Adarsh Library, Jaipur

Wakif Hai Umar Se

Parsai Harishankar · 2011/03

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हम इक उम्र से वाकिफ हैं।

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हम इक उम्र से
वाकिफ हैं
हरिशंकर परसाई

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क्रम
14
21
29
37
46
54
हम इक उम्र से वाकिफ हैं।
परिवार
हम तो 'परभाकर' हैं जी
दस फार एड नो फर्दर
क्या कहूँ आज जो
गाँधी जी रसोईघर मे
न्य हाईस्कूल खेडवा
जबलपुर मे शिक्षक
अध्यापको का सगठन
तब जबलपुर में कुछ व्यक्तित्व
पहली किताब का छपना
कुछ लेखको से रिश्ते
मुक्तिबोध का साथ और 'वसुधा'
उद्घाटन भाषण
'सतन कहाँ सीकरी सो काम ।'
63
72
81
93
101
112
121
128

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हम इक उम्र से वाकिफ हैं मस्मरण लिखने का प्रस्ताव आया, तो अचानक फैज अहमद फैज का यह शेर याद आ गया हम इक उम्र मे वाकिफ हैं अब न समझाओ के. लुत्फ क्या है मेरे मेहरबाँ सितम क्या है। मैंने शेर का आरभ का हिस्सा शीर्षक बना दिया हम इक उम्र से वाकिफ न जाने क्यो उपचेतन से अचानक बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' की ये पक्तियाँ भी कौंध उठी हम विषपायी जनम के सहे अबोल कुबोल नेक न मानत अनख हम जानत अपनो मोल। कही उपचेतन मे जीवन-सघर्ष के अनुभव, कड़वाहट, अपमान और उत्पीडन, अन्याय, यातना की स्मृतियाँ होगी। साथ ही विष को पचाकर जीने और लड़ने की स्मृति । और इसके साथ ही आत्मगौरव कि हमने टुच्ची बातों का धुरा नहीं माना। हम अपनी कीमत जानते हैं। वह चीमत हम वसूलते हैं और तुम, कभी हँसने और तकलीफ देनेवाले, अब अपने निर्लज्ज व्यक्तित्व के माथ वह कीमत देते हो, क्योंकि वह कीमत देकर अब तुम छोटे मे थोडाघडे होते हो। ये अनुभव मुझे बहुत हुए हैं कि जो कभी मेरी निंदा और उपहास करके बडे बनते थे, वहीं अब यह कहकर बड़े बनते हैं कि दर्शन करके आ रहे हैं। मुझे इनकी दरिद्रता पर दया आती है और अटपटेपन पर हँसी। गुस्सा नहीं आता। पवित्र हम इक उम्र से वाकि -अलग संदर्भ होते हैं। 'नवीन' कहना यह चाहते हैं कि म मयत जानता हूँ। जो काम मैं कर रहा हूँ वह कितना महत्वपूर्ण है यह ता हूँ। मैं अपना और अपने काम का मूल्य जानता हूँ। न जाननेवालों की परवाह नहीं। मगर यही न जाननेवाले बाजार भाव बनाते हैं। यही माल का विज्ञापन रते हैं और उसे खपाते हैं। बाजार भाव वदलते रहते हैं। साहित्य के मूल्य दलते रहते हैं। हम जो लिखते हैं, उसका मूल्य हम जानते हैं। पर हम हित्य में भी उसका मूल्य चाहते हैं और बाजार में भी। यह चाहना जायज है। से कीमत घटती-बढ़ती है, इसके मुझे अनुभव बहुत हैं। मैंने शुरू से ही साहित्यशास्त्र के कोई बंधन नहीं माने। आचार्यों के चौखटे तोड़ डाले। मेरी लिखी हुई यह अगर कहानी नहीं मानते, तो परिभाषा बदल दो। यही नहीं, मुझे काफी जड़, दकियानूस, कट्टर, अविवेकी शास्त्रियों से भी लड़ाई लड़नी पड़ी। न ये नई वास्तविकता को ग्रहण कर सकते हैं, न नया सोच सकते हैं। दर्शन के फाटक पर चौकीदार बने बैठे हैं और दिनभर मक्खी उड़ाने की रोटी खाते हैं। मैं भारतीय क्लासिकों का शुरू से अध्येता रहा हूँ और इनका खुलकर उपयोग करता हूँ। मध्य युग के तुलसीदास, सूरदास, कबीरदास, कुंभनदास, रहीम आदि के संदर्भ और उद्धरण खूब देता हूँ। पर इन शास्त्रियों के पास जो सूचियाँ रखी हैं उनमें ये पतनशील, सामंती और जातिवादी हैं। सूरदास, पतनशील रूमानी थे। तुलसीदास घृणित जातिवादी और सामंती। और मैं-पुरातनवादी! बहुत लड़ाइयाँ लड़ी मैंने इन कवियों के लिए । तुलसीदास ने खुद जितनी लड़ाई लड़ी होगी उससे अधिक मैंने उनके लिए लड़ी। फिर मैं 'प्रथम पुरुष एक वचन' का प्रयोग करता हूँ। कुछ व्याकरणाचार्य प्रथम पुरु को 'उत्तम पुरुष' कहते हैं। वे होंगे। मैं नहीं। मेरे लेखक में यह 'मैं' हरिशंक परसाई नहीं है। पर तब और अब भी बहुत लोग मानते हैं कि यह 'मैं' ह परसाई है, व्यक्तिनिष्ठ है, आत्म-मोहित है, व्यक्तिगत प्रतिक्रियाएँ व्य करता है। अब ज़रूर पिछले कुछ सालों से प्रबुद्ध समीक्षक यह समझने-समझ में लगे हैं कि 'मैं' परसाई नहीं है। यह एक प्रतिनिधि व्यक्ति है। बहरहाल मुझे 5-6 साल लिखते हुए हो गए, तो मैंने एक समझदार जानेवाले प्रकाशक को पुस्तक की पांडुलिपि प्रकाशन की विनती के साथ कुछ दिनों बाद उन्होंने पांडुलिपि लौटाते हुए कहा-माफ कीजिए, इन रच हक उम्र से वाकिफ हैं में पुरातनवाद है और व्यक्तिगत प्रतिक्रियाएं हैं। तव 5-6 माल मैनेजिमे'बुर्जुआ प्रेम' कहा जाता है, उसमें लगातार वैमी ही रचनाएं सैकड़ों छपवाई। शायद बुर्जुआ प्रेम ने भी मुझे वही समझा जो प्रगतिशीलों ने । मेरी तीन पुस्तकें भी बडे प्रकाशकों ने प्रकाशित की। वे खूब विक रही थीं। तब उन्ही प्रकाशक ने एक दिन मुझसे कहा-हमें भी अपनी पुस्तक छापने का अवमर दीजिएन ! मैंने तपाक मेकहा-आपको पुस्तक देने मे क्या फायदा । विक्री आपकी बहुत कम है। मुझे क्या रायल्टी मिलेगी? एक तरह से किताब कुएं में डालना ही होगा। यह 'जानत अपनो मोल' का रहस्य है। आप मोल सिर्फ जानिए ही नहीं, उमे मनवाइए भी। वमूलिए भी। संस्मरण लिखने की बात कुछ ऐमे ही उठी। आत्मकथा नहीं लियूँगा। लोग यह मानते हैं कि आत्मकथा में मछिपा लिया जाता है। जो व्यक्तित्वको महिमा दे,वही लिखा जाता है। मगर हर मच को लिखने की ज़रूरत भी क्या है ? अपनी हर टुच्ची हरकत का बयान आखिर क्यों कर ? उम टुच्ची हाक्न का क्या महत्त्व है, पाठकों के लिए? कोई उमा मामाजिक मूल्य है क्या ? नहीं है। तो फिर मैं मिर्फ यह अहकार ही तो बताऊंगा कि मैं कितना महान् हूँ कि अपने टुच्चेपन को भी खोल देना हूँ। माथंक मच हो तो लिखो। यही आग्रह है 'सत्य' के बारे में। मत्य-मत्य-मत्य ! आखिर मत्य है क्या? वहुत पढ़ा मैंने। मुकरात भी, उपनिषद भी,टाल्मटाय भी, गांधी भी । सत्य का आग्रह मरका है पर किमी ने मत्य को परिभाषित नहीं किया। मैं नहीं जानताकि मत्य क्या है। जे. कृष्णमूर्ति कहते हैं :सत्य तक पहुंचने का मार्ग कोई नहीं है। पर जो ऐमा अगम है,वह मत्य क्या है, यह कृष्णमूर्ति ने भी नहीं बताया जिसे जानने ही नहीं उसके लिए मार्ग खोजना एक वेवकती है। और यह कहना कि उम नक पहुंचने का कोई मार्ग नहीं है, निरर्थक प्रलाप है। ये पग-चेतना की यातें हैं, जो शायद पुपुल जयकर ममझती हो, जिनकावृष्णमूर्ति की मर्गात मे उदात्तीकरण हो चुका होगा। मुझे तो कृष्णमूर्ति के प्रमग में यह याद आ गया कि वे एनी बेमेट के दत्तक पुत्र थे। वनार्ड शा और एनी बेमेंट दोनों पवियन मोमाइटी में थे और घनिष्ट मित्र थे। यह मित्रताविवाह बननेवाली थी, पर कई कारणों में एनी बेमेट शा में कट गई। मजदूरों की हडताल के ममर्थन मेबियन मामाइटी की बैठक में शा ने बहुत लडाकू भाषण दिया। तय हुआ कि बल मजदूरों के साथ फेबियन लोग हम इक उम्र मे वाकिफ है/11 .

भी जुलूस में होंगे। शा और एनी बेसेंट साथ थे। पुलिस ने 'बेटन' चलाए । एनी बेसेंट को सिर पर चोट लगी। उसने आसपास देखा तो शा गायव थे। शाम को वह शा के पास गई और कहा-"तुम भाग आए । यू आर ए कावर्ड!"शा ने कहा : "इट इज़ बेटर टु बी ए कावर्ड दैन ए फल !" जब विश्वयात्रा के लिए वर्नार्ड शा निकले तो बंबई में तीन दिन रुके। एनी बेसेंट ने कृष्णमूर्ति से कहा कि तुम 'शा से मिलना । कृष्णमूर्ति मिले। परिचय दिया कि मैं एनी बेसेंट का दत्तक पुत्र हूँ। शा ने पूछा : "तुम्हारी माँ कैसी है ?" कृष्णमूर्ति ने कहा : "वैसे तो ठीक है पर कभी-कभी मानसिक रूप से कुछ गड़बड़ हो जाती है।"शा ने कहा: "ओह, शी नेव्हर हैड ए माइंड !" बहुत क्रूर बात कही अहंकारी ने । । मगर बहरहाल संस्मरण लिलूँगा। मैं इनमें कम होऊंगा, मेरे साथ बदलता ज़माना ज़्यादा होगा। लोग आत्मकथा और संस्मरण से आशा करते हैं कि हम सीखेंगे और हमें सही रास्ता मिलेगा। अपने और दूसरे के अनुभव से आदमी ज़रूर सीखता है, पर रास्ते अलग-अलग होते हैं। वन मेन्स फूड इज़ एनदर मेन्स पायज़न । मुझ पर कभी बहुत ज़ोर डाला गया कि अपनी जिंदगी का रास्ता दूसरों को बताऊँ । तब मैंने जो कहा था, वह तभी छप भी गया था। वह यह है : यों तो मेरी जिंदगी चमत्कारों से भरी है, मगर कुछ भी ऐसा नहीं हुआ जिससे मुझे प्रेरणा मिली हो या जिसके बयान से किसी को प्रेरणा मिले। साधारण आदमी के जीवन में आनेवाली स्थितियाँ ही मेरे जीवन में आई, मैंने साधारण आदमी से बदतर काम किया। जिन स्थितियों में आदमी व्यावहारिक विवेक से काम लेता है, मैंने अविवेक मे काम लिया । दुनियादारी में विवेक का अर्थ है लाभ-हानि का हिसाव लगाकर अपनी सुरक्षा को निश्चित करनेवाला बोध । पर मैंने जहाँ वहादुरी दिखानी थी, वहाँ कायरता दिखाई। जहाँ कायरता फायदेमंद थी, वहाँ बहादुरी दिखा बैठा । जहाँ सधा हुआ आदमी खतरा नहीं उठाता, वहाँ मैं खतरा उठा बैठा । कुछ पिट-पिटाकर फिर आगे बढ़ गया। ऐसा मेरे पराक्रम से नहीं हुआ। लेखक बनने में भी कोई आकस्मिक घटना या प्रेरणा नहीं थी। ऐसा नहीं हुआ कि शैशव में माँ की गोद में टट्टी-पेशाव करके किलकारी मारी तो लोगों ने कहा : सुनो, वच्चा महाकाव्य बोल रहा है। जिंदगी भर, अव भी 35-40 साल कलम धिमते हो गए, पर जब लिखने बैठ जाता हूँ, हाथ-पाँव ठंडे पड़ जाते हैं। जो लिखा, बाद में पढ़ा तो 12/हम इक उम से वाकिफ हैं । ।

उमने और अपने से नफरत हुई। पछतावा हुआ लिखने का मगर जब लेखक बन ही गया, तब उस काम को पूरी ईमानदारी के साथ किया। दो बार नर्मदा नदी में डूबते डूबते बचा। दो बार रेलगाड़ी से क्टते-कटने रह गया। एक बार हत्या में बचा और पिटाई मे ही छूट गया। पहली यार तीन माल की उम्र में नर्मदा मे डूबना दुर्घटना थी । दूसरी बार अविवेकवारण मौत तक पहुँचा । विवेकशील आदमी पैसे का इतजाम करके शादी तय करता है। पर मैंने पैसे के बिना दो बहनो की शादी तय कर दी। क्मिी चमत्कार से वे अच्छी तरह हो भी गई। गेटी का विकल्प खोज विना नौग्याँ छोडता गया। आखिरी नौकरी छोड़ने के तीन महीने बाद ही मेरी वहिन विधवा हो गई। वह जबलपुर रहने आ गई। मैने विना यह मोवेकिक्ल इन पाँच प्राणियों को क्या खिलाऊँगा, जिम्मेदारी ले ली। घर में एक दिन के आटा-दाल के भरोमे बीम मालों की जिम्मेदारी। चमत्कारो से यह काम भी पूरा हो गया। जब अभी तक काम चला है तो आगे क्यों नही चलेगा-इमी विश्वास पर चलता रहा । मेरे भीतर चाल्र्स डिकिन्म के डेविड कापर फील्ड का एक चरित्र मिस्टरमिकावर वैटा है, जो मुफलिसी में भी मस्त रहता है और कहता है-'मयिग विल टनं अप! कुछ हो जाएगा 'जिम लिखने के कारण पिटा, वह न लिसता तय भी चलता। उसे लिखने से कोई प्रातिलो हो नहीं गई। पर लिख दिया और पिट गया। पीटनेवालो ने मोचा होगा कि अब यह हमारे खिलाफ नहीं लिखेगा। पर मैं अभी भी उनके खिलाफ लिख रहा है। यह भी अविवेक हुआ। इन भव चीजो मे कोई अगर प्रेरणाने नो वह मजे मे जिदगी यरवाद कर सकता है। मुझे कोई एतगज नहीं। हम इक उम्र से वाकिफ है/13 परिवार । ज्योतिषियों ने मेरे पिता को बताया कि लड़के के ग्रह ऐसे पड़े हैं कि पुलिस इंस्पेक्टर बनेगा। अंग्रेजों के शासनकाल में गाँवों, कस्बों में मनुष्यता का सर्वोच्च शिखर पुलिस थानेदार होता था। वह राम भी होता था और कृष्ण भी। मर्यादा पुरुपोत्तम भी और लीलामय भी। मेरे फुफेरे भाई हेड कांस्टेबिल थे। मगर क्या रोव था। लोगों को लोकतांत्रिक अधिकार नहीं थे। जो अधिकार साम्राज्यवादी सरकार ने दिए थे, उनकी भी जानकारी लोगों को नहीं थी। चेतना भी नहीं थी। इसीलिए पुलिस का इतना दबदवा था। मेरे पिता लकड़ी के कोयले का धंधा करते थे, और बाहर कोयला भेजने के लिए रेलवे वैगन जल्दी पाने के लिए स्टेशन मास्टर को घूस खिलाते थे। वे खुद बाहर से आते तो रेल टिकट नहीं लेते थे। मैं भी विना टिकट आता था। मेरे पिता की घूस खाने वाले बाबू थे न सब । तो पिता की नज़र में आदर्श नौकरी रेलवे बाबू की ! घुस थानेदार भी खाता था और रेलवे स्टेशन मास्टर भी। देशी साहव भी और अंग्रेज़ साहब भी। मगर अंग्रेज़ साम्राज्यवादी के शोषण और भ्रष्टाचार में 'साफिस्टिकेशन' होता था-नीडिग व्हाइट विथ ग्रेस । 'ग्रेस' था। आज जैसा भौंडापन नहीं । अंग्रेज़ साहब यह नहीं कहता था :पिपरिया से एक बोरा अच्छी दाल लेते आना। नहीं, नहीं। टू क्रूड ! These petty natives आई एम इंग्लिश ! तो साहब को बड़े लोग 'डाली' लगाते थे-डाली में फल, फूल, मेवे और इनके साथ रुपए। साहब बोलता था: "टोम सेठ गोपालदास अच्छा आदमी हाय । नाईस मेन ! हामको पसंड है।" 'ग्रेस' था साम्राज्यवादी में । इस तरह का-दें वाइसराय इन काउंसिल इज़ " 14/हम इक उम्र से वाकिफ हैं प्लीज्ड टु कनफर्म में सेटेन्स ऑफ डेय-प्लीज्ड टुक्नफर्म! लटन में छपे 'क्लासिफाइड डाक्यूमेंट्स' के पोयों में ऐसे नूमने मिलेगे। क्या वन, यह बात तव उठी जब मैं मैट्रिक में था। उसके पहले की पृष्ठभूमि बता दूं। मेरे पिता तीन भाई थे। ब्राह्मण थे, पर पौरोहित्य नहीं करते थे। उनकी मौसी मालगुजास्थी। यानी मालगुजार परिवार के थे, पर कानूनी हिस्मा मालगुजारी में नहीं था। इसका मतलब है कोई बुनियाद नहीं थी। मौसी ने खेती दे दी होगी। घर ये ही। यानी आश्रित थे। किमी कारण मौसी के बेटे से झगडा हुआ। मेरे बडे दादा ने मुझे बताया कि इस मॅझले श्यामलाल ने लट्ठ चला दिए और हम लोग गाँव से उखड़ गए। बडे दादा कहते थे 'पास-पास पांच-छ: गांव थे। हम ब्राह्मण हैं । वैसे ही मजे में रह लेते।' आधी शताब्दी से पहले की बात है यह। तब ब्राह्मण को श्रद्धालु गाँववाले पाल लेते थे। पौरोहित्य न करे, सिर्फ चदन लगाया करें तो भी पाल लेते थे। जनेऊ और चंदन वडी पूंजी थी। ये सुरक्षा कवच भी थे। बेचन शर्मा 'उग्र' ने किसी पौराणिक कहानी में लिखा है कि बाहमण देवदत्त किमी स्त्री के घर मे व्यभिचार करके निकला तो बाहर लोग लाठियों लिए मारने को खडे थे। देवदत्त ने झट मिरजई में से जनेऊ निकालकर बताई तो लोगों ने कहा 'जाने दो। ब्राह्मण है। शायद किन्ही ने देवदत्त को अपने घर पधारने का निमंत्रण भी दिया हो। मैंने भी एक वाक्या देखा या। लोग एक आदमी से कह रहे थे। 'काम तो तुमने ऐसा किया है कि तुम्हारे हाथ-पांव तोड दिए जाएं। पर तुम ब्राह्मण हो, तो छोड देते हैं।' ब्राह्मण ने उच्चतम बौद्धिक स्तर पर और निम्नतम भिक्षाटन के स्तर पर घंधा जमाकर रखा था । इतिहास मे ब्राह्मण ने चिंतन किया, तत्वज्ञान दिया। पर क्षत्रिय भी पीछे नहीं रहे। ब्राह्मण और क्षत्रिय का शस्त्र और शास्त्र दोनों में संघर्ष हुआ। तत्वचिंतन और दर्शन में क्षत्रिय पीछे नहीं थे। पर ये जो आश्रमवासी ऋपि चितन करते थे, उसका कोई उत्पादक उपयोग नहीं होता था। कारण, जो श्रम करके उत्पादन करते थे, उन्हे इन्ही ब्राह्मणो ने नीची जाति का करार दे दिया था और उनसे कोईसपर्क नहीं था। चिंतन अलग और श्रम अलग। कोई तकनीक विकमित नहीं की उनचितको ने। हल के फल तक में तो कोई सुधार किया नही । इस पूरे ब्राह्मण मप्रदाय ने न कोई उत्पादन हम इक उम्र से वाकिफ है/15. ।

परिवार । । ज्योतिषियों ने मेरे पिता को बताया कि लड़के के ग्रह ऐसे पड़े हैं कि पुलिस इंस्पेक्टर बनेगा। अंग्रेजों के शासनकाल में गाँवों, कस्बों में मनुष्यता का सर्वोच्च शिखर पुलिस थानेदार होता था। वह राम भी होता था और कृष्ण भी। मर्यादा पुरुषोत्तम भी और लीलामय भी। मेरे फुफेरे भाई हेड कांस्टेबिल थे। मगर क्या रोब था। लोगों को लोकतांत्रिक अधिकार नहीं थे। जो अधिकार साम्राज्यवादी सरकार ने दिए थे, उनकी भी जानकारी लोगों को नहीं थी। चेतना भी नहीं थी। इसीलिए पुलिस का इतना दबदवा था। मेरे पिता लकड़ी के कोयले का धंधा करते थे, और बाहर कोयला भेजने के लिए रेलवे वैगन जल्दी पाने के लिए स्टेशन मास्टर को घूस खिलाते थे। वे खुद बाहर से आते तो रेल टिकट नहीं लेते थे। मैं भी बिना टिकट आता था। मेरे पिता की घूस खाने वाले बाबू थे न सब । तो पिता की नज़र में आदर्श नौकरी रेलवे वाबू की ! घूस थानेदार भी खाता था और रेलवे स्टेशन मास्टर भी। देशी साहब भी और अंग्रेज़ साहव भी। मगर अंग्रेज़ साम्राज्यवादी के शोषण और भष्टाचार में 'साफिस्टिकेशन होता था-ब्लीडिंग व्हाइट विथ ग्रेस । 'ग्रेस' था। आज जैसा भौंडापन नहीं । अंग्रेज़ साहब यह नहीं कहता था :पिपरिया से एक बोरा अच्छी दाल लेते आना। नहीं, नहीं। टू क्रूड ! These petty natives आई एम इंग्लिश ! तो साहब को बड़े लोग 'डाली' लगाते थे-डाली में फल, फूल, मेवे और इनके साथ रुपए। साहब बोलता था: "टोम सेठ गोपालदास अच्छा आदमी हाय । नाईस मेन ! हामको पसंड है।" 'ग्रेस' था साम्राज्यवादी में । इस तरह का-वाइसराय इन काउंसिल इज़ 14/हम इक उम्र से वाकिफ हैं

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। सीसा, न किया । ये समाज की आध्यात्मिक आवश्यकता की पूर्ति करते थे और समाज इन्हें सम्मान के साथ पाल लेता था। पर अध्यात्म अनुत्पादक है। आगे जब सामंतवाद जम गया, तो ब्राह्मण देवता राजाश्रयी हो गए। सामंती शोषण के लिए उन्होंने विधि-विधान दिए, नीतियाँ बनाई। तब बाह्मण के प्रवेश करते ही सामंत अपने आसन से उठकर विप्रदेव को प्रणाम करता था। सामान्य समाज में ब्राह्मण पौरोहित्य करते थे। पर जो जाति उत्पादन नहीं करती उसकी दुर्गति होती है । कभी पूजे जानेवाले बाह्मण आगे भिखमंगे हो गए और इस द्वार से उस द्वारं भगाए जाने लगे। जातिवाद और अस्पृश्यता को स्थापित करनेवाले ब्राह्मण देवता का बेटा अब जूतों की दुकान में काम करता है और चमार अफसर को अपने हाथ से जूता पहिनाकर कहता है : 'यह आपको फिट बैठता है सर!' मैं कहता हूँ ब्राह्मण को भी यही फिट बैठता है। नीचे के पौरोहित्य के स्तर पर भी ब्राह्मण ने अच्छा जमाकर रखा था। तरह-तरह के पर्व, पूजा, अनुष्ठान, मुंडन, कनछेदन, लग्न आदि तो थे ही, ब्राहमण ने अच्छा माल खाने की एक नई तरकीब ईजाद कर ली थी। दोपहर में हमारे दरवाजे पर पंडित जी सके। मेरे पिता बरामदे में थे। पंडित ने पूछा : 'कौन जाति है ?' पिता जी ने कहा : 'ब्राह्मण ।' पंडित जी बोले-'तो बस जल पिला दो। आगे बढ़ जाएँगे।' पिता जी ने कहा : 'दोपहर हो गई है। भोजन भी कर लीजिए।' पंडित ने पूछा : 'कौन ब्राह्मण हैं आप?' पिता जी ने कहा: 'जिझौतिया।' पंडित जी ने कहा : 'हम कान्यकुब्ज हैं । कच्चा भोजन तो कर नहीं सकते गैर जाति में । पक्का भोजन ज़रूर कर लेंगे।' कच्चा भोजन यानी दाल, रोटी, सब्जी और पक्का भोजन यानी पूड़ी, हलवा, मिठाई । पक्का भोजन ब्राह्मण तेली, बनिया, कर्मी के घर कर लेता है। अगर दक्षिणा की रकम बड़ी हो तो भंगी के घर भी पक्का भोजन कर ले । माल खाने की क्या बढ़िया तरकीय निकाली ब्राहमण देवता ने। परिवार के बारे में मुझे बहुत कम याद है। हाँ, वे मेरे लठैत चाचा श्यामलाल याद है क्योंकि मैंने उन्हें घोर अक्खड़ता और कारुणिक टूटन दोनों स्थितियों में देखा । जवानी में विधुर हो गए । एक लड़की थी, जिसे वे मेरे पिता के पास छोड़कर गायव हो गए थे। आवारा प्रवृत्ति के थे। लठैत थे। कटोरे में तिल का तेल भरकर उसमें लाठी का सिरा डुबाकर उसे दीवार से टिकाते थे। 16/हम इक उम्र से वाकिफ हैं ' कहते थे 'लाटी तेल को पी जाएगी। लट्ठको वे दुस-भजन कहते थे। कोई बड़ी लड़ाई उन्होने नहीं लड़ी। लट्ठ कम चलाने थे, रंग ज्यादा बांधते थे। उनी बडी इच्छा यह थी कि वे पलिमवाले माने जाएं । वे सावीकमीज पहनने थे। पलिस विभाग में पुराने'फुलयूट' बहुत मम्ने मे पलिमवालो कोही बेच देते हैं । उनके भानजे हैंड कास्टेबिल छरीद लेते थे। हमारे दादावे फुलयूट पहनने, सायी शर्ट पहनने और मिर पर निगडी यादी टोपी मजाते थे। इस तरह वे चम्नी में हाथ में दुख-भंजन' लेकर घूमते थे। किमी में बहने 'हवानरान में मडा दंगा।' विमी में रहते .'जिदगी-मर जेल मे चपची चलवाऊंगा। और पुरातत्ववेताओं का ख्याल रखकर कहते 'जमीन में ऐमा गाईगा चि हजार मालन नहीं मिलेगा। अधिकतर लोग उनकी भक्यिों जानने थे। पर गैर भी गालिव हो जाता। वे कहाँ रहते थे, हमे पता नहीं। आवाग थे। हरफनमौला थे । केही मदिर कं पुजारी बन जाते, ही विनी मेठ के यहाँ उधारी वमननेवाले । कभी हमारे पान आकर कुछ दिन रहते। एक बार तीन माल मेरे पिता के कोयले के भट्टी की देसोस करते रहे। मेरे पिता के मित्र पोस्ट मास्टर मेहनाजी ने मोपिना में कहा 'श्यामलाल नो भट्टी पर बडी मुस्तैदी में काम कर रहे हैं । पिना जी में रहा. 'हाँ, दो रेजा (मजदरनी) सूबसूरत हैं।' दादा अपने पुलिमवाले भानजे मे सूब गप्प करने थे। अपने कारनामे मनाने थे। मैं पढ़ने का बहाना किए मुनता रहता था। एक दिन यता रहे थे.'मय छोटे-मे लडके के गुदा स्थान मे ऊपर मैंने एक धान सोम दी । धान दोनो तरफ में गड़नी थी और लडया गेलामा । मेट-मेवानी जय घटे भा तर लग हो गए और ना याचीसना बद नहीं हुआ, तब मैंने कहा 'मेट जी, यह प्रेत बाधा है। मुझे प्रेत उतारना आता है। आप लांग मब कमरे मे बाहा चने जाए। मैं प्रेत उतारता हूं। मैंने कमरा वदक्यिा । जोर-जोर से अट-शट जैमा यांनना रहा-उतर माले ! भाग माले प्रेत के बच्चे ! हनुमानविक्रम बजागी। और मैंने पान निकाल दी) बच्चे ने रोना बद कर दिया। दावाजा खोला। बच्चा माँ की गोद मे किलवारी मारने लगा। अब नो मैं बडा 'नयाँ माना जाने लगा। मेठ ने पूरे कपड़े दिए और ग्यारह रूपा भेट।' कई माल वाद मन् 1963 में जबलपुर में घर के मामने रिपशा या और उसमे से उतरे हमारे दाश 180 माल मे ऊपर थे,मगर लगई थे। फर्नी वैमी हम इक उम्र मे वाकिफ है/17 !

। - ही थी। 4-6 किलोमीटर यों ही चल नेते थे। पर दोनों आँसों में मोतियाबिंद था। कहने लगे : 'बेटा, ऑपरेशन कराके मेरी आँसें ठीक करा दे। 'पर डाक्टरों ने मुझगे कहा कि कोई आशा नहीं है। मेरेगाथ तव मेरी छोटी विधवा बहिन और उसके चार बच्चे भी थे। दादा मोचते थे-मैंने कभी लड़के-लड़की के लिए कुछ नहीं किया । पैसा मेरे पास है नहीं । ये क्यों मेरी मेवा करेंगे। इन्हें भ्रम पैदा करना चाहिए कि मेरे पास बहुत धन है। अपनी ममा के हिसाब से वे झूठा भरोसा देते थे : 'बेटा, पिछली बार जव मैं यहाँ रहा था, तब एक सोने की ईंट अमुक के पाम मैंने रख दी थी। और दस हज़ार रुपए मेरे फलों के पास जमा है। मुझे इनके पास ले चल । मैं अपना गोना और रूपया ले आऊंगा। मैं जानता था कि यह झूठ है । वे आई-विक्षिप्त भी हो गए थे। आखिर उनके बहुत हठ करने पर मोतियाबिंद का ऑपरेशन हुआ। हम उन्हें आशा देते थे कि पट्टी सुलने पर साफ़ दिखेगा। एक दिन पट्टी सुली। आँखें सुनीं। हमने पछा : 'साथ दिसता है ? पाँचों अंगलियाँ दिखती हैं ? हम दिखते हैं ?' उन्होंने अपने को और हमें धोखा दिया। बोले : 'हाँ, अब दिखता है। फिर फफककर रोने लगे और बोले : 'वेटा, मैं अंधा हो गया।' उनकी जीने की इच्छा उसी क्षण सत्म हो गई। वे रोज़ स्नान करके पूजा करते और तब भोजन करते थे। उस दिन से उन्होंने नहाना और पूजा करना छोड दिया। बिलकुल चुप पड़े रहते। 7-8 दिनों में वे मर गए। मरने के पहले कई बार वोले : 'अच्छा है। बेटा भी यहीं है। बेटी भी यहीं है। बच्चे भी यहीं हैं। मेरे मभी मेरे पास हैं।' उन्होंने अटकल से मेरे, मेरे छोटे भाई के तथा वहिन के सिर पर हाथ रसा । बोलते गए : 'बेटा शंकर है, ये गौरी का बेटा है, ये सीता बेटी है।' जीवन-भर के निर्मोही का अंतिम मोह था यह। उन्होंने प्राण त्याग दिए। लोगों ने कहा-श्राद्ध करो, पिंडदान करो गद्गति के लिए। मैंने कहा कि 'मदगति और दति उसकी होती है और स्वर्ग या नरक बह जाता है, जो सत्कर्म या दुष्कर्म करे । हमारे दादा ने जिंदगी-भर कुछ किया ही नहीं। 'अकर्म योगी' थे। मीधे स्वर्ग पहुँच गए होंगे। मेरे पिता जंगल नीलामी में लेते थे और लकड़ी का कोयला बनवाते थे। जहां जंगल लेते वहीं पाम की बस्ती में रहने लगते। जंगल में कोयला बनाने के - 18/हम इक उस से वाकिफ हैं । लिए बडे-बडे भट्टे लगाते थे। इस गाँव मे उम गाँव हम लोग जाते रहे । विच्ट्र का डेरा पीठ पर था। मेरे पिना मुझमे भी ऊँचे थे। तगडे थे। कोशे का माफा बाँधने थे। झरटिदार मूंछे रखते थे। घोडे पर सवारी करते थे। 'ठेकेदार माहब' कहलाते थे। वे घोडे पर माथ बियकर मुझे भी जगल ले जाते । मैं मिर्फ आठ माल का या। घोडा अपनी परडी में घास खा रहा था। न रस्मी,न लगाम,न जीन । मैं चयूनर पर मे उसकी नगी पीठ पर बैठ गया। उसकी गर्दन के याल पकडलिए और झटका लगते ही घोडा अपने रोज के परिचित जगल के गम्ते पर चल पड़ा। सामने का मैदान पार कर लिया तो मुझे डरलगा। मैं उमे लौटाना चाहता था पर लौटाना मुझे आता नहीं था। घोडा दौडने लगा। मैंने उसे रोकने के लिए बाल जोर मे सीचे । इमे उसने और तेज दौडने का इशाग ममझा । वह सब तेज दौड़ने लगा। धवडाकामैं उसकी गर्दन मेचिपट गया। घोडा भाग रहा था और मैं चीख रहा था। आखिर मैं फिमलकर गिर पड़ा। मेरे गिरते ही घोडा मक गया। मेरे पास आकर खडा हो गया । मुझे देखता रहा। मुझे घुटने में चोट आई थी। जरा देर बाद देखा कि मेरे पिता कुछ आदमियों के माय दौडते आ रहे हैं। वे गुस्मे मै थे। पर मुझे पडा देखकर वे चितित हो गए । मुझे उमी घोडे की पीठ पर विटाकर घर लाया गया। यह मेरा पहला दुस्माहमिकता का काम था। आगे तो मैंने बहुत दम्माहम के काम का। पिता का दवगपन मुझे अच्छा लगता था। पर वे मेरे हीगे नहीं थे। मैंने उनमे कुछ नहीं मीसा । इतनी जर मुझमे प्रेरणा आई कि आदमी को तगडा होना चाहिए। बल्कि नब वे वहत वो आदमी लगने थे जब हर इनवार को भट्टे पर काम करनेवाले गोडो को डॉटने और गाली देते थे। वे उनके पैसे भी काट लेते थे और मुझे गोडो के विवश-पीडामय चेहगे को देखकर द स होना था। माँ-बाप मुझे प्यार बहुत करने थे। जगल मे रहने पर भी उन्होंने मेरी पढ़ाई में व्यवधान नहीं आने दिया। 5-6 किलोमीटर दर प्राथमिक शाला नक एक गोड मुझे कधे पर बिठाकर ले जाता था। वहाँ तीन-चार घटे रुकना और मुझे कधे पर बिठाकर घर लौटा लाना। यह क्रम एक माल चला। मग काम मेरे पिता ने अच्छा किया कि उमी अवस्था मे मुझे गमग्नि मानम' का कई बार पाठ कग दिया। मुबह गमर्चाग्न मानम का पाठ और । । । हम इक उम्र मे वाक्फि है/19

शाम को भगवान की आरती-यह नियम था। 'रामचरित मानस' की
छोटी-मोटी दिलचस्प बातें ही समझ में आती थीं । 'सुंदरकांड' बहुत अच्छा
लगता था। हनुमान मेरे हीगे थे। मुझे आधी रामचरित मानस कंठस्थ हो गई
थी। इसमे मझे आगे बहुत लाभ हुए।
20/हम इक उम्र से वाकिफ हैं

हम तो 'परभाकर' हैं जी । । । । प्राइमरी स्कूल मे हमारे गुरु जी शरीफे खाते थे और हम शरीफ की छडी साते । यह शायद 1931 की बात होगी। होशगाबाद जिले में हरदा तहमील में एक बडा गाँव था तबरेहटगाँव । अब अखबार मे पढता हूँ कि वहाँ लॉयम क्लब भी है। छोटा शहर हो गया है । इस गाँव मे पिता जी वम गए थे। यहाँ हिंदी की मातवी कक्षा तक का स्कूल था । प्रधानाध्यापक हमारे रिश्तेदार थे। वे भी परमाई ही थे। मैं इस स्कूल में दाखिल हुआ । हमारे स्कूल में लगा हुआ शरीफे का बागीचा था--जगल ही था। हमारे गुरु जी शरीफा खाने के बडे शौकीन थे। वे किन्ही दो लडको से कह देते 'जाओ, इम झोले मे शरीफे तोडकर ले आओ। अच्छे लाना, जिनकी आँखे खुल गई हो। और तीन-चार अच्छी डालियाँ भी तोड लाना। मुझे यह काम ज्यादा मिलता था क्योंकि मैं ऊंचा और तगडा था। यो शरीफे के पेड इतने नीचे थे कि लगभग जमीन मे लगे थे। हम शरीफे लाते। उनमे मे जो चौबीम घटे में पकनेवाले होते, उन्हे गुरु जी अलमारी मे रख देते और पहले के रखे पके हुए 2-3 निकालकर टेबिल पर रस लेते। घर ले जाने के लिए शरीफे झोले मे रख लेते। वे आलमारी मे भी निकालते। वे शरीफे खाते हुए एक पवित्र अनुष्ठान करते। चाकू में उन डालियो की बड़ी कलात्मक तन्मयता मे गाँठे निकालकर, उन्हे छीलकर मुदर घड़ियाँ बनाते। बडी धार्मिक तल्लीनता मे। इधर हमारे प्राण काँपते। उनकी यह कलाकृति हमारी हथेलियो के लिए थी। शरीफा साकर तृप्त होकर, मुखी मनस्थिति मे वे छडी उठाते । मुझे या किसी दूसरे लडके को बलाकर कहते 'क्यो चे, ये दो शरीफे बिलकुल कच्चे क्यो ले आया? तुझे पहचान नहीं । चाक हम इक उम्र से वाकिफ हैं/21 हमारे गुरु । .. है? हाथ सोल। मैं या वह हाथ खोलता और दोनों हथेलियों पर गएक-एक छड़ी सटाक, मटाक पड़ती। हम दोनों हाथों को हिलाते और काँसों में दवा लेते। जी शरीफा खाते थे और हम शरीफे की छड़ी खाते थे। गुरु जी दिन-भर किसी भी कारण मे हम लोगों को छड़ी मारते थे। पढ़ाई की भूल पर तो मारते ही थे। पर वे आविष्कारक थे। नए-नए कारण माग्ने के खोजते थे। किमी मे कहते : 'क्यों वे, कान में अँगली डालकर क्यों खुजा रहा है? कान माफ नहीं है ? इधर आ। हाथ खोल।' इसके बाद-मटाक! अपनी माँ मे कहना कि गत को कान में गरम तेल डाल दे और सवेरे जव मैल फूल जाए नो निकाल दे।' लगभग सब अध्यापक पीटते थे बच्चों को-कोई कम, कोई अधिक। इसमें शक नहीं कि अपवाद भी होते थे। ऐसे अध्यापक मुझे आगे.मिडिल स्कूल में मिले। मगर सौ में मे अस्सी अध्यापक पीटते थे। सोचता हूँ, मेरे वे गुरु जी नथा दसरे अध्यापक हम बच्चों को क्यों पीटते थे? एक कारण तो यह हो सकता है कि वे 'मेडिज्म' (पर-पीड़न प्रमोद) मानसिक रोग के मरीज हों। पर इतनी बड़ी संख्या में पूरा का पूरा वर्ग मेडिम्ट' नहीं हो सकता। एक कारण तो यह हो सकता है कि इनका वेतन बहुत कम होता है और ये परेशान नथा सीझे रहते हैं। एक कारण यह कि ये पढ़ाते नहीं हैं या बहुत कम पढ़ाते हैं। अचरज यह कि ये बिना क्रोध या तनाव के या नफरन के मामान्य मंतुलित मन मे पीटने थे। मैं ममझता हूँ, नव, आधा शताब्दी पहले, ये पिटाई को पढ़ाई का एक जरूरी भाग मानने थे। तब कहावत प्रचलित थी : Spare the rod and spoil the child. बच्चों को पीटना ये अध्यापक अच्छी शिक्षा का तकाजा मानते थे। इंग्लैंड के पुराने ग्रामर स्कूलों में यह मिद्धांत-वाक्य भारत आया था। पीटते अभी भी हैं-पर बहुत कम । अब तो छात्रों को पीटने के खिलाफ़ कानून भी वन गया है। मोचता हूँ, हम मुसंस्कृत होने का गर्व करनेवाले लोग बच्चों के प्रति कितने वहुत निर्दयी हैं-स्कूल में भी और घर में भी । हमारे घरों में देखिए। बच्चे के हर प्रश्न का, हर ममम्या का, हर छोटी हरकत का एक ही इलाज है-तमाचा जड़ दो, कान खींच दो, घुसा मार दो। वच्चा कुछ मांग रहा है, उनकी कुछ समस्या है, वह ज़िद कर रहा है, वह पढ़ने में लापरवाही कर रहा है, उसके हाथ मे कोई चीज़ गिर गई तोकही हल है कि उसे पीट दो। वच्चे को 22/हम इक उम्र से वाकिफ हैं क्रर हैं।

। । ममझेगे नही, उसे समझाएँगे नही । ममम्या कुल यह है कि वह या तो बोल रहा है या रो रहा है । कल सवाल उमे चुप कराके उममे वर्ग हो जाने का है। एक-दो तमाचे जड़ देने मे यह काम हो जाता है। गेते हुए बच्चे को धमकाने हैं.' चुप हो ! चोप्प!' और चॉटा जडदिया। चॉटा तो मलाने के लिए होता है.गेना रोकने के लिए नहीं। मगर वह बच्चा चुप तो डर के कारण हो जाना है. परगेता और ज्यादा है। वह बुरी तरह मिमकता है। मां-बाप को मिमकने पर कोई एतगज नहीं। गते बच्चे का 'मूड' (मन ति) बदलना चाहिए । उमकी दिलचम्पी के विषय की तरफ उमका मन मोड देना चाहिए। मेरे भानजे का लड़का है मोन् । क्रिकेट का शौकीन है, चित्रकला का भी । निजी मकान की अपेक्षा क्गिा के मकान मे बागीचा ज्यादा अच्छा लगता है। बच्चा फलो का शौकीन है। मेरी मेज पर फूल लाकर रख देता है और नारीफ का इतजार करता है। टेलीविजन पर क्रिकेट देखता रहता है। उसके प्रिय खिलाडी हैं। जब वह गेता है तो में कहता हूँ 'अरे सोन गुरू, इम मैच मे नो भारत हार ही जाएगा। वि शाम्बी तेईम पर आऊट हो गया। वह फौरन रोना बद करके कहता है क्या बात करते हो मामा जी। अभी तो अजहर को खेलना है। चौवे पर चौवे मारता है, अजहर ।'-वह मुनील गावस्कर, चेतन शर्मा वगैरह की बात करता है । खुश हो जाता है। कभी मैं कह देता हूँ 'तुम्हारा बागीचा मृत्व गया. मोन । आज नो टेबिल पर फूल ही नहीं हैं। वह रोना बद करके कहता है 'ओ. मेग वागीचा कभी नहीं मूसमकता। क्या बात करते हो। अभी फल लाता है। वह उन्माह मे फूल लाता है और टेविल पर बडी खुशी मे मजाता है। हमारे लोग एक नो बाल-मनोविज्ञान नहीं समझते। फिर परेशान रहते हैं। काम मे रहते हैं। वे एक-दो चाँटे मारकर इस समस्या को फौरन हल कर देना चाहते हैं। पर बच्च का भीतर कितना हिस्मा मरता है। उमके विकास पर बुरा अमर पड़ता है। उसे मजा की आदत पड़ती है। वह बडा होकर नौकरी करता है तो गैर-जिम्मेदारी मे काम करता है और डॉट या दूसरी मजा के बिना काम नहीं करता। मैं खुद बारह माल अध्यापक रहा। याद करता हूँ तो मैंने भी कभी-कभी लडको को पीटा था। पर बहुत कम । एक घटना को मैं अब भी याद करता है तो बडी पीडा होती है । मैं माडल हाईम्कल मे छठवी कक्षा में पढ़ाता था । एक चपगमी का लडका था। वह लगातार चार दिन नहीं आया। छुट्टी का आवदन हम इक उम्र मे वाविप । - - . 8 .

