Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Vasvadutta Katha
Front matter
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राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला
रापम्यान राज्य तारा प्रकाशित
मामान्यत अग्विन भारतीय नया विशेषा. गजन्यानदेशीय पुरातन कालीन
सस्कृत, प्राकृत, अपा, राजस्थानी, हिन्दी प्रादि मापानिबद्ध
विविधवाड्मयप्रकागिनी विशिष्ट-ग्रन्थावली
प्रधान सम्पादक
पन्नश्री मनीषी मुनि जिनविजय, पुरातत्याचार्य
सम्मान्य सचालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर,
प्रॉनरेरि मेम्बर ऑफ जर्मन ओरिएन्टल नोमाइटी, जर्मनी;
निवृत्त सम्मान्य नियामक (यॉनरेरि डायरेक्टर ),
भारतीय विद्याभवन, बम्बई; प्रधान सम्पादक,
सिंघी जैन ग्रन्थमाला, इत्यादि
ग्रन्थाङ्क २८
महाकवि सुबन्धु विरचिता
वासवदत्ता कथा
प्रकाशक
राजस्थान राज्याज्ञानुसार
सञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
जोधपुर ( राजस्थान )
१९६६ ई०
महाकवि सुबन्धु विरचिता
वासवदत्ता कथा
( पाठान्तर, परिशिष्ट एव समीक्षात्मक भूमिका सहित )
सम्पादक
डॉ० जयदेव मोहनलाल शुक्ल
एम.ए., पी-एच् डी.
प्राध्यापक, सस्कृत एव प्राचीन भारतीय संस्कृति
एल. डी. पार्टस् कॉलेज, अहमदावाद
प्रकाशनकर्ता
राजस्थान राज्याज्ञानुसार
सञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
जोधपुर ( राजस्थान)
विक्रमाब्द २०२३
प्रथमावृत्ति १०००
भारतराष्ट्रीय शकाब्द १८८६
ख्रिस्ताब्द १९६६
मूल्य- ४,५०
मुद्रक- वसन्त प्रिन्टिग, प्रेस अहमदाबाद, साधना प्रेस, जोधपुर
VASAVADATTA
1
of
SUBANDHU
-
Critically edited with
Introduction and Appendices
by
Dr. JAYDEV MOHANLAL SHUKLA,
MA., Ph.D.
Professor of
Sanskrit & Ancient Indian Culture
LD, Arts College, Ahmedabad
Publighed under the orders of the Government of Rajasthan
By
THE HONY, DIRECTOR,
THE RAJASTHAN ORIENTAL RESEARCH INSTITUTE
JODHPUR (Rajasthan)
V.S 2023 1
[ A D. 1966
R: 4.50
(First Edition-1,000 Copies)
Printers - Vasant Printing Press, Ahmcdabad.
Sadhapa Press, Jodhpur,
संचालकीय वक्तव्य 1 वासवदत्ता सस्कृत साहित्य मे एक सुप्रसिद्ध और विशिष्ट काव्यात्मक कथा है । इसका कर्ता सुवन्धु कवि है और उसने गद्य में इस कथा-काव्य की रचना की है। पद्य मे तो सैकडो ही छोटे-बड़े काव्य सस्कृत भाषा मे लिखे गए हैं परतु गद्य में लिखी गई काव्यात्मक रचनाएं अत्यन्त अल्पसख्यक हैं। महाकवि वाणभट्ट रचित हर्षचरित और कादम्बरी, कवि धनपाल ग्रथित तिलकमञ्जरी आदि ५-७ ही मुख्य गद्य-काव्यात्मक ग्रथ उपलब्ध होते है । इन सब मे सुबन्धु कवि कृत वासवदत्ता प्राचीनतम रचना है । यद्यपि यह कोई बड़ी रचना नही है परंतु भाषा, भाव और शैली की दृष्टि से यह रचना बहुत ही उत्तमकोटि की समझी जाती है। इसमे उपमा और अन्य अलकारो की बड़ी अद्भुत उक्तिया हैं । शब्दो का प्रयोग इस प्रकार किया गया है कि जो प्रतिपद में श्लेषालकार का आभास कराता है । इसलिए महाकवि बाण जैसे सस्कृत वाड्मय के एक अत्यंत तेजस्वी साहित्यकार ने भी सुबन्धु कवि की इस वासवदत्ता को प्रशसा करते हुए कह दिया कि 'क्वीनामंगलद्दो नून वासवदत्तया' अर्थात् वासवदत्ता की रचना को देख कर कविजनो का अभिमान गल गया। वासवदत्ता के ऐसे रचना-वैशिष्टय को देख कर बाण की ही तरह अनेक अन्य कवियो ने भी इसकी भूरि-भूरि प्रशसा की है। इस प्रकार बहुत प्राचीनकाल से वासदत्ता की ख्याति और प्रतिष्ठा बनी हुई है और इसके पठन-पाठन का भी यथेष्ट प्रचार होता रहा है । इस कथा पर अनेक विद्वानो ने अनेक टोकाए लिखी, जिनमे से कुछ लुप्त भी हो गई हैं और कुछ विद्यमान हैं। काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के अखड भारत मे प्राचीनकाल से ही सस्कृतज्ञ विद्वानो मे इसके अध्ययन-अध्यापन का यथा-योग्य प्रचार रहा है, अत. देवनागरी के सिवाय दक्षिण देशों मे प्रचलित तामिल, तेलुगु, कन्नड आदि लिपियो मे भी इस ग्रन्थ की प्रतिलिपिया होती रही और न विभिन्न देशीय प्रतिलिपियो मे विभिन्न विद्वानो के द्वारा अनेक पाठभेद भी उत्पन्न हो गये । इस प्रकार इस ग्रन्थ की दो वाचनाए बन गई-एक उत्तर- भारतीय और दूसरी दक्षिण-भारतीय । इस पर टीकाए लिखने वाले विद्वान् दक्षिण देशोत्पन्न भी हैं और उत्तर देशोत्पन्न भी। इन विद्वानो ने अपनी टीकाए ।
वासवदत्ता कथा . २ ] उन मूलादर्शो के आधार पर लिखी जो उनको अपने देश में प्राप्त और प्रच- लित थे। इसलिए इन टीकाप्रो मे भी उक्त प्रकार से कई पाठ-भेद और उसके कारण प्रर्थ-भेद भी उत्पन्न हो गये। सब से पहले ई० स० १८५६ मे फिट्ज़ वार्ड हॉल नामक सस्कृतज्ञ अंग्रेज विद्वान् ने कलकत्ता मे इसका मुद्रण कराया । इस मुद्रण मे उक्त विद्वान् ने ५- ७ बगला एव देवनागरी लिपि में लिखित प्राचीन प्रतिलिपियो का उपयोग किया और उनके आधार पर मूल पाठ शुद्ध करने का यथेष्ट प्रयास भी किया। विद्वान हॉल को जो प्राचीन प्रतियां मिलीं थी उनमें सबसे पुरानी प्रति सं० १६६४ (१६३८ ई. स.) की लिखी हुई थी। इस मुद्रण मे मुख्य रूप से शिव- राम विद्वान् की लिखी हुई दर्पण नामक टीका के पाठ को आधारभूत माना गया है। सुबन्धु कवि का समय निर्णय करने के लिए विद्वानो ने अन्यान्य बाह्य प्रमाणो के अतिरिक्त वासवदत्तागत कुछ विशिष्ट उल्लेखो का भी ऊहापोह किया है । इन उल्लेखो मे भी कुछ पाठ-भेद दृष्टिगोचर होते हैं जिससे यह निर्णय करना भी विद्वानो को शकास्पद लगता है कि कौन पाठ प्राचीन और वास्त- विक है और कौन पाठ परिवर्तित या परवर्ती है । इस विषय को लेकर संस्कृत- साहित्य के कुछ मर्मज्ञ विद्वानो मे विशेष विचार-विमर्श हुआ है। इन विद्वानो के लेखो को पढ कर हमे भी यह जिज्ञासा हुई कि वासवदत्ता की प्राचीन प्रतियां जो जन-भंडारों मे मिलती हैं उनका अवलोकन करना चाहिए और उनके पाठो का भी मुद्रित पुस्तकों के पाठो के साथ मिलान करना चाहिए। अनेकानेक जैन पुस्तक भडारो के विशाल ग्रंथ-सग्रहो का अवलोकन करते समय हमे अनुभव हुआ है कि सस्कृत, प्राकृत, अपभ्र श और देशभाषा के कई महत्त्व के अधिक प्राचीन ग्रथ जितने जैन-भण्डारो में उपलब्ध होते हैं वैसे अन्यत्र नही । साथ मे, कुछ जैन विद्वानो ने भी वासवदत्ता पर टीका-टिप्पण आदि भी लिखे हैं । अतः इनका भी अन्वेषण आदि करना हमे आवश्यक लगने लगा। प्रयत्न करने पर हमें कादम्बरी के सुप्रसिद्ध टीकाकार भानुचन्द्र गणि कृत वासवदत्ता की एक पुरानी हस्तलिखित प्रति प्राप्त हो गई। इन्ही के प्रसिद्ध शिष्य सिद्धिचन्द्र गणि कृत एक टिप्पण भी लिखा हुआ मिल गया । इन टीका-टिप्पणो के साथ वासव- दत्ता कथा का एक नूतन सस्करण प्रकाशित करने का हमारा विचार हुना और तदनुसार कथा के मूल पाठ की कुछ प्रतियाँ प्राप्त करने का हमने प्रयत्न शुरू किया । ई. सन् १६४२ मे प्राचीनतम जैन-ग्रथों के विशाल संग्रह स्वरूप जैसलमेर के जैन पुस्तक-भंडारो का अवलोकन करते समय हमे वहां इस कथा सवालकीय पक्तव्य [ ३ की एक प्राचीनतम ताडपत्रीय पुस्तक की उपलब्धि हुई। इसको देख कर हमने तुरन्त इसकी शुद्ध प्रतिलिपि करवालो, क्योकि उस समय इसकी माईक्रोफिल्म, फोटोकॉपी या फोटो-स्टाट-कॉपी करने-कराने का साधन उपलब्ध नहीं था। द्वितीय विश्व महायुद्ध का वह योवनाकाल था और भारत मे भी स्वतत्रता प्राप्ति का महा संघर्ष छिडा हुआ था। जैसलमेर ही के एक अन्य पुस्तक भंडार मे इसकी एक और कागज पर लिखी प्राचीन प्रति की उपलब्धि हुई। इसकी भी हमने प्रतिलिपि करवा ली । अनन्तर, भावनगर के भडार मे से भी हमे एक मूल कथा की प्रति मिल गई जो अपेक्षाकृत अर्वाचीन थी पर अच्छी लिखी हुई थी। अभी तक वासवदत्ता की जितनी भी पुरानी हस्तलिखित प्रतिया प्राप्त हुई हैं उनमे जैसलमेर वाली ताडपत्रीय पुस्तिका सब से प्राचीन है। यह, जैसा कि इसके अन्त मे उल्लेख किया हुआ है, वि० स० १२०७ मे लिखी गई थी अर्थात् आज से कोई ८१५ वर्ष पहले । सद्भाग्य से लिपिकर्ता ने उस समय के राज- कर्ता का भी निर्देश कर दिया है और स्थान का भी । इसका लिपिकर्ता कोई यशो- धर विद्वान् है जिसने रुद्रपल्लीय स्थान मे, जब राजा गोविन्दचन्द्र का शिविर- निवेश हो रहा था, इसकी प्रतिलिपि किसी आचार्य के लिए तैयार की थी। यह गोविन्दचन्द्र राजा इतिहास-प्रसिद्ध गाहडवाल वंशीय राजा है जिसकी राज- धानी कान्यकुब्ज थी। राजस्थान के इतिहास में यह सवत् एक विशिष्ट ऐति- हासिक घटना का सूचक है। इसी विक्रम संवत् १२०७ मे गुजरात पाटण के राजा कुमारपाल चौलुक्य ने अजयमेरु के चाहमान राजा अर्णोराज पर चढाई करके विजय प्राप्त की थी और उसके बाद वह चित्रकूट अर्थात् चित्तौड की तीर्थयात्रा करने गया था और उसने वहा समिधेश्वर महादेव के मन्दिर में पूजा- अर्चना की थी। इस विजय और यात्रा के निमित्त कुमारपाल ने एक शिलालेख भी उक्त मदिर में लगवाया था जो अभी तक विद्यमान है। जैसलमेर से ही हमें दूसरी प्राचीन प्रति उपलब्ध हुई, जो कागज पर लिखी हुई है, पर इसका प्राकार-प्रकार ठीक ताड़पत्रीय पुस्तको के जैसा है, अर्थात् छोटे आकार के कागजो पर यह लिखी हुई है। इसका लेखन समय वि० स० १४६८ है अर्थात् यह पुस्तिका उक्त ताडपत्रीय पुस्तिका के लेखन-समय से २६१ वर्ष बाद और आज से कोई ५५६-५७ वर्ष पहले लिखी गई है। इसका लिपि- कार भी कोई यशोधर ही है, जो अपने को कायस्थ लिखता है । यह प्रति किस स्थान में लिखी गई थी इसका तो कोई निर्देश इसमें नहीं किया गया है, पर इतना सूचित किया गया है कि 'मालेखिता पूर्वदेशमध्ये' इससे यह निश्चय १ . ४ ] वासवदत्तो कथा होता है कि यह पुस्तिका भी उक्त ताडपत्रीय पुस्तिका की तरह पूर्व भारत में लिखी गई थी। इस प्रति को लिखाने वाली अच्छर नामक श्राविका है जो जैन धर्मानुयायी ठक्कर धाउग की भार्या थी और उसने अपने पुत्र रामदास की पुण्य- स्मृति के निमित्त यह वासवदत्ता कथा की पुस्तिका लिखवाई थी। इस पुस्तिका के अन्त में एक और पक्ति पीछे से अन्य हस्ताक्षरो में लिखी हुई है जिसमे सूचित किया है कि सं १५३६ के वर्ष मे, सागरचन्द्रसूरि की शिप्य-सन्तति मे वाचक महिमाराज गणि के शिप्य वाचक दयासागर गणि ने इस प्रति को लिया । वासवदत्ता कथा की इन दो प्राचीनतर एवं शुद्व और सुन्दर लिपि मे लिखी प्रतियो को आधारभूत रख कर तुलनात्मक पाठ-भदो के साथ, 'राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला' द्वारा इस का एक नूतन सुसपादित संस्करण निकालने का हमने निश्चय किया। प्रसगवश जब हमारा अहमदाबाद जाना हुआ तो वहां के प्रो. श्री रसिकलाल परिख, प. श्री केशवराम शास्त्री, डॉ श्री हरिप्रसाद शास्त्री, डॉ. प्रियवाला शाह, प्रो. श्री मधुसूदन मोदी आदि जिन विद्वान् मित्रवर्ग द्वारा इतः पूर्व ग्रन्थ- माला के अनेक ग्रन्थो का जो सपादन-सशोधन कार्य चल रहा था. उसी प्रसग- मे प्रस्तुत ग्रन्थ के सपादक विद्वान् डॉ. श्री जयदेव शुक्लजी से भी किसी ग्रन्थ के सपादन कार्य के विषय मे बात निकली । मेरे मन मे वासवदत्ता के सपादन का विचार बना हुआ था, अतः मैंने श्री शुक्लजी को इस कार्य को करने की प्रेरणा की। मेरे प्रति अत्यत सद्भाव और स्नेह के कारण उन्होने बडे उत्साह और आह्लाद के साथ इसको स्वीकार किया। मैंने अपने पास जो उक्त प्रकार की इसकी विशिष्ट सामग्नी थी वह इनको दे दी और ग्रन्थ के छपने आदि की प्रेस की व्यवस्था कर दी। डॉ जयदेव शुक्ल संस्कृत के बड़े गंभीर एव परिश्रमी विद्वान् है । दर्शन, साहित्य और शब्दशास्त्र इनके प्रिय और विशेष परिशीलन के विषय हैं। प्रस्तुत कथा के सपादन में इन्होने बहुत परिश्रम पूर्वक कार्य किया है, अपनी विस्तृत अग्रेजी प्रस्तावना मे, सपादन, सशोधन आदि के बारे मे यथा-योग्य सब बातो का स्पष्टीकरण किया है तथा कवि सुबन्धु के समय और कथागत वस्तु का भी यथेष्ट विवेचन किया है । डॉ. जयदेव शुक्ल हमारे प्रिय-मित्र और सुहृद्-शिष्य स्वरूप हैं । इनके विषय में कुछ विशेष उल्लेख करना अस्वाभाविक सा होगा। तथापि हम इनके इस प्रकार के, प्रस्तुत ग्रन्थमाला के कार्य में हादिक सहयोग देने के निमित्त इनके प्रति अपनी हार्दिक आभार-भाव प्रकट करना कर्त्तव्य समझते हैं। - -
सञ्चालकीय वक्तव्य
[ ५
आशा है कि संस्कृत साहित्य और भाषा के विज्ञ-प्रेमी विद्वान्, सस्कृत
वाड मय के एक विशिष्ट रत्न-स्वरूप-इस कथा-काव्य का यह नूतन विशिष्ट
संस्करण, विशेष आदर के साथ स्वीकृत करेंगे।
*
--
मुनि जिनविजय
चैत्र शुक्ला द्वितीया, स० २०२३
दिनांक २४-३-६६
राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान,
जोधपुर
1
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CONTENTS
TO
सञ्चालकीय वक्तव्य
4
Introduction
I - SS
1 -
Text
I - $3
Appendix I
Subandhu & Bāņa
S4 - 66
Appendix II
Index of Verses
67 - 84
84
Corrigenda
1
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राजस्थान पुरातन प्रन्थमाला, ग्रन्थाक २८
घासवदत्ता कथा
"T"
Pr
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नमस्मा सायाकरबदरसदृशमेखिलवातलेयत्यसोदनाकवयापश्यतिसममतया
साजयतिसरवतादिवविरनासिवाशेलबच्चामाव्यमितिवदत्सुशिथिलसुनसरचावितन
वाचगायनुसनन्दर्जियति शशाकविनतरदामावश्चनालवासावाददायिनाय॥
धागतिवलिबिस्तंगारसयाबदा. मादारावतमासमयतिदिमकरालवाचकालिया
स्थामायान्युकानिक्षितीनियनपुर दायकाजालमिक्षयारजतशुक्तिरिवाछितवतिरत
गवमधिकं विश्वारितपरयुगोसजायाविन्दतिक्षिविकशितवादाहियाकविहिमकारााद्यांतर
सावियवरताथति विद्यमाखलइतिश्नावदंतिविहांसरीयदयनकलाव्यासकलाइयाखनीय
तिमलानकायसवतिरवलानामतावनिक्षणाधातिमिारक्षिाकोशिकानांबीयनिया
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है
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वि० स० १४६८ को लिखित प्रति का प्रथम पत्र
घासषवत्ता कया राजस्थान पुरातन प्राथमाला, अम्याक २८ 77 . समस्.TV सा 4 + ८ . F मंकित्तारुलंगासण्यावनइवययसिविविशाकशिवशरताल्पानामाइवम्वसनासाशकाचवाइव विक्लवाहतस/गशिक्लिामाक्षणमकाराशतताविधसबजयटयतत्यताकतवायवामरायाडसिल वझवितकोतत्समसममिथासेद्य मवायाधनंतरयस्याश्रमासनमुनिनायुष्यादिकमाद) ममायमात्रामासगतिशिलामयानावतिसशादायने धा यागतनपतियनसनतनवकार करुयाधार्यवयसंपर्कशायांतमामकाराशेतता ४२ तरबराकावनइस्कमचन्नविष्यतीतिर किंवाकसमागस्तनमकरोदनवास वदलयावसह पुरंगवाहदयासिल धितानिखरतर खायचमवनकालनिनाध्यतिnिाइ तिमहाकविमुक्षुधिरवितावासवदतानिधी स्थायिकांसमानामा बासव यसमयमार्गसिरवदिश्वुधवासरालवतकायचयशस्खया शालारश्राविकांतवानिज वरामदासपवासवदनातामधालविवाहमयो मवताय३६वर्षश्रामागारवंदर रिलता वा महिममाजगालवरामाशिष्यवा०दम स्लिसिसिरेगाड्या रहे। - ने . P है hy of thrower - M H वि० स० १४६८ की लिखित प्रति का अन्तिम पत्र - INTRODUCTION $ koul In October 1959 I was very kindly introduced to Munis'ri Jinavijayji Mahārāja, the great savant of Sanskrit and Prakrit learning and research in India by my revered teacher Prof. Rasikbhai C Parikh, Director of B ). Institute of Learning and Research, Ahmedabad, under whose guidance research in Sanskrit and Ancient Indian Culture is making good progress in Gujarat and who is a great source of inspiration to young teachers like me The revered Munis'ri was very kind in asking me to prepare an edition of Subandhu's Vasavadartā and for this purpose he gave me three manuscripts of the work The first was a copy of a palm-leaf manuscript from Jesalmer dated Samvat 1207, the second obtained from Bhāvanagara was an excellent paper manuscript with very good readings and dated Samvat 1468 and the third, also from Bhāvanagara, was dated Samvat 1734 He also kindly procured for me a copy of Hall's edtion of Vasavadatta A copy of Bhãnuchandra's Tippanaka on Vāsavadattā dated Samvat 1690 was also made available to me The material for the present work could be classified as follows A Printed Works 1 The Vasaradattā A romance by Subandbu, accompanied by Slivarāma Tripāthin's perpetual gloss, entitled Darpana, edited by Fitzedward Hall, MA , Calcuttā, 1859 Hall bas taken help of eight manuscripts A-H, out of which B, C, D and H are dated 1638, 1641, 1834 and 1758 A D respectively, the remaining four being undated In the text-constitution of Väsa vadattā Hall has followed Sivarama's readings in his commentary called Darpana and he is not willing to discard the readings of Sivarama against a united authority of his manuscripts Hall has also noted readings from Jagaddbara, a commentator who went before Sivarama and from Narasimba, who probably flourished after Sivarāma Hall's manuscript D represents perhaps an older tradition and is almost identical with Jagaddhara's text of Subandhu It may be noted here that Hall's ms D is nearer to the tradition of Southern Recension of Vasavadattā. 2 Väsaradattā Edited by Pandit R V. Krishnamacbāriar (Abhinava Bhatt Bāņa), Shrirangam, 1906.
2 ] VĀSAVADATTĀ sons The learned editor has appended to the work his own Sanskrit commentary which is very useful in understanding the intricacies of Vāsa vadattā The text of the work belongs to tbe Southern Recension and although the learned editor proclaims that he has consulted many manuscripts he does not give the readings of these mss. The Sanskrit Introduction which has some very interesting and suggestive remarks discusses some aspects of Vāsayadattā although the sarcastic remarks about our author Subandhu do not arrive at fruitful conclu- The work needs a careful reprint. 3. Vāsavadattā· A sanskrit romance by Subandhutranslated with an introduction and notes by Louis H. Gray, Ph. D., New york, 1924 (Columbia University Press). Gray has transated Vasavadattā into English and has reprinted as an appendıx to the Madras edition of Vāsavadattā, 1862. He has given in the foot-notes to his reprint of the Madras edition, variants from the Telgu text and the readings of Hall's manuscripts. It is out of context to enter into a discussion regarding the English rendering of Subandhu's work done by Gray. However, it should be said that Gray's text affords some help for a critical edition of Vāsavadattā. It may be said that in the context of the difficulties in making available the ms material from the South the texts of Krsņa māchāriar and Gray bave roughly been taken to represent the Southern Recension of Vasavadatta B Manuscripts Besides the three manuscripts named above, I have examined the following mss of the text and the commentary on Vasavadattā. Unfortunately, I was not able to make use of these mss earlier and therefore readings from them have not been incorporated in the foot-notes. This is not to be regretted, for the superior readings have been noted through the help of the codex P and A and these other mss, do not materially differ from P, A, B and T. 463 1. Vasavadatta of Subandhu (No in B O R I Govern- 1887-91 ment Manuscript Library, Poona. ) Beginning : श्रीनिविघ्नेश्वराय नमः । श्रीसरस्वत्यै नम ॥ श्रीगुरुभ्यो नमः ।। करवदरसदृशम- खिलं भुवनतल यत्प्रसादतः कवय.। पश्यति सूक्ष्ममतयस्सा जयति सरस्वती देवी ।। End इतिमहाकविसुर्वघुविरचिता वासवदत्तात्यायिका समाप्ता ।। शुभ भूयात् ।। स्वयभु- वांभोनिघिरसनिशानाथगणितेन्दे पौषे विमलनवमीवाक्पतिदिने । जगत्पूर्वोनाथो मधुरिपु- 1 INTRODUCTION [ 3 566 च गोपालतनुजो लिलेखेदं पुस्त निजपरजनाथं तः।। नवनीतविलिप्तागो यशोदानंदवर्धनः। नवनीरदसच्छायो गोविन्दस्तु मुदे मम ।।२।। The scribe uses a single danda for a comma and double danda for a full-stop marking the end of a sentence He indulges into occasional lapses in this The handwriting is rather unsteady and hurried but legible. There are marginal notes and explanations which quote lexicons and authoritative works in Alamkārasāstra The number of lines varies from eight to fourteen in sach folio The lines in each folio measure 8.6" and the follos are 23. 2 Vasavadatta tippanasāra of Ranganātha . (No BO.R I, Government Manuscript Library) 1891-95 Beginning : श्रीगणेशाय नमः ॥ चितामरिणाम राजाभूदिति संबंधः।। हिरण्यादीनां दानं वितरण ॥ पक्षे हिरण्यकशिपु त्यः प्राछादने भोजने च कशिपुः कथितो द्वयो। तद् द्वयं मि लतं चापि कशिपुर्भाष्यते क्वचिदिति घररिणः । End यत्संदिग्धमतिश्लिष्ट क्लिष्ट चामूलभाषितं । तद्वोधार्थ मसौ यत्नस्तेन प्रीरणातु मे हरि ॥६॥ इति रंगनाथोद्धृतो वासवदत्ताटिप्पनसार ॥६॥ As the name explains the work is short but proposes to explain important sentences and words The ms is written in good uniform hand-writing The folios are 12 in number and have 10-12 lines in each folio The lines in each folio measure 10-3" About 1680 AD is the date of Ranganātha as proposed by Gode 3 Vasavadattāpañíıkā called Vidagdhavallabha: (No 464 BORI Govt. Manuscript Library) 1887.91 Beginning: श्रीगणेशाय नमः ॥ सद्भेदे श्रीवाग्देवतयो गिरिः विश्व. ॥ अर शीघ्र रथागे व शीघ्रगे पुनरनन्यवत् इति च प्रसादोनुग्रहस्वास्यकृपाकाव्यप्रसत्तिथिति च ॥ End: .''जनपदविशेषः सन् शक्ति मुमोच । राजासौ ततस्तस्य शक्त्यभावे रक्षणायोग्य- त्वात् । अगाव्याकुलत्वात् । The ms has 59 folios. Folios 47 to 52 and 53 to 59 are numbered separately as i to 7 These are written in hurried and bold hand, the remaining portion of the ms is written in small hand The length of each line in a folio is 7-3. Gode proposes a date after 1350 A. D. for the author of this commentary Pañjikā । --------------- +-------- - 6 ] VĀSAVADATTĀ End. इति श्री महाकविसुबन्धुविरचिता वासवदत्ताभिधानाख्यायिका समाप्ता ।। संवत १७३४ प्रमिते माघशुक्लपक्षे अष्टम्या तिथौ । श्रीरस्तु ।। "कल्याणमस्तु ।। शिव- मस्तुपाठकवाचकयोः ॥ There are twelve folios with nineteen to twenty lines in each folio, the length of a line being about 81" The manner of writing, punctuation and spacing is uniform, the size of letters occasionally varying with each page There are only two marginal notes explaining a reading and a compound The above-noted mss P, A, and B. form the basis of our text. They follow the tradition of the Northern Recension and may be said to represent three stages of the Northern Recension, A and B giving some idea of the additions made subsequently in the original composition of Subandhu As we have understood the Shrirangam text (K) as representing roughly the Southern Recension, it will be interesting to compare a few samples in both the Northern and Southern Recensions of Subandhu's composition. We give below about half a dozen such samples which will give a fairly correct idea of the differences in the two recensions यस्य च निहितनाराचजर्जरितमत्तमातङ्गकुम्भस्थलविगलितमुक्ताफलदन्तुरितपरि- सरे, तरत्पत्ररथे रक्तवारिसञ्चरत्करिकच्छपोत्फुल्लपुण्डरीकशतसमाकुले, नृत्यत्कबन्धे, सुरसुन्दरीसङ्गमोत्सुकचारभटाहवारसम्भारभीषणे, समरसरसि, भिन्नपदातिकरितुरग- रुधिराों जयलक्ष्मीपादालतकरागरञ्जित इव खड्गो रराज । P.(Va. p.6 1 20-p 7.1 4) यस्य च निशितनाराचजर्जरितमत्तमातङ्गकुम्भस्थलविगलितनिस्तलमुक्ताफलदन्तु. रितपरिसरे, 'पतत्पत्ररथे, रक्तवारिसमुड्डयमानद्विरपदकच्छपे, विलसदुत्पलपुण्डरीके, वाहिनीशतसमाकुले, नृत्यत्कबन्धबन्धुरे, सुरसुन्दरीसमागमोत्सुकभटाहकारभीषणरव- भीपणे, सागर इव समरशिरसि, भिन्नपदातिकरितुरगरुधिराो जयलक्ष्मीपादालतक- रागरजित इव खङ्गो रराज । K (p 55,56) १. are added In the S.R words like निस्तल, समुड्डयमान, बन्धुर, चार, सम्भार, चारभीषणे, There is an attempt to break one sentence of the NR, into two or three clauses and to change the metaphor, २. अटवीमिवोत्तुगश्यामलकुचा, वानरसेनामिव सुग्रीवाङ्गदशोभिता, शनैश्चरेण पादेन सौम्येन दर्शनेन, गुरुणा नितम्बेन, लोहितेनाघरेण, विकचेन विलोचनेन, भास्वता- लद्वारेण, ग्रहमयीमिव ससारभित्तिचित्रलेखामिव त्रैलोक्यसौन्दर्यसङ्केतभूमिमिव रसा- जनसिद्धिमिव यौवनस्य, संकल्पवृत्तिमिव शृङ्गारस्य, निधानमिव कौतुकस्य, विजय- INTRODUCTION [ 7 पताकामिव मकरध्वजस्य, अभिभूतिमिव मदनकान्ताया., सकेतभूमिमिव लावण्यस्य"कन्य- कामष्टादशवर्षदेशीयामपश्यत्स्वप्ने । P. (Vās p II, 1, 3 ff) विन्ध्याटवीमिव उत्तुङ्गश्यामलकुचा, वानरसेनामिव सुग्रीवाङ्गदशोभिता, भास्वता. लङ्कारेण श्वेतरोचिषा स्मितेन, लोहितेनाघरेण, सौम्येन दर्शनेन, गुरुणा नितम्बेन, सितेन हारेण, शनैश्चरेण पादेन, तमशा केशपाशेन, विकचेन लोचनोत्पलेन ग्रहमयीमिव, ससार- भित्तिचित्रलेखामिव त्रैलोक्यचित्तरङ्गस्य, रसायनसमृद्धिमिव यौवनमहायोगिन', सकल्प- सिद्धिमिव शृङ्गारस्य, निधानमिव कौतुकस्य, विजयपताकामिव मकरध्वजस्य, प्राजिभूमि- मिव मदनस्य" कन्यकामपश्यत्स्वप्ने। K. (p. 77-79) भास्वतालङ्कारेण चन्द्रेण वदनमण्डलेन लोहितेनाघरपल्लवेन सौम्येन दर्शनेन गुरुणा नितम्ब विम्बन विकचेन नेत्रकमलेन शनैश्चरेण पादेन तमसा केशपाशेन ग्रहमयीमिव । H. (p 64) Under foot-note I on p 64 Hall notes-'भास्वतेत्यादिकेशपाशेने- त्यन्तस्य स्थाने सर्वेषु मूलपुस्तकेषु जगद्धरनरसिंहटीकयोश्चान्यक्रमावलम्बी पाठोऽस्ति' । In the above samples the differences in readings and also those noted by Hall are due to the anxiety of the learned scribes to improve upon and bring an order into the original statement of Subandhu which may not have been complete The confusion is very well cleared once for all by the SR when it meticulously adds words in the original sentence of Subandhu, so as to bring in all the nine planets Such descriptions of a maiden were rather an order of the day and a literary convention can be seen from the description of a young man in Harsa-Charita and verses like the one found in Bhartſharı (Kosambi : verse no 132) गुरुणा स्तनभारेण मुखचन्द्रेण भास्वता। शनैश्चराभ्या पादाभ्या रेजे ग्रहमयीव सा ।। तयोश्च मध्य मध्यमोपान्तवयसि वर्तमानयो कथमपि दैववशात् त्रिभुवनविलोभनीया. कृति पुलोमतनयेवानन्दितसहस्रनेत्रा वासवदत्ता नाम [तनया] वभूव । P. (Vas. p 21) तयोश्च मध्यमोपान्ते वयसि वर्तमानयो कथमपि दैववशात् त्रिभुवन विलोभनीया- कृति. पुलोमतनयेवानन्दितसहस्रनेत्रा मेरुगिरिमेखलेव सुजातरूपा शरन्निशेव उल्लसत्ता- रका मत्परिषदिव अच्छिद्र द्विजपङ्क्तिभूषिता राक्षसकुललक्ष्मीरिव माल्यवत्सुकेशशोभिता तनयाभूद्वासवदत्ता नाम। K (p. 151-159) The abruptness and brevity with which the N. R closes the ३.
