठका फल तो नहीं मिले और वृथा परिश्रम होता है ॥८॥ यःश्रुत्वा नैव गीतार्थ मोदते परमादरात् ॥ नैवाप्नोति फलं लोके प्रमादाब वृथा श्रमम् ॥ ८२॥ जो गीताके अर्थको सुनके अतिआदरसे आनंद नहीं पाता है उसको फल नहीं मिलता है वह प्रमादसे वृथा होता है। ८२॥ गीतां श्रुत्वा हिरण्यं च पट्टांबरसुवेष्टनम् ॥ निवेदयेच्च तद्वेष्टय प्रीतये परमात्मनः॥ ८३॥ गीताको सुनके सुवर्ण और रेशमी वस्त्र पुस्तक लपेटनेका उस पर लपेटिके परमात्माकी प्रीविके वास्ते बाँचनेवालेको देना।। ८३॥
भाषाटीकासमेत।
(२१॥
वाचकं पूजयेद्भक्त्या द्रव्यवत्राद्युपस्करैः ॥
अन्नैर्बहुविधैः प्रीत्या तुष्यतां भगवानिति ॥ ८४ ॥
द्रव्य, वस्त्र, आभूषणादिकोंकरके वक्ताका पूजन करके नाना-
प्रकारके अन्न देना कि, भगवान् प्रसन्न होवे, इस बुद्धिसे देना ॥८४॥
माहात्स्यमेतद्रीतायाः कृष्णप्रोक्तं सनातनम् ॥
गीतांते पठते यस्तु यथोक्तं फलमाप्नुयात् ॥ ८५॥
यह श्रीकृष्णका कहाभया सनातन गीताका माहात्म्य इसके
गीतापाठके अंतमें पढे तो यथोक्त फल पावै ॥ ८५॥
गीतायाः पठनं कृत्वा माहात्म्यं नैव यः पठेत् ॥
वृथा पाठफलं तस्य श्रम एव हि केवलम् ॥ ८६॥
गीतापाठ करके माहात्म्यको न बाँचे तो उसके पाठ करनेका
श्रम वृथाही है. पाठका फल नहीं पाताहै ।। ८६ ॥
एतन्माहात्म्यसंयुक्तं गीतापाठं करोति यः ॥
श्रद्धया यःशृणोत्येव दुर्लभां गतिमाप्नुयात् ॥ ८७॥
जो इस माहात्म्यके संयुक्त गीतापाठ करेगा अथवा सुनेगा सो
दुभ मोक्षपदको पावेगा ।। ८७॥
श्रुत्वा पठित्वा गीतां च माहात्म्यं यः शृणोति वै ।।
वस्य पुण्यफलं लोकेभवेद्धि मनसेप्सितम् ॥ ८८॥
(२२) गीतामाहात्म्य। जो गीताको सुनके और पढके माहात्म्यको पढते सुनते हैं ने, मनइच्छित फलको पावत हैं।। ८८॥ इति श्रीमद्वाराहपुराणे सूतशौनकसंवादे श्रीकृष्ण- प्रोक्तं श्रीमद्भगवद्रीतामाहात्म्यं संपूर्णम् । इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिता श्रीमद्भगवदीतामाहात्म्यमंद्रिकाव्याख्या समातियात् ।। ॥श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ ॥शुभं भवतु ।। भापका-खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम् प्रेस, खेतवाड़ी-बंबई. "
भीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भगवद्गीता।
सान्वय-अमृततरंगिणीभाषाटीकासमेता।
श्रीजयति।
प्रणम्य परमात्मानं कृष्णं रामानुजं गुरुम् ॥
गीताव्याख्यामहं कुर्वं गीतामृततरंगिणीम् ॥ १॥
धृतराष्ट्र उवाच।
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः॥
मामकाः पांडवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥१॥
जब श्रीकुरुक्षेत्रमें दुर्योधनादिक धृतराष्ट्रके पुत्र और युधिष्ठिरा-
दिक पांडुके पुत्र आपआपकी सेनाओंको लेके युद्धके वास्ते तयार
भये तब यहां हस्तिनापुरमें धृतराष्ट्र संजयसे पूछने लगे कि, हे संजय ।
धर्मस्थल कुरुक्षेत्र में युद्धकी इच्छा कियेभये इकडे भयेड्डये मेरे पुत्र
और पांडुके पुत्र ये निश्चयकेरके क्यों करनेको प्रारंभ करते भये सो
कहो ॥१॥
संजय उवाच।
दृष्ट्वा तु पांडवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥ २॥
ऐसे धृतराष्टके वाक्य सुनिके संजय कहते भये कि, हे राजन् ।
राजो दुर्योधन तबै व्यूहरचनायुक्त पांडवनकी सेनाकोदेखके और द्रोणां:
चार्यके समीपे जाके वचन बोलतेभये ॥२॥
पश्यैती पांडुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ॥
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमंता ॥३॥
- (२४) • भगवद्गीता। [अध्यायः- हे आचार्य ! जो तुम्हारी बुद्धिमान् शिष्य द्रुपदका पुत्र धृष्ट- धुन तिसकरके यथायोग्यस्थानोंपर स्थापित पांडुपुत्रोंकी इसँ सर्वो- तमं सेनाको आप देखो ॥३॥ अत्र शूरो महेवासा भीमार्जुनसमा युधि । युयुधानो विराटश्च द्रुपदैश्च महारथः॥४॥ इससेनामें जो युद्धकरनेमें भीम अर्जुनके समान बडे धनुषधारी शूर हैं वे ये कि, युयुधान और विराट और महारथी द्रुपद ॥४॥ धृष्टकेतुश्चेकितानः काशीराजश्च वीर्यवान् । पुरुजित्कुंतिभोजश्च शैब्यश्च नरपुंगवः॥५॥ धृष्टकेतु चेकिताने और बलवान् काशीका रोजा तथा पुरुजिव और कृतिभोज और नरोंमें श्रेष्ठं शैब्य ।।५।। युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजार्च वीर्यवान् ॥ सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥६॥ पराक्रमी और उत्तमशक्तिवाला और धीरजवान ऐसा युधामन्यु सुभद्राका पुत्र अभिमन्यु और महास्थवाले संवहीं" द्रौपदीके पुत्र जिसमें है इसप्रकार पांडवोंकी सेना रची है ॥६॥ अस्माकं तु विशिष्टाय तान्निबोधैं द्विजोत्तम ॥ नार्यका ममं सैन्यस्य संज्ञार्थ तान्ब्रवीमि ते" ॥७॥ है द्विजोत्तम ! हमारेनमें जो श्रेष्ठ और हमारी सेनाके पति हैं उनको जाननेके वास्ते तुलारसे कहती हूं तिन्होंको जानो ॥७॥ भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः॥ अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥८॥ जो हमारी सेनामें मुख्य हैं उनमें एक आप हो और भीष्म और कर्ण .
(२५).
प्रथमः १..] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० ।
और संग्रामके जीतनेवाले कृपाचार्य अश्वत्थामा और विकर्ण
और तैसा ही राजा सोमदत्तका पुत्र भूरिश्रवा ॥ ८॥
अन्ये च बहवः शूरामदर्थे त्यक्तंजीविताः ॥
नानास्त्रिप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥९॥
और मेरेवास्ते जीवितकोत्यागनेवाले और नानास्त्रिोंके प्रहारकर-
नेवाले और भी सर्व युद्धचतुरऐसे बहुत शूर हैं ॥९॥
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ॥
पर्याप्तं विद॑मेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥ १० ॥
हमारी सेनों भीष्मकरके रक्षित है तिससे असमर्थ है और इनकी
यह सेना भीमकरके रक्षित है इससे बलिष्ट है. तात्पर्य यह है कि, भीष्म
उभयपक्षपाती हैं॥१०॥
अयनेषु चं सर्वेषु यथाभांगमवंस्थिताः ॥
भीष्ममेवाभिरक्षतु भवतः सर्वएव हि ॥ ११ ॥
इससे सर्व नाकेनपैर यायोग्य भागबनायेभये खड़े रहके तुर्म
सवही निश्चयकरके भीष्मका ही संरक्षण करो ॥ ११॥
तस्य संजनयन्हर्ष कुरुवृद्धः पितामहः ॥
सिहनादं विनंद्याच्चैःशखं दध्मौ प्रतापवान् ॥ १२ ॥
ऐसे सुनके बडेप्रतापवान् कौरवनमें वृद्ध पितामह भीष्म उस दु-
योधनको हेर्ष उत्पन्नकरनेवाले ऊंचेस्वरसे सिंहनादसे गर्जनाके
र शेखको बजातेभये ॥ १२॥
वतःशंखांश्च भेर्यश्च पणानकगोमुखाः ॥
सहसैवाभ्यहन्यंत से शब्दस्तुर्मुलोऽभवत् ॥ १३॥
(२६)
भगवद्गीता।
[ अध्याय:-
तवं शंख और भरी और तासे नगारे रणसिंहे एकसंग ही बजतेर्भये
"सो शब्द मिश्रित भारी होताभया ।। १३ ॥
वतः श्वेतैहयैर्युक्ते महति स्यदने स्थिती॥
माधवः पौडवाश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः ॥ १४ ॥
तवं जिसमें श्वेत घोड़े जोड़ें हैं ऐले श्रेष्ट स्थपर बैठेभैये कृष्ण और
अर्जुन दिव्य शेखोंको बनातभये ॥१४॥
पांचजन्य हषीकेशो देवदत्तं धनंजयः॥
पौंडूं दध्मौ महाशंख भीमकर्मा वृकोदरः ॥ १५ ॥
तहां श्रीकृष्ण पांचजन्यको, अर्जुन देवदत्तको, भयंकर है कर्म
जिसका ऐसा वृकोदर याने तीक्ष्णाशिउदरवाला अर्थात् भीम पौंडूनामक
महाशंखको बजातेभये ॥६॥
अनंतविजयं राजा कुंतीपुत्रो युधिष्ठिरः।।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥ १६ ॥
कुंतीका पुत्र राजी युधिष्ठिर अनंतविजयशंखको, नकुल और
संहदेव सुघोष और पुष्पकशंखोंको, क्रमसे बजातेभये याने नकुल
सुघोषको और सहदेव मणिपुष्पको वजातेश्ये ॥१६॥
काश्यश्च परमेष्वासः शिखंडी च महारथः ॥
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सौत्यकिश्वापराजितः ॥ १७ ॥
श्रेष्ठधनुषवाला काशीका रोजा और महारथ शिखंडी और धृष्टद्युम्नं
और विराट और शत्रुनकरिके अजित सात्यकि यादव ।। १७ ॥
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशःष्टथिवीपते ॥
सौभद्रश्च महाबाहुःशंखाँन्दः पृथक्टक् ॥ १८॥
.
प्रथमः १.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०॥ (२७)
हे पृथ्वीनाथ ! राजाद्रुपद और सबै द्रौपदीके पुत्र और महाबाहु
अभिमन्यु ये न्यारे न्यारे शंखों को बजातेभये ॥१८॥
सं घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदौरयत् ॥
नभश्च प्रॅथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयत् ॥ १९॥
सो मिश्रित ऐसा बैडा शब्द आकोश और पृथिवीको शन्दायमा-
न करनेवाला धृतराष्ट्रके पुत्रोंके हँदयोंको ही विदीर्णकरताभया॥१९॥
अंथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः॥
प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पांडवः ॥२०॥
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ॥
सेनयोरुभयोमध्ये रैथं स्थापय मेंऽच्युत ॥ २१ ॥
हे महीपते। तवे शस्त्रपात प्रवृत्तहानेके समय में कपिध्वज पांडव अर्जुन
तुम्हारे पुत्रोंको युद्धार्थ खंडे देखके त धनुषको ऊंचांकरके श्रीकृ-
ष्णसे ये वाक्य बोलतेभये कि, हे अॅच्युता दोनों सेनाओं के मध्य में
मेरे रथको स्थापितकरो॥२०॥२१ ॥
यौवदेतानिरीक्षेऽहं योर्द्धकामानवस्थितान् ॥
कैमयां सह योद्धव्यमस्मिव्रणसमुधमे ॥ २२ ॥
मैं' प्रथम इन युद्धइच्छावाले खडेभयेनको देखूगा कि, इस.
रणखेतमें मेरे साथ कौनकरके युद्धकरनी योग्य है ॥२२॥
योत्स्येमानानवेक्षेह य एतेऽत्रं समागताः॥
धार्तराष्ट्रस्य बुद्धेयुद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ २३ ॥
जो ये जितने द्धि धृतराष्ट्रपुत्रके युद्ध में प्रियइच्छनेर्वाले यहाँ .
इकडे भयेहैं इन युद्धकरनेवालोंको मैं देखूगा ॥२३॥
(२८)
भगवद्गीता।
[अध्यायः
१६
संजय उवाच ।
एवमुक्तो हषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थायित्वा रथोत्तमम् ॥२४॥
भीष्मद्रोणत्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ॥
उवाच पार्थ पश्यैतौन्समवेताल्कुल निति ॥ २५ ॥
संजय धृतराष्ट्रसे कहतेहैं कि हे भारत ! अर्जुनकरके ऐसे कहेभये
श्रीकृष्ण दोनों सेनाओंके बीचमें श्रेष्ठरथेको स्थापितकरके भीम
और द्रोणाचार्यके सामने 'और सर्व राजाओंके सामने इसप्रकार बोले-
तेभये कि पाथीये इकडेभये जो कुरुवंशी तिनको देखो ॥२॥२६॥
तंत्राऽपश्यस्थितान्पार्थः पितॄनर्थ पितामहान् ॥
आँचार्यान्मातुलान्धातन्त्रान्पौत्रीन्सखीस्तों ॥
श्वशुरान्सुहृद श्चैवं सेनयोरुभयोरपि
तौन्समीक्ष्य से कौंतेयः सर्वान्बंधूनवस्थिताने ।
कृपयाँ परैयाविष्टो विषीदैनिदमब्रवीत् ॥२६॥२७॥
श्रीकृष्णजीके कहनेपर अर्जुन उस रणमें खडेझुए पित ( मिता-
सदृशभूरिश्रवादिक काका) पितामह (भीष्म सोमदत्तादिक) आचा-
ये (द्रोणाचार्यादिक) मामाँ (शकुनिशल्यादिक) भ्रातो ( दुर्योधना-
दिक) पुत्र (द्रौपदी में पांचों से भये जो पांच) पौत्र ( लक्ष्मणादिकोंके
पुत्र) तथा सखौ (अश्वत्थामा जयन्यादिक) ससुर (द्रुपदादिक) और
सुहृदै (कृतवर्मादिक)इनको देखतेभये ऐसे दोनों सेनाओंमें भी उनै
सर्व वधुनको खडे देखि के सो कुंतीपुत्र अर्जुन अति कृपांकरके
व्याप्त खेदित होते होते यह बोलते भये ॥२६ ॥२७॥
प्रथमः १:] समन्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । ( २९.) अर्जुन उवाच । दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्णं युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥ सीदति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ॥ वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जीयते॥२८॥२९॥ अर्जुन कहते हैं कि, हे कृष्ण ! युद्धइच्छावाले खडेभये ईन स्वेज- नोंको देखिके मेरे गात्रं शिथिल होतेहैं और मुंख सूर्खता है और मेरे शरीरमें कंप और रोमांच होते हैं ।। २८॥२९॥ गांडीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदद्यते ॥ ने च शैक्नोम्यवस्थातुं भ्रमंतीवं च में मैंनः ॥ ३० ॥ हाथसे गांडीवधनुप गिरापरता है और त्वचाभी जरीजातीहै और खंडेहोनेको भी नहीं सकता हूँ और मेरी मन भ्रमतीसरीखाहै ॥३०॥ निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ॥ न च श्रेयोऽनु पश्यामि हत्वां स्वजनमाहवे ॥ ३१ ॥ और हे केशव ! निमित्तभी विपरीत देखता हूं और संग्राममें स्वज- नोंको मारके फिर कल्याणभी नहीं देखताहूं ॥३१॥ न कांक्षे विजयं कृष्णं न च राज्यं सुखानि च ॥ किन्नो राज्येन गोविंद कि भोगै जीवितेन वा ॥२॥ हे कृष्णं ! विजय और राज्य और सुख नहीं चाहताहूं. हे गोविंद ! हमारेको राज्यकरके भोगकरके क्या प्रयोजन? अथवा जीवनेकर भी क्या प्रयोजन है ॥३२॥ येषाम) कांक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ॥ तं ईमेवस्तिथा युद्धे प्रोणांस्त्यका धनानि च ॥३३॥ हमको जिनकेवास्ते भोग सुख और राज्य चाँहीयेथा वे ये प्राण और नोंको त्यागके युद्ध में खडे हैं ॥ ३३॥ .
३०) मगवद्गीता । [अध्याय:- आंचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः॥ मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालीः संबंधिनस्तथी॥३४॥ ये सर्व मेरे आचार्य पितातुल्य काका पुत्रं और तैसेही पितामई भामाँ ससुर नातीपोतो साँले तथा और संबंधी हैं ॥३४॥ एतान्ने हंतुमिच्छामि नतोऽपि मधुसूदन । अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हे तोः किं नु मैहीकृते॥३५॥ हे मधुसूदन ! तीनोंलोकोंके रोज्यके वास्ते भी मेरेको ये मारते होय तोभी इनको मारनेकी नहीं इच्छाकरताहूं तो" पृथिवीके- वास्ते क्यों मारूंगा॥ ३५॥ निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः को प्रीतिः स्याँज्जनार्दन ॥ पापमेवा श्रयेदस्मान्त्वैतांनाततायिनः॥३६॥ हे जनार्दन ! धृतराष्ट्रके पुत्रोंको मारके हमको क्या प्रसन्नता होयगी इन आततायिनको मारके हमको पोपही लगेगा। आततायी- लक्षणादोहा-अग्निदेइ विषदेइ जो, क्षेत्रदारहरजोइ ॥ धनहरसन्मुखश- स्त्रकर, आततायिषट्होइ ॥१॥३६॥ तस्मांनाही वयं हेतुं धार्तराष्ट्रान्स्वबांधवान् ॥ स्वजनं हिं कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधर्वं ॥३७॥ तिससे कि, इनके मारनेका पाप ही होयगा तिससे हमारेबंधूंधृतरा- ट्रके पुत्रोंको मारनेके वास्ते हम नहीं योग्य हैं हे माधव ! निश्चयपूर्वक स्वजनोंको मौरके कैसे सुखी होयंगे" ॥३७॥ यद्यप्येते न पश्यति लोभोपहतचेतसः॥ कुलक्षयकृतं दोषं मित्रंदोहे च पातकम् ॥ कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मॉनिवर्तितम् ।
(३१). प्रथमः १.] सान्वय-अमृततरंगिणीभा० टी०। कुलक्षयकृतं 'दोषं !पश्यद्भिर्जनार्दन ॥ ३८॥ ३९ ॥ हे जनार्दन ! लोभकरके जिनके चित्त भ्रष्ट भयेहैं ऐसे ये दुर्योधना- दिक कुलक्षयरनेके दोषको और मित्रद्रोहमें पापको यद्यपि नहीं देखते हैं नहीं जानतेहैं तोभी कुलक्षयकृत दोषको देखतेभये हम- करके इस पापसे निवृत्त होनेके वास्ते कैसे" नै जाननाचहिये ॥३९॥ कुलक्षये प्रणश्यति कुलधाःसनांतनाः॥ धर्म नष्टे कुले कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युतं॥४०॥ कुलके क्षयहोनेसे सनातन कुलके धर्म नाश होतेहैं फिर धर्म नष्ट- होनेसे सर्व कुलंको अधर्म जीतलेताहै याने कुलको अप्रतिष्ठित करदेताहै ॥४०॥ अधर्मोऽभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यंति कुलस्त्रियः॥ स्त्रीपुं दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥४१॥ हे कृष्ण ! अधर्मकरके कुलको अतिष्ठितहोनेसे कुलकी स्त्रीजन दुष्ट होयेंगी हे वृष्णिवंशोद्भव ! उन दुष्ट स्त्रियनमें वर्णसंकर उत्पन्न होयगा॥४१॥ संकरो नरकायैव कुलन्नानां कुलस्य च ॥ . पतंति पितरो ह्येषां लुप्तपिंडोदकक्रियाः॥१२॥ जिससे कि, जिनके पितर पिंडोदकक्रिया प्राप्तभयेविना संसारमें पे- डतेहैं और इसीसे कुलवातिनके कुलको वह वर्णसंकर नरकेप्राप्तिही के हेतु उत्पन्न होताहै ॥१२॥ दोषैरे तैः कुलनानां वर्णसंकरकारकैः॥ उत्सांद्यते जांतिधर्माकुलधर्मार्च शाश्वताः॥४३॥ जो कुलपाती हैं उनके जो ये वर्णसंकरकारक दोर्षे तिनकरके जातिधर्म और सनातन कुलधर्म नष्ट होतेहैं ।। १३ ॥ .
..
(३२)
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
उत्सन्नकुंलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दने ।
नईके नियंतं वासो भवतीत्य॑नुशुश्रुम ॥ ४४ ॥
हेजनार्दन! जिनके कुलधर्म नष्ट भयेउन मनुष्योंको नरकमें अवश्य
वास होताहै ऐसा सुनेतेहैं।। ४४॥
अहो बंत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ॥
यद्राज्यसुखलोभेन हेतु स्वर्जनमुद्यताः ॥ ४५ ॥
अहो कष्ट ! हम बडेपॉपको करनेको निश्चयकिये हैं जो राज्यसु-
खलोभकरके स्वजनोंको मारनेको उद्योगकियेहैं ॥ ४५ ॥
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः॥
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥ ४६ ॥
जो हाथमें शस्त्रलियेहुये धृतर्राष्टके पुत्र अशको और अप्रतीकोर-
को याने जो मैं बदला नहीं लेताहूं ऐसे मेरेको रणमें मारेंगे सो मारना
भी मेरा अतिकल्याणरूप होयगा ॥४६॥
संजय उवाच ।
एवमुक्त्वाऽर्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ॥
विसृज्य संशरं चापं शोकसंविनमानसः॥४७॥
राजातराष्ट्रसे संजय कहते हैं कि, संग्राममें अर्जुन ऐसे कहके
चाणसंयुक्त धनुष डारिके शोकव्याकुलसनहुआ भया स्थके पिछाडी
नायक रथमें बैठरहतांभया ॥४७॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योग-
शास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अर्जुनविषादयोगोनाम
प्रथमोऽध्यायः॥१॥
इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरकि
तायां गीतामृततरंगिण्यांप्रथमाध्यायप्रवाहः॥१॥
द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी। (३३)
संजय उवाच।
ते तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदंतमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥१॥
राजा धृतराष्ट्रसे संजयकहते हैं कि, जोप्रथम अध्यायमें करुणावाक्या
कहे वैसेही कृपाकरके व्याप्त आंसूंनके भरनेसे नेत्र व्याकुल विषाद-
युक्त उस अर्जुनसे मधुसूदन भगवान् ये वाक्य बोलेते भये ॥ १ ॥
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ॥
अनार्यजुष्टमस्वयमकीर्तिकरमर्जुन ॥२॥
जो बोले सो कहतेहैं कि, हे अर्जुन ! जो अनार्यनके सेवनेयोग्य
नरकको लेजानेवाला और अपकीर्तिका करनेवाला ऐसा यह मोह
तुमको ऐसे विषमस्थलमें कैसे प्राप्तंभया ॥२॥
कैव्यं मा स्मगमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ॥
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठं परंतपं ॥३॥ .
हे पृथाके पुत्र! तुम कायरतोको न ग्रहणकरो तुम्हारेमें यह
नहीं योग्य है हे परंतप ! तुच्छे हृदयकी दुर्बलताकारके काय-
रताको छोर्डि के खडेहोजावो ॥३॥
अर्जुन उवाच ।
कथं भीष्ममह संख्ये द्रोणं च मधुसूदन ॥
इंषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजाविरिसूदन ॥४॥
ऐसे कृष्णके वाक्य सुन अर्जुन बोले कि,हे मधुसूदनों में संग्राममें भी-
म और द्रोणाचार्य से बाणोंकरके कैसे युद्धकरूंगा हे अरिसूदन ! ये
दोनों पूंजनेयोग्य हैं यहां मधुसूदन कहनेका तात्पर्य यह कि,आप दैत्यह-
ता हो तो सज्जनोंसे क्यों युद्धकरातेहो आरिसूदन कहनेका तात्पर्य यह
कि, जो शत्रुनाशक हो तो भीष्मादिक पूज्यनपर बाणप्रहार क्यों
कराते हो॥४॥
- मगवद्गाता। [अध्यायः- [रूनहत्वां हि महानुभावाञ्च् यो भोक्तुंभक्ष्यम- पीह लोके ॥ हेत्वार्थकामांस्तु गुरूनि हैवभुजीय भोगाधिरप्रंदिग्धान् ॥५॥ इस लोकैमें अतिउत्तमप्रभाववाले गुरु को मारेविनों भिक्षाका अन्न भी खानेको कल्याणही जानना और अर्थ याने व्यकी है कामना जिनके ऐसे गुरुनको इस संग्रोममें मारके रक्तसे भरेभये भो- गोंको भोगौंगा ॥५॥ ने चैतदिन्ननः कतरन्नो गरीयो यंदा जयेम यदिवा'नो जयेयुः ॥ याने हत्वा नजिजीवि- षामस्तेऽवस्थिताः प्रमुंखे धार्तराष्ट्राः ॥६॥ यह भी नहीं जानतेहैं कि, हमारेमें कौन बली है नजाने हेम जीतेंगे किंवा ये हमको जीत जिनको मारके हम जीना नहीं चाहतेहैं दे" धृतराष्ट्रके पुत्र सन्मुख ही खंडेहैं ॥६॥ कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्म- संमूढचेताः॥ यच्छ्रेयः स्यौनिश्चितं ब्रूहि तन्में शिष्यस्तेऽहैं शौधि मां त्वौं प्रपन्नम् ॥ ७॥ कार्पण्ये यह कि हम इनको मारके कैसे जियेंगे तथा जो कुलक्षय- कादोषं इन कार्पण्य और कुलक्षयदोषोंकरके मेरा क्षत्रियस्वभाव विध्वं- सित भयाहै इसीसे धर्ममेंभी मेरा चित्त चकितभयाहै जैसे कि क्षत्रिय धर्म- युद्ध अथवा भिक्षान्नभोजन इनमें कौन कल्याणकारक है ऐसे चित्तचकि- तहै ऐसा मैं तुम्हारा शिष्य तुर्मको पूंछताहूँ जो मेरेवास्ते निश्चय कल्या- मैदायक होये वही कहो तुम्हारे शरणागत मेरे को सिखावो ॥ ७ ॥ न हि पँपश्यामि ममौंप द्यायच्छोकमुच्छो- - द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (३५) षणमिंद्रियाणाम् ॥ अवाप्य भूमावसंपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाँधिपत्यम् ॥ ८॥ अरे रे रे रे । बडो अनर्थ है कि, जो पृथिवीमें शत्रुरहित संपदायुक्त राज्यको और देवताओंके भी अधिपतित्वको पायके मेरी इंद्रियेनके सुखानेवाले शोकको दूरकरे उसको मैं नहीं देखतीहूं ॥८॥ संजय उवाच। एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परंतपः॥ न योत्स्य इति गोविंदभुक्त्वा तूंष्णीं बभूव है ॥९॥ संजय धृतराष्ट्रसे कहनेलगे कि, शत्रुनको संतापितकरनेवाला तथा गुडाका जो निद्रा तिसके जीतनेमें समर्थ ऐसा जो अर्जुन दृषी- केश याने इंद्रियों के मालिक श्रीकृष्णको ऐसे कहके फिर नहीं युद्धकरूंगा ऐसे गोविंदसे कहके मौन होतेभये ॥९॥ तमुवाच हँषीकेशः प्रहसन्निव भारत ॥ सेनयोरुभयोमध्ये विषीदंतमिदं वचः ॥ १० ॥ हे भरतवंशोत्पन्न धृतराष्ट्र ! दोनों सेनाओंके - मध्यमें युद्धके- उत्साहको त्यागिक शोक कररहा जो अर्जुन तिससे हँसतेसरीखें श्रीक- ष्णजी यह याने जो आगे कहेंगे सो वचनं बोलते भये ॥१०॥ श्रीभगवानुवाच । अंशोच्यानंन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादाचं भाषसे ॥ गतासूनगतासुंश्चं नौऽनुशोचंति पंडिताः ॥ ११ ॥ श्रीकृष्णभगवानने निश्चय किया कि, इसको धर्माधर्मका ज्ञान नहीं है, इससे यह धर्मको तो अधर्म और अधर्मको धर्म मान रहा है, परंतु धर्मको जानना चाहता है सो मोह गये विना यह कैसे जानेगा? सो मोह आत्मदर्शनविना नष्ट होनेका नहीं ज्ञानविना आत्मदर्श (३६) भगवद्गीता।. [.अध्यायः- न होनेका नहीं, सो ज्ञान निष्कामकर्मविना होनेका नहीं और अध्या- त्मशास्त्र जो आत्मा-अनात्मा-विवेक उपदेश याने जीव और शरीर- का विवेक उसका उपदेश इसविना निष्काम कर्म होने सकतानहीं इससे अध्यात्मशास्त्र ही उपदेश करो, ऐसा विचारके उपदेश कर- नेलगे. अब इस श्लोकसे लेके अठारहे अध्यायमें छासठके श्लोकमें जो “माशुचः" ऐसा वाक्य है वहां पर्यंत गीता उपदेश है. तहां प्रथम भगवान् कहते हैं कि, हे अर्जुन ! "त्वं अशोच्यान अन्वंशोचः' याने जो शोचनेयोग्य नहीं तिनको शोचते हो और प्रज्ञावाद याने पंडितोंसरीखी बातें तिनको भाषते याने कहते हो वे ऐसे कि, हमारे पितरोंका श्राद्ध और तर्पण न होनेसे वे स्वर्गसे नरकमें पडेंगे सो स्वर्गप्राप्ति और पडना श्राद्धादिक होने न होनेके स्वाधीन नहीं है। वे तो आपके करे पुण्यपापके स्वाधीन हैं "क्षीणे पुण्ये मर्त्य- लोकं विशंति" इस प्रमाणसे वे पुण्य पाप सदेह आत्माके स्वाधीन । हैं. केवल देहके स्वाधीन नहीं हैं यद्यपि पुत्रादिकोंके करेभये श्राद्धा- दिकोंका पुण्य प्राप्त होता है; कारण कि, पुत्रादिक सदेह आत्मसं- बंधी हैं, तथापि श्राद्ध न होनेसे स्वर्गसे पडना यह कोई कालमें भी होनेका नहीं, इसवास्ते गतासू जो ये शरीर नित्य नाशधर्मी और अगतामू जो जीव नित्य अमर एकरस है इससे "नासतोविद्यते भावोनाऽभावोविद्यतेसतः " इसप्रमाणसे पंडितजन इनका शोच नहीं करते हैं, इससे तुमकोभी शोचना अयोग्य है. “स्वेस्वकर्म- ण्यभिरत सिद्धिविंदतिमानवः " इसप्रमाणसे स्वधर्मयुद्ध ही कल्याण- कारक है ॥ ११ ॥ नत्वेवहिं जातु नास ने त्वं "नेमे "जनाधिपाः॥ मैं चैव ने भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥ १२॥ श्रीकृष्ण कहते हैं कि, हे अर्जुन ! जो आत्मा,याने जीवात्मा , . • . - (३७) द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। परमात्मा है उनके स्वभाव सुनो. सो ऐसे कि, "अहं सर्वेश्वर इतः पूर्वमनादी काले जातु नासमपि त्वासमेव" मैं सर्वेश्वर इस समयसे प्रथम अनादिकालमें क्या न था ? क्योंकि, निश्चयकरके था "त्वं नासीः अपितु आसीः एव" जैसा मैं था ऐसा क्या तू न था ? तू भी था." इमे जनाधिपाः किं न आसन् अपित्वासन एव" ये सब राजा क्या न थे? अर्थात् ये भी थे. "अतः परं सर्वे वयं किं न भविष्या- मः अपितु भविष्याम एव" इसकालसे अगाडी क्या हम, तुम ये सर्व न होयंगे ? अर्थात् होयहींगे. इससे आत्मा नित्य है. शोच करना वृथा है. तथा जो यहां हम, तुम और ये ऐसा कहा इससे यह सिद्धां- त भया कि, जीवात्मा और परमात्मा न्यारे न्यारे हैं यह न्यारापनाही सत्य है. इसीसे श्रीकृष्णजीने भी उपदेश किया क्यों कि, अज्ञानमो- हित अर्जुनको मिथ्यांउपदेश करनेहीके नहीं. इस न्यारेसनेमें श्रु- तिभी प्रमाण है सो यह-"नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहू- नां यो विदधाति कामानिति" अर्थ-जो एक नित्यचेतनः परमात्मा है सो बहुत नित्यचेतन जीवोंकी कामनाको परिपूर्ण करताहै। जो कोई कहे कि, यह भेद अज्ञानकृत है तो उनसे कहना कि, यह परमार्थदृष्टिके अधिष्ठाता और आत्मयाथात्म्यसे सदा अज्ञानर- हित, नित्यस्वरूप परमपुरुष श्रीकृष्णमें अज्ञानकृतभेददर्शनकार्य होनेका नहीं. तोभी कोई कृष्णको अज्ञ कहे तो उनकरके उप दिष्ट गीता अप्रमाण होती है. जो कोई कहे कि, श्रीकृष्णने अभेद- निश्चय कियाहै इससे वह भेद निराकृत है; सो जले वस्त्रतुल्य बंधन- कारक नहीं है. तब कहना कि, मृगतृष्णानिराकृत · जानिके फिर उसमें जल लेने न जायगा जो गया तो वह अज्ञ है. इसीतरह नो मिथ्या भेदका इसमें उपदेश दिया तो इस गीताकामी प्रमाण न मानना चाहिये. दूसरा यह कि, भेदविना उपदेशभी नहीं बनेगा + " (३८) भगवद्गीता। (अध्यायः- तथा परमात्मामें ऐसाभी होनेका नहीं कि प्रथम अज्ञ थे शास्त्रा- ध्ययनसे ज्ञानी भये. जिसको शास्त्राभ्याससे ज्ञान होताहै उसको कोई समयमें अज्ञान भी होता है. सो नित्यज्ञानस्वरूप श्रीकृष्णमें यह भी नहीं होसकताहै. यहां श्रुती प्रमाण है सो ऐसे कि, 'यःसर्वज्ञः सर्ववित् ॥ पराऽस्यशक्तिर्विविधैवश्रूयतेस्वाभाविकीज्ञानवलक्रियाच' तथा यहांभी कहेंगे 'वेदासमतीतानिवर्तमानानिचार्जुन । भविष्या- णिचभूतानिमांतुवेदनकश्चन' इत्यादि प्रमाणोंसे भेदही सिद्ध होता है. भेदविना उपदेश किसको करै ? तहां कोई कहतेहैं कि, अर्जुन कृष्णका प्रतिबिंब है, आपको आपही उपदेश करतेहैं. तहां कहना कि, दरपन जल इत्यादिमें आपके प्रतिबिंबको देखके जो बातें करे सो उन्मत्त याने चित्तभ्रष्ट सिरीं होताहै, उसके वाक्यभी अप्र- माण हैं, जिसको अभेदज्ञान है उसको उपदेश बननेहीका नहीं न उसके गुरू हैं न शिष्य है इससे यही सिद्ध भया कि, परमात्मासे जीव न्यारे हैं ।। १२॥ देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमार यौवनं जरां ॥ वाँ देहांतरप्राप्तिर्षीरस्तत्रै नै मुह्येति ॥ १३॥ जैसे इस देहमें जीवकी कुमार अवस्था यौवन और जरा अवस्था होतेहैं तैसे देहांतरकी प्राप्ति भी होतीहै तहां धीरे याने ज्ञानीपुरुष नहीं मोहता है॥ १३॥ मात्रास्पर्शीस्तु कौंतेय शीतोष्णसुखंदुःखदाः॥ आगमापायिनोऽनित्यास्तास्तितिक्षस्व भारत॥१४॥ हे कुंतीपुत्र मात्रों जो इंद्रियां तिनके स्पर्श जो शब्दस्पर्शरूप रस और गंध ये शीत उष्ण याने मृदु कठोर शब्द शीतोष्ण शस्त्र प्रहारादिक और द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (३९) संयोगवियोगादिक दुःखके देनेवाले अनित्य और. आगमापायी याने होते जाते रहते हैं हे भारत ! तुम भरतवंशी हो उनको सहनकरो ॥१४॥ ये हिनं व्यर्थयंत्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । संमदुःखसुखं धीरं सोऽसृतत्वाय कैल्पते ॥ १५॥ हे पुरुपेर्षभ! सुख और दुःख है सम जिसके ऐसे जिस ज्ञानी पुरुष- को ये निश्चयकरके नहीं पीडां करते हैं सो मोक्षजानेको समर्थ- होती है ॥ १५॥ नोऽसतो विर्यते भांवो नॉर्भावो विद्यते सर्वः॥ उभयोरपि दृष्टोऽतस्त्वनयोस्तत्वेदर्शिभिः॥ १६ ॥ जो “गतासूनगतासुंश्चनानुशोचंतिपंडिताः" इस वाक्यकरके आ- त्माका स्वाभाविक नित्यत्व और देहका नाशित्व समझके शोक न करना कहा उसीको अब 'नासतः' इत्यादिकरके खुलासा दृढता- करके कहते हैं सो ऐसे कि, असत् जो नाशवान है उसकी थिरता नहीं होती है और सेत् जो अविनाशी है उसका नाश नहीं होता तत्त्वदर्शी- पुरुषोंने इन दोनोंकी भी सिद्धांत देखा है सोई आगे दो श्लोकों खुलासा कहेंगे ॥१६॥ * .. अविनाशि तु तैदिद्धि येनं सर्वमिदं ततम् ॥ विनीशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥१७॥ जिस आत्मतत्त्वकरके यह सर्व अचेतन तत्त्व व्याप्त है उसको तो अविनाशी. जानो इस अविनाशीका विनाश करनेको कोई नहीं समर्थ है ॥ १७॥ अंतवंत इम देहां नित्यस्योक्ताः शरीरिणः॥ अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युद्धचस्व भारत ॥ १८ ॥ जो यह जीव अविनाशी है तथा अप्रमेय है याने यह इतना ही है (४०) भगवद्गीता। [अध्याय:- ऐसा कहने में नहीं आता है तथा नित्य है याने सर्वदा एकसा है ऐसे जीवके ये 'देह हैं नाशवंत कहे हैं हे अर्जुन ! तिससे युद्ध करो॥१८॥ य एनं वेति हतारं यश्चै नै मन्यते हैतम् ॥ उभौ तौ" ने विजानीतो नार्थ ईन्ति न हन्यते ॥१९॥ जो इस आत्माको मारनेवालो जानता है और जो इसको अन्यक- रके मरा मानता है। वे दोनों नहीं जानते हैं यह न किसीको मारता है. किसीकरके मरता है ॥१९॥ न जायते म्रियते वा कदाचिनीयम्भूत्वा भविता वा न भूयः॥ अंजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो में हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥२०॥ यह आत्मा कोईकालमें भी जन्मता और मरतो नहीं यह अर्ज- माहै नित्यं सर्वकालमें है पुराण याने पहिले था सो भी है नवा नै भयो है और फिर होनेवाला भी नहीं है शरीरके मारनेपर भी नहीं औरता है ॥२०॥ वेदाँऽविनाशिनं नित्यं ये एनर्मजमव्ययम् ॥ कैथं से पुरुषः पार्थ के घातयति हंति करें ॥ २१ ॥ जो इस आत्माको अजन्मा अक्षयं नित्य अविनाशी जानता है तो हे अर्जुन ! सो वह पुरुष कैसे किसको मरवावताहै और कैसे किमको मारता है ॥२१॥ वासासि जीर्णानि यथा विहाय नवानि हाति नरोऽपराणि ॥ तथा शरीरीणि विहाय जीणा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही.॥२२॥ 'यद्यपि शरीर नष्टहोनेसे आत्माका नाश नहीं तो भी शरीरवियोगका जो दुःख होताहै ऐसाअर्जुनका आशय जानिके भगवान कहनेलगे कि द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणी-भा०.टी। (४१) जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रोंको त्यागिके और नवीनोंको ग्रहणकरताहै तैसे जीव पुरीने शैरीरोंको त्यौगिक और नवीन शरीरोंको प्राप्त होताहै२२ नैनं छिन्दंति शस्त्राणि नैं न दहति पावकः॥ नं चैनै कैदयंत्योपोनँ शोषयति मारुतः ॥२३॥ सर्व शस्त्रं भी इस आत्माको नहीं छेदि काटि सकतेहैं अंमि इसको नहीं जलाँताहै ॥जल इसको नहीं भिजोयसकताहै और पवनभी नहीं सुखायसकताहै ॥२३॥ अंच्छेद्योऽयमायोऽयमक्तेद्योऽशोध्य एव च ॥ नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ २४ ॥ यह आत्मा छेदनेयोग्य नहीं यह जलानेयोग्य नहीं और भिजाने सुखानेयोग्य भी नहीं है। यह नित्य सर्वप्रकारके शरीरोंमें जानेवाला स्थिरस्वभाव अचल और सनातनहै ॥ २४ ॥ अव्यक्तोऽयमचिंत्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ॥ तस्मादेवं विदित्वैनं नाशो चिर्तुमहसि ॥२५॥ अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ॥ तथापि त्वं महाबाहो नैनं शोचितुमर्हसि ॥२६॥ यह अतिसूक्ष्मतासे अप्रगट है यह विचारमें नहीं आताहै यह वि- काररहित कहाँहै ॥ तिससे इसको ऐसा जानिके शोचकरनेको न- ही योग्यहै । जो कि', इसको नित्य जन्मा अथवा नित्यं मरा जानों- गे। तोभी हे महाभुज अर्जुन! तुम इस आत्माको शोचनेको नहीं योग्यहो॥२५॥२६॥ जातस्य हिंध्रुवो मृत्युर्धर्व जन्म मृतस्य॑ च । वस्मादपरिहार्येऽथ न त्वंशोचितुमर्हसि ॥२७॥ .. . 40 "
:४२)
मंगवद्गीता।
[अध्याय:-
जिससे कि, जन्मेको मृत्यु निश्चय है और मरेका जन्म निश्चय है।
तिससे इस निरुपाय परिणाममें तुम शोचनेको नहीं योग्यहो ॥२७॥
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ॥
अव्यक्त निधनान्येवं तत्र का परिदेवना॥२८॥
हे अर्जुन ! मनुष्यादिक भूतप्राणीजन्मके आदिमें प्रगट नथे जन्म-
केपीछे मरणके आदिमध्य अवस्था में प्रगट दीखतेहैं मरेपीछे भी नदीखें-
गे ऐसे निश्चयसे तहां शोक कौन है ॥२८॥
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाचर्यवर्द्ध-
दति तथैव चान्यः॥आश्चर्यवच्चैनमन्यः
शृणोति श्रुत्वाप्येन वेदै नै चैव कश्चित् ॥ २९ ॥
ऐसे देहात्मवादमें शोकका परिहार किया अब कहतेहैं कि, देहसेन्यारे
आत्मामें द्रष्टा श्रोता वक्ताऔर ज्ञाता भी दुर्लभहै।प्रथमकहेभये लक्षणों-
करके युक्त आत्मा सर्वसे विलक्षणहै तहां कोईतपस्वी पुण्यवान इस
आत्माको आश्चर्यवत् देखताहै और तैसाही कोई आश्चर्यवत् कहता
है । और तैसाही और पुरुष इसको आश्चर्यर्तुल्य सुनताहै और कोई
पुरुष इस आत्मोहीको सैनिके भीनहीं जानता है ॥२९॥
देही नित्यमवंध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ॥
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥३०॥
हे अर्जुन ! सर्वेकी देहमें यह जीव नियही अवध्य है ।। तिससे तुम
सर्व भूतोंकों शोचनेको नहीं योग्यहो ।।३०॥
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य में विकपिमतुर्हर्सि ॥
धम्यादि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षेत्रियस्य न विद्यते ॥३१॥
स्वधर्मको भी देखके दयाँकरनेको नहीं योग्यहो । क्यों कि
क्षत्रियको धर्मसंबंधी युद्ध और कल्याण नहींहै ॥३१॥
देतीयः२.] सान्वय-अमृततरंगिणी मा०टी०॥ E यदृच्छंया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ॥ सुखिनः क्षत्रियोंः पार्थ लभते युद्धमीदृशम् ॥ ३२ ॥ हे पृथापुत्र अर्जुन ! जो आपसे प्राप्तंभया और खुलांभया स्वर्गका द्वार ऐसे युद्धको पुण्यवान क्षत्रियलोग पावते हैं ॥३२॥ अंथ चेत्त्वमिमं धर्म्य संग्रामं नं करिष्यसि ॥ ततः स्वधर्म कीर्ति च हित्वा पापंमवाप्स्यसि ॥३३॥ अंकीर्ति चापि भूतानि कथयिष्यंति तेऽव्ययाम् ॥ संभावितस्य चाऽकीर्तिमरादतिरिच्यते ॥३४॥ जो कदाचित् तुम इस धर्मरूपं संग्रामको न करोगे। तो उस से स्वधर्म और कीर्तिको भी छोडके पापको प्राप्त होवोंगे ॥ और लोगे तुह्मारी अखंडे अकीर्तिको भी कहेंगे । सो अकीर्ति संभावितपुरु- पके मरणसे अधिक है ॥३३॥३४॥ भाद्रणादुपरतं मस्यते त्वां महारथाः ॥ येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥ ३५॥ अवाच्यवादांश्च बहूँन्वदिध्यति तैवाहितीः॥ निंदतस्तव सामर्थ्य ततो दुःखंतरं न किम् ॥३६॥ श्रीकृष्णजीने अर्जुनका अभिप्राय जाना कि, जो मैं बंधुनके स्नेह और दयालुतासे युद्ध न करूंगा तो मेरीअकीर्ति कैसे होयगी याने होनेकी नहीं ऐसा जानिके बोले कि, हे अर्जुन ! जिन कर्णदुर्योधनादिक महारथोंके तुम शूर शत्रु ऐसे मान्यथे उनहीके अब युद्ध न करनेसे निंदनयोग्यल- घुताको प्राप्त हो वोगे वोई महारथ शत्रु तुमको भयसे संग्राम न किया ऐसा मानेंगे वोई तुहारे श तुझारी सामर्थ्यको निंदतेभये बहुत से दुर्वाक्य बोलेंगे याने अर्जुन कायर है शोभाके वास्ते शस्त्र बांधता है जैसे (४४) भगवद्गीता। स्त्री आभूषनमें सर्पसिंहादिक देखिके प्यारसे धारण करे और साक्षात् दे- खिके प्राणलेके भागे तैसे जब ऐसी निंदा करेंगे तब उससे बडादुःख कौन है सो केहो ॥३५॥३६॥ हैतो वा प्राप्स्यसे स्वर्ग जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ॥ तस्मादुत्तिष्ठ कौंतेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥ ३७॥ उसनिंदाके सुननेसे रणमें मरना मारना ही श्रेष्ठ है ऐसा कहते हैं हे कुं- तीपुत्र ! जो रणमें शत्रुप्रहारसे मरोगे भी तो स्वर्गको प्राप्तहोवोगे जो जी- तोगे तो पृथिवीको भोगोगे तिससे युद्धके अर्थ निश्चयकियेभये उठो।। सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ॥ वतो युद्धाय युज्यस्व नै व पाँपमवाप्स्यसि ॥३८॥ सुख और दुःखको समानकरके तथा लाभ और होनि जय और परा- जय समान जानिके फिर युद्धके अर्थयुक्तहो. ऐसे पॉपकोनहीं प्राप्तहोवोगे। एषो तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिोंगे विमौ शृणु ॥ बुद्धयाँ युक्तों यया पार्थ कर्मबंधं प्रहास्यति ॥ ३९ ॥ श्रीकृष्णभगवान्ने ऐसा आत्मस्वरूप दिखाया अब आत्मस्वरूप ज्ञानपूर्वक मोक्षसाधनभूत कर्मयोग कहतेहैं सो ऐसे कि, हे पृथापुत्र! यह बुद्धि तुम से मैंने सांख्य जो आत्मा देहका विवेक उसमें कही और इसीको योगमें याने कर्मयोगमें सुनो जिस बुद्धिकरकेयुक्त कर्मबंधजो संसारदुःख उसको छोडोगे ॥३९॥ नेहांभिक्रमनांशोस्ति प्रत्यवायी न विद्यते ॥ स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥४०॥ जो अब ज्ञानयुक्त कर्मयोग कहेंगे तिसका माहात्म्य कहतेहैं। इस ज्ञानयुक्त कर्मयोगमें याने निष्काम कर्मयोगमें प्रारंभका भी नाश नहीं है • • द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणीभा० टी०। (४५) याने प्रारंभ होके समाप्त न होय तोभी नाश नहीं है इसके छूटनेका दोष भी नहीं होताहै इस निष्काम कर्मको लवलेशमात्र भी जन्ममरणरू- प बडेभयंसे रक्षणकरताहै ॥४०॥ व्यवसायात्मिकाबुंदिरेह कुरुनंदन ॥ बहुशाखाह्यनंताय बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ ११ ॥ हे कुरुनंदनाव्यवसाय जो विष्णुपरमात्मा तिनमें है आत्मा नाम मन जिनका ऐसे पुरुषोंकी बुद्धि इस निष्काम कर्महीमें वह एक है याने एक मोक्षसाधनहीके वास्तैहै जो अव्यवसाई याने परमात्माविना नानापदार्थ पशुपुत्रादिकोंके चाहनेवालेहैं उनकी बुद्धि वहुँतहै याने अनेककामना- ओंमें लगी है और तहां भी बहुशाखायाने एककार्यके वास्ते कर्मकरके उसमेंभी अनेक फल मांगतेहैं जैसे पुत्रार्थ यज्ञमें धन धान्य,आयुष्य आरोग्यका मांगना ॥११॥ यौमिमी पुष्पिंतां वाँच प्रर्वदंत्यविपश्चितः ॥ वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीतिवादिनः ॥ कामा- त्मानः स्वर्गपरौं जन्मकर्मफलप्रदाम् ॥ क्रियावि- शेषबहुलांभोगैश्वर्यगति प्रति ॥ भोगैश्वर्यप्रसक्तीनां तयाँपहतचेतसाम् ॥ व्यवसायात्मिकाबुद्धिः समा- धौ नै विधीयते॥४२॥४३॥॥४४॥ हे पृथापुत्र! जो अज्ञानी जैन वेदवादरत याने वेदोक्तकमसे स्वर्गा- दिकफलही होताहै ऐसे कहनेवाले स्वर्गसुखसे और सुखनिहीं है. ऐसाँ कहनेवाले कामनाहीमें चित्तरखनेवाले स्वर्गहीको श्रेष्ठ माननेवलेजिस पुष्पित याने कहनेमात्रमें रमणीय जन्मकर्मरूपंफलकी देनेवाली तथा जिसमें भोग और ऐश्वर्यनिमित्त बहुत उपकरण याने कर्मसाधन जि समें ऐसी इस वाणीको कहतेहैं इसीसे उसी वाणीकरके अपहरणमये हैं (४६) भगवद्गीता। [ अध्याय:- चित्त जिनके इसीसे भोग और ऐश्वर्य में आसक्त हैं उनके मन में वह पर- आत्मविषयकबुद्धि नहीं प्रवृत्तहोतीहै ॥ १२॥४३॥४४॥ गुण्यविषया वेदां निस्वैगुण्यो भवार्जुन ॥ निद्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥४५॥ हे अर्जुन!वेदेये त्रैगुण्यविषयहैं याने तीनों गुणोंके कर्मनहींको कहते हैं तुम निद्वंद्व याने सुखदुःख,जयपराजय लाभअलाभ, इन द्वंद्वनसे र- हितहो अर्थात इनसे उत्पन्न हर्षशोकरहितहो नित्यसत्वेस्थहो याने सात्विककर्म करो नियोगक्षेम याने कोइसा भीलाभ और लब्धका रक्ष- गईश्वराधीन नजानो आत्मवान् याने परमात्मामें चित्त राखो ऐसेभये हुये निस्वैगुण्यहो याने कर्मफलोंका त्यागकरो॥ १५॥ यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ॥ तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥ ४६ ॥ जो कहा कि, वेदोक्त कौमेंसे तुम सात्त्विक करो उसीको खुलासा कहतेहैं जैसे सर्वत्र जलसे भरेभये तालाव इत्यादिक जलाशयमें मनुष्य-. का जितनाप्रयोजन होताहै उतनाही लेताहै तैसेही वेर्दके जाननेवालेको सववेदोंमें तावान्याने सात्विककर्म ही योग्यहै ॥४६॥ कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ॥ मा कर्मफलहेतुर्भूमी ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥४७॥ तुझारेको कर्महीमें अधिकारहै फलोंमें नहीं कर्मोके फलका कारण तुझारेमें कोई समयमें भी मंति हो तुम्हारे को अकर्म याने स्वधर्म योग्य युद्धादिकाँका न करना इसमें संगै जोनिष्ठा सो कदाचित् न हो ४७॥ योगस्थः कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय ॥ . सिद्धयसिद्धयोः संमो भूत्वा समत्वं योगै उच्यते४८॥
द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (४७) हे अर्जुनं ! सिद्धि और असिद्धिमें समंबुद्धि होके कर्मफलके संगको त्यागिक योगमें स्थितभयेहुये कौंको केरो सिद्धि और आसिद्धिमें जो समत्व है वही योग कहीं है अर्थात् चित्तके समाधानत्वको योग कहते हैं तात्पर्य चित्तको समाधानकरके युद्धरूप स्ववर्णांचित कर्म करो॥४८॥ दूरेण हावरं कर्म बुद्धियोगांद्धनंजय ॥ बुद्धौशरणमन्विच्छ कृपणः फलहेतवः॥ १९ ॥ हे अर्जुन ! जो बुद्धियोगसे और कम है सो निश्चयकरके अत्यंत नी- च है इसवास्ते बुद्धियोग जो निष्काम कर्म उसीमें ईश्वरप्राप्तिकी इच्छा करो फलंकी इच्छा करनेवाले कृपण हैं ॥ १९ ॥ बुद्धिंयुक्तो जहांतीहै उभे सुकृतदुष्कृते॥ तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥५०॥ बुद्धियुक्त जो निष्कामकर्मी सो इसीलोकमें सुकृत जो पुण्यकर्म और दुष्कृत जोपापकर्म उन दोनोंको त्यागताहै इससे योगके अर्थ याने बुद्धियोग जो निष्काम कर्म उसकेवास्ते युक्तहो यह योगे सर्वकमौके कुशल कारकहै ॥५०॥ कर्मजंबुद्धियुक्ता हि फैलं त्यक्त्वा मनीषिणः ॥ जन्मबंधविनिर्मुक्ताः पदं गच्छंत्यनामयम्॥५१॥ जो बुद्धियोगयुक्तहैं वे ज्ञानी कर्मजन्य फलको त्यागके जन्मबंध- नसे मुक्तंभयेहुये निश्चयकरके मोक्ष पैदको जातेहैं ॥५१॥ यदा ते मोहॅकलिलं बुद्धियंतितरिष्यति॥ तागंतासि निर्वेद श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥५२॥ जब तुझारी बुद्धि मोहरूप दुःखको उल्लंघनकरेगी तब जो फला- दिक सुननेयोग्य और जो सुनेहो उनके वैराग्यको प्राप्तहोवोगे ॥५२॥ "
(४८)
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
श्रुतिविप्रतिपन्नाते यदास्थास्यति निश्चला॥
साधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥५३॥
जब तुझारी बुद्धिं श्रुतिमें याने मेरे उपदेशमें विशेषकरके आसक्त
निश्चले मनमें अचल ठहरेगी तबै योगको पावोगे ॥५३॥
अर्जुन उवाच।
स्थितप्रज्ञस्य का भाषां समाधिस्थस्य केशव ॥
स्थितधीः किंभाषेत किमासीत व्रजेत किमैं॥५४॥
ऐसा सुनिके अर्जुन बूझते भये कि, केशवा याने सर्वके अंतःकर-
णमें रहनेवाले हे ईश्वर ! स्थिरबुद्धि समाधिस्थकी कौनसी भाषा याने
उसका वाचक कौन हैं अर्थात् वह स्थिरबुद्धि किससे कहाताहै स्थिरबुद्धि
के से बोलताहै कैसे बैठताहै और कैसे चलता है ॥५४॥
श्रीभगवानुवाच ।
प्रजहाति यदा कामान्सान्पार्थ मनोगतान् ॥
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तैदोच्यते ॥५५॥
अब श्रीकृष्णभगवान स्थिरबुद्धिवालेका स्वरूप : कहतेहैं तहाँ ऐसा
न्यायहै कि, रहनिरीतिसे भी स्वरूपनिश्चय होताहै इससे रहनिरीति
कहतेहैं सो ऐसे कि, हे अर्जुन ! जब आपके मनकरके आप स्वरूपहीमें
संतुष्भया हुआ मर्नमें रहेभये सबै मनोरंथोंको सर्वथा त्यागताहै तब
बह स्थिरबुद्धि कहाताहै ॥५५॥
दुःखेष्व दिग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः॥
वीतरोगभयत्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥५६ ॥
दुःखोंमें जिसका मनं व्याकुल नहीं होताहै सुखोंमें निराश होताहै
और जिसके पुत्रादिस्नेह भय और क्रोध न होय सो मुनि स्थिरबुद्धि
कंदाता है ॥५६॥
(४९)
द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० ।
यः सर्वत्राऽनभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाऽशुभम् ॥
नाऽमिनंदति न द्वेष्टि स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥५७॥
जो सर्वत्र स्नेहरहित उसऊस शुभाशुभको पाइकेभी न शुभसे आ:
मंदहो न अशुभसे दुःखीहो तंब सो स्थिरबुद्धि कहाताहै ॥१७॥
यदा संहरते चायं कूर्मोऽगानीवं सर्वशः॥
इंद्रियांणींद्रियाँर्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥५८ ॥
जब यह कछवा जैसे अपने सर्व अंगोंको समेटिलताहै तैसे
इंद्रियोंके विषयन से आपकी सर्व इंद्रियोंको खेचिलेताहै तब उसकी
धुद्धि स्थिर होतीहै ॥५८॥
विषया विनिवर्तते निराहारस्य देहिनः।
रसर्वज रसोप्यस्य पर हवा निवर्तते ॥५९ ॥
इंद्रियनके आहार इंद्रियविषय उनको जो नहीं सेवताहै उस देहीके
विषयानुरागविना विषय निवर्त्त होतेहैं उसका वह विषयानुराग भी.
आत्मस्वरूपको देखके निश्चय निवर्त्त होतीहै ॥१९॥
यततो ह्यपि कौंतेय पुरुषस्य विपश्चितः ॥
इंद्रियाणि प्रमाथीनि हरैन्ति प्रसंभं मैनः॥ ६० ॥
तौनि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
वंशे हि यस्येंद्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठितीं ॥६१ ॥
हे कुंतीपुत्र ! आत्मदर्शनविना विषयानुराग निवर्त होता नहीं और
उसकी निवृत्तिविना जो ज्ञानी पुरुष बुद्धिकी स्थिरताकेवास्ते यौनकर-
ताहै तोभी जिससे ये जोरावरीसे मनको हरनेवाली इंद्रियाँ जबरईसे
मैनको हैरती हैं । इससे योगयुक्तमैयाहुआ उन सर्वइंद्रियोंको नियन
मितकरके मेरेआश्रय रहै जिसके इंद्रियों वश हैं तिसकी निश्च-
पकरके बुद्धि स्थिर है ॥ ६०॥६॥
(५०)
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
ध्यायेतो विषयानं पुंसःसंर्गस्तेषूपजायते ॥
संगात्संजायते कामः कामाको धोऽभिजायते॥६२॥
क्रोधौद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः॥
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥६३ ॥
बाह्यइंद्रियनकी प्रबलता और उनको वश नकरनेमें जो दोष सो कहा
अब मनसंबंधी कहते हैं जो पुरुष मन वशकिये विना जितेन्द्रियता चाह-
ताहै सो होनेकी नहीं जैसे कि, जिसके मनमें विषयोंको चितवन है उस
पुरुषको उनविषयोंमें संयम करतेकरतेभी आसक्ति होगी उस आँसक्ति-
से अभिलाषा होगी अभिलाषासे क्रोध होगी क्रोध से मतिभ्रम होता है
मतिभ्रमसे स्मरणशक्तिमें विभ्रम होताहै स्मृतिविभ्रमसे ज्ञानका नाश
ज्ञानके नाशसे स्वरूपसे नष्ट होताहै याने संसारमें भ्रमताहै ॥६२॥६३॥
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषानिद्रियैश्चरन् ।
आमवश्यैविधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ ६४ ॥
प्रसौंदेसर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ॥
प्रसनचेतसोह्या बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥ ६५॥ .
वश्यहै मन जिसका ऐसा पुरुष रागद्वेषकरके रहित और आपके
वश्य ऐसी इंद्रियों करके विषयोंका सेवनकरता.भया प्रसन्नताको प्राप्त
होताहै याने निर्मलांतःकरण होताहै तब निर्मलचित्तहोनेसे इसके स-
घेदुःखोंका नाश होता है उस प्रसन्नचित्तवालेकी बुद्धि शनिही स्थिर
होतीहै ॥६॥६॥
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ॥
ने चांभावयतः शांतिरैशांतस्य कुतः सुखम् ॥ ६६ ॥
द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी। (५१)
अयुक्त जो समतारहित है उसकी बुद्धि नहीं स्थिर होतीहै और उस
भयुक्तके भावना याने आस्तिकता सो भी नहीं होतीहै और जिसके
भावना नहीं उसके शांति नहीं जिसके शांति नहीं उसको कहाँसे
सुख होगा ॥६६॥
इंद्रियाणां हि' चरतीयन्मनोऽनुविधीयते ॥
तदस्यं हरति प्रज्ञां वायुविमिवासि ॥६७॥
तस्मौद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः॥
इंद्रियाणींद्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्टिता ॥६८ ॥
जिससे कि, जो मन विषय में प्रवृत्त इंद्रियोंको अनुसर्रताहै सो इस
पुरुषकी बुद्धिको वायु जैलमें नावको ऐसे हरता हे तिसीसे हेम-
हावाहो । जिसकी सर्व इंद्रियाँ इंद्रियोंके विषयोंसे सर्वथों रोकी हैं
सिसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है ॥ ६७॥६॥
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी॥
यस्याँ जाग्रतिभूतानि साँ निशा पर्यंतो मुनेः॥६९॥
सर्वभूतप्राणीमात्रोंकी जो रात्री अर्थात् जिसविषयमें सर्वसोइसे रहे
हैं ऐसी परमात्मविषया बुद्धि तिर्स में इंद्रियसंयमी जागताहे याने आत्म-
स्वरूपको देखताहै जिस शब्दादिविषयरूपं रात्रिमें सर्वभूतप्राणी
जोगतेहैं सो" ज्ञानीजनकी रात्रिरूप है ॥६९ ॥
आफूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापःप्रविशंति यद्वत्॥
तद्रकामायं प्रविशति सर्वे से शांतिमाप्नोति ने
कामकामी ॥ ७० ॥
जैसे आपही परिपूर्ण सर्वदा एकसे भरेभये समुद्रमें जल बाहरसेभ-
रताहै तैसे जिसकी सर्व कामना प्राप्तहोयहैं सो"शौतिको प्राप्त होता है
जो कामनाओंकी इच्छाकरनेवाला है सो नहीं शांतिको पविताहै ॥७॥
(५२ भगवद्गीता। [अध्यायः- निहाय कामान्यः सान्पुमाश्चरति निःस्टहः । निर्ममो निरहंकारः संशांतिमधिगच्छति ॥ ७१ ॥ जो पुरुप सर्व अभिलाषनको छोड़के इच्छारहित विचरताहै सो ममतारहित और अहंकाररहितभयाहुआ शांतिको प्राप्तहोताहै।। ७१ ॥ एषो ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नै नां प्राप्य विमुह्यति ॥ स्थित्वाऽस्योमंतकालेपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥७२॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोग शास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादे सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः॥२॥ हे पृथापुत्रअर्जुन ! यह जो निष्कामकर्मरूप मैंने कही सोब्रह्मप्राप्ति- कारक स्थिति है इसको पाके नहीं मोहको पावताहै इसमें अंतकाल- में भी स्थितहोके ब्रह्मसहशैमुक्ति पावै अर्थात् जो सर्वकाल ऐसाही रहै उसकी मुक्तिको संदेह क्या है ॥ ७२ ।। इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां गीतामृततरंगिण्यांद्वितीयाऽध्यायप्रवाहः॥२॥ अर्जुन उवाच। ज्यायसी चैत्कर्मणस्ते मँता बुद्धिर्जनार्दन । तत्किदमणि 'घोरे मौ नियोजयसि केशवं ॥ १ ॥ ऐसे श्रीकृष्णक वाक्य सुनके अर्जुनने विचार किया कि, भग- वान्ने प्रथम मेरेको 'अशोच्यानन्वशोचस्त्वं' इत्यादिवाक्योंकरके ज्ञा- नयोग उपदेश किया. फिर 'बुद्धियोगविमांशृणु' इत्यादिकरके क- मेयोग उपदेश किया उसमें भी 'श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति नि- चला' इत्यादिकरके निष्कामकर्मसे आत्मज्ञानहीकी प्राप्ति कही इस तृतीयः ३.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (५३) से निश्चय होताहै कि, कर्मयोगसे जो पीछे आत्मज्ञान कहा सोई श्रेष्टहै ऐसे विचारके अर्जुन भगवानसे कहने लगे कि, हेजनार्दन । जोकि कर्मयोगसे ज्ञानयोगही तुमने श्रेष्ठ मानांहोय तो हे केशव! पोरै कर्ममें मेरेको क्यों युक्तकरतेहो ॥ १ ॥ व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयंसीव में। तदेकं वैद निश्चित्य येन श्रेयोऽहंभाप्नुयाम् ॥ २॥ ऐसे मिश्रित वाक्यंकरके मेरी बुद्धिको मोहतेसे हो जिसकरके मैं कल्याणको प्राप्तहोउ सो एक निश्चयकरके कहो॥२॥ श्रीभगवानुवाच । लोकेऽस्मिनं दिविर्धा निष्टा पुरों प्रोक्ता मंयाऽनघ ।। ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेनं योगिनीम् ॥३॥ ऐसे अर्जुनके वाक्य सुनके श्रीकृष्णभगवान बोलते भये हेनिष्पाप अर्जुन ! इस लोको पूर्वकालमें मैंने दोप्रकारकी निष्ठा कहीहै सो सां- ख्येवालोंको ज्ञानयोगकरके और योगिनको कर्मयोगकरके ॥३॥ ने कर्मणामनारंभान्नैष्कर्म्य पुरुषोऽश्नुते ॥ न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥४॥ शास्त्रोक्तंकर्मोंके किये विनों पुरुष निष्कर्मता जो सर्वैद्रियवि. षयनिवृत्तिपूर्वकज्ञाननिष्ठा उसको नहीं प्राप्तहोताहै और कर्मके न करनेसेमी सिद्धिको नहीं प्राप्तहोता है॥४॥ न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ॥ कार्यते यवंशः कर्म सर्वैः प्रकृतिजैर्गुणैः॥५॥ कोईकालमें क्षणभरंभी कमकियेविना कोईभीपुरुष निश्चय
(५४)
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
करके नहीं रहता है क्योंकि सर्व सत्वादिप्रकृतिके गुणोंकरके पर-
वंश कर्म करनेही पैरता है॥५॥
कर्मेंद्रियाणि संयम्य यं ऑस्ते मनसा स्मरन् ।।
इंद्रियार्थाने विमूढात्मांमिथ्याचारःसं उच्यते॥६॥
जो ज्ञानयोगमें प्रवर्तहोनेको कर्मेंद्रियोंको हठसे संयममें रखके
इंद्रियविषयोंको मनकरके सुमिरतासुमिरता रहता है सो सूट-
मति मिथ्यांचार याने वृथायोगी कहाती है ॥६॥
यस्त्विंद्रियाणि मर्नेसा नियम्यारभतेऽर्जुन ॥
कमेद्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥ ७॥
और जो इंद्रियोंको मनसे नियममें रखके विषयोंमें आसक्त
न भयाहुवा कर्मेंद्रियोंकरके कर्मयोगको करता है हे अर्जुन ।
सो" श्रेष्ठ है ॥७॥
नियंतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः॥
शरीरयात्रापि चे ते" नै सिध्येदकर्मणः॥८॥
तिससे तुम स्ववर्णउचित कर्म करो क्योंकि कर्म न करनेसे कर्म
करना श्रेष्ठ है और कर्म विना तुम्हारा ज्ञानयोग करनेको शरीर निवार
भी न सिद्ध होगा ॥८॥
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽय कर्मबंधनः ॥
तदर्थ कर्म कौंतेयं मुक्तसंगः समाचर ॥९॥
जो कर्मसे बंधन कहाहै सो ऐसा कि, जो यज्ञार्थकम है उससे अ.
न्यत्र कर्म करनेसे यह मनुष्य कर्मबंधनको प्राप्त होता है हेकुंतीपुत्र !
