Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Ek Aur Abhimanyu
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एक और अभिमन्यु
[देश को सम-सामयिक समस्याओं पर आधारित
आधुनिक भाय-योग का एक सराश्त नाटक]
हो. रागणोपाल णोराल
अभिनव प्रशासन, अजमेर
.
1
i रामगोपाल गोयल
गा पनीम पये
गरण: 1990
अभिनव प्रयागन
घरी गेट, पां. स. न. 118
अमर
मुनि, पहरी रोग, मजमेर
IK AUR ASHIKIANYU (PLAY) By-lom Gopal Goyal Rs 35 -
पात्र
पुरुष पात्र
अमित
शहज़ात
हरवंश
प. रामनाथ
.
सेठ धर्मदा
मनीश
पुलिस इन्सपेक्टर
जज
सरकारी वकील
पहला युवक
दूसरा युवक
स्मो पात्र
सुभद्रा
वीणा
सविता
अपनी बात प्रत्येक रचनाकार को अपने अनुभव की सीमा मे कुछ समस्याएं बेचन किया करती हैं, किन्तु रचनाकार की ये समस्याएं अथवा उसकी पीड़ा केवल उसकी व्यक्तिगत न होकर देश और ममाज की भी होती है। अतः अपने देश और समाज में व्याप्त जो समस्याएँ हैं, दारुण परिस्थितियां हैं, उन्हें मुखरित करने के लिए प्रत्येक रचनाकार किसी न किसी विधा को माध्यम बनाता है । इसके लिए जब वह पात्र और मच ढूंढता है, तब उसे नाटक रचना की ओर प्रवृत्त होना पड़ता है। इस देश और समाज में व्याप्त कुछ ऐमी समस्याएँ और परिस्थितियां है जो मेरे मन को एक लम्बी अवधि से मथती रही है । उन समस्याओ मे कुछ समस्याएं हमारे देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, गोपण और उत्पीड़न को है जिनसे हमारी युवा पीढी मे घोर निराशा की भावना घर कर गयी है। वह इन समस्याओं का निराकरण करने एव प्रतिकूल तामसी प्रवृत्तियो के विरुद्ध संघर्ष करने की अपेक्षा दिग्भ्रान्त होकर या तो विदेश से आयातित हिप्पियो की नकल करके पलायन की मनोवृत्ति को अपना रही है या निराश हो विध्वंसात्मक प्रवृत्तियो मे संलग्न है । युवा पीढ़ी की यह दिशा-शून्यता हमारे देश के वर्तमान और भविष्य के लिए एक गम्भीर चुनौती है; क्योकि जब कभी भी समाज में मूल्य-भ्रष्टता, अन्याय और असत्यजनिक तामसी प्रवृत्तियो का तिमिर छाया होता है, तब युवा पीढी ही मूर्य बनकर अपने प्रखर तेज से तिमराच्छादित वातावरण को छिन्न-भिन्न करने में समर्थ सिद्ध हुई है। महाभारत काल का वीर अभिमन्यु उस संघर्षशील 'युवाआक्रोश' का प्रतीक है जिमने अन्याय और असत्य के प्रहरियो के चक्रव्यूह को तोड़कर अपता आत्म- बलिदान कर दिया था। प्रस्तुत नाटक मे मैने इम पौराणिक पात्र 'अभिमन्यु' के नाम का प्रयोग एक प्रतीक के रूप मे अन्याय के प्रतिकार की भावना से युक्त युवा-आक्रोश के लिए किया है । जब-जब भी ममाज मे मूल्य-भ्रष्टता, अन्याय, शोपण और उत्पीडन का चक्रव्यूह रचा जाता रहा है, तब-तब अभिमन्युओ ने जन्म लेकर इन भ्रष्ट प्रवृत्तियो के विरुद्ध संघर्ष किया है और सत्य तथा न्याय का पथ प्रशस्त किया है। आधुनिक युग का अभिमन्यु अमित एक ऐसा ही युवक है जो एक और सामाजिक रूढ़ियों, अन्धविश्वास, समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, शोषण और उत्पीड़न की प्रवृत्तियो के विरुद्ध निरन्तर संघर्ष करता है, दूसरी ओर देश और समाज का रूप सवारने के लिए रचनात्मक कार्य करता है। इस तरह वह आज के दिशाहीन युवा-आक्रोश को एक सही दिशा प्रदान करता है। प्रस्तुत नाटक मे व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र, और यहाँ तक कि अन्तर्राष्ट्रीय क्षितिज को स्पर्श करने वाती समस्याओ का दिग्दर्शन है जो मानव-समाज का एक भोगा हुआ यथार्थ है और चूंकि मैं मानव-समाज का एक लघु अंश हूँ, इसलिए ये समस्याएं मेरा भी 'एक भोगा हुआ यथार्थ' है । वस्तुतः आज आम आदमी अपने युग की यातना के सलीब को कन्धो पर ढोकर तीर्थ-यात्रा पर निरन्तर रूप में चलने के लिए अभिशप्त है जबकि दूसरी ओर सुविधा-भोगी बौद्धिक वर्ग-प्रोफेसर वकील, न्यायाधीश, नेता आदि-केवल एय्यास प्रेत वनकर आम आदमी की इम यातनापूर्ण यात्रा मे काँटे बिछाकर मग्न है । एक ओर कमर-तोड श्रम करने पर भी अपने प्राप्य से वचित थमिक वर्ग है तो दूसरी ओर दूसरो के श्रम को चुराकर अपने हित में उसका उपभोग करने वाला परोपजीवी वर्ग । मेरी मान्यता है कि जब तक हमारे समाज मे श्रम को समुचित प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी तथा उसके प्राप्य भाग का सम-वितरण नही होगा, तब तक वह वर्ग-विभेद ममाप्त नहीं होगा। अत: प्रस्तुत नाटक मे इस समस्या को उठाने का प्रयत्न किया है। एक अन्य समस्या जो मेरे मानस को मथती रही है, वह है परम्परा और आधुनिकता के बीच सम्बन्ध की। परम्परा सर्वथा रूढिवादी नहीं होती और न आधुनिकता सदैव प्रगतिशील । परम्परा मे भी प्रगतिशील तत्व विद्यमान रहते हैं जो हमे अपने पथ पर बढने के लिए गति देने है । वस्तुतः परम्परा एक ऐसा पुल है जिस पर चलकर हम आधुनिकता के राजमार्ग तक पहुँच सकते है। प्रस्तुत नाटक का शीपंक 'एक और अभिमन्यु' भी मुझे परम्परा से ही प्राप्त हुआ है और इस नाटक का नायक अमित भी परम्परा के उन प्रगतिशील तत्वों की खोज कर उनके द्वारा ही अपने पथ के लिए प्रकाश पाता है और रूढ़िग्रस्त परम्परावादी व्यक्तियों को निरुत्तर करता है । उदाहरण के लिए, जहां एक ओर प. रामनाया भारतीय संस्कृति को दुहाई देकर जन्म पर आधारित वर्ण-व्यवस्था की रक्षा की गुहार लगाता है, वहाँ उसका ही पौत्र उसी भारतीय संस्कृति के उदाहरण देकर जाति-पोति, छुआ- छुत आदि भेदो को नकारता है। पुरानी पीढी और नयी पीढी के इम सघर्ष में अन्तत. विजय नयी पीढ़ी की ही होती हैं। इस प्रकार प्रस्तुत नाटक मे जहाँ एक ओर पुरानी और नयी पीढी का संघपं उभर कर आया है, वहाँ दूसरी और भारतीय संस्कृति का प्रगतिशील पक्ष उजागर हुआ है । यह बात सत्य है कि हमारे देशभक्त वीरो एवं स्वतन्त्रता सेनानियों ने 'रामराज्य' का स्वप्न संजोकर स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए बलिदान दिया, किन्तु स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात सामाजिक अन्याम, धामिक पाखण्ड और राजनीतिक छल के इस त्रिकोण ने उस सुखद स्वप्न को बड़ी निर्ममता से भग कर दिया । इस मोह-भग की सबसे अधिक शिकार हुई आज को हमारी युवा पीढी । अत. हमारी युवा पीढी के समक्ष आज जो ज्वलन्त प्रश्न है, वह यही कि देश और ममाज में प्रचलित सामाजिक सकीर्णता, प्रान्तवाद, भाषावाद, साम्प्रदायिकता, धार्मिक पाखण्ड, भ्रष्टाचार, शोपण और उत्पीडन वी समस्याओ से बचने के लिए शुतुरमुर्गीय दृष्टि-अपना-कर निराशा और कुण्ठा • के गहन अन्धकार में गिरे अथवा जीवन मे, आस्था और सम्भावनाओं में विश्वास रख कर इन समस्याओ और परिस्थितियों की चुनौती को स्वीकार - कर रचनात्मक कदम उठाये । प्रस्तुत नाटक मे मैंने युवा पीढी की सम्भावनाओं में विश्वास रखकर ममस्याओं से मघर्ष करने और रचनात्मक कदम उठाने की ओर प्रेरित किया है। (m) प्रस्तुत नाटक के शिल्प के विषय में मुझे केवल इतना ही कहना है कि नये प्रयोगों के इस युग में मैंने कोई नया प्रयोग नाट्य-शिल्प में किया है। ऐसा मेरा दावा बिल्कुत नहीं है। हां, प्रस्तुत नाटक को मचीय बनाने का ध्यान मैंने अवश्य रखा है। मचीय-निर्देशन या रग-संकेत की विस्तृत और अनावश्यकः जटिलताओ में न उलझकर सामान्य सकेत ही दिये है जिससे नाट्य-निर्देशक स्थान, समय और परिस्थितियों के अनुसार अपनी कल्पना का समुचित उपयोग कर सके । दृश्य-परिवर्तन में मैंने 'अन्धकार और प्रकाश' योजना का महारा लिया है। मंच पर प्रौढ़-शिक्षा की कक्षाओ, सभाओ आदि के दृश्यों के लिए अदृश्य श्रोताओ को धारणा व्यक्त कर पात्रो के 'एकाभिनय' के द्वारा प्रस्तुत नाटक को पात्रो को अधिक भीड से बचाने की चेष्टा की है जिससे सीमित और सुगम साधनो के द्वारा ही इमका मचीय रूप निखर मके। प्रस्तुत नाटक के अध्ययन से यदि हमारी युवा पीढ़ी में देश में व्याप्त दारुण समस्याओ और परिस्थितियों से सघर्प लेकर रचनात्मक प्रवृत्तियो के द्वारा राष्ट्र और समाज का रूप संवारने की प्रेरणा जागृत हुई तो मैं अपने श्रम को सार्थक समझूगा । इमी आशा के साथ- -लेखक iv)
इस नाटक कर मचन करने तथा इमको सम्पूर्ण या
आशिक रूप से उद्धृत करने के लिए निम्नलिखित पते
पर लेखक से पूर्व अनुमति लेना आवश्यक है।
डॉ० रामगोपाल गोयल
59, शास्त्री नगर,
अजमेर-~-305001
अंक १ [निम्न मध्य वित्तीय परिवार का घर । सब कामों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला इस घर का एक कमरा जिसमें लकड़ी को एक गोल मेज रखी हुई है। समीप ही गोदरेज को दो-तीन कुसियां एवं दो मोड़े रखे हुए हैं। कमरे की दीवार से सटा हुआ एक पुराना पलंग है। कमरे को दीवारों पर यत्र-तत्र शंकर, पार्वती, गणेश आदि देवी-देवताओ के साथ मुमताज, रेहाना सुल्तान आदि अभिनेत्रियों के कलेण्डर टंगे हुए हैं । कोलों के सहारे कुछ पारिवारिक फोटो भी टंगे हैं जिनमें एक प्रौढ़ व्यक्ति के चित्र पर माला पड़ी हुई है । कमरे का एक दरवाजा पोछे के अहाते में जाता है और एक अन्य दरवाजा बगल वाले कमरे से जोड़ता है। कमरे के सामने बरामदा है जिसके दोनों ओर गमले रखे हुए हैं । पर्दा उठने पर जहां प्रकाश केन्द्रित होता है, वहाँ एक प्रौढ़ महिला सुभद्रा सिलाई मशीन को सुई मे धागा पिरोने में प्यस्त दिखलाई पड़ती है। वह मशीन चलाती है किन्तु धागा फिर टूट जाता है। बार-बार धागा टूट जाने से यह झुंझला उठती है और उसके मुंह पर परेशानी की रेखाएं उभर उठती है तथा पसीने को यूंदें चमकने लगती हैं। सुभद्राः (खोज कर सिलाई मशीन के चपत मारती हुई) उफ् ! मरी को न जाने क्या हो गया है ? बार-बार यही पटरान, पर इसका भी क्या कसूर? बहुत पुरानी हो गयो है न ! कल-गुर्जी में जंग लग गया है। पुराना मॉडल होने से एक और अभिमन्यु/९ ऐसे पुर्जे भी नहीं मिलते। बहुत ठीक कराया, ठीक होती ही नहीं। (कुछ रुककर) पर, इससे पिण्ड भी तो नही छूटता। नई मशीन खरीदने पर ही तो पिण्ड छूट सकता है इससे । पर नई मशीन के लिए पैसे (वाक्य अधूरा छोड़- कर, आँचल से मुंह का पसीना पोछती हुई शून्य मे ताकने लगती है । इतने में ही दीवार घडी दो टंकारे करती है। टंकारो की ध्वनि सुनकर सुभद्रा कुछ चौंक पड़ती है और चिन्तातुर भाव से बाहर दरवाजे की ओर देखती है ।) अरे, दो बज गये । वह अभी तक नहीं आया ! सुबह-सुबह ही घर से निकला था । न मालूम कहाँ भटकता फिरता है ? खाना भी तो नही खाया अभी तक। [लगभग २७ वर्षीय एक युवक का प्रवेश । मुंह की पेशानी पर बेहद थकान के चिन्ह । हाय में एक फाइल जिसमें विभिन्न परीक्षाओं से सर्टीफिकेट और टेस्टीमोनियल्स को मेज पर रख मोडे पर बैठते हुए-] अमित : बेहद गर्मी है माँ | इतनी तेज गर्मी तो ... .." रूमाल से गर्दन का पसीना पोंछने लगता है] अरी मां ! भरी दोपहर मे तुम मशीन मे क्या खट-पट कर रही हो ? आराम नहीं किया अभी ! सुभद्रा अरे मेरे आराम की छोड़ बेटा ! पहले यह बता, तू इतनी देर कहाँ रहा अभी तक खाना भी नहीं खाया। कव से तेरा इन्तजार कर रही हूँ । अमित: खाने की भली चिन्ता की मां । खाना तो खा ही लंगा, पर। [फुध चिन्तित होकर मोडे पर बैठ जाता है और अनमने मन में सर्टीफिकेट देखने लगता है। सुभद्रा अमित को चिन्तित मुद्रा को गौर से देखकर कुछ स्मरण करती-सी-] ? सुभद्रा : अरे हो ! मैं तो भूल ही गई। आज तेरा इन्टरव्यू था न ! क्या हुआ बेटा? एक और अभिमन्यु/१० अमित : होता क्या ? मा, सब बेकार का दिखावा है, छल है। सब कुछ पहले से ही तयशुदा होता है । वही इसमे भी हुआ । मिनिस्टर साहब की सिफारिश वाले एक व्यक्ति का चयन हो गया । सब फ्राड है सुभद्रा: पर अमित तुम तो प्रथम श्रेणी में पास हुए थे। पढाई-लिखाई का पुरस्कार भी प्राप्त किया है तुमने तो। अमित: प्रथम श्रेणी ही नहीं मां, फस्र्ट पोजीशन भी है। स्वर्ण-पदक भी प्राप्त किया है, किन्तु रिफमण्डेशन के मामने सब बेकार है । या तो पैसा हो या सिफारिश । बस यही एक मापदण्ड रह गया है किसी की योग्यता मापने का। आजकाल बिना पेपरवेट के मर्टीफिकेट का कोई वजन ही नही होता और बिना मिफारिश के नौकरी नही मिलती । सैकडो-हजारों इजीनियर, डाक्टर आदि युवक-युवतियों डिग्रियां प्राप्त कर नोकरी की तलाश में दर-दर भटक' रहे हैं। देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार एव भाई-भतीजावाद से निराश हो मैकडों प्रतिभाएँ आत्म-निर्वासित होकर विदेशो मे वमती जा रही है। गांधी जी के रामराज्य का क्या यही स्वप्न था मां ? क्या मैकडों देशभक्तों ने इसलिए भय कर यातानाएँ सही, आत्म-लिदान किया ? (दीवार पर लगी तस्वीर को और देखकर) क्या पिताजी इसीलिए शहीद हुए थे ? [क्रोध, घृणा और निराशा के मिधित भाव में अपने सौफिकेट को मोड़कर कमरे के कोने में फेंक देता है। सुभद्रा: हिम्मत से पाम नो वेटा । आदमी को इतना निराश नहीं होना चाहिए । अखिर मब ठीक ही होगा । पत: सब ठीक होगा? कब ठीक होगा, कैसे ठीक होगा? चारों और नैतिक संकट व्याप्त है। रक्षक ही भक्षक बन गये है। न्यायाधीश ही न्याय का गला घोंटने लगे है, तब भी? नहीं मां ! मैं इस मामाजिक अन्याय का प्रतिकार एक और अभिमन्यु११
पारूंगा। शोषण, भ्रष्टाचार के विग्द्ध मरते दम तक मघर्ष कहंगा । मुझे
आशीर्वाद दो मां, जिससे मैं देश में व्याप्त तामसी वृत्तियों का निवारण करने
मे सफल हो सकूँ।
(अमित अपनी दृष्टि उठाकर सुभदा के चेहरे को देखता है, तब उसे पता
चलता है कि यह दोबार में लगी तस्वोर को एकटक देख रही है और उसकी
आँखों के कोर नम हो चले हैं । अमित कुछ विचलित होकर) अरी मां, यह
क्या? तुम्हारी आंखो मे ओमू ?
(आँचल से आँखो को पोछती हुई) नही रे, यह तो बस यो हो !
ममित :
फिर भी मौ!
सुभद्रा ।
तेरे पिताजी की कोई बात याद आ गयी थी।
अमित
क्या बात थी मां ? मुझे भी तो बताओ।
सुभद्रा:
बस रहने दे बेटा ! यों ही कोई वात थी। तू क्या करेगा जान कर ?
:
.
अमित:
(निहोरे करता-सा) नही मां, बता दो न !
सुभद्रा:
तो ले सुन । विना सुने अब तू मानेगा भी नहीं। उस रात की बात
जब तेरे पिताजी दूसरे दिन देश की रक्षा-हित युद्ध के मोर्चे पर जाने वाले
थे । उम समय तू मेरे गर्भ मे था । मालूम है उस रात उन्होने क्या कहा था?
अमित:
क्या कहा था माँ ?
सुभद्रा :
उन्होने कहा था-मुभद्रा तुम भी महाभारत वाली सुभद्रा हो । तुम्हारे
गर्भ में भी एक और अभिमन्यु पल रहा है जो जन्म लेकर तुम्हारी कोष को
एक और अभिमन्यु/१२
गौरवान्वित करेगा। बड़ा होकर वही वीरता से देश के भीतरी और बाहरी शत्रुओ के चक्रव्यूह का भेदन करेगा। अमित : (उल्लसित होकर) ऐमा कहा था? सुभद्रा। हाँ बेटा तब तुम्हारे पिताजी की बात सुनकर पहले तो मेरा मन पुलकित हो उठा, किन्तु तत्क्षण बाद ही में एक अज्ञात आशका से मिहर उठी । अमित: (जिज्ञासा को मुद्रा में) किस आशका में मां ! सुभद्रा (बात को समाप्त-सो करती हुई) बस, अव रहने दे धेटा ! क्या करेगा जानकर ? ले उठ ! हाथ-मुंह धोले । खाना परोस देती हूँ। अमित : . ? - नही माँ ! मैं पूरी बात सुने बिना खाना नहीं खाऊँगा । सुभद्रा (बड़े स्नेह से अमित के सिर पर हाथ फेरती हुई) नू तो बड़ा जिद्दी है रे। तो ले सुन ! वीर अभिमन्यु चक्रव्यूह को भेद कर उसमे प्रवेश करने की कला तो जानता था, किन्तु उसमे से सुरक्षित निकलने की कता उसे ज्ञात नहीं थी। तव जानते हो, उम वीर बालक के साथ कैसा भयंकर अन्याय हुआ अमित हाँ मा ! मालूम है, जब उस महावीर की अद्भुत वीरता के प्रखर तेज के आगे कौरव दल का संघन तिमिर छिन्न-भिन्न होने लगा, तब धर्म और न्याय के रक्षक होने का मुखोटा पहिनने बाले मात महारथियों ने षड्यन्त्र रचकर एक निहत्थे वीर का बड़ी निर्ममता से बध कर डाला था। यही हुआ था न माँ ? [किंचित देर के लिए स्तम्धता छा जाती है] सुभद्रा: (कुछ सजग हो स्तब्धता तोड़ती हुई) हाँ बेटे ! किन्तु तेरे पिताजी तो मन के पारखी थे न ? उन्होंने मेरी इस मानसिक स्थिति को तुरन्त भांप लिया और एक और अभिमन्यु/१३ बोले-'किन्तु सुभद्रा ! तुम्हें तनिक भी भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। हमारा अभिमन्यु तो असत्य पर आधारित अन्याय और शोषण के चक्रव्यूह को वडी वीरता से भेदकर उसमें से सकुशल निकलने में समर्थ होगा।' [उक्त बात सुनकर अमित के मन से निराशा के भाव तिरोहित हो जाते हैं और मुख पर आशाजनक उल्लास का भाव तैरने लगता है। सुभद्रा : (बात को बदलती हुई) लो, तब उठो बेटा ! बहुत देर हो गई । अब खाना खा लो। [अमित सुभद्रा के साथ कमरे के पिछले दरवाजे से घर के भीतरी दालान में प्रवेश करता है। मंच पर कुछ क्षणों के लिए अन्धकार हो जाता है । नेपथ्य में गुनगुनाने को धीमी-धीमी ध्वनि सुनाई पड़ती है । धीरे-धीरे स्वर स्पष्ट सुनाई पड़ने लगता है—"दम मारो दम, मिट जाय गम ! बोलो सुबह शाम । हरे कृष्णा हरे राम ।" [मंच पर पुनः धीमे-धीमे प्रकाश एक किशोरी पर केन्द्रित होता है जो उक्त गाना गाने के साथ-साथ 'हरे कृष्ण हरे राम' फिल्म में काम करने वाली अभिनेत्री जीनतअमान की-सी चेष्टा एवं हाव. भावो की नकल करतो हुई प्रतीत होती है । लड़की स्कर्ट पहिने हुए, है तथा बाँब कट बाल चेहरे पर लापरवाही से इधर-उधर बिखरे हुए हैं। व्यक्तित्व में अल्हड़पन और मुख-मुद्रा से विद्रोह का भाव झलकता है। अपने हाय में ली हुई पुस्तकों को बड़ी लापरवाही से मेज पर पटकती है । एक पुस्तक में से अभिनेता-अभिनेत्रियों के कुछ चित्र बाहर निकल कर बिखर पड़ते हैं। उन बिखरे चित्रों को समेट कर पुनः पुस्तक में रखती है और उनमें से एक चित्र लेकर लापर. वाही से पलंग पर लेट जाती है। वीणा: (चित्र को तन्मयता से देखकर उसे चूमती हुई) हाय ! हाउ स्वीट ? [चित्र को तन्मयता से देखने लगती है। नेपथ्य मे खट-खट् -- एन और अभिमन्यु/१४
आवाज । तदनन्तर एक स्त्री का स्वर-~'कौन है कमरे में? कौन
विनी ?' लड़की आवाज सुनकर चौंक पड़ती है और बैठी होकर खिन्न
मन से बड़बड़ाती है ।
वीणा:
इस घर मे तो प्राइवेसी नाम की कोई चीज भी नहीं है। एक ही कमरे
में मोओ, खाओ भी, सिलाई भी करो और सिलाई मशीन की खट-खट् मे
पढ़ाई भी । बाबा मेरा तो दम घुटता है यहाँ ।
[सुभद्रा का पुनः प्रवेश
सुभद्रा :
(वीणा को कुछ तीक्ष्ण दृष्टि से देखकर) क्या कहा रे तूने ?
वीणा:
(कुछ अचकचाती हुई) कुछ भी नहीं।
सुभद्रा
नुछ भी नही।
.
वीणा:
(खोजकर) हा-हाँ कह तो दिया । कुछ भी नही !