- है? हाथ खोल ।'मैं या वह हाथ खोलता और दोनों हथेलियों पर एक-एक छड़ी मटाक, मटाक पड़ती। हम दोनों हाथों को हिलाते और काँखों में दवा लेते। हमारे गुरु जी शरीफा साते थे और हम शरीफे की छड़ी खाते थे। गम जी दिन-भर किमी भी कारण से हम लोगों को छड़ी मारते थे। पढ़ाई की भूल पर नो मारते ही थे। पर वे आविष्कारक थे। नए-नए कारण माग्ने के खोजने थे । किसी ने कहते : 'क्यों वे, कान में अंगुली डालकर क्यों खुजा रहा है?कान माफ नहीं है? इधर आ।हाथ सोन।'इमके वाद-मटाक!'अपनी माँ मे कहना कि गत को कान में गरम तेल डाल दे और मवेरे जव मैल फूल जाए तोनिकाल दे।' लगभग मव अध्यापक पीटते थे वच्चों को-कोई कम, कोई अधिक ! इसमें शक नहीं कि अपवाद भी होते थे। ऐसे अध्यापक मुझे आगे,मिडिल स्कूल में मिले । मगर मौ में से अस्सी अध्यापक पीटने थे। मोचता हूँ, मेरे वे गुरु जी तथा दूसरे अध्यापक हम बच्चों को क्यों पीटते थे ? एक कारण तो यह हो सकता है कि वे डिज्म' (पर-पीड़न प्रमोट) मानसिक रोग के मरीज हों। पर इतनी बड़ी संख्या में पूरा का पूग वर्ग मेडिम्ट' नहीं हो सकता। एक कारण तो यह हो मकता है कि इनका वेतन बहुत कम होता है और ये परेशान नथा खीझे रहते हैं। एक कारण यह कि ये पढ़ाते नहीं हैं या बहुत कम पढ़ाते हैं। अचरज यह कि ये विना क्रोध या तनाव के या नफरत के मामान्य मंतुलित मन से पीटने थे। मैं ममझता हूँ, तव, आधा शताब्दी पहले, ये पिटाई को पढ़ाई का एक ज़रूरी भाग मानने थे। तव कहावत प्रचलित थी : Spare the rod and spoil the child. बच्चों को पीटना ये अध्यापक अच्छी शिक्षा का तकाजा मानते थे इंग्लैंड के पुराने 'ग्रामर स्कूलों मे यह सिद्धांत-वाक्य भारत आया था। पीटते अभी भी हैं--पर बहुत कम । अव तो छात्रों को पीटने के खिलाफ कानून भी वन गया है। मोचता हूँ, हम नुसंस्कृत होने का गर्व करनेवाले लोग बच्चों के प्रति कितने क्रूर हैं। बहुत निर्दयी हैं स्कूल में भी और घर में भी। हमारे घरों में देखिए। बच्चे के हर प्रश्न का, हर समस्या का, हर छोटी हरकत का एक ही इलाज है-तमाचा जड़ दो, कान खींच दो, घुमा मार दो। बच्चा कुछ मांग रहा है, उनकी कुछ समस्या है, वह ज़िद कर रहा है, वह पढ़ने में लापरवाही कर रहा है, उसके हाथ मे कोई चीज़ गिर गई-तोएक ही हल है कि उसे पीट दो। बच्चे को 22/हम इक उम्र से वाकिफ हैं ।

। ममझेगे नही, उमे ममझाएंगे नही । ममस्या कुल यह है कि वह या तो बोल रहा है या गेरहा है । कुल सवाल उसे चुप कराके उममे बरी हो जाने का है। एक-दो तमाचे जड देने मे यह काम हो जाता है। गेते हुए बच्चे को धमकाते हैं 'अरे चुप हो । चोप्प। 'और चांटा जड़ दिया । चौटा तो मलाने के लिए होता है, गेना रोकने के लिए नहीं । मगर वह बच्चा चुप नो डर के कारण हो जाता है. पर गेता और ज्यादा है। वह बुरी तरह मिसकता है। मां-बाप को सिमकने पर कोई एतराज नही। । 1 गेते बच्चे का 'मूड' (मन स्थिति) बदलना चाहिए । उमकी दिलचम्पी के विषय की तरफ उसका मन मोड देना चाहिए । मेरे भानजे का लडका है मोन् । क्रिकेट का शौकीन है, चित्रकला का भी। निजी मकान की अपेक्षा विगार के मकान मे बागीचा ज्यादा अच्छा लगता है। बच्चा फूलो का शौकीन है। मेरी मेज पर फूल लाकर रस देता है और तारीफ का इतजार करता है । टेलीविजन पर क्रिकेट देखता रहता है। उसके प्रिय खिलाडी हैं। जब वह गेता है, तो मैं कहता हूँ ' मोनू गुरु, इम मैच मे तो भारत हार ही जाएगा। रवि शास्त्री तेईस पर आऊट हो गया। वह फौरन रोना बद करके कहता है: क्या बात करते हो मामा जी। अभी तो अजहर को सेलना है । चौवे पर चौवे मारता है, अजहर ।'-वह सुनील गावस्कर, चेतन शर्मा वगैरह की बात करता है । सुश हो जाता है । कभी मैं कह देता हूँ. 'तुम्हारा बागीचा मूल गया, मोन् । आज नो टेबिल पर फूल ही नहीं हैं। वह रोना बद करके कहता है 'अरे. मंग बागीचा कभी नही सूख सकता। क्या बात करते हो। अभी फल लाता है । वह उन्माह मे फूल लाता है और टेबिल पर बड़ी खुशी मे मजाता है। हमारे लोग एक नो बाल-मनोविज्ञान नही ममझते। फिर परेशान रहते हैं। याम मे रहते हैं। वे एक-दो चांटे मारकर इस समस्या को फौरन हल कर देना चाहते हैं। पर बच्च का भीतर कितना हिस्सा मरता है । उमके विकास पर बुरा अमर पडना है । उमे मजा की आदत पडती है। वह बडा होकर नौकरी करता है तो गैर-जिम्मदारी में काम करता है और डॉट या दूसरी मजा के बिना काम नहीं करता। मैं सुद बारह माल अध्यापक रहा। याद करता हूँ नो मेने भी कभी-भी लडको को पीटा था। पर बहुत कम । एक घटना को मैं अब भी याद सता र तो घडी पीडा होती है। मैं माडल हाईस्कूल मे छठवी कक्षा में पढ़ाना था। चपगमी का लड़का था। वह लगातार चार दिन नहीं आया। छटी का प्रार . हम इक उम्र मेवारिफ । भीगा था। उगने पीरा भी नहीं चुकाई थी। पांचवें दिन पर आया और बात उत्तारा अपनी जगह बैठ गया। उसके गाग गगा और बोला : 'अरे, चार दिन राम मयों नहीं आए ? पीर भी नहीं पटाई । नाग बाट जाएगा । बोल, कहां गायव सो गया था?' या नीचा सिर किए सड़ा रहा। मैंने तीन बार उसने पाछा, परवाह धेगा ही मला रहा । मुझे गस्सा आ गया । मैंने कोटा: 'अरे, कुछ बोलता भी नहीं है। और एक गाँटा गार दिया। उसकी आँखों में और गिरने लगे। धीरे-गे बोला : 'सर, पिता जी की मृत्यु हो गई।' अब मेरी हालत बहुत सराव हो गई। गो जैसे गी जते पड़ गए हों । आत्मग्लानि मे मैं निश्चेत-मा हो गया । इतनी पीला किमो लगा मैं पूरी कक्षा के सामने रो पड़ेगा। मैं फौरन बाथरूम गगा और वात रोता रहा। मैं आगे की पढ़ाई के लिए टिमरनी भेजा गया। वहीं मेरी बुआ थी। उनका नमा बेटा कांस्टेबल था और परिवार बड़ा था। मेरे पिता सहायता करते रहते थे। एक तरह से गंगगत परिवार -जैसा था। आगे तो जब मेरे माता-पिता भी टिगनी आ गए, तो गव गाथ रहने लगे। मेरी बुआ अद्भुत थी। बड़े जीपट की। पबलाती नहीं थी। उसके मुंह से अगसर गह बात निकलती थी : 'कोई पिता ना । सब हो जाएगा।' पनास साल पहले की उरा ब्राहमण वृक्षा ने मेरे सहपाठी एक मगलमान लड़को को तीन महीने पर में रख लिया-पर केनके की सगा। कोई आणत नाहीं । बस, उसके साने के बर्तन अलग रहते थे। पर या अनवर को नहीं मालूम था। हमारे पलोग में एक पल दंपती साते थे । वृत पयोगी अद्भुत आदमी थे । बीगार रहते। मुझे पता नहीं, उन्होंने गया धंधा किया होगा। भोपाल गज्य में शाम पटवारी गा की काछ सेती करते थे। बहरहाल अब वेकाछ नहीं करते थे। उन्हें अपनीमराने की आदत थी। शाम होते ही ये अफीम मांगने लगते। ग्रला कभी का देती : 'हा, लाती है। पैसे का ज्ञानाम भी तो करना पड़ता है।' चिल्लाने : 'पैसे अपने जग भाई गेलिया करन । गाना. मलो अफीम नहीं सिना गया था तो अपनी बहिन की शादी मारोगों की जब अफीग गद गाती तो से जगलियों में पलंग के गाटा पर ताल देकर गाने लगने: 'गरा मे न बोले कान्हा बाजवंद सोने कानमा बाजचंद सोले। 34/गइक उस सेवाकिफाई ।

गेज यही गाते । बृद्धा कहती 'बाजवद खुल गए । अवखाना खा लो और मो जाओ। हमे इस दृश्य मे बड़ा मजा आता। 'बाजवद सोल मे मुझे कुछ माल पहले का एक मामला याद आ गया। मेरे एक परिचित थे, जो मडक किनारे मकान मे ऊपर की मोजल पर रहते थे। उनका लडका नौकरी करना था। वह अद्धीक्षिप्त-जैमी हरकते करता। रात को मोना नहीं । एक-दो बजे छोटे भाई में कहता कि मुझे स्कूटर पर घुमाओं। कभी मौ रूपए कामावुन ले आना। कभी कहता 'मामने में मात मुर्देनिक्ले हैं अभी। मैं आज ऑफिम नहीं जाऊँगा।' उमके पिता बहुत इलाज कराते थे। एकदिन मैंने उनसे कहा 'लडके की शादी कर दीजिए। उन्होने कहा 'शादी की उम्र में तो इनकार करता रहा। अब मैंतीम माल का हो गया है। लड़की मिल भी गई और यह ठीक नहीं हुआ तो ममम्या और विकट जाएगी । वैसे उसकी शादी के बारे मे मैं भी माल-भर से मोच रहा हूँ। आप भी यही कहते हैं। वे आगग-दिल्ली और अपनी रिश्तेदारी मे गए और पद्रह दिनो मे लड़के की शादी कर लाए 1 3-4 दिन बाद मैंने देखा कि लड़या छत की मुंडेर मे टिके हुए गा रहा है। जव माझढले आना जवदीप जले आना दमदिन मेंने उसके पिता मे पूछा कि अब कैमा है। उन्होंने कहा कि अब विलकुल ठीक है। मैंने कहा 'हां, मैंने उमे कल शाम छन पर गाते देखा था- जब मांझ ढले आना जव दीप जले आना। वे मज्जन बहुत हॅमे। ग्लो-वनांकलर मिडिल स्कल था वह । डिस्ट्रिक्ट काउमिल का स्कूल था। वहाँ काग्रेम का कब्जा था। इमलिए अंग्रेजी शामन होते हुए भी कई अध्यापक गांधी टोपी पहनते थे। बाद में जब 1937 में प्रदेश में काँग्रेस की मरकार बनी तब तो हाई स्कूल के कई अध्यापक गाँधी टोपी पहनने लगे। 11938 में हमारे कम्बधी काँग्रेस कमेटी के मचिव एक अध्यापक ही थे। मैं महायक सचिव था.मैं तबदमवी कक्षा का छात्र था और भापण बढिया देना हम इक उम्र से वाकिफ हैं /25 । था। वे अध्यापक 'दाँत निपोर' आदमी थे। 'हे हैं करते रहते। लोकल बोर्ड के स्कूल में अध्यापक थे। लोकल बोर्ड चेयरमैन हमारे बड़े नेता थे। उनके पास मलाह करने जाते तो अध्यापक सचिव पीले दाँत निपोरकर कहते : भैया हुन (चेयरमैन) जैसों आदेस दें वैसों ही करनौ चैये।' अव मेरी राजनैतिक ईमानदारी बताऊँ। 1937 में मैं काँग्रेस का स्वयंसेवक था। 'विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा'-राष्ट्रीय गान गानेवाले गुट में था। पर हमारे स्कूल के मैनेजर 1937 के चुनाव में विधान सभा के लिए काँग्रेस के खिलाफ खड़े हुए। तो दिन को तो मैं काँग्रेस की चिटें बाँटता था और रात को मैनेजर की चिटें वनाता। 1937 में काँग्रेस की सरकार वन गई, तब जेल जाने का डर नहीं रहा । डटकर काँग्रेस का काम किया। अपना कुल इतना राजनैतिक जीवन रहा। मिडिल स्कूल और फिर प्राइवेट हाई स्कूल में कई तरह के अध्यापक मिले। पाँचवीं में अंग्रेज़ी के अध्यापक छड़ी लेकर कक्षा में घूमते रहते थे। जिस खिड़की के पास पहुंचते उसी पर नाक का मैल निकालकर चिपका देते और पास वैठे लड़के को अकारण ही छड़ी मार देते। गनीमत है, वे कुल तीन महीने रहे। वरना वे कभी घर मे नाक साफ करके नहीं आते और हम लोग पिटते । फिर बहुत ही सौम्य अध्यापक आए-गोखले। वे छड़ी रखते ही नहीं थे। बड़े प्यार मे पढ़ाते थे। हाई स्कूल के मैनेजर पंजाबी थे। वे ज्यादातर पंजावी शिक्षक बुलाते थे। पंजावी तो वहुत बुद्धिमान होते हैं। पर हमारे मैनेजर शायद पुरातत्व विभाग से कहते होंगे कि ज़मीन में से खोदकर विचित्र चीजें भेजो। एक हिंदी के अध्यापक आए। पंजाव में तव हिंदी 'प्रभाकर' की डिग्री मिलती थी। यह वी.ए. के बरावर मानी जाती थी। ये सपताल मास्साब हिंदी में कोरे ही थे। आदमी अच्छे थे। कह देते थे-यह हम नहीं जानते। हम तो 'परभाकर' हैं जी। विहारी का यह दोहा उन्होंने पढ़ाया : मेरी भव वाधा हरौ राधा नागरी सोय जा तन की झांई पड़े श्याम हरित द्युति होय । सतपाल जी ने 'सोय' का अर्थ सोनाले लिया, जबकि उसका अर्थ है वही' । सोने का अर्थ लेकर उन्होंने राधा-माधव को साथ सुलाकर भव-बाधा हरवा दी। बड़े संकोच से मैंने कहा : 'सर, इसका यह अर्थ नहीं है। इसका सही अर्थ 26/हम इक उम्र से वाकिफ हैं . । यह है।' उन्होंने कहा.'आपका बताया अर्थ ही ठीक होगा। भई हम तो परभाकर' हैं जी !' वे मुसकराते रहते । कभी डॉटते नहीं। और जिम महजता मे वह कहने 'हम तो परभाकर हैं जी, तो हमे वे अच्छे लगते । दूसरे पजाबी अध्यापक जो आए, वे लडको से कहते 'ए, तुझे जूते मारूँगा।' बीच मे छुट्टी में वे किसी भी लड़के मे कह देते 'जा,गिलास मे पानी भरकर ले जा और बाहर निय विक रहे हैं, तो एक निबू पानी मे निचोडकर ला।' हमारे गणित के अध्यापक को कुछ नही आता था। वे हमे सवाल करने को किताब मे से दे देते। हममे नही बनता, तो जब वे पास से निकलते तो हम कहते 'मर, यह सवाल नहीं बनता । बता दीजिए।' मास्माब हमारा कान मरोडकर कहते 'आसान है। डु इट! डू इट!' असल मे उन्हें खुद नहीं आता था। हमने उनका नाम 'डू इट माम्टर' रख दिया था। हमने एक प्रिय अध्यापक से पूछा कि इन्हें तो कुछ नहीं आता। मैनेजर ने इन्हे क्यो रख लिया? उन्होंने समझाया 'तुम लडके लोग जानने नहीं हो कि मैनेजर को उनसे अपनी लडकी की शादी करनी है।' एक बहुत अच्छे अध्यापक थे, व्रजमोहन दीक्षित । होशगाबाद मे अभी रहने हैं। जबलपुर मे पढे थे। भवानीप्रमाद मिश्र, भवानीप्रमाद तिवारी, गमेश्वर गुरु, मोहनलाल वाजपेयी आदि की मडली के वरिष्ठ सदस्य थे। 'मन्ना भैया कहलाते हैं । इसी मडली में मैं आगे चलकर शामिल हुआ। पर 1939 में तो वे हमारे अत्यत आदरणीय व प्रिय अध्यापक थे। वे नाटक कराते थे। खुद बढिया रोल करने थे। उम माल की गमलीला मे ता उनका जयजयकार हो गया। वे बहुत भावक और प्रभावशाली वक्ता थे। कस्बे मे उनकी बहुत इज्जत थी। पर दीक्षित माम्साव ने एक चमत्कारी काम किया। हमारे हेडमास्टर कन्या विद्यालय की प्रधान अध्यापिका से इश्क फरमा रहे थे। वह हमारे ही मुहल्ले में रहती थी । उममे थोडा आगे दीक्षित मास्साब रहते थे। एक रात हेडमास्टर साहव रमण हेतु नायिका के मदन मे प्रवेशे तो मुहल्ले के लोग इकट्ठा हो गए। काफी मख्याभे कोधित मुहल्लेवाले चिल्ला रहे थे 'अरे बाहर निकल। माले, बदचलन हेडमास्टर । मुहल्ले को क्या चकलाघर समझ रखा है। यह पक्का था कि माहव बहुत बुरी तरह पीटे जाते। तभी पोस्ट मास्टर मेहता ने कहा.'अगर इन माहब को कोई बचा सकता है तो दीक्षित मास्टर माहब 1 उन्हे बुलाओ।' हम इक उम्र से वाकिफ हैं/27 दीक्षित मास्साब आए। ऐसी मार्मिक अपील उन्होंने, इतनी भावुकता से की कि लोग वहाँ से चले गए। तब दीक्षित जी ने हेडमास्टर को बाहर निकाला और ताँगे पर विठाकर घर पहुँचा आए। दूसरे दिन साहब स्कूल नहीं आए। वहुत बदनामी हो गई थी और मैनेजर ने उन्हें सस्पेंड कर दिया था। उनका वहाँ से चला जाना पक्का ही था । एकदिन तो वे घर में छिपे रहे। लेकिन वाह रे हेड मास्साब ! साहस या वेशर्मी की हद कर दी । स्कूल के पास पान का ठेला लिए एक आदमी बैठता था। वह लोगों के बैठने और गपशप करने की जगह थी। मैंने देखा-लुंगी पहने हेडमास्टर साहब मज़े से चले आ रहे हैं। उस घटना की कोई शर्म चेहरे पर नहीं। वे पानवाले के पास बैठ गए और बोले : 'खिला यार, एक डवल पान बढ़िया।' उन्हें देखने के लिए आसपास बहुत लोग जमा हो गए। पर वाह रे हेडमास्टर ! वे लोगों से मज़ाक करते रहे। ऐसे तो हमारे हेडमास्टर हुए जिनसे सुसंस्कार लिए। । म इक उम्र से वाकिफ हैं दस फार एंड नो फर्दर गुमनिंदा मैं काफी कर चुका । पुराना विश्वास है कि गुरुनिदा मे कोढ़ होता है। तो शिष्य का अंगूय कटवाने में कैंसर होता होगा। द्रोणाचार्य को हुआ होगा। मामत पुत्र के लिए जो गरीब के पुत्र का अंगटा कटवा ले, ऐसे गुरु को युद्ध में वारत में नहीं मरवाना था। व्यास ने न्याय नहीं किया। अच्छे गुरुओं का मैने आदर भी किया है। इसलिए मुझे कोढ़ नहीं हुआ, 'प्लरिमी' हुई थीं। आगे चलकर मै खुद अध्यापक हुआ और मैं अध्यापकों का पहला मगठन बनानेवालो में है। मैं अध्यापकों का नेना रहा है। गुरुओं के जलूम निकलवाए हैं, हहनाले करवाई है और स्कूलों में नौकरियाँ खोई है । मैं डटकर खहा हूँ अध्यापकों के हितों के लिए, अधिकारों के लिए, बेहतर जिंदगी के लिए। यह कया आगे रहूंगा। मगर इनमे शिकायते चालीम माल पहले भी थी और अब भी हैं। अब ज़्यादा हैं। तब चालीम साल पहले नीचे की कक्षाओ के अध्यापक बच्चों को पीटते थे, यह महीं है। पर यह एक 'रिफ्लेक्म' जैमा या। अन्यया वे छात्रों को चाहने ये। उनमें दिलचस्पी लेते थे। उनकी उन्नति चाहने थे। वे नैतिक दायित्व भी अनुभव करते थे और शिक्षण को एक पवित्र कार्य भी मानते थे। आदर्शवादिना थी उनमे। यह बान अव बहुत कम है में ऐसा नहीं कहता कि पुराना जमाना बेहतर होता है। नहीं, अमल में आजादी के बाद मे मूल्यों में लगातार गिरावट आती गई है । मूल्य-पद्धति बहुत बदल गई है। इस मृत्य-पद्धति के केंद्र से मनुष्यता हट रही है। लोग अभी भी अध्यापकों में उच्चतर नैतिक मूल्यों की अपेक्षा करते हैं। कॉलेज और विश्वविद्यालयोमरस्वती के पवित्र सस्थान मानते हैं। वहां की - हम इक उप मे वाकिफ है/20.

कोई शिकायत हो, तो अखबारों में लोग पत्र लिखकर ग्लानि बतलाते हैं-सरस्वती के पवित्र मदिर में तो ऐसा अनैतिक कृत्य नहीं होना चाहिए। तो अनैतिक कृत्य कहां शोभा देते हैं ? हमने क्या यह मान लिया कि इन-इन जगहों में अनैतिक कृत्य होंगे, भ्रष्टाचार होगा। और यह जायज होगा। पूरी तरह न्यायसंगत । अनैतिकता इन जगहों में शोभा देगी। मगर हाय ! सरस्वती के पवित्र मंदिर विश्वविद्यालय में ऐसा अनैतिक काम नहीं होना चाहिए । मैंने एक विश्वविद्यालय में भापण देते ममय अध्यापकों और छात्रों में कहा था : लोग आप लोगों से बहुत अधिक आशा करते हैं। आप में से अधिकांश अध्यापक यहाँ सरस्वती की भक्ति के कारण नहीं आए, विद्यादान को पवित्र मानकर नहीं आए। आप सिर्फ नौकरी कर रहे हैं। यहां नौकरी न करते तो पुलिम या आबकारी या इनकमटैक्स विभाग या सेल्सटैक्स विभाग में करते या जुआ-सट्टा सिलाते । अभी भी आप में बहुत मे ऐसे लोग यहाँ बैठे हैं, जिन्हें पुलिस थानेदारी मिल जाए, तो वे फौग्न सरस्वती की गोद छोड़कर थानेदार की कर्मी पर बैठ जाएं। आपसे विशिष्ट नैतिकता की माँग होती है। समाज में संपूर्ण मूल्य-पद्धति (टोटल वैल्यू मिस्टम) होती है, खंड-खंड नहीं। विश्वविद्यालय हिंद महासागर में स्थित कोई दूर का द्वीप नहीं है, जहाँ बंबई के सट्टे की हवा न पहुँचती हो । जो नैतिक मूल्य राजनीति में, बाजार में, पुलिस में, आवकारी में होंगे, वही विश्वविद्यालय में होंगे। आप लोग बदनाम कम हैं, सो इसलिए कि इस जगह मौके कम हैं । पर जो भी मौके हैं, उनका उपयोग आप भी करते हैं। पुलिस विभाग मरीखे मौके यहाँ होते तो आप भी थानेदार सरीखे जुए का हफ्ता बटोरते और बदनाम होते। मगर मेग यह मतलब कतई नहीं है कि विश्वविद्यालय भी भष्ट हो जाएं। वे न हों। अगर कोई यह भ्रम पाले है कि ये आचार्यगण प्रकाश देते हैं, हमें पिछड़ेपन से सींचकर बाहर निकालते हैं, आधुनिक बनाते हैं और वैज्ञानिक दृष्टि देते हैं, तो इस सम को निकाल दें । तुलसीदास के ज़माने में तो कुल ब्राह्मणवाद होगा, पर आज विश्वविद्यालय में कान्यकुब्ज ब्राह्मणवाद और सरयूपारी ब्राह्मणवाद है । यह क्या प्रक्रिया है कि हम जितना ज्यादा पढ़ते हैं उतना ही पीछे जाते हैं ? जवाहरलाल नेहरू बार-बार 'माइंटिफिक टेंपर' और 'साइंटिफिक एटीट्यूड अपनाने पर जोर देते थे। मगर यह वैज्ञानिक दृष्टि दे कौन ? नई शिक्षा नीति के संबंध में मुझसे बात करने प्रोफेसर लोग आते रहे हैं। मैं कहता हूँ : आप में जो 30/हम इक उमने वाकिफ हैं विज्ञान पढ़ाते हैं, डॉक्टर ऑफ माइंस हैं, वेमिर्फ लेबोरेट्री' (प्रयोगशाला) में ही वैज्ञानिक दृष्टि रखते हैं। बाहर अवैज्ञानिक हैं । आप प्रयोगशाला मे बाहर हुए नहीं कि शास्त्री से जादू-टोनावाले हो जाते हैं। जीवन और जगत के बारे मे आपकी दृष्टि अवैज्ञानिक होती है। आप अपनी सफलता के लिए सत्य माई बाबा, हनुमान जी या किसी भी तांत्रिक की भक्ति करते हैं। आप प्रयोगशाला में ऑक्सीजन और हाइड्रोजन को मिलाकर पानी बना देते हैं। इसी तरह प्रयोगशाला में आप यह सिद्ध करके दिखाइए कि आप रीडर से प्रोफेसर सत्य साईबाबा की फोटो टांगने से और भभूत खाने मे हुए । उस भभूत का विश्लेषण करके बताइए कि इसमें वे तत्व हैं, जिनसे नौकरी में तरक्की मिलती है। प्रोफेमरी और सत्य साई बाबा की भभूत मे कार्य-कारण संबंध आप सिद्ध कीजिए। विज्ञान की ऊँची-से-ऊंची पढ़ाई करके डिग्री ले लेने का यह जरूरी निष्कर्ष नहीं है कि दृष्टि वैज्ञानिक हो जाएगी। कृष्ण मेनन ने लिखा है कि यूरोप में मुझे विज्ञान मे नोबल पुरस्कार प्राप्त ऐसा वैज्ञानिक मिला, जिसका विश्वास है कि दुनिया कुल ढाई दिनो में वैसे ही बनी जैमा बाइबिल में लिखा है। गुरु-शिष्य सबध आदान-प्रदान का है। गुरु मे देने की क्षमता चाहिए और शिष्य में लेने की । लोटे को महासागर मे डुबाओ तो भी उतना ही पानी उसमें आएगा जितना डबरे मे डुबाने मे । और इधर टकी में पानी नहीं है, तो कितना ही मोटा नल हो, वह सुरसुराएगा पर पानी की एक बूंद नहीं टपकाएगा। तुलसीदास ने दो परस्पर-विरोधी पर दोनो सही बाते कही है। कहा है मठ मुधरहि सत्मगति पाई। पारस परस कुधातु मुहाई।। यह पारम की क्षमता है कि लोहे जैसी घटिया धातु को स्पर्श से मोना बना देता है। दूसरी जगह कहा है मूरख हृदय न घेत जो गुरु मिलहि विरचि सम फूलहि फलहिं न बेत जदपि सुधा बरसहि जलद । यादल चाहे अमृत बरसाएं, मगर बेंत में फल और फल नहीं आएंगे। हम इक उम्र से वाकिफ है/31 - मुझे हाईस्कूल में एक पारस अध्यापक मिले और मैं भी कोरा वेंत नहीं था। ग्यारहवीं कक्षा के आरंभ में हमें बताया गया कि हमारे अंग्रेजी के नए अध्यापक आ रहे हैं केशवचंद्र बग्गा। हम लोगों ने कहा-लो, मैनेजर ने पंजाब के म्यूजियम से एक और अजूवा बुला लिया। ऐंजी! पणजाव दा शेक्सपीअर आरिया है। एक दिन हेड मास्टर माथुर साहब केशवचंद्र वग्गा को लेकर आए और कक्षा में उनका परिचय दिया। वे अंग्रेज़ी और इतिहास के एम.ए. थे। माथुर माहब ने कुछ इस तरह बयान किया गोया बग्गा जी ने इस स्कूल में आकर मेहरबानी की हो । बात यह थी कि वग्गा साहव के बहनोई शमांजी हमारे यहाँ अध्यापक थे। उन्होंने वग्गा जी मे कहा कि कुछ समय के लिए यहीं आ जाओ। मैनेजर ने उनसे विशेष आग्रह भी किया था। माथुर साहब चले गए। हमारे सामने थे मझोले कद केएक 30-32 साल के आदमी। खादी की शेरवानी और चूड़ीदार पाजामा । रंग गोरा । चश्मे के भीतर बहुत सुंदर और भावपूर्ण आँखें, जिनमें वृद्धि की चमक । पूरे व्यक्तित्व में सहज आत्मीयता । बग्गा साहव बोले : 'आई एम योर फ्रेंड एंड एल्डर ब्रदर । वीशैल लन टुगेदर एंड लर्न फ्रॉम ईच-अदर ।' यह बात विलकुल नई थी। हम इम आत्मीयता के आदी नहीं थे। हम आदी थे किसी खीझे हुए अध्यापक के जो कहता : 'यू हैव लट नथिंग ! ओपन पेज 57 एंड यू-यू फूल सिटिंग इन लेफ्ट कॉर्नर, विगिन रीडिंग लाउडली! बग्गा मास्टर साहव ने पढाना शुरू किया। वहुत ड़वकर पढ़ाते थे। विनोद- प्रतिभा गज़ब की थी। एक घंटे में हम कितना सीख जाते और कितना मज़ा लेते थे, इसका अंदाज़ इससे लगाया जा सकता है कि जब उनके पीरियड की घंटी बजती तो हम उछल पड़ते और कहने : 'वाह, बग्गा मास्साव का पीरियड आ गया।' वग्गा जी मुनकराते हुए प्रवेश करते और हमारे चालीस मिनिट ज्ञान और आनंद में निकलते। चालीस मिनिट में मे पच्चीस मिनिट में कोर्स पढ़ाते और वाकी पंद्रह मिनिट में वे कितनी बातें बताते-इतिहास की, साहित्य की, स्वाधीनता आंदोलन की। उनके पास चुटकुले और लतीफे थे। वे बात-बात में मज़ाक करते । कभी अकबर इलाहावादी के शेर सुनाते, कभी उनकी नज़्म आम भेजिए।' शेक्सपीयर तो उन्हें शायद पूरा ही याद था। वे उर्दू पढ़े थे। इसलिए उर्दू साहित्य पर उनका बड़ा अधिकार था। इतिहास के पंडित थे। 32/हम इक उम्र से वाकिफ़ हैं - - इतनी छोटी उम्र के, इतने कम ज्ञान के हम छात्रो से इस कदर दिलचस्पी और बराबरी से संवाद करते थे। एक शाम हम लोग'हाई जंप' (ऊंची कूद) कर रहे थे। शायद चार फीट पर रस्सी थी और हम कूद रहे थे। उधर से बग्गा जी चूडीदार पाजामा और कुतां पहने आए। पूछा : 'कितनी ऊंचाई पर है ?' हमने कहा: 'चार फीट! उन्होंने कहाः'साढ़े चार कर दो।' हमने साढ़े चार फीट कर दिया। बग्गा माहब 6-7 कदम दौडे और गुड्डे की तरह कूद गए। बोले. 'अव पांच फीट कर दो।' पाँच फीट भी वे कूद गए। फिर इच-इच बढ़वाते गए और कूदते गए। इसके बाद मैदान मे फुटबॉल का ऊंचा-से-ऊंचा 'किक' मारने की स्पर्धा चल रही थी। बग्गा जी ने जितना ऊँचा 'किक' मारा, उतना ऊंचा हमने नही देखा था। उन्होने बताया- 'मैं लगातार दो साल विश्वविद्यालय का चैंपियन रहा हूँ।' उन्होंने यह भी बताया कि मुझे दोनो एम ए मे विश्वविद्यालय में टॉप करना था। पर मुझे दोनो मे दूमरा दर्जा मिला, क्योंकि मैं बहुत धीरे लिखता हूँ। मैंने किसी पर्चे मे पूरे मवाल नही किए। अब धीरे-धीरे पीएच.डी के लिए अध्ययन कर रहा हूँ। वग्या माहब को ठड बहुत लगती थी। एक दिन ओले गिरे और ठंड बहुत बढ़ गई। बग्गा मास्माब क्लास मे आए तो हमने देखा कि मोटे हो गए हैं। वे मुसकराए। बोले. 'आजमोटा हो गया हूँन । देखो, मैं कितने कपडे पहने हैं। वे बटन खोल-खोलकर दिखाते गए-ओवरकोट, उसके नीचे शेरवानी, शेरवानी के नीचे जैकेट, जैकेट के नीचे स्वेटर, स्वेटर के नीचे कुरता, कुरते के नीचे एक और स्वेटर, स्वेटर के नीचे बनियान । इतने लदे हुए थे वे। बग्गा साहब पर इतना ज्यादा इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि उन्होने मुझमें ज्ञान के लिए उत्कट प्रेरणा जगाई, अध्ययन की आदत डाली और साहित्य के सस्कार दिए। मैट्रिक मे कौन अध्यापक अपने प्रिय छात्रों को शेक्सपीयर के नाटक पढ़ाता है। बग्गा साहब ने यह किया। 'जूलियस सीजर' और 'मचेंट ऑफ वेनिस' के तो नाटक खिलवा दिए। मेरा मित्र था-मनोहरलाल तिवारी। हम दोनों हमेशा साथ रहते थे। पढ़ते थे, घूमते थे, बाते करते थे। हमने कस्बे की 'अग्रवाल लाइब्रेरी' पूरी पढ़ डाली थी। हाईस्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक पढ़नेवाले छात्रो का यह सौभाग्य है हम इक उम्र से वाकिफ हैं/33 - । कि अध्यापक 'अग्रवाल लाइब्रेरी से पुस्तकें नहीं लेते। इसलिए प्रतिभावान छात्रों को पुस्तकें मिल जाती हैं। मैं और मनोहर पुस्तकें चाटते' जाते थे। सचमुच चाटते थे। हमारी पढ़ने की गति बहुत तेज़ थी। मैं बहुत तेज़ पढ़ता हूँ। पृष्ठ का ऊपर,मध्य और अंत इन तीनों हिस्सों पर नज़र डालकर पन्ना पलट देता हूँ। मगर उस पृष्ठ का कुछ भी नहीं छटता । दूसरे, मेरी स्मरण-शक्ति वहुत तीव्र है। बग्गा साहव ने हमें जवाहरलाल नेहरू की 'रिल्म्सेज़ ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री' के दोनों खंड दिए और मनोहर ने तथा मैंने दोनों पढ़ डाले। हम अंग्रेज़ी के दो दैनिक पर रोज़ पढ़ते थे-'फ्री प्रेस जर्नल' तथा 'हितवाद' । कहाँ से पढ़ते थे? खरीद तो सकते नहीं थे। स्कूल में आनेवाले असवार अध्यापकों के कमरे में ही रहते थे। पोस्ट मास्टर मेरे पिता के बहुत अच्छे दोस्त थे। वे तथा उनकी पत्नी मुझे बहुत चाहते थे। उनके छोटे भाई श्यामलाल रेलवे में असिस्टेंट स्टेशन-मास्टर थे। पर उन्हें वैराग्य का दौरा आया और वे नौकरी छोड़कर अपने भाई के पास रहने लगे। हम उन्हें काका जी' कहते थे। काका जी बहुत अनुभवी, तीव्र बुद्धि और समझदार आदमी थे। वे मुझे और मनोहर को अखबार पढ़वाते थे। शहर में कुछ लोगों के यहां अखवार आते थे। काका जी दो असवारों की एक डिलीवरी रोक लेते। हम जाते तो वे बड़ी सावधानी से पतेवाले रैपर में से असवार निकाल लेते और हम तीनों पढ़ते ।फिर काका जी उन पर जैसा-का- तैमा रैपर चढ़ा देते। काकाजी मस्त आदमी थे। तरह-तरह के किस्से सुनाते थे। दूसरे महायुद्ध के शुरू होने मे रेलों में फौजियों का आना-जाना बहुत बढ़ गया था। हम इन गाडियों को देखने रेलवे स्टेशन जाते थे। काका जी ने अपना अनुभव मनाया : "स्टेशन पर मैं ड्यूटी पर था। बड़े कस्बे का स्टेशन था। मिलिटरी स्पेशल वहाँ रुकी। पूरी अंग्रेज फौज थी। एक कैप्टन दो-तीन सिपाहियों के माथ स्टेशन-मास्टर के कमरे में घुसा । वहाँ मैं कुर्सी पर था। कैप्टन ने एकदम माँगें रस दी: 'इतना बर्फ, इतने अंडे, इतना मक्खन, इतनी सिगरेटें। मैंने कहा : 'यह छोटी जगह है। यहाँ ये चीजें नहीं मिलेंगी। तीन स्टेशन वाद जंक्शन है। वहाँ मिल जाएंगी।' कैप्टन ने गुस्से में कहा : 'बट माई कर्नल टोल्ड मी दि स्टेशन-मास्टर विल अरेंज ऐवरी थिंग। व्हाट काइंड ऑफ ए ब्लडी फूल 34/हम इक उम्र से वाकिफ़ है म्टेशन-मास्टर आर यू!' "मैं जरा देर तो इम रिमार्क मे विचलित हुआ।फिर मैंने धीरज मे कहाः 'कैप्टन, आई डू नॉट नो दै काइंड्स ऑफ ब्लडी फल्म । बट आई ड्रनो दैट दें इंग्लिश आर कल्चर्ड एड रीजनेवल पीपल।' इमसे कैप्टन का पानी उतर गया। उसने फौरन कहा. 'आयम वेरी सॉरी मिस्टर स्टेशन-माम्टर फॉर माई बिहेवियर । प्लीज पॉरगिव मी। हैव ए सिगरेट। वह शर्मिंदा होकर चला गया।' वग्गा माहब के माथ मैं और मनोहर घूमने जाते। रास्ते में वे बहुत-मी वाने बताते । उदाहरण उन्हें हजारों यादथे । शेक्सपीयर को अक्सर उद्धृत करने । ए. जी. गार्डनर के 'आल्फा ऑफ द प्लग' और 'फीवल्म ऑन द शोर' मे में मुनाते । डिकिन्स की बात करते । उर्दू के अच्छे शेर तो बात-बान मे बोलते। एक साम पुलिया पर आकर वे झकते और कहते 'दम फार एड नो फ्दर' और लौट पडते। जब मैं लेखक हो गया तो दिल्ली में मुझे उनकी चिट्ठी मिली- My dear Harishankar, I have read some articles under your name I am told, you have quite a reputation. Are you the same Harishankar, whom I taught in Radha Swamy High School, Timarni, in 1938-39? If you are the same, see me when you are in Delhi next. I do not know your standard of living now, but you can comfortably stay with me आखिरी पत्र मे उन्होंने लिखा कि मेरी एक टांग की हड्डी टूट गई थी। वह जुड़ी और मैं वैसाखी मे चलने लगा, तो दूसरे पाँव की तीन अंगुलियो मे 'इनफेक्शन' हो गया और उन्हें काटना पड़ा। और आगे When sorrows come they come not single spies but in battalions (जब दुख अकेले सैनिक की तरह नहीं, दुखों की पूरी फौज आती है।) वग्गा माहब ने ही मुझे माहित्य के मस्कारदिए और ज्ञान की अनतपिपामा दी। उन्होने मुझे इतिहास-चेतना दी और इतिहास-बोध दिया। पर मैंने तय आना है तो हमइक उससे

एक पंक्ति भी नहीं लिखी वल्कि आठ साल बाद लिखना शुरू किया। लेकिन
प्रेरणा वही थी।
मैं खुद अध्यापक रहा हूँ, सैकड़ों अच्छे अध्यापक भी देखे हैं। पर केशवचंद्र
बग्गा सरीखा कोई नहीं।
दस फार एंड नो फर्दर!
36/हम इक उम्र से वाकिफ हैं

क्या कहूँ आज जो । 'निराला' ने लिखा है दुख ही जीवन की कथा रही क्या कहूं आज जो नही कही बहुत महज वक्तव्य है यह और दुखों के सधे हुए लेखन के कई पन्नो से अधिक मार्मिक । मैंने अपने दुखो का ढिंढोरा नहीं पीटा। लेखन के आरम मे कुछ उद्वेलिन हुआ था और बाद में एक लेख 'गदिश के दिन' में लिखा था में नहीं चाहता अपने को बहुत देना, उन्हे महिमा-मंडित करना और बडे लेखक होने के लिए जो 'मार्कशीट' तैयार होती है उममे दुख के विषय मे अधिक नंवर जुडवाना। अधिक दुख भोगने मात्र से कोई बडा लेखक नहीं होता। अधिक दुख भोगनेवाला चोर भी हो जाता है। किमी को बडा लेखक इसलिए नहीं माना जा मकना कि उसने बहुत दुख भोगे हैं। सिर्फ हाय-हाय की कॅची गे कला मै रग नहीं भरे जाने। दुख सबको होते हैं । यह पूरी तरह सही नहीं है कि दुख मनुष्य को मॉजना' है, दुख आदमी को उठाता है, उसका उदात्तीकरण करता है । यह प्रचार दुख देनेवालो ने दिया है-जिममे वे दूमरो का मुख छीनकर उसका भोग करे और अपने द्वारा दुखी बनाए गए लोगों में कहे कि तुम महान हो और हम क्षुद्र हैं । दुख किमी की सवेदना को व्यापक और गहरा बनाता है। उसे पर-दुख कातर बनाता है । पर दुख मनुष्य को गिगता भी है । उमे नीच और क्षुद्र बनाता है। दुख मनुष्य को अधिक कर भी बनाता है। रचनाकार दुख को दो तरह से झेलता है-मामान्य मनुष्य की तरह और रचनाकार की तरह । वह दुख मे दो तरह मे जूझता और निपटता है। मेरा ख्याल हम इक उम से वाकिफ हैं/37 । ।

- है कि आम आदमी भी दुख से दो तरह से पेश आता है। एक तो यही कि दुख पर चोट दे रहा है, आप चीख रहे हैं, दया मांग रहे हैं। मगर दुख दया नहीं करता। एक दिन वह आपको तोड़कर टुकड़े-टुकड़े कर देगा,विखेर देगा । दूसरातरीका यह है कि आप दुख पर जवाबी चोटें करें-सकारात्मक भी और नकारात्मक भी। निश्चित ही दुख आप पर ज्यादा तीखे प्रहार करेगा, मगर इस तरीके में संभावना है कि आप टूटने और बिखरने से बच जाएँ। ऐसी लड़ाई में हर हालत में जिजीविषा को जगाए रखना होता है, हताशा को दुत्कारना होता है और व्यक्तित्व को इंडित होने से बचाना होता है। मेरी याद में मेरा पहला दुख मेरी माँ की बीमारी और मृत्यु था। इससे पहले दुख मैंने नहीं जाना था। जिसे अच्छा 'खाता-पीता' परिवार कहते हैं, वह था हमाग । कोई दुर्घटना नहीं हुई थी बल्कि बुआ की सबसे छोटी लड़की की शादी भी बहुत अच्छी तरह हो गई। कोई दहेज नहीं लगा। दहेज तव भी दिया जाता था। अधिकतर वधू-पक्ष स्वेच्छा से देता था। मैं लोगों को कहते सुनता था : 'परिवार में एक ही तो अपनी लड़की है । इसे काफी दो।'वर का पिता अगर मांगता भी था,तो वह भी संकोच के साथ । मर्यादा का एक पदां था। वह लड़की-पक्ष से पैसा माँगना मूलतः कुछ अशोभन वात मानता था। वह किसी विश्वासी आदमी को कुछ शर्म के माथ ही इशारा करता था। मैंने सुना था, कोई मेरे पिता से कहता था: 'परमाई जी, वैसे तो हमें कन्या-पक्ष में कुछ नहीं चाहिए। मगर हमारी हालत आप जानते ही हैं । शादी में सचं लगेगा ही। फिर लड़के का नया घर बसेगा। इसमें सर्च लगेगा। तो आप जग तिवारी जी को हमारी कठिनाई ममझा दें। हम तो अपने मुँह में कुछ नहीं कहेंगे। ऐसा नहीं था कि लोभ लोगों में नहीं था। लोभ था । मगर वेटे की कीमत सुले माँगना नहीं होता था। मवेशी-बाज़ार नहीं खुले थे। अब तो लड़के का बाप टेडर' बुलाता है। कुछ इस तरह कि नगरपालिका के 'डंप' किए हुए माल को सरीदने के लिए टेंडर आमंत्रित किए जाते हैं । या इस तरह कि हमारे पास दो बकरे अगली ईद पर कटने को तैयार हैं-इतना कद, इतनी मोटाई, इनना वजन ! खरीदार हममे मिलकर सौदा करें। अव तो लड़के का वाप बेटे के पालन, पढ़ाई, बल्कि जचकी का सर्च भी वसूल करता है। उपभोक्तावाद और बाज़ार की सभ्यता ने अव पति को जिन्स बना दिया है। वह बैल हो गया है। पचास साल पहले वैल विवाह मंडप में नहीं अड़ता था कि स्कूटर अभी दो. वरना 38/हम इक उम्र से वाकिफ हैं शादी नहीं करूंगा। हर पीढ़ी मेकाति की उम्मीद की जाती है। यही हमारी नई पीढ़ी का क्रांतिकारी रूप है, जो मार्वजनिक रूप में जनेऊ तोडकर फेंक देता है और उधर विवाह मडप में अपने-आपको वेचता है। दोमुंहापन, मुखौटा, पाखंड, क्षुद्रता, बेशर्मी पहले से ज्यादा है। गनीमत है कि बहुत मे युवक इममें वचे हैं। - सुनता हूँ--आजकल आई ए एम. का रेट दो लाख पर पहुंच गया है सुनता है-यूनिवर्सिटी मे पढ़ानेवाले लडके को लडकी देने से क्या फायदा ? मूखी तनख्वाह पर ही तो गुज़ारा होगा। इसमे अच्छा है, सिंचाई विभाग के उम मब-इजीनियर को लडकी दे दो। ऊपरी आमदनी बहुत होगी तो मुख मे रहेगी। । वर उपभोक्ता वस्तु की तरह बाजार मे है । यह अनिवार्य उपभोक्ता वस्तु होता गया है-प्राणरक्षक दवा की तरह। यह माल कई प्रकार का होता है, कई क्वालिटियों में मिलता है, अलग-अलग म्टेडई का होता है। जिसकी जैमी हैसियत है, वैमा माल खरीदा जाता है। मजबूरी है। विना दहेज के प्रेमविवाह अव कुछ बढ़े हैं। पर जो विवाह रूपोन्माद- यौनोन्माद में होते हैं वे चार-पांच महीने में असफल हो जाते हैं। अतरजातीय प्रेमविवाह मेरी जानकारी मे, कुछ मेरी मदद मे, हुए हैं। मेरे विचारों के कारण मैं युवक-यनियों को विगाइनेवाला माना जाता हूँ, बुजुर्गों द्वारा। मैंने देखा है, माता-पिता पहले गुम्मा करते हैं, पुलिम की शरण में जाते हैं, कुछ गुडागर्दी करते हैं। पर चार-पाँच महीनो में दोनों परिवार ऐसे विवाह को स्वीकार कर नेते हैं। लड़के के मां-बाप कमाऊ पून को हाथ में निकलने नहीं देना चाहते। लडकी के मां-बाप समझ लेते हैं कि बुढ़ापे का महाग'प्राविडेट फड' लडकी ने बचा दिया। दो हफ्ते पहले ही मंग एक प्रिय युवक दूसरी जाति की लडकी मे शादी करकं इधर आ गया। उसने बताया कि पचाम हजार रुपए मे मेरे परिवार नेकिमी पग्विार में मेरी शादी नय कर ली थी। परिवार को यह दुख नहीं है कि कान्ययम्जो में नाक कट गई। दुख पचास हजार जाने का है। उन्हें लगता है, जैमे गत कां निजाग मे में उनके पचास हजार रुपए चोरी चले गए। एक लडक-लडकी ने इसी तरह शादी करने का नय क्यिा। लड़का-लडकी दोनो अच्छी नौकरियों पर हैं। लडके के मां-बाप ने विरोध किया। लड़का लड़की महित अपने पिता के पास आया और कहा 'पिता जी, आपको हममे पचाम हम इक उम्र से वाकिफ हैं/39 । हज़ार ही चाहिए न! हम दोनों का वेतन मिलाकर साढ़े पाँच हजार है। हम पचीस हज़ार आपको अभी एकमुश्त देते हैं। और फिर आगामी पचीस महीनों तक हज़ार रुपया देते जाएंगे। अब तो आशीर्वाद दे दीजिए।' लिख तो मैं रहा था अपने पहले दुख माँ की मृत्यु के बारे में । मैं तव आठवीं कक्षा में पढ़ता था। मुझसे छोटा एक भाई और तीन बहिनें थीं। बचपन में बहुत मे बच्चों की माँ की मौत हो जाती है। बहुत दिन दुख रहता है । फिर सामान्य हो जाना है। मेरी माँ की मृत्यु मेरी स्मृति में इतने गहरे क्यों जमी है ? एक कारण तो यह कि यह मृत्यु भयावह आतंक के वातावरण में हुई। दूसरे, इस मृत्यु ने वह सुरक्षित रास्ता छुड़वा दिया, जिस पर हमारा परिवार आगे बढ़ रहा था। माँ की मृत्यु ने हमें काँटों पर चलने को मजबूर कर दिया। काफी अरसे से माँ बीमार थी। पिता जंगल में काम देखने कम जा पाते थे और धंधा विगड़ रहा था। वीमारी का अंतिम दौर जब आया तब प्लेग पड़ा था। सारा कस्बा खाली हो गया। लोग खेतों में छप्पर डालकर रह रहे थे। कुछ ही परिवार मजबूरी में वस्ती में रह गए थे। शाम से भयावह सन्नाटा । रात को माँ की दर्द से चीख । कभी किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज । तीन लालटेनें गत-भर जलती थीं। मेरे पिता और दादा एक लालटेन और लाठी लेकर घूम-घूमकर पहरा देते। मेरी बुआ, उनकी बड़ी लड़की और मेरे साथ पढ़नेवाला उनका लड़का घर में थे । बुआ ने हमें हमेशा हिम्मत दी और कभी नहीं छोड़ा। मेरे पिता की मृत्यु भी उनके बनायुग के घर में उनकी गोद में हुई। हमारा तब कोई घर नहीं था। शाम को हम मव आरती करते हुए प्रार्थना करते थे: जय जगदीश हरे स्वामी जय जगदीश हरे, भक्त जनों के संकट छन में दूर करे। भजन के बाद हम सब रोने लगते थे। हम जानते थे कि माँ मरनेवाली है और जगदीश कुछ नहीं कर रहे हैं। अभी भी यह प्रार्थना गाते कहीं लोगों को मुन लेता हूँ, तो आतंकित हो जाता हूँ। पचास साल बाद भी यह भजन मेरे लिए अशुभ है, बामदायक है। मैं इससे नफरत करता हूँ। जवानी में ही मैं सब प्रार्थनाओं और भजनों से नफरत करने लगा। माँ भजन के बाद हम बच्चों को चिपका लेती और हम सब रोते । हम कहते : 'माँ, तू अच्छी हो जा।' वह कहती. बेटा, जल्दी अच्छी हो जाऊँगी'-और रोने लगती। पिता भी रोने लगते । सभी 40/हम इक उम्र से वाकिफ हैं ।

रोने लगते। सिर्फ बुआ नही रोती थी। कहती 'अरे, तुम लोग पढ़ने बैठो। और लडकियो, रोटी बनाना शुरू कर दो।' 'जय जगदीश हरे' से कुछ नही हो रहा था। जगदीश हर दिन प्रार्थना के बाद हालत बिगाडते जाते थे। प्रार्थना से कोई फायदा नही। स्कूलो मे प्रार्थना कराई जाती है-शरण मे आए हैं हम तुम्हारी, दया करो हे दयालु भगवन् ! बचपन में ही शरण में डाल दिया बच्चे को । उसे पुरुषार्थ की जगह शरण में जाना मिखाते हैं । सार्थक श्रम से बड़ी कोई प्रार्थना नही है। मैं तो यहां तक कहता हूँ कि मां-बाप को कोई अधिकार नहीं है कि बच्चे को, जब वह अबोध है, जबरदस्ती अपना धर्म भी दे दे। यह अपराध है। बच्चा जब बडा हो जाएगा, समझने लगेगा, तब यदि उसे जरूरत होगी तो कोई धर्म ले लेगा। या बिना धर्म के रहेगा । यह प्रावधान संविधान मे होना चाहिए । वालिग होने के पहले बच्चे को कोई धर्मदे देना दडनीय अपराध होना चाहिए। बच्चा समझता नहीं है और आपने उसे जिंदगी-भर के लिए मुसलमान या हिंदू बना दिया। क्या धाधली । एक रात दो बजे माँ की मृत्यु हो गई। मुबह उन्हे दफनाने के बाद हमारे परिवार की जिंदगी बिलकुल बदल गई। पिता टूट गए, बीमार रहने लगे, धधा चौपट होने लगा और एक निश्चित अनिश्चय मगर भयावहता की ओर हम पाँच भाई-बहिन बढने लगे। भाइयो में मैं सबसे बडा था। औरजिम्मेदारी के अहसास मे पद्रह साल से बढकर पचास माल का हो गया। मुझमे छोटी तेरह माल की वहिन गृहस्थिन हो गई। इम उम्र का कुछ नहीं भूला जाता, मगर वह कितना ही त्रासदायक हो तत्काल भूलकर दूसरे कामो मे. शौको मे, मनोरजनो मे तडका लगा रहता। पिता जी अधिक वीमार होते गए, धधा खत्म हो गया। कोयले की आखिरी दो दैगने उन्होने बबई के किसी व्यापारी को बेची और धधे के औजार फावडे, गेती, तगाडी बेचकर खा गए। दो वैगनो के वे रुपए पिता जी कलेजे से चिपकाए रहते। एक-एक पैमा मुश्किल से निकालते । इन्ही रुपयो मे गेटी चल रही थी, इन्ही मे पिता का इलाज हो रहा था और इन्ही पैसो मे उम्मीद की जा रही थी कि वेतब तक माथ दे, जब तक बडा लडका हरिशकर मैट्रिक पास करके नौकरी पर नही लग जाता। - हम इक उम्र से वाकिफ हैं/41 । से समझ में यह आगया थाकि कॉलेज की पढ़ाई का सपना खत्म हो मेरे चरित्र में एक बात है, जो मेरी बड़ी ताकत है। कोई भी चिता हो, वित हो, आसन्न संकट हो, गर्दिश हो, मैं सव भुलाकर गैर-ज़िम्मेदार होकर सनियमित रूप से कर लेताहूँजिसमें मेरी दिलचस्पी है। तव भी,नौकरी तलाश की गर्दिश में भी, विखरे परिवार की समस्याओं में भी तथा और और कड़ों मुसीवतों के बीच भी कुछ चीजें मैं सब भूलकर कर लेता रहा। अब भी यह मेरी प्रकृति है। मैं पहले की तरह ही रोज़ सुबह मनोहर के साथ घूमने जाता, वैसी ही गप्पें होतीं, हम वैसे ही पढ़ते और विचार करते, वैसे ही हँसते, शाम को खेलता। और खानदानी ब्राहमण के बेटे की तरह खूब खाता भी। घर में जो भी बना हो, भरपेट खाता। क्या शुद्ध ब्राह्मण देवता का भोजन करना देखा है ? भोजन दोपहर को वन जाने पर ब्राह्मण नहाएगा। गंगा, जमुना, नर्मदा, कृष्णा, कावेरी, क्षिप्रा, मंदाकिनी, वेत्रवती मव नदियों के नाम से पानी के लोटे डालेगा। फिर अंगोछे से मिर और शरीर पोंछकर, धोती पर जनेऊ रगड़कर सुखाते हुए ब्राह्मणपाटे पर बैठ जाएगा। सामने भोजन की थाली आएगी। ब्राह्मण सारे विश्व को असार और भोज्य पदार्थों को ही परम सत्य मानकर खाएगा। भोजन पर शत्रु की तरह पटेगा। गले तक जव भर जाएगा, तब उठेगा । दाँत खोदकर कुल्ला करेगा। पेट पर हाथ फेरते हुए डकार लेगा और पीछे से अपान वायु के दो-तीन धड़ाके मारेगा। (नौ द्वारे कौं पीजड़ा तामें पंछी मौन) इसके बाद ब्राह्मण विस्तर प लेटेगा और पेट पर हाथ फेरते-फेरते उसे झपकी लग जाएगी। ब्राह्मण भोजन का यह ठाठ था। एक शाम हम तीन मित्र रोज़ की तरह रेलवे स्टेशन पर घूम रहे थे एकाएक तय हुआ चलो हरदा में फिल्म 'अछूत कन्या' देख आएँ । गाड़ी थी। हम तीनों उसमें विना टिकिट बैठ गए। तीसरा स्टेशन हरदा था मित्र के चाचा वहाँ दुकान करते थे। उनके घर गए। भोजन किया। सिनेमा की टिकटें खरीद दीं। 'अछूत कन्या' में अशोक कुमार और देवि हैं। ये मेरे आदि और अनंत हीरो-हीरोइन हैं। अशोक कुमार की फोट खुश होता हूँ। पिछले दिनों अब की देविकारानी का फोटो उनके रूसी 42/हम इक उम्र से वाकिफ हैं ।

। - पनि गरिक माय एक पत्रिकामे देखा। मोटी, बट्टी और मट्टी हो गई है । मंग मन बहुतासन्न हुआ। पन्ला पलटाया नोदमवित्र दिया । इसमें वही हमार्ग मन चालीमके आमपास की देविकारानी थी-फिल्म'ममता वाली दिलखुश हुआ। बड़ी देर तक देखना रहा। 'अछूता कन्या' देखने के बाद हम तीनों ने प्रण किया था कि हम अद्दत लडकी मे शादी करेंगे। पर उन दो ने तो अपनी अग्रवाल जाति में ही शादी का ली, और मेग अमृत कन्या तो क्या, ब्राह्मण कन्या तर में शादी नहीं हुई। जय मैं मैट्रिक में था,नव एक घटना घटी, जिनने मुझे बहुत गहरा आघात दिया । हम बहुत गरीव हो गए थे। मेर्ग आधी फीस माफ थी । मेरे गर्गबी के कपडे थे । मेरे पाम कोई जैवस्व नहीं होता था,जिसमे मैं दूसरे कई लड़यों की तरह छुट्टी में चाट साता। मगर हीनता की भावना मुझमें कतई नहीं दी। इसका कारण यह था कि मैं दूसरी बातो मे यहत मपन्न या। शिक्षक के प्रश्न पूटने पर मवसे पहले मंग हाय उठना था। भाषण में बहुत अच्छा देता था। पढाई में बहत नेज या । वग्गा माम्माम ने मेरे पाम हो जाने के बाद किमी में पहा कि उनकी जगह अग्रेजी अब कौन पढ़ाता है। उसने किमी अध्यापक का नाम बनाया। वग्गा माम्माय ने कहा 'उनने अच्छा नोहरिशर पढ़ा सकता है।' में बाहर का बहुत पढना या । दमरा महायुद्ध शुरू हो गया था। इस महायुद्ध की पृष्ठभूमि नया लहनेवाली शक्तियों के बारे में जितना मनोहर तिवारी और मैं जानते थे, उनना एक-दो अध्यापक ही जानते होंगे। उसी उम्र में मैं एक ट्यूशन करता था। मब अध्यापक कहते थे कि हरिशयर म्यूल को परीक्षा में गौरव देगा। मैं हीनता की भावना में नहीं उच्चता की भावना में पीडित था। तभी मैट्रिक की परीक्षा के पद्रह दिन पहले यह घटना घटी। हम फ्टबॉल खेल रहे थे। शाम हो गई थी। दो लडके फुटबॉल कोक्कि करते-करने सेल के मैदान मेनगे नाले नवले गए। दर या-मैदान के बीच में। थोड़ी देर नावे लड़के नहीं लौटे तो मैं घर लौट आया। दूसरे दिन सेल के अध्यापक ने मुझे युलाया और पूछा कि वह फुटबॉल कहां है। मैंने यनादिधा विदेदो लाये उसे नाले तक ले गए थे। अध्यापक ने कहा नहीं. पटबाल तुम्हारे पास थी। वर गायव है । या तो नुमने वह गुमा दी या कुछ और क्यिा। कुछ और क्यिा का मतलब था, चुगली । मैंने बहुविनती कीरि मर फटबॉल उन दोनो लडकी हम इक उम्र में वारिफ है/43 - .