तुम फलासंग छोडेभये उस यहीके अर्थ कर्म करो ॥९॥
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवार्च प्रजापतिः ॥
अनेन प्रसविष्यध्वमर्षे वो ऽस्त्विष्टकामधुक् ॥१०॥
तृतीयः ३.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (५५)
प्रजापति जो परमात्मा सो पुरा याने सृष्टिकालमें यज्ञसहित प्रजाको
उत्पन्न करके बोले कि, इस यज्ञकरके तुम वृद्धिको प्राप्तोउ यह यज्ञ
तुम्हारे इच्छित कामनाओंको पूरनेवाला होउँ ॥१०॥
देवान्भावयताऽनेन ते देवां भावयं वः ॥
परस्परं भावयतः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥
इस यज्ञकरके तुम देवताओंको पूजिके उनको बढावो वे तुम्हारे पूजे
बढायेभये देव तुम्हारा मनोरथ पूरतेभये तुमको बढावेंगे ऐसे परस्पर ब-
ढातेभये तुम और देवता दोनों श्रेष्ट कल्याणको प्राप्त होवोंगे ॥११॥
इष्टॉन्भोगोन्हि वो देवा दास्यते यज्ञभांविताः ।
तैर्दत्तानप्रदायै यो 'यो 'भुक्ते स्तेन एवं सैंः॥ १२ ॥
जो यज्ञ करोगे उसकरके वदितकियेभये देव तुमको इच्छित भोग
निश्चयकरके देंगें उनकरके दियेभये भोगोंको उनको दियेविनी जो"
भोगेगी सो" निश्चयकरके चोर है इससे चोरतुल्य दंड पावेगा ॥१२॥
यज्ञशिष्टांशिनः सेतो मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥
झुंजते ते बंध पापी ये पंचंत्यात्मकारणात् ॥ १३ ॥
देवादिपूजनरूप यज्ञका शेष याने उबरेभये अनादिकके भोगनेवाले
सत्पुरुष सर्वपापोंकरकै मुक्तहोते हैं और जो आपहीकेवास्ते अन्नको
पातहैं वे पापी पाप जैसाहोय तैसा ही सौतेहैं ॥ १३॥
अन्नाद्भवंति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः ।।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुंद्भवः ॥१४॥
कर्मब्रह्मोद्भवं विद्धि" ब्रह्माक्षरसमुंद्भवम् ।।
वस्मात्सर्वगतं ब्राँ नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ १५॥
भगवद्गीता।
ऎवं वर्तितंचक्रं नानुवर्तयतीहै यः॥
अघायुरिद्रियाँरामो मोघं पार्थ संजीवति ॥ १६ ॥
अब दिखातेहैं कि लोकदृष्टि और शास्त्रदृष्टिसे भी सर्वका मूल यज्ञ
ही है सो ऐसे कि,सर्व भूतप्राणि अन्नसे होतेहैं अन्नकी उत्पत्ति वर्षांसे है
सो लोकप्रसिद्ध देखनेमें आताहै वर्षा यज्ञसे होतीहै. यह शास्त्रप्रसिद्ध है
सो यह श्लोक । “अनौप्रास्ताहुतिःसम्यगादित्यमुपतिष्ठति।।आदित्या-
ज्जायते वृष्टिवष्टेरनं ततःप्रजाः ॥१॥" यज्ञकी उत्पत्ति यज्ञक के किये
भये कर्मसे होतीहै सो कर्म ब्रह्मसे होतीहै ऐसे जानो ब्रह्म नाम प्रकृति इहां
प्रकृतिहीका रूप शरीर ब्रह्म जानना तहां प्रथम श्रुतिः तदेतानाम
रूपमन्नं च जायते"तथा इहां भी कहेंगे"मम योनिमहद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भ
दधाम्यहम्"इत्यादिप्रमाणों से यहां यही अर्थ है कि, प्रकृतिको ब्रह्म कह-
ते हैं उसीका परिणाम यह शरीर इससे कर्म होताहै यह शैरीर अक्षरस-
मुद्भव याने अक्षर जो जीव तिसकरके सहित उत्पन्न होताहै याने सजीव
शरीर कर्मका कारक है जिससे कि, शरीरही कर्मकारक है इसीसे सर्वग-
त याने सर्वाधिकारयोग्य शैरीर यज्ञमें नित्य प्रतिष्ठित है याने यज्ञका
मूलकारण है ऐसे यह ईश्वरकरके प्रवर्तमान इस चक्रकोजो कर्माधि-
कारी किंवा ज्ञानकर्माधिकारी नहीं अनुवर्तताहै याने यज्ञविना शरीर
पोषताहै हेअर्जुनासो इंद्रियाराम पापऔंयुष्य वृथा जीवता है जो चक्र
कहा उसका खुलासा यह कि,अन्नसे शरीर, अन्न वर्षासे, वर्षा यज्ञसे,
यज्ञ कर्मसे, कर्म शरीरसे, शरीर अन्नसे, ऐसे प्रवत है ।।१४॥१५॥१६॥
यस्त्वात्मरतिरेव स्यांदात्मतृप्तचं मानवैः॥
आत्मन्येवं च संतुष्टस्तस्य कार्य नै विद्युते ॥१७॥
नैव तस्य कृतेनार्थों नाकृतेनेहँ कश्चन ॥
नै चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥१८॥
तृतीयः ३.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (५७) कर्म न करनेसे किसको दोष नहीं सो कहते हैं सो ऐसा कि, जो मनुष्य आत्मरति हो यानेआत्मस्वरूपहीमें आनंदहोय और आत्मस्व- रूपहीसे तृप्त हो अन्नादिकसे प्रयोजन नहीं और आत्माही में संतुष्टहो उसके कर्तव्यता नहीं है उसके कर्मकरनेसे न करनेसे भी यहां कुछ प्रयोजन नहीं है और इसके सर्वभूतप्राणिनमें कोई ऐसा भी नहीं जि- ससे कुछ प्रयोजन होय तात्पर्य ऐसा मनुष्य कर्म करै अथवा न करे घोचिंता नहीं ॥ १७॥१८॥ तस्मादसक्तैः सततं कार्य कर्म सर्माचर ॥ असतो ह्याचरन कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥ १९ ॥ जिससे कि, ऐसेको दोष नहीं तुम तो द्रव्यकुटुंबादिसे रतहो इससे कर्म में असक्त न भयेहुये करनेयोग्य स्ववर्णोचित कर्मको निरंतर करो क्यों कि फलेच्छारहित कर्म करते करते पुरुष परमात्माको प्राप्त होताहै ॥ १९॥ कर्मणैव हि संसिद्धिांस्थिता जनकादयः॥ लोकसंग्रहमेवॉपि संपश्यन् कर्तुमर्हसि ॥२०॥ अब यह दिखातेहैं कि, ज्ञानीको भी कर्मही श्रेष्ठहै सो ऐसे जिससे कि, जनकादिक ज्ञानी भी कर्मकरकेही मोक्षको प्राप्तभये वैसे तुमभी लोकसंग्रहको भी देखतेभये कर्म करनेको योग्य हैं ॥२०॥ यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जैनः॥ सं यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ २१ ॥ यहां कारण यह है कि, श्रेष्ठ पुरुष जो जो आचरणकरतेहैं दूसरे लोग भी वैसाही आचरणकरते हैं सो श्रेष्ठपुरुष जो प्रमाणे कर. ताहै सर्वलोगभी वही प्रमाणकरने लगतेहैं ॥ २१ ॥ न में पार्थाऽस्ति कर्त्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन ॥
(५८) भगवद्गीता। [अध्यायः- नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एवं च कर्मणि ॥ २२ ॥ हे पृथापुत्र अर्जुन ! तीनों लोकों में मेरेको कुछ कर्त्तव्य नहीं हैं तथा नहीं प्राप्त ऐसाभी नहीं और प्राप्तहोय ऐसा भी नहीं अर्थात सर्व मेरा ही है तथापि कर्ममें निश्चयकरके वर्तमान रहताहूं याने लोगों को सिखाने- को कर्म करता रहताहौं ॥२२॥ यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतंद्रितः ॥ मम वत्मानुवर्तते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥२३॥ हे अर्जुन ! जो कदाचित् सावधानभैयाहुआ मैं कर्म में न वर्तमान रही तो निश्चयकरिकै सर्व मनुष्य मेरी ही रीतिपर चलनेल याने वे- भी निरर्थ मानके कर्म न करें ॥२३॥ उत्सीदेयुरिमे लोको न कुर्यां कम चेदहम् ।। संकरस्य च कर्त्ता स्योमुपहन्यामिमाः प्रैजाः॥ २४ ॥ जो कदाचित् मैं कर्म नै करौं तो ये लोक भी ऐसे जानेंगे कि, जो कर्म श्रेष्ठ होता तो श्रीकृष्ण करते इससे कर्म तुच्छ है ऐसा जानके कर्म छोडके नष्ट होंगे तब मैं वर्णसंकरका कती होउंगा और इस प्रजाको भौरनेवाला होउंगा ॥२४॥ सक्ता कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वति भारत ॥ कुयाबिंद्रांस्तथाऽसक्तश्चिकीर्षुलोकसंग्रहम् ॥२५॥ हे अर्जुन ! जैसें अविद्वान लोग कर्म में आसक्तगयेहये कर्म करतेहैं तैसे विद्वान् आसक्तंनभयाहुआलोकसंग्रहको करनेकी इच्छा कियेभये कैर्म करे ॥२५॥ ने बुद्धिभेद जनयेदानां कर्मसंगिनाम् ॥ जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्रोन्युक्तः समाचरन् ॥ २६ ॥ जो ज्ञानी है सो ज्ञानयोगयुक्तभैयाहुआ कर्मकरताकरता जो कर्म;
तृतीयः ३.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (५९) संगी अज्ञानीहें उनको सर्वकाँकी प्रीति उपजावै याने उनसे प्रशंसा करके कर्म करावे और बुद्धिभेद याने कर्ममें अश्रद्धा ने करावै ॥२६॥ प्रकृतेः क्रियाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः॥ अहंकारविमूढात्मा केहिमिति मन्यते ॥२७॥ तत्त्ववित्तुं महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ॥ गुणों गुणेषु वर्तत इति मत्वा न सज्जते ॥२८॥ हे अर्जुन ! सर्व कर्म प्रकृतिके सत्वादिगुणोंकरके कियेभयेहैं जो अहं- कारसे मूचित्त है सो मैं केहि ऐसे मानताहै और जो सत्यादि- क गुण और उनके कर्मके तत्त्वैका ज्ञाताहै सो जानताहै कि, सत्वा- दि गुण आपआपके कार्यों में वर्तमान हैं ऐसौं जानके आस नहीं होताहै ॥२७॥२८॥ प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सजते गुणकर्मसु ॥ तनिक- स्नविदो मंदान कृत्स्नविन विचालयेत् ॥ २९ ॥ प्रकृतिके सत्वादिकगुणकार्योंकरके भूलेभये जो पुरुष वे सत्वादिगु- णकर्मफलोंमें आसक्त होतेहैं उनै अल्पज्ञमंदोंकों सर्वज्ञपुरुष कर्ममार्गसे चलायमान न करें ॥ २९॥ मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याऽध्यात्मचेतसा ॥ निराशीनिममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥ ३० ॥ हे अर्जुनाअध्यात्म जो स्वभाव स्वभावोऽध्यात्म उच्यते” इस प्रमाणसे हात्रियका जोशूरत्वादिक स्वभाव है उसमें चित्तको लगायेभये उसकरके ले कर्म 'मेरेमें अर्पणकरके निरांशी याने फलाशारहित निर्मम याने कत्तापनका ममत्व छोड़के कर्मबंधनभयरूपदरसे हुटेभले युट्टै करो॥३०॥ ये' में मतमिदं नियमनुतिष्ठंति मानवाः ॥
(६०) मगवद्गीता। [अध्याय:- श्रद्धावतोऽनसूयंतो मुंच्यते तेपि कर्मभिः ॥ ३१॥ . ये खेतदभ्यसूयंतो नानुतिष्ठति में मतम् ॥ सवज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टौनचेतसः ॥३२॥ जो मनुष्य इस मेरे मतको नित्यं धारण करतेहैं और जो इसमें श्रद्धा ही रखतेहैं और जो इसकी निंदारहितेहैं वे भी कमबंधनोंसे छुटेंगे और जो इस "मेरे मैतकी निंदाकरतेभये इसको ग्रहण नहीं करतेहैं वे सर्व- ज्ञानविषयमें मूढ उन अज्ञानिनको नष्टंभये जानो ॥३१ ॥ ३२ सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि । प्रकृति यांति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ ३३ ॥ जो ज्ञानवान है सो भी आपके जातिस्वर्भावके सदर्श चेष्टाकरताहे अज्ञकरे तो शंकाही क्या है।सर्वभूतप्राणी आपके जातिस्वभावको अनु- सरतेहैं यहां निह क्या करेगी ॥३३॥ इंद्रियस्येंद्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ॥ तैयौन वंशमार्गच्छेत्तौ" ोस्य परिपंथिनौ ॥ ३४ ॥ जब कर्म स्वभावहीसे है और उसका निग्रह नहीं तव उपाय क्या सो कहतेहैं कर्मेंद्रिय और ज्ञानेंद्रिय इनके निमित्त राग द्वेष युक्त हैं ति- नेके वश न होना क्यों कि, वे इसके शत्रु हैं याने जीवके बंधनकारक रागद्वेषही हैं ॥ ३४॥ श्रेयान्वधर्मों विगुणः परधर्मीत्स्वनुष्ठितात् ॥ स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मों भयावहः॥ ३५॥ जो रागद्वेषके वश होनेसे स्वधर्मका त्याग और परधर्ममें निष्ठा होतीहै उसका निवारण करतेभये श्रीकृष्ण कहतेहैं सो ऐसे कि, नेत्रादिइंद्रियोंकी प्रीतिसे अर्जुन स्वधर्मों को त्यागने लगे कि, इन स्वजनोंको देखके मेरे दया आतीहै इससे युद्ध न करौंगा भीख मागि खाउंगा सो निवारते हैं जैसे कि, श्रेष्टक - तृतीयः ३. सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (६१) मारंभ अन्यके धर्मसे स्वधर्म न्यूनभी कल्याणकारक है स्वधर्ममें मरना कल्याणदायक है परधर्ममें मरनेसे भी अतिभयकारक है ॥३५॥ अर्जुन उवाच । अर्थ कैन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः॥ अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलाँदिवं नियोजितः ॥ ३६॥ अर्जुन भगवानसे पूंछतेहैं कि, हे वृष्णिवंशोत्पन्न कृष्ण! आपने कहा स्वधर्मही श्रेष्ठ है अन्यधर्म भयदायक है ऐसा जो जानताभी है और स्वधर्मपूर्वक ज्ञानयोगमें प्रवर्तहोके विषयं भी त्यागेहैं तौभी फिर यह पुरुष विषयइच्छा नकरता भी बलात्कार विषयोंमें युक्तकिया सरीखो किसका प्रेरौभया पोपोंको करता है ॥ ३६॥ श्रीभगवानुवाच । काम एर्ष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः॥ महार्शनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम् ॥ ३७॥ अर्जुनका प्रश्न सुनके श्रीकृष्णभगवान कहतेहैं कि,जो यह रजोगु- णसे प्रगट काम याने कामना सोबड़ा पापी अतिविषयसेवनरूप बडे आहारका करनेवाला यही क्रोधरूप होताहै इसको इस ज्ञानविषयमें वैरी" जानों ॥ ३७॥ धूमेनात्रियते वह्निर्यथादर्शो मैलेन च ॥ यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथी ते नेर्दैमावृतम् ॥ ३८॥ जैसे अनि धुवाँकरके ढकताहै और मलकरके दर्पण ढकताहै जैसे गर्भ जराकरके आवृत तैसे यह ज्ञान उसकामांकरके ढकी है ।। ३८॥ आँवृतं ज्ञानंमेतेनं ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ॥
- १६९) भगवद्गीता। [अध्यायः- कामरूपेण कौंतेयं दुःपूरेणानलेन च ॥ ३९ ॥ हेकुंतीपुत्र! इस ज्ञानीका नित्यवैरी दुःखसे भी नभरसके इससे अप- रिपूर्ण और इच्छाचारी ऐले इस कामकरके ज्ञान ढकरहाहै काम याने विषयवासना ॥ ३९॥ इंद्रियाणि भनो बुद्धिरस्याऽधिष्ठानमुच्यते ॥ एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमाईत्य देहिनम् ॥ ४० ॥ जब शत्रुको जीतना होय तब प्रथम उसके स्थान स्वाधीन करना इससे इस कामनाके स्थान कहतेहैं सो वे ये कि, सर्व इंद्रिये मेन और बुद्धि ये कार्मनाके स्थान कहते हैं यह ईनहींकरके ज्ञानको आच्छादि- तकरके जीवको मोहित करता है।॥ ४०॥ तस्मात्त्वमिंद्रियाण्यादौ निययं भरतर्षभ । पाध्याने प्रजैहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥ ४१ ॥ हेभरतवंशिनमें श्रेष्ठ ! तिससे तुम प्रथम इंद्रियोंको संयममें कर- के स्वरूपज्ञान और विज्ञान जो भक्ति इनके नाशनेवाले इस काम पापीको निश्चय मारो॥११॥ इंद्रियाणि पराण्याहुरिंद्रियेभ्यः परंमनः॥ मनसस्तु परा बुद्धियों बुद्धः परतस्तु सः॥ ४२ ॥ जो ज्ञानके विरोधी हैं उनमें विद्वान् लोग इंद्रियों को प्रवेल कहते हैं इंद्रियोंसे मन प्रबलहै और मनसे बुद्धि प्रबलहै और जो बुद्धिसे प्रबलहै सो" वह कामनाहै ॥४२॥ एवं बुद्धेः परं बुद्धां संस्तभ्यात्मानमात्मना। जैहि शत्रु महाबाहो.कामरूपं दुरासद॑म् ॥ ४३
चतुर्थः ४.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०।
(६३)
इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगोनाम
तृतीयोऽध्यायः॥३॥
हे महाभुज अर्जुन ! ऐसे बुद्धिसे प्रईल स्वेच्छाचारी दुःसह कामना-
रूप शत्रुको जानके फिर मनको बुद्धिकरके रोकके इस शत्रु-
को मारो॥४३॥
इतिश्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिता-
यांश्रीमद्भगवद्गीतामृततरंगिण्यांतृतीयाध्यायप्रवाहः॥३॥
प्रकृतिसंसर्गी मुमुक्षू सहसा ज्ञानयोगाधिकारी नहीं होसकता
है इससे तीसरे अध्यायमें उसको कर्म करनाही उपदेशा तथा
ज्ञानयोगीकोभी कर्तृत्वत्यागपूर्वक कर्म करनाही उत्तम कहा और
जनसंग्रहके वास्ते भी कर्म करनाही श्रेष्ठ कहा. अब जो जमत
उद्धारके वास्ते मन्वंतरके आदिमें इसी कर्मयोगका उपदेश किया था
उसीको इस चौथे अध्यायमें दृढ करते हैं. ज्ञानयोग भी इसीके
अंतर्गत है। इससे इसकी ज्ञानयोगाकारता दिखायके कर्मयोगका
स्वरूप और भेद तथा उसमें ज्ञानांशकी प्रधानता तथा इसीप्रसं-
गसे भगवदवतारनिश्चय भी कहते हैं।
श्रीभगवानुवाच।
इमं विवस्वते योग प्रोक्तानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुंरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥ १ ॥
श्रीकृष्णभगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि, जो यह योग मैंने तुमसे
कहा सो केवल अब युद्धोत्साह बढानेको तुम्हारेहीसे नहीं कहा
इसको कल्पकी आदिमें भी कहा है सो सुनो में प्रथम इस अव्यय
कर्मयोगको सूर्यसे कहतार्भया सूर्य वैवस्वतमनुसे कहतेभये मैनु
इक्ष्वाकुसे कहतेभये ॥१॥
[ अध्याय:-
4
(६४)
भगवद्गीता।
एवं परंपराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ॥
से कौलेनेह महता योगो नष्टः परंतपं ॥२॥
ऐसेही परंपरासे प्राप्त इसको राजऋषि जानतेभये हेपरंतप ! सो यह
योग इससमयमें बहुत कालकरके नष्टभया था॥२॥
संएवाऽयं मया तेऽधं योगःप्रोक्तः पुरातनः॥
भैकोसि "मे सखाँचे "तिरहस्य ह्येतदुत्तम ॥३॥
सोई यह पुरातन योर्ग मैंने तुम्हारसे आज कहाँ क्योंकि तुम
मेरे" भक्त और सखा हो" यह उत्तम रहस्य है ॥३॥
अर्जुन उवाच।
अपरं भक्तो जन्म पर जन्म विवस्वतः ॥
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥४॥
ऐसे निकै अर्जुन कहने लगेकि, तुम्हारा जन्म अभी भैया विव-
स्वानको जन्म प्रथमर्भया तुम आदिमें उनको कहतेभये ऐसे
इसको इस कैसे जानें ॥४॥
श्रीभगवानुवाच।
बहूनि में व्यतीतानि जन्मानि तवं चार्जुनं ।
तान्यहं वेझिं सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंप ॥५॥
अर्जुनके प्रश्नका श्रीकृष्ण भगवान उत्तर देतेहैं इसीमें आपके
अवतारका भी प्रयोजन कहेंगे सो ऐसे कि, हे परंतप ! याने शत्रुनको
संतापित करनेवाले अर्जुन ! मेरे और तेरे बहुत जन्म व्यतीतंभये
उन सवैको "मैं जानतीही तुमै नहीं जानतेहो ॥५॥
अंजोपि सन्नव्यंयात्मा भूतानांमीवरोपि सन् ॥
प्रकृति स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥६॥
चतुर्थः ४.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (६९)
यहां कारण यह है कि, मैं अविनाशी सर्वोतर्यामी हूं सर्वभूतोंका भी
ईश्वर भयोहुवा तथा अजन्मा भयाँहुवा भी मेरो स्वभाव जो सौशील्य
वात्सल्य शरणागतरक्षकत्व इत्यादिक तिसको आश्रितकरके याने उ-
स स्वभावहीसे आपके ज्ञानसहित अवतौरलेताहूं जीवको ज्ञान नहीं
रहताहै मेरा ज्ञान अखंडहै मैं केवल स्वभक्त स्वसेतुरक्षणार्थ अवतार
लेताहूं इसका कारण अगाडीके श्लोकोंमें है ॥६॥
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ॥
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहमें ॥७॥
हे भारत ! जब जब निश्चयपूर्वक धमकी हानि अधर्मकी वृद्धि होती
है तब मैं" रूपैको धारणकरतौहूं ॥७॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ॥
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥८॥
जो स्वस्वभावसे अवतार कहा वह स्पष्ट करतेहैं धर्महानि अधर्म-
दि देखके मैं साधुनके संरक्षणके वास्ते और दुष्टनके विनाशके वास्ते
युग युगमें धर्मस्थापनके वास्ते अवतार लेताहूं ॥८॥
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेति तत्त्वतः॥
त्यक्त्वो देह पुनर्जन्म नै "ति ममिति सोऽर्जुन ॥९॥
हेअर्जुन ! मेरे जन्म और कर्म दिव्य याने प्राकृत नहीं हैं ऐसे जो
निश्चयकरके जानता है सो" देहेको त्यागिके फिरिके जन्में नहीं
लेता है अर्थात् मेरे को प्राप्तहोताहै ॥९॥
वीतरांगभयक्रोधा मन्मयां मांमुपाश्रिताः॥
बहवो ज्ञानंतपसा पूता मद्भावमागताः ॥१०॥
D (६६) भगवद्रीता। [अध्याय:- व्यतीत भये हैं सांसारिक अनुराग भय और क्रोध जिनके तथा सर्वत्र मेरेहीको जानतेहैं और जो मेरे ही आश्रितहैं ऐसे बहुत मेरे स्व- रूपज्ञानरूपतपकरके पवित्रभयेहुये मेरी सहर्शताको प्राप्तभये हैं॥१०॥ ये यथा मां प्रपद्यते तास्तथैवं भजाम्यहम् ॥ मम वर्मांनुवर्तते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ ११ ॥ हे पृथांपुत्र अर्जुन ! सर्व मनुष्य ममवम याने जो जो सकामनिष्का- म वेदमें मार्ग कहेहैं वे मेरेही कहे मार्ग हैं. उन्हीं मार्गोके आश्रित कर्मक- रतेहैं तहाँ जो मेरेको जैसे भजतेहैं में" उनको वैसे ही भेजता हूं, याने जो सकाम इंद्रादिरूप मेरेको भजतेहैं उनको 'तदेवाग्निस्तत्सूर्य अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता' इत्यादि प्रमाणसे इंद्रादिलोक पुत्रादिकाम- ना देता हूं और जो निष्काम मेरेको सर्वेश्वर जानके सर्वकर्म 'कायेन पाचा मनसेंद्रियैवी' इत्यादि प्रमाणोंसे मेरे अर्पण करतेहैं उनको मेरे ' स्वरूपवैभवको प्राप्त करताहूं ॥११॥ कांक्षतैः कर्मणां सिद्धि यजंत इह देवताः॥ क्षिप्रै हिँ मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥ १२॥ जो कमौकी सिद्धिकी इच्छा करतेभये इस लोकमें देवताओंका यजन करतेहैं उनकी निश्चयकरके शीघ्र मनुष्यलोकमें कमसे उत्पन्न सिद्धि होती है" ॥१२॥ चातुर्वर्ण्य मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य करिमपि मां विद्धयकतरिमव्ययम् ॥ १३ ॥ गुणकर्मविभागसे जैसे सत्वगुणप्रधान ब्राह्मण उनके शमदमादि कर्म सत्वरज प्रधान क्षत्रिय उनके शूरत्वादि कर्म रजस्तमः प्रधान वैश्य चतुर्थः ४.] सान्वय-अमृततरंगिणीभा० टी०। (६७) उनके कृषिवाणिज्यादि कर्म तम प्रधान शव उनके परिचर्यात्मक कर्म ऐसे गुणकर्मविभागकरके चातुर्वर्ण्य यह संसार मैंने सृर्जा है उसका अविनाशी का भी मेरेको अर्कता जानो ॥१३॥ नं माँ कर्माणि लिम्पति ने मे कर्मफैले स्टहाँ । इंति मी यो"ऽभिजानाति कर्मभिन से बध्यते॥१४॥ जो प्रथम कहा कि, मेरेको अकर्ता जानो उसका कारण कहतेहैं सो ऐसा कि, मेरेको कर्मफलेमें इच्छा नहीं इससे मेरे कर्म नहीं 'लिप्तहोतेहैं ऐसो मेरेको" जो" जानती है सो काँकरके नहीं बंधती है॥१४॥ एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूरैपि मुमुक्षुभिः ॥ कुरुकम तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥ १५ ॥ पूर्वसमयके मनु इत्यादिक मुसुक्षुजनोंने भी ऐसें जानके कर्म किया है तितसे तुमे पूर्व मुमुक्षुनकरके पूर्वकालमें किये भये कर्म हो को कैरो॥१६॥ किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यंत्र मोहिताः ॥ तते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञौत्वा मोक्ष्यसेऽशुभीत् १६ कर्म क्या है और अकर्म क्या है ऐसे इसविषयमें कविजन भी मोहते भये तो कर्म मैं तुम्हारेको कहूंगी जिसको जानके संसौरसे मुक्त होगे ॥१६॥ कर्मणो ह्यपि' बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ॥ अकर्मणचं बोईव्यं गहनों कर्मणो गतिः॥ १७॥ जिसंवास्ते कि, कर्म याने करने योग्य कर्म उसका रूप भी जानना चाहिये और विकर्म जिस एककर्ममें विविध प्रकार है उसका रूप भी जानना चाहिये और अकर्म जो निश्चयात्मक बुद्धिकरके केवल ईश्वरारा- -
(६८)
भगवद्गीता।
[अध्यायः-
धनार्थ निष्काम कर्म उसकाभी रूप जानना चाहिये इसवास्ते कमकी
गति दुर्गम है ॥ १७॥
कर्मण्यकर्म यः पश्येकमणि च कर्म यः॥
सं बुद्धिमान्मनुष्येषु से युक्तः कृत्स्नैकर्मकृत् ॥१८॥
अब कर्म और अकर्मका स्वरूप जानना कहतेहैं जो प्रारंभित
कर्ममें अकर्म याने आत्मज्ञान देखें याने इस निष्कामकर्महीसे ज्ञान
होयगा इससे यह ज्ञानही है और जो मनुष्य अकर्म जो आत्मज्ञान
उसमें कर्म याने यह कर्मसे भया कर्म ही है ऐसा देखनेवाला मनुष्य
मैंनुष्योंमें बुद्धिमान है सो योगी और सोई सर्वकर्मोंका करने-
वाला है ॥ १८॥
यस्य सर्वे समारंभाः कामसंकल्पवर्जिताः॥
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पंडित बुधाः ॥ १९ ॥
जो कर्म प्रत्यक्ष कररहेहैं उसकी ज्ञानाकारता कैसी होगी सो कहते
हैं सो ऐसी कि, जिसके सर्व लौकिक वैदिककर्मों के आरंभ कामना से-
कल्परहित हैं ज्ञानरूप अग्निकरके दग्धमयेहैं बंधक कर्म जिसके उसको
विद्वान्जन पंडित कहतेहैं ॥१९॥
त्यक्त्वा कर्मफलासंगं नित्यतृप्तो निराश्रयः॥
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैवं किंचित् करोति सः ॥२०॥
जो कर्मफलेका संबंध छोड़के निरंतर आत्मस्वरूपहीमें तृप्त
मश्वर संसारके आश्रयरहित कर्ममें प्रवृत्त भी है तोभी सो कुछ नहीं
करती है ॥२०॥
निरोशीर्यंतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ॥
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ २१ ॥
चतुर्थः ४.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (६९) जो कर्मफलकी आशारहितचित्त और मन जिसका संयममें हो जिसने परमात्मप्रीतिविना और सर्व उपासना त्यागी हो सो केवल शेरीरसंबंधी कर्मको करताभया कर्मबंधनरूप पीडाँको नहीं प्राप्तहोता है ॥२१॥ यदृच्छालामसंतुष्टो द्वंद्वातीतो विमत्सरः ॥ समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥ २२॥ जोआपही आयमिले इतनेही लाभसे संतुष्ट हो और जो सुखदुःख लाभालाभ जय पराजय हर्ष शोक इत्यादिक इंद्रोंकरके रहित होय मत्सर जो दूसरेका मुख न सहना उसकरके रहित कार्यकी सिद्धि और असिद्धिमें समबुद्धि सो कर्म करके भी नहीं बंधनपावै ॥२२॥ गतसंगस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः॥ यज्ञायांचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥ २३ ॥ निवृत्तभयाहै आत्मानंदविना संग जिसका और संसारवासनासे मुक्त है और आत्मज्ञानमें अवस्थित है चित्त जिसका सो जो यज्ञके अर्थ कर्म करे तो उसके बंधनकारक सर्व प्राचीन कर्म नाश होतेहैं।॥२३॥ ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविब्रह्मानौ ब्रह्मणा हुर्तम् ।। ब्रह्मैवं तेन गंतव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥२४॥ निष्कामकर्मसे ज्ञान होताहै इस भेदसे कर्मकी ज्ञानाकारता कही. अब परमात्माके अनुसंधानसे उसी निष्कामकर्मकी ज्ञानाकारता कह- तेहैं सो ऐसे कि, जिसकरके हव्य अर्पणकरते हैं वह सुवादिक वस्तु ब्रह्म है याने ब्रह्महीका कार्यहै घृतादिक हव्य भी ब्रह्महीहै ब्रह्मरूप अग्निमें यह ब्रह्मरूप हव्य ब्रह्मरूप होतांकरके होमाजातीहै ऐसे यह सर्व ब्रह्मरू- पहै तिस ब्रह्मकमनियमकरके ब्रह्मही प्राप्त होनेयोग्य है ॥२४॥ दैवमेवापरे' यज्ञं योगिनः पर्युपासते ॥
(७०)
भगवद्गीता।
[ अध्यायः-
ब्रह्मानापरे यज्ञं यज्ञेनैवोपैजुह्वति ॥ २५ ॥
ऐसे कर्मयोगकी ज्ञानाकारता कहके अब कर्मयोगके भेद कहतेहैं
अपरे 'अकारो वै विष्णुः' इस श्रुतिप्रमाणाते जो विष्णुपरायण हैं वे योगी
देवयज्ञहीं याने प्रतिमापूजनरूप यज्ञ करतेहैं इनसे और भी ऐसही
योगी ब्रह्मात्मक अग्निमें यज्ञंसाधन सामग्रीकरके हवनात्मक यज्ञेही को
हवन करतेहैं ॥२२॥
श्रोत्रांदीनींद्रियाण्यन्ये संयमामिषु जुहति ॥
शब्दादीन्विर्षयानन्ये इंद्रियाग्निषु जुह्वति ॥ २६ ॥
और कितने योगी श्रोत्रादिक इंद्रियोंको संयमरूप अनिमें होमते हैं
अर्थात् श्रोत्रादिकोंको हरिकीर्तिश्रवणादिकहीमें युक्त करतेहैं और कि-
तनेक शब्दादिकविषयोंको इंद्रियरूप अग्निमें होमते हैं याने हरिकी-
तैनविना और श्रवणादिक नहीं करतेहैं ॥२६॥
सर्वाणींद्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ॥
आत्मसंयमयोगानौ जुबति ज्ञानदीपिते ॥ २७ ॥
और कितने योगी सर्व इंद्रियनके कर्मोंको और प्राणोंके कमौको
ज्ञानकरके प्रदीप्त ऐसे मनके संयमरूप अग्निमें होमतेहैं अर्थात् मनकर-
के इंद्रिय प्राण कर्म वृत्तिनको संसारविषयसे निवारणकरके आत्मज्ञान-
में लगानका यत्न करतेहैं ॥२७॥
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञोस्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाच यतयःशंसितव्रताः॥२८॥
और कितने योगी द्रव्यसे यज्ञकरतेहैं. याने दानादिक करतेहैं. कि-
तनेक उपवासादि तपरूप यज्ञ करतेहैं. तैसेही और कितने पुण्यक्षे-
त्रादिक वासरूप योग करते हैं और कितने हँढवती यती याने
पत्नशील वे वेदाध्ययन वेदार्थविचाररूप यज्ञ करतेहैं ॥२८॥
चतुर्थः ४.] सान्वय-अमृततरंगिणीभा० टी०॥ (७१) अपने जुह्वति प्राण प्राणेऽपानं तथा परे॥ प्राणापानगती सैद्धा प्राणायामपरायणाः॥२९॥ अपरे नियंताहाराः प्राणान्प्रौणेषु जुहति ॥ सर्वेऽप्येते" यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥ ३० ॥ यज्ञशिष्टाऽमृतभुजो याति ब्रह्म सनातनम् ॥ नीयं"लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम३१॥ और कितनेक कर्मयोगी प्रमाणसे आंहार करनेवाले जैसे कि, आधा पेट अन्नसे भरे चौथाई जलसे और चौथाई वायुसंचारनिमित्त खाली राखै ऐसे और प्राणायाम परायण हैं ऐसे योगी अपानमें प्राणको 'होमतेहैं याने पूरक करतेहैं; तसेही किर्तनेक प्राणवायुमें अपानको होमतेहैं याने रेचक करतेहैं. ऐसेही और प्राण अपान दोनोंकी गति को रोकके प्रोणोंको प्राणनही में होम तेहैं याने कुंभक करतेहैं। इतने ये सर्व भी यज्ञके जाननेवाले यज्ञकरके पापरहित यज्ञ- हीका शेष अमृतरूप अनके खानेवाले सैनातन ब्रह्मको प्राप्त होतेहैं. हे कुरुवंशिनमें श्रेष्ठं अर्जुन! जो यज्ञ नहीं करताहै उसको यह लोकभी नहीं है और परलोक तो कैसे होयगा॥ २९ ॥३०॥३१॥ एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुंखे ॥ कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥३२॥ ऐसे बहुतै प्रकारके यज्ञ ब्रह्मके सुखमें याने वेदमें विस्तारसे कहेहैं उन सबको कर्मजं जीनो याने वे कर्महीसे होते हैं, ऐसे जानिके कर्म करके मुक्त होवोगे ॥३२॥ श्रेयोन्द्रव्यमांद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप ॥ सर्व कौखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥३३॥ हे परंतप ! द्रव्यमय यज्ञसे ज्ञानयज्ञे श्रेष्ठ है, कारण कि द्रव्य- (७२) भगवद्गीता। [अध्यायः- यज्ञकाभी फल ज्ञानही है हे पार्थ ! फलंसहित सर्व कर्म ज्ञान में समाप्त होताहै याने इस ज्ञानहीके वास्ते यज्ञ करतेहैं ॥३३॥ तंद्रिद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवयाँ ॥ उपदेक्ष्यंति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ३४ ॥ सो ज्ञान तत्त्वदर्शी ज्ञानीजन तुमको उपदेशेंगे तुम उनकी सेवा करके और सत्कारपूर्वक नमस्कार करके उनसे प्रश्न करके जानो। यहाँ श्रीकृष्णभगवानने केवल ज्ञानीजनोंकी प्रशंसानिमित्त यह वाक्य कहाहे और " अविनाशि तु तद्विद्धि" यहांसे लेके "एषा लेभिहिता सांख्ये" यहां पर्यंत ज्ञान उपदेश तो करही चुकेहैं ॥३४॥ यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पांडव ॥ येने भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥ ३५ ॥ हे पांडुपुत्रं ! जिस ज्ञानको जानिके ऐसे मोहेको फिर नहीं प्राप्त होगे. जिसज्ञानकरके सर्वे भूतप्राणिमात्रको औपसदृश देखोगे. "जैसे कि, प्रकृतिसे भिन्न ये परज्ञानाकारतासे सर्वसमान हैं आपसंदेश देखे पीछे फिर मेरेसमान देखोगे याने ज्ञान प्राप्तभये जीव मेरी समता- को प्राप्तहोतेहैं सो आगे कहेंगेभी “ इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्य मागताः॥" यहां ब्रह्मसूत्र भी प्रमाणहै "भोगमात्रसाम्यलिंगाच" ऐसे ही श्रुतिभी प्रमाण है "तथा विद्वान्पुण्यपापे विधूय निरंजनः परमां शां- तिमुपैति ॥” इत्यादिप्रमाणोंसे नामरूपरहित याने सूक्ष्मावस्थामें आ- त्मा और परमात्माकी स्वरूपसमता निश्चय होतीहै ॥ ३५ ॥ अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः॥ सर्व ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि ॥ ३६ ॥ जो कि, सर्व पापिनसे भी तुम बड़े पापकारक होउगे तो भी इस ज्ञानरूप नौका करकेही सेव दुःखसमुद्रको तरोगे ॥३६ ।।
चतुर्थः ४.] सान्वय-अमृततरंगिणीभा० टी०। (७३) यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ॥ ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥ ३७॥ हे अर्जुन ! जैसे प्रज्वलित अँग्नि इंधनको समयभस्मकरताहै तैसे विज्ञानरूप अग्नि सर्वकर्मबंधनको समग्र भस्मकरताहै ॥ ३७॥ न हि ज्ञानेन संदृशं पवित्रमिह विद्युते ॥ तस्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विदति ॥ ३८॥ इसलोकमें निश्चयकरके ज्ञानके सदृश पवित्र नहीं हैं उस ज्ञानको कुछकाल कर्म करते करते कर्मयोगसे सिद्धिभयाहुँवा ऑपहीमें आप ही प्राप्तहोताहै ॥३८॥ श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेंद्रियः ।। ज्ञानं लब्ध्वा परां शांतिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ३९ ॥ ज्ञानप्राप्तिमें लगांभया इंद्रियोंको संयममें कियेभये श्रद्धावान पुरुष ज्ञानको प्रातहोते हैं उसज्ञानको पाइँके थोड़ेहीकालमें परमशांति को प्राप्त होताहै ॥३९॥ अज्ञेश्चाऽश्रद्दधानच संशयात्मा विनश्यति ॥ नायं लोकोस्ति नं पैरो नैं सुखं संशयात्मनः॥४०॥ जो अज्ञानहै और ज्ञानप्राप्तिमें श्रद्धाको भी नहीं धारणकियेहैं और मनमें संशय रखताहै सो नष्टभ्रष्ट संसारमें भ्रमताहै जिसके मनमें संशय है उसको यह लोक सुखदायक नहीं है" परलोक भी नहीं है उसको कहीं भी सुख नहीं है ॥४०॥ योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसँछिन्नसंशयम् ॥ आत्मवंतं न कर्माणि निबनति धनंजय ॥४१॥ हे अर्जुन ! परमेश्वराराधनरूप जो निष्काम कर्मयोग उस योगकरके
(७४)
मगवद्गीता।
[ अध्याय:-
परमात्माके अर्पण कियेहैं कर्म जिसने और ज्ञानकरके संछिन्नभये हैं
संशय जिसके ऐसे स्थिरचित्त ज्ञानीको कर्म नहीं बंधनकरतेहैं ॥४॥
तस्मादज्ञानसंभूतं ह्रस्थं ज्ञानांसिनात्मनः॥
छित्त्वैन संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठं भारत ॥४२॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां
योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसंन्यास-
योगो नाम चतुर्थोऽध्यायः॥४॥
हेभरतवंशोत्पन्ने अर्जुन ! तिससे जो अज्ञानसे उत्पन्न तुम्हारे हृदय-
में स्थित ऐसे ईस आपके संशयको ज्ञानखड्गसे छेदनकरके उँठो
और कर्मयोगमें प्रवृत्त होउँ याने क्षत्रियका कर्म युद्ध करो ॥ ४२ ॥
इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिता-
यांश्रीमद्भगवद्गीतामृततरंगिण्यां चतुर्थाऽध्यायप्रवाहः ॥४॥
अर्जुन उवाच।
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ॥
यच्छ्रेय एतयोरेक तन्मे" ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ १ ॥
श्रीकृष्णको अर्जुन पूंछतेहैं कि, हे कृष्ण! कर्मीको संन्यास जोज्ञान-
योग उसको और फिर कर्मयोगको कहतेहो इन दोनों में एक 'जो नि-
श्चय कियाभया श्रेष्ठ होय उसीको मुझे कहों जैसे कि, दूसरे अध्याय
में कहा कि, मुमुक्षु प्रथम कर्मकरके अंतःकरण शुद्धभयेपर ज्ञानयोग
करके आत्मदर्शनका उपायकरे तीसरे सोथेमें ज्ञानीको भी कर्म करना
ही श्रेष्ठ कहा, ऐसे दोनों कहते हो जो इन दोनों में श्रेष्ठ हो सोई कहो॥३॥
श्रीभगवानुवाच ।
संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसैकरावुभौ ॥
तयोस्तुं कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥२॥
पंचमः ५.] सान्वय-अमृततरंगिणीभाटी। (७५) जब अर्जुनने प्रार्थना की तब श्रीकृष्ण भगवान बोले सो ऐसे कि, संन्यास जो कर्मका त्याग और कर्मयोग ये दोनों कल्याणकारक हैं. तिनमेंसे भी कर्मके त्यागसे कर्मयोग विशेष श्रेष्ठ है ॥२॥ ज्ञेयः सं नित्यसंन्यासी यो नै टेष्टिं ने कांक्षति ॥ निद्रो हि महाबाहो सुखं बंधात्प्रसुच्यते॥३॥ हे महाबाहो । जो न कोई वस्तुसे द्वेष करै, ने चाहनाकर, सो सुखदुःखादि द्वंदरहित नित्यसंन्यासी जानना वह सुखपूर्वक निश्चय बंधनसे मुक्त होताहै ॥३॥ सांख्ययोगौ पृथम्बालाः प्रवदंति न पंडिताः॥ एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोविदंते फलसें ॥४॥ जो मूर्ख हैं वे सांख्ययोगोंको यानेज्ञानकर्मोंको न्यारे कहतेहैं पंडिती नहींकहतेहैं. इन दोनोंमेंसे एकमें भी अच्छीतरहसे स्थितरहाभया दोनोंके फलेको पाता है ॥४॥ यंत्सौख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्यो गैरपि गम्यते ॥ एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति सैं पश्यति ॥९॥ जो स्थान ज्ञानकरिके प्राप्तहोता है सोई कर्मकरिकेभी प्राप्तहो- ता है। इससे ज्ञानेको और कर्म को जो एक जानताहै 'सो जानता है याने विद्वान् है ॥६॥ संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः॥ योगयुक्तो मुंनिर्ब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति॥६॥. हे महाबाहो! यह संन्यास कर्मविना प्राप्तहोनेको दुर्गम है याने होने- (७६) भगवद्गीता। [ अध्याय:- होका नहीं और जो कर्मयोगयुक्त आत्मज्ञानमें मनलगाये है सो थोड़ेही कार्लमें ब्रमको प्राप्तहोताहै ॥६॥ योगेयुक्तो विशुद्धांत्मा विर्जितात्मा जितेंद्रियः॥ सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥७॥ जो कर्मयोगयुक्त है याने निष्काम कर्म करताहै और वाणी जिसकी शुद्ध है याने वाणीसे हरिकीर्तन करताहै और मन शुद्ध है याने मनसे हरिस्मरण करताहै और जितेंद्रिय है याने इंद्रियविषयको श्रेष्ठ नहीं जा- 'नताहै और सर्वभूतप्राणीका आत्मा अंतर्यामीमें है आत्मा मन जिसका सो पुरुष कर्म करताभया भी नहीं लिप्त होता है ।। ७॥ नै व किंचित्करोमीति" युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।। पश्यञ्छृण्वन्स्टैंशञ्जिवनश्ननगच्छन्स्वपञ्फुसैन ॥८॥ प्रलपन्विसृजन्गृह्णन् न्मिषन्निमिषन्नपि" ॥ इंद्रियाणींद्रियार्थेषु वर्तत इति धारयन् ॥९॥ इंद्रियनके विषयोंमें इंद्रियां वर्तमान रहतीहैं ऐसे धारणकरेभयेत- त्वज्ञानी कर्मयोगी देखता, सुनतो, स्पर्शता, सूर्धता, खातो, चलती, सोता, श्वासलेता, बोलता, छोइँता, पकरता, नेत्रखोलता, मीचंता : भयोभी मैं कुछ भी नहीं करताहूं ऐसे मानताहै ॥८॥९॥ ब्रह्मण्याधार्य कर्माणि संगं त्यक्त्वा करोति यः॥ लिप्यते न स पापेनं पद्मपत्रमिवाभसौ ॥ १० ॥ जो शरीरमें याने शरीरस्थ इंद्रियने में कौंको धारणकरके याने कर्मकरनेवाली इंद्रियां है ऐसे जानिके कर्मफलासक्तिको यागिके कर्म करता है सो पापकरके नहीं लिप्त होता है, जलकरके कमलपै- सरीखा ॥१०॥ - 1 पंचमः ५.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा०टी०। (७७) कायेन मनसा बुद्धयाँ केवलैरिद्रियैरपि ॥ योगिनःकम कुवैति संगं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥११॥ जो योगी हैं वे फलसंग त्यागिके आत्मशुद्धिके वास्ते याने आत्म- गत प्राचीन कर्मबंधन छूटनेके वास्ते शरीरकरके, मनकरके, बुद्धि- करके, केवल इंद्रियोंकरके भी कम करते हैं ॥ ११॥ युक्त कर्मफेलं त्यक्त्वा शांतिमाप्नोति नैष्टिंकीम् ॥ अयुक्तः कामकारेण फैले संक्तो निबद्धयते ॥ १२ ॥ युक्त याने आत्मज्ञान योगयुक्त पुरुष कर्मफलको त्यागिके ईश्वर- निष्ट शांतिको प्राप्तहोताहै जो आत्मज्ञान योगरहित है सो यथेष्ट करण- करके फेलविषे आँसक्तभया ऐसा जो जीव सो बंदहोय ॥ १२॥ सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वंशी ॥ नवद्वारे पुरे देही नै वैकुर्वन्न कारयन् ॥१३॥ वशी याने जिसका चित्त वैशहै ऐसा देही देहधारी जीव सो नवद्वार- का पुर जोदेहँ तिसमें मनसे सब कर्मोंको स्थापितकरके न करता में करीता भया सुखं जैसे होय तैसे ही रहता है ॥ १३॥ न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ॥ न कर्मफलंसंयोगं स्वभाँवस्तु प्रवर्तते ॥१४॥ प्रभु याने अविनाशी आत्मा लोक जो देवादिक शरीर तिसका ने फपिन ने कर्म न कर्मफलके संयोगको सिरजेताहै क्योंकि, यह ॥ स्वभाव याने अनादिकाल प्रकृतिसंसर्गकी वासना प्रवृत्त है ॥ १४ ॥ है। नादत्ते कस्यचित्पापं ने चैव सुकृतं विभुः ॥ अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेनै मुझंति जंतर्वः ॥ १५॥ जैसे कि, कर्तृत्व और कौको नहीं उत्पन्न करताहै इसीसे यह जी-
(७८)
भगवद्गीता।
[अध्यायः-
वात्मा किसी शरीरसंबंधी पापको भी नहीं ग्रहणकरता है और सुकृत
को भी नहीं ग्रहणकरता है क्योंकि, जिनका ज्ञान अज्ञानकरके टके-
रहाहै उस करके वे जीव मोहको प्राप्त होतेहैं याने अज्ञानकरके देहा-
दिकमें आसक्ति और उससे दुःख होताहै ॥ १५॥
ज्ञानेन तु तेदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः॥
तेषामादित्यैवज्ज्ञान प्रकाशयति तत्परम ॥ १६ ॥
परंतु जिनका आत्मसंबंधीज्ञानकरके वह अज्ञान नष्टभैयाहै उनका वई
श्रेष्ठं ज्ञान सूर्यसहशे प्रकाश करताहै याने वे संसारदुःखरहित मुक्तहैं१६
तबद्धयस्तदात्मानस्तनिष्ठास्तत्परायणाः ॥
गच्छंत्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिषूतकल्मषाः ॥ १७॥
उस आत्मज्ञानहीमें है बुद्धि जिनकी उसीमें है मन जिनको उसीमें
है निष्ठा जिनकी और वही है श्रेष्ठस्थान जिनका इसतरहसे ज्ञानकरके
नष्ट भये हैं मनके विकार जिनके वे पुरुष मुक्तिको पावतेहैं।॥ १७॥
विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैवं श्वपाके च पंडिताः समदर्शिनः॥१८॥
विद्या और विनययुक्त ब्राह्मणमें, गऊँमें, हाथी और कुत्तेमें और
चाँडालमें भी पंडितजन समदर्शी होतेहैं याने आत्माको आपसदृश
जानते हैं ॥१८॥
इहैव तैर्जितः सर्गों येषां साम्ये स्थितं मनः॥
निर्दोष हि" समं ब्रौ तस्माद्रमणि ते स्थिताः १९॥
'जिनका मने ऐसी समतामें स्थित है उन्होंने इही ही संसार जीता
है. जिसँवास्ते कि, बझै निदोष सर्वत्र समान है ति सीसे वे"ब्रह्मप्रीति-
निमित्त स्थित हैं।॥१९॥
पंचमः५.] सान्वय-अमृततरंगिणीभा०टी०। (७९) नप्रहष्येत्प्रेियं प्राप्यं नोदिजेत्प्राप्य चोप्रिंयम् ॥ स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्रमणि स्थितः॥२०॥ प्रियवस्तुको पायके हैंपेना नहीं और अप्रियको पायके व्याकुल ने होना; ऐसा स्थिरबुद्धि, विचारशीले नौका ज्ञाता ब्रह्मप्राप्तिनिमित्त स्थितहै ॥२०॥ बाह्यस्पर्शष्वसत्तात्मा विदत्यात्मनि यत्सुखम् ॥ सब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुर्खेमक्षयमश्नुते ॥२१ ॥ जो शन्दादिक विषयोंमें अनासक्तभयाहुआ जो आत्मामें सुखको पार्वताहै सो ब्रह्मप्राप्ति उपायचित्तवाला पुरुष अक्षय सुर्खेको पावताहै याने मोक्ष पाताहै ॥२१॥ ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयो य एंव ते ॥ आँधतवंतः कौंतेय नै तेषु रमते बुधैः ॥ २२॥ हे कुंतीपुत्र! जे शब्दस्पर्शादिक भोग हैं वे दुःखके कारण आयत- पंत याने होतेजाते रहते हैं अर्थात् अल्पसुख हैं इस निश्चयंसे उनमें पंडितजन नहीं रमते हैं ॥ २२ ॥ शैक्नोती हैव यः सोढुं प्राक् शरीरविमोक्षणात् ॥ कामक्रोधोद्भवं वेग से युक्तःस सुखी नरः॥ २३ ॥ जो मनुष्य कामैक्रोधके वेगको शरीरसे निकसनके प्रथम उस वे- गको सहनेको सर्कताहै सो 'योगी है सो मनुष्य इसे ही लोकमें -सुखीहै ॥२३॥ योतःसुखोऽतरारामस्तथतियोतिरेर्वं यः॥ सं योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्र भूतोऽधिगच्छति ॥ २४ ॥ जो आत्मोहीमें सुखी और आत्माहीमें है विश्राम जिनको तैसे' - - (८०) भगवद्गीता। [अध्याय:- ही जो अंतज्योति याने आत्मज्ञान ही करके प्रकाशितहै सोई योगी ब्रह्मप्राप्ति उपायतत्पर ब्रह्मवत् मुक्तिको प्राप्तहोताहै ॥ २४॥ लभंते ब्राँनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः॥ छिन्नधा यंतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥२५॥ जिनके लाभ अलाभसुखदुःखादिक दो दोउपद्रव नष्ट भयेहैं जिनका मन ईश्वरमें लगी है और सर्वभूतप्राणिमात्रके हितमें रहतेहैं इससे उनके पाप क्षीण भयेहैं ऐसे ऋषिजन ब्रह्मसमान मुक्तिको पातेहैं ॥२५॥ कामक्रोधवियुक्तानां यंतीनां यतचेतसाम् ॥ अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदिात्मनाम् ॥ २६ ॥ जो कामक्रोधरहित हैं और ईश्वरप्राप्तिके यत्नकरनेवालेहैं और चित्त जिनके वश हैं ऐसे आत्मज्ञानिको सर्वप्रकारसे ब्रह्मसुखं वर्त्त- मान होरहाहै ॥२६॥ स्पैन्कृित्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवांतरें भ्रुवोः । प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यंतरचारिणौ ॥ २७॥ यतेंद्रियमनोबुद्धिमुनि मोक्षपरायणः । विगतेच्छाभयंक्रोधो यासंदा मुंक्त एव सः ॥२८॥ बाह्यइंद्रियोंके स्पर्श जो शब्दादिकं विषय तिनको बौहर याने त्याग करके फिरे भौंहोंके मध्य में दृष्टिको करके नासिकाके भीतरही संचार करें ऐसे प्राणापानोंको सैम करके जो मुनि याने मननशील पुरुष इंद्रिय, मन और बुद्धिको वश करै मोक्षहीमें आसक्त इच्छा, भेय और क्रोधक- रके रहित होय सो"सेदा मुक्तही है ॥२७॥२८॥ भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ॥ सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शांतिमृच्छति॥२९॥ अब और भी अतिसुगम मुक्तिका उपाय कहतेहैं.सर्व यज्ञ और तपोंका .
षष्ठः ६.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (८१) भोक्ता सर्वलोकोंका महेश्वर याने लोकेश्वरोंका भी ईश्वर सर्वभूता- णिनका सुहृद ऐसा मेरेको जानिके भी मुक्तिको प्राप्तहोता है ॥२९॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सुब्रह्मविद्यायां योग- शास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसंन्यासयोगो- नाम पंचमोऽध्यायः॥५॥ इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां गीतामृततरंगिण्यां पंचमाध्यायप्रवाहः ॥५॥ अनाश्रितः कर्मफल कार्य कर्म करोति यः॥ संसंन्यासी च योगी च न निरंगिन" चाँक्रियः ॥१॥ कर्मयोग कहिके अब ज्ञानकर्मसाध्य आत्मदर्शनरूप योगाभ्यास कहतेहैं. तहां कर्मयोगकी अपेक्षारहित योगसाधनत्व दृढकरनेको ज्ञानाकार कर्मयोगको योगशिरोमणि कहतेहैं सो ऐसे कि, जो कर्म- फलेको नचाहताभया स्ववर्णाश्रमोचिंत करनेयोग्य कर्मको करताहै सो संन्यासी है और योगीहै और जिसने अग्निकर्मको त्यागाहै सो संन्यासी और योगी नहीं है और जिसने क्रियाकर्मको त्यागाहै सोभी संन्यासी योगी नहींहै ।। यहां श्रीकृष्णका एक अभिप्राय औरभी दीखताहै कि, कलियु- गमें सन्यासका निर्वाह होगानहीं क्योंकि मनुष्योंकी बुद्धि चंचल होगी. सो देखनमेंभी आता है कि, जो घर छोड़ते हैं तो संन्यासी हके मठ बांधिके व्यापार करते हैं. जो स्त्री विवाहित नहीं तो परस्त्री- गमन करते हैं. पुत्रोंकी जगह शिष्य करते हैं, ऐसेही औरभी सामान्यगृहस्थोंसे अधिक रखके केवल प्रपंचरत होते हैं इससे श्रीकृष्णने निष्कामकर्मकर्ताहीको संन्यासी योगी कहा है और भग्निकर्म तथा क्रियात्यागनेका निषेध किया है ॥१॥ - .
(८२)
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
यं संन्यासमिति प्राईयोंग तें विद्धिं पांडवे ॥
नै ह्येसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन ॥२॥
अब कहेभये कर्मयोगमें ज्ञानभी दिखातेहैं. हेपांडुपुत्र ! जिसको
संन्यास कहतेहैं उसको अभेर्दकरके योग जाँनो जिसवास्ते कि,
कर्मफल संकल्प त्यागेविना कोईभी" योगी नहीं होता है. अर्थात्
कर्मफलको ईश्वरार्पण कियेविना योगी संन्यासी होता नहीं. जो
कर्मफलको ईश्वरार्पण करताहै वही योगी और संन्यासी है ॥ २ ॥
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते॥
योगारूंढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥३॥
आत्मज्ञानकी प्राप्ति चाहनेवाले मननशीलको ज्ञानप्राप्तिकारण
कर्म कहाहै उसी ज्ञानप्राप्तभयेको मुक्तिकारण संकल्पविकल्पत्या-
गपूर्वक कर्म ही कहाहै ॥३॥
यदा हि नेंद्रियार्थेषु नै कर्मस्वनुषजते॥
सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥४॥
जब ने इंद्रियों के विषयनमें न कर्मोंमें आसक्तहोय तर सर्वसंक-
ल्पोंका त्यागी योगारूढ कहाताहै इससे कर्मकरना अवश्यहै ॥ ४ ॥
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ॥
आत्मैव ह्यात्मनो बंधुराँत्मैव रिपुरात्मनः ॥५॥
ऐसे आपके वश मनकरके आपको उद्धारकरना, आपका अव-
सोद याने घात याने अधोगति नकरना. कारण कि, आपका मन ही
आपका मित्र है और वह मन ही" आपका शत्रु है ॥५॥
बंधुरात्मात्मनस्तस्य॑ येनात्मैवात्मना जितः ॥
अनात्मनस्तु शत्रुले वर्तेतात्मैवै शत्रुवत् ॥६॥
षष्ठः ६.] सान्वय-अमृततरंगिणीभा० टी०। (८३) जिसने बुद्धिकरके निश्चय मर्ने जीताहै उस जीवात्माका मन मित्र है और जिसने मन नहीं जीताहै उसका मन ही शत्रुत्वमें शत्रुसै- रखिा होती है ॥६॥ जितात्मनः प्रशांतस्य परमात्मा समाहितः ॥ शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥७॥ शीत उष्ण सुख और दुःखमें तैसेही मान अपमानोंमें जीताहै मन जिसने ऐसे शांतकी बुद्धि अतिशय परिपूर्ण रहतीहै ॥७॥ ज्ञानविज्ञानंतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेंद्रियः॥ युक्तं इत्युच्यते योगी समलोष्ठाश्मकांचनः ॥ ८॥ ज्ञान जो आत्मज्ञान विज्ञान जो विशेषज्ञान याने अनात्म आ- त्मविवेक इन करके जिसका मन तृप्त होय कूटस्थे याने सर्वशरी- रोंमें आत्माको समान जानिके निर्विकार इसीसे जितेंद्रियत्वसे जो ठीकरी पत्थर और सोना इनको सम जान रहाहै ऐसा योगी युक्त याने आत्मदर्शनयोगयुक्त कहाँताहै ॥८॥ सुहृन्मित्रायुदासीनमध्यस्थद्वेष्यवंधुषु । साधुंष्वपि चे पापेएं समबुद्धिविशिष्यते ॥९॥ सुहृद् जो प्रत्युपकारविना हितकारक मित्र परस्पर उपकारी अरि शत्रु उदासीन जो प्रीति वैररहित मध्यस्थ जो सर्वकाल प्रीति वैर समान द्वेष्य जो सदा ईर्षा करता होय सो जो सदाहितेच्छु सो बंधु जो धर्मशील सो साधु और जो पापशील सो पापी इन सबोंमेंभी जो सम- बुद्धि होर्य सो श्रेष्टं है ॥९॥ योगी युंजीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।। एकांकी यतचिंत्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥ १० ॥ एकही बैठा स्ववशचित्तमैनवाला सांसारिक आशारहित आत्म- (८४) भगवद्गीता। [अध्यायः- विना परिग्रहरहित ऐसा योगी एकांतमें बैठाभया मैनको निरंतर परखा- त्मामें लगातारहे ॥१०॥ शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ॥ नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलोजिनकुशोत्तरम् ॥ ११ ॥ तंत्रैकाँग्रे मैनः कृती यतचित्तेंद्रियक्रियः॥ उपविश्यांसने युज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥ १२ ॥ अब योगाभ्यासमें आसननियम कहतेहैं. जैसे कि पवित्र स्थानमें न अति ऊंचा न अति नीचा कुशासनपर भृगचर्मादिक उसपर वस्त्र ऐसा और थिर आपका आसन विछोइके उस आसन पर बैठिक मनको एकत्र करके चित्त और इंद्रियोंके कर्म स्वदेशकिये भया अपना बंधन छुटनेके वास्ते योगको करें ॥ ११॥ १२ ॥ समं कायशिरोग्रीवं धारयनचलं स्थिरम् ॥ संप्रेक्ष्यं नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ १३॥ प्रैशांतात्मा विगतभीब्रह्मचारित स्थितः ॥ मनःसंभ्य मैचित्तोयुक्त आसोते मैत्परः ॥ १४ ॥ अब बैठनेका नेम कहतेहैं-काया जो मध्यशरीर शिर और श्रीवा इनको अचल थिर और सम राखेभये आपके नासिकाँग्रको देखिके और और और नदेखता या प्रशांतचित्त भयरहित ब्रह्मचर्यनतमें स्थित मेरेमें चित्तलगाये भये मैंनको नियमितकरके आत्मनिष्ट पुरुष मेरेमें लीनभयाहुआ बैठारहै ॥ १३॥ १४ ॥ युअन्नेवं सदात्मोनं योगी नियतमानसः॥ शांति निर्वाणपरमां मत्संस्थासँधिगच्छति ॥ १५॥ ऐसे नियममें मनहै जिसका ऐसा योगी ऐसेही सर्वकालमें मनको मेरेमें लगातामया आनंद है परम जिसमें ऐसी मेरेसहश शांतिको पाताहै ।। १५॥
पाठ: ६.] १५ . सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । • (८५) नात्यभूतस्तुयोगोऽस्ति न चैकाँतमनश्नतः ॥ नं चौतिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चौर्जुन ॥१६॥ अब योगीके आहारादिकोका नियम कहतेहैं-जैसे कि, हे अर्जुन ! जो अति भोजन करताहै उसका योग नहीं सिद्धहोताहै; और जो कुछमी भोजन नकर उसकाभी योग नहीं सिद्धहोताहै और अति- सोनेवालेसा योग नहीं सिद्धहोताहै, और अतिजागनेवालेकी भी योग नहीं सिद्धहोताहै ॥ १६॥ युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नाऽवबोधस्यं योगी भवति दुःखहा ॥ १७ ॥ जो आहार और स्त्रीप्रसंग प्रमाणमें करेगी आहारका प्रमाण यह कि, आधापेट अन्नसे और चौथाई जलसे भरके चौथाई पवनसं- चारके वास्ते खाली राखे, स्त्रीप्रसंगप्रमाण यह कि, अतिकामकी इच्छा होनेसे स्त्रीसंग करै, जो कोई यहां शंका करै कि, योगीको तो ब्रह्म- चर्य कहि आये हैं जैसे कि, इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें कहाहै सो सत्य है; परंतु "ऋतौभार्यामुपेयात्" इस श्रुतिप्रमाणसे ऋतु- समयमें स्त्रीप्रसंग करनेमेंभी एक ब्रह्मचर्य है। औरभी कहाहै कि, "इंद्रियाणींद्रियार्थेषु वर्तत इति धारयन् ॥ कर्मेंद्रियाणि मनसा निय- म्यारभतेऽर्जुन" इत्यादि तथा कहेंगे कि, “ अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्" तो जो योगी स्त्रीप्रसंग न करेगा तो उसके कुलमें जन्म कैसे होगा ? इत्यादि प्रमाणोंसे योगी स्त्रीप्रसंग प्रमाणसे करे यह विहारशब्दका अर्थ सिद्धहै । ऐसेही कर्ममेंभी चेष्टा प्रमाणहीसे करै अति परिश्रम नकरना यहाँ भागवतका प्रमाणदेतेहैं “सिऽऽ- न्यथार्थे न यतेत तत्र परिश्रमं तत्र समीक्षमाणः" ऐसा हितीयस्कंधक - ,
.
(८६).
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
दूसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें कहाहै ऐसेही जो प्रमाणसे सोवे और
प्रमाणहीसे जाग उसका दुःखनाशक योग सिद्ध होता है ।। १७॥
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
निस्टहासर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥१८॥
जब ओत्मा हीमें अतिनिश्चल चित्त लगरहताहै तव सर्वकामना-
ओंसे निःस्पृहहुआभया वह पुरुष युक्त ऐसी कहाताहै ॥ १८॥
यथा दीपो निवातस्थो नेंगते सोपमा स्मृता॥
योगिनो यतचित्तस्य युंजतो योगमात्मनः ॥ १९ ॥
जैसे निवातस्थानमें धराभया दीपक नहीं हालता तथा डोलताहै
तसेही वशहै चित्त जिसका ऐसे योगके करनेवाले योगीके मनकी
उपमा 'सोई केहीहै ॥ १९॥
येत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ॥
यत्रं चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥२०॥
योगसेवन करके विषयोंसे रोकाभया चित्त जहां विश्रामको प्राप्त
होता है और जहां बुद्धिकरके आत्मस्वरूपको निश्चय करता भैया
मन हीमें संतुष्ट होय ॥२०॥
सुखमात्यंतिकं यत्तद्बुद्धिंग्राह्यमतींद्रियम् ॥
वेत्ति यत्र ने "चैवाय स्थितश्चलति तत्वतः॥ २१ ॥
जो इंद्रियोंके जाननेमें नआवै बुद्धिकरके ग्रहणकरनेमें आवै ऐसा
अत्यंत सुख उसको जिसयोगमें स्थितभयाहुआ यह पुरुष जानहै ऐसा
निश्चय और फिर आत्मस्वरूपसे न चलायमान होय ॥२१॥
यं लब्ध्वा चाऽपरं लॉभं मन्यते नाधिकं ततः ॥
यस्मिन्स्थितो नै दुःखेनै गरुणापि विचाल्यते ॥२२॥
षष्ठः ६.] सान्वय-अमृततरंगिणीं भा० टी० । (८७)
जिसको पार्यके फिर उससे अधिक श्रेष्ठ लाभ नहीं मानताहै जिसमें
प्रवर्त भौरी भी दुःखकरके नहीं |बराताहै ॥२२॥
तं विद्यायुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ॥
संनिश्चयेनयोक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥ २३ ॥
उसको दुःखसंयोगवियोगकारक योगनामक जानना सो योग
निर्विकल्पचित्तसे निश्चयकरके करनेही योग्यहै ॥२३॥
संकल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ॥
मनसैवेंद्रियग्राम विनियम्यं समंततः॥ २४ ॥
शनैःशनैरुपरमेत् बुद्धया धृतिगृहीतया ॥
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा . किंचिदपि चिंतयेत्॥२५॥
स्पर्शजन्य और संकल्पज ऐसे भेदसे कामना दोप्रकारकी है,
तिनमें स्पर्शज शीत उष्णादिक, संकल्पज पुत्रवित्तादिक इनमें स्पर्श-
जका त्याग स्वरूपसे नहींहोसकता इससे संकल्पज सर्व कामनाओंको
समग्रतासे मनहीसे त्यागि' के सर्व इंद्रियों को सर्वत्रसे नियमित करके
विवेकशुद्ध बुद्धिकरके धीरे धीरे विश्रामको प्राप्तहोना फिर मनको
आत्मस्वरूपमें स्थिर करके आत्मस्वरूपविना किसीकाभी ने
चितवनकरना ॥२४॥२५॥
यतो यतो निश्चरति मनश्चंचलमस्थिरम्
तंतस्ततो नियम्यैतदात्मन्येवं वैशं नयेत् ॥ २६ ॥
यह मन चंचल है इसीसे आत्मस्वरूपमें थिर नहीं रहताहै. सों
यह मैन जहाँ जहाँ लेग तहांतहां से इसको फिरायके आत्मस्वरूप-
"हीमें लगाना ॥२६॥
प्रशांतमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ॥
उपैति शांतरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥ २७ ॥
(८८) भगवद्गीता। [अध्याय:- कारणे कि, जिसका मन आत्मस्वरूपमें स्थिर है उसीसे उसका रजोगुणभी नष्टेभयाहै, उससे वह निष्पाप है, उससे वह आपके स्वरूपमें स्थिरहै ऐसे इस योगीको उत्तम याने आत्मानुभवरूप सुखे प्राप्त होताहै ॥२७॥ युजन्नेवें संदात्मानं योगी विगतकल्मषः ॥ सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शर्मत्यंत सुखमश्नुते ॥२८॥ ऐसे निष्पाप योगी इसीतरहे सर्वदा मनको स्वरूपज्ञानमें युक्त करताकरता ब्रह्मानुभवरूप अत्यंत सुखको सुखेसे पार्वताहै ॥२८॥ सर्वभूतस्थर्मात्मानं सर्वभूतानि चामनि ॥ ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र संमदर्शनः ॥ २९ ॥ सर्वत्र शत्रुमित्रादिकोंमें समदृष्टियोग जो "द्वासुपर्णासयुजा सखा- या" इस श्रुतिप्रमाणसे सखित्वरूप संयोग उसमें लगायाहै मन जिसने सो आपरूपको आकाशादि सर्वभूतोंमें स्थित और उनका आकाशादि सर्वभूतोंको आँपमें देखताहै ॥ २९ ॥ यो मां पश्यति सर्वत्र सर्व चं माँय पश्यति ॥ तस्याहं ने प्रणयामि मैं चै मे" मैं प्रणश्यति॥३०॥ ऐसे जो मेरेको सर्वत्र मालाके मणिकोंमें सूत्रकीतरह देखता है और सर्वजगत् सूत्रमें मणियोंकी तरह मेरेमें देखता है मैं उसके अह- श्य नहीं होतीहूं और वह मेरे नहीं अदृश्य है ॥३०॥ सर्वभूतस्थित यो मां भजत्येकलमास्थितः॥ सर्वथा वर्तमानोपि स योगी मैयि वर्तते ॥ ३१ ॥ जो एकत्वे याने सर्वसे मित्रभाव, ( एकत्वका अर्थ जो स्वरूपकी एकताकरै तो भजन किसका करै । इससे मित्रताही अर्थ है. वाल्मीकी- य सुंदरकांडमें भी " रामसुग्रीवयोरैक्यं देव्येवं समजायत इंस षष्ठः ६.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (८९) हनुमानके वाक्य करके एकताका अर्थ मित्रता ही सिद्ध होताहै इस से) जो सर्वकी मित्रतामें रहाभया सर्वभूतों में व्यापक मेरेको अंज- ताहै निश्चय सो योगी सर्व आचरण करताभया मेरेमें वर्तमानहै याने मेरे हृदयमें वसता रहताहै ।।३१ ।। आत्मौपम्येन सर्वत्रं समं पश्यति योऽर्जुन ॥ सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥ ३२ ॥ हे अर्जुन ! जो सुखै अथवा दुःखको आपके समत्व करके सर्वत्र समान देखता है तो योगी उत्तम है. यह श्लोक उनतिसवे श्लोकका खुलासा करनेवाला है ॥३२॥ 'अर्जुन उवाच । योऽयं योगस्त्वां प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चंचलत्वात्स्थिति स्थिराम३३ श्रीकृष्णके वाक्य सुनके अर्जुन बोलते भये कि, हे मधुसूदन । जो यह योग समताकरके तुमने कहाँ सो मनके चंचलत्वसे में इस की स्थिर स्थिति नहीं देखताहूं ॥३३॥ चंचलं हि मनः कृष्ण प्रेमाथि बलवईटम् ॥ तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ ३४ ॥ हे कृष्ण ! जिससे कि, यह मैनचंचल इंद्रियोंका क्षोभक दृढ बली है मैं इसको रोकना पवनका रोकना जैसी दुष्कर मानताहूं ॥ ३४ ॥ श्रीभगवानुवाच। असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ॥ अभ्यासेन तु कौंतेयं वैराग्येण च गृह्यते ॥३५॥ ऐसा सुन श्रीकृष्णभगवान् वोले कि, हे महावाहो! यह मन चंचल हे इसीसे रोकनेमें आना काठन है. यहां रास नहीं तोभी हे कृती- (९०) भगवद्गीता। [अध्याय:- पुत्र ! अभ्यास करके और वैराग्यकरके रोकनेमें आताहै ॥ ३५ ॥ असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति में मंतिः॥ वश्यात्मना तुं यततां शक्योऽवाप्तुमुंपायतः ॥३६ ॥ यह योग जिसने मन वश न किया उसैकरके प्राप्त होनेका नहीं 'ऐसी मेरी मति है और जिनने मनको वश कियाहै उसकरके यत्न करते करते उपायसे प्रीप्ति होनेको सैकताहै ॥ ३६॥ अर्जुन उवाच। अयंतिः श्रद्धयोपेतो योगाचलितमानसः ॥ अप्राप्यं योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥३७॥ "नेहाभिकमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते' इत्यादि वाक्यों- करके योगमाहात्म्य सुना था तो भी विशेषज्ञानके वास्ते फिर पूंछ- ते हैं जैसे कि, हे कृष्ण!जो श्रद्धाकरके युक्तं और यत्न न करसका इस से योगसे मन चलायमान भया इससे योगसिद्धिको न पायके किस गतिको जाताहै ॥३७॥ कच्चिन्नोभयविभ्रष्टाश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति॥ अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ ३८ ॥ हे महाबाहो ! वेदके मार्गमें भूलाभया याने स्वर्गादिप्राप्तिनिमित्त कर्मत्यागके निष्कामकर्मरूप योगको भी न प्राप्तभया इसीसे वह अप्रतिष्ठितं और उभयभ्रष्टं याने स्वर्गादिप्राप्तिकारक कर्मभी छोडा और योगभी नमिला इसीसे कदाचित् छिन्नाभ्रकी तरह जैसे बड़े मेघमेंसे निकसिके मेघका टुकडा दूसरे मेवको न प्राप्त होके बीच- हीमें नष्टहोताहै तैसे ने नष्टहोई ॥३८॥ एतन्मे' संशयं कृष्ण च्छेत्तुमर्हस्यशेषतः ॥ त्वदन्यः संशयस्यास्यं च्छेत्ता नझुपपर्यंते ॥ ३९॥ ne षष्ठः ६.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (९१) हेकृष्ण ! इसे मेरे संशयको अच्छीतरहसे छेदन करनेको योग्यहो क्योंकि, इस संशयका छेदनेवाला तुमविन दूसरा नहीं मिलेगा ॥३९॥ श्रीभगवानुवाच । पार्थ नै वे है नामुत्रं विनाशस्तस्य विद्यते ॥ नै हि कल्याणकृत्कश्चिहुँर्गतिं वात गच्छति ॥४०॥ अर्जुनके वाक्य सुनिके कृष्ण बोले कि, हे पार्थ ! उस योगीको नाश न इस लोकमें हीन परलोकमें होताहै, क्योंकि हेतात ! शुभ- का कोई भी ढुंगतिको नहीं पाताहै॥४०॥ प्राप्यं पुण्यकृताँल्लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः॥ शुंचीनां श्रीमतां गेहे" योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ ११ ॥ जो योग पूराभयेविना मरजाय तो भी वह योगभ्रष्ट पुण्यकरके उपार्जित लोकोंको प्राप्तहोके वहां अनेक वर्ष रहिके पवित्र और धन- वालोंके घरमें जन्मताहै ॥४१॥ अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ॥ एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥ ४२ ॥ अथवा बुद्धिमान योगिनके कुलमें ही जन्मतीहै, जो ऐसा यह जेन्म सो इस लोकमें निश्चय दुर्लभहै ॥ ४२ ॥ तंत्र तै बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदैहिकम् ॥ यतते च ततो भूयः संसिद्वौ कुरुनंदन ॥४३॥ हे. कुरुनंदैन । वहां जन्मलेके वही पूर्व देहसंबंधि बुद्धिसंयोगको पावताहै और उसपीछे फिरभी उस सिद्धिनिमित्त यत्नकरताहै ॥४॥ पूर्वाभ्यासेन तेनैव हियते ह्यवशोपि सः॥ जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥४४॥ जो न करना चाहै इंद्रियजित न होय तो भी वह पुरुष उसी ११ N - (९२) भगवद्गीता। [अध्यायः- पूर्वाभ्यासकरके ही उसीको प्राप्तहोताहै. क्योंकि जो योगेके जाननेकी भी इच्छाकरे तो भी शब्दब्रह्म ताले देवादिनाम शब्दयुक्त जो प्रकृति उसको उल्लंघन करजीताहै याने मुक्त होता है ॥ ४ ॥ प्रयत्नांधतमानस्तुं योगी संशुद्धकिल्बिषः॥ अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो यांति पर गतिम् ॥ ४ ॥ ऐसे प्रयत्नसे योगकरता करता निष्पाप भैयाहुआ योगी अनेक जन्मोंकरके सिद्धर्भया तब उत्तम युक्तिको प्रांतहोताहै ॥ ४५ ॥ तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मंतोऽधिंकः॥ कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी अवार्जुन ॥४६॥ हे अर्जुन ! योगी जो निष्काम कर्म का सो सकामिक तपस्विनसे अधिक माना है, ज्ञानिनसे भी अधिकहै और सकाम कर्म करने- वालोंसे भी योगी" अधिक है; तिस तुम योगी" हो" याने निष्काम होके स्वधर्मरूप क्षत्रियकर्म युद्ध करो॥ ४६॥ योगिनामपि सर्वषां मद्गतेनांतरात्मना । श्रद्धावान्भजते यो मां स में युक्तमो मैतः॥४७॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अभ्यास- योगोनास षष्ठोऽध्यायः॥६॥ श्रद्धावाने पुरुष मेरेमें लगारहै जो चित्त ऐसे चिर्तकरके मेरेको भजताहै सो सब योगिनमें भी श्रेष्ट योगी है ऐसा मेरो अभि- प्राय है॥१७॥ इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिता यांश्रीमद्भगवद्गीतामृततरंगिण्यां षष्टाध्यायप्रवाहः ॥६॥ इति प्रथमं षट्कं समाप्तम् ।
सप्तमः ७.] तान्वय-अमृततरंगिणी मा० टी०। (९३) अथ द्वितीयषट्कं प्रारभ्यते ॥ प्रथम षट्कमें याने प्रथमके छ: अध्यायनमें ईश्वरप्राप्तिका, उपायरूप भक्तियोगका अंग आत्मस्व- रूपज्ञानकी प्राप्ति ज्ञानयोग कर्मयोगसे कही. अब मध्यषट्कमें याने छःसे बारहपर्यंत छः अध्यायनमें परमात्मस्वरूपका- यथार्थ ज्ञान और उस ज्ञानके माहात्म्यपूर्वक भगवान्की उपासना याने भक्ति इसीको प्रतिपादन करते हैं. इसका खुलासा अठारवहें अध्या- यमें पैंतालिस श्लोकपीछे "यतःप्रवृत्तिः यहाँसे लेके "मद्भक्तिं लभते परां" इस चौअनवें श्लोकपर्यंत कहेंगे. अब सातवें अध्यायमें भगवान् आपका स्वरूपवैभव वर्णन करेंगे। श्रीभगवानुवाच । मय्यांसक्तमनाः पार्थ योग गुंजन्मर्दोश्रयः॥ असंशयं समग्रं मां यथाँ ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥१॥ हे पृथापुत्र अर्जुन ! तुम मेरेमें चित्तलगाये ये मेरे आश्रित भयेहुँये योगमें युक्तभये हुये जैसे संशयरहित समग्र याने विभूति बलसहित मेरे को जानोगे सो सुनो॥१॥ ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः॥ यज्ज्ञात्वा ने है भूयोन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥२॥ मैं तुम्हारेको इस विज्ञानसहित ज्ञानको संपूर्णकरके कहता हूं जिसको जानके फिर इस लोकमें और जाननेयोग्य नहीं रहती है।।२।। मनुष्याणां सहस्रेषु कचियंतति सिद्धये। यतामपि सिद्धानां कश्चिन्मीं वेत्ति तत्वतः ॥ ३ ॥ मनुष्यों के हजारोंमें याने अनेक हजारमनुष्यों में आत्मज्ञानसि- द्धिके वास्ते कोई एक यत्नकरताहै यनकरनेवाले सिन्धों में भी - (९४) भगवद्गीता। [अध्यायः- कोई एक मेरेको निश्चयकरके जानतोहे अर्थात् ऐसा जानने- वालाही दुर्लभ है ॥३॥ भूमिरापोऽनलो वायुःखं मनो बुद्धिरेव च ॥ अहंकार ईतीयं में भिन्नौ प्रकृतिरष्टधा॥४॥ अपरेयमितस्त्वैन्यौं !कृतिं विद्धि में पराम् ।। जीर्वभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥५॥ हेमहाबाहो ! पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार ऐसे आठ प्रकारकरके न्यारीन्यारीभैयी यह जो मेरी" प्रकृति सो यह अंपरा याने जड है और इससे और जीवेर- पंको मेरी पैरा याने चेतन प्रकृति जानो जिस प्रकृतिकरिके यह गैंगत धारण भयाहै ॥४॥५॥ एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।। अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥ ६ ॥ सर्वभूत प्राणीमात्र इन्ही दोनोंसे प्रगट होतेहैं ऐसा जानो. मैं सब जगत्का उत्पत्तिस्थान तथा प्रलयस्थान भी हूं ॥६॥ मंत्तः परतरं किंचिन्नान्यदस्ति धनंजय ॥ मयि सर्वमिदं प्रोत सूत्रे मणिगणा इव ॥७॥ सूत्रमें मालाके मेणियोंकी तरह मेरेमें यह सर्वजगत् पोहाँ है इसीसे हे धनंजय मेरेसे न्यारा और कुछभी नहीं है" ॥ ७॥ रसोऽहमप्सु कौंतेय प्रभास्मि शर्शिसूर्ययोः । प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नेषु ॥८॥ "सूत्रे मणिगणा इव" इसीको दिखातेहैं. हे कुंतीपुत्र ! जलेमें इस चंद्रसूर्यकी कांति सर्ववेदों में ओंकार आकाशमें शन्दै पुरुषोंमें पुरु- पाथ में "हूं याने इन जलादिकोंके सार जो रसादिक उनका भी शरी- सप्तमः ७.] सान्वय-अमृततरांगणी भा० टी०। (९५) ही मैं और वे मेरे शरीर हैं ऐसे अहंशब्दका अर्थ सर्वत्र शरीरशरी- रीसंबंधसे जानना ॥८॥ पुण्यो गंधष्टथिव्यांचे तेजश्चास्मि विभावसौ ॥ जीवनं सर्वभूतेषु तैपश्चास्मि तपस्विषु ॥९॥ पृथिवीमें पवित्र गंध और अग्निमें तेज मैही हूं सर्वभूतप्रोणिनमें आयुष्य और तपस्विनमें तैप मैं हूं ॥९॥ बीजं माँ सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ॥ बुद्धिबुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥ १० ॥ हे पार्थ । सर्वभूतोंको सनातन उत्पत्तिकारण मेरेको जानो मैं बुद्धि- मानों में बुद्धि तेजस्विनमें तेजें "हौं ॥१०॥ बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ॥ धर्माऽविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥११॥ हे भरतर्षभ। मैं जो वस्तु प्राप्त नहीं उनकी कामना और प्राप्त वस्तुमें जो अनुराग इन कामरागोविना बलवंतोंका बले और भूत प्राणिनमें धर्मसे अविरुद्ध काम हूँ ॥११॥ ये चैवं सात्विका भावा राजसास्तामसार्श्व ये॥ मत्त एवेति तान्विद्धि नैं ल ह तेषु ते मयि॥१२॥ . जो शमादिक सात्विक भाव और द्वेषादिक राजर्स और ज- मोहादिक तामस भाव हैं वे मेरेसे ही हैं ऐसे उनको जानो और मैं उनमें नहीं याने उनके स्वाधीन नहीं हूँ वे मेरेमें हैं याने मेरे स्वाधीन हैं ॥१२॥ त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरोभिः सर्वमिदं जगत् ॥ मोहित नाभिजानाति मामेभ्यःपरमव्ययम् ॥१३॥ १४ भगवद्गीता। [अध्याय:- इन तीनों गुणमय भावोंकरके मोहितं यह सँ जगत् इनसे पर अविनाशी येरेको नहीं जानता है ॥ १३॥ दैवी होषा गुणमयी मम मा दुरत्यया ॥ मामेवं ये प्रचंते मायामेती तरंतिते ॥१४॥ जिसंवास्ते कि, यह गुणमयी दैवी याने मेरे संबंधिनी मेरी माया दुरत्यय है इसीसे जो मेरे शरण होतेहैं वे इसे मायाको तरतेहैं॥१४॥ न माँ दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यते नराधमाः॥ माययापहृतंज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥ १५॥ मायाकरके हरागयाहै ज्ञान जिनका ऐसे मनुष्य के असुरनके धर्म- को प्राप्तहोरहे निंदित कर्मकरनेवाले नरनमें अधम मूर्ख मेरेको नहीं भजतेहैं ॥ १५॥ चतुर्विधा भजते. मी जेनाः सुकृतिनोऽर्जुन ॥ जिज्ञासुंरार्थी ज्ञानी च भैरतर्षभ ॥ १६ ॥ तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ॥ प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहंचे सैं च में प्रियः॥१७॥ हे अर्जुन ! एकप्रकारके जो संसारसे दुःखी दूसरे जाननेकी इच्छा करनेवाले तीसरे धनादिक चाहनेवाले और चौथे ज्ञानी याने स्वरूप- ज्ञाता ऐसे चार प्रकारके सैंकृती जेन मेरे को भेजतेहैं. हे भरतर्षभ। तिनमें ज्ञानी नित्ययोगयुक्त मेरी मुख्यभक्तिवाला श्रेष्ठं है कारण कि, ज्ञानीके "मैं अत्यंत प्रियहूं और "सो मेरे अतिशय प्रिय है।॥ १६॥१७॥ उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव में मतम् ॥ आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवाजुत्तमांगतिम्१८॥ वे सर्व ही उदार हैं तो भी ज्ञानी आत्माही मेरेको पुत्रवत् प्रियहै, सप्तमः ७.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (९७) ऐसा मेरा अभिप्राय है कारण कि, वह मेरेहीमें चित्तको युक्तकिये भये सर्वोत्तम गति मेरेही को ध्यावताहै ॥ १८॥ बहूनां जन्मनामते ज्ञानवान्मी प्रपद्यते ॥ वासुदेवः समिति से महात्मा «दुर्लभः॥ १९॥ अनेक जन्मोंके अंतमें सर्वजगत् वासुदेवरूप है ऐसे ज्ञानवान होताहै याने वासुदेवात्मक जानिके ईर्षादिरहित होताहै तब मेरेको भजताहै सो महात्मा अति दुर्लभ है याने कोट्यावधीनमें कोईएक होता है ॥ १९॥ कामैस्तैस्तैहतंज्ञानाः पद्यतेऽन्यदेवताः ॥ तं नियममास्थार्य प्रेकृत्या नियताःस्वया ॥२०॥ दूसरे सर्व तो आपकी राजस तामस प्रकृतिकरके राजस तामस काँमें लगेभये उनउँन कामनोंकरके नष्टज्ञानभयेहुये उनउन पु- त्रादिनिमित्त नियमोंको धारणकरके अन्यदेवोंको भजते हैं ॥२०॥ यो यो यायों तनुं भक्तैः श्रद्धयाचितुमिच्छति ॥ तस्य तस्याचलां श्रद्धांतामेव विदधाम्यहम् ॥ २१ ॥ से तया श्रद्धया युक्तस्तस्यारीधनमीहते ॥ लभते चै ततःकामान्मयैव विहितीन्हितान् ॥ २२ ॥ अंतवत्तुं फैलं तेषों तैद्भव॑त्यल्पमेधैसाम् ॥ देवान्देवयजो यौति मद्भक्ता यौति मौमपि ॥ २३ ॥ " तदेवाग्निस्तत्सूर्यस्तदुचंद्रमाः" इत्यादि श्रुतिनके अर्थको खुलासा करनेवाली जो “ यस्यादित्यः शरीरं" इत्यादि श्रुतिनके मर्थरूप इन श्लोकोंकरके अन्य देवतोंको भी भगवान आपहीके शरीरभूत दिखातेहैं. जैसे कि, जोजो भक्त जिस जिस इंद्रादिरूप मेरे (९८) भगवद्गीता । [अध्यायः-- शरीरको श्रद्धाकरके अर्चनेको चाहताहै उसउस भक्तंको मैं वही अचले श्रद्धी धारणकरातीहूं "सो भक्त उसी श्रद्धीकरके युक्त उसी इंद्रादिरूप मेरी सूर्तिका आराधन करताहै. और उसीसे मेरे ही करके नियमित कियेभैये हित कॉमनोंको प्राप्तहोताहै; परंतु उनै अल्पबुद्धिनके वह फैल नाशवान होता है. जैसे कि, इंद्रादिदे- व पूजेनेवाले इंद्रादि देवीको प्राप्तहोतेहैं मेरे भैंक्त निश्चय में रेको प्राप्त होते हैं॥२१॥२२॥२३॥ अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यते मामबुद्धयः॥ परंभावमजानंतो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ २४ ॥ मेरे अविनाशी सर्वोत्तम. परस्वरूपको न जाननेवाले मूर्खलोग जो मैं सर्वके हृदयमें मूर्तिमान प्राप्त तिस मेरेको अव्यक्त याने अमू- ति मानतेहैं. तात्पर्य इसीसे अन्यदेवोंको भजते हैं ॥२४॥ नहिं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।। मूढोऽयं नौभिजानाति लोको मामेजर्मव्ययम् ॥२५॥ यहां न जाननेका कारण कि, योगमायाकरके आच्छादित में खर्वको दीखता नहीं हूं इसीसे यई मुर्ख जन अजन्मो अविनाशी धेरे को नहीं जानता है ॥२६॥ वेदोहं समंतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ॥ भविष्याणि च भूतानि मी तुं वेदै नै फैश्चन ॥२६॥ हे अर्जुन ! मैं जो प्रथम भये उनको और हैं तिनको और होयंगें उन सर्वभूतप्राणीमात्रोंको जानताहूँ, परंतु मेरेको कोई भी नहीं मानताहै ॥२६॥ इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वंमोहेन भारतं ॥ सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यांतिपरंतप ॥२७॥ .
- सप्तमः ७.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (९९) हेभारत । हेपरंतपै ! इच्छा और द्वेषकरके उत्पन्नभये सुख दुःख लाभ भलाभादि द्वंद्वरूप मोहकरके सर्वभूतप्राणिसंसारमें मोहको प्राप्त होतेहैं। येषां त्वंर्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ॥ ते इंद्रमोहनिर्मुक्ता भजते मी इंढवताः॥२८॥ और जिन पुण्यकर्मवाले मनुष्योंकों पापं नाशको प्राप्तभयारे, में बंद्रमोहसे छुटेभये दृढव्रती मेरेको भजते हैं ॥२८॥ जरामरणमोक्षाय मांमाश्रित्य यतंति ये ॥ ते'ब्रह्म तँद्विदुः कृत्स्नमध्यात्म कर्म चौखिलम्॥२९॥ जो मेरे आश्रितहोके जरामरण छूटनेके वास्ते यत्नेकरतेहैं वे उस ब्रहाँको और सवै अध्यात्मको सर्व कर्मको जानतेहैं इन ब्रह्मश- ब्दादिकोंका खुलासा आठवें अध्यायमें होगा ॥२९॥ साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ॥ भैयाणकालेपि च मी ते विर्युक्तचेतसः॥३०॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योग शास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः॥७॥ जो मेरेको अधिभूत और अधिदेवसहित और अधियज्ञसहित जानतेहैं वे मनुष्य ही मेरेमें नित्य चित्तलगायेभये मरणकालमें भी मेरे को जानतेहैं ॥३०॥ इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिता- यां श्रीगीतामृततरंगिण्यांसप्तमोऽध्यायप्रवाहः ॥७॥ अर्जुन उवाच। किती किंमध्यात्म कि कर्म पुरुषोत्तम ॥ .
(१००) भगवद्गीता। [अध्याय:- अधिभूतं चे कि' प्रोक्तंमधिदैवं किमुच्यते॥१॥ जो सातवें अध्यायमें कहा था कि, जो जरामरणसे मुक्त होनेके वास्ते मेरा आसरा करके यत्न करतेहैं वे उस ब्रह्मको तथा सर्व अध्यात्मको और सर्व कर्मको जानते हैं इत्यादि मुनिके अर्जुन कृष्णसे पूंछते हैं कि, हे पुरुषोत्तम ! जो आपने कहा वह ब्रह्म कौन है, अध्यात्म कौन है, कम क्याहै और अधिभूत कौन कहता है और अधिदेव कौन कहाँताहै ! ॥१॥ अधियज्ञः कथं कोऽत्रं देहेऽस्मिन्मधुसूदन ॥ प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥२॥ हे मधुसूदन ! इसे देहमें अधिया कैसेभया और कौन है और इसलोकमें मरणकालमें जिसने मन जीताहै उसकरके कैसे जाने- नेमें आतेहो।॥२॥ श्रीभगवानुवाच । अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ॥ भूतभावोद्भवको विसँगः कर्मसंज्ञितः॥३॥ ऐसे अर्जुनके वचन सुनिके श्रीकृष्णभगवान् बोले कि, परहे प्रकृति जिससे याने प्रकृतिमुक्त जो अक्षर याने मुक्तजीव सो ब्रह्म है स्वभाव अध्यात्म कहाँताहै जो सर्व भूतप्राणिनकी उत्पत्ति करने वाला विसर्ग याने सृष्टि सो कर्मसंज्ञक है ॥३॥ अधिभूतं क्षरोभावः पुरुषश्चाँधिदैवर्तम् ॥ अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतावर ॥४॥ जो क्षर भावे याने नाशवान् देहादिक सो अधिभूतहै और पुरुष जो सूर्यमंडलवर्ती मेराही एकरूपे सो अधिदैवत है. हे देहधारिनमें श्रेष्ट अर्जुन। इस देहेमें अधियझें मैं ही हूं याने जीवका पूज्य मैं हूं ॥४॥ - १२.१३ अष्टमः ८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१०१) अंतकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ॥ यःप्रेयाति से मद्भौवं याति नौस्त्यत्र संशयः॥५॥ और जो पुरुष अंतसमयमें मेरे हीको सुमिरतासुमिरता देहको त्यांगिके इसलोकसे जोताहै सो मेरी समताको प्राप्तहोताहै यहाँ संशय नहीं ॥५॥ यं यं वापि स्मरन् भाँव त्यजत्यंते कलेवरम् ।। ततमे वैति कौंतेय सर्दा तद्भावभावितः॥६॥ जो मेरा सदा और अंतकालहीमें स्मरण करतेकरते शरीर त्यागे सो तो मेरेहीको पावै. अथवा जो जो भाँव याने वस्तु अथवा कोई प्राणीको सुमिरतासुमिरता सदा उसीमें लवलीन भयाआ अंतमें 'देहको त्यागता है, सो हे कुंतीपुत्र ! उसी उसीको ही प्राप्तहोताहै ॥६॥ तस्मात्सर्वेषु कालेषु मॉमनुस्मर युद्धय च ॥ मय्यर्पितमनोबुद्धिीमेवैष्यस्यसंशयः ॥७॥ तिससे सर्व कालमें मेरेको सुमिरो और युद्धको ऐसे में रेमें मन शुद्धिको लगायेभये मेरे हीको पावोगे, इसमें संदेह नहीं ॥७॥ अभ्यासयोगयुक्तेन चैतसा नाऽन्यगामिना । परमं पुरुषं दिव्यं योति पार्थानुचितयन् ॥ ८॥ हे पृथापुत्र ! सदा अभ्यासयोगयुक्त आत्मस्वरूपविना दूसरेमें नहीं जानेवाला ऐसे चित्तकरके मेरा चितवन करताकरता देदीप्यमान अति- उत्तम ऐसा जो परमपुरुष मैं उस मेरेको प्राप्त होताहै ॥ ८॥ कैवि पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ॥ सर्वस्य धातारमचिंत्यरूपमौदित्यवर्णं तैमसःपर- (१०२) भगवद्गीता। [अध्याय:- स्तात् ॥ ९॥ प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्यायु तोयोगबलेन चैव ॥ध्रुवोर्मध्ये प्राणवेिश्यसम्य सतं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १० ॥ जोकोई भक्तिकरके युक्त पुरुष मरणसमयमें अचेल मनकरके और योगवर्लंकरके भौंहोंके मध्यमें निश्चल अच्छीतरहसे प्राणोंको प्रवेशकरके अर्थात् कुंभककरके जो सर्वज्ञ, पुरातन, सर्वका शिक्षक, सूक्ष्मसे सूक्ष्म, सर्वको पालनेवाला, नहीं चितवनमें आताहै रूपै जिस- का, सूर्यसरीखा प्रकाशमान जो पुरुष और प्रकृतिसे पर उसको सुमि- रताहै सो उँस पैरे देदीप्यमान पुरुषको प्राप्तहोताहै ॥९॥३०॥ चैदक्षरं वेदविदो वदंति विशति यधर्तयो वीतरागाः ॥ यदिच्छं तोब्रह्मचर्य चरति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये११ वेदके जाननेवाले जिसको अक्षर कहते हैं, वीतराग ईश्वरप्राप्तिका पत्न करनेवाले जिसको प्राप्तहोतेहैं, जिसको चाहनेवाले बालाचर्यको आचरतेहैं, उस पर्दैको तुम्हारेसे संक्षेपैकरके कहूंगा ।। १३॥ सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हँदि निरुंध्य च ॥ सूटयांधायात्मनः प्राणमौंस्थितो योगधारणास् ॥१२॥ ओमित्येकाँक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मौमनुस्मरन् । यः याति त्यजेन्देहं से याति पैरमा गतिम् ॥ १३॥ जो योगी देहेको त्यागतात्यागता सर्व इंद्रियोंकों संयममें करके और हृदयमें मनको रोकेके आपके प्राणों को मस्तकमें चढीयके योगधार में थिर भयाआ 'ॐ' इसे एकअक्षर मका उच्चारण करताकरता मेरेको सुमिरतीसुमिरता देहत्यागिके जोताहै सो अतिउत्तम गतिको प्राप्तहोती है ॥ १२ ॥ १३॥ ।'- अष्टमः ८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१०३) अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः॥ तस्याहं सुलभैः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ १४॥ हे पृथापुत्र। जो अनन्यचित्त मेरेको नित्य निरंतर सुमिरताहे उस नित्य मेरे संयोग चाहनेवाले योगी को "मैं सुलभ हूं ॥१४॥ मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ॥ नाप्नुवंति महात्मानः संसिद्धि परमां गताः ॥१५॥ यहांसे अध्यायसमाप्तिपर्यंत ज्ञानी जो कैवल्यार्थी उसकी मुक्ति और ऐश्वर्य चाहनेवालेकी पुनरावृत्ति कहतेहैं सो ऐसे कि, जो मेरी उपासनारूप परमसिद्धिको प्राप्तभयेहैं वे महात्माजन मेरेको प्राप्त होके फिर दुःखका घर नाशमान जन्मेको नहीं प्राप्तहोतेहैं ॥ १५ ॥ आब्रह्मभुवेनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ॥ मामुपेत्य तु कौंतेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥१६॥ हे अर्जुन । ब्रह्मलोकपर्यंत सर्वलोक, पुनरावर्ती है और हे कुंती- पुत्र ! मेरेको प्राप्तिहोके फिर जन्म नहीं होतीहै ॥ १६॥ सहस्रयुगपर्यंतमहयद्रह्मणो विदुः ॥ रात्रि युगसहस्रांतांतें होरात्रंविदो जनोः ॥ १७ ॥ ब्रह्मलोकपर्यंत पुनरावृत्ति देखनेको ब्रह्माके दिनरात्रिका प्रमाण दिखातेभये उसको जाननेवालोंकी श्रेष्ठता कहतेहैं जो ब्रह्माका हजार चतुर्युगीपर्यंत दिर्ने और हजार चतुर्युगीपर्यंत त्रिको जानते वे मनुष्य दिनरातिके जाननेवाले हैं, याने दीर्घदर्शी हैं ॥ १७॥ अव्यक्ताईयक्तयः सर्वाः प्रेमवंत्यहरागमे । राागमे प्रलीयते तत्रैवायंक्तसंज्ञके ॥ १८ ॥ दीर्वदर्शित्व दिखातेहैं सो ऐसे कि, ब्रह्माके दिनके आगममें ब्रह्माके (१०४) भगवद्गीता। [अध्याय:- शरीरसे सर्व जीवोंके शरीर होते. रात्रिके आगममें उसी ब्रह्माके शरीरमें लीनेहोतेहैं ॥ १८॥ भूतामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ॥ रांच्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहीँगमे ॥ १९ ॥ हे पृथापुत्र ! सोई यह भूतप्राणीसमूह कर्मपरवशं भया हुआ सदा ढह के रात्रिके आगममें लीन होताहै, दिनके आगममें उत्पन्न होताहै ॥ १९॥ परस्तस्मात्तुभांवोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तीत्सनातनः॥ यःसे सर्वेषु भूतेषु नयत्स्वपि नैं नश्यति ॥२०॥ उसे ब्रह्माके जडप्रकृतिशरीरसे श्रेष्ठं और जो अव्यक्त सनातन भाव है याने शुद्धचेतन है सो से आकाशादि और शरीर नष्टदोने- से भी नहीं नष्टहोताहै ॥२०॥ अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ॥ यं प्राप्य नै निवर्तते तैद्धाम परमं मम ॥२१॥ वह अव्यक्त अक्षर ऐसे कहाहै 'कूटस्थोऽक्षर उच्यते' उसको परम गति कहतेहैं जिस शुद्धरूपको प्राप्तहोके नहीं जन्मतेहैं वह मेरौं अर्वोत्तम धाम है, याने जैसे प्रकृति में मेरा शरीर है और जीवभी मेरा शरीर है परंतु जेसे सर्व घर किसी पुरुषका है उसमें निजमंदिर श्रेष्ठहो- खाहै तैसे जीवकृतिमें और मैं जीवमें रहताहूं: इससे वह मेरा मुख्य- शरीर है. यह कैवल्यमुक्ति कही, अब ऐश्वर्य प्राप्ति कहतेहैं ॥२१॥ पुरुषः से पैरः पार्थ भैक्त्यालेभ्यस्त्वनन्यया ॥ यस्यांतानि भूतानि येन सर्वमिदं तेतम् ॥२२॥ हे पृथापुत्र ! ये सर्व भूतप्राणि जिसके अंतस्थ हैं और यह सर्व
मष्टमः ८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१०५)
मगर जिसकरके विस्तरितहै 'सो पैर पुरुष याने परमात्मा अनन्य-
भक्ति करके प्राप्तहोने योग्यहै ॥२२॥
यंत्र कालेत्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः॥
प्रयाता यांति त कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥ २३ ॥
हे पुरुषनमें श्रेष्ट ! जिस कालमें देहत्यागिके गर्येभये योगी अना-
वृत्तिको और आवृत्तिको जोतेहैं उस कालको मैं कहतीहूं ॥ २३ ॥
अग्निज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ॥
तत्रं प्रयाा गच्छंति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥२४॥
जिसकालमें अग्नि प्रकाशक है तथा दिन शुक्लपक्षहै ऐसे छ महीने
उत्तरायण उसमें गये भये ब्रह्माज्ञोनी जनै ब्रमको प्राप्तहोतेहैं ॥२४॥
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ॥
तत्रं चांद्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥ २५ ॥
जिसकालमें धूम गति तथा कृष्णपक्ष छमहीने दक्षिणायन
इसमें गया या योगी चांद्रमेस ज्योति को याने स्वर्गपायके यज्ञादि
फलभोगिके फिर यहाँ जन्मलेतीहै ॥२५॥
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतःशार्श्वते मते ॥
एकया यात्यनाईत्तिमन्ययावतते पुनः॥ २६ ॥
ये शुक्लकृष्ण मार्ग जगत्के सनातन नियमितहैं एककरके
झुक्तिको जोताहै दूसरेकरके फिर जन्मतो है ॥२६॥
नैं ते मृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ।।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुनं ॥ २७ ॥
हे पृथापुत्र ! इन मार्गोको जानतांभया कोईभी योगी नहीं मोह-
ताहे. हे अर्जुन । तिससे सर्व कालमें योगयुक्त हो ॥२७॥
. (१०६) भगवद्गीता। [अध्यायः वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ॥ अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी पर स्थानk पैति चाद्यम् ॥२८॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योग शास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्मयोगोनाम अष्टमोऽध्यायः॥८॥ मनुष्य इसको जोनिके फिर जो पुण्यफल वेदाध्ययनमें, यईमें, तपैमें और दान में कहा है उसे सवैको अतिक्रमणकरताहै याने उससेभी अधिकफल पाताहै, फिर योगी होके सर्वोत्तम आदिस्था- नको पाताहै, याने मुक्तहोताहै ॥२८॥ इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां श्रीगीतामृततरंगिण्यामष्टमोऽध्यायप्रवाहः ॥ ८॥ इदं तु तेगुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूर्यवे ॥ ज्ञान विज्ञानसहितं य॑ज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेंऽ भात् ॥ १॥ सप्तम और अष्टम अध्यायोंमें आपकी स्वरूपप्राप्ति भक्तिहीसे कही है. अब नवममें आपका सर्वोत्तम प्रभाव और भक्तिका भी प्रभाव कह- तेहैं सो ऐसे कि, हे अर्जुन ! यह अतिगुप्तकरनेयोग्य विज्ञानसहित ज्ञानको असूया जो पराये गुणमें दोष लगाना उसकरके रहित जो तुम तिनसे कहूंगा। जिसको जानिके संसारदुःखसे छूटोगे ॥ १॥ राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ॥ प्रत्यक्षावगमं धर्म्य सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥२॥ यह भक्ति ज्ञान विद्या और गोप्यवस्तुनमें सर्वोत्तम पवित्र अतिउत्तम 1
'नवमः ९.] सान्वय-अमृततरंगिणी मा०टी०। (१०७)
प्रत्यक्षफलरूप धर्मयुक्त करनेकोभी अतिसुगम और अविनाशी है।।२।।
अश्रद्दधानाः पुरुषां धर्मस्यास्य परंतप ॥
अप्राप्य मां निवर्तते मृत्युसंसारवमनि ॥३॥
हे परंतप अर्जुन ! इस धर्मसंबंधी श्रद्धाको न धारणकरनेवाले पुरुष
मेरेको प्राप्तभयेविना मृत्युरूपसंसारमार्गमें फिरतेरहतेहैं ॥३॥
मयाँ ततमिदं सैव जंगदव्यक्तमूर्तिना॥
मंत्स्थानि सर्वभूतानि नै चहि तेववस्थितः॥ ४ ॥
न – मत्स्थानि भूतानि पैश्य में योगमेश्वरम् ॥
भूतभृन्त्रं च भूतस्थो मैमात्माँ भूतभावनः ॥५॥
यह सर्व जगत् अतिसूक्ष्म अंतर्यामीरूंप मेरे करके व्याप्त है।
इससे सर्वभूतप्राणी मेरे स्वाधीन हैं और मैं उनमें नहीं स्थित
याने उनके स्वाधीन नहींहूं और वे भूतप्राणी मेरेमें स्थित नहीं है
याने जैसे घडेमें जल तैसे नहीं हैं मेरे इश्वरसंबंधी इस योगेको देखो
भूतोंका भरने पोषनेवाला भी मेरी आत्मा याने मेरा शरीरभूत
जीवात्मा भूतोंको धारणकरनेवाला और भूतोंमें स्थित नहीं है।।४॥५॥
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ॥
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥६॥
जैसे महान् वायु नित्यही आकाशमें रहाभया मेरे आधारसे सर्व-
विचरता है तैसेंही सर्व भूतं मेरे आधार हैं ऐसे निश्चयकरो ॥६॥
सर्वभूतानि कौंतेयं प्रकृति यांति मामिकॉम् ॥
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥ ७॥
हे कुंतीपुत्र ! प्रलयकालमें सर्वभूतप्राणी मेरी प्रकृतिमें
लीन होतेहैं कल्पकी आँदिमें मैं उनको फिर अनेक प्रकारके
उत्पन्न करती हूं ॥ ७॥
(१०८) भगवद्गीता। [अध्याय:- प्रकृति स्वामवष्टभ्यं विसृजामि पुनः पुनः ॥ भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥ ८॥ अपनी प्रकृतिको आश्रयदेके प्राचीनस्वभावके वर्शसे परवंश संपूर्ण इस भूतप्राणीसमूहको वारंवार सृनती हूं ॥८॥ ने चे मां तोनि कर्माणि निबंध्नति धनंजय ॥ उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥९॥ हेअर्जुनै । जो कहोगे कि, ऐसे विषमसृष्टि सृजनेवालेको विषम- ताके वैषल्य निर्दयत्वदोष क्यों न लगेंगे तहाँ सुनो, जो मैं सृष्टयादि- ककर्म करताहूं उन काँमें असक्त और उदासीनसरीखा स्थित ऐसे मेरेको वे कर्म नहीं बंधनकरतेहैं ॥९॥ मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिःमूयते सचराचरम् ॥ हेतुनानेन कौंतेय जंगद्विपरिवर्तते ॥१०॥ हे कुंतीपुत्र ! जब मैं अध्यक्ष याने सर्वकृत्यका सम्हारनेवाला होता हूं तब मेरे करके प्रकृति चराचरंजगत्को उत्पन्नकरती है इस कारण करके जगत् उत्पन्न होताहै ॥१०॥ अवजानति मी मूढा मानुषीं तनुमास्थितम् । परंभावमनितो मैम भूतमहेश्वरमें ॥ ११ ॥ मोघांशामोधकर्माणो मोवज्ञाना विचेतसः ॥ राक्षसीमासुरी चैर्व प्रकृति मोहिनीं श्रिताः ॥ १२॥ जो राक्षसी और आसुरी आपसरीखी मोहकारक प्रकृतिको धारण कररहेहें याने ऐसे स्वभाववाले, निष्फल आशावाले, निष्फले कर्मवाले, निष्फलज्ञानवाले वे भ्रष्टचित्तै पुरुष, जो सर्व भूतोंके नवमः ९.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। . १०९) ईश्वरोंका भी ईश्वर ऐसे मेरे प्रभावको न जानतेभये मूर्ख अति: करुणासे मनुष्यरूप शरीरमें स्थित मेरी अवज्ञौकरतेहैं ॥ ११॥१२॥ महात्मानस्तु मां पार्थ दैवी प्रकृतिमाश्रिताः ॥ भजत्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥ १३ ॥ हे पृथापुत्र ! दैवी प्रकृतिको प्राप्तभयेहुये महात्माजन मेरेको सर्वभूतोंका आँदि और अविनाशी जानिके अनन्यमनवाले भयेहुए मेरेही को भजतेहैं ॥१३॥ सततं कीर्तयतो माँ यतंतच दृढवताः॥ नमस्यंतश्च मौ भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥१४॥ अब महात्मनके भजनकी रीति कहते हैं जैसे कि, निरंतर मेरो कीर्तनकरतेभये और दृढसंकल्पकियेभये मेरी प्राप्तिके वास्ते पनकरतेभये और भक्तिकरके मेरेको नमस्कार करतेभये नित्य मेरे समागमकी इच्छा करनेवाले मेरी उपासना करते हैं ॥ १४ ॥ ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजतोर्मामुपासते ॥ एकत्वेनं पृथक्त्वेन बहुंधा विश्वतोमुखम् ॥ १५ ॥ और कितनेक महात्मा एकत्वकरके याने सख्यावसे और कितनेक पृथकत्व से याने दास्यभावसे ऐसे बहुर्धा याने कोई वात्सल्य और कोई शृंगार इत्यादि भावनाकरके सर्वतोमुख याने सर्वव्यापी मेरेको इत्यादि ज्ञानयज्ञकरके पूजतेभये उपासना करते हैं ॥ १६ ॥ अहंऋतुहं यज्ञः स्वधाऽहमहंझौषधम् ॥ मंत्रोऽहंमहमेवाँज्यमहमैग्निरहं हुतम् ॥ १६ ॥ अब आपका सर्वव्यापित्व दिखातेहैं सो ऐसे कि भगवान् कह- तेहैं कि, क्रतुं याने अग्निष्टोमादिक श्रौतयज्ञ मैं हौँ, यज्ञ जो स्मात पंचमहायज्ञ सो मैं हौँ स्वधा जो पितॄनके श्राद्धादिकम सो मैं हौं .