सुभद्रा':
कुछ भी नहीं !' यह तू सच बोल रही है ?
वीणा:
(एठकर) हो-हाँ सच बोल रही है।
सुभद्रा
फिर किसका दम घुट रहा है इस पर मे ? मेरा या तेरा ! बोल बताती
क्यो नही?
वीणा:
(बनावटी हसो हंसकर) ओह !मा तुम भी। मैं तो वह रही थी कि बड़ी
तेज गर्मी है। ऐसो तेज गर्मों में क्या दम नही घुट रहा ?
एक और अभिमन्यु/१५
सुभद्रा
तू तो ऐसी तेज गर्मी में अब तक कहाँ रही ? तेरा पेपर तो कभी का हो
गया था।
वीणा :
आज पेपर हुआ ही नही मां! कॉलेज में तो हड़ताल हो गयी थी।
सुभद्रा
यया पहा ? कॉलेज मे हड़ताल ! फिर तू कहाँ थी अब तक ?
वीणा:
मैं....... मैं तो।
सुभद्रा:
कहती-कहती रुक क्यों गयी? बोल, कही थी ?
वीणा:
मैं चित्रा के साथ पिक्चर देखने चली गई थी। और भी लड़कियां थी।
सुभद्रा:
तू पिक्चर देखने गई थी। लड़की तेरा दिमाग तो ठीक है ? किसे पूछकर
गयी तू पिक्चर ?
[वीणा चुप रहती है । कोई प्रत्युत्तर नहीं देती और उपेक्षा भाव से
मेज से पुस्तक उठाकर उसे खोलकर पढ़ने का बहाना करती है।
अमित कमरे में प्रवेश कर एक ओर मोड़े पर बैठ जाता है।
सुभद्रा:
(वीणा से) बोल ! चुप क्यों है ?
वीणा।
(तुनककर) क्या बोलू? कभी से दिमाग खाये जा रही हो।
अमित:
(तुनककर वीणा से) विनी ! तुझे जरा भी तमीज नही है बोलने की।
वीणा .
(और भी अधिक तुनककर तोखे स्वर मे) हो, नही हैं हम में तो।
(किताब से अपना मह टफ लेती है।)
एक भौर अभिमन्यु/१६
। । अमित: ठहर जरा तू । (मोड़े से उठकर वोणा से पुस्तक छीन लेता है। पुस्तक में से अभिनेता-अभिनेत्रियों के चित्र निकलकर कमरे के आंगन में बिखर पड़ते हैं। सुभद्रा और अमित उन चित्रों को अवाक् हो देखते हैं, फिर एक दूसरे के मुख को देखकर घोणा को देखते रह जाते हैं। वोणा तुनक कर रोने लगती है। अमित : तो तू यह पढती है कॉलेज में शर्म नही आती तुझे। सुभद्रा : बस अब नही सहा जाता अमित ! इस लडकी के दिन ब दिन लक्षण बिगडते जा रहे है । बस यह पढ़ चुकी अब कॉलेज में। मैं तो दिन-रात एका करके किसी तरह कपड़े सीकर पेट पालती हूँ और यह लड़की फिल्म देखती फिरती है। अमित : इसमे बिनी का भी क्या दोष है मां। आज को शिक्षा-प्रणाली ही बड़ी दूषित हो गयी है । उसमे नैतिक मूल्यो के लिए कोई स्थान ही नहीं रहा । आज की युवा पीढ़ी हिप्पयो की नकल करके पलायनवादी मनोवृति की शिकार हो रही है । अपने घर-परिवार, समाज से आत्म-निर्वासित होकर किमी अतोन्द्रीय लोक के आनन्द की तलाश मे चरस, गांजा पीकर तथा एल.एस.डी., मरजुआना आदि मादक द्रव्यों का सेवन कर अपने मूल्यवान जीवन को नष्ट कर रही हैं बड़ी विकट समस्या है माँ ! 'सा विद्या या विमुक्तया'-शिक्षा का लक्ष्य भौतिक अभावो से मुक्ति, अज्ञान से मुक्ति पाना है, आज वही शिक्षा कर्म से व्युत होकर बन्धन का कारण बन रही है। (योणा को पुचकार कर उसे मनाते हुए) अरी तू रो रही है ? इतनी बड़ी होकर । तू तो बड़ी अच्छी लड़की है । अच्छा बता आज नेरा पेपर कैसा हुआ? सुभद्राः आज इसने परीक्षा दी हो वहाँ ? कहती है कॉलेज में हड़ताल हो गई थी। एक और अभिमन्यु/१५
अमित
(मा मिश्रित भाव में) मागिर महामार हो गयो ? (घोणा की
मोर उम्मय होकरणंगे मित्रो ! क्या यह गप है?
वीणा:
(म फुलाकर उसो तुनकमियानी के साप) तोमपा ममद गी?
मित
खिन्न होकर) ना हरताराप माप भी होगा।
वीणा
मुझे ना मालम
अमित :
मो भी
वीणा
यहते है परीक्षा में नकलवानी रोपने क लिए प्रिगिपत ने पुलिस को
कलिज के अहाते में बुला लिया था और इलाजीपेटग भी दूसरे कॉनजी गे
बुला लिये थे।
अमित :
तो।
वीणा:
इससे कॉलेज के लडनों ने अपना अपमान समझा। कुछ लड़को ने शुध
होकर परीक्षा की कापिया फार डाली और कॉलेज-भवन पर पथराव करने
सगे। इस पर पुलिस ने साठी चार्ज किया। मुना है कि पुलिस से मुठभेड़ में
कुछ लडके बहुत गम्भीर रूप से घायल हो गये और उन्हें अस्पताल ले जाया
गया है । बम मुझे इतना हो मालूम है ।
अमित :
ओफ्फ् ! इतना बड़ा काण्ड हो गया। तब तो तमाम परीक्षाएँ स्थगित
करनी पडेगी?
एक और अभिमन्यु/१८
वीणा:
यह तो पता नहीं।
सुभद्रा :
(अब कर उठती हुई) अच्छा भाई, मै तो चलू। अभी देर मारे वर्तन
मांजने है । अमित तू इस लड़की को समझा।
[सुभद्रा भीतर के अहाते में चली जाती हैं। दूसरी ओर से एक युवक
का प्रवेश
शहजात :
अरे भाई अमित क्या हो रहा है ? (एक कुर्सी खींचकर उस पर बैठते
हुए) तुम्हारा इण्टरव्यू कमा रहा ?
अमित :
अरे छोड़ो यार इण्टरव्य की। वह तो हो गया जैमा होना था। हा, यह
तो बताओ शहनात ! आज कॉलेज मे यह हड़ताल कैसे हो गई?
शहजात:
अरे ये हडताले तो आजकल होती ही रहती हैं। सारे देश मे ही जब
हड़ताले तालेवन्दी चल रही है तब कतिजो मे क्यों नहीं? •तुम इस एक
हड़ताल की बात कर रहे हो । पूरा सन्न ही हडतालो मे बीत गया । हड़ताल
तो आज के समाजवाद-का फैशन है यार। आम आदमी की जागृति का
वित है। (कथन के साय व्यंग्य मिश्रित हंसी)
अमित :
पर शहनात भाई, परीक्षा के दिनो मे यह हड़ताल ! इससे तो
विद्यार्थियों का ही नुकमान होगा।
शहजात।
अमित तुम भी बडे बमभोले हो यार! मरे विद्यार्थियो के नफे-नुकसान
की इस डर्टी पोलिटिका में कौन सोचता है। ये सब तो इस गन्दी मियामत
की पातरंज-के सिर्फ मोहरे हैं जिन्हें , कभी जातिवाद-वर्गवाद, नमी
सम्प्रदायवाद, कभी विद्यार्थियों को विभिन्न दलों में विभक्त करके राजनीतिक
दलवाद के द्वारा अपने मतलब के लिये यूज किया जाता है। चुनावों के समय
एक और अभिमन्यु/१९
. भी चाहे वे नगर परिषद के हो, विधानसभा या लोकसभा के, मभी अवमरो पर हुड़दग मवाने के लिए विद्यार्थियों को ही हथियार बनाया जाता है अपने कॉलेज में ही लो न । प्रोफेसरों के अलग-अलग गुट हैं और इन गुटों की गोटियां कॉलेज के विद्यार्थी ही तो हैं। जानते हो, इस हड़ताल के पीछे कौन थे? अमित : (जिज्ञासा की मुद्रा मे) नहीं तो ? शहजात इम हडताल के पीछे भी प्रोफेमर-वर्ग की गुटबाजी थी। एक जाति विशेष का प्रोफेमर वर्ग अपनी जाति के विद्यार्थियों को परीक्षा में नकल कराना चाहता था, दूसरा गुट प्रिन्सिपल को नीचा दिखाना चाहता था। इसी माहोल में एक स्थानीय नेता को भी प्रिन्मिपल से अपना पुराना बदला लेने का मौका मिल गया। बस फिर क्या था। विस्फोटक सामान तैयार था ही, आग क्यों नहीं लगती ? परीक्षा में नकल करने दो, नही तो तोड़-फोड, छुरेबाजी । यही तो आज का युवा-आक्रोश है ! एग्रो जनरेशन का यही तो नया तेवर है । (व्यंगपूर्ण हँसो हँसता है।) अमित : (कुछ तिलमिलाने की मुद्रा में) इसे तुम युवा-आक्रोश कहते हो शहजात यह तो इस पीढी को विमूढ़ता का चिह्न है, अपने ही परों में कुल्हाडी मारने जैसा कार्य है । यदि दर्पण पर पत्थर फेकोगे तो जानते हो क्या होगा? (प्रश्न मुहा में कुछ रुककर, फिर स्वयं ही उत्तर देता है) होगा यही न कि दर्पण या तो चकनाचूर हो जायेगा या उसमे घटक पड जायेगी। चटक पड़े दर्पण में वही बदसूरत चेहरा जव अपना प्रतिबिम्ब देखेगा तो एक के स्थान पर अनेक क्षत-विक्षत बदसूरत चेहरों में बंटा हुआ दृष्टिगोचर होगा। आज के इम तथाकथित युवा-आक्रोश की भी यही स्थिति है जो व्यवस्था के ययास्थितिवाद, सामाजिक पाय 'और राजनीतिक छल का ढ़ता से प्रतिकार करने के बदले अपने को ही क्षत-विक्षत कर रहा है । और ! (कुछ सोचता-सा) और यह विदेशों से आयात किया हुआ तथाकथित एप्रोजन- एक और अभिमन्यु/२० रेगा का गुस्मा एक नपुमक गुस्सा है जो कायरता का ही छम नाम है जिसमे कर्म का तेज नहीं, कर्म से विमुख हो भागने की, पलायन की मनोवृत्ति है । अपना मूल्यवान अध्ययनकाल यदि विद्यार्थी इस प्रकार नष्ट करने लगे?....? शहजात : तुम तो भाई भाषण के मूह मे आ गये। यार अब छोड़ो भी इस किस्से को। किस पचड़े को ले वैठे। पढ़-लिखकर भी ऊंची-ऊंची डिग्रियां प्राप्त करके भी क्या होगा। वही ढाक के तीन पात । डिग्रियां लिये-लिये रोड मास्टरी किया करो, जगह-जगह अपमानित होते फिरो। बोलो यही तो हर होगा न इस पढ़ाई-लिखाई का । अब तुम अपने को ही लो न । फस्दं पोगी- जन प्राप्त करके भी तुमने कौनमा तीर मार दिया ? अमित : (कुछ हतप्रभ-सा होकर) पर! । - 1 पर ! पर कुछ नहीं भैया। मौजुदा हालात मे हमे तो कबीर बाबा का वह दोहा बड़ा फिट लगता है-'पढ़-पड़ कर सब जग मुआ, पण्डित मया न कोई । ढाई अक्षर प्रेम के पद सो पण्डित होइ।' भाई वाह । कबीर की भी कोइ मिसाल नही । बात बड़े पते को कह गया है। हमारी युवा पीढी ने तो इसे अपने हलक में मानो गहराई से उतार लिया है । खुले आम खुलकर प्रेम कारना । हो, मी लव । दम मारो दम, मिट जाय गऽऽम ! (ध्यंग से हंसता है). अमित : इसे इतने हल्के स्तर पर न ली शहजात ! वस्तुत. यह एक मोशियो-माइको- लोजीकल प्रॉब्लम है ! फिल्मी अभिनेता-अभिनेत्रियो की नकल करके फिल्मी डामलोग बोलने को तुम क्या प्रेम की संज्ञा दोगे? वस्तुतः यह तो अत्यधिक मामाजिक वर्जनाओ से दवी हुई बीमारी काम-कुण्ठाओं का अनियंत्रित विस्फोट है। शहजात : यदि यही बात है तो इसका जुम्मेवार कौन? जब छात्र-छात्राएं देखती है कि उनके लेक्चरर्स हो प्रणय-लीलाओं में मशगूल है, खुलकार प्रेम करते हैं, तब वे अपने आदर्श-पुरुषों का अनुकरण ही तो करते है। मैडम भार्गव एवं 4 74 - एक और अभिमन्यु/२१ प्रोफमर डेविड के प्रणय-प्रमग को मान पर चढ़ाने के लिए तुमने ही मदद की। मैनेजमेण्ट के द्वारा कॉलेज में उनको निकारा दिये जाने पर तुमने ही तो उन्हें नौकरी पर वापम मेने के लिए कॉलेज में छात्रों से हड़ताल करयाई थी। अब क्या भूल गये उस बात को अमित उम घटना को इस रूप में मत ली शहनात। वह एक ऊंचे मिहान्तावा प्रश्न था । कुछ दकियानूमी लोगों ने उसे जातिवाद और माम्प्रदायिकता वा रूप दे दिया था और राजनीतिक पार्टियों ने मे राजनीतिक स्टन्ट बना लिया था। उन लोगो की दृष्टि उम युगल के प्रणय-प्रमंग और उनकी मिवित मंरिज पर न थीं, वरन् उगम जाति और धर्म पर थी। चूकि मैडम भार्गव जाति से ब्राह्मण थी और मि डेविड हरिजन जाति से कनवर्टेड क्रिश्चियन थे, एक का धर्म हिन्दू था तो दूसरे का मज़हब ईमाई । बस फिर यया था ? पोगा- पंथी पण्डितो, मजहबी फिरकापरस्त लोगों को अपना दम फुलाने का अवसर मिल गया। अब तू ही बता ऐसे अवसर पर रुढिवाद, परम्पराओ और माम्प्रदायिक ताकतो के विरुद्ध संघर्ष नही किया जाता तब ). शहजात : तब? [एक सिक्ख युवक का प्रवेश। बह शहनात के मुंह से निकले 'तब' शरद को पकड़कर पुनरावृत्ति करता है । हरवंश : ! अमित : अरे बैंठो भी यार हरवंश ! तुम भी खूब मौके पर आये। ( हरवंश एक मोड़े पर बैठ जाता है- अमित अपनी बहन वीणा को आवाज देता है । वीणा आकर प्रश्न चिन्ह मुद्रा में खड़ी हो जाती है।) अमित : बिन्नी, जरा चाय तो लाओ हम लोगों के लिए। एक और अभिमन्यु/२२
[यीणा का प्रस्थान]
हरवश :
हां भाई अमित, जरा इम 'तब' का खुलामा हो जाय ।
अमित :
तुम 'तव' का खुलामा चाहते हो न हरवंश तो सुनो। तब तुम भी कर
तोड़ने के उस झूठे और फरेबी काण्ड को गिरफ्त में आकर अभी तक कभी के
दोजख में पहुंचा दिये जाते । मालूम है कॉलेज के उस नवनिर्मित साइन्स ब्लॉक
की नमीग में, साम्प्रदायिक लोगो को गिद्ध दष्टि ने, किसी तरह एक पुराना
कब्रिस्तान खोज निकाला था और तुम पर कब तोड़ने का जुर्म लगा दिया था।
शहजात:
और तब सघो-लीगी शब्द कितने जोरी से उछलने लगे थे और सारे
शहर में तनावपूर्ण वातावरण उत्पन्न हो गया था। हम लोग भी एक दूसरे
को शक की नजर से देखने लगे थे। तब अमित ही ने तो अपने को जोखिम
में डालकर उस मामले को ठण्डा किया था।
हरवश :
जानता हूँ भाई, जानता है। यह साम्प्रदायिकता का जहर न मालूम
कितने निरीह और बेगुनाह इन्सानों की जान लेगा, कुछ पता नही । फिरका-
परस्ती के इस डेविल ने महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों को भी नहीं छोड़ा।
उन्हें भी अपने राक्षसी जबड़ों तले निगल गया ।
शहजात ।
वह अल्लाह, ईश्वर पुकारता ही रह गया।
अमित:
लेकिन वह मर कर फिर जी उठा।
हरवश :
(आश्चर्य से) मर कार जी उठा ?
शहजात:
(आश्चर्य से) मर कर जी उठा? कहाँ है वह ?
-
--
एक और अभिमन्यु/२३
अमित: हाँ, वह मर कर भी जो उठा और जब-जब भी जहाँ-जहाँ भी माम्प्र- दायिकता, भाषावाद, प्रान्तवाद के नाम पर पशुता का नंगा नाच होने लगता है, वह निर्भय होकर वहां पहुंच जाता है । फिर उसका 'मर्डर' होता है, किन्तु वह फिर जी उठता है। यार हरवंश, यार शहजात ! वह बडा चमत्कारी व्यक्ति है । लगता है वह कभी नही मरेगा। हरवंश और शहजात : (दोनों एक साथ) कभी नहीं मरेगा ? । अमित : हाँ, कभी नहीं मरेगा। हरवश जहां इन्मानियन है, मानवता है, वह वही है । जब मानवता गिरने लगती है, उसका दम घुटने लगता है। जब वह मिटकर भी पुनः जी उठती है, तब वह भी जी उठता है। पर मानवता मिटती नहीं, वह गिर पडती है और गिरकर उठ बैठती है, फिर खड़ी होकर अपने पथ पर चल पडती है । पर इस पथ का कोई अन्त नहीं। चलते रहना ही जिसकी नियति है -चरैवेति- चरैवेति ! शहजात . भाई अमित तुम तो ऊँचे दर्जे के दार्शनिक हो । अमित : मैं क्या, जिनमे दृष्टि है वे मब दार्शनिक हैं । इस दृष्टि से हम मभी तो दार्शनिक हैं। [एक युवती का प्रवेश । युवती के हाथ में कुछ पुस्तकें हैं जिन्हें वह अपने वक्ष से सटाये हुए है। युवती इन तीनो को चर्चा में तल्लीन देख पहले तो ठिठक जाती है। फिर सब को नमस्ते कहकर घर के भीतर जाने वाले दरवाजे की ओर बढ़ जाती है। एक और अभिमन्यु/२४ अमित : अरी सविता तुम ! आओ ! कब आई ? बैठो ! सविता: " . (विस्मित हास्य के साथ) नही, आप गप्पें लगा लीजिए, तब तक मैं माताजो से मिल लेती हूँ। [युवती का प्रस्थान । मौतर जाती हुई सविता को अमित के दोनों मित्र कनखियों से देखते हैं और कुटिल हास्य के साथ एक दूसरे को आँख मारते हैं। अमित उनको इस हरकत से झेंप-सा जाता है।) हरवंश : (अमित से) बादशाहो की गल है ? शहजात : यो भाई अमित बात कहाँ तक बढी ? हरवश : स्टोरी क्लाईमैक्म तक पहुंची या नहीं ? अमित: अरे तुम दोनो यो बहाने क्यो लगे। शहजात। हम बहरने है हरवंश : हम बहाते है ? लो भाई शहजात टूर्मरोधात सुनो शहजात: अच्छा अमित ! अपनी वह कविता सुनाओ [अमित जिज्ञासा को मुद्रा में। हरवश: अरे वही पर स्वयं ही बढ जायेंगे । शहजात : राह जरा मिल जाने दो। 7 एक और अभिमन्यु/२५
हरवश :
होठ स्वय ही हिल जायेंगे-
शहजात :
बात जरा बढ जाने दो।
अमित:
क्या बकवास कर रहे हो शैतानो। किसी लड़की को देख कर तुम्हारे
फेफड़े क्यों फूलने लगते हैं ?
हरवंश :
तुम्हारे फेफड़े सूखने लगते है।
शहजात.
यार छोड़ो भी हरवंश । (मुस्करा कर अमित से) क्यो अमित अव
मिठाई-विठाई हो जाय ।
अमित .
मिठाई किस खुशी में ?
हरवंश :
अरे हमारे लिए भाभी जो लाओगे ।
अमित:
भाभी! कैसी भाभी?
शहजात:
अत्र पहेली मत बुझाओ।
अमित:
भाई तुम तो बड़े अजीब अहमक हो । अरे यह सवित चटर्जी है। कभी-
कभी अपनी डिफीकल्टी सोल्व करने आ जाती है।
हरवंश :
अच्छा तो तुम्हारे पास पढ़ने आती है।
शहजात:
क्या पढ़ाते हो भाई ?
-
एक और अभिमन्यु/२६
. हरवश : प्रेम-मन्त्र ! शहजात अरे नहीं यार, वाक्-तन्न ! अमित: (कुछ उद्विग्न-सा होकर) अब तुम वकवाम बन्द नही करोगे? शहजात : लो, कर दी बकवास बन्द । अमित : . (कुछ शान्त होकर) जानते हो उनके साथ मेरा रिश्ता सिर्फ मित्रता का है। हरवंश : यानी कि पह तुम्हारी मित्र है । शहजात : नहीं गर्ल-फण्ड है। [इस पर हरवंश य शहजात ठहाके के साथ हंस पड़ते हैं। अमित (खोजकर) तुम लोग इस तरह मूखों की भांति क्यों हँस रहे हो ? हरवंश : (अपनी हंसी रोककर) यदि बुरा न मानो तो एक बात कहूँ अमित ! अमित: कहो तो। हरवंश: हमारे समाज में औरत और मर्द का रिश्ता दोस्ती के रूप में मान्य नहीं है । औरत मां, पत्नी, बहिन, पुत्री वगैरह-वगैरह हो सकती है, किन्तु मित्र नहीं। अमित: यह तुम्हारी प्रान्ति है। भारतीय संस्कृति के प्रति अनभिज्ञता का प्रमाण है। एका और अभिमन्यु/२७ हरवंश : वह कैसे? अमित: तुम्हें मालूम होना चाहिए, प्राचीन काल मे पुरुष-स्त्री के बीच मंत्री को भी पवित्र दृष्टि से देखा जाता था। द्रौपदी और कृष्ण मे बडी घनिष्ट मित्रता थी, किन्तु दोनों की मित्रता पर किसी ने आपत्ति नहीं की थी। शहजात : (कुछ ऊवता-सा) लो अब तुम फिर कथावाचक बन बैठे। यार अब छोड़ो इस बात को । (हरवंश की ओर देखकर) क्यी भई हरवंश ! बैठे ही रहोगे या चलोगे भी) अमित (शहजात से) पहले तू यह बता, आजकल क्या कर रहा हे तू ? शहजात: भाई, आई० ए० एस० 'एग्जाम्स' को तयारी कर रहा हूँ। उम्मीद तो है निकल जाउंगा। यू० पी० एस० सी० के सदस्य आजकल यूसुफ अली है । शिक्षा मन्त्री जी से कहलाऊंगा। हमारे वो एम० पी० साहब है न ! उनके मार्फत ही कुछ तिकड़म भिड़ानी होगी। . अच्छा भाई चल। काफी देर हो . गयी। अमित : अच्छा | गुड विसेज विद यू शहजातः - सेम टू यू [शहजात का प्रस्थान; अमित और हरवंश पूर्ववत् बैठे रहते हैं । अमित . और हरवण । तुम्हारे पेपर कैसे हो रहे है ? हरवंश . पेपर तो ठीक हो रहे थे यार, पर अब मव गुड़-गोवर हो गया । राडको ने परीक्षा के बीच में हड़ताल कर दी । अब तो यह माल गया ही समझो। एक और अभिमन्यु -
अमित :
वास्तव में यह तो अपने पैरों में अपने आप ही कुल्हाड़ी मार ली
लडकों ने।
हरवश:
(उसांस लेकर) क्या बताऊँ अमित ? पिताजी इस वर्ष ही रिटायर हो
रहे है, उधर बहिन की शादी करना भी बहुत जरूरी है। सोचा था इस वर्ष
परीक्षा में पाम होकर कुछ नौकरी-वोकरी की जुगाड़ बैठाऊँगा, पर अब तो!
