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Yatra

Guruji Sanie · 2011/03

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यात्रा

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यात्रा साने गुरुजी

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. भूमिका ११ जून १९५० के दिन महाराष्ट्र की एक महान् विभूति माने गुरुजी का देहावसान हुआ। महाराष्ट्र को मन परम्परा में माने गुरुजी भी एक मन्न थे। महागष्ट्र के जीवन का एक भी अंग ऐसा नहीं, जिस पर माने गुरुजी की छाप न पड़ी हो । संकुचित प्रान्नवाद, जातिवाद, धर्मवाद को दूर करने के लिये उन्होंने अविश्रान्त प्रयत्न किया। 'निर्माण और निप्टा' उनके जीवन का मूत्र था। इमी निष्ठा मे प्रेरित हो उन्होंने गौचालय, रास्त और गटर माफ़ करने के लिये हाथ में माडू उठाई और विचारों का मनोमालिन्य नष्ट करने के लिये कलम उठाई। माने गुरुजी का गन्म एक निर्धन परिवार में हुआ था। जीवन के प्रति उदार दृष्टि, उन्हें, अपनी माता की ओर मे मिली । माता से ही अनन्त संचार प्राप्त हुए। मातृ-प्रेम ने ही उनमें भारतमाता के प्रति प्रेम जगाया और यही आगे चल कर जगन्माता के प्रेम में परिणत हुआ। इसी मातृभक्ति से उन्हें मातृमक्ति अर्थात् दूसरों से ममरस होने की नपिन मिली। दूमरों के दुःख से दुःपी हो उनका दुःग दूर करने का मातृ हृदय उन्हें मिला था। दुःप दारीद्य को देख कर उनका हृदय रो उठता था ! मन्याय के विरुद्ध वे प्राण देने पो तत्पर रहते थे। जनता के प्रति फरणा कर्तव्य से प्रेरित हो, उन्होंने जन सेवा कार्य अपनाया।

साने गुरुजी आर्दश त्रिमूर्ति थे। सर्वत्र समभाव देखनेवाले रामकृष्ण परमहंस, कलोपासक रवीन्द्र और सेवामूर्ति गांधीजी के संदेश का उनके जीवन में एकीकरण हुआ था। अपने एक लेख में उन्होंने लिखा है कि लेखनी के लालित्य की अपेक्षा में झाड़ के लालित्य का उपासक हूं। मेरे जीवन में लेखनी, झाड़ और जाति-निरपेक्ष-वृत्ति का अनुभव करने की उत्कटता ये तीन वृत्तियां हैं। इन तीनों का थोड़ा सा भी अंश मिलने पर मैं मस्त हो जाता हूं। लेखनी रवीन्द्र की, झाड़ गाँधीजी की और जाति-निरपेक्ष-वृत्ति रामकृष्ण का प्रतीक थी। साने गुरुजी की जीवन-दृष्टि ऐसी ही थी ! इसी दृष्टिकोण के कारण वे किसी के शिष्य नहीं बने, और न ही किसी एक पक्ष के साथ रहे। उनका मार्ग स्वतंत्र था। वे सन्त थे। स्थापित जड़-मार्ग पर चलने वाले न थे। समाज-कल्याण के लिये अर्वाचीन और प्राचीन का समन्वय करते वे कभी न हिचकिचाये। रूस के किसान-मजदूर आन्दोलन से वे प्रभावित हुए । इंग्लैण्ड का विचार-स्वातंत्र्य उन्हें प्रिय था और भारत की सहिष्णुता उन्हें आवश्य प्रतीत हुई। उनका कहना था कि भारतीय संस्कृत का महासागर नए नए प्रयोगों से बना हुआ है और इसको यथावत् रखने के लिये नए नए प्रयोगों की ज़रूरत है। साने गुरुजी का यह उपन्यास ऐसा ही एक प्रयोग चित्र है आर्थिक और सामाजिक समता स्थापित करने का नया प्रयो है । साने गुरुजी का जीवन, या लेखन में कहीं विध्वंसक वृ नहीं दिखाई देती । विधायक वृत्ति का ही उन्होंने पोषण वि . है देश को जड़ता दूर करने के लिये उन्होंने एक विधायक प्रयोग हमारे सामने प्रस्तुत किया। इमी ध्येय तक पहुंचने वाली यात्रा का, इसम, वर्णन है। पूंजीवाद को गमान्त करते हुए मामूहिक सेती द्वारा अन्न को समस्या को सुलझाने का इसमें प्रयत्न किया गया है। गांधीवादी मार्ग-द्वारा पूंजीवाद को नष्ट करने का, ममाजवादी कार्यक्रम इम में सफल रूप में दियाया गया है । मजदूर और किसानों को नई दृष्टि से पूजीपतियों को महायता के विना संगठित करके, विध्यमका कार्य के बदले, विधायक कार्यक्रम की पोर अन्मुग होना है । जिरा दंग ने अद्वन की कल्पना की, उस देश में इतनी असमानता मी? इम असमानता को दूर करने के लिये अत को वृद्धि से कर्म में भाना चाहिये । आर्थिक अद्वैत के लिये समाजवाद चाहिये । इस अद्वैत की प्राप्ति के लिये रूम में पानी हुई भाग्न में भी मवको समानता देनी है, विचार स्वातंत्र्य भी देना है। इसको लिये नये प्रयोग की आवश्यकता है। यह प्रयोग सत्याग्रह मार्ग द्वारा, अहिंसक साधनों में उपलब्ध होगा माने गुरुजी ने यही मागं अपनाया है। आज साने गुरुजी हमारे बीच में नहीं हैं। लेकिन जीवन को प्रति उनका उदार व्यापक हार्दिक और ममानतावादी दृष्टि कोण जीवित है। उनके माहित्य में वही सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है। यह दृष्टि कोण जय हमारे अपने और ममम्न भारत के जीवन में प्रकाशित होगा तो माने गुरुजी का स्वप्न साकार हो जाएगा और पंनगील की अमर आधार शिला पर नए भारत को नवरचना होगी।

'यात्रा'
प्रस्तुत उपन्यास इसी दिशा में एक कदम है। चरण
चिन्ह है । साने गुरुजी के इस कदम को हमें आगे बढ़ाना है।
दिशा उन्होने दी है, दशा हमें प्रस्तुत करनी है
इसका एक उदाहरण है। सत्य के साधन के लिये यह एक
सम्बल सिद्ध होगा, ऐसा मेरा विश्वास है।
मैंने प्रस्तुत अनुवाद
में साने गुरुजी के भावों और विचारों
को यथावत् रखने का प्रयत्न किया है। मेरी कोशिश रही
है कि मूल आशय और प्रयोग रक्षित रहें। फिर भी कोई
त्रुटि हो तो पाठक क्षमा करें । ऐसी त्रुटि मेरी ब्रटि, न कि भूल
लेखक साने गुरूजी की
रंजन परमार

स खा राम छुक छुक छुक करते हुए रेलगाड़ो ने स्टेशन में प्रवेश किया। यों देखा जाय तो सुन्दरपुर का स्टेशन बहुत बड़ा न था। लेकिन उसमें हमेशा भीड़ रहा करती थी। और आज तो फिर दास- गांवका साप्ताहिक बाजार जो था। इसी गाड़ी से छोटे बड़े सभी व्यापारी दासगांव जाते थे। और अन्यत्र भी आसपास के गांवों में लोग जाया करते थे। अतः हमेशा की अपेक्षा आज स्टेशन में ज्यादा भीड़ थी। केले, संतरे, चिवडा आदि खाद्य पदार्थ व फल बेचनेवालों की भीड़ थी । अखबार, मासिक पत्रिकादि की विक्री करने वाले भी इस भीड़ में दृष्टिीगोचर हो रहे थे । चाय के हॉटेल के पास काफी तादाद में लोगों की भीड़ थी। गाड़ी का आगमन होते ही सबकी दौड़-धूप शुरू हो गयी । हिन्दू चाय, मुस्लिम चाय, सोडा लेमन, सिगारेट आदि विविध प्रकार के स्वर कर्णपटल से टकराने लगे। कुलीगण पंक्तिवद्ध खड़े प्रवासियों की ओर निहार रहे थे कि कहीं किसी के पास बोझ है अथवा नहीं । स्टेशन के बारह से ही तांगेवाले चिल्ला रहे थे-"है क्या, तांगा चाहिये क्या, आइये तांगा हाजिर है वैठिये' "

ऐसी भीड़ में देखी न वह एक विचित्र मूर्ति । वह भी सब
प्रवासियों की तरह इसी गाड़ी से उतरी है । और वेश भी
क्या तो एक खादी का अंगोछा और बदन पर खादी की एफ
वंडी (जॉकेट) । सिर पर टोपी न थी। हाथ में सिर्फ एक थैली
थी और कंधे पर काले रंग का ऊनी कम्बल । ऊंचा पूरा, दुवला
पतला व्यक्ति नाक पर ऐनक थी । मुंह पर अदम्य उत्साह
और ओंठो पर मन्द स्मित खेल रहा था। उस भीड़ में वह
तरुण व्यक्ति क्षण भर खड़ा रहा । आसपास में दृष्टि दौड़ाई ।
और फिर भीड़ में से रास्ता निकालता टिकट देने के हेतु फाटक
पर पाया स्टेशन के अधिकारी को दे, वह बाहर आया।
मालिक, तांगा चाहिये क्या मालिक ?"
अहो महाराज, कहाँ जाइयेगा ?" संस्कृति में जाना है
क्या ? आईये, मठ में जाना है क्या महाराज ?" तांगेवालों
ने तरुण को चारो ओर से घेर लिया।
मुझे तांगे की कोई ग्राश्यकता नहीं" युवक ने ठंडे दिल से
उत्तर दिया। थोड़ी देर तक सर्वत्र शांति छा गयी, तब उसने
वहाँ खड़े एक सज्जन से पूछा, "भारतीय संस्कृति मन्दिर यहाँ
कहाँ होगा भला?"
इस तरफ से जाइये । फिर बायीं ओर मुड़िये । आगे
नदी है और उसी के किनारे वह इमारत है। दिखाई देगे
ही तुम्हें । गाड़ी में से तुमको वह संस्था दिखाई नहीं दी ?"
"गाड़ी में कमाल की भीड़ थी। किसी तरह खड़ा
था। अच्छाजी । नमस्ते ।" कह, युवक वहाँ से शीघ्र गति
फादम उठता चला गया। वह देखिये नदी और नदी कि
।

११
पर स्थित गगन चुम्बी भारतीय संस्कृति मन्दिर की आलीशान
ईमारत । युवक संस्था के दरवाजे तक पहुंचा । वाहर एक
घड़ी तस्ती लगी हुई थी। युवक ने संस्कृति-मन्दिर में प्रवेश
किया तो अन्दर सुन्दर छोटी सी बगिया के दर्शन हुए। दोनों
ओर फव्वारों फी हारमाला थी और वीच-बीच में ऊंचे वृक्ष ।
और मागे जाने पर युवक को एक तरफ 'व्यवस्थापक-कार्यालय'
तख्ती दिखाई दी। उसने कार्यालय में प्रवेश किया। वहां
पर एक सज्जन उपस्थित थे। शायद वे ही स्वयं व्यवस्थापक
होंगे।
"नमस्ते"
"नमस्ते, वैठिये"। जो ने स्वागत करते हुए
कहा । मैने आप की संस्था में प्रवेश पाने के लिये दरखास्त
दी थी। चूंकि मुझे सव संस्कृतियों का अध्ययन करना है ।
यहां से स्वीकृति-दर्शक पत्र भी मुझे मिला था। यह देखिये
वह पत्र ।" उसने अपनी जेबमे से निकाल संस्था का पत्र
ध्यवस्थापक महोदयजी को बताया।
'क्या आप ही सखाराम है ?"
जी हां मैं ही हूं।
'अच्छा । आपको जीविकोपार्जन के लिये प्रति माह ३०
रुपये मिलेंगे। यहां पर निःसंकोच, बिना किसी रोक-टोक के
अध्ययन कीजिये।
"मुझे ज्यादा (अधिक) रुपयों को कुछ आवश्यकता
नहीं।" सखारामने शांत चित्त से उत्तर दिया।
"चलिये, आपका कमरा दिखा दूं ।
॥
"

२
सखाराम को उसका कमरा दिखा दिया गया। तत्पश्चात्
व्यवस्थापक महोदय अपने काम से चले गये । संस्था के अन्य
विद्यार्थी व प्राध्यपक-वर्ग ने उसे घेर लिया। प्रसंगोपात् उनमें
वात-चीत भी हुई।
'यहां पर क्लव है, उसमें भोजन करने आईयेगा। अरे
हां यह रही मेरी वालटी-और देखिये वह रहा पानी का
हौज़ । वहां स्नान करने की सव व्यवस्था है।" एक युवक है
सखाराम को बिना पूछे सब बातें बता दीं।
'आपका शुभ नाम ?" सखाराम ने घड़ी भर शांत रहकर
पूछा “मुझे सव घना के नाम से संबोधित करते हैं। घनश्याम
मेरा पूरा नाम है। ‘और आपका'
सखाराम
वाह, क्या ही अच्छा नाम ! सव का सखा बननेवाला
राम । सव का मित्र बनने में गौरवानुभव करने वाला राम ।
मुझे बचपन से ही सखाराम नाम वहुत ही प्यारा लगता है ।
आप थक गये होंगे । मैं वालटी ले पाता हूं। पहले स्नान कर
लीजिये । और फ़िर विश्राम कीजिये। भोजन में अभी देर
है । आज छुट्टी जो है।
आज किस बात की छुट्टी ?"
जिस व्यक्ति विशेष की प्रेरणा से इस संस्था
स्थापना करने में आयी उनका श्राद्ध दिन है आज।" इस
कह घना अपने कमरे की ओर चला गया। थोड़ी देस
पश्चात् वालटी
हाथ
में लिये
लौटा और उसने सख
को पानी का हौज, पाखाना आदि सब दिखा दिया ।
पुनः
,

॥
आप अव जाइये । में अभी सव ते निवृत्त हो पाता हूं।
आपको देख मुझे ऐसा प्रतीत होता है, मानो हम कोई वर्षों
पुराने मित्र हों।" सखाराम ने मधुर हास्य करते हुए घना से
कहा।
घना चला गया। सखाराम वहुत देर तक स्नान का मज़ा
लेता रहा । वह काफी लम्बी मुसाफिरी कर आया था। बीच
में दो दिन तक स्नान करने का मौका ही न मिला । कपड़े
घोये और फिर अपने कमरे में आया । थैली में से डोरी निकाल
एक तरफ़ वांधी और उस पर कपड़े सुखाये । कमरे में एक
टेवल पर आवश्यक दो-चार पुस्तकें सजा दी । पुस्तकों में एक
तुकाराम की गाथा थी, उपनिपद और रविन्द्रनाथ टागोर की
'साधना' व 'गीतांजली' भी थी। प्राथम भजनावली व गीता
ये दो और छोटी पुस्तिकाएं थीं। साथ में श्रीरामकृष्ण परमहंस
की तस्वीर भी थी जिसे उसने टेवल के मध्य में करीने से रखा
और बगिया में से दो-तीन ताजे फूल लाकर उसे श्रद्धानत हो
समर्पित किये । फिर फर्श पर एक तरफ़ कंवल विछा, शरीर
को लंवा किया । अल्प समय के पश्चात् उसको अांख लग
।
गयी।
घना जव सखाराम के कमरे में आया तव वह निद्रितावस्था
में था। वह चुपचाप वहां एक कुर्सी पर बैठ गया और पुस्तकें
उलट-पुलट करने लगा । साधना में तो स्वयं खो गया । इतने
में भोजन की घंटी बज उठी। सखाराम जग गया।
चलिये, भोजन करने ?" घना ने कहा ।
'चलिये ।" सखारामने उत्तर दिया।

क्लब में दस-बारह व्यक्ति खानवाले थे। एक रसोईया
भी था। और अन्य काम के लिये एक नौकर भी था, जिसे
सव गणा कहकर पुकारते थे । गणा का बड़ा लड़का कस्बे की
मिल में काम करता था। और छोटा लड़का रुपल्या दस-बारह
वर्ष का था, जो अभी तक कोई काम नहीं करता था। रुपल्या
गणा की आँख का तारा था। रुपल्या भी वहीं पर काम किया
करता था । और बाप-बेटे दोनों इस भाँति क्लब में बचे-खुचे
भोजन पर अपना भी निर्वाह चलाते थे ।
वैठिये, सखाराम !" घना ने कहा ।
दोनो मित्र आखिरकार पास पास में भोजन करने वैठे
भोजन करने वालों में कोई बंगाली, कोई गुजराती, एक मद्रासी,
कुछ महाराष्ट्रीय और एक कन्नड बंधु था। मानो वह अखिल
भारतीय संमेलन ही था।
नूतन बंधुर नाकी ?" बंगाली ने पूछा ।
" नामटी एकटू सखाराम !" सखाराम ने हंसते हुए जवाब' .
दिया।
"बंगला जानते पारी ?"
किछु, किछु"
सव के मुंह पर हास्य रश्मियां विखर गयी थीं। अचानक
सखाराम को ठसका लगा।
पानी लीजिये, पानी लीजिये किसी ने कहा ।
तन्नी कुडी।" मद्रासी मित्रने कहा।'
कुडच्याची !" पानी पीकर सखाराम ने जबाव दिया।

आप तो हर एक प्रांत की भापा जानते हैं ऐसा मालूम
पड़ता है।" एक उत्तर प्रदेशी ने कहा ।
में तो भारत का यात्री हूं। आज इतने दिन घूमता हूँ।
अल्मोड़ा से कन्या-कुमारी तक घूमा । आज यहां आया हूं।"
सखाराम ने सव की ओर ताकते हुए कहा ।
समाधान वाहर कहीं नहीं मिलता । समाधान मन का
एक धर्म है । मन की वृत्ति है। इधर उधर मिलने वाली
यह चीज नहीं । तो भी स्थान महात्म्य का असर होता है।
सत्संग का परिणाम होता वही मैं देखूगा सखाराम ने कहा ।
भोजनोपरांत सखाराम अपने कमरे में चला गया ।
आपको लौंग चाहिये?" धना ने आकर पूछा।
"नहीं तो।
श्राप सो जाइये । मुसाफ़िरी को थकावट होगी । कहां से
आये?"
मद्रास की ओर से
थकावट के मारे शरीर चूर चूर हो गया होगा। दोपहर
में सभा है । मैं उठाऊंगा।
इस संस्था की स्थापना तो सुंदरदास ने ही की है न?"
लेकिन उन्हें प्रेरणा देने वाले एक सोधे साधे गृहस्थ थे।
उन का नाम था रामजी मास्टर । स्वयं रामजी मास्टर बड़े
वेदान्ती साथ ही सितार वादन कला में तज्ञ भी थे। सुंदरदास
को बचपन में वे सिखाने के हेतु घर जाया करते थे । और फिर
उन्होंने ही सुंदरदात को अव्यात्म-विद्या का रसिक भी बनाया।
धर्म, तत्त्वज्ञान व भारतीय संस्कृति का गहनाध्ययन कर उसकी
"
"
-
.
,

लेकिन वह ठता समझ सके इसी हेतु वश उन्होंने सुंदरदास को यह संस्था पापन करने की प्रेरणा दी थी। पहले इस संस्था में विद्यार्थियों को भी प्रविष्ट किया जाता था। लेकिन आज कल प्रथा बंद हो गयी है । अब सिर्फ एम. ए. आदि उच्च परीक्षोत्तीर्णों को ही फेलो बना लिया जाता है। वे परस्पर चर्चा करते हैं - अभ्यास करते हैं और संशोधन भी। सुंदरदास स्वयं चर्चा में सम्मिलित होने आते हैं। वे अध्यात्मशाली हैं। लेकिन उनका अध्यात्म मुझे अच्छा नहीं लगता।" मैं हिन्दुस्तान का कोना, कोना घूमफिर कर इधर आया हूँ। और यहां भी कितने दिन टिक रहूंगा हरि जाने । आप ज़रा सोइये, में जाता हूँ। घना चला गया। सखाराम लेट गया। अपने विचारों में खो गया। घना के लिये उस के हृदय में प्रेम रस प्रवाहित होने लगा। क्या इसके लिये मैं यहां आया? अपने जीवन के संबंध कहाँ से किस तरह निर्माण होते हैं, कुछ ध्यान में नहीं आता, इन्हीं विचारों की उलझन में वह सो गया। तीसरे पहर संस्था के बड़े आलीशान हॉल में रामजी मास्टर के श्राद्ध दिन के निमित्त सभा होने वाली थी। रामजी मास्टर के तेलचित्र को पुष्प हार अर्पण किया गया। सुंदरदास सेठ स्वयं उपस्थित थे। उन्होंने अपने भाषण में कहा- “रामजी मास्टर का प्रभाव मेरे जीवन पर हमेशा के लिये पड़ा है। जिस कार्य में हाथ डाला, वह पूरा करना चाहिये यह शिक्षा उन्होंने मुझे दी है । वचपन में मुझे एक शब्द ठीक तरह लिखना नही आता था, उन्होंने वही शब्द एक नहीं दो नहीं बल्कि पच्ची ।

मर्तबा लिखवाया। लेकिन उनका मुझ पर सब से बड़ा उपकार है । वेदान्त के प्रति आकृष्ट करना, उसका रसिक वनाना । संसार में प्रचलित अन्य सव तत्वज्ञान की अपेक्षा वेदान्त श्रेष्ठ है। ऐसा वे प्रायः कहा करते थे। उनकी ही प्रेरणा व स्फूर्ति के परिणाम स्वरूप इस संस्था की स्थापना करने में आयी है। विवेकानंद जैसे जगत प्रसिद्ध महापुरुष यह संस्था देखें - ऐसी उनकी मनीपा थी । वे स्वयं निस्पृह थे। मैने एक समय उनसे कहा, "आप मुझसे कुछ मांगते तो मैं अवश्य दे देता। लेकिन वे तो निःस्वार्थ वृत्ति के थे।" मृत्यु समय उन्होंने कहा – “देह मुक्त भया राम ।" मानो आत्मा के चारों तरफ लिपटा बंधन टूट गया । उसी संस्था के आप सब हैं और संस्था आपकी है। आप सब धर्म, सर्व तत्वज्ञान व सभी प्रकार की संस्कृति का अध्ययन करें। लेकिन हमारी संस्कृति में जिस अद्वैत की सुगंध भरी पड़ी है, उसी अद्वैत तत्वज्ञान को सर्वत्र फलाइये-ले जाइये। उनका मगन भेदी जयघोप कीजिये।" सुंदरदास का इस तरह व्याख्यान हुआ और भी दूसरों के हुए ! सभा समाप्त हुई । सेठजी ने सखाराम की पूछ-ताछ की और कहा, "अापके जैसे तपस्वी इस संस्था को चाहिये। यहाँ सुशी से रहिये । अध्ययन कीजिये। और आपको समाधान प्राप्त हो। 'आपको तो समाधान है ना?" सखाराम ने प्रश्न किया । 'यह कैसे कहूं? 'मेरा अध्यात्म अलग ढंग का है। मैं वेदांत उसीको मानता हूं कि हमने कुछ भी कार्य किया तो भी हमारी आत्मा "

से पूर्ण रूप से अलग है ऐसा विचार मन में रात-दिन बनाये
बना। कर्म सत्कार हो अथवा दुष्कर्म, उस से आत्मा मैली
हीं होती। आत्मा का स्थान सत् और असत् के दायरे से
बाहर का है।
यह तत्त्वज्ञान भयंकर है। साधु संतों की साधना क्या
व्यर्थ थी ? अद्वैत का जिन्होंने अनुभव प्राप्त किया है इस भौति
कभी भी नहीं बरतते थे। उनके जीवनपर से अगर वेदान्त
समझ लेना हो तो फिर आप कहते हैं उसका उस से मिलाप
कैसे किया जाय ? शंकराचार्य रचित भाष्य के प्रारंभ में ही कहा
गया है कि शम, दम आदि सद्गुण हमारे हुए बिना कहां का
वेदांत ? कहां का अद्वैत ?
आप अभी इस क्षेत्र में दुध-मुंहे बच्चे हैं बच्चे।
मुझे बच्चों ने ही रहने दीज़िये । ऐसा कह वंदन कर
सखाराम वहां से चला गया। संस्था
प्रमुख
सेठने
कहा "यह युवक अलग वृत्ति का लगता है। यह अन्यों के समान
सिर्फ चर्चाराम नहीं लगता।
को सुंदरदास
उस दिन सखाराम और घना बहुत दूर तक घूमने गये थे।
नदी के बीचोंवीच स्थिति एक शिला पर दोनो मित्र वैठे हुए थे।
नदी का पानी स्फटिक-मणि-ता श्वेत वस्त्र धारण किये कल-कल
करता वह रहा था। शरद् रितु का साम्राज्य जगत पर छाय
हुआ था । संध्या समय धित्ताकर्षक गंभीर प्रकाश जल-रानी
निकट कीड़ा कर रहा था। सूर्य रश्मियां संध्याकालीन स्न
ससाप्तं कर अस्ताचलकी ओर गमन की तैयारियां करने
. मग्न दृष्टिगोचर हो रही थीं।

"
घना, चारों तरफ़ से जल हो और वीच में यह शिला है
उसी तरह जीवन में सर्वत्र निंदा, स्तुति स्पर्धा मानापमान के
वेगवान प्रवाह बहते हुए भी हमारे लिये ऐसा एकाध अटल,
अचलस्थिर आधार होना चाहिये। जहां हम इन सब बातों से
संरक्षण पा सके वहां हम परम शांति का अनुभव कर सकें।
सखाराम ने नदी के वहते प्रवाह में गहराई की एक दृष्टि
डालते हुए कहा।
और ऐसा आधार यानी सब चराचरों से एकता अनुभव
करना, अलगतावाद की बात हो जड़ मूल से नष्ट करना । हमें
अपना मन क्षण भर के लिये भी इस सारे जंजाल व्याप से
अलिप्त रखना और सर्व विश्व से मूल भूत अंक्य भावना का
निर्माण करना चाहिये। घना ने कहा।
'परन्तु आंतरिक अक्यका अनुभव करना भी कोई सीधी
सरल बात नहीं । वाह्य जीवन में भी उस की अनुभूति होना
परम आवश्यक है । मैंने अपने कमरे में गया को सोने के लिये
कहा तो अन्य पंडित हंसने लगे। बारिश जोर की हो रही थी,
गएा को टूटी-फूटी मडैया अंतिम श्वास ले रही थी। अत: मैंने
उसे बुला कर कहा, "मेरे कमरे में सोजाओ, आओ।" रुपल्या
को मैं पढ़ाता हूं, वह उन्हें फूटी आँख नहीं सुहाता । रुपल्या मेरे
खाट पर बैठा चित्र को कापी देखता है तो उनका जी ऊपर
नीचे होने लगता है।
"कालेज से एम. ए. की सब से उच्च डिग्री हासिल कर
आने वाला यह वर्ग । इन्हें गरीबों से समरस होना अभी मालूम
नहीं है"।
"

२०
और ये ही क्या संस्कृति एवं वेदान्त के अभ्यासी गण ?
जैसे सेठजी ठीक वैसे यह सब । सुंदरदास वेदान्त के
नाम से सुप्रसिद्ध हैं साथ ही दानेश्वर भी। लेकिन मिल में
रात-दिन खून का पानी करने वाले मजदूरों से लिये वे कुछ भी
नहीं करेंगे। उनके
खून की गाढ़ी कमाई अन्य संस्थाओं को दे
देंगे, लेकिन कठिन परिश्रम करने वाले मजदूर और उनके बाल
बच्चों के लिये सुन्दर-स्वच्छ वस्ती कदापि नहीं बसायेंगे। अरे
इतना ही क्यों? वह राममंदिर उन्होंने लाखों रुपये खर्च करके
वनवाया है न ? लेकिन अभी तक वहीं हरिजनों को दर्शन कर
लिये प्रवेश नहीं मिलता। कपास के बड़े बड़े व्यापारियों के
किसानों की एक दफ़ा संयुक्त सभा थी। वहां व्यापारी और
किसानों के प्रतिनिधि बैठे दर निश्चित करते हैं। अन्य लोग
सभा में ठीक समय पर उपस्थित हुए मगर सुन्दरदास ज़रा
विलंब से आये । उनके लिये सभा में एक रिक्त कुर्सी रख दी
यी । लेकिन सब किसानों को वहां कुर्सियोंपर बैठे देख कर वे
नीचे ही बैठ गये गुस्से के मारे ।
सेठजी ऊपर वैठिये, यह कुर्सी आप के लिये ही खाली
सब ने एक स्वर से आग्रह किया तो झट बोल उठे
" इन गंवारों के साथ के नहीं बैठेगा, हाँ !"
मानों गवार तो नीचे बैठने की सी योग्यता के है
पुनिचै वश्य पाकेच पंडित समदर्शितः, गीता में ऐसी एक पंनि
है नं सुन्दरदासने
कहा-
पंडित सर्वत्र समदर्शी होते हैं समन
नहीं । सब एक ही स्तरपर निर्वाह करने वाले मिले तो
उनके व्यवहार समान कैसे रखे जाए
रखी है।
? गाय की खुराक

२१
हमें खानी चाहिए ? गाय को चारा ही चाहिये । और हमें तो
अनाज ।" इसी तरह यही वात एक कदम आगे बढ़े तो
धनिकों को आलीशान बंगले ही चाहिए और दीनो को सिर्फ
झोपड़ी टूटी फूटी मईया। फिर तो धनिक वर्ग कुर्सी और अन्य
ऊंचे ऊंचे प्रासनों का अधिकारी हो गया और गरीव वेचारे को
उनसे दूर बैठ मक्खियाँ हो मारनी होगी इसी सिद्धांत पर हम
आते हैं। ऐसा है इनका तत्वज्ञान । और वे कहते भी तो हैं कि
हम कशा भी क्यों न वर्ताव करें लेकिन आत्मा का उस वर्ताव
से जरा भी संवन्ध नहीं ऐसी भावना सतत हृदय में रहनी
चाहिये । यही मुक्ति-मोक्त है । लेकिन ये तो सब शब्द हो
हुये । उनका कयन ऐसा है कि आत्मज्ञान होने पर भी पूर्व
संस्कार कहाँ जायेंगे ? वे तुम्हें किसी न किसी तरह खींच ही
लेंगे । आत्मज्ञान से हृदय में रही गन्दगी हमेशा के लिये साफ़
हो जाती है, जीवन में नव क्रांति का उद्गम होता है ऐसा तो
वे स्वीकार ही नहीं करते ।
सखाराम चुपचाप बैठा सुन रहा था । मित्रद्वय अब
बिलकुल शांत थे । अचानक सखाराम ने प्रश्न किया।
क्या रे घना मजदूरी की तनख्वाह में से इस संस्था के
लिये रकम ली जाती है-क्या ठीक वात है ? उस दिन एक ने
मुझ पर व्यंग कसा था कि गरीबों के लिये आप के मन में
इतनी सहानुभूति है तो गरीबों की रकम पर निर्वाह क्यों कर
रहे हैं ?
"मिल मजदूरों की तनख्वाह में से प्रति रुपया एक
पहले ली जाती थी अवश्य । लेकिन वर्तमान में ली
"

यवा नहीं यह मालूम नहीं है । मजदूर स्वेच्छा से प्रति रुपया यी प्रदान करता है-ऐसा लिखवा लिया जाता था। प्रति पया एक पायी के अनुपात से भी प्रति माह ८००-६०० रुपयों की बड़ी राशि इकट्ठी होती थी और वन्ति में लगभग दस हजार रुपये मजदूरों के आते थे संस्था में । इस भाँति गत दस वर्ष लगातार पैसे लिये गये । अर्थात इस लंबी अवधि में मजदूरों ने करीब एक लाख रुपये दिये कहिये न । इस विपय पर किसी अज्ञात व्यक्तिने अखवारों में लेख माला प्रारंभ की थी। लेकीन सुना है कि अखवार वाले की जेब गर्म कर लेख माला बंद कर दी गयी। मुझे तो सिर्फ इतनी ही जानकारी है। धना तो फ़िर में इस संस्था में किस लिये रहूं ? मजदूरों के लिये हम कुछ भी नहीं करते। न तो हम उनके लिये रात्रि-पाटशालाएं चलाते हैं न ही उनका कोई संगठन भी करते हैं। मेरी तो ऐसी पहले से वृत्ति ही नहीं है। मैं झाडू हाथ में ले स्वच्छता करने का कार्य करूंगा। लेकिन अन्य मुझ से न होगा । मेरा यहाँ पर न रहना ही अच्छा है । यहाँ रहना यानी पाप करना अछी ही मेरी प्रात्मा रात-दिन पुकारती रहेगी। "मैं तुम्हें क्या कहूं भला ? यहाँ से कहाँ जाओगं ?" कहां जाऊं ? अात्मा को चिरशांति मिलेगी इस आशय से सारे भारत का पैदल-भ्रमण किया। विवेकानंद के आश्रम में गया, अल्मोड़ा की भी मुलाकात की, वेल्लूर भी गया, रविंद्रनाथ टागोर द्वारा स्थापित विश्व भारती भी देखी, अरविंदबाबू आश्रम की खाक भी छान आया। वे सब महान आत्मायें होंग है २३ लेकिन इन बड़ी संस्थाओं में मेरे जैसे को कहाँ स्थान ? वहां योरप अमेरिका से जिज्ञासु पाते हैं, उनका कैसा वढ़िया प्रबंध हैं। लेकिन उसी पांडेचरी के आश्रम में में रोते जैसा होगयां । ऐसा लगा कि ये सव आश्रम सिर्फ़ विज्ञापन वाजी हैं। अरविंदवावू को मेरे शतगः प्रणाप ! वे इतनी लंबी अविधि से एकांत वास कर रहे हैं और हम पांच मिनट भी एक स्थान पर गांति से बैठ नहीं सकते । लेकिन उस आश्रय के वाह्य व्यवस्थापक ! वहां गरीबों को कौन पूछता है ? बड़ी बड़ी संस्थानों में भी सूक्ष्म दृष्टि डालने से मुझे संकुचितता के दर्शन हुए । एक बड़ी संस्था में गया, वहां एक शास्त्री थे। मैं रहँट के पास खड़ा था। उन्होंने कहा, "कुएं में गागर डुवो कर रखिये, फिर में निकाल दूंगा।" उन्हें क्या मेरी छूत लगती थी? एक जगह गया तो वहां मेरे साथ कोई सीथे मुंह बात करने के लिये भी तैयार नहीं । कहने लगे यह तो काम करने का समय है । अरे, एक अनभिज्ञ अभ्यागत आप की संस्था में आता है क्या उस की सहानुभूती से पूछ-ताछ भी नहीं करनी चाहिये ? क्षणभर अपना काम एक तरफ रख दीजिये ! घना, में तो तंग आ गया बड़ों के ऐसे व्यवहार से । हो सकता है कि मैं टीकाकार की दृष्टिी से अवलोकन करने वाला हूंगा, वृत्तपत्रों में नित्य प्रति दिन बड़े बड़े लेख आते हैं। लेकिन नजदीक जाने पर मृगजल-सा लगता है कहां जाऊं में ? इस संस्था में स्थायी होने के दृढनिश्चय के आया तो यहां के अद्वैत का अलग ही अवतार ! मैं घर जाऊगा । आज वारह वर्ष व्यतीत हो गये में घर नहीं गया। मेरे बड़े भैया सब का

।
"घर
लन पोषन करने होंगे। उन्हें उन के कार्य में सहायता दूंगा
पना सब कुछ त्याग व्यर्थ में ही दूसरों के पीछे क्यों पडू ?"
में कौन कौन हैं तुम्हारे ?"
बड़े भैय्या और उन की सुशील पत्नी, मेरी भाभी।
अब तो बाल-बच्चे भी होंगे। एक मेरे बाद वाली
वहन
वो
घर त्याग के समय सात आठ वर्ष की थी। शायद उसकी
शादी भी हो गयी होगी। पिताजी की मृत्यु कभी की हो
गयी। मां है । वह मेरे लिये गले में प्राण रोके जिंदा होगी।
जीवित होगी अथवा नहीं यह भी क्या मालूम ? मैं घर ही
जाऊंगा। मां भारती का दर्शन, पैदल भ्रमन से कर लिया
है। अब जन्मदात्री के दर्शनार्थ जाऊंगा । उस की सेवा में ही
भारत मां की सेवा का समावेश हो जायेगा।
तुम्हे यहां रहना जो हृदयशूल वनता हो तो यहाँ तुम्हारा
जाना ही इष्ट है।"
हाँ-हाँ मेरा जाना इष्ट है । घना, तुम्हारा परिचय यहाँ
मिला, और हममें मित्रता हो गई। पत्र लिखते रहना !"
"तुम जाओगे और मैं यहाँ रहूँगा? मेरी भी क्या
आवश्यकता ? तुम्हारे जैसा धैर्य, तीव्रता मुझमें विलकुल नहीं ।
हम कौन कहांके ? थोड़े दिन साथ रहे । क्या इतना ही संबन्ध
था। और कुछ भी अर्थ नहीं हमारे मिलन में ?
'प्रभु जाने।
अंधकार सर्वत्र छाने लगा था। रात्रि-रानी मंदगतिसे
पृथ्वी देव के जीवन में प्रवेश कर रही थी। दोनों मित्र अपर्न
जगह से उठे । घुटने घुटने तक पानी में वाहर आयें। दोनों

हाथ परस्पर के एक दूसरे के हाथ में थे। मित्र द्वय संस्था में
आये । अन्य सब के भोजन होकर गये थे। शेष घना और
सखाराम ही वचे थे।
'क्यों रे रुपल्या, भोजन हो गया ?" सखाराम ने पूछा।
"आप भोजन कीजिये, फिर में कर लूंगा।" उसने कहा ।
'अरे, हमारे साथ ही बैठ जा । आ।
"नहीं दादा, मै वाद में वैलूंगा।"
आखिरकार बना और सखाराम दोनो ही बैठे। रुपल्या
वहां से भाग गया। दोनो मित्र भोजन कर अपने-अपने कमरे
में गये । धना अपने कमरे में बैठा पुस्तक पढ़ता रहा और
सखाराम विकसित बगीचे में तुकाराम महाराज का एक अभंग
गुन गुनाता आसन जमा वैठा था। रात रानी की मोहक तरल
सुगंध से सारा वातावरण सजीव हो उठा ।
०
.
आज शाम की गाड़ी से सखाराम इस संस्था को छोड़
अपने घर जानेवाला था। उसके सम्मान में क्लब के सहकारियों
की तरफ से भोजन दिया जाने वाला था। घना ने सारी तैयारी
की थी । केले के पते, रागोली के स्फूर्तिदायक चित्र, पूरा ठाठ
था। लेकिन ऐन समय पर रंग में भंग हो गया ।
"मेरे निकट रुपल्या को वैठने दो।" ससारामने कहा ।
हम ऐसे नहीं सायेंगे उसको हमारी पंगत में क्या
आवश्यकता । आप जानबूझकर हमें ध्रप्ट क्यों करते हैं ? बड़े
समदर्शी हैं, हमें क्या मालूम नहीं ? हम बड़ी खुशी से आप के
॥

२६
सम्मान में भोज देने निकले तो आप उस नालायक नीच को
भोज के समय अपने पास ले हमारा अपमान करेंगे!" एक
पदवीधरी ने कुपित हो सखाराम से कहा ।
इसमें अपमान की बात ही क्या है ? मेरा उसपर प्रेम
है, मैं उसे नित्य पढ़ाता हूँ। उसके शरीर पर खादी का
स्फटिक सा सफेद शर्ट है । क्या वह गंदा है ? हमारे ही तो ये
सन बन्धु है । सारे देश में स्वाधीनता प्राप्ति के हेतु विदेशी
सरकार से मोर्चे लिये जा रहे हैं और यहाँ अपने को शिक्षित
कहलवाने में गौरव समझनेवाले आप सब इस बच्चे को भोजन
समय पास बैठाने तक तो तैयार नहीं । आप प्रथम भोजन कर
लीजिये । मैं आपकी पंगत में न वैलूंगा। मैं रुपल्या के साथ
बाद में भोजन करूंगा। आप सब उच्च कुलीन व्यक्ति पहले
बैठ जाइये।"
आखिरकार धना व सखाराम भोजन करने के हेतु सब के
वाद वैठे । बाकी सब पहले ही भोजन कर चले गये थे। गणा
रुपल्या आदि दूसरे सखाराम के साथ भोजन करने बैठे।
सखाराम और धना भोजनोपरान्त काफी देर तक चर्चा
करते रहे । गाड़ी का समय होनेपर मित्रद्वय स्टेशन जाने के
लिये संस्था से निकल पड़े । सामान तो कोई था ही नहीं । सिर्फ
थैली और कम्बल । सुन्दरपुर स्टेशन में आज बहुत भीड़ थी।
आम तौरपर शाम की गाड़ी में हमेशा भीड़ हुआ करती थी।
गाड़ी आ गयी । वह घर र करती रुकी। घनाने एक डिट
में चढ़ सखाराम के लिये बैठने की जगह प्राप्त की। सखारा
भी डिब्बे में बैठा इतने में तो रुपल्या और उसके वृद्ध पित
गणा भी विदा करने वहाँ आये ।

४
रुपल्या
कहा।
'दादा ये फूल लीजिये।" ने
"गरीबोंपर मेहर नज़र रखना।" गएा ने धीरे से कहा ।
"गणा मेहरबानी तो प्रभु को है। हम सब एक दूसरों को
कव तक साथ दे सकेंगे भला? तुम्हारा रुपल्या बड़ा होगा और
और मोल में जाया करेगा । तुम्हें किसी चीज की कमी न होने
देगा । और रुपल्या गणा की देखभाल करना ।
'आप वापिस कय लीटेंगे दादा? आपको याद हमें नित
सतापा करेगी। आपकी नाई मुझे कौन पढ़ायगा? कौन तस्वी.
रोंकी पुस्तकें देगा?" रुपल्या की आंखें डबडबा गयीं।
यह घना यहीं पर है । यह तुझे सब सिखायेगा । होशि-
यार बनना । अच्छा लड़का बनना।" सखाराम ने आशिर्वाद
देते हुए कहा ।
गाड़ी के छूटने का समय हो गया। सखाराम ने घना की ओर
प्यार भरकर देखा । सखराम ने घना की आखों में आसुओं के
रुपमें उमडे कितनेही अरमान व उमियोंके दर्शन किये ।
" सखाराम, पयोतर देते रहना और भविष्य का क्या
कार्यक्रम है इस की भी सूचना देना । यहां पर जिस तरह
तुम्हारे व मेरे वीच मित्रता की गांठ बँधी है, वह जीवन भर
अटूट रहे । कभी कभी अचानक अनजान मनुष्य परस्पर एक
दूसरे के संपर्क में आते हैं । लेकिन वे ऐसे हिल मिल जाते हैं,
मानो शत जन्मों से परस्पर पहचानते हों । मानो एक दूसरे की
खोज में ही निकले हों । लेकिन उन्हें इसकी कोई जानकारी
नहीं होती । तुम क्या मुझे खोजने ही निकले थे । तुम्हारे मेरे
संबंध कसे निर्माण हुए ? जन्म-जन्मान्तर का कोई अदृश्य रिश्ता

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धना स्थिर दृष्टि से निहार रहा था । जाती हुई गाड़ी हो
चुपचाप । वह दुःसी था । रुपल्या व गणा कमी के चले गये
। अकेला घना मंद गति से कदम उठाता नदी किनारे को
तरफ प्रस्थान कर गया । वह विचार नागर में तन्मय हो गोने
लगा रहा था । सखाराम आया और चला गया, मुझे क्यों न
जाना चाहिये ? यह प्रश्न वार वार उसके हृदय को रह न्ह
कर मय रहा था। लेकिन यह जायेगा कहाँ ? कितनी ही
देरतक चुपचाप नदी तटपर आसन जमाये बैठा रहा । इतने
में ही नदी में से जाते हुए किसी के धड़ाम से गिरने की
अावाज आयो । वह एक वृद्ध था। घना शीघ्र ही उसकी और
दौड़ पड़ा । उसने वृद्ध को सहारो दे खड़ा किया उसके मस्तक
पर का जो सामान पानी में गिर गया था, वह उसने उठा
लिया।
"
भीग गया होगा" वृद्ध ने क्षीण स्वर में कहा ।
'हाँ बावा चलिये । उस पार आपको ले चलता हूं।
धनाने वावा को सहारा दे उस पार पहुंचाया। वोझा उनके
सिरपर रखा । वृद्ध चला गया । घनाके मन को अतिशयानंद
प्राप्त हुआ। उसके मन में रही खिन्नता न जाने कहा उड़
गयो । क्षण भर ही सही लेकिन जीवन का उपयोग तो हुआ।
नीबीड़ अंधकार में भी प्रकाश की छोटीसी किरण आशा का
संदेश सुनाती हैं । स्वत: के जीवन का उपयोग क्या ? इस
संसार में ऐसे विचार रह रह कर घनाके मन में उठ रहे थे,
कि किसी मोहताज अपाहिज के उपयोगी बनने का स्वर्ण अवसर
हाय लगा । पनाको किसी कवि की एक पंक्ति स्मरण हो

३० आयी । "किसी की जीवन कली विकसित करने के हेतु यदि तुम्हारा कोई उपयोग हो सके, तो मान लो तुम्हारा जीवन सार्थक हो गया । घना प्रानन्द विभोर हो अपने कमरे में चला गया। जल प्रवाह की तरह समय तो वहता ही गया । लगातार पिछले सतत विचारों परांत धनाने अनुभव किया कि इस संस्था के आधार पर उसे जीवन निर्वाह नहीं करना चाहिये। तनख्वाह अवश्य लेता हूं । लेकिन संसार को मेरा क्या उपयोग ? यहां हम निश्चित हो तत्वज्ञान की चर्चा में रात दिन व्यतीत करते हैं। लेकिन किन के प्राणों पर हम वैचारिक अानन्द का मज़ा लूटते है ? जिनके प्राणों पर हम जीते हैं बड़े ग्रंथ उपर नीचे करते है, विविध संस्कृति व तत्वज्ञान की डींग हांकना उन्ही के अंधकार मय जीवन को उत्साह स्फूर्ति से प्रकाशमय करने की कभी कोशिश करते हैं क्या ? यहां की मिल में सख्त परिश्रम करने वाले मजदूरों के पसीने की कमाई पर यह संस्था जल रही है । सुन्दरदास सेठजीने संस्था के लिये दान अवश्य दिया। लेकिन वह दान आया कहां से ? मजदूरों के अधिक परिश्रम के पश्चात् प्राप्त निधी ही तो उनके पास होती है । फिर मजदूर वर्ग के लिये वे क्या करते हैं ? जिनके पसीने की कमाईमें से वे मन चाहा धर्म, पुण्य, दान कर सकते हैं। आश्रमों को भेंट देते हैं। उनके लिये वे सुन्दर स्वच्छ मकानो का निर्माण क्यों न करें ? उनके वेतन में दो प्रतिशत भी वृद्धि कर दें तो कितना अच्छा होगा। उन्हें विमारी में सवैतनिक छुटी दे दें तो खुदाकी कसम ! जव चाहा !