8 ] VĀSAVADATTĀ ४ sentence in describing Vasavadattā makes us doubt whether the addıtional phrases in S R. were part of the original composition of Subandhu. अतिदूरप्रवृद्धेन मधुना जगति को वा न विक्रियते यदतिमुक्तोऽपि मुनिरपि विच. कास । कुसुमशरस्य नवचूतशरमूलनिलीनमधुकरावलिपत्रेणेव रेजे। वृन्तनिर्गतविच- किलविवरे गुञ्जन्मधुकरो मकरकेतोस्त्रिभुवनविजयशङ्खध्वनिमिव चकार । नवयावक- पङ्कपल्लवितसनूपुरतरुणीचरणप्रहारानुरागवशान्नवकिसलयच्छलेन तमेव रागमुद- वहदगोकपादप । अतिदूरप्रद्धेन मधुना जगति को वा न विवियते, यदतिमुक्तको मुनिरपि विच- कास ! कुसुमगरस्य नवचूतप्रसवशरमूले निलीयमाना मधुकरावलि माक्षरपक्तिरिव रेजे। वृन्तविनिर्गतविकचविचिकिलकलिकाविवरे मञ्जु गुञ्जन्मधुकरो मकरकेतोस्त्रि. भुवनविजयप्रयारणशङ्खध्वनिमिव चकार । नवयावकपकपल्लवित सनूपुरतरुणीचरणप्रहा- रानुरागवशान्तवकिसलयच्छलेन तमिव रागमुददहदशोक । (KP 163-165) Here S R. tries to improve upon N.R, by breaking a compound to make an independent phrase and by adding words like~ नामाक्षरपक्ति, विकच, कलिका, मजु, प्रयाण, which pretend to add poetic beauty to the readings in NR अथ सा तम्यामेव रात्री स्वप्ने वालिनमिवाङ्गदोपशोभित .."महामेघमिव विलसत्करक, [समुद्रमिव] महासत्त्व, मालिन्या कवरिकया, तुङ्गभद्रया नासिकया, शोणे- नाघरेण, नर्मदया वाचा, गोदया भुजया, स्वर्वाहिन्या कीर्त्या च पुण्यमयमिव, आदिकन्द शृङ्गारपादपस्य, रोहणगिरि सकलगुणरत्नसमूहस्य त्रिभुवनविलोभनीयाकृति ५ युवान ददर्श। युवान ददर्श। K (p 185) P (Vas p. 24 1 18 ff) महामेघमिव विलसत्करक, समुद्रमिव महासत्त्व, मालिन्या कवरिकया तुङ्गभद्रया नामिकया गोणेनाघरेण नर्मदया वाचा गोदया भुजया स्वर्वाहिन्या कीर्त्या च पुण्यसरि- न्मयमिव... A, B, Hall and the ms of Hall do not give these words Bhānucandra also does not notice these words (folio 14,b ) विधान्तकायानुवन्धतया प्रवर्तमानकथकजनगृगमनत्वरेषु चत्वरेपु, ममावासित- कुक्कुटेपु, निप्कुटेषु. कृतयष्टिममारोहणेषु वहिणेषु, विहितसन्ध्यासमयव्यवस्थितेपु गृह- म्थे, नकोचोदनचदुच्चकेसरकोटिसङ्कटकुशेगयकोशकोटरकुटीरशायिनि पट्चरणचक्रे, अयानेन प्रवर्तता [वमंना] भगवता भानुना [या गन्तव्यमिति सर्वपट्टमयर्वसनरिव मगिट्टिनाभिविरचिनवरुणेन, भगवता कालेन कृत्तस्य दिवसमहिपम्य रुधिरधारेव, दशमलवादरमहार्णवन्ध रक्तकमलिनीव गगनतटाकन्य, काञ्चनमेतुरिव कन्दर्पस्य, मनियारागारणलाकेव गगनयंतलस्य, लक्ष्मीरिद स्वयवरगृहीतपीताम्बरस्य, ६ INTRODUCTION [ 9 भिक्षुकीव तारानुरागरक्ताम्बरधारिणी, वारमुस्येव पल्लवानुरक्ता, कामिनीव कालेया- ताम्रपयोधरा, बभ्रुरिव कपिलतारका, भगवती सन्ध्या समदृश्यत । KP. 219 #f. Here the two recensions are following different traditions, it can be seen from the added phrases at the end of the paragraph The additions which reflect the spirit of Subandhu's composition, may be said to belong to early times, for not only the Madras Text of Gray but also Hall's ms. D gives the added readings 7 There are some sentences and passages which are found in the Southern Recension but not in our codex in the same order of words Such sentences appear in the mss. of the Northern Recension which thus have influenced the N Roeg Vás p 35 Para 40-Instead of STATE SIC- कैकदेशविरचितकान्तनिहितमुक्तामकरन्दपद्मरागशकलेन वासवदत्तादर्शनार्थमास्थितेन देवता- गरणेनेव जातवलयेन परिगतम् we have अथ स प्रविश्य कटकैकदेशे विनिर्मितम्, अभ्रदपशिखरेण सुधाधवलेनैकान्तरनिविपकनकमुक्तामरकतपद्मरागच्छलेन TAGarcirinaffiagaamaaa #11969 aftra I in Kmpage 282 and अभ्रलिहशिखरेण सुधाधवलेनकान्तरनिविपृकनकमुक्तामरकतपद्मरागशकलेन वासवदत्ता- दर्शनार्थमुच्छ्रितदेवतागणेनेव शालवलयेन विरचितम् । according to B and Hall and also according to A in adscript These few samples may, it is hoped, be helpful in giving some idea about how the original text of Subandhu developed in the two recensions The N R is shorter while the S, R. attempts to fill the blanks and adds further to complete a figure of speech or to balance a construction or improve the syntax Such improvements have a tendency to alter the original composition to such an extent that the stamp of individuality of the author is blurred. Bāņa's compositions were no less responsible in altering the text of Subandhu, for it is very likely that some of the enthusiastic improvements that Bāņa worked out in his desire to surpass Subandhu, might have been added Subandhu's text by learned scribes The parallels can be decided upon by a comparison of contemporary ms of the works of Subandhu and Bana In preparing this edition important variants only have been reported in the foot-notes at the bottom of the page In some cases clear mistakes on the part of the scribes e.g those found in B have been ignored noting those few which reveal a real variant reading or which make a material distinction between a reading of the Southern and the Northern Recension As has been said above the excellent readings of the palm-leaf codex have made my work smooth Some of these readings which could not be decided on their own merit have been in - Lemon 10 ] VASAVADATTĀ I established with the help of A. Clear omissions on the part of the scribe bave been put 10 square brackets only after a consideration of grammatical points Here and there a verbal form inadvertantly omitted by the scribe has been supplied. In such cases help from A and Hall has been accepted. In one case I bave ventured to alter a reading I do not know how far such a change is justified. The passage 1s न्यायस्थितिमिवोद्योतकरस्वरूपा, वौद्धसङ्गीतिमिवालङ्कारप्रसाधिताम् । (p 38-1-13 ) P न्यायस्थितिमिव उद्योतकरस्वरूपा, वौद्धस्थितिमिवालङ्कारप्रसाधिताम् । 2 A न्यायविद्यामिवोद्योतकरसुल्पा वौद्धसङ्गतिमिवालवारप्रसाधिताम् । 3 K and G न्यायविद्यामिव उद्योतकरस्वरूपाम् सत्कविकाव्यरचनामिव अलङ्कार- प्रसाधिताम् । Hall न्यायस्थितिमिवोद्योतकरस्वरूपा बौद्धसङ्गतिमिवालङ्कारभूपिताम् । 5. HC वौद्धसहतिमिवालङ्कारभूपिताम् । 6 Bhānuchandra does not refer to the point. 7 न्यायस्थितिमिव उद्यतकरस्वरूपा बौद्धसगतिमिवालंकारप्रासाधिताम् । Vāsaydattā, folio 18 b 1 10 (BOR.I Govt Ms Library ms. no. 463/1887-91 Samvat 1644) 8. पक्षे उद्योतकरो वार्तिककृत् । सगतिः सिद्धान्त. पक्षेलकारस्त Folio 12 a 1 i Vasavadattā-tippaņasāra of Ranganāth (BOR I. no 566/1891-95) 9 प्रसाव्यते काचित् संहतिरिति पाठ तत्रापि सहतिशब्देन ग्रथ एव ।। Folio 54 b, 1 2 Vāsaradattāpañjikā called Vidagdhavallabhā (BO. RI No 464/1887-91) 10. अलकारप्रसाधितां मडनभूषितां पक्षे अलकारो वौद्धाचार्य । Folio 74 b I. 5, Narayana's com. (B O RI No 567/1891-95) From these references it may be inferred that the reading सत्कवि- काव्यरचना of the S R is clearly against the spint of the N R. which has वौद्धस्थिति, बौद्धसंगति and बौद्धसहति (B and Vidagdhavallabha) as the readings The reading atafafe is clearly a improvement on the part of the scribe following the words न्यायस्थिति. The word सङ्गीति primarily means a 'council', hence a Buddhist Council. Such 'Councils' were three in number (सङ्गीतितयम्-Mahāvastu, P. 251) It also means, according to Childers' Pali Dictionary 'chanting together, celestial choir and the Nikāyas of Suttapitaka which are called, according to Sinhalese tradition, मझिमसङ्गीति'. The word सङ्गीति later INTRODUCTION [ II is found used with qufa as in lfagufu where "More important Dharmas arc taught by the Master because Dharmas held by Vajjian Bhikkhus of Pāvā were not the truc ones' (JP.T S. 1905 P 99). Here the words mean a book by riga (acc to Chinese tradition) or Fitfoca (acc to Bu-ston). That the word mcans doctrine and particularly 'Buddhist doctrine' can be seen from the names of works like महायानाभिधर्मसगीतिशास्त्र of Asamga and its commentary महायानाभि- Ehtiyan Huitfeetika of Sthiramatı (JR.AS. 1929 p. 451. Buddhist Logic before Dignāga) Sylvain Levi (Mahāyānasūtrālankāra Paris 1911. P. 15 and 16) following a similar meaning of the word infa reads the Vāsavadattā passage as atanifafhale e Testfear and suggests that the passage refers to the Buddhist doctrine as propounded by works like HERTTIHÄHifaznit of Āsanga which was translated into Chinese by Hiuan-tsang. All this has impelled me to adopt the reading #lfa suggested by the more or less corrupt reading सङ्गति. MI 1 Subandhu's date, home, personality etc Subandhu's date and the place where he lived and wrote are yet unsolved problems in Sanskrit literary chronology Tradition proclaims him as a nephew of Vararuchi and a poet in the court of Vikramaditya (नरसिंह वैद्य circa 1500 AD, a commentator of Vasavadattā, कविरय विक्रमादित्यसभ्य । तस्मिश्च राजनि लोकान्तर प्राप्ते एतन्निवन्ध FAT Hall, intro p 6 ) and therefore living in the later part of the sixth century alter Christ. We give below a few references from Sanskrit and Prakrit writers and inscriptions which directly or indirectly refer to Subandhu I sitiusafta of Mankha (12th century) has the following verse- मेण्ठे स्वढिरदाधिरोहिरिण वश याते सुवन्धी विधेः शान्ते हन्त च भारवौ विघटिते वाणे विषादस्पृशः । वाग्देव्या विरमन्तु मन्तुविधुरा द्राग्दृष्टयश्चेते शिप. कश्चन स प्रसादयति ता यद्वारणी सद्वारिणनी। II 53 That Markha intended chronological order in the references to hos, ry, Hrfa and arut may be accepted 2, 79qyrugata of Kavirāja (about 1200 A. D) has the following 1 + - - 12 ] VÄSAVADATTA verse in which the poet mentions सुबन्धु, वारण and himself (कविराज) in a chronological order सुवन्धुर्वाणभट्टश्च कविराज इति त्रयः । वक्रोक्तिमार्गनिपुणाश्चतुर्थो विद्यते न वा II I. 4I 3 A Canarese record of 1168 A D found at Balagani (Rice Lewis • Mysore inscriptions p III, Bangalore 1879, also Epigraphia Carnatica Vol vii, 92-96) describes the attainments of Vāmasaktı, the learned head of the Kodiya Matha "In Slabda Pānını, in Niti Bhāsaņāchārya, in Nātya and other Bharatadāstras Bharatamuni, in Kāvya Subandhu, in Siddhānta Lakulis'vara, at the feet of Siva a Skanda adorning the world, thus is Vamasakti truly described." 4 Two verses found in anthologies which are attributed to Rāja- Sekhara (900 A. D.) give a list of poets. Subandhu is one of them. (a) भासो रामिलसौमिलो वररुचि. श्रीसाहसा कवि- मेंण्ठो भारविकालिदासतरला. स्कन्ध सुबन्धुश्च य । दण्डी वाणदिवाकरौ गणपतिः कान्तश्च रत्नाकर सिद्धा यस्य सरस्वती भगवती के तस्य सर्वेऽपि ते ॥ Quoted by Sarngadhara (शार्ङ्गधरपद्धति, Peterson I 188) (b) सुवन्धौ भक्तिर्न क इह रघुकारे न रमते धृतिर्दाक्षीपुत्रे हरति हरिचन्द्रोऽपि हृदयम् । विशुद्धोवित शूरः प्रकृतिमधुरा भारविगिर- स्तथाप्यन्तर्मोद कमपि भवभूतिर्वितनुते ।। It may be supposed that (a) has observed chronological order in the enumeration of poets while (6) has not 5 काव्यालङ्कारसूत्रवृत्ति of Vamana hes a passage- कुलिशशिखरखरनखरप्रच- यप्रचण्डचपेटापाटितमत्तमातङ्गकुम्भस्थलगलन्मदच्छटाच्छुरितचारुकेसरभारभासुरमुखे केसरिणि (1 3 25 ) which is similar with one from Vāgavadattā (p 45 1 3) कुलिशशिखरखरनखरप्रचयप्रचण्डचपेटपाटितमत्तमातङ्गरक्तच्छटाच्छुरितचारुकेसरभासुरकेसरि. कदम्बकेन । A similar sentence is also found in Harsacharita (cp. Appendix I no 37) As will be shown in the course of our discussion Bapa has accepted a number of passages from Subandbu who is quoted by Vamana who flourished in the later half of the 8th century 6 The inscription in the Rādhanpur plates of Govinda III (Keilborn Epigraphia Indica Vol vi. p 239 ff) takes a number of alliterations and puns from Subandhu and - Bâņa as has been very ably proved by Keilhorn in his notes The inscription which is dated 808 A D (शक सवत् ७३०) is an ample testimony of Subandhu's Influence on later writers । - INTRODUCTION [ 13 In .. 7 Gaudavaho of Vākpatırāja mentions Subandhu, भासम्मि जलणमित्त कन्तिदेवे अ जस्स रहुआरे । सोवन्वेन अबन्धम्मि हारिचन्दे अपाररान्दो ॥ V. 800 It is rather strange that Vākpatirāja does not mention Bāna whose fame must bave spread by the time this protege of Yashovarman of Kanyakubja living about 725 A. D flourished. 8 Dandin discusses श्लेष the second chapter of his Kāvyādars'a while illustrating tbe नियमवान् variety he says- निस्त्रिशत्वमसावेव धनुष्येवास्य वक्रता । शरेप्वेव नरेन्द्रस्य मार्गरणत्वञ्च वर्तते ।। II. 319 and while illustrating fasterat he says- अच्युतोऽप्यवृपच्छेदी राजाप्यविदितक्षय । देवोऽप्यविवुधो जज्ञे शङ्करोग्यभुजङ्गवान् ।। II 322 Subandhu has similar phrases in Vasavdatta, eg. यत्र च राजनीतिचतुरे भुवो नायके शासति वसुमती निस्त्रिगत्वमसीनाम् (Vasavdattā p. 211, 7) and शङ्करोऽपि न विपादी (Vas p 5 1.5). Some of the illustrations given by Dandin while discussing आदिमध्यान्तगोचर यमक have resemblance with tliose found in Vasavadatta e g मधुर मधुरम्भोजवदने वद नेत्रयो । (Kavya IIL. 8 a) and वदने वदनेत्रपेयकान्ती। (Vasa p 37.1 2), कमल कमल कुर्वदलिमहल- मत्प्रिये (Kavya III 17a) and कमला कमलालया जिता (Vasa. 34 1.9) It should be said that the resemblances may be accidental or merely verbal or both might have taken them from a common source. 9 Māgha who flourished after 700 A. D-as his reference to Jinendrabuddhi's Nyāsa on Kās'ıkā, found in S'islupālavadha II 112 proves--borrows ideas from Subandhu's Vasavadattā I () मत्सङ्गतिप्रसिद्धो वारुणीसमागमाद् द्विजपतिरेप पतिष्यतीति हसन्त्यामिवाखण्डलककुभि । भगवति भास्करे समुदयमारोहति । । Vasa. p 41 1. 16 (b) Sisupalavadha X1. 12 उदयमुदितदीप्तिर्याति य सगती मे पतति न वरमिन्दु. सोपरामेप गत्वा । स्मितरुचिरिव सद्य साभ्यसूय प्रभेति स्फुरति विशदमेषा पूर्वकाष्ठाङ्गनाया. ।। 2 (a) [नव] नखपददष्टकेशनिर्मोकवेदनाकृतसीत्कारविनिर्गतदुग्धमुग्धदशनकिरण- च्छटाधवलितभोगवासासु । Vasa p 8 1 9 ++ 14] VASAVADATTA (b) S'is'upālavadha x1 54 सरसनखपदान्तर्दपृकेशप्रमोक प्रणयिनि विदधाने योपितामुल्लसन्त्य विदति दशनाना सीत्कृताविष्कृतानो अभिनवरविभासः पद्मरागानुकारम् ॥ 10 There is a striking resemblance between some of the verses of Bhartrhari and some statements in Vāsa vadattā (a) गुरुणा स्तनभारेण मुखचन्द्रेण भास्वता । शनैश्चराभ्या पादाभ्या रेजे ग्रहमयीव सा। भर्तृहरिसुभापितसङ्ग्रह (Kosambi) V 132 and शनैश्चरेण पादेन सौम्येन दर्शनेन गुरुणा नितम्वेन, लोहितेनाधरेण, विकचेन विलोचनेन, भास्वतालङ्कारेण, ग्रहमयीमिव, ससारभित्तिचित्रलेखामिव कन्यकामष्टाद- शवर्पदेशीयामपश्यत्स्वप्ने । Vasa. p II 1. 4 (b) क्षीरेणात्मगतोदकाय हि गुणा दत्ता पुरा तेऽखिला क्षीरे तापमवेक्ष्य तेन पयसा स्वात्मा कृशानी हुत . । गन्तु पावकमुन्मनस्तदभवद् दृष्ट्वा तु मित्रापद युक्त तेन जलेन शाम्यति सता मैत्री पुनस्त्वीदृशी ।। भर्त हरिसुभाषितसङ्ग्रह (Kosambi) V 28 2nd [तथाहि] माधुर्यशैत्यशुचित्वतापशान्तिभि पय पय इति निमित्ततामुपगतस्य दुग्धस्य मत्समागमादृर्षितस्य क्वाथे पुरो ममैव क्षयो युक्त इति विचिन्त्येव वारिणापि क्षीयते। Vasa p I 1.37 (c) वह्विस्तस्य जलायते जलनिधि• कुल्यायते तत्त्क्षणान् मेरुः स्वल्पशिलायते मृगपति सद्य कुरजायते। व्यालो माल्यगुणायते विषरस. पीयूषवयिते यस्याङ्गेऽखिललोकवल्लभतम शील समुन्मीलति ।। भर्तृहरिसुभाषितसड्ग्रह (Kosambi) V 324 and त्वत्कृते यानया वेदनानुभूता सा यदि नभ पत्रायते सागरो लोलायते ब्रह्मा लिपिकरायते भुजगपतिर्वाक्कथक तदा किमपि कथमपि एककयुगसहस्र रभिलिख्यते कथ्यते वा । Vasa p 39 1 5 As regards the times and personality of Bhartrharı we are not on a sure ground. At least four Bhartrharis are known to the literary tradition. The grammarian Bhartſbarı among these, 18 the earliest This great grammarian referred to, quoted and refuted with reverence by almost all the great minds in Brahmanic, Buddhist, and Jain philosophy is the famous writer of Vākyapadiya in three (Agama, Vākya and Pada) Kāndas, discussing the philosophy of Word-Essence, Sentence and grammatical categories and Mahābhāsya Dipikā or । .