(शून्य में ताकने लगता है । फिर खड़ा होकर) अच्छा अमित अब चलूं, बहुत
देर हो गयी।
[हरयश का प्रस्थान । अमित कुछ सोचने को मुद्रा में खड़ा रहता है ।
मंच अन्धकार में डूब जाता है ।
[कुछ क्षण पश्चात् मंच पर प्रकाश पुनः शनैः शनैः उभरता है । पार्क
का दृश्य दिखलाई पड़ता है। वृक्ष के नीचे रखी हुई एक बैच पर बैठे
अमित और सविता पर प्रकाश केन्द्रित होता है। अमित किसी विचार में
खोया-सा लगता है । सविता उसे निनिमेष दृष्टि से देख रही है ।]
सविता
क्या सोच रहे हो अमित ?
अमित :
(सजग-सा होकर) कुछ भी नही सविता । कुछ भी तो नहीं ।
सविता:
फिर भी.?
अमित :
कह तो दिया न, कुछ भी नही ।
सविता :
अमित, तुम इस प्रकार जब सोच में डूब जाते हो तो मुझे डर लगता है।
अमित:
(आश्चर्य मिश्रित भाव से) डर लगता है ! पर क्यो ?
सविता :
जाने क्यो? यह तो मैं बता नहीं सकती। पर, लगता है।
एक और अभिमन्यु/२९
अमित :
पर सविता कुछ व्यक्ति सोचने के लिए ही अमिशिप्त हैं। उन अभिशिप्त
व्यक्तियों मे से मैं भी एक हूँ। जानती हो एडम और ईव को स्वर्ग के राज्य
से क्यो वचित होना पड़ा था ?
[सविता जिज्ञासा की दृष्टि से देखती है।]
क्योकि उन्होने भूल से ज्ञान-पक्ष का फल चख लिया था । क्या करूं
सविता ! सोचते-सोचते मस्तिष्क की नसें फटने लगती हैं । शिराओ में कितनी
दारुण वेदना उबलने लगती है।
सविता :
पर सोच-सोच कर यो अपने को ही क्षत-विक्षत करने से लाभ क्या
मिलेगा तुम्हे ?
अमित:
तव फिर जी चाहता है इस तथाकथित समाज को, उसके झूठे नियमो
को, भ्रष्टाचार और अन्याय पर टिकी व्यवस्था को तत्काल नष्ट कर दूं।
सविता:
लेकिन इतना गुस्सा फिस लिए?
अमित:
किम लिए? तुम पूछ रही हो मविता किस लिए? शायद तुम्हे पता
नहीं है कॉलेज मै पुलिम के द्वारा छायो की निर्मम पिटाई के कारण एक
निरंपराध किशोर वय छात्र अस्पताल में मर गया। वह लडका गांव से
पढ़ने आया करता था। अपनी विधवा माता का वह इकलौता पुत्र था और
अपने अन्धे-बहरे वृद्ध दादा का एकमात्र सहारा था।
[सविता अमित को चुपचाप देखती रहती है।
तुमने सुना होगा सविता | उस एम० पी० सेठ के ट्रक ड्राइवर ने नशे में
धुत्त हो किस तरह एक सड़क पर चलते राहगीर को कुचल दिया था, किन्तु
न्याय व्यवस्था के कानो मे जू तक नहीं रेंगी थी।
सविता:
यह तुम जो बात कह रहे हो, वह तो ठीक है अमित, किन्तु !
एक और अभिमन्यु/३०
अमित :
किन्तु सविता पहले मेरी बात तो सुनो !
सविता:
:
सुन रही हूँ।
अमित :
क्या तुमने कल के न्यूज पेपर में नहीं पढ़ा था ?
सविता:
नहीं तो! क्या लिखा था?
अमित
लिखा था एक व्यक्ति ने पहले अपने बच्चो को, फिर अपनी पत्नी को
कुएं में धकेल दिया, और स्वयं कुएं के झूद कर आत्महत्या कर ली।
सविता:
(आह भरकर) बड़ी दर्दनाक घटना है । उस व्यक्ति ने ऐसा क्ष्यों किया ?
अमित:
कारण जानना चाहती हो?
सिविता चुप]
तो सुनो! इस स्वतन्त्र भारत में उस गरीब को अपना व अपने बच्चों
का पेट भरने के लिए कोई काम नहीं मिला, कही नौकरी नहीं मिली।
अन्त में अपने बच्चो को भूख छटपटाहट उससे बर्दाश्त नहीं हो सकी और
सपरिवार अपनी आत्म-हत्या कर ली। यह एक नही, ऐसी अनेक घटनाएँ
इस देश मे नित्य घटित होती हैं सविता । हमारे देशभक्त वीरों ने, स्वतन्त्रता
सेनानियों ने अपने रक्त की बूदो से सोच कर इस धरती पर स्वतन्त्रता,
समता और न्याय के कमल खिलाये थे, उसे आज हमारे नेताओ के क्षुद्र स्वार्थ
और सत्ता-लिप्सा ने अपने पैरों तले रौद डाला । यहाँ 'सत्य मेव जयते' के
ठीक नीचे बैठ न्यायाधीश धूस लेकर न्याय को बेचता है । जानती हो समाज
की पाखण्ड पूर्ण स्थिति एवं राजनीतिक छल पर एक फ्रासीसी लेखक कामू ने
कितना तीखा प्रहार किया है ?
एक और अभिमन्यु/३१
सविता: (जिज्ञासा फी मुद्रा में) नही तो! अमित: कामू का कथन है—'यहां हर कैदखाने पर स्वतंत्रता का और हर मुनाफे की दूकानदारी पर समता का लेविल लगा हैं।' सविता: आज की मामाजिक और राजनीतिक विसगतियो पर यह तो बड़ा तीखा प्रहार किया है कामू ने । अमित : सविता ! कहते हुए बड़ी पीड़ा होती है। 'राम-राज्य' के स्वप्न देखने वाला देश आज अन्याय, शोषण, भ्रष्टाचार, वेकारी, बीमारी के साथ-साथ मूल्य-भ्रप्टता, धार्मिक पाखण्ड, सकीर्ण साम्प्रदायिफ भावना जातिवाद, प्रान्तवाद एवं पावाद की अनिष्टकारी प्रवृत्तियो के चत्रव्यूह से पूरी तरह घिरा हुआ है। [पूरे जोश के साथ अपने दोनों हाथो को मुट्टियां तानकर] मैं अपनी पूरी शक्ति और सामर्थ्य के साथ अपना सर्वस्व बलिदान करके भी इस चक्रव्यूह को भेदना चाहता हूँ जिससे स्वतन्त्रता, समता और न्याय के स्वर्ण- पुष्प खिल सकें। सविता: [विह्वल होकर] तुम्हारा यह लोक-कल्याणकारी शुभ सकल्प तो महनीय है अमित । [अमित के एक हाथ को अपनी कोमल हथेली में लेकर] किन्तु एक बात कहने की इजाजत दोगे मुझे ? अमित : कहो न सविता ! चुप क्यो हो ? सविताः इतना बडा कार्य जो तुम करना चाहते हो, वह केवल सोचने से, केवल गुस्मा करने से पूरा हो सकेगा ? [अमित जिज्ञासा की दृष्टि से सविता को चुपचाप देखता है] . . एक और अभिमन्यु/३२ जब तक व्यक्ति के सोच या विचार में कर्म की तेजस्विता प्रकट न हो, तब वक ऊसर भूमि मे बोये गये बीज की भांति ऐसा मोच मा विचार निरर्थक होता है। विचार या सिद्धान्त की खाद में जब कर्म के बीज बोये जाते है तब लक्ष्य प्राप्ति का पुष्प खिल उठता है। बिना कर्म के शब्द केवल झाझ को झंकार से कर्ण-काट लगते हैं और वे लफ्फाजी का रूप लेते है। विना कर्म के आक्रोश या गुस्सा व्यक्ति को क्लोव बना देता है। वह आदमी में विवशताजन्य दैन्य भाव उत्पन्न करता है, इसलिए मेरा पहना इतना ही है अमित कि इस चक्रव्यूह को तुम अभिमन्यु जैसे कर्मवीर बनकर भेद सकते हो। अमित्त: [उल्लसित होकर] अरी, सविता आज तो तुमने अपने नाम को सार्थक कर दिया । आज तो तुमने मंत्रयो, गार्गी, वैदिक काल की सब विदुषियो वो पीछे छोड़ दिया। [अमित भावातिरेक से सविता के कोमल हाथ को आहिस्ता से अपने हाथ में लेकर धीरे से चूम लेता है।] सविता: [अमित से अपना हाथ छुड़ाकर सलज्ज भाव से] अरे ! सार्वजनिक पार्क में यह क्या कर रहे हो? कोई देख लेगान ! अमित: लेकिन हम कौन-सा अपराध कर रहे हैं जो तुम इतनी डर रही हो । सविता: डरने की बात ही है, नियम का उल्लंघन जो कर रहे हो। अमित: (उत्तजित होकर) सविता ! देखो तुम नियमों की बात चलाकर फिर मुझे गुस्सा दिला रही हो। तो क्या तुम ममाज के इन जड़-वाधनो को नियम कहती हो । सविता: ममाज इन नियमों के सहारे ही तो टिका हुआ है अमित ! नहीं तो कभी का धराशायी हो गया होता । एक और अभिमन्यु/३३
अमित:
जिस नियम से मानव जाति का एक अंग जन्म से पवित्र मान लिया
जाता है, किन्तु दूसरा अंग अस्पर्श्य घोषित कर दिया जाता है, अपनी जाति-
गत पवित्रता के दम्भ में हरिजनो को स्वच्छ पानी पीने तक का अधिकार
नहीं देता और उनके घर जला दिये जाते हैं। जिस नियम से समाज में पहले
भिखमगो को जमात पैदा की जाती है फिर भीख देकर दया दिखलाने का
दम्भ प्रकट किया जाता है। समाज के ऐसे नियमों को मानने के लिए तुम
बाध्य हो' बोलो सविता । जवाब दो । चुप क्यों हो?
सविता.
पर यह बात दूसरी है अमित ।
अमित:
-
दूसरी कैसे है मविता । जिस नियम से व्यक्ति अपना प्यार पूरी सच्चाई
और निष्ठा से प्रकट नही कर मके। जिस समाज में पग-पग पर वर्जनाएँ,
कदम-कदम पर कुण्ठाएँ हो, उस ममाज का मानसिक स्वास्थ्य"......!
[सथिता अमित के मुंह पर हाथ रखकर उसे बोलने से रोकते हुए।
सविता :
बम इतना ही बोलो अमित । तुम्हारा इस तरह उत्तेजित होना ठीक नहीं।
[फिर बात को बदलती हुई।]
एक बात कहूँ अमित।
[अमित जिज्ञासापूर्ण दृष्टि से सविता की मुख-मुद्रा देखता है ।
जब तुम इस तरह उत्तेजित होते हो, अपना गुस्सा प्रकट करते हो तब !
अमित :
सविता:
मुझे भय लगता है।
अमित:
यह तो सुम पहले भी वह नुको हो ।
पर और अभिमन्यु ।
सविता:
किन्तु साथ ही तुम्हारे प्रति प्यार भी उमड़ पड़ता है ?
अमित :
भय भी लगता है, प्यार भी उमड़ पड़ता है। यह तुम कैसी पहेली बुझा
रही हो।
सविता:
यह पहेली नहीं है अमित । मानव-मन का द्वन्द्वात्मक सत्य है ।
अमित :
मैं समझा नहीं।
सविता.
ठीक से मैं समझा भी नहीं सकती, केवल महसूस करती हूँ। मैं ठहरी
'साधारण लड़की। नारोहू न । नारी के लिए नियम मानना ही ठीक रहता
है, जीवन में आस्था, सम्भावनाओ में विश्वास ।
अमित:
समाज के नियमो को मानने के लिए नारी बाध्य है, पुरुष नहीं । क्या
यही कहना चाहती हो तुम
सविता:
मेरी पूरी बात तो सुनो अमित ।
अमित :
सुन रहा हूँ।
[अमित सविता के चेहरे को चुपचाप देखता रहता है।
और तुम्हारे गुस्से से प्रेम इसलिए करती हूँ कि इससे तुम साधारण व्यक्ति
न रहकर एक असाधारण व्यक्तित्व वाले हो जाते हो मामान्य से ऊँचे उठकर
विशिष्ट बन जाते हो । यदि तुम में यह गुस्सा नहीं होता तो, शायद मुझ जैसी
एक साधारण लड़की को तुम्हारा सहारा नहीं मिला होता । तुम्हारे इस गुस्से ने
ही, मड़े-गले नियमों के प्रति विद्रोह भाव ने ही तो मुझ जैसी अज्ञात-कुलशीला
अनाथालय की लड़की को (भाव-विह्वलता के कारण कण्ठ अदबद्ध हो जाते हैं ।)
?
एक और अभिमन्यु/३५
अमित (भाव-विलिल होकर) नही सविता, अपने को यो छोटा बता कर मुझे भी छोटा न बनाओ। कौन कहता है तुम एक साधारण लड़की हो । सविता तुम गायत्री के समान ही पवित्र और सविता के समान ही तेजस्वी हो, तपस्वनी हो । मैं क्या बताऊँ सविता । तुम मेरे जीवन की प्रेरणा-शक्ति हो । मैं तुम्हारे - बिना आधा-अधूरा - [अमित भाव-विह्ललता जनित मानसिक स्थिति से सजग होकर कहता-कहता रुक जाता है] सविता (भाव परिवर्तन के साथ उल्लसित होकर) अरे अमित । क्या यो बातें ही करते रहोगे या कुछ पढाओगे भी। (पुस्तक खोलकर अमित के सामने रखती हैं ।) अमित जव जीवन का पाठ पढ़ रही हो, तब इस पोथी को बीच मे क्यो ला रही हो मविता । आओ हम दोनो मिलकर जीवन को इस पुस्तक में कुछ नये पृष्ठ जोडे-~-स्वतन्त्रता, ममता और न्याय के, शोषण मुक्त ओ । लोकतन्त्र के देवता । श्रम की स्याही मे डुवो, कर्म की लेखनी से, तेरे लिए लिखे हम- नये-नये छन्द । यातना के कैदखाने में वन्दी, मानव मुक्ति के मानवता मे निष्ठा और प्रेम के, क्योकि- समाज के एयः और अभिमन्यु/३६
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अंक २
[मंच पर पहले जैसा ही कमरे का दृश्य । एक मेज पर दर्शकों की
ओर पीठ किये अमित कुछ लिखने में तल्लीन दिखलाई पड़ता है ।
एक ओर से सुभद्रा का प्रवेश । अमित को लिखने में तल्लीन देखकर
ठिठक कर क्षणिक खड़ी रहती है। तदनन्तर-कोमल और धोमे
स्वर में]
सुभद्रा :
बेटा अमित।
अमित चुप]
बहुत देर हो गयो बेटा खाना परोस दूं।
[स्वर को जरा ऊँचा करती हुई]
अरे सुनता भी है बेटा।
अमित:
(तन्मयता में व्याघात पड़ने से कुछ खोजता-सा) क्या है मा ?
सुभद्रा:
बेटा ! बहुत देर हो गयी, खाना नहीं खायेगा।
अमित:
खा लंगा मां । तुम व्यर्थ ही चिन्ता मत किया करो।
सुभद्रा:
तू तो हमेशा यही कहता है । (फिर कुछ पाद-सी करती-)
सुन तो अमित।
एक और अभिमन्यु/३८
अमित:
बोलीमा।
सुभद्रा :
मालूम है तुझे । तेरे दादाजी गांव से आ गये है।
अमित :
२
(कुछ सजग-सा होकर) कब आये मां । अभी कहाँ है
सुभद्राः
आज सुबह ही, तब तू बाहर था। बिन्नी को साथ लेकर बाजार गये हैं,
अब आ रहे ही होगे।
अमित:
(अन्यमनस्क-सा) अच्छा !
सुभद्रा:
बेटा अमित ! देख तो मेरी ओर !
अमित:
(अपनी मां को मुख-मुद्रा को पढ़ता हुभा-सा) हो, कहो माँ !
सुभद्राः
देख तू अपने को कुछ सम्हाल, कुछ साध बेटा!.
अमित:
मैं समझा नही मां!
सुभद्रा:
यो उखड़ा-उखड़ा रहने से कब तक चलेगा !
अमित :
ऐमा लगता है तुम्हें माँ कि मैं ?
सुभद्राः
[बड़े स्नेह से अमित के सिर पर हाय फेरती हुई] देखबेटा ! तू अब मेरा
कहा मान!
एक और अभिमन्यु/३९
.
अमित (बात को कुछ समझता हुआ तल्खी के साथ) कि मैं झट विवाह कर और पट चौके-चूल्हे मे तुम्हारी मदद के लिए बहू ले आऊ, यही न ! सुभद्रा . इसमें अनोखी बात क्या है वेटा । सभी तो ऐसा करते हैं । यह तो ससा का नियम है। अमित . (उत्तेजित होकर) सभी छीकते हैं इसलिए मुझे भी छीकना चाहिए और फिर चुटको बजानी चाहिए। फिर मभी झीकते है इसलिए मुझे भी झीकन चाहिए। सभी शादी करते हैं, बच्चे पैदा करते है और फिर एक दिन कीडे- मकोड़ों की तरह मर जाते है, यही तो आदमी की नियति है । इसी को तु संसार का नियम कहती हो। (फिर सुभद्रा की आंखें नम देखकर अपन उत्तेजना को शान्त करके) देख मां, तू मुझे समझने की कोशिश कर । तुम ही तो एक दिन कहा था-पिताजी मुझे अभिमन्यु । ....." खर। अब छोड़ इस बात को। सुभद्राः तू कह रहा जो मब समझ रही हूँ बेटा । पर तेरे दादाजी का खया आता है। मैंने तो बहुत कुछ सहा है रे और भी मह लंगी। इम जीवन रूप यातना के पहाड को तिल-तिल काटा है । अब शेष ही बितना रहा है ? अमित: [सुभद्रा के आईस्वर से भीग कर गीले स्वर से] पर तुम ही बताओ में भी क्या करूं मां? सुभद्रा : तेरे दादाजी भी तो बहुत टूट चुके हैं बेटा। उनकी अपनी मान्यनाए अपना दृष्टिकोण और इसके अनुरूप इच्छाएँ-आकाक्षाएँ । उनका बेटा विद्रोह निकला। उनकी मर्जी के खिलाफ शादी कर लेने पर उन्होने अपने बेटे को कर्भ क्षमा नही किया। पर उनका पोन भी उमी रास्ते चले, कैसे मह पायेंगे वह यह एक और अभिमन्यु/४० अमित: [कुछ खिन्न होकर] पर वे चाहते क्या हैं माँ, मुझसे ? [नेपथ्य में खट-पट की ध्वनि के साथ ही खंखारने की ध्वनि सुभद्रा: लो, वह आ गये दिखते हैं । अब तू उन्ही से पूछना, पर बेटा वृद्ध प्राण है, देख, जहाँ तक हो, उनकी भावना को ठेस न पहुँचाना बैटा। [सुभद्रा का प्रस्थान । छड़ी टेकते हुए एक वृद्ध व्यक्ति पं० रामनाथ का प्रवेश । पं० रामनाथ अपनी परम्परागत वेशभूषा में घोतो और अचफन पहिने हुए हैं। सिर पर सफेद पगड़ी बांधे हुए हैं तथा ललाट पर तिलक छापा लगा हुआ है। अमित उठकर अपने दादाजी के चरणों में प्रणाम करता है। पं० रामनाय अपना वरद हस्त उठाकर 'जीते रहो बेटा' कहकर आशीर्वाद देते हैं । फिर दोनों कुर्सियों पर बैठ जाते हैं । योणा छड़ी को नचाती हुई भीतर चली जाती है। अमित: आप कब आए दादाजी? पं.रामनाथ: प्रातःकाल ही आ गया था बेटा। फिर मन्जी लाने वीणा को साथ लेकर बाजार में चला गया था और कहो, सब ठीक तो है ? अमित : सब ठीक ही पल रहा है दादाजी ! आप ही बताइए गांव के क्या गमावार है? पं० रामनाथ: गौय के समाचार मत पूछो येटा! हवा उल्टी चल रही है। उफ क्या जमाना आ गया है । धर्म-कर्म सब प्रष्ट । ब्राह्मण-शूद्र में कोई अन्तर नहीं। आजकल तो नीच कोम इतनी सिर पर चढ़ गयी है बेटा किमत पूछो। समार को माधार शिला वर्णाश्रम व्यवस्था ही नाट हो रही है। अब न जाने क्या होगा हमारी विश्व-विख्यात भारतीय संस्कृति का ? कुछ समझ में ही नहीं आता? एक और अभिमन्यू/४१
अमित :
।
अमित:
इसमे चिन्ता करने की कोई बात नही है दादाजी। भारतीय संस्कृति
का कुछ बिगड़ने वाला नहीं है । प्राचीन काल में वर्ण-व्यवस्था का विकृत रूप
था ही कव । वर्ण का निर्धारण कर्म से होता था, न कि जन्म से । ऋग्वेद
के प्रथम मन्त्र-दृष्टा एतरेय ऋषि भी इतरा दासी से उत्पन्न सन्तान थे।
सदियो से शोपित-उत्पीडित वर्ग यदि अब मुक्ति की कुछ सांस लेता है तो
इसमे बुराई क्या है?
[पं० रामनाय को शुन्ध मुद्रा को देखकर कुछ संकोच मे पड़ता हुआ]
खैर छोडिये इस बात को। मै भी आपसे किस वहम मे उलझ गया ?
पं० रामनाथ .
तो तू ब्राह्मण का पुत्र होकर भी वर्ण-व्यवस्था को नहीं मानता?
मैने कहा न कुछ अन्य बात कीजिए। इस सम्बन्ध मे शायद आपको मेरे
विचार रचिकर न लगे।
प० रामनाथ .
अमित तू भी अपने पिता पर ही गया है । उसो की तरह ही बातें करता है।
पर दादाजी | मैं केवल बातें ही नहीं करता, अपने विचारो को जीवन
में कार्यान्वित भी करना चाहता हूँ।
पं० रामनाथ :
(कुछ उत्तेजित होकर) अच्छा कर लेना अपने विचारो को कार्यान्वित ।
पहले यह तो यता इतना पढा-लिखा होने पर भी वही अच्छी जगह जमबर
नोकरी क्यो नही करता? ऐमा कब तक चलेगा ?
अमित :
कोशिश तो करता हूँ दादाजी ! पर बही जम नहीं पाता।
पं० रामनाथ:
बुछ कारण भी तो होगा । आशा थी कि इतनी ऊंची पहाई पढकर यही
यहा अफमर बनेगा । कुल यो उजागर करेगा । पर देखता है.......?
