Adarsh Library, Jaipur
Dank Bangla
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ਡੀਓ ਰੀਵ
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आज भी जब मैं इरा के बारे में सोचता हूं ता उसका मूरत-शक्ल से पयादा मुझे मेजर सोलंकी, बतरा, डाटर और विमल याद आते हैं। मेरे कानों में सभी दौडते हुए घोडो की टाप को बादाज गूजने लगती है, कभी बतरा को फेंद परछाई याद आती है, कभी डाक्टर का वह जुमला-अब जंगा तुम चाहो ! और कभी विमल का ध्यान पाता है, जिसके शरीर में पसीने के काटे उगते थे और मेरे सामने काश्मीर के ये दृश्य आज भी घूम जाते हैं जहा इस ने मुझे यह सब बताया था। कई बार मैंने कोशिश की कि इस बात को, जो रह-रहकर मेरे दिल में घुमह उठती है, कहानी फे रूप में लिस हाल, पर पिछले तीन साल मे कोशिश करते रहने के बावजूद मैं नहीं लिख पाया । आज इने लिखने बठा हूं तव भी इस बात का यकीन नहीं है कि इसे पूरा कर ही पाऊगा, क्योकि यहुत गोचने के बाद भी मैं किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका, न मैं इरा को ही पहपान सका । बस, इतना लगता है कि उसके लिए मैं सब कुछ कर सकता था। काश्मीर, इरा, मोलंकी और मैं और धुघली-सी तीन परवाश्या-सय एक साथ गुये हुए हैं। जब भी लिखने घंठा, तव काश्मीर के दृश्यों को उतारते-उतारते पक गया और इरा न जाने पाहा गो गई। और काश्मीर को लेकर कहानी लिखने में एक बेईमानी का बोध भी होता है । यही घटना कहीं भी घटित हो सकती थी, हिन्दुस्तान ये किसी भी हिस्से में, लेकिन सौन्दयं-मान के प्रति इरा का दीवानापन मुझे मजबूर करता है कि में कम से कम उसके प्रति अन्याय न करूं । और जब मैं इस प्रेरणा गे अभिभूत होकर लिखना शुरू करता हूं तो 1 का अनन्त सौन्दर्य मेरे ऊपर हावी हो जाता ''मेरे कानों में घोड़े की टापों की आवाज़ गूंजने लगती है और धीरे-धीरे हिलती हुई चीड़ की झूमरें मुझे स्पष्ट दिखाई देने लगती हैं... पहलगाम से आडू का रास्ता ! वाएं लिद्दर बह रही है और दाएं पहला पठार घास-फूलों से ढका है । उसीकी कमर पर से पतला रास्ता जा रहा है । जगह-जगह घनी कंटीली झाड़ियां हैं। पत्थरों की उभरी हुई रेखा उस पतले रास्ते की दिशा बता रही है। नदी का शोर घोड़े की टापों के साथ जैसे पार्श्व संगीत का काम कर रहा है । "दूर छूटे हुए पहलगाम की चहल-पहल ऐसे खो गई, जैसे किसीने दरवाजा बन्द करके किसी फैक्टरी के बाहर निकाल दिया हो। लिद्दर की धार में लकड़ी के लट्ठे बहते हुए चले आ रहे हैं । मंडराते, चकराते और सीधी धार में पड़ते ही शीशे की सतह पर फिसलते-से । पर रास्ता इतना ऊपर चढ़ गया है कि उसका कोलाहल ऊपर तक नहीं आता। नीचे गति है, दृश्य हैं और चट्टानों से टकराती धार है।"उड़ते हुए जल-पक्षियों की पंक्ति है !... मौन खड़े वन हैं''या चट्टानों की आड़ में रुककर दम लेते के लट्ठे हैं । जल-फेन के तैरते हुए सफेद फूलों के गुच्छे हैं । अवरोध से टकराकर छिटके हुए जल-बीज हैं। पर सब निःस्वन, आवाजहीन ।... जैसे एकाएक सिनेमा में आवाज़ वन्द हो गई हो। कि एकाएक वही-घोड़े की टापों की आवाज़ ! सोलंकी घोड़ा दौड़ाता हुआ सरपट आड़ के डाक बंगले की ओर भागा जा रहा है।""उसे इस बात का भी खयाल नहीं कि रात बारिश हो चुकी है और घोड़ा फिसल सकता है। घोड़े के खुर जमीन पर पड़ते नजर ही नहीं आते, जैसे उसकी पिछली टांगें हंस की तरह हवा चीरती जा रही हैं और सोलंकी लगाम कसे उसकी गरदन पर दोहरा हुआ जा हुए लकड़ी यह तस्वीर का एक रुख है। अकस्मात् इरा मिल गई थी।"मैं सोलंकी को जानता भी नहीं था। उस समय हम पहलगाम में थे। ६ और तस्वीर का दूसरा रुस यह है- रात थाए तूफान में बिजली का तार टूट गया था। मोमबत्ती को मद्धिम रोशनी में सब चीजें घुघली घुघलो लग रही थी, जमे तम्बू में कोहरा भर गया हो। मैं भाप को भट्टी में बन्द था, जिसमें मोमबत्ती की लो एक गोले की तरह चमक रही थी। हर चीज पर मोमनामा पड़ा हुआ था। बाहर हवा अमो भी माय-सांय कर रही थी। तम्बू की ऊपरी परत नीचे झुकती तो लटके हुए कपटे आकुल जीवों की तरह कापते और उनकी परछाइयां बडी देर तक पेंडुलम की भांति एक सीमा में हिलती रहती । रात के बादल अभी आकाश में ठहरे हुए थे। पहलगाम की वस्ती नीद में डूब-उतरा रही थी। दूर दक्षिण वाले पठार पर लगे हुए तम्बुओ पी रोगनियां मशालों की तरह चमक रही थी। चीडवन से गुजरती हया का स्वर किसी नजदीम को सडक से लगातार जाती हुई कारो की तरह या रहा था। भीगी हुई धानों को महक चारों ओर भरी हुई थी। आधिर पादर लपेटार मैं उठा । तम्बू का सामनेवाला भारी परदा हटाकर मैंने बाहर झाका । 'एलपाइन होटल' छाए हुए बादलो के घेरे में नुकीले काले पहाड की तरह लग रहा था। इरा के कमरे में रोशनी नही थी । एकाएक रोशनी टिमटिमाई और उसका फैलाव बढ़ गया। कोई देवदूत घाटी में दीपक लिए मेरी ओर या रहा था। उस उजाले का याभास ही बहुत था। अंधेरे में जैसे किसी रोशन मुरग का गोल दरवाज्ञा गुल गया हो। उगी स्वप्निल रोगनी में, सिड़की के शीशों पर, नीद के समुद्र से एक अंगड़ाती हुई छाया धीरे-धीरे उभरी। मैं परदा उठाकर बाहर ना गया। इदं-गिदं सडी पहाड़ियों की चोटिया कुछ-कुछ साफ हो रही थी। अंधेरा स्पिरिट को तरह अनजाने ही उड़ता जा रहा था। इरा के कमरे की रोशनी और साफ हो गई थी। माम को इरा कह रही थी, "तुम नहीं । जाग पाओगे !' उसे जताने के लिए और इसलिए भी कि इतनी देर हम दोनों एक-दूसरे की जागृत अनुभूति से दूर रहे, मैं भीतर गया था और टाचं उठा लाया था। टार्च की रोशनी से मैंने अपने जागने का सिगनल दिया था। तभी सिड़की खुली और कमरे में - रोशनी के परदे पर इरा छायाचित्र की तरह दिखाई दी, मैंने उसके ओठों को पहचाना और वह वनघास की भीगी-भीगी महक, जो हमेशा उसके चिकने नम शरीर से उठा करती थी और उसकी, अलस आंखों की कोर में सोए उन्माद की लहरियों को जागता हुआ महसूस किया। तभी इरा ने कोई इशारा किया था, पर मैं अपने में बेसुध खड़ा था यह भी नहीं जान पाया कि कब इरा ने खिड़की की कानिस पर मोमबत्ती रख दी, जिसकी ली में उसके वाल गोटे के झीने तारों की तरह चमक उठे थे । और इरा कुछ क्षण बाद तैयार होने चली गई थी। अंधेरी घाटी में चमकता हुआ एक आकाशदीप ! पठार के नीचे किसी मोड़ से ऊपर आते हुए घोड़ेवालों की आहट हुई । सुनकर मैं तैयार होने के लिए राउटी में घुस गया, कुछ देर बाद घोड़ेवाले ने ऊपर पहुंचकर आवाज दी, 'साव, साहवा !" मैंने निकलकर उसका नाम याद करते हुए पूछा, 'ममदू, ये बादल देख रहे हो ! ऐसे में चलना ठीक होगा?' पूछते तो मैं पूछ गया पर लगा कि कहीं ममदू ने मौसम खराव घोपित कर दिया तो? मैं चाह रहा था कि ममदू कहे, 'नहीं साहब, इससे कोई फरक नहीं पड़ता।' मजदूर में दूसरे की आंतरिक इच्छा जान सकने की अद्भुत शक्ति होती है। एक क्षण के लिए उसने अपने साथी घोड़ेवालों की ओर देखा, उसकी मिचमिचाती आंखों की खामोशी में जिस भावना का बोध था, उसे उसने पहचाना और मतलब समझकर नाक मलते हुए बोला, 'नई साव, इससे कोई फरक नहीं पड़ता।' मैंने अपने मन का उतावलापन छिपाते हुए उसीपर अहसान लादा, 'तुम कहते हो तो ठीक है, चलो !' 'हल्की बारिश में मौज रहेगा साव! आपको आराम मिलेगा।' ममदू मेरे अहसान को उतारता हुआ विस्तर लपेटने के लिए भीतर घुस गया। तभी इरा के होटल का बॉय चाय लेकर आ गया, उसके पीछे-पीछे एक मजदूर पीठ पर इरा का विस्तर लादे हुए भालू की तरह झूमता हुमा घोड़ों के पास पहुंच रहा था। मैंने जब तक चाय पी तब तक सामान ढोनेवाला खच्चर तैयार हो - गया था। मैं कमरा लटकाकर और अपने तम्यू के चौकीदार को हिदा- यते देकर एलपाइन होटल की ओर चल दिया । घोडेवालों से नीचे सड़क पर मिलने की बात कह दी थी । उजाला अच्छी तरह फैल चुका था। इरा होटल के छोटे-से फाटक का सहारा लिए सडी यो, कुचली हुई पास में उनके पर छिपे थे। तुम यहां खड़ी हो, मैं वहा इन्तजार कर रहा था। पास पहुंचते हुए मैंने कहा, और वह मेरे कधे से सट गई यो । उसके सुडोल रेशमी कधों पर हाप रराते ही उगलिया पारो ओर से अपने-आप सिमटने लगती थीं और कधे से पुछ नीचे पीठ पर वे स्वतः सहसी की तरह वद हो जाती थी । इरा का शरीर लहर की तरह सिहरता और व्यय मुक्ति की सार- हीन पेष्टा पापी में आकर पूछती, श्या? और उनमे झारते हुए प्रश्न और उत्तर एक ही विदु पर आकर मिल जाते। प्रश्न और उत्तर से परे एक सहज पेप्टा और उससे उत्पन्न एक मोहक प्रक्रिया-भरी स्वीकृति । घोड़ेवाले योल्हाई के रास्ते पर खड़े हमारा इन्तजार कर रहे थे। एलपाइन होटल से उतरते हुए पहलगाम की छोटी-मी बस्ती रेलवेयार्ड की तरह लगती। मास महक के किनारे लकड़ी के मकानों की कतार रेलगाड़ी की तरह खड़ी थी। रात-भर युझी यत्तिया जल गई थी और लिएर नदी का पोर बढ़ गया था। बालसा होटल के कुछ लोग माय चलनेयाले थे, उनका क्या हुआ ? इरा ने पूछा । मैं उनसरा साय चाहता भी नहीं था, आमानी से समझा दिया, ये आते रहेंगे, हम जल्दी चल रहे हैं । डाक बंगले में आराम को जगह मिल जाएगी। मैंने एक रात आड के डाक बगले में रखने का प्रोग्राम बनाया है और एक रात लिहरवट के डाफ बगले में, उसके बाद फोल्हाई ! ठीक है न? पहले कहीं पहुंचें भी! इरा ने कहा तो मेरे मन की यात फूट पड़ी, तुमने विस्तर वैकार लिया। मेरे पास सब चीजें एक्सट्रा हैं । इस बात में मेरा कुछ आशय था । लेकिन इरा के चेहरे पर कही भी संकोच नहीं था। न जाने क्यों, सामान्य स्त्रियों की भांति एसी । 4 हलचल नज़र नहीं आती थी, जैसे कुछ भी अनुचित न हो। वह स्त्री- पुरुप की इन तमाम छोटी-छोटी सामाजिक और नैतिक धारणाओं को बड़ी सरलता से नकार देती थी, जिन्हें मैं महत्त्वपूर्ण समझता था । इससे मुझे बल मिलता, मैं और खुलता, इरा और उन्मुक्त हो जाती। मैंने अपनी पेंट की जेब से लेमनडाप्स निकालकर उसकी ओर बढ़ाए। एक मुंह में डालकर दो-तीन बार चूसकर उसने फेंकते हुए कहा, कहां से उठा लाए । 'सौंफ और धनियावाले, मुंह का जायका विगाड़ दिया । टाफी दूं ? कहते हुए मैंने जान-बूझकर आधी टाफी दांत से कुतर लो और आधी उसकी ओर बढ़ाता हुआ बोला, मैं जानता था, इसीलिए लेता आया । और उसके उत्तर में इरा ने सहज भाव से मुंह खोलकर इलायची दिखा दी, मैं इलायची खा रही हूं, आप ही खाइए इसे .. सुनकर मुझे अपनी गलती का पता चला और संकोच से गड़ गया। इरा की ऊपरी सहजता से जितना बढ़ावा मिलता था, वह क्षण-भर में उसकी भीतरी सजगता से व्यर्थ हो जाता था । वह ऊपर से जितनी निस्संकोच, मुक्त, निर्वन्ध दीखती थी, शायद अन्दर से उतनी ही संकोचशील, परम्परानुरागी और भीरु भी थी। रात बड़े वादल थे, लगता था चलना नहीं हो पाएगा। मैंने इरा की मनःस्थिति की थाह पाने को वात बदल दी थी, वह रहस्यमय-सी लगती थी ऐसे अवसरों पर । मछली की तरह वार-बार फिसल जाती । "क्षण दो क्षण हाथों में टिकती और सरक जाती, दिन-रात सपनों की बातें करती...। श्रीनगर में डल पर सैर करते हुए कल्पनाशील दार्शनिक की तरह आधी आंखें मूंदते हुए उसने कहा था-प्रकृति में जो यह जंगलीपन है, तिलक, यह भी कितना खूबसूरत है ! .."मैं वहशियों की तरह जीना चाहती हूं। 'प्रकृति के इस जंगलीपन की तरह ! कभी-कभी सोचती हूं।''आसाम की जंगली जातियों में ही मेरा जन्म होता । बनपाखियों के पंखमुकुट लगाकर घूमती ! .कहते-कहते उसने पूरी आंखें खोलकर एक पल की खामोशी के बाद कहा था, देवदार देखे हैं ? मन करता है नंगी चट्टानों के बीच देवदारों की तरह उग सकूँ । वस, खड़ी रहूं । १० तपानी हवाएं मुझे fats जाएं, यारिंग मे मिहर-सिहरकर भी भोर नंगी चा पगारकर परफमा म्यागत कर.. यात गुनकर मैं यह प्यावहारिक दंग में मुस्करा दिया था । अपने प्रति जसा या भाव यह महन न फर पाई थी। योनी-नासमतों की तरह हंगते पया हो' मुर्दे नही सोग सासे यह राव । उगरी आवाज में सेसी पी और यह पहली मारी थी-हल के तीन मोर पटोय पहा. दियां तुम्हें नही पुकारती । इन पिरनी पट्टानो पर पहार इन्हें गेंद सलने गोमा नही होती की मादमी हो तिर ? शिरे में बैठे. बेटे पल पल यो सच्चा की नाह पालो एए यह बोलनी जा रही पी, दम राम तक पगार पानी उरीपने पो मन होता है। शिवार के जाल में फंगर बनने में रिलना गुरा होगा। माग कमलयन में पुग पर उगे गैरराफमटनागे मो सोदगार बिगर हर पानी पो गदला कर " उग पर मैंने उगे यहा पहरी नाये गे देगा था, माह में पही पूलिया मराना उपम परले एए उमरी साह पर पददी बार हाग राणाया। इराकीवचा में गिनाय पा । उनका गेम-रोम भर आया पा, जमे रेत के पप गरे गरीर पर विपर गार हो । उगमी आयो में उमग पी और होठों पर माल गूगएन । उम गरीर मा गारा रंग निसरपही गीतर गमा पापा। ग्यासन मूमी टहनी की तरह पग पा, पर ऐगा कापन जो उगली से शारे-मागे पटाय में टूट जाए। में उसकी पीठ पर एप रप लिया पारा मे ही परमा- माही की पहाड़िया देती रही। वातावरण यरसने लिए मैंने परत मुगमिपर पाा'तुग एक झूटो जिन्दगी को बन्लना में परेशान हो । तुम एप मा मोड़ पर गुट गई, मीलिए अब तुम शिन्गी जीना नहीं, जगे तोर-मरोर देना चाहती हो...' ने अपनी माटोमाली रोगों में मेरी तरफ देगा, मादामी पुन- हिमों में आने पी सरह महीन तार घमा रहे पे और बेन्द्र का झाला. रप्टिबिन मोती की तरह प्रसमला गा पा । उगी योनियों पार पटीने पार की तरह गरे । न जाने बों मुरे टन ११ लगा कि जैसे सारी गलती इन्हींकी हो. इरा की सौन्दयंपूर्ण जावना का :: बियावान में घसीट लाने का दोष इन वहशी आंखों का है। उसीसे प्रेरित होकर मैंने कहा, इस तरह तुम दूट जाओगी। आदमी-आदमी के रिश्ते इसी तरह पहाड़ बने खड़े रहेंगे, उसका प्यार पानी की तरह लहराता रहेगा और कमल इसी तरह खिलते रहेंगे। "और मैं अपनी भावुकता की रो को पहचानते ही चुप हो गया था। कुछ देर शिकारे पर ही इधर-उधर घूमकर हम नेहरू पार्क में चले आए थे। शाम थी, इसीलिए भीड़ बढ़ती जा रही थी। नव विवाहित जोड़े रोशनी से दूर इधर-उधर रेलिंगों या झाड़ियों के पास अंधेरे में खड़े थे। मेरा मन हो रहा था कि इरा को लेकर उधर रेलिंग के पास चला जाऊं, जहां अपेक्षाकृत अंधेरा था । इतनी निकटता मैं महसूस करने भी लगा था। इरा का हाथ पकड़ कर मैं उस अंधेरी रेलिंग की ओर चल दिया था। ऐसी जगहें अलगाव दिखाने की होती भी नहीं, क्योंकि इन जगहों का संस्कार ही ऐसा होता है । रेलिंग पर झुके-झुके डल के पानी में रोशनी के चमकदार सांपों को लहराकर नीचे की ओर जाते हुए देखकर इरा ने पूछा था, तिलक, तुम कब तक रुकोगे यहां ? काश्मीर में ? मैंने बात साफ करके कहा, जव तक कहो । इरा ने बात आगे नहीं बढ़ाई । मुझे कुछ बुरा-सा लगा। पिछले पांच दिनों से मैं इसी कशमकश में था। इतनी निकटता के बावजूद हमारे व्यक्तित्व ताड़ के पेड़ों की तरह अलग-अलग खड़े थे। जव भी वात करता तो इरा अपना पुराना किस्सा सुनाने लगती....आसाम की उन बस्तियों में रहना बहुत खतरनाक है. खिड़की पर खड़े होते डर लगता था। न जाने कब गोली शीशे के पार से छाती में घुस जाए।... ऐसे ही अचानक उनकी मौत हुई थी। डाक्टरी का पेशा ही ऐसा है, रात-बिरात भी जाना पड़ता है। मैं भला क्या कहता ! उसके पति की मृत्यु के प्रति आंखों से संवे- दना ही प्रकट कर सकता था। वैसे इरा की चेतना पर उसके पति की इस आकस्मिक मृत्यु का कोई भीपण प्रभाव हुआ हो, मुझे उस वक्त तक १०
नही सपा पाराम या वो कोटामा सबार फरहरा खामोश हो गई
पी, उममे मान हो रही यो। वा पुरयाप पारों ओर के डायो
बोदेय रही थी। रामाशे पराडो पर मा य मन्दिर के
यतिर जान करा रहा था । सामने महादेवको पक्षमा पी,
प्रिनरी टीम पर पानी को काला कर रही थी। माई पोर हार.
पंत, और इन मरो शेप मामा इस का गोला जल । उरा पानी
में नहाते परंतो पर और माह पर पिशेरी तरफ दिने
पिंग के मिरे । सरने पर और हम भार
सोमवार पास
पट्टी हुईरा। मेग्नि मर येवमी के गम में भारत का पप ग
तरह नहीं रह पाऊगा पर पानी को भाग पहाहान! या तो
गमें पदना होगा या म अग्नि-देश गे भागना होगा-राकी पीर
मेरे मामने थी.. पानीका मे सरामोह मागी गरम पट्टान ।
मोर तय, नहीं जानता मे. उगोहनाप गरदन पर मेरे ताप
होठ पे.."पुरे पगो कोटमा परी गे पागो र गई. नि
गोला, मनपाग की भीगी ग.."मधुगामि पर ए पपरों का
मग अग्निाव...या योग मे भीगे गगा पर पीई भाग पर .
होगदम्पिो, पंगुटियो की गरम होताना और पराम की भीगी.जीनी
पन्ध.."मीपमालयों-गी रंगगी दगी उगलियां रे पास पर
परपराई थी। बान भर पाए, अंगे uिहो गया पागल'."
उपती उगलियों में मेरे पानीको हाहा पा और पार
उनी पकर दीली हो गई थी।"मोरीहवा निमित
होते मानों की मौत कार पारी भोर मागी...
पानों ने पुाग गा गुरे, पर गंगा गायीप पर निक्ष भाशय
मापर सभी भी गिी महीपा। पद गमनार मीरा रेलिग पर
पर गई थी, छ र माटी को मोतीपी,
मिसागवान या मुलानो, म पागे ।
याय पर मार हम सरना ar
- नव नम इरा ने मांझी की हथेली पर दस का नोट थमा दिया था। मैं मकुत्राना ही रह गया। मांझी दोपहर से साथ था, जब तक वह हा लोगों के विते को जानने की कोगिन करे, तब तक इस ने उसे इस आश्वयंपूर्ण स्थिति से उबार लिया, बोली, नाहब को पहले पुल तक पहुंचा मानो, इनको घर जाना है, अपने होटल में... इस न ही असम्बद्ध हो जाती थी । मुझे यह अपमान बल गया श्रा, लेकिन इरा यह सब ऐसी सम्मान-भावना में करती थी कि सहज ही अबदलना करने का साहस नहीं हो पाता था। जब वह इस तरह अपने को बाट-छांटकर अलग खड़ा कर लेती तो उसके शरीर के तनाव ने तेज की मियां विकसित होती, जिनमें अपमान की क्षुद्रता का बोध हो सपाना सचमुच मसंभव हो जाता। 'पल-पल परिवर्तित प्रकृति वेश' सच, बिलकुल ऐसी ही थी, इरा! और मुंह में इलायची दिखाकर उसने ऐसी ही ठेस पहुंचाई थी, जो मेरे मन की छोटी-सी बात को खंडित करके यात्म-भर्सना से भर गई थी। हम दोनों चुपचाप बोहेवालों की तरफ बढ़ रहे थे । घोड़ेवाले सफर पर जाने के लिए वहां जमा हो रहे थे, जहां से आड़ -कोल्हाई और चंदनवादी का रास्ता कटता था । हम सभी पहलगाम के मुहाने पर ही थे। एका भावाज सुनकर हम दोनों ने ही उस तरफ देखा, मैं उस आदमी को नहीं पहचान पाया-सूरत साफ दिखाई पड़ रही थी। वह घोड़ा दौड़ाता हुआ आया था । रूखे मोटे-मोटे वाल, पुष्ट भरा हुआ शरीर । मोटे-मोटे पर साफ तराशे हुए होंठ । कनपटियों पर मांसलता कुछ अधिक थी। वह और पास माया तो मैंने गौर से देखा-दानेदार रेगमाल की तरह गुरदरी मुंह की खाल, कोयले की महीन कनियों-सी बढ़ी हुई दाढ़ी और मूंछे। सांसों से हिलते हुए नथुनों के बाल, कान की लवों पर भी काले दो। मैंने इस मादमी को कभी नहीं देखा था। तभी इरा बोल पड़ी, अरे सोलंकी, इधर कहाँ ? चन्दनवाड़ी से वापस आ रहा हूं, शेपनाग गया था । तुम किधर...? १४ उस सोलंकी ने पूछा, तब तक इग उसके घोड़े के पास पहुंच गई दी। यह नीचे यही गोलपी यो मगरह ताक रही थी जैसे कोई विजयी राजपून वापस याया हो। उपकी यह बात गुनार मेरा मन आ कि वहंग्या तो मैं पन्ना। पर पामोन हा गोली के पोई को सारता रहा जो अभी भी छाप पापा ने पोहे ग पदकर रामं ए दग्नागार और ओपरमोट की जेब में पाइप निराकर सम्मा मरने गा। पाप भरने-मरने पर बोला, माग पोडे याला सहरमा था, गाहर अभी गरदीगे चन्हेंगे शिर पोर्ट पी और नये एमा, रहला पा, यगर मार मोराने पर मोसादलाएगे तो टोग माफ. दट गारगी पर फोर या नही, विजिटर मोरक पाने पानी पानी । पौनी गार पर उगने कर दिया मा धौरहमा था. फिर पादरा जलाने हुए योग था, टांग ना ग ता नही दूदा । मरवे एए उसने अपने पौत्री सुटगे घो? के टगने पर जोर से वार रिया । पोडे ने पोटनिमिदारर तीन-पार पार गरेटग उठाई जगे सरपरा में मसाम कर रहा होगा यमी का नहीं पा, जगको सम्बार दमाने हार सोलंकी फिर मोहापा, बागाको मन भामहीपा, एम पदन- बाहो में रा गया । गुबह उठार में भाग माया, यगरपाला मार गया मालिकपीद आ रहा है। कहते हुए र उसने फिर पाप गुलगाया और नथुनों से ए पी पतली धार निकारते हुए बोला, हा, यही सो पोहाई एन? और सय जगले परली नजर मुसपर चली थी। राको मेरी उशिरा या जमे ररमा भान हुआ तो एकदम पर बोली, मरे में मिटर Hिer, भौर बार मेजर गोलंकी। मोटगी ने सफर हाप मिलापा । पापी और गे उसने मेरा हाप दोप लिया पा । यदी मानीनगा मे पहाते हुए मैंने कहा था, अभी भार पदनयादी मे मा रहे है, पर होंगे। रामोटि में गहमति और गहमति दोनों ही पी फि पार कर पुआं उमोहए मांगो मे पहा, नही, नहीं, बिलकुल नहीं । और गुओ गरे पहरे र पार्टी कार में लिपट गया था, जो उसने पारदर्शी - प्लास्टिक का मोमजामा ओढ़ लिया हो । ईजिप्शियन तम्बाकू की मीठी- मीठी गन्ध उसके मोवरकोट से फूट रही थी। उसके भारी-भारी जूते मोस से भीगे थे। अपने घोड़े की रासें पकड़ते हुए सोलंकी ने ही कहा था, मैं थका हुआ हूं या नहीं, यह अलग बात है, वहरहाल मुझे भी कोल्हाई चलना चाहिए । आइए, इरा जी हम लोग कहीं एक-एक प्याला कॉफी पिएं तव तक मेरा सामान और घोड़े वाला आ जाएगा। आइए, आइए तिलक साहब। और हम तीनों होटल की ओर चल दिए। कुछ देर बाद सोलंकी का सामान और घोड़े वाला आ गया। हम कॉफी पी चुके थे। सामान दूसरे खच्चर पर लदवाकर और घोड़ा बदल- कर सोलंकी भी साथ चल दिया। दिन-भर पैदल और घोड़ों पर चलने के बाद आडू को पीछे छोड़ते हुए शाम होते-होते हम सीधे लिद्दरवट के डाकवंगले में पहुंच गए। जव हम वहां पहुंचे तो हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। खच्चर वाले सामान लेकर पहले ही पहुंच चुके थे । डाक बंगला नया था-सामने दो कमरे, उनके पीछे वरामदा और बरामदे से पूंछ की तरह जुड़ा एक रास्ता, जो पीछे बने किचन और भण्डार खाने के जुड़वां कमरों तक जाता था। सामने के ऊंचे पठार से देखने पर यह डाक बंगला हवाई जहाज़ की शक्ल का लगता था और उसके पीछे लिद्दरवट का पहाड़ सपाट चट्टान की तरह खड़ा था। लकड़ी के फर्श पर सामान पटककर घोड़ेवाले चौकीदार की कोठरी की ओर चले गए। सामने ऊबड़-खाबड़ मैदान था और उसके दाहिनी ओर लिद्दर का पानी चुपचाप वह रहा था। पास खड़े देवदारों के नीचे सूखी कत्थई पत्तियों की चटाई-सी विछी थी। डाक बंगले के दोनों कमरे वन्द थे। उनके मुसाफिर कोल्हाई लौटनेवाले थे। १
वहां पहुंचते ही इरा यदन-गी गई। रास्ते-मर उसको जो पहक
गुनाई पर रही थी, यह एकदम सुप्त हो गई। सोलको अपने में मस्त था।
यह पार-बार पाइप गुनगाकर पोडी-गो तम्बाफ पीता और फिर उसे
साफ करने के लिए लपीपी मानिस पर टोरने लगता । मैं मामान के
पाम एक पुरमी योवार थेट गया। दोनों माय थे, पर तीनों ही यहुन
अलग-अलग महगूम कर रहे थे. जमे हम योनी यहा भाने का कारण
दूर रहे हो। गौर भी मन में कोई यात स्पष्ट न पी। मापा मगरी
परामा मतापा हुआ मैं हो पा रहा था, उस यार । गोलको के रेगमाल
से मैहरे पर भी प्पपंता महरा रही थी। रा गुमसुम भी और हम
मापदणीलिए पुप में किया करते ही काही एक-दूगर के मन पाठ
नपाड़ा जाए।
मापिर पौरीदार ने मार हम उपार लिया। वह सारने के लिए
अंगोटी से मापा पा। उसने पूछा, मम गार, किमो पीर की दरकार...?
और मुलगी हुई पंगोटी उगने परा के पास गदी थी।
दूध मिल जाएगा? एकदम यान पाकर दरा ने मामोसी तोदी।
घर दूप मिदना योत मुतिस है, मागन ब मिमेगा."पर साव,
मायद पोड़ा दूध हमारे पास यमा है, सभी लाएगा । पहार वह अपनी
कोठरी मी घोर पा गया और मिनट-मर माद ही दूध लेकर लोट
भागाराने गोमंसी से पूण, मरा पोजिएगा मेजर साह्य ?
जो पिला दी। गोलंकी ने करा देते हुए महा।
योर थापतिकाजी?
जो मरजी हो। म असाव दे दिया।
देय भी तोकिसाय में सा है ? पाप, कापीमा मोवस्टीन ।
महती ईरा गामान की ओर पड़ी।
मंघम, यह पोई पस, धाप-कॉफी का ! मेरे पास इंतजाम है,
पहिए तो निकाल, बरछा अभी सीजिएयहते हुए सोलंकी अपना
गूटसंग पोलने पगा। गूटकेम गुसते ही पूरा बरामदा होती की तरह
महतने गा."रम मो एक बोतल टूट गई थी।
सुम भी मित्रो"तुम भी पिभो। सराय रो"
- निकालता हुआ सोलंकी वोला । उसके चेहरे पर मस्ती छा गई थी। इन्हें सूखने के लिए फैला दो। इरा ने शराव में भीगे कपड़ों की ओर इशारा किया। सोलंकी ने अपना निचला मोटा ओंठ दांतों से दवाया और बोला, ओह नो। मैं रात में इन्हें पहनकर लेटूंगा। और सूटकेस से दूसरी बोतल और गिलास निकालकर उसने खिड़की की कानिस पर शतरंज के मोहरों की तरह सजा दिए और वोला, आइए, मिस्टर तिलक। मैंने धन्यवाद सहित इनकार कर दिया। सोलंकी ने मेरे नाम का जाम भरकर गट-गट उतार लिया, फर्श पर पैर पटके और वरामदे से नीचे उतर गया। इरा ने तब तक वहीं अंगीठी पर चाय का पानी चढ़ा दिया था। सोलंकी को जाते देखकर वह बोली- मैं आऊं ? जैसे उसका मन घूमने के लिए मचल रहा हो। जरूर' 'जरूर । सोलंकी की आंखें पहले से बड़ी लग रही थीं। अपनी साड़ी को पकड़कर ऊंचा उठाते हुए इरा वरामदे से नीचे भीगी-भीगी घास पर कूद गई । देवदार की छतरीदार शाखों पर बूंदें अव. भी चमक रही थीं। नदी का शोर दूर था । वादल काफी नीचे थे। चारों ओर निस्तब्धता छाई हुई थी। इधर-उधर टापुओं की तरह उभरी हुई चट्टानों और लम्बी-लम्बी घास से भरे असमतल मैदान में सोलंकी और इरा चले जा रहे थे। मैं चुपचाप बैठा देखता रहा । उन दोनों की पीठ दिखाई दे रही थी। वे कभी नीचाइयों में चले जाते, कभी ऊपर आ जाते-जैसे वे लहरों पर सवार हों, डूवती-उतरती किश्ती की तरह, उनके आकार छोटे होते गए और वे लकीरों के बने पुतले लगने लगे। •"पेड़ों के नीचे जब इरा का आकार खो जाता, तो लगता जैसे सोलंकी ने उसे ढक लिया हो। । अंगीठी पर इरा का चढ़ाया हुआ पानी खोलने लगा था। उसे उतारकर मैंने नीचे रख दिया। आधे घंटे बाद जब वे दोनों लोटे, वारिश फिर होने लगी थी और में एक विजार में बाहुना पा। मंगोठी गग में भर गई पी। रा एकदम भीगी हुई थी। म नजर र देवा तो वह तोरिये से मुह पोछ रही पी और गोलीही पुरगी पर बंटा मंग्रेजी गीत पी धुन गुनगुनाना गुरू पर गुफा पा-ओ..ओ... मी टेगर...ओ.. ओ.ओ. 'लय मोबीच-बीच में यह मान मोटे बोटी को गोल फरके गोटी गवाना और यूटगे मन पर पाप देता जा रहा था। मंजर माहब ने तो अपना इन्तज्ञाम कर लिया है, बाप पाय बना- कर पोलोजिए, नहीं तो सरदी सग जाएगी। मैंने राहा तो अपना नाम गुनगर गोलंगी ने स्वर धीमा करते हुए यही मापन गरी से मुझे दया। पुरा हो रही, जमे उमने गुना न हो। बोल्हाई में सौटने पाले अभी सर यापम नहीं पाए थे। कमरी पर गरिलें पड़ी हुई थी। रायपटे सामने के लिए म्पान पोर रही पी, मैंने उगे पोशीदार को कोटरी और पियन मी मोर सारा फरफ जगह मुगाई, तर ता मोरी ने उठार एक बमरे की पुण्ठी पोल दी, आर दगमें पाली ना."ाए, बलिए। उगमें धनरों मा मामान रा है, आपने गोला पयों ? रा ने पहा तो मौलंगी ने माल पाट दी, परे मर जाकर कपर बदलिए, कोई युए पहेगा सौ ६ देश मूंगा। दरा पमरे में पुरा गरें। मैं हर यात मो गौर से मुन रहा था और हरयति को टीम से रामाने की कोशिश कर रहा पा । रा भीगे पपड़ी में लिपटी पदर पगी गई पी, रेग्नि उरारा गूटरग माहर बरामदे में ही पड़ा था। उसने बदलने के लिए परे नहीं निराम। # सोपही रहा पा रिग टोन उठाने आएगी रिमोटकी ने एपदम में उटा और भिएशियाड़ों को टेलकर भीतर पुम गया, पपई तो इसमें है भापरे । मैंने अंधेरे ममरे में रोर मउरें सोयाएं कोने की और गिफ गोलकीपी पीट दियाई पा रही पी, फिर एक आपाट गुनाई दी, रमे रख दीजिए, मेंनिगास लगो। “सोलंकी हंगामा महर आया और मुमसे बोला, मोमबत्ती है ?