.
,
(११०)
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
औषध याने अन्न सो मैं हौँ, मंत्र मैं हौं",आज्य याने धृत सो मैं हौं,
अनि मैं हौं, होम मैं हौं" यह निश्चय है ॥ १६॥
पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पिर्तामहः ॥
वैद्यं पवित्र मोंकार ऋक् साम यजुरेव च ॥ १७॥
गैतिर्भती प्र#ःसाक्षी निवासःशरणं सुहँत् ॥
प्रभवः प्रलयस्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥ १८॥
इस जगतका पिता, माता, धाता पितामह जो जाननेयोग्य सो
और पवित्र है सो और ओंकारे, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद इस
जगतकी गति, पालनकर्ता, स्वामी, शुभाशुभकर्मनका साक्षी, रहनेका
स्थान इच्छितवस्तु देनेवाला और अनिष्टका निवारक सुहदै उत्पत्ति
और नासँका स्थान धारणकरनेवाला अविनाशी उत्पत्तिकारण सर्व
मैं ही हौं॥ १७॥१८॥
तपाम्यहमहं वर्ष निनाम्युत्सृजामि च ॥
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसचाहमर्जुनं ॥ १९ ॥
हे अर्जुन ! अग्नि और सूर्यरूप होके मैं ही तपाताहौं, मैंही ग्री-
मादिऋतुनमें वर्षाको बंदकरताहौं और वर्षाऋतु वर्षांताहौं, अमृत
और मृत्यु और सत् और असत् मैं निश्चय हौं ॥ १९॥
विद्या माँ सोमपाः पूतपापा यज्ञैरि स्वर्गति
प्रार्थयते ॥ ते पुण्यमासाद्य सुरेंद्रलोकमश्नंति"
दिव्यान दिवि देवभोगान्॥२०॥ते तं भुक्की स्व-
गलोकं विशालं क्षीणे"पुण्ये मैंर्त्यलोकं विशति ।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्नों गतागतं कामकामा
1
लभते ॥२१॥
नवमः ९.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१११) इसतरहसे महात्मा ज्ञानिनका व्यवहार और आपका वैभव कहा अब सकाम जनोंकी रहनि रीति कहतेहैं, जैसे कि, विद्या याने ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेदोक्त इंद्रादिदेवनिमित्त यज्ञ करनेवाले सोमपान कियेभये पापरहित यज्ञोंकरके इंद्रादिरूप मेरेको आर- धिके स्वर्गकी प्राप्ति मानते हैं वे पुण्यरूप इंद्रलोकमें प्राप्तहोके वहां स्वर्गमें दिव्य देवभोगोंको भोगते हैं. फिर वे उस विशाल स्वर्गलोकको भोगिके पुण्य क्षीण होनेसे इस मनुष्यलोकमें प्राप्तहोते हैं, ऐसे" वेदत्रयीधर्मको केवल वारंवार करतेभये सकामीजैन गता- गत याने स्वर्गजाना मनुष्यलोकको आना फिर जाना फिर आना ऐसे फलको पाते हैं ॥२०॥२१॥ अनन्यौश्चितयंतो मां ये जनाः पर्युपासते ॥ तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ २२ ॥ जो मनुष्य अनन्यभयेड्डेये मेरी चितवन करते करते मेरेको भेजते हैं उन नित्य सेरे संयोग चाहने वालोंका योग जो धनादिककी और मेरी प्राप्ति क्षेम जो धनादि संरक्षण और अधुनरावृत्ति इनको मैं प्राप्तकरताहौं ॥ २२ ॥ येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ॥ तेपि मामेव कौंतेयं यजंत्यविधिपूर्वकम् ॥२३ ॥ जोकि और देवोंके भक्त उनका श्रद्धायुक्त पूजन करतेहैं वेभी मेराही पूजन करतेहैं। परंतु हे कुंतीपुत्र ! वे अविधिपूर्वक पूजन करतेहैं याने विधिपूर्वक नहीं ॥२३॥ अंहं हिं सर्वयज्ञानां भोक्तां च प्रभुरेव च ॥ नै तुं मामभिजीनंति तत्त्वेनाऽतथ्यवति तें ॥२४॥ मैं निश्चय करके सर्वयज्ञोंका भोक्तों और स्वामी भी हौं परंतुं - (११२) भगवद्गीता। [अध्यायः- वे सकामिक जन मेरेको ऐसे निश्चयकरके नहीं जानतेहैं इससे जन्म मरणको प्राप्त होतेहैं ॥२४॥ यांति देवव्रता देवाने पितॄन्याति पितॄनताः॥ भूतानियोंति भूतेज्या याति मद्यौजिनोऽपि माम५ अहो जो कहोगे कि, एकही कर्ममें संकल्पमात्रसे कैसे भेद भया तहांः सुनो जो इंद्रादिदेवनको भक्तिपूर्वक आराधते हैं तो उनहीको प्राप्त होतेहैं, पितृभक्त पितृनेको प्राप्त होतेहैं; जो कोईसे भी राजा साधू चोर इत्यादि भूत प्राणिकी सेवा संगतिकरतेहैं वे उन- हीकी समताको प्राप्त होतहैं जो मेरी भक्तिकरतेहैं वे निश्चय मेरे को प्राप्त होते हैं याने मेरी समताको पाते हैं ॥२५॥ पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो में भत्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहतमश्नौमि यतात्मनः ॥ २६॥ जो कहोगे कि, बडेनके प्रसन्न करनेको बड़े उपाय चाहिये तहाँ सुनोजो कोई पत्र, पुष्प, फैल, जल मेरेको भक्तिकरके युक्त अर्पण करताहै मैं उस शुद्धचित्तभक्तका भक्तिपूर्वक अर्पणकियेभये उठा पत्रादिक पदार्थको स्वीकार करताहौं ॥२६॥ यत्करोषि यदनांसि यज्जुहोषि ददासि यत् ॥ यत्तपस्यसि कौंतेय तत्कुरुष्व मैदर्पणम् ॥ २७ ॥ शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबंधनैः॥ संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मा९पैष्यसि ॥२८॥ हे कुंतीपुत्र ! मेरेको ऐसा सुलभ जानिके जो कुछभी तुमकरो, जो खाउँ, जो होमौ, जो देउ, जो तपकरौ उसको मेरे अर्पण किये भये करो ऐसे करतेभये जो कर्म बंधनकारक हैं उन शुभाशुभ फल काँकरके छटोगे. ऐसही इस कर्मफलअर्पण संन्यासयोगयुक्त चित्तवाले तुम मुक्त भये हुये मेरेको प्राप्तहोवोगे ॥२७॥२८॥ १ नवमः ९.] सान्वय-अमृततरंगिणीभा० टी०। संमोहं सर्वभूतेषु नै में देष्योऽस्तैि नं प्रियः॥ ये" #जति तु मां भक्त्या मैयि ते तेषु चाप्यहम२९ मैं सर्वभूतोंपर सैम हौं मेरे ने अप्रिय नं कोई प्रिय हैं. परंतु जो" मेरेको भक्तिकरके भजतेहैं वे"मेरे हृदयमें और उनके हृद- 'यमें निश्चयकरके मैं रहताहौं ॥२९॥ अपि चेत्सुदुराचारो भजते मॉमनन्यभाक् ॥ साँधुरेव स मंतव्यः सम्याव्यवसितो हि सः॥३०॥ क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वेच्छांतिं निगच्छति ॥ कौंतेय प्रतिजानीहि नै में भक्तः प्रणश्यति ॥ ३१ ॥ जो कदाचित् कोई पुरुष अतिर्दुराचारी भी होई और वह मेरेको अनन्यभाक् याने औरको न भाग देताभया सर्वत्र मेरेहीको जानिके सर्व मेरे अर्पण करताभया भजताहोय सो साधूही है ऐसे माननो चाहिये, जिससे कि वह सम्यक् निश्चय कियेहै उससे वह शीघ्रही धर्मात्मा होयगा और मोक्षहीको प्राप्तहोयगा. हे कुंतीपुत्र ! तुम यह निश्चय जानो कि, मेरों भक्त नहीं नाशको पावताहै याने मुक्तही होताहै ॥३०॥३१॥ मौ हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयो- नयः ॥ स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रौस्तेपि" याति पैरों गतिम् ॥ किं पुनब्राह्मणोंः पुण्या भक्तों राजर्षयस्तों ॥ अनित्यमसुखं लोकमिम प्राप्य भजस्वं मौम् ॥ ३२ ॥३३॥ है पृथापुत्र । निश्चयपूर्वक मेरेको आश्रय करके जो पापयोनी भी होय तथा स्त्री शुद्र वैश्य वे भी उत्तम मोक्षको जाते हैं. जो पवित्र ८ ::: (.११४) भगवद्गाता। [ अध्याय:- नाह्मण तथा क्षेत्रिय भक्त हैं उनकी मोक्षको फिर क्या शंकाहै ? इससे अनित्यै दुःखरूप इस लोकको पाँइके मेरेको भेजो ॥३२॥ ३३ ॥ मन्ना भई मद्भक्तो मयाजी मां नमस्कुरु ॥ मामेवैध्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥३४॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रहाविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे राजविद्यारा- जगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः ॥९॥ भजनरीति यह कि, मेरेहीमें मनको युक्त कियेभये रहो मेरेही भक्त मेराही पूजन करनेवाले होउँ, मेरेहीको नमस्कार करो ऐसे मेनको मेरेमें युक्तकरके मेरेही पैरायण अयेहुये मेरेही को प्राप्तहोवोगे ॥३४॥ इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायो श्रीगीतामृततरंगिण्यां नवमोऽध्यायप्रवाहः ॥९॥ सप्तमादिक तीनों अध्यायोंमें श्रीकृष्णजीने आपका भगवत्तत्त्व मोर विभूति वर्णन की. जैसे कि, सप्तममें “ रसोहमप्सु कौंतेय" इत्यादि, अष्टममें “ अधियज्ञोऽहमेवात्र " इत्यादि, नवममें “अई तुः" इत्यादिकरके संक्षेपसे कहीं. उनको और भक्तिकी आव- श्यकता अब दशमाध्यायमें विस्तारसे कहते हैं। श्रीभगवानुवाच । भूय एव महाबाहो शृणु में परमं वर्चः॥ यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥१॥ श्रीकृष्णभगवान् कहतेभये कि, हे महाबाहो मेरी सर्वोत्तम शाक्यं फिर भी मुंनो; जो वाक्य प्रीतियुक्त जो तुम तिन तुमसे तुम्हारे हितके वास्ते में कहताहौं ॥१॥ .
दशमः १०.] सान्वय-अमृततरंगिणी.भा० टी० । ( ११५) नं में विदुःसुरंगणाः प्रभवं ने महर्षयः॥ अंहमादिर्हिदेवानामहर्षीणांचे सर्वशः ॥२॥ मेरो जन्मभैया ऐसा न देवता न मही जानते हैं। कारण कि, मैं देवनकों और सर्व महर्षिनकामी ऑदि हौं ॥२॥ योमोमजमनादि चं वेत्ति लोकमहेश्वरम् ॥ असंमूढः सं मत्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥३॥ जो मेरेको अजन्मा और अनादि लोकमहेश्वर जानता है सो मनुष्योंमें ज्ञानी है और सर्वपापोंकरके छुटाहै ॥३॥ बुद्धिनिमसंमोहःक्षा सत्यं दमःशमः ॥ सुखं दुःखं भवो भावो भैयं चाभयमेव च ॥४॥ अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः । भवंति भावों भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥५॥ बुद्धि, ज्ञान, अव्याकुलता, क्षमा, सत्य, दर्म, शम, सुख, दुःखे, उत्पत्ति, नौश, भय और अभयभी और अहिंसा, समता, संतो, तप, दान, यश, अयशैं ये न्यारे न्यारे भूतोंके भाव मेरेहीसे होते हैं ॥४॥५॥ महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ॥ मदावा माना जाता येषां लोक इमाः प्रजाः॥६॥ सात महाऋषी याने मरीचि वसिष्ठादिक महाऋषि चार इनके भी पूर्वज याने सनकादिक ऋषि तथा चौदह मनु मेरे संकल्पज मन इच्छा प्रमाणं उत्पन्नहोतेभये जिनके लोकमें ये प्रजा हैं ॥६॥ एती विभूति योगं च ममं यो वेत्तिं तत्त्वतः॥ सोऽविकपन योगेनै युज्यते नात्र संशयः ॥७॥ जो पुरुष मेरी महर्षी इत्यादिकोंकी उत्पत्तिरूप इस विभूतिको २७
(११६)
मगवद्गीता।
[ अध्याय:-
और कल्याणगुणादिरूप योगको तत्त्वसे जानती है सो अचलें भक्तियो-
गकरके युक्तहोताहै इसमें संशय नहींहै ॥७॥
अंहं सर्वस्य प्रभवो मत्तःसर्वे प्रवर्तते ॥
इति मत्वा भेजते माँ इंधा भावसमन्विताः॥८॥
मैं सर्वको उत्पतिस्थान हौं मेरेसे सर्व प्रवर्तहोताहै ऐसा मेरेको
मानिके भावसंयुक्त ज्ञानीजन मेरेको" भजतेहैं ॥८॥
मच्चित्ता मद्दतप्राणा बोधयंतः परस्परम् ॥
कथयंतश्च मां नित्यं तुष्यंति च रैमति च ॥९॥
उनका भजन प्रकार यह कि, मेरेहीमें जिनका चित्त है श्वासो-
च्यासपर मेरा स्मरण करते रहते हैं. परस्पर एक दूसरेको उपदेश
करते ये निश्चयपूर्वक मेरेको याने मेरेही गुणगणनको कहते
कहते निरंतर संतुष्ट होतेहैं और मेरी करीभई क्रीडा करने
लैंगतेहैं ॥९॥
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ॥
ददामि बुद्धियोगं ते येन॑ मौमुपयाति ते ॥१०॥
ऐसे वे निरंतर मेरे संगी मेरेको प्रीतिपूर्वक भजनेवाले तिनको उसे
बुद्धियोगको देताहौं कि, जिसकरके वे मेरेको प्राप्त होते हैं ॥१०॥
तेषामेवानुकंपार्थमहेमज्ञानजं तमः॥
नोशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वंता ॥ ११ ॥
उनहींकी दयाके वास्ते उनकी मनोवृत्तिमें रहाभैया में प्रकाशित
ज्ञानरूप दीपकरके उनके अज्ञानजन्य तिमिरंका नाशकरताहौं ॥११॥
अर्जुन उवाच।
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ॥
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवम विर्भुम् ॥ १२ ॥
दशमः १०.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (११७)
बहुस्त्वामृषयः सर्वे देवषिर्नारदस्तथा ॥
असितो देवलो व्यासःस्वयं चैव वीषि में ॥१३॥
ऐसे श्रीकृष्णजीके वाक्य सुनिके अर्जुन बोले कि, आप परब्रह्म
हो श्रेष्ठप्रभाव हो परम पवित्र हो; सर्व ऋषिजन आँपको अविनाशी
दिव्य पुरुष औदिदेव अंजन्म व्यापक ऐसे कहतेहैं, वे ये जैसे कि,
देषि नारद तथा असित देवल व्यास और आप भी "मेरेसे
कहतेहो ॥ १२॥ १३॥
सर्वमेततं मन्ये यन्मां वदसि केशवं ॥
न हि ते" भगवन व्यक्ति विदुर्देवा ने दानवाः ॥१४॥
हे केशव ! जो 'मेरेसे कहतेहो यह सर्व सत्य मानर्ताहौं, कार-
अंकि, हे भगवन् ! तुम्हारी उत्पत्तिको नै देवता जानतेहैं में दानव
जानतेहैं ॥१४॥
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ॥
भूतभावनं भूतेश देवदेर्वं जगत्पते ॥ १५॥
हे पुरुषोत्तम । हे भूतभावन । हे भूतेश ! हे देवदेव । हे जगत्पते ।
भाप आँपको आपहीकी बुद्धि से ओपही जानतेहो ॥१५॥
तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः॥
घाँभिविभूतिभिर्लोकानिमास्वं व्याप्य तिष्ठसि॥१६॥
जो दिव्य औपकी विभूती हैं उनको समग्रतासे कहनेको योग्य हो
कारण कि, जिन विभूतिनकरके इन लोकोंमें आँप व्योपिके
रहेहो ॥१६॥
कथं विद्यामहं योगी त्वांसापरिचितयन् ।।
केषु केषु च भावे) चिंत्योसि भगवन्मया ॥१७॥
(११८)
भगवद्गीता।
[अध्यायः-
मैं भक्तियोगयुक्तभयाहुँआ आपको सर्दा घ्यावतामयों कैसे जानों.
और हेभगवन् ! आप मेरेकरके कौन कौनसे सैंपोंमें ध्यावनयो-
ग्य हो॥१७॥
विस्तरेणात्मनो योग विभूतिं . जनार्दन ।
भूयः कथंय तृप्तिर्हि शृण्वतोनास्ति में तम्॥१८॥
हे जनार्दन ! आपको प्राप्ति उपाय और विभूति याने वैभव सोवि-
स्तारसे फिर कहो. याने संक्षेप कहा अब विस्तार कहो क्योंकि, इस
अमृतरूप माहात्म्यको सुनते सुनते मेरे तृप्ति नहीं होतीहै ॥ १८॥
श्रीभगवानुवाच ।
इत ते कथयिष्यामि दिव्या हात्मविभूतयः॥
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ट नास्त्यंतो"विस्तरस्य मे॥१९॥
ऐसे सुनिके भगवान् बोले कि हत याने हे अर्जुन ! तुम्हारेसे दिव्य
पसे विभूतिनको प्रधानतासे याने मुख्य मुख्य कहाँगा क्योंकि,
क्षेरुश्रेष्ठ ! मेरे विस्तारका अंत नहीं है ॥ १९॥
अहात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः॥
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामत एव च ॥२०॥
हे गुडाकेश ! सर्वभूतोंके अंतःकरणमें रहोगया मैं सर्वभूतोंका
अंतर्यामी हौं और मैंही आदि और मध्य और अंतभी हौं, अब
यहाँसे मैं मैं कहते जायंगे यहां ऐसा अर्थ करना कि, जैसे आदित्य-
नमें विष्णुनाम आदित्य में हौं ऐसे कहनेसे यह भया कि, विष्णु :
आदित्य मेरी श्रेष्ठ विभूति है याने उसमें मेरी शक्ति जादा है ऐसाही
जहां मैंही हौं शब्द आवै तहां समझना विशेष गीतावाक्यार्थवो-
धिनी टीकामें मैंने लिखाहै वहां श्रुतिस्मृतिनका भी प्रमाण दियाई सों
देखलेना ॥२०॥
, दशमः १०.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी (११९), आदित्यानाम, विष्णुंज्योतिषां रविरंशुमान् ॥ मरीचिमरूँतामस्मि नक्षत्राणामह शंशी ॥ २१ ॥ बादश आदित्यनमें विष्णुनाम आदित्य मैं ही, ज्योति में किर- जवंत सूर्य उनचास मरुतनमें मरीचिमरूद नक्षत्रोंमें चंद्रमा मैं हौं ॥२१॥ वेदानां सोमवेदोऽस्मि देवानाममिं वासवः ॥ इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥ २२ ॥ वेदनमें सामवेद है, देवनमें इंद्र हैं। और इंद्रियों में मर्न हौं मृतप्राणिनमें चेतना हों" ॥२२॥ रुद्राणां शंकरश्चास्मि वित्तेशी यक्षरक्षसाम् ॥ वसूनां पावकश्चास्मैि मेरुः शिखरिणामहम् ॥ २३ ॥ रुद्रनमें शंकर हौ और यक्षराक्षसोंमें कुबेर, और अष्टवसुनमें अग्नि शिखरवालोंमें मेरुपर्वत में हो ॥ २३ ॥ पुरोधसां चं मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् सेनानीनामहं स्कंदः सरसामस्मि सागरः ॥ २४ ॥ हे पृयापुत्र! पुरोहितनमें मुख्य बृहस्पति मेरेहीको जानो और खेना, पतिनमें कार्तिकस्वामी, सरोवरनमें समुद्र में ही हो ॥२४॥ महर्षीणां भृगुरहं गिरामभ्येकमक्षरम् ।। यंज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥ २५ ॥ महर्पिनमें भृगु, वाक्यनमें एक अक्षर याने "ओम्" मैं हौं यज्ञ- नमें जपयज्ञ, स्थावरोंमें हिमाचल हौं ॥२५॥ अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।। गंधर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कैपिलो मुनिः ॥ २६ ॥ .
(१२०)
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
सर्वक्षनमें पीपैर और देवपिनमें नारद, गंधर्वनमें चित्ररथ
सिद्धनमें कैपिलसुनि हौं ॥२६॥
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि मामतोद्भवम् ॥
ऐरावतं गजेंद्राणां नराणां च नराधिपम् ॥ २७॥
घोडोंमें अमृतसे उत्पन्न उच्चैःश्रवाको, हाँथिनंमें ऐरावतको और
मनुष्योंमें राजा मेरेहीको जानो ॥२७॥
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक
प्रजनश्चीस्मि कंदर्पः सणामस्मि बासुकिः ॥२८॥
आयुधर्नमें वैत्र, धेनुनमें कामधेनुं मैं ही उत्पत्तिकारक काम:
हौं और एकशिवाले सर्पलमें वासुकीसर्प मैं हो ॥२८॥
अनंतश्चास्मि नागानां वरुणो यांदसार्महम् ॥
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥ २९॥
और अनेक शिरवाले सपोंमें शेषजी मैं हौं, जेलजीवनमें मैं वरुण
पिर्तृनमें अर्थमा और शासनकरनेवालोंमें मैं यम हौं ॥ २९॥
गद्वादश्वास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ॥
ट्रगाणां च पैगेंद्रोऽ'हवैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥ ३०॥
बयन प्रेहाद हौं और अनर्थकारककी गनतीकारकोंमें मैं काल
में और मगोंमें मैं" "हौं और पक्षि में गरुड हौं ॥३०॥
पंवनः पवतामस्मि रोमः शस्त्रभृतामहम् ॥
झंषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥ ३१ ॥
पवित्रकारकोंमें पैवन है! शस्त्रधारीनमें रोम साक्षात् में हों, यहां
मस्त्रधारणमात्र विभूति है मच्छनमें मकर हो और प्रवाहवालोंमें श्रीभी
करथी हौं ॥३॥
. दशमः १०.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१२१) संर्गाणामांदिरंतश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ॥ अध्यात्मविद्याविद्यानां वादः अवदतीमहम् ॥ ३२ ॥ संगै जो ब्रह्माके दिवस उनमें आदि उत्पत्तिकारक और अंत प्रलय- कारक और मध्ये याने रक्षक मैं ही हौं हे अर्जुन ! सर्वविद्यानमें अध्या- स्मविद्या बादकरनेवालोंमें वाद याने सिद्धांत मैं हौं ॥ ३२ ॥ अक्षराणामकारोस्मि द्वंद्वःसामासिकस्य च ॥ अहमेवाक्षयः कालो धाताह विश्वतोमुखः ॥ ३३ ॥ अक्षरोंमें अकार हाँ समासनमें इंद्वसमास और अक्षय काल में चौतरफ मुख जिसके ऐसा सर्वनका भरनेपोषनेवाला मैं ही हौं॥३३॥ मृत्युः सर्वहरेश्वाहमुद्भवश्च भविष्यताम् ॥ कीर्तिःश्रीवा चनारीणां स्मृतिमधा धृति क्षमा॥३४॥ सर्वका हरनेवाला मृत्यु मैं और आपकी बेढती चाहनेवालोंमें उद्भव याने बढती मैं हौं - स्त्रीजनोंमें कीर्ति, श्री, वा, स्मृति, मेधी, धृति और क्षमा मैं हौं ॥३४॥ बृहत्साम तथा सोम्नां गायत्री छंदसामहम् ॥ माँसाना मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः॥ ३५ ॥ तैसे सामवेदेके मंत्रोंमें बृहत्साम, छंदोंमें गायत्रीमंत्र में हो महीनों में मार्गशीर्ष ऋतुनमें वैसत मैं हौं ॥ ३६॥ ए॒तं छलयतामस्मि तेर्जस्तेजस्विनामहम् ॥ जयोस्मि व्यवसायोस्मैि सैत्वं सत्ववैतामह ॥३६॥ छलकारिनमें जुवा तेजस्विनमें तेज मैं हौं, जीतनेवालोंमें जय हौं', निश्चयवालोंमें निश्चय, हौं उदार में उदारती मैं हौं ॥३६॥ वृष्णीनांवासुदेवोस्मिं पांडवांनां धनंजेयः॥
भगवद्गीता। - (१२२). [अध्यायः- मुनीनामप्यह व्यासः कवीनामुर्शना कैविः॥ ३७ ॥ वृष्णिवशिनमें वासुदेव यहां वसुदेवपुत्रत्व मात्र विभूति जानना पांडवमें अर्जुन तुमहो सो श्रेष्ठ विभूति हो इससे तुमभी मैं हौँ, मुनि- नमें व्यासजी मैं हौं, कवि जो शास्त्रदशी उनमें शुक्राचार्य कवि मैं हौं ॥३७॥ दंडो दमयंतामस्मि नीतिरस्मिं जिगीषताम् ॥ मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवैतामहस् ॥ ३८॥ स्ववशकर्तनमें दंड हौ, जयं चाहनेवालोंमें नीति हौ, गुप्तकर: नेके उपायोंमें मौन हौं ज्ञानिनमें मैं ज्ञान हौं ॥३८॥ यचापि सर्वभूतानां बीजं तंदहमर्जुन । न तैदस्ति विनीयंत्स्यान्मयाभूतं चराचरम् ॥ ३९ ॥ हे अर्जुनं सर्वभूतोंका जो आदिकारण है सो मैं हौं; जो चराचर भूते "मेरे विना होय सो" नहीं है ॥३९॥ नांतोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप ।। एवं तूंद्देशतः प्रोक्तो विभतेर्विस्तरो मया ॥४०॥ हे अर्जुन ! मेरी दिव्य विभूतिनका अंत नहीं है परंतु यह विभू- तिका विस्तार मैंने संकेतमात्रसे कहाहै ॥१०॥ यद्यद्विभूतिमत्सत्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ॥ तत्तदेवाऽवगच्छ त्वं मम तेजोंशसंभवम् ॥ ४१ ॥ जो जो प्राणी ऐश्वर्यवान्, शोभार्यमान अथवा बडा होय सोसी मेरे तेजके अंशयुक्त है ऐसे तुम जानो ॥११॥ अथवा बहुँनेतेन किं ज्ञातेन तवार्जुने ।। विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमांशेन स्थितो जगत् ।।४२॥ 1 -
एका० ११.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१२३)
इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां यो;
गशास्नेश्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो
नाम दशमोऽध्यायः॥ १० ॥
हेअर्जुन ! अथवा इस बहुत जानकरके तुम्हारे क्या प्रयोजन है
मैं इस सर्व जगत्को एक अंशकरके धारण कियेभयस्थित हौं ॥४२॥
इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचित्तायां
श्रीगीतामृततरांगण्यां दशमोऽध्यायप्रवाहः ॥ १० ॥
अर्जुन उवाच ।
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ॥
यत्त्वयोक्तं वचस्तेने भो होऽयं विगतो मम ॥ १ ॥
जब भगवान्ने आपकी विभूति कही और उसमें आपका स्वरूप
वर्णन किया तव सुनिके अर्जुन देखनेकी इच्छा करके बोले कि, हे
भगवन् ! मेरे अनुग्रहके वास्ते सर्वोत्तम गोप्य अध्यात्मसंज्ञित याने
मात्मज्ञानविषयक जो वचन आपने कहा उसकरके मेरा यह
मोह गया ॥१॥
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ॥
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहौत्म्यमपि चाव्ययम् ॥२॥
कारण कि, हे कमलदलनयना भूतप्राणिनक उत्पत्ति प्रलय आपसे
भने विस्तारपूर्वक सुने और आपका अक्षयमाहात्म्य भी सुना॥२॥
एवमेतर्वथात्थे त्वैमात्मानं परमेश्वर ।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥३॥
हे परमेश्वर। तुम आपको जैसे कहतेहो यह ऐसाही है हे पुरु-
षोत्तम । तुम्हारे ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य, तेज, इन छहों
ऐश्वर्ययुक्त रूपको देखनेको चौहताहौं ॥३॥
(१२४)
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
भन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुंमिति प्रभो॥
योगेश्वर तंतो में त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्॥४॥
हे प्रभो ! जो वहरूप मेरेकरके देखनेको योग्य है ऐसा मानते हो
हे योगेश्वर! तो तुम अविनाशी आपके रूपको मेरेको "दिखायो।।४॥
श्रीभगवानुवाच ।
पैश्य में पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।।
नानाविधानि दिव्यानि नानांवर्णाकृतीनि च ॥५॥
ऐसे वचन सुनिके भगवान बोले कि, हे पृथापुत्र! सैकडों फिर
ईजारों अनेकप्रकारके दिव्य और अनेकवर्ण आकारके मेरे स्पोको
देखो॥५॥
पश्यादित्या बसून रुद्रानश्चिनौ महंतस्तथीं।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पैश्याश्चर्याणि भारत ॥६॥
इहकस्थं जगत्कृत्स्नं पैश्याच सचराचरम् ।।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्रष्टुमिच्छसि ॥ ७ ॥
हे भारत ! मेरी देहमें द्वादशसूर्य अष्टवसु ११ रुई अश्विनीकु-
मार १९ मरूँत् देखो तथा जो प्रथम न देखे ऐसे बहुत आश्चर्य
देखो हे गुडाकेश ! इस मेरे देहमें सचराचर सर्व जगत् एकही ठिकाने
इकडेको आज देखी और जो और भी देखनेको चाहतो उसे
भी देखो॥६॥७॥
न तु मी शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषां।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य में योगमैश्वरम् ॥८॥
ईस आपकी दृष्टिकरके मेरेको देखनेको ने समर्थ होगे इससे
तमको दिव्य ने देताही तिसकरके मेरे ईश्वरसंबंधी योगको
देखो॥८॥
एका० ११.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी। (१२५) संजय उवाच। एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः॥ दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥ ९ ॥ संजय धृतराष्ट्रसे कहतेभये कि, हे राजन् ! महायोगेश्वर श्रीकृष्ण ऐसे कहिके फिर सर्वोत्तम ईश्वरसंबंधी रूप अर्जुनको दिखाते भये ॥९॥ अनेकवक्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ॥ अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥ १० ॥ जिसरूपमें अनेक मुख और नेत्र हैं और अनेक अद्भुत दर्शन है अनेक दिव्य आभूषणयुक्त है और दिव्य अनेक उगाये हैं आयुध जिसमें ॥१०॥ दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगंधार्नुलेपनम् ॥ सर्वांश्चर्यमयं देवमनंतं विश्वतोमुखम् ॥ ११ ॥ दिव्य मालो और वस्त्रधारणकियेहैं दिव्य चंदनादि गंधका लेपन किये हैं सर्व आश्चर्यमय प्रकाशमान् अंतर्हित और सब और जिसमें मुख हैं ऐसा रूप अर्जुनको दिखातेभये ॥११॥ दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेयुगपंदुत्थिता॥ यदि भोः सदृशी सांस्यौदासंस्तस्य॑महात्मनः॥१२॥ जो आकाशैमें हजारों सूर्यलेका एक समयमें उत्पन्नभयाहुआ तेज होय सो तेज उन महात्मा भगवानके तेजके समान होय ॥ १२ ॥ तत्रैकस्थं जगत्कृस्नं प्रविभक्तमनेकधा अपश्यदेवदेवस्य शरीरे पांडवस्तों ॥ १३ ॥ उस देवनकेभी प्रकाशक कृष्णको शरीरमें उस समयमें अनेक (१२६) भगवद्गीता। [अध्याय:- प्रकारका न्यारा न्यारा एकही ठेकाने इकट्ठा ऐसे सर्व जगदको अर्जुन देखतेभये ॥१३॥ ततः स विस्मयाविष्टो हष्टरोमांधनंजयः ।। प्रणम्य शिरसा देवं कृतांजलिरभाषत ॥१४॥ तब विस्मय करके व्याप्त रोमांचयुक्त वह अर्जुन कृष्णको स्तकसे प्रणामकरके हाथ जोरेभये बोले ॥१४॥ अर्जुन उवाच। पश्यामि देवास्तवं देवं देहे सर्वीस्तथा भूतवि- शेषसंचार ॥ ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषी- श् सर्वानुरगाँश्च दिव्या ॥ १५॥ अर्जुन कहते हैं कि, हे देव ! तुम्हारे शरीरमें देवनको तेथा सर्व भूतप्राणिनके समूहोंको तथा ब्रह्माको और कमलासन जो ब्रह्मा उनमें स्थित जो ईश्वर याने आपही तिनको और सर्व ऋषिनको और दिव्य सर्पनको देखताहीं ॥१५॥ अनेकबांहूदरवक्रनेत्रं पश्यामि त्वा सर्वतोऽनंत- रूपम् ॥ नातं नै मध्यं न र्पुनस्र्तवादि पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥ १६॥ हे विश्वेश्वर । हे विश्वरूप ! तुमको सर्व ओरसे अनेक भुजा उदर सुख और नेत्रवाले अनंतरूप देखताहौं तुम्हारा ने अंत ने मध्य ने फिर ऑदि देखताहौं ॥ १६॥ किरीटिनं गैदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमंतम् ॥ पश्यामि त्वां दुनिरीक्ष्य समंता: दीप्तानलाकशुतिमप्रमेयम् ॥ १७॥ . ...
एका०११.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१२७) तुमको किरीटवान् गदावान् चक्रवान और तेजकी राशि सब ओरसे प्रकाशवान सब ओरसे दुनिरीक्ष्य प्रदीप्त अग्नि और सूर्यनकी कांतिसरीखी कांतिमान् और अपरिमितरूप देखताहौं ॥ १७॥ त्वमक्षरं परमं वेदितव्य खेमस्यं विवस्य पर निर्धानम् ॥ त्वमव्ययःशाश्वतधर्मगोप्ता सनातै- नस्त्वं पुरुषो मतो में" ॥१८॥ जो मुमुक्षु जनोंकरके जानने योग्य सर्वोत्तम विष्णु आप हो इस विवके श्रेष्ठं आधार आप हो सनातनधर्मके रक्षक अविनाशी आप हो सनातन पुरुष आप हो यह मैंने जाना है ॥ १८॥ अनादिमध्यांतमनतवीर्यमनंतबाहुं शशिसूर्यने- अस् ॥ पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवकं स्वते- जसा विश्वमिदं तपतम् ॥ १९॥ नहीं है आदि, मध्य और अंत जिनके अनंत है पराक्रम जिनका अनंत है भुना जिनके चंद्र सूर्य हैं नेत्र जिनके प्रदीप्त अग्निसहश भुख जिनके जो आपके तेजकरके इस विश्वको तपायमान करर- देहो ऐसे मझो देखता हौं ॥ १९॥ द्यावाष्टथिव्योरिदमतरं हि व्याप्तं त्वयन दिशा सर्वाः ॥ देवाऽद्भुतं बैंपKग्रं तवेदं" लोकत्रयं व्यथितं महात्मन् ॥ २० ॥ हे महाशरीर ! यावापृथिवीका यह अंतर याने इस ब्रह्मांडका पोल आप एक करके व्याप्त है और सर्व दिशा व्याप्त हैं अर्थात् ऊंचाई करके ब्रह्मांड पोल और चौडाई करके सर्व दिशा पूरगई हैं ऐसे (१२८) भगवद्गीता। [अध्याय:- आपके इस अद्भुत उग्र रुपको देखि के तीनों लोके याने तीनों लोकोंके निवासी देव मनुष्यादिक व्याकुल हैं ॥२०॥ अंमी हि त्वां सुरसंघा विशति केचिद्भीताः प्रा- जलयो गृणंति ॥ वस्तीत्युको महर्षिसिद्धसं- घाः स्तुति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः॥ २१ ॥ ये देवतनके समूह आपके समीपं प्राप्तभयेहैं कितनेके भयभीत हाथ जोरे ये तुम्हारे गुण नाम उच्चारण करतेहैं महर्षी और सिद्धन- के समूह स्वस्ति ऐसे" कहिके तुझारी अनेक प्रकारकी स्तुतिन करके स्तुति करतेहैं ॥२३॥ रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वश्विनी मं- रुतश्चोष्मपाश्चै ॥ गंधर्वयक्षासुरसिद्धसंघों वी" क्ष- ते ली विस्मिताश्चैव सर्वे ॥२२॥ एकादश रुद्र द्वादश आदित्य अष्टे वसु और जी साध्य नामक उपदेव तेरह विश्वेदेव दो अश्विनीकुमार उंचार्श मरुत् और पितर और गंधर्व यक्ष देवता और सिद्ध इनके समूह ये सर्व विस्मित भये हुए तुमको ही देखिर हेहैं ॥२२॥ रूपं महत्ते बहुवक्रनेत्रं महाबाहो बड्डबाहूरुपा- दम् ॥ बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथौहस ॥ २३॥ हे महाबाहो ! बहुत हैं मुखं और नेत्र जिसमें तथा बहुत हैं भुजा जांघों और चरण जिसमें बहुत हैं उदर जिसमें बहुत दांडों करके एका०.११.] . सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी। (१२९) विकराल ऐसे तुम्हारे महत् रूपको देखिके लोके व्याकुल हैं तैसेही मैं भी व्याकुल हूं ॥२३॥ नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्ण व्योत्ताननं दीप्तवि- शालनेत्रम् ॥ हुँझा हिं त्वां प्रैव्यथितांतरात्मा धृति नै विदामि शैमं च विष्णो ॥ २४ ॥ दंष्ट्रा- करालानि च ते मुखानि हैवैव कॉलानलसन्नि- भानि ॥ दिशो ने जौन न लेंभे चे शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ २५॥ अमी चैत्वा ("हवा दिशो नै जनिति शर्म नै लभंते इति पूर्वेण पंच- विंशतितमेन पद्येनान्वयः") धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंधैः ॥ भीष्मो द्रोणः सूत- पुत्रस्तथाऽसौ सहाऽस्मदीयैरपि योधर्मुख्यैः ॥ ॥ २६ ॥ वैवाणि ते त्वरमाणों विशति दंष्ट्री- करालानि भैयानकानि ॥ केचिद्विलैंग्या दश- नांतरेघु संश्यते चूँणितैरुत्तमांगैः ॥ २७ ॥ हे विष्णो। नभ जो प्रकृतिसे परे परम आकाश वैकुंठ तहांपर्यंत हे स्पर्श जिनका जो प्रकाशमान अनेक वर्णयुक्त रूप तथा मुखे फैलाये प्रदीप्त और विशाल नेत्र ऐसे आपको देखिके जिससे कि, मैं व्याकुलचित्त भयाहुआ धीरजको और शांतिको नहीं प्राप्त होताहूं और दा हैं कराल जिनमें और कालानलके तुल्य हैं ऐसे तुम्हारे मुंखोंको देखिके ही दिशाओंको नहीं जानताहूं और सुखको भी नहीं प्राप्तहोताहूं और राजोंके समूहोंकरके सहित सवै धृतराष्ट्र के पत्र तथा भीष्म द्रोण यह कर्ण और हमारे जोधनमें मुख्य जो हैं - + (१३०) भगवद्गीता। [अध्यायः- तिनकरके सहित तुमको ("देखिकै दिशाओंको नहीं जानते हैं और मुखको नहीं प्राप्तहोते हैं ऐसे प्रथमके पञ्चीसवें श्लोककरके अन्वय ")। ये सर्व अतिवेगको प्राप्तभैये डोटें हैं कराल जिनमें ऐसे भयानक आपके मुंखोंमें प्रवेश करते हैं कितनेक चूर्णितँभयेहुये मस्तकोंकरके सहित तुम्हारे दांतोंकी संधिनमें पंटकभये दीखते इससे हे देवेश । हे जगन्निवास ! आप कृपा करो याने हम सब डरते हैं इससे आप प्रथमसरीखे सौम्यरूपको धारणकरो॥२॥२५॥२६॥२७॥ येथा नदीनां बहवोऽबुंवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवंति ॥ तथा. वैवामी नैरलोकवीरा विशति बैंकायभितो ज्वलंति ॥२८॥ जैसे नैदिनके बैबुतसे पानीके वर्ग समुद्रहीके संमुखं धावते । वैसे ये नैरलोकवीर तुम्हारे सबै ओर प्रज्वलित मुंखोंमें प्रवेश करतेहैं ॥२८॥ यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा विशंति नाशाय स- मृद्धवेगाः॥ तथैव नौशाय विशंति लोकांस्त- वापि" वक्रॉणि समृद्धवेगाः॥ २९ ॥ जैसे अतिवेगवंते पतंग आपके नाशके वास्ते प्रदीप्त अनिमें प्रवेश करतेहैं तैसेही अतिवेगवंत ये लोग भी अपने विनाशके वास्ते तुम्हारे मुंखोंमें प्रवेश करते हैं ॥२९॥ लेलिझसे ग्रंसमानः संमंताल्लोकोन्सम॑यान्वदु- नैवद्भिः ॥ तेजीभिरीपूर्य जगत्समग्रं भी- सस्तवोः !तपंति विष्णो॥३०॥ हे विष्णो ! प्रज्वलित अपने मुखोकरके सर्वे लोगोंको सब जोरैसे घेरतेभये चाटेजातेहो याने खायेजातेहो तुम्हारे उग्रं प्रकाश एका० ११.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी। (१३१४ सर्व जगतको अपने तेजकारके परिपूरित करिके तैपरहेहैं ॥ ३० ॥ आख्याहि में को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते" देववर प्रसीद ॥ विज्ञातुमिच्छामि भवंतमाचं नै हिँ जानामि तव प्रवृत्तिम् ॥ ३१ ॥ हे देववर ! ऐसे उग्ररूप औप कौन हो सो मेरेसे कहो क्योंकि, तुम्हारी प्रवृत्तिको मैं नहीं जानताहूं जो आपै आदिहो उनको जानने की इच्छा करताहूं आप कृपाकरो तुम्हारेको नमस्कार होउँ ॥३१ ॥ श्रीभगवानुवाच । कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाह- मिह प्रवृत्तः ॥ ऋतेऽपि वा न भविष्यति से- वैयेऽवस्थिताः प्रेत्यनीकेषु योधाः ॥ ३२ ॥ ऐसे सुनिके श्रीकृष्ण भगवान बोले कि, मैं इन लोगोंके क्षयके पास्ते बढाभया कोल हूँ यहाँ इन लोगोंका संहार करनेके वास्ते प्रवर्त भयाहूं जो यें जोधा तुम्हारी शत्रुसेनाओंमें खड़े ये सर्व तुम्हारे विनों निश्चयपूर्वकै नै रहेंगे ॥३२॥ वस्मात्त्वभुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वां शत्रून् भुं- क्ष्व राज्यं समृद्धम् ॥ मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥ ३३ ॥ हे सव्यसाचिन् ! हे अर्जुन ! जिससे कि ये मरहोगे तिससे तुम उठो यश लेउ शत्रुनको जीतिक समृद्ध राज्यको भोगों" प्रथमही ये अब मैंने मारराखेहैं तुम तो निमित्तमात्रै होउँ ॥३३॥ द्रोणं च भीष्म , जयद्रथं च कर्ण तथाऽन्यानपि (१३२) भगवद्गीता। [अध्यायः योधैवीरान् ॥ मैया हतास्त्वं जैहि मी व्यथिष्ठा युध्यस्व जैतार्सि' रणे संपत्लान् ॥ ३४ ॥ द्रोण और भीष्म और जयद्रथ और कर्ण तां औरंभी शूरवीर इनको मेरे मारेभयेनको तुम मारो, मैति दुःखित होउँ रैगमें शत्रून- को जीतोगे युद्धकैरो॥३४॥ संजय उवाच । एतच्छ्रुत्वा वर्चनं केशवस्य कृतांजलि।पमानः किरीटी ॥ नमस्कृत्वा भूयएवाह कृष्णं संगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥ ३५॥ संजय धृतराष्ट्रसे कहतेहैं कि, किरीटी जो अर्जुन सो श्रीकृष्ण के इतने बचन सुनिके कांपते कांपते हाथ जोड़ेभये नमस्कार करके फिरंभी भयभीत प्रणाम करके गद्दकंठयुक्त श्रीकृष्णसे बोलतेभये॥३५॥ अर्जुन उवाच । स्थाने ह्रषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्य- रज्यते च ॥ रक्षांसि भीतीनि दिशो वंति सै- वै नेमस्यंति चे सिद्धसंघाः ॥३६॥ अर्जुन कहतेहैं कि, हे हृषीकेश ! तुम्हारी उत्तम कीर्तिकरके ज- गत् आनंदित होताहै और आपसे प्रीति करताहै राक्षस भयकों प्राप्तभयेहुये सवैदिशाओंको भागतेहैं और सर्वे सिद्धसमूह नम- स्कार करतेहैं सो यह योग्यही है ॥३६॥ कमाच्च तेन नमेरन् महात्मन् गरीयसे ब्रह्म- णोऽप्यादिकत्रै ॥ अनंत देवेश जगनिवास त्व- मक्षरं सदसैतत्परं यत् ॥३७॥ {2;
एका०११.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१३३) हे महात्मन् ! ब्रह्मासे भी बैंडे आदिकर्ती जो आप तिन तुमको में क्यों न नमन करै अर्थात् करेहीकरें. हे अनंत ! हे देवेश हे जैग- निवास । जो अक्षर याने जीवतत्त्व सत् जो कार्य स्थूलप्रकृति असत् जो सूक्ष्मप्रकृति कारण तत्पर जो शुद्ध आत्मा सो सब आप हो याने सबके अंतर्यामी हो ॥३७॥ त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ॥ वेत्तासि वेयं च परं च धाम स्वैया तेतं विश्वमनंतरूँप ॥ ३८॥ आप आदिदेव पुराण पुरुष हो तुम इस विश्वके परम आधारे हो इसके जाननेवाले और जानने योग्य और इसके सर्वोत्तम वास- स्थान हो" हे अनंताप ! यह विच तुमकरके व्याप्त है ॥३८॥ वायुयमोनिवरुणः शशांकः पितामहस्त्वं प्रपि- तामहश्च ॥ नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः (नश्च भूयोपिनमो नमस्ते ॥३९॥ पवन अग्नि यम वरुण च पितामह और अपितामह तुम हो इससे तुमको हजारोंवार नमोनमः होउँ फिर और फिरभी, तुमको नैमोनमः॥३३॥ नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ॥ अनंतवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्व समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥४०॥ हे सर्व ! तुंमको अगारीसे और पिछारीसे नमस्कार और तुमको सब ओरसे भी नमस्कोर होउँ अनंत बल और अमित परीक्रम तुम सबमें व्यापक हो इसीसे तुम सर्वरूप हो ॥४०॥ सखेति मत्वा पँसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव ११३४, भगवद्गीता। [अध्याय:- हे सखेति ॥ अजानता महिमानं तैवेदं मया प्रमादात्प्रणयेनं वापि ॥ ४१. ॥ यच्चीवहाँ- सार्थमर्सत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु ॥ एकोऽथाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वाम- हैमप्रमेयम् ॥४२॥ हे अच्युते ! तुम्हारेः महिमाको और इस विश्वरूपको न जानने- पाला जो मैं तिस मैंने प्रमादसे अथवा प्रणयसे भी संखा ऐसे" मौनिक हे कृष्णा हे यौदव ! हे सखे । ऐसे हैंठसे जो कहाहोय और कोडा शयन आसन तथा भोजनकालमें अकेला अथवा और उन सखोके संमुख इसीके वास्ते जो आपका अपमान किया होय सो परमितिरहित जो आपतिनं आपसे में क्षमा करताहूं ॥४१॥४२॥ पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्चं गुरुगरीयान् ॥ न त्वत्समोस्त्यभ्यधिकः कुतोन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रेतिमप्रभावः ॥ ४३ ॥ तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वाम- हमीशमीयम् ॥ पितेव पुत्रस्य संखेव सैख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देवं सोढुंम् ॥ ४४ ॥ हे सर्वोत्तमप्रभाव ! आप इस चराचर लोकके पिता हो और सर्व गुरुनसे बडे गुरु हो इसीसे पूज्य हो तीनों लोकमें भी आप समान और नहीं है तो कहांसे और अधिक होयँगा. तिसँसे मैं शरीरकों पृथिवीपर धारणकियेभये प्रैणामकरके ईश्वर इसीसे स्तुतिकरने- योग्ये आपको प्रैसन्न करूंहूं. हे देखें ! पुत्रके प्रियके वास्ते पिती जैसे सेखाके प्रियके वास्ते सेखा जैसे ऐसे मेरे प्रिय आप हो सो मेरे प्यारके वास्ते मेरे अपराध सहनेंको योग्य हो ॥१३॥४४॥ .
एका० ११.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी। (१३५)
अदृष्टपूर्व हृषितोस्मि इंश्वा भयेन च प्रव्यथितं
मंनो में ॥ तदेव में दर्शय देव रूपं प्रसीद देवे-
शै जगन्निवास ॥४५॥
जो रूप मैंने और किसीनेभी.प्रथम नहीं देखा था उसको देखिके
चकित भयाहूं और भयेसे मेरी मन व्याकुल भयाहै हे देवे। मेरे-
को वही प्रथमका रूप दिखावो हे देवेश! हे जगनिवास ! आप
मेरेपर प्रसन्न होउ ॥४॥
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्ट-
महं तथैव ॥ तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्त्र-
बाहो भई विश्वमूर्ते ॥ ४६॥
हे सहस्रबाहो! हे विश्वमूत ! मैं वैसाही किरीटयुक्त गदायुक्त
चक्रहस्त आँपको देखनेको चाहता हूं इसवास्ते उस ही चतुर्भुज
रूपैकरके युक्त होई॥१६॥
श्रीभगवानुवाच।
मैया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं पैर दर्शितमात्म-
योगात् ॥ तेजोमयं विश्वमनंतमाद्यं यन्मे त्वंद-
न्येन ने दृष्टंपूर्वम् ।। ४७॥
ऐसी अर्जुनकी प्रार्थना मुनिके भगवान् बोले कि, हे अर्जुन ! जो
मेरा तेजोमयं विश्वरूप अंतर्हित सर्वका आदि तुम्हारे विना और
किसीने नहीं प्रथम देखा सो यह पैर रुप प्रसन्न होके मैंने आपके
सत्यसंकल्परूपयोगसे तुमको दिखायाँ ॥४७॥
नं वेद॑यज्ञाऽध्ययनैनं दोनैन" च क्रियाभिनं
तपोभिरुग्रैः ॥ एवरूपः शक्य अहं ।लोके द्रष्टं
त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥४८॥
(१३६) भगवद्गीता। [ अध्याय:- हे कुरुवंशिनमें श्रेष्ठवीर ! ऐसे रूपका में इस मनुष्यलोकमें तुम्हारे पिना औरके न वेदपाठ यज्ञ और मंत्रजएकरके न दानकरके मौर ने योगनियाकरके न तेषकरके देखनेको योग्यहूं ॥४८॥ मां ते व्यर्था भी चे विमूढभावो दृष्ट्वा ईपं घोर मी अदई ।। व्यऐतभी प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव में कैपमिदं प्रपश्य ॥४९॥ ऐसे घोर मेरे इस रूपको देखिके तुमको व्यथा अति होउ और मोहंभाव भी मति होउ सयरहित प्रसन्नमन तुम वही यह मेर कैप फिर देखो ॥१९॥ संजय उवाच । इत्यर्जुनं धांसुदेवस्तथोक्कों वकं रुपं देर्शया- मास भूयः ॥ आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौव्यव(महात्माँ ॥ ५० ॥ संजय धृतराष्ट्रसे कहते हैं कि, वसुदेवपुत्र कृष्णं ऐसे अर्जुनकों कहिके वैसा ही पूर्ववत् आपके रूपको फिर दिखातेभये और जो धडेशसरयुक्त थे सो सौम्यरूप होके फिर भयभीत अर्जुनको आश्वासते मये ।। ६०॥ अर्जुन उवाच । दृट्वेदं मानुषं रूपं लवं सौभ्यं जनार्दन । इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृति गतः॥५१॥ तब अर्जुन बोले कि हेजनार्दन तुम्हारे इससौर्य मानष रूपको देखि के अंव सचेतंभयाहुआ आपके स्वभावकोप्रौप्तभया सावधान हूँ॥५१॥ श्रीभगवानुवाच । सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टनिसि यन्मम ॥
एका०११.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१३७) देवो अप्यस्य रूपस्यं नित्यं दर्शनकाक्षिणः ॥ ५२ ॥ अर्जुनके वाक्य मुनिके श्रीकृष्ण बोले कि, हे अर्जुन ! जो अति- दुर्लभदर्शन इस मेरे रूपको तुम देखतेभये इस लैपके देवता भी निरंतर दर्शनाभिलाषी रहाकरते हैं ॥१२॥ नहिं वैर्दै नै तपसा नै दानेन नै चे" ज्यया ॥ शक्य एवंविधो ट्रैष्टुं दृष्टानसि मौ यथा ॥५३॥ भक्त्या त्वॅनन्यया शक्य अहमेवंविधो ऽर्जुनं ॥ ज्ञातुं द्ष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं चे परंतपै ॥ ५४ ॥ हे अर्जुन ! जैसे मेरेको तुम देखतेभये इसप्रकारका मैं न वेदों- करके ने तपकरके नै दीनकरके और में यज्ञकरके देखें नेको सकताही क्योंकि हे परंतप । ऐसों में अनन्य भक्तिकरके निश्चयपूर्वक जाननेको और देखनेको समी प्राप्तहोनेको भी सकताहीं॥५३॥५४॥ मकर्मकृन्मपरमो मद्भक्तः संगवर्जितः ॥ निर्वैः सर्वभूतेषु यः सं मामेति" पांडव ॥ ५५ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां यो- गशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शन- योगो नाम एकादशोऽध्यायः॥ ११ ॥ हे पांडव ! जो मनुष्य मेरेनिमित्त लौकिक वैदिक सर्व कर्म करताहै मेरेहीको सर्वसे अतिउत्तम मान रहाहै मेरा ही भक्त है मेरे संबंध विना और संगोंकरके रहितहै और सर्वभूतप्राणिनमें निर्वैर हैं सो मेरे को प्राप्तहोताहै ॥ ५५॥ इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां श्रीमद्भगवद्गीतामृततरंगिण्यामेकादशाध्यायप्रवाहः ॥१३॥.
(१३८) भगवद्गीता। [अध्याय:- अर्जुन उवाच। एवं सततयुक्ता ये भक्तांस्त्वों पर्युपासते ॥ ये चाप्यारमव्यक्तं तेषों के योगवित्तमौः ॥१॥ ऐसे प्रथम आत्मज्ञानकी महिमा श्रीकृष्णजीने वर्णन की फिर भक्तिहीसे जानने देखनेमें और प्राप्तहोनेमें आताहौं सो दोनोंको सुनिके अर्जुन पूंछते हैं कि, निरंतर भक्तियोगयुक्तभयेहुए जो भक्त ऐसे जो आप पीछे अध्यायके अंतमें कहा तैसे आपकी उपासना करते हैं और जो इंद्रियोंके अदृश्य अक्षर याने आत्मस्वरूप उसकी उपासना करतेहैं उन दोनोंमें अतिश्रेष्ठे कौन है याने आत्मज्ञानी श्रेष्ठ है कि, आपके उपासक श्रेष्ठ हैं सो कहो॥१॥ श्रीभगवानुवाच। मय्यावश्य मनो ये मी नित्ययुक्ता उपासते ॥ श्रद्धया परयोपेतास्ते में युक्ततमा मताः॥२॥ ऐसा अर्जुनका प्रश्न 'सुनिके श्रीकृष्णभगवान् बोले कि, जो निरंतर भक्तियोगयुक्त मेरेमें मैंनको लगायके पर्रम श्रद्धाकरके युंक्त मेरेको भेजते हैं वे" योगिर्नमें श्रेष्ठ मेरे मान्य हैं॥२॥ येत्वारमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ॥ सर्वत्र- गमैचिंत्यं च कूटस्थमचल ध्रुवम् ॥ सैन्निय- म्येंद्रियग्राम सर्वत्र समबुद्धयः॥ प्राप्नुवंति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ केशोऽधिकतरस्ते- षामव्यक्तासक्तचेतसाम् ॥ अव्यक्ता हि" गति- दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ ३॥ ४॥५॥ जो कोई इंद्रियसैमूहको नियममें रौखिके सर्वत्र समर्बुद्धि सर्व - वोंके हितमें रतहुयेभये अँनिर्देश्य याने देवादि शरीरशब्दोंकरके कह '.
२७
द्वाद०.१२.] सात्वय-अमृततरंगिणी भा० टी। (१३९)
नेमें न आवे ऐसे अव्यक्त याने इंद्रियगोचर नहीं "सर्वत्रगं"याने सर्वत्र
देवादिशरीरोंमें रहनेवाला अचिंत्य याने. ध्यानमें न आवे और कूट-
स्थ याने सर्वत्र एकसा रहे अंचल याने स्वस्वरूपहीमें स्थिर इसीखें
नित्य ऐसे अक्षरको याने 'आत्मस्वरूपको भजते हैं याने आत्मस्व-
" रूपहीका अनुसंधान करते हैं वेभी मेरेहीको प्राप्तहोते हैं परंतु
आत्मज्ञाने देशा दुःखपूर्वक देहधारिनकरके प्राप्तहोताहै इससे
उँन अव्यक्तासक्तचित्तनको केशै अतिशय है ॥३॥४॥५॥
ये सर्वाणि कर्माणि मैयि संन्यस्य॑ मत्पराः ॥
अनन्येनैव योगेन मी. ध्यायंत उपासते ॥६॥
तेषामहं समुद्धा मृत्युसंसारसागरात् ॥
भैवामि नचिरात्पार्थ मैय्यावेशितचेतसाम् ॥७॥
हे पृथापुत्र ! जो कोई सर्व कर्मोंको मेरेमें अपर्णकरके मेरेही
शरणंभयेहुये अनन्य भक्तियोगकरके मेरे"को ध्यावते पूजते हैं ऐसे
"मेरेमें लगायाहै.चित्त जिनने उनका मैं थोडे ही कालमें मृत्युदुःख-
रूप संसारसागरसे उद्धारकर्ता होउंगा॥६॥७॥
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशयः ॥
निवसिष्यसि मय्येव अतऊर्ध्व नै संशयः॥८॥
इससे तुम मेरेहीमें, मैनको लगावो मेरे हीमें बुद्धिको लगावो
इस मनं,बुद्धिलगाये पीछे मेरेही समीप रहोगे इसमें संशय नहीं है।
अर्थ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ॥
अभ्यासयोगेनं ततो मामिच्छाप्तुं धनंजये ॥९॥
हे अर्जुन ! जो कदाचित् मेरेमें चित्तको स्थिर समाधानकरने-
को नहीं सकते हो तो अभ्यासयोगकरके मेरे" प्राप्तहोनेको इच्छे
तेरहो॥९॥
(१४०) भगवद्गीता। [अंध्याय:- अभ्यासप्यसमर्थोसि भत्कर्मपरमो भव । मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ १० ॥ जो अभ्यासभी असमर्थ होउँ तो मेरे पूजन्नादिक कामें मुख्य स्थिर होउ मेरे अर्थ भी कर्मोको करतेकरते मेरी मोतिरूप सिद्धिको प्राप्त होवोगे ॥१०॥ अथैतदप्यर्शक्तोऽसि कैतु मद्योगमाश्रितः॥ सर्वकर्मफलत्यागं वः कुरु यतात्मवान् ॥ ११ ॥ जोकि, तुम यहभी करनेको अर्शत होउँ ईससे पलको सावधान कियेभये मेरे भक्तियोगका आश्रय कियेभये सर्व कर्मफलका त्याग करो॥११॥ श्रेयो हिं ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाध्यान विशिष्यते ॥ ध्यानाकर्मफलत्यागस्त्यागाच्छांविरनंदरम॥१२॥ जिससे कि, अभ्याससे कल्याणकारक ज्ञान होताहै हानसे विचार होताहै विचारसे कर्मफलका त्यागं होताहै कर्मफलके त्यागसे फिर शांति याने संसारसे वैराग्य होताहै ॥ १२ ॥ अद्वेष्टौ सर्वभूतानां भैत्रः करुण एव च ॥ निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखानी ॥ १३ ॥ संतुष्टःसततं योगी येतात्मा दृढनिश्चयः॥ मैय्यतिमनोबुद्धिामद्भक्तः मैं प्रियः ॥ १४ ॥ जो सर्वभूतोंकों ने द्वेषकारक होय और सबका मित्र होय और दयालू भी होय ममतारहित अहंकाररहित सुखदुःखमें सम क्षमावान यथालाभसंतुष्ट निरंतर भक्ति योगवान् जितचित्त दृढनिश्चय मेरेमें मन बुद्धिको लगायेहोई सो मेरों भक्त मेरे को प्रिय है।॥ १३॥१४॥ १३
द्वाद० १२.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी। (१४१)
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकोनोदिजते . यः ॥
होमर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च में प्रियः ॥ १५ ॥
जिससे कोई भी जंतु त्रास नपावैऔर जो किसी भी दुःख न पाव
औरजो हर्ष, ईर्षा,भय और उद्वेगोंकरके रहित होय सो मेरो प्रिय है१५
अनपेक्षः शुचिर्दा उदासीनो गंतव्यथः ॥
सर्वारंभपरित्यागी यो मद्भक्तः से में"प्रियः ॥ १६ ॥
जो मनुष्य मेरे संबंधविना सर्वत्र अपेक्षारहित शुचि याने शुद्ध-
आहारी और बाहर मृत्तिका जलादिकरके और अंदर चित्तकी
शुद्धताकरके, पवित्र स्वधर्मअनुष्ठानमें चतुर्र शत्रुमित्रादिभेदरहित
शास्त्रोक्त कर्म करनेमें व्यथारहित सर्व आरंभोंके फल और ममता
का त्यागी ऐसा मेरा भक्त सो मेरे को प्रिय है ॥ १६॥
यो न हृष्यदिन द्वेष्टिं नैशोचति नकांक्षति ॥
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥१७॥
जो सुखकारक वस्तु पायके नै हर्षे दुःखकारक पायके न देषकरे
शोकनिमित्तमें न शोककरै और हर्षकारककी न इच्छाकरे जो शुभा-
शुभं कर्मफलोंका त्यागीहुआभया भैक्त होय. सो मेरे प्रिय है ॥१७॥
संमः शत्रौं चं मित्रे च तथा मानापमानयोः ॥
शीतोष्णसुखदुःखेषु संमः संगविवर्जितः॥तुल्यनि-
दोस्तुतिमाँ ना संतुष्टो येनकेनचित् ॥ अनिकेतः
स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥१८॥ १९ ॥
शंत्र और मित्रमें समें तैसा ही मान अपमानमें और शीत.
ष्ण सुखदुःखोंमें समं होय विषयोंकी आसक्तिरहित निंदा स्तुति
तुल्येमाने मितभाषी जो स्वतःप्राप्तहोई इसीकरके संतुष्ट घरमें
अनासक्त स्थिरद्धि भक्तिमान मनुष्य मेरो प्रिय है ॥ १८ ॥ १९॥
(११२) भगवद्गीता। [अध्याय:- येतु धामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ॥ श्रद्दधांना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव में प्रियाः॥२०॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु. ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२॥ : जो कोई श्रद्धा धारेभये मेरेहीको सर्वोत्तम जाननेवाले भक्त इस क्योक्त धर्मरूप अमृतको याने मेरेमें मन लगाना इत्यादि धर्मरूप अमृतको सेवते हैं वे मनुष्य मेरे" अतिशय प्रिय हैं ॥२०॥.. इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिता- यां श्रीगीतामृततरंगिण्यांद्वादशाऽध्यायप्रवाहः ॥१२॥ इति द्वितीयं षट्कम् । अथ तृतीयं षट्कम् । श्रीभगवानुवाच । इदं शरीरं कौंतेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ॥ एतद्यो वेत्तिं तं प्राहुँः क्षेत्रसँ इंति तद्विदः॥१॥ प्रथमके छः अध्यायोंमें ईश्वरप्राप्तिका उपायभूत उपासना और उपासनाका अंगभूत आत्मस्वरूपज्ञान कहा और उस आत्मस्वरूप.. ज्ञानकी प्राप्ति ज्ञानयोगकर्मयोगनिष्ठासे होती है ऐसे कहा ॥ मध्यके छःअध्यायोंमें परमात्मस्वरूपका यथार्थ ज्ञान और उसके माहात्म्य ज्ञानपूर्वक उपासना जिस उपासनाको भक्ति भी कहते हैं सो कहते भये ॥ अब अंतके छः अध्यायोंमें प्रकृतिपुरुषका निरूपण और इस प्रपंचका प्रकृतिपुरुषसंयोगसे होना कहेंगे और प्रथम बारह अध्या- योंमें जो परमात्मस्वरूपका यथार्थ निश्चय और कर्मज्ञानभक्ति- ..
बयों० १३.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी। (१५३) स्वरूप और इनके ग्रहणके न्यारेन्यारे प्रकार कहेंगे। वहां तेरहवें . अध्यायमें देह और आत्माके स्वरूप और आत्मस्वरूपप्राप्तिका उपाय तथा प्रकृतिमुक्त आत्माका स्वरूप और उसके प्रकृतिसंव- धका कारण और प्रकृतिपुरुषविवेकका अनुसंधानप्रकार कहेंगे। श्रीकृष्णभगवान कहतेहैं कि हे कुंतीपुत्र ! यह शरीर क्षेत्र ऐसो. कहाहै जो इसको जानताहै उसको देहात्मज्ञौनिजन क्षेत्रज्ञ ऐसे" कहते हैं याने देह क्षेत्र और आत्मा क्षेत्रज्ञ है॥१॥ क्षेत्रज्ञं चर्पि माँ विहि सर्वक्षेत्रेषु भारत ॥ क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोनं यंत्तज्ज्ञानं मत मम ॥२॥ हे भारत ! सेवैक्षेत्रोंमें याने सर्वदेहोंमें क्षेत्रज्ञ जो जीव और में जो परमात्मा तिस मेरेको भी जानो जो क्षेत्र और क्षेत्रका ज्ञान याने इनका विवेक ज्ञान है सो ज्ञान मेरेको" अंगीकार है । यहां जो शरीरोंमें आत्मा परमात्मा दोनों कहे उसपर श्रुति प्रमाण है सो यह "द्वा सुपर्णा सयुजासखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते॥ तयोरन्यः पिप्प- लं स्वाद्वत्त्यनभन्नन्योऽभिचाकशीति ॥" अर्थ-दोपक्षी संगसंग रह- नेवाले परस्पर सखा एक सहश वृक्षपर रहतेहैं उनमेंसे एक उस वृ- क्षके स्वादु फल खाताहै दूसरा खाएविना प्रकाशताहै ॥ अर्थात् ईश्वर और जीव. सदा संग रहते हैं परस्पर सखा एकसरीखे देहमें रहते हैं तिनमें जीव शरीरजन्य कर्मफलोंका भोक्ता है और ईश्वर साक्षी- मात्र प्रकाशक है दूसरा यह अर्थ होताहै कि, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ मैंही हौं अर्थात् इन दोनोंका अंतर्यामी हौं तो भी देहांतर्यामी जीव जीवां- तर्यामी परमात्मा ऐसे भी वही अर्थ सिद्धभया जो यहां जीव और ईश्वर एकही कहते हैं उनको “ उत्तमःपुरुषस्त्वन्यः" यहां अर्थकी पंचाइत होनेकी शंका आती है अंतर्यामित्वमें तो ईश्वर सर्वभूतानां हृद्दे- शेर्जुन तिष्ठति ॥ नतदस्तिविनायत्स्यान्मया भूतं चराचरम्" और (१४४). मगवद्गीता। [अध्याय:- "यस्यात्मा शरीरंयआत्मनि तिष्ठन्य आत्मानमंतरो यमयति यमात्मा नवेद स ते आत्मा अमृत" इत्यादिक श्रुति भी प्रमाण हैं ॥२॥ तत्क्षेत्र यंर्च याईकचं यद्विकारि यतेश्चयत् ॥ से च यो यत्प्रभावश्च तत्समाँसेन में शृणु ॥३॥ सो क्षेत्रे जिस द्रव्यका है. और जिनके आश्रयभूत है और जिन विकारोंकरके और जिस प्रयोजनकवास्ते उत्पन्न भयाहै और जिसरूपसें वर्तमान है और वह क्षेत्रज्ञ जो है याने जैसे लैपयुक्त है और जैसे प्रभाववाला है 'सो संक्षेपकरके मेरे से सुनो।।३॥ ऋषिभिर्बहुधा गौ तं छंदोभिर्विविधैः पृथक ।। ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुम॑द्भिर्विनिश्चितैः॥४॥ वह क्षेत्र क्षेत्रज्ञका यथास्वरूप बहुत प्रकारकरके पराशेरादिक ऋषिननें और ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद ऐसे अनेक प्रकार वेदोंने और ब्रह्मके प्रतिपादन करनेवाले जो ब्रह्मसूत्र याने व्यासकृत शारीरक सूत्ररूप पदोंने जो कारणयुक्त निश्चय याने सिद्धांतकरने- वाले उनने भी क्षेत्रक्षेत्रज्ञके स्वरूपको न्यारान्यास कहाहै सो मैं संशे- पसे कहौंगा तुम मेरेसे सुनो॥४॥ महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ॥ इंद्रियाणि दशैकं च पंच चेंद्रियगोचराः॥५॥ इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतनों धृतिः॥ ऐतत्क्षेत्र समासेन सविकार हुँदाहृतम् ॥६॥ पंचमहाभूत, अहंकार, बुद्धि याने महत्तत्व और अव्यक्त याने सूक्ष्मरूप प्रकृति ये क्षेत्रके उत्पत्तिकारक द्रव्य हैं अब विकार याने कार्य कहते हैं देश और एक ऐसे ग्यारह इंद्रियां हैं जैसे कि, कान, त्वचा, नेत्र जीभ और नासिका ये पांच ज्ञानइंद्रियां वाणी, हाथ, पाँव, बयोद० १३.] सान्वय-अमृततरंगिणीभा०टी०। (१४५) गुदा और लिंग ये पांच कर्मइंद्रियां एक मन ऐसे ग्यारह इंद्रियाँ और शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध ये पांच इंद्रियों के विषय हैं। ये सोलह विकारहैं इच्छौं, द्वेष, सुख, दुःख, संघात याने सविकार- भूतसमूह चेतना जो ज्ञानशक्ति धृति जो धीरज ऐसे संक्षेपैसे विकारसहित यह क्षेत्र कहा ॥५॥६॥ अमानित्वमदमित्वमहिंसा क्षतिराजवंम् ॥ आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥७॥ अब क्षेत्रकार्यों में आत्मज्ञानसाधनके वास्ते ग्रहण करनेके गुण कहतेहैं जैसे कि, श्रेष्ठ जनोंमें मानका न चाहनो लोक दिखानेको धर्म कर्मरूप दंभ न करना, परपीडारूप हिंसाका न करना, अपनेसे पलहीनके अपराँध सहनरूप क्षमा राखना, सर्वसे सरलस्वभावें रहना, मन, वचन, कर्म करके गुरुकी सेवा करना, मृत्तिका जलादिसे बाहर और शुद्धचित्तसे ईश्वरस्मरणरूप अंतर ऐसा शौच करना आत्म: ज्ञानमें स्थिर रहना,मनको सर्वत्रसे निवारणकरके ईश्वरमें लगाना॥७॥ इंद्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च ॥ जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ ८॥ इंद्रियविपयोंमें गुणवुद्धि नं करना और देहमें और देहसंबंधी पदार्थोंमें अहबुद्धिभी न करना, जन्म मृत्यु वृद्धावस्था अनेक रोग ऐसे शरीरमें इन दुःखरूप दोषोंका विचारना ॥८॥ असक्तिरनभिष्वंगः पुत्रदारगृहादिषु ॥ नित्यं च समॅचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥९॥ आत्माविना अन्यत्र आसक्तिरहित पुत्र स्त्री और घर इत्यादि- कैमें अति मिलाप न रखना और इष्ट और अनिष्टवस्तुको प्रोप्तिम निरंतर समचित्त रहना ॥९॥ १० ६१४६) भगवद्गीता। [अध्यायः- मंयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ॥ विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसँदि ॥१०॥ .. मेरेमें अनन्ययोगकरके अखंड भक्ति और एकांत रहनेमें प्रीति जनसभामें अप्रीति ॥१०॥ अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम्॥ एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तंमज्ञानं यंदतोऽन्यथा॥११॥ आत्मसंबंधी ज्ञानकी नित्यता तत्वज्ञानके प्रयोजनका विचारना ऐसे यह ज्ञान कहाँ जो इससे अन्यथा है सो अज्ञान है ॥११॥ ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्रुते ॥ अनादिमत्परं ब्रह्म नै सतनीसदुच्यते ॥ १२॥ जोजोलनेयोग्यहै सौ कहताहूं जिसको जानिके मोक्षको पाताहै यह ऐसा है कि, अनादि याने जन्मरहित है मत्पर याने उससे श्रेष्ठ .ही हूं वह केवल मेरे स्वाधीन है ब्रह्म याने प्रकृतिमुक्त शुद्ध चैतन्य जीवात्मा है वह आत्मों ने सत् न अखत् कहनेमें आताहै याने कार्य- कारण दोनों अवस्थाओंकरके रहित है ॥ १२ ॥ सर्वतः पाणिपादं वसवतोऽक्षिशिरोसुखम् ॥ सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १३॥ वह जीवात्मा सब ओरसे हाथपाँववाला है सब ओरसे नेत्र मस्तक और सुखवालाहै सब ओरसे कानवालाहै लोकसें वस्तुमात्रमें व्यापक होके रहताहै यह स्वरूप मुक्तजीवका कहा सुक्तदशामें जीवकी समता परमात्माके सरीखी है सो यहां गीतामेंभी कहेंगे " इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः " सूत्रभी है " भोगमा- असाम्यलिंगाच" और " तथाविद्वान् पुण्यपापे विधूय निरंजनः . परमं साम्यमुपैति" ऐसे जो परमात्माकी समता कही है तो परमा- त्मासरीखा स्वरूप होने में क्या शंक है।॥ १३॥ .
घयोद० १३.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा ही। (१४७) सर्वेद्रियगुणाभासं सर्वेद्रियविवर्जितम् ॥ असक्तं सर्वभृञ्चैव निर्गुणं गुंणभोत्कृ च ॥ १४ ॥ सर्व इंद्रियनकी वृत्तिनकरके भी विषयनको जाननेमें समर्थ हैं और आप स्वभावसे सर्वइंद्रियोंकरके रहित भी हैं याने इंद्रियनकी वृत्तिनविना भी विषयनको जाननेमें समर्थ हैं आप स्वयं देवादि.श- रीरोंमें आसक्त नहीं हैं और सर्व देवादिशरीरोंका धारणकरनेवालाहै सत्वादिगुणरहित और गुणोंका भोगनेवाला है ॥१४॥ बहिरंतेचं भूतानामचरं चरमेव च । सूक्ष्मत्वातंदविज्ञेयं दूरस्थं चौतिके च तत् ॥ १५॥ वह आत्मा मुक्तावस्थामें पृथिव्यादिभूतोंके बाहर और बद्धाव- स्थामें भीतर रहता है स्वयं आप अंचर है और देहसंयोगसे चरहो- ला है सूक्ष्म है इससे जाननेयोग्य नहीं है वह अज्ञानिनको दूरहे और ज्ञानिनको समीप है ॥ १५ ॥ अविभक्तं च भूते विभक्तमिव च स्थितम् ॥ भूतभर्तृ चं तज्ज्ञ यं असिष्णुं प्रभविष्णुं च ॥ १६ ॥ वह पृथिव्यादि भूतविकार देवादि शरीरोंमें एकरस रहता है और अज्ञानिनको देवादिशरीरोंमें देवादिशरीरोंके सदृश दीखता है कि, यह देव यह मनुष्य पशु इत्यादिक विभक्तसरीखा स्थित दीख- ता है और सर्वभूतोंका पोषक है और अन्नादिक भूतोंका भक्षक है देहरूपसे आहारकरनेवाला है और उसी अन्नादिविकारसे उत्पत्ति- कर्ताभी है ऐसे जाननेयोग्य है ॥ १६ ॥ ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमर्सः परंपुर्च्यते ॥ ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हदि सर्वस्य धिष्ठितम् ॥ १७॥ बह सूर्यादिक ज्योतिनको भी प्रकाशक है सूक्ष्मकारणरूप प्रकृ- (१४८) भगवद्गीता। [अध्याय:- तिसे पर यो ने न्यारा कहाता है ज्ञानरूप जाननेयोग्यं ज्ञानसे प्राप्त- होने योग्य सर्वके हृदयमें रहता है याने सर्व देव, मनुष्य, पशु, पक्ष्यादि शरीरोंके हृदयमें रहता है ॥ १७॥ इति क्षेत्र तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः॥ मद्भक्त एतद्विज्ञाय मौवायोपपद्यते ॥ १८॥ ऐसे "महाभूतान्यहंकारः" यहांसे लेके, “संघातश्चेतनाधृतिः"यहाँ- पर्यंत क्षेत्र कहा तथा "अमानित्वं" यहाँसे लेके "तत्वज्ञानार्थदर्शनं यहांपर्यंत ज्ञान कहा और "अनादिमत्पर" यहाँसे लेके "हदि सर्वस्य धिष्ठितं" यहांपर्यंत ज्ञेय याने जाननेयोग्य आत्मस्वरूप कहां ऐसे यह संक्षेपसे कहा यौनेको जानिके मेरों भक्तहोके मेरेसरीखे स्वरूपको प्राप्तहोय ॥१८॥ प्रकृति पुरुषं चैवं विद्धयनोदी उंभावपि ॥ विकारांश्च गुणांश्चैवं विद्धि प्रकृतिसंभवान् ॥ १९ ॥ प्रकृतिको और पुरुषको याने जीवको इन दोनोंको भी अनादि याने सनातन जोनों जो बंधनकारक इच्छा द्वेष सुख दुःखादिक विकार उनको और मोक्षकारक अमानित्व अदभित्वे गुण उनको निश्चयपूर्वक प्रकृतिसंभव जोनो अर्थात् इच्छादिविकारयुक्त प्रकृ- ति पुरुषकी बंधनकारक और अमानित्वगुणयुक्त मोक्षदायक होती है ॥ १९॥ कार्यकारणकर्तृले हेतुः प्रकृतिरुच्यते ॥ पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥२०॥ अब एकसंग रहेभये प्रकृतिपुरुषोंके कार्यभेद कहते हैं जैसे कि, कार्य जो प्रकृतिपरिणाम देहकारण मनसहित इंद्रियां इनका व्यापार करानेमें कारणे प्रकृति कही है सुखदःखोंके भोक्तार्पनेमें कारण त्रयोद० १३.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१४९ पुरुष कहाँ है याने भोगसाधनकर्मकी आश्रय प्रकृतिपरिणाम और पुरुषयुक्त देह तथा सुखादिभोक्तृत्वआश्रय पुरुष है ॥२०॥ पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुंक्त कृतिजान्गुणान् ॥ कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥ २१ ॥ जिसवास्ते कि, यह पुरुष प्रकृतिहीमें रहाभयो प्रकृतिजन्य शुणोंको भोगताहै तिसीसे इसका ऊंचनीचयोनि में जन्मलेनमें कारण प्रकृतिगुणोंका याने सत्वादिगुणोंका संगही है अर्थात् उन गुणनकी आसक्तिहीसे ऊंच नीच जन्म होते हैं ॥२१॥ उपद्रष्टाऽनुमंता चे भंग भोक्ता महेश्वरः॥ परमात्मेति चाँप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः॥ २२ ॥ इस देहेमें यह पुरुष देखनेवाला है याने चौकसी करनेवाला है और अनुमोदन देनेवाला याने सलाह देनेवाला है और इस देहका पोषनेवाला है और भोगनेवाला है और इसका महेश्वर है जैसे कि, इस देहमें ईश्वर इंद्रिय मन इत्यादि हैं उनका भी ईश्वर है. ऐसे इस देहसे यह जीव भ्यागंभी है तौभी अज्ञानसे केवल यह देह ऐसौ कहाताहै ॥ २२॥ य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह । सर्वथा वर्तमानोपि न से भूयोऽभिजायते ॥२३ ।। जो ऐसे इस जीवको और गुणोंकरके सहित प्रकृतिको जानता है सो सर्व प्रकारसे संसारमें रहताहै तौभी फिर नहीं उत्पन्न होताहै ॥२३॥ यानेनात्मनि पश्यंति केचिदात्मानमात्मना।। अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चाँपरे ॥२४॥ अन्ये वेवमानतः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते ।।
(१५०).
