Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner

Napush Ka Mairta Ranav

Shri Kirshan Dass · 2010

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भूमिका । पाठक महाशयो ! इस विषयके अधिक विवेचनाकी आवश्यकता नहीं कि, इस समय ससारकी क्या अवस्था है जो है वह किसीसे भूलीहुई नहीं प्रायः आँख उठाकर देखतेही अपने कुकर्मसे दूषित शरीरवाले नवयुवकोके झुडही दिखाई पड़तेहै इन झुडोमे कुछ ऐसेभी होते है जो अपनी ऐसी रद्दी अवस्था होनेसे घरमे जाना मानो कालके मुखमे पड़ना समझतेहैं । कुछ ऐसे भी है जिनको स्वय नपुसक होनेके सबबले अपने घरके दुश्चरित्र देखने पडतेहै ऐसी दुखव्यजक अवस्थामे न जाने यह विचारे क्या २ सोचतेहोगे सो भगवान् जाने परतु कोई कोई मूर्ख महान् अनर्थभी कर बैठतेहै जिसके फलसे इनका तो यह लोक और परलोक दूषित होताही है परतु यह दुष्ट अपने मातापिता आदि मुदवियोका जीवनभी कलंकित करजातेहै इस दुःखसे बढ- कर इस समय भारतको क्या दुःख होसक्ताहै ऐसा विचारकर मुझे महान् पेद हुवाकरताधा देवयोगले स० १९६५ के आरभमेही मै अखिल भारतीय आयुवेदिक यूनीवर्सिटीके महोत्सवमे ववईके निकट पनवेल गयाथा वहांपर परमोदारचरित शास्त्रोद्धारक वैश्यकुलभूषण श्रीयुत-लेठ खेमराजजीले भेट हुई और कुछ इस विषयकी चर्चा चली और लोगोंकी व्यवस्था तथा उनका झठे सच्चे इस्तिहारा ले लूटना आदि विशेष विवेचन होनेके अनंतर श्रीयुक्त सेठजीने इस विषयका कोई उत्तम ग्रथ बनाकर भेजिये" ऐसी इच्छा प्रगटकी मै पहले- ही ऐसाथ लिखना चाहाताभी था सो श्रीयुक्त सेठजीके कहनेसे मानो सोतीहुई.इच्छा इस पुस्तकके बनानेको एकदम उठखडी हुई मैने घर आनेपर अवकाश पाकर यह नपुंसकामृतार्णव नामक ग्रंथ नव तरगोमे लिखकर आधुनिकटोगांके कल्याणके लिये श्रीमान् शास्त्रोद्धारक सेठजीके प्रति समर्पण शिया और सेठजीनेभी निज "श्रीवकटेश्वर" स्टीम्-प्रेसम छापकर सबके कल्याणके लिये प्रसिद्ध किया । आशा है सहणग्राही इसग्रथले स्वय लाभ उठाकर औराकोभी शिक्षा देंगे आपका शुभचितक- रासप्रसाद उपाध्याय मु०-टकसाल, रियासत पटियाला.

f ॥ प्रा.॥ अथ नपुंसकामृतार्णवग्रंथस्थविषयानुक्रमणिका। २२ २३ . " " ८ २५ . " २७ २८ विषय पृष तिपय अथ प्रथमस्तरंगः। अथ द्वितीयस्तरंगः । मंगलाचरण वीर्यशुद्धिकर विधि ग्रधारभ नपुसकोंकी चिकित्सा वीर्यकी प्रशता सामान्यचिकित्सा विषयमे विशेष आसक्तिका हेतु ५ वीजोपघातकी चिकित्सा ब्रह्मचर्यके न रक्षण करनेले न- वजभगका यत्न पुसकादिरोगोकी सप्राप्ति . जरासभव और क्षयजकी चि- नपुसकाधिकार कित्ता निदान अथ वाजीकरण सातप्रकारकी नपुसकता विविध वाजीकरण नपुसकताके अन्य कारण ९ बुढापेके कारण बीजोपघातनपसकताके लक्षण वाजीकरणपदार्थ और निदान १० शतावरीवृतम् ध्वजभगनपुसकताके लक्षण ११ लघुवाजीसर्पि. ध्वजभगनपुसक्ताका निदान जरासभवनपुसकताका लक्षण वानरीगुटिका और उसका कारण वाजीकरणशप्कुली क्षयजनपुसकताका लक्षण ११ पायस कुवर्मज आधुनिक नएसकता ५ सितादिवृप्ययोग अन्यमतले नपुलवनिदान योग्यदूध नपुसकोसे साप्पासाध्यता रसाला १८ प्तिशुक्रके लक्ष्ण अश्वगधादिघृतम् इपित शुक्रो भेट माषादिवृत वातपित दफ्पित चदनादितल रधिरयुत्तावीर्य निकालनेका कारण , द्राक्षासव . वीयय होने लक्षण .. साध्यासाध्य २१ वाजीकरणपालिका शुगुको रक्षण म्टेन्छयोग " १२ गोवूमादिवृत : : :- .. . सुनतोक्त अन्य नपुसक ३२ . . १ २० महासुगधितैल ३३ ३४ ३५ ३६ ३७ . " राक्षसयोग ६ नपुंसकामृतार्णव- .. ५७ ... . " " ६१ . " " " :: ६८ 0 ... " विषय पुरुषार्थ दायक कम्तिकर्म वृप्य अथ तृतीयस्तरंगः। वाजीकरणादि चूर्ण वर्णन गोक्षुरादिचूर्ण प्रकारान्तर नारसिहचूर्ण सुसलीचूर्ण वाराहीकद चूर्ण अन्यचूर्ण उच्चटादिचूर्ण मनुयष्टीचूर्ण विदारीकन्दचूर्ण आमलकीचूर्ण शतावर्यादि चूर्ण गोखरूचूर्ण सुसल्यादिचूर्ण ... अन्यशतावर्यादिचूर्ण अश्वगंधादिचूर्ण करवीरादिचूर्ण कामदेव चूर्ण मानसोल्लासचूर्ण... वृहद्धाराहीकदचूर्ण मदनप्रकाशचूर्ण.. अश्वगधाचूर्ण मापचूर्ण वृद्ध दारुकचूर्ण अकर्कराचूर्ण गधकादिचूण लक्ष्मणादि चूर्ण मवुयष्टयादिचूर्ण कुछ एक औपविक यो। रपसहार.. पृष्ट विषय पृष्ट ३९ अथ चतुर्थम्नरंगः। ४० कौचपाक... आन्नपाक ५६ ४२ कामसुन्दरपाक ४२ रतिवल्लभपृगपाक ५८ महाकामे वरपाक ६० रतिवृद्धि करपाक ४४ शतावरीपाक रतिवल्लभविजयापाक ६२ ४५/ खण्डकूप्माण्डपाक ६३ केशरपाक... अमृतमहातकपाक ६६ १६ खोप्यापाक मेथीपाक आमलापाक ४७ छुवारापाक मुशलीपाक ४८/ वादामपाक मलापक पिट्टीपाक... ४९ अथ पञ्चमम्तरंगः। ५० गुटिकारसादिवर्णनम् ५१ | वल्लभागुटिका ७६ वाजीकरणगुटिका ५. चंद्रोदयरस लघुचद्रोदयरस सिद्वसुतरस ५३ | बखतकुसुमाकररस पूर्णचरम कामदेवरस हत्पूर्णचरम सनरावजरम .. .. . . " B " ::: . " . a . १ ८, विषयानुक्रमणिका। ७ विषय ए विषय पुण ८७ ८८ . . ... . ९२ " श्रीमन्मथरस ८५ अथवा १०८ बृहच्छृङ्गाराभ्रक ८६ | इंद्रगोपादिटेप पुष्पधन्वरस करवीरजटादिलेप कन्दर्पसुन्दररस लेप लक्ष्मीविलास रस ८९ कार्पासवीजलेप श्रीकामदेवरस ९१ अरिष्टकादिलेप १११ रससेवनमे आज्ञा करवीरादिलेप कस्तूरीगुटिका मूलिकावीजादि वीर्यग्नभीगुटिका मर्दन म्तभनवटिका इन्द्रिय सूखगईहो तो मर्दन ११२ वीर्यस्तभिनी केशरादिगुटिका ९४ २ इन्द्रियके बांकपनका यत्न वीर्यस्तभककामेश्वर रस ९५ १ इन्द्रियमे म्पर्शनदायक तेल तैललेपके समय पथ्यापथ्य ११३ अथ षष्टरतरंगः। तलसेकलेपादिवर्णन अथ सप्तमस्तरंगः । ९६ बृहतीतल ९७ | नपुसककारणत्वेन प्रमेहवर्णन ११४ पातालयत्र प्रमेहनिदान १२५ दूसरा प्रकार तीसरी विधि सव प्रमेहोमे मूत्र दृष्य ११६ अतैल ९९ । प्रमेहमे दूप्य रास्तेल १०० प्रमेहके पूर्वरूप वामदेवतेल प्रमेहके सामान्यलक्षण पलाशवीजतेर १०१ | प्रमेहभेदोकी कल्पना वलयहरतल. १८२ कफके १० प्रमेह पानीनाशक तेल १०३ | पित्तके ६ प्रमेह . ११८ अजेपालतल वायुके ४ प्रमेह ११९ राक्षसतल १०४ असाध्य नपसकतानाशक संक १ १०५ सव प्रमेहोके मूत्रमे मीठाआताहै १२० संकके बाद लेप १०६ | वातादिभेदसे साध्यासाव्य लेप२ १०७ कपके प्रमेहांका यत्न ... १२१ सबके पीलेप पित्तप्रमेहकी चिकित्सा संर १०८ वातप्रमेयत्न " ९ ८ सप्राप्ति . " " प्रमेहोसे नपुसकता संद.२ , नपुंसवामृतार्णव-विषयानुक्रमणिका । .... , . फिरगके उपद्रव " ... .. १ " . विपय दृष्ट विपन पृष्ट सवप्रकारके प्रमहांका यत्न १२१ | लेप सिहामृत वृत १२२ भूनिवादित धान्वन्तरवृत १०३ । करजादिवृत १३३ चन्द्रप्रसा १२४ उपदंशका भेद फिरग गन्धकयोग १२५ फिरगका रूप १३४ नाग भस्मयोग अभ्रकयोग साध्यासाध्यत्व शिलाजीतप्रयोग १२६ रसकर्पूरतेवन वंगेश्वररस मल्हम १३६ महावंगेश्वररस चोपचीनीयोग मेहकुलान्तकरस १२७ उशवावलेह पचाननवटी जंबुआदि तैल १२८ त्रिफलापाक १२८ कोशातकीर्तल १३९ उपदंशन्न रस अथाष्टमस्तरंगः। नपुंसकत्वे कारणत्वेनौपदशफि- अथ नवमस्तरंगः। रगवर्णनम् १२९ अथोत्तमवाजीकरणरसायनयो- उपदशनिदान वातोपदशके लक्षण दशमूलारिष्ट पित्तोपदशके लक्षण... १३१ मृतसजीवनी सुरा ११२ कफोपदंश० १४६ भल्लातक सन्निपातोपदश महाकल्कनामक असाध्य उपदश दिवालमुक उपदंशकी चिकित्सा ग्रयकाउपसहार उपगपर लेप २३७ अयसमाप्ति इति नपुसकामृतार्णवस्थितविषयानुक्रमणिका समाना। . " १३० / गवर्णनम् " ... ...

। श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीगुरवे नमः । श्रीसरस्वत्यै नमः ॥
नपुंसकामृतार्णवः ।
coko
भाषाटीकासमेतः।
प्रारभ्यते।
(मंगलाचरणम्-)
विलोलवीचिसंयुक्ता दुःखत्रयविनाशिनी ।
राजते ह्यापगा यस्य शशिशोभितमस्तके ॥१॥
गिरिजा यस्य वामांगे सपुत्रा च विराजते॥
भस्मोद्धूलितदेहाय नमस्तस्मै पिनाकिने ॥२॥
दोहा।
चपल वीचि युत आपगा, करहि दुःखत्रयनाश ।।
शशिशोभित मस्तक विपे, रही निरंतर भास ॥१॥
गणनायकको अंक ले, गिरिजा वामाधार ॥
भस्म लिप्त तनु देवको, नमः है वारंवार ॥२॥
ग्रंथारंभः।
पुंस्त्ववृद्धिकरं चैव पंडादिदोषनाशनम् ॥
संतत्यादिसुखकरमायुरारोग्यदं तथा ॥१॥
तरंगैरप्टभिः शुद्धैनपुंसकामृतार्णवम् ॥
अनुभवकृतैयोगैस्तथैव शास्त्रसंमतैः ॥२॥

२
नपुंसकामृतार्णवः।
निबध्नामि नियोगाच्च सतां लोकहितैपिणाम् ॥
वैद्यो रामप्रसादोहं दृष्ट्वा लोकस्य संस्थितिम् ॥३॥
संसारके हित चाहनेवाले श्रेष्ठ पुरुषाकी आज्ञासे तथा इस समय
लोककी अवस्था देखकर रामप्रसादनामक वैद्य में इस "नपुंसकामृतार्णव"
ग्रंथको शास संमत अनुभव किये हुवे योगासे निबंधन करताहूं अर्थात्
ग्रंथरूपसे लिखताहूं । सो यह नपुंसकामृतार्णव (नपुंसकोके लिये अमृतका
समुद्र ) सुंदर शुद्ध आठ तरंगोंसे युक्त होगा। और पुरुषार्थका बढ़ानेवाला
तथा पंड (नपुंसक ) आदि दोपोका हरने वाला, और संतानआदिमुखका
करनेवाला, आयु तथा आरोग्यताका देनेवाला होगा ॥ १-३ ॥
शरीरे सर्वधातूनां सारं वीर्य प्रकीर्तितम् ॥
तदेव चौजस्तेजश्च बलं कांतिः पराक्रमः ॥४॥
यस्मिञ्छुद्धे शरीरस्य गतिः शुद्धा भवेत्सदा ॥
ब्रह्मचर्यदशायां हि क्षीणे क्षीणपराक्रमः ॥५॥
धैर्यतेजोविरहितः रोगग्रस्तकलेवरः
सारहीनं यथा वस्तु तथैव स नरः स्मृतः ॥६॥
शरीरमं सब धातुबाका सारभूत वीर्यही कहाजाताहै, वही वीर्य'ओज,
नंज, बल, कांति और पराक्रम रूपमे गगरमे है जिसमें शुद्ध होनेसे
शरीरकी गति सर्वदा सवतरहसे शुद्ध रहती है, ब्रह्मचर्य अवस्थाम
वीर्यके क्षीण होनेसे मनुष्य पगक्रम तथा धर्य और तेजसे हीन होकर
अनेक रोगासे युक्त शरीरबाला होता है । जैसे सारहीन पदार्थ ही होता
है वैसेही वीर्यमे विना पुरुपार्थ है ॥४-६ ॥
अन्यैरपिमहारोगर्नरः शीवादमाप्नुयात ॥
मातृपितृजनोपाज नया देवमात्रतः ॥ ७ ॥

भाषाटीकासमेतः। परं च बहवो लोके दुःखिता निजदोषतः ॥ ब्रह्मचर्यविहीनास्ते स्वयं क्लीबत्वमागताः ॥ ८॥ औरभी बहुतसी महाव्याधियों से मनुष्य नपुंसकताको प्राप्त होताहै तथा मातापिताके रजवीर्य संबंधी विकारोसे मनुष्यको नपुंसकता होती है। और पूर्व जन्मके पापोके सववसे भी असाध्य नपुंसक होते हैं । परंतु इस समय अधिकतर मनुष्य ब्रह्मचर्यसे विहीन होकर अपनेही कुकर्मों के फलसे नपुंसकताको प्राप्त होकर दुःख भोग रहेहैं ॥ ८ ॥ शिप्य उवाच । आश्चर्यमिदमत्यंतं दृष्ट्वा लोकस्य संस्थितिम् ॥ निवृत्तिदृश्यते नित्यं धर्मात्कर्माहयात्तथा ॥ ९॥ सत्ययोगतपोभ्यश्च ब्रह्मचर्याद्विशेषतः ॥ शमो दसस्तु कुत्रास्ति विवेकोपि गतः स्वयम् ॥ १० ॥ प्रवृत्तिमैथुने कामे सदा सर्वत्र दृश्यते ॥ दुःखितापि भृशं नाथ परदाराभिमर्पणात् ॥ ११॥ उपदंशप्रमेहादीन्प्राप्य वेश्याप्रभावतः ॥ नपुंसकत्वं संप्राप्य अयोनिमैथुनात्तथा ॥ १२॥ हतदृष्टिरुजाश्चि पश्यन्तोपि हि तत्फलम् ॥ न ते पापानिवर्तते न तानृष्ट्वा जनाः स्वयम् ।। कारणं चात्र किं नाथ कृपया वद मे प्रभो ॥ १३॥ हाथ जोडकर शिष्य कहने लगे । हे गुरो इस समय संसार की अवस्था देखकर अत्यंत आश्चर्य होता है, प्रायः मैं जिधर देखताहूं सब मनुष्योंकी प्रवृत्ति धर्मादिको मे नहीं है। बल्कि धर्मसे दयासे कर्मकाण्डसे तथा सत्य मे और योग तप आदिसे निवृत्ति ही दिखाई देती है। खासकर ब्रह्मचर्य नो नामायमा प्रतीत होने लगा। मनमें शांतभाव और इंद्रियांका दमन नो गया परंतु विवेक भी माना नानकोही छोडभागा । हे नाथ ४ नपुंसकामृतार्णवः । इस समय जिधर देखाजाय प्रायः सबकी प्रवृत्ति संसारकी विषयवासनासे भरीहुई है । और ऐसा विचित्र समय आया कि अनुचित मैथुनेच्छा- कोही मनुष्य शरीरधारणका मुख्य कर्तव्य समझने लगे । हे गुरो ! यद्यपि इन कुकर्मियोंको परस्त्रीगमनसे अनेक दुःसह दुःखोंसे सामना करना पड- ताहै, और वेश्यागमन आदिसे आत्सक सोजाक आदि दारुण रोगोकी करड़ी जेलकी सेवा सदाके लिये करनी पडतीहै । तथा अयोनिमैथुन (हस्तमैथुन व गुदमैथुन) से नपुंसकताको प्राप्त होकर अनेक दुःसह रोगोकी जंजीरसे जकड़ेजातेहैं बल्कि इन विचारोंकी दृष्टि, बल, बुद्धि, शरीर इन विषयोंकी भेटही होलेतीहै । परंतु आश्चर्य यह है कि, अपने कुकर्मका फल देखकरभी न तो यह (रोगी)आपही इन महापापोंसे आगेको वचनेके लिये घृणा करतेहैं न इनको देखकर और मनुष्यभी बुरा समझतेहैं सो हे आयुर्वेदके ज्ञाता ! मुझपर कृपाकरके कहिये इस अनर्थका कारण क्याहै ॥९-१३ ॥ प्रश्रमेतादृशं श्रुत्वा सद्गुरुः शिष्यवत्सलः ॥ प्रसन्नात्मेन्द्रियमना उवाच कृपया तदा ॥ १४॥ गुरुरुवाच। धन्य तात त्वया चाद्य प्रश्न एतादृशः कृतः॥ विद्याबलं समासाद्य दीर्घायुं प्राप्स्यसि भृशम् ॥ १५ ॥ कारणं यत्त्वया पृष्टं लोकानुग्रहकांक्षया ।। तदहं संप्रवक्ष्यामि श्रयतां शिष्यसत्तम ॥ १६॥ इस प्रश्नको सुनकर शिष्यके प्यारे सद्गुरु बड़े प्रसन्न हुये मुखकी कांति उज्ज्वल हो उठी मनमें आनंद हुवा, फिर कृपाकरके शिष्यको कहने लगे हे पुत्र ! तुमको धन्य है तुमने बहुतही अच्छा प्रश्न कियाह तुम विद्या- वलसंपन्न होकर दीर्घायु होगे सांसारिक मनुष्योंपर कृपा करनेकी इच्छासे इस समयकी कुकर्मजनित अवस्थाका जो कारण पूछा है वह सुनानाई, सो हे श्रेष्ठ शिष्य ! सावधान होकर सुनो ॥ १४-१६ ॥

भाषाटीकासमेतः । सर्वदेवमयो राजा नेता लोकस्य दर्शितम् ॥ तस्मिन्धर्मरते लोके प्रजा धर्मपरायणा ॥ १७॥ राशि पापरते नित्यं प्रजा पापरता भवेत् ॥ यत्र राजा स्वार्थपरो प्रजापीडनतत्परः ॥ १८॥ तत्र प्रजा भवेत्सर्वा शिश्नोदरपरायणा ॥ जातिधर्मो न तत्रान्ति कुलधर्मो न विद्यते ॥ १९॥ पितरौ च तदा पुत्रानज्ञानात्पालयंति हि ॥ वधानाध्यापयति यतो मूर्खाः स्वयं हि ते ॥ २० ॥ द्विजाश्च नित्यं ससुता गच्छंति नर्तनादिष्ठ ॥ वालोपि पितरं पश्यन् वेश्यया सह मोदते ॥ २१ ॥ अभ्यासं पितृ प्राप्य तस्मिन्नेव रतः सदा॥ मछादीत् विषयान प्राप्य हतधर्मपराक्रमः ॥ २२ ॥ स्वधर्म नैव जानाति यतः शिक्षा न विद्यते॥ नानादुःखान्यपि पश्यन् नेच्छंति ते निवर्तितुम् ॥२३॥ एवं रुजार्दिता एते न लभंते प्रतिक्रियाम् ॥ राजा च जनकश्चैव कारणानि इमे स्वयम् ॥ २४॥ शास्त्रोंमें लिखा है कि परमात्माने सव देवताओंकी शक्तियोंसे राजा बनाया है । इसीलिये राजा संसारका नेता होता है । यदि यह राजा धर्मात्मा हो तो सब प्रजाभी धर्म परायण होतीहै । यदि राजा पापमें लीन हो तो प्रजाभी वैसीही होजातीहै । जिसजगे राजा स्वार्थपर होकर प्रजाको पीडनकरनेवाला होताहै उस राजाकी प्रजा तमाम शिश्नोदर परा- यण होजातीहै । जातिका व कुलका धर्म तथा वर्णव्यवस्था नष्ट होजाती है। उस समय माता पिता अपनी संतानके उचित संस्कार न कराकर

नपुंसकामृतार्णवः ।
अज्ञानसे पालन करतेह और अपनी जातीके अनुकूल धर्मकी शिक्षा नहीं
देते क्योंकि वह विचारे स्वयंही धर्मके विषयों मूर्ख होतेहैं । फिर वणा-
चित शिक्षा न होनेसे ब्राह्मण क्षत्री वैश्य भी अपने पुत्रीको गोदम लेकर
वेश्याके नाचमें बैठकर वेश्याओंसे अनुचित हास्व करतेहैं । बालक भी
अपने पिताको वेश्यासे हास्य करते देख कर स्वयं उसकाम में प्रवृत्त होते
हैं। अपने पितासे प्राप्त हुए अभ्यास में ही रत रहते हैं फिर जवान
होनेपर मब पीकर वेश्यागमन आदि कुकर्मको अपना मुख्य कर्तव्य
मानने लगते हैं अपने धर्म पराक्रम आदिको उसीमे नष्ट कर डालते हैं
क्योंकि इन विचारोंको धर्मकी शिक्षाही नहीं दीगई । इस लिये यह
अपने धर्मको जानते ही नहीं, अपने कुकर्मसे अनेक दुःख भोगते हुये भी
वह उनसे हटना नहीं जानते । सो है शिष्यसत्तम । संसारमें इस
अनर्थका कारण एक तो राजा, दूसरा माता पिता, तीसरे यह विचारे
स्वयं आपही हैं ॥ १७-२४ ॥
यज्ञो वै ब्रह्मचर्य हि यतः पुरुषार्थसाधनः ॥
ब्रह्मचर्यप्रभावेण नरः प्राप्नोति गौरवम् ॥२९॥
ब्रह्मचर्य शरीरस्य साधनं परमं मतम् ॥
ब्रह्मचर्यविहीनानां जीवनं हि निरर्थकम् ॥२६॥
हे तात, ब्रह्मचर्यही परम यज्ञ हे क्या कि ब्रह्मचर्यके विना मनुष्य
। पुरुषार्थका साधन नहीं करसक्ता ॥ ब्रह्मचर्यके प्रभावते मनुष्य
को प्राप्त हो सक्ताह ॥ २५ ॥ ब्रह्मचर्यही शरीरका परम मावन
। ब्रह्मचर्यके विना मनुष्यका जीवन ही निसर्थक है ॥ २५-२६ ।।
शिप्य उवाच।
ब्रह्मचर्यविहीनानां स्वेच्छया च विहारिणाम् ।।
के रोगा विघ्नकर्तारः कां गतिं प्राप्नुवंति ते ॥२७॥

७
भाषाटीकासमेतः।
शिष्य बोले हे गुरो । जो मनुष्य अपनी इच्छानुसार विहार करके
ब्रह्मचर्यको खो बैठे उनकी शरीरयात्राम विघ्न डालनेवाले कौन २ से रोग
होते हैं और उन ब्रह्मचर्यविहीन पुरुषोकी क्या गति होतीहै ॥२७॥
गुरुरुवाच।
पंचविंशतिपर्यतं विंशतिन्तु विशेषतः ॥
ब्रह्मचर्य न चरति ज्ञात्वा वाऽज्ञानतः पुमान् ॥ २८॥
गति तस्य प्रवक्षामि लोकद्वयभयावहाम् ॥
ब्रह्मचर्यविहीनत्वाद्रोगग्रस्तकलेवरः ॥ २९ ॥
इहाऽऽसुष्मिककार्येषु ह्यसमर्थतनुर्भवेत् ॥
मेहल्लीबादिभी रोगैर्दुःखितो विमनाः सदा ॥३०॥
गुरु कहने लगे हे तात ! पच्चीसवर्षतक ब्रह्मचर्यका पालन करना
चाहिये । और वीसवर्षतक तो अवश्य ही ब्रह्मचारी रहना चाहिये । यदि
इस प्रथमावस्थामें मनुष्य ज्ञानसे अथवा अज्ञानसे ब्रह्मचर्यका
पालन नहीं करते उनकी गति जो इसलोक और परलोकमें भयका-
रकहै उसका कथन करता हूं ब्रह्मचर्यके न होनेसे उन मनुष्योंका शरीर
रोगोंसे असा हुचा होता है और इसलोक और परलोकके सब कामोंम
असमर्थ होतहे प्रमेह और नपुंसक आदि रोगोसे दुःखित होकर मनमें
सदा दु:खितही रहते हैं ॥ २८-३० ॥
शिष्य उवाच ।
कीवत्वं कतिधा नृणां दुःसहं दुःखदायकम् ॥
कैः कारणैर्भवति तद्वद नो भिपजां वर ॥३१॥
शिष्य कहने लगे हे गुरो ! मनुष्याको दुःसह दुःखके देनेवाली नपुंस-
कता कितने प्रकारकी है और किन २ कारणांसे यह बीमारी होतीहै । हे
वैयोम श्रेष्ट । कृपा करके मेरे पास कथन करो ॥ ३१॥

८ नपुंसकामवार्णवः नपुंसकाधिकारः। क्लीबः स्यात्सुरताशक्तस्तद्भावः कैव्यमुच्यते ॥ तब सप्तविधं प्रोक्तं निदानं तस्य कथ्यते ॥३२॥ जो मनुष्य स्त्रीसे मैथुन करनेमें इच्छा तो करे परंतु इन्द्रियकी कमजोरी से मैथुन न करसके उसको क्लैव्य कहते हैं । वह लैव्य (नपुंसकता) सातप्रकारकी होतीहै । उसका निदान कहते हैं ॥ ३२ ॥ निदान । तैस्तैीवरहदैस्तु रिसोर्मनसि क्षते ।। ध्वजः पतत्यतो नृणां क्लैब्यं समुपजायते ॥३३॥ पुरुषके हृदयको अप्रिय (जिनसे नफरत हो) ऐसे भय शोक को- धादिकोंसे चित्त दुःखित होनेसे लिंगमें शिथिलता होवे और मैथुनकी इच्छा न हों उसको नपुंसक कहते हैं ॥ ३३ ॥ १ मानसक्लैब्य । द्वेष्यस्त्रीसंप्रयोगाच कैव्यं तन्मानसं स्मृतम् ॥ ३४॥ जिस पुरुषको मैथुनविषयक वार्ता बुरी लगे और स्त्रीरमणसे द्वेष हो उसको मानसक्लीव कहते हैं ॥ ३४ ॥ २ पित्तजल्लीवता। कटुकाम्लैः सलवणैरतिमानोपसेवितैः ॥ पित्ताच्छुक्रायो दृष्टाकैव्यं तस्मात्प्रजायते ॥३५॥ मिरच खटाई निमक आदि पित्तकर्ता पदार्थोका अत्यंत सेवन करनेमे वढकर वीर्यको विगाड देताहै उससे वीर्य क्षीण होकर नपुंकता प्राप्त होतीहै (यह दूसरी न०) है ॥ ३५ ॥ ३ शुक्रक्षयजनपुंसकता। अतिव्यवायशीलो यो न च वाजीक्रियारतः ।। ध्वजभंगमवाप्नोति म शुक्रक्षयहेतुतः ॥३६॥ :

भाषाटीकासमेतः।
जो मनुष्य मैथुन तो अधिक करे और वीर्यके वढानेवाली वाजीकरण
घोषधिका सेवन न करे उसके वीर्यले क्षीण होनेसे इन्द्रिय शिथिल होजाती
है उसको शुक्रक्षयज नपुंसक कहतेहैं ॥ ३६ ॥
४ चतुर्थनपुंसकता।
लिंगवृद्धिकरान्योगातृ सेवतेयः प्रसादतः ॥
सहता मेट्रयोगेन चतुर्थी क्लीवतां ब्रजेत् ॥ ३७॥
जो मनुष्य प्रमादसे अज्ञानवश लिगके बढानेवाली औषधिका उपयोग
करते हैं उसले लिग वडा होनेके कारण चौथी क्लीवता होतीहै ॥३७॥
पंचम न०
पंचमी सीबता ज्ञेया शिराच्छेदादिकारणात् ॥ ३८ ॥
पांचवी नपुंसकता वीर्यवाही नसके कटनेसे और दारुण प्रमेहादिकोंसे
भी होती है ॥ ३८॥
षष्ठ न०
बलिनः क्षुब्धमनसो निरोधाद्ब्रह्मचर्यतः॥
षष्ठं क्कैव्यं स्मृतं तत्तु वीर्यस्तंभनिमित्तकम् ॥ ३९॥
यदि वल्यान् मनुष्य खिन्नमन होकर ब्रह्मचर्यसे वीर्य रोक लेवे वह
गस्तम्भ निमित्तक छठी कीवता है ॥ ३९ ॥
सप्तम न०
जन्मप्रभृति यक्लैब्यं सहजं तद्धि सप्तमम् ॥ ४०॥
जो पुरुप जन्मसेही नपुंसक हो उसको सहज नपुंसक कहते हैं ॥४०॥
(नपुंसकताके अन्य कारण)
बीजध्वजोपघाताभ्यां जरया शुक्रसंक्षयात् ॥
वैलव्यसंभवस्तस्य सामान्यं शृणु लक्षणम् ॥११॥

१०
नपुंसकामृतार्णवः ।
संकल्पप्रवणो नित्यं प्रियां वश्यामथापि वा।
न याति लिंगशैथिल्यात्कदाचिद्याति वा यदि ॥१२॥
श्वासातः खिन्नगात्रांशो मोघसंकल्पचेष्टितः ॥
म्लानशिश्नश्च निर्बीजः स्यादेतत्क्लैव्यलक्षणम् ॥
सामान्यत्वाच्च कैव्यानां लक्षणं समुदाहृतम् ॥४३॥
वीर्य तथा लिंगमें खराबी होनेसे और बुढापेके कारण शुक्रके क्षय होजाने
से जो नपुंसकता होतीहै, हे शिष्यसत्तम ! उसके लक्षण सुनो ॥ ४१ ॥
नपुंसकताके सामान्यलक्षण यहहै कि रमण करनेका विचार तो नित्य को
परंतु लिंगकी शिथिलताके सववसे अपनी विवाहिता स्त्रीसे भी गमन न
करसके । कदाचित् करे भी तो श्वास हो देह कंधों में पसीना आवे और इस
विचारेका सव संकल्प निष्फल होवे लिंग मुर्शाया हुवा और वीर्य रहितहो
सामान्यतासे नपुंसकोंके यह लक्षण हैं ॥ ४२-४३ ॥
श्रूयतां तन्मना भूत्वा विस्तरेण प्रवक्ष्यते
बीजोपघातध्वजभंगजराक्षयसमुद्भवान् ॥४४॥
हे शिष्य, सावधान होकर सुनो (वीजोपघात-ध्वजभंग, जरासंभव और
क्षयज नपुंसकोंके विस्तारपूर्वक लक्षण कथन करताहूं ॥ ४४ ॥
बीजोपघातके लक्षण और निदान ।
शीतरूक्षाम्लसंक्लिष्टविरुद्धाजीर्णभोजनात
शोकचिंताभयत्रासात्स्त्रीणां चात्यर्थसेवनात् ॥४५॥
वातादीनामोजसश्च तथैवानशनाच्छ्रमात ॥
नारीणामनभिज्ञत्वात्पंचकर्मापचारतः ॥४६॥
बीजोपघातो भवति पांडुवर्णः सुदुर्वलः ॥
अल्पप्रजोल्पहर्पश्च प्रमदासु भवनमः ॥४७॥

भापाटीकासमेतः। ११ शीतल, रूखा, खट्टा, कठोर तथा विरुद्ध भोजन करनेसे और अजीर्णमें भोजन करनेसे । शोक, चिता, भय, अति मैथुनसे तथा अभिघात और अविश्वाससे रसादि धातुवोकी क्षीणतासे भोजन न करनेसे निर्जलव्रत करनेसें अति परिश्रमसे स्त्रियोंपर प्यार न होनेसे वमन विरेचनादि पंच- कर्मके विगडनेसे मनुष्योंका वीर्य विगडता है । फिर उसमनुष्यके यह लक्षण होतेहैं । देहमें पीलापन । शरीर दुबला होना । संतानका अल्पायु होना और कम होना या न होना स्त्रियोंमे स्नेह न होना श्वासादि होना वीजोपघात नपुंसकके लक्षण हैं ॥ ४५-४७ ॥ ध्वजभंग न०। ध्वजभंगस्य चोत्पत्तिलक्षणं शृणु विस्तरात् ॥ अत्यम्ललवणक्षारविरुद्धाजीर्णभोजनात् ॥४८॥ अत्यंबुपानाद्विपमपिष्टान्नगुरुभोजनात् दधिक्षीरानूपसांससेवनादतिकर्षणात ॥४९॥ कन्यायां चैव गमनादयोनिगमनादपि ॥ दीर्घरोम्णी चिरोत्सृष्टां तथैव च रजस्वलाम् ॥ ५० ॥ दुर्गधां दुष्टयोनिं च तथैव च परिश्रुताम् ॥ नरस्य प्रमदां मोहादतिहर्षात्प्रगच्छतः ॥११॥ चतुष्पदाभिगमनाच्छेफसश्चाभिघाततः अधावनाहा मेस्य शस्त्रदंतनखक्षतात् ॥५२॥ काष्टप्रहारनिश्शेषशूकानां चातिसेवनात् ॥ रेतसश्च प्रतीघाताद्धजभंगः प्रवर्तते ॥ ५३॥ अत्यंत खटाई अत्यंत निमक और तीक्ष्णखार विरुद्धभोजन ( दूध मछ- ही आदि ) कहा अन्न तथा विना भूख भोजन करनेसे बहुत जलपीनेसे वेपम अन्न पिष्ट भारीपदार्थ खानेने दधि दूध अनूप संचारी जीवोंके मांस

॥
१२
नपुंसकामृतार्णवः ।
खानेसे अत्यंत कमजोरी से १२ वर्षसे कम उमरवाली स्त्रीगमनसे अयोनि
'गुदमैथुन वा हस्तमैथुन ) मैथुनसे। जिसकी बडे कडे वाल युक्त योनि हो
जो देरमें स्खलित हो रजस्वला, दुर्गंधयुक्त योनिवाली और जिसको गरमी
या सोमरोग हो अथवा प्रदर आदिसे दूषित गीली योनि हो ऐसी स्त्रिया-
से मैथुन करनेसे मूर्खतासे मैथुन करनेसे, अयवा चौपाये जानवरसे
मैथुन करनेसे, लिंगमें चोट लगने से लिंगको न धोनेसे अथवा छुरी आदि
शस्त्रके घावसे लकडीके लगनेसे और कामशास्त्रोक्त शक प्रयोगसे वीर्यके
नष्ट होनेसे ध्वजभंग (लिंगका सुस्त होकर गिरजाना ) होताहै॥४८-५३॥
श्वयथुर्वेदना मेढ़े रागश्चैवोपलक्ष्यते
रूफोटास्तीवाश्च जायते लिंगपाको भवत्यपि ॥५४॥
मांसवृद्धिर्भवेच्चापि त्रणाः क्षिप्रं भवत्यपि ॥
पुलकोदकसंकाशः सावः श्यावारुणप्रभः ॥१५॥
वलयीकुरुते वापि कठिनं च परिग्रहम् ॥
ज्वरस्तृष्णा भ्रमो मूर्छा छर्दिश्चास्योपजायते ॥६६॥
रक्तं कृष्णं स्रवेच्चापि नीलमाविललोहितम् ॥
अग्निनैव च दग्धस्य तीनो दाहः सवेदनः ॥१७॥
बस्तौ वृषणयोर्वापि सीवन्यां वंक्षणेषु च ॥
कदाचित्पिच्छिलो वापि पाण्डुस्रावश्च जायते ॥ ५८ ।।
श्वयथुश्च भवेन्मंदस्तिमितोल्पपरिस्रवः ॥
चिरात्स पाकं व्रजति शीघ्र वाथ प्रपद्यते ॥५९ ॥
जायते कृमयश्चापि क्लिद्यते पूतिगंधि च ॥
प्रशीर्यते मणिश्चास्य मेढ़मुकावथापि च ॥
ध्वजभंगकृतं क्लैब्यं कथितं शिप्यसत्तम ॥६० ॥

भाषाटीकासमेतः। १३ लिंगका सूज जाना उसमें पीडा होना लाल होजाना, घोर फोडे होवें लिंग पकजावे । लिंगमे मांसका बढना तत्काल घाव होना उनमेंसे काले लाल या घोवन के रंगका स्राव होना तथा लिंगमें गोल चूडीसी आटेसे कठोर जड़वाले होना उस मनुष्यको इस रोगसे पीडित होने के कारण ज्वर, तृपा, मूर्छा. वमन आदि विकार होवें लिगमेंसे लाल काला साव हो अग्निसे जलनेकीसी दाह हो, वस्ती, वृषण, सीवन, वंक्षण, इनमें दाहयुक्त दर्द होवे । कभी इनमेसे गाढ़ा पीला स्राव हो, कभी इन्हीं स्थानोंमें मन्द सूजन और थोड़ा स्राव हो, कभी देरमें कभी जल्दी पक जावे उसमें कृमि पड़जा सदैव गीला रहै और दुर्गन्ध आवे और सुपारी गलकर गिर जावे अथवा लिंग पोते दोनों गिर जावें । हे शिष्यसत्तम ! यह ध्वजभंगके महाउपद्रव हैं ॥ ५४-६० ॥ जरासंभवन के कारण और लक्षण । जघन्यमध्यप्रवरं वयस्त्रिविधसुच्यते ॥ अथ च प्रवरे शुक्र प्रायशः क्षीयते नृणाम् ॥६॥ रसादीनां संक्षयाच संक्षयाच्च तथैवावृष्यसेवनात् ॥ बलवणेंद्रियाणां च क्रमेणैव परिक्षयात् ॥ ६२ ।। परिक्षयादायुपश्चाप्यनाहाराच्छ्रमारकमात् जरासंभवजं कैब्यमित्येतैहेतुभिर्नृणाम् ॥६३ ॥ जायते तेन सोत्यर्थं क्षीणधातुः सुदुर्बलः॥ विवर्णो विह्वलो दीनः क्षिप्रं व्याधिमथाश्नुते ॥ ६४ ॥ बुढापेसे हुवे नपुंसकके यह लक्षण हैं । अवस्था तीन प्रकारकी है । अधम मध्यम उत्तम, सो वृद्ध अवस्थामें मनुष्योंका वीर्य क्षीण होता है उसका कारण यह है कि रसादिकोंका क्षय होनेसे विना वृष्यपदार्थाके सेवन किये मैथुन करनेसे क्रमसे वल वर्ण इंद्रियोंके क्षीण होनेसे भोजन न करनेसे परिश्रम करनेसे इन कारणोंसे बुढापेका नपुंसकत्व होता है । ॥ ॥

१४ नपुंसकामृतार्णवः । फिर उस बुढ़ापेमें मनुष्य अत्यंत क्षीण दुर्बल होजाता है देहका वर्ण पलट जाता है विह्वल और दीन होजाता है इसको रोग शीघ्रही घेरलेते हैं यह जरासंभव नपुंसकके लक्षण हैं ॥ ६१-६४ ॥ क्षयजन के लक्षण। अतिप्रचिंतनाच्चैव शोकात्क्रोधाद्भयादपि ॥ ईयोत्कंठात्तथोरेगात्समाविंशतिको नरः ॥ ६५ ॥ कृशो वा सेवते रूक्षमन्नपानमथौषधम् ॥ दुर्बलप्रकृतिश्चैव निराहारो भवेद्यदि ॥६६॥ अथाल्पभोजनाचापि हृदये यो व्यवस्थितः ॥ रसः प्रधानधातुर्हि क्षीयेताशु नरस्ततः ॥ ६७ ॥ रक्तादयश्च शीर्यते धातवस्तस्य देहिनः ॥ शुक्रावसानास्तेभ्यो हि शुक्र धाम परं मतम् ॥ ६८ ॥ चेतसो वातिहण व्यवायं सेवते तु यः॥ शुक्र तु क्षीयते तस्य ततः प्राप्नोति संक्षयम् ॥ ६९॥ वोरां व्याधिमवाप्नोति मरणं वा समृच्छति ॥ शुक्रं तस्मादिशेपेण रक्ष्यमारोग्यमिच्छता ॥ ७० अतिचिता, गोक, शोध, भय, ई, उत्कंठा, उद्वेग, इसके अत्यंत फरनेसे वीस वर्षका मनुष्य भी कृश होकर रूक्ष अन्न पान औपविका सेवन करे और दुर्वल होकर निराहार रहे अथवा बहुत थोड़ा भोजन करे तो गेमे करनेमे हृदयस्थ प्रधान धातु क्षीण होजाता है जिसमे यह मनुष्य शीघ्र श्रीण होकर मदिरसे वीर्य पर्यन मधातु जीप, जाने है । अयथा प्रपन्न चिनगे जो अन्धाधुन्दी अधिक मटन है उसका शुभ ना होजाता %3D भाषाटीकासमेतः। १५ है ऐसा होनेसे मनुष्य महाभयंकर व्याधि अथवा मृत्युको भी प्राप्त होताहै । इसलिये आरोग्यताकी इच्छावाले पुरुषको शुक्रकी अवश्य रक्षा करनी चाहिये ॥ ६५-७०॥ कुकर्मजआधुनिकनपुंसकता। एतनिदानलिंगाभ्यासुक्तं कैव्यं चतुर्विधम् ॥ समयेस्मिन्प्रमादाच मद्यवेश्याप्रभावतः ॥७१॥ ब्रह्मचर्यविहीनत्वादयोनिमैथुनात्तथा ॥ हतशुक्रहतोत्साहाः इतबुद्धिपराक्रमाः ॥ ७२॥ अप्रजाल्पप्रजा वा च म्लानध्वजयुताथ वै ॥ समर्था सनने चैवासमर्थाः पत्निरंजने ॥७३॥ हे पुत्र ! इस प्रकार निदान लक्षगसे चार प्रकारकी नपुंसकता यह कही है। परन्तु हे शिष्य ! इस समय अधिकतर प्रमादवश मद्य पीकर वेश्याग- मन करनेसे, छोटी उमरमें ब्रह्मचर्य के नष्ट होनेसे हस्तमैथुन तथा गुदमैथु- नसे मनुष्योके वीर्य और बुद्धि तथा पराक्रम यह सब नष्ट होजाते हैं फिर यातो इनके संतान होतीही नहीं या हो भी तो गर्भपात या छोटी उमरमें ही मृत्युको प्राप्त हो । और यह मनुष्य इंद्रियकी शिथिलताके सवव मनमें तो स्त्रीविषयका विचार करे परन्तु स्त्रीके समीप जाकर लज्जित होकर कुछ न करनके ॥७१-७३ ॥ अन्यमतसे नपुंसकनिदान । रूहानशाकाद्यशनाच्चकिचि- प्रभूतरूक्षाम्लनिषेवणाच ॥ बीजास्रजोर्वकृतिजन्यदोपा- दोजक्षयः पुंस्त्वविनाशहेतुः ॥७४॥ रीहार्वाहदसावीजः ओजस्तेजस्त्वसंकरः ।। जुद्धशनरिणां तात कांतिकामबलास्पदम् ॥ ७९ ॥ r । ३ १६ नपुंसकामृतार्णवः । रूक्ष अन्न और रूक्ष शाक आदिके सेवनसे तथा अत्यंत खार (निमक) खटाई आदिके खानेसे दोष कुपित होकर मनुष्यके वीर्य व रुधिरको बिगाड देते हैं जिससे इसका ओज (शरीरकी सत्ता) क्षीण होजाता है जब ओज क्षय हुवा तो पुरुषार्थ भी नष्ट हो जाता है । सो हे तात! उस पुरुषार्थके प्रधान कारण अन्यमतसे चार माने हैं जैसे १ रीह अर्थात् का- मोत्पादकवायु और २ अर्वा है अर्थात् चार प्रकारकी रूह, ३ दम अर्थात् रुधिर४ बीज अर्थात् वीर्य इन चारोंके ओजका शुद्ध तेज शुद्ध शगरीयोके कांति बल और कामका प्रकाशक है ॥७४-७५ ॥ बलोत्साहौ मनस्थैर्य वैशयं प्रतिभा धियः॥ वर्णप्रसादक्षुद्रद्धिदीपनं पुष्पधन्विनः ॥७६॥ ओजसः स्युश्चनरुज्यादोजोनिर्दोषताबलात् ॥ गुणा भवेयुः प्रागुक्ता दोषास्तन्नाशजाः स्मृताः॥७७॥ ओजःक्षीणावलं क्षीणं स्मरःक्षीणः सुखापहः ॥ रिरंसोरपि पुंसः स्याद्ध्वजपातश्चिरं पुनः ॥ ७८॥ यावनीयमतं तात माथुरेण प्रकाशितम् ॥ वाग्भेदस्यहि भेदोस्ति कथितं विस्तरात्पुरा ॥ ७९ ॥ बल उत्साह मनकी स्थिरता विशदपना बुद्धिका ( फैलना ) देहके वर्णका उत्तम होना क्षुधाका वढना कामदेवकी चैतन्यता यह ओजके गुणहैं और वलवान् होनेसे वल वाले होते हैं उस मोजके नाश होनेमे बल उत्साह आदिका नाश होताहै तब बल घटता है और वल घटनेसे कामेच्छा क्षीण होतीहै उस कामेच्छाके क्षीण होनेमे मैशुनम आनंद नहीं पाता इसी सवबसे मैथुन करतेवक्त इंद्रिय ढीली पट जाती है । हे पुत्र मथुरानिवासी चौवानीने युनानी ग्रंथोंसे निकालकर यह मन एक पुम्नकम लिखा है परंतु मैं तुमको पहले विस्तार पूर्वक मुना चुका हूं आयुर्वेदमेही -- भाषाटीकासमेतः। निकालकर किसी ने कुछ किसीने कुछ लिखा परंतु इस्मे तो केवल वाणी- काही भेदमात्र है यथार्थमें विस्तारसे आदि आयुर्वेदसे बढकर किसीने कुछ नहीं किया ॥ ७६-७९ ॥ सुश्रुतोक्त अन्य नपुंसक। मातृपितृजदोषैहिँ ये प्रोक्ता वै नपुंसकाः ॥ तानहं संप्रवक्ष्यामि शृणु विस्तरतस्तु तान् ॥८॥ माता पिताके दोषोंसे जो नपुंसक होते हैं अब मैं उनका विस्तारसे कथन करताहूं हे पुत्र ! सावधान होकर सुनो ॥ ८० ॥ पित्रोरत्यल्पवीर्यत्वादासेक्यपुरुषो भवेत् ॥ स शुक्र प्राश्य लभते ध्वजोच्छ्रायमसंशयन् ॥ ८१॥ यः पूतियोनौ जायेत स सौगंधिकसंज्ञकः ॥ स योनिशेफसो गंधमात्राय लभते बलम् ॥ ८२ ॥ स्वे गुदेब्रह्मचर्याद्यः स्त्रीषु पुंवत्प्रवर्तते ॥ कुंभिकः स तु विज्ञेय ईय॒कं शृणु चापरम् ॥ ८३॥ दृष्ट्वा व्यवायमन्येषां व्यवाये यः प्रवर्तते ॥ ईष्यकः स तु विज्ञेयो दृग्योनिरयमीरितः ॥ ८४ ॥ यो भार्यायामृतौ मोहादंगनेव प्रवर्तते ॥ तत्र स्त्रीचेष्टिताकारो जायते खंडसंज्ञकः ॥ ८५ ॥ ऋतौ पुरुषवद्वापि प्रवर्ततांगना यदि ॥ तत्र कन्या यदि भवेत्सा भवेन्नरचेष्टिता ॥ ८६॥ १ पिता के अत्यंत अल्यवीर्यसे जो गर्भ रहता है उससे मासेक्य नपुंसक पैदा होता है वह जब अन्यपुरुपके वीर्यको पीवे तो उसका लिंगो स्थान होताहै उसको मुखयोनी भी कहते हैं ।। ८१॥२ जो वालक दुर्गधित योनीसे प्रगट हुवा उसकी सौगंधिक संज्ञा है इसको लिंग व योनीके सूंघने