मैं मना नहीं कर पाया, क्योंकि झूठ बोलने के लिए वक्त की ज़रूरत होती है, पर मैं उसका आशय समझ गया था। वह किसी बहाने दुबारा कमरे में जाना चाहता था । जानते हुए भी मैंने दूसरी जगह मोमबत्ती की तलाश शुरू की । मैं नहीं जानता था कि सोलंकी की इन बातों को इरा किस तरह ग्रहण कर रही थी... इतने में इरा कपड़े बदलवार बाहर आ गई-मैंने मोमबत्ती जला-- कर शराव की खाली बोतल के पास कानिस पर चिपका दी। रोशनी उन दोनों के चेहरों पर पड़ रही थी। अभी तक हम लोगों का सामान डाक बंगले के बरामदे में ही रखा हुआ था। रात उतरने लगी थी पर डाक बंगले के दोनों कमरों में टिके लोग कोल्हाई से वापस नहीं आए थे। सोलंकी कुछ उलझा हुआ लग रहा था, कुछ क्षणों की खामोशी के बाद बोला, हम अपना सामान क्यों न भीतर कमरे में रख दें ? तभी चौकीदार आता दिखाई पड़ा तो उसने पूछा, यह साहब लोग अभी वापस नहीं आया ? हम किधर सोएगा? चौकीदार असमंजस में पड़ गया, क्योंकि जो सैलानी लौटकर आने ' वाले थे, उन्हें भी रात वहीं गुजारनी थी और दोनों ही कमरे उनके पास * थे । बरामदे में सोना खतरे से खाली नहीं था। वह बोला, अभी साब लोग वापस आएगा। सोलंकी ने गुर्राते हुए कहा, पर दोनों कमरा उनके पास है ! कितना मेम साहव हैं उनके साथ ? दो। चौकीदार ने बताया तो सोलंकी को खल गया। उठकर वह कमरे की ओर जाने लगा तो इरा ने मना किया, उन लोगों को आ जाने दो "सामान वगैरह रखा हुआ है। कानिस पर रखी हुई मोमबत्ती उठाकर सोलंकी भीतर घुस गया। हम भी उठकर कमरे में पहुंचे, तब तक सोलंकी ने एक विस्तर लाकर भीतर पटक दिया-तिलक भाई ! वो खाट उधर सरका दो। वह . वोला। लकड़ी का वह कमरा हम लोगों की आमदरफ्त से धीरे-धीरे चर-
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उदासी के क्षण मुझे प्रभावित करने लगे थे और मैं चाहता था की ज़िन्दगी के सभी दुःखों को मैं मोड़ लूं.. पर इस क्षण मन या। गहरे होते हुए अंधेरे में उसकी आकृति मोम-सी लग रही र मुझे उस क्षण वह बहुत बदली-बदली लगी। मेरी आंखों के र मैदान की लहरों में इरा और सोलंकी के डूबते-उतराते चित्र थे, मन अपने में भीतर-भीतर घुमड़ रहा था। तभी दूर पर टार्च की रोशनी दिखाई पड़ी और दो मिनट के भीतर कोल्हाई से लौटने वाले सैलानियों के घोड़े डाक बंगले के दूसरी तरफ ले वरामदे के सामने रुक गए । दो घोड़ों पर दो खूबसूरत औरतें यकी-सी बैठी हुई थीं। हाय का सहारा देकर साथ के आदमियों ने उन्हें उतारा और वे सहारा लिए-लिए ही कमरे में दाखिल हुई । सोलंकी कमरे में ही था और पलंग को उठाकर सीधा कर चुका था। वेहद थकी होने के कारण वह खूबसूरत औरत जो आगे-आगे आई थी शायद एकदम लेटना चाहती थी... कमरे में खड़े सोलंकी को देखकर उसका फोजी आदमी अपनी हरी जीन की पेंट पर वेंत चटकाता एकदम विफर उठा-व्हा ई हैव यू डन दिस ? वाट राइट यू हैड ?..'यू'यू" सोलंकी कद में उसके वरावर था। वह अविचलित-सा खड़ा रह और उस आदमी की जवान लहखड़ाते देख वह बोला, 'दिस इज़ ए डाक बैंगलो । यू सी. 'नाट योर कॉटेज ।...' गरमागरमी वढ़ती जा रही थी और वह फौजी आदमी तथा सोलं दोनों झगड़ रहे थे। हमें भी जगह चाहिए ! वरामदे में सो सकत कोई ? सोलंकी वोल रहा था, आई थाँट यू वुड अंडरस्टैण्ड अवर प्ल ''चौकीदार टोल्ड मी यू आर ए कर्नल इन द आर्मी... अपने गुस्से में वह फौजी चीखा था-आइ मे बी ए डंकी आर्मी, वट व्हाइ डिड यू रिमूव.. तभी इरा भीतर चली गई और मैं दरवाजे के पास ठिळक गर ... २२
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। । । डाक बंगला है"डाक बंगलों में पीली-पीली मोमवत्तियां जल रही हैं और दूर पर वहती नदियों का शोर है । चारों तरफ चीड़ और देवदार के जंगल हैं.. अनगिनती पेड़ हैं, पर सब अपने में अकेले हैं। और तभी, जब मेरी पलकें भारी हो आई थीं, मेरी बन्द आंखों में एकाएक अंधेरा छा गया था, माथे पर किसीके हाथ का स्पर्श-सा महसूस हुआ था, मैंने हाथ बढ़ाए तो रेशमी वालों की लटें उंगलियों में उलझ गई. वह इरा थी जो शायद सो नहीं पाई थी और चुपचाप उठकर आई थी। मेरे विस्तर के पास, अंधेरे में ही वह झुकी बैठी रही थी। मैंने उसके ठण्डे हाथ अपनी हथेलियों में कस लिए थे। वह कुछ भी नहीं बोली थी। फिर धीरे से उसने मेरी बांह को खींचा था, जैसे कह रही हो- उठो... अंधेरे में ही मैंने उसे देखा था। उसने फिर हलके से वाह खींची थी। आखिर मैं उठ गया था। ...और उस अंधेरे में ही हम दोनों नीचे मैदान में उतर गए थे... कम्बल में दोनों जने जैसे-तैसे अपने को लपेटे चारों तरफ अंधेरा था। जंगली पेड़ों की छायाएं पहाड़ के सीने में धुल गई थीं-वारिश से भीगे मैदान में देवदार की महक भरी हुई थी "एक नंगी चट्टान पर हम दोनों वैठ गए थे । मैं इरा का आशय नहीं समझ पाया था। वह इस वक्त इस अंधेरे और डरावने मैदान में क्यों मेरे साथ आई थी-क्या सिर्फ मुझे खुश करने के लिए ? या अपनी की हुई गलती की माफी मांगने के लिए? तभी मुझे इरा की गहरी-सी सांस की आवाज़ सुनाई पड़ी थी। मैंने उसे गौर से देखा-अंधेरा कुछ-कुछ उजाला देने लगा। और मुझे लगा कि इरा मुझसे छल कर रही है। उदासी ओढ़कर बैठ जाना और इस तरह अपने में विश्वास पैदा करने का यह कोई तरीका नहीं है । मन में आया, इरा को बांह पकड़कर उठा दूं या खुद उठकर चल दूं। मैं उठने लगा तो इरा ने हाथ पकड़ लिया-कहां जा रहे हो ? मैं सोना चाहता हूं। हुए थे ।
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। रुकते हुए उसने कहा, - की तरफ देखता रह गया था। आखिर मुझे घूरते हुए वह बोली, क! जो वात मैं कहने जा रही हूं, उसे वरदाश्त नहीं कर पाओगे। क्यों ? ऐसी क्या बात है ? इसलिए कि अभी इसी क्षण तुम्हारे खयालात मेरे बारे में बदल एंगे । शायद तुम सोचो कि मैं वेशऊर और वेहूदी हूं। और यह हो सकता है कि "कहते-कहते वह रुक गई थी। क्या हो सकता है ? कुछ भी नहीं। वताओ न-जो तुम्हारे मन में हो, कह डालो-मैं भी बताऊंगा सब कुछ, जो मेरे मन में है। -कुछ यही कि तुम अभी सच बोल सकते हो क्योंकि मैं तुम्हारे पास अकेली हूं और इस सुनसान घाटी में कोई नहीं है 'यह छूट जब मिलती है तभी तुम लोग सही बात करते हो ! तुम आदमी लोग ! तुम अच्छी तरह जानते हो कि इस वक्त तुम मेरे साथ किसी भी तरह पेश आ सकते हो मुझे बांहों में घेरकर अच्छी- सी बात कह सकते हो, या मेरी वांह मरोड़कर नाराज़ हो सकते हो, या दूर वैठकर दार्शनिकता वधार सकते हो। लेकिन यह सव इसी वक्त हो सकता है, क्योंकि घाटी सुनसान है और मैं तुम्हारे पास अकेली एक क्षण के लिए वह खामोश हो गई थी। फिर बोली थी, अकेलापन व्यक्तियों की सचाई खोलता है । यह अकेलापन बड़ा मोहक होता है इसमें आदमी सब कुछ स्वीकार कर लेता है "अच्छा, वुरा सुंदर असुंदर लेकिन ऐसा अकेलापन तो कई वार हम लोगों को मिला है। तुमने कुछ क्यों नहीं पूछा ? आज ही क्या खास बात है ! कहते-कहते लगा कि इरा का शरीर सूखने लगा है. ठीक वैसे ही जैसे डल पर सूखी-सूखी हो गई थी। मेरी वांहों पर अपने नाखून गड़ाते हुए वह व दिन और वक्त खास नहीं होता-कोई वात ऐसी होती है जिसके स कोई दिन या क्षण याद में उलझा रह जाता है। मैं चाहती हूं यह और सुनसान घाटी इस आज की बात की साक्षी रहे यह आधी २६ का बीतता हुआ क्षण माद में उलझा रह जाए.. फिर एक गहरी सांस लेफर यह बोली थी- तिलक ! मैं राव सुनती रही हूं आज तक 'अय में ही बोलती जाऊंगी। मेरी जिन्दगी बगैर मंजिलों के चलती रही-मैं चिर-पथिका हूं! मेरा पडाय पही भी नहीं है । इन पहाडी रास्तों में जैसे लोग पैदल पलते हैं, वैसे ही मैं आज तक चलती रही हूं। रास्ते में कोई गंदी पाय की दूकान मा गई तो लोग यहा भी रुफकर एक प्याली पी लेते है, पयोकि और कोई चारा नही है... हो सकता है । मैंने यहा। इरा मुझे ताकने लगी-पया मतलब ? हर रात को आदर्श के परदे में रखकर मत देखो, तिलक ! गंदी चीज पर भी परदा डाल दो तो उसकी शिलमिलाहट पूबसूरत लगती है । मादर्श का जामा जिन्दगी को मत पहनाओ ''यह मुझसे नही सहा जाता। इरा ! आखिर तुम चाहती क्या हो ?..'या अब तक क्या चाहती रही हो?''राही-सही बताना । मैंने पूछा था। दरा ने बड़े प्यार से मेरी तरफ देखा था। अंधेरी रात में उसकी पुतलियो मोती-सी शिरमिलाने लगी थी। नगदीय खिसकते हुए उसने महा पा-तिलक ! अपनी बांह रय लो मुझपर 'या मेरी बाह पकड़- कर पूणे यही बात । पहते-कहते वह बहुत सरल-सी हो आई थी। एक दाण सामोश रहकर यह आगे बोली, यह योह सोंगध होती है तिलक।' इसके याद शूठ नहीं बोला जाता । और फिर जैसे इरा के भीतर रुका हुआ सचाई का झरना फूट पड़ा था... -मैं इन जंगलों को, पहाडों को नदियो, झरनों और झीलो को प्यार नहीं करती, बिलकुल नहीं । मुझे फल भी अच्छे नही रुगते, इतने कि मैं उन्हें प्यार कर सकू । नदी एक-सी यहती है और डूब जाती है। पहाड ऐसे ही पड़े रहते हैं. लेकिन मुझे याद आती है उन स्वरो की जिनमें प्यार पा और जो अब डूब चुके हैं । स्वरो की आत्माए अभी भी मेरे चारों ओर भटक रही हैं तिलक ! सीधे-सीधे कहूं-मैं सिर्फ आदमी को प्यार करती हूं, उसे ही कर सकती हूं। यह पूरी प्रकृति मुझे अच्छी - सकी तरफ देखता रह गया था। आखिर मुझे घूरते हुए वह बोली, क ! जो वात मैं कहने जा रही हूं, उसे वरदाश्त नहीं कर पाओगे। क्यों ? ऐसी क्या बात है ? इसलिए कि अभी इसी क्षण तुम्हारे खयालात मेरे बारे में बदल एंगे । शायद तुम सोचो कि मैं वेशऊर और बेहूदी हूं। और यह हो सकता है कि कहते-कहते वह रुक गई थी। क्या हो सकता है ? कुछ भी नहीं। वताओ न-जो तुम्हारे मन में हो, कह डालो-मैं भी बताऊंगा सब कुछ, जो मेरे मन में है -कुछ रुकते हुए उसने कहा, यही कि तुम अभी सच बोल सकते हो क्योंकि मैं तुम्हारे पास अकेली हूं और इस सुनसान घाटी में कोई नहीं है यह छूट जव मिलती है तभी तुम लोग सही बात करते हो ! ! तुम आदमी लोग ! तुम अच्छी तरह जानते हो कि इस वक्त तुम मेरे साथ किसी भी तरह पेश आ सकते हो. 'मुझे वांहों में घेरकर अच्छी- सी बात कह सकते हो, या मेरी वांह मरोड़कर नाराज़ हो सकते हो, या दूर बैठकर दार्शनिकता वधार सकते हो। लेकिन यह सब इसी वक्त हो सकता है, क्योंकि घाटी सुनसान है और मैं तुम्हारे पास अकेली हूं।'' एक क्षण के लिए वह खामोश हो गई थी। फिर वोली थी, अकेलापन र व्यक्तियों की सचाई खोलता है । यह यकेलापन बड़ा मोहक होता है इसमें आदमी सब कुछ स्वीकार कर लेता है 'अच्छा, दुरा 'सुंदन असुंदर.. लेकिन ऐसा अकेलापन तो कई बार हम लोगों को मिला है। तुमने कुछ क्यों नहीं पूछा ?आज ही क्या खास बात है ! कहते-कहते लगा कि इरा का शरीर सूखने लगा है। ठीक वैसे ही जैसे डल पर सूखी-सूखी हो गई थी। मेरी वांहों पर अपने नाखून गड़ाते हुए वह व दिन और वक्त खास नहीं होता-कोई बात ऐसी होती है जिसके कोई दिन या क्षण याद में उलझा रह जाता है । मैं चाहती हूं यह और सुनसान घाटी इस आज की वात की साक्षी रहे. 'यह आधी २६ । का बीतता हुआ क्षण याद में उलझा रह जाए" फिर एक गहरी सांस लेकर वह बोली थी- तिलक! सब सुनती रही हूं आज तक''अव में ही वोलती जाऊंगी। मेरी जिन्दगी बगैर मजिलो के चलती रही-मैं चिर-पथिक हूँ! मेरा पडाव पही भी नहीं है। इन पहाडी रास्तो में जैसे लोग पैदल चलते हैं, वैसे ही में आज तक चलती रही हूं । रास्ते में कोई गंदी चाय की दूकान आ गई तो लोग वहा भी स्ककर एक प्याली पी लेते हैं, क्योंकि और कोई चारा नहीं है." हो मकता है । मैंने कहा। इरा मुझे ताकने लगी--क्या मतलय ? हर रात को आदर्श के परदे में रपकर मत देखो, तिलक ! गंदी चीज पर भी परदा डाल दो तो उसकी झिलमिलाहट खूबसूरत लगती है । आदर्श का जामा जिन्दगी को मत पहनाओ..'यह मुझमे नही सहा जाता। इरा ! आखिर तुम चाहती क्या हो ?.. 'या अब तक क्या चाहती रही हो?.."मही-सही बताना । मैंने पूछा था। इरा ने बड़े प्यार से मेरी तरफ देखा था। अंधेरी रात में उसकी पुतलियां मोती-सी झिलमिलाने लगी थीं। नजदीक विसकते हुए उसने कहा था-तिलक ! अपनी बांह रख लो मुझपर 'या मेरी वाह पकड़- कर पूछो यही बात । कहते-कहते वह बहुत तरल-सी हो आई थी। एक क्षण सामोश रहकर वह आगे बोली, यह थाह सोगघ होती है तिलक ।' इसके याद झूठ नहीं बोला जाता । और फिर जैसे इरा के भीतर रुका हुआ गचाई का झरना फूट पड़ा या... -मैं इन जंगलों को, पहाड़ों को · नदियो, झरना और झीलों को प्यार नहीं करती, विलकुल नहीं । मुझे फल भी अच्छे नही लगते, इतने कि मैं उन्हें प्यार कर सकू । नदी एक-सी यहती है और डूब जाती है। पहाड़ ऐमे ही पटे रहते हैं लेस्नि मुझे याद आती है उन स्वरों की जिनमें प्यार था और जो अब इव मुके हैं । स्वरों की बात्माएं अभी भी मेरे चारो और भटक रही हैं तिलक ! सीधे-सीधे कहूं-मैं मिर्फ यादमी को प्यार करती हूं, उमे ही कर सकती है। यह पूरी प्रति मुझे अच्छी ।
- लगती है, पर इसे मैं प्यार नहीं कर पाती''कोई उस चीज़ को कैसे चाह सकता है, जो बदले में कुछ न बोले ! में सोच नहीं पाती उस प्रेम को, जो गूंगा हो ! जो कुछ दे न सके । देने को फिर चाहे भौतिक और शारीरिक सुख हो या आत्मिक वैभव ! उसका चाहे जो कुछ अर्थ हो... पर हो'"निरर्थक प्यार विलास लगता है मुझे। और मेरी ज़िन्दगी की वासदी सिर्फ यही है कि मुझे निरर्थक प्यार ही मिला.'जो भी मेरी ज़िन्दगी में आया उसने यही विलास किया मेरे साथ-क्यों कोई भी मुझसे खुलकर नहीं कह पाया कि ज़िन्दगी की शर्ते प्यार से बड़ी होती हैं. 'सव यही कहते रहे कि प्यार ज़िन्दगी से बड़ा होता है। लेकिन प्यार को ज़िन्दगी के मुताबिक काटते, सिलते और उधेड़ते रहें... इतना कहकर इरा कुछ देर के लिए चुप हो गई थी। मैंने उसका कांपता हुआ हाथ अपने हाथ में ले लिया था। इतनी देर बैठने के कारण रात अव रात जैसी नहीं लग रही थी। पश्चिम की चोटियों पर कुछ घने बादल घिर आए थे और घाटी का पश्चिमी कोना थरथराता-सा लगता था । घास के उस मैदान में ऊबड़-खाबड़ नंगी चट्टानें मुंह उठाए जैसे किसी सचाई से साक्षात् के लिए खामोश खड़ी थीं। पैरों के नीचे देवदार की रोशनी और सेई के कांटे जैसी पत्तियों का विछावन था, जिनसे बड़ी सौंधी महक फूट रही थी । नदी का पानी टूटी हुई वीणा के तार जैसा झनझना रहा था । पक्षी खामोश थे। लिद्दरवट का पहाड़ किसी विशाल डबल रोटी के कटे हुए टुकड़े की तरह जमीन पर खड़ा था और उसपर चीनियों की दाढ़ी-मूंछों की तरह कहीं-कहीं लम्बी घास उगी हुई थी। चीड़ और देवदार के पेड़ सटे-सटे- से खड़े थे। सिर्फ, शायद बांहें पकड़ने की देर थी' 'खामोश सचाइयां उनमें से फूटने लगतीं। .."सभी ने विलास किया है मेरे साथ "इरा ने यह क्या कह डाला था ? मैं परतों को उधेड़ देना चाहता था। पीठ पर रखा हुमा मेरा हाथ जैसे संगमरमर पर थरथरा रहा था. 'देवदार की पत्तियों की बिछावन की तरह चिकनी देह से सोंधी महक फूट रही थी । और नदी का पानी चट्टानों पर खामोश पछाड़ें खा रहा था, जिसकी झनझनाहट मैं उसकी - ।
पीठ पर महसूस कर रहा था। सब कुछ मेरी आंखों के सामने आज भी ज्यों का त्यों घूम रहा है । उस दिन सूनी घाटी में चट्टान पर बैठे-बैठे इरा ने अपनी कहानी सुनाई थी। कहानी इसलिए कह रहा हूं कि उसने सचाई ययान की थी। जिन्दगी बदसूरत भी हो सकती है, पर जिन्दगी की बदसूरती कहानी में सचाइयों के नामने रू-ब-रू खडी होकर नये अर्थ देने लगती है, इसलिए कहानिया बड़ी हैं, जो सदियो जीती हैं और जिन्दगी छोटी है, क्योकि उमर के साथ उसकी सांस उपड़ जाती है। आज जिन्दगी की सचाइयां क्षणो से चारित हैं और कई-कई सवा- इया एक साथ समातर चलती हैं। ताड़ के पेडो की तरह सत्य समांतर पड़े हैं । जिसने बने बनाए सत्यों से अलग जितना ही 'झूठा' जीवन जिया है, उतनी ही नई सचाइयों का साक्षात् किया है उसने ! मुझे इरा की जीवन-गाया एक ऐसे ही 'झूठ' के सिवा और कुछ नही लगी थी, इसीलिए आज उसकी आन्तरिक ईमानदारी को पेश करते मेरे हाथ कांपते है । और लगता है कि अगर मैंने उन यने-बनाए सत्यो के आधार पर उसके बारे में सब कुछ मच-सघ' लिख दिया तो उसकी जीवित या मृत आत्मा को वडा सदमा पहुचेगा। इसलिए मैं सब कुछ 'झूठ' लिखने पर उतारू हूं, जोकि बदसूरत ही हो सकता है-पर घूति इसे कहानी की गवल दे रहा हूं इसलिए मुझे विश्वास है कि यह बद- मूरनी कुछ और ही अयं देने को बाध्य होगी । पयोकि जो कुछ खूबसूरत है, उसे 'सत्य' स्वीकारा जा चुका है और जो कुछ अब तक स्वीकारा जा चुका है, सिर्फ वहीं ज़िन्दगी को नापने का पैमाना नहीं हो सकता... स्वीकृत सत्यो के पैमाने से बाज की जिन्दगी नप नहीं पाती" उमने कहा था- तिलक ! मुझे बाहों में कस लो, तब मैं सब-कुछ सच-सच बता दूगी। अगर मुझमे हटकर दूर बैठोगे तो मैं नाटक करूंगी-इतना अच्छा अभि- नय कर सकती हूं मैं कि तुम मुलाये में पड़ जाओगे और मैं अनजाने ही तुममे छल करूंगी । मेरा दोष नहीं होगा, तिल्क ! तुम मेरी बातों के । जाल में फंसकर यह समझने लगोगे कि मेरे जीवन में तुम्हारे सिवा और कोई नहीं आया आज तक । सचमुच कभी-कभी मुझे आश्चर्य होता है कि यह अभिनय मैं कैसे कर लेती हूं. मेरी आत्मा का कोना-कोना यादों से भरा हुआ है। मेरी आंखों में हर उस व्यक्ति की तस्वीर है जिसके साथ मैंने थोड़े-से भी दिन गुज़ारे हैं । और जव-जव उसने मुझे बाहों में लेकर प्यार से पूंछा है, इरा तुम अभी तक कहां थीं. "तुमने किसीको प्यार क्यों नहीं किया ? 'शायद तुम मेरे लिए ही थीं. "तव 'तिलक, तब मैंने हमेशा सव-कुछ बता डालने की कोशिश की। और यह समझा कि वह मेरी सारी खामियों के साथ जीवन-भर साथ देगा। पर ऐसा कभी नहीं हुआ''मैं बार-बार अकेली रह गई। बड़े गहरे-गहरे घाव लगे हैं मुझे। और उन धावों का खून अब कहीं भीतर चट्टानों की तरह जम गया है । आज मैं उन खूनी चट्टानों पर किसीको भी सुला सकती हूं। पर मेरी कमजोरी यही है कि आदमी के सिवा मैं किसीको प्यार नहीं कर सकती "इसलिए झूठ भी नहीं बोल पाती... इरा की एक-एक बात रह-रहकर याद आती है." उसने बताया था-मैं तब छोटी ही थी, पन्द्रह या सोलह साल की। दुनिया तव वड़ी अच्छी लगती थी। हर तरफ ताजगी और रंग थे। मैं तितली की तरह उड़ती थी। कालेज में पहुंचते ही मेरे सपने बदलने लगे । मुझे अपने शरीर का अहसास हुआ। देखने वालों की आंखें मुझे सौंदर्य की अनुभूति देती थीं और तब मैं अपने शरीर से कुछ-कुछ डरने लगी थी। मुझे क्या होता जा रहा था ? मेरी हर सुवह कुछ न कुछ बदली नज़र आती थी। मेरे वालों में रेशमीपन आ रहा था और आंखों के किनारे नदी के तट की तरह गीले होकर खुलते जा रहे थे। वाहें चन्दन की लकड़ी की तरह चिकनी और गंध-भरी होती जा रही थीं। मेरी आत्मा, जिसे मैं अब पहचान रही हूं, तब जैसे मुक्त होती जा रही थी। बड़ी रंगीन कल्पनाएं पंख पसार-पसारकर मेरी दुनिया में प्रवेश कर रही थीं। और तब मुझे लगा था कि दादी की सुनाई कहानियां मेरे जीवन में । ही चरितार्थ होगी 1 कोई एक राजकुमार आएगा और रंग-भरी दुनिया के किसी एकान्त में मुझे उठा ले जाएगा एक नया संसार मेरे सामने होगा और में पख पसारकर उसमे मुक्त विहार करूगी । तव हर हम- उम्र लड़का मुझे ऐसा ही राजकुमार लगता था और मैं आखें चुरा-पुरा कर हर लड़के को देखती थी, उसके सपने बुनती थी और सपनों में वहीं कोई मेरा राजकुमार बनकर माता था • नीले आकाश की गहराइयो से वह उतरता था, और मैं फूलो से सजी उसका स्वागत करती थी... मुबह उठकर मैं उसकी कही हुई बातें याद करने की कोशिश करती थी, पर कुछ भी याद नहीं रहता था। घटनाओ के घुधले चित्र भर याद रह जाते थे। तव मेरा एक भगगन भी था, जो नीले आसमान के ऊपर रहता था और मेरी हर बात को देखता और नोट करता था । सपनो में किसी राजकुमार ने मुझे छुआ नहीं, उसके स्पर्श की कल्पना-मान से मेरे शरीर में रोमांच हो आता था । वस हम एक-दूसरे को देखते और यातें करते ये। तिलक ! कभी-कभी तो जागते हुए भी ये सपने दिखाई पड़ते रहते पे और मेरा तन पसीने से लथपथ हो जाता था। तब उठकर मैं घंटो बारजे पर घूमती रहती थी और सितारों को झिलमिलाहट देखती रहती थी। एक राजकुमार ने मुझे मेरा सितारा दिसाया था-सबसे बड़ा सितारा, जो हवडयाई आख की तरह चमक रहा था। आज मुझे, सच लगता है कि वह सितारा चाहे मेरा न रहा हो, पर उसका शाप मेरे जीवन का शाप अवश्य है। मैं ऊपरवाले कमरे में रहती थी। मेरी आत्मा निबंध होकर फैल जाना चाहती थी-हर कला के साथ । मैं संगीत भी मीसती थी और नृत्य भी। रंग लेकर मानसिक भावनाओं के चित्र अंकित करने की कोशिश करती थी और शीशे के सामने खड़े होकर देर-देर तक अपने से पातें किया करती थी। में एक तरफ अपने में डूबती जा रही थी और दूसरी तरफ मेरी बला मुझे दूसरों के पास ले जा रही थी" तभी मैंने एक नाटक लिखा-सपनों का राजकुमार । हमारी पत्रिका में वह छपा । उसके बाद मैंने कई नाटक लिये, क्योंकि मैं दुनिया में - । 5 से सीधे-सीधे बात करना चाहती थी और यह नाटक में ही हो ता था। वार्षिक समारोह पर कालेज की सहेलियों ने मिलकर एक टक खेला-वही पहले वाला । उसमें मैं राजकुमारी वनी थी, तिलक ! लिदास की शकुन्तला की तरह भोली और लज्जा-विनत । और सच- च जब मेरी ही एक सहेली राजकुमार का वेप पहनकर मंच पर आयी व मुझे पसीना छूट गया था। मेरा मन कांपने लगा था। शरीर का नंग-अंग पुलकित होकर शिथिल हो गया था । और सूखते गले से मैंने अपने लिखे हुए संवाद कहे थे । 'तिलक ! बड़ी अजीव-सी अनुभूति हुई थी। हफ्तों मेरा रोम-रोम पसीजता रहा, गला सूखता रहा और मन नीले आकाशों में भटकता रहा । फूलों के गहने पहने में घूमती । तुम हंसोगे मेरी इन वचकानी वातों पर, लेकिन सच बताऊं. वे दिन मुझे भूले नहीं भूलते । इम्तहान खत्म हो चुके थे । गरमियां आ गई थीं... कभी-कभी अकेले में मैं वेला और मोतियों के गहनों से अपने को सजाकर घण्टों खुली छत पर आंखें वन्द किए वैठी रहती । इस इंतजार में कि कोई आकर मुझे धीरे से छुए। आंखें बन्द किए-किए ही मैं सपनों के राज- कुमार का स्पर्श महसूस करती । मेरे शरीर में गुदगुदी होती थी."तब मैं अपने आप ही घुटनों में अपना मुंह छिपाकर तन कस लेती थी। कभी रोती थी, क्यों, यह मैं नहीं जानती। वह रोना भी कैस था ! आज के इन आंसुओं-सा खारापन तब नहीं था। मेरे सूखते ओं ढरक आए आंसुओं से नम और चिकने हो जाते थे... और रात में मैं अमलतास के गुच्छों से अपना विस्तर भर ले थी। चारों ओर अमलतास महकता था और मैं वेसुध-सी सोई रह कभी बहुत थी। मम्मी नहीं थी मेरी तिलक! मैं नौकरानियों के हाथों में थी। डंडी आर्मी में थे ! । और इसके बाद मेरे जीवन का वह पहला अनुभव आता यूनिवर्सिटी में पढ़ते हुए मैं नाटकों में अभिनय करने लगी थी ! ३२ m तभी, उन्हीं दिनों एक नाटक-समारोह हुआ था शिमला में। शहर में कई यलय थे, पर निमंत्रण सिर्फ एक क्लव को ही मिला था। उस क्लब के साथ में भी शिमला गई थी। क्लववालों ने जरूरत की वजह से मुझे मेम्बर बना लिया था। हम लोग समरहिल में डाकखाने के पास वाले एक कॉटेज में ठहरे थे, जिसके चारों ओर पहाड़ियां और जंगल थे और नीचे स्टेशन। वही, एक दिन''अब नाम बता ही दू तुम्हें-विमल था उसका नाम । मैं उसे कुछ-कुछ चाहती भी थी। वह यूनिवसिटी में हमारे साथ था और उस फ्लय का मेम्बर भी। मुझे वह अच्छा भी लगता था। हम दोनों कभी-कभी जंगल में होते हुए पैदल शिमला निकल जाया करते थे। उसका एक मित्र था, जो वही 'विशप काटन' स्कूल के पास रहता था। हम दोनों एकाध यार साथ-साथ उसके महां गए थे। वे हमारी स्वार्थ रहित जिन्दगी के शुरू के दिन थे । और एक दिन जब मैं उसके साथ जंगल के पथरीले रास्ते से चली आ रही थी, विमल ने मुझे जीवन में पहली बार छुआ था । मेरा रोम- रोम सिहर गया था, वह सिहरन मैंने फिर कभी महसूस नहीं की। आर्ट स्कूल के पास ही हम दोनों एक गए थे। अंधेरा हो रहा था, मुझे डर भी लग रहा था, और यह पयाल भी था कि साय के लोग क्या सोच रहे होगे ! पर विमल बिलकुल निश्चित था। उसने मुझसे कहा, दोस्त के घर तक चलेंगे जरा! वह तो अभी बहुत दूर है । मैं नहीं चल पाऊगी और अगर अब वहां गए तो लौटेंगे कब? मैंने कहा था। उसके पाम जीप है। वह हमें पहुंचा जाएगा मैं अस्वीकार नहीं कर पाई थी, सपनों में जैसे कोई राजजुमार मुझे सहारा देकर ले जाता था वैसे ही मैं उसके सहारे-सहारे चली गई थी। वही विमल ने मुझे एक विश्वास दिया था-इरा, हम-नुम दोनो रगमच के लिए समर्पित हैं । हम जीवन भर इसीमें लगे रहेंगे."बात तो छोटी- सी थी, पर वह विश्वास बहुत बड़ा था, तिलक ! लेकिन मेरे इस विश्वास को रंडी नही समझ पाए थे। उनके लिए । में भाग लेना और नंगे होकर नाचने-गाने में कोई फर्क नहीं था। जो भी ये सब पसंद नहीं कर पाए। लेकिन मैं अपने विश्वास को ही जीना चाहती थी। सचमुच कितनी प्यारी दुनिया है रंगमंच । जिन्दगी के सारे उतार-चढ़ाव, दुख-सुख, पाप-पुण्य, सब दो घण्ट परिधि में सिमट आते हैं। पूरा जीवन, घर-गृहस्थी, सव रिश्ते, गा और प्यार, भावनाएं और कल्पनाएं इस छोटी-सी दुनिया में क्षणों परवान चढ़ती हैं । जीवन को गति मिलती है और विविधता-वह वविधता जो और कहीं नहीं मिलेगी। दो घण्टों में मैं पूरा जीवन जी लेती थी.. जीवन को बार-बार दुहराती थी। किसे मिलता है यह अव- सर तिलक ! लोग अपनी जिन्दगी नहीं जी पाते। जीवन के अनुभवों को दुहराने से आत्मा पर निशान बन जाते हैं । जैसे पत्थर रगड़ से घिसता है, वैसे ही आत्मा की चट्टान पर ये निशान बन जाते हैं। यहां जीने की सार्थकता मिल जाती है । सार्थकता उन्हें ही मिली है जो दूसरों को अपने में उतारकर जिये हैं । जो अपने लिए जिए . और मर गए, वे कीड़े थे... कितना सुखद था वह दौर' विमल के साथ वीतते वे दिन इसी च डंडी का ट्रांसफर हो गया था और मैं होस्टल में रहने लगी थी जब भी मौका लगता, विमल के पास चली जाती... मैं नये नाटक की बात करती, विमल बैठकर सेट का डिज़ा वनाता, नये प्रभावों को रूप देने पर विचार करता। लेकिन दिन मुश्किल से कटते । मंच का गतिमय रोमांच और उसीके साथ है हुए दिन । सव कुछ आसान नहीं था, बल्कि बहुत मुश्किल था । वह मेरी पढ़ाई का आखिरी वर्प था। इम्तहान देकर मैं डैड पास गई थी और वहीं हमारी-उनकी लड़ाई हो गई थी। उन्होंने दिल्ली ड्रामा कम्पिटीशन में जाने से रोका था। मैं विमल को वच आई थी कि हफ्ते बाद मैं रिहर्सलों के लिए लौट आऊंगी.. लेनि ने विकराल रूप धारण कर लिया था। वे किसी शर्त पर मुझे के लिए तैयार नहीं थे। कोई चारा नहीं रह गया था. आखिर गार्जी के खिलाफ नाटक की तैयारी के लिए विमल के पास '2Y थी। कुछ दिनों तो मैं अपनी एक सहेली के पाम रही, पर वह प्रबंध भी कब तक चलता ? दुनिया दिलाने के लिए मैं कब तक अलग रहती ? उसमें रखा भी क्या था ! मैं सुल्लमसुल्ला विमल के साथ रहने लगी थी । और डंही मे सम्पर्क गम्बन्ध-सब कुछ टूट गया था। नाटक कम्पिटीशन के बाद दो साल तक मैंने और विमल ने दिल्ली में ही स्थायी रंगमंच स्थापित करने की जी-तोड़ कोशिश की. "पर कजे के सिवा कुछ हाय न आया। यहा तक कि हम पैसे-पैसे के लिए मोहताज हो गए.'वह कुण्ठित होता गया और मैं उदास... आखिर एक दिन जब हम दोनो पूरी तरह हताश हो चुके थे, विमल ने कहा था, तुम अपने पैरो पर पड़ी हो सकती हो, कही नौकरी क्यों नहीं कर लेती ? तब तक मैंने यह सोचा भी नहीं था। पर जीना तो था ही। डैडी के पास लोटकर जाने का अब सवाल नही उठता था। उनकी चरखी और जिद का जवाव भी मुझे देना था। सच बात तो यह थी -तिलक, कि मा को मौत के बाद डंडी एक तरह से मेरे लिए खो ही गए थे। उनकी अपनी जरूरतें धी.. जो गलत भी नहीं थीं। लेकिन वे अपनी उस जिन्दगी को हमेशा मुझसे छुपाते रहे"शायद उन्हें यह लगता रहा कि जिस दिन वे अपनी सही जिन्दगी को मेरे सामने खोल देंगे, वाप के पद से नीचे गिर जाएगे. इसीलिए वे हमेशा एक याप की साय पेश आने की मजबूरी में बंद रहे । वे कभी मेरे लिए प्यार-भरे दोस्त नहीं बन पाए । मेरी पाहतो को नहीं समझ पाए । वे हमेशा मेरे सामने सवाल वनकर ही खड़े हुए और हमेशा मुझसे जवाव ही मागते रहे। और यही जवाब देने के लिए मैं गहरे पानी मे उतर गई । वातें तो बहुत छोटी होती हैं पर उनके जवाब बहुत बडे हो जाते है । और जिस पर में मां न हो, उस घर के बच्चों को जिन्दगी-भर ये बडे-बडे जवाब देने पड़ते हैं अपने अस्तित्व के लिए, आकाक्षाओ और सपनों के लिए, व्यवहार और सामाजिक स्थिति की गरिमा के लिए यहा तक कि रहन- महन और खाने-पीने के लिए भी। मैं सब जवाब देने के लिए कमर कस चुकी थी, पर भीतर-भीतर बहुत डर रही थी, क्योकि देह और प्यार से बड़ी चीजों का सामना अव तरह मेरे । तलखियों से आंखें चार होनी थीं। सचाइयों से मुकाबला था। ल ने किसीसे कहकर मेरे लिए नौकरी तलाश कर दी थी। पने होनेवाले मालिक से मिलने पहुंची तो दंग रह गई। दिल्ली - दिखावट और सजावट की कमी नहीं, पर वतरा साहब का फ्लैट दा ही सजावटदार था। बड़ी ही शांति थी उसके यहां। उसके कोई भी नहीं था । वह विधुर था और उसकी कनपटियों के बाल छ सफेद हो रहे थे। उम्र चालीस के आसपास और नक्श आर्यों सकी आंखों में बड़ी करणा-सी समाई हुई थी और ओठों पर ता की मुस्कराहट हमेशा रहती थी। उसने मुझे देखा, इज्जत से T, चाय पिलाई और दूसरे दिन से काम पर आने की आज्ञा दे दी। मैंने काम की कैफियत जाननी चाही तो वह वोला-आपके लिए खास काम नहीं है। सिर्फ टेलीफोन-काल्स अटेण्ड करनी हैं, क्योंकि यादातर बाहर रहता हूं, आप सुबह दो घंटे आकर दस बजे जा ती हैं। फिर पांच बजे आ जाइए और आठ-साढ़े आठ बजे चली पहले तो मैं कुछ समझ नहीं पाई, पर वतरा के सलूक और शराफत मैं प्रभावित हुई थी। और सचमुच बतरा एक निहायत शरीफ आदमी वित हुआ-इतना शरीफ कि उसकी शराफत लाचारी की हदें छूने गी। तीन दिन बाद मैं काम पर जाने लगी। मेरा मन लगा रहे, इसलिए बतरा ने तरह-तरह की पत्रिकाएं मंगानी शुरू की थीं। मेरी मेज पर फोन रखा रहता था और मैं पत्र-पत्रिकाएं उलटती-पलटती रहती थी। कभी मन घबराता तो उठकर लॉन पर घूमने लगती। बतरा शराव का शौकीन था--जब वह शराब पिए हुए नहीं होता था, तव कुछ-कुछ उजड्ड • और भयानक भी दिखाई पड़ता था। गिलास खाली करते ही उसके चेहरे पर करुणा आने लगती थी और मांखों की कोरें नम होकर बड़ी प्यारी हो जाती थीं। ओठों की मुस्कराहट से शालीनता बिखरने लगती थी। बतरा की सज्जनता और निष्कपटता शराब पी सुकने के बाद ही ३ उभरती थी। उसे रिकार्डों का बहुत शौक था । पश्चिमी संगीत के बीच हिन्दुस्तानी का सिर्फ एक ही रिकार्ड उसके पास था, जिसे यह अवसर मुना करता था- शहर की रात और मैं नाशादो नाकारा फिरूं जगमगाती जागती सड़को पं आवारा फिरूं गैर की वस्ती है कब तक दर-य-दर मारा फिर ऐ गमे-दिल क्या करूं, ऐ बहाते-दिल क्या करूं... माज भी तिलक, मैं बतरा को याद करती हूं"'खास तौर से मुझे यह लाइन याद आती है जिसे दुहरा-दुहराकर वह व्याकुल-मा घूमता या-गर की बस्ती है कब तक दर-बदर मारा फिरूर की वस्ती - और उम गजल को वे लाइनें मुझे भी अब सालती हैं। जैसे-जैसे मैं उमर काटती जाती हूं मुझे उन लाइनों के अयं माफ होते दिखाई देते हैं । "मुबह आठ बजे में जिस बतरा को देखकर हिकारत से आखे फेर लेती थी.."उसीको मैं शाम को देखती तो मेरे दिल के किमी कोने में एक लगाव-सा हिलोरें लेने लगता, बहुत दिन तक मैं तम नहीं कर पाई फि बतरा के किस रूप को स्वीकार करूं और किसे नकार दू । पहले मुझे लगा था कि शायद उसने मुझे अच्छा-खासा देषकर नौकर रख लिया था। योर वह शायद किसी दिन प्यार की रगीनी से भरकर मेरे सामने आए में प्रतिकार के लिए हर तरह से तैयार थी पर बतरा कभी नही आया । हमेशा उसने काम की ही बात की। शाम को मेरे जाने के वक्त वह पलर से वापस भी नहीं आता था। मेरा काम था, फोन करनेवाली का नाम और पता नोट करना, जिसकी लिस्ट बनाकर मैं उसकी मेज पर छोड जाती थी, बम । सुबह वह दिसाई देता तो वात करती, पर तब उसे देखने को मैरा जी नहीं करता था। शायद आदमी की खूबसूरती उसकी बेहोशी में है, होश में आया हुआ आदमी वहा चलता-पुर्जा और छोटा लगता है। आदमियों को यही बेहोसी मुझे भाती है, तिलक ! जो आदमी गिन-गिनकर कदम रखता है, वह मुझे निहायत ओछा लगता है।...