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
तेपिं चाति तरंत्येव मृत्युं श्रुतिपरायणोंः॥२५॥
कितनेक पुरुष आपके अंतःकरणमें बुद्धिं से विचारकरके इस
जीवात्माको जानतेहैं और कितनेक सांख्यं योगकरके जानतेहैं और
कितनेक कर्मयोग करके याने ईश्वरार्पणकर्म करते करते जान-
तेहैं और कितनेक और ऐसे नहीं जानतेभये दूसरोंसे सैंनिके
उपासना करतेहैं याने सुनिके प्रथमसरीखे उपाय करके जानतेहैं
और कितनेक केवल श्रद्धायुक्त श्रवणही करते रहते हैं तो वे भी
संसारको तैरतेहैं ॥ २४॥२९॥
यांवत्संजायते किंचित्सत्वं स्थावरजंगमम् ॥
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥२६॥
हे भरतवंशिनमें श्रेष्ठे अर्जुन ! जितना कुछ थावर और जंगम
प्रोणी उत्पन्न होता है उसको क्षेत्र और क्षेत्रके संयोगसे याने
शरीर और जीवके संयोगसे जानो ॥२६॥
संमं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठंतं परमीश्वरम् ॥
विनश्यत्स्वविनश्यंतं यः पश्यति स पश्यति॥२७॥
जो कोई सेवं भूतोंमें समं रहेभये केवल मन इंद्रियादिकोंके
ईश्वर इस जीवको इन इंद्रियादिकोंके नाशहोतेभी इसको नाशर-
हिते दीखताहै याने जानताहै सोई जानताहै ॥ २७ ॥
समें पश्यन् हि सर्वत्रं समवस्थितमीश्वरम् ॥
नहिनस्त्यात्मनात्मानं ततोयाँति पैरां गतिम्॥२८॥
सेव देवादिशरीरोंमें एकसरीखे रहेभये इस मन इंद्रियादिकोंके
ईश्वर जीवात्माको सम देखताभयां जो कि, बुद्धिपूर्वक आपको नहीं
हताह याने संसारमें नहीं गिराताहे उससे वह परम गतिको याने
मुक्तिको पावताहै ॥२८॥
. प्रयोद० १३.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१५१ पंकृत्यैव च कौणि क्रियमाणानि सर्वशः ॥ यः पश्यति तथाँत्मानमेकर्तारं से पैश्यति ॥ २९ ॥ जो सर्व कर्मीको प्रकृतिहीकरके याने प्रकृतिविकार इंद्रियों- करके ही करेभये जानताहै और तैसेही आपको अकर्ता जानताहै. 'सो जानताहै ॥ २९॥ यदा भूतप्पथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ॥ तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते तदा ॥३०॥ जर्व भूतोंका पृथग्भाव याने देवमनुष्यादिक शरीरोंकी छोटाई चड़ाई मोटाई पतराई इत्यादिक न्यारेन्यारे भावोंको एकल्य याने एकप्रकृतिहमें देखताहै और उसी प्रकृतिमें पुत्रादिरूप विस्तारको देखताहै तब शुद्धस्वरूपको प्राप्तहोताहै ॥३०॥ अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।। शरीरस्थोपि कौंतेय न करोति नै लिप्यते ॥ ३१ ॥ हे कुंतीपुत्र ! यह जीवात्मा अनादिपनेसे अविनाशी है केवल शरीरमें रहाँभया भी निर्गुणपनेसे में कुछ कर्मनको करताहै नै उन कर्मफलोंकरके लिप्त होताहै ॥३३॥ यथा सर्वगतं सौक्षादाकाशं नोपंलिप्यते॥ सर्वत्रावस्थितो देहे तात्मा 'नोपैलिप्यते॥३२॥ जैसे सर्वत्र प्राप्त अयाहुआ आकांश सूक्ष्मतासे उन भूतोंके गुणोंकरके लिप्त नहीं होता है तैसे सर्वदेवादिशरीरोंमें रहाभया जीवात्मा देहगुणोंकरके नहीं लिप्तहोताहै ॥ ३२ ॥ याँ प्रकाशयत्येकैः कृत्स्नं लोकमिमं रविः॥ "क्षेत्र क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ ३३ ॥ - (१५२) भगवद्गीता। [अध्याय:- हे भारत ! जैसे एक सूर्य इस सर्व लोकको प्रकाशताहे 'तैसे यह जीव सर्व शरीरको प्रकाशताहै ॥३३॥ क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमंतर ज्ञानचक्षुषा । भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्थीति ते परम् ॥ ३४ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां यो- गशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे प्रकृतिपुरुषविवे- कयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥ जोकोई ज्ञानदृष्टिकरके क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका ऐसे अंतरंको और भूतप्रकृतिके मोक्षको जानतेहैं वे मेरे को प्राप्तहोतेहैं ॥ ३४॥ इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिताया श्रीमद्भगवद्गीतामृततरंगिण्यांत्रयोदशाध्यायप्रवाहः॥ १३॥ पर भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानांनां ज्ञानमुत्तमम् ॥ यज्ज्ञात्वाँमुनयः सर्वे पैरां "सिद्धिमितो गताः॥१॥ श्रीकृष्णभगवान अर्जुनसे कहतेहैं कि, सर्वज्ञानों में उत्तम प्रसिद्ध अयाहुँआ ज्ञान फिर कहताहों जिसको जानि सर्व मुनिजन यहांसे श्रेष्ठ सिद्धिको याने परमपदको जातेभये ॥१॥ इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमार्गताः ॥ सर्गेऽपि नोपजायते प्रलये नै व्यथंति चें ॥२॥ जो कहताहौं इस ज्ञानको प्राप्तहोके मेरौं सधर्मताको याने मेरे समानरूप वैभवको वे मुनिजन प्राप्तहोतेभये वे उत्पत्तिकालमें न उत्पन्न होतेहैं और प्रलयमें नै दुःखी होते हैं ॥२॥ मम योनिर्मही तस्मिन्गर्भ दधाम्यहम् ॥ संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारतं ॥३॥ .
चतुर्द० १४.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१५३) हे भारत ! ममै महब्रह्म याने मेरी प्रकृति सर्वभूतोंका योनि याने उत्पत्तिस्थान है मैं उस प्रकृतिमें जीवरूपगर्भको धारण करता हौं तब उससे सर्वभूतोंकी उत्पत्ति होतीहै ॥३॥ सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवंति याः॥ तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥४॥ हे कुंतीपुत्र ! देवमनुष्यादि सर्व योनि+में जो देहै उत्पन्नहोतेहैं उन सबकी महंत ब्रह्म याने प्रकृति कारण है मैं चेतनरूप बीजका देने- पाला पिता हौं ॥४॥ सत्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः॥ निबध्नति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥५॥ हे महाबाहो ! सत्वगुंण रजोगुण और तमोगुण ये प्रकृतिसे उत्पन्न गुणं इस देहमें अविनाशी जीवको बंधनकरतेहैं ॥५॥ तत्र सत्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकर्मनामयम् ॥ सुखसंगेन बनाँति ज्ञानसंगनं चाँऽनघं ॥६॥ हे निष्पाप ! उनगुणोंमें सत्वगुंण निर्मलतासे प्रकाशक याने शु. भाशुभकर्मीका दिखानेवाला रोगरहित है इसीसे यह सुखकी आस- क्तिसे और ज्ञानके संगे करके बांधताहै याने ज्ञानसुखसे शुभकर्म शुभकर्मसे स्वीदि फिर उत्तमकुलमें जन्म फिर ज्ञानसुख ऐसे बांधताहै ॥६॥ रंजो रॉगात्मकं विद्धि तृष्णासंगसमुद्भवम् । संन्निबध्नाति कौंतेयं कर्मसंगेनं देहिनम् ॥ ७॥ हे कुंतीपुत्र ! तृष्णा और स्त्री धनादिनमें आसक्तिका करनेवाली रजोगुण विषयादिकमें प्रीति उपजानेवाला जोनो वह जीवको कर्म (१५४) भगवद्गीता । [ अध्यायः संगसे बांधताहै जैसे प्रीत्यात्मक कर्मसे उन कर्मसंगिनमें जन्म फिर कर्म फिर जन्म ऐसे ॥७॥ तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ॥ प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥८॥ हे भारते । सर्वदेहधारी जीवोंको मोहनेवाली तमोगुण अज्ञानका कारण जानो और वह प्रमाद आलस और निद्राकरके बंधन करताहै ॥ ८॥ संत्वं सुखे संर्जयति रजः कर्मणि भारत ॥ ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रैमादे संजयत्युत ॥९॥ हे भारत । सत्वगुण मनुष्यको सुखमें लगाता है रजोगुण कर्ममें तमोगुण ज्ञानको टेकिके फिर प्रेमादमें लगाताहै ॥९॥ रजस्तमश्चाभिभूयं सत्वं भवति भारतं ॥ रजः सत्वं तमश्चैव तैमः सत्वं रजस्तथा ॥ १० ॥ हे भारत ! यद्यपि ये गुण प्रकृतिके हैं तोभी विपरीतताका कारण यह कि, रजोगुण और तमोगुणको जीतिके सत्वगुण प्रबल होताहै और रजोगुण सत्वगुणको जीतिके तमोगुण प्रबल होता है तैसोही तमो- गुण सत्वगुणको जीतिक रजोगुण प्रैवल होताहै यहां कारण प्राचीन कर्म और नित्य आहारादिक हैं ॥१०॥ सर्वदारेषु देहेऽस्मिन् प्रकाश उपजायते ॥ ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्वमित्युत ॥ ११ ॥ लोभः प्रवृत्तिरीरंभः कर्मणामशमः स्टहाँ । रजस्येतानि जीयंते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ १२ ॥ हे भरतवंशिनमें श्रेष्ठं ! इसे देहमें जब सर्वनेत्रादिद्वारोंमें प्रकाश या- ने वस्तुका यथार्थ निश्चय सोई ज्ञान उत्पन्नहोय तवं सत्वगुण बढाहै ऐसा जानना और रजोगुणके बैढनेसे लोभ जो धनादिक खनारचेविः चतुर्द० १४.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१९५) भौर मिलनेकी इच्छा प्रवृत्ति याने प्रयोजनविना चंचलता कर्मनका आरंभ इंद्रियलोलुपता विषयइच्छौ इतने उत्पन्न होतेहैं ॥११॥१२॥ अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ॥ तमस्येतानि जायते विवृद्ध कुरुनंदन ॥ १३ ॥ हे कुरुनंदन ! तमोगुणके बढ़नेसे विवेककी हानि निरुद्यमता और न करनेका करना और विपरीतेज्ञान इतने ये होते हैं ॥ १३ ॥ यदा सत्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ॥ तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥१४॥ जैव सत्वगुणके बढनेके समयमें देहधारी प्रलय याने मृत्युको प्राप्त होय तब आत्मज्ञानिनके शुद्ध लोकोंको प्राप्तहोताहै अर्थात आत्मज्ञानिनके कुलमें आत्मज्ञान जाननेयोग्य शरीरोंको प्राप्तहोताहै "लोकस्तुभुवनेजने" इसप्रमाणसे यहाँ लोकशब्द जनवाचीहै ॥१४॥ रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसंगिषु जायते ॥ त प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥ १५ ॥ रजोगुणकी वृद्धिमें मृत्युको प्राप्त होके कर्मसंगिर्नमें जन्म देता है याने उनमें जन्म लेके सकामकर्म करके स्वर्ग जाताहै फिर उनहीमें जन्म लेके फिर कर्म करके स्वर्ग ऐसेही फिरता रहताहै तथा तमो- गुणमें मराभंया नीचेयोनिमें जन्मतीहै वहाँभी वैसाही क्रम जानना ॥१५॥ कर्मणः सुकृतस्याईः साँत्विकं निर्मलं फलम् ॥ रजसंस्तु फेलं दुःखमज्ञान तैमसः फलम् ॥ १६ ॥ सुकृत कर्मको फल सात्विक निर्मल कहते हैं याने उसके करते करते कोई जन्ममें मुक्तहोता है और रजोगुणी कर्मका फेल दुःख याने उस सकामसे स्वर्ग स्वर्गसे मृत्युलोक फिर स्वर्ग ऐसे संसारदुःख ही है.
( १५६) भगवद्गीता। [अध्याय:- तमोगुणीकर्मको फैल अज्ञान है याने उससे नरक ही है ॥ १६ ॥ सत्वात्सैजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ॥ प्रमादमोहौतमसो भवेतोऽज्ञानमेव च ॥ १७॥ साविककर्मसे ज्ञान होताहै और रोजससे लोभही होताहै ताम- ससे अज्ञान और मोहँ होतेहैं और अज्ञान भी होताहै ॥ १७॥ ऊर्ध्व गच्छति सत्वस्था मध्ये तिष्ठति राजसाः॥ जघन्यगुणवृत्तिस्था अंधो गच्छंति तामसाः ॥१८॥ सात्विककर्म करनेवाले मुक्तिको पातेहैं रजसकर्मवाले मध्य में (स्वर्ग मृत्यु लोकहीमें) रहते हैं जैसे पुण्यसे स्वर्ग पुण्य क्षीण होनेसे मनुष्यलोक फिर पुण्यसे स्वर्ग ऐसे वारंवार मध्यहीमें रहतेहैं तमोगुणी नीचगुणकी वृत्तिमें वर्तनेवाले तामसी नीचजाति पशुकीटादिकमें जन्मते रहतेहैं ॥१८॥ नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यंदादंष्टाऽनुपश्यति ॥ गुणेभ्यश्च परं वेति मैद्भाव सोऽधिगच्छति ॥ १९॥ जब विवेकी पुरुष सत्वौदिगुणोंके विना और किसीको कत्ती नहीं जानता है और आपको गुणोंसे न्यारों जानता है तब सो मेरी सौम्य- ताको प्राप्तहोताहै ॥ १९॥ गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहंसमुद्भवान् ॥ जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥ २०॥ यह देहधारी जीवं देहमें उत्पन्नभये इन सत्वादि तीनि गुणोंको उल्लंघन करके जन्म मृत्यु और जरापनके दुःखोंकरके छुटाभयां मोक्षको पाताहै गुणयुक्त. नहीं ॥२०॥ अर्जुन उवाच। कैलिंगेस्त्रीने गुणानेता तीतो भवति प्रभो॥
चतुर्द० १४.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१९७) किमाचारः कथं चैतस्त्रिीन्गुणानैतिवर्त्तते ॥२१॥ ऐसे सुनिके अर्जुन पूंछते हैं कि, हे प्रभो ! कौनसे चिह्नोंकरके इन तीन गुणोंको उल्लंघन किया या होताहै वह कैसे आचरणवाला होताहै और इन तीनों गुणोंको कैसे उल्लंघन करे ॥२१॥ श्रीभगवानुवाच। प्रकाशं चे प्रवृत्तिं च मोहमेवं च पांडवं ॥ ने द्वेष्टिं संप्रवृत्तानि न निवृत्तीनि कांक्षति ॥ २२ ॥ उदासीनवीसीनो यो गुणैन विचाल्यते ॥ गुणों वर्तत इत्येवं योतिष्ठति ने" गते ॥ २३ ॥ समदुःखसुखःस्वस्थैः समलोष्टाश्मकांचनः॥ तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिंदात्मसंस्तुतिः॥२४॥ मानापमानयोस्तुल्यैस्तुल्यो मित्रॉरिपक्षयोः॥ सारंभपरित्यागी गुणातीतः सैं उच्यते ॥ २५ ॥ अर्जुनका प्रश्न सुनिके भगवान् कहते हैं कि, हे पांडुपुत्र ! जो पुरुष प्रकाश याने आरोग्यादिक सत्वगुणके. कार्य और प्रवृत्ति याने रजोगुणके कार्य और मोह याने तमोगुणके कार्य ये जो प्रवृ- तहोय तो इनको नहीं त्यागचाहता है और निवर्त्तभये इनको ने चाहता है उदासीनसरीखाँ स्थित भैयाहुआ गुणोंकरके नहीं चला- यमान होता है आप आपके कार्योंमें गुण ही वर्तमान हैं ऐसे जो स्थिर है चलायमान नहीं होताहै सुखदुःखमें सम स्वस्थ ठीकरी कंकर पत्थर और सोना जिसके सम हैं तुल्य हैं प्रिय अप्रिय जिसके घर इसीसे आपकी निंदा स्तुति समान जीनताहै मान और अप- ११५८) भगवद्गीता। [अध्याय:- भान तुल्य मित्रशत्रुपक्षमें तुल्य मेरे सेवनादिकविना सर्व आरंभोंका त्यागी सो गुणातीत कहाताहै ॥ २२ ॥२३॥२४॥२५॥ माँ , योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ॥ से गुणान्समैतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६ ॥ ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहम तस्याव्य॑यस्य च ॥ शाश्वतस्य च धर्मस्य सुर्खस्यैकांतिकस्य चे ॥ २७॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयवि- भागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥ जिसवास्ते कि मरणधर्मरहित और इसीसे अविनाशी जो ब्रह्म याने भुक्तजीव उसका और सनातन धर्म जो भक्तियोग उसका और मुख्य सुख जो स्वस्वरूपकी प्राप्ति उसका मैं आधारहूंईसीसे जो अखंडित भक्तियोगकरके मेरेको भेजताहै सो इन गुणोंको उल्लंन करके मेरी समताको प्राप्त होताहै ॥ २६॥२७॥ इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिता- यो श्रीमद्भगवद्गीतामृततरंगिण्यांचतुर्दशाध्यायप्रवाहः॥१४॥ श्रीभगवानुवाच । ऊर्ध्वमूलमधशाखमश्वत्थं प्राहुरय॑यम् ॥ छंदांसि यस्य पनि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ १॥ , तेरहवें अध्यायमें क्षेत्ररूप प्रकृति और क्षेत्रज्ञ पुरुष याने जीव इनका लवकर कहा, शुद्धजीवात्माके भी प्रकृतिसंबंधी गुणोंके प्रवाहनिमित्त देवादिक आकारसे परिणामको प्राप्तभई जो प्रकृति उसका संबंध अनादि कहा, चोदहवें अध्याय में कहा कि, इस जीवको जो कार्य और पंचद० १५.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१५९) कारण अवस्थानमें यह गुणसंगप्रवाह मूलप्रकृतिसंबंध सो भगवान हीने किया है ऐसे कहिके विस्तारसहित गुणसंगप्रकारको कहिके कहा कि, गुणसंगनिवृत्तिपूर्वक स्वस्वरूपकी प्राप्ति भगवद्भक्तिमूल ही है. अब पंद्रहवें अध्यायमें जो भजने योग्य भगवान आपके कल्याण- गुणादिकोंकरके बद्ध मुक्त दोनों प्रकारके जीवोंसे विलक्षण ( न्यारे ) उनका पुरुषोत्तमत्व कहनेको जो यह बंधन आकारसे विस्तरित प्रकृतिका परिणाम विशेषसंसार उसको पीपवृक्षरूप कल्पित करके श्रीकृष्ण भगवान् बोलतेभये कि, जिसके वेद पत्ते अर्थात् जैसे पत्तोंकरके वृक्ष बढताहै तैसे यह संसाररूप वृक्ष वेदोक्तकर्म करके बढताहै इससे वेद पत्तारूप हैं ऊर्ध्वमूल याने सत्यलोकमें ब्रह्मा जिसका मूल है अधःशाख याने सत्यलोकसे नीचे जो देव म- नुष्य कीट पतंगपर्यंत शरीर ये उसकी शाखा हैं ऐसा अव्यय याने सम्यक् ज्ञानप्राप्ति होनेसे प्रथम अज्ञानदशामें प्रवाहरूप करके छेदनेके अयोग्य इसीसे अज्ञानिनके अविनाशी हैं ऐसा इस सं- सारको अश्वत्थ याने पीपरवृक्षरूप श्रुति कहती हैं तिसेको जो जानताहै सो वेदका जाननेवाला है अर्थात् वेद इस संसारके छेदने- का उपाय कहताहै तो जो इसको जानेगा तो छेदनेका भी उपाय जानेगा इससे वह वेदजाननेवाला है ॥ १॥ अधेश्वोर्व प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा वि- षयप्रवालाः॥ अधेश्चै मूलान्य संततानि कर्मा- नुबंधीनि मनुष्यलोके ॥२॥ १० अब उस संसारवृक्षकी और भी विलक्षणता कहते हैं जैसे कि, स- स्वादिगुणोंकरके बैठीभई और अन्दादिक विषय जिनके प्रवाल याने - (१६०) भगवद्गीता। [अध्यायः- कोपल याले जो नये एक दिनके निकसेभये पत्ते वैसे पत्ते जिनके विषय हैं ऐसी उस वृक्षकी शाखायें नीचे मनुष्यलोकमें और ऊपर देव गंधर्वादिलोकोंमें फैलँरही हैं अर्थात् नीचकमसे नीचे मनुष्योंसे भी नीच पश्चादिशरीर ऊपर उत्तमकर्मसे उत्तम देवादिशरीररूप शाखें फैलरही हैं नीचे मनुष्यलोकमें भी उसकी कर्मानुसारी मूलें फैली- रही हैं अर्थात् मनुष्यलोकमें जो ऊंच नीच कर्म वही मूलरूप हैं ऊंच नीच पदवी कर्मविना नहीं कर्म मनुष्यशरीरविना नहीं होताहै ॥२॥ नरूमस्येह तथोपलभ्यते नांती नं चांदिन' चें संप्रतिष्ठा ॥ अश्वत्थमेनं सुविरूँढमूलमंस- गशस्त्रेण हूँढेन छित्त्वों ॥३॥ततः पदं तत्परिमा- गिंतव्यं यस्मिन्गता नै निवर्तति भूयः ॥ तमेव चौधं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रत्तिः प्रसृतौ पुराँणी ॥४॥ इस संसारवृक्षका इस लोकमें जैसा कहा है तैसा रूप अज्ञानीजनों करके नहीं जानने में आताहै न उसका अंत और नै आदि और ने स्थिति जाननेमें आतीहै ऐसे दृढमूल इस पीपरवँक्षको अतिहँढ वैराग्यरूप शस्त्रसे छेदन करके फिर जिससे यह प्राचीन प्रवृत्ति याने गुणमय भोगरूप संसारप्रवाह विस्तरितहै उसी आँदि पुरुषके औरणागत होके उस पैदको ढूँटना कि, जिसमें गयेभये मुनिजन फिर इस संसारमें नहीं आतेहैं ॥३॥४॥ निर्मानमोहां जितसंगदोषां अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकार्माः ॥ द्वंद्वैविमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्ग- छंत्यमूढाः पैदमव्ययं तत्॥५॥ जो मानमोहकरके रहित हैं और जिनने संगदेषोंको जीताहै और जो अध्यात्मशास्त्रहीमें नित्य वर्तमान हैं और जिनकी कामना निवृत्त पंचद० १५.] सान्षय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१६१). है जो सुखदुःखसंज्ञक वैद्रोंसे छुटेभये हैं वही ज्ञानीजन उस अविनाशी पैदको प्राप्त होतेहैं याने स्वस्वरूपको प्राप्त होतेहैं ॥५॥ ने तंद्रासयते सूर्यों ने शशांको नं पावकः॥ यद्त्वाने निवर्तते तैद्धाम परमं मम ॥६॥ सूर्य उस आत्माको नहीं प्रकाशिसकताहै ने चन्द्रमा और न अग्नि प्रकाशिसकताहै जिसरूपको याने शुद्धआत्मस्वरूपको प्राप्त होके नहीं संसौरमें आतेहैं वह मेरों परम धाम है याने मेरे रहनेका मुख्य स्थान मेरा शरीर है इस जगह “यस्यात्मा शरीरं" यह श्रुति भी प्रमाण है ॥६॥ ममैवांशो जीर्वलोके जीवभूतः सैनातनः॥ मनःषष्ठानींद्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥७॥ जो यह ऐसा वर्णन किया सो यह मेरोही सनातन अंश है याने जैसे प्रकृति और अनंत जीव मेरेही हैं उनमें यह एक मेराही है मेरी ही विभूति है सो यह इस जीवलोको जीवभूत याने अति संकुचितज्ञान- भयाहुआ पांच ज्ञानेंद्रिय और एक मन ऐसे मनसहित छः प्रकृतिवि: 'कार इस देहमें रहीमयी इंद्रियोंको बँचता फिरताहै ॥७॥ शरीरं यदवाप्नोति यचाँप्युत्क्रामतीश्वरः ॥ गृहीत्वैतानि संयाँति वायुगंधीनिवांशयात् ॥ ८॥ जंब यह जीव शरीरको प्राप्तहोताहै और जैव वर्तमान शरीरसे जाताहै तब यह मन इंद्रियोंका ईश्वर आपकी सेनारूप इन इंडियों- को, पेवन पुष्पादिक गंधस्थानसे गंधों को जैसे तैसे गैहणकरके बाँताहै ॥८॥ श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घाणमेव च ॥
(१६२)
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
अधिष्ठाय मैनश्चीयं विषयानुपैसेवते ॥९॥
यह जीवात्मा श्रोत्रइंद्रिये याने कान नेत्र और स्पर्शन जो त्वचा-
इंद्रिय रसना जो जिह्वा और प्राण जो नासिका और मैंन इनको आश्र-
यकरके विषयोंको सेवता है ॥९॥
उत्क्रामंतं स्थितं वापि भुजान वा गुणान्वितम् ॥
विमूढां नार्नुपश्यंति पश्यति ज्ञानचक्षुषः ॥१०॥
यह जो गुणोंकरके युंक्त आत्मा तिसको देहत्यागतेको अथवा
देहमें रहते भयेको अथवा विषयभोगतेभयेको भी अज्ञानीजन नहीं
देखतहैं जिनके ज्ञानदृष्टि है वे देखते हैं ॥१०॥
यंतंतो योगिनश्चैनं पश्यंत्यात्मन्यवस्थितम् ॥
यतंतोऽप्यंकृतात्मानो नैनं पश्यत्यचेतसः ॥११॥
योगीजेन जतन करते करते आपके अंतःकरणमें रहेभये इस
आत्माको देखतहें और जो विषयासक्त हैं वे जो शास्त्रद्वारा उपाय करें
तोभी वे अज्ञानी इस आत्माको नै देखिप्त ॥११॥
यंदादित्यगतं तेजो जंगद्भांसयतेऽचिलम् ।।
यँच्चंद्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ १२ ॥
जो सूर्यमें रहार्भया तेज सर्व जगत्को प्रकाशिरहा है और जो तेज
चंद्रमा और जो अग्निमें है उस तेजको मेराही तेज जानो ॥ १२ ॥
गांमाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसाँ॥
पुष्णामि चौषधीः सर्वाःसोमो भूत्वा रसात्मकः॥१३॥
मैं पृथिवीमें प्रविष्होके अपने अचिंत्य सामर्थ्यकरके सर्वभूतों-
को धारण करताहूं और अमृतमय चंद्र "होके सर्व औषधिनको
पौलताई ॥१३॥
पंचद० १५.] सान्वयं-अमृततरंगिणीभा० टी। (१६३)
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहाश्रितः॥
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ १४॥
मैं जठराग्नि होके सर्वप्राणिनके देहमें रहामा प्राण और अपान-
संयुक्त अक्ष्य, भोज्य, लेह्य पेय ऐसे चारप्रकारके अन्नको पंचाताहूं१४
सर्वस्य चौह हदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञान-
मपोहनं च ॥"वैदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदांत-
द्वेदविदेवें चाहम् ॥ १५॥
मैं सर्वके हृदयमें प्रविष्टहूं और सर्वक स्मृति ज्ञान और विचार
मेरेले होतेहैं और सर्व वेदोंकरके मैं ही जानने योग्यहूं "और वे-
दांतका कर्ता और वेका जाननेवाला मैं ही हूँ॥ १५ ॥
द्राविमौ पुरुषौ लोके क्षरेश्वाक्षर एव च ॥
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १६ ॥
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमौविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥१७॥
इस लोकमें क्षर और अक्षर ऐसे ये दोप्रकार के पुरुष हैं तिनमें
सर्व शरीरधारी भूतप्राणी और और मुक्तजीव अक्षर केहाताहै इन
दोनोंसे उत्तम. पुरुष और है जो परमात्मा ऐसे कैहाताहै जो अ-
विनाशी ईश्वर त्रिलोकीमें प्रवेशकरके सर्व त्रिलोकीका भरण पोषण
करता है।॥ १६॥ १७॥
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ॥
अतोऽस्मि लोके वेदे" च प्रथितैः पुरुषोत्तमः॥१८॥
जिसवास्ते कि, मैं बद्धावस्थ जीवसे श्रेष्ठं और मुक्तसेभी उत्तम
है इससे स्मृति और वेदमें भी पुरुषोत्तम प्रसिहं ॥ १८ ॥
(१६),
भगवद्गीता।
[ अध्याय:-
यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।।
संसर्वविद्भजति मा सर्वभावेन भारत ॥ १९॥
हे भारत ! जो सम्यक ज्ञानीपुरुष ऐसे मेरेको पुरुषोत्तम
जानता है सो सर्वज्ञहे इसीसे वह सर्वभाव याने माता पिता सुहद्
धनादिक मेरेको जानिके मेरेहीको" भेजताहै ॥ १९॥
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मर्याऽनघे ॥
एतद्वंवा बुद्धिमान्स्योत्कृतकृत्यश्चै भारत ॥ २० ॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सुब्रह्मविद्यायां योग-
शाने श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुराणपुरुषोत्तमयो-
गोनाम पंचदशोऽध्यायः ॥ १५॥
हे निष्पाप ! ऐसे यह अतिगोप्य शास्त्र मैंने कहा हे भारत ।
इसको जानिके बुद्धिमान् और कृतकृत्य होताहै ॥२०॥
इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिताया
श्रीमद्भगवद्गीताऽमृततरंगिण्यां पंचदशाध्यायप्रवाहः ॥१५॥
ऐसे तेरवहें अध्यायले पंद्रहके समातिपर्यंत क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका वि-
चेक और गुणत्रयका विभाग और क्षराक्षर याने बद्ध मुक्त जीवोंका
स्वरूप तथा परमात्माका पुरुषोत्तमत्व और सामर्थ्य कहते भये अब
सोरहें अध्यायमें जीवकी शाखावश्यता और दैवासुरसंपत्तिविभाग कहेंगे।
श्रीभगवानुवाच ।
अभयं सत्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः॥
दाँलं हमेश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्त ऑर्जवम् ॥१॥
अहिंसी सत्यमक्रोधस्त्यागः शांतिरपैशुनम् ॥
दया भूतेष्वलोलत्वं मदिवं वीरचौपलम् ॥ २॥
पौंडशः १६.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१६९) तेजः क्षमा धृतिःशौचमैद्रोहो नातिमानिता ॥ भवंति संपदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥३॥ श्रीकृष्ण भगवान अर्जुनसे कहतेहैं कि, हे भारत । दैवी संपदाको प्राप्त भये मनुष्यको निर्भय रहना अंतःकरणकी शुद्धि प्रकृतिसे भिन्न आत्मा है ऐसी निष्ठा सुपात्रको कुछ देना और मनको विष- योंसे निवृत्त करना और निष्कामतासे भगवान्के पूजनरूप पंचम- हायज्ञोंका करेंना घेदमंत्रादिकोंका जप एकादशीव्रतादिरूप तप सर्वसे सरल रहना जीवमात्रको पीडा न देना हित और यथार्थ भाषण कोका न करना उदारता शांति याने इंद्रियोंको वशकरना चुंगली न करना भूतप्राणिमात्रपर दया परस्त्रीधनादिपर इच्छा न करना अकरता लज्जा व्यर्थकामका न करना तेज क्षमा याने सहन- शीलता धीरज पवित्रता द्रोहको न करना मानप्राप्तिके वास्ते अति- मानका न करना ये २६ गुण देवीसपैदाके होतेहैं ॥ १ ॥२॥३॥ दंभो दोऽभिमानश्च क्रोधः पौरुष्यमेव च ॥ अज्ञानं चाँभिजातस्ये पार्थ संपदमांसुरीम् ॥ ४ ॥ हे पृथापुत्र ! आंसुरी संपदाको प्राप्तभये मनुष्यके दंभ, दर्प और अभिमान क्रोध "और केंटुभाषण और अज्ञान ये लक्षण होतेहैं ॥४॥ दैवीसंपद्विमोाय निबंधायासुरी मता ॥ मौ शुचः संपदं दैवीमंभिजातोसि पांडवं ॥५॥ हे.पांडपुत्र ! देवीसंपदा मोक्षके वास्ते है आसुरी बंधनके वास्ते निश्चय कीगई है तुम देवीसंपदाको प्राप्तभयेहो मैति शोचो.॥५॥ द्वौ भूतसौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुरंएव च ॥ दैवी विस्वरशः प्रोक्तं औसुरं पार्थ में शृणुं ॥६॥ 53 2 (१६६) भगवद्गीता। [अध्याय:- हे पार्थ ! ईस लोकमें दो प्रकारके प्राणी, एक देव और दूसरे आसुर दैव विस्तारसे कहा और सुझसे आनुरको हुंनो ॥६॥ प्रवृत्तिं च नितिं च जना न विदुरासुराः ।। नं शौचं नाऽपि" चाँचौरो नैं सत्यं तेषु विद्युत ॥७॥ असुरस्वभाववाले मनुष्य संसारसाधन और मोक्षसाधनभी नहीं जानतेहैं उनमें में शुचिता और ने शास्त्रीय आचरण नै सत्यंभी रहताहै ॥७॥ असत्यमप्रतिष्ठं ते' जगदाहुरनीश्वरम् ॥ अपरस्परसंभूतं किंमन्यत्कामहैतुकम् ॥८॥ वे असुरप्रकृति मनुष्य इस जगत्को कोई तो असत्य याने मिथ्यो और भ्रम कहतेहैं कोई अप्रतिष्ठे याने इसका कोई आधार नहीं ऐसा कहते हैं कोई अनीश्वर कहतेहैं स्त्रीपुरुषके परस्परसंयोगसे भये विना और जगत् क्या है केवल कामहीके निमित्तसे याने स्त्रीपुरुषके संयोग- हीसे होताहै ऐसा कहतेहैं ॥ ८॥ एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः॥ प्रभवत्युग्रकर्माणः क्षयायं जगतोऽहिताः ॥९॥ वे अज्ञानी जन खानपानादिक अल्पपदार्थमें बुद्धिवाले ऐसी समुझे- को ग्रहणकरके उग्रकर्मकरनेवाले याने परस्त्रीधन पुत्रादिकोंके हरण करनेवाले सर्वके भहित जगतक नाशके वास्ते प्रवृत्त होते हैं॥९॥ कार्ममाश्रित्य दुःपूर दंभमानमदान्विताः॥ मोहाँहीत्वाऽसदाहन्प्रिवर्ततेऽशुचित्राः॥१०॥ जो दुःखसे भी न पूरी होय ऐसी कामनाको आश्रितहोके दंभ मान और मदयुक्त भयेछये मोहसे असद्गाहोंको Jहणकरके याने
"
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पोडशः १६.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा०टी० । (१६७)
मारण मोहन वशीकरणके उपाय करना ऐसे भ्रष्टाचारनको स्वीकार
करके अपवित्रवल भूतादि सेवनेवाले भयेहुए उनही कामों में प्रवृत्त
होतेहैं ॥१०॥
चितामपरिमेयां चे प्रलयांतांमुपाश्रिताः ॥
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥ ११ ॥
अपार और मरणांत चिताको प्राप्तभये हुये कामोपभागमें तत्पर
इतनाही सुखहै ऐसे निश्चयकियेभये ॥११॥
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ॥
इहते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचर्यान् ॥ १२ ॥
सेकंडों आशाकी फाँसिनकरके बधेभये काम और कोपके स्वाधी-
न भये कामभोगके वास्ते अन्यायकरके द्रव्यसंचयको उपायकरते
रहतेहैं ॥ १२॥
इदमद्य मयां लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ॥
इदमस्तीदमपि में भविष्यति ऍनर्धनम् ॥ १३ ॥
मैंने आज यह पाया इस मनोरथको पावूगाँ मेरे यह धन है" फिर
पहभी होयेंगा ॥१३॥
अंसौ सया हतः शत्रुहनिध्ये चापरानपि ।
ईश्वरोहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥ १४ ॥
मैंने यह वैरी मारा और औरनकोभी मारूंगा मैं ईश्वरहूं "मैं
भोगीहूं मैं सिद्धहूं मैं बलवानहूं मैं सुखीहूं ॥ १४ ॥
आंढयोऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ॥
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥१५॥
+ . (१६८) भगवद्गीता। [अध्याय:- मैं योग्यहूं उत्तम कुलमें जन्मोहूं मेरे समान और कौन हैं यज्ञ करूंगा दोन देऊंगा आनंद करूंगा ऐसे अज्ञानमें माहेरहतेहैं॥१६॥ अनेकचित्तविश्रांतां मोहजालसमावृताः ॥ प्रसक्ताः कामभोगेषु पतंति नरकेऽशुचौ ॥ १६ ॥ अनेकजगह चित्त लगनेसे भ्रमिष्ठे मोहके जाल में फँसेभये कामभोग- में आँसक्त वे अपवित्र नरकमें पड़तेहैं ॥१६॥ आत्मसंभाविताः स्तब्धौ धनमोनमदान्विताः॥ यजते नामयज्ञैस्ते दंभेनाऽविधिपूर्वकम् ॥ १७॥ जो आपको आपही श्रेष्ठ मानिरहेहैं और अनत्र हैं धन मान मदयु- कहैं वे दंर्भसे अविधिपूर्वक नाममात्र यज्ञोंकरके यजन करतेहैं॥१७॥ अहंकारं बलं दर्प कॉम क्रोधं च संश्रिताः॥ मामात्मपरदेहेऱ्या प्रद्विषतोऽभ्यसूयकोः ॥ १८॥ अहंकार बैल हर्ष काम और क्रोधका आश्रयकर रहेहैं ऐसे वे आपके और औरोंके देहोंमें रहेभये मेरेसे द्वेष करतेभये मेरी निंदा करतेहैं ॥१८॥ तानेहं द्विषतः क्रूरॉन्संसारेषु नराधमान् ।। क्षिपाभ्यजस्मशुभांनासुरीष्वेर्वं योनिषु ॥ १९ ॥ मैं उन द्वेषकरनेवाले क्रूर अशुभ नराधमोंको संसारमें आसुरीही योनिनमें वारंवार पटकैताहूं ॥१९॥ आर्सेरी योनिमापन्ना मूढां जन्मनि जन्मनि ॥ मॉमप्राप्यैवं कौंतेय ततो यात्यधमां गतिम् ॥ २० ॥ हे कुंतीपुत्र । वे मूर्ख जन्मजन्ममें आँसुरी योनिको प्रतिभयेहुये मेरेको न प्राप्तहोके फिर अंधम गैतिको प्राप्तहोतेहैं ॥२०॥ त्रिविध नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः॥
पोडशः १६.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी। (१६९) कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्रयं त्यजेत्॥२१॥ कामना, कोष तथा लोभ यह तीन प्रकारका नरकका द्वार ओ. पका नाशनेवालाहै याने संसारमें भ्रमानेवालाहै इससे इन तीनोंको त्यांगना ॥२१॥ ऐतैर्विमुक्तः कौंतेयं तमोदारैत्रिभिर्नरः ।। आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति पैरां गतिम् ॥ २२॥ हे कुंतीपुत्र ! इन तीनों नरकद्वारोंकरके छुटाभया मनुष्य आपके कल्याणका साधन करताहै उससे परम पैदको प्राप्तहोताहै ॥२२॥ यःशास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्त्तते कामकारतः ॥ नं स सिद्धिमाप्नोति न सुखं न परगतिम् ॥ २३॥ जो शास्त्रविधिको त्यागि के स्वइच्छाप्रमाण चलताहै सो न सि- दिको पावताहे न सुखको नै मोक्षको पावताहै ॥२३॥ तस्माच्छास्त्रं प्रमाण ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ॥ ज्ञात्वा शास्त्रंविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ २४ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसंपद्वि- भागयोगो नामषोडशोऽध्यायः॥ १६॥ इससे तुमको कार्याकार्यव्यवस्थामें शास्त्रहीप्रमाणहै यह जानिके ईस लोकमें शास्त्रविधानोक्तं कर्म करनेको योग्यहो ।। २४॥ इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचि- तायां श्रीमद्गीतामृततरंगिण्यां षोडशाध्यायप्रवाहः ॥१६॥ अर्जुन उवाच । ये शास्त्रंविधिमुत्सृज्यं यजते श्रद्धयान्विताः॥
" ( १७०) भगवद्गीता। [अध्याय:- तेषां निष्ठां तु का कृष्ण सत्त्वमौहो रँजस्तमः ॥ १ ॥ सोरहवें अध्यायमें ईश्वरतत्त्वका ज्ञान और ईश्वरपालिका उपाय इनके कारण मूल वेदही हैं ऐसे कहा और अंतमें कहा कि शास्त्रवि-. विहीन कर्म करनेवालेको सुखादिक नहीं सो शुनिके अर्जुन बोले कि, हे कृष्ण ! जो शास्त्राविधिको त्योगिक श्रद्धांकरके युक्त यजन करतेहैं उनकी क्या निष्ठाहै सत्वगुण है किंवा रजोगुण है या तमो- गुण है ॥१॥ श्रीभगवानुवाच । त्रिविधा भवंति श्रद्धां देहिनों सौ स्वभावजा ।। सांत्विकी राजसी चैवं तामसी चैंति तो शृणें ॥२॥ अर्जुनका प्रश्न सुनिके श्रीकृष्ण भगवान् कहते हैं कि, सात्विकी और राजसी और तामसी ऐसे तीनप्रकारकी निश्चय श्रद्धा होतीहै" "सो देहधारिनकी स्वभावहीसे होतीहै उसको मैंनो॥२॥ सत्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धार्मयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः संएव सः ॥३॥ हे भारत ! सेवकी श्रद्धा अंतकरणके अनुरूप होतीहै यह पुरुष श्रद्धामयहै जो जिसश्रद्धावाला होताहै सो" वही होताहे जैसे सात्विकी श्रद्धावाला सात्विक इत्यादि ॥३॥ यजते सात्विका देवान्यक्षरक्षासिराजाः॥ प्रेतान्सूतगणांश्चान्ये येते तामसां जनाः॥४॥ सात्विक पुरुष देवतानको पूजतेहैं राजसी यक्षरीक्षसोंको और और तामसी जने प्रेत भूतगणोंको पूँजतेहैं॥४॥ अशास्त्रविहितं घोरं तप्यते ये तपोजनाः।
सप्तद. १७.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१७१) दंभाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥५॥ कर्शयंतः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः॥ माँ चै"वांत शरीरस्थं तान्विद्धयासुरनिश्चयांच॥६॥ दंभ और अहंकारसंयुक्त कामना और विषयानुराग. इनहीको सेनायुक्त जे मनुष्य वे अशास्त्रविहित याने जो शास्त्रप्रसिद्ध नहीं ऐसे घोर तपको तपतेहैं वे अज्ञानी जेन शरीरमें रहेभये भूत- समूहको "और अंदर शरीरमें स्थित मेरेको भी दुःख देते हैं उनको आसुरनिश्चय याने असुरपनेमें निश्चय जिनका ऐसे उनकों जानो॥५॥६॥ आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः॥ यजस्तपैस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥७॥ आहार भी सर्वका तीनप्रकारको प्रिय होती है और यज्ञ तथा तप देन येभी तीनि प्रकारके हैं तिनका भेद यह सुनो ॥७॥ आयुःसत्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्द्धनाः॥रस्याः स्निग्धाःस्थिरो हृया आहाराः सात्विकप्रिमी॥८॥ जो आहार आयुष्य होशियारी बल आरोग्य सुख और प्रीतिके बढानेवाले हो मधुरादिरसयुक्त स्निग्ध स्थिर याने बहुतकाल रह- मेवाले हृदयेका वर्दक ऐसे आहार सात्विक जनोंको प्रिय होतेहैं।८॥ कदम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः । आहारा राजसंस्यष्टौ दुःखशोकामयप्रदाः ॥९॥ अतिकटु जैसे बहुत मिर्चवाला पदार्थ अतिखडा अतिलोन- पाला वडावगैरे अति गरमागरम अतितीक्ष्ण राईवगैरह मिश्रित अति रखे और दाहकारकै राजसिनेके प्रिय आहार दुःख शोक और रोगोंके देनेवाले होते. ।। ९॥
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(७२)
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
यांतयाम गतरसं पूंति पर्युषितं च यत् ॥
उच्छिष्टमपि चाँमेध्यं भोजन तामसप्रियम् ॥ १० ॥
जिस भातवगैरेको एक पहर बिता होय वह ठंढा पदार्थ सिवि-
हीन दुर्गधवाला और बासी और उच्छिष्ट भी ऐसा अपवित्र भोजन
तामसिनको प्रिय होताहै।॥१०॥
अफलाकांक्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो यं इज्यते ॥
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय से सात्विकः ॥ ११॥
यज्ञकरनाही योग्यहै ऐसे मनको समाधानकरके फल-इच्छा.
रहित मनुष्योंने विधिपूर्वक जो यज्ञ कियाहोय सो" यज्ञ सात्विक ११
अभिसंधार्य तु फलंदभार्थमपि चैव येत् ॥
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजेसम् ॥ १२ ॥
हे भरतश्रेष्ठ ! जो फल की इच्छाकरके और दंभके वास्तेभी
यज्ञ करे उस यज्ञको राजस जानो ॥ १२ ॥
विधिहीनमसृष्टान्नं मंत्रहीनमदक्षिणम् ॥
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥ १३॥
जो यज्ञ विधिहीन उचित अन्नहीन मंत्रहीन दक्षिणारहित और
श्रद्धारहित यज्ञं तामस कहाहै ॥ १३ ॥
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजन शौचमार्जवम् ॥
ब्रीचर्यमहिंसा चे शारीरं तर्प उच्यते ॥ १४ ॥
देव ब्राह्मण गुरु और विद्वानोंका पूजन शुचिंता सरलता ब्रह्म
चर्य और परपीडावर्जन यह शरीरसंबंधी त केहाहै ॥१४॥
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ॥
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तपै उच्यते॥१५॥
. (१७३) सप्तद०१७.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। जो वचनं उद्वेगकारक न होय और सत्य प्रिय हितहोय और वेद- पाठ मंत्रजपादिकका अभ्यास यह वाणीमय त कहाँ है ।। १६ ॥ मनःप्रेसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ॥ भावंसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥ १६ ॥ मनकी प्रसन्नता सदयपना याने क्रूर न होना मितभाषण मनको पश करना और अंतःकरणकी शुद्धता यह इतना तप मानस कहोताहै ॥१६॥ श्रद्धया परयाँ तप्तं तपस्तंत्रिविधं नरैः । अफलोकांक्षिभियुक्तैः सौखिक परिचक्षते ॥ १७ ॥ फलकी इच्छा नकरनेवाले योग्य पुरुष तिनकरके परम श्रद्धां- करके तपार्भया सो तीनों प्रकारका याने मानस, कायिक, वाचिक तेप सात्विक कहहि ॥ १७॥ सत्कारमानपूजार्थं तैपो दंभेन चैव यत् ॥ क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥ १८॥ जो तैप सत्कार मान और पूजाके वास्ते और दंभकरके भी किया जाताहै सो यहां शास्त्रमें रौजस चले और नौशमान कहाहै १८ मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ॥ परस्योत्सादनार्थ वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥ १९ ॥ जो तप दुराग्रह करके आपकी पीडाका निमित्त अथवा दूस रेके विगाडके वास्ते कियाहोय सो तामस कहाहै ॥ १९॥ दातव्यमिति यदानं दीयतेऽनुपकारिणे ॥ देशे काले च पात्रे च तद्दौनं साँत्विकं स्मृतम् २०॥ जो दान देनाही चाहिये ऐसी बुद्धिकरके कुरुक्षेत्रादि देशमें मोर ग्रहणादिककालमें जिससे फिर कुछ अपना उपकार न होय (१७४) मगवद्गीता। [अध्याय:- ऐसेको तथा वह पात्र याने तपास्वाध्यायकरके रक्षक होय उसको दियाजाय 'सो दान सात्विक कहाहै ॥ २० ॥ यत्तु प्रत्युपकारार्थ फलमुद्दिश्य वा पुनः ।। दीयते च परिक्लिष्टं तंद्राजसमुदाहृतम् ॥ २१ ॥ जो प्रत्युपकारके वास्ते अथवा फलके निमित्त करके फिर भी राहुबगैरह हनिमित्त उपदान दियाजीय सोरानस कहाहै ॥ २१॥ अदेशकोले यदानमपात्रेभ्यश्च दीर्यते ।। असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥ जो दोन तिरस्कार अवज्ञापूर्वक देशकालेविना और कुपा- नोको दियाजाताहै सो दोन तामस कहाहै ॥ २२॥ ओं तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिंविधः स्मृतः ॥ ब्राह्मणांस्तेनं वेदाश्च याश्च विहिताः पुरौं ॥ २३ ॥ ओं तत् सत् ऐसे तीन प्रकारका वेर्दका निश्चय जानागाँ है "याने ओशब्दसे कर्मका स्वीकारकरना उचित है तत् शब्दसे तदर्थ याने परमेश्वरार्थ करना उचितहै सबसे श्रेष्ठकर्म साधुवृत्तिसे करना ऐसा वेदका निश्चय है" उसी निश्चयकरके युक्त ब्राह्मण याने वेदकर्म करनेवाले तीनों वर्ण कर्मस्वीकारार्थ और वेद जो ईश्वरार्थकर्मको प्रतिपादन करतेहैं और यज्ञ दानं जो सत्कर्म ये मैं ने पूर्वकालमें स्थापितकिये हैं॥२३॥ तस्मादोमित्युदाहृत्यं यज्ञदानतपःक्रियाः॥ प्रवर्तते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥२४॥ जिससे कि, वेदवादी तीनोंवर्णकर्म स्वीकारार्थ हैं तिससे ओं ऐसे कहिके याने कर्मस्वीकार करके वेदवादी तीनोंवों की विधिसे कही- भई यज्ञ दान तपैकी क्रियायें निरंतर प्रवृत्त होती ॥२४॥ .
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सप्तद० १७. सान्वय- अमृततरंगिणी भा० टी०। (१७)
तंदित्यनभिसंधार्य फलं यज्ञतपःक्रियाः ॥
दानक्रिया विविधाः क्रियते मोक्षकांक्षिभिः ॥२५॥
तत्याने कर्म तदर्थहै याने परमेश्वरार्थहै ऐसी बुद्धिसे फलका
अनुसंधान नहीं करके यज्ञ, दान, तप, किया और अनेकप्रकारको
छानक्रिया मोक्षके चाहनेवालों करके कीजातीहै ॥२६॥
सद्भावे साधुभावे च संदित्येतत्प्रयुज्यते ॥
प्रशस्ते कर्मणि तथो सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥ २६ ॥
हे अर्जुन ! श्रेष्ठपेनमें और साधुभावमें सत् ऐसा यह शब्द युक्त
फरतेहैं तथा श्रेष्ठ कर्ममेंभी संतशब्द युक्तकरते हैं ॥२६॥
यज्ञे तपंसि दाने च स्थितिः संदिति चोच्यते ॥
कर्म चैव तदीयं सदित्येवाऽभिधीयते ॥२७॥
जो यज्ञमें, तैपमें और दानमें स्थिति है सो सत् ऐसे कहाँतीहे
और जो ईश्वरार्थ कर्महै सो सेत् निश्चयहै ऐसे कहतेहैं इन
चारों श्लोकोंमें ओतत् सत् इनका खुलासा कियाहै ॥२७॥
अश्रद्धयाँ हुतं देत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ॥
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्यै नो इह ॥२८॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्तु ब्रह्मविद्यायां यो-
गशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभाग-
योगोनाम सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥
हे पृथापुत्र! जो श्रद्धाविना होमाभया हवन दिया भयादान तपार्भया
कैप और कियाभया कर्महे 'सो असत् ऐसा कहाताई और सोने पर
लोकमें में इस लोकॅमें सुखदायक है ॥२८॥
इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिताया
श्रीमद्भगवद्वीतामृततरंगिण्यां सप्तदशाध्यायप्रवाहः ॥१७॥
(१७६) मगवद्गीता। [अध्याय:- अर्जुन उवाच । संन्यासस्य महावाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ॥ त्यागस्यं चे हषीकेश पृथकेशिनिदैन ॥ १ ॥ अब इस अठारहवें अध्यायमें सर्वगीताका सारांश निरूपण होय. तहां अर्जुन प्रश्नकरतेहैं कि, हे महाबाहो ! हे हृषीकेश ! हे केशिनि- पूदन ! संन्यासका और त्यागका तत्त्व न्यारा न्यारा जाननेकों चाहताहूं ॥१॥ श्रीभगवानुवाच । काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विर्तुः ॥ सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यांग विचक्षणाः ॥२॥ ऐसा अर्जुनका प्रश्न सुनिके श्रीकृष्णभगवान् बोलते भये कि, के वि जो सारासार विवेकी वे कामनावाले कौके छोड़नेको संन्यास जानतेहैं और विचक्षण जो तत्त्वज्ञानी हैं वे सर्व कर्मोंके फर्लत्यागकों त्योग कहतेहैं ॥२॥ त्याज्यं दोषवंदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ॥ यज्ञदानतः कर्म न त्याज्यमिति"चाँपरे ॥३॥ कोईएक ज्ञानिपुरुष दोषवाला कर्म त्यागनाचाहिये ऐसे कहते हैं और कितनेक और आचार्य यज्ञ, दान, तप कर्म नहीं त्यागना चाहिये ऐसेकहतेहैं ॥३॥ निश्चयं शृणु में तनं त्यांगे भरतसत्तम ।। त्यागो हि पुरुषव्याघ्र निधि परिकीर्तितः॥४॥ यज्ञदानतः कर्म नै त्याज्यं कार्यमेव तत्॥ यज्ञो दानं तपैश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ।।५।।
मष्टाद०१८.] सान्वय-अमृसतरंगिणीभाटी। (१७७) हे भरतसत्तम । उस त्यागमें मेरों निश्चय सुनो हे पुरुषनईः श्रेष्ट ! जिसरो कि, त्याग तीनि प्रकारको कहा है ति साने यज्ञ, दान, तपरुप कर्म नहीं त्यागना, करनाही योग्य है यज्ञ, दान और वैध ये ज्ञानिनको भी पवित्र करनेवाले हैं॥४॥६॥ एतान्यपि तु कमाणि संगं त्यक्त्वाँ फलानि च । कर्तव्यानीति में पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥६॥ हे पार्थ । ये यज्ञादिकभी कर्म ममता और फलोको त्यागि के करनेयोग्य हैं ऐसा निश्चय कियाभयाँ मेरी उत्तम मतदै ॥६॥ नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते॥ मोहात्तस्यं परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥७॥ कारणे कि, जो नियमित संध्यादि पंचमहायज्ञादिकहें उन कर्मका त्याग नहीं होर्सकताहै जो मोहसे उसका त्याग किया सो तामस कहाताहै ॥७॥ दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशर्मयात्त्यजेत् ॥ सं कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥८॥ जो कर्म दुःख ऐसे शरीरक्लेशके भयसे ही त्याग सो राजस त्यागको करके त्यागफैलको नहीं पावताहै ॥८॥ कार्यमित्येव थत्कर्म लियतं क्रियतेऽर्जुन । संगत्यक्त्वां फलं चैव सत्यागः सात्त्विको मतः॥९॥ हे अर्जुग जो कर्म करनेयोग्य ऐसी बुद्धिसेही ममता और फलको त्योगिक नियमित याने उचित ऐसीही दिसे करे सो त्याग सात्त्विक मानाहै ॥९॥ नं द्वेष्टर्यकुशलं कर्म कुशले नानुषजते ।
(१७८) भगवद्गीता। (अध्यायः- त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥१०॥ 'जो सत्त्वगुणयुक्त बुद्धिमान संशयरहित कर्मफलत्यागी है सो मञ्जुशलको याने संसारारक कसैको न निदताहै ने. कुशल याने पज्ञादिक तिनमें आसक्त होताहै ॥ १०॥ नहिं देहमृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।। यस्तु कर्मफलत्यागी से त्यागीत्यभिधीयते ॥ १५ ॥ जिलवास्ते कि, देहधारीकरके सर्व कर्म त्यागनेको नहीं होसक- साहै तिससे जो कर्मफलका त्यागीहै तो त्यांगी ऐसा हाताहै।॥३१॥ अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविध कर्मणः फलम् ॥ भवत्यत्यागिनां प्रेत्य नव संन्यासिनां कैचित्॥१२॥ अप्रिय, प्रिय और मिश्रित ऐसे कर्मका तीन प्रकारका फल कर्मफलातुरागिनको मरेपर होता है और कर्मफलत्यागिनको कहीं भी नहीं ॥ १२॥ पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध में। सांख्ये कृतांते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥१३॥ हे महाबाहो ! सर्वकाँकी सिद्धिके वास्ते में पांच कारण सांख्यसिद्धांतमें कहेभये मेरेसे सुनो।॥ १३॥ अधिष्ठानं तथा कत्ती करणं चे पृथग्विधम् ॥ विविधांश्च पृथक् चेष्टा दैवं चै" वात्र पंचमम् ॥१४॥ वे ये कि, अधिष्ठान याने आधार अर्थात् शरीर तथा कर्ता याने जीवे इस जीवके कर्त्तापनमें "ज्ञातएवचकाशास्त्रार्थत्वात्" यह ब्रह्मसूत्र प्रमाणहै और न्यारे न्यारे प्रकारके करण याने मनसहित पंच इंद्रियों के व्यापार और अनेकप्रकारकी न्यारी न्यारी चेष्टी याने पांच मष्टाद० १८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१७९) प्राणवायुनकी चेष्टा और यहां पांचवां देव याने अंतर्यामी अर्थात मैं हूं इस विषयमें "परात्तुतच्छुतेः" यह ब्रहारसूत्रभी प्रमाण है यहां शंकासमाधान वाक्यार्थबोधिनीमें कियाहै ॥ १४ ॥ शरीरवाइनोभियत्कर्म प्रारभतेऽर्जुनं ॥ न्याय्यं वा विपरीतं वां पंच"ते" तस्य हेतवः॥१५॥ हे अर्जुन । शरीर वाणी और मन करके जो न्याय्य अथवा अ- न्यायें जो कर्म प्रारंभ करा जाताहै तिसके ये पांच कारण हैं।॥१६॥ तत्रैवं संति कतारमात्मानं केवलं तु यः ।। पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न सं पश्यति हुँमतिः॥ १६ ॥ ऐसे सिद्धांत होनेपर भी तहां जो केवल आत्माको की जान- ताई सो दुर्बुद्धिपुरुषं अकृतबुद्धित्व से याने यथार्थ निश्चयकारक बुद्धिहीन है तिससे नहीं जानताहै ॥ १६॥ यस्य नहिंकृतो भावो बुद्धिर्यस्यं न लिप्यते ॥ हत्वापि से ईमाँल्लोकान्नै हति" नै निबध्यते ॥१७॥ जितके आपके कर्तापनेका भाव नहीं है जिसकी बुद्धि कर्ममें नहीं लिहोतीहै सो ईन लोकनको मोरके भी न मारताहै ने पापमें क्यताह तात्पर्य कि, तुम भीष्मादिक वधसे डरते हो तहां जो धनुष्य ममता अहंतारहित होके स्वधर्माचरण करताहै उसको उस कर्यजन्य पापपुण्यका भय नहीं ॥ १७ ॥ ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविर्घा कर्मचोदना ।। करणं कम कतैति त्रिविधैः कर्मसंग्रहः ॥ १८ ॥ ज्ञान जो कर्त्तव्यकर्मका जानना ज्ञेय जो वह कर्म परिज्ञाता उस. सम्यक् जाननेवाला ऐसे तीन प्रकारका शास्त्रविधान है तहां करणं - ११८०) भगवद्गीता। [ अध्यायः- जो कर्सकरनेकी साधनलमग्री जैसे यह सुवादिक युदणे शरणादिक कर्म जो करना होय को करनेवाला ऐसे तीनि प्रकारका कर्मके वास्ते संग्रह है अर्थात इनहीले होसकेगा इन विना नहीं ॥ १८॥ ज्ञानं करें ये कति त्रिधैर्व गुणभेदतः ॥ प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥१९॥ ज्ञान कर्म और कर्ता ऐसे ये गुणभेर्दकरके सायशास्त्रमें तीन प्रकारहीके कहाँ उनको भी यथावते सुनो।। १९ ।। सर्वभूतेषु येनैक भावमव्ययमीक्षते ॥ अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥२०॥ जिस ज्ञानकरके प्रामणक्षत्रियादि विभागयुक्त सर्वभूतोंमें विभाग- रहि याने आत्मा सर्वमें समान है ऐसा अविनाशी एक भावको देखताहो उसे ज्ञानको सात्त्विक जानना ॥२०॥ पृथक्केन तु यज्ज्ञानं नानाभावाने पृथग्विधान् ॥ वेत्तिं सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि रोजसम् ॥ २१॥ और जो सर्वभूतोंमें अनेक ब्राह्मणादिक छोटे बडे उत्तम मध्यम भेदयुक्त आत्मनकोथी उत्तम मध्यम न्यारे न्यारे जानता है ऐसा जो न्यारेपनेकरके जो ज्ञान है उस ज्ञानको रोजस जानो ॥२१॥ यंतु कृत्स्नवैदेकस्मिन्कार्य सक्तमहैतुर्कस ॥ अतत्त्वार्थवल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥ जो कि एकही कर्ममें सक्त याने आसता सफलयुक्त जाने और वह निरर्थ होय कारण कि, जिसमें तत्त्वार्थ नहीं और तुच्छे याने भूतादि भाराधनरूप ज्ञान सो" तामस कहाँहै ।। २२ ॥ नियतं संगरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।। -
अष्टाद०१८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०॥
(१८१)
अफलप्रेप्सुनां कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥२३ ।।
जो कर्मफलकी इच्छा न करनेवालेने नियत याने कर्त्तव्यं फला-
संगरहित और रागद्वेषविना किया होय सो सात्त्विक कहाहै ॥२३॥
यत्तु कामेप्सुनां कर्म सहिंकारेण वो पुनः ॥
क्रियते बहुलायासं तंद्रांजसमुदाहृतम् ॥ २४ ॥
जो बहुत परिश्रमयुक्त कर्म कामनाको प्राप्ति इच्छार्करके अर्थ-
पा फिर अहंकारसहित कियाहोय सो राजसें कहाहै ॥२४॥
अनुबंध क्षयं हिंसामनवेक्ष्य , पौरुषम् ।।
मोहाँदारभते कर्म यंत्तत्तामसमुच्यते ॥ २५ ॥
कर्मके परिणामको दुःख द्रव्यादिकका क्षय उस कर्ममें प्राणि-
पीडा और आपके पुरुषार्थको न देखि के मोहसे जो कर्म आरंभ
कियाजाताहै सो" तामस कहाताहै ।। २५ ॥
मुक्तसंगोऽनहवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ॥
सिद्धयसिद्धयोनिर्विकारः कर्ता साँत्त्विकांच्यते२६
जो पुरुष कर्मफलासक्तिरहितं मैं कर्ता हूं ऐसे न कहनेवाला
धीरज और उत्साहयुक्तं सिद्धि और अँसिद्धिमें निर्विकारेहोय सो
कर्ती सात्त्विक कहाँताहै ॥२६॥
रोगी कर्मफलप्रेमुलुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः॥
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥२७॥
जो कर्ममें आसक्त कमफलके चाहनेवाली लोभी याने कर्ममें
यथार्थ खर्चका न करनेवाला प्राणिपीडा करनेवाला अपवित्र हर्षशो-
कयुक्त सो कत्ती राजस केहाहै ॥२७॥
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ॥
विषादा दीर्घसूत्री चं कर्त्ता तामस उच्यते॥२८॥
( १८२) भगवद्गीता। [अध्याय:- जो शास्त्रोक्त कर्मके अयोग्य विद्याहीनं अनम्र मारणादिकर्मत- र ठेग आलसी विषाद करनेवालाँ और घड़ीके काममें एक दिन बितानेवाला लो कती तामस हाताहै ॥२८॥ बुद्धर्भेद धृतेश्चैवं गुणतंत्रिविध शृणु। प्रोच्यमानमशेषेण पृथकेर्न धनंजय ॥ २९ ॥ हे धनंजय ! संपूर्णपनेकरके मेरा कहाँभया न्यारा न्यारों गुणोंक- रके तीनिप्रकारका बुद्धिका और धीरजको भेर्दै सुनो ॥ २९ ॥ प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्य भयाभये । बध मोक्षं च यो वेत्ति छद्धिः सौ पार्थ सात्त्विकी३०॥ हे पार्थ । जो बुद्धि प्रवृत्तिको और निवृत्तिको कार्यअकार्यको और भय अभयको बंधको और मोक्षको जानतीहै सो साँत्त्विकी ॥३०॥ यया धर्ममधर्म च कॉर्य चाकार्यमेव च ॥ अयथावत्प्रजानांति बुद्धिः सौ पार्थ राजसी॥३१॥ हे पृथापुत्र ! जिस बुद्धिकरके धर्मको और अधर्मको तैसे' कार्यको और अकार्यको भी उलटा जानै सो" बुद्धि राजसी ॥३१॥ अधर्म धर्ममिति यो मन्यते तमसावृतां ॥ सर्वार्थाविपरीतांश्चै बुद्धि सौ पार्थ तामसी ॥ ३२॥ हेपार्थे । जो बुद्धि अज्ञानकरके ढकीमई अधर्मको धर्म ऐसा माने और सर्व अर्थीको उलटे माने 'सो तामसी ॥३२॥ धृत्यां ययाँ धारयते मनःप्राणेंद्रियक्रियाः ॥ योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी३३ हे पार्थ ! जिस अखंडमोक्षसाधनहप धारणार्करके योगवलेसे मन प्राण और इंद्रियनकी क्रियोंको धारणकरे सो धारणा सात्विकी॥३३॥ यया तु धर्मकामार्थान्धृत्यां धारयते नरः॥
अष्टाद० १८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टा। (१८३) प्रसंगेर्ने फलोकांक्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥ ३४ ॥ हे पार्थ । फलकी इच्छा करनेवाला पुरुष फलइच्छाप्रसंगले जिसे धारणाकरके धर्म अर्थ कामोंको धारणकरे सो धारणा शेजसी॥ ३ ॥ यया खलं भयं शोकं विर्षादं मदमेव च ॥ ने विपुंचति दुर्मेधा धृतिः सौ तामेसी सती ॥ ३५ ॥ दुधवुद्धिपुरुष जिस धारणाकरके स्वप्न भयं शोक विर्षाद और मंद इनको नहीं त्यागताहै सो धारणा तामसी मानतेहैं ।। ३६ ॥ सुखं त्विंदानी त्रिविध शृणु में भरतर्षभ। अभ्यासाद्रीते यत्र दुःखति – निगच्छति ॥ ३६ ॥ यत्तग्रे विभूमिव परिणामेऽमृतोपमम् ॥ तत्सुखं सात्त्विक प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादेजम् ॥ ३७॥ हे भरतश्रेष्ठ । अव सुखभी तीन प्रकारका मेरेसे सुनो खो ऐसे कि, जिस सुखमें अभ्यासकरनेसे मन रमता है और दुःखकोनाश होतो. जो" उसके प्रथम विषतुल्य अंत में अमृततुल्य सुख वह आत्मबुद्धि की प्रसन्नतासे उत्पन्न सुख सात्त्विक कहाँहै ।। ३६॥ ३७॥ विषयेंद्रियसंयोगांद्यात्तदग्रेऽमृतोपमम् ॥ परिणामे विषमिव तत्सुखं राजेसं स्मृतम् ॥ ३८॥ जो विषयेंद्रियके संयोगले प्रारंभ में अमृततुल्य अंतमें विषतुल्य सो सुख राजस कहा। ॥ ३८॥ , येदंग्रे चार्नुबंधे च सुख मोहनमात्मनः ॥ निद्रालस्यमादोत्यं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥ जो प्रारंभमें और अंतमें भी आपका मोहक सोनिज्ञा आलस और रप्रमादसे उत्पन्न सुखै तामस कहाहै ॥३९॥ नै तदस्तैि पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः॥
(१८५)
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
सत्त्वं प्रकृतिजैमुक्तं यदेभिः स्यानि मिर्गुणैः॥ ४० ॥
जो वस्तु प्रकृतिसे उत्पन्न इन सत्त्वादि तीन गुणोंकरके मुक्त
होय सो पृथिवीमें अथवा स्वामें अथवा फिर वहांही देवन में
नहीं है ॥४०॥
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंत।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥४१॥
हे परंतप । ब्राह्मण क्षेत्रिय वैश्योंके और शूद्रोंके स्वभावसे उत्पन्न
गुणोंकरके कर्म न्यारे न्यारे कियेहैं ॥११॥
शेमो दमस्तपः शौचं झांतिरार्जवमेव च ॥
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभाविजम् ॥ ४२ ॥
शम जो बाह्यइंद्रियोंका संयम दम अंतःकरणका संयम तप शा-
स्रोक्त नतादिक शौच बाह्य और आभ्यंतर क्षमा और सरलता ज्ञान
स्वस्वरूप परस्वरूपका जानना विज्ञान जो स्वरूपज्ञानभये पर
ईश्वरभक्तिकरना आस्तिस्य जो वेदशास्त्रवाक्योंमें विश्वास ये ब्राह्मण
के कैर्य स्वभावही से हैं॥४२॥
शौर्य तेजो विदाक्ष्य युद्धे चाप्यपलायनम् ॥
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ ४३ ॥
शूरपना तेज याने जिससे दूसरे डरै धीरज चतुराई और युद्ध में
भागना नहीं उदारता और प्रजाको स्वाधीन रखना यह क्षत्रियका
कैर्म स्वभावज है॥४३॥
कृषिगोरक्ष्यवाणिज्य वैश्यकर्म स्वभावजम् ॥
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ ४४ ॥
खेती गौपालना वाणिज्य करना यह वैश्यकर्म स्वभावसे हैं तीनों
वर्णकी सेारूप कर्म शुद्धका स्वभावसे है ॥ १४ ॥
अष्टाद०१८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१८५) स्वे' स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः॥ स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विदति तच्छृणु ॥ ४५ ॥ ऐसे आपआपके कर्ममें तत्परभयाहुआ मनुष्य सिद्धिको याने मोक्षको प्राप्तहोती है स्वकर्मनिष्ठ पुरुष जैसे मुक्तिको पाताहै सो" मैंनो॥१६॥ यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ॥ स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विदेति मानवः ॥४६॥ जिस ईश्वरसे भूतप्राणिनकी उत्पत्ति रक्षण है जिसकरके यह सर्व व्याप्त है उस ईश्वरको आपके स्वभावज कर्मकरके पूजिके मनुष्य मोक्षको प्राप्तहोताहै ॥१६॥ श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ॥ स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति" किल्पिम् ॥४७॥ अतिउत्तम परधर्मसे आपकाधर्म गुणहीनभी कल्याणकारक है आपके जातिविहित कर्म करताभया पापको नहीं प्राप्तहोताहै तात्प- ये तुम्हारा हिंसात्मक भी धर्म है तो भी तुम्हारा कल्याण उसीसे है४७॥ सहज कर्म कौंतेय संदोषमपि नै त्यजेत् ॥ सरिंभा हिंदोषेणे धूमेनाग्नि"रिवावृताः॥४८॥ हेकुंतीपुत्र । दोषयुक्तंभी आपके वर्णोचित धर्मको नै त्यागनी क्योंकि, सर्व ज्ञानकर्मादिक आरंभ दोषकरके धुवाँकरके अमि ऐसे युक्त हैं॥१८॥ असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विमतस्पृहः ॥ नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाँधिगच्छति ॥ १९ ॥ सर्वकर्मों में बुद्धिको आसक्त न करनो मनको वश किये भये (१८६) भगवद्रीता। [अध्यायः- वांछारहित पुरुष परमै नैष्कर्म्यसिद्धिको याने आत्मज्ञानको फल त्यागकरके प्राप्तहोताहै ॥ १९॥ सिद्धि प्राप्तो यथां ब्रह्म तथाऽऽनोति निबोध में। समासेनैव कौंतेय निष्ठा ज्ञानस्य यो परों ॥ ९ ॥ हे कुंतीपुत्रं ! उस आत्मज्ञानको प्राप्तभयाहुआ जैसे बल्लेको प्राप्तहोताहै तैसे संक्षेपकरके मेरेले सुंनो जो" ध्यानात्मज्ञानको परम निष्ठा है याने उपायकी सीमा है ॥५०॥ बुद्धया विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ॥ शब्दादीन्विषयास्त्यका राँगद्वेषौ व्युदस्य च ॥११॥ विविक्तसेवी लैंध्याशी यतवाकायमानसः ॥ ध्यानयोगएँरो नित्यं वैरोग्यं समुपाश्रितः ॥ ५२ ॥ अहंकार बैलं देष काम क्रोध परिग्रहम् ॥ विमुच्य निर्ममः शीतो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥५३॥ सो जैसे कि, शुद्धबुद्धिकरके युक्त और धारणाले मनको वश के- रके शब्दादिक विषयोंको त्यौगिक और रोगद्वेषोंको त्यागिक एकांत बैठाभयाँ अल्पाहारी शरीर वाणी और मनको वशकियेभये नित्य ध्यानयोगपरायण वैराग्यको धारणकियोंये अहंकार बल देपे काम को) ममता इन सबको त्यागिके निर्मम शांत ऐसा पुरुष आत्मज्ञानमय होता है ॥५१॥५२॥५३॥ ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा ने शोचति न कक्षिति ॥ समः सर्वेषु भूतेषु अनक्तिं लभते पराम ॥ ५४॥ ऐसे आत्मज्ञानमय भयाहुआ प्रसन्नमनयुक्तं न कोई वस्तु मेरे सिवा- प जोगई तो उसको शोचताहै न चाहताहै सर्व भूतोंमें समदृष्टिभया- हुओं अतिउत्तम मेरी भक्तिको प्राप्तहोताहै याने सर्व जगतकों अष्टाद०१८] मान्वय-अमृततरंगिणी भाटी। (१८७) मेरे शरीरभूत मेरी परमविभूति जानिके पक्षपातरहित सर्वमें मेरे- हीको देखताभया मेराही स्मरण उनमें करताहै कि, ये सब मेरे स्वामीके हैं यही परमभक्ति है॥५४॥ भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः॥ ततो माँ तत्त्वतो ज्ञात्वा विर्शते तदनंतरम् ॥ ५५ ॥ मैं जितना और जो हौं तितना और तिस मेरेको भक्तिकरके निश्चयपूर्वक जानताहै फिर मेरेको" निश्चयपूर्वक जौनिके मेरेहीको उसपीछे प्राप्तहोताहै ॥ ५५॥ सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्यपाश्रयः॥ मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥ ५६ ॥ मेरा आश्रितजने सर्व लौकिक वैदिक कर्मनकोभी सदो करा- भया मेरे अनुग्रहसे सनातन नाशरहित पर्दको प्राप्तहोताहै ॥५६॥ चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः। बुद्धियोगमुपाश्रित्य मञ्चित्तः सततं भवे ॥ ५७॥ मेरे परायण भयेहुये चित्तकरके सर्वकर्मोंको मेरेमें स्थापितर्क- रके याने मेरे अर्पणकरके ज्ञानयोगको आश्रयकरके निरंतर मेरेमें चित्तको लगायेभये स्थितरहो ॥१७॥ मच्चित्तः सर्वहुँाणि मत्प्रसादातरिष्यसि । अर्थ चेत्त्वंमहंकारान्न श्रोष्यसि विनंक्ष्यसि ॥५८॥ मेरेमें चित्तलगाये ये मेरे अनुग्रहसे सर्वसंसारदुःखोंको तरोगे जो केदाचित् तुम अहंकारसे मेरा उपदेशन सुनोगे तो नष्टहोउंगे।५८॥ यदहंकारमाश्रित्य ने योत्स्य इति मन्यसे । मिथ्यैवैव्यवसायंस्ते प्रकृतिस्त्वा नियोक्ष्यति॥१९॥ जो अहंकारको आश्रयकरके न.युद्धकरोंगों ऐसे मानोगे सो भी - (१८८) भगवद्गीता। [अध्याय:- तुम्हारा निश्चयं वृथा होयगा क्योंकि, सुमको तुम्हारा जातिस्वभी- वही युद्धमें लगायदेयगा ॥१९॥ स्वभावजेन कौंतेय निबद्धः स्वेर्न कर्मणा ॥ कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवंशोपि तत् ६० हे कुंतीपुत्री जोयुद्धे मोहसे करनेको नहीं चाहते हो सो आपके क्षत्रि- यस्वभावजन्यं आपके कर्मकरके बंधेभये परवशंभये भी करोग।।६०॥ ईश्वरः सर्वभूतानां हृदेशेऽर्जुन तिष्ठति ॥ भ्रामयन्सर्वभूतानि यंत्रारूढानि मायया ॥ ६१ ॥ हे अर्जुन ! ईश्वरं आपकी मायाकरके यंत्र जो शरीर तिनमें रहेभये सर्वभूतोंको भ्रमाताभयां सर्वभूतोंके हृदयस्थलमें स्थित है ॥६१ ॥ तमेवं शरणं गच्छ सर्वभावेनं भारतं ॥ तत्प्रसादात्परांशांति स्थान प्राप्स्यसि शाश्वतमदर हेभारत ! सर्वभावनाकरके उसी परमात्मौके शरण हो उसीके अनुग्रहसे परम शांति और सनातन स्थानको प्राप्तहोवोगे ॥ ६२ ॥ इति ते ज्ञानाख्यातं गुह्यादातरं मया ।। विमृश्यैतेंदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥६३ ॥ मैंने यह गोप्यसेभी गोप्य ज्ञान तुमको कहाँ इसको अच्छीत- रहसे विचारके जैसा चाहो तैसी करो॥ ६३ ॥ सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु में परमं वचः ॥ इष्टोसि में दृढमतिस्ततो वक्ष्यामि ते" हितम्॥६॥ सर्वगोप्यनमें भी अतिगोप्य मेरी परम वायं फिर सुनो मेरे अतिहढं प्रियहो तिसँसे तुमको यह हित उपदेश करताहूं ॥ ६॥ मन्मना भर्वं मद्भक्तो माजी मां नर्मस्कुरु ॥ मामेवैष्यसि सत्यंते" प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ६५॥
. अष्टाद०१८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी। ( १८९) मेरे मनको लगावो मेरे भक्त होउँ पेरा पूजनकरनेवाले होर्ड मेरेको नमन करो और ऐसे करनेसे मेरेको ही प्राप्तहोगे तुमसे सत्य प्रतिज्ञा करतीहूं क्योंकि, मेरे" प्रियही ॥६६॥ सर्वधर्मान्परित्यज्यं मोमेकं शरणं व्रज ॥ अहं त्वा सेर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥६६॥ हे अर्जुन ! तुम सर्वधर्मीको परित्यागि के याने सर्वधर्मों के फलकों त्यागिके अर्थात् “यत्करोषि यदनासि इत्यारभ्यतत्कुरुष्व-मदर्पणम्" इस रीतिसे मेरे अर्पणकरके मुख्य मेरे शरणं प्राप्त होउं अर्थात "स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विदति मानवः” इस प्रमाणसे मेरेको पूज्य और मेरेको प्राप्य जानिके मेरी आज्ञा करो याने मेरा पूजन जानिके स्वधर्मरूप युद्धकरो मैं तुमको इन भीष्मादिकोंको युद्धमें मारने इत्यादिक सर्वपोपोंसे मुक्तकरौंगी तुम मैति शोचकरों यहाँ इस श्लोकमें कोई विद्वद्भुषण अर्थ करते हैं कि, चातुर्मास्ययाग श्राद्ध पितृतर्पण इत्यादिकर्मरूप धर्मोको त्यागिके मेरे शरण होउ याने मेरेको और आपको एकही जानो इस एकताज्ञानरूप भक्ति करो तब विचारना चाहिये कि, प्रथम तो "उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मे- त्युदाहृतः” इत्यादिप्रमाणसे जीवनलकी स्वरूपएकता नहीं होसक- तीहै मुक्तभयेपरभी "मम साधर्म्यमागताः" और "भोगमात्रसाम्यलि गाच"तथा “निरंजनः परमं साम्यमुपैति” इत्यादिक गीताब्रह्मसूत्र और श्रुतिप्रमाणसे भी भोगादिकमें समता होती है एकता नहीं जहां एकता भी कहींहै तहां अंतर्यामिभावसे अथवा "दासुपर्णा" इत्यादिश्रुतिप्रमा- ण सखापनसे कहींहै दूसरे 'भज सेवायाँ' धातुका भक्ति शब्द होता भक्ति याले सेवा सो भी एकतामें बननेकी नहीं इससे जीव परमात्मायें न्यारे परमात्माके स्वाधीन हैं यह सिद्ध भया तब जो अर्थ किया कि मेरी और आपकी एकतारूप भक्तिकरो. सो यह अर्थ तो सिद्धभया नहीं अब जो धर्मको त्यागनेका अर्थ किया तहां “धर्मसंस्थापना- र्थाय संभवामि युगेयुगे। श्रेयान्स्वधर्मों विगुणः। स्वधर्मे निधनं श्रेयः"
(१९०)
भगवद्गीता।
[ अध्याय:-
इत्यादि वाक्यों में विराधे-आताहे इसवास्ते सर्वधर्मोंका फलत्यागिके
निष्काम और ईश्वरपूजनरूप जानिके करना यही सिद्धहोताहै. यहां
इसी अध्यायमें प्रमाणहै "निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः परिकीर्तितः" यहाँसे लेके "संग त्यक्त्वा
फलं चैव स त्यागः सात्विको मतः॥ यस्तु कर्मफलल्यागी सत्यागीत्य-
भिधीयते" इत्यादि और भी कहेहैं ग्रंथाढनेले भयसे नहीं लिखते
सुज्ञजन इतनेहीमें समुझिके धर्माचरण करेंगे ॥६६॥
इंदं ते नातपरकाय नाऽभक्ताय कदाचन ॥
नचांऽशुश्रूषवे वाच्यं नमी योऽभ्यसूयति ॥६७ ॥
हे अर्जुन ! यह मेरा गोप्य उपदेश तुर्म जिसने तप नकियाहोय उ-
सको न कहना तथा कभी भी मेरा और मेरे जनोंका भक्त न होय
उसको न कहना और जो गीताउपदेष्टाकी सेवा नकर उसको भी न
कहना और जो मेरी" निदाकरै उसको तुम न कहना ॥६७॥
ये इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिर्धास्यति ॥
मेक्ति मयि परां कृत्वा मौमवैष्यत्यसंशयः ॥६८ ॥
जो इस परम गोप्य गीताशास्त्रको मेरे भक्तोंमें प्रसिद्ध करेगा वह
सेरेमें सर्वोत्तम भक्ति करके मेरेहीको प्राप्त होगा इसमें संशयनहीं ६८
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्में प्रियंकृत्तमः ॥
भविता ने च में तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥६९ ॥
उस गीताको भक्तों में प्रसिद्धकरनेवालेसे अधिक मेरी प्रियका-
एक पृथिवीमें दूसरा मनुष्यों में कोईभी नहीं है और न उसकी
दरोवर और मेरे को प्रिय होगा।६९ ॥
अध्यध्यते च ये इमं धयं संवादमावयोः॥
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति में मैतिः॥ ७० ॥
जो मेरे तुम्हारे इस धर्मवईक संवादरूप गीताका अध्ययन करेगा
सस करके मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित होउंगा ऐसा मैं मानताहूं ॥७॥
१२ अष्टाद०.१८] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (१९९) श्रद्धावान सूयुश्च शृणुयादपि यो नरः॥ सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ७१ जो निंदारहित और श्रद्धायुक्त श्रवणभी करेगा लोभी संसारसे मुक्त झोके पुण्यकर्म करनेवालोंके भुखद लोकों को प्राप्त होयगा ॥७१ ॥ कच्चिदेतच्छतं पार्थ खयैकाँग्रेण चेतेसा॥ कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रणष्टस्ते धनंजय ॥ ७२ ॥ भगवान पूंछतेहैं कि, हे पृथापुत्र ! इस ज्ञानेको तुमने एकाग्र चितसे सुना कि नहीं, और हे धनंजय । जो सुना होय तो अज्ञानजन्य मोह तुम्हारा नष्ट भया कि नहीं सो कहो ॥ ७२ ॥ अर्जुन उवाच । नष्टो मोहः स्मृतिलब्धा त्वत्प्रेसादान्मयाच्युत ॥ स्थितोऽस्मिं गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव ॥ ७३ ।। श्रीकृष्णके वचन सुनिके अर्जुन कहतेहैं कि, हे अच्युत ! तुम्हारे अग्रहसे मोह नष्टंभया और मैंने ज्ञान प्राप्तकिया अब सदेहरहित स्थित हूँ" आपका वचैन जो स्वधर्मरूप युद्धकरनेकी आज्ञा सो कौंगा॥७३॥ संजय उवाच। इत्यह वासदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः॥ संवादमिर्ममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ७४ ॥ संजय धृतराष्ट्रसे कहतेहैं कि, हेराजन् । ऐसा यह श्रीकृष्ण और महात्मा अर्जुनका अतिअद्भुत रोमांचकारक संवा मैं सुनताभिया ७४ व्यासप्रसादाच्छुतवानेतनामहं परम् ॥ योग योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ७५ मैं यह अत्यन्त गोप्य प्रत्यक्ष स्वयंही. योग कहतेभये योगेश्वर श्रीकृष्णके मुखसे वेदव्यासजीके अनुग्रहसे सुनतोंभया ॥ ७५ ॥ - . (१९२) भगवद्गीता । [अष्टादशोऽध्यायः १८] राजेन संख्सृत्य संस्सृत्य संवादसिमडुतम् ॥ केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च सुहेसंहः ॥ ७६ ॥ हेराजन् ! इस श्रीकृष्ण और अर्जुनके अद्भुत पुण्यदायक संवा दको सुमिरि सुमिरिक वारंवार हर्षितहोताहौं । ७६ ॥ तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः॥ विस्मयो में महान राजन् हँष्यामि चैं पुनःपुनः७७ हेराजन् ! उस अद्भुत भगवानके रूपकोभी सुमिरिसुमिरिके मेरे चडी विस्मय होताहै और वारंवार हर्षित होताहौं ॥ ७७॥ यत्र योगेश्वरः कृष्णो यंत्र पार्थों धनुर्धरः॥ तत्र श्रीविजयो भूतिधुवा नीतिमतिर्मम ॥ ७८ ॥ इति श्रीमद्भगवद्वीतासूपनिषत्सुब्रह्मविद्यायां योग: शास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसंन्यासयोगो नाम अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८॥ हेराजन् ! जहां योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ अर्जुन धनुर्धारी हैं तहांही अचल संपदा अचलविजेय अचलवैभव और अचल नीति है यह मेरी निगय मत है ॥ ७८॥ इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां श्रीमद्भगवद्गीताऽमृततरंगिण्यामष्टादशाध्यायप्रवाहः ॥१८॥ अंबराब्ध्यंकभूसंख्येविक्रमार्कस्यसंवदि ॥ माघमासेदलेशुभेदि. वीयायांतिथौबुधे ॥ १ ॥ इयंसंपूर्णतायातागीताऽमृततरंगिणी ॥ श्रीमद्भागवताचार्यानुग्रहात्सगुरुर्मम ॥२॥ समाप्तोऽयं ग्रंथः। पुस्तकमिलनेका पता-खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर" (स्टीम् ) यन्त्रालयके मालिक-मुंबई.
Alettet. t नि %AS RAAT TIME ॥ श्रीः॥ श्रीमन्महाभारतातुशासनिकपर्वान्तर्गत- विष्णुसहस्रनामस्तोत्र। भाषाटीकासहित । वैश्यमाहेश्वरी नानालाल सोमाणीने औदीच्यज्ञाति पंडित-रामचन्द्रजीसे विराचित. HIR यह. खेमराज श्रीकृष्णदासने बम्बई निज "श्रीवेङ्कटेश्वर” स्टीम् यन्त्रालयमें मुद्रितकर प्रकाशित किया. संवत् १९८०, शक १८४५, सर्वाधिकार "श्रीवकटेश्वर" यन्त्रालयाध्यक्षने स्वाधीन रक्खाहै. -- स १३
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श्रीविष्णवे नमः।
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सूचना। श्रीपरब्रह्म परमेश्वर सगुणनिर्गुणरूप सच्चिदानन्दके चरणारविंद, मनवाणीकायासे अनन्तकोटि नमस्कार करके यह सत्पुरुषोंका दासानुदास वैश्यमाहेश्वरी नानालाल सोमाणीने यथार्थनामसहस्र औदीच्यज्ञाति पंडितरामचन्द्रजी रईसडीडवानासे श्रीविष्णुसहस्र- नामका अर्थ शांकरभाष्यानुकूल देशभाषामें शुद्धलिखवायके सब सुज्ञजनोंसे हाथ जोड़के विनती करता है जहाँ अर्थमें वा लिपिमें भूलचूक होंय सो इस तुच्छबुद्धि अत्यंत अबोध दासपर कृपा करके सुधारदें । अर्थ जिस नामके दो तीन हैं उसपर अंक लिखा है. जहां श्लोक पूरा है उसका भी अंक है। नामोंकी संख्याका भी अंक अतिपत्रमें लिखाहै ॥ श्लोकः ॥ शराब्धिगोभूमितविक्रमाब्दे चैत्रा- भिधे मासिवलक्षपक्षे ।। सेनानिवेशाख्यपुरे व्यलेखि श्रीरामचन्द्रा- भिधपंडितेन ॥ ॥ श्रीरस्तु ॥
श्रीः। com अथ श्रीविष्णुनामसहस्रम्। भाषाटीकासमेतम् । वैशंपायन उवाच । श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः। युधिष्ठिरः शांतनवं पुनरेवाभ्यभाषत ॥ १ ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ वैशंपायनजी बोले कि, युधिष्ठिर नाम: -युद्धमै न भागने वाले ऐसे धर्मराजाने सब पवित्र करनेवाले धम्माको शंतनुके पुत्र भीष्मपितामहसे अशेष नाम सम्पूर्ण सर्वधर्म जैसे-- आपद्धम, रानधर्म, मोक्षधर्म, दानधर्मादिक; वो धर्म कैसे हैं कि पावन नाम पवित्रकरनेवाले सर्वशः नाम सब तरहसे पावन हैं श्रवणमनननिदिध्यासनादिक वा सब प्रकारके धर्म व्रत उपासना उपवास प्रायश्चित्तादिकको भीष्मजीसे सुनकर फेर पूछा ॥१॥ युधिष्ठिर उवाच। किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् ॥ स्तुवन्तः के कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ॥२॥ युधिष्टिरने कहा इस लोकमें एक बड़ा देवता कौन है अथवा एक प्राप्त होनेके लायक कौन है और किसके जप करनेसे किसकी पूजा और किसकी स्तुति करनेसे मनुष्यका कल्याण होता है॥२॥ को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः॥ किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥ ३ ॥ सब धर्मों में कौन धर्म आपको परममत (बड़ा है और किस नाम के जप करनेसे प्राणी जन्ममरणरूपी संसारके बंधनसे छूट जाता है (१९८) विष्णुसहस्रनाम। (परममत नाम उत्तम मत जब तीन तरहका है १ ऊंचेशब्दसे २ मध्यमस्वरमें ३ मनसे जो जन्मलेते रहै उसका नाम जंतु है) युधिष्ठिरने यही पांचप्रश्न किये १ कौन एक बड़ा देवता है २ कौन प्राप्तहोने लायक है ३ किसकी पूजा और स्तुतिकरनेसे आदमीका भला होता है । सब धर्मों में आपकी परममतसे कौन धर्म बड़ा है। किस नामके जपसे फेर जन्म नहीं होता ॥३॥ भीष्म उवाच । जगत्प्रभु देवदेवमनंतं पुरुषोत्तमम् । स्तुवन्नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः॥४॥ भीष्मने उत्तर दिया। (जिससे सब शत्रु डरै सो भीष्म)आदमी सदा उठकर जगत्के प्रभु नाम स्वामी और देवतोंके देवता अनन्त पुरुषोत्तमके सहस्रनामसे स्तुति करनेसे संसारसे छूट जाता है सबै स्थावर जङ्गमका नाम जगत् है, उसके प्रभु अनंत जिसका अंत नहीं और किसी देश किसी काल किसी वस्तुमें जिसको नियत न करसकैं, पुरुषोत्तम नाश होनेवाले और चिरजीवी रहने- वालोंसे परे ॥४॥ तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् ॥ ध्यायन्स्तुवन्नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ॥५॥ सहस्रनामसे उसकी स्तुति सदा निरंतर जो पुरुष करता है वह जन्ममरणसे छूट जाता है उसी अव्यय नाम अविनाशी पुरुषकी भक्ति सहित नित्य पूजा और ध्यानपूर्वक स्तुति नमस्कार करनेसे यजन करनेसे पुरुष सब दुःखसे छूट जाता है ॥५॥ अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् ॥ लोकाध्यक्ष स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत् ॥६॥ .