एक और अभिमन्यु/२
अमित :
अमित : 'कि मैं कपूत निकला, नालायक निकला, किन्तु इसमे मेरा दोप भी क्या है दादाजी। जहां कही नौकरी करता हूँ, वहाँ सव यही चाहते हैं कि मैं भी उनको रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार में साथ दूं। आफिस का काम न करके अफमरों की चमचागीरी करूं। घरो पर जाकर उनकी बीबियों के नखरे उठाऊँ । चाहे भूखों मरना पड़े, पर यह सब मुझमे कभी नही होगा दादाजी । पं० रामनाथ : फिर तू क्या करना चाहता है आखिर । ऐसे किस-किस से उलझेगा ? स्नेिह से आर्ट होकर] देख बेटा! सोच तो, तेरी वहिन वीणा कितनी बड़ी हो गयी है। आखिर वह कब तक कुंदारी दैठी रहेगी । और आजकल जमाना भी तो बडा खराब है वेटा, ईश्वर न करे कुछ हो-वो गया तो? अमित : Y (एकदम उत्तजित होकर ) तो इसका मतलब है कि मैं भी तस्करी, रिश्वतखोरी, या भ्रष्टाचारी के कार्यों में सम्मिलित हो जाऊँ। अपनी अन्त- रात्मा को चन्द चांदी के सिक्को के बदले बेच डालू । क्रूर व्यवस्था के निर्मम यन्त्र का पुर्जा बन जाऊँ। और एक दिन घिस जाने पर निर्दयतापूर्वक फेंक दिया जाऊँ। आप क्या यही चाहते है मेरे से ? प० रामनाथ: (कुछ क्रुद्ध होकर ) जय मारी दुनिया ही ऐसे चल रही है, तब तुम्हारे ही कौन सुर्खाब के पर लगे हैं ? अमित : मारी दुनिया रिश्वत खाती है तो मैं भी खाने लगू। मारी दुनिया जहु- नम मे जाती है तो मैं भी जहुन्नम का रास्ता लू । क्या यही चाहते हैं आप? क्षमा करें दादाजी, यह मुझसे नहीं होगा, चाहे कितनी ही कीमत चुकानी पडे । प० रामनाथ: (कुछ तोष्ण स्वर में) कीमत तो हमे चुकानी पड़ रही है बेटा ? जो हमारे कुल मे तेरा जमा भागीरथ पैदा हुआ। सुभद्रा वेचारी जीवनभर दुःख सहती रही और अब भी कपड़े सी-सीकर सबका भरण-पोषण कर रही है। मैं भी पा और अभिमन्यु/४३ कब तक टिका रहूँगा। न मालूम कब जीवन-दीप बुझ जाय । चिन्ता अपनी नही है बेटा । चिन्ता तो वीणा को है, उमका क्या होगा? [कहते-कहते पं० रामनाय को आंखें नम हो जाती हैं, किन्तु अंगोछे के छोर से पोंछ लेते हैं । अमित : (कुछ मुलायम होकर सफाई देता हुआ-सा ) यह नही दादाजी कि मैंने सर्विस के लिए कोई प्रयत्न ही न किया हो । प्रयत्न करने पर एक अच्छी-मी पोस्ट सोशियल वेलफेयर आफीमर को मिल भी गयी थी, किन्तु वहां दफ्तर में देखा तो हरेक कर्मचारी के पीछे किसी न किसी को मिफारिश का बिल्ला लगा हुआ था। दफ्तर का कोई कार्य ही नही करना चाहता । विना रिश्वत के कोई फाइल हिलती ही नही। कार्यालय के अन्तर्गत संचालित महिला• समाज-कल्याण केन्द्र की तो हालत बहुत खराब निकली। वह तो अनैतिक व्यापार का अड्डा बन गया था। जब इस स्थिति मे मैंने कुछ सुधार लाने के प्रयत्न किये तो मव कर्मचारी मेरे विरुद्ध हो गये। उन बाबुओं में एक मन्त्री जी का दूर का रिश्तेदार था। अतः मब वाबुओं ने उसके साथ मिलकर मेरे विरुद्ध षड्यन्त्र रच डाला। मिनिस्टर ने मिथ्यारोप लगा कर मुझे रिवर्ट करके अन्यत्र भेजने के आदेश निकला दिये। अब ऐसी स्थिति में आप ही बताइए दादाजी कि एक स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए सिवाय अपनी सर्विस से स्तीफा देने के अन्य क्या उपाय होता। जगह-जगह मविम की और जगह- जगह यही दुष्चक्र मिला। प० रामनाथ : किन्तु वेटा अमित ! ऐसे माहोल में अपने को टिकाने के लिए एडजेस्ट- मैण्ट करके, कुछ मिल-जुल के चलना ही पडेगा। खैर अब छोड़ो इस बात को । मैं तुम से एक खाम विषय पर बात करना चाहता हूँ। अमित : (अनमना-सा होकर) कहिये दादाजी। पं० रामनाथ : मुभद्रा ने शायद तुम से जिक्र किया भी होगा। [ अमित चुप] एक और अभिमन्यु/४४ -- देख बेटा ! तेरे लिए एक लड़की देख ली है मैंने। घर के काम-काज में प्रवीण, पढी-लिखी बड़ी सुशील लडकी है । खानदान अच्छा है और धनाढ्य भी है वेटा ! दहेज भी ठीक मिलेगी। तुमने भोपाल के ज्योतिषमार्तण्ड पं० उमादत्त तिवारी का नाम सुना होगा न ! बड़े प्रसिद्ध ज्योतिषी है । हमारे भूतपूर्व राष्ट्रपति जी को विजय की घोपणा अखबारों में उन्होंने पहले से ही छपवा दी थी। अपनी ज्योतिष विद्या के चमत्कार के कारण मंत्रिमण्डल में भी उनकी गहरी पहुंच है । उनको ही कन्या है । उससे तेरी सगाई की बात पक्की भी करली है। विलम्ब करने से भी क्या फायदा ! ऐसा घर और लड़की कोई वार-बार थोड़े ही मिले है। [अमित अपने आवेश को दबाकर चुप रहने का प्रयत्न करता है मगाई का महूर्त भी। अमित: (बोच मे ही बात काट कर) किन्तु दादाजी, अभी तक तो मैं किसी नौकरी या कोई काम-धन्धे पर जम ही नहीं पाया । ऐसी स्थिति में एक बोझ अपने सिर पर बाँध लेना क्या समझदारी की बात होगी ! पं. रामनाथ: तेरी नौकरी की दृष्टि से यह सम्बन्ध होना और भी जरूरी है अमित । ज्योतिषमार्तण्ड पं० उमादत्त तिवारी को तुम नही जानते ! अपने ज्योतिप, ज्ञान के कारण बडे-बडे मिनिस्टरो तक उनकी पहुंच है। किसी भी मिनिस्टर से कहकर वे तुम्हें कोई अच्छे पद पर नौकरी दिलवा देंगे। अमित: [अपने को जप्तकर अप्रिय स्थिति को टालने का प्रयत्न करते हुए] किन्तु दादाजी, इतनी जल्दी भी क्या है । मुझे कुछ सोचने का अवसर तो दीजिए। प. रामनाथ: इसमें सोचने-विचारने की क्या बात है बेटा। अरे मैं तेरा दादा हूं दादा ! भला मेरे अलावा तेरे भले-बुरे की बात कौन सोच सकता है ? मैंने तिवारीजी को वचन दे दिया है बेटा ! अब यह मेरी प्रतिष्ठा का प्रश्न है। अपने मान्य-कुल की प्रतिष्ठा का। एक और अभिमन्यु/४५
अमित.
(तिलमिलाकर) पर इसके लिए मैं क्या करूं ?
[कुछ क्षणों के लिए मंच पर चुप्पी छा जाती है और वातावरण
गम्भीर हो जाता है। घर के भीतर के अहाते से धोणा छड़ी को
नचाते हुए प्रवेश करती है, किन्तु अमित य पं. रामनाथ की चुप्पी
देखफर तथा स्थिति को गम्भीरता को भांपकर ठिठक जाती है।
तदनन्तर एक कोने में जहां कुर्सी रखी है, बैठ जाती है और मेज
पर रखी किसी फिल्मी पत्रिका को उठाकर उसके पृष्ठ उलटने.
पतटने लगती है।]
पं० रामनाथ:
तो तुम्हे स्वीकार है न?
अमित.
क्या?
.
पं. रामनाथ:
वही तेरी विवाह की बात ।
[वियाह शब्द को मुनकर वीणा अपना मुंह पत्रिका में छिपाए हुए
उन दोनों का यार्तालाप सचेष्ट हो गुनने सगतो है ।]
লগিন
यह तो दिया आपसे।
प० रामनाथ
[पोनकर क्या पह दिया ? अरे तू अपने दादा की बात नहीं मानना,
पर अपनी मां पी तो गोर बेटा । रात-दिन पा के गाम-धन्धे में ओनेही
वटी परती है। यह आ जायेगी, उसे भी महारा मिलेगा।
अमित.
[पास से पचता हमा] पर अभी वीणा रा विगह भी सो पाता है।
पही मो विवाह गी भी सो गोविये।
पं. गमनाप.
गुमांग पर गाभी गती । अनि ! रेटा टरिगान मे गांगोग
rr sir भिम
विना दहेज दिये आजकल अच्छा राड़का मिल जायेगा और दहेज के लिए
पैसे कहां से लायेगे। तेरे ससुराल वालो से जो दहेज आयेगा, परवीणा के
विवाह में काम आ जायेगा। फिर पं. उमादत्त जो तुझे अच्छी नौकरी पेरणी
लगवा देंगे।
अमित :
[उकताकर बात को समाप्त करने को मुद्रा में] पर दादाजी। क्या
विवाह गुड्डे-गुडियो का खेल है ।
प. रामनाथ.
[ तीक्ष्ण स्वर में] जो कहना चाहता है साफ-साफ कह न ।
अमित .
यहो कि अपने जीवन साथी का चुनाव क्या विना देखे-समझे · !
प. रामनाथ:
[उत्तेजित होकर व्यंग्य भरे स्वर में] ओह ! समझा ! तो तुमने किसी
लडकी को देख-समझ रखा है क्या । बोल ! वताता क्यो नहीं ?
[वातावरण में क्षणिक स्तब्धता छा जाती है। अमित चुप रहता है।
वीणा अपनी कुर्सी छोड़कर अमित के समीप खड़ी हो जाती है और पं०
रामनाथ की ओर उन्मुख हो कहती है ।
वीणा.
भैया नहीं बतायेगा दादाजी । मैं बताती हूँ । भैया ने एक लड़की को-
अमित:
[द्ध होकर वीणा को बीच में ही रोकता हुआ] बिन्नी !
पं. रामनाथ:
क्यो रे, इतनी बड़ी लड़की को इस प्रकार क्यो डॉट रही है ?' उसे पूरी
बात कहने दे ना ! (वोणा से) हाँ बेटा कहो तो कौन लड़की है,वह ?
वीणा:
सविता दीदी ! वैरी स्वीट, वैरी-वरी चामिग' दादाजी। अमित भया
उसे बहुत चाहते है।
एक और अभिमन्यु/४७
.:5
अमित:
विको नू अपनी बवाम बन्द नहीं करेगी?
प० रामनाथ:
(घोणा से) हो, वोगा तुम कहो ! क्या करती है यह सहकी। उमरे
माता-पिता यहाँ रहते हैं ?
वीणा:
यह मब भया से ही पूछ लो न आए।
प.रामनाथ:
भपा से मया पूध सं बेटा ! जितना नू जानती है, यह नो यतलादे।
वीणा:
गविता दीदी गमाज-गत्मण विभाग में मोगल औरगनाइजर है दादाजी।
परिण योमग होस्टल में रहती है। माता-पिता तो वेगारी हो यहाँ ?
अनायालय में हो पालन-पोषण हुआ है। मेरिन यही अगदी महती है दादागी।
महापा तो अभी गे गपिता दीदी मो मेरी भाभी बनाकर मुझे गिती
पिन:
मानीया में अभी
माग
(भायेग से) तो अपनी
तुझे बताऊँ !
प.मनाप:
वीणा:
(समक कर अमित से) मैं झूठ कह रही है। पार्क में सविता
घण्टो बैठकर बतियाते नहीं रहते ?
अमित :
(घीणा को ओर उन्मुख होकर ) तो इसमे भी कोई बुराई है । गुनाह है
किमी से बात करने में?
वीणा:
यह मैं कब कहती हूँ?
प. रामनाथ:
लेकिन एक अज्ञात कुल भील जिसके मां-बाप, जाति, कुल किसी का भी
कुछ पता नहीं।
अमित:
किन्तु वह एक इन्सान तो है, मानव तो है।
प० रामनाथ:
(उत्तेजित होकर) तो तेरा मतलब है, वह एक नीच कुल की आवारा
लड़की हमारे पवित्र ब्राह्मण कुल को पुत्र-वधु बनेगी। यही कहना चाहता है
अमित :
-
(क्रोधावेग से) एक शरीफ लड़की के प्रति यो अपशब्द मत बोलिये दादाजी।
पं० रामनाथ:
उस लड़की के लिए अब तो मेरे से भी सवाल-जवाव ( कुछ रुककर )
'अच्छा तू ही बता किस जाति को है वह लड़की ?'
अमित :
रक्त की कोई जाति नहीं होती दादाजी। सबके रक्त का रंग लाल होता
है । भगवान् बुद्ध के ""!
पं० रामनाथ :
(बीच में ही बात काट कर) अरे भगवान बुद्ध की बात छोड़, अपनी बात
कर । ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर सारे धर्म-कर्म, वर्ण-व्यवस्था को भ्रष्ट क्यों
एक और अभिमन्यु/४९
अमित :
विकी नू अपनी यकवास बन्द नही करेगी?
पं० रामनाथ:
(वीणा से) हां, वीणा तुम कहो । क्या करती है वह लड़की। उसके
माता-पिता कहां रहते हैं ?
वीणा:
यह मय भैया से ही पूछ लो न आप 1
प० रामनाथ:
भैया से क्या पूछ लू बेटा ! जितना तू जानती हैं, यह तो बतलादे ।
वीणा:
सविता दीदी ममाज-कल्याण विभाग में सोशल ऑरगनाइजर है दादाजी।
वकिंग वीमन्स होस्टल में रहती है । माता-पिता वैचारी के हैं ही कहाँ ?
अनाथालय में ही पालन-पोषण हुआ है। लेकिन बड़ी अच्छी लड़की है दादाजी।
लड़कियां तो अभी से सविता दीदी को मेरी भाभी बतलाकर मुझे चिढ़ाती
रहती है।
अमित:
(आवेश से) तो तू अपनी बकवास बन्द करती है या नही । या मैं अभी
तुझे बताऊँ । इडियट !
प० रामनाथ:
तो बात इस हद तक बढ गई। (अमित से) क्यो रे । बिन्नी जो यह सब
कह रही है ?
अमित:
[आवेश मे] मुझे कुछ पता नहीं।
पं० रामनाथ:
(उत्तेजित होकर) तुझे पता नही तो फिर किसे है ? क्या वीणा झूठ
बोल रही है ?
अमित:
इम लडकी का दिमाग तो! पढ़ने-लिखने में तो इसका मन लगता नहीं,
बस बिना समझ-बूझे वीच-बीच यो ही टांग अड़ाती रहेगी।
एक और अभिमन्यु/४८
वीणा: (तमक कर अमित से) मैं झूठ कह रही हूँ। पाक में सविता घण्टों बैठकर बतियाते नही रहते ? अमित: ( वीणा को और उन्मुख होकर ) तो इसमे भी कोई बुराई है। गुनाह है किसी से बात करने में? . वीणा: यह मैं कब कहती हूँ? प.रामनाथ: लेकिन एक अज्ञात कुल शील जिसके मां-बाप, जाति, कुल किसी का भी कुछ पता नहीं। अमित: किन्तु वह एक इन्सान तो है, मानव तो है। प० रामनाथ: (उत्तेजित होकर) तो तेरा मतलब है, वह एफ नीच कुल की आवारा लड़की हमारे पवित्र ब्राह्मण कुल की पुत्र-वधू बनेगी। यही कहना चाहता है न तू? अमित : (क्रोधावेग से) एक शरीफ लड़की के प्रति यो अपशब्द मत बोलिये दादाजी। पं० रामनाथ : उस लड़की के लिए अब तो मेरे से भी सवाल-जवाव { कुछ रुककर । अच्छा तू ही बता फिस जाति को है वह लड़की ?' अमित: रक्त को कोई जाति नहीं होती दादाजी। सबके रक्त का रंग लाल होता है । भगवान् बुद्ध के । पंरामनाथ: (बीच मे ही बात काट कर) अरे भगवान बुद्ध की बात छोड़, अपनी बात कर । ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर सारे धर्म-कर्म, वर्ण-व्यवस्था को भ्रष्ट क्यो 1 1 ३ , एक और अभिमन्यु/४९ कर तुम लोग धर्म और संस्कृति को नष्ट करने में क्यो तुले हुए त मामत . आप किस संस्कृति की बात कर रहे हैं दादाजी? हमारी संस्कृति में जाति-पांति के संकीर्ण बन्धन थे ही कय ? अज्ञात कुलशील होकर भी 'सत्य- काम जावालि' वैदिक ऋचाओ के मृप्टा और मंत्र-दृष्टा थे। वैदिक युग में अनुलोम और प्रतिलोम विवाह होते थे। हमारी संस्कृति इतनी संकीणं नहीं है। प० रामनाथ: ( और भी अधिक आवेश में होकर ) तो तू अब अपने दादा को भी धर्म और सस्कृति का नया पाठ पढायेगा ? अरे जोशी कुल में जन्म लेकर, अपने कुल के कलक न लगा बेटे। सोच तेरी इस बहिन को अपनी जाति-बिरादरी में कौन ब्याह करेगा ? अपनी नही तो, इसकी तो मोच । वीणा : ( तुनक कर पं. रामनाय से ) पर दादाजी आप दोनो की बहस में मुझे क्यो घसीट रहे है ? आप लोग मेरी चिन्ता न करे। - प० रामनाथ: चिन्ता की वात ही है बेटी। तू अब कौन-सी कुवारी ही घर मे बैठी रहेगी। यह भाग्य ही खोटे है, वरना अभी तक तेरे हाथ कभी के पीले हो जाते । (हताश भाव से) हे ईश्वर ! न जाने अब इस घर का क्या होने वाला है ? [आँखें मीच अपना सिर कुर्सी की पीठ पर टिका देते हैं। निमिप मात्र में ही सजग होकर चीखते से स्वर में सुभद्रा को पुकारते हैं, आवाज सुनकर हड़बड़ाते हुए सुभद्रा का प्रवेश। सुभद्रा : (सिर के आंचल को कुछ और आगे खींचकर ) कहिये दादाजी ! आप इतने परेशान क्यो है । क्या आपकी कुछ तबीयत खराब है ? (फिर अमित को ओर देखकर) क्योरे अमित क्या वात है ? [ अमित चुप रहता है ] एक और अभिमन्यु/५० .
. पं० रामनाथ : अब यह क्या बोलेगा बह। यह तो अपने जोशी कुल को कलो पर तुला हुआ है। सुभद्रा (अमित से) बोलता क्यों नही अमित। आखिर तुमने दादाजी को क्या उल्टा-पुल्टा कह दिया रे ? अमित कुछ भी तो नहीं मां। दादाजी तो व्यर्थ मे ही परेशान हो रहे है । पं० रामनाथ : मैं व्यर्थ में ही परेशान हो रहा हैं ? और तू उस कुलच्छनी लडकी के पीछे मेरे वचन का मूल्य और अपने परिवार की प्रतिष्ठा को भी स्रोने पर तुला हुआ है। अमित : (उत्तजित होकर) तो फिर सुनिये दादाजी जिस शरीफ तडकी को आप बिना जाने ही कुलच्छनी कह रहे हैं, मैं जब कभी भी विवाह करूंगा तो उसी के साथ करूंगा। मैं आपके कुल-जाति, धर्म जनित भेद-भाव के जड बन्धनों को स्वीकार नहीं करता। भले ही मुझे अपने सिद्धान्तो का कितना ही मूल्य क्यो न चुकाना पडे? पं० रामनाथ: (सुभद्रा से) सुन ली न बहू तुम्हारे इस अभिमन्यु की बात। अपने सिद्धान्तों का पहला पाठ वह अपने दादा को ही सिखाने चला है। (हताश भाव से) हे ईश्वर ! अब क्या होने वाला है इस पर का? (डबडबाती आंखों को अपने अंगोछे के छोर से पौंछते हुए) लो बहू अब मैं तो वापस गाँव जाता है। इस घर मे मेरे लिए कोई स्थान नहीं बचा है । मैं ठहरा पुराने विचारो का आदमी। पं० रामनाथ अपनी छड़ी उठाकर खड़ा हो जाता है । सुभद्रा : [इस अप्रत्याशित घटना से बिलखती हुई] नही दादाजी ! आप काही मत जाइये । जब आप ही ऐमा करेंगे तव । : एक और अभिमन्यु/५१ वीणा छड़ी पकड़कर) नहीं दादाजी मैं आपको हगिज नहीं जाने दूंगी। १० रामनाथ: लेकिन जिस घर में मेरा पौत्र ही मेरा अपमान करे वहाँ । अमित : से ( उत्तेजित होकर ) तब लीजिए मैं ही चले जाता हूँ इस घर से । मैं ही तो नकारा हूँ न । पारिवारिक कलह का मूल कारण। आप सब सुख रहियेगा। [ अमित तोर की तरह निकल जाता है। पं० रामनाथ, सुभद्रा व वीणा, तीनों अवाक् देखते रह जाते हैं। वातावरण में विवाद को कालिमा छा जाती है । नेपथ्य में एक विषाद को ध्वनि उभरती है। कुछ क्षण पश्चात् मंच पर अंधेरा हो जाता है। [मंच पर धीरे-धीरे पुनः प्रकाश । एक ओर से हरवंश का प्रवेश एवं दूसरी ओर से अमित का प्रवेश । हरवंश चमक-दमक पूर्ण वेशभूषा में होता है । अमित: . अरे हरवश ! खूब मिले भाई तुम भी, इतने दिनो कहां गायब हो गये थे । कहो कैसी गुजर रही है ? हरवंश : यार सब ठीक चल रहा है। पिंकू के लिए कॉपियां-किताबें लेकर आ रहा हूँ । कान्वेंट में एडमीशन दिलवाना है भाई । बड़ी मुसीबत है । आजकल स्कूल में बच्चो के एडमीशन दिलाना भी तो कितना मुश्किल हो गया है । अमित: अरे तो तुमने शादी कब की हरवंश और उसका रिजल्ट भी इतना जल्दी । बड़ा चुप्पा है रे तू । सब काम चुपके-चुपके । हमे खबर तक नही । हरवश : (कुछ मेंप कर) भाई अमित क्या बताऊँ। सब काम इतना जल्दी में हुआ कि कुछ खबर ही नहीं दे पाया। अच्छा चलू भाई, देर हो रही है । क्ल एकः और अभिमन्यु/५२
टेन्डर सबमिट करने की लास्ट डेट है। यदि डेट निकल गई तो
का नुकसाने समझलो।
अमित:
तो तू इतना बड़ा ठेकेदार हो गया है क्या आजकल ? कुछ बता भी, यह
सब कैसे हुआ । इतने असे बाद मिलने पर भी तू तो कन्नी काटना चाह रहा
है । चल, उस वेंच पर बैठकर कुछ बातें कर लें।
[हरवंश अनमने मन से अमित के साथ एक बैच पर बैठ जाता है]
हां, तो बता तेरे सव हाल
हरवंश :
यह तो सब उस वाहे गुरु की कृपा है अमित, वरना कहाँ तो वह दिन
जब कि नौकरी की तलाश मे रोड मास्टरी करना पड़ रही थी, कहाँ आज
लाखों का व्यवसाय, इस जान को पल भर की फुर्सत नहीं ।
अमित :
.
तो मतलब यह है कि बडे ठाठ-बाट मे हो।
हरवंश :
ठाठ-बाट तो क्या है अमित। हो, माल रोड पर एक नया फ्लट बन
रहा है जिसमें दम-पन्द्रह लाख तो लग हो जायेंगे।।
अमित :
यह अल्लादीन का चिराग तुम्हे मिला कहाँ से?
हरवंश :
मह तोलक की बात है यार । कहावत है न जब ईश्वर देता है, तब छप्पर
फाड़कर देता है। कभी-कभी बुरी बात भी अच्छाई का कारण बन जाती है ।
अमित .
(जिज्ञासा से) यह कैसे?