एक दिन वारिश हो रही थी. 'वतरा को कार सात बजे ही आकर पोटिको में रुक गई। मेरा मन आशंका से घड़क उठा । कार से उतरकर वह सीधा मेरे पास आया और वोला--कोई फोन आया था ! मैंने कागज़ का परचा उसकी तरफ बढ़ा दिया। एक नज़र उसने देखा और बोला-~-मेरी मेज़ पर लगा दो। उसकी अनुपस्थिति में कमरे में जाते मुझे दशहत नहीं होती थी, पर उसके होते हुए, और जवकि वह खुद कमरे में जा रहा था, उसका यह कहना मुझे मतलव से खाली नहीं दिखाई दिया। साहस करके मैं भीतर चल दी। पर हर क्षण मेरी माशंका के चौकन्ने कान उसकी आहट सुनते रहे। और वह पीछे-पीछे आया। मैं विजली की तरह तड़क उठना चाहती थी, पर तभी सुनाई पड़ा.-मिस इरा, तुम अपने कमरे में अगर मेरा इन्तज़ार कर सको तो अच्छा हो । 'जाने लगो तो मुझसे पूछ लेना। हो सकता है आज कुछ देर तुम्हें रुकना पड़े। बंगले में कोई भी नहीं था । झाड़ियों की छायाएं रहस्य-भरी लग रही थीं। मैं कमरे में आकर चुपचाप बैठ गई । मन फिर भी शंकाओं से भरा था। बतरा ने अपना दरवाज़ा बन्द कर लिया, पर खिड़की पर पहरेदार की तरह घूमती उसकी परछाई साफ बता रही थी कि वह व्याकुल-सा चक्कर काट रहा है । सब कमरों में खामोशी थी। मैंने बाहर की बत्ती वुझा दी थी और चुपचाप लॉन में निकल आई थी। अंधेरे में वह दुमंजिला मकान लोहे की रापाट दीवारों का बना लग रहा था और बतरा के कमरे की दोनों रोशन खिड़कियां चौकोर आंखों की तरह लग रही थीं। घास सुप थी। झाड़ियों की छायाओं ने हरियाली को सोख लिया था । पिछवाड़े का सूखा पेड़ विशाल कंकाल की तरह बांहें पसारे पूरे मकान को समेट लेना चाहता था। और विजली के सीधे समांतर कसे हुए तार माथे पर पड़ी दुर्भाग्य की लकीरों की तरह अटल थे । आसमान सूना था और बतरा की परछाई छटपटाती आत्मा की तरह उस सीमेंट के संदूक में कैद थी। मेरा मन अकुला उठा 'काश, कोई फोन ही कर दे तो खामोशी का यह नागपाश विखर जाए ! या आसमान से कोई घुन्नाता हुआ हवाई जहाल ही गुजर जाए तागि तारोको और मौत की चुप्पी का यह आलम गूंज जाए लेकिन कुछ भी नहीं हुआ। दूर सडक से एक कार तक नहीं गुजरी । बसेरे को जाते हुए पक्षियों का कोई झुण्ड ऊपर से नहीं निकला। कुछ दूर सड़क पर लगा विजली का बल्व हो अगर एकाएक बुझ जाता तो अंधेरा फैलने से भी जिन्दगी का एहसास होता. "पर कुछ तो नहीं हुआ "वतरा को कैद परछाई ही अगर रकती तो भी शायद कुछ आवाज आती। कभी-कभी तेजी से भागती हुई सृष्टि भी एकदम रुकी- रुकी-सी लगती है, जैसे किसीने उसकी सास खीच लो हो.."तब किसी चीज़ का रुकना जिन्दगी का लक्षण बन जाता है, क्योकि उसके रुकते ही एक लय में भागने की मजबूरी कई स्वरो में चीखकर रुक जाती है... और मेरा मन हुआ कि मैं चीख पड़ ताकि सीमेट के सन्दूक मे कंद यह परछाई डरकर एक जाए, ताकि पिछवाड़े खडे कंकाल पेड को चाहें चरमराकर टूट जाएं और खिड़कियो की चौकोर रोगनी की आखें अधेरे डूब जाएं । लेकिन मेरी आवाग नहीं निकली। मैं डरी-सी घास पर बैठी रही.. और कई पल के बाद कैद परछाई की आवाज सुनाई दो-~- ओह गॉड ! ओह गॉड! अगर दुनिया में भावाजें न होती तो यह कितनी बदसूरत और वेरोनक होती! और मावाजों में अकेलेपन का दर्द न होता तो कितनी बेमानी और सूनी होती यह दुनिया ! अकेलेपन के दर्द में झिलमिलाती यादें न होती तो यह दुनिया कितनी उदास और घामोश होती! और झिलमिलाती यादों में कसक न होती तो क्तिनी सीमित और झूठी होती यह दुनिया "और अगर यह कसक न होती तो सदियो पहले किसी जर्राह ने दिल को मारमा का नाम दे दिया होता और मुट्ठी-भर गोश्त का वह टुकड़ा जिसका नाम आत्मा होता-मौत के साथ मर जाया करता। अच्छा हुआ कि ऐमा नहीं हुआ । नहीं तो यह कीमती दुनिया कभी हमारे हाथ न आई होती."और आत्मा की अकुलाहट को किसी मर्ज का नाम मिल गया होता और जैसे दिल की धड़कन का इलाज होता है वैसे ही शायद उसका भी इलाज होता.
ओह गॉड ! मोह गॉड ! ..'नावाज़ अभी भी आती है और कैद परछाई की आत्मा अकुलाती है । 'अव भी यही लगता है मुझे, खर"" मेरे जाने का वक्त हो गया था । पर मैं हिम्मत नहीं कर पा रही थी कि वतरा के पास जाकर कहूं."अब मैं जा रही हूं। इसी सोच में बैठी हुई थी कि वाहर वाले वरामदे की रोशनी जली और बतरा वाहर आया । भीगी हुई घास में मेरे कपड़े भी नम हो गए थे। देखते ही मैं उठ खड़ी हुई। पास आकर बतरा ने कहा-यहां आओ, मेरे साथ । और उसकी भरी-भरी उदासी के सम्मोहन से खिंची हुई मैं चली गई। कमरे में पहुंचकर वतरा ने एक तस्वीर की ओर इशारा किया-- इसे देखो। बड़ी खूबसूरत तस्वीर थी वह । सौन्दर्य से भरी-पूरी, पर बहुत सादा । ऐसा सौन्दर्य था उस महिला का जो मन को विभोर कर लेता है। हिचकिचाते हुए मैंने पूछा-यह आपकी पत्नी... वतरा विलकुल मुक्त होकर हंस पड़ा.. ओह गॉड ! क्या वकत हो ? और वह हंसता रहा । कुछ क्षण पहले सुने हुए मोह गॉड ओ स समय कहे हुए उसी शब्द में जमीन-आसमान का अन्तर था । वतन र क्षण मेरे लिए रहस्यमय होता जा रहा था। वह बोला-मैं नह नानता कि यह किसकी तस्वीर है."सचमुच नहीं जानता । दंगों में ज रावलपिण्डी से भागा था तो लाहौर स्टेशन पर कत्ल किये गए लोगों सामान के बीच धूप में इसका चौखटा चमकता नजर आया था । त मैंने इस तस्वीर को देखा था और देखता रह गया था. वहीं से, मौत घाट उतरे लोगों की वतीर यादगार, में इसे किसी तरह लेता आय इसका चौखटा सोने का है, यह यहां पहुंचने पर पता चला। मा नहीं, लानेवाला इसे इस कीमती चौखटे के लिए ला रहा था या तर के लिए .. मैं इसे उठा ही लाया। यह मेरे पंजाव की तस्वीर है मेरी मां से भी बहुत मिलती है, बीवी से भी और बहन से भी.. मैं चुपचाप सुनती रही। एकटक उधर देखने से वाद वह ए वोला-तुमसे भी बहुत मिलती है यह तस्वीर ! ४० मैं सकुचाकर रह गई। युछ समझ ही नही पाई कि क्या जवाब दूं... और दिन यू ही गुजरते गए... विमल इस बीच वैतरह टूट गया था । उसका व्यवहार कभी-कमी बहुत रूया हो जाता था। वह एक ही बात कहा करता या–अब इन क्लासिकल नाटकों से काम नहीं चलेगा, हमें कुछ और करना होगा." मेरी समान में नहीं आता था कि वह 'कुछ और क्या करना चाहता या? कभी-कभी वह पंसेवालों के पास अनुदान के लिए भागता था, कभी कहीं अर्जी देता था पर जैसे नाटक वह करना चाहता था, उनके लिए कही से मदद नहीं मिल रही थी। हमारा ट्रप बिखर गया था "वह सचमुच बहुत अकेला रह गया था। हारकर वह फैक्टरियों के ड्रामेटिक क्लयों के माथ दशहरे-दीवाली पर रामलीला तक करने लगा था... परिवार नियोजन के लिए प्रचारवादी ड्रामों में हिस्मा लेने लगा था. और यह सब करते हुए वह बुरी तरह से पराजित हो गया था ''इसी बीच उसके कुछ नये दोस्त बने थे, जो घर पर जमा होते थे। वे सब न जाने कहां-कहां की बातें किया करते थे। मेरी समझ में ये बातें नहीं आती थी। सत्ता, सरकार, पूजीवाद, दोपण और अर्थव्यवस्था की। वर्ग- संघर्ष की। और एक दिन विमल मुझे अकेला छोड़कर कहीं चला गया ।... अपनी पराजय और अकुलाहट को लिए हुए। कई वरस उसका पता ही नहीं चला । फिर मालूम हुआ कि वह आध्र में मातिकारियों के साथ है और वही कही पकडा गया है । तिलक ! सूबसूरत और मासूम तस्वीरें सोने के चौखटो मे बन्द हैं, कुछ करके जीने की चाह रखनेवाले कुत्तो की तरह इधर-उधर भटक रहे हैं या पकड़े जा रहे हैं और ऊपर गॉड का साया है जो शराब पीकर शराफत से घूम रहा है। वतरा के यहां मुझे नौकरी दिलवाकर विमल स्वयं अपने में पछताता रहा था । क्योंकि मेरे नौकरी कर लेने के बाद वह खुद सोच कि .
सिर्फ फोन रिसीव करने के लिए किसीको नौकर रखने की क्या जरूरत हो सकती है? अगर रखा भी जाए तो चार सौ रुपये वेतन के क्यों दिए जा रहे हैं ? कभी-कभी विमल से मेरी लड़ाई भी होती थी, इसी बात को लेकर, और वह मेरी खाट से उठकर चला आया करता था। दो-दो दिन हम नहीं बोलते थे, पर बाद में किसी बात पर वह तरल हो जाता था और मुझे प्यार से पकड़कर गलती मान लिया करता था। तिलक ! मैं गवाह हूं इस बात की, कि जब आदमी का विश्वास टूटता है, तो वह दृश्य कितना दारुण होता है । मैं शुरू-शुरू में समझ ही नहीं पाई थी कि विमल के भीतर कौन-सा ज्वालामुखी उबल पड़ने के लिए मचल रहा था । एकांत क्षणों में वह मुझे समझाता था। अकेले नाटक कैसे जी पाएंगे? इसके लिए पूरी सांस्कृतिक हवा का बदलना जरूरी है. 'जब तक लोगों के रुझान नहीं बदलेंगे, नाटक सफल नहीं होंगे. लोगों को हंसाने और उनकी शामें रंगीन करने के लिए मैं कर तक इन घटिया नाटकों से घिरा रहूंगा' 'एक तरफ वह यह बातें करता था और दूसरी तरफ वह इस बात को लेकर भी दुखी था कि मुझे नोकरी करनी पड़ रही है। वह मुझपर ऐकांतिक अधिकार चाहता था.। मुझे वह कभी-कभी बड़ी अजीव नजरों से देखता था."वतरा के बारे में जान- बूझ कर वह मुझसे कभी कुछ नहीं पूछता था और उसका यह न पूछना ही बहुत खतरनाक था. अब मुझे लगता है कि उन दिनों निश्चय ही उसके मन में बार-बार यही वात उठती थी कि मैं वतरा के साथ किसी समझौते पर पहुंच गई हूं। अपने शक के बावजूद वह मुझे बरदाश्त करता था। हर सातवें-आठवें रोज़ वह झगड़ पड़ता था, बिना किसी बात के, और फिर अपने आप ठीक हो जाता था। लेकिन उन दिनों मैंने देखा-वह अन्तर्मुखी होता जा रहा था और जान-पहचान वाले सभी लोगों को शक की निगाह से देखता था। हर उस व्यक्ति की, जिसकी उसने पहले कभी तारीफ की थी, वह बुराई करने लगा था. फिर भी इतना बुरा नहीं था यह सब, पर उसका विश्वास लगातार टूटता जा ४२ रहा था। एक बार उसने नाटक करने की पूरी तैयारी की-दिन-रात कापियां बनाता रहा, सेट डिशाइन तयार करता रहा और प्रकाश- व्यवस्था के बारे में सोचता रहा, पर लोगों ने उसे वचन देकर भी सहारा नही दिया वह हताश हो गया। बीमारी की तरह दिन-दिन-भर वह पड़ा रहता । और रात को जब मैं लौटती तो उसे उदास देखकर बहलाने की कोशिश करती. "कुछ देर बाद वह मेरे शरीर की ओर चाहत से देखकर हंसने मुस्कराने लगता । उसके मन पर जमा हुआ अवमाद और पराजय जैसे कुछ-कुछ हटने लगती-~-कुछ घंटो के लिए विमल पहले सा सुदर, मुक्त और प्रपर लगता । हम साथ-साथ लेटे हुए फिर सपने वुनते और यह उम्मीद करते कि अंत मे हमे मफलता मिलेगी। पर यह बहुत अजब बात थी कि उन दिनों उसकी भावनाओ का जोश, कल्पना की प्रसरता और यात्मविश्वास सिर्फ उन क्षणो में ही मरता था, जो मदहोशी के होते थे। शायद तब उसका समन पौरुप सार्थकता पाने के लिए मच- लताथा.. जो और जितने भी थे, पर वे क्षण बहुत कोमती थे-शरीर की प्यास के नहीं, यात्म-विश्वास के ! हम दोनो अपनी स्थितियों से पूरी तरह परिचित होते हुए, अपनी कंटीली सीमाओं को समझते हुए भी ऐमी योजनाएं बनाते थे, जो पूरी होनी मुश्किल नहीं दिखाई देती थी... हमारे घर के सामने एक सेमल का पेड़ था। वह पेड़ आज भी मेरी स्मृति में उलझा हुआ है। उसके तने पर काटे थे"ऊंचाई बहुत थी उसकी, और सुती हुई वाहे थाममान की नीली पृष्ठभूमि पर फैली हुई थी और शाखों में मासल लाल फूल थे। विमल जय सपनो की बातें बडी गंभीरता और जोर-शोर से करता था तव उसकी वाहे भी सेमल को वाहों की तरह मजबूती से फैली होती थी."उसके शरीर पर पसीने के काटे उभर आते थे और मैं मुग्ध-सी देखती रह जाती थी-एकदम सम्मोहित ! मन होता था उन मजबूत 1 वाहों के विस्तार में मैं फैल जाऊं और पसीने के सर्व कांटे मेरे शरीर में दहकते दंश की तरह विध जाएं और मांसल लाल फूल मेरे शरीर से खिल उठे... लेकिन विमल को भी वे ईमानदारी-भरे क्षण कभी-कभार ही मिलते थे। विश्वास के वे क्षण उसके पास भी कम होते जा रहे थे। वह खुद मजबूर था । दिन-ब-दिन उसका मन शंकालु होता जा रहा था। अब वह बड़ी मुश्किल से किसी भी वात को सच मान पाता था। विमल जैसा आंख मूंदकर बात मान लेने वाला आदमी अव खुली आंखों देखते हुए भी किसी बात पर एकदम विश्वास करने को तैयार नहीं होता था।.', वतरा के बंगले के आस-पास वह चक्कर काटता, और मुझसे अपने मन के चोर को छिपाता था। महं उसका इतना बड़ा था कि चाहते हुए भी वह मेरे सामने एकदम खुल नहीं पाता था। मैं जव आठ बजे काम खत्म करके बस से लोटती तो एकाध बार वह मुझे वहीं आस-पास मिल गया। जहां तक मुझे पता था, उस वस्ती में उसका कोई दोस्त भी नहीं रहता था। पर वह झूठमूठ उघर आने का कारण वता ही देता था। पहले तो मैं नहीं समझो पर जब वह मेरे घर पहुंचने के घंटे-आध घंटे वाद पहुंचने लगा तो मुझे यकीन हो गया कि विमल निश्चय ही अपनी घुटन और मानसिक असंतोष के कारण बतरा के बंगले की ओर रोज़ जाता था। उसकी नाकामी और असंतोष ने क्या-क्या रूप लेने शुरू कर दिए थे.! एक दिन मैंने उसे अपने पीछे-पीछे माते देख ही लिया, पर यह जानने के लिए कि वह क्या करता है, मैं अनजान की तरह चलकर बस-स्टाप पर रुक गई । वह एक पेड़ के अंधेरे में तव तक खड़ा रहा, जब तक वस में चढ़कर मैं चली नहीं आई। और उस दिन भी वह हमेशा की तरह एक घंटा देर से घर आया। मैंने पूछा-कहां चले जाते हो, विमल ? तो उसने वही पुराना जवाब दे दिया-मैं चांदनी चौक गया था। मन में आया, कहूं कि सुन्दर नगर में अभी एक घंटा पहले कौन घूम रहा था? पर उसको घुटन इतनी भारी लगती थी कि मैं कुछ भी नहीं बोल पाई। विमल का इस तरह घुटना और अपने को सताना मुझे बहुत दुःख देता था। मन में माता या कि नौकरी छोड़ दूं तो विमल के दिल-दिमाग पर कुण्डली मारकर बैठा हुआ यह घोर संशय का सर्प शायद मर जाए। पर जिन्दगी बडी जालिम है। नौकरी छोड़ने का मतलब था भूखों मरना। मेरे डंडी इस बीच दो बच्चों वाली उस पूवसूरत विधवा से शादी कर चुके थे । और ऊधमपुर छावनी में पोस्टेड घे"यह मुझे मालूम पड़ा था, पर मुझे अव लेना-देना क्या था. कभी-कभार मन में कुछ आता भी था, तो वह भी उनके शादी कर लेने के बाद समाप्त हो गया था। विमल की उदासी से मेरी हिम्मत टूटती थी। उसकी आंबी मे जो सपने धीरे-धीरे दम तोड रहे थे, मुझे बडी पीडा देते थे, पर मेरे पास कुछ भी ऐसा नहीं था कि मैं उसके लिए कुछ कर सकती। मन, आत्मा और दारीर उस समय एकदम झूठे पड जाते हैं जब आदमी के पास काम नहीं होता । रावकी निरर्थकता सामने आने लगती है । आत्मा की उन्मुक्त उड़ान, मन का सौन्दर्य और शरीर का अवाघ उपभोग तभी ताकत देता है जब व्यक्ति के पास कुछ करने को होता है । बतरा के घर के चारों ओर रात के आठ बजे तक भकुला-अकुला- कर चक्कर लगाते हुए विमल की छाया मुझे अब भी दिखाई पड़ती है । आदमी छायाओं मे बदलकर कितना दुःस पाता है"वतरा की छाया, और उसके याद उसी तरह भटकती विमल की छाया. , और एक दिन बेहद हताश होकर विमल यम्बई चला गया। वहां से सिर्फ तीन लाइनों का खत मुझे मिला था-इरा, मैं घबराकर यहा चला आया हूं। जल्दी ही माऊंगा, तुम तैयार रहना, यहां ठीक होते ही तुम्हें भी बुला लाऊंगा.. बम। वर्ग: पर तिलक ! यह तुम्हारी दुनिया बहुत शमीनी बगर आदमी के रह ही नहीं सकती।.."चाहे उसके या भाई, या वाप । कोई न हो तो नौकर ही हो। पर मादमी की छाया जनर चाहिए। यह विधान कैसा है ? तुम इसे नहीं समझ सकते, क्योंकि तुन औरत नहीं हो । पर मैंने वड़ी गहराई से यह महसूस किया है। किसी भी मादमी की आड़ में चाहे वह आदमी काठ का ही हो... अच्छी-से-अच्छी और दुरी-से-बुरी जिन्दगी शान से चल सकती है, पर वगैर आदमी के न वह अच्छी जिन्दगी जी सकती है और न दुरी। इसलिए हर लड़की एक कवच ढूंढ़ती है-वह चाहे पति का हो, भाई या वाप या किसी झूठे रिश्तेदार का। इस कवच के नीचे वह अच्छा या बुरा हर तरह का जीवन विता सकती है। उसे पहनने के लिए जैसे एक साड़ी चाहिए वैसे ही यह कवच भी चाहिए । विमल के जाते ही मैं नंगी हो गई थी। और बहुत सोचने-समझने के बाद मुझे बतरा से ही कहना पड़ा, कुछ मजबूरियों के कारण अब मैं वहां नहीं रह सकती जहां रहती आ रही थी 'अगर कुछ दिन के लिए आप मुझे एक कमरा दे दें तो सुविधा होगी। एकाध महीने में मैं इन्तजाम कर लूंगी। बतरा ने इनकार नहीं किया। मैं सामान उठाकर उसीके फ्लंट में पहुंच गई। साथ में नाटकों की कितावों का एक पुलिंदा था, जिन्हें विमल ने इकट्ठा किया था। वह मेरी सबसे बड़ी घरोहर थी। विमल ने मेरी मजबूरी को नहीं समझा । मैंने सव समझाते उसे खत लिखा था कि क्यों मुझे बतरा के यहां आना पड़ा । पर विमल कुछ भी नहीं समझ पाया । न फिर वह लौटकर आया, न उसने मुझे कोई खत लिखा। उसका भ्रम उसे खा गया। । वहुत देखा और बहुत सहा है मैंने, तिलक! लोग आत्मा की बात करते हैं, पर तन पर ऐकांतिक अधिकार चाहते हैं. ऐसा अधिकार जो उनकी वासना की घड़ी के मुताबिक चलता है। रात को दो वजे उठा- कर वे एकाएक प्यार-भरी बांखों से देखने लगते हैं। भरे बाजार में चलते-चलते वे चार जरूरी काम छोड़कर एकदम घर लौट सकते हैं या ४६ घटयती धूप में गरमी की बात करते-करते वे आत्मिक मिलन का दाशं- निक आधार समझाते हुए नितात भौतिक स्तर पर उतर सकते हैं। उनके लिए बुरी-से-बुरी औरत एक क्षण में पूरी तरह अच्छी बन सकती है, अगर वह उन्हे समर्पित हो जाए। पाप और पुण्य के ये मूल्य समांतर चलते हैं। इनमें कोई विरोध नहीं है । अगर विरोध कही है तो धर्म और आचरण की पोथियों में या ऐकांतिक अधिकार प्राप्त न कर सकने वाले व्यक्ति को दूपित और कुण्ठिन मानसिक गुजलको में। आज मैं किसी के लिए निहायत पुरी औरत हो सकती हू, तिलक ! पर अगर उसीको अपना तन दे दू तो बहुत अच्छी हो जाऊंगी। चार दिन बाद वह मुझसे छिटककर अलग जा सकता है, पर फिर कभी मुझे दुरा नहीं कहेगा, बल्कि अपने अह में चूर होकर दया देने की कोशिश करेगा। वह मेरा मसीहा बनने की कोशिश करेगा, क्योकि तुम्हारे इस समाज में हर आदमी कुछ करने आता है और हर औरत युछ भोगने आती है। इसी लिए हर क्वारी मा की कोख से तुम्हारे प्यार-भरे पापों ने जबरदस्ती संतानें पंदा की हैं और उन संतानों को तुमने पैगम्बरों का दर्जा दिया है। घर, मैं रो में बहकर बहुत कुछ कह जाती हूं.""पर तुम पहले आदमी हो तिलक, जिससे मैं अपने मन की कुछ बातें कह पा रही हू, कितना बनकहा रह जाता है, ऐसा-जो किसी से भी नही कहा जा सकता । अकेलापन यही से पैदा होता है। कहने की अकुलाहट जब मुह नही खोल पाती तो भीतर-भीतर घुमड़ती है । आग कोल्हाई के रास्ते की इस घाटी मे मैं तुमसे कुछ कहने की कोशिश कर रही हूं ताकि मेरा यह अकेलापन टूट सके । मैं जानती है कि तुम्हारी नजरों में इस वक्त बहुत गिर गई हू, पर क्या करूं, कभी- कभी अपने को नीचे गिराने में भी रस आता है । आदमी वह सब भी अपने से जोड़कर यह डालता है जो उसने कभी नही किया, जिसे वह गलत समझता है और शायद जिसे वह कभी नहीं करेगा। ।
और ऐसी ही भटकी-भटकी तमाम बातें करती रही इरा । कुछ दे के लिए हम दोनों ही खामोश हो गए थे । घाटी में सुबह होने वाले थी। चारों तरफ के पहाड़ और जंगल एक परकोटा वनाए हुए थे जो हम दोनों उसके अकेले वाशिदे थे। जब कभी बातों में खामोशी आत तो कोल्हाई के पानी का शोर उभरकर ऊपर ना जाता। बदन कुछ कुछ भारी हो रहा था । हमें यह खयाल ही नहीं रह गया था कि सुबह उठकर कोल्हाई ग्लेशियर जाना है। शायद इरा ग्लेशियर जाने के लिए आई भी नहीं थी। यह तो घूमने का बहाना-भर घा, अपने मन को तसकीन देने का एक तरीका। उसने अपने बाल खोल लिए थे और उस चट्टान पर बांह का सहारा लेकर लेट-सी गई थी। मैंने कहा, नींद आ रही हो तो डाक बंगले में चलें। वह बोली- मुझे नींद कहीं भी नहीं आती। जव मन या तन से थक जाती हैं तभी पलकें भारी होती हैं। आज तो मन का बोझ हलका, कर रही हूं तिलक । आज के वाद ज्यादा से ज्यादा यही होगा कि तुम मुझसे दूर चले जाओगे और मेरी कहानी अपने दोस्तों को सुनाजोगे।''कभी मुझे अच्छा समझोगे या बुरा । कभी ठीक समझोगे या गलत । लेकिन तुम्हारे समझने से न मेरा भला होगा और न वुरा । हां, शायद मैं वाद में पछताऊं कि तुमसे मैंने क्यों यह सब कहा। यही तो धरोहर है मेरी, जिसे मैं अपने पास रख सकती थी और नाज तक रखे लेकिन तुम मुझे एक मुसाफिर की तरह ही मिले हो । मैं नहीं जानती कि जिन्दगी में तुम्हारी क्या जिम्मेदारियां हैं बोर क्या विचार हैं ? मुझे उनसे कुछ लेना-देना भी नहीं। बहुत सोचकर शिझकते हुए मैंने इरा से पूछा-सोलंकी को कैसे जानती हो? इरा खिलखिलाकर हंस पड़ी। पीठ पर पड़े रेशमी चाल सरसराने लगे और उसके चेहरे की एक-एक रेखा हंसते हुए उभर बाई । उसके ओंठों में जैसे रस भर आया और नक्श तीते हो गए। पहली बार हनी थी इरा इतने खुलेपन से । मैं उसकी हंसी की आवाज को थी।... ।
पीता रहा और एकटक उसके बेहद खूबसूरत चेहरे को ताकता रहा। इरा के रूप के फई पहलू ये "कुछ को मैंने देखा या और कुछ शायद और देख पाता... मेरे सवाल पूछने से वह खिलखिलाकर हंसी थी. "रसवंती इरा ! हंसते-हसते उसके अग-अंग में रस भर आया था । अंगों को चिकनाहट बढ गई यो कानो की लवें गुलाबी कोपल की तरह नरम और गुदारी हो आई थीं। फैले हुए ओठो से पडती लकीरो ने गालो को अछूती- अनदेखी नरमी से भर दिया था । उसको बोहे केले के पुलते हुए पात को तरह कोमल हो गई थी और उंगलियां रूई की बनी लग रही थी, जिनमें नाखूनों की जगह गुलाब की लम्बी पसुडिया चिपकी हुई थी। आंसों की पलकें नरम सीप की तरह थी और कानो के पास वालो की लट सेम के अंकुर की तरह लिपटी हुई झिझक रही थी। उसके शरीर के अंग-अंग, पोर-पोर में जैसे लाखों-करोड़ों गोरी गोरी कोंपलें विकसित हो आई हों.."भीतर लाखों रसस्रोत फूट पड़े हों और उनकी गंध-धार ओंठों के तट तक आफर भीतर-भीतर लोट जाती हो। गीले तटों से ओंठ और आंखो के पारदर्शी पानी में उन लहरों की पड़ती हुई प्रतिच्छाया "तन की घुमड़ती लहरियो से मासल गहराइयों मे पड़ती हुई मंवर ! कमर के ऊपर भंवर नाभि की परिधि में पड़ती सपिल मासल लहरें । और अथाह गहराइयों की तरह परपराता हुआ रस-प्लावित सागर शरीर "सचमुच उस क्षण वसंती रसवंती थी इरा... और उसके रूप का वह रुख'जो डल पर चश्माशाही की पहाड़ियों को देखते हुए उभरा था, जब भीगो आग में जलते हुए मैंने उसकी पूड़िया सरकाने का उपक्रम करते हुए उसके शरीर पर पहली बार हाय रखा था. उसकी यही चिकनी त्वचा तनाव से भर गई थी। शरीर का सारा रस जैसे निचुडकर भीतर समा गया था। उसका रोम-रोम भर आया था। माखों में नीलापन भरने लगा था और ओठों पर मादक सूखापन या था, जैसे रसधार भीतर समा गई हो और तटों की किनारियां । हो गई हों। सौन्दर्य के बिखरने में भी एक अद्भुत सौंदर्य होता - पतझर का सौन्दर्य । वैसी ही थी इरा उस दिन। माथे पर वालों लटें रस-रिक्त वन-घास की तरह हिल रही थीं। जैसे पतझर में दूर- र के दृश्य साफ हो जाते हैं, दृष्टि की सीमा बढ़ जाती है, उसी तरह रा के पतझरे-तन की एक-एक टहनी साफ थी और आंखों का नीला- काश दूरियों तक खुल गया था. पतझर के रूखे वैभव की तरह था इरा का सौन्दर्य.. उसके शरीर में गरम हवाओं की सनसनाहट थी और शब्द उड़ते पत्तों की तरह वोल रहे थे । उसके वालों की फिसलन में सूखी घासों से बहती हवा की उदास आवाज़ थी, और झील के पानी में आग लगी हुई थी। और रोशनी में झिलमिलाते उस पार्क में.. जब मैं उसके साथ एक अंधेरे कोने में रेलिंग के सहारे खड़ा था." नीली झील का पानी छिटक रहा था "जब मैंने अपने ओंठ इरा के हे के नीचे रख दिए थे और धुले हुए केशों की भीगी-भीगी ठंडक लकों से आंखों में उतर गई थी, तब इरा की पलकें नम हो आई थीं और उसके भीतर हुई वरसात का भीगापन पूरे शरीर के रंध्र-रं में समा गया था पीठ की मांसल चट्टान गीली हो आई थी.'लार की किनारियां नमी से चिपक गई थीं। ओंठ धुले-धुले-से हो गए और वरोनियां भीगकर कोमल कांटों की तरह नुकीली हो गई थी वालों के उड़ते हुए रेशमी रोएं माये और कनपटियों पर चिपक गए वह जैसे वारिश में नहायी हुई खड़ी थी आंखों में बादल रहे थे और उसके पसीजे शरीर में धीमे-धीमे विजली की चुम शक्ति दौड़ रही थी, जो हल्के-से हाथों को जगह-जगह रोकती भाप की शीतलता-भरी नम गरमाहट थी उसके तन में, जो पा को भी नमी से भर देती है। और जैसे वरसात में नहाकर नाता है, वैसा ही मादक खारा स्वाद ओंठों में रिसकर रह गर उसका अंग-अग बरसाती वादलों की तरह घुमड़ रहा या सौर पूरे शरीर पर नीलम परछाई चमक रही थी." बादल-भीगी इरा। उमके चारों ओर भीगी वन-घास की गंध उड़ रही थी। स्निग्ध शीतलता के ज्वार उमड रहे ... । और उसके सौंदर्य का चौथा रूप तब देखा था जब वह सोलंकी पर विफर उठी थी।... जय उसका अग-अंग पलाश फूलों-सा दहक उठा था और उसकी देह की चमक विछलती धूप की तरह चौधिया रही थी। उसके भीतर का शीशा एकाएक झनझनाकर टूटा था और उसकी किरची से विधा इरा का शरीर चकमक कर रहा था। आंखों में आग जल रही थी । मोठ अंगारों की तरह दहक रहे थे... मुख के उठे हुए हिस्से उस भाग को तपिश से तावे की तरह दमक रहे थे। फंघों से नीचे आई हुई वालो को लटें छाती पर नीली लपटों की तरह मचल रही थी। कानो की लवें जैसे उस गरमी मे पिघलकर वूद की तरह घू पड़ने के लिए और गोल हो रही थी। और उसके शब्द बाग में चटखती वही चिनगारियों की तरह बिखर रहे थे। ल-मरी दोपहरी की तरह सुनसान था-उसका तन और मन । भीतर गरमी में मब जल गया था और... इरा उस पोखले पेड की तरह खड़ी रह गई थी, जिसके तने में बनजारे आग लगा देते हैं और वह भीतर-भीतर जलकर भी जड के सहारे खड़ा रह जाता है। उसकी बांहों की नीली नसें चमक आई थी. और गरदन से पसीने की वू ऐमे ढरक रही थी जैसे शमा की शिखा के नीचे गरम मोम पिघलकर ढरकता है। गरमी की दोपहरी की तरह अकेली भरती हुई इरा ! अग्नि में दहती इरा। ...