INTRODUCTION [ 15 Pradıpıkā, a voluminous commentary on Mahābhāsya, which unfortunately does not go beyond the bhāsya on para SSTTAA, cp Adyar transcript no 39G 17/V I-II) which has laid under debt all the commentaries on Mabābhāşya, beginning with Pradipa of Kaiyata This grammarian cannot be the poet Bhartrharı as can be easily seen from a comparison of the works of both, from the soleciems found in TTiTy, from the number of Gods refered to as against the Advaita of the grammarian and also because no poetical activity of such an early writer as grammarian Bhartſbarı has ever been recorded The other personality known as Bhartſhari is the famous poet Bhatti who composed Bhattıkāvga and who flourished during the reign of the Maitraka king Dharasena II about 600 A D The other Bhartrhari was a famous chief of the Kanfatta Logins in Eastern India. It is likely that I Ching has confused the poet Bhartrharı with the grammarian Bhartrhari and in his enthusiasm to see everything Buddhist in India has feathered on him the worship of 'Three Jewels' Subandhu uses almost the same words of Bhartrharı, adds a few of his own and instead of compressing the meaning in fewer words expresses it elaborately In Subandhu the echoes of the rhythm of the original phrases of Bhartſbarı can be found Thus either Subandhu imitates Bhartſbarı or both are following a common source. As for the latter possibility we have no evidence and considering the fact that Bbartpharı lived sometime in the later half of the sixth century Subandhu may safely be assigned to a period later than sixth century A.D II While Subandhu may be said to follow Varābamıhıra in his descriptions of Vindhya (V p 13-14, Revā Vp 15-16 and the ocean V.P 45, Bţhatsamhita Vol I p. 267-270) there are verbal resemblances like रहसि मदनसिक्तया रेवया कान्तयेवोपगूढ (बृ स p 270) विन्ध्यमस्तम्भयद्यशश्च तस्योदय श्रूयताम् । and रेवया प्रियतमयेव प्रसारितवीचिहस्तोपगूढ । (Vasavadatta P 16 1. 8) Subandhu imitates Varābamıhıra who flourished around 550 AD - 12 Subandhu in his enthusiasm to weave into his composition ideas from earlier authors has unconsciously imitated poets like Amaru दम्पत्योनिशि जल्पित गृहशुकेनाकणित यद्वच प्रातस्तद्गुरुसनिघौ निगदतस्तस्यैव तार वधू । हाराकर्षितपद्मरागशकल विन्यस्य चञ्चो पुरो व्रीडार्ता प्रकरोति दाडिमफलव्याजेन वाग्बन्धनम् ।। Subhāsıtaratnakosa (Kosambi) V. 621 1 I 16 ] VĀSAYADATTĀ and Vasavadatta p. 8 1 II क्षणदागतसुरतर्वयात्यवचनशतसस्मारकगृहशुकचाटुन्याहfagmura TCHFGTETTE! While it is difficult to determine the date of Amaru, he may be said to have flourished after Kālıdāsa and the later half of the sixth century may be assigned to him as bis date. Subandhu may have been a younger contemporay of Amaru, 13 A terminus a quo to the composition of Subandhu's Vāsavadattā is the reference to Udyotakara, fareferfafuatata Frategy atanglfafar- FRIHEGIĄ I (p. 38 1 13). It is clear that Subandhu here refers to Udyotakara the famous writer of Nyāyavártıka on the Nyāyasātra of Aksha pāda Gautma The philosophical activity of the five centuries after cbrist an era was one of refutation of other's points of view and establishing one's own The Nyāga doctrine had been severly criticised by Dignāga and it was the express purpose of Udyotakar to dispel the shadow of 'the arguments of bad logicians' lıke Dignāga (parmiara ficaraeg Afroad TFG II farato i Nyāyavārtika-mangala verse ) The famous Buddhist logician Dharmakirti tried to refute Udyotakara, while his other rival was the mimānsaka Kumārıla and the grammarian Bhartrhari. It may be assumed that while Dignāga and Bhartrharı were contemporaries refering to and refuting the views of each other, Kumārıla, Udyotakara and Dharmakirti were also contemporaries not very far removed in time from one another, Thanks to Rahulji's researches, we now are pretty certain about Dharmakirti's date wbich is about 600 AD As against the above order in chronology of these famous philosophers it is very plausible that farin flourished about 475 AD, Udyotakara about 500 AD, and Kumārıla and Bhartrharı about 525 A.D and Dharmakirti about 600 AD In any case Subanbdu's reference to Udyotakara and bis mighty contribution in Nyāya determines for him tbe earlier date viz that he could not have lived before 500 AD in any case The other reference bas raised many arguments In the manner of Subandbu's reference to an author in the earlier sentence the word 15 gr should definitely be construed to refer to a work and nothing else, Nārāyaṇa Dixita, (about 1500 AD) one of the earliest commentators of Vāsavadattā reads the name of a Buddhist logician (997 Fratergri.) while Vidagdhavallabā (a commentary on Vāsavadattā), Bhānuchandra (1900A D) and Ranganātha (1685A.D) are silent on the point Sivatāma (1700 A.D) explains, 19777 itfagnat fry. footgeste foart (Hall D. 235). According to Jagaddhara (1400 A.D) another commentator on Vāsa vadattâ, Dharmakirti was the author of the work. Narasimba Vaidya (1500 AD) another commentator of Vasapadatt also suggests that Alamkāra was a "cāstra bouddhique." - INRODUCTION [ 17 From these references one thing is certain and it is that the term Alamkāra should be understood in the sense of a work discussing 'buddbist philosophy' (Sylvain Levi Mahāyānasātrālankāra of Asang, Paris 1911, Intro p. 15 'En fait de shastras l’Alankāra par excellence ne peut eitre que le shastra issu du ciel Tusit et revele par maitreya) Now Dharmakirti is not reputed to have written any work of the name Alamkāra, nor bas he written any work the ending word of which is a Pt Rābulji's researches have thrown considerable light on the works of the famous logician It cannot also be said that the word met refers to some work on WAGTETTE Although as a poet Dharmakirti is known to have composed some stanzas now found in anthologies of Sanskrit verses, and such stanzas have the grace, sparkle and clarity of their own, there is no tradition connecting Dharmakirti with the composition of any poetical work or a work on poetics Anandavardhana only refers to an uncertain opinion when he quotes (Dhvanyaloka with Lochana, Benares 1940 p 487) the verse aquafa- Tout a fua etc as composed by Dharmakirti. He remarks (p 489) 7 914 3717 qqfacgara sfa que la 4759***1717- Threarea afeticcerat i although he is quite certain about Dharmakitti's authorship of another verse, अनघ्यवसितावगाहनमनल्पधीशक्तिना- प्यदृट्टपरमार्थतत्त्वमधिकाभियोगैरपि मत मम जगत्यलव्वसद्दर्शप्रतिग्राहक 'प्रयास्यति पयोनिचे पय इव स्वदेहे जराम् । which is Pramāņavārtika iv 288 It is very likely that by 991677 Subandbu referred to either HF191797791&T of Maitreya , and commented upon by Vasubandhu or सूत्रालङ्कार of Asvaghosa or अभिसमया- लद्वार of Asanga The word सङ्गति or सङ्गीति meant a doctrine or a deliberation arrived at in a Buddhist council, hence ultimately the Buddhist doctrine Subandhu refers to older doctrines, authors and works His reference to Mimānsā ( HIFTETT 99 fafeafaut faepia Vāsa. P 15 1 2, केचिज्जैमिनिमतश्राविण इव तथागतमतध्वसिन. | Vasa p. 24. 1 7 श्रुतिवचनमिव क्षतदिगम्बरदर्शनम् | Vasa p 52 1 11, and मीमासकदर्शनेनेव तिरस्कृतदिगम्बरgaiat i Vāsa p 52 I II ) refer in general terms to Kumārıla and his views in works like Slokavārtika and Tantravārtika while refuting the Jain doctrine He refers to' वृहत्कथा, कामसूत्र of Mallanaga, हरिवश 1 18 ] VĀSAVADATTĀ and the gratatfafa as the science of metrics (and not the work of the same name attributed to Danạın. (See Kane : I. A 1911 P. 177 ). The terminus ad quem to the work of Subandhu is the reference to Vāsavadattā by Banabhatta in Harsacharita Bāna in the introduction, after paying his homage to TFT, 3#1 and 21 criticises bad poets and plagiarists He then refers to peculiarities of style with the northern, western, southern and eastein writers and in the same context declares that the idea with a novel turn (779154) uncommon and attractive description (TURIT ETT ) words with unforced double meaning (अक्लिप श्लेप), transparent rasa (स्फुटो रसः) and a compactness in diction (fafCTETSOFT ),-all these are difficult to combine in one composition He then refers to the writers of Ākhyāyıkās or Narratives With this mental background he immediately writes the following verse. कवीनामगलद्दो नून वासवदत्तया। शक्त्येव पाण्डुपुत्राणा गतया कर्णगोचरम् ।। The Vasavadattā praised in this verse is the present work of Subandbu. The word Vāsayadattā is known to us from Mabābhāsya Commenting on the Vārtika लुबाख्यायिकाभ्यो बहुलम् on Panini's sātra अधिकृत्य कृते ग्रन्थे (1v 3 87) Patalijali mentions as illustrations वासवदत्ता, सुमनोत्तरा and TT. Sumanottarā as story book was known to Buddhist literature and the story of Vāsavadattā referred to the famous Vasapadattā. Udagana episode Another work known as a Vāsavadattānātyadhārā was a drama by Subandhu, a poet and minister at the court of Bindusāra, son of Chandragupta Maurya Several extracts have been traced from the work in the अभिनवभारती on नाट्यशास्त्र. In भावप्रकाश he is referred to as a writer on dramaturgy (cp I H Q I. P 261 ) The manner and context in which Bāņa writes the verse makes it quite clear that he refers to a work and not to a mere story The story-works known to Bāna could be Brhatkathā and Subandhu's Vāsapadattā for no early story-works except that of Subandhu and Dandın are known to us The Vāsavadattā Ākhyāyıkā known to Patañjalı has not come down to us nor any of its adaptations or abridgements. The name of the author viz Subandhu is not mentioned because it was very well-known to others and to Bāna At the end of the introductory verses to Kādambari Bāņa says that he wrote the work 'to surpass the two' (feat Fraauufaaut 9597) which may be said to refer to BỊhatkatbā of Guņādhya and Vasavadattā of Subandhu. The internal similarities between Väsayadattā the on } : 19 INTRODUCTION one hand and Harsacharita and Kādambari on the other prove, as we are going to show, the indebtedness of Bāņa to Subandhu in matters of diction, style, use of figures of speech like Virodha, Parisamkhyā, S'lesa and Mālādipaka and with regard to some of the motiffs common to both Vāsayadattā and Kādambari It is almost certain that the superior composition Kādambari of the master narrator Bāņa whose genius as a great poet is evident at each sentence of Kādambari threw away Vāsayadattā into the limbo of disrespect and criticism, The importance that Harshavardhana, the patron of Bāņa swayed over many regions of northern India was also responsible for spreading the fame of his protege far and wide. Social and political conditions of the later half of the sixth century and the early decades of the seventh century also prove the above contention A general social and political degeneration had set in after the fall of the Guptas More than once Hiuen Tsang himself was robbed by brigands Mutilation of the nose, ears, hands or feet was penalty for serious offences as is shown by Yajñayalkya Smộti and Subandhu when the latter says यत्र च शासति धरणिमण्डल कण्टकयोगो नियोगेपु, परीवादो वीणासु, खलसयोगः शालिषु, द्विजिह्वसङ्गृहीतिराहितुण्डिकेपु, करच्छेदः क्लृप्तकर- JEUG, 75179177 HPTTAT" (Vāsa p. 3. 1 13) Weber declared (Indische Streifen I 372) that on a comparison of the style in the writings of Dandin, Subandhu and Bāņa, be felt compelled to assign to Subandhu a middle place between Dandin and Bāņa. According to Keith "Subandhu must be placed in the second quarter of the 7th century" (History of Sanskrit Literature p 308) and that he "was only a slightly older contemporary of Bāņa" (JRAS. 1914 pp. 1100) It would be too much to read some historical reference in the name Dāmodara in the introductory verse no 3 of Vāsayadattā or to Krsnagupta and Mahāsenagupta in the phrases like Son 59 mayacai i (Vāsa p. 3 1 3 ) and 59 HETOHIFTETT faforcatoa i (Vāsa P 317) How ever, it is very likely that Subandhu lived at the court of either Damodaragupta or Mahāsenagupta of Malwa who belonged to the family of the later Guptas of Magadha According to an inscription found at Aphsad, near Gayā (C II III 200) Dāmodaragupta defeated the Maukharis though he was either killed or fatally wounded in the battle His son Mabāsenagupta, carried his armies as far as western banks of Brahmaputrā and defeated Susthita varmā, the king of Assam As Kumāragupta and Madhavagupta, the two sons of Mahāsenagupta are referred to as attendants of Rājyavardhana and Harşavardhan by 20 ] VĀSAVADATTĀ Bāņa and as they are referred to as sons of the king of Malavā, Mālavā is generally established as the seat of Mahāsenagupta By 505 A. D. Mahāsenagupta, pressed by two powerful enemies viz Siladicya I of Valabhi and the Kalchuri Sankargana, lost control over Malavā and had probably a tragic end. It is very likely that Subandhu's fame also sufferred with the fate of his patron Mahāsedagupta It is possible that Bāna does not mention Subandhu as some of the later Mälava kings helped S'as'ānka against Harsa vardhana From all these evidences we may be tempted to opine that Subandhu probably lived at the court of the Mālava king who was either Damodargupta 'or Mahāsenagupta during a period between 550 A. D. and 600 A D. That Subandhu hailed from the capital of Mālavā or some place in Mālavā may be proved from a number of evidences Although it is difficult to determine anything from the geographical refërences in Subandhu which are too conventional, it should be noted that he refers to Lāta, Kuntala, Kerala, Mālavā, Āndbra, Vindhya, Revā, Marudesa, theVindhya-forest, the hinterland near the ocean and the ocean most of which are places not far removed from Mālavā. Scholarly opinion tried to establish Subandhu as living in Bengal or Eastern India (I H. Q. 1939, p 472 fn ) from the simple reason that verbal conceits are a peculiarity of the easterners (1ÈCETTGFT:), from the fact that Subandhu shows familiarity with fish and catching of fish (qfFECYHTE ART Hoidit. 98719 59 qrafago TERUTTI (Vāsa. p. 23. 1. 5) a daily act of the Bengalis in general and a reference to Sundari trees (a1c9055- राजरसितसुन्दरसुन्दरीवनेन ।) which are found in abundance in the Sundaraban area of Southern Bengal But against this opinion another view has been advanced viz that he belonged to Malavā ( A volume of Studies in Indology presented to Prof Kāne P 220) from his reference to Mālavā women (Väsa p 23 1 11; 37-13, 38-8) and from Subandhu's knowledge of local regions and their traditions viz the sight of Fiuretat birds in union impelling kiratas to search for gold (खञ्जरीटकणाटीनमिथुन- मैथुनोपजातनिधिग्रहणकौतुककिरातगतखन्यमानतीरया । ( Vasa p_16, 1 4) difficult to decide anytbing on the point but the very realistic descriptions of Vindhya, Narmadā, the forests in the hinterland of the Bay of Bengal, near Madhyapradesha and Orissa, the forests overgrown with different varieties of trees and the emphasis on Vispu and Vaisnavism may be useful to prove the opinion that he belonged to Malavā or was at least familiar, either directly or indirectly, with Mālavā. About the personality of Subandhu we know only next to nothing He was a devotee of Vışņu for he pays his homage to Visņu in the It is - 1 INTRODUCTION [ 21 mangala verse no 2 of Vāsayadattā and remembers Visņu again almost at the end of the work (सत्पुरुपेणेव विष्णुपदावलम्बिना । Vasa p 52 1. 12) The great personalities of Brahmanıc mythology, both Vedic and epic, were at the tips of his fingers and Visnu and his various forms and aspects enjoy a detailed mention in the very first paragraph of Vasavadatta (cp. the names नृसिंह, कृष्ण, नारायण, कसाराति, यशोदानन्द, AITEît and so on) However, he had respect for Siva and other gods and goddesses Subandhu calls himself a friend of the righteous (#art:) and living up to that ideal in life he praises the good and chastises the wicked This traditional praictice of praising the good and criticising the bad was known from the time of Kālıdāsa (cp. Raghuvamsa [ 10). Later writers like Bāņa, Dhanapāla and Somadeva and prākrit and Apabhramsa writers follow the practice detailed by Subandhu. But with Subandhu this is no merely a traditional hang-over, for it is likely that he had some personal experience of the good and the bad in his own life-time People attended the Kings and courts for money TATYTA TI941 1 Vāsa p 16 1 7) The service of the good and the righteous bore late but certain fruits (सदीश्वरसेवयेव दूरोद्गतवहु- 98791 Vāsa p. 17 1 3; Fegahaifaa 54747179TH I Vāsa. p. 40.1 9) The gossip-mongers and those who took delight in others' miseries had already left him (कर्णाम्या परपरीवादश्रवणकुतूहलिभ्या नेत्राभ्यामालोकितसाधुविपत्ति- PTT 976 hÀ THAT I 749015 I Vāsa p 52 1 5) Perhaps these were the sentiments of a writer who felt uncomfortable amidst unhealthy political and social conditions which may be said to have been reflected in an early remark of Subandhu, सा रमवत्ता निहता नवका विलसन्ति चरत्ति नो कङ्कः । सरसीव कीर्तिशेष गतवति भुवि विक्रमादित्ये ।। Gone are those days when poets and poetry were appreciated The new wretches adorned with importance both in the political and the literary fields enjoy the benefits The wise move only guardedly, for Vikramāditya the very fountain of poetry lived only in memory A good composition like Vāsavadattā sprinkles with delight the ears vexed with noisy nothings as a garland of Mālati flowers attiacts the sight though the fragrance is not determined For sometime bis work may not have attracted wide reputation as he says, अविदितगुणापि सत्कविभरिणति. कर्णेपु वमति मधुधाराम् । अनधिगतपरिमलापि हरति दृश मालतीमाला || Intro v no II !
22 ] VĀSAVADATTA 1 ܢܚ Although self-confident (Ifma-F7EH), objective valuation of his composition by others is his aim Ifurthfa fautesfayfa: 937 ga #wafa i स्वमहिमदर्शनमक्ष्णोर्मुकुरतले जायते यस्मात् ।। Intro v no 12 He is humbly conscious of his achievements in literature, for, blessed by Saraswati he can have an all comprehensive vision of the world. He is the very abode of that intelligence which revels in dextrously interweaving words and in a composition full of words with double meaning in each letter, सरस्वतीदत्तवरप्रसादश्चक्रे सुबन्धुः सुजनं कवन्धुः। प्रत्यक्षरश्लेपमयप्रवन्ध विन्यासर्वदग्ध्यनिधिनिवन्धम् ।। Vāsa Introduction v no. 13 The main currents of the story of Vasavadattā are given below. Once there was a King called Chintamani He was the one lord of all kings of the earth, generous, a friend of poets, protector of all foui quarters and a lord of a hundred armies. Like Sliva he had conquered Kāmadeva, like Meru he was the resort of the wise, like the Sun he removed the torment of people, like the god of Love he gave pleasures, like the moon he was a friend of all kalās and like the ocean he was the abode of friends While he was the one lord of the Earth, righteousness prevailed, there was equality before taxation and absence of severe punishments and bad administration. He had a son Kandarpaketu Like Pārijāta, the Tree of Paradise, he was the delight of those wbó sought his protection Like Arjuna he was adventurous in battle, strong-handed and delightful in, love On seeing him the hearts of damsels bubbling with youth rejoiced and yearned for him, for pleasant like a flower, he was an elixir to the ears and a feast for the eyes His sword coloured as it were by the red dye of the feet of the Goddess of Conquest, was dazzling while it was steeped in the blood of the elephants and horses of the foe in battle. Once while the night was leaving the moon and the stars, while the hermitages were humming with the recitations of the early-rising tea chers, while the roads echoed the songs of the kārpatika bards, while the cuckoos awakened the ladies from the arms of their lords and while the unconcerned wind blew away the complaint of the female chakra. väka, Kandarpaketu had a morning dream He beheld in the dream a virgin who had hardly completed eigbteen years Her eye-lashes were like the banks of the river of desire ne river of desire The glances of her large INTRODUCTION [ 23 eyes were impeded by the ears. Her nose was like the needle of the scales of the pearl-like teeth Her breasts were the undisturbed pleasure-resorts of the God of Love in need of rest after the worldconguest. Her waist was slender in grief at not being able to bave a good view of her face on account of the intervening fullness of her bust. The girdle around the waist which showed a golden hairy nothingness was like the shining rampart of the temple of Love She was a beautiful painting on the wall of life, an elixir of youth and an abode of astonishment While Kandarpaketu drank this vision with eyes wide awake with longing, sleep forsook him. When he came to his wisdom he could not control himself 'Darling, do not depart', were the words that rested on his lips when he requested ber to return. Shutting out his kinsmen he passed the day in bed refusing food and toilet The same night he vainly tried to console bimself with dreams of union with her His friend Makaranda learning about the condition of Kandarpaketu somehow obtained access to him and lectured to him on his behaviour that his enemies were glad to see him perturbed by grief because the heart of the vicious always rejoiced at the pain of others Like a disease he gains strength gradually The heart of the wicked sprouts into a plant of venom, he, therefore, should leave the slippery path and return to tread on the road of the righteous This homily bad little effect and Makaranda had to leave the city to follow Kandarpaketu when he set off in search of the beloved vision he had seen in dream because his senses had been rendered ineffective, his discerning powers had gone away, bis memory bad proved faithless and his soul was ready to depart. When they had travelled some hundreds of furlongs the Vindhya mountain appeared in view In the mountain lived the wild tribes who were ready to pierce the musk-deer when they were attentively listening to the tunes sang by the Vidyādbaras Its stony surface was scented with sandalwood It was difficult to pass in the interior on account of the creepers encircling full-grown trees It was wide and calm with the stillness of the bamboos The damsels of heaven honoured their rendezvous in the captivating quietude of the mountain. It seemed that even now the reverberating echoes of the palm-leaves in the mountain loudly implored Agastya to return Witb her encircling breezes like the arms of a beloved flowed Revā by the side of the mountain Her sandy islands were the resorts of the heavenly couples Hundreds of Kırātas thronged the place nearby + 1 24 ] VĀSAVADATTA when they learnt about hidden treasures suggested by the perching of Khanjarīta birds in union The friends rested under a Jambu tree when it was slowly getting dark. Makaranda brought some fruits and roots and after pursuading Kandarpaketu to eat he also partook of the remaining fruits While Kandarpaketu with the thoughts of the damsel of the dream, slumbered in the bed prepared by Makaranda, he heard at midnight the conversation of a Sluka and a Sarıkā Lending their ears to the dialogue between the couple they heard the male bırd saying, 'My dear, I have returned late not because I have been dangling with another of the fair sex but I beard an unprecedented story which I am going to tell you at your request "There was a city of Kusumpura full of beautiful buildings wherein lived citizens who were wise, strong, truthful, loving Here the public women were a great attraction. The presiding deity of the city was Goddess Chandā whose sacred feet were adored by Gods and demons, who was a flame of destruction for the whole tribe of demons captarned by Sumbba and Nis'umbha. Nearby flowed the Ganges lıké a stream of righteousness The seven sages descended here to take their holy bath Here swans and lotuses presented a pleasant sight In the city lived its ruler S'rngārasekhara He was strong and generous His chief queen was Anangavati who was fair and graceful like Pārvati They had in their late age an only child named Vāsavadattā Her youth gradually unfolded with the passing of the years, yet she was a verse to any talk of marriage But who can withstand charms of spring when it has already come! The travellers felt a longing for their beloveds when they heard the hum of the bees around the mango-blossoms The cuckoo's notes filled the air The young and the dandish murmured sweet nothings in the ears of their fair companions The Bakula tree, the Ashoka and the Nāgakesara flower experienced new life The friends of the maiden conveyed her new emotion to her father who invited to bis capital kings and princes from all quarters and proposed that his daughter should choose a husband from among them At the proper time Vāsavadattā ascended a dais to survey the kings who had assembled there. Some of them were hopeful, others were doubtful, some invited the aid of astrologers while others were confident of tbeir valour. She surveyed them, one and all and without hoosing any one from among them descended the dais and went away - 1 INTRODUCTION [ 25 That same night she saw in a dream a young man, attractive and noble, valorous and virtuous, the very resort of the learned and the wise, a mirror to goodness, the origin of sciences and the treasure of beauty She came to know in the very dream that he was Kandarpaketu, the son of King Chintāmaņi On seeing him she proclaimed as wasteful the efforts of Damayanti for Nala, of Indumati for Aja, of Sakuntala for Dushyanta, of Rambhā for Nalakūbara and of Dhumornā for Dharmarāja. The Creator desired to see his own competence in beautiful creation Hence was created this Kandarpaketu with the aid of the most beautiful objects collected from the three worlds With the day-break her torment increased The efforts of her friends and maid-servants to calm her mind and body burning with desire and love proved fruitless Her complaint was why her limbs, one and all were not made eyes She only hoped tbat the guest of her eyes might experience as poignant a torment as was her own lot When consciousness was restored with the efforts of the friends, she wandered about the river-banks, the forests, the gardens and under the tree-shades She spent her time tossing about in a flowerbed and on marble-slabs dripping with coolness and meditated on that charming full mouth, those warm lips rippling the smiles and that snow-white row of teeth She blessed the places graced by his presence Seeing her heading towards madness her 'confidante Tamālıkā, after consultation with the friends set out to find Kandarpaketu and know how he responded to the maiden's love. She came with me and at the moment stood under the tree Here ended the parrot's tale When Makaranda narrated the condition of Kandarpaketu and his wanderings in search of Vāsavadattā, Tamālıkā was grateful and presented to Kanarpaketu a love-letter from Vāsavadattā Delighted to hear the contents of the letter he was greatly happy and passed a day and a night in her company repeatedly asking Tamālıkā about Väsa vada ttā and her condition The company started for tbe city of the father of Vāsavadattā L By now the