हरवश :
तो लो जब सुनना ही चाहते हो तो बतला ही दूं। तुम तो मेरे पुराने
दोस्त हो। तुममें क्या छिपाना । एम० ई० कर लेने के पश्चात् बड़ी सिफारिश
एक और अभिमन्यु/५३
पर पब्लिक वर्ग टिपार्टमेन्ट मे ओवरमियर की पोस्ट मिल गई । यह भी ब हुआ जब मेक्रेट्रियेट मे कोई अपना दूर का रिश्तेदार निकल आया। इसके बाद मजबूरन ठेकेदारोके और एक्जीक्यूटिव इंजीनियर के मिले जुलै जाल में फंम गया । झूठे मास्टर रोल, झूठे कन्सट्रेक्शन्स के प्रमाण-पत्र । मबको जेबें गर्म । बडे सहेजकर पकड़े हुए सच्चाई और ईमानदारी के परिन्दे हाथ से फिसल कर दूर आकाश में उड गये। केवल बच रह गई; यथार्थ की ठोस दुनिया । पर एक दिन एक्जीक्यूटिव इजीनियर ने ही अपने बचाव के लिए मुझे सस्पेंड कर दिया । यह सस्पेंशन मेरे लिए तो वरदान बन गया । और देख लो उस नौकरी के लात मार कर एक बड़ा ठेकेदार बन गया हूँ। यह दुनिया यो ही चलती है अमित । (उठते हुए) अच्छा भाई चलूं । सिमेंट का परमिट भी लेना है । देर हो जायेगी। हाँ, हो मके तो कभी मिलना । घर आना। [हरवंश का प्रस्थान । अमित बैच पर बैठकर कुछ सोचने लगता है । नेपथ्य में मोटर गाड़ी का हान बजने की ध्वनि । मंच पर शहजात का प्रवेश । शहजात कीमती सूट पहिने हुए है। चाल एवं चेष्टाओ में एक बड़ा अफसर होने का अहसास] शहजात: (वैच पर बैठे अमित के समीप जाकर उसे पहिचान लेने की मुद्रा में) अरे अमित तुम यहाँ इस प्रकार अकेले बैठे-बैठे क्या सोच रहे हो भाई । पहले तो दूर से मैंने पहचाना ही नही । यह क्या मूरत बना रखी है तुमने ? अमित: (कुछ आश्चर्यमिथित उल्लास भाव से) ओह शहजात भाई तुम ! यहो, कैमे हो ? बडे असें बाद दिखलाई पड़े। शहजात। ठीक हूँ भाई ! अव यहाँ एस० डी० ओ० होकर आ गया है। मुख्यमन्त्री से कहकर एम० पी० साहब ने मेरा पोस्टिंग भी यही करवा लिया है । भाई ! आई०ए० एम० के इण्टरव्यू में लेकर एम. डी. ओ. के पोस्टिंग तक में एक और अभिमन्यु/५४ उन्ही का हाथ है । बडे अच्छे आदमी है। अब यो तो दुनिया दुनिया का मुंह कोन पकड सकता है। अमित : पर मुना है उन्होंने झोपड पट्टी से गरीब मजदूरों को गैर कानूनी ढंग से वैदखल करवा के उस जमीन पर अपनी कोई नई सीमेंट फैक्टरी खोल रहे हैं । शहजात : अरे तो इसमें बुराई क्या है ! वे गरीव तो कही भी रह लेंगे। क्या जमीन अपने साथ लाये थे? पर सीमेट फैक्टरी से तो जिले की तरक्की ही होगी। बेरोजगार लोगों को रोजगार मिलेगा। (फिर अमित के कान के पास कुछ फुसफुसाता है, वह सुनाई पड़ने लगता है) भई, मुख्य मुद्दा तो समझ ही गये न । जब मन्त्री बनाने मे ही इन्ही का हाथ था, तब मन्त्री अपना बदला चुकायेंगे हो न, अव हमे ही देख लो न । बहुत-सी बातें ऐमी करनी पड़ती हैं जिसकी गवाही मन नहीं देता। ...... कोटा, परमिट, लाइमेस, सभी कुछ, अब समझलो सभी कुछ । एहमान का बोझ मिर पर है। अमित : (व्यंग से) पर शहजात ! तुम इतने होशियार तो न थे। फिर एक दम कैसे बदल गये? शहजात: जमाने का दस्तूर सबको बदल देता है अमित ! याद रखो, एक दिन तुम्हें भी बदल देगा। अमित : लेकिन हम चाहें तो जमाने को बदल भी सकते हैं शहजात ! चाहिए दृढ संकल्प शक्ति के साथ उच्चतर जीवन की सम्भावनाओ मे अमिट विश्वास । अकर्मण्य बनकर समय की धार मे बहते जाना तो सहज है, किन्तु अपनी कर्म-शक्ति की सहस्र-सहस्र बाहुओ से, लक्ष्य हीन समय की धार को निर्धारित लक्ष्य की ओर मोड देना ही तो बडा कठिन कार्य है। जीवन को सार्थकता इमी में है। एक और अभिमन्यु/५५ लेकिन जिस सार्थकता की यात तुम कर रहे हो, उसका अन्तिम स्र तो निरर्थकता ही है अमित । वक्त किसी का इन्तजार नहीं करता । सावधान रहकर वक्त का फायदा उठा लो तो ठीक, वरना गया वक्त फिर हाय कहाँ आता है ? अमित : लेकिन वक्त का फायदा उठाने का मतलब यह तो नहीं कि इन्सान वक्त के हाथो खिलौना बन जाय । वह अपनी इन्सानियत को भूलकर एथ्यास प्रेती का पुजारी वन जाय । शोपण और उत्पीड़न के अमानवीय क्रूर तन्त्र का पुर्जा बन जाय। (शहजात निरुत्तर) खैर छोड़ो यार इन बातो को। आज बहुत अर्से बाद तो मिले। मैं भी किम बहस में उलझ गया। हां, कुछ और बातें करें। (मुस्कराकर) कहो अभी शादी-वादी को या नहीं। शहजात : भाई बगले पर आओ कभी तो अपनी भाभी से भी मिल लेना । लो चलूं भाई अब, देर हो रही है । एम०पी० साहब के यहां जा रहा था कि तुम दिखलाई पड़ गये। अमित : एम० पी० क्यो माहब के यहाँ कोई विशेष कार्यक्रम है। शहजात. हो भाई, एम० पी० साहव ने आज काकटेल पार्टी अरंज की है जिसमें कुछ विशिष्ट व्यक्ति भाग लेंगे। मुख्य मन्त्री भी तशरीफ लामेंगे। लो, इस तरफ ही चलना हो तो रास्ते मे डाप कर मकता हूँ। अमित: धन्यवाद ! मैं अभी यही ठहरूंगा। [गहनात का प्रस्थान । नेपभ्य में कार का हार्न सुनाई पड़ता है और स्टार्ट होने को ध्यान होती है। मंच पर अन्धकार । [मंच पर शन:-शनः पुन: प्रकाश होता है । अमित कुर्सी पर बैठा अखबार पाता हुआ दिखलाई दे रहा है । सामने मेज रखी हुई है। गरः और अभिमन्यु/५६ अमित: (अखबार को इस प्रकार पढ़ता है कि सबको सुनाई दे सके।) विया में भीषण बमवारी...... हवाई अड्डा पूर्णत: ध्वस्त, सहस्रो व्यक्ति मरे, सहस्रो घायल, क्षत-विक्षत-अपंग । अमरीका द्वारा पाक को हथियारों की सप्लाई। भारत ने अन्तरिक्ष भू उपग्रह आर्यभट्ट छोड़ा । नरबलि की एक और सनसनी खेज घटना । पिता ने पुत्र को बलि दी। असम में भाषायी दंगे । अहमदाबाद में साम्प्रदायिक उन्माद। गुजरात मे भयकर सूखा, भोपण अकाल, लाखों लोग भूख से मरे। विधायक के घर से डाकू गिरफ्तार। तस्करों को सुविधाएँ । भारतीय हाकी फंडरेशन, क्रोकट टीम, रेहाना सुल्ताना""जीनत....। [सविता का हाथ में चाय को दे लिए हुए प्रवेश सविता: अमित छोड़ो इस अखवार को । लो पहले चाय पीलो । अमित: देखो सविता । इस चित्र को देखो तो। मानव-जीवन की कितनी बेहद दर्दनाक भयंकर ट्रेजेडी है यह ? [सविता अखबार में छपे चित्र को देखती है जिसमें वियतनाम युद्ध में मरे हुए शिशु को अपने हाथों में लिए एक मों विलख-विलख कर रो रही है, दूसरे चित्र में अकाल पीडित क्षेत्र का चित्र है जिसमें एक स्त्री को गोद में बालक भूख से बिलख रहा है और जानवरों के फंकाल दृष्टिगोचर हो रहे हैं । ये हथियारो के सौदागार । खोखले वादो के लेबिल लगाकर मानवता का कैसी क्रूरता से संहार कर रहे है-व्यक्ति स्वातन्त्र्य, साम्यवाद, समाजवाद, लोकतन्त्र, डिक्टेटरशिप । मविता कैसा शब्द-जाल है यह ? अव तो शब्दो के अर्थ ही खो गये हैं। सविता: (अमित के अन्तिम वाक्य को मुनकर कुछ याद करती हुई-सी} अमित तुम्हारी कविता की पंक्तियां भी कुछ ऐसे ही भाव को लिए हुए है-'कोलाहल में शब्द मो गया।' एक और अभिमन्यु/५७ , . ति: 'भरी भीड में व्यक्ति खो गया।' सविता: वाह अमित ! तुमने तो आधुनिक युग को विडम्बना को लगता है, केवल इन दो पंक्तियो मे ही कैद कर लिया, ठीक ही तो है-आचरण विहीन सिद्धान्त केवल शब्द-जाल ही तो रह जाते है। अमित: और कर्मच्युत शादिदर घोपणाएँ शव के ममान निष्प्राण । सविता : जब हमारे मिद्धान्त आचरण की अग्नि और कर्म के तेज से मम्मोपित होगे- अमित तभी वे लोक कल्याणकारी शिव का रूप ग्रहण कर पायेंगे । यही कहना चाहती हो न । सविता : लेकिन अमित कभी-कभी हथियारों की इस भीपण होड़ को देखकर लगता है कि मानव-समाज की नियति स्वय अपनी आत्महत्या की ओर बढ़ रही है । अमित. लगता तो मुझे भी ऐसा ही है सविता कि कभी भूल से ही याद आणविक अस्त्रशस्त्रो का स्विच आन हो जाय तो एक-दो आणविक बम विस्फोट से समस्त मानवता नष्ट हो जाय, किन्तु ऐसा होगा नही सविता । क्योंकि मानव के पाम विवेक का अकुश जो है। सविता और अमित मोचती हूँ यदि हथियारों की बेहताशा होड में लगने वाले ये करोड़ो डालर एव मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति को जीवित रखने के लिए करोड़ो डालर के सामान को समुद्र में वहाने से रोक लिया जाय और इसे समय मानवता के कल्याण के लिए व्यय किया, जाय तो समार में कोई व्यक्ति भूखा-नेगा न रहे। . एक और अभिमन्यु/५८ अमित : समस्त वसुन्धरा भोनिक समृद्धि और आध्यात्मिक आनन्द से खिल उ सविता : यह एक स्वप्न ही तो है अमित । अमित : लेफिन आदमी यदि चाहे तो अपनी संवत्प-शक्ति और कर्म-शक्ति मे स्वप्न को मच्चाई में भी बदल सकता है। सविता: तो तुम बदलोगे मच्चाई मे स्वप्न को ? अमित . यदि तुम माथ दो तो! सविता: . [सस्मित नही तो! अमित: तव कवीन्द्र रवीन्द्र के गीत की एक पंक्ति ही मेरा मम्बल बनेगी । 'एकता चलो रे' । तब मैं अपने पथ पर अकेला ही चलने के लिए अभिशप्त होऊँगा। सविता: लेकिन जीवन के झंझावातों में बाही पथ भूल गये तो। अमित तो फिर से पथ पोज ट्रंगा या नया पथ बना लूंगा। सविता: [ध्यंग से] तब तुम्हारी पूर्व घोषित उम प्रेरणा-शक्ति का क्या होगा? अमित : (व्यंग के भाव को समझकर सस्मित) तब तुम्हारे सामीप्य की रमृति- गन्ध ही मुझ में प्रेरणा के मोहक पुप्प खिलायेगी। सविता: (अमित की बात से कुछ उल्लसित होकर) लो, छोडो.दर्शन और संसार की इन थकाने वाली बातो को। कोई और बात करो। -- एक और अभिमन्यु/५९
त:
और वात ! वातें ही तो कर रहे हैं ।
सविता:
नहीं, अपनी वात । निजी बात ।
अमित :
मसलन।
संविता:
अब तुम अपने वारे में क्या मोच रहे हो?
अमित:
अपने बारे में?
सविता :
हाँ, अपने बारे मे । ममाज, राष्ट्र, विश्व, इन बातो के अलावा भी।
अमित:
तुम्ही करो कोई बात।
सविता:
सो, मैं क्या करूं कोई बात। अन्या, झगड़ा करके घर से इस प्रया
क्यो निकल पड़े तुम
१
अमित :
यह तुम्हें मालूम है।
सविता :
यीणा से जो पता पला है, उममे तो मैं ही अपराधी गिद्ध होती है
सुम मेरे लिए अपने दादाजी मे में झगड पड़े थे।
अमित
यह यनाने की जरूरत है मुझे?
सविता:
(मान करने की मुद्रा में) लो ! अब तुम मुझे ही डोटने लगे।
एर भोर मभिमा/.
Tr ममित: मैं डांट नही रहा, सिर्फ कह रहा हूँ। (क्षण भर के लिए रुककर) सविता मेरी बात सुनोगी। सविता : सुन तो रही है। अमित । मैं तुम से विवाह करना चाहता हूं। सविता: (आश्चर्य मिश्रित प्रसन्न मुद्रा में) मुझसे ? अमित: (उद्विग्न होकर) ओह ! तुमसे नहीं तो और किससे ? सविता: (विह्वल होकर) मै एक अज्ञात कुलशील । मेरे लिए तुम्हारा यह पावन प्रेम हो बहुत कुछ है अमित । इससे, अधिक मैं सहेज नही पाऊँगी। अमित: अनात कुलशील की बात छोडो सविता । इस बात को लेकर तो दादाजी से भी झगड़ा हो चुका है। सविता: मही तो मैं कहना चाहती हूँ अमित कि बिना दादाजी की इच्छा के मैं उम घर की बहू कैसे बन सकती हूँ। अमित: मैं तुमसे मिविल मैरिज करना चाहता हूँ। सविता: लेकिन इतनी जल्दी भी क्या है ? वैसे मैं तुम्हारे जीवन-पथ की सह- यात्री हूँ हो। अमित: पर, किसी न किसी दिन तो हमे निर्णय लेना ही है । एक और अभिमन्य/६१ ! सविता: तुम्हारी बात ठीक है अमित, किन्तु मैंने अभी इस विषय पर सोचा ही नहीं है । ( फिर बात को बदलकर ) अच्छा बताओ ! तुम्हें यह मेरा पलट कैसा लगा? अमित: फ्लैट तो अच्छा है, किन्तु तुमने होस्टल क्यो छोड़ दिया ? सविता: होस्टल में मेरा दम घुटने लगा था। वहां का वातावरण • पता नहीं मुझे ! कुछ दिनो से मन को कचाटने-सा लगा। फिर मन में एक बात यह भी पर कर बैठी कि मेरा अपना भी एक छोटा-सा सुन्दर घर हो जिसे मैं अपना कह मकू । कल्पना में कुछ चित्र बनने लगा कि मेरा कोई एक ऐमा नीड़ हो जिसमे मैं अपने सपनो का ससार वमा सकूँ । अमित: किन्तु उम नीड़ मे बसने वाली सारिका ने अपना कोई शुक भी लिया है क्या ? कौन भाग्यशाली है वह ? क्या इतना जानने का अधिकार मुझे दे सकोगी मथिता? सविता: लेकिन मेरे उस शुफ का परिचय प्राप्त कर तुम्हें ईर्ष्या तो नहीं होगी न । अमित . ( उपलो आह भर कर ) नयों मुझे ईर्षा क्यों होने लगी तुम्हारे गम से। मैं तो उमगे जीवन में मधुमय स्पन्दन ये मोठे-मोठे गीत गुनगा। मयिता: (शिम भाव भंगिमा मोर स्मित हास्य के साप) तो देयो उग दपंग में निमकी दपि तुम्हें दियनाई दे रही है, वही मेरा मन-पारणी, मेरे गानीमा मौदागर है। उमा पी प्रतीक्षा में मेरी चिर-विहरणी आरमा दिन-रात आपुनः पारन रही है। मुझे अपनी मारमा यी मापूर्ण गलता में यह किसी एर और परिमार/६२ अमित कि वह एक दिन इस नीड़ में आकर वातावरण को संगीत लघु लहरों से आप्लावित करेगा। (अमित दर्पण में स्वयं को छवि देखकर सविता के काव्यात्मक विनोद से झेंप जाता है, तदनन्तर भाव-विव्हल होकर] अमित: ओह । सविता | मेरे प्राणो की स्पन्दन, मेरे जीवन की प्रेरणा । सिविता को निश्छल प्रेमनिष्ठापूर्ण बात से अमित मावातिरेक से गद्-गद् हो जाता है। कुछ क्षणों के लिए वातावरण में मौन छा जाता है और दोनों एक दूसरे की आंखों में निनिमेष देखने लगते हैं। मंच पर शनै:- शनैः प्रकाश को रेखायें धूमिल होती हुई अन्धकार में विलीन हो जाती है। [मंच पर पुनः प्रकाश होता है। एक सोफे पर सेठ धर्मदास, सदस्य- लोकसभा पसरकर बैठे हुए हैं। समीप ही टेलीफोन रखा हुआ है। एक दूसरे सोफे पर एक अफसरनुमा युवक बैठा हुआ है जो 'जन- क्रान्ति' समाचार-पत्र को सुखिमों को गौर से पढ़ रहा होता है । सहसा उसकी प्टि एक न्यूज हैडिंग पर स्थिर हो जाती है। यह उस न्यूज हैडिंग को उच्च स्वर से पढ़ता है] शहजात : (न्यूज हैडिंग पढ़ता हुआ) सेठ धर्मदास के काले कारनामे । सिमेंट मे पत्थर के चूरे की मिलावट । एम० पी०, अफमरो और ठेकेदारी की मिली भगत से जनता का क्रूरता पूर्ण शोपण एवं उत्पीड़न । [एक सांस में पूरी न्यूज को पढ़कर प्रश्न वाचक दृष्टि से सेठ धर्मदास की ओर देखता है। सेठ धर्मदास: देखा न आपने एस.डी.ओ. साहब । यह अखवार वाला तो सबको बेन- काब कर देगा। जनता में हमारी बदनामी करके, हमें कही का भी नहीं रहने देगा। यदि इसवा मुंह बन्द नहीं किया तो। (बात को बीच में तोड़कर) अच्छा शहजात साहब ! जनक्रान्ति का सम्पादक यह अभिमन्यु है कौन ? आपको कुछ पता तो होगा। - : - -- एक और अभिमन्यु/६३ 7 शहजात : हां, पता तो है । जानता हूँ मैं उसे । [टेलीफोन को घण्टी बजती है। सेठ धर्मदास रिसीवर उठाकर बात सुनता है और धौंक पड़ता है। सेठ धर्मदास : क्या कहा ? मब मजदूर फैक्ट्री से बाहर निकल आये है यानी कि हड़- ताल कर दी है । उस गिरधारी नाम के मजदूर की मृत्यु की न्यायिक जांच"" कहते है उसकी हत्या की गई है। क्या रहा निकाले हुए मजदूरो को वापस लेने की मांग कर रहे है । हेलो-हेलो मैनेजर साहब आप घबरायें नहीं । अभी पुलिस भिजवाता हूँ। ये लातो के देवता वातो से यों नहीं मानेंगे । हलो, आप चिन्ता न करें। हाँ, अभी तुरन्त पुलिस ( रिसीवर रखकर शहनात से ) देख लिया न आपने । चीटी के पर उगने लगे हैं। अब इन लोगो में इतनी हिम्मत बढ़ गई है कि कहते हैं हमारे मजदूर नेता की हत्या की गई, वह एक्सीडेण्ट में नहीं मरा । शहजात साहब ! ऐसे अमन और शान्ति कैसे टिकेगी ये गुण्डे लोग तो? शहजात: आप फिक्र न करें एम० पी० साहव । अभी मैं पुलिस फोसं भेज कर सबको ठीक करवा दूगा। (टेलीफोन का रिसीवर उठाता है) हेलो--पुलिस स्टेशन । कौन एम० पी० साहब ? हां भाई देखना, मोदी सिमेट फैक्टरी में मजदूरो ने हड़ताल कर दी। जरा इस मसले को ठीक ढंग से सम्हालो । हो अभी-तुरन्त ! हा-हाँ लाठी चार्ज, आवश्यकता पड़े तो गोली भी । (रिसीवर रखकर सेठ धर्मदास से मुस्कराता हुआ) इन मिरफिरो का बम यही एक इलाज है एम० पी० साहव । मेरे रहते हुए आप चिन्ता न करें। बहुत-बहुत शुक्रिया शहनात माहव । मुख्य मन्त्री जी से कहकर और भी ऊंची पोस्ट पर आपका प्रमोशन करने को कहेगा। हो, आप उस मम्पादन को जानते हैं ? शहजात: जानता तो है एम०पी० साहब । कॉलेज में यह और में दोनों पर साप एक और अभिमन्यु/६४ धर्मदास : .
ही पड़े हुए है। उसका वास्तविक नाम तो अमित है । अभिमन्यु उपनाम है । मेरा तो वह पक्का दोस्त था। धर्मदास: (आश्वयं मिश्रित भाव के साथ-साथ घाघ हष्टि से) अभिमन्यु आपका दोस्त है फिर भी आप के खिलाफ लिख कर, हम लोगो को वदनाम करके यह कोनसी दोस्ती निवाह रहा है ? क्या कुछ ब्लैकमेल करना चाहता है ? अरे आपके पाम तो बहुत साधन है, किसी भी डिपार्टमेंट मा एडवरटाइजमेण्ट दिला कर बेचारे की कुछ मदद कर दिया कीजिए न । मैं भी उसकी मदद कर दिया करूंगा। शहजात : लेफिन एम० पी० साहब ! वह कुछ और ही मिट्टी का बना हुआ है । उमका करियर बडा ब्रिलियन्ट रहा है, श्रू आउट फर्स्ट क्लास फर्स्ट । यदि वह चाहता तो आज किमी ऊँचे औहदे पर होता, पर उसका तो दिमाग कुछ और ढंग का है। अजीव अहमक है । अपने को गरीबो का मगीहा ......? [टेलीफोन को घण्टी फिर बज उठती है। रिसीवर उठाकर] सेठ धर्मदास : हेलो, कौन ? प. विष्णु प्रसादजी ! सम्पादक जुबली । हाँ-हाँ मैने लोक सभा मे श्रमिको के कल्याण की आवाज उठाई थी। बेचारे रात-दिन कमर तोड़ कठिन मेहनत करने पर भी हा-हाँ-बोनस बढ़ाने, काम के घण्टे कम करने आदि का विधेयक मैने ही रखा था। क्या कहा ? जी मेरे फोटो छापने के लिए ब्लाक बनायेंगे (हँसकर) रहने भी दीजिए- अच्छा-अच्छा भेज दूंगा। सनातन धर्म-शाला के लिए डोनेशन-छात्रों के लिए होस्टल "ठीक है ठोक है। अच्छा नमस्ते। सेठ धर्मदास: (शहजात से) सब अखवार वाले अपने ही पक्ष मे लिखते है किन्तु यह 'जन क्रान्ति' ही भ्रान्ति फैला रहा है। (टेबुल पर रखी विहस्की को और संकेत करके) अरे भाई लो न! अभी से क्या हाथ खीच लिया। (प्याले में खुद वाइन उडेलता है।) एक और अभिमन्यु/६५ . शहजात : बम एम० पी० साहब, बम कीजिए । बहुत ले चुका । आप भी तो लीजिए। आपने बिल्कुल ही। सेठ धर्मदास: भाई । मैं तो शाकाहारी हूँ, काजू ले रहा हूँ, वाइन तो कभी-कभी स्वास्थ्य-वृद्धि के लिए दवा के तौर पर ही ले लेता हूँ। [टेलीफोन को घण्टी फिर बज उठती है। सेठ धर्मदास रिसीवर उठाकर] सेठ धर्मदास हेलो । कौन हरवश जी । वोलिए ठेकेदार साहब क्या आज्ञा है ? इम्पोर्ट लाइसम ..."आप बैफिक्र रहिये । अरे डेढ लाख रुपया इलैक्शन फण्ड के लिए ? भाई धन्यवाद । आजका चुनाव खर्च भी बहुत बढ़ गया है । पार्टी आप लोगो के बलबूते पर...."हाँ लाइसेन्स परमिट-ठीक-ठीक । क्या ? डाइरेक्टर्म आफ कामर्स एशोसियेशन कान्फ्रेंस । आऊँगा भाई आऊँगा । तुम्हारी आज्ञा जो ठहरी। अच्छा नमस्ते । सेठ धर्मदास . (रिसीवर रखता हुआ शहजात से) भाई शहजात मियां । ये ठेकेदार भी पूरा आफत का पुतला है । स्साला वडा कांईया है । [शहजात मुस्कराता है। इससे पहले कि वह कुछ बोले, टेलीफोन की घण्टो फिर बज उठती है ।] सेठ धर्मदास : (टेलीफोन का रिसीवर उठा कर कुछ कर्कश आवाज में) हेलो, कोन हैं आप? ओह । मिल मालती। (स्वर में माधुर्य घोलता हुआ) जी, क्षमा कीजियेगा। कुछ परेशानी मे था। महिला समाज कल्याण केन्द्र, आज रात्रि को मास्कृतिक कार्यक्रम' मुख्य अतिथि ! अजी क्या कीजियेगा, किसी और को ..."। (अचानक चपरासी का प्रदेश) चपरासी: साहब वाहर (सेठ धर्मदास-चपरासी पर बिगड़कर फोन पर हो) एक और अभिमन्यु/६६ - 7 अरे ठहर वाम्बख्त, इडियेट! 'जी, जी क्षमा कीजिए। यह तो अपने चपरासी से, ना, आप नाराज ना.हो-हाँ आऊँगा-जरूर-श्योर, हुक्म कीजिए ना सरकार-कोन? वीणा । स्मार्ट "स्वीट स्टेनो टाइपिस्ट के लिए। इसमे ओवलाइज को क्या बात कह रही है ? उल्टे आप हमे ओबलाइज कर रही है। हमें अवसर दे रही हैं बेकारी दूर करने का, जन-सेवा का । जी धन्यवाद । [टेलीफोन का रिसीवर रखकर चपरासी को आग्नेय दृष्टि से देखते हुए सेठ धर्मदास : हाँ-वाहो क्या बात है ? चपरासी: जी, एक लड़की आप से मिलना चाहती है । सेठ धर्मदास: क्यो क्या काम है मुझसे (फिर कुछ याद करता-सा) अरे हाँ-अच्छा भेज दो उसे अन्दर । [लगभग बीस वर्षीय एक नवयुवती का प्रवेश । क्रीम कलर की साड़ी, बॉब कट हेयर । लिपस्टिक-पाउडर । पूरा मेकअप । हाय में मैनिटी बैग मूलता हुआ,-सेठ धर्मदास से नमस्ते करती है । समीप बैठे शहजात को ओर उसका ध्यान नहीं जाता। सेठ धर्मदास: तो आपका ही नाम वीणा है। वैठियेगा। मिस मालती ने आपके लिए फोन किया था। वैसे स्टेनो टाइपिस्ट को हमारे यहां जगह तो नहीं, किन्तु जब मिस मालती से आपकी तारीफ मुनी तो"""। . मिस वीणा: (कुछ संकोच के साय) जी, बड़ी मेहरवानी है आपकी, जगह न होते हुए भी आपने! सेठ धर्मदास: नही, मेहरवानी को कोई बात नहीं। प्रतिभाओं को प्रोत्माहन देना एक और अभिमन्यु/६७
तो.."मिम मालती से ही सुना-आप अच्छी आर्टिस्ट भी है। आज रात्रि को
'कल्चल प्रोग्राम' में आप भी तो कुछ आइटम दे रही हैं न ।
वीणा :
(संकोच मिश्रित मुस्कान के साथ) जी, हो। आप अवश्य आइयेगा।
सेठ धर्मदास :
(शहजात की ओर संकेत करके) मिस वीणा । इन्हें आप जानती हैं ।
यह है हमारे जिले के एम. डी. ओ माहब !