काम पर से निकाल दिया और रख दिया। मिल में भी बस
चाहा, ताले लगा दिये । इन मालकौ को मनमानी से लाखों
मजदूरों की जानें, जीवन मृत्यु के बीच झोंके सातो होंगी।
और उनकी लहर यानी जहर है जहर कालकूट ! छिः यह नव
अन्याय है । मुझे यहां पर नहीं रहना चाहिये । लेकिन बाई
काहां ? मैं यहीं पर क्यों न रह जाऊं? यहां के पक-नन्दन
का संगठन क्यों न करूं? यहां के विद्यार्थी वर्ग में यौन
नव-चैतन्य की अखंड ज्योति जला दूं ? ऐने कई विचार के
हृदय सिंधु में नित्य उठा करते थे। वह देव पावन
नहीं बल्कि मन से विचारों से । कुछ निश्चय ही न होता था।
लेकिन एक दिन तड़के ही उनने त्यान-मत्र किया
संस्था के व्यवस्थापक के पास और सब ने विज्ञानी।
'आप कहां जायेंगे मालिक ?" गणाने पूछा।
"मने सुन्दरपुर में ही एक कमरा किये जिला
है, वहीं रहूंगा । सुन्दरपुर में ही में यात्री बनाइने
में संगठन कार्य करूंगा । हम मब मिलते ही न्दन। कते
प्रेमपूर्वक उत्तर दिया । रुपल्या भी दांडा आना मन कहा।
"क्यों भैया आप भी चले गये। मरने
लगें । क्या यह सच है कि आपको यहां छा नहींन्द्रा?"
रुपला अव मे में कन्चे में ही कमा किन मां कीं।
मेरे कमरे पर याते रहना।" वनाने कहा कि में
अपनी छोटी सी ट्रंक-विनर बन्दा । मंन्यावं दिवामिला
को सांदर व सप्रेम अंतिम विदाई नमस्कार दिया। दर
पड़ा मंजिल को ओर । जाओ पना नुन मी रात्री दोन-ती
-

३२ की सेवा शुश्रूषा के लिये जानो। तुम्हारे जीवन का उत्तरार्ध प्रारंभ होने दो। लेकिन तुम्हारे मार्ग में कदम कदम पर उपहास, अपमान और मुश्किलों के ढेर लगे हुए हैं। निराशा तुम्हें आशासे दूर करने के लिये घेर लेगी। सर्वत्र अंधकार का साम्राज्य छा जायेगा । लेकिन दूरदर्शिता को नित्य अपने साथ रख कर्तव्य वृद्धि से निरंतर आगे की ओर कूच करना । परिणाम अच्छा अथवा बुरा प्राये परवाह न करना । लेकिन तुम अपने प्रयत्न, कोशिशें कभी न छोड़ना भले ही जानपर पान पड़े।

लंबे अर्से के पश्चात् सखाराम अपने घर पुनः लौटा था। सखाराम का गांव छोटा सा तहसील का गांव था। लेकिन रेल्वे की वजह से अपने आसपास के क्षेत्र में विशिष्ट स्थान भी रखता था। उसके दीर्घकाल पश्चात् पुनः प्रागमन से घर में मां, भाई, प्रानंदित हो उठे। लेकिन सखाराम को दृष्टि तो छोटी वहन को खोज रही थी। वह कहीं न दिखाई दी। उससे वह छोटी थी। बचपन में ही उसकी शादी हो गयी थी। लेकिन विधि के कठोर हाथों ने बेचारी की मांग का सिंदूर दो ही वो में नोच लिया था। पति के पश्चात् समुराल में उसको नाना प्रकार के कप्टों का सामना करना पड़ता था, अतः वह मैके ही रहती थी। सखाराम को रह-रहकर वहन की याद रुलाने लगी। बीते दिनों की कई छोटी बहन की स्मृतियां एक के बाद एक उसकी आंखों के सामने आने लगीं । उसकी ससुराल गांव में ही थी। एक मर्तवा बड़े भैया वहन को ले ससुराल गये। विधवा बहन को ससुराल में रखा । लेकिन बड़े भैया के पीठ फेरते हो वह भी उसके पीछे होली । भैया ने आव देखा न ताव, और ताड़कन् उसके मुंह पर तमाचा जड़ दिया । "कहाँ पाती हो, रोती-चिल्लाती? हमारे मुंह पर कालिख ४ तिना चाहती हो क्या ? ससुराल में ही रहो।" भैया न दुःखित हृदय से उसे डांटते हुए कहा । " मैं प्राण तक दे दूंगी दादा । लेकिन उस नरक में मत रखो।" वह जैसे दीन वन गयी थी। "ले जाओ अपनी बहन को-कुलच्छनी को यहां से । आते ही पति को खा गयी और न मालूम अब किसकी बारी है । जान देकर क्या हमारे गले फाँसी का फंदा डलवायेगी? लेजाओ अपनी बहन को।" उसकी सास लाल-पीली होकर वोल रही थी। अड़ौसी-पड़ोसियों ने भी ' ले जाओ अपनी बहन को' ऐसी ही सलाह दी । और भैया उसे घर ले आये । पुनः वह कभी ससुराल न गयी। लेकिन मरते दम तक उसने सुख की सांस न ली। मालती ने उसकी अन्त तक की अवस्था का वर्णन किया। क्षयी वन उसने इस असार संसार से बिदा ली थी। लेकिन अपनी थूक को वह स्वयं किसी जगह दूर जा गढ़े में डालती थी कभी भूल कर भी उसने किसी से अपना काम न करवाया। वह स्वयं अपना सारा काम करती थी। सखाराम प्रायः मां से उसके पुनर्विवाह से बारे में कहा करता लेकिन सनातनी ख्यालात में गर्दनतक डूबी बूढ़ी को इसमें से एक बात भी अच्छी नहीं लगती थी। सखाराम वहन के वैधव्य-दुःख से तंग आ गया था। लेकिन मजबूर था। फिर तो वह से चला गया था वर्षों तक । घर से चले जाने के बाद पुनः आगमन तक उसे अपने संबंधी व घर के विषय में एक शब्द भी मालूम न हुआ था। और घर आया तो वहन अदृश्य । उसे प्रायः वहन की आत्मा उसके चारों ओर घूमती फिरती स्वयं घर प्रतीत होती। घर में क्या आज तक उतको माला उसके लिये तड़प रही थी। लेकिन सखाराम शांत था । उसने अपने दिमाग का संतुलन न खोया । जब वह घर त्याग कर चला गया था तब मालती सिर्फ आठ-दस वर्प को ही थी। लेकिन अब तो वह भी अठारह वीस वर्प को जवान बन गयी थी। उसे हरेक बात अच्छी तरह से ज्ञात होने लगी थी। उस वहन की शादी तो पिताजी ने बचपन में ही कर दी थी। और फिर तो उसके जीवन चमन में दुःख के ऐसे छोले वरसे कि अन्त में उसे यमराज की ही शरण लेनी पड़ी थी। अत: भैया ने इसे आगे पढ़ा कर सुशिक्षित बनाने की मन में ठानी थी। सखाराम प्रायः पिता जो के बारे में यही कहा करता था कि अगर वे रहते तो वे अवश्य ऐसा ही करते लेकिन उन्हें यमदेव ने कुटुम्ब से उठा लिया था। तब से मां प्रायः दुःखी रहा करती थी। लेकिन दुःख पर समय जैसा रामबाण दूसरा इलाज भी नहीं। धीरे धीरे-वह शोक भूलने लगी। घर गृहस्थी में मन लगाने लगी। सखाराम के घर त्याग से एक बार फिर उसे दुःख का जबरदस्त धक्का लगा था। वह पुनः घर लौट आये इस हेतु प्रायः वह जप-तप किया करती थीं। और मानो उसके पूजन-अर्चन से ही प्रसन्न हो ईश्वर ने वर- दान दिया जिसते बारह वर्ष की लंबी अवधि के पश्चात् अचा- नक एक दिन सखाराम घर लौट गया। सखाराम के घर लोट पाने से सब के मुंह पर आनंद को लहर दौड़ आयी थी। सव के चित आनन्दोन्मत्त हो नाच रहे थे। भंया किती दूकान में नौकरी करते थे। छोटा सा बाड तो उनकी अपनी पैतृक संपत्ति थी। घर के ठीक पीछे एक कुआं

था और उसके पास में अमरूद का पेड़ । सखाराम की आंखों
के आगे बचपन की एक स्मृति शीघ्र ही प्रकट हुई। बहन
कितनी क्रोधि हो उठी थी जव उसे असरूद के पेड़ पर से उसके
लिये एक भी अमरूद फेंका न था।
"भैया, यह चन्दन का पेड़ । दीदी ने अपने हाथ से
लगाया था और वही इसे सींचा भी करती थी। मेरी मृत्यु के
पश्चात् यही मेरी स्मृति को सव के हृदय में ताजी रखेगा ऐसा
प्रायः वह कहा करती थी । मृत्यु के दिन भी उसने कहा था-
"पौधे को सींचा क्या? मालती कंठावरुद्ध हो जाने को वजह
से एक एक शब्द मुश्किल से वोलती, सखाराम को चंदन-पौधे
की उत्पत्ति-कथा कह रही थी।
सखाराम वक्त-वेवक्त उस चंदन के पौधे की तरफ एक
टक हो निहारा ही करता मानो अपनी लाडली वहन इस पौधे
के स्वरूप में साक्षात् उसके समक्ष ही खड़ी है।
घर के सूने वातावरण में, भाभी के दो बच्चे ही प्रायः
सखाराम के मनोरंजन के साधन थे। जयंत छः सात वर्ष का
था और पारवी तीन वर्ष की । सिर्फ दो ही बच्चे । घर लौटे
चाचा के इर्द गिर्द दिन भर नाचते-कूदते और फुदकते रहते ।
"आप हमारे चाचाजी? इतने दिन कहां थे?" जयन्त
प्रायः पूछा करता।
चाचा, दादी वारवार रो रही थी।"
"रोती न होंगी-आँखें मल रही होंगी।" सखाराम
उनसे कहता
नहीं नहीं सचमुच रो रही थी। उसे कोई कुछ कहत

I
नहीं, मारता नहीं, फिर चाचा वह क्यों रोती है भला?"
जयन्त ने पूछा।
"मैं पूलूंगा दादी से । समझे जयन्त, अच्छा यह तो बता
तेरे अध्यापकजी भी हैं ?" "एक दफे उन्होंने छड़ी मारी थी।
चाचा, हमारे अध्यापक हैं तो लेकिन मारते हैं जोरसे । फिर
तो मैं रो पड़ा।"
'उन्होंने तुझे क्यों मारा था भला?"
"अपने साथी के साथ बोल रहा था इसलिये।"
"कौन है तेरा साथी ?"
"वही वाळशा, कल हमारे यहां नहीं आया था क्या ?
वृक्ष पर वह गिलहरी-सा शीघ्र गतिसे चढ़ता है। वेर के
पेड़ पर भी चढ़ता है, लेकिन मजाल है जो एक कांटा भी चुभ
जाये। वृक्ष पर चढ़ वह वृक्ष हिलाता भी खूब है। हम
सब नीचे रह वैर इकट्ठे करते हैं। अध्यपकजी उसे भी खूब
पीटते हैं । एक मर्तवा तो उसकी जेब में से बेर निकले अतः
बहुत पीटा अध्यापकजी ने और सारे वेर सड़क पर फेंक दिये।
चाचा, वेर खराव होते हैं क्या ?"
"अरे, राम को शवरी ने वैर ही तो दिये थे।"
"झूटे ना? दांतोंसे तोड़े हुये । पक्षियोंने दांतोंसे कुतरे
होंगे । ठीक है न चाचा?"
इतने ही में पारवी ने गाते गाते प्रवेश किया।
चाचा पारवी आई ।" जयन्तने कहा।
वह आते ही चाचा की गोद में बैठ गयी। तालियों से
ताल देती वह धीमें स्वर में कोई गीत गुनगुना रही थी।
"चाचा, दही विषयक गीत सुनाइये ना?"
"

८
'तुम्हें दही भाता है पारवी ?" सखारामने पूछा ।
जी हाँ, और उस में शक्कर ।
"पारवी लोभी है चाचा ।
तू ही लोभी, तू ही कौआ ।"
"पारवी ऐसा न वोल, मैं गीत सुनाऊं ना?"
"हाँ सुनाओ, अवश्य सुनायो
सखारामने गीत प्रारंभ किया।
"यों खेलत मोरी पारवी' ऐसा कहो चाचा" । उसन
कहा।
तेरा नाम क्यों, मेरा चाहिये।" जयन्त ने कहा ।
तू बड़ा है और मैं छोटी। मेरा ही नाम चाहिये। क्यों
चाचा?" पारवी ने अपने दोनों छोटे करों को सखाराम के
गले में डालते हुए कहा।
क्यों नहीं, क्यों नहीं ? जयन्त,
तुम पाठशाला.
जायो।
सखाराम ने कहा । जयन्त पाठशाला चला गया। और पारवी
खेलते खेलते वहीं चाचा के निकट सो गयी । भाभी भी
रसोइ-घर का सारा काम काज पूरा कर जरा लेट गयी थी।
मालती सिलाइ वर्ग में गयी थी।
सखाराम अन्दर जा मां के पास बैठा। फिलहाल मां की
तवियत अच्छी न थी, मानो वह करुणा की मूर्ति रह-रहकर
सखाराम का ही इन्तजार कर रही थी। लेकिन उसके सिर पर
एक और चिन्ता सवार थी; और वह थी मालती की शादी की।
माँ, तुम आज रो रही थी ?" उसने धीरे से पूछा।
कभी कभी आंखें भर आती हैं। वे तो कभी के हम
सवको रोता-विलखता छोड़ राम की शरण में चले गये और

३९
मुझे तड़पाने के लिये पिछे छोड़ गये । यह गोक मानो कम या
अतः तेरी वहन भी चली गयी । तड़प तड़प कर बेचारी ने प्राण
दिये । वह रात-दिन तेरा स्मरण कर कहा करती कि जहां
कहीं भी हो, मेरा भया सुख में रहे । लेकिन खैर, जाने दे वीती
वातों को.। लेकिन अब मालती का क्या होगा यही चिन्ता
रात-दिन मुझे खाये जाती है । व्यर्थ में ही दादाने इसे उच्च
शिक्षा दिलायी। हमारे समाज में शिक्षित युवक हैं ही कहां ?
कोन इस की मंगनी करेगा ? नाक की बनिस्वत मोती भारी,
यही तो हर कोई कहेगा । मैं तो पहले से ही कहती रही कि
दो किताबें सिखा दीं तो काफी हो गया। लेकिन तेरा भाई
मेरी बात माने तव ना । तू भी तो प्रायः ऐसा ही कहा करता
था । तू तो चुपचाप मां-बाप के वात्सल्य को गढ़े में डालकर
चल दिया घर से और उसके पास समय नहीं है और समय
मिल तो भी कहां से । इतना बड़ा कुटुम्ब और कमाने वाला
एक । मालती आखिर कार और कितने दिन यों रहेगी।
मां, अपना दुःख बेटे के सामने प्रकट कर रही थी।
"मां, समय पायेगा तब सब ठीक होगा। और विना
मादी-व्याह किये वह ऐसी ही कुमारी का रह गयी तो क्या
बिगड़ेगा ? कहीं भी रचनात्मक कार्य करेगी सेवाश्रम प्रारंभ
करेगी। हमारे देश के कोने कोने से यही पुकार है कि कार्यकर्ता
कार्यकतियां चाहिये, जो अपने जीवन की बलि देकर
देशकल्याणार्थ घर वार को तज दें। छोटे-मोटे गांवों की
महिलाओं में कार्य करने के लिये कार्यकर्ताओं की सख्त
आवश्यकता है। सखाराम कह रहा था मां से।
"शादी के बाद काम करने दो। तुम्हारे प्रेरक महात्मा
"

० ? ने गांधी जी ने शादी नही की थीं क्या ? शादी के बिना भला कोई रहता है ? व्यवहारानुसार सव होना चाहिये । तुम बम्बई-पूना की तरफ जानो, कहीं से भी गुणवान, शीलवान, बुद्धिमान् , एकाध लड़का ढूंढ कर लाओ। मां कह रही थी। और सचमुच एक दिन सखाराम पूना की तरफ प्रयाण किया । वर्षों पुराने सहपाठियों से उसकी मुलाकातें हुईं । वहुतों की शादियां हो गई थीं तो बहुतों के जीवन प्रांगण में नन्हें मुन्हें क्रीड़ा कर रहे थे। वहन के लिये वर देखें भी तो कहां? वह अलग-अलग छात्रालयों में जा कर जांच करता। छात्रा वर्ग उसके आगमन का रहस्य समझ परस्पर मुस्कराते हुये काना-फूसी करते दुष्ट गोचर होते । लेकिन सखाराम था सीधा- साधा और भोला-भाला। वह यह सब चुपचाप सहन करता था। एक जगह पर उसे एक एसे तरुण का पता मिला जो बॅरिस्टर वनने के लिए विलायत जाने वाला था। उनके घर की पूछ- ताछ करते करते वह वहां पहुंचा तरुण अभी घर पर ही था। वह आराम कुर्सी पर बैठा सिगार पी रहा था। नमस्कार !" सखाराम ने कहा । Good Morning (गुड माँनिंग) ।' तरुण ने प्रत्युत्तर दिया। आपकी पूछ-ताछ करने के लिये में आया हूं,। चन्द बातें पूछ सकता हूं। "हाँ, हाँ, अवश्य पूछिये । क्या नहीं ? " आपकी शादी करने की मनीषा है ऐसा सुना है मैने । मेरी बहन शादी के योग्य है। "शिक्षण है क्या ?

" " मैट्रिक तक शिक्षण हुआ है। 'वाह बहुत ही अच्छा ! हमारे समाज में शिक्षित लड़- कियां हैं ही कहां? अरे, कल तो मै बॅरिस्टर या आइ.सी.एस. अफ़सर बनूंगा । ऊंचे पदों पर आसन्न व्यक्ति मेरे यहां आयेंगे, और मुझे भी तो बड़ों में जाना पड़ेगा, भोजन, पार्टी, समारो- हादि अनेक कार्यक्रम में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से हिस्सा लेना पड़ेगा । सर्वत्र पत्नी को साथ में ले जाना होगा। ऐसी स्थति में यदि वह मूर्ख, दुर्वल नासमझ हुई तो फायदा हो क्या शादी का? ठीक है न ? वाकई आपको वहन पढ़ी लिखी हैं ? यह तो सब ठीक । लेकिन एक शर्त है । मुझे उच्च शिक्षण के लिये दिलायत जाना है जो कोई मेरे विलायत जाने का पूरा खर्च अदा करेगा उसीकी कन्या से में शादी के सूत्र में बंधूगा । और फिर उस में लड़की की भलाई है । अपनी कन्या के लिये फारेनें रिटनंड पति मिला तो निश्चय ही मां-बाप को कितना आनन्द होगा ! ठीक है ना?" "आप एक एक मर्तवा वहन को देख तो लीजिये।" 'अरे, इसमें देखने की वात ही क्या है ? शिक्षित कन्या और धन भी मिलता हो तो समझिये बिना देखे-सुने वह पसंद ।" "लेकिन मेरी वहन भी आपको भी। परस्पर एक-दूसरे को देख लेना, आपस में बोलना और जो हो वह तय कर लेना अच्छा । पैसे की बात तो फिर देख लेंगे।" "अच्छा, मैं आऊँगा । अापका पता दे दीजिये घरका। आने के पूर्व सूचना दूंगा । अच्छा, मुझे जाना है अभी । बाहर अपॉइन्टमेन्ट हैं। शहर में सब टाइम-टाइम । और मैं रेखा भी हूँ ऐसी वातों में।"

२
सखाराम ने नमस्कार कर विदा ली। वह घर लौटा।
उसने बड़े भैया तथा माँ को सब बातें सविस्तार बतायीं।
" मेरी मानो तो सखाराम, उसके विलायत गमन के पूर्व
ही शादी-वादी कर दो। वह एकाध मैडम वहांसे उठा लायगा
अपने साथ । पहले एक पाई भी देने का नाम न लो।"
माँने कहा।
की तारा
थी;
'माँ, सचमुच मुझे यह शादी नहीं चाहिये। दादा की
तिजोरी में जो थोड़ी बहुत रकम होगी वह भी फिजूल वरवाद
होगी। और उपर से कर्ज भी लेना पड़ेगा। विलकुल नहीं।
मुझे कहीं भी नौकरी कर भैया के दुःख-दर्द में सहभागी होने
दे । इसमें कोई बुराई है क्या ? समय आनेपर शादी भी हो
ही जायगी।" मालती मां को समझा रही थी।
"मालती, ऐसा न बोल । अगर वे आज जीवित होते तो
कितने ठाठ-बाट से तेरी शादी रचाते । तू तो उनकी आँखों
लेकिन वे तो चले गये कभी के । मैं ही अभागिन,
फूटे नसीव को रोने के लिये वची रही हूँ अव । एक बार तेरे हाथ पीले
हो जायें फिर मैं शांति से अांखें मूंद लूंगी । दादा भी तेरा भाई ही
है न? यह घर रखो गिरो। और फिर सखाराम भी तो कमाने
लायक होगा। धीरे धीरे
साहुकार की रकम अदा होती रहेगी।
वहन के चिर-सुख की बनिस्बत क्या भाइयों को चांदी के चंद
टुकड़े ज्यादा प्रिय हैं ?" मां ने मालती की पीठ सहलाते
हुये कहा।
" मां अब मैं भी दादा का वोझ हल्का करने का जी
जान से प्रयत्न करूंगा। गिरो रखे घर-वारको छुड़ाने का प्रयत
करूंगा। मालती की शादी ठाठ-बाटसे होनी चाहिये

४३
ससाराम ने माँ को आश्वासन देते हुए कहा।
मालती को कोई देखने आने वाला है- ऐसी काना-फूसी
घर-घाट, चोपालादि गांव के प्रत्येक हिस्से में होने लगी।
प्रत्येक ग्रामनिवासी कुतुहलवश ठीक बात क्या है यह जाननेकी
कोशिश करने लगा। छोटे गांव में छोटी वार्ता के फैलने में
देर नहीं लगती।
चाचा, फूफी को कौन देखने आयेगा ? फूफी की शादी
होगी?" जयन्तने यालसुलभ उत्सुकता से सखाराम को अकेला
पा, प्रश्न किया।
"हाँ बेटा !" सखाराम ने कहा ।
"और चाचा, आपकी शादी कब होगो ? मैं आपका
हाय देखू ?"
'हाय में क्या देखना है रे जयन्त?"
" मुझे सब ज्ञात है । देखू तो आपका हाथ।"
"देख।
"
" आपका पत्नी पर प्रेम नहीं । आप के दस बच्चे होंगे,
दस । और क्या... मैं तो भूल ही गया ।"
तुम्हें हाथ देखना किसने सिखाया जयन्त ?"
" हमारी पाठशाला में लड़के एक दूसरे का हाथ नित्य
ही देखते हैं। ऐसा ही कुछ हाथ में होता है ना? चाचा, फूफी
की शादी कब होगी? फिर तो वैड, लड्डू, पेढे-मिठाई और
भी बहुत कुछ ?"
'फूफी की शादी ऐसी न होगी।"
"तो फिर कैसे?"
विना वाजे-गाजे के उसकी शादी संपन्न होगी।
.

भी
नहीं, नहीं।
इतने में, जयन्त के कान पर अपनी माँ की आवाज टकराई।
उसे बुला रही थी । जयन्त चला गया। किसी आवश्यक
कार्यवश सखाराम वाहर
जाने के लिये घरसे अभी निकला
ही था कि डाकिये ने एक पत्र उसके हाथ में दे दिया । पत्र
और किसी का नहीं बल्कि उस युवक का ही था। वह आज
आने वाला था। स्टेशनपर उसकी अगवानी के लिये जाना
आवश्यक होगया। उसने
युवक
के प्रागवानी की पूर्व सूचना
घरमें दे दी। बड़े भैया अच्छी तरकारी लाने के लिये बाजार
चले गये और सखाराम अगवानी के लिए स्टेशन ।
" मालती, जरा सुन्दर साड़ी परिधान करना। कानो में
कर्णफूल डालना न भूलना और कंगन भी हाथ में अच्छे हों।"
माँ ने सस्नेह कहा।
" माँ, क्या में प्रदर्शन की चीज हूँ ?"
"जरा मेरी अपनी वृद्धा माँकी भी सुन !"
भीभी ने भी अच्छे से अच्छे वस्त्र-भूषणो से मालती को
सजाया और खूब सजाया। मालतीने भी फिर सजने में कमी
न की । सचमुच आज वह रूपसौंदर्य की प्रतिनिधि रति-सी
लग रही थी। लेकिन उसके लावण्य में करुणा भी छिपी थी,
वदनपर खिन्नता और स्वभाव में गंभीरता।
आज कौन आनेवाला है माँ ?" जयन्त ने पूछा।
फूफी को देखने आयेंगे । ठीक तरहसे रहना । गड़बड़
धमाल न हो श्रीर खवरदार पारवी को रुलाया तो।"
नन्ही पारवी भी ‘फूफी की शादी, फूफी की शादी'
गुनगुनाती प्रांगन में नाच रही थी। "मेरी गुड़िया रानी की
-

"
"
"
भी शादी में रचाऊंगी। मां मुझे लड्डू देगी और गुड़िया के
लिये कीमती गहने । जरा मनोरंजन भी होगा और आनन्द भी।
ससाराम जब स्टेशन से लौटा तो साय में वह युवक भी
था। द्वारपर दादा ने स्मित हो कर उसका मौन स्वागत किया ।
नमस्कार आदि हुए । हस्त-मुख-प्रक्षालनादि विधि पूरी हुई ।
तव मालती घर में से चाय की प्याली लेकर आयी।
जयन्त ने ताली बजायी।
'जयन्त, अन्दर जा। दादा गुस्सा होकर बोल उठे।
"यह मेरी वहन ।" सखाराम ने मालती का परिचय
देते हुए कहा ।
"जी हां, चाय किसने बनायी, स्वादिष्ट हुई है-बहुत ही
स्वादिष्ट । वैठिये, खड़ी ययों हैं ?" युवक ने उसकी तरफ
टकटकी लगाते हुए कहा ।
"मैं जाती हूं, घर में काम है।" कह मालती अन्दर
चली गयी।
बड़ी शर्मीली है भाई आपकी बहन ।"
"विनय ही नारी का भूपण है।" दादा ने कहा ।
"यह सब पुरानी संस्कृति की बातें हैं। नव-संस्कृति में
तो विनय ही सब से बड़ा दूपण है । आज के युग में तो हो
जी करना चाहिये । गप्पें लगाने में दिलचस्पी लेनी चाहिये ।
मुस्कुराना आवश्यक है । दिवाई हो, युवक वेभान हो
प्रवचन झाड़ने लगा।
स्नानशौचादि आवश्यक कार्य से कभी के सब निवृत्त हो
गये थे । सखाराम व दादा देवघर में बैठे देवपूजा कर रहे थे।
जयन्त और पारवी युवक को चुपके चुपके दीवार की आड़ से
॥
11

.
देख रही थी।
"अरे, ओ यहाँ आओ. युवक ने आवाज दी और
जयन्त सारी हिम्मत इकट्ठी कर बाहर आया।
तुम्हारा नाम क्या ?"
जयन्त।
बहुत सुन्दर है नाम तो।
आप फूफी से शादी करेंगे?"
तुम्हें क्या मालूम है वच्चे ?'
मुझे सब ज्ञात है।
आपका हाथ देखू ?"
"तुम्हें सिखाया किसने यह सब ?"
"मुझे आता है देखनें दो हाथ ।"
उस युवक ने मनोरंजन की खातिर हाथ आगे बढ़ाया और
छोकरे ने चेहरेपर गंभीरता लाते हुए कहा, “आपकी शादी न
होगी । आपके दस दस वच्चे होंगे कुल दस । और क्या . . .
अरे, शादी न होगी तो वच्चे कहाँ से आयेंगे ?"
में ऐसा लिखा है। हमारी पाठशाला के
लड़के हाथ देख प्रायः यों ही कहते हैं।" पारवी भी भय-रहित
हो बाड़में से बाहर निकल आई । “फफीका दूल्हा काला या
गोरा?"
वह कह रही थी।
"में तो काला हूं।" युवक ने सस्मित कहा।
छिः मुआ कहीं का काला ।" उसने नाक भौं सिकुड़ते
हुए कहा।
पारवी-जयन्त, एक दफा कह दिया न ? अन्दर वैठो।"
दादा क्रोध से लाल पीले हो पारवी की ओर घूरते हुए बोले
'आपके हाथ
।
--

४७
।
-
होशियार है आपके बच्चे।" अभ्यागत ने, मानो कुछ
नहुमा ऐसे मांत स्वर में दादा से रहा ।
भोजन के लिये नव एक साथ बैठे। कोई किसी से ज्यादा
बोलने की स्थिति में न था। सिर्फ विलायत गमोत्सुक वह युवक
रह रह कर मालती को घूरता और जरा मुस्कुरा देता। मालती
कुछ परोस रही थी, वह इन्कार नहीं कर रहा था। वह और
परोस रही थी अपनी तान में।
"अरे सब तो बस । अभी से अाग्रह क्यों ? फिर करियेगा
शांति से । मुझे तो लगा आप स्वयं ही परोसना बंद करेंगी।
युवक निर्लज्ज बन मालती से कह रहा था।
मालती का हंसता चेहरा यकायक कोष से तमातमा उठा।
क्षण भर तक उसकी यही स्थिति रही, फिर वही चिरपरिचित
मुस्कुराहट की रेखा पुनः उसके चेहरेपर छा गयी । वह समुद्र-सी
शांत थी । मानो कुछ हुआ ही नहीं । सवका भोजन पूरा हुआ।
पान-वोड़ा अतिथी को दिया गया। पान को मुंह में रख
चवाते और सिंगार सुलगा धुआँ निकालते हुए युवक महाराय ने
पाराम कुर्सी में स्थान लिया और कलात्मक धुम्रवलय की
ओर निहार वह कृताय दृष्टि से हंस रहा था।
"याप जरा सो जाइए । सारी रात्रि की थकावट होगी।
पास के कमरे में सोने की सारी व्यवस्था कर दी गई है।
"
दादाने कहा।
"प्रापकी वहन मुझे पसन्द है । सुन्दरता के साथ ही साथ
विनय भी प्रचुर मात्रा में इसमें भरी पड़ी है। लेकिन इतनी
विनय कल न चलेगी। समय पाने पर हंसना होगा- दशेकहॅण्ड
करना होगा । अन्य बड़े व्यक्तियों से काम पड़ा तो कोई एकाध

४८ है ने ।” युवक जाम भी होठों से लगाना होगा। अपटुडेट रहना आवश्यक । यह सब अपने आप पायेगा । एक मर्तवा बड़े सर्कल में जाने की देर है फिर तो किससे कैसा वर्ताव करना चाहिये । स्वयं सीख जायगी- उसकी आदी हो जायगी । अच्छा मैं जरा आराम कर लूं। कहा और वह पास के कमरे में जा आराम करने लगा। जयन्त पाठशाला चला गया था पारवी सो गयी थी। वैठक-गृह में दादा व सखाराम आपस में बोल रहे थे। उन्हें युवक की प्रत्येक रीत, चाल-ढाल बोलने चालने का तरीका तिरस्करणीय प्रतीत हो रहा था। वामकुक्षी के पश्चात् पुनः चाय की प्याली आयी। मालती भी वहीं आकर बैठ गई। परस्पर स्पष्ट शब्दों में निसंकोच वार्तालाप होने लगी। उसने अंग्रेजी में प्रश्न पूछा। मालती ने टाईम्स अख़बार पढ़ सुनाया। युवक बेहद खुश हुआ। मालती की तीव्र बुद्धि की अनुभव कर उसने कहा, मैं आपको पसंद हूं क्या ? मुझ से जो कुछ पूछना है अवश्य पूछिये । आप खादी परिधान करेंगे?" उसने शांति से पूछा । " खादी पहन कर मैं बड़ा अफ़सर कैसे वन सकूँगा। तुम उसकी चिता न करो"। आप बड़े अधिकारी बन गये ? भविष्य में समस्त देश में स्वाधीनता-संग्राम तो शुरु होगा ही आप अपने ही देशवंधुओं पर बंदूकों की गोलियां चलायेंगे क्या? लाठीमार से उन्हे स्वतंत्रता प्राप्ति पथ से विमुख करेंगे क्या?" उसने प्रश्न किया " राजनिष्ठा यह तो प्रत्येक सरकारी कर्मचारी का अ धर्म है । मैं लाठीमार गोलावारी के आदेश दूंगा तभी उच् पद प्राप्त कर सकूँगा। फिर मोटरें मिलेंगी उन में बैठ 3

४६
"
"
रानी सी सर्वत्र फिरेगी।
लगता है, आप शराब भी पीते हैं ?"
"कभी कभी। लेकिन कल उच्च पद प्राप्त करने
पर लेनी ही पड़ेगी। अतः अभी से आदत डाल रहा हूं।
और फिर विलायती हवा से अपना संरक्षण करने के लिये
शराब लेना ही पड़ेगा। वर्ना मैं मर जाऊंगा । कहते हैं थोड़ी
बहुत तो टानिक का काम देती है। लेकिन छोड़ो इन बातों को।
मैं तुम्हें पसंद हूं क्या ? अवश्य दुबला-पतला हूं लेकिन विलायत
में भारी भरकम, मोटा-ताजा बन जाऊंगा और सावला होने
पर भी वहाँ की आवोहवा से गोरा वनूंगा; कहिये'
"दादा से कह दूंगी। " मालती इतना कह वहां से
चली गयी।
'कितनी विनीय है यह । " युवक अपने आप बोल उठा।
"विलायत-गमन के लिये आपको कितनी करम देनी
होगी?" दादा ने पूछा।
सिर्फ पांच हजार । और जो कुछ लगेगा मैं ऋण रूप में
दूसरों से लेलूंगा । सारा का सारा वोझ आप अकेले पर नही, में
जो कुछ निर्णय कगता हूं काफ़ी सोच विचारके करता हूं।
'दो दिन के पश्चात् आपको प्रत्युत्तर दूंगा।
'मुझे एक बात पूछनी है।
'पूछिये ।
" आपके ये बंधु अभी अविवाहित हैं । उनका विवाह भी
हमारे साथ ही साथ हो जाये तो अच्छा रहेगा। मेरी बहन है -
ज्यादा लिसी-मढ़ी नहीं और एक आंख से जरा कानी है। जैसी
आपको अपनी वह्न को चिंता है, ठीक वैसी ही मुझे अपनं
"