भाषाटीकासमेत । ( १९९)
आदि अंतसे रहित विष्णु सबलोकके महाईश्वर नाम ब्रह्मादिक
ईश्वरोंके ईश्वर लोकाध्यक्ष नाम सबलोकके साक्षी अर्थात् द्रष्टा सब
लोकके स्वामीकी स्तुति करनेसे सर्व दुःख नाम तापत्रयसे
छूट जाता है॥६॥
ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम् ॥
लोकनाथ महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम् ॥७॥
ब्रह्मण्य सब धर्मोंके जानने वाले प्राणियोंकी कीर्ति बढ़ाने
वाले लोककेनाथ अर्थात् जिससे लोग मांगते हैं वा लोकके
शिक्षा देनेवाले महद्भूत महत् नाम ब्रह्मविद्यापूर्ण भूत नाम परमार्थ
अथवा महत् नाम पूज्य भूत नाम सत्ता अथवा पिशाचादिकरूपसे
पूज्य सर्वभूतभव नाम संसार और जिससे उत्पत्ति संसारकी है उस-
को सर्वभूतभवोद्भव कहते हैं ॥ ७॥
एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः ।।
यद्भक्त्या पुंडरीकाक्ष स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥८॥
सब वेदके कहेहुये बड़े बड़े धर्मों से बहुत बड़ा धर्म यही है
जो पुंडरीकाक्षकी स्तुतिसे भक्तिपूर्वक पूजा सदा करता रहै यही
हमारा मत है॥ पुंडरीक हृदयकमलमें प्रकाशवानका नाम है अक्ष.
नाम मंदिर ॥ और स्तुति करना सर्व धर्मों में अधिक है इसमें
प्रमाण देते हैं-विष्णुपुराणका वचन ॥ध्यायन्कृते यजन्यस्त्रेतायां
द्वापरेऽर्चयन् ॥ यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम् ॥ १॥
मनुका वचन ॥ जप्येनैव तु संसिध्येद्राह्मणो नात्र संशयः॥ कुर्या-
दन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥ १॥ जपस्तु सर्वधर्मेभ्यः
परमो धर्म उच्यते ॥ अहिंसया च भूतानां जप यज्ञः प्रवर्तते ॥ इति
महाभारते ॥ यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मीति भगवद्वचनम् ॥ ८॥
(२००) विष्णुसहस्रनाम।
परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः॥
परमं यो महदब्रह्म परमं यः परायणम् ॥९॥
जो परमतेज है कि सूर्य उसी तेजसे सब जगतको प्रकाशकरते
हैं और जिस तेजसे चांद और अग्नि प्रकाशित हैं और बड़ा तपनाम
आज्ञा देनेवाला अंतर्यामीरूप है। यद्भयाद्वाति वातोऽयं सूर्यस्तपति
यद्यात् ॥ वर्षतीन्द्रो दहत्यग्निर्मृत्युश्चरतियद्यात् ।। जो परब्रह्म
सत्य है ज्ञानरूप है अनन्त है महत् नाम पूज्य जो परायण
नाम जहाँ जायके फेर नहीं आवते ॥ ९॥
पवित्राणां पवित्र यो मंगलानां च मंगलम् ॥
दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता॥ १०॥
सब तीर्थों को जो पवित्र करे ध्यानसे दर्शनसे कीर्तनसे स्तुतिक-
रनेसे पूजन स्मरण प्रणाम करनेसे सब पापोंकी जड़ खोद डालते हैं
सो परम पवित्र पुण्य पाप जो संसारके हेतु हैं उनका कारण अज्ञान
है उसका नाश आत्मज्ञानसे जो करे सो सब पवित्रोंसे पवित्र है
प्रमाण'कलावपि च दोषाढये विषयासक्तमानसः॥ कृत्वापिसकलं
पापं गोविंदं संस्मछुचिः॥ १॥शाठयेनापि नमस्कारः प्रयुक्त
श्चक्रपाणये ॥ संसारस्थूलबंधानामुद्देजनकरो हि सः" ॥ २ ॥
मंगल नाम कल्याण सबमंगलों के मंगल किंतु परमकल्याण रूप वा
उसके साधन देवतोंके देवता भूत कहैं प्राणियों के एक पिता नाम
पालनहार कैसे पिता कि,अव्यय जिसका नाश नहीं वही इस लोकमें
एक देवता हैं यह उस प्रश्नका उत्तर है ॥ किमेकं दैवतं लोकइत्या-
दि॥ प्रमाण-ज्ञानदे ध्यानजले रागद्वेषमलापहे ॥ यः स्नाति
मानसे तीर्थे स याति परमांगतिम् ॥ १॥ आत्मा नदी संयमतोय-
'पूर्णा सत्यावहाशीलतटा दयोमिः ॥ तत्राभिषेकं कुरु पांडुपुत्र न
वारिणा शुध्यति चांतरात्मा ॥२॥ इति महाभारते ॥ १० ॥
भाषाटीकासमेत । (२०१) यतः सर्वाणि भूतानि भवत्यादियुगागमे ॥ यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥ ११ ॥ जिससे सत्ययुगके प्रारंभमें सब प्राणी उत्पन्न होते हैं और युगके क्षय नाम महाप्रलयमें और प्रलयके पहिले भी फेर सब जीव जिसमें लय होते हैं ॥११॥ तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते ॥ विष्णोर्नामसहस्रं मे शृणु पापमयापहम् ॥ १२॥ हे भूपति ! उसी लोकके मालिकजगत्के नाथ जो विष्णु तिनका सहस्रनाम जो पाप और भयको नाशकरनेवाला है उसको मन चित्तलगायके हमसे सुनो ॥ १२॥ यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः॥ ऋषिभिः परिगीतानितानि वक्ष्यामिभूतये ॥ १३॥ जिन गुणसहितनामोंको महात्मा लोगोंने प्रसिद्ध किया है और सब ऋषिलोगोंने गाया है उसको मैं भूतये नाम धर्म अर्थ काम मोक्ष मिलनेके वास्ते कहता हूँ ॥ १३ ॥ हरिःआविश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः॥ भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः॥ १४ ॥ सहस्रनामप्रारंभः ॥ विश्वम् ॥ जगत्का कारणरूप परब्रह्म १ अथवा सब जगतरूप है २ जो संसारको बनायके आप उसमें प्रवेश करे ३ प्रलयमें सबजगत् जिसमें समायजाय ४ प्रणवरूप ५॥ एवं सर्वेषु भूतेषु भक्तिरव्यभिचारिणी॥ कर्तव्या पंडितैत्विा सर्वभूतमयं हरिम् ॥॥ विष्णुः॥जो सबमें व्यापक है १ किसी देश किसी काल किसी पदार्थमें जिसको नियत न करसकै किंतु सबदेश सबकाल सबवस्तुमें निरंतर एकाकार व्याप्त है २ जिसकी शक्ति (२०२) विष्णुसहस्रनाम। सबमें भरी है ॥३॥ वषट्कारः ॥ वषट्कार यज्ञको कहते हैं और ब्रह्मा और देवतोंको भी कहते हैं जिसके निमित्त होम यज्ञादिक २॥ भूतभव्यभवत्प्रभुः ॥ भूत भविष्य वर्तमान तीनों कालके स्वामी १॥ भूतकृत् ॥ रजोगुणके आश्रयसे ब्रह्मारूप होके प्राणि- योंके पैदा करनहार १ तमोगुणको धारण करके रुद्ररूपसे जगत्- काटते हैं वा नाश करते हैं २॥ भूतभृत् ॥ सत्त्वगुणसे विष्णुरूप होके सबभूतोंके पालनहार और रक्षक १ शेषरूपसे जगत्को धारणकरने वाले २ अनंतरूपसे जगतको पोषणकरनेवाले ३॥ भावः ॥ सत्ता- रूप जिसको नित्य कहते हैं १॥ भूतात्मा ॥प्राणियों के अन्तर्यामी ॥ भूतभावनः॥प्राणियों के उत्पन्नकरनेवाले ॥ १४ ॥ पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः॥ अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ १५॥ पूतात्मा ॥ त्रिगुण और जन्मकर्मके दोष जिसमें नहीं १० नाम परमात्माबहुत बड़ी है मायाशक्ति जिसकीऔर सबमें निरंतर व्याप्त १ नित्य शुद्धबुद्ध मुक्त स्वभावरनित्य जो तीनों कालमें शुद्ध रहे रागादिकसे रहित बुद्ध आपही प्रकाशवान् और सदा आनंदरूप मुक्त मायाके बंधनसे छूटाहुआ ॥ मुक्तानां परमागतिः॥मुक्त लोग जो रागद्वेषभयसे छूटे हैं उनकी परमा नाम उत्तम गतिरूप जहां जायके फेर न आवै १॥ अव्ययः जिसमें विकार वा नाश नहीं पुरुषः ॥ पुर नाम शरीर वा ब्रह्म जो शरीरमें अथवा ब्रह्ममें वास करै सो पुरुष १॥ नवद्वारं पुरं पुण्यमेतैर्भावैः समन्वितम् ॥ व्याप्य शेते महात्मा बस्तस्मात्पुरुष उच्यते ॥ १॥ इति महाभारते ॥ जो सबके पहिले था वो पुरुष २ सत्त्व गुण जहाँ अधिक होय वहाँ रहनेवाले ३ अनेक मनोरथोंके देनेवाले १ पुर भाषाटोकासमेत। (२०३) नाम संसारको जो प्रबलकालमें नाशंकरै सो पुरुष ५ जिसको सब जगत् भरा है और सब जगत में घूमता फिरता है ६ ॥ साक्षी ॥ साक्षाच्चैतन्यरूप संबको देखने वाले क्षेत्रज्ञः॥क्षेत्र नाम शरीरको जो जानै सो क्षेत्रज्ञ॥क्षेत्राख्यानि शरीराणिं तेषां चैव यथासुखम्॥ तानि वेत्ति स योगात्मा ततः क्षेत्रज्ञ उच्यते ॥ १॥ अक्षरः॥ जो कभी न टलै सदा एकसा थिर रहै एव नाम वही क्षेत्रज्ञ है ॥ १५॥ योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः ॥ नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ १६ ॥ योगः॥ ज्ञानेंद्रिय और मनको जीतकर जीवात्मा परमात्मा दोनोंको एक जाननेको योग कहते हैं । इसके अभ्याससे जो मिलै सो योग ॥ योगविदां नेता ॥योगकेजाननेवाले योगविद् उनके नेता नाम योगक्षेम करनेवाले १ ॥ योग अनमिली वस्तुकी प्राप्तिक्षेम प्राप्तिकी रक्षा ॥ प्रधानपुरुषेश्वरः॥ ॥ प्रधान नामप्रकृति जिसको माया कहते हैं ।पुरुष नाम जीव दोनोंके ईश्वर॥२०॥ नाम नारसिंहवपुः ॥ जिसके शरीरमें आदमी और सिंहका स्वरूप होय ॥ श्रीमान् ॥ जिसकी छातीमें सदा लक्ष्मीका चिह्न है ॥ केशवः॥जिसके बाल बहुत सुन्दर हों क नाम ब्रह्मा अ नाम विष्णु ईश नाम रुद्र तीनों जिसके वशमें हैं सो केशवर केशीदैत्यकेमारने- वाले ३ ॥ पुरुषोत्तमः ॥ जो पुरुषों में उत्तम नाम जीव और ईश्वर दोनोंसे परे शुद्ध ब्रह्म ॥ भगवद्गीता प्रमाण ॥ यस्मात्क्षरम- तीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ॥ अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितम पुरुषोत्तमः ॥१६॥ सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिनिधिरव्ययः॥ सभवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ १७ ॥ हैं (२०४) विष्णुसहस्रनाम । सर्वः॥ सत् और असत्के उत्पत्ति स्थिति विनाशका स्थान॥ शर्वः॥ सवोंका संहार करावनेवाला आपही सबका संहार करै १॥ शिवः ॥ तीनोंगुणोंसे हितसिद्धिवाले वही ब्रह्मा वही विष्णु वही रुद्र है यह श्रुति है शिवके नामसे विष्णुकी स्तुति है ॥ स्थाणुः॥ स्थिरभाव ॥ भूतादिः॥ सबभूतोंका आदिभूत १॥ निधिरव्ययः॥ प्रलयके समयमें जिसमें सबलय होय सो निधि और जो सदार है कभी नष्ट न होय सो अव्यय यह दो मिलके एक नाम है। ३० नाम ॥ संभवः ॥ अपनी इच्छासे भली तरह आपही १॥ चौथे अध्यायमें गीताजी में कहा है धर्मके स्थापनके वास्ते युगयुगमें मैं होता हूँ स्वेच्छासे गर्भादिकदुःखोंसे रहित ॥ भावनः।। सबभोक्ता जीवोंको फल देनेवाला ॥ भर्ता ॥प्रपंचको अधिष्ठानहोके धारण करै १ ॥ प्रभवः॥ जिससे पंचमहाभूत अपने विस्तारसमेत पैदा होय अवतारादिक जिसके उत्तम जन्म हैं ॥ प्रभुः ॥ सब तरहकी कृपामें अत्यंत सामर्थी १ ॥ ईश्वरः॥ उपाधि रहित जिसका ऐश्वर्य है यही सबका ईश्वर है ।। १७ ॥ स्वयंमाशंभुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।। अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः॥ १८॥ स्वयंभूः॥ जो आप ही विना किसीकी सहायताके प्रगट होय १ जो आप स्वतंत्र होय २॥शंभुः ॥ जो भक्तोंको सुख देते १॥ आदित्यः ॥ सूर्यमंडलमें जो सुवर्णमय पुरुष बैठा है १ बारहो सूर्यमें विष्णु नाम सूर्यहों सूर्यकेनाम विष्णु १ शक २ अर्यमा ३ 'धाता ४ त्वष्टा ५ पूषा ६ विवस्वान् ७ सविता ८ मित्र ९ वरुण १० अंशुमान ११ भग १२ आदित्यानामहं विष्णुः॥ गीताजीमें कहा है २ अखंडितपृथ्वीके पति जैसे एक सूर्य अनेक जल पात्रमें अनेक भाषाटीकासमेत। (२०५) दिखाई देते हैं वैसे एक आत्मा अनेकरूप होके अनेक शरीरमें देखाई देते हैं । पुष्कराक्षः ॥ कमलके पत्र से हैं नेत्र जिसके ॥४० नाम । महास्वनः ॥ जिसका शब्द बड़ा है ॥ जिसका शब्द वेद है २॥ अनादिनिधनः ॥ जिसके जन्म और नाश नहीं ॥ धाता। शेष नाग और कच्छप और सूर्यचंद्ररूप होकर जगत्को धारण पोषण करनेवाले १॥ विधाता ॥ कर्म और कर्मके. फलोंका रचनेवाला ॥ कर्म दर्शपौर्णमासादिक यज्ञ और उनके फल स्वर्गा- दिकके बनावनेवाले १ शेषनागादिकके धारण करनेवाले २ ॥ धातुरुत्तमः ॥ पृथिव्यादिक सब धातुओंसे उत्तम चैतन्यरूपधातु १ ब्रह्मासे ही उत्तम यह दो नाम हैं एक धातु दूसरा उत्तम कार्य- कारणरूपसे जगत्के धारणकरनेवाले चैतन्य उत्तम सब ऊपर जानेवाले हिरण्यगर्भादिकोंसे भी उत्तम नाम बहुत ऊपर जानेवाले भाष्यकार एक ही नाम गिनते हैं ॥ १८ ॥ अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः ॥ विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्टःस्थविरोध्रुवः॥ १९ ॥ अप्रमेयः॥ जिसकी प्रमा नाम यथार्थ ज्ञान प्रत्यक्ष अनुमान उपमान शब्दादिकोंसे न हो सकै १ ॥ हृषीकेशः॥ इंद्रियों के स्वामी सूर्यचन्द्ररूप होके अपने केश नाम किरणसे जगत्का भला करते हैं २ महाभारतके दानधर्ममें प्रमाण है ॥सूर्याचंद्रमसोः शश्वद- शुभिःकेशसंज्ञितैः । बोधयन्स्वापर्यश्चैव जगदुत्तिष्टते पृथक् ।। बोध- नात्स्वापनाच्चैव जगतो हर्षणं भवेत् । हपीकेशोऽहमीशानो वरदो लोकभावनः ॥ पन्मनाभः ॥ जिनकी नाभिमें सब · जगतका कारणरूप कमल है ॥ अमरप्रभुः॥ देवतोंके स्वामी ॥ विश्व- .
(२०६) विष्णुसहस्रनाम ।
कर्मा ॥ जिसकी क्रिया जगत् है १ ॥ जिसकी शक्तिसे सब जगत्
क्रिया करते हैं २ जैसे विश्वकर्मा अपनी शक्तिसे सब विचित्र काम
करते हैं वैसे ईश्वर भी अपनी मायासे चित्र विचित्र रचना करते हैं
इसवास्ते विश्वकर्मा नाम है ३॥ ५० नाम ॥ मनुः॥ जो मनन करे
सो मनुः १ मंत्ररूप २ प्रजापतिमनु ३॥ त्वष्टा ॥जो संहारकालमें
सब संसारको सूक्ष्मरूपकरके अपने में मिलाय ले ॥ स्थविष्ठः ।।
स्थूलोंसे बहुत स्थूल १ ॥ स्थविरः पुराने ॥ ध्रुवः ॥ जो सदा
अचल रहै यह दोनों पदोंसे एक नाम ठहरा ॥ पुराने कैसे
कि अचल ॥ १९ ॥
अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।
प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मंगलं परम् ॥ २० ॥
अग्राह्यः ॥ जिसका ग्रहण इंद्रियोंसे न हो सकै ॥ शाश्वत:
सबकालमें रहनेवाले ॥ कृष्णः॥ कृषि नाम सत्ता ण नाम सुख ॥
प्रमाण-कृषिभूवाचकः शब्दो णश्च निवृतिवाचकः । विष्णुस्तद्भाव-
योगाच कृष्णो भवति शाश्वतः ॥१ अर्थात् सत्तारूप और
सुखरूप है जिसका वर्ण श्याम है २ लोहिताक्षः ॥ लालडोरे हैं
जिसकी आंख में १॥ प्रतर्दनः ॥प्रलयमें जगत्के नाशकर्ता ॥
प्रभूतः ॥ सब ऐश्वर्यसे पूर्ण ॥६० नाम ॥ त्रिककुब्धाम ॥ ऊपर-
नीचेबीच तीनों दिशाके आधार वा उनके प्रकाश करनेवाले १ ॥
॥ पवित्रम् ॥ पवित्र करनेवाले ऋषिरूप देवतारूप मंत्ररूपहोके
१॥मंगलं परम् ॥ सव मंगलोंसे उत्तम १ ॥ विष्णुपुराणका प्रमाण।
अशुभानि निराचष्टे तनोति शुभसंततिम् ॥ स्मृतिमात्रेण यत्पुंसां
ब्रह्म तन्मंगलं विदुः ॥२०॥
ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः॥
हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥२१॥
भाषाटीकासमेत। (२०७) ईशानः ॥ जीवमात्रके प्रेरक १॥ प्राणदः ॥ प्राणके दाता १ कालरूप होके प्राणके हर्ता २ प्राण नाम इंद्रियोंको दर्शन श्रवण मननकरनेसे शुद्रकरनेवाले ३ इंद्रियोंको छेदन करनेवाले नाम अंधा गूंगा बहिरा करनेवाले ४॥ प्राण ॥ खास लेनेवाले १ जीवरूप वा परमात्मारूपसे २ प्राणस्वरूप ३॥ ज्येष्ठः॥ सबके बड़े बूढ़े ॥ श्रेष्ठः ॥ अतिप्रशंसायोग्य १॥ प्रजापतिः।। ईश्वररूप होके ब्रह्मासे लेकर तिनुकेतक सब प्रजाके पति नाम पालनहार १ ॥ हिरण्यगर्भः सुवर्णरूप अंडेके भीतर रहनेवाले १ ब्रह्मारूप २ भूगर्भः ॥ सबकी आधारभूत पृथ्वी जिसके गर्भ में है। माधवः ॥ लक्ष्मीके पति १ मधुविद्या जो छांदोग्य उपनिषदमें कही है उस विद्यासे जो जाननेवाले वा विद्यासे जो जाना जाय २ मधुसूदनः॥ मधु नाम दानवके हंता ॥२१॥ ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ॥ अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ॥ २२ ॥ ईश्वरः॥ सर्वशक्तिमान् ॥विक्रमी शूर॥ धन्वी॥धनुषधारी॥ भगवतवचनसेप्रमाण ॥ रामाशस्त्रभृतामहम्।। मेधावी सब शास्त्रोंके धारणकरनेकी बुद्धि रखनेवाले १ ॥ विक्रमः॥ तीनोंलोकमें पांव फैलावनेवाले विराट्प १ विनाम पक्षी गरुड़पर सवार होके चलनेवाले ॥ क्रमः ॥ जो सबमें आपही चलै १ प्राणियोंके चलावनेवाले २॥ अनुत्तमः ॥ जिससे कोई दूसरा उत्तम नहीं ॥१॥ ८० नाम ॥ दुराधर्षः॥ जिसको दैत्यलोग अपना प्रताप न दिखायसकै १ ॥ कृतज्ञः ॥ जीवोंके कर्मोके जाननेवाले १ थोडी पूजनको बहुत करके माननेवाले फल फूल पत्र चढ़ावनेसे मुक्तिफल देनेवाले २॥ कृतिः॥ सबको पुरुषार्थरूप १ पुरुषोंके क्रियारूप २ पुरुषकी कृपामें जो प्रेरक समझा जाय क्योंकि सबके आधार (२०८) विष्णुसहस्रनाम। रूप हैं ॥ ३॥ आत्मवान् ॥ अपनी महिमामे जो सदा स्थित रहै ॥२२॥ सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः ॥ अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥ २३ ॥ सुरेशः ॥ देवतोंके स्वामी १ ॥शरणम् ॥ दुःखीजनोंके दुःखहर्ता ॥ शर्म ॥ परमानंदरूप १॥ विश्वरेताः ॥ जगत्के कारण ३ ॥ प्रजाभवः ॥ सबप्रजाके उत्पन्न करनेवाले १ ॥ अहः॥ प्रकाशरूप दिनकी तरह १ ॥ संवत्सरः ॥ कालरूप विष्णु ॥ ९० नाम ॥ व्यालः ॥ सांपकी तरह जो पकड़नेमें न आवै जैसे मस्तहाथी नहीं पकड़ा जाय वैसे दैत्यादिक उनको नहीं बसकर सकते १ ॥ प्रत्ययः ॥ प्रतीतिरूप १॥ सर्वदर्शनः।। सबकी आँखोंसे आत्मारूप होकर आप देखनेवाले ॥ २३ ॥ अजः सर्वेश्वरः सिद्धःसिद्धिः सर्वादिरच्युतः॥ वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिम्मृतः ॥ २४ ॥ अजगजिसका जन्म नहीं ॥ सर्वेश्वरः॥सब ईश्वरोंके ईश्वर॥ सिद्धः ॥ सदा बनें बनाये जैसे उचित हैं वैसे तैयारं १॥ सिद्धिः॥ सवजगत्में चैतन्यरूप १ सबसे उत्तम फलरूप क्योंकि स्वर्गादिक नाशवान हैं और परमेश्वरकी प्राप्ति अविनाशी है २॥ सर्वादिः॥ सवजातके आदि ॥ अच्युतः॥ जिसकी सामर्थ्य तीनों कालमें न घटै।। १०० नाम ।। वृषाकपिः ॥ वृष नाम धर्म जो सबका- मनाको बरसावै १ क नाम जल जो पृथ्वीकी रक्षा जलसे करे सो कपि अर्थात् वराह भगवान् दोनों पदसे एक नाम वृषाकपि भया तिसका अर्थ धर्मरूप ॥ इसमें व्यासका प्रमाण है ॥ कपिराहः श्रेष्ठश्च धर्मश्च वृप उच्यते ॥ तस्मात् वृषाकपि प्राह भाषाटीकासमेत । (२०९) कश्यपो मां प्रजापतिः ॥ १ ॥ अमेयात्मा ।। जिसके स्वरूपका कोई प्रमाण न करसकै कि इतना है। सर्वयोगविनिःसृतः । सब संबंधसे रहित १ सबशास्त्रमें कहे हुए जो योग हैं उनसे जानेगये २॥२४॥ वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्मा संमितः समः ॥ अमोघः पुंडरीकाक्षो कृषकर्मा वृषाकृतिः ॥ २५ ॥ वसुः ॥ प्राणियोंमें वसनेवाले १. जिसमें सबप्राणी दसैं २ आठौं वसुमें पावक नाम वसु३॥ वसुमनाः॥ उत्तम मन जिसका प्रशस्त रागद्वेषादिक केशसे और मानमदमोहादिक उपक्केशादिसे रहित ऐसा मन जिसका होय सो वसुमनाः ।। सत्यः।। सत्यरूप जो तीनों कालमें अबाधित है १ मूर्तिमान् अमूर्तिमान २ स नाम, प्राण त नाम अन्न य नाम सूर्य प्राणरूप. सूर्यरूप अन्नरूप है ३ भक्तों में जो क्षमाशील है ४ ॥ समात्मा ॥ संम नाम रागद्वेषादिकसे रहित है आत्मा जिसकी सब भूतोंमें एक है आत्मा जिसकी२॥ संमितः॥ सब पदार्थोंसे मित नाम प्रमाण किये गये १ असमितनाम किसी पदार्थसे जिसका प्रमाण नहीं हो सकता|समासबकालमें सब विकारसे रहित १ मा नाम लक्ष्मीके सहित२॥ अमोघः|जिसके पूना स्तुति स्मरण निष्फल नहीं १ जिसका संकल्प व्यर्थ नहीं होता२॥ ११० नाम ॥ पुंडरीकाक्ष हृदयकमलमें अक्ष नाम घर हैं: जिसका १ ॥ कमलके पत्रसे नेत्र है जिसके २ ॥ वृपकर्मा । धर्मयुक्त हैं कर्म जिसके ॥ वृपाकृतिः ॥ धर्मके वास्ते जो आकृति नाम अवतार धारण करते हैं ॥२५॥ रुद्रो बहुशिरा वषिश्वयोनिः शुचिश्रवाः । अभृतः शाश्वतः स्थाणुर्वरारोहो महातपाः ॥२६॥ २१ (२०) विष्णुसहस्रनाम । रुद्रः॥ संहारकालमें प्रजाको रुदन करावनेवाले १ रुदन नाम दुःख जो दुष्टोंको दुःख दे सो रुद्र २ रु नाम दुःख वा दुःखका कारण उसको जो वावै नाम नाश करै सोरुद्ध ३॥ लिंगपुराणका वचनप्रमाण ॥ सदुःखं दुःखातुं वा विद्रावयति यः प्रभुः । रुद्र इत्युच्यते तस्माच्छिवः परमकारणम् ॥१॥ बहुशिराः ॥ अनंतशिर- वाले । बभ्रुः ॥ लोकके धारणकरनेवाले वा पालन करनेवाले ॥ विश्वयोनिः ॥ जगत्के कारण ॥ शुचिश्रवाः॥ पवित्रकारक हैं जिनके नाम वा यश॥ अमृतः॥ जो न मरै ।। शाश्वतः स्थाणुः॥ जो निरंतर स्थिर ॥ १२० नाम ॥ वरारोहः॥ उत्तम है आरोह नाम अंक जिसका श्रेष्ठ है शेषशय्या जिसके वास्ते२श्रेष्ठ है जीवोंका आरोह नाम चढ़ना जिस पदमें अर्थात् जिस पदको पहुँचके फेरन आवै ॥ महातपाः ॥ समग्रसृष्टिका पूर्णज्ञान है जिसको 3. बड़ा है जिसका ऐश्वर्य प्रताप २ ॥२६॥ सर्वगः सर्वविद्धानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः ॥ वेदो वेदविदव्यंगो वेदांगों वेदवित्कविः ॥२७॥ सर्वगः ॥जो सब जगह कारणरूप होके व्याप्त है। सर्ववित् ।। सब जाननेवाला सत्यसंकल्प है इसवास्ते जो संकल्प करते हैं सोई होता है।भानुःजो प्रकाशमान है जो सर्वविद् और प्रकाशमान है सोई॥ सर्वविज्ञानुः॥ दोनों पद मिलके एक नाम भया ।। विष्वक्सनः ॥ जिसकी थोड़ी ही क्रियासे दैत्योंकी सेना विष्वक् नाम चारों तरफ भागजाय ॥ जनार्दनः ॥ दुष्ट जनोंको जो मारे १ अथवा नरकादिमें डालै२ भक्त लोग जिससे मौगै ३॥ वेदः॥ जो अपने मार्गको जतावित वित्॥ वेदके अर्थको यथार्थ जाननेवाले १ देदके अर्थको धारण करनेवाले २॥ अव्यंगः ।। . - १ भाषाटीकासमेत। (२११) व्यक्तिरहित ॥ वेदांगः ॥ जिसके अंगसे वेद उत्पन्न भये हैं । वेदरूप २ ॥ १३० नाम ॥ वेदवित् वेदको विचारनेवाले १॥ कविः ॥ जो पदार्थ इंद्रियोंसे न देखा जाय उसके देखनेवाले ॥२७॥ : लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः॥ चतुरात्मा चतुर्दूहश्चतुर्दष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥ २८ ॥ लोकाध्यक्षः ॥ सब लोकके प्रधान नाम द्रष्टा १ सब लोकके योगक्षम करनेवाले २ ॥ सुराध्यक्षः ॥ देवतोंके स्वामी १ उनके शत्रुओंके हंता और मनोरथोंके देनेवाले२॥ धर्माध्यक्षः ।। धर्म और अधर्मको साक्षात् देखनेवाले और उसका फलदेनेवाले ॥ कृताकृतः ॥ कृत कार्यरूप अकृत कारणरूप ॥ चतुरात्मा। स्वर्गादिकमें पृथक् चार चार मूर्ति जिसकी हैं जैसे सृष्टिकालमें ब्रह्मा १ दशारिप्रजापति २ काल ३ सब जीव ४ और पालनकालमें विष्णुपमन्वादिक २ काल३सब भूत ४ संहार कालमें रुद्र मृत्यु काल ३सबभूतथ्यह तीनों कालमें भगवानकी विभूति हैविष्णुपुराणमें लिखा है। चतुर्ग्रहः॥ चार हैं व्यूह नाम विभाग जिसके वासुदेव १ संकर्षग २ प्रद्युम्न३ अनिरुद्धष्ट चार रूप हैं जिसके ।। चतुर्दष्ट्रः॥ चार डाढवाले श्रीवृसिंह १ चार डाढवाले वराह भगवान् २॥ चतुर्भुजः ।। चारभुजावाले ॥ १४० नाम ॥ २८ ॥ प्राजिष्णुभॊजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः॥ अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः॥ २९॥ प्राजिष्णुः सदा प्रकाशरूप|भोजनम्॥ भोज्यरूप जो माया है १. सोहै भोजन ॥ भोक्ता ॥ पुरुषरूप होकर मायाले भोगने- वाले ॥ सहिष्णुः ॥ देत्योंको इरावनेवाले ॥ जगदादिजः। .
(२१२) विष्णुसहस्रनाम । हिरण्यगर्भरूप होके जगत्के आदिमें प्रगट होनेवाले ॥ अनघः ।। पापदुःखव्यसनसे रहित ॥ विजयः ॥ ज्ञानवैराग्यऐश्वर्या- दिगुणोंसे जगत्को जीतनेवाले ॥ जेता ॥ स्वभावकरके सब भूतोंको अच्छी तरह जीतनेवाले ॥ विश्वयोनिः ॥ विश्व है योनि जिसकी ॥ विश्वरूपसे कार्यरूप और योनिरूपसे कारणरूप है २॥ पुनर्वसुः॥ वारंवार जीवरूप होके शरीरमें वसने वाले ॥ १५० नाम ॥ २९ ॥ उपेंद्रो वामनःप्रांशुरमोघः शुचिलर्जितः ॥ अतींद्रः संग्रहः सम्र्गो धृतात्मा नियमो यमः॥३०॥ उपेंद्रः ॥ इंद्रके समीप. छोटे भाई बनके रहनेवाले १. उपार नाम गोलोकके इंद्र २॥ वामनः ॥ वामन अवतार १ जिसका भजन देवता करै२॥प्रांशुः॥ बहुत लंबे चौडे बलिके दानसमयमें जो रूप धराथा॥ अमोघः ॥ जिसका व्यापार व्यर्थ नहीं १ ॥ शुचिः॥ स्मरण पूजा स्तुति करनेवालोंको जो पवित्र करै १॥ उर्जितः॥ परमबलवान् ॥ अतींद्धः ॥ स्वाभाविक ज्ञान वैराग्य ऐश्वर्यादिकसे इंद्रको जीतनेवाले ॥ संग्रहः ॥ संहारकालमें सबको बटोरलेनेवाले ॥ सर्गः॥ सृष्टिरूप १ सृष्टिके कारणरूप २॥ धृतात्मा ॥ एकरूपसे स्थिर है आत्मा नाम स्वरूप जिसका॥१६० नामः॥ नियमः॥ अपने अपने अधिकारमें प्रजाको लगानेवाले ॥ ॥ यमः॥ ॥ सबके हृदयमें बैठके सबको अपने अपने कामों में लगावनेवाले ॥ ३ ॥. वेद्यो वैद्यः सहायोगी. वीरहा माधवो मधुः॥. अतींद्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः॥ ३१॥ देय मोक्षार्थियों के जालने योग्य वैद्यः विवादि सब विधा
मापाटीकासमेत। (२१३)
ओंसे जानने योग्य ॥ संदायोगी॥ सदा आत्मज्ञानका योग है
जिसको ॥ वीरहा ॥ धर्मसेतुके नाशक जो असुर वीर हैं उनके
इंता ॥ माधवः ॥ मा नाम ब्रह्मविद्या उसके पति ॥ हरिवंशका
प्रमाण ॥मा विद्या चहरेःप्रोक्तातस्या ईशो यतो भवान्॥तस्मान्मा-
धवनामासि धवः स्वामीति शब्दितः॥१॥ मधुः॥ मधुनाम
अमृन उसकी तरह अत्यंत आनंद देनेवाले ॥ अतींद्रियः ।।
इन्द्रियोंकी जहाँ पहुँच नहीं ॥ महामायः ॥ सब मायावियोंसे
बड़े मायावी ॥ १७० नाम ॥ महोत्साहः॥ जगत्के उत्पत्ति स्थिति
प्रलय करनेमें बड़ा उत्साह जिसको ॥ महाबलः ॥ सव
बलवानोंसे बली ॥ ३१ ॥
महाबुद्धिर्महावीयों महाशतिर्महाद्युतिः ॥
: अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥ ३२ ॥
महाबुद्धिः ॥ सब बुद्धिमानोंसे बड़े बुद्धिमान् ॥ महावीर्यत
जिसका अविद्यारूप बड़ापराक्रम जो गतिका कारण हैं।
महाशक्तिः ॥ बडी सामर्थ्यवाले ॥ महाद्युतिः ॥ भीतर बाहर
महाप्रकाशरूप ॥ अनिर्देश्यवपुः ॥ जिसका शरीर ऐसा
कहने के योग्य नहीं है कि यही है। श्रीमान् ॥ ऐश्वर्यरूपलक्ष्मी-
वाले ॥ अमेयात्मा ॥ जिनका आत्मा नाम बुद्धि प्रमाणसे
बाहर है ॥ महाद्रिधृक् ॥ बड़े पर्वतके उठावनेवाले, समुद्र-
मथनमें कच्छपरूपसे मंदराचलको, वा ब्रजरक्षामें कृष्णरूपसे
गोवर्द्धनको धारणकरनेवाले ॥ १८० नाम ॥ ३२॥
महेष्वासो महीमा श्रीनिवासः सतांगतिः ॥
अनिरुद्धः सुरानंदो गोविंदो गोविदांपतिः ॥ ३३ ॥
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(२१४) विष्णुसहस्रनाम।
महेष्वासः ॥बड़ाहै धनुष जिसका
महीभर्ता ॥ वराह-
रूपसे पृथ्वीको धारण करनेवाले ॥ श्रीनिवासः ॥ जिसकी
छातीमें स्वर्णरेखारूप लक्ष्मी वसे ॥ सतांगतीः ॥ सत् नाम
वैदिकसाधुओंके गति नाम मोक्षदाता १ ॥ अनिरुद्धः ॥ जिसको
कोई शत्रु रोक न सकै ॥ ॥सुरानंदः॥ ॥ देवतोंके आनंद देनेवाले
॥ गोविंदः ॥ वराहरूपसे पृथ्वीके धारण करनेवाले १ गायोंके
इंद्र २ गो नाम वेदरूपवाणीसे पावनेवाले ३॥ गोविदांपतिः ॥
वेदवाणी जाननेवालोंके पति ।। ३३ ।।
मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः ॥
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः॥ ३४ ॥
मरीचिः ॥ तेजस्वियोंमें बड़े तेजस्वी ॥ दमनः॥ रमा-
दिकरूपसे जो प्रजा अधिकार पायके प्रमत्तहोय उनके दंड देनेवाले
॥ १९० नाम ॥ हंसः ॥ मैं वही हूँ ऐसी भावनाकरनेवालोंको
संसारबंधनसे छोडावनेवाले १ सब शरीरोंमें बिंबरूप और
प्रतिबिंबरूपसे रहनेवाले २॥ सुपर्णः ॥ सबके हृदयमें जो
भलीभाँति गमन करे १ सुंदर पंखवाले गरुड़जी २ ॥
भुजगोत्तमः ॥ शेषवासुकीरूपसे भुजंग नाम टेढेचलनेवालोंमें
उत्तम ॥ हिरण्यनाभः ॥ सुवर्णकी तरह सुंदर है नामि जिसकी
१॥ हि नाम हितकारक रण्य नाम रतिकारक है नाभि जिसकी
ध्यानकरनेवालोंको २॥ सुतपाः ॥ बदरिकाश्रममें नरनागयण
रूपसे उत्तम ज्ञानरूप तप करनेवाले १॥ मन और इंद्रियोंका
एकाग्र होना परम तप है यह स्मृतिमें लिखा है ॥ पद्मनाभः ॥
कमलकी तरह सुंदर गोल है नाभि जिसकी १ हृदयकमलमें
प्रकाशमान २॥ प्रजापतिः। प्रजाओंके पति ॥ ३४ ॥
. ॥ भाषाटीकासमेत। (२१५) अमृत्युः सर्वदृक् सिंहःसंधाता संधिमान् स्थिरः ।। अजो दुर्मषणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥३५॥ अमृत्युः ॥ मृत्यु नाम विनाश उसका कारण तिससे रहित । सर्वहरु ॥ सबजगतके शुभाशुभ कर्म देखनेवाले अपने स्वाभा- विक ज्ञान क्तिसे ॥ विहः ॥ दैत्यरूपमृगोंके हेता ॥ २०. नाम ॥ संधाता ॥ जीवोंके कर्मके पूरे फल देनेवाले ॥ संधिमान् ॥ जीवरूप होके संधि नाम कर्मों के फल भोगनेवाले स्थिरः॥ सदा एकरूप ॥ अजः॥ भक्तों के हृदयमें रहनेवाले १ दैत्योंपर बाण चलानेवाले २ ॥ दुर्मर्षणः॥ जिसके प्रतापको दानवादि सह न सके ॥ शास्ता ॥ श्रुति स्मृतिशास्त्रोंकरके सबके शिक्षा देनेवाले ॥ विश्रुतात्मा ॥ बहुत प्रसिद्ध सत्यज्ञाना- दिकरूप आत्मा ॥ सुरारिहा ॥ ॥ देवतोंके शत्रुनाशक ॥ ३५॥ गुरुर्मुस्तमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः ॥ निमिषोऽनिमिषः स्रग्बी वाचस्पतिस्दारधीः॥३६॥ गुरुः ॥ सब विद्याके उपदेश करनेवाले १ सबके पिता २॥ गुरुतमः॥ ब्रह्मादिकोंको बह्मविद्या सिखावनेवाले ॥ २१० नाम ॥धाम ॥ ज्योतिरूप १ सब कामनाके रहनेकी जगह २॥ सत्य ॥ सत्यवचनरूप १ जगत् जो दिखाई देताहै उसमें परमसत्यरूप आप है ॥ सत्यपराक्रमः ॥ सत्यहै पराक्रम जिसका । पर नाम शत्रु उसको जो दबावै सो पराक्रम कहावै॥ निमियः ॥ योगनिद्रासे आँख मूंदनेवाले ॥॥अनिमिषः । नित्य प्रबुद्धस्वरूप १ मत्स्यअवतारमें पलकरहित २ ॥ स्त्रग्वी ॥ पञ्चतन्मात्रारूपी वैजयंतीमालावाले॥ ॥ वाचस्पतिः ॥ उदा-
(२१६) विष्णुसहस्रनाम ।
रधीः ॥ वाणीके पति, उदार नाम सब पदार्थके ज्ञाताहै बुद्धि
जिसकी ॥ यह दोनों पदसे एक नाम है ॥ ३६॥
अग्रणीामणीः श्रीमान्न्यायो नेता समीरणः ॥
सहस्रमू विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात्॥ ३७॥
अग्रणी ॥ मुमुक्षु लोगोंको अग्रनाम उत्तम पद देनेवाले ॥
ग्रामणीः ॥ चतुर्विधभूतग्रामके नायक ॥ चार प्रकारके भूत है
अंडज अंडेसे जी उत्पन्न होय पक्षी सादिक १ पिंडज मनुष्य
पश्चादिक २ स्वेदज जुआं मच्छर कीडे ३ उद्भिज्ज वृक्षलतादिक
४॥श्रीमान् ॥ सबसे अधिक शोभावाले ॥ २२० नाम ॥
न्यायः ॥तर्कशास्त्रसे प्रमाणपूर्वक जिसका ज्ञान होय ॥नेता ॥
जगत्को निबाहनेवाले :॥ समीरणः ॥ प्राणवायुरूपसे. सब
जीवों के प्रेरक सहस्रमी ॥ अनंत हैं शिर जिसके ॥ विश्वात्मा ॥
सब जगत्के आत्मा अतंर्यामीरूप ॥ सहस्राक्षः ॥ अनंतनेत्रवाले
१ अनंत इंद्रियवाले २ ॥ सहस्रपात् ॥ अनंतपैखाले ॥३७ ॥
आवर्तनो निवृत्तात्मा संवतः संप्रतर्दनः ॥
अहःसंवतको पहिरनिलो धरणीधरः ॥ ३८ ॥
आवर्तनः ॥ संसारचक्रके घुमावनेवाले ॥ ॥ निवृत्तात्मा ॥
जिसका आत्मा नाम स्वरूप संसारबंधनसे निवृत्त है । संवृतः॥
मायासे ढकेहुए ॥ २३० नाम ॥ संप्रतर्दनः ॥ रुद्रकालादिक-
रूपसे जगतके संहार करावनेवाले ॥ अहःसंवर्तकः ॥ दिनके
करनेवाले सूर्य ॥ वह्निः ॥ अग्निरूप होके देवतोंको आहुति
पहुँचावनेवाले ॥. अनिलः ॥ जो नाश न होय १ वायुरूप
२ जैसे वायु सुगंध दुर्गधको ग्रहण करके आप शुद्ध रहता है
वैसे पुण्यपापसे पृथक् रहनेवाले ॥ धरणीधरः ॥ शेषरूपसे
अथवा वराहरूपसे पृथ्वीके धारणकरनेवाले ॥ ३८॥
भाषाटीकासमेत । (२१७)
सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वविश्वभुग्विभुः ॥
सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जहुर्नारायणो नरः॥ ३९ ॥
सुप्रसादः ॥ सुंदर है प्रसाद नाम रीझ जिसकी जैसे शिशु-
पालादि शत्रुओंको भी मुक्ति दयी ॥॥ प्रसन्नात्मा ॥ ॥ रजो-
गुण तमोगुणसे रहित आत्मा नाम अंतःकरण जिसका १ दयालु-
स्वभाववाले २ पूर्णकाम होनेसे प्रसन्न हे आत्मा जिसकी ॥ ३॥
विश्वधृक् ॥ ज्ञान वैराग्य ऐश्वर्यादिकसे जगत्को तुच्छ जान
नेवाले १॥ विश्वयुक् ॥ प्रलयकालमें महाकालरूपसे जगत्को
भोजनकरनेवाले १ विष्णुरूपसे जगत्के पालक २ ॥ विभुः॥
अनेकरूपहोनेवाले ॥ २४० नाम ॥ सत्कर्ता ॥ सत्कार करने-
वाले १॥ सत्कृतः॥ पूजितोंके पूजित ॥ १ ॥ साधुः ॥ लोक
वैदके अनुकूल आचरण करनेवाले १ सब चहोतीवस्तुके सिद्ध-
करनेवाले २ ॥ जहः ॥ संसारकालमें जनोंके हंता विमुख-
जनोंको त्यागनेवाले भक्तोंको परमपदके दाता ३ ॥ नारायणः ।।
'मर नाम आत्मा तिससे उत्पन्न भये पंचभूतादिको नार
कहते हैं अयन नाम घर पंचभूतमें कारणरूप होके जो रहै
उसको नारायण कहै 3. महाभारतका प्रमाण “नराजातानि
तत्त्वानि नाराणीति विदुर्बुधाः॥ तान्येव चायनं तस्य तेन नारा-
यणः स्मृतः" ॥१॥ प्रलयकामें नर नाम जीवोंके अयन नाम
निवासस्थान २ नार नाम जलमें अयन नाम घर है जिसके
अर्थात हिरण्यगर्भरूप ३जीवसमूह नार तिसमें वसे सो नारायण
४ जीवसमूहका अयन नाम ज्ञान है जिसको सर्वज्ञरूप ॥ नरः ॥
जीवोंको कर्ममें लगावनेवाले १ कर्मका फल देनेवाले २ ॥३९॥
असंख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः ॥
सिद्धार्थः सिद्धसंकल्पःसिद्धिदः सिद्धिसाधनः॥४०॥
(२१८) विष्णुसहस्रनाम । असंख्येयः॥ जिसके नामरूप कर्म गिनती न आवे ॥ अप्रमेयात्मा। जिसके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान न हो सकै १॥ विशिष्टः॥ सबसे उत्तम बड़े शिष्ट ॥ शिष्टकृत् ।। शिक्षाकरने वाले १ शिष्टजनोंके पालक २५० नाम ॥. शुचिः ॥ मायासे रहित ॥१॥ सिद्धार्थः । सिद्ध है मनोन्थ जिसका ॥ १ ॥ सिद्ध संकल्पः ॥ सत्य है संकल्प जिसवा १॥ सिद्धिदः॥ कमेके फल. तथा योग देनेवाले ॥१॥ सिद्धिसाधनः ९ ॥ भक्तोंको अणि- मादिक सिद्धि और मुक्ति के दा॥०॥ हषाही वृषभो विष्णुपार्वा वृषोदरः ।। वर्धनो वर्द्धमानश्च विविक्तः श्रुतिमागरः॥ ११ ॥ वृषाही ॥ कृपलाम धर्म द्वादशाहादिक यज्ञके अह नाम प्रकाश अर्थात् आपही उसके कर्ता और भक्ता भी है १ ॥ वृषभः ॥ भक्तोंकी कामनाके व .सनेवाले ॥ १॥ विष्णुः॥ लोकके आक्रमण करनेवाले ॥ १॥ वृषपर्वा ॥ जिसकी प्राप्ति दी धर्मसे होय ॥१॥ वृषोदरः ब्रह्मादि सब प्रजा जिसके उदरसे रूपन्न होय ॥२६. नाम ॥ वर्द्धनः ॥ भक्तोंका पूजाके फलको बढ़ावनेवाले १ जैसे सुदाम के तंडुलका फल बढाया ॥ वर्द्धमानः ॥ जगरूप होके बढनेवाले ॥१॥ विविक्तः॥ वर्तमानः होकर भी जगतसे न्यारे श्रुतिसागरः ॥ वदके समुद्र १ जिसमें वेदशास्त्ररूपी समुद्र बास करै ॥११॥ सुरजो दुर्धरो वाग्मी महेंद्रो वसुदो वरः ॥ नैकरूपो रहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥४२॥ सुभुजः ॥ जिसकी भुजा जगत्को रक्षाकरनेवाली बहुत सुंदर हैं॥१॥दुर्धरः ॥ जिसको कोई धारण न कर सके १ योगीलोग भाषाटीकासमेत । (२१९) जिसको ध्यानमें बहुतदुःखसे धारण नाम ठहराय सकै ॥वानग्मी।। उत्तम वेदरूप वाणीके धारण करनेवाले १ ॥ महेंद्रः ॥ ईश्रोंके ईश्वर ॥ १॥ वसुदः ॥ धनक देनेवाले १ ॥ वसुः ॥ धनरवरूप . मायाकरके अपने रूपको छिपाक्नेवाले ॥ अधरने वास करनेवाले ॥ २७० नाम।। नैकरूपः ॥ जिसका एकरूप नहीं १॥ वृहद्रूपः॥ बहुतबड़ा रूप वराहादिक १ ॥ शिपिविष्टः॥ शिपि नाम पशु विष्टः नाम प्रवेश करनेवाले यज्ञपशुरूप १ शि नाम जल पि नाम पान करनेवाले अर्थात् जलकी शोपनेवाली किरनवाले सूर्यरूप २ अंतर्यामी ३॥ ॥ प्रकाशनः ॥ सबके प्रकाशक ॥४२॥ ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः ॥ अद्धः स्पष्टाक्षरो मंत्रश्चंद्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ ४३ ॥ ओजतेजोद्युतिधरः॥ ॥ओज नाम बल तेज नाम शूरतादिगुण धुति नाम प्रकाशबलशौर्यादिगुण और प्रकाशके धारण करनेवाले १ बलरूप तेजरूप युतिनाम ज्ञानके धारणकरनेवाले २ पहिले अर्थमें तीनों विशपगका एक नाम है दूसरे अर्थमें तीन नाम हैं । प्रकाशात्मा ॥ प्रकाशरूप है मूर्ति जिसकी॥३॥प्रतापनः॥सूर्यरूपसे नगतके प्रकाशक १ . सूर्यसंकर्षणादिरूपसे जगत्को भस्म करनेवाले २॥ ऋद्धः ॥ धर्म ज्ञान वैराग्य ऐश्यादिकसे पूर्ण १॥ स्पष्टाक्षरः॥स्पष्ट है अक्षर जिसका अर्थात् प्रणवरूप ॥ ॥ मंत्रः ॥ तीनोंवेदक मंत्ररूपी मंत्रसे जिसका ज्ञान होय २८० नाम ॥ चंद्रांशुः ॥ संसारके तापको चांदकी किरणवत् हरनेवाले ॥ १ ॥ भास्करद्युतिः ॥ सूर्यकी तरह जगत्के प्रकाशक ॥४३॥ .
(२२०.) विष्णुसहस्रनाम। अमृतांशूद्भवो भानुः शशर्विदुः सुरेश्वरः ।। औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥४४॥ अमृतांशुद्भवः ॥ ॥ समुद्र मथनकरके चंद्रमाको निका- सनेवाले॥ १॥ भानुः॥ ॥ सदाप्रकाशमान ॥ ॥शशबिंदुः॥शश नाम मृग बिंदु नाम चिह्न है जिसके सो चंद्रमाकी तरह. प्रजाको पोषणकरनेवाले १॥ सुरेश्वरः ॥ सु नाम सुंदरफल र नाम दाता ऐसे जो देवता उनके ईश्वर ॥ औषधम् ॥ संसाररूप रोगके औषध ॥ १॥ जगतःसेतुः॥ जगत्के पार उतरनेकेवास्ते सेतु जगत्के वर्णाश्रमधर्मके सेतु नाम मर्यादापालक २॥ सत्यधर्म- पराक्रमः ॥ जिसके धर्म नाम ज्ञानवैराग्यादिक और पराक्रम सामर्थ्य सत्य है॥४४॥ भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽतलः ॥ कामहा कामकृत्वांतः कालः काममदः प्राः॥४॥ भूतभव्यभवनाथः ॥ भूत भविष्य वर्तमान तीनोंकालके प्राणियोंके स्वामी १ उन प्राणियों करके जो प्रार्थित होय २ प्रलयकालमें प्राणियों के नाथ नाम नाश करनेवाले प्रजाके सृष्टिकालमें आशिषदेनेवाले ४ स्थितिकालमें प्रजाको सत्कर्ममें लगा नेवाले ५ ॥२९० नाम ॥ पवनः॥ पवित्र करनेवाले १ वायुरूप॥ पावनः पवित्र करानेवाले जिसके भयसे वायु चलता है ॥१॥ अनलः ॥ अन नाम प्राण ल नाम ग्रहण करनेवाला जीवरूप १ नलं नाम गंध उसकरके रहित २ जिसका प्राण नहीं क्योंकि अनंत है ॥ ३॥ कामहा ॥ मुमुक्षुभक्तोंके विषयकामनाके हता हिंसकोंके साधुपीडादि कामनाके नाशक ॥ २॥ कामकृत् ॥: सात्त्विक भक्तोंकी कामना पूरी करनेवाले १ काम नाम प्रद्युम्नके .
भाषाटोकासमेत । (२२१) जनक २॥ कांतः ॥ मनोहररूप.१ क नाम ब्रह्माको दूसरे पराईके अंतमें नाशकरनेवाले ॥ ॥ कामः ॥ सुमुक्षु लोग जिसकी कामना करै १॥ कामदः ॥ भक्तोंकी कामनासे अधिक देनेवाले १ ॥ प्रभुः बहुत होनेवाले ॥ ४५ ॥ युगादिकृतयुगावों नैकमायो महाशनः । अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनंतजित ॥ १६ ॥ युगादिकृत् ॥ ॥ युगसंवत्सरमासादिका करता १ युगोंका प्रारंभ करनेवाला ॥ ३०० नाम ॥ युगावतः सत्ययुगादि को वारंवार घुमावनेवाले ॥ १॥ नैकमायः ॥॥ अनेकप्रकारकीमाया, रचनेवाले ॥ १॥ महाशनः ॥ प्रलयकालमें संब जगतके खाने- वाले ॥१॥ अदृश्यः॥ सबकी बुद्धि और इंद्रियोंसे लखानजाय॥ व्यक्तरूपः॥ ॥ प्रगट है स्थूलरूप जिसका १ योगियोंके हृदयमें स्वयंप्रकाशरूपसे प्रगट होनेवाले २॥ सहस्रजित् ॥ हजारों असरोंके जीतनेवाले१॥अनंतजित् ॥ अनंतजीवोंको युद्धादि सब लीलामें जीतनेवाले ॥ १६ ॥ इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखंडी नहुषो वृषः॥ क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुमहीधरः ॥४७॥ इष्टः॥ ॥ परमादनरूप होनेसे सबको प्रिय १ यज्ञादि करके यूजित २ ॥ अविशिष्टः ॥ ॥ सबके हृदयमें समानरूपसे अंतर्यामीरूपहोके रहनेवाले ॥ ३॥ शिष्टेष्टः॥शिष्ट नाम उत्तमज- नोंके इष्ट १ शिष्टजन जिनको प्यारे हैं २ शिष्टजनों करके पूजित ३॥ ३१० ॥ शिखण्डी ॥ मोसुकुटवाले ॥ १ ॥ नहुषः ॥ अपनी मायासे जीवोंको वांधनेवाले ॥9॥ वृषः॥ धर्मरूप होके परामनाके बरसावनेवाले १ ॥ोधहां ।।। साधुजनोंके कोषहता - (२२२) विष्णुसहस्त्रनाम । कोधकृत् ॥ दुष्टोंके क्रोधबढावनेवाले १ ॥ वर्ता जगत्के क्रोधकृत् नाम दुष्टजनोंके कर्ता नाम मारनेवाले ॥ दोनों पदसे एक नाम ॥ विश्वबाहुः ॥ जिसकी बाहु सबका आधार है १ सब तरफ जिसकी भुजा है ॥२॥ महीधरः ॥ पृथ्वीके धारण करनेवाले १ पूजाके धारण करनेवाले २॥१७॥ अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः ॥ अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः॥४८॥ अच्युतः॥ ॥ षड्भावविकारसे रहित ॥ छः विकार जन्म लेना १ अस्ति नाम रहना २ वर्धते नाम बढना ३.विपरिणमते नाम रूपका बदलजाना ४ अपक्षीयते नाम घटना ५ नश्यते नाम नाशहोना ६॥ प्रथितः॥ पालनादिकमें प्रसिद्ध ॥ १ ॥प्राणः॥ प्रजाको प्राणरूपसे जिलावनेवाले ॥ ३२० नाम ॥ प्राणदः ॥ सुरोंको बलदेनेवाले १ असुरोंके बलके नाशक ॥ १ ॥ वास वानुजः ॥ ॥इंद्रकेछोटेभाई १ अपांनिधिः ॥ समुद्ररूपसे जलकेघर ॥१॥ अधिष्ठानम् ॥ जिसमें सबभूत वासकरें कारण रूप ब्रह्म ॥ १॥ अप्रमत्तः॥ कर्मके अनुकूल फल देने में सावधान ॥अतिष्टितः ॥ अपनी महिमामें स्थित ॥ १८॥ स्कंदा स्कंधरो धुर्यों वरदो वायुवाहनः । वासुदेवो बहदानुरादिदेव पुरंदरः ॥ ४९ ॥ स्कन्दः॥ ॥ अमृतरूप होके बहनेवाले १ वायुरूप होके जगत्के शोपनेवाले २॥ स्कंदधरः ॥ धर्मपथके धारण करने वाले ॥१॥धुर्यः॥ सब जगतका जन्मस्थितिलयरूपी बोझ उठावनेवाले ॥ वरदः ॥ ॥ वांछित वादेनेवाले १ वरनाम गऊ उसे दान देनेवाले यजमानरूप होके २ ॥ ३३० नाम ।
भाषाटीकासमेत। (२२३), : " नायुवाहनः ॥ ॥ सातों वायुके चलानेवाले नाम सातों वायुके आवह १ प्रवह २ अनुवह ३ संवह ४ विवह ५ पावह ६ परिषद -७ सातों वायुके स्थान यह है-मेघ और पृथ्वीके बीचमैं आवह १ मेघ और सूर्य के बीचमें प्रवह २ सूर्यचांदके बीचमें अनुवह ३ चांद और नक्षत्रों के बीच में संवह ४ नक्षत्र और ग्रहोंके बीच में विवह ५ ग्रह और सप्तऋषिके बीचमें परावह ६ सप्तऋषि और ध्रुवके बीचमें परिवह ७॥ वासुदेवः ॥ जो सबमें वसै वा सबको ढकलेवे देव नाम क्रीडा करै अथवा विवाह करै वा प्रकाश करे वा जिसकी सब स्तुतिकर वा मुमुक्षुलोग जहां प्राप्त हों सो देव ॥ प्रमाग महाभारतका ॥ " वासनात्सर्वभूतानां स्तुत्यो यो देवयोनिषु ॥ वासुदेवस्ततो ज्ञयो योगिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ १ ॥ बृहद्भानुः ॥ बडी है भानु नाम किरण जिसकी १ चंद्रसूर्य में प्रकाशकानेवाली और जगत्को प्रकाश करनेवाली २ ॥ आदिदेवः ॥ आदि नाम कारणरूप देव ॥: पुरंदरः : ॥ देवतोंके शत्रुओंके पुर नाम गांवके विदारण करनेवाले ॥ १९ ॥ अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः॥ अवकला शातावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ॥ ५॥ अशोकः ।। शोकादिपीसे रहित ॥2॥ "क्षुत्पिपासा जरामृत्यू शोकमोहो पर्मयः ॥ ॥ तारणः ॥ संसावर्णवसे तारनेवाले ॥ १ ॥ तारः॥ गर्भ जन्म जरा मृत्युके भयसे तालेवाले ॥ १ ॥ शुरः ॥ बडे पराक्रमवाले ॥ १॥शौरिः शुरलेनके कुलों उत्पन्न ॥ ३४० ॥ जनेश्वरः ॥ जन नाम जंतुके ईश्वर ॥१॥ अनुकूलः ॥ आत्मारूपसे सबको अनुकूल.१ .
Lal (२२४) विष्णुसहस्रनाम । जिसका कोई प्रतिकूल नहीं २॥ ॥ शतावर्तः ॥॥ धर्मको रक्षाके वास्ते सब पदार्थों में वर्तमान १, प्राणरूपसे सैकडों नाडियों में वर्तमान ॥२॥ पद्मी ॥ पद्म है जिसके हाथमें ॥ १ ॥ पद्मनि- भेक्षणः ॥ ॥ कमलकी रोशनी जिसकी आखोंमें ॥ ५० ॥ पद्मनाभोऽरविंदाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत् ॥ महर्डिक्रंद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः॥ ५१ ॥ पद्मनाभः ॥ ॥ ब्रह्मा जिसमें पैदा हुवा ऐसा कमल है जिसकी नामिमें १ कमलके भीतर. जो गुच्छा है उसके बीचकी किरणों में वसे सो पद्मनाभर ॥ अरविन्दाक्षः ॥ कमलकीसी आँखोंवाले १॥ पद्मगर्भः ॥ योगियोंका दिल जों कमलकी सूरत है उसको गर्भ नाम बीचमें रहै । ॥ शरीरभृत् ॥ विनारूपं होके वा प्राणरूप होके सब शरीरोंको धारै १ वा अपनी मायासे.सब शरीरोंको धार :२॥ महर्दिः ॥ बडी विभूतिवाला ॥ ३५॥ ऋद्धः ॥ प्रपंचरूप होके बढै जो ॥..१॥ वृद्धात्मा ॥ पुराना है आत्मा जिसकाः ॥ १॥ महाक्षः ॥ बडी आखोंवाला . १ गरुडध्वजः ॥ जिसकी ध्वजामें गरुडकी मूर्ति है ॥५१॥ अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविहरिः। सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान समितिजयः ॥५२॥ अतुलः ॥ ॥ जिसके समान कोई नहीं गीतामें कहा है कि, तुम्हारे समान', कोई नहीं ॥ भारी है यश जिसका २ यह श्रुतिहै ॥ शरभः ॥ शरनाम शरीर सब शरीरों में आत्मारूप होके भासे ॥ १॥ भीमः ॥ जिससे सब डरें १ भक्तोंको अभय देनेसे अभीषः ॥२॥ समयज्ञः ॥ मृष्टि स्पिति प्रलयको सबंजान १ सरभूतों संमष्टि होना यही पूजा है जिसकी जिसका आराधन' । .
भापाटीकासमेत । (२२५)
समभाव है ॥३॥ हविहरिः ॥ यज्ञोंमें आहुति ग्रहणकरनेवाला
१ हविष्यका प्राहक २ गीतामें कहा है-मैं सब यज्ञोंका भोक्ता
और प्रभु हूँ स्मरणसे पुरुषोंकी अविद्या दूरकरनेवाला ॥ श्याम
अर्थात् हरितवर्ण ॥ व्यासका वचन ॥ हराम्यघं च स्मर्तृणां
हविर्भागं ऋतुष्वहम् ॥ वर्णश्चमेहरिश्रेष्ठस्तस्मादरिरहं स्मृतः ॥३॥
सर्वलक्षणलक्षण्यः ॥ सर्वतरहके प्रमाणोंसे जो जाना जाय १ साधु
सर्वलक्षलक्षण्य होते हैं परमार्थरूप होनेसे २ ॥३६०॥ नाम ॥
लक्ष्मीवान् ॥ जिसके हृदयमें नित्य लक्ष्मी वसै ॥ १॥ संमि-
सिंजयः ॥ समिति नाम लड़ाईको जीतनेवाला १ जिसकी
जय शुद्ध है २ ॥५२॥
विक्षरो रोहितो मार्गों हेतुर्दामोदरः सहः ॥
महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ॥ ५३॥
विक्षरः ॥ दूर हुवा है नाश जिसका १॥ रोहितः ॥ रोहितनाम
रोहूमछलीका रूप १ वराहरूप २ ॥ मार्गः ॥ परमानंदका
रस्ता १ मुक्तिका मार्ग २ ॥ हेतुः॥जगतका हेतु उपादानकारण,
निमित्त कारण होनेसे १ ॥ दामोदरः ॥ दमादिकसाधनोंसे
प्राप्त होनेवाला १ यशोदाजीने जिसके पेटमें रस्सी. लगाकर
बाँधा २ ॥ सहः ॥ सब जीवोंका तिरस्कार क्षमा करै १
(सहनकरै)॥ महीधरः ॥ पर्वतरूपं होकर पृथ्वीको धारै १
वराहरूपहोकर पृथ्वीको उठावै २ ॥ महाभागः ॥ अपनी
इच्छासे बड़े शरीर १ अतिश्रेष्ठ शरीर २ भाग्यजन्यके भोंगोंको
भोगनेवाला ३अवतारों में बड भोगोंका लेनेवाला ४॥३७० नाम।
वेगवान् ॥ जल्दी दौडनेवाला वेदूनचले १ मनसे भी अधिक है
वेग जिसका २ ॥ अमिताशनः प्रलय कालमें बे प्रमाण
भोजन करने वाला ॥५३॥
(२२६) विष्णुसहस्रनाम । उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः॥ करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः॥ ५४॥ उद्भवः ॥ संसारकी उत्पत्तिका उपादानकारण १ उद्गत नाम पृथक है भवं नाम संसारसे २॥ क्षोभणः ॥ प्रकृति और पुरुषमें प्रवेश करके क्षोभकरै १॥ विष्णुपुराणका वचन है प्रकृति और पुरुषमें आत्मा प्रवेशकरके क्षोभ करता है और आप सदा अविनाशी रहता है ॥ देवः ॥ सर्गादि नाम उत्पत्ति पालन संहारसे पीडा करै १ प्रकाश करे २ असुरोंको जीतै ३ सब भूतोंको धारै ४ आत्मा करके प्रकाश करै ५ स्तुतिके योग्य ६.सब देशकाल सब वस्तुमें व्याप्त ७॥ श्रुतिमें कहा है कि एक देव हैसब भूतोंमें छिपा हुवा सर्व व्यापी है सबका साक्षी है ॥ श्रीगर्भः ।। जगवरूप श्री है जिसके गर्भ में १॥ परमेश्वरः॥ सबसे पर और प्रेरणा करनेवाले १॥ करणम् ॥ जगतकी उत्पत्तिका साधकतम ॥ कारणम् ॥ निमित्तकारण उपादानकारण ॥ कर्ता ॥ स्वतंत्र १॥ विकर्ता ॥३८० नाम ॥ विचित्र लोकोंका करनेवाला १ गहनः ॥ जिसके स्वरूप और सामर्थ्य और चेष्टाको कोई भी न जाने १॥ गुहः॥ अपनी माया करो आपही छिप जाय १॥५॥ व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः ।। परढिः परमः स्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ॥ ५५॥ व्यवसायः ॥ सचित्मात्र ॥ व्यवस्थानः ॥ सब जगत्का स्थान १ सबलोकपालोंसे लेकर अधिकार पूर्वक अण्डज पिंडज स्वेदज उद्भिज चारों वर्णाश्रमके विभाग करनेवाले२॥ संस्थानः॥ प्रलयकालमें जहाँ सब भूत स्थान करै १ प्रलयरूपी स्थान है जिसका २॥ स्थानदः॥ ध्रुव प्रहादादिभक्तोंको यथायोग्यस्थानके - 1 भाषाटीकासमेत। (२२७) दाता ॥ध्रुवः॥ अविनाशी ॥परदिः॥ ॥सबसे श्रेष्ठविभूतिवाले? ॥ परम स्पष्टः॥ परमनाम शांति ज्ञानरूप स्वतंत्रहोनेसे स्पष्ट सब सिद्धि जिसके अधीन हैं २॥ ३९० नाम।।तुष्टः। परमानंदरूप पृष्टः ॥ सदा सब जगह एकरूप ॥ शुभेक्षणः ॥ शुभकारी है दृष्टि जिसकी ३ मुसुक्षुजनोंको मोक्ष कामेप्सुजनोंको काम पापी लोगोंको दंडदेनेवाला २ खर्व संदेहजन्य हृदयकी ग्रंथि और अविद्या जिसकी दृष्टिसे दूर होय है जिसकी दृष्टिसे कर्मका नाश होय ४॥ श्रुति कहती है कि, हृदयकी गांठ जिसकी दृष्टि खोलती है ॥५५॥ रामो विरामो विरजो भागों नेयो नयोऽनयः॥ वीर शक्तिमतां श्रेष्ठो धौ धर्मविदुत्तमः ॥ ५६ ॥ रामः ॥ जिसमें योगी लोग रमणकरें १ योगियोंके हृदयमें रमणकरै २ आत्मामें रमणकर ३ अपनी इच्छासे :रमणीय सुंदर शरीर धारनेवाला ४ रघुकुलमें अवतारलेनेवाला ५॥ विरामः। जगत्का विश्राम नाम आधार वा अवसान है जिसमें १ जगत् जिसमें अंतकालमें प्रवेश करै २॥ विरजः ॥ रजोगुणसे निवृत्त १ जिसका वीर्य नाम पराक्रम आकाशसे भी परे है२॥ मार्ग ॥ जिसे जानके मुमुक्षु असर होते है उसी राहको मार्ग कहते हैं श्रुतिमें कहा है कि सुमुक्षुका यही ज्ञानमार्ग है। नेयः ।। प्राप्त होनेवालेको नेय कहते हैं, पहुँचावनेवालेको नेता कहते हैं, मार्ग कहते हैं,नेय कहते हैं, सुखसे उत्तम मार्गनामब्रह्मज्ञानसे जीवों- को परमात्मास्वरूपकी प्राप्ति करै ॥ अनयः ॥ जिसका कोई प्रेरक नहीं॥४०० नाम ॥ वीरः ॥ पराक्रमवाला ॥ शक्तिमतां- श्रेष्ठः ॥ ब्रह्मादिक शक्तिमानोंसे श्रेष्ठ ॥ धर्मः ॥ जिसका सबभूत धारण करे सो धर्म यह बडा सूक्ष्य धर्म है १ धर्मकरके (२२८) विष्णुसहस्रनाम। जिसका आराधन होय २ ॥ धर्मविदुत्तमः ॥ धर्मजाननेवालों में उत्तम श्रुति स्मृति जिसकी आज्ञा है धर्मके जाननेवाले अवतारा- दिकसे भी उत्तम ॥ ४०० नाम ॥५६॥ वैकुंठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥५७ ॥ वैकुंठः॥॥ नानाप्रकारकी गतिका दाता विविध नाम नाना प्रकारकी कुंठः नाम गति विकुंठा नाम नगरीके कर्ता पंचभूतका जगत्के आरंभमें इकट्ठा करनेवाला १॥ पुरुषः॥ सब शरीरों में सोनेवाला १ सब पापोंका सादननाम नाशकरनेवाला २ ॥ प्राणः॥ जीवरूप होकर रक्षाकरै १ प्राणरूप होकर चेष्टा करावे २ संसाररूपहोकर चेष्टा करावै ३ विष्णुपुराणमें वचन है । प्राणदः ॥ प्रलयमें प्राणोंको खंडन करनेवाला १ सृष्टिके आदिमें प्राण देने वाला २॥ प्रणवः पवित्रकरनेवाला इसी कारण श्रुति अकार उकार मकारको प्रणव कहती है जिसको नमस्कार करै यह सनत्कुमारका वचन है २॥ पृथुः ॥ प्रपंचरूप होकर विस्तार करै॥४१० नाम॥ हिरण्यगर्भः॥सृष्टिका कारण १ हिरण्यरूप ब्रह्मांडका बीज गर्भमें है जिसके २॥ शत्रुघ्नः ॥ देवतोंके शत्रुनके मारनेवाले १ ॥ व्याप्तः ॥ सबका कारण सबमें व्याप्त ॥ वायुः॥ सबमें सुगंधरूप १ गीतामें वचन है कि, पृथ्वीमें सुगंध में हूँ २ ॥ अधोक्षजः ॥ किसीसे नीचे छीन न हो १ स्वर्ग और पृथ्वी जिसके नीचे है ॥१७॥ ऋतुः सुदशनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः । उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ ५८॥ ऋतुः ॥ कालात्मा ऋतुशब्द है ॥ सुदर्शनः ॥ सुनाम मोक्ष निनाम ज्ञान है जिसका १ शोभावान कमलपत्रसे नेत्रवाले २ - भाषाटीकासमेत । (२२९) अपनी इच्छासे सुन्दररूप धारने वाले ३ अक्तोंको जिसका दर्शन सुख देव ४॥ कालः ॥ कालहोकर सबको खाय १ लोकके क्षयकरनेको में काल हूँ २ गीतामें कहा है ॥ परमेष्ठी ॥ परनाम उत्तम है महिमा जिसकी १ हृदयरूपी आकाशमें है स्थिति जिसकी २॥ परिग्रहः॥१२० नाम ॥ जो शरण आवै उसको सब ओरसे ग्रहण करे । सर्वगत २ सर्वज्ञ ३ ॥ उग्रः ॥ सूर्यादिकको भयदाता १ जिसके भयसे पवन पवित्र करता है और सूर्य तपता है यह श्रुति कहती है ॥ संवत्सरः ॥ भूत जिसमें सुखसे वसे ।। दक्षः॥ जगद्रूप होकर वर्द्धमान होय १ सर्वभूतको तत्क्षण उत्पन्न करै २॥ विश्रामः ॥ संसारसागरसे व्यासादिकको पर्मि अविद्यासे और पंचक्लेश और मदमात्सर्यादि पंचटपकेशसे सब मुमुक्षुजनोंको छुटादेनेवाले ॥ विश्वदक्षिणः ॥ सब संसारसे सामर्थी विश्वके रचनेमें दक्ष नाम चतुर ॥ ५८॥ विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् ॥ अर्थोऽनर्थों महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥५९॥ विस्तारः ॥॥ जिसमें जगत्का विस्तार है ॥ स्थावर- स्थाणुः ॥ स्वभाविक स्थिति है जिसकी १ पृथ्वी आदिक स्थित है जिसमें २ स्थावरस्थाणु एकनाम है ॥ प्रमाणम् ॥ ज्ञानात्मा द्वारा सबका प्रमाण रूप १ प्रत्यक्षादिक प्रमाणोंसे प्रमाण है जिसका २॥ बीजम् ॥ अन्यथा भाव विना सबका कारण १॥ अव्ययम् ॥ नाशरहित॥बीजमव्ययम् । एकनाम है। अर्थः॥ सुखरूप जिसकी प्रार्थना करै १॥४३० नाम॥ अनर्थः॥ पुनरकाम जिसको कुछ अर्थ नाम काम नहीं ॥ महाकोशः ॥ अन्नमयकोशादिक जिसके बडेबडे भंडार हैं १ ॥ महाभोगः ।। है (२३०) विष्णुसहस्रनाम। सुखरूप भोग है जिसके ॥ महाधनः ॥ भोगोंका साधन- लक्षणरूप महाधन है जिसके । ८९॥ अनिविण्णः स्थविष्ठोऽभूधर्मयूपो महामखः । नाननेमिनक्षत्री क्षमः शालः समीहनः ॥६० ॥ अनिविण्णः ॥ सब काम प्राप्त होनेसे अशोच ।। स्थविष्ठः ।। विराटरूप होनेसे स्थित ॥ अनि जिसका शिर है सूर्य चांद जिसकी आखें हैं पूर्णकामनाहोनेसे जिसको कुछ पीडा नहीं है २ ॥ अभूः ॥ ॥ जन्मादिकसे रहित १ सत्तारूप २ पृथ्वीरूप ३॥धर्मयूपः॥ यज्ञस्तम्भरूप १ पझकी तरह जो आरा- धनरूपी धर्ममें बँधा है २ ॥ महासखः ॥ यज्ञादिक जिसका अपणकरनेसे निर्वाणमोक्षफल: मिले इसी कारणसे यज्ञका फलं महान हो जाता है १॥ नक्षत्र नेमिः ॥ नेमि नाम चक्र सूर्यादि नवग्रह और तारोंकोशिशुसारचक्रके हृदयमें वायुचक्रमें चक्ररूप होकर फिरावै ॥ ४४० नाम ॥ नक्षत्री ॥ चन्द्ररूप नक्षत्रों में चांदरूप मैं हूँ यह गीतामें कहा है १ ॥ क्षमः ॥ सब कामोंमें समर्थ १ क्षमा जिसका स्वभाव है २ पृथ्वीकी तरह क्षमा है जिसको ३॥ क्षामः ॥ सब विकारोंके नाश हो जाने पर आत्मारूप होकर जो रहै १ ॥ समीहनः ॥ सृष्टि करनेमें भली प्रकार चेष्टाकरनेवाला ॥ ६०॥ यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः ॥ सर्वदशी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥६१ ॥ यज्ञः ॥ सर्वयज्ञस्वरूप सब देवतोंके तृप्तिकारण यज्ञस्वरूप १ यज्ञ विष्णु है यह श्रुति कहती है। इन्यः ॥ सबके इष्टदेव १ कलके दाता इज्य नाम पूज्य जो देवता और पितरोंका पवित्र भाषाटीकासमेत । (२३१) यज्ञ करते हैं सो आत्माका पूजन करते हैं । यह हरिवंश पुराणमें कहा है। महेज्यः ॥ सब पूज्योंमें पूज्यतम मोक्षफल देनेसे १ ॥ क्रतुः॥ स्तंभसहित यज्ञका नाम ऋतु है १ ॥ सत्रम् ॥ आसनादि उपाय जिस यज्ञके लक्षण हैं १ सत्पुरुषोंके रक्षक २ ॥ सतां गतिः ॥ सुमुक्षुजनोंको नानाप्रकारकी गति १ ॥ ४५० नाम ॥ सर्वदर्शी ॥ ॥ सबका पाप पुण्य देखने वाला ॥ विमुक्तात्मा ॥ स्वभावहीसे मुक्तनाम छुटा है आत्मा जिसका ॥ सर्वज्ञः॥ वही सर्व है वही ज्ञानयोग्य है यह जगत् जो दिखाई देता है सो आत्मा है यह श्रुति कहती है ॥ ज्ञानमुत्तमम् ॥ एक नाम है । ज्ञानरूप श्रेष्ठ १ जन्मरहित अनवच्छिन्न नाम आदि अन्त रहित सर्वका साधक परमात्मा ब्रह्म सब है सत्य है आनंद है ज्ञान है यह श्रुति कहती है ॥ ६ ॥ सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् ॥ मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ॥ ६२॥ सुव्रतः ॥ उत्तम शोभित है व्रत जिसका सब भूतोंको अभय देता हूँ यह मेरा व्रत है यह रामायणमें रामजीका वचन है व्रतनाम नियम ॥ सुमुखः ॥ सुंदरसुखवाले १ आनंदरूप मनोहर मुख कमलसे नेत्र विष्णुपुराणमें लिखा है २ वनयात्राके समय श्रीरामचंद्रका मुख परमे सुहावनाभया पिताका वचन राज्यसे भी प्यारा माना, यह रामायणमें लिखा है ३ ब्रह्मको सर्व विद्याके उपदेश करनेसे सुंदरमुख ४॥ जिसने ब्रह्माको उत्पन्न करके वेद दिया सब वेदोंको प्रकाश किया यह श्रुतिने कहा है ॥ सूक्ष्मः॥ इंद्रियोंका विषय नहीं १ शब्दादि जो विषयके कारण पंचभूत हैं उनसे रहित नाम जुदा २ बारीकसे बारीक ३ सर्वगत नाम सबमें व्यापक यह श्रुति है ॥ सुघोषः ॥ सुहावना है शब्द
(२३२) विष्णु सहस्रनाम ।
जिसका १ श्रुतिरूप मेघकी तरह गभीर वचन २॥ सुखदः॥ भले
जनोंको सुखदाता १ दुर्जनोंका सुख दूरकरनेवाला २ ॥
सुहृत् ॥ वेदून सेवा और बदला चाहनेका उपकार करनेवाला
॥ ४६० नाम।। मनोहरः ॥ परमानंदरूपसे मनहरनेवाला जो भूमा
नाम व्यापक है सोई सुख है १ यह श्रुति कहती है।
जितक्रोधः ॥ क्रोधका जीतनेवाला १ वेदमार्ग था २ विना
क्रोध असुरोंको मारै ३॥ ॥ वीबाहुः ॥ देवतोंके वैरियोंको
मारे १ वेदकी मर्यादा स्थापन करै २ बड़ी पराक्रमी बाहुवाले
३ ॥ विदारणः ॥ अधर्मियोंको नाश करै ॥ ६२ ॥
स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत् ॥
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥ ६३ ॥
स्वापनः ॥ अज्ञानी जनोंको मायामें सुलावै नाम आत्मबोधसे
रहित करै १॥ स्ववशः ॥ सृष्टिकी उत्पत्ति स्थिति और लय
जिसके वशमें है १॥ व्यापी ॥ आकाशकी तरह व्यापक सब
कार्यों में कारणरूप होकर १ ॥ नैकात्मा ॥ अनेकात्मा होकर
जगतरूप १ जगत्की उत्पत्ति स्थिति प्रलयके वास्ते अनेकरूपसे
विराजमान २॥ नैककर्मकृत् ॥ जगत्की उत्पत्तिसे आदि लेकर
अनेक कर्म करै १ ॥ वत्सरः ॥ सब जगत् जिसमें वसे ॥
वत्सलः ॥४७० नाम ॥ जगत्पर दयालु, भक्त जिसको प्यारे हैं२॥
वत्सी ॥ वत्सोंका पालक नाम जगत्का पिता उसके
सब बेटे हैं १ ॥ रत्नगर्भः ॥ रत्न है गर्भमें जिसके ऐसा समुद्र
जिसके गर्भ में है ॥ धनेश्वरः॥ धनोंका मालिक १ यक्षोंमें कुबेर
मैं हूँ यह गीतामें कहा है ॥ ६३ ॥
भाषाटीकामेसत । (२३३) धर्मगुब्धर्मकृद्धी सदसत्क्षरमक्षरम् ॥ अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाताकृतलक्षणः॥ ६४ ॥ धर्मगुप् ॥ धर्मोंके रक्षक धर्म की रक्षाके हेतु युगयुगमें अवतार लेताहूँ यह गीताके ४ अध्यायमें कहा है ॥ धर्मकृत् ॥धर्म करने वाला वेदमर्यादाके स्थापनके वास्ते धर्मकरनेवाला १ धर्म अधर्मसे रहित भी है परन्तु धर्म मर्यादा स्थापन करे है २ ॥ धर्मी ॥ धर्मोंका धारण करनेवाला १ ॥ सदसत् ॥ सत्तामात्र सतरूप जगत्से सतरूप पहिले यह सत्पदका अर्थ है असत् जगतरूप होकर असत् नाम रूपविकार असत् है १ यह श्रुति है। क्षरः सब भूतरूप जगत होकर क्षरनाम नाशवान् है १॥४८० नाम ॥ अक्षरः॥ कूटस्थ गीतामें लिखा है कूटस्थ अचलरूप जगत् ध्रुव है ॥ अविज्ञाता ॥ आत्माको कर्ता माननेसे दुर्बल शक्ति होगई है जिसकी ऐसा जो है जीव उसको विज्ञाता कहते हैं उसका प्रतिद्वंद्व अविज्ञाता नाम सर्वज्ञ ॥ सहस्रांशुः ॥ जिसके किरण सूर्यादिक ज्योतिवालोंमें चमक रही है सूर्य उसीके तेजसे प्रकाश करता है १ यह श्रुति कहती है ॥ जो तेज सूर्य चंद्र अग्निमें है वह मेरा ही तेज है यह गीतामें कहा है ॥ विधाता ॥ सब भूतोंका धारनेवाला १शेष दिग्गजादि जो जगतके आधार हैं उनका भी धारनेवाला २ ॥ कृतलक्षणः॥ सदा चैतन्यरूप शास्त्रादिकके कर्ता २ सजातीय विजातीयके विच्छेद लक्षणका कर्ता ३ श्रीवत्सरूप लक्ष्मी है लक्षण जिसका नाम ४ ॥ ६४ ॥ गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः ॥ आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृगुरुः ॥६५॥ -गभस्तिनेमिः ॥ गभस्तिनाम सूय मंडलकी किरण उसमें
(२३४) विष्णुसहस्रनाम।
सूर्यरूप होकर वसै ३॥ सत्त्वस्थः ॥ प्रकाश सतोडणमें
प्रधान होकर वसै ३ सत्त्व अंतः करण सबजीवके अंतःकरणमें
स्थित २॥ सिंहः॥सिंहकी तरह बलवान् नृपदके लोप होनेसे
दृसिंहका नाम सिंह है ॥ भूतमहेश्वरः ॥ सब भूतोंका बड़ा
ईश्वर १ भूतनाम जीव उनमें बड़ा२ ॥ आदिदेवः ॥ सब
भूतोंका आदिकर्ता ।। ४९० नाम ॥ महादेवः ॥ महादेवजीके
सिवाय सब देवतोंको अपने आत्मज्ञानसे योगरूपी ऐश्वर्यमें लय
करै १ सबभावोंको आत्मज्ञान योग ऐश्वर्यमें जो पूज्य होय सो
महादेव यह श्रुति कहती है ॥ देवेशः ॥ सब देवतोंका
ईश नाम मालिक १ ॥ देवमुद्रुः॥ देवतोंके सरदार इंद्र
उनके शुरु १ देवतोंका और सबविद्याका पालंक सब विद्याका
धारण करनेवाला ॥६५॥
उत्तरो.गोपतिर्गोता ज्ञानगम्यः पुरातनः ॥
शरीरभूतभृद्धोक्ता कपींद्रो भूरिदक्षिणः ॥६६॥
उत्तरः। संसारसागरसे तारनेवाला १ सबसे श्रेष्ठ सबसे उत्तम
इंद्र है यह श्रुति है ॥ गोपतिः ॥ गोपनाम अहीर बनकर
गौवोंको पालै गोनाम पृथ्वी उसका पति नाम पालक२॥ गोप्ता ॥
जगत्का पालक ॥ ज्ञानगम्यः ॥ केवल ज्ञानसे ही मिलने
योग्य कर्महीसे नहीं ॥ पुरातनः ॥ जो सदा रहै पुराना १
सबसे पहिले जो होय २ ॥ शरीरभूतभृत् ॥ शरीरके कारण
प्राणरूप होकर पंचभूतका धारण करनेवाला भोक्ता ॥. पालनेवा-
ला अनंतरूपसे जगत्का भोग करनेवाला २॥ ६०० नाम ।
॥कपीद्रः॥कपिनाम वराह कपिनाम बंदरोकेइंद्र रामचन्द्ररूप॥
भूरिदक्षिणः ॥ भारनाम बहुत यज्ञरूप धम और मर्यादारूपी
यज्ञ बहुत दक्षिणावाले करै १॥६६॥
भाषाटीकासमेत। (२३५) सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः ॥ विनयोजयः सत्यसंधो दाशार्हः साखता पतिः६७॥ सोमपः॥ सोमलताके पीनेवाले यज्ञमें देवतारूप १ धर्मकी मर्यादा दिखातेहुये यजमानरूप होकर सोमलता पीनेवाले २॥ अमृतपः॥ आत्मारूपी अमृतका पीनेवाला १ समुद्रसे निकला हुआ अमृत असुरोंसे छीनके देवतोंको पिलावे और आप पिये २॥ सोमः॥ चन्द्रमा होके औषधोंको पुष्ट करनेवाला मैं चन्द्रमारूप होके औषधोंको पुष्टकरता हूँयह गीता में कहा है उमा नाम पार्वतीके साथ रहनेवाला शिव २ ॥ पुरुजित् ॥ पुरु नाम बहुतको जीतनेवाला १ ॥ पुरुसत्तमः ॥ विश्वरूपको पुरु कहते हैं सत्तम नाम श्रेष्ठ १॥ विनयः ॥ विनय नाम दण्ड दैत्य और दुष्ट प्रजाको जो दण्ड दे१॥जयः ॥ सब भूतोंको जय कर ॥ सत्यसंधः ॥ संध नाम संकल्प जिसका सत्य है सत्यसंकल्प है यह श्रुति कहती है ॥५१० नाम ॥ दाशार्हः॥ दाश नाम दान उसके योग्य १ यदुकुलमें जन्में २॥ सात्वतां- पतिः ॥ तंत्रको निर्माणकरै १ सात्त्वतनाम यादवोंके अंशसे उत्पन्न २ सतोगुणी पुरुषोंका पति ३॥ ६७ ॥ जीवो विनयितासाक्षी मुकुंदोऽमितविक्रमः ॥ अभोनिधिरनंतात्मा महोदधिशयोन्तकः ॥६८॥ जीवः॥ क्षेत्रज्ञरूप होकर प्राणोंको धारणेवाला ॥ विनयिता- साक्षी ॥. धर्म युक्त जीवोंको साक्षात्जानै १ आत्मासे जुदा कोई पदार्थ जो न देखें २ ॥ मुकुंदः ॥ मुक्तिका दाता ॥ अमितविक्रमः ॥ अनंतपराक्रमवाला १ तीन पैरसे तीन लोकनापै २ बड़ी शूरता है जिसकी ॥ ३ अभोनिधिः ॥ भंभ
(२३६) विष्णुसहस्रनाम।
नाम देवतादिक जिसमें लय होते हैं १ देव पितृ मनुष्य असुर
इन चागेका नाम अंभस यह श्रुति है २ अंभोनिधि नाम समुद्र
तालाबोंमें समुद्र में हूँ॥ यह गीतामें कहा है ॥ अनंतात्मा ॥
जिसको किसी देश किसी काल किसी वस्तुमें नियम न कर स-
के १॥ महोदधिशयः॥ प्रलय करके सब भूतों समेत तमुद्र में
शयन करै १॥ अंतकः ॥॥ भूतोंको अन्त करै १॥ ९२०
नाम ।। ६८॥
अजो महाहः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः॥
आनंदो नंदन नंदः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ॥६॥
अजः॥ जिसका जन्म नहीं १ अजनास कामका है । महाईः
बडी पूजाके योग्य ॥ स्वाभाव्यः ॥ स्वभाव करके सदा
सिद्विरूप १॥ जितामित्रः ॥ रावणादिक बाहरके शत्रु और
काम क्रोधादिक भीतरके शत्रुको जीतनेवाले ॥ प्रमोदनः ॥
ज्ञानियोंको आत्माका स्वाद अमृतरूप नित्य देनेवाला :
और कथनकरनेसे हर्ष देनेवाला २॥ आनंदः॥ आनंदस्वरूप
१ जिस आनंदका लेश सर्व भूतोंमें है यह श्रुति है ॥ नन्दनः ॥
आनंददायक १ ॥ नन्दः॥ सबसे बड़ा ऐर्यवान् विषयसुखसे
रहित आनंदस्वरूप २॥ सत्यधर्मा ॥ सत्य और धर्म और
ज्ञानवाला १ सच्चा है धर्म जिसका आचार दया अहिंसा दान
स्वाध्याय यह परम धर्म है इनके संयोगसे आत्माका दर्शन
२॥ त्रिविक्रमः ॥ तीन लोक उल्लंघनकरनेवाला १
तीन लोकके नाप लेनेसे वामनजीको त्रिविक्रम हरिवंश पुराणमें
कहा है तीनपद रखता हुआ यह श्रुति है उत्पत्ति पालन संहार
तीन पराक्रमवाला ॥९३० नाम ॥ ६९ ॥
भाषाटीकासमेत। महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।। त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृंगः कृतान्तकृत् ॥७०॥ महर्षिः कपिलाचार्यः ॥ यह विशेषण सहित एक नाम है महान् हो वही ऋषिहो सब वेदोंके जाननेसे वेदका एकदेश जाने सो ऋषि कपिल नाम शुद्धात्म तत्त्वका उपदेश करनेवाला आचार्य सो कपिलाचार्य ऋषिका पुत्र जो कपिल है वह महान है यह श्रुति है । सिद्धोंमें कपिल मुनि मैं हूँ यह गीतामें कहा है ।। कृतज्ञः ॥ कृत नाम जगत् ज्ञ आत्मा आप ही जगत है आप ही आत्मा है १॥ मेदिनीपतिः ॥ पृथ्वीका. पति ॥ विपदः । तीन पाद है जिसके तीन पैर धरता हुआ यह श्रुति है १॥ त्रिशाद।। ध्यक्षः॥ जायत्स्वप्नसुषुप्ति तीनों अवस्थाका साक्षी १॥ महाशृंगः मत्स्यरूप महाशृंग प्रलयकालमें नाव बना कर अपनी शृंगमें बांधके क्रीडा करै ॥ कृतांतकृत् कृत नाम जगत्का अन्तनाम संहारकरनेवाला १ कृतांत नाम मृत्युको काटनेवाला २॥७॥ महावराहो गोविंदः सुषेण कनकांगदी। गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ॥ ७१ ॥ महावराहः ॥ वराहावतार १ ॥ गोविंदः गो नाम वेदवाक्यसे जो प्राप्त होय वाणी वा वेदांतवाक्यसे जो जाना जाय सो गोविंद २ यह विष्णुपुराणमें कहा है ॥ सुषेणः ॥ सुन्दर है त्रिगुणरूप सेना जिसकी ॥५४० नाम ॥ कनकांगदी ॥ सोनेका है अंगद नाम भुजबंद जिसका १॥ गुह्यः ॥ रहस्य और उप- निषदोंसे जो जाना जाय १ हृदयरूपी गुफामें प्राप्त २॥ गंभीरः ॥ ज्ञान ऐश्वर्य बलमें गम्भीर १॥ गहनः ॥ शरीरोंमें प्रवेश होनेवाले से जिसमें प्रवेशकरना दुर्घट है २ जायत्स्वान: सुषुप्ति तीनों अवस्थाके भाव अभावका साक्षी ३॥ गुप्तः ॥
१ (२३८) विष्णुसहस्रनाम। मन वाणी जहां न पहुँचै सबमें छिपा हुआ १ सब भूतोंमें एक आत्मा छिपा है प्रकाश नहीं करता यह श्रुति है ।। चक्रगदाधरः॥ चक्र और गदाके धारण करनेवाले १॥ ७१ ॥ वेषाः स्वांगो जितः कृष्णो दृढः संकर्षणोऽच्युतः॥ वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥ ७२ ॥ ॥ वेधाः ॥ ब्रह्मारूप होकर जगतको रचनेवाला १ ॥ स्वांगः ॥आपही कार्य और कारण अपने असे रचनेवाला ॥ अजितः ॥ अवतारधारके किसीसे जीता न जाय १ ॥ कृष्णः ॥ द्वैपायननामव्यासको कृष्ण जानो १ नारायण जानो कृष्णके सिवाय और किसकी सामर्थ्य महाभारत बनानेकी है २ यह विष्णुपुराणमें कहा है सब मुनियोंमें व्यास मैं हूँ यह गीतामें कहा है ॥ ६५० नाम ॥ दृढः॥ जिसके स्वरूप और सामर्थ्य का नाश नहीं है ।। सकर्षणोऽच्युतः ॥ प्रलयकालमें एकही बेर सब प्रजाको खींचनेवाला नाश रहित स्वभावसे विशेषण सहित एक नाम है १ ॥ वरुणः ॥ वरुण नाम सूर्य वा जल इनको प्राप्त होय १ वरुण सूर्य है यह श्रुति है ॥ वारुणः ॥ वरुणकी संजान वसिष्ठ वा अगस्त्य १ ॥ वृक्षः ॥ वृक्षकासा अचल स्वभाव है जिसका वृक्षकी तरह अचल है यह श्रुति है ।। पुष्कराक्षः ॥ हृदयकमलमें चिंतन होय. जिसका १ स्वरूप जिसका प्रकाशवान है २ ॥ महामनाः ॥ उत्पत्ति स्थिति प्रलय अपने मनसे करनेवाला ॥७२॥ भगवान भगहानंदी वनमाली हलायुधः॥ आदित्यो ज्योतिरादित्य सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥७३॥ भावान् ॥ ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, वैराग्य, मोक्ष इन छ: पदार्थों का नाम भग है जिसमें भग रहै सो भगवान् १ जिसको -- भाषाटीकासमेत (२३९) इन छः पदार्थोंका यथार्थ ज्ञान होय २ भूतोंकी उत्पत्ति लय गति अगति विद्या अविद्या इन छः वस्तुका जाननेवाला ३॥ भगहा ॥ प्रलयकालमें ऐश्वर्यादि भगका नाशक १ ॥ आनंदी ॥ सुखरूप सर्व संपत्तियुक्त ३ ॥ ५६० ,नाम ॥ वनमाली ॥ पंचभूततन्मात्रारूपी वैजयंती नाम वनमाला है जिसकी १ तुलसी कुंद मंदार पारिजात कमल इन पांच फूलोंसे बनै सो वनमाला पांवतक लटकती हुई माला वनमाला जिसकी २॥ हलायुधः ॥ हल जिसका शस्त्र है बलदेवमूर्ति : जरासंधकी लड़ाईके समय हल सूशल आकाशसे उतरा यह विष्णुपुराणमें लिखा है ॥ आदित्यः ॥ अदितिमें कश्यपसे उत्पन्न वामनरूप १॥ ज्योतिरादित्यः ॥ सूर्यमंडल जिसमें ज्योति रहती है आपही ज्योति आपही आदित्य २ ॥ सहिष्णुः ।। शीतोष्ण और दुःख सुखको सहनेवाला १ ॥ गतिसत्तमः॥ आपही गतिरूप आपही सत्तम श्रेष्ठ ॥७३॥ सुधन्वा खंडपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः ।। दिविस्पृक्सर्वग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ॥७॥ सुधन्वा ॥ सुंदर इंद्रियरूपी धनुष है जिसका १ ॥ खंड- परशुः ॥ शत्रुओंका खंडन करनेवाला परशाधारे परशुराम- रूप १ अथवा शिवरूप २ अखण्ड है नाम अमोघ है परशा जिसका ३॥ दारुणः ॥ सन्मार्गके विरोधियोंको मारने- वाला १.॥इविणप्रदः॥ भक्तोंको वांछित फलका देनेवाला ॥ ६७० नाम ॥ दिविस्पृक् ॥ दिवनाम स्वर्गका स्पर्श करनेवाला ॥ सर्वव्यासः॥ सर्वदृष्टिवाले जो सर्वज्ञ उसका विस्तार करनेवाल व्यास १ आफ्ही सर्व और आपही द्रष्टा २ जिसने चारों वेदकी १ (२४०) विष्णुसहस्रनाम। शाखा करदी ऋग्वेदकी २१ यजुर्वेदकी १०१ सामवेदकी १०००. अथर्वण वेदकी ९ और १८. पुराणोंका कर्ता ॥ वाचस्पतिरयोनिजः ॥ वाचनाम विद्याकापति. ॥ अयोनिजः ॥ माताकी योनिसे.जिसका जन्म नहीं यह नाम ब्रह्माका है ।। ७४ ॥ त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् ॥ संन्यासकृच्छम शांतो निष्ठा शांतिः परायणः॥७॥ त्रिसामा ॥ त्रिसामनाम वेदव्रतका है तीनों वेदके व्रतसे जिसकी स्तुति होय १ ॥ सामगः ॥ सामवेदका गानेवाला १ सामवेदने जिसको गाया है २॥ साम ॥ साम वेद १. वेदोंमें सामवेद मैं हूं ॥ यह गीतामें कहा है ॥ निर्वाणम् ।। सर्वदुःखनाशरूप परमानंद लक्षणरूप ॥ भेषजम् ॥ संसारसे छूटनेकी दवा॥ भिषक् संसाररूपी रोगके नाश करनेवाले मोक्षरूप ब्रह्मविद्या उपनिषद् गीता सब रोगके वैद्य होय यह श्रुति है ॥ ॥ संन्यास कृत् ॥ मोक्षके वास्ते चौथा आश्रम करनेवाला १ ॥ ५८० नाम ॥ शमः ॥ संन्यासियोंको ज्ञानका साधन शमरूप १ ज्ञानका साधन शम २ सदा संन्यासीका मुख्य धर्म शमता है ३ वानप्रस्थोंका नियम गृहस्थोंका केवल दान ब्रह्मचारीका गुरुसेवा यह स्मृति है सब भूतोंको शमनकरनेवाला.४॥ शांतः॥ विषयसुखमें संगरहित १ किया और कलंकसे रहित है शांत हैं यह श्रुति है ॥ निष्ठा ॥ प्रलयकालमें रहैं ॥ शांतिः ॥ ब्रह्मविद्या १ समतासे अविद्याका नाश २॥ परायणः ॥ पर अयननाम स्थान जहां जायके फेर नहीं आवे ॥ ७॥ शुभांगः शांतिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः ॥ गोहितो गोपतिर्गोशा वृषभाक्षो वृषप्रियः ॥७६ ॥ सब भूत : जिसमें .