[घोणा शहजात को देखकर चौंक-सी पड़ती है, किन्तु निश्चय नहीं
कर पाती है कि वह शहजात ही है]
वीणा:
(शहजात की ओर उन्मुख होकर) जी, नमस्ते । क्षमा कीजिए, लगता
है मैंने पहले कही आपको देखा है।
शहजात :
(मुस्कराकर) मैंने भी आपको कही देखा है, पर पता नहीं कहाँ ?
सेठ धर्मदास .
(वीणा से) अच्छा मिस वीणा। आप मेरे पी. ए. से अपना काम अच्छी
तरह समझलें।
(चपरासी से) रामदीन, मिस वीणा को पी. ए. साहब से मिलवा दो।
[चपरासी के साथ वीणा का प्रस्थान]
सेठ धर्मदास :
(शहजात से) हां, तो शहजात साहब, जनक्रान्ति के उस अड़ियल टट्ट का
कुछ बन्दोबस्त कीजियेगा, वरना जनता में वह हमारा इमेज बिगाड़ कर
रख देगा।
शहजात,
(रहस्यमयी मुद्रा मे) आप फिक्र न करें एम पी. साहब। शेर को अपनी
मांद मे ही कैद करने वा मसाला जुट गया है। जानते है यह मिस वीणाकौन है ?
एक और अभिमन्यु/६८
सेठ धर्मदास:
(जिनासा को मुद्रा में) नही तो।
शहजात:
अरे माहव यह उस जनक्रान्ति के सम्पादक अभिमन्यु की हो तो बहिन है
जो हम सब के लिए सर-दर्द बना हुआ है ।
सेठ धर्मदास :
(प्रसन्नता से उछल कर तब-तो, तब-तो, शहजात साहब मामला काबू के
बाहर नहीं हैं । इस बात पर तो एक बूंट और हो जाय ।
[दोनो का अट्टहास । धीरे-धीरे मंच अन्धकार में डूब जाता है ।)
[मंच पर प्रकाश को धूमिल धाराएँ विकीर्ण होती हैं । एक युवक का
हाथ थामे वीणा मंच पर प्रवेश करती है। प्रकाश उन दोनों पर
केन्द्रित हो जाता है। युवक के बाल बढ़े हुए हैं, बेलबॉटमनुमा पेन्ट
में धंसी सफेद शर्ट | आंखो पर गोगल चश्मा । घोणा भी बेलबॉटम
पर शर्ट पहिने हुए है । यॉव कट हेयर स्टाइल, आंखों पर गोगल]
वीणा:
(प्रेम-विह्वल जनित भायुकता से) हाय मनीप | तुम कितने अच्छे हो ।
मनीप:
डालिंग? माई स्वीट हार्ट । इट इज माई लक दू" ।
वीणा:
(मनीष का वाक्य बीच मे काटती हुई) ओह ! नो, नो। इट इज माई,लक ।
सिर्फ मेरा लक है कि तुम जैसा साथी मुझे मिला । लेकिन एक बात कहूँ मनीय ।,
(मनीष प्रश्न भरी दृष्टि से थोणा को देखता है।)
बुरा तो नही मानोगे !
मनीप:
अरे डालिग; तुम कहो न । तुम्हारी बात का बुरा ? भई, वाह "तुम
भी कैसी बात कर रही हो ? एक दम नोनसेंस ।
एक और अभिमन्यु/६९
-
.
कभी-कभीमा लगता है !
मनीप:
कसा लगता है ?
वीणा :
अब मैं क्या बताऊँ तुम्हे ? मन मे डर लगता है।
मनीप:
किस बात का ?
वीणा
(कुछ झिझकती हुई-सी) फि कही तुम
मनीष
कहो-पही वीणा | कहते-कहते रुक क्यो गई ?
वीणा:
मुझे छोड तो नहीं दोगे?
मनीप:
ओह ! वीणा तुम भी कैसी बच्चो जैसी बात करती हो। क्या मुझे
इतना कायर समझती हो ?
वीणा
नहीं मनीप, पर मन नहीं मानता। दिन-रात मुझे यही आशंका घेरे
रहती है। कही तुमने मुझे छोड़ दिया तो मैं कही को भी नहीं रहूंगी, वही
की नही रहूंगी। (वीणा विचलित हो, मनीष के कन्धे पर सिर रख देती है
और उसकी आँखों के कोर गीले हो जाते हैं।)
मनीप
(हमाल से वीणा के अश्रु पौंछते हुए) यह क्या पागलपन है वीणा, तुम
एक एडवाम गर्ल होकर कैमी पागलपन की बातें कर रही हो? अरी में अमेरिका
से जल्दी ही सौट आऊंगा। लाम एंजेल्म से तुम्हें पत्र लिगा । जवार तो
दोगीन!
एक और अभिमन्यु/७०
-- घोणा . लेकिन तुम अमेरिका से नहीं लौटे तो मेरा क्या होगा मनोप ? भनीप. अरी, ऐमा कैसे हो सकता है डालिंग। यदि अमेरिका से नहीं भी लौटा तो फिर तुम्हे ही वहां बुला लूगा । तुम कतई चिन्ता मत करो ! अच्छा चलता हूँ--गुडवाई। (मनीष रूमाल हिलाता सरपट चाल से चला जाता है। वीणा वॉय कह कर हाय हिलाती है और जाते हुए मनीष को ताकती रहती है। फिर कुछ क्षणों के लिए विचार मुद्रा में खड़ी रहती है। एक ओर से हाय में पुस्तक लिए सविता का प्रवेश। प्रकाश की क्षीण रेखाएं सविता पर पड़ती हैं । जब सविता वीणा के समीप पहुंच जाती है तो प्रकाश तेज होकर उन दोनों पर केन्द्रित हो जाता है।) मविता: अरे वीणा । तुम यहाँ अकेली क्या सोच रही हो ? वीणा: (चौक कर) ओह ! सविता दीदो। आओ। कहो कैसी हो सविता: पहले तुम बताओ। तुम्हारे क्या हाल है ? आज बहुत अर्से बाद मिली हो। वीणा (अपराध भाव से कुछ पती-सी) ठीक ही है सविता दीदी। सविता: लेकिन तुम्हारा यह उदास मुंह, तुम्हारी आँखें तो कुछ और ही कह रही हैं। वीणा: (भारी मन से) मनीष अमेरिका जा रहा है । सविता: ओह ! समझी । तो क्या तुम नहीं जा रही हो उसके साथ वीणा: कहता है बाद मे बुला लूंगा। एक और अभिमन्यु/७१ ? ?
सविता : फिर तुम वीणा : 1 मेरा मतलब तुमने क्या सोचा है अपने बारे में? किस बात को लेकर? A । सविता: (कुछ शिक्षक कर बात को बदलती हुई) यही तुम्हारे रहने-सहने के बारे में? वीणा: क्यो महिला-समाज कल्याण केन्द्र के होटल मे रह तो रही हूं न मालती दीदी के पास । मालती दीदी बडी अच्छी हैं। मुझमे बहुत स्नेह रखती हैं, सविता दीदी! सविता : अच्छा वीणा: हो, उन्होंने मुझे एम. पी. माहब के यहां स्टेनो टाइपिस्ट का काम भी दिलवा दिया है। मविता : अरी, तू उस एम. पी. के वहां स्टेनो टाइपिस्ट का काम करेगी जो... वीणा यो । क्या अच्छे व्यक्ति नहीं हैं एम. पी. साहन्न । भई; वह तो इम क्षेत्र के बडे आदमी हैं। मविता लेगिन वीणा' मोचती हूँ" वीणा: क्या मोचती हो। मयिता नि मायद तुमने यह अन्दा वाम नहीं लिया । वीणा . पोमे, गम और अभिमन्यु/७२
सविता :
वह तुम्हे माध्यम बना सकता है।
वीणा :
मैं समझी नहीं।
सविता :
जानती हो, अमित की शोपण, उत्पीडन एवं भ्रष्टाचार के विरुद्ध
लड़ाई चल रही है। उसने जनक्रान्ति मे उनके काले कारनामें छाप कर,
लोक-सेवक का मुखौटा पहिने हुए गरीब जनता का क्रूरता से शोपण और
उत्पीड़न करने वाले उन भ्रष्टाचारियो को बेनकाब कर डाला है।
[वीणा चुप रहती है]
अमित का मुंह बन्द करने के लिए वे तुम्हें माध्यम बना सकते है, तुम्हारी
स्थिति का लाभ उठाकर वे ब्लैकमेल करने से भी बाज नहीं आयेगे ।
वीणा :
(सोच में पड़कर अनिश्चय की स्थिति में) तब फिर ।
सविता :
-
देख वीणा ! गहराई से सोच तू
(वीणा प्रश्न पाचक मुद्रा मे सविता के मुंह को देखती है) तू यहा मान,
अब भी घर लौट चल ।
वीणा :
(विचलित होकर) एक बार घर से निकलकर अब किस मुंह से !
सविता :
तू मां की ममता और भाई के प्यार को नही जानती। वे तुझे क्षमा कर
देगे । तुझे पर लोट आई जान कर वे बड़े प्रसन्न होंगे।
घोणा :
(अनिर्णय को मनःस्पिति में) पर मनीप !
सविता:
तो तू अब भी सोचती है कि मनीप अमेरीका से लौटकर तेरे पास
आयेगा और!
एक और अभिमन्यु/७३
वीणा : और ? मविता : तुझे अपनी च्याहता बहू बनाकर अमरोका ले जायगा। वीणा: ( सविता के इस सीधे प्रश्न से तिलमिलाकर ) तो तुम्हें संशय है सविता दीदी? सविता : अव तू ही पूछ अपने मन से । मनौप जिम मभ्यता की 'प्रॉडक्ट' है, नारी का शरीर जिसके लिए सिर्फ खिलोना मात्र है। इसी से ....! वीणा: (संशय, आशंका को मनः स्थिति से विचलित होकर भरमि स्वर में ) सविता दीदी। मेरा मन भी । लाख ममझाने की कोशिश करने पर भी मुझे भी यही डॉउट है ? सविता : देख वीणा । तुमने भावुक प्रेम से उद्वेलित होकर यह जो घर मे मो भाग निकालने का ( वीणा एफ दम निढाल होकर जमीन पर बैठ जाती है।) फिर वह कितना अविवेकपूर्ण मदम था। (वीणा सुबक-सुवक कर रोने लगती है। वीणा को यों रोते देखकर सविता का मन मोंग उठता है) अरी यह क्या हुआ तुझको । (वीणा की बांह पकड़कर खड़ी करती हुई) चल उठ, खडी हो । लो अब घर चलें । [दोनों का प्रस्थान | मंच पर अंधेरा हो जाता है] [मंच पर पुन प्रकाश की धाराएं गतिशील हो जाती हैं । प्रकाश विव मच के बीच में केन्द्रित होता है, जहाँ मैज पर बैठा हुआ एक व्यक्ति दिपलाई पड़ता है। वह सफेद खादी का कुर्ता-पाजामा पहिने हुए है तथा कुर्ते पर जाकेट पहिने है। आंखों पर चश्मा लगा है। मेज के समीप रंक में कुछ अखबार, फाइलें रखी हुई हैं । एक तिकोने एक और अभिमन्यु/७४ स्टूल पर फोन रखा हुआ है। पीठ पीछे दीवार के सेन्टर में 'स्वामी विवेकानन्द' की एवं अलग-बगल में सुकरात, ईशा, बुद्ध, महात्मा गांधी के चित्र लगे हुए हैं। मेज के इधर-उधर व सामने तीन-चार कुसियों रखी हुई हैं। युवक कुछ लिखने में व्यस्त दिखलाई पड़ता है । मंच पर सूट-बूट धारी एक अन्य युवक को मुख-मुद्रा से अफ- सरों का रुतबा झलकता स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है] अमित : ( लिखना छोड़ कर खड़ा होते हुए ) ओह ! शहजात भाई तुम । आओ बैठो। कहो आज अचानक इस गरीब खाने पर आप जैसे व्यस्त व्यक्ति को आने की फुर्सत कैसे मिल गई ? शहजात : (कुर्सी पर बैठता हुआ कुछ, ध्यंग भाव मे ) जब देखा कि हमारा एक दोस्त 'जनक्रांति' का सम्पादक बनकर हमारे खिलाफ ही अपनी कलम के कारनामे दिखला रहा है, तो सोचा, एक बार मिल लिया जाय । अमित : (उसी व्यग्य भाव से) ओह ! अब समझा ! मैंने भी सोचा यह एस.डी. मो. साहब आज यहा कैसे ? तो शहजात, मैं यह समझं कि मुझसे मिलने मेरा एक मित्र नहीं, वरन् भ्रष्ट प्रशासन का प्रतिनिधि एक अधिकारी मेरे पाम आया है। शहजात: (बात को बिगड़ती देखकर उसे बनाने का प्रयत्न करता-सा) नहीं अमित, नही मेरे दोस्त ! ऐसी बात नहीं है। यह जो तुम समझ रहे हो, एक दम गलत है। एक एस. डी. ओ. वो तुम्हारे यहाँ चलकर आने की आवश्यकता नही थी । मैं तो अपने एक पुराने दोस्त से मिलने चला आया हूँ। माथ ही मोचा यदि कुछ गलतफहमी हो तो उसे दूर करली जाय । अमित : देखो शहजात ! एक बात स्पष्ट ममशनी! यह तुम मेरे मित्र हो, किन्तु कोई अन्य न्यक्ति भी हो तो उससे मेरी कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं एक और अभिमन्यु/७५
है । व्यक्तिशः मेरा तिमी में वर-भाव नहीं है, किन्तु ।
शहजात:
किन्तु !
अमित:
एक निर्भय सम्पादक के नाते, एक निष्पक्ष प्रेस की गरिमा रखते हुए
मुझे उस व्यवस्था का जिसके क्रूरतन्त्र से जनसाधारण का, आम आदमी का
शोषण, उत्पीड़न हो रहा है और भ्रष्टाचार का दानव जिस व्यवस्था का
प्रहरी है, उसके विरुद्ध आवाज उठा कर जनजागृति पैदा करना मेरा पायन
कर्तव्य है । एक स्वतन्य देश के स्वतन्त्र प्रेस की यही एक गरिमा है ।।
शहजात:
निस्सन्देह यह तुम्हारा एक ऊंचा आदर्श है अमित, किन्तु बुरा नही
मानना, जीवन केवल आदर्शों के सहारे ही नही जिया जाता । यथार्थ की चोट
कुछ और ही होती है।
अमित:
(मुस्कराकर) यथार्थ के भीपण प्रहार सह-सह कर अब मेरा तन-मन पक
चुका है शहजात । तुम इसकी चिन्ता न करो।
शहजात :
लेकिन अमित, इस प्रकार जीवन से दुश्मनी निकालने के बजाय तो तुम
इसका मोठा स्वाद चख सकते हो, जीवन का आनन्द उठा सकते हो। तुम्हारे
पास प्रतिभा को भी कमी नहीं है। तुम यदि चाहो, मैं तुम्हारे लिए कुछ कर
सकता हूँ । एक दोस्त का फर्ज निबाह सकता हूँ।
.
अमित:
वह कैसे?
शहजात:
एम. पी. साहब, मुख्य मन्त्री जी से कहकर तुम्हें जन-सम्पर्क अधिकारी
बना सकते हैं। कुछ असें वाद डाइरेक्टर ऑफ पब्लिक रिलेशन भी बन सकते
हो । और
.
एक और अभिमन्यु/७६
अमित :
और?
शहजात :
यदि तुम इसी को पसन्द करते हो तो तुम्हारे पत्र के लिए सरकार से
'ग्रांट इन ऐड, दिलवा सकते है, चन्दा एकत्रित करवा सकते हैं, जिससे तुम
एक अच्छा भवन बनवा सकते हो, टेली प्रिन्टर लगवा सकते हो, पर!
अमित :
पर?
शहजात :
शत यही है कि तब तुम्हे विरोध की भावना छोड़कर उन्हें सपोर्ट करना
पड़ेगा।
अमित:
[ टेलीफोन को घण्टी बज उठती है ]
(जिन्न मन से रिसीवर उठाकर) हेलो। कोन हरवंश? हाँ, मैं अमित
ही बोल रहा हूँ। हां, वह एडवरटाइजमेण्ट की धनराशि का हापट अग्रिम
रूप में मिल गया है, किन्तु खेद है, मैं उसे लौटा रहा हूँ। बुरा न मानना
हरवंश, मै मजबूर हूँ। हो, मित्रता के मूल्य पर मैं जनता के साथ धोखा नही
भार सरता । हो "हो ऐसे जनक्रान्ति का मुंह बन्द नही होने दूगा। (फर हो
रिसीयर रख देता है।)
अमित :
(अपनी उत्तेजना को दबाने का प्रयत्न करता हुआ) सब वह युके तुम
मजात ।
शहजात :
हाँ भाई, एक मित्र की भलाई के लिए मुझे जो कुछ महना चाहिए था,
यह मुका । सोचलो! अब यह तुम्हारे पर निर्भर है रि इस जिन्दगीमा
कांटो से पुनसते हो या पुलों की सेज पर सुनाते हो। दोनों ही रास्ते तुम्हारे
लिए बने हुए हैं। एक रास्ता दोजय मे भी अधिक भयानकः पातनाओं का
है। दूसरा महिश्त के सुग से अधिक वैभव और आनन्द ?
एक और अभिमन्य/७७
- [अमित उत्तेजित होकर पा हो जाता है, फिर एक तस्वोर की ओर संकेत करके गहनात से अमित: देखते हो, यह किसका चित्र है ? (फिर प्रश्न का स्वयं ही उत्तर देता : हुआ) यह है गुकरात ! सच बात कहने के लिए इसे जहर का प्याला पीना पड़ा था । यह दूसरा चित्र ईमा का-इमें क्रॉस पर लटका दिया गया था और तीसरा चित्र तो तुम जानते ही हो। मानवता के मसीहा इस गान्धी को गोली खानी पड़ी। (दोनों हाय जोड़कर शहनात को नमस्ते करता हुआ) अच्छा मैं तुम्हारा मूल्यवान ममय अधिक लेना नहीं चाहता। एक उपजिलाधीश का समय बड़ा कीमती होता है। [शहजात अमित के इस व्यंग्यपूर्ण व्यवहार से हतप्रभ रह जाता है, तदनन्तर अमित के नमस्कार का उत्तर कर ला जाता है । नेपथ्य में गाड़ी का हॉर्न सुनाई पड़ता है और गाड़ी स्टार्ट होने को ध्यान होती है । अमित कुछ क्षणों तक सोचता हुआ दिखाई पड़ता है। तदनन्तर टेलीफोन को घन्टी बज उठती है।) अमित: (रिसीवर उठाकर) हेलो | कौन ? क्या कहा ? खिलाफ लिखना बन्द नहीं करूंगा तो दफ्तर के आग लगा दोगे" हत्या कर दोगे हेलो हेलो ! कौन हो तुम? हेलो-कहां से वोल रहे हो ? हेलो"हेलो ! (रिसीवर रखता हुआ) व्यग्य पूर्ण मुस्कान से हँस पड़ता है-हं हं हं ! ( दर्शकों की ओर देखता हुआ ) जब पतित लोग सत्य का सामना नहीं कर पाते है तब मानवता कलकित करने वालो कायरतापूर्ण हरकतो पर उतर आते हैं । आग लगाने की, हत्या करने की धमकियां देने है। लेकिन अमत्य के उन पुजारियो को शायद यह पता नहीं है कि जीवन मृत्यु से बब हारा है ? आखिर सत्य की विजय होती है। शिनः-शनः मंच पर अन्धकार हो जाता है । एक और अभिमन्यू/ अंक ३ [एक कमरे में सेन्टर टेबुल रखी हुई है। टेवुल के इधर-उधर दो. तीन कुसियां रखी हुई हैं । सेन्टर टेवुल पर अखवार रखा प्रतीत होता है । बायीं ओर टेबुल-कार्नर पर एक टेबुल-फेन चल रहा है। एक कुर्सी की पीठ का सहारा लिए क्लान्त मुद्रा में अमित दिखलाई पड़ रहा है। उसके सिर पर पट्टी बंधी हुई है तथा उस पर रक्त का एक धब्बा दृष्टिगोचर हो रहा है । अमित के हाथ में अखबार है जिसे वह उड़ती नजर से पढ़ रहा प्रतीत होता है। कुछ क्षण पश्चात ही एक ट्रे में चाय लिए हुए सविता प्रवेश करती है और चाय की टू को सेन्टर टेबुल पर रखकर अमित के समीप ही एक अन्य कुर्सी पर बैठ जाती है। वह अमित के हाथ से बड़ी आहिस्ता से अखबार लेकर एक ओर रख देती है। सविता : ( चाय का प्याला अमित को देती हुई ) लो अमित। पहले यह चाय । पीलो। {सविता के हाय से अमित चाय का प्याला ले लेता है और कुछ क्षण सविता के मुंह को निनिमेष दृष्टि से देखता रहता है । तदनन्तर---] अमित: (थके स्वर में) सविता, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। मैं जानता था, यह सब होगा । रिन्तु इतना जल्दी यह सब हो जायगा, ऐसो आशा नही सविता: जानते थे फिर भी। एक और अभिमन्यु/७९
अमित :
टेलीफोन पर एक अज्ञात व्यक्ति ने धमकी दी थी, लेकिन तब उस आदमी
को मैंने परवाह नही की। परवाह करने से होता भी क्या?
सविता:
पुलिस में रिपोर्ट कर देते, सेफ्टी की दृष्टि से ही।
अमित:
की तो थी, किन्तु जब रक्षक ही भक्षक बन जाय ! पुलिम पहुंची तब
तक 'जनत्रान्ति' का दफ्तर आग की लपटो में स्वाहा हो चुका था। मुझ पर
जालिमों ने कातिलाना हमला किया, किन्तु यह तो जीवन शेष था, नहीं तो?
[सविता की आंखें नम हो जाती हैं किन्तु अपनी साड़ी के आंचन से
तुरन्त पोछ लेती है।
सविता:
(प्लेट में रखी स्लाइस देती हुई ) लो, अब इमे खालो। छोड़ो उस
बात को।
अमित .