और इन रूपों के भी कई-कई स्तर हैं, जो मेरी नजरों के सामने घूम रहे हैं । कैसे बयान कलं, यह मेरी समझ में नहीं आता । प्रकृति के रूप हो सकते हैं, सब उसमें छिपे थे। उसकी कोमलता, कठो- पता, नीरसता और मस्ती-सभी कुछ उसमें था। सामने वह खुलती चली गई थी।" फसोस इतना ही था कि सव-कुछ बता चुकने के बाद उसने भारी से रूखी आवाज़ में कहा था-~-अभी भी कुछ ऐसा बाकी है जो मैं नहीं बता सकती, शायद किसीको नहीं बता सकती... हर जिन्दगी में ऐसा कुछ ज़रूर रह जाता है जो कहीं भी, किसीके ने नहीं खुलता, आदमी के साथ दफ्न हो जाता है । सबके बारे में बात करते हुए भी इरा उस विमल को नहीं भूल ई थी, सोलंकी के बारे में पूछते ही वह हंसी थी। हंस चुकने के बाद सने बताया था-सोलंकी से मेरी मुलाकात वहीं वतरा के साथ एक बार हुई थी, वोल्गा होटल में ! ... वतरा के बारे में भी इरा बहुत कुछ बताना चाहती थी। उस क्षण उसने सोलंकी के बारे में इतना ही और कहा था-उसके बारे में बात मत करो, नहीं तो नींद टूट जाएगी बेचारे की।-अच्छा-खासा सो रहा होगा। फिर बोली-बतरा का पेशा था एक खूबसूरत बंगला रखना, एक कार रखना, फोन रखना और क्लबों में जाना । क्लबों में वह रातें गुजारता था । बड़े-बड़े अफसरों से जान-पहचान करके, उन्हें खिलापिलाकर वह अपनी नेकी को कुएं में डाल देता था । पोकर खेलने का बहुत शौकीन था बतरा । एकाध वार जव उसने मुझसे पूछा- पोकर जानती हो ? तो मैंने इनकार कर दिया था। उसने कभी बताया भी नहीं कि कैसे खेला जाता है। फोन रिसीव करते-करते बतरा पेशे का राज़ खुल चुका था। जिन नेकियों को वह कुएं में फेंक चुने होता था, उसे सब याद रहती थीं और वक्त पड़ने पर वह उनमें से ए एक को निकाला करता था। जो फोन में रिसीव करती थी, उन्ह काम वे नेकियां आती थीं। बतरा अपने इन रसूखों को बड़े-बड़े मसले हल करने के काम था। उसका यही पेशा था-सरकारी अफसरों से दोस्तियां गा व्यापारियों तथा अन्य जरूरतमंदों का काम करवाना। चं स ५२ पचास हजार के नीचे का काम करना वह अपनी तौहीन समझता था। इसीलिए पहे-बडे व्यापारियो या उनके प्रतिनिधियों के फोन बराबर आते रहते थे । बतरा वक्त तय करके उनके लिए दौड़-भाग करता या और सौ में नव्वे काम बन ही जाते थे। सेक्रेटरियो की वोवियों और प्रेमिकाओं से भी उसके अच्छे सम्बन्ध थे और उसे लोगो को कमजोरियों का भी अहमास था । क्लयों में जाकर अच्छे से अच्छे सम्बन्ध बनाना और तीन-चार हजार रुपये महीने खर्च करना ही उसकी लागत थी। मेरे यहां काम करते हुए उसने चालीस-पचास व्यापारियों के काम निकाले ये-किसीको टेके मिलने थे, किमीको हिसपोजल का सामान सस्ते में उठाना था, किसीको लाइमस की जरूरत थी और किसीको इम्पोर्ट की मुविधाओं आदि की। अपना मुल्क ऐसा है जिसमें हर काम मुश्किल से होता है। अपने यहां अगर कोई काम आसानी से होता है तो वह है वच्चो की पैदाइश । इसके अलावा हर काम में रुकावटें हैं, हर कदम पर मुश्किलें हैं । और इन मुश्किलों को वह हल कर सकता है जो सबकी नस जानता हो । नस पहचानने में बतरा का जवाब नहीं था। उसका आकर्षक व्यक्तित्व और रहन-सहन को चमक-दमक के साथ खुली हुई जे उसकी बहुत सहायक थी। जरूरतमद व्यापारियों से उसका कमीशन तय हो जाता था। यही या उमकी आमदनी का जरिया । यों चतरा हरफनमौला था, दुनिया की सारी बातों का नपा-तुला ज्ञान उसे या । राजनीति और दर्शन से लेकर रूई के बाजार-भाव तक की खवर उसे रहती थी। अस. बार को वह दीमक की तरह चाटता या । बतरा की आमदनी किसी भी महीने में आठ-दस हजार से कम नहीं रही थी और वह बड़े-बड़े लोगों के बीच प्रिंस की तरह घूमता था। बहुत मजीव लगता था मुझे वतरा। एक रात वह जल्दी ही क्लय से वापस माया। उसके आने के आधे घंटे वाद ही एक टैक्मी भी आई। टैक्सी का सामान जब उतर रहा था, तभी मैंने खिड़की से देसा, एक सूबसूरत औरत उसमें से उतरी बतरा । रूप हो सकते हैं, सव उसमें छिपे थे। उसकी कोमलता, कठो- पता, नीरसता और मस्ती-सभी कुछ उसमें था। सामने वह खुलती चली गई थी। फसोस इतना ही था कि सब-कुछ बता चुकने के बाद उसने भार से रूखी आवाज़ में कहा था-अभी भी कुछ ऐसा बाकी है जो नहीं बता सकती, शायद किसीको नहीं बता सकती... हर जिन्दगी में ऐसा कुछ ज़रूर रह जाता है जो कहीं भी, किर्स ने नहीं खुलता, आदमी के साथ दफ्न हो जाता है। सवके वारे में बात करते हुए भी इरा उस विमल को नहीं भूल ई थी, सोलंकी के बारे में पूछते ही वह हंसी थी। हंस चुकने के बाद सने बताया था-सोलंकी से मेरी मुलाकात वहीं वतरा के साथ एक बार हुई थी, वोल्गा होटल में ! ... वतरा के बारे में भी इरा बहुत कुछ बताना चाहती थी। उस क्षण उसने सोलंकी के बारे में इतना ही और कहा था-उसके बारे में बात मत करो, नहीं तो नींद टूट जाएगी बेचारे की।-अच्छा-खासा सो रहा होगा । फिर वोली-बतरा का पेशा था एक खूबसूरत बंगला रखना, एक कार रखना, फोन रखना और क्लबों में जाना । क्लबों में वह रातें गुजारता था । बड़े-बड़े अफसरों से जान-पहचान करके, उन्हें खिलापिलाकर वह अपनी नेकी को कुएं में डाल देता था । पोकर खेलने का बहुत शौकीन था वतरा । एकाध बार जब उसने मुझसे पूछा- पोकर जानती हो? तो मैंने इनकार कर दिया था। उसने कभी बताय भी नहीं कि कैसे खेला जाता है। फोन रिसीव करते-करते बतरा पेशे का राज़ खुल चुका था। जिन नेकियों को वह कुएं में फेंक चुर होता था, उसे सब याद रहती थीं और वक्त पड़ने पर वह उनमें से ए एक को निकाला करता था। जो फोन में रिसीव करती थी, जन काम वे नेकियां आती थीं। वतरा अपने इन रसूखों को बड़े-बड़े मसले हल करने के काम था। उसका यही पेशा था-सरकारी अफसरों से दोस्तियां ग व्यापारियों तथा अन्य जरूरतमंदों का काम करवाना। च है ५२ पचास हजार के नीचे का काम करना वह अपनी तौहीन समझता था। इसीलिए बड़े-बड़े व्यापारियो या उनके प्रतिनिधियों के फोन वरावर आते रहते थे। बतरा वक्त तय करके उनके लिए दौड-माग करता था और सौ में नये काम बन ही जाते थे। मेक्रेटरियो की बीवियो और प्रेमिकाओ से भी उसके अच्छे सम्बन्ध थे और उसे लोगो की कमजोरियों का भी अहसास था । पलवों में जाकर अच्छे से अच्छे सम्बन्ध बनाना और तीन-चार हजार रुपये महीने खर्च करना ही उसकी लागत थी। मेरे यहा काम करते हुए उसने चालीम-पचास व्यापारियो के काम निकाले थे-किसीको टेके मिलने थे, किमीको हिसपोजल का सामान सस्ते में उठाना था, किसीको लाइसेंस की जरूरत थी और किसीको इम्पोर्ट की सुविधाओं आदि की। अपना मुल्क ऐमा है जिसमे हर काम मुश्किल में होता है । अपने यहां अगर कोई काम आसानी से होता है तो वह है बच्चो की पंदाइश । 'इसके अलावा हर काम में स्कावटें हैं, हर कदम पर मुश्किलें हैं। और 'इन मुश्किलों को वह हल कर सकता है जो सवको नस जानता हो । नस पहचानने में बतरा का जवाब नहीं था। उसका आकर्षक व्यक्तित्व और रहन-सहन को चमक-दमक के साथ खुली हुई जेवें उसकी बहुत सहायक थी। जरूरतमद व्यापारियों से उसका कमीशन तय हो जाता था। यही था उसकी नामदनी का जरिया । यों बतरा हरफनमौला था, दुनिया की सारी बातों का नपा-तुला ज्ञान उसे था। राजनीति और दर्शन से लेकर रूई के बाजार-भाव तक की खबर उसे रहती थी । अख. यार को वह दीमक की तरह चाटता था। बतरा की आमदनी किसी भी महीने में आठ-दस हजार से कम नहीं रही थी और वह बड़े-बड़े लोगो के बीच प्रिंस की तरह घूमता था । बहुत अजीब लगता था मुझे बतरा। एक रात वह जल्दी ही क्लब से वापस आया । उसके याने के आधे घंटे बाद ही एक टैक्सी भी आई। टक्सो का सामान जव उतर रहा था, तभी मैंने खिडकी से देसा, एक खूबसूरत औरत उसमें से उतरी....
ने उसे लपककर रिसीव किया और अपने कमरे में लेकर चला गया। नौकर ने उसका सामान भीतर वाले कमरे में पहुंचा दिया था। रात बड़ी देर तक बतरा के कमरे से हंसने-हंसाने की आवाज़ आती रही। आधी रात के बाद जब मेरी आंख खुली तो मैंने देखा-लॉन में दोनों जने बैठे थे। बतरा पीछे हाथों की टेक लगाए अपलेटा-सा था और वह खूबसूरत औरत उसके कन्धे से सटी हुई बैठी थी। चांदनी रात में दोनों बड़े खुश नजर आ रहे थे। मैंने दूर से ही सही, पर गौर से उस औरत को पहचानने की कोशिश की, क्योंकि वतरा के सारे एलबम मेरे देखे हुए थे. पर मैं किसी तस्वीर से उसका मेल न विठा पाई। पता नहीं वे लोग उठकर कव चले गए। सुबह एक नयी बात हुई । चाय पर बुलाने के लिए नौकर आया । मैं तैयार भी नहीं थी, क्योंकि इतने दिनों में कभी भी बतरा ने मुझे कभी साथ चाय पीने के लिए नहीं बुलाया था। मैं चाहती भी नहीं थी। पर घर में एक औरत के आ जाने के बाद जाने में मुझे संकोच भी नहीं हुआ। । पहुंचते ही बतरा ने परिचय कराया-ये हैं मेरी वाइफ, शीला, और शीला, यह हैं मिस इरा, मेरी असिस्टेंट । शीला सचमुच बड़ी हंस- मुख और अच्छी लगी मुझे । शीला की उपस्थिति से मेरी हिचक भी थोड़ी खुल गई थी। मैंने कहा, आपने बताया ही नहीं, मैं स्टेशन जाकर रिसीव करती... वतरा हंस पड़ा, बोला, इन्होंने मुझें खबर दी ही नहीं, मैं कैसे तुम्हें बताता ! और वे दोनों प्यार से देखकर मुस्कराने लगे। मुझे दो तरह का संतोप मिल गया था-एक तो यह कि अब घर में मुझे अकेलापन नहीं लगता था और दहशत भी नहीं रह गई थी, दूसरे यह कि बतरा की कैद परछाईं उस सूखे पेड़ की बांहों से मुक्त हो गई थी. अब उसके कमरे से अंग्रेजी रिकाडों की आवाजें आती थीं। शीला ने आते ही घर को सलीके से सजाया--सारी चीज़ों में अपनी रुचि की छाप लगा दी। बतरा का कमरा तो उसने एकदम वदल दिया। सिर्फ सोने के फेम में जड़ी हुई उस मनजान औरत की तस्वीर वही लगी रही। वतरा के बारे में जो रहस्यमयता थी, वह कुछ थोड़ी-सी और बढ़ गई थी। कंसा आदमी है यह, जिसने कभी अपनी बीवी के बारे में बताया तक नहीं, और जिसे अब वह इतने प्यार से रख रहा था, उसकी याद तक उसे कभी नही आई । शीला की एक तस्वीर ही उस जालिम ने कही रखी होती। घर में कोई तो निशानी होती उसकी । शीला के आने के बाद बतरा की दिनचर्या ही बदल गई थी... गराव वह अब और ज्यादा पीता था, पर अपने को उतना ही काबू में रयता था। शाम होते ही वह शीला के साथ सैर-सपाटे के लिए चला जाता था। क्लव जाना एकदम वन्द हो गया था। मैं बहुत सोचती--कौन-सी ऐसी मजबूरी थी जो इन दोनों को अलग किए हुए थी ? हो सकता है, किसी आपसी लड़ाई के कारण दोनों अलग हो गए हो. और अब फिर नया मिलन हुआ हो । शायद शीला ने अपनी गलती महसूम की हो और वतरा ने उसे माफ कर दिया पर दोनो को मैंने कभी पुरानी यातें करते नहीं सुना । सचमुच बतरा का में मन-ही-मन बड़ा बादर करने लगी थी। कसा अजीब है यह आदमी । कितनी पुटन और पीड़ा सहता रहा, पर अपनी बीवी के बारे में एक शब्द भी कभी नहीं बोला-कभी यह भी नहीं कहा कि मुझे उमका खयाल आता है"न कभी खत लिखा और न कभी शोला का ही खत आया। मेरा मन होता था, बतरा के लिए जान दे दू, बतरा को तरह अना- सक्त तो देवता ही रह सकते हैं। मुझे बड़ी खुशी होती जव चतरा शीला से कहता--अगले इतवार फो शिमला चलेंगे. वहां से कुछ चीजें भी खरीदनी हैं । अव तुम साप हो तो सरीद लोगी, नहीं तो मैं कभी चीज पुन ही नहीं पाता।.. शीला जब भी कनाट प्लेस से लौटती तो तमाम चीजें लाती- घर की सजावट के लिए, कुछ बतरा के लिए और कुछ अपने नि: एक शाम शीला मेरे कमरे में चली आई। उसके हाथ में एक देते हुए बोली-इराजी, हम यह आपके लिए लाए हैं। मैं देखती रह गई। संकोच और माभार से मैं कुछ वोल ही नहीं । शीला ने मेरा संकोच भांपते हुए कहा-लीजिए न. और इसे कर आज डिनर के लिए हमारे साथ चलिए। मैं इतनी घवरा-सी कि बस यही कह पाई-मैं कैसे जाऊंगी ? क्यों, क्या बात है ? आखिर मैं भी तो चल रही हूं..'चलिए, जल्दी पार हो जाइए, नहीं तो रिजर्वेशन कैसिल हो जाएगा। मैं मना नहीं र पाई, लेकिन कुछ कहने के लिए वोली-साड़ियां मेरे पास और भी ...इसे क्यों खराब करूं? अरे यही पहनने-ओढ़ने के दिन हैं, वुढ़ापे में कौन करता है यह सव.. और कौन देखता है किसीको। कहते-कहते वह हंस दी और वोली-मेरे लिए भी ये एक नई साड़ी लाए हैं, मैं वही पहन रही हूं, बड़ा शौक है इन्हें । हर चीज़ सुन्दर देखना चाहते हैं ! कहते हुए वह चली गई। बड़ी देर तक मैं असमंजस में खड़ी रही। क्या करूं, क्या न करूं? इनकार करने का मतलब होगा शीला को नाराज़ करना और साथ जाते मैं घबरा रही थी। घबराहट आकस्मिक निमंत्रण की थी."आखिर मैंने साड़ी भी पहनी और मेक-अप भी किया और जव शीशे के सामने खड़ी हुई तो एकाएक विमल का ध्यान आया-काश वह होता और मैं उसके साथ जाती । मेरे रूप को देखकर वह फूला न समाता। बाहों में लेकर बहुत प्यार करता"और आज की रात आंखों में कट जाती वह किस-किस सिम्त से मुझे देखता । 'कभी मेरी घड़कती छाती पर सर रखकर चुपचाप लेटा रहता, 'कभी मुझे उठाकर ऊपर छत प सितारों की छांह में ले जाता। कभी हम दोनों लॉन पर धूमते . वह प्यार करता वह अपनी रगों में दौड़ते उसके स्पर्शों की झनकार- आई थी। अंग-अंग से जैसे उसकी सांस वह रही थी-गूंजती-पुकार हुई. मैं सार्थक हो जाती उसकी निकटता में, और थकती सांसों के की वह अदम्य विश्वास से एक ही बात कहता-इरा, नाटक ज़रूर होग पसीने के काटे मेरे रोम-रोम में समा जाते और सेमल के मासल लाल- लाल फूल विकसित हो जाते । मेरी आखें भर आई घों, पता नहीं विमल कहां चला गया। आशकाओं का मारा आदमी कही चन नहीं पाता। कुछ भी नहीं कर पाता । काश, मेरे पंख होते तो उसी क्षण उड़कर मैं उसे खोज लाती । और तव "मुझे अपने रूप से वितृष्णा हुई थी। किसके लिए है यह पगली। और मैं बुरी तरह रो पड़ी थी... शीला की आवाज सुनकर मैं बाथरूम में भाग गई."लोटकर फिर मेक-अप किया और कार में साथ बैठकर चल दी। हम तीनों ही आगे घंठे हुए थे । बतरा ड्राइव कर रहा था। वोल्गा की वह रात बडी मादक थी। साढे आठ बजे से साटे दस तक दिवस चलते रहे, फिर डिनर चलता रहा. वैण्ड की धुन हाल में गूज रही थी और मिगरेटों का धुओं पर परत की तरह जमा होता रहा था। कॉफी के दौर के साथ ही डांस में मस्ती आ गई थी। वैसे कई जोडे बीच-बीच में भी नाचते रहे थे। बतरा और शीला बडी देर तक नाचते रहे । थककर कुछ देर वे आराम करते और फिर फ्लोर पर उतर जाते, जैसे दोनों नगे में हो। रात का डेढ़ बजते ही वोल्गा की बत्तियां जल गई और रंगीन रात खत्म हुई । थके और वेसुध जोडे कारों में बैठ-बैठकर हसो की तरह नजर से ओझल हो गए । हम तीनों कार में बैठे ही थे कि एक लम्बा- चौडा आदमी लपकता हुआ आया और उसने बतरा को 'विश' किया। बैठे-बैठे ही बतरा ने हाय मिलाया और गाडी स्टार्ट कर दी। आजकल क्लय में आना वन्द है ? उस आदमी ने पूछा था । बनरा ने टालने के अंदाज में कहा था-जल्दी ही आना शुरू करूगा 'अच्छा सोलंकी, सो लांग । और गाड़ी चल दी थी। तिलक ! यही पर सोलंकी को पहली बार देया था मैंने। वडा हूस लगा था। दो औरतों को देखकर ही वह बतरा को 'विश' करने आया था। उसके आने में कुछ ऐसा ही लग रहा था · वोल्गा की भीर और चहल-पहल में मेरी नज़र उसपर नहीं पड़ी थी। उसने भी नही देखा होगा, नही तो वही आकर जम जाता।
हम दोनों ने जूड़ों में फूल लगाए हुए थे। रास्ते में शीला के जूड़े ल सूंघते हुए बतरा ने गहरी सांस ली थी... उस रात मुझे बहुत तकलीफ हुई । मेरा मन भटकता रहा । मैंने अकेलापन महसूस किया। उस रात मुझे लगा कि क्या मेरी दगी ऐसी ही बीत जाएगी."अब कौन है जो सहारा देगा मुझे ? उस र में सहारा अपने आदमी का होता है, सपनों के रंग उसीके साये . निखरते हैं। रात को रोज़ यही अनुभूति मुझे सताती थी-कोई ऐसा हो जिसे अपना कह सकू, एक नन्हा-सा घर बनाकर रहूं, किसीके आने का तजार करूं."मन में लगता था शायद विमल कभी हारकर दिल्ली आया होगा तो मुझे देखने भी उस घर में ज़रूर आया होगा । इधर का चक्कर भी उसने ज़रूर काटा होगा.. न जाने क्यों, लगता था कि विमल ज़रूर आया होगा. क्या वह सचमुच विना मिले जा सकता है ? ... अगर नहीं जा सकता था तो मिला क्यों नहीं, पता नहीं क्या-क्या सोचा होगा उसने। शीला के साथ घर में वहार आई थी। और एक रोज मैं आश्चर्य और आशंकाओं से विमूढ़ हो गई जव पता चला कि शीला जा रही वह कहां जा रही है ? क्यों जा रही है ? कव वापस आएगी? कुछ भी पता नहीं चल सका । नौकरों को भी कुछ नहीं मालूम था । आखिर जब टैक्सी आ गई तो मैंने वेहद साहस बटोरकर पूछ ही लिया-अब आप कब आएंगी? शीला मेरी ओर देखकर मुस्करा दी। उसकी मुस्कराहट में अजीत सी कुटिलता थी.'छ: महीने में ही क्या इसका भी जी भर गया ? भ अपने पति को छोड़कर यह कहां जा रही है ? मेरी आंखों में उभरे प्र का सीधा-सा उत्तर शीला ने दे दिया--फिर आऊंगी। मुलाकात होग जरा खयाल रखना वतरा का।
- और टैक्सी चली गई। जितना मामान वह लाई थी, उससे बहुत ज्यादा ले गई थी। कंसी थी वह औरत ? क्या पति-पत्नी का रिश्ता इतना अजीब भी होता है ? पर बतरा जैसे आदमी के बारे में कुछ भी सोचा जा सकता था। और फिर घर पर कार होते हुए भी गीला टॅक्मी से क्यों गई ? बतरा उसे स्टेशन तक छोडने क्यों नहीं गया ?.."वह तो नीचे भी नहीं उतरा था । जातो हुई टक्मी में से शीला की 'वाई-बाई' का जवाब उसने वही ऊपर खिडकी से दिया था। मैं बतरा को जितना ही समझना चाह रही थी, उतनी ही उलझती जाती थी। मेरा दम घुटने लगा था । अजीव तिलस्मी आदमी था यह भी । वह कार से उसे छोड़ने तक नहीं गया । और मुझे लगा कि दोनों के जीवन में कोई भयंकर दरार पड़ी है, जो मिटाए नहीं मिटती । गदिश के मारे ये दोनो जने घूम रहे हैं । शीला ने कभी यह भी नहीं बताया कि वह कही कोई नौकरी वगैरह करती है। और फिर बतरा जैसे आदमी की बीवी नौकरी भला क्यो करेगी? क्या कमी थी घर मे ? क्या इतनी जल्दी दोनो का मन भर जाता है ? एक दूसरे से ऊबने लगते हैं ? या एकाएक कोई भयंकर लडाई हो गई, जिससे मिले हुए दिल फिर फट गए ? यह औरत भी कसी थी जो इस तरह चली गई । मैं होती तो सब साफ कर लेती, जिन्दगी को नये सिरे से गढती । .. यह मैंने उस वक्त सोचा था, तिलक ! आज यह वात भी आदर्श से भरी लगती है। जिन्दगी को गढ़ना सबके लिए मुमकिन नहीं होता। "बतरा की सहन-शक्ति और अपने को छिपाकर रखने की ताकत को मैं मान गई थी। शायद आदमियो के रहस्यो को खोल मकने की जितनी उत्सुकता और उत्कट अभिलापा औरतो मे होती है. उतनी किसी में भी नहीं ! वतरा को मैं उधारकर खोल देना चाहती थी.. उसके रहस्यों को जान लेना चाहती थी। मेरे मन मे करुणा उपजती थी उसके लिए । यह कमा आदमी है जिसे शीला छोडकर चली गई। और वह शंकर की तरह विप पीकर खामोश था। कभी-कभी अकेले में बतरा की दशा सोच-सोचकर मैं रो -- अपना और उसका अकेलापन बहुत अलग-अलग भी नहीं लगता था। यह कैसी टूटी हुई जिन्दगी थी ? शीला सिर्फ छ: महीने रुकी थी, पर उसके जाने के महीने-भर वाद ही घर ज्यों का त्यों हो गया था। वही उखड़ी-उखड़ी जिन्दगी चालू हो गई थी, पिछवाड़े खड़े सूखे पेड़ की राक्षसी बांहों में बतरा की अकुलाती परछाई फिर कैद हो गई थी और रात में क्लब से लौटने के बाद वही रिकार्ड सुनाई पड़ने लगा था- गैर की वस्ती में कब तक दर-व-दर मारा फिरूं ! ऐ गमे-दिल क्या करूं ऐ वहशते-दिल क्या करूं? जव रिकार्ड की गूंज डूब जाती थी और खिड़कियों के भीतर उसकी छाया वहुत देर तक अकुलाती हुई घूम चुकती थी तो उस खामोश उजड़े हुए आशियाने से एक ही सदा आती थी-ओह ओह गॉड ! ओह गॉड! चार-पांच दिन वाद चाय के वक्त मैंने जान-बूझकर बतरा से मिलने की कोशिश की । यही वक्त था जव उससे मिला जा सकता था। मैं भी वहीं चाय पीने गई । बहुत संभलकर मैंने वात शुरू की-शीलाजी कव तक वापस आएंगी? वहशी आंखों से मुझे घूरता हुआ वह बोला-शायद कभी नहीं । क्यों? कोई बात नहीं, ऐसे ही पूछा था । और मैं क्या कहती। मैंने उसके चेहरे पर आते-जाते भावों को देखने की कोशिश की । सुवह वह वैसे भी वहशी लगता था, उसकी आंखों या चेहरे पर कोई भी दुःख का भाव नहीं था बल्कि एक कमजोर हिंस्र पशु झांक रहा था। वतरा सब बातों को कैसे पी लेता है और कैसे इतना वरदाश्त करता है, यही मैं नहीं समझ पाती थी। कुछ दिन पहले जो भंवरे की तरह उड़ रहा था और हर क्षण गूंज मचा रहा था वही टिड्डे की तरह खामोश और स्थिर हो गया था। उसकी आंखें सोडावाटर की गोलियों की तरह निकली पड़ रही थीं । मैं चाय पीती रही तो सिगार जलाकर वह बोला-~~-शीला बहुत बुरी है, वस ! इतना कहकर वह फिर चुप हो गया। मेरे मानस में मन्यन होने लगा। बतरा कठिन पहेली की तरह उलझा हुआ था। ।
दोपहर में मैंने पहली बार यतरा के कमरे में तलाशी ली। तीन एलयम ये । सभीमें कुछ जगहें पाली थी जिनकी तस्वीरें निकाल ली गई थी। मुझे लगा कि नाराजगी के कारण बतरा ने शोला की सब तस्वीरें निकालकर फाड दी होगी या कभी शोला खुद निकालकर ले गई होगी। दोनों में बड़े गहरे मनमुटाव का अहसास मुझे होता या... शीला बहुत बुरी है, यह कहने का उसका क्या मतलब था? शायद किसी और से सम्बन्ध बना रखे होंगे। पर गीला जैसी शालीन और समझदार दिखनेवाली औरत यह करेगी, मैं मान नहीं पाती थी। जितने दिन वह रही, यतरा के लिए जान देती रही। अपना दिल कही रखकर इस तरह की दोहरी जिन्दगी क्या जी जा सकती है ? मैं मान ही नही पायी थी । यह कमे हो सकता है ? पर तिलक । यह भी होता है." और शायद ज्यादातर होता है । मन कहीं और अटका रहता है और फर्ग के मातहत एक अच्छी-खासी जिन्दगी जी जा सकती है । सौ में पचहत्तर औरत एमी हो जिन्दगी जीने की आदी हो चुकी हैं । अगर उनका मन कहीं और नहीं है, तो वहा भी नही है जहां वे हैं । उनका मन मर चुका है। पत्नी के रूप में वे ही ज्यादा सफल साबित होती हैं जिन्होने अपने मन को मार लिया है, यानी जो जिन्दगी भोगने आती हैं। इस भोग में विलास नहीं, पीहा से भरी एक मजदूरी है। हर औरत मेरी तरह जिन्दगी भोग रही है । शोला, जो वतरा को छोड़कर चली गई थी, वह भी इसोका शिकार यी । अगर न होती, तो इस तरह न भटकती । शीला के बारे में पूरी बात मुझे बाद में एक दिन बड़े नाटकीय ढग मे मालूम हुई। मेरी यांखो के सामने अंधेरा छा गया था और मैं विश्वास नहीं कर पाई थी कि शीला का यह रूप भी हो सकता है । वतरा ने ही मेरा भ्रम तोडा था.. उन दिनों, शाम को जब बतरा क्लब चला जाता था, मैं अपने को सजाती थी। खूब शृंगार करती थी। एक-एक अग को सुघर बनाती थी और साही बदलकर लॉन पर अकेली घूमती रहती थी। मैं ऐसे तैयार होती थी जैसे किसीके साथ मुझे बाहर जाना हो। शीला के आने के बाद से मेरा खाना भी बतरा के किचन में बनने लगा था। तनख्वाह बिलकुल वत्र जाती थी । मैं यह खिलवाड़ किया करती थी और खिलवाड़ कर चुकने के वाद खूब रोती थी । वहुत बार ऐसा होता कि दुःख का अहसास भी नहीं होता और आंसू निकल आते हैं। मेरे साथ ऐसा बहुत बार हुना है। जिसकी ज़िन्दगी कारवां की तरह मंजिल के बासरे में भटकती रही है, वही इस बात की गहराई को समझेगा, तिलक ! कोई बात न हो और आंसू अपने-आप ना जाएं। बहुत बार मैं किसी भी वात के बगैर रोई हूं। मन में इतने घाव हैं कि पता नहीं चलता कि कब कौन रिसने लगा, किसमें कचोट हुई । वत बैठे-बैठे आंखें भर जाती हैं और खूब रो त्रुकने के वाद मन हलका हो जाता है। श्रृंगार करके ही मैं क्यों रोती थी, इसका पता मुझे नहीं । मुझे अपने रूप से ईष्या होती थी और में कई-कई मिनट तक अपने को शीशे में देखती रह जाती थी। एक रात जब मैं सो रही थी, पता नहीं क्या हुआ, सोते-सोते मेरी आंखें भर आई, और मैं जाग गई । जागने पर बहुत सोचा, वार-बार दिमाग पर जोर डाला कि सपना ही याद आ जाए, पर मैंने कोई सपना देखा ही नहीं था. एकाएक मेरा ध्यान वगल से आती रोने की आवाज़ की ओर गया ! कोई बगलवाले कमरे में रो रहा था । मैं अंधेरे में ही निकलकर गैलरी में पहुंची, अभी उधर देख ही रही थी कि वतरा के कमरे का दरवाजा खुला और वह लपककर मेरे पास आया और बच्चों की तरह मुझे बाहों में थामकर अपने कमरे में ले गया और बत्ती जला- कर वाथरूम में मुंह घोने चला गया । मैं सकते में बैठी रह गई। लौटकर आते ही उसने आधी रात को परेशान करने के लिए माफी मांगी और बड़ी गम्भीरता से बोला, इरा, मैं शीला को एकदम भूल जाना चाहता हूं.'कोई ऐसा है जो मेरी मदद कर सके? आखिर वात क्या है ? मैंने पूछा था । और बतरा का इतने दिन का रुका हुआ वांध टूट गया-बात बहुत गहरी है"कैसे कहूं तुमसे ! फिर प्रकृतिस्थ होते हुए उसने बताया-शीला मेरी बीवी नहीं है । सुनकर मैं आसमान से गिरी-जो और कौन है ? शीला का हाल सुनोगी तो द्धिन्दगो से मन हट जाएगा तुम्हारा।" क्या नहीं है शीला के पास • वह खूबसूरत है, पढ़ी-लिखी और सलीके- दार है। सोसाइटी में उसके साथ कोई भी शान से जा सकता है, उसे लेकर खुश हो सकता है, पर सारी जिन्दगी उसके साथ नही गुजारी जा सकती। मैं समझी नहीं ? बतरा मागे वताने लगा--रावलपिण्डी मे शीला हमारे घर के पास रहती थी। हम दोनों एक-दूसरे को चाहते भी थे। पर दंगों में हम जुदा हो गए । जब सन् पचास मे मैं दिल्ली आया तो एक दिन शीला मुझे एक जान-पहचानवाले के यहां दिखाई दी। उमने मेरा परिचय कराया, ये मेरी बीवी है वीना"और वीना, ये हैं मेरे दोस्त हेमेन्द्र बतरा ! हम दोनो ने एक-दूसरे को देखकर भी नहीं पहचाना । बडे ओप- चारिक ढंग से हमने बातें की और शाम होते ही मैं वापस चला आया। मैं शीला का वीना नाम मुनकर अचकचाया भी था, पर अब तक तो उसके कई नाम जान चुका हू.."