sun descended the horizon and it was evening. The crows flew into their nests. The apartments of beautiful damsels wafted scented breezes. The infants were lulled to sleep by the elderly Murmurs of love began on the lips of ladies The peacocks returned to their resting rods Darkness, the child of night and a friend of the wicked, gathered around. The shrill notes of the Kurara bird pierced the dome of silence Stars began to twinkle. They women 26 ] VĀSAVADATTA looked like white grains scattered around by the beatiful hands of Rats in company of Kāmadeva when he began bis world-coquest. The Chakravāka pair was desolate. The heart of the lotus plant was broken into pieces The row of bees moving around the lily assumed the role of a 'confidante' of the moon in love The quarters were calm with griet at the passing away of their Lord, the Sun. In a few moments the moon appeared looking like a breast of a female, like an ear-ornament of the sky, like a silver pot The maidservants on an errand from their love-tormented fnends were eloquent with a thousand requests before the lovers They implored them to return to the arms of their beloveds The gentle evening breezes, the sighs of the nigbt-damsel, carrying away the broken love-talk of the Shabara women united with their lords, welcomed the party when they reached the city Kandarpaketu saw the apartment of Vāsavadattā It was like the sacrificial ground of Janaka, attractive to Rāma It was an abode of astonishment, resort of love-play and a meeting place of beauty Kandarpaketu was extremely joyful to find a bevy of beautiful damsels engaged in a number of pleasant activities At last bis eyes obtained the fruit of their struggle He saw Vāsavadatta with a pair of full, reddish and well-built thighs, a slender waist, a resplendent form, adorned with ornaments and a pair of beautiful legs Wbıle Kandarpaketu was feeding his gaze in astonishment and love at the sight of Vāsavadattā he swooned with joy. So did Vāsavadattā at his sight. When they were brought back to consciousness they, sitting on the same seat exchanged sweet nothings Kalāvati, a friend of Vāsavadattā, explained to Kandarpaketu how Väsavadattā bad endured innumerable torments which could not be written by Brahmā or narrated by the Lord of Serpents This was not the proper time for love-talk, for Väsavudattā's father, vexed at her indecision in choosing a husband had decided to give her away to Puspaketu, the son of a Vidyadhara Chief Kandarpaketu, fearing the situation asked Makaranda to remain behind to know what happened after they had gone, took a celestial steed Manojava and a twinkle was more than enough before they crossed a thousand miles to reach the Vindhya forest Tired of the day-long journey they slept in a creeper bower. While it was noon he got up and not finding Väsa vadattā either in the bower or under the trees or on their tops began to weep in helplessness. He lamented his ill-luck and could not decide what wrong he had done in bis previous births that suddenly came to fruition in 3 1 INRODUCTION [ 27 action 1 this spanner. Had he not studied the sciences humbly ? Had he not served the elders and the teachers ? Had he not offered oblations in the sacred fire ? Had he not provided shelter to the needy ? Verily the stars, ill-luck and Time were responsible, not he, for this Getting out of the forest from its southern side he saw the surging ocean. Suicide was his next thought Although a person free from disease bad no tight to leave off life, the soul should depart, for there are a number of illustrations of persons crossing the boundaries of enjoined action Chandra, Purāravas, Nahusa, Yayati, Sudyumna, Soma, Purukutsa, Kuvalayās'va, Niga, Nala, Samvarana, Dasaratha, Kartavirya, Manu, S'antanu and Yudhisthira are prominent examples of such persons. Hence shall I leave my life which no longer can bear separation from the beloved. With solemn deliberation he prepared to abandon the body When he completed his bath a voice from the sky promised him the union with bis beloved within a short time and bade him desist from the Hope for the union rising anew in his mind, Kandarpaketu began to wander bere and there waiting for the realisation of his desire. Once while the rainy season gradually began to appear the dustclouds descended, the lightning began to glow, the frogs began croaking and the travellers hastily planned homeward a return, Kandarpaketu inadvertently touched a stone-image which to his love-torn mind appeared resembing with his beloved and ah, heavens be praised, the stone-image turned into a real Vasavadattā When they were free from a long and close embrace Vasavadatta began, at Kandarpaketu's bidding, to relate the events after she had gone in search for some fruits for both of them in the Vindhya-forest She narrated how she perceived an army-camp where the grass-huts were being hidden in trees, where the quarters for the courtesans were being set up and where flags were displayed Having seen the camp she could not decide whether it was the army of her father come to search for her or the army of her lord. In an instant the general of the army, who ran towards her was attacked by 'another general, a Kuāta Both the generals and their armies engaged themselves in a fierce battle In the end they were destroyed. The ascetic of the hermitage near the borders of wluch the fierce battle took place learnt about the destruction and suspecting Väsavadattā as responsible for the destruction wrought to the Ashrama, he cursed her to get turned into stone but on further imploring took pity and made the 'termination of the curse concurrent with the touch of her lord 28 1 VĀSAVADATTA Then Kandarpaketu in company of Vāsavadattā and Makaranda who had come up suddenly, went to his city and enjoyed to his heart's desire all those enchanting delights of union These outlines of the story of Vasavadattā prove the utter disregard of the author for a consistent narrative. While we do not mourn the absence of any biographical detail on the part of our author who has given nothing except his name this feature being one of the accepted peculiarities of Sanskrit literary chronology--we have absolutely no clue in understanding the exact location of places where the events of the narrative choose to take place We do not know the state or the country where Chintāmanı ruled nor the city where his prince Kandarpaketu had a dream nor do we gather anything about the place that Kandarpaketu arrived at in company of his friend Makaranda, in search of the damsel of the dream. We cannot make out wbich direction of the vindhya or the adjoining forest they came to and rested. The motiffs of a parrot telling a tale of love and adventure to his female only to help the hero in finding the whereabouts of his beloved, of the curse of a sage who turns Vāsa vadattā into a stone image of the dreams of the hero and the heroine who fall in love with each other fondly hoping to get united for a life-time with the objects of their love visible only in a dream, and a love-letter are only conventional. It is very likely that the poet is only selecting a few such motiffs to embellish his tale the incidents in which are loosely connected with one another Such narratives seem to have been very current in Subandbu's days and he has tried to weave the incidents of different narratives into one single story which according to him should supply him with a good opportunity in describing a king, a prince, a princess, an ocean, a river, Vindhya mountain and the forest regions near by, cremation ground and a scuffle between two armies In Bāna and in later writers like Somadeva, and Dhanapāla, the narratives are not much different The poets of the post-Gupta age had consciously developed stylistic embellishments at the cost of consistent delineation of the incidents of an interesting narrative Subandhu is perhaps a brilliant exponent of this tendency which revels in descriptions of young men and their beloveds and some of the majestic aspects of nature like, sunrise and sunset and the mountains and rivers, descriptions which were considered inevitable in a Mabakāvya and a Gadyakãvya from the time of Valmiki, As'yaghosa and Kālidāsa. There is very little of characterisation in Vāsa vadattā. There are not more than four characters in the story and they are Kandarpaketu, 7 INTRODUCTION [ 29 1 Väsavadattā, Makaranda and Tamālıkā These persons speak and talk, move and act in a stereotyped manner The heroism of Kandarpaketu is hnown to the author only for there is no occasion afforded to this poor lover to show his valour. Vasavadattā is only a moving doll who swoons and is turned inadvertently into a stone image by an ascetic. We have some idea of her love-torments which she began to experience wben she had seen Kandarpaketu in a dream and of her feelings which are set to a verse in Āryā More realistic are the characters of the friend of Kandarpaketu and the 'confidante' of Vāsa vadatta Makaranda performs a timely duty of disuading Kandarpaketu from inactivity and infatuation, but he is not successful and has to help the hero in his important venture Tamalıkā has crossed those long and weary distances to arrange a meeting between Väsavadatta and Kandarpaketu and to apprise him of the love-lorn condition of Vāsa vadattā We hear very little about these two helpful persons afterwards except that Makaranda gave company when the happy pair was repairing to the city of Kandarpaketu. The emphasis on the part of Subandhu for form at the cost of matter is a conspicuous characteristic of Sanskrit literature of the Gupta and the post-Gupta age During periods of civilisation when the atmosphere of the land is luxuriant, the aim of the writers is always to appeal to the scholar and to the elite without craving for appreciation from the less enlightened mass Sanskrit poets and their compositions were appreciated by the kings and the chiefs of the land, who encouraged advance in learning and literary creation A sanskrit poet always composed with one eye on the king or his patron and the other on the enlightened elite. While the patron made the poet free from economic worries the real judge of the poet was the scholar, the master in different arts and sciences. He had to be pleased Thus a tendency among the poets developed to parade their knowledge of metrics, of rhetoric, of the dictionaries, of the science of erotics and of different systems of philosophy Once such a tendency had struck its roots it was difficult for a writer to desist from that competition of showing oft his skill in the form rather than in the ingenuity of the narration, *Bhāravi emphasied Spbutatā, Arthagaurava, Girām prthagarthatā and Samarthya Magha emphasised the independent importance of both the word and the meaning Subandhu demonstrated the conscious interweaving of words and letters in such a way that each word had a double or sometimes treble entendre Sriharsa boasted of his skill in stringing difficult words and expressions together with the poetic ones so that the ignorant wretch could never rush to understand them 30 ] VĀSAVADATTĀ ces Almost similar conditions prevailed in cotemporary arts and scien- The Sūtra and the Vārtika were now elaborately explained in the Bhāsyas which were veritable mines of scholarship. The age of scholarly commentaries on the early-laid-out fundamentals of the sciences had already begun Even the Purānas and the works on medicine and astrology thought themselves insufficient if they could not demonscate their knowledge of the sciences which could hardly find a place in them. The poet could not be expected to remain ignorant of these developments when sometimes the king or the minister or the royal preceptor was an expert in one or many of them This atmosphere bad a direct influence on the form of the composition and generally on the style of the poet Simplicity was discarded. Superflous words or words having little direct relation with the meaning intended to be conveyed were piled up for attaining a grandiose style and were mostly adopted to cover one's poverty of idea and imagination Such अप्रयोजक epithets were अवकर and अप्रतिभोद्भव Prolixity, vagueness and word-pomp (tyfact, प्रहेलिकाप्रायत्व, शब्दालङ्कारबाहुल्य and 19611578) at the cost of simplicity, clarity, precision, plainness, elegance, sweetness and delicacy were developed Such a development influencing the poets not gifted with Pratibhā was responsible for the criticism of this kind of style in a poetic composition When a poet like Bhāravi, Subandhu, Bāņa or Māgha chose to accept this style the escesses of form were hept in control and were in proportion to individual enthusiasm and appreciative patronage These excesses were criticised by rhetoricians who went before Bbāmaha They called such a style as Gaudi and the simple and the elegant one as Vaidarbhi These two 'Ritis' or concepts of literary style had three stages of developments At first of developed as a ‘geographical mode of literary criticism' In the second stage it came to be 'stereotyped' wib reference to stylistic mode of composition and in the third stage Afar was related to the character of the poet The earliest reference to different modes of literary criticism in context of their geographic association is found in Bāņa who says श्लेपप्रायमुदीच्येपु प्रतीच्येष्वर्थमात्रकम् । उत्प्रेक्षा दाक्षिणात्येपु गोडेप्वक्षरडम्बर. ॥ Harsacharita v7 T'he northerners employ est in their composition, the westerners are satisfied with 'bare idea', the southerners employ cats and the easterners employ pompous words Bāṇa here gives expression to the popular characteristics of syle in different regions Bāna is however not very dogmatic about it as he further says 1 INTRODUCTION [ 31 I AI नवोऽर्थो जातिरनाम्या श्लेपोऽक्लिष्ट. म्फुटो रसः । विकटाक्षरवन्धश्च कृत्स्नमेकत्र दुर्लभम् ॥ Harsacharita v8 From this verse it is quite clear that Bāna has not in mind the two specific modes of style viz. Vaidarbhi and Gaudi It has been argned that the earliest mode that developed was Vaidarbhi, and that Dandi had in mind the word gft of Bāna when he wrote इत्यनालोच्य वैषम्यमर्थालङ्कारडम्बरो। अवेक्षमाणा ववृधे पौरस्त्या काव्यपद्धति । काव्यादर्श 1-50 He employs the word मार्ग, पद्धति and वम but not रीति. Nether Bharata nor Bbāmaba accepts two separate modes of diction viz Qauf and that Dandi speaks of ten Tus in poetic compositions as the very essentials of good poetry It is pointed out that the sentence स्फुटलघुमधुरचित्रकान्त- शब्दसमयोदारालड्कृतगद्यपद्यस्य in the Girnar Inscription of Rudradāman emphasises the ten guņas which have been systematically enumerated by Dandin श्लेप. प्रसाद समता माधुर्य सुकुमारता अर्थव्यक्तिरुदारत्वमोज.कान्तिसमावय Anandavardhana does not give prominence to Ofers but discusses afa Dondi it seems, is prejudiced against Gaudi for althougb अर्थव्यक्ति, उदारत्व and समाधि are common essentials to both the Gaudi and Vaidarbhi he in a sweeping statement says एषा विपर्यय प्रायो दृश्यते गौडवर्मनि ! का द. I 42 Bhamaha 1s against condemning Gaudi or praising Vaidarbhi. Both the styles should be accepted if they present the general features of good poetry He emphasies that in all good poetry there should be अलङ्कारवत्व; अग्राम्यत्व, अर्थ्यत्व, न्यायत्व, अनाकुलत्व Vaidarbhi, 10 is very likely, may degenerate into overdone simplicity resulting in baldness whereas in the same way Gaudi might develop the excesses of समास-भूयस्त्व and अलकारडम्बर गौडीयमिदमेतत्तु वैदर्भमिति किं पृथक् । गतानुगतिकन्यायात् नानास्येयममेघसाम् ॥ काव्यालङ्कार 1 32 The nature of Subandhu's narrative should invite dicussion Bhāmaha, probably the earliest known rhetorician clearly distinguishes between a Katha and an Ākhyay:kā In the first chapter of his work Kāryālankāra ( Verses 25-29 ) Bhāmaha says that an Alchyayrkā is written in prose and is agreeable to the matter at hand, should contain verses in वक्त्र and अपरवक्त्र metres, the theme may be कन्याहरण, सग्राम, विप्रलम्भ, and नायकाभ्युदय, is divided into उच्छवासs and is narrated by the and सङ्घटना ।
32 ] VĀSAVADATTA hero In a Kathā there are no such 992 and 3797297 verses and no division into 37997745., the story is narrated by some one other than the hero, Dandın does not accept such divisions and regards them as mere formalities- तत् कथाख्यायिकेत्येका जातिः सजायाङ्किता । Kävyādars'a I 28 a Our codex of Vasavadattā emphasises that Tāsaladattā is a Katlia The same thing is suggested by Bana when he says feet maagafaeut 191T in the intro verse no, 20 to Kādambari, Vasavadattā begins with thirteen introductory stanzas in Arya The, narrative continues uninterrupted and without running into any divisions like gata. The other verses in the story are in istefeuit, strat and TTTTT Although tbere is 95714 It is certainly not between a friend of the hero and bis enery Although 7749124 may be generally said to bave occured there is no popular In this way Subandbu bas a very novel way in bis narrative. It is not yet understood as to who supplied Subandhu with the outlines of the plot From the existing mass of narratives current in his days and found in collections like Brbatkathā Subandhu has selected not a bigbly effective and attractive narrative That Subandhu had before him a great mass of poetic compositions from which he could draw very freely can be proved from a number of parallel passages and verses which are common to Subandliu and other poets. In each case Subandhu is not the borrower We shall perhaps never know who has been benefitted from whom by accepting a phrase or a group of alamkāras, ideas and turns of expression The only conclusion that emerges is about the perfenial stream of thoughts and turns of expression common to these poets and authors among whom comparisons are noted I (a) क्षणदागतसुरतवयात्यवचनशतसस्मारकगृहशुकचाटुव्याहृतिक्षणजनित- HEGISTE I Vāsa P 8 I. II (b) प्रत्यूपे गुरुसंनिधौ गृहशुके तत्तद्रहो जल्पित प्रस्तोतु परिहासकारिणि पदैरोदितैरुद्यते । क्रीडोशारिकया निलीय निभृत त्रातुं अपार्ता ववू प्रारब्ध सहसैव सभ्रमकरो मार्जारगर्जारवः ।। Subbâsıtaratnakosa (Kosambi) v 631 (c) Bāņa bas also a similar sentence + INRODUCTION [ 33 - शुकमारिकाप्रकागितसुरतविश्रम्भालापलज्जितावरोधजनेन । Kadambari P.89 1 21 2 (1) उखेल्लभुजवल्लीमणकारसुभगासु । Vasa. P.8 18. (b) The last line of the verse which begins with $177* FAST 15, गोपिभिर्भुजवल्लिकवणझणत्कारोत्करास्तालिका । Kāvyakalpalatās ſtriparimala as quoted by Zachariae 'Bruchstrucke alter verse in der Vasavadatta' P 32 in Gurupuja Kaumudi and his remarks "So erscheint denn Suvandhu als Nachahmer oder, renn man 1111, geradezu als Kālijachania". 3 (a) यस्य च समरभुवि भुजदण्डेन कोदण्ड, कोदण्डेन बारणा, बारगरिपुशिर, तेनापि भूमण्डल, तेन चाननुभूतपूर्वो नायक , नायकेन कीर्तिः, कीर्त्या च सप्तमागरा , सागर. कृतयुगादिराजचरितस्मरण, अनेन च स्थैर्य, अमुना च प्रतिक्षणमाश्चर्यमोसादितम् । Visa p 6 1 14 (b) मझामाङ्गणमागतेन भवता चापे समारोपिते देवाकर्णय येन येन महसा यद्यत्समासादितम् । कोदण्डेन शरा गर रिपुणिरस्तेनापि भूमण्डल तेन त्व भवता च कीतिरनघा कीर्त्या च लोकत्रयम् ।। Subhāsıtaratnakosa (Kosambi) v no 1407 attributed to Karkarāja, Kashmere Shivite The verse is also quoted by Mammata in his Kāvyaprakās'a VII 229. X 459. 4 (a) त्रिभुवन विजयप्रगस्तिरोमावलीकनकपत्रेण । Vasa, p 9. 1.5 (b) रोमावली फनकचम्पकदामगोर्या लक्ष्मी तनोति नवयौवनसभृतश्री । त्रैलोकचलव्यविजयस्य मनोभवस्य सौवर्णपट्टलिखितेव जयप्रशस्ति । Subhasitaratnakosa (Kosambi) v no. 394. 5 (a) अनिष्टोद्भावनरसान्तर खलहृदय भवति । प्राश्रयाशोऽपि मातरिश्वा,... न काटवं जहाति । तालफलरस इवापातमधुर परिणामविरसस्तिक्तश्च । Vasa p. I2 1.5 ff. (b) अाश्रयाश कृष्णवर्मा दहनश्चप दुर्जन । अग्निरेव तथाप्यस्मिन्स्याद्भस्मनि हुत हुतम् ।। Subhasitaratnakosa (Kosambi) v no 1284 प्रारम्भरमणीयानि विमर्दे विरसानि च । and प्रायो वैरावसानानि सगतानि खलै सह ।। Subhâsıtaratnakosa (Kosambi) v no 1287 6 (a) शनैश्चरेण पादेन, सौम्येन दर्शनेन, गुरुणा नितम्बेन, लोहितेनाधरेण, विकचेन विलोचनेन, ग्रहमयीमिव ससारभित्तिचित्रलेखामिव प्रैलोकयसौन्दर्यसङ्केत- भूमिमिव 'कन्यकामपश्यत्स्वप्ने । Vasa p II 1 4 ff. - a - - . 1 -------- -------- ----- - 34 ] VĀSAVADATTĀ (b) मुखेन चन्द्रकान्तेन महानीले. शिरोरुहै . पाणिभ्या पदरागाभ्या रेजे रत्नमयीव सा॥ गुरुणा स्तनभारेण मुखचन्द्र ण भास्वता । शनैश्चराभ्या पादाभ्या रेजे ग्रहमयीव सा ।। S'atakatrayādisubbāsıtasamgraha (Kosambi) v no 131, 132 7 (a) भवति सुभगत्वमधिक विस्तारितपरगुणस्य सुजनस्य । वहति विकासितकुमुदो द्विगुगलचि हिमकरोद्योत ॥ Vasa v no. 5. (b) मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णा- स्त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभि प्रीणयन्त । परगुणपरमाणून्पर्वतीकृत्य नित्य निजहृदि विकसन्तः सन्ति सन्त. कियन्त. ।। Satakatrayadisubhasitasamgraha (Kosambi) v no. 19 8 (a) त्वत्कृते यानया वेदनानुभूता सा यदि नभः पत्रायते सागरो लोलायते ब्रह्मा लिपिकरायते भुजगपतिर्वाक्कथकः तदा किमपि काथमपि एकैकैर्युगसहस्र रभि- लिख्यते कथ्यते वा। Vasa p 39 15 (b) वहि नस्तस्य जलायते जलनिधिः कुल्यायते तत्क्षणान् मेरु स्वल्पशिलायते मृगपति सद्य कुरङ्गायते । व्यालो माल्यगुणायते विपरस: पीयूपवर्षायते यस्याङ्गेऽखिललोकवल्लभतम शील समुन्मीलति ।। Satakarrayādı Subhāsıtasamgraha Kosambi v no 324 (c) यदि पत्रायते व्योम मेलानन्दायतेऽर्णव । ब्रह्मायते लिपिकरस्तथाप्यन्त कुतो गिराम् ।। Anekarthasamgraha v no 27 as referred by Zachariae Bruchstricke alter zerse in der Vāsavadattā, Gurupujākaumudi p 39 Subandhu has taken note of some of the current poetic mannerisms which came down to him through poetic compositions in inscriptions 1 In the description of King Chintāmaņi and S'ğngārasekhara be has followed the practice of comparing the king with famous mythological personalities (a) पृथिव्यामप्रतिरथस्य · धनदवरुणेन्द्रान्तकसमस्य स्वभुजवलविजितानेकनरपति- विभवप्रत्यर्पणानित्यव्यापृतायुक्तपुरुषस्य "I 24-26 Allahabad Pillar Inscription of Samudragupta (330-370 AD.) (b) वुध्या बृहस्पतिसमस्य कलेन्दुवक्त्रा। औपम्यभूत इव रामभगीरथाभ्याम् । v no 6 Gangadhār stone inscription of Visvavarman (423 A D.) - INTRODUCTION [ 35 . P 6 1 14 3 (c) धनदवरुणेन्द्रान्तकसमस्य कृतान्तपरशोः न्यायागतानेकगोहिरण्यकोटिप्रदस्य चिरोत्सन्नाश्वमेघाहर्तु । 2 Bilsād Stone Pillar Inscription of Kumaragupta I (414-455 AD) One can easily trace an influence of these comparisons in Vāsavadatta p 20 1 4-यो वलभिद् पावको धर्मराण निऋति प्रचेताः सदागतिर्धनद शङ्कर इत्यष्टमूर्तिरप्यनण्टमूर्ति । and Vāsavadattā p. 5 1 12 राम इव जनितकुशलवयोरूपोच्छायः । 2 (a) यस्मै चानुगतदक्षिणसदागतये प्रवालहारिण्य विलसद्वयसस्तरुण्य स्पृहयाञ्चा Vās The sentence tells us of the yearning for marriage with Kandarpaketu on the part of young maidens (b) स्वयमधिगतमहाक्षत्रपनाम्ना नरेन्द्रकन्यास्वयवरानेकमाल्यप्राप्तदाम्ना महा- क्षत्रपेरण रुद्रदाम्ना। Junāgaờha Rock Inscription of Rudradāman (A D 150) The description of Revā in Vāsavadattā (P 15 Pard 9) has some resemblance with similar descriptions in Vatsabhatti's Mandasor Stone Inscription of Kumaragupta (436 AD) तटोत्थवृक्षच्युतनकपुष्पविचित्रतीरान्तजलानि भान्ति । प्रफुल्लपद्माभरणानि यत्र सरासि कारण्डवसकुलानि ॥ 7 and विलोलवीचीचलितारविन्दपतद्रजःपिञ्जरितैश्च हस । The Nāsık Cave Inscription of Shri Pulumāyı beats a close relationship with the Gadya Kavyas and that it especially contains many comparisons current in the latter Sanskrit inscriptions of the eighth and ninth centuries consciously imitate Subandhu and Bāna The Radhanpur plates of Govind III (of 808 AD) provide us with good examples of puns accepted from Subandhu, on मण्डल, कर्ण, दान, द्वादशरवि, सन्नक्षत्र, मुक्ताफल Subandhu's dependence on the Mahābbārata and the Rāmāyana is abundantly clear when we note that for each श्लेप, परिसङ्घया or विरोधाभास he comfortably falls back upon the stories, the incidents and the personalities and places famous in the epics. दु शासनदर्शन भारते (4-2), भरतोऽपि रामदर्शितभक्तिरपि राज्ये विराममकरोत् (4-5), धृतराष्ट्रोऽपि गुणप्रिय (3-J0), सदा पार्थोऽपि न महाभारतरणयोग्य (5-3), राम इव जनितकुशलवयोरूपोच्छाय. (5-12), सुयोधनधृतिमिव कर्णविधान्तलोचना 10 21), विराटलक्ष्म्येव प्रानन्दितकीचकशतया (17-3), भरतेनापि शत्रुध्नेन (18-3), अर्जुनसमरमिव नन्दिधोपमुखरितदिगन्त (24-2), केचिद्धार्तराष्ट्रो इव विश्वल्पावलोकन- जनितेन्द्रजालोद्भुतप्रत्यया (24-10), भारतसमरमिव वर्धमानोलूककलकल (30 10) - - - - 361 VASAVADATTA भारतेन सुपर्वणा (38-11), रामायणेनेव सुन्दरकाण्डचारणा (38-II), भारतसमरभूमिमिव दूरप्ररूढार्जुना, (40-9), पुलोमकुलस्थितिमिव सहस्रनेत्रोचिते-न्द्राणिका (40-9), क्वचिद्राघव चित्तवृत्तिमिव वैदेहीमयी (40-22), क्वचिद्वाल्मीकिसरस्वती मिव दगितेक्ष्वाकुवशा (40- 14), लड्वामिव बहुपलाशसेविता धार्तराष्ट्रसेनामिवार्जुनशरनिकरपरिवारितां, नारायणfafua agent, mutathaifue 97279787789gagfaar""* qafacere afhaigetigiugfaatat 2761faat 9 (40.15) and so on It is clear from these references that Rāmāyaṇa and Mahābbārata (or Bhārata) had attained their final shape and the classification into $705 and go bad already been made and praised and that Sundarakāņda had attained a place of special bonour among the other kāņdas Subandhu's references to works and their authors are preferrably to older and less known works many of which could not be identified He refers to persons like Sārapāla and works like Ganıkārıkā (40-10), to kings like Brahmadatta and his Queen Somaprabbā (38-17), to Nāgarājya and Sudbarmā, names which could not be easily explained except by recourse to useless conjectures Among known works he refers to Mallanāga and his Kāmas'ātra (14-13), to Harivamsa (15-3), to Brbatkathā and its divisions into lambhakas (17-20) and important personalities in Brhatkātbā lıke Naravāhanadatta (149) and Priyangus'yāma In his references to music is reflected the development of different Rāgas He refers to Rāgas like Bhāsa (7-12) which were popular among common masses and ascetics, for the roads were resonant with narrative songs entuned in Bhāsarāga by Kārpatikas He refers to गान्धारविच्छेद (20-20) and मूर्छाविगम and चलरागता in songs (21-1; 21-2). He knows the light:musical compositions like it which were bighly popular (22-8) (charchari is a 'tāla' rather than a rāga. It can be compared with dhumali' in the Indian classical music) In his reference to literature there are a few very interesting statements which help us in understanding his ideas about poetic compositions To him Puspitāgrā Sikhariņi and Praharsiņi are some of the 'sukumāra lalita' types among Sanskrit metres (156) Acording to him poets should be endowed with deep insight (verse no I) who, blessed with the favour of Saraswati, are able to have an all-comprebensive vision of this universe (verse no I) Their compositions are charming with beautiful interweaving of s'lesa and extensive sections called Ucch. vāsas (324) In them the poet is able to demonstrate his skill in adoring each word with a double-meaning (2-16) These compositions are full of Utpreksās (20-17) and stylistic devices like Srnkhalābandha (20-17) A good poet is careful in seeing that useless expletives like 'tu', 'D', 'na' and so on are at oided.