( आह भर कर ) वह सब कुछ तो अब छूट ही चुका है मविता, किन्तु
स्वतन्त्र भारत में प्रेस को स्वतन्त्रता का इस सीमा तक हनन । (आवेश में
आकर) वे मेरे इस शरीर को खत्म कर सकते है सविता किन्तु मेरी आत्मा
की आवाज को नहीं। वै सत्य का गला घोट देना चाहते है, किन्तु सत्य कभी
नही मरता । वे लाख सिर पटक लें सविता किन्तु अन्याय, उत्पीड़न, शोषण
एवं भ्रष्टाचार के विरद्ध मेरी लडाई अन्त तक चलती रहेगी।
सविता :
लेकिन कभी-कभी सोचती हूँ अमित कि"(कहती-कहतो इक जाती है।)
अमित :
कि?
सविता:
हम एक ऐसी अन्धी सुरग मे धकेल दिये गये हैं, जहां से निकलने का
कोई रास्ता दृष्टिगोचर नही होगा।
एक और अभिमन्यु/८०
अमित: तुम्हारा कथन ठीक है, किन्तु अन्धकार और प्रकाश की लड़ाई तो युग- युग से चलती आयी है। सविता: और युग-युग तक चलती रहेगी । पर अन्तत: जीत प्रकाश की ही होगी। अमित : तमसो मा ज्योतिर्गमय'-अन्धकार से प्रकाश की ओर अभियान, यही तो भारतीय संस्कृति की उद्दात्त उद्घोषणा है । (कुछ रुककर) मेरे अन्तर्मन मे प्रकाश की एक नयी किरण ने जन्म लिया है सविता । [सविता अमित को इस नयी उल्लसित मुद्रा को बड़े ध्यान से देखती हुई चुप रहती है । मैं सोचता हू सविता कि जब तक अज्ञान रूपी अन्धकार को ज्ञान के भालोक से नष्ट नहीं किया जायगा तब तक ? सविता : तब तक? अमित : तब तक यह देश कभी प्रगति नहीं कर सकता। आज हमारे देश की बहुत बड़ी जनसंख्या निरक्षर एवं अशिक्षित है। आम जन-समाज अज्ञान के गहन अन्धकार में विमूढ़, आत्म-सन्तोषजनित आलस्य मे डूबा हुआ तथा अन्याय, शोषण और उत्पीड़न के प्रति उदासीन है । अन्धविश्वासों की श्रृंखला मे जकड़ी कर्म-चेतना से शून्य इस भाग्यवादी जनता को जब तक व्यापक लोक-शिक्षा के द्वारा जागृत नहीं किया जायेगा, तब तक अपने प्रति हो रहे अन्याय का प्रतिकार करने की क्षमता वह नहीं जुटा पायेगी। अपनी मूढता एवं अज्ञान के कारण वह शोपण-तन्य को स्वयं ही शिकार बनती रहेगी। सविता: तुम्हारा यह कहना तो ठीक है किन्तु उपाय ? एक और अभिमन्यु/१ अमित मैंने निश्चय किया है सविता कि प्रौढ़-शिक्षा का कार्य प्रारम्भ कर मैं लोगों को माक्षर बनाने के साथ-माय लोक-शिक्षण द्वारा उनमे नयी चेतना जागृत करूंगा तथा आज के दिग्भ्रान्त युवा-आकोश को सही दिशा देकर प्रतिगामी एवं प्रतिक्रियावादी शक्तियो से निरन्तर संघर्ष जारी रखंगा। अपने तथाकथित अभिजात-वर्गीय समाज से उपेक्षित उस आदीवासी बस्ती में जाकर आज ही से प्रौढ-शिक्षा का कार्य प्रारम्भ करने जा रहा हूं। सविता: तुम्हारा निश्चय तो नि.सन्देह पवित्र है अमित, किन्तु तुम पहले पूर्ण स्वस्थ हो लो। अभी तुम बहुत कमजोर हो। घाव भी पूरे ठीक नहीं हुए है । यह काम तो जिन्दगी भर का है। अमित : अब तो मैं ठीक हो चला हू सविता, फिर मैं अपनी अन्तरात्मा की पुपार पर जब कोई नया काम हाथ में लेता हूँ तो मुन्न में एक नई ताजगी, एक नई शक्नि उत्पन्न होती है तथा नया उल्लाम मिलता है। सविता: इस दिशा में मैंने भी कुछ मोचा है, अमित । (अमित सथिता के मुख को रेखाओं को पढ़ता हुआ-सा चुप रहता है) में बच्चों को पढ़ाने या कार्य प्रारम्भ करूंगी तथा पददलित और पिछड़ी जाति की महिलाओं में लोक शिक्षण के द्वारा जागति उत्पन्न करूंगी। मैं मोचनी अमित कि यच्चे यदि देश के भविष्य की युनियाद हैं तो नारी उमाओ मास्ति। সির : मेरिन तुम तो ममाज-गल्याण विभाग में मचिंग पर रही हो। उसका का होगा? गविता: मेने उग रिंग में मुगा होने में लिए ागपत्र दे दिया है। पोर भिमन्यु/८२ अमित : लेकिन इससे पूर्व तो इस सम्बन्ध मे तुमने कुछ बताया नहीं । सविता: सोच तो बहुत दिनों से रही थी, किन्तु कुछ निश्चित नहीं कर पा रही थी। वैसे भी हमारी डायरेक्टर पिस मालती का व्यवहार मेरे प्रति बहुत कटुतापूर्ण हो चला था। तुम्हे लेकर किसी न किसी बहाने, वह प्राय. नित्य ही मुझे अपमानित करने लगी थी । अमित: मुझे लेकर तुम्हे ? सविता : वह सेठ धर्मदास को प्रसन्न करना चाहती थी, इसलिए नित्य मुझसे आग्रह करती थी कि तुम्हे समझाकर मै सही रास्ते पर लाऊं और तुम उन लोगो के विरुद्ध 'जन-कान्ति' में कुछ भी प्रकाशित नही करो। फिर वहाँ का वातावरण भी बहुत दूषित हो चला था । ऐसे वातावरण मे मेरा तो दम ही घुट जाता। अमित: बर! दूषित वातावरण से मुक्ति की सांस लेकर यह तो तुमने अच्छा किया सविता, लेकिन एक दूसरा पक्ष भी है जो उपेक्षणीय नहीं है। सविता: मैं समझ रही हूँ अमित कि तुम क्या कहना चाह रहे हो। मैने उस पक्ष पर भी विचार किया है। अपनी आजीविका का एक सम्मानपूर्ण साधन भी मैने सोच लिया है। अमित: (कुतूहल और उतावलेपन की मुद्रा मे) वह क्या? सविता: हम एक क्राफ्ट-सेन्टर शुरू करेंगे यानी कि उद्योग-कला-केन्द्र का संचालन करेंगे । इससे समाज मे आज की पूंजीवादी व्यवस्था पर आधारित परोपजीवी मनोवृत्ति के स्थान पर श्रमनिष्ठा में विश्वास रखने की मनोवृत्ति को बल एक और अभिमन्यु/३ मिलगा । म्वावलम्बी समाज-रचना की दिशा में हमारा यह एक छोटा-सा प्रयोग भी .! अमित : (उल्लसित होकर) तुम्हारा यह प्रयोग नि गन्देह आज के शिक्षित बेरोज- गारी को एक नयी दिशा देगा। उनमें आत्मविश्वास जागृत करेगा। (माव- विझल होकर) ओह ! सविता, तभी तो नारी को मृजन-शक्ति की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। तुमने अपनी विलक्षण मूझ-बूझ से मेरे मन के बोझ को दूर कर दिया। सविता [अमित से अपनी प्रशंसा सुनकर सलग्न भाय से संकुचित होकर] किन्तु अमित में तो तुम्हारी अनुगामिनी हूँ। तुम्हारे पद-चिह्नो पर चलने वाती। तुम्हारे से ही प्रेरणा प्राप्त कर".."। अमित . नही सविता ! ऐसा न कहीं। हम एक ही पथ पर चलने वाले मह्यात्री हैं । आशा-निराशा की घडियो में एक दूसरे को मम्हाल कर जीवन की इस तीर्थयात्रा पर निरन्तर चलते रहना ही हमारी नियति है । [वीणा का प्रवेश । वह अपराध-भावना से शिक्षक कर खड़ी रह जाती है। अमित : [घोणा को देखकर आश्चर्य-मिश्रित उल्लास के साय] अरी वीणा तुम ! कब आई ? वीणा [विचलित होकर भर्राये स्वर में] मुझे माफ कर दो भैया ! मैने बहुत गलती की। [मुबफ-सुबक कर रो पड़ती है।] अमित: (वीणा की पीठ पर स्नेह से हाय फेरता हुआ) अब भूल जाओ उस बात को । ममझ लो कि वह एक दुःस्वप्न था। एक और अभिमन्यु/८४ सविताः अमित ठीक कहता है वीणा । अतीत की उम कटु स्मृति में अपने को यों घायत करना"""। मैंने कितना भमझाया है तुम्हें ! वीणा : (बिलखती हुई) पर मुझे क्या पता था कि वह इस प्रकार धोखा देगा। सविता: (अमित से) इसको तो अन्त तक यही विश्वास रहा अमित कि मनीष अमेरिका से वापस आकर""और मह वापस लौट तो आया, किन्तु यह विश्वास नहीं था कि वह अमेरिकन पत्नी लेकर लौटेगा। अमित । (उद्विग्न होकर आवेश से) मैं उस मनीप के बच्चे को पहले से ही जानता था कि यह एक अव्वल दर्जे का ? पर मुझे क्या पता था । खैर, अब इस टॉपिक को यही छोडी। (घीणा से स्नेहपूर्वक) हां वीणा! बस तुम यही समझ लो कि तुमने एक बुरा स्वप्न देखा था। समझी न । जब कोई भूल करके अपनी गलती सुधार ले तो वह भूला नहीं कहाता है बीणा: (चिह्नल होकर भर्राये स्वर में) भैया [वीणा पुनः सुबक पड़ती है और अपना मुंह अमित के कन्धे से दिपा लेती है। अमित वीणा की पीठ पर स्नेहातिरेफ से हाथ फेरता रहता है और उसकी आँखों से आंसू चू पड़ते हैं। मंच तिमिरान्छा- दित हो जाता है। [मंच पर पुनः प्रकाश होता है। एक दीवार पर भगवान बुद्ध का कलेण्डर टंगा हुआ है। सफेद खादी का पाजामा-कुर्ता पहने व आँखों पर ऐनक लगाये अमित पढ़ाने को मुद्रा में खड़ा है । उसके हाथ में पोइन्टर है। अमित पांइन्टर मेज पर रख देता है तथा रजिस्टर खोलकर प्रोद-शिक्षा केन्द्र के छात्रों के नाम बोलने लगता है।] - एक और अभिमन्यु/८५ अमित : हनुमान बब्श, हमीद, रामदीन, रहमान, कर्तारसिंह, डेविड, भोला । (अदृश्य प्रौढ़ छात्रों को सम्बोधित करके) मब आ गये न! (नेपथ्य में फुसफुसाहट व मन्द कोलाहल) तो अब सुनिए। मैं आपको अपने देश व समाज की कुछ ऐसी बातें बताऊँगा, जिनको जानना हम सब के लिए जरूरी है ।१५ अगस्त, १९४७ को हमारा देश स्वतन्त्र हुआ था, किन्तु स्वतन्त्रता का पूरा लाभ हम नही उठा पाये । माप जानते है इसका कारण क्या है ? तो सुनिए इमका मूल कारण यह है कि बीना आर्थिक व सामाजिक स्वतन्त्रता प्राप्त किये राजनीतिक स्वतन्त्रता अधूरी रहती है । सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से हम अब भी बहुत पिछडे हुए हैं। सब भारतीय समाज जाति, भाषा, प्रान्त एवं धर्मगत भेदभाव से बेटा हुआ है। साम्प्रदायिकता का जहर हमारे जीवन को विषाक्त बनाता है, लेकिन हमे मोचना चाहिए कि हिन्दू, मुस्लिम, सिक्स, ईसाई, अलग-अलग धर्म के होकर भी वतन के चमन मे खिले हुए अलग-अलग रगो के खुशबूदार फूल है जो इमको शोभा बढाते है । (नेपम्य में कुछ मन्द- मन्द कोलाहल । अमित अदृश्य श्रोताओं की ओर उन्मुख होकर एकाभिनय की मुद्रा में) अच्छा तो आज यही तक । कल इसी समय फिर मिलेंगे। [नेपथ्य में पुनः बातचीत की ध्वनि और कक्षा छूटने जैसा कोलाहल । अमित का प्रस्थान । [कुछ क्षण पश्चात सविता का प्रवेश । सविता के हाय में दो एक पुस्तकें हैं जिन्हें यह मेज पर रख देती है । तदनन्तर महिला-मण्डस में एकत्रित अदृश्य नारी-समूह के समक्ष खड़ी हो उन्हें उद्बोधन देने की मुद्रा में खड़ी प्रतीत हो रही है।] सविता: (अदृश्य नारी-समूह को ओर उन्मुख होकर) माताओ और बहिनों । मैं आज आपके समक्ष समाज और देश की प्रगति और ममृद्धि में महिलाओ 'योगदान' विषय पर चर्चा करूंगी । बहिनों ! जिस-जिम देश का नारी-समाज प्रबुद्ध और जागरूक होता है, वह देश और समाज भी उन्नत और समृद्ध होता एक और अभिमन्यु/८६ है। लेकिन जिस देश की नारियाँ अज्ञान और अन्ध-विश्वामो के अन्धकार में भटकती है, वह देश और समाज कभी उन्नति नही कर सकता। [सविता बोलती-बोलती एक जाती है और एक अदृश्य महिला के प्रश्न का उत्तर देने का एकाभिनय करती है) नही धापू बाई, तुम्हारा यह मोचना ठीक नहीं है । पुरुष और स्त्री को समान अधिकार है । वह पुरुप की दासी नहीं, वरन् महचरी है साथ-साथ चलने वाली सहयात्री है। हमारे ममाज में प्रचलित सामाजिक बुराइयों को दूर करना तथा भगवती दुर्गा बनकर अन्याय का प्रतिकार करना नारी जाति का पावन कर्तव्य है। यदि नारी अपनी अन्तनिहित शक्ति को पहवान ले तो समाज मे एक क्रान्तिकारी मोड ला सकती है। (नेपथ्य में नारी कण्ठ मे निमृत, अस्फुट ध्वनि, मन्द-मन्द कोला- हल । तदनन्तर एक नारासविता दीदी की जय ! नारी-जागृति आन्दोलन जिन्दावाद ! धीरे-धीरे कोलाहल मन्द होकर शान्त हो जाता है। सविता अदृश्य महिला कार्यकर्ताओं से बातचीत की मुद्रा में। सविता: हां, रमा । हाँ सरस्वती । अच्छा सुनीता तुम भी, अच्छा-अच्छा भगवती भी। आप सब मिलकर महिलाओ में काम करने के लिए अपना-अपना कार्य- क्षेत्र बाँट लें । याद रखिए-(कहती-कहती रुक जाती हैं। वोणा का प्रवेश । सविता वीणा को ओर देखकर अदृश्य महिला कार्यकर्ताओं से) लो, अब यह वीणा दीदी भी आ गई। आप इनको गाइडेंस लेकर अपना-अपना कार्यक्रम बना लें। हो, इस बात को सदैव स्मरण रखिए की हम आदिवासी, पददलित तथा पीडित वर्ग की महिलाओं को सुशिक्षित बनाकर, और उनमें जागति लाकर इस ममाज में एक क्रान्तिकारी मोड़ ला सकते है । अच्छा, अब आप जा सकती है । नमस्ते नमस्ने । [नेपथ्य में महिलाओं का मन्द स्वर, फिर शान्ति ।] सविता: (यीणा से) अरी वीणा । तुम यहाँ कसे ? - एक और अभिमन्यु/१७
वीणा:
(मुस्कराकर) क्यों मविता दीदी, तुम्हारे इस महिला-जागृति कार्यक्रम में
क्या मैं अपना योगदान नहीं दे सकती?
सविता:
वाह ! यह कसी बात कही तुमने । अरे ! इस कार्यक्रम का अब तुम्हे ही
तो संचालन करना है। तभी मैंने तुम्हारे आते ही तुम्हे महिला कार्यकर्ताओ
को गाइड करने का महत्वपूर्ण काम दिया है ।
वीणा:
बस मविता दीदी ! तुम्हारी यही बात तो मुझे अच्छी नहीं लगती । यह
गाइडेंस का काम तो तुम्ही कर सकती हो। हाँ, मैं उनके साथ-साथ महिला
कार्यक्रम मे काम करने के लिए अवश्य तत्पर हूँ।
सविता :
(मुस्कराकर) चलो, यही मही । बात एक ही है । अच्छा, यह तो बताओ,
अभी
तुम कहाँ से आ रही हो ?
वीणा:
अभी तो मविता दीदी, मैं उद्योग-कला-केन्द्र से आ रही हूँ । अम्मा भी
वही है।
सविता.
अच्छा अम्मा जी वही है । उनको कैसा लगा हमारा उद्योग-केन्द्र ?
वीणा:
अम्मा बड़ी प्रसन्न हो रही थी 1 कह रही थी कि मिलाई-कढाई के कार्य
को देख-रेख का कार्य तो मेरे जुम्मे छोड़ दो।
सविता:
(प्रसन्नता से) अच्छा ! बहुत अच्छी बात है।
वीणा:
लेकिन सविता दीदी, अब हमे उद्योग-कला-केन्द्र को एक बड़ा रूप देना
पड़ेगा । अनेक युवक-युवतियो इम केन्द्र में दिलचस्पी लेने लगे हैं । कार्य बहुत
एक और अभिमन्यु/८८
. बढता जा रहा है। विक्री के समुचित प्रबन्ध के लिए सेल्स मैनेजर, अमि- स्टेंट्स आदि की व्यवस्था करना भी बहुत जरूरी हो गया है । सविता: हाँ, मैं भी चाहती हूँ कि इसका प्रॉडक्शन विभाग हो। सेल्स विभाग अलग हो, क्राफ्टमैन एवं अन्य, सिलाई-कढाई, आर्ट स एण्ड पेटिंगज, गृह- साज-सज्जा की वस्तुओं वगैरह-वगैरह के अलग-अलग उत्पादन केन्द्री की व्यवस्था की जाय । वीणा: चलो सविता दीदी! हम उधर चले। अमित भैया से भी इस सम्बन्ध बात कर लें ।' [दोनों का प्रस्थान । कुछ क्षण बाद अमित का प्रवेश। अमित मंच के ठीक बीच में आकर प्रेक्षकों की ओर मुंह करके खड़ा हो जाता है । तदनन्तर प्रेक्षकों को युवा मंच का सदस्य मानकर उद्बोधन फी मुद्रा में दिखलायी पड़ता है। नेपथ्य में जन-रव उभरता है किन्तु अमित का बोलना प्रारम्म होते ही जन-रय बन्द हो जाता है। अमित: मित्रो ! अपनी बात कहने से पूर्व में सर्वप्रथम इस देश की समस्त युवा- शक्ति को नमन करता हूँ। क्योकि किमी भी देश और समाज में जब-जब भी इन्कलाब आया है. कान्ति हुई है, वह युवक और युवतियों के द्वारा हुई है। हमारे देश में ही लो। देश को आजादी दिलवाने के लिए कितने युवका- युवतियों ने, किशोर-किशोरियों ने आजादी की मशाल लेकर हमले-हंसते अपने प्राणोत्सर्ग पर दिए । चन्द्रशेखर आजाद, भगतसिंह आदि इसी युवा- शाक्ति के प्रज्ज्वलित अग्निपिण्ड थे। विन्तु हमारे देश की दुर्दशा देखिए । था इसीलिए हमारे देश-मक्तवीरो ने आत्म-बलिदान किया था। (नेपथ्य में कोसाहत की ध्वनि होती है।) आज को युवा शक्ति के समक्ष दूसरे प्रार को चुनौतियां हैं। ये हैं-आम जनता को शोषण, उत्तौड़न, भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलवाना तथा अन्याय का मुखता से प्रतिकार करके शोषण-मुक्त नवीन समाज की रचना करना। इसके लिए हमें लोक-शक्ति को संगठित कर एक और अभिमन्यु/८९ वर्तमान प्रष्ट व्यवस्था को बदलना होगा तथा प्रतिक्रियावादी शक्तियों से लोहा लेकर एवं देश की युवा-शक्ति को रचनात्मक प्रवृत्तियों में लगाकर देश एक नवीन क्रान्ति लानी होगी। इसके लिए चाहे हमें कितना ही मूल्य चुकाना पड़े, आत्म-बलिदान करना पडे......। [नेपथ्य में "अमित भया अमर रहे", "पुया-शक्ति जिन्दाबाद के नारे" सुनाई पड़ते हैं । और दोस्तों। जब-जब अन्याय का प्रतिकार करने की आवश्यकता पड़ी है, हमारी युवा-शक्ति ही आगे आई है। हमारे पुराण और इतिहास इसके साक्षी हैं । महाभारत काल में वीर अभिमन्यु ने भी असत्य और अन्याय के पक्षघरो का चक्रव्यूह तोड़कर तथा आत्म-बलिदान करके सत्य और न्याय का पथ प्रशस्त किया था। आज देश के कोटि-कोटि अभिमन्युओं को देश मे व्याप्त भ्रष्टाचार, शोषण, उत्पीडन एवं सामाजिक अन्ध-विश्वामो के चक्रव्यूह को बड़ी वीरतापूर्वक, कम-शक्ति से तोडना है। युवा-शक्ति जिन्दाबाद ! जयहिन्द ! [नेपथ्य में अमित भया को जय, युवा शक्ति जिन्दाबाद के नारों की तुमुल ध्वनि सुनाई पड़ती है। मंच गहन अन्धकार में विलीन हो जाता है। [मंच पर पुन: प्रकाश होने पर अमित, सविता और वीणा परस्पर विचार-विनिमय मे तल्लीन दिखलाई पड़ते हैं। वीणा के हाथ में दैनिक समाचार-पत्र है जिस पर वह कभी-कभी अपनी दृष्टि डाल लेती है। अमित : (सविता से) उद्योग-कला-केन्द्र को विस्तृत रूप देने की योजना से मैं पूर्णतः सहमत हूँ, सविता ! वस्तुत, हमारा यह प्रयोग बड़ा मफल रहा है । सविता: बेरोजगारी की समस्या को हल करने में इस योजना से कुछ तो मदद मिलेगी ही अमित ! साय हो युवा वर्ग में श्रम के प्रति निप्टा भी जागृत होगी। एव और अभिमन्यु/९० वीणा: उनमें स्वावलम्बन की भावना जागृत होने के साथ-साथ आत्म-विश्वास भी उत्पन्न होगा। अमित: आज हमारे समाज की सबसे बड़ी दुर्बलता यह है वीणा कि उसमे श्रम के प्रति सम्मान को भावना बिल्कुल नहीं है। एक किसान का पुत्र कृषि में स्नातक होने के बाद भी अपने तकनीकी ज्ञान का उपयोग कृषि की उन्नति के लिए न कर केवल क्लर्क बनने के लिए भटकता फिरता है। भला, ऐमी स्थिति में यह समाज कैसे उन्नति कर सकता है ? वीणा: किन्तु, हमारे समाज में असन्तुलन भी तो बहुत है भैया। समाज मा एक वर्ग तो ऐसा है जो कमर तोड़कर मेहनत करने के लिए अभिशप्त है और दूसरा वर्ग ऐसा है जो श्रम से जी चुराकर केवल दूसरो के श्रम का उपभोग कर ऐय्याशी करता है। अमित : ऐसे परोपजीवी शोषक वर्ग, के शोषण से मुक्त होने के लिए श्रमिक वर्ग को श्रमिक-संधो की स्थापना कर संगठित होना अति आवश्यक है। मेरे मस्तिष्क में एक योजना यह भी है कि ऐसे श्रमिक-संघों की स्थापना की जाय। उनके सदस्यों को नवीन तकनीकी ज्ञान की शिक्षा देने के लिए एवं श्रम के प्रति निष्ठा जाग्रत करने के लिए श्रम-शिविर संचालित किये जायें। वीणा: न हाँ भया ! तुम्हारी यह योजना तो बहुत अच्छी है। शोषण से मुक्त होने की दिशा मे,यह एक नया अभियान होगा । सविता: लेकिन इस प्वाइंट पर मैं एक और दृष्टि से भी सोच रही हूँ। [अमित और योणा सविता को जिज्ञासा से देखते हैं। एक और अभिमन्यु/९१ मेरा विचार है कि इस समस्या का मूल कारण हमारे व्यक्तित्व का विखण्डित होना है। एक संतुलित व्यक्तित्व निर्माण के लिए ज्ञान, कर्म और भावना का समन्वय होना अति आवश्यक है, किन्तु आज कर्म ज्ञान से अलग जा पड़ा है और भावना निष्क्रिय हो गई है। वीणा: तुम्हारा आशय क्या है सविता दीदी ! सविता: मेरा माशय यह है वीणा कि सन्तुलित व्यक्तित्व के इम विघटन से एक वर्ग तो ऐसा बन गया जो केवल ज्ञान देने का ठेकेदार है, किन्तु कर्म के अभाव मे बिना हाथ-पैर का होकर पंगु हो गया है और दूसरा वर्ग ऐमा है जो ज्ञान के चक्षुओं के अभाव में अन्धा है। अब तुम्ही बताओ वीणा कि लूले अन्धे अश्वों की यह जोड़ी समाज के रथ को कैसे खीच सकती है। बिना कर्म के ज्ञान पंगु होता है और बिना ज्ञान के कर्म अंधा। व्यक्ति की भावना कमं को कमनीय और ज्ञान को रमणीय बनाती है। शान-गगा में जब कर्म की कालिंदी मिलती है, तभी जीवन-सरिता में सफलता के सुमन खिलते है । वीणा: (चहककर) वाह भाभी, तुम्हारा भी कोई जवाब नहीं। अमित: (चुटकी लेकर) अरे ! यह क्या बोल रही हो तुम? बिना विवाह के ही भाभी? सविता: (पकर) वडी नटखट हो यीणा तुम ? अभी तुम्हारा बचपन नहीं गया। . वीणा: लिया जाय, (इठलाकर) तो क्या हुआ? एक दिन ऐमा भी तो आयेगा, तुम मेरी भाभी बनोगी, तब तुम्हें भाभी रहने का पहले मे ही रिहर्सल क्यों न कर मविता दीदी? [घोणा को इस बात पर तीनों का यहहाप्त । मुमत्रा का प्रवेश । एप और अभिमन्यु/९२
सुभद्रा :
“अरे तुम यो वैठे-बैठे गप्पे ही लड़ाते रहोगे या खाना-वाना भी खाओगे।
अमित:
अरी माँ! खाने की बड़ी चिन्ता की। वह कहाँ भागा जा रहा है ?