उस मुलाकात के बाद मैं ऐसा नौका खोजने लगा, जब उससे मैं अकेले में मिल पाऊं... एक शाम इण्डिया गेट के पास नहर के किनारे वह मुझे घूमती हुई दिखाई दी। मैं कार रोककर उसके पास पहुंचा । वह अकेली थी। मैंने आवाज़ दी, शीला ! और दो महीने पहले की वीना अपना नाम सुनकर मुड़ पड़ी । वहुत-सी बातें मैं कहना चाहता था उससे । पर मैंने इतना ही कहा, तुमने घर वसा लिया, यह अच्छा किया। शीला हंस पड़ी। शोखी से बोली, मैं अब भी तुममे शादी कर सकती हूं, करोगे? उसके इस सीधे सवाल के लिए मैं तैयार नहीं था। कुछ भी नहीं कह पाया तो वह आगे वोली, हैमेन्द्र चाहो तो मैं तुम्हारे घर तुम्हारी मरजी से वीवी बनकर रह सकती हूं। मेरे मन में चोट लगी। वह शीला, जिसे मैंने लिया जिप ह पेश आ रही थी। न हया, न शरम, न लिहाज, मैं विगड़ पड़ा- * बेहूदी बातें कर रही हो? शीला ने शांति से जवाब दिया, इसमें बेहूदगी क्या है ? असलियत सगर वेहूदी है तो हो, लेकिन तुम उसे कैसे बदल सकते हो! कहते-कहते शीला उदास हो आई थी और चुप हो गई थी। आगे वह कुछ भी नहीं कह सकी थी... . बस यही ज़िन्दगी है शीला की ! क्या तुम सोच सकती हो इरा, पैसे की मार ने, और घर की ज़िम्मेदारियों ने शीला को ऐसा बना दिया था? उसका वाप दंगों में मारा गया था और किसी तरह बच-बचाकर वह अपनी बहनों और मां को लेकर भागी थी। फिर क्या-क्या नहीं भोगा उसने जिंदा रहने के लिए क्या-क्या नहीं किया ! आखिर वह जिस चक्कर में पड़ गई थी, उसमें अपनी मां को उसने वही बता रखा था कि उसकी नौकरी दौरे की थी। उसे वक्त-वेवक्त कभी भी जाना पड़ सकता है और तीन-तीन, चार-चार महीने बाहर रहना पड़ सकता है तुम्हें याद होगा जब हम शिमला गए थे। तब उसने अपनी मां को व से एक हजार रुपये का ड्राफ्ट भिजवाया था। वह इसी तरह आदमि की वीवी बनकर रहती है, जब तक वे चाहते हैं तव तक, जब वे चाहते हैं तब वह अपने घर लौट जाती है । अगर बीच में ज़रूरत जाए और शीला को घर से हटाना हो तो वह कहीं और चली जा कुछ दिन बाद फिर आ जाती है । वह हर घर में वीवी का नकाव कर रहती है और घर का इस तरह ध्यान रखती है जितना कि भी नहीं रख सकतीं। अपनी शारीरिक और आर्थिक ज़रूरतों करने का यही साधन है उसके पास । बड़े-बड़े लोगों से मेल-मुल उसकी और अब शायद दस-बीस हजार रूपया भी उसके । इस वार कह रही थी-मन बहुत कोसता है, पर क्या कारूं ? वह एक शरीफ औरत है.."वक्त और पैसे की मार ने बनाया है। वक्त की मार खाते-खाते अव वह...मैं क्या लिए? आप उससे शादी क्यों नहीं कर लेते ? मैंने कहा था V । देर चुप रहा, फिर वोला, शादी कर लू तो जहा उठता-बैठता हूं वहां कितनी-सी इज्जत रह जाएगी "और शीला ने अगर फिर भी धोखा दिया तो कही का नहीं रह जाऊंगा।""मुझे बड़ी याद याती है उसकी, अव पता नहीं वह किस नाम से कहा दिन गुजार रही होगी ! .."उसको इरजत करने के लिए ही मैंने तुमसे अपनी बीवी के रूप में उसका परि- चय कराया था। मैं उसे बहुत चाहता हू, इरा ! मेरा मन भीतर- भीतर रोता है, मुझे कही भी चैन नहीं मिलता और इस अकेलेपन में जब मैं घबराता हूं तो रिकार्ड सुनता हूं और गांड को आवाज लगाता हूं। मेरा अकेलापन दोहरा है-एक परत मेरी है और दूसरी परत सोला की । उन दोनो परतो के बीच मेरा दम घुटता है । कहकर वह उठा और परेशानी से घूमने लगा। अगर मैं तॉन मे होती तो उसकी केंद परछाई मुझे दिखाई पड़ती. पर इस क्षण मुझे उसकी कैद आत्मा के दर्शन हो रहे थे। उकताकर मैं खड़ी हो गई थी। मुझे उस वक्त वतरा को वह दुनिया झूठ और विलासिता की नकाब पहनाकर असलियत सावित करने की दुनिया लगी थी। पर आज जब मैं इन राहो से गुजरकर आई हूं, कुछ भी मान सकने को तैयार हूं। उसकी दुनिया झूठी और उसकी परेशानिया या दुख खामख्वाह के लगने के बावजूद यतरा की बेहाली मुझे बहुत सता रही थी। उसे उस तरह छटपटाते और घूमते देख मेरा दिल भर आता था और कभी-कभी एक क्षण के लिए मुझे उसमे विमल की परछाई भी दिसाई पड़ती थी। परेशान होने पर वह भी ऐसे ही झुझला-झुझलाकर घूमा करता था। मैं निस्तब्ध खड़ी थी कि सामने शीशे में नजर पड़ी-पिछली शाम सबारे हुए रूप की कुछ छवि वाकी थी "काग, विमल होता तो मैं क्या वनती !.."इस उजाली रात मे में यतरा के दुसो की साक्षी न होकर भरपूर सुसों को भोग रही होती... कि वतरा मेरे सामने आकर रुक गया-उसकी नजरें मुझे बहुत पहचानी-सी लगी। विलकुल विमल जैसी... ...जब मैं रात को घर वापस पहुंचती थी तो गुमसुम पडा विमल धीरे-धीरे मेरे रूप के सहारे जागता थे.. .. था"उसका मुरझाया मन-कमल खिलता था और वह मुझे विलकुल इसी तरह देखता था... और बतरा के हाथ मेरी कमर में आ गए 'उफ कितनी एकता थी स्पर्श में ! और वतरा ने मुझे नज़दीक लेते हुए बड़ी गहराई से चूम लिया था और वाद तक ओंठों पर मोंठ रखे उनींदी आंखों से मेरी आंखों में देखने की कोशिश करता रहा था। उसकी गरम सांसें और कसते वाहुपाश मुझे बेहाल करते जा रहे थे। उसका चेहरा, उसके स्पर्श, उसकी सांसें और उसकी मादकता-भरी आंखें बिलकुल विमल की तरह पी": वही उमस और उखड़ती-सी सांसें थी.. वैसा ही समर्पण था।" लेकिन सुवह मेरा मन ग्लानि से भरा हुआ था। बतरा भी मुझे वताए वर्गर सुवह-सुवह ही निकलकर कहीं चला गया। मैं अकेली कमरों में घूमती रही । एक तरफ कुछ सुख की अनुभूति थी और दूसरी तरफ ग्लानि की, पर साथ ही पूरा घर अब मुझे अपना-सा लग रहा था । पर दूसरे ही क्षण खयाल आता कि कहीं आर्थिक दासता के कारण ठगी तो नहीं गई हूं. क्या भरोसा किसीका ! विमल से जो विश्वास मिलता था, वह यहां नहीं था, यह मैंने बाद में महसूस किया। यह केवल एक जरूरत थी और ऐसी ज़रूरत तो बहुत बड़ी न होते हुए भी एक क्षण- विशेष पर विकराल बन जाती है, सारी मान्यताएं धरी रह जाती हैं... इसके वाद वतरा ने मुझे तनख्वाह देना वन्द कर दिया था । अगर वह देता तो सचमुच मुझे बड़ी चोट लगती, पर खर्च करने के लिए वह मेज़ पर सौ-पचास रुपये छोड़ जाता था. चाहते-न चाहते हुए भी वह क्रम चलता रहा । और मुझे पहली वार लगा कि आत्मा की स्वीकृति के वगैर भी यह सव-कुछ हो सकता है । केवल भावनाओं के बुलवुले शारीरिक सम्पर्क के लिए काफी होते हैं और एक साथ दोहरी जिन्दगी चल सकती है। किसीको न चाहते हुए भी दुनियावी बातें ठीक-ठीक चलती रह सकती हैं। और शादी करने से कोई बड़ा फर्क नहीं आता, क्योंकि शादी से आत्मा का कोई सम्बन्ध नहीं है। अगर आत्मिक मिलन की ही बात होती तो शादियां करने की उम्र पचास के बाद होती। यह महज एक शारीरिक आवश्यकता है, जिसे आदर्श का ताज पहनाकर गरिमा प्रदान की गई है। "हर विवाहित जोडा पच्चीस से पंतीस तक आदमी और औरत की तरह रहता है, पैतीस से पैतालीस तक पति-पत्नी की तरह, पंतालीस से पचपन तक दोस्तो की तरह, पचपन से पैरुठ तक भाई-बहन की तरह और पैसठ की उम्र पार करते ही ये मां और पुत्र की तरह हो जाते । आध्यात्मिक मिलन की यात पंसठ के वाद ही जाती है। इस ययार्थ में भी एक खूबसूरती है"ऐसा होता है तिलक । जिन्होंने पच्चीस की उम्र से विवाहित जीवन शुरू किया है वे इन्ही सीढियो से नीचे उतरे हैं। इरा की बात सुनकर मुझे हसी आ गई थी। सोच-मोचकर मैं काफी देर तक हसता रहा । मुझे हमते देखकर इरा भी हंस पड़ी- क्यो, बेहूदी बातें कर रही हूं ? कुछ-न कुछ बेहूदगी तो है ही। मैंने कहा तो वह और हस पड़ी, योली, और यह कम बडी बेहूदगी है कि मैं सोलंकी को खुद पहलगाम से बुलाकर लाई हूँ ! तभी हमारी नजर डाक बंगले के बरामदे की ओर गई."एक वडा- सा काला धच्चा वहा चलता हुआ नजर आ रहा था। मैंने इरा को दिखाया तो वह बोली, सोलंकी ही होगा । आख खुलने पर जव में नही दिखाई पडी होऊंगी, तो वह तुम्हे देखने निकला होगा... और अब वह क्या सोच रहा होगा ? मैंने पूछा तो इरा बोली, वह हमें यहां खोजने नहीं पाएगा। सोलंकी बहुत डरपोक भी है ! तभी अस्त-व्यस्त लेटी हुई इरा को कंधे से उठाते हुए मैं भी खडा हो गया । रात गुजर चुकी थी। सबेरे का पंछी पंखो मे रोशनी लिए आने ही वाला था। हम दोनों के कपडे नम हो गए थे। घास से गंध उठ रही थी। कुहरा जगह- जगह पयादा गहरा होकर लटका हुआ था, सरदी बढ़ गई थी नहीं चाहिए। क्यों! नहाओगे नहीं ? इरा ने पूछा तो उसने सीधे-सीचे इनकार कर दिया। पहले दिन-भर चलने के बाद की थकान से नहाना जरूरी हो गया था, पर सोलंकी कुछ इस तरह से कतरा रहा था कि अजीव- सा लग रहा था । रोज़ न नहानेवालों-सी सहजता नहीं थी उसके इन- कार में। दोपहर में इरा ने मुझसे पूछा---आस-पास घूमने चलते हो, तिलक ? .. मैं तैयार था। उसकी निकटता मेरे लिए आत्मिक सुख का कारण थी। मैंने औपचारिक रूप से सोलंकी को भी बुलाया। उसने एक- दम मना कर दिया। हट्टा-कट्टा सोलंकी इस वक्त बहुत निरीह और पिटा हुआ लग रहा था। मैं इरा के साथ बाहर निकल गया। कच्ची धूप चारों ओर टुकड़ों में फैली हुई थी 'कहीं किसी चट्टान के कोने पर और कहीं देवदार के पेड़ों के बीच से होती हुई धरती पर। धरती पर कच्ची धूप रुई के फाहों की तरह लग रही थी। हम दोनों वाई और खड़े देवदारों के जंगल में घुस गए। सेही के कांटे जैसी देवदार की पत्तियों का गद्दा धरती पर विछा हुआ था। सूखकर पत्तियां ज्यादा चिकनी और लाल-लाल हो गई थीं। उनपर पैर फिसलता था। इरा ने मेरा सहारा ले रखा था। चलते-चलते मैंने इरा से कहा, बतरा का किस्सा तुमने अधूरा छोड़ दिया। मैंने देखा तुम्हें नींद आ रही थी, नहीं तो मैं लगातार कई दिन-रात अपनी कहानी सुनाती रहती। अपनी कहानी से ज्यादा दिलचस्प बात और दुनिया में कोई नहीं होतीपर कोई धीरज वाला नहीं मिलता जो दूसरों की कहानियां सुने और अपने तक रखे। मैं धीरज वाला नहीं हूं? शैतानी से मैंने कहा । क्या पता, कल तुम भी मुझे समझने से इनकार कर दो। बुरा सम- झने लगो । वैसे अच्छाई और बुराई से मुझे क्या लेना-देना ! पर अपने को खोलते एक झिझक होती है, बस । तुम्हें सुनाकर मैंने अपने बीते दिनों को जीने की कोशिश की है और मुझे लग रहा है कि मैंने यह गलत ७० नहीं किया है। फिर चलते-चलते ही वह बताने लगी- बतरा मेरा अपना हो गया था। मैं विवाहित जीवन तो व्यतीत कर रही थी, पर उसकी सामाजिक सनद न मैंने ली थी और ने बतरा ने ही लेने की सोची थी। एक-दूसरे को समर्पित हो जाने के बाद यह बहुत छोटी-मी चीज़ लगती थी । दुनिया के जो भी ऐश और आराम हो सकते हैं, वे मुझे बतरा ने दिए । और अपने मन का चोर वताऊ-पहले ज्वार के बाद मैं भी चाहने लगी थी कि बतरा के वैभव को मैं क्यों न भोगू ? उसपर अव मेरा अधिकार था लेकिन तिलक ! .. सेमल के लाल मांसल फूलों के खिलने की वात मुझे भूली नहीं थी। बतरा इससे बहुत घबराता था। वह अपने समर्पण का कोई निशान नहीं छोड़ना चाहता था, क्योंकि उसका मन लोगो के बीच नही लगता था। वह नितात एकाकी होकर रहना चाहता था। वह कहता था- दुनियावी रगड़े मुझमे नही चल मकते. मैं गृहस्यी नहीं चाहता, मुझे मिर्फ वे चीजें चाहिए जो मेरे जीते-जी मेरे काम माएं, आगे कुछ नहीं चाहिए।" लेकिन मैं जानती थी कि जो मैं चाहती हू वह पा लूगी, उसमें पतरा क्या कर लेंगा? और वह दिन भी आया जब मैंने सपने में सेमल के फूल देसे मेरा रूप और अंगों को रेखाए और उमर आई थी। मैं भरा-भरा महसूस करती थी । एक रात मैंने बतरा को बताया तो वह एकदम बोला---तुम्हें टॉनिक वगैरह लेना चाहिए। दूसरी रात वह तमाम टॉनिक और खाने- पीने की चीजें भर लाया। पहली बार मैंने अपने को स्त्री के रूप में देखा था और अपने जीवन को सार्थकता को महसूस किया था। बतरा सुद मुझे दवाइया और टॉनिक पिलाता था। पर यह उसका एक भयानक फरेव था, मेरे साय गहरा धोखा था। चार-याच दिन बाद मुझे सच्च तकलीफ हुई और मैं पस्त हो गई "मेरा शरीर जैसे टूट गया । बरा ने यह धोखा क्यों दिया था मुझे? एक दिन जब मैं उठने-बैठने लान हुई तो चीख पड़ी-तुमने ऐसा क्यो किया । मेरी मरजी ! उसको आवाज सख्त थी।
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तुम्हें? कोई पास तो नहीं.."यही कि रावलपिण्डी में आप दोनो के घर पास-पास थे और बतरा आपको चाहते भी थे... वह तेजी से बोली-और अव नहीं चाहता तुम्हारा क्या सयाल उसके इस सवाल का कोई जवाब नहीं था मेरे पास । मैं खामोश ही रही । मैंने महसूस किया कि शीला के भीतर कुछ भयकर उथल- पुथल हो रही है, जिसे दवाने की वह भरसक कोशिश कर रही है । वह वार-वार मेरी ओर इस तरह देख रही थी जैसे मुझे तोलने की कोशिश कर रही हो। रात को मैंने बतरा को बताया कि घोला आई थी। उसने भी धीरे से कहा-हा, गाम को मुझे क्लब में मिली थी। कोई भी औरत यह नही बरदाश्त कर सकती कि उसका कोई पुराना प्रेमी उससे प्रेम करना छोड दे।"वह जिसे घृणा भी करना चाहती है उससे भी प्यार का ही प्रतिदान चाहती है। यही उसकी सबसे बड़ी धरोहर है। और शीला सतरंगी जिन्दगी जीते हुए भी बतरा का मेरे साथ रहना पसन्द नहीं कर पाई। वह रोज बतरा को क्लब में मिलती और उसे अपने साथ घुमाती। बतरा कभी-कभी देर से भी आने लगा और एक दिन उसमी टक्सी आकर पर पर रकी । मेरा मन सनक उठा । वतरा के कमरे मे जाकर मैंने सीधे-मीधे कहा, मैं यह पसंद नहीं करती, शीला यापस जाएगी। बतरा भयंकर असमंजस में पड़ गया। वह कुछ भी नहीं कर पा रहा था। अपनी वैवसी पीते हुए वह बोला, उसे आने दो, तुम्हे इससे क्या फर्क पड़ता है? वहुत बड़ा फर्क पड़ता है.. मैं यह वरदाश्त नहीं कर सकती। मैंने कहा तो यह बोता, इस वक्त शात रहो । मैं सब ठीक कर लूगा। और तिलक, उस मानमिक खीचतान और परेशानी से मैं हार गई। पीला फिर घर पर आ गई थी। पूरे दिन मैं अपने गोपी Har- ७३ है मैंने आपसे कहा जार करती रही कि वतरा कुछ तय करके मेरे पास आएगा। आखिर दरवाजे पर दस्तक हुई। मैंने दरवाजा खोला तो बतरा नहीं, शीला सामने खड़ी थी। वह बेहद अपमानजनक ढंग से बोली, कल से आपकी नौकरी खत्म है ! आप अपना कोई और इन्तजाम कर लें ! मैं सन्नाटे में आ गई। सिर्फ इतना ही पूछ पाई, बतरा कहां है? वो बाहर गए हैं ! शीला ने कहा, लेकिन जो है, वही होगा। बतरा से बात करने का कोई मतलब नहीं है...फिर सुन लीजिए । कल से आपकी नौकरी खत्म है.. नौकरी ! नौकरी ! यह शब्द मुझे छेद गया। बतरा की बर्गर मरजी यह सब नहीं हुआ होगा, यह मैं जानती थी। क्या मैं सिर्फ वतरा की नौकर थी? क्या सम्बन्धों की नीं। इतनी पोली होती हैं। क्या यह सब एक कीचड़ है, जिससे हर आदमी उकताकर भागता है ? मैं नितांत अकेली हो गई थी, तिलक ! मेरे पास भी ऐसा क्या था जिसके सहारे मैं अपना अधिकार जताती ! नौकर तो मैं थी ही और तनख्वाह के बदले में सब कुछ देती रही थी। दूसरे दिन भी वहीं रुकी रही। मैं बतरा का इन्तजार करना चाहती थी और सब कुछ उसके मुंह से सुनकर रहे-सहे सम्मान के खोल को भी उतार देना चाहती थी। व्यर्थता मुझे चारों ओर से घेर रही थी। अपने हाथ-पैरों को देखती तो मुझे घृणा होती । अपने शरीर के अंग-अंग से मुझे गंदी बास फूटती लगती थी। मुझे लग रहा था कि मेरी मजबूरियों का फायदा उठाया गया है, मुझे 'प्रप्ट किया गया है। मैं कमरे में ही बैठी थी कि शीला फिर आई और बोली-आप अभी तक गई नहीं ? .. यह 'आप' सुनकर मेरा जी जल उठा था । मैं उठी और मैंने उसे दरवाजे के बाहर ढकेल दिया और चटखनी वन्द कर ली थी। बन्द घुटते कमरे में मैं जी भरकर रोई..'अपार असीम सागर फैला था मेरे सामने और मुझे विना किश्ती के उसमें कूदना था । कोन- सा सहारा था जो मुझे पार लगाता ! इन कड़वे क्षणों का वोध सिर्फ औरत को होता है। - रात उतर रही थी, मैं अंधेरे में पड़ी रो रही थी। सारा सामान झुंझलाहट में मैंने बिखेर दिया था। शीगा तोड दिया था। उसी परेशानी में मैं कमरे से निकली और मडक पर आकर सड़ी हो गई। मन में आया आत्महत्या कर लू । लेकिन कैसे करती ! मन कांप जाता था, पर अपनी व्यर्थता के वोध मे में उबरना चाहती थी। रात में देर-देर बाद कोई आदमी उधर से गुजरता था-हर आदमी को देखकर मन में आता था, उससे नाटक करूं, गले में वाहें डालकर कहूं, मैं तुम्हें प्यार करती हूं और जब वह मुझे घर ले जाए और मेरी ओर बढ़े तो उसका गला घोट दू। पर तिलक ! मेरी सबसे यही मजदूरी यही थी कि जो भी आदमी मेरे निकट आया, उसमे मुन्दरता की कोई-न कोई किरण मेरे लिए फूटने लगती थी। मा तो उसका मन मुझे जीत लेता था, या उसके दुख मुझे हार मानने को मजबूर करते थे, या उसका अपनापन मुझे मार देता था। आज भी मैं बतरा को घृणा नहीं कर पाती। उसके दुखो ने मुझे जीत लिया था। अपनी सारी बुराइयो, वेईमानियों और बेवफाइयों के बावजूद हर आदमी मुझे बहुत मासूम लगता है । जब भी मैंने आदमी को अकेले में देखा है मेरा मन उसके लिए करुण हो आया है, क्योकि हर आदमी जीवन मे बहुत दुःखी है। और उसके दुखो के बदले उसे सिर्फ प्यार ही दे सकती हू-मैं हर आदमी से अच्छी तरह बोलने के लिए, प्यार करने के लिए मन से मजबूर है। में तुम्हें देखती हू "तुम्हारे इन बढे हुए वालो को देखती हूँ तो ममता-सी उपजती है मन मे। तुम साम लेते हो, तुम्हारे उठते-बैठते सीने की इस गति मे मुझे लगाव होता है। तुम जब बार-बार पलकें झपकते हो, तो तुम्हारे चेहरे से मासूमियत बिखरती है। यही सब मुझे बहुत प्यारा लगता है। जरा गौर से देखो किसीको-आस-भर देखने के बाद जिसका मन ममता में न भर आए वह हृदयहीन है। मैंने उन्हें भी देखा है जो जघन्य जुर्म करते हैं। उन्हें गौर से देखने पर भी मन विश्वास नहीं कर प इसी आदमी ने जुर्म किया होगा.. एक वार में नागरा स्टेशन पर बैठी हुई थी। दो पुलिस वाले किसी को पकड़कर बैठे हुए गाड़ी का इन्तजार कर रहे थे। सच बताऊं लक ! मैंने उस खूनी को देखा ... उसकी गर्दन से पसीना बह रहा और आंखों में मायूसी थी। मेरा मन हुआ, उसका पसीना अपने हाथों पोंछ दूं और प्यार से पूछ्रे -तुमने ऐसा क्यों किया? और मुझे ऐसा गा कि वह खूनी आदमी सब कुछ सच-सच बता देगा और फिर कभी एसा नहीं करेगा . मैं उसे लेकर कहीं चली जाती पर यह मुमकिन तो नहीं होता उसकी मासूम गरदन से पसीना बहता रहा । जव में वर्दाश्त नहीं कर पाई तो स्टेशन के दूसरे छोर पर चली गई थी। सोता हुआ आदमी मुझे इतना भोला और प्यारा लगता है कि मैं पूरी रात उसके सिरहाने वैठकर काट सकती हूं, मेरा मन करता है, उसकी पलकों पर उंगलियां फेलं, उसके वालों को सहलाऊं, चेहरे के एक-एक नक्श पर हल्के स्पर्श से लकीरें खींचती रहूं, उसे धीरे-धीरे छुऊं और अपनी छाती से चिपकाकर सो जाऊं । वांहों की मांसपेशियों की उथली गहराइयों में रोनों की जो लहरें-सी बनती हैं, मुझे बड़ी सुन्दर लगती हैं । बांहें जहां से मुड़ती हैं, वहां पर भीगी-भीगी-सी जो लकीर पड़ती है, बड़ी प्यारी लगती है। आंखों के कोनों में जो गीलापन है न, उससे मासूमियत-सी फैलती है चेहरे पर। और बात करते हुए जव ओंठ किसी बात को न कह सकने के कारण पत्ते-से कांपते हैं, तब मन होत है उन पर हाथ रख लूं, अव वतामो, मैं आदमी से कैसे घृणा करूं? मिनट-दो मिनट की वात और है, किसी गुस्सा-भरे क्षण की बात नह करती, पर दुनिया में जितना सुन्दर नादमी है उतना और कुछ भी न है तिलक ! और जव यही आदमी वाहें फैलाकर मुझसे कुछ मांगता है। मेरी तरफ भरी-भरी निगाहों से देखता है तो मैं अपने को नहीं रे पातीयह जानते हुए भी कि कल यही मेरी बदनामी करेगा, कल मेरी बुराई करेगा । और जब-जब वह ऐसा करके अपने को धोखा है या डींग मारता है या बड़े बोल बोलता है, तो मुझे उसपर दया . - ७६ । है। बहुत वैचारा लगता है, तब वह आदमी वतरा भी उतना ही बेचारा लगा था जब वह मेरे सामने पड गया था। उनकी आंसो में बडी वेयसी थी। इन्तहा मजबूरियों में ही आदमी जगली बनता है, ज्यादतियां करता है, वे मगरिया मन की हो सकती है, मस्कारों और परिस्थितियों को हो सकती है । ऐमा कौन है जो गलत काम करने के बाद पडताता नही ? और पताते हुए आदमी को देस लेने के बाद मिवा ममता और प्यार के कुछ भी नहीं दिया जा सकता। मयमे वडा झूठ में एक ही वोलती रही है। बहुत खूबसूरत झूठ है यह । जव-जय, जो भी मेरी जिन्दगी में आया, उसने जाने-अनजाने, धुमा-फिराकर या सीधे-सीधे हमेशा यही जानने की कोशिश की कि मैंने पहले कितीस प्यार तो नहीं किया। पुरप का यही सबसे बड़ा सतोप है। और मैंने अपने हर प्रेमी में यही कहा है कि तुम मेरी जिन्दगी में पहले हो, तुम प्रथम हो ' यह खूबसूरत फरेव में करती रही है । इसके अलावा मैं और कुछ कह भी नहीं मकती थी । मैं हर पुरप में यही चाहती रही हूं कि वह मुझे अपना अतिम प्यार दे, मेरे बाद उसको जिन्दगी में कोई न हो। लेकिन ऐसा होता नहीं तिलक ! न होने पर भी इस खूबसूरत फरेव तो जा सकता है, इसके लिए जिया जा सकता है। बतरा ने मुझे गवरदस्ती कुछ दिन के लिए रोक लिया था, नहीं तो मैंने सोचा था कि मैं अपनी सहेली दमयन्ती के पास नागपुर चली जाऊंगी। वह कही एक अस्पताल में नर्स थी। लेकिन वतरा ने किसी और से कह कर मेरे लिए ट्यूटर-गाजियन की एक जगह दिलवा दी थी। अगर मुझे पहले पता चलता कि यह बतरा के महारे हुआ है तो मैं भूखो मरना पमन्द करती, पर यह नौकरी न करती। बतरा यह जानता था कि उन परिस्थितियों में मैं उसका एहसान नहीं लूगी, इसीलिए उसने मिरोज़ कृष्णन के जरिये यह काम कराया था। यह हमारी पड़ोसिन थी । ट्यूटर- गाजियन का काम मिलते ही मैं यतरा के घर से चली गई."कोई मुझे छोड़ने नहीं माया-सिर्फ नौकर की आंखों में पानी था। चलते वक्त उसने सलाम किया था और फाटक तक आकर तब तक देखता रहा था, जब तक मेरी टैक्सी मोड़ पर घूम नहीं गई थी। यह मेरी जिन्दगी का तीसरा मोड़ था। इसीके साथ मुझे आनाम की याद आती है - डा० चन्द्रमोहन के बारे में मैंने पहले भी तुम्हें बताया था । उम्र उनकी पचास से ऊपर थी और उनके दो बच्चे थे जिन्हें पढ़ाने और देखभाल के लिए मैं रखी गई थी। बच्चे आठ और दस साल के थे। उन्हें गाजियन की इतनी जरूरत नहीं थी जितनी कि स्वयं डा. चन्द्रमोहन को। डा. चन्द्रमोहन की अकेली वहन शिलांग में थी, इसीलिए उन्होंने डिवरूगड़ में एक नौकरी स्वीकार कर ली थी। अपने बच्चों को वे आंखों के सामने ही रखना चाहते थे। वहां बड़ी सीधी तरह से जिन्दगी चल निकली। साम में नागा विद्रोह को दवाने के लिए उन दिनों सेंट्रल रिजर्व फोर्स की टुकड़ियां जा रही थीं और वहां खासी हलचल थी। मेरी जीवनी का यह टुकड़ा सवसे छोटा पर सबसे दुखद है। अभी डा० चंद्रमोहन के घर चार महीने ही काम करते हुए थे कि मासाम जाने की तैयारी होने लगी। घर में सामान वांधा जा रहा था और मैं इस सोच में बैठी हुई थी कि अब कहां जाऊंगी। आसाम जाना मेरे लिए संभव नहीं था और फिर डाक्टर मुझे क्यों ले जाता? बच्चों से स्नेह हो ही जाता है पर इससे क्या ! वह तो बहता पानी है। में अपनी सहेली के पास नागपुर ही जा सकती थी, और कौन-सा सहारा था मेरा ! सचमुच मन बेहाल था। जिस नाव पर पैर रखती, वही डूबने लगती थी । और कोई चारा भी नहीं था। इसी सोच में बैठी हुई थी कि छोटे रंजन ने आकर कहा-पापा वुला रहे हैं । मैं समझी हिसाब-किताव करेंगे और क्या होगा ! कमरे में गई तो डाक्टर ने बढ़कर मुझे बैठने को जगह दी और बोले-तुम डिवरूगढ़ चल सकती हो? 1 ? उतनी दूर जाकर क्या करूंगी, डाक्टर ? मैं सोचता हू, बच्चों को सास तौर से हिंदी पढ़ाने के लिए वहां किसीका मिलना मुश्किल होगा। अगर तुम चल सको तो अच्छा रहेगा। बड़ी घूवगूरत जगह है "मैं दिन-भर अस्पताल में रहूगा तो इन बच्चों की देखभाल नहीं हो पाएगी क्यों कोई हिचक है ? या कोई दिक्कत ? नहीं-नहीं, ऐमी कोई बात नहीं, पर मैंने कभी भी आसाम जाने की बात सपने में भी नहीं सोची थी, इसलिए थोडा अटपटा लगता है... और क्या बात हो सकती है ? मैने कहा । शायद तुम यह भी सोच रही हो कि मेरे साथ आसाम जाने पर तुम्हारे रिश्तेदार वगैरह क्या कहेंगे नौकरी तो तुम्हें यहा भी पचासों मिल मकती हैं, फिर जाने की क्या ग़रूरत ? पर मैं सोचता हूं कि... मेरे कहने का मतलब है कि उसकी जवान मूल गई थी और मैं अस. मंजस में बैठी थी, आखिर डाक्टर कहना क्या चाहता था ? दूसरी तरफ देखते हुए डाक्टर ने सीधी-सी बात कह दो-अगर तुम्हे मंजूर हो तो हम गादी भी कर सकते हैं ! यह कह और सुन चुकने के बाद कई क्षण तक कोई नहीं बोला। फिर डाक्टर ने ही खामोगी तोड़ी-तुम्हे देखते हुए मैं कह नहीं पा रहा था, पर यह तुम्हारे मन पर है कि तुम इमे मंजूर करो या न करो। मैं तुम्हारे लायक भी नहीं, पर जो वात मन में थी, वह मैंने कह दी । सोच लो, और क्या कह सकता हूं, मैं सिर्फ कह सकता था, अब जैसा तुम चाहो। जब डाक्टर कोई प्यार-भरी वात करता था तो उसके मुह के कोनों में सफेद दाग आ जाता था, उससे मुझे परेशानी होती थी। उसके चेहरे की ओर देखना मुश्किल हो जाता था । और यह उसका तकिया- कलाम था-अब जैसा तुम चाहो ! इस तकिया कलाम को मैं भूल नहीं पाई हूं। वह बहुत मोटे गोशे का चश्मा भी नहीं भूल पाई हूं जो उसकी आंखो पर रहता था। मैं येसहारा थी, पर.डाक्टर के लिए मेरे मन में किमी भी तरह को उद्दाम भावना नहीं उठती थी, नफरत में उससे भी नहीं कर पाती - हां मुझे कुछ वातों से चिढ़ ज़रूर होती थी। वह धीरे से बोला, मैं तुमसे तुम्हारी ज़िन्दगी मांग रहा हूं."