१८
नपुंसकामृतार्णवः।
से चैतन्यता होती है इसको नासायोनि भी कहते हैं ॥ ८२ ॥ ३ जो
मनुष्य स्वयं गुदभंजन करावे तब स्त्री गमनकी चैतन्यता हो इसको कुंभिक
और गुदयोनि भी कहते हैं ।। ८३ ॥ ४ दूसरेको मैथुन करते देखकर
फिर स्वयं मैथुनमें प्रवृत्त हो इसको ईय॑क और दृग्योनि भी कहतेहैं॥८॥
५ जो मनुष्य ऋतुसे शुद्ध स्त्रीसे स्त्रीवन्मैथुन करे अर्थात् आप नीचे हो
और स्त्री ऊपर पुरुषवत् हो यदि उस समय गर्भ रहजावे तो पुत्र हो तो स्त्री-
कीसी चेष्टावाला हो उसको खंड और कन्या हो तो पुरुषकी चेष्टावाली हो
इनको नारीषंढ कहते हैं ।। ८५ ॥ ८६ ।।
आसेक्यश्च सुगंधी च कुंभिकश्चयॆकस्तथा ।
सरेतसस्त्वमी ज्ञेया अशुक्रः पंढसंज्ञकः ॥ ८७॥
१ असेक्य २ सुगंधी ३ कुंभिक ४ ईर्ष्णक यह चार तो वीर्ययुक्त होते
हैं और षण्ढ नपुंसक वीर्यरहित होताहै ॥ ८७ ॥
अनया विप्रकृत्या तु तेषां शुक्रवहा शिरा ॥
हर्षात्स्फुटत्वमायाति ध्वजोड्रायस्ततो भवेत् ।। ८८॥
इस प्रकार इन आसेक्यादि नपुंसको की विरुद्ध चेष्टासे शुक्रवाही नस
हर्पसे फूल जाती है इसीसे उनको चैतन्यता होती है ।। ८८॥
नपुंसकोंमें साध्यासाध्यता ।
केचित्क्कैव्ये त्वसाध्ये द्वे ध्वजभंगशयोद्भवे ॥
वदंति शेफसच्छेदापणोत्पाटनेन वा ॥८९॥
कोई आचार्य ध्वजभंग और क्षयजको अमाध्य मानते हैं कोई कहतह
वीर्यवाही नसके कटनेसे तथा अंडकोशके न रहनेमे अमाध्य होतह ।।८।।
मातापित्रो/जदोपादशुभैश्च कृतात्मनः ॥
गर्भस्थस्य यदा दोपा प्राप्य रेतोवहाः शिराः॥ ९ ॥

६९ भाषाटीकासमेतः। शोषयंत्याशु तन्नाशाद्वेतश्चाप्युपहन्यते ॥ तत्र संपूर्णसर्वांगसभवत्यपुमान् पुमान् ॥ ९१ ॥ एतेत्वसाध्या व्याख्याता सन्निपातसमुच्छ्रयात् ॥ मातापिताके वीर्यदोपसे और अपने पूर्वजन्मके पापके प्रभावसे गर्भस्थ टोप वीर्यवाही नसोंमें प्राप्त होकर उन नसोंको सुखा देते हैं. तब उन नसांके क्षीण होनेसे इसका वीर्य भी मारा जाता है फिर उसगर्भसे जे वालक होता है वह सर्वाग सुन्दर होते हुवे भी नपुंसक होता है यह सब नपुंसकतीनों दोपों की आधिक्यतासे होते हैं इस लिये असाध्य.॥९०-९१॥ दूषित शुक्रके लक्षण । मिथ्याहारविहाराभ्यामयोनिभैथुनादिभिः ॥ वेगाघातात्क्षयाचापि धातूनां सप्तदूषणात् ॥ ९२॥ दोषाः पृथक् समस्ता वा प्राप्य रेतोवहाः शिराः॥ शुक्र संदूपयंत्याशु तद्वक्ष्यामि विभागशः ॥ ९३ अनुचित आहार और अनुचित विहार करनेसे अयोनि मैथुनादि खरा वियोंसे बड़े वेगसे भागनेसे चोटके लगनेसे धातुवोंकी क्षीणतासे तथा खरा से वात पित्त कफ कुपित होकर अलग २ अथवा मिलकर वीर्यवाह- नसोंग प्राप्त हो वीर्यको दूपित करते हैं सो उनका मैं अलग २ कथन करताई ॥ ९२-९३ ॥ दूषित शुक्रके भेद। फेनिलं तनु शुष्कं च विवर्ण पूति पिच्छिलम् ॥ अन्यधातूपसंसृष्टमवसादि तथाष्टमम् ॥ ९४ ॥ झागदार. थोडा शुष्क, विवर्ण, दुर्गवित, पिच्छिल, रसरक्तादिनन्य वातरक्त. और वीर्यके गुणोंसे रहित यह दूपित शुक्रक आठ भेद हैं।९४॥

नपुंसकामृतार्णवः।
वातदूषित।
वातेन फेनिलं शुक्रं कृच्छ्रेणापिच्छिलं तनु ॥
भवत्युपहते शुक्र न तद्गर्भाय कल्पते ॥ ९५ ॥
झागदार, सुखाहुवा कठिनतासे निकले, ल्हेसदार और थोडा ऐसा वीर्य
वायुसे दूपित होता है इससे गर्भ नहीं होता ॥ ९५॥
पित्तदूषित ।
सनीलमथवा पीतमत्युष्णं पूतिगंधि च ॥
दाहलिंगं विनिर्याति शुक्र पित्तेन दूषितम् ॥ ९६॥
नीला, पीला, अत्यन्त गरम,सड़ीहुई दुर्गंधियुक्त, निकलते वस्त्त लिगम
दाह हो ऐसा शुक्र पित्तदूषित होता है ।। ९६ ॥
कफदृषित।
श्लेष्मणा बद्धमार्ग तु भवत्यत्यर्थपिच्छिलम् ॥ ९७ ॥
कफसे दूषित हो तो अत्यंत गाढा कतलेदार होता है ॥ ९७ ॥
रुधिरयुक्त वीर्य निकलनेके कारण।
स्त्रियामत्यर्थगमनादभीघातात्क्षयादपि ॥
शुक्र प्रवर्तते जंतोः प्रायेण रुधिरान्वितम् ॥ ९८ ॥
अत्यंत स्त्रीगमनसे, चोट लगनेसे, अत्यन्त क्षीणतासे, और वीर्यके क्षय
होनेसे मनुष्यका वीर्य रुधिरयुक्त निकलता है ॥ ९८ ॥
वीर्य क्षय होनेके लक्षण ।
शुक्रक्षये मेढ़वृपणवेदनाऽशक्तिमथुने चिराद्रा प्रसेकः
प्रसेके चाल्परक्तशुक्रदर्शनं च ॥ ९९ ॥
शुक्र क्षीण होनेसे लिंग और वृपणाम वेदना, स्त्रीगमन अशक्ति, कभी
देरसे वीर्यपात होना,पात होनेमें कुछ रक्तता लिये और थोडा होना॥९॥

भापाटीकासमेतः। २१ असाध्यांसाध्य । तेषु कुणपग्रंथिपूतिपूयक्षीणरेतसः कृच्छ्रसाध्याः॥ मूत्रपुरीपरेतसस्त्वसाध्याःशेषाःसाध्या इति ॥१०॥ इनमें मुर्देकी गन्धवाला, और ग्रंथियुक्त दुर्गन्ध और राधसदृश और क्षीणवीर्य कष्टसाध्य है । मूत्रपुरीपयुक्त असाध्य है बाकी सव साध्य ह ॥ १०॥ शुद्धशुक्रके लक्षण । स्फटिकाभं द्रव स्निग्धं मधुरं मधुगंधि च ॥ शुक्रमिच्छंति केचित्तु तैलक्षौद्रनिभं तथा ॥१०१ ॥ जो वीर्य सफेद हो । पतला, चिकना, मीठा हो, तथा मधुकीसी गन्ध- युक्त हो तो शुद्ध वीर्य जानना । कई आचार्य तैल अथवा सहदकी समान वीर्य शुद्ध होता है ऐसा मानते हैं । १०१ ॥ तरंगकी समाप्तिः। अतोधिको यदस्ति चेद्वाक्यभेदं विजानीहि ॥ सामान्यतस्तरंगेऽस्मिन् यथावर्णितं मया ॥ १०२॥ इससे अधिक नपुंसकांके निदान के विषयमें यदि कहीं कुछ कहा है वह केरल वाक्यभेदही है और सूक्ष्म रथूल गतिसे जैसा होना चाहिये वैसा हम प्रथम तरंगम वर्णन करदिया है इसको हे शिष्य ! तुम यथोचित समझ लेवो ॥ १०२ ॥ इति श्रीवैय ५० रामप्रसादप्रणीतनपुसकामृतार्णवे नपुसकनि- दानवर्णनो नाम प्रथमस्तरगः ॥ १ ॥ - २२ नपुंसकामृतार्णवः । अथ द्वितीयस्तरङ्गः। शिष्य उवाच। . अथ क्लैब्य चिकित्सां च वाजीकरणमेव च ॥ शुक्रशुद्धकरं चैव विधानं कृपया वद ॥१॥ इस प्रकार नपुंसकांका निदान सुननेके अनंतर शिष्य बोले, हे नाथ ! अब कृपा करके वीर्यके शुद्ध करनेकी विधि और नपुंसकोकी चिकित्सा तथा वाजीकरण विधिको कथन कीजिये ॥ १॥ गुरुरुवाच । श्रूयतां विधिना तात शुक्रशोधकरं विधिम् ॥ तेष्वाद्याशुक्रदोषांस्त्रीन्स्नेहस्वेदादिभिर्जयेत् ॥ २॥ क्रियाविशेषैर्मतिमांस्तथा चोत्तरवस्तिभिः ॥ गुरुबोले हे तात! वीर्यके शुद्ध करनेकी विधि सुनो-पहले जो दुष्टवीयोंका वर्णन कर आए हैं उनमें वायुसे दूपित वीर्यम नेहपान और स्वेदन आदि करावे, ॥ २॥ पित्तदूपितमें विरेचन करावे और कफदूषितम यमन और विरेचन दोनी करावे तथा उत्तर वस्ति आदि कगवे ॥ पाययेत्तं नरं सपिर्भिपक कुणपरेतसि ॥३॥ धातकीपुष्पखदिरदाडिमार्जुनसाधितम् ॥ पाययेदथवा सर्पिः सालसारादिसाधितम् ॥ ४ ॥ ग्रंथिभूते शठीसिद्धं पालाश वापि भस्मनि ॥ परुपकवादिभ्यां पूयप्रख्ये तु साधितम् ॥ ५ ॥ विद्प्रभे पाययेत्सिद्ध चित्रकोशीरहिंगुभिः ॥ वाजीकरणविधि तात कर्तव्यं क्षीणरेतसि ॥ ६॥ ॥

भाषाटीकासमेतः। २३ जिसके वीर्यमे मुर्देकीसी गंध होवे उसको धावेके फूल, दाडिम, अर्जुन वृक्षकी छाल, इनसे सिद्ध किया घृत पिलावे अथवा सालसारादिगणसे सिद्ध घृत पिलावे ॥३॥४॥ जो ग्रंथियुक्त वीर्य हो तो कचूरसे सिद्ध किया घृत पिलावे अथवा पलासकी भस्मसे सिद्ध किया घृत पिलावे जिसका वीर्य राध सहश हो उसको फालसे और वटादिगणसे सिद्धकिया घृत पिलावे ॥ ५ ॥ जिसके वीर्यमें विष्ठाकी गंध हो उसको चित्रक खस और हींगसे सिद्ध किया घृत पिलावे और क्षीणवीर्यवालेको वाजीकरण औष- धियांका सेवन करावे ॥६॥ नपुंसकोंकी चिकित्सा। अथ चिकित्सितं वक्ष्ये क्लीबानां हितकाम्यया ॥ क्लैब्यानामिह साध्यानां कार्यों हेतुविपर्ययः ॥७॥ इसके उपरांत गुरुवोले अब हम नपुंसकोके कल्याणके लिये चिकित्सा का कथन करते हैं जो साध्य नपुंसक हैं उनकी नपुंसकताके कारणसे उलटा कर्म करे ॥७॥ सामान्यचिकित्सा। मुख्यं चिकित्सितं यस्मानिदानपरिवर्जनम् ॥ क्लैव्योपशांतये कुर्यात्क्षीणक्षतहितं च यत् ॥ ८॥ वस्तयः क्षीरसपीषि वृष्ययोगाश्च ये मताः ॥ रसायनप्रयोगाश्च सर्वानेतान्प्रयोजयेत् ॥ ९॥ समीक्ष्य देहदोपानिवलभेषजकालवित् ॥ व्यपैति हेतुजं क्कैव्यं यत्स्याद्धेतुविपर्ययात् ॥ १० ॥ मुख्य चिकित्सा यह है कि जिसकारणसे रोग हुवा हो उसको त्यागदेवे फिर जो नुकसान पंहुच चुका हो उसका यत्न करे नपुंसकताकी शांतिके वास्ते जोशीणातमें हितकारी औषधि हो उसको उपयोग करे और वस्तिकर्म वो तथा दूध. घी. पुष्टिकारक पदार्थ,और रसायन इनका उपयोग करे ।

२४
नपुंसकामृतार्णवः ।
और जो नपुंसकताके कारणको नष्ट करनेवाले उपयोग हों उनको औषधी
और कालके जाननेवाला वैद्य देहदोष, और अनिका बलाबल देखकर
करे ॥ ८-१० ॥
विशेषचिकित्सा और बीजोपघातकी चिकित्सा।
सुस्विन्नस्निग्धगात्रस्य स्नेहयुक्तं विरेचनम् ॥
प्रदद्यान्मतिमान् वैद्यस्ततस्तमनुवासयेत् ॥११॥
पलाशैरंडमुस्तायैः पश्चादास्थापयेत्ततः
वाजीकरणयोगाश्च योज्या बीजोपघातजे ॥ १२ ॥
प्रथम स्वेदनकराके स्नेहयुक्त विरेचन करावे फिर, पलास, एरंड, मोथा,
इनके क्वाथोंसे अनुवासन अस्थापन, कराकर वाजीकरण योग सेवन कगवे
तो बीजोपघातज नपुंसक अच्छा हो जाता है ॥ ११-१२ ॥
ध्वजभंगका यत्न ।
ध्वजभंगकृतं कैब्यं ज्ञात्वा तस्याचरेक्रियाम् ॥
प्रदेहान्पारिषेकांश्च कुर्याद्वा रक्तमोक्षणम् ॥१३॥
स्नेहपानं च कुर्वीत सस्नेहं वा विशोधनम् ।।
ततोनुवासनं कुर्यादथवा स्थापनं पुनः ॥ १४ ॥
वणवच्च क्रियाः सर्वास्तत्र कुर्याद्विचक्षणः ॥
ध्वजभंगका पहले निदान द्वारा निश्चय करके फिर चिकित्सा करे लेप
सेचन अथवा नसवेधन करके रुधिर निकाले अथवा घृततेलादि
ह' न करावे या स्नेह युक्त विरेचन करावे । फिर अनुवासनवस्ति
आस्थापनवस्ति कर्म करे ॥ १३ ॥ १४ ॥ तथा इस ध्वजभंग
पुंसककी व्रणके समान विग्लापन पाटन गेपणादि क्रिया क्रमपूर्वक करे ।।
जरासंभव और क्षयजकी चिकित्सा ।
जरासंभवजे कैव्ये क्षयजे चैव कारयेत् ॥१५॥
स्नेहस्वेदोपपत्रस्य सस्नेह शोधनं हितम् ॥
क्षीरसर्पिवृष्ययोगाः वस्तयश्चैव यापनाः ॥१६॥

भाषाटीकासमेतः।
२५
रसायनप्रयोगाश्च तयोर्भेषजमुच्यते ॥
इति विशेषतो ज्ञात्वा वाजीकरणमपिशृणु ॥ १७॥
वृद्ध अवस्थाके कारण जो नपुंसक हो अथवा क्षयज नपुंसक हो उनको
स्नेहन स्वेदन करके स्नेहयुक्त शोधन करे फिर दूध, घी, वाजीकरणयोग,
और यापन वस्ती तथा रसायन पदार्थाका सेवन करावे । इस प्रकार
नपुंसकोंकी चिकित्सा क्रमको समझो और हे तात । अव वाजीकरण-
योगांको सुनो ॥ १५-१७ ॥
अथ वाजीकरणम् ।
येन नारीषु सामर्थ्य वाजिवल्लभते नरः॥
बजेच्चाप्यधिकं येन वाजीकरणमेव तत् ॥१८॥
यद्रव्यं पुरुषं कुर्याद्राजीव सुरतक्षयम् ॥
तद्वाजीकरणं ख्यातं सुनिभिषिजां वरैः ॥ १९ ॥
जिसप्रयोगसे मनुष्य घोडेकी सदृश और वारवार स्त्रियोंसे रमणकरसके
उसको वाजीकरणकहते हैं ॥ १८ ॥ अथवा जो द्रव्य पुरुषको घोडेकी
महा मैथुन शक्तीवाला वनादे उसको वाजीकरण कहते हैं ॥ १९ ॥
वाजीनामप्रकाशत्वात्तच मैथुनसंज्ञकम् ॥
वाजीकरणसंज्ञाभिः पुंस्त्वमेव प्रचक्षते ॥२०॥
वाजी अर्थात् घोडेका यहां प्रकाश न होनेसे वाजी शब्द मैथुन संज्ञक है
चस जो पदार्थ मैथुनशक्तिको चढावे वह वाजीकरण है अथवा वाजी
नाम प्रकाशक होनेसे मैथुनसंज्ञकहै इस लिये कामशक्तिके वर्द्धक पदार्थ
को वाजीकरण कहते हैं ॥ २० ॥
विविध वाजीकरण ।
शुक्रस्रुतिकरं किंचित् किंचिच्छुकविवर्द्धनम् ॥
तिवृद्धिकरं किंचित् त्रिविधं वृष्यमुच्यते ॥ २१ ॥

नपुंसकामृतार्णवः । वीर्यके निकालनेवाली, और वीर्यके बढानेवाली, तथा वीर्यक निकालने और वढानेवाली इस प्रकार वृष्य ( वाजीकरण ) तीन प्रकारका है ॥२१॥ नरो वाजीकरान्योगान्सम्यकशुद्धो निरामयः॥ सप्तत्यंत प्रकुर्वीत वर्षादूर्ध्वं तु पोडशात् ॥२२॥ नचैव पोडशादाक् सप्तत्या परतो न च ॥ आयुष्कामो नरः स्त्रीभिः संयोगं कर्तुमर्हति ॥ २३॥ क्षयवृद्धयुपदंशाया रोगाश्चातीवदुर्जयाः अकालमरणं च स्याङ्जतः स्त्रियमन्यथा ॥२४॥ मनुष्यको चाहिये कि पहले भले प्रकार वमन विरेचनसे शुद्धदेह होकर सोलह १६ वर्षकी अवस्थासे ऊपर ७० सत्तर वर्षकी अवस्था पर्यन्त वाजी- रण औषधियोंका सेवन करे । आयुकी कामनावाले मनुष्यको १६ वर्षकी अवस्थासे कम और ७० सत्तरसे ऊपर स्त्रीसंग न करना चाहिये जो इस कथनानुसार नही चलते उनको क्षय,अंडवृद्धि,उपदंश, प्रमेह आदि वडेदर्जय घोररोग होजाते हैं बल्कि अकालमृत्युको भी प्राप्त होतेहैं ॥ २२-२४॥ विलासिनामर्थवतां रूपयौवनशालिनाम् ॥ नराणां बहुभार्याणां विधिर्वाजीकरो हितः ॥ २५ ॥ स्थविराणां रिरंसूनां स्त्रीणां वाल्लभ्यमिच्छताम् ॥ योपित्प्रसंगाक्षीणानां क्लीवानामल्परेतसाम् ॥ २६॥ हिता वाजीकरा योगा प्रीत्यपत्यवलपदाः॥ एतेऽपि पुष्टदेहानां सेव्याः कालाअपेक्षया ॥२७॥ विलासी, धन रूप योवनवाला, जिसके अनक बी हो, जो बुढा गये हो परंतु स्त्रीरमणकी इच्छा रखते हो, जो वियोग मेह रखते हो जो स्त्रीरमणसे क्षीण होगये हो,जो नपुंसक तथा अल्पपीहा टतने पुरुपाको - २७ भाषाटीकासमेतः। वाजीकरण योग हितकारी, और स्त्रियोंम प्रीतिक देनेवाले तथा संतान और वलके देनेवाले होते है तथा स्वस्थ हष्टपुष्ट मनुष्योंको भी अपने वीर्यकी रक्षाके लिये वाजीकरण पदार्थोंका समयानुसार सेवन करना चाहिये ॥ २५-२७॥ बुटापेके कारण। पंथाः शीतं कदन्नं च वयोवृद्धाश्च योषितः॥ मनसः प्रातिकूल्यं व जरायाः पंच हेतवः ॥२८॥ बहुत रास्ता चलनेसे अत्यंत शीत सहनेसे, सडावुसा अन्न खानेसे. वृद्धास्त्रीसे गमन करनेसे, मलमे सदैव शोक रहनेसे, इन पांच कारणासे मनुप्यको शीघ्र बुढापा आता है ॥ २८॥ वाजीकरण पदार्थ । भोजनानि विचित्राणि पानानि विविधानि च ॥ वाक् श्रवणाभिरामा च त्वचः स्पर्शसुखावहाः ॥२९॥ यामिनी सेन्दुतिलका कामिनी नवयौवना ॥ गीतं श्रोत्रमनोहारि ताम्बूलं मदिरा स्रजः ॥३०॥ गंधा मनोज्ञा रूपाणि चित्राण्युपवनानि च ॥ मनसश्चाप्रतीवातो वाजीकुर्वन्ति मानवम् ॥३१॥ विचित्र भोजन अनेक उत्तम दूध शर्वत आसव आदि पीने के पदार्थ, जो मुनने प्यारे प्रतीत हो ऐसे वचन, देहको सुख कारक सुदर नरमवस्त्र आभूषण पूर्णचंद्रमाने शोभायमान रात्री, सर्वांगसुंदर नवयौवना स्त्री, कानी और मनको हरनेवाले सुंदर गीत, पानका वीडा, मद्य, फूलमाला, सुन्दर लगन्ध मनको हग्नेवाला मुंदर रूप मुदर विचित्र वाग बगीचे, मनकी इच्छापूर्वक रहना अर्थात् जिसमे मनको दुःख न हो, ये सब बाजी- कर्ता कामको बढाने वाले ) पदार्थ है ।। २९-३१॥

नपुंसकामृतार्णवः ।
1
.
शतावरीवृतम् ।
घृतं शतावरीगर्भ क्षीरे दशगुणे पचेत् ॥
शर्करापिप्पलीक्षौद्रयुक्तं तदृष्यमुच्यते ॥३२॥
१सेर गोघृत लेकर उसमे दश१० सेर सतावरका स्वरस,और दश१०
सेर गौका दूध मिलाके पकावे फिर १० तोला पीपल,१० तोला शहद, २०
तोला खांड, इन सबको मिलाकर इस घृतको दोतोला नित्य खाकर दूध
पीवे तो वीर्यको बढावे और पुष्ट करे ॥ ३२ ॥
लघुवाजीसर्पिः।
कल्केन वाजीगंधाया विपचेद् घृतमुत्तमम् ॥
चतुर्गुणमजाक्षीरं दत्त्वोद्धृत्याथ शीलिते ॥
सितां समां प्रदायाबादलपुष्टिविवृद्धये ॥३३॥
१ सेर उत्तम गोघृत, असगंधका कल्क १ सेर, बकरीका दृध ४ सेर
इन सबको मिलाके घृत सिद्ध कर लेवे इसमें बराबरकी मिसरी मिलाकर
नित्य सेवन करे तो वल और वीर्यको बढावे ॥ ३३ ॥
गोधूमादिवृतम्।
गोहपाश्च पलशतं निवाथ्य सलिलाढके ॥
पादावशेपे पूते च द्रव्याणीमानि दापयेत् ॥ ३४ ॥
गोधूमं मुंजातफलं सापद्राक्षापरूपकम् ॥
काकोली क्षीरकाकोली जीवंती सशतावरी ॥३५॥
अश्वगंधा सखर्जरं मधुकं यूपणं पिता ॥
भल्लातकमात्मगुप्ता समभागानि कारयेत ॥३६॥
घृतप्रस्थं पचेदेकं श्रीरं दत्त्वा चतुर्गुणम ॥
मृदग्निना च संमिद्धे व्याप्येतानि निक्षिपेत् ॥ ३७॥

२९ भाषाटीकासमेतः। त्वगेला पिप्पली धान्यकर्पूरं नागकेशरम् ॥ यथालाभं विनिक्षिप्य सिताक्षौद्रपलाष्टकम् ॥३८॥ दुग्धेक्षुदंडेनालोड्य विधिवद्विनियोजयेत् ॥ शाल्योदनेन मुंजीत पिबन्मासरसेन वा ॥३९॥ केवलस्य पिबेदस्य पलमात्रप्रमाणतः ॥ न तस्य लिंगशैथिल्यं न च शुक्रक्षयं व्रजेत् ॥४०॥ बल्यं परं वातहरं शुक्रसंजननं परम् ॥ मूत्रकृच्छ्रप्रशमनं वृद्धानां चापि शस्यते ॥४१॥ पलद्वयं तदश्नीयादशरात्रमतंद्रितः ॥ ४२ ॥ रमते दशरामाभिः पीत्वा चावपिबेत्पयः॥ अश्विभ्यां निर्मितं चैतद्गोधूमायं रसायनम् ॥ ४३ ॥ जलद्रोणे तु गोधूमकाथे तच्छेपमाढकम् ॥ मुंजातकस्य स्थाने तु तद्गुणं तालसुस्तकम् ॥४४॥ कल्कद्रव्यसमं मानं त्वगादेः साहचर्यतः॥ ४५ ॥ सफेद गेहूका सत्त्व ५सेर लेकर बीससेर जलमें पकावे जव ५ सेर वाकी रहे तो इसको छान लेवे फिर आगे लिखी औपधियोंको कूटकर मिलावे। सफेद गेहूं मुंजातकफल, उड़द, दाख, फालसे, काकोली, क्षीरकाकोली जीवंती. शतावरी, असगंध, छुहारे, मुलठी, सांठ, मिर्च, पीपल, मिसरी, मिलावे, कोरके वीज, प्रत्येक ६ मासे, गौका घी १ सेर, दूध चारसेर, इनको घृतपाकविधि मन्द आंचमे पकावे और दालचीनी, इलायची, पीपल धनियां, भीमसेनीकपूर प्रत्येक ६ मासे वारीक पीसकर पकते २ में डाल देवे सिद्ध होनेपर छान लेवे और इसम, ३२ तोला सहद, और ३२ तोला मिसरी मिलावे फिर इसको ईखके डंडेसे मथकर दृधर्मे मिलाके पीवे, ३० नपुंसकामृतार्णवः । अथवा साली चावलोंके भातसे खाय, या मांसरससे पीवे, इसको दो तोला से ८ तोलातक बलके अनुसार खावे यदि यह अकेला पीना हो तो इसकी ४ तोलाकी मात्रा है । इसके सेवनसे लिंगमें शिथिलता नहीं होती, वीर्यक्षीणताको प्राप्त नहीं होता, यह बलको बढाताहै, वातरोगीको शांत करता है, वीर्यको पैदाकर मूत्र कृच्छ्रको दूर करे, बूढे पुरुपाके लिये परमोपयोगी है । दशरात्रि दूधके साथ सेवन करनेसे दर्श स्त्रियोंसे गमन करे, यह गोधूमादि रसायन अश्विनीकुमारने कहा है ॥ ३४-४५ ॥ वानरी गुटिका। बीजानि हि कपिकच्छो कुडवमितानि तु स्वेदयेच्छनकैः प्रस्थे गोभवदुग्धे दुग्धं यावद्भवेद्गाढम् ॥ ४६॥ त्वग्रहितानि च कृत्वा सूक्ष्म संपेषयेत्तानि ॥ पिष्टिकायाश्च वटिकाः कृत्वा गव्ये पचेदाज्ये ॥४७॥ द्विगुणितशर्करया ता वटिकाः सपक्कया लेप्या ॥ बटिका माक्षिकमध्ये मननयोगेऽखिलाःस्थाप्याः॥४८॥ पंचटंकमितास्तास्तु प्रातः सायं च भक्षयेत् ॥ अनेन शीघ्रद्रावीयो यश्च स्यात्पतितो ध्वजः ॥ १९॥ सोपि प्राप्नोति सुरते सामर्थ्यमतिवाजिवत् ।। नानेन सदृशे किंचिद्रव्यं वाजीकरं परम् ॥५०॥ एक पाव कीचके वीज लेकर १ सेर दूधम पकावे, जब दूध गाढा हो. जावे तव उतारकर वीजाका छिलका दूर करके उन वीजाकी पार्टी पीम लें। फिर इम पीठीकी एक २ तोलाकी टिकिया बनाकर गौतम पका लये फिर आधसेर खांडकी चायनी करके इन टिकियों पर बालूशाहीकी भाति चढादेवे, फिर इनको शहदम छा देवे इनममे नित्य १० मागे खाकर ऊपरसे गर्म दूध पीवे इसीतरह प्रातः और मायंकाल दाना यात

भाषाटीकासमेतः।
३१
खावे इसके प्रभावसे जिसका वीर्य शीघ्र निकल जाता और इंद्रिय शिथिल
हो उसके सब विकार दूर होनेसे घोडेकी समान मैथुन करै इससे बढकर
दूसरा वाजीकरण योग कोई नहीं है ॥ ४६-५० ॥
वाजीकरण शकुली।
तिलाश्वगंधाकपिकच्छुसूलैर्विदारिका यष्टिकपिष्टयोगः ॥
आजेन पिष्टः पयसा घृतेन पक्का स्वेच्छष्कुलिकाऽतिवृष्या।
काले तिल,असगंध,कौंचके वीज,विदारीकंद, मुलहठी,इन सबको समान
भाग लेकर कपडछान करके, बकरी के दूधमें गूंधकर पूडी बनाकर बकरी
के घीमे पका लेवे इनको मिसरी मिले दूधके संग खावे इनके खानेसे
वार्य पुष्ट हो शरीरम वल आवे ॥५१॥
पायसा
गवां विरूढवत्सानां सिद्धं पयसि पायसम् ॥
तथा गोधूमचूर्णं च सितामधुघृतान्वितम् ॥
भुक्त्वा हृष्यति जीर्णोपि किं पुनर्यदि यौवने ॥५२॥
जिसका बछडा वटाहो उस गौके दूध कनकका दलिया डालकर खीर
नाये फिर इस वीरम घृत सहद मिसरी मिलाके खावे तो बूढा भी
कामकी इच्छा करनेलगे और युवा अवस्थावाले कर तो आश्चर्य ही
या है ।। ५२ ॥
सिनादिवृष्य योग।
शर्करायास्तुलेका स्यादेका गव्यस्य सर्पिपः ॥
प्रस्थं विदार्याश्रूर्णस्य पिप्पल्या प्रस्थ एव च ॥ ५३॥
अर्धाढकं तुगाशीर्याः सौद्रस्याभिनवस्य च ॥
तत्सर्व मिश्रिनं तिष्टेन्मात्तिके वृतभाजने ॥ १४ ॥

३२ नपुंसकामृतार्णवः । मात्रामग्निसमां तस्य प्रातःकाले प्रयोजयेत् ॥ एष वृष्यः परो योगः कंब्यो बृहण एव च ॥५६॥ मिसरी ४०० तोले, गौका शुद्ध घी, ६४ तोले, विदारी कंद ६४ तोले, पिप्पलीका चूर्ण १२८ तोले, उत्तम सहत १२८ तोले, इन सबको मिला. कर उत्तम चिकने मट्टीके वर्तनम रक्खे,फिर जठराग्निका बलावल विचारकर नित्य प्रातःकाल भक्षण करै । यह योग परमवृष्य (वीर्यवर्द्धक) कंठशोध. क और सब रसादिधातुवोंको बढानेवाला है ।। ५३-५५ ॥ योग्य दूध। . गृष्टीनां वृद्धवत्सानां माषपर्णभृतां गवाम् ॥ यत्क्षीरं तत्प्रशंसति बलकामेषु जंतुषु ॥ १६॥ पहलौन व्याई गौ, जिसका बछडा बडा होगया हो और उडदोंके पत्ते चरती हो उस गौका दूध बल और वीर्यके वढानेमें परमोपयोगी होता है॥५६॥ रसाला। अ ढकं च शुचिपर्युपितस्य दधनः खंडस्य षोडशपलानि शशिप्रभस्य ।। सर्पिः पलं मधुपलं मारचाईकप सुंठ्यास्तथाईपलमईपलं चतुर्णाम् ॥ १७ ॥ शुक्ले पटे वरवधूमृदुपाणिष्टा कर्पूरगंधसुरभिनवभांडसंस्था । एपा वृकोदरकृता सुरसा रसाला या स्वादिता भगवता मधुसूदनेन ॥५८॥ गाढा मीठा मलाईदार दही २ सेर, सफेद वरा १ सेर, घी गांका, छटांक, सहत १ छटांक, काली मिग्च ६ मामे, इलायची, दालचीनी, भाषाटीकासमेतः। ३३ नागकेशर, छः छः मासे इनको बारीक करके दहीमे डालकर फिर स्वच्छ सफेद बारीकवस्त्रमें स्त्री नरमहाथसे छाने फिर इसको भीमसेनी कपूरकी गंधसे सुवासितकर मट्टीके नये पात्रमें रक्खे। यह भीमसेनका बनाया रसाला भगवान् मधुसूदनने भोग लगाया है। यह परम वृष्य है ॥ ५७-५८ ॥ अश्वगंधादिघृत। अश्वगंधा प्रस्थमेकं दुग्वं चैवाढकद्वयम् ॥ घृतप्रस्थमितं दद्याञ्छनैर्मदग्निना पचेत् ॥ ५९॥ त्रिकटुकं चतुर्जातं विडंगं जातिपत्रकम् ॥ बला चातिबला चैव श्वदंष्ट्रावृद्धदारुकम् ॥ ६॥ पलैकञ्च प्रदातव्यं लोह वंगं तथाभ्रकम् ॥ प्रस्थाई माक्षिकं दद्यात्प्रस्थार्धा शर्करा शुभा ॥ ६॥ सर्वमेतदिनिक्षिप्य स्निग्धे भांडे निधापयेत् ।। द्वौ काली भायेन्नित्यं समीक्ष्यामिबलं यथा ॥६२।। अर्थ वातं हनुस्तंभ संधिवातं कटिग्रहम् ॥ गर्भप्रसवजान्दोपाञ्छक्रदोषांस्तथैव च ॥६३॥ सर्ववातानिहन्त्येतद्यथोन्मत्तगजं हरिः ॥ अश्वगंधादिविख्यातं घृतं वाजीकरं परम् ॥६४ ॥ मगन्ध १ सेर दूध ८ सेर शुद्ध गोघृत १ सेर, इनको मन्द अनिसे धीरे २ पकाये और जब घृत पाकपर आवे तब इसमें सोंठ, मिरच,पीपल, चतुर्भात वायविडंग. जवत्री, वला अतिवला, गोखरु, विधारा इन प्रत्ये- उवा चूर्ण चार चार तोला लोभस्म, वंगभस्म, अभ्रकमस्म प्रत्येक४तोला, नद ३२ तोला. उत्तम मिसरी ३२ तोला, इन सबको डालकर घृतको उतारत्वे पिर विश्ने वर्तनमें भरकर रखदेवे और अग्निका वलाऽवल विवा- दोनों समय नममे भक्षण करे इसके सेवन से, अर्दित वात, हनुस्तम्भ, च॥ ३४ नपुंसकामृतार्णवः। संधिगतवायु, कटिग्रह ( कमरका दर्द ) यह सब दूर हों और गर्भसम्बन्धी रोग तथा प्रसवके रोग, वीर्यके सब विकार, सब किस्मके वातरोग, इन सवको ऐसे जीतलेता है जैसे सिंह मतवाले हाथीको भगादेता है यह अश्व- मन्धादिघृत परमवाजीकरण है ॥ ५९-६४ ॥ माषादिवृत। माषाणामात्मगुप्तानी बीजानामाढकत्रयम् ॥ जीवकर्षभको मेदे वीरावृद्धी वीरावृद्धी शतावरी ॥६५॥ मधुकं चाश्वगंधा च साधयेत्कुडवोन्मितम् ॥ तमेवास्मिन्घृतप्रस्थे द्रव्यादशगुणं द्रव्यादशगुणं पयः॥६६॥ विदारिणो दशप्रस्थं प्रस्थमिक्षुरकस्य दत्त्वा मृदमिना साध्यं सिद्धं सपिनिधापयेत् ॥६७॥ शर्करायास्तु गोक्षीयाः क्षौद्रस्य च पृथक् पृथक् ।। भागांश्चतुष्पलांश्चात्र पिप्पल्याश्च द्वयं पलम् ॥ ६८॥ बलपूर्वमतो लीड्वा ततोत्रमुपयोजयेत् ॥ यदीच्छेदक्षयं शुक्र शेफसश्चोत्तमं बलम् ॥ ६९ ॥ काँचके वीज ४ सेर, उड़द ४ सेर, जीवक, ऋपभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, ऋद्धी, वृद्धी, शतावर, मुलहटी, असगन्ध प्रत्येक १६ तोले लेकर आठगुने पानीम पकावे और जब पकने २ चौथाई रहे तब उतारकर छान लेवे । फिर इसमें घृत १ सेर, दृध १० सेर, विदारीकंटका स्वरस १० सेर, डालकर पकावे जव पकने २ वृतमात्र शेष रहे तो इसम मिसरी, वंशलोचन, सहद, प्रत्येक मोलह १६ तोले, पीपलका चूर्ण टनोले, मिलाकर चिकने पात्रम ग्खदेवे इसममे अग्निके बलानुमार खाकर ऊपरंग मूंग चावल घृत यह इच्छापूर्वक खावे इसके प्रभावसे वीर्य कभी क्षय नहीं होता । और लिंगम अपूर्व ताकत आजाती है ॥ ६५-६॥

भाषाटीकासमेतः। ३५ . महासुगंधितैलम् । कर्पूरागरुचोचपत्रनलिकालाक्षासटीधातुकी पुष्पैः सप्तदलैलवालुसरलैः शैलेयमांसीप्लवैः ॥ एलाकुंकुमरोचनादमनकैः श्रीवासजातीफलैः कंकोलक्रमकोचटामदमुराकांतालवंगामयैः ॥७० ॥ वालोशीरहरेणुकामलयजस्थौणेयचंडानखै- र्जातीकोशकुलीरपद्मकनतैः स्पृक्कान्वितैः पालिकैः ।। लाझायोजनबल्लिलोध्रसलिलैस्तैलं विपाच्याढकं तैलाभ्यक्ततनु रन्नपि भवेत्स्त्रीणां परं वल्लभः ॥ ७१ ॥ शुक्राख्यो द्युतिमाननल्पतनयः षण्डोपि रत्युत्सुको बंध्या गर्भवती भवेदपि तथा वृद्धापि सूते सुतम् ॥ कण्डस्वेदविचर्चिकामलहरं दौLध्यकुष्टापह- मश्विभ्यां परिकीर्तितं बहुगुणं तैलं सुगंधं महत् ॥७२॥ कपर. अगर. दालचीनी, पत्रज, नलिका, लाख, कचूर, धावेके फूल, मतदन. एलवालुक, सुगन्धद्रव्य, सरल, छड, जटामांसी, सुगंधवाला, वायची, फेगर, गोरोचन, दोनो प्रकारके मरुवा, श्रीवास, जैफल,कंकोल, मुपारी. सफेद चिरमिटी, कस्तूरी, मुरा, प्रियंगु, लौग, कूठ, नेत्रवाला, सन. रेणुका, चन्दन, थुनेर, गठौना, नख, जावत्री, काकडासिंगी, पद्माख, उड स्पृषा (सुगन्धद्रव्य ), पालिक, लाख, मजीठ, लोध प्रत्येक ४ तोला रेकर इनका काढा करे फिर अष्टावगेप रहनेपर इस काढ़ेको छानकर इसमें मेर शुद्ध तिलतैल मिलाकर पकावे मन्द २ पकावे जब पानी जलकर तटमात्र दोप रहे तो उतारकर छान लेवे, इस तेल की मालिश करनेसे पानी जवानकी नन स्त्रियोंका प्यारा हो, पुगेदाला हो. नपुंसक भी मैथुनाभिलाषी हो, इस तैलके नित्य सेवनसे शुक्रयुक्त, कांतिमान, बहुतसे 1

नपुंसकामृतार्णवः ।
वंध्या भी गर्भवती हो, वृद्धास्त्रीभी पुत्रजने, और देहकी खुजली, पसीना,
विचर्चिका, मैल, देहकी दुर्गधि, कोढ़, यह सब नष्ट हों यह अश्विनीकुमा
रका बनाया महासुगंधि तैल है ॥ ७०-७३ ॥
चन्दनादितैलम् ।
चंदनादेविधि तात चंदनं रक्तचंदनम् ।।
पतंगमथ कालीयागरुकृष्णागरूणि च ॥ ७ ॥
देवद्रुमः ससरलः - पद्मकं क्रमुकोपि च ॥
करो मृगनाभिश्च लताकस्तूरिकापि च ॥ ७ ॥
सिल्हकः कुंकुमं गव्यं सजातीफलमेव च ॥
जातीपत्रं लवंगं च सूक्ष्मैला महती तथा ।। ७६ ॥
कंकोलं फलकं त्वक्च पद्मकं नागकेशरम् ।।
वालकं च तथोशीरं मांसी दारुसितापि च ॥ ७७॥
मुरा करकश्चापि शैलेयं भद्रमुस्तकम् ॥
रणुकश्च प्रियंगुश्च श्रीवासो गुग्गुलुस्तथा ॥ ७८ ॥
लाक्षा नखश्च रालश्च धातकीकुसुमं तथा ॥
ग्रंथपर्ण च मंजिष्टा तगरं सिक्थकस्तथा ॥७९॥
एतानि शाणमानानि कल्कीकृत्य शनैः पचेत् ॥
तैलप्रस्थमितं सम्यगेतत्पात्रे शुभे क्षिपेत् ॥ ८० ॥
अनेनाभ्यक्तगावस्तु वृद्धोऽशीतिसमोपि यः॥
सुखी भवति शुक्राढयः स्त्रीणामत्यंतबल्लभः ॥ ८ ॥
वंध्यापि लभते गर्भ पण्डोपि तरुणायते ॥
अपुत्रः पुत्रमाप्नोति जीवच शरदां शतम् ॥ ८२ ॥