सुभद्रा :
तू तो हमेशा ऐसे ही कहता रहता है ।
अमित :
(मुस्कराफर) तुम भी तो मां हमेशा खाने की ही बात करती हो।
सिंहसा पुलिस इन्सपेक्टर का प्रवेश । पुलिस इन्सपेक्टर को देखकर
सब अवाक् खड़े रह जाते हैं ।]
अमित:
(पुलिस इन्सपेक्टर से) कहिए, किसे तलाश रहे है आप ?
पुलिस इन्सपैक्टर :
क्या अमित आपका ही नाम है ?
अमित :
जी हाँ, कहिए।
पुलिस इन्सपैक्टर :
आपकी गिरफ्तारी का वारन्ट है।
अमितः
(हैरत में पड़कर) क्यो? क्या किया है मैंने
सुभद्रा :
(धीरज खोकर) क्या किसी पर डाका डाला है या चोरी की है मेरै
अमित ने?
अमित :
(सुभद्रा से) तुम बीच में मत वोलो मो! ( पुलिस इन्सपेक्टर से ) हाँ,
कहिए, किम जुर्म में गिरफ्तार कर रहे है मुझे।
पुलिस इन्सपेक्टर :
आप पर नगर की शान्ति भंग करने का आरोप है।
.
एक और अभिमन्यु/९३
अमित :
(आश्चर्य से) मुझ पर शान्ति भंग करने का मारोप ! यह झूठा आरोप
किसने लगाया है मुझ पर ?
पुलिस इन्सपैक्टर :
इस सब का तो आपको पुलिस स्टेशन पर चलने से ही पता चलेगा।
अमित :
(अधीर होकर) तब फिर चलिए ।
[अमित पुलिस इन्सपेक्टर के साथ जाने को प्रस्तुत होता है, सुभद्रा
सन्न रह जाती है। वीणा भी हतप्रभ । सविता कुछ सोच में एव
जाती है।]
अमित:
(पुलिस इन्सपंपटर के साप जाते-जाते ) सविता। तुम मां को समझाना
कोई चिन्ता न करे । मैं वापस आ ही रहा हूँ।
[पुलिस इन्सपेक्टर के साथ अमित का प्रस्थान : मंच पर अंधेरा हो
जाता है।
[मंच पर पुनः प्रफाश होने पर न्यायालय का दृश्य । एक व्यक्ति
जज की मुद्रा में न्यायाधीश की कुर्सी पर रोव से बैठा हुआ है।
मेज पर एक लकड़ी का हथौड़ा व कुछ मोटो-मोटो पुस्तके और
फाइलें रखी हैं। बायों और एक कटघरा है। जज के सामने
सरकारी वकील खड़ा है और दरवाजे पर चपरासी खड़ा प्रतीत
होता है। दर्शकों को गैलरी में सुभद्रा, सविता, योगा बंठी
दिखलाई पड़ती है।
अभियुक्त को पेश पिया जाय ।
[पुलिस इन्सपेक्टर के साप अमित का प्रवेश ! उसे कटघरे में सहा
किया जाता है।
(सरकारी वकील से) अभियोग बयान दिया जाय।
एम और अभिमाग/९४
. सरकारी वकील : मो लॉर्ड ! अभियुक्त अमित उर्फ अभिमन्यु पर बड़े गम्भीर आरोप हैं । अभियुक्त हमारे देश के युवा वर्ग को करप्ट कर रहा है। उन्हें गुमराह करके तोड-फोड तथा आगजनी कराने का आरोप इस पर जिला मजिस्ट्रेट की अदालत मे माबित हो चुका है। मी लार्ड ! अभियुक्त बडा खतरनाक है । इसने मोदी फैक्टरी के मजदूरों को भड़काकर फैक्टरी मे आग लगाने की कोशिश की है । उनसे हडताले कराई है । मी लार्ड | पुराना रिकार्ड भी इस बान का मबूत है कि [जज को कुछ नोट करते देखकर रुक जाता है। जज गो आंन! सरकारी वकील : मी लार्ड ! पुलिस के रेकॉर्ड म से पता चलता है कि अभियुक्त ने जब वह कॉलेज में स्टूडेण्ट यूनियन का प्रेसीडेण्ट था, तब भी छात्रो को भड़का कर हडताल व तोड़-फोड़ करवायी थी तथा साम्प्रदायिक दंगो मे भी इसका हाथ था। मी लार्ड ! इसके बाद अभियुक्त ने 'जन-कान्ति' अखबार निकालकर नगर के संभ्रान्त लोगों के मुतल्लिक झूठी खबरें छाप कर उनके चरित्र-हनन की कोशिश की, उनकी प्रतिष्ठा को हानि पहुँचाई । अव अभियुक्त पर युवको, छात्रो, मजदूरों और किसानों को भड़काकर आगजनी, लूटमार कराने तथा हिंसा भड़काने के गम्भीर आरोप है। (जज कुछ नोट करता है। फिर सर- फारी वकील से) जज कुछ और कहना है ? सरंकारी वकील : मी लॉई ! अभियुक्त पर इन आरोपो के अलावा एक और भी गम्भीर आरोप है। वह यह कि अभियुक्त समाज के प्रचलित नियमो की अवहेलना करके बिना ब्याह किये एक युवती के साथ रह रहा है। अभियुक्त का उस युवति के साथ अनैतिक .....। . एक और अभिमन्यु/९५ [सरकारी वकील के उक्त वाक्य को सुनकर अमित अधीर हो उठता है और तिलमिलाकर बोल पड़ता है।] अमित: न्यायमूर्ति ! यह सब बकवास है । एकदम झूठ है। (हयोड़े को मेज पर मारकर ) ऑर्डर ! ऑर्डर मिस्टर अमित इस तरह बीच में मत बोलिए। सरकारी वकील: मी लॉर्ड ! इन गम्भीर आरोपों को मद्दे नजर रखते हुए मेरी कोर्ट से गुजारिश है कि अभियुक्त को कठोर से कठोर मजा दे। बस, मी लॉर्ड ! सरकारी पक्ष की ओर से मुझे इतना ही कहना है । जज : (अमित से) नाऊ अभियुक्त अमित उर्फ अभिमन्यु ! तुम्हे इन आरोपो के विरुद्ध कुछ सफाई देनी है ? अमित : न्यायमूर्ति बस मेरा यही निवेदन है कि ये सव आरोप मिय्या और मन- गढन्त हैं । इन तथाकथित समाज के ठेकेदारों, काला-बाजारियों और भ्रष्टा- चारियों ने पुलिस से मिलकर मेरे विरुद्ध साजिश की है। अपने काले कार- नामो पर से पर्दा उठा जानकर, गरीबो के शोषक और उत्पीड़क इन लोगो ने बौखला कर मेरे विरुद्ध यह षड्यन्त्र रचा है ताकि मेरे विरुद्ध चक्रव्यूह रच कर बिना अवरोध के वे गरीब जनता का शोपण जारी रखे रहे । न्यायमूर्ति ! यदि इसे अपराध माना जाय तो मेरा अपराध इतना ही है कि समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, शोपण और उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए मैंने लोक-शक्ति को जाग्रत करने का कार्य क्यिा, अन्याय और असत्य का प्रति पर करने के लिए युवा वर्ग को संगठित किया और उन्हें देश की रचनात्मक प्रवृत्तियों की ओर प्रवृत्त किया। एक दूसरा आरोप समाज में अनैतिकता फैलाने का लगाया गया है, उस पर मुझे बड़ा दुःख होता है। न्यायमूर्ति ! समाज की प्रगतिशीलता का इतना दम भरने पर भी नारी जाति के प्रति जो 1 एक और अभिमन्यु/९६ अब तक हम क्षुद्र विचार रखते आये है, उनमें तनिक भी परिवर्तन नही आया है। पुरुष और नारी का रिश्ता माँ, बहिन, पत्नी या रखैल तक ही सीमित नहीं है, मी लॉडें ! समान विचार और उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह महयात्री भी हो सकते है। उनमें पवित्र मंत्री का रिश्ता भी हो सकता है । सविता के साथ मेरा ऐसा ही पवित्र सम्बन्ध है । 1- -IT " (अधीर होकर) मि. अमित ! भाषण मत दीजिए, अपनी सफाई में कुछ कहना हो तो कहिए। अमित: (जन को पूर्वाग्रह से. पूर्ण दृष्टि को भांपकर) बस जज साहब ! मुझे अपनी सफाई में जो कहना है, बस इतना ही है । [कोर्ट में चुप्पी छा जाती है। अमित अभियुक्त के कटघरे में चुप खड़ा रहता है। सुभद्रा, सविता एवं योणा एक दूसरे को बड़ी आतुर दृष्टि से देखती हुई प्रतीत होती हैं।] जज (फोर्ट को चुप्पी को भंग करते हुए, गम्भीर मुद्रा में) अभियुक्त अमित उर्फ अभिमन्यु, तुम्हारे बयानो से यह माबित नहीं होता कि तुम पर जी आरोप लगाये गये हैं, वे गलत हैं । [कोर्ट में बैठी सुभद्रा, सविता, वीणा जज को इस बात से चौंक पड़ती है तथा सरकारी वकील के मुख पर हल्की-सी मुस्कान खिल उठती है। जज: अतः तुम्हे ? इण्डियन पीनल कोड को दफा 144 के तहत छः महीने की सख्त सजा तया पांच सौ रुपया जुर्माना किया जाता है। [कोर्ट में स्तब्धता छा जाती है। जज के इस फैसले को सुनकर सुभद्रा संशा शून्य हो जाती है। वोणा मिलत-पिलस कर रोने लगती है। किन्तु सविता घंयंपूर्वक कटघरे में पड़े अमित के पास पहुंच । एक और अभिमन्यु/१७ - जाती है और उसे निनिमेष इस प्रकार देखती रहती है मानो आंखो ही माणों से उसे हंसते हँसते कठिनाइयों पर विजय पाने का पाठ पढ़ा रही हो। कुछ क्षण या प्रेम को पावन विहवलता से अमित , और सयिता दोनों की आंखों के कोर गोले हो जाते हैं। धीरे-धीरे मंच गहन तिमिर में डूब जाता है । नेपथ्य मे अवसावपूर्ण याद्य यन्त्र को ध्यान सुनाई पड़ने लगती है। मंच पर पुनः प्रकाश को रेखाएं शनः-शनं उभरने लगती है । नेपथ्य में कोलाहल की ध्वनि सुनाई पड़ती है । तत्पश्चात् कुछ नारे अनुगंजित होने लगते हैं- सोकनायक अमित भया जिन्दाबाद ! अन्याय और अत्याचार का नाश हो ! युवा-एकता जिन्दावाद !] फूल मालाएं पहिने अमित मंच पर प्रवेश करता है । प्रसन्न मुद्रा में सविता और वीणा तया दो युवक उसके साथ हैं। पहला युवक : (ऊँचे स्थर से नारा लगाता है) लोकनायक अमित भैया दूसरा युवक अमर रहे, अमर रहे ! सविता: नही झुकेंगे, नहीं झुकेगे ! वीणा: बाधाओ से नहीं रुकेंगे। पहला युवक : महंगाई और भ्रष्टाचार--- दूसरा युवक खत्म करो, खत्म करो। पहला युवक भारत माता की जय। दूसरा युवक: लोकनायक अमित भैया की जय ! -- एक और अभिमन्यु/९८ पहला युवक लोक-क्रान्ति जिन्दावाद ! दूसरा युवक: युवा-शक्ति जिन्दावाद ! [दोनों युवक नारे लगाते मंच से दूसरी ओर चले जाते हैं। कुछ क्षण पश्चात सुभद्रा का प्रवेश । अमित झुककर सुभद्रा के चरण स्पर्श करता है। सुभद्रा आशीर्वाद देती है। तदनन्तर सस्नेह अमित का सिर अपने वक्ष से सटाकर सिर पर हाथ फेरती है और उसको आँखों में प्रसन्नता के आंसू चू पड़ते हैं।] सुभद्राः (भाव विहवलता के साय) बेटा अमित ! बड़ा दुबला हो गया, बेटा । जालिमो ने जेल में बड़ा दुरा दिया होगा, बेटा। अमित : नही माँबस यह समझो कि समय (चुटकी बजाकर) यों ही कट गया ! वीणा: (सुभद्रा से) माँ, ज्यो ही लोगो को भैया के जेल से छूटने का पता चला, भैया के स्वागत के लिए हजारो लोगों की भीड़ एकत्रिक हो गयी। 'अमित भैया अमर रहे' के नारों से आकाश गूंज उठा। युवकों ने अमित भया को अपने कन्धों पर बैठा लिया और आनन्द से उछलने लगे। युवतियों ने उन्हे मालाओं से लाद दिया। : . सविता: हो मां ! लोगों का ऐसा उत्साह मैने कम देखा। उन्होंने अमित दादा को शोषण, अन्याय और भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष को तीव्र करने के लिए लोक-सघर्ष समिति का अध्यक्ष भी चुना है। मुभद्रा: (गद्गद् होकर) तुमने अपनी मां की कोस की लाज रख ली बेटा ! (कहती कहती रुककर कुछ याद करतो-सौ) बेटा अमित, तुम मेरे ऐसे अभिमन्यु हो जिसे समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, शोपण और अन्याय के चक्रव्यूह को तोड़ने में अवश्य सफलता मिलेगी। एक और अभिमन्यु/९९ [पहला पुवक और दूसरा युवक का मंच पर प्रवेश । दोनों सुभद्रा के घरण स्पर्श करते हैं। पहला युवक मां, तुम्हारे एक नही हम अनेक अभिमन्यु बेटे हैं । दूसरा युवक जो देश और समाज में प्रचलित सामाजिक कुरीतियों, अन्ध-विश्वामी, माम्प्रदायिकता, शोषण, भ्रष्टाचार का चक्रव्यूह तोड़ने के लिए प्राण-प्रण से कटिबद्ध हैं। पहला युवक जो रचनात्मक प्रवृत्तियों में लगकर देश का रूप संवारने के लिए द- प्रतिज्ञ है। दोनों युवक हमे आशीर्वाद दो मा! हम अपने लक्ष्य की प्राप्ति में मफलता प्राप्त करें। [सुभद्रा भाव विह्वल होकर उन दोनो के सिरों पर अपने हाय रखती हुई उन्हें आशीर्वाद देती है। नेपथ्य में छड़ी टेककर चलने को ध्वनि सुनाई पड़ती है । मंच पर पं० रामनाय का हाथ में घड़ी लिये हुए धीमी चाल से प्रवेश । लगता है उनकी आंखों को ज्योति धूमिल हो चली है। प. रामनाथ: (वृद्धावस्था-जनित शिथिल स्वर में) सुभद्रा बहू वीणा : (प्रसन्नतापूर्वक उछलकर) लो भैया, दादाजी भी आ गये। पं. रामनाथ: अरे, तुम लोग कहाँ हो ? क्या अमित जेल से छूट आया, बहू ? [अमित दादा जी के पास तीव्र गति से चलकर उनके चरण स्पर्श करता है। अमित : मैं-मैं आ गया हूँ दादाजी ! अब आपकी तबियत कमी है ? एक और अभिमन्यु/१०० पं. रामनाथ: (अमित को गले लगाकर सिर पर हाथ फेरते हुए) मुझे माफ कर दो बेटा । मुझे मालम नहीं था कि एक दिन तुम लोक-देवता बनकर हमारे कुल का नाम उजागर करोगे। अमित: (भाव-विहवल होकर) यह आप क्या कह रहे है दादाजी? यह सब आपके ही आशीर्वाद का तो फल है । पं.रामनाथ: अरे, बेटी सविता कहां है अमित ? सविता . (आगे बढ़कर पं. रामनाथ के चरण स्पर्श करती हुई) मैं सविता प्रमाण करती हू दादाजी ! (पं. रामनाय सविता को आशीर्वाद देते हैं ।) पं. रामनाथ: तुम गायत्री के समान उज्जवल और पवित्र हो बेटी ! मैंने तुम्हें समझने में बड़ी भूल की। सविता . (विव्हल होकर) ऐसा न कहे दादाजी ! मै~~मैं तो कुछ भी नहीं हूं दादाजी । मैं क्या हूँ? पं. रामनाथ: (कुछ अभिनय करता-सा) अमित, अब अपने इस बूढे दादा की एक बात तो मान ले बेटा! न जाने कब प्राण उखड जाय? अमित : (उत्सुकता और अधोरता के मिथित भाव के साय) काहिए दादाजी ! आपकी आज्ञा शिरोधार्य है। पं. रामनाथ: अब तू अपना विवाह कर ले बेटा । तेरी मां सुभद्रा को कुछ तो सहारा मिलेगा। [अमित पं. रामनाय को उसी पुरानी बात को याद कर आशंका से विचलित हो उठता है और पं. रामनाय की बात का कुछ भी उत्तर नहीं देता।]: एक और अभिमन्यु/१०१ क्यों ? चुप क्यों है बेटा ! मने तेरे लिए एक लहकी भी ढूंढ ली है । [अमित पुनः निरुत्तर (पं. रामनाय अमित के मनोभावों को समझ कुछ मुस्कराते हुए) क्यों ? तू चप क्यों है वेटा जन्म भर कुआंरा ही रहेगा ? अमित : (उद्विग्न होकर) में मै “मने अभी भी कोई निश्चय नही किया है दादा जी । इस बात के लिए आप व्यर्थ में चिन्तित न हों। प.रामनाथ: (मुस्कराकर) क्यों बेटा ? क्या तुझे सविता पसन्द नहीं है ? उसके लिए तो तू अपने दादा से भी झगड बैठा था । [पं रामनाय की बात सुन सयिता और अमित दोनों उल्लसित हो उठते हैं और कनखियों से एक दूसरे को देखकर 'मुस्करा उठते हैं। वीणा चहक कर उछल पडती है।] वीणा: (वही पुराने अल्हड़पन से) वाह दादाजी, बुढ़ापे में भी आप विल्लो-चूहे का खेल खेलते हैं। (शरारत से अमित और सविता को देखती हुई) बात किस तरह धुमाकर कही है; भैया-भाभी के तो प्राण ही मूख चले थे। [वीणा की बात सुनकर पं. रामनाय ठहाका मारकर हंस पड़ता है। सब उनकी हंसी में साय देते हैं । मंच पर अन्धकार छा जाता है। [मंच पर पुन. प्रकाश होने पर सविता और पीणा बातें करती दिखलाई पड़ती हैं। सविता को मांग सिन्दूर से भरी हुई है । मुंह पर उल्लास की रेखाएं उभरती जान पड़ती हैं। चलते-चलते सविता हल्के से कराह कर जमीन पर बैठ जाती है।] वीणा: (सविता को इस प्रकार जमीन पर मंठते देख कुछ आशंका से) क्यों क्या हुआ भाभी ? तबियत तो ठीक है न ? सविता: कुछ नहीं वीणा। यह तो कुछ यो हो। (फिर सलज्ज भाव से) इन दिनों कुछ ! (लाज के कारण कहती-कहती रुक जाती है।) एक और अभिमन्यु/१०२ वीणा: । ? • योही क्या भाभी ? कुछ बताओ भी न ! सविता: (मुस्कराती हुई) चल हट ! अव तू क्या समझेगी ? वीणा: (प्रसन्नता से उछलकर) वाह भाभी । मै क्यो नहीं समझूगो ? क्या मुझे निरी बुद्ध समझ रखा है तुमने ? सविता . तो चल बता। वीणा. (इसी तरह उल्लास भाव से) एक और अभिमन्यु का जन्म ! (सविता सलज्ज भाव से चुप रहती है) क्यों है न यही बात? [विता मुस्कराकर चुप रहती है। वीणा प्रसन्नता से चहक चहक 'एक और अभिमन्यु'--'एक और अभिमन्यु' बोलती रहती है। मंच पर अमित का प्रवेश अमित : (वीणा को इस प्रकार चहकते देखकर विस्मम मुद्रा में) अरे, आज तुझे क्या मिल गया वीणा! इस प्रकार चहक क्यो रही है ? वीणा पहले मिठाई खिलाओ। अमित: (सविता से) क्यों क्या बात है मविता ? वीणा यों चहक क्यों रही है ? (सविता सलज्ज भाव से केवल मस्करा देती है।) वीणा: अरी! भाभी क्या बतायेगी, भया? तुम पहले मिठाई तो खिलाओ अच्छा क्या खिलाओगे ? अम्मा के पास जाती हूँ यह खुशखबरी सुनाने । घोणा का प्रत्यान। मंच पर सविता और अमित रह जाते हैं । अमित: क्यों मविता ! वीणा आज इतनी प्रसन्न क्यो है ? एक और अभिमन्यु/१० .
मविता: (कुछ व्यंग भाव से) तुम तो निरे बुद, हो। इतना भी नहीं समझते ! अरे हमारे यहाँ एक और अभिमन्यु का जन्म हो रहा है। अमित : (प्रसन्नता से उछसकर) मच मविता । मविता नही तो क्या झूठ कह रही हूं। किन्तु अमित हमारा यह नया अभिमन्यु तुम निश्चय मानो, समाज में व्याप्त अन्याय, शोपण और उत्पीडन के चक्रव्यूह को भेदकर ही रहेगा। युवा पीढ़ी का यह नया सूरज समाज की जड़ता, अन्ध-विश्वाम और अन्याय के तिमिर को नष्ट करके रहेगा। अमित : और सविता ! जब तक यह धरती अन्याय, शोषण और उत्पीड़न से मुक्त नही होगी, तब तक असत्य और अन्याय के इस चत्रव्यूह को तोड़ने के लिए बार-बार हर युग में अभिमन्युओ का जन्म होता रहेगा। [दोनों एक साथ भावपूर्ण मुद्रा में गुनगुनाते हुए मंच से प्रस्थान करते हैं । [नेपथ्य में उच्च स्वर सुनाई पड़ते है। अमिट विश्वास है यह, प्राण को आश है यह, जिन्दगी कभी न हारेगी चेतना यही पुवारेगी, ध्वंस के साधकों सुन लो, प्रगति के बाधको सुन किरन यह मृजन मूरज की तिमिर से कभी न हारेगी।' [मंच शनैः शनैः, अन्धकार में विलीन हो जाता है। लो, . एक और अभिमन्यु/१०४
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