मेरे स रुपये के सिवा कुछ भी नहीं, पर तुम मुझे सहारा दे सकती हो... कर जैसा तुम चाहो ! मैंने खूब समझ-बूझकर उसे यही जवाव दिया कि शादी की बात में नहीं सोचती, पर साथ चल सकती हूं। बच्चों की देखभाल में कोई फर्क नहीं पड़ेगा । और पांचवें दिन में डाक्टर चन्द्रमोहन और दो बच्चों के साथ डिवरूगढ़ के लिए रवाना हो गई। चौथे दिन हम वहां पहुंच गए। डिवलगढ़ की बस्ती में दो कमरों का अस्पताल था, जहां एक टूटी-सी अलमारी में दवाइयों की कुछ शीशियां और औज़ार थे। एक मेज़ डाक्टर के लिए थी और दूसरे कमरे में छ: पलंग थे जिनपर गद्दे वगैरह रोगियों के आने के बाद बिछाए जाते थे। अंग्रेजी दवाइयों में वहां के लोगों का ज्यादा विश्वास नहीं था. वे खुद अपने वैद्य हैं। डिवरूगढ़ पहुंचकर मानसिक और शारीरिक आराम भी मिला यह छोटी-सी वस्ती है । कहां दिल्ली की धूमधाम और कहां डिवरूगढ़ का शांत वातावरण । नीले पहाड़ों का वह भूखण्ड बड़ा ही मनोरम है तिलक ! काश्मीर की अपनी सुन्दरता है, पर आसाम की खूबसूरती वयान नहीं की जा सकती। ब्रह्मपुत्र से सुन्दर कोई नदी नहीं है, धरती पर... छरहरे शरीर और पीले रंग के पुरुषों और औरतों को देखकर में मन रम गया था। सचमुच जीवन का एक अनुभव ही था आ जाना । और कामरूप''सचमुच कामरूप है. जादू का देश ! हुए नीले पहाड़ और उनके उठे शिखरों से उन हुए धुंघराले बादल । नीले आसमान की पृष्ठभूमि पर गहरे नीले की उन्नत चोटियां मुझे बहुत लुभाती थीं। छोटे-से पर साफ-सुथरे की खिड़की से मैं घंटों बांस के वनों और नीले पहाड़ों को देखती थी। पहाड़ी ढलानों पर कहीं-कहीं हरे झरने-से दिखाई पड़ते चाय के वाग थे, जिनकी हरियाली सवसे अलग थी। दूर-दूर तक फैले , एक शाम में बच्चों को पढाकर बाहर निकल आई। दूर नीले पहाड कालिख मे डूब चुके थे."तभी एक डरावना-सा दृश्य दिखाई पड़ा। काले पहाड़ पर से आग का दरिया वहता हुआ आ रहा था और हजारों मशालें ऊपर-नीचे जल रही थी, गोले फटने जैसी आवाजें आ रही थी। मैं घबराकर अन्दर भाग गई । डाक्टर को पुकारा तो भागता हुआ नौकर आया. मैंने उसे दिखाते हुए पूछा कि यह क्या है, तो वह बड़ी ही सरलता से मुस्करा दिया"मैं उसको बोली भी ठीक तरह से नहीं समझ पाती थी। डाक्टर कुछ-कुछ समझ लेता था। मेरे कंधे पर अभय का हाय रखने की चेष्टा करते हुए डाक्टर ने मुझे समझाया-बास के जंगलों में आग लगी है। ये धडाके वास फटने के हैं और यह आग का जो दरिया ढलान से नीचे उतर रहा है वह फैलती हुई आग है. यहां की खेतिहर जातियां बंजारों का जीवन बिताती हैं । जगल जलाकर वे कुछ दिन यहां खेती करेंगे, फिर आगे बढ जाएंगे, यही इनकी जीविका का साधन है । सेत बनाने के लिए उन्होंने जंगल जलाया है । अव जैसा तुम चाहो ! डाक्टर का सूखा-सूखा हाथ मेरे कंधे पर थरथरा रहा था। भयग्रस्त नारी को सात्वना देने का काम कायर पुरुप भी कर लेते है । -डिवरूगढ में थोड़े दिन बाद मुझे अकेलापन काटने लगा । सौन्दर्य के बीच रहते हुए भी व्यक्ति को ऊब हो सकती है । एकरसता जीवन का धर्म नहीं है । पर मैं लौटकर कहीं भी जाने की बात जब सोचती तो दम फूलने लगता । मेरे जैसा अकेला भी कोई होगा भला! कहां ये सोग समाएंगे ! आखिर मेरे मन का चोर भी जागा--इतनी ठोकरें खाने के वाद शायद भीतर-भीतर मैं जीवन की सुरक्षा चाह रही थी. मैं शायद ऐसी हालत में थी कि किसी भी गलत मजिल पर एक सकती थी । पहाडी रास्तों पर चलते-चलते गंदी दुकान की चाय भी पीनी पड़ती है, उसी तरह का सवाल था मेरे साथ । और डाक्टर हर रोज मेरो तरफ लालसा-भरी निगाहों से देखता -- था और अपने रुपये का हिनाव समझाता था। यह उसका नियमित कार्यक्रम था-~-चश्मा लगाकर मुझे देखना और इधर-उधर से बात जोड़-तोड़कर रुपयों पर ले आना। चूंकि उसके मुंह के कोनों में सफेद झाग आ जाता था, इसलिए मैं समझ लेती थी कि अब वह प्यार से पीड़ित है। अब जैसा तुम चाहो ! बस इसी पर उसकी वात टूटती थी। पर में भी चाह नहीं पाती थी। उससे मैं क्या चाह सकती थी? रोज़ यही होता था । वह हमेशा पूरे कपड़े पहने रहता था। वैसे अपने कमरे में वह कमीज़ उतारकर बैठता था, पर ऐसे मौके पर जव उसे मेरी आंख के सामने पड़ना होता था, वह कमीज़ पहनकर और कफ के बटन वन्द करके ही आता था। उसकी निरीहता पर मुझे तरंस आता था । कभी-कभी वह मुझे बहलाने के लिए अपनी विद्वत्ता और ज्ञान का प्रदर्शन भी करता था. ऐलोपैथी का डाक्टर होते हुए भी वह आयुर्वेद पर भाषण देने लगता था---आयुर्वेद के आठ अंग हैं इरा जी! शल्य, शालाक्य, काय-चिकित्सा, कोमार भृत्य, भूत विद्या, अगदतंत्र, बाजीकरण और रसायनतन्त्र! रसायनतन्त्र से ही आज की डाक्टरी की पूरी विद्या निकली है और शल्य से सर्जरी ! अपने देश में क्या नहीं था ? समझीं ! फिर जैसा तुम चाहो... और वह आगे कहता- आसाम के गारो और गासी तो खास तौर से अच्छी वैद्यक जानते हैं। घाव, हड्डी टूटना आदि का इलाज तो ये हड़जोड़, पोजो और कक- रोधा से कर लेते हैं। कुछ की दवा हम आज तक नहीं खोज पाए, पर इन आदिम जातियों ने कई जड़ी-बूटियों को पहले से खोज रखा है." कोरैया, अनन्तमूल और गखुला से ये उसका इलाज भी कर लेते हैं... है। "हैं. अब जैसा तुम चाहो। मुझे खामोशी से सुनते देख वह बोलता जाता-जिसे हम मानसिक व्याधि कहते हैं-यानी भूत-प्रेत, उसका इलाज भी इनके पास है। तो फिर यहां आने से फायदा ? मैंने कहा और उसकी ओर देखा- उसके मुंह के कोनों में आग भर रहा था । वस, फिर उसने क्या कहा, । मैंने ध्यान नहीं दिया। उसकी यात्मा प्रेम से व्यागुल हो रही थी। मैं बहुत छटपटाती थी, पर मेरे लिए कोई किनारा नहीं था । धीरे-धीरे डाक्टर को मैं गौर से देखने लगी, शायद उसमें कुछ ऐसा हो जिसे मैं चाह सकू, तो यह हर क्षण को चिट तो न हो। आखिर एक दिन हारकर मैंने शादी की स्वीकृति दे दी। मेरे सामने कुछ भी नहीं था । जव दलदल से निकलना हो ही नहीं सकता था तो बेहतर था कि एक बड़ा-सा पत्थर अपने पर डाल लू और आकण्ठ उसी- में समा जाऊं। निश्छल प्यार कर सकने की स्थिति मेरी नहीं थी। डाक्टर को पैसे का सहारा था। और सच पूछो तो मुझे भी वह सहारा उस वक्त छोटा नही लगा था । आज मैं जो थोडी-सी आजाद हू, उसी के बल पर हूं, नही तो लोग मुझे खा गए होते। दूसरे महीने हमने शादी कर ली। जब तक हमने शादी नहीं की, डाक्टर ने कभी मेरे शरीर को छूने की हिम्मत नही की थी। भीतर- भीतर वह भारतीय संस्कृति का संघा प्रेमी, आदर्शवादी और बड़ा ही कायर था । कापर वह भी है जो अपना अधिकार स्थापित न कर पाए। डाक्टर कभी भी अपना अधिकार मुझपर नही जमा पाया। जिस रात हम शिलांग से शादी करके लौटे, उसी रात पहली बार डाक्टर ने मेरी कमर में कापता हुआ हाथ डाला था। मुझे लगा था जैसे कोई मरा हुआ साप मेरी कमर मे लिपट गया हो और जव पहली वार कापते हुए उसने मुझे प्यार से चूमा था, तो मैं गिजगिजाहट से भर गई थी... जैसे किसी मेढक पर मेरे ओठ पड़ गए हों। ..'अव कल्पना करो मेरे सुख की ! चारों तरफ हताश होकर मैं अपने को मारने पर तैयार हो गई थी। एक इरा उसी दिन मर गई, तिलक "एक इरा उसी दिन जिन्दा दफन हो गई। वह मेरे पास लेटता तो उसकी टाणे डर से कापती रहती "वह सिर्फ मुझे परेशान करता था "मुझे अस्त-व्यस्त करके भयातुर-मा चिपका रहता था और फिर दात निकालकर पाम की मेज पर रख देता और झागदार मुंह से कहता था-अब जैसा तुम चाहो !
कितना बड़ा व्यंग्य था यह-अव जैसा तुम चाहो ! मैं क्या चाह सकती थी? चाहने को रह ही क्या गया था ? कभी-कभी जब मेरे भीतर का पशु जागता था तो उसका चश्मा उतारकर रख देती थी, तव वह जैसे बंधेरे में विलविलाता था। कुछ दिनों बाद मैंने उसे अपने पास आने से मना कर दिया, अगर वह आता तो मैं कमरे से निकलकर चट- खनी चढ़ा देती थी और खुद वाहर वाले कमरे में जाकर लेट रहती थी। तव वह रोता था.और दरवाजे पर माथा फोड़ता और चीखता था- इरा, मुझे निकाल दो, अव नहीं आऊंगा... उसे सताकर भी मैं चैन नहीं पाती थी। और वह भी मुझे कम नहीं सता रहा था। मेरे लिए वहां रहना मुश्किल होता जा रहा था। जैसे-जैसे शाम आती, मेरा मन घबराने लगता था। एक रोज़ जव उसने मुझे बहुत छेड़ा तो मैंने उसके हाथ बांध दिए। वह नकली दांत भी निकालकर रख चुका था, नहीं तो उन्हींसे मुझे काटता । वह मुझे टांगों से मारता रहा और अपने को कोसता रहा." उस रात वारिश हो रही थी और हाथ बंधने के बावजूद वह मान ही नहीं रहा था। बार-बार कहता था--तुम मेरी बीवी हो ! तुम मेरी बीवी हो.. मेरा जो मन आएगा करूंगा." और अपने को असहाय पाकर वह रोने लगा। मेरी आत्मा को वड़ा कष्ट हो रहा था। पर मैं झुंझला रही थी। आखिर मैंने उसके हाथ खोल दिए। वह भीतर गया और शराब के कुछ बूंट पीकर फिर आया और उसकी मरे सांप जैसी बांहें मेरे चारों ओर लिपटने लगीं। मैं पलंग से उतर गई। पागलपन की सीमा छूते हुए वह मुझपर टूट पड़ा-जैसा मैं कहूंगा वैसा करोगी तुम ! नहीं करोगी तो निकल जाओ निकल जाओ। और छिपकली की तरह जवान निकालकर वह अपने ओंठों पर वार-बार फेरता रहा था। मैं वरदाश्त करती रही, करती रही । अब उसने देखा कि मैं न बाहर जा रही हूं और न उसके पास आ रही हूं तो वह मेरे ऊपर लपका। मैंने पूरी ताकत से उसे पकड़ा और बारिश में ही उसे दरवाजे के बाहर कर दिया। वह भीगता रहा और चीखता रहा । आसपास कोई घर भी ।
नहीं था और वास के पेड़ों पर पानी शोर भी श्यादा करता है, इसलिए उसकी आवाज़ कुछ असर नहीं कर रही थी। मैं कितनी क्रूर वनती, कब तक सहती ? यह उसे सताने की बात नहीं बल्कि सुद अपने को सज़ा देने की बात थी। मैं अपने को सताती थी। आखिर मैंने दरवाजा खोला था और वह पर पटकता हुमा भीतर आया । रात-भर कम्बल ओढे वह एक तरफ सोता रहा था। सुबह उठते ही वह मेरे पास आया और बोला-इरा जी, मुझसे चार-वार गलती होती है, मुझे माफ कर दो अब मैं कभी नहीं करूंगा." अब जैसा तुम चाहो। मुझे बड़ा रहम आता था उसपर। उतना ही रहम अपने पर आता था। मेरे भीतर की एक इरा अपना पूग व्यक्तित्व लेकर अलग खडी हो गई थी और वह हम दोनो को देखा करती थी। जब मैं चाय बनाने उठी, तो उसने मेरा हाथ पकड कर छोड़ दिया और बोला-~मैं अभी नौकर से वनवाकर लाता है। कहते हुए उसके मुह के कोनो में प्यार का झाग आ गया था और उसपर दया करते हुए भी मैंने मुह फेर लिया । पता नहीं कब बाजार जाकर वह मेरे लिए मेखला और चादर खरीद लाया । बडी ही खूबसूरत थी मेखला ! असमिया कला का नमूना'"औरतों की यही पोशाक है वहां । मैंने उसको सुशी के लिए मेखला पहनी और चादर भी डाल ली। देखते-देखते उसके झाग निक- लने लगा और टार्गे कांपने लगी। चश्मा उतारकर उसने मुह नीचा कर लिया। मुझे सुश रखने के लिए वह भरसक कोशिश करने लगा था। एक दिन अस्पताल से लौटा तो कुत्ते के दो बच्चे बमुश्किल तमाम वह अपनी गोर में दवाकर लाया और बोला, तुम्हारे लिए लाया हू इरा जी ! इन्हें तुम्हारा मन बहलेगा... पिल्ले सुन्दर थे, पर मेरा जो उवकाने लगा। डाक्टर की नई किसी भी चीज से मेरा मन घबराने लगता था। जब भी में उन' । देखती या छूती तो वे मुझे डाक्टर की ही तरह लिजलिजे और गंदे लगते । वैसी ही निरीहता से वे पिल्ले ताकते थे और एक-दूसरे से चिपक- कर सोते थे 'मन में घृणा उबाल खाने लगी और मैंने दूसरी सुवह ही उन्हें भगा दिया। शाम होते-होते डाक्टर के लौटने से पहले एक पिल्ला फिर वापस आ गया. मेरा जी घबराने लगा। उसे देखकर मैं पागल हुई जा रही थी, उसे बाहर पटककर मैंने दरवाज़ा बन्द कर लिया। कुछ देर बाद डाक्टर ने आवाज़ दी और दरवाजा खोलते ही वह पिल्ला भी दुम दवाकर उसके साथ भीतर आ गया। मैं रात-भर नहीं सो पाई थी। हर क्षण लगता था जैसे तमाम पिल्ले मेरे शरीर से चिपके हों और अपनी लेसदार जीभ से मुझे चाट रहे हों। आधी रात में उठकर मैं खूव नहाई । जव सरदी सताने लगी तो मैं निकलकर आई। पर उस रात मुझे नींद विलकुल नहीं आई। डाक्टर पिल्ले पर हाथ रखे सोता रहा था। सुवह मेरा सर भारी था। हृदय पर हजारों मन भारी पत्थरों का वोझ था। मैंने डाक्टर को बुलाया और हुक्म दिया, इस पिल्ले को छोड़ आमो... मैं इसे नहीं छोडूंगा। डाक्टर ने गुस्से से कहा तो मैंने साफ-साफ कह दिया--अगर इसे नहीं छोड़ोगे तो शाम को घर जाने की ज़रूरत नहीं है। और शाम को जब वह आया तो पिल्ला नहीं था। मैंने राहत की सांस ली। पर वह क्षणिक राहत कव तक साथ देती ! मेरी ज़िन्दगी का राग-रंग खो गया था। मेरे पास कुछ भी नहीं था... । और जव असमिया औरतें मेखला और चादर पहन-पहनकर राग- रंग-भरे वीहू त्योहार का इन्तजार करते हुए नाचतीं और गाती वीहू लोई कोई दिन आसे सामानिया। वीहू लोई कोई दिन आसे उजानी नामानी मारो के उखानी वीहू लोई वारा दिन आसे ! -:
कितने दिन वाकी हैं बीहू के आने में सखी.. में हर दिशा में देखती हूं."उत्तर और दक्षिण देखती हूं."ओह ! अभी तो बारह दिन वाकी है। पर तिलक ! मेरे जीवन का वीहू तो हमेगा-हमेशा के लिए चला गया था, अब फिर वह नहीं आनेवाला था । सब दिशाएं वन्द थी मेरी · सोचती थी कि में वारह जन्मों तक इंतजार करूंगी, फिर भी बीहू का रागरंग मुझे नसीव नहीं होगा. तिलक | जब धान कट सुकता था, पागल बना देनेवाली हवा चलती थी और जगल मे नई कोपलें फुटती थी, तब मेरा मन रोता था" आसाम के वास जैसे लचकीले पुरुष और नारिया जब झूम-झूमकर गाते और नाचते थे, और नये घर बसाए जाते थे तो मैं सिड़की पर मर रखकर रोया करती थी। मेरी खुशियां कहा चली गई ? क्या मुझे यह सब नही मिलना था ऐसा कौन-मा पाप किया था मैंने जो जीवन के सारे सहारे खो दिए थे । क्या मैं घर नहीं वसा सकती थी ? एक नई जिन्दगी शुरू नहीं कर सकती थी। एक-एक आवाज़ पर मेरा मन रोता था."अंग-अंग से दुख के स्वर फूटते थे। मैं तपती रेत के दलदल में फंसी हुई थी। मेरा सब कुछ झुलसा जा रहा था "मेरी आत्मा मर गई थी। बावजूद अपनी हारो और निराशाओं के, जो कुछ मैं नहीं थी, यही बनती जा रही थी। मैं जानवर होती जा रही थी। भावनाओ की कोमल स्वर-तहरिया अब मन के किसी भीतरी कोने में भी नही गूजती थी। मेरे शरीर पर नकली दातों के दंश थे। मैं पहाडों की तरह जड और नीली पड़ती जा रही थी। पांस-वनो से जैसे खोखली हवा श्रीरान सीटिया वजाती हुई गुजरती है, वैसे ही अरमानों की सासें सीटिया वजाती गुजरती थी और वीरानो मे खो जाती थी । मैं आग के दरिया में वह रही थी और मन की अच्छाइयां लपटो मे चटख-चटखकर दम तोड़ रही थी। आखिर मैं डाक्टर से कहकर एक दिन डिवरूगढ से चली आई और । नागपुर में अपनी सहेली के पास पहुंच गई। मैं डाक्टर को एकदम भूल जाना चाहती थी, पर जिन्दगी की चट्टान पर पड़े हुए निशान जल्दी नहीं मिटते । उधर आसाम में विद्रोहियों के वलवों तथा हमलों की भी खबरें आ रही थीं। नागपुर पहुंचकर एक बार मन हुआ कि बम्बई हो आऊं। न जाने मन में क्यों यह बात आई थी. शायद विमल कहीं मिल जाए। शायद वह मिल ही जाए... मुझे दमयंती के पास पहुंचे सात-आठ दिन ही हुए थे कि एक रात कम्पाउण्डर का भेजा हुआ तार मिला-डाक्टर गोली लगने से घायल हो गए हैं, फौरन आइए ! वावजूद उफनती घृणा के मैं रुक नहीं पाई। आखिर वहां परदेश में उसका कौन था ! तीन दिन बाद जव मैं डिवरूगढ़ पहुंची, तो पता चला कि वह अस्पताल में ही पड़ा है। मेरे वहां पहुंचने से पहले शिलांग से उसकी वहन पा चुकी थीं। डाक्टर को ऐसी हालत में देखकर मेरी आंखों में आंसू आ गए। गोली लगने से जैसे उसके भीतर का लिजलिजा और कायर आदमी मर गया था। दाहिने फेफड़े से गोली पार हो गई थी। वह फेफड़ा चिथड़ा हो चुका था। दूसरे डाक्टर लोग उसकी जीवनी- शक्ति की तारीफ कर रहे थे.."उसे कभी-कभी होश आता था। बीच में होश आते ही उसने मुझे पहचाना था और उसके ओंठ हिले थे... नकली दांत अलग रखे हुए थे, चश्मा उतरा हुआ था, जिसके कारण वह एकदम वदला हुआ लग रहा था । और आसाम के नुकीले नीले पहाड़ों की तरह उसके नाखून सुन्दर लग रहे थे, मेरा मन उसे देख-देखकर भर आता था. 'जो कुछ भी हो, उसका मरना मुझसे नहीं सहा जा रहा था 'मुझे देखकर उसने कुछ कहने की कोशिश की तो वही झाग मुंह के कोनों में आ गया था और मुझे लग रहा था जैसे वह ओंठों में बुदबुदा रहा हो-अब जैसा तुम चाहो। ..'अव जैसा तुम चाहो ! उसकी खामोश आवाज़ बार-बार मन में घुमड़कर गूंजती थी-~~अब जैसा तुम चाहो। और मुंह के कोनों में प्यार का झाग जमा हुआ था जैसे वह झाग कहता हो-~~-अव जैसा तुम चाहो।
और मरी आस्मा ने चीखकर कहा था-में चाहती हूं तुम जी जाओ'तुम जी जाओ। मैं यही चाहती हूँ। और उस झाग को मैंने पहली बार हलके से पोछा था । मन में आता था कि अगर डाक्टर के मीने का पाव मेरे चिपका लेने से भर जाए तो मैं वारह जन्मों तक उसे वैसे ही चिप- काए रहूं, मरे हुए सापों-मी बाहे स्वीकार करती रहूंगी। लेकिन डाक्टर को फिर होश नहीं आया, पाव दिन बहुत-सा झाग उसके मुंह से आया और दम टूट गया । उस वक्त उसके हाथ मेरे हायों में अवड़ रहे थे और अंधी आखों को पुतलिया पलटा खा रही थी। में पछाड़ साकर रो पड़ी थी, तिलक ! में जिससे मुक्ति पाना चाहती थी, वही मिल जाने के बाद आत्मा पर और गहरा वोझ आ पड़ा था । मरते हुए आदमी को देखने की दारुण व्यथा से कोई भी पीडा बडी नहीं है। आज भी डाक्टर का अस्फुट स्वर सुनाई पडता है—अब जैसा तुम चाहो । पर चाहते हुए भी मैं उसे बचा नहीं पाई। लेकिन इतना कह देने से मैं उऋण नहीं हो जाती। यह ऋण मैं कभी भी उतार नहीं सकती.. और मेरे पास इसका कोई भी जवाब नहीं है जो मैं डाक्टर को आरमा को दे सक-अव जैसा तुम चाहो । अब जैसा तुम चाहो । यह प्रश्न हमेशा मुझसे लिपटा रहेगा। इसे छुडाकर और बाहर टवेलर चटसनी बन्द करने से काम नहीं चलेगा, क्योकि आत्मा में पहली नहीं होती। आसाम में अब भी बीहू मनाया जाता होगा । दान-दनेश लगती होगी । धान कटने पर नशीली हवा वहतो होगी और न जाते होंगे । घरो मे चरखे चलते होगे और धरती मे होगी: तरुणियां मेखला पहनकर मस्ती में गाती और नोले पहाड़ों को घुघराले बादल चूमते होगे" पर मेरे :- सिर्फ एक आवाज गूंजती है-अब जैसा तुम पाहो .
'डाक्टर को किसी विद्रोही ने गलती से गोली मार दी थी, यह सकर कि वह कोई बड़ा सरकारी अफसर है । डाक्टर की वहन से मैंने त कहा कि मैं दोनों बच्चों को दिल्ली ले जाऊंगी; उन्हींके साथ गी और उन्हें पढ़ाऊंगी-लिखाऊंगी, पर वे नहीं मानी। डाक्टर के उस क्य का जवाब मैं ऐसे ही दे सकती थी-मैं रंजन और विजन को पने साथ ले जाना चाहती हूं। बस यही चाहती हूं मैं "इन्हींके लिए में जी लूंगी। पर हर व्यक्ति को जीवन में उठे अहम सवालों का जवाब देने का मौका नहीं मिलता। मैं डाक्टर को जवाब नहीं दे पाई। उसकी बहन कुछ दिनों बाद अपने पति के साथ दोनों बच्चों को लेकर शिलांग चली गई थी। आजकल रंजन शिलांग में डाक्टरी पढ़ रहा है और विजन शायद इण्टर में है। शिलांग जाने से पहले उसकी बहन ने मुझे सांत्वना देते हुए कहा था-तुम्हारा घर अब भी है. 'जव मन चाहे शिलांग चली आना। ये बच्चे भी तुम्हारे ही हैं, जब कहोगी इन्हें तुम्हारे पास दस-पांच रोज़ के लिए भेज दूंगी। यह मत समझना भाभी, कि भइया के न रहने से तुम्हारे रिश्ते टूट गए." रिश्ते ! घर ! पहली वार सुना था इन शब्दों को। इतने दिनों में यह भूल ही गई थी कि एक घर भी होता है और रिश्ते भी होते हैं और ये रिश्ते जीवनपर्यन्त रहते हैं। जीवन के बाद भी इन रिश्तों लोग याद कर लेते हैं, और रो लेते हैं । डाक्टर से भी मेरा कुछ रिक्ष था, इसीलिए तो रोई थी। नहीं तो न जाने कितने लोग रोज़ मरते हैं मैं इस मृत रिश्ते को लेकर ही बाकी वक्त गुज़ार लेना चाहती है क्या एक रिश्ता काफी नहीं होता? पश्चात्ताप का ही रिश्ता सही। उसी पश्चात्ताप के रिश्ते को मैं अभी तक निभा रही हूं, तिलक ! जिन्दगी का सबसे दुखद अध्याय यही है । पश्चात्ताप का रिश्ता और वह गूंज-अव जैसा तुम चाहो उनकी वहन जा रही थीं। बच्चों का सामान जब बांधा था, तो मैं पत्थर रखे सव बरदाश्त करती रही थी। मैं एकाएक कैसे बदल पाती । उसी तरह अनामक्त खडी थी और सोच रही थी मैंने तो सच- मुच यच्चो की उम दुनिया की ओर भी कभी पूरा ध्यान नहीं दिया था। सिवा पढाने और खाना खिलाने के मैंने उनका कुछ भी नहीं किया था। और जब वे मेरे पैर छूकर चले तो ममता से मेरा हृदय फट पड़ा था। यह ममता इतनी देर वाद क्यो उपजी थी?...पर थी कहीं भीतर ही, जिसे अपनी परेशानियो में सहेजना भूल गई थी "सेमल के मासल लाल-लाल फूल । डाक्टर की वह्न ने चलते समय कुछ कागज मुझे सौंपे थे और कहा था-भइया पच्चीस हजार म्पया इन बच्चों के लिए छोड गए हैं, वह मेरे नाम हैं ताकि मैं इनकी पढाई और देखभाल में लगाऊ । यह पच्चीन हजार का कागज तुम्हारे लिए छोड गए हैं, भाभी | ताकि तुम्हे दिक्कत न हो। सचमुच डाक्टर बहुत समझदार था। उसकी मृत्यु के माय ही मेरे जीवन का तीसरा और सबसे दुखद और करण अध्याय समाप्त हो गया। कुछ मेरे भीतर मरा भी और कुछ बहुत अच्छा पैदा भी हुआ । डाक्टर एक पारस पत्थर की तरह था। जो सोना यन सकता था, उसे वह सोना बना गया, जो मिट्टी था वह मिट्टी रह गया। मेरे लिए वह सब कुछ करता था। मेरा मन बहलाए रखने को वह कुत्ते के पिल्ले लाया था, मेखला लाया था और फूलो की वेणिया बनवा- कर लाता था। मुझे अपने साथ नीले पहाडों की घाटियो में घुमाने ले जाता था। बंसवट के नीचे विठाकर वह प्यार की बातें करता था और वही झाग उसके मोंठो के कोनो में जमा हो जाता था। तभी से जो-जो चीजें, जो रस्य और फूल वह साया मेरे लिए अछूत होते गए । उसके साथ रहने से मेरे मन की मौन्दर्य-भावना मरती गई। कुत्तो, फूलों, पहाड़ों और जगलों से मुझे अनजाने ही चिड़ हो गई । चाय के बागों के आसपास घूमते-घूमते चाय तक पीने से नफरत होने लगो अगर कुछ मुझे अच्छा था तो वे युवक और युवतियां, जिनके मंगोल, तिब्बती और चेहरों में शांति का आभास मिलता था-अपार मानसिक शांति डाक्टर को वहां के लोग अच्छे नहीं लगते थे और न वे तुनी ड़यां, जो चायवागानों के पास फुदकती रहती थी। मैंने हर उस ज्ञ से घृणा की जो डाक्टर को अच्छी लगती थी. इसीलिए मेरा मन च गया। दुनिया के दृश्य में मेरा मन नहीं रमता था। हर सुन्दर दृश्य साथ डाक्टर की निकटता का आभास जुड़ा हुआ था। लेकिन उसके गरने के बाद मैं मन ही मन सोचती रही और मुझे लगा कि मैं एक पागल को भी प्यार कर सकती हूं, उसके साथ जिन्दगी बिता सकती हूं, ऊपरी तौर से जो ममता और करुणा मेरे भीतर की हिंसा और पशुता में छिप गई थी वह भीतर-भीतर जौर गहरी जड़ें पकड़ रही थी, क्योंकि कायर होने के साथ डाक्टर वेहद ममतामय और करुणा से भरा हुआ था । डाक्टर ने मुझे आंतरिक सामर्थ्य दी, मुझे यह एहसास कराया कि मैं भी कुछ हूं। और मेरे लिए रुपयों छोड़कर उसने मुझे परिस्थितियों का सामना करने का साहस दिया । मुझे मेरे पैरों पर खड़ा कर दिया। वह तिरस्कार और हिंसा का शिकार होता रहा पर उसका मन कितना उजला था, वह सावित कर गया । औरों के साहस मुझे कुचलते रहे, मेरे अहं को चूर-चूर कर खुद जीत की भावना से भरते रहे और मुझे तोड़ते गए, पर डाक्टर की कायरता ने ही मुझे साहत दिया मेरे प्रेम की संकुचित सीमाओं को उसने जवरदस्ती खींचकर फैला दिया मेरी ममता को असीम कर दिया। उसने मेरे पूरे व्यक्तित्व के को कोने को मथकर छान दिया। मेरी सारी वृत्तियां-अच्छी और दू जागकर भयंकर मानसिक द्वंद्व में आवद्ध हो गई और उनके संघर्प ने व्यक्तित्व को विराट् बना दिया है । आज मैं उतनी संकुचित नह जितनी पहले थी, उतनी निरीह और अपंग नहीं हूं, जैसी पहले थी मैं सुनता रहा था और इरा जैसे दूर खड़ी डाक्टर की आत्म श्रद्धांजलि अर्पित कर रही थी। वह पूजा की आग की तरह पवि रही थी। उसका अंग-अंग ममता और करुणा की अनुभूति ते रहा था । लग रहा था जैसे कोई देवदासी तन्मय होकर आराधना लगी हो । शायद वह यह भी भूल गई थी कि मैं उसके पास बैठा हूं और डाक बंगले में सोलंकी पड़ा है । नीचे देवदार की कत्यई पत्तियों का चिकना गद्दा था और लगता था कि अभी उठते ही वह फिमलेगी। में इरा के व्यक्तित्व से आक्रान्त हो गया था। मन करता था कि उसे सहेजकर रखू और अव विखरने न दूं, इसीलिए मैंने उससे पूछा- लेकिन इरा, अव तुम क्या सोचती हो ? किस बात के बारे में? उसकी निर्मल आखो मे आश्चर्य भर गया था। यही, आगे आने वाली जिन्दगी के बारे मे, मैंने कहा । मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझीउसने फिर पूछा। तुम शादी क्यो नही कर लेती ? क्या नहीं है तुम्हारे पास अपार रूप है, मन को निर्मलता है और ममता भी। कोई भी तुम्हें पाकर सुखी हो सकता है । मैंने कहा। तुम हमेशा आदर्श और दर्शन वधारते हो । सुप के लिए किस चीप की जरूरत है, यह कोई नही जानता । आज जिसमे मुख मिलता है, काल वही घोर दुःख का कारण बन जाता है। सुरा और दुग किमीके जीवन मे नहीं आते। ये दो रेखाए है जो जीवन के दोनो ओर गमावर बिंची हुई है । परिस्थितियो और इच्छाओं का बोझ जब जमा पड़ता है, व्यक्ति खिसककर किसी एक रेखा मे अटक जाता है और उसपर फिमलने लगता है। फिर कोई एक वडा-मा झटका उम रेखा में दूसरी ओर फेंर 'देता है. ऐसे ही जीयन चलता है। सुख कामना करने में नहीं मिलता और मैं किसीको सुखी बना सकती हू यह भी एक कामना ही है। क्यों, गलत कह रही हूं? कहते हुए वह एकदम हम पड़ी यौर बोली--में ही दर्शन बघारने लगी। लेकिन यदि कोई यह ममझता है तो तुम्हें क्या amiti है ? मैंने पूछा ..