भाषाटीकासमेतः। ३७ चंदनादि महातैलं रक्तपित्तं क्षयं ज्वरम् ।। दाहं प्रस्वेददौर्गध्यं कुष्ठं कंडूं विनाशयेत् ॥ ८३॥ हे पुत्र! अव चंदनादि तैलकी विधिसुनो।सफेद चन्दन, लाल चंदन,पतंग, हरिचंदन,अगर, काला अगर,देवदार,सरल, पद्माख, सुपारी,कपूर, कस्तूरी, लता कस्तूरी, शिलारस, केशर, गौका घी,जायफल, जावित्री, लवंग, छोटी इलायची, वडी इलायची, कंकोल, तज, कमल, नागकेशर, सुगंधवाला, खस, जटामांसी, देवदारु, दालचीनी, मुरा, कचूर, छड, सिलाजीत, भद्र- मोथा, रेणुका, प्रियंगु पुष्प, श्रीवास, गुग्गल, लाख, नख, राल, धावेके फूल, गठौना, मंजीठ, तगर, मोम, इन सवोको चार चार मासे लेकर कल्क बनावे फिर स्वच्छ धुली तिलीका तैल १ सेर लेकर उसमें वह कल्क डाल कर तैलपाक विधिसे इस तेलको बनाकर वोतलमे भरकर रखदेवे । इसकी मालिशसे अश्शीवर्षका बूढा अत्यंतवीर्यवाला होकर स्त्रियोंका प्यारा हो और सुखी रहै, वंध्याभी पुत्रवती हो, नपुंसकभी तरुण हो, जिसके संतान न होती हो संतान होय, पूर्ण सौ वर्पकी आयु हो, यह चंदनादि तैल, रक्त पित्त, क्षय, ज्वर,दाह,पसीना, दुर्गध, कोढ,खाज,इनको भी नष्ट करताहै ७४-८३ द्राक्षासवम् । द्राक्षातुलामुपादाय जलद्रोणे चतुष्टये॥ पक्त्वा चतुर्थशेषं तु तं कषायमुपाहरेत् ॥ ८४ ॥ दत्त्वा गुडतुलां तत्र धातकीप्रस्थमेव च ॥ निखात्य स्थापयेद्भूमौ यावतासौ वरो भवेत् ॥ ८५॥ ततस्तत्सारमादद्याद्वारुणीयंत्रतः पुनस्तं वारुणीयंत्रे समारोप्य तदाहरेत् ॥ ८६॥ एवं तु दशधा सारं पुनश्च विधिना हरेत् ।। ततस्तस्मिंश्चतुर्जातं जातीकोशं लवंगकम् ॥ ८७॥ शनैः।।

३८
नपुंसकामृतार्णवः ।
कर्पूरं कुंकुमं चापि यथालाभं नियोजयेत् ॥
तं यथाग्निबलं मर्त्यः पिबेत्सर्वक्षयापहम् ।। ८८ ॥
स्निग्धेन भोजनेनैव आसवं विधिना पिवेत् ॥
नरो नवतिवर्षोपि पौरुपेण महीयते ॥ ८९॥
४ सेर मुनक्काको १६ सेरपानीम पकावे जब ४ सेर वाकी रहे तो
उतार लेवे फिर इसमें ४ सेरगुड़, और १ सेर धावके फूल डालकर एक
मट्टीके वर्तनमें भरकर करडीम दवा देवे जब वह सडकर उफानपर आवे
तो वारुणीयंत्रद्वारा अर्क संचलेवे फिर उस अर्कको दुवाग वारुणीयंत्रद्वाग
खेंचे ऐसेही वारवार उसीको दसवार चुआवे फिर चतुर्जात, जावित्री, लोग,
भीमसेनी कपूर, केशर यह सब अनुमान माफिक मिलावे फिर इसको
जठरामिका वलावल विचार कर सेवन करै तो यह क्षय ( यक्ष्मा )
इनको दूर कर इसको सुंदर चिकने भोजनके साथ विधिपूर्वक उचितमात्रासे
पीवे तो ९० वर्षका बूढाभी पुरुषार्थका अभिमान करने लगे ॥८४-८९।।
राक्षसयाग।
वस्तांडं सर्पिपा भृष्टं कणासैंधवमिश्रितम् ॥
भक्षयेत्सततं यस्तु अंगनामदभंजकः ॥ ९ ॥
वकरके आंडको घृतमे भूनकर उसमें संधानमक और पीपल मिलाके
भक्षण करे इसके निरंतर खानसे बडी मढवती स्त्रियांके मदको भंजन करने
वाला पुरुप हो जाता है ॥१०॥
मद्यमांसयुता योगा म्लेच्छानांशोभनाः स्मृताः॥
निंदनीया द्विजातीनामभक्ष्या इति में मतिः ॥ ९१ ॥
मद्यमांमके मेलक जो योग है वह म्लेच्छोंके लियेही गोभायमान है।
द्विजातियांके लिय यह योग अभक्ष्य है और उनका म्पर्श करनाभी निट
नीय है इस विषयमं हं गिप्प ! हमाग यही मन है ॥ १ ॥

भाषाटीकासमेतः।
९
वाजीकरण पूपालिका।
तिलमापविदारीणां शालीनां चूर्णमेव च ॥
पौंड्रकेचरसेनाई मर्दितं सैंधवान्वितम् ॥ ९२॥
वाराहमेदसा युक्तां घृतेनोत्कारिकां पचेत् ॥
तां भक्षयित्वा पुरुषो गच्छेनारी यथेच्छया ॥ ९३॥
तिल, उडद, विदारीकंद, शाली चावल, इन चारोका वारीक चूर्ण
पोडा नामक ईखके रसमे गूंव लेवे और अनमान माफिक इसमें सेधान-
मक मिलावे और वराहकी मेदका मोन डाले फिर इसको उत्तम घृतमें
पृटी बना लेवे यह पूडी परम वाजीकरण है इसको खाकर पुरुष यथेच्छ
स्त्री गमन करसक्ता है ।। ९२ ॥९३ ॥
म्लेच्छ योग।
क्षीरेण बस्तांडयुजा शृतेन
संप्लाव्य कामी च बहूस्तिलान्यः॥
सुशोषितानत्तिपिवेत्पयश्च
तस्याग्रतः किं चटकः करोति ॥ ९४॥
बकरके आडाको दूधम डालकर पकावे और इस दूधकी भावना
तिलोको देवे इस प्रकार कई भावना देकर सुखालेवे फिर दो तोला तिल
खाकर ऊपरसे मिसरी मिला धारोष्णदूध पीवे तो यह मनुष्य घरके चिडेसे
भी अधिक मैथुन करे ॥ ९४॥
पुरुषार्थदायकवस्तिकर्म।
जीवत्यतिबलामेदाकाकोलीद्वयजीरकैः ।।
साभयातिकृताकृष्णाकाकनासारसायनैः ॥ ९५॥
स्वयंगुप्तासठीशृंगीजीवकशारिवाद्वयैः ॥
सहचरखराविश्वपिप्पलीमूलभर्जनैः ॥ ९६ ॥

४०
नपुंसकामृतार्णवः।
पिष्टैस्तैलं घृतं पक्वं क्षीरेणाष्टगुणेन च ॥
दत्तमनुवासनैज्ञेयं शुक्राग्निवलवर्द्धनम् ॥ ९७ ॥
वृहणं वातपित्तनं गुल्मानाहहरं परम् ॥
नस्यैः पानश्च संयुक्तमूर्ध्वजत्रुगदापहम् ॥ ९८ ॥
जीवती, अतिबला, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली दोनो जीरे,
हरड, पीपल, काकनासा, वायविडंग, कोचके वीज, (पुनर्नवा-या कचूर ।
काकडासिंगी, जीवक, ऋषभक, दोनों सारिवा, सहचर, (वीयावांमा),
त्रिफला, सांठ, पिप्पलीमूल, इन सबका चुग्न करके प्रथम थोडा वृतम
भून लेवे फिर घृत अथवा तेल,-या तैल घृत दोनाम उपरोक्त भुने चूर्णका
कल्क मिलावे फिर तैलघृतसे बाठगुना दूध डालकर पकावे । इसके द्वाग
अनुवासनवस्ति नसे वीर्यकी, तथा अनि और बलकी वृद्धि होती
यह इस प्रकार सिद्ध किया घृत, या तैल पुष्टिकारक वातपित्तनाशाक
गुल्म, अफारा, इनको दूर करता है इसको यदि नस्य तथा पीनेमे उप-
योग किया जाय तो उर्ध्व जत्रुवोंके सब रोग दूरहोते हैं ॥ ९५-९८ ॥
वृप्यम् ।
यत्किचिन्मधुरं स्निग्धं जीवनं तर्पणं गुरु ॥
हर्पणं मनसश्चैव सर्व तदृप्यमुच्यते ॥ ९९ ॥
जो पदार्थ, मधुर, चिकने, प्राणरक्षक, तृप्तिकारक, भारी, तथा मनम
नंद देनेवाला है उन सबको वृष्य कहतेह ॥ १९ ॥
सामान्यत इमे योगाः पुरुषार्थप्रदायकाः ॥
कथिता विधिवत्तात केव्यानां हितकाम्यया ॥१००॥
अथाग्रे यद्वदिप्यामि क्रमशश्च तरंगके ।
तत्त्वया प्रश्नकमतः श्रोतव्यं हि विभागशः ॥१०॥

भापाटीकासमेतः।
४१
गुरुचोले हे तात ! सामान्यतासे नपुंसकोंके कल्याणके लिये पुरुषार्थ
दायक योग हम कह चुके हैं वह तुमने विधि पूर्वक सुन लिये । अब जो
कुछ हम आगे तरंग प्रतितरंग कहेगे । वह तुम क्रमपूर्वक नपुंसकसंबंधी
हरेक विषयमें प्रश्न करके उत्तररूपसे सुनते जाओ ॥ १००-१०१॥
इति प्रबोधितः शिष्यस्तरंगेऽस्मिञ्चिकित्सिते ॥
चूर्णपाकरसस्तैिलान्पृष्टवान् क्रमशः पृथक् ॥१०२॥
इस प्रकार गुरुमुखसे इस चिकित्सा तरंगमें प्रबोधन किया हुवा शिष्य
फिर तरंग प्रति तरंग नपुंसकताके नाशक और वीर्यवर्द्धक चूर्ण, पाक, रस,
तैल पूछने लगासो आगे क्रमेसे लिखे जावेगे ॥१०२॥
श्री वै० ५० ५० रामप्रसाद उपाध्यायप्रणीत नपुकामृतार्णवे
नपुमकचिकित्सित नाम द्वितीयस्तरगः ॥ २ ॥
अथ तृतीयस्तरंगः।
वाजीकरणादिचूर्णवर्णनम् ।
शिप्यउवाच ।
अथ चूर्णप्रकारं हि खंडादिदोषनाशनम् ॥
वीर्यवृद्धिकरं ब्रूहि वाजीकरणमुत्तमम् ॥ १ ॥
इम के उपरान्त शिष्य बोले हे गुरो ! नपुंसकता आदि दोषोके हरने-
वाले वीर्यको बढ़ानेवाले और उत्तमवाजीकरणकर्ता चूर्णाका कथन कीजिये ?
गुरुरुवाच ।
शृणु चूर्णविधानं हि वीर्यवृद्धिकरं परम् ॥
क्षीणमेहादिशमनमायुरारोग्यदं तथा ॥ २ ॥
अत्यंतशुष्क यद्रव्यं सुपिष्टं वस्त्रगालितम् ।।
तत्स्याच्चूर्णं रजोदस्तन्मात्राकर्पसम्मिता ॥ ३ ॥

॥
४२
नपुंसकामृतार्णवः।
इस प्रश्नको सुनकर गुरु बोले हे तात! वीर्यक बढानेवाले और क्षीणता
तया प्रमेह आदिघोर व्याधियोके शमन करनेवाले आयु तया आरोग्यताके
बढ़ानेवाले चूर्णों का कथन करता हूं तुम सावधान होकर सुनो ॥ २ ॥
अत्यन्त सूखी हुई औषधियोको वारीक पीसकर कपड़े में छान लेवे उस
छनेहुवे रजको चूर्ण रज और क्षोद भी कहते हैं इसकी सामान्यतासे मात्रा
(खोराक) १ तोलाकी कही है ॥ ३ ॥
१ गोक्षुरादिचूर्णम् ।
गोक्षुरकः क्षुरकः शतमूली वानरी नागबलाऽतिबला च ॥
चूर्णमिदं पयसा निशि पीतं वाजिकरं परमं मनुजानाम् ।
गोखरू, तालमखाना, शतावर, कौंचके वीज, गंगेरण, और खरंटी,
इन सबका चूर्ण करके वरावरकी मिसरी मिलाके दो तोला चूर्ण रात्रीके
समय भक्षण करके ऊपरसे मिसरी मिला गर्म अथवा धारोष्ण दूध पीवे
तो यह चूर्ण परम वाजीकर्ता और वीर्यके बढ़ानेवाला है ॥ ४ ॥
२ अथवा।
त्रिकटकात्मगुप्तानां बीजचूर्ण सशर्करम् ॥
क्षीरेण यः पिबेगच्छेदशवारं निरंतरम् ॥ ५ ॥
गोखरू, और कीचके वीज इन दोनोके चूर्णको मिसरी मिले गर्म दूध
से जो पुरुष निरन्तर ( हमेशा) सेवन करता है वह नित्य स्त्रीसे दशवार
नम करसक्ता है ॥५॥
३ नारसिंहचर्णम्।
शतावरीरजःप्रस्थं प्रस्थं गोक्षुरकस्य च ॥
वाराह्या विंशतिपलं गुडच्याः पंचविंशतिः ॥ ६॥
भल्लातकानां द्वात्रिंशचित्रकस्य दशेव तु ॥
तिलानां शोधितानां च प्रस्थं दद्यात्सुचूर्णितम् ॥ ७ ॥

भाषाटीकासमेतः। ४३ त्र्यूषणस्य पलान्यष्टौ शर्करायाश्च सप्ततिः॥ माक्षिकं शर्कराधेन माक्षिकार्थेन वै घृतम् ॥ ८ ॥ शतावरीसमं देयं विदारीकंदजं रजः ॥ एतदेकीकृतं चूर्ण स्निग्धे भांडे निधापयेत् ॥ ९ ॥ पलार्धमुपयुंजीत यथेष्टं चापि भोजनम् ॥ मासैकसुपयोगेन जरां हंति रुजामपि ॥१०॥ बलीपलितखालित्यं मेहपांडादिपीनसान् ।। हत्यष्टादशकुष्टानि तथाष्टावुदराणि च.॥११॥ भगंदरं मूत्रकृच्छ्रे गृध्रसी सहलीमकाम् ॥ क्षयं चैव महाश्वासान्पंचकासान्सुदारुणान् ॥ १२॥ अशीतिवातजाव्रोगाञ्चत्वारिंशच पित्तजान् ॥ विंशतिश्लेष्मकांश्चैव संसृष्टान्सानिपातिकान् ॥ १३॥ सर्वानोंगदान्हति वृक्षमिंद्राशनिर्यथा ॥ वीर्यवान्रमते नार्या दशवारं निरंतरम् ॥ १४ ॥ पुत्रान् संजनयेद्वीरान् नरसिंहनिभांस्तथा। नारसिंहमिदं चूर्ण सर्वरोगहरं परम् ॥ १५ ॥ शतावरका चूर्ण १ सेर । दक्षिणीगोखरूका चूर्ण १ सेर । वाराहीकंदका चूर्ण १ सेर । गिलोय सत्व ११ सेर । शुद्ध भिलावे २सेर । चित्रककी छाल बाईपाव । शुद्ध तिल १ सेर । त्रिकुटा बाधसेर । मिसरी ४॥ सेर । सहद रागर। गोघृत एकसेर दोछरोक । इन सबको कूटछान मिला करके चिकने शुद्ध पात्रमं भरकर रख देवे इसमसे दो तोला प्रातःकाल भक्षण करे और पधेच्उभोजन किया करे इसके एकमहीने के सेवनसे बुडापेके रोग दूर हा देहम गलजटपटना सफेदवाल होना, गंज, प्रमेह. पांड, पीनस, , ४४ नपुंसकामृतार्णवः । १८ कोढ, ८ उदररोग, भगंदर, मूत्रकृच्छू,गृध्रसी, हलीमक, क्षयरोग, महा- श्वास, पांच प्रकारकी खांसी, ८० वायुके रोग, ४० पित्तरोग, २० कफके रोग, मिश्रित और सन्निपातके रोग, सब प्रकारके बवासीर, इन सब रोगोंको नष्ट करे, जैसे इंद्रका वन वृक्षाको नष्ट करता है । इसके सेवनसे वर्यि अत्यंत बढकर मनुष्य स्त्रियांसे नित्यप्रति १० वार गमन करसक्ता है। इसके प्रभावसे मनुष्य शेरकी समान पगक्रमवाले शूरवीर पुत्रोंको उत्पन्न को यह नारसिह चूर्ण मनुष्योके सव रोग नष्ट करने वाला है ॥६-१५ ॥ ४ मुसलीचूर्णम् । मुसलीकंदचूर्ण च गुडूचीसत्वसंयुतम् ॥ वानरीगोक्षुराभ्यां च शाल्मलीशर्करामलैः ॥ आलोड्य घृतदुग्धाभ्यां भक्षयेत्कामवृद्धये ॥ १६॥ मुसलीस्याह, मुसलीसफेद, विदारीकंद, गिलोयका सत्त्व, कीचके वीज, गोखुरू, शैवलाकी मुसली,इनके चूर्णम वरावरकी शुद्धमिसरी मिलावे फिर इसमेंसे १॥ तोला या दो तोलाकी फकी लेकर ऊपर मिसरी और घी मिला हुवा दूध पीवे तो वीर्य पुष्ट होकर कामकी वृद्धि होवे ॥ १६ ॥ ५ वाराहीकन्दचूर्णम् । वाराहीकंद गाभ्यां पलं पोडशचूर्णितम् ॥ किंचिदाज्येन भृष्टं च सितायुक्तं च कारयेत् ॥ १७ ॥ त्वपत्रनागपुप्पाभ्यां केशरं मधुयटिका ॥ एतानि पलमात्राणि शर्करासममेव च ॥ १८॥ आलोड्य घृतदुग्धाभ्यां पिवेत्कामं निशामुखे॥ वीर्यवृद्धिकरं पुसा बहुरामासु रम्यते ॥ १९ ॥ वारहीकंदके चूर्ण और भांगरके चूर्णको १६ मोलहपल लेकर फिचित धीमे भृनलेवे फिर इसम वगवरकी मिमरी मिलाकर इमममे रनाला चूर्ण खाकर ऊपर से दूध पीवे तो कामगक्ति बलवान होती है ॥ १७ ॥ अथा

भाषाटीकासमेतः।
४५
दालचीनी, तेजपात, नागकेशर, मुलहठी, इनको चार २ तोला लेकर बरा-
वरकी शुद्धचीनी मिलावे फिर घृत और मिसरीमिले दूपसे इसका सेवन
करे अथवा इस चूर्णको उपरोक्त विदारीकंदके चूर्णमही मिलाकर भक्षण
करके दूध पीवे ॥ १८ ॥ १९ ॥
६ अन्यच्चूर्णम् ।
स्वयंगुप्तेक्षुरकयो/जचूर्ण सशर्करम् ॥
धारोष्णेन नरः पीत्वा पयसा न क्षयं व्रजेत् ॥२०॥
काचके वीज, तालमखाने, इनक चूर्णम समभाग मिसरी मिलाकर
धागेष्ण दूधसे सेवन करे तो उस मनुष्यका वीर्य कभी क्षीण न हो सदैव
पुष्ट रहे ।। २० ॥
७-८ उच्चटादिचूर्णम् ।
उच्चटाचूर्णमप्येवं क्षीरेणोत्तममुच्यते ॥
शतावयुर्चटाचूर्ण पेयमेव सुखार्थिना ॥२१॥
इसीप्रकार उटंगणके बीजांका चूर्णकर मिसरी मिलाकर धारोष्ण दूध
संग खावे तो वीर्य पुष्ट हो । अथवा शतावरकी और उटंगण इन दोनोंके
तूर्णम मिसरी मिलाकर १॥ तोला या दो तोलाकी फंकी लेकर धारोष्ण
(तत्काल निकालादूध जिसमेसे निकालनेकी गर्माई दूर न हुई हो ) दूधमें
मिसरी मिलाको पीवे तो वीर्यकी वृद्धि होकर कामशक्ति बलवान् हो॥२१॥
९ मधुयष्टीचूर्णम् ।
कर्प मधूकचूर्णस्य घृते क्षौद्रसमन्विते ॥
प्रयुक्ते यः पयश्चानु नित्यवेगः स ना भवेत् ॥ २२ ॥
एकतारा मुरहटीके चूर्णको छमासे घी और १ तोला शहद मिलाकर
चाटकर उ.परसे मिनरी मिला गर्म दृध पीवे तो वह मनुष्य संदेव वीर्य
देग युत्त रहता है ॥२७॥

.
४६
नपुंसकामृतार्णवः।
१० विदारीकंदचूर्णम् ।
चूर्णं विदार्याः सुकृतं स्वरसेनैव भावितम् ।।
सर्पिःक्षौद्रयुतं लीड्डा उष्णदुग्धं ततः पिबेत् ॥२३॥
विदारीकंदके चूर्णको विदारीकंदके रसकी भावना देकर सुखाता जावे
इसी प्रकार २१ भावना देकर इसमेंसे १ तोला चूर्णम १ तोला घृत और
दो तोला शहद मिलाकर भक्षण करे ऊपरसे मिसरी मिला गर्मदूध पीवे तो
पुरुष अनेक स्त्रियोंसे यथेच्छ गमन कर सक्ता है ॥ २३ ॥
११ आमलकीचूर्णम्।
एवमामलकं चूर्ण स्वरसेनैव भावितम् ॥
शर्करामधुसपिभिर्युक्तं लीड्वा पयः पिबेत् ॥
एतेनाशीतिवर्षोपि युवेव परिदृष्यते ॥२४॥
-
इसी प्रकार नवीन सूखे आमलोंके चूर्ण आमलोके रसकी २१ भावना
देकर मिसरी शहद घी मिलाकर खावे ऊपरसे गर्म दूध पीवे तो अस्तीवर्ष-
का बूढाभी जवान के समान मैथुन करे ॥ २४ ॥
१२ शतावर्यादिचूर्णम् ।
शतावरीनागवलाविदारी-
त्रिकंटके रामलकीफलान्वितैः ।।
विचूर्णितेः पंचभिरेकशः पृथक्
प्रकल्पितेर्वा घृतमाक्षिकप्लुतैः ॥ २५ ॥
इति प्रयोगाः पडिमे भिपवर-
रुदीरिताः शर्करया समन्विताः॥
नृणां मदांधप्रमदोपसर्पिणां
प्रधानधातोरतिरेककारणम् ॥२६॥

भाषाटीकासमेतः। शतावर, खरैटी, विदारीकंद, गोखरू, आमले, इन सवका अलग २ अथवा सवका एकत्र चूर्ण करके इसमे घी और शहद तथा मिसरी मिलावे यह वैद्योने पांच अलग २ और एक सबको मिलाकर छः प्रयोग कहेहैं यह छहा प्रयोग कामदेवसे मदांधकर्ता और स्त्रीरमणकर्ता मनुष्योंके वीर्य के बढाने वाले हैं ॥ २५-२६ ॥ १३ गोखरूचूर्ण। शमयति गोक्षुरचूर्ण छागीक्षीरेण साधितं समधु ।। भुक्तं क्षपयति पांढयं यजनितं कुप्रयोगेण ॥२७॥ गोखरूका ५ टंक चूर्ण ७ टंक शहदमें मिलाकर चाटकर ऊपरसे वकरीका गर्मदूध मिसरी मिलाके पीवे तो हस्तमैथुन आदिकी नपुंसकता दृर हो ।। २७ ॥ १४ मुसल्यादिचूर्णम् । मुसलिकोकिलगोक्षुरचूर्णक शशिविलोचनराममितं पचेत् ।। पयसि प्रातरिदं यदि कोष्णके सुसितया खलु टंककपट्टया ॥२८॥ त्रिगुणसप्तदिनं परिभक्षयञ् छतवया अपि कांक्षति कामिनीम् ॥ किमिह चित्रमुदित्त्वरयौवनः शशिमुखींशयनान्न जहाति सः॥२९॥ कालीमसली, तालमखाने, गोखरू, ए क्रमसे एक तथा दो और तीन भाग रेवे ( काली ममली ३ तोला, तालमखाने ६ तोला, गोखरू ९ तोला, फिर इनका चूणकर प्रातःकाल मिसरी मिले गर्म दूधसे नित्यक्ष्मासे साये इसप्रकार २१ दिन भक्षण करनेमे १०० वर्षका बृढा मनुष्य भी स्त्री

४८
नपुंसकामृतार्णवः।
रमणकी इच्छा करने लगे, फिर यदि चढीहुई जवानीवाला मनुष्य स्त्रीसंग
की इच्छा करे तो आश्चर्यही क्या है ॥ २८-२९ ।।
१५ अन्य शतावर्यादि चूर्ण ।
शतावरीगोक्षुरकाश्वगंधापुनर्नवानागबलामुसल्यः ॥
घृतेन खंडेन तुभक्षणीयाःक्षीणा नरा नागबला भवंति॥३०॥
शतावर, गोखरू, अप्तगन्ध, पुनर्नवा, खरटी, मुसली, इन सबका चूर्ण
कर घी और मिसरी मिलाके गर्मधसे भक्षण करे तो क्षीण मनुष्यभी
हायीके समान पुरुषार्थी होवे ॥ ३०॥
१६ अश्वगन्धादिचर्णम् ।
अश्वगंधा दशपला
तन्मात्रो वृद्धदारुकः॥
ककं पयसा पीत्वा नारीभिर्नेव तुष्यति ॥ ३१ ॥
असगन्धनागौरी १० पल (४० तोला ), विधायग दश पल इन
दोनोका बारीक चूर्णकर बराबरकी मिसरी मिलावे फिर इसममे दो तोला
गर्म अथवा धारोष्ण दूधके साथ खाय तो धातु पुष्ट होकर मनुष्य स्त्रीमे
रमण करता न थके ॥ ३१ ॥
१७ करवीरादिचर्णम् ।
करवीरशाल्मलिजटास्तथा वानरिकं समम् ॥
सूक्ष्मचूर्णं कृतं सर्व शाणमात्रं पिवेनिशि ॥
आलोड्य घृतदुग्धेन मानिनीमानभेदनम् ॥३२॥
कनेरकी जड़का चूर्ण १ तोला,नये मेमलकी जड़ पाच तोला, कायके
वानाकी गिम ७ तोला इन तीनोंको कपडछान करके बगवाकी मिर्ग
मिलाके घी और मिमर्गयुक्त दृवमे नित्य छ: मामे प्रमाण सार तो वीर्य
पुष्ट होकर स्त्रियांका मानभंग कं ॥ ३२॥

भाषाटीकासमेतः। ४९ । कामदेवचूर्णम् । पलं गोक्षुरबीजस्य द्विपलं कपिकच्छुरा॥ पलं नागबलाबीजं पलमेकं शतावरी ॥ ३३ विदारीकंदचूर्णस्य पलद्वयमथापि वा।। पलं पुपबीज च वाजिगंधापलत्रयम् ॥३४॥ वासा च तालमूली च गुडूची रक्तचंदनम् ।। त्रिसुगंधिकणा धात्री लवंगं नागकेशरम् ॥ ३५॥ एतानि कर्पमात्राणि सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत् ॥ वला शाल्मलिसूलं च भवेदेकैकविंशतिः॥३६॥ कुशकाशशिफासप्तशर्करासतयोजितम् ।। दुष्टशुक्र वीर्यहानि मूत्रकृन्छ्राणि यानि च ॥३७॥ सूत्राघात मूत्रदोषाअयेच्छकविवर्द्धनम् ॥ दशकं गच्छति स्त्रीणां हयतुल्यपराकमः ।। कामदेवाभिधं चूर्ण धन्वंतरिनिरूपितम् ॥ ३८॥ गोखरू, १ पल काचके वीज २ पल, गंगेरनके वीज १ पल,शतावर? पर, विदारीकन्द २ पल, असगंध ३ पल, अडूसा. मुसली,गिलोय, लाल- चन्दन, त्रिसुगन्ध ( दालचीनी, इलायची, तेजपात ), पीपल, आमले, लोग नागवेगर इन सबको एक. २ तोला लेवे । खरटी और सेमलकी भगती वर इवीस २ तोला लेवे । कुशाकी जड़ काशकी जड़ सरपतेकी जर प्रत्येक सात तोला लेवे इन सबका चूर्णकर वरावर शुद्ध खांड मिलावे इन वर्णका नित्य दूधसे सेवन करे तो दुष्टवीर्य वीर्यका न होना मृत्रकृच्छू वापात मत्रदोप इन सबको दूर करे और वीर्यको वढाये दा स्त्रियोंसे रमण मानजी दाक्ति होवे घोड़े की समान पगकाम होवे यह धन्वन्तरिजीका कथन विवादा गामदेव चूर्ण है ।। ३६-३८ ।। - १० मान नपुंसकामृतार्णवः । मानसोल्लासचूर्णम् । त्वक पिप्पली लवंगला चंदनं व शिवापलम् ॥३९॥ सारसाईपलं भंगा साईद्विपलसंमिता ॥ कपूरो मृगनाभिश्च दशमापमितः पृथक् ॥ ४० ॥ सर्व तुल्यसिताचूर्ण मानसोल्लाससंज्ञकम् ॥ वृष्यं वह्निप्रदं चैतत्कामोद्दीपनकारकम् ॥४१॥ तज, पीपल, लौंग, छोटी इलायची, सफेद चंदन, आमले प्रत्येक एक पल ( ४ तोला), लोहभस्म १॥ पल शुद्धभांग २ पल भीमसेन कपूर और कस्तूरी दशरमासे इन सवका चूर्णकरके सबकी बराबर मिसर मिलावे इसचूर्णको ६ मासे प्रमाण दूधके साथ भक्षण करे तो, सोलासक चूर्ण वीर्यको पुष्ट करे जठराग्निको बढावे कामको उद्दीपन करे ॥ ३९-४१॥ बृहदाराहीकंदचूर्णम्। वाराहीकंदं शृंगाटं कंद मार्जारमेव च॥ चूर्ण सूक्ष्मं कृतं सर्व पलमानं पृथक् पृथक् ॥ ४२ ॥ घृतभृष्टं पश्चादेतन्महोपधम् ॥ चतुर्जातं लवंगं च पिप्पली नागरं तुगा ॥४३॥ एतान्द्रिकर्पकान्भागान्सिता सर्वसमानिका ।। पलाई भक्षयेन्नित्यं सम्मितं महिपीपयः ॥ १४ ॥ दिनांते च पिवेन्नित्यं क्लीवत्वनाशनं परम् ।। प्रमेहव्याधिशमनं वीर्यस्तंभनकारकम् ॥१५॥ वाराहीकंट, मिघाडे, विदागकंद, प्रत्येकका पूर्ण चार २ ताले लेकर मि भून लेबे फिर इसम दाल्ट चीनी इलायची तेजपान नागकेटार दांग पीपल साठ वंगलोचन इन मव प्रत्येकका चूर्ण दो दो नान्टा मिगर्ग गरे वगवर ले मवको एकत्रका चिकने वर्तनम गये फिर मममे निल्ल दो तु तच्चूर्ण - भाषाटीकासमेतः। ५१ तोला खाकर ऊपरसे मिसरी मिला भेसका दूध पीवे इस प्रकार नित्य गत्रिको सेवन करनेसे प्रमेह नपुंसकता दूर होने और वीर्यस्तंभन होये ॥ ४२-४५॥ मदनप्रकाशचूर्णम् । कोकिलाशस्य बीजानि मुसलीकंदनागरम् ।। बाजिगंधा कपिबीजं शाल्मलीपुष्पमेव च ॥४६॥ बला शतावरीमूलं सोचाई च त्रिकंटकम् ॥ जातीफलं च मापानं मातुलानी तुगा तथा ॥१७॥ एतानि समभागानि सिता सर्वसमानिका ॥ पयसा हि पिबेदात्री कर्षयुग्मं च नित्यशः ।। ४८॥ बलवीर्यकरं पुंसां प्रमेहव्याधिनाशनम् ॥ मदनप्रकाशचूर्ण हि प्रौढानां द्रावणं परम् ॥४९॥ नालमखाणे, मुसली, विदारीकंद, सोठ, असगंध, कौंचके बीज, सेमलके पूल, वटी शतावर, मोचरस, गोखरू, जायफल, भुनी उडदकी दाल, नाग वंगलोचन इन सबको समभाग लेकर चूर्ण करे फिर इसमे वरावरकी गिसरी मिलाये । इस मदन प्रकाश चूर्णको नित्य दो तोला खाकर ऊपरसे र पीवे तो वीर्षकी वृद्धि हो प्रमेहोका नागहो इसके प्रभावसे मनुष्य नोटा टियागो द्रावण करने वाला होता है ॥ ४६-४९ ॥ अश्वगंधाचूर्णम् । अवगंधा तिलाः कृष्णाः समानं सूक्ष्मचूर्णितम्॥ पलाईमधुर्पिा भुक्त्वा चातु पयः पिवेत् ॥ वीर्यवृद्धिकरं चैव झीवत्वनाशनं परम् ॥५०॥ मगर जाते निर वरावर लेकर बारीक चूर्णकरे फिर घी और पदम मिलावर नित्व दो तोला खाने ऊपरले गर्म दूध पीवे तो वीर्यकी हो रनकता दूर होदे ॥ ५० ॥ , ५२ नपुंमकामृतार्णवः। माषचूर्णम् । त्रिपलं माषचूर्णं तु तत्समा श्वेतशर्करा ॥५१॥ आलोड्य मधुसर्पिा पलाई भक्षयेन्नरः ।। बलवीर्यकरं शश्वदलीपलितनाशनम् ॥५२॥ शुद्धउडदाके १२ तोला चूर्णको घृतस किंचित् भून लेवे फिर टंडा करके इसम वरावरकी मिसरी मिलावे फिर घी और शहद मिलाकर दो तोला नित्य भक्षण कर ऊपरसे गर्म दूध पीवे तो बल और वीर्यकी वृद्धि हो शरीरमें गुलजटी पडना बाल सफेद होना दूर हो ।। ५१-५२ ॥ वृद्धदारुकचूर्णम् । वृद्धदारस्य मूलानि सूक्ष्मचूर्णीकृतानि च ॥ शतमूलीरसेनैव सप्तवारं विभावयेत् ॥५३॥ तच्चूर्ण सर्पिषा लिह्यात्कर्षमात्रप्रमाणतः ॥ त्रिंशदिनप्रयोगेण जायते धातुवर्द्धनम् ॥५४॥ विधारेकी जडके वारीक चूर्णको शतावरके रसकी सात भावना दें फिर इसमेसे एक तोला चूर्ण घृतमं मिलाकर चाट लेवे उपग्स दृय पावेदमनट ३० दिन सेवन करनेसे वीर्यकी वृद्धि होती है ॥ ५३-.५८ ॥ अकरकरा चूर्ण। अकारकरभः शुंठी लवंगं कुंकुमं कणा ॥ जातीफलं जातिपुप्पं चंदनं कार्पिक पृथक ॥ ५ ॥ चूर्णयेदहिफेनं च तत्र दद्यात्पलोन्मितम् ॥ सर्वमेकीकृतं मापमानं क्षाद्रेण भक्षयत ॥५६॥ शुक्रस्तंभकरं पुंसामिदमानंदकारकम् ॥ नारीणां प्रीतिजननं सेवेत निशि कामुकः ॥५॥ अकरकग, सांट, लोग, कार, पीपल, जावित्री, सफेद चंदन प्रवेश । एक एक तोला लेवे शुद्ध भीम ८ तोला मयका एकत्र करदममंगे दाग मापाटीकासमेतः। चूर्णको एकमासा शदहम मिलाके चाटले उपरसे मिसिरीयुक्त दूध पीवे तो वीर्यस्तंभन हो स्त्रीपुरुषोको आनंददायी हो इसको कामी पुरुष रात्रीको गयन करने के समय सेवन करे ।। ५५--५७ ॥ गन्धकादिचूर्णम् । गंधकामलकं चूर्ण धात्रीरसविभावितम् ।। सप्तधा शाल्मलीतोयैः शर्करामधुयोजितम् ॥१८॥ लीढ़ा चातु पयःपानं प्रत्यहं कुरुते तु यः॥ एतेनाशीतिवर्पोपि वेगेन रमते स्त्रियम् ॥१९॥ शुद्ध बामलासार गंधक और आमलोंके चूर्णको समभाग लेकर आम- लोके रमकी ७ भावना देवे और सात भावना सेमलके रसकी देकर इसमें मिसरी और शहद मिलाकर भक्षण करे ऊपरसे मिसरी मिला धारोष्ण दूध पीवे तो अस्त्रीवर्पका बूढाभी बडे वेगसे स्त्रीगमन करे ।। ५८-५९ ॥ लक्ष्मणादिचूर्णम् । लक्ष्यणाहस्तिकर्णाभ्यां विकत्रयसमन्वितम् ।। अश्वगंधासमायोगाल्लौह पुसदनं स्मृतम् ॥६० ।। पुत्रोत्पत्तिकरं वृष्यं वन्यासूतिनिवर्तकम् ॥ कृशस्य बलदं श्रेष्टं सर्वामयहरं परम् ॥ ६१ ॥ राणा, लालएरंडकी जट हाड,वहेडा, आमला, सोंठ, मिग्च, पीपल, दालचीनी, इलायची, तेजपत्र, असगंध इन सबको समानभाग लेवे और उत्तम प्रकारंग बनीहई रोह भस्म सबकी वरावर लवे फिर इसमें मिसिरी मिलाकर रचित मात्रासे भक्षणवरे उ.परने दूध पीने तो इसके प्रभावसे पुनोत्पत्ति हो सारीर बलवान हो वीर्यकी वृद्धि हो, जिसके कन्या होती हो अरे पुत्र ही तामनुष्य बलवान होवे ॥ ६०-६१॥ मधुयष्टवादिचर्णम् । मधुयष्टी तुगा क्षीरी धात्री गोक्षुरकं तथा ।। बंगमनं कपिबीजं यात्रीरसविभावितम् ।। ६२॥

५४ नपुंसकामृतार्णवः । भक्षयेन्मधुसर्पियो ततश्चानुपयः पिबेत् ॥ वीर्यवृद्धिकरं पुंसां क्लीबत्वनाशनं परम् ॥ ६३ ॥ मुलहठी, वंशलोचन, आमले, गोखरू, उत्तम दशपुटी वंगभस्म, उत्तम- प्रकारसे बनीहुई ६० पुटीअभ्रक भस्म, इन सवको आंवलेके रसकी, सातभावना देकर बारीक चूर्ण करलेवे फिर उचित मात्रासे चूर्णको घी और सहदमें मिलाके चाटले उपरसे गर्म मिसरी मिला दूध पीवे यह योग वीर्यको वढानेवाला और नपुंसकताको दूर करनेवाला है ।। ६२-६३ ॥ वीर्यवृद्धिकरान्योगान्पंढादिदोपनाशकान् ॥ देशकालबलं ज्ञात्वा योजयेन्मतिमानरः॥६४ ॥ इसमकार नपुंसकताको दूरकरनेवाले और वीर्यके वढानेवाले चूणों को बुद्धिमान् मनुष्य देश काल बलावल विचारकर सेवन करावे ॥ ६४ ॥ कुछ एक औषधिके योग । शतावरी ह्युच्चटा च कपिकच्छुर्विदारिका ।। मधुयष्टी च मापानं तथैवामलकी स्मृताः ॥ ६९॥ एप पृथक्पृथक चूर्णं सासितं भक्षयेत्पुमान् ॥ ततः पयोनुपानेन वाजीकरणमुत्तम् ॥ ६६॥ शतावर उटंगणके बीज, कीचके वीज, विदारीकंद, मलटी, उडद आमले, इनका अलग रचूर्ण मिसरी मिलाकर खावे उपरस गर्म दव पाय तो यह एक, भी परम वाजीकरण है ॥ ६५ ॥६६॥ उपसंहार। इति चूर्णविधानं च तरंगेऽस्मिन्हि वर्णितम् ॥ वलवृद्धिकरं शश्वद् पंढादिदोपनाशकम् ॥ ३७॥ इसप्रकार वलके बढानेवाले और नपुंसकताके नाश करने वाले वगांका विधान इसतरंगमं वर्णन किया है ॥ ६७ ॥ श्रीपचाननपडितरामप्रसादोपा यायप्रगीतनामका ताण वर्गवर्णन नाम तृतीयम्तरग ॥ ३ ॥ T ५५ भाषाटीकासमेतः। अथ चतुर्थस्तरंगः। कामोदीपकपाकवर्णनम् । गुरुरुवाच । अथ पाकान्प्रवक्ष्येहं तृणां क्लीबत्वनाशकान् ॥ वीर्यवृद्धिकरश्चैिव बलकांतिविवर्द्धकान् ॥ १॥ गुरु कहने लगे हे शिष्य ! अव में वीर्यकी वृद्धि करनेवाले बल और जातिके वढानेवाले पुरुषांके नपुंसकता आदि दोषोके नष्ट करनेवाले पाकोंका र्णन करता हूं ॥ १॥ कोचपाक। निस्तुपं वानरीबीजं कृत्वा विंशत्पलानि च ॥ त्रिंशत्पलां सितां दत्त्वा घृतं दत्त्वा पलाष्टकम् ॥ २ ॥ दुग्धाटकं समायुक्तं मृदुना वह्निना पचेत् ॥ यावदावींप्रलेपः स्यात्तन्मध्ये चूर्णितं क्षिपेत् ॥ ३ ॥ जातीफलं त्रिकटुकं विगंधं देवपुष्पकम् ॥ आपल्लवं जातिपत्री कोकिलाबीजकेशरम् ॥ ४ ॥ पुनर्नवा बले द्वे च मुसली साहिफेनकम् ॥ पारदं लोहचूर्ण च अभ्रकं च पलार्द्धकम् ॥ ५ ॥ चंदनागरुकस्तूरीकर्पूरं शाणमात्रकम् पलाई भक्षयेदेतत्क्रमाद्वीर्यबलप्रदम् ॥६॥ हिरवे वाचक वीज ८० तोला, मिसरी १२० तोला, गोघृत ३२ तोला दप ४ सेर, इन सबको एकत्र कर मंद २ आंचसे पकावे जब पकते २ खोयेकी सहा गादा होजावे तब नीचे लिखी औषधियोका चरण मिला । नायफर त्रिकुटा विगन्ध, लवंग, अकरकरा जावत्री, तालमरवाणे, ५६ नपुंमकामृतार्णवः । केशर, पुनर्नवा, बला, अतिवला, मुसली, चंद्रोदय, लोहभस्म, अभ्रक- भस्म प्रत्येक दो २ तोला चन्दन, अगर, कस्तूरी, कपूर, प्रत्येक ४ मामे इन सबके वारीक चूर्णको उपरोक्त पाकमें मिलाकर चिकने पात्रमें रख देवे इसमेंसे दो तोला प्रमाण नित्य खावे उपग्से दूध पीवे तो अत्यंत बल और वीर्यकी वृद्धि होवे ॥२-६॥ आम्रपाका पक्काम्रस्य रसे द्रोणे रसाढ़कमितां सिताम् ॥ घृतप्रस्थमितं दद्यान्नागरस्य पलाष्टकम् ॥७॥ मरिचं कुडवोन्मानं पिप्पलीद्विपलोन्मिता ॥ सलिलस्याढकं दत्त्वा सर्वमेकत्र कारयेत् ॥ ८॥ पचेत्तन्मृण्मये पात्रे दारुदा प्रचालयेत् ॥ चूर्णान्येषां क्षिपेत्तत्र घनीभूतेऽवतारिते ॥९॥ धान्यकं जीरकं पत्रं चित्रकं मुस्तकं त्वचम् ॥ वृहजीरकमप्यत्र ग्रंथिकं नागकेशरम् ॥१०॥ एलाबीजं लवंगं च पृथक्जातीफलं पलम् ॥ सिद्धे शीते प्रदातव्यं मधुनः कुडवद्वयम् ॥११॥ भक्षयेदोजनादक पलमात्रमिदं नरः ॥ अथवा नियमो नात्र मात्रां खादेयथावलम ॥ १२ ॥ मानवस्सेवनादस्य वाजीव सुरते भवेत् ॥ समर्थो वलवान्पुष्टो यो नित्यं निरामयः ॥ १३ ॥ पके मीठे आमाका ग्म १६ सेर, शुद्ध मिमग ४ मेर, गोवृन् ? गर, साठका मैदा ३२ तोला, कालीमिग्च ३२ तोला, पीपल ३२ तोलामा जल ४ सेर सबको मिलाकर मट्टीके पात्रमं पका और लकडीकी कदर- लामे हिलाता जाय, जब मन्द • आंच मे पकते २ गाटा होजार बीर या भाषाटीकासमेतः। ५७ दिखाई देने लगे फिर इसमें धनिया, जीरा, पत्रज, चित्रक, मोथे, तज, कलोजी, पीपलामल, नागकेशर, इलायची, लोग, जायफल, प्रत्येक चार २ तोला लेकर इनका चूर्ण करके उपरोक्त पाकमें डाले जब शीतल हो जाय तो इसमें आधसेर शहद मिलावे फिर नित्य भोजन करनेसे पहले चार तोला खावे अथवा जठराग्निका वल देखकर मात्रा कल्पना करे इसके सेवनसे घोडेकी समान मैथुन करने में प्रवृत्त होय समर्थवान, बल- वान, हष्टपुष्ट होय और नित्य निगेग रहे यह आम्रपाक हृदयको हित- काग है ॥ ७.-१३॥ कामसुन्दरपाक। शतावरी च सुसली गोक्षुरस्त्वग्लवंगकम् ॥ खर्जुरमेला कृष्णा च शिवा कमलचंदनम् ॥ १४ ॥ कपिकच्छुभवं बीजं पत्रं सुस्ता च नागरम् ॥ कोकिलाक्षश्च धनिका शक्तिपूगं पलद्वयम् ॥ १५॥ विंशत्पलासिता दर्पकर्पूरश्चाईकार्पिकः ॥ विजया लार्धपलिका प्रमेहन्नो रसायनः॥ ज्वरमः पुष्टिजननः पाकोयं कामसुंदरः ॥१६॥ पतावर मुगली, गोखरू, तज. लवंग छुवारे, इलायची, 'पीपल,आमल, कमरगह, चन्दन, कोचो वीज. पत्रज,मोथा सुंठ, तालमखाणे, धनिया, प्रत्येक एक. तोला, दक्षिणी चिकनी सुपारी ८ तोला मिसरी ८० तोला, परी भीमनेनी कपूर छे २ मासे, धुलीहुई भांग ६ तोला इन सवका विधिपूर्वक पार पनावे और अनिका बलावल देखकर उचित मात्रासे खावे जो या काममन्द पाक आएको स्थिर को प्रमेह और ज्वरको नष्ट करे. वीर्यगे पुष्ट बने ।। १४..१६॥

५८
नपुंसकामृतार्णवः ।
(रातिवल्लभ पृगपाक)
पूगं दक्षिणदेशजं दशपलोन्मानं भृशं कर्तयेत्
तच्छिन्नं जलयोगतो मृदुतरं संकुव्य चूर्णीकृतम्।।
तच्चूर्णं पटशोधितं वसुगुणे गोशुद्धदुग्धे पचेत्
गव्याज्यांजलिसंयुतेऽतिनिबिडे दद्यात्तुला सिताम् १७
पक्कं तज्ज्वलनाक्षितिं प्रतिनयेत्तस्मिन्पुनः प्रक्षिपेत्
यद्ययत्तत्तदुदाहरामि बहुला दृष्ट्वादरात्संहिताः ॥
एलानागबला तथा सचपला जातीफलालिंगिता
जातीपत्रकमत्रपत्र कयुतं तच्च त्वचा संयुतम् ॥ १८ ॥
विश्वा वीरणवारि वारिदवरा वांशीवरी वानरी
द्राक्षा सेक्षुरगोक्षुरातिमहती खजूरिका क्षीरिका ॥
धान्याकं सकसेरुकं समधुकं शृंगाटकं जीरकं
पृथ्वीकाथ यवानिका वरटिका मांसी मिसी मेथिका १९
कदेवत्र विदारिकाथ मुसली गंधर्वगंधा तथा
करं करिकेशरंच मरिचं चारस्य बीजं नवम् ।।
वीजंशाल्मलिसंभवं करिकणावीजं च राजीवजम्
श्वेतं चंदनमत्र रक्तमपि च श्रीसंज्ञपुप्पैः समम्॥२०॥
सर्वचेतिपृथक् पृथकू पलमितं संचूर्ण्य तत्र क्षिपेत् ।।
सूतं वंगभुजंगलोहगगनं सन्मारितं स्वच्छया ॥
कस्तूरीधनसारचूर्णमपि च प्राप्तं यथा प्रक्षिपेत् ॥
पश्चादस्य तु मोदकान्विरचयेदिल्लप्रमाणानथ॥ २१ ॥

भाषाटीकासमेतः। तान्भोक्तातिसदा यथानलबलं भुंजीत नाम्लं रसं पूर्वस्मिन्नसिते गते परिणते प्राग्भोजनाद्भक्षयेत् ॥ नित्यं श्रीरतिवल्लभाख्यकमिमं यः पूगपाकं भजेत् सस्याद्रीयविवृद्धवृद्धमदनो वाजीव सक्तो रतौ ॥२२॥ दीप्ताग्निबलवान्वली विरतिहो हष्टःस पुष्टस्सदा वृद्धो योपि युवेव सोपि रुचिरः पूर्णेन्दुवत्सुंदरः॥२३॥ दक्षिणी सुपारी ४० तोला लेकर काट लेवे फिर जलमे भिगोकर धीरे २ कूटकर बारीक चूर्ण करे उस चर्णको सुखाकर कपडछान करे फिर चारसेर गौके दूधमे पकावे फिर उसमे १६ तोला गौका घी डाले, और ५ सेर मिसरी डाले जब पकते पकते पाक बनकर तैयार हो तो उसको नीचे उतारकर इन औषधियोंका प्रक्षेप करे । इलायची, नागवला, वला, पीपल. जायफल, जवित्री, जवत्री, पत्रज, तज, दालचीनी, सोठ, खस, क्षेत्रवाला, नागरमोथा त्रिफला, वंशलोचन, शतावर, कोचके बीज, दाख, तालमखाणे. गोखरू, खजूर, छुवारे धनियां, क्षीरकाकोली, कसेरू, मुवा, सिघाडे जीरा कलोजी. अजवायन. वटके वीज, जटामांसी, सोप., मेथी, विदारिकंट, मृसली. असगंध कवर, नागकेशर, कालीमिर्च चिरीनी सेमरके वीज, गजपिप्पली, कमलगट्टा, दोनों चंदन, लौंग, प्रत्येव चार २ तोला लेकर सबका चूर्णकर पाककी चासनीमें डाले, सार चद्रोदय. वंगभस्म नागभस्म, लोभस्म, अभ्रक, कस्तूरी, भीमसेनी वापर यह अपनी बुद्धि अनुसार वैद्य डाले, फिर सबको एकजीवकर चार २ तालेवे र बनावे रसतो अपनी अनिका वलावल विचार खावे भीर बाई भी खट्टा पदार्य न खावे । जब पहले दिनका किया भोजन पचगया हो तो भोजनसे पहले इसकी खावे. जो मनुष्य इस रतिवलभ पापाजी सेवन करताहै वह बहुवे वीर्यवाला और कामशक्तिके वेग बात होवर घोडेजी समान मथुन को । इसके सेवनसे निर्बलभी बल- -- ६० नपुंमकामृतार्णवः। वान् होकर अग्निचैतन्य रहे, हृष्टपुष्ट हो और वृद्धभी मुदा पूर्ण चंद्रमाकी सदृश कांतिवाला होताहै ।। १७-२३॥ महाकामेश्वर पाकः॥ एतस्मिन्रतिवल्लभे यदि पुनः सम्यक् खुरासानिका धत्तुरस्य च बीजमर्ककरभा पाथोधिशोषस्तथा ॥ सन्माजूफलकं तथा खसफलं त्वक चापि निक्षिप्यते चूर्णा विजयातदा स हि भवेत्कामेश्वराख्यानकः२४॥ इसी ऊपर कहे रतिवल्लभ पूगपाकमें खुरासानी अजवायन, धत्तरेके बीज, अकरकरा, समुद्रशोप, माजूफल, खसखस, तज इन सबका चूर्ण करके मिलावे और इस चूर्णसे आधी भांगका चूर्ण मिलाये तो यह कामेश्वर पाक बने । यह पाक वीर्यको गाढ़ा और स्तंभन करता और काम शक्तिको वलवान करता है ॥ २४ ॥ रतिवृद्धकर मोदक। गोक्षुरेक्षुरवीजानि वाजिगंधा शतावरी ॥ मुसलीवानरीबीजं यष्टी नागवला बला ॥२५॥ एषां चूर्ण दुग्धसिद्धं गव्येनाज्येन भर्जितम् ॥ सितया मोदकं कृत्वा भक्ष्यं वाजीकरं परम् ॥२६॥ चूर्णादष्टगुणं क्षीरं घृतं चूर्णममं स्मृतम ॥ सर्वतो द्विगुणं खंडं खादेदग्निवलं यथा ॥२७॥ ग्वरू, तालमरवाने, अमगंध, शनावर, मुमटी, कीचके बीज, मुलटी, नागवला, इनमवका चूर्ण करके वर्णकी बगवर गोवृत, और में आठ गुण दृव डालकर पकाये जब पककर गायकी समान हो जाय इसमं दुगनी शुद्ध मिमग मिलाकर लट्ट वनांलवे नटगमिक व दान- पर खावे तो यह परम वानीकरण है ॥२-०७॥

भापार्टीकासमेतः। ६१ शतावरीपाक। शतावरी खदंष्ट्रा च बला चातिबला तथा ॥ मर्कटीचर्बीजं च बिदारीकंदजं रजः॥२८॥ एतानि समभागानि पलिकानि विचूर्णयेत् ॥ चूर्णाचतुर्गुणं चैव त्रैलोक्यविजयारजः ॥ २९ ॥ एतदेकीकृतं यावत्तदर्ध माहिषं पयः तावन्मात्रेण दातव्यं शतावर्या रसं तथा ॥३०॥ विदार्याः स्वरसं प्रस्थं सितापलशतद्वयम् ॥ गोलयित्वा सितां चैव पात्रे ताम्रमये दृढे ॥३१॥ पाचयेत्पाकविद्वैयो मोदकः परमो हितः ॥ यूपणं त्रिफला शृंगी विजातं सैंधवं शटी ॥ ३२ ॥ धान्यकं बालकं सुस्तं द्विजीरं कुंदरुर्मुरा ॥ काकोली क्षीरकाकोली कस्तूरी मृद्धिका तुगा ॥ ३३ ॥ जातीकोपफलं मांसी पत्रं वारेंद्रग्रंथिजम् ॥ शतपुष्पा च वीदारु प्रियगुः सलवंगकम् ।।३४ ॥ सरलं शैलजं कुष्टं जातीपुप्पं यवानिकाम् ॥ कट्रफलं केशरं मेथी मधुकं देवताडकम् ॥ ३५ ॥ मिपा तालीसपत्रं च खर्जुररसगंधकम् ॥ त्रिसुगंधिसमायुक्तं कर्पूरेणाधिवासयेत ॥ ३६॥ कोलप्रमाणं कर्तव्यं क्षीरं चापि पिवेन्नरः ॥ प्रमदादशकं गच्छेन च शुक्रक्षयो भवेत् ।। ३७ ॥ -

६२
नपुंसकामृतार्णवः ।
सतावर, गोखरू, बला, अतिवला, काँचके वीज, तालमखाणे, विदा-
रीकंद, प्रत्येक चार २ तोला शुद्ध भांगका चूर्ण २८ पल, शुद्रखांड १००
पल, भैसका दूध, और शतावरका रस, तथा विदारीकन्दका रस, प्रत्येक
३२ पल, इन सबको मिलाके तविक पात्रमें मन्द २ आंचसे पकावे । जब
पकते २ गाढा होजावे तो त्रिफला, त्रिकुटा, त्रिसुगन्ध, शृंगी, सेन्धा,
कचूर, धनियां, मोथे, सुगन्धवाला, दोनोंजीरे, कुन्दरू, करकचरी,
काकोली, क्षीरकाकोली, दाख, वंसलोचन, जावत्री, जायफल, छड़, वारंद्र-
पत्र, गठौना, सोये, चव्य, देवदारु, प्रियंगु, लौंग, सरल, भूरीछरीला,
कुठमीठा, चुमेलीके फूल, अजवायन, कायफल, नागकेशर, मुलेठी, मेयी,
देवताड़, सौंफ, तालीसपत्र, खजूर, शुद्ध पारे और शुद्ध गंधककी कजली,
इन सवका चूर्णकर उपरोक्त पाकमें मिलावे फिर त्रिसुगंध और भीमसेनी
कपूरसे सुगंधितकर एक २ तोलेका लइ वनाचे, इसलको प्रातःकाल
खाकर दूध पीवे और पथ्यसे रहै खटाई न खाये तो उस मनुष्यका
कभी वीर्य क्षीण न होय और दश स्त्रियांसे मैथुन कग्नेपग्भी शिथिलना
न हो ॥ २८-३७॥
रतिवल्लभबिजयापाक ।
समूलपत्रशाखायास्तुला शक्राशनस्य च ॥
संरुध्योलूखले छित्त्वाऽपा द्रोणे हि तथा च वै ॥ ३८॥
काथं पादावशिष्टं तु वस्त्रपूतं च कारयेत् ॥
सीरप्रस्थं समादाय खंडस्याई शतं न्यसेत् ॥ ३९ ॥
शतावरी रसस्याप्टौ पिप्पल्याः कुडवस्तथा ॥
सर्वमेतत्समालोड्यू वृतग्रस्थेन मेलयेत् ॥१०॥
ओपधीनां ततञ्चूर्ण दापयेत्कलिकं पृथक् ॥
विकटु त्रिफला चव्यमेलावरपत्रकेशरम् ॥ ११ ॥
चित्रकं पिप्पलीमलं धान्यकाजाजिमेथिका ।।
कुष्टाब्दरेणुकाव्योपं भागी तादीशगग ॥ १२ ॥

भाषाटीकासमेतः। ६३ तालमूली विवृदंती श्रेयसी हिंगु पौष्करम् ॥ लवंगजातिकोपं च यमानी कारवी तथा ॥४३॥ शुभा जातिफलं चंद्रं शृंगी चैव विदारिका । अष्टवर्ग च काकोलं श्लक्ष्णचूर्ण च कारयेत् ॥४४॥ गुडवद्धिपद्वैद्यो मोदकं कारयेत्ततः । ॥ असमानं च जरध्वैषां शीतलं पाययेजलम् ॥ ४५ ॥ नाशयेच्छुकदोपं च पंढं चैवातिदारुणम् ॥ श्रीकर लाघवकर मेधाबुद्धिप्रवर्द्धकम् ॥४६॥ भांगके मूलपत्र शारवासमेत सब लेकर कूट लेवे ऐसी कुटी भांग ६। सवाछेसेर, ३२ सेर पानीमें पकावे, जव ८ सेर पानी वाकी रहै उसको शुद्ध वस्त्रम छान लेवे फिर इसमे गोदूध २ सेर, बूरा ६। सेर, शतावरका रम १ सेर, पिप्पलीका काथ १ सेर, घी २ सेर, सव मिलाके पकावे जव पकते २ गाढ़ा होजाय तो इसमें त्रिफला, त्रिकुटा, चव्य, छोटी इलायची, दालचीनी, तेजपात, नागकेशर, चित्रक, पीपलामूल, धनियां, जीरा, मेथी, मोटापूट, मोथे, रेणुका, त्रिकुटा भांर्गी, तालीसपत्र, नागकेशर, मुसली, निगोत. दन्ती, गजपीपल, होग, पोष्करमूल, लौंग, जावत्री, अजवायन, सौपा पीपल जायफारस, कपूर, काकड़ासिगी, विदारीकन्द, अष्टवर्ग (जीवया, नरूपएक सदा महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली ऋद्धी, वृद्धी,) शीतलचीनी, प्रत्येकका चूर्ण चार २ तोला मिलाके गुड़पाक विधिसे एकाकर दो २ नोरेले ल बनावे एक लाडू खाकर ऊपरसे थोडा जल पीये नो मनिवारण नपुंसकता दूर हो वीर्यके सब विकार दूर होकर पुरु- पार्ष २ ॥ ३८.-४६ ॥ रवष्टप्माष्टपाव पुराणं पीनमानीय कृष्माण्डस्य फलं महत् ।। तदीजाधारवीजत्वक् शिराशून्यं नमाचरेत् ॥४७॥ १ ६४ नपुंसकामृतार्णवः । -- ततस्तस्य तुलां नीत्वा पचेजलतुलाद्रये ॥ तस्मिन्नीरेऽर्धशिष्टे तु यत्नतः शीतलीकृते ॥४८॥ तानि कूष्माण्डखण्डानि पीडयेहढवाससा ॥ यत्नतस्तज्जलं नीत्वा पुनः पाकाय धारयेत् ॥४९॥ कूष्माण्डं शोषयेद्धर्मे ताम्रपात्रे ततः क्षिपेत् ॥ क्षित्वा तत्र घृतं प्रस्थं कूष्मांड तेन भर्जयेत् ॥ ५० ॥ मधुवर्णं तदालोक्य तज्जलं तत्र निक्षिपेत् ॥ सितायाश्च तुलां तत्र विस्वा तल्लेहवत्पचेत् ॥५१॥ सुपक्के पिप्पली शुंठी जीराणां द्विपले पृथक् ॥ पृथक् पलाई धान्याकं पत्रैलामरिचं त्वचम् ॥ १२ ॥ चूर्णमेपां क्षिपेत्तत्र घताध सौद्रमावपेत् ॥ एतत्पलमितं खादेदथवाग्निबलं यथा ॥५३॥ खण्डकूष्मांडलेहोयं रक्तपित्तं च नाशयेत् ॥ हंति कासक्षयादींश्च बलवीर्यविवर्द्धनः ॥५४॥ बड़े पकेहुवे पेठेके शुद्ध छिलेहवे टुकड़े १०० पल, लेकर २०० पल जलमं पकावे, जव जल, आधा वाकी रहे उतारकर ठंडा करके साफ वस्त्रमे खुब दवाकर छान लेवे, उस छनहुवे जलको अलग एक पात्रमं रख दो र उन पेठेके टुकड़ोंको कुछेक धूपमं सुखाकर, एक तांत्रिक पात्रमं? मेर डाल कर मन्द आंचसे भृनता जाय, जब पककर लाल होजाये, फिर वह नुचडाहुवा जल भी इसीम डाल देवे और १०० पल दशीमिर्ग डालकर अवलेहकी भांति पकावे, सिद्ध होने पर इसमें पीपल, मुष्ट, नीग प्रत्येक दोपल । धनियां, पत्रन इलायची, मिर्च, तेज, प्रत्येक दो ताला टन सवका चूर्ण करके डाल देव और खुब मिलाकर टंडा कर लं टंडा होने पर आधसेर शुद्ध शहद भी इसमें मिला देवे यह सण्टकृष्माटावंद बना भाषाटीकासमेतः । ६५ इसमेसे ४ तोला या जितना माफिक होवे, इसको नित्य प्रातःकाल खावे तो रक्तपित्त खांसी. राजयक्ष्मा. क्षय आदिरोग दूर हों, और बल तथा वीर्यकी वृद्धि होवे ॥ ४७-५४ ॥ केशरपाक। व्योपं चतुर्जातफलत्रिकं च लवंगकृष्णागरुचंदनं च ॥ काँडेक्षुबीजं करहाटकं च जातीफलं मर्कटिकाफलं च॥१६॥ शाल्मल्यनिर्यासबलाश्वगंधागोशूरबीजं मुसली कृमिघ्नम् ॥ समुद्रशोपं विपपंजरं च पुष्पं सजात्युद्भवकंकबीजम् ॥५६॥ सर्वेः समं योज्य सकुंकुमं च सुचूर्णितं विंशतिभागयुक्तम्॥ कस्तूरिकापोडशभागचूर्ण खंडं चतुर्भागयुतं विपक्वम्॥१७॥ दलानि हेमो द्विशतानि दत्त्वा तथैव देयानि च राजतानि॥ एकत्र सर्व विनिधाय वैद्यो जयाष्टभागं विदधीत लेहम्५८॥ जातीफलप्रमाणेन भक्षयेत्प्रातरुत्थितः॥ वीर्यवृद्धिं करोत्येष सर्वव्याधिविनाशनः॥ १९ ॥ दशकं रमते स्त्रीणां वृद्धोपि तरुणायते ॥ सर्वान्वातामयान्हंति प्रवृद्ध वातशोणितम् ।। काश्मीरकावलेहोयं बलकांतिविवर्द्धनः॥६०॥ त्रिपुरा चतर्जात, त्रिपाला, लोग सफेदचंदन, कालाअगर, तालम- खाणे, षषरकरा. जायफल. कौचके वीज सेमलका गोंद, गुलशकरी, भनगंप, गोखरू मुसरी वायविडंग,समुद्रशोप, विषपंजर, जवित्री, खरैटी यसप नमानभाग लेवे और केशर सब दवाईयोके चूर्णसे वीसवां भाग लेने पार परी सपने मोलवां भाग लेवे । सब दवाइयोसे चौगुनी शुद्धखांड लौरकी चासनी बनाकर उसमें विधिपूर्वक सब दवाइयोंका प्रक्षेप ६६ नपुंसकामृतार्णवः। करे फिर २०० वर्क सोनेके और २०० चांदीके इसीम मिलावे और केशरसे आठवाँ भाग विजया (शुद्ध भॉग) का बारीक चूर्ण मिलाकर एकजीव करके रक्खे, फिर इसमेंसे जायफलके वरावर नित्य प्रातःकाल शुद्ध होकर खावे यह केशरपाक वीर्यको वढावे और अनेकरोगीको दूर करता है,दशस्त्रीसे नित्यरमणकी सामर्थ्य पैदा करे, इसके प्रभावसे बुढा भी जवा- नकी सदृश मैथुन करे । सब किस्मके वातविकार और बढाहुवा वातरक्त इनको दूरकरे यह केशरावलेह बल और शरीरकी कांतिको बढाने वाला है ॥ ५५-६०॥ अमृतभल्लातकपाक। भल्लातकानां पवनोत्थिताना तरुच्युतानां च यदाढकं स्यात् घृट्वेटिकाचूर्णकणैर्जलैश्च प्रक्षाल्य संशोष्य च मारुतेन ६३ शुष्काणि तानि द्विदलीकृतानि विपाचयेदप्सु चतुर्गुणासु।। तत्पादशेष पुनरेव शीतं क्षीरेण तुल्येन विपाचयेत्तत्॥१२॥ तदर्खया शर्करया विमिश्य पश्चात्खजेनोन्मथनं विधाय ।। सन्यूपणं त्रैफलचंद्रमासी त्रिवृच्च वासी खदिरामृतं च॥६३॥ सचंदनाकल्लकणाकबावं सदेवपुष्पं मुसलीदयं च ॥ कंकोलमोचाह्वयदीप्ययुग्मं नतं समातंककणाविदारी६४ ॥ जातीफलं मुस्तकजातिपत्री कुबेरजीरागरुसाधिशोपम् ॥ मेदाइयं लोहरसेंद्रवंगमधं तथा कुङ्कुमकं च कर्पम् ॥६६॥ तत्सतराबादतिजातवीर्यं सुधारसादप्यधिकं वदति ॥ प्रातःप्रबुद्धः कृतदेवकार्यो मात्रा भजेत्सात्म्यागयोग्याम् ॥ नचानुपाने परिहार्यमस्ति नचातपे नाध्वनि मथुने च ॥ यथेष्टचेष्टो विचरेत्प्रयोगानगे भवेतांचनगशिगौरः ॥६॥ -- भापाटीकासमेतः। ६७ अनेन मेधानरसिंहवीयों दृढेंद्रियो व्याधिगतः सुबुद्धिः ॥ दंताविशीर्णाःपुनरेव दिव्याकेशाश्च शुभ्राः पुनरेव कृष्णाः६८ नीलांजनालिप्रतिमा भवंति त्वचो विशीर्णाः पुनरेव भव्या।। विशीर्णकर्णालिनासिकोपिकृम्यदितो भिन्नगलोऽपि कुष्ठी शुष्कः पुनः स्याद्गतमूलशाखस्तरुर्यथा भाति नवाबुसिक्तः।। वृहस्पतेरप्यधिको हि बुद्धया ग्रंथं विशालं च नवं करोति७० गृह्णाति सद्यो नच विस्मृति च करोति कल्पायुरनल्पवीर्यम्।। कुर्वन्निमं कल्पमनल्पवुद्धिर्जीवनरो वर्षशतं सुखी स्यात्७१ पके भिलावे जो पवनसे टूटकर गिरे हो ४ सेर लेकर ईटके चूर्णम घिस पर शुन्द्र जलसे धोकर पवनसे सुखालेवे । जव सूरव जावें तो एक २ के दो टुकडे करके, १६ सेर पानी में पकावे जव चारसेर पानी वाकी रहे उतार- पर टंदा परे । फिर उसमें चारसेर दूध मिलाके पकावे. पकनेपर दो सेर मिनी मिलाके मथानीसे मथ डाले फिर इसमें, त्रिकुटा, त्रिफला,कपूर, टामांसी, निसोथ, वंशलोचन, खेरसार, सिगियाविष, सफेदचन्दन, अक- पग पीपर कवायचीनी, लोग, सफेदमुमली राहमुसली, कंकोल, मंचर अजवायन, अजमोद उड़ गजपीपल. विदारीकंद, जायफल, नागरमोथा अवित्री लताकाज, अगर, जीरा. समुद्रशोप, मेदा, महामेदा. तहला चादर सनक केदार प्रत्येक एक २ तोला लेकर सबका गण भी पार मिला देवे. एक जीप करके चीकने बर्तन में भरकर सात नालाहले देटे तो यह अमृतमे जी अधिक गांपन्न अमृत- " नि होगया । इनममे प्रातःकाल नौवादि सममि निवृत्त माहिती पच सके उतनी मात्राने खाये अपग्मे गर्म जलका न कोई नहुमान है और यमे चना मधुर आहार ९.नी पदे इन नमारे मनुष्य नुवर्णना

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६८
नपुंसकामृतार्णवः ।
कांतिमान् रूपवाला हो, बुद्धि बढे, नरसिहसमान बल हो, इंद्रिये दृढ होत,
सब रोग दूर हों, गिरे दांत फिर पैदा हो सफेद वाल भौरेके समान काले
गुलजटियें दूर हो त्वचा मजबूत हो, जिसके कान नाक उंगली गिर
गये हो कृमि पड़रहे हों, गला बैठ गया हो, उस मनुष्यको इसके सेवनसे
ऐसा आराम हो जैसे जड़ शाखाहीन वृक्ष जलके संयोगसे हरा होजाता है,
इस प्रकार इसके खानेवाला मनुष्य भी सब रोगरहित रूपवान् होजाता
है और वृहस्पतिके समान बुद्धिवाला हो नया अन्य रचनेकी सामर्थ्य
हो, बात सुनतेही धारण करे, भूले नहीं, कल्पायु हो, अधिक वीर्यवान हो
इस भिलावे कल्पके सेवनसे सौ १०० वर्ष निरोग होकर जीवे ॥६१-७१॥
खोप्यापाक।
गोलकं नारिकेलस्य पाटयेच विधानतः ॥
पलाईमिक्षुरबीजास्तस्मिन्दत्त्वा विभावयेत् ॥ ७२ ॥
वटदुग्धेन संपूर्य दुग्धे वसुगुणे पचेत् ॥
चतुर्पले घृते भृष्ट्वा सिते प्रस्थे च मेलयेत् ॥ ७३ ॥
संस्कृत्य विधिवत्पाकं चूर्णानेतान् क्षिपेत्ततः॥
जातिपत्रं लवंगं च वंगं जातीफलं तथा ।। ७४ ॥
गोक्षुरांकों सुंठी कपिकच्छं बलां त्वचम् ।।
मधुयष्टी चोच्चटां च चूर्ण कृत्वा च प्रक्षिपेत् ॥ ७९ ॥
शीते मधु प्रदातव्यं कुडवेकप्रमाणतः॥
स्निग्धे भांडे निधायाथ मात्रा पलमिता भवेत् ।। ७६॥
अथवाग्निवलं दृष्ट्वाऽनुपानं पयसश्चरेत् ।।
वीर्यवृद्धिकरं चैव पण्ढादिदोपनाशनम् ॥
नारिकेलस्य पाकोयं वाजीकरणमुत्तमम् ॥ ७॥

भाषाटीकासमेतः। ६९ एक उत्तम नया नारियलका गोला लेकर उसको युक्तिसे ऐसा काटे कि कटाहुवा टुकड़ा फिर उसी खोपडेके मुहॅपर लगजावे जिसमसे, जिस जगेसें काटा हो फिर इसमें दोतोला तालमखाणेका चूर्ण डालकर इसको वड़के दृधमे भरदेवे, फिर इस तालवखाणे युक्त गोलेसे आठगुणें दूधमें इसको डालकरखोवा, करे, और खाँचेसे खूब रगडे ताके यह खोपडाभी दूधर्म मिलजावे यदि कुछ वाकी रहे तो उसे पत्थरसे पीस डाले फिर इसमें १६ तोला शुद्ध घी डालकर मंद आँचसे भून लेवे फिर १ सेर मिस- गकी तेज चासनी में इस खोयको डाल देवे फिर इसमे, जवत्री, लौंग, वंगभरम, जायफल, गोखरू, अकरकग, सुंठ, कौंचके वीज, खरटी, मुलठी, उटंगणकेवीज, प्रत्येक १॥ तोला लेकर चूर्ण करके मिलावे फिर ठंडा होनेपर १६ तोला शहद मिलाकर चिकने वर्तनमे राखे इसमसे चार तोला अथवा जितना माफिक आवे खाकर ऊपरसे दूध पीवे । यह नारि- केलपाक वीर्यचल" (नेवाला नपुंसकता आद दोर्पोका हरनेवालाहै और परम वाजीकरण ॥ ७२-७७ ॥ मेथीपाक। मेथीप्रस्थमिता पलद्वयमितं चूर्ण वरीसम्भवं त्ववपत्राऽनलविश्वजीरमगधाद्राक्षाशिवागोक्षुरम् ।। धात्रीनागवाणाप्रियंगुसुसलीकीनाशबीजैः समैः पिष्टैः सूक्ष्मतरं पलैकतुलितैः सर्वैः पृथक्पाचयेत्७८॥ गोदरधेन चतुर्राणेन विधिना मंदाग्निना वैद्यराट यावत्तद्धनतारियादथ ततः सर्वद्विभागा सिता ।। पाच्यापाच्यसुशीतमेतदखिलं दृष्ट्वा तदेलाद्वयं मनाचारमवाथ देवकुसुमं खार्जुरवातामकम् ॥ ७९ ॥ . - नपुंसकामृतार्णवः। जातीपत्रसमं विदल्यदलितं प्राग्गोघृतैर्भजिते युक्तांशैरवधूल्यमेव सकलं तन्मोदकान्कल्पयेत्॥ वंगाभ्रेण पलार्द्धकेन सहितान्संभक्ष्य यावद्रलं कांतासंगविलासभोगचपलो वृद्धो युवा वै भवेत् ॥८०॥ मेथीका चूर्ण १ सेर, सतावर १० तोला, तेजपत्र, चित्रक, सुंठ, सफेदजीरा, पीपल, दाख, हरड, गोखरू, आमले, गनपीपल, प्रियंगु, मुसली, कौंचके वीज, प्रत्येक चार २ तोला लेकर सबका चूर्ण करके सबसे चारगुणं दूधमें डालकर खोया करे फिर आधसेर धीमे उस और- धियुक्त खोयेको भूने जब मंद २ ऑचसे भुनकर तैयार होजावे फिर इसको दुगुनी खांडकी चासनीमे मिलावे जब देखे कि ठीकपाक तैयार हो गया फिर नीचे उतार लेवे और ठंडा करे तथा इसमे छोटी इला- यची, और बड़ी इलायची, पिस्ता, लोंग, छुवारा, बादाम चिगेजी जवत्री प्रत्येक १ तोला मिलावे । वंगभस्म, अभ्रक भस्म, ये दोनो दो २ तोला मिलाव, फिर इसके लट्ट बनाकर जटगग्निका बलाबल विचारकर खावे तो बृहामनुष्य भी युवा हो और स्त्रीसंगमे बटी चपलता दिखावे ॥ ७८-८० ॥ आमलापाक। सुपकधात्रीफलशुष्कचूर्णं पुनः पुनस्तन्मभावितं च ॥ शतैकवारान्परिशोप्य पश्चादघृतेन तुल्येन सिताइयेन८१॥ वृताईभागेन च मालिकेण विधाय पाकं सह दुग्धपानः ॥ भुंजीत यस्त्वाश च कामिनीनां दशंतु विद्रावयो पुगतान बच्छे पंकहुवे सखे आमलका एकंगर चूर्ण टेकर, गाव चामलो रसम भिगो २ कर मुखांव इसीतरह १०० दफा मुगाका ग ? गर उत्तम घी, २ सेर मिसर्ग,आयमेर शहद मिलाकर कलक अनुमान पाकर दृध पीवे इसके प्रभावम मनुष्य दावियोंको द्रापिन कमलाद८१-८२१

भाषाटीकासमेतः।
७१
छुवारापाक।
खर्जरप्रस्थं मगधापलैकं दुग्धेन संपाच्य चतुर्गुणेन ।
घृतेन संभयं पलाष्टकेन द्राक्षाश्वगंधामुसलीद्वयेन ॥८॥
लवंगजातीफलजातिपत्रीपत्राबलाकेशरकैः समांशः ॥
सर्वद्विभागासुसितासमेतं वंगाभ्रलोहै स्तुपलार्द्धमानैः॥८॥
मज्जात्रयाक्षोटककाश्मरीभिःसाकं विधायास्यच मोदकान्यः
पुष्टस्तु दृष्टःप्रमदामदनो मुंजीत वै रोगगणप्रमुक्तः ॥८॥
छ्वाग १ सेर (विना गुठली), पीपलका चूर्ण ४ तोले इन दोनोंको
४ चारसेर दृधर्म पकावे, जो गाढा होजाय तो आधसेर घीमें मंद २
यांचसे खूब भूने, फिर इसमें मुनक्का असगन्ध, दोनों मुसली, लौंग,
जायफल, जवत्री पत्रज, वला, केशर. प्रत्येक दो २ तोला लेकर चूर्ण
वारे फिर सब औषधियोसे दुगनी खांडकी चासनी करके उस चासनीमे
सब दवाइयोको मिला देवे, और वंगभस्म, अनकभस्म, लोहभस्म, प्रत्येक
दो २ तोला टाले फिर बादाम, पिस्ता, चिरौंजी, अखरोटकी, गिरू
किसमिस, मिलाकर लट्ट बनावे इनके खानेसे मनुष्य हष्टपुष्ट हो,गर्ववती
खियोक मानको भंजन घरे और सब रोगोसे रहित रहे ॥ ८३-८५ ।।
मुशलीपाक।
सुतालमूलाइयचूर्णमेव सुबटपूतं विनिगृह्य प्रस्थम् ॥
गोदुग्धप्रस्थैर्वसुभिश्च पाचं यावदनं तत्प्रसमीक्ष्य सर्वम्।।
पलाएकनाथ घृतेन भहा एलैकमानानि तथौपधानि ।
संवक्ष्यमाणानि गुरुतयुत्तया खंडं हिमानं सकल पधीभ्यः
गोरंटर. शतावरीभ्यां शिवाकणावानरबीजपत्रैः ॥
दबंगलार्जरसुजातपत्रीमनायैश्चंदनगोस्तनीभ्याम् ॥८८॥

७२
नपुंसकामृतार्णवः।
जातीफलैलानतवंगयुक्तं ग्राह्यं यथोक्तं सकलं पलेकम् ॥
पलद्वयं मोदकमस्य प्रातः सायं समश्राति समाक्षिकाज्यम् ।
वृद्धोपि तारुण्ययुतस्तरुण्या युक्तोपि चान्यास्तरुणीरिरंसुः॥
वीर्यप्रमोदेलपौरुषाभ्यां युक्तः सुदृग्रोगगणैर्विमुक्तः ॥९॥
दोनों मुसलियोंका चूर्ण १ सेर लेकर वस्त्रमें छानले । फिर ८ सेर गो
दुग्धमें डालकर खोवा करलेवे फिर इस खोवेको आधसेर घीमें भूनलेवे
फिर युक्तिपूर्वक इसमें गोखरू, तालमखाणे, शतावर, हरड, पीपल,
कौंचके वीज, पत्रज, लौंग, छुवारा, जवत्री, वादाम, पिस्ता, चिरौंजी,
चन्दन, दाख, जायफल,छोटी इलायची, वंगभस्म, प्रत्येकका चूर्ण चार
२ तोला, खांड सव औपधियोंसे दुगुनी डालकर विधिपूर्वक पाक बनावे
इसमसे ४ तोलाका लड्डू सवेरे और चार तोला सायंकाल घृत और सहत
मिलाके खावे तो वृद्ध पुरुपभी तरुणकी समान स्त्रीसे मैथुन करे और मैथुन
करताहुवा भी और स्त्रीरमणकी इच्छा करे और वल तथा वीर्यकी वृद्धि हो
आनंद और पुरुषार्थसे युक्त हो आंखोंके सब गेग दूर हो ॥ ८६-१० ॥
वादामपाक।
मज्जां वातादजं पिष्ट्वा प्रस्था) मानतो बुधः ॥
प्रस्थैकं च सिता पक्त्वा विधिना मलयेत्ततः ॥ ९१ ॥
पलद्वयं घतं दत्त्वा चूर्णानेतांश्च संक्षिपेत् ॥
एलाद्वयं जातिफलं लवंग केशरं त्वचम् ॥ ९२ ।।
कर्पकर्पप्रमाणेन चूर्णयित्वा विमेलयेत् ।।
मज्जाद्वयं पलकै दलाश्चाथ सुवर्णनान ॥ ९३ ॥
राजताञ्छतमानेन संमेल्य विधिना ततः ॥
पंचकर्षप्रमाणेन मोदकान्कारयेधः ॥ ९ ॥

. भाषाटीकासमेतः। धनिनां पुरवासानां भक्षणार्थ हि शोभनम् ॥ बलवृद्धिकरं शश्वद्वाजीकरणमुत्तम् ॥ ९५ ॥ छिलीहुई वादामकी गीरूकी पीठी आधसेर, शुद्ध मिसरी १ सेर लेकर विधिपूर्वक चासनी करे, इस चासनीम १० तोला शुद्ध घृत मिलावे फिर वादामकी पीठी भी इसीम मिला देवे, फिर छोटी इलायची, बड़ी इला- यची, जायफल, लोग, केशर, दालचीनी, एक २ तोला लेकर इनका बारीक चूर्ण इसीम मिलावे, चिरोंजी ५ तोला, पिस्ता ५ तोला, मिलाये, और १०० वर्क सुवर्णके, तथा १०० वर्क चांदीके मिलाकर पांच,२तोलेके लाडू वनावे यह लइ धनिक पुरुपीके और शहरों में रहनेवाले पुरुषोंके लिये बहुत अच्छे है वलको बढानेवाले और कामशक्तिको बलवान् करनेवाले हैं ॥ ९१-९५ ॥ मलाईपाक। संतानिकाह्यर्द्धप्रस्थं सितां प्रस्थां च संपचेत् ।। चतुर्पलं घृतं दत्त्वा कुर्यात्पाकं विधानतः ॥ ९६ ।। एलाद्वयं जातिपत्री काश्मीरं च लवंगकम् ।। प्रत्येवाकर्षमाचूर्ण्य दलांश्चैव सुवर्णजान् ॥ ९७ ॥ राजतान्मेलयित्वा च मोदकान्पलसम्मितान् । कारयित्वा विधानेन भक्षयेद्धनवांस्ततः ॥ वीर्यवृद्धिकरं शश्वद्वाजीकरणमुत्तमम् ॥ ९८॥ तम दूधकी मलाई प्राधमेर घी १ पाव शुद्ध देगी मिसरी १ सेर, इननसको मिलाकर मन्द भावपर विधिपूर्वक पाक बनावे फिर इसमें ही इलायची, वही इलायची, जवत्री, केटार, लीग, प्रत्येक एक तोला मित कार यथासंभव सदणके वर्क और चाटीके वर्क मिलाके पांच २ ये बह नावे फिर प्रातःकाल और मारंकाल इच्छापूर्वक -- ७४ नपुंसकामृतार्णवः। धनिक पुरुष खावे इसके खानेसे वीर्यकी वृद्धि हो तथा कामशक्ति युक्त बलवान् हो ।। ९६-९८ ॥ पिठ्ठीपाक। प्रस्थैकं माषजां पिष्टिं प्रस्थाई मुद्गजं तथा ॥ गोधूमानां च वै चूर्णमर्द्धप्रस्थप्रमाणतः ॥ ९९ ॥ घृते समे विभज्याथ सर्वांश्चैव पृथक्पृथक् ॥ पाकं चैव विधायाथ शर्कराप्रस्थकत्रयम् ॥ १० ॥ पाकं कृत्वा विधानेन पश्चाच्चूर्णांश्च मेलयेत् ॥ मुशलीद्वयमिखं च अश्वगंधा शतावरीम् ॥ १०१॥ वृद्धदारं कपीकच्छु पलैकांचूर्णयेत्पृथक् ॥ जातीफलं जातिकोशं आकारकरभं त्वचम् ॥ १०२ ॥ लवंगं चैव काश्मीरं तथैव नागकेशरम् ॥ वंगमभ्रं च संमेल्य कर्पकर्पप्रमाणतः ॥ १०३ ॥ कारयित्वा विधानेन द्विपलिकांश्च मोदकान ॥ प्रातर्नित्यं भक्षणीयं पाकोयं पिष्टिसंभवः ॥ १०४॥ कटीशूलं च काय च नाशयेन्नात्र संशयः ॥ वलवृद्धिकरं शश्वद्वाजीकरणमुत्तमम् ॥ १०५ ॥ उत्तम उडदकी दालकी बागकपिसी पीटी १ सेर, मुंगी दालकी पार्टी आधसेर, कणकका आटा आधा इनकी अलग २ वगवा २ घीम विधिपूर्वक भृन लेवे फिर तीन सेर उत्तम दी गांटी चागनी करे जब समझे कि चामनी तयार होगई तब तीनांचीज भुनीटा भी यह खांडकी चामनी दानाको ग्व मिला दो बार दगम, दाना मुगली तालमखाणे, असगंध, सनावर विधायग कोच मीनाकी गिम, मन्य- ७५ भाषाटीकासमेतः। कका चूर्ण चार २ तोले । जायफल, जंवत्री, अकरकरा; दालचीनी, लोग, केशर, नागकेशर, वंग, अभ्रक, प्रत्येक एक २ तोला मिलावे सबको अच्छी तरहसे मिलाकर दशर तोलेकी पिन्नी बनावे इस पिटीपाकको नित्य प्रातःकाल खावे तो कृशता कमरकी पीडा दूर होवे वलकी वृद्धि हो कामशक्ति वलवान् हो वीर्य बढे यह परमोत्तम पाकहै इसमें संशय नहीं ॥ ९९-१०५॥ एवं पाकविधानं च तरंगेस्मिन्हि वर्णितम् ॥ ज्ञातव्यं तात विधिना बलवृद्धिकरं महत् ॥१०६॥ इस प्रकार पाकों के विधानको इसतरंग; वर्णन करचुकेहे हेतात! इसको तुम विधिपूर्वक समझ लेना यह पाकावली परम बलवीर्यके बढानेवाल २॥ १०६ ॥ भी वैद्यपचान ५० रामप्रनादप्रणीतनपुसकामृतार्णवे बाजीकरणपाक वर्णनो नाम चतुर्थस्तरगः ॥ ४ ॥ अथ पञ्चमस्तरङ्गः। गुटिकारसादिवर्णनम् । शिप्य उवाच । अथ गुटिका रसांश्चैव पुरुषार्थप्रदायकान् ॥ वीर्यवृद्धिवरांश्चैव हि मे भिपजां वरः ॥ ३ ॥ इन उपात निष्प वीट हे भिपजांबर' वीर्यके वानवाल और पुर पर्व देनेवाती गोरिया और सका वर्णन कीजिये ॥ १ ॥ गरुरुवाच । तमुवान गुरुीमानायुर्वेदस्य पारगः विधिवर-यतां शिप्य गुटिकाश्च रसांस्तथा ॥ २ ॥ ॥

७६ नपुंसकामृतार्णवः। इस प्रश्नको सुनकर आयुर्वेदको जाननेवाले गुरु शिष्यको कहने लगे हैशिष्य! अब विधिपूर्वक नपुंसकताके नष्ट करनेवाली गोलियां और रसांका वर्णन सुनो ॥२॥ वल्लभागुटिका। बहुफली मोचरसं मुसल्यौ करहाटकम् ॥ तुगा च मर्कटी बीजं कोकिलाक्षमुटंगणम् ॥ ३ ॥ गोक्षुरं हामृतासत्त्वं जपापुष्यं लिसोरकम् ॥ मस्तगी जातिकोशं च लवंगं वंशजातकम् ॥ ४ ॥ एतानि समभागानि सिता च द्विगुणा भवेत् ॥ पाकं कृत्वा गुटीबद्धां कोलमात्रप्रमाणतः ॥ ५ ॥ सायंकाले भक्षयित्वा पिबेदुग्धं तदोपरि ॥ नपुंसकत्वरोगघ्नं वाजीकरणमुत्तमम् ॥६॥ बबूरके धीज, मोचरस, दोनों मुसली, अकरकग, वंशलोचन, काँचके वीज, तालमखाणे, उटंगणके वीज गोखरू, गिलोका सत, जपाके फूल, लिसोडे, मस्तगी जवत्री, लोंग, वंशलोचन, इन सबको समानभाग लेकर चूर्ण करे फिर सबसे दुगुनी मिसगैकी चासनीम मिलाकर छ २ मामेकी गोली वनावे नित्य सायंकाल खाकर उपग्मे दृध पीवे नपुंसकता दूर हो वीर्यकी वृद्धि हो ॥ ३-६॥ वाजीकरणगुटिका। करवीरस्य बीजानि बृहतीफलमेव च ॥ वृद्धदारस्य वीजानि वानरीवीजमूलकम् ॥७॥ एतानि समभागानि सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत् ॥ संमर्थ तांबूलरसे वटीवल्लयुगं कृतम् ॥८॥ एकैकं भभितं पुसां नपुंसकगदापहम् ॥ वीर्यवृद्धिकरं पुष्टं बलवाजीकरं परम् ॥९॥ २ ७७ भाषाटीकासमेतः। कटेरीके वीज. कनेरके वीज, विधायरेके वीज, कौंचके वीज, मूलीके वीज, इन सबका वारीक चूर्ण करके वंगला पानके रसमें खरल करके एक २ मासेकी गोली बनावे एकगोली नित्य खाकर दूध पीवे तो नपुं. सकता दूर हो बलवीर्यकी वृद्धि हो ॥ ७-९ ॥ चन्द्रोदयरस । पलं मृदुस्वर्णदलं रसेंद्रात्पलाष्टकं षोडश गंधकस्य । शोणैस्तु कासिभवैःप्रसूनैःसर्व विमथ कुमारिकाद्भिः१० तत्काचकुंभे निहितं सुगाढे मृत्कर्पटैस्तदिवसत्रयं च ॥ पचेक्रमानो सिकताख्ययंत्रे ततो रसः पल्लवरागरम्यः११॥ सौवर्णमेतत्सकलामयनं सर्वेषु योगेषु च योजनीयम् ।। निगृह्य चैतस्य पलं पलानि चत्वारि कर्पूररजस्तथैव ॥१२॥ जातीफलं चोपणमिंद्रपुष्पं कस्तूरिकायामिह शाण एकः ॥ चंद्रोदयोयं कथितोस्य मापोभुक्तो हि वल्लीदलमध्यवर्ती १३ मदोद्धतानां प्रमदागणानां गर्वाधिकत्वं श्लथयत्यवश्यम् ।। मृतं घनीभूतमतीवदुग्धमानंददायीन्यपराणि पथ्यम् ॥१४॥ उत्तम कन्दनसुवर्णके वर्क ४ तोले. शुद्ध पारा ३२ तोले. शुद्ध गन्धक ६४ तोले इनकी कजली करके लाल फूलकी कपासके फूलोंके रसमें खरल करे । फिर बिहदारवे. रसम ४ प्रहर खरल करे फिर आतशी शीसीमें म. रम भीसीपर ७ कपडमिट्टी करके वाटुकायन्त्रमे रखके नीचे आग देवे । नवीनीके मसले धूवा निकल जावे तब ईटके टुकड़ेसे शीसीका परख कर करदेव और मामले मंद मध्य, तीक्ष्ण आंच तीन दिनरात्रि देवे. भीतीकी नली काली होजाय तो नीचसे नाग निकाल देवे, फिर सागकर रोनेपर निचन्द्रोदयका ननि पत्रकी लालीकी समान लाल गरे द्रोदयको पीनी पाडका निकाल लेने इनको सर्व रोगोंमें अनुपान-

७८
तो
नपुंसकामृतार्णवः ।
भेदसे देवे चन्द्रोदय ४ तोला, भीमसेनी कपूर १६ तोला, जायफल.
लौंग, कालीमिर्च यह १६ तोला लेवे और कस्तूरी ४ मासे लेवे सबको
खरल करके शीसी में भरके रक्खे इसमें एकमासा पानमें रखके खाय
मदमाती स्त्रियोंके गर्वको अवश्य दूर करे इसके ऊपर कढकर गाढा हुवा
दूध पीवे और घृत, मिसरी, चावल, माप, आदि आनन्ददायक पथ्यभो-
जन करे ॥ १०-१४॥
लघुचन्द्रोदय रस।
जातीफलं लवंग च कपूर मरिचं तथा ॥
प्रत्येक तोलकं दत्त्वा सुवर्णस्य च माषकम् ॥ १५ ॥
अंडजं माषमानं च सर्वतुल्यमथेश्वरम् ॥
यत्नतो मर्दयेत्खल्वे चतुगुंजावटीं चरेत् ॥ १६॥
एप चंद्रोदयो नाम रसो वाजीकरः परः॥
हंति रोगानशेपाश्च बलवीर्याग्निवर्द्धनः॥१७॥
जायफल, लौंग, भीममेनीकपूर, कालीमिर्च,प्रत्येक एक २ तोला, सुप
के वर्क एक मासा, कस्तूरी एक मासा, रससिंदूर ४॥ तोला, गतको
एकत्र करके खरल करे पानके रसमं चार २ रत्तीकी गोलियां बनावे मला
ईके संयोगसे खाय ऊपर दूध पीवे यह चंद्रोदय ग्स वाजीकरण का
या सर्व रोगांको नष्ट करे । वल, कांति, वीर्य, जटगाग्नि इनको
.वे ॥ १५..१७॥
सिद्धस्तरस।
मुक्ताफलं शुद्धसूतं सुवर्ण गप्यमेव च ॥
यवक्षारं च तत्सर्व तोलके प्रकल्पयेत ॥ १८ ॥
रक्तोत्पलपवतोयर्मदयेत्पत्तलीकृतम् ॥
मर्दयेच पुनर्दत्त्वा गंधक तदनंतरम् ॥ १९॥

भाषाटीकासमेतः।
७९
शिवा काचघटीमध्ये सन्निरुध्य त्रियामकम् ।।
सिकताख्ये पचेच्छीते सिद्धं सूतं तु भक्षयेत् ॥ २० ॥
पंचरक्तिप्रमाणेन मुसलीशर्करान्वितम् ॥
शुक्रवृद्धिं करोत्येप ध्वजभंगं च नाशयेत् ॥ २१ ॥
दुर्बलं वपुरत्यर्थ
वपुरत्यर्थ बलयुक्त
बलयुक्तं करोत्यसौ॥
सुदगर्भ घृतं क्षीरं शालयो माहिषं हितम् ॥ २२ ॥
मोती, शुद्धपारा. सुवर्णभस्म, चांदीकी भस्म, जवाखार प्रत्येक एक २
तोला लेवे फिर लालकमलके पत्रोंके रसमें खरल करके वरावरकी शुद्ध
गन्धया मिलाके तीन प्रहर बरावर खरल करे फिर आतसी शीसी में भरके
वालवायन्त्रद्वारा तीन प्रहरकी आंच देवे स्वांगशीतल होनेपर इस सिद्ध
मृतको निकाल कर शीसीमें रक्खे । इसमंसे पांचरत्ती लेकर मूसली और
मिगरीम मिलाकर सेवन करे तो वीर्यकी वृद्धि हो इंद्रियकी शिथिलता और
अन्यविकार दूर हो । दुर्बल शरीरवाला भी इस रसके प्रभावसे बलवान
हो इसके सेवन समय मुंग, घी, दूध, सांठीचावल, भैसका दूध,
मययन, यर सब हित है खटाई, लालमिर्च, तेल आदि कुपथ्य त्याग
ये ॥ १८--२२ ॥
वसंतकुसुमाकररस।
दिमागं टाट चंद्रं त्रयो बंगाहिकांतकाः ॥
चतुर्भागं शुद्धमभं प्रवालं मौक्तिकं तथा ॥ २३ ॥
भाववेदव्यदुरधेन तथा चेक्षुरसेन च ॥
मालाक्षारसोदीच्यरम्भाकंदप्रसूनकैः ॥२४॥
भानपदररेनव मालत्या कुंकुमोदकैः ।।
पामृगमदेर्भाव्यं सुगंधिसभवम् ॥ २५ ॥

नपुंसकामृतार्णवः । कुसुमाकर आख्यातो वसंतपदपूर्वकः ॥ गुंजाइयेन संसेव्यः सितामध्वाज्यसंयुतः ॥२६॥ मेहन्नः कांतिदश्चैव कामदः पुष्टिदस्तथा ॥ वलीपलितनाशश्च श्रुतिभ्रंशं विनाशयेत् ॥२७॥ पुष्टिदोयं बलायुष्यपुत्रप्रसवकारकः ॥ तथा सोमरुज हंति साध्यासाध्यमथापि वा ॥२८॥ सुवर्णके वर्क दोतोला, वंगभस्म, शीशेकीभस्म, कांतलोहभस्म, प्रत्येक एकर तोला धान्याभ्रकभस्म,मोती, मूंगेकी भस्म, प्रत्येक चार २ तोला, सबको मिलाकर, गौके दृध ईखके रस अहसा, लाख, नेत्रबाला, केलाकंद, केलेके फूल, कमल, मालती, केशर, इनके रसोकी भावना देकर सुखाता जावे फिर कस्तुरी तथा और सुगंधित रसांकी भावना देवे फिर इस वसंतकुसुमाकर रसकी दो २ रत्तिकी गोलियां बनाकर, मिसरी, सहत, धीमे मिलाके खावे तो सब प्रकारके प्रमहाको नाश करे । कांति और कामशक्ति बढाव शरीरको पुष्ट करे । वलीपलितका नाशकरे, बहरेपनको दूरकरे, वीर्यको पुष्ट करे । बल तथा आयुको वढावे, संतानको देनेवाला, साध्य तथा असाध्य सोमगेगका नाश करने- वाला यह रसहै ॥२३-२८॥ पूर्णचंद्ररस । मृताभ्रलोहं सशिलं जतु स्याद्विडंगताथे मधुना घृतेन ॥ पिष्टंप्रशस्तं खलु पूर्णचंद्रोमापोस्य पुष्टय भवतिप्रशस्तः रससिंदूर अभ्रकभस्म शिलाजीत. वायविडंग, मुवर्णमाक्षिकभम्म इन सवको समानभाग लंकर खरल करके रपे । इमममे शहद और वृतम मिलाकर एकमामा खावे तो यह पूर्णचंद्रग्म अत्यंत पुटि का १२३...', .

भाषाटीकासमेतः। ८१ कामदेवरस । तारं वनं सुवर्णं च तानं सूतकगंधकम् ॥ लोह क्रमविवृद्धानि कुर्यादेतानि मात्रया ॥ ३० ॥ विमर्च कन्यकाद्रावैर्त्यसेत्काचमये घटे ॥ विमुद्रच पिठरीमध्ये धारयेत्सैंधवैभृते ॥३१॥ वहिं शनैःशनैः कुर्यादिनैक तु तदुद्धरेत् ॥ स्वांगशीतं च संचूर्ण्य भावयेदर्कदुग्धकैः ॥३२॥ अश्वगंधा च काकोली वानरी मुसली क्षुरा॥ त्रिवारं च रसैर्भाव्य शतावर्याश्च भावयेत् ॥३३॥ कस्तुरीव्योपकर्पूरं कंकोलेल लवंगकम् ।। पूर्वचूर्णादष्टमांशमेतच्चूर्ण विमिश्रयेत् ॥ ३४ सर्वेः समां शर्करांच दत्त्वा शाणोन्मितं पिबेत् ॥ गोदुग्धद्विपलेनैव मधुराहारसेवकः ॥३५॥ अस्य प्रभावात्सौंदर्य बलं तेजो विवर्तते ॥ तरुणीरमयेदृद्धो न च हानिः प्रजायते ॥ ३६॥ रूपरस हीरेकी भस्म. सुवर्णभस्म, ताम्रभस्म, शुद्धपारा, शुद्धगंधक, सामरम या ब्रामसे एक से दूने लेवे सबकी कजली करके घीकुमारके रसम खरर करे पिर आतशी शीसीमे भरके कपडमिट्टीकर छेदवाली टीम रखदेवे बोर उस हांडीको सेधेनमकसे भरदेवे फिर एक दिनरात मंद झाव देवे जब स्वांग शीतल हो तो निकालकर खरलमें डाले फिर भाय पे पी एच. भावना देवे और असगंध, काकोली, कोच, मुसली, तालमखाने इनवे रमकी तीन २ भावना देवे तथा शतावरके रसकी तीन मरना । पिर बाती. विटा. कपूर कंकोल इलायची, लौंग, ET पूर्णत भएमा मिराहे मिनरी सबकी वरावर मिलावे

नपुंसकामृतार्णवः।
फिर इसमेसे चार मासे औषधी भक्षण कर आधपाव दूध पीवे और
इसके सेवन समय मीठे चिकने पदार्थही खावे खटाई, लालमिर्च.
वातकर्ता, आदि कुपथ्य न खाय तो इस रसके प्रतापसे सुंदरता. वल
तेज, बढे और वृद्ध मनुष्यभी स्त्री रमणकरे तथापि उसके कोई हानि न
होवे ॥ ३०-३६ ॥
बृहत्पूर्णचंद्ररस।
द्विकर्ष शुद्धसूतस्य गंधकं च द्विकार्षिकम् ॥
लोहभस्म परं चाभ्रं जारितं च पलांशकम् ॥ ३७॥
द्वितोलं रजतं चैव वंगभस्म द्विकार्पिकम् ॥
सुवर्ण तोलकं चैव तानं कांस्यं च तत्समम् ॥ ३८॥
जातीफलं चंद्रपुष्पमेला भृगं च जीरकम् ॥
कपूरं वनितामुस्तं कर्षकष पृथक् पृथक् ॥ ३९ ॥
सर्व खल्लतले सिवा कन्यारसविमर्दितम् ॥
भावयित्वा वरातोयैः केंबुकानां रसेन च ॥ ४० ॥
एरंडपत्रैरावेष्टय धान्ये रात्रिदिनोपितम् ॥
उद्धृत्य मर्दयित्वा च वटिका चणसम्मिताम् ॥११॥
खादेच पर्णखंडेन संयुक्तां व्याधिनाशिनीम् ॥
सर्वव्याधिविनाशाय काशीनाथेन भापितः ।। १२ ।।
पूर्णचंद्ररमो नाम सर्वरोगेषु योजयेत् ॥
वल्यो रसायनो वृप्यो वाजीकरण उत्तमः ॥१३॥
अयमष्टीलिकां हंति कामश्वासमगेचकम् ॥
आमसुलं कटीशुलं हृच्छूलं पित्तलकम् ॥ ४ ॥

भाषाटीकासमेतः। ८३ अग्निमांद्यमजीर्ण च ग्रहणी चिरजामपि ॥ आमवाताम्लपित्तं च भगंदरमपि द्रुतम् ॥४५॥ कामलां पाण्डुरोगं च प्रमेहं वातशोणितम् ॥ नातः परतरः श्रेष्ठो विद्यते वाजिकर्मणि ॥४६॥ रसस्यास्य प्रसादेन नरो भवति निर्गदः ॥ मेधां च लभते वाग्मी सर्वशास्त्रसमन्वितः ॥४७॥ मदनस्य समा कांतिर्मदनस्य समं बलम् ॥ गीयते मदनेनैव मदनस्य समं बपुः ॥४८॥ स्त्रीणां तथानपत्यानां दुर्बलानां च देहिनाम् ॥ क्षीणानामल्पशुक्राणां वृद्धानां वातरेतसाम् ॥ ओजस्तेजःकरश्चायं स्त्रीषु कामविवर्द्धनम् ॥ १९ ॥ अभ्यासेन निहंति मृत्युपलितं सर्वामयध्वंसनो वृद्धानां मदनोदयोदयकरः प्रौढांगनासंगमे ॥ नित्यानंदकरः सुखातिसुखदो भूपैः सदा सेव्यते दृष्टः सिद्धफला रसायनवरः श्रीपूर्णचंद्रो रसः ॥५०॥ राजपारा दो तोला शुद्धगंधक दो तोला, लोहभस्म ४ तोला, चांदीकी परम दो तोला सुवर्णभस्प एकनोला, तांबेकी भस्म १ तोला, कांस्यभस्म तोल नायपर लांग लायची, भांग, जीग कपूर फूलप्रियंगु, नागामापे. प्रत्य. एक. २ तोला लेने । इन नवको खरल में डालकर विवार को सार करें रिर त्रिफलेके रममे खग्लकर अयदा बाम र कर सहावे फिर मुमारीके काटेकी भावना देकर गोला नाकर गोको एरंट. पनोंमे र पेटकर तीन दिनरात धानोंकी निनाद जिस दिन निर'लका पानीमे चनेशी वरावर ८४ नपुंसकामृतार्णवः । गोलिये वनावे । एकगोली पानके साथ खाय यह संपूर्ण व्याधियांके नाशनार्थ काशीनाथ आचार्यने कहाहै इसपूर्ण चंद्ररसको संपूर्ण रोगीमें देवे । यह बलकारी, रसायन वृष्य, उत्तम वाजीकरण कर्ता तथा अष्ठी- लिका, खांसी, श्वास, अरुचि, आमशूल, कटीशूल, हृच्छूल, पित्तशूल, मंदाग्नि, अजीर्ण, पुरानी संग्रहणी, आमवात, अम्लपित्त, भगंदर, कामला, पांडुरोग, प्रमेह, वातरक्त, इन सवको दूरकरे । इससे बढ़कर वाजीकर्ता दूसरा रस नहीं इसके प्रभावसे मनुष्य रोगरहित होताहै सब शास्रीके जाननेकी बुद्धि हो कामदेवके समान कांति, बल, बडाई, और देह हो । स्त्रियोंको जिनके संतान न होती हो ऐसे दुर्वल पुरुपोको क्षीण, अल्पशुक्र, वृद्ध, वातरेतस, इनको ओज और तेजका देनेवाला, स्त्रियों में काम वढानेवाला और अभ्याससे सेवन किया अकालमृत्यु और बुढा- पेको रोंकताहै, संपूर्ण रोगोंको नष्ट करता है, वृद्धपुरुषों को भी स्त्रीसंगमे कामवृद्धि करता है नित्य आनंदकारी, अत्यंत सुखदाता, अनुभव किया हुवा राजाओंके सेवन करने योग्य, रसायनों में श्रेष्ठ यह श्रीपूर्ण- चंद्ररस है ॥ ३७-५० ॥ मकरध्वजरस। स्वर्णद्विभागौ वंगं च मौक्तिकं कांतलोहकम् ॥ जातीकोपफले सूप्यं कांस्यक रससिंदुरम् ॥५१॥ प्रवालचंद्रं कस्तूरी अभ्रकं चैकभागिकम् ॥ स्वर्णसिंदूरतो भागाश्चत्वारः कल्पयेधः ॥५२॥ नातः परतरः श्रेष्टः सर्वरोगनिपूदनः ॥ वीर्यवृद्धिकरश्चैव वाजीकरण उत्तमः ॥५३॥ सुवर्णभस्म दोतोला, बंगभस्म, मक्तिकभम्म, कानयोहमम्म, जाय- फल, जावत्री, चांदीकी भस्म, कांसीकी भस्म, रममिंदर, प्रन्यक पर । -- -- भापाटीकासमेतः। तोला स्वर्णसिदूर ४ तोला, सवको एकत्रकर पानके रसमें खरल कर सेवन करे यह सर्वरोगोंको नष्ट करनेवाला और वीर्यको बढानेवाला उत्तम वाजीकरण है ।। ५१--५३ ।। श्रीमन्मथरस। रसगंधकयोग्राह्यं कर्पमेकं तु शोधितम् ।। अभ्रं निश्चंद्रकं दद्यात्पलाई तु विचक्षणः ॥५४॥ करं शोधितं दद्याद्वंगं च कोलसंमितम् ॥ तानं कोलार्द्धकं तत्र निःशेष मरिचं क्षिपेत् ॥ ५५॥ लौहं कर्ष सुजीर्णं च वृद्धदारुकबीजकम् ।। विदारी शतमूली च क्षुरबीजं वला तथा ॥५६॥ एकटयतिबला चैव जातीकोषफले तथा ॥ लवंगं विजयाबीजं श्वेतसर्जयमानिका ॥१७॥ एतेषां चूर्णमादाय प्रक्षिपेच्छाणसंमितम् ॥ गुंजाइयं च भोक्तव्यं कोष्णं क्षीरं पिबेदनु ॥ १८ ॥ प्रमदा यस्य विद्युते गृहे च न्यवसायिनः॥ न तस्य शिश्नशैथिल्यमापधस्यास्य सेवनात् ॥ ५९॥ न च शुक्राक्षयं याति न बलं हासतां व्रजेत् ॥ कामरूपी भवेद्दिव्यो वृद्धः पोडशवार्षिकः ।।६० ॥ रसायनवरो बल्यो वाजीकरण उत्तमः॥ रस श्रीमन्मथो नाम रसेषु झुत्तमः स्मृतः ॥ ६१॥ पास १ तोला. शुद्धगंधर. १ नोला उत्तम अभ्रकभरम दो तोला नीता और गभन्म प्रत्येक आट २ मामे ताम्रभस्म ८ मासे : : तालिले वीक, विद्यारीकंद, मनावर नालमखाने,

८६
नपुंसकामृतार्णवः।
खरटी, कौंचके वीज, गंगेरन, जायफल, जावत्री, लौंग, भांगके बीज,
सफेद राल, अजवायन, प्रत्येकका चूर्ण चार २ मासे लेवे। पहले पारे
गंधककी कजली करके फिर उसमें सब धातुवोको मिलाके एकजीव करे
फिर सबको मिलाकर पानके रसमें खरल कर दो २ रत्तीकी गुटिका बना-
लेवे गोली खाकर ऊपरसे थोडा गर्मदूध पीवे । तो इस रसके प्रभावसे
जिस व्यवसायी पुरुपके घरमें बहुत स्वियं होवे उसकी इंद्रियमें भी
शिथिलता नहीं आती और न वीर्यक्षीण हो न बलकी हानि हो। इसके
प्रभावसे वृद्ध भी १६ वर्षके समान रूपवाला हो यह रसायन
बलकारी और उत्तम वाजीकरण है श्रीमन्मथग्स रसाम उत्तम
कहाहै ॥ ५४-६१॥
बृहच्छंगाराभ्रक।
पारदं गंधकं चैव टंकणं नागकेसरम् ॥
कर्पूरं जातिकोपं च लवंगं तेजपत्रकम् ॥ ६२॥
एतेपां कर्पभागानि सुवर्ण तत्समं भवेत् ॥
शुद्धकृष्णाभ्रभस्मापि चतुष्कं पिचुभागिकम् ।। ६३ ॥
तालीशं वनकुष्टं च मांसी पुष्पवरांगकम् ॥
एलाबीजं विकटुकं त्रिफला गजपिप्पली ॥ ६४ ॥
एपां कर्पद्वयं चैव पिप्पलीरसभावितम् ॥
अनुपानं प्रयोक्तव्यं चोचं क्षौद्रसमायुतम् ॥६५॥
नानारोगप्रशमनं विशेपाकासगेगनुत् ॥
वातिकं पैत्तिकंचव श्येमिकं सानिपातिकम् ॥६६॥
हृच्छूलं पाशुलं च शिनःशुलं विशेषतः ॥
स्वरामयं तथा कुष्टं श्लेप्माणं वातशोणितम् ॥ ३७॥

८७
-
भाषाटीकासमेतः।
रक्तपित्तं च कासं च नाशयेन्नात्र संशयः॥
मुसलीघृतक्षौदैश्च वाजीकरणमुत्तमम् ॥ ६८ ॥
शुद्धपारा, शुद्धगन्धक, सुहागा, नागकेशर, भीमसेनी कपूर, जायफल,
लोग, तेजपात, प्रत्येक एक २ तोला । सुवर्णके वर्क एक तोला शुद्ध
धान्याभ्रकभस्म ४ तोला, तालीसपत्र, नागरमोथा, कूठ, जटामांसी,
जावत्री, दालचीनी, छोटी इलायची, सोंठ, मिरच, पीपल, हर्ड, बहेडा,
आमला. गजपीपल, प्रत्येक दो २ तोला लेवे, इन सबका चूर्णकर पीप-
लव कायकी भावना देवे तो यह रस तैयार होगया । इसको दालचीनी
और महतसे चाटे तो यह अनेक रोगोको नष्ट करे विशेषकर खांसीको
नष्ट करे । वातके, पिचके कफके, सन्निपातके रोगोको नष्ट करे, तथा हृद-
यका शूल, पार्श्वगूल, मरतकपीडा. स्वरभंग, कुष्ठ, कफके रोग, वातरक्त,
रत्तापित्त, इनको दूर करता है मुमली और घी, शहद, इनके संयोगसे
रवार तो यह परम वाजिकर्ता है ॥ ६२ -६८ ॥
पुप्पधन्वारस।
ररजभुजगलोहान्यभ्रकं च त्रिभाग
कनवा विजययष्टी शाल्मली नागवल्यः ।।
सितमधुपृतदुरधैः सेवितो वीर्यवृद्धी
रमयतिबदुरांताः पुष्पधन्वा रसः स्यात् ॥ ६९ ॥
पान नाग नामकी भस्म १ भाग. लोहभस्म १ भाग, अभ्रक,
१२ भाग. रसको एकत्र कर तरेदे. रसकी एक भावना और भांग,
मगर पान करे सकी एक. २ भावना देवे फिर इसको मिसरी,
पदक मित्र चाट उपरते दृध पीई इसके प्रभावसे वीर्यकी वृद्धि
शिरमा यो पर पुरयन्का रस है ॥ ९ ॥

८८ नपुंसकामृतार्णवः । कन्दर्पसुन्दररस। सूतो वज्रमहिमुक्ता तारं हेम सिताभ्रकम् ॥ रसः कासकानेतान्मर्दयेदरिमेदजैः ॥ ७० ॥ प्रवालं चूर्णगंधञ्च द्विद्धिकर्ष विमिश्रयेत् ॥ स्वरसे वाजिगंधाया विमर्थ मृगशृंगके ॥ ७१ ॥ विस्वा मृदुपुटे पक्त्वा भावयेद्धातकीरसैः ।। काकोली मधुकं मांसी बलात्रयविगुदम् ॥ ७२ ॥ द्राक्षा पिप्पली वंदा कबरी पर्णीचतुष्टयम् ॥ परूषकं कसेरुश्च मधुकं वानरी तथा ॥ ७३ ॥ भावयित्वा रसैरेषां शोपयित्वा विचूर्णयेत् ॥ एला त्वक्पत्रकं मांसी लवंगागरुकेशरम् ॥ ७४ ॥ मुस्तं मृगमदं कृष्णा जलं चंद्रश्च मिश्रयेत् ॥ एतचूर्णैः शाणमितेः रसं कंदर्पसुंदरम् ॥ ७५ ॥ खादेच्छाणमितं रात्रौ सिता धात्री विदारिका । एतेषां कर्पचूर्णेन सर्पिष्मण सम्मितम् ॥ ७६ ।। तस्यानुद्विपलं क्षीरं पिवेत्सुखितमानमः ॥ रमणी रमयेद्वहीन हानि कापि गच्छति ॥ ७७॥ शुद्धपाग, हीरेकी भस्म, गीमेकी मम्म,मोतीकी मम्म, चादीकी मम्म, सफेद अभ्रकमम्म, प्रत्येक चार२ तोला लेकर कपागके फूलों के गीत भावना और खरंक कायकी एक भावना देवे,फिर मुंगी भम्म दा नाला शुद्धगन्धक तोला,लेकर अमगन्धक ग्मम पाट करके द्विग्न के गागामि मा देवे फिर उन मांगीर कपटमिट्टी कर लयमंपुटम पृ दो,सिर वारकर, - भाषाटीकासमेतः। काकोली, मुलठी, जटामांसी, वला, अतिवला, नागवला, भसीडा, हिंगोट, दाख, पीपल, वांदा, शतावर, शालपणी, पृष्ठपर्णी, मापपर्णी, मुद्गपर्णी, फालसा, कसेरू, महुवा, कोचके वीज, इनमेंसे जिसका रस मिले रसकी चरना काथकी अलग २ भावना देकर सुखाता जावे । फिर इलायची, तज, पत्रज, जटामांसी, लौंग, अगर, केशर, नागरमोथा, कस्तूरी, पीपल, नेत्रवाला, भीमसेनी कपूर, इन सवका चूर्ण मिलावे तो यह कन्दर्पसुन्दर ग्स तयार हुवा । इसमेसे चार मासे लेकर उसमें भामले, विदारीकन्द, मिसरी प्रत्येक एक २ तोला मिलाकर रात्रीके समय खावे ऊपरसे आध पार पहा दूध पीने और प्रसन्नचित्त रहे तो इसके प्रभावसे अनेक स्त्रियोंसे गमन करके भी वीर्यहानी नहीं होती ॥ ७०-७७ ।। लक्ष्मीविलासरस। पलं कृष्णाभ्रचूर्णस्य तदछौ रसगंधकौ ॥ करं वै तदर्द्ध च जातीकोपफले तथा ॥ ७८ ॥ वृद्धदारुकबीजं च बीजमुन्मत्तकस्य च ॥ त्रैलोक्यविजयाबीजं विदारीकंदमेव च ॥७९॥ नारायणी तथा नागबला चातिबला तथा ।। बीजं गोक्षुरकस्यापि नैचुलं बीजमेव च ॥ ८० ॥ एतेषां कार्पिकं चूर्ण पर्णपत्ररसेन च ॥ निप्पिय वटिका कार्या त्रिगुंजाफलमानतः ॥ ८१ ॥ निरंति सन्निपातोत्थान्गदान्घोरान्सुदारुणान् ॥ बातोत्थानपिपित्तोत्थानास्त्यत्र नियमःक्वचित्।। ८२ ॥ कुटमष्टादशविधं प्रमेहान्विशति तथा नाडीव्रणं नणं घोरं शुदामयभगंदरम् ।। ८३॥ %3D ॥ ९० नपुंसकामृतार्णवः । श्लीपदं कफवातोत्थं चिरजं कुलसंभवम् ॥ गलशोथमंत्रवृद्धिमतीसारं सुदारुणम् ॥ ८४ ॥ कासपीनसयक्ष्माशः स्थौल्यदोर्गंध्यमेव च ॥ सर्वशूलं शिरःशूलं स्त्रीणां गदनिषूदनम् ॥ ८५॥ वटिका प्रातरेकैकां खादेन्नित्यं यथाबलम् ।। अनुपानमिह प्रोक्तं मांसं मिष्टं पयो दधि ॥ ८६॥ वारिभक्तसुरासीधुसेवनात्कामरूपधृक् वृद्धोपि तरुणस्पर्धी न च शुक्रस्य संक्षयः ॥ ८७ ॥ उत्तम शुद्ध सहस्रपुटी कृष्णाभ्रकभस्म ४ तोला, पारा, गन्धक, दोनों दो २ तोला, भीमसेनी कपूर? तोला, जायफल, जावत्री, विधायरेके बीज, धतूरेके वीज, भांगके बीज, विदारीकन्द, शतावर, बला, अतिवला,गोसा, समुद्रफल, इन सबको एक २ तोला लेवे और इन सबको बारीक चूर्ण करके पानांके रसमें खरलकर । तीन २ रत्तीकी गोलियां बनावे । यह गोलियां सन्निपातसे हुवे दारुण रोगोंको दूर कर और वातमे पैदा हुंचे रोग, पित्तसे पैदा हुवे रोग, और सब किस्मके रोग, अठारह कुष्ठ, वीम प्रकार के प्रमेह, नासूर, घाव, भगंदर, कफवातमे हुवा श्लीपद, गलेकी ग्रजन, र वृद्धी, अतिसार, खांसी, पीनस, क्षयी, बवासीर, मेदगेग, देहकी दुर्गनि, मव किस्मके शूल, गिरका दर्द, स्त्रियांके रोग, यह गव इम लक्ष्मीविना सके सेवनसे दूर होतेहै,। इसको प्रातःकाल जटगग्निका बलावल विचारकर खावे और इमको खाकर मांसरस अथवा दूध पीये और मीट अन्न, दूर दही, घृत, जलमे पके चावल, मद्यपिशेप, आमा, दनका मेपन को और पथ्यमे रहे। इसके सेवनमे बूढाभी कामदेवके समान रूपपान हा और बुर की सहा वीगमनकी इच्छा करे और यथेच्छ पियां में गमन करने पर भी वीर्यकी हानि न हो ॥ ७९-८७ ।।

भाषाटीकासमेतः। ९१ - A श्रीकामदेवरस। कामदेवमथो सूतं कामिनां कामवृद्धये ।। यस्य प्रसादतो बल्यो रम्यश्च रमते स्त्रियम् ॥ ८८॥ पारदं पलमेकं स्यादिपलं शुद्धगंधकम् ॥ रक्तकासितोयेन घृष्ट्वा काचस्य कुप्यतः ॥ ८९॥ निक्षिप्य टंकणेनैव सुखं तस्य निरोधयेत् ॥ वालुकायंत्रमध्यस्थं कुप्यं च कुरुते दृढम् ॥ ९० ॥ अहोरात्रं पचेदग्नौ शास्त्रवित्कुशलो भिषक् ॥ शीते चादाय पात्रस्थं कृपिकांतरलंबितम् ॥ ९१ दरदेन सयं रक्तमुज्वलं भस्म यद्भवेत् ॥ भक्षयेन्मापसेकं च घृतेन मधुना सह ॥ ९२ ॥ पश्चाएरधं गुडं चाज्यं कृष्णेक्षुमपि शर्कराम् ॥ द्राक्षाखर्जूरमधुकप्रभृतीनथ भक्षयेत् ॥ ९३ ॥ त्रिफलामधुना याति शांति पितं चिरोद्भवम् ।। निर्गण्डियारसेनात्र दुर्वारा वातवेदना ।। ९४ ।। प्रशमं याति वेगेन नृतनं च वपुर्भवेत् ।। वीर्यवृद्धिप्रभावेण वृद्धोपिरमते स्त्रियम् ॥ ९५ ।। पाल्देव नार दान यह दोनों कार्मा पुरुषको काम वृद्धि कारक है शिकतानाताने निरभी रवान् और सुन्दर होकर विषाने रमण समान ४ तोरा राद गन्धर, ८ तोला दोनांकी कजली करके ती जपान दो प्रहर साल करके आतमी गामि भग्ने REATो साग बन्द गर बार मापत्रद्वारा शावत जानने एए. दिनानिही गंद देवे मिन्दानगीर होने पर उन नपुंसकामृतार्णवः। रसको शीसीसे निकाल ले, वह रस सिंगरफके रंगका लाल वर्ण निक- लेगा। इस रसको १ मासा घी और सहतसे खावे और घी, खांड, दूध, कालीमिर्च, छुवारा, महुवा, आदि मधुर और चिकने पदार्थ खाय भौर पथ्यसे रहे । त्रिफला और सहतसंग इस रसको खाय तो पित्तके रोग शान्त हो । निर्गुडीके रससे खाय तो दुनिवार वातकी पीडा शान्त हो और नवीन देह हो, इस रसको वाजिकर्ता पदार्योंसे सेवन करे तो वीर्यकी वृद्धि होनेसे वृद्धपुरुष भी स्त्रीरमण करे ॥ ८८-९५ ॥ रससेवनमें आज्ञा। रससेवी नरः पथ्यं सेवेत वा ह्यतंद्रितः ॥ तैलमम्लं च तीक्ष्णं च कुपथ्यं परिवर्जयेत् ॥९६॥ रसको सेवनकर्ता मनुष्यको सावधानीसे रहकर पथ्यही सेवन करना चाहिये और तेल, खटाई, लाल मिरच, आदि तीक्ष्णपदार्थ और कुग- थ्यको त्यागदेवे ।। ९६ ॥ कस्तुरीगुटिका। सुवर्ण मृगनाभिं च रौप्यकाश्मीरको तथा ॥ लघुएला जातिफलं तुगा क्षीरी तथैव च ॥ ९७ ॥ जातिपत्रीं च संचूर्ण्य भागवृद्धया प्रयोजयेत् ॥ अजादुग्धे च संपेश्य नागवल्लीरसे तथा ॥ ९८ ॥ दिनत्रयं विमर्याथ युग्मगुंजासमा वटी संतानिकायुतं भुक्तं रेतःक्षयनिवारणम् ॥ ९९. ॥ मधुना मेहनाशाय शथिल्ये पानमंयुतम् ॥ गुटिकां भक्षयेद्धीमान्धातुमंजीवनी शुभाम ॥ १०. '

भापाटीकासमेतः।
९३
सुवर्णके वर्क १ भाग, कस्तूरी २ भाग, चांदीके वर्क ३ भाग, केशर
४ भाग, छोटी इलायचीके बीज ५भाग, जायफल ६ भाग, वंशलोचन
७ भाग, जावित्री ८ भाग इन सवका चूर्णकर वकरीके दूधमे और पानके
रसम तीनदिन खरल करके दो २ रत्तीकी गोलियां बनालेवे । जिसकी
धान क्षीण होगई हो उसको मलाई के साथ या मलाईके पाककी साथ
खिलावे और सहदके साथ प्रमेहांके नष्ट करनेको देवे । पानके संग शिथि-
लताम, देवे इसमकार इन शुभधातुसंजीवनी गोलियोंको बुद्धिमान
मनुष्य सेवन करे ॥ ९७-१०० ॥
वीर्पस्तंभी गुटिका।
जातीफलं लवंग च जातीपत्रं सकुंकुमम् ।।
सूक्ष्मेला चाहिफेनं च आकारकरभस्तथा ॥१०१ ॥
प्रत्येक कर्षमात्राणि कर्पूरं शाणमात्रकम् ॥
नागवल्लीदलरसेवटी चणकसन्निभा ।। १०२॥
वीर्यसंस्तंभनी ह्यपा बलवर्णाग्निदीपनी ॥
भुक्त्वा शयनसमये पिबेदुग्धं सितायुतम् ॥ १०३॥
जायपाल. टोग, जावत्री, केशर छोटीइलायची, अफीम, अकरकरा,
प्रत्येक एक २ तोला. भीमसेनीकपूर ४ मासे, इन सवको नागरवेलके
पानवे समझे खरर करके चणेके प्रमाण गोलियां बनाये । यह गोली
तीर्यको संभन कर्ता तथा बट वीर्य, जठराग्नि, इनके वढानेवाली है
इनको गत्रिको मापन करते समय खाकर ऊपरसे मिसरी मिला दूध
पी ॥ १८९-९०६ ॥
स्तंभनवटिका।
भागेर मृगनाभिं च तथा काश्मीरसंभवम् ।।
जातीपर. लवां च प्रत्येक भागयग्मकम् ॥ १०४॥

९४ नपुंसकामृतार्णवः । चतुर्भागाहिफेनं च विजया भागयुग्मकम् ॥ चणकाभा वटी कार्या वीर्यस्तंभकरी मता ॥ १० ॥ भक्षयेन्मधुना साई कामी नित्यं निशामुखे ॥ ससितं सर्पिषा युक्तं दुग्धं चैव पिबेदनु ॥ १०६॥ कस्तूरी १ तोला, केशर, जायफल, लौंग, प्रत्येक दो २ तोला, कीम ४ तोला, शुद्धभांग २ तोला, इन सबको कूटकर कपड़छान करे और पानीके संयोगसे रगडकर गोलियां वनावे । इनमेंसे कामी पुरुष रात्रिको शयनसमय एकगोली सहतके संयोगसे खावे और ऊपरसे घी, मिसरी मिला गर्म दूध पीवे यह परमोत्तम वीर्यस्तंभन करनेवाली गोलियां हैं ।। १०४-१०६ ॥ वीर्यस्तंभिनी केशरादिगुटिका । काश्मीरं देवसुमनं जातीपत्रफले तथा ॥ शर्कराशाल्मली माजू कारवी चाब्धिशोपकम् ॥१०७॥ तालमूली च माकल्लशिफावर्धरसर्जकम् ॥ पाठा मस्तकी दरदमहिफेनं च वत्सकम् ॥१०८॥ एतानि शाणमानानि चूर्णयेच्च पृथक् पृथक् ॥ कस्तूरिका च कपूरं शाणा दीयते वुवैः ।।१०९|| समं च मधुना योज्याः मापद्वयवटी कृता । ससितदुग्धपानेन भक्षयेत्तां निशामुखे ॥१०॥ केदार, लौंग, जायफल, जवत्री, मिसरी, समलकी मुमी माफल, कालाजीरा, समुद्रगोप मुसली, अकरकग, साटमा, काकरी कच्ची फली, राल, पाह, रूमीममगी, शुदमिंगरफ, अफीम, दंदनी, प्रत्येक चार मासे लंबे कम्तृग, भीममनी कपर प्रत्येक दो २ माम । इन पर धार- धियोंको चूर्णका बगवरके महतमें मिलाकर दी २ मामेकी गारिया बना भाषाटीकासमेतः। गत्रिको सोते समय एकगोली खाकर ऊपरसे मिसरी मिला दूध पीवे ।। १०७-११० ॥ वीर्यस्तंभक कामेश्वररस । वीर्यस्तंभकरी ोपा बलकामविवर्द्धिनी ॥ जातीफलं च सौराष्ट्री कृष्णधत्तूरबीजकम् ॥ १११॥ जातीपुप्पमहेः फेनं नागं हिंगुलमेव च ॥ एतानि समभागानि खसक्काथेन मर्दयेत् ॥ ११२॥ गुंजामात्रां च वटिकां सितया सह भक्षयेत् ॥ नाम्ना कामेश्वरः प्रोक्तः परमानंदकारकः ॥ ११३॥ यह गोली वीर्यको स्तंभनकरती तथा वल और कामकी वृद्धि करनेवाली जायपाल, अकरकग काले धत्तरेके बीज, जवत्री, अफीम, शीशेकी भरम पद्धनिगरप इन सबको समानभाग लेकर खसखसके काथम स्वरत कारये. एक २ रत्तिकी गोलियां बनावे । इनमेसे १ गोली मिसरीके नाथ पांव तो यह कामेश्वररस परम आनंदका देनेवाला है।।१११-११३॥ एवं प्रतितरंगे च कैव्यदुःखनिवृत्तये॥ नानाविधाः प्रयोगाश्च वर्णिताः शिष्यसत्तम ।। ११४॥ तथापि उत्तरे तंत्रे ह्यधिके च तरंगके ॥ सारनाबाजिकरान्प्रयोगान्कथयामि वै ॥ ११ ॥ है

U
९६
नपुंसकामृतार्णवः ।
1
अथ षष्ठस्तरङ्गः।
तैलसेकलेपादिवर्णनम् ।
शिष्य उवाच।
तैलसेकप्रलेपादीन् नृणां कीबत्वनाशकान् ॥
ध्वजोदण्डकरश्चैिव ब्रूहि मे भिषजां वर ॥ १ ॥
शिष्य बोले हे भिषजांवर ! मनुष्योंकी क्लीवता ( नामर्दी ) के नाश
करनेवाले तथा उनकी ध्वज ( लिंगेंद्रिय ) को उद्दण्ड अर्थात् कामशक्ति
युक्त बलवान् करनेवाले तैल सेक लेप पट्टियोंका वर्णन कृपा करके मेरे पास
कहिये ॥ १॥
गुरुरुवाच ।
प्रश्नंशिष्यमुखाच्छ्रुत्वा किंचित्तूष्णी हि चिंतयन् ॥
उवाच वै खिन्नमनाः शास्त्रलोकगति विदन् ॥ २ ॥
इसप्रकारका प्रश्न शिष्यके मुखसे सुनकर शास्त्र और लोककी गनिके
जाननेवाले गुरु थोडी देरतक चुपचाप सोचते रहे फिर खिन्न मन होकर
बोले ॥२॥
तात लोकगतिं दृष्ट्वा महाखेदोभिजायते ॥
धर्मकर्मविरहिता नित्यमुन्मार्गगामिनः ॥ ३ ॥
नीरुजोपि क्रियामेनां करिष्यंति ह्यतः परम् ॥
तेपां वै मैथुनेनैवोभयलोको विनश्यति ॥ ४ ॥
विधिं यदि न वक्ष्येऽहं सरुग्वे किंकरिष्यति ॥
धूर्तास्तु वे स्वयं तात शिश्नोदरपरायणाः॥ ५ ॥
वर्णाश्रमाचारपराः सत्पुरुषाः स्वयं हि वे ॥
इति मत्वा हि तैलादीन्वक्ष्ये तीवत्वनाशकान् ॥ ६ ॥

भापाटीकासमेतः।
९७
हं पुत्र ! लोककी गति देखते हुये बड़ाभारी दुःख उत्पन्न होता है
जो मनुष्य धर्मकर्मसे हीन होकर नित्यप्रति कुकर्मके रास्तेपरही चलते हैं
वह बिना रोगसेभी इन तैलादिकांका इस्तेमाल किया करेंगे फिर नित्य
मैथुनोत्साहमही अपने इस लोक और परलोलको नष्ट करडालेगे। यदि मैं
म तलादि विधिको कथन ही न करूं तो जो मनुष्य क्लीवता (नामर्दी )
रोगमे ग्रस्त है और जिनकी इंद्रियके पट्टे मलेजानेसे खराव होगये अर्थात
उनम यथोचित रक्ताभिसरण और वायुकी उग्रता नही होती उन रोगियोंका
चपा उपाय होगा। और जो धूर्तलोग हैं वह तो स्वयंही शिश्नोदरपरायण
होनेद (जिनका खालेना और मैथुन करनाही कर्तव्य है ) हे तात ! सत्पु-
पभी वर्णाश्रमधर्मको नही छोड सक्ते सो मैं ऐसा समझकर नपुंसकोंक
वल्याणके लिये अब तैल आदिकोका कथन करता हूं तुम सावधान होकर
मनो ॥ ३-६॥
बृहतीतल।
वृदतीपंचांगमानीय अजादुग्धे विभावयेत् ॥
यंत्रे पातालिके तैलं विधिना संहरेत्पुमान् ॥ ७ ॥
एकविंशतियोगेन सुच्यते स्वकृतार्दनात् ॥
नही वाटलीके जट फूल पत्ते फल छिलका लेकर कूटले फिर वकरीके
इधर खरर करके छायामे सुखालेवे इसीप्रकार तीनदफा सुखावे फिर
मी वही २ गोलिय बनाकर पातालयंत्रद्वारा तेल निकाल लेवे ।। ७ ।।
सतलपी २१ दिन इद्रियपर मालिश करने मे हस्तमैथुनसे प्राप्तहुई नपुं-
सपनादर हो।
पातालयंत्र।
रस्तप्रमाण निर्म च गर्त कृत्वा प्रमाणतः ॥ ८ ॥
तस्मिन्मांडं च संस्थाप्य तथान्यत्पात्रमाहरेत ॥
नरिमापवर्ग च दत्त्वान्यच्च शरावकम् ॥ ९ ॥

९८ नपुंसकामृतार्णवः । मुखे च्छिद्राणि संस्थाप्य कृत्वा चैव शरावके । शरावसहितं पात्रं गर्तस्थं भाजनं न्यसेत् ॥ १० ॥ संधिलेप ततः कृत्वा गर्तमापूर्य मृत्स्नया ॥ पश्चादग्निं च प्रज्वाल्य स्वांगशीतं समुद्धरेत् ॥ ११ ॥ तदंतःस्थं च तत्तैलं गृह्णीयाद्विधिपूर्वकम् ॥ पातालाख्यमिदं यंत्रं जानीहि शिष्यसत्तम ॥ १२॥ एक हाथ गहरा गढा खोदकर उसमें बडेमुखका पात्र रखे पीछे दूसरे पात्रम औषधी रख ऊपरसे छेदावाला शराव ढक दे फिर शरावयुक्त ओपविवाले पात्रको उस गदेवाले पात्रपर युक्तिसे उलटा करके रख दे ताके दोनों के मुख मिल जावे और वह छिद्रोंयुक्त शराव दोनोंके मुखके बीच आगारे फिर इन दोनों के मुखको विधिपूर्वक कपडमिट्टीसे बंद करदेवे और गटको मट्टीसे दवाकर भग्दे ऊपरसे अग्नि जला देवे इस अमिकी आंचसे उपरके दवाइयांका तेल नीचेके वर्तनमें टपक जावेगा जब यह स्वांगशीतल होना फिर युक्तिसे नीचेके पात्रमंसे तेल निकालले इसको दे शिष्यसत्तम पातार यंत्र कहते हैं ।। ८-१२॥ दुसरा प्रकार। अग्नितापसहेकाचे विधिनाऽनेन पातयेत् काचानां मुखंसमेल्य लोहोशीरे मुखं न्यसेत् ॥ १३ ॥ ययवा दो अनिसहनशीला गीमिय लेकर एकम आपको भनक गरे मुखम लोहेकी नार या स्वार टम दे नाक गीप्ती उलटी होने से आपवि नगि. फिर दूसरी बोतल मे मुग्व जोडकर उमपाताल यंत्रकी विधिमे नेच गीचलें। नीमरीविधि। कश्यपानाप्रथादाय छादयेत्सूक्ष्मवत्रतः॥ तदुपरि न्यमवर्ण पत्रणाच्छादयेत्ततः ।। 12 || , ९९ भाषाटीकासमेतः। अग्नियुक्तं ततः पात्रं युक्त्या तदुपरि न्यसेत् ॥ उमणा चूर्णतस्तैलं काश्यपात्र हि गच्छति ॥१६॥ नीमरी विधि यहहै, एक कांशीका कटोरा अथवा चीनीका प्याला कर उसके मुखका बारीक मलमलसे ढकदेवे फिर जिस औपधिका तेल निकालना हो उसका चूर्ण उस कटोरेके मुखपर वस्त्रके ऊपर विछादे उसके ऊपर एक पत्ता अथवा कागज रखकर ऊपर अग्निसे भरा तसला सावधानीसे रखदेवे और यह खयाल रखे कि पांचसे कपडा जलकर दवाई कटोरे न गिरजाय । इस मंद आंचकी गर्माईसे चूर्णमेसे तेल निकालकर कटोग्में भाजावेगा फिर आगवाला पात्र जल्दीसे नीचे उतार कटोरेरसे तेलको कामम लावे यह थोडेसे तेल निकालनेकी विधि आधु- निक लोगाने बनाई है परंतु उत्तम पहलेवाली दोविधियही हैं ॥१४-१५॥ अर्कतैल। वयं वा अई.दुग्धेन सप्तवारं विभावयेत् ॥ निरातऐ विशोप्याथ नवनीतेन लेपयेत् ॥ १६॥ रतिका कारयित्वा तु वह्निना योजयेत्ततः ॥ रर्तितः पतितं तैलं कांस्यपात्रे विनिःक्षिपेत् ॥ १७ ॥ तलं लेपयेच्छिश्ने पत्रैरंडेन वेष्टयेत् ॥ नाशयेद्धस्तन दुःखं तथा वै गुदसंभवम्॥ १८॥ सारे राम दरको भिगोकर सखारे इसीतरह सातवार सुखाकर • १९ २६पन र गावा दी बनाये फिर इस दतीको जलाकर नीचे समका पाली वा माने जो तेल टपरकर थाटीमें गिरे उस तेलको " TREसा पत्र टरेटे इनमशार २१ दिन करनेसे कालिदा होनार ॥१६-१८ ।।

- १०० नपुंसकामृतार्णवः । ३(रालतेल) श्वेतचंदनचूर्णं च चतुःपलप्रमाणतः ॥ द्विगुणं सालनिर्यासं लोबानं द्विपलं तथा॥ १९॥ लवंगं वै द्विकर्षं च सर्वान्संचूर्ण्य भावयेत् ॥ संकर्ण्य विधिना तैलं वृकशिष्णं च लेपये ॥२०॥ पंढत्वनाशनं ज्ञेयं वृक्णबलप्रदं परम् ॥ सफेद चन्दनका बूरा २० तोला, सफेद राल ४० तोला, लोबान १० तोला, लौंग २ तोला सबको बकरीके दूधमे खरल करके छायाम सुसाके पूर्वोक्त विधानसे तैल खेंचले फिर इसको गुर्दोपर और इंद्रियपर लेप कर नेसे दोनों में बल आता है और नपुंसकता दूर होती है ॥ १९ ॥ २० ॥ ४ (कामदेवतेल) कामदेवस्य तैलस्य विधांनं चाधुना शृणु ॥२१॥ जातीफलं लवंगं च सुगुंजां जातिपत्रिकाम् ॥ आकारकरभं चौलं मूलं करवीरजं सितम् ॥२२॥ ज्योतिष्मती समादाय त्रिविकर्ष पृथक्पृथक ॥ इंद्रगोपं च गंडूपं पट्पट् कर्पप्रमाणतः ॥२३ ।। गजदंतजम् ॥ अजादुग्धे भावयित्वा छायायां परिशोपयेत् ॥ २४ ॥ पातालसंज्ञके यंत्रे विधिना तैलं पातयेत् ।। नित्यं च मर्दयेच्छिश्ने ह्यग्रभागं विहाय च ॥२५॥ एकविंशतिपर्यंत तांबुलेन च वेष्टयत ॥ दोपं नाशयते शीत्रमयोनिमथुनोदयम् ॥२६॥ । कारस्करमितं कएँ रजश्व भाषाटीकासमेतः। १०१ उद्दण्डो जायते शिश्नः दशस्त्रीद्रावकः स्थिरः॥ रोगातीय हि दातव्यं न दातव्यं प्रमादतः ।। २७॥ है तात ! अब कामदेवतलका विधान सुनो । जायफल, लौंग, सफेद स्तक, जावत्री, अकरकरा, दालचीनी, सफेद कनेरकी जडका वकल, मालकांगनी प्रत्येक तीन तोला, केचुवे, वीरबहूटी, छै २ तोला । कुचले, हाथीदातका बुरादा, एक २ तोला इन सबको वकरीके दूधमें रगड़कर छायाम सुखावे फिर पातालयन्त्रद्वारा विधिपूर्वक तैल निकाल लेवे। फिर मीवन धार सुपारी छोडकर लिगपर इस तेलकी मालिस करके ऊपरसे मंगलपान लपेटे इसी प्रकार २१ दिन करे । हस्तमैथुन और गुदमैथुनसे उत्पन्न हुई नपुंसकता दूर होकर इंद्रिय उद्दण्ड रहे दश स्त्रियोंके गमनकी शत्ति हो । यद्द तेल जिनकी इंद्रियम अयोनिमैथुनसे शिथिलता हुई हो उनहीको इस्तेमाल करना चाहिये अन्य मनुष्योंको प्रमादरश सेवन नहीं करना चाहिये ।। २१-२७ ॥ ५ पलाशबीजतैल । पलाशसंभवान्बीजान्किम्पाकं कनकप्रभाम् ।। पापोतारण्यजं विष्टं प्रत्येकं पट् च कर्पकम् ॥ २८॥ लवंगाकारकरभी चोलं च कर्षसम्मितम् ।। अजादुग्धे पेपयित्वा शोप्य तैलं च पातयेत् ॥ २९ ॥ प्रमोंतेन विधानेन शिश्नपृष्टे विलेपयेत् ।। विकदिवसै गेगान्मुच्यते हस्तसंभवात् ।। ३० ॥ .२९. वीज एपले मारकागुनी. जंगली कबूतरकी बीउ प्रत्येक छै २ 1|| in इचो दालचीनी, एक २ तोला । इनको वकरीके गावरापामे सुरसाव कि पातालयन्त्रद्वारा तेल निकालकर पहिले लिलि तिमी पाटप: मले दिन ऐसे करनेमे हस्तमैथुनका का !!२८-: ॥

१०२ नपुंसकामृतार्णवः । कैव्यहरं तेलम। चुकं कारस्करं चैव ह्यश्वगंधा च कंगुनी ॥ त्वचं लवंगं मुमुनं जातिकोशं सुरक्तिका ॥३१॥ बीजं पलाशजं चैव विष्ठा वाराहसंभवम् ॥ विषं चाथ समाकुटय प्रत्येकं वै त्रिकार्पिकम् ॥३२॥ गंडूपं इंद्रगोपं च पल्लिं वे भूमिसंभवा ॥ मेदं च व्याघ्रजं शुद्ध प्रत्येकं पट्च कार्पिकम् ॥ ३३॥ काश्मीरं मृगमदं चैव मलं मनुजकर्णजम् ।। टंकंटंक प्रगृह्याथ सर्वान् सूक्ष्मविचूर्णयेत् ॥३४॥ मेपीदुग्धे भावयित्त्वा विधिना तैलंकर्पयेत् ॥ तांबुलं वेटयेत्पश्चात् त्रिसप्ताहे विधानतः ॥ ३५ ॥ यदि काचिद्भवेत्पीडा तैलं तत्र न लेपयेत् ।। तैलं कैव्यहरं नाम लिंगोद्दण्डत्वकारकम् ॥ ३६॥ शैथिल्यं न भवेत्तस्य दशवारानियायदि ॥ हस्तगुदसंभवक्कैव्यनाशनं परमं मतम् ॥३७॥ चोककुचले अमगन्ध मालकांगुनी, दालचीनी, लोग, जावत्री, जाय- फल, सफेद रतक ढाकके खग्गी, जंगली मुबकी विधानेलियाविप प्रत्येक तीन २ तोला गंडाये, वीरबहूटी, सांडा, वायकी चाबी, प्रत्येक 3. ie केशर, कस्तूरी, मनुष्यके कानका मल प्रत्यक नीन २ मागे इन सवनी भेड़के दूधर्म सरल कर छायाम मुरवावे फिर पाताल यन्त्रद्राग नेर निकाल ले इम नलकी इंद्रियकी मापन और गिर छोड़कर जनपद- यार मले परमे पान वबिइमताद करने यदि कुछ नमानी तेल लगाना बन्द कर दे धागम होने पर फिर लगा । बदर लिंगको लकड़ीकी तरह ताकनवाला बनांदताई बीर १० गमन का

भाषाटीकासमेतः।
१०३
नमें भी शिथिलता नहीं होती हस्तमैथुन और गुदामैथुनसे प्राप्त हुई नपुंस-
कता दूर होतीह परन्तु यह तेल नामर्दकोही देना चाहिये प्रमादी पुरुषोंको
कभी भूलकर भी न बताना चाहिये ।। ३१.-३७॥
पानिनाशक तेल।
रोगार्ताय तु दातव्यमप्रकाश्यं तु ह्यन्यथा ॥
जोतिष्मती तु कुडक्मजेपालं पलद्वयम् ॥
जातीफलं जातिपत्री चोलं च देवपुष्पकम् ॥ ३८॥
सर्वान्संमेल्य विधिना तैलं संकर्पयेत्ततः ।।
अग्रभागं च सीमानौ त्यक्त्वा लेपं प्रलेपयेत् ॥ ३९ ॥
पिडिकादर्शनात्त्यक्त्वा लेपने तैलसंभवम् ॥
रोपणी चकियां कुर्याचावदारोग्यतां ब्रजेत् ॥ ४० ॥
अनेनैव विधानेन शिश्ननाडीमवं जलम् ॥
नश्यति नात्र संदेहो योगोयं परमोत्तमः ।। ४१॥
मालकानी १ पाव, जमालगोटेकी गिर धपाव, जायफल, जावत्री,
दादानी होग. पर एक २ छटाक लेकर सबका विधिपूर्वक तेल खेंच
इस तेत्या दिएका अग्रभाग और सीमन छोडो मले जब फुनसियें
नाद ता तर गाना छोडकार गेपणीमरहम लगावे इस प्रकार करनेसे
निसाका शिघिटताकाग्दा पानी नष्ट होजाता है । यह परम उत्तम
111॥ - ॥
अजेपाल तेल।
तापनिपालनं तेलं. द्विपलं जातिसंभवम् ॥
ममल्प मर्टनं शिले नाडीनां दोपनाशनम् ॥ ४२ ॥
r: ताजगारगोटा करतेला चीतर में मिला.
. कसाइंटिपही नादिपांके दिवको दृर कान्ता॥४२॥

नपुंसकामृतार्णवः। राक्षसतैलम् । अश्वगंधा तथा चुकं करवीरं सुमनं त्वचम् ॥ जातीकोशं पलाशं च आकारकरभं तथा ॥४३॥ लवंगं मर्कटीबीजं किंपाकं कनकप्रभम् ॥ चंदनं देवदारुं च बृहतीमर्कमृलकम् ॥४४॥ एरंडमाकफ चैव धत्तूरं विषमेव च ॥ काश्मीरं मृगनाभिं च प्रत्येकं कर्षमानकम् ॥ ४५ ॥ चर्मको रोहितः पल्ली हींद्रगोपश्च कर्कटः॥ शशःशल्यः शिवा गोधा सिंहोव्याघ्रश्च भल्लुकः॥४६॥ वन्यकपोतो गंडूपः गृद्धवाराहकस्तथा ॥ मेदोमांसान्यथाशक्यानानीय विककार्पिकान् ॥४७॥ मेपीदुग्धे भावयित्वा पूर्ववत्तेलमाहरेत् ॥ नानायोगप्रयोगैश्च शैथिल्यं यन्न निर्गतम् ॥ १८ ॥ उद्दण्डं जायते सोऽपि कोटियोगैर्विसर्जितः ।। शैथिल्यं न भवेत्तस्य नित्यं दिक् स्त्री प्रगच्छतः॥४१॥ तैलोयं राक्षसो नाम गोपनीयः प्रयत्नतः ॥ धनिनां यत्र युंजीत प्रायश्चित्तं समाचरेत ॥ ५० ॥ अन्यथा यः प्रकाशेत म भिपड़नग्कं व्रजेत ।। अमगन्ध, चोक, मफेट कनेकी जड़, जापत्री, दालचीनी, जायस्ट, पलागके बीज, कुचले मालकागुनी लोग, कांच बीज, अकरकग, गद- चन्दन. देवदाम, वडीकटेली, आककी जड़, पण्ड अफीम, चतृग नेटि याविय, केदार, कम्नी प्रत्येक एक २ ताला ॥ चमगाद माष्टा, कन्या हटी, कंकडा ग्वग्गांग मेट म्यार गांवा दोर व्याघ्र, गठ, पता भाषाटीकासमेतः । १०५ जंगली कचूनर, गंडाये, गीध, जंगली सूबर, इनमेंसे जिसका मांस मिले मांसले. जिसकी चरबी मिलसके चरवी लेवे प्रत्येक तीन तोला लेकर भेडके दूधकी भावना देकर पातालयन्त्रसे तेल खेंच लेवे जिस मनुष्यको अनेक बापधि तलप्रयोगसे आराम न हुवा हो और अनेक वैद्योंने इलाज करके छोड़ दिया हो और आराम न हुवा हो उसकी इंद्रिय कामशक्तिके वलसे उण्ड हे नित्य दश स्त्रियांसे गमन करतेहुवे भी शिथिल न हो । इस गश्मनाम तैलको कभी किसी के पास न बताना चाहिये हमेशा छिपाके र रखना चाहिय जिस जगे इस तेलको बनाकर धनिक पुरुषके यहां उपयोग चरे पहले इसके बनानेका प्रायश्चित्त करना चाहिये । जो वैद्य विना समझे हरेवाको यह तेल समझावे अथवा उपयोग करे वह पापी वैद्य नरकमें परता ॥ ८३-५० ।। इति तेल विधानं च ावश्यं ते निवेदितम् ॥ इसनर यह तलायी विधि नपुंसकोंपर दया करके और तुमको योग्य सगलवार कथन वारदिया है। यावदारोग्यतां याति तावद्यामं विवर्जयेत् ॥ ११॥ तरमेवनय गमय जबतका विल्कुल तन्दुरुस्त न होजाय तबतक मैथुन शादिया विशेष परहेज रबखे ।। ५१ ॥ अथ सेवान्प्रलेपांश्च व्यानां हितकाम्यया । यतां विधिवत्तात वक्ष्ये विधिविधानतः ॥ १२॥ पर समे नागे नपुंसदावे कल्याणके लिये संक और लेपोंकी विपि भार उन सबकी विधिको वर्णन करनाहूं तुम मावधान होकर सानो। ५२ ॥ नक । गोप गडपो चश्वगंधा तथैव च ॥ सं. रिलाचणरं भनितं च विनिनिपेत् ।। ५३ ।। - --- । - १०५ नपुसकामृताणवः। चूर्ण वै दंतजं तत्र मेल्यं पोटलियुग्मकम् ॥ कृत्यसत्यत्रिके तैले झुष्णे पोटलिकांक्षिपेत् ॥५४॥ मुहूर्त सेकयेत्ताभ्यां तांबूलं वेष्टयेत्ततः ॥ अनेन विधिना सेकं सप्तरात्रं च कारयेत् ॥५५॥ वीरवहूटी, कंचुवे, असगंधनागौरी, चीख, अम्बा हलदी भुने चणे. हाथीदांतका बुरादा, इन सबको छै २ मासे लेकर कूट छानकर दो पोटली बनावे फिर गुलरागनको कोयलेकी ऑचपर रख उसम पोटली भिगोकर सहता २ दोघडीतक सेंक करके उपर गर्भ करके बंगला पान बांये इसी प्रकार सातरोज करे ॥ ५३-५५ ॥ सेंकके बाद लेप। कुडवैकमुच्चटाबीजान्मेपीक्षीरे चतुर्गुणे ॥ पाचयित्वा विधानेन शिश्ने मासं विमर्दयेत् ॥५६॥ औदण्डयं जायते शिश्ने दोपं हत्वा योनिजम् ॥ एकपाव उटंगणके बीज लेकर १ सेर भेइके दूध खीर बना फिर इस खीरको लिंगपर आधघंटा तक मलता रहे इस प्रकार एकमहीना कन्न से अयोनि मथुनका दोप दूर होकर इंद्रियमं बल. आजानाई कामात वलवती होती ॥ ५६ ॥ अथवा। नागरं देवसुमनमाकारकग्भं तथा ॥५७ ।। चूर्णितं मधुयोगेन मास लेपयेधः ॥ तांबुलेष्टितं कृत्वा पुरुषार्थप्रदायकम् ॥१८॥ मुंट लोग अकरकग इन नीनाकं चूर्णको मदद मिला. इंद्रिया लेप करे ऊपर पान लपटे एमा एक महीना कानम दंद्रिय दर सर्व है ।। ५७ ।। ५८॥

भापाटीकासमेतः। १०७ २ सेक। पलं गजदंतचूर्णं तथैव मत्स्यदंतजम् ।। जातीफलं लवंगं च माषाष्टकमुदाहृतम् ॥ ५९॥ अरण्यजं पलांडं च संचूर्ण्य पोटलीसमौ ॥ विधाय मेपीदुग्धं च पाने तु मृण्मये क्षिपेत् ॥ ६॥ भाण्डोपरि च्छिद्रयुक्तं शरावं स्थापयेत्ततः ॥ अग्नी संस्थापयेद्भांडं पोटल्युपरि संन्यसेत् ॥ ६१ ॥ स्वेदेनोमी भवेद्यावत्तावत्सेकं विधानतः ॥ कर्तव्यं घटिकायुग्मं तांबूलं वेशयेत्ततः ॥ १२॥ दश दिवसान्विधायाथ शीतं वारिन संस्पृशेत् ।। हाथीदांत का बुरादा ४ तोला । मच्छीके दांतका पूरा ४ तोला । लोग ( मागे । जायफल ८ मासे । जंगलीगठा एक अदद । इन सबका चूर्ण कर दी पोटली बनावे फिर एक मिट्टीकी हाडीम भेड़का दूध डालकर अपर छिद्रयुत्ता शरावी रवखे फिर इसको आगपर गर्म होनेको रक्खे दूधके पवनर को गापा रागरीके छिद्रद्वारा निकले उमपर पोटली रक्खे उस गोरलीये. गर्भ रोनेपर उससे इंद्रियवी नाको नाभि पर्यत सेक करै कि मरादपर गर्म होनी रखे दुसरीको उठाकर संक करे इसीतरह घंटा २६. ३. ऊपर गर्म करके बंगलापानवांचे ऐने दसदिन करे और ठंडे लानी पज सखे ॥ ५९-६२ ॥ सेंकवं. पीछे लए। एलापाल. नातिकोशं मूलं कीरजं सितम् ॥ ६३ ।। शालालवनमादाय ह्याकुर पट्वमापकम् ॥ गले. निनिनिप्प हाणं कृत्वा विलेपयेत् ।। ६४॥

नपुंसकामृतार्णवः। अवश्यं पुस्त्वमाप्नोति पण्डत्वं तस्य नश्यति ।। शीतं वारि न सेवेत मैथुनं चापि वर्जयेत् ॥६५॥ बड़ी इलायची, जायफल, सफेद कनेरकी जड़का छिलका, अफीम, सेमलका छिलका, प्रत्येक छै २ मासे कपड़छान करके एक तोला तिलते- लमें मिलाकर गर्म करके इंद्रियपर लगावे इसतरे २१ रोज करनेसे अवश्य नपुंसकता दूर होकर पुरुषार्थ प्राप्त होताहै । परंतु इस अवसरमे शीतलजल और मैथुनसे विशेष परहेज रखना चाहिये ॥ ६३-६५ ।। संक। आकारकरभं कुष्ठं जातीपत्रं फलं तथा ॥ अर्धकर्पप्रमाणेन सर्वान् संचूर्णयेत्पृथक् ॥६६॥ गुडमेरंडबीजांश्च कार्पासबीजखर्परम् तिलान्कर्पप्रमाणेन माक्षिकं द्विपलोन्मितम् ॥ ६७॥ सर्वेप पोटली कृत्वा हजादुग्धेन स्वेदयेत् ॥ अनेन जायते चौच्छ्रे ध्वजदोपनिवारणम् ॥ ६८ ॥ अकरकग, कूठ, जायफल, जवत्री, हरेक छे २ मागे पुगण गुड़, एडके वीज, विनालेकी गिरू, तिल, प्रत्येक एक २ ताला, शहद दो तो- ला, सबको कूट छानकर वर्गके दृधम भिगोकर अग्निपर गर्म करके इंद्रियपर संक करे तो इंद्रियका विकार दूर होकर उडता हो ॥६६-६८|| अथवा। मलं मनुजकर्णस्य मेदः मकरसंभवम् ।। संखल्य लेपयन्नित्यं हस्तदोपस्य शांतये ॥६॥ मनुष्यके कानका मलजंगली मारकी चम्बाम गरट कांक ला का एमे नित्य ४० दिन करनेम हम्नमथुनमे प्रान दर्द नपंसस्ता दा रानी" भाषार्टीकासमेतः। १०९ इन्द्रगोपादिलेप। टंकंटंकमिंद्रगोपं श्वेतगुंजां श्वेतगुंजां ह्यकर्भको मापकं च समादाय लोहपाषाणसंकरम् ॥ ७० ॥ तीक्ष्णमये विमर्याथ शिश्ने नित्यं विलेपयेत् ॥ तांबूलं वेष्टयेत्पश्चात्सप्तरात्रीश्च नित्यशः ॥७१॥ अयोनिजं हरदोपं कामवृद्धिकरं परम् ॥ वीरबहूटी सफेद रतक, अकरकरा प्रत्येक तीन २ मासे संखिया १ मामा इन सबको तीक्ष्ण मद्यमें खरल करक इंद्रियपर लेप करके पान लपेटे इसीप्रकार मातगेज करने से इन्द्रिय की शिथिलता दूर होकर कामशक्ति बलवती होती है ॥ ७०॥ ७१ ।। करवीरजटादिलेप। करवीरत्वन्द्विकप दुरधे प्रस्थद्वये पचेत् ॥ ७२ ।। तञ्च दुग्धं दधि कृत्वा मंथनेन विलोडयेत् ।। नवनीत विनिष्कृष्य स्वौषधि तत्र निक्षिपेत् ॥ ७३॥ जातीफलमजेपालं विपमाखुपपाणकम् ॥ विधिना मर्दयेत्यल्वे ततो लेपं समाचरेत् ॥ ७४ ॥ त्यामभागं सीमानौ तांबूले तं प्रवेष्टयेत् ॥ पिडिका चेद्भवेच्छुद्धनवनीतेन लेपयेत् ।। ७५ ।। पंदत्वनाशनार्धाय लेपोयं समुदादतः ॥ E को सफेद बनेरके नहकं टिलरेको कूटकर दो सेर दूधमे पकाकर दिन दहीमा मकरसन निकालकर जमालगोटा जायफल, विष. गरिपान लागेको महा पणत. मक्खन खुब खरल करके इंद्रि- IIT मन तोडकपको उपा पान वांधे, इसप्रकार .११० नपुंसकामृतार्णवः । ७ रोज करें यदि सूजन या फुन्सी होजाय तो लेप बन्द करके शुद्ध धुला- हुवा मक्खन लगावे । इसके प्रभावसे अयोनिमथुनकी नपुंसकता दर होती है ।। ७२-.७५ ॥ लेप । आमिपं तु कुलीरस्य तिलतैलेषु पाचयेत् ॥ ध्वजस्तेनोपलिप्तस्तु शैथिल्यं शैथिल्यं परिमुंचति ॥ ७६॥ कुलीरके मांसको तिलोंके तेलमें भूनकर इंद्रियपर लेप करे तो इंद्रि- यकी शिथिलता दूर हो ।। ७६ ॥ कार्पासबीजलेप। कार्पासबीजमज्जाहिफेनं जातीफलं विपम् ॥ आकारकरभं सर्व पलाई सूक्ष्मचूर्णितम् ।। ७७॥ पलपंचमिता ग्राह्या वसा सूकरसंभवा ।। संमर्दयेन्मेलयित्वा द्वात्रिंशत्प्रहरावधि ॥ ७८॥ लिंगलेपं विधायाथ नागवल्लीदलेन च ॥ बनीयानश्यति क्षिप्रं ध्वजपातः कियदिनैः ॥ ७९ ॥ बिनोलेकी मांगी, अफीम, जायफल, मिगियाविप, अकरकग, प्रत्येक दो २ तोला लेकर कपडछान चूर्ण कर । फिर इसम २० तामा जंगली सूकरकी चरबी मिलाकर ३२ पहर साल को फिर इसका (सुपारी व सीवन बचाकर ) इद्रियपर लेप को उपा बंगलापान बांधकर पट्टी बांध देवे इसप्रकार १८ दिन करनेमे लिग शिविदना दृर होती ।। ७७-७१ ॥ आखुविष्टां समानीय मधुना पपयेशम ॥ विधिना लेपयेच्छिश्ने धजम्योच्छ्रायकारकम ॥ ८०॥ चूहेकी मेगनाको गढ्दमें एकदिन बन गई फिर लिंगपर रंग का तो लिंगकी मिथिलता दूर हो ॥ ८८ ।।

भाषाटीकासमेतः । १११ अरिष्टकादिलेप। त्वचामरिएकमवामाकारकरभं तथा॥ नीक्ष्णे मछे मर्दयित्वा शिश्ने नित्यं प्रलेपयेत् ॥ ८ ॥ तांबूलं वेष्टयेत्पश्चादिशैकदिवसानयम् ॥ योगोऽयोनिरतोद्भूतपण्डत्वस्य विलोपकः ॥ ८२॥ गटेका छिलका. और, बकरकग, इन दोनोको तीक्ष्ण मद्यमें खरल कब २१ दिन पर्यन इंद्रियपर लेप करके पान बांधे इस प्रयोगसे हरनमधन और गुदमैथुन से पैदाहुई नपुंसकता दूर हो ।। ८१॥ ८२ ॥ करवीरादिलेप। प.रवीरमूलत्वचं रंमद्य बृहतीरसे॥ विधिना लेएयेच्छिश्ने ध्वजस्योत्तेजनाय वै ॥ ८३ ॥ मफेद कनेकी जड़के छिलकेको बड़ीकटेलीके रसमें खरल करके गिपर लेप करे तो कामशक्ति बलवती होतहि ।। ८३ ॥ मूलिकावीजादिले। पापालबीजमादाय निस्तुएं कारयेद्बुधः ।। तीन सूलिकावीजान्कर्पद्वयमितान्पृथक् ।। ८४ ॥ आपारपरभ कुष्ठं प्रत्यकें पट्चमापकम् ।। गरे गर्दचित्ता वै शिश्ने नित्यं प्रलेपयेत् ॥ ८५ ।। र वीज प्रादेदो २ भाग बकर्कग, कडवाहट, ५. १२. कमवतो मरमसल करके इंद्रियपर लेप करे "? निदान लिगकी भिदिलना दूर हो ।। ८४-८९ ॥ महन गांकन दाई र मावि. समभागतः ॥ भारपिा शिश्ने नित्यं विमर्दयेत् ॥ ८६ ।। .

११२
नपुंसकामृतार्णवः ।
मासैकमर्दनेनैव शैथिल्यं च विनाशयेत् ॥
हस्तमैथुनजं दुःखं प्रणश्यति न संशयः ॥ ८७ ॥
गोका घी, आकका दूध, महत, इन तीनोको कांसीके वर्तनम कांसीफे
कटोरेसे खूब रगड़े फिर इसमेसे नित्य इंद्रियपर मले तो इंद्रियकी शिथि-
लता दूर हो और हस्तमैथुनका विकार दूर हो ॥ ८६-८७ ॥
इंद्रिय सुखगई हो तो मर्दन ।
चोलोद्भवं तथा तैलं लवंगानां च मईयेत् ॥
स्वकृतोत्थं शिश्नशोषं मासमेकं च नश्यति ॥ ८८ ॥
दालचीनी तथा लौंग, इनमें से किसीएक अथवा दोनीका तेल निकाल-
कर इंद्रियपर मलनेसे अपने कुकर्मसे प्राप्त किया लिगंद्रियका सूराना
एकमहीनेमे दूर होताहै ॥ ८८ ॥
इंद्रियमें स्पर्शज्ञानदायकतेल ।
यस्य शुकप्रयोगेण हस्तेन मर्दनेन च ॥
महता शिश्नयोगेन स्पर्शज्ञानं विनश्यति ॥ ८९ ॥
लोबानोद्भवं तैलं तत्र योज्यं सदा बुधैः ॥
इंद्रियको बढानेवाले लेप भादिकांके करनेमे तथा हायमे मलनेगे
अथवा इंद्रिय बड़ी होनेके कारण यदि लिंगंद्रियका स्पर्शज्ञान जाता रहा
हो नो बुद्धिमानीको उचित है उस जगे लोवानका तल मला कर ।। ८.।।
इंद्रियके बांकपनका यत्न ।
मनः शिला टंकणं च कुष्टं कर्पप्रमाणतः ॥ १० ॥
जातीपत्ररसं चैव क वे त्रयमेव च ॥
तिलतैले पाचयित्वा लिम्पेदेकांतरे दिन ॥ ९ ॥
एक दिन विहायाथ चत्वारिंशदिनेषु च ॥
विकृतिः शिश्नस्य नश्येत्कामोत्तेजकर परम ॥ १२ ॥

भापाटीकासमेतः। ११३ मनसिल. सुहागा, कुठ, प्रत्येक एक २ तोला, चमेलीके पत्तोंका रस तोला, तिलका तेल ६ तोला इन सवको तेलमें डालकर आंवपर पकावे तलमात्र शेप रहनेपर इंद्रियपर मले चालीसदिनमें २१ वार लगावे एक- दिन वीचमें छोड़दे एकदिन लगाये इसप्रकार लगानेसे इंद्रियका बांकपन दर हो और कामशक्ति वलवती हो ॥ ९०-९२ ॥ इति तेलविधानं च लेपशेकविधि तथा ॥ रोगाय हि कर्तव्यमप्रकाश्यं तु चान्यथा ॥९३॥ इसप्रकार तेल लेप सेककी विधि कथन करचुके हैं सो यह तैलादि गगिशेके कल्याणके लिये ही प्रकाश करने चाहिये अन्यथा प्रकाशकरना नही चाहिये ॥ ९१॥ तेललेपके समय पथ्यापथ्य । उणं च शीतमम्लं च तैलं च वातकारकम् ॥ त्याज्यं शिनगदे नित्यं व्रणवत्सेवनं हितम् ।। मुद्रं घृतं शुभान्नं च दुग्धं वा तण्डुलं तथा ॥ ९४ ॥ मिक्षादि तीक्ष्ण बीर अत्यंतगर्म, अत्यंत शीत, खटाई, तैल, पातपा पदार्थ इन सबको इंद्रियको विकारमे त्याग देवे और व्रणगे- न जो तिरो उसका सेवन करे । तथा मंग, घृत, शुभ हलका पन्न, ए चारानका सेवन करे ।। ९४ ॥

११२ नपुंसकामृतार्णवः । मासैकमर्दनेनैव शैथिल्यं च विनाशयेत् ॥ हस्तमैथुनजं दुःखं प्रणश्यति न संशयः ॥ ८७ ॥ गौका घी, आकका दूध, महत, इन तीनोको कांसीके वर्तनमे कांसीके कटोरेसे खूब रगड़े फिर इसमेसे नित्य इंद्रियपर मले तो इंद्रियकी शिथि- लता दूर हो और हस्तमैथुनका विकार दूर हो ॥ ८६-८७ ॥ इंद्रिय सुखगई हो तो मर्दन । चोलोद्भवं तथा तैलं लवंगानां च मईयेत् ॥ स्वकृतोत्थं शिश्नशोषं मासमेकं च नश्यति ॥ ८८॥ दालचीनी तथा लौंग, इनमें से किसीएक अथवा दोनाका तेल निकाल- कर इंद्रियपर मलनेसे अपने कुकर्मसे प्राप्त किया लिगेद्रियका सूखना एकमहीनेमें दूर होताहै ॥ ८८ ॥ इंद्रियमें स्पर्शज्ञानदायकतेल । यस्य शूकप्रयोगेण हस्तेन मर्दनेन च ॥ महता शिश्नयोगेन स्पर्शज्ञानं विनश्यति ॥ ८९॥ लोबानोद्भवं तैलं तत्र योज्यं सदा बुधैः ।। इंद्रियको बढानेवाले लेप यादिकोके करनेसे तथा हायसे मलनेसे अथवा इंद्रिय बड़ी होनेके कारण यदि लिगेंद्रियका स्पर्शज्ञान जाता रहा हो तो बुद्धिमानोंको उचित है उस जगे लोबानका तेल मला करे ॥ ८९॥ इंद्रियके बांकपनका यत्न । मनः शिला टंकणं च कुष्ठं कर्षप्रमाणतः॥ ९॥ जातीपत्ररसं चैव कर्ष वै त्रयमेव च ॥ तिलतैले पाचयित्वा लिम्पेदेकांतरे दिने ॥ ९१॥ एक दिनं विहायाथ चत्वारिंशदिनेषु च ॥ विकृतिः शिश्नस्य नश्येत्कामोत्तेजकरं परम् ॥ ९२॥ 7

भाषाटीकासमेत
११३
मनसिल, सुहागा, कूठ, प्रत्येक एक २ तोला, चमेलीके पत्तोंका रस
तोला, तिलका तेल ६ तोला इन सवको तेलमें डालकर आंचपर पकावे
तलमात्र शेष रहनेपर इंद्रियपर मले चालीसदिनमें २१ वार लगावे एक-
दिन बीचमें छोड़दे एकदिन लगावे इसप्रकार लगानेसे इंद्रियका वांकपन
दूर हो और कामशक्ति वलवती हो ॥ ९०-९२॥
इति तैलविधानं च लेपशेकविधि तथा॥
रोगाीय हि कर्तव्यमप्रकाश्यं तु चान्यथा ॥९३॥
इसप्रकार तेल लेप सेककी विधि कथन करचुके हैं सो यह तैलादि
गगिया कल्याणके लिये ही प्रकाश करने चाहिये अन्यथा प्रकाशकरना
नही चाहिये ॥ ९१॥
तैललेपके समय पथ्यापथ्य ।
उष्णं च शीतमम्लं च तैलं च वातकारकम् ॥
त्याज्यं शिश्नगदे नित्यं व्रणवत्सेवनं हितम् ॥
मुझं घृतं शुभान्नं च दुग्धं वा तण्डुलं तथा ॥ ९४॥
गि आदि तीक्ष्ण धीर अत्यंतगर्म, अत्यंत शीत, खटाई, तैल,
तपारी पदार्थ न सबको इंद्रियके विकारमें त्याग देवे और व्रणरो-
गर्भ जोति हो उसका सेवन करे । तथा मूंग, घृत, शुभ हलका पन्न,
१० पावर इनका सेवन करे ॥ ९४ ॥

११४ नपुंसकामृतार्णवः । अथ सप्तमस्तरंगः। नपुंसककारणत्वेन प्रमेहवर्णनम् । शिष्य उवाच । यदुक्तं श्रीमता नाथ कैव्ये मेहोऽपि कारणम् ॥ अतस्तहि कृपया सनिदानचिकित्सितम् ॥ १॥ शिष्य बोले हे नाथ ! श्रीमान्ने नपुंसकतामें प्रमेहको भी कारणत दी थी अर्थात् नपुंसकोंका निदान कथन करते समय प्रमेहसे नपुंसकता होना भी कथन किया था। इसलिये सविनय प्रार्थना है कि, उस प्रमेहक भी कुछनिदान और चिकित्सा नपुंसकोंके कल्याणके लिये कृपया कथन कीजिये ॥१॥ प्रश्नं शिष्यमुखाच्छ्रुत्वा गुरुः संदृष्टमानसः ॥ उवाच कृपया शिष्यं मनसा तं प्रशंसयन् ॥२॥ इस प्रश्नको शिष्यके मुखसे सुनकर प्रसन्नमन हुये गुरु मनमें शिष्यकी बडाई करते हुये कृपा करके कहने लगे ॥२॥ गुरुरुवाच । तात कारणता मेहे क्लीबतायाऽपि वतर्ते ॥ दोषा धातून्दूषयित्वा मेहांश्च जनयंति वै॥३॥ यतो बस्तिगता दोषाः सुखस्वप्नादिकारणैः ॥ वीर्य मूत्रं च संदूष्य पुंस्त्वं च नाशयति वे॥४॥ अतः किंचिनिदानं च चिकित्सां सिद्धिसंयुताम् ॥ वक्ष्ये युक्तिप्रमाणैश्च विधिवच्छास्त्रसमितेः ॥५॥ हेतात ! प्रमेहमेभी नपुंसकताकी कारणता अवश्य है क्योंकि वात पित्त कफ प्रायः सब धातुवोको दूपित करकेही प्रमेहको पैदा करतेहैं और सुख पूर्वक बैठने सोने आदि अनेक कारणोंसे कुपित हुये दोष वस्तिमें प्राप्त भापाटीकासमेतः। होकर वीर्यको और मूत्रको भी दूषित करदेतेहैं, फिर वीर्य और मूत्रके दूषित होनसे मूत्रवाही और वीर्यवाही नली भी दूषित होती है उसमें प्रमेहपि टिका आदि विकार होनेसे ध्वजभंग होजाता है और वीर्यके दूषित होनेसे शुक्रामय होकर नपुंसकता होजाती है और पुरुषार्थ नष्ट हो जाताहै । इस लिये प्रमेहका कुछ निदान और सिद्धचिकित्साका वर्णन शास्त्रसंमत युक्ति मीरममाणसे विधिपूर्वक कथन करेंगे तुम सावधान होकर सुनो ॥ ३-५॥ प्रमेहनिदान । आस्थासुखं स्वप्नसुखं दधीनि ग्राम्योदकानूपरसाः पयांसि ॥ नवानपानं गुडवैकृतं च प्रमेहहेतुः कफकृच्च सर्वम् ॥ ६ ॥ पटनेये सुरवसे, दिनमें सोनेसे स्वप्न में खीसंग करनेसे.दही, ग्रामसंचारी- जीशंका मांस (भेट, बकरी, ) जलसंचारी मछली. आदिके खानेसे, जलके समीप नदाले जीवारे, मांसखानेसे और अनेक मांसरस, दूध नया अन्न, गगा जर गुड, पीर गरके विकार विशेप तथा और विकारोंसे भी और आपका पैदा करनेवाले सवपदार्थ प्रमेर के कारण है अर्थात् इन कारणांसे ममेर होता ॥ ६ ॥ संप्राप्ति । मेख मांसद शरीरजञ्च क्लेदं कर्फ बस्तिगतं प्रदूप्य ॥ वरोति मेदान्समुदीर्णमुणस्तानेव पित्तं परिदूष्य चापि ॥ क्षीणेषु दोपेप्वकृप्य धातून्संदूप्य मेहान्कुरुतेऽनिलश्च७॥ हरितगत प. मंद, मान और शरीरमे होनेवाले क्लेद (जल) को पिया एप को पैदा करता है और अपने कारणांसे वर्थात दोहे मेन गानेले दावा पित्तभी. मेद माम आदि. कि दिन मौको पैदा करता है इसीप्रकार दोप:

११६ नपुंसकामृतार्णवः । (वात, पित्त, कफ, ) के क्षीण होजानेसे वायु मेद मज्जा आदि धातुओंको दूषित करके उनके स्थानसे खींचकर वस्तीके मुखपर लाकर वायुके प्रमे होको पैदा करता है ॥ ७ ॥ सब प्रमेहोमें मूत्रदूष्य । दोषो हि बस्तिं समुपेत्य मूत्रं ॥ संदूष्य मेहान् कुरुते यथास्वम् ॥८॥ इस प्रकार वातादिदोप वस्तिमें प्राप्त होकर मूत्रको दूषित करके प्रमे; होंको पैदा करते हैं ॥ ८॥ प्रमेहमें दृष्य। मेदो मांसं तनुक्लेदो वसा मज्जा लसीकया । ओजो रसोऽमृक्छुकं च मूत्रं मेहेषु दुष्यति ॥९॥ मेद, मांस, देहका क्लेद, चिकनाई, मज्जा, लसीका (मांसके घावका जल) ओज, रस, रुधिर, शुक्र मूत्र, इनको दोपदूपित करके प्रमेहाँको पैदा करते इसवास्ते इन सवको दृष्य अर्थात् दूषित होनेवाले कहतेहैं॥९॥ प्रमेहके पूर्वरूप। दंतादीनां मलाढयत्वं प्रापं पाणिपादयोः ॥ दाहश्चिकणता देहे तृट् स्वादास्यं च जायते ॥ १० ॥ दांत, तालु, गला, आदिमें मैल जमा रहना, हाथ पैरोंमें दाहका होना, देहका चिकना रहना,प्यास लगे और मुखमें मिठास रहै यह प्रमेहके पूर्व- रूप हैं ॥ १०॥ प्रमेहके सामान्य लक्षण। तेषां प्रभूताविलमूत्रता ॥ शुक्रवोऽप्रमाणेन मूत्रे विषमतोपि वा ॥११॥ सामान्यलक्षणं भापाटीकासमेतः। ११७ पहुत गंदला पेशाव आना अथवा वीर्य मिला मूत्र उतरना मूत्रसे मागे अथवा पीछे वीर्यका गिरना, यह सामान्यतासे प्रमेहके लक्षण 1॥ ११ ॥ प्रमेहभेदोंकी कल्पना। दोपदूष्यविशेपेऽपि तत्संयोगविशेषतः ॥ मूत्रवर्णादिभेदेन भेदो मेहेषु कल्प्यते ॥ १२॥ यपि दोप वात पित्त कफ और दूष्य ( रसरक्तादि०) विशेष नहीं भी हैं अर्थात् जितने हैं उनसे अधिक नही हो सक्ते इसलिये वातादि भेदसे प्रमेह भी अधिक न होने चाहिये । परंतु इनही दोपदप्योंकी न्यूना- भिवतासे और मूत्रके वर्णादि भेदसे प्रमेह २० प्रकारके कथन किये ॥ १२ ॥ कपके १० प्रमेह । अच्छं बहुसितं शीतं निर्गधमुदकोपमम् ॥ मेहत्यदकमेहेन किंचिदाविलपिच्छिलम् ॥१३॥ दक्षो रससिवात्यर्थ मधुरं चेक्षुमेहतः ॥ सद्रिीभवेत्पर्युपितं सांद्र स्नेहेन मेहति ॥ १४ ॥ सुरामेटी परातल्यमुपर्यच्छमधोधनम् । संटएरोमा पिटेन पिष्टवद्वहुलं सितम् ॥ १५ ॥ शुजा शुक्रमिथ वा शुक्रमेही प्रमेहति ॥ महानिएकतामेटी सिक तारूपिणो मलान् ॥१६॥ शीतमेरी सरदशो मधुरं बहु शीतलम् ॥ शनः नि: शनी मंदं गंदं प्रमेहति ॥१७॥ लालातंतुयुत भत्रं लालामेहेन पिच्छिलम् ॥

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११६
नपुंसकामृतार्णवः।
(वात, पित्त, कफ, ) के क्षीण होजानेसे वायु मेद मज्जा आदि धातुवोंको
दूषित करके उनके स्थानसे खींचकर वस्तीके मुखपर लाकर वायुके प्रमे-
होको पैदा करता है ॥ ७ ॥
सब प्रमेहोमें मूत्रदूष्य ।
दोषो हि बस्तिं समुपेत्य मूत्रं ॥
संदूष्य मेहान् कुरुते यथास्वम् ॥ ८॥
इस प्रकार वातादिदोष वस्तिमें प्राप्त होकर मूत्रको दूषित करके प्रमे;
होंको पैदा करते हैं ॥ ८॥
प्रमेहमें दूष्य ।
मेदो मांसं तनुक्लेदो वसा मज्जा लसीकया ॥
ओजो रसोऽमृक्छुकं च मूत्रं मेहेषु दुष्यति ॥९॥
मेद, मांस, देहका क्लेद, चिकनाई, मजा, लसीका ( मांसके घावका
जल) ओज, रस, रुधिर, शुक्र मूत्र, इनको दोपदूपित करके प्रमेहाँको
पैदा करतेहैं इसवास्ते इन सबको दृष्य अर्थात् दूषित होनेवाले कहतेहैं॥९॥
प्रमेहके पूर्वरूप।
दंतादीनां मलाढ्यत्वं प्रापं पाणिपादयोः ॥
दाहश्चिकणता देहे तृट् स्वाहास्यं च जायते ॥ १० ॥
दांत, तालु, गला, आदिमें मैल जमा रहना, हाथ पैरामें दाहका होना,
देहका चिकना रहना,प्यास लगे और मुखमें मिठास रहै यह प्रमेहके पूर्व-
रूप हे ॥ १०॥
प्रमेहके सामान्य लक्षण ।
सामान्यलक्षणं तेपां प्रभूताविलमूत्रता ॥
शुक्रवोऽप्रमाणेन मूचे विपमतोपि वा ॥११॥

भाषाटीकासमेतः। बहुत गंदला पेशाब आना अथवा वीर्य मिला मूत्र उतरना मूत्रसे आगे अथवा पीछे वीर्यका गिरना, यह सामान्यतासे प्रमेहके लक्षण प्रमेहभेदोंकी कल्पना। दोपदूष्यविशेषेऽपि तत्संयोगविशेषतः ॥ मूत्रवर्णादिभेदेन भेदो मेहेषु कल्प्यते ॥ १२॥ यद्यपि दोष वात पित्त कफ और दूष्प (रसरक्तादि०) विशेष नहीं भी हैं अर्थात् जितने हैं उनसे अधिक नही हो सक्ते इसलिये वातादि भेदसे प्रमेह भी अधिक न होने चाहिये । परंतु इनही दोषदूष्योंकी न्यूना- धिकतासे और मूत्रके वर्णादि भेदसे प्रमेह २० प्रकारके कथन किये ॥ १२॥ कफके १० प्रमेह । अच्छं बहुसितं शीतं निर्गंधमुदकोपमम् ॥ मेहत्युदकमेहेन किंचिदाविलपिच्छिलम् ॥१३॥ इक्षो रसमिवात्यर्थं मधुरं चेक्षुमेहतः ॥ सांद्रीभवेत्पर्युषितं सांद्र स्नेहेन मेहति ॥१४॥ सुरामेही सरातुल्यमुपर्यच्छमधोधनम् संदृष्टरोमा पिष्टेन पिष्टवबहुलं सितम् ॥१९॥ शुक्रामं शुक्रमित्रं वा शुक्रमेही प्रमेहति ॥ मूत्राणून्सिकतामेही सिकतारूपिणो मलान् ॥ १६॥ शीतमेही सुबहुशो मधुरं बहु शीतलम् ॥ शनैः शनैः शनैर्मही मंद मंदं प्रमेहति ॥१७॥ लालातंतुयुतं मूत्रं लालामेहेन पिच्छिलम् ॥ ॥ .

११८
नपुंसकामृतार्णवः।
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(१) उदकामेहमें, स्वच्छ बहुत सफेद, शीतल, गंधरहित, पानीके
समान, कभी कुछ गदलाई लिये, मूत्र होताहै ॥ १३ ॥
(२) ईखके रसकी समान अत्यंत मीठा इक्षुमेहमें मूत्र आता है ॥
(३) सांद्रमेहमें, रात्रिको पेशाव करके पात्रमें धरे तो सबेरे गाढा होजा-
ता है ॥ १४ ॥
(४) जिसका मूत्र मद्यके समान ऊपर स्वच्छ नीचे गाढा हो उसको
सुरामेही कहते हैं ।
(५) पिसेहुवे चावलोके पानीके समान सफेद और बहुत मूत्र मूते और
मूतते समय रोमांच हो उसको पिष्टमेह कहते हैं ॥ १५ ॥
(६) शुक्रमेहमें, वीर्यके समान या वीर्यमिला मूत्र होताहै ।।
(७) सिकतामेहमें, मूत्रमें बालूके समान छोटे २ कणके गिरते हैं ॥१६॥
(८) शीतमेहमें, मीठा, और अत्यंत शीतल ऐसा वार २ बहुत मूते ॥
(९) शनैर्महमें, थोडा २ बूंद २ मूत्र आताहै ॥ १७ ॥
( १० ) लालामेहम, लारके समान तारयुक्त चिकना मृत्र होताहै ॥ १० ॥
यह १० कफकी अधिकतासे होतेहैं ।।
पित्तके ६ प्रमेह ।
गधवर्णरसस्पर्शः क्षारेण क्षारतोयवत् ॥ १८ ॥
नीलमेहेन नीलाभं कालमेही मपीनिभम् ।।
हारिद्रमेही कटुकं हरिद्रासन्निभं दहत् ॥ १९ ॥
(१) क्षारमेहम, खारे जलके समान गंध रस स्पर्शमें मूत्र होताहै ॥१८॥
(२) नीलमेहमें, नीलेरंगका मूत्र होताहै ॥ २ ॥
(३) कालमेहम, कालेरंगका मूत्र होताह ॥ ३ ॥
( ४ ) हरिद्रामेहम, हलदीकी समान रंगवाला दाहयुक्त मूत्र होताहै ॥१९॥
विस्रमांजिप्टमेहेन मंजिष्टासलिलोपमम् ॥
विस्रमुष्णं सलवणं रक्ताभं रक्तमेहतः ॥२०॥

भाषाटीकासमेतः। (५) मांजिष्ठमेहमे, आमदुर्गंधयुक्त और मंजीठके समान रंगका मूत्र होताहै ॥ ५॥ ( ६ ) रक्तमेहमे, दुर्गधयुक्त, गरम, खारयुक्त, और रुपिर समान लाल- मूत्र होताहै ॥ २० ॥ येह ६ पित्तसे होते हैं ।। वायुके ४ प्रमेह । वसामेही वसामिश्रं वसामं मूत्रयेन्मुहुः ॥ मज्जाभं मजमिश्रं वा मजमेही मुहुर्रहः ॥ २१ ॥ कषायमधुरं रूक्षं क्षौद्रमेहं हस्ती मत्त इवाजत्रं मूत्रं वेगविवर्जितम् ।। सालसीक विबद्धं च हस्तिमेही प्रमेहति ॥२२॥ (१) वसामेही चरवीके समान या चरवीमिला मूत्र मूते ॥ (२) मजामेहमें, मज्जाके समान या मज्जामिला वार २ मूत्र माता- है ।। २१॥ (३) क्षौद्रमेहमें. सहतके समान, कषैला, मीठा, मूत्र होताहै ॥ (४) हस्तिमेहमें, मत्तहाथोके समान वेग रहित तारयुक्त ठहर २ क मृते ॥ २२॥ यह चारवातके विकारसे हैं। वदेद्बुधः॥ असाध्य। ॥ आलस्यं ष्ठीवनं देहे मक्षिकाणां परिग्रहः ॥२३॥ मूच्छिर्दिज्वरश्वासकासवीसर्पगौरवः पिडिकापीडितश्चैव प्रमेहो हंति मानवम् ॥२४॥ आलस्य. मुखसे लारोका गिरना, शरीरपर मक्खियोंका बैठना, मूर्छा, उदी वर घास खांसी, दारुणप्रमेहेकी पिडिका (फुनसी) का होना इन उपद्रवाते युक्त प्रमेह मनुष्यको मारडालता है ॥ २३-२४ ॥ १ प्रोसिटि मुलाहियोंमें देखो. D १२० नपुंसकामृतार्णवः । सबप्रमेहोंमें मत्रमें मीठा आताहै। सर्व एव प्रमेहास्तुऽकालेनाप्रतिकारिणः ॥ मधुमेहत्वमायांति तदा साध्या भवंति हि ॥२५॥ सब प्रकारके प्रमेहोंमें प्रमेहके पैदा होतेही यत्न न करनेसे कुछकाल पाकर पेशावमें मीठा आने लगजाता है इसीकारण सब प्रमेहोंकीही मधु- मेह संज्ञा होती है । मधुमेह होनेसे प्रायः प्रमेह असाध्य होजाते हैं ॥२५॥ वातादिभेदसे साध्यासाध्य । मेहाः कफभवाः साध्याः कृच्छ्रसाध्यास्तु पित्तजाः॥ असाध्या वातजा ज्ञेयाश्चिकित्साशोषिणी यतः ॥२६॥ कफके प्रमेह साध्यहैं । पित्तके कष्टसाध्य हैं । वायुके असाध्यहै क्योंकि प्रमेहोंमें सब चिकित्सा शोषण होती है वायु शोषणपदार्थोंसे कुपित होता- है ॥ २६ ॥ प्रमेहोंसे नपुंसकता। रसशुक्रादिदुष्टत्वाद्वीयत्वं नश्यति स्वयम् ॥ पिडिकाभिदारुणाभिर्ध्वजभंगः प्रवर्तते ॥२७॥ एवं प्रवर्तिते चक्रे जीवनं हि निरर्थकम् ॥ अतस्तदोपशांत्यर्थं सिद्धयोगान्वदामि ते ॥२८॥ हेतात ! जब प्रमेहोंमें रस, रक्त, मांस, वीर्य आदि सबही खराव होजा- तेहैं तव वीर्यकी शक्ति तो स्वयंही नष्ट होजाती है और दारुण प्रमेहकी पिडिकाओंका विकार इंद्रियमें भी होकर ध्वजभंगनपुंसकता आकर अपना अधिकार जमा लेती है, इस प्रकार इस रोगका चक्र चलनेसे मनुष्यका जीवनही निरर्थक होजाता है । इस लिये हे शिष्य ! अब तुम्हारे पास इस दुष्ट प्रमेहके शासनकर्ता सिन्द योगोंका वर्णन करता हूँ तुम सुनो॥२७॥२८॥ .. f

भाषाटीकासमेतः।
१२१
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कफके प्रमेहोंका यत्न।
त्रिफलां दारुहारिद्रं सुस्तकं देवदारुकम् ॥
काथयित्वा मधुयुतं कफमेहनिवृत्तये ॥२९॥
त्रिफला, दारुहलदी, नागरमोथा, देवदारु इनका काथ करके शहत
मिलाकर पीवे तो कफके प्रमेह नष्ट हो ॥२९॥
मुस्ताहरीतकीलो|ः कट्फलेन कृतं शृतम् ॥
पीतं मधुयुतं हंति प्रमेहं कफहेतुकम् ॥३०॥
नागरमोथा, हरड, लोध, कायफल, इनके क्वाथमें शहत डालकर पीना
कफके प्रमेहोंको दूर करता है ॥ ३० ॥
पित्त प्रमेहकी चिकित्सा।
पटोलनिंबामलकामृतानां पिबेत्कषायं मधुना समेतम् ॥
उशीरलोध्रार्जुनचंदनानां तथा पिबेत्पित्तनिमित्तमेही३१
पित्तके प्रमेहमें पटोलपत्र, निवका बक्कल, आमले, गिलोय, इनका
काथ कर शहत मिलाकर पीवे । अथवा खस, लोध, धव, लाल चन्दन,
इनका काथ शहत मिलाकर पीवे वो पिचका प्रमेह नष्ट हो ॥३१॥
वात प्रमेह यत्न।
त्रिफलागोक्षुरुचूर्ण घृतमाक्षिकसंयुतम् ॥
लेहयेन्मासयुग्मं च वातमेहनिवृत्तये ॥३२॥
त्रिफले और गोखरूके चूर्णको शहत और घीमें मिलाकर नित्य दो
महीने चाटे तो वातप्रमेह निवृत्त हो ॥ ३२ ॥
सब प्रकारके प्रमेहोंका यत्न ।
मधुना फलं चूर्णमथ वाश्मजतूद्भवम् ॥
लोहजं वाऽभयोत्थं वा लिहन्मेहनिवृत्तये ॥३३॥

१२२ नपुंसकामृतार्णवः। त्रिफलेके चूर्णको शहतमें मिलाकर चाटनेसे सब प्रकारके प्रमेह दूर होते हैं । अथवा शिलाजीतके खानेसे भी सर्व प्रमेह नष्ट होते हैं और लोह भस्म अथवा हरडका चूर्ण शहतमें मिलाकर चाटनेसे प्रमेह दूर होतेहैं।।३३। गुडूच्याः स्वरसः पेयो मधुना सह मेहनुत् ॥ ३४। गिलोयका स्वरस शहत मिलाकर पीवे तो सब प्रकारके प्रमेह दूर हों। सिंहामृत घृत। कंटका- गुडूच्याश्च संहरेच्च शतं पलम् ॥ संकुट्योलूखले विद्वांश्चतुद्रोणेभसः पचेत् ॥३५ । तेन पादावशेषेण घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ त्रिकटुत्रिफलारास्नाविडंगान्यथ चित्रकम् ॥३६॥ काश्मयः पंचमूलानि पूतिकस्य त्वगेव च ॥ कलिंग इति सर्वाणि सूक्ष्मपिष्टानि कारयेत् ॥ ३७॥ अक्षमात्रं पिबेत्प्रातःशालिभिः पयसा हितैः ॥ प्रमेहं मधुमेहं च मूत्रकृच्छ्रे भगंदरम् ॥ ३८॥ आलस्यं चांत्रवृद्धिं च कुष्ठरोगं विशेषतः ।। क्षयं चैव निहंत्येतनाम्ना सिंहामृतं घृतम् ॥ ३९॥ कटेली और गिलोयको सौ सौ पल लेकर कूटकर ६४ से पानीम पकावे जब १६ सेर वाकी रहे तो उतारकर छान लेवे फिर इस कार्यमें त्रिफला त्रिकुटा, रायसन, वायविडंग, चिता, कुम्भेर, पंचमृल, पूतिकरंज की छाल, इन्द्रजी, इन सबका कल्क बनाकर एक सेर घृत सिद्ध करे फिर प्रातःकाल इस वृतमने एक तोला घृत खाकर दृध पीवे और दूध चावल खाय तो प्रमेह, मधुमेह, मूत्रकृच्छ्र, भगंदर, बालस्य, अंत्रवृद्धि, कुष्ठ, क्षय यह सब रोग नष्ट हो ॥ ३५.-३९ ।।

भाषाटीकासमेतः। १२३ धान्वन्तर घृत। दशमूलं करंजौ द्वौ करंजौ द्वौ देवदारुहरीतकी ॥ वर्षाभूर्वारुणो दन्ती चित्रकं सपुनर्नवम् ॥ ४०॥ सुधानिंबकदंबाश्च बिल्लभल्लातकानि च ॥ शठी पुष्करमूलं च पिप्पलीसूलमेव च ॥४१॥ पृथग्दशपलान्भागानेतांस्तोयार्पणे पचेत् ॥ यवकोलकुलित्थानां प्रस्थं प्रस्थंविपाचयेत् ॥४२॥ तेन पादावशेषेण घृतपस्थं पचेद्भिषक् ॥ निचुलं त्रिफला भांर्गी रोहिषं गजपिप्पली॥४३॥ शृंगवेरं विडंगानि वचा काम्पिल्लकं तथा ॥ गर्भणानेन तत्सिद्धं पाययेत्तु यथाबलम् ॥४४॥ एतद्धान्वंतरं नाम विख्यातं सर्पिरुत्तमम् ॥ कुष्ठप्रमेहगुल्मांश्च श्वय) वातशोणितम् ॥ १५॥ प्पीहोदराणि चाईसि विद्रधिः पिडिकाश्च याः॥ अपस्मारं तथोन्मादं सपिरेतन्नियच्छति ॥ ४६॥ पृथक्तोयाम॑णे तत्र पचेव्याच्छतं शतम् ॥ शतत्रयाधिके तोयमुत्सर्गक्रमतो भवेत् ॥४७॥ दशनलकी सब औषधिय १०० पल, दोनों करंज १०० पल, देवदारु, दर. पुनेरा वरना, देती,चीता, पुनर्नवा थूहर, निम्ब, कदम्ब, विलगिरु, भिलावे. कचर, पोकरमूल, पीपलामूल, प्रत्येक चालीस २ तोला लेवे । जो, वेर. कुलथी. प्रत्येक एक २ सेर लेवे फिर इनको अलग २ लोरर २ सेर जलमें पकावे चौया हिस्ता वाकी रहे तो उतारकर छान

१२४
नपुंसकामृतार्णवः।
लेवे फिर इस क्कायमें जलवेत, त्रिफला, भाडंगी, रोहिपतृण, गजपीपल,
अदरख, वायविडंग, वच, कमीला, प्रत्येक एक २ तोला लेकर कल्क
बनावे उत्तम गोघृत १ सेर लेकर इन औषधियोंका क्वाथ और कल्क
मिलाकर सिद्ध करे । इस घीको धान्वन्तरघृत कहते हैं । इसके सेवनसे
कोढ़, प्रमेह, गुल्म, सूजन, वातरक्त, प्लीहा, उदररोग, बवासीर, विद्रधि,
प्रमेहपिडिका, अपस्मार, उन्माद, यह सबरोग नष्ट होते हैं इस घृतमें
ऊपर कहीं सौ २ पल औषधि अलग २ सोलह २ सेर जलमें पकाने
चाहिये ॥ ४०-४७॥
चन्द्रप्रभा।
चंद्रप्रभावचामुस्ताभूनिंबसुरदारवः ।।
हदिदातिविषा दावी पिप्पली मूलचित्रकम् ॥४८॥
धान्यकं त्रिफला चव्यं विडंगं गजपिप्पली ॥
सुवर्णमाक्षिकं व्योषं द्वौ क्षारौ लवणत्रयम् ॥ ४९ ॥
एतानि टंकमानानि संगृह्णीयात्पृथक्पृथक् ॥
द्विकर्ष हतलोहं स्याचतुष्कर्षा सिता भवेत् ॥५०॥
शिलाजत्वष्टकर्ष स्यादृष्टकर्षाश्च गुग्गुलोः ॥
विधिना योजितैरतैः कर्तव्या गुटिका शुभा ॥५१॥
चंद्रप्रभादि विख्याता सर्वरोगप्रणाशिनी ॥
निहति विंशतिमेहान्कृच्छ्रमष्टविधं तथा ॥५२॥
चतस्रश्वाश्मरीस्तद्वन्मूत्राघातांस्त्रयोदश ॥
अण्डवृद्धिं पाण्डुरोगं कामलां च हलीमकम् ॥ ५३॥
श्वासं कासं तथा कुष्टमग्निं मांद्यमरोचकम् ॥
वातपित्तकफव्याधिवल्या वृष्या रसायनी ॥५४॥

- भाषाटीकासमेतः। १२५ कचूर, वच, नागरमोथा, चिरायता, देवदारु, हलदी, अतीस, दारु- हलदी, पीपलामूल, चित्रक,धनियां, त्रिफला, चव्य, वायविडंग, गजपी- पल, सोनामक्खीकी भस्म, सोंठ, मिरच, पीपल, सज्जीखार, जवाखार, संचरनमक, सेंधानिमक, विडनमक, प्रत्येक चार चार मासे, लोहभस्म २ तोला, मिसरी ४ तोला, उत्तम शिलाजीत ८ तोला, शुद्ध गुग्गुल ९ तोला, इन सबको मिलाकर लोहे के इमामदस्तेसे खूब कूटे और एक जीव बना देवे फिर दो २ मासेकी गोली वनावे । यह चन्द्रप्रभा गुटिका सर्वरोगनाशिनी है। इसके सेवनसे बीस प्रकारके प्रमेह मूत्रकृच्छू, पथरी, मूत्राघात, अण्डवृद्धि, पांडुरोग, कामला. हलीमक, श्वास, खांसी, कुष्ठ, मन्दाग्नि, अरोचक, यह सब रोग नष्ट हों । वात, पित्त, कफके सब रोग नष्ट होते हैं और बलकारक वृष्य और रसायन है ॥ ४८-६४ ॥ गन्धकयोग। गंधकं गुडसंयुक्तं कर्ष भुक्त्वा पयः पिबेत् ॥ विंशतिस्तेन नश्यंति प्रमेहपिटिका अपि ॥५५॥ शुद्ध आमलासार गन्धक एक तोला लेकर गुड़में मिलायकर खावे उपर दूध पीवे तो बीस प्रकारका प्रमेह और प्रमेह पिडिका नष्ट होतीहैं५५ नाग भस्म योग। शुद्धस्य च मृतस्याहे रजोवल्लमितं लिहेत् ॥ सुनिशामलकं क्षौद्रं सर्वमेहप्रशांतये ॥५६॥ शुद्ध किये शीशेकी भस्म ३ रत्ती लेकर हलदी और आमलेके चूर्णके साथ सहतमें मिलाकर नित्य चाटे तो सब प्रकारके प्रमेह नष्ट होतेहैं।६॥ अभ्रक योग। सवरा रजनीरजः॥ मधुना लीढमचिरात्प्रमेहान्विनिवर्तयेत् ॥ ५७॥ निश्चंद्रमभ्रक भस्म १२६ नपुंसकामृतार्णवः । निश्चन्द्र अभ्रक भस्ममें त्रिफला और हलदीका चूर्ण मिलाकर शहतम चाटे तो सब प्रमेह शीघ्र नष्ट होते हैं । ५७ ॥ शिलाजीत प्रयोग। शिलाजतुरसं पीत्वा प्रातः क्षीरसितायुतम् ॥ . मुच्यते सर्वमेहेभ्यस्त्रिसप्तदिवसैनरः ॥२८॥ शिलाजीतको मिसरी मिले दूधसे नित्य प्रातःकाल सेवन करे तो २१ रोजमें सब प्रमेह दूर हों॥ ५८ ॥ वंगेश्वर रस। रसस्य भस्मना तुल्यं वंगभस्म प्रकल्पयेत् ॥ अस्य गुंजाद्वयं हंति मेहान्क्षौसमन्वितम् ॥ पक्कोदुंबरचूर्णं च मधुना चानुपानकम् ॥ ५९॥ पारेकी भस्म (अथवा चन्द्रोदय या रस सिंदूर ) और वंगभस्म, दोनोंको मिलाकर सहतके साथ दो रत्ती प्रमाण चाटे और ऊपरसे गूलरके फलोका चूर्ण शहतमें मिलाकर खावे तो सब प्रकारके प्रमेह दूर होते हे५९ महावंगेश्वररस। वगं कांतं च गगनं हेमपुप्पसमं समम् ॥६०॥ कुमारीरसतो भाव्यं सप्तवारं भिपवरैः॥ एप वगेश्वरो नाम प्रमेहान्विशति जयेत् ॥ मूत्रकृच्छं सोमरोगं पांडुरोगं महाश्मरीम् ॥ ६१ ॥ चंगभस्म, कांतभस्म, नागभस्म, धतूरेके फूल, इनको समभाग लेकर घीकुमारके रसमें खरल करके एक रति २ प्रमाण गोलियां बनाकर सह- तके साथ खावे तो यह वंगेश्वर रस २० प्रकारके प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र, सोम, पांढुरोग, पथरी, इन सबको दूर करता है ॥ ६०-६१ ॥

१२७
भाषाटीकासमेतः।
मेहकुलांतकरस।
मृतं वगं मृतं चानं शुद्धपारदगंधकम् ॥ १२ ॥
भूनिंबपिप्पलीमूलं त्रिकटुत्रिफलात्रिवृत् ॥
रसांजनविडंगाब्दबिल्वगोक्षुरदाडिमम् ॥ ६३॥
प्रत्येक तोलकं ग्राह्यं शुद्धमश्मजतोः पलम् ॥
गोपालकर्कटीमूलस्वरसैर्वटिका
कुरु॥६४॥
प्रमेहात्विशति हंति सूत्रकृच्छं हलीमकम् ॥
अश्मरी कामलां पांडं. सूत्रा घातमरोचकम् ॥ ६५ ॥
अनुपानं प्रयोक्तव्यं छागीदुग्धं पयोथवा ।।
धात्रीफलस्य निर्यासं काथं कौलत्थजं पिबेत् ।। ६६ ।।
वंगभरम, अभ्रकभस्म, शुद्ध पारा, शुद्धगंधक, चिरायता, पीपलामूल,
गयविडंग, त्रिकुटा, त्रिफला, निसोथ, रसौत, मोथा, विलगिरु, गोखरू,
अनारदाना, प्रत्येक दो २ तोला लेवे, शुद्धशिलाजीत ४ तोला लेवे प्रथम
पारेगंधककी कजली करके फिर सबका चूर्ण उसमें मिलाके गोपालक-
कटी ( कचरी) की जडके स्वरसमें खरलकर दो २ रत्तिकी गोली बनावे
और वकरीके दध, अथवा, जल, या आमलेके रससे खाय अथवा कुल-
थीके काढेसे खाय तो यह प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र, हलीमक, पथरी, कामला,
पांड, मूत्राघात, अरोचक, इन सबको दूर करता है । ६२-६६ ॥
पंचाननवटी।
चित्रकं गंधपाषाणं न्यूषणं पारदं विषम् ॥
त्रिफला मुस्तकं चैषां श्लक्ष्णचूर्णीकृतं शुमम् ॥६७॥
गुंजानुमानकां तां तु प्रातरेकां च भक्षयेत् ॥
अष्टादशविधं कुष्ठं वातगुल्मं स शुलकम् ॥ ६८ ॥

१२८
नपुंसकामृतार्णवः ।
वातरोगं कर्फ सर्वं प्रमेहाश्मारिकृच्छ्रजम् ॥
प्लीहानं राजरोगं च वह्निसादमरोचकम् ॥ ६९॥
त्वरित हंति चाभ्यासाज्वरनी संप्रकीर्तिता ॥
पंचाननवटी ह्येषा रोगाणां क्षयकारिणी॥ ७० ॥
चित्रककी छाल, सोंठ, मिरच, पीपल, शुद्ध गंधक, शुद्धपारा, सिंगि-
याविष, त्रिफला, नागरमोथा, इन सबको वरावर लेवे। पहले पारे गंध-
ककी कजली करके फिर सब दवाइयोंका चूर्ण भी कजली ही मिला देवे
पानीके संयोगसे रगड़कर एक २ रत्तिकी गोली बनावे इसगोलीके सेव-
नसे कुष्ठ, वातगुल्म,शूल, वायुके रोग,कफरोग, सब किस्मके प्रमेह, पथरी,
मूत्रकृच्छू, प्लीहा, राजरोग, मंदाग्नि, अरुचि, ज्वर, यह सब दूर होते हैं यह
पंचाननवटी सवरोगोंको नष्ट करनेवाली है ॥ ६७-७० ॥
त्रिफलापाक।
प्रस्थाई त्रिफलाचूर्णं शुद्धतोये विभावयेत् ॥
चतुःपले घृते भय मंदमंदेन वह्निना ॥७१ ॥
त्रिकुटा गोक्षुरु एला चित्रकं पुष्करं तथा॥
शाणद्वयप्रमाणेन मुस्तकं
त्वपत्रजम् ॥ ७२॥
निस्तुपं धान्यकं दद्यात्पलाई च प्रमाणतः ।।
काश्मीरमश्मजं शुद्धं पण्मासञ्च प्रमाणतः ॥७३॥
प्रस्थैकस्य सितायास्तु पाकं कृत्वा विधानतः ॥
शीते मधु प्रदातव्यं कुडवैकमितन्तथा ॥ ७४॥
कर्पद्वयप्रमाणेन भोक्तव्यं च द्विसंध्ययोः॥
नेत्ररोगशिरोरोगान्सर्वान्मेहांश्च नाशयेत् ॥ ७ ॥

भाषाटीकासमेतः। १२९ आधसेर त्रिफलेका चूर्ण लेकर १ पाच शुद्धजल में भिगोकर २० तोला घृतमें मंद २ आंचसे भूनकर एकसेर मिसरीको चासनीमे मिलावे फिर इस चासनीमें सोंठ,मिरच,पीपल,गोखरू,इलायची,मोथा, तज,पत्रज,पोहकरमूल, चित्रक, प्रत्येक आठ २ मासे लेकर चूर्ण करके उसी चासनीम डाल देवे और दो तोला निस्तुप धनियां कूटकर डाले । शुद्ध शिलाजीत, केशर, यह छे२ मासे मिलाकर चासनीको नीचे उतारकर शीतल करे फिर इसमें एक पाव शुद्ध शहद मिलाकर चिकने वर्तनमे रख देवे । इसमेंसे नित्य प्रातःकाल और सायंकाल दो २ तोला खाय तो भाखोंके रोग. शिरके रोग, सब प्रकारके प्रमेह नष्ट हों ।। ७१-७५ ॥ इति मेहविधानं च सनिदानं चिकित्सितम् ॥ ज्ञातव्यमल्पाक्षरैस्तत् बह्वर्थशास्त्रसम्मतैः ॥७६॥ इसप्रकार नपुंसकतामें प्रमेहभी कारण होनेसे प्रमेहका निदान चिकित्सा का विधान कहचुके हैं सो हे तात ! इन बहुत अर्थ और शास्त्रोके सम्मत थोड़े अक्षरोंसे तुम अच्छीतरेसे समझ लो ॥ ७६ ॥ श्रीये ० पचानन १० रामप्रसादोपाध्यायविनिर्मितनपुसकामृतार्णवे नपुसकते कारणत्वात्प्रमेहवर्णनो नाम सप्तमस्तरंगः ॥ अथ-अष्टमस्तरङ्गः। नपुंसकत्वे कारणत्वेनोपदंशफिरंगवर्णनम् । शिप्य उवाच उपदंशफिरंगाभ्यां शिश्नञ्चापि विशीयते ।। शिश्नेन हि विना नाथ कुतः पुंस्त्वस्य संभवः॥ १ ॥ वीर्यशिश्नविकाराभ्यां ध्वजभंगः प्रवर्तते ॥ अतस्तदोषशांत्यर्थ यथावद्वक्तुमर्हसि ॥२॥ 4.

१३०
नपुंसकामृतार्णवः।
शिष्य कहने लगे हे गुरो ! उपदंश और फिरंगसे भी तो लिगद्रिय गल
जाती है और गिरभी जाती है बस जब लिंगेंद्रिय विकाररहित निरोग न
हो तो पुरुषार्थपना कहां होसक्ती है और वीर्यम तथा लिंगेंद्रियमें विकार
होनेसे ध्वजभंग नपुंसकता झट आ प्रवृत्त होती है । इसलिये उनकी शांति
के लियेभी ठीक २ निदानचिकित्साका वर्णन कीजिये ॥ १॥२॥
गुरुरुवाच ।
उपदंशे फिरंगे च किंचिद्भेदो हि वर्तते ॥
तदहं संप्रवक्ष्यामि सनिदानं चिकित्सितम् ॥ ३ ॥
गुरु कहने लगे हे तात ! उपदंश और फिरंगमें किंचिन्मात्र भेद है ।
सो वह निदान चिकित्सायुक्त कथन करता हूं ॥ ३ ॥
प्रायोपदंशमेहैश्च पीडिता मानवा भृशम् ॥
ध्वजभंगत्वमापन्ना निर्जीवा इव संस्थिताः ॥ ४ ॥
क्योंकि प्रायः उपदंश, फिरंग, प्रमेहसे पीडित होकर मनुष्य ध्वज -
गताको प्राप्त होकर मानो जीवनरहित होरहे हैं ॥ ४ ॥
उपदंशनिदान ।
हस्ताभिघातान्नखदतपातादधावनाद्रत्युपसेवनाद्वा ॥
दुष्टस्त्रिया योनिविकारसेवनात्पंचोपदंशाः प्रभवति शिश्श्रेय
हस्तमैथुन आदिसे हाथकी चोट लगनेसे, नख और दांतके लगनेसे
लिंगको न धोनेसे, अत्यन्त स्त्रीसे गमन करनेसे, दुष्ट विकृत आदि
योनिवाली अथवा गर्मी आदि रोगयुक्त योनिमें मैथुन करनेसे पांच
प्रकारका उपदंश लिंगद्रियमें होता है ॥ ५॥
वातोपदंशके लक्षण ।
सतोदभेदस्फुरणैः सकृष्णः स्फोटेwवस्येन्मरुतोपदंशम् ६
लिगेन्द्रियके ऊपर काले रंगके फोडे ही उनमें सूई चुभनेकीसी योर
तोडनेकीसी पीडा हो और स्फुरण हो येद्द वातोपदंशके लक्षण हैं ॥ ६ ॥

भाषाटीकासमेतः।
१३१
पित्तोपदंशके लक्षण।
पीतैर्बहुक्लेदयुतैः सदाहैः पित्तेन रक्तैः पिशितावभासैः ।।
पित्तके उपदंशमें पीले रंगके फोड़े होतेहैं उनमेसे पानी स्रवता
है दाह होवे और रुधिरकी दुष्टतासे मांसके समान लाल रंगके घावहों ।।
कफोपदंश।
सकंडुरैः शोथयुतैमहद्भिः शुक्लर्घनैः स्रावयुतैः कफेन॥७॥
कफके उपदंशमें सफेद और मोटे, खाजयुक्त, गाढी राधाले घाव
होतेहैं ॥ ७ ॥
सन्निपातोपदंश।
नानाविधनावरुजोपपन्नमसाध्यमाहुस्त्रिमलोपदंशम् ८॥
अनेक किस्मके स्राव पीडायुक्त तीनों दोषोंके लक्षणोंवाला उपदंश
बसाध्य होता है ॥ ८॥
असाध्य उपदंश।
संजातमात्रे न करोति मृढःक्रियां नरो योविषये प्रसक्तः।
कालेन शोथकृमिदाहपाविशीर्णशिश्नो नियतेस तेन९
उपदंशके पैदा होतेही जो मूर्ख इसका यत्न नहीं करते और स्त्रीसंग
आदि विषयोम लगे रहते हैं उनका लिंग थोडेही समयमें सूजन और
कीडे, दाबाला होकर गलकर गिरजाता है ॥ ९॥
उपदंशकी चिकित्सा।
उपदेशेषु सर्वेषु स्निग्धस्विन्नस्य देहिनः ॥
मेमध्ये शिरी विध्येत्पातयेद्वा जलौकसः ॥ १० ॥
सद्यो निहंति दोषस्य रुक्छोथावुपशाम्यति ॥
पाको निवार्यों यत्तेन शिश्नक्षयकरश्च यत् ॥ ११ ॥

१३२ नपुंसकामृतार्णवः। सव किस्मके उपदंशोमें स्नेहन, स्वेदन, कराकर लिगकी नसमेंसे रक्त निकलवावे । अथवा जोंक लगवाकर रक्त मोक्षण करावे ताके रुधिरके निकलनेसे दोष शांत होकर पीटा और सूजनभी शांत होजाती है और उपदंशमे विशेष करके इंद्रियके घावोंको शीघ्र सुखा देना चाहिये क्यों कि वह बढ़कर लिंगको नष्ट करडालते हैं ॥ १० ॥ ११ ॥ उपदंशपर लेप। वटप्ररोहार्जुनजंबुलोध्रपथ्याहरिदारचितमलेपः॥ व्यथां तथाशोथमपाकरोति सर्वोपदेशेषु यतोहितोयम् १२ बड़के अंकुर, कोहवृक्षकी छाल, जामुनकी छाल, हरड, हलदी, लोध, इन सवको जलके संयोगसे रगड़कर किचिद्गर्म करके लेपकरे तो सब किस्मके उपदंशासे हुई लिंगकी पीड़ा और सूजन दूर होती है ।। १२ ॥ त्रिफलायाः कषायेण झंगराजरसेन च ॥ उपदेशेषु पक्केषु व्रणप्रक्षालनं पक्केषु व्रणप्रक्षालनं हितम् ॥ १३ ॥ त्रिफलेके काथ अथवा भांगरेके रससे उपदंशके घावोको धोना घायाको आराम करता है ॥ १३ ॥ लेप । पूगीफलं हरिद्रां च श्लक्ष्णं पिष्ट्वा प्रलेपयेत् ॥ लिंगशोथव्यथाकडूनाशनं नास्त्यतः परम् ॥ १४ ॥ सुपारी और हलदीको वारीक पीसकर लेप करना उपदंशकी सूजन, पीडा, खाज इनको दूर करता है ।। १४ ।। भूनिवादिघृत । भूनिंबनिवत्रिफलापटोलकरंजधात्रीखदिराशनानाम् ॥ कपायकल्कैः शृतमाज्यमाशु सोंपदंशापहरं प्रदिष्टम्॥ १५ चिगयता, निंब, त्रिफला, पटोलपत्र, करंजके फल, आमले, खरसार, विजयसार, प्रत्येक एक २ पाव लेकर १६ सेर जलम पकावे जब ४ सेर भाषाटीकासमेतः। १३३ रहे उतारकर छान लेवे और फिर उपरोक्त सब दवाइयोंका चार २ तोला चूर्ण दूसरीदफा फिर लेकर इस क्वाथमें रगड़कर १ सेर गोघृतमें मिला कर घृत सिद्ध करे । इस घृतके खाने और लगानेसे सब प्रकारके उपदंश दूर होते हैं ।। १५ ॥ करंजादिघृत। करंजनिंबार्जुनशालजंवूवटादिभिः कल्ककषायसिद्धम् ॥ सर्पिनिहन्यादुपदंशदोषं सदाहपाकं नुतिरागयुक्तम् ॥ १६॥ करंजके पत्र और फल, नीमके पत्र, कोहकी छाल, शालकी छाल, जामुन, वट, पीपल, गूलर, पाखर, पिलखन, वेतस, इन सबकी छाल लेकर उपरोक्त रीतिसे घृत सिद्ध करे । इस घृतके खाने और लगानेसे दाह, पाक, स्राव, लाली युक्त उपदंश दूर होता है ॥ १६ ॥ उपदंशका भेद फिरंग। उपदंशस्य भेदोयं फिरंग इति कथ्यते ॥ दुष्टयोनिप्रभावाच संसर्गोष्णप्रशीततः॥ १७॥ उष्णदेशोद्भवा ये च शीतदेशभवाश्च ये ॥ विकृतानां प्रसंगाच फिरंगमुपपद्यते ॥ १८॥ हेतात ! उपदशकाही भेद फिरंग रोगहै । यह रोग दुष्ट योनि अथवा रोगयुक्त योनिके संसर्गसे अथवा गरम देशके पुरुष शीतल देशके रहने वाली सियासे मैथुन करें । या शीतदेशवासी मनुष्य उष्णदेशवासी स्त्रियोंसे मैथुन करे तो यह फिरंग होताहै और विकृत अर्थात् उलटे स्व- भाववाले देश निवासियोंके संसर्गसे यह फिरंग रोग उत्पन्न होताहै । अथवा फिरंगियोंके देशमें होनेवाले उपदंशको भी फिरंग कहते हैं उनके संसर्गसे हुवा उपदंश इसदेशमें भी फिरंगनामसे कहा जाताद यथार्थमें यह उपदंगकाही भेद है ॥ १७-१८ ॥ ,

१३४
नपुंसकामृतार्णवः।
फिरंगका रूप।
फिरंगस्त्रिविधो ज्ञेयो बाह्य आभ्यंतरस्तथा ॥
बहिरन्तर्भवश्वापि तेषां लिंगानि च ब्रुवे ॥ १९॥
तत्र बाह्यफिरंगः स्याद्विस्फोटसदृशोऽल्परुक् ।।
स्फुटितो व्रणवद्वेद्यः सुखसाध्योपि स स्मृतः ॥२०॥
संधिष्वाभ्यंतरःस स्यादामवात इव व्यथाम् ।।
शोथं च जनयेदेष कष्टसाध्यो बुधैः स्मृतः॥२१॥
फिरंग रोग तीनप्रकारका है १ वाहर, दूसरा भीतर, तीसरा बाहर
और भीतर, इसप्रकार ३ किस्मका है उन तीनोंके चिद अब कथन
करते हैं बाहरके फिरंगमें जो फोडे होतेहैं उनमें थोड़ी पीड़ा होतीहै
और फोडेकी समान फूटताहै इसका यत्नभी फोडेके घावकी समान
सुखसाध्य है और अन्दरके होनेवाला फिरंग सन्धियोमें होता है और
उसमें संधियोम अत्यंत पीड़ा तोद आदि होतेहैं अथवा जिसमें वाहर
और भीतरके दोनों लक्षण मिलते हों और शोथ भी पैदा होगया हो यह
कष्टसाध्य है ॥ १९-२१॥
फिरंगके उपद्रव।
काय बलक्षयो नासाभंगो वह्वेश्च मंदता ॥
अस्थिशोपोस्थिवक्रत्वं फिरंगोपद्रवा अमी ॥२२॥
शरीरका कृश होना, वलका नाश, नाक बैठ जाना, अग्निमंद होना,
हड़ियोंका सूखना, या टेढा होजाना, ये फिरंग रोगके भेदहें ॥ २२ ॥
साध्या साध्यत्वञ्च ।
बहिर्भवो भवेत्साध्यो नवीनो निरुपद्रवः ॥
आभ्यंतरस्तु कष्टेन साध्यः स्यादयमामयः॥२३॥

भाषाटीकासमेतः। १३५ बहिरंतर्भवो जीणे क्षीणस्योपद्रवैर्युतः ॥ व्याप्तो व्याधिरसाध्योऽयमित्याहुर्मुनयः पुरा ॥ २४ ॥ जो फिरंग नवीन वाहर प्रगट हुवा हो और उपद्रवरहित हो वह साध्यहै । और जो भीतर प्रगट हुवा हो और पुराचीन हो वह कष्टसाध्य है और जो बाहर और भीतर प्रगट हो पुराचीन हो और मनुष्य क्षीण हो और उपद्रवयुक्त हो तो असाध्य समझना ॥२३-२४॥ फिरंगकी चिकित्सा। फिरंगे सर्पिषः पानं तीक्ष्णं वापि विरेचनम् ।। रक्तस्य मोक्षणं चैव हितं च पथ्यभोजनम् ।। २५ ।। फिरंग रोगमें फिरंगनाशक घृतोंका पीना, और जमालगोटे बादिका तीक्ष्ण विरेचन कराना, तथा रक्तमोक्षणकराना और पथ्य भोजनका सेवन करना तथा पथ्यसे रहना यह सब हितकारक है ॥ २५ ॥ रसकर्पूरसेवन। केवलं रसकर्पूरमूर्द्धपातनकारितम् ॥ रक्तिकाईप्रमाणेन पक्कगोधूमवेष्टितम् ॥२६॥ अथवा रक्तिकामानं पक्कचूर्णेन वेष्टितम् ॥ विधिना भक्षयेद्रोगी लवंगचूर्णसंयुतम् ॥२७॥ अलवणं भक्षयेचानं अथवा घृतसंयुतम् ॥ स्नातको ब्रह्मचारी च तिष्ठेविधियुतो बुधः ॥२८॥ पूर्व विरेचनं कुर्यात्तत्पश्चाद्भक्षयवटीम् ॥ उपदंशफिरंगनीं उत्तमेयं प्रकीर्तिता ॥२९॥ रसकपुरको लेकर डमरूयंत्रद्वारा उडा लेवे फिर इस उडेहुवे रसकपूरको एकरति अथवा आधी रत्ती प्रमाण लेकर कनककी रोटीके अंदरके गूदेमें

नपुंसकामृतार्णवः ।
डालकर युक्तिसे गोली वनावे ताके गोलीसे बाहर किंचिन्मात्रभी रसकपूर
न रहै फिर इस गोलीको लौगोंके वारीक चूर्णमें लपेटकर फिरंगरोगवाला
इसगोलीको सावतही निगल जावे मुखमें न लगने देवे, ऊपरसे केवल एक
चूंट सील गर्मपानीको पीवे और विना नमक व मीठेके केवल सूखी रोटी
खाय अथवा केवल घीसेही खावे और स्नान न करे ब्रह्मचारी रहे इस
प्रकार ७ रोज अथवा १४ रोज खाना चाहिये । परतु पहले तीक्ष्ण विरे-
चनद्वारा शुद्धशरीर होकर खावे तो उपदंश और फिरंग अवश्य नष्ट हो
यह अनुभव कियाहुवा परमोत्तम योगहै ॥ २६-२९ ।।
महम ।
तुत्थंसिक्थं च कांप्पिल्लं सिंदूरं मृतमश्मकम् ॥
पूगीफलं च खरं भर्जितं शाणमात्रकम् ॥३०॥
कपूरं च वेदगुंजा सर्व संमेलयेद्बुधः ।।
एकोत्तरशतं धौते नवनीते विमेलयेत् ॥३१॥
उपदंशफिरंगनं लेपनं
परमोत्तमम् ॥
अनुभूतश्च योगोयं योगेषु प्रवरो मतः॥३२॥
नीलाथोथा, मोम, कमीला, सिदूर, मुर्दाशंख, सुपारीका कोयला, छुवा-
रेका कोयला, प्रत्येक चार २ मासे, रसकपूर ४ रत्ति, सवको वारीक
करके १०१ वार धुले मक्खनमे मिलाकर उपदंश, और फिरंगके जख्मा-
पर लगावे तो वह जखम जल्दी अच्छे होजाते हैं यह परमोपयोगी उत्तम
अनुभव किया परम उत्तम महम है ॥ ३०.३२ ॥
चोपचीनीयोग।
चोपचीनीभवं चूर्ण शाणमानं समाक्षिकम् ।।
फिरंगव्याधिनाशाय भक्षयेल्लवणं त्यजेत् ॥३३॥
चोपचीनीके '४ मासे चूर्णको शहदम मिलाके चाटे और केवल घृत-
रोटी खावे और नमक आदिसे परहेज रक्खे तो फिरंगरोग दूर हो ॥३३॥

भाषाटीकासमेतः। १३७ उशवाऽवलेह । चतुःपलां ध्रुवजटां नवकर्ष किरातकम् ॥ दशकर्षा त्रिवृद्धाह्या षट्कर्षा स्वर्णपत्रिका ॥३४॥ हरीतकीत्रयं चैव वित्रिकर्ष पृथक् पृथक् ॥ शतपत्री निराधारा शतपुष्पा तथैव च ॥ ३५ ॥ नीलोत्पलं पर्यटं च साईकलवालुकम् ॥ कर्षकर्पप्रमाणेन धान्यकं रक्तचंदनम् ॥३६॥ चोपचीनीपलं चैकं योजयेन्मतिमान्नरः॥ सर्व सकुट्यविधिना श्लक्ष्णं चूर्णं च कारयेत् ॥ ३७॥ वातामकोद्भवे तैले मर्दयेच्च चतुःपले ॥ त्रिगुणे माक्षिके शुद्ध विधिना मेलयेद्भिपकू ॥ ३८ ॥ कर्षमानं भक्षयित्वा कोष्णतोयं ततः पिबेत् ।। वसंते भक्षयेन्नित्यं प्रातःकाले यथावलम् ॥ ३९ ॥ घृतं मुद् तथा शालीन्भक्षयेन्मतिमानरः॥ अम्लं तैलं दधि दुग्धं गुडं चापि परित्यजेत् ॥ १० ॥ नानायोगेषु योगोयमुत्तमः परिकीर्तितः॥ मेहं कुष्टं फिरंगं हि उपदंशं च नाशयेत् ॥१५॥ सनित्तमवांश्चैव रोगानाशयति ध्रुवम् ॥ कृपया होकदा मह्यं मातुलेन प्रकाशितम ॥१२॥ उशवा २० तोला, चिरायता ९ नोला, उत्तम निगाय १. गाया, सनाय ६ तोला, वटी दर्टका वधाल, ३ तोला, कावाहका बाल १३८ नपुंसकामृतार्णवः। तोला, जंगीहर्ड ३ तोला, गुलाबके फूल १॥ तोला, आकाशवेल (अफति- मुन)१॥ तोला, सौंफ १॥ तोला, नीलोफर १॥ तोला, पापडा १॥ तोला, एलुवा १॥ तोला, चोपचीनी ५ तोला, धनिया १ तोला, लालचंदन १ तोला, इन सबको कपडछान करके, वीसतोला बादाम रोगनम मसलकर सबसे तीनगुने शुद्ध शहदमें मिलाकर चिकनेवर्तनमें भरकर रख देवे इसमेंसे एक तोला, अथवा जितना वैद्य उचित समझे उतना खिलाकर ऊपरसे थोडासा गरम जल पिलावे और मुंग, चावल, घी, आदि पथ्य भोजन करावे तैल, खटाई, दही, दूध, उदडकी दाल लाल मिर्चसे परहेज रक्वे और इसको वसंत ऋतुमें वरावर दोमहीने खिलावे तो प्रमेह, कुष्ठ, फिरंग, उपदंश, और रक्तके विकार, इन सबको नष्ट कर्ताहै । यह परमोत्तम उशवावलेह, एक समय नेहवश कृपा करके हमारे मामा केशवानंदजीने कथन कियाथा ॥ ३४-४२॥ जंबु आदि तैल । जंबुवेतसपत्राणि धात्रीपत्रं तथैव च ॥ नक्तमालस्य पत्राणि तद्वत्पद्मोत्पलानि च ॥४३॥ बला चातिबलाम्रास्थि मधुकं च प्रियंगवः ॥ लाक्षा कालीयकं लोधं चंदनं त्रिवृताह्वया ॥४४॥ एतान्येकीकृतान्येव वत्समूत्रेण पेषयेत् ॥ अक्षमात्रयुतैव्यस्तैलप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ४५ ॥ सर्वत्रणहरं तैलमेतत्सिद्धं प्रयोजितम् ॥ उपदंशहरं श्रेष्ठं फिरंगनाशकन्तथा ॥ ४६॥ जामुनका छिलका, वेतका छिलका, आमलेके पत्र, करंजुवेके पत्र, नीलोफर, कमल, वला, अतिवला, आमकी गुठली, मुलठी, फूलप्रियंगु, लाख, कालीयक, लोध, लालचंदन. निशोथ, प्रत्येक एक २ तोला लेकर ॥ भापाटीकासमेतः। १३९ बछड़ेके मूत्रमे रगड़कर कल्क वनावे इस कल्कदारा एकसेर तैलको सिद्ध करे, इस तेलके लगानेसे सब प्रकारके घाव, उपदंशके घाव, फिरंगके घाव नष्ट होतेहैं ॥ ४३-४६ ॥ कोशातकी तैल। तिक्तकोशातकीलम्बाबीजनागरसाधितम् तैलं हत्यचिराधोरं व्रणं दुष्टमनेकधा ॥४७॥ कडवी तोरीके बीज, कडवी तोंवीके वीज, सोंठ, इन तीनोंका कल्क करके तैलको सिद्ध करे इसके लगानेसे अनेक प्रकारके घोर दुष्ट घाव नष्ट होते हैं ।। ४७॥ उपदंशघ्न रस। पारदः कर्षमात्रः स्यात्तावन्मानं तु गंधकम् ॥ तावन्मावस्तु खदिरस्तेषां कुर्यात्तु कज्जलीम् ॥१८॥ रजनीकेशरं युटयौ जीरयुग्मं यवानिका ॥ चंदनद्वितयं कृष्णा वांसी मांसी च पत्रकम् ॥ १९॥ अर्द्धकर्पमितं सर्वं चूर्णयित्वा च निक्षिपेत् ।। तत्सर्व मधुसर्पिा द्विपलाभ्यां पृथक्पृथक् ॥५०॥ मर्दयेदथ तत्खादेदर्द्ध कर्पमितं नरः।। व्रणः फिरंगरोगोत्थस्तस्यावश्यं विनश्यति ॥५१॥ अन्योऽपि चिरजातोऽपिप्रशाम्यति महाव्रणः॥ एतद्भक्षयतः शोथो मुखस्यांतर्न जायते ॥५२॥ दर्जयेदत्र लवणमेकविंशतिवासरान् घृतयुक्तामथो शुष्कां भक्षयेत्करपट्टिकाम् ॥५३॥ ॥

१३८ नपुंसकामृतार्णवः । तोला, जंगीहर्ड ३ तोला, गुलाबके फूल १॥ तोला, आकाशवेल (अफति- मुन)१॥ तोला, सौंफ १॥ तोला, नीलोफर १॥ तोला, पापडा १॥ तोला, एलुवा १॥ तोला, चोपचीनी ५ तोला, धनिया १ तोला, लालचंदन १ तोला, इन सबको कपडछान करके, वीसतोला वादाम रोगनमें मसलकर सबसे तीनगुने शुद्ध शहदमें मिलाकर चिकनेवर्तनमें भरकर रख देवे इसमेंसे एक तोला, अथवा जितना वैध उचित समझे उतना खिलाकर ऊपरसे थोडासा गरम जल पिलावे और मुंग, चावल, घी, आदि पथ्य भोजन करावे तैल, खटाई, दही, दूध, उदडकी दाल लाल मिर्चसे परहेज रक्खे और इसको वसंत ऋतुमें वरावर दोमहीने खिलावे तो प्रमेह, कुष्ठ, फिरंग, उपदंश, और रक्त के विकार, इन सबको नष्ट कर्ताहै । यह परमोत्तम उशवावलेह, एक समय स्नेहवश कृपा करके हमारे मामा केशवानंदजीने कथन कियाथा ॥ ३४-४२॥ जंबु आदि तैल। जंबुवेतसपत्राणि धात्रीपत्रं तथैव च ॥ नक्तमालस्य पत्राणि तद्वत्पद्मोत्पलानि च ॥४३॥ बला चातिबलाम्रास्थि मधुकं च प्रियंगवः ।। लाक्षा कालीयकं लोधं चंदनं त्रिवृताह्वया ॥४४॥ एतान्येकीकृतान्येव वत्समूत्रेण पेपयेत् ॥ अक्षमात्रयुतैर्द्रव्यस्तैलप्रस्थं विपाचयेत् ॥४५॥ सर्वत्रणहरं तैलमेतत्सिद्धं प्रयोजितम् ॥ उपदंशहरं श्रेष्ठं फिरंगनाशकन्तथा ॥४६॥ जामुनका छिलका, वेतका छिलका, मामलेके पत्र, करंजुवेके पत्र, नीलोफर, कमल, वला, अतिवला, आमकी गुठली, मुलैठी, फूलमियंगु, लाख, कालीयक, लोध, लालचंदन. निशोथ, प्रत्येक एक २ तोला लेकर . भापाटीकासमेतः। १३९ बछड़ेके मूत्रमे रगड़कर कल्क बनावे इस कल्कदारा एकसेर तैलको सिद्ध करे, इस तेलके लगानेसे सब प्रकारके घाव, उपदंशके घाव, फिरंगके घाव नष्ट होतेहैं ॥ ४३-४६ ॥ कोशातकी तैल। तिक्तकोशातकीलम्बाबीजनागरसाधितम् तैलं हत्यचिराद्धोरं व्रणं दुष्टमनेकधा ॥४७॥ कडुवी तोरीके बीज, कडवी तोंवीके वीज, सोंठ, इन तीनोंका कल्क करके तैलको सिद्ध करे इसके लगानेसे अनेक प्रकारके घोर दुष्ट घाव नष्ट होते हैं ॥ ४७॥ उपदंशघ्न रस। पारदः कर्षमात्रः स्यात्तावन्मानं तु गंधकम् ॥ तावन्मात्रस्तु खदिरस्तेषां कुर्यात्तु कज्जलीम् ॥४८॥ रजनीकेशरं युटयौ जीरयुग्मं यवानिका॥ चंदनद्वितयं कृष्णा वांसी मांसी च पत्रकम् ॥४९॥ अर्द्धकर्पमितं सर्व चूर्णयित्वा च निक्षिपेत् ॥ तत्सर्व मधुसर्पिभ्यां द्विपलाभ्यां पृथक्पृथक् ॥५०॥ मर्दयेदथ तत्वादेदर्द्ध कर्षमितं नरः। व्रणः फिरंगरोगोत्थस्तस्यावश्यं विनश्यति ॥५१॥ अन्योऽपि चिरजातोऽपिप्रशाम्यति महाव्रणः ।। एतद्भक्षयतः शोथो मुखस्यांतर्न जायते ॥५२॥ वर्जयेत्र लवणमेकविंशतिवासरान् घृतयुक्तामथो शुष्कां भक्षयेत्करपट्टिकाम् ॥५३॥ ॥

१४० नपुंसकामृतार्णवः। शुद्ध पारा १ तोला, गंधक, १ तोला, कत्था १ तोला, इन तीनोंको खरलमे डालकर तीनदिन खूब रगड़े जब कजली होजाय फिर इसमें हलदी, केशर, इलायची, जीरा, काला जीरा, अजवायन, चन्दन, लालचं- दन, पीपल, वंशलोचन, जटामांसी, पत्रज, यह छै २ मासे मिलावे और वारीक पीसकर एक जीव करदेवे फिर इसमें शहद ८ तोला डालकर खूब घोटे फिर ५ तोला घृत मिलाकर खरल करे । फिर छै २ मासेकी गोली वनावे और १ गोली नित्य २१ रोजतक खाय नमक न खावे केवल सूखी रोटी अथवा घी रोटी खावे इसके खानेसे मुह नहीं आता और फिरंग, घाव, सब प्रकारके नये पुराने जखम नष्ट होतेहैं ॥ ४८-५३ ॥ प्रसंगात्कथिता तात उपदंशहरी क्रिया ।। व्रणवत्कुष्ठवच्चात्र कर्तव्या विविधाः क्रियाः॥५४॥ स्वेदनं वमनं चाथ तीक्ष्णञ्चैव विरेचनम् ॥ ततश्च औषधीनां वै प्रयोगमुपयोजयेत् ॥५५॥ हे तात ! प्रसंगवश इस तरंगमें उपदंश और फिरंग नाशक थोडीसी क्रिया कथन करदी है । प्रायः फिरंगमं कुछ और व्रणकी समान अनेक क्रियाओंसे शरीरके दोषको शमन करना चाहिये और पहले स्वेदन स्नेहन कराकर वमन करादेना चाहिये । फिर तीक्ष्ण औषधि ( जमालगोटा आदि) से विरेचन कराकर फिर दोपन्न गेगनागक औषधियोंसे गेगकी शान्ति करे॥५४-५५॥ विधिनानेन प्रथमं प्रमेहादीन्विनाशयेत् ॥ ततः शुद्ध शरीरे च कुर्याद्वाजिकरं विधिम् ॥५६॥ पहले इस प्रकार पृक्ति विधिसे प्रमेह उपदंश आदि उपद्रवोंको शमन करे जव शुद्ध शरीर होजाय तो वाजीकरण पदार्थासे विधिपूर्वक शरीर और वीर्यकी शक्तिको बलवान् करनेका उपाय करे ॥५६॥ इति श्रीवैध पचानन पं० गमग्रमादोपाध्यायतनपुमका मृतार्णव उपदशगंगवर्णनो नामाष्टमस्तरगः ॥ +

भाषाटीकासमेतः।
अथ नवमस्तरंगः।
अथोत्तमवाजीकरणरसायनयोगवर्णनम् ।
गुरुरुवाच।
यद्यत्तात त्वया पृष्टं तत्तत्सर्वं हि वर्णितम् ॥
उत्तमानधुना योगान्वाजीकररसायनान् ॥ १ ॥
तर बुद्धिप्रभावेण विनयावनतेरथ ।।
प्रसन्नाहेमतस्तात वक्ष्ये तदपि श्रूयताम् ॥ २ ॥
हे तात ! तुमने हमसे जोजो कुछ पूछा वह हमने सब कुछ सुनादि-
यहि । परंतु तुम्हारी बुद्धिके प्रभावसे और नीतियुक्त नम्रतासे मैं बहुत
प्रसन्न हुवा हूं इसलिये अब उत्तम वाजीकरण और रसायन योगोंका
थोड़ा और कथन करता हूं सो तुम सुनो ॥ १-२॥
दशमूलारिष्ट ।
पण्यौ बृहत्यौ गोटबिल्वाग्निमंथनोरलूः ।।
पाटला काश्मरी चेति दशमूलमिहोच्यते ॥ ३ ॥
दशमूलानि कुर्वीत भागैः पंचपलैः पृथक् ॥
पंचविंशपलं कुर्याचित्रकं पौष्करं तथा ।। ४ ।।
कुर्याविंशत्पलं लोभ्रं गुडूची तत्समा भवेत् ॥
पलेप्पोडशभिर्धात्री रविसंख्यदुरालभाः॥५॥
खदिरो बीजसारश्च पथ्या चेति पृथक् पलैः ॥
अष्टाभिर्गुणितैः कुष्ठं मंजिष्टा देवदारु च ॥ ६॥

१४२
नपुंसकामृतार्णवः।
विडंगं मधुकं भाी कपित्थोक्षः पुनर्नवा ॥
चव्यमांसी प्रियंगुश्च सारिवा कृष्णजीरकम् ॥ ७ ॥
त्रिवृता रेणुका रास्ना पिप्पली क्रमुकः सटी ॥
हरिद्रा शतपुष्पा च पद्मकं नागकेशरम् ॥ ८ ॥
मुस्तमिद्रयवा शृंगी जीवकर्षभको तथा ॥
मेदाश्चान्या महामेदा काकोल्या ऋद्धिवृद्धि च ॥ ९ ॥
कुर्यात्पृथक् द्विपलिकान्पचेदष्टगुणे जले ॥
चतुर्थांशशृतं नीत्वा मृद्भांडे संनिधापयेत् ॥ १० ॥
ततष्पष्टिपला द्राक्षां पचेन्नीरे चतुर्गुणे ॥
त्रिपादशेषं शीतं च पूर्वकाथे शृतं क्षिपेत् ॥११॥
द्वात्रिंशत्पलकं क्षौद्र गुडं दद्याचतुःशतम् ॥
त्रिंशत्पलानि धातक्याः कंकोलं जलचंदनम् ॥ १२॥
जातीफलं लवंगं च त्वगेलापत्रकेशरम् ॥
पिप्पली चेति संपूर्णभागैर्द्विपलिकैः पृथक् ॥ १३॥
शाणमात्रां च कस्तूरी सर्वमेकत्र निक्षिपेत् ॥
भूमौ निखनयेद्भांडं ततो जाते रसे पिवेत् ॥ १४ ॥
कतकस्य फलं क्षित्वा रसं निर्मलतां नयेत् ।।
ग्रहणीमरुचिं शूलं श्वासकासभगंदरान् ॥ १५ ॥
वातव्याधि क्षयं छर्दि पाण्डुरोगं सकामलम् ॥
कुष्टान्यऑसि मेहांश्च मंदाग्निमौदराणि च ॥ १६॥

भाषाटीकासमेतः। १४३ , . शर्करामश्मरीं चैव सूत्रकच्छू क्षयं नयेत् ॥ कृशानां पुष्टिजननो वंध्यानां पुत्रदः परः॥ अरिष्टो दशमूलाख्यस्तेजःशुक्रबलप्रदः ॥ १७॥ शालपर्णी, पृष्ठपर्णी, छोटीकटेली, वडीकटेली, गोखरू, बिल्व, भरणी, अरलू, पाटला, कुमार, इनको दशमूलकहतेहैं । दशमूलकी प्रत्येक औषध पांच २ पल ( अर्थात् सवमिलाकर दशमूल ५० पल ) और चित्रक २५ पल, पुहकरमूल २५ पल, लोध २० पल, गिलोय२० पल, आमले १२ पल, धमासा १२ पल खैरसार ८ पल, विजयसार ८ पल, हरड ८ पल, कूठ, मंजीठ, देवदारु, वायविडंग, मुलैठी, भारंगी, कैथ, बहेडा, पुनर्नवा, चव्य, जटामांसी, प्रियंगु, सारिवा, कालाजीरा, निशोथ, रेणुका, राना, पीपल, सुपारी, कचूर, हलदी, सौंफ, पद्माख, नागकेशर, मोथा; इंद्रजौ, काकडासिगी, जीवक, ऋपभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, ऋद्धी, वृद्धी, प्रत्येक दो २ पल लेकर सबसे आठगुणे जलमें पकावे चतुर्था- शबाकी रहने पर उतार लेवे । मुनका ६० पल, लेकर चारगुणे जलमें पकावे तीसरा हिस्सावाकी रहने पर उतारले, इन दोनोंक्वार्थोको एकत्र करके मिट्टीके पात्रमें भरकर उसमें सहद ३२ पल, गुड़ १०४ पल, धायके फूल ३० पल, कंकोल, नेत्रवाला, लालचंदन, जायफल, लौंग, दालचीनी इलायची, तेजपात, नागकेशर. पीपल, प्रत्येक दो २ पल कस्तूरी चार मासे लेवे, सवका चूर्ण कर उसी पात्रम डालकर पात्रका मुख बंद करदेवे और उसको पृथ्वीमें ( खातयुक्त गरम पृथ्वी- में गाड देवे एकमहीने बाद निकालकर इसमें निर्मली फलका चूर्ण डालकर रसमात्र शुद्ध करके नितार लेवे ( अथवा अर्क खींच लेवे ) इस्यो भोजनके समय रचित मात्रासे सेवन करे. इसके सेवन करनेसे मंत्रणी, अरुचि, शूल धाम. खांसी, भगंदर, वातव्याधि, क्षय, वमन, पाटुरोग, कामला, कोट, बवासीर. प्रमेह मंदाग्नी, उदररोग, शर्करा, .

१४४
नपुंसकामृतार्णवः ।
पथरी, मूत्रकृच्छ्र, धातुक्षय, ये सब दूर होवें, कृश मनुष्योंको पुष्ट करे,
वंध्या पीवे तो संतानवाली होवे, यह दशमूलारिष्ट तेज, वीर्य और बलको
देताहै ॥ ३-१७ ॥
मृतसंजीवनीसुरा।
नवं गुडं च संगृह्य शतमेकपलं तथा ॥
वर्धरीत्वचं च संगृह्य बदरीत्वचमेव च॥ १८॥
प्रस्थंप्रस्थं प्रदातव्यं पूगं देयं यथोचितम् ॥
दत्त्वा लोधं च कुडवमाकं च पलक्ष्यम् ॥ १९॥
तोयमष्टगुणं दत्त्वा गुडं संघोलयेत्सुधीः ॥
प्रथमे चाकं दद्याहितीये बर्द्धरीत्वचम् ॥२०॥
तृतीये बदरीं दत्त्वा गोलयित्वा भिषग्वरः॥
सुखे शरावकं दत्त्वा यत्नात्कृत्वा च बंधनम् ॥ २१ ॥
मुखं संबंधनं कृत्वा स्थापयेदिनविंशतिम् ॥
मृण्मये मोचिकायंत्रे मयूराख्येपि यंत्रके ॥ २२ ॥
यथाविधि प्रकारेण मंदमंदेन वह्निना ॥
चुहीमध्ये विधातव्यं मृत्तिकाढ़भाजने ॥ २३॥
तदौपधं च तन्मध्ये समुद्धृत्य विनिक्षिपेत् ॥
नले च युगलं दत्त्वा कुंभौ च गजकुंभवत् ॥ २४ ॥
कुंभमध्ये निधातव्यं पूगं च तेलवालुकम् ॥
देवदारुं लवंगं च पद्मकोशीरचंदनम् ॥२६॥
शतपुष्पा यवानीका मरिचं जीरकद्वयम् ॥
शठी मांसी त्वगेला च जातीफलसमुस्तकम् ॥२६॥

भाषाटीकासमेतः। १४५ - ग्रंथिपर्णी तथा शुठी मेथी मेषी च चंदनम् ॥ एपां चाईपलान्भागान्कुट्टयित्वा विनिक्षिपेत् ॥ २७॥ यथाविधिप्रकारेण चालनं दापयेत्सुधीः॥ बुद्धिमान्सोंजनं कृत्वा उद्धरे विधिवत्सुराम् ॥ २८॥ एतन्मयं पिबेन्नित्यं यथाधातुवयःक्रमम् ॥ आरोग्यजननं देहदाढयकृद्धलवर्द्धनम् ॥ २९ ॥ मेध्याग्निस्मृतिकृद्धीर्यशुक्रकृद्वातनाशनम् ॥ बलपुष्टिकरं चैव कामदं दीपनं परम् ॥ ३० ॥ दश स्त्री रमयेन्नित्यमानंद उपजायते ॥ रणे तेजोमयः सद्यो यथा भीम पराक्रमीः ॥३३॥ नवीन गुड़ ४०० तोले, कीकरकी छाल वेरीकी छाल, सुपारी, प्रत्येक एक २ सेर, लोध १ पाव, अदरख ८ तोला, इनसे आठगुणा जल लेकर उसम गुड़ घोल देवे फिर यथाक्रम पहले अदरख, वेरकी छाल आदि डालकर उत्तमरीतिसे मिला देवे । फिर सुपारी और लोधके चूर्णका प्रक्षेप करके उस पात्रका मुख बंद करके २० रोजतक रक्खा रहने देवे फिर इसको भिट्टाके वारुणीयंत्र अथवा मयूर यंत्रमे डालकर मंद २ अग्निसे गरम करे। फिर इसमें सुपारी एलवालुक, देवदारु, लौंग पद्माख, खस, रामचंदन सौफ, अजवायन मिरच, दोनों जीर कचूर, जटामांसी, दालचीनी, इलायची, जायफल, नागरमोया, गठौना, सांठ, मेथी, भटालिगी चंदन प्रत्येक दो २ तोला कूटकर डाल देवे और लकडीसे खन मिला देवे । फिर मुखवंदकर नाल लगाकर विधिपूर्वक अर्क खीच तेवे । फिर अवस्था आदिशा विचार करके वैद्य योग्यमात्रासे सेवन करावे दलंद सरनले मनुर आरोग्य ररे देह दृढहो, वल, मंबा, अनि. स्मृति, १४५ नपुसकामृताणवः। वीर्य, पुष्ट हो, कामाग्नि दीपन हो, दश स्त्रियोंसे रमण करनेकी शक्ति हो, रणमें लडनेकी शक्ति बढ़े । यह मृतसंजीवनी सुराई क्षत्रियों के सेवन- योग्य है ।। १८-३१ ॥ भल्लातक। अनुभूतं शुभं योगं प्राप्तमाप्तसकाशतः॥ तदहं संप्रवक्ष्यामि शृणु तात विधानतः॥३२॥ पक्वान्भल्लातकांश्चैव मृदुवातेन पातितान् ॥ आनीय विधिना कुटय तदूरीकृतमूर्द्धजान् ॥ ३३ ॥ घृतेन पाणिं संलिप्य सगुडं मृदु पेषयेत् ॥ मापमात्रप्रमाणेन वटी कार्या प्रयत्नतः॥३४॥ शुद्धं घृतं समानीय मुखे संलिप्य पाययेत् ॥ वटिकां भक्षयित्वाथ घृतानुपानमाचरेत् ॥ ३५ ॥ सायं प्रातश्च संभुज्य लवणादीन्परित्यजेत् ॥ नीरोगो बलवान्धीमान्मासैकेन भविष्यति ॥३६॥ घृतेन भक्षयेदन्नं वातातपं परित्यजेत् ॥ उपदंशप्रमेहार्श फिरंगाश्चैव दारुणाः॥३७॥ वातव्याधिस्तथा चैवं नश्यति नात्र संशयः॥ विरेचनं पुरा कृत्वा पश्चादेनं प्रभक्षयेत् ॥३८॥ हे तात ! एक महात्माका कथन किया हुवा और आजमाया हुवा एक उत्तम योग मुनाता हूं तुम सावधान होकर सुनो। मन्द २ पवनसे उत्तम पककर गिरेहुये भिलावे लेकर उनके ऊपरकी टोपियें उतार डाले फिर हायाको घी लगाकर इनको खूब कूटे (घी इसलिये लगया जाता है कि जिस

भाषाटीकासमेतः।
१४७
स्थानपर भिलावेके रसका छींटा पड़जाय वहींपर सूजन पैदा होजाती है इस-
लिये हाथोको घी लगा लेवे और शरीरपर भिलावेका छींटा लगनेसे बचावे)
और बरावरका पुराना गुड मिलाकर भिलावे और गुडको एक जीव कर
देवे फिर इसकी एक २ मासेकी गोली बनावे फिर रोगीको पहले वमनविरे-
चन कराकर इन गोलियोका सेवन करावे । गोली खानेसे पहले उत्तम
साफ घीका एक बूंट लेकर मुखमें चारो तर्फ फेरकर निगल लेने फिर १
गोली मुखके अन्दर डालकर निगल लेवे ऊपरसे फिर घीका बूंट लेवे
यदि गोली बड़ी हो तो छोटी २ वनाकर निगल जावे और मुखमें जादे
न लगने देवे इस प्रकार एक महीना दोनो वक्त सेवन करनेसे उपदंश,
प्रमेह, बवासीर, दारुणफिरंग, यह सब दूर होतेहैं इसमे संशय नही३२-३८
महाकल्कनामक रस ।
महाकल्क प्रवक्ष्यामि श्रूयतांशिष्यसत्तम ॥
धान्यानकं विनिक्षिप्य मुसलीरसमर्दितम् ॥ ३९ ॥
स्थाल्यांक्षित्वा निरुध्याथ पिधान्या मध्यरंध्रया
स्थाल्यधो ज्यालयेद्वहिं यामपर्यतमुद्धृतम् ॥ ४०॥
ततः क्षिपेत्पिधान्यां हि व्योम्नस्त्वष्टगुणं पयः॥
जीर्णे पयसि पिष्ट्वा तत्वालमूलीरसैः पुनः॥४१॥
इत्थं हि साधयेव्योम त्रिवारमतियत्नतः॥
अजादुग्धपुटैः पश्चाद्वारिणा विंशतिः खले ॥४२॥
कंपिल्लेन रसेनापि विष्णुकांतारसेन च ॥
कदलीकंदतोयेन तालमूलीरसेन च ॥४३॥
शतवारं पुटं देयं भवेद्वयोमरसायनम् ॥
तद्वयोमभस्मितं ताप्य भस्मताम्रस्य भस्म च ॥१४॥

. १४८ नपुंसकामृतार्णवः । शुल्बभस्म च तत्सर्वं समांशं परिकल्पयेत् ॥ भावयेत्सप्तधा निंबरसैलोधरसेन निंबरसैलॊधरसेन च ॥४५॥ त्रिफलायाः कदल्याश्च केतक्यामार्कवस्य च ॥ कोरकस्यापि सारेण तावद्वाराणि यत्नतः॥४६॥ इति निष्पन्नकल्केऽस्मिस्तत्समां त्रिफलां क्षिपेत् ॥ भस्ममृतं सिता व्योपं चित्रकं च पृथक् पृथक् ॥४७॥ मधुना गुटिकाः कार्याः शाणेन प्रमिताः खलु ॥ महाकल्क इतिख्यातो ह्याश्विभ्यां परिकीर्तितः॥४८॥ विधिना वर्षपर्यन्तं भक्षयेन्मतिमानरः॥ बलवृद्धिकरः शश्वत्सर्वरोगनिवारकः॥४९॥ मेहानशास्तथा पांडुकासश्वासहलीपकात् ॥ उपदंशं फिरंगं च कुष्ठं वापि वापि निहन्त्यसौ ॥२०॥ हे शिष्य ! अब में तुमको महाकल्कनामक उत्तम रसायन सुनानाहूं सो सुनो । उत्तम काली धान्याभ्रकको मूमलीके रसम खरल करके एक हाण्डीम भरदेवे और उस हांडीके ऊपर वीचमे छेदवाला शराव ( ढकना) ढक देवे और किनारासे बन्द करदेवे फिर इस हांडीके नीचे तीक्ष्ण अग्नि जलावे । और उस ऊपरवाले छिद्रद्वारा थोडा २ करके अभ्रकमे आटगुना दूध डाले जब सब दूध जलजावे । फिर इस अभ्रकको निकालके मृमलीके सम फिर खरल करे और उसीप्रकार हांडीमें रखके आठगुना दूध जलाव एमेही तीनवार अग्निपर रखनाजाय और उतारकर मृमली के रसमें खरत करता जाय फिर २० पुट बकरीके दृवकी देवे और कमीलाके सकी, नथा कोयल, और केलेके कंदके गसकी, तया मुगलीके रसकी नव मिलाकर १०० पुट देवे पुटप्रति पुट अनि देता जाय तो यह उत्तम

भाषाटीकासमेतः।
१४९
अभ्रक भस्म तैयार हुई । इसमें सोनामक्खीकी भस्म, ताम्रभस्म कांत-
लोहभस्म, मिलाकर नीम, लोध, केलाकंद, त्रिफला, केतकी, भांगरा,
सेमलके फूल, इनके रसकी एक २ भावना देकर सुखाकर पीस लेवे ।
फिर इसमें बरावरका त्रिफलेका चूर्ण, तथा, रससिंदूर, त्रिकुटा चित्रक,
यह मिलाकर सहतसे चार २ मासेकी गोलियां बनावे इनमेंसे एक २
गोली एकवर्षपर्यत नित्य खाय और पथ्यसे रहे । अथवा जिसतरे वैद्य
उचित समझे खिलावे इस महाकल्कके सेवनसे सर्वरोगमात्र नष्ट होकर
वलकी वृद्धि हो सब किस्मके ममेह, बवासीर, पांडु, खांसी, श्वासरोग,
हलीमक, उपदंश, फिरंग, कुष्ठ, यह सब रोग नष्ट होते हैं ।। ३१-५० ।।
दिवालमश्क।
नवमापकचोलं च मापकं दलरौप्यजम् ।।
प्रवालं मौक्तिकं चैव भेदखपरमुत्तमम् ॥५१॥
मणिं याकूतनाभं च मृगनाभिन्तथांबरम् ॥
उत्तमस्वर्णपत्राणि साईमाषप्रमाणतः ॥१२॥
काश्मीरकं लघु एलाद्विमापं च पृथक्पृथक् ॥
आमपट्टस्य चूर्ण
तु टंकमात्रप्रमाणतः ॥५३॥
चंदनं शतपत्री च गोजिह्वा पत्रपुष्पकम् ॥
जातिपत्री तथा चैव शाणमात्रप्रमाणतः॥५४॥
निस्तुषं धान्यकं चैव तुगाशीरी तथैव च ।।
कर्धिकप्रमाणेन योजयेन्मतिमानरः॥५५॥
वक्रांतमाफुकं चैव खपरं च पृथक्समम् ॥
द्विरक्तिकोत्तरं चैव टंकद्वयप्रमाणकम् ॥५६॥

सदा नरैः॥ १५० नपुंसकामृतार्णवः। बिटकं निस्तुपं शुद्धं बीजं कुल्फकसंभवम् ।। मृदुदाडिमसारं च सारं मुष्टिवदरजम् ॥२७॥ सारामृतफलाभेदं सपादयुग्म्माषकम् ॥ अर्धकुडवप्रमाणेन गंधशतपत्रीजलम् ॥ ५८॥ द्विभागाच सिता शुद्धा मागैकं माक्षिकं स्मृतम् ॥ संमेल्य विधिना सर्वमवलेहं च कारयेत् ॥ ५९॥ कस्तूरिकावलेहोयं भक्षणीयः वातरोगादिशमनं बलकांतिविवर्द्धनम् ॥ ६॥ यथापि उत्तमा योगा ह्यस्मात्पूर्व प्रकाशितः ॥ लोके प्रथाधुना चास्य अत अत्र उदाहृतम् ॥ ६१ ॥ दालचीनी ९ मासे, चांदीके वर्क १ मासा, अनवीधे मोती, जहरमो- हरासताई, मूगेकीजड, उत्तम याकूत, कहरवा, अंबर, कस्तूरी, सोनेक वरक, प्रत्येक डेढ २ मासा, केशर, छोटी इलायची, प्रत्येक २ मासा आवरेशमका चूर्ण ३ मासा, चंदनसफेद पिसाहुवा, गुलाबके फूल, गाजुवां, गाजुबांके फूल, जवत्री प्रत्येक ४ मासे, धनियेके चावल, वंशलो चन प्रत्येक छे २ मासे, अफीम, संगय सव, प्रत्येक छेमासे २ रति, कुलफेके वीज छिले हुवे ९ मासे, सेव, अनार, वीही, इन तीनाका सव्व सवादो २ मासे, गुलावका मर्क आधपाव वेदमुश्क आधपाव, शहद २ भाग, मिसरी २ भाग, सबको विधिपूर्वक मिलाकर अवलेह अर्थात् माजन बनावे । इसको दिवालमुश्क कहतह यह उचित रीतिसे सेवन करनेसे वायुके रोगोंको दूर करता है और वल तथा कांतिको वढाता है यद्यपि इससे बहुत उत्तम योग हम पहले कथन कर- चुकह परन्तु यह व्यवहारमे प्रसिद्ध है इस लिये यहांभी लिखटिया?-६१ भाषाटीकासमेतः। १५१ गुरुरुवाच। नवभिश्च तरंगैश्च क्लीबानां हितकाम्यया ॥ सर्वं हि कथितं युक्त्या त्वया पृष्टो यथातथम् ॥ ६२ ईश्वरं च गुरं चैव आयुर्वेदरतांस्तथा ॥ प्रणम्य यत्करोषि त्वं सर्वं तच भविष्यति ॥ ६३ ॥ गुरु कहने लगे हे तात ! जो कुछ तुमने पूछा अयवा अपनी इच्छासे मैंने युक्तिपूर्वक नौ तरंगोंमे नपुंसकोके कल्याणके लिये समझा दिया है सो ईश्वरको और गुरुको तथा आयुर्वेदके जाननेवाले आचार्योंको प्रणाम करके जो वैद्यकसंबंधी क्रिया करोगे वह तुमारी सब शीघ्र सफल होगी६३ एवं गुरुमुखाच्छ्रुत्वा नपुंसकामृतार्णवम् ॥ प्रेम्णा साश्रुनेत्रोयं पादयोः पतति स्म तम् ॥ ६४ ॥ इस प्रकार गुरुके मुखसे नपुंसकोंके लिये अमृतका समुद्ररूप ९ तरं गोमें यह ग्रंथ सुनकर शिष्यके नेत्रों में प्रेमका जल भर आया और उसी- समय श्रीगुरुमहाराजके चणरयुगलमें गिरपडा ॥ ६४ ॥ पंचपडूनवचंद्रेऽब्दे शुक्लेभाद्रपदे शुक्लेभाद्रपदे शुभे ॥ कुजे चैव त्रयोदश्यां ग्रंथपूर्तिः कृता मया ॥६५ । श्रीविक्रमाव्दसे सं० १९६५ भाद्रपदशुक्लत्रयोदशी भौमवारको यह ग्रंथ बनाकर मैने पूर्ण किया ॥ ६५ ॥ सोयं सद्भिः समाधेयः पश्यद्भिलोकसंस्थितिम् ॥ मुखराणां त्रुटिदग्धैर्वाक्यैर्हानिर्न मे कचित् ॥ ६६॥ सो यदि इसमे कुछ त्रुटि रह गई हो तो श्रेष्ठ पुरुपाको उचित है वह संसारकी अस्था देखकर और मेरी दद्धिपर क्षमा करके समाधान करेंगे। - १५२ नपुंसकामृतार्णवः । और यदि निंदक लोग अपने छलयुक्त दूषणसे दग्ध हुवे वाक्योंसे मेरी निन्दाभी करें तो उनसे हानिही क्या है क्यों कि वे विचारे तो संसारमं सत्पुरुषों में दूषण लगानेके लिये ही पैदा हुवे हैं ॥६६॥ दोहा-यथावुद्धि कल्पित करि, शिष्यगुरूसंवाद ।। पुंस्त्वकरण कैव्यहरण, विरच्यो रामप्रसाद ॥१॥ आयुर्वेद अध्ययन करि, सत् शासनको मंथ। भेट जगतहितकर यह, कल्प कियो सद्रंथ ॥ २ ॥ श्रीटकसालनिवासिवैद्यपचाननपडितरामप्रसादोपाध्यायकृतो नपुसकामृतार्णवः समाप्तः ॥ 22 . पुस्तकमिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृणदास, "श्रीवेंकटेश्वर" स्टीम-प्रेम-चंबई

विज्ञापन।
(नपुंसकसंजीवनवख्स ) इसमें ४० गोलियोंकी शीसी, एक १२
तोला माजूनकी डिवी इस्तामाल परचा साथ है। माजून और गोलियोंसे
वीर्यसंवन्धी सब विकार प्रमेह जिरियान क्षीणता आदि दूर होती है और
तेलके इस्तामालसे इंद्रियके पट्टे ( जो छोटी उमरकी बेजाहरकतसे खराव
होगये हों ) ताकतवर होतेहैं अधिक प्रशंसाकी आवश्यकता नहीं ।
नं. १ नपुं० सं० बख्त इसमे कस्तूरी स्वर्णभस्मादि कीमती
दवाइयें है। ११०)
नं० २ न० सं०
५०)
नं० ३ न० सं०
१०)
फायदा सवका एकही है किचिन्मात्र फरक है इलावा इसके सब
रोगोंके लिये बनीहुई औषधिये रस, पाक, चूर्ण, तैल, घृत, आदि बेचनेके
लिये अतिशुद्धताईसे बनाकर तैयार रहती है ।
और लक्ष्मणा, शिवलिंगी, आदि बूटिये तथा अनेक किस्मके कन्द
वनस्पति भी यहासे मिलसकते हैं।
ठिकाना-
वैद्यपञ्चानन पं० रामप्रसाद उपाध्याय और मुरारीलाल उपाध्याय,
मु० टकसाल-रियासत पटियाला ।

वद्यकग्रंथाः। नाम. की० रु. १२) " सुश्रुतसंहिता--सान्वयसटिप्पण सपरिशिष्ट भाषार्टीका समेत - सूत्रस्थान, निदानशारीरस्थान, चिकित्सास्थान, कल्प- स्थान, उत्तरतंत्र, संपूर्ण पंडित राजवैद्य मुरलीधरजीकृत भाषाटीका सहित जिसमें संपूर्णरोगोंका निदान लक्षण और औषधोके प्रचार वा प्रत्येक रोगपर क्वाथ, चूर्ण, रस, घी, और आदिसे अच्छीप्रकारसे चिकित्सा वर्णित है इस ग्रंयकी योग्यता संपूर्ण भारतवर्षमे प्रसिद्ध है तथा उपरोक्त अलकारों समेत सूत्रस्थान प्रथमभाग निदान शारीरस्थान द्वितीयभाग चिकित्सा व कल्पस्थान तृतीयभाग उत्तरतंत्र चतुर्थभाग केवलशारीरस्थान चरकसंहिता-- पं मिहिरचंद्रकृत भाषाटीका समेत सूत्र निदान शारीर चिकित्सक, कल्प और सिद्धिस्थानादिम उपरोक्त विषयानुसार वर्णितहै . . हातिसंहिता-मूल पडित रविदत्तकृत भापाटीका सहित और राजवैद्य पं. मुरलीधर संशोधित इसके छः स्थानमि सं- पूर्ण पयधान्यादिवर्ग और औषधीके गुणदोप और रोगांकी उत्पत्ति संप्राप्तिलक्षण निदान चिकित्सादिका वर्णनह ... भावप्रकाश--मृल और लालाशालिग्रामकृत भापाटीका तीनख- डॉम भावमिश्र संगृहीत, कर्पूगादिवर्ग गुट्टच्यादिवर्ग पुष्पवर्ग बटादिवर्ग आम्रादि फलवर्ग शाकवर्ग मांसबर्ग ३) २) २) ३॥) १) 1 " ८) ३) जाहिरात. (३) नाम. की० रु० ७) . जातिभेदसे पशु पक्षियोंके मांसके गुण, कृतान्नवर्ग, वारिवर्ग. दुग्धवर्ग, नवनीतवर्ग, घृतवर्ग. मूत्रवर्ग, तैलवर्ग, सन्धानवर्ग, मधुवर्ग, इक्षुवर्ग, अनेकार्थ, नामवर्ग, धातुनाम, शोधन, मारणविधि, पुटप्रकार, रत्नोंकी शोधनमार णविधि. विष और उपविषोंकी शोधनविधि संपूर्ण रोंगोंकी उत्पत्ति समाप्ति निदान चिकित्सा इत्यादि वर्णित है अष्टांगहृदय--( वाग्भट ) वाग्भटविरचित--रविदत्तकृत भाषा टीकासहित और पंडितज्वालाप्रसाद मिश्र संशोधित जिसमे सूत्रस्थान, शारीरस्थान, निदानस्थान, चिकित्सास्थान, कल्पस्थान, उत्तरस्थान, इत्यादिमें संपूर्ण रोगोंकी उत्पत्ति निदान लक्षण और क्वाथ चूर्ण रस घी तैल आदिसे अच्छीप्रकार चिकित्सा वर्णित है अष्टांगहदयवाग्भट--मूल मोटा अक्षर शाईधरसंहिता-मूल और पं०दत्तरामौवेकृत भाषाटीकासमेत चरक वाग्भट सुश्रुतादिसे संगृहीत-इस ग्रंथमें रोगोंकी उत्पति लक्षण प्रतीकार सवप्रकारकी धातुओं का मारणशोधन आदि प्रयोग बहुत अजमाये हुए लिखेहै और रसादिके सेवनकी विधि भी संयुक्त है ग्लेज ८) २॥ २) तथा रफ . २) वैघरहस्य-मूल और पंडित दत्तराम चौवे कृत भाषाटीका समेत संपूर्ण रोगोकी चिकित्सा भलेप्रकार वर्णितहै पुरनिघण्टरत्नाकर-मूल पंडित दत्तराम चौवेकृत संकलित बीर भापाटीकासहित जिसमें शारीराध्याय यंत्राध्याय शखावचारणाध्याय योग्य सूत्राध्याय अष्टविधशस्वकर्माध्याय तथा दूसराभाग झारपाक विधि अग्निकर्म दोपधातुमलवृद्धि ४) जाहिरात. नाम. को० रु० ३) ३॥) " २॥) ५) ४॥) ८) दोपवर्णन ऋतुचर्या दिनचर्या रात्रिचर्या नाडीदर्पणादि वर्णन, प्रथम भाग तथा द्वितीयभाग तथा तृतीयभाग(विविधरोगोंकी चिकित्सा संग्रह) तथा चौथाभाग (चिकित्साखंड) तथा पंचमभाग ( रोगोंका कर्मविपाक) तथा षष्ठभाग (रोगाणां चिकित्साभागः). तथा सप्तम अष्टमभाग लाला शालग्रामसंकलित अर्थात् “शालग्रामनिघंटुभूपण' अनेकदेशदेशांतरीय संस्कृत हिन्दी वंगला, मराठी, गौर्जरी, द्राविडी तैलंगी, औत्कली, इंग्लिश, लौटन्, फारसी, अरबी भाषाओमें सर्व औषधोंके नाम और गुणांका वर्णन औषधियों के चित्रोंसमेत तथा उपरोक्त अलंकार समेत आठो भाग संपूर्ण वृहन्निघंटुरत्नाकरांतर्गत-चिकित्साखंड भापाटीकासहित पंडित दत्तरामप्रणीत संपूर्ण रोगांकी औषधीका अपूर्व संग्रह चचिंद्रोदय-भाषाटीका व्यंजन बनानेकी क्रिया है योगतगंगणी-श्रीमत त्रिमल्लभट्ट विरचित और दत्तरामचीवेकृत भापाटीका सहित यह बडा उपकारी ग्रंथहे अच्छे २ प्रयो. गदरशाये योगचिन्तामणि-भापाटीकासहित दत्तरामचावे कृत इसमें पाक तेल चूर्ण गुटिका घृत इत्यादि अनुभव सिद्ध प्रयोग लिखे- गयेहें ग्लेज तथा रफकागज वालतंत्र-कल्याण वद्यरचित नंदकुमारकृत भाषाटीका इसमें पोडगवंध्या साधारण वंध्या औपय पुरुष वीर्यवृद्धि गर्भा. धान रुद्रस्नान मान गृहीत वालरक्षा वर्षगृहीतवालरक्षा ४) २॥) .... २ ) .. ) २) जाहिरात. (५) की० रु० नाम. १) - --- । ४) .... २) || दिनमास वर्षगृहीत बालरक्षा साधारण वालग्रहरक्षा ज्वरहर- णोपाय साधारणरोग चिकित्सा नानारोगोंके अनुभवी प्रयोग इत्यादि वर्णित है वंगसेन-लालाशालिग्रामकृत भाषाटीका सहित-वैद्यकमे इस ग्रंथसे बढकर दूसरा ग्रंथ नही है. इस एकही ग्रंथसे वैद्यराज हो सकता है। रसरत्नसमुच्चय-गुर्जरभाषाटीकासमेत इसमे पारद, धातु, उप- धातुओं के शोधनविधि, नानाप्रकारके रस, भस्म, औषधोके सिद्धयोग इत्यादि वर्णित हैं. यह रसभस्म आदिकी सिद्धिका अद्वितीय ग्रन्थ है रसरत्नसमुच्चय-मूलमात्र आयुर्वेदसुपेणसंहिता--भाषाटीका इसमें सामान्य औषधीवर्गधा- न्यवर्ग पयवर्ग इत्यादिकके गुणदोष वर्णित हैं वैद्यक परिभाषाप्रदीप-भापाटीकासहित (वैद्योपयोगी औषधियां की योजनामे तैल माप और बदला अर्थात् प्रतिनिधि तथा वर्ग चूर्ण आदिकोंकी योजनाका वर्णन वैद्यरत्न-पं. ज्वालाप्रसाद मिश्रकृत भाषाटीकासमेत सर्वरोगोकी चिकित्सा उत्तम प्रकारसे वर्णन की गई है वैद्यबल्लभ-हस्तीरुचिकृतभाषाटीकासमेत अनुभवीउत्तमचिकित्सा द्रव्यगणगतक-भापाटीकासमेत औषधिद्रव्योंका गुणदोष वर्णन द्रव्यगण बडा- पं. ज्वालाप्रसाद मिश्रकृत भाषाटीकासहित वीरसिहावलोकन ज्योति शास्त्रादिकर्मविपाक चिकित्सावर्णन लोलिम्बराजकृत-वैद्यजीवन संस्कृत और भापाटीकासहित श्रृंगार रसप्राधान्यरोगांवी चिरित्सा अत्यन्त उपयोगी वैद्यकता यह पामहरहर- भाप टीकासमेत गरीबी क्षीणतादिम अपूर्व पार्दा तन 11) 1) १॥ १) D (६) जाहिरात. नाम. की० 11) २) - - - 17) कुमारतत्र-भापाटीकासमेत "रावणकृत" वालकोंकी अर्व दवाई वर्णन कामरत्न-योगेश्वर नित्यनाथ प्रणीत और पंडित ज्वालाप्रसाद मिश्रकृत भापाटीकासहित इस ग्रंथ में रोगोंकी औपधि तथा वाजीकरण औपवि अनुभूत है और वशीकरणादि प्रयो- गभी हैं . चालबोध पाकावली-पाकरस वर्णन है कूटमृद्गर-भापाटीका ) तथा सटीक चोपदेवशतक-भापाटीका इसमें वैद्यक काथादिकका वर्णनहै अर्कप्रकाश-भापाटीका ॥ रावणकृत " इसमे नानाप्रकारके यंत्रोंसे औषधियोंका अर्क खींचना और गुण वर्णन किया गयाहै ज्ञानभैपज्यमंजरी-भापाटीकासमेत इसम प्रत्येकरोगांपर एक २ औषधि वेदान्तमतानुसार वर्णन कियाहै महामारीविवेचन-भापाटीका जिसमें हैजादि रोगोंका उपद्रव :: किसप्रकारसे होताहे वह शास्त्रानुसार वर्णित है योगशतकम-भापाटीका सहित सौ श्लोकोमे योपधिका काथा- दि वर्णन रोगांपर किया है चिकित्साधातुसार-भापामें धातुफूंकनेका उत्तमोत्तम प्रयोगहे माधवनिदान-मूल और पं. दत्तरामचौबेकृत भापाटीकासहित इसमें संपूर्ण रोगांका कारण उत्सति लक्षण संप्रामि इत्यादि वर्णनहै कागज ग्लेन १) .... =) . 1 ) . .... २) १॥) तथा रफ . हंसराजनिदान-भापाटीकासहित इसमें रोगोंकी पहिचान नाडी- परीक्षा साध्यनमाध्यका ज्ञान इत्यादि अनेक विषय वर्णित है ..".

जाहिरात. (७) नाम. .... .. की० २० अंजननिदान-भापाटीका सुगमतासे रोगोंका निदान लिखा, नाडीदर्पण-भाषाटीकासमेत नाडीदेखनेके प्रकार वर्णित हैं अनुपानदर्पण-भा टी. इसमें रसधातु वनानेकी क्रिया और अनु- पानदेना और रोगोंपर औषधोंमे क्या २ अनुपान देना यह सव वर्णित हैं 1) नाडीविज्ञान-भाषाटीकासमेत कालज्ञान-भाषाटीका यह ग्रथ संपूर्ण अभ्यास करनेसे भूत भविष्य वर्तमानका ज्ञान होताहै .) पाकप्रदीप-वाजीकरण भाषाटीका नामहीसे गुण जानलो 12) शालिग्रामौषवशब्दसागर-अर्थात् आयुर्वेदीय औषधिकोश २) पथ्यापथ्य-भाषाटीका सहित पं० केशवप्रसादमिश्र संगृहीत जिप्तमें संपूर्ण रोगोंपर पथ्यापथ्य करना और अपथ्यादिक- का निषेध इत्यादि वर्णितहै भिषगू गणोंको अवश्य लेना उचित है रसरत्नाकर--सिद्धनाथ प्रणीत--समस्त रसग्रंथों में शिरोभूषण-- लाला शालिग्रामकृत भाषाटीका सहित-इस ग्रंथमें पारा गंधक हरताल तांवा रूपा हीरा वैक्रांत सफेद अभ्रक मन- शील खपरिया नीलाथोथा शिलाजीतादि रसोंकी शोधन- विधि तथा उनके गुण और प्रत्येक रोगोंकी चिकित्साका वर्णन हे ग्रंथ बहुतही उत्तम वैद्योपयोगी है रसमंजरी--भापाटीकासहित सर्वप्रकारके रस बनाने और धातु फेकने की क्रिया ॥) शुभसंतति योगप्रकाश-भा टी. समेत-नामहीसे जानलो १) तिब्वत्रकावर--हकीम अकबर अलीखां लिखित देवीप्रसादकृत हिन्दीभापामें अनुवादित छब्बीस अध्यायम शिरसे पैरतक रखी पुरुष लड़के भादिका संपूर्ण रोगोंका उत्पत्तिनिदान (८) जाहिगत. गाम. की० रु० ७) MAT .... कारण स्वरूप लक्षण और यूनानीमतसे एक २ रोगापर सैकडी औपधीका उपचार ( चिकित्सा) वर्णित अपूर्व ग्रंथ वैद्यमात्राको उपयोगीह (मथुगका) शरीरपुष्टिविधान- अर्थात् शरीरके सदा हष्ट पुष्ट वलिष्ठ होनकी विधि जिसमें प्रकीर्णाध्याय क्षीणाध्याय नपुंसकाध्याय जराध्याय संगृहीताध्यायादिम निदान और चिकित्सा पाका दि प्रकरण है तथा छोटा गुटका डाक्टरीचिकित्सासार-संक्षिप्त डास्टरी निघंटु डाक्टरीचिकित्सार्णव-प्रत्येकरोगोंका डाक्टरीमतसे और सायर देशी वैद्यक मतसे नाम लक्षण रोग निदान और उपाय आदि लिखेगये हैं वैद्यकरसगजमहोदधि-प्रथमभाग भापामें मुन्शीभगवानप्रसाई शिष्य भगतभगवानदास कृत यूनानी हिकमत यूनानीदना फकीराकी जड़ी बूटी और सन्तोकी पुस्तकोका संग्रह है वैद्यकरसराजमहोदधि-दूसरा भाग भापामें उक्त महाशयरचित उपरोक्त विषयानुसार शरवत पाक विधि सहित तथा तीसराभाग रामविनोद-भाषा संपूर्णरोगोकी औपधि प्राचीन ग्रंयाको अनु- सार निदान लक्षण और उत्पत्ति लिखी गई है ११) 111) % पुस्तकांके मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर" (स्टीम् ) यन्त्रालयाध्यक्ष-बंबई.

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Napush Ka Mairta Ranav

Author
Shri Kirshan Dass
Title
Napush Ka Mairta Ranav
File name
Napush Ka Mairta Ranav
Text
OCR done
Citation
1931
Published
2010
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
176
Library
Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
DLI number
325957
Barcode
99999990007827.00
Scanning centre
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Digital publisher
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