भाषाटीकासमेत। (२४१.) शुभांगः ॥ शोभावान अंग १॥ शांतिदः ॥ रागद्वेष खोनेव ला शांतिके दाता १ ॥ स्रष्टा ॥ सृष्टिके आदिमें सबभूतोंका रचनेवाला १ ॥ कुमुदः॥ कु नाम पृथ्वीमें आनंदपानेवाला १ पृथ्वीको आनंद देनेवाला २ ॥ कुवलेशयः ॥ पृथ्वीको सब दिशासे ढकनेवाला १ कुवल नाम जल उसमें शेषनागपर सोने वाला २ कुवलनाम बेरका फल उसमें तक्षकरूप होके सोनेवाला ३ कु नाम भूमि वल नाम चलन ऐसा जो सर्पका. पेट उसपर सोनेवाला ४ ॥५९० नाम ॥ गोहितः ॥ गंउके बढावनेके वास्ते गोवर्द्धन पर्वतरूप १ गउको प्यार करै २ गोनाम भूमिके भार उतारनेको अपनी इच्छासे अवतार धारनेवाला ॥ गोपतिः ॥ पृथ्वी, गऊ इंद्रियोंके पति नाम पालक १ ॥ गोप्ता ॥ जगतके रक्षक १ अपनी मायासे अपने आत्माको आच्छादन करनेवाला २॥ वृपभाक्षः॥ सब कामना बरसाने वाला १ धर्म रूप पवित्र दृष्टिं है जिसकी २॥ वृषप्रियः॥ धर्म प्यारा है जिसको ॥ ७६॥ अनिवर्ती निवृत्तात्मा संक्षेप्ता क्षेपकृच्छिवः । श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिःश्रीमतांवरः॥ ७७ ॥ अनिवर्ती ॥ देवता और असुरोंके संग्रामसे जो छुट्टी न पावै १ जो धर्म न छोड़े २ ॥ निवृत्तात्मा ॥ स्वाभाविक जिसकी आत्मा नाम मन विषयोंसे निवृत्त है १ ॥संक्षेप्ता ॥ जगत्के विस्तारको प्रलयमें घटानेवाला , क्षेमकृत् । शरण आयेकी रक्षा करै १ ॥ शिवः ॥ स्मरणमात्रले पाप खोनेवाला १॥ ६०० नाम ॥ श्रीवत्सवक्षाः ॥ श्रीवत्सनाम छापा. है छातीपर जिसके १ ॥ श्रीवासः ॥ जिसके हृद- यमें नित्य लक्ष्मी वसे ॥ श्रीपतिः ॥ समुन्द्रमथनके समयमें १६ (२१२) विष्णुसहस्रनाम। -सब देवतोंको छोड़कर लक्ष्मीने जिसको अपना वर किया। परमशक्तिके पति २॥ श्रीमतांवरः॥ तीनोंवेदरूप श्री है जिसकी १ ब्रह्मादिक श्रीमानोंसे उत्तम ॥ ७७॥ श्रीदः श्रीशः श्रीनिवास श्रीनिधिः श्रीविभावनः॥ श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाल्लोकत्रयाश्रयः॥७८ ॥ श्रीदः ॥ भक्तोंको श्री देनेवाले १॥ श्रीशः॥ लक्ष्मीके स्वामी मालिक १॥ श्रीनिवासः ॥ लक्ष्मीवानोंमें नित्य वसे १ ॥ लक्ष्मी जहां रहै २॥ श्रीनिधिः ॥ जिस सर्वशक्तिरूपमें संपूर्ण श्रीस्थापन होय १॥ श्रीविभावनः ॥ कर्मके अनुसार नाना- प्रकारकी श्री सर्वभूतोंको देनेवाला १ ॥ श्रीधरः ॥ सर्वभूतोंको उत्पन्न करनेवाले १ लक्ष्मीको छातीपर धारे २॥ ६१० नाम ॥ श्रीकरः ॥ श्रवण, स्मरण, स्तुति, ध्यान, पूजा करने वालोंको ऐश्वर्य देनेवाले १ ॥ श्रेयः ॥ कल्याणरूप परब्रह्म १ नाशरहित सुखकी प्राप्तिका नाम श्रेय है २॥ श्रीमान् ॥ सदा लक्ष्मीसहित १ ॥ लोकत्रयाश्रयः ॥ तीनों लोकोंका आधारभूत ॥ ७८॥ वक्षः खंगशतानंदो नंदिज्योतिर्गणेश्वरः। विजितात्माऽविधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः॥७९॥ स्वक्षः॥ कमलकोसी सोहनीआँखों वाले १॥स्वंगः॥ अच्छे सुंदर अंगवाले १ ॥ शतानंदः ॥ एक परमानंद जो भेदसे अनेक आनंदरूप हुआ है १ एकी आनन्दके आसरे सबभूत जीते हैं यह श्रुति ह ॥ नदिः ॥ परमानन्दरूप १॥ ज्योतिगणेश्वरः ॥ सब चत्रकनेवाले समूहके ईश्वर १ उसीके प्रकाशलें सब प्रकाश करते हैं यह श्रुति है। सूर्य, चंद्रमा, अग्निमें भाषाटीकासमेत। (२४३) मेराही तेजहै यह गीतामें कहा है । विजितात्मा ॥ मनको जीतने- वाला १॥ ६२० नाम ॥ अविधेयात्मा ॥ जिस आत्माका विधाननाम कथन न हो सके १॥ सत्कीर्तिः ॥ सत्य है सत्कीर्ति जिसकी १॥ छिन्नसंशयः ॥ हस्तामलकवत् साक्षात ज्ञानसे जिसको कोई संदेह न रहै १ ॥ ७९ ॥ उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतः स्थिरम्॥ भूशयो भूषणो भूतिविंशोकः शोकनाशनः॥ ८॥ उदीर्णः ॥ सब जगत्से श्रेष्ठ १ ॥ सर्वतश्चक्षुः ॥ सबको अपना चैतन्यरूप देखै- १ सबदिशामें हैं नेत्र जिसके यह श्रुति है ॥ अनीशः ॥ जिससे कोई बड़ा नहीं १ ॥ शाश्वत स्थिरः॥ सदा होनेपर भी विकार नहीं जिसमें १ ॥दोनों पदोंका एकही नाम है ॥ भूशयः॥ लंकाजानेके समय समुद्रके तटपर भूमिपर सोनेवाला १ ॥ भूपणः ॥ अपनी इच्छासे अवतारादिक धारकर पृथिवीको शोभा देनेवाले १ ॥ भूतिः ॥ होनेवाली शक्तिविभूति सब विभूतिका कर्ता ॥ ६३० नाम ॥ विशोकः ॥शोकरहित परमानंदरूप ॥शोकनाशनः ॥ स्मरणसे भक्तोंके शोक नाश करै ।। ८० ।। अचिष्मानर्चितः कुंभो विशुद्धात्मा विशोधनः ॥ अनिरुद्दो प्रतिस्थः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ॥ ८॥ अर्चिष्मान् ॥ जिसके प्रकाशसे सूर्य चंद्रमा प्रकाश करते हैं १ अर्चिनाम किरणवाले सूर्यरूप चंद्रमारूप २ ॥ अर्चितः ।। सब लोकके पूज्य ब्रह्मादिकदेवतोंके पूज्य २ ॥ कुंभः ॥ घड़ेकेरूप जिसमें सब वस्तु भरी जाय १ ॥ विशुद्धात्मा ॥ तीनोंगुणोंसे रहित १ ॥ विशोधनः ॥ स्मरणले पाप दूर करे ((२४४) विष्णुसहस्रनाम। १॥ अनिरुद्धः ॥ चारमूर्तियों में..अनिरुद्धरूप जो लड़ाईमें किसीसे न रुके २॥ अप्रतिरथः॥ बैरी जिसके नहीं ॥प्रद्युम्नः॥ प्र उत्तम द्युम्न नाम द्रव्य है जिसके १ चारमूर्तिमें प्रद्युम्ररूप २॥ ६४० नाम ॥ अमितविक्रमः ॥ बेप्रमाण बलवाले १ हिंसारहित पराक्रम है जिसकार अपरिच्छिन्न पराक्रमवाला॥८॥ कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः ॥ त्रिलोकात्मा त्रिलोकेश केशवः केशिहाहरिः॥८२॥ कालनेमिनिहा ॥ कालनेमि नाम दैत्यको मारने वाला १ ॥ वीरः ॥ अगले पिछले शत्रुका नाशक १॥ शौरिः ।। शुरकुलमें अवतार लेनेवाला १॥ शूरजनेश्वरः ॥ शूरतामें इंद्रादिक देवतोंसे अधिक ऐश्वर्य वाला १॥ त्रिलोकात्मा ॥ तीनों लोकका अंतर्यामी आत्मा १ तीनों लोकमें अभेदआत्मा- रूप २॥ त्रिलोकेशः ॥ तीनोंलोकका स्वामी १ तीनों लोक जिसकी आज्ञासे अपने अपने मार्गमें चले २॥ केशव ॥ सूर्यादिककी किरण जिसके केश हैं १ ब्रह्मा, विष्णु शक्ति गणेश नाम है जिसके २ क नाम ब्रह्मा ईश नाम शिव दोनों तुम्हारे अंश यह हरिवंशपुराणमें है ॥ केशिहा ॥ केशि दैत्यके मारनेवाले १॥ हरिः॥॥ अज्ञान सहित संसारको हरे१॥६५०नाम ॥८२॥ कामदेवः कामपाल कामी कांतः कृतागमः॥ अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनंतो धनंजयः ॥ ८३ ॥ कामदेवः॥ धर्म, अर्थ, काम, मोक्षके चाहनेवाले जिसकी पूजा कर सो कामदेव १ ॥ कामपालः ॥ कामनावालोंके काम पूरण करें १॥ कामी ॥ पूरणकाम जिसको कामना न रहै 3 सरस्वतीके वारते कामना की यह श्रुति है ॥ कांतः ॥ - :.
भाषाटीकासमेत । (२४९) परमसुंदररूप १ क नाम ब्रह्माका दो पराईनाम १०० वर्षमें अंतकरै १॥ कृतागमः॥ वंद श्रुतिस्मृतिके कर्ता । वेद शास्त्र विज्ञान यह सब जनार्दनसे भये विष्णुसहस्रनाममें कहा है ॥ अनिर्देश्यवपुः ॥ जिसके शरीरको यह है ऐसा न कहाजाय १ सबगुणोंसे रहित शरीर है जिसका २ ॥ विष्णुः ॥ सारे जगत्में व्याप्त जिसकी कांति अधिक करके है॥ १॥ वीरः ॥ कांति नाम वेग अथवा कांतिवाले॥ १॥ अनंतः॥ व्यापक नित्य सबका आत्मा देश काल वस्तुके नियमसे रहित सत्य है ज्ञानरूप है अनंत है यह श्रुति है २ देवता जिसके गुणोंका अंत न पावें यह विष्णुपुराणमें है ३॥ धनंजयः ॥ दिग्विजयकरके धन लेनेवाला अर्जुन १ पांडवमें धनंजय मैं हूँ यह गीतामें कहा है।६६० नाम ॥ ८३॥ ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ॥ ब्रह्मविद्ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥८४ ॥ ब्रह्मण्यः ॥ तप वेद सत्य ज्ञान इन पदार्थों को जाननेवाले १ इन्हीं पदार्थोंसे जानने योग्य और हितकारी नरनारायण रूपसे तप किया २ ब्राह्मणजातिके रक्षाके वास्ते अवतार धार राक्षसोंको मारके वेदकी रक्षा की ३ अर्जुनको ज्ञानदिया ४॥ ब्रह्मकृत् ॥ तप, वेद, सत्य, ज्ञानका कर्ता १ ॥ ब्रह्मा ॥ ब्रह्मारूपसे सब का रचनेवाला १ ॥ब्रह्म ॥ सत्यादिक चार पदार्थके बढ़ने अथवा बड़ावनेसे सत्य है ज्ञानस्वरूप है अनंत है यहश्रुति है ॥ १॥ ब्रह्म विवर्द्धनः॥ तप आदिक चारों पदा- र्थको बढ़ानेवाला १॥ ब्रह्मविद् ॥ वेदके अर्थ और वेदको जो यथार्थनाने ॥ १॥ ब्राह्मणः ॥ ब्रह्मारूपसे सबलोकको वेद देने- वाला १ ॥ ब्रह्मी ॥ जगत् ब्रह्मरूपको धारणेवाला १ ॥
(२४६) विष्णुसहस्रनाम । ब्रह्मज्ञः ॥ ब्रह्मको जाननेवाला १॥ ब्राह्मणप्रियः ॥ ब्राह्मणोंका प्रिय १ जिसको ब्राह्मण प्रिय हैं २ ब्राह्मण मारता हुवा गाली देता हुवा शाप देता हो तो भी पूज्य है जो ब्राह्मणको प्रणाम न करै तो ब्रह्म अग्निसे दग्ध है दहनके योग्य है मेरा नहीं है यह भगवद्वाक्य है ॥ ६७० नाम ॥ ८४ ॥ महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ॥ महाऋतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ॥ ८५ ॥ महाक्रमः ॥बड़े क्रमवाले १ क्रम नाम चरण धरतीरूपी बड़े चरण हैं जिसके २ बड़े क्रमवाले विष्णु मुझे पवित्र करो यह श्रुति है ॥ महाकर्मा ॥ महान् जगत्के रचने और पालने और नाशकरने रूप हैं कर्म जिसके १॥ महातेजाः॥ बड़े तेजवाले १ सूर्यादिक जिसके तेजसे होवें २ जिसके तेजको पाकर सूर्यतप- ता है यह श्रुति है सूर्यमें मेराही तेज है यह गीतामें है अपनी शूरता और वीरतासे सबको लडाईमें तृप्त करै ३ ॥ महोरगः॥ बड़ा सर्प १ सपोंमें वासुकि मैं हूं यह गीतामें है ॥ महाक्रतुः ॥ आपही बड़ा है आपही यज्ञ है जैसे अश्वमेध यज्ञोंकाराजा है सो नारायणरूप है ॥ महायज्वा ॥ आपही बड़ा है आपही यज्ञकर- नेवाला है जगतके उद्धारके वास्ते यज्ञका प्रचारक ॥ महायज्ञः॥ आपही बड़ा है आपही यज्ञ है । यज्ञोंमें जपयज्ञ में हूँ यह गीताई १ ॥ महाविः ॥ आपही बड़ा है आपही हवि नाम होमकरनेका अल और घी है जिस परमात्मामें सब जगत् होमा जीव ॥ ८५ ॥ स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः॥ पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ॥ ८६ ॥ स्तव्यः ॥ उसकी सब स्तुति करते हैं वह किसीकी स्तुति A पाले १ १ भाषाटीकासमेत । (२४७) न करै १ स्तुति करनेवालोंके स्तुतियोग्य २ आपही स्तुति- रूप है ३॥ स्तवप्रियः ॥ स्तुति प्यारी है जिसको १ ॥ ६८० नाम ॥ स्तोत्रम् ॥ गुणवर्णनरूप हरि १ जिस शब्दसे स्तुति करै सो स्तोत्र आपही स्तोत्र है ॥ स्तुतिः ॥ आपही स्तुतिरूप है १ ॥स्तोता ॥ आपही स्तुति करनेवाला १ ॥ रणप्रियः ॥ रण है प्यारा जिसको १ लोकके देखानेके वास्ते पांच आयुध रखनेवाले २॥ पूर्णः ॥ संपूर्ण काम और शक्ति रयिता ॥ सब ऋद्धि और सब शक्तिसे कामना पूरण करनेवाले १ कुछ आपही पूरण नहीं हैं सबको सब संपत्के. पूरणकरनेवाले २॥ पुण्यः॥ स्मरण करनेसे पापोंका नाश करै १ ॥ पुण्यकीर्तिः॥ पवित्र है यश और कीर्ति जिसकी १ आदमियोंको जिसकी कीर्ति पवित्र करै २॥ अनामयः॥ कर्मसे उत्पन्न होनेवाली आधि और व्याधिसे रहित अनामय. नाम रोगरे रहित ॥ ८६॥ मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः॥ वसुप्रदो वासुदेवो वसुवसुमना विः॥ ८७ ॥ मनोजवः ॥ मनकी तरह जलदी दौड़नेवाले १ ॥ ६९० नाम ॥ तीर्थकरः॥चौदहविद्या और उपविद्या सबका कर्ता। बसुरताः॥ सुवर्ण है बीज जिसका १ सृष्टिकी आदिमें जलमें तेजका त्याग किया उससे सोनेका अंडा सूर्यकी तरह प्रकाशित २॥बसुप्रदः ॥ भक्तोंको धनदाता १ धनके दाता कुबेर २ ॥ वसुप्रदः ॥ दैत्योंके धनको नाश करै १॥ वासुदेवः ॥ वसुदेवके बेटे १ ॥ वसुः॥ जिसमें सब भूत वसैं १ सबभूतोंमें वसनेवाला २ मयासे जो अपने स्वरूपको छिपाले ३ सबदेश सबकाल सबवस्तुमें जो बराबर वसै ॥ वसुमनाः ॥ तद्रूप - 4 . (२४८) विष्णुसहस्रनाम। है मन जिसका १. सबमें बराबर वसे सो वस्तु वसु है मन जिसका २॥. हविः ॥ होमकी साकल्य इवि ब्रह्म है यह गीतामें है १॥ ८७॥ सद्धतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भतिः सत्परायणः॥ शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ॥ ८८.॥ सद्गतिः॥ ब्रह्म है ऐसा निश्चय करनेवालेकी जो गति . वह सद्गति १ श्रेष्ठ बुद्धिशाला२ ॥ सत्कृतिः ॥ जगत् की उत्पत्ति पालन लय जिसकी क्रिया है ॥ ७०० नाम ॥ सत्ता ॥ सजातीय नाम अपना विजातीय नाम दूसरा स्वगत नाम दैहिक इन भेदसे रहित जो अनुभव १. एक ब्रह्म है दूसरा नहीं यह श्रुति ॥ सद्भूतिः ॥ एक आत्मा बहुत प्रकार देखाई देवे १ तेरे निश्चय होनेसे और कुछ नहीं है क्योंकि सब एक है ॥ सत्प- रायणः ॥ सत् नाम तत्त्ववेत्ता पर नाम श्रेष्ठ अयन नाम स्थान ॥ शूरसेनः ॥ हनूमानादिक शूर वीर जिसकी सेना है १॥ यदुश्रेष्ठः ॥ यादवकुलमें श्रष्ठ १ ॥ सन्निवासः॥ सत्पुरुषोंके रहनेकी जगह १ ॥ सुयामुनः ॥ सोहावनी यमुनाकी आवर्त चारों ओर हैं जिसके १ गोपवेषधारी पद्मासनादिक गोपोंकरके आवृत ॥ यामुनः॥ नाम चारोंतरफ घेरनेवाले॥८८॥ . . भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः ॥ दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्घरोऽथापराजितः ॥ ८९ ॥ भूतावासः ॥ सब भूतोंको रहनेकी जगह १ जिसमें सब भूत बसें यह हरिवंशपुराणमें है ॥ वासुदेवः ॥ मायासे जगत्को छिपालेनेवाले १ अपनी विभूति और ऐश्वर्यसे जगतको ढंक है (२४९) भाषाटीकासमेत। लेताहूँ यह भगवद्वचन है छिपाता हूँ सब जगत्को सूर्य्यकी तरह अपने किरनोंसे यह महाभारत मोक्षधर्म है. ॥ सर्वासुनिलयः ॥ सब प्राण जिसमें लय होजायँ १॥ ७१० नाम ॥ अनलः ॥ जिसकी शक्ति और संपत अनंत हैं ॥ दर्पहा ॥ अधर्मियोंका दर्प नाम अहंकार हरनेवाला १ ॥ दर्पदः ॥ धर्मवालोंका दर्प देनेवाले नाम रक्षाकरनेवाले १ ॥ दृप्तः ॥ आत्मारूपी अमृतका स्वाद जिसके सदा है ॥ दुर्द्धरः ॥ बहुत दुःखोंसे जिसकी धारणा होय । अव्यक्तमें मन लगानेवालेको बहुत क्लेश हैं अव्यक्तमें गतिनाम पहुँच दुःखसे भी देहवालेको नहीं होती यह गीतामें कहा है ॥ अपराजितः ॥ भीतरके शत्रु रागद्वेषादिक और बाहरके दानवादिकसे जीता न जाय ॥ ८९ ॥ विश्वमूर्तिमहामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् ॥ अनेक मूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ॥१०॥ विश्वमूर्तिः ॥ सब विश्व जिसकी मूर्ति है १ ॥ महामूर्तिः ॥ शेषनागपर सोनेवाली बड़ी मूर्ति १॥ दीप्तमूर्तिः ॥ ज्ञानमयी और तेजसी मूर्ति है जिसकी १ ॥ अमूर्तिमान् ॥शेषनागपर सोनेवाली बड़ी मूर्ति होकर नाम भेद करके बहुत मूर्ति नहीं १॥ ७२० नाम ॥ अनेकमूर्तिः॥ उपकारके अर्थ ,अनेकंमू- र्तिवाले १॥ अव्यक्तः ॥ अनेकमूर्तिवाला भी है तो भी उसको यह है और ऐसा है नहीं कह सकते ॥ शतमूर्तिः ॥ ज्ञानरूप मूर्ति १॥शताननः॥ जिससे जगत् मूर्तिमान है जिससे सब भूत होयँ यह श्रुति है ॥९॥ एको नैकः सवः कः किं यत्तत्पदमनुत्तमम् ॥ लोकबंधुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥९॥ .
(२५०) विष्णुसहस्रनाम। एकः ॥ एक है श्रुति है जिसके दूसरा नहीं १॥ नैकः ॥ अपनी मायासे जगवरूप होनेवाला १ इन्द्र मायाकरके बहुत- रूपवाला हुआ यह श्रुति है ॥ सवः ॥ जिस यज्ञमें सोमपान होय १॥कः ॥ सुखरूप १ ब्रह्मरूप २ क ब्रह्म है यह श्रुति है। किम् ॥ सब पुरुषार्थका स्वरूप । जिससे सब भूत होंय यह श्रुति है ॥ १॥ यत् ॥ स्वतः सिद्ध जिससे भूतोंकी उत्पत्ति पालन लय होय यह श्रुति है ॥ तत् ॥ विस्तार करनेवाला ब्रह्म । ब्रह्मके तीननाम हैं प्रणव १ तत् २ सत् ३ गीतामें हैं । पदमनुत्तमम् ॥ ७३० नाम ॥ जिस उत्तम पदको मुमुक्षु लोग प्राप्त होंय १ जिससे कोई उत्तम पद न होय २ ॥ लोकबंधुः॥ आधाररूप परमात्मासे सब लोग बध हैं १ लोकोंका जनक है दूसरा बंधु नहीं है। श्रुति स्मृतिरूप हित अहित जीवोंको उपदेश करै २॥ लोकनाथः ॥ सब लोक जिससे मांगे दैत्योंको दंड देनेवाला २ ॥ माधवः ॥ मधुकुलमें उत्पन्न । १ ॥ भक्तवत्सलः ॥ भक्तोंपर कृपा करै ॥ ९१ ॥ सुवर्णवर्णों हेमांगो वरांगश्चंदनांगदी ॥ वीरहा विषमः शून्यो धृताशीरचलश्चलः ॥१२॥ सुवर्णवर्णः ॥ सोनेके रंग १ रुक्मवर्णको देखो यह श्रुति है ॥ हेमांगः ॥ सोनेकासा अङ्ग १ जो एक सूर्यमण्ड- लमें हिरण्मय पुरुष है यह श्रुति है ॥ वरांगः ॥ श्रेष्ठ है अङ्ग निसका १ ॥ चदनांगदी ॥ चंदन लगाये हुए अङ्गद नान बाजुबंध पहिरे हैं. १. चंदन, नाम आनंददेनेवाला अङ्गदनाम बाहुभूषण है जिसका २. ॥ ७४० नाम ॥ वीरहा धर्मकी रक्षाके वास्ते वीर दैत्योंको मारनेवाला १ रागद्वेष कामादिकको दूर करै २ ॥ विषमः ॥ सम नाम बराबर जिसके कोई नहीं .
भाषाटीकासमेत । (२५१) है तुम्हारे सम कोई नहीं तो अधिक कहांसे होयगा यह गीतामें है ॥शून्यः ॥ सब गुणोंसे पर है १ शून्यकी तरह शून्य २ ॥ धृताशीः ॥ अशी नाम कामना, धृत नाम सय, दूर हो गई है चाहना जिसकी १॥ अचलः ॥ स्वरूपसाम- यगुण जिसके अचल हैं १ ॥ चलः ॥ वायुरूप होकर चल- नेवाला॥ ९२॥ अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक् ॥ सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ॥१३॥ अमानी ॥ अनात्मवस्तुमें अभिमान नहीं करनेवाले १ मान- रहित शुद्ध ज्ञानस्वरूप २ जिसकी प्रमा नाम हद्द नहीं ३ ॥ मानदः॥अपनी मायासे जीवोंको आत्मामें आत्मारूपीअभिमान देनेवाला १ भक्तोंको मान देनेवाला २ दैत्योंका मान तोड़नेवाला ३ ज्ञानियोंका देहाभिमान दूरकरनेवाला ४ ॥मान्यः ॥ सबका मान्य नाम पूज्य लोकस्वामी ॥ चौदह लोकोंका स्वामी नाम ईश्वर १ ॥ ७५० नाम ॥ त्रिलोकधृक् ॥ तीनों लोकोंका धारण करनेवाला १ ॥ सुमेधाः॥ उत्तमबुद्धिवाला १॥ मेधजः॥ यज्ञमें प्रकाशित होय ॥१॥धन्यः॥ कृतार्थरूप १॥ सत्यमेधाः॥ सत्यस्वरूपनाम विकाररहित बुद्धि जिसकी १ ॥ धराधरः । शेषसे आदि अपने वेप्रमाण अंशोंसे पृथ्वीको उठावै ॥ ९३ ॥ तेजोषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः॥ प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशंगो गदाग्रमः ९४१ तेजोवृषः ॥ आदित्यरूप होकर वरसानेवाला 1. जलको सूरजरूपसे खींचकर वरसानेवाला २॥ द्युतिधरः ॥ शरीरकी कांतिवाला १सत्पुरुषोंकी कीर्ति धारणेवाला २॥ सर्वशस्त्रभृतांवरः।। सब हथियार रखनेवालोंमें श्रेष्ट १ ॥ प्रग्रहः ॥ भक्तोंके अर्पण -- .
(२५२) विष्णुसहस्रनाम।
किये हुये पत्र फूल फलं जल प्रसन्नतासे ग्रहण करै १ दुर्दात
इंद्रियरूपी घोड़े विषयरूपी 'जंगलमें दौड़ते हुये जिसके प्रसादसे
प्रग्रह नाम पगमें बंध जाते हैं २ ॥ ७६० नाम ॥ निग्रहः ॥
सबको अपने वश करनेवाले १॥ व्ययः॥ नाशरहित १ भक्तोंको
इष्ट नाम मनोरथदाता २॥ नैकशृंगः ॥ चारशृंगवाले १ चार श्रृंग
तीन पांव दोशिखा सात हाथ यह श्रुति है २॥ गदाग्रजः॥गदनाम
यादवके बड़े भाई वासुदेव हैं निगदनाम मंत्रसे सामने प्रगट होय ९४॥
चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्दूहश्चतुर्गतिः ॥
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥ ९५ ॥
चतुतिः॥विराट् १ सूत्र २ अव्याकृत नाम वेदांतका सिद्धांत
३ तुरीय आत्मा ४ यह चार मूर्ति हैं जिसकी १ श्वेत रक्त पीत
कृष्ण चाररंगकी मूर्तिवाले २ ॥ चतुर्बाहुः ॥ चारभुजावाले यह
नाम वासुदेवमें रूढ है क्योंकि चार भुजा और देवताओं के भी
हैं पर चतुर्भुज वासुदेव ही कहावते हैं १॥ चतुर्ग्रहः ॥ शरी-
रपुरुष १ वेदपुरुष२ महापुरुष ३ छंदपुरुष ४ इन चार व्यूहवाले
२॥ चतुर्गतिः॥ चारो वर्ण चारो आश्रमके स्वधर्म करनेवालोंकी
जो गतिरूप हैं।चतुरात्मा॥रागद्वेषादिकसे रहित ऐसा चतुर है मन
जिसका १ मन चित्त बुद्धि और अहंकार चार आत्मावाले २॥
चतुर्भावः ॥धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, यह चारजिससे उत्पन्न हैं॥
७७० नाम ॥ चतुर्वेदवित् ॥ चारों वेदोंको यथार्थ जाननेवाले
१॥ एकपात् ॥ एकचरणवाले १ सारा विश्व जिसका चरण है
यह श्रुति है सारा जगत् मेरे एक अंशसे स्थित है यह गीताकी
१० अध्यायमें है ॥ १५ ॥
समावर्तोनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ॥
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गा दुरावासो दुरारिहा ॥ ९६ ॥
ह भाषाटीकासमेत ! (२५३) '. समावर्तः॥संसारचक्रको जो अच्छी तरह घुमावै ॥ अनि- त्तात्मा ॥ सर्व व्यापक होनेसे जिसकी आत्मा. किसी पदार्थसे पृथक् नहीं है १ निवृत्त है सब विषयोंसे आत्मा जिसका २ इस अर्थसे निवृत्तात्मा नाम है ॥ दुर्जयः ॥ किसीसे जीता न जाय १ ॥ दुरतिक्रमः॥ जिसके भयसे सूर्यादिक आज्ञा मानते १ जिसके भयसे वायु वहता है सूर्य तपता है इंद्र वर्षताहै आग जलती है जिसके डरसे मौत मारती है यह महाभारतमें है। दुर्लभः॥ दुर्लभ भक्तिसे मिलता है १ हजारों जन्मोंके तप ध्यान समाधि करनेसे कृष्णभक्ति होती है यह व्यासका वचन अनन्य भक्तिसे मिलता है यह गीतामें कहा है २॥ दुर्गमः ॥ दुःखसे जानाजाय १॥ दुर्गः ॥सब विषयोंके दूर होनेपरभी बड़े दुःखसे जानाजाय १॥ दुरावासः॥योगियोंके हृदयमें कष्टकी बड़े समाधिसे वसे १ ॥७८० नाम ॥ दुरारिहा ॥ दुष्ट वैरी जो दानव. उनका नाशक १ ॥९६॥ शुभांगो लोकसारंगः सुतंतुस्तंतुवर्धनः॥ इंद्रकर्मा महाका कृतकर्मा कृतागमः ॥ ९७ ॥ शुभांगः ॥ सुन्दर अंगध्यानके योग्य १॥ लोकसारंगः॥ लोकसारनाम भक्तिको सारंग धनुषकी तरह धारण करते हैं १ ॥ लोकसार नाम प्रणवसे जो प्राप्त होय २ ॥ सुतंतुः ॥ सुंदर है जगत्के विस्ताररूपी तंतु जिसका १॥ तंतुवर्द्धनः ॥ संसार- रूपतंतुको बढानेवाले १ संसाररूपीतंतुको काटै २ ॥ इंद्रकर्मा । इंद्रकेसे कर्म जिसके हैं १॥ ऐश्वर्यके कर्म हैं जिसके २॥ महाकर्मा ॥ आकाशादिक पंचभूतका कर्ता १.॥ कृतकर्मा ॥ जो संपूर्ण कमको करचुके और कुछ करना बाकी न रहै १ धर्मरूपी कर्मका स्थापन करनेवाला २॥ कृतागमः॥ आगम (२५४) विष्णुसहस्रनाम। नाम वेदका कर्ता .१ जिस महद्भूतका वेद श्वास है यह श्रुति है ।। ९७॥ उद्भवः सुंदर सुंदो रत्ननाभः सुलोचनः ॥ अर्को वाजसनः शृंगी जयंतः सर्वविजयी॥९८॥ उद्भवः ॥ दूर हो गया है जन्म जिसका सर्वकारण होनेसे १ ॥ ७९० नाम ॥ सुंदरः ॥ सोहना जन्म है जिसका अपनी इच्छाले १ ॥ सुंदः ॥ सुंद नाम कोमल है स्वभाव जिसका १॥ रत्ननामः ॥ रनकी नाईं चमकती है नामि जिनकी १ ॥ सुलोचनः ॥ उत्तम हैं ज्ञानके नेत्र जिसके १॥ अर्कः ॥ ब्रह्मा- दिक के परम पूज्य १ ॥. वाजसनः ॥ वाज नाम • अन्न सनः नाम दाता अन्नके दाता ॥ शृंङ्गी । प्रलयमें मत्स्यरूप होके अपनेशृङ्गमें नाव बांधी जिसने १॥ जयंतः वैरियोंको अच्छी तरह जीतनेवाले १ ॥ जयदाता २ ॥ सर्वविजयी ॥ सबको जानै सो सर्ववित् सर्ववित् भी है जयी भी है भीतरके शत्रु रागादिक बाहरके शत्रु हिरण्यकशिपु आदिकके जीतनेका स्वभाव है जिसका १॥ ९८॥ सुवर्णबिंदुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः॥ महाह्रदो महागों महाभूतो महानिधिः॥ ९९ ॥ सुवर्णबिंदुः ॥ बिंदु नाम अवयव तथा अंग जिसके सुवर्णकी नाई चमकें १ वर्णनाम अक्षर सुंदर अक्षर और बिंदु है जिस मंत्रमें मंत्ररूप २ ॥८०० नाम ॥ अक्षोभ्यः ॥ विषयादिक और विकारादिकसे जो क्षुब्ध न होय क्षोभनाम घबराना १ ॥ सर्ववागीश्वरेश्वरः ॥ ब्रह्मा बृहस्पति आदिक जो वाणी के ईश्वर हैं उनका भी ईश्वर १॥ महादः ॥ जिस आनंदरूपी हदनाम तालाबमें नान करके योगी लोग सुखसे वास करें १ ॥
भाषाटीकासमेत। (२५५)
महागतः ॥गढेकी तरह जिसकी मायाका बहुत दुःखसे भी पार न
मिले १"मम माया दुरत्यया" यह गीतामें है ॥ गर्त नाम रथ
जिसका बड़ा रथप्रमाण महाभारतसे २ ॥ महाभूतः ॥ तीन
कालमें परिपूर्ण स्वरूप..१॥ महानिधिः॥ सबभूत-जिसमें है
सो महानिधि १॥ ९९ ॥
कुमुदः कुंदरकुंदः पर्जन्यः पावनोऽनिलः ॥
अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतो मुखः॥१०॥
कुमुदः ॥ कु नाम पृथ्वी मुद नाम हर्षदाता अवतारादिक
धारके पृथ्वीको आनंददाता ॥ ॥ कुंदरः ॥ कुंदकेफूलसे
उजले धर्मोके फलदाता १ पृथ्वीके. धारनेवाले हिरण्याक्षके
घातक वराहरूप २॥ कुंदः ॥ कुंदके रंग समान निर्मल प्रधान
अंगवाले १ कुंदनाम यम २ कु पृथ्वी के राजोंको मारनेवाले
परशुरामजी ३ कुनाम 'पृथ्वीको अश्वमेध करके परशुरामजी
रूपसे कश्यपको दान करदी ४॥ पर्जन्यः॥ मेघकी तरह तीनों
तापके मिटानेवाले १ सब कामनाके मेघनाम वरसावनेवाले २॥
८१० नाम ॥ पावनः॥ स्मरणहीसे पवित्र करते हैं.१ ॥अनिलः॥
जिसको कोई इल नाम प्रेरक नहीं १ इल नाम नींदसे रहित
सदा जागृत् २ ॥ अमृताशः ॥ आत्मारूपी अमृत भोजन है
जिसका १ अमृत नाम अविनाशी फलदायक है आत्मा जिसका
२ समुद्र मथ आपभी अमृत पिया देवतोंको भी दिया ३ ॥
अमृतवयुः॥ जिसको मौत नहीं १ ॥ सर्वज्ञः॥ सब वस्तुका ज्ञाता
१ सर्वज्ञ सर्ववित हैं यह श्रति है ॥ सर्वतोमुखः ॥ सब तरफ
मुँह है जिसका १ ॥ सब तरफ आंख शिर मुँह. है यह
गीता है॥ १०॥
(२५६.) विष्णुसहस्रनाम। सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः ॥ न्यग्रोधोदंबरोऽश्वत्थश्चाणूरांध्रनिषूदनः ॥ १०१ ॥ सुलभः॥ भक्तोंसे पत्रपुष्प लेकर जलदी प्राप्त होय ॥ सुव्रतः ॥ सुंदर शोभित है व्रत नाम नेम जिसका १ ॥ सिद्धः॥ आपसे आप जिसको सब सिद्धि प्राप्त हैं। शत्रुजित् ॥ जो देवतोंके वैरी सोई नारायणके वैरी हैं उनके जीतनेवाले १॥ ८२० नाम ॥ शत्रुतापनः ॥ देवतोंके शत्रुको जलानेवाले १॥न्यग्रोधः॥ सबसे ऊँचे १ सबभूतोंको मायामें लपेटनेवाले २॥ उदंबरः॥ अम्बरनाम आकाश सबभूतोंका कारणभूतसे जो उत्पन्न होय १ उर्ग अन्न- रूप आत्मासे विश्वको पालन करें २॥ ऊर्ग नाम अन्नसे जिसने जिलाया यह श्रुति है,॥ अश्वत्थः॥ श्वनाम कल्ह जो कल्हनाम दूसरे दिनतक न रहै १ अश्वत्थकी तरह जो स्थित रहै २॥ ऊपर जड़ नीचे डाली है जिसकी ऐसा अश्वत्थ सनातन है यह श्रुति है और गीता में है ॥ चाणूरांध्रनिषूदनः॥ चाणूर नाम दैत्य आंध्र- जातका अथवा अन्ध्रनाम देशका वासी सो आंध्र उसके घातकी चाणूरके शरीरके नाशक २॥ १०१॥ सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तधाः सप्तवाहनः॥ अमूर्तिरनघोऽचिंत्यो भयकृदयनाशनः ॥१०२॥ सहस्रार्चिः ॥ अनन्त किरणवाले १ ॥ गीतामें कहा है कि जोहजार सूर्य आकाशमें एक बार उदय होय तो भी उस महात्माकी किंचित् सादृश्य होय ॥ सप्तजिहः ॥ अग्निरूप सात जिह्वावाले ॥ काली १ कराली २ मनोजवा ३ सुधूम्रवर्णा , सुलोहिता ५स्फुलिंगिनी ६ विश्वरुचिः ७॥ सप्तधाः ॥ सात एधसनाम दीप्तिवाले .॥ सप्तवाहनः ॥ सात. घोड़ोंपर चढ़नेवाले १ एक मापाटीकासमेत (२५७) वाहन घोड़ा सात नामवाला । शुक घोड़ा सात नामवाला है ये श्रुति है ॥ गायत्री बृहती २ जमिन ३ जगती १ त्रिष्टुप् ५ अनुष्टुप् ६पंक्ति ७ सातघोड़ों के रुप होकर छंदनाम वेद जिसको उठावै वह विष्णुपुराणमें मत्स्यपुराणों है ॥ अमूर्तिः ॥ चरा- चररूप जो भोज्य है सो जिसको नहीं जो कुछ खाता नहीं और प्रकाशमान है॥पंचभूतों सेआदमियोंका भोजन अन्न औरजान- वरोंका भोजन जानवर यह सुधा नहीं है जिसको, यह श्रुति है मूर्ति नाम देह जिसको नहीं॥८३० नाम।। अनघः ॥ पाप और दुःखसे रहित १॥ अचिंत्यः सबका साक्षी पालनहार १ सबप्रमा- णोंसे बाहर जिसको चिंतन न कर सकेर सब प्रपंचसे न्यारा ३ जिसको यह है ऐसा है नहीं कहतले ४॥ भयकृत् ॥ असत्- मार्गवालोंको भयदाता १ अकोला अय काटनेवाले २ ॥ भय- नाशनः ॥ अपने अपने वर्गाश्रम धर्मवालोंको परमपुरुष विष्णुकी आराधनाके सिवाय दूसरी शह नहीं है यह विष्णुपु- राणमें है ॥ १०२॥ अणुवृहत्कृशः स्थूलो शुणनिर्णणो महान् ॥ अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्द्धनः॥ १०॥ अणुः ॥ परमसूक्ष्म १ ब्रा अधु है यह श्रुति है ॥ बृहत् ॥ बढनेवाले बढानेवाले बड़ोंसे बड़ा है यह श्रुति है ॥ कृशः॥ स्थूलता नाम मोटाईरहित । स्थूलः ॥ सर्वरूप है इसवास्ते मोटा -॥ गुणभृत् ॥ सत्त्व, रज, तम तीनोंगुणोंका और उत्पत्ति स्थिति लय तीनों क्रियाके अधिष्ठान ॥ निर्गुणः ॥ गुणसे रहित १ कैवल्य है निर्गुण है यह श्रुति है ॥ ८४० नाम ॥ महान् ॥ गुणोंसे रहित सूक्ष्मतर १ नित्य शुद्ध बुद्ध सर्वगत (२५८) विष्णुसहस्रनाम। जिसको यह है इतना है यह न जानसकै २ जिसके शब्द नहीं स्पर्श नहीं ३ ॥ अधृतः ॥ जो किसीसे उठाया न जाय पृथ्वीके बोझ उठानेवाले शेषनागादिकाभी बोझ उठानेवाले १॥ स्वधृतः॥ अपनी आत्माको आफ्ही उठानेवाले १ वह भगवान् किसीमें प्रतिष्ठित है अपनी ही महिमामें प्रतिष्ठित है यह श्रुति है । स्वास्यः॥ कमलकीसी शोभा है जिसके सुखकी १ वेदरूपी शब्द जिसके मुखसे पुरुषार्थके उपदेशके वास्ते निकाला है २ परमात्माके सब वे श्वास हैं यह श्रुति है। प्राग्वंशः ।। सब वंश वालोंका वंश है नाम सबसे पहिले है पीछेसे प्रपंच रूपी वंश जिसका हुआ वंशवईनः॥ वंश नाम संसाररूपी पंचका बढानेवाला १ प्रपंचके काटनेवाले २ ॥ १०३ ॥ भारभृत्कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ॥ आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ॥१०४॥ भारभृत् ॥ शेष नाग कूर्मवाराहादिक धारणकर भूमिमारको धारनेवाले १ ॥ कथितः ॥ वेदोंने देवतोंने जिसको परमात्मा कहा है. १ सब वेद जिसकी मर्यादा मानते हैं सब भूतोंका परमात्मा वेदोंने कहा है २ सब वेद जिसके पदका मनन करें सबवेदोंमें मैंही जानने योग्य हूँ यह गीता है वेदमें पुराणमें भारतमें रामायणमें विष्णुको सब जगह गाया है ।। योगी योग नाम ज्ञानसे जो मिले योगसमाधिसे अपनी आत्माको सदा धारनेवाले १॥ योगीशः ॥ योगियोंका भेद दूर करनेवाले आप अमेद १ सब योगियोंके ईश्वर २ ॥८५० नाम ।। सर्वकामदः ॥ सबकामनाके दाता ॥ जिससे फल उत्पन्न होते हैं यह व्यासने कहा है १ ॥ आश्रमः ॥ सव संसारका घर १ संसाररूप वनमें भटकते हुये लोगोंका भाषाटीकासमेत। (२५९) विश्रामस्थान २ ॥ श्रमणः ॥ मूखों को संताप नाम दुःख देनेवाले १ ॥क्षामः ॥ सब भूतोंको छिन करनेवाले १ ॥ सुपर्णः ।। वेदरूपी अच्छे पंखवाले १ वेद जिसके पत्ते हैं यह गीतामें है ॥ वायुवाहनः ॥ जिसके डरसे हवा चलती है ॥ १०४॥ धनुर्धरो धनुर्वेदो दंडो दमयिता दमः ॥ अपराजितःसर्वसहो नियंता नियमोयमः॥ १०५॥ धनुर्धरः ॥ श्रीरामरूपसे धनुषधारी १ ॥ धनुर्वेदः ॥ रामचंद्ररूपसे धनुर्विद्याका जाननेवाला १ ॥ दंडः ॥ दंडरूप होकर दमनकर्ता १॥ दमयिता ॥ धर्मराजरूप और मनु और राजारूपसे प्रजाके दमन करनेवाले १ दंड और दमयिता मैं हूँ यह गीताहै ॥ ८६० नाम ॥ दमः। दंड और दंडका कार्यरूप और दंडरूप भी है ॥ अपराजितः॥ शत्रुओंसे जीता न जाय १ ॥ सर्वसहः।। सब कामों में सामर्थ्यवाले १ सब वैरियोंको अनादर कर- नेवाले २ पृथ्वीरूपसे सबके उठानेवाले ३ ॥ नियंता ॥ सबको अपने अपने कामोंमें लगानेवाले ॥ अनियमः॥ जिसका कोई काममें लगानेवाला नहीं १ सब कामप्रेरक नाम हाकीम है उसका कोई प्रेरक नहीं ॥ अयमः॥ यम नाम मृत्यु जिसको नहीं १ यम नियम योगके अंग हैं उनके करनेसे जो मिलै आपही यम है आपही नियम हैं क्योंकि यम नियम करनेसे आत्मा मिलता है।। १०५॥ सत्त्ववान्सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः॥ अभिप्रायः प्रियाहोऽईः प्रियकृत्प्रीतिवर्धनः॥१०६॥ सत्त्ववान् ॥ शूरता वीरता सत्त्व नाम पराक्रम, है, जिसका १॥ सात्त्विकः ॥ सत्त्वगुणमें प्रधानकरके स्थित १॥ सत्यः॥ १
(२६०) विष्णुसहस्रनाम।
सत्पुरुषोंमें भली भाँति जो वास करै १ ॥ सत्यधर्मपरायणः ॥
सच बोलनेमें और धर्म नाम वेदकी आज्ञामें परायण नाम लोहुये
॥१॥८७० नाम ॥ अभिप्रायः॥ पुरुपार्थी लोग जिससे मुक्तिको
प्रार्थना करै १ अथवा जिसमें जगत् लय होय २॥ प्रियाहः ।।
प्रिय नाम प्यारी वस्तु उसके योग्य ॥ अर्हः ॥ अर्हनाम आसन
प्रशंसा अर्घ पूजा स्तुति नमस्कार ध्यान इन साधनोंके योग्य
प्रियकृत् ॥ स्तुति करनेवाले भक्तोंकी कामना पूरी करै १ ॥
॥ प्रीतिवर्द्धनः।। भक्तोंकी प्रीति वढावनेवाले ॥ १०६॥
विहायसगतिज्योतिः सुरुचि तमुस्विभुः॥
रविविरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥ १०७ ॥
विहायसगतिः॥ विहायस नाम आकाशमें है गति जिसकी
लोकमें जो जो प्यारी वस्तु है उसके बढ़नेकी इच्छासे गुणवान्
श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ अथवा सर्वज्ञ आत्माके अर्पण करनेलायक २
विष्णुके चरण वा सूर्य ३॥ ज्योतिः॥ आप प्रकाशरूप १ नारा-
यण परमज्योति है यह श्रुति हैं ॥ सुरुचिः ॥ सुंदरप्रकाश अथवा
उत्तम इच्छावाले १ ॥ हुतमुक् ॥ देवतोंके नामकीजो आहुति
है उसके खानेवाले १॥ विभुः॥ व्यापक तीन लोकके प्रभु १ ॥
८८० नाम ॥ रविः ॥ रसके लेनेवाले सूर्यरूप १॥ विरोचनः ॥
नानारूपसे सूर्य चांद ग्रहरूपसे प्रकाश करनेवाले ॥ सूर्यः ॥
सबके उत्पत्ति करनेहार १ सब जगत्को काममें लगानेवाले
२॥ सविता ॥ सवजगत्के दाता १ सब जगत्के रचनेवाले२
सब रसोंके दाता ३॥ रविलोचनः ॥ सूर्य है आंख जिसकी
अग्नि माथा है सूर्य चांद आँख हैं यह श्रुति है ।। १०७॥
अनंतो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः॥
अनिविण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्धतः॥१०॥
.. भाषाटीकासमेत। (२६१) । अनंतः॥ नित्य सब देश सब काल सब वस्तु रूप व्यापक किसी देश किसी काल किसी वस्तुमें जिसका नियम न होसके शेष नागरूप २॥ हुतभुक् ॥ यज्ञको भोगनेवाला १॥ भोक्ता ॥ भोग नाम मायाके भोग करनेवाले १ जगतके पालनेवाले २ ॥ सुखदः॥ भक्तोंको मुक्तिरूप सुख देनेवाले १ दुःखको काटनेवाले २॥ नैकजः॥ धर्मकी रक्षाके वास्ते वारंवार जन्म लेनेवाले १॥ ८९० नाम ॥ अग्रजः।। सबसे पहले जन्म धारनेवाले १ अग्रज नाम हिरण्यगर्भ २ हिरण्यगर्भ सबके पहले हुवा यह श्रुति है । अनिर्विण्णः ॥ सब काम प्राप्तहोनेसे वैराग्यरहित १॥ सदामर्षी ॥ सत्कर्म करनेवालोंको सहनेवाले १ ॥ लोकाधिष्ठानम् ॥ सब जगत्को धारणकरै नाम जगत् जिसमें रहै १ जिसमें तीन लोक वसै ऐसा ब्रह्म है २॥ अद्भुतः॥ आश्चर्यरूप शक्ति जिसकी १ कोई आश्चर्यकी तरह देखता है कोई अचरजकी नाई कहता है कोई अचरजकी तरह सुनता है यह गीतामें है ॥ १०८॥ सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः॥स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिमुक्स्वस्तिदक्षिणः ॥१०९॥ • सनात् ॥ सबका कालरूप कल्पोंसे श्रेष्ठ ब्रह्मका रूप बहुकाल रहनेवाला सनातन है यह विष्णुपुराणमें है। सनातनतमः सबका कारण ब्रह्मादिकसे भी पुराना १॥ कपिलः ॥ वडवाग्निरूप कपिलवर्ण १ क नाम जल पि नाम पीनेवाला अपनी किरणोंसे सूर्यरूप २॥ कपिः ॥ नाम वराहजी ॥ अव्ययः ॥ प्रलयकालमें जगत् जिसमें लयहोय ॥ ९०० नामः ॥ स्वस्तिदः॥ भक्तोंको कल्याणदायक १॥ स्वस्तिकृत् ॥ कल्याण करनेवाले १ ॥ स्वस्ति ॥ मंगलरूप परमानंदलक्षण ॥ स्वस्तिभुक् ॥ कल्याणके
(२६२) विष्णुसहस्रनाम ।
भोगनेवाले १ भक्तोंको कल्याणका भोग करानेवाले २॥
स्वस्तिदक्षिणः ॥ कल्याणरूप होकर बढ़नेवाले १ कल्याणकर
नेमें समर्थ २ कृष्णके स्मरणसे सब सिद्धि प्राप्त होती है यह
स्मृति है॥१०९॥
अरौद्रः कुंडली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः॥
शब्दातिगःशब्दसहाशिशिरः शर्वरीकरः॥ ११०॥
अरौद्रः॥ कर्मरौद्र रागरौद्र कोपरौद्रसे रहित नाम दुःखदायी
काम दुःखदायी राग नाम प्रीति और बहुत दुःखदायी कोप
जिसमें नहीं १ सर्वकाम प्राप्त होनेसे रागद्वेषसे रहित २ ॥
कुंडली ॥ शेषरूप सहस्रांशुसूर्यमंडलरूपी कुंडल है जिसका २
सांख्य योगरूपी कुंडल धारनेवाला ३॥ चक्री ॥ लोगोंकी रक्षाके
वास्ते मनरूप सुदर्शनचक्र धारनेवाले १ बलरूप धारनेवाले २
बडेवेगसे वायुको मनरूपी चक्रमें छीननेवाले ३ ॥ विक्रमी।
चरणोंका धरना अथवा शूरता विलक्षण है जिसकी उर्जितशा-
सनः॥ उर्जित नाम बढ़ी है 'शासन नाम आज्ञा जिसकी १
श्रुतिस्मृति हमारी आज्ञा है, उसको न माने सो हमारा शत्रु है यह
भगवद्वचन है ॥ ९१० नाम ॥ शब्दातिगः॥ वाणी जिसके कह-
नेमें मनसहित जिसके विचारमें फेर आतीहै १ शब्दनाम वेदसे
जाना जाय यह श्रुति है सब वेदोंसे मैंही जाननेयोग्य हूँ यह गीता
है ॥ शब्दसहः ॥ सारे वेदं व्यंगसे जिसको कहें सब वेद जिसकी
आज्ञामानें ॥ वेदोंमें सामवेद में हूँ यह गीतामें है ॥ शिशिरः॥
तीनों तापसे भूलसे हुवोंको ढक देनेवाले शिशिररूप १॥
शर्वरीकरः ॥ ज्ञानियोंको मुक्तिदाता १ संसारी लोगोंको
रात करनेवाले ॥ ११०॥
.. भाषाटीकासमेत (२६३) अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणांवरः॥ विद्वत्तमो वीतमयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ १११॥ अक्रूरः ॥ सब कामके प्राप्तहोनेसे क्रोधरहित ॥पेशलः ।। जिसका शरीर कर्म मन वाणी शोआवान् है ३ ॥ दक्षः ॥ बड़ेसे बहुत बड़ा परम समर्थ और बहु जल्दीरूप १॥ इक्षिणः ॥ दक्षिण शब्दका भी दक्षं अर्थ है ॥ क्षमिणांवरः ॥ क्षमाकरनेवाले योगी १ अथवा पृथ्वी इनसे श्रेष्ठ गृथ्वीकी तरह क्षमावाला है यह वाल्मीकिका वाक्य है । क्षमा जोशक्ति सब शक्तिवानोंमें श्रेष्ठ । वित्तमः ॥ सदा पूर्णज्ञानवाले १॥ ९२० नाम ॥ वीतभयः॥ दूर हो गया है संसाररूपी भय जिसका संसारके भयसे रहित २ सबका ईश्वर नित्यमुक्त । पुण्यशवणकीर्तनः ॥ श्रवण और कीर्तन जिसके गुण और यशको पवित्र करता है जिसका श्रवण कीर्तन करनेसे दोनों लोक अशुभ नहीं होता यह व्यासका वचन है २ ॥ १११॥ उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः॥ वीरहारक्षणः सन्तो जीवन पर्यवस्थितः॥ ११२॥ उत्तारणः ॥ संसारसागरसे पार उतारनेवाला १॥ दुष्कृतिहा ॥ दुष्कृति नाम पाप समूहको दूरकरनेवाले १ पापीजनोंको मारनेवाले२ ॥ पुण्यः ॥ सब स्मरणादिककरनेवालोंको पवित्रकरे श्रुति स्मृतिआदिक वचनोंसे उपदेश करनेवाले २ इतिहास पुराण श्रवणकरनेवालोंको पवित्र कत ३॥ दुःस्वप्ननाशनः ॥ ध्यान पूजा स्तुतिकरनेसे खोटेस्वप्न नाशकरनेवाले १ ॥ वीरहा ॥ सब दुःखोंको दूरकरके मुक्तिदाता १॥ रक्षणः ॥ सत्त्वगुणसे तीन लोककी रक्षाकरनेवाले ॥ सन्तः ॥ संत रूप होकर विद्या और विनयको बढ़ावनेवाले १ उत्तम मार्ग में चलें सो संत ॥ जीवनः।
(२६४) विष्णुसहस्रनाम। प्राणरूप होकर जगत्को जिलावनेवाले १ ॥.९३० नाम पर्यवस्थितः ॥ संपूर्ण विश्में व्यावहोके रहनेवाले १॥ ११२॥ । अनन्तरूपोऽनतश्रीजितमन्युर्भयापहः । चतुरस्रो गभीरात्मा विदिशोव्यादिशो दिशः११३ अनंतरूपः ।। अनंतरूप होकर अथवा जगतरूप होके रहै १॥अनंतश्रीः॥ अप्रमाण शक्तिवाले १ उसकी परमशक्ति नाम हैं यह श्रुति है ।जितमन्युः । मन्यु तुम क्रोधको जीतनेवाले ॥ भयापहः ॥ संसारका सय नाश करनेवाले १संसाररूपी भयके नाशक२॥ चतुरस्नः ॥ न्याययुक्तको चतुरस्त्र कहते हैं पुरुषोंको क- मैके अनुसार चार फल देनेवाले ॥ गभीरात्मा ॥गमीर नाम अथाह आत्मा स्वरूप १ अमाप आत्मा २॥ विदिशः ॥ नाना प्रकारके फल अधिकारियों को देनेवाले १॥व्यादिशः ॥ इंद्रा- दिकको आज्ञा देनेवाले इंसादिककी आज्ञाकरनेवाले २॥ दिशः ॥ वेदरूप होके कयाँके फल बतावनेवाले १ ॥ ९४० नाम ॥ ११३ ॥ अनादिवो लक्ष्मी वीरो रुचिरांगदः ॥ जननो जनजन्मादिसीयो भीमपराक्रमः ॥११४॥ अनादिः ॥ अनादि नाम कारणरहित १॥ भूर्भुवः॥ जगत्की आधार पृथ्वी उसके भी आधार १॥ भू नाम पृथ्वीकी लक्ष्मी नाम शोभा भुवोलक्ष्मीः एकनाम है १ भूलोक भुवर्लोक और लक्ष्मी नाम आत्मविद्या यह वीनरूप है जिसका २॥ लक्ष्मीः ।। आत्मविद्या चंद्र सूर्य अग्निरूपले लक्ष्मी नाम. शोभित २ सुवीरः ॥ ईर नाम गति सुन्दर है जिसकी १ श्रवणमनननिदिध्यास । नादिक सुन्दर हैं ज्ञान के साधन जिसके २ सुन्दर है गति मच्छ कच्छ आदिक रूपमें पृथ्वीके हितके वास्ते जिसकी ३ ॥ - १ भाषाटीकासमेत । (२६५) रुचिरांगदः ॥ सुंदर बाहुभूषणवाला ॥ जननः ॥जीवोंका पैदा करनहार ॥ जनजन्मादिः ॥ जीवोंके जन्मका मूलकारण १ ॥ भीमः॥ सबको भयदाता १॥ भीमपराक्रमः ॥ असुरोंके भय- दायक है पराक्रम जिसका ॥ ११ ॥ आधारनिलयोधाता पुष्पहासः प्रजागरः॥ ऊध्र्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥११५॥ आधारनिलयः॥ पृथिव्यादिक पंचभूत जो जगत्का आधार है उनकामी आधार ॥ ९५० नाम ॥ अधाता ॥ जिसके स्वरूपका कोई पैदा करनेवाला नहीं है आपसे आपही स्थित प्रलयमें सबको धारनेवाला इस पक्षमें धाता नाम है १ ॥ पुष्पहालः ॥ खिलेहुये फूलकी तरह जगत्को प्रकाश करनेवाले १ यह जगत् भगवान्की फुलवारी है २॥ प्रजागरः ॥ सदाबु- द्विरूप हैं इसीवास्ते सदा जागनेवाला है ॥ उर्ध्वगः ॥ सबसे ऊंचा १ ॥ सत्पथाचारः ॥ सत्पुरुषोंके कर्म अच्छीराहसे आच- रण करनेवाले १ सज्जनोंको भले मार्गमें चलावै २ वेदमार्ग आचार है जिसका ३॥ प्राणदः ॥ प्राण देनेवाले १ परीक्षिता- दिक मरेहुवोंको जिलावनेवाले २ ॥ प्रणवः ॥ ॐकाररूप परमात्मा १॥ पणः ॥ व्यवहारमें प्रतिज्ञा पूर्ण करनेवाले १ अधि- कारियोंके पुण्य लेकर उसके बदलेमें फल देनेवाले २ पण नाम चित्त वह मोक्षकालमें अथवा सुषुप्तिकालमें जिसमें लयहोय ॥ ११५॥ प्रमाणं प्राणानिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः॥ तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः॥११६॥ प्रमाणम् ॥ प्रमाज्ञानस्वरूप १ स्वयंप्रकाश २ प्रमा ज्ञान ब्रह्म- विद्या यह श्रुति है अनंतज्ञानस्वरूप प्रांतिसे जीवरूप हो गया यह विष्णुपुराणमें है २॥ प्राणनिलयः॥ प्राणइंद्रिय जिसमें ॥ (२६६) विष्णुसहस्रनाम। लय होय ऐसाजीवरूप १ प्राण अपानादिकहीसे मनुष्य नहीं जीता किंतु जिसके आश्रय प्राण हैं उससे जीता है २॥ ९६० नाम ॥ प्राणभृत् ॥ अन्नरूप होके प्राणका पालक १॥ प्राणजीवनः ।। प्राण नाम वायुसे मनुष्योंको जिलावनेवाले १ तत्त्वम् ॥ तत्सत अमृत यह ब्रह्म के नाम हैं ॥ तत्त्ववित् तत्त्वके स्वरूपको यथार्थ जाननेवाले ॥ एकात्मा ॥ आपही एक आत्मारूप हैं और कुछ नहीं है १ एक है सब पहिले होनेवाला यह श्रुति है ॥ जन्ममृ- त्युजरातिगः॥ जन्मसे आदिलेकर पदविचारोंका उलांघनेवाला न जन्मता है न मरता है न यह था न है न होगा। अज है नित्य है शाश्वत है पुराणहै यह गीता है ॥ ११६ ॥ भूर्भुवः स्वस्तसस्तारः सपिता प्रपितामहः॥ यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञांगो यज्ञवाहनः ॥१३७॥ भूर्भुवः स्वस्तरुः ॥ तीनों लोकरूप वृक्षके रूप १ भूर्भुवः स्वः इन व्याहृतिसे जगत्को तारनेवाला २ यज्ञसे मेघ वर्षता- है मेघसे अन्न होता है अनसे प्राणी यह मनु कहते हैं और गीतामें भी है २॥ तारः॥ संसारसागरसे तारनेवाले १ तार नाम प्रणवका भी है ॥ सपिता ॥ लोकोंका पिता ॥ प्रपितामहः॥ ब्रह्माकाभी पिता १॥ ९७० नाम ॥ यज्ञः॥ यज्ञरूप यज्ञमें जाने वाले २॥ यज्ञपतिः॥ यज्ञके रक्षक अथवा स्वामी १ सब यज्ञोंके प्रभु और भोक्ता में हूँ यह गीता है ॥ यज्वा ॥ यजमानरूप १॥ यज्ञांगः॥ यज्ञ है अंग जिसके ऐसी वराहमूर्ति वेद जिसके परे हैं, डाढ जिसकी स्तंभ हैं, ऋतु हाथ हैं, चित्ती नाम अग्निका स्थान मुख हैं, अनि जीम है, कुशारोम है, रात दिन आंख हैं, वेदक मंत्र अंगभूषण, घृत नाक है सुवा थुथुन है सत्य और धर्म शब्द है, ब्रह्म नाम ब्रह्माअथवा ब्राह्मण अर्थात् शिर है, महापिता ऐसी वराहमूर्ति ॥ यज्ञवाहनः ॥ यज्ञोंका फलदाता ॥ ११७ ॥ --
(२६७)
भापाटीकासमेत ।
यशंभृद्यज्ञद्यज्ञी यज्ञभुग्यज्ञसाधनः ॥
यज्ञांतकृयज्ञगुह्यमन्नाद एव च ॥ ११८॥
यज्ञभृत् ॥ यज्ञोंका रक्षक १॥ यज्ञकृत् ॥ जगत्के आदिमें
यज्ञ करनेवाले १ जगत्के अन्तमें यज्ञ काटनेवाले २॥ यज्ञीयज्ञ-
करनेवालोंमें प्रधान १॥ यज्ञभुक् ॥ यज्ञका भोक्ता ॥ यज्ञ
साधनः ॥यज्ञकासामान दुर्वी वा चपाल हरि इत्यादिक अंग.१ ॥
९८० नाम ॥ यज्ञांतकृत् ॥ यज्ञका अंत नाम फल जो दे १ ॥
यज्ञगुह्यम् ॥ यज्ञोंमें सिद्धांतज्ञानयज्ञ १ ॥ अन्नम् ॥ आहा-
ररूप जो खाया जाय अथवाजो सबको खाय उसको अन्न कहतेहैं
यह श्रुति है ॥ अन्नादः ॥ अन्नखानेवाले ॥ एव च ॥ ११८॥
आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः ।
देवकीनंदनः स्वष्टा क्षितीशः पापनाशनः ॥ ११९॥
आत्मयोनिः ॥ आत्माहीसे उत्पन्न ॥ स्वयंजातः ॥ स्वयमेव
नाम स्वतः होनेवाला ॥ वैखानः ॥ बहुत खोदनेवाले १ पृथ्वी
खोदके पातालमें रहनेवाले वराहरूपहोके हिरण्याक्षको मारनेवाले
२॥ सामगायनः ॥ सामवेदके गावनेवाले १ सामवेद जिसको
गावै २ ॥ देवकीनंदनः ॥ देवकीके बेटा जिसकी आज्ञा सब वेद
सब देवता सब लोकपालक तीनों अग्नि मानते हैं वही देवकीनंदन
है यह महाभारत है ॥ स्रष्टा ॥ सब सृष्टिका रचनेवाला ॥ ९९०
नाम ॥ क्षितीशः ॥ पृथ्वीके प्रभु रामचन्द्ररूप ॥ पापनाशनः।।
पूजन भजन करनेसे पाप नाश करनेवाले पक्षभरके उपवाससे पुरुषका
पाप जितना नाश होता है उतना ही १०० प्राणायामसे जाता है
जितना'१००० हजार प्राणायामसे नाश होता है उतना विष्णुके एक
क्षण ध्यानकरनेसे । यह वृद्ध शातातपका वचन है ॥ ११९ ॥
(२६८) विष्णुसहस्रनाम ।
शंखभृन्नंदकी चक्री शाङ्गधन्वा गदाधरः ॥
स्थांगपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ॥ १२०॥
शंखभृत् ॥ भूतोंका आदि जो अहंकार सोई पांचजन्य शंखके
धारनेवाले १ ॥ नंदकी ॥ विद्यारूप नंदक नाम तलवार
जिसकी १॥ चक्री ॥ मन रूप सुदर्शन नाम चक्रके धारनेवाले
3 ॥ शार्ङ्गधन्वा ॥ इंद्रियरूप जिसका शाङ्ग नाम धनुष है १ ॥
॥ गदाधरः ॥ बुद्धिरूपी कौमोदकी नाम गदा है जिसकी ।।
स्थांगपाणिः ॥ रथका पहिया जिसके हाथमें होय १ यह कथा
महाभारतमें ३ ।। अक्षोभ्यः ॥ जिसको कुछभी क्रोध वा भय
घबराहट न होय १ ॥ सर्वप्रहरणायुधः ॥ जितने हथियार
ऊपर कहे हैं उनके सिवाय और जितनी मारनेकी वस्तु हैं वह सब
उसीके हथियार हैं ॥ १००० नाम ॥ १२० ॥
सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति ॥ ॥ इतीदं
कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः॥ नास्नां सहस्रं
दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम् ॥ १॥
ओंनमः ॥ नमस्कारवास्ते पूजाके सर्वप्रहरणायुध दो-
बार कहनेसे समाप्तिका सूचन होता है ॥ अथ फलश्रुतिः।इतीदं ॥
इति शब्दसे हजारनामकी पूरी गिनती यह कीर्तन करनेके योग्य
केशवमहात्माके हजार नाम जो प्रकाशमान हैं तिनको संपूर्ण भली
साँति कहे हैं ॥१॥
य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् ॥
नाशुभं प्राप्नुयात्किञ्चित्सोऽमुत्रहच मालवः॥ २॥
जो इसको नित्य सुने और कीर्तन करै किसीतरहके अशुभ
उसको इस लोकमें और परलोकमें नहीं होते ॥२॥
भाषाटीकासमेत। .(२६९)
वेदांतगो ब्राह्मणः स्यात्क्षत्रियो विजयी भवेत् ॥
वैश्यो धनसमृद्धः स्याद्रः सुखमवाप्नुयात् ॥३॥
ब्राह्मण वेदांतका जाननेवाला होय क्षत्रिय लड़ाईमें जीत पावै
वैश्यका धन बढ़े शद्र सुख पावै ॥३॥
धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात्॥
कामानवाप्नुयाकामी प्रजा प्राप्नुयात्प्रजाः॥४॥
धर्म चाहनेवाला धर्म पावै अर्थ चाहनेवाला अर्थ पावै काम
चाहने वाला काम पावै प्रजा चाहनेवाला औलाद पावै ॥४॥
भक्तिमान्यः सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः॥
सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत्प्रकीर्तयेत् ॥ ५॥
भक्तिसे जो सदा उठकर पवित्र होकर दिल लगाके वासु-
देवके सहस्रनामका पाठ करे ॥ ५ ॥
यशःप्राप्नोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च ॥
अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥६॥
उसको बहुत यश मिले जातिमें प्रधानता मिल अचल लक्ष्मी
मिले सबसे उत्तम कल्याण नाम मुक्ति मिलै ॥ ६॥
न भयं वचिदाप्नोति वीर्य तेजश्च विंदति ॥
भवत्यरोगो द्युतिमान्बलरूपगुणान्वितः ॥७॥
कुछ डर न लगै बड़ा पराक्रम होवै रोग जाय प्रकाशवान
होय बलरूपगुणसे भरा रहे ।। ७॥
रोगातों मुच्यते रोगाबद्धोमुच्येत बंधनात्
भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः ॥८॥
रोगी रोगसे छूटजाय और कैदी कैदसे छूटजाय आपदावाला
आपत्से छूटे ॥ ८॥
(२७०) विष्णुसहस्रनाम। दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम् ॥ स्तुवन्नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः ॥९॥ बड़े दुःखोंसे जल्दी पार होजाय पुरुषों में उत्तम पुरुषको नित्य भक्तिसे सहस्रनाम पढ़के स्तुति करै ॥९॥ वासुदेवाश्रयो मयों वासुदेवपरायणः ॥ सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम् ॥ १० ॥ वासुदेवके आसरेवाला आदमी वासुदेवकी पूजा सेवा स्मरणमें लगाहुआ सब पापोंसे मनशुद्धकरके सनातनब्रह्मकोपावताहै।॥१०॥ नवासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते कचित् ॥ जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते ॥११॥ वासुदेवके भक्तोंको कभी अशुभ नहीं है जन्म लेना मरना बूढ़ा होना बीमारी यह उसको नहीं होतीं ॥११॥ इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः॥ युज्येतात्मसुखशांतिश्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः ॥१२॥ इस स्तोत्रको जो श्रद्धाभक्तिसे पाठ करता है पाता है आत्म- सुख शांति लक्ष्मी धृति कीर्तिसे उसकी आत्मा युक्त होती है ॥१२॥ न क्रोधो नच मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः ॥ भवंति कृतपुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे ॥ १३ ॥ जो पुरुषोत्तमके भक्त कृतपुण्य लोग हैं उनको क्रोध और मत्सरता और लोभ अशुभमति न होती है ॥ १३ ॥ द्यौः सचंद्रार्कनक्षत्रा खं दिशो भूमहोदधिः॥ वासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि महात्मनः ॥ १४ ॥ ।
भाषाटीकासमेत (२७१)
स्वर्ग चंद्रमा सूर्य नक्षत्रोंसमेत आकाश दिया पृथ्वी समुद्र
वासुदेवके पराक्रमसे सब धारण करते हैं ॥ १४ ॥
ससुरासुरगंधर्व सयक्षोरगराक्षसम् ॥
जगहशे वतेतहं कृष्णस्य सचराचरम् ॥ १५॥
देवता असुर गंधर्व यक्ष सर्प राक्षस समस्त यह जगत् सब
चरअचर कृष्णके वशमें हैं ॥ १५ ॥
इंद्रियाणि मनो बुद्धिः सत्त्वं तेजो बलं धृतिः॥
वासुदेवात्मकान्याहुःक्षत्र क्षत्रज्ञ एवच ॥ १६॥
इंद्रियां मन बुद्धि अंतःकरण तेज बल धृति क्षेत्र क्षेत्रज्ञ यह
वासुदेवके आत्मस्वरूप हैं ॥१६॥
सर्वांगमानामाचार प्रथमं परिकल्पते ॥
आचारप्रभवो धर्मों धर्मस्य प्रभुरच्युतः ॥ १७॥
सब वेदोंमें प्रथम आचार पहिला धर्म है धर्मका रक्षक
अच्युत है ॥ १७॥
ऋषयः पितरो देवा महामृतानि धातवः॥
जंगमाजंगमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम् ॥ १८॥
ऋषि पितर देवता महाभूत सब धातु और जंगम स्थावर यह
सब नारायणसे उत्पन्न हैं ॥ १८॥
योगो ज्ञानं तथा सांख्य विद्याः शिल्पादिकर्म च ॥
वेदाः शास्त्राणि विज्ञानमेतत्सर्वं जनार्दनात् ॥१९॥
योग ज्ञान सांख्य विद्या शिल्पविद्यासे आदिलेकर कर्म वेदशा-
अविज्ञान यह सब जनार्दनसे हुए हैं ॥ १९ ॥
(२७२) विष्णुसहस्रनाम। एको विष्णुमहद्भुतं पृथग्भूतान्यनेकशः ॥ बील्लोकान्व्याप्य भूतात्मा मुंक्तविश्वभुगव्ययः२०॥ एक विष्णु महाभूत जुदा जुदा हुआ अनेक हैं तीनों लोकमें व्यापक होकर वो भूतोंका आत्मा अव्यय नाम नाशरहित भोगकरता है ॥२०॥ इमं स्तवं भगवतो विष्णोळसेन कीर्तितम् ॥ पठया इच्छेत्पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च ॥२१॥ यह स्तोत्र भगवद्विष्णुका व्यासजीने भलीभाँति कहा है. जो पुरुष अपना कल्याण और सुख चाहै सो पाठ करे ॥२१॥ विश्वेश्वरमज देवं जगतः प्रभवाप्ययम् ॥ भजति ये पुष्कराक्ष न ते यांतिपराभवम्॥२२॥इति॥ जगत्के ईश्वर जन्मरहित प्रकाशवान जगत्के प्रभु नाशरहित कमलकीसी आँखवालेको जो भजता है नाम सेवा करता है वह पराभव नाम अनादरको नहीं पावता ॥ २२ ॥ इति श्रीमहाभारतके शांतिपर्वमें दानधर्मके उत्तर व्यास- जीका बनाया हुआ विष्णुसहस्रनामस्तोत्र संपूर्ण ॥ ॥ श्रीरस्तु॥ पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराजश्रीकृष्णदास, "श्रीवेंकटेश्वर" छापाखाना, खेतवाडी-मुंबई.
॥श्रीः॥
अथ भीष्मस्तवराजः।
बेरी निवासी. पं० वसतिरामविरचित
भाषाटीकासमेतः।
साऽयं
क्षेमराज-श्रीकृष्णदासश्रेष्टिना
मुम्बय्यां
स्वकीये "श्रीवेङ्कटेश्वर” (स्टीम् ) यन्त्रालये
मुद्रयित्वा प्रकाशितः।
संवत् १९८०, शके १८४५.
सर्वाधिकार "श्रीवेंकटेश्वर" यन्त्रालयाध्यक्षने स्वाधीन रक्खा है.