INTRODUCTION [ 37 His references to philosophical tenets are limited to older doctrines He refers to early systems like HHTAT (15-16), मीमासकदर्शन (52-II), जैमिनिमत (24-7), श्रुतिवचन (32-4) and the non-brahmanical systems like दिगम्बरदर्शन (15-16), 32-11, 52-11), तथागतमत (24-7) and बौद्धसिद्धान्त (30-20) The architectural references are numerous and varied and give us an idea of a full-scale building and its ancilliary structures. These are सुतलसनिवेश (18-1), तोरण (9-3), कनकप्राकार (9-4), बालवालवलय (9-4), मण्डल- परिवेश (9-5), कनकपत्र (9-5); परिखावलय (9-6), शलाकागुण (9-6), गवाक्ष (18-1), कपाट (11-20), एकायतनशाला (11-10), भित्तिचित्रलेखा (11-6), मणिकुटिम (29-19), पट्टाकण (35-15), करिणी (36-2) and so on. That he follows the Kāmas'āstra tradition in describing the various actions pertaining to ladies and love is clear from his descriptions of भोगावास, (8-10) नखपद (8-9), नखालकृतपयोधर (8-12), सीत्कार (8-9), सुरतवैयात्य- वचन (8-11), विदग्धपधुगोष्ठ्येव नानाविटपीतासवया (17-1), रणरणक (23-9), and SO on . Subandhu and Bana One of the most important aspects of the discussion concerning Subandhu is whether Subandhu preceded Bāņa. We have already referred to this point earlier Early scholarly opinion was divided on this crucial problem. Pandit Krishnamācbāriar Vasavadattā, Shrirangam 1906, intro P xlvin एतावता च पूर्वोक्तेषु सर्वेष्वपिहेतुषु निपुणमालोड्यमानेषु, किस्ताब्दीय सप्तमशतकादिमभागोत्पन्नवारणभट्टादर्वाचीन., अष्टमशतकमध्यमभागोत्पन्नालङ्कारि- कवामनात्प्राचीनश्च वासवदत्ताकर्ता सुबन्धुरिति सिद्धम् । b Peterson . Kadambari, intro P 72 opines as above but later (Intro to Subhāsıtāvalı p 133) has 'seen reason to change' his opinion that 'Subandhu's Vāsavadāttā is doubtless the same as the work of that name referred to by Bāņa' c Keith. History of Sanskrit literature, Oxford 1928, P 307 says 'that Subandhu's work is meant is not now very seriously questioned' d Kāņe Harsacharita, Bombay 1918, intro DX11, it seems very propable that Subandhu the author of the present 'Vasuvadattā preceded Bāna', We discuss below a few passages and sentences running almost iden. tical in Subandhu and Bāņa and try to arrive at some conclusions These parallel passages which are fairly numerous help us in arriving f -~- --U 1 ----- -- ----- 38 ] VĀSAVADATTA मुक्तः। 6.1 19. at the correct text of the works of these two ancient writers and go a long way in assisting their interpretation A detailed list of such parallel passages appears as appendix I. (a) 1 पृथुरपि गोत्रसमुत्सारणाद्विस्ता I पृथुरिव पृथिवीपरिशोधनावधानसझलित- रितभूमण्डल.। सकलमहीभृत्समुत्सारण । Vasavadattā p 6, 1. 19. Harsacharita p 208, 1 15. (Nirnayasāgar, Bombay 1946) 2 यस्य च करतलताडनभीतैरिव 2 निर्दयकरतलताडनभियेव क्यापि गते हृदये । मुक्ताहार पयोधरपरिसरो H. p. 182 1. 13. V p. 3 विधातुरतिपीडयत. हस्तपरामर्श 3 मन्ये च मातङ्गजातिस्पर्शदोपभयादस्पृश- जनितपरिक्लेशेनेव क्षीणतरतामु तेयमुत्पादिता प्रजापतिना अन्यथा कथमिय- पगतेन मध्यभागेनालड्कृताम् । मक्लिप्टता लावण्यस्य । न हि करतल- V pol 10 स्पर्शक्लेशितानामवयवानामीदृशी भवति कान्ति । Kadambari, p II 1 22 (Peterson, Bonibay, 1885) 4 दशनरत्नतुलादण्डेन नयनसेतु 4 आयतननदीसीमान्तसेतुबन्धेन ललाटतट- यौवनमन्मथ शशिमरिणशिलातलगलितेन कान्तिसलिल- वारणवरण्डकेनेव नासावशेन स्रोतसेव द्राधीयसा नासावंशेन शोभमानम्। परिष्कृताम् । V.p. 10 l. 16. Hp 22, 1 6. 5 स्तम्भनचूर्णमिवेन्द्रियाणा 5 वशीकरणमन्त्रमिव मनस, स्वस्थावेश- कन्यकामपश्यत्स्वप्ने । चूर्णमिवेन्द्रियाणाम् । V 9 Hp. 23, l. 18. 6 अथ ता प्रीतिविस्फारितेन पिब 6 अथ सरस्वतीप्रीतिविस्फारितेन चक्षुषा निव चक्षुषा प्रत्यवादीत् । V p. I], 1 14 Hp 36, 1. II 7 अत्रान्तरे भगवानपि मरीचि 7 अत्रान्तरे सरस्वत्यवतरणवार्तामिव कथयितु माली एन वृत्तान्तमिव कथ मध्यम लोक अवतताराशुमालि । यितु मध्यम लोकमवातरत् । Hp 14 1 3 Vp 28 17 8 नायमुपदेशकालः पच्यन्त 8 दूरातीत. खलूपदेशकाल... इवाङ्गानि क्वथ्यन्त इवेन्द्रि- मेऽङ्गानि । उत्क्वथ्यत इव हृदयम् । यारिण। Vp 13, 1 14 Kp 156, 1 6 9 विराटलक्ष्म्येवानन्दितकीचकश 9 क्वचिद्विराटनगरीव कीचकशतावृता । तया। Vp 17, 1 3. Kp. 20, l. II समुद्धतबन्धेन P. II, 1. . .. पच्यन्त इव t INTRODUCTION [ 39 है 10 पश्चिमे वयसि वर्तमानस्य कथमपि पितुरहमेवको विधिवशात्सूनुरभवम् । Kp 25,14 10 तयोश्च मध्यमोपान्तवयसि वर्त. मानयो. कथमपि दैववशात् त्रिभु- वनविलोभनीयाकृति वासव. दत्ता नाम (तनया) बभूव । Vp 21, 1 12 II अत्रान्तरेऽभिसारिकासार्थप्रेपिताना प्रियतमान्प्रति दूतीना द्वयर्थाः सप्रपञ्चा. विकारभड्गुराः प्रवादा बभूवुः। V p. 33, 1. 16 12 नरवाहनदत्त इव प्रियङ्गुश्यामा Vp 14, 1 9 सनाय । II आविर्भूतमदनरसाना चान्योन्यतः सपरिहासा सविश्रम्भाः सेाः सो- त्प्रासा. साभ्यसूयाः सविलासा समन्मथाः सस्पृहाश्च तत्क्षण रमणीया' प्रसस्नु रालापा.। K. p. 84, 1. 12 12 नरवाहनदत्तचरितमिवान्त सवपित- प्रियदर्शनराजदारिकागन्धर्वदत्तो. त्कण्ठम्। K. p. 91, 1. I 13 प्रजापतिकरदृढनिष्पीडितमध्यभाग- गलितजघनशिलातलप्रतिघाताल्लावण्य- जलस्रोत इव द्विधागतमूरुद्वय दधाना", उन्नतकुचान्तरितमुखदर्शनदु खेनेव क्षीय- मारगमध्यभागा, त्रिभुवनविजयप्रश- स्तिवर्णावलीमिव लिखिता मन्मथेन रोमराजिमञ्जरी विभ्राणाम् । K p. 187, 1 3 13 त्रिभुवनविजयप्रशस्तिरोमावली- कनकपत्रेण · मेखलादाम्ना परि- कलितजघनस्थला, उन्नतपयोघर भारान्तरित मुखदर्शनाप्राप्तिखेदे- नेव गुरुनितम्वपयोघरकुम्भपीडाज- नितायासेनेव पयोघरकलशयो कथ मय्येव पातो भविष्यतीति चिन्त. येव · विधातुरतिपीडयतो हस्त- परामर्शजनितपरिक्लेशेनेव क्षीण- तरतामुपगतेन मध्यभागेनालकृ- ताम् । V. P 9, 1.5 14 रागसागरविद्रुमशकलेनेवाधरपल्ल- वेनोपशोभमाना "गतिप्रसररोधक. श्रवणकृतकोपेनेवोपान्तलोहितेन धवलतयेव जगदशेपम् । VP 10, 1 9 - " 14 रागसागरस्य तरंगाम्यामिवोद्गताभ्या विद्रुमलतालोहिताभ्यामघराभ्या.... गतिप्रसरनिरोधीश्रवणकोपादिव- किञ्चिदारक्तापाङ्गेन निजमुखलक्ष्मी- निवासदुग्धोदधिना लोचनयुगलेन लोचनमयमिव जीवलोक कर्तुमुद्यताम् । K p. 1871. 18 1 In the above passages Bāņa paraphrases Subandhu's words over and above accepting most of tbem The general idea, the comparison, the restricting adjective and the verbal form are all followed after the pattern that Subandhu has presented Bāņa has a growing desire to --------- . - r -- -- - - -- -- 40 ] VÄSAVADATTA - surpass Subandhu and therefore we find a compound of Subandhu elaborated and sometimes changed to form a separate clause. Bāna's enthusiasm to improve upon Subandhu is so acute and impatient that it lends him into using unwanted words like प्राविभूतमदनरसाना instead of fift1teffan of Subandhu and ignoring repetitions in सेp and साभ्यसूया , सविश्रम्भा and सविलासा and rests content only after using nine adjectives as against three of Subandhu (cp no II) From poras 13 and 14 it is clear that Bāņa's description of Kādambari is modelled on that of Vāsa vadattā of Subandhu Subandhu and Bāņa describe their beroines from the lower limbs of the body Wbile Subandhu is content with describing in great detail the more prominent and better known limbs of a feminine form often ignoring consistency and repetition, Bāņa is definitely superior in meticulously noting each limb of his heroine starting with gue and ending with the description of 2019 Bāņa is clear, consistent, logical and restrained while Subandhu is at times unnecessarily elaborate and allows himself the tempation of describing the beauty of Vāsavadatta's breasts चटकचक्र (b) क्रमेण च रजोलुठितोत्थितकुलायाधि- कलहविकलकलविककुलकलकल- वाचालितशिखरेषु शिखरिषु. वसति- साकाङ्क्षपु ध्वाक्षेपु, अनवरतदह्य- मानकालागुरुधूपपरिमलोद्गारेपु वासा गारेषु, दूर्वान्विततटिनीवद्धगोष्ठीक- विदग्धजनप्रस्तूयमानकथाश्रवणोत्सुक- शिशुजनकलकलनिवारणकुपितश्रद्धेपु वृद्ध पु, [ पालोनिकातरलरस- नाभि कथितकथाभिर्जरतीभिरति लघुकरताडनज नितसुखे, गिशयिप माणशिशुजने], विरचितकन्दर्पमुद्रासु, क्षद्रा, कामुकजनानुवन्यमानदासोजन- विविधाश्लीलवचनश्रुतिविरसीकृत- सन्ध्यानन्दनोपविण्टेपु शिष्टेषु, रोमन्यमन्थरकुरङ्गकुटुम्बकाध्या- म्यमानम्रदिष्ठगोष्टीनपृष्ठावरण्य- म्यनीपु] २ निद्राविनिद्रागद्रोग- मातफलितकुनायेप्वारामारपू], वाणोऽपि निर्गत्य घौतारकूटकोमलातपत्विषि निर्वाति वासरे, अस्ताचलकूटकिरीटे निचुलमञ्जरीभासि तेजासि मुञ्चति वियन्मुचि मरीचिमालिनि, अतिरो- मन्यमन्थरकुरङ्गकुटुम्बकाध्यास्यमान- म्रदिष्ठगोष्ठीनपृष्ठास्वरण्यस्थलीषु], शोकाकुलकोककामिनीकूजितकरुपासु तरङ्गिणीतटिपु, वासविटपोपवितृवाचाट- वालेष्वालवालावजित- सेकजलकुटेपु निष्कुटेपु] दिवसहृतिप्रत्यागत प्रसृतस्तन स्तनन्धये धयति धेनुवर्गमुद्गत- क्षीरक्षुधिततर्णकवाते, क्रमेण चास्तधराधर- घालुवुनीपूरप्लावित इव लोहितायमानम- हनि मज्जति सन्ध्यासिन्धुपानपात्रे पातङ्गे मण्डले, कमण्डलुजलशुचिशयचरणेषु चैत्य- प्रगतिपरेपु पाराशरिपु, यज्ञपात्रपवित्रपाणी प्रकोर्णबहिण्युत्तेजसि जातवेदसि, हवींपि वपट्कुर्वति यायजूकजने, [निद्राविद्राण- द्रोणकुत्तकलिलफुलायेषु कापेयविकलकपि- 4 INTRODUCTION [ 41 [निजिगमिषति जरत्तरुकोटरकुटीर कुटुम्बिनिकौशिककुले] [तिमिरतर्जन- निर्गतासु दहनप्रविष्टदिनकरकिरणा- ष्विव स्फुरन्तीपु दीपलेखासु], [मुख- रितधनुषि वर्पति शरनिकरमनवर- तमशेषससार-शेमुपीमुषि मकरध्वजे सुरतारम्भाकल्पशोभिनि, शम्भली. भापितभाजि भजति भूषा भुजि ज्यजने, सैरन्ध्रीवध्यमान-रशनाजाल- जल्पाकजघनासु जनीपु ] वि-श्रान्त- कथानुवन्यतया प्रवर्तमानकथकजन गमनत्वपु चत्वरेपु, [समावोसित. कुक्कुटेपु निष्कुटेपु ], कृतयष्टिसमारो- हणेपु वहिणेपु, विहितसन्ध्यावन्दन- व्यवस्थितेपु गृहस्थेषु, ४ [सङ्कोचोद. ञ्चदुच्च-केसरकोटिसङ्कटकुशेशयकोश- कोटरकुटीरशायिनि षट्चरणचक्रे ] अथानेन प्रवर्तता [ वर्त्मना] भगवता भानुनागन्तव्यमितिसर्वपट्टमयर्वसनरिव मरिणकुट्टिमाभिविरचितवरुणेन, भग. वता कालेन कृत्तस्य दिवसमहिषस्य रुधिरधारेव, विद्रुमलतेवाम्बरमहार्ण. वस्य, रक्तकमलिनीव गगनतटाकस्य काञ्चनसेतुरिव कन्दर्पस्य, मञ्जिष्ठा. रागारुणपताकेव गगनहर्म्यतलस्य, लक्ष्मीरिव स्वयवरगृहीतपीताम्बरस्य, भिक्षुकीव तारानुरागरक्ता, रक्ताम्बर धारिणीव भगवती सन्ध्या समदृश्यत V. p 28, 1. 20-V p. 30, 1 2 कुलेवारामतरुपु], [निर्जिगमिषति जर- त्तरकोटरकुटीरकुटुम्बिनि कौशिककुले] मुनि- करसहन्नप्रकीर्णसन्ध्यावन्दनोदविन्दुनिकर इव दन्तुरयति तारापथस्थली स्थवीयसि तारका- निकुरम्वे अम्बराश्रयिणि शर्वरीशवरीशि- खण्डे, खण्डपरशुकण्ठकाले कवलयति वाले ज्योति शेप मान्ध्यमन्धकारावतारे, [तिमि- रतर्जननिर्गतासु दहनप्रविष्टदिनकरकरशा- खास्विव स्फुरतीषु दीपलेखासु], अररसम्पुट- सनीडनकथितावृत्तिविव गोपुरेषु; [शयनोपजोषजुषि जरतीकथितकथे शिश- यिषमारणे शिशुजने] जरन्महिषमपीमलीमस- तमसि जनितपुण्यजनप्रजागरे विजृम्भमाणे भीपणतमे तमीमुखे [मुखरितविततज्यध- नुषि वर्पति शरनिकरमशेपससारशेमुषी- मुपि मकरध्वजे रताकल्पारम्भशोभिनि शम्भ- लीसुभाषितभाजि भजति भूपा भुजिष्यजने, सरन्ध्रीबध्यमानरशनाजालजल्पाकजघनासु जनीपु.] H p. 80,18-Hp 81 1 II 1 क्रमेण च 10 [सुरतभरखिन्न पुलिन्दसुन्दरीस्वेदकणिकापहारिणि ] प्रतिवाति [सायन्तने तनीयसि निशा. नि श्वासनिभे नभस्वति] कन्दर्पकेतुस्त- मालिकासहायो वासवदत्ताजनकनग- रीमयासीत् । Vp 35,16ff. अत्रान्तरे सरस्वत्यवतरणवार्तामिव कथयितु मध्यम लोकमवतताराशुमालो । क्रमेण च मन्दायमाने ' वासरे..[सायन्तने तनीयसि निशानि श्वसनिभे नभस्वति], [सङ्कोचोदञ्चदुच्चकेसरकोटीसकटकुशे- शयकोशकोटरकुटीशायिनि पट्चरणचक्रे] सावित्री सरस्वतीमवादीत् । Hp I4, 13-H p. 161 10 8 42 ] VĀSAVADATTĀ 10[रति खिन्नगवरसीमन्तिनीस्वेदजल- कणिकापहारिणी] ... मन्दमन्दसञ्चारिणी प्रवाति प्राभातिके मातरिश्वनि' । K. p 2618 In the above passage ten groups of exactly similar sentences are found Bāņa, it can be very easily seen has bodily taken them from Subandhu without the change even of a letter. In group no 2 he adds अति before रोमन्थ, in group 6 he puts the word रत instead of सुरत of Subandhu and in group no I It is Bāna who is guilty of clumsily wording the beautiful and realistic picture that Subandhu offers * (c) प्रियसखि अनङ्गलेखे वितर मि] हृदये पाणिपाददु सहो विरहसन्तापः, मुग्धे मदनमञ्जरि सिञ्च चन्दनोदकेन [सरले वसन्तसेने सरण केशकलाप- पाश, तरले लवङ्गवति विकिर केतक. धूलि, मालिनि अल शैवलदलेन, चपले चित्रलेख लिख चित्रे चित्तचोर जन, भामिनि विलासवति विक्षिप मुक्ताचूर्णनिकर, रागिरिण रागलेख स्थगय नलिनीदलसमूहेन पयोधरभरम्] सुकान्ते कान्तिमति मन्द मन्दमपनय वाष्पविन्दून्, यूथिकालड्कृते यूथिके सञ्चारय नलिनीदलावातान् V p 26,1 8 8 द्रवसि द्रवसिन्धुतो निगलिते चपला चपलायते किमेषा । स्तबकस्तव कर्णत पतितोऽयम् । सुरेखे सुरया सुरयात्रनोचितश्रीस्त्वमसि । कलहे कलहेमदामकाञ्चीदामक्वरिणत स्मरमिवाह्वयसि । मलये मलयेप्सित उत्स- आविर्भूतमदनरसाना चान्योन्यतः सपरिहासा ससभ्रमाः सेाः सोत्प्रासाः साम्यसूया. सविलासा. समन्मथा. तत्क्षण रमणीया. प्रसस्र रालापाः । तथा हि त्वरित- गमने मामपि प्रतिपालय। दर्शनोन्मत्ते गृहा- णोत्तरीयम् । उल्लासयालकलतामाननाव- लम्बिनी मूढे । चन्द्रलेखामुपहारोपहारकुसुम- स्खलितचरणा पतसि मदनान्धे । [सयमय मदनिश्चेतने केशपाशम्], उत्क्षिप चन्द्रापीड- दर्शनव्यसनिनि काञ्चीदामकम् । पय पापे कपोलदोलायित कर्णपल्लवम् । अहृदये गृहाण निपतितं दन्तपत्रम् । [यौव- नोन्मत्ते विलोक्यसे जनेन स्थगय पयोधर- भारम्] अंपगतलज्जे शिथिलीभूतमाकलय दुकूलम् । अलीकमुग्धे द्रुततरमागम्यताम् । कुतूहलिनि देहि दर्शनान्तरम् । असतुष्टे किय. दालोकयसे । तरलहृदये परिजनमपेक्षस्व । पिशाचि गलितोत्तरीया हस्यसे जनेन । रागावृतनयने पश्यसि न सखीजनम् । अनेक- भङ्गिविकारपूर्णे दुखमकारणमायासित- मत्ता । *In these passages it can be easily perceived that the text of Harscharita awaits amendation at the bands of a careful editor रत can be changed into a and the addition of afa and the attempt at simplicity resulting in a jumble of phrases may be the work of an irrespons.ble scribe. - INRODUCTION [ 43 भव। . दृशैवाधिगतासि । कलिके कलिकेतु- मिमा मुखरा मुञ्च मेखला शृणुवः कलवल्लकीविरुतम् । मेखला मे खला न भवति, त्वमेव त्वमेव मुखरतया मुख रतया च । श्रपतेऽत्र पतेदियमवन्ति- सेनाकुसुमोपहारे मुग्धा तव कैतव- करल, लवङ्गिके वेपथुरेवाशय व्य- नक्ति । वहतीव हतिरनङ्ग लेखे स्मर- सायकाना तव वपुरलसम् । पिहि- तापि हितायते । उत्कलिके तवोत्क- लिकामहोमि. । वदने वद नेत्रपेय- कान्तौ किमुपमानमिन्दुरप्पयाति । वसतीव सतीव्रते तव हृदये कोऽपि । शतधा शतधारसारावाचस्तवानु- भूता । केरलि करकाकरकालमेघखण्ड- तुलामयमुल्लसितोत्फुलुमल्लिकामाल. भारी [तव याति] कुन्तलकलापः। कुन्तलिके पुरगोपुरगोचरा श्रूयन्ते गीत. ध्वनयः । किमत्र कल्पयसि क्षणमीक्षण- भीलनात् । अपि चटुल चटुलम्पट सखीजनमायासयसि । मुरले स्तनता स्तनाडनेषु यत्सौख्य लव्ध स्मरता स्मरतापनोदन तदिय तेन वियुक्ता कि मुह्यसि। हतमोहतमो दयित स्म. रति स्म रतिप्रिय तवकौशलम् । नख- राणां व्रण स्मरजन्या स्म रजन्या कुरुते रुज न ते। किं लोचनाभ्यां लोचनाभ्यां प्रीरिणताखिलजनेक्षणदेशः क्षणदेश किं न पीयते। प्रियसखि मदनमालिनि मालिनि विम्बाधरसङ्ग- त्यागेच्छया विराम कुरु । मधुमदारुण- मालवीकपोलतलसमानोऽभ्रान्तसमानो रक्तमण्डलतया त्वया को विशेष । कुरङ्गिके कल्पय कुरङ्गशावकेभ्यः शष्पाड़करम् किशोरिके कारय कि- शोरकप्रत्यवेक्षाम् तरलिके तरलय गुरु- हृदया जीवसि । मिथ्याविनीते कि व्यपदेश- वीक्षितविश्रब्धमालोकय । योवनशालिनि कि पीडयसि पयोधरभारेण। अतिकोपने पुरतो मत्सरिणि किमेकाकिनी रुणत्सि वातायनम् । अनङ्गपरवशे मदीयमुत्तरीया- शुकमुत्तरीयता नयसि । रागासवमत्त निवारयात्मानम् | उज्झितधर्ये किं घावसि गुरुजनसमक्षम् । उल्लमत्स्वभावे किमेव- माकुलीभवसि । मुग्धे निगृहस्व मदनज्वर- जनितपुलकजालकम् । असाध्वाचरणे किमेवमुत्ताम्यसि । बहुविकारे विविधाङ्ग- भङ्गवलनायासितमध्यभागा वृथा खिद्यसे । शून्यहृदये स्वभवनान्निर्गतमपि नात्मान- मवगच्छसि । कोतुकाविष्टे विस्मृतासि नि.श्व- सिनुम् । अन्त सकल्परचितरतसमागमसुख- रसनिमीलितलोचने समुन्मीलय लोचनयुगल- मतिक्रामत्ययम् । अनङ्गशरप्रहारमूछिते रविकिरण निवारणाय कुरु शिरस्युत्तरीया- शुकपल्लवम् । अयि सतीव्रतग्रहगृहीते द्रष्टव्य- मपश्यन्ती वञ्चयर्यास लोचनयुगलम् । अधन्ये हतासि परपुरुपदर्शनपरिहारव्रतेन । प्रसीदोत्तिष्ठ सखि पश्य रतिविरहित साक्षा- दिव भगवन्तमगृहीतमकरध्वज मकरध्वजम् । Kp 84,1 12 ff तस्य चैवविधस्य किञ्चिदभ्यन्तरमति- कम्येतश्चेतश्च परिभ्रमत. कादम्बरीप्रत्या- सन्नस्य परिजनस्य शुश्राव तास्तानतिमनोह- रानालापान् । तथा हि । लवलिके कल्पय केतकधूलिभिर्लवलीलतालवालमण्डलानि सागरिफे गन्धोदककनकदीपिकासु विकिर रत्नवालुकाम् । मृणालिके कृत्रिमकमलिनीषु कुङ्कुमरेणुमुष्टिभिएछुरय यन्त्रचक्रवाक मिथुनानि । मकरिके कर्पग्पल्लवरसेनाधि- वासय गन्धपात्राणि । रजनिके तमालदीथि- कान्धकारेपु निघेहि मणिप्रदीपान् । कुमुदिके स्थगय शकुनिकुलरक्षणाय मुक्ताजालैर्दाडिमी- 44 ] VĀSAVADATTĀ मदन- सञ्जनय । सान्द्रधूपपटलम् । कर्पूरिके पाण्डुरय फलानि । निपुरिणके लिख मणिशाल- कर्पूरघूलिभिः पयोधरभारम्। मात भञ्जिकास्तनेषु कुकुमरसपत्रभङ्गान् । ङ्गिके मानय मातङ्गशिशुयाचनाम् । उत्पलिके परामृश कनकसमाजनीभि कदली- शशिलेखे लिख ललाटपट्टे शशिलें गृहमरकतवेदिकाम् । केसरिके सिब्च मदि- खाम् । केतकिके सङ्केतय केतकी- रारसेन वकुलकुसुममालागृहाणि । मालतिके मण्डपस्य दोहदम् । शकुनिके देहि पाटलय सिन्दुररेगुना कामदेवगृहदन्तवल- क्रीडाशकुनिभ्य आहारम् । भिकाम् । नलिनिके पायय कमलमधुरसं मञ्जरि मजरय सभामण्डपकदली भवनकलहसान्। कलिके नय धारागृहगृह- गृहम् । शृङ्गारमञ्जरि सङ्कल्पय मयूरान् । कमलिनिके प्रयच्छ चक्रवाकशा- शृङ्गाररचनाम्, [सञ्जीवनिके वितर वकेभ्यो मृणालक्षीररमम् । चूतलतिके देहि जीवज्जीवकमिथुनाय मरिचपल्ल पञ्जरपुस्कोकिलेम्यरचूतकलिकाड कुराहार वम् ।] पल्लविके पल्लवय कर्पूरधूलि. [पल्लविके भोजय मरिचानपल्लवदलानि भि कृत्रिमकेतकाननम् । सहकार. भवनहारीतान् ।] लवङ्गिके विक्षिप चको- मञ्जरि सहकारसोरम रपजरेपु पिप्पलीतण्डुलशकलानि । मधु- व्यजनवातेषु । मदनलेखे लेखय मदन करिके विरचय कुसुमाभरणकानि । मयूरिके लेख मलयानिलस्य । मकरिके देहि सङ्गीतशालाया विसर्जय किन्नरमिथुनानि । मृणालाडकुर राजहसशावकेभ्यः । कदलिके समारोहय क्रीडापर्वतशिखरं विलासवति विलासय मयूरकिशोरक । जीवजीवमिथुनानि । हरिणिके देहि पञ्जर- तमालिके परिमलय मलयजरसेन भव- शुकसारिकारणामुपदेशम् । नवाटम् । काचनिके विकिर कस्तूरि- Kp 184,17-Kp 185 1.3 द्रव काञ्चनमण्डपिकायाम् । प्रवालिके सेचय घुसृणरसेन वालप्रवालकाननम् । Vp 36, 1.10-Vp 38, 1 5 The paras quoted above will leave little doubt that the description of प्रमदालापा . in Bana 1s fashioned on that found in Subandbu In the first paragraph in Bana we can see sentences like सयमय मदनिश्चेतने केशपाशम् and यौवनोन्मत्ते विलोकयसे जनेन स्थगय पयोधरभारम् echoing similar words and sentences in Subandhu In the second para quoted above, Bāņa has decided to surpass Subandhu so that whereas Subandhu is gracefully expressing some of the finer emotions of the damsels at play without loosing an opportunity to show his skill in 79 and , Bāna accepts a wider range and shows skill in and fondness for describing the activities of royal ladies and their kind Here also sentences like पल्लविके मोजय मरिचारपल्लवदलानि भवनहारीतान् have their basis In Subandhu's words like सजीवनिके वितर जीवज्जीवकमिथुनाय मरिच- पल्लवम् । 7 INIRODUCTION [ 45 1 1 r (d). Another important parallel is Vāsa vadattā page 43 1. 20 to Va- --savadattā page 45 1 5 and Harshacharita page 234 1. I to Harsha- - charita p. 235 1 13 where in describing and enumerating the trees Bāņa has literally copied from Subandhu (cp. 'Appendix I no. 37) and has not cared to change even a word. His only contribution in this paragraph of Harshacharita is the addition of a few more sentences between those which he has bodily taken from Subandhu, the conclusion therefore is that so far as Harshachaista is concerned Bāņa was not able to show himself completely independent of the literary tradition and Subandhu Small-phiases, compounds, expressions of comparision and modes of alliteration like gitara (HP 40 1 2), HEIGHEATITU (H. ,p 208 1 15), FETITA uutta (H p 56 I 4) Jeaftalans (H 37 1 12), stafarurfeda 291 '(H'p 36. 1 11), 5787447 ( HP 222. 1. 14), सहपासुक्रीडापरिचय (H.P 17 1.10), 4(700+ (H. D 15 1 9), 7TFITTHIATIA (H p 97 1. 1) scattered in Harshacharita are also found in Vāsavadattā. (e) The list of Kings who came to trouble on account of some sflaw in their character (cp Appendix I no 38 Vāsa vadattā p 46 1.14 'to Vāsavadattā p 47 1 4 and Harsacharita p. 87. 1. 9 to Harsacharita p go. I 5) is another example of Bāņa's dependence on Subandhu As will be pointed out the list is traditional, having its origin in the epics, found with changes in Kauțalya, Vātsyāyana and Varāhamıbıra and later on introduced with some changes by prose-writers like Somadeva and Dhanapāla. We have sixteen short sentences in Subandhu which give the account of sixteen ancient personalities and their moral lapses Witb similar puns we have twenty short-sentences in Bāna which give twenty names the order of the sixteen in Subandhu being the same as.the order of the first sixteen in Bāņas except that the names of #lear, 922, FIETT, and qrug are added, the additions can be accounted for by the enthusiasm of scribes Some other parallels in thought, arrangement and general treatment may he pointed out. The description of Vindyāta vi (Kadambari p 19 1. i to Kādambari p 201 15), that of Ujjayını (Kādambari p 50 ff) that of the first interview between Kādambari 'and' Chandrāpida (Kadambari P 182 ff ) follow similar descriptions of farset 777- Etfift (Vāsavadattā p 13 1 18 to Vāsa vadattā p 14 1 21) and farsica) (Vāga vadattā p 39 | 17 to Vāsa vadattā p 41-) 2), of Kusumapura (Vāsavadattā p 17) and fireišg's entry into Vāsavadattā's palace and meeting her (Vāsavadttä p. 36 ff. and p 39). In Väsa vadattā and * T wer mo 46 ] VĀSAVADATTĀ ! Kadambari we have similar plans of describing palaces, seasons, cities, kings, heroes, speeches and forests The motif of a parrot reciting the story or giving expression to the clues to further events, the faithful following of the tradition of the science of rhetorics and the Kāmasātra in describing anything pertaining to love and lovers and the orderly treatment of these following a definite plan go a long way in proving Bāņa's dependence on Subandhu Bāņa increases the number of alliterations and mythological allusions over Subandhu Many times he introduces words to obtain longer and more fully sounding compounds In describing kings, heroes and heroines the same method of introducing afhent and fatta is followed by Bāna (cp the description of farsafu in Vasavadattā p 3 and Slūdraka and Tārāpida in Kadambari p 5, 53, 54) From the above discussion it can be proved that in Bāņa and particularly in his Kādambari there is a definite and growing desire to surpass Subandhu's work, which we find fulblled The great french novelist Balzac had an ambition to surpass in literature the glory of earlier writers and his model of fame was Napolean In the same way Bāņa desired to surpass the fame of Guņādhya and Subandhu by writing an afagutom and be an equal in everlasting glory with his patron Harshavardhana whose ambition as the strongest king in Northern India was achieved at least for some years. In spite of Bāna's remarks agair st plagiarists (कुकवय., कोकिला इव वाचाला , श्वान इव, कवय शरमा इव, facati: Harsa charita Intro verses 4. 5 and 6) it is not something strange that he should imitate Subandbu, for, the literary tradition in India anticipates a detailed study of the earlier writers and sciences on the part of a young aspirant in literature It was a regular practice of Indian poets to lift an idea or an expression from an earlier writer, dress it in a different garb and try to demonstrate his superiority in skill. It was perbaps tbis in Rājasekhara's mind when he declared in a lighter vein Hifpues: fasta Moreover, imitation may not always be conscious, the impression or echo of an earlier thought or reading suddenly rushing in the mind without the knowledge of the imitator Scholar scribes would also contribute not a little to this for, to suit their fancy they altered the text of the one with the borrowings from tbe other, Another instance of Bāņa's indebtedness to Subandhu is the list of kings who came to trouble on account of some flaw in their character. Such a list which accepts the names of kings found in a similar enumeration in Subandhu is the one found in Harsacharita In this case Bāņa as well as Subandhu are following the traditional literary conventions, for such lists are found in Kautilya, Vātsyāyana and Dandin also IN TRODUCTION [ 47 (a) यथा दाण्डकयो नाम भोज कामाबाह्मणकन्यामभिमन्यमानः सवन्धुराष्ट्रो विननाश । करालश्च वैदेहः । कोपाज्जनमेजयो ब्राह्मणेषु विक्रान्त । तालजङ्घश्च भृगुषु । लोभाद- लश्चातुर्वर्ण्यमत्याहारयमाण सौवीरश्चाजविन्दु । मानारावण परदारानप्रयच्छन् दुर्योधनो राज्यभ्रशच। मदाद्डुम्भोद्भवो भूतावमानी हैहयश्चार्जुन । हर्षाद वातापिर- गस्त्यामत्यासादयन् वृष्णिसङ्घश्च द्वैपायनमिति । अधिकरण, १-अध्याय ६ (p 7 Shāmashastri's edition) (b) Vatsyāyana also refers to some kings who came to trouble on account of their unhealthy attachment to sensual pleasures (Kāmasātra II. 1 ) बहवश्च कामवशगाः सगणा एव विनष्टा. श्रूयन्ते। यथा दाण्डकयो नाम भोज. कामाद् ब्राह्मणकन्यामभिमन्यमानः सवन्दुराष्ट्रो विननाश । देवराजश्चाहल्यामतिबलश्च कीचको द्रौपदी रावणश्च सीतामपरे चान्ये च बहवो दृश्यन्ते कामवशगा विनष्टा इत्यनर्थ- चिन्तका.। (c) Dandın has also a list of the great personalties of the past who indulged in some immoral act but with remorse and better action later on were able to cast away the sin (Dashakumāracharita Bombay 1936 p. 84 1 II) तत्त्वदर्शनोप हितश्च यथाकथचिदप्यनुष्ठीयमानाभ्या नार्थकामाभ्या बाध्यते । बाधितोऽपि चाल्पायासप्रतिसमाहितस्तमपि दोष निहृत्य श्रेयसेऽनल्पाय कल्पते । तथाहि पितामहस्य तिलोत्तमाभिलाष', भवानीपतेर्मुनिपत्नीसहस्रसदूषणम्, पद्मनाभस्य षोडशसहस्रान्त पुरविहार , प्रजापते स्वदुहितयपि प्रणयप्रवृत्ति , शचीपतेरहल्याजारता, शशाकस्य गुरुतल्पगमनम्, अशुमालिनो वडवालवनम्, अनिलस्य केसरिकल म., वृहस्पतेरुतथ्यभार्याभिसरणम्, पराशरस्य दागकन्यादूषणम्, पाराशर्यस्य भ्रातृदारसगति , अमृगीसमागम इति । While Kautilya and Vātsyāyana list some of the historical personalities, Dandın's list enumerates persons known to mythology only (d) Subandhu's list contains names of historical, mythological and legendary personalities तथाहि । गुरुदाहरण द्विजराजोऽकरोत् । पुरूरवा ब्राह्मणधनतृष्णया विननाश नहुषः परकल पदोहदी महाभुजग आसीत् । ययातिराहितपाणिग्रहण पपात । सुधुम्न. 'स्त्रीमय इवाभवत् । सोमस्य प्रख्याता जन्तुवनिर्घ पता । पुरुकुत्स कुत्सित इवासीत् । कुवलयाश्वो नाश्वतरकन्यामपि परिजहार । नृग कृकलासतामगमत्। नल कलिरभिभूत- वान् । सवरणो मित्रदुहितरि विक्लवतामगात् । दशरथ इष्टरामोन्मादेन मृत्युमवाप । कार्तवीर्यो गोब्राह्मणपीडया पञ्चत्वमयासीत् । मनु. सुवर्णव्यसनी ननाश । शन्तनुरतिव्य नाद्विपने विललाप । वुधिष्ठिरः समरशिरसि सत्यमुत्ससर्ज । नास्त्यकलङ्क कोऽपि प्रायः Vasavadatta p 46.1 14-Vasavadattā page 47 1 4 - 1 - - 48 ] VĀSAVADATTĀ - - - (e) तात बाण द्विजाना राजा गुरुदारग्रहणमकापीत् । पुरूरवा ब्राह्मणवनतृष्णया दयितेना- युपा व्ययुज्यत । नहुष परकलवाभिलाषी महाभुजङ्गा प्रामीत् । ययांतिराहितब्राह्मणी- पाणिग्रहण पपात । मुद्युम्न स्त्रीमय एवाभवत । मोमकस्य प्रस्याता जगति जन्तुवध- निघृणता । मावाता मार्गणव्यसनेन मपुत्रपौत्रो रसातलमगात् । पुरुकुत्स कुत्सित कर्म तपस्यन्नपि मेकलकन्यकायामकरोत् । कुवलयाश्वो भुजङ्गलोकपरिग्रहादश्वतरकन्यामपि न परिजहार । पृथु प्रथमपुरुषक परिभूतवान्पृथिवीम् । नृगस्य कृकलासभावेऽपि वर्णमदर. समदृश्यत । सौदासेन नरक्षिता पर्याकुलीकृता क्षितिः। नलमवशाक्षहृदय कलिरभिभूत- वान् । सवरणो मित्रदुहितरि विक्लवतामगात । दशरथ इण्टरामोन्मादेन मृत्युमवाप । कार्तवीर्यो गोब्राह्मणपीडनेन निधनमयासीत् । मरुत्त. इष्टबहुसुवर्णकोऽपि देवद्विजबहुमतो न बभूव । शन्तनुरतिव्यसनादेकाकी वियुक्तो वाहिन्या विपिने विललाप । पाण्डुर्वनमध्य- गतो मत्स्य इव मदनरसाविष्ट. प्राणान्मुमोच । युधिष्ठिरो गुरुभयविषण्णहृदय. समर- शिरसि सत्यमुत्सृष्टवान् । इत्य नास्ति राजत्वमपकलङ्कमृते देवदेवादमुतः सर्वद्वीपभुजो हर्षात् । Harsacharita p 87.1 g-Harsacharita p go 1 5. "- + Bana's emphasis, like that of Dandin and Subandhu is on the enumeration of persons known to legend and mythology rather tban on the enumeration of bistorical persons , One can easily conclude that Bāna has added to the list given by Subandhu, retaining all that has been given by Subandbu. Subandhu's style Subandhu's style gives evidence of some of the major characteristics of Gauļi There are bombast and prolixity (अक्षरडम्बर) reflecting the mental bombast in the artist Some of his ornamentations are cumbrous There are a few occasions only when the majestic in Subandbu degenerates into the cumbrous cases his style is forceful, majestic with compounds which are claimed by Gray as possesing "melody, alliterations having a lulling music and a compact brevity in S'lesas which are gems of terseness and two-fold appropriateness In many Subandhu's aim is to show his cleverness in interweaving words and sentences in such a way that they give rise to double or sometimes treble meaning Such examples of Arthas'lesa and Sabhangas'lesa are numerous, cp Vas p 3 para I w.here the king Chintamanis described in context of different names of Krşğa with the help of double-meaning words and phrases नृसिंह इव दर्शितकशिपुक्षेत्रदानविस्मयः · कसारातिरिव जनितयशोदानदसमृद्धि. पान- कदुन्दुभिरिव कृतकाव्यादर • विद्याधरोऽपि सुमना धृतराष्ट्रोऽपि गुणप्रियः, वृहन्नलानुभावोऽ- प्यन्त सरल', महिर्षीसभवोऽपि वृपोत्पादी-अतरलोऽपि महानायक राजा चिन्तामणि म । .