-१० " ने सब सखाराम, बहन की। मैं आपकी वहन से विवाह करूंगा और ये मेरी वहन से । विल्कुल सीधी-सादी वात है । बोलिये है मंजूर ? " पीछे से सूचित करूंगा। दादा कहा। अतिथि स्टेशन के लिये घर से सखाराम के साथ रवाना हुआ फिर भी मालती वाहर न आयी। सखाराम अतिथि को रेल में बिठा कर घर आया। आज घर में शून्यता का राज्य था कोई भी युवक के बारे में एक शब्द भी बोलना नहीं चाहता था। सव के चेहरे से एक ही वात प्रकट हो रही थी और वह उस युवक के प्रति उनके हृदय में घृणा हो रही थी। सव तंग आगये थे उसके व्यहार से । आखिर क्या सोचा तुम ने?" मां ने पूछा " लगभग सब सोचा हुआ ही है।" उसने प्रत्युत्तर दिया। "अच्छा ही हुआ । अव में शादी की अवधि तक प्रत्यक्ष रूप में जीवित न रही तो भी कुछ बात नहीं । एक बोझ तो कम हुआ। पिछले दो दिनो से मेरा जी कहीं भी नहीं लगता। ऐसा प्रतीत होता है कि इस मायावी संसार से सदा के लिये विदा हो जाऊं।" मां ने संतोष व्यक्त करते हुए कहा । मां, तुम मालती की चिन्ता न करो। सब ठीक होगा। दिन आयगा तब मालती अपने सुखी संसार में फूलेगी। में तुम्हें वचन देता हूं कि जब तक मालती को अच्छा घर और वर न ला दूं तवतक कहीं न जाऊंगा।" सखाराम ने मां को आश्वासन देते हुए कहा । सचमुच उस दिन से मां ने बिछौना न घोड़ा। उसने चिर परिचित शैया से ही मित्रता कर ली। मालती रात दिन विना कुछ खाये पिये मां की शैया के पास मौन बैठी रहती । और म अपनी लाडली का हाथ में थामे दिनभर आंखें मूंद शैया पर पड़ी रहती थी। "मालती, मेरी बच्ची सुखी रह । बड़े की पत्नी बन तू कंचा दर्जा हासिल करेगी । मोटर में फिरेगी। तेरी भाग्यरेसा बलवान जो है । लेकिन हमेशा एक बात ध्यान में रखना । उसके प्रति जीवन में कभी दुर्लक्ष न करना । वह यह कि दुखियों को भूलकर भी तकलीफ न देना । मिथ्याभिमान न रखना । ज्यादा अकड़ अच्छी नहीं। प्रत्येक से मोठा बोलना और कुल परंपरा से आये रोति-रिवाजों को बड़ों में जा खंडन- मंडन न करना । देव-धर्म और देश को स्वप्न में भी कभी न भूलना । समझो ना?" माता समझा-बुझा रही थी। जयन्त- पारवी को अपने निकट बुला और प्रत्येक का चुम्बन ले सिर- पर हाथ फेर चिरंतन प्रेम से बहू के सिरपर हाथ रख प्राशीर्वाद दिया। उस दिन को रामि में, जहां सारी दुनिया सुख के खर्राट ले रही थी, वहां सखाराम, बड़े भया, मालती, भाभी वृद्धा की पाय्या को धेरे बैठे थे। सब के चेहरे पर उदासी की घटा छायी हुई थी। जय जय मां जरा हिलती डुलती-तव तव मय के नन प्राशा से चमक उठते लेकिन क्षणभर के पश्चात् वहाँ भयंकर शांति घर में सर्वत्र छा जाती। जयन्त और पारवी, दुनिया के साथ सुख को निद्रा ले रहे थे। वे क्या समझे? अवोध जो ठहरे। वृद्धा ने जरा आखें खोली, प्रत्येक की ओर क्रम से देसा । दोनो कृश हाथ धीरे-धीरे उठाये आशिर्वाद देने के लिये । क्षणभर वही स्थिति रही। पलक गिरते गिरते मुंह फेर लिया। इहलोक की यात्रा समाप्त कर अपने पति से मिलने - २२ ने प्रयाग स्वर्गलोक की ओर वृद्धा किया। सब आश्चर्यचकित हो निष्प्राण देह को देखते ही रहे और दूसरे ही क्षण आँखों से आँसू उमड़-उमड़कर बहने लगे मालती फूट-फूटकर रोने लगी। कुछ दिनों के पश्चात् जब शोक-बदली फटने लगी तो एक दिन भाभी अपने दोनो बच्चों को ले मैके चली गयी ताकि सास के दुःख को भूल ठीक तरह से अपने गृह संसार में पुनः लग जावे । घर में सिर्फ तीनो भाई-बहन ही रह गये थे । घर का सारा काम-काज मालती ही करती थी, सखाराम भी कभी-कभी गृहकार्य में उसे मदद देता। " सखाराम, तू वकालत का तो अभ्यास कर। किसी न किसी कार्य में अपने को लगाये रख वर्ना पुनः जीवन से उव घर छोड़ कहीं चला जायगा । कमाना सीख । तेरी भी मदद होने दे । संसार-गाड़ी को प्रगति-पथ पर ले जाने के लिये ।" दादा ने कहा एक दिन । मैं भी यही सोच रहा हूं। हायकोर्ट प्लीडर की परिक्षा में सम्मिलित होने का । लेकिन मैं एक धेला उर्पाजन नही करता और आप पर ही सब का वोझ...! "मैं तो अपनी शक्ति के अनुसार तुम सबका बोझ ढोता ही हूं और यथाशक्ति जीवन में आगे भी ढोता ही रहूंगा। लेकिन तू ज़रा अपने भविष्य के जीवन की दृष्टि से व भलाई- बुराई का विचार कर।" "हां भैया।' सखाराम वकालत के अभ्यास में मन लगाकर जुट पड़ा मालती घर में सिलाई का कार्य करने लगी थी उसे अभी-अभी बड़े भैया (दादा) ने सीने की मशीन ला दी थी। वह में 'दादा, - ।

५३
।
अपनी शक्ति के अनुसार घर-खर्च में योग देने लगी । भैया के
कंधे पर का भार जरा कम हुमा उससे ।
अचानक धना का पत्र सखाराम को प्राप्त हुआ है।
वह बहुत देर तक उसका पत्र पढ़ता रहा। और आखिरकार
गंभीर चेहरा बना पत्र जमीं पर रख चुपचाप बैठ गया। उसके
चेहरे से व्यग्रता टपक रही।
"भैया, किसका पत्र है ?" मालती ने यों ही पूछा।
"उसी मेरे मिा का?"
"पनाका, ठीक है ना?"
'हां, उसने भी मेरे पीछे पीछे संस्था को तिलांजल दे,
वहीं गांव में एक पर ले रहना शुरू किया। वहां पर उसने
रात दिन श्रम कर धनवानों के भंडार भरने वाले श्रमिक
मजदूरों का संगठन प्रारंभ किया है। वह नित्य प्रति रानिमें
उनके वर्ग लेकर जग की प्रगति से उन्हे परिचित करता है,
उन्हें अपने प्रश्न समझाता है और उनकी तकलीफों को स्वयं
समझने की कोशिश करता । प्रति रविवार को विद्यार्थियों
के भी सास तौरपर वर्ग लेता है । उन्हें अपने साथ ले गाम की
गन्दगी मिटाने के हेतु स्वच्छता आंदोलन चलाता है। पासाने
भी उसने स्वयं स्वच्छ किये। गांव की गली गली स्वच्छता में
नहा रही है। में घर आकर निष्क्रिय बन गया और घना
सक्रिय बन सेवा में रम गया। मालती, यह सब इस पत्र में
लिखा है और भी बहुत कुछ।
'और क्या लिखा है उसने?"
'वह वीमार हो गया है। मुझे अपने निकट बुलाया
जाऊ क्या ?"
"

५४
.
"उसे ही अपने यहां क्यों नहीं ले पाते? यहां उसकी
तबीयत लग जायगी। घर का आहार प्राप्त होगा। और तुम
भी वहां जाकर क्या करोगे? क्या घर जैसी व्यवस्था वहां
करती बनेगी?'
तो उसे मैं लिख देता हूं कि तेरी यहां हवा फेरके लिये
आने की शक्ति हो तो, चले आओ शीघ्र ही। अगर नहीं है।
तो सूचित करो में स्वयं तुम्हें लेने आता हूं।
"लिख दो; ठीक ऐसा ही लिखा दो।
सखाराम ने ठीक उसी तरह के मज़मून वाला पत्र लिखा।
प्रत्युत्तर में घनाने लिखा था, "मेरी तबीयत अब ज़रा ठीक है।
मैं आ रहा हूं।" उसे लेने के लिये मालती व सखाराम दोनो
स्टेशन गये थे, वहां उनकी पूरे उंचे, दुबले-पतले घना से
मुलाकात हुई लंबे अर्से से मिले दोनो मित्रों ने परस्पर एक दूसरे
का हाथ, हाथ में लिया।
" कितना दुवला हो गया रे तू । सखाराम ने कहा।
" अव मुझे भारी भरकम होने की टॉनिक देकर ही फिर
से भेजना।
यह मेरी वहन मालती। इस के बारे में मैं तेरे साथ
कई मर्तवा बोला था। पिताजी की लाडली थी यह और म
की भी। माँ की मृत्यु से उसे बहुत सदमा पहुंचा है हमे
उदास बनी रहती है। मानो इसके लिये है ही नही
आज जरा इस के हृदय की कली विकसित हो उठी है।
" और चिर काल तक ऐसे ही विकसित रहे - a
मुरझाने का नाम न ले।" घना ने मालती की ओर निह
हुए कहा। तीनो चुपचाप एक-दूसरे से बिना बोले घर अ
"
दुनिया

पना थकावट महसूस कर रहा था। "स्नानादि करने से जरा ठीक लगेगा।" सखाराम ने कहा। 'भैया, गरम पानी चूल्हे पर तैयार है।" मालती गीन हो बोल उठी। घना ने स्नानादि कार्य से निवृत्त हो भोजन किया और पाराम लेने के हेतु पास ही के कमरे में सो गया। पिछले कितने दिनो के पश्चात् आज वह गहरी नौद सोया था। तीसरे प्रहर में जब वह जगा तव उसके चेहरे पर प्रसन्नता खेल रही थी । थकावट तो मानो उस से डर कर कमी को कोसों दूर भाग गयी। घना चाय लोगे ना?" सखाराम ने पूछा। "लूंगा। मालनी चाय की ट्रे ले आयी। तीनो ने एक साथ चाय पी और बाद में घना पढ़ने के लिये वैठ गया एक और एकांत- मय जगह देख। क्या पड़ रहे हैं ?" मालती ने पूछा। 'मजदूर नांदोलन का इतिहास पढ़ रहा था।" " आपको यह सब अच्छा लगता है क्या ?' " इस कार्य में हाय अवश्य डाला है लेकिन मेरे मन में नित नयी आकांक्षाएं और उमंगें जन्म लेती है। कोई ख़ास काम कर दिखाने की मन ही मन में तीव्र लालसा होती है। 'खास काम यानी क्या?" समझ लो कल हड़ताल हो गई तो यह क्या करेंगे? एकाध मतवा हमें होछे हट भी करनी पड़ती है। तब सैकड़ों की तादाद में मजदूर बेकार हो जाते हैं तब इलाज क्या? कहीं 6 १६ माही बंजर पागीन तो होती ही है। वहां रीगाड़ों की तादाद में गजदूर वर्ग गे साथ जानो और सागुदयिगा जीवन बरार गरने गा एगा प्रयोग करें। एगा नूतन राहगारी पन्नति पर निगिंग गानषीय राति विकसित करने की कल्पना गन में पाती है। में गयपि सुन्दरपूर गे कार्य करता हूं लेकिन हमेशा इसी विचार में रह पर रापाल गव-प्रयोग के सपने देखा गरता हूं। "यहाँ हपताल गया होगी भला?" "लाज नहीं तो गल रागय आयेगा ही। बहुत माग गजूरी दी जाती है वहां गजदूरों को उगो रहने की कोई व्यवस्था नहीं। सुन्दरपूर स्थित उस संस्था में, आज तक कम-रो-कग ७५ हजार रुपये वेगार-धीन-मजदूरों की तनख्वाह गे से गये होंगे । गह सारी की सारी रसग उन्हें फिर से गयों न गिलनी चाहिये ? उरा में से उनको लिये नयी एगारतें बांधी जायंगी, जिरागे घे आपनी गृहरणी व बाल-बच्चों के साथ रह राजेंगे । मैं ये राव प्रश्न लेकर गालिका रागमा जाने वाला हूँ । लेगिन यहां जाने से पूर्व राब गजदूरों, श्रमिकों का एक गजबूत अटूट रांगठन होगा अत्यन्त आवश्यक है। संगठन के बल पर ही राब गुरुष हो रागेगा और ऐसा गजबूत संगठन निर्माण करने की कोशिश में भाजपाल सुन्दरपूर गे गजदूरों में रह गार करता रहता हूं। " गुश रो माग होगा गया यहां ? हा अवश्य ही होगा गोंग होगा? आप नारी-वर्ग में जाती रहें। उन के वर्ग गलागें । गजदूरों बच्चों को राम्हाल उनगो. गपड़े सीकर दें। फाग गी फगी ही कहां है ? लेकिन " ल ५७ ॥ । " आप वहां कैसे भायेंगी ? सखाराम यहां पाता तो आप भी उन के साथ पा सकती थी।" भैया हम जायें क्या सुन्दरपूर? फिलहाल नहीं । अब कहीं ठीक तरह से अभ्यारा प्रारंभ किया है । आज तक प्रयोग करने में, धूमने और पहर पहर तथा गांव-गांव भटकने में सारा आयुष्य बिता दिया। एक तो काम इस हाथ से पूरा होने दें। मां ने कहा था कि बड़े भैया को सहायता देना । आज तक घर-गृहस्थी या सारा योग बिना कुछ कहे दादा ने अपने कंधों पर उठाया है। मेरे हाथ से ना हुई देश-रोया और ना ही कुटुम्ब-सेवा । 'हिंदुस्तान के प्रत्येक कोने की पाप धान तुमने अभय रूपी धन एकत्रित किया है। घनान कहा, 'परन्तु यह इस संसार में किस उपयोग में पायेगा ?" ससाराम ने प्रत्युत्तर दिया। 'भैया, ये हैं बीमार ना? व्ययं की चर्चा अच्छी नहीं। मालती ने कहा। मुझे अब अच्छा लगता है। धना ने कहा। 'हम सब घूमने चलें क्या ?" मानती ने मसाराम मे पूछा। " उससे पूछ।" ससाराम ने पनाकी तरफ इंगित करते हुए कहा। "आप मा सफेंगे क्या?" उसने पृटा। "भाऊंगा। तुम नाई वह्न की बगरामर यागाय-मियन जोड़ी की संगशि में मुझे भी अनंद प्रान होगा।" पना ने कहा। संध्या का समय, जब भगवान माम्बर अन्नाचल की बोर जाने की तैयारी कर रहे , ये तीनों पमने के लिये पगं बाहर " "

५८
निकले । गांव के बाहर जरा दूर स्थित एक सरोवर श्वेत
स्फटिक से जल में ज़रा दूर कमल थे जो शाम होने की वजह
से भगवान भास्कर के वियोग में अपने को अवगुंठित कर रहे
थे। सरोवर-जल के साथ वृद्ध रश्मियाँ निरुत्साहित हो
निष्फल क्रीड़ा कर रही थी।
क्या हम ठिकरी चलाने का खेल खेलें?" मालती ने
कहा।
हम क्या छोटे हैं जो अब भी यह खेल खेलें।'
सखाराम ने कहा।
"खेल कभी भी खेलने में कोई बाधा नहीं। खेल जैसी
निष्पाप कौनसी वस्तु है इस जग में । मैं खेलूंगा। इतना
कह घना ने छोटे छोटे पत्थर इकट्ठे किये और एक छोटासा
पत्थर उसमें से उठा उसने पानी पर टेढ़ा फेका। पत्थर
फुदकता हुआ चला गया उस पार ।
"आपके पत्थर में मानो पंख लग गये थे। आपके हाथ
में अजव शक्ति है । अब मैं फेकूगी पत्थर देखिये ।" मालती ने
पत्थर फेंका, लेकिन वह फुदकने के बजाय पानी डूब में गया
अव सखाराम से भी रहा न गया। वह भी खेलने में शामिन
हो गया। तीनो खेल खेलने में मग्न हो गये। घना के पत्थ
नाम मात्र पानी को । शर्र करते फुदकतेचले जाते । मालती
मन ही मन सराहना की।
राम नाम की शक्ति से बड़ी बड़ी शिलाएं भी तैर गर
आप भी मन में क्या राम नाम जपते हैं ? पूछा
" जनसाधारण की सेवा ही मेरा राम नाम है । मेरे
उस
ने

मंत्र-तंग से लिये कोई स्थान नहीं।"
" आप देव-देवी में विश्वास नहीं रखते, तो क्या नास्तिका
है आप?"
पुनः पूछा उसने ।
'नास्तिक का अयं ही क्या? यह सारी दुनिया नांगल्य की
ओर तेजी से कूच कर रही है, यह आशा जिसके पास है, यह
भासा जिसके पास है वह आस्तिक नहीं क्या? देव, व्योम के
दिसी भी कोने में स्थित है. ऐसा मान इस दुनिया में प्रत्यक्ष
वर्ताव में वह मनचाहा बर्ताव करता है उसके वनस्थित विश्व
के मांगल्य के प्रति श्रद्धा रस मांगल्य के मानव जीवन में
समरस हो जाये इसके लिये रात दिन अविश्राम मेहनत करता
है वही सच्चा आस्तिक है, ऐसा आप नहीं कहेंगी? सखाराम
तुम्हें क्या लगता है ?
'ईश्वर के प्रति रती मात्र भी श्रद्धा-भक्ति न रखनेवाले
नास्तिक कई दफा महान संतों की तरह जिन्दगी बिताने नजर
पाते हैं तो दिन भर हायों में माला लिये फिरनेवाले दांभिक
भी साधु-चरित मानवों को धर्म की आड़ में लूटते-खसोटते
प्रत्येक जगह यदाकदा दृष्टिगोचर होते हैं।" उसने कहा ।
मालती टकटकी लगा संध्याकालीन रंग-बिरंगे सप्तरंगों
से आच्छादित व्योम में शतरंग का बाजार लगा हुआ था।
लोक उसी तरह उसके मुंहपर भी रंगों का बाजार लगा हुआ ।
था। उसने यकायक मौन व्रत धारण कर लिया। और जरा
दूर की चट्टान पर बैठ गयो । सखाराम और घना ने भी उसी
चट्टान पर बैठक ली। सृष्टि को क्षणभर में रंग बदलती
निहार तीनो ऐसे निस्तब्ध बन गये मानों समाधिस्त हों।

. 'भैया, चलो। देर हो गयी, मुझे रसोई बनानी है । नाभी अगर आज यहां होती तो उनके हाथ की स्वादिष्ट रसोई ये खाते ।" मालती ने कहा । घना, हमारी भाभी सामान्य नारी नहीं बल्कि देवी है। आजतक कभी भी दो मुंह होने की वारी नहीं आई घर में। द्वेष -- मत्सर तो उससे कोसों दूर भागते हैं। ईर्ष्या का नामोनिशान नहीं उसके स्वभाव में। मालती जब कभी गृह कार्य में उसका हाथ बंटाती है तब वह प्रेम भरे शब्दों में प्रायः डांटा करती है, “वहन तुम क्यों काम करती हो ? कल ससुराल जानेपर काम ही काम मिलेगा तुम्हें करने के लिये।" सचमुच हमारे दादा और भाभी की जोड़ी तो राम-सीता सी पवित्र और प्रेममयी है।" सखाराम ने भाभी व भैया के प्रति प्रशंसोद्गार निकालते हुए कहा । आप कभी ससुराल भी जायेंगी?" घना ने अचानक प्रश्न किया मालती से । शादी के विना कैसे और कहां जाऊं।" तत्क्षण हँसते हुए मालती ने जवाब दिया। "मेरे ध्यान में तो कुछ ही न रहा । मुझे तो लगा कि आप की शादी कभी की हो गई होगी। चन्द रोज पहले कोई बॅरिस्टर साहब पधारे थे ना ने कहा। वह बॅरिस्टर न था वल्कि बालिशतर था पागल कहीं का, मेरे मन में तो उस से घृणा ही उत्पन्न हो गई।" सखाराम दिया। घूमकर वापस लौटते समय, राह में घना के जोर की ठोकर लगी। अंगूठे में से खून जोर से बहने लगा। "कितनी बड़ी चोट आई है।" मालती ने पूछा । ?" घना att जवाब १ "मेरा उस तरफ ध्यान ही न था।" पता ने कहा। 'सम्हाल कर चलना पड़ता है इस दुनिया में! सखाराम बोल उठा। चुपचाप सारी राह में बिना कोलेजनों घरमा वाम कभी के आगये थे नौकरी पर ने। मालनी गानेही मक में जुट पड़ी । वाहर की वाल्कनी में शासन इन कना राह की यकावट दूर उतारने नगा ! पोज दशरने क.. उसकी आंख लग गयी प्रांर कर दोनों नाई परमानी की शादी के विषय में बातचीत कर रहे थे। "ये तेरे मित्र मादी के लिये गती न होः" दाने "पूछा। "दादा, अचानक यह प्रश्न आके नन में की अस्थित हुआ?" " उन्हें निहार मेरा मन-मयूर मानदिन हो दृत्य बन्ने लगा। मुझे इस में पतितरावन के नातात दन हल । उनी स्वभाव में पवित्रता की झलक दिखाई दी। ऐलानमा नानी तेरे मित्र सा पति मालती को प्राप्त हुना तो मन मुतादम्या स्वरूप में पड़े अनेक विध गुणों को विकसित होने का क्योदित मौका प्राप्त होगा।" " मैं उस से भी पूछू तो केने ? दह मुन्दरपुर न्द दीन- दरिद्धों की सेवा में रात दिन ख म्हता है। वहां के अनहाय- निर्बल मजदूरों के लिये वर्ग चलाता है। लोगों को बान की तरफ आकर्षित करने के मायाजाल में पलाऊं? और मंमार चलाने के लिये क्या नहीं चाहिये ? उस के पास है भी क्या ? ना साने का पता ना पीने का । सुन्दरपुर के चन्द मित्र परिवार ना वर से स्पर चन्दा करके इसका खर्च चलाते हैं। सखाराम ने के बारे में सविस्तर जानकारी दादा को देते हुए कहा । "मेरे मन में जो वात आई सो तुझे बता दी।" " क्या आया, आप के मन में दादा?" मालती ने रसोई- वाहर झांकते हुए पूछा। "तेरी शादी के अलावा मन में होगा भी क्या ? उसके सिवा मां की मृतात्मा को संतोष न होगा।" दादा ने दुःखित स्वर में कहा। दादा में आज आपसे स्पष्ट कह देती हूं कि मेरी शादी का विचार ही जड़ मूल से मन में से निकाल दीजिये । क्यों री तू ने किसी को पसंद कर लिया है क्या ? यों शमिन्दा न बनो। दादा, मैं अपने घर का दालान छोड़ कहीं जाती भी हूं क्या? फिर किसे और कैसे पसंद करूं? मेरी तीन लालसा तो दरिद्र-नारायण की तन-मन से सेवा करने की है। आज या कल आपकी मालती जन साधारण के सेवार्थ घर से बाहर जायेगी जहां उसको कर्तव्य पुकार रहा है । मालती मुझे तेरा ज़रा भी बोझ नहीं लगता। तू व्यर्थ में ही चितित मत हो तेरी शादी के लिये हम कुछ भी प्रयत्न नही करते ऐसा तुझे प्रतीत होता है क्या? तेरे मुंह में ऐसी उद्वेग की भाषा क्यों ?" दादा ने दुःखित हो उससे कहा। खैर, अब भोजन करने चलो पहले । सखाराम ने आवाज़ दी । वह आंखें मलते हुए आराम कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। और “ मैं कितने " उसने कहा। घना, ओ घना।

।
सुन्दर स्वप्न में विहार कर रहा था । क्यों जगाया मुझे अपने
कल्पित स्वप्न देश से वापिस बुला कर?" उसने कहा ।
"प्रथम पेट पूजा कर लो फिर खूब देखना स्वप्न । समझे।"
सखाराम के शब्दों से प्रेम-रस टपक रहा था। सब के भोजन
हो गये और सचमुच धना शीघ्र ही निदिया रानी की गोद में
सो गया । वह आज पूरी तरह से थक गया था। घूमते-घामते
ग्रार खेलते हुए।
आठ दिन कैसे बीते किसी को पता न लगा। आज घना
वापस अपने गांव सुन्दरपूर कार्यक्षेत्र की ओर प्रयाण करने
वाला था। आज खास तौर पर खोर पूरी का आयोजन था।
"पेट भर भोजन कीजिये।" मालती ने कहा,
" आज खीर पूरी की योजना किस लिये?" उसने पूछा।
'यह शादी के उपलक्ष में। दादा ने शांति से प्रयुत्तर
दिया।
'तो क्या शादी कहीं ठीक हो गयी ?"
" दादा को मालूम " सखाराम ने कहा।
घना का सारा सामान व्यवस्थित - रूप में बांधा गया
बाहर कोई वस्तु न रही । जाने की तैयारी ही थी स्टेशन की
पोर इतने में मालती एक डिब्बा ले आयी। यह अपने साथ
ले जाइये" उस ने कहा।
'व्ययं में ही वोझ क्यों?"
रास्ते कम करियेगा । और वहां भी तो आप अकेले
हैं। कौन है, जो देगा पकवान बना कर खाने के लिये ? आप
सारे विश्व की फिक्र करते हैं, लेकिन आप की कौन करेगा? हम
तो हैं साधारण लोग थोडीसी सेवा आप जैसों की हम से हो
।
-

६४
" उसने
गई तो इस से बड़ा और कौन सा सौभाग्य हमारा हो सकता
है भला? सचमुच !" वह कंपित स्वर में बोल रही थी।
मालती, आप सव चिर काल तक सुखी रहें।
कहा और सबसे विदा ले स्टेशन को गया। रेल में बैठने के
पश्चात् उसके पिछले आठ दिन से रुके विचार-चक्र ने पूरे
जोर से
घूमना
प्रारंभ कर दिया।

घनश्याम का कार्य तो स्वच्छता सप्ताह में योग दोगे न? हम नित्य ही ६ से लगाकर ८ बजे तक जायेंगे स्वच्छतार्थ हर कहीं । तुम्हारे अभ्याम में खलल न पड़ेगी यह निश्चित समझो। हम सितम्बर २६ दिनांक से स्वच्छता यज्ञ प्रारंभ कर गांधी-जयन्ति २ अक्तूबर तक इसे जारी रखेंगे। गांधी जयन्ति निमित्त योजित गांधी सप्ताह को इस मर्तवा हम स्वच्छता-सप्ताह में परिवर्तन कर सूब ठाट-बाट से मनायेंगे। समझे आनोगे ना फिर ? धनाने, उसके वर्ग में आये, गांव के विद्यार्थियों से पूछा। वह प्रति रविवार इन विद्यार्थियों दो घंटे पढ़ाया करता था। कभी संस्कृत तो कभी अंग्रेजी कभी गणित तो कभी मराठी। इती भांति क्रमशः वह सब विषय पढ़ाता था। पढ़ाने का उस का उद्देश्य भी अस्पष्ट न था। यह विद्यार्थियों से संबंध बने रहे और अपना ज्ञान-नीर भी अबाधित रूप से बहता रहे, इस हेतु दो घंटे उन्हें पढ़ाता था। कभी कभी यह अंग्रेज़ी अप- बारों में प्रकाशित मुन्दर व शैक्षणिक लेख पढ़ कर सुनाया करता । इस तरह राजनीति-विषयक ज्ञान भी उन्हें प्रायः देता रहता। उसका रविवार का वर्ग यानो एक प्रकार का सहभोज था । पिछले कितने दिनो से उसको स्वच्छता सप्ताह मानने की मनीपा थी। इसी बहाने सारा गांव साफ होगा। गंदगी का दिया। " " नामोनिशान मिट जायगा यहां से - यही स्वच्छता-सप्ताह मनाने के पीछे पर्श्वभूमि थी घना की । स्वच्छता विषय पर उसने अनेक गीतों की रचना भी की थी। लेकिन अभी तक कोई मौक़ा ही न आया था। इस मर्तवा अवश्य मनाना - ऐसी उस की अपनी निश्चित योजना थी। वह विद्यार्थियों के प्रत्युत्तर का वेचैनी से इंतजार कर रहा था। " हम आयेंगे और अवश्य आयेंगें । आपका साथ होने पर हम भला क्यों न आयें। अवश्य योग देंगे स्वच्छता-सप्ताह मनाने में।" उनसे एक विद्यार्थी ने प्रत्युत्तर " में भी आऊंगी। एक विद्यार्थिनी ने धीरे से कहा । तुम विद्यार्थिनियो को तो ऐसे कार्यों में सबसे पहले योग देना चाहिये। स्वच्छता निर्माण करना या रखना नारी का जन्म-सिद्ध हक़ है। नर का कार्य ही गंदगी फैलाना और नारी का दूर करना। नरकासुर को सत्यभामा ने ही मारा था मालूम है ना? हम कहां एकत्रित हों ? मेरे कमरे पर ही एकत्रित होना बेहतर होगा। वहीं से हम स्वच्छतोपयोगी सर-सामान के साथ सज्ज हो कूच करेंगे अपने कार्यक्षेत्र की ओर। सव साथ ही चाहिये ना?" सव तय हुआ की सुवह, घना द्वारा संचा- लित ग्रामोद्वार-कार्यक्रम की ओर शहरियों को आकृष्ट करने की प्रथम सोपान थी। ठीक समय पर विद्यार्थी व विद्यार्थिनियां घना के कमरे पर एकत्रित होने लगीं। निश्चित मुहुर्त पर स्वच्छता-टुकड़ी ने कूच प्रारंभ की। सारे शहर को सात रण दिनांक २६ ६७ क्षेत्र में विभाजित कर दिया था। क्रमशः प्रत्येक रणक्षेम पर प्रतिदिन चढ़ाई करने की घना की योजना थी। आज बाहेरपुरा क्षेत्र उनकी कूच का लक्ष था। घना ने अपने हाथ में पतरे के टुकड़े ले रये थे। जहां कहीं विष्टा दृष्टिगोचर होती उस पर मिट्टी डाल सफाई कर दी जाती। धना की विद्या सायी विद्यापिनियों ने भी आत्मसात कर ली थी। सब जगह सफाई के दर्शन होने लगे। गन्दगो निहारते ही विद्यार्थियों में स्फूर्ति उत्पन्न होती और "अरे, यह देखो गन्दगी यहां देसो" कोला- हल से सारा मोहल्ला गूज उठता। टुकड़ी के सैनिक दीघ्र ही सेनापति के आदेश की राह तके उस पर टूट पड़ते और तभी दम लेते जब उनका शत्रु साफ हो जाता। उसका नामोनिशान तक मिट जाता वहां से। उन्हें लगता मानो वे सचमुच अपने शत्रु पर आक्रमण कर रहे हो। और यही हमारे जीवन-समृद्धि पथ के बड़े रोड़े नहीं क्या ? अज्ञान, अस्वच्छता (गन्दगी) आलस्य, रुढी, नाना भेद यही तो वास्तविक रूप से देखा जाय तो हमारे शत्रु हैं। इन्हें जड़ मूल से उसाड़े बिना स्वराज्य कहां? इन्हें दूर किये बिना स्वराज्य आ भी गया तो वह दीर्घ काल तफ टिकेगा नहीं। उपरोक्त प्रकार के उत्साह-वधंक गीत गाते हुए टुकड़ी अपने कार्य में कदम कदम पर प्रगति कर रही थी। गन्दे मोहोल्लों में झाडू मारते, टोकरी में कचरा भरते वे अपने आप को भूल गये थे इस महद् कार्य में । सेवा यही सबसे वड़ा प्रानंद है जग का, जिस को इसकी लगन लग गयी, वह आजन्म सेवा प्रत धारण किये अविरत रूप से जनता-जनार्दन की सेवा करता रहेगा।

६८ " पूछा। वस अव । आज का हमारा कार्यक्रम पूर्ण हुआ। नदो किनारे स्नान करने चलोगे न ? बड़ा ही मज़ा आयेगा। घना ने साथियों से हां हां नदी किनारे ही जाएं ?" एक ने कहा। " लेकिन वस्त्र तो साथ में है नही किसी के ?" दूसरों न झट शंका उठायी। " नदी पर जा हाथ-पैर धो चले आयेंगे और हमारी स्वच्छता औजार भी तो साफ करनी है अभी। घना ने सूचित किया। " स्वच्छतोपासक समूह नदी किनारे गया। वहां पतित पावत सरितादेवी शांतमूर्ति सी मन्द गति से बह रही थी। सारी दुनिया की गंदगी को विना किसी बैर विरोध के अपने अयाह प्रवाह में निरंतर बहा के जाने वाली यह लोक माता समूह को लख, मानों हर्ष विव्हल हो उठी हो या लहरों रूपी मुस्कान को ओठों पर ला कल कल नाद करती स्वागत गीत गा रही हो। अदम्योत्साह में पहला दिन समाप्त हुआ इसी तरह और दिन भी व्यतीत होने लगे आप हमेशा हमें नया विभाग दिखाते हैं शहर का । आज तक कालुपुरा नामक कोई चीज़ भी शहर में हैं यह मैं न जानता था।" एक विद्यार्थी ने विस्मित हो कहा। " मैं तुम्हें सव को सुन्दरपूर का भूगोल सिखा रहा हूं। इस शहर में कौन कहां है, दीन दरिद्रों के आवास कहां उनकी वस्ती कैसी होती है, उनके उद्योग धंदे क्या? आदि सब धीरे धीरे अपनें आप ज्ञात होगा। जिस शहर में हम वर्षों से निवास

-
करते हैं उसकी जानकारी भी हमें कहां होती है? ठीक है ना?"
घना ने कहा।
फालुपुरा के तो भाग्य ही सुल गये । उस दिन वह पाइने
सा स्वच्छ होगया। फिसी जगह एक चाल थी जिसके मालिक
महाशय ने पाखाने की ओर कभी एक बार भी निहारा हो तो
खुदा की कसम।
छोटे छोटे कीड़े तड़प रहे थे। सिर फट ऐसी बुरी दुर्गन्ध
पा रही थी। यहाँ रह कर लोग कैसे बैठते होंगे? इतनी
गन्दगी में वे कैसे जीवित रह सरते हैं ? जो गन्दगी में जी
सकता है, रह सकता है क्या वह मानव है ?
घना और उनकी टुकड़ी ने विना ज़रा भी अनाकानी किये
सारी गन्दगी को केंद्र बिंदु समझ, उस पाखाने को अच्छी तरह
साफ किया। उसके चारों तरफ फिनेल डाला। चाल के
मालिक को सूचित करने पर वह अश्वरथ पर सवार हो वहां
जापा । लेकिन वहां नझारा लख वह स्वयं शर्मिन्दा हो गया
और उसने कहा, “घनाभाई, रहने भी दो। आप क्यों करते
है ऐसा काम?"
'हमने यह काम अपना खुद का मिथ्या अहंकार दूर
करने के हेतु किया है । हरिजन वन्धुओं के साथ अपने
संबंध पनिप्ट बनाने और वे तया हम दो नहीं एक है-यह
जनता के हेतु यह सब करते हैं । हमारा उद्देश आपको शमिन्दा
करना पदापि नहीं। यह विद्यार्थी समुदाय हमेशा महात्मा
गांधीका जयघोप करता है। लेकिन पूज्य बापूजी नित्य ही
कहा करते हैं। कि 'मेरे नाम का जयघोप क्यों ?' मेरी शिक्षा,
मेरी पद्धति, मेरी प्रगाली, मेरे कार्यक्रम का जयमोप

७०
गांधी जयंति मत कहो, उसे चर्खा जयन्तिरोटिया वारस कहो ।
हमें अत्यंत प्रसन्नता हुई आपकी चालवाले पाखाने में भरपूर
काम मिला इसलिये," घनाने शांतिसे कहा ।
तत्क्षण ही विद्यार्थी समुदाय में 'महात्मा गांधी की जय'
गगन भेदी घोषणा की।
एक दिन की बात है - स्वच्छता कार्य चल रहा था किसी
मोहल्ले में । घना गन्दगी साफ कर एक टोकरी में भर रहा
था कि अकस्मात ऊपर से किसीने गन्दा पानी उंडेल दिया।
धना एडी से चोटी तक नहा लिया गन्दे पानी में। और पानी
भी था झूठा, काला-कलूटा और न जाने किन किन पदार्थों
का मिश्रण।
"मैं कैसा सोह रहा हूं दुल्हे के रूप में।"
"लेकिन दुल्हन है कहां?" किसी विद्यार्थिनी ने पूछा।
स्वच्छता यही मेरी दुल्हन । जन्म-जन्म मुझे ऐसी दुल्हन
प्राप्त हो । वजाओ तालियां, साथियो रचाओ शादी। स्वच्छता
देवी के जय-जयजयकार से सारा व्योम गूंजने दो।
सेवा का वह प्रात्यक्षिक था। सेवकों को निराहंकारी बन
कार्य करना पड़ता है सर्वत्र । वह किसपर कुपित होगा?
किससे रूठेगा? अपने ही ओंठ अपनें ही दाँत सजा दे तो
भी किसे?
"तुका कहते एक ही देह के अवयव हम सब ।
आज स्वच्छता सप्ताह का अन्तिम दिन था। आज क
मोर्चा मजदूर वस्ती की ओर था। वहां के स्वच्छता संग्राम मे
मजदूरों ने भी जी भर के साथ दिया । अन्त में घना ने एकत्रि
मज़दूर-मेदिनी को दो शब्द सुनाये स्वच्छता-यज्ञ में आदि
।

1.
अन्त तक परोक्ष-अपरोक्ष रूप से सहानुभूति दर्शाने वाले और
सक्रिय साथ देनेवाले अपने साथ विद्यार्थी विद्यार्थिनियों को
धन्यवाद दिये।
'अब कौन सा सप्ताह मनायेंगे?" विद्यार्थियों ने उत्सुक
हो पूछा।
'अल्प अवधि के पश्चात् हम 'साक्षरता सप्ताह मनायेंगे।
सबको क्यों सीखना चाहिये - विषयफ ३० चित्र मेरे बड़ोदा के
मित्र ने चित्रित किये हैं। उसे वह सीन भेजनेवाला है। उनके
आजाने पर हम सुवह ही सुबह में लगातार सप्ताह तक
'साक्षरता गीत' गाते जुलूस निकालेंगे । और प्रदर्शन में
आनेवालों को चित्रो का महत्व समझायेंगे।"
'काय मनायेंगे यह सप्ताह ?"
दिवाली की छुट्टियों में।"
विद्यार्थी
समुदाय
बेचनीसे दिवाली छुट्टियों का
इंतजार कर रहे थे । यथा समय बड़ोदा से धना के मित्र ने
सब चित्र भेज दिपे। नगर - मंदिर की जगह किराये पर
लेकर साक्षरता सप्ताह निमित्त बड़ी प्रदर्शनी की योजना तय
की । नागेश, रमेश, उज्ज्वल, मुल्लादि बालमित्र अदम्य
उत्साह से निश्चित जगह की सजावट में मग्न हो गये। हॉल की
दीवारों पर क्रमानुसार चित्र करीने से लगाये गये। रंगविरंगी
पताका, वन्दनवार और तिरंगे ध्वजों से हॉल सुशोभित
हो गया था। जगह जगह पर ब्रीद वाक्यों की रचना
की गई थी।
राष्ट्र के सभी प्रतिभाशाली प्रमुख नेताओं की तस्वीरों ने
मंडप की शोभा में और भी वृद्धि कर दी थी 1. ना'
।

७२ रंगोली द्वारा चन्द शिक्षणात्मक चित्र चित्रित किये थे। प्रत्येक के मन में कुछ न कुछ कर दिखाने की इच्छा वलवत्तर होती. जा रही थी । घना ने गेय ऐसे साक्षरता गीतों और मुंह में बैठ जायें ऐसे सरल विचारात्मक घोष वाक्यों की रचना की थी। 'सीखो वन्धुओं, सीखो औरों की स्पर्धा में सीखो' आदि कित्येक ब्रीद वाक्यों की रचना की थी। साक्षरता का महत्त्व साधारण जनता को समझाने हेतु बड़े बड़े फलकों का प्रयोग जुलूस में किया जाता था। नित्यप्रति उषादेवी के आगमन के साथ ही साथ अज्ञानन्धकार में डूबी जनता में दिलचस्पी निर्माण करने हेतु इन साक्षरता प्रचारकों की टोलियां शहर के निश्चित सड़कों पर कूच करती थी । शहर में चैतन्य निर्माए हुआ। शहरी गए भी घना के कार्य में बहुत बड़ी तादाद में दिलचस्पी लेने लगे। रोज तीसरे प्रहर में प्रदर्शनो देखने के लिए शहरियों व आसपास के ग्रामिणो को भीड़ उमड़ पड़ती। छीटे भी आते और बड़े भी राव और रंक भी आते । आवाल वृद्धों का भी जमघट होता प्रदर्शनी निरीक्षणार्थ । स्वयंसेवक गण चित्रों द्वारा व्यक्त भावनाओं को अच्छी तरह समझाते । “वह देखो एक वृद्धा ।" घना चित्र-दिखा कह रहा था। सव के आगे-" इस चित्र के चार भाग हैं। इस इस तरफ के चित्र में सेठजी हमें बड़े गद्दे का सहारा ले बैठे दृष्टिगोचर ही रहे हैं । नौकर उन्हें हवा कर रहा है, पास ही में फलफूल हैं नाश्ते के लिये । सुख में लोट रहे हैं और इधर देखिये कोने में एक कंकाल अस्थिपंजर का मारा गरीव मजदूर वह क्षय ग्रस्त है मक्खियां उसके इर्द गिर्द भनभना रही और हर