మరినిలయం Tol श्रीविष्णवे नमः। ఆహారంలో ఆలయంలో GE यं योगिनः प्राणविमोक्षकाले यत्नेन चित्ते विनिवेशयंति । साक्षात्पुरस्ताद्धरिमीक्षमाणः प्राणाञ्जही प्राप्तकालो हि भीष्मः॥३॥ వారం Cotto Chope contentertone
श्रीः।
अथ भीष्मस्तवराज ॥
भाषाटीकासमेत।
जनमेजय उवाच।
शरतल्पे शयानस्तु भारतानां पितामहः ॥
कथमुत्सृष्टवान्देहं कं च योगमधारयत् ॥ १ ॥
जनमेजय बोले-शरशय्या (बाणोंकी शय्या) पर सोतेहुए
भीष्मपितामहजी शरीरको कैसे त्यागतेभये और किस योगको
धारण करतेभये ॥ १॥
वैशंपायन उवाच ।
शृणुष्वावहितो राजन् शुचिर्भूत्वा समाहितः॥
भीष्मस्य कुरुशार्दूल देहोत्सर्ग महात्मनः ॥२॥
वैशंपायनजी कहते हैं-हे राजन् ! हे कुरुवंशमें शार्दूल ! तुम पवित्र
हो सावधान होके महात्मा भीष्मजीके देह त्यागको सुनो ॥२॥
निर्वृत्तमात्रे त्वयने उत्तरे वै दिवाकरे ॥
समावेशयदात्मानमात्मन्येव समाहितः॥३॥
उत्तरायण सूर्य होते समय परमात्माविषे अपने आत्माको साव-
'धान होके समावेश करते भये अर्थात् परमात्माविषे लीन होके
मुक्त भये हैं ॥३॥
(२७६) भीष्मस्तवराज। शुक्लपक्षस्य चाष्टम्यां माघमासस्य पार्थिव ॥ प्राजापत्ये च नक्षत्रे मध्यं प्राप्ते दिवाकरे ॥४॥ हे राजन् ! माघ शुक्ल अष्टमीके दिन रोहिणी नक्षत्रविषे मध्याह्न समयमें ॥४॥ विकीणींशरिवादित्यो भीष्मः शरशतैश्चितः ॥ शुशुभे परया लक्ष्या वृतो ब्राह्मणसत्तमैः॥५॥ भीष्म पितामहजी सैकडों बाणों करके संयुक्त होके ऐसे शोभित होतेभये कि, जैसे खिलीहुई किरणोंकरके सूर्य शोभित हो, और उत्तम ब्राह्मणोंसे आवृत होते भये ॥५॥ व्यासेन वेदविदुषा नारदेन सुरर्षिणा । देवरातेन वात्स्येन तथाऽऽतेन सुमन्तुना ॥६॥ वेदव्यासजी, सुरर्षि नारद, देवरात, वात्स्य, आत, सुमंतु ॥ ६॥ तथा जैमिनिना चैव पैलेन च महात्मना ॥ शांडिल्यदेवलाभ्यां च मैत्रयेण च धीमता ॥७॥ जैमिनी, महात्मा पैलऋषि, शांडिल्य, देवल, बुद्धिमान मैत्रेय ॥७॥ असितेन वसिष्ठेन कौशिकेन महात्मना । हारीतरोमशाभ्यां च तथाऽत्रयेण धीमता ॥८॥ असित, वसिष्ठ, महात्मा कौशिक, हारीत, रोमश, बुद्धिमान आत्रेय इन्हों करके संयुक्त होतेभये ॥ ८॥ . बृहस्पतिश्च शुक्रश्च च्यवनश्च महामुनिः ॥ .. सनत्कुमारकपिलौ वाल्मीकिस्तुंबुरुः कुरुः॥९॥ " भाषाटीकासमेत। (२७७) और बृहस्पति, शुक्र, महामुनि च्यवन, सनत्कुमार, कपिल, वाल्मीकि, तुंबुरु, कुरु ॥ ९॥ मौद्गल्योभार्गवो रामस्तृणबिंदुमहामुनिः॥ पिप्पलादश्च वायुश्च संवतः पुलहः कचः ॥१०॥ मौद्गल्य, परशुराम, महामुनि तृणबिंदु, पिप्पलाद, वायु, संवर्त, पुलह, कच ॥ १० ॥ कश्यपश्च पुलस्त्यश्च कतुर्दक्षः पराशरः॥ मरीचिरंगिराः कण्वो गौतमोगालवो मुनिः॥ ११॥ कश्यप, पुलस्त्य, ऋतु, दक्ष, पराशर, मरीचि, अंगिरा, कण्व, गौतम, गालव मुनि ॥ ११॥ धौम्यो विभाडोमांडव्योधौम्रः कृष्णोऽनुभौतिकमा उलूकः परमो विप्रो मार्कंडेयो महामुनिः ॥ १२॥ धौम्य, विभांड, मांडव्य, धौम्र, कृष्णनामक मुनि, अनुभौ- तिक, परमविप्र उलूक, महामुनि मार्कंडेय ॥ १२॥ भास्करः पूरणः कृष्णः सूतः परमधार्मिकः॥ शैब्येन याज्ञवल्क्येन शंखेन लिखितेन च ॥१३॥ भास्कर, पूरण, श्रीकृष्ण, परमधार्मिक सूत, शैब्य, याज्ञव- ल्ल्य, शंख, लिखित ॥१३॥ एतैश्चान्यैर्मुनिगणैर्महाभागैर्महात्मभिः ॥ श्रद्धादमपुरस्कारैर्वृतश्चंद्र इव ग्रहैः ॥ १४ ॥ इन्होंकरके और अन्य महाभाग महात्मा श्रद्धालु जितेंद्रिय .
(२७८) भीष्मस्तवराज। मुनि गणों करके भीष्मजी ऐसे आवृत होतेभये कि, जैसे ग्रह (तारागणों) करके चद्रमा आवृत होरहा हो ॥ १४ ॥ भीष्मस्तु पुरुषव्याघ्र कर्मणा मनसा गिरा॥ शरतल्पगतः कृष्ण प्रदध्यौ प्रांजलिः शुचिः ॥१५॥ हे पुरुष व्याघ्र ! शरशय्या पर प्राप्त हुए भीष्मपितामहजी हाथ जोड़ पवित्र होके मन, वचन, कर्म करके श्रीकृष्णका ध्यान करते भये ॥ १५॥ स्वरेण हृष्टपुष्टेन तुष्टाव मधुसूदनम् ॥ योगेश्वरं पद्मनाभ विष्णुं जिष्णुं जगत्प्रभुम् ॥१६॥ हृष्टपुष्ट(उत्तम)स्वरकरके योगेश्वर पद्मनाभ विष्णु जिष्णु सबको जीतनेवाले जगत्के स्वामी ऐसे श्रीकृष्णकी स्तुति करतेभये॥१६॥ कृतांजलिः शुचिर्भूत्वा वाग्विदां प्रवरः प्रभुः॥ भीष्मः परमधर्मात्मा वासुदेवमथास्तुवत् ॥ १७॥ इसके अनंतर वचन जाननेवालोंमें अत्यंत श्रेष्ठ प्रभु परम- धर्मात्मा भीष्मजी वासुदेव (श्रीकृष्ण) की स्तुति करते भये॥१७॥ भीष्म उवाच। आरिराधयिषुः कृष्णं वाचं जिगदिषाम्यहम् ॥ तया व्याससमासिन्या प्रीयतां पुरुषोत्तमः ॥१८॥ भीष्मजी बोले-श्रीकृष्णको आराधन करनेकी इच्छावाला मैं वचन बोलनेकी इच्छा करता हूँ तिस वेदव्यासजीसे कही हुई ( प्रचलित की हुई) वाणी करके श्रीकृष्ण भगवान प्रसन्न हो ॥ १८॥ शुचिं शुचिपद हंस तत्पद परमेष्ठिनम् ॥ .
भाषाटीकासमेत। (२७९) मुक्त्वा सर्वात्मनात्मानं वं प्रपद्य प्रजापतिम् ॥ १९॥ मैंसर्वात्मा करके(सब यतन करके) अपने शरीरको अथवा मनको त्यागके पवित्र पवित्रोंके स्थान हंस अर्थात् शुद्धस्वरूप तदपद (लक्ष्यस्वरूप) (परमेष्टी) परमें अर्थात् चिदाकाश ब्रह्मपदविषे स्थित हुए तिस प्रजापति अर्थात् संसारके पति ईश्वरकी शरण हूँ॥१९॥ अनाद्यं तत्परं ब्रह्म न देवा नर्षयो विदुः ॥ एकोऽयं भगवान्देवो धाता नारायणो हरिः॥ २० ॥ अनादि तिस परमब्रह्मको देवता नहीं जानते हैं और ऋषि नहीं जानते हैं सो यह एक भगवान् देव विधाता हरि नारायण है॥२०॥ नारायणादृषिगणास्तथा सिद्धमहोरगाः ॥ देवा देवर्षयश्चैव त विदुः परमव्ययम् ॥२१॥ नारायणसे ऋषिगण होते हैं. सिद्ध, महोरग, देवता,देवर्षि होते. हैं तिसको परम अविनाशी कहते हैं ॥२१॥ देवदानवगधर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः॥ यं न जानंति को ह्येष कुतो वां भगवानिति ॥२२॥ देव, दानव, गंधर्व, यक्ष, राक्षस, पन्नग(सर्प )ये जिसको ऐसे नहीं जानते हैं कि, यह भगवान् कहाँ भये है ॥२२॥ यस्मिन्विश्वानि भूतानि तिष्ठति च विशंति च। गुणभूतानि भूतेशे सूत्रे मणिगणा इव ॥२३ ॥ १ आत्मा पुंसि स्वभावेऽपि प्रयत्नमनसोरपि । धृतावपि मनीषायां शरीरब्रह्मणोरपि । इति अत्र-सर्वात्मना कोऽर्थः सर्वस्वभावेन सर्वप्रयतेन वा आत्मानं कोऽर्थः शरीरं मनो वा मुक्त्वा प्रपद्य इत्यन्वयः कर्तव्यः ।
" (२८०) भीष्मस्तवराज। और जिसविषे संपूर्ण भूत प्राणी मात्र ठहरते हैं और लीन होत हैं गुणभूत संपूर्ण, भूतेश भगवान विषे ऐसे हैं कि, जैसे सूतमें मणिगण पुरोये रहते हैं ॥२३॥ यस्मिन्नित्येतते तंतो दृढे स्रगिव तिष्ठति ॥ सदसद्ग्रथितं विश्व विश्वगे विश्वकर्मणि ॥२४॥ जिस नित्यस्वरूपी विश्वगत विश्वकर्मा, विस्तृत हुए परमा- त्मा विषे दृढ तागाकी मालामें पुरोयाहुआकी तरह, सत् असत् अन्थिसे ( कारणलिंगशरीरसे) ग्रथित हुआ विश्व ( संपूर्ण संसार) रहता है ॥ २४॥ हरि सहस्रशिरसं सहस्रचरणेक्षणम् ॥ सहस्रबाहमुकुटं सहस्रवदनोज्ज्वलम् ॥२५॥ हार अर्थात् सब पापोंको हरनेवाले सहस्र अर्थात् असंख्यात चरण और नेत्रोंवाले असंख्यात बाहु और मुकुटवाले अनंत सुखोंकरके प्रकाशित ॥२५॥ प्राहु राणं देवं यं विश्वस्य परायणम् ॥ अणीयसामणीयांसं स्थविष्ठं च स्थवीयसाम् ॥२६॥ ऐसे नारायण देवको विश्वका परम निवासस्थान कहते हैं सूक्ष्मोंके भी सूक्ष्म हैं और स्थूलोंके भी स्थूल हैं ॥२६॥ गरियसो गरिष्ठं च श्रेष्ठं च श्रेयसामपि । ये वाकेष्वनुवाकेषु निषत्सूपनिषत्सु च ॥२७॥ भारवालोंमेंभी भारवाले हैं श्रेष्ठोंमें श्रेष्ठ हैं और जिसभगवान्को वाक अनुवाक संज्ञक ऋचाओंके भेदोंमें निषद उपनिषदोंमें॥२७॥ गृणति सवकर्माणं सत्यं सत्येषु सामसु॥
भाषाटीकासमेत। (२८१),
चतुर्भिश्चतुरात्मानं सत्वस्थं सात्वतां पतिम् ॥ २८॥
सर्वकर्मा अर्थात् सब कार्यको करनेवाला गिनते हैं सत्योंमें अ-
र्थात् पंचतत्त्वोंमें तथा सामवेदोंमें सत्यरूप कहते हैं और प्रद्युम्न
आदि चार मूर्तियोंकरके चतुरात्मा कहते हैं और सत्त्वगुणमें स्थित
हुआ तथा सात्वत अर्थात् भक्तोंके पति कहते हैं ॥ २८ ॥
यं दिव्यैर्देवमर्चति गुःि परमनामभिः ॥
यस्मिन्नित्यं तपस्तप्तं यदंगेष्वनुतिष्ठति ॥२९॥
जिस देवको दिव्य परम गुह्य नामोंकरके पूजते हैं जिस विषे
नित्य तप कियाहुआ जिसके अंगोंमें सदा ठहरता है ॥२९॥
सर्वात्मा सर्ववित्सर्वः सर्वगः सर्वभावनः ॥
यं देवं देवकीदेवी वसुदेवादजीजनत् ॥.३० ॥
जो सर्वात्मा सर्वस्वरूप सर्वगत सबको उत्पन्न करनेवाले हैं ऐसे
जिस देवको वसुदेवजीके सकाशसे देवकीदेवी जनती भई ॥३०॥
भूमेश्च ब्रह्मणो गुप्त्यै दीप्तमग्निमिवारणिः ॥
यमनन्यो व्यपेताशीरात्मान वीतकल्मषम् ॥३१॥
पृथ्वी और ब्रह्माकी रक्षाके वास्ते ऐसे उत्पन्न किये जैसे अरणी
दीप्त अग्निको उत्पन्न करदेती है जिस निष्कलङ आत्माको नि-
राहार व्रती अनन्य भक्तजन ॥३१॥
इष्वाऽऽनंत्याय गोविंदं पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥
अतिवाविद्रकर्माणमतिसूर्याग्नितेजसम् ॥ ३२॥
मोक्षके अर्थ गोविंदको पूजके अपने आत्माको आत्मामें ही
देखता है (तिस) वायु और इंद्रसें भी उल्लंघके कर्म करनेवाले
सूर्य तथा अग्निको उल्लंघके अर्थात् उनसे भी विलक्षण ॥ ३२ ॥
.
(२८२) भीष्मस्तवराज।
अतिबुद्धींद्रियात्मानं तं प्रपद्ये प्रजापतिम् ॥
पुराणे पुरुष प्रोक्तं ब्रह्म प्रोक्तं युगादिषु ॥ ३३ ॥
बुद्धि इंद्रियोंसे ग्रहण नहीं किये जावें ऐसे आत्मा प्रजापतिकी
शरण हूँ पुराणों में पुरुष कहा हैं: युगादिकोंमें ब्रह्म कहा है॥३३॥
क्षये संकर्षणं प्रोक्तं तमुपास्यमुपास्महे ॥
यमेकं बहुधाऽऽत्मानं प्रादुर्भूतमधोक्षजम् ॥ ३४ ॥
प्रलयकालमें संकर्षण कहा जाता है तिस उपास्य (उपासना
करने योग्य) देवकी उपासना करते हैं जिस एक परमात्माको
बहुत प्रकार हुएको अधोक्षज अर्थात् नीचे कर दिया है इंद्रियों-
का ज्ञान जिसने ऐसे इंद्रिय अग्राह्यको ॥ ३४॥
नान्यभक्ताः क्रियावंतो यजंते सर्वकामदम् ॥
यं प्राहुर्जगतः कोशं यस्मिन्सन्निहिताः प्रजा॥३५॥
क्रियावाले अनन्य भक्तजन सर्व कामदायीको पूजते हैं और
जिसको जगत्का कोश (निवासस्थान) कहते हैं जिस विषे संपूर्ण
प्रजा रहती है ॥ ३५॥
यस्मॅिल्लोकाः स्फुरंतीमे जले शकुनयो यथा ॥
ऋतमेंकाक्षरं ब्रह्म यत्तत्सदसतः परम् ॥ ३६॥
जिसमें ये सब लोक ऐसे स्फुरते हैं (चेष्टा करते हैं) कि, जलमें
(हंस आदि) पक्षी जैसे चेष्टा करते हैं जो सत्स्वरूप एकाक्षर
सत् असत्से परे ब्रह्म है ॥ ३६ ॥
अनादिमध्यपर्यंत न देवा नर्षयो विदुः॥
य सुरासुरगंधर्वाः ससिद्धर्षिमहोरगाः ॥ ३७॥
भाषाटीकासमेत । (२८३) आदि,मध्य, अंत रहित है जिसको देवता और ऋषि नहीं जानते है जिसको सुर, असुर, गंधर्व, सिद्ध, ऋषि, महोत्ग ॥३७॥ प्रयता नित्यमर्चति परमं दुःखभेषजम् ॥ अनादिनिधनं देवमात्मयोनि सनातनम् ॥३८॥ दुःखमें परम औषधरूपको आदि अंतरहित आत्मयोनि सना- तन देवको सावधान होके नित्य पूजते हैं ॥३८॥ अप्रतय॑मविज्ञेयं हरि नारायणं प्रभुम् ॥ यं वै विश्वस्य कर्तारं जगतस्तस्थुषां पतिम्॥ ३९ ॥ तिस अप्रतयं (विचारमें नहीं आसकें ऐसे) अविज्ञेय हरि नारायण प्रभुको विश्वकत्ताको स्थावरजंगमसंसारके पतिको ॥३९॥ वदंति जगतोऽध्यक्षमक्षरं परमं पदम् ॥ हिरण्यवर्णो यो गर्भो दितेर्दैत्यनिषूदनः ॥ ४०॥ जगत्का पति कहते हैं अक्षर कहिये कभी क्षीण न हो ऐसा परम पद कहा जाता है जो हिरण्यवर्ण गम है (हिरण्यगर्भ है)दितिके पुत्र दैत्योंको नष्ट करनेवाले हैं ॥४०॥ एको द्वादशधा जज्ञे तस्मै सूर्यात्मने नमः॥४१॥ और जो एक ही बारह प्रकारसे प्रगट होतेभये तिस सूर्यात्मक रूप भगवान्के अथ नमस्कार है॥४१॥ शुक्ले देवान् पितॄन कृष्ण तर्पयत्यमृतेन यः॥ यश्च राजा विजातीनां तस्मै सोमात्मने नमः॥४२॥ जो शुक्लपक्षमें देवतोंको और कृष्णपक्ष। पितरोंको अमृतकरके (२८४) भीष्मस्तवराज। तृप्त करता है जो द्विजाति कहिये ब्राह्मणोंका पति है तिस सोमात्मक चंद्र स्वरूपी भगवानके अर्थ नमस्कार है ॥४२॥ महतस्तमसः पारे पुरुष ह्यतितेजसम् ॥ य ज्ञात्वा मृत्युमत्येति तस्मै ज्ञेयात्मने नमः ॥४३॥ महान् तमोगुण(मायाके पार) विषे पुरुष है जिस अत्यंत तेज- वाले पुरुषको जानके मृत्युको उलंघ जाता है मोक्षरूप होजाता है तिस ज्ञेयात्मारूपी भगवान्के अर्थ नमस्कार है ॥४॥ यं ब्रहंत हत्युक्थं यमिनो यं महाध्वरेः ॥ यं विप्रसंघा गायति तस्मै वेदात्मने नमः ॥४४॥ जिस बृहत् ब्रह्म रूपको जितेंद्रिय ब्रह्मचारीजन बृहति कहिये वेद विषे उक्थ अर्थात् सामवेदका अंगभेद ऋचास्वरूपी कहते हैं और ब्राह्मणों के समूह जिसको महान् यज्ञमें (वेदरूपसे) गाते हैं तिस वेदात्मारूपी भगवान्के अथ नमस्कार है ॥४४॥ ऋग्यजुःसामाणिं दशाई हविरात्मकम् ॥ यं सप्ततंतुं तन्वंति तस्मै यज्ञात्मने नमः ॥ ४५ ॥ ऋग्वेद, यजुर्वेद, साम, अथर्वणरूप जो है और दशाईसंज्ञक ऋचा (मन्त्र) रूपी जो है अथवा जो दशाई कहिये पंचभूतात्मक है तथा साकल्यरूप है जिस तन्तु अर्थात् यज्ञरूपी को सप्तऋषि विस्तार पूर्वक पूजते हैं तिस यज्ञात्माके अर्थ नमस्कार है ॥ ४५ ॥ चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पंचभिरेव च। हुयते च पुनर्वाभ्यां तस्मै होमात्मने नमः ॥४६॥ चार वेदों करके चार होता उदाता आदिकोंसे दो स्त्री पुरुषोंसे
भाषाटीकासमेत। (२८५)
पांच प्रणापानादिकों करके फिर दो हाथ और सुवा करके जो
हवन किया जाता है तिस होमात्मकरूपी भगवान्के अर्थ नम-
स्कार है॥४६॥
यः सुपर्णो यजुर्नाम छंदोगात्रविच्छिराः ॥
रथंतरं वृहत्साम तस्मै स्तोत्रात्मने नमः॥४७॥
जो सुपर्णसंज्ञक यजुर्वेदरूप है छन्दोगात्र है वेदत्रयीयुक्त वा
त्रिलोकीयुक्त, वा त्रिगुणयुक्त शिवाले हैं रथंतर बृहत्सामवेद हैं
जिस स्तोत्रात्मारूपी भगवानके अर्थ नमस्कार है ॥ ४७॥
यः सहस्रसमे सत्रे यज्ञे विश्वसृजामृषिः ॥
हिरण्यपक्षः शकुनिस्तस्मै हंसात्मने नमः॥४८॥
जो हजारवर्वतक अवधिवाले यज्ञमें ब्रह्मा आदिकोंके ऋषि होते
हैं (हिरण्य ) सुवर्णकी पंखोंवाले पक्षी (हंस ) हैं तिस हंसात्म-
करूपी भगवान्के अर्थ नमस्कार है ॥४८॥
पदांगसंधिपर्वाणं स्वरव्यंजनभूषणम् ॥
यमातुश्चाक्षरं नित्यं तस्मै वागात्मने नमः ॥४९॥
जो पद, अंग, संधिपर्व ४ वेदके स्वरूप हैं स्वर व्यंजनके भूषण
हैं जिसको नित्य अक्षर कहते हैं-तिस वागात्मा (वाणीरूप)
भगवान्को नमस्कार है॥४९॥
यज्ञांगो यो वराहो वै भूता गामुज्जहार ह.॥
लोकत्रयहितार्थाय तस्मै वीर्यात्मने नमः॥ ५० ॥
जो यज्ञांग वराहरूप होके त्रिलोकीके हितके वास्ते पृथ्वीका
उद्धार करते भये तिस. वीर्यात्माको नमस्कार है॥५०॥
(२८६) भीष्मस्तवराज। यः शेते योगमास्थाय पर्यके नागभूषिते ।। फणासहस्ररचिते तस्मै निद्रात्मने नमः ॥५१॥ जो अपने योगके आश्रय होके हजार फणोंसे रची हुई शेष- शय्या पर शयन करते हैं तिस निद्रात्मारूपी भगवान्को नमस्कार ॥५१॥ यश्चिनोति सतां सेतुमृतेनामृतयोनिना ॥ धर्माथ व्यवहारार्थ तस्मै सत्यात्मने नमः॥५२॥ जो धर्मके वास्ते और व्यवहारके वास्ते अमृतयोनि सत्य करके श्रेष्ठ पुरुषों के पुलको चिनते हैं तिस सत्यात्मास्वरूपी भगवा- नके अर्थ नमस्कार है ॥५२॥ यं पृथग्धर्मचरणाः पृथग्धर्मफलैषिणः॥ पृथग्धः समचंति तस्मै धर्मात्मने नमः ॥५३ ॥ अलग २ धर्मका आचरण करनेवाले अलग २ धर्मों के फलोंकी इच्छावाले जन जिसको अलग २ धर्मोकरके पूजते हैं तिस धर्मात्मा भगवान्के वास्ते नमस्कार है ॥ ५३॥ यतः सर्वे प्रसूयंते ह्यनंगात्सांगदेहिनः॥ उन्मादः सर्वभूतानां तस्मै कामात्मने नमः॥५४॥ जिस शरीर रहित (कामदेवरूपी) ईश्वरके सकाशसे शरीरधारी जीव उत्पन्न होते हैं जो सब भूतोंका उन्मादक है तिस कामात्माके अर्थ नमस्कार है॥५४॥ यं व्यक्तिस्थितमव्यक्तं विचिन्वन्ति महर्षयः॥ क्षेत्रे क्षेत्रज्ञमासीनं तस्मै क्षेत्रात्मने नमः॥५५॥ महर्षिजन जिस अव्यक्त (अप्रकटरूपी) को अलग २ स्थित
भाषाटीकासमेत । (२८७)
हुआ को ढूंढते हैं क्षेत्रमें क्षेत्रज्ञरूपी बैठेहुए तिस क्षेत्रात्माके
अर्थ नमस्कार है ।। ५५ ॥
यं त्रिधाऽऽत्मानमात्मस्थं वृतं षोडशभिर्गुणैः ॥
प्राहुः सप्तदशं सांख्यास्तस्मै सांख्यात्मने नमः ॥५६॥
सोलह प्रकारके ( महदादिक ) गुणोंकरके संयुक्त हुए तीन
प्रकारके विश्व, तेजस, प्राज्ञ आत्माको आत्मामें स्थित हुएको
सांख्यवाले सतरहवाँ पुरुप पृथक् कहते हैं तिस सांख्यात्माके अर्थ
नमस्कार है ॥५६॥
यं विनिद्रा जितश्वासाः शांता दौता जितेंद्रियाः॥
ज्योतिः पश्यति युंजानास्तस्मै योगात्मने नमः॥५७॥
निद्राको जीतनेवाले, श्वासको जीतनेवाले शांत अंतःकरण और
इंद्रियोंको जीतनेवाले योगधारीजन जिसको ज्योतिःस्वरूप देखते
है, तिस योगात्माके अर्थ नमस्कार है ॥ ५७ ॥
अपुण्यपुयोपरमे यं पुनर्भवनिर्भयाः॥
शांताःसंन्यासिनो यांति तस्मै मोक्षात्मनेनमः॥५८॥
शांत संन्यासीजन पुनर्जन्मके भयसे रहित होके पाप पुण्य
रहित जिस (ब्रह्म) को प्राप्त होते हैं तिस मोक्षात्माके अर्थ नम-
योऽसौ युगसहस्रांते प्रदीप्तार्चिविभावसुः ॥
संक्षोभयति भृतानि तस्मै घोरात्मने नमः॥५९॥-
जो हजार युगोंके अंतमें (प्रलयकालमें) प्रदीप्तकिरणोंवाला
सूर्य ( होके ) सब भूतोंको क्षोभ करता है ( नष्ट करता) है तिस-
घोरात्माके अर्थ नमस्कार है ॥५९ ॥
(२८८) भीष्मस्तवराज। सभक्ष्य सर्वभूतानि कृत्वाचैकार्णवंजगत् ॥ बाल स्वपिति यश्चैकस्तस्मै मायात्मने नमः॥६॥ संपूर्ण भूतोंको भक्षणकर जगतमें एकार्णव जल फैलाके जो अकेला बालकस्वरूप होक सोता है तिस मायात्माके अर्थ नम- स्कार है ॥६॥ अजस्य नाभौ संभूतं यस्मिन्विश्वं प्रतिष्ठितम् ॥ पुष्करं पुष्कराक्षस्य तस्मै पद्मात्मने नमः॥६१ ॥ पुष्कराक्ष अजन्मा भगवान्की नाभिमें कमल उत्पन्न भया है और जिसमें विश्व प्रतिष्ठित (स्थित ) है तिस पद्मात्माके अर्थ नमस्कार है ॥६॥ सहस्रशिरसे चैव पुरुषायामितात्मने ॥ चतुःसमुद्रपर्यंके योगनिद्रात्मने नमः॥ ६२ ॥ हजार शिरोंवाले अतुल आत्मावाले पुरुषके अर्थ चार सागररूपी जलशय्यापर योगनिद्रात्मा होनेवालेके अर्थ नमस्कार है ।। ६२॥ यस्य केशेषु जीमूता नद्यः सर्वांगसधिषु ॥ कुक्षौ समुद्राश्चत्वारस्तस्मै योगात्मने नमः ॥६३ ॥ जिसके बालोंमें मेघ है और संपूर्ण अंगकी संधियों में नदी हैं कूखिमें चार समुद्र हैं तिस जलस्वरूपी भगवानके अर्थ नम- स्कार है॥६३॥ यस्मात्सर्वाः प्रसूयंते सर्गप्रलयविक्रियाः॥ यस्मिश्चैव प्रलीयते तस्मै हेलात्मन नमः ॥६॥ रचना और प्रलय पर्यंत सब विकार(क्रिया)जिससे उत्पन्न होते हैं भाषाटीकासमेत। (२८९) और जिसमें ही लीन हो जाते हैं तिस हेत्वात्माके अर्थ नम- स्कार है।। ६४॥ यो निषण्णो भवेद्रात्रौ दिवा भवति धिष्ठितः ॥ इष्टानिष्टस्य च द्रष्टा तस्मै द्रष्ट्रात्मने नमः॥६५॥ जो रात्रिविषे शिथिल हो जाता है दिनमें जागत् अवस्थामें अधिष्ठाता साक्षी रहताहै और इष्ट अनिष्टका ( भली बुरी वस्तु का ) देखनेवाला है तिस द्रष्टात्माके अर्थ नमस्कार है ॥ ६५ ॥ अकुंठं सर्वकार्येषु धर्मकार्यार्थमुद्यतम् ॥ वैकुंठस्य हि तद्रूपं तस्मै कार्यात्मने नमः ॥ ६६ ॥ जो सब कयौँमें निपुण तत्पर है धर्मकार्योंके वास्ते उद्यत है वह वैकुण्ठका ही रूप है तिस कार्यात्माके अर्थ नमस्कार है ॥६६॥ विभज्य पंचधाऽऽत्मानं वायुभूतः शरीरगः ॥ यश्चेष्टयति भूतानि तस्मै वाय्वात्मने नमः ॥६७॥ जो अपने आत्माका पांच प्रकार (पृथ्वी वायु, जल, अग्नि आकाश,ऐसे)विभाग करके वायुस्वरूप हो सब शरीरों में प्राप्त होके भूतोंको चेष्टा कराता है तिस वाय्वात्माके अर्थ नमस्कार है ।। ब्रह्म वक्रं भुजौ क्षत्रं कृत्स्नमूरूदरं विशः॥ पादौ यस्याश्रिताः शूद्रास्तस्मै वर्णात्मने नमः६८॥ ब्राह्मण जिसका मुख है,क्षत्रिय भुजा है, सब वैश्य जांघ और उदर है, शूद्र पैर है तिस वर्णात्माके अर्थ नमस्कार है ॥ ६८॥ युगेष्वावर्तते योगैसिवयनहायनैः ॥
(२९०) भीष्मस्तवराज। सर्गप्रलययोः कर्ता तस्मै कालात्मने नमः ॥६९॥ मास, ऋतु, वर्ष इन्हों करके अपने योगोंकरके जो युगों में विचरता है उत्पत्ति और प्रलयको करनेवाला है तिस कालात्मा (कालस्वरूपी) के अर्थ नमस्कार है ॥ ६९ ॥ यस्याग्निरास्य द्यौर्मूर्धा खं नाभिश्चरणौ क्षितिः ॥ सूर्यश्चक्षुर्दिशः श्रोत्रे तस्मै लोकात्मने नमः ॥७० ॥ अनि जिसका मुख है, स्वर्ग मस्तक है, आकाश नामि है,पृथ्वी चरण है, सूर्य नेत्र है, दिशा कान हैं, तिस लोकात्माके अर्थ नम- स्कार है॥ ७०॥ परः कालात्परो यज्ञात्परात्परतरो हि यः ॥ अनादिरादिविश्वस्य तस्मै विश्वात्मने नमः॥७१॥ वह परमात्मा कालसे पर है यज्ञसे पर है एरमसे भी परे है स्वयं अनादि है विश्वके आध है तिस विश्वात्माके अर्थ नम- स्कार है॥७१॥ विषये वर्तमानोऽयं तं वैशेषिकनिर्गुणैः॥ प्राहुर्विषयगोप्तारं तस्मै गोप्वात्मने नमः ॥७२॥ जो विषयमें वर्तमान है तिसको वैशेषिक निर्गुणोंकरके विष- यका गोप्ता रक्षक कहते हैं तिस गोप्ता रक्षक आत्माके अर्थ नमस्कार है ॥ ७२॥ अन्नपानेधनमयो रसप्राणविवर्डनः॥ यो धारयति भूतानि तस्मै प्राणात्मने नमः॥७३॥ जो अन्न पानका ईधनरूप हो रस प्राणोंको बढाता है जो भूतोंको धारण करता है तिस प्राणात्माके अर्थ नमस्कार है।। ७३ ॥
भाषाटीकासमेत। (२९१.) पिंगेक्षणसट यस्य रूपं दंष्ट्रानखायुधम् ॥ . दानवेंद्रांतकरणं तस्मै दृतात्मने नमः ॥७४ ॥ जिसका रूप पिंगल नेत्रोंवाला और पिंगलंवर्णजटाधारी है और जाड तथा नखोंका आयुध शस्त्रवाला है.दानवोंका नाश करनेवाला है तिस हप्तात्मा ( मदोन्मत्त अभिमानीरूप ) के अर्थ मन- कारहै ॥ ७४॥ रसातलगतःश्रीमाननंतो भगवान्विभुः॥ जंगधारयते कृत्स्नं तस्मै वीर्यात्मने नमः॥७५ ॥ जो श्रीमान् अनंत विभु भगवान् रसातलमें प्राप्त होके संपूर्ण जगतको धारण कर रहा है तिस वीर्यात्मा ( बलरूपी ) के. अर्थ नमस्कार है॥ ७॥ यो मोहयति भूतानि स्नेहपाशानुबंधनैः॥ सर्गस्य रक्षणार्थाय तस्मै मोहात्मने नमः॥७६ ॥ जो स्नेहपाशोंके अनुबंधों करके संपूर्ण भूतोंको प्राणिमात्रोंको संसारकी रक्षाके वास्ते मोहता है तिस मोहनरूपीके अर्थ नमस्कार है॥ ७६॥ भृतलातलमध्यस्थो हत्वा तु मधुकैटभौ ॥ उद्धृता येन वैवेदास्तस्मै मत्स्यात्मने नमः ॥ ७७॥ जिसने पाताललोकमें स्थित हुए मधु कैटभ दैत्य मारके वेदोंका उद्धार किया तिस वेदात्माके अर्थ नमस्कार है ॥ ७७ ॥ ससागरनगां बिभ्रत्सप्तद्वीपां वसुन्धराम ॥ यो धारयति पृष्ठेन तस्मै कूर्मात्मने नमः ॥ ७८ ॥ H..
--
(२९२) भीष्मस्तवराजः।
समुद्र और पर्वतों सहित सात द्वीपोंवाली पृथ्वीको जो अपनी
पीठ करके धारण करता है तिस कूर्म (कछुआ) स्वरूपी भगवानके
अर्थ नमस्कार है ॥ ७८॥
एकार्णवे हि मनां तां वाराह रूपमास्थितः॥
उद्दधार महीं योऽसौ तस्मै क्रोडात्मने नमः॥७९॥
जो वराह (सूकर) रूप करके एकार्णव जलमें डूबी हुई पृथ्वीका
उद्धार करता भया तिस वराहरूपी भगवान्के अर्थ नम-
स्कार है ॥७९॥
नारसिंह वपुः कृत्वा यत्रैलोक्यभयंकरः॥
हिरण्यकशिपु जन्ने तस्मै सिंहात्मने नमः ॥८० ॥
जो त्रिलोकीको भयंकर नृसिंहरूप धारणकरके हिरण्यकशिपु
दैत्यको मारता भया तिस नृसिंहरूपी भगवान्के अर्थ नमस्कार
॥८० ॥
वामन रूपमास्थाय बलिं संयम्य मायया॥
सहस्रार्जुनहतैव तस्मा उग्रात्मने नमः ॥८१ ॥
जो वामनरूप धारण कर माया करके बलिको वशमें करता भया
और ये तीनों लोक मांप लिये तिस उग्रात्माके अर्थ नमस्कार
है॥ ८१॥
जमदग्निसुतो भूत्वा रामः परशुधृक्प्रभुः ॥
इमे क्रांतास्त्रयो लौकास्तस्मै क्रांतात्मने नमः॥८२॥
जो प्रभु जमदग्नि ऋषिका पुत्र परशुराम होके सहस्रबाहु
राजाको मारता भया तिसक्रान्तामाके अर्थ नमस्कार है ॥ ८२॥
रामो दाशरथिर्भूत्वा पौलस्त्यकलनंदनम् ॥
जघान रावणं संख्ये तस्मै क्षत्त्रात्मने नमः ॥८३॥
भाषाटीकासमेत। (२९३) जो दशरथका पुत्र रामचंद्रजी होके पुलस्त्य ऋषिके कुलमें होने- वाले रावणको युद्धमें मारते भये तिस क्षत्रीरूप आत्माके अर्थ नमस्कार है ॥ ८३॥ वसुदेवसुतः श्रीमान्वासुदेवो जगत्पतिः ॥ जहार वसुधाभारं तस्मै कृष्णात्मने नमः॥ ८४॥ जो वसुदेवके पुत्र श्रीमान् वासुदेव पृथ्वीके भारको उतारते भये तिस श्रीकृष्णात्माके अथ नमस्कार है ॥ ८४ ॥ बुद्धरूपं समास्थाय सर्वरूपपरायणः ॥ मोहयन्सर्वभूतानि तस्मै मोहात्मने नमः ॥ ८५ ॥ जो बुद्धावतार करके सब रूपोंमें परायण हो सब भूतोंको मोहता है तिस मोहात्माके अर्थ नमस्कार है ॥ ८ ॥ हनिष्यति कलेरते म्लेच्छांस्तुरगवाहनः ॥ धर्मसंस्थापनार्थाय तस्मै कल्क्यात्मने नमः॥ ८६॥ जो कलियुगके अंतमें घोडाकी सवारी करके ( अवतार हो) धर्मकी स्थिति करनेके वास्ते म्लेच्छोंको मारेगा तिस कल्कि आत्माके अर्थ नमस्कार है ॥ ८६॥ आत्मज्ञानमिदं ज्ञानं ज्ञात्वा पंचस्ववस्थितः ॥ यज्ञानेनाधिगच्छति तस्मै ज्ञानात्मने नमः ॥८॥ पांच भूतोंमें अवस्थित हुआ (जीव) इस आत्मज्ञानको जानके जिसको ज्ञानका अधिष्ठाता मानता है तिस ज्ञानात्माके अर्थ नम्- स्कार है ॥ ८७ ॥ .
(२९४) भीष्मस्तवराज।
अप्रमेयशरीरस्य सर्वतो बुद्धिचक्षुषे ।
अपारापरिमेयाय तस्मै दिव्यात्मने नमः॥ ८८
अप्रमेयशरीवाले सब तर्फ बुद्धि और नेत्रोंवाले अपार अ
रिमेय तिस दिव्यात्माके अर्थ नमस्कार है ॥ ८८ ॥
जटिने दंडिने नित्यं लंबोदरशरीरिणे ॥
कमंडलुनिषंगाय तस्मै ब्रह्मात्मने नमः॥ ८९॥
जटाधारी नित्य दण्डधारी लंबोदर शरीवाले कमंडलुरूप (तर
कस) वा शस्त्रवाले तिस ब्रह्मात्मा (ब्रह्मारूपी) के अर्थ नमो
स्कार है ॥८९॥
शूलिने त्रिदशेशाय त्र्यंबकाय महात्मने ।
भस्मदिग्धोर्ध्वलिंगाय तस्मै रुद्रात्मने नमः॥९०॥
त्रिशूलधारी देवताओंके पतित्र्यंबकतीन नेत्रोंवाले अथवा तीनों
लोकों के पिता महात्मा भस्मसे लिपेहुए शरीखाले ऊर्ध्वलिंगवाले
ऐसे रुद्रात्माके अर्थ नमस्कार है ॥९० ॥
चंद्रार्धकृतशीय व्यालयज्ञोपवीतिने ॥
पिनाकशूलहस्ताय तस्मा उग्रात्मने नमः ॥९१॥
मस्तकमें अई चंद्रमाको धारण करनेवाले सर्पका यज्ञोपवीत
धारण करनेवाले धनुष और शूलको हाथमें धारण करनेवाले तिस
उपात्माके अर्थ नमस्कार है ॥ ११॥
पंचभूतात्मभूताय भूतादिनिधनाय च ॥
अक्रोधद्रोहमोहाय तस्मै शांतात्मने नमः॥ ९२॥
पंचभूतोंके आत्मभूत भूतोंकी आदि और अंतस्वरूप क्रोध द्रोह
मोहसे रहित तिस शांतात्माके अर्थ नमस्कार है ॥ ९२ ॥
भापाटीकासमेत। (२९६) यस्मिन्स। यतः सर्वे यः सर्वे सर्वतश्च यः॥ यश्च सर्वमयो देवस्तस्मै सर्वात्मने नमः ॥ ९३ ॥ जिसविषे सब है जिससे सब होतेहैं जो सर्व स्वरूप है सब जगह है जो सर्वमय देव है तिस सर्वत्माके अर्थ नमस्कार है यहां कर्ता, करण, उपादान, कर्म, सब कुछ ईश्वर (ब्रह्म) ही माना है ॥९३॥ विश्वकर्मन्नमस्तेऽस्तु विश्वात्मा विश्वसंभवः ।। अपवर्गस्थभूतानां पंचानां परतः स्थितः ॥९४ ॥ हे विश्वकर्मन् ! तुम्हारे अर्थ नमस्कार हैं तुम विश्वके आत्मा हो तुमसे विश्व होता है मोक्षमें स्थितहुए भूतोंको पांच तत्त्वोंसे पर अलग स्थतहुए प्राप्त हो ॥ ९ ॥ नमस्ते त्रिषु लोकेषु नमस्ते परतस्त्रिषु ॥ नमस्ते त्रिषु सर्वेषु त्वं हि सर्वमयो निधिः ॥ ९५॥ त्रिलोकीमें (स्थित हुए) तुम्हारे अर्थ नमस्कार है तीन गुणों विपे अथवा त्रिलोकी विपे (परतः) अलग अधिष्ठाता रहनेवाले तुम्हारे अर्थ नमस्कार है त्रिगुणोंमें वा त्रिलोकीमें सब जगह तुम ही सर्वमय निधि हो ॥ ९५ ॥ नमस्ते भगवन्विष्णो लोकानां प्रभवाप्ययः॥ वं हि कर्ता हृषीकेश संहर्ता चापराजितः ॥ ९६ ।। हे भगवन् ! हे विष्णो ! तुम्हारे अर्थ नमस्कार है तुम लोकोंकी उत्पत्ति और नाश करनेवाले हो, हे हृषीकेश! तुम ही कर्ता संहर्ता और अपराजित अर्थात् किसीसे नहीं हारनेवाले हो ॥ ९६ ॥ तेन पश्यामि भगवन्दिव्येषु त्रिषु वर्त्मसु ॥
(२९६) भीष्मस्तवराज। तच पश्यामि तत्त्वेन यत्ते रूपं सनातनम् ॥ ९७॥ हे भगवन् ! दिव्य तीन लोकोंमें तुम्हारे रूपको मैं नहीं देखता हूँ और जो तुम्हारा सनातनरूप है उसको तो मैं तत्त्वसे देखता हूँ॥९७॥ दिवं ते शिरसा व्याप्तं पद्भ्यां देदी वसुंधरा ॥ विक्रमेण त्रयो लोकाः पुरुषोऽसि सनातनः ॥९८॥ स्वर्ग तुम्हारे शिर करके व्याप्त हो रहा है और पैरोंकरके पृथ्वी देवी व्याप्त हो रही है तुम्हारे पराक्रम करके तीनों लोक व्याप्त रहते हैं तुम सनातन पुरुष हो ॥ ९८ ॥ दिशो भुजारविश्चक्षुर्वीर्य शुक्रः प्रजापतिः॥ सप्त मार्गा निरुद्धास्ते वायोरमिततेजसः ॥ ९९ ॥ दिशा भुजा हैं सूर्य नेत्र है शुक्र प्रजापति वीर्य है और अतुल तेजवाले तुम्हारी वायु करके सात मार्ग रुक रहे हैं ॥ ९९ ॥ अतसीपुष्पसंकाशं पीतकौशेयवाससम् ॥ ये नमस्यति गोविंदन तेषां विद्यते भयम् ॥ १०॥ अतसी (अलसी) के पुष्पसमान नीले कांतिवाले पीले रेशमी वस्त्रोंवाले गोविंद भगवान्को जो नमस्कार करते हैं उनको भय नहीं है ॥ १०॥ नमो नरकसंत्रासरक्षामण्डलकारिणे ॥ संसारनिम्नगावर्त्ततरिकाष्ठाय विष्णवे ॥१॥ नरकके वाससे रक्षामंडल. करनेवाले संसाररूपी नदीके आवर्त ( भौंहरियोंमें) नौकारूप मार्गवाले विष्णु भगवान्के अर्थ नमस्कार है॥१॥ नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च ॥
, भाषाटीकासमेत । (२९७) जगद्विताय कृष्णाय गोविंदाय नमोनमः॥२॥ ब्रह्मण्य देवके अर्थ गौ ब्राह्मणों के हित करनेवाले और जगत्का हित करनेवाले श्रीकृष्ण गोविंदके अर्थ वारंवार नमस्कार है ॥२॥ प्राणकांतारपाथेयं संसारच्छेदभेषजम् ॥ दुःखशोकपरित्राणं हरिरित्यक्षरद्वयम् ॥३॥ प्राणरूपी गहरखनमें खर्ची (उपयोगी वस्तु ) संसारका छेदन करनेमें औषधरूप, दुःख शोकसे रक्षा करनेवाले ऐसे हरि ये दो अक्षर हैं ॥३॥ यथा विष्णुमयं सत्यं यथा विष्णुमयं जगत् ॥ यथा विष्णुमयं सर्व पाप्मनो नाशकस्तथा ॥४॥ जैसे विष्णुमय सत्य है और विष्णुमय जगत् है जैसे संपूर्ण वि- ष्णुमय है तैसे मेरे पापको नष्ट करनेवाले विष्णु हैं ॥४॥ खां प्रपन्नाय भक्ताय गतिमिष्टां जिगीषवे ॥ . यच्छ्रेयः पुंडरीकाक्ष तयायस्व सुरेश्वर ॥५॥ हे सुरेश्वर । हे पुंडरीकाक्ष ! तुम्हारी शरण प्राप्तहुए मनोवांछित गतिको चाहनेवाले भक्तके अर्थ जो कल्याण है उसको आप चितवन करो ॥५॥ इति विद्यातपोयोनिरयोनिर्विष्णुरीडितः॥ वाग्यज्ञेनाचितो देवः प्रीयतां मे जनार्दनः॥ ६ ॥ इसप्रकारसे विद्या तपकी योनि और अयोनि (उत्पत्तिरहित) विष्णु. भगवान स्तुत किये वाणीरूप यज्ञकरके पूजित किये जनार्दन देव मुझपर प्रसन्न हों ॥६॥ -- &..
(२९८) भीष्मस्तवराज।
नारायणपरं ब्रह्म नारायणपरं तपः॥
नारायणपरं चेदं सर्व नारायणात्मकम् ॥७॥
नारायण परब्रह्म हैं नारायण परम तप हैं यह संपूर्ण विश्व नारा-
यणपर है नारायणात्मक (नारायण स्वरूप ) हैं॥ ७ ॥
वैशंपायन उवाच।
एतावद्वक्त्वा वचनं भीष्मस्त्वाहतमानसः ॥
नम इत्येव कृष्णाय प्रणाममकरोत्तदा ॥८॥
वैशंपायन कहते हैं-आदरसहित मनवाला भीष्मपितामहजी
इतना यह वचन कहके तब 'श्रीकृष्णाय नमः 'ऐसे श्रीकृष्णको
प्रणाम करता भया ॥८॥
अभिगम्य तु योगेन भक्ति भीष्मस्य माधवः ॥
त्रैलोक्यदर्शने ज्ञानं दिव्यं दत्त्वा ययौ हरिः॥ ९॥
श्रीकृष्ण हरि भगान् योगकरके भीष्मपितामहजी भक्तिको
प्राप्त होके त्रिलोकी दर्शनमें दिव्य ज्ञान देके जाते भये ॥ ९॥
तस्मिन्नुपरते शब्दे ततस्ते ब्रह्मवादिनः॥
भीष्मं वाग्भिवष्पिकंठास्तमानचुमहामतिम् ॥१०॥
तिस भीष्मजी विर्षे शब्द (बोलना) बंदहोगया तब वे ब्रह्मवा-
दीऋषिलोग गद्गद कंठवाले होके महामति तिस भीष्मजीको
वचनोंकरके पूजते भये ॥ ११० ॥
ते स्तुवंतश्च विप्रायाः केशवं पुरुषोत्तमम् ॥
भीष्मं च शनकैः सर्वे प्रशशंसुः पुनः पुनः ॥११॥
भाषाटीकासमेत । (२९९)
पुरुषोत्तम श्रीकृष्णकी स्तुति करते हुए वे सब उत्तम ब्राह्मण
वारंवार शनैः २ भीष्मजीको सराहते भये ॥ ११ ॥
यं योगिनः प्राणविमोक्षकाले यत्नेन चित्ते विनिवे-
शयति ॥ साक्षात्पुरस्तादरिमीक्षमाणः प्राणा
जही प्राप्तकालो हि भीष्मः ॥ १२ ॥
प्राण निकलनेके समय योगीजन जिस भगवान्को यत्नसे अपने
चित्तमें ठहराते हैं तिस हरि भगवान्को साक्षात अपने आगे देखता-
हुआ प्राप्त भया है काल जिसका ऐसा भीष्मपितामहजी अपने
प्राणोंको त्यागता भया ॥ १२ ॥
शुक्लपक्षे दिवा भूमौं गंगायां चोत्तरायणे।
धन्यास्तात मरिष्यति हृदयस्थे जनार्दने ॥ १३ ॥
हे तात ! शुक्लपक्षमें दिनमें गंगाजीके तटपर भूमिमें उत्तरायण
कालमें जनार्दन भगवान्को हृदयमें स्थित करक जो मरेंगे
वे धन्य है ॥ १३॥
विदित्वा भक्तियोगं तु भीष्मस्य पुरुषोत्तमः ॥
सहसोत्थाय संतुष्टो यानमेवान्वपद्यत ॥१४॥
पुरुषोत्तम भगवान् भीष्मजीके भक्तियोगको जानके प्रसन्न हो
खड़े होके शीघ्रही गमन करते भये ॥ १४ ॥
केशवः सात्यकिश्चैव रथेनैकेन जग्मतुः ॥
अपरेण महात्मानौ युधिष्ठिरधनंजयौ ॥ १५ ॥
(३००) भीष्मस्तवराज। श्रीकृष्णभगवान् और सात्यकि एक रथमें बैठक गमन करते भये दूसरे स्थमें बैठके युधिष्ठिर अर्जुन गमन करते भये ॥ १५॥ भीमसेनो यमौ चोभौ रथमेकं समास्थिताः॥ कृपो युयुत्सुः सूतश्च संजयश्चापरं रथम् ॥ १६ ॥ भीमसेन और नकुल, सहदेव एक ही रथमें बैठते भये कृपा- चार्य, युयुत्सु, सूत, संजय ये एक रथमें बैठते भये ॥ १६ ॥ ते स्थैर्नगराकारः प्रयाताः पुरुषर्षभाः ॥ नेमिघोषेण महता कम्पयंतो वसुंधराम् ॥ १७ ॥ नगरके समान (ऊंचे) आकारवाले रथोंमें बेठेहुए ये उत्तम पुरुष सबही लोग रथचक्रोंके शब्दकरके संपूर्ण पृथ्वीको कँपातेहुए गमन करते भये ॥ १७ ॥ ततो गिरः पुरुषवरस्तवान्विता द्विजेरिताः पथि सुमनाः स शुश्रुवे ॥ कृतांजलिं प्रणतमथापरं जनं स केशिहा मुदितमनाभ्यनंदत ॥१८॥ इसके अनंतर कशी दैत्यको मारनेवाले श्रीकृष्ण विष्णु भगवा- की स्तुतिके वचनोंको ब्राह्मणोंकरके कहेहुओंको सुनतेभये तब प्रसन्नमनवाले श्रीकृष्ण अंजली बांधके खड़ेहुए प्रणतहुए अन्य- जनको प्रसन्नमन करके सराहते भये ॥ १८ ॥ अनादिनिधन विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् ॥ धर्माध्यक्ष स्तुवन्नित्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १९ ॥ m
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-
भाषाटीकासमेत । (३०१)
आदि अन्त रहित सब लोकोंके महेश्वर धर्मके अधिपति ऐसे
विष्णु अर्थात् सबलोकमें व्याप्त रहनेवाले देवको नित्य प्रति स्तुति
करता हुआ जन सब पापोंसे छूटता है ॥ १९ ॥
इमं स्तवं यः पठति शाङ्गधन्वनः शृणोति वा भ-
क्तिसमन्वितो जनः ॥ स चक्रधृक्प्रतिहतसर्वक-
ल्मषो जनार्दनं प्रविशति देहसंक्षये ॥ १२० ॥
जो मनुष्य विष्णुके इस स्तोत्रको भक्तिसे पढ़ता है वह शरीर
नाशहुए पीछे विष्णुकरके सब पापोंसे छूटके विष्णुमें लीन हो-
जाता है ।। १२०॥
अशनिशितसुधारं यस्य चक्रं सुचारू मणिकनक-
विचित्रे कुंडले यस्य कर्णे ॥ भ्रमरशतसहलैः
सेविता यस्य माला असुरकुलनिहंता प्रीयतां
वासुदेवः ॥२१॥
जिस विष्णु भगवान्का चक्र वज्रसमान पैना और सुन्दर
धारवाला उत्तम है और मणि तथा सुवर्णसे विचित्र जिसके का-
नोंमें कुंडल हैं जिसकी माला सैयडों हजारों भ्रमरों करके सेवित
है असुरकुलको मारनेवाले वे वासुदेव भगवान् प्रसन्न हों ॥२१॥
स्तवराजः समाप्तोऽयं विष्णोरद्भुतकर्मणः ॥
गांगेयेन पुरा गीतो महापातकनाशनः ॥२२॥
अद्भुत कर्मवाले विष्णुका यह स्तवराज समाप्त भया महापापोंको
नष्ट करनेवाला यह स्तोत्र पहले भीष्मपितामहने कहा है ॥२२॥
(३०२) भीष्मस्तवराज। श्रीभगवानुवाच। यः संपठेदिदं स्तोत्रं मम जन्मानुकीर्तनम् ॥ देवलोकमतिक्रम्य तस्य लोको यथा मम ॥१२३॥ श्रीभगवान् बोले-कि जिसमें मेरे जन्मचरित्रोंका वर्णन है. ऐसे इस मेरे स्तोत्रका जो पुरुष पाठ करेगा वह देवलोक अर्थात् स्वर्गादिलोकोंका अतिक्रमण करके मेरे लोकको. प्राप्त होगा ॥ १२३॥ इति श्रीमन्महाभारते शतसाहत्यां संहितायां वैयासि- क्यां शांतिपर्वणि भीष्मयुधिष्ठिरसंवादे पं० वसतिरामकृतभापाटीकायां भीम- स्तवराजः समाप्तः। MA
WATER
॥श्रीः॥
अथानुस्मृतिः।
बेरी निवासी पं० वसतिरामविरचित
-
भाषाटीकासमेता।
सेयं
क्षेमराज-श्रीकृष्णदासश्रेष्ठिना
सुम्बय्यां
स्वकीये "श्रीवेङ्कटेश्वर” (स्टीम् ) यन्त्रालये
मुद्रयित्वा प्रकाशितः।
संवत् १९८०, शके १८४५.
सर्वाधिकार "श्रीवेंकटेश्वर" यन्त्रालयाध्यक्षने स्वाधीन रक्खा है.
* को अथानुस्मृतिः। . . actacleodoecootecteoroot Ge . न वासुदेवात्परमस्ति मङ्गलं न वासुदेवात्परमस्ति पावनम् । न वासुदेवात्परमस्ति दैवतं तं वासुदेवं प्रणमन सीदति ॥१॥ *BOOctarotectaclestee sese ta అత్యం श्रीः। अथानुस्मृतिः। भाषाटीकासमेता। altatunmmms शतानीक उवाच । महामते महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ॥ अक्षीणकर्मबंधस्तु पुरुषो द्विजसत्तमः ॥ १॥ शतानीक बोले- हे द्विजसत्तम ! हे महामते ! हे महाप्राज्ञ ! है सर्वशास्त्रविशारद ! जिसका कर्मरूपी बंधन नहीं छूटा हो वह सततं किं जपेज्जाप्यं विबुधः किमनुस्मरन् । मरणे यज्जपेज्जाप्यं यं च भावमनुस्मरन ॥२॥ निरंतर किस मंत्रको जपै पंडितजन क्या स्मरण करै मरणसम- यमें जो जपने लायक जपै और जिस भावको स्मरण करता हुआ॥२॥ यच्च ध्यात्वा हिजश्रेष्ठ पुरुषो मृत्युमागतः॥ परं पदमवाप्नोति तन्मे वद महामुने ॥ ३ ॥ जिसका ध्यान करके पुरुष मृत्युको प्राप्त होके परमपद(मोक्षको) प्राप्तहो हे द्विजश्रेष्ठ ! हे महामुने ! वह मेरे आगे कहो ॥३॥ शौनक उवाच । इदमेव महाप्राज्ञ पृष्टवांश्च पितामहम् ॥ भीष्मं धर्मभृतां श्रेष्टं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ४॥ २०
(३०६)
अनुस्मृति।
शौनकजी कहते हैं हे महाप्राज्ञ ! इसको ही धर्मका पुत्र युधिष्ठिर
धर्मधारयोंमें श्रेष्ठ भीष्मपितामहजीको पूछता भया ॥ ४ ॥
युधिष्ठिर उवाच ।
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
प्रयाणकाले किं चिंत्यं मुमुक्षोस्तत्त्वचिंतकैः॥५॥
युधिष्ठिरबोले-हे पितामह ! हे महाप्राज्ञ ! हे सर्वशास्त्रविशारद !
तत्त्वको चितवन करनेवाले मुमुक्षु ( मोक्षकी इच्छावाले ) जनोंने
मरणसमयमें क्या चितवन करना चाहिये ॥५॥
किनु स्मरन् कुरुश्रेष्ठ मरणे पर्युपस्थिते
प्राप्नुयां परमां सिद्धिं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वत॥६॥
हे कुरुश्रेष्ठ !मरणसमय प्राप्त होवे तब किसका स्मरण करता हुआ
जनपरम सिद्धिको प्राप्त होवे यह तत्त्वसे मैं सुना चाहताहूँ॥६॥
भीष्म उवाच ।
तयुक्तं स्वहितं सूक्ष्म प्रश्नमुक्तं त्वयाऽनघ ।
शृणुष्वावहितो राजन्नारदेन पुराश्रुतम्॥७॥
भीष्मजी बोले-हे राजन् ! तुमने वही यथायोग्य स्वहित सूक्ष्म
प्रश्न कहा है जोकि, पहले नारदने सुनाथा अब सावधान होके
तुम सुनो ॥ ७॥
श्रीवत्सांकं जगद्वीजमनंतं लोकसाक्षिणम्॥
पुरा नारायणं देवं नारदः परिपृष्टवान् ॥८॥
पहले श्रीवत्सचिह्नवाले जगत्के बीज अनन्तलोकके साक्षी ना-
रायणदेवको नारद पूछता भया ॥ ८॥
भाषाटीकासमेत । (३०७) नारद उवाच । समक्षरं परं ब्रह्म निर्गुणं तमसः परम् ॥ आहुर्वेद्यं परं धाम ब्रह्माणं कमलोद्भवम् ॥९॥ नारदजी बोले-तुम परम अक्षर (नहीं घटनेवाले)ब्रह्म हो नि - णमायासे वा अज्ञानसे परे हो कमलसे उत्पन्न हुए ब्रह्माजीको जानने योग्य परमधाम तुमको कहते हैं ॥ ९ ॥ भगवन भूतभव्येश श्रद्दधानजितेंद्रियैः ॥ कथं भक्तैर्विचिंत्योऽसि योगिभिर्मोक्षकांक्षिभिः १० हे भगवन् ! हे भूतभविष्यत्के पति ! श्रद्धावान् भक्तोंकरके और मोक्षकी इच्छावाले योगीजनोंकरके आप कैसे चिन्तवन करेजावो ॥ १०॥ किंनु जाप्यं जपेन्नित्यं कल्य उत्थाय मानवः । कथं जपेत्सदा ध्यायेद् ब्रूहि तत्त्वं सनातनम् ॥११॥ प्रातःकाल उठके मनुष्यने क्या जाप्य मन्त्र जपना चाहिये कैसे जप कैसे सदा ध्यान करै ऐसे सनातनतत्त्वको कहो ॥ ११ ॥. भीष्म उवाच। श्रुत्वा च देवदेवर्षेर्वाक्यं वाक्यविशारदः॥ प्रोवाच भगवान्विष्णुारदाय च धीमते ॥ १२ ॥ भीष्मपितामह कहते हैं-वाक्यविशारद विष्णु भगवान् देवऋषि नारदके वचनको सुनके बुद्धिमान नारदजीके अर्थ बोले ॥ १२ ॥ श्रीभगवानुवाच। हत ते कथयिष्यामि इमां दिव्यामनुस्मृतिम् ॥ .
(३०८) अनुस्मृति ।
मरणे मामनुस्मृत्य प्राप्नोति परमां गतिम् ॥ १३॥
श्रीभगवान् बोले-अब तेरे आगे इस दिव्य अनुस्मृति(स्तोत्रको)
कहूँगा मरणसमयमें मेरा स्मरण करके मनुष्य परमगतिको प्राप्त
होता है ॥ १३॥
यामधीत्य प्रयाणे तु मदावायोपपद्यते ॥
ओंकारमग्रतः कृत्वा मां नमस्कृत्य नारद ॥१४॥
जिसको मरणसमयमें पढके मेरे भावको प्राप्त होता है (तिसअ-
नुस्मृतिको सुन ) हे नारद ! कारको आगेकर सुझको नम
स्कार करके ॥१४॥
एकाग्रः प्रयतो भूत्वा इमं मंत्रमुदीरयेत् ॥
ओं नमो भगवते वासुदेवाय इत्ययम् ॥ १५ ॥
एका सावधान होके इस मन्त्रको उच्चारण:करे(ॐनमो भग-
वते वासुदेवाय) ऐसा यह मन्त्र है।। १५ ॥
अवशेनापि यन्नाम्नि कीर्तिते सर्वपातकैः ।
पुमान्विमुच्यते सद्यः सिंहवस्तैमूंगैरिव ॥ १६ ॥
अवश हुआ पुरुष भी इस नामका कीर्तन करनेसे सब पापोंसे
शीघ्र ही छूट जाता है जैसे सिंहसे भयभीत हुए मृग अलग हो
जाते हैं॥ १६॥
क्षराक्षरविसृष्टस्तु शोच्यते पुरुषोत्तमः ।।
अव्यक्तं शाश्वतं देवं प्रभवं पुरुषोत्तमम् ॥ १७ ॥
(क्षरअक्षरविशिष्ट ) जिसने जीव,ईश्वर रचे हैं ऐसे पुरुषोत्तमः
भगवान् ध्यायेजाते हैं; अव्यक्त शाश्वत (सनातन) देव जगत्में
अपने अंशादिकसे उत्पन्न होनेवाले पुरुषोत्तम ॥ १७॥
भाषाटीकासमेत। '(३०९) प्रपद्ये पुंडरीकाक्षं देवं नारायणं हरिम् ॥ लोकनाथं सहस्राक्षमक्षरं परमं पदम् ॥ १८॥ पुण्डरीकाक्ष नारायण देव हरिकी मैं शरण हूँ लोकोंके नाथ सहस्राक्ष अक्षर परमपद ॥ १८॥ भगवंतं प्रपन्नोऽस्मि भूतभव्यभवत्प्रभुम् ॥ स्रष्टार सर्वलोकानामनंतं विश्वतोमुखम् ॥ १९ ॥ भूत भविष्यत् वर्तमानके स्वामी सब लोकोंके कर्ता संब तर्फ मुखवाले ऐसे अनन्त भगवान्की मैं शरण हूँ ॥ १९॥ पद्मनाभ हषीकेशं प्रपद्य सत्यमच्युतम् ॥ हिरण्यगर्भममृतं भूगर्भ तमसः परम् ॥ २० ॥ पद्मनाभ हृषीकेश सत्यस्वरूप अच्युत (अपने स्थानसे पतित नहीं होनेवाले ) हिरण्यगर्भ, अमृत, भूगर्भ,तम अर्थात् माया और अज्ञानसे परे (अलग रहनेवाले) ऐसे भगवान्की मैं शरण हूँ॥२०॥ प्रभोः प्रभुमनाद्यं च प्रपद्ये तं रविप्रभम् ॥ सहस्रशीर्षक देवं महर्षेः सत्त्वभावनम् ॥२१॥ प्रभोः अर्थात् ब्रह्मादिक प्रभुवोंके प्रभु (स्वामी ) अनादि सूर्य समान कांतिवाले हजार शिरोंवाले महर्षि कपिलाचार्य आदि रूपसे सत्त्व सांख्यशास्त्र आदिको प्रवृत्त करनेवाले ऐसे भग- वान्की शरण हूँ॥ २१॥ प्रपद्ये सूक्ष्ममचलं वरेण्यमनघं शुचिस् ॥ नारायण पुराणेशं योगावासं सनातनम् ॥ २२ ॥ सूक्ष्म, अचल; वरेण्य, (प्रधान, मुख्य पुरुष) पापरहित,पवित्र, नारायण; पुराणेश, योगावास अर्थात् योगके निवासस्थान, सनातन ॥ २२॥ ~ . -- (३१०.) अनुस्मृति। सयोगं सर्वभूतानां प्रपद्ये शिवमीश्वरम् ॥ यः पुरा प्रलये प्राप्ते नष्टे स्थावरजंगमे ॥ २३ ॥ संपूर्ण भूतोंके संयोगरूप शिव ईश्वर की शरण हूँ और जो पहले प्रलयसमयमें स्थावर जंगम सब जगत् नष्ट हुए पर ॥२३॥ ब्रह्मादिषु प्रलीनेषु नष्टे लोके चराचरे ॥ एकस्तिष्ठति विश्वात्मा स मे विष्णुः प्रसीदतु॥२४॥ ब्रह्मादिक और चराचर लोक नष्टहुएपर जो विश्वात्मा अकेला स्थित रहता है सो विष्णु सुझपर प्रसन्न हो ॥ २४ ॥ यः प्रभुः सर्वलोकानां येन सर्वमिदं ततम् ॥ चराचरगुरुदेव स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥ २५ ॥ जो सब लोकोंका प्रभु है जिसने यह संपूर्ण जगत् रचाक्खा है जो देव चराचर जगत्का गुरु है सो विष्णु मुझपर प्रसन्न हो॥२५॥ आभूतसंप्लवे चैव प्रलीने प्रकृतौ महान् ॥ योऽवतिष्ठति विश्वात्मा स मे विष्णुःप्रसीदतु ॥२६॥ महा प्रलयके समयमें महान् प्रकृति (माया) लीन हुयेपर जो विश्वात्मा अवशेष बाकी रहता है सो विष्णु मुझपर प्रसन्न हो॥२६॥ येन क्रांतास्त्रयो लोका दानवाश्च वशीकृताः ॥ शरण्यः सर्वलोकानां स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥२७॥ जिसनेतीनोंलोक (अपने पैरोंसे) नापलिए और दानव (दैत्य) वशमें करलिये जो सब भूतोंको शरण देनेवाला है सो विष्णु मुझ पर प्रसन्न हो ॥२७॥ Ama
-
~
भाषाटीकासमेत (३११).
यस्य हस्ते गदा चक्र गरुडो यस्य वाहनम् ॥
शंखः करतले यस्य स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥२८॥
जिसके हाथमें गदा और चक्र है गरुड़ जिसका वाहन है जिसके
हाथमें शंख है वह विष्णु मुझपर प्रसन्न हो ॥ २८ ॥
कार्य क्रिया च करणं कर्ता हेतुः प्रयोजनम् ॥
अक्रिया करणाकार्य स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥२९॥
जो कार्यस्वरूप और क्रिया, करण, कर्ता, हेतु, प्रयोजन तथा
अक्रिया, अकरण, अकार्य आपही है वह विष्णु मुझपर
प्रसन्न हो ॥ २९ ॥
चतुर्भिश्च चतुर्मिश्च द्वाभ्यां पचभिरेव च ॥
इयते च पुन भ्यां स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥३०॥
जो चार वेदोंकरके चार होता उद्गाता आदि आचार्योंकरके
द्वाभ्यां अर्थात् दो स्त्री पुरुषोंकरके पांच प्राण अपानादिकों करके
फिर दोहाथ और नुवा करके हवन किया जाता है सो (होमात्मक)
विष्णु भगवान् मुझपर प्रसन्न हो ॥ ३० ॥
शमीगर्भस्य यो गर्भस्तस्य गर्भस्य यो रिपुः ॥
रिपुगर्भस्य यो गर्भः स मे विष्णुः प्रसीदतु ।। ३१ ।।
शमीगर्भका अर्थात् अरणिगर्भ अनिका जो गर्भ सुवर्ण, तिस
सुवर्णके गर्भ कहिये हिरण्यगर्भ शत्रु (हिरण्यकशिपु) तिस शत्रु
गर्भके गर्भ कहिये प्रहादके गर्भ अर्थात् हृदय अंतःकरणमें निवास
करने वाले जो विष्णु है अथवा तिसप्रहादके भर्त्ता नाम पालन पोषण
करनेवाले स्वामी है सो विष्णु भगवान् मुझपर प्रसन्न हो यहाँ
इस श्लोकके अन्य भी अर्थ हैं सो यहाँ विस्तारभयसे नहीं
लिखे हैं ॥३॥
(३१२)
अनुस्मृति ।
अग्निसोमाताराणां ब्रह्मरुद्रेद्रयोगिनाम् ॥
यस्तेजयति तेजांसि स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥३२॥
जो अग्नि,चंद्रमा,सूर्य, तारागण तथा ब्रह्मा,शिव, इंद्र, योगीजन
इनके तेजको तेजवाला करता है वह विष्णु मुझपर प्रसन्न हो॥३२॥
पर्जन्यः पृथिवी सस्य कालो धर्मः क्रियाफलम् ॥
गुणाकारःस में वाभूर्वासुदेवः प्रसीदतु ॥ ३३॥
जो भगवान् पर्जन्यरूप और पृथ्वीस्वरूप और सब अनाजरूप
और काल स्वरूप तथाकाल और धर्म सब क्रियारूप तथा सर्व
ळियाओंके फलको देनेवाला और त्रिगुणात्मक सो वासुदेव मुझपर
प्रसन्न हो ॥३३॥
योगावास नमस्तुभ्यं सर्वावास वरप्रद ॥
हिरण्यगर्भ यज्ञांग पंचगर्भ नमोऽस्तु ते ॥ ३४ ॥
हे योगावास सर्वावास ! अर्थात् योग और संपूर्ण प्राणिमात्रोंके
निवासस्थान हे वरप्रद ! हे हिरण्यगर्भ ! हे यज्ञांग ! हे पंचगर्भ !
(पंचतत्त्वोंको उत्पन्न करनेवाले ) तुम्हारे अर्थ नमस्कार है ॥३४॥
चतुर्मूर्तं परं धाम लक्ष्म्यावास सदाऽच्युत ॥
शब्दादिवास नान्योऽस्ति वासुदेव प्रधानकृत् ॥३५॥
हे चतुर्म्यहमूर्तिवाले ! हे परंधाम ! हे लक्ष्मी निवास ! सदाऽच्युत
हेशब्दोंके आदि निवासस्थान! हे वासुदेव ! हे प्रधानकृत् ! आयाको
रचनेवाले ( सब जगह तुमसे) अन्य कोई नहीं है ॥ ३५ ॥
अजः संगमनः पाथों ह्यमूर्तिर्विश्वमूर्तिधृक् ।
श्रीः कीर्तिः पंचकालज्ञो नमस्ते ज्ञानसागर॥३६॥
भाषाटीकासमेत। (३१३)
तुम जन्मरहित हो सब जगह व्याप्त हो अवतार आदिकों करक
मूर्तिमान हो मूर्तिरहित हो और विश्वकी मूर्तिको धारण करनेवाले
हो लक्ष्मीरूप कीर्तिरूप हो पंचकालको ( पंचभूतोंके कालको )
जाननेवाले हो हे ज्ञानसागर ! तुम्हारे अर्थ नमस्कार है ॥ ३६ ॥
अव्यक्ताधक्तमुत्पन्नमव्यक्तायः परात्परः ।।
यस्मात्परतरं नास्ति तमस्मि शरणं गतः ॥३७ ॥
अव्यक्त कहिये प्रधान पुरुषसे ( व्यक्त )माया उत्पन्न होती है
जो अव्यक्तसे भी परात्पर शुदा है और जिससे परे कोई नहीं है
तिसकी मैं शरण हूँ॥ ३७॥
चिंतयंतो ह्यजं नित्यं ब्रह्मेशानादयः सुराः ॥
निश्चयं नाधिगच्छंति तमस्मि शरणं गतः॥३८॥
अजन्मा प्रभुको नित्य चिन्तवन करते हुए ब्रह्मा आदि शिवआ-
दिदेवता जिलका निश्चय नहीं करसकते हैं मैं तिसके शरण हूँ॥३८॥
जितेंद्रिया जितात्मानो ज्ञानध्यानपरायणाः॥
यं प्राप्य न निवर्तते तमस्मि शरणं गतः॥ ३९ ॥
हे जितेंद्रिय ! और जितात्मन् अर्थात् मन अन्तःकरणको जी-
तने वाले ज्ञान ध्यानमें परायण मुनिजन जिसको प्राप्त होके फिर
निवृत्त नहीं होते हैं (संसारमें नहीं आते हैं ) तिसके मैं शरण
एकांशेन जगत्कृत्स्नमवष्टभ्य स्थितः प्रभुः ॥
अग्राह्यो निर्गुणो नित्यस्तमस्मि शरणं गतः॥४०॥
जो प्रभु अपने एकांशसे सम्पूर्ण जगत्को व्याप्तकर स्थित है
और निर्गुण होनेसे मन वाणी करके अग्राहा है उस सनातन पर-
मात्माको मैं शरण हूँ॥४०॥
(३१४.) अनुस्मृति। सोमार्काग्निमयं तेजो या च तारामयी युतिः॥ दिवि संजायते तेजःस महात्मा प्रसीदतु ॥ ४१ ॥ चन्द्रमा,सूर्य, अग्मिरूप जो तेज है तारागणमें जो कांतिहै स्वर्गमें (आकाशमें ) जो तेज होताहै ऐसा वह महात्मा प्रसन्न हो ॥४१॥ गुणात्मा निर्गुणश्चान्यो रश्मिवांश्चेतनो बजः॥ सूक्ष्मः सर्वगतो देहः स महात्मा प्रसीदतु ॥४२॥ जो गुणोंकी आत्मा और आप निर्गुण अलग है प्रकाशरूप चेतन अजन्मा है सूक्ष्म है सर्वगत देहरहित है वह महात्मा प्रसन्न हो॥४२॥ अव्यक्तं सदधिष्ठानमचिंत्यं तमसः परम् ॥ प्रकृतिः प्रकृति भुक्ते स महात्मा प्रसीदतु ॥ ४३ ॥ जो अव्यक्त अप्रगटरूप है सत्( जीवका)-अधिष्ठान है अचिंत्य है मायासे अलग है महदहंकार प्रकृतिरूप हो प्रकृति कहिये मायाको भोगता है वह महात्मा प्रसन्न हो ॥४३॥ क्षत्रज्ञः पंचधा भुक्ते प्रकृति पंचभिर्मुखैः॥ . महागुणांश्च यो भुक्ते स महात्मा प्रसीदतु ॥४४॥ जो क्षेत्रज्ञ होके पांचप्रकारसे पांचमुख र प्रकृति (माया) को भोगता है वह महात्मा प्रसन्न हो ॥४४॥ सांख्ययोगाश्च ये चान्ये सिद्धाश्च परमर्षयः॥ य विदित्वा विमुच्यते स महात्मा प्रसीदतु ॥४५॥ सांख्ययोगवाले जो अन्यजन तथा सिद्ध और परमसृष्टि जिसको जानके (संसारबन्धनसे) छूटजाते हैं वह महात्मा प्रसन्न हो ॥४५॥ - भाषाटीकासमेत । (३१५.) अतींद्रिय नमस्तुभ्यं लिंगळक्तैन मीयसे ॥ यं च त्वां नाभिजानति तमस्मि शरण गतः॥४६॥ हे अतींद्रिय ! अर्थात् इंद्रियोंकरके अग्राह्य तुम्हारे अर्थ नमस्कार है । तुम प्रकट चिह्नोंकरके ( इंद्रियगोचरों करके ) नहीं प्रमाण किये जाते हो और जिस तुमको नहीं जानते हैं तिसकी मैं शरणागत हूँ॥ ४६॥ कामक्रोधविनिर्मुक्ता रागद्वेषवि वर्जिताः॥ अन्यभक्ता न जानंति न पुनारका जनाः॥४७॥ कामक्रोधसे छूटे हुए रागद्वेषसे रहित हुए अन्य भक्त भी तुमको नहीं जान सकते हैं तैसे ही नरकवासी जन तो कभी नहीं जानते हैं ॥१७॥ एकांतिनो हि निता निराशाः कर्मकारिणः ज्ञानाग्निदग्धकर्माणस्त्वां विशंति मनस्विनः ॥४८॥ निरंतर तुम्हारे भक्त सुखदुःखआदि द्वंद्वरहित आशारहित कर्म करनेवाले ज्ञानरूपी अग्निसे कर्मको दग्ध करनेवाले पंडितजन तुम्हारे विषे लीन (प्रवेश ) होते हैं ॥ १८ ॥ अशरीरं शरीरस्थं समं सर्वेषु देहिषु ॥ पापपुण्यविनिर्मुक्ता भक्तास्त्वां पर्युपासते ॥ ४९ ॥ शरीररहित शरीरमें स्थित सब देहधारियोंमें समानरहनेवाले ऐसे तुमको पापपुण्यसे विनिर्मुक्त हुए भक्तजन उपासना करते हैं॥१९॥ अव्यक्तबुद्धयहंकारमनोभूतेंद्रियाणि च ॥ स्वयि तानि च तेषु त्वं न तेषु त्वं न तानि ते॥५०॥ .
(३१६) अनुस्मृति ।
माया बुद्धि अहंकार मन ज्ञानेंद्रिय ये सब तुम्हारे विषे हैं (जैसे
आकाशमें घट) और उनमें तुम भी हो ( वास्तवमें ) उन माया
आदिकोंमें तुम नहीं और वे तुममें नहीं हैं ॥५०॥
एकत्वाय च नानन्यं ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥
समत्वमिह कांक्षति भक्त्या वै नान्यचेतसा ॥ ५॥
मुनिजन एकत्वके वास्ते तुमसे अन्य कछु नहीं जानते हैं
जो और भक्ति करके अनन्यचित्तसे इस संसारमें समत्व (समता)
की इच्छा करते हैं वे परम मोक्षको प्राप्त होते हैं ॥५१॥
चराचरमिदं सर्व भूतग्रामं चतुर्विधम् ॥
त्वयि तन्तौ च तत्प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥५२॥
यह सब चार प्रकारका अंडजादि ४ भेदका संसार तागारूप
तुम्हारे विष ऐसे पुरोया हुआ है जैसे सूतमें मणिसमूह पुरोयें
हुए हैं ।। ५२ ॥
स्रष्टा भोक्तासि कूटस्थो ह्यचिंत्यः सर्वसंज्ञितः ॥
अकर्ता हेतुरहितः पृथगात्मा व्यवस्थितः ॥ ५३॥
तुम खष्टा (कर्ता ) मोक्ता हो कूटस्थ अचिंत्य हो सर्वसंज्ञा
वाले हो वास्तवमें अकर्ता और हेतुरहित हो पृथक् आत्मा करके
व्यवस्थित हो ॥ ५३॥
न मे भूतेषु संयोगो न भूतित्वं गुणातिगे ।।
अहंकारेण बुद्धया वा न मे योगस्त्रिभिर्गुणैः ॥ ५४॥
भूतोंमें (तत्त्वोंमें ) मेरा संयोग नहीं है गुणोंसे अतिरिक्त हुये
विषे ऐश्वर्यादिक धर्म नहीं है अहंकारकरके अथवा वुद्धिकरके
और तीनों गुणों के साथ मेरा योग नहीं है ॥५४ ॥
भाषाटीकासमेत । (३१७)
न मे धर्मो ह्यधर्मों वा नारंभो जन्म वा पुनः ॥
जरामरणमोक्षार्थ त्वां प्रसन्नोऽस्मि सर्वगम् ॥१५॥
मेरे धर्म और पाप नहीं हैं किसी कार्यका आरंभ और जन्म भी
नहीं है वृद्धावस्था और मरणकी मोक्षके वास्ते सर्वगत हुये तुम्हारी
शरण हूँ॥६५॥
विषयैरिद्रियश्चापि न मे भूयः समागमः ॥
ईश्वरोऽसि जगन्नाथ किमतः परमुच्यते ॥ ५६॥
विपयं और इंद्रियोंके साथ फिर मेरा समागम न हो । हे
जगन्नाथ ! तुम ईश्वर हो इससे विशेष क्या कहैं ?॥ १६ ॥
भक्तानां यडित देव तत्ते हि त्रिदशेश्वर ॥
पृथिवीं यातु मे घ्राणं यातु मेरसनं जलम् ।। ५७॥
हे त्रिदशेश्वर ! देवतोंके ईश्वर ! भक्तों को जो हित है वह तुमसेही
होता है मेरी नासिका इंद्रिय पृथ्वीको प्राप्त हो मेरी जिह्वा जलको
प्राप्त हो ॥६७ ॥
रूपं हुताशने यातु स्पशों मे यातु मारुते॥
श्रोत्रमाकाशमभ्येतु मनो वैकारिकं पुनः ॥ ५८ ॥
रूप अशिमें प्राप्त हो, स्पर्श वायुमें प्राप्त हो, श्रोत्रइंद्रिय आका-
शमें प्राप्त हो मन अहंकारको प्राप्त हो ॥ ९८॥
इंद्रियाणि गुणान्यांतु स्वेषु स्वेषु चयोनिषु ॥
पृथिवी यातु सलिलमापोऽग्निमनलोऽनिलमा ५९॥
सबइंद्रिय अपनी २ योनियोंमे गुणोंको प्राप्तहो जावो पृथ्वी
जलमें प्राप्त हो जल अग्निमें लीन हो अग्नि वायुमें लीन हो
जावो ॥१९॥
३८) अनुस्मृति वायुराकाशमभ्येतु मनश्चाकाशमेव च ॥ अहंकारं मनो यातु मोहनं सर्वदेहिनाम् ॥६०॥ वायु आकाशमें लीन हो मन भी आकाशमें लीन हो जावों से- पूर्ण देहधारियोंको मोहनेवाला मन अहंकारमें प्राप्त होवो ॥६॥ अहंकारस्तथा बुद्धिं बुद्धिरव्यक्तमेव च ॥ प्रधानं प्रकृति यातु गुणसाम्ये व्यवस्थिते ॥६१ ॥ अहंकार बुद्धिमें लीन हो जावो बुद्धि मायामें लीन हो माया जहां सब गुण समानतासे व्यवस्थित रहते हैं ऐसी प्रकृतिमें प्राप्तहो जावो ॥ ६ ॥ विसर्गः सर्वकरणैर्गुणभूतैश्च मे भवेत् ॥ सत्त्वं रजस्तमश्चैव प्रकृति प्रविशंतु मे ॥६२ ॥ गुणोंसे उत्पन्न हुए संपूर्ण करण (इंद्रियादिकों) करके मेरा वि- सर्जन हो मेरे सत्त्व रजतमोगुण प्रकृतिमें प्रवेश होवो ॥ ६२॥ . नैष्कैवल्यं पदंदेव कांक्षेऽहं ते परंतप । एकीमावस्त्वया मेऽस्तु न मे जन्म भवेत्पुनः॥६३॥ हे,देव ! हे परंतप ! मैं तुम्हारे नैष्कैवल्यपदकी इच्छा करता तुम्हारे संगमें मेरा एकीभाव हो फिर मेरा जन्म नहीं हों॥६३ ॥ नमो भगवते तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ खबुद्धिस्त्वद्गतप्राणस्त्वद्भक्तस्त्वत्परायणः॥ ६४॥ तिस भगवान् विष्णु प्रभविष्णु (विशेषकरके होनेवाले ) के अर्थ नमस्कार है हे भगवन् ! तुम्हारे विषे बुद्धि और प्राणोंवाला तुम्हारा भक्त और तुम्हारे विषे परायण हूँ॥ ६४ ॥ DRU .
भाषाटीकासमेत। (३१९) वामेवाहं स्मरिष्यामि मरणे पर्यवस्थिते॥ पूर्वदेहकृता ये मे व्याधयः प्रविशंतु माम् ॥६५॥ मरणसमयमें तुम्हारा ही स्मरण करूँगा और मेरे किये हुए जो पूर्वजन्मके रोग है वे सब रोग मेरे विषे आजावो ॥ ६५ ॥ अर्दयंतु च मां दुःखान्य॒णं मे प्रतिमुच्यताम् ॥ अनुध्येयोऽसि मे देव न मे जन्म भवेत्पुनः॥६६॥ दुःख मुझको पीड़ा दो अनृणी हुए मुझको छोड़ो हे देव ! तुम ध्यान करनेयोग्य हो फिर मेरा जन्म मत हो ॥६६॥ अस्माद्रवीमि कर्माणि ऋणं मे न भवेदिति ॥ उपतिष्टंतु मां सर्वे व्याधयः पूर्वसंचिताः ॥ ६७॥ इसीवास्ते में कर्मोको कहता हूँ कि, मेरा ऋण मत रहो पूर्वजन्ममें संचित कीहुई सब व्याधि मेरे विषे आजावो ॥ ६७॥ अनृणो गंतुमिच्छामि तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ अहं भगवतस्तस्य मम वासःसनातनः ॥६८॥ अनृणी हुआ मैं तिस विष्णुभगवान्के परमपदको जाऊँ मेरा वास सदा रहो ॥ ६८॥ तस्याहं न प्रणश्यामि स च मेन प्रणश्यति ॥ कर्मेंद्रियाणि संयम्य पंचभूतेंद्रियाणि च ॥ ६९॥ तिसको मैं नष्ट नहीं होऊँ और मेरा वह परमपद नष्ट नहीं हो 'कर्मेंद्रिय और पांच ज्ञानेन्द्रियोंको वशमें कर ॥ ६९ ॥ दशेंद्रियाणि मनसि अहंकार तथा मनः॥
(३२०) अनुस्मृति। अहंकार तथा बुद्धौ बुद्धिमात्मनि योजयेत् ॥७०॥ दश इन्द्रियोंको मनमें प्राप्त कर मनको अहंकारमें प्राप्त अहं- कारको वृद्धिविषे लीन करै बुद्धिको आत्मामें युक्त करै ॥७॥ आत्मबुद्धींद्रियं पश्येद्दया बुद्धेः परात्परम् ॥ एवं बुद्धेः परं बुद्धा संस्तभ्यात्मानमात्मना ॥७॥ बुद्धिकरके मन और ज्ञानेन्द्रियोंको देखे (आत्माको) बुद्धिसे परात्पर जाने ऐसे अपने आत्माकरके आत्माको बुद्धिसे परे जा- नके निश्चय करै॥७॥ ततो बुद्धेः परं बुद्धा लभतेन पुनर्भवम् ॥ ममायमिति तस्याहं येन सर्वमिदं ततम् ॥ ७२ ॥ फिर बुद्धिसे परे जानके पुनर्जन्मको नहीं प्राप्त होता है ऐसे विचारै कि, जिसने यह सम्पूर्ण जगत् रचा है सो यह मेरा है मैं तिसका हूँ॥७२॥ आत्मन्यात्मनि संयोज्य परात्मानमनुस्मरेत् ॥ नमो भगवते तस्मै देहिनां परमात्मने ॥ ७३ ॥ आत्माविषे आत्माको संयुक्त करके परमात्माका स्मरण करै देहधारियोंके परमात्मास्वरूप तिस भगवान्के अर्थ नम- स्कार है॥७३॥ नारायणाय भक्ताय एकनिष्ठाय शाश्वते। हृदिस्थाय च भूतानां सर्वेषां च महात्मने ॥७४॥ नारायण भक्तस्वरूप एकनिष्टावाले'शाश्वत (सनातन) सब भूतोंके हृदयमें स्थित महात्माके अर्थ नमस्कार हैं।७४ ॥ इमामनुस्मरन दिव्यां वैष्णवीं पापनाशिनीम् ॥ .