। । के पास थी। पर अध्यापक ने कहा : 'नहीं, वे ऐसा नहीं कर सकते। वे बड़े आदमियों के लड़के हैं। एक लड़का सेठ का था और दूसरा स्टेशन-मास्टर का । मैं सन्न खड़ा रहा । मैं गरीब हूँ, तो चोर माना जाता हूँ । अध्यापक ने एक रुपया जुर्माना कर दिया। मुझे जो आघात लगा, उसका बयान नहीं कर सकता। मेरी मर जाने की तवीयत हुई । क्रोध भी बहुत आया। आत्मग्लानि बहुत हुई। मैं नफरत करने लगा अध्यापक से और उनसे जो 'बड़े आदमी' कहलाते हैं। मेरी स्थिति आखिर क्या है ? सारा स्कूल, सारा कस्वा मुझ पर गर्व करता है। पर मेरे पिता बहुत गरीब हो गए हैं, तो मुझ पर चोर होने का शक भी किया जाता है। मेरे भीतर घोर कटुता पैदा हुई। मैंने किसी से यह बात नहीं कहीं। एक-दो बार अध्यापक से जुर्माना माफ कर देने के लिए ज़रूर कहा। पर उन्होंने दुर्व्यवहार किया। मैं आज भी नहीं समझ पाता कि आखिर मैं हेडमास्टर माथुर साहब के पास क्यों नहीं गया। वे बहुत शरीफ और सुसंस्कृत आदमी थे। मुझे बहुत चाहते थे। मैं बग्गा साहब के पास भी नहीं गया। वे उन अध्यापक को बहुत लताड़ते । मैंने पिता जी से भी नहीं कहा। मैट्रिक की परीक्षा आरंभ होने के तीन दिन पहले जब मैं परीक्षा प्रवेश-पत्र लेने लगा, तक क्लर्क ने कहा : 'एक रुपया जुर्माना चुकाओ, तब प्रवेश-पत्र मिलेगा।' मैं हक्का-बक्का रह गया। पिता जी से बात करना कठिन हो गया था। वे बहुत निराश, जिद्दी और कठोर हो गए थे। फिर भी उनसे कहा। उन्होंने पहले तो मुझे लापरवाही के लिए बहुत डाँटा । फिर कहा कि अगर यह झूठा दोष मढ़ा गया है, तो जुर्माना माफ कराओ। मैं एक पैसा भी नहीं दूंगा। मैं फिर खेल के अध्यापक और क्लर्क के पास गया, पर अपमान ही मिला। शायद मैं हेडमास्टर के पास इसलिए नहीं गया था कि इसे मैं आत्म-सम्मान के विरुद्ध समझता था। मुझे यह भी विश्वास था कि एक रुपया पिता जी दे देंगे और जुर्माना दे देना अधिक सम्मानजनक होगा। दूसरे दिन भी पिता जी ने रुपया नहीं दिया। जब परीक्षा शुरू होने में कुल चौबीस घंटे रह गए, तब मैंने फिर कहा । वे बहुत खीझे मगर रुपया नहीं दिया । वे शायद समझते थे कि परीक्षा में बैठने से नहीं रोका जाएगा। 44/हम इक उम्र से वाकिफ़ है । - में घर मे जाकर उम वागावे मंदिन-भर अकेला बैठारहाजिममें बैठकर में और मेरा एक दोस्त पढ़ा करते थे। मैं बहुत वाम में था। शाम को मैं लौटा । पिता जी में मैंने यहुन क्टोग्ता मे कहा: 'एक रुपए के कारण मैं परीक्षा में नहीं बैठ मकँगा। मैं कन मुबह घर मे भाग जाऊंगा और कभी नहीं लौटूंगा। आप जो आशाएं मुझमे लगाए बैठे हैं, वेमव छोड़ दीजिए। मरिए और बच्चो को मागिए।" वे उठकर बैठ गए। ऐमा मैं कभी नहीं बोला था। उन्होंने चुपचाप एक मपया दे दिया। मैं मीधाम्पल के दफ्तर गया। पाम ही क्लर्क रहता था। उ बुलाया, और गन को आठ बजे एक रुपया देकर प्रवेश-पत्र लिया। मुझे यहा दुख इस बात का था कि ये लोग कितने हृदयहीन हैं । ये क्मिी भी प्राणविना पछनावे के ले सकते हैं क्योंकि र्गजस्टर में उनके नाम एक रुपया लिखा है। हेडमास्टर तकने इस बात की जांच नहीं की कि मारे प्रवेश-पत्र जारी हो गए या नहीं। उन्हें यह पना तक नहीं था कि अपने मवमे अच्छे डात्र का प्रवेश-पत्र पड़ा हुआ है और वह परीक्षा में नहीं बैठ रहा है। मेरे मन पर. मेरे विचागे पर बहत अमर डाला इस घटना ने । लवे अरमे तक मैं इस घटना के अमर मे रहा। आगे मेरी जो दृष्टि बनी वह शायद इन घटना में ही बनना शुरू हुई। । हम इक उम्मेवारि गाँधी जी रसोईघर में । . . । जैसा मैंने पहले लिखा है, सारी घरू गर्दिशों के बावजूद मैं डटकर खाता था खेलता था, पढ़ता था, और सामाजिक-राजनैतिक कार्यों में भाग लेता था। घर से बाहर होते ही बदल जाता था। घर लौटने में ज़रूर डर लगता था। वहाँ बीमार, दुखी और चिड़चिड़े पिता होते और उदास छोटे भाई-बहिनें होते। बुआ चौथे स्टेशन बनापुरा चली गई थी और वहाँ उसने छोटा-सा घर बना लिया था। हमारे लठैत दादा ज़रूर लगातार रहे और मेरे पिता की सेवा करते रहे। वे दोनों भाई सलाह करते रहते थे कि कोई छोटा धंधा कर लें, जिससे बच्चे पल जाएँ । किसी धंधे की योजना पक्की नहीं हुई और पास के पैसे खाए जा रहे थे। सारी बातचीत के बाद वे एक ही पंचवर्षीय, दसवर्षीय या स्थायी योजना पर पहुँचते थे, और उस योजना का नाम था-हरिशंकर ! कहते थे-कुछ ही महीनों में शंकर मैट्रिक पास हो जाएगा। पहला दर्जा आएगा और नौकरी फौरन लग जाएगी। मैं काँग्रेस के कार्यक्रमों में खूब हिस्सा लेता था। हमारे स्थानीय नेता थे-नाना साहब गद्रे । वे सभा में हर संभावित वक्ता से कहते थे: 'कुछ तो भी बोलिए। दो शब्द ।' वे खुद 'कुछ तो भी' बोलते थे, मगर दो नहीं हज़ारों शब्द । पर आदमी सच्चे और कर्मठ थे। एक हमारे नेता हरदा के महेशदत्त मिश्र थे। छरहरे बदन के, गोरे, सुंदर, तरुण ! इलाहावाद विश्वविद्यालय से पहले दर्जे में राजनीतिशास्त्र में एम.ए.किया था। वे गाँधी जी के सचिव रहे। फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापक हो गए और कुछ साल पहले जवलपुर विश्वविद्यालय के राजनीतिशास्त्र विभाग के अध्यक्ष पद से रिटायर हुए। वे सुभापचंद्र बोस के साथी भी रहे । वे विधानसभा और लोकसभा सदस्य . 46/हम इक उम्र से वाकिफ़ हैं गाँधी जी रसोईघर में . जैसा मैंने पहले लिखा है, सारी घरू गर्दिशों के बावजूद मैं डटकर खाता था, खेलता था, पढ़ता था, और सामाजिक-राजनैतिक कार्यों में भाग लेता था। घर से बाहर होते ही बदल जाता था। घर लौटने में ज़रूर डर लगता था। वहाँ वीमार, दुखी और चिड़चिड़े पिता होते और उदास छोटे भाई-बहिनें होते। बुआ चौथे स्टेशन वनापुरा चली गई थी और वहाँ उसने छोटा-सा घर बना लिया था। हमारे लठैत दादा ज़रूर लगातार रहे और मेरे पिता की सेवा करते रहे। वे दोनों भाई सलाह करते रहते थे कि कोई छोटा धंधा कर लें, जिससे बच्चे पल जाएँ। किसी धंधे की योजना पक्की नहीं हुई और पास के पैसे खाए जा रहे थे। सारी बातचीत के बाद वे एक ही पंचवर्षीय, दसवर्षीय या स्थायी योजना पर पहुँचते थे, और उस योजना का नाम था-हरिशंकर ! कहते थे-कुछ ही महीनों में शंकर मैट्रिक पास हो जाएगा। पहला दर्जा आएगा और नौकरी फौरन लग जाएगी। मैं काँग्रेस के कार्यक्रमों में खूब हिस्सा लेता था। हमारे स्थानीय नेता थे-नाना साहब गद्रे । वे सभा में हर संभावित वक्ता से कहते थे: 'कुछ तो भी बोलिए। दो शब्द ।' वे खुद 'कुछ तो भी' बोलते थे, मगर दो नहीं हज़ारों 'शब्द । पर आदमी सच्चे और कर्मठ थे। एक हमारे नेता हरदा के महेशदत्त मिश्र थे। छरहरे बदन के, गोरे, सुंदर, तरुण ! इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पहले दर्जे में राजनीतिशास्त्र में एम.ए. किया था। वे गाँधी जी के सचिव रहे। फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापक हो गए और कुछ साल पहले जबलपुर विश्वविद्यालय के राजनीतिशास्त्र विभाग के अध्यक्ष पद से रिटायर हुए। वे सुभाषचंद्र बोस के साथी भी रहे । वे विधानसभा और लोकसभा सदस्य । 46/हम इक उम्र से वाकिफ हैं रह। ये 'महेश वाय'हर्माकशोगें के 'हीरो'थे। पिछले कईमालों ने हम उनके माय विश्व शाति आंदोलन, भारत-म्म मैत्री मप आदि में काम कर रहे हैं। हमारे होशंगाबाद जिले के वास्तविक जननेता नाना अजुनसिंह थे। वे मच्च भूमिपुत्र ये। नेता की कोई बनावट उनमें नहीं थी। जनता की भाषा नई बुंदेली या 'हुलगावादी में बहुत प्रभावगाली भाषण देने थे। आशुकवि थे। दोहं और पद बनाकर बोलते जाते थे। दो पॉकनयाँ वे मापण के उन में जार कहते थे: वई द्वारे ते पत हैं, बई द्वार ते मृत देशभक्त होप नो पन है नहीं मून व्ये मृत लाला अर्जुनमिह विधानममा के मदम्य चनं गए। वहां उन्होंने अपने भाषण में कहाः'नहम पूंजीवाद समझें,नममाजबाद। हम समझे-हुमगाबाद । हमारे हुमगावाजिले की उन्नति होनी चाहिए। वे इनका एक अर्थ और करने यःहोमग-नावाद ! नगठित हो जाना। में मुनता था अंग्रेज़-भक्त अफवाह भी फैलाने थे। कहते थे: यह गांधी बड़ा धूत है। हरिजनों के नाम में चढ़ा इकट्य करता है, और उम पैने ने अहमदाबाद में लड़कों के नाम में कपड़ा मिलें खोलता है।' उस जमाने की गजनीति त्याग की गजनीति थी, 1947 के बाद गजनानि प्राप्ति की हो गई। नवम्वाधीनता आदोलन में शामिल हर आदमी कोई मत था,ऐमा नहीं या। मगठन के भीतर होड़ थी विचारधाग के विवाद भी थे और नगटन में पद-प्राप्ति की नहाई भी। कांग्रेसी एक-दूसरे को काटने भी थे। काँग्रेनी दुकानदार मुनाफाखोग भी करता था। पर आम भ्रष्टाचार नहीं था। अब एक जाति गष्ट्रीय स्वाधीनता जैन महान नयप में लगी हो, नययक्तिगत और मामूहिक नैतिकता उंची होती ही है। गांधी नव ममा के मैदान में ही नहीं थे, वे घर-घर में घुन थे। गांधी का प्रभाव रमाइंघर तक में था। गांधी हर विषय में दखलदानी करते थे। विश्व गजनीति और गष्ट्रीय स्वाधीनता मग्राम में लेकर रमाइंघर और पाखाना तक में। औरतें कहती थी 'गाँधी जी कहते हैं कि मादगी मे रहो। तो अपन ये तामझाम नहीं करते।''गांधी जी को नफाई पसंद है। नो पासाने में मुबह-शाम एक बालटी पानी ऊपर डालते हैं हम ।' जय गांधी जी किमी ममम्या को लेकर उपवान पर बैठने थे, तवर्गर कांग्रेनी घरों की कई औरतं भी एकदिन भोजन नहीं करनी थीं । गाँधी फिल्म में भी घने हम इक उम्र ने वाकिफ हैं/47 । । थे। 'अछूत कन्या' फिल्म गाँधी के आंदोलन से पैदा हुई थी। जो लोग समझते हैं कि गाँधी के नेतृत्ववाला आंदोलन काँग्रेसी ही चलाते थे और वह केवल राजनैतिक था, वेगलत हैं। गाँधी का आंदोलन रसोईघर और पाखाने में भी था, दांपत्य संबंधों में भी था, परिवार की व्यवस्था में भी था। यह जीवनव्यापी आंदोलन था। इसमें बहुत बड़ा योगदान उन असंख्य पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों का था, जिनका नाम अखवार में कभी नहीं छपा। इन्हीं दिनों लखनऊ में मुस्लिम सांप्रदायिक संगठन 'ख़ाकसार' बना, जिसका शस्त्र बेलचा था। इसने कुछ उपद्रव किए । मगर हैदराबाद में बहुत वड़ा फासिस्ट संगठन बन चुका था-'रजाकार'। इसके डिक्टेटर कासिम रिज़वी थे। हैदरावाद में हिंदू-मुस्लिम फ़िसाद बहुत हो रहे थे। हिंदुओं के नेता रामानंद तीर्थ थे। आर्य समाज ने हिंदुओं को जगाने और उनकी रक्षा करने के लिए उत्तर भारत से जत्थे भेजे। इनमें प्रवचन करनेवाले भी होते थे। ये हारमोनियम रखते थे। जोशीले भाषण देते थे। बीच-बीच में हारमोनियम पर भजन गाते थे। ये लोग पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के होते थे, इसलिए उर्दू इनकी मातृभाषा-जैसी थी। धाराप्रवाह भावुकतामय प्रवचन करते थेये। एक शेर इनका मुझे अभी भी याद है : तसव्वुर खींच वो तस्वीर आँखें हों रसाई हो, उधर शमशीर खींची हो इधर गर्दन झुकाई हो। हमारे कस्बे में भी ये रुकते थे। बड़े जोशीले भाषण देते थे। रास्ते के कस्बों, शहरों में ये रुकते, प्रवचन करते और किराया इकट्ठा करके हैदराबाद की तरफ आगे बढ़ जाते। आर्य समाजी प्रचारकों के बारे में भदंत आनंद कौसल्यायन ने बड़ी दिलचस्प बात लिखी है। शहर में एक आर्य समाजी प्रचारक स्वामी जी के तीन भाषण हुए। हमने भाषण के बाद उनसे पूछा 'स्वामी जी, और कितने दिन यहाँ मुकाम है ?' स्वामी जी ने सहज भाव से कहा-'हम पाँच भाषणवाले हैं। तीन हो चुके। दो दिन दो भाषण और देकर चल देंगे।' स्वामीजी पाँच भाषणों के आधार पर छठवाँ भाषण नहीं बना सकते थे। आर्य समाज का सुधारवादी आंदोलन था। पर यह पुनरुत्थानवादी और कट्टर सांप्रदायिक था। आर्य समाजियों का विश्वास कुछ इस तरह का होता है कि वैदिक साहित्य की रचना के बाद पाँच हज़ार सालों में पूरी मनुष्य जाति ने 48/हम इक उम्र से वाकिफ हैं ।

कुछ नहीं सोचा । इसी तरह का यह विश्वास है कि पैगवर मुहम्मद के बाद तेरह शताब्दियों मे पूरी मनुष्य जाति ने कुछ नहीं सोचा । ऐमा विश्वास जातियो को जड बनाता है। जवाहरलाल नेहरू ने ठीक ही कहा है. Religion gives static view of things मुझे पहला दर्जा नहीं मिला । कारण मेरा अहकार कि पाठ्यक्रम मे वेवकूफ उलझते हैं। मुझे यह मव मालूम है जो इन किताबो मे लिखा है और जो ये अध्यापक बोलते हैं। पहले दर्जे के लिए योजना होती है। सभावित प्रश्न खोजने पड़ते हैं। उनके सधे हुए उत्तर तैयार करने पड़ते हैं। उन्हें घोटना पडता है और मधे हुए उत्तर लिखने पड़ते हैं। मैं यों ही लापरवाह तरीके से परीक्षा में बैठ गया। बहुत कम नवरों से पहला दर्जा छूट गया। 'डिस्टिवशन' मिला उम विषय मे जिसमे में बहुत कच्चा था-गणित में। एक-दो दिन दुखी रहा। फिर अपवारो मे सबमे लुभावनी मामग्री पढ़ने लगा-(WANTED) आवश्यकता है। नौकरी तत्काल और कोई भी मिलनी चाहिए, वरना परिवार भूखा मर जाएगा। मैं खुद क्या बनना चाहता था? मेरी क्या महत्वाकाक्षा थी ? वास्तव मे मेरी कोई महत्वाकाक्षा नहीं थी। सबसे प्रबल इच्छा अध्यापक होने की थी-घग्गा मास्नाव की तरह। लोग अध्यापकी को 'पापड बेलना' कहते थे। में इसमें इतना इजाफा और कर सकता था कि प्राइवेट एम ए करके कॉलेज में अध्यापक हो जाऊँ-तब चावल के पापड से आगे मूंग के पापड वैलता। मेरी एकमात्र इच्छा आदर्श अध्यापक होने की थी। लोग इसे महत्वाकाक्षान तब मानते थे, न अब मानते हैं। इमे वेवकूफी मानते हैं। सही यह है कि मेरी कभी कोई महत्त्वाकाक्षा नहीं रही। अब भी कोई महत्वाकाक्षा नही है। जब पूरी तरह लेखन करने लगा, तब भी कोई महत्वाकाक्षा नही रही। मेहनत से लिखता था। बस यही चाहता था लेखन मार्थक हो और पाठक कहे कि यह सही है । मुझे मान-सम्मान बहुत मिल चुके हैं पिछले पांच मालो में-मानद डाक्टरेट, साहित्य अकादमी पुरस्कार, शिरसर सम्मान, दो और पुरस्कार-आगरा के साहित्य वाचस्पति वगैरह । मेरे पास 10 प्रशस्ति-पत्र हैं, पर वे सब आलमारी मे रखे हैं। मेरे कमरे मे सिर्फ एक चित्र टॅगा है- गजानन माधव मुक्तिबोध का । भाऊसमर्थ मेरा पोर्टेट बनाना चाहते हैं। मैंने यहाँ बैठे लोगों से कहा: अपने कमरे में अपना चित्र या पोर्टेट' लगाना हम इक उम्र से वाकिफ हैं/49 । . संस्कृतिहीनता है। मैं अपना 'पोर्टेट कमरे में नहीं लगाऊँगा।' कोई महत्वाकांक्षा नहीं रही तो हमेशा यह हाय-हाय, असंतोष और वेचैनी किसलिए? इसका कारण है-मैं कभी भी वैसा नहीं लिख सका जैसा लिखना चाहता था। यही दुख रहा। यही दुख इस क्षण भी है, जब यह लिख रहा हूँ। वे कितने सुखी हैं जो अपने लिखे को श्रेष्ठ मानते हैं, खुश होते हैं, संतुष्ट होते हैं। बार-बार खुद पढ़ते हैं और दूसरों को सुनाते हैं। 'छगन-मगन' हैं ये लेखक । कस्तूरी मृग हैं-अपनी नाभि को बार-बार सूंघते हैं और अपनी ही सुगंध से मस्त रहते हैं। नौकरी की तलाश में खूब खाक छानी। हर जगह आवेदन भेज देता। जिस-तिस से मिलता । अपमान सहता। कभी 'गर्दिश के दिन' लिखा था, एक लेख। उसके कुछ अंश यहाँ देता हूँ: -फिर नौकरी की तलाश । एक विधा मुझे और आ गई थी : बिना टिकिट सफर करना। जबलपुर से इटारसी, टिमरनी, खंडवा, इंदौर, देवास वार-बार चक्कर लगाने पड़ते। पैसे थे नहीं। मैं बिना टिकिट बे-खटके गाड़ी में बैठ जाता । तरकीबें बचने की बहुत आ गई थीं। पकड़ा जाता तो अच्छी अंग्रेजी में अपनी मुसीबत का बखान करता । अंग्रेजी के माध्यम से मुसीवत बाबुओं को प्रभावित कर देता और वे कहते : 'लैट्स हेल्प दें पूअर ब्वॉय।' दूसरी विधा सीखी : उधार माँगने की। मैं बिलकुल निःसंकोच भाव से किसी से भी उधार माँग लेता। अभी भी इस विधा में सिद्ध हूँ। तीसरी चीज़ सीखी बेफ़िक्री। जो होना होगा होगा, क्या होगा? ठीक ही - होगा। मेरी एक बुआ थी। गरीब, ज़िंदगी गर्दिश भरी, मगर अपार जीवन-शक्ति थी उसमें । खाना बनने लगता तो उनकी बहू कहती : 'बाई, न दाल ही है न तरकारी।' बुआ कहती : 'चल चिंता नहीं।' राह-मोहल्ले में निकलती और जहाँ उसे छप्पर पर सब्जी दिख जाती, वहीं अपनी हमउम्र मालकिन से कहती : 'ए कौशल्या, तेरी तोरई अच्छी आ गई है। ज़रा दो मुझे तोड़ के दे।' और खुद तोड़ लेती। बहू से कहती : 'ले बना डाल, ज़रा पानी ज्यादा डाल देना। मैं यहाँ-वहाँ से मारा हुआ उनके पास जाता तो वह कहती : 'चल, कोई चिंता नहीं। कुछ खा ले। नौकरी तो लग ही जाएगी।' उनका यह वाक्य मेरे लिए ताकत बना : कोई चिंता नहीं। 'गर्दिश फिर गर्दिश' । होशंगाबाद शिक्षा अधिकारी से नौकरी माँगने गया। निराश हुआ। 50/हम इंक उम्र से वाकिफ़ हैं । स्टेशन पर इटारसी के लिए गाड़ी पकड़ने के लिए बैया था। पाम में एक रुपमा पा,जो कही गिर गया था। इटारमी तो बिना टिकिट चला जाता। पर साऊं क्या? दूसरे महायुद्ध का जमाना । गाड़ियां यहुत लेट होती थी। पेट खाली । पानी से बार-बार भरता। आधिर वेच पर लेट गया। 14 घटे हो गए। एक किसान परिवार पाम आ बैठा। टोकरे में उसके अपने खेत के खरबूजे थे, मैं उस वक्त चोरी भी कर मकता था। किसान घरघूजा काटने लगा। मैंन कहा: 'तुम्हारे ही खेत के होगे। बडे अच्छे हैं। किसान ने कहाः'सव नर्मदा मैया की किरपा है भैया! शक्कर की तरह है। लोया के देखो।'उमने दो वही फाँके दी। मैंने कम-से-कम छिलका छोड़कर खा लिया। पानी पिया, तभी गाड़ी आई और हम खिडकी से घुस गए। नौकरी जल्दी ही मिल गई वन विभाग में । इटारसी के बाद नागपुर लाइन पर पहला रेलवे स्टेशन है-ताक। यहां एक बडा सरकारी टियर डिपो' है। यहाँ कुल आठ महीने के लिए मेरी नियुक्ति हुई पच्चीम रुपए महीने पर । मेरा पद था-'जमादार'। मेरे ऊपर डिपो ऑफिसर था। मेरे मातहत दो 'फारेस्ट गार्ड ये। ये तीनो मुसलमान ये। डिपो ऑफिसर मेरी नियुक्ति मे ही नाखुश था। मेरे पिता से उसकी पुरानी जान-पहचान थी। पर मेरे पिता ने उसके मुसलमान होने और अच्छा आदमी न होने की बात किसी से कह दी थी, जो उसे मालूम हो गई। उसने जाते ही मुझसे कहा- 'तुम्हारे वालिद ने फला आदमी से कहा था कि मैं मुसलमान हूँ और तुम्हें तग करूंगा।' और उसने तग करना शुरू कर दिया। वह मेरी जगह किमी मुसलमान को चाहता । मेरे मातहत दोनों फारेस्ट गार्ड मेरे खिलाफ षड्यन करते थे। वे वहाँ 4-5 सालो में थे। इस माहौल में मैं पचड़ा गया और अक्सर काम में गलती कर बैठता। मेरे साथ मेरे लठैत दादा गए थे। वे एकाध महीना रहे और पिता जी की तबीयत ज्यादा खराब होने का समाचार पाकर घर लौट गए। मैं अकेला रह गया। युदखाना बनाता था। वहाँ दृध बहुत अच्छ और सस्ता मिलता था। में कुल सात रुपयो में अपना सर्व निमल लेता था और अयरह रुपए घर भेज देता था। 1940 में इतने रुपए बहुत होते थे। डिपो से लगा रेलवे स्टेशन था। उससे लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर वडी वस्ती थी। हर रेलगाडी वहाँ नही रुकती थी। सिर्फ पैसेजर गाडियाँ रुकती थी। रेल के आने की घटी बजते ही, मैं दौडकर स्टेशन पहुंच जाता। वहाँ मैं आदमी देखने जाता था। तो क्या हम डिपो के हम इक उग्रसेवाकिफ 51 । ।

- . संस्कृतिहीनता है। मैं अपना 'पोट्टेट कमरे में नहीं लगाऊंगा।' कोई महत्वाकांक्षा नहीं रही तो हमेशा यह हाय-हाय, असंतोप और वेचैनी किसलिए? इसका कारण है-मैं कभी भी वैसा नहीं लिख सका जैसा लिखना चाहता था। यही दुख रहा । यही दुख इस क्षण भी है, जब यह लिख रहा हूँ। वे कितने सुखी हैं जो अपने लिखे को श्रेष्ठ मानते हैं, खुश होते हैं, संतुष्ट होते हैं। वार-बार खुद पढ़ते हैं और दूसरों को सुनाते हैं। 'छगन-मगन' हैं ये लेखक। कस्तूरी मृग हैं-अपनी नाभि को बार-बार सूंघते हैं और अपनी ही सुगंध से मस्त रहते हैं। नौकरी की तलाश में खूब खाक छानी। हर जगह आवेदन भेज देता। जिस-तिस से मिलता। अपमान सहता। कभी 'गर्दिश के दिन' लिखा था, एक लेख । उसके कुछ अंश यहाँ देता हूँ: -फिर नौकरी की तलाश । एक विधा मुझे और आ गई थी : बिना टिकिट सफर करना । जबलपुर से इटारसी, टिमरनी, खंडवा, इंदौर, देवास बार-बार चक्कर लगाने पड़ते । पैसे थे नहीं। मैं बिना टिकिट बे-खटके गाड़ी में बैठ जाता । तरकीबें बचने की बहुत आ गई थीं। पकड़ा जाता तो अच्छी अंग्रेज़ी में अपनी मुसीबत का बखान करता । अंग्रेज़ी के माध्यम से मुसीबत बाबुओं को प्रभावित कर देता और वे कहते : 'लैट्स हेल्प दें पूअर व्वॉय ।' दूसरी विधा सीखी : उधार मांगने की। मैं बिलकुल निःसंकोच भाव से किसी से भी उधार मांग लेता। अभी भी इस विधा में सिद्ध हूँ। तीसरी चीज़ सीखी बेफ़िक्री। जो होना होगा होगा, क्या होगा? ठीक ही होगा। मेरी एक बुआ थी। गरीब, जिंदगी गर्दिश भरी, मगर अपार जीवन-शक्ति थी उसमें । खाना बनने लगता तो उनकी बहू कहती : 'बाई, न दाल ही है न तरकारी ।' बुआ कहती : 'चल चिंता नहीं।' राह-मोहल्ले में निकलती और जहां उसे छप्पर पर सब्जी दिख जाती, वहीं अपनी हमउम्र मालकिन से कहती : 'ए कौशल्या, तेरी तोरई अच्छी आ गई है। ज़रा दो मुझे तोड़ के दे।' और खुद तोड़ लेती। बहू से कहती : 'ले बना डाल, ज़रा पानी ज़्यादा डाल देना। मैं यहाँ-वहाँ से मारा हुआ उनके पास जाता तो वह कहती : 'चल, कोई चिंता नहीं। कुछ खा ले। नौकरी तो लग ही जाएगी।' उनका यह वाक्य मेरे लिए ताकत बना : कोई चिंता नहीं। 'गर्दिश फिर गर्दिश' । होशंगाबाद शिक्षा अधिकारी से नौकरी माँगने गया। निराश हुआ। 50/हम इक उम्र से वाकिफ़ हैं । । ।

स्टेशन पर इटारसी के लिए गाड़ी पकहने के लिए बैय था। पास में एक रुपया था, जो कही गिर गया था। इटारसी तो बिना टिकिट चला जाता। पर खाऊँ क्या? दूसरे महायुद्ध का जमाना । गाड़ियां बहुत लेट होती थी। पेट साली। पानी से बार-बार भरता। आखिर वेंच पर लेट गया। 14 घटे हो गए। एक किसान परिवार पास आ बैठा । टोकरे में उसके अपने खेत के खरबूजे थे, मैं उस वक्त चोरी भी कर सकता था। किसान सरबूजा काटने लगा। मैंन कहा: 'तुम्हारे ही खेत के होंगे। वडे अच्छे हैं। किमान ने कहा: 'मव नर्मदा मैया की किरपा है भैया! शक्कर की तरह है। लोया के देखो।' उसने दो बड़ी फांके दी। मैंने कम-से-कमछिलका छोड़कर खालिया। पानी पिया,तभी गाडी आई और हम खिडकी से घुस गए। नौकरी जल्दी ही मिल गई वन विभाग में। इटारमी के बाद नागपुर लाइन । पद था-'जमादार' । मेरे ऊपर डिपो ऑफिसर था। मेरे मातहत दो 'फारेस्ट गाई थे। ये तीनो मुसलमान थे। डिपो ऑफिसर मेरी नियुक्ति से ही नाखुश था। मेरे पिता से उसकी पुरानी जान-पहचान थी। पर मेरे पिता ने उसके मुसलमान होने और अच्छा आदमी न होने की बात किसी से कह दी थी, जो उमे मालम हो गई। उसने जाते ही मुझसे कहा 'तुम्हारे वालिद ने फलां आदमी से कहा था कि मैं मुमलमान हूँ और तुम्हें तग करूंगा।' और उसने तग करना शुरू कर दिया। वह मेरी जगह किमी मुसलमान को चाहता था। मेरे मातहत दोनो फारेस्ट गार्ड मेरे खिलाफ पड्यत्र करते थे। वे वहाँ 4-5 सालों से थे। इस माहौल में मैं घबडा गया और अक्सर काम में गलती कर बैठता। मेरे साथ मेरे लठेत दादा गए थे। वे एकाध महीना रहे और पिता जी की तबीयत ज्यादा सराव होने का ममाचार पाकर घर लौट गए। मैं अकेला रह गया। खुदखाना बनाता था। वहां दूध बहुत अच्छा और सस्ता मिलता था। मैं कुल सात रुपयो में अपना सर्च निकाल लेता था और अयरहरुपए घर भेज देता था। 1940 मे इतने रुपए बहुत होते थे। डिपो से लगा रेलवे स्टेशन था। उमसे लगभग डेढ़ किलोमीटर दर बडी यस्ती थी। हर रेलगाडी वहाँ नहीं रुकती थी। सिर्फ पैसेंजर गाड़ियाँ सकती थी। रेल के आने की घटी बजते ही, मैं दौडकर स्टेशन पहुंच जाता। वहाँ मैं आदमी देखने जाता था। तो क्या हम डिपो के हम इक उम्र से वाकिफ हैं/51 " संस्कृतिहीनता है। मैं अपना 'पोर्टेट कमरे में नहीं लगाऊँगा। कोई महत्वाकांक्षा नहीं रही तो हमेशा यह हाय-हाय, असंतोष और बेचैनी किसलिए? इसका कारण है-मैं कभी भी वैसा नहीं लिख सका जैसा लिखना चाहता था। यही दुख रहा । यही दुख इस क्षण भी है, जब यह लिख रहा हूँ। वे कितने सुखी हैं जो अपने लिखे को श्रेष्ठ मानते हैं, खुश होते हैं, संतुष्ट होते हैं। बार-बार खुद पढ़ते हैं और दूसरों को सुनाते हैं। 'छगन-मगन' हैं ये लेखक । कस्तूरी मृग हैं-अपनी नाभि को बार-बार सूंघते हैं और अपनी ही सुगंध से मस्त रहते हैं। नौकरी की तलाश में खूब खाक छानी। हर जगह आवेदन भेज देता। जिस-तिस से मिलता । अपमान सहता। कभी 'गर्दिश के दिन' लिखा था, एक लेख। उसके कुछ अंश यहाँ देता हूँ: -फिर नौकरी की तलाश । एक विधा मुझे और आ गई थी : बिना टिकिट सफर करना । जबलपुर से इटारसी, टिमरनी, खंडवा, इंदौर, देवास बार-बार चक्कर लगाने पड़ते। पैसे थे नहीं। मैं विना टिकिट बे-खटके गाड़ी में बैठ जाता । तरकीबें बचने की बहुत आ गई थीं। पकड़ा जाता तो अच्छी अंग्रेज़ी में अपनी मुसीवत का बखान करता । अंग्रेज़ी के माध्यम से मुसीबत बाबुओं को प्रभावित कर देता और वे कहते : 'लैट्स हेल्प दें पूअर ब्वॉय।' दूसरी विधा सीखी : उधार माँगने की। मैं बिलकुल निःसंकोच भाव से किसी से भी उधार माँग लेता। अभी भी इस विधा में सिद्ध हूँ। तीसरी चीज़ सीखी बेफ़िक्री । जो होना होगा होगा, क्या होगा? ठीक ही होगा। मेरी एक बुआ थी। गरीब, जिंदगी गर्दिश भरी, मगर अपार जीवन-शक्ति थी उसमें । खाना वनने लगता तो उनकी बहू कहती : 'बाई, न दाल ही है न तरकारी ।' बुआ कहती : 'चल चिंता नहीं।' राह-मोहल्ले में निकलती और जहाँ उसे छप्पर पर सब्जी दिख जाती, वहीं अपनी हमउम्र मालकिन से कहती : 'ए कौशल्या, तेरी तोरई अच्छी आ गई है। ज़रा दो मुझे तोड़ के दे।' और खुद तोड़ लेती। बहू से कहती : 'ले बना डाल, ज़रा पानी ज़्यादा डाल देना। मैं यहाँ-वहाँ से मारा हुआ उनके पास जाता तो वह कहती : 'चल, कोई चिंता नहीं। कुछ खा ले। नौकरी तो लग ही जाएगी।' उनका यह वाक्य मेरे लिए ताकत बना : कोई चिंता नहीं। 'गर्दिश फिर गर्दिश' । होशंगाबाद शिक्षा अधिकारी से नौकरी माँगने गया। निराश हुआ। 50/हम इक उम्र से वाकिफ हैं । -- । स्टेशन पर इटारमी के लिए गाड़ी पकड़ने के लिए बैठा था। पाम में एक रुपया या, जो कहीं गिर गया था। इटारसी तो विना टिकिट चला जाता। पर खाऊ क्या? दुसरे महायुद्ध का ज़माना । गाडियो बहुत लेट होती थी। पेट खाली। पानी से वार-बार भरता । आखिर वेंच पर लेट गया। 14 घटे हो गए। एक किसान परिवार पाम आ बैठा। टोकरे में उसके अपने खेत के खरबूजे थे. मैं उस वक्त चोरी भी कर सकता था। किसान सरवूजा बाटने लगा। मैंन कहाः 'तुम्हारे ही खेत के होगे। बडे अच्छे हैं। किसान ने कहा 'सव नर्मदा मैया की किरपा है भैया ! शक्कर की तरह है। लोसा के देखो। उसने दो वढी फांके दी। मैंने कम-से-कम हितका छोडकर धालिया। पानी पिया, तभी गाड़ी आई और हम खिड़की से घुस गए। नौकरी जल्दी ही मिल गई वन विभाग में। इटारमी के बाद नागपुर लाइन पर पहला रेलवे स्टेशन है-ताक । यहाँ एक बडा सरकारी 'टियर डिपो' है। यहां कुल आठ महीने के लिए मेरी नियुक्ति हुई पच्चीस रुपए महीने पर । मेरा पद था-'जमादार'। मेरे ऊपर डिपो ऑफिसर था। मातहत दो'फारेस्ट गाई' थे। ये तीनों मुसलमान थे। डिपो ऑफिसर मेरी नियुक्ति में ही नासुश था। मेरे पिता से उसकी पुरानी जान-पहचान थी। पर मेरे पिता ने उसके मुसलमान होने और अच्छा आदमी न होने की बात किसी से कह दी थी, जो उसे मालूम हो गई। उसने जाते ही मुझसे कहा 'तुम्हारे वालिद ने फनो आदमी से कहा था कि मैं मुसलमान हूँ और तुम्हें तग करूंगा।' और उसने तग करना शुरू कर दिया। वह मेरी जगह किमी मुसलमान को चाहता था। मेरे मातहत दोनों फारेस्ट गार्ड मेरे खिलाफ पड्या करते थे। वे वहाँ 4-5 मालों ने थे। इस माहौल में मैं घबडा गया और अक्मर काम में गलती कर बैठना। मेरे साथ मेरे लटैत दादा गए थे। वे एकाघ महीना रहे और पिता जी की तबीयत ज्यादा खराव होने का समाचार पाकर घर लौट गए। मैं अकेला रह गया। खुद खाना बनाता था। वहां दूध बहुत अच्छा और सस्ता मिलता था। मैं कुल सात रुपयों में अपना खर्च निगल लेता था और अयरह रूपए घर भेज देता या। 1940 में इतने रुपए बहुत होते थे। डिपो मे लगा रेलवे स्टेशन था। उससे लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर यही वस्ती थी। हर रेलगाडी वहां नहीं रुकती थी। सिर्फ पैसेजर गाडियां रुकती थी। रेल के आने की घटी बजते ही, मैं दौडकर स्टेशन पहुंच जाता । वहाँ मैं आदमी देखने जाता था। तो क्या हम डिपो के हम इक उस से वाकिफ है।5। ।

। । कर्मचारी आदमी नहीं थे? नहीं, हम चाबी से चलनेवाले गुड्डे थे। वही वही चेहरे, वही वही आवाजें, डिपो साहब की वही दाढ़ी। हमारी आपसे में वही मुसकान और वही नफरत । हम छः आदमी एक-दूसरे से ऊबे हुए व्यक्ति थे। मैं वास्तविक मनुष्य देखने रेलगाड़ी पर जाता था । तरह-तरह के पुरुष, रंग-बिरंगी साड़ियाँ पहने स्त्रियाँ, प्यारे-प्यारे बच्चे। उन पाँच मिनटों में मेरी सारी उदासी चली जाती। मैं उत्फुल्ल हो जाता। मैं दुनिया से जुड़ जाता। आदमी को वास्तविक आदमी देखना कितना जरूरी है। दूसरी चीज़ जिसने मुझे दुनिया से जोड़े रखा, वह थी अखबार । मेरी अखबार पढ़ने की आदत थी। मैं उस थोड़े वेतन में से भी अखबार खरीदता था। नागपुर से निकलनेवाले दैनिक अखबार 'हितवाद' को मैंने पैसे भेज दिए थे। यह पत्र मुझे डाक से मिल जाता था। मैं इसे ध्यान से पूरा पढ़ जाता था। दूसरे महायुद्ध के बारे में मैं जानकारी लेता था और घटनाओं को डायरी में लिखता जाता था। सारे मोर्चे और सारी लाइनें मुझे 1945 तक याद थीं। सिगफ्रिड लाइन, मेजिनाट लाइन, डंकर्क, पर्ल हार्बर। मैं युद्ध का एक कुशल संचालक हो गया था। अभी भी 1939 से 1945 तक युद्ध की रोज़ पढ़ी हुई बातें मुझे याद हैं । मुझे याद है म्यूनिख पैक्ट पर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने तत्काल टिप्पणी की थी : The Munich Pact is directed against the Soviet Union. म्यूनिख समझौते में फ्रांस और ब्रिटेन ने हिटलर को समर्पण कर दिया था और काफ़ी पूर्वी यूरोप हिटलर को दे दिया था। इस तरह फासिस्ट पूँजीवाद और लोकतांत्रिक पूँजीवाद रूसी साम्यवाद के खिलाफ एक हो गए थे। ब्रिटेन और फ्रांस समझे थे फासिस्ट हिटलर हमें छोड़ देगा, पर हिटलर ने दोनों पर हमला किया। ताक फारेस्ट डिपो के जीवन के बारे में मैंने 'गर्दिश के दिन' में लिखा है : मैट्रिक हुआ, जंगल विभाग में नौकरी मिली। जंगल में सरकारी टपरे में रहता । ईट रखकर, उन पर पटिए जमाकरं बिस्तर लगाता । ज़मीन चूहों ने पोली कर दी थी। रात-भर नीचे चूहे धमा-चौकड़ी करते रहते और मैं सोता रहता। कभी चूहे ऊपर आ जाते तो नींद टूट जाती, पर मैं फिर सो जाता। छह महीने धमा-चौकड़ी करते चूहों पर मैं सोया। बेचारा परसाई? नहीं, नहीं, मैं खूब मस्त था । दिन-भर काम । शाम को जंगल में घुमाई। 52/हम इक उम्र से वाकिफ हैं - - फिर हाथ में बनाकर पाया गया भरपेट भोजन-शुद्ध घी और दूध । और चूहों ने बड़ा उपकार किया। ऐसी आदत डाली कि आगे की जिदगी मे भी तरह-तरह के चूहे मेरे नीचे ऊधम करते रहे हैं, सांप तक मगंते रहे हैं, मगर मैं पटिए विछाकर उन पर सोता रहा हूँ। चूहों ने ही नही, मनुष्यनुमा विच्छुओ और माँपो ने भी मुझे बहुत काटा है, पर 'जहरमोहरा' मुझे शुरू में ही मिल गया। इसलिए 'बेचारा परमाई का मौका ही नहीं आने दिया। उसी उम्र से दिखाऊ सहानुभूति मे मुझे बेहद नफरत है। अभी भी दियाऊ महानुभूतिवाले को चांटा मार देने की इच्छा होती है-जब्त कर जाता है, वरना कई शुभचिंतक पिट जावे। हम इक उससे न्यू हाईस्कूल खंडवा - मैंने जंगल विभाग की नौकरी छोड़ दी। जो पैसा मेरे मार्फत घर में आता था, वह बंद हो गया। मैं घर से बाहर रहता था, पर अकेला हो गया। मनोहर नागपुर चले गए थे। वहाँ उनका भाई शीतल था। मेरे एक और दोस्त राजेंद्र शुक्ल टाइपिंग सीखने खंडवा चले गए थे। दो और दोस्तों ने बाहर नौकरी कर ली थी। जिनकी दुकान थी या खेती थी, वे उसमें लग गए थे। जो मिलता वही पूछता : 'कोई दूसरी नौकरी नहीं लगी ? कॉलेज में क्यों नहीं पढ़ते?' इन सवालों से मुझे बहुत तकलीफ होती। मैं पोस्ट ऑफिस में बैठता या पुस्तकालय में । टिमरनी में मेरे स्कूल के मैनेजर बड़े ठेकेदार-पुल और इमारत-निर्माता और इंजीनियर थे। खंडवा में फौज की बैरकें उन्होंने खरीद ली थीं या किराए पर ले ली थीं। यहाँ उन्होंने एक 'न्यू हाई स्कूल' खोल दिया था। वे बग्गा मास्साब को साथ ले गए थे। मैंने बग्गा मास्साब को पत्र लिखा और उनका जवाब आया कि फौरन चले आओ। मैं फौरन विस्तर-कपड़े बाँधकर खंडवा बग्गा मास्साब के पास पहुँच गया। वे बैरक में ही एक कमरे में रहते थे। मुझे पच्चीस रुपए महीने पर अध्यापक नियुक्त कर दिया गया। संभागीय शिक्षा अधिकारी ने अपनी जाँच रिपोर्ट में लिखा : 'The Pay of one of the teachers is inordinately low.' इसके बाद भी मेरा वेतन नहीं बढ़ाया गया। पर मैं खुश था। मैं अध्यापक होना चाहता था और अध्यापक हो गया। बड़ी बात यह थी कि बग्गा मास्साब का साथ था। मैंने दो रुपए महीने किराए पर एक कमरा ले लिया। दस रुपएं में पूरा खर्च चलाता और पंद्रह रुपए महीने घर टिमरनी भेजता रहा। 54/हम इक उम्र से वाकिफ़ हैं । ।

वेतन कठिनाई ने मिलता था। हमारे तीसरे हेड मास्टर गुप्ता जी का चित्र अभी भी मुझे स्पष्ट है। भले आदमी ये। ढीला सूट पहनते और एक हाय हमेशा कोट की जेब में होता । उन जेब में पैसा होता था। उनकी हमेशा एक ही चिंता होती थी-अध्यापकों के वेतन का इतजाम करना । कभी मैनेजर के दफ्तर जाते,कभी कक्षा-कक्षा में जाकर जो फीस आईहो उसे ले आते, वरापदे में परेशान घूमते रहते । फिसी अध्यापक के पास जाते और बड़े दुख ने कहते: 'भैया,पैसा अभी आया नहीं। अभी ऐसा करो, ये दस रुपए ले ली। अभी काम चता लो। जल्दी ही पूरे वेतन का इतजाम कर दूंगा।' वे किमी को दम, किसी को पदह,किमी को बीस रुपए देकर मनाते रहते थे। मैं वग्गा मास्नाव ने पंद्रह रुपए लेकर पहिली तारीख को ही घर भेज देता था। आगे मैं अध्यापकों का सगठन बनाने और चलाने के काम मे मक्रिय रहा। मैंने देखा कि मव प्राइवेट स्कूलों में अध्यापकों को वेतन की वैसी ही तकलीफ है। तरह-तरह के हथकडे करके, झूय हिसाव बनाकर मैनेजमेंट के लोग पैसा खाते थे। सरकारी अनुदान आघाधा जाते थे। वेचारे अध्यापकों को बहुत कम वेतन देते, देर से देते और अक्सर किस्तों में देते। इसके खिलाफ मैने खूब लडाई सही। आगे बताऊँगा। मैं कल मात महीने उस स्कूल में रहा। उन दिनों वह मध्यप्रदेश राज्य 'मेंट्रल प्राविसेज एड बरार' कहलाता था। राजधानी नागपुर थी। इतने बड़े प्रात में शिक्षकों को अध्यापन की शिक्षा देने के लिए कुल एक कालेज या स्पेन्म ट्रेनिंग कालेज, जबलपुर । इसमें एक डिग्री कोनं था धी टी यानी वेचलर ऑफ टीचिंग और एक डिप्लोमा कोर्स या डिप टी यानीडिप्लोमा इन टीचिंग। अध्यापक दम-दन, पद्रह-पद्रह सात की नौकरी के बाद कही इस कॉलेज में जा पाते थे। हर सात स्कल ने नाम भेजे जाते थे। ट्रेनिंग कॉलेज में प्रवेश पाना बहीनियामत घी। मुझे कुल मात महीनो का अनुभव था, पर मेरा नाम भेज दिया गया। क्यों भेज दिया गया? यान यह थी कि स्कूल सुले एक साल मे भी कम हुआ था । जो अनुभवी अध्यापक थेवेरिटापडं थे। जो नए थे, वे वहां रहनेवाले नहीं थे। मेरी भी मेवाएं तीन अप्रैल को समाप्त कर दी गई जिमने गर्मी की छुट्टियों का वेतन न देना पडे। मैनेजमेंट को कोई नाम तो ट्रेनिंग के लिए भेजना था। वे जानते थे कि मेग चनाव तो होनेवाला नहीं है, मैनेजमेंट का सवाल था कि मैं ही एक दीन-हीन बाह्मण-पुत्र है जिने कही और हम इक उसले वाकिफ है/55 . ।

नहीं जाना है और लौटकर वहीं आना है। सोर मेरा नाम भेज दिया गया। और सव आश्चर्यचकित थे, जब कॉलेज से पत्र आया कि हरिशंकर परसाई को डिप्लोमा कोर्स में प्रवेश दे दिया गया है। मैंने सामान बाँधा और रेलगाड़ी में बैठकर जबलपुर तीस जून 1949 को पहुँच गया। सबसे प्रमुख सड़क के किनारे यह कॉलेज है, और होस्टल के दुमंज़िला दो ब्लाक सड़क से दिखते हैं। इनमें से एक ब्लाक में मेरा कमरा तय था। कमरे का एक साथी यानी 'रूममेट' भी था। इस कॉलेज का नाम अब प्रांतीय शिक्षण महाविद्यालय है, पर लोग इसे पी. एस. एम. कहते हैं। रिक्शावाले से कहो: 'प्रांतीय शिक्षण महाविद्यालयले चलो।' वह कहेगा : 'यह कहाँ है साहब? मुझे नहीं मालूम।' आप कहेंगे : 'अरे, पी. एस. एम. । " रिक्शावाला कहेगा : 'ऐसा हिंदी में बोलिए साहब ! बैठिए, चलिए।' हिंदी आंदोलनकारियों को, जो भाषा की समस्या को सपाट समझते हैं, जानना चाहिए कि यह मामला बहुत जटिल है। जबलपुर तव बड़ा शहर माना जाता था। कुछ भयावह भी । मशहूर था कि यहाँ साल में दो बार हिंदू-मुस्लिम दंगे होते हैं : दशहरे पर और मुहर्रम पर । दोनों दंगे शहर पुलिस कोतवाली के पास शुरू होते हैं । यह ठगों और पिंडारियों का इलाका रहा है। कर्नल स्लीमन ने इसी इलाके में ठगों, पिंडारियों का सफ़ाया किया था। कर्नल स्लीमन के नाम पर जबलपुर से कुछ किलोमीटर दूर एक रेलवे स्टेशन है-सलीमनाबाद। यहाँ बड़ी वस्ती है। जबलपुर की हेकड़ी मशहूर है। एक पुलिस सुपरिटेंडेंट ने मुझसे कहा : ।

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। , । हम लोग चपरासी से लेकर प्रिंसिपल तक से डरते थे। सबकी खुशामद करते थे। कॉलेज की दिनचर्यां क्या थी? बहुत सवेरे हम प्रार्थना के लिए एकत्र होते थे। प्रार्थना अंग्रज़ी में करवाई जाती थी : 'Almighty God, who brought us to this day.''इत्यादि । 2-3 महीने में कंसर्ट होता। हम सामूहिक गान करते थे : 'Leaders of youth hark the calling of the land and mark the falling. पी. टी. होती थीं। कॉलेज में पढ़ाई और फिर माडल हाईस्कूल में शिक्षण की प्रेक्टिस। हमें पच्चीस रुपए छात्रवृत्ति मिलती थी। मैं बहुत कम खर्च करके बारह-तेरह रुपए घर भेज देता था। कपड़ेगरीवी के थे। चाय नहीं पीता था। वहाँ जो दूसरे अध्यापक आए थे, वे दस-पंद्रह साल की नौकरी के बाद आए थे। उनके पास अच्छे कपड़े थे। कई स्टोव लाए थे और चाय-नाश्ता बनाते थे । मैं हाथ से कपड़े धोता था । सुखाकर, सलवटें मिटाकर, घरी करके तकिए के नीचे रखकर सोता। इस तरह इस्तरी होती। मेस में सात रुपयों में महीने-भर का खाना मिल जाता था। मेरे पास के कमरे का अध्यापक मुझे बहुत तुच्छ प्राणी मानता था। उसके पास अच्छे कपड़े थे। सूट और टाई पहिनता था। चेहरे पर स्नो लगाता था। बी. टी. के दो महत्त्वपूर्ण छात्रों को बुलाकर उन्हें चाय पिलाता था, खुशामद करता था। मुझसे चाय के लिए औपचारिकता से पूछना तो दूर, वह मेरी तरफ देखता भी नहीं था । वह जब कॉलेज जाता, तो इस ठाठ से कि लड़कियाँ कलेजे लेकर हाज़िर हो जाएंगी। मगर पूरे कॉलेज में सिर्फ तीन लड़कियाँ थीं, जिन्हें देखा जा सकता था। एक सुंदरी थी पर गंभीर और सुस्त भी। वह बहुत सुसंस्कृत और कुशाग्र बुद्धि की थी। मुझमें हीनता की भावना नहीं थी। इसके दो कारण थे: एक तो मेरे मूल्य दूसरे थे। दूसरे, जव मैं चार आदमियों में बैठता तो उन्हें अपने अध्ययन और बुद्धि के चमत्कार से प्रभावित कर देता। तीसरे, मुझे एक बहुत अच्छे मित्र मिले-रामचरण पाठक । वे पास ही सिवनी मालवा से लगे चतरखेड़ा गाँव के थे। कॉलेज में कवि भवानीप्रसाद मिश्र तथा भवानीप्रसाद तिवारी के साथ पढ़े थे और इनके दोस्त थे। एक ही अखाड़े के थे। वे बड़े भले आदमी हैं, बड़े स्नेही, 58/हम इक उम्र से वाकिफ हैं । ।

। । । बडे मज्जन, बडे उदार । वेतभी मुझे बहुत चाहने लगे थे। मुझस उम्र में बडे हैं। वे अभी भी एक माध्यमिक विद्यालय के प्रिंसिपल हैं। राष्ट्रपति पुरस्कार विजेता हैं। ऐसे अच्छे आदमी कम मिलते हैं। अभी भी मुझमे जव मिलते हैं, हम दोनो की आँखें छलछला आती हैं। यहुत कुशाग्र बुद्धि हैं, गजब की व्यग्य प्रतिभा है। वे लिखते, तो मुझमे बड़े लेखक होते। इन रामवरण पाठक ने मुझे छोटा भाई बना लिया। पाठक जी मुझे कई मामलो मे मही समझ देते थे। एक महीना में मेम का मचिव था। हिमाव में मैं लापरवाह हूँ। पैसा खर्च करता गया और हिमाव लिखा नहीं। महीने के अत मे जय हिमाच देकर दूसरे को चार्ज मौंपना था, मेरी आफत हो गई। पाठक जी ने दो रात मेरे साथ जागकर हिसाव वनवाया। हिमाय की एक घटना और है । मैं जव मॉडल हाईस्कूल में था, तब प्रौढ़ शिक्षा शिविर चलाने के लिए एक गांव भेजा गया। मातहत मात शिक्षक-शिक्षिकाएं । इनके रहने-साने का प्रवध करना था। मुझे एक हजार रुपए दे दिए गए। मैं खर्च करता गया और थोक गेहूँ, चावल, दाल, घी के निवा कोई हिमाव नहीं था। हिसाव बनाने बैठा तो सबसे ज्यादा रोज गुजाइश मब्जी खर्च की थी। मैं रोज आहिमाव मे डालता गया। एकाउटेट मेरा दोस्त था। उमने जांचकर कहा- हिमाव पैमा-पैमा ठीक है। अचरज यह है कि हर अध्यापक ने चार मेर आलू रोज़ खाए। पाठ्यक्रम के बारे में में वैमा ही लापरवाह था, जैमा हाईस्कूल मे। स्मृति मेरी बहुत अच्छी है और बहुत जल्दी पढ़ता हूँ। पन्ने पलटाता जाता है। डिप टी में भी मुझे पहला दर्जा नहीं मिला। पर मैं पुस्तकालय मे बहन वैठना था। सूब पढ़ता था। लाइबेग्यिन पगजपे मुझे ममझ गए थे। मैं पुस्तकालय पहुँचना नो वे कभी-कभी कहने 'परमाई, हीअर इज ए गुड बुक फार य ।' शाम को में वालीबॉल खेलता और फिर जिला पुस्तकालय और वाचनालय चला जाता । दमा महायुद्ध का जमाना था। मैं वहन ध्यान में असवार पढ़ता। दूसरे महीने मे ही कॉलेज में भाषण आयोजित हुए। विपय था War Aims मैं भी बोला और बहुत अच्छा बोला। डिप टी का मैं एकमात्र वक्ता था। इस भाषण मे मेरी प्रतिष्या बढ़ी। दूमरे दिन हमारे अंग्रेजी के प्रोफैमर वह निवध जो दिन पहले लिया था। मुझं 43 नवर मिले और मुझे नुच्छ ममझनेवाले उम माथी को || । अब वह अनुकल हो गया। मुझमे चाय हम इक उप मे वाकिफ हैं / । जांच कर लाए, । । की पूछने लगा। वह जिन लोगों का भक्त था, वे अब मुझसे बातें करने लगे। वे अपेक्षाकृत अच्छी आर्थिक स्थिति के, अच्छा सूट पहननेवाले, दिखाऊ बौड़म आदमी थे। मैं तभी समझ गया था कि आदमी को अपनी क्षमताओं को पहचानना चाहिए और उनका पूरा उपयोग करना चाहिए। इसके साथ ही धीरज रखना चाहिए। मुझमें अपार धीरज है । जो धीरज रख सके, वह जीतता है। उसकी बाकी मजबूरियाँ दव जाती हैं, उसे परास्त नहीं कर सकतीं। व्यक्तित्व को कोई भी सहारा देकर टूटने से बचाना चाहिए। अपने को साधारण आदमी मानना भी एक ताकत है। ऐसा आदमी असाधारणता के कोई फालतू सपने नहीं देखता और निराश नहीं होता, टूटता नहीं। मैंने हमेशा अपने को साधारण आदमी समझा । अब कुछ प्रतिष्ठा मुझे मिल गई है। मुझसे मिलने आनेवाले न जाने क्या मेरे बारे में सोचकर आते हैं । डरते हुए भी आते हैं। असाधारणता के आतंक का सामना करने की तैयारी से आते हैं। मैं साधारण छोटे आदमी की तरह सरल बातें उनसे करता हूँ। कई बाद में कहते हैं : 'हम जो सोचकर आए थे, उसके ठीक उल्टे आप निकले।' मैं मिलने आएबूढ़े हो रहे आदमी से पूछता हूँ: 'आपकी पारिवारिक जिम्मेदारियाँ कितनी पूरी हुईं ? लड़के काम से लगे? लड़कियों की शादी हो गई ?' वे चकित होते हैं और प्रसन्न भी कि यह लेखक ज्ञान और अहंकारं न बघारकर हमारी घरू जिंदगी में रुचि लेता है। वे आश्वस्त होते हैं। ऐसा व्यवहार मैं किसी योजना के तहत नहीं करता। यह मेरा स्वभाव है। असाधारणता को साधारणता से भी अच्छा निभाया जा सकता है। मैं कुछ महीने सागर विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध पीठ पर रहा । दुनिया में रहने के लिए यदि सबसे खराव जगह है, तो वह है विश्वविद्यालय कैंपस । गुट होते हैं। सुबह से ही निंदा अनुष्ठान चालू हो जाता है और शाम से षड्यंत्र । कोई भी विद्या की बात नहीं करता। सब्जी बेचनेवाली के पास सिर्फ कुम्हड़ा बचा है और ज़रूरतमंद रीडर-पत्नी उसे खरीद ले तो शाम तक यह कलंक-कथा सब जगह फैल जाती है। अध्यापक और उनकी पत्नियाँ यही चर्चा मज़ा ले-लेकर करते हैं : 'अमुक की पत्नी ने आज कुम्हड़ा खरीद लिया। कद् ! क्या स्टेंडर्ड है इन लोगों का।' मेरे पास भी जो आते, निंदा से ही बात शुरू करते। मैं तुरंत धर-गिरस्ती के बारे में पूछने लगता। तीसरे दिन एक रीडर ने मुझसे कहा : 'आप यह बहुत अच्छा करते हैं कि बाल-बच्चों की बात 60/हम इक उम्र से वाकिफ हैं , करने लगते हैं। हम लांग किम कीचड में रहने के आदी हो गए हैं।' मैंने डिप.टी. पान किया। इस बीच मेरे पिता इतने बीमार हो गए कि मेरे दादा और छोटे भाईगौरीशंकर इलाज कराने इदौर देवाम ले गए। टिमरनी में मेरी दो छोटी बहनें थीं, सीता और मोहनी । समस्या थी कि इन्हें कहाँ रसा जाए । मेरी सबसे बड़ी बहन की शादी हो गई थी। वह भोपाल राज्य में छिदगांव मे रहती थी। वह दोनो छोटी बहनों को अपने साथ ले गई और उनकी शादियों होने तक वै वहीं रही। छोटे भाई गौरीशकर की पढ़ाई छूट गई। वह पिता जी की मेवा में लगा था। उसने जीवन भर पढ़ाई छूटने का नतीजा भोगा। अभी भी तकलीफ मे जिंदगी गुजारता है। टिमरनी के घर का मामान पडोनियो के यहां रखकर मकान मे ताला डाल दिया गया। अब मेरा कोई घर नहीं था। नौकरी की तलाश मे में भाग-दौड करता रहता और पिट-पिटाकर दुखी होकर बुआ के घर मिवनी मालवा आ जाता। बुआ बहुत दमदार थी. वह कहती 'तू कोई चिंता मत कर । तेरी नौकरी लग जाएगी। चल पहले खाना खाले।' इसी तरह इटारमी में बुआ की बडी लडकी के घर चला जाता। उनका लडका मेरी ही उम्र का था। वह भी मुझे बहुत प्रेम में रखनी और मेरी हिम्मत बाँधती रहती। खडवा के स्कूल में मुझे पत्र मिला कि तुम्हारी नियुक्ति 35 रुपए महीने पर की जाती है। मैंने तुरत कोई जवाब नहीं दिया। मैं मरकारी स्कूल में नौकरी करना चाहता था। होशगाबाद मेमभागीय शिक्षा अधीक्षक डॉ वेणीशकर झा थे, मैं उनके पास गया। उन्होंने कहा कि आप उनी स्कूल में क्यों नहीं जातं जिमने आपको ट्रेनिग केलिए भेजा था। आप उनी मीढ़ी को लात मारना चाहते हैं, जिनमे आप ऊपर चढ़े। उन्होंने मुझे नौकरी नहीं दी। मुझे एक जुलाई को खडवा के स्कूल में नौकरी में पहुंचना था। अब कोई एक हफ्ता बचा था। मुझे याद आया कि ट्रेनिंग कॉलेज के प्रिनिपल वाईपी रानाडे मुझसे बहुत खुश थे। जब में जबलपुर मे पढाई खत्म करके लौटने लगा, तब उन्होंने मुझने कहा था कि परमाई, तुम अब किम स्कूल में जाओगे ? मैंने कहा कि एक तो वही घडवा या स्कूल है जहाँ मे मैं आया हूँ। गनाडे माहब ने मुझे कहा कि यही भी जाने के पहले तुम मुझमे पूछ लेना । यहाँ माडल हाईस्कूल में शायद एक जगह साली होगी। मैं तुम्हे उममै ले लगा। मझेगनाडे माहवकी यह बात याद आई। मैंने बिना बांधा और 28 जून हम इक उम्र मे वाकिफ है/61 । । . को बिना टिकिट जबलपुर के लिए रेलगाड़ी में बैठ गया । उस दौर में तीन सालों तक मैंने बिना टिकिट रेलयात्रा की और कभी पकड़ा नहीं गया। मैं चाहूँ तो बिना टिकिट यात्रा करने की एक किताब लिख सकता हूँ। मैंने एक पैंट, एक शर्ट अच्छे बनवा लिए थे। इन्हीं को पहनकर रेलयात्रा करता था। किसी स्टेशन पर गाड़ी रुकी होती और प्लेटफार्म परटिकिट चेकर होता तो मैं उसके पास बहुत हिम्मत से जाता और कहता : I think the train is running late.'वह जवाब देता : 'It will make up.' अब जब वह डिब्बे में टिकिट चेक करने आता तो सबसे टिकिट देखता, मगर मुझे देखकर मुस्कराता और कहता-'हैलो।' जबलपुर के पहले का दूसरा स्टेशन भेड़ाघाट आया तो मैं घबराने लगा। मेरे साथ जो आदमी बैठा था वह मुझसे बातचीत करता था। मैं शिक्षक हूँ तो मेरा सम्मान करता था। उसने मुझसे कहा कि आप कुछ घबड़ाए मालूम होते हैं। पहले तो मैंने टाला, फिर बताया कि मेरे पास टिकिट नहीं है । उसने कहा : 'कोई बात नहीं। मैं कलेक्टर का खानसामा हूँ। मैं आपको स्टेशन के बाहर निकाल लूँगा। उसे सव बाबू जानते थे और वह मुझे बाहर निकाल लाया। में रानाडे के पास पहुँचा । वे खुश हुए और बोले : आर्डर मिल गया था न । मैंने कहा कि मुझे कोई आर्डर नहीं मिला, क्योंकि मैं दो माह से टिमरनी से बाहर हूँ। उन्होंने कहा कि तुम्हारी नियुक्ति मैंने माडल हाईस्कूल में कर दी है। आर्डर की नकल दफ्तर से ले लो। माडल हाई स्कूल की प्रतिष्ठा पूरे प्रदेश में थी। यहाँ के शिक्षक को एक तरह से देवता माना जाता था। सारे प्रदेश के शिक्षक, माडल हाईस्कूल के शिक्षकों द्वारा सिखाए गए होते थे। अव रहने की समस्या थी। मैं पहुँचा जैन बोर्डिंग हाउस के मैनेजर मदन गोपाल पुरोहित के पास। इनसे मेरे बहुत अच्छे संबंध थे। यह इमारत गोल बाज़ार में है और इसमें अब डी. एन. जैन कॉलेज और डी. एन.जैन हाईस्कूल लगते हैं। तब 1943 में यहाँ ऊपर जैन मंदिर था और नीचे होस्टल । पुरोहित जी से मैंने अपनी समस्या बताई, उन्होंने कहा : 'रहने की क्या समस्या है! इतने कमरे पड़े हैं। किसी में भी डेरा जमा लो।' मैं एक कमरे के पलंग पर आसीन हो गया। मेस वहाँ था ही। वहाँ खाना खाता था। जुलाई 1943 को मैंने माडल हाईस्कूल में शिक्षक की नौकरी शुरू कर दी । । । 62/हम इक उम्र से वाकिफ हैं जबलपुर में शिक्षक सन् 1943 जुलाई में मैंने माडल हाईस्कूल में नौकरी शुरू की। सब अध्यापक तथा हेडमास्टर पहले से पहचान के थे। स्कूल का यश बाहर भी फैला था। लेकिन हम जानते थे कि इसमे कुछ भी 'माडल' (आदर्श) नही है। मामूली एकर्माजला इमारत जिसमे बिजली भी नहीं थी, बीच मे खेल का मैदान और उसमे लगा हुआ जबलपुर का सबसे बडा हॉल । हॉल के पीछे होस्टल। इसी अहाते मे टीचर्म ट्रेनिंग कॉलेज की इमारते तथा होस्टल थे। ये सब इमारते तथा माडल हाईस्कूल के होस्टल की इमारते फौज ने ले ली थी। दूसरा महायुद्ध पूरे जोर पर था और हिटलर की फौजे रूस मे घुसी हुई थी। हमारे पूरे अहाते मे सिपाही अधिक, छात्र कम दिखते थे। स्कूल के अहाते मे रंगरूट ही रंगरूट थे। ये दिन मे चाहे जवडिल और परेड करते रहते । दिनभर शोर होता था। इन्हें पढ़ाने का काम मुझे दे दिया गया था, ,जिसका अलग से वेतन मिलता । था। जबलपुर बहुत पुराना और महत्वपूर्ण केटोनमेट है। यह एरिया आर्मी कमाड रहा है, और है। युद्ध के उन दिनो मे पुरानी गन गैरिज फैक्टरी का विस्तार हुआ। सेंट्रल आर्डिनेंस डिपो खुला और हथियारों की खमरिया आर्डिनम फैक्टरी भी खुली। कई हजार आदमी वाहर से यहाँ नौकरी करने आए और बढ़ते ही गए और यह शहर फैलने लगा। सिविल लाइस और केटोनमेट में बहुत रौनक थी। खूब चमक-दमक थी। कारण यह था कि बहुत बडी सख्या में बहुत ऊँचे कद के अमेरिकी सैनिक आ गए थे। अग्रेज कम थे। अमेरिकी और अग्रेज में फर्क होता है। अग्रेज कम बोलनेवाला,कम हँसनेवाला,हिसाबी, कजूस और वद दिल का होता है । अमेरिकी मस्त, खुले दिल का, हंसनेवाला, । हम इक उम्र से वाकिफ है/63 खर्च करनेवाला और मौज करनेवाला होता है। सदर बाज़ार में अमेरिकी सिपाही चाहे जिस दुकान पर शौक का सामान खरीदता था। जहाँ न केंटोनमेंट होता है वहाँ सेक्स का धंधा भी चलता है। आसपास के क्षेत्र की बदचलन औरतों के दिन चमक उठते हैं। कई सामान्य स्त्रियाँ भी 'सेक्स' का धंधा करने लगती हैं। ऐसे क्षेत्र की नैतिकता गिर जाती है। घरुआँ वेश्यालय खुल जाते हैं। मैंने यह भी देखा कि सिपाही सड़क के किनारे की ज़मीन को ही 'वेडरूम' बना लेते थे। उस ज़माने में जाने कितने बच्चे पैदा हुए होंगे जिनके बाप का पता नहीं है। एंग्लो-इंडियन जाति में तब बहुत वृद्धि हुई। शहर के काँग्रेसी नेता जेल में थे। सुभद्राकुमारी चौहान और उनके पति लक्ष्मणसिंह चौहान अपने तीन बच्चों को छोड़कर जेल चले गए थे। 'झाँसी की रानी' कविता लिखनेवाली सुभद्राकुमारी चौहान एक दीपशिखा की तरह थी। दूसरे बहुत प्रभावशाली नेता कवि भवानीप्रसाद तिवारी भी जेल में थे। 1942 में सोलह साल का एक लड़का गुलाबसिंह काँग्रेस का झंडा लेकर निकला और चौराहे पर वंदेमातरम्, भारत माता की जय और अंग्रेज़ो भारत छोड़ो के नारे लगाए। उसे पुलिस ने गोली मारी और वह मर गया। उसकी शहादत के चर्चे शहर में थे। कुछ बचे हुए काँग्रेसी तथा दूसरे राष्ट्रीय भावना के लोग छिपकर मिलते थे और आंदोलन की योजना बनाते थे। शहर के बीच में एक तिलकभूमि तलैया थी जो बहुत पहले से सार्वजनिक सभाओं की जगह है। यहीं एक मामूली और सिर्फ चाय का होटल था, जिसे लोग मिस्त्री का होटल कहते थे। यहाँ गुपचुप मीटिंग होती । अभी कुछ साल पहले तक यह मिस्त्री का होटल था, जहाँ राजनेता, कवि, लेखक, पत्रकार और रंगदार सब बैठते थे। यह एक क्लव-जैसा था। मैं भी कई साल शाम को बैठा। मेरा वेतन मिलते ही देवास से तार मिला कि पिता जी की हालत बहुत खराब है। मैं गया। पिता जी मौत के पास पहुँच गए थे। डॉक्टर ने उन्हें घर ले जाने का कह दिया था। पर हमारा तब कोई घर नहीं था। पिता को मरने के लिए कहाँ ले जाएँ ? सिवनी मालवा बुआ को तार किया कि पिता को लेकर आ रहे हैं। हम लोगों ने उन्हें उठाकर रेलगाड़ी में डाला और बनापुरा स्टेशन पर दो फुफेरे भाइयों की मदद से उतारा। खाट पर डालकर घर ले गए। अब कुछ नहीं था, सिर्फ मौत का इंतज़ार था। दवाएं बंद थीं। दर्द वगैरह 64/हम इक उम्र से वाकिफ हैं कोदरंजन कवडसान मैं वाला ये, जनसंबर मला जE पर हय केही यस्ता जन्म बाररहते कोशकाहगावानमारमा - है। भगवान है । बमल जाएंगे। मैं जानता पिताजी ने रनिर पर हाथ रखकर कहा 'वेट कर जा रहा हूँ। मैं कुछ नहीं समझ पा रहा था। क्या होगा बडी बहन के पास गाँव मे थी। दादा और छोटा भाई जबलपुर मे एक होस्टल मे। मेरा वेतन कल 50 मार विचारहीनता की स्थिति मे जबलपुर पहुंचा। अगुममा मात्र करता रहा। अगले महीने मुझे तार नहीं बल्कि बुआवे बडनमा मिला कि पिता जी की मृत्यु हो गई और उनका दाह-सकारका अमुक तारीख को तेरहवीं का पाद है। मैं तेरहवीं के मुबह ही रा. नौकरी थी.सात-आठ दिनयंट्टी लेकर वहाँ क्या करता । बोइस्लाम पना - । लोग एक साथ यही नहीं रह मकने थे। जबलपुर में तो मैं खुद होन्टर: बुआ सुदबहुत गरीव थी। दादा यहाँ-वहाँ कुछ करके अपना पेट मामा लेकिन दूसरे का नहीं । छोटा भाई नौंवी कक्षा पाम हुआ था। आखिबई छोटी बहनो को गाँव ले गई। दादा और छोटा भाई कुछ दिन बनानानन्द गए। थोड़े में रुपए जो बचे थे, उन्हें मैंने वही छोडा और जबलपः आ गमा , आगे मन् 1946 में दमरी बहन मीता की शादी इटारसी ने वी आर :- सबमे छोटी बहन मोहनी ची गादी जवलपुर में हुई। जबलपुर अध्यापक मित्रों के माय कमरे में रहने लगा और इंटगई बुला लिया। पर पद्माई में उमस मन हट चुका था। सदा मंट्रल आहिनन डिपों में नौकरी कर ली। मैंने अब तीन कमरा मसन किराए पर लिया। 15 अगस्त, 1947 को बल म दही रनी और नभाई। अग्रेज़मरमर कामहा यनियन जैक उतारा गया आरमको धमह हम इक उप से वापि/65 । तिरंगा झंडा फहराया गया। मैं पहले से खादी की काली शेरवानी और पायजामा पहनता था। मैंने स्वाधीनता पर्व के बारे में भाषण भी दिया। अब बहुत लोग जानना चाहेंगे कि मैंने लिखना कैसे चालू किया। पढ़ता तो मैं खूब था, पुस्तकें और पत्रिकाएँ पढ़ता था। जबलपुर में मैं कवि सम्मेलनों में जाता रहता था। सुभद्राकुमारी चौहान, भवानीप्रसाद तिवारी, नर्मदाप्रसाद खरे आदि की कविताएँ सुनता था, पर इनके पास नहीं जाता था। बहुत पहले से जबलपुर में एक साप्ताहिक 'शुभचिंतक' निकलता था। उसमें मेरे एक-दो परिचितों की रचनाएँछपती थीं और मेरे मन में आता कि मेरी रचनाएँ भी छपें। अभिव्यक्ति की इच्छा मुझमें तीव्र थी। पर मैं इसे बातचीत से ही संतुष्ट कर लेता था। सन् 1947 में काँग्रेस के भीतर के समाजवादी जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बाहर आ गए और अलग समाजवादी दल बनाया, जिसके अध्यक्ष आचार्य नरेंद्रदेव थे। नरेंद्रदेव प्रकांड पंडित थे। अनेक भाषाओं पर उनका अधिकार था। वे लखनऊ और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। आचार्य जी स्पष्ट घोषणा करते थे कि मैं मार्क्सवादी हूँ। पर वे चिंतक थे और यूरोप में प्रचलित मूल मार्क्सवादी सिद्धांत एवं कार्यप्रणाली को भारतीय संस्कृति, भारतीय जनमानस और भारतीय परिस्थितियों में जैसा-का-तैसा स्वीकार नहीं करना चाहते थे। वे भारतीयता पर आधारित मार्क्सवाद को स्वीकार करते थे और उस पर उन्होंने सैद्धांतिक पुस्तकें भी लिखीं। वे बौद्ध धर्म के विद्वान थे और उससे प्रभावित थे। ये तरुण समाजवादी जिनके नेता जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, अशोक मेहता, अरुणा आसफ अली थे 1942 के 'अंग्रेज़ो भारत छोड़ो'' आंदोलन के हीरो थे। स्थानीय से अखिल भारतीय स्तर तक इनके प्रति युवकों का खास आकर्षण था। ये बड़े क्रांतिकारी माने जाते थे। इनका बोलना और लिखना उग्र हो गया था। ऐसा लगता था, जैसे ये देश को उलट-पलटकर रख देंगे। जबलपुर में उनके नेता भवानीप्रसाद तिवारी थे। मैं उन्हें सभाओं और कवि सम्मेलनों में सुनता था। 1945 में आर्मी सिगनल कोर के सिपाहियों के जत्थे तिलक भूमि आए और वहाँ सभा हुई, तब उस समय के नगर काँग्रेस के अध्यक्ष भवानीप्रसाद तिवारी का भाषण मैंने पहली बार सुना था। वे नगर के ही नहीं पूरे मध्यप्रदेश के बहुत लोकप्रिय और प्रखर नेता थे। तिवारी जी ने 66/हम इक उम्र से वाकिफ हैं । ।

गमेश्वर गुरु के माथ मिलकर 1947 में एक माप्ताहिक पत्र 'प्रहरी' निकाला, जिसके व्यवस्थापक सवाईमल जैनथे। ये सच 35 की उम्र के आसपास के थे। रामेश्वर गुरु सक्रिय राजनीति में नहीं थे। वे क्राइस्ट चचंवॉयज हाईस्कूल में अध्यापक थे। वे लेखक और पत्रकार तथा प्रहरी के सपादक थे। यह पत्र इतना प्रखर व ओजस्वी होता था तथा सामग्री इतनी मनमनीखेज होती थी कि शनिवार की शाम को इसके निकलते ही, चौराहों पर चर्चा होने लगती थी। सब जगह प्रहरी' की चर्चा । तरुणों के लिए तो यह बहुत प्रेरक था। इन पत्र ने और ममाजवादियों ने कांग्रेस की हालत पतली कर दी थी। मैं इसे पढ़ता था, इमसे महमत होता था और इममे लिखना भी चाहता था। पर मुझमें मोच वहत था। दीवाली की जगमग गतो मे में फुहारे की मडक मे निकल रहा था । यह शहर का केंद्रीय बाजार है। यहाँ एक बडी दुकान पर लक्ष्मी की पूजा हो रही थी और मडक पर चमचमाती हुई नई कार खडी थी। कुछ बच्चे कार कोप्रशना में देख रहे थे। दो बहुत गरीब बच्चे लोभ को नहीं रोक पाए और कार पर हाथ फेरने लगे। ड्राइवर आया और दोनों को तमांचे मारे, वे गेने नगे। मैं खडा-खडा यह दृश्य देख रहा था। उसने मुझे झकझोर दिया और मेरी वर्ग-चेतना को भी जगाया। मैंने इस घटना को अपनी कल्पनाशीतता और भाषा की मामथ्य के साथ लिसदिया। लेखक की जगह अपना नाम न देकर उपनाम उदार लिखा। रचना को लेकर 'प्रहरी दफ्तर मे मपादको के पास जान का मझमे माहम नहीं था। मैंने डाक मे उसे भेज दिया। दूसरे हफ्ते वह स्ट्रप गई । मेग लिखना इम तरह शुरू हुआ। मैंने अपने दोस्तों से ग्चना की तारीफ मनी । तब दूसरी रचना भी मैंने उसी उपनाम से लिसी, फिर तीसरी फिर चौथी और मभी छपी। अव तलाश शुरू हुई कि यह उदार उपनाम का आदमी कौन है । सबमें ज्यादानलाश सपादको को थी। मेरे नजदीकी दोम्ता को ही पता नहीं था किटन रचना का लेखक मैं हैं । गमेश्वर गुरु को पहले मग पता चला. इममे मनः कि पता कैमे चला । गुरु जी का कहना है कि मैं फोटोग्राफर पाठक के स्ट्रार बैठता था । पाठक ने उन्हें बताया कि मैं लेखक हरिशकर परभाई है और हाईस्कूल में अध्यापक हूँ मझ जो याद है वो यह है कि मेरे एकत्रिम अवधेश प्रमाद गौतम थे उन्हें किसी तरह यह रहम्य मानन होकर हम इक ।

। एक दिन मशे किगी बहाने रामेश्वर गुरु के घर ले गए और परिचय कग दिया कि यही आपके ना लेखक हैं। गुरु जी ने मुझे बहुत आत्मीयता से ग्रहण किया और भवानी प्रसाद तिवारी के पास दफ्तर ले गए। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा : 'तुम्हारी कलम में बहुत तेज है।' नतीजा यह हुआ कि मैं समाजवादियों की मंडली में शामिल हो गया और सरकारी नौकरी में होते हुए भी 'प्रहरी' के दफ्तर में बैठने और लिखने लगा। मैंने पहला स्तंभ'नर्मदा के तट से''प्रहरी' में ही लिखा। इसे कभी तिवारी जी लिखते थे और कभी मैं । लगभग आधा अंक तो रामेश्वर गुरु विभिन्न शैलियों और रूपों में लिखते थे। अब मैंने उपनाम छोड़ दिया और अपने नाम से ही लगातार लिखता चला गया। मेरे ऊपर अभी ज़िम्मेदारी थी, सबसे छोटी बहन की शादी अभी मुझे करनी थी, पर मैं लिखने में पूरी तरह डूब गया। 'प्रहरी' के सिवा दूसरे पत्र-पत्रिकाओं में भी लिखने लगा और 1950 तक राष्ट्रीय पत्रों के माध्यम से मैं एक लेखक के रूप में कुछ प्रतिष्ठा पा गया। जो लोग कहते हैं कि मेरा लेखन बहुत अधिक राजनैतिक है, उन्हें बताना चाहता हूँ कि मैं समाजवादी आंदोलनकारी पहले था और लेखक बाद में हुआ। नेखन के क्षेत्र में में राजनीति के मार्फत ही आया। मैं इसीलिए बार-बार यह कहता हूँ कि कोई लेखक अराजनैतिक नहीं हो सकता। जो लेखक कहते हैं कि लेखक को राजनीति से कोई मतलब नहीं, वे खुद बहुत घृणित दक्षिणपंथी, प्रतिक्रियावादी, यथास्थितिवादी राजनीति के प्रचारक हैं। मैं इन समाजवादियों के साथ पूरी तरह जुड़ गया । इनके राष्ट्रीय नेताओं में आचार्य नरेंद्रदेव, जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूँ, मार्क्सवादी थे और सिद्धांतशास्त्री भी थे। अशोक मेहता अर्थशास्त्री थे। डॉ. लोहिया बहुत प्रखर, उग्र और अतिवादी थे, उनका निशाना हमेशा जवाहरलाल नेहरू हुआ करते थे। युवकों में सबसे अधिक आकर्षण उन्हीं के प्रति था, क्योंकि वे नाटकीय और दुस्साहसिक थे। जयप्रकाश नारायण आरंभ में माक्र्सवादी थे। फिर वे गाँधी के संपर्क में आए और कांग्रेस के अंदर काँग्रेस समाजवादी दल बनाया, लेकिन आगे चलकर साम्यवाद विरोधी हो गए। अरुणा आसफ अली प्रखर ज्योति की तरह थीं। उन दिनों जब उनकी जवानी थी, वे दीप-शिखा की तरह थीं जवाहरलाल नेहरू से वे प्रभावित थीं लेकिन मतभेद भी रखती थीं। उनके मूल बौद्धिक संस्कार माक्र्सवादी थे और इन लोगों को छोड़कर साम्यवादी पार्टी में - 68/हम इक उम्र से वाकिफ हैं । । चली भी गई थी जहाँ कुछ दिन रही भी। अशोक मेहता अर्थशास्त्री थे, परत माक्र्मवादी नहीं थे। वे लोकतारिकममाजवाद में विश्वास करत पे, पर बाद में कांग्रेम मे चले गए। वे भारत के अर्थ मनी तथा योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे । विदेशी पूंजी निवेश के वे प्रवल ममर्थक थे। तब उनका एक वारय बहुत प्रचलित था. 'India should open her womb to foreign capital.' वास्तव में ये लोग मोशलिस्ट इटरनेशनल मेमबद्ध लोग थे। नरेद्रदेव और अरुणा आमफ अली इममे मवद्ध नहीं थे। मोशलिस्ट इटरनेशनल के लोकतांत्रिक समाजवादियों की मुख्य सडाई माम्यवादियों से होती है। इसके लिए वे फासिस्टों में भी समझौता कर लेते थे। जर्मनी में हिटनर को सत्ता मे लाने में इन समाजवादियों ने महयोग किया। जबलपुर के समाजवादी नेताओं में कोई विशेष बौद्धिक नहीं था। वैज्ञानिक समाजवाद की ममझ इनमे से किसी में नहीं थी। इन्हें यह जानकारी नहीं थी कि हमारे नेता सोशलिस्ट इटरनेशनल मे सबद हैं। इनमे मबमें प्रसर भवानी प्रमाद तिवारी थे, परतु उनका भी राजनीति तथा अर्थशास्त्र का अध्ययन नहीं था। वे गरीबो के पक्षधर थे, मोटे रूप मे वर्ग-भेद भी मानते थे, परतु भावुक रूप मे गांधीवादी भी थे। कुल मिलाकर मय साम्यवाद विरोधी थे। तब गजनीति की मेरी ममझ भी कच्ची थी और मैं इन लोगों के नागे मे शामिल हो गया। मुझे 4-5 माल लगे समझने मे और मैं इनसे दूर हो गया। में 'प्रहरी' दफ्तर मे नियमित बैठता था और मुझे लिखने की पूरी छूट धी तब 'प्रहरी' मुख्य रूप से कांग्रेसी नेता सेठ गोविंददाम और जबलपुर के ही निवानी प्रदेश के गृहमत्री द्वारिकाप्रमादमिश्र पर हमलो में भग रहता था। यह हमला बहुत कट भी होता था और उपहाम करनेवाला भी। अनगिनती पृष्ठइन दोनो के सिलाफ लिखे हुए हैं। बाद मे द्वारिकाप्रसाद मिश्र मत्ता में पूरी तरह बाहर हो गए। तब उन्होने मुझसे कहा भी कि आपने मेरे खिलाफ बहुन व्यग्य लिखा, पर उममें माहित्यिक गण होते थे। 'प्रहरी' मे ही मेरे व्यग्य लंघन का आरभ हुआ। यह आकस्मिक नहीं है कि मैं व्यग्य लेखक हो गया । वास्तव में में साहित्यिक मे अधिक मामाजिक मनुष्य रहा हूँ । जीवन की वास्तविकता की मेरी निकट की जानकारी रही है। मेरी समझ और सवेदना का दायरा भी स्थानीय मे बढ़कर अनर्गष्ट्रीय हो गया। स्वभाव मे में बहुत सवेदनशील है। आरभ मे मैंने अपने ही हम इक उम्रनेवाकि लिखे। पर । । - । - जल्दी ही इस आत्म-मोह से बाहर आ गया। मैं समाज में व्याप्त अंतर्विरोध समझ गया। मूल्यों की लगातार गिरावट मेरी समझ में आने लगी । भ्रष्टाचार, पाखंड, दोमुंहापन, व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में बढ़ती हुई अनैतिकता-इनका असर मुझ पर पड़ा, फिर मार्क्सवाद ने गहरे जाकर इनके कारण विश्लेषण में मेरी मदद की। इस तरह मेरी समझ बढ़ गई। मेरे लेखन में गहरी करुणा और गहरा व्यंग्य दोनों एक साथ हैं। इसे कुछ लोग अंतर्विरोध कहते हैं और समझ नहीं पाते। हिंदी में तो एक परंपरा रही है कि इस प्रकार के सब लेखन को विनोद और हास्य कह दिया जाता है। ऐसी बात लिखी जाए, जिसे पढ़कर पाठक हँस पड़े तो इस तरह के समस्त लेखन को 'हास्य' की कोटि में रख दिया जाता है। रसों में एक हास्यरस भी है। हँसना अच्छी बात है, परंतु साहित्य का जीवन से सरोकार केवल उपहास का नहीं है। लेखक का सरोकार गहरा है। ऐसा नहीं है कि संवेदनशील लेखक जो भी है जीवन में जो भी जैसा है, उस पर जहाँ-तहाँ हँसें और उसे खारिज कर दें। ऐसा नहीं है कि जो पीट रहा है, उस पर भी हँसा जाए और जो पिट रहा है, उस पर भी हँसा जाए। यह निहायत गैर-ज़िम्मेदाराना है और अमानवीय भी। लेखक को पीटनेवालों पर क्रोध आना चाहिए और पिटनेवाले पर करुणा । साथ ही उसे विचार करना चाहिए कि क्या ये कारण हैं, जिनसे यह स्थिति बनीं । जीवन जटिल है, सरल नहीं। जीवन को हँसने और रोने के दो खाते में नहीं बाँटना चाहिए। मुख्य बात है कि लेखक का सरोकार जीवन से है किस तरह । वह जीवन से संपृक्त है या केवल उसका पर्यवेक्षक । मैं जीवन का मात्र सर्वे करनेवाले लेखक को लेखक नहीं मानता। सर्वे विभाग की तरह नक्शे वनाना लेखक का काम नहीं है । लेखक समाज का एक अंग है और उस समाज पर जो गुज़रती है उसमें समभागी है। समाज के उत्थान और पतन, संघर्ष, सुख-दुख, आशा-निराशा, अन्याय-उत्पीड़न आदि में वह दूसरों का सहभोक्ता है। इस रिश्ते से यह निष्कर्प सहज ही निकलता है कि वह सामाजिक जीवन के प्रति संवेदित हो, समाज के उत्थान की चेष्टा करे, पतनशीलता से लड़े। लेखक इसीलिए संवेदित होने के साथ-साथ एक आलोचक की तरह जीवन का अन्वेषण और विश्लेषण करे, अंतर्विरोधों को समझे, पतनशील प्रवृत्तियों को जाने और सबके साथ संघर्ष में शामिल हो। यह बहुत गंभीर कार्य है, सतही उपहास नहीं, 70/हम इक उम्र से वाकिफ हैं / ।

इसीलिए जब व्यग्य-लेखक अतर्विरोधो को उजागर करता है, पतनशील प्रवृत्तियों से माक्षात्कार करता है तो इस कारण कि जीवन मे जोकछ युग है उससे वह दुखी है, उसमें करुणा भाव है। जैसा है, उममे अच्छे वह चाहता है। इसीलिए व्यग्य में करुणा की अतर्धाय होती है। एक और आरोप जो उन वर्षों में मुझ पर लगाया जाता पावह यह कि इन्हें बुरा ही पुरा दिखता है और इनकी दृष्टि नकारात्मक है । यह कहना उमी तरह हुआ जैसे डॉक्टर के बारे में कहा जाए कि उसे आदमी में रोग ही गेगदिखता है। अगर डॉक्टर के पास रोगी आए और वह उमे रोगीन बताकर स्वस्थकहदे और हैसने लगे तो डॉक्टर गैर-जिम्मेदार है और हत्यारा है। कला के नाम पर बीमार ममाज पर रग पोतकर जो उसे सूबसूरत बनाकर पेश कर दे, वह लेखक गैर-जिम्मेदार है। जिम्मेदार लेखक चुराई बताएगा ही, क्योंकि वह उमे दूर करके बेहतर जीवन चाहता है। मक्तिवोध ने कहा है "जैसा जीवन है उममे चेहतर जीवन चाहिए। सारा कचरा माफ करने को मेहतर चाहिए। इस मेहतर को न निराशावादी कह सकते हैं, न ही युगई का प्रेमी और न नकारात्मक। वह जीवन की वास्तविकता का मामना करता है और उसे साफ करता हैं। यह दृष्टिकोण आशावादी है और मकारात्मक है। लगभग यही स्थिति व्यग्य-लेखक की है। यह सब विस्तार से इमलिए समझाना पड़ रहा है क्योंकि मेरे लेखन को लेकर कई प्रश्न उठ रहे हैं और उनका मर्म ममझने में कठिनाई हुई है। धीरे-धीरे समाज के सचेत लोगों ने जो मात्र कलावादी नहीं हैं, इम लेखन को समझने-समझाने की कोशिश की है। एक आरोप मुझ पर तात्कालिकता का भी लगाया जाता है। माग माहित्य नात्कालिक जीवन के अनुभवों में लिखा जाता है। यदि उममें सवेदना की गहराई और दरगामी अर्थ होते हैं तो वह टिकाऊ होता है। इस तरह तात्कालिकता मे मे ही शाश्वतता पैदा हो " हम इक उम्र मे वाकिफ हैं/71 अध्यापकों का संगठन मैं सरकारी नौकरी में था और 'प्रहरी' उग्र समाजवादियों का पत्र था, उसमें मुझे लिखने की पूरी छूट थी। मुझे इस बात का ध्यान रखना चाहिए था कि मैं राजनैतिक आलोचना करता हूँ और सत्ता काँग्रेस की है, पर मैंने यह सावधानी नहीं बरती। संपादकों को भी मुझे सलाह देनी चाहिए थी कि बचाकर लिखू। पर उन्होंने भी ऐसा नहीं किया। मुझमें लिखने का आवेग बहुत था और विद्रोह भावना थी। मैं एक स्वतंत्र राजनैतिक व्यक्ति की तरह लिखता। इसकी रिपोर्ट हुई, ट्रेनिंग कॉलेज के प्रिंसिपल को अक्सर कैफियत देनी पड़ती । लिखने की धुन में मुझसे स्कूल के काम में भी भूलें होने लगीं। अब मैं अपने अफसरों और सरकार की नज़रों में बहुत खटकने लगा। जबलपुर में मैं अध्यापक और नए लेखक के रूप में कम जाना जाता था और सक्रिय समाजवादी कार्यकर्ता के रूप में अधिक। मैंने बी.ए. कर लिया था और उच्च श्रेणी अध्यापक के पद के योग्य हो गया था। मैं चाहता था कि इसी स्कूल में मेरी पदोन्नति हो जाए। मैंने इसके लिए आवेदन भी दिया। हेडमास्टर शिवशंकर मिश्र साहित्यप्रेमी थे। वे संस्कृत और अंग्रेज़ी के विद्वान थे। वे मुझे चाहते थे। उन्होंने कहा : 'यहाँ तो जगह नहीं तुम पदोन्नति पर जोर दोगे, कहीं तबादला हो जाएगा। एक-दो साल रुको। Take a philosophical view of things. मैंने आवेदन वापस ले लिया। पर सरकार को शायद मुझे जबलपुर से वाहर भेजना ही था। तो जून के अंत में मुझे शिक्षा विभाग के निदेशक का आदेश मिला कि मेरा तबादला उच्च श्रेणी अध्यापक के पद पर हरसूद कर दिया गया । हरसूद खंडवा के पास एक कस्वा है। अव एक समस्या खड़ी हो 72/हम इक उम्र से वाकिफ हैं है।

- । गई। यह तो स्पष्ट हो गया कि सरकार मुझे जबलपुर मे हटाना चाहती है । पर मुझमे लिखने की इतनी उत्कट आग थी और इतनी तीन अभिव्यक्ति-ऊर्जा थी कि मुझे और मेरे मित्रो को लगा कि हरमूद गया तो लिखना हो नहीं सकेगा। तव 'प्रहरी' ममाज की मडली बैठी। पांडत भवानीप्रमाद तिवारी ने कहा 'तुम तय कर लो। लेखक रहना है, तो हरमूद मत जाओ। तुममे प्रतिभा वहुत है। हेड मास्टर बनना है तो हरसूद चले जाओ। जीविका का ऐमा है कि प्राइवेट स्कूल में नौकरी कर लो या पत्रकारिता करो।' मैंने अततः सरकारी नौकरी में इस्तीफा दे दिया। एक अध्यापक किशोरीलाल पाडे थे। यहुत मुदर, आकर्षक और भरा व्यक्तित्व । महत्वाकाक्षी और अथक परिश्रमी । उनका व्यवहार इतना मधुर था और व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली कि शहर के एक प्रमुख व्यक्ति बन गए थे। बहुत लोकप्रिय । वे हितकारिणी हाईस्कूल में अध्यापक थे। वहां उनकी पटी नहीं । उन्होंने इस्तीफा दिया और एक'न्यू एजुकेशन सोसाइटी' बनाई। वे खुद स्कूल खोलना चाहते थे। किशोरीलाल पाडे चदा करने के उम्ताद थे। वैसे तो कोई उनसे इनकार ही नहीं करता था। करे भी तो वे पीछे पडकर चदा लिए विना छोडते नहीं थे। एक धनवान आदमी के घर हर एकादशी को सत्यनारायण की कथा होती थी। पाडे जी 6 महीने तक हर एकादशी को उनके घर सत्यनारायण की कथा सुनते रहे और ढाई हजार रुपए चदा ले आए किशोरीलाल पाडे ने 'नवीन विद्या भवन हाईस्कूल खोला और मैं वहाँ अध्यापक हो गया। मेरी लोकप्रियता का वे काफी फायदा उठाते थे और हम दोनो मस्या के लिए माथ काम करते थे। पाडे जी को पैमा सचं करने का जनुपात नहीं आना था। वे ऊँचे स्तर की सीली कल्पना मे मगन रहते थे। नतीजा यह होता कि जो पैमा आना उमे वे गैर-जम्ग दिसावटी चीजों मे खर्च कर देते और फिर हाय-हाय करते । पैमा लेनेवाले मामने के दरवाजे पर होने नों वे पीछे के दरवाजे मेखिमक जाते। पर वे पैमा कही-न-कहीं मे ले आते थे। बडे विकट कार्यक्ता थे। तब हमारी तरफ महाकोशल क्षेत्र में अध्यापकोका कोईमगठन नहीं था। प्राइमरी स्कूलों के अध्यापको कामगठन था, जिसके अध्यक्ष प्रहरी के मपादक समाजवादी नेता भवानीप्रसाद तिवारी थे । माध्यमिक विद्यालयों के अध्यापकों हम इक उम्र मे वाकिफ हैं/13 । - - का कोई संगठन नहीं था। नागपुर और विदर्भ में संगठन ज़रूर था। उधर एक डी. एच सहस्रबुद्धे विकट संगठक थे। यह बात सन् 1952-53 की होगी। सहस्रबुद्धे हमारे प्रधानाध्यापक तथा गवर्निंग कमेटी के सचिव किशोरीलाल पांडे के मित्र थे। पांडे जी शिक्षकों के संगठन में रुचि लेते थे। उन्होंने मेरा परिचय सहस्रबुद्धे से कराया और मैं उनका सहयोगी हो गया। पांडे जी नहीं जानते थे कि मेरा शिक्षक संगठन में लाया जाना उन्हीं के लिए सिरदर्द होगा। पांडे जो अब शिक्षक नहीं रहे थे, स्कूल के मालिक हो गए थे। मेरी और उनकी टकराहट आगे चलकर हुई। अब तो मैं देखता हूँ कि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर जुलूस निकाल लेते हैं, रैली कर लेते हैं, विधानसभा का घेराव तक कर डालते हैं। मैं इनके संगठन में शुरू से सहयोगी रहा हूँ। पर 30-35 साल पहले माध्यमिक विद्यालयों के अध्यापकों का संगठन करना, मेंढकों को तौलने जैसा दुष्कर कार्य था। शिक्षक अपने को श्रमिक मानने को तैयार नहीं थे। अपने को ऋषियों की परंपरा के मानते थे। ऋषियों के ट्रेड यूनियन कहाँ होते थे? गुरु क्या कोई मज़दूर है, जो तनख्वाह बढ़ाने के लिए कहेगा ! गुरु गुरु है। तब अध्यापक का आदर आज से अधिक था। अध्यापक बाहर निकलता तो लोग उसके चरण छूते थे। वह सोचता : मैं, जिसे इतनी श्रद्धा समाज देता है, क्या रोजी-रोटी के लिए नारेबाजी करूँगा। लड़के क्या कहेंगे? इनके माता-पिता क्या सोचेंगे? मुझे शर्म आएगी। मैं इनकी नजरों से गिर जाऊँगा। तब प्राइवेट स्कूल के अध्यापकों की नौकरी की कोई सुरक्षा नहीं थी। मनमानी करता था मैनेजमेंट । बहुत कम वेतन और वह भी समय पर नहीं। ये विद्यालय शिक्षा की दुकानें थे। अब भी हैं, पर अब ऐसे नियम-कानून बन गए हैं कि अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षा हो गई है। 35 साल पहले तो अध्यापक दैनिक वेतन-भोगी-जैसा था। उससे कह दिया जाता कि कल से काम पर मत आना, तो वह नहीं आता था। नौकरी बचाने का उसके पास कोई उपाय नहीं था। यह अधपेटा ऋषि रोजी-रोटी की लड़ाई को प्रतिष्ठा के विरुद्ध भानता था। मैं नागपुर प्रांतीय अधिवेशन में गया। विदर्भ के अध्यापक बड़े लड़ाकू और उग्र थे। एक पाँच-फुटे मरियल गुरु जी ने खड़े होकर कहा : 'अरे, प्रस्तावों से कुछ नहीं होगा। स्कूल के मैनेजरों को पकड़कर जब तक लड़कों के सामने जूते नहीं मारोगे, कुछ नहीं होगा।' 74/हम इक उम्र से वाकिफ हैं .. ।

इसी अधिवेशन के समय मेरी भेट कवि श्रीकात वर्मा मे हुई। वेविलासपुर के माध्यमिक विद्यालय में अध्यापक थे। इस अधिवेशन में सहस्रबुद्धे महासचिव हुए और मैं सहायक मचिव हुआ। इसके बाद ही जबलपुर माध्यमिक शिक्षक संघ का मैं अध्यक्ष चुना गया। मुझे अध्यक्ष बनवाया मेरे हेडमास्टर किशोरीलाल पाडे ने ही। उन्होने सोचा होगा कि मेरा मातहत है तो जैसा चाहूंगा वैमा इससे करवाऊंगा। एक तरह से सगठन मेरे हाथ मे रहेगा। पर उनका सोचना गलत निकला। पहला'काम बद' मैंने अपने ही स्कूल मे पाडे जी के सामने करवाया। मैं पूरी तरह अध्यापको के सगठन मे लग गया। अध्यापक बहुत सकोच करते थे। कहते थे:'हम लोग कोई मजदूर हैं क्या? लोग क्या कहेगे? मजदूर की तरह तनख्वाह बढ़ाने की मांग करना क्या गुरुओ को शोभा देता है ?' में उन्हें समझाता 'हम श्रम करते हैं,तोश्रमिक हैं ही। हमारी हालत तो देखिए। जो हमारे माथ किया जाता है, वह दैनिक मजदूर के साथ भी नही किया जा सकता। हम तो गुलाम सरीखे हैं। सगठित हो जाएंगे तो ताकतवर हो जाएंगे और न्याय पा सकेंगे।' अध्यापक डरते भी थे कि शिक्षक सय मे शामिल हुए तो हेड मास्टर और मैनेजर नाराज हो जाएंगे। बड़ी मुश्किल में अध्यापको को हम मगठन मे लाते । एक गुरु जी तो इतने हरे हुए थे कि मैं जब भी उनके घर जाता, लडका कह देता कि बाजार गए हैं। एक दूसरे गुरु जी का लडका तो मुझे देखते ही कह देता 'पिता जी बाथरूम मे हैं। शाम को आइए।' एक गुरु दिन-भर बाजार मे रहते और दूसरे दिन भर बाथरूम मे । पर में पीछे पडा ही रहता । कुछ तरुण अध्यापक मेरे माथ उत्साह से काम करते थे। पाठक नाम के एक बुजुर्ग शिक्षक बहुत दमदार थे। वे कहते 'अरे परमाई, ये जिंदा मुर्दे हैं। मारे जाओ कोडे । कभी जाग जाएंगे।' हमने एक जुलुस निकालकर तिलक भूमि में सभा करने का प्रयोग किया। प्रातीय सरकार के किसी नए आदेश का विरोध हमे करना था। करीव सौ अध्यापक लेकर हम महाकौशल स्कूल से जुलूस की शक्ल में चले। तिलकभूमि पहुंचे तो कुल माठ बचे थे। याची चालीस गायब । अवस्थी ने कहा: 'यार, गस्ते में सडक मे लगी जो गली पडती उसी में कुछ अध्यापक पेशाव करने बैठ जाते और जुलूम दूर निकल जाता, तब उठकर घर खिसक जाते।' । - हम इक उम्र से वाकिफ है/75 अव उस विरोध सभा का यह हाल रहा । हम कई अध्यापक उस सरकारी आदेश के खिलाफ गरमागरम वोले। मांग की कि आदेश तुरंत वापस लिया जाए। सभा की अध्यक्षता कर रहे थे बाबूराव ओक । ये भी चंदा-उस्ताद थे। 'ओक चेरिटी ट्रस्ट' बना रखा था और लाखों रुपए दान में लेते थे। दो स्कूल चलाते थे। ट्रस्ट की 3-4 और इमारतें भी थीं। ट्रस्ट की घपलेवाजी सब जानते थे। वाबूराव ओक हेड मास्टर भी थे और प्रबंध समिति के सदस्य भी । सवको खुश रखते थे। वे बोलने को खड़े हुए तो हमें आशा थी कि बुजुर्ग ज़ोरदार विरोध करेंगे, पर वे वोले 'जैसे भगवान के राज में देर है, पर अंधेर नहीं है, वैसे ही मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल के राज में देर हो सकती है, पर अंधेर नहीं होगा। उनकी कृपा-दृष्टि हम दीन अध्यापकों पर पड़ेगी। सियावर रामचंद्र की जय ! पंडित रविशंकर शुक्ल की जय !'हमने माथा ठोका और सभा खत्म कर । दी। उन दिनों प्रदेश के गृहमंत्री पंडित द्वारिकाप्रसाद मिश्र थे। विद्वान थे, विद्याव्यसनी थे, साहित्यिक थे। मगर शासक के रूप में वे कठोर माने जाते रहे। वे 'लौह पुरुप' कहलाते थे। उन्होंने विधानसभा में पेश करने के लिए एक 'स्कूल कोड विल' तैयार किया। यह अध्यापक-विरोधी था। शिक्षकों के अधिकार और स्वाधीनताएँ छीन ली गई थीं। हमने इसके विरुद्ध प्रांतव्यापी आंदोलन किया और अंततः सरकार को यह विल वापस लेना पड़ा। आरंभ में मेरे-जैसे नेता को मज़दूर-आंदोलन का कोई अनुभव तो था नहीं। अध्यापक भी कोई ठोस औद्योगिक मजदूर नहीं थे। संगठन था ढीला-ढाला। मैं तो तब श्रम-कानून भी नहीं जानता था। मैं जो सीखता था, वह प्राथमिक शिक्षक संघ के अध्यक्ष पंडित भवानीप्रसाद तिवारी से। तिवारी जी मूल रूप से कवि थे। वे सुरक्षा सामग्री के यानी तोप, बारूद, राइफल बनानेवाले कारखानों की यूनियन के भी अध्यक्ष थे। तव की इनके राष्ट्रीय नेता एस. एम वनर्जी थे। मैं ढीले शिक्षक संगठन को लेकर उग्र आंदोलन चलाना चाहता था, जो हो नहीं सकता था। मैनेजर की एक भृकुटी पर शिक्षक हमसे कट जाता था। हम अपीलें निकालते, प्रतिनिधि मंडल लेकर मैनेजमेंट से मिलते, निवेदन करते, कभी अदालत जाने की हल्की-सी धमकी दे देते। पर धीरे-धीरे दम आई। दम आने का बड़ा कारण तो यह था कि मैं कोई भी खतरा उठा सकता था। मेरे पारिवारिक दायित्व खत्म हो चुके थे। मैं अकेला रह गया था। मेरा 76/हम इक उम्र से वाकिफ हैं ।

प्रेटा भाई किताबें बेचने का धंधा करता था। मैंने पहली लडाई अपने ही स्कूल में कराई और उन्ही किशोरीलाल पाडे के खिलाफ जिन्होंने मुझे नंता बनाया था। पाडे जी की नवमे बडी शक्ति थी उनका मोहक व्यक्तित्व, तरल मुस्कान और वाणी की अतिशय मिटयस वे कुछ मांगतं तो कोई 'न' नहीं कर सकता था। मगर वे अब हेडमास्टर तथा प्रवध समिति के सचिव हो गए थे। यानी कार्यकता मे मालिक हो गए थे। उनमें अहकार भी आ गया था। उन्होंने अपने कमरे के दरवाजे पर मोटा पा लगा लिया था और भीतर टाइपराइटरलिए बैठे रहते थे। मोहक आदमी चला गया था, काला टाइपराइटर आ गया था। वेतन बहुत कम देते और वह भी किस्तों में। चाहे जिन अध्यापक को चपरासी टाइप किया कागज दे जाता, जिसमें कैफियत तलव की जाती। वे जब बात भी करते तो डॉटते और शिक्षक का अपमान करते। मय परेशान थे। क्या किया जाए? मैंने पाडे जी में कहा : दखिए, वेतन कम और विस्तो मे। किसी के घर में जरूरत के लायक आटा-दाल नहीं होता । भुखमरी की स्थिति है। इधर आपने अपनी मवमे वडी नाकत-व्यक्तित्व की मोहकता, वाणी की मिठाम, मुस्कान त्याग दी है। यह होती तो लोग नकलीफ भी भोग लेते और शिकायत नहीं करते । तनख्वाह आप देते नहीं हैं, मगर डॉटते और कैफियत तलव करते हैं। आप पहले जैन हो जाइए और आर्थिक मामले घोडे मुधार लीजिए।' इस पर पाडे जी का जवाब था- 'परमाईजी, सस्था अभी बन रही है। तकलीफ मघको महनी पड़ेगी। जो नहीं मह मकने, वे छोड़कर चले जाएं। अनुशासन-भग में किमी भी तरह बर्दाश्त नहीं करूंगा।' आखिर मैंने शिक्षको की 2-3 मीटिंगे ली। कुछ करना ही पड़ेगा । लोग तग थे, पर डरते भी थे। बाकायदा नोटिन देकर दीर्घकालीन हडताल करने की हमारी ताकत नहीं थी। हम प्रतीकात्मक रूप से मामूहिक जमतोष जाहिर करना चाहते थे । दो पीग्विड के बाद दस मिनिट की छुट्टी होती थी। हमने तय किया कि छुट्टी खत्म की घटी पर हम कक्षा में न जाएं। तीन पीरियड मे कोई शिक्षक कक्षा में नहीं आया। हम सब टीचर-रूम मे बैठे रहे। में दरवाजे के चाहर खड़ा था। पाडे जी आए। गुम्मे में थे। उन्होंने मुझे देखा। मैंने उन्हें देखा । कोई कुछ नहीं बोता। पाडे जी वापस लौटे और चपरासी ने कहा कि पूरी छुट्टी की घटी बजा दो। हम इक उम्र मे वाकिफ हैं/77 ।

- डॉक्टर बराट प्रबंध समिति के अध्यक्ष थे। दूसरे दिन उन्होंने हमें बुलाया। पांडे जी थे, मैं था, दूसरे सदस्य थे। मैंने सारी बातें समझाईं। यह भी कहा कि हमने हड़ताल की ही नहीं। मगर आप लोगों को वेतन का इंतजाम तो करना चाहिए। डॉक्टर बराट बड़े संवेदनशील हैं। उन्होंने तीन सदस्यों की एक अर्थ समिति विठाई और अगले महीने से वेतन में काफी सुधार हुआ। इसकी खबर सब जगह फैली और यह हमारी बड़ी जीत मानी गई। मैनेजमेंटों ने मुझसे नफरत करना चालू कर दिया। एक नाटकीय भूख हड़ताल मैंने और कराई । स्कूलों में पढ़ाई 31 मार्च तक होती है। फिर अप्रैल में परीक्षाएं होती हैं। फिर मई-जून की छुट्टी । तव आम बात थी, अब कम है कि पाँच-पाँच साल तक नए अध्यापक को 31 मार्च को नौकरी से अलग कर दिया और जुलाई में फिर नियुक्त कर लिया। इस तरह मैनेजमेंट तीन महीने की फीस बचा लेता था। जब छात्र ही नहीं हैं, तो अध्यापक को वेतन क्यों देना । जब ढो ही नहीं हैं तो चरवाहे को मज़दूरी क्यों देना। अध्यापक विवश थे। साल में नौ महीने का वेतन पाते थे। फिर यह भी पक्का नहीं था कि जुलाई में फिर नियुक्ति हो ही जाएगी। महाराष्ट्र स्कूल में एक अध्यापक था जवाहरलाल नाम का । उसका चौथा साल था और उसे फिर नोटिस मिल गया कि 31 मार्च से सेवाएँ समाप्त । मैं उस स्कूल में गया। छुट्टी में अध्यापकों की मीटिंग ली। सबने कहा कि यह बेईमानी यहाँ आम है। मैंने कहा : 'कुछ किए बिना तो कुछ नहीं सुधरेगा। आप लोग हड़ताल को तो तैयार होंगे नहीं। ऐसा करें-ये जवाहरलाल परसों स्कूल खुलते ही अध्यापक-कक्ष में आमरण अनशन पर बैठ जाएँ। आप लोग माला-वाला डाल दीजिए इन्हें । बाकी मैं देख लूँगा । इन्हें कुछ घंटे ही बैठना पड़ेगा। इस मैनेजमेंट की तीन रिपोर्ट तो मैंने ही शिक्षा मंत्री को की हैं। यह डरता है।' जवाहरलाल अनशन पर बैठ गए। थोड़ी देर में भीड़ लग गई । हेडमास्टर और प्रबंध समिति के सबसे प्रभावशाली सदस्य बाबूराम ओक आए। बोले : 'हे काय आहे?' इससे आगे वे नहीं बोले। जवाहरलाल ने अपना माँग-पत्र उनके हाथ दिया। उन्होंने पढ़ा। मैंने पूछा : 'ओक साहब, ऐसा आप क्यों करते हैं।' ओक ने सफाई दी : 'मैं तो इनको अलग नहीं कर रहा था। परलेले मास्टर अड़ गए।' मैं लेले साहब के पास गया। वे बोले : 'वह शिक्षक अनुशासनहीन 78/हम इक उम्र से वाकिफ हैं । है। मैंने कहा : 'अगर वह अनुशासनहीन हैं, तो चार सालों से आप उसे बार-बार नियुक्त श्यों कर रहे हैं ?' लेले मास्टर ने कहा : 'कमेटी के सेक्रेटरी भाऊ माहब मुले हैं। उन्ही से पूछिए ।' मैं मुले के पास गया । वे किराने की दुकान करते थे। उन्होंने कहा. 'मारी गड़बड़ी ये बाबूराम ओक और नीलकंठ लेले करते हैं। हमको तो दुकानदारी से ही फुरसत नहीं है।' मैं जब दुवारा स्कूल पहुंचा तो वहाँ लेले, ओक और मुले तीनों व समिति के 5-6 सदस्य और थे। मैने कहा : 'बड़ा अन्याय करते हैं आप लोग। आगे हम बर्दाश्त नहीं करेंगे। हम आप लोगों मे नही डरते अब । ये जवाहरलाल अनत काल तक अनशन करते रहेंगे। आप लोग अपना फैसला वलए और इनकी नौकरी जारी रखिए। अभी मैं समझौता कराने मे लगा हूँ। रात के बारह बजे बाद यानी कल में इन जवाहरलाल का पक्ष ले लूंगा और जबलपुर के सारे स्कूलो के अध्यापकों की 'जनरल स्ट्राइक' का आहवानन कर दूंगा। तब आप संभालिए।' वे डरे। ओक माहव ने कहा 'अब शाम हो गई है। प्रवध समिति की बैठक बुलानी पड़ेगी। इतनी जल्दी कैसे सभव होगा?' मैंने कहा: 'आपके सारे सदस्य राइट टाउन और नेपियर टाउन में रहते हैं। एक घटे में सबको नोटिस मिल जाएगा। आधी रात के पहले फैसला कर लीजिए वरना कल जो हो, वह भुगतिए ।' तीनों ने अलग जाकर मलाह की । रात को दस बजे प्रबंध समिति ने तय किया कि पहले का आदेश निरस्त किया जाता है। जवाहरलाल की नोकरी जारी रहेगी। तब तक वहीं दूसरे स्कूलों के भी सौ-डेढ़ सौ अध्यापक इकट्ठे हो गए थे। एव जय-जयकार हुआ। अब अनशन तुडवाना था। मुसम्मी का रम बुलवाने की बात उठी। मेरे कर-कमलों से गितान जवाहरलाल को देना था। उतनी रात को कहाँ से मुसम्मी लाई जाए। मैंने कहा 'देछिए, यह जवाहर मवह माढ़े दस बजे खूब भरपेट खाकर यही बैठा था। अभी कल बारह-तरह घटे तो हुए ही हैं। इसे की क्या जरूरत ? वह सिनेमा के पास का होटल अभी सुला है। वहां से समोसे ले आओ और इन्हखिल्म दो।' मैने अपने कर-कमल से समोसा जवाहर के मुंह में दिया और तालियां बजने लगी। क्रिश्चियन स्कूल में भी कुछ मघर्ष हुआ। मैं हर स्कूल के मामले मे हम इक उम्र मे वाकिफ है/79 । मुसम्मी के सलंदाजी करता था। जहां से कोई ऐसी-वैसी खबर मिलती, मैं मैनेजर और डमास्टर के सिर पर सवार हो जाता। ये मालिक लोग तंग आ गए। मुझसे पिंड छुड़ाना ज़रूरी था। इन्होंने अध्यापकों पर दवाब डाला। डराया। आगामी चुनाव में अपना आदमी खड़ा किया। चुनाव हुआ और मैं बुरी तरह हार गया। मैनेजमेंट का आदमी अध्यक्ष हो गया। थोड़ी देर बाद मैदान में अध्यापकों ने मुझे घेर लिया और कहा : 'हम बहुत शर्मिंदा हैं । पर हम मजबूर थे। पेट का डर सबको है। आप हारने के बाद भी हमारे नेता हैं।' मैं प्रादेशिक संगठन का उपसचिव फिर भी रहा।

तव जबलपुर के कुछ व्यक्तित्व - . तव शहर में बहुत प्रतिभाएं थी। पडित केशवप्रसाद पाठक थे। हिंदी, उर्द, अग्रेजी के विद्वान । यूरोप की रोमाटिक कविता उनके घरावर कोई नहीं जानता था। के कवि थे। रहम्यवादी थे। भाषा के मास्टर थे। उनके कई गीत है। रहस्यवादी काव्य में वे महादेवी में वरावर पडते हैं। लिखा बहुत कम है । उमर सय्याम की झवाइयों का हिंदी अनुवाद उनका मवमे अच्छा है। मगर जिदगी को वे रुमानी चश्मे में देखते थे और बेहद शराब पीने लगे थे। अच्छा पैतृक छापाखाना था, पर उसे नहीं चलाया और टाइप वेच-वेचकर पीने गाा। फर्नीचर की दुकान खोली । उमे भी पी गए । इस मय पर उनकी जय-जयकार होनी थी । अरे, वह केशव पाठक है। बादशाह है कविताका । वाह पाठक जी। वे कवि-मम्मेलन के मच पर नशे मे लडखडाते हुए आते तो दमा कवि, भवानीप्रमाद तिवारी नक,चिल्लाते 'अरे बादशाह आरहा है। बादशाह को मैंने दम बारह माल बहुत पाम मे देखा । मुबह में लेकर शाम तक वे एक ही काम करते थे-शाम को एक पौआ शगव के लिए पर्म का इनजाम । इसमे मांगा. उममें मांगा। कुल दम-बारह माल रचना-काल रहा । पढना भी वद कर दिया था। इस मामती भावक शहर ने जय-जयकार करकं कमजोरियों को महिमा देकर कवि को अममय मार डाला। वे लगभग 55 माल की उम्र में क्षय मे भो। छिदवाडा मेनेटोरियम में मैं ही उन्हें भरती करा आया था। मामनी मस्कार के कस्बे ने उन्हें मार डाला। पडित भवानीप्रमादतिवारी प्रखान्यक्तित्व के आदमी थे। बडे दवग नेना थे । बहुत प्रभावी वक्ता थे। श्रोताओं को चाहे जैमा हिलाने-डुलाते थे। माहमी थे, मघर्षशील थे। उनमे परवाही और मस्ती थी। वे इलाके के हीरो धे। - हम इक उम ने वाकिफ है/81 1 । उनका कुछ भी प्राइवेट नहीं था। सव खुला जीवन था। उनमें अपार धीरज था, असीम सहनशीलता थी, अथाह गंभीरता थी। मैंने थोड़े उनसे ये गुण सीखे। वे विचलित नहीं होते थे। परिवार के प्रति गैर जिम्मेदार और पूरी तरह जनता को समर्पित । अपनी सफलता, हीरो होना,शहर पर राज करना-एक तरह के नशे में रहते थे। बहुत छोटी उम्र में, 35 साल के आसपास वे पंडित जी' कहलाने लगे थे। जिस रास्ते से निकल जाते, दोनों तरफ से लोग आकर चरण छूते थे । कवि अच्छे थे। 'गीतांजलि' का बहुत अच्छा अनुवाद किया था। इतनी छोटी उम्र में जय-जयकार से घिर गए, पूजा होने लगी। प्रकृति से रूमानी थे ही । बस आलसी हो गए, पूरी तरह अलाल । अब कुछ करने की ज़रूरत ही नहीं थी। परिवार है, आगे क्या होगा, वे सोचते ही नहीं थे। जिंदगी रूमान-ही-रूमान थी। सुबह से मुँह में तमाखू डालकर बैठ जाते। अखबार पलट लेते। भक्त-मंडली आ जाती । गप्पें होतीं। ठहाके लगते । दोपहर को पंडित जी पेट में दाल-भात भरकर जो सोते, तो शाम को उठते । शाम को किसी अड्डे पर पहुँच जाते तो दो बजे रात को घर लौटते। भाँग का गोला शाम को ही कोई भक्त दे जाता। पंडितानी कटोरे-भर दूध में दो रोटियाँ डालकर रख देती थीं। पंडित जी दूध-रोटी खाकर सो जाते। कारण क्या था? बहुत छोटी उम्र में चारों तरफ से जय-जयकार, श्रद्धा और भक्ति। इस शहर ने एक और उद्भट व्यक्तित्व को असमय मार डाला। पंडित जी में अद्भुत गुण थे। वे द्वेष-ईर्ष्या से परे थे। अपना नुकसान करनेवालों से भी स्नेह करते थे। किसी की निंदा नहीं करते थे और न सुनते थे। कोई किसी की निंदा करे तो वे कहते : अरे छोड़ो भाई, मनुष्य ऐसा ही होता है। वे शालीनता नहीं छोड़ते थे। वर्नार्ड शा ने कहा है : 'Courage is grace under pressure.' यह तिवारी जी पर लागू होता था। मेरा-उनका रिश्ता बड़े और छोटे भाई का था। मैंने उनसे बहुत सीखा। काश, यह शहर उन्हें अकर्मण्य न वनाता। वे बहुत लिखते, बहुत ऊँची पत्रकारिता करते और बहुत बड़े नेता होते । राजनीति में ऐसे ईमानदार आदमी दुर्लभ हैं। 'प्रहरी' के दूसरे संपादक रामेश्वर गुरु बहुत सुदर्शन पुरुष थे। 'क्राइस्ट चर्च ब्वॉयज़ हाईस्कूल' में गणित के अध्यापक और बड़े पत्रकार थे। जीवन-भर वे 'अमृत वाज़ार पत्रिका' के प्रतिनिधि रहे । वे साहित्य के अध्येता थे और अद्भुत गद्य लिखते थे। ऐसा मार्मिक सशक्त गद्य मैंने बहुत कम पढ़ा 82/हम इक उम्र से वाकिफ हैं ।

। । है। दूसरे, वे अबले एक 'एनमाइक्लोपीडिया' हैं। कितने विषयों का कितना जान है उन्हें । अभी भी मैं उनमें पचाम माल पहले का कोई गजनैतिक- साहित्यिक मदर्भ पूछ लेता हूँ और वे तत्काल बता देते हैं। हसमुख, मिठ-योले, विराट परिचय और व्यापक मवधों के आदमी । हर मडक और गली मे उनके कक्या जी, बुआजी, भौजाई और मौसी होती थी। उनमें दो कमजोरिया हैं-एक तो मयके प्यारे बनने की कोशिश करना और दमरे, किसी को 'नहीं' कहने का माहम न होना। गुरु जी अत्यत स्नेही आदमी हैं। पहले परिचय के बाद उन्होंने मुझे इतवार को भोजन के लिए निर्मात्रत कर दिया । में।। बजे पहुंचा तो वे पर पर नहीं थे। मैं इतजार करता रहा । बारह बज गए, एक बज गया, दो बज गया । पर में में किमी और मदस्य को जानता नहीं था। एक लड़या पूछ जाता 'कोई जरूपी काम है क्या?' मैं कैसे कहता कि मुझे उन्होंने भोजन के लिए बनाया था। भीतर स्त्रियों की 'ठिल-टिल' मुझे मनाई देती 'कैमा आदी है। वैटा है तो बैठा ही है। कुछ सताता ही नहीं है।' इतने में अध्यापक अवधेशप्रसाद गौतम आ गए। उनमे मैंने कहा नो वे सब हमे । योले 'तुम भी गुरु जी के चक्कर में आ गए । अरं, वे सदाकिनी दमरे के यहाँ साना सा चकं होंगे। वेमचमुच नारद जी के घर साना साकर लेटे थे और में उनका मेहमान भूखा बैय था। गौतम पास में ही अपने घर ले गए और मुझे भोजन कगया। गुरु जी के दो शौक थे-नमकीन चटपटी चीजे खाना और पर लिखना । न जाने कितने पर वे रोज लिखते थे। आगे चलकर मैंने उनके माथ मिलकर 'वसुधा' मासिक पत्रिका निकाली। यह विस्तार मे आगे लिसंगा। गुरु जी नए लेखकों को बहुत प्रोत्माहन देने थे । घर बुलाने । उनकी रचना मुनते । सुधारते । मिटाई सिलाते । फिर रचना छापने । वे सुद कई तरह की कविता और गद्य रूप लिखते थे। मैं तो चमत्क्त था. मवैया मे लेकर दादग और प्रगतिशील काव्य नक लिखते थे। लोकगीतों को यो ही बोल देते। गद्य में नाटक, कहानी. रेसाचित्र, चटकुले. मय लिखते। तब जबलपुर के बौद्धिक जगन में मयमे प्रबुद्ध रामेश्वर गुम ही थे। उनमें और भवानीप्रमादतिवारी मे बारीकस्पर्धा थी। तिवारी जीमच केहीगेये. जीटेबिल टॉक के उस्ताद थे। महत्त्वाकाक्षी गुरु जी भी थे. पर मोची स्वभाव के कारण नहीं मे में ही निकलवाते थे। एक बार मेयर के पद के लिए उनमें हम इक उप से वाकिफ है/83 ।

और तिवारी जी में मतदान हो गया। गुरु जी जीत गए। तिवारी जी हार गए। बाहर बरामदे में निकले तो दोनों रोने लगे और लिपट गए। दूसरी तरफ इस पूरे कांड के रचयिता, मित्रों को लड़ानेवाले उस्ताद गुलाबचंद गुप्त मुँह में अंगुली डालकर उलटी कर रहे थे और रो रहे थे : 'हाय, मेरे कलेजे का एक टुकड़ा भवानी और दूसरा गुरु। आज दोनों लड़ लिए। मुझे मौत आ जाए तो अच्छा है।'-और लड़वाया इन्हीं ने था। लेकिन तिवारी जी और गुरुजी में मैत्री बनी रही। गुरु जी के बारे में बड़े भ्रम हैं। एक तो यह कि वे बालक की तरह भोले हैं जबकि सच यह है कि वे चतुर, चालाक, योजना से काम करनेवाले आदमी हैं। दूसरा भ्रम है कि वे लापरवाह हैं । लेकिन वास्तव में वे बहुत सावधान, सधे हुए, मेहनती और अनुशासित व्यक्ति हैं। वे फाइलिंग के उस्ताद हैं। किसी संदर्भ की चार लाइनों के अखवारी समाचार की कटिंग भी उनकी फाइल में मिल जाएगी। एक भ्रम यह कि कोई भी उन्हें बुद्धू बनाकर काम करा सकता है, यह भी भ्रम ही है। वे योजना से बुद्धू बनते हैं। उन्हें बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता। एक भ्रम यह कि इतने उदार हैं कि अपनी लंगोटी भी उतारकर दे देते हैं। पर मैंने उन्हें कई की लंगोटी उतरवाते देखा है। मित्रों पर पैसा दिल खोलकर खर्च करते हैं, पर उड़ाऊ नहीं हैं। ये न समझो कि फकत ठूठ हूँ मैं मये-मंसूर के दो चूंट हूँ मैं जिसपे लैला हुई सौ बार सवार हल्फिया कहता हूँ वो 'ऊँट' हूँ मैं । ये हजरत 'ऊँट' शहर की सबसे अजीम हस्तियों में थे। शहर की कला-चेतना, संस्कृति, साहित्य-साधना, तहजीब जिन पर टिकी थी, उनमें वे सबसे आगे की पंक्ति में थे। वे वास्तव में 'ऊँट' जैसे थे, जो व्यंग्य लिखने का उनका तखल्लुस था। 'प्रहरी' में उन्होंने धारावाहिक 'जज़्बाते-ऊँट' लिखा। उसके बाद उसी नियमितता से धारावाहिक रूप से हिंदी-भापियों को 'गालिब' की शायरी अद्भुत सहजता से समझाई। दोनों पुस्तक रूप में बाद में छपे। वे बहुत गंभीर काव्य भी लिखते थे। नगर निगम प्रांगण में सुभद्राकुमारी चौहान की प्रतिमा पर उनकी ये पंक्तियाँ अंकित हैं : 84/हम इक उम्र से वाकिफ़ हैं जानते हैं मव तुम्हे उद्घाम हो, उदोडका हो, आग हो, तूफान हो, भूचाल हो, रणर्चाडका हो, और रूमानी गीतों की लडी : 'उनीदी राते' पिछले पहर नीद की बेला तुम आ पहुंची नेह जताने। कहानियाँ भी लिखते थे। एक मग्रह है : 'हम इश्क के बंद हैं। अनुवाद करते थे। चेसव की कहानियों का सबसे पहले अनुवाद उन्हीं ने 'सरस्वती' में । । किया था। 1 'अनीम' के मरमिए'करवला' पर टिप्पणियों महित बडी किताब लिसी। इसके लिए कठिन शोध कार्य किया। 'प्रेमा' मासिक पत्रिका निकाली, जिसके कुछ ही अक निकले। प्रकार विद्वान थे । गभीर अध्येता थे। हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, फारमी के परम विद्वान थे। बहुपठित थे। विद्याव्यमनी थे। साढ़े-छ फीट में अधिक ऊंचे, दुवते याबू रामानुजलाल श्रीवास्तव इडियन प्रेस की शाखा के मैनेजर थे। एक बड़े बैंगले में डिपो और दफ्तर था। ऊपर रहते थे। तब हमारे यहाँ इंडियन प्रेम की ही पाठ्य-पुस्तकें चलती थी। रामानुज बाबू खूप वेतन और कमीशन पाते थे। नवाब की तरह रहते थे। उनके मिजाज मे लखनऊ की मामती शान तथा आधुनिक जीवन पद्धति और चेतना मिले हुए थे। इतने ऊंचे व दवले आदमी मय तरह के कपडो का शीक करने थे-शेरवानी और चूड़ीदार पाजामा, छीट की अचकन, करता-पायजामा. मुट और टाई। यही नहीं, यह आदमी हाफ पेट और हाफ शर्ट भी पहनता था। गमानुज बाबू खिलाडी भी थे। 'जबलपुर क्लब' जिनके दम पर चलता था, उनमे वै प्रमुख थे। टेनिम के उस्ताद । रोज शाप कोटेनिम सेलते। विज खेलने में भी माहिर थे। 'वार' उनकी दम पर आवाद रहता। वे हर महफिल की शान थे । बहुत गभीर. माथ ही बहुत विनोदशील भी। अपने मम्मान के जवाब में उन्होने भरी मभा में कहा 'मैं गद्य में, पद्य मे और मद्य में तीनों में पारगत हूँ। एक ममारोह मे वे टीक वक्त पर पहुंचे। हॉल साली था। पीछे-पीछे मैं चला आ रहा था। मुझे देसा तो बोले 'The tragedy of being punctual is that there is no one to appreciate it ' **Tİ हम इक उम्र में वाकिफ है/85 । .

और तिवारी जी में मतदान हो गया। गुरु जी जीत गए। तिवारी जी हार गए। बाहर बरामदे में निकले तो दोनों रोने लगे और लिपट गए। दूसरी तरफ इस पूरे कांड के रचयिता, मित्रों को लड़ानेवाले उस्ताद गुलाबचंद गुप्त मुँह में अंगुली डालकर उलटी कर रहे थे और रो रहे थे : 'हाय, मेरे कलेजे का एक टुकड़ा भवानी और दूसरा गुरु । आज दोनों लड़ लिए। मुझे मौत आ जाए तो अच्छा है।'-और लड़वाया इन्हीं ने था। लेकिन तिवारी जी और गुरु जी में मैत्री बनी रही। - । गुरु जी के बारे में बड़े भ्रम हैं। एक तो यह कि वे बालक की तरह भोले हैं जबकि सच यह है कि वे चतुर, चालाक, योजना से काम करनेवाले आदमी हैं। दूसरा भ्रम है कि वे लापरवाह हैं। लेकिन वास्तव में वे बहुत सावधान, सधे हुए, मेहनती और अनुशासित व्यक्ति हैं । वे फाइलिंग के उस्ताद हैं। किसी संदर्भ की चार लाइनों के अखबारी समाचार की कटिंग भी उनकी फाइल में मिल जाएगी। एक भ्रम यह कि कोई भी उन्हें बुद्धू बनाकर काम करा सकता है, यह भी भ्रम ही है। वे योजना से बुद्धू बनते हैं। उन्हें बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता । एक भ्रम यह कि इतने उदार हैं कि अपनी लंगोटी भी उतारकर दे देते हैं। पर मैंने उन्हें कई की लंगोटी उतरवाते देखा है। मित्रों पर पैसा दिल खोलकर खर्च करते हैं, पर उड़ाऊ नहीं हैं। ये न समझो कि फकत ,ठ हूँ मैं मये-मंसूर के दो घूट हूँ मैं जिसपे लैला हुई सौ बार सवार हल्फिया कहता हूँ वो 'ऊँट' हूँ मैं । ये हजरत 'ऊँट' शहर की सबसे अजीम हस्तियों में थे। शहर की कला-चेतना, संस्कृति, साहित्य-साधना, तहजीब जिन पर टिकी थी, उनमें वे सबसे आगे की पंक्ति में थे। वे वास्तव में ऊंट' जैसे थे, जो व्यंग्य लिखने का उनका तखल्लुस था। 'प्रहरी' में उन्होंने धारावाहिक 'जज़्वाते-ऊँट'लिखा। उसके बाद उसीनियमितता से धारावाहिक रूप से हिंदी-भाषियों को 'गालिब' की शायरी अद्भुत सहजता से समझाई। दोनों पुस्तक रूप में बाद में छपे । वे बहुत गंभीर काव्य भी लिखते थे। नगर निगम प्रांगण में सुभद्राकुमारी चौहान की प्रतिमा पर उनकी ये पंक्तियाँ अंकित हैं : -- -- 84/हम इक उम्र से वाकिफ हैं । जानते हैं मव तुम्हें उदाम हो, उडिया हो, आग हो, तूफान हो, भूचान हो, रणडिका हो, और रूमानी गीतों की लडी: 'उनीदी गते' पिछले पहर नीद की घेला तुम आ पहुंची नेह जताने। कहानियां भी लिखते थे। एक सग्रह है 'हम इश्क के वदे हैं।' अनुवाद करते थे। चेखव की कहानियों का सबसे पहले अनुवाद उन्ही ने 'सरस्वती' में किया था। 'अनीम' के मरमिए'करयला' पर टिप्पणियों सहित बड़ी किताब लिखी। इसके लिए कठिन शोध कार्य किया। 'प्रेमा' मासिक पत्रिका निकाली, जिसके कुछ ही अक निकले। प्रकार विद्वान थे। गभीर अध्येता थे। हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, फारसी के परम विद्वान थे। बहुपठित थे। विद्याव्यमनी थे। साढ़े-छ फीट मे अधिक ऊंचे, दुपले पाय रामानुजलाल श्रीवास्तव इंडियन प्रेस की शाखा के मैनेजर थे। एक बडे चंगले में डिपो और दफ्तर था। ऊपर रहते थे। तब हमारे यहाँ इंडियन प्रेम की ही पाठ्य-पुस्तके चलती थी। रामानुज याच खूप वेतन और कमीशन पाते थे। नवाब की तरह रहते थे। उनके मिज़ाज में लखनऊ की मामती शान तथा आधुनिक जीवन पनि और चेतना मिले हुए थे। इतने ऊंचे व दुवले आदमी मब तरह के कपडो का शौक करने थे-शेरवानी और चड़ीदार पाजामा. डीट की अचकन, करना-पायजामा. मृट और टाई। यही नहीं, यह आदमी हाफ पेट और हाफ शर्ट भी पहनता था। रामानुज बाबु सिलाडी भी थे। 'जवलपुर क्लब' जिनके दम पर चलता था, उनमें वे प्रमुख थे। टेनिम के उम्नाद । रोज शाम को टेनिम सेलते। विज खेलने में भी माहिर धे। 'बार'उनकी दम पर आबाद रहता। वे हर महफिल की शान थे। बहुत गभीर, माथ ही वहत विनोदशील भी। अपने सम्मान के जवाब में उन्होंने भगमभा में कहा 'मैं गद्य में, पद्य में और मठ मेनीनों में पारगन है।' एक ममारोह में वे टीक वक्त पर पहुंचे। हात खाली था। पीछे-पीछे मैं चला आ रहा था। मुझे देखा नो चोले -The tragedy of being punctual is that there is no one to appreciate 11 431 हम इक उम्र म वाकिफ हैं/ss - लतीफ़े और मज़ाक उनके खाते में जमा हैं। वे अकेले एक साहित्यिक आंदोलन थे। मध्ययुगीन भक्त कवियों-जैसी श्रद्धा उनमें साहित्य के प्रति थी। वे साहित्य के मामले में कोई समझौता नहीं करते थे। धंधे में नुकसान उठाकर भी साहसी और स्पष्टवादी थे। पंडित द्वारिकाप्रसाद मिश्र से उनकी व्यक्तिगत मित्रता थी। मिश्र जी मध्यप्रदेश के गृहमंत्री हो गए। सब जानते हैं कि मिश्र जी कठोर शासक थे। तभी उनका महाकाव्य 'कृष्णायन' प्रकाशित हुआ। एक साहित्य सभा में मिश्र जी की उपस्थिति में दो सरकारी कॉलेजों के आचार्यों ने 'कृष्णायन' की वेहद भटैती की । रामानुजलाल श्रीवास्तव बर्दाश्त न कर सके। वे खड़े हो गए, बोले और आचार्यों को बहुत लताड़ा। अत्यंत उदार दिल के रामानुज बाबू साहित्यिक गतिविधियाँ चलाते रहते थे। वे अच्छे संगठक भी थे। मेरे प्रति उनका विशेष स्नेह था। 'प्रगतिवाद' से चिढ़ते थे, पर मेरे यथार्थवादी लेखन के प्रशंसक थे। उनकी शव-यात्रा में उन्हीं का लिखा गीत गाया गया, जिसके कुछ शब्द हैं: ये मस्त चला इस बस्ती से थोड़ी-थोड़ी मस्ती ले लो। इसने तो पाईं सव कुछ खोकर तुम इससे सस्ती ले लो। यह निरभिमानी, विनम्र पर गरिमामय व्यक्तित्व हमें बहुत कुछ सिखा the गया। । उर्दू-फ़ारसी के प्रकांड विद्वान महादेव प्रसाद श्रीवास्तव 'सामी' यहीं रहते थे। वे फारसी के काव्य-सिद्धांतकार और समीक्षक थे। गोल काली टोपी पहनते और बीड़ी फूंकते । अंग्रेज़ी क्लासिकल तथा रोमांटिक काव्य के मर्मज्ञ । हम लोग उन्हें नहीं समझते थे। केशव पाठक और रामानुज बाबू उन्हें कुछ-कुछ समझते थे। वे अवहेलित मनीपी थे। अंतिम वर्ष बड़े कष्ट में बीते। उनकी शवयात्रा में कुल 15-20 आदमी थे। मेरे हमउम्रों में श्री वाल पांडे थे । वे प्रखर वर्ग-चेतना के कवि थे और वहुत प्यारे गीत भी लिखते थे। मेरा-उनका 1950 से साथ है। 'वसुधा' निकालने में उनका विशेष सहयोग रहा। वे प्रबंध संपादक थे और दिन-भर सुरक्षा कारखाने की नौकरी करके रात एक बजे तक वसुधा का काम करते थे। कवि-सम्मेलनों में श्री बाल बहुत जमते थे। । 86/हम इक उम्र से वाकिफ हैं गोविदामाद तिवारी हममे कुछ बड़े थे। अध्यापक धे। अत्यन भावक और भोले आदमी । रवि बहुत अच्छे ये । स्वाधीनता आदोलन में जेल भी गए थे। वे हम नवतरुणो को बहुत प्यार करने और बहुत प्रोत्साहित करते थे। प्रभातकुमार तिवारी 'प्रभात'मयमे कम उम्र के, उन्माद यी हरको पहुँचे हुए उग्र कविथे। ये मेधावान थे,तव मे में उन्हे जानता था। वे व्यक्तिगत रूप मे मझमे जड़े थे। उन्होने उद्सीस ली थी। कैफी आजमी, अनी मरदार जाफरी, मखदूम महिउद्दीन की नाइन पर चल रहे थे। तब जवाहरलाल नेहरू इन कम्युनिस्ट शायगे की नजर में माम्राज्यवाद या क्ला' धे। पार्टी का यही विश्लेषण और मूल्याकन था दमरे तर इन्हें और पार्टी को कल ही कानि होनी नजर आती थी। माम्यवादी आदोलन में वह रणदिवंगाल था। ये मारे बहिर्मुख शायर गाली-गलौज की हद तक शायरी यो ले जाने थे। 'प्रभान भावक थ अव्यावहारिक थे, उग्र थे, जन्दबाज थे और मारसंवाद का उनका अध्यपन बहन कम था। बी ए हो गए वे, पर काफी माल बेकार रहे। घा हालत क नहीं थी। वे कातिकारी काव्य कंपीगत-दिन पागल कमाने नहीं थे बदहवान रहने और गत-गन-भर जागते घोर हिमश उनकी अभियान थी। लवी-लवी नग्मे लिखने और मनाने थे। विनोद-क्षमता विलकन नहीं थी, इसलिए चिढ़ जाने धं बद हो जाने थे। घर में दवाव था कि कमाओ उनका भीतरी दवाव था कि लिसो क्रानिवारी लिरो। वैप्रमामान्य होगा। एक हाईम्कल में उनकी नोकरी लग गई। फिर वे अध्यापक की ट्रेनिंग के लिा भेजे गए। सिगरेट और चाय की लत थी। लगातार ननाव में रहने उन्हान अपना मरकट एक ही दांव पर लगा दिया था--भावहीन उग्र क्रांतिकारी कविता पर । वे निगशहए। उन्होंने आत्महत्या कर ली। परिवार में अपनी ग्र्धािन में पीडिन थ। वे कलाग्रम्न हो गा- अपने यो अन्याय का शिवार मानने लगे। अपन वाव्य पर फिर भी उनकी अटल आस्था थी। उनके धनिष्ठ गयध कला निकेतन के कला गम अमनलाल चंगर माथ मुझमे थे और प्रसर वि गमकृष्ण श्रीवास्तव में थे जा नागपुर चले गए। हमें बाद म मालम हाकि वे वायदा आत्महत्या की योजना बना रहे थे। आत्महत्या आदमी आवग में करता है पर वे विविध योजना- थे। उन्होने अपनी पुस्तक की पानिपि नैया उनकी प्रस्तावना कछ ।

। । । । - हिसाब लिखा कि किससे कितना लेना है और किसका कितना देना है और फिर आत्महत्या पर एक नज़्म लिखकर स्थानीय अखबारों को भेजी। एकदम निरुद्वेग। मैं उस दिन सुबह भोपाल होता हुआ हैदराबाद से लौटा था। मेरी बहन भी उसी सुवह आई थी। 'प्रभात' मेरे घर अक्सर ही आते थे। अक्सर भोजन कर लेते थे। उस दिन वे लगभग दो घंटे बैठे। बहन ने भोजन का बहुत आग्रह किया पर उन्होंने नहीं माना। उनके जाने के बड़ी देर बाद बहन ने कहा कि 'प्रभात' की हालत आज गड़बड़ है। मैं बस स्टैंड गया जहाँ वे रहते थे। वे वहाँ और घर पर नहीं मिले। अमृतलाल बेगड़ ने बाद में बताया कि शाम को वे उनके घर गए थे। बेगड़ के साथ उन्होंने पूड़ी-सब्जी खाई। फिर यह कहकर चल दिए कि मुझे एक ज़रूरी काम है। बेगड़ भी नहीं समझ पाए कि कुछ गड़बड़ है । रात को आठ बजे के लगभग खबर मिली कि 'प्रभात'ने रेल से कटकर आत्महत्या कर ली। जो आखिरी नज्म लिखकर वे अखबारों को भेज गए थे, उसमें ये शब्द थे: इंसान तो मक़तल में यहाँ कौन जिए। 'प्रभात' ने अपना व्यक्तित्व, स्वास्थ्य, पूरी चेतना, पूरा समय, पारिवारिक स्थिति, आर्थिक मामले, सब जुए के एक ही दांव पर लगा दिए थे, एक ही 'स्टेक' पर -बहिर्मुखी कच्ची, उग्र, आक्रोशभरी, क्रांतिकारी शायरी । यह दांव वे हार गए क्योंकि काव्य युग बदल गया था और वे वहीं अड़े थे। जिंदगी में हारे हुए वे पहले से ही थे। एक और प्रतिभावान कवि इंद्र बहादुर खरे थे। वे धर्मवीर भारती से प्रभावित थे और उन्होंने 'परिमल' की शाखा भी खोली थी। उनकी युवावस्था में ही मृत्यु हो गई। नगर का स्नायु केंद्र था तिलकभूमि स्थित मिस्त्री का होटल । पुरानी दोमंजिला इमारत । बरामदा। भीतर बहुत लंबा-चौड़ा हॉलनुमा कमरा, जिसमें बहुत लंबी-चौड़ी शताब्दी पुरानी टेबिल। इसके आसपास टूटी हुई 15-20 कुर्सियाँ । बाहर दो सिगड़ियों पर पानी उबालते हुए मिस्त्री जी। जब मैं पहली बार उनसे मिला, वे लगभग 45 साल के होंगे। चाँद निकल चुकी थी। शरीर तगड़ा था। चेहरे पर रोब था। मिस्त्री बहुत लोगों के विश्वासभाजन थे। स्वाधीनता संग्राम की गुप्त योजनाएं मिस्त्री के होटल में ही बनती थीं। सामने ही सभास्थल तिलकभूमि है। 88/हम इक उम से वाकिफ हैं . . . ।

दो सीढ़ियां चढ़ने पर याएं मोटे सभे मे टिकी लकडी की एक मज़बून टूटी मदकरती रहती थी। साबन का कोई चडा वक्मा था यह । इस पर विराजमान रहते थे कांग्रेसी नेता, कवि और युवको के प्रेरक प्रसर व्यक्ति पडित भवानी प्रमाद तिवारी। वे अपने को टूटी सदूक का राजा' कहते थे। वे हमेशा उमी टूटी संदूक पर बैठे मिलते । सडक लगी हुई थी । मैकडो लोग वहां उनमे मिलते थे। वह टूटी सड़क नगर कास्पदन था। तिवारी जी ने खुद एक बढ़िया आत्म-लेख लिया है 'टूटी सदूक का राजा ।' मिस्त्री लगभग मौन रहते, सबकी मुनते जाते, गुनते जाते, समझते जाते और चाय के कप देते जाते थे।रोवदार ममझदार आदमीथे। कभी स्पष्ट बोल देते : 'तिवारी जी, जैसा आप समझ रहे हैं. वैमा नहीं है।' सही बात यह है कि मिस्त्री की बात सच होती थी। कभी कोई चायप्रेमी घुमते ही कहता ."एक 'स्पेशल'चाय।"मिस्त्री चिड जाते।कहते 'उठो और सामनेवाले उम होटल में 'स्पेशल' चाय पीओ। इधर 'आर्डनरी' ही मिलेगी। इस देश मे कोई 'स्पेशल' नहीं।' एक थे मिस्त्री के सहायक नेता जी नारायण वर्मा । वे कहते 'भैया, इधर आदमी स्पेशल मिलते हैं. चाय नहीं।' ऊपर की जिल में एक और विभूति या मुकाम था-पडित महादेव प्रसाद मिथ 'मनीषी' का। पत्रकार, वैद्य, राजनेता आदि । खादी की मिरजई, घुटनों तक धोती, मुनहरी फ्रेम का चश्मा, लवे धुंघराले बाल, गौरवर्ण मुदर मय-कई वार वे कांग्रेस नेत्री समझ लिए गए। एक बार तो उनका स्वागत रेलवे स्टेशन पर श्रमिक नेता आर एम रुईकर की पत्नी के रूप में कर दिया गया था। मैने 'मनीपी पर पूरा रेखाचित्र लिसा है, जो छपा नो मनीपी ने पढ़कर सुद मुझमे उनकी तारीफ की। मनीपी अद्भुत व्यक्ति थे। वे माहित्य मनीपी, माहित्याचार्य, आयुर्वेदाचार्य-न जाने क्या-क्या थे। गाली-गलौज का एक. हाथ मे छपा हुआ, माप्ताहिक पत्र-हिमाचल निकाल चुके थे और पिट चुके थे । व्यक्तित्व अत्यत मोहक । पर पेट भरने का जरिया कोई नहीं जानते थे। उन पर लिसे रेखाचित्र के कुछ अश 'मनीपी इमी होटल के ऊपरी हिम्मं मे न जाने कब मे रह रहे हैं और इस इमारत के गिरने तक शायद यहाँ रहेगे। उनका धधा कट भी नहीं है। भोजन आने का क्या जर्जाग्या है, किसी को नहीं मालूम । कपडे कहाँ मे मिल जाते हैं, और हमेशा इतने उजले कैमे रहते हैं, यह भी एक रहम्य है. परत इस व्यक्ति के मुस हम इक उस मे वाकिफ है/50 ।

- पर मैंने कभी चिंतारेखा नहीं देखी। कभी परेशानी की छाया नहीं देखी, कभी दुख की मलिनता नहीं देखी। जिसके खाने का ठिकाना नहीं है, जो दो दिन भूखा पड़ा रहता है, एक फटा टाट जिसकी शैया है, वर्षों पहले का ईंट का चूल्हा, जिस पर अभी तक मिट्टी नहीं चढ़ पाई, एक मिट्टी का घड़ा, एक टीन का गिलास, एक तवा और डेगची जिसकी समस्त संपत्ति है, शरीर पर पहने हुए कपड़ों के सिवा जिसके पास एक अंगोछा और एक फटा कंवल मात्र है-वह चिर यौवन से कैसे लदा है ? वार्धक्य इससे क्यों डरता है ? केश किस भय से श्वेत नहीं होते? झुर्रियाँ चेहरे को क्यों नहीं छूती ? चिंताओं के दैत्य इससे क्यों दूर रहते हैं ? दुख इसके पास क्यों नहीं फटकता? यह किस स्रोत से जीवन-रस खींचता है कि सदा हरा-भरा रहता है ? किस अमृत-घट से इसने यूंट पी लिया है कि संसार का ज़हर इस पर चढ़ता ही नहीं? एक दिन मैं होटल में बैठा था। ऊपर से बाँसुरी की आवाज़ आई। मैंने होटल मालिक से पूछा : 'वाँसुरी कौन बजा रहा है ?' उन्होंने कहा : 'वही होगा मनीषी । खाना नहीं मिला होगा, तो वाँसुरी बजा रहा है। उन्होंने उसे पुकारा और पूछा : 'अरे खाना खाया कि नहीं?' भूखे मनीपी के मुख पर मुस्कान आई, जैसी भरे पेटवाले के मुख पर भी दुर्लभ है। वह बोला : 'खाया था लेकिन परसों।' होटल मालिक ने उसे कुछ पैसे देकर कहा : 'जा कुछ खा ले और यह गाना-बजाना बंद कर दे।' वाद में मुझे मालूम हुआ कि अगर मनीपी वाँसुरी वजाता हो तो इसका यह अर्थ है कि वह भूखा है। भरपेट वह कभी बाँसुरी नहीं बजाता। एक-दो रोज़ का भूखा होता है तव टाट पर पड़ा-पड़ा बाँसुरी बजाया करता है। आगमी कल की जिसे चिंता न हो ऐसा आदमी दुर्लभ है, पर मनीषी को आज की भी चिंता नहीं है । कल कहीं से रोटी मिल गई थी, तो आज भी कहीं से मिल जाएगी। आज न आई तो झक मारकर कल आएगी, ऐसा उनका विश्वास है। उनके कमरे में एक मिट्टी का घड़ा है, जिसमें ज्वार, बाजरा, गेहूँ, किसी का भी या सबका मिला हुआ आटा कभी-कभी रखा रहता है । एक छोटे से बर्तन में नमक और मिर्च हैं । जब कहीं से खाना नहीं मिलता और घड़े में आटा हुआ तो मनीषी एक-दो रोटी सेंककर नमक-मिर्च से खा लेता है। यदि आटा नहीं हुआ तो पड़ा-पड़ा बाँसुरी बजाता है। भूख को इस प्रकार संगीत बनाकर आसपास विखेरता है। कोई सुन लेता है और भोजन करा देता है। 90/हम इक उम्र से वाकिफ हैं ।

। उनके चिकित्सा जान पर जब किसी ने आक्षेप किया तो उन्होंने ममझाया. 'देखो भाई गरीब आदमी न तो ऐलोपैथी से अच्छा होता है और न होमियोपैथी मे, उमे तो मिम्पैथी (महानुभूति) चाहिए। मैं निम्पैथी की महम्रपुटी मात्रा देता हूँ, गंगी अच्छा होता जाता है। अपनी चिकित्मा की मफलता के मयध में उन्होन एक बार कहा 'मो मे पचास रोगी अपने आप अच्छे हो जाते हैं-दम डॉक्टर की दवा में अच्छे होते हैं। जो चालीम मरते हैं, उनमें पढ़ह तो जीवन शक्ति की ममाप्ति के कारण मरने हैं और पच्चीम को डॉक्टर की दवा मार डालती है। में इन पचीम लोगों को माफ यचा लेता है क्योंकि मेरी पुड़िया न अच्छा अमर करती है, न युग ! पद्ह तो धन्वतरि के इलाज में भी मरेगे ही। शेष को में अपनी मिम्पैथी' की डोज मे बचा लेता हूँ। दम तरह मेरे इलाज में पचासी फीमदी रोगी अच्छे हो जाते हैं।' अपनं खाने का ठिकाना नहीं है पर उदारता में कणं है। बड़े शरणागतवत्मल हैं। कोई भी आफत का माग आ जाए, मनीषी के एक गज टाट पर और मस्के की दो गेटी पर उमया अधिकार है। जब तक घड़े मे आटा है तब तक दो गेटी खिलाएगा और आप पाएगा। जब आटा चुक जाएगा तव मनीपी यांमग वजाएगा और अतिथि कढ़ना हुआ मुनगा । जिसे कहीं जगह नहीं मिलती, उमे मनीपी के यहां जरूर आश्रय मिल जाएगा। जिम मय तिरस्कृत करे,वह अगर मनीषी के यहां पहुंच गया तो मनीपी उसे अपना भाई बना लेगे। कितने ही लोग उनका आश्रय पाते हैं । घर मेनिकने हुए लइके. बेकार आदमी, निरस्कृत नारियाँ । लेकिन मनुष्य-मय उनके औदार्य की छाया में आ बैठने हैं। कोई-कोई कृतघ्न जिम वृक्ष की छाया में बैठते हैं उसे एक-दो कल्हाडी मार जाने है या कुछ शाखा ही नोच जाने है। मनते है ये आश्रयहीन लोग जाने वक्त उनका फटा कवल या लोटा ही ले भागने हैं। एक बार अनाथालय म भागी हई नीन-चार निगम्बन ओर नाटिन लडकियों मनीषी के आश्रम मे आई। मनीपी ने उन्हें धर्म-पुत्री मान लिया। दो चार दिनों में उनके यहां धर्म-पुत्र भी जाने लगे और जब इन धर्म-पुत्रों ने धर्म-पनियों को धर्म-पत्नियों बनाने का उपक्रम किया नो महल्लेवालो ने बडा हल्ला-गल्ला मचाया। वे लडक्यिों धम-पिता को छोड़कर भागी। अभी भी मनापी जी बडे दर्द में धर्म-पत्रियों को याद करते हैं। कहते हैं न जाने बेटियों कहाँ हैं किस हालत में हैं।' हम इक उम्र ने वाकिफ हैं/91 ।

- , फिर मनीपी ने राजनीति काव्यवमाय अपनाया। नेता हो जाना बड़ा अच्छा धंधा है। पर वे किसी भी दल के प्रति पक्षपात नहीं करते थे। वे एक माथ ही काँग्रेम,समाजवादी दल, साम्यवादी दल, जनसंघ,गमगज्य परिषद् आदिमव में थे। हर मंच में भाषण देते। घंटों बोलते और लोग ऊवते नहीं, क्योंकि वे कुछ बोलते ही नहीं हैं। एक बार वे एक सभा में बोलने खड़े हो गए । बड़े जोश में बोले; काँग्रेमी चोर हैं। ममाजवादी उचक्के हैं, माम्यवादी लुच्चे हैं आदि-आदि।'आधा घंटे तक सब दलों को गाली देते रहे। श्रोताओं ने हल्ला मचाया : अपने शब्द वापम लो।' मनीषी ने हंसते हुए कहा : 'तुम शब्द वापम लेने की कहते हो, मैं अपना पूरा भाषण वापस लेता हूँ और फिर नया भाषण आरंभकरता हूँ। मुनो भाइयो और बहनो 'फिर आधा घंटे तक भाषण देते रहे। मव काम कर देखे और जब कोई नहीं बना तव मनीषी ने मोचा कि कोई काम नहीं करना ही अच्छा है। पर हौंसले उनके वहुत ऊँचे हैं । मुझसे कभी-कभी बड़ी गंभीरता से कहते है : 'मैं शीघ्र ही अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार संघ खोलनेवाला हूँ।' एक फिल्म कंपनी खोलने की भी उनकी योजना चल रही है, जिसमें मुझे नायक का काम देने का वादा वे कर चुके हैं। नीचे वे मुझसे फिल्म कंपनी की योजना पर चर्चा करते रहे। थोड़ी देर बाद ऊपर उठकर गए तो वाँसुरी बजाने लगे। भूखे थे। थोड़ी देर बाद नीचे उतरे तो चेहरे पर वही मस्ती,वही हंसी थी। मैं सोचता हूँ, क्या यह हँसी विक्षिप्त की हँसी है ? क्या यह निरपेक्ष जीवन.का हास्य है ? क्या यह उस चरमविफलता की हँसी है, जब आदमी सोच लेता है कि हमसे अव कुछ नहीं बनेगा? क्या यह उस उदासीन वृत्ति का हास्य है कि हमारे बनने या विगड़ने में कोई मतलब नहीं अथवा दर्द को कलेजे की भट्टी में गलाकर इसने हँसी के रूप में प्रवाहित कर दिया है?' मिस्त्री का होटल एक विश्वविद्यालय था। पाम ही 20-25 कटम पर 'प्रहरी' का दफ्तर था। यह दूसरा विश्वविद्यालय था। शहर के इन दो. विश्वविद्यालयों में पढ़ना लेखक, नेता, समाजसेवी आदि के लिए जरूरी था। 92/हम इक उम्र से वाकिफ हैं पहली किताब का छपना और एक चुनाव लड़ना - मुझे लिखते कुछ माल गए थे । मेरी बहुत-सी रचनाएं छप चुकी थी । मध्यप्रदेश के पत्रों मे तो छपी ही थी । इस प्रदेश से तीन मासिक पत्रिकाएं भी निकली,जिनका प्रमार सीमित था । बाहर इलाहाबाद के साप्ताहिक'सगम' मे कुछ कहानियां छप गई थी। प्रयागराज तब कई कारणो मे प्रसिद्ध था । अमरूद इनमे सर्वोत्तम चीज थी। फिर मगम का तीर्थ-स्थान, पिंडदान, पडे । इसके बाद साहित्य का नबर आता था । प्रयाग माहित्य का तीर्थ था । जितने पडे पिंडदान करानेवाले थे, उससे कम लेखक-कवि नही थे । अधिकतर गाँवो मे आटा-दाल लाकर इलाहाबाद और वाराणसी में पढ़े लडके, मव तरुण माहित्यकार हो गए थे। इनके दो प्रकार के नेता थे-एक तबके के नेता धर्मवीर भारती थे और दूसरे के कमलेश्वर व मार्कंडेय । फिर प्रौढ़ मठाधीश थे। रामकुमार वर्मा की पीढ़ी के । उपेद्रनाथ 'अश्क' का वर्गीकरण में अब तक नहीं कर सका । शकराचार्य थे इधर ज्यादातर विवाद मे परे श्रद्धेय किस्म के महादेवी, पत्त, निगला । निराला को 'महाप्राण महाप्राण । चिल्लाकर मिडिलचियो ने विक्षिप्त कर दिया और जल्दी मार डाला । जब दिल्ली और लखनऊ मे साहित्यिको के योग्य अच्छी नौकरियां खुली और औद्योगिक घरानो ने पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित की, तब ये मगम के गगाजली पछी इन महानगरो मे जाकर पम गए और चार-पांच मालो तक एकाकीपन और निर्वासन की कविताएं लिखते रहे । यह स्वाभाविक था । गांव से आए थे, जहाँ कदम-कदम पर लोग रामजी की और 'पालागी' करते थे । इलाहाबाद रहे तो हर सड़क और मुहल्ले मे परिचित और नमस्ते' वाले मिल जाते थे । दिल्ली गए । कनाट हम इक उम्र मे वाकिफ है/93 - रही है, अपार भीड़ । एक लाख आदमी सामने से निकल गए, मगर 'नमस्ते' एक से भीनहीं हुई । एकाकीपन, निर्वासन तो महसूस होगा ही। अधिकतर लेखक महानगर उड़ गए। 'परिमल' वाले ज़्यादातर चले गए। उनके स्वामी करपात्री 'अज्ञेय' भी दिल्ली जा बसे । महादेवी जी की तो विद्यापीठ थी । पंत इस प्रकार के करियरिस्ट' नहीं थे । निराला फक्कड़ थे ही । 'अश्क' भी कापालिक की तरह जमकर वहीं साधना तय किए बैठे थे। युवकों में वे रह गए जिन्हें विश्वविद्यालय या प्रकाशन गृह में नौकरी मिल गई। कुछ पत्रकार हो गए । प्रयाग सूना हो गया । मैं कई बार प्रयाग हो आया था, पर मिलता था सिर्फ़ अमृतराय से । वे हमारे बहनोई हैं, सुभद्राकुमारी चौहान के दामाद । और ठहरता हमारे स्कूल के दिनों के प्रखर नेता महेशदत्त मिश्र के यहाँ, जो अब विश्वविद्यालय में अध्यापक थे । किसी लेखक से मैं नहीं मिलता था । एक बार जब 'अंचल' के पास धर्मवीर भारती आए थे, तब मेरा उनसे परिचय कराया गया था । महानगरों और प्रयाग में बसनेवाले लेखक हम-जैसे लेखकों को 'प्राविंशल' कहते हैं यानी देहाती । बस अश्क' ही हैं जो बलिया के गाँव के ढोलकिया को भी वाशिंग्टन का नागरिक मानते हैं और उससे कहते हैं : 'आप-जैसे महान लेखक के पास मेरी किताबों का सेट होना चाहिए। खरीद लीजिए।' बाकी लेखक 'प्राविंशल' की उपेक्षा-उपहास करते हैं । हम 'प्राविंशल' लेखकों की बड़ी इच्छा होती है अपनी पहली पुस्तक छपवाने की । मेरी इच्छा भी जाग गई थी। मिस्त्री के होटल की मंडली में अक्सर यह कहा जाता : 'भई, अव तो परसाई जी.की पुस्तक छप ही जानी चाहिए । कहते सब थे, सच्चे मन से कहते थे, पर कैसे छपेगी, कौन छापेगा, कौन बेचेगा? यह कोई नहीं बताता था । जानते भी नहीं थे। जबलपुर में सिर्फ पाठ्य-पुस्तकों के प्रकाशक थे । मैंने तय किया कि पुस्तक खुद छपाऊँगा और खुद बेचूंगा । पैसे कहाँ से आएँगे ? इस पर मैंने विचार नहीं किया । एक तर्कहीन विश्वास में हमेशा फंसा रहा हूँ-जब अब तक काम होता आया है, तो आगे भी हो जाएगा। इससे कठिनाइयाँ तो आईं, मगर बहुत-से अच्छे काम भी हो गए, जो तर्क और हिसाब से चलने पर नहीं होते । जबलपुर में सेठ गोविंददास का 'जयहिंद' प्रेस था । उनका 'जयहिंद' दैनिक पत्र भी निकलता था । इसमें वावू गोविंददास का प्रचार होता था । जो 94/हम इक उम्र से वाकिफ हैं भाषण वे नहीं देते थे, वह भी छप जाता था । प्रेस अच्छा था । सिर्फ इसी प्रेस में मोनोटाइप थे। मैनेजर थे गुनाय प्रमन्न'शाखाल' । कवि थे । इन कमजोरी का लाभ मुझे यह मिला कि विना पेशगी लिए, विना रेट तय किए, उन्होंने गद्गद रूमानी अदाज में मेरी पांडुलिपि ले ली । इसमे कुछ अत्यंत करुग कहानियाँ धी, कुछ मामाजिक कहानियां और कुछ व्यग्य कथाएँ । पुस्तक का नामरसा 'हमते हैं रोते हैं । महीने भर मे किताव तैयार । लगभग मवा मौ पृष्ठो की अच्छी छपी पुस्तक का बिल आया लगभग माढ़े तीन सौ रुपए । मैंने एक प्रति का दाम रखा कुलद रुपया । ममर्पण किया ऐसे आदमी को जिमे किताय खरीदने की आदत हो और जिमकी जेब मे डेढ़ रुपए हो। 'शासाल' जी ने कहा 'हजार प्रतियां हैं। माढ़े तीन नौ रुपए का बिल चुकाकर उठा लीजिए । पर रूपए आप कहाँ में ? मिस्त्री के होटल में किताव का चर्चा गेज होता, मगरविल चुकाने की बात नहीं होती । मैंने रामेश्वर गुरु, भवानीप्रमाद तिवारी, मदाईमल जैन वगैरह से नहीं कहा । कहता, तो ये दिल चुकवा देते । मेरी कठिनाई की चर्चा गोरखपुर मुहल्ले के मेरे तीन स्नेहियों में हुई। ये थे-भोला प्रमाद पाठक, टाकर परमिह और अर्जुन मनजी राठौर । राठोर ठेकेदार थे। उन्होंने चुपचाप माढ़े तीन मौ रुपए चुका दिए और मैंने पुस्तके उटा ली । में शांतिनिकेतनी झोले में पुस्तक रखता और डेढ़ रुपए लेकर पुस्तक बेचता फिरता। अद्भुत आहलादकारी अनुभव होता है वह, जव लेखक अपनी पहली पुस्तक किमी को देता है और उसकी तारीफ सुनता है । नोवुल पुरस्कार पाने पर भी वैमा उल्लाम नहीं होता । मैं अपने स्नेहीजन को झोले मे किताब निकालकर देता तो वह प्रसन्न और चमत्कृत होकर कहता 'वाह । किताव आ गई। नीयन सुश हो गई। मैं डेढ़ रुपया ले लेता । एक मित्र मायाराम मुरजन ने कहा 'यह क्या मृखी किनायटेग्हे हो । अरे कुछ मम्नेह मप्रेम नोलिसकर दो। मैंने लिख दिया भाइ मायागम मुरजन को मम्नह दो रुपए में ।' मायागम ने कहा इंद सपा की किताब है । दो रुपए क्यो। मैंने पहा 'आधा रुपया स्नेह चार्ज। मुषमा माहित्य मदिर पुम्नक केवितरक हो गए। किताय थाहर भी गई। कुमिनी ने फिनाये येचने का काम ले लिया । नाथूलाल मराफतोझोले में मेरी किनावे भरे ही रसते थे । यहुत किताये वेची । हम इक उस से वाकिफ है/95 । । मैं खुश और चकित हुआ, जब मैंने 'सरस्वती' के ताज़ा अंक में अपन पुस्तक पर संपादक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की लंबी-सी टिप्पणी पढ़ी उन्होंने मेरी समाज-संलग्नता को सराहा था, व्यंग्य-क्षमता को पहचाना था मगर मेरे नकारात्मक नज़रिए की आलोचना की थी। मेरी किताब का डिपो, शोरूम, सेल्स सेंटर, विज्ञापन केंद्र मिस्त्री का होटल था । मिस्त्री खुद मेरे सबसे बड़े प्रचारक थे। वे चाय का कप देते हुए कहते 'तुमने परसाई जी की किताब देखी कि नहीं ?' ग्राहक अनभिज्ञता प्रगट करत तो मिस्त्री कहते : 'अरे, तो फिर कैसे पढ़े-लिखे आदमी हो ।' खोके में से किताब निकालकर देते और कहते: 'येलो । निकालो डेढ़ रुपया ।' मिस्त्री क यही ठाठ था। पहली पुस्तक 'हँसते हैं रोते हैं सब बिक गई । पसंद बहुत की गई । इसमें मेरे लेखन के दो प्रकार थे । कुछ अत्यंत करुण प्रसंग थे, मेरे और परिवार के भोगे हुए दुख के । लोग कहते थे कि एक-दो कहानियाँ तो बिना रोए पढ़ी है नहीं जा सकतीं । इनके सिवा कुछ व्यंग्य कथाएँ थीं । ये कहावत और सुभाषित की तरह लोगों की जवान पर आ गईं । दुख को लिख लेने से मैं हल्का हो गया मुक्त हो गया । मैंने अपने 'मैं' को विस्तार दे दिया । दूसरे, अभिव्यक्ति का मेर प्रधान माध्यम व्यंग्य हो गया । इस पुस्तक का दूसरा संस्करण नहीं हुआ । पर कुछ दूरदर्शी पुस्तव विक्रेताओं ने कुछ कितावें रख ली होंगी । 25-30 साल बाद शोध के लिए इस पुस्तक की ज़रूरत महसूस होने लगी । विश्वविद्यालयों के हिंदी-विभाग तथ शोध-छात्रों के लिए यह दुर्लभ ग्रंथ हो गया । मेरी जानकारी में तब यह डेर रुपए की पुस्तिका अलभ्य साहित्य की हैसियत से पच्चीस-तीस रुपयों । बिकती है । मुझमें अगर तब समझ होती कि कुछ साल बाद मैं 'दुर्लभ' और 'अलभ्य' लेखक होनेवाला हूँ, तो मैं ही सौ प्रतियाँ रखे रहता । वह पुस्तिका अद 'अलभ्य ग्रंथ' कहलाती और बीस-तीस गुनी कीमत में बिकती । परं मैं उन भाग्यवान लेखकों में नहीं हूँ, जिनमें एक साथ दो प्रतिभाएँ होती हैं-रचना के और व्यापार की। इसी के आगे की घटना जो मुझे याद है, वह है पहले आम चुनाव । 1952 जी-तोड़ काम करना । मैं समाजवादियों के साथ था । विधिवत ये समाजवाद 1948 में काँग्रेस से बाहर आए और समाजवादी दल बनाया । अध्यक्ष 96/हम इक उम्र से वाकिफ हैं . - आचार्य नरेंद्रदेव । वास्तव में पार्टी चलाते थे जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया और अशोक मेहता । जयप्रकाश नारायण ने आगे चलकर ममाजवादियो के लिए लाल टोपी पहनने का नियम बना दिया । डॉ. लोहिया ने इसका उपहास किया और कभी लाल टोपी नही लगाई। अशोक मेहता अपनी दादी में प्रातिकारी की छवि रखते थे। मैंने उनका भाषण पहली बार मुना । वे अर्थशास्त्री थे। वे ऑकडे-ही-ऑकडे बोलते थे । लोहिया उग्र थे । व्यग्य में बोलते थे । घातक प्रहार करते थे । जवाहरलाल नेहरू पर व्यक्तिगत हमले करते थे। पूरी मुद्रा एक क्रांतिकारी की थी-फक्कड क्रातिकारी की । लोहिया काममाजवादी आदोलन में चाहे जो योग हो-मेरा ख्याल है नकारात्मक और 'मिनिकल' था । एक नई हिंदी-तेज, मुहावरेवाली, ओजस्वी, शक्तिशाली, नई अदा की भाषा का श्रेय उन्हे है । बहुत लेखको ने, विशेषकर 'परिमल' गुटवालो ने यह जानदार भाषा उनमे मीठी । 'दिनमान में आरभ मे ही लोहिया में प्रभावित लेसक मपादक मइलमे थे । 'दिनमान की भापालोहिया से सीखी हुई भाषा थी । लोहिया का मकारात्मक मूल्यवान योग भाषा मे था, राजनीति में नहीं। . । जयप्रकाश नागयण माधु-जैसे थे । 1952 तक भमाजवादियों मे मेरा काफी मोह-भग हो गया था। ये कांग्रेसी ही थे । वही मस्कार थे । अदा क्रांतिकारी थी । भापा तीसी मीस ली थी । पर अधिकाश को कोई समझ नहीं थी समाजवाद की । ये भावुक लोग थे । गरीबों में महानुभूति थी । इनका समाजवाद यह या 'हाय, एक तरफ गरीब की झोपड़ी और उसी में लगा अमीर का बंगला । हाय, यह अन्याय है।' गरीवी-अमीरी का भेद मिटाना चाहिए। ये न इतिहास जानते थे, न अर्थशास्त्र, न ममाजशास्त्र । पहले महात्मा गांधी की जय बोलते थे, अब जयप्रकाश नारायण की जय बोलने लगे। इनके नेता जरूर पढ़े-लिखे थे । अधिकाश'मोशलिस्ट इटरनेशनल' से जुड़े थे। ये बडे महत्त्वाकाक्षी थे । पर मैंने चुनाव में भवानीप्रसाद तिवारी का काम इटकर किया । इमका कारण ममाजवाद में मोह नही, तिवारी जी से व्यक्तिगत सवध थे जहाँ तक ममाजवादी पार्टी का सवाल है, इसके नेता स्वप्नलोक मे थे । चुनाव के पहले अशोक मेहता ने गर्वोक्ति की थी 'We will sucep the हम इक उम से वाकिफ हैं/97 - - । polls.' (हम सारे मत ले लेंगे) चुनाव में जब पार्टी बुरी तरह हारी, तव एक कार्टून मैंने देखा था-अशोक मेहता झाडू से मतदान केंद्र की सफ़ाई कर रहे हैं । कार्टून का शीर्षक था: 'We will sweep the polls.' आखिर अशोक मेहता काँग्रेस में चले गए । योजना आयोग के उपाध्यक्ष और फिर अर्थ-मंत्री हुए। ज़ब वे काँग्रेस में जा रहे थे, तब एक कार्टून 'शंकर्स वीकली' में देखा था । साँप के बिल में अशोक मेहता घुस रहे हैं । आचार्य कृपलानी और राममनोहर लोहिया देख रहे हैं । लोहिया कृपलानी से कहते हैं : 'Dada, Can't you save him.' कृपलानी जवाब देते हैं : 'You Can't save a man who wants a state funeral.' तिवारी जी के मित्रों, असंख्य प्रशंसक और भक्तों का विराट समूह था । उनके विरोध में जो काँग्रेसी उम्मीदवार थे, वे आज़ादी मिलने पर काँग्रेस में आए थे । उनका कोई काम नहीं था । हम तिवारी जी की जीत के प्रति पूरे आश्वस्त थे । उनका चुनाव पोस्टर बहुत सादा और प्रभावकारी था । उस पर उनका रेखाचित्र था, जिसके नीचे लिखा था : 'सुख-दुख के साथी ।' बस ! लोग अपने आप चुनाव प्रचार में लग गए । पैसा भी आया । दिन-भर का काम करके हम लोग तिवारी जी की बैठक में पहुँचते । पंडित जी राजनीति भी कविता की तरह करते थे । मस्ती में रहते । शाम को हम लोग भांग की गोली भी ग्रहण करते। मगर काँग्रेस ने आज़ादी के बाद शहरी और ग्रामीण निहित स्वार्थों से साँठगाँठ कर ली थी। ये ही मत दिलानेवाले थे । दूसरे जवाहरलाल नेहरू का जादू पूरे जोर पर था । मतगणना हो रही थी। हम कुछ लोग तिवारी जी के घर उनके साथ बैठे थे। लगातार पहले तो 'लीड' की खबरें आती रहीं । मतगणना का आखिरी दौर शुरू होने तक वे काफ़ी आगे थे । जीत पक्की थी । मिठाई और मालाएँ आ गईं । मगर आखिरी दौर की पेटियों की मतगणना में काँग्रेस बढ़ती गई और खवर आई कि लगभग तीन सौ मतों से तिवारी जी हार गए। अब जो दृश्य उपस्थित हुआ वह अभी भी मेरी दृष्टि में जैसा-का-तैसा है । कमरे में हम लगभग 15 मित्र थे । बाहर बरामदे में लगभग सौ-डेढ़ सौ लोग होंगे। । जीते हुए और हारे हुए राजनेता मैंने बहुत देखे हैं । पर तिवारी जी की 98/हम इक उम्र से वाकिफ़ हैं प्रतिक्रिया निराली थी। आपान उन्हें विकट लगा था, यह मही है। थोड़ी देर मौन रहे । तभी उनमे अपने उन व्यक्तित्व की चेतना जागी, जो उन्होंने इतने माला में बनाया था-औघड,मम्न, फक्कड अजेय और हार-जीत में उपर वे खड़े होकर चिल्लाए 'यागे, क्या मातम मना रहे हो । अरे, मियईचोटो । और गत को लुकमान की कव्वाली होगी।' मिटाईबेटी । तिवारी जी मस्ती में आ गए थे,पर भीनरी मघर्ष में गमन रहा था । गत कोलकमान की कब्दाली हुई । जय कन्वानी होती थी, तिवारी जी मम्नी मे डोलते थे, ताल देते थे, कभी तबला बजाते थे । आज वे कुट अतिरिक्त मस्ती बता रहे थे। पर मेरे लिए यह मस्ती अत्यत कार्यणक थी। उनके भीतरी रोदन को मैं ममझ रहा था, जिसे दवाकर वे मम्ती निवाल म्हे थे । मेग मन उम मम्नी में बहुत सिन्न था। अपने एक साम तरह के व्यक्तित्व का प्रक्षेपण आदमी कर दे, तो उम रूप की रक्षा के लिए कितना आतरिक और बाहरी मघर्ष करना पडता है । इसके बाद मेंने तरह-तरह के रोल देखें । आम ममाजवादी काँग्रमी ही था। नेता लोग जर वही गेल अदा करना चाहते थे, जो यूरोप के ममाजवादियो, विशेषकर जर्मन ममाजवादियों ने किया। माम्यवाद विगंध और पामम्टो में ममझौता । भारत में नेहरू का विरोध इसलिए कि वेरूम में गहरेमवध म्यापित कर रहे थे, अमेरिका में दर होने जा रहे थे और एक तीमरे शक्नि-गुट निरपेक्ष मगठन के नेता थे, जिम रूनी साम्यवादी गुट का समधन था। पर 1954 में नेहरू और जयप्रकाश नागयण में समझौता हो गया था और समाजवादी पार्टी का कांग्रेस में विलय करने पर महमति हो गई थी। उन ममाजवादी नेताओं के नाम भी तय हो गए थे. जिन्हे मत्रिमडल में जाना था। पर वायकारिणी में डॉक्टर लोहिया ने इम ममझाने को नामजर करवा दिया। इसके बाद जयप्रकाश नागयण की निगशा और पथभ्रम का दौर शुरू हुआ। अनत उन्होंने 1975 मे पानिम्टो मे समझौता किया। मपणं कति आदोलन या नेतृत्व किया जो पूरी तरह गष्ट्रीय स्वयमेवक मघ द्वारा मवानित था। पाचार्य कृपलानी गांधीवादी थे। वे महंगाई, भष्टाचार आदि की शिकायत लगातार करते थे. पर विद्वान होते हुए भी इनके कारण नैनिक मानने । किमी बुनियादी आर्थिक परिवर्तन के पक्ष में वे नहीं थे। नेहरू के समाजवादी मन्नान और माम्यवादी रूम मे मित्रता के विरोधी थे। वे दक्षिणपथी थे। उन्होंने हम इक उसमें वारिफ है . ।

। ? किसान-मज़दूर प्रजा पार्टी' बना ली थी। इस पार्टी को 1952 के चुनाव में समाजवादी दल से अधिक सीटें मिलीं। दोनों पार्टियाँ मिल गई और नया नाम दिया 'प्रजा समाजवादी पार्टी'। केरल में इस पार्टी की सरकार भी बनी। मुख्यमंत्री थे पट्टम थानु पिल्लई। किसी जगह पुलिस ने गोली चलाई और कुछ लोग मारे गए। डॉक्टर लोहिया ने पिल्लई की बहुत खिंचाई की । इस्तीफा माँगा। आंतरिक कलह हुई। लालबहादुर शास्त्री मौका देखकर पट्टम थानु पिल्लई को दिल्ली उड़ा लाए और काश्मीर का राज्यपाल बना दिया। कृपलानी अविश्वसनीय और झूठे गाँधीवादी थे। संसद में उन्होंने कहा था : 'गाँधी के इस देश को सेना और हथियारों की क्या ज़रूरत है ? हम क्यों इतना पैसा इन पर खर्च करते हैं ? हमने अहिंसा की शक्ति से एक साम्राज्य को पराजित किया है। मगर जब चीनी हमला 1962 में हुआ, तब इन्हीं कृपलानी ने सवसे तीखा हमला रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन पर किया कि उन्होंने देश को रक्षा के लिए तैयार नहीं किया। कैसे गाँधीवादी होते हैं। पहले कहते थे कि इस रक्षा मंत्री को पैसा मत दो। बाद में आरोप लगाते हैं कि इस रक्षा मंत्री ने सुरक्षा की तैयारी नहीं की। प्रजा समाजवादी पार्टी से काँग्रेस में लौटने का सिलसिला शुरू हुआ। अशोक मेहता गए। हमारे इधर के नेता हमारे मित्र प्रो. महेशदत्त मिश्र गए। तिलकभूमि की एक सभा में आचार्य कृपलानी ने कहा : 'अब यह तुम्हारा महेश है। कहता है कि दादा, विचारों से हम आपके साथ हैं, पर आप हमें काँग्रेस में जाने की इजाजत दीजिए-जैसे मेरी बीवी सुचेता कहे कि दिल से तो मैं तुम्हारी धर्मपत्नी हूँ, पर मुझे आप जवाहरलाल नेहरू के 'बेडरूम' तक भेज आइए।' आगे डॉ. लोहिया पार्टी से निकाले गए। उन्होंने 'संयुक्त समाजवादी दल' बनाया। उनके जीवनकाल में ही पार्टी टूटने लगी थी। उनके बाद तो भारत में कोई समाजवादी दल रहा ही नहीं। 100/हम इक उम्र से वाकिफ हैं कुछ लेखकों से रिश्ते अपने ने ऊपर की पीढ़ी के बहुत कम लेखकोने में मिला हूँ। आमरिवाज यह है कि मामान्यन नेसक बडे. नामधारी, श्रसास्पद नेसवों में मिलना एक जारी माहित्यिक कर्म मानना है। मैंने यह क्या नहीं । कारण कई हैं। एक नो गरिमा के मामने नघना को लेकर जाने में मेग मोच-अहकार नहीं। दूसरे, मुझमे यह उन्मुकना ही नहीं रही कि यहां-वडो मे मिल । लेग्नि मयमे बड़ा कारण मंग यह डर किये मिर्फ नाहित्य की ही बात करेंगे और हम दोनो नाटक करंगे और महज नहीं होंगे। मझेदन बान पर चिढ़ होती है कि नेसक मिनने हैं तो निफ साहित्य की बात करने हैं । में सद साहित्य की बात मवने कम करता है। में दूसरे विषयों की बात करता है-क्सिी वतमान सामाजिर. गजनानक आर्थिक समस्या परवान करता है। में रोनाल्ड रेगन और मिसाइल गांवाव पर बात शुरू करता है और यहाँ बैठे लेखक अडचन महमन सत। में इतिहास, गजनीनि. मम्मान यहाँ नक कि ग्मायन शाम्प पर भी बात माना है उन कारण में बहन कम बडनमा नेमिला । में उन अभागाम है जिसन अजेय मे भेट नहीकी। दावार दसा जमर है।एकदिन श्रीवान वमापाग 'दिनमान के दफ्तर में बटाधा। अजय लिफ्टम उनकापती विनारिनी को देनीधे मपादक के विनमगनगा । श्रीमान ने कहा लिए प्रार मिनवाई। मैन कहा रहन दा। मग अहवार नही था। मनीगा। जो आमपास बैठे अपने मित्रो-महामियो की नगफ नजर न दानरमीभा अपने दिन मंघम जाग यह मामी मझे अपना नही नगा। उमरी पारा "दिनमान मेवामकानवान श्यामलाल शमा पर की शादीमा पगनी - - कमरमगरम- किसान-मज़दूर प्रजा पार्टी' बना ली थी। इस पार्टी को 1952 के चुनाव में समाजवादी दल से अधिक सीटें मिलीं। दोनों पार्टियाँ मिल गईं और नया नाम दिया 'प्रजा समाजवादी पार्टी'। केरल में इस पार्टी की सरकार भी बनी। मुख्यमंत्री थेपट्टम थानु पिल्लई। किसी जगह पुलिस ने गोली चलाई और कुछ लोग मारे गए। डॉक्टर लोहिया ने पिल्लई की बहुत खिंचाई की। इस्तीफा माँगा । आंतरिक कलह हुई । लालबहादुर शास्त्री मौका देखकर पट्टम थानु पिल्लई को दिल्ली उड़ा लाए और काश्मीर का राज्यपाल बना दिया। कृपलानी अविश्वसनीय और झूठे गाँधीवादी थे। संसद में उन्होंने कहा था : 'गाँधी के इस देश को सेना और हथियारों की क्या ज़रूरत है ? हम क्यों इतना पैसा इन पर खर्च करते हैं ? हमने अहिंसा की शक्ति से एक साम्राज्य को पराजित किया है। मगर जव चीनी हमला 1962 में हुआ, तब इन्हीं कृपलानी ने सबसे तीखा हमला रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन पर किया कि उन्होंने देश को रक्षा के लिए तैयार नहीं किया। कैसे गाँधीवादी होते हैं। पहले कहते थे कि इस रक्षा मंत्री को पैसा मत दो। बाद में आरोप लगाते हैं कि इस रक्षा मंत्री ने सुरक्षा की तैयारी नहीं की। प्रजा समाजवादी पार्टी से काँग्रेस में लौटने का सिलसिला शुरू हुआ। अशोक मेहता गए । हमारे इधर के नेता हमारे मित्र प्रो. महेशदत्त मिश्र गए। तिलकभूमि की एक सभा में आचार्य कृपलानी ने कहा : 'अब यह तुम्हारा महेश है। कहता है कि दादा, विचारों से हम आपके साथ हैं, पर आप हमें काँग्रेस में जाने की इजाजत दीजिए-जैसे मेरी बीवी सुचेता कहे कि दिल से तो मैं तुम्हारी धर्मपत्नी हूँ, पर मुझे आप जवाहरलाल नेहरू के 'बेडरूम' तक भेज आइए।' आगे डॉ. लोहिया पार्टी से निकाले गए। उन्होंने 'संयुक्त समाजवादी दल' बनाया। उनके जीवनकाल में ही पार्टी टूटने लगी थी। उनके बाद तो भारत में कोई समाजवादी दल रहा ही नहीं। 100/हम इक उम्र से वाकिफ हैं कुछ लेखकों से रिश्ते अपने में ऊपर की पीढ़ी के बहुत कम लेसयो में में मिला है। आम रिवाज यह है कि मामान्यन लेखक बड़े नामधारी, थदास्पद लेसयों में मिलना एक जरी माहित्यिक कर्म मानता है। मैने यह किया नहीं। कारण कई हैं। एक ना गारमा के मामने लघुना को लेकर जाने में मेग मयोच-अहवार नहीं । दसरे मामले यह उन्मुकना ही नहीं रही कि बडो-पड़ो से मिले । लेकिन मयने बड़ा कारणा मेग यह डर कि ये सिर्फ माहित्य की ही बात करेंगे और हम दोनो नाटक कंग और महज नहीं होंगे। मुझे इन बान पर चिढ़ होती है कि लेसक मिलने है ना मिर्फ माहित्य की बात करने है । में उद माहित्य की बात सबसे उमरगना है। में दूसरे विषयों की बात करना है-किनी वनमान मामाजिक गजनांतर, आर्थिक समस्या पर बात करना है। मैं रोनाल्डगन और मिसाइन गोयांव पर बान शुरू करता है और वहाँ बैठे लेखक अडचन महनन करते हैं। में इतिहास गजनीति, मम्पनि यहाँ तक कि रमायन शास्त्र पर भी बान करना उस कारण में बहुत कम बड लसको मे मिला । में उन प्रभागा मे है जिनन 'मय में भेट नहीं की। दो बार दसा जरूर हे।एकदिन श्रीगन वमा के पान दिनमान के दफ्तर में बैठा था। अजेय लिपट म उनम्बर पनी नपिनाविनी कोदेरोमीधेमपाठक के बंधन मापनमा श्रीमान ने पता चला आपण मिलवा दे। मैन कहा गहन टा। मंगप्रहार नहीं था। मन ही नही। जो आमपाम बैठे अपने मित्रो-महाभियो की नग्फ नजर न डालर मीधा अपने कयिन में घम जाए वह आदमी मरे अच्छा नहीं लगा। दमग शारदा 'दिनमान' में काम करनवाने श्यामलान शमा पत्र की शादी में । पगर्न हमदर 7.

। । 'किसान-मजदूर प्रजा पार्टी' बना ली थी। इस पार्टी को 1952 के चुनाव में समाजवादी दल से अधिक सीटें मिलीं। दोनों पार्टियाँ मिल गई और नया नाम दिया 'प्रजा समाजवादी पार्टी'। केरल में इस पार्टी की सरकार भी बनी। मुख्यमंत्री थे पट्टम थानु पिल्लई। किसी जगह पुलिस ने गोली चलाई और कुछ लोग मारे गए। डॉक्टर लोहिया ने पिल्लई की बहुत खिचाई की । इस्तीफा माँगा। आंतरिक कलह हुई । लालबहादुर शास्त्री मौका देखकर पट्टम थान पिल्लई को दिल्ली उड़ा लाए और काश्मीर का राज्यपाल वना दिया। कृपलानी अविश्वसनीय और झूठे गाँधीवादी थे। संसद में उन्होंने कहा था: 'गाँधी के इस देश को सेना और हथियारों की क्या ज़रूरत है ? हम क्यों इतना पैसा इन पर खर्च करते हैं ? हमने अहिंसा की शक्ति से एक साम्राज्य को पराजित किया है। मगर जब चीनी हमला 1962 में हुआ, तब इन्हीं कृपलानी ने सबसे तीखा हमला रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन पर किया कि उन्होंने देश को रक्षा के लिए तैयार नहीं किया। कैसे गाँधीवादी होते हैं । पहले कहते थे कि इस रक्षा मंत्री को पैसा मत दो। बाद में आरोप लगाते हैं कि इस रक्षा मंत्री ने सुरक्षा की तैयारी नहीं की। प्रजा समाजवादी पार्टी से काँग्रेस में लौटने का सिलसिला शुरू हुआ। अशोक मेहता गए । हमारे इधर के नेता हमारे मित्र प्रो. महेशदत्त मिश्र गए। तिलकभूमि की एक सभा में आचार्य कृपलानी ने कहा : 'अब यह तुम्हारा महेश है। कहता है कि दादा, विचारों से हम आपके साथ हैं, पर आप हमें काँग्रेस में जाने की इजाज़त दीजिए-जैसे मेरी बीवी सुचेता कहे कि दिल से तो मैं तुम्हारी धर्मपत्नी हूँ, पर मुझे आप जवाहरलाल नेहरू के 'वेडरूम' तक भेज आइए।' आगे डॉ. लोहिया पार्टी से निकाले गए। उन्होंने 'संयुक्त समाजवादी दल' बनाया। उनके जीवनकाल में ही पार्टी टूटने लगी थी। उनके बाद तो भारत में कोई समाजवादी दल रहा ही नहीं। 100/हम इक उम्र से वाकिफ हैं

कुछ लेखकों से रिश्ते
अपने में ऊपर की पीढ़ी के बहुत कम लेसों में में मिला है। आमनागर है
कि मामान्यन लेखक वडे, नामधार्ग, धदाम्पद सामना)
माहित्यिक कर्म मानता है। मैन यह विया नहीं। वारण करणारा
के मामने नयना को लेकर जान में मंग मोच-अहबार । दमा म
यह उन्मकता ही नहीं रही कि वडा-यही में मिल । मरिन सबगबहाm
मेग यह डर किये मिर्षमाहित्याची हीचान करग और हम दाना-ना
और महज नहीं डाग । मझटम बात पर चिढहानी है विमा
निफमाहिन्यकीयानकान। मपदमाहित्यकीयान गवाम
मैं दमर विपया कीयानलाई-किनी वनमान मामाजिर
नाम्निमम्मा पर चान सना है। मे गेनान्ड गगन और म: ...
पर यात गाकरता और वहाँ बैठ लेसर अडचन महमम
निहान गन सम्मान हा तर विग्मायन भारत..

दिल्ली में पास ही लड़कीवालों का घर था। वहाँ बरात में श्रीकांत, सर्वेश्वर और मैं पहुँचे । श्रीकांत ने छोटे-से मैदान के उस पार संकेत किया, और कहा : 'वे खड़े हैं अज्ञेय और कपिला जी।' बस, दो बार दर्शन किए। सुमित्रानंदन पंत से एक बार छोटी-सी भेंट हुई। मुक्तिबोध का पुत्र दिल्ली से पिता की अस्थियाँ लेकर प्रयाग आया। साथ शमशेर बहादुर सिंह और मैं थे। शाम को वेसेंट हॉल में शोकसभा हुई। सभा खत्म होने पर पंत जी मेरे पास आए और बोले : 'मैं भी आपका प्रशंसक हूँ। 'कल्पना' में आपका कालम ज़रूर पढ़ता हूँ।' मैं तव'कल्पना' में और अंत में स्तंभ नियमित लिखता था। यह पत्रिका के अंत के पृष्ठों में होता था। धर्मवीर भारती ने कहा था : 'आपके कारण 'कल्पना' को शुरू से नहीं, अंत से पढ़ना आरंभ करते हैं। जिसकी 'खिंचाई हो गई हो, वह फिर पत्रिका पढ़ता ही नहीं।' पंत जी से मैंने कुछ औपचारिक विनम्रता निवाही होगी। दूसरी भेंट कभी नहीं हुई। महादेवी जी को कुल तीन बार देखा । सुभद्राकुमारी चौहान की प्रतिमा का अनावरण करने वे आई थीं। सुभद्रा जी के घर बड़ी देर उन्हें देखा। बात नहीं हुई। मुभद्रा जी के संदर्भ में उनके भाषण के अंश मुझे अभी भी याद हैं । कहा था : 'नदियों के जय स्तंभ नहीं बनते। दीपक की लौ को सोने से नहीं मढ़ा जाता।' एक और छोटी-मी मीटिंग में महादेवी जी के साथ एक घंटा बैठा था। चर्चा और चिंता का विषय था : लेखकों की आर्थिक समस्या। भदंत आनंद • कौसल्यायन ने कुछ कहा तो महादेवी जी ने रिमार्क किया : 'आप तो संन्यासी हैं। आपको रोटी की क्या चिता?' भदंत ने जवाब दिया : 'रोटी की सबसे ज़्यादह चिता मंन्यासी को ही होती है, देवी जी! 'तीसरी वार महादेवी जी को 'लोक भारती' प्रकाशन में यशपाल की किताब 'मेरी तेरी उनकी वात' के विमोचन समारोह में देखा था। भदंत आनंद कौसल्यायन बहुत प्रभावी वक्ता थे। उनके भाषण मैंने सुने हैं। एक समारोह में वे काफ़ी बोल चुके, तो कहा : 'अव मुझे खत्म करना चाहिए क्योंकि यहाँ कवि-सम्मेलन होगा।' इस पर लोग चिल्लाए : 'बोलते जाइए ! बोलते जाइए !' मंच पर कवियों में 'नीरज' जैसे मुग्ध करनेवाले गीतकार बैठे थे। जो कवि-सम्मेलन को काट दे, वह बहुत सिद्ध वक्ता होता है। भदंत के साथ 4-5 बार की मुलाकात है। दो बार एक ही मंच से हम दोनों वोले। दोनों 102/हम इक उम्र से वाकिफ हैं । ।

। - । आयोजन 'आल इंडिया शिड्यन्ड कास्ट्म फेडरेशन' के थे। भटन में मेरी अच्छी याने होती थीं। नागार्जुन 1975 में जयप्रकाश नारायण के 'मपूर्ण कति आदोलन मे शामिल हो गए। मैंने इसकी जातोचना जनपग' में की थी । भदन ने कहा : मी समझ के कारण ही नागार्जुन का चीवर वहन पहने उतर गया। नागार्जुन चौद्ध भिक्स रहे हैं। माखनलाल चतुर्वेदी में मंग भेट मिर्फ दो ही वार की है। मैं नुनी उपती पर भाषण देने सडवा गया था। वहां विपिन जोशी नया दो और वियों के माध मैं उनमे मिलने गया। वे बिम्नर पर नेटे थे। बहन प्रशस्त थे। वर्गय आधा घटा बैठे। वहीं बोलते रहे । यातचीत में कविता बोलते थे वे । ऐनी प्रतिभाका मग लेसक नहीं हुआ। वे जैमा निसते थे, वैमा ही घोननं। उनमें ममपंग और विद्रोह, लालित्य और क्टोग्ता, प्रेम और क्रोध,मनुहार और फटकारएक माध थे। उनके लेसन की पचनावनी नौसडामेछप गई है। वे जेल जानेवाले प्रधम मत्याहियां में थे। मत्ता गजनीति में वे मान सा गाए। इन नौ सडा में बदभुत काव्य और गद्य है। वे 'कर्मवीर' साप्ताहिक के मपादक थे। छोटी-छोटी मपाटीय टिप्पणियां भी पवित्वमय होती थी। नये लेरा भी लिखते थे। विमान ममम्बा की यहत अच्छी ममझ थी। माम्राज्यवादी शोपग के नर्गके वे समझन धे। उनी विश्व-दष्टि थी। मासनलाल चतुर्वेदी के माहित्य का पुनर्मूल्याकन होना चाहिए। वे उनमे कही बडे धेजिनने माने गए। मे निर्भीक पत्रकार भी कम होने हैं। उनके मवध मंक घटना मेंने वहीं पढ़ी थी। शब्दश मुझे याद नहीं । स्मृति में बताना है। 'कर्मवीर जवनपुर में निकलता था। गोरं कस्टर ने उन्हें एक दिन चलाया । नव जो बातचीत हुई वह बछ इस तरह थी कलेक्टर आपक असयार में वाबिले-गज चाने एपनी हैं। मासनलान वाविन-तिगज वान प्रापन के लिए ही हमन असवार निशाना है। कलेक्टर आप सरकार की आलोचना करने हैं। मासननाल मग्वार की आलोचना करने के लिए ही हमने अखबार निवाला है। कलेक्टर में आपका असयार यद करवा सकता है। . हम इक उर में वारिस./10 माखनलाल : हमने यह मानकर ही अखवार निकाला है कि आप इसे बंद करवा सकते हैं। कलेक्टर : मैं आपको जेल में डाल सकता हूँ। माखनलाल : हम यही मानकर यह सब करते हैं कि आप हमें जेल में डाल सकते हैं। कलेक्टर हँसा । बोला : Look here, I am not English, I am Irish, but I am an employee of these bastards, Englishmen. I will have to take some action to show them. So be cautious. यशपाल से मेरी मुलाकातें कुल तीन हुई। इलाहाबाद में 1957 में साहित्यकार सम्मेलन हुआ था। इसके पहले इलाहावार में ही अज्ञेय' के नेतृत्व में 'परिमल' का साहित्यकार सम्मेलन हुआ था, जिसका उद्घाटन ताराशंकर बंद्योपाध्याय ने किया था। 1957 का यह सम्मेलन विखरे हुए प्रगतिशीलों ने बुलाया था और इसका उद्घाटन पंडित हज़ारीप्रसाद द्विवेदी ने किया। पांडित्यपूर्ण, ओजस्वी और प्रगतिशील मूल्योंवाला भाषण था वह । इस सम्मेलन में यशपाल भी गए थे और मैं भी। मेरे ठहरने का इंतज़ाम मेरे मित्र प्रोफेसर महेशदत्त मिश्र के घर था। पर अश्क का बेटा मेहमान घर में भर लेने के लिए इतना उत्साही था कि मुझे, मुक्तिबोध और प्रमोद वर्मा को भी ताँगे में विठाकर ले आया। अश्क के अपने घर में ठहरे थे यशपाल और मोहन राकेश । मजबूर कौशल्या जी को हम तीनों को आउट हाउस में ठहराना पड़ा। वहाँ यशपाल सिर्फ भोजन की टेबिल पर मिलते थे या फिर मीटिंगों में । मेरी उनसे बात ही नहीं हुई। वे भूल भी गए कि अश्क के घर कोई लेखक हरिशंकर परसाई भी था। आगे दो मुलाकातें हुईं। मैं इनके बारे में लिख चुका हूँ। यों हुआ : 1964 में दिल्ली से मुक्तिबोध की अस्थियाँ लेकर उनका बेटा रमेश आया। साथ में मैं और शमशेर जी थे। अस्थि कलश साहित्य सम्मेलन भवन ले जाया गया। अमरकांत ने मुझसे कहा कि आपसे यशपाल जी मिलना चाहते हैं। मैं गया। यशपाल घास पर बैठे थे। मुझे देखते ही हाथ जोड़कर झुककर बोले: 'अरे महाराज, महाराज, मैं कब से आपसे मिलने को उत्सुक हूँ। मैं थोड़े असमंजस में पड़ा। मैंने बहुत नम्रता से कुछ बातें कहीं। बस ! दूसरी मुलाकात हुई लखनऊ में । उत्तरप्रदेश साहित्य परिषद् का 104/हम इक उम्र से वाकिफ़ हैं ।

। पुरस्कार लेने मैं गया था । पुरस्कार यशपाल को भी मिला था । बड़े हॉल मे यशपाल की और मेरी कुर्सी लगी हुई थी । लेखको और अफमरोसे हॉल भरा था । मच से घोषणा हुई कि महामहिम राज्यपाल पधार रहे हैं । तमाम लोग सड़े हो गए । पर, हालांकि मेरी और यशपाल की कोई बात नही हुई थी, हम दोनों खड़े नहीं हुए । काफी लोग हम दोनो को बैठा देख रहे थे। यशपाल ने कहा : 'टीक किया महाराज ! क्यों खड़े हो ? होगे गवर्नर ! .' इसके बाद 'जन-गण-मन' शुरू हुआ तव यशपाल ने खड़े होते हुए कहा: 'अब खडे होगे। यह राष्ट्रीयगीत है।' 1965 मे जैनद्र कुमार से कहानीकार सम्मेलन में कई बार भेट हुई । वह 'नई कहानी' का दौर था । पता नहीं यह नाम किसने दिया । शायद नामवर सिंह ने निर्मल वर्मा की 'परिदे' को हिंदी की पहली नई कहानी कहा था । उन्होंने उषा प्रियवदा की वापमी' को भी नई कहानी कहा था । पर इम'नई कहानी', आदोलन को उठा लिया तीन तिलगों ने-कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेन्द्र यादव । कमलेश्वर आदोलनप्रेमी आदमी हैं । वे सबसे तीखे और मुखर थे । मेरा कोई वास्ता इस आदोलन से नहीं था । में कहानी-लेखक माना ही नही जाता था । 'व्यग्यकार' कहकर दरकिनार कर देने में समीक्षको, सिद्धातकारो को भी मुभीता था और मुझे भी । पर हमारे बाद की पीढ़ी के काफी लोग'अकहानी' वाले थे । ये अपने को मरा हुआ मानकर फिर लिखते थे । एक किताब इनमे से एक की तवनिकली थी । उसमें उनका परिचय था । जन्म का मन् दिया और लिखा था मृत्यु 1964 । जी हाँ । मगर 1965 को कलकत्ता मे उमी सम्मेलन मे वे मेरे सामने थे। मेरी अपनी हिस्सेदारी यथार्थ की वास्तविकता, विचार और जीवन-दृष्टि पर थी। इस सम्मेलन मे लगभग मव कम उम्र के लेसको ने जैनेंद्र को अपने हमले का लक्ष्य बनाया । मैंने भी उनकी जीवन-दृष्टि नथा जीवन-यथार्थ के सवाल उटाए । नव उनमे व्यक्तिगत रूप में कोई बात नहीं मैंने कल्पना' में 'ओर अन में शीर्षक अपने म्नभ मे जैनेट की जीवन-दृष्टि और उलझी मुलझी बातों पर व्यग्यलिसा था । वह बहुत मशहर हुआ । और जगह भी मैंने उन पर व्यग्य किए । एक बार वे दिल्ली मे मिल गए। कहने लगे 'तुम जो मुझ पर व्यग्य करने हो, उपहास कग्ने हो नो मुझे वग नहीं लगता । इनमें तुम्हारी कोई योजना नहीं है, न निहित स्वार्थ हैं । पर ये जो तुम्हारे 3-4 हम इक उम्र मे वाकिफ हैं /105 . • - च्चे दोस्त हैं मैं उन दोस्तों के नाम नहीं बताऊँगा। मेरी आखिरी मुलाकात जैनेंद्र से अफ्रो-एशियाई शांति सम्मेलन में हुई । कार्यक्रम समाप्ति पर मैं बाहर आया तो देखा कि जैनेंद्र खड़े हैं । मैंने कहा : 'जैनेंद्र जी, आपकी कार कहाँ खड़ी है ?' जैनेंद्र ने कहा : 'मेरे पास कार कहाँ है भाई !' मैंने कहा: 'अज्ञेय के पास तो है । वे बोले : 'कहाँ अज्ञेय और कहाँ मैं । वे बड़े आदमी हैं और मैं गरीव हूँ।' फिर उन्होंने मुझ पर कटाक्ष किया : 'बड़ी दूर से आए हो। | इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए रूस से बहुत पैसा मिला होगा ।' मैंने जवाब दिया : 'हाँ, जितना पैसा आपको इस सम्मेलन को असफल कराने को सी. आई. ए. से मिला है, उससे कुछ ही ज़्यादा मुझे रूसी पैसा मिला है।' हम दोनों हँसने लगे । वे कहने लगे : 'तुम आदतन ऐसा बोलते-लिखते हो।' मुझे अच्छा लगा कि मेरे व्यंग्य का बुरा जैनेंद्र ने नहीं माना । इसमें उनकी शालीनता तो प्रगट हुई ही, मुझे यह भी भरोसा हुआ कि मेरा व्यंग्य द्वेष-प्रेरि नहीं माना जाता । इसी प्रकार मैंने 'आंचलिकता' को लेकर ऐसा ही उपहा फणीश्वरनाथ 'रेणु' की भाषा-शैली का 'कल्पना' में किया । मुझे उन चिट्ठी मिली कि हँस-हँसकर उनकी हालत खराब हो गई, पान का पीक व पर गिर गया । वाद में मुझे पटना के कुछ लेखकों ने बताया कि मेरे लिखे खुद पढ़कर सुनाते थे। पंडित हजारीप्रसाद द्विवेदी से मेरी मुलाकातें काफ़ी हुईं । हमारी जब मंडली के पं. मोहनलाल बाजपेयी शांतिनिकेतन में हिंदी-विभाग में अ थे। वे द्विवेदी जी के साथ छात्र-छात्राओं को लेकर भ्रमणार्थ जब आए । तब तक मेरी पहली किताब ही छपी थी, जो मैंने भाई में बाजपेयी को भेजी थी । वह शायद उन्होंने देखी हो। वे और बा पंडित भवानीप्रसाद तिवारी के घर ठहरे थे । खूब गप्पें होती थीं । दि अद्भुत विनोद-प्रतिभा थी। उनके ठहाके गूंजते थे । पांडित्य को फूल की तरह ढोते थे। तीसरे दिन वे बोले : 'जबलपुर में हर बा जमती है । सबेरे आप लोग कहते हो : नाश्ता जमा जाए । फिर उस पर तमाखू जमती है । भाषण जमता है । कविता जमती है रात को मच्छड़दानी जमती है।' सन् 1957 में इलाहाबाद में साहित्यकार सम्मेलन में उन भाषण सुना । कोई व्यक्तिगत बातचीत नहीं हुई। .. पा से वाकिफ हैं वर्णन और होने - । फिर उनसे कई मुलाकाते हुई । हम'याणभट्ट की माय बैठकर पढ़ते थे । जव खुलकर बातें होने लगी, तवा उस चाँदनी रात में उन पर आपने भट्ट और भट्टिनी को तक ले जाकर फिर यचा दिया है । यह अच्छा नहीं है । आदर्शवादी दैहिक पवित्रतावाद की मजबूरी है या आप व उनके जवाब का सार यह था कि भट्ट भट्टिनी को और पा कथा ही बदल जाती । मर्यादा इस हेतु जरूरी थी। पडित जी हास-उपहास के बहुत शौधीन थे । गप्प-गोष्ठी के शौकीन थे। वे क्लामिको के आदर्श पात्रों का बहुत अच्छा उपहास कर लेते थे। साधारण चात मे से भी विनोद निकाल लेते थे । जबलपुर विश्वविद्यालय आए तो हिंदी विभागाध्यक्ष पंडित उदयनारायण तिवारी से कहा कि शाम को परसाई यो जरूर बुला लेना । मैं गया । उनका भाषण सुना । बाहर निकले तो मेरे कधे पर हाथ रखकर कहा : 'चलो, कही बैठकर गप्पें करेगे । पांडित्य बहुत धार लिया ।' हम 10-12 लोग उदयनारायण तिवारी के घर जाकर बैठे। खूब गप्पें हुई। द्विवेदी जी का अट्टहाम गूंजता रहा। द्विवेदी जी, उदयनारायण तिवारी और राजबली पाडे के गांवों के फूहड़ मजाक हम लोग मुनते रहे। द्विवेदी जी की मेरे प्रति आत्मीयता थी । मेरालिखा वेपसद भी करते थे । उनकी लडकी मालती ने बताया कि जब आपकी कोईरचनापकर आती,तो वे पूरे परिवार को बुलाकर बिठा लेते और आपकी रचना पढ़कर सुनाते और अट्टहास करते जाते । उनका पाडित्य आतंकित नही करता था। उनके कई सतीफे मशहूर है। जो उनके निकट रहे हैं उन्हें सैकडो लतीफे उनके मालूम होंगे, मुझे भी कुछ मालूम हैं। द्विवेदी जी कहते हैं : 'एक बार डॉ. धीरेद्र वर्मा और मैं मौखिक परीक्षा ले रहे ये । एक लड़यी बहुत डरती-सहमती आई । धीरेंद्र जी ने उससे पूछा ' 'मीरायाई की विरह वेदना का वर्णन करो।' वह लड़की घबडाई । उसके मुंह से दो-तीन यार भीग-मीरा निकला और वह रोने लगी। हमने उससे जाने के लिए कह दिया। धीरेद्र जी ने कहा: 'इमे तो कुछ भी नहीं आता । मैंने कहा 'आपने उसमे वेदना का वर्णन करने को कहा था । वेदना का इतना अच्छा हम इक उम्र से वाकिफ हैं/107 लुच्चे दोस्त कौन कर सकता है । लड़की को मालूम है, पर घबड़ाहट में बोल नहीं मुलाकात पर एक मौखिक परीक्षा में लड़के से पूछा : 'हिंदी के सबसे बड़े कवि कौन है ?' उसने जवाब दिया : सूरदास । पूछा : उनके बाद दूसरे ? जवाब दिया : तुलसीदास । मैंने पूछा : तुलसीदास के बाद? उसने जवाब दिया-कवि उडगन । निर्णयात्मक दोहा यह प्रचलित है: सूर सूर तुलसी ससी, उडगन केसवदास । अबके कवि खद्योत सम जहँ तहँ करहिं प्रकास ।। 'उडगन' का अर्थ तारा या नक्षत्र है । केशवदास को नक्षत्र कहा गया है, जो वहुत छोटा है और टिमटिमाता है । लड़के का ख्याल था कि'उडगन' नाम का कोई कवि था । आखिरी बार 1976 में दिल्ली में राजकमल प्रकाशन में शीलासंध के कमरे . । में उनसे यह सुना : ये विदेशी छात्र-छात्राएँ बड़ा गड़बड़ करते हैं । ये हिंदी भाषा तो अच्छी मीख लेते हैं, पर हमारे पारिवारिक-सामाजिक जीवन को नहीं समझते । अर्भ एक पोलिश छात्रा मुझसे मिलने वाराणसी आई । मैं लखनऊ गया था । दिल्ल लौटकर उसने पत्र लिखा : पंडित जी, मैं आपके दर्शनार्थ वाराणसी गई थी आपके दर्शन नहीं हो सके । पर आपकी 'सुपत्नी' से भेंट करके मुझे बहु प्रसन्नता हुई।-वताइए भला, यह मेरी पत्नी को 'सुपत्नी' समझती है शीला जी, इस देश में क्या कोई पत्नी सुपत्नी होती है ? ये विदेशी समझते कि जैसे 'सुपुत्र' होता है, वैसे ही 'सुपत्नी' भी होती होगी। उपेंद्रनाथ अश्क बुजुर्ग हैं, महिमामय हैं । पर वे बुजगी का आभास का नहीं देते । मैं जब भी उनसे मिला, मुझे लगा कि यह कोई नवोदित किश लेखक हैं, जो अपना लिखा हुआ सुनाने को बेताब हैं और तारीफ सुनने उत्सुक हैं और इन किशोर को शिकायत है कि उन्हें प्रोत्साहन नहीं मिलता अश्क अस्सी साल की उम्र में भी किशोर-जैसा बर्ताव करते हैं। 10/IT से वाकिफ हैं - अश्क के पाम जी कहा करके इम तैयारी के माय जाना चाहिए कि उन्होंने जो ताजालिसा है वह मुनाएंगे-चाहे पूरी किताय ही क्यों न हो । एक दिन'नई कहानियों के नव मंपादक भीष्म माहनी के कमरे में घुमा तो देखा कि वहां श्नपदर और अश्क बैठे हैं । मुझे देखते ही अश्क नै कहानी पर अपना लंबा लेस मुनादिया, जिमेवे'नई कहानियां' में छपाना चाहते थे । लेख पूरा होने पर उन्होंने मुझसे पूछा 'कहो, कैमा है । मैंने कहा शिक्षाप्रद है । अश्क मंतुष्ट नजर आए । कृश्नचदर ने एक टहाका लगाया और कहा : 'यार अश्क, जिदगी-भरलिधने हो गए तुझे और तू यह भी नहीं ममझा कि परमाई जी ने तेरे नेस को पटिया कह दिया । वे कहते हैं कि तेग लेख शिक्षाप्रद है, यानी म्कूल-कॉलेज के लड़कों के लिए है। 'अश्क' मे मेरी कई मुलाकात हुई। मैंने कभी भी उनमे मनभेट प्रगट नहीं क्यिा, इलिए यान आगे बढ़ाना मुश्किल होता था । मैं जानबूझकर उनकी हर बात को 'टीक कहता था । वे मुग्ने ममझदार मानने लगे थे । और लोग भी होतं, तो महफिल जमती और अश्क कुछ विनोद करते । अश्क ये मेहनती आदमी हैं । वही मेहनत मे लिखते हैं । अपने दूसरे कामों में भी वे बड़ी मेहनत करते है । उन्होने परिवार को पालने तथा 'पेट भरने के लिए परचून की दुकान खोली तो प्रचार पर कितनी मेहनत की । अग्रेजी अरावारवालों ने परचून' में मे 'चून पक्डा और प्रचार कर दिया कि अश्क ने 'नाइम शाप सोली है । अश्क ने प्रचार कर डाला कि मझे और मेरे परिवार को ममाज पाले । अब ममाज तो बहुत विगट है । इम ममाज में से कौन पाने ? क्या तच के मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी पालें या प्रधानमत्री राजीव गांधी पानें । उन्होंने यह भी दस बताया कि मुझे कई मालों में कोई परम्बार नहीं मिला । परम्बार देनेवालों को इमशिकायत पर ध्यान देना था। 'अश्र भने आदमी हैं। उनमें मिलने और यातचीत करने के बाद निष्कर्ष निरनना है कि 'अश्कनिहायत भले और भोले आदमी हैं । पर सब उन्हें मताते हैं, और वे मयका भला करने हैं । अश्क के पाम हिंदी माहित्य जगत की मार्ग जानकारियां मिल जाती हैं। कौन नेयक कहाँ है, क्या कर रहा है- 'श्य में आप हर लेखक वी चनक कथा जान लीजिए । मवकी पोलें उनके पाम है । नाजा'म्बंडल'क्या है और निकट भविष्य में कौन-मा'म्हल'एंटन होनेवाला है। धेचारे'अश्व' इतनी माया के बाद ग्रीय हैं और येचारे हैं। हम इक उम्र में वारिफ है/109 । । । डॉ. रामविलास शर्मा को, 'वसुधा' में आलोचकों के प्रकार तय करते हुए, 'फौजदारी' आलोचक बताया गया था। आमतौर पर हिंदी के साहित्यिक यह समझते हैं कि वे हमेशा लाठी चार्ज करते रहते हैं । पहलवान वे हैं ही । अखाड़े खेले हुए हैं। पीठ में मिट्टी नहीं लगने देते । तगड़े हैं, छ:-फुटे हैं । प्रातः भ्रमण करते हैं, व्यायाम करते हैं। मगर वे हमेशा फौजदारी नहीं करते। उनसे मेरी भेंट मेरे घर पर ही 1953 में हुई । वे निजी काम से आए थे । वे मुझसे मिलने भी आए । थोड़ी देर बातें हुईं । फिर भोपाल में भेंट हुई । मगर ज़्यादा उनके साथ रहा आगरा में । आगरा के एक प्रकाशक ने मुझपर और मेरे प्रकाशक सरदार जगंजीतसिंह खन्ना के ऊपर मुकदमा चला दिया था । उस सिलसिले में आगरा पेशी पर सरदार और मैं जाते और राजा मंडी स्टेशन के पास दिल्ली दरवाजा तरफ के होटल में ठहरते । रामविलास जी का मकान स्टेशन के दूसरी तरफ है । बहुत पास. । पहली वार मैं जब उनसे मिला तो वे खुश हुए । मुकदमे के बारे में पूछा । मैंने बताया कि कुछ प्रकाशकों ने माध्यमिक शिक्षा बोर्ड को पटा लिया है और विश्वविद्यालयों में चलनेवाली किताबों का कुछ हिस्सा वोर्ड से मध्यप्रदेश के हाईस्कूल के कोर्स में लगवा लिया है । 21 कवियों का संग्रह विश्वविद्यालय में चल रहा है । इन 21 कवियों में से तीन-सूरदास, तुलसीदास, कबीरदास को बोर्ड ने हाईस्कूल के पाठ्यक्रम में लगा दिया है । वह मोटी पुस्तक सात रुपए की है । इन तीन कवियों की पुस्तिका पचास पैसे की होगी । यानी छात्र सिर्फ इन तीन कवियों के लिए 21 कवियोंवाली वह किताबखरीदते हैं । यह शोषण है। मैंने प्रकाशक खन्ना से बात की कि इस लूट से लड़ना चाहिए । तीनों कवियों पर कापीराइट नहीं रहा । क्रम बदल देते हैं और पुस्तिका छाप देते हैं । पचास पैसा कीमत रख देते हैं । मैंने संपादन किया । वह पुस्तिका विकी और पहले दौर में खूव विकी । प्रकाशक ने 'इन्जक्शन लगवाया और हमारे प्रकाशक का स्टाक जब्त हो गया । सरदार खन्ना और मुझ पर फौजदारी मुकदमा चला । हमारी जमानत हुई । अव हमें हर पेशी पर आना पड़ता है । रामविलास जी सुनकर खुश हुए । बोले : 'आपने बहुत अच्छा किया। इतनी लूट मची है, पर उसका विरोध करने का साहस किसी ने नहीं दिखाया। आपने चुनौती तो दी। रामविलास जी की आत्मीयता मुझे मिली । न जाने क्यों लोग उनसे डरते 110/हम इक उम्र से वाकिफ़ हैं - ।

हैं । वे सब गप्पें करते हैं । मजाक करते हैं । ठहाका लगाते हैं । हाँ, अपने विश्वास के मामले मे क्टोर है । यहाँ न नरमाई,न समझौता । असाडे में निपट लें। एक बार दही अमृतलाल नागर आ गए । उनकी ननिहाल राजामंडी में ही है । हम तीनों घटों बैठते और खूब बातें होती । रामविलाम जी,नागर जी और घनश्याम अम्याना घूमकर लौटते तो होटल मे हमारे कमरे में आ जाते । एक-डेढ़ घटे नागर जी के लतीफे गूंजते और हम लोगों का अट्टहास । अमृतलाल नागर मे बहुत मुलाकात हैं । वे बहुत बेतकल्लुफ हैं । अड्डेमाज हैं । महफिल जमाते हैं । वे जबलपुर आए दो बार । समारोह के याद हम चले गए प्रो. हनुमान वर्मा के घर रात के भोजन के लिए । हनुमान ने गिलामों में रम हाली तो वे बोले 'यारो, शाम कोरेलगाडी में ही माजूम भांग ले ली थी, फिर भवानी तिवारी के घर एक गोला निगला और ऊपर से यह रम । कैमे बर्दाश्त होगा ।' सब बर्दाश्त हुई और दो बजे रात तक हम लोग गप्पें करते रहे। नागर जी के मामने सोच टूट जाते हैं । वे एकदम आत्मीयता स्थापित कर लेते हैं । स्नेही हैं । भावुक हैं । बहुत हद तक राग-द्वेष से परे हैं । वे निदा नहीं करते । किमी की कमजोरी का उपहास नहीं करते । शरीर और मन मे बहुत स्वस्थ है नागर जी । मगर अपने विश्वामों के लिए वे श्री रामविलास जी घी तरह टिक्टिाकर भिड जाते हैं । नागर जी मे मिलना एक आह्लादकारी अनुभव है, जिसमे मिलनेवाला खुद शुद्रताओ मे ऊपर उठना है। हम इक उम्र से वाकिफ हैं/m मुक्तिबोध का साथ और 'वसुधा' मानन माधव मुक्तिबोध का 1954 में मिलना मेरे लिए उतना ही महत्वपूर्ण है तना 1938 में हाई स्कूल में वग्गा मास्साब का मिलना। मुक्तिबोध ने नवलपुर में उसी स्कूल में नौकरी की थी, जिसमें वाद में मैंने भी की। उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की थी और एक समारोह में राहुल सांकृत्यायन भी आए थे। वे साम्यवादी पार्टी के बहुत सक्रिय सदस्य थे। तीन साल वे और मैं इसी शहर में रहे, पर मेरी-उनकी भेंट नहीं हुई। नाम ज़रूर सुनता था। मैंने तब लिखना शुरू नहीं किया था। मैंने लिखना शुरू किया, तब तक मुक्तिबोध नागपुर जा चुके थे, जहाँ वे सूचना और प्रकाशन विभाग में नौकरी करने लगे थे। मैं 1954 में प्राइवेट तौर र एम. ए. करने नागपुर गया। मुझे कवि रामकृष्ण श्रीवास्तव के कमरे में ठहराया मेरे मित्रों ने । मैंने देखा, कमरे की दीवारों पर, विशेषकर भाषा-विज्ञान और साधारणतः हिंदी के अन्य पक्षों के सूत्र बड़े-बड़े अक्षरों में लिखे हैं। मैंने कवि 'विद्रोही' से पूछा : 'ये क्यों लिखे हैं?' विद्रोही ने समझाया: 'पिछले साल इसी कमरे में रहकर मुक्तिबोध जी, रामकृष्ण श्रीवास्तव और भोपाल के मि अक्षय कुमार जैन ने एम. ए. जैन ने एम. ए. किया है। यहाँ प्रमोद वर्मा भी आते थे, विश्वविद्यालय के नियमित छात्र थे. और जिन्होंने सर्वोच्च स्थान पा स्वर्ण-पदक पाया । मुक्तिबोध प्रमोद को आचार्य शंकुकं कहते थे । मुक्ति भाषा-विज्ञान से बहुत घबड़ाते थे। उन्होंने आचार्य शंकुक से कहा कि पर भाषा-विज्ञान के सूत्र लिख दीजिए। मैं उन्हें जब-तव पढ़ लूँगा। फि विषयों के नोट्स भी। प्रमोद वर्मा ने ये सूत्र लिखे हैं, जिन्हें पढ़कर ती पिछले साल एम.ए. कर चुके हैं। अभी पूरी तरह मिटे नहीं हैं। तुम्हारे आएंगे।' । 112/हम इक उम्र से वाकिफ हैं परीक्षा शुरू होने के पहदिन पहले मैं नागपुर पहुंच गया था। जबलपुर में खानपढ़ाई नहीं हुई थी। सोचा,नागपुर में पढ़ लूंगा। तीसरे दिन विद्रोही' और रामकृष्ण मुझे मुक्तिबोध के घर ले गए। एक मामूली मकान का कमरा, जिसमें दरी परवे पालथी मारे बैठे थे। बगल में खास आकार का वह लोटा और उमपर रसा वह छोटा गिलाम जो महाराष्ट्रीय परिवारो में होता है। दूसरी दरी परहम बैठ गए। मैंने देखा माभने जो आदमी बैठा था, वह छह-फुटा तो होगा ही । दुबला, पिचके गाल, गाल की हड्डियाँ उठी हुई,लंबी नुकीली नाक, बडी-बडी भावपूर्ण बेधक आँखे-निश्चय ही यह दुखभोगा आदमी था। मुझमे उन्होंने बहुत थोडी औपचारिक याने ही की। कोई साम दिलचस्पी नहीं दिखाई। पर उनकी वे बेधक आँखें बार-बार मेरे ऊपर गड़ जाती थी। मुक्तिबोध एकदम गले लगानेवाले, उद्वेलित व्यक्तित्ववाले आदमी नहीं थे। बहुत सावधान थे सबधों के मामले मे । एकदकिमी मे निकटता स्थापित नहीं करते थे। वे अविश्वास मे शुरूपरके विश्वास पर आने । खूब जांचते-परखते, तब निजी मयंध बनाते थे। यों भी वे गप्प-गोष्ठीवाले आदमी नहीं थे। जिनसे बात करना है और काम की बातें करना है, उनमे गतभर यातें करते थे। एक पूरी रात मुक्तिबोध ने श्रीकात वर्मा, प्रमोद वर्मा और मेरे माय भोपाल की सड़कों पर चलते, चाय पीने, तियाने गुजार दी थी। अगले ही माल मैं नागपुर गया रेडियो कार्यक्रम के लिए । तब वे नया खून' के संपादक हो गए थे। मैं मीधा'नया खून' के दफ्तर पहुंच गया। इस बार वे इस तरह मिले जैसे पहले कई मुलाकातें हो चुकी हो। तपाक से हाथ मिलाया,बहुत देर हाथ में हाथ लिए रहे। बोले : आइए पार्टनर, वाह साहब, खूब आए। वाह ! वाह !' सचमुच पुलकित हुए। इस बार डेढ़ दिन उनके साथ रहा। कई घंटे बाते हुई, मच तरह की। वे खुले। मैं भी खुला । उन्होंने 'नया खून' दफ्तर मे ही मेरे रहने का इतज़ाम कर दिया । उनका निवास पास ही था । मुक्तिबोध की आत्मीयता बहुत प्रेरक होती थी और बहुत शिक्षाप्रद भी। मैं उनसे प्रेरणा और पहले से माफ नजरिया लेकर लौटा। कुछ महीने बाद ही उन्होंने 'नया सून' में पूरे पृष्ठ का लेख लिखा : 'हरिशंकर परमाई और 'घाट' की स्पिरिट में अतर है।' हुआ यह कि मेरी एक हम इक उम्र से वाकिफ़ है/113 - 1 , कहानी तब दिल्ली से निकलनेवाले अंग्रेज़ी के साप्ताहिक पत्र 'Thought' मे अनुवाद करके छापली गई थी। मेरी अनुमति नहीं ली गई थी, पर मुझे वह अंक और पचहत्तररुपए भेजे गए थे। यह पत्र 'फ्रीडम ऑफ कल्चर' वालों का था। जवाहरलाल नेहरू रोज़ ही संस्कृति की बात करते थे और एक समन्वित राष्ट्रीय संस्कृति के बारे में जनता को शिक्षित करते थे। उनके राज में संस्कृति को क्या खतरा था? संस्कृति की स्वतंत्रता कौन छीन रहा था? फिर 'फ्रीडम ऑफ कल्चर' की लड़ाई किसलिए? बात यह थी कि नेहरू समाजवाद की बात लगभग रोज़ करते थे और कभी-कभी स्पष्ट भी करते थे कि जब मैं समाजवाद की बात करता हूँ, तब वायवी, भावात्मक समाजवाद की नहीं, 'वैज्ञानिक समाजवाद' की बात करता हूँ। फिर पहली पंचवर्षीय योजना में नेहरू ने सार्वजनिक उद्योग क्षेत्र शुरू कर दिया था। पूँजीवाद को इतना खतरा महसूस होने लगा था कि उसकी रक्षा और स्वतंत्र उद्योग नीति के लिए एक 'स्वतंत्र पार्टी' बन गई थी। इसके अध्यक्ष कट्टर समाजवाद विरोधी, भारत के पहले देशी गवर्नर जनरल (भूतपूर्व) चक्रवर्ती राजगोपालाचारी थे और महासचिव मीनू मसानी (जिनका गॉड फेल हो गया था)। फिर नेहरू गुटनिरपेक्ष रहकर गुटनिरपेक्ष देशों का एक संगठन बना रहे थे। वे भारत को अमरीकी गुट में नहीं ले गए बल्कि सोवियत रूस से संबंध अधिक नज़दीकी बना रहे थे। इन सब कारणों से समाजवाद-विरोधियों और अमरीका-समर्थक साहित्यकारों को संस्कृति की स्वाधीनता खतरे में लगने लगी। इन लोगों का पत्र'थॉट' था, जिसे अमरीकी मदद मिलती थी। मेरी कहानी राजनीतिक थी। मैंने उसमें पूँजीवादी लोकतंत्र के पाखंड को उजागर किया था और बताया था कि कैसे इस लोकतंत्र में भी 'सर्वसत्तावाद' (Totalitarianism) स्थापित हो सकता था। 'थॉट' वालों ने कहानी का दूसरा अर्थ निकाला-साम्यवादी सर्वसत्तावाद, और उसे अपने काम की समझकर उसका अनुवाद छाप दिया । मुक्तिबोध सतर्क थे। वे अपनों पर भी निगरानी की नज़र रखते थे। श्रीकांत वर्मा को उन्होंने कितनी ही नसीहत की चिट्ठियाँ लिखी थीं। उन्होंने 'नया खून' में लिखा था कि परसाई और 'थॉट' की विचारधारा बिलकुल विपरीत है। पर ये लोग किसी भी तेजस्वी नए लेखक को पकड़कर अपने खेमे में ले जाने की कोशिश करते हैं। मुझे तो वह टिप्पणी अच्छी लगी। पर नागपुर में किन्हीं लेखकों ने उनसे झूठ कह दिया कि मुझे बुरा लगा है। उन्होंने मेरी दो चिट्ठियों का जवाब ही नहीं दिया। तीसरी का 114/हम इक उम्र से वाकिफ हैं । । .

1 । जवाब दिया, जिसके शुरू में ही उन्होंने लिखा कि मुझे बताया गया था कि आप उम टिप्पणी के कारण मुझमे नाराज हैं। मैंने म्पष्ट किया कि टिप्पणी मुझे अच्छी लगी। आपमे झूठ बोला गया, जिसमे हमारे मयध पनिष्ठ न हों। मुक्तिबोध मे पनिष्ठ मबंध 1956 मे बने, जब हम लोगो ने जबलपुर मे 'वसुधा मासिक पत्रिया निकाली। इसके पहले विलामपुर मे श्रीकात वर्मा ने 'नई दिशा' के मिर्फ तीन अक निकाले थे। मुक्तिबोध मैंने जब 'वसुधा' निकालने कीयात लिसी,तो उनका उत्माहभरा पत्र आया। वे अपनी पत्रिका पाकर बहुत खुश थे। 'मैं लिदंगा, सब लितूंगा'-उन्होंने लिखा था, और 'वसुधा' में उन्होने सूलिसा । एक विचित्र विरोधाभास था उनकी प्रवृति में। वे पैमे-पैसे के मोहताज थे, पर अच्छा पारियमिक देनेवाली प्रचार-प्रमारवाली पत्रिकाओं में नहीं लिखते थे। मैं आग्रह भी करता कि इन पत्रिकाओं में लिसिए। आपनी रचनाएं और आपके विचार लाखों लोगों तक पहुंचेंगे और पैमा मिलेगा तो कुछ आर्थिक कष्ट कम होगा। वे जवाब देते 'पार्टनर, ये पत्रिकाएं क्निकी हैं, आप जानते हैं। इनमे अपनी पटरी नहीं बैठेगी। अपन उम सेमे में नहीं जाएंगे। उनकी कुछ जडीभूत मान्यताएं थी। पत्रिकाओं का प्रकाशन मुख्यत व्यावमापिक मामला है। उन्हें अच्छी सामग्री चाहिए, जो बाजार में चले । लेखक को प्रकाशन और पैमा चाहिए। यह मीधा मौदा है। यह भी सही है कि इन पत्रिकाओं की विचारधारा दक्षिणपयी है। पर वामपथी लेसक योधापना उनकी मजपूरी भी है। उन्हें याजार में अच्छा माल लाना है। मगर मुक्तिबोध यह समझौता नहीं करते थे। यह सही है कि मुक्तिबोध असुरक्षित महसूम करते थे और किसी आमन्न संकट की आशका उन्हें घेरे रहती थी। वे सदेही थे। या तो किमी आदमी पर पूर्ण विश्वास या पूर्ण अविश्वास । उन्हें यह भी लगता था कि मैं दुश्मनों से घिर गया है। वे अतिशयता मे भी ग्रस्त थे। वास्तविक मे कई गुना कल्पना मे अनुभव करते थे। स्नेह को वे पराकाष्य तक ले जाते थे। आशा को भी अनुपात से ऊपर ले जाते थे। मीमातता और अतिशयता उनमें हमेशा रहती थी। वे चितक घे इमीलिए हमेशा येचैन रहते थे। मानसिक स्थिति उनी ननावग्रम्न थी। भीतरी और बाहरी ममर्ष उनका विकट या। आशका. मक्ट के भय सतना और असुरक्षा की भावना का कारण ये उनके कट अनुभव । वे मता" यहत गए थे। उन्होंने लिसा भी है हम इक उम्र मे वाकिफ है/115 । । - पिस गया वह भीतरी औ' बाहरी दो कठिन पाटों बीच ऐसी 'ट्रेजडी' है नीच! सही है कि जीवन के अनुभवों के कारण मुक्तिबोध ऐसे हो गए थे। उनके विरोधी खेमे के हमले तो उन पर होते ही थे, उनका कहना था कि मैं अपने ही खेमे में मारा गया। मुक्तिबोध को इतना सताया गया था कि थोड़ी-सी उदारता भी उन उद्वेलित कर देती थी। वह उन्हें अविश्वसनीय लगती थी। 'कामायन पुनर्विचार' के प्रकाशक शेषनारायण राय वास्तव में पुस्तक-विक्रेता थे। हमारे मित्र थे और साम्यवादी पार्टी के सदस्य भी थे। इसी कारण उन्हों पुस्तक छाप दी। मुक्तिबोध को उन्होंने शायद दो सौ रुपए दिए और सौ के किताबें अपनी दुकान से ले जाने दीं। मुक्तिबोध बहुत गद्गद थे। उन्हें या अविश्वसनीय भी लग रहा था। इसी तरह भारत : इतिहास और संस्कृति' प्रकाशक के मामले में हुआ। उन्होंने मुझसे कहा : 'प्रकाशक अगर दो सौ रुपा दे दे तो बच्चों के लिए कपड़े लेता जाऊँ।' मैंने प्रकाशक से अलग कह दिया यि इन्हें पाँच सौ रुपए दे देना । जब वह पाँच सौ रुपए लेकर सड़क पर आए त चमत्कृत थे। बोले : 'यह प्रकाशक भी, साहब, अद्भुत है। मैंने तो संकोच दो सौ माँगे थे, पर उसने पाँच सौ दे दिए। अव कपड़े नहीं खरीदेंगे, कम चुकाएंगे।' सारे कष्टों के बावजूद मुक्तिबोध पठन, चिंतन और सृजन में लगातार लग रहते थे। रातें सोचने और लिखने में गुज़ार देते । पौष्टिक भोजन पाते नहीं थे चिंताग्रस्त रहते। उस पर इतना मानसिक श्रम करते थे। इसी कारण वे जवानी में ही बूढ़े- हो गए थे और कुल 47 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई । इस सारे चक्कर आदमी शरीर और बुद्धि से शिथिल हो जाता है। पर वे शिथिल बिलकुल नहीं हुए थे। वे बहुत सचेत और सक्रिय थे। बेहोशी के पहले वे पंडित जवाहरलाल नेहरू की तबीयत के बारे में पूछ रहे थे और बता रहे थे कि नेहरू की मृत्यु बाद कौन-सी ताकतें जोर पकड़ेंगी। मुक्तिबोध कट्टरपंथी मार्क्सवादी नहीं थे। कट्टरता से तो उनका झगड़ा है । 116/हम इक उम्र से वाकिफ हैं पा। पर वे कभी-कभी वर्ग-दृष्टि से दिलचस्प निर्णय देते थे। वे जबलपुर आए। मेरे माप ही टहरे । हमारे एक मित्र प्रोफेमर हनुमान वर्मा ने उन्हें और मुझे भोजन के लिए बुलाया। हनुमान के घर सोपाया और डाइनिंग टेवल पी। हम लोग भोजन करके लौटे। मुक्तिबोध पूरी गंभीरता से बोले: 'आप कहते हैं ये वर्मा जी आपके घनिष्ठ मित्र हैं। पर ये हमारे कैमे हो सकते हैं ! उनके घर मोफा है, हाइनिग टेयन है। रहने का ऊंचा ढंग है। ही बिलांग्ज टू एनादर वर्ल्ड वेहमारी 'क्नाम' के नहीं हैं। वे हमारे मित्र में हो सकते हैं। मैंने उन्हें ममझाया कि हनुमान कल हजार रूपया महीना पाता है। उमी में टीम-टाम कर लेता है। यह हमारे ही वर्ग का है। आगरावाले मुकदमे की जबलपुर में ही तीमरी पेशी थी। मैंने करीय दम पजे मुक्तिबोध मे कहा- 'मुझे तो अदालत जाना है। आप आराम मे भोजन कीजिए।' मुक्तिबोध ने पूछा : 'पार्टनर, मजिस्ट्रेट कौन है ?' मैंने यहा. 'एक जापव है । मुक्तियोघ ने कहा. 'जाधव महाराष्ट्र में नीची जाति है । मजिस्ट्रेट वी वर्ग-महानुभूति मेसक के माय होगी, प्रकाशक के माप नही । आप छूट जाएंगे।' पिछली दो पेशियों पर प्रकाशक अदालत में नहीं आया था, और अपना मेडियन मर्टीिफट भेज दिया था। उमरा बयान होना था। इस बार भी मैंने कहा 'मैं हाजिर हूँ।' जाधव माहब ने प्रकाशक के वकील में पूछा 'और आपके मुवक्किन?' वकील माहव एक कागज मेकर आगे बढ़े। न्यायाधीशने कागज लेकर देसा और कहा.'तीसरी पेशी पर भी बीमार हैं । वाह माहव, यह सूप है । आगरा मे बैठे हैं । यम एक मागज भेज दिया और लेखक पर मुकदमा दायर कर दिया। अब लेसक हर पेशी पर आ रहा है और आपके प्रकाशक माहय आगरा में बैठे हैं । एक डॉक्टर का माफिकेट भेज दिया। मुकदमा में आगे बढ़ेगा? जानने है वकील माहय, आप इन नेसकों को। ये इमी मव पर तो लिसते हैं-भ्रष्टाचार, शामन में येईमानी, मुठ वगैरह पर । यही इन्होंने लिए दिया कि मैं ही पैमा सा गया तो नहीं, नहीं । मैं मुक्दमा सारिज करना है। मैं चलने भगा तो जापद माहब ने हमकर मेरे भाई मे कहा 'अम क्या लिखेंगे।' घर लौटा तो मतियोध को बताया कि में छूट गया, मुक्दमा सारिज हो गया। वे बोले : 'मैंने कहा था न, पार्टनर । अटल मत्य है।' भोपाल में एक माहित्यकार सम्मेलन युनाया गया था। मतियोध, हम इक उम्र मे वाकिफ है/117

कददऔर मैं वहाँ गए थे। हम लोगों ने तय किया कि अपने
भाप मेमचनपरिभाषिक शब्दों का प्रयोग नहीं करेंगे। संस्कृति पर
गोठा दिख रहा था कि पंडित नंददुलारे वाजपेयी और मुक्तिबोध में
वैगरिकाभन होगी। वाजपेयी जी बोल चुके । मुक्तिबोध बोलने लगे। वे
मरत होकर दिली-जुलते, कटाक्ष करते बोलते थे। वे मूड में बोल गए:'और
ये बुर्जुआपातवियानादी बुद्धिजीवी'
था मारवाद भी पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग नहीं करेंगे। प्रमोद,
श्री सौरभैसामने ही बैठे थे। उन्होंने हमारी तरफ देखा और मुस्कराकर
देनी भी कहो पार्टनर, अपन को ये शब्द पसंद हैं।'
महोटल लौटे। मुक्तिबोध समझाने लगे : 'प्रो. रामलाल सिंह यादव हैं,
हौरउनकी वर्ग-सहानुभूति हमारे साथ है। पर वे वाजपेयी के समर्थन में
इसलिए बोले कि वे रीडर हैं और वाजपेयी जी विभागाध्यक्ष हैं।
बहुत सतर्क और सक्रिय मुक्तिबोध ने लकवे से शिथिल होकर अपने को
मित्रों को सौंप दिया। वे कोई निर्णय नहीं लेते थे। उनके लिए हम लोग निर्णय
लेते थे। मैं दिल्ली में श्रीकांत वर्मा के पास था। श्रीकांत के नाम उनका पत्र
आया कि वाएँ बाजू में लकवा मार गया है । मैं दूसरे दिन ही भोपाल गया । तब
पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र मुख्यमंत्री थे। वे जबलपुर के ही हैं। मुक्तिबोध
उनके आग्रह पर उनके माताहिक पत्र 'सारथी' में 'अवंतीलाल' के नाम से
अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं
थे। 'योग से भी उन्होंने
कुछ लेख लिखे थे।
अंतर
लिखवाते
थे और मुक्तिबोध लि
घर उन
होती
थीं। मुक्तिबोध के नि
प्रसारण
भी
।

। : गहनी । देबोनले बहन यमये। असवाररोज पढ़ने महामनी'बार' कोअपरमार जी ने आए और परिचय संगा।'ताने रस : भांगरोध माहब, गानिय ने कहा है: आह को चाहिए इस उप अमर होने तर। यौन जीता है लेग जल्फ ये मा होने तर।। दमी जमीन पर मैंने एक शेर बहा है। आह मे हमने निकाली है अभय की मग्न हमरो जीना है तेग जल्फ वे मर होने तक। मुक्तिबोध यहत रागहए 'वाह, सब है । बडा पेट शेर हैरागेको दो-तीन बार मुना। उन्हें 'ट्यूबरक्ला मैननजाइटिम रोगथा।हालत गिरनी गई। वे गमम्म रहने लगे। जब उन्हें दिल्ली अनि इडिया मेडिक्ल इस्टीट्यूट में ले जाया गया, तब वे 'योमा मे आ चर पे और वहाँ मे पिर नौट नहीं। मपिनयोध में मैंने बातमीसा-या में और उनके मेसन में । मरितबोध में बध भाव यहत था। हम मांगों के माप दे मई मुरनम्नेह मे बैठने पे और यां भाई की तरह मिसाते थे। वैचारिक कपट को वे एकदम पहचान मैने ऐ और हम लोगो यो मावधान करते थे। वैचारिक एल उन मामने चल नहीं मरता था। हमारी पीढ़ी के पर बडे हिम्मे ने उनमे गीता। देरावागिमारे पाद की पीढी उनमे और अधिर प्रभावित है । यहुन गे नेरार ममय के बदले गम्भीन होने जाते हैं। मगर मुक्तिबोध ज्यों-ज्यों ममय बीनना है और ना वनागर आते हैं, अधिरमदर्भवान होते जाते हैं । बीम मे पनीम गाली उभयाने मरण रचनाकार शायद हममे अधिर उन्हें अपने निपट पाते हैं। मुक्तिबोध ने 'वसुधा में बहे उन्माद में एक माहित्यिर पीटायर्ग नियमित रूप मे लिखी। वसुधा मामिक नप पत्रिका हमने 1956 मे निगली थी। वह ढाई मान चली । विनागपर मे धीरान वर्मा ने गमरण श्रीवालय में महयोग में 'नई दिशा पपिरा निवाली थी, जिम एल नीन अरनिरन मरे। 1956 मे हमारे पर याहर के मित्र उयनपुर में ही थे। प्रो प्रमोद यमाको यातिरमार जैन यहाँ तबादले पर, शोध-मम्यान में भार थे। पोलमान वमा यही प्राइवेट लिजमे थे। श्रीवात पाडे भी यही पे।हमार्ग पेटा प्रारी' एक मपादक रामेश्वर गुमचं घर होती थी। इन विषय में विस्तार मेनिस हम हर जब मे वारिप है।। ।

चुका हूँ। उस समय प्रगतिशील लेखक संघ बिखर चुका था। 'नया पथ' पत्र बंद हो गया था। 'अज्ञेय' के निर्देशन में, डॉ. धर्मवीर भारती के नेतृत्व में 'परिमल' संस्था चलती थी। तब धर्मवीर भारती का प्रभाव बहुत था और ज़्यादातर तरुण लेखक उनके साथ थे। तब 'लघुमानव', 'क्षणवाद', 'नदी के. द्वीपवाद,' 'मृत्यु-बोध' का बोलबाला था। हम लोगों ने तय कर डाला कि एक मासिक पत्रिका निकाली जाए। नाम 'वसुधा' भी तय कर डाला । रामेश्वर गुरु चंदा लेने में उस्ताद हैं। उन्होंने कई कार्यों के लिए चंदा किया है। वाकी हम लोग थेही। तीस साल हो गए हैं। हमें अपेक्षित सहयोग जाने-माने, प्रगतिशीलों का नहीं मिला । मुक्तिबोध ने ज़रूर नियमित लिखा । नागार्जुन की दो कविताएँ मिलीं । शमशेर की एक कविता और एक रुबाई। तवरमेश बक्षी और शरद जोशी लगभग'नवोदित' थे, मित्र भी थे। इनकी रचनाएँ काफी मिलीं। हम लोग ही कल्पित नामों से लिखते थे। श्रीकांत वर्मा 'समुद्रगुप्त' नाम से 'कलम की दिशा' स्तंभ नियमित लिखते थे। प्रमोद वर्मा 'गोरखनाथ' नाम से लिखते थे और मैं 'आनंद स्वामी' नाम से लिखता था । वे बहुत अच्छे दिन थे। हम लोग शाम को गुरु जी के घर पहुँच जाते और रात ग्यारह बजे तक काम और गपशप करते। दिन में नौकरी करते थे। इसके बावजूद अपना पढ़ना-लिखना कर लेते थे। हम लोग चंदा.भी करते थे और ग्राहक बनाने भी निकलते थे। विज्ञापन गुरु जी ले आते थे। हम दूसरे छोटे शहरों जैसे सागर, गाडरवारा, इटारसी आदि से भी चंदा लाते थे और वहाँ ग्राहक भी बनाते थे। 120/हम इक उम्र से वाकिफ हैं

उद्घाटन, भापण वगैरह ..
मैं कॉलेजो, विश्वविद्यालयो, गरमों और
मामा
हैं। मैं पैसे लेकर वि-गामेमनी की अध्यक्षता भी या AIYAHIT
उद्घाटन कर चुका है। वह मे में मार गाI MAmar श्री।
याला हुआ द वेचता रहा है। यात्रा-ग गया पानी REnt
चैझिझक लेता रहा है। गा में आयोजनानां प्रागो ममाना nm
"देखिए, आर रोशनी, माइय, वर्ग, मिया, मग गामा ग्राशिminine
फिर भाषण देनेवाले यो क्यों नहीं। 'धीरे-धीपायाशErantiy
यह आदमी पैसे लेकर भाषण दना है। निदाmam
मम्या के चिद ने मनमे पृष्ठा 'आप't mre:
मगर मंग भागने की भी माfatuinth
आमतौर परदन आयोजनों में मीरगनायाtrrirr.
रहे हैं। मैंनएर वलिंगमगारमा rm.mementnet
कानों में पा मंग आरखा भारदरmantr"
क्यों नहीं बनाने जो आगमनमr"FArmy
जवाब दिया 'उन पाने मय का हार.tr
तःहै। छात्र उन्हें मनना नही टाटारमाmarwa
सक्षेत्रमाबायलगित12rrer.
मंगनाtrrrrr.
बरामदिया। गrrrrrrr.
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- 1 रगड़ना शुरू कर दिया। मंत्री बोल नहीं सके और बुरा मानकर चले गए।' मैं जानता हूँ, छात्र मेरा लिखा पढ़ चुके होते हैं । वे उसे न सिर्फ पसंद करते हैं बल्कि अपनी ही बात मानते हैं। इसी कारण मुझे सुनते भी हैं । कुछ तरकीबें भी मैं करता हूँ। मैं जानता हूँ, छात्र उपदेश नहीं सुनना चाहते । मैं अक्सर भाषण इस तरह शुरू करता : 'आप लोग चिता न करें। मैं बहुत दयालु आदमी हूँ। मैं उपदेश नहीं देता और लंबा नहीं बोलता। वे बड़े लोग हैं, जो आपसे कहते हैं : 'युवको, तुम्हें देश का निर्माण करना है, क्योंकि हम देश का नाश कर रहे हैं । तुम्हें चरित्रवान होना है क्योंकि हम चरित्रहीन हो चुके हैं।' इस पर छात्र खुश होते हैं, ताली बजाते हैं और भाषण रुचि से सुनते हैं। मैं पैसे लेकर कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता भी करता रहा हूँ। यह बड़ा कठिन काम है। सर्कस के शेर पालने सरीखा है। कवि-सम्मेलन में कवि की श्रोताओं से, श्रोताओं की कवि से और कवि की कवि से रक्षा करनी पड़ती है। कवि-सम्मेलनों को जमाए रखना आसान काम नहीं है। मैं कवि-सम्मेलन को ऐसा जमा देता था कि श्रोता यह तय नहीं कर पाते थे कि कौन कवि अच्छा है और कौन बुरा ! घटिया कवियों का मैं बहुत प्यारा अध्यक्ष हूँ। जितना घटिया कवि होता, मैं उसे उतना ही जमा देता। भाषण और अध्यक्षता के इस धंधे में मुझे बहुत तरह के अनुभव हुए । एक कॉलेज में स्नेह-सम्मेलन के उद्घाटन के लिए बुलाया गया। मैं भोपाल से पहुँचा । साथ में कवि रामविलास शर्मा (डॉक्टर नहीं) थे, जो कवि सम्मेलन में आमंत्रित थे। यह देशी राज्य था। राजशाही तो खत्म हो गई पर सामंती घराने वहाँ बहुत हैं और नगर का वातावरण सामंतवादी है। हम लोग कॉलेज के प्रवेश-द्वार पर पहुँचे । आमतौर पर यहाँ 'स्वागतम्' जैसा कुछ लिखा रहता है। पर यहाँ फाटक के दोनों चौड़े खंभों पर प्रिंसिपल का कार्टून अंकित था, जिसके नीचे उनके लिए गंदी गालियाँ लिखी थीं। भीतर से हल्ला सुनाई पड़ रहा था-यानी हुल्लड़ चालू था। मैंने पूछा 'प्रिंसिपल कहाँ है ?' जवाब था : 'वे छुट्टी पर गए हैं । ' मैंने कहा : 'वे चतुर हैं, जो इस शुभ अवसर पर यहाँ से भाग गए। हम बेवकूफ हैं, जो मौत के मुंह में आ गए।' खैर भीतर हॉल में गए। बहुत शोर था। एक के बाद एक तीन आचार्यों ने माइक पर शांति की अपील की, मगर हल्ला बढ़ता गया। मुझे माला पहनाने का कर्मकांड हुआ। मैं उद्घाटन-भाषण करने उठा। आमतौर पर मैं ऐसी भीड़ को नियंत्रित कर लेता 122/हम इक उम्र से वाकिफ हैं है। मगर नियत्रित नवकरप्रय मुझे 2-4वाश्य बोलने दें। सिर मैंने कहाः 'उद्घाटन आम मांग कर चरे। अब बाहर जाइए और कवि-सम्मेलन । यादा मैदान था। मंत्र या कवि थे। कोईघांव दो पाक्नदों मे उपर पढ़ नहीं पाता था। मझे नाम के लिए अध्यक्ष बना दिया था। मंचालन हिंदी के आचार्य कर रहे थे । म बगल में एक अधेड यििवत्री बैठी थीं। प्रोनर ने पटा 'अब इनमें पढ़वा दें? मैंने रविपित्री मे पहा : 'आप इस माहौल में कविता पढ़ेंगी?' उन्होंने सुशी मे कहा: "हां, पर्दगी।" कोईवीगगना थी। अब, आचार्य जी ने माइक पर पोपगावी:जिनस आप लोग बड़ी बेमनी में इतज़ार कर रहे हैं, वे आपके सामने आ रही हैं । क्लेजा थामकर मनिए।' मैं ममम गया-आचाहावी मे चीन पहते हैं । ऐमे आचार्य हैं,नी एमे छात्र हाए है। बडयों ने आवाज़ दी 'आने दो। आने दो। देख लेंगे। कविपित्री ने दो पक्तियां ही पड़ी होगी कि शोर हुआ 'हाय मार डाला। सब हल्लड । अव मैंने माइक ने लिया। लडके लिए चप हो गरि उन्होंने मेरी आवाज ही नहीं मुनी पी । देखें. यह माला अध्यक्ष क्या यकता है। मैंने कहा 'मैं वही प्रशमा मे आप लोगों के करतब देख-मुन रहा है। मैं जबलपुर काई और यह जो आपकह रहे हैं. इसमें जबलपुर मारे देश में मशहा है। मगर आप हमारे लहकों ने बढ़कर हैं। हमने हार मान ली। बात यह है कि हमारे शहर के महयनो अपनी उम्र की जवान नकियों कोडते हैं. मगर आप नो अपनी मां-जैनीको भीड नंत है।'मन्नाटा सिच गया। मैंने बगल में बैठेगविलान शमां में कहा 'दो-नीन मिनिट के लिए गम्ना मिला है। इसमें में फों ने निकल जा। गर्मावलान ने जल्दी मे 8-10 पत्नियों पी.लडकों के मंमलने के पहनेहल्लह पि राम हो गया और कार्यक्रम सन्म करना पड़ा। पार पलिज में मेरे मित्र को प्रमोद वर्मा थे। उन्होंने मुझे स्नेह-मम्मेलन का उद्घाटन करने और कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता करने को बुनाया भाषण मैंने दे डाला। अब यदि मम्मेलन शाहआ। एक तगडे कवि पिस्तौल लिए हा पधारे । बडीदर में आए थे। वे बार-कापिम्नौलहाप में नेकर उममें रोचने, जिमयं प्रांता देस में। मैंने दो कवियों में विनाएं पढ़वाई। अब मैंने वीर कवि कोयलाया । वे पिम्नान लिए माइक पर आए। बोले 'आज देशको गौयं चाहिए, प्रगप नहीं । ये जो कवि प्रणय के गीत गाते हैं, वे नपुसक है और हम इक उम्र मे वाकिफ हैं/123 ।

। निर्वीर्य हैं। मैं वीरत्व का आह्वान करता हूँ।' वे कुछ देर तक कोमल भावनाओंवाले कवियों को गाली देते रहे। जो कवि कविताएँ पढ़ चुके थे, वे कुछ परेशान थे। जिन्हें आगे पढ़ना था, वे भी चितित थे। वीर कवि ने कठोर वर्गों की दो कविताएँ ओज़ से पढ़ीं । वातावरण ऐसा बन गया कि आगे कविता पढ़ना संभव नहीं रहा। वीर कवि तमाम कवियों को हिकारत से देख रहा था। मैंने माइक लिया और बोला : अभी एक वीर कवि को आपने सुना । मैं नहीं जानता चौबीस घंटों में कितने घंटे वे लड़ते हैं और किनसे लड़ते हैं। उनकी बातों से मालूम होता है कि वे चौबीसों घंटे लड़ते रहते हैं। वे स्त्री से प्यार करने को वीरोचित काम नहीं मानते तो वे तीन बच्चों के बाप कैसे हो गए? उन्हें क्या पता नहीं है कि नपुंसक और निर्वीर्य पुरुष प्रणय नहीं कर सकता। ऐसा ही कुछ और भी कहा तो वातावरण बदला और दूसरे कवियों ने कविता-पाठ किया। कवि-सम्मेलन के बाद भोजन पर पहुँचे। वीर कवि मेरे वगल में ही बैठे थे। दोपेग शराब के बाद वे अश्लील बातें बकने लगे। दोपेग में कुछ लोग अंग्रेजी भी बोलने लगते हैं। मैंने कहा :'आपका वीररस कहाँ चला गया ?' उनका जवाब छापने लायक नहीं है। वे मेरे चरणों से लिपट गए। बोले : 'आप गुरु हैं। जनता बेवकूफ है और हम ढोंगी हैं। हमारा यह धंधा मज़े में चलता है मगर आपने पकड़ लिया गुरु! हीहीही"!" कभी ऐसा भी होता है कि कुछ लोग योजना बनाकर उपद्रव करने आते हैं। वे श्रोताओं में बैठ जाते हैं और बीच-बीच में आवाजें करते हैं। मेरे जीवन में ऐसे मौके भी आए । एक जगह भाषण दे रहा था। लगभग एक हज़ार श्रोता होंगे। दो बार इन उपद्रवी लोगों ने आवाजें कसीं । कुल 10-12 होंगे वे। श्रोता बहुत ध्यान से सुन रहे थे और वे इन आवाजों से खीझ भी गए थे। मैंने कहा: 'उपद्रव करनेवाले दोस्तो, आप लोग कुल 10-12 हैं। ये सैकड़ों लोग मुझे सुनना चाहते हैं। आप इनके सुनने में बाधा डाल रहे हैं। ये लोग भी मर्द हैं । मैं इनसे कहने वाला हूँ कि वे खुद ऐसी स्थिति बना लें जिससे बिना बाधा के वे मुझे सुन सकें।' यह सुनकर श्रोताओं में से कुछ युवक खड़े हो गए और उन्होंने आस्तीन चढ़ा ली। मैं बोलता गया। विलकुल शांति रही। उपद्रवी एक-एक कर खिसक गए। ऐसे ही दूसरे मौके पर मैंने दूसरी तरकीब की । मैंने कहा : 'आप सैकड़ों लोग यहाँ बैठे मुझे सुनना चाहते हैं। मगर ये कुछ लोग आपके सुनने में बाधा डाल रहे हैं । आप लोग इन्हें पहचान गए हैं। आप इनके चरणों पर श्रद्धा से 124/हम इक उम्र से वाकिफ हैं ।

। अपना मस्तक रखकर प्रार्थना करें कि प्रभु, हमें सुनने दीजिए।' वे बाधा गलनेवाले फुर्ती मे वहां से चले गए। एक विश्वविद्यालय में छात्रमघ का उत्सव था। मैंने उद्घाटन-भाषण दिया। याहर आए तो वहां ग्रुप फोटो का इतजाम था-छात्रसंघ के पदाधिकारी, बलपति और मैं। छात्र-नेता, कुलपति से उलन गए : 'सर, आपने हमारा ममारोह पर्याद कर दिया। आपने छुट्टी नहीं दी। हमें फोटो-वोटो नहीं सिवाना। कुलपति और दूसरे आचार्य लहको को समझाने लो, पर विवाद बढ़ता गया। यात विगहती देखकर मैंने छात्र-नेताओं से कहा:'आप लोग देर नहीं करते। भीतर हॉल में मैंने सामाजिक क्रांति की बात की थी और आप लोगों ने याहर निकलते ही क्रांति शुरू कर दी।' उसी विश्वविद्यालय में फिर तीन माल याद गया। मैदान में ममारोह था। मुझे मालूम था कि छात्र नेताओं से कनपति का अक्सर झगडा होता रहता है । वहाँ माहौल तूफानी था। मेरे बगल मे कुलपति थे और उनके बाद एक वरिष्ठ अध्यापक बैठे थे, जिनकी छात्रों मे यहत इज्जत थी। छात्रों के दो गुट होते ही हैं। छात्र कुलपति के खिलाफ नारे लगा रहे थे। कुलपति उठकर जाने लगे तो उन वरिष्ठ अध्यापक ने, जिनकी यही इज्जत थी, उन्हें हाथ पकडकर बिठा लिया और मुझसे कहा कि आप बोलिए। मैंने माइक लिया। लडके यह सोचकर चुप हो गए कि इसकी बात सुन लो, फिर हुल्लह करेंगे। मैंने कहा 'मैं बहुत खुश हूँ। आप लोग क्रांति करनेवाले माने जाते हैं और बड़ी देर से मैं आपका क्रांति-कर्म देख रहा हूँ। इतनी देर में आपने मचमुच समाज बदल दिया। यहां वहादुरी बतानेवाले आप क्ल पढ़ाई पूरी करके बेकार और कायर होगे और मामूली नौकरी के लिए हर नीय आदमी के सामने गिडगिडाएंगे, दुम हिलाएंगे और उसके चरण घूमेंगे।'-मेरे इतना कहने पर लडके सकते में आ गए और शांति तथा उत्साह मे घंटे भर मेरा भाषण सुनते रहे। जिन अध्यापक ने कुलपति को रोककर मुझमे बोलने को कहकर मामला मंभाला था, वे प्रसिद्ध भूगर्भ-शास्त्री डॉ वेस्ट थे और यह वाकया सागर विश्वविद्यालय का है। एक छोटे शहर में क्षेत्रीय साहित्य समारोह था। दो-तीन गोष्ठियों होनी थी। समापन से पूर्व सार्वजनिक ममारोह का आयोजन था। वैमे छोटे शहर में माहित्य-गोष्ठी भी सार्वजनिक हो जाती है । मुझे उद्घाटन करना था। मैं कार हम इक उम्र से वाकिफ है/125 1 । से ज्यों ही उतरा, वहाँ के एक नेता ने मेरा स्वागत किया। कुहनी तक हाथ जोड़कर सिर बहुत झुकाकर बोले : 'आपका स्वागत है । आपके चरणों की धूल के स्पर्श से इस नगर की भूमि पवित्र हो गई।' मैं जानता था कि वे खुराफ़ाती हैं। उनकी अतिशय विनम्रता से मैं सशंकित हो गया । तुलसीदास ने कहा है : 'नमन नीच की अति दुखदाई।' दो दिन मैं उनकी और उनके चेलों की गतिविधियाँ देखता रहा । अंतिम कार्यक्रम में उनके 10-15 चेले सामने बैठ गए । नेता उनसे दूर बैठे थे । हॉल में लगभग तीन सौ आदमी और होंगे । अध्यक्षता एक कवि कर रहे थे । एकाएक एक युवा खड़ा हुआ और बोला 'हम कुछ प्रश्न आप लोगों से करना चाहते हैं।' अध्यक्ष ने कहा : 'इस कार्यक्रम में प्रश्न पूछने का विषय नहीं है । इस पर चार-पाँच युवा खड़े हो गए और चिल्लाए : 'हम प्रश्न पूछेगे। आप हमें रोक नहीं सकते।' स्थिति बिगड़ती देख माइक मैंने ले लिया। कहा : 'आप प्रश्न पूछिए।' एक ने कहा : 'हम माइक पर प्रश्न पूछेगे।' मैंने कहा : 'आपको माइक नहीं दिया जाएगा। आप वहीं से प्रश्न कीजिए और मैं उसे घोषित कर दूंगा।' दो-तीन लड़के खड़े हो गए और चिल्लाए : 'हम माइक छीन लेंगे।' मैंने कहा: 'हमें पीटकर ही आप माइक छीन सकते हैं। और यहाँ बैठे दो-तीन सौ नागरिक अगर मर्द होंगे तो आपको ऐसा नहीं करने देंगे। आखिर हम इस शहर के मेहमान हैं। कुछ लोग उन लड़कों पर चिल्लाए : 'गड़बड़ मत करो। चुप बैठो।' लड़के कुछ ढीले पड़े। फिर भी एक ने वहीं से पूछा : 'आप लोगों की विचार-गोष्ठियों का क्या निष्कर्ष निकला?' मैंने कहा : 'विचार-गोष्ठी में विचार होता है, निष्कर्ष नहीं निकलता। चिंतन गतिशील है। कोई सत्यनारायण की कथा नहीं है, जिसमें निष्कर्ष निकल आता है।' दूसरे ने पूछा: 'आप लोगों ने राष्ट्रीय संस्कृति और राष्ट्रीय चरित्र पर विचार क्यों नहीं किया?" मैंने कहा : 'कैसी संस्कृति और कैसा चरित्र ? क्या वही संस्कृति और वही चरित्र जो आप लोग यहाँ बता रहे हैं ?' इस पर लोग ज़ोर से हँस पड़े और आवाजें लगने लगी : 'गड़बड़ बंद करो। वे हताश हो गए थे। उठकर बाहर । ' -- चले गए। 126/हम इक उम्र से वाकिफ हैं - इस तरह के कई मौके आए। ज्यादातर मैंने मामना गभान लिया गर्म मेरा पोईजाद या चमत्कार नहीं है । पछतावा होती हैं प्रोताओं को वश में करने की । मेरी यही तायन यह है कि लोग मंगलियाहुमा ज्यादातर पदा होते हैं और मेरी यात मनना चाहते हैं।

- संतन कहा सीकरी सों काम!'
फतेहपुर सीकरी में शहंशाह अकबर थे। उन्होंने संत कवि कुंभनदास को
दरवार में बुलाया। बहुत घेराघेरी के बाद संत सीकरी गए । लौटकर पछताए ।
कहा :
संतन कहा सीकरी सों काम
आवत जात पन्हैया घिस गई,
विसर गयो हरि नाम;
जिनके देखे दुख उपजत है,
तिनकों करवो पड़े सलाम ।।
तुलसीदास को भी मनसबदारी से अलंकृत करने के लिए अकबर ने बुलाया
था। संत ने जवाब दिया:
हम चाकर रघुवीर के, पढ़ी लिखौ दरबार ।
अव तुलसी का होहिंगे, नर से मनसबदार ।।
यह जो लिखा वह भूमिका नहीं है अपने को संत सिद्ध करने की। संत
बिलकुल नहीं हूँ। खास महत्त्वकांक्षी भी नहीं हूँ, मगर रास्ते में लाभ दिख जाए
तो उसे लेने की कोशिश करता हूँ । साधारण आदमी हूँ। साधारण आदमी के
गुण और दोष मुझमें हैं। हम लोग-इस युग के अधिकतर लेखक,
बुद्धिजीवी-इस व्यवस्था की जारज संतानें हैं। हम मानसिक रूप से 'दोगले'
नहीं, 'तिगले' हैं। संस्कारों से सामंतवादी हैं, जीवन मूल्य अर्द्ध-पूँजीवादी हैं
और बातें समाजवाद की करते हैं। अधिकांशहम लोग 'रेटारिक' खाते हैं और
'पोलेमिक्स' की कै करते हैं।
128/हम इक उम्र से वाकिफ हैं

मैं समझता हूँ,मंग एन उपनधि मानवीय मवेदना और मरोकार है। मनुष्य के जीवन की बेहतरी की चिता मेरी रही है। इमी में मैंने लिखा है और पर मशहूर भी हो गया है। यह आम्था न होती तो मैं कुछ नहीं होता। तुलमीमाम ने निसाः का गिनती मह गिनती जम वन घाम । नाम जपन भए तुलसी, तुलसीदाम ।। वह पाम ही है। विनम्र हूँ। विनम हूँ। मगर क्येर माना जाता है। यह है कि व्यक्तिगत कारणों में मुझे गुस्मा लगभग नहीं आता। आत्म-क्षयरता है। मगर मैं मामाजिक अन्याय को बरदानन्दका बटोर मे क्टोर प्रहार करता हूँ। लेकिन हम असाडे के भीतर ही पहन्दन असाडे के बाहर अयोधशिशु हैं । हमाग यह नरमपन भी आया है और लोग मेरे नमन पर भी कुडमुडाने हैं। गानव ने कहा है हम यहाँ के दाना ये श्मि इल्म में चेमयय हुआ है गालिब रमन आनन।। अहकार क्यिा नी नहार नेवर में का देखियो गालिब मेरोलाई है वनी पोमाता कति सुन्न। वहरहाल,मैंने पहले कहा है किगमनकार दो टमाटर की कोशिश करता है। नीमरमान पानेगा की मम्मामे गन्ट आ गई थी। मैंने गनमक कीट अभी भी मानता र गन्ना गा र माटर बुदमन लेसों के लिए निकल्टन मिला आरम्य कामना कर मंसदीय वनमनट काम- गदनापरले जनमत 8 म्बनी दर्शवना र गन्ती सरस गनमाई दाट charmings मार मौन धां-ट- र:- - सोनिया की शादी विलिंगडन क्रीसेंट स्थित सरकारी बँगले से कराई। यह सत्कार्य आज राजीव का संकट है। खुशवंत सिंह ने ज़रूर मुँह खोला मगर बदकिस्मती से भूपेश गुप्त से टकरा गए। भूपेश गुप्त ने खुशवंत सिंह की तरह इशारा करके कहा : 'Sychophants like him, caused the death of Sanjay Gandhi.'खुशवंत सिंह ने तैश में आकर असंयमित और अशिष्ट बोला। भूपेश गुप्त ने संयमित पर कठोर जवाब दिया। कुछ सदस्यों ने अध्यक्ष से निवेदन किया कि कार्रवाई में से यह बहस निकाल दी जाए। भूपेश गुप्त ने कहा : 'Mr. Chairman, not a word should be expunged and a copy should be sent to the President, so that he may know what type of man he nominates to this house. फूहड़ लतीफ़ों के शौकीन खुशवंत सिंह के संसदीय जीवन को झटका लगा। राज्यसभा सदस्यता के लिए मेरी पन्हैया कैसे घिसी, यह बताता हूँ। दिल्ली में मेरे संबंध काँग्रेस के भीतर के और बाहर के वामपंथी नेताओं से थे। मेरे मित्र कवि श्रीकांत वर्मा तव काँग्रेस में नहीं गए थे, पर उनके राजनीतिक संबंध थे। यह बात दिल्ली में मुझसे कही जाती थी कि मुझे दिल्ली आ जाना चाहिए । मगर किस सहारे दिल्ली में बस जाएँ?-माना कि रहेंगे दिल्ली, मगर खाएँगे क्या? (गालिब)। एक दिन मुझे भोपाल में फोन पर खबर दी गई कि चौबीस तारीख को आपको और मायाराम सुरजन को पंडित द्वारिकाप्रसाद मिश्र से मिलना है। मिश्र जी तव प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के बहुत निकट थे। हम मिश्र जी से मिले। उन्होंने मायाराम जी से कहा कि आप काँग्रेस टिकट पर लोकसभा में चुनकर जाएँगे। मुझसे कहा कि आपको राष्ट्रपति से राज्यसभा की सदस्यता के लिए नामज़द कराएंगे। वहाँ आपको नए अनुभव होंगे, आर्थिक निश्चितता होगी और आप बहुत लिखेंगे। वात मुझे अच्छी लगी। मैं कुछ दिन बाद दिल्ली गया। सुभद्रा जोशी ने कहा कि आपका नाम चल रहा है और ऊपर है। केशवदेव मालवीय आदि ने भी कहा । अब मेरी कल्पना में वेस्टर्न कोर्ट घूमने लगा। वेस्टर्न कोर्ट में रहेंगे। राज्यसभा में 'डमी' नहीं होंगे, सक्रिय होंगे। बहुत सारी योजनाएँ बना डालीं। मैं जवलपुर लौट आया। एक दिन श्रीकांत वर्मा का तार मिला कि फौरन दिल्ली आइए । मैं पहुँचा। श्रीकांत से मिला । उन्होंने कहा : 'आपको पहले आ 130/हम इक उम्र से वाकिफ हैं 1 जाना था। पल शायद चार मदम्यो की नामजदगी पी है। मैं ममता जोशी व पाम आया। उन्होंने मिश्रा जी में पांन पर माती नाम चली थी। मुझे बनाया गया चि ज्योति बग में, धांधली गे यगान लग मितार्यशर गप आए है, और दिल्ली दरबार में उनकी चली | उनाने बगला लसर प्रमथनाथ विभी को नामजद वगदिया है। अगा। म दिल्ली दरवार नहीं चढ़ सके। दा तो मुझे मा पर में जन्नी उसमें उपर गया । महामे ग्चना की ऊर्जा और उत्गाहयात पारदम नारन गे विफलता को पगग्न कर देना है। निया अनमी के पाटे यो भगानी ये मना गे पूरा कर लेता है। इसी तरह मैं दुनियावी विरलनाभी और हानियों को लेसन-यम में जीन लेता है। यहाँ यह वनावि 1985 में मोदौड में महल पानवानी नही पी.टी. उपा के माय पथभी मिल गया। मो दिल्ली आवत-जान पन्हैया तो पिगी, पर हरि नाम नहीं विमग । एक बार मैं चलिंज में अध्यापक होते-होने चाल-पान रह गया । मग्यारी ग्वाल की नौवर्ग छोडने के बाद मैंने दो प्राइवेट स्कूलों में नौवर्गकी में नय माध्यमिक अध्यापनशे कामगठर और नेता था और म्पलाचं मालिग में गवर्ण होता रहता था। मैं डायो मे बहन नोप्रिय था। मन की दुकानदारी चलानेवालो की नजर में ये दोनो सनग्नाक गुण थे। पहले प्राइवेट म्पल में मैंने अध्यापको वीडनाल यगई थी और मझे नौकरी छोडनी पड़ी थी। दूसरे म्कल के प्रवधको ने नौकरी दी। उसी म्पल के ट्रम्ट का एक कार भी उनी इमारत मे चलना था। ये मम्थाएं अभी भी हैं और दालच नागयणदाम जैन ट्राट की हैं। वालेज में भी मुझे पार्ट टाइम पढ़ाने वा वाम दे दिया गया था। पालेज में हिंदी के अध्यापक की जगह साली थी । प्राचार्य महोदय यहत नादवीय व्यरिन थे। वे मेरे प्रति बहुत स्नेह और आदर दिसाने घे और चार यार बहने धेवि आप तो पलिज में पूर्णकालिक अध्यापक हो जाइए। मैं चाहता है कि आप हमारे कॉलेज में हो । मुझे अभी भी उनके व्यवहार को याद करके हैगी आनी है। वे जब-तय सभेकी आड मे या इमारत ये एकान योने मे माग धीरे-धीर पाहते. 'तोपिर आप कनिज मे आ ही रहे हैं न आप तय कर लीजिए। आप परिमान हैं, आपका व्यक्तित्व है,मैं तो आपयोगनिज मे ने ही देगा। वे इस तरह यात करने जैसे कोई पाप म्बी में प्रेम-निवेदन कर रहा हो। हम इस उम्र में वारिफ है/11 ।

मेरी इच्छा मचमुच कॉलेज में अध्यापक हो जाने की थी। विज्ञापन निकला। आवेदन-पत्र देने की तारीख के तीन दिन पहले मैं प्राचार्य से मिला और पूछा : 'क्या मैं आवेदन कर दूँ?' उन्होंने सीधे मेरी तरफ़ नहीं देखा। अगल-बगल देखते हुए उन्होंने कहा : 'हाँ, आवेदन करने में क्या हर्ज़ है। मुझे झटका लगा। वे मुझसे तीन माह से प्रेम-निवेदन कर रहे थे। अब बदल गए थे। मैंने कहा कि 'मैं आवेदन नहीं करूँगा।' मुझे बाद में मालूम हुआ कि उन्हें एक-दो लोगों ने सलाह दी कि इस परसाईको यदि आपने कॉलेज में ले लिया तो यह आपकी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल होगी। यह लड़कों को भड़काएगा और उपद्रव कराएगा। अध्यापकों को आपसे लड़वाएगा। प्राचार्य ने जिंदगी की सबसे बड़ी भूल नहीं की। फिर मैंने स्कूल की नौकरी भी छोड़ दी। तीसरा लाभ रास्ते में आया सागर विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध पीठ पर आसीन होने का। यह काफी नाटकीय हुआ। 1980 में जबलपुर में राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासंघ का अधिवेशन हुआ। बहुत लेखक आए। हमारी तरफ से मुख्यमंत्री से मायाराम सुरजन ने बात की। शिक्षा और संस्कृति सचिव अशोक वाजपेयी थे। मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह ने 10 हज़ार रुपया अनुदान दिया और कहा कि मैं लेखकों का स्वागत करने आऊँगा। इस सम्मेलन की अध्यक्षता मैंने की, उद्घाटन केदारनाथ अग्रवाल ने और संचालन ज्ञानरंजन तथा कमलाप्रसाद ने किया। स्थानीय प्रशासन ने हमारे प्रतिनिधि डॉ. श्यामसुंदर मिश्र को बुलाया और पूछा : 'मुख्यमंत्री उद्घाटन कितने बजे करेंगे? ' श्यामसुंदर ने कहा : 'वे उद्घाटन नहीं करेंगे।' तो अफ़सर ने पूछा : 'तो अध्यक्षता करेंगे?' श्यामसुंदर ने कहा : 'अध्यक्षता भी नहीं करेंगे।' तो अफसर ने पूछा : 'फिर क्यों आ रहे हैं ?' श्यामसुंदर ने कहा : 'लेखकों का स्वागत करेंगे।' अफ़सर कुछ चक्कर में आगए । अफ़सर ने कहा : 'ऐसा तो कभी हुआ नहीं।' दिलचस्प बात यह है कि प्रशासन की तरह की ही प्रतिक्रिया कुछ लेखकों की भी हुई। कहने लगे कि मुख्यमंत्री को बुला लिया है । व्यवस्था को सिर पर लाद लिया है। मैंने कहा : 'मुख्यमंत्री ने खुद स्वागत करने के लिए आने की इच्छा प्रगट की है। वे हाथ ही जोड़ेंगे, सम्मेलन पर कब्जा नहीं करेंगे। मुख्यमंत्री दंगाग्रस्त क्षेत्रों का और अकाल पीड़ित क्षेत्रों का दौरा करते हैं। यह लेखकों का महासम्मेलन हो रहा है जो खुला है, गुप्त नहीं है । वे इसमें आ रहे 132/हम इक उम्र से वाकिफ हैं . है। आपको व्यवस्था की जितनी आलोचना करनी हो,विरोध करना, मार बीजिए।' पर शिवकुमार मिश्र पहिया या गडगत मौट गए। रमेशकलाल मैप रहे, विश्वभर उपाध्याय और नागार्जन भी गं. गिरावभर उपाध्याय ने धापी मानविरोध किया मुत्यमत्रीचे आने का । उन्होंने हम' में याद में गलतबयानी भी की कि मुख्यमत्री को उपाटन चे लिए पना निता। मैंने प्रतिवाद छादिया कि उद्घाटन रेदारनाथ अग्रवाल ने किया था। एक और अनि तिवारी सर मग्वार्ग पनिज में अध्यापर। मैंने उनमे पटा 'अगर आप कालेज में मुस्यमयी आनेवाले हो और आप प्राचार्य आपसे कहे कि उनकी शान में मानपत्र लिसदीजिए तो आप मानपत्र लिसेगे या नौकरी छोड देगे' वे पशोपेश में पड़ गए। मैंने कहा.'मेरी गलार होगी कि आप मानपत्र लिसदे, नौवर्ग न हो। मौजूदा व्यवस्था में मसा और लेसक के मयध बहुत जटिल हैं । उनका अनि मग्नीकरण वग्ना गलत निर्णयों पर पहुंचना होगा। नौकरी छोडकर आप अपना और अपने परिवार का नाम बरेगे और कति के उम झडे के विथडे कर देगे, जो दिसाने फिरते हैं।' मत्यमत्री ने म्वागत में कातिवारी भाषण दे दिया। मार्मवाद की शब्दावली का प्रयोग भी दिया। कहा कि वर्ग-भेपी दीवारें आप लोग नोर दीजिए। अब जो नागज लेसक थे, वे बहत सुशहए। मैंने कहा- 'आप पहले भी गलत थे और अब भी गलत हैं। भेद की दीवार तोडने जाएंगे तो पानगी माटी मे मिर टूटेगा। दमी मम्मेलन में यह प्रस्ताव दिया गया कि पिनी विश्र्वावधालय में मुक्तिबोध पीठ की स्थापना की जाए। महीने-भर याद मस्यमत्री अनगिर ने घोषणा कर दी कि मागर विश्वविद्यालय में मस्तिबोध पीठ की म्यारना धी जाएगी। 4-5 दिन बाद मम्वृति मचिव अशोक वाजपेयी या पत्र आ गार आपसे अनुरोध है कि आप मुक्तिबोध पीठ पर आसीन हो । मैं जाना नहीं चाहता था। एक नो मेग म्वास्थ्यटीप नही पा. मरे पर पारिवारिक समस्याएं थी। मैंने एक महीने जवाब नहीं दिया। मामे हम प्राध मे आग्रह हुए, मेरे ऊपर दबाव डाले गए और मरितोध मे निपटना की भावरना उभाग गई। मुख्यमत्री, अशोर वाजपेयी, मापागम मुग्जन, यमलाप्रमाद, ज्ञानरजन आदि ने यापी आग्रह दिया। मागर मे गिपरमार श्रीवास्तव, महेद पमरने. डॉ प्रेमशरडा वानियमार मदिरे पर आए। हम हर उस में वारिप।/13 कांतिकुमार जबलपुर में रहे थे और पुराने मित्र थे। एक दिन मेरे मित्र मायाराम का पुत्र ललित सुरजन, जो बचपन से मेरा साथी है, कार लेकर रायपुर से आया और दूसरे दिन मुझे कार में बिठाकर सागर के लिए रवाना हो गया। साथ में मेरा भानजा प्रकाश था और हफ्ते-भर साथ रहने के लिए डॉक्टर 'मलय' भी थे। दमोह में हनुमान वर्मा एक दिन पहले से थे। वहाँ भोजन किया और सागर को बढ़ लिए। सागर में शिवकुमार और कृष्ण कुमार साथ हो लिए और हम कुलपति के बँगले में पहुँचे। वहाँ चाय-नाश्ते के बाद मैं अपने बंगले में पहुँच गया। मुझे बताया गया कि आपने आकर कुलपति की एक बड़ी समस्या हल कर दी। इस बंगले में आने के लिए तीन प्रोफेसरों में मल्लयुद्ध हो रहा था क्योंकि यह परिसर का सबसे अच्छा बँगला है। विश्वविद्यालयों में नई शोध या नई बौद्धिक स्थापना के लिए आचार्यों में संघर्ष नहीं होता: अच्छे बँगले, चपरासी, • अच्छे बगीचे के लिए संघर्ष होता है। सागर विश्वविद्यालय में मेरे बहुत अध्यापक मित्र थे। मैं साल में एक-दो बार वहाँ किसी कार्यक्रम में जाता था । सव जाना हुआ था मेरा । मेरे पहुँचने से पहले वहाँ कमलाप्रसाद डी. लिट. के लिए 'टीचर फेलो' थे। उनके साथी और चेले थे। उनके कनिष्ठ साथियों में कपिल तिवारी और मनोहर देवलिया थे। कपिल तिवारी अद्भुत मेधावान और अध्ययनशील युवा हैं । देवलिया ने मुझ पर शोध की है और दो पुस्तकें छपाई हैं। ये दोनों रोज़ ही मेरे पास बैठते थे और वहुत मदद करते थे। सारे विश्वविद्यालयों के परिसरों और अध्यापकों का हाल एक-सा है। सभी विश्वविद्यालयों में गुट होते हैं । परनिंदा आध्यात्मिक साधना होती -संघर्ष रचनात्मक कार्य होता है। हर विभाग में शोध का स्थायी विषय होता है-शत्रु पक्ष की कमजोरियों का पता लगाना। भाषा का विकास निंदा-कर्म से बहुत अच्छा होता है। ये परस्पर संबंधों के समीकरण बदलते रहते हैं। हर सोमवार को कुलपति को सब विभागों में सूचना भेज देनी चाहिए कि इस सप्ताह शत्रु-मित्र के ये समीकरण हैं । तदनुसार निंदास्तुति की जाए। जैसे नए आदमी के लिए यह जानना असंभव था कि वर्तमान समीकरण क्या है। डॉ.'क' आए हैं और डॉ. 'ख की बात निकाल दी है। अब मैं नहीं जानता कि डॉ. 'ख' इनके इस सप्ताह मित्र हैं कि शत्रु । अगर मित्र हैं और मैंने 'ख' की 134/हम इक उम्र से वाकिफ हैं है। गुट- । धगईघर दी तो में मेरा हो जायेगे । अगाग और पैन नागर भी शत्रहो जाएंगे। म निया में कोचि नही। मेरे पाम जो आना वहरिगीची निताही याना में परगना नमो मा चौथे दिन गव माहय आए। उन्होंने विभाग की यात गायी। मरेटोगा 'जोडिए। परिवार पे यारे में यनाइए। चिटिया ची गादीमा पाम-धं में लगे कितनी जिम्मेदारियां पूरी या पुरे' गा माय ग्लानिग्रनहाए। फिर एकदम सग होकर कहा 'या आपने यात अाया जो परिवार की बात निकाल दी। मुझे यत अच्छा नगा ।म मांग यहाँ रिग वीचड मे गहने हैं।' भी ऐसा भी होता कि 3-4 अध्यापक थैट हैं और उनमें विश्वविधालयपी गजनीतिको संकर गर्मविवाद चलने लगता। मैनाकीय में विषय यान देना। विमी विषय के अध्यापक में उनके विषय का कोईगीरपानपादनावो ममझाने लगते और वह गर्म यहम सत्म हो जानी । एक्शामायावी नौयत आनेवाली थी। तभी टिपरली गिर्ग। उमे भगाने में धन-भरापमा तो मैंने प्रागिंशास्त्र के आचार्य डॉ मनमना मेटा 'मक्सेना गायटिपरली का विकास यों नहीं हुआडा मरमेना गमझाने मगे और पगारामती । । गया। - म्वास्थ्य सगव रहने के बावजूद मैंने याम यह क्यिा । वैसे काम मी माई नहीं दिया गया था। दो हजार रूपया प्रतिमाह मेना ही मेग वाम था। पर ममी अपेक्षा थी कि मैं वहां रहयर सुदलिस-पई नथा युवा युनियो गं मान्य रचना के लिए प्रोत्माहित कई और मिसाऊं। मुझे इस काम मेचयों भी मेरे पाग ना-मे-नए लेखक आते हैं । मैं बजगहाही नही। मेरे निवास पर बहत-छात्र-छात्राएं आते थे। नगर के माहित्यिय व पगर भी आते थे। मेरे पास आमपामयम्यो के अर्दीक्षित पचनागर भी आते थे। दाता किनमे नक्नीक की चाहे कमी हो. पालिशन हो.पर वाम्नविर जीवन-गपर में उत्पन्न उनकी रचनाएँ शक्तिशाली होती है। लिसना मिसात-मिसाने में जुट भी मीसा था । एक मार्ग प्रशस्त बह की यहानी लिएर लाई। माम दाग यह प्रनाहिती जाती है और दा आत्महत्या कर लेनी है। मैंने पदवर कहा 'यह नो असवार याममाया। इमे पदकर मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। तुम क्याग्निी मी या योगी हमर र मेरिर/S - । हो जो सास द्वारा सताई जाती हो?' लड़की ने कहा : 'हाँ, बिलकुल पड़ोस में दीवार के उस पार ऐसी बहू है।' मैंने कहा : 'तो ऐसा करो, दो दिन तक तुम सिर्फ यह नोट करो कि सास किस तरह से पीड़ा देती है। सुबह से ही सुनो, सास क्या बोलती है। उसके शब्द जैसे-के-तैसे लिख लो। वह क्या करती है उसे पीड़ा देने के लिए, यह जैसा-का-तैसा नोट करो। बहू से तुम्हारी वात होती ही होगी। वे बातें जैसी-की-तैसी नोट कर लो। अपनी तरफ़ से कुछ मत लिखो। जो कहा जाता है और जो होता है वही सिलसिलेवार लिख डालो। अपनी तरफ से करुणा मत पैदा करो। करुणा उसी में से पैदा होने दो। लड़की चार दिन बाद इस तरह लिख लाई। मैंने दूसरों के सामने वह रचना पढ़वाई। वह सचमुच बहुत प्रभावकारी हो गई थी। कुल पाँच महीने काम कर पाया था कि मैं बहुत बीमार हो गया। भोपाल हमीदिया अस्पताल में भरती किया गया। तीन महीने इलाज के बाद सागर लौटा, पर फिर मन लगा नहीं । मैं उसी क्षण जबलपुर लौट आया । ।

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Wakif Hai Umar Se

Author
Parsai Harishankar
Title
Wakif Hai Umar Se
File name
Wakif Hai Umar Se
Text
OCR done
Citation
1900
Published
2011/03
Publisher
Xxxxxxxxxxxxxx
Language
Sanskrit
Pages
151
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Geography
DLI number
552016
Barcode
4990010032700.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
xSYyd4ZANRz
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