७३
हैं। घर में अन्धकार का साम्राज्य है और गोलापन उसके
घरकी अनोखी शोभा है । न तो पेट भरने के लिए मुट्ठीभर
दाने, पोन के लिए चुल्लुभर पानी है और प्रकाश तो उससे
सर्वथा रुठ हो गया है और नीचे देखिये तीसरे चित्र में। उसे
एक ज्योतिप महाशय कह रहे हैं कि तुझ पर शनी को कुदृष्टि
है । योग्य दान धर्म करो, प्रति शनिवार को उपवास करो
लेकिन हाय वेचारा । दान-धर्म करेगा तो कहां से ? उपवास
इच्छा से न सही अनिच्छासे भी करता है यह । अव देखिये
चोथे कोने में सेवादल के सैनिक को, जो कह रहा है कि
शनि:-मंगल की पीड़ा-वोड़ा कुछ नहीं होती। व्योम में
निशी दिन विचरण करने वाले ग्रह क्यों आये दीन दरिद्रों
को व्यर्थ ही में सताने ? गर सेठजी अधिक मजूरी देते, रहने
के लिए अच्छी चाल बन्धवाते, वीमारी में सवेतन छुट्टी देते, तो
क्या यह मजदूर वीमार होता? व्योमस्थित शनिग्रह सताता
है। अथवा पृथ्वी पर कहर ढानेवाला यह थनिक शनि ?
कौनसा शनि?"
वह वृद्धा कभी से घना को सुन रही थी। उसके सूखे
व झुरियों से युक्त चेहरे पर क्षणभर के लिये प्रकाश की आभा
छा गयी। सेठजी की तस्वीर की तरफ इंगित करते वह झट
बोल उठी-"यही शनि है । यही शनि है।
लेकिन ये शनि महाशय भी किस तरह अशिक्षितों को
फंसाते हैं । यह यह भी जान लेना आवश्यक है हमारे लिये ।
हमें सिखना चाहिये लिखना पढ़ना आना चाहिये बुद्धओं को
सब लूटते है सव फंसाते हैं । ठीक है ना माजी?"
'मैं भी पढ़ने आऊंगी।" वृद्धाने उत्साहित होकर कहा।
।

४ प्रदर्शनी-यशस्वी हुई और खूब हुई। शहर में अदम्य उत्साह से कित्येकों ने सीखना प्रारंभ किया गली-गली व मोहल्ले मोहल्ले में साक्षरता-वर्गों का जन्म हुआ । स्वयंसेवक भी पढ़ाने के लिये बहुत बड़ी तादाद में मिल गये । चन्द शिक्षकों ने भी वर्गों में पढ़ाना स्वीकार किया। किताव स्लेट व पेन्सिल के लिये अर्थ की आवश्यकता थी। सव ने मिलकर अर्थोपार्जनार्थ एक नाटिका अभिनीत करने का निश्चय किया। घना ने एक सुन्दर शिक्षणात्मक नाटक की तैयारी शुरु की। घना भी इस नाटिका में अभिनय करनेवाला था। लेकिन गोपाल व मोती की अभिनय करने की तिथि निश्चय की गयी। टिकट विक्री भी हुई । अपेक्षाकृत ज्यादा तादाद में लोग नाट्य प्रयोग में उपस्थित रहे । रहे । और नाट्य प्रयोग भी खासा हुआ । गोपाल के गाये गीत को "वन्समोर" [प्त हुआ। सवका अभिनय प्रशंसनीय था साक्षरता के लिये काफ़ी अर्थ प्राप्ति हुई इस प्रयोग से । मध्यांतर में घनाने सव के आभार माने । प्रेक्षक-वर्ग में अमुक धनराशि अपनी तरफ से सहर्ष भेट दी। गोपाल व मोती को उत्कृष्ट अभिनय तथ गीत के लिये लिये किसी ने पुरस्कृत "यह पुरस्कार हमें नहीं चाहिये । साक्षरता-प्रचार समय आनेपर उपयोग होगा इनका भी।" दोनो युवकों उदार मन से पुरस्कार हुए कहा। इस तरह धीरे धीरे घना के अधिक परिश्रम के परि सुन्दरपुर में सेवा ज्योति प्रज्वलित हो रही थी। स्वच ज्ञान, सहकार्यादि तेल का सेवा ज्योति को अखंड र प्रज्वलित करने में पूर्ण उपयोग हो रहा था। नि किया। लेते

विद्याथिनियों को साथ लिये जो आनेवाले भारत के आधार
स्तंभ है; घना अपना सेवा कार्य अविरत रूप से चला रहा
था । युनियन के सभासद भी अपेक्षा कृत ज्यादा बन गये थे।
मजदूरों में घना के ठोस कार्य ने नये प्राण फूंक दिये थे।
वीच बीच में वह मजदूरों की सभायें भी करता वाहर के
व्याख्यातानों को निमंत्रण दे बुलाता भी। चुने हुए होशियार
मजदूरों का वह अलग एक अभ्यास-वर्ग भी चलाता था।
उसमें वह समझाता कि अलग अलग देशों में मजदूर आदोलन
कैसे हुए, क्यों हुये। उनके विशेष अध्ययनार्थ उसने एक
छोटी-बड़ी लायबरी को जन्म दिया था। उसमें बहुत कुछ
पुस्तकें भी थीं मजदूर आंदोलन सम्बन्धित । उस दिन रानिमें
घना व कुछ मज़दूर कार्यकर्ता गण आपस में चर्चा कर
रहे थे।
" और कितने दिन यों ही व्यर्थ चर्चा करें हम? अभीतक
प्रत्यक्ष कदम उठानेकी बेला नहीं, और क्या? यहांवाले मजदूरों
की मजदूरी कितनी कम है अन्य जगह तो मजूरी वढ़ाई गई है,
लेकिन यहां क्यों नहीं। हमारे यहांके समाचार भी किसी
अखवारों में प्रकाशित नहीं होते कभी। जब तक अखवार के
अखवार रंग जायें हमारे समाचारों से ऐसा कोई कड़ा कदम
उठाना चाहिये ।" गंभीरने गंभीरता धारण करते हुये कहा ।
"काफी सोच-विचार के कदम उठाना चाहिये नित्य ।
बुलंद हुई आवाज को भविष्य में कुछ कठिनाइवरा रुक जाना
कुल अच्छा नहीं।" पंढरी ने कहा।
ब्रिजलाल, तुम्हें क्या कहना है ? धना ने पूछा
प्रयम हम अपनी मांगें निश्चित कर लें तत्पश्चात उन्हें
पड़े - यह

७४ हुई और खूब की। प्रदर्शनी-यशस्वी हुई। शहर में अदम्य उत्साह से कित्येकों ने सीखना प्रारंभ किया गली-गली व मोहल्ले मोहल्ले में साक्षरता-वर्गों का जन्म हुआ। स्वयंसेवक भी पढ़ाने के लिये बहुत बड़ी तादाद में मिल गये। चन्द शिक्षकों ने भी वर्गों में पढ़ाना स्वीकार किया। किताव स्लेट व पेन्सिल के लिये अर्थ की आवश्यकता थी। सव ने मिलकर अर्थोपार्जनार्थ एक नाटिका अभिनीत करने का निश्चय किया। घना ने एक सुन्दर शिक्षणात्मक नाटक की तैयारी शुरु घना भी इस नाटिका में अभिनय करनेवाला था। लेकिन गोपाल व मोती की अभिनय करने की तिथि निश्चय की गयी। टिकट विक्री भी हुई। अपेक्षाकृत ज्यादा तादाद में लोग नाटय प्रयोग में उपस्थित रहे । और नाट्य प्रयोग भी खासा हुआ । गोपाल के गाये गीत को "वन्समोर" प्राप्त हुआ। सवका अभिनय प्रशंसनीय था साक्षरता के लिये काफ़ी अर्थ प्राप्ति हुई इस प्रयोग से । मध्यांतर में घनाने सव के आभार माने । प्रेक्षक-वर्ग में अमुक धनराशि अपनी तरफ से सहर्ष भेट दी। गोपाल व मोती को उत्कृष्ट अभिनय तथा गीत के लिये लिये किसी ने पुरस्कृत यह पुरस्कार हमें नहीं चाहिये । साक्षरता-प्रचारार्थ समय आनेपर उपयोग होगा इनका भी।" दोनो युवकों उदार मन से पुरस्कार लेते हुए कहा। इस तरह धीरे धीरे घना के अधिक परिश्रम के परिणा सुन्दरपुर में सेवा ज्योति प्रज्वलित हो रही थी। स्वच्छत ज्ञान, सहकार्यादि तेल का सेवा ज्योति को अखंड रूप प्रज्वलित करने में पूर्ण उपयोग हो रहा था। विद्या किया।

विद्याथिनियों को साथ लिये जो आनेवाले भारत के आधार
स्तंभ है; घना अपना सेवा कार्य अविरत रूप से चला रहा
था । युनियन के सभासद भी अपेक्षा कृत ज्यादा बन गये थे।
मजदूरों में घना के ठोस कार्य ने नये प्राण फूंक दिये थे।
बीच बीच में वह मजदूरों की सभायें भी करता बाहर के
व्याख्याताओं को निमंत्रण दे बुलाता भी। चुने हुए होशियार
मजदूरों का वह अलग एक अभ्यास-वर्ग भी चलाता था।
उसमें वह समझाता कि अलग अलग देशों में मजदूर आदोलन
कसे हुए, क्यों हुये। उनके विशेप अध्ययनार्थ उसने एक
छोटी-बड़ी लायब्ररी को जन्म दिया था। उसमें बहुत कुछ
पुस्तकें भी थीं मजदूर आंदोलन सम्बन्धित । उस दिन रात्रिमें
घना व कुछ मजद्दर कार्यकर्ता गण आपस में चर्चा कर
रहे थे।
" और कितने दिन यों ही व्यर्थ चर्चा करें हम? अभीतक
प्रत्यक्ष कदम उठानेको बेला नहीं, और क्या ? यहांवाले मजदूरों
की मजदूरी कितनी कम है अन्य जगह तो मजूरी वढ़ाई गई है,
लेकिन यहां क्यों नहीं। हमारे यहांके समाचार भी किसी
अखबारों में प्रकाशित नहीं होते कभी। जब तक अखबार के
अखबार रंग जायें हमारे समाचारों से ऐसा कोई कड़ा कदम
उठाना चाहिये ।" गंभीरने गंभीरता धारण करते हुये कहा ।
" काफी सोच-विचार के कदम उठाना चाहिये नित्य ।
बुलंद हुई आवाज को भविष्य में कुछ कठिनाइवश रुक जाना
पड़े - यह बिल्कुल अच्छा नहीं।" पंढरी ने कहा ।
ब्रिजलाल, तुम्हें क्या कहना है ? घना ने पूछा।
प्रथम हम अपनी मांगें निश्चित कर लें तत्पश्चात् उन्हें
.
"

६ से फर्ज है। मालिक के पास भेज सोचने के लिये समय दें। मालिक किसी भी हालत में कुछ भी करने के लिये तैयार नहीं हुआ तो आखिरकार हड़ताल का आधार लें। हड़तालाग्नि से पार होना ही चाहिये । ठोकरें खाये बिना मानव प्रगति की ओर कूच नहीं कर सकता कभी। "ब्रिजलाल ने अपने विचार प्रकट किये। "कुछ न कुछ करना चाहिये। सिर्फ फिजूल बातें करने कुछ नहीं होता। झंडा उठा कर आगे बढ़ना यही हमारा चुपचाप बैठना आदमी के लिये अच्छा नहीं। कुतुव ने अपना मत व्यक्त किया। " आप तो कुछ बोलते ही नहीं। आपकी क्या राय है घनाभाई ?" अर्जुन ने घना की ओर एक टक निहारते हुए कहा। मैं क्या कहूं ? लेकिन एक दफे सेठजी से मुलाकात अवश्य करूंगा। उनके पास निवेदन करूंगा। हड़ताल कर देना मुश्किल नहीं लेकिन उसे अंत तक यशस्वी ढंग से निभाना कठिन । और फिर हमारी तरफ बेकारी भी ज्यादा। एक काम पर से दूर हुआ तो उसका रिक्त स्थान प्राप्त करने के लिये सैकड़ों मजदूर आगे आयेंगे । मालिक के पिछलग्गू अासपास के गांव में भटक मजदूर पूर्ति करेंगे। हमें जो कुछ करना है शांति से करना है । जव तक मैं यहां हूं जरा भी गड़वड़ न होने दूंगा गर किसी ने दंगा दस्ती करने की कोशिश की, तो मैं सब से प्रथम अपना सिर ओखली में रखूगा। लेकिन मुझे ऐसा कोई डर नहीं हैं। सुन्दरपूर के वातावरण में ही सुन्दरता कूटकूट भरी पड़ी है । मालिक के प्रत्युत्तर पर अगवी कार्यवाही अव- लंवित है। इसके पूर्व तुम सब अपनी युनियन के वड़ी तादाद में सभासद वनने में तो जुट जायो। छोटे छोटे कार्य तो अभी

.
हम मन-वचन से ठीक करते नहीं ओर चले हैं क्रांति का विचार
विमर्ग करने । मुझे मुट्ठी भर लोगों द्वारा की गयी क्रांति
कतई पसंद नहीं। जब लाखों लोग जागृत वन एक साथ
अपने हकों के लिये उठ खड़े होंगे तब एक और ही प्रकार की
महान ऐसी क्रांति होती है। हम शीघ्र ही फिर मिलेंगे।
धना ने सब को विदा करते हुए कहा ।
सब मित्रों के विदा होने के पश्चात धना वहीं बैठा गहरे
सोच में पड़ गया। वह हड़ताल के बारे में ही सोच रहा था।
गर अपनी गिरफ्तारी हो गई तो पीछे कौन? इन सव का सही
पय प्रदर्शन कौन करेगा? सखाराम सहायता के लिये आयेगा
क्या ? मजदूर मां वहनों में मन लगा कर काम करने को
मालती स्वीकार करेगी क्या? आदि कित्येक विचार लहरें उस
के हृदयोदधि में रह रह कर उमड़ रही थीं। उसमें ही खास
बात यह थी कि गर हड़ताल पुकार दी तो आसपास के छोटे
गांवों में से नये मजदूर नहीं आने चाहिये। उसके लिये दिन
रात नपिरत प्रचार करना होगा एक मोटर लारी किराये पर
ले पास-पास के गांवों में प्रचारार्य फिरे ऐसा एक विचार
मनमें तत्क्षण पाया । प्रचारक भी तैयार करने होंगे। वह मन
ही मन हड़ताल यशस्वी करने की रूपरेखा निश्चित करने
लगा।
और वह नाटिका ? वह एक नाटिका लिख रहा पा
अाजकल । 'सच्ची-संस्कृति' नाटिका का नाम था। उसके
द्वारा घनाने अपनी नई दृष्टि लोगोंके सामने रखने की कोशिश
की थी। वह हड़ताल प्रारंभ होने के पूर्व यह सव कार्य पूरे करना
चाहता था। किसी साहित्य रसिक राजा साहब ने उत्कृष्ट

७८ नाटिका पुरस्कारर्थ मंगवायी थी। सर्वोत्तम नाटिका के लिये । पांच हज़ार का नगद पुरस्कार रखा गया था। घना पुरस्कार का भूखा न था लेकिन यदि पुरस्कार मिल ही गया तो भविष्य में कभी सहाय होगा ऐसी दृढ़ भावना रखता था। रात बहुत हो गयी है। बाहर सर्वत्र निस्तब्धताका साम्र- ज्य फैला हुआ है । अंधकार के आवरण में लिपटा सारा विश्व सुख की नींद सो रहा है। और इधर घना लिख रहा था। उसे समय का भान नहीं है । वह अपनी कृति के साथ तल्लीन हो कल्पना में विहार करता है। अपनी लेखनी की अद्भुत शक्ति में नाटिका का सर्वश्रेष्ठ दृश्य रंगने में मशगूल है । कल्पनोदधि में डुबकी लगाने के हेतु क्षण भर वह आंखें मूंद शांत बैठा रहा । मानो आगे आलेखित होने वाली घटना प्रत्यक्ष उसके अंत,चक्षु समक्ष उपस्थित हो । आंखें खोल वह पुनः मूंदने जा ही रहा था कि उसे कुछ श्याम रंगीय वस्तु दिखाई दी। क्या थी वह ? कितना बड़ा विच्छू ! कांटा ऊपर किये महाशय पधारे थे और अड्डा जमाया था.घना की नोटबुक पर। घना शीघ्र ही एक तरफ खिसका लेकिन उसके मन में विच्छू महा- शय को जान से मार डालने की इच्छा जागृत न हुई। विच्छु महाशय पधारे कहां से ? यह एक उलझन भरा प्रश्न था घना के लिये । उस समय वह नाटिका के दृश्य में एक प्रेम रस से शराबोर संवाद आलेखित कर रहा था। प्रेम रश्मियों में सब कुछ सौन्दर्यमय दृष्टिगोचर होता है । श्याम वर्णीय घटाओं प भगवान अंशूमालिकी प्रातःकालीन रश्मियां फैली हुई आ सुन्दर भासित होती है ! ऐसा ही वह कुछ लिख रहा था। के प्रेम की परीक्षा करने तो विच्छू न आया? उसने संडसी विच्छू को पकड़ वातायन में से बाहर फेंक दिया। लेकिन किसी को काटेगा तो? इस तरह का विचार भी उसके मन में न आया क्षण भर के लिये भी। वह पुनः अपने कमरे से लौट गया। लिखना रुक गया लेकिन उसके मस्तिष्क में नये ही विचारों ने जन्म लिया। अगर बिच्छू का कांटा तोड़ दिया जाता, तो निर्विप विच्छू निरुपद्रवी सिद्ध होता । ठीक उसी तरह धनिकों द्वारा नियंत्रित सांपत्तिक-सत्ता उनके पास से छीन ली जायं तो भी विच्छू की नाई निरुपद्रवी सिद्ध होंगे । महाविप धर के विपमय दांत तोड़ देने के पश्चात् वह सहर्प सारे घर में क्रीड़ा करता रहे तो क्या विगड़ा? धनिकों के बंदूक की गोलियों से भून दिया जाय ऐसी कोई बात नहीं । लेकिन उनको निर्वाध सता छीनने की हिम्मत कौन करेगा? प्रजा द्वारा चुने प्रभावी व्यक्तियों की सरकार ही यह काम कर सकेगी। लेकिन अभी तो दिल्ली बहुत दूर है स्वराज्य है कहां - वह तो हमसे कोसों दूर है। एक मतवा परकीय सत्ता का पतन हो जाय तब आगे की बात । घना ने लेखनी को आराम देने के हेतु लिखना बंद किया और शय्या पर लम्बा हुआ। नोंदिया रानी ने भी शीघ्र ही उसे अपनी गोद में सुला दिया और कल्पना जगत में विहार करने के लिये स्वप्न अश्व भी प्रदान किया। विच्छू नींद में घना से कह रहा था कि, "मैं तुम्हारे लिये क्या करूं? तुमने मुझे प्रेम दिया है ? मैं तुम्हें बदले में क्या दूं? हम विच्छू भी कृतज्ञ होते है मानव समय आने पर कृतज्ञ नहीं रहेगा, लेकिन मानवेतर प्राणी जीवन पर्यंत उपकार का स्मरण करते रहते हैं। - ८० कही और कुछ कहो। घना स्वप्न में विच्छू की वाणी सुन, कह रहा था उससे । "और कहूं। अरे, तुम्हारा मानव-समाज हमे विषैला- विषैला कह पुकारता है निरंतर, लेकिन तुम नही हो क्या विषैले ? अविरत परस्पर एक दूसरे के विरुद्ध नाना प्रकार के षड़यंत्रों की रचना करते रहते हो। हमारे पास तो सिर्फ यह छोटा सा कांटा है, लेकिन तुम्हारे पास तो अगणित हैं । कितनी ईर्षा द्वेष परस्पर रखते हो एक दूसरे से ! सांप बिच्छू के डंक से मानव मृत्यु को प्राप्त होता है । उससे कई गूने अकाल युद्ध, क्षुधा, पूर और बीमारी आदि की वजह मे मृत्यु को प्राप्त होते हैं। ईश्वर द्वारा सजित सव प्राणियों में अगर विषैला प्राणी कोई है तो वह मानव सिर्फ मानव! तुम स्वयं प्रथम सुधरो। मैं अभी तक जहरीला हूं, उसे डंक मारा, इसे कांटा, उस पर टीकास्त्र चलाया, इसके प्रति मन में वैर बनाके रखा, सर्व प्रथम मुझे निविष होने दे ऐसी भावना कभी तुम्हारे मानव समाज के मस्तिष्क में भी आती है क्षणभर के लिये?" विच्छू कटु शब्दों में स्वार्थी मानव समाज की टीका कर रहा था। उसकी टीका कव समाप्त हुई। राम जाने, लेकिन अचानक घना घवरा कर श्य्यापर उठ बैठा। उसे लगा, विच्छू कान के पास है, दीया जलाया उसने और आसपास में सर्वत्र सावधानी से देखा । ना तो कही बिच्छू था न ही अन्य जहरीला प्राणी, लेकिन रह-रह कर स्वप्न में श्रवण किये वृश्चि कोपनिषद् की उसे याद आ रही थी। मन द्वारा निर्मित कपोल कल्पित सृष्टि का स्मरण कर एसे वार वार आश्चर्य हो रहा था। हमेशा मिल से छुटने पर घना अपने सहकार्यकर्ताओं के साथ मोटर-लारी में सवार हो आसपास के गांवों में प्रचारार्थ फिरने लगा। धना सवको वा सविस्तार समझाता, गंभीर तथा कुतुब हड़ताल पर रचे गीतों को ललकारते और ब्रिजलाल सबका भनुमोदन करता। किसी एक गांव में प्रश्नोत्तर हुए। कोई सेवानिवृत्त सज्जन उस गांव में निवास करते थे। वे बड़े ही धार्मिक वृत्ति के तथा कर्मठ थे। सभा वीच खड़े हो उन्होंने कहा, “ मैं चन्द प्रश्न आपसे पूछू ?" "शौक से पूछिये ।" घना ने कहा । लोगों को आश्चर्य हुआ। वे धुन के पक्के प्रतीत होते थे। उनके दोनो कानो में रुद्राक्ष शोभा दे रहे थे। सिर पर श्वेत पगड़ी पहने थे और शरीर पर घुटने से कंधे तक लम्बा दुपट्टा लटक रहा था। वे प्रश्न कर रहे थे। बिना रुके, विश्राम लिये। 'तुम संसार की सेवा करने निकले हो; लेकिन अपने पास कुछ धर्म वर्म भी है ? सुबह में, शय्या त्याग, स्नान भी करते हो क्या ? केश बढ़ा कर, विड़ी सिगारेट दिन-रात फूकना जो कुछ मिले सो खाना, क्या यही तुम्हारा धर्म? फिर कैसा होगा तुम्हारे हाथ से समाजोन्नत्ती का महद कार्य तुम समाजवादी हो या कम्युनिस्ट ? धर्म को अफीम की उपमा देने वाले तुम ही लोग हो न? धनिकों को जी चाहे गालियां बकते फिरते हो-वे गरीबों को सताते हैं। लूटते खसोटते हैं आदि वातें सरे आम बकते हो। लेकिन हमारे धर्म का मजाक उड़ा, मस्कारो कर तुम हमारे हृदय को ठेस क्या नहीं पहुंचाते ! धनि पानी शरीफ गुंडा, उनकी वजह से शांत समाज में अशांति को अग्नि प्रज्वलिज होती है। ऐसा ही तुम्हारा कथन है न? लेकिन तुम लोग भी गुन्डे नहीं क्या? तुम्हारी बकवास से भी समाज में है

१२
।
निर्माण नहीं होती क्या? समाज - शांति में वास्तव में देखा
जाय तो धनिकों से वजाय तुम ही लोग ज्यादा वाधक हो ।
धर्म की टीका करने वालों को तो विना जांच जेलखाने भेज
देना चाहिये । अगर मैं अधिकारी होता तो कभी की तुम सव
की बड़वड़ बंद कर देता । वाह ! कहते है धर्म यानी अफीम की
गोली।
ओह, वैठ जाइये । वस करो अव । तुम कितने काम
आते हो दूसरो के ? यों श्रोता-वर्ग में कोई पूछने लगा। लेकिन
घना ने सबको शांत किया और उसने एक छोटासा गीत
सुनाया।
उपरोक्त काव्य पंक्तियों में वर्णित तरह का धर्म हो तो
उसकी कौन टीका करेगा? आप धर्म धर्म की अहर्निश रट
लगाने वाले समाज में फैली विषमता को दूर करने हेतु कभी
आगे नहीं आते । हो सकता कि हम समय पर स्नान-कार्य से
निर्वत्त नही होते । कभी सिगारेट पीते हैं। लेकिन हमारे दूसरे
वंधु का संसार सुखमय हो इस हेतुवश सर्वदा अपने प्राए
भी देने से लिये तैयार
लिये तैयार रहते हैं। दूसरो के लिये कुछ नहीं करने
वाला लेकिन सिर्फ जपतप और समयपर स्नानादि से निपटने
वाला धार्मिक या स्नानादि जल्दी न करने वाला लेकिन परार्थ
प्राणार्पण करने वाला धार्मिक ? जो धर्म अन्याय सहन करना
सिखाता है समाज में वही विपमता को शनी मंगल की युति
कह पुकारता है । मज़दूर क्षय से बीमार मरा तो व्योमस्थित
शनि ग्रह की उसे फोड़ खाती थी ऐसे विधान जो धर्म करत
है, उसे हम अफीम की गोली की उपमा देते हैं। मालिक
महाशय ने सवेतन छुट्टी दी होती, अच्छी हवादार चालें बांध

८३ होती, पेट का सड्डा भर सके इतनी मजूरी दी होती, तो क्या मजदूर प्राप्त करता? उधर मालिक मजदूर के पसीने कमाई रकमों से नित नये मंदिरों का निर्माण करता है। उस पर स्वणिम कल की प्रतिष्ठा करता है, देव मूर्तियों के लिये लाखों की संपत्ति स्वेच्छा से खर्च करता है । लेकिन इधर मजदूर उसके बाल बच्चे बिना अन्न-जल के तड़पते रहते हैं। इन दरिद्र-नारायण की सेवा क्या धर्म नहीं? वहां मंदिर निर्माण करने के बजाय यहां चाल' वांध कर दी तो धर्म कर्म न होगा ? गधे को पिलाई गंगा भी जब प्रभु तक पहुंच सकती है तो इन श्रमजीवि मानव समुदाय की भक्ति भाव पूर्वक की गई सेवा प्रभू के श्री चरणों में न पहुंचेगी ? हमें लम्बे तिलक रुद्राक्ष माला वाला धर्म नहीं चाहिये । शनि-मंगल फा धर्म नहीं चाहिये । तू दरिद्री क्यों, तो कहे तेरा प्राक्तन ! ऐसी अन्धी शिक्षा देने वाला धर्म नही चाहिये । में श्रम करता हूं फिर क्षुधित क्यों ? श्रमिकों की प्रतिष्ठा प्रस्थापन करना यही सच्चा धर्म । वेदान्त मे ठीक ही कहा है। न ऋते थान्तस्य सख्याय देवाः । जो श्रमिक नहीं उसकी मित्रता देव भी नहीं चाहते। जिसमें लुच्चाई व लफंगापन कूटकूट के भरा पड़ा हो ऐसे धर्म की हम जोरदार टीका करते हैं । समाज में अड्डा जमाये बैठी विषमता को दृष्टि से निहारते हुए भी उसे दूर करने की कोशिश न करते सिर्फ भरे पेटसे चर्चा करनेदाला धर्म मार्तड ही क्या है ? धार्मिक तुकाराम महाराज कहते हैं- "तुका म्हणे व्हावी प्राणासवें ताटी, नाहीं तरी गोष्टी वोलूं नये ।

८४
?
धर्म यानी परमध्येयार्थ अपने प्राणों की भी वाजी
लगाने में सर्वदा तैयार रहना, धर्म यानी सवों के विचारों का
सम्मान करनेवाला । वही सच्चा धर्म है। और आदि-अनादि
काल तक जीवित भी है, ऐसा ही मानवता प्रेरक धर्म हमें
निहित है शेष धर्मों का उपयोग ही क्या उसे पाकर ? तुम्हारी
गीता में कहा है-
गीता जिन अन्य धर्मों का त्याग करने की शिक्षा देती है।
वे कौनसे धर्म ? में बड़ा, मेरा जन्म उच्च-कुल में, मेरी ही
जाति श्रेष्ठ, धर्म मेरा ही श्रेष्ठ, मेरा ही राष्ट्र सर्व श्रेष्ठ
आदि सतरह औ अहंकारी धर्मों को त्यागने का गीता उपदेश
देती है । सभी कर्मों को एक तुला पर तोलने का आदेश
भगवान गोपाल कृष्णा देते हैं। और वह यह कि " मैं जो
कुछ करता हूं" देवता को पसंद आयेगा। इस तुला में अपने
कर्मों को रख क्षणभर सोचो। दीन-दरिद्रों के लिये घर
वांधना छोड़ भव्य मंदिर निर्माण करना देवता को पसंद
आयगा? आत्मा सो परमात्मा नहीं क्या? मनुष्य में भगवान
नहीं क्या? वह क्या सिर्फ पाषाण-मूर्तियों में ही है? माता के बच्चों
को छोड़ उसको अच्छी से अच्छी मिठाई दोगे भोजनार्थ, तो क्या
पसंद आयगा? इसी तरह देव-देवियोंकी करोड़ों संतानो को
अन्नहीन, वस्त्रहीन, गृहहीन, ज्ञान-विज्ञान-हीन सुखहीन
आनंदहीन और विश्रामहीन रखोगे, और उन्हें पुष्पमाला
धूप पूजन-अर्चनादि से रिझाते रहोगे? उसे हीरे मोती की
मणियोंसे सजाते वैठेगे तो यह सव उस जग-माता के
सन्द आयगा? हम सच्चे धर्म के उपासक व अनुयाई हैं
हम प्रभु के दरबार में गर्दन नमा, दोनों कर जोड़ क
?
?

स
खड़े रह सकेंगे बिना किसे हिचकिचाहट से।
घना अपने अंतरंग के बांध तोड़ अविरत रूप से उसमें
रहे तत्त्वज्ञान-नीर को प्रवाहित करते ही आज तक अवसर
ढूंढ़ रहा रहा था। और आज मुअवसर प्राप्त होते ही
मानो बह रहा था। उसका समाजवाद मानवी मूल्य
(कर्तव्य) का पुजारी था । जिस समाज व धर्म में उसके
घटका मानय की गर्दन हमेशा नीची रहती है यहां कहां का धर्म
और कैसी संस्कृति ? दूसरे के हृदय को स्पर्श कर जाना
प्रेमवश इसमें धर्मारंभ है । संतो की यही प्रवृत्ति विस्तार
पा " वमुदेव कुटुंबकम्" होती हैं। वे ही मानव के सच्चे
उद्धारक हैं । ग्यानबा-तुकाराम का ही गगनभेदी
घोप सर्वत्र सुनाई देता है। तथा ज्ञानेश्वर तुकाराम ने
विश्वपर सभी जीव-जंतु पशु प्राखी सुखी हो यही चाहा
है। "जो में वांछील तो ते लाहो।" यही ज्ञानेश्वर
महाराज की सबसे बड़ी मनीपा थी।
घनाने कहा, ज्ञानेश्वर महाराज के स्वप्न को सत्य कर
दिखाने के लिये ही तो हम सब दौड़ धूप करते हैं। समाजवाद
यानी प्रत्यक्ष में आया हुआ वेदांत । हम मारपीट अथवा
डराधमका कुछ भी करना नहीं चाहते । लोगों में अपने सिद्धांत
को यथेष्ट प्रचार कर उन्हें समझा बुझा जो करना है, वह
करना चाहते हैं। यही मेरा वैदिक धर्म, वेद यानी ज्ञान । ज्ञान
और विचार शक्तिपर श्रद्धा रख हम आगे बढ़ते हैं। मेरा
कथन मान्य करो अथवा प्राए लेतूंगा ऐसी दहशतवादी प्रवृति
में हमें विश्वास नहीं । हम ऐमी नादिरशाही के कायल नहीं ।
इस देश से परकीय सत्ता को मूल से दूर कर कभी समाजवाद
।

.६
नाये हम देश में तो जनता जनार्दन को समझा बुझाकर ही
लायेंगे। उन्होंने हमें चुनाव में विजयी किया तो हम लायेगे।
हम मानवी प्राणों को सबसे ज्यादा पवित्र मानते हैं। समस्त
जीवन पवित्र मानते हैं। तुम धर्म-धर्म की रट लगानेवाले ही
मानवी जीवन की विटंबना करते हो । जो हरिजन बंधुओ को
अपने से दूर रखे, हिन्दु-मुस्लिमों में द्वेष फैलाते रहते हो, धर्म
कार्यो में भेंट देनेवाले, होमहवनादि यज्ञों में पैसे लुटानेवाले,
दानी महात्मा यहां मजदूरों की तरफ एक सहानुभूति भरी दृष्टि
भी डालने को तैयार नहीं। यह क्या धर्म? यही क्या संस्कृति?
यही मानवता? यही क्या जीवन का जीव आदियों के
प्रति प्रेम!
घना का वक्तव्य जनता एकतान हो श्रवण कर रही थी।
सभामें शांति छाई हुई थी कहीं भी गड़बड़ नहीं हो रही थी
सभा भी प्रचंड थी वह । ज्ञानेश्वर महाराज व तुकारामवुवा के
अभंग ओवियाँ आदि गाने हुए । वह वक्तव्य दे रहा था उन
सवकी समझमें घना का एक एक शब्द आ रहा था। उन्हें वह
अपरिचित, विदेशी, लंवा तंग करनेवाला किस्सा-कहानी
प्रतीत नहीं हो रही थी। और “सुन्दरपूरमें हड़ताल हुई तो
तुम सव मजदूर-बंधुओं के प्रति सहानुभूति दिखाओगे अथवा
नहीं ? अपने दीन-बंधुओंके पेट पर पैर रखने हेतु तुम मिलमें
नौकरी तो न करोगे ? बोलो। मजदूरों के प्रति ज़रा भी
सहानुभूति तुममें हो तो हाथ उपर उठाओ।" घना के यों
कहते ही सैकड़ों की तादाद में सभामें से हाथ उपर उठे।
अनेक माँ बहनो ने हाथ उपर किये। घनाका वक्तव्य पूरा
असरकार हुआ था सभा पर । घना को अत्यंत ही खुशी हुई

८७ राष्ट्रगीत होने के पश्चात सभा बरसास्त हुई। सब अपने गांव व घर गये । घना को मोटर लारी अन्यत्र चली गई प्रचार करने के लिये । सर्वत्र धूम धड़ाके से प्रचार हो रहा था । और उस दिन सुन्दरपुरमें प्रचंड सभा हुई। सभा के पहले सारे शहर में मशाल जुलुस निकाला गया था। गगनभेदी घोपणानों व जयजयकारों से चारों दिगंत गूज रहे थे । “वेतन वृद्धि तुरंत हो ।” नारा सर्वत्र गूंज रहा था। सुन्दरपुर के वातावरण प्रक्षुन हो उठा था। ये जागृत मजदूर क्या करेंगे और क्या नहीं यही प्रश्न सबकी जवान पर था । लेकिन सर्वत्र शांति थी । सभा के प्रारंभ में पंढरीने एक सुन्दर गीत अपने मधुर गलेसे ललकारा। गीत के पश्चात कितने एक मजदूर कार्यकर्ताओं के भाषण हुए सभामें मजदूर भगिनी पार्वती ने रंगमंच पर आते ही शब्दों की झड़ी लगा दी सभा में बोली, 'मेहनत मजदूरी कर हम दिन रात मरते है लेकिन देह ढंकने के लिये ये फटे पुराने चिथड़े । लाखों गज कपड़ा वहां तैयार होता है लेकिन तैयार करने वाले ही ठीक अर्ध नग्न रहते हैं । सर्वत्र पाप का बाजार है। और सुन्दरदास उसका निरंकुश मालिक एक और भव्य मंदिर वनवाता है । और दूसरे हमें प्राणों से मारता है । यह कौनसा दुनियासे अलग उसका धर्म? यह धर्म मानव का नहीं। दानव का है दानव का । हम हड़ताल पुकारेंगे भूखे मरेंगे लेकिन ऐसा अन्याय सहन नहीं करेंगे । शहर ने हमें एक प्रावाज से साथ दिया है। मेरे पास देने के लिये कुछ भी नहीं। फिर भी हड़ताल फंडशुरू किया तो में अपनी उंगलीमें रही एक मात्र अंगुठी सहर्प उसमें दूगी। यही अंगूठी उनकी स्मृति हैं जो

८
सी मिल में काम करते क्षय ग्रस्त हो मृत्यु को प्राप्त हुए ।
लेकिन मालिक ने मेरे बाल-बच्चों के लिये कुछ
भी दिया क्या?
सिर्फ यही एक अंगुठी मेरा आधार है फिर भी वह मैं
हंसते हंसते दान करूंगी।
तालियोंकी गड़गड़ाहट से सभा उठी, साथ ही व्योम
और पृथ्वी भी। थोड़ी देर पश्चात घना समारोप करने के
लिये खड़ा हुआ । उसने अपने समारोप भाषण में निम्न
वातें जाहिर की।
"मैं सेठ सुन्दरदास से मुलाकात करने वाला हूं।
मजदूरी में वृद्धि, और पहले लगातार दस वर्ष तक तनख्वाह
के समय संस्कृति-मंदिर के लिये प्रति रुपया पाई पैसेवाली
रकम वापस, ये दो मांगे खासतौर से उनके समक्ष रखूगा
और उसपर सविस्तर चर्चा भी करूंगा वैसे तो छोटी मोटी
वहुतसी अन्य मांगें भी लेकिन खास तो ये दो ही हैं । मालिक
तैयार होंगे-ऐसा प्रतीत तो नहीं होता लेकिन हमने हड़ताल
करने का तय कर लिया तो सवों को एकता के सूत्र में बंधकर
कदम उठाना होगा । एक दफे हड़ताल पुकार लेनेपर मैं तुम्
पीछे पैर हटाने न दूंगा । हड़तालावधिमें फंड की सस
आवश्यकता पड़ेंगी तो अगले माह की तनख्वाह के समय फंड
पैसे दे देना । ठीक इसी तरह एकाध नया काम धंदा भी से
रखो तो वेहतर है। हमें खाली हाथ नहीं बैठना है।
प्रत्येक के ध्यान में रहे । कुछ प्रप्त करेंगे तभी हड़ताल
काल चल सकेगी। एक बात की ओर सब लोग ज्यादा
दें। हड़ताल शांति से आरम्भ कर हमें समाप्त भी उसी
से करना है। इसके वीच अशांति का नामोनिशान तक

८६ नागरिक बंधुओं का वाद्य कर्तव्य है कि वे हमारे न्यायमय आंदोलन में पूरा सहकार्य दें। अगर अग्नि-परीक्षा को वेला आई तो हमें खुले हाथों से सहायता दें। बाप सबों का संसार मजदूर व किसानो पर ही पूरी तौर से आधारित है । मजदूर मिल में काम न करेगा तो आप सव वस्त्रहीन हो जायेंगे। थापके शरीरपर वस्त्र होते हैं। आपके नित्य प्रति प्रयोग में पानेवाली शय्या और चादर, कहाँ से आती हैं? ये सब वस्त्र, टेवल क्लॉथ, शादि, धोती, पगड़ी, अनेक स्वरोंमें अपनी राम कहानी सुनायेंगी आपको, कि हम पसीने से निर्माण हुई हैं। श्रमिकों के पसीने से हमारा जन्म हुआ है । लेकिन वही श्रमिक आज वस्त्रहीन है-नंग-घडंग है और भूखा-प्यासा । जनता जनार्दन में कृतज्ञता होगी तो वह मजदूर के पक्ष व मांग को उठा लेगा । मजदूर सुखी तो सारा संसार सुखी यह ध्यान में रहे, सदा ।" सभा अदम्योत्साह वीच समाप्त हुई । सारे गांव के लबों पर एक ही चर्चा का विषय था, हड़ताल होगी क्या?