भापाटीकासमेत। (३२१)
स्वपन विबुध्य च पठेद्यत्नेन च समभ्यसेत् ॥७९॥
पापको नष्ट करनेवाली इस दिव्य वैष्णवी(विष्णुकी अनुस्मृति)
को सोके प्रातःकाल उठके यत्नसे पढ़े और अच्छेप्रकारले अभ्यास
करै ॥ ७९ ॥
मरणे समनुप्राप्ते यदेकं मामनुस्मरेत् ॥
अपि पापसमाचारः स याति परमां गतिम् ॥७॥
मरणसमयमें जो एक मेरा ही स्मरण करे तोजो यदि पापी पुरुष
हो तो भी वह परम गतिको प्राप्त होता है ।। ७६ ॥
यद्यहंकारमाश्रित्य यज्ञदानतपःक्रियाः॥
कुर्वन्फलमवाप्नोति पुनरावर्तनं च तत् ॥ ७७ ॥
जो, यदि अहंकारके आश्रय होके यज्ञ, दान, तपस्या आदि
कर्म करता हुआ जन कर्मफलको प्राप्त होवे तो फिर जन्मको
प्राप्त होता है ॥ ७७॥
अभ्यर्चयन्पितॄन्देवान्पठञ्जुह्वन्बलिं ददत् ॥
ज्वलदग्निं स्मरेद्यो मां लभते परमां गतिम् ॥ ७८ ॥
पितर और देवताओंको पूजता हुआ पाठकरता हुआ होस
करता हुआ बलि देता हुआ, जो ज्वलते हुए अग्निको मुझको ही
स्मरण करता है (जानता है ) वह परम गतिको प्राप्त होता है॥७॥
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥
यज्ञं दानं तपस्तस्मात्कुर्याद्रागविवर्जितः ॥ ७९ ॥
यज्ञ, दान, तप, ये पण्डितजनोंको पवित्र करनेवाले हैं इस
लिये राग (फल स्नेह ) से रहित हुआ पण्डितजन यज्ञ, दान
तपस्या करै॥७९॥
(३२२) अनुस्मृति। पौर्णमास्याममायां च द्वादश्यां च तथैव च ॥ श्रावयेच्छ्रद्दधानश्च मद्भक्तश्च विशेषतः ॥ ८० ॥ विशेषकरके मेरा भक्त पौर्णमासी अमावास्या. द्वादशी इन दिनोंमें श्रद्धासे युक्त होके इस स्तोत्रको सुनावै ॥ ८०॥ नम इत्येव यो ब्रूयान्मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः॥ तस्याक्षयो भवेल्लोकः श्वपाकस्यापि नारद ॥ ८१ ॥ श्रद्धासे युक्त हुआ जो मेरा भक्त नमः, ऐसे (प्रणाम)कहता है हे नारद ! वह चाहे चाण्डाल हो तोभी तिसको अक्षय मेरा लोक प्राप्त होता है॥ ८१ ॥ किं पुनर्ये भजते मां साधका विधिपूर्वकम् ॥ श्रद्धावंतो यतात्मानस्ते यांति परमां गतिम्॥ ८२॥ फिर जो साधक उत्तमजन मुझको विधिपूर्वक पूजते हैं उनका क्या कथन है जो श्रद्धावाले जितेंद्रिय पुरुष होते हैं वे परम गतिको प्राप्त होते हैं ॥ ८२ ॥ कर्माण्यावंतवंतीह मद्भक्तोऽनंतमश्नुते ॥ मामेव तस्माद्देवर्षे ध्याय नित्यमतंद्रितः ॥८३॥ कर्म तो आदि अन्तवाले हैं मेरा भक्तजन अनन्त (अक्षय) पदको प्राप्त होता है, हे देवर्षे ! इसलिये तू सावधान होके नित्य मेरा ही ध्यान कर ॥ ८३॥ अज्ञानां चैव यो ज्ञानं दद्याडर्मोपदेशतः ॥ कृत्स्नांवा पृथिवीं दद्यात्तेन तुल्यं चतत्फलम्॥८४॥ जो मनुष्य धर्मके उपदेशसे अज्ञजनोंको ज्ञान देता है वह सम्पूर्ण पृथ्वीदानके फलको प्राप्त होता है ।। ८४ ॥
भाषाटीकासमेत।
(३२३)
तस्मात्प्रदेयं साधुभ्यो जपं बंधभयापहम् ॥
अवाप्स्यसि ततः सिद्धि प्राप्स्यसे च पदं मम॥८५॥
इसलिये भयको दूर करनेवाला जप (मन्त्र) साधुजनोंके वास्ते
देना चाहिये तिससे सिद्धिको प्राप्त होगा और मेरे पद (स्थान)को
प्राप्त होगा ॥ ८५॥
अश्वमेधसहस्त्रैश्च वाजपेयशतैरपि।
नासौ पदमवाप्नोति मद्भक्तैर्यदवाप्यते ॥ ८६ ॥
जो पद मेरे भक्तोंको प्राप्त होता है वह पदह नार अश्वमेध और सौ
वाजपेय यज्ञों करकेभी नहीं प्राप्त होता है ॥ ८६ ॥
भीष्म उवाच।
हरेः पृष्टं पुरा तेन नारदेन मुरर्षिणा॥
यदुवाच ततः शंभुस्तदुक्तं समनुव्रत ॥ ८७ ॥
भीष्मजी कहते हैं-हे समनुव्रत ! अर्थात् सम्यक् सावधान हुए
युधिष्ठिर ! पहले देवऋषि नारदजीने हारसे पूछा फिर शंभु अर्थात्
ब्रह्मरूप( सुख करनेवाले )हरि जो कुछ कहते भये वही मैंने
कहा है ॥ ८७॥
लमप्येकमना भूत्वा ध्याहि ध्येयं गुणाधिकम् ॥
भजस्व सर्वभावेन परमात्मानमव्ययम् ॥८८ ॥
तुम भी एकाग्रमनकरके गुणोंसे अधिक ध्येय(ध्यानकरने योग्य)
अविनाशी परमात्माको ध्यावो और संपूर्णभावसे भजो ॥८८ ॥
श्रुत्वैवं नारदो वाक्यं दिव्यं नारायणोदितम् ॥ ।
अत्यंत भक्तिमान्देवमेकांतित्वमुपेयिवान् ॥ ८९ ॥
, (३२४) अनुस्मृति । नारदमुनि इसप्रकारके दिव्य नारायणके कहे हुए वचनको सुनके अत्यन्त भक्तिमान् वह नारदमुनि एकान्तित्व सब जगह निरंतर एक रस रहनेवाले देवको प्राप्त होता भया ॥ ८९ ॥ नारायणमृषि देवं दशवर्षाण्यनन्यभाक् ॥ इमं जपित्वा चाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥१०॥ अनन्यभक्ति करके दश वर्षतक नारायण देवको ऋषि भजता भया इसाही (नारायणमन्त्र) कोजपके विष्णुके तिस परम पदको प्राप्त होता है ॥९॥ किं तस्य बहुभिर्मः किं तस्य बहुभिव्रतैः ॥ नमोनारायणायेति मंत्रः सर्वार्थसाधकः ॥९१॥ उसके बहुत मन्त्रोंकरके क्या है बहुत व्रतोंकरके क्या है किन्तु 'नमोनारायणाय” यही मन्त्र सम्पूर्ण प्रयोजनको सिद्ध करने वाला है।। ९१॥ किं तस्य दानः किं तीर्थः किं तपोभिः किमध्वरैः।। यो नित्यं ध्यायते देवं नारायणमनन्यधीः॥ ९२ ॥ जो पुरुष नित्य प्रति अनन्य (एकान ) बुद्धिकरके नारायण देवको ध्याता है उसके दानोंकरके तीर्थोकरके तप और यज्ञों करके क्या है ॥ ९२॥ ये नृशंसा दुरात्मानः पापाचाररतास्तथा ॥ तेऽपि यांति परं स्थानं नारायणपरायणाः ॥ ९३ ॥ जो कूर (हिंसक) दुष्टात्मा पापी पुरुष हैं वे भी (इस मन्त्रकरके) नारायणमें परायण होके परमस्थानको प्राप्त होते हैं ॥ ९३॥ अनन्यया मंदबुद्ध्या प्रतिभाति दुरात्मनाम् ॥
भापाटीकासमेत। (३२५)
कुतर्का ज्ञानदृष्टीनां विभ्रांतेंद्रियवर्मनाम् ॥ ९४ ॥
कुतर्क और अज्ञानकी दृष्टिवाले इंद्रियों के विषयोंमें भ्रमते हुए
दुष्टजनोंको अनन्य मन्दबुद्धिकरके वह परमात्मा प्रतिकूल
(खराब) मालूम होता है ॥ ९४ ॥
नमो नारायणायेति ये विदुर्ब्रह्म शाश्वतम् ॥
अंतकाले जपायांति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ९५॥
जो पुरुप 'नमो नारायणाय' इस मन्त्रको सनातन ब्रह्म जानते
हैं वे अंतसमयमें इस मन्त्रको जपते हुए विष्णुके तिस परम
पदको प्राप्त होते हैं।९५॥
आचारहीनोऽपि मुनिप्रवीर भत्या विहीनोऽपि
विनिंदितोऽपि ॥ किं तस्य नारायणशब्दमावतो
विमुक्तपापो विशतेऽच्युतां गतिम् ॥ ९६ ॥
हे मुनिप्रवीर ! जो आचारहीन तथा भक्तिहीन होवे और
निंदित हो उसके (क्या पाप हैं) किन्तु"नारायण" ऐसे शब्दमा-
त्रसे पापरहित होके परम अविनाशी गतिको प्राप्त होता है ॥१६॥
कांतारवनदुर्गेषु कृच्छ्रेष्वापत्सु संयुगे।
दस्युभिः सन्निरुद्धश्च नामभिर्मी प्रकीर्तयेत् ॥९७॥
गहर भयंकर मार्ग, वन, दुर्ग (किला) कष्ट, विपत्ति, युद्ध
इन्हीमें और शत्रुओंकरके रुका हुआ जन मुझको मेरे नामों
करके कीर्तन करै ॥ ९७॥
जन्मांतरसहस्रेषु तपोध्यानसमाधिभिः ॥
नराणां क्षीणपापानां कृष्ण भक्तिः प्रजायते॥९८॥
(३२६) अनुस्मृति । हजारों जन्मांतरों में तप, ध्यान समाधियोंकरके जब मनुष्यों के पाप क्षीण होते हैं तब उसकी भक्ति श्रीकृष्णविषे होती है ॥ ९८॥ नाम्नोऽस्ति यावती शक्तिः पापनिर्हरणे हरेः॥ श्वपचोऽपि नरः कर्तु क्षमस्तावन्न किल्बिषम् ॥१९॥ पापोंके हरनेमें हरिके नामोंमें जितनी शक्ति है उतने पाप करनेमें चाण्डाल पुरुष भी समर्थ नहीं है ॥ ९९ ॥ न तावत्पापमस्तीह यावन्नामाहतं हरेः॥ अतिरेकभयादाहुः प्रायश्चित्तांतरं यथा ॥ १० ॥ इस संसारमें उतने पाप नहीं है कि जितने पाप हरिके नामों करके हत (नष्ट) होजाते हैं इसलिये अतिरेक अर्थात् ज्यादे होनेके भयसे अन्य प्रायश्चित्तोंको वृथाही कहते हैं अर्थात् हरि- नामके समान कोई प्रायश्चित्त नहीं है ।। १०० ॥ गत्वा गत्वा निवर्तन्ते चंद्रसूर्यादयो ग्रहाः॥ अद्यापि न निवर्तन्ते हादशाक्षरचितकाः॥१०१॥ चन्द्र, सूर्य, आदि ग्रह तो प्राप्त होके उलटे निवृत्त होते हैं और द्वादशाक्षरमन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) को चितवन करनेवाले जन अब तक निवृत्त नहीं होते हैं । १०१॥ न वासुदेवात्परमस्ति मंगलं न वासुदेवात्परमस्ति पावनम् ॥ न वासुदेवात्परमस्ति दैवतं तं वासुदेवं प्रणमन्नसीदति ॥ १०२॥ वासुदेव भगवानसे परे मंगल नहीं है वासुदेवसे परे कुछ पवित्र भाषाटीकासमेत। (३२७) नहीं है वासुदेवसे परे दैव नहीं है ऐसे तिस वासुदेवको प्रणाम करताहुआ जन दुःखित नहीं होता है ।। १०२ ॥ इमा रहस्यां परमामनुस्मृति योऽधीत्य बुद्धिं लभते च नैष्टिकीम् ॥ विहाय पापं विनिमुच्य संकटात्सवीतरागो विचरे- न्महीमिमाम् ॥ १०३ ॥ इस रहस्य (गुह्य ) परम अनुस्मृतिको जो पढता है वह नैष्ठिकी ब्रह्ममें (निष्ठावाली) बुद्धिको प्राप्त होता है और पापसे छूटके तथा संकटसे छूटके स्नेहरहित होके इस पृथ्वीमें विचरता है ॥ १०३ इति अनुस्मृतिभापाटीका समाप्ता एषा भापाटीका वेरीनिवासि.. पण्डितवसतिरामशर्मणा विरचिता ॥
time
H
కాలకులు
॥श्रीः॥
अथ गजेन्द्रमोक्षः।
बेरी निवासी पं० वसतिरामविरचित.
भाषाटीकासमेतः।
सोऽयं
क्षेमराज-श्रीकृष्णदासश्रेष्ठिना
मुम्बयां
स्वकीये "श्रीवेङ्कटेश्वर” (स्टीम् ) यन्त्रालये
मुद्रयित्वा प्रकाशितः।
.
संवत् १९८०, शके १८४५.
सर्वाधिकार "श्रीवेंकटेश्वर" यन्त्रालयाध्यक्षने स्वाधीन रक्खा है.
ముందంజలు
गजेन्द्रमोक्षः।
SOCIE
FAడలో
Godభలలలలలలో
ENIOR
ररक्ष यः कुञ्जरचक्रशक
नकस्य चक्रेण विपाटय वक्रम् ॥
सदाऽवनस्थः खरहेतिहस्तो
हरिर्वरीवर्ति विलक्षणोऽसौ ॥
లంగా
దయం
అలనాటి
॥श्रीः॥
अथ गजेन्द्रमोक्ष।
भाषाटीकासमेत।
शतानीक उवाच ।
मया हि देवदेवस्य विष्णोरमिततेजप्तः ॥
श्रुताः संभूतयः सर्वा गदतस्तव सुव्रत ॥ १॥
शतानीक बोले-हे सुव्रत ! कहते हुए तुमसे मैंने अतुल तेजवाले
देवनके देव विष्णुभगवानके सम्पूर्ण ऐश्वर्य गुण सुने ॥ १॥
यदि प्रसन्नो भगवाननुग्राह्योऽस्मि वा यदि ॥
तदहं श्रोतुमिच्छामि नृणां दुःस्वप्ननाशनम् ॥२॥
भगवान् तुम यदि प्रसन्न हो और मेरा अनुग्रह किया चा-
हते हो तो मनुष्यों के दुःस्वप्न ( बुरा स्वप्नफलको ) नष्टकारक
(इतिहासादिकको) मैं सुना चाहता हूँ ॥२॥
स्वप्नादिषु महाभाग दृश्यते ये शुभाशुभाः॥
फलानि च प्रयच्छंति तद्वणान्येव भागव ॥ ३ ॥
हे महाभाग ! स्वप्न आदिकोंमें जो शुभाशुभ दीखते हैं, हे
भार्गव ! वैसाही वे फल देते हैं ॥३॥
ताहक्पुण्यं पवित्रं च नृणामतिशुभप्रदम् ॥
दुष्टस्वप्नोपशमनं तन्मे विस्तरतो वद ॥४॥
वसा ही पवित्र मनुष्योंको अत्यन्त शुभदायक दुष्ट(बुरे) स्वपके
नाश करनेवाले (इतिहास आदिको )मेरे आगे विस्तारसे कहो॥४॥
(३३२) गजन्द्रमोक्ष!
शौनक उवाच।
इदमेव महाभाग पृष्टवांश्च पितामहम् ॥
भीष्मं धर्मभृतां श्रेष्ठं धमपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ५ ॥
शौनकजी बोले-हे महाभाग ! इसही प्रश्नको धर्मधारियों
भीष्मपितामहजीसे धर्मका पुत्र युधिष्ठिर पूछता भया ॥ ५ ॥
भीष्म उवाच।
जितं ते पुंडरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन ।
नमस्तेऽस्तु हृषीकेश महापुरुषपूर्वज ॥ ६ ॥
भीष्मजी कहते भये हे पुण्डरीकाक्ष ! हे विश्वभावन ! अर्थात्
विश्वको उत्पन्न करनेवाले हे हृषीकेश, हे महापुरुष ! हे पूर्वज
(सबसे प्रथम उत्पन्न होनेवाले)तुम्हारी जय हो तुम्हारे अर्थ नम-
स्कार है॥६॥
" आद्यं पुरुषमीशानं पुरुहूतं पुरातनम्॥
ऋतमेकाक्षरं ब्रह्म व्याकाव्यक्तं सनातनम् ॥७॥
आयपुरुष ईशान(ईश्वर) पुरहूत ( यज्ञादिकोंमें बहुत है बुलाना
जिसका) पुरातन ऋत अर्थात् सत्यस्वरूप एकाक्षर (ॐकार)
स्वरूप ब्रह्म व्यक्ताव्यक्त अर्थात अपने अवतार आदिकोंकरके प्रगट
और निजस्वरूप निराकार होनेसे अप्रकट रहनेवाले सनातन॥७॥
असच सच यद्विश्व नित्यं सदसतः परम् ॥
परापराणां स्रष्टारं पुराणं परमव्ययम् ॥ ८॥
सत् असत् कहिये सूक्ष्म, स्थूल रूपकरके जो विश्वहै सो और
तिस सत् असत्से भी परे परापर कहिये ब्रह्मा आदि सब जीवोंको
रचनेवाले पुराण परम अविनाशी ॥ ८॥
भाषाटीकासमेत। (३३३) मांगल्यं मंगलं विष्णुं वरेण्यमनघं शुचिम् ॥ नमस्कृत्य हृषीकेशं चराचरगुरुं हरिस ॥ ९॥ मंगल करनेवाले, मंगलस्वरूप विष्णु ( सब लोकोंमें व्याप्त- रहनेवाले )अत्युत्तम निष्पाप, पवित्र, चराचरके गुरु ऐसे हृषीकेश हरिनारायणको नमस्कार करके वेदव्यासजीके ॥ ९ ॥ प्रवक्ष्यामि मतं पुण्यं कृष्णद्वैपायनस्य च ॥ येनोक्तेन श्रुतेनापि नश्यते सर्वपातकम् ॥ १० ॥ पवित्र मतको कहता हूँ जिसके कहने सुननेसे सम्पूर्ण पाप नष्ट होते हैं ।। १० ॥ नारायणसमो देवो न भूतो न भविष्यति एतेन सत्यवाक्येन सर्वार्थान्साधयाम्यहम् ॥ ११॥ नारायणके समान देवता न भया और न होगा इसी सत्य- वचनकरके मैं सम्पूर्ण प्रयोजनोंको सिद्ध करता हूँ ॥११॥ किं तस्य बहुभिमत्रः किं तस्य बहुभिर्वतैः॥ नमो नारायणायेति मंत्रः सर्वार्थसाधकः ॥ १२॥ जो(नारायणको ध्याता है) उसको बहुत मंत्रोंकरके क्या है और उसको बहुत ब्रतों करके क्या है किन्तु अनमो नारायणाय' यही मंत्र सम्पूर्ण प्रयोजनको सिद्ध करनेवाला है ॥ १२ ॥ जज्ञे बहुशं परमत्युदारं यं द्वीपमध्ये सुतमात्मव- न्तम् ॥ पराशराद्धवती महर्षेस्तस्मै नमोऽज्ञानत- मोनुदाय ॥ १३ ॥ गंधवती देवी पराशरजी महर्षिके सकाशसे द्वीपके मध्यमें जिस (३३४) गजेन्द्रमोक्ष। परम उदार बहुज्ञ (बहुत जाननेवाले ) आत्मज्ञानी पुत्रको जनती- भई अज्ञानरूपी अन्धकारको नष्ट करनेवाले तिसके अर्थ नम- स्कार है॥ १३॥ नमो भगवते तस्मै व्यासायामिततेजसे ॥ यस्य प्रसादाहक्ष्यामि नारायणकथामिमाम् ॥१४॥ जिसकी कृपासे नारायणकी इस कथाको मैं कहूँगा तिस भग- वान् अतुलतेजवाले वेदव्यासजीके अर्थ नमस्कार है ॥ १४॥ वैशम्पायनमासीनं पुराणार्थविचक्षणम् ॥ इममर्थस राजर्षिः पृष्टवाञ्जनमेजयः॥ १५॥ वह राजऋषि जनमेजय पुराणोंके अर्थको जाननेवाले बैठे हुए वैशम्पायनजीको इस ही अर्थको पूछता भया॥ १५ ॥ जनमेजय उवाच। किंजपन्मुच्यते पापारिक जपन्सुखमश्नुते॥ दुःस्वप्ननाशनं पुण्यं श्रोतुमिच्छामि मानद ॥१६॥ जनमेजय बोला-हे मानद ! (मानदायी) क्या जपता हुआ मनुष्य पापसे छूटता है और क्या नपता हुआ सुखको प्राप्त होता है मैं दुष्टस्वप्नफलको नष्ट करनेवाले पवित्र (इतिहासको) सुनना चाहता हूँ ॥१६॥ वैशंपायन उवाच। देवव्रतं महाप्राज्ञं सर्वशास्त्रविशारदम् ॥ विनयेनोपसंगम्य पर्यपृच्छयुधिष्ठिरः॥ १७॥ वैशंपायनजी बोले-देवव्रत ! (देवतोंके समान व्रतवाले) महाप्राज्ञ
भाषाटीकासमेत । (३३५)
सर्वशास्त्रवेत्ता ऐसे भीष्मपितामहजीको विनयसे प्राप्त होके
युधिष्ठिर पूछता भया ॥ १७॥
युधिष्ठिर उवाच ।
दुःस्वप्नदर्शनं घोरमवेक्ष्य भरतर्षभ ।
प्रयतः किं जपेजाप्यं विबुधः किमनुस्मरेत् ॥१८॥
युधिष्ठिर बोला-हे भरतर्षभ ! पंडितजन घोर दुःस्वप्न देखके
सावधान होके किस मन्त्रको जपै और क्या स्मरण करै ॥ १८॥
कस्य कुर्यान्नमस्कार प्रातरुत्थाय मानवः ॥
किं च ध्यायेत सततं कः पूज्योवा भवेत्सदा॥१९॥
मनुष्य प्रातःकाल उठके किसको नमस्कार करें निरंतर किसका
ध्यान करै और सदा कौन पूज्य है ॥ १९ ॥
पितामह प्रसादेन बुद्धिभेदो भवेन्न मे ॥
तदहं श्रोतुमिच्छामि ब्रूहि नो वदतां वर ॥२०॥
हे भीष्मपितामहजी ! हे वदतांवर (कहनेवालोंमें श्रेष्ट) ! आपके
प्रसादसे जिससे मेरी बुद्धि भेद नहीं हो सो मैं तुमसे सुनना चाहता
हूँ आप मेरे अर्थ कहो ॥२०॥
भीष्म उवाच।
शृणु राजन्महाबाहो वर्णयिष्ये हि शांतिदम् ॥
दुःस्वप्नदर्शने जाप्यं यहै नित्यं समाहितैः ॥२१॥
भीष्मजी बोले-हे . राजन् ! हे महाबाहो ! जो दुःस्वप्न दर्शनमें
सावधान हुए जनोंकरके जपनेयोग्य शांतिदायक (मंत्र) है तिसको
सुनो ॥ २१ ॥
गजेन्द्रमोक्ष।
अत्राप्युदाहरतीममितिहास पुरातनम् ॥
गजद्रमोक्षणं पुण्यं कृष्णस्याक्लिष्टकर्मणः ॥ २२ ॥
यह पुरातन गजेंद्रमोक्षनामक अर्थात् जिसमें संकटसे गजेंद्रका
छुटाना ऐसे उत्तमकर्मवाले श्रीकृष्णके पवित्र इतिहासको
कहते हैं ॥ २२ ॥
सर्वरत्नमयः श्रीमास्त्रिकूटो नाम पर्वतः ॥
सुतः पर्वतराजस्य सुमेरो स्करातेः ॥ २३ ॥
संपूर्णरत्नोंसे संयुक्त हुआ श्रीमान् त्रिकूटनामक पर्वत होता
भया वह सूर्यसमान कांतिवाले पर्वतराज सुमेहका पुत्र भया॥२३॥
क्षीरोदजलवीच्यौतामलशिलातलः॥
उत्थितः सागरं मिला देवर्षिगणसेवितः ॥ २४ ॥
तहाँ क्षीरसागरके जलकी लहरियोंके अग्रभागकरके धुया
हुआ स्वच्छ शिलातलोंवाला तथा देवर्षिगणोंसे सेवित हुआ
वह पर्वत समुद्रको भेदन करके उपरको उठा हुआ है ॥ २४॥
अप्सरोभिः परितः श्रीमान्प्रस्रवणाकुलः॥
गंधवैः किन्नरैर्यक्षः सिद्धचारणपन्नगैः॥ २५॥
अप्सराओंकरके संयुक्त शोभावाला झिरनोंकरके संयुक्त गंधर्व,
किन्नर, यक्ष, सिद्ध, चारण, पन्नग, दिव्यसर्प इन्हों करके ॥ २५॥
मृगैः शाखामृगैः सिंहमतिंगश्च सदामदैः ॥
वृकहीपिक्राहाद्यैश्तगात्रो विराजते ॥२६॥
और मृग, वानर, सिंह, मदोन्मत्तहस्ती; भेड़िया, गैंडा, शूर
इत्यादिकों करके संयुक्त हुआ वह पर्वत विराजमान है ॥ २६ ॥
भाषाटीकासमेत । (३३७) पुन्नागैः कर्णिकारैश्च सुबिल्वौर्दिव्यपाटलैः ॥ चूतनिंबकदवैश्च चंदनागुरुचंपकैः ॥२७॥ और पुन्नाग ( गुर्जरदेशमें उडीण संदेशरा बोलते हैं) तथा काठचंपा वृक्ष और सुंदर बेलपत्र, दिव्यपाटलवृक्ष, आंब,नींब, कदंब, चंदन,अगर, चंपावृक्ष ॥ २७ ॥ शालैस्तालैस्तमालैश्च तरुभिश्चार्जुनैस्तथा। बकुलैः कुंदपुष्पैश्च सरलदेवदाभिः॥ २८ ॥ शालवृक्ष,ताडवृक्ष, तमालवृक्षोंकरके तथा अर्जुन (कोहवृक्ष) बकुल और कुन्दपुष्प, सरलवृक्ष, देवदार इन्होंकरके ॥ २८ ॥ मंदारकुसुमैश्चान्यैः पारिजातैश्च सर्वतः॥ एवं बहुविधैः शोभितः समलंकृतः॥ २९ ॥ और मन्दार ( देववृक्ष) के पुष्पोंकरके तथा कल्पवृक्षों करके संयुक्त है ऐसे बहुत प्रकारके वृक्षों करके सब तर्फसे शोभित और परिपूर्ण है ॥ २९॥ नानाधात्वंकितैः शृंगैः प्रस्रवद्भिः समंततः॥ जीवंजीवकसंघुष्टं चकोरशिखिनादितम् ॥३०॥ अनेकप्रकारकी धातुओंसे चिह्नित, तथा जलके झिरनोंवाले शिखरोंसे सब तर्फसे शोभित है जीवजीवक पक्षियोंकरके कूजित चकोर और मयूरोंकरके शब्दित है ॥३०॥ पद्मरागसमप्रख्यं ज्वालापुंजमिवोत्थितम् ॥ तस्यैकं कांचनं श्रृंगं सेवते यदिवाकरः॥ ३१ ॥ और पुखराजके समान कांतिवाला अनिके समूहकी तरह उठा
(३३८) गजेन्द्रमोक्ष।
हुआ ऐसा तिस पर्वतका शिखर सुवर्णका है जिसको सूर्य
सेवता है॥३१॥
नानापुष्पैः समाकीण नानागंधैः समाकुलम ॥
द्वितीयं राजतं श्रृंग सेवते यन्निशाकरः॥ ३२ ॥
अनेकप्रकारके पुष्पोंकरके और अनेक प्रकारकी सुगन्धियों
करके संयुक्त है दूसरा शिखर चान्दीका है उसको चंद्रमा
सेतवा है ॥३२॥
पांडुरांबुदसंका तुषाराचलसन्निभम् ॥
वजेंद्रनीलवैडूर्य..जोभिर्भासयनमः ॥ ३३ ॥
वह सफेद मेघ (बादलके समान) कांतिवाला तथा बर्फके पर्वत
समान कांतिवाला है और वन इन्द्रनीलमणि, वैडूर्यमणि,
इन्होंके तेजोंकरके आकाशको काशित करता हुआ॥ ३३ ॥
तृतीयं ब्रह्मसदनं प्रकृष्टं ३, मुत्तमम् ॥
अत्यद्भुतं महासानु विचित्रसरसद्रुमम् ॥ ३४ ॥
तीसरा शिखर ब्रह्माजीका स्थान और अत्यंत उत्तम है अत्यंत
अद्भुत महान् सानु अर्थात् शिखरके समान भूमिवाला है तथा
सरस उत्तम वृक्षोंवाला है ॥ ३४॥
विद्याधरपुरं तत्र हेमप्राकारतोरणम् ॥
तरुणादित्यसंकाशं तप्तकांचनसन्निभम् ॥३५॥
वहाँ सुवर्णकी खाही कोट और तोरणवाला विद्याधरोंका पुर है
तेजयुक्त सूर्यसमान कांतिवाला और तपाया हुआ सुवर्णसमान
कांतिवाला है ॥ ३५ ॥
भाषाटीकासमेत। (३३९) बालस्फटिकसोपानं वैडूर्यसुशिलातलम् ॥ जांबूनदमहदिव्यं नाना रत्नोपशोभितम् ॥ ३६ ॥ उत्तममणियोंकी पैडी है वैडूर्यमणिकी शिला है अनेक रत्नोंसे शोभित महान् सुवर्ण है।।.३६ ॥ अप्सरोगणसंकीणं सिद्धगंधर्वसेवितम् पद्मरागसमप्रख्यं तारागणसमन्वितम् ॥ ३७॥ तहां वह अप्सराओंके गणसे संयुक्त और सिद्ध गंधर्वोकरके सेवित है और पद्मरागमणिके समान है शोभा जिसकी और तारागणोंसे युक्त ॥३७॥ नैतत्कृतघ्नाः पश्यति न नृशंसा न नास्तिकाः नातप्ततपसो लोके ये च पापकृतो नराः ॥ ३८॥ ऐसे स्थानको कृतघ्न और हिंसा करनेवाले और नास्तिक तथा तपस्या न करनेवाले पापिष्ट लोग नहीं देखते ॥ ३८ ॥ नानाराधितगोविंदाः शैलं पश्यंति ते नराः ॥ तस्य सानुमतः पृष्ठे सरः कांचनपंकजम् ॥ ३९ ॥ जिन्होंने गोविन्द भगवानकी आराधना नहीं कियाहो ऐसे मनुष्य इस पर्वतको नहीं देखते इस पर्वतके पृष्टपर सुवर्ण कमलोंसे युक्त ॥ ३९ ॥ कारंडवसमाकीर्ण राजहंसोपशोभितम् मत्तभ्रमरसंघुष्ट चकोरशिखिनादितम् ॥ ४०॥ और कारंडवपक्षियोंसे व्यात तथा हंसोंसे युक्त और मत्तभ्रम- रोंसे सेवित तथा चकवा और मयूरोंके शब्दोंसे नादित ॥ ४०॥.
(३४०) गजेन्द्रमोक्ष
कमलोत्पलकलारपुंडरीकोपशोभितम् ।
कुमुदैः शतपत्रैश्च कांचनैः समलंकृतम् ॥४१॥
और अनेक प्रकारके सूर्यविकासी और चन्द्रविकासी कमलों
करके शोभायमान ऐसा मनोहर सरोवर था ॥४१॥
पत्रैमरकतप्रख्यैः पुष्पैः कांचनसनिमः।
गुल्मैः कीचकवेणूनां समंतात्परिवारितम् ॥ ४२ ॥
मरकत मणिके समान कांतिवाले पत्तोंसे युक्त तथा सुवर्णके
समान वर्णवाले पुष्पोंसे युक्त और चारोंतर्फमें गुच्छे छिद्रोंवाले
वाजते हुए बांस संकीर्ण हो रहे हैं ॥ ४२ ॥
अत्यद्भुतं महास्थानं विचित्रशिखराकुलम् ॥
शतयोजनविस्तीर्ण दशयोजनमायतम् ॥ ४३ ॥
तहां एक विचित्र शिखरोंकरके संयुक्त अत्यन्त अद्भुत महा-
स्थान है सौ योजन (४०० कोश) लंबा है दशयोजन (४०
कोश ) चौडा है ॥४३॥
पंचयोजनमूढानं सर एतत्प्रमाणतः ॥
हिमखंडोदकं राजन्सुस्वादममृतोपमम् ॥४४॥
पांच योजन ऊँचा ऐसे प्रमाणका सरोवर है हे राजन् ! तहाँ
बर्फ गलनेका पानी अमृतके समान सुन्दर स्वादु है ॥ ४॥
त्रैलोक्येऽदृष्टपूर्व च यत्सरस्तदनुत्तमम् ॥
सुप्रसन्नं सरो दिव्यं देवानामपि दुर्लभम् ॥४५॥
ऐसा अत्युत्तम सरोवर पहले त्रिलोकीमें नहीं देखा गया है
सुन्दर, स्वच्छ दिव्य यह सरोवर देवताओंको भी दुर्लभ है ॥ ४५ ॥
भाषाटीकासमेत । (३४१)
खातेन द्विगुणं प्रोक्तं शरद्यौखि निर्मलम् ॥
उपहाराय देवानां सिद्धाद्यर्जितपंकजम् ॥ ४६ ॥
उँचाईसे दूना ढूंचा है शरदऋतुके आकाशकी तरह निर्मल है
जिस सरोवरमें सिद्ध आदि लोग देवताओंकी पूजाके वास्ते कम-
लके पुष्पोंको संचित करते हैं ॥ १६ ॥
तस्मिन्सरसि दुष्टात्मा विरूपोऽन्तर्जलाशयः॥
आसीद् ग्राहो गजेंद्राणां दुराधर्षों महावल॥४७॥
तिस सरोवरमें दुष्टस्वभावाला, विरूप, जलके भीतर रह-
नेवाला गजेंद्र (हस्तियोंको ) दुराधर्ष ( नहीं सहने योग्य)
महाबली ग्राह होता भया ॥ ४७ ॥
अथ दंतोज्ज्वलमुखः कदाचिद्गाजयूथपः ॥
आजगाम तृषाऽऽक्रांतः करेणुपरिवारितः ॥४८॥
इससे अनन्तर किसी समयमें दांतों करके उज्ज्वल मुखवाला,
तृपासे पीडित हुआ, हस्तिनियोंकरके संयुक्त हुआ हस्तिसमूहों-
का पति (एक हस्ती) आताभया ॥ १८॥
मदत्रावी जलाकांक्षी पादचारीव पर्वतः ।।
वासयन्मदगंधेन महानरावतोपमः॥४९॥
मद झिरानेवाला जलकी इच्छावाला मदकी सुगंधि फैलाता
हुआ महान् ऐरावत हस्तीके समान, औरमानों पैरोंसे चलके पर्वत
आया हो ऐसा विशाल ॥ १९ ॥
गजो ह्यंजनसंकाशो मदाचलितलोचनः ।
तृषितः पातुकामोऽसाववती! महाहदे ॥ ५० ॥
(३४२) गजेन्द्रमोक्ष। अञ्जनके समान कांतिवाला मदसे नेत्रोंको चलायमान करता हुआ ऐसा यह तिलाया हस्तीजल पीनेकी इच्छा करके तिस महान सरोवरमें उतरा ॥१०॥ पिबतस्तस्य तत्तोयं ग्राहः समुपपद्यते ॥ सुलीन पंकजवने यूथमध्यगतः करी ॥ ५ ॥ तिसका जल पीते हुए तिसको ग्राह प्राप्त होता भया फिर यूथ हस्तिसमूह) के सध्यमें प्राप्त हुआ वह हस्ती कमलवनमें लीन भया, लुकनेलगा॥ ५१॥ गृहीतस्तेनरौद्रेण ग्राहेणाव्यक्तमूर्तिना। पश्यतीनां करेणूनां क्रोशंतीनां च दारुणम् ॥५२॥ तब उस भयंकर अप्रकट मूर्तिवाले ग्राहने हस्तिनियों के देखते हुए और दारुण पुकारते हुए पकड़लिया ॥ १२ ॥ नीयते पंकजवने प्राहेणातिबलीयसा ॥ गजश्चाकर्षते तीरं ग्राहश्चाकर्षते जलम् ॥ ५३ ॥ अत्यन्त बलवाला ग्राह कमलवनमें खीचनेलगा हाथी तो किनारकी तर्फ खीचता है ग्राह जलमें खीचता है ।। ५३ ॥ तयोरासीन्महबुद्ध दिव्यवर्षसहस्रकम् ॥ दारुणैः संयुतः पाशैनिष्प्रयत्नगतिः कृतः ॥५४ ॥ इसप्रकार तिन दोनोका महान् युद्ध दिव्य हजार वर्षांतक होता भया दारुण फाँशियोंकरके संयुक्त किया हुआ हस्ती कुछ चेष्टा न करसके ऐसा करदिया॥ ५४॥ वेष्टयमानः स घोरैस्तु पाशैर्नागो दृद्वैस्तथा ॥
भाषाटीकासमेत । (३४३)
विस्फूर्य च यथाशत्या विक्रोशंस्तु महारवान् ५५
घोर दृढ फांसियों करके बँधा हुआ वह हस्ती शक्ति के अनुसार
चेष्टा स्फुरणा करके महान् चिक्कार मारताभया ॥५५॥
व्यथितः स निरुत्साहो गृहीतो घोरकर्मणा ।
परमापदमापन्नो मनसाऽचिंतयद्धरिम् ॥५६ ।।
पीडित हुआ, उत्साह रहित हुआ, घोर कर्मवाले ग्राहसे पकडा
हुआ परम विपत्तिको प्राप्त हुआ हस्ती अपने मन करके हरि-
भगवानकी शरण होता भया ॥५६॥
स तु नागवरः श्रीमान्नारायणपरायणः ॥
तमेव शरणं देवं गतः सर्वात्मना तदा ॥ ५७ ॥
तब वह श्रीमान् हस्तिवर नारायणको परम आश्रय करके
सर्वात्मा करके तिस ही देवकी शरण प्राप्त भया ॥ ६७ ।।
एकाग्रो निगृहीतात्मा विशुद्धेनांतरात्मना ।।
जन्मजन्मांतराभ्यासाइक्तिमान्गरुडध्वजे ॥५८ ॥
विशुद्ध मन करके एकाग्र हो मनकी वृत्तियोंको वशमें कर जन्मर
के अभ्याससे गरुड़ध्वज भगवान्में भक्तिमान होता भया ॥१८॥
नान्यं देवं महादेवात्पूजयामास केशवात् ॥
दिग्बाहुं स्वर्गमूर्दानं भूपादं गगनोदरम् ॥ ५९ ॥
महान् देव केशव भगवानसे अन्य किसी देवको नहीं पूजता
भया दिशा बाहु, स्वर्ग मस्तक, भूमी पाद, आकाश उदर-
वाले ॥१९॥
आदित्यचंद्रनयनमनंतं विश्वतोमुखम् ॥
भूतात्मानं च मेघाभ शंखचक्रगदाधरम् ॥६० ॥
(३४४) गजन्द्रमोक्ष । सूर्य चंद्रमा नेत्रोंवाले अनन्त सव तर्फ सुखवाले भूतात्मा मेघसमान कांतिवाले शेख चक्र गदाधारी ॥६॥ सहस्रशुभनामानमादिदेवमजं विभुम् ॥ प्रगृह्य पुष्कराग्रेण कांचनं कमलोत्तमम् ॥६१ ॥ सुन्दर सहस्रनामवाले आदिदेव अजन्मा ऐश्वर्यवान् नारायण- को पूजता भया कमलदंडीके अग्रभागसे उत्तम सुनहरा कम- ल युष्पको ग्रहण करके ॥ ६॥ नैवेद्यं मनसाध्यात्वा पूजां कृत्वा जनार्दने । आपहिमोक्षमन्विच्छन्गजः स्तोत्रमुदीरयत्॥६२॥ मनकरके नैवेद्यका ध्यान कर जनार्दन भगवान विष पूजाकरके विपत्तिले छूटनेकी इच्छा करता हुआ हस्ती स्तोत्र कहता भया ॥६२॥ गजन्द्र उवाच। नमो मूलप्रकृतये अजिताय महात्मने ॥ अनाश्रयाय देवाय निस्पृहाय नमो नमः॥६३ ॥ गजेंद्र बोला-सूलप्रकृतिस्वरूप अजित महात्माके अर्थ नम- स्कार है अनाश्रयदेव अर्थात् किसीके आश्रय नहीं रहनेवाले निस्पृह इच्छा रहितके अर्थ नमस्कार है ।। ६३ ॥ नम आद्याय बीजाय आर्षेयाय महात्मने ॥ अनंतराय चैकाय अव्यक्ताय नमो नमः ॥ ६४॥ आद्य बीजस्वरूप, आय महात्मा अन्तर ( मध्य ) रहित, एक, अव्यक्त किसीप्रकार प्रकट न होनेवाले देवके अर्थ नमस्कार है नमस्कार है॥ ६४॥ १
.
भाषाटीकासमेत । (३४५)
नमो गुह्याय गूढ़ाय गुणाय गुणवर्तिने ॥
अतायाप्रमेयाय अतुलाय नमो नमः ॥ ६५ ॥
गुह्य गूढस्वरूप,गुणस्वरूप,गुणोंमें वर्तनेवाले अतळ (किसी
प्रकार विचार नहीं किये जावें) अप्रमेय (किसी प्रकार प्रमाण नहीं
किये जायें) अतुल ऐसे नारायणको नमस्कार है नमस्कार है॥६५॥
नमः शिवाय शांताय निश्चिताय यशस्विने ॥
सनातनाय पूर्वाय पुराणाय नमो नमः ॥ ६६ ॥
शिवस्वरूप शांतस्वरूप चिंतारहित यशस्वी सनातन पूर्व सबसे
पहिले रहनेवाले पुराण पुरुषके अर्थ नमस्कार है नमस्कार है॥६६॥
नमो जगत्प्रतिष्ठाय गोविंदाय नमो नमः ॥
नमोऽस्तु पद्मनाभाय सांख्ययोगोद्भवाय च ॥६७॥
जगत्की स्थिति करनेवाले गोविंदके अर्थ नमस्कार है नम-
स्कार है पद्मनाभ और सांख्ययोग शास्त्रों करके जानने योग्यके
अर्थ नमस्कार है॥ ६७॥
विश्वेश्वराय देवाय शिवाय हरये नमः॥
नमोऽस्तु तस्मै देवाय निर्गुणाय गुणात्मने ॥६८ ॥
विश्वेश्वर देव शिव हरिके अर्थ नमस्कार है निर्गुण और गुणा-
त्मक तिस देवके अर्थ नमस्कार है॥ ६८॥
नमो देवाधिदेवाय स्वभावाय नमो नमः॥
नारायणाय विश्वाय देवानां परमात्मने ॥६९ ॥
देवतोंके अधिपति देव आप ही उत्पन्न करनेवाले विश्वस्वरूप
नारायणके अर्थ देवताओंके परमात्माके अर्थ नमस्कार है ॥६९॥
-- (३४६) गजेन्द्रमोक्ष। नमो नमः कारणवामनाय नारायणायामितविक्र- माय ॥ श्रीशाङ्गचक्रासिगदाधराय नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय ॥७॥ कारणरूपी वामन सूक्ष्मके अर्थ नमस्कार है नारायण अतुल पराक्रमवाले श्रीशाङ्गधनुष, चक्र गदा धारण करनेवाले तिस पुरु- पोत्तमदेवके अर्थ नमस्कार है ॥ ७० ॥ गुह्याय वेदनिलयाय महोदराय सिंहाय दैत्यनि- धनाय चतुर्भुजाय ॥ ब्रहेंद्ररुद्रमुनिचारणसंस्तु- ताय देवोत्तमाय वरदाय नमोऽच्युताय ॥ ७१ ॥ गुह्यस्वरूप वेदके स्थान महान् उदरखाले सिंहस्वरूप दैत्योंको नष्ट करनेवाले चतुर्भुजस्वरूपवाले ब्रह्मा, इंद्र, शिव, मुनि, चारण, इन्हों करके संस्तुत देवताओं में उत्तम वरदायी अच्युत अर्थात् जिसका अपने स्थानसे पड़ना नहीं होताहै ऐसे देवके अथ नम- स्कार है॥७१॥ नागेंद्रदेहशयनासनसुप्रियाय गोक्षीरहेमशुक- नीलधनोपमाय ॥ पीतांबराय मधुकैटभनाशनाय विश्वाय चारुमुकुटाय नमोऽक्षराय ॥७२॥ शेषनाग शय्यापर आसन करने में सुंदर हितवाले गौके दूधंस- मान सुवर्णसमान (कांतिवाले) तोता और नील मेधके समान उ- पमावाले अर्थात् श्वेत,पीत,हरित, नील सब वर्णवाले पीतांबरधारी मधुकैटभ दैत्यको नष्टकरने वाले विश्वरूप सुंदरमुकुटवाले अक्षर (क्षीणता आदि) विकाररहितके अर्थ नमस्कार है॥७२॥ नाभिप्रजातकमलस्थचतुर्मुखाय क्षीरोदकार्णव-
भापाटीकासमेत। (३४७)
निकेतनशोभनाय ॥ नानाविचित्रमुकुटांगदभूष
णाय योगीश्वराय पुरुषाय नमो वराय ॥ ७३ ॥
जिसकी नाभिसे उत्पन्न हुए कमलमें स्थित होनेवाले चतुर्मुख
ब्रह्माजी होते हैं (ऐसे) क्षीरसागर स्थानमेंशोभित होनेवाले अनेक
प्रकारके विचित्र मुकुट और बाजूबंद आदि आभूषणोंवाले योगी-
श्वर पुरुष, उत्तम, श्रेष्ठ, भगवान्के अर्थ नमस्कार है ॥ ७३ ॥
भक्तिप्रियाय वरदीप्तिसुदर्शनाय फुल्लारविंदविपुः
लायतलोचनाय ॥ देवेन्द्रविघ्नशमनोद्यतपौरुषाय
नारायणाय विरजाय नमोऽच्युताय ॥ ७४॥
भक्तिको प्रिय माननेवाले उत्तम कांतियुक्त सुदर्शनचक्रवाले फूले
हुए कमलसमान विस्तृत नेत्रोंवाले देवेंद्रके विनकी शांतिके वास्ते
उद्यत होके पुरुषार्थ करनेवाले (रागादि) रजोगुणरहित नारायण
अच्युत भगवानके अर्थ नमस्कार है ॥ ७ ॥
नारायणाय नरलोकपरायणाय कालाय कालक-
मलायतलोचनाय ॥ रामाय रावणविनाशकृतो-
द्यमाय धीराय धीर तिलकाय महोदराय ॥७५ ॥
नारायण नरलोकमें परायण कालस्वरूप कालरूपी कमलके
समान नेत्रोंवाले रावणको विनाश करनेवाले रामचन्द्रजी धीरज-
वाले धीरजवालोंमें शिरोमणि महान् उदरवाले ऐसे भगवान्के अर्थ
नमस्कार है ॥७२॥
पद्मासनाय मणिकुण्डलभूषणाय कंसांतकाय
शिशुपालविनाशनाय ॥ गोवर्धनाय सुरशत्रुनि-
कृतनाय दामोदराय बरदाय नमो वराय ॥७६॥
(३४८) गेजेन्द्रमोक्ष। कमलासनभगवान् और मणि कुण्डल आभूषणोंवाले, कंसको मारनेवाले शिशुपालका विनाश करनेवाले गोवर्द्धनरूप देवतोंके शत्रु (दैत्यों) को मारनेवाले दामोदर वर देनेवाले अत्यन्त श्रेष्ठ भगवान्के अर्थ नमस्कार है ॥ ७६ ॥ ब्रह्मायनाय त्रिदशाधिपाय लोकायनायात्मभवो- इवाय ॥ नारायणायातिविनाशनाय महावराहाय नमस्करोमि ॥ ७७॥ ब्रह्माजीके निवासस्थान देवता और स्वर्गके पति लोकोंके निवासस्थान आप ही उत्पन्न होनेवाले नारायण पीडाको नाश करनेवाले महावराह अवतारधारी भगवान्के अर्थ मैं नमस्कार करता हूँ। ७७॥ कूटस्थमव्यक्तचिंत्यरूपं नारायणं कारणमा- दिदेवम् ॥ युगांतशेषं पुरुषं पुराणं तं वासुदेवं शरणं प्रपद्ये ॥ ७८॥ कूटस्थ (परमात्मारूप) अव्यक्त अचिंत्यरूप नारायण कारणस्वरूप आदिदेव प्रलयकालमें शेष रहनेवाले पुराणपुरुष तिसं वासुदेवकी शरण हूँ॥ ७८॥ अदृश्यमच्छेद्यमनंतमव्ययं महर्षयो ब्रह्ममयं सनातनम् ॥ वदंतिय वै पुरुषं पुराणं तं वासुदेवं शरणं प्रपद्ये ॥ ७९ ॥ अदृश्य, अच्छेद्य, अनंत, अविनाशी जिसको महर्षिजन स- नातन ब्रह्ममय पुराणपुरुष कहते हैं तिस वासुदेवकी शरण हूँ ॥७९॥ उत्तिष्ठतस्तस्य जलारूरुशोर्महावराहस्य महीं .
भापाटीकासमेत। (३४९)
विदार्य ॥ वितन्वतो वेदमयं शरीरं लोकांतरस्था
मुनयो वदंति ॥ ८०॥
पृथ्वीको उपाडके जलके ऊपर आरूढ होनेकी इच्छावाले
उठते हुए वराहजीको वेदमय शरीर लोकान्तरस्थ मुनिजन
कहते हैं ॥ ८० ॥
योगेश्वरं चारुविचित्रमौलिं ज्ञेयं समक्ष प्रकृतेः
परस्तात् ॥ क्षेत्रज्ञमात्मप्रभवं वरेण्यं तं वासुदेवं
शरणं प्रपद्ये ॥ ८१॥
योगीश्वर सुन्दर विचित्रमुकुटवाले प्रत्यक्ष प्रकृतिसे परे क्षेत्रज्ञ
आप हीउत्पन्न वरेण्य (प्रधानपुरुष) तिस वासुदेवकी शरण हूँ॥८॥
कार्यक्रियाकारणमप्रमेयं हिरण्यवाहुं वरपद्मना-
भम् ॥ महावलं वेदनिधिं सुरोत्तमं ब्रजामि विष्णुं
शरणं जनार्दनम् ॥ ८२॥
कार्य क्रिया कारण स्वरूप है अप्रमेय है सुवर्णवत् तेजवाली
भुजावाले उत्तम पद्मनाभ महावलवाले वेदनिधि देवतोंमें श्रेष्ठ
जनार्दन अर्थात् शत्रुजनोंको नष्ट करनेवाले विष्णु भगवान्की
शरण हूँ ॥ ८२ ॥
किरीटकेयूरमहार्हनिष्कैरत्यंतमालंकृतसर्वगात्रम् ॥
पीतांबरं कांचनभक्तिचित्रमालाधरं केशवमभ्यु-
पैमि ॥ ८३॥
मुकुट बाजूबन्द उत्तम गलेका आभूपण इन्होंकरके विभूषित-
किया है संपूर्ण शरीर जिन्होंने ऐसे और पीतांबरधारी भक्तिसे
विचित्रित सुवर्णकी मालाको धारण करनेवाले केशव भगवान्-
की शरण हूँ॥ ८३ ॥
(३५०) गजेन्द्रमोक्ष। भवोद्भवं वेदविदां वरिष्ठमादित्यचन्द्राग्निवयुप्रभा- वर ॥ योगात्मकं सांख्यविदां वरिष्ठं प्रभु प्रपद्ये- ऽच्युतमात्मवन्तम् ॥ ८४॥ संसारको उत्पन्न करनेवाले वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, वसु इन्होंमें तेजवृद्धि करनेवाले, योगात्मक सांख्यवेत्ता- ओंमें श्रेष्ठ प्रभु, अच्युत, आत्मवंत भगवान्की शरण हूँ॥८४॥ यदक्षरं ब्रह्म वदंति सर्वगं निशम्य यन्मृत्युमुखा- प्रमुच्यते ॥ तभीश्वरं युक्तमनुत्तमैर्गुणैः सनातनं लोकगुरु स्मरामि ॥ ८५॥ जिसको अक्षर (निर्विकार अविनाशी) सर्वगत ब्रह्म कहते और जिसको सुनके विचारके यह जीव मृत्युके मुखसे छूटजाता है, सर्वोत्तम गुणोंकरके युक्त हुए तिस ईश्वरको लोकके गुरुको मैं स्मरण करता हूँ ॥ ८५ ॥ श्रीवत्सांकं महादेवं वंदे गुह्यमनुत्तमम् ॥ प्रपद्य सूक्ष्ममचलं वरेण्यमभयप्रदम् ॥८६॥ श्रीवत्सचिह्नवाले, महान् देव, गुहा, अत्युत्तम, सूक्ष्म, अचल प्रधानपुरुष अभय देनेवाले भगवानकी शरण हूँ॥८६॥ नमस्तस्मै वराहाय लीलयोडरते महीम् । स्नुरमध्यगतो यस्य मेरुः खुरखुरायते ॥ ८७ ॥ जो अपनी लीला करके पृथ्वीको उठा लेता है और जिसके पैरमें (खुरमें ) प्राप्त हुआ सुमेरु पर्वत खुर खुर होता है अर्थात खुरमें अत्यंत सूक्ष्म लीन होजाता है तिस वराहजीके अर्थ नमस्कार है ॥ ८७ ॥ "
भापाटीकासमेत। (३५१)
प्रभवं सर्वभूतानां निर्गुणं परमेश्वरम् ॥
प्रपद्ये मुक्तसंगानां यतिनां परमां गतिम् ॥ ८८ ॥
जो सब भूतोंको उत्पन्न करनेवाला निर्गुण परमेश्वर है और संग-
रहित यतिजनोंकी परम गति है तिनकी शरण हूँ॥ ८८ ॥
भगवंतं गुणाध्यक्षमक्षरं परमं पदस ॥
शरण्यं शरणार्तानां प्रपद्ये भक्तवत्सलम् ॥ ८९ ॥
(भगवंत) ऐश्वर्यवाले गुणोंके अधिष्ठाता अक्षर परमपद
शरणागतोंके रक्षक भक्तोंपर दया करनेवाले ऐसे भगवान्की
शरण हूँ ।। ८९॥
त्रिविक्रमं त्रिलोकेशं सर्वेषां प्रपितामहम् ॥
योगात्मानं महात्मानं प्रपद्येऽहं जनार्दनम् ॥९॥
त्रिविक्रम (तीनों लोकोंमें वा त्रिगुणोंमें जिसका पादविक्षेप
प्रचार) है ऐसे त्रिलोकीके स्वामी सबके प्रपितामह ( वडेदादे)
योगात्मा महात्मा ऐसे जनार्दन भगवान्की में शरण हूँ॥ ९ ॥
आदिदेवमजं विष्णुं व्यक्ताव्यक्तं सनातनम् ॥
नरायणमणीयांसं प्रपद्ये ब्राह्मणप्रियम् ॥ ९१ ॥
आदिदेव अजन्मा विष्णुकहिये संबलोकोंमें व्याप्त होके रहने-
वाले व्यक्त अर्थात् अवतारं आदिकों करके प्रगट अव्यक्त कहिये
इंद्रियोंकरके अग्राह्य सनातन नारायण अत्यंत सूक्ष्म ब्राह्मणोंके.
प्रिय ऐसे ईश्वरकी शरण हूँ॥ ॥ ९१ ॥
अकूपाराय देवाय नमः सर्वमहात्मने ।
प्रपद्ये देवदेवेशमणीयांसमणोर्यथा ॥ ९२ ॥
(३९२) गजेन्द्रमोक्ष।
समुद्रस्वरूप देवके अर्थ, सर्व महात्माके अर्थ नमस्कार है।
देवदेवेश सूक्ष्मोंसे भी अत्यंत सूक्ष्म ऐसे प्रभुकी शरण हूँ॥ ९२ ॥
लोकनयाय चैकाय परतः परमात्मने ।
नमः सर्वत्रशिरसे अनंताय महात्मने ॥ ९३ ॥
त्रिलोकीस्वरूप एक परम परमात्माके अर्थ नमस्कार है सब
जगह शिरोंवाले अनंत महात्माके अर्थ नमस्कार है ॥ ९३ ॥
तमेवं परमं देवमृषयो वेदपारगाः॥
कीर्तयंति च यं सर्वे ब्रह्मादीनां परायणम्॥९४॥
जो ब्रह्मादिकोंका परम निवासस्थान है तिसही परमदेवको वेद-
पारगामी सब ही ऋषि कीर्तन करते हैं ॥ ९४ ॥
नमस्ते पुंडरीकाक्ष भक्तानामभयंकर ॥
सुब्रह्मण्य नमस्तेऽस्तु त्राहि मां शरणागतम् ॥१५॥
हे पुंडरीकाक्ष ! हे भक्तोंको अभय करनेवाले हे सुब्रह्मण्यदेव !
तुम्हारे अर्थ नमस्कार है शरणागत हुए मेरी रक्षा करो ॥ ९५ ॥
तावद्भवति मे दुःखं चिंतासंसारसागरे ॥
यावत्कमलपत्राक्षं न स्मरामि जनार्दनम् ॥ ९६ ॥
चिंतायुक्त संसारसागरमें मेरेको तबतक दुःख होता है कि, जबतक
कमलके पत्रसमान नेत्रोंवाले जनार्दन भगवानको स्मरण नहीं
करता हूँ ॥ ९६ ॥
भीष्म उवाच ।
भक्तिं तस्य तु संचिंत्य नागस्यामोघसंस्तवम् ॥
प्रीतिमानभवद्राजञ्छत्वा चक्रगदाधरः ॥ ९७ ॥
भाषाटीकामेत। भीष्मपितामहजी कहते हैं .हे राजन् ! तिस हस्तिके अमोघ स्तो- त्रको और भक्तिको चितवन करके चक्र और गदाधारी विष्णुभगवान् प्रसन्न होते भये ॥ ९७॥ आरुह्य गरुडं विष्णुराजगाम सुरोत्तमः ॥ सान्निध्यं कल्पयामास तस्मिन्सरसि लोकधृ०९८ लोकको धारण करनेवाले देवोत्तम विष्णुभगवान् गरुड़पर चढ़के तिस सरोवरके समीप प्राप्त होते भये ।। ९८ ॥ ग्राहग्रस्तं गजेन्द्रं च तं ग्राहं च जलाशयात् ॥ उज्जहाराप्रमेयात्मा तरसा मधुसूदनः ॥ ९९॥ अतुल शरीरवाले मधुसूदन अगवान् ग्राहसे पकडेहुए हस्ती को और तिस ग्राहको उस सरोवरसे बाहर निकालते भये॥९९ ॥ जलस्थं दारयामास ग्राहं चक्रेण माधवः॥ मोचयामास नागेन्द्र पापेभ्यःशरणागतम् ॥ १००॥ माधवभगवान् जलमें स्थित हुए ग्राहको अपने सुदर्शनचक्रसे काटते भये और शरणागत हुए नागेन्द्रको पापोंसे छुयते भये ॥ १० ॥ सहि देवलशापेन हू(गंधर्वसत्तमः ग्राहत्वमगमत्कृष्णाद्वधं प्राप्य दिवं गतः॥ इदमप्यपरं गृह्यं राजन् पुण्यतमं शृणु ॥१॥ वह उत्तम हूहूनामक गंधर्व पहले देवलऋषिके शापसे ग्राह होगया था सो श्रीकृष्णसे मृत्युको प्राप्त होके स्वर्ग पहुँचा, हे राजन् ! यह और भी अत्यंत पवित्र गुह्य सुनो ॥१॥ २३
(३९४) गजेन्द्रमोक्ष
युधिष्ठिर उवाच ।
कथं शापोद्भवं नाम गंधर्वाणां महात्मनाम् ॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण पितामह ॥ २॥
युधिष्ठिर बोले-हे पितामहजी ! महात्मा गंधर्वोको कैसे शाप
होता भया यह मैं विस्तारसे सुनना चहता हूँ॥२॥
भीष्म उवाच।
हाहा हूहूरिति ख्यातौ गीतवाद्यविशारदौ।
इति तौशापितो तेन देवलेन महात्मना ॥३॥
भीष्मजी कहने लगे-हाहा हह ऐसे प्रसिद्ध गंधर्व गाने बजानेमें
निपुण भये इन दोनोंको महात्मा देवलऋषि शाप देता भया ॥३॥
उर्वशी मेनका रंभा तथा चान्येऽप्सरोगणाः॥
शक्रस्य पुरतो राजन्नृत्यंते ताः सुमध्यमाः॥४॥
हे राजन् ! उर्वशी मेनका रंभा ये तथा अन्य बहुतसी उत्तम
अप्सरा होती भई वे सब इंद्रके आगे नाँचती थीं ॥४॥
ततस्तो गायमानौ तु गंधर्वो राजसद्मनि ॥
अन्योन्यं चक्रतुः स्पधी शक्रस्य पुरतस्तदा ॥५॥
फिर वे दोनों गंधर्व राजसभामें तहाँ इंद्रके आगे गाते हुए
आपसमें स्पर्धा (ईर्षा) करते भये ॥५॥
आवयोरुभयोर्मध्ये कः श्रेष्ठो गीतवाद्ययोः॥
तं वदस्व सुरश्रेष्ठ ज्ञात्वा गीतस्य लक्षणम् ॥६॥
कि,हमारे दोनोंमें कौनसा गाने बजानेमें श्रेष्ठ है। हे इंद्र ! इस
वातको गीतके लक्षणको विचारके आप कहो ॥६॥
--
भाषाटीकासमेत। (३५५)
गंधर्वयोर्वचः श्रुत्वा प्रत्युवाच शतक्रतुः॥
युवयोर्गीतवाद्येषु विशेषो नोपलक्ष्यते ॥ ७॥
गंधवों के वचनको सुनके इंद्र प्रतिवचन बोला कि, तुम्हारे गाने
बजाने में कुछ विशेष हमको नहीं दीखता ॥ ७ ॥
एक एव मुनिश्रेष्ठो देवलो नाम नामतः॥
युवयोः संशयच्छेत्ता भवष्यति न संशयः॥ ८॥
किंतु एक देवल नामले प्रसिद्ध मुनिश्रेष्ठ है वह तुम्हारे संदे-
हको दूर करेगा इसमें संदेह नहीं ॥ ८॥
ततस्तु तो शक्रवचो निशम्य प्रणम्य राजञ्छिर-
सा सुरेश्वरम् ॥ गतौ सुहृष्टौ जयकांक्षिणौ तौ
यत्राश्रमे तिष्ठति स हिजाग्र्यः ॥ ९॥
हे राजन् ! पीछे वे दोनों इंद्रके वचनको सुनके शिर करके
प्रणाम कर जयकी (जीतनेकी ) इच्छावाले दोनों प्रसन्न हुए जहाँ
वह ऋषि था उस आश्रममें जाते भये ॥९॥
ततो दृष्ट्वा मुनिश्रेष्ठं देवलं शंसितव्रतम् ।
अभिवाद्य महात्मानं प्रोचतुः पार्श्वसंस्थिती॥१०॥
फिर तीव्र व्रतवाले मुनिश्रेष्ठ देवलको देख तिस महात्माको
विधिपूर्वक प्रणाम कर बराबरमें स्थित होके बोलते भये ॥ १० ॥
शक्रेण प्रेषितौ देव त्वत्समीपे हिजोत्तम ॥ .
एकस्य च जयं देहि यत्ते मनसि रोचते ॥११॥
हे द्विजोत्तम ! हमदोनोंको तुम्हारे पास इद्रने भेजे हैं सो जौ
नसा तुम्हारे मनमें रुचै उस एकको जय दो ॥११॥
(३५६) गजेन्द्रमोक्ष। पृथक चरंतो गायतौ रुचिरं मधुरस्वरम् ॥ न किंचिंद्रदते वाक्यं मुनिर्मोनस्य धारणात् ॥१२॥ ऐसे कहके अलग २ विचरते हुए सुंदर मधुरस्वरमें गाते भये तब मौनधारण होनेसे मुनि कुछ नहीं बोले ॥१२॥ शृण्वन्नपि पदं तेषां न किंचिद्वदते मुनिः॥ तदा तौ कुपितो तस्य देवलस्य महात्मनः ॥१३॥ तिन्होंके पदको सुनतेहुए भी मुनि कुछ नहीं कहते हैं तब वे दोनों देवल महात्मापर क्रोधी होते भये ॥ १३॥ ऊचतुस्तौ तदा वाक्यं गंधर्वो कालनोदितौ । मूढोऽयं नाभिजानाति निश्चयं वाद्यगीतयोः॥१४॥ कालसे प्रेरे हुए गंधर्व बोले कि, यह मूर्ख है गाने बजानेके सिद्धांतको नहीं जानता ॥ १४॥ निशम्यैतहचस्तेषां गंधर्वाणां मदान्वितम् ॥ क्रोधादुत्थाय विप्रेन्द्र इदं वचनमब्रवीत् ॥ १५॥ गंधर्वोका ऐसा मदका वचन सुनके वह मुनि क्रोधसे उठके यह वचन बोला ॥१६॥ एष हूहूर्दुरात्मा तु ग्राहत्वं यातुमूढधीः ॥ त्वमेव गजराजस्तु भवस्व गिरिगहरे ॥ १६ ॥ यह हूहू दुष्टात्मा तो ग्राह बनो तू मूर्ख गह्वर पर्वतमें हस्ती हो ॥१६॥ ततस्तौ शापितौ तेन देवलेन महात्मना । प्रणम्य शिरसा विगं गंधर्वाविदमूचतुः॥ १७॥ "
भाषाटीकासमेत। (३५७)
तब वे दोनों देवल महात्माकरके शापको प्राप्त हुए पीछे
तिस मुनिको प्रणाम करके यह बोले ॥ १७ ॥
भूमंडलगती ह्यावां प्रसादं कुरु सत्तम ।
निश्चयं वद विप्रेन्द्र-येन शापाद्विमुच्यतः ॥ १८ ॥
हे विप्रेन्द्र ! पृथ्वीलोकपर गये हुए हमपर दया करो, हे
मुनिश्रेष्ठ! जिससे हम शापसे छूटै ऐसा कोई निश्चय कहो ॥१८॥
ततस्तौ पुरतो दृष्ट्वा उभौ शापभयादितौ ॥
प्रत्युवाच मुनिश्रेष्ठो गंधवौँ तो भयान्वितौ ॥१९॥
फिर शापके भयसे पीड़ित हुए आगे खड़ हुए उन दोनोंको
देखके भक्तियुक्त गंधवोंको मुनिश्रेष्ट बोलता भया ॥ १९ ॥
मेस्पृष्ठे सरो रम्यं बहुक्षसमाकुलम् ॥
नानापक्षिनिनादाढयं द्वितीय इव सागरः ॥ २० ॥
सुमेरुपर्वतकी शिखरपर रमणीक बहुत वृक्षों से संयुक्त अनेक
पक्षियों के शब्दसे युक्त मानों दूसरा सागर हो ऐसा एक सरो-
वर है ॥२०॥
तस्मिन्सरोवरे रम्ये नित्यं ग्राहो भविष्यसि ॥
तृषार्तस्तत्र मातंगो गमिष्यति न संशयः ॥२१॥
तिस रमणीक सरोवर विषे तू नित्य ग्राह होगा तहां तृषासे
पीड़ित (तिसाया) हस्ती जावेगा इसमें सन्देह नहीं ॥२१॥
तयोर्मध्ये महयुद्धं भविष्यति सुदारुणम् ॥
ग्राहेणाकृष्यमाणस्तु गजः स्तोत्रं करिष्यति ॥२२॥
तब तिनका महान घोर युद्ध होगा फिर ग्राहसे जलमें खींचा
हुआ हस्ती स्तुति करेगा ॥ २२ ॥
(३५८) गजेन्द्रमोक्ष।
तदैव देवदेवेशस्तुष्यते नात्र संशयः॥
ततो नारायण प्रीतः शापतो मोचयिष्यति ॥२३॥
उसी समय देवदेवेश भगवान् प्रसन्न होंगे इसमें सन्देह नहीं
तब प्रसन्न हुए नारायण शापसे छुटावेंगे ॥२३॥
इत्युक्तादृषिणा तेन वरेणैतौ प्रमोदितौ॥
भीष्म उवाच।
एवं परावार्तभृतौ श्रुत्वासीद्भगवानिह ॥ २४ ॥
ऋषिने ऐसे कहके तिस वरकरके प्रसन्न करदिये-भीष्मजी
कहते हैं-ऐसे परम पीडित इन्होंको सुनके विष्णु भगवान
यहां आतेंभये ॥२४॥
श्रीभगवानुवाच ।
क्रोधोऽपि वरतुल्योऽयमापदं तं प्रयच्छतु ॥
आपहिमुक्तौ युगपद्जो गंधर्व एव च ॥ २५ ॥
श्रीभगवान् कहते हैं-यह क्रोध भी वरके समान है तिस विप-
त्तिको करो विपत्तिसे छूटते समय हस्ती और गंधर्व (ग्राहरूपी)
ये दोनो गंधर्व ही होते भये ॥२५॥
गजोऽपि मुक्तता यातः श्रीकृष्णेन विमोक्षितः ॥
तस्माच्छापाहिनिर्मुक्तः प्रागिवाविकृतोऽभवत् ॥ २६॥
हस्ती भी मुक्तिको प्राप्त भया है श्रीकृष्णचन्द्रने विमोक्ष किये
तब तिस पापसे छूटके पहलेकी तरह विकाररहित होता
भया ॥२६॥
तौ चस्व स्वं वपुः प्राप्य प्रणिपत्य जनार्दनम् ॥
गजो गंधर्वराजश्च परां नितिमागतौ ॥ २७॥
भाषादीकासमेत। (३९९)
वे दोनों गज, ग्राह अपने२ रूपको प्राप्त होके जनार्दन भग-
वान्को प्रणाम कर गज और गंधर्वराज दोनों परम आनन्दको
प्राप्त होते भये ॥ २७ ॥
प्रीतिमान्पुंडरीकाक्षः शरणागतवत्सलः॥
अभवत्तत्र देवेशस्ताभ्यां चैव प्रपूजितः ॥ २८ ॥
शरणागत जनोंपर दया करनेवाले पुंडरीकाक्ष भगवान प्रसन्न
होते भये और देवेश विष्णु भगवान् वहाँ तिन दोनों करके पूजिता
होते भये ॥२८॥
इदं चैव महाबाहो देवस्य च प्रभाषितम् ॥
भजंतं गजराजानमवदन्मधुसूदनः॥२९॥
हे महाबाहो ! स्तुति करते हुए हस्तीराजको मधुसूदन भगवान्
कहते भये तहा विष्णुदेवका कहा हुआ यह वचन है ॥ २९ ॥
श्रीभगवानुवाच ।
यो मां वां च सरश्चैव ग्राहस्य च विदारणम् ॥
गुल्मकीचकवेणूनां तं च शैलवरं तथा ॥३०॥
श्रीभगवान् बोले-जो पुरुष मुझको तुम दोनोंको सरोवरको
ग्राहके मारनेको और गुच्छेवायुसे बाजते हुए बाँसोंके झुंडों-
को और तिस उत्तम पर्वत को स्मरण करेगा ॥३०॥
अश्वत्थं भास्करं गंगा नैमिषारण्यपुष्करम् ॥
प्रयागं ब्रह्मतीर्थं च दण्डकारण्यमेव च ॥ ३१ ॥
और पीपलवृक्ष, सूर्य अथवा भास्कर तीर्थ गंगाजी नैमिपा-
रण्य पुष्करजी प्रयाग ब्रह्मतीर्थ दण्डकारण्य ॥३१॥
(३६०) गजेन्द्रमोक्ष। पुराणं रामचरितं भारताख्यानमुत्तमम् ॥ विभूति विश्वरूपं च स्तवराजमनुस्मृतिम् ॥ ३२॥ पुराण, रामचरित्र, महाभारतके इतिहास, विभूति, विश्वरूप, भीष्मस्तवराज, अनुस्मृति ॥ ३२ ॥ प्रणवं च कुरुक्षेत्रं गरुडं मेरुपर्वतम् ॥ रूपं कांचनगुल्मानां रूपं मेरोः सुतस्य च ॥३३॥ ॐकार, कुरुक्षेत्र, गरुड, सुमेरु पर्वत, सुवर्णके गुच्छोंका रूप सुमेरु पर्वतके पुत्र (त्रिकूटका) रूप ॥३३॥ ये स्मरिष्यति मनुजाः प्रयताः स्थिरबुद्धयः॥ दुःस्वप्नो नश्यते तेषां सुस्वप्नश्च भविष्यति ॥ ३४ ॥ इन सबोंको जो स्थिर बुद्धिवाले जितेंद्रिय पुरुष स्मरण करेंगे उन्होंका दुःस्वप्न (बुरा सुपना) नाश होगा और सुंदर स्वप्न फल होगा ॥३४॥ अनिरुद्धं गजं ग्राहं वासुदेवं महाद्युतिम् ॥ संकर्षणं महात्मानं प्रद्युम्नं च तथैव च ॥ ३५ ॥ अनिरुद्ध, गज, ग्राह, महाकांतिवाले वासुदेव (श्रीकृष्ण) महात्मा बलदेवजी, प्रद्युम्न ॥ ३५ ॥ मत्स्यं कू च वाराहं वामनं तायमेव च ॥ नारसिंहं च नागेंद्र सृष्टिसंहारकारकम् ॥३६॥ मत्स्य, कूर्म, वाराह, वामन, गरुड़, नृसिंह, सृष्टिसंहार करने- वाले नागेन्द्र ॥३६॥ विश्वरूपं हृषीकेशं गोविंदं मधुसूदनम् ॥ -
भाषाटीकासमेत। (३६१)
त्रिदशैवदितं देवं दृढभक्तिमनूपमम् ॥ ३७॥
विश्वरूप, हृषीकेश, गोविन्द और देवताओंसे वंदित दृढ
भक्तिवाले अत्युत्तम मधुसूदन देव ॥ ३७ ॥
वैकुण्ठं दृष्टदमनं भक्तिदं मधुसूदनम् ॥
एतानि प्रातरुत्थाय संस्मरिष्यति ये नराः ॥ ३८॥
वैकुंठ, भक्तिदायी मधुसूदन, इन्होंको जो मनुष्य प्रातःकाल
उठके स्मरण करेंगे ॥ ३८ ॥
सर्वपापैः प्रमुच्यते स्वर्गलोकमवाप्नुयुः ॥
भीष्म उवाच।
एवमुक्त्वा महाराज गजेन्द्रं मधुसूदनः ॥ ३९॥
वे सब पापोंसे छूटते हैं और स्वर्ग लोकमें प्राप्त होते हैं भीष्मजी
कहते हैं हे महाराज ! मधुसूदन भगवान् गजेंद्र (हस्ती) को ऐसे
कहके ॥ ३९॥
स्पर्शयामास हस्तेन गजं गन्धर्वमेव च ॥
तौं च स्पृष्टौ ततः सद्यो माल्यांबरधरावुभौ ॥४०॥
अपने हाथसे हस्तीको और गंधर्वको स्पर्श करते भये फिर-
स्पर्श किये हुए वे दोनों शीघ्र ही उत्तम माला और वस्त्रोंको धार-
ण करनेवाले (गन्धर्व होके) ॥ ४० ॥
तमेव मनसा प्राप्य जग्मतुस्त्रिदशालयम् ॥
ततो दिव्यवपुर्भूत्वा हस्तिराट्र परमं पदम् ॥४१॥
तिस भगवान्को मन करके प्राप्त होके स्वर्गलोकमें प्राप्त होते भये
फिर वह हस्तिराज दिव्य शरीर धारण करके परम पदको ॥४१॥
(३६२) गजेन्द्रमोक्षः।
गच्छति स्म महाबाहो नारायणपरायणौ ॥
ततो नारायणःश्रीमान्मोक्षयित्वा गजोत्तमम्॥४२॥
प्राप्त होता भया हे महाबाहो ! ये दोनों नारायणमें परायण
होतेभये तब श्रीमान् नारायण गजोत्तमको छुडाके ॥ ४२ ॥
ऋषिभिः स्तूयमानोऽध्यैदेंदगुह्यपदाक्षरैः ॥
ततस्तु भगवान्विष्णुर्विज्ञेयगतिः प्रभुः ॥ ४३ ॥
ऋषिलोगों करके बहुत उत्तम वेदके गुह्य पदाक्षरों करके स्तुत
होते भये फिर दुर्विज्ञेय गतिवाले विष्णु भगवान् ॥ ४३ ॥
शंखचक्रगदापाणिरंतर्धानं युधिष्ठिरः॥
गजेंद्रमोक्षणं दृष्ट्वा सर्वे प्रांजलयस्तदा ॥४४॥
शंख, चक्र, गदा इनको हाथमें धारण किये हुए ही अंतरधान
होगये । हे युधिष्ठिर ! तब सब (ऋषिलोग) गजेंद्रकी मोक्षको देख
हाथ जोड़के ॥४४॥
ववंदिरे महात्मानं प्रभु नारायणं परम् ॥
विस्मयोत्फुल्लनयनाः प्रजापतिपुर-सराः ॥ ४५ ॥
महात्मा प्रभु परम नारायणको प्रणाम करते भये ब्रह्मा आदि
सब देवता, आश्चर्यकरके खिले नेत्रोंवाले होगये ॥ ४५ ॥
य इदं शृणुयान्नित्यं प्रातरुत्थाय मानवः ॥
प्राप्नुयात्परमां सिद्धिदुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥४६॥
जो मनुष्य नित्य प्रातःकाल उठके इस स्तोत्रको सुनता है वह
परम सिद्धिको प्राप्त होवे और तिसका बुरा स्वपना नष्ट होवे ॥४६॥
भाषाटीकासमेत । गजेन्द्रमोक्षणं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ श्रावयेत्प्रातरुत्थाय दीर्घमायुवाप्नुयात् ॥ १७ ॥ यह गजेंद्रमोक्ष पवित्र है सब पापोंको नष्ट करनेवाला है जो प्रातःकाल उठके इसको सुनावे वह दीर्घ (बड़ी) आयु- वाला हो ॥१७॥ श्रुतेन हि कुरुश्रेष्ठ स्तुतेन कथितेन च ॥ गजेन्द्रमोक्षणेनैव सद्यः पापात्प्रमुच्यते ॥४८॥ हे कुरुश्रेष्ठ ! गजेन्द्रमोक्षके सुननेसे स्तुति करनेसे कहनेसे शीघ्र ही पाप दूर होते हैं ॥४८॥ मया ते कथितं राजन्पवित्रं पापनाशनम् ॥ कीर्तयस्व महाबाहो गजेन्द्रस्य महात्मनः ॥ १९ ॥ हे राजन् ! पवित्र पापनाशक स्तोत्र मैंने तेरे आगे कहा, महाबाहो ! महात्मा गजेंद्रके स्तोत्रको कीर्तन करो ॥१९॥ चरितं पुण्यकर्माणि पुष्कलं वईते यशः ॥ प्रीतिमान्पुण्डरीकाक्षो गजं दुःखात्प्रमुक्तवान् ॥५०॥ यह चरित्र पवित्र कर्म है और बहुतसा यश बढता है ऐसे प्रीतिमान् हुए पुंडरीकाक्ष भगवान् गजको दुःखसे छुटाते भये ॥५०॥ वशपायन उवाच। एतच्छुत्वा महाबाहो भारवानां पितामहात् ॥ गजेन्द्रमोक्षण राजा कुंतीपुत्रो युधिष्ठिरः॥५१॥ वैशंपायनजी कहते हैं-हे महाबाहो ! (जनमेजय ) कुंतीका पुत्र राजा युधिष्ठिर भीष्मपितामहजीसे इस गजेन्द्रमोक्षको सुनके॥५॥ है
(३६४) गजेन्द्रमोक्ष।
भ्रातृभिः सहितः सम्यग्ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ।।
पूजयामास देवेशं पार्श्वस्थं मधुसूदनम् ॥ ५२ ॥
सब भाइयोंसहित होके वेदके पारगामी ब्रह्मणों करके( युक्त हो)
समीपमें स्थित हुए श्रीकृष्णभगवानको पूजता भया॥५२॥
विस्मयोत्फुल्लनयनाः श्रुत्वा नागस्य मोक्षणम् ॥
ऋषयस्तु महाभागाःसर्वे प्रांजलयस्तदा ॥ १३ ॥
सब महाभाग ऋषिजन गजेन्द्रमोक्षको सुन आश्चर्य से प्रफुल्लित
नेत्रोंवाले होके हाथ जोड़के ॥ ५३॥
अजं वरेण्यं वरपद्मनाभं महाबलं वेदनिधि सुरोत्तमम्
तं वेदगुह्यं पुरुषं पुराणं ववंदिरे वेदविदां वरिष्ठम् ५४॥
अजन्मा, प्रधानपुरुष, उत्तम कमल है नाभिमें जिसके ऐसे
महाबली वेदनिधि सुरोत्तम तिस वेदगुह्य ( वेदमें गुप्त हुए) वेदवे-
त्ताओंमें श्रेष्ठ पुराणपुरुषको प्रणाम करते भये ॥ ॥५४॥
एतत्पुण्यं महाबाहो जनानां पुण्यकर्मणाम् ॥
दुःस्वप्नदर्शने घोरे श्रुत्वा पापात्प्रमुच्यते ॥ ५५ ॥
हे महाबाहो ! पवित्र कर्मवाले जनों को यह पुण्य पवित्र है
(मनुष्य) घोर दुःस्वप्नविषे इसको सुनके पापोंसे छूटता है॥५५॥
तस्मात्त्वं हि महाराज प्रपद्य शरणं हरिम् ।
विमुक्तः सर्वपापेभ्यः प्राप्स्यसे परमं पदम् ॥ ५६ ॥
हे महाराज ! इसलिये तुम भी हरिकी शरण हो फिर सब
पापोंसे छूटके परम पदको प्राप्त होगे ॥५६॥
भाषाटीकासमेत ।
(३६५)
यदा महाग्राहगृहीतकातरं सुपुष्पिते. पद्मवने महा
द्विपम् ॥ विमोक्षयामास गजं जनार्दनः स्मरामि
दुःखप्नविनाशनं हरिम् ॥ ५७ ॥
जब महाग्राहसे पकड़ेहुए डरते हुए महान् हस्तीको खिले हुए
कमलवनमें जनार्दन भगवान् छुटाते भये (तिस समयके रूप-
वाले ) दुःस्वप्नको नष्ट करनेवाले हरिको मैं स्मरण
करता हूँ॥२७॥
परं पुराणं परमंपवित्रं पुराणमीशं सुरलोकनाथम् ॥
सुरासुरैरचितपादपद्म सनातनं लोकगुरुं स्मरामि ॥५८॥
परम पुराण परम पवित्र पुराण ईश, देवलोकके स्वमी देवता
और दैत्योंकरके पूजित चरणारविंदवाले सनातन लोकके गुरुको
मैं स्मरण करता हूँ॥२८॥
वरगजशरणादिमुक्तिहेतुं पुरुषवरस्तुतदिव्यदेह-
गीतम् ॥ सततमभिपठंति ये तु तेषां सुमरणमं-
तिककिल्बिषापहं स्यात् ॥ ५९॥
उत्तम हस्तीकी रक्षाके विमुक्तिहेतु पुरुषोत्तमकी स्तुति और दिव्य
देहका गीत (ऐसे गजेंद्रमोक्ष स्तोत्रको)जो निरंतर पढते हैं तिन्होंके
मरणसमयपर्यंतके संपूर्ण पाप नष्ट होते हैं ॥ ५९॥
धर्मदृढबद्धमूलो वेदस्कंधः पुराणशाखादयः ॥
ऋतुकुसुमो मोक्षफलो मधुसूदनपादपो जयति ॥६०॥
धर्मरूप दृढ बँधे मूलवाले वेदस्कंधवाले पुराणरूपी शाखायु-
क्त, यज्ञरूपी पुष्पोंवाले मोक्षरूप फलवाले वृक्षरूप मधुसूदन. भ-
गवान्की जय हो ॥ ६० ॥
-
(३६६)
गजेन्द्रमोक्ष।
नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च ॥
जगद्धिताय कृष्णाय गोविंदाय नमो नमः॥६१ ॥
ब्रह्मण्यदेवके अर्थ नमस्कार है गौ और ब्रह्मणोंके हितदायी जग-
तके हितदायी श्रीकृष्ण गोविंदके अर्थ नमस्कार है ॥६१ ॥
आर्ता विषण्णाः शिथिलाश्च भीता घोरेषु च व्या-
धिषु वर्तमानाः ॥ संकीर्त्य नारायणशब्दमात्र
विमुक्ततुःखाः सुखिनो भवंति ॥६२ ॥
पीडित, दुःखित शिथिल, भयभीत घोर बीमार (रोगी) ऐसे जन
"नारायण" ऐसे शब्दमात्रको कहके दुःखरहित होके सुखी हो
जाते हैं। ६२॥
वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा ॥
आदौ मध्ये तथा चाते हरि सर्वत्र गीयते ॥६३॥
वेद, रामायण,पुराण,महाभारत इन सबोंमें आदि मध्य अन्तमें
सब जगह हरि गाये जाते हैं। ६३॥
एकोऽपि कृष्णस्य कृतः प्रणामो दशाश्वमेधाऽव-
पृथेन तुल्यः॥ दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म कृष्ण-
प्रणामी न पुनर्भवाय ॥६४॥
श्रीकृष्णके अर्थ किया हुआ एक भी प्रणाम दश अश्वमेध
यज्ञोंके अवभृथस्नानके समान होता है दशअश्वमेध यज्ञ करने-
वाला तो फिर जन्म लेता है परन्तु श्रीकृष्णको प्रणाम करनेवालेका
पुनर्जन्म नहीं होता ॥ ६४ ॥
भाषाटीकासमेत। (३६७) सर्व रत्नमयो मेला सर्वाश्चर्यमयं नमः ॥ सर्वतीर्थमयी गंगा सर्वदेवमयो हरिः॥६५॥ सर्वरत्न मय सुमेरु पर्वत है और सम्पूर्ण आश्चर्यमय आकाश है सब तीर्थमयी गंगानी हैं सर्व देवमय हरि हैं ॥ ६५ ॥ आकाशात्पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम सर्वदेवनमस्कारः केशवं प्रतिगच्छति ॥ ६६ ॥ आकाशसे वर्षा हुआ जल जैसे सागरमें चलाजाता है ऐसे ही सब देवतोंके अर्थ किया हुआ प्रणाम केशव भगवानको प्राप्त होता है ॥ ६६॥ गीता सहस्त्रनामानि स्तवराजो ह्यनुस्मृतिः ॥ गजेन्द्रमोक्षणं चैव पंचरत्नानि भारते ॥ १६७॥ गीता, विष्णुसहस्रनाम, भीष्मस्तवराज, अनुस्मृति, गजेंद्रमोक्ष महाभारतमें ये पञ्च रत्न हैं ॥ १६७ ॥ इति श्रीवेरीनिवासि-पंडित-वसतिरामविरचितगजेंद्रमोक्ष- भाषाटीका समाप्ता॥
विक्रय्यपुस्तके-संक्षिप्तसूची।
नाम.
की.रु. भा.
भगवद्गीता-चिद्धानानन्दी "गूढार्थदीपिका" भाषाटीका।
श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीस्वामी विद्घनानन्द
गिरिजीने "श्रीमच्छांकरभाष्य" के अनुसार पदच्छेद
अन्वयांक-तथा-पदार्थसहित निर्माण किया है।
भगवद्गीता-आनन्दगिरिकृत भाषाटीकासहित । जिसमें-अ
न्वयकरके भावार्थ स्पष्ट कियागया है ग्लेज रफ ३-०
भगवद्गीता-सान्वय ब्रजभाषा दोहासहित । अत्युत्तम ग्लेज
कागज.
१-८
तथा रफ कागज....
१-४
भगवद्वीता वैष्णव हरिदासजीकृत भाषार्थ तथा दोहा
चौपाइयोंमें (परमानन्दप्रकाशिका.) ....१-०
भगवद्वीता-(अमृततरंगिणी भाषाटीका) रघुनाथदासकृत
बड़ा अक्षर.
भगवद्गीता-अमृततरंगिणी-दोहासहितभाषाटीका पाकिटबुक०-१
भगवद्वीता-श्रीधरीटीका सहित ग्लेज कागज.
तथा रफ कागज.
१-०
पुस्तक मिलनेका ठिकाना-
खेमराज श्रीकृष्णदास,
"श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम् प्रेस-मुंबई.
"
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