-- INTRODUCTION [ 49 . । 4 - - Similar epithets' are found 10 the description of Kandarpaketu. (p 5I.9) जरासन्ध इव घटितसन्धिविग्रहः, भार्गवे इव सदानभोगः, दशरथ इव सुमित्रोपेत सुम- प्राधिष्तिश्च, दिलीप इव सुदक्षिणानुगतो रक्षितगुश्च, राम इव जनितकुशलवयोंरूपोच्छ्रायः। and so on In the same way such s'lesas are found in the whole body of the work e g in the shaftrat so eloquently put forward by Makaranda ( 12 1 5 ff ), in the description of Vindhya (p. 14,1 5ff), Kasumapura (p. 241 4 f) of Spring Season (p 22, 1.5 ff ), of the princes who had gathered for the hand of Vasavadatta (p. 24, 1 4 ff) and in the enumeration of the kings who suffered on account of some flaw 10 their character (p. 46, para 46.). Subandhu's self-conscious assertion (प्रत्यक्षरश्लेषमयप्रवन्ध विन्यासर्वदग्ध्यनिघिनिवन्धम। Intro. y no. 13) may, not be taken literally for in the small work that is Väsa vadattā the paragraphs which can be brought to evidence as examples of the poet's capacity at slesa are not many We know that some of the Utpraeksās, Upamās and Rāpakas as well as Vorodhas of the poet are dependent upon double-meaning words, however at many places pointed out above the s'lesa has added to the beauty of composition, compactness and wellknit brevity which anticipates great scholarship and mastery over telling words and phrases. Examples of Parışamkhyā is another evidence of the poet's mastery over the style he has chosen Once in the description of king Chintamaņi (para 2) and again in the description of king S'rngārasekhara (para 17) we have beautiful instances of Parisamkhyā यत्र च राजनीति चतुरे चतुरम्वुधिमेखलाया भुवो नायके शासति वसुमती पितृकार्ये पो- त्सर्गः शशिन कन्यातुलारोह. योगेषु शूलघातादिचिन्ता, दक्षिणवामकरण दिग्विनिश्चयेषु पारभेदो दधिपु, शृङ्खलावन्धो वर्णनथनासु, उत्प्रक्षाक्षेप काव्यालङ्कारेषु लक्षदानच्युतिः सायकाना, क्विपा सर्वविनाश , कोशससोच कमलाकरेषु जातिहीनता दूण्कुलेषु न पुष्पमालासु, .. · दुर्वर्णयोग कम्बिकादिपु न कामिनीकान्तिपु, गान्धारविच्छेदो रागेषु न पौरवनितासु, मूर्छाधिगमो गानेपु, खर्माभावो नीचसेवकेषु न परिघानेषु कर्तनमलकम् षु न पुरन्ध्रीषु, निस्त्रिशत्वमसीना, करवालनाशो योधाना परं व्यवस्थित । Virodha 15 another figure of speech that Subandhu employs very successfully (cp Vās p 5, 1 3) यस्य च रिपुवर्ग सदापार्थोऽपि न महाभारतरणयोग्य., भीष्मोऽप्यशान्तनवे हित , 'सानुच- रोऽपि न योगभूपितः । अपि च स त्रिशङ्करिव नक्षत्रपयस्खलित . । शङ्करोऽपि न विषादी, पावकोऽपि न कृष्णवर्मा, प्राश्रयाशोऽपि न दहन. नान्तक इवाकस्मादपहतजीवन and so on An illustration of Bhedakālıs'ayoki is found on p 4, 1, 89. - । -- । 50 ] VĀSAVADATTĀ - स हिमालयो नावश्यायोच्छलितः नो मायाजन्मने हितश्च । असौ हि मानी गिरि स्थितो वृषध्वजश्च । असी सद्गति. अवधूताखिलकान्तारः, पावकाग्रेसरः, न भोगोत्सुकः, सुमनोहरश्च । स रत्नाकरोऽनहिमयः, कथमगाधः समयदि नोट्रेकोऽप्यस्य विस्मय', हिमकराश्रयोऽमृतमयः, सत्पात्रः तस्याचलो न क्रोध , महानदीन , स सपोत. स समुद्रः | Maladipalra is another figure of speech that we meet with on p 6, 1. 14 यस्य च समरभुवि भुज- दण्डेन कोदण्ड, कोदण्डेन वारणा., वाण रिपुशिर , तेनापि भूमण्डल, तेन चाननुभूतपूर्वो नायकः, नायकेन च कीतिः, कीर्त्या च सप्तसागरा, सागरैः कृतयुगादि राजचरितस्मरण. अनेन च स्थैर्य , अमुना च प्रतिक्षणमाश्चर्यमासादितम् । On page 13, 1 8 we have an illustration of Malata. Verses 15 and 16, where the appearance of a lion is described in Saidulaurhrīdita metre and which are good illustrations of Subandhu's compact and mature diction are examples of Srabhāvokti. Verses 17 and 18 are good illustrations of Kāryalinga and Asangatz The following two paragraphs are some of the most beautiful Utprehşas found Vasavadatta. . -- रविविरहविधुराया. कमलिन्या हृदयमिव द्विधा पपाट चक्रवाकमिथुनम् । प्रागमिष्यतो हिमकरदयितस्य पार्वे सञ्चरन्ती कुमुदिन्या भ्रमरमाला दूतीवालक्ष्यत । तारकाव्याजादस्तङ्ग- तस्य दिवाकरस्य शोकादिव ककुभो व्यरुदन् । भास्वतो निजदयितस्य विरहादभिनवकिजल्क- राशिव्याजेन मुर्मुर इव नलिनीकोशहृदये जज्वाल। (p 321 6 ff) and रजनीवधू- करद्वयोच्छलितपतन्मुसलाहतिक्षतान्तर उलूखल इव चन्द्रे, कण्डनविकीर्णेषु तण्डुलेष्विव तारा- गणेपून्मीलत्सु. सन्ध्याताम्रमुखेन वासरवानरेण नभस्तरुमारोहता, शाखाभ्य इव कम्पिताम्यो दिग्भ्यो विकचप्रसून इव तारागणे इन्दुमण्डलफले च पतति'. । (p. 41, 1. I f) The best achievements of Subandhu in Vasavadattā are the descriptions of nature and man, hero and heroine, the seasons, mountain, rivers, army and so on With a conscious desire to describe all these he procceds to string with one another epithets and further adjectives to these epithets The background of these descriptions is varied. The standard of comparisions are not always the objects of nature and this proves the range of Subandhu's poetic gemus. In the earlier descriptions of king Chintāmanı and prince Kandarpaketu we have double and triple entendres running along a background of mythological persons and places Very interesting social conventions are suggested because here we get an idea of punishments like छलनिग्रहः कण्टकयोग; खलसयोग, करच्छेद, नेत्रोत्पाटन, अग्नितुलागुद्धि, शूलसयोग and करपत्रदारण In a paragraph (no 4) full of short, beautiful and poetic sentences the poet has described the generosity, the personal charm and attraction and the strength and valour of Kandarpaketu The whole INTRODUCTION [ 51 para may be taken to be a good illustration of Tafea: or clarity in conveying meaning. The description of dawn and the vision of a beautiful maiden (Vasavadatta) that was seen by Kandarpaketu are not only charming but they follow the best poetic conventions in sanskrit literature The moon, a drinking cup of the night-maiden was slowly drowning itself in the ocean, the bees had concealed themselves in the scented dome of the lilies, the Sārikā birds were requesting the maidens to tear themselves away from the embrace of their lords, the scholarly teacher had awakened for his morning recitation and the lonely roads were resonant with the poetic narrations of the Kārpatika bards who had tuned them to the sweet notes of Bhāsarāga The aim of Subandhu in such descriptions is to explore all possible sources and objects of comparison Then follows a descriptions of Vāsavadattā, the heroine of the story: The poet begins to describe each limb and its innocent beauty and starts with the description of the thighs of the heroine The Sanskrit literary works have recorded a continuous tradition of such descriptions which are found in ealier works like Rāmāyaṇa, in the Kāvgas of Asvaghosa and Kālıdāsa and in works like Kāmasūtra and BỊhatsamhitā Architectural details have been pressed into service as standards of comparison, for we have such objects for standards of comparison as तोरण, कनकप्राकार, प्रालवालवलय, मण्डलपरिवेष, कनकपत्र, परिखा- वलय and शलाकागुरण It should be noted that in such descriptions Bāņa closely follows Subandhu in details and manner of comparison The description of Kādambari follows the same plan Vasavadattā's description on page 38 is another instance of the power of Subandhu's literary genious which revels in departing from the already known standards, Here the limbs of Vāsa vadattā are compared with sciences like vyakarana, astronomy and dialectics, literary works like Bluārata, Rāmāyaṇa, Chhandovichiti and the systems of philosophies like the Buddbist and the Upanisadıc pbilosophies The love of the novel and not attempted-by-any-one-before is another characteristic of Subandhu's style Unlike Kālıdāsa who has successfully deleneated the inner workings of the human mind and the whole atmosphere of the mental world of men and women, Subandhu loves to describe the calm majesty of seasons, the wealth of the woodlands, the wide expanse of the ocean, the flowing beauty of Revā, the charm of the sunrise and the sunset and the blinding darkness of the night We should take into consideration the father baffling brevity of the story and the paucity of characters and incidents in Vasavadattā In + 52 ] VASAVADATTĀ - this background the uneasiness of Kandarpaketu and the torment and lamentations of Vasavadattā are the only occasions that tbe poet can willfully stumble upon to describe. Here also words like भामिनि विलासवति विक्षिप मुक्ताचूर्णनिकर, रागिरिण रागलेखे स्थगय नलिनीदलसमू- हेन पयोधरभरं, सुकान्ते कान्तिमति मन्द मन्दमपनय वाष्पविन्दून्, यूधिकालते यूधिक सञ्चारय नलिनीदलार्द्रवातान्, एहि भगवति निद्रे अनुगृहारण माम्, धिगिन्द्रियरपर. किमिति लोचनमयानि ममाङ्गानि विधिना न कृतानि, भगवन्कुसुमायुध तवायमजलिरनुचरो भव भाववति तादृशे जने | are full of deep, poignant and sincere emotion. The descriptions of Revā and Bhāgirathi are notable for the wealth of the details that the poet could demonstrate. He is eager to note each bird, beast, tree, creeper, man, gods, and-goddesses The creepers and flowers rustling in the wind are promiscuously described with the fearful noises of the owl and jackals, and the love play of the heavely couples. The same is true of descriptions of Vindya (Paras 8, 9 and 42) and the description of महासागरकच्छप्रान्त which enumurates a number of tress, creepers, birds and beasts. They are नल, निचुल, पिचुल, चिरिविल्व, विल्वोटज, कुटज, भृङ्गराज, सुन्दरी, वेत्र ताल, हिन्ताल, पूग, पुन्नाग, नागकेसर, घनसार, मल्लिका, केतक, कोविदार, मन्दार, वीजपूरक, जम्बीर, जम्बू, रक्ताशोक, केसर, मुचुकुन्द, सहकार, हरिद्रा, गुल्जा and so on (Para 45). The small paragraph (56) describing the fight between two Iival armies of two generals is very effective with its realistic atmosphere The ladies of the palace lovingly talking with each is another instance of Subandhu's power of describing finer emotions and incidents वदने वदनेत्रपेयकान्तौ किमुपमानमिन्दुरप्यायाति । वसतीव सतीव्रते तव हृदये कोऽपि । शतधा शतधारसारा वाचस्तवानुभूताः । अपि चटुल चटुम्लपट सखीजनमायासयसि । मुरले स्तनता स्तनताडनेमु यत्सौख्य लव्ध स्मरता स्मरतापनोदन तदिय तेन दियुक्ता कि मुह्यमि । हतमोहतमो दयितः स्मरति स्म रतिप्रिय तव कौशलम् । and प्रियसखि मदनमालिनि मालिनि विम्बाधरसङ्गत्यागेच्छाया विरामं कुरु । कुर- ङ्गिके कल्पय कुरङ्गशावकेभ्य शष्पाकरम् । किशोरिके कारय किशोरकप्रत्यवेक्षाम् । तरलिके तरलय गुरुसान्द्रधूपपटलम् । कर्पूरिके पाण्डुरय कर्पूरघूलिभिः पयोधरभारम् । मात- गिके मानय मातङ्गशिशुयाचनाम् । शशिलेखे लिख ललाटपट्ट शशिलेखाम् । केतकिके सङ्के- तय केतकीमण्डपस्य दोहदम् । शकुनिके देहि क्रीडाशकुनिभ्य आहारम् । मदनमजरि मज- रय सभामण्डपकदलीगृहम् । शृङ्गारमञ्जरि सङ्कल्पय शृङ्गाररचनाम् । and so (para 41) We have two more instances of Subandhu's desire to select únconventional objects of comparison while describing Väsavdatta on the one hand and Kandarpaketu on the other, -- - . .. on + INTRODUCTION [ 53 T V cp शनैश्चरेण पादेन, सौम्येन दर्शनेन, गुरुणा नितम्वेन, लोहितेनाधरेण, विकचेन विलोचनेन, भास्वतालङ्कारेण, ग्रहमयीमिव, ससारभित्तिचित्रलेखामिव 'अष्टादशवर्षदेशीया कन्यामपश्यत्स्वप्ने । (Vasa. p II. 1.4). The southern recension represented by Shrirangam text tries to fill in the gaps भास्वतालङ्कारेण, श्वेतरोचिषा स्मितेन, लोहितेनाधरेण, सौम्येन दर्शनेन, गुरुणा नितम्वेन, सितेन हारेण, शनैश्चरेण पादेन, तमसा केशपाशेन, विकचेन लोचनोत्पलेन and so on (p. 77.11) Kandarpaketu is described with objects of comparison which are rivers like Mālıni, Tungabhadrā, S'ona, Narmadā and Godavari cp. समुद्रमिव महासत्त्व मालिन्या कबरिकया, तुगभद्रया नासिकया, शोरणेनाघरेण, नर्मदया वाचा, गोदया भुजया स्वर्वाहिन्या कोल् च पुण्यमयमिव त्रिभुवन विलोकनीयाकृति युवान ददर्श । (Vasa. p. 25. 1. Iff) While we sometimes deplore the presence of long compounds, it is an extremely pleasant experience when we sigbt beautiful thought dressed in simple and poetic words, cp प्रलयकालोदितद्वादशरविकिरणकलापतीविरहाग्निदह्यमाना सती, अति कृशा विप्राणा- मिव 'तनुं विभ्रती, प्रचलदमन्दरान्दोलितदुःखसिन्धुतरलतरतरगच्छटाधवलहासच्छुरिता- घरपल्लव तन्मुखारविन्द, द्विजकुलमिव श्रुतिप्रणयि तदीक्षणयुगल, सहजसुरभिमुखपरिमला- मोदमाघ्रातुकामा सुदूरनिर्गतनासावशलक्ष्मी कलङ्कमुक्त न्दुकलाकोमला पीयूषफेनपटलपाण्ड- रास्यद्विजपक्ति तददृष्टचरमनङ्गमतिशयान रूप, धन्यानि तानि स्थानानि ते च जनपदा , पुणनामाक्षराणि च तानि सुकृतभानिज यान्यमुना परिष्कृतानीति मुहुर्मुहु परिभावयन्ती, दिक्षु विलिखितमिव, नभस्युत्कीर्णमिव, लोचने प्रतिविम्बितमिव, चित्रपटलिखितमिव, पुरो दशितमिवेतस्ततो विलोकयन्ती व्यतिष्ठत। (Vasa p 27 1 6ff) These few remarks regarding the literary importance of Subandhu's Vása vadattā prove one point very 'clearly that Subandhu was a master of a clear, simple and beautiful diction as well as a style majestic with long and rolling compounds, and full of doublemeaning epithets. , That he was very fond of showing off his scholarly abilities, his command of sciences,'his ability to weave together words to form a difficult construction and his love of the out-of-the-way and the un-attempted so far by anyone else is evident at each sentence of Vāsavadattā. He may be said to have successfully illustrated the prevailing requirments of a good poetic composition viz नवोऽर्थ , प्रानम्या जाति , अक्लिप्ट श्लेषः, स्फुट रस and विकटाक्षरबन्ध: through bis work viz Vāsayadattā. His @9 is not always afarce but the scholar will definitely enjoy it, for it challenges his learning and the ability of interpretation Baldness is something that Subandbu guards . '- 54 ] VĀSAVADATTA himself against in his composition. He has tried to live up to the few requirements of a good composition that he himself has suggested. It is not studded with useless expletives lihe g, fe, , or 7, (retifa 164- afa garagem: I 22,11. ) The double-meaning epithets are very cleverly strung together (32.4 ) for it is the composition of one who is specially adept in this type of well-knit construction (verse no 13) which is singularly devoid of even a letter the relevancy of which could be questioned by a critic (20-29) The figures of speech like Utprekshās (2017) and metres like Sikharini, Praharsini and Puspitāgrā add to augment the beauty of Vasavadatta (15-6). Some of the flaws in Subandhu's work are bis utter disregard for plot, for relevancy of incidents and for characterisation His love of अनुप्रास and 7 is responsible for laboured paragraphs like para 33 where the darkness and the stars are described and para 45 the latter part of which is little short of enumeration of trees and creepers, birds and beasts Some of his puns are laboured and consciously over-done (cp the description of Chintāməni, para 1, 2 and 3). There are a few sentences which can be said to be open to the charge of vulgarity (A1F48) [(a) Tafiter 59 799$#a77isfa zaufa 197 (12-21) (b) ge- मदनमन्दिरतोरणाभ्यां लताभ्या विराजिता...। (10-18) and (c) अथ मकरन्द- HOTTAKATIFETTI at #1974qaat (39-1)] Although there cannot be two opinions es regards Subandhu's command over Sanskrit language that he so successfully wields to his purpose, he is careless about repetitions of thought and phraseology' in his work. Words like वाहिनीशत, सदागति, नृत्यत्कबन्ध, जीवाकृष्टि, दोषानुबन्ध, हरिचन्दन and so on occur very frequently In Subandhu we bave little evidence of the chiselled beauty of diction that one meets with in Kālıdās, Bhāravi, Magha and Sbriharsa, His sentences are in a few cases loosely connected with one another, there being presented a very quick and not very intelligible leap from one idea to the other. It is likely that Subandhu's scribes may be responsible for this for it is quite possible that Subandhu's text suffered greatly with the rise of Bāņa's fame and the unsettled political atmosphere of Subandhu's time These few remarks about Subandhu' and his work will give some idea of the problems connected with the appreciation of Vāsavadattā No claim is advanced here about a full and comprehensive treatment of these problems This work based on the earliest ms. so far available to us will, it is hoped, create some enthusiasm regarding the appreciation of Subandhu and in getting nearer the original composition of Subandhu Х Х X ?