हड़ताल के पूर्व
दिवानखाना भव्य था और करीने से सजाया हुआ भा।
थोड़े अंतरपर कोचों की हारमाला लगी हुई थी। और ठीक
वीचोबीच वैठक थी। गादी व गोल तकियोंका पारावार न था।
एक तरफ पूज्य महात्मा गांधी की पूरे कदकी तस्वीर भी थी।
घना वहां बैठा । व्यवस्थापक महोदय व सेठ श्री. सुन्दरदासजी
का इंतजार कर रहा था। उसने खिसेमें से तकली निकाली
व रामनाम की मन ही मन धुन जमाये कात रहा था। वह
क्षण भर में तन्मय हो गया सूत कातने में।
"वस करो अपने सारे ढोंग" व्यवस्थापक ने प्रवेश
कर कहा।
ढोंग मैं कर रहा हूं? इसका तो ईश्वर को ही पता है ।
लेकिन आप तो व्यर्थ में ढोंग न रचाइये। यहां भारत को पवित्र
आत्मा की तस्वीर टंगी हुई है । उसका स्मरण कर ही तो हर
घड़ी व्यवहार करते न?" घनाने सीधा प्रश्न किया।
महात्माजी तो मालिक को ट्रस्टी कहते हैं। जव कि
आपका प्रचार तो उससे अलग ही ढंग का होना है।
"ट्रस्टी का अर्थ ही आप क्या लेते है?"
"लेकिन अज्ञानों के पालक वनना अर्थात ट्रस्टी होना
?

मजदूर अपना हित अहित कतई नहीं समझते । हमें उनके हिताहित को पिता करनी पड़ती है। हमें रोज-व-रोज कोर्ट कचरियों को मुलाकात देनी पड़ती है । ट्रस्टी यानि क्या हमें ज्ञान नहीं?" सचमुच आपको कुछ भी ज्ञान नहीं पूज्य महात्माजी द्वारा व्याख्या की हुई ट्रस्टीशिप का यह अर्थ नहीं । मजदूरों को अपने मालिक से कहना चाहिये, विनति करनी चाहिये “हम अपनी कड़ी मेहनत से उत्पन्न की संपत्ति आपके हवाले करते हैं। उसे ठीक तरह सम्हालिये । वढ़ाइये । प्याज के स्वरूप में किसी को दीजिये अथवा अधिक उत्पादन योजना में लगाइये । जव हमें आवश्यकता महसूस होगी आपसे मांगेंगे। मॅहगाई की वजह से तनख्वाह कम पड़ती होगी तो कहेंगे कि तनख्वाह बढ़ाइये । और यह सब करने के लिये, हमारी कप्टोपार्जित संपति की ठीक तरह से व्यवस्था करने के लिये (परिणाम स्वरूप ) अपने लिये सौ दो सौ रुपये कमिशन लीजिये । महात्माजी ने तो एक दफे कहा था मजदूर अगर पांच रुपये लेने को कहे तो मालिक को पांच रुपये ही लेने चाहिये । महात्माजी को ट्रस्टीशिपका ऐसा चमत्कारीक रहस्य है और क्रांतिकारक अर्थ समामा हुआ है ? और मालिक को मजदूरों को विरोध दर्शाने के शांत रोति से अहिंसक सत्याग्रह का अवलंब करना चाहिये। यह भी पूज्य गांधीजीने ही कहा है । है क्या यह अर्थ पसंद? कहिये इस दृस्टी होने के लिये तैयार है क्या आप? नही होंगे तो गएना पाखंडियोंमें होगी। फिर क्यों ये तसवीरें, यह सादगी, छद्म वेप? किस लिये यह वगुला-भक्ति और ये सारे ढोंग?" "हम गांधीजी द्वारा, निर्धारित ट्रस्टीशिप का अर्थ हमारे कीलों से पूछेगे । मुन्शीजी से दरियाफ्त करेंगे।" "विनोवाजी पूछिये-मश्रुवाला साहव से पूछिये ?" "लेकिन उन्हें कहाँ कानूनी भाषा समझती है ?' लेकिन सत्यकी भाषा के तो वे माहिर है न?" दुनिया सत्य पर नहीं चलती। चादीका रुपया बाजार में नहीं चलता । उसमें अन्य धातु मिश्रण करनी ही पड़ेगी। तव कहीं खनन्न् बजेगा व बाजार में भी निस्संकोच जायगा। जाने भी दो यह सव चर्चा । अव हम अपने मुद्देपर आये। आपका कहना क्या है ? वर्तमान में सभा, प्रभात- फेरियाँ वगैरे किस लिये और जलती हुई असंख्य मशालोंवाले जुलूस क्यों ? गांव को क्या आग में भस्म कर देना है ? आप सख्त टीकाएं करते हैं। गालियां देते हैं। आप तो कृतघ्न हैं। जिस उदार हृदय मालिक ने इतने सारे वेकार मजदूरों को रोटी और रोजी दी उसी को आप व आपके साथी गण चोर और लुटेरे कहते हैं।" आपकी गीता उसे चोर घोपित करतो है। वेदांतों के ऋषीगण उसे चोर कहते हैं। गीता कहती है कि दूसरों की क्षुधा मिटा शेष रहा खाओ वही अमृत है। लेकिन दूसरों क्षुधा न मिटाते उससे क्रूर मस्करी करते रहना चोर होना है आप अपनी छोटी कार के लिये सुन्दर अस्तवल निर्माण क करते हैं; लेकिन मजदूरों के लिये चालें नहीं वांधेगे। एं रात दिन कार्य करता रहे यंत्र की उत्पादन शक्ति कम न इसलिये उसे आवश्यक सामग्री से सज्ज करेंगे। लेकि जीवित यंत्र मौजूद रहे, उनके शरीर के अवयवों को पुष्ट के लिये उचित खाद्य सामग्री प्राप्त हो इस हेतु से ज़रा भी तन

"
में वृद्धि नहीं करेंगे। सिर्फ अधर्म भरा है आप और आपके
धनिक वर्ग में।
" सुन्दरदास और अधार्मिक? उन्होंने भव्य राम मंदिर
का निर्माण किया है। संस्कृति मंदिर की नीव रखी है। हजारौं
लाखों रुपये दान स्वरूप पानी की तरह बहा दिये । और ये
अधार्मिक।
"जो दाता संपत्ति एकत्र कर उनके हवाले करता है, उस
के लिये क्या किया, कहिये? अन्यत्र किये दान-धर्म की लंबी
सूची यहां न पढ़िये । मजदूरों की मजदूरी में वृद्धि करेंगे क्या?"
'फिलहाल की मजदूरी विलकुल ठीक प्रमाण में है।
मजदूरी में वृद्धि करने पर भी उनका समाधान होगा अथवा
नहीं, यह भी विचारणीय प्रश्न है । वे शराब, जुआ और
सिनेमा में ही जायेंगे । आखिरकार ।
'सारा दिन सख्त परिश्रम करने वाला मरादुर महीने में
दो चार दफे सिनेमा देखने चला गया तो क्या उसे हम ऐश
कहेंगे? और सभी मजदूर कोई दाराव पान नहीं करते, जुए में
पैसे नहीं गंजाते । गरीवों के दुःख पर दाग़ न दीजिये - उनके
हृदय मे हरे घाव पर निमक न छिड़काइये। उनके वारे से
आपके मन में कितनी सहानिभूति है - में अच्छी तरह समझता
हूं उस दिन पार्वती का पति क्षय से मृत्यु का शिकार हुआ।
उसे कुछ दिया भी किया? आपको ही मिल में तो रात-दिन
काम कर अपनी हड्डियों को सड़ा लिया विचारे ने।" ऐसा कोई
करार तो नहीं था।
मानव धर्म भी तो कोई चीज है ना? कहते है कि उसे
मजदूरी दे हम उस पर बेहद उपकार करते हैं। आठ आने
"
।

ते हैं सारे दिन की मेहनत के बदले में। लेकिन उसके पास
बीस वीस रुपये मूल्य का उत्पादन करवाते हैं । आठ आने ही
देने है तो उसके बदले में आठ आने का ही काम लीजिये
एक रुपये का लोजिये। लेकिन काम तो लेंगे बीस रुपये का;
और हाथ पर सिर्फ आठ आने के पैसे रखेंगे न चाय न पानी
के लिये एक पाई भी ज्यादा। जहां तहां चोरों का बाज़ार है,
चोरों का!
इतने में ही सुन्दरदास ने प्रवेश किया वहां । व्यवस्थापक
जी खड़े हो गये। घना भी खड़ा हो गया। उसने नम्र वन
दोनों हाथ जोड़ वंदन किया।
" किस लिये चोर को वंदन?" हास्य विखेरते सुन्दरदास
ने घना की ओर एक दृष्टि फेकते हुए कहा ।
" अन्य चोरों के बनिस्वत आप लाख दर्जे अच्छे हैं। किसी
प्रकार का दुर्व्यसन तो आपको नहीं है । संस्कृति, ज्ञानादि उच्च
विषयों के रसिक तो आप हैं। दान - धर्म भी आप प्रमाण में
करते हैं । आप का अगर कोई पाप है तो सिर्फ एक ही कि
जो संपत्ति आपके हवाले, कड़ी मेहनत से प्राप्त कर, करता है,
उसके प्रति आप पूर्णतया कृतघ्न हैं ।
उन्हें तनख्वाह देते हैं
"लेकिन इस तनख्वाह
में तो उनका जीवन-निर्वाह न
होता।
तो उन्हें मिल की नौकरी छोड़ देनी चाहिये।
कितने एक पाने के लिये तैयार हैं।"
भूल जाइये यह सव । अब पहले वाले दिन नहीं
मजदूर युग का आगमन होने वाला है। संसार भर में
"

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६
"लेकिन सब बातें ज्ञात होनेपर शीघ्र ही त्याग पत्र दे
वहाँ से बाहर
निकल पड़ा।"
"और यहाँ असंतोषाग्नि भड़काने का धंदा करने लगे।
हमारे शांत कस्बे में अशांति का बीज बोना ही क्या आपका
धर्म है?"
"लोकमान्य तिलक को भी तो अंग्रेज ऐसा ही कहते थे
एक समय पूज्य बापूजी ने ही कहा था, 'अंग्रेजी राज्य के
विरुद्ध साधारण जनता के हृदय में अप्रीति निर्माण करना ही
मेरा धर्म है।' न्याय का पुजारी अशांति से भयभीत नहीं
होता। मरे हुए मुर्दे को जीवित करना ही क्या अशांति
है ? स्वाभिमान पूर्वक व न्याय पद्धतिसे जिंदगी व्यतीत करने
का उपदेश देना ही क्या अशान्ति है ? शांति का अर्थ यह
क्या मुट्ठीभर गर्भ श्रीमंतों का संपत्तिके झूले में झूलना और
दीन-दरिद्रों का फुटपाथ पर क्षुधा पीड़ित पड़े रहना।
गांधीजी पराई सत्ता के विरूद्ध अशांति के बीज वो
थे। स्वजनों के विरूद्ध नहीं।
स्वजन भी अन्याय-जुल्म ढायेंगे तो? गांधीजी ने क
हैं, 'उच्च वर्ग से अव मैं निम्नस्तर पर जीवन निर्वाह क
वाले जनता जनार्दन को उपर उठाऊंगा ताकि लब्ध प्रति
अपने आप धड़ाम से नीचे आयेंगे।
"ये महात्माजी के शब्द ?"
"हाँ । उनके ही ? स्वतंत्र हिन्दुस्तान अव एक दि
आर्थिक विषमता सहन नहीं करेगा, ऐसा भी उन्होंने
आप कान होते हुए भी बहरे हैं । सुनते भी हैं तो सि
लाभ के वाक्य ही ?"

९७
'आप भी तो दूसरा क्या करते हैं ?"
'हम प्रत्येक पहलू से विचार करते हैं। खेर जाने
दीजिये यह सब । हां, तो वताईये आप क्या करेंगे?"
'घनश्याम, व्यर्थ में अपने जी को क्लेश न दो? मेरे
साहित्यमंत्री बन जाग्रो। और नित्य ही मुझे साहित्याकाश
के कल्पना व्योम में विठा क्रीड़ा कराना।"
"भूलावे में किसे डालना चाहते हैं आप? मुझे ना ही
संपत्ति की और ना सुख की लालसा है। श्रमिकों का सिर
संसार के सामने अभिमान के साथ उठवाये, रसना व उन्हें
स्वाभिमान पूर्वक जीना-सिसलाना ही मेरा आद्य कर्तव्य !
कहिये । तो आप क्या करेंगे।"
"कुछ भी न किया तो क्या आप हड़ताल करेंगे?"
"सब उपायों पर पानी फिरने के बाद फिर हड़ताल हो
रामवाण उपाय है!
"अहमदाबाद में जब कुछ दिन पूर्व महात्माजी के
नेतृत्व में हड़ताल टिक न सकी; तीसरे ही दिन मजदूर
काम पर जाने लगे। फिर तो गांधीजी ने उपवास शुरू किया ।
घनश्याम, जैसी कि तुम्हारी कल्पना है हड्ताल सरल वात
नहीं है । बाल-बच्चों को क्षुधा की असह्य पीड़ा से तड़पते
देखना पड़ता है । दूकानदार उधार नही देता । हड़ताल की
भयंकर आग में गरीब मजदूरों को जलने न दो।"
"राजकीय स्वातंत्र्य प्राप्ति हेतु समस्त देश को आग में
से गुजरना पड़ा । सोना भी तो अग्नि में ही गिर कंचन का
रूप धारण करता है ना। पूज्य बापू, लोकमान्य तिलक आदि
देश की पवित्र महान प्रात्माओं ने देश की साधारण जनताको
"
M

ग्निदिव्य करने का आदेश दिया । व क्या पागल थे?"
"लेकिन इसमें आपका प्रयोजन ?
"आर्थिक स्वातंत्र्य ! सिर्फ राजकीय स्वातंत्र्य ले कर
चाटना है क्या ? विजयश्री को वरने के लिये त्यागाश्वरी
होकर जाना पड़ता है । मजदूर आज त्यागवृत्ति अपनायेंगे
तो उनके वंशजों को ही उसका सुफल प्राप्त होगा। अमेरिका
का मजदूर वर्ग ५० वर्ष के पूर्व गोलीबार में आहत हुआ,
फांसीपर झूल गया लेकिन कार्य करने का समय ८ घंटे हो
गया। कोई किसी को मुफ्त में नहीं देता।"
'आपको सरकार ने गिरफ्तार कर लिया तो?"
मैंने क्या पाप किया है। कौनसा अपराध ?"
"अशांति निर्माण करने का। धर्म की कड़ी टीका
करने का साधारण जनता की धार्मिक भावनाओं को ठेस
पहुंचानोगे तो समाज में प्रक्षोभाग्नि धू धू करती भड़क उठेगी।
धर्म यानी क्या अफीम है ?"
"हाँ अपने प्राक्तन की वजह से तू दरिद्री है। शनि
मंगल तुझे सता रहे हैं। राहुसे बचने के लिये बाह्म-भोज
देना होगा । ऐसा कहनेवाला धर्म अफीम नहीं तो और क्या
लेकिन जो धर्म प्राणिमात्र को आत्मवत मानने का उपदेश दे
है वह अफीम नहीं बल्कि अमोल अद्भुत संजीवनी ।
भगवान बुद्ध व तीर्थ कर महावीर से महापुरूष खड़े रहते
और चराचरमें से उत्क्रांतित उनके मनको-हृदय को
चराचर के विषय में अपनापन लगता है, उनके प्रति सद्भ
व समभाव पैदा होता है ऐसी अलौकिक भावना अफीम
कहलाती। वह धर्म है क्या ? आपके तन मन में रोमरोम

मजदूरों के दुःखों में कभी सहभागी भी बनते हैं क्या? आपके
बिड़ला सेठजी ने फर्माया कि.मंदिरों पर हमारा कतई विश्वास
नहीं।' लेकिन भव्य अलिशान मंदिरों की निमिति कर,
धर्मवीर के नाते जनता-जर्नादन के समक्ष जाने में हमें
हिचकिचाहट कभी नही ! संस्कृति रक्षक का बाना धारण कर
सर्वत्र जाने में हर्ज भला किस बात का। ये सव संस्कृति के
रक्षक अयवा भक्षक ? और डालमिया सेठ ने मजदूरों को
बतलाया पैसा यह तो सांसारिक माया मात्र है। लेकिन खुद
सेठजी सुख की बन्सी बजाते हैं । एक शादी, दूसरी शादी और
तीसरी शादी ! स्त्रियां तो उनके लिये सब्जी से सस्ती प्रतीत
होती हैं । सुन्दरदास, ऐसे ही लोग आज के जग में धर्म व
संस्कृति के उद्धारक माने जाते हैं-उनका हर जगह सम्मान
किया जाता है। यह कितना बड़ा विरोधभास !"
"आपकी वक्तृत्व-शक्ति गजब की (अद्भुत) है।
" आपके प्रमाण-पत्र की कोई आवश्यकता नहीं ।
घनश्याम, हड़ताल करने की कल्पना भी की तो याद रखना
गिरफ्तार किये जाओगे।
'सरकार सिर्फ आपकी ही है ?
" तो फिर है किसकी?
गरीब-दीन-दरिद्रों को नहीं ?"
शब्द कहने को गरीबों की, लेकिन सूत्र संचालक तो
हम ही है न । और फिर संपत्ति से किसको हथिया नहीं जा
सकता? सारा का सारा अधिकारी वर्ग हमारे ही हाथ की
कठपुतली है। और तो और अगर चाहूं तो कल ही भापको
सीमा पार करवा सकता हूं।
"
17
"
॥
"

अच्छा । तो यही आपकी संस्कृति है ना? अच्छा हुआ
आपकी ही जवानी आपके भयंकर षडयंत्र का भंडा-फोड़ हो
गया। मेरे मन के किसी कोने में आपके प्रति आदर की भावना
आज तक सोई पड़ी थी, लेकिन वह भी हवा हो गयी।
'तुम्हारे आदर की हमें कोई आवश्यकता नहीं । जब
तक अंग्रेजी, हिन्दी, मराठी, गुजराती आदि समाचार पत्र
हमारी प्रशंसा के पुल बांधते हैं, अपने कॉलम के कॉलम हमारे
गुणगान से भरते हैं, तब तक हमें किसकी भीति ? संपादक का
कान पकड़ हम लिखावते हैं। पूरी तनख्वाह अवश्य देते हैं
लेकिम उसकी बुद्धि पर लटू होकर नहीं, बल्कि वृद्धि का
दुरुपयोग करने के लिये। उसकी स्वतंत्रता बुद्धि को मारने
हेतु । भीष्माचार्य जैसे विद्वान, बलाढय भी जव अर्थ के दास
वन गये तो इन बेचारे मामुली संपादकों की क्या मजाल जो
सर भी उठावें? तुम्हारे विरुद्ध अभी विषैला-प्रचार शुरू करवाता
हूं। और ऐसा सताता हूं, ऐसा सताता हूं कि काटो तो खून
नहीं आप समझते क्या है ?
मैं अच्छी तरह समझ गया कि आप एक द्रव्यान
व्यक्ति है।
" चुप रहिये ।
अच्छा नमस्ते।
सुन्दरपुर से निष्कासित न किया तो मेरा
सुंदरदास नहीं।
ईश्वर द्वारा निर्मित हुई पृथ्वी बहुत विपुल और नि
है । फिर मरने पर ३॥ हाथ की भूमि ही पूरी होती है
नहीं । साथ में ज्यादा भी ले तो नहीं जा सकते ।
"
।

१०१ । " ॥ घना वहां से चला गया । अव वहाँ शमशान शांति फैली हुई थी। जल लाऊं' व्यवस्थापक ने पूछा। एक गिलास ले आओ।" मालिक ने आदेश दिया। थोड़ी देर पश्चात् , गिलास भर जल पीके सुन्दरदास ने व्यवस्थापक से कहा 'हां, तो फौजदार व न्यायाधीश तो तुम्हारे परिचित ही हैं। उन्हें सब बातों से ज्ञात कर दीजिये और पैसों की तरफ जरा भी न देखना। किसी न किसी तरह इसका कांटा निका- लना ही चाहिये। यह सव मेरे जिम्मे । मैने वैसे तो सब बातें उनके कान पर डाल ही रखी हैं.। उन्होंने कहा, निश्चित रहिये । आप विश्रांति लीजिये । आपको बहुत कुछ क्लेश हुआ होगा व्यर्थ की चर्चा में। 'अच्छा तो मैं जाता हूँ। सुन्दरदास चले गये। व्यवस्थापक अपने पड़यंत्र को सफल बनाने के लिये आवश्यक सामग्री एकत्रित करने में लग गये। मजदूर-वर्ग में वायुवेग से समाचार प्रसारित हो गये कि घना व सुन्दरदास मिलने से कोई भी मांग पूरी न हो सकी। सर्वत्र असंतोपमय वातावरण फैल गया था । हड़ताल के सिवाय दूसरा चारा न था । एक दफे शक्ति की कसौटी कर देखनी चाहिये। घना सचित था। वह गिरफ्तार हो गया तो? उसे अपनी अनुपस्थिति में ? यही विचार उसे वार वार सता रहा था। हड़ताल का नेतृत्व करने के लिये कौन तयार होगा कौन मज़- दूरों में धीरना का शंख फूकेगा? सखाराम ! हां सखाराम " " २ ह सब कर सकता है। लेकिन सखाराम आयेगा? उसकी हन आयेगी? लाभ ही होगा! दोनो आ गये तो कितना अच्छा होगा। उसने मन-ही-मन में सखाराम को पत्र लिखने का निश्चय किया । और रात्रि में हम मजदूर कार्यकर्ताओं से सलाह मश. वरा कर घर आके उसे पत्र लिखने वैठा । प्रिय सखाराम, 4- काफी लम्बे अर्से के पश्चात् पत्र प्रेषित करने जा रहा तुम्हें मेरे आन्दोलन की सूचना नहीं होगी। इसी बीच सार तहसील का तूफानी दौरा कर आया हूं। अभी परसों ही तो सेठ सुन्दरदास जी को मिला था। लेकिन मिलने के अंत में निराशा को ही गले लगाना पड़ा। वे कुछ भी करने के लिये तैयार नहीं । अब हड़ताल के बजाय कोई उपाय ही शेष न रहा । लेकिन हड़ताल प्रारंभ होते ही मेरी गिरफ्तारी अटल- अचल है। तुम यहां आओगे क्या? कुछ नहीं तो मेरी गिरफ्तारी हो जाने के बाद तो आओगे न? मेरी गिरफ्तारी के पहले श्रा जाओ तो और भी अच्छा। मैं सब बातें तुम्हें अच्छी तरह से समझा सकूँगा । सबों से परिचय करा दूंगा। और हां ! मालत आये तो और भी अच्छा ! वे मुझे प्रायः पूछा करती थी । उनसे काम होगा अथवा नहीं। वह मन लगा कर काम में सकेगी। उनके जीवन में भी अदभुत आनन्द का निम् होगा । कर्महीन जीवन से वे ऊब गयी-सी लगती है। देश विचार कर । हो सकता है कि तुम्हें भी कृष्ण मंदिर की कात लेनी पड़े। लेकिन उस में बुराई ही क्या हैं ? बड़ी ने किया वही हम भी कर रहे हैं। इस बात पर गह १०३ विचार विनिमय कर प्रत्युत्ततर देना। प सबको मेरा प्रणाम। तुम्हाराही घना सखाराम कुछ कार्य वस उस दिन कहीं बाहर गांव गया हुआ था। बड़े भैया की पत्नी अभी अपने मैके से लौटी न थी। मालती अकेली ही घर में थी। डाकिया घना का पत्र घर के दालान में डाल चला गया। उसने पत्र हाथ में लिया तो उस पर सुन्दरपुर की मुहर पड़ी हुई निहारी । घना का पत्र । क्षण- भर में उसे घना को याद हो आयो। कभी कभी घना की मूर्ति उसके नयनों के समक्ष माकै सड़ी हो जाती थी। लेकिन वह उसपर पर्दा डालने की कोशिश करती थी। वावरे मन की निरर्थक आशा नहीं रखनी चाहिये ऐसा वह प्रायः सोचा करती। लेकिन आज उसका पत्र आया था। क्या होगा भला उसमें । मेरे विषय में कुछ होगा क्या उसमें ? भैया उसके पास कुछ बोले होंगे क्या? बड़े भैया को तो तीन इन्दा यो। पूरके तो देख, ऐसा भयासे बड़े भैयाने कहा भी था। लेकिन भयाने तुरन्त इन्कार कर दिया । न मालूम क्या होगा इस पत्र में ? पुनः बीमार नहीं पड़ गये? यहां पर नाये तो तनमन से उनकी मुथुपा सेवा करूंगी । पुनः एक बार उस तलया के किनारे ठोकरीका खेल खेलेंगे। तुम्हारे पत्थर को तो मानो पर लग गये हैं-ऐसा हो तो वे बोलें थे पिछले दफे। हंसी भी कितनी मधुर? आंखों में असीम करुणा लेकिन कभी कभी सात्विक संताप से आंखें लाल वीर बहुटी-टी सी बन जाती थीं। सचमुच ! घना नाम कितना मोहक है ? मेघराज कभी गर्जन- तालपर नृत्य करेगा तो कभी मौन एकादशीका प्रत अंगिकार

४
?
मानो, यह
र लेगा। कभी भास्कर की रश्मियों से होली खेलेगा। उसे
। घर है ना दर । कमी दूर की यात्रा पर जाता है तो कभी
चावरा बन पृथ्वी-सुन्दरी के निकटस्थ खींचा आता है । अपना
पूरा जीवन भू-नटी को सजाने में लगा देता है । सृष्टि रानी
को हंसा-हंसाके नित नयी लीलाका सर्जन करता है । घना,
तुम्हारा नाम भी कितना आनंददायी ! तुम किस भाग्यशाली
नारी की जीवन-भूमी को अपनी प्रेमदृष्टि से हरी-भरी करोगे?
मज़दूरों की, श्रमिकों की; हां न ? और मैं? मुझे कभी न
दोगे प्रेम ? मेरे प्रति क्या कभी सहानुभूति न दिखानोगे?
हाथ में पत्र ले मालती कल्पना लोक में कभी की खो
गई थी। स्नेहमई स्वर्गीय मांकी अकस्मात हो आई। मृत्यु
समय उसने कहा था, " तेरा कल्याण होगा पुत्री।" क्या मांके
शब्द गलत सावित (सिद्ध) होंगे ? हृदय की गहराई से उत्पन्न
उदगार स्वयं परमेश्वर के होते हैं। वेद-वाणी होती
है, अपौरुषेय वाणी है वह क्या कर गलत सिद्ध होगी ?
इस प्रकार की कित्येक विचार-लहरियों ने उसके ज्ञानतंतुओं
को चारों ओर से घेर लिया। उसने पत्र पर प्रेमपूर्वक दृष्टिपा
कियां । अक्षर क्या ही सुन्दर है ? उनका समस्त जीवन सुन्दर
से भरा पड़ा है - सौंदर्य तो उनको चेरी बनी फिरती है।
फिर उनके जीवन में किसी चीज़ की कमी नहीं ? समाज
के स्वर्गीयानन्द से क्या वाकई उनकी जीवन परिपूर्ण
होगा? किसे पता? मै पागल हूं। व्यर्थ में ही आशा क्यों
किसकी?
मालती, जा अपना सीलाई का काम देख। यहां
के घर सेवा करने का जितना अवसर मिले, करती
?

१०५
ज्यादा इन्छा न रख ।" ऐसा ही उसको अंतरात्मा कुछ कुछ
छुट पुटा रही थी । उसने धीरे से नयनो में आये प्रथु बिंदुओं
को साड़ी के छोरेसे पोछा । उसने पत्र को खोलने का कतई
प्रयल नहीं किया। 'मुझे किस बात का अधिकार' यो निश्वय
कर वह पुनः कपड़े सीने बैठ गयी।
दो-तीन दिन और व्यतीत हो गये लेकिन सखाराम घर
नहीं लौटा । पुनः घर त्याग कर जग भ्रमणार्थ निकल पड़ा
पया? अब तो मां की ममता का भी अदृश्य पाश न था अतः
चला गया क्या ? लेकिन इतने दिनो के दीर्यानुभव से मालती धैर्य
रखना सीख गई थी। पर वैसा ही पड़ा रहा प्रत्युत्तर की
चैनी से इंतजार करता । दो दिन व्यतीत हुए, चार दिन हुए
लेकिन प्रयुत्तर का नाम तक नही। सखाराम वकालत का
अभ्यास कर रहा था। वह आयेगा तो भी कैसे ? हो सकता है
कि बहन की शादी ठीक करने कहीं गया हो। घना के सामने
सुशील शांत मालती की मूर्ति क्षणभर में साकार हो उठी।
उसके पास वह हृदय खोल कर वोला करती थी, उसके साथ
निःसंकोच सेला करती थी। उसकी यहां आने को तीन लालसा
भी होगी उसे सार्वजनिक क्षेत्र में प्रविष्ट हो सेवा करने का
वेहद शौक भी था। वहां पर उसका विकास रुक गया है।
सखाराम के ध्यान में क्या यह सब न आता होगा? लेकिन में
भी तो एकदम यह सब कैसे कहूं ? और मेरा ना कोई घर है
न दर । आज जेल तो कल बंदूक की गोली । मालती है वहीं
भले सुखी रहे । एक मतवा उसने आंखें भर मेरी तरफ़ निहारा
था। लेकिन उसको दृष्टि में रहे मूक संदेश का ठीक अयं किसे
ज्ञात हो सकेगा, कौन समझ सकेगा? मैं मालती को पत्र ९

राम घर नहीं होगा अतः उसके नाम पर प्रेषित पत्र सी ने खोला भी न होगा। लिखू मालती को पत्र ? लेकिन लखू तो क्या लिखू ? प्रिय संवोधन प्रयोग में लाऊं तो क्या होगा? संवोधन आजकल रुढ जो हो गया है । अव पहले जैसे अर्थ की गहराई में कोई कभी नहीं जायेगा । और उसने एक पत्र मालती के नाम लिखा। प्रिय मालती, सप्रेम वन्दे प्रिय सखाराम वहाँ नहीं है क्या? तुम दोनो यहाँ पर आयोगे क्या? ऐसा पिछले पत्र मेंलिखा था। यहां परसों से हड़ताल का श्रीगणेश होगा। मजदूर वर्ग में उत्साह का वातावरण फैला है। जहांतक मेरा ख्याल है, हड़ताल प्रारंभ होते ही अथवा उसके कुछ पूर्व मेरी गिरफ्तारी होगी। सखाराम आ गया तो वह नेतृत्व कर सकेगा । आप भी आयीं तो मज़दूर- नारियों में अपेक्षा से भी ज्यादा उत्साह व धैर्य का निर्माण होगा । आपने मुझसे पूछा था, "मुझे क्या कार्य करना नहीं आयेगा?" संयोग से मनमांगी मुराद पाई है। यहां कार्य का ढे लग गया है ढेर । सुनहरे मौके को वातों में न खोइये साधारणतय ऐसे मौक़ रोज़-रोज़ नहीं पाते । जीवन में क्रांति निम करनेवाले ये क्षण होते हैं, जीवन नव सर्जन होता अकस्मात हम ऊंचे उठते है मानो हिमकर, दिनकर और त मंडल से चर्चा करने लगते हैं सच है ना? देखना। विचा सूचित कीजियेगा जो कुछ निश्चित करें सो। सखाराम नहीं है, उसके आते ही निर्णय सूचित करें। पहुंच ए कम से कम प्रेषित करियेगा। सबको सप्रेम वन्दन ।

भाभीजी का आगमन हुआ क्या ? जयंत, पारवी की बातें
निरंतर मुझसे कहा करती थी, लेकिन इनके निकट न होने से
मन उदास अवश्य रहता होगा। घर सूना-सूना लगता होगा।
बच्चे तो सुखी संसार के प्रतीक और घर की शोभा होते हैं।
सैर, आपके पत्र का वचनी से इंतजार कर रहा हूं।
घना
मालती के नाम से भूल-चूककर भी कभी पर न आता
था। उसकी न तो कोई सहेली और न ही वहन थी। उसके
नाम पर पन आया। यह तो वावरी बन गयो । अवश्य उनका
ही पत्र मेरे नाम आया? हां, मेरे नाम । भैयाने कसा लिखा
होगा भला । सिर्फ दो ही पंक्तियां होंगी अथवा फिर कोई
मधुर भावनोत्पादक संदेश । लेकिन वे तो कामकाज बाले जो
ठहरे उन्हें भला समय ही कहां प्राप्त होता होगा इधर उधर
देखने के लिये भी? ऐसे व्यक्ति अगर अपने पीछे काम का
लफड़ा लगा न ले तो वे चैन न मांगेंगे। वह प्रादिसे अंत तक
उसका पन एक सांस में पढ़ गई। एक दफा, दो दफा नहीं
तीन दफा पढ गई। जीवन में क्रांति निर्माणवाले पल !
सचमुच मेरे जीवन में कांति निर्माण होगी? घर से स्वप्न में
भी वाहर न जानेवाली अवोध मालती मजदूरों की प्रचंड
सभाओं में भाषण करेगी, उनके क्वार्टस में फिरेगी और उन्हें
धैर्य वंचायेगी यह क्रांति नहीं तो और क्या? लेकिन कांति
एकांगी नहीं होती बल्कि सागपूर्ण होती है । वह तो सतमुखी
होती है। ये ही क्षण क्या घनश्याम के शांत-गंभीर सागर
जैसे जीवन में हलचल पैदा न करेंगे ? वह विविध तरीकों से
विचार कर रही थी। और मेरे जीवन में क्रांति हो गई तो
-

?
वश्य उनके जीवन में भी हुए विना न रहेगी।
शाम को सखाराम बाहर गांव से घर लौट आया।
भैया, इतने भी दिन कोई बाहर गांव रहता है भला
उसने पूछा।
'वहां अकस्मात ही मेरी तबीयत खराब हो गई । अब
जरा ठीक हूं। व्यर्थ में ही तुम सवको चिन्ता न हो इस
आशय से सूचित नहीं किया।
लेकिन चिन्ता थोड़े ही मिटती है भला? कल बड़े
भैया ने एक दाना भी मुंह में न रखा । उन्हें लगा कि तुम पुनः
कहीं घर त्यागकर प्रयाण कर गये हो। सचमुच बड़े भैया का
हम सब पर अपार प्रेम है । तुम्हारा व मेरा खर्च बड़े भैया को
ही नाहक में उठाना पड़ता है-हमारे कारण उन्हें अत्यधिक
दुःख होता है । मैं तो समय व्यतीत करने मात्र करती हूं।
भैया, तुम्हारे उस सुन्दरपुरवाले मित्र का पत्र आया है। कल
अथवा परसों से वहां मिल में हड़ताल प्रारंभ होनेवाली है।
शायद प्रारंभ हो भी गई होगी। मेरे पत्र में वैसा थोडासा
उल्लेख मात्र है । हमें उसने बुलाया है। जाना है क्या ? वे
इन्तज़ार कर रहे होंगे? तुम्हें जो कुछ लिखना है उन्हें
कल लिख देना। तुम गये तो मैं भी अवश्य आऊंगा।
सखाराम ने आदिसे अंत तक घना का पत्र पूरा
लिया और उस पर विचार करता इधर उधर चहल क़द
करने लगा। मालती भोजनगृह में थी। वह उसकी र
करने गया। भाई बहन दोनो आपस में सलाह-मशवरा
रहे थे।
मालती, वहां जाना विपत्तियों से खाली नहीं ।

" पाया तो जेल यात्रा करनी पड़ेगी। हमारा तो कुछ नहीं लेकिन फिर तेरा क्या होगा? तेरी जेलयात्रा गादी में रोड़ा न बनी तो ठीक ...!" उसने कहा "मेरी शादी की आप क़तई चिंता न करें, मैंने पिछली ही मर्तवा नहीं कहा क्या? परम पिता परमेश्वर ने कोई उदार हृदय साथी जीवन क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिये दिया तो उसके साथ विवाह वद्ध होना या आजन्म कुमारी का जीवन व्यतीत कर इसी घर में ही सेवा करने का मैने दृढ़ निश्चय किया है। तुम मुझे साथ लिये विना हगिज़ न जाना। मैं तुम्हें वहां वोझा नहीं वनूगी। भैया, मालती में और किसी अन्य का संचार हो गया है। नियंल, अधीर, भयभीत, मुसविवर्ण मालती की मृत्यु कभी की हो चुकी है। मैं तो नवमालती हूं। धैर्यशील दृढ़ निश्चयी, फूर्तिलो ओर क्रांतिकारक मालती अब में हूं। "तेरी निडर वृति तो मुझे तभी ज्ञात जब तुझे देखने वह मूर्ख-पागल आया था, और तूने उसे आड़े हापों लिया था। मालती, तुझे अपने साथ ले जाने की हिमत नहीं होती। थोड़ी देर के लिये मान ले लाठी का स्वाद नखना पड़ा, गोलीबार हो गया, मारपीट हो गई, पत्थर लगा तो क्या होगा? बड़े भैया क्या कहेंगे? माताजी आसमान से क्या संदेश भेजेंगी? तु पिताजी के आंखों का तारा थी। बचपन में एक समय माताजी ने गुस्सा हो तुझे जरा पीटा तो पिताजी दौड़े आये और मां से कहने लगे, "मुझे पीटो लेकिन मेरी बीटिया रानी को कदापि नहीं। इन शब्दों ने गहरे असर काम का किया । फिर कभी भी मां ने तुम्हारी तरफ प्रांख उठा कर देगा सका नहीं । फिर तुम ही कहो, में भला कसे तुझे अपने समक्ष पु गयी थी, "

१०
जलती अशांति की ज्वाला में जलने के लिये वहां साथ में
ले जाऊं? भैया, मेरा सुख तुझे प्रिय है ना?
" यह भी कोई पूछने की बात है।
तो फिर इन्कार न करो, मेरी अनंत सुखनिधी सुन्दरपुर
में है । उस मंगलमयी मूर्ति के सानिध्य में महाकाल के समक्ष
भी निडर वन खड़ी रहूंगी।
" और तेरी मूर्ति जेल की चहार दीवारी में जकड़ गयी
तो-बंद करवा दी गयी तो?
मैं उस मूर्ति के उच्च ध्येय को दिल में वसा उसके
सिद्धि के हेतु आग में भी हंसती हंसती कूद पडूंगी।
बड़े भैया भी कभी के घर वापस आ गये थे। तीनो भाई
वहन साथ में खाने बैठे। खाते-खाते सब बातों की चर्चा हो
गई। दो दिन के पश्चात् भाभी आने वाली थीं। उनके पाते
ही मालती व सखाराम दोनो सुन्दरपुर की ओर प्रयाण करें
ऐसा तय हुआ। और दूसरे दिन सखाराम ने अपना निर्णय पत्र
द्वारा घना को सूचित कर दिया। मालती आनंद विभोर ही
नृत्य करने लगी। उसका पिछले लम्बे अर्से से निस्तेज चेहर
अनोखी अदृश्य ज्योति से दैदिप्यमान हो उठा। कभी दृष्टिगो
नहीं हुआ आज तक ऐसा मनमोहक सौंदर्य उसके अंग अंग
रम गया। दोनो भाइयों ने मन-ही-मन प्रभु से प्रार्थना
सुखी हो अनंत काल तक ।"
।

हड़ताल में
मजदूरों की प्रचंड समा लगी थी। आज ही अभी मिल से
वेतन मिला था। कुछ दिनों तक निर्वध व्यवहार चल सकता
था। वेतन प्राप्त होने के बाद ही हड़ताल प्रारंभ करने का
निर्णय काफी सोच विचार के पश्चात् किया गया था। आज
की सभा में हड़ताल-निधी के लिए रकम इकट्ठी की जाने वाली
यो । परसों से हड़ताल जो थी। चालो में से प्रचार बहुत ही
जोर शोर से हो रहा था। सुन्दरपुर में एक ही हलचल
थी। सभास्थल की ओर मजदूर व नागरिक पक्तिवद्ध जा
रहे हैं। हम नहीं हटने वाले, हम है लड़ने वाले।"
और घना रंगमंच पर आया। तालियों के गगन भेदी
कड़कड़ाहट से उसका स्वागत किया गया । बहुत ही देर
हो गई थी। उसने आते ही सभा का कार्य प्रारभ कर दिया ।
गंभीर, पंटरी विजलाल आदि मजदूर कार्यकर्ताओं के व्याख्यान
हुए । सहसा व्याख्यान के बीच में एक ने सड़े होकर कहा,
'मुझे कुछ बोलना है।
धमाल शुरू हो गई।
'आईए अवश्य अपनी वात वनलाईए। यहां सबको नोटा
दिया जाता है । विना रोक टोक के कोई भी बोल''
"

ए! इनका कहना हव लोग शांति से सुने । घना ने कहा। वह व्यक्ति रंगमंच पर आया। लोग उसे वासुदेव अण्णा ह पुकारते थे । आस पास के गांवों का निवासी न था बल्कि ह कोई दूर नगर शोलापुर की तरफ का था । वहां के भी कुछ मजदूर मिल में थे। उनका हड़ताल के प्रति विरोध था कुछ अंशो में । इधर मालिक-वर्ग ने मजदूरों में भेद नीति के अव- लम्बन में फूट डालने की कोशिश प्रारम्भ की थी। कोई कहता था कि उन्हें हड़ताल तुड़ाने के लिये बड़ी रकम भी दी गई थी। वासुदेव अण्णा बोलने के लिये खड़े हुए। मज़दूर वन्धू भगिनियों, मैं तुम्हें अलग ही बात कहने वाला हूं। हड़ताल वड़ताल के झंझट में हमें न पड़ना चाहिए। तुम में से बहुत से आसपास के हैं। तुम लोगों की छोटे-बड़े प्रमाण में खेती वाड़ी भी है। तुम्हारे सगे संबधी भी यहीं निकट हैं । तुम लोग हड़ताल जाहिर कर चले जाओगे लेकिन हम कहां जायें ? शोलापुर जिला के हम जैसे उदरपूर्ति के लिये आए दीन मज़दूर कहां जायें? इसके अलावा हड़ताल यशस्वी तो न होगी मालिकों के कारिन्दे प्रत्येक गांव में घूम बेकार वेवसों की भरती कर रहे हैं। पांच पांच रुपये के नोट का लालच दिखा पहले से ही नाम लिख रखते हैं । तुम सब शांति-मार्ग से अहिंसात्मक ढंग से हड़ता जारी रखोगे? लेकिन नये आने वाले मजदूरों को कौन माई लाल रोकेगा ? निधि-निर्माण कर रहे हो वह दो-तीन दिन लिए ही काफी होगी ये नेता कहलाने वाले तो नौ दो ग्य हो जायेंगे अथवा जेल यात्रा करेंगे। वह भी 'सी' क्लास में बल्कि 'बी' क्लास में। समाचार पत्रों में उनके नाम प्रशस्ति छपेंगी लेकिन हम सब तो मिट्टी में मिल जायेंगे। ऐसे नेता विश्वास घातक होते हैं। खैर, गर मान भी लिया जाये कि ये अन्य लोगों से नहीं हैं तो भी उनकी शक्ति ही कितनी? पांच दस हजार रुपयों की निधि भी जमा सकेंगे क्या ?'मैं तुम लोगों में से ही एक हूं (“पैसे साऊ! मजदूर-द्रोही ! मालिकों का हस्तक" प्रावाज़ सभा में से सुनाई देती है) तुम कुछ भी कहो मैं तुम्हारी सबकी भलाई के लिए कह रहा हूं। (खींचिए तो नीचे ढके- लिए इस पोर ! नमकहराम कहों का) मुझे जो कुछ कहना था मेने कह दिया है अब तुम सवों को जो अच्छा लगे करो। उनके नीचे उतरते ही घना बोलने के हेतु खड़ा हुआ " उसने कहा - ॥ - हम सब हड़ताल का निर्णय करने के लिए यहां एकत्रित हुए हैं । मै अपना कोई भी निर्णय तुम लोगों मत्थे मढना नहीं चाहता । मुझे अपने नाम, कीति व यश की कोई परवाह नहीं। मुझे यह सब नहीं चाहिए । मालिक-वर्ग के साथ तुम्हारी वात रह जाय - तुम्हारा सिर तन कर रहे - यही मेरी हार्दिक अभि- लापा है। इस दुनिया में तुम सव स्वाभिसान पूर्वक जीवन वसर कर सको - यही मेरा ध्येय है । आदि और अंतिम । तुम सब पर अन्याय हो रहा है, घोर अन्याय । और अन्याय का डट कर सामना करने का नाम ही सच्चा पुरुपार्थ है । तुम सब मनुष्य बनो। में अंतिम दौर तक तुम लोगों के साथ हूंगा । संभवतः में गिरफ्तार भी हो जाऊं तो मेरे अन्नय मिय सखारोम अवश्य तुम्हारा साथ देंगे । वर्ना ब्रिजलाल है, पंडरी है, कुतुब है , धनजी है रामदास है - उनके बताये रास्ते पर चलना- मागे वढ़ना । आसपास के ग्रामों की कृपक-वगं आवाज देगा।

४ - ड़े दिन तो यशस्वी तौर से मोर्चा दो। तुम में भी पानी है म निस्तेज नहीं - ऐसा सव को ज्ञान होने दो मेरे पास तुम लोगों को देने के लिए एक पाई भी नहीं है सिर्फ इस घट में एक प्राण है - और सयय आ गया तो इसे भी कसौटी प लगा दूंगा, लेकिन तुम्हें दग़ा न दूंगा। मेरे मन में और ए विचार के कभी से सुप्तावस्था में घर किये हुए है। पं जवाहरलाल नित्यप्रति ही कहते है, साहस करना चाहिये, नव-निर्माण करके जग को दिखाना चाहिए। मानलो कि हड़ निष्फल हो गई - मजदूर-वर्ग एक-एक, दो-दो कर काम पर जाने लगे तो जिन्हें स्वाभिमान पूर्वक जिन्दगी बसर करने की इच्छा है उनके लिये में एक नया प्रयोग योजन करने जा रहा हूं। वहां इन्दौर की ओर मेरे एक धनिष्ठ मित्र है। वहां जमीन भी वंजर पड़ी हुई है विना बोई। हम वहां नई वस्ती का निर्माण करेंगे। सभी प्रकार के भेद भावों को तिलाञ्जलि दे, वहां सर्व धर्म, सर्व संस्कृति, सर्व भाषा, सर्व जाति के साथ में. मिल परिश्रम कर सुखी ज़िन्दगी की बहारें लूटेंगे। वर्षों से बंजर पड़ी भूमि को पसीने की सिंचाई से नंदन वन में रमनीय स्थान में बदल देंगे। एक नये इन्द्रलोक का निर्माण करेंगे इन्दौर मालवा प्रदेश यहां से कोई दूर भी नहीं है। तुम्हें वह यसाँ स्थित अपने घर-बारों को छोड़ कर आना होगा। औ यहां के घर वार भी कहाँ सुव्यवस्थित है। अंध कारासन्न य की ये अंधकुप सी कोठरियां। हम सब एक नये जीवन की डालेंगे। एक नव प्रयोग से दर्शन समस्त विश्व को करायें सहकारी कृपि करेंगे घरोद्योग को विकसित करेंगे। छोटे घंधे खोलेंगे । एक दफे अपने पैर पर खड़े होने के बाद चाहिए ही क्या कुछ भी तो पराकन करने हो । तीन राता- निवां पूर्व इंग्लिस्तान के निवासी स्वतंत्र जीवन व्यतीत करने के लिए बनेरिका में स्थानापन होने गये थे। यहां उन्होंने घने जंगलों का जड़ मूल से सफाया लिया और नई नई वस्तियों की निर्मित हुई । साहस के दर वैभव कहां से? स्वतंत्र सुखी जिने नव संस्कृति को दिकसाचेंगे। नव प्रयोग करेंगे । मन ही मन निश्चय कर रखिये। यहां विजय यी हाथ न लाई तो वहां अवश्य करेंगे। अब यहां के नागरिकों से दो शब्द कहना चाहता हूँ ! मजदूरों का प्रश्न सिर्फ उनका अपना नहीं, बल्कि माप सबका है । अगर मजदुर हड़ताल पर चले जायेंगे तो आपका सब व्यवहार, सारा कारोबार क्षण भर में ठस जायेगा। होटेल, तांबुल गृह, रजत पट, सौदे बेचने वाली दूकानो नादि सबका ही होगा। देह में कहीं थोड़ा सा दिगाढ़ होते ही सारी की सारी देह विफल हो उठती है । ठीक उसी तरह तुम्हारा भी यह समाज गरीर है "तुका ल्हर्षे एका देहाचे अव्यव बर्यात् एक ही शरीर के सब कल पुर्जे हैं। आप अलग नहीं है इससे । अतः इस हड़ताल में सहयोग दे सहायता दीजिए । में नागा रखता हूं लेकिन यह सब तय तो मजदूरों को ही करना है। मैं कौन ? जहां तक आप मेरो वात अंगिकार करते हैं तब तक में हूं। मैं किती पर अपने निर्णय लदवाने की अनाधिकार चेष्टा न फलंगा। समझाकर करना मेरो वृत्ति । तुम्हें हड़ताल चाहिए क्या? न्यापार्य मोर्चा देंगे क्या? जय अपना पराजय इसका सवाल ही नहीं उता। लेकिन न्याय के लिए हमें तन तोड़ मिहनत-प्रपल करने हो चाहिए । कहिए, तुम्हें हड़ताल चाहिए क्या? (हां हां। हमें "

हड़ताल चाहिए मुक्कमल हड़ताल ) तो हाथ उठाइए
( असंख्य हाथ उपर उठते हैं) हड़ताल जिसे नहीं चाहिये,
वे हाथ उपर उठायें ! ( कोई हाथ उपर नही उठता)
थोड़ी देर पहले के विरोधक क्या चले गये ? या वे भी सवका
साथ देंगे? और कुछ भी हो। यह निर्णय तुम सवने
मिलकर सर्व-सम्मति से लिया हैं। हड़ताल के लिये मदद
चाहिए। आप हड़तालार्थ मदद दें। सभा समाप्ति के पश्चात
यहां मदद भर कर जावें। फिर सब ठीक व्यवस्था होगी।
हड़ताल की अवधि में जिसे सच्ची मुश्किलों का सामना
करना पड़े सिर्फ वे ही सहायता मांगो! नन्हें बच्चों को
लिए दूध बांटा जायेगा। ज्यों ज्यों हड़ताल की अवधि
बढती जायगी, त्यों त्यों मुश्किलों की भरमार होती
जायगी। बनिया उधारी से अनाज देना बंद कर देगा। हमें
भासपास के ग्रामों में से जो कुछ धन-धान्य मिलेगा, सब
के बीच समप्रमाण में बांट दिया जायगा। दाल कुरमुरे
बांटेगे । आप सब निश्चित रहिए। आपकी मुश्किलें मेरी
अपनी मुश्किलें हैं-और क्या कहूं ? खरी कसौटी का समय
प्रागया है। पीछे न हटें आगे ही बढ़ें।
जयहिंद" ।
घना के अपील करने देर थी कि रुपयों की सभा में
बारिश होगई और तत्काल सभास्थल पर ही पाँच हजार व
बढ़ी निधि इकट्ठी होगई । ग्राम निवासियों ने भी परिस्थिर
अनुसार खुले हाथ मदद दी । पार्वती की अंगूठी वहीं ।
निलाम कर दी गई और संस्कृति-मंदिरवाले एक प्राध्या
महोदय ने उसी अंगूठी को दो सौ रुपयों में सहर्प खरीद

मानों उसे संस्कृति मंदिर की पत्थर की चार दिवारी में संस्कृति के कतई दर्शन ही नहीं हुए । उसे सच्ची व उच्च संस्कृति के दर्शन तो इन बहुसंख्य फटे हाल मजदूर में ही हुए। भीड़से एक आवाज़ ने उसे चार शब्द कहने की आग्रह भरी विनंती की । आखिरकार उसने उठकर अपनी मातृभाषा में मजदूरों के सामने चन्द शब्द कहे जिसका सारांश यह था की- "संस्कृति तुम्हीं लोग समस्त विश्व को दोगे। सकल मानव हितोपी संस्कृति का जन्म अभी होता है ? जित संस्कृति के लिए आज अखिल विश्व हाय वटा रहा है ऐसी संस्कृति है कहाँ ? श्रमिकों को विश्राम मिलेगा, यथेष्ठ समय प्राप्त होगा, तभी तो वे संस्कृति संवर्धन करेंगे ना? राजाजी ने अभी परसो ही कहीं कहा, "समाजवादियों को काम नहीं उनका ध्येय तो बड़े बड़े तकियों पर लोटना है।" राजाजी जैसे विद्वान् व्यक्ति भी ऐसा कुप्रचार क्यों भला करते हैं ? समाज वादियों के लिए तो श्रम सी कोई पवित्र अन्य वस्तु नहीं । और अगर श्रमिक वर्ग को जरा भी आराम मिला- कार्य से छुटकारा मिला तो वह जीवनोपयोगी अन्य प्रानंद प्राप्त कर सकेगा। वह खगोल शास्त्र का अध्ययन करेगा, पुष्पायन करेगा। वह शौक से संगित-शास्त्र व चित्रकला के अथाह सागर में गोते लगा जीवत का असीम आनंद लूटेगा। वह शास्त्रत्ता बनेगा। राजाजी के द्वारा वणित व्यक्ति क्या चौबीस घंटे धुलि-कणों में लोटते है ? मन चाही बक बक करते ही हैं वे हिम्मत ही कंसे ? इस तरह का कुप्रचार आम जनता में करने की हिम्मत ही कैसे उनकी होती है ? श्रमिक वर्ग ही समाजवाद चाहते हैं। वे आलसी बनना कतई नहीं ८ हते वल्कि जीवन विकास व नव संस्कृति संवर्धन में हाथ टाने हेतु पूर्ण विश्राम चाहते हैं । वही सच्ची व उच्च प्रकार को अखिल माननीय संस्कृति होगी। श्रमिक ही सच्चा धर्म रंगे सच्ची संस्कृति का निर्माण करेंगे, मानवता समता न्याय पादिकी स्थापना करेंगे। तुम्हें अपने महान् कार्य में विजय मिले।" मजदूर संगठन विषयक प्रचंड घोष करते सभा समाप्त हुई । घना के कमरे में इने गिने कार्य कर्ता इकट्टे हो परस्पर सलाह मशविरा कर कोई कार्यक्रम निश्चित कर रहे थे। घनाने बाबूसे कहा-- बाबू, तुम्हारे जिम्मे मैं एक महत्वपूर्ण कार्य सौंपना चाहता हूं। तुम्हें इंदौर जाना होगा। अमरनाथ नामक मेरे एक अन्य मित्र वहां कृषि विभाग के प्रमुख हैं उन्होंने ही कुछ समय पूर्व अखबार में विज्ञापन छपवाया था कि जिन्हें नई वस्ती करनी हो वे सहर्ष श्रावें । इन्दौर रियासत उन्हें हर किस्म की सहायता विना किसी शर्त के प्रदान करेंगी। इन्दौर महाविद्यालय से ही उसकी व मेरी गहरी पहचान है । कृषि विद्यालय की उच्च परीक्षा अच्छे नम्बर प्राप्त कर उसने उत्तिर्ण की है। कितनी एक महान् योजनाएं उसके विलक्षण मस्तिष्क में हैं मैं जो पत्र दूं वह तू उसे देना । और प्रत्युत्तर लेकर पाना । मैं जेल की चार दिवारी में बन्द हो जाऊं तो वह सखाराम को दे देना । लॉक-अप में मेरी मुलाकात लेने की अनुमति मिले तो वहीं आकर कहना । ।" मैं अवश्य जाऊंगा भैया।" सचमुच हम नयी वस्ती की नींव रनें । नव समाज निर्मिती का प्रात्याक्षिक प्रयोग कर दिखावें । एक वार किया गया प्रयोग सफल होते ही साधारण जनता में बेहद उत्साह निर्माण होगा। पारावार कठिनाई व मुश्किलें सफलता की राह में रोड़े वन आयेंगी। लेकिन हम कुछ करके दिखायें। अगर संयोग यश कल यहाँ मालिक वर्ग के सामने नाक रगड़ के जाने का मौका आया तो सचमुच वहां, भूमाता के ओठों पर नव-मुस्कराहट लाने के लिये प्रयाण करें।" पंढरी की आवाज सर्वत्र गूंज रही थी। "मैने तो उस वस्ती का सर्वोत्कृष्ट नकदा भी हृदयांकित कर रख छोड़ा है कभी का । मनकी सुनहरी कल्पनाये प्रत्यक्ष में जव साकार रुप धारण करेंगी तब की बात तब है।" धनाने कहा । अल्पावधि के पश्चात् वहां से सव मित्र अपने अपने ठौर चले गये। वहां सिर्फ घना अकेला अटूला रह गया था पीछे । भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है - यही समझ में न आ रहा उसके । तभी वह चिंतित हो उठा उसने नाटय-स्पर्धा में अपनी नाटिका भी प्रेषित की थी। पुरस्कार्य वह मन ही मन सोच रहा था नाटिका पुरुस्कृत हो गई तो कितना अच्छा होगा। मालती सखाराम दोनो में से किसी का प्रत्युतर अभी तक नहीं। मुझ पर अप्रसन्न तो न हुई होंगी। ? मुझ पर अप्रसनता तो प्रकट करने जितना अपमान क्या मेरे प्रति उनके हृदय में होगा? वह भय्या पर लम्बा हुआ। थकावट के मारे सारी देह दर्द कर रही थी। शीघ्र ही आंखें लग गई उसकी और जब वह उठा तब धूप चढ़ गई थी भगवान दिनकर कभी के पृथ्वी भ्रमणार्थ पूर्व दिशा से प्रयाण कर चुके थे । आज रविवार होने की वजह १२० से छात्र समुदाय की सभा बुलाई थी उसने । वह उन्हें हड़ताल के समय अवश्य ऐसा कार्य सौंपना चाहता था। विद्यार्थी-वर्ग को आसपास के गांवों में चंदा वसूली व हड़तालियों के पीठ में घुसेड़ने वाले मालिकों का षडयंत्र, वेकार हो वहीं अपनी जगह रोक, निष्फल करना चाहता था । वह उन्हें पढ़ाना था। उनके सह स्वच्छता सप्ताह मनाता। सब के लिए उसके हृदर में प्रेम कुट कूठ कर पड़ा था । आवश्यक कार्यो से निवृत्त हो वह धर्यशाला की ओर गया। जहाँ विद्यार्थी-समुदाय की सभा होने वाली थी। सभा में उसने विद्यार्थियों को सब बातों से अवगत किया। विद्यार्थी-वर्ग में भी सहायता एकत्रित करने का आदेश दिया । अपना जीवन व्यापक प्रश्नो से जोड़ देना यही सच्चे शिक्षण का ध्येय है ऐसा चर्चा के दौरान में उसने कहा । विद्यार्थी समुदायकों कई टुकड़ियों में विभाजत किया गया सब के साथ प्रचारो-प्रयोगी पत्रक, गीत नारे, आदि सामग्री दे उन्हें मोर्चे पर विदा कर वह घर लौटा। दरवाज़ा खोलते ही लिफ़ाफ़ा पड़ा नज़र आया उसने उठाया और उत्मुक्तावश फाड़ा । मालती सखाराम दोनो के पत्र उसमें लख, आनंद विवल हो उठा। दोनो आने वाले थे। वह प्रसन्नता वारि में प्रफुलित हो नहाने लगा। निराधार हृदय को सहारा मिला मालती का पत्र छोटा लेकिन उल्लेखनीय था। . प्रिय घनश्याम, सुनहरे अवसर को हाथ से कैसे जाने दूं ? शतयुगों से क्षुधा पीड़ित, पिरसे थाल को भला कैसे सामने से हटायेगा? ऐसी घड़ियां जन्म में बार बार नहीं आती। और मनीषा रखती कि यही घड़ी मेरे जीवन में नव-क्रांति निर्माण करें। और 'hch

वह क्रांति करने वाला और कोई नहीं तुम्ही हो, सिर्फ तुम्हीं!
मालती
आज कहीं भी शहर भर में थाम सभा न थी। सारे
कामों की व्यवस्था हो रही थी। प्रत्येक मजदूर मुहल्ले व
चालों में समितियों की स्थापना की गई, जो हड़तालावधि मे
सारी व्यवस्था रखने वाली थी। घना के अन्य साथियों के
लिए यह सब एक नया शिक्षण था। संचालन कार्य के लिए
आवश्यक । जिन्हें कल राज्य संचालन को धुरा हाथ में लेनी
है। उन्हें इस से परिचित होना आवश्यक था। अनुभव यही
सच्चा शिक्षक। कितने एक वर्षों में जो ज्ञान हमें प्राप्त नहीं
होता वह दो दिनो अल्पावधि में होता है । अनुभव महा-
विद्यालय का महाज्ञान ! रात्रि में घनश्याम अपने मित्रों के साथ
बैठा हुआ था। मिल के अंदर कोई प्रवेश करने ही लगा तो
रास्ते में सोजाना। फिर क्यों न कोई शरीर पर से मोटारलारी
ही ले जाय, परवाह नहीं, यह तय हुा । अपने को गिरफ्तार कर
ही लिये तो बाद में से सभी को किस भांति व्यवस्थित रूप से
अांदोलन व दैदनंदिन कार्यक्रमों को कार्यन्वित करना चाहिए।
प्रादि प्रश्नो के विषय में सविस्तार जानकारी देने वाला पत्रक
घनश्याम ने लिख रखा।
" इसकी हजारों प्रतियां निकाल वाट दो? उसने कहा।
'सखाराम आ रहे है ना?"
'हाँ साय में उनकी बहन भी आ रही है । वह नारी-वर्ग
में समरस हो खूब कार्य करेंगी और हमारे आंदोलन को
वेगमय बनाएगी"
'तब तो बहुत ही अच्छा ! कव आ रहे हैं दोनों ?"
-

१२२
।
कल संध्या को आ रहे है। कल की सभा में उनका
भाषण रखेंगे । सभी से उनकी पहचान करा देंगे। सखाराम
तो पूरा देवता है देवता । काम का भी उसे काफी अनुभव है।
अगर में गिरफ्तार हो गया तो किसी वात कि चिन्ता न करना।
अन्त में धैर्य और आत्म-विश्वास ही हमारे सच्चे मार्गदर्शक है।
और हिम्मत, यही हमारी प्रिय सखी।" घनश्याम गम्भीर स्वर
में कह रहा था।
'वावू अभी कल ही आखरी गाड़ी से गया है।
रामदास ने कहा। अमरनाथ क्या कहता है यह भी देखें।
वह है दिलेर आदमी । आठ-दस दिन तो हड़ताल चलेगी
ही । आगे का नहीं कह सकते ?"
"देखे तो सही । प्रकृति यही मनुज का आद्य कर्तव्य ।"
चर्चा विचारणा के पश्चात सभी कार्यकर्ता गण अपने अपने घर
लौट गये। घनश्याम अभी
कुछ लिख रहा था पता नही वह
काव्य था अथवा पत्र । नहीं नहीं वे तो दो अलग-अलग पत्र
थे मालती और सखाराम के लिये अगर उसे अचानक
गिरफ्तार करलें तो । पत्र लिफाफे में बंदकर वह शय्याधीन
होने जा ही रहा था कि रामदास ने दौड़ते हुए प्रवेश किया ।
रामदास बात क्या है ?
'सिपाही आ रहे हैं। तैयारी कीजिए। मुझे आदेश
दीजिए।
तुम इसी कमरे में सोना । सखाराम और मालती
को यही रहने के लिये कहना । ये दोनों पत्र उनके लिए हैं।
तुम इन्हें अपनी जेब में रख दो। और शेष सभी. काग़ज़
यहाँ से ले जाओ। व्यवस्थित रख दो । मैने तैयार किये पत्रक
।

"
की हजारों प्रतियाँ आज ही रात निकालने का प्रवन्ध करो।
कोई शांति भंग न करे वल्कि शांत रहे । जाओ ये सभी कागज
लेकर।"
रामदास महत्व के सभी काग़ज़ ले कर चला गया ।
घनश्याम तैयार हो वैठा। उसने अपनी जेब में 'गीता' की
प्रति रखी और तकली पर सून कातने बैठा। अल्पावधि के
के पश्चात् सिपाहियों का अपने अधिकारियों सहित आगमन
हुमा ।
'आइए, कल ही से आपकी प्रतीक्षा कर रहा हूं।
घमश्याम ने स्मित पूर्वक कहा।
अंत तक हमें यही लग रहा था कि आप हड़ताल की
राह पसंद न करेंगे."
किन्तु जनाव, हड़ताल टालना तो मालिक-वर्ग के हाथ
की बात है मजदूर वर्ग के नहीं आजतक जोंक की नाई वेचारों का
शोषण करते आये हैं । भला उन्हें क्यों आप कृष्ण-मंदिर की
यात्रा करायेंगे। वास्तव मे अगर देखा जाए तो वे ही चोर हैं।"
"कितु हमें तो कानूनानुसार सभी करना पड़ता है ।
आपको तयारी पूर्ण हो गई कपड़े • लतें जो आवश्यक लगें
ले लीजिए।
" चलिए गठरी तैयार है।
कमरे वीचोंबीच दीवार पर टंगी हुई महात्मा जी के पूरे
क़द की तस्वीर को उसने मन ही मन वंदन किया और
चल पड़ा।
"कमरे को ताला लगायेंगे?"
नहीं, अभी मेरे साथी यहां आयेंगे।"
"

इतने ही रामदास का आगमन हुआ। रामदास की ओर
निहार घनश्याम ने कहा अच्छा रामदास ! सवको वन्दे
मातरम् ! मैं चला। शांति पूर्वक हमारा आन्दोलन चला
हड़ताल सफल वनाना।
"आपके आदेश का अक्षरश पालन करेंगे भैय्या ।"
पुलिस के साथ घनश्याम चला गया। उसे तहसील के
लॉकप में बन्दी बना लिया गया। अवैधानिक रूप से उसकी
तलाशी ली गई। जहां उसे वन्दी रूप में रखा था उस कमरे
को बाहर से ताला लगाया गया । घना लॉकप में चहल-कदमी
कर रहा था देह सरकारी नोकरशाही के प्रतिनिधियों द्वारा .
वन्दी बनायी गयी थी पर मन विश्व में संचार कर रहा था।
मानव-मन कहीं भी हो स्वतंत्र रह सकता है। वास्तविक रूप
में मन का सदसद विवेक बुद्धि का एक स्वातंत्र्य स्वरूप है ।
वैसे तो इस विश्व में एक प्रकार से हम सभी परवश ही हैं।
शास्त्रों की कितनी ही प्रगति हो जाने के पश्चात् क्षणार्ध में
मूसलधार वर्षा होती है, भूचाल घटनायें भी दिन दहाड़े होती
हैं, ज्वालामुखी फटते हैं, उष्णता की लहर मानव - मन को.
त्रयस्त कर देती है, और कड़ाके की ठंड पानी जमा देती है।
ऐसे विचित्र संसार में केवल एकही स्वतंत्रता है और वह यह
के मैं अपनी सद्सद् विवेक बुद्धि के अनुसार चला हूं। विश्व
में रही पाशवी सतायें फांसी पे लटकायेंगी, वंदूक की गोली सीने
आरपार करवा देंगी। वे मेरे शरीर को मिटा देंगे; किन्तु
मन पर कौन
हुकूमत
चलायेगा? जुल्मी
कानूनो को
ती ठोक कह सकते हैं कि तुम मुझे चीर डालोगे • मुझे
कड़े टुकड़े कर डालोगे; पर तुम्हारे अन्याय अत्याचारों के
रे
हम

१२५ सामने भूल कर भी मस्तक न झुकाऊंगा। घना उसी अलौलिक स्वातंत्र्य का अनुभव कर रहा था । सखाराम और मालती के स्वागतार्थ वह जा नही सकता, संपूर्णत: असमर्थ है, अतः उसे दुःख हुआ। दोनो को पहनाने के लिए उसने सूत की माला कात कर तैयार की थी, गड़बड़ में उपरोक्त वात उसने पत्र में लिस रखी थी। उसके कमरे में रामदास बैठा हुआ था। ये मालायें याने वाले साथियों के सन्मानार्थ' चिठी पर लिखा हुआ था। दूसरे साथी-कार्यकर्ताओं का आगमन हुग्रा । घना द्वारा लिखित पत्रक वे सायक्लो स्टाइल प्रतियां निकालने के लिए ले गये। रामदास ने कमरे की चीजों को ठीक से व्यवयित रूप में रखा और वह निद्राधीन हुआ इधर लांकप में घनश्याम भी तन-मन को विश्राम देने के लिये खाट पर लेटा, लेटते ही उसकी आंखें लग गई। और इधर मालती उठी । सखाराम और वह दोनो आज की गाड़ी से निकलने वाले है । घनश्याम के लिए उसने खास- तौर पर खाने की चीजें तैयार कर, साथ ली हैं और कुछ फल-फूल भी। भया विदा दो।" बड़े भैया के पांव छू मालती ने कहा। "तेरी भाभी आजाने के बाद जाती तो" बड़े भैया ने गंभीर स्वर में कहा। "दो दिन तो उनके लिये रुक गई, अब और कितनी रुकू? शायद वे वहाँ गिरफ्तार भी कर लिये गये होंगे । भाभी को नमस्ते कहना । जयंत, पारवी को मेरे चुंबन । और आप तवियत का ख्याल रखना । मेरी कतई चिन्ता न करना भय्या। "

१२६
।
सब ठीक होगा। नई दृष्टि, नयी सृष्टि ! माँ का आशिर्वाद
हमारे साथ ही है।
सखाराम चिट्ठी डालना, न भूलना। बाल-बच्चों को
छोड़ में आ न सकूँगा, पर जाओ, अपने कार्य में सफलता पाना।"
बड़े भैय्या कह रहे थे उनके स्वर में वात्सल्य का कम्पन था ।
आपका स्नेह है तो सब कुछ है।
सखाराम और मालती रेलगाड़ी में बैठे। मालती के
जीवन में आज नव प्रयोग की नींव पड़ी नया प्रयोग ।
सखाराम सारे हिन्दुस्तान की खाक छान आया था। पर
मालती ने तो कभी भूलकर भी चौखट के वाहर पैर न रखा
था । आज वह फूली न समा रही थी, उसके उत्साह का
पारावार न था । किसी एक स्टेशन पर उसकी दृष्टि रामफल
पर पड़ी। उसने सखाराम से कहा- "भैय्या, लोगे क्या? उन्हें
रामफल की ही भेट देंगे।
सखाराम ने रामफलों की सहर्ष खरीदी की। मालती ने
उन्हें सम्हालकर टोकरी में रखा । वह खिड़की से बाहर दूर
दूर तक दृष्टि गड़ाये देखने में तल्लीन थी। भला क्या देख
रही थी ? गाड़ी पूरे वेग से अपनी मंज़िल की ओर अग्रसर हो
रही थी। गाड़ी के साथ ही उसका विचार-चक्र भी गति
पकड़ रहा था। उसका हृदय-पंछी कभी का उड़कर घनश्याम
के निकट पहुंच गया था, पर मिट्टी देह को जाने में समय
लगता है । अतः वह पूर्णतया असमर्थ थी।
संध्यारानी व्योमरथ से उतर भूपरिक्रमा के लिये तैयार
हो रही थी । सुन्दरपुर नज़दीक आया। मिल दृष्टिगोचर होने
लगी। नदी किनारे चिरकाल से अटल अचल उन्नत मस्तक
.
,

१२७ किये खड़े मंदिरों को निहार, मालती ने श्रद्धातिक्त हो भाव पूर्वक प्रणाम किया । गाड़ी की गति मन्द होती जा रही थी। और इधर मालती के हृदय की धड़कन पल-पल में द्विगुणित होती जा रही थी । घनश्याम से क्या बोलूं, कैसे बोलूं उसकी ओर कैसे निहारूंगी, हसू अथवा गंभीर बनी रहूं आदि अनेक अकस्मात उपस्थित हुए प्रश्नो का निराकरण खोज रही थी वह। किंतु निराकरण मिलता ही न था। उसे राह नज़र न आरही थी। वह सोच रही थी “कृत्रिमता क्यों-बनावट किसलिये ?" हृदम में छुपाई भावनाएं-अरमान भले ही नयनी में तैरने लगें। सूर्य का दर्शन होने पर किस तरह विकसत होना चाहिये यह सुरजमुखी पुप्प-समुदाय अच्छी तरह जानता है । सुरजमुखी भला कौनसी पूर्व नियोजित योजना रखते है ? वसंतऋतु के भागमन होने पर किस तरह 'कुछ-कुऊ' मृदु ध्वनी से वन-उपवन गूंजा देना यह क्या कोकिला तय करती है ? वह सब सहज होता है। प्रकृतिप्रघ्त नियम निरंतर चलते ही रहते हैं । वह रहा स्टेशन । क्या ही भीड़ थी वहाँ ? गाड़ी के पहिये सुन्दरपुर का प्लेटफॉर्म आते ही रुक गये । “ मजदूर वर्ग की विजय हो, घनश्याम जिन्दावाद, सखाराम जिन्दावाद ।" आदि के तुमुल घोप से सारा स्टेशन निनादित हो उठा। किंतु घनश्याम कहाँ है ? मालती के नयन स्टेशन पर की भीड़ में धनश्याम को खोज रहे थे सर्वत्र । उसे अपना निधान नहीं मिला। "ये माला स्वीकार कीजिए । घनश्याम ने आपके लिये खासतौर से भेजी है। उसने स्वयं अपने हाथ से काते सूत की यह माला है।" रामदास ने सखाराम के निकट आ कहा।

१२८ वह कहाँ हैं ?" मालती ने प्रश्न किया सरकार के आतिथ्य का स्वाद चख रहे है।" 'क्या उन्हें गिरफ्तार कर लिया ?" "हां, कल ही शाम को। और हड़ताल ?" सखाराम ने गंभीर बन पूछा। हड़ताल का आज प्रथम दिन है । कुछ मज़दूर अवश्य मिल गये थे पर वे भी अल्पावधि के पश्चात बाहर निकल आये । आज रात को प्रचंड सभा होने वाली है । आपके भी भाषण रखे हैं।" ब्रिजलाल ने कहा । सहसा भीड़ में से एक लड़का सखाराम की ओर आरहा था । “अरे, कहाँ जा रहे हो, कीन चाहिए तुझे ?" आदि प्रश्नों की झड़ी लग गई पर वह चुपचाप आगे बढ़ रहा था। निकट आ, सखाराम के चरणों पर झुक पढ़ा। कौन रुपल्या ? उठ ! पागल कहीं का। यों किसी के चरणों में नहीं गिरना चाहिए । राष्ट्र को अब किसी के आगे घुटने नहीं टेकने चाहिए। खड़े रहना चाहिए । गणा का स्वास्थ्य कैसा है ?" सखाराम ने उसे बाहों में लेते हुए कहा । अच्छा है। सखाराम और मालती का जुलूस धूमधाम से निकाला गया । यह भी एक नया ही अनुभव था मानो ज़िम्मेदारी अभी कंधे पर गिरना चाहती थी। स्थान-स्थान पर उसकी आरती उतारी गयी। " भला किस लिये हमारा सत्कार, सम्मान हमने क्या किया है ?" प्रश्न दोनो भाई-बहन के हृदय में रह- रह कर उठ रहे थे। लेकिन यह घना की तपस्या का फल था। वे दोनो उसके ही होने की वजह उसका भी सत्कार हो रहा १२९ राम- था । घना का कमरा आया। नारे लगे। "भोजन के पश्चात् सीधे सभा में ही जायेंगे। दास ने कहा। मंदिनी विखर गई । सखाराम तथा मालती आवश्यक क्रियाओं से निवृत हुए । भोजन किया । थोरी देर के लिए मालती लेट गयी। सखाराम, सुन्दरपुर और हड़ताल के विषय में सविस्तार जानकारी प्राप्त कर रहा था। मालती ने घनश्याम द्वारा तैयार किये गये सूत के हार को हृदय से लगा मन ही मन कहा - "उन्होंने मेरे लिये हार तैयार किया । मैं भला कब उन्हें हार पहनाऊंगी? कल मिलने जायेंगे तब अवश्य पहनाऊंगी। और वह भी यही हार जो उन्होंने मेरे लिये तैयार किया था खासतौर पर । दोनो के लिए एक ही हार केवल एक हार । दो प्रेमी हृदयों को चिरकाल के लिए परस्पर जोड़ने वाला, जीवन ग्रन्थियों को सुदृढ़ करने वाला। सभा का समय हो गया। नागरिकों की भीड़ सभास्थल की ओर उमड़ रही। मजदूर वर्ग के उत्साह का ठिकाना न था । गीत पेवाड़ों का कार्यक्रम कभी का प्रारम्भ हो गया था। सखाराम और मालती मजदूर कार्यकर्ताओं के साथ सभा- स्थल पर जा पहुंचे। उनके स्वागतार्थ सभा में तालियों की प्रचण्ड कड़कड़ाहर हुई जयघोशों से व्योम गूंज उठा। विज- लाल ने श्रोताओं को दोनो भाई-बहन का परिचय देते हुए कहा- 'वायू सखाराम सुन्दरदास वाले नन्कृति मंदिर में ? दिन थे । पर जब उन्हें ज्ञात हुआ कि नकृति मंदिर का र खर्च मजदूर वर्ग की तनख्वाह में में काडी अमुक में चलाया जाता है । तब ये वहां से चल पड़े त्याग पत्र दे १३० के लिए इन्होंने फकीरीवृति का अवलम्बन किया है। मानः सेवा से ये विवाह बद्ध हुए । हिन्दुस्नान के प्रत्येक प्रदेश, शहर और भूमि को छान इन्होंने अलौकिक अनुभव-ज्ञान प्राप्त किया है हमारे नेता घनश्यामजी के ये अभिन्न हृदय मित्र है । और यह सुश्री कुमारी मालती देवी । उच्च शिक्षण प्राप्त हैं। यहां मजदूर वर्ग को धैर्य बंधाने और उनके न्यायार्थ प्रारम्भ किये आन्दोलन-प्रवाह में गोता लगाने यहां आई हुई हैं। बाबू सखाराम इनके बन्धु हैं। दोनो ही माननीय मेहमान दो शब्द हमें कहेंगे । शांति से सुने । ब्रिजलाल के स्वस्थान लौटते ही सखाराम ने खड़े हो सभा में उपस्थित सभी श्रोताओं को दोनों हाथ जोड़ नमस्कार किया और अपना वक्तव्य प्रारंभ किया- "जाहिर में बोलना मुझे आता नहीं। भाषण देना मैने सीखा नहीं । मुझे कोई सेवा कहे व कार्य की जिम्मेदारी मुझ पर डाले में अवश्य करूंगा। घनाश्याम के आदेशानुसार में यहां आया हूं।तुम सब न्याय के लिये कष्ट, भूख, बेकारी का सामना करने तैयार हुए हो यह देख, मेरा हृदय मारे आनन्द के झूम उठा है । जब मैं सेठ सुन्दरदास के संस्कृति मंदिर में था तक तुम लोगों में अाज जैसी जागृति न थी। घनश्याम बहुत बड़ी तपश्चर्या की है। उसने पाखाने साफ किये, रास्तों में झाडू लगाये साक्षरता के वर्ग चलाये । तुम्हारे पंगठन की नीव उसने सुदृढ कर, उस पर आज बड़ी इमारत ड़ी की है। आज वह कैद में है-बन्दीवास में है। अन्याय और अत्याचारों की नींव पर जमी नौकरशाही में न्याय के ए प्राणार्पण करनेवाले देश के सच्चे सपूतों का स्थान कृष्ण ने मन्दिर ही है। घनश्याम भले हो वन्दीवास में आज बन्द है पर उनका स्थान विचार तो तुम्हारे हृदय में हैं। उसी के आदेशानुसार हम भविष्य में आन्दोलन चलाने का प्रयत्न करेंगे। सखाराम के बैठते ही मालती भाषण देने खड़ी हो गई। प्रथम वह घबराई, विव्हल हो उठी। जहां दृष्टिपात करे वहां मनुज ही मनुज । किंतु सहसा उसमें स्फूर्ति का संचार हुआ, घबराहट कहीं भाग गई । उसने सुदृढ़ स्वरूप में कहा - 'भाइयों तथा वहनो में एक सामान्य नारी हूं। मुझ से बन सकेंगी उतनी सेवा-सुश्रूपा आप सब को निस्वार्थ भाव से करूंगी। तुम्हारी चालों का परीक्षण करूंगी। तुम्हारे फटे जीर्ण-शीर्ण कपड़े सी कर दूंगी । बीमारों को औपध दूंगी। तुम सभी के साथ जिऊंगी और मरूंगी।तुम सव हड़ताल पर हों। तुम्हें सहाय की आवश्यकता पड़ेगी ही। तुम लोगों ने पांच हजार का कोप इकट्ठा किया है। पार्वती देवी ने उसमें अपनी मुद्रीका दे अपूर्व उदारता दिखाई - यह भी सुना और मैं झूम उठी ! मैं गरीव हूं। पर मेरे दोनो हाथों में जो सोने का अंग है, कुमारीत्व के प्रतीक स्वरूप। उसे मैं तुम्हारे कोप के लिए देती हूं । तन - मन - धन अर्पण कर सेवा करनी चाहिये। ऐसा प्रायः कहा जाता हैं। ईश्वर तुम्हारे आन्दोलन को सफल बनाये । हड़ताल सफल होवे । उन चूड़ियों का वहीं पर नीलाम किया गया। कस्बे के एक अमीर युवक ने पांच सौ की बोली में उन्हें खरीदा। सभा में ही बहुतों ने हड़ताल-कोष में निज की शक्तिनुसार मदद दी। बड़े ही उत्साह के साथ सभा समाप्त हुई। मालिक-वर्ग के पिळू-कारिदे मजदूरों में फूट डालने का "

१३२
जी-जान से प्रयत्न कर रहे थे। आस-पास के गांवों में रहे
वेकारों को लालच दिखा भरती करने की पराकाष्टा की जा
रही थी। किंतु ताहम फल दृष्टि गोचर नहीं हो रहा था।
मालती और सखाराम मुहल्ले-मुहल्ले तथा गली-गली में घूम
हड़ताल सफल बनाने को हड़तालियों को प्रेरणा देते थे। किसे
क्या चाहिए, किस चीज़ की आवश्यकता है - इसकी वे निरंतर
जांच करते रहते । वह देखिए बच्ची । उसका जंपर फटा
हुआ है। मालती वहीं रुक गई और
ठहरो तो तुम्हारा
जंपर सी देतो हूं' मृदु स्वर में कहा । जेब से सुई-डोरा निकाल
जंपर सी दिया उसने। उसके आस-पास मज़दूर-नारियों की
भीड़ लग गई । उसे वे अपने सुख दुख की कहानी सुनाने लगीं।
होमियोपेथी का उसने घर बैठे-बैठे ही अभ्यास किया
था । उसने कहा " कल मैं अपनी पेटी ले आऊंगी। इन बच्चों
को दवाई दूंगी। मीठी दवाई ।
वहाँ झाडू हाथ में ले सखाराम चाल स्वच्छ करने में लग
गया । और भी बहुत से हाथ बांटते लगे।
शावाश वेटा! वास्तव में आप घनश्याम जी के मित्र
प में शोभा देते हैं।" वृद्ध मतहारी ने शावाश देते हुए कहा।
" घनश्यामजी ने यहाँ पाख़ाने साफ किये थे और हम
थ-पर हाथ धरे निरा देखते रहे।
उनकी केस का क्या होगा?" हरी ने पूछा।
" मैं आज उनसे मुलाकात करूंगा।
सखाराम ने
त्तर दिया।
अल्पावधि के पश्चात् मालती और सखाराम अपने कमरे
जोट आये। वहाँ घनश्याम का चर्खा-यंत्र टंग रहा था
मार्तड ने कहा।

१३३
।
॥
एक खूटी से । मालती ने उसे नीचे उतारा, साफ़ किया और
सूत कातने लगी । सयय वीतते देर न हुआ । भोजन का समय
हो गया
घनश्याम स्वयं ही पकाया करता था। वन्दी गृह
में उसे भोजनालय से थाल भेजा जाता था प्रायः ।
में भोजन बना कर उन्हें भेजूंगी।" मालती ने कहा ।
" व्यर्थ ही में भला क्यों कष्ट उठाती हैं?" रामदास ने
कहा ।
'यह कप्ट नहीं बल्कि आनंद है संतोप है मेरे लिए।
उसने उत्तर दिया।
'आप दोनो की हमने तो भोजनालय में ही व्यवस्था
कर दी थी।" उसने कहा ।
'भोजनालय चला क्यों ? मेरे पास पर्याप्त समय है।
यहां भोजन के लिए आवश्यक सारा सामान भी मौजूद है।
भय्या साग-भाजी वजार से ले आयेंगे। आप बुरा न माने
अपने मन में । वुद्ध वही ही आया तो भोजनालय है ही।" उसने
गंभीरता से कहा
रामदास जाने के बाद मालती ने चूल्हा सुलगाया।
सखाराम दूसरे कमरे में बैठा कुछ लिख रहा था। थोड़ी देर
के बाद रामदास ने साग-भाजी ला दी। मालती ने रोटी,
साग चटनी बनाई। भोजन स्वादिष्ट बना था । अव्यवस्था
दोनो को कतई पसंद न थी। उसने घनश्याम के लिये टिफीन
भरा, घरसे लाई मिठाई भी उसमें रखी और करंडक में के
फल भी । सखाराम सब ले गया । और मालती रसोईघर
साफ करने में लग गई।

१३४
"यह चिट्ठी उन्हें पहुंचा देना।" सखाराम ने द्वार पर
खड़े हो कहा।
रामदास टिफिन लिये जब लॉकप में पहुंचा तव घनश्याम
तकली पर कात रहा । रामदास को लख घनश्याम आनन्दित
हो उठा । उसके होठों पर मुस्कराहट दौड़ गई। सिपाही ने
द्वार खोला। टिफीन तथा करंडक घनश्याम को दिये गये।
"ये फल भला किसलिए?" उसने पूछा
मालती बहन आपके लिये घर से साथ लायी थी अतः ।
रामदास ने प्रत्युत्तर में कहा भोजनोपरांत घनश्याम ने रामफ़ल
काटा । उसमें से कुछ हिस्सा सिपाही तथा रामदास को भी
दिया। काफी स्वादिष्ट था ।
"अरे, हाँ ! बाबू सखाराम ने आपके लिये यह चिट्ठी
।
दी है।
सिपाहीदादा को दिखा कर दे।" घनश्याम ने सिपाही
की ओर दृष्टिपात करते हुए कहा दे दीजिए । कोई बात नहीं।
उसमें लिखा ही क्या होगा? तुम सब सीधे-सादे लोग। बम
फोड़तेवाले भले थोड़े ही ?"
घनश्याम ने सखाराम की चिट्टी आधोप पढ़ली। उसमें
विशेष कुछ भी न था। वर्तमान स्थिति का संपूर्ण चित्रांकन
किया गया था। रामदास ने पिछले रोज़ हुई सभा का सभा
वृतांत सुनाया। चूड़ियों वाली घटना भी उसने सुनाई।
"तुम लोगों की मुझे सेवा-सुश्रूषा करनी है। हाथमे सुवर्ण
चूड़ियाँ रख, भला मैं किस भाँति कर सकूँगी।
मालती
वहन
ने अपनी बुलन्द आवाज में कहा था । व थोड़ा बहुत मजदूर
नारियाँ रो दी । सभा पर उनके भाषण की अमिट छाप पड़ी।

किंतु इधर मालिक-वर्ग मजदूरों में 'येनकेन प्रकारण' फूट
डालना चाहते हैं । मजदूरों को अपने पैसे के वल पर खरीदना
चाहते हैं। देखें क्या होता है आगे-आगे । पर परिस्थिति
दिन-ब-दिन विषमता धारण कर रही है। अभी तो केवल
आरम्भ ही हुआ है । सत्ता इसमें हस्तक्षेप करेगी ऐसा आज
तो प्रतीत नहीं होता । यूनियन मिट जायगी ऐसा ही शायद
सरकार और मालिक-वर्ग ने परस्पर मिल निश्चय कर दिया
रामदास ने सरोप कहा।
" इन्दौर से वाबू पायगा?"
'नहीं।
उसके आते ही मुझे सूचित करना।"
"आपके केस का क्या?"
"सुना है न्यायाधीश की बदली हो रही है। दूसरा जव
जव इसके रिक्त स्थान की पूर्ति करेगा तभी केस निकलेगी।
रामदास चला गया। धनश्याम लॉकप में चहल कदमी
करने लगा। करंडक में रहे बेरो को उसने चखा । हृदय-सिंधु
में विचारों का तूफान उठ रहा था। हड़ताल के विचार थे
ही; बीच बीच में मालती की भोली मूर्ति दृष्टि गोचर
होती थी कि सहसा उसके मन में एक नई कल्पना ने जन्म
लिया । करंडक में चिठ्ठी चपाती तो न होगी? उसने करंडक
में से सभी फल बाहर निकाले पर चिट्टी कहीं नजर न बाई
वह लज्जित हो उठा। यों चोरी-चोरी, सखाराम को वह
चिट्ठी भला देगी भी कसे ? मेरा यह सोचना भी गलत का
मन स्वार्थी बनते ही दूसरी दृष्टि से विचार करने लगताई:
वह अपने ध्येयवाद को अल्पांग में भी विस्मरण

१३६ प्रत्युत्तर दिया। विचार लहरियों के थपेड़ों से परेशान हो उसने चटाई पर शरीर टेक दिया। और अल्पावधि के पश्चात् उसकी आंखें लग गई तीसरे प्रहर मालती और सखाराम उसे मिलने पाये। "पुष्पहार कंठारुढ होने के लिये लालयित है, जरा इस पोर मुंह फिराइए तो?" क्या यह तुम्हारा अपने हाथ का काता सूत ? उसने पूछा जी हाँ !" सहास्य उसने वाकई बहुत ही महीन, यह तो मेरा अपने सूत सा है । पनश्याम ने प्रशंसा भरे शब्दों में कहा । आपके हाथ और मेरे क्या अलग हैं ? आपने हमारे लिये रामदास के साथ भेजी माला, मैं आपके लिए अव यहाँ ले आई हूं। दोनो के लिए केवल एक ही हार बहुत है।" सुना, कल आपने कोप में हाथ की सुवर्ण कंगन ही दे दिये? किन्तु आपने तो समस्त जीवन दे दिया है। राखाराम ! तुम्हारे आगमन से मेरी सारी चिन्ताएं दूर हो गई।" सखाराम को सम्बोधित करते हुए घनश्याम ने कहा । "आप भैय्या को तो 'तुम' से सम्बोधित करते हैं और मुझे 'आप' शब्द से भला क्यों ?" मालती ने प्रश्नार्थ भरे स्वर में कहा । नारी सम्मान की अधिकारिणी जो ठहरी ।" "हमारे देश में बड़ी-बड़ी उपाधियां प्रदान कर तुच्छ मानने की वृति सर्वत्र है। रसोईए को महाराज कहते है और शंगी को मेहतर । मेहत्तर यानी महत्तर, महान् । सच ना भैय्या?"

१३७
"हाँ। मेहत्तर यानी महाराज ही।" सखाराम ने
हंसते हुए प्रत्युत्तर दिया।
'हड़ताल के बारे में क्या ख्याल है?" घनश्याम ने प्रश्न किया।
'अभी तो प्रारंभ है। दस-बीस दिनो के पश्चात खरी
कसौटी है । अभी तनख्वाह सभी के हाथ में खेल रही है
धर्य है । अगर महीने तक हड़ताल सफलता पूर्वक बनी रही
तो फिर क्या ? घर में फूटी कौड़ी नहीं होगी। और मोदी
बाटा-दाल भी उधार नहीं देगा और दुकानदार अपनी ड्योढी
पर पैर न रखने देगा।"
"दुकानदार-मोदी सब उधार देंगे। वर्ना दुकानें लूटी
जायेंगो यह भीति तो उन्हें होगी ही।"
'किन्तु वास्तविक सत्त्व परीक्षा तो आगे ही है। कारी-
वर्ग कितने अंशों में अडिग रह सकेगा- यह एक प्रश्न है।
वाल-बच्चे जो होते हैं। घर की सारी जिम्मेदारी उन्हीं पर होती
है। रूखा सूखा ही क्यों न हो पेट की अग्नि शांत करने हेतु देना
तो चाहिए ही? देखते हैं।
अरे, हाँ ! तुम्हारे केस का क्या ?" सखाराम ने घनश्याम से पूछा।
'ऐसा लगता है कि जब दूसरा न्यायाधीश ना आजाए
तव तक कुछ नहीं।
"मुझे तो ऐसा विदित हुअा है कि यही न्यायाधीश
झटपट निर्णय दे देगा । मालिक-वर्ग ने काफी हद तक इसकी
जैव गर्म कर दी है।
"तो हम अपील करेंगे।" मालती ने कहा
किन्तु दिन पर दिन तो व्यर्थ ही में बीते जा रहे हैं न ।
और यहां हड़ताल जो चल रही है।" सखाराम ने गंभ
।
"

१३८ वनते हुए कहा । जैसी प्रभु की इच्छा, वही होगा।" उसने कहा नही, मानव की इच्छा। घनश्याम ने मालती को सुधारते हुए बीच में ही कहा । "प्रभु को आप क्यों नहीं मानते क्यों उनमें श्रद्धा नहीं रखते?" 'किन्तु क्या वही प्रभु तुम में मुझ में सर्वत्र व्याप्त नहीं ? उस परम् ब्रह्म के विकास का एक स्वरूप अर्थात मानव । कभी किसी समय ब्रह्म पूर्ण होता है ऐसा नही । वह तो निरी एक कल्पना है । तुम्हारे-हमारे द्वारा ही वह मूर्तरूप धारण करती है । विश्व का लक्षकोटी पंखडियोंवाला पुण्डरिक, एक एक पंखड़ी खोल रहा है।" "आप बहुत ही अच्छा बोलते हैं।" उसने कहा । "और आप कार्य करती हैं। घनश्याम ने प्रत्युत्तर दिया। और आप नहीं करते क्या ? भैया, यहां से घर चले आये; किंतु आपने सुन्दरपुर को ही अपना कार्यक्षेत्र बनकार सेवा कार्य प्रारम्भ कर दिया मुझे कर्म यानी संकुचिन्ता प्रतीत होती है । कर्म यानी अनंत विचारों में से नीचे पाना । नील गगन में मुक्त विचरण करने वाले निहंग का कीड़े-मकोड़े से लिए भूतल पर आना कर्म यानी बंधन, मर्यादा । मुझे विचारों के स्वच्छ आकाश में विचरण करना पसंद है।" सखाराम ने कहा। किन्तु केवल विचार-प्रवाहों पर ही अवलम्बित रह, जिन्दा नहीं रह सकते ?" घनश्याम ने कहा । मैं वृक्षों के पत्ते खाऊंगा, झरनों का पानी पिऊंगा। संस्कृत यानी जीवन में पाँच - पचास पदार्थों का संग्रह होना १३९ यह तुम्ही सबको लगता है; किन्तु मुझे ऐसा नहीं लगता। सिनेमा, आकाशवाणी, चोकोलेट, यानी क्या संस्कृति है ? शत- वधनों मे से तुम कितने अंशों में मुक्त हुए। इस पर तुम्हारी संस्कृति अवलम्बित है आकाशवाणी शौकिन प्राणी उसके विगड़ने पर वेचैन हो उठता है। कारण उसका ग्रानन्द उसी वस्तु पर अवलम्वित हो जाता है पूर्ण रूपेण । सहस्त्रों वसु- तुओं के तुम लोग गुलाम हो । तुम्हें स्वातंत्र्य का अर्थ हो ज्ञात नहीं । शर्ट में वटन न होने पर, बाहर जाने में लज्जा प्रतीत होती है। वह बटन यानी क्या मेरे जीवन की उच्चता-महान्ता? विवेकानन्द कभी बनियान पहनते; कभी साहब पोशाक में सजे होते । वे हमेशा कहते, वस्त्रों की गुलामी भला क्यों । मैं चाहूंगा वैसी पोशाक परिधान करूंगा । अमुक ही पहनिये ऐसा बंधन भला किस लिए ? सुख यानी वस्तुओं की सूची नहीं। सुख हमेशा विवेकवृत्ति मे ही प्राप्त होता है। सखाराम के वक्तव्य की ओर ही दोनो का पूरा ध्यान फेन्द्रित था ! मानो वह संस्फूर्त हो यंत्रवत् घोल रहा था । तुम लोग वस्तुओं के झंझट में पड़ दिन दुगनी रात चौगुनी वृद्धि कर रहे हो । किन्तु क्या उससे किसी के हृदय बड़े हो पाये हैं ~ विशाल बने है? उलटे और भी ज्यादा प्रमाण में संकुचित बने दृिष्टिगोचर हो रहे हैं। उसने पुनः कहा। "भैया जाने भी दो ये सव बातें। " मालती ने कहा। 'सखाराम जीवन के लिए परमावश्यक वस्तुएं भी तो चाहिए ना ? अन्न, वस्त्र, घर ये तो चाहिए हो? हमारे मन का विकास क्षुधितावस्था में तो नहीं हो सकता ? विश्व संगीत के सम्मेलन में भाग लेने के लिए भी तो पेट भरा हुआ होना

१४०
चाहिए। महात्मा जी ने कहा था " पंछी सुवह ही सुबह में
ऊपर आकाश में ऊंचा ऊंचा उड़ता है; किन्तु वह भी पहले
दिन पेट भर दाना चुगा हुआ होता है । ठीक है न?
"मेरा केवल यही कहना है कि वास्तविक संतोष हमें विवेक
ही प्राप्त होता है। अमेरिका में इतना सुख होते हुए भी
वहाँ आत्म हत्याओं की भी कमी नहीं बल्कि प्रमाण अधिक
मात्रा में है। वहाँ क्या अंतरिक समाधान-संतोप है? यह
चाहिए, वह चाहिए । दौडादौड़। मनू ने प्राचीन काल में बहुत
ही अच्छी तरह से सुखदुःख की मासिक व्याख्या कर रखी है :-
यत् यत् परवशं दुखं
यत् यत् आत्मवशं सुखं
जो दूसरों पर अवलम्वित वह दुःख और जो स्वयं पर
वह सुख । गांधीजी यह बात कहते थे नित्य प्रति। चरखा गांवों
में दुरूसा होगा । वह अमेरिका से कब आएगा - इसकी प्रतीक्षा
करने की कोई आवश्यकता नहीं । अन्न और वस्त्र, जो हमारे
जीवन की प्रमुख आवश्यकताएं हैं उनकी यथेष्ट पूर्ति स्थानिक
मात्रा में करना हमें सीखना चाहिए। तभी बहुत कुछ अंशों में
स्वातंत्र्य का अनुभव कर सकेंगे। सखाराम ने
कहा।
मुलाक़ात की अवधि पूर्ण हो गई । सिपाही ने सूचना दी।
सखाराम और मालती घर जाने के लिए तैयार हुए।
रोटी सागादि भोजन पसंद आया ?" चलते चलते
मालती ने पूछा।
जब मेरे हाथ की बनाई रसोई का स्वाद चखेंगी तभी
वास्तविक पता लगेगा कि कौन अच्छी रसोई बना सकता है ?"
उसने सस्मित कहा।
"
"

१४१ 'आज तो पराधीन हैं - और हाथ का ही स्वाद लीजिए।" इस पराधीनता में भी एक प्रकार की स्वतंत्रता यानी मनोमय आनन्द का उपभोग कर रहा हूं। 'अच्छा घनश्याम, जाता हूं। सखाराम ने उसके कंधे पर हाथ रख कहा। अच्छा विदा दीजिए।" मालती ने नमस्कार कर कहा । न्यायालय में आज घनश्याम का केस था। सारी गॅलरी तथा प्रेक्षक हॉल लोगों से भर गया था। न्यायाधीश महोदय निर्णय देंगे - यह अफ़वाह सारे कस्बे में हवा की तरह फैल गई थी मालतो और सखाराम न्यायालय में उपस्थित थे। रामदास ब्रिजलाल, पंढरी मार्तंड, गंभीर आदि सभी मजदूर-कार्यकर्ता भी वहां आये हुए थे । पहिले से ही। अन्याय अत्याचारों को उत्तेजन वढावा देना, लोगों की धार्मिक-भावनाएं दुखाना आदि थे उस पर । घनश्यास ने दिये वक्तव्यों में से कुछ फिकरे पढ़ कर सुनाये । सरकारी वकील का भाषण हुआ। उसने अपने वक्तव्य में कहा 'अरे, इस प्रकार के वक्तव्य हर दिन हर कहीं देना यानी अत्याचारों को उत्तेजन देना ही है । तुम लोग मालिक-वर्ग को चोर कहते हैं। फिर दूसरा कोई कहेगा कि अगर ये चोर है तो इन्हें बदल दो। अपने शब्दों का परि- णाम काफी दूरगामी होता है। मालिक-वर्ग यानी समाज को हुआ महारोग - भयंकर बीमारी, मालिक यानी काला विप- घर नाग ऐसी अनेक उपमाएँ तुम्हारे भाषण में हैं। तुमने नाग कहा तो दूसरा नाग को कुचलने दौड़ेगा। विचारा वह नाहक फांसी का फंदा अपने गले में डालेगा। किंतु उसे ऐसी भयंकर बातें सिखाने वाला कौन? उसका मार्गदर्शक कौन ?

१४२ तुम, तुम सभी लोग शांति भंग करने वाले अपराधी !" इसी तरह के निवेदन वाला सरकारी वकील का लम्बा चौड़ा भाषण पूरा हुआ पूर्व निश्चित् पद्धति अनुसार गवाही आदि हुए। घनश्याम ने अपनी पैरवी के लिए कोई वकील न किया था। उसने स्वयं अपनी पैरवी की। निवेदन में उसने बताया मैंने मालिक-वर्ग को विषधर नाग अवश्य कहा किन्तु अगले वाक्य में यह भी कहा था कि विपधर नाग के अगले विषैले दांत निकाल दें तो वह एक निरूपद्रवी खिलौना अवश्य बन जाएगा। मालिक-वर्ग के हाथ में वही धन-संपत्ति की सारी सत्ता निकाल लेना उसके लिए रामबाण उपाय है। इसमें मैने बुरा ही क्या कहा ? ये धनिक, कारखानेदार और मिल वाले इनमें मानवता का अंश तक नहीं। केवल लाभ उनका दैवत । समाज द्रोह का पाप वे अहोरात्र निरंतर करते रहते हैं। उन्हें बन्दीगृह का रास्ता क्यों नहीं दिखाया जाता ? समाज में प्रचलित अशांति के वे ही मुख्य कारण हैं । आज शक्कर नहीं, कल गुड़ नहीं, परसों वस्त्र नहीं, राशन नहीं, मिट्टी का तेल नहीं, दियासलाई नहीं। इन धोखेबाज़ों को सरकार क्या सज़ा दे रही है ? परम- पिता परमेश्वर के न्यायालय में भला कौन अपराधी सिद्ध होगा? - कौन गुनाहगार घोपित होगा? और कहते हैं कि मैं लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाता हूं। धर्म का मर्म ही सब को सुखी करना है। और यही सच्चा धर्म हमारे देश के कोने कोने में और प्रत्येक समाज में व्याप्त हो जाना चाहिए - फैलाना चाहिए इसी लिये तो ये सब प्रयत्न हैं । हमें ही धर्मद्रोही के नाम से सम्बोधित किया जाता है! कैसा उलटा न्याय!"

१४३
न्यायालय में धनश्याम बावू लगातार दो घंटे अविरत
रूप से बोलते रहे मानो नव धर्म का सूक्षम निरूपण कर रहे हो
सबके समक्ष । मानवता विषयक वह प्रवोधक प्रवचन था।
उनको ऐसा भासित हो रहा था मानो न्यायालय में कोई सभा
ही लग नहीं हो।
घनश्यामजी की प्रवचन के पश्चात न्यायालय में सर्वत्र
शांति छा गई यदि सुई गिर जाएं स्पष्ट सुनाई दे जाय ।
न्यायाधीश ने शांति भंग करते हुए कहा- “ में आपको निर्दोप
घोषित कर, मुक्त कर रहा हूं। (जयघोपों के निनाद से
न्यायालय का चप्पा-चप्पा गूंज उठता है। लोग आश्चर्य से
दंग रह जाते हैं ) गाँव में ऐसी बहुत सी अफवाहें उठी हैं कि
मैंने रिश्वत ली है-मालिक वर्ग से निश्चित राशि ली है आदि
किन्तु इस में से कोई अफवाह सत्य नहीं हाँ, अढलक संपत्ति
का लालच दिखा, मुझे पूंजीपति कितनेएक और उनके
प्रतिनिधि खरीदने अवश्य पाये थे; किन्तु में अपने को उनसे
अलिप्त रख सका; अपनी आत्मा को जरासी राशि के
लिए कलुपित न होने दिया । यहाँ से जाते जाते
ऐसी कोई बात में करना नहीं चाहता था जिसमें भैरी
आजतक की प्रामाणिकता तथा सच्चाई पर पानी फिर जाए ।
पुलिस विभाग ने केवल भ्रष्ट होकर ही यह केस बनाया है,
ऐसा प्रतीत हो रहा है । उन्हें भी रिश्वत का लालच दिखाया
गया अथवा क्या, मालूम नहीं। किन्तु भविष्य में वे सत्य-मार्ग
पर चलकर ही सरकार को ज्यादा अच्छी सेवा कर सकेंगे।
अगर स्वयं वे ही असत्य मार्ग का अवलंबन करेंगे तो राज्य
चलेगा ही कैसे शासन संस्था का नीव चुटकियों में ख

१४४
।
हो जाएगी । घनश्यामवावू, आपके भाषण सुने हैं मैंने । आपने,
हमारे जीवन से विस्मरण की प्रोट में भागती, शांती का
अमर संदेश पुनः सुनाया है । सच्चा धर्म, सच्ची संस्कृति आदि
विविध विषयों पर दिये गये आपके भाषण सुनने का अवसर
मिला है। इन विचारों से समाज के संगठन में किसी प्रकार
की रुकावटें आएंगी - मैं नहीं मानता । झूठे धर्म पर तो सभी
संत महात्माओं ने जी भरके प्रहार किये हैं। धर्म की आड़ में
क्लेष करनेवालों की उन्होंने कुत्ते साथ तुलना की हैं । मैं आपको
निर्दोष घोषित करता हूं।"
"महाशय, मैं आपका अत्यंत आभारी हूं।" घनश्याम ने कहा।
न्यायालय के द्वार से घनश्याम बाबू का जुलूस निकाला गया।
ऐसा जुलूस आज से पहले सुंदरपुर में कभी निकला न था।
जगह-जगह और मुहल्ले-मुहल्ले के तुकडों पर घनश्याम की
आरती उतारी जाती थी। अंत में जुलूस का रूप विराट सभा
में बदल गया ।. मालती ने उसके अभिनंदार्थ, जो प्रवचन
दिया वह निहायत उत्कृष्ट और सुन्दर था ।
" तुम अपना सौभाग्य समझो कि तुम्हारा भाग्यविधाता
तुम लोगों में पुनः लौट आया है। कौए राजहंस को घेरने
अवसर में थे; किन्तु पडयंत्र का भंडा फोड़ हो गया । डाव
फंस गया । न्यायाधीश महोदय ने न्याय की प्रतिष्ठा रखली
अव तुम अपने संकल्प की प्रतिष्ठा रख लो अंतिम ध्येय तव
हड़ताल रखो । शांति और आत्मविश्वास के शस्त्र सज आ
बढ़ो। तुम सभी की तरफ से घनश्यामबाबू को हार अर्प
करती हूं।" और उसने घनश्याम के गले में ताजे महक
पुष्पों का बढ़िया हार डाल दिया।

१४५
उसके बाद सभा में मजादूर कार्यकर्ताओं के भी धनश्याम
वाबू के अभिनंदनार्थ भाषण हुए। धनश्याम ने उन सब का
प्रत्युत्तर एक संक्षिप्त भाषण से दिया । तालियों की कड़कड़हट
से गगनमंडल गूंज उठा । उत्साह की अद्भुत-ज्योति से सभी
के मुख मंडल दीप्त हो गये । सभा बहुत ही उत्साह व आवेश
में विजित हुई । हड़ताल की नींव और भी सुदृढ हुई।
इन्दौर से अमरनाथ का पत्र ले बाबू आया । धनश्याम ने
अतिउत्साहित हो पत्र पढ़ा और मारे खुशी के झूम उठा।
आंखें नूतन आशा से चमक उठीं । मालती उसके मुखचंद्र को
टकटकी लगाए हुए थी कभी की।
"सहसा यह खुशी कैसी !" उसने विस्मित हो प्रश्न किया।
"ध्येय-प्राप्ति की और किसकी ।" उसने मुस्कराते हुए
कहा।
उसने नई बस्ती स्थापना को योजना सविस्तर सखाराम
और मालती को समझाई । साथ ही इन्दौर से आया पत्र भी
पढ़ कर सुनाया-
"धनश्याम, वाक़ई अगर हमने ऐसा कोई महद् कार्य
किया तो अच्छा ही होगा ! सर्व धर्म और पंथ के अनुयायी
एकत्रित हो सहकारी जीवन जीने का मजा ले सकेंगे, नव
संस्कृति का विकास करेंगे अपने तन, मन, धन और परिश्रम
से।" सखाराम ने प्रत्युत्तर में कहा ।
" सखाराम, तुम मालती और कुछ मजदूर वहां प्रारंभ
करोगे? हड़ताल अयशस्वी रही तो यहां के मजदूर - वर्ग साथ
ले में उस ओर प्रस्थान करूंगा, और अगर यशस्वी होगई तो
यहां की यूनियन का सारा कार्य, जिम्मेदारी किसी योग्य

१४६ । सहकारी के कंधे पर रख यहां से मुक्त हो, वहां नये प्रयोग में हिस्सा बटाने हेतु आ मिलूंगा तुम पहले जाओ । नींव रखो। उक्त भूमिका ठीक तरह से निरीक्षण परीक्षण करो। वहीं पास में कल-कल नाद करती नदी भी वहती है। उसकी जलधारा को हमें अपनी योजना के लिये कैसे उपयोग होगा, उसका संशोधन करना । सचमुच; तुम जाओ ही।" "आपको छोड़ कर?" मालती ने शंकित भाव से पूछा।" मेरा प्रयोग तुम सब के हाथों में है मसलन मेरी आत्मा भी तुम्हीं लोगों के पास; क्या यह बात ठीक नहीं ? मै तन, मन से तुम लोगों के साथ ही हूं। वहाँ जा जैसे बन सके वैसे वसुंधरा की सेवा में जुट जाओ।" किन्तु परिणाम-फल ?" वह हम सभी पर प्रसन्न होंगी और आशीर्वाद देंगी।" कैसा आशीर्वाद ?" कोई यहीं । सुखी वनो; सफलता पाओ; नव-संस्कृति का विकास करो आदि। और वाकई एक दिन सखाराम, मालती, वाबू, वन्या, श्रीपत आदि लोग प्रस्थान कर गये इन्दौर के लिए। ध्येय प्राप्ति के लिए। सखाराम, मालती, और बाबू तो नई वस्ती की नींव रखने का निश्चय कर ही गये थे। यहाँ हड़ताल चल रही थी शांति से। कहीं भी किसी प्रकार की गड़बड़ न थी। मालिक और मज़दूर; दोनो वर्ग अपने-अपने निश्चय पर अटल-अचल थे । और वहाँ नये प्रयोग का शिला-रोपण हो ही '. बंडू, गया था ।

नयी आशा नयी दिशा
हड़ताल प्रारंभ हुए एक माह की लंबी अवधि व्यतीत हो
गयी थी। दिन-ब-दिन मजदूर वर्ग की परिस्थिति बदतर होती
जा रही थी। आजूबाजू के पड़ोसी गांवों से अन्न, धान्य,
• कपड़े आदि की सहायता प्राप्त हुई थी। लेकिन कृपक वर्ग के
पास इन दिनो ज्यादा अनाज था ही कहां? और राशन का
जमाना जो था। दुकान में से उधार मिलना प्रायः असंभव था।
सब व्यवहार नक़द चलता था। और फिर राशनिंग में कौन
उधार देगा? ठीक है, अन्य सामग्री तो कोई उदार हृदय व्या-
पारी बिना पैसे लिये दे भी देता था लेकिन राशन तो क्या,
किसी के पास विप-पान करने के लिये एक पैसा भी नहीं था।
हां, थोड़ा फंड अभी शेष था, जिस में से छोटे व रोगी मजदूर
बच्चों को दूध दिया जाता। दाल-सेव, मुरमुरे, चने वांटने में
आते थे। लेकिन समय रह-रह कर संकट और विपत्तियों की
घोषणा कर रहा था। मालिक कुछ भी करने को तैयार न था
उसे किसी की क्या पड़ी? और सरकार भी चुप थी - उसके
भी कान पर चींटी रेंगती न थी। क्या किया जाय? यह एक
ही प्रश्न प्रत्येक मजदूर व कार्यकर्ता के समक्ष था।
रात के समय निर्दिष्ट स्थान पर मजदूरों की प्रचंड

१४८ हुई । सव के चेहरे पर दीनता व निस्तेजता के दर्शन होते थे। लेकिन चेहरे की रेखाओं से आत्माभिमान टपक रहा था । उन की बातों से दृढ़ता टपकती थी। हाल-चाल में हिम्मत छिपी थी। घना ने वर्तमान समय की हड़ताल की पूरी परिस्थिति से सभा को ज्ञात किया । साथ ही उसने कहा, "हमारे पास जहर खाने के लिये भी पैसे नहीं हैं। फंड में की रक़म लगभग समाप्त हो गयी है। मैं भगवान-स्वरूप नन्हे बच्चों की दुर्दशा नहीं देख सकता। मेरा कलेजा फटता है नारी को खुले शरीर देखकर । आज ही मुझे इस आशय का तार प्राप्त हुआ है । कि मेरे नाटिका को पांच हजार का प्रथम पुरस्कार मिला है । मैं वह पुरस्कार मजदूर फंड को अर्पण करता हूं। और पांच दिन जायेंगे। लेकिन अहम सवाल यह है कि आगे क्या ? वंधु-भगिनियों, मैं आपके समक्ष एक साहसी योजना पेश करता हूं। आप सव सहकुटुम्ब - बच्चोंसह मेरे साथ चलोगे क्या ? किस लिये इस मिल में रहकर जीवन का सत्या नाश करते हो ? यहां मानवता का नामोनिशान नहीं, कदर करना कोई जानता ही नहीं, तो फिर यहां क्यों रहते हैं ? इंदौर रियासत में एक अच्छी जगह उपलब्ध हुई है। मेरे मित्र वहां का निरीक्षण करते आगे गये हुए हैं। वहां हम अपनी सब मिलकर नयी वस्ती बसायें। सोने व चांदी की खेती करें। उर्वरा भूमि है - सत्य का बोलवाला है । भरपूर अनाज पैदा होगा वहाँ हम छोटे प्रमाण में गृहोद्योग प्रारंभ करेंगे। शीघ्र ही विजली के सर्व साधनो का आगमन होगा। विजली की शक्ति पर बड़े बड़े यंत्र चलायेंगे । अन्य बहुत से कार्य करेंगे। एक सहकारी जीवन की निर्मित करेंगे - जहां आर्थिक, सामा- १४९ जिक समता को स्थापना होगी। शिक्षण के क्षेत्र में नये प्रयोग दाखिल करेंगे। मानव के विशेषण से जीवन व्यतीत करेंगे हम सब । अन्य सब भेदाभेद, झगड़ों-रगड़ों को हमेशा के लिये जमींदोज़ कर देंगे। प्रायेंगे मेरे साथ ? नवभारत भारतीयों के पूर्वोकालीन साहस वृत्ति की आज फिर अपेक्षा कर रहा है । विधायक साहस ! सृजनशील साहस ! यहां से गमन करते समय मन में दुःख होगा । पुरानी यादें सजीव हो उठेगी पुराने संबंध स्मरण हो आयेंगे। लेकिन एक दिन यह सब त्याग कर भी तो हमें जाना पड़ता है। पुरानी लकीर के फ़क़ीर बने तभी तो आज इस बुरी हालत में हैं। अपना गांव नहीं छोड़ना, रीति-रिवाज नहीं त्याग ने ऐसे से भला कहीं प्रगति होती है ? जीवन में हमेशा सीमोलंघन करेंगे तभी हम परस्पर एक दूसरों को सब कुछ दे सकेंगे। पुरानी मर्यादा सीमाओं का दायरा पार कर आगे बढ़ना । नया क्षितिज, नये आदर्श । देखो, विचार करो। लेकिन मेरे नयनो के समक्ष तो आज भी सुन्दर स्वप्न, सुन्दर मूर्ति है । वह देखिये नयी वस्ती। सबों को निवास के लिये स्वच्छ, हवादार घर हैं। और वीचों- वीच में एक बड़ा चौक है। वहां हमारे स्वातंत्र्य का प्रतीक, तिरंगा फहरा रहा है । वह पाठशाला, और वह चिकित्सालय । वह रहा क्रीडांगण, और वह म्युझियम । वहां आलीशान भव्य सभागृह है । और एक तरफ उद्योग-धंधों के केन्द्र बड़े बड़े कल कारखाने हैं । और वह देखिये, सार्वजनिक वाग़ । एक व्योम के नीचे वहां सव स्वच्छा से परमपिता परमेश्वर की प्रार्थना कर रहे है ! सोच लो, फिर एक दफा अच्छी तरह सोच लो। यहां ,

१५०
हम कितना समय टिक सकेंगे। मेरे पास देने के लिये अब है
ही क्या? प्रभु की असीम कृपा से यह पुरस्कार ऐन अवसर
पर प्राप्त हुआ, जो आप सब मज़दूर-वर्ग के चरणों में
समर्पित है।"
इसी तरह और आठ दिन पानी की तरह समाज के प्रवाह
में बह गये । घना से स्वयं मजदूर की दिन-ब-दिन बदतर होती
परिस्थिति देखी न जाती थी। वह सब परिस्थिति उसके लिए
सर्वथा
असह्य
थी। और
वह
भी कुदिन आया जब मजदूरों को
विनशर्त अपती हड़ताल वापस लेनी पड़ी। क्षुधा-पीड़ित
मजदूर वर्ग पुनः काम पर जाने लगा। घना अभी भी मन लगा-
कर उनकी सेवा किया करता था। उसके लिये मन में श्रद्धा
भरी पड़ी थी। विना किसी बात का अथवा अपने भविष्य का
विचार किये क्षणभर में उसने प्राप्त पुरस्कार उनके लिये दे
दिया। ना कोई स्वार्थ, ना अहंकार !
घनाद्वारा योजित नयी वस्ती विषयक प्रचार जोर-जोर
से चल रहा था। मधु व माधव नामक दो नवयुवक साथी और
प्राप्त हुए थे जो स्वयं कृषितज्ञ थे। सखाराम का भी आशा-
दायक पत्र उसे आया था। सुन्दरपुर स्थित कुछ मज़दूर जाने
लिए तैयार भी हुए । आसपास के पड़ोसी गांवों में से भी कुछ
उत्साही ग्रामीण जिनके पास रहने के लिये ठीक व्यवस्थित
घर और पालन पोषण के लिये खेत नहीं थे, वहां जाने के लिए
तैयार हुए। किसी ने अपने मां-बाप से उत्साहपूर्वक कहा,
" वहां अच्छी तरह से आजीविका व निवास की व्यवस्था होते
ही आपको भी ले जायेंगे तबतक यहीं रहिये ।" नयी बस्ती
में बसनेवाले इच्छुकोंकी सूची तैयार की गई। लगभग ५००

।
नर-नारी-बच्चे अलग। वहां जाने के लिए एक तास गाड़ी
को व्यवस्था की गई। सूचना देने एक आगे गया। सखाराम
ने सबके लिये वहां उत्कृष्ट प्रबंध पहले से ही कर रखा था।
सबके लिए सार्वजनिक भोजनशाला की खास तौरसे व्यवस्था
की गई थी। पीने के लिए नदी का जल लाया गया था। कुछ
छोटी-बड़ी छोपड़ियां थीं और कुछ स्थायी राबटियों का भी
प्रबंध था। वहां अमरनाथ ने औजार भेजे थे । गाय बैल वगैरा
ढोरों की खरीदी की गई । मानों वहां गोगाला शुरु हो गई।
व्योम चुम्बी पर्वत की तलहटी में वह जगह थी। पर्वत
हरियाली से युक्त था । आसपास में व्योम में यातें करनेवाले
वृक्ष थे । और एक वटवृक्ष का पेड़ तो कितना बड़ा । ढोर,
गाय, भैस सव उसकी शीतल छाया में विश्राम लिया करती
थीं। श्रतिक थकित वहां सुख की नींद सोते थे। सखाराम व
उसके साथी, इन सोने मिल वहां शुभारंभ किया । घना उसके
साथ आनेवाले साहसी व्यक्ति इनका ठाट-बाटसे बड़ी ही
धूम-धामसे स्वागत करने के लिए वे तैयार थे।
घना व उसके साहसी मित्रों को विदा देने के लिये आज
विदाई समारोह समस्त कस्बेकी तरफसे होनेवाला था।
समारोह में भाग लेने विद्यार्थी-जगत् दौड़ पड़ा था मजदूर दर्न
भी आया था। विद्यार्थियों की तरफ से गजानन ने समारोह
में भाषण देते हुए कहा, “ घनश्याम को आज हम सब विदा कर
रहे हैं। उनका सारा जीवन नित नये प्रयोगों के लिये है। इन
हम विद्यार्थियों को नयी दृष्टि व नवज्ञान प्रदान किया है
हमे पाठ्यक्रम में निविष्ट विषय तो अध्ययन करने
लेकिन हमें गांवों की ओर ले जाते - वहां का रहन