हंसते हुए ही वह वोली, साफ-साफ क्यों नहीं कहते कि तुम मुझसे शादी कर सकते हो। लेकिन तिलक ! ऐसा में नहीं कर सकूँगी... राज़ व्यक्ति की जिन्दगी के सबसे बड़े दुश्मन होते हैं। पिछली जिन्दगी वार-बार कुचले हुए सांप-सी पलटा खाती है और इस सकती है। जिसे मैंने सब कुछ बताया है, उससे शादी नहीं कर सकती क्योंकि मैं यह नहीं कह सकती कि तुम मेरी ज़िन्दगी में पहले हो । कैसी बातें कर रही हो, इरा? मैं ठीक ही कह रही हूं। तुम्हारे मन की यह उदारता हमेशा नहीं रहेगी। कितीके पास नहीं रहती। तव रोना पड़ेगा, इससे फायदा ? इरा ने कहा। मैं कहता हूं. मुझपर विश्वास करो, इरा। हम इतना मानकर चलेंगे कि इस क्षण से पहले के क्षणों पर हमें निगाह नहीं डालनी है। - मैंने कहा। । कहने से कुछ नहीं होता । हर मन पवित्रता का भूखा होता है। मेरा मतलव दकियानूसी पवित्रता से नहीं है । मैं उस बोध की बात कर रही हूं जो एकाधिपत्य के आस-पास की चीज़ है । कोई भी इससे इंकार नहीं कर सकता। मैं भी नहीं करूंगी। और अव सव कुछ बता देने के वाद मैं तुम्हारी पत्नी नहीं हो सकती, कतई नहीं हो सकती । बुरा मानने की इसमें कोई बात नहीं है । कहते हुए वह धीरे-धीरे चलने लगी। मैंने इधर-उधर की वात छेड़ दी ताकि वह यह न समझे कि मैं बुरा मान गया हूँ! . शाम हम लोग जल्दी ही सो गए थे। सुबह उठकर कोल्हाई जाना था। सुबह सात बजे हम तीनों घोड़ों पर रवाना हुए । घाटी पार करते ही ऊबड़-खाबड़ पत्थरों का रास्ता आ गया, जिसमें पगडण्डी भी नहीं थी। घोड़े बहुत संभल-संभलकर चल रहे थे। नीचे कहीं दरिया के पानी के गुण्ड थे। दरिया हमारी दाहिनी ओर था। रास्ता संकरा हो रहा था । टूटे हुए पत्थरों के पहाड़ बाई ओर थे और दाहिनी ओर दरिया १४ के पाम देवदारों के पेड बन्द पाने की तरह पारा-गारा उगे हुए थे। काफी आगे चलकर भोजपर का जगल पा : भोजपत्र पी धूने- सी सफेद छाल देखकर इरा चीख पडी-चादी के पेड | जय उरी गालूग हुआ कि यही भोजपम है तो बोली-इसके पत्ते तो इतने छोटे-छोटे हैं । इनपर पोथिया कसे लिसी जाती होगी। ..."आराम करने के लिए हम थोड़ी से उतरकर नीचे पट्टानो पर वंठ गए थे और वहते हुए चश्मे में पर डुयोए हुए थे। सोलंकी के नधुने चिमनियों की तरह धुआ उगल रहे थे। उराने जेब से पाक निकाला, भोजपत्र के तने से छाल को चीरफर से आया-यह है छाल जिरापर पोथिया लिखी जाती थी • फागत से भी हाकी है छाल । और एक- एक में सात-सात परतें हैं । अपने यंग मे छाल रखते हुए हरा बोली- मोलंकी, हाथ-पैर धो लो, यडा अच्छा पानी है। पर सोलकी ने जैरी सुना ही नहीं था। हम लोग कुछ दूर पैदल ही पते । दरा सोलंकी के साथ-साथ आगे चल रही थी। मैं कुछ पीछे पा। उनके बीच बतरा की कोई बात चल रही थी, क्योंकि पीला और बतरा दोनो का ही नाग कभी-कभी गुनाई पड़ जाता था। सोलंकी सीमा की बुराई भी कर रहा था और गह भी कहते हुए मैंने सुना कि शीला यरायर उसीके पास रह रही है और बतरा की जिन्दगी मुहाल किए हुए है। उसका रुपमा पानी की तरह बहाती है और अपने जान-पहपान पानी के साथ अब भी घूमती-फिरती है। शायद उन दोनों ने कोर्ट में शादी कर ली है, पर उसे घोपित नहीं किया है। ...मैं घोड़े धालों के साथ बात करने लगा। उनका लीहर मगदू बोला-गाय ! कोल्हाई मजार एक दूधरार लेक है । घहुत ज्वगूरत लेक है । ऐगा ऐक माशीर गेमही भी नहीं है" फिवना पर है ? मी पूछा। थोड़ा कार है। मोरहाई पर उतारने का रास्ता भी उधर लेक गे है."यगर गाव मांग घाईगा तो ले चलेंगा। बहुत खूबसूरन लेगा ।
- दूध का माफिक पानी है। वीच में सतलंजन का मैदान विलकुल उलटे त्रिकोण की तरह पड़ा था। उसमें नाले सीधे गिरते थे, जिनमें किसी भी क्षण एकाएक पानी बढ़ जाने की आशंका रहती थी। एक गहरे नाले पर देवदार के तने का पुल बना हुआ था। तना काटकर ोगों ने पत्यरों से सिरे दवाकर यह पुल बनाया हुआ था। पानी के ज़ोर से वह कांपता था और मेंढक की तरह फुदक-फुदककर ही उसे पार किया जा सकता था। । इरा घोड़े पर बैठ गई। वह तने पर से निकलने को तैयार नहीं थी। अपनी बहादुरी दिखाने के लिए सोलंकी ने तने को खड़े होकर चलते हुए पार किया और इरा के घोड़े की रासें थामे रहा । उस पार पहुंचकर सोलंकी ने इरा को कमर से पकड़कर गुड़िया की तरह उतार लिया था। फिर पतली और पथरीली घाटियों में होते हुए हम एक ऐसी जगह पहुंच गए, जहां से कोई रास्ता दिखाई नहीं पड़ता था। तीनों तरफ के पहाड़ सिमसिम के दरवाजे की तरह वन्द थे। हम लोग रुक गए। ममदू ने आगे बढ़कर बताया -इधर दाहिनी तरफ दरी है. इसी दर्रा में दो मील दूर पर कोल्हाई ग्लेशियर है । उधर पास तक कोई भी नहीं जा सकता । इधर मोड़ पर मुड़ते ही बरफ की नदी दिखाई पड़ेगा। चारों ओर सन्नाटा था । एक चिड़िया तक वहां नहीं थी। तीन तरफ नीले-नीले पहाड़ खड़े थे। ऊपर साफ आसमान था। घड़ी देखी तो साढ़े ग्यारह बज चुके थे। हम तीनों ही खामोश थे। वीरान सौन्दर्य चारों ओर विखरा हुआ था. 'नदी की धार उथली थी, पर बहुत तेज जंगल पीछे छूट गए थे। पास और नन्ही-नन्ही झाड़ियों के सिवा और कुछ भी वहां नहीं था। सौन्दर्य जव खुलता है तो आदमी मूक हो जाता है। तीनों ही उस उजाड़ सौन्दर्य को फटी-फटी आंखों से देख रहे थे । हलकी हरी और सिलेटी चट्टानों के पहाड़ संन्यासियों की तरह चुपचाप खड़े थे। उस खामोशी को मैंने भंग किया-ममदू कह रहा है कि कोल्हाई के ऊपर - + । - एक बहुत खूबसूरत झील है-दूघसर ! अगर चलने का इरादा हो तो बताइए। सोलंकी अपनी हिम्मत से ज्यादा आगे बढ़कर बोला, जरूर चलना चाहिए। क्यो इरा? इरा ने भी सहमति दे दी। कुछ दूर हम लोग घोड़ो पर गए, और दाहिनी ओर मुडते ही एक सुला हुआ मैदान आ गया। तिलिस्म की तरह यह सब सुलता जा रहा था-दूर पर कोल्हाई ग्लेशियर गाय की बेहद चौडी जीभ की तरह जमीन पर पसरा हुआ था और उस जीभ से राल की तरह पानी टपक रहा था "नीचे गहरी बरफीली झील दिखाई दे रही थी। उसी झील से बरफीला पानी पचास-साठ छोटी- बड़ी धाराओ में बहता हुआ आ रहा था। यह नदी का उद्गम था। आगे चलकर ये छोटी-बड़ी धाराए एक हो गई थी. कल-कल करती धाराएं वह रही थी। हम दलवा पहाडी पर वाईओर खड़े थे । ग्लेशियर पर धूप सतरंगे रंगों में चमक रही थी और वरफ की ऊंची-नीची नुकीली घट्टाने श्वेत मुकुट-सी झिलमिला रही थी। रोगनी की आभा उनपर पड़कर लौट रही थी और घाटी के सामने वाले पहाड़ चकाचौंध हो रहे थे। इरा बेसुध-सी खडी थी । सोलंकी अपने नाखून कुतर रहा था। कुछ आगे बढ़कर उसने इरा के कंधे पर हाय रख लिया और स्वयं भी वेसुध होकर सेलने का अभिनय करने लगा। मेरा मन उस अपार सौंदर्य के सामने अपने-आप निर्मल होता जा रहा था."इरा की शारीरिक मोहकता महज एक मुलम्मा लग रही थी। कण-कण मे सुन्दरता विसरी हुई थी. ऐसे में दैहिक रिश्ते बडे ही नगण्य और ओछे लग रहे थे। इरा को वह सारी खूबसूरती, जिसको आग में मैं जल रहा था, इस क्षण इतनी बनावटी और बेकार लग रही थी कि मन क्षोभ से भर जाता था। उम विशाल और विराट् सौन्दर्य-राशि के सामने कुछ भी नहीं टिक सकता था। मन ऊंचाइयो की ओर जाता था। तभी ममदू ने कहा- अगर दूधसर जाना है तो अबी चलना होगा। हम ऊपर से अप लोग को
ल वरफ का दरिया पर उतारेगा. विजिटर लोग वरफ का दरिया
सी जगह से देखता । आगे दलदल भी होने सकता।
सोलंकी ने कैमरा खोल लिया था और वह इरा को इधर-उधर
-विठाकर फोटो खींच रहा था। इरा मदमाती-सी देख रही थी।
इरा को देखा-कल वाली इरा यह नहीं थी। मैं आश्चर्य और
मंजस से भर गया। कैसी है यह लड़की ! इसका कौन-सा रूप सही
! घाटी में मेरी बाहों में बेसुध होकर अपनी गाथा सुनानेवाली इरा
ही थी या यह जो सोलंकी के इशारों पर सोलह वरस की लड़की की
रह चाव से फोटो खिंचवा रही है !
मैं सह नहीं पाया। मौका पाते ही मैंने उसे पकड़ा और कहा, तुम
अजीव हो"शरम भी नहीं आती।
इरा चकित-सी मेरी ओर देखती रह गई, उसकी आंखों में चौबीस
घण्टे पहले की कोई पहचान नहीं थी। वह अपने को शायद वेहद दावते
हुए बोली, मैं ऐसी बातें सुनने की आदी नहीं हूं।
...और आश्चर्य तव और भी हुआ जब वह मुस्कुरा दी और
ली-मैं चाहती हूं, इस सौन्दर्य से ज्यादा मुझे चाहो। समझे! यह
कृति का सारा सौन्दर्य कुछ पलों का है। इसे देखकर या इसके सहारे
गन्दगी नहीं कट सकती "सौन्दर्य वह बड़ा है जो जीवन को साथ ले
वले । समझे! कहकर वह सोलंकी की ओर चली गई।
ममदू ने फिर कहा-दूधसर चलना है ?
इरा एकदम वोल पड़ी-हां-हां, चलना है।
तब आइए, घोड़ा इधर ही छोड़ेंगे, पैदल का रास्ता है।
सबसे पहले हमें साठ धाराएं पार करनी थीं। चौथी और सब
चौड़ी धारा पर लकड़ी के लट्ठे रखे थे । इरा को सोलंकी ही सहारा
रहा था और वह उसीके साथ हाथ पकड़े-पकड़े बढ़ रही थी। धा
काफी खतरनाक थीं। जरा-सी चूक से जान जा सकती थी हम
हुए आदमी को देख सकते थे, पर निकाल नहीं सकते थे।
दाहिने पहाड़ के चरणों में पहुचते-पहुंचते एक घण्टा और हो
था। इरा और सोलंकी साथ-साथ जा रहे थे कि तभी एक चीख
१८
तेज आवाज मे पथरीली घाटी गूज उठी। इरा ने चीखकर सोलंकी के सीने में मुह छिपा लिया । सोलंकी उसे पक्षी की तरह दवाए चारो तरफ तेज नजरो से ताक रहा था। मम बोला-मामर दीखता है, इसका आवान बहुत तेज होता, पर आदमी लोग को नुकसान नहीं पहुंचाता । सोलकी ने जेब मे ब्रांडी की बोतल निकाली और गट-टकर चार घूट चढाकर ओठ चूमने लगा। हम बढ़ते ही जाते थे, एक के बाद एक पहाडी की शृखला आती जाती थी, पर चढाई सत्म नहीं होती थी तभी दो पहाडियों के बीच फूलो की घाटी पडी प्रवृति का उन्मुक्त, आवरणहीन सौंदर्य विखरा पड़ा था। हजारो तरह के फूल थे और हजारों ही रग! थकान काफी हो चली थी। घाटी की हवा नशीली थी। मैं एक पहाडी की आड मे धाक लगाकर आराम करने लगा। दो मिनट बाद पथरीली पर पूली से भरी घाटी को आख-भर देखना चाहा तो देखा-इरा सोलकी के सोने पर सर रखे आखें बन्द किये टिकी हुई है, सोलंकी उसके जूडे में बन-धासो के फूल लगा रहा है और हसरत-भरी निगाहों से उसे देख रहा है। कुदरती खूबसूरती के उस हसीन सैलाब में उन्हे यो देखकर मेरा मन घुटने लगा। वे दोनो ही मुझे वासना में लिप्त गंदे कीडो की तरह लगे और इरा का खड़ा किया हुआ सारा तितिस्म टूट गया। मैं अकेला ही आगे बढ़ने लगा। कुछ देर बाद सोलंकी को भारी आवाज़ सुनाई दी । वह कुछ गा रहा था शो'"मो.. लव मी टेंडर ओ..ओ मैंने रुककर देसा, इरा यकान से चूर थी और सोलंकी उसे छेड रहा था। घड़ी चार वजा रही थी । पहाड़ियों की शृंसला खत्म नहीं हो रही थी। अजीब-सी झुझलाहट हो रही थी। मैंने ममदू से कड़ी आवाज में पूछा-किधर है दूधमर ? वस, इस पहाड़ी के उस पार! वह घोला और आगे-आगे चलने लगा। उसकी पीठ पर कुछ सामान बंधा हुआ था, इसलिए 4 Aur की तरह मटक-मटककर चल रहा था। वह पहाड़ी भी पा - : का कहीं कोई पता नहीं था। चारों ओर पहाड़ियां ही पहाड़ियां -नंगी चट्टानों की पहाड़ियां, जिनकी कोख में घास उगी हुई थी। रों तरफ पत्थर ही पत्वर-बहुत नीचे ताठ धाराजों वाली घाटी नक्शे की तरह लग रही थी। सभी थकान से चूर थे। थे। लेकिन लने के अलावा अब कोई चारा नहीं था। ममदू बार-बार कह रहा था धर से रास्ता छोटा पड़ेगा वापसी में "आप फिकर काहे को करता। आखिर हम और चले.."तीन श्रेणियां पार करके जब नीचे देखा तो वर्फ से ढके पहाड़ों के बीच में नगीने की तरह जड़ी हुई थी- दूधसर सील ! पानी दूध की तरह निर्मल था. अजीव-सी बाश्वत शांति छायी हुई थी। निर्जन और निविड़ एकांत था उसके शांत पानी पर बर्फीले पहाड़ों की दूधिया छाया पड़ रही थी और वर्फ के पेड़ जैसे उसमें लगे हुए थे, जो वहुत धीरे-धीरे तैर रहे थे। उन बर्फ के पेड़ों की शाखाएं शीशे की तरह चमक रही थीं। डबडबाई शांत आंख की तरह का आकार था दूधसर का। सांप की आंख जैसा सम्मोहन था उसमें । मैं चुपचाप उतर गया। मेरे उतरते ही डील पर वादल छा गए और मैं वादलों के नीचे आंख वन्द किये बैठा रहा । उस सौन्दर्य को देखकर आदमी अंधा हो सकता था । दूधसर के पानी की एक अंजलि भरी मैंने, और पी गया यही प्रसाद था उसका । सुन्दरता स्थान नहीं देखती । जहां वह अपने के अनावृत कर देती है वहीं उसकी किरणें विखरने लगती हैं। इरानी सोलंकी भी नीचे आ गए थे। इरा ने हाथ डाला तो चौंक पड़ी-इत ठंडा पानी। सोलंकी दूर पर ही खड़ा रहा। ...मेरी आत्मा उस दृश्य से भर आई थी। झील के दूधिया में बर्फ के श्वेतपंखी हंत जैसे धीरे-धीरे तैर रहे थे और जमी हुई की छाया चांदी की चादर की तरह उसके तल की गहराइयों तक रही थी। बड़ी शांति थी वहां । सारी थकान उतर गई थी। । लोग मम ऊपर आते-आते शाम के छ: बज चुके थे.। हम पोछे ग्लेशियर के रास्ते की ओर बढे और हम लोगों के हाथों के तोते उड गए, जव ममदू ने डेढ घंटा परेशान होने के बाद कहा-रास्ता नहीं मिलता। सवके चेहरों पर हवाइयां उड़ने लगी थी। नंगे पहाटो की गोद में रुक सकना संभव नहीं था। हमारे पास कपडे भी नही थे और जिस रास्ते माए थे, उसी रास्ते वापस जाने में रात हो जाती। तब उन पतली- चौड़ी तेज रफ्तार बहती माठ धाराओ को पार करना मौत से जूझना था । इसी परेशानी में आठ बज गए । पश्चिमी पहाड़ो पर रात जरा देर से आती है पर आठ बजते-बजते अधेरा घिरने लगा था और हम लोगो को कोल्हाई ग्लेशियर पर उतरने का रास्ता नहीं मिल रहा था। मामर चोखता तो पूरी घाटी दरकने लगती । सर्द हवा चलने लगी थी। लेकिन ऊपर से कोल्हाई ग्लेशियर का दृश्य अद्भुत था-नीचे धरती पर हजारो साल की जमी हुई काली बर्फ थी और उसके ऊपर केक की शक्कर-जैसे साफ बर्फ के वेतरतीब और मुह बाए हुए जवडे खडे थे । जैसे पानी पड़ने से चूना खिल जाता है उसी तरह वे वर्फ-जवडे सिले हुए थे । और उनपर सर्द कोहरा धुए की तरह लिपटा हुआ था। जहा तक दृष्टि जाती थी, खिली हुई वर्फ की परतें थी। निपट सुनसान था। खामोशी छायो हुई घो। तोर को तरह हवा चल रही थी, पर रास्ता न मिलने मे हम लोग परेशान थे और भीतर-भीतर डर समाता जा रहा •या। प्रकृति जैसे सांस रोके पडी थी ग्लेशियर के दोनो ओर पहाड़ थे-एक सामने था, एक पर हम थे... बीचो-बीच वह विशाल सफेद अजगर तीन सौ फुट की नीचाई पर पडा वर्फीली सांसें छोड़ रहा या। हमारा पहाड टूटे पत्थरों का पहाड था। टूटी हुई चट्टाने वेतरतीबी से एक दूसरे पर टिकी हुई थी। तेज हवा से कोई एक चट्टान सरकती तो अपने साथ बहुत-सी पट्टानो को लेती घड़- घड़ाती हुई गिरती थी ग्लेशियर की घाटी खौफनाक आवाज़ो से भर जाती थी और दिल बैठने लगता था । पहाड़ को चोटी से दस-बारह फुट नीचे तक वजरी थी 'बजरी के वाद टूटी हुई चट्टानें आती थी। नहीं मिल रहा था, बजरी से नीचे फिसल जाने का डर भी था, टूटी चट्टानों से उतरना मौत के मुंह में जाना था। ममद् पागल कुत्ते की तरह रास्ता खोज रहा था। मैं हारकर एक जगह बैठ गया 'मासमान ते काला पक्षी पंख फैलाए उतर रहा था। उसके पंखों का दवाव और अंधेरा हर क्षण बढ़ता जा रहा था । इरा दूर पर दिखाई दे रही थी। सोलंकी भी रास्ता खोजने में लगा हुआ था कि मैं अपने को संभाल नहीं पाया और बजरी से नीचे फिसल गया। जांघे छिल गई थीं, पर फिसलकर मैं बारह नीचे जमी हुई विशाल चौरस चट्टान पर आ गिरा था । अगर वह चट्टान बड़ी न होती तो शायद मेरी हड्डियां भी न मिलती। मौत का पहला झटका मुझे लगा था। सारा वदन सनसना गया था। अब मेरे पास नीचे उतरने के सिवा कोई चारा नहीं था बजरी से ऊपर नहीं चढ़ा जा सकता था। नीचे टूटी हुई चट्टानें थीं.. मैंने हिम्मत करके नीचे उतरना शुरू किया''यह जानते हुए कि कोई भी क्षण मेरी मौत का क्षण हो सकता है। पर चारा भी क्या था। हवाएं विषले तीरों की तरह सनसना रही थीं और मैं उस ठंडे कुएं में उतरता जा रहा था। चट्टानों का एक रेला कहीं दूर पर धड़धड़ाकर गिरा-मैं सांस रोककर वीच में खड़ा हो गया। आखिर हथेली पर जान लिए मैं ग्लेशियर की तराई में पहुंच गया। सड़ी हुई घास वहां महक रही थी और अजगर की खाल की तरह गंदी चिकनी काई चट्टानों पर चकत्तों की तरह चिपकी हुई थी। मैंने ऊपर देखा इरा, सोलंकी और ममदू कहीं भी नज़र नहीं मा रहे थे। शायद वे लौट न गए हों''यह विचार जाते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गए। अभी तो ग्लेशियर पार करना था." उन बर्फीले जबड़ों में से जाना था। तब उस पार जाकर कहीं रास्ता मिलेगा। भय से मेरा शरीर ठंडा पड़ता जा रहा था। उस वर्फीली निर्जन घाटी में कोई भी नहीं था। मेरे सिवा । और वह अजगर सर्द हवाओं की सांसें छोड़ रहा था। वर्फ पर से गुज़रती हवा में एक अजीव-सी गूंज होती है और सूखापन । मेरा आधा धड़ सुन्न पड़ गया, लगा उसमें जान नहीं है। चाकू निकालकर मैंने काली चट्टान को खोदा तो वर्फ की ची उतर आई.''वे सदियों से १०२ जमी बर्फ की चट्टानें थी, जिस पर मैं सडा था। जेय से प्राडी को गौशी निकालकर मैं चार-छः घूट पी गया तब कही जान में जान आई. सीने में ग्राही की गमशीर जलती रही। प्रति की रोद्र मुन्दरता मेरे सामने थी। मैं नितान्त हीन कीडे की तरह पड़ा था, आसिर मैन आवाज लगाई-इरा".. सोलंकी...! घाटी गूंग उठी. बर्फ की गुफाओ पर टकरा-टकराकर आवाग लौटती रही- तभी आवाज आई-तिलक... और मैंने देखा-कुछ धब्बे-ऊपर पहाड पर रेंग रहे हैं। मैंने स्माल जलाकर हिलाया ताकि ये जान जाएं कि मैं नीचे पहुच चुका हू । ग्लेशियर अकेले पार नहीं किया जा सकता था। मैं सरदी में अकडकर मरने को तैयार था। नाक से पानी आ रहा था, सर्दी के मारे नाक का मिरा और कान जैसे उड गए थे। जलता रूमाल देखकर उन्होंने आवाज लगाई- घुमड़ती हुई आवाज पछाडै साती रही । मैं चुपचाप खड़ा हो गया। कुछ दूर पर वर्फ की सील थी जिसमे ग्लेशियर का पानी टपक रहा था । किनारों को घुली हुई बर्फ पन्नी की तरह चमक रही थी। उस झील को चमकदार वर्फीली दीवारी से रोगनी फूट रही थी, जिनसे यासपास की जगह चमक रही थी। हिम-हंस झील में शालीनता से तेर रहे थे। ग्लेशियर के जबड़ो से भयानक सासें आ रही थी "बर्फ की झील के किनारे ढरके हुए मोम की तरह वेतरतीब थे."चारों ओर बर्फ का साम्राज्य था। काली और गंदी वर्फ की चट्टानों के बीच वह छोटी-सी झील मीरामहल की तरह जगमगा रही थी “हिम-जल का गीरामहल ! शायद इसीके नीचे हसीन परियों का महल होगा और हिम-हस जैसे उनकी रखवाली कर रहे होंगे ! सौंदर्य की अनुभूति होते ही भय भी बिखरने लगता है. शरीर में अजीव-सी ताजगी और स्फूति आ गई थी, पर पीछे पलटकर देखने से डर लगता था। फटे हुए चूने-से खुले हुए वर्फीले जबडे निगलने को तैयार थे। और उन बर्फ के खभो के बीच से गुज़रती हवा साय-साय कर रही थी । आशंका और साहस दोनो ही मन मे थे, पर भीतर कही बेरहम मौत का पंजा कसता जा रहा था। पोछे कुछ आहट हुई और एक क्षण में ही प्रकृति भयानक और 1 - - ई। आवाज़ से भी दृष्टि वेकाबू हो जाती है, बेकार हो जाती वशाल शिला-खण्डों का पथरीला झरना ग्लेशियर पर गिरने लगा इरा की चीख-भर मैने सुनी, फिर सब कुछ उस भयानक आवाज़ डूब गया। कुछ ही क्षणों में सव शांत हो गया । और हांफते हुए की, ममदू और इरा मुर्दो की तरह मेरे पास आकर लुढ़क गए। इरा वाल विखर गए थे और चेहरे पर सफेदी छायी हुई थी। शीशी की ची हुई ब्रांडी मैंने तीनों को दी, तो थरथराते हुए हाथों से इरा ने मुझे कड़ लिया-में मर जाऊंगी तिलक, मैं मर जाऊंगी.. सोलंकी का दम उखड़ रहा था और उसके नथुने धौंकनी की तरह फूल रहे थे, कनपटियां तमक रही थीं। सभीके कपड़े जगह-जगह से फट गए थे। ममदू बहुत लाचार-सा बैठा था । वह धीरे से बोला-साहवा'"होश कर, हिम्मत कर'' 'यहां से चलना होगा, नहीं तो मर जाएगा साव । मार तो तूने डाला ही है ! इरा वोली तो सोलंकी ने कहा, अब बाकी क्या है ? रात के साई नौ बजे थे। और हमें अभी ग्लेशियर पार करना था। यासलाइयां, सिगरेटें और दो टाचें हमारे पास थे, उन्हींका सहारा i। आखिर हिम्मत करके हम उठे और ग्लेशियर पार करने लगे। मूंज जूते ममटू ने हमारे जूतों पर चढ़ा दिए थे और नुकीली लाठियों के अहमियत अब समझ में आ रही थी। एक-एक कदम नाप-तोलकर र जा रहा था, कि ग्लेशियर की तीन नदियां सामने आ गई। वर्फ नदियां जो घूमती-घामती आगे चलकर वर्फीली गुफाओं में च काटती हुई नीचे ही नीचे झील तक जाती थीं। दो को हमने पार किय तीसरी नदी चौड़ी थी। और मुंह खोले बर्फ की गुफा ऐसे जगमग थी, जैसे भीतर गैस के हण्डे जल रहे हों। भीतर भरी हुई हव मैक्स की तरह आवाज कर रही थी। उस नदी के शीशे जैसे चि पर पर नहीं रखा जा सकता था, अगर फिसले तो कोई सह था."और ढाल पर सरककर उस सर्द अजगर की गुफा-से मुंह सकते थे, जिसके भीतर सर्प-मणि-सी रोशनी जगमगा रही थ पानी में पर भी नहीं डाला जा सकता था, और कूद कर - खतरे से खाली नहीं था । बर्फ की गुफाओ में जब हवा फंसकर अबुलाती थी तो सीटिया-मी वजती थी और हर क्षण विस्फोट का डर-मा लगता था। ममदू ने हिम्मत करके, हम लोगों के हाथ पकड़कर सघते हुए उस चौड़ी नाली के तल मे पर डाला और धंसाता गया। जब पर बर्फ में घंस गया तो उसने सहारा देकर हम तीनो को पार करा दिया । बेहद सर्द हवा बह रही थी और निर्जनता में गूजती अजीब डरावनी आवाजें दिल को कंपा जाती थी। सोलंकी बैखबर-ना होता जा रहा था । उसकी आखो मे भय और मौत की परछाई नाच रही थी। सबके शरीर वैतरह टूटे हुए थे। संभल- संभलकर चलते हुए सोलंकी ने ममदू की पीठ पर बधे सामान से टार्च निकाली और बड़े ही भेद-भरे स्वर में बोला-यहा ज़रा नज़र रखना " बहुत कीमती पत्थर ऐमी जगहों पर मिलते हैं । और सोलंकी टार्च जलाकर, मौत और मुमीवत से बेखवर होकर कीमती पत्यरो को झुक झुककर खोजने लगा। मौत के साये मे चलते हुए भी सोलंकी की इस हरकत पर मुझे हमी आ गई थी... मैं सच कह रहा हूं ! उसकी आवाज़ में गरमी और आखो मे चमक थी । झुक्कर उसने एक रोडी उठाई और जेब में डालते हुए बोला-- सदियो की जमी हुई बर्फ है, दवाव से ऐमी जगहो पर ही हीरे बनते हैं। वह चौंक-चौंककर इधर-उधर देखता और पत्थर के छोटे-छोटे टुकडी को उठाकर चेस्टर की जेब मे डाल लेता। यह मौत की घाटी थी."जहां हम तीनो-~मैं, इरा और ममद् के जिदा गोश्त के टुकड़े बिखरे हुए थे. अधेरे का उकाव अपने पर फैला- कर उतर चुका था "वर्फीली सांसें सांपो की तरह फुकार रही थी और सिन्दवाद की तरह सोलकी होर बीनने में लगा हुआ था। अपना और कपड़ों का बोझ उठाना मुश्किल हुआ जा रहा था, पर वह जेबो में पत्थर भर रहा था । आखिर धीरे-धीरे जव उसकी टार्च में जवाव दे दिया तो वह हमारे साथ आया । यके होने पर भी उन्ह भावनाजों में चढ़ाव था । ग्लेशियर हमने पार कर लिया था, पर किनारे का दलदल अभी बाकी था । वर्फ के दलदल में हमारे पैर दो-दो मन के हो गए थे। इरा की हिम्मत जवाब दे चुकी थी। दलदल पार कर हम सुस्ताने लगे। होने वाली खामोग मांत की वर्फीली बादी से हम जरूर निकल आए थे पर अंधेरी घाटी और जंगली जानवरों का डर अभी बाकी था। . कुछ देर रुककर जब हम दो मील आगे खड़े घोड़ों की तरफ चले तो करीब एक घंटा और वीत नुका था। सोलंकी इरा को सहारा दिए हुए चल रहा था और वहुमूल्य पत्थरों की बात कर रहा था-नदियों के तल में भी हीरे वहकर आ जाते हैं पत्थरों के साथ । हीरे की जमीन बजरी जैसी होती.है, उसी वजरी में कोई बेशकीमती टुकड़ा निकल आता है । हीरा ज़मीन से वहुत नीचे नहीं होता "कहीं-कहीं होता भी है, पर ज्यादातर फुट-दो फुट नीचे ही मिलता है. इस हां-हूं करती जा रही थी और अपना हाथ उसके कंधे पर रखे हुए चल रही थी। वह कहता जा रहा था-हीरे कई रंग के होते हैं-सफेद, हरे और नीले । पर मैं जान रहा था कि इरा मन से नहीं सुन रही थी, सोलंकी की सनक पर मुझे बार-बार हंसी आ रही थी। आखिर हम घोड़े दालों के पास पहुंच गए। वे घबराए हुए थे और समझ रहे थे कि हम लोग खत्म हो गए। गनीमत यह थी कि वे लोटे नहीं थे। ममदू बहुत शर्मिदा था । सोलंकी अव उत्ते खुलकर गालियां रे रहा था। घोड़े पर बैठकर उसने शीशी निकाली और जाम लेते हुए इच्छा प्रकट की खूबसूरत इरा और खौफनाक वर्फीली वादी के नाम ! और खाली शीशी उसने वहीं पटक दी और अपने घोड़े पर बैठकर आगे चल दिया। मौत की वादी दूर छूटती जा रही थी। साठ धाराओं का मैदान वाई तरफ फैला हुआ था। हम साढ़े ग्यारह बजे रात को वहां से रवाना हुए थे । खतरनाक सतलंजन के नाले पार करके हम भोजपन्न के जंगल १०६ मे रास्ता भटक गए । सव दियासलाइयां खत्म हो चुकी थी, टार्च हीरे वीनने में जाया हो चुकी थी और ऊपर घुप अंधेरा था। आसमान में मडराते हुए बादा शोर कर रहे थे। पत्थरो के ऊवर-खाबड खण्डो के नीचे कही-कही नदी के पानी के कुण्ड थे, जिनमे कोई भी गरा-मा वेखवर होकर गिर सकता था। कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था, जगल की सांय-साय डरा रही थी। वारिश के छोटे पउने लगे थे। घोटे वाले पीछे आते हुए दडवडा रहे थे। अकेला ममदू उम घुप अंधेरे में आवाज के सहारे हमे ले चल रहा था "उसकी आवारा आती थी-हिम्मत कर साहवा ! होरा कर साहवा ! संभल के - साहवा ! वह आवाज़ हमें सीच रही थी, हमारी जिन्दा लाशें उससे बंधी हुई थी, कही कोई रोशनी नहीं. कोई पगडण्डी या रास्ता नहीं, कोई सहारा नहीं" वम ममदू की आवाज गूजती थी... थकी हुई इरा ने न जाने किमरो उस अंधेरे में कहा था-जव अंधेरा होता है तब किसीकी आवाज ही सहारा होती है। डाक बंगले मे पिछली शाम कुछ सैलानी और आ चुके थे। चौकी- दार ने समझ लिया था कि हम खत्म हो गए। अंधेरे में चलते-चलते हम रोशनी की एक किरन के लिए तरम रहे थे, पर लस्त थे और आसों के सामने अंधेरा छा रहा था। आखिर दूर पर एक मशाल जलती दिखाई दी.. परों में जैसे जान आ गई, और जब हम मशाल के पास पहुंचने लगे तो डाक बंगले का आकार साफ हो गया। चौकीदार बरामदे में ही मो रहा था, आहट से उठ बैठा और बोला -सुदा का शुक्र है, मशाल लेकर हम लोग रात एक बजे के करीव जंगल तक गए, पर आप लोगो का कोई पता नहीं था। हम समझा खतरा हो गया, फिर हमने मगाल डाक बंगले के कोने से वाध दिया... मैंने घड़ी देखी, सुबह के पांच बज रहे थे। सोलंकी और इरा जमीन विस्तर फैलाकर नीचे ल८ ... थे। उस दिन हम लोग शाम तक नीर जागते रहे, पर उठा कोई भी नहीं। शाम के सात बजे उठकर इरा ने ब्रुश किया। मैं भी उठ गया, पर की औंधा लेटा हुआ था। उसने सिर्फ वूट उतारे थे। जोवरकोट हुए वह लाश की तरह पड़ा था। कीमती पत्थर उसकी जेबों में भरे थे। शाम को पानी नहीं मिल पाया, इसलिए सुस्ती नहीं उतरी ।। एक-एक प्याला काफी पीकर हम फिर लेट गए। रात नौ बजे के रीव सोलंकी उठा। उसने अपने सूटकेस से व्हिस्की का एक अद्धा निकाला और पानी के साथ आधा पीकर फिर सो गया। दूसरी सुबह जब हम तीनों उठे, तो सर बहुत भारी था, पर थकान कुछ-कुछ उतर चुकी थी। ज्यादा सोने का बुखार-सा चढ़ा हुआ था। मेरा सर फटा जा रहा है, सोलंकी ने कहा। जल्दी से नहा लो, आराम मिलेगा । इरा ने उससे कहा। इरा की बात सुनकर जैसे उसके मुंह का जायका विगड़ गया-आप लोग नहाइए। क्यों, तुम नहीं नहाओगे? इरा ने पूछा। नहीं, सोलंकी ने दो टूक जवाब दिया। इरा आश्चर्य से उसकी ओर देखती रह गई। चौकीदार ने पानी गरम कर दिया था। एक वा फिर इरा ने कहा-पानी गरम है, सोलंकी ! नहीं, मैं नहीं नहाऊंगा, मुझे ज़रूरत नहीं है। आखिर इरा नहाने चली गई। जव तक हम दोनों ने नहा सोलंकी ग्लेशियर से वीने हुए पत्थर के टुकड़ों को देखता-परखता र कुछ उसने फेंक दिये और कुछ सुटकेस में डाल लिए। उसने सिर्फ बदले, बदन पर खूब पाउडर छिड़का जोर पाइप सुलगाकर चार इंतज़ार करने लगा। वह दिन भी धीरे-धीरे वीत गया। मैं इरा से कोई खास वात करने के मूड में नहीं था। उसका हार मेरी समझ में नहीं आता। पर वह शाम को जबरदस्ती में ने गई और तरह-तरह की बातें करती रही। डाक्टर के .