1 INTRODUCTION [55 1 It is my very pleasant duty to acknowledge the help rendered to me by different scholars. To revered Munishri Jinavijayaji Mahārāja I am specially indebted, for he offered me an opportunity to study critically Subandhu's work. I am overwhelmed by his fleuarea, his parental love for the progress of the work and the magnanimity of his heart at each word of advice that I had the priviledge of listening to, during the work I am highly thankful to my revered teacher Prof Rasıkbhãi C. Parikh for a number of important suggestions which have helped me in various ways To my revered guru Prof K V. Abhyankar, I am gieatly indebted for his kindness in going through portions of the critical text of Vāsavadattā and securing for me a loan of four manuscripts from Bhāņdārkar Oriental Research Institute, Poona. I take this opportunity of thanking Prof. A.D. Pusalkar for making arrangements for the loan of mss from the Bbandarkar Oriental Research Institute, Poona I also thank Prof Vasudevasharanaji Agrawal for promptly replying to my querries regarding certain points Vāsavadatta # in 5-4-65 J. M SHUKLA 3 2 1
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महाकवि-सुबन्धु-विरचिता वासवदत्ता नाम कथा। ॥ ॐ नमो भारत्यै॥ करवंदरसदृशमखिलं भुवनतलं यत्प्रसादतः कवयः । पश्यन्ति सूक्ष्ममतयः सा जयति सरस्वती देवी ॥१॥ खिन्नोऽसि मुश्च शैलं विभृमो वयमिति वदत्सु शिथिलभुजः। भरभुग्नविर्ततवाहुषु गोपेषु हसन् हरिर्जयति ॥२॥ कठिनतरदामवेष्टनलेखासन्देहदायिनो यस्य । राजन्ति वलिविभङ्गाः स पातु दामोदरो भवतः ॥३॥ स जयति हिमकरलेखा चकास्ति यस्योत्सुकोमया निहिता। नयनप्रदीपकज्जलजिघृक्षया शिरसि रजतशुक्तिरिव ॥४॥ भवति सुभगत्वमधिकं विस्तारितपरगुणस्य सुजनस्य । वहति विकासितकुमुदो द्विगुणरुचिं हिमकरोद्योतः ॥५॥ A ॐ नमो वीतरागाय । B श्रीसरस्वत्यै नमः । ॥ श्री हयग्रीवाय नमः । वासवदत्ता सव्याख्या । २ A, B, H, T, KG करवदर० । P करवदर० । A वनिमो। G, K •वितथ० | T विनत ( भरेण भुना विनताश्च वाहवो येषाम् )। T has in mind हरेर्जयति as it explains हरेहास्यम् । ६ A सन्दोह० । Ha, Hh वलिविभागा. । G has a different order of the verse, It puts this verse after verse no. 4 स जयतिः । A यस्योमयोत्सुका निहिता । B यस्यामयोत्सुकाभिहिता । H यस्योमयोत्सुकान्निहिता । a, K यस्योमयोत्कया० । Sivarama adds : उन्मुखा निहिता इति क्वचित्पाठः । १० A, B, H, a omit शिरसि । He °शशुक्ति० । ११ A वहति हि विकसित० । १२ हिमकरद्योत । ។ ३ , ४ ९ , -- 1 - - २] महाकवि-सुवन्धु-विरचिता [ श्लो. ६-१३ विषधरतोऽप्यतिविषमः खल इति न मृषा वदन्ति विद्वांसः। ययं नकुलद्वेषी स कुलदेषी पुनः पिशुनः॥६॥ अतिमलिने कर्तव्ये भवति खलानामतीव निपुणा धीः। तिमिरे हि कौशिकानां रूपं प्रतिपद्यते दृष्टिः॥७॥ हस्त इच भूतिमलिनो लङ्घयति यथा यथा खलस्सुजनम् । दर्पणमिव तं कुरुते तथा तथा निर्मलच्छायम् ॥ ८॥ विध्वस्तपरगुणानां भवति खलानामतीव मलिनत्वम् । अन्तरितशशिरुचामपि सलिलमुचां मलिनिमाभ्यधिः ।।९।। सा रसवत्ता निहता नवका विलसन्ति चरति नो कङ्कः । सरसीव कीर्तिशेषं गतवति भुवि विक्रमादित्ये ॥१०॥ अविदितगुणापि सत्कविभणितिः कर्णेषु वमति मधुधाराम् । अनधिगतपरिमलापि हि हरति दृशं मालतीमाला ॥ ११ ॥ गुणिनामपि निजरूपप्रतिपत्तिः परत एव संभवति । स्वमहिमदर्शनमक्षणोर्मुकुरतले जायते यस्मात् ॥१२॥ सरस्वतीदत्तवरप्रसादश्चक्रे सुबन्धुः सुजनैकबन्धुः । प्रत्यक्षरश्लेषमयप्रबन्धं विन्यासवैदग्ध्यनिधिनिबन्धम् ॥ १३ ॥ G adds (पुन.) after पुन' । ? The verse is quoted as one of Subandhu in Vidyākara's Subhāsıtaratnakośa' (Kosambi verse no. 1254). H K and read यथायथा before लवयति । A and B invert, the order of the verses 8 and 9. ५ A, B, T, H, K, G विहता। Also Kosambi सारसवत्ता. विहता न वका। ibid note २ verse no 1491 H क क । This is following Bivarama who understands it as क सबल: क निर्बल नो चरति न भक्षयति । The verse is quoted as one of Subandhu in Vidyākara's Subhasitaratnakosa (Kosambi : verse no 1718). A ०मणा। A, B H, G read 0799 FriiO I K reads the verse at the end of the work and reads प्रत्यक्षर लेपमयप्रपञ्चविन्यासवैदग्ध्यनिधिं प्रवन्धम् । and reads the first line tanto as second. १ . ३ ६ 42 , ६१.६२] वासवदत्ता - नाम-कथा [३ ६१) अभूदभूतपूर्वः, सर्वोर्वीपतिचक्रचूडामणिश्रेणीशाणकोणकषण- निर्मलीकृतचरणनखमणिः, नृसिंह इव दर्शितंकशिपुक्षेत्रदानविस्मयः, कृष्ण इव कृतवसुदेवतर्पणः, नारायण इव सौकर्यसमासादितधरणी- मण्डलः, कंसारातिरिव जनितयशोदानन्दसमृद्धिः, आनकदुन्दुभिरिव कृतकाव्यादरः, सागरशायीवानन्तभोगीचूडामणिरञ्जितपाः, वरुण इवाशान्तरक्षणः, अगस्त्य इव दक्षिणाशाप्रसाधकः, जलनिधिरिव वाहिनीशतनायकः समकरप्रचारश्च, हर इव महासेनानुयातो निर्जि- तमारश्च, मेरुरिव विबुधालयो विश्वकर्माश्रयश्च, रविरिव क्षणदान- प्रियश्च्छायासन्तापहरश्च, कुसुमकेतुरिव जनितानिरुद्धसंपद् रतिसुख- प्रदश्च, विद्याधरोऽपि सुमनाः, धृतराष्ट्रोऽपि गुणप्रियः, क्षमानुगतोऽपि सुधर्माश्रितः, बृहन्नलानुभावोऽप्यन्तःसरला, महिषीसंभवोऽपि वृषोत्पादी, अतरलोऽपि महानायक राजा चिन्तामणि म । - ६२) यत्र च शासति धरणिमण्डल छलनिग्रहप्रयोगा वादेषु, नास्तिकता चार्वाकेषु, कण्टकयोगो नियोगेषु, परीवादो वीणासु, खलसंयोगः शालिषु, दिजिवसङ्ग्रहीतिराहितुण्डिकेषु, कर[च्छेदः क्लप्तकर ] ग्रहणेषु, नेत्रोत्पाटनं मुनीनां, रोजविरुद्धता पङ्कजाना, १ A, B, T, H, K, G चक्रचारुचूडामणिः । २ A, T, H, K, G दर्शितहिरण्यकशिपु । ३ B महावराह इव । A in adscript and B, H, K, G have पद्म after पाद । ५ A, कुमारसेनानुयातो । H amends faria of his mss A bcdfgh and Narasimha to निवर्तित । ६ . K,G कुसुमायुध इव । ८. K सुधर्माश्रयः । . - K घरा। A छलजातिनिग्रहस्थानप्रयोगो । H, O छलनिग्रहप्रयोगो । K छलजातिनिग्रहप्रयोगो । A, K योगेषु । Hd वनेषु इति नरसिंह । ०कण्टको राजनियोगेषु इति जगद्धर । A in adscript and H द्विजराजविरुद्धता । ११ -- १२ - , ४] महाकवि-सुबन्धु-विरचिता [६२.६३ सार्वभौलयोगो दिग्गजाना", शूलसंयोगो युवतिप्रसवे, अग्नितुला- शुद्धिः सुवर्णानां, दुःशासनदर्शनं भारते, करपत्रदारणं जलजानां, परमेवं व्यवस्थितम् । महावराहो गोत्रोद्धरणप्रवृत्तोऽपि गोत्रोदलनम- करोत् । राघवः परिहरन्नपि जनकभुवं जनकभुवा सह वनं विवेश । भरतोऽपि रामदर्शितभक्तिरपि राज्ये विराममकरोत् । नलस्य दम- यन्त्या मिलितस्यापि पुनर्भूपरिग्रहो जातः । पृथुरपि गोत्रसमुत्सारणा- विस्तारितभूमण्डलः । इत्थं नास्ति वागवसरः पूर्वतरराजेषु । ६३) स पुनरन्य एव वक्तसर्वपूर्वोर्वीपतिचरितः। तथाहि । सर्वतः कटकसञ्चारिणो गन्धर्वान् दर्शितशृङ्गोन्नतिः सुखयन्नं विरराम । स हिमालयोनावश्यायोच्छलितःनो मायाजन्मने हितश्च। असौ हिमानी गिरि स्थितो वृषध्वजश्च। [असौ] सैद्गतिः, अवधूताखिलकान्तार, पावकाग्रेसरः, न भोगोत्सुकः सुमनोहर:[श्च] । स रत्नाकरोऽनहिमया, कथमगाधः,समर्यादा, "नोद्रेकोऽप्यस्य विस्मयः, हिमकराश्रयोऽमृत- मयः, सत्पात्रः, तस्याचलो न क्रोधः, महानदीनः, सपोतः स समुद्रः। १ A, B, H, T, G add सूचीमेदो मणीनाम् । HT, O शूलभङ्गो युवतिप्रसवेषु । ३ A, B, H, omit व्यवस्थितम् । A राज्य विराग्येन । ५ A °समुत्सारणविस्फारित० । B विसृतभूमण्डल. । A तदित्य [तद् in adscript] । G (पूर्वतनेषु) राजसु ( अपि तु वचनीयतायाः) । A, H, K, G न्यक्कृतसविर्वीपति [B चक्रचारु ] चरितः । ९ A, B, H, K, G स पर्वत । A सुखयन्नपि न । ११ A, B, H, K, G स सदागतिरवधूताखिल० । १२ G, स रत्नाकरोऽनतिभयो । Habcdeg नाहिमय । B रत्नाकरोऽपि न हिमालयः । and K रत्नाकरोऽनहिभय । १३ A, B नोद्रकोप्यस्य । H, G नोद्रोकोऽप्यस्य । K नोद्रोकः विस्मयः । A, B, H, K, G read सदा before हिमकराश्रयो । १५ A, B, H omit सत्पात्रः । २ ४ + ६ ८ + १० 2 वासवदत्ता-नाम-कथा [५ . , . [से चन्द्र इव] क्षणदानन्दकरः, कुमुदवनवन्धुः, सकलकलाकुलगृहं, नतारातिबलः । [स समुद्रो] मित्रोदयहेतुः, काश्चन शोभा विभ्रत् , अचलाधिकलक्ष्मीः सुमेररिव । यस्य च रिपुवर्गः सदा पार्थोऽपि न महाभारतरणयोग्यः, भीष्मोऽप्यशान्तनवे हितः, सानुचरोऽपि न गोत्र- भूषितः। अपि च स त्रिशकुरिव नक्षत्रपथस्खलितः, शंकरोऽपि न विषादी, पावकोऽपि न कृष्णवर्मा, आश्रयाशोऽपि] न दहनः, नान्तक इवाकस्मादपाहतजीवनः, न राहुर्मित्रमण्डलग्रहणवर्धितरुचिः, न नल इव कलिविलसितविनटितः, न चक्रीव शृगालवंधस्तुतिसमुल्लसितः, नन्दगोप इव यशोदयान्वितः, जरासन्ध इव घटितसन्धिविग्रहः, भार्गव इव सदानभोगः, दशरथ इव सुमित्रोपेतः सुमन्त्राधिष्ठितश्च. दिलीप इव सुदक्षिणानुगनो रक्षितगुश्च, राम इव जनितकुशलवयो- रूपोच्छ्रायः । तस्य च पारिजात इवाश्रितनन्दनः, हिमालय इव जनित- शिवः, मन्दर इव भोगिभोगाद्धितः, कैलास इव महेश्वरोपभुक्तकोटिः, मधुरिव नानारामानन्दकरः, क्षीरोदमथनोद्यतमन्दर इव मुखरित- भुवनः, रागरज्जुरिवोल्लासितरतिः, ईशानभूतिसञ्चय इव सन्ध्यो- च्छलितः, शरन्मेघ इवाचदातहदयो "विष्णुपदावलम्बी च, पार्थ इव समरसाहसोचितः, कंस इव कुवलयापीडभूषिता,ताय इव [विनता- नन्दकरः] सुमुखनन्दन [श्च], विष्णुरिव "क्रोडीकृतसुतनुः, शान्तनव , . । 1 १ A सचन्द्र in adscapt I H, G सचन्द्र इव । २ P does not have स समुद्रो । A reads स समुद्रो मित्रोदयहेतु । ३ र सुमेरुश्च । ४ र, नाक्षत्रपथच्युतः । ५ A, B, H कलिविघटितो । K, O कलिविजितविग्रहो । ६ र शृगालवघलब्धस्तुतिसमुल्लसितो । P, Hcefg and जगद्धर ० यशोदयान्वितो । H यशोदयाश्रितो । H सुदक्षिणानुरको | K, सुदक्षिणान्वितो । ९ Ka add राज्ञ after तस्य च । K adds चन्द्र इव and omit च । ११ K, 0 कुवलयापीडभूषण । B सुमुखनन्दकरश्च । १३ A विष्णुरिव वराहक्रोडीकृतसुतनुः । ८ १० १२ T , , , , ६] . महाकवि-सुबन्धु-विरचिता [६३.६४ इव स्ववशस्थापितकालधर्मः, कौरवव्यूह इव सुशर्माधिष्ठितः, सुबाहुरपि रामानन्दी, समदृष्टिरपि महेश्वगे, सुक्तामयोऽप्यतरल- मध्यो, जलद इव विमलतरबारिधारावासितराजहंसः, वंशप्रदीपोऽ- प्यक्षतदशः, तनयः कन्दर्पकेतुर्नाम । ६४) येन च चन्द्रेणेव सकलकलाकुलगृहेण, शर्वरीतिहारिणा, कुमुवनबन्धुना, प्रसादिताशेन, विलोकिताजलधय इवोल्लसितगोत्राः, सुदूरवर्तितजीवनाः, प्रसन्नसत्वाः सन्तः परापृद्धिमवापुः प्रजा- लोकाः । यस्य च जनितानिरुद्धलीलस्य, रतिप्रियस्य, कुसुमशरास- नस्य, मकरकेतोरिव दर्शनेन वनिताजनस्य हृदयमुल्ललास । यस्मै चानुगतदक्षिणसागतये, नेत्रश्रुतिसुखदकोमलकोकिलरुताय, विका- सितपल्लवाय, कृतकान्तारतरङ्गाय, सुरभिसुमनोऽभिरामाय, सर्वजन- सुलभपद्याय, विस्तृतकरसंपदे, अतिक्रान्तदमनकाय वसन्तायेव, वनलता इवोत्कलिकासहस्रसंकुलाः, भ्रमरसङ्गताः, प्रवालहारिण्यः, विलसद्व्यसस्तरुण्यः स्पृहयाञ्चक्रुः। यस्य [च समरभुवि भुजदण्डेन कोदण्डं, कोदण्डेन बाणाः, बाणै रिपुशिरः, तेनापि भूमण्डलं, तेन चाननुभूतपूर्वो नायकः, नायकेन च कीर्तिः, कीर्ला च सप्तसागराः, सागरैः कृतयुगादि राजचरितस्मरणं, अनेन च स्थैर्य, अमुना च प्रतिक्षणमाश्चर्यभासादितम् । यस्य च प्रतापानलदग्धानां रिपु- सुन्दरीणां करतलताडनभीतैरिव मुक्ताहारैः पयोधरपरिसरो मुक्तः। यस्य च निहितनाराचजर्जरितमत्तमातङ्गकुम्भस्थलविगलितमुक्ता- १ B शारीविहारिणा । B, H, K दलितकैरवेण 1s added before कुमुदवनवधुना । २ G केरवविवन्धुना । ३ A, H, K, प्रसाधिताशेन । B इबोध्वसितगोत्राः । ५ A, B, H, K, G सुदूरविवर्द्धित० । ६ P only has प्रजालोका । B, H, G विस्तारितकनकसपढे । also K विस्तृतकनकसंपदे । K,G ०दग्धदयिताना । A, B, H, K, G निशित; also Habdf and Narasimha, निशितनाराचरानिजर्ज० ।। He निशितनाराचचक्रजजेरित । 5 , . ९ - ४.६५] वासवदत्ता-नाम-कथा [७ फलदन्तुरितपरिसरे, तरत्पत्ररथे, रक्तवारिसंचरत्करिकच्छपोत्फुल्ल- पुण्डरीकशतसमाकुले, नृलत्कबन्धे, सुरसुन्दरीसंगमोत्सुकचार- भटाहङ्कारसंभारभीषणे, समरसरसि, भिन्नपदातिकरितुरगरुधिराद्रों जयलक्ष्मीपादालक्तकरागरञ्जित इव खड्गो रराज ।" (५) अथ स कदाचिद्वसन्नायां यामवल्यां दधिधवले काल- क्षपणकपिण्ड इव निशायमुनाफेनस्तबके, मेनकानखमार्जनशिला- शकल इव मधुच्छत्रच्छायमण्डलोदरे, पश्चिमाचलोपधानसुखनिलीन- शिरसः, ताडङ्क इव शेषमधुभाजि, चषक इव विभावरीवध्वाः, अपरजलनिधिपयसि शङ्घकान्तिकामुके निमजति कुमुदिनीनायके, शिशिरकर्दमितकुमुदपरागमध्यबद्धचरणेषु षट्चरणेषु, कलप्रलाप- बोधितचकिताभिसारिकासु सारिकासु, प्रबुद्धाध्यापककर्मठेपु मठेषु, भासरागमुखरकार्पटिकोपगीयमानकाव्यकथासु रथ्यासु, सकल- निपीतनिशातिमिरसंघातमतितनीयस्तया सोढुमसमर्थेष्विव कजल- व्याजादुद्वमत्सु, कामिमिथुननिधुवनलीलादर्शनार्थमिवोद्ग्रीविका- शतदानखिन्नेषु, विविधवुधाश्रयभवनविचित्रसुरतक्रीडासाक्षिषु, शरणागतभिवाधोनिलीनं तिमिरमवत्सु, दुर्जनवचनेष्विव दग्धस्ने- हतया मन्दिमानमुपगतेषु, अतिवृद्धेष्विव दशान्तमुपगतेषु, विपन्न- १ Habdh, G"तरत्पत्ररथे । T, H, K पतत्पत्ररथे । H on the testimony of Narasimha and Jagaddhara रक्तवारिसञ्चर- दनेकच्छायोत्पलपुण्डरीकवाहिनीशतसमाकृले । (Hal's manuscripts have many variant readings-रक्त० नेककच्छपोत्फुल्ल पु०, रक्तवारिज० योत्फुल्ल पु०, रक्त वारिज० दरुणकच्छपे उत्फुल्लपुण्डरीके ।), K, G रक्तवारिसमुड्डयमानद्विरदपदकच्छपे विलसदुत्पलपुण्डरीके वाहिनीशतसमाकुले 1; T विलसदुद्दण्डपुण्डरीके । ३ B, H समरसागरे । H, K, O राजतताटङ्कचक्र इव (श्यामाश्यामाया ) । K, G सागर इव समरशिरसि । ५ ' H शिशिरकर्दमितकुमुदधूलिमध्यवद्धचरणेषु । K, G शिशिरहिमशीकरकर्दमित० । ६ A वासरादिमुखर० । B, H, T विभासरागमुखर० 1 0 o(हास) रागमुखर० । A, B विविधबहुवन्धसुरतक्रीडासाक्षिषु । विविधविलांसचित्रसुरतसाक्षिषु । T विविधविभ्रमसुरतक्रीडासाक्षिषु । म विविधवन्धरतक्रीडासाक्षिषु । A, B, H, O दुर्जनेष्विव । २ . ४ ८] महाकवि-सुबन्धु-विरचिता [६५ सदीश्वरेष्विव पात्रमात्रशेषेषु, दानवेष्विव निशान्तपथचारिषु, अस्त- गिरिशिखरेष्विव पतितपतङ्गेषु, प्रदीपेषु, अनवरतमकरंदबिंदुसंदोहे- मोहमुखरमधुकरनिकुरुम्बहुंकारमुखरितेषु म्लानिमानमुपगच्छत्सु वासागारकुसुमोपहारेषु, विगलितकुंन्दैरलकैः प्रियविरहशोकाद् वाष्प- विन्दूनुत्सृजद्भिरिव प्रियतमगमननिषेधमिव कुर्वतीषु वाचालतुला- कोटिभिश्चरणपल्लवैर्विलसितासु, रजनिशेषसुरतपरिश्रमविगलित- केशपाशदरदलितमालतीमालापरिमललुब्धमुखरमधुकरनिकुरुम्बप- क्षानिलपीतनिदाघजलशीकरकणासु, उखेल्लद्भुजवल्लीझणत्कारसु- भगासु,[नव]नखपदर्दष्टकेशनिर्मोकवेदनाकृतसीत्कारविनिर्गतदुग्ध- मुग्धदशनकिरणच्छटाधवलितभोगवासासु, पुनदर्शनपृच्छाविधुर- सखीजनानुक्षणवीक्ष्यमाणप्रियतमासु, क्षणदागतसुरतवैयात्यवचन- शतसंस्मारकगृहशुकचाटुव्याहृतिक्षणजनितमन्दाक्षासु, शरद्वासर- लक्ष्मीष्विव नखालङ्कृतपयोधरासु, आसन्नमरणास्विव जीविते- शपुराभिमुखीषु, वसन्तवनराजिष्विवोत्कलिकाबहुलासु, प्रियैरा- लिङ्ग्यमानासु कामिनीषु, आन्दोलितकुसुमकेसरे, केशरेणुमुषि- H, K निशान्तमध्यचारिषु । A, B, G H, K, C पतत्पतङ्गेषु । K, 0 अनवरतनिपतन्मक० । A adds in later hand निपतित A मोहमुग्ध० । B मोहमुखर० । H सन्दोहलुब्धमधुकर० । Hb, Hd, He, Hg, Hh • सन्दोहमोहमुग्धमदमुदितमधुकरनिकरनिकुरुम्ब० । K, O °सदोहास्वादमुग्धमधुकरनिकुरुम्ब० । ५ A, B, H, K, G विरहशोकात् । H, K, O .निरोधमिव । K ०जलकणिकासु । जलशीकरकणिकासु । 4 १ २ ४ ६ + ९ १० H ०कणझणत्कारमुखरासु ।। K, G ०कङ्कणझणत्कारसुभगासु । H ससककेश- -निर्मोक । K नखपदससक्त | Ha, Hc, Hd, He, Hf, Hh as also Narasimha and Jagaddhar नव० पददष्टकेश० । K, O केशपाशविनिर्मोक. । K, O सुरत 18 added before वैयात्य । A केसररेणुमुपिरणितमधुरमणीना । B केगरकेशरेणुमुषिः । K केसरेणुमुषिरणितनपुर- मणीनां । G केसरेणुमुपिरतिरणितनूपुरमणीना । ११ 1 ~ १२ . 4 .. ५] वासवदत्ता नाम - कथा, [९ रणितमधुकरमणीनां रमणीनां, विकंचकुमुदाकरे मुदाकरे सङ्गभाजि प्रियविरहितासु रहितासु सुखेन मुंमुरमिव वर्षति समन्तादर्पके दर्प- केषुदहनस्य, दूरप्रसारितकोकप्रियतमारुते मारुते वहति, जघनमदन- नगरतोरणेन, मन्मथमहानिधिमन्दिरकनकप्राकारेण, रोमलतालवाल- वलयेन, गगनचन्द्रमण्डलपरिवेषेण, त्रिभुवनविजयप्रशस्तिरोमावली- कनकपत्रेण, सकलजनहृद्यबन्दीनिवासपरिखावलयेन, जगल्लोचनवि- लासशलाकागुणेनेव मेखलादाम्ना परिकलितजघनस्थलाम्, उन्नतपयो- धरभारान्तरितमुखदर्शनाप्राप्तिखेदेनेव गुरुनितम्बपयोधरकुम्भपीडा- जनितायासेने पयोधरकलशयोः कथं मय्येव पातो भविष्यतीति चिन्तयेव, गृहीतगुरुकलत्रानुशयेनेव, विधातुरतिपीडयतो हेस्तपराम- जनितपरिक्लेशेनेव क्षीणतरतामुपगतेन मध्यभागेनालङ्कृताम् , अनुरागरनमयकनकपरुवकाभ्यां चुचुक मुद्रांसनाथाभ्याम् , अतिगुरु- परिणाहतया पतनभयखिल्लिताभ्यामिव चूचुकच्छलेन विधिनी इव A विकचकुंमुदाकरसहभाजि | Ha, Hb विकासितकुं० । and Hg, विकसितंकु० । २P मुखेन । A, B, K सुखेन । ३. A, B, H, K, G समन्तादर्प दर्पकेषुदहनस्य । H रोमावलीलतालवालेन । र रोमराजिलताल. । A, B जगल्लोचनविहशमलासकशलाका० । म जग०मालालासक० । K, G जगलोचनविहंगमावासलासक० । ६ B, H परिवृतः but परिंगते according to Narasimha and Jagaddhara. A un adscript निवद्धोभयपार्श्व after कुम्भ । The superiority of PS readings can be judged from different readings found in K and G. (a) गुरुनितम्वविम्वपयोधरकुम्भपीडाजनितायासेनेवं । (b) गुरुतरनितम्ब .कुम्भनिरुद्धोभयपार्श्वपीडाजनितायोसेनैव . (c) गुरुतरनितम्वविम्बकुचकुम्भनिरुद्धोभयपावे . नेव.. . A, B add मममूर्द्धजयोरियत्प्रमाणयो स्तनकलशयोः । A, B हस्तपाशपरामर्शजनितायासेन । १४. AB कुरुवकाभ्या० । H अनुरागरत्नमयकनकरुचकाभ्यां । a, K .पत्रकाभ्या० । K explains पश्वक as सम्पुट 6 समुद्क । ११ A, B, H चूचुकमुद्रासनार्थीभ्यां । 99 H, K, G add fifcurtatai after" fafetat i १ - - - १०] महाकवि-सुवन्धु -विरचिता [६५' कीलिताभ्यां, सकलावयवनिषिक्तशेषलावण्ययुक्ताभ्यां, हृदय]तदाक- कमलाभ्यां [इच] हृच्छयचातुरिकाविभ्रमाभ्यां, रोमावलीलताफलाभ्यां, कन्दर्पदपवर्धनवंशीकरणचूर्णपूर्णसमुद्गाभ्यां, अंशेषजनहृदयपतनस- जातगौरवाभ्यां, संसारमहातरुफलाभ्यां, यौवनमहापादपप्रसवाभ्यां, हारलतामृणाललोभनीयचक्रवाकाभ्यां, हारलतारोमावलीसङ्गसव्याज- प्रयागतरुफलाभ्यां, त्रिभुवनविजयपरिश्रमखिन्नस्य मकरकेतोविजनवा- सगृहाभ्यामुद्भासमानां स्तनाभ्यां, मुखचन्द्रसंततसंनिहितसन्ध्यारागे- ण, दन्तमणिरक्षासिन्दुरमुद्रानुकारिणा, निस्सरता हृदयानुरागेणेव रञ्जितेन, रागसागरविद्रुमशकलेनेवाधरपल्लवेनोपशोभमानां, तरुणके- तकदलद्राधीयसा पक्ष्मलचटुलालसेन हृदयावासगृहावस्थितस्य हृच्छ- यविलासिनो गवाक्षशङ्कामुपजनयता, सरागेणापि निर्वाणं जनयता, गतिप्रसररोधकश्रवणकृतकोपेनेवोपान्तलोहितेन धवलयतेवजगदशेषं, उत्फुल्लकमलकाननसनाथमिव गगनं कुर्वता, दुग्धाम्भोनिधिसहस्राणी- वोदमता,कुन्दनीलोत्पलमालतीमालालक्ष्मीमुपहसतानयनयुगलेन वि- भूषितां, दशनरत्नतुलादण्डेन नयनसेतुसमुद्धतबन्धेन यौवनमन्मथवा- रणवरंडकेनेव नासावंशेन परिष्कृतां, विलोचनकुवलयभ्रमरपङ्क्ति- भ्यां भुखमदनमन्दिरतोरणाभ्यां. रागसागरवेणिकाभ्यां, यौवननर्तक- लासिकाभ्यां भूलताभ्यां विराजितां, घनसमयाकाशलक्ष्मीमिवोल्ल- सच्चारुपयोधरा, जयघोषणापन्नजनतामिवोल्लसत्तुलाकोटिप्रतिष्ठितां, सुयोधनधृतिमिव कर्णविश्रान्तलोचनां, वामनलीलामिव दर्शितवलि- १ r २ ! 1 १ . A, B, H हृच्छयकपोलचातुरिकाविभ्रमाभ्या० । G adds विलेपन instead of कपोल while K adds विलास for कपोल । K ०वर्धनचूर्णपूर्णकनककलशाभ्यामिव । G कन्दर्पदर्पकशीलचूर्णपूर्णकनककलशाभ्या० । यौवन प्रसवाभ्या is omitted by K and G.. K. a हारलतारोमावलीगङ्गायमुनासगमव्याज० । H •कुर्वता | but K and G accept जनयता following Habcdfgh as well as Narasimha, ६ A, B, H नयनसमुद्रसेतुवन्धेनेव । K, नयनामृतसिन्धुसेतुबन्धेनेव । A, B, H, K जयघोषणापनजनमूर्तिमिव० । G जयघोषणापन(नरपति मूर्ति० ।। (- ४ । - , ६५.६६६७] वासवदत्ता-नाम-कथा -[११ भङ्गां वृश्चिकरविस्थितिमिवातिक्रान्तकन्यातुलां,उषामिवानिरुद्धदर्शन- सुखां, शचीमिव वन्दनेक्षणरुचि,पशुपतिताण्डवलीलामिवोल्लसच्चक्षु:- अवसं,अटवीमिवोत्तुंगश्यामलकुचां, वानरसेनामिव सुग्रीवादशो- भितां, शनैश्चरेण पादेन सौम्येन-दर्शनेन गुरुणा नितम्बेन, लोहिते- नाधरेण विकचेन विलोचनेन भास्वतालङ्कारेण, ग्रहमयीमिव संसार- भित्तिचित्रलेखामिव त्रैलोक्यसौन्दर्यसङ्केतभूमिमिव. रेसाजनसिद्धि- मिव यौवनस्य, संकल्पवृत्तिमिव शृङ्गारस्य, निधानमिव कौतुकस्य, विजयपताकामिव मकरध्वजस्य, अभिभूतिमिव मदनकान्तायाः, सङ्केतभूमिमिव लावण्यस्य, स्तंभनचूर्णमिवेन्द्रियाणां, मोहनशक्ति- मिव मन्मथस्य, विहारस्थलीमिव सौन्दर्यस्य, एकायतनशालामिव सौभाग्यस्य, उत्पत्तिस्थानमिवकान्तेः, [आकर्षणमन्त्रसिद्धि] मिव मनसः, चक्षुर्वन्धनमहौषधिमिव मन्मथेन्द्रजालिनः, त्रिभुवनविलो- चनमृष्टिमिव प्रजापतेः कन्यकामष्टादशवर्षदेशीयामपश्यत्स्वप्ने । ६६) अथ तां प्रीतिविस्तारितेन पियन्निव चक्षुषा, जनितेय॑येव निद्रया चिरसेवितया सुमुचे । विबुद्धस्तु विषसरसीव दुर्जनवचसीव निमग्नमात्मानमवधारयितुं न शशाक। तथाहि क्षणमाकाशतलालिङ्ग- 'नार्थ प्रसारितबाहुयुगलः, एह्येहि प्रियतमे, मा गच्छ मा गच्छेति दिक्षु "विदिक्षुच विलिखितामिवोत्कीर्णामिव चक्षुषि निखातामिव हृदये प्रियामाजुहाव । ततस्तत्रैव शय्यातले निलीनो निषिद्धाशेषपरिजन- दर्शनो दत्तकपाटः परिहृतताम्बूलाहारादिसकलोपभोगस्तं दिवस- मनयत् । तथैव निशामपि स्वप्नसमागमेच्छाभिरनैषीत् । ६७) अथ तस्य प्रियसखो मकरन्दो नाम कथमपि लब्धप्रवेशः कन्दर्पसायकप्रहारविवशं कन्दर्पकेतुमुवाच । सखे किमिदमसाम्प्रत- १ A •मुषामिव जनितानिरुद्धदर्शनसुखाम् । B मिवानिरुद्धदर्शितसुखाम् । 