१५२ - व नया दृष्टिकोण बताते और समझाते थे। वे स्वच्छता के हेतु हमें ले अवश्य जाते थे लेकिन जो गन्दगी उठाने अथवा साफ करने से हम घबराते, शीघ्र ही वे आगे आ उसे साफ करते थे। उन्होंने श्रम की प्रतिष्ठा कैसे की जाय यह बोध हमें दिया । दीन-दरिद्रों से समरस होना सिखाया। उनका नया प्रयोग पूर्णतया यशस्वी हो और हर्ष-पुलकित हम निरीक्षणार्थ जावें - यही प्रार्थना है। नागरिकों की ओर से शिवरामपंत बोले, घनश्याम यहां से विदा हो रहे हैं। उन्होंने नागरिकत्व के पाठ हमें प्रत्यक्ष सेवा के रूप में पढ़ाये हैं। उन्होंने चिरनिद्रा में पड़े मज़दूर- वर्ग में जागृति का संचार करा। उनकी हड़ताल भले ही निष्फल गयी, लेकिन हड़ताल के दरमियान मजदूर-वर्ग में जो शांति बनी रही उसका सारा श्रेय इन्हें देना चाहिये । खुद को प्राप्त पुरुस्कार इन्हें असहाय मजदूरों के क्षुधा से पीड़ित बाल- बच्चों के हित क्षणभर में दे दिया। किसी बात की लाज-शर्म के बगैर दाल-कुरमुरे मजदूरों में वांटते रहे । दूध की बटलोई हाथ में थामे प्रत्येक के दरवाजे खटखटाते रहे। इन्हीं की वजह से कस्बे ने साक्षरता को मन-वचन काया से अपनाया। किसान- पत्नियां कहीं कागद निहारते ही पढ़ने का प्रयत्न करती हैं। जहाँ घनश्याम का आगमन होगा वहां नव-चैतन्य का सर्जन होगा । उनका साहस-वृत्ति से भरा प्रयोग यशस्वी हो यही शुभेच्छा।" और संपत मज़दूर-वर्ग की ओर से घना के कार्य का गौरव करने सभा में खड़ा हुया, हम में किसी बात की खूबी न थी लेकिन घनश्यामजी ने हमें मनुष्य वन, जिंदगी बसर - करने का बोध दिया। यद्यपि हड़ताल सफल न हो सकी । लेफिन जय-पराजय में से ही प्रगति-पथ का अन्वेषण करना पड़ता है। हम अपने संगठन को विशाल रूप देंगे - हम में अनबन-मत-भेद नहीं हुए तो उसे विस्तृत करेंगे - वल शालो बनायेंगे, मज़बूत करेंगे। हम में से चन्द मजदूर बंधु लोभवश कर्तव्य-च्युत भी हुए। किंतु कितना विशाल हृदय घनश्याम के सीने में है, जो उन्होंने भूल कर भी मजदूरों को दोप नहीं दिया। उन्होंने यशापयश की सारी जिम्मेदारी स्वयं पर ही ले ली। भले ही वे आज नव-निर्माण की ओर प्रस्थान कर रहे हैं। लेकिन हम सब के मन तो प्रति पल उनके साथ ही रहेंगे। चन्द भाग्यगाली मजदूर बंधु उनके प्रयोग में कंधे से कंधा भिड़ा साथ देने साथ में जा रहे हैं, सहर्ष जावें। उनके प्रयोग सफलार्य प्रावश्यना रकम हम भी भेजेंगे। श्रमिक वर्ग का मस्तक अभिमान पूर्वक- संसार के सामने ऊंचा बनाये रसने के लिये उनके प्रयोग यशस्वी होने के हेतु हमें तो सहायता देनी ही चाहिये । अरे! यह कौन खड़ा हुआ है बोलने के लिये? यह तो रुपल्या । वह खड़ा हुआ लेकिन कंठ अवरुद्ध हो गया। उसकी यांखों भर आयीं। उसने रुकते रुकते कहा, “ सखाराम भाई, घनाभाई जैसे व्यक्तित्व वाले व्यक्ति कहां देखने को मिलेंगे भला? आज अथवा कल में भी जाऊंगा वसने, उनकी नयी बस्ती में। मेरा पिता गणा आज कल सस्त बीमार है। जाने से मजबूर हूं। यह पुष्पहार घनाभाई के गले में हूं । जव यें संस्कृति मंदिरों में थे तव हमेशा मुझे अपने बैठा सिलाया करते थे। उन्हें किसी बात का अभिमान र " १५४ । उनके लिये सब मनुष्य वरावर हैं।" ऐसा कह रुपल्या घना के चरणों में लेट गया। सारी सभा गद् गद् हो उठी ! सव के नैन हर्षाश्रु व शोकाश्रु से पूर्ण थे । घना ने अंत में सब का प्रयुत्तर देते हुए कहा, " में अपने साथ आप सबों का प्रेम लिये गमन कर रहा हूं। ज़िदगी के चन्द वर्ष यहां गुजारने थे । इस अवसर पर में मजदूर-बंधु व भगिनियों को सिर्फ इतना ही कहूंगा कि स्वयं मिट जाओ पर अत्याचार सहन मत करना हमारे देश में अहिंसा व शांति के मार्ग पर चलने से समाज-वाद का आगमन होगा ऐसी मुझे पूरी आशा है। विलम्ब अवश्य लगेगा। लेकिन धर्म न खोवें हम अपना । माना कि रक्तमय क्रांति से समाजवाद जल्दी ही आ सकता हैं लेकिन यह राह हमारी नहीं - हिन्द की नहीं। विद्यार्थियों को भी मैं यही कहूंगा, प्राप्तज्ञान जनसाधारण के हितार्थ सेवा रूप में समर्पित कर दें। इस देश को विभिन्न शास्त्र तज्ञों की सख्त जरूरत है। लेकिन ज्ञान संपादन के पश्चात् बड़ी तनख्वाहों की स्वप्न में भी अपेक्षा न धरिये । नाना शास्त्रों में प्रवीणता प्राप्त कर, सेवा करते आगे बढ़िये कुछ अपना जौहर दिखाइये । प्रयोग कीजिये। नागरिक वर्ग से कहूंगा सच्चे अर्थ में नागिरक बनिये । दूसरे के विषय में भी सोचिये । परस्पर सहकारी भावनाओं को आपस में बढ़ा- इये। स्वच्छता-धर्म का आचरण जीवन में कीजिये। आप के गांव का मान अपमान, प्रतिष्ठा आपके व्यवहार व बर्ताव अवलंवित है । नाम सुन्दरपूर लेकिन कदम कदम पर कचरे के ढेर लगे हुए हो तो? यहां के निवासियों के सुन्दर प्राचार- विचार, रीति-रिवाज से कस्वा सुन्दरपूर वनाइये । यद्यपि में ।

आप सब-से दूर कोसों दूर जा रहा हूं फिर भी हर जगह आप
सबों का प्रेम मुझे लाखों विपत्तियां आने पर भी बचाएगा और
हरदम नव-स्कृति का फवारा मेरे जीवन में छोड़ेगा।
समारोह समाप्त हुमा । रात में बहुत देर तक घना अपने
मित्रों व सहकारियों के साथ वात-चीत करता रहा । दूसरे दिन
सुबह दस बजे खास गाड़ी छूटने वाली थी।
दूसरे दिन पौ फटते ही धना उठ सीधा रुपल्या के पिताजी
से मिलने उनके यहां गया । गणा विधोने में पड़ा कराह रहा
था । घना ने उससे विदा ली; फिर संस्कृति मंदिर के मित्रों से
वह सुन्दरदास से भी मिलने गया-सत्र के आश्चर्य का ठिकाना
"तुम मिलने आये हो ?" उन्होंने भाश्चर्य से पूछा।
"हड़ताल कर, मालिक द्वारा मजदूर वर्ग पर किए जाने-
वाले अत्याचारों से मोर्चा लिया । लेकिन यों तो इस जीवन में
चलता ही रहेगा। आपके अमुक सिद्धांत मुझे पसंद नहीं है
फिर भी आप में सज्जनता कूट-कूटके भरी पड़ी है। उसी
सज्जनता को प्रमाण करने के हेतु आया हूं। आप उदार हैं
और ज्ञानोपासक भी। लेकिन यह एक अलग बात है कि आपके
औदार्य का रुख मजदूर-वर्गको हित-तरफ नहीं है। मंदिर
निर्माण करने के बजाय अगर मजदूरों के लिये चालें बनाते तो,
अधिक प्रभुसेवा निसंपन्न होती, ऐसी मुझे सौ फी सदी पाशा
है। खैर।
नमस्ते।"
"नमस्ते।
गाड़ी का समय कभी का हो गया था। आज

१५६ सब संस्थाओं-मिलों आदि में सरकारमान्य छुट्टी जो थी। अग्निरथविश्रामधाम पर कमाल की भीड़-भाड़ थी। गाड़ी पुष्प-लताओं से सजाने में आई थी और डिब्बों पर 'नवभारत का नवसाहस' 'साहस में ही रही संपत्ति,' 'भारतीयों गांवों की ओर आदि विविध ध्येय-सूचक सूत्र अंकित थे। जन साधारण उत्साहित हो जयघोष कर रहे थे। मेल-मुलाकातों का भी यही समय था। किसी के नयनों से अश्रुधारा बह रही थी, तो किसी का मुखमण्डल उदासी के बादलों से मलिन हो उठा था। अग्निरथ-रक्षक ने हरी झंडी दिखाई। और नवभारत के सर्जन में जी-जान लुटाने जानेवाले साहसी भारतीयों को गर्वसे अपने सीनेपर बिठाए अन्निरथ चल पड़ा सुन्दरपुर से। धीरे-धीरे सुन्दरपुर कस्वा चिर परिचित नदी, घाट, मन्दिर, मिल और आध्यात्मशिक्षा-केंन्द्र, वह संस्कृति-मंदिर आंखोंके समक्ष आये और एक एक करके दृष्टि से ओझल हो गये। गाड़ी द्रुत गति से दौड़ी जा रही थी मानो प्रवासियों का उत्साह उसके भी रोम रोम में संचार कर गया हो। नव भारत के साहसी नागरिकों ने गाड़ी में ही बैठे बैठे चिर परिचित मातृभूमि, इष्ठ स्थलों और श्रद्धांकित पदार्थों को विदा-वंदन किया। सवके नयन डवडवा आये। सबके उरोंमे हर्ष और शोक के मिश्र विचार थे उस समय । हर्ष इस बात का कि वे नव सर्जन की ओर कूच कर रहे थे और शोक इस बात का कि अपनी जन्मभूमि, रिश्तेदार-संबंधियों व अपनों से कोसों दूर जा रहे थे । फिर भी सारा भारतवर्ष उनको मातृभूमि थी। जहां जायेंगे वहीं उनका ठौर । गाड़ी में उत्साहमय वातावरण छाया हुआ था। कहीं

१५७
गायन वादन हो रहा था तो कहीं महाराष्ट्र के लोकप्रिय
पोवाडों की धूम थी। घना अपने पूर्व-जीवन की घटनाओं से
सवको परिचित करा रहा था । औरतों ने भी निःसंकोच हो
हो गायन-वादन में हिस्सा लिया। बहुत ही मजा पाया । और
वह चिर प्रतिक्षा स्थल भी आ गया, जहां पर सबको
उतरना था। यहां से नयी वस्ती की ओर जाने के लिये रास्ता
था । चन्द बैलगाड़ियां भी और एक दो मोटर लॉरियां । सवों
का सामान-असवाव बैल गाड़ियों में ठीक तरह से रखा गया।
लॉरी द्वारा प्रवासियों को नयी वस्ती ले जाने की व्यवस्था
पूरी हुई। शेप रहों को दूसरे फेरे में ले जाना तय किया गया।
सखाराम ने घना को प्रालिंगन किया क्षण भर तक दोनों
में से कोई एक शब्द भी न बोल सका।
"मालती कहाँ है ?" घना ने पूछा।
पिछले दो दिनों से उसे बुखार ने घर दवाया है। सख्त
परिश्रम रात दिन किया करती थी न। उसने गुलाब का
पौधा लगाया था और उसे पूरा आत्मविश्वास था कि तुन
आओगे । तव तक एकाध गुलाव अवश्य कण्टकाकीर्ण-डालो पर
मुस्करायेगा लेकिन अभी तक तो कली ही दृष्टिगोचर हो रही
है। विकसित नहीं हुई अभी।"
रामदास, वाचू आदि ने हस्तान्दोलन किया और कुतुब
और लाला ने 'सलाम अलैकुम' से धना को बंदन किया।
और वहां वस्ती में नये निवासियों के स्वागत की तैयारी
बड़े जोर शोर से हो रही थी । नवगनितो की हर्ष विव्हल हो
आरतियां उतारी गयीं। उनके लिये भोजन तयार था।
प्रवासियों को उतार लारियां फिर से गयो और पुनः । ले आया

१५८ जैसे जैसे लोग आते जाते, भोजन करने जाते थे। आज सवको छुट्टी दे दी गई थी। रात्रि के समय शीतल चांदनी की छाया में सब लोग इकट्ठे हुए कहा । घना ने सबको संबोधित करते हुए कहा, भाईयों तथा भगिनियों, सबके लिए प्रथम झोंपड़ियां बांधना हमारा आद्य कर्तव्य है। झोपड़ी के लिये आवश्यक साधन- सामग्री कभी की आ चुकी है। नींव थोड़ी वहुत भर, उस पर झोपड़ियां बनाना प्रारंभ कर देवें । जंगल में वांस है ही, और वहुत बड़ी तादाद में लाने की इजाजत भी हैं। हमें यह भी निश्चय करना है कि कितनी जमीन खेने योग्य है; फिर तो उसमें रहा कचरा-कांट-पत्थर आदि सब हटाने पड़ेगे । ट्रैक्टर हमें मिलने वाला है और चार-पांच सौ हाथ भी । भूमाता के उदर में जितनी गहराई तक घुसेंगे वह उतना ही अधिक फल देगी । टट्टियां बनाई हुई हैं पाखाने के लिये । अतः सब वहीं पाखाने के लिये बैठे। ओट है ही उस तरफ । ऊपर मिट्टी डालना कोई न भूले । सोनखाद का भी उपयोग कर लेंगे। अगर ठीक प्रमाण में डाला गया, तो अपेक्षा से ज्यादा अनाज पैदा होगा । गंदगी से नंदनवन का निर्माण हो सकता है । जो पैदा होगा वह सवकी मिलकियत का । किसी को भी शिकायत करने का समय पड़े, ऐसी कोई बात यहाँ घटित न होगी । नव-स्वर्ग को ही धरती पर ला खड़ा कर देंगे। मालती को अभी तक ज्वर था। सखाराम तथा घना उसके पास बैठे हुए थे। " सोचा, आपको यहां आने की सुधि आती भी है अथवा नहीं। हम सवों के ।

घना ने
"सबकी योग्य व्यवस्था करना यह मेरा प्रथम कर्तव्य ।
एक मर्तवा और मैं यहां प्राके गया हूं। लेकिन उस समय मुझे
ऐसा प्रतीत हुआ, तुम्हें नींद आ गई है। अतः धीरे से चला
गया । कल ज्वर विल्कुल उतर जायेगा-ऐसी मुझे पूरी आशा
कहा।
"वह कैसे ?" उसने प्रश्न किया ।
"मैं जो आ गया हूं, अव ज्वर अवश्य उतरेगा।" उसने
उसकी आंखों में अांखें डालते हुए कहा ।
और सचमुच दूसरे दिन मालती को ज्वर न आया।
मानो जादू की लकड़ी धना ने फिरा दी और ज्वर कहीं भाग
गया। नयी आई किसान बहू-बेटियों ने उसकी पूछ-ताछ
की । पार्वती ने उसके पैर दबायें सहलाये।
"पार्वती तुम आ गयो?" उसने भीण स्वर में पूच्छा।
" आपके पास रहने आ गयी, जी जो न नाना । वृला
हवा में रहेंगे सब । ख और खायें, प्रमु गीत गाते हुए
आप पहिले ठीक हो जाइये। फिर बच्चों को पढ़ाइयेगा ।
पार्वती ने कहा।
मैं तुम लोगों के साथ मेहनत कलंगी।
'यों बीमार होने के लिये ? कान अदम्य करिये, पर
पढ़ाने का।
मैं सोदूंगी, दोऊंगी, फसल पदूगी और जंगल में से
लकड़ियों के गढ़े अपनी दल्ली में तुम सब के नाप लाऊंगी।"
ठीक, यह तो सब ठीक । पहले स्वस्य हो जाइये।"
सब अपने अपने कार्य में मग्न ये कोई भोजनशाला में
कार्य कर रहे थे। छोटे-छोटे वाल-बच्चे भी कार्य में लगे ।
"

१६० थे। खाली कोई न था । सव का जो काम था वह । बीच में ही जंगली पुष्पों का गुच्छा हाथ में लिये घना मालती के पास आया। जाम्रो काम पर । यहां क्यों आये?" वह गुस्से हो बोली। जंगली पुष्प लाया हूं ये !" आप क्या जंगली है ?" " और तुम क्या नहीं हो।" मुझे आपने तुम कहके पुकारा । क्या ही फजीहत हुई ! पुष्प कितने सुन्दर व मोहक हैं ? आपको जंगली कह दिया, गुस्से तो न हुए ? जंगल में नहीं रहते क्या हम ? जंगल में मंगल करना है हमें, ठीक है न?" " और दो दिन तक काम पर मत आओ। बीमार होना पाप है। तुम्हारे निकट होते क्या मैं बीमार हूंगी? अमृत का कुंभ पास में रहते भला कोई मरेमा भी?" "तू तू तो बड़ी कवित्री बन गई है।" 'यहां आच्छादित प्रकृति-रानी की मनहर छवि निहार कौन कवि न बनेगा भला ?" 'हमें यहां धनधान्य निर्मिता सुन्दर काव्य-सर्जन करना है सारी वंजर भूमि उपजाऊ बना दो, फिर देखना कमाल ! शक्ति की योग्य कसौटी कर काम हाथ में लेंगे। अच्छा, तो मैं जाता हूं। भूख के मारे मेरा बुरा हाल है। घना चला गया और ठीक सामने से सखाराम भोजन कर आ रहा था। " अभी तक तो ज्वर का नामोनिशान नहीं । जाओ भोजन कर लो, तुम बीमार हो न जाना । सखाराम ने कहा। - 1 समय चक्र प्रकृति के नियमानुसार द्रुत गति से फिरता जा रहा था । सारी वंजर जमीन काम के योग्य बना दी गयी। सब्जी-तरकारियां लगाई गयीं। पेड़ पौधे भी दिन-ब- दिन विकसित होने लगे। सबों के चेहरे अदम्य उत्साह से देदीप्यमान लगते थे- और व्योम में घनघोर घटायें वां देव के आगमन की सूचना लिए आयौं । रानी-चंचला व-देव को रह-रह कर अपनी दमक से पृथ्वी माता की ओर ले जाने वाले पथ को प्रकाशित कर रही थी। मयूरराज अपनी वेली में वादेव के आगमन की घोषणा धरावासियों को सुना रहे थे। वर्षा देव का पृथ्वी माता के प्रदेश में धूम-धाम से आगमन हुआ। पृथ्वी मां, वर्षा देव द्वारा वहाई प्रचंड जल धाराओं में नहा, पुलकित हो उठी । कृपक गण इंद्र का आभार मानने लगे। सवों के दिल आनंद विभोर थे। अनाज दिन दुगुना रात चौगुना बढ़ने लगा। पुप्प बगीचों में विकसित होते थे और नन्हे-मुन्ने प्रायः उनसे अाँख-मिचौली खेला करते थे। बड़े-- बड़े मनुज अपने अपने काम और जवाबदारी में मस्त थे । स्वर्ग निर्मिति जो हो रही थी कलियुग में इस धरा पर! इधर घना, सखाराम आदि वस्तीवाले सबों की आंखें देश में नित्य-प्रति घटित होनेवाली अच्छी, बुरी घटनाओं की ओर लगी हुई थीं। समाचार पत्र, नियमित रूप से वहां आता था। रात्रि को, दिन में घटित नयो घटना अथवा समाचार पत्रांकित बातों पर परस्पर चर्चा मशवरा हुआ करता था। 'देश दो भागों में बांटा जायगा' समाचार सबको बजघात-सा महसूस हुआ प्रथम । लेकिन धना ने उसके १६२ पीछे रही पार्श्वभूमि व प्रत्येक उपस्थित कारण की मीमांसा ठीक तरह से कर सबको समझाते हुए कहा, "आज अथवा कल यह प्रश्न सबके सामने देश के सर्वमान्य, सर्वपक्षीय नेताओं के समक्ष उपस्थित होने वाला ही था। कोटयावधि लोगों से भरे पड़े हिन्हुस्तान-से लंबे-चौड़े खंड को जहां अनेक जाति विचारों के व्यक्ति बसते हैं, कोई भला कब तक तलवार के ज़ोर पर रोक सकेगा? हमें पिछले हजार वर्ष की लंबी अवधि में एक होना आया नहीं यह बात सोलह आने सच है। संत-सन्यासी भिक्षु व श्रमणादियोंने, ध्येयवादी मनुजों ने प्रयत्न भी किये; लेकिन समंदर पार साम्राज्य सत्ता का यहां आगमन हुआ और उसने वो हमारे पूर्वजों द्वारा योजित समन्वय प्रयोग मिट्टी में मिला दिया । तोड़ो और फोड़ो-इसी कुटिल नीति पर तो साम्राज्य- शाही टिकती है। साथ में रह रोज-रोज़ के क्लेशों के के वजाय अलग रहकर परस्पर में समभाव भातृत्व प्रेम बना रहा तो अच्छा ही होगा। ऐसा गांधीजी का दृष्टिकोण होगा। दो विभाजित देशों में एक आत्मा, एक मन, एक विचार निर्माण करने के हेतु वे सारी शक्ति लगा देंगे। हमारे यहां जो मुस्लिम बंधु हैं, वे निर्भय-निडर वन अपनी ज़िन्दगी वसर कर सकें-ऐसा हमारा उनके प्रति व्यवहार होना चाहिए। हम भारतवर्ष के दस हजार वर्ष के एक कुटुम्ब के रूप में जीवन व्यतीत कर दिखाने के महान् स्वप्न को सिद्ध-सफल करने के हेतु प्रयत्न करें। अपनी इसी छोटी सी बस्ती में तो हम लोग ऐसा प्रयोग कर ही रहे हैं, उसे उर्वरा बनाने में रात- दिन एक कर रहे हैं यह ही नहीं बल्कि मनोभूमि की मशक्कत । ।

" भी कर रहे हैं। यहां लाला है. कुतुब है, अहमद है ठीक उसी तरह रामदास, वाबू, रघुनाथ आदि सब हैं। यहां अस्पृश्य है और स्पृश्य भी। हम यहां जातिभेद, वर्णभेद, धर्मभेद आदि सब भेदों से उस पार जा मानवता की नव स्थापना कर रहे हैं। १५ अगस्त १९४७ ! हिन्दी स्वातंत्र्य की घोषणा की गई। हिन्द नामक विभाजित प्रदेश में तिरंगा ध्वज ठौर-ठोर लहराया गया, फहराया गया । जंगल के पुप्पों व लता बेलिमों के तोरण सब और लगाये गये । नये लगाये बगीचे सब ओर में से कुछ पुष्प उन माला-तोरण में थे। लेकिन थोड़े दिनी के बाद अनोखी बातें कानो में आने लगीं। शरणार्थियों को हृदय द्रावक घटनायें सुनते में आने लगों सरे आम वाल-खून, घरोंको आग लगाना बहू-बेटियों की इज्जत लूटना आदि कु-खबरों सेसखाराम का हृदय रो उठा । देश में शांति की पुनः स्थापना होने के हेतु उसने लगातार तीन दिन उपवास किये। लेकिन उन्हें एक दिन अपनी बस्ती के पास ही विचित्र माजरा देखने को मिला । वह देखिये कुछ बैलगाड़ियां घीमी रफ्तार से जा रही हैं । कौन होगा उनमें ? रामदास और बापू गये। उनमें पड़ोस के गांवों के दस-बारह मुस्लिम कुटुंब थे। वहां के ग्रामवासियों ने.-"यहां से चलते बनो" ऐसा कहा । बेचारे निःसहाय जो ठहरे । कर भी क्या सकते थे। शेप बचा खुचा, सामान- गाड़ियों में भर कर जा रहे थे । "कहां जाओगे?" सखाराम ने पूछा "अल्लाह को मालूम ।"दुखः भरी पाराज से एक ने कहा । " आप हमारे साथ रहिए। हमारे अन्य मुस्लिम मित्र भी यहां हैं । हम यहां सहकारी जीवन बिता रहे हैं,

१६४
भाई भाई वन गये हैं एक दूसरों को भाई मानो। परमपिता
परमेश्वर ने ही आपको यह रास्ता सुझाया होगा। और दूर
मत जाइये । देखिये न छोटे-छोटे बच्चे भूख से कुम्हला गये
रामदास ने सहानुभूति-शब्दों में उनसे रहा।
इतने में वहां लाला, कुतुब भी आ धमके।
" यहां ही रहना। ये सब दोस्त हैं। खतरा नहीं, धोखा,
दग़ा नहीं । सबके साथ काम करना, मीज से रहना।" कुतुब
ने उनसे कहा।
सखाराम व घना भी वहां पर आ गये सब मिल अपने
वस्ती में ले आये । वहां उनका ठीक तरह प्रबंध किया
गया। बच्चों को दूध पिलाया गया।
उधर महात्माजी देश में फैली अशांति की लहर को
शांति-बांध के द्वारा रोकने की भरसक कोशिश कर रहे थे।
हिंद में तुम सब शांति से रहो मैं संप्रदायाग्नि में पाकिस्तान
' को शांत करने वहां जाऊंगा। ऐसा वो सब को प्रार्थना सभा में
नित्य कहते थे। स्वराज्य अवश्य आ गया लेकिन राष्ट्र की
आत्मा के मुझे कहीं दर्शन नहीं हुए यों वे प्रायः दुःखित हृदय
से कहते थे।
रोज़-बरोज़ घटित देशव्यापी घठनाओं से घना व सखाराम
मित्र - द्वय दुःखित थे। लेकिन अपने दुःख को विस्मरण कर
अन्यों के साथ हमेशा सन परिश्रम किया करते थे। वर्षा ऋतु
उतर गई थी। फसल अच्छी हुई थी। ज्वार, बाजरा और
मक्का बोया गया था। साथ ही साथ रवी फसल भी बोयी
गयी ।। गेहूं चना भी बोया गया और शीतकाल में होने वाली
गोभी आदि तरकारिया लगायी गयीं। ककड़ी व कुम्हड़े की

। तरकारी रूपमा कृत बहुत पैदा हुए। एक कुम्हड़ा हंडिया-सा आकार में बड़ा था । टमाटर को वोजाई बहुत ही अच्छी हुई थी। प्रत्येक क्यारी में सोन-खाद का खुले हाथों उपयोग किया गया था। और एक दिन अचानक अमरलाय का आगमन हुआ। वह नयी वस्ती के निवासियों के लिये पूज्य बापूजी का शुभाशीर्वाद ले आया था । अमरनाय किसी कार्यवश देहली गया था। वहां पर अवसर मिलते ही घना व सखाराम द्वारा योजित नवप्रयोग की जानकारी उसने वापूजी को सविस्तर दी थी । मुस्लिम शरणा- थिर्यों को किस भांति अपनो में ला वसाया वह भी कहा । उन्होंने नयी वस्ती को अपने अमूल्य आगीर्वाद भेजे थे । अमर- नाथ ने भारतीय लौह पुरुप मरदार वल्लभभाई पटेल से भी मुलाकात की थी। वल्ली द्वारा सहकारी वृत्ति पर अवलंवित प्रयोग विलीनीकरण के पश्चात् भी शुरू रहना चाहिये। इस महान् प्रयोग को सरकारी तिजोरी से सहायता भी मिलनी चाहिये - ऐसा उसने सरदार से कहा था। प्रयोग वाली सारी योजना सुन स्वयं मरदार ने सब को साधुवाद भेजे थे। अमर- नाथ यह सब कहने पाया था। उसने कृषि की सारी व्यवस्थामों का सूक्षम रीति से निरीक्षण किया। वह बेहद खुश था बत्ती वालों की सफलता और अपने मित्र धना का सुसंचालन देखकर। रात के समय सव को एकत्रित कर उसने कहा, बदल रहा है। राजा-महाराजाओं का सामंतशाही-युग नामशेष हो रहा है । इन्दौर आदि मध्य भारत की सव रियासतों को केन्द्र सरकार में विलीन फर एक नूतन प्रांत की रचना की जायगी। लेकिन जो भी प्रधान-मंडल आयेगा, तुम्हारे इस महान् प्रयोग "समय - १६६ को सर्वतोपरी सहाय करेगा। देहली में उनको उच्च अधिका- रियों व राजकीय नेताओं से मुलाक़ात करके तुम्हारे प्रयोग की की सविस्तर जानकारी उन्हे दी है । सबोंने एक आवाज़ में तुम्हें धन्यवाद दिये हैं। और तुम लोगों ने परित्यक्त मुस्लिम भगिनियों को अपने में समावेश कर लिया, यह सुन कर तो पूज्य बाबूजी की आँखें आशा से चमक उठीं । तुम्हारे इस प्रयोग को उन्होंने शुभाशिष दी है। और क्या चाहिये ? इसी तरह यहां कहिये । इसके साथ ही साथ हृदय-भू को भी अपने श्रम मे उर्वरा बनाइये । कृषि दो प्रकार की होती है । ज्वार, बाजरा गेहूं आदि की वाह्य; और प्रेम, दया, धैर्य ज्ञानादि की मान- सिक। दोनों की अपने श्रम से उर्वरा बनाओ। फिर देखना फ़सल कितना सुन्दर आती है । अमरनाथ चला गया। अल्प समय के पश्चात् बस्ती का प्रथम स्थापना-दिन आया। लेकिन देश की वर्तमान हालत को मद्दे नज़र रख, मनाया न गया। समय पानी की तरह वहता जा रहा था। और अकल्पित गांधी के उपवास, वम का फेंका जाना, और आखिरकार राष्ट्र के पिता पू. बापू का एक भारतीय द्वारा खून, ऐसे हृदर विदारक समाचार एक के एक आते ही गये। सब के मुंह दुःख से काले हो गये थे । लवों की हंसी सभी की अदृश्य हो गयी थी। एक दिन बस्ती के छोटे-बड़े सभी निवासियों ने उपवास किया। सखाराम ने कहा, " शिवजी ने ज्यों गरल पान कर देवों अमृत दिया, वैसे ही गांधीजी ने हमें दुःख को भूल कर्तय- य पर निरंतर आगे बढ़ाना सिखाया है। वही हम रात दिन रते रहेंगे। अगर हम यहां ठीक तरह से जीवन व्यतीत वाद को

१६७
"
करेंगे तो वे हमेशा हमारे निकट ही हैं। ऐसा हमें अनुभव
अपने आप होगा।
चंद रोज़ तक वस्ती का वातावरण काफी उदास मय रहा।
लेकिन धीरे धीरे सब अपनी-अपनी प्रवृत्तियों में रम गये ।
बस्ती निर्माण हुए को दूसरा वर्ष शुरू हो गया। मालतो छोटे
बालक-बालिकाओं को पढ़ाती, वह रात-दिन उनके ही साथ
रहती, कहानियां सुनानी और गाना सिखाती थी। प्रौढ़ों को
घना व सखाराम सिखाते थे। कोई निरक्षर न रहे ऐसा वस्ती
संचालकों व निवासियों का दृढ़ संकल्प था। पार्वती ने मानो
रट लगायी थी पढ़ने की। वह अब अच्छी तरह से समाचार
पर पढ़ लेती थी।
वस्ती का रंग दिन-ब-दिन पलट रहा था। नवमृष्टि-
नवसंस्कृति निर्माण हो रही थी। श्रमिकों, कृपकों, मजदूर
अपने उद्देश-पूर्ति के हेतु रात-दिन अविराम श्रम करने वाले
ध्येयार्थी जीवो श्रम करो, मेहनत करो। तुम्हारी मेहनत-परियम
निष्फल न होंगे।

ध्येय-सिदि ? ? बच्चों को साथ लेकर मालती जंगल में चली गई थी। बच्चे वृक्ष पर चढ़ रहे थे । गांवों से बाहर विस्तृत फैली वटवृक्षों की डालियों को थामे ऊपर चढ़ रहे थे। कोई फूल इकट्ठे कर रहे थे। कोई इधर उधर दौड़-दौड़ कर तितली रानी को पकड़ रहे थे। मालती मौन व्रत धारण किये, एक शिला पर बैठी हुई थी। वहां से लहलहाते खेत दृष्टिगोचर हो रहे थे। बाग़ बगीचे दिखाई दे रहे । वर्षों से वंजर पड़ी ज़मीन उर्वरा बन गयी, वहां आज नयी सृष्टि का निर्माण हो गया। लेकिन मेरा जीवन ! मैं भी आजन्म ऐसी ही रहूंगी क्या ? घनश्याम आखिर विवाह क्यों नहीं करना चाहता ? मैं उनसे पूछू तो भी कैसे ? मेरे मन की व्यथा, यहां कौन अपना है जिसे कहूं भी? उसकी अांखें भर आई, उसे अपनी स्वर्गवासी माँ की याद आई। वह वहाँ, बच्चों के कलरव से अलिप्त एक तरफ आँखे बंद किये चुपचाप बैठी थी। और धना हाथ में पुष्पहार लिये उसके बिलकुल निकटस्थ खड़ा था। मालती ने आँखें खोलते ही घना को सामने खड़े देखा । उसका दिल क्षण-भर के लिए चल-बिचल हो गया। लेकिन अपने को सम्हाल खड़ी हो गयी। परस्पर दोनो सामने खड़े थे। मैं अपना स्वयं बनाया है उसने पूछा ?

। " में नित्य-प्रति ही अश्रु-हार पिरोया करती हूं और आज भी अभी यही काम कर रही थी।" उसने प्रयुत्तर दिया। "मालती" "हूं (क्या)?" तुम मेरी जीवन सखी बनना पसंद करोगी?" मैं तो कभी की वन गई । लेकिन तुम्हारे आदर्श तथा ध्येयों के बीच अवरोध वन, जीवन में रोड़ा अटकाना नहीं चाहती । मुझपर दया न खाइये !" "तुमने तो मेरे हृदय पर विजय प्राप्त की है अपनी अथक सेवा-सुश्रुपा, त्याग व परियम से। मैं कोई दया नहीं खाता; अभी कल ही रात्री में इसी विषय की सखाराम के साथ चर्चा की थी । उसकी सम्मति है। प्रवके हमारी नयी बस्ती का द्वितीय जन्म दिन धूम धाम से मनाना है । और इस बस्ती का नामाभिकरण भी पूज्य वापू के नाम पर 'मोहन-गांव' रखना है। इसी भव्य समारोह के सुन्दर मौके पर हम दोनो भी शादी के गठबंधन वधेगे। तुम्हें पसंद है न ? में युगानुयुग भी इन्तज़ार में विता दूंगी। तो मैं जाऊं? "कोई काम हो तो अवश्य जाईए । घना उसकी तरफ घड़ी भर प्रेम सूचक दृष्टि निहार चला गया। मालती ने धना द्वारा दिया हार अपने गले में पहना हृदय से लगाया । वह आनन्द विभोर तन्मय हो, केयूर सी नृत्य करने लगी। छोटे-छोटे बच्चों में तन्मय हो उधम मवाने लगी। वह भी वृद्ध वट-दादा की लम्बी चोटी का सहारा ले अन्य बच्चों की नाई ऊपर चढ़ गई और मोदित मन से ऊंचे 1 । " " १७० ऊंचे झोंके खाने लगी। मानों उसका हृदय अमित आनन्दलहरी पर नाच रहा था। आज उसके हर्ष का पारावार न था। बस्ती का नामभिकरण-समारोह बहुत ही धूमधाम से होने वाला था। अधिक अन्त उपजाईये -' आंदोलन ये इस प्रयोग को पुरस्कार प्राप्त हुआ था। यहां सिर्फ अनाज ही अधिक मात्रा में उत्पन्न नहीं होता था। पंडित जवाहरलाल नेहरू का वहां आगमन होने वाला था, लेकिन पूर्व नियोजित अमेरिका-प्रवास की वजह से उन्होंने अपनी बहु-मूल्य शुभेशा भेजी थी। जयप्रकाशजी आयेंगे क्या? घना ने उन्हें पत्र प्रेषित कर निमंत्रण दिया था और उन्होंने आने का वचन दिया था। सबको बहुत ही आनन्द हुअा। तीन दिन का विशाल कार्यक्रम तय किया गया था। नाटिका, भारतीय खेलों की प्रतिस्पर्धा, वनविहार और सहभोज आदि नाना थे। जिस नाटिका को प्रति- स्पर्धा में पुरस्कार प्राप्त हुआ वह घना द्वारा लिखित दिग्दर्शित और अभिनित 'सच्चा प्रयोग अर्थात् सच्ची संस्कृति' का अभि- नय होने वाला था। नाटिका की रिहर्सल प्रारंभ हो गया था। रंगमंच तैयार करने का कार्य भी शुरु हो गया। प्रत्येक, अपने में रही अद्भुत कला के दर्शन साधारण जनता को कराने के लिए उत्सुक था। चूंकि उनमें नाना प्रकार के कलाकार तथा उत्साही कार्यकर्ता भी थे। सखाराम के बड़े भैया भी अपनी सब घर गिरस्ती बेच- च कर इस बस्ती में निवासार्थ आ गये। बड़े भैया, भाभी, यन्त, पारवी आदि अपने सगे-सम्बंधियों को एकत्र हुए लख, लती हर्ष से पागल हो उठी। " ओ फुफी, तुम्हारी शादी?" पारवी हंसते हुए पूछती

"
और मालती उसे अपने निकट खीच चुम्बन लेती हुई कहती
"हां, मेरी बच्ची।
फिर तो मेरी गुड़िया-गुडे को गादी भी तनी कले।
चलेगा न?"
" हाँ-हाँ चलेगा।"
सुन्दरपुर के समस्त मित्र-समुदाय को आमंत्रण पत्रिकाएं
भेजी गयी । मजदूरों के संगठन द्वारा, मजदूर-वर्ग को और
विद्यार्थियों की यूनियन द्वारा विद्यार्थियों को भी परिकाएं भेजी
गयीं। यहां तक कि, सुन्दरदास सेठ जी को भी आमंत्रणिका
भेजी गयी। और कमाल यह कि उन्होंने आना मंजूर भी
किया । रामदास ने सेवादल का संगठन किया था। आमंत्रित
अभ्यागतों के लिए छोटी-बड़ी झोपड़ियां भी तैयार की गयीं।
सर्वत्र आनंद का वातावरण छाया हुआ था। नई बस्ती में
प्रसन्नता की अखंड-धारा प्रवाहित हो चली थी।
और वह दिन भी गया, जिसका इंतजार, नई बस्ती के
निवासी, घना, सखाराम, मालती, रामदास आदि बेचनी से कर
रहे थे। सुन्दरदास का आगमन हुआ। जयप्रकाश और
प्रभादेवी पधारे । अभ्यागतों का स्वागत बड़ी ही सज धज ने
हुआ। स्वागत में किसी बात की कमी न रखी। -
नाथ भी समारोह में सम्मिलित होने हेतु इन्दौर से सात
पर आया था। उसने समस्त योजनाए जयप्रकाश-मुन्दन्दर
प्रभावती आदि अभ्यागतों को ठीक तरह से दिखाई दर
कालिन योजनाएं भी । मुस्लिम गरणाथियों के कि
पूरी जानकारी दी गई।
"यहां पर सव मानव के रूप

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रहे हैं । मुसलमान भी प्रथम, वह मानव है फिर मुसलमान,
इस बात को अच्छी तरह जानता-समझता है। व्योम ही
जिसका गुवंद है । ऐसी मसजिद व मंदिरों में प्रत्येक विना
किसी रोक-टोक के प्रार्थना करता है" घना सब को समझा
रहा था।
-
भोजन की सब चीजें वहीं की थी। वहीं के केले व
शकरकन्द को पीठ-कण में मिलाकर बनाई गई रोटियां बहुत
ही स्वादिष्ट लग रही थी खाने में ।
"उवाले शकरकन्द को ठीक तरह से पीस, उसे कण में
मिला, बनाई गई रोटियां बहुत ही स्वादिष्ट होती है" मालती
ने कहा । जयप्रकाश व अन्य अभ्यागतों के चेहरे मुस्कराने लगे।
रात्रि के समय नाटिका अभिनीत होनेवाली थी। ठीक
समय पर सब लोगों ने रंगमंच पर अपना-अपना स्थान ले
लिया। जयप्रकाशजी अपने नियत स्थान पर बैठे हुए थे।
प्रभावतीदेवी भी उपस्थित थी। और सेठ सुन्दरदास भी।
जन-साधारण में, घना और सखाराम के सुन्दरपुर वाले मित्र
पड़ोसी गाँवों के ग्रामीण नर नारियाँ व नयी वस्ती के निवासी
बहुत बड़ी तादाद में उपस्थित थे। घना ने अपने ध्येयों को
सफल करने व मंज़िल तक पहुंचने के जो जो आज तक प्रयत्न
किये थे वे ही सव नाटिका के रूप में पेश किये गये थे। उस
नाटिका में सुन्दरदास अपने जीवन की झांकी भी निहार रहे थे।
नाटिका के अंत में प्रधान-पात्र कहता है “ यही हमारा नया
प्रयोग", और यही हमारी नयी संकृति ।
लोग अभी उठ भी न पाये थे कि घना और मालती दोनों
ने रंगमंच पर प्रवेश किया। उनके साथ ही मालती के बड़े

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१७४ कर्तव्य करते रहना चाहिए और यह सुन्दर आदर्श शादी! न कोई धमाल, न विज्ञापन, न कोई, मालती-घनश्याम ! उनका उत्साह व फूर्ति लख, उनका जीवन-चरित्र श्रवण कर हृदय- कमल विकसित हो उठा। ऐसे ही प्रयोग करिये और सच्ची संस्कृति निर्माण कीजिए। जिस पर, समस्त राष्ट्र राष्ट्रनेता अभिमान करें। जयहिंद !" व

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Yatra

Author
Guruji Sanie
Title
Yatra
File name
Yatra
Text
OCR done
Published
2011/03
Publisher
Mumbai,book Dipote
Language
Sanskrit
Pages
178
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Geography
DLI number
552014
Barcode
4990010032698.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
xYZKnOjUbTl
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