वाद उमने फिर क्या-क्या किया और जिन्दगी में कहां-कहां ठोकरें खाई और कैसे फिर वह वापस अपनी सहेली दमयंती के पास नागपुर लोट गई थी। बम्बई जाने का खयाल भी उसे आया था, क्योंकि विमल की धुधली-सी याद अब भी वाकी थी। । तीन साल का यह अरसा उसे बहुत कुछ देकर गया था। किसी स्कूल में उसने मास्टरी की थी, किसी फर्म में रिसेप्शनिस्ट की तरह काम किया था और कुछ दिनो सावुन और अन्य शृगार-सामप्रियो के निर्माता की कम्पनी में सेल्स गर्ल का काम भी किया था। इरा ने कहा -तिलक, मैंने लिपस्टिक लगाना छोड दिया था, पर ये नौकरियां करते हुए मुझे स्मार्ट बनने की हमेशा सलाह मिलती रही। स्मार्ट वनने का मतलब होता है कि अपने को दूसरों की नजरों में चुभो दो। और अपने शरीर और रूप के सहारे धेजान चीजो को वेचो। कही भी मैं टिकने न पाई, क्योकि हर जगह एक ही माग थी- अपने को बाटो ।"तुम एक चीज़ हो''तुम्हारा रूप और यौवन ही तुम्हारी सम्पत्ति है, जब मैं बाहर निकलती तो लोगो की नजरें देखकर मुझे एक ही अनुभूति होती थी-वही अनुभूति, जैसे डाक्टर के साथ रहते हुए मुझे गगता था कि तमाम पिल्ले मेरे शरीर से चिपक गए है... उमी तरह ये तेज और वहशी नजरें मेरे वदन से चिपकी रहने लगी। रात-रात-भर मैं सो नही पाती थी अल्पसंख्यक जाति की तरह मेरी दशा थी · कब कौन क्या कर बंठेगा, यह भय मुझे हमेशा सताता रहता था। चारो ओर कुण्ठित और प्यासे लोग घूमते थे। कतरा-कतराकर चलते हुए दो मील का फासल चार मील बन जाता था और कुछ ऐने रास्ते थे, जिनपर मैं क्तुईन जा सकती थी। मुझे ऐसा कोई भी नहीं मिला जो नाधे घटे बंटकर तरह वात कर पाया हो । हर बानी बहने लगता था, हा मुझमे कुछ चाहने लगता था । कोटे कमर में काश्मीर हूं। सब कुछ छोड़-छाड़ार-बार मना मापा' ..
है कि उसके बगैर हमारा रहना मुश्किल है। वह साया भी का है। प्यार और लगाव तो बहुत छोटी चीजें हैंझणजीवी, जो बुलों की तरह उठती हैं और फूट जाती हैं, मिलती हैं और खो जाती । पर इस उलझी हुई जिन्दगी में चैन नहीं मिलता, नस-नस फूटने गती है"लगता है, मैं पागल हो जाऊंगी-लेकिन फिर बात वहीं आ ती है.. आदमी से भागना भी चाहती हूं और उसीके पास रहना भी वाहती हूं। शिकायतें भी उसीसे हैं और प्यार भी उसीते है । मैं आखिर क्या करूं... तीसरे दिन सुबह हम लोग वापस चल पड़े । मैं अपने में डूबा हुआ था। सोलंकी इरा के साथ-साथ घोड़े पर चल रहा था। मैं कभी नज़- दीक आ जाता तो उसके पास से भभक-सी उठती थी और उसका रेग- माली चेहरा सूजा-सूजा लगता था। पर इरा थी कि वह लगातार उस से बातें करती आ रही थी। आड़ के डाक बंगले में पहुंचकर हमने कुछ देर आराम किया। वहीं इरा का मन वदल गया। वह कहने लगी-मेरा विस्तर यहीं उतरवा दो। मैं कुछ दिन अकेली यहीं रहूंगी। वहां कोई ठहरता नहीं था। दो कमरों का नन्हा-सा काटेज ध आड़ में, पहलगाम से वह इतना पास था कि वहां ठहरने के लिए लो कम ही आते थे। कोई खास खूबसूरत जगह भी नहीं थी। खाने-पी का इंतजाम भी कोई नहीं था। इरा की ज़िद से हम दोनों हार गए मुझे बुरा भी लगा-आखिर ऐसी भी जिद क्या ? उसने सोलंकी रुपये दिये कि वह जाकर होटल का बिल चुका दे और बाकी सा अपने घोड़े वाले के साथ वहीं आड़ के डाक बंगले में भिजवा दे। आखिर इरा की ज़िद के कारण हम उसे वहीं आडू के डाक के में छोड़ आए थे। मैं और सोलंकी वापस पहलगाम लौट आए कुछ दिनों बाद मैं वहीं आड़ से एक वार और मिलने गया इरा का सारा काम सोलंकी ने ही किया। होटल का विल थे। में इरा ११० कर और बाजार में जाती थी यासा, माया मग को दे पाया था। जात यस मुहीका, मिया II Hit चमक थी। सोलंकी ने ही दाद वां further-gar रहने की इजाजत ले ली थी। मैंने फिर इरा का स्याल दिल में नियमन पर यह हो नहीं पाया था। बाइ के हाक वाले ram:- को पतली सकीर मुझे अपने तम्बू से दिवा mittar आई. का रास्ता-याए लिद्दर यह रही है और पापा:- फूलों से ढका है, लिद्दर की धार में लकड़ी के मटन से हैं, मंडराते, पकराते और सीधी धार में पहले ही की मन पर फिसलते हुए पर राता भार चढ़ जाता है, मषिक दोगान र तक नहीं पहुंचता । नीचे गति है, दृश्य हैं और चट्टानों में टक गरी प्रार है, रहते हुए जल-पक्षियो की मम्नी है, मौत सड़े वन हैं। चट्टानों की माह में कर दम देते हुए लफडी के मछे हैं, जल-पेन के नैरते हुए मदनों के गुच्छे है, अवरोध गे टकराकर छिटके हुए जल- विताकर शाम को लौट आऊंगा। मैं सुवह-सुवह ही चल पड़ा। पहुंचा तो देखा कि सोलंकी भी ,वहीं | इरा उसे नहलाने की जिद कर रही है और वह अपना माथा पकड़े हुए बैठा है और इरा चीख रही है उसका अंग-अंग पलाश के फूलों- सा दहक उठा है और उसकी देह की चमक बिछलती धूप की तरह चौंधिया रही है । छाती पर आयो हुई वालों की लटें नीली लपटों की तरह मचल रही हैं। ... तभी देखा था इरा का वह रूप । उसने यह भी खयाल नहीं किया था कि मैं खड़ा हुमा हूं। नज़दीक ही पनचक्की. चल रही थी और एकाध काश्मीरी बकरवाल आटा पिसाने आए हुए थे। मुझे देखते ही इरा सोलंकी को भीतर खींच ले गई. "मुझे उस वक्त पहुंचना बहुत खल गया था। मैं घोड़े से उतरकर दरवाजे तक पहुंचा तो उसकी अधूरी वातं सुनाई पड़ी-तिलक आया है, मैं उसके पास जा रही हूं। तुम भी आ जाओ उस कमरे में। और उसने बाहर निकल मुस्कराकर मेरा स्वागत किया। उसकी वह मुस्कराहट बहुत झूठी थी। मैं दूसरे कमरे में उसके साथ बैठ गया। वात चली तो वताया-पांच-सात दिन में वापस जा रहा हूं, सोचा तुमसे मिलता चलू, इसीलिए चला आया।" मैं भी यही सोच रही थी कि इन दो महीनों में तुम्हें एक वार भी यहां आने की फुरसत नहीं मिली। इरा बोली। मैं इधर-उधर घूमता रहा । गुलमर्ग चला गया था। शेषनाग की तरफ गया, अमरनाथ तक नहीं पहुंच पाया । मौसम खराव हो गया था। मैं इरा को ही ज्यादा देख रहा था। क्षण-क्षण में उसके चेहरे पर अनेक भाव आ-जा रहे थे। वह बोली-मेरा भी कोई ठिकाना नहीं, किसी भी दिन जा सकती हूं। दिल्ली ही जाऊंगी।" फिर जैसे सोलंकी के साथ कुछ मिनट पहले वाली वात की सफाई देते हुए बोली- यह सोलंकी नहाता ही नहीं, पानी से डरता है। तिलक, आज मिलकर हम इसे ठीक से नहला.दें, क्यों ठीक रहेगा न? कहते हुए
इरा की बात मैंने सुन ली, लेकिन यात में कोई तुक मुझे नही सगी।
वह कोई गम्भीर वात दवाने के लिए इस छोटी-सी बात को बड़े जतन ।
खोजकर लाई थी। मैंने जवाब देने के लिए कहा, जरूर नहलानी, सभी
तक नहला नहीं पाई।
मैं नच कह रही हूं। इरा योली-चलो, अभी नहलाएं । कही हा
वह भीतर गई और सोलंकी के लिए हाथ से घुले हुए कपड़ों का पर
जोड़ा निकाल नाई। फिर योली-गलो उसे उठाएं। मैं न चाहने हार
भीतर नया । वरने पर बैठा हुआ गोलंगो पाइप पी रहा था।
चलो, नहाने चलो। इरा योली ।
मैं नहीं आऊंगा, नही जाऊंगा'"सोलंकी बड़बडाया। मैंने कह दिना,
मैं नहीं नहा ठा।
ने पाउडर-मिली पसीने की गध आ रही थी। मुझे बरः
दादा पा। उसे मनाने के अन्दाज़ में इरा ने उनके घर
में बनायरा और वेहद ममता से माया चूम लिया-टोन..
मंगेहनन!
अदिलंग मुद ही उठकर नहाने चला गया। पर उमपर जमे
कुन्द कर दूर पडा "भारी कदमो से वह पनचक्की वे पान
हिमपी बना हुआ दिखाई दिया ।
इस कोमिट न देखा"उसके अन्दर इन दिनों कोई टूटी
कायनात मही थी, ऐमा लगा। वह मेरे नजदीक आकर
खट्टी हो गईटीपीनापन या। मेरी आखो में पूरते हुए उसने
कहा, अब उन्हें एक दाट और बता दूं। मैं बहुत दुखी हू इन दिनों...
भरपूर मुख के बीच गहन दुखी हूं। इस सुले, पयरीले आगन मे पड़े
होकर भी मेरी मांग घटती है।
से चक्कर आता है, इसीलिए मैं नहीं नहाता था। और वह जाकर लेट शाम को मैं वापस लौट आया और चार दिन बाद श्रीनगर चला गया । श्रीनगर में बारिश हो रही थी। चार दिन वस सर्विस नहीं थी, इसलिए मैंने झुंझलाहट में वापसी का अपना रिजर्वेशन कैंसिल करा दिया था। दुवारा रिजर्वेशन मिलने में देर लग रही थी। मुझे पता भी नहीं था कि इरा सभी काश्मीर में है या चली गई। उसका दिल्ली का पता ज़रूर मैंने ले लिया था। रेजिडेंसी रोड पर शाम को अकस्मात् सोलंकी दिखाई पड़ा। देखते ही वह लपककर आया और बड़े उतावलेपन से उसने पूछा-इरा तुम्हारे पास है ? मेरे पास, क्या मतलव ? मैंने आश्चर्य से पूछा। वह प्राडू के डाक बंगले से चार दिन हुए एकाएक चली आई है। मैं पहलगाम में था, वह न तो मिली और न कोई खबर छोड़कर गई। सामान भी डाक बंगले में छोड़ गई है... सारा सामान ? मैंने पूछा । हां, सिर्फ एक सूटकेस वह साथ ले गई है। चार दिन इन्तज़ार करने के वाद वाकी सामान वगैरह तो मैं होटल में उठा लाया, पर अभी तक उसका कोई पता नहीं चला। फिर वह हिचकते हुए बोला, इस वक्त उसकी हालत भी ऐसी नहीं थी कि अकेली जाती."वह मेरे साथ मेरठ चलने का प्रोग्राम बना चुकी थी। मैं सकते में आ गया। इरा ने फिर यह क्या कर लिया था ! वह आगे बताने लगा, कोई वात भी नहीं हुई। बड़ी खुश थी। मेरे साथ पहलगाम तक आई । कुछ देर रुकी और. वाज़ार से कुछ खरीद- फरोख्त करके वापस लौट गई। बस, उसके बाद से उसका पता नहीं है। कब चली गई, कहां चली गई। सुनकर मुझे भी काठ मार गया था। मैंने उसे गौर से देखा-उसका चेहरा वेहद खुरदरा दिखाई पड़ रहा था और आंखों में दुख-भरी परेशानी - की झलक थी। वह ऐसे झटके में बात कर रहा था जैसे उसकी चेतना चौक-चौंक उठती हो । एकाएक वह बोला-मैं जरा झेलम के उम पार जा रहा हू । थीनगर आकर वह वही रकी थी, जरा पता करता आऊं मुझे भी खबर देना । उसने इतना ही सुना और वह पागलों की तरह तेजी से वाध की सीढ़ियों पर चढ़ गया। इरा का फिर कोई पता नहीं लगा। मुझे भी अजीव-अजीव-सा लगता रहा । और काश्मीर पीछे छूट गया पर आडू का डाक बंगला और सोलंकी के घोडे की टापों की आवाज़ अब भी कानो में गूजती है । मेरी आखो के सामने तस्वीरें आती है-घोडा दौडाकर जाता हुआ सोलंकी और वीरान डाक बंगला और मुझे लगता है कि अब भी, चार साल के इस अरसे मे, मोलंकी रोज़ इरा को खोजने घोडा दौड़ाता हुआ वहां जाता होगा और सुनसान उदास डाक बंगले को देखकर लौट आता होगा। घोडे की टापों की आवाजें अब भी गूजती हैं । और इसके बाद जो कुछ हुआ, वह या तो मैं जानता हूं या इरा" क्योंकि तीसरा जानने वाला अब नहीं है। दिल्ली में दो साल पहले इरा से मुलाकात हुई थी। तभी उसने बताया था कि वह आडू के डाक बंगले से क्यों चुपचाप चली आई थी। उस शाम जब वह सोलकी के साथ पहलगाम आयी थी, तो अपने खत लेने डाकखाने भी गयी थी। उसीमे उसकी नागपुर वाली सहेली दमयन्ती का खत था, जिसमें उसने लिखा था कि विमल उससे मिलने आया था और इरा के बारे में पूछ रहा था । "इरा ने . था- हां तिलक ! बारह वरस वाद.. बारह जन्मों के बाद विमल जेल लौटा था और दमयन्ती से मिलने नागपुर पहुंचा था। दमयन्ती के तसे पता चला था कि वह मेरे वारे में बहुत पूछ रहा था । तरह- रह की बातें दरयाफ्त कर रहा था."उसकी हालत ठीक नहीं थी। वह मार लग रहा था और कोई काम-धंधा उसके पास नहीं था। वह कार था । दमयन्ती ने लिखा था--आजकल विमल नागपुर में ही भटक रहा है । लखवारों को कुछ लिख-लिखाकर भेजता है, पर कुछ छपता नहीं। मैंने उससे घर खाना खाने को कहा, पर वह नहीं माना । एकदम विगड़ गया है। तिलक, मुझे एक-एक बात याद आने लगी। विमल की बात सोचकर मेरी आंखों में आंसू आ गए। और मुझे लगा कि उसकी वर- वादी का एक कारण मैं भी हूं। वह मुझे अव भी याद करता है क्या सोचता होगा विमल मेरे बारे में? अपने जीवन की पहली घटना या दुर्घटना कोई नहीं भूलता और तिलक, शायद जीवन की सबसे बड़ी दुर्घटना यही है कि हमें हर चीज़, हर सुख मिलता है, पर समय पर नहीं ! अगर विमल मुझे जिन्दगी में दो या तीन वरस वाद मिला होता."या बतरा की ज़िन्दगी में मैं पन्द्रह वरस पहले आ गई होती.. या डाक्टर से बीस वरस पहले मुलाकात हो गई होती तो... लेकिन मुश्किल यही है तिलक कि वक्त पर कुछ नहीं मिलता विमल ही यदि वक्त पर मिला होता तो जिन्दगी का क्या रूप होता. खर, वेवक्त ही सही । यही क्या कम है कि विमल मुझे एक वक्त मिला था। मेरे जीवन में वह जो कुछ भी रहा हो.. पर मैं उसे भी नहीं पाई थी। उसका रोम-रोम मेरा देखा हुआ था। आगा और नि- के क्षण मेरे देखे हुए थे. मेरे शरीर में पसीने के कांटे चुभे हुए थे सव जैसे एकाएक उभर आए थे। और मैं व्याकुल हो उठी थी... विमल पर तरस खाये, यह मैं वरदाश्त नहीं कर सकी। मैंने बहुत खूब सोचा' पर अन्त में यही तय किया कि मैं चुपचाप ही चलीज सोलंकी मुझे कभी भी जाने नहीं देता। और मैं चुराकर चुपचाप बंगले से भाग आई थी। ११६ सात-आठ रोज दमयन्ती के यहा उसका इतजार किया । आखिर' एक दिन वह घूमता-पामता आ ही गया। मुझे देखा तो मुस्करा उटा । उसकी मुस्कराहट से मन पर न जाने कसी चोट लगी थी। कुछ देर बैठने के बाद जब वह बेगानो की तरह चलने लगा तो मैं साथ चल दी। वह मुझे अपने कमरे में ले जाने को तैयार नहीं था, पर मैं जबरदस्ती चली गई। अंधेरा, सीलन-भरा कमरा था । एक कोने में जमीन पर विस्तर लगा हुआ था और दीवार पर चीटियो का कारवां रेंग रहा था । खुली हुई आलमारी में अखबारो का ढेर लगा हुआ था। पहुंचते ही उसने एक बड़ा-सा लिफाफा अखवारो के बीच छिपा दिया था। बिस्तर पर हम दोनों चुपचाप बैठ गए थे। मैंने ही बात शुरू की थी-तुमने तो कोई खबर ही नहीं दी, विमल ! वह फिर मुस्कराया "उसकी घंसी हुई आंखें मुझे गौर से देख रही थी। उसके हाथ-पैरो की उंगलिया लम्बी हो गई थी और चेहरे पर पीलापन झलक रहा था। वह कुछ भी नही योला । सिगरेट मुलगाकर बस उसने इतना ही पूछा-चाय पियोगी ? और मेरी ओर से स्वीकृति समझकर वह गली की दूकान पर चला गया। अखबारो के बीच दुवका हुआ बड़ा-सा लिफाफा मैने सोलकर देखा --उममे एक्सरे की प्लेट थी। धुधले फेफडो की तस्वीर । तभी वह चाय लेकर आया और बोला-अच्छा, तो यह तुमने देख लिया । ... और उसकी आखो में वेवसी और मायूसी का सैलाब-मा आ गया । फिर चाय पीते हुए बोला--कोई खास बात नहीं है. ठीक हो जाऊगा। इतना मुझे विश्वास है कि बीमारी से नही मरूगा · मैं आत्महत्या कर सकता हूं, पर ऐसे नहीं मरूंगा। ऐसी वातें क्यों करते हो ? मैंने धीरे से कहा । अरे मैं तो ऐसे ही कह रहा था । आत्महत्या करने का सवाल ही क्या है ? वह तो वात की वात थी 'चाय पिओ ! कहकर उसने वही पुरानी नजरों से मुझे देखा और कसमसाकर रह गया।
जेल में उसे तमाम रोगों ने घेर लिया था। वह आसाम के छरहरे लोगों की तरह लग रहा था। बहुत मुश्किल से मैं उसे दिल्ली ले आई। वह मानता ही नहीं था। आखिर कुछ दिनों में ही उसकी हालत सुधरने लगी। एक रोज़ न मैं बाल खोले बैठी थी, वह मेरे निकट सरक आया और बोला- स, सचमुच तुम विलकुल नहीं बदली हो । मुझे पुराने दिन याद आ हे हैं."ज़िन्दगी एक बार फिर शुरू हो रही है." मैं यह सुनकर घबरा उठी थी। जिस हालत से मैं गुजर रही थी, उसका अहसास विमल को नहीं था। वह बड़ी वेफिक्री और सादगी से वोला-हम दोनों अव नौकरी करेंगे और सीधी-सादी ज़िन्दगी जिएंगे। कोई चक्करं नहीं अव । ठीक है न ! और उसकी धंसी हुई आंखों में जिस विश्वास की ज्योति चमकी थी, वह बड़ी ही पवित्न थी। और जैसे-जैसे उसका यह विश्वास जड़ पकड़ता जाता था, मैं व्याकुल होती जाती थी। रात-रात-भर मैं उसके सिरहाने जागती बैठी रह जाती। अजीव-अजीव खयाल आते । कभी-कभी मन करता कि विमल को जगाकर कह दूं-तुम यह वरदाश्त कर पाओगे ? तभी उसके वीमार फेफड़े मेरी आंखों के सामने कांपने लगते, और मुझे लगता कि मेरी हालत का अहसास होते ही यह जागता हुआ जीवन वुझने लगेगा। .."एक रात बड़ा भयानक सपना देखा-वही पुराना मकान है सेमड़ के पेड़ में लाल-लाल मांसल फूल लग आए हैं. मैं विमल को घ में खोजती हूं कि विमल देखो, मेरे शरीर में लाल मांसल फूल खि हैं पर विमल कहीं भी नहीं मिलता । घबराकर मैं वाहर आती हूं- सेमल के मांसल फूल वैसे ही खिले हुए हैं और उसीके नीचे. विमल लाश पड़ी हुई है। मेरा शरीर पसीना-पसीना हो गया। एक बार उसका भ्रम उसे . .. ११८ चुका था और अब तो वह पहले से भी अधिक ईप्यालु, जिद्दी और चिड़- चिड़ा हो गया था। जब यह मामने आएगा या वह जानेगा तो बने वरदाश्त कर पाएगा."रातो मे मैं यही सोचती रह जाती थी... मैं सिर्फ एक को जीवन दे सकती थी। कभी-कभी जब उनकी हालत दो दिन ठीक रहकर बिगड़ती तो मैं फिर सोच में पड़ जाती। क्या कर्ट, क्या न करूं? रात-रात-भर वह खासता और जब मैं उसके पास जाती तो वह आंखों में आमू भरकर कहता--इरा, मेरे पास मत आओ, नहीं तो ये कीटाणु तुम्हें भी खा जाएंगे - क्यो मेरे लिए अपनी जिंदगी खराब करती हो? में उसका सिर अपने सीने से लगा लेती। एक दिन मैंने पूछा था-विमल, तुम कहां चले गए थे? क्या करते रहे इतने बरस तो वह भभक उठा था । योला था-- इरा! गायद तुम मेरी बैचनी नही समज पाओगी.. पर उस मजबूरी को जरूर समझ सकती हो, जो तुमने मेरे साथ भोगी थी। मेरी और मेरे जैसे लाखों नौजवानों की असफलता के कारणों पर कभी तुमने गौर किया है । क्यों हम इस तरह सडने-गलने और मर जाने के लिए मजबूर हैं ? कभी सोचा है ? तपेदिक के ये कीटाणु तो बहुत बाद में मुझे मिल हैं । पर जो कीटाणु पूरी जिंदगी को खा रहे है उन्हे कभी तुमने देखा है .... मैं तुमसे क्या कहता "उन्ही दिनो मुझे लगने लगा था कि 'शकुतला' नाटक करने से कुछ नहीं होगा अब अगर हमे मार्थक होकर जीना है तो सब कुछ बदलना होगा सबसे पहले बदलना होगा इस दोगली अर्थव्यवस्था को, जिसमे घूमे जाने के लिए हमे छोड दिया गया है । इस गातिमय विरान से कुछ नहीं होगा. जिम अवरुद्ध काति मे हम फंस गए हैं, उसे पूरा करना होगा "जव तक सड़ती हुई इम क्रांति के कीटाणु नहीं मान होने , तब तक इस देश में हम और तुम यो हो मह-महकर और अमानित होकर मरने के लिए मजबूर होंगे। लेकिन लेकिन इस की होता दिखाई नहीं देता! और सुबह होते ही उमरा या हुआ पर गैप धीरे-धीरे सिर उठाता था, वह मुस्कराकर कहता
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नीरोग हो जाए । पर उसका मन सोबला हो चुका या कभी-कभी तो लगता था कि वह दिलनुल अन्पटी बातें करता है."याद और बंदूकों की । आखो पर चश्मा चढाए यह काति की कितायें पड़ता रहता था और येतरह खासता पा । प्राति के लिए समर्पित उन साथियों की बातें करता जिन्हें बीमारी के कारण उसे छोडकर बाना पड़ा था। कभी जेल के साथियों को याद करता''अपने टूटे हुए गरीर को लेकर पछताता ...और विलस-बिलखकर रो पडता · कभी मुझसे पूस्ता~ययो इरा! क्या यहा कुछ भी कभी नहीं बदलेगा?.. और फिर निराश नजरों में देखकर पूछता या-क्या इन मुल्क में हम कभी वह नहीं कर पाएंगे जो करना चाहते है ? क्या हम ऐसे ही व्यर्य मर जाएंगे? उसका यह हाल देखती तो मेरी छाती फटने लगती थी। मैं राजनीति की उमकी बातें तो नहीं समझ पाती थी पर उमे दिलासा जरूर देती थी- हम मब कुछ करेंगे "सब कुछ वदलेगा पर मुझे अपनी बात पर विश्वान नहीं होता था। एक तरफ यह था और दूसरी तरफ मेरा अपना यसमजस... क्या विमल मुझे उस रप में मंजूर कर पाएगा । और में घुलती जा रही थी कि कैसे छिपाऊगी उसने वह बात । जिम दिन उसे यह पता चल जाएगा, उस दिन वह जीने से इनकार कर देगा... एक दिन मुबह वह बहुत खुश था"तब मैंने फैसला कर ही लिया- ...मैं दमयन्ती की तबीयत खराय होने का बहाना करके पाव दिनों के लिए घर से चली गई। कही भी गई नहीं, यही रही, पर एक नसिंग होम में 1- ."और विमल के लिए मैं अग्नि-परीक्षा देकर नितान्त अकेली बन. कर लौट आई। नया जीवन हुआ था मेरा और मन में दृढ विश्वास जम गया था कि अब मैं विमल को पूरी तरह वचा लूगी । जो कुछ मैं उसके लिए कर सकती थी, जो मेरे वदा था वह मैंने किया था। भ्रम, संशय और दुविधा के सारे साए मैंने मिटा दिए थे और मैं ऐका. तिक रूप से उसके लिए तैयार हो गई थी, यही सोचकर कि कम से कम वह मुझसे तो निराश और हताश नहीं होगा...
.."पर मैं अकेली रह गई.."अब तो बिलकुल अकेली हूं। एक साल वाद विमल ने अस्पताल में आंखें मूंद लो। कहते-कहते इरा रो पड़ी- सब कुछ खोकर भी यही हाय आया। यही मुझे पाना था तिलक.. भोजपत्र के वन की याद आती है "जहां अन्धेरे में भटकते हुए ममदू की आवाज का सहारा था. 'जो हमें मौत से उवार लाई थी.. अव फिर कुछ-कुछ वैसा ही अन्धेरा है वही घुटन है "कोई आवाज़ नहीं है.. और कोई भी ऐसा नहीं है जिसे नावाज़ दूं." मैंने इरा की ओर देखा। कमरा गंदा था और सिरहाने एक खिड़की थी। दो कुरसियां कमरे में पड़ी थीं और एक ओर विमल का बंधा हुआ सामान रखा था । विमल नहीं था, पर उसका सारा सामान इरा ने जतन से बांधकर रख दिया था। एक मला-सा विस्तर था और सुतली में बंधी हुई कुछ कितावें। कमरा बहुत उदास था, इरा वहुत अकेली थी। धीरे से वह बोली -~~-अब कहीं नौकरी कर लूंगी'या यह सूटकेस उठाकर कहीं और चली जाऊंगी... तभी खिड़की के पास से किसी पिल्ले की कू-कू करती आवाज सुनाई दी। इरा उदासी से मुस्कराई और बोली-~~यह पिल्ला पाल लिया है। मैंने देखा, खिड़की की छड़ से बंधा एक छोटा-सा झवरा पिल्ला बैठा था, वहीं सकोरा रखा था, जिसमें दूध से भीगी रोटी के टुकड़े चिपके हुए थे। और वह इरा की और बड़ी ममता से देख-देखकर कू- कर रहा था। कुछ देर की खामोशी के बाद इरा वोली--इसीसे बातें करती रहती हूं, और कौन है जिससे कुछ कह सकू."और शायद मैं किसीसे कुछ कहना भी नहीं चाहती । वहुत अजीव हो गया है यह मन "नहीं कहती हूं तो पछताती हूं और कह लेती हूं तव भी पछताती हूं। उसकी आंखों में आंसू छलछला आए थे। फिर वह धीरे से बोली ----दस-बारह दिनों में नौकरी मिल जाएगी, यही आसार हैं अगली मंजिल के । कोई फिक्र की बात नहीं है। कहां ? मैंने पूछा था। दिल्ली से बाहर"चण्डीगढ़ में एप्लाई किया है."देखो क्या होता । .१२२ है ? इन्तजार कर रहा हूं। यह शहर छोड़ गी तो स्टेशन पर विदा देने आओगे ? कहकर वह फोकी सी हस दी थी। मैंने इरा को गौर से देखा तो वह फीकी मुस्कराहट उमके ओठो पर जमी हुई थी। उसकी आखो में वेवसी झिलमिला रही थी। रेनामी वालों के स्खे रोयें धीरे-धीरे काप रहे थे । वातावरण हलका करने के लिए मैं इधर-उधर की बातें करता रहा । उठकर चलने लगा तो इरा दरवाजे तक छोडने आयी । घुमकर गली में निकला तो देखा—सीखचों की छड़ से बंधा हुआ वह खूबसूरत पिल्ला बैठा था और स्टूल पर बैठी इरा उसे ताक रही थी। उस एकाकी अन्धेरे कमरे के सिर्फ एक कोने मे कही मे रोगनी आ रही थी मैंने रककर कहा-घवराना मत, में मिलता रहूंगा."नौकरी पर जाओगी तो छोडने आऊंगा उसने हलके से मिर हिलाया और मुस्कराने की कोशिश की, तो आखें फिर भर आई थी मुझे दूधसर याद आई थी डवडवाती आखो की शक्ल की वह खूबसूरत और अकेली झील, जिसमे आंसुओ के हिम-हंस तैर रहे थे... और वह वर्फ की बादी याद आ रही थी, जिसमे से हम जिंदा निकल आए थे। और मुझे डाक बंगले के वे दिन याद आते हैं, जब इरा ने मुझे सब कुछ बताया था और वह दिन भी जव आडू के डाक बंगले में उसने मुझसे कहा था-आगन ने पड़े होकर भी मेरी मास घुटती है.. और विमल के साय इनी कमरे में गुजार हुए वे दिन ''जव विमल को उसने मंभाला होगा."उसे जिलाने के लिए अग्नि-परीक्षा देकर लौटी होगी। कितने अपने और माय ही कितने वेगाने होते है डाक बंगले ! मुसाफिर आने है और चले जाते हैं... वहुत-सी बातें मुझे एक साथ याद आती हैं। विमल, सोलंकी, चतरा और डाक्टर-मभी जैसे मेरे मामने है, सीखचों के पार...इरा और उसका पिल्ला भी मुझे याद आता है। और मौत की वादियों से जिंदा लौटना भी नहीं भूलता।
उसे चण्डीगढ़ में नौकरी मिल गई थी। उदास आवाज में एक दिन सका फोन आया था-तिलक ! मैं कल रात की गाड़ी से जा रही हूं "अलविदा! और मैं उसके कमरे पर पहुंचा था। उसने सब कुछ यों ही छोड़ दिया था। खिड़की बंद कर दी थी। कुत्ते का पिल्ला पडोसी को दे दिया था। सिर्फ एक सुटकेस लेकर वह निकली थी। मैंने पूछा था-कमरा छोड़ा नहीं ? क्या पता, फिर लौट कर आना पड़े"या कहीं और जाना पड़े ? और उसने दरवाजे पर ताला लगाकर सूटकेस वाहर रख लिया था, और धीरे से बुदबुदाई थी-चलो भाई सूटकेस, चलें. मैं उसे कालका मेल पर छोड़ आया था, वह अपनी वर्थ पर चुप- चाप वैठ गई थी। गाड़ी चलने के समय भी वह खिड़की पर नहीं आई थी। गाड़ी चली गई थी। अव मैं इतना ही जानता हूं कि या तो इरा ने चण्डीगढ़ में नौकरी कर ली होगी, या अपना सूटकेस लेकर कहीं और चली गई होगी। कम से कम दिल्ली लौटकर वह नहीं आई है...
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