4 रसायनसिद्धिमिव यौवनस्य । K रसायनसमृद्धिमिव यौवनमहायोगिनः । H रसायनसिद्धिमिव यौवनमहायोगिनः । ३ H, A, B, G प्रीतिविस्फारितेन । P विषरससरसीव, A in adscript विषयरससरसीव and adds before विष...सर- सीव the word चिंतासरसीव । 1 ५. K निर्लक्षमाकाशतले । ६ H, K, Gomit दर्शनो । २ १२] महाकविः सुवन्धु विरचिता I७ ससाधुजनोचितचरितमाश्रितोऽसि । तबैतदालोक्य [चरितं] वितर्क- दोलासु निवसन्ति सन्तः । खला पुनस्तत्तदनिष्टमनुचितमेवावधार- यन्ति । अनिष्टोद्भावनरसान्तरं खलहृदयं भवति । को नामास्य तत्व- निरूपणे समर्थः । तथाहि भीमोऽपि न वकद्वेषी, आश्रयाशोऽपि मातरिश्वा, अतिकटुरपि महारसः, सर्षपस्नेह इव करयुगलालितोऽपि शिरसा धृतोऽपि न काटवं जहाति । तालफलरस इचापातमधुरः परिणामविरसस्तिक्तश्च । पादपराग इवाधूतोऽपि मूर्द्धानं कषाययति । विषतरुप्रसव इव यथा यथानुभूयते तथा तथा मोहमेव द्रढयति । न वारिविरहोऽस्य जायते नीचदेशस्येव । निदाघदिवस इव मत्सरो वहति संतापं सुमनसाम् । अन्धकार इव दोषानुबन्धचतुरः विश्वकर्मा- चलोपनोद्यतः। विरूपाक्षोऽपि चक्रधरः, शक्ताश्व इवोच्चैःश्रवाः नदेश- जप्रशंसी च । शरस्येव निभिन्नस्यापि सतः स्नेहं दर्शयति। तक्राट इव हृदयं विलोडयति। यक्षवलिरिवात्मधोषमुखरो मण्डलभ्रमणकथकश्च । मनमातङ्ग इव स्ववशालोलमुखोऽधरीकृतदानश्च । वृषभ इव सुरभि- यानविकलः कामी गोत्रस्खलनविधुरो वासाध्वानुरक्तश्च । अजीर्ण- विकार इव कलेवरेऽपि वचसि मन्दिमानमावहति । वञ्चक इव रक्तः केटुकफलेन विभावरीरक्तश्च । परेत इव बन्धुतापदर्शनः । परशुरिव भद्रश्रियमपि खण्डयति। कुद्दाल इव दलितगोत्रःक्षमाभाजः प्राणिनो निकृन्तति । रतकील इव जघन्यकर्मलग्नोऽपि हेपयति साधून । दुष्ट- । ३ ४ A, H, K, G रसोत्तर० । H कटुत्व । B इवाकम्पितोऽपि । र प्रसून इव । । प्रसूनमिव । ५ B, H, K, G बहुमत्सरो० । K, G रुद्र ईव विरूपाक्ष विष्णुरिवचक्रधरः । A स्नेहं दर्शयतोऽपि कालकूट इव हृदय विलोडयति । B स्नेह दर्शयतोऽपि नक्राटु इव मद्य विलोड़यति । ८ र, जीर्णरोग इव । H, K, G वचक इव कटपले [also Hd, Narasimha and Jagaddhara कटफळे ] रको । ६ ७.६८] वासवदत्ता नाम-कथा [१३ शूर्पश्रुतिरिव काननरुचिरनुगतमपि यवसं ततं नानुमोदते । अधीजा- देव जायन्ते काण्डात्पसरन्ति खेलव्यसनाङ्कराः दुरुच्छेदाश्च भवन्ति । असतां हृदि प्रविष्टो हि दोषलवः करालायते, सतां न विशत्येव हृदयम् ,भूयो यदि कथमपिविशति तदा पारद इव क्षणमात्रं न तिष्ठति। मृगा इच [विनोद] विन्दोः श्रमगा भवन्ति साधवः। सुखं जना हि भवादृशाः शरत्समथा इव हरन्ति न च मित्रस्य सचेतना विसदृश- मुपदिशन्ति । अचेतनानामपि मैत्री समुचितपक्षनिक्षिप्ता। [तथाहि] माधुर्यशैत्यशुचित्वतापशान्तिभिः पयः पय इति निमित्ततामुपगतस्य दुग्धस्य मत्समागमावर्धितस्य काथे पुरो ममैव क्षयो युक्त इति विचि- त्येव वारिणापि क्षीयते । तदिदमसांप्रतमाचरितम् । सखे गृहाण साधु- जनोचितमध्वानम् । साधवो हि मोहात्परमुत्पथप्रवृत्ता भवन्तीत्यादि वदति तस्मिन्कथमपि स्मरप्रहारपरवशः परिमिताक्षरमुवाच [कन्दर्प- केतुः]। वयस्य दितिरिव शतमन्युसमाकुला भवति सज्जनचित्तवृत्तिः। नायमुपदेशकालः। पच्यन्त इवाङ्गानि कय॑न्त इवेन्द्रियाणि। भियन्त इव मर्माणि । निःसरन्तीव प्राणाः । उन्मूल्यन्त इव विवेकाः। नष्टेव स्मृतिः। तदधुना यदि त्वं सहपांसुक्रीडितसमदुःखसुखोऽसि तदा मामनुगच्छेत्युक्त्वा परिजनालक्षितस्तेन सहैव पुरान्निजंगाम । ६८) अनन्तरं कतिपयनल्वशतमध्वानं गत्वागस्त्यवचनसँमाहृत- ब्रह्माण्डगतशिखरसहस्रः, कन्दरान्तरलतागृहसुखर्पसुप्तविद्याधर- मिथुनगीताकर्णनसुखितचमरीगणमारणोत्सुकितशवरशतसंवाधकक्ष- तटः, कटककरिकराकृष्टभग्नस्यन्दमानहरिचन्दनामोदवाहिगन्धवाह- सुरभितशिलातलः, सुदूरपतनभग्नतालफलरसाकरतलास्वादसोत्सु- A, B खलव्यसनाकुरा दुरुच्छेदा भवन्ति । Am is the reading of Hd and Jagaddhara and following it accepts it; B, H, K read विनोदविन्दोवंशगा। A, H मित्रतामुपगतस्य । K, G पय इति शब्दसाम्याच मित्रतामुपगतस्य । A, B, H, K, G दिङ्मोहात् । K, G उत्पथप्रवृत्ता अपि पुनर्ग्रहीतसत्पथा भवन्ति । ५ K, G अस्मादृशजनचित्तवृत्ति । H भवति मनोवृत्तिः । ६ A, B काथ्यन्तः । WA सगृहीत ! H, K, G सहृतः । K, G सुखसुप्तप्रबुद्ध । 1 १ २ ३ ४ - 1 1 [६८ ८ १४ ] महाकवि-सुबन्धु-विरचिता कशाखामृगकदम्बकः, प्रलम्बमाननिर्झरवरेसविधोपविष्टजीवंजीवक- मिथुनलिवमानविविधफलरसामोदसुरभितपरिसरः, सरभसकेसरि- सहस्रखरनखरधाराविदारितमत्तमातङ्गकुम्भस्थलगलितमुक्ताफलश- बलशिखरतया शिरोलग्नं तारागणमिवोदहन , सुग्रीव इव ऋक्षग- वयशरभकेसरिकुमुदसेव्यमानपादच्छायः, पशुपतिरिव नागनिःश्वा- ससमुत्क्षिप्तभूतिः, जनार्दन इव विचित्रवनमालः, सहस्रकिरण इव सप्तपत्रस्यन्दनोपेतः, विरूपाक्ष इव सन्निहितगुहः शिवानुगतश्च, कांभीव कान्तारोषरसानुगतः समनश्च, श्रीपर्वत इव सन्निहितम- ल्लिकार्जुनः, नरवाहनदत्त इव प्रियङ्गुश्यामासनाथः, शिशुरिव कृत- धात्रीधृतिः, वासरारम्भ इबारुणप्रभापाटलितपत्रवनराजिः, कृष्णपक्ष इव बहुलतागहनः, कर्ण इवानुभूतशतकोटिदानः, भीष्म इव शिखण्डि- मुक्तैरर्धचन्द्रराचितः, कामसूत्रविन्यास इव मल्लनागघटितकान्तारसा- मोदितः, हिरण्यकशिपुरिव शम्बरकुलाश्रयः, गैरिकरागव्याजादुपरि- रविरथमार्गमार्गणार्थमिवारुणेनोपास्यमानः, शिखरगतसूर्याचन्द्रम- स्तया विस्तारितविलोचनोऽगस्त्यमार्गमिवोदीक्षमाणः, स्रस्तान्त्रनाल इव जरदजगरभोगैः, कुम्भकर्ण इव दन्तान्तरालगतवानरव्यूहः, पिण्डालक्तकाङ्कितपदपङ्क्तिसूचितसञ्चरितशचीपतिवारविलासिनीस- इतकेतकीमण्डपः, अकुलीनोऽपि -सबंशभूषितः, दर्शिताभयोऽपि मृत्युफलदायी, सप्रस्थोऽप्यपरिमाणः, सनदोऽपि निश्शब्दः, भीमोऽपि कीचकलुहृत् , पिहिताम्बरोऽप्युल्लसदंशुको विन्ध्यो नाम महागिरि- रदृश्यत। " . . १ . A निझरोपविष्टः । K, G .निर्झरोपान्तोपविष्टः । २ A, B, H, K, G लेलिह्यमान । ३ K, G शिखरावलग्न । K, G add पनस after कुमुद । ५ P यानपादच्छाय । B omits कामीव...समदनश्च । H, K, G कान्तारसामोदः । A अत्रांतमाल इव । B स्रस्तांत्रमाल इव । K कुलिशशतरन्ध्रस्रस्तान्त्रजाल इव । K पिण्डालककरागपल्लवित० | H पिण्डालतकरांगाङ्कितपादपतिः । G पिण्डालक- करक्तपदपछिक्क० । -- w . r न वासवदत्ता-नाम-कथा , ६९] ६९) यश्च प्रवृद्धगुल्मनेयैवेह दृश्यमानबहुधातुविकारः, साधुरिव सानुग्रहप्रचारप्रकटितमहिमा, मीमांसान्याय इव पिहितदिगम्बरदर्श- नः । यश्च हरिवंशैरिव पुष्करप्रादुर्भावरमणीयैः, राशिभिरिव मीन- मिथुनकुलीरसङ्गतैः, करणैरिव शकुनिनागभद्रबालवकुलोपेतः खात- कैरुपशोभितोपान्तः। यश्च कुसुमविचित्राभिः, वंशपत्रपतिताभिः, सुकुमारललिताभिः पुष्पिताग्राभिः शिखरिणीभिः प्रहर्षिणीभि लताभिदर्शितानेकवृत्तविलासः। यश्च समदकलहंससारसरसितोड़ा- तभाकूटविकटपुच्छकच्छच्याधूतविकचकमलखण्डविगलितमकरन्द- विन्दुसन्दोहसुरभितसलिलया, सायन्तनसमयोन्मज्जद्राजसुन्दरिना- भिमण्डलनिपीतसलिलया, मदमुखरराजहंसकुलकोलाहलमुखरित- कूलपुलिनया, तटनिकटमत्तमातङ्गगण्डपिण्डनिर्गतमद्धारास्तवकित- सलिलया, तीरप्रख्ढकेतकीकानननिपतितधूलीनिकुरुम्बजातसैकतसु- खोपविष्टतरुणसुरमिथुननिधुवनलीलापरिमलसाक्षिकूलोपवनया, ते- टावदनिकटनिपतितजम्बूखण्डमण्डपावस्थितजलदेवतावगाह्यमानपय- सा, तीरप्ररूढवेतसलताभ्यन्तरनिलीनदात्यूहब्यूहमदकलकुहकुहाराव- कौतुकाकृष्टसुरमिथुनैसंस्क्रियमाणोपभोगया, उपकूलसञ्जातकुलालकु- कुटघटाघूत्कारतीरया, जैलमानुपमृदितसुकुमारपुलिनया, उपवनवाता- १ - ४ + 1 - KG प्रवृद्धगुल्मतया रोगीव । २ K, G मीनमकरकुलीरमिथुन० । ३ A, B H, K, ' देवखातरुपशोभितोपान्तः । K यश्च छन्दोविंचितिरिव । K विकटकुञ्जकूर्चव्याधूत । विकटकुञ्जकच्छव्याधूत । H विकटपुच्छच्छटाव्याधूत । ६ H. K, d न्मज्जत्पुलिन्दराजसुन्दरी । K, 'तटिनीतट : गण्डस्थलविगलन्मदधाराविन्दुप्रकर० । H, K, G सितसैकत । P कूलपवनया । १० K, G तटावटविघटिताम्भोजखण्ड० | B, H तटाटवीनिकट० । A, B, H, R, 0 संस्तूयमानोपभोगया । १२ A उपकुले नलनिकुञ्जपुञ्जकुलाल. I H, K, G उपकूलसजातनलनिकुञ्जपुजितकुलायकुक्कुट- घटाघटित०। १३ K, आतपसेवासमुत्सुकजलमानुषीमृदितः । A and B have hopelessly missed the order of the long phrases. ९ ११ .
महाकवि-सुबन्धु-विरचिता [६९. श्लो. १४-१६ न्दोलिततरलतरङ्गया,नलनिकुनपुननिविष्टबकोटककुटुम्बिनीनिरीक्ष्य- माणाईशफरया, पोताधानलुब्धककोयष्टिकस्कभनभीमवेतसवनया, तरङमालासन्तरदुद्दण्डपालदर्शनधावदतिचपलराजिलराजिराजितोप कूलसलिलया, खञ्जरीटकणाटीनमिथुनमैथुनोपजातनिधिग्रहणकौतु- ककिरातशतखन्यमानतीरया, क्रुद्धयेव दर्शितमुखभङ्गया, मत्तयेव स्खलद्गत्या, दिनारम्भलक्ष्म्येव वर्धमानवेलया, भारतसमरभूम्येव नृत्य- त्कबन्धया, प्रावृषेव विजृम्भमाणशतपत्रपिहितविषधरया, धनकामयेय कृतभूभृत्सेवया रेवया प्रियतमयेव प्रसारितवीचिहस्तोपगूढ़ेः। यश्च हरिखरनखरविदारितकुम्भस्थलविकलवारणध्वानैः। अद्यापि कुम्भसम्भवमाह्वयतीवोचतालभुजः ॥ १४ ॥ तंतो मकरन्दस्तमुवाच पश्योदश्चवाञ्चदचितवपुःपश्चाईपूर्वार्द्धभाक् स्तब्धोत्तानितपृष्ठनिष्ठितमनाग्भुनाग्रलाशूलभृत् । दंष्टाकोटिविसङ्कटास्यकुहरः कुर्वन्सटामुत्कंटा- मुत्कर्णः कुरुते क्रमं करिपती क्रूराकृतिः केसरी ॥ १५ ॥ . - अपि च उत्कर्णोऽयमकाण्डचण्डिमकटुः स्फारत्स्फुरत्केसरः क्रूराकारकरालकॉयविकटः स्तब्धोललाशूलभृत् । चित्रेणापि न शक्यते विलिखितुं सर्वाङ्गसङ्कोचभाक्, चीत्कुर्वद्गिरिकुञ्जकुञ्जरशिरः कुम्भस्थलस्थो हरिः ॥ १६ ॥ ६१०) अनन्तरं च नीचदेशनद्येव न्यग्रोधोपचितया, उत्तरगोग्रहण समरभूम्येव विजृम्भितबृहन्नलया, मरुदेशटॅकयात्रयेव घनसारसार्थ- १ A, B omit खञ्जरीट and add दर्शन after मैथुन । A has मिथुनमैथुन in adscript H omits खजरीट while K omits कणाटीर । २ र तरङ्गहस्तयोपगूढ । B adds य after अद्यापि । kG उत्कर्णोऽय...पटुः । KG करालवक्त्रकुहर । H ०करालवक्त्रविकट० । K फिटकुर्वनिरिकुञ्जकुञ्जरबृहत्कुम्भस्थलस्यों हरिः । ७ कुरुदेशेढकये। + ३ ؟ ७ . ܩ ६१०.६.११.६ १२.६१३ ] वासवदत्ता- नाम - कथा- [१७ वाहिन्या, विदग्धमधुगोष्ठ्येव नानाविटपीतासवया, नलकूबरचित्त- वृत्त्येव सततधृतरम्भया, मत्तमातङ्गगत्येव घण्टारवविदितमार्गया, सदीश्वरसेवयेव दूरोद्गतबहुफलया, विराटलक्ष्म्येव आनन्दितकीचक- शतया विन्ध्याटव्या कतिपयपदं गत्वा, कामिन इव मदनशलाका- डितस्य, विकर्तनस्येव स्निग्धच्छायस्थ, वैकुण्ठस्येव लक्ष्मीभृतः, यात्रो- द्यतनृपतेरिव धनपत्रशोभितस्य,वेदस्येव भूरिशाखालङ्कृतस्य,गाणि- क्यस्येवानेकपल्लवोज्ज्वलस्य, जम्बूवृक्षस्य तलच्छायायां विशश्राम । ६११) अत्रान्तरे भगवानपि मरीचिमाली आतपक्लान्तमत्तमहिष- लोचनपाटलमण्डलश्चरमाचलशृङ्गमारुरोह । ६ १२) ततो मकरन्दः फलमूलान्यादाय कथमपि तमभिनन्दिताहार- परिचयमकार्षीत् । स्वयं च तदुपभुक्तशेषमशनमकरोत् । अथ तामेव प्रियतमां हृद्यफलके संकल्पतूलिकया लिखितामवलोकयन्निष्यन्द- करणग्रामःकन्दर्पकेतुर्मकरन्दविरचितपल्लवशयने सुष्वापाअंधाईयाम- मात्रखण्डितायां विभावर्या तत्र जम्बूतरुशिखरे मिथः कलहाय- मानयोः शुकशारिकयोः कलकलं श्रुत्वा कन्दर्पकेतुर्मकरन्दमुवाच । वयस्य श्रुणुवस्तावदेतयोरालापमिति । ततः सारिका प्रकोपतरलाक्षर- मुवाच । कितव शारिकान्तरमन्विप्य समागतोऽसि, कथमितैरथा रात्रिरियती तवेति । तच्छत्वा शुकस्तामब्रवीत् । भद्रेऽपूर्वी मया कथा श्रुता । अथ समुपजातकुतूहलयानुबध्यमानः स कथयितुमारेभे । ६ १३) अस्ति प्रशस्तसुधाधवलैः वृहत्कथालम्बैरिव शालभञ्जिकोप- शोभितः, वृत्तैरिव समाणवकक्रीडितः, करियूथैरिव समत्तवारणैः, H, K, G अदूरोद्गत० । K remarks, “दूरोद्गत इति पाठे तु दूरोद्गता अत्युच्छ्रिता इति । पक्षे दूरोद्गतानि अत्यन्ताधिकानि इति च व्याख्येयम् । A, B omit विकर्तनस्येव ..अनेकपालबोज्ज्वलस्य । ३. K omits परिचयम् । H, G .निष्पन्द० । र निस्पन्द० । K याममात्रखण्डिताया यामवत्यां तत्र । A प्रकोपतरलाक्षरं (B शुक)। Hd, K जम्बूनिकुञ्जस्थिता शारिका काचिचिरादागत शुक । H, K, G अन्यथा । K, O अपूर्वा बृहत्कथा मया श्रुता । K, 0 अस्ति मन्दरगिरिश्रुटैरिव प्रशस्त । १ २ ५ ur - ९ ३ ३ र n १८] महाकवि-सुबन्धु-विरचिता [६१३.६१४ सुग्रीवसैन्यैरिव सगवाक्षः, बलिभवनैरिव सुनलसन्निवेशैर्वेश्मभि- रुद्रासितं, धनदेनापि प्रचेतसा, जापालेनापि रामेण, प्रियंवदेनापि पुष्पकेतुना, भरतेनापि शत्रुधनेन, तिथिपरेणाप्यतिथिसत्कारप्रवणेन, असङ्ख्येनापि सङ्ख्यांवता, मर्मभेदिनापि वीरतरेण, अपतितेनापि नानासवासक्तेन, सुदर्शनेनाप्यचक्केण, अज्ञातमदेनापि सुप्रतीकेन, अपक्षपातिनापि हंसेन, अविदितस्नेहक्षयेणापि कुलप्रदीपेन, अग्रहे. णापि काव्यजीवज्ञेन, निदाघदिवसेनेव वृषवर्धितमचिना, माघविरा- मदिवसेनेव तपस्यारम्भिणा, नभस्वतेव सत्पथगामिना, विवस्वतेव गोपतिना, महेश्वरेणेव चन्द्रं दधता निवासिजनेनानुगतं, धनाधनेनेव प्रवालमणिमण्डलेन, देवाङ्गनाजनेनेवेन्द्राणीपरिचितविदग्धेन, वन- गजेनेव नवपल्लवपल्लवितरुचिना, कोकिलेनेव परपुष्टेन, भ्रमरेणेव कुसुमेषु लालितेन. जलौकेनेव रक्तावृष्टिनिपुणेन, यायजूकेनेव सुरतार्थिना, महानटवाहुनेव बद्धभुजङ्गेन, गरुडेनेव विलासिहृदयताप- कारिणा, अन्धासुरणेव शुलानामुपरिगतेन वेश्याजनेनाधिष्ठित कुसुमपुरं नाम नगरम् । १४) यत्र च सुरासुरमौलिमणिमालालालितचरणारविन्दा, शुम्भनिशुम्भवलमहावनदावानलज्वाला, महिषमहासुरगिरिवरवज्र- धारा, प्रणयप्रणतगङ्गाधरजटाजूटस्खलितजाह्नवीजलधाराधौतपादपद्मा A, B, H अजापालेनापि । K, G गोपालेनापि । K लक्ष्मणेन । P अपक्षपातेनापि । -A, B, H, K read 'अग्रन्थिनापि वशपोतेन' after कुलप्रदीपेन । ५ After काव्यजीवज्ञेन A reads जनेनानुगत घनागमदिवसेनेव दर्शितखण्डाभ्रेणेव 'वेलातटेनेव प्रवालमणिमण्डितेन देवाशनाजनेनेवेन्द्राणीपरिचयविदग्धेन वनगजेनेव नवपल्लवपल्लवितरुचिना कोकिलेनेव परपुष्टेन । Evidently A has confused the order of words in the original ६ K घनापगमेनेव दर्शितखण्डाभ्रेण वेलातटेनेव प्रवालमण्डनेन । H याजकेनेव । P वाहुवनेनेव । म महानटवाहुनेव वल्गभुजगेन ।-G, K महा. बद्धभुजङ्गाङ्केन । K, G अन्धकेनेव । १ २ ३ . . - v" ( ६१४.६१५.६१६] वासवदत्ता नाम कथा [१९ भगवती कात्यायनी चण्डाभिधाना स्वयं निवसति । यस्य परिसरे सुरासुरमुकुटकुसुमरजोराजिपरिमलथाहिनी, प्रजापतिकमण्डलुधर्म- द्रवधारा, धरातलगतसगरसुतशतसुरनगरसमारोहणपुण्यरज्जुः, ऐरा- वणकटकमठकम्पिततटा, हरिचन्दनस्यन्दनसुरभितसलिला, सलील- सुरसुन्दरीनितम्वबिम्बाहतितरलिततरङ्गा, लानावतीर्णसप्तर्षिमाला- विमलजटाटवीपरिमलपुण्यवेणिः, एणतिलकमुकुटजटाजूटकुहरभ्रान्ति- जनितसंस्कारतथैव कुटिलावर्ता, धरणीच सार्वभौमकरस्पर्शापभोग- क्षमा, जलदकालसरसीव गन्धान्धोपरिभ्रमभ्रमरमालानुमीयमान- जलमग्नकुमुदपुण्डरीका, छन्दोविचितिरिव-मालिनीसनाधा, ग्रहपडि- रिव सूर्यात्मजोपशोभिता सराजहंसाच, शरत्कालदिनश्रीरिवोज्ज्व- लत्कोकनदा प्रबुद्धपुण्डरीकाक्षा च, हतान्धतमसापि तमसान्विता, [वीचिकलिताम्यवीचिदुर्गमा भगवती भागरथी प्रवहति । ६१५) [यच्च ] दिशि दिशि कुसुमनिकरमिव तारागणमुद्रहद्भिः, उत्तम्भितजलदैः,अनूरुकशाभिधातपरवशरविरथतुरगग्रासविषमित- पल्लवैः, चन्द्रवमूलरुचिरचरणसङ्क्रान्तामृतकणनिकरसेकसंजातबहल- सुकुमारनवकिसलयसहस्रकलिताकालसन्ध्याविभ्रमैः, भरतचरितैरिव सदारामाश्रितः, महावीरैरिव नारिकेलधरैः, असंस्कृततरुणैरिव दूर- प्रसारिताः,तपस्विभिरिव जपासक्तैः, प्रसाधितैरिव मालोपशोभितः, मातङ्गाकुम्भस्थलदारणोयतसिंहैरिवोकर्णकेसरैः, 'सारिष्टैरपि चिर- जीविभिः, मुनियुतैरपि मदनाधिष्ठितैः, उपवनपादपैरुपशोभित, अदितिजठरमिवानेकदेवकुलाध्यासितं, पातालमिव महाबलिशोभितं भुजङ्गाधिष्ठितञ्च, सुरालयैरपि पवित्रं, 'भोगिभिरपिनिरुपद्रुतम् । ६१६) तत्र च सुरतभरखिन्नसुप्तसीमन्तिनीरत्नताटङ्कमुद्राङ्कित- A चण्डाभिधाना, B वेतालाभिधायिनी । K, G सुरासुरमज्जनगलितकुसुमः । ३ A, B, K, G पितामहकमण्डलु । A, B ऐरावतकटकषणकम्पिततटगतहरिचन्दनः ।। K, G .रज्जुनिश्रेणिका । ऐरावतकपोलकषणकम्पिततटगतहरिचन्दन । ५ R, G गन्धपरिभ्रमद् । ६H दिशिदिशि तारागणमिव कुसुमनिकरमुबहद्भिरुत्त । K, G यच दिशि दिशि सन्तानकतरु० । १ २ 4 ४ . " -- । N , , २०] महाकवि सुबन्धु-विरचिता [ श्लो. १७-१८ ६ १६.६ १७ बाहुदण्डः, प्रचण्डप्रतिपक्षलक्ष्मीकेशपाशकुसुममालामोदसुरभितकर- कमलः, प्रशस्तकेदार इव बहुधान्यकार्यसंपादकः, पार्थ इव सुभद्रा- न्वितः सभीमसेनश्च, कृष्ण इव सत्यभामोपेतः शृङ्गारशेखरो नाम राजा प्रतिवसति। यो बलभित् पावको धर्मराण नितिः प्रचेताः सदागतिर्धनदः शङ्कर इत्यष्टमूर्तिरप्यनष्टमूर्तिः । सुराणां पातासौ स पुनरतिपुण्यैकहृदयो ग्रहस्तस्यास्थाने गुरुरुचितमार्गे स निरतः । करस्तस्यात्यर्थं वहति शतकोटिप्रणयितां स सर्वस्वं दाता तृणमिव सुरेशं विजयते ॥ १७॥ जीवावृष्टिं स चक्रे मृधभुवि धनुषः शत्रुरासीद्तासु- लक्षाप्तिांगणानामभवदरिवले तेघशस्तेन लब्धम् । मुक्ता तेन क्षमेति त्वरितमरिगणैरुत्तमाः प्रतीष्टो पञ्चत्वं देषिसैन्ये स्थितमवनिपति प सख्यान्तरं सः॥१८॥ ६ १७) यत्र च राजनीतिचतुरे चतुरम्धुधिमेखलाया भुवो नायके शासति वसुमती पितृकार्ये वृषोत्सर्गः, शशिनः कन्यातुलारोहः, योगेषु शूलघातादिचिन्ता, दक्षिणवामकरणं दिग्विनिश्चयेषु, शरभेदो दधिषु, शृङ्खलाबन्धो वर्णग्रथनासु, उत्प्रेक्षाक्षेपः काव्यालङ्कारेषु, लक्षदानच्युतिः सायकानां, किपां सर्वविनाशः, कोशसङ्कोचः कमला- करेषु, जातिहीनता दुष्कुलेषु न पुष्पमालासु, शृङ्गारहानिर्जरत्करिषु न जनेषु, दुर्वर्णयोगः कम्बिकादिषु न कामिनीकान्तिषु, गान्धारविच्छेदो K adds सवलश्च after पेतः । G सत्यभामानुरक सवलश्च । Ha, K, G सद्यग० । ३ H प्रतिष्ठा । K, G प्रविष्टा । K, G मेखला शासति वसुमती । K, G add न जनेषु after कमलाकरेषु । ६ K, जातिविहीनता मालासु न कुलेषु । त जातिविहीनता मालासु न दुष्कुलेषु । A कठिकादिषु । B दुवर्णयोग कटिकासु न कामिनीकमलाकान्तिषु | K, G कर्णिकादिषु । H कटकादियु । कम्विका or कम्बि () is explained by Monier Willams as a shoot or a branch or a joint of a bamboo and the word according to him rarely occurs except in lexicons. २ ४ ५ ७ ६१७ ६१८.६१९ ] वासवदत्ता-नाम-कथा [२१ रागेषुन पौरवनितासु, मूछोधिगमो गानेषु, खेाभावो नीचसेवकेषु न परिधानेषु, मलिनाम्बरत्वं निशास्लु न जनेषु, चलरागता गीतेषु न विदग्धजनेषु, वृषहानिः निधुवनलीलासु न पौरेषु, भङ्गुरत्वं राग- विकृतिषु न चित्तेषु, अनङ्गता कामदेवे न परिजने, मारागमो यौवनो- दयेषु न प्रकृतिषु, द्विजघातः सुरतेषु न प्रजासु, रशनावन्धो रति- कलहेषु न दानानुमतिषु,अधररागता तरुणीषु न परिजनेषु, कर्तन- मलकभूषु न पुरन्ध्रीषु, निस्त्रिंशत्वमैसीनां, करवालनाशो योधानां परं व्यवस्थितः । १८) तस्य च महिषी दिग्गजमदलेखेवानन्दितालिमाला, पार्वतीव सुकुमारा चन्द्रलेखालङ्कता च, वनराजिरिव नवमालिकोद्भासिता सचित्रका च, अप्सरस्संहतिरिव संहतसुकेशी समजुघोषा च, सर्वान्तःपुरप्रधानभूता अनङ्गवती नाम । तयोश्च मध्यमोपालवयसि वर्तमानयोः कथमपि देवशात् त्रिभुवनविलोभनीयाकृतिः, पुलोम- तनयेवानन्दितसहस्रनेत्रा वासवदत्ता नाम [तनया बभूव । अथ सा रावणभुजवन इवोल्लासितगोत्रेव परिणाममुपयात्यपि यौवनभावे परिणयपराङ्मुखी तस्थौ। ६ १९) अथैकदा तु विजृम्भमाणसहकारकोरकनिकुरुम्बनिपतित- मधुकरमालामदहुङ्कारजनितपथिकसंज्वरः, कोमलमलयमारुतोद्भूत- १ A कर्माभावो नीचसेवकेषु । H, K, G न परिजनेषु । A न चरितेषु । B न चिनेषु । K, G मसिपु न मनस्सु, करवालनागो योधेषु न जनपदेषु परमेवं व्यवस्थितम् । । K, a तस्य चाभूदेवविधस्य राज्ञो महिषी । A, H omit 7-GDET समजुघोषा च । P पुलोमतनयातनयेवानन्दितसहस्रनेत्रा । K has a long line after सहस्रनेत्रा- मेरुगिरिमेखलेन मुजातरूपा शरन्निशेवोल्लसत्तारका सत्परिषदिवाच्छिद्रद्विजपङ्क्तिभूषिता राक्षसकुलल्क्ष्मीरिव माल्यवत्सुकेशशोभिता तनयाभूद्" । 'G follows K | K has again a longer line अथ सा रावणभुजवन इवोल्लसितगोने विन्ध्याचल इव मदनालङ्कते पारावार इव सजात लावण्ये नन्दनवन इव सदा कल्पतरुणाभिनन्दिते पवन इव सुमनोहरे । G follows K B मदकलझड्कारध्वनिजनितपथिकजनद्वार । २ ३ ५ .. . ६ , + २२ ] महाकवि-सुबन्धु-विरचिता [६१९.६२० चूतप्रसवसरसास्वादकषायकण्ठकलकण्ठकुहरितभरिलसकलदिङ्मुखः, विकचकमलखण्डलीयमानसत्तकलहंसकुलकोलाहलसुखरितकमलसरो- वरः, परभृतनखकोटिपाटितपाटलकुड्मलविवरविनिर्गतमधुधारासार- शीकरकणनिकरसमारब्धदक्षिणसमीरयाणदुर्बणितपथिकवधूहृदयः, मधुमदमुदितकामिनीगण्डषसीधुसेकपुलकितबकुलः, मदनरैयपरवश- विकासिनीतुलाकोटिविकटचटुलचरणारविन्दामन्दमहारहृष्टकड्रेलि- शतः, प्रतिदिशमलीलप्रायंगीयमानश्रवणोत्सुकखिङ्गजनप्रायप्रारब्ध- चर्चरीगीताकर्णनमुह्यदनेकपथिकशतः, दुर्जन इव सतामरसा,दुष्कुल इव जातिहीनः, रावण इवापीतलोहितपलाशशतसेवितः, महा- शृङ्गारीव सुगन्धवहः, सुराजेव समृद्धकुवलयः, वास्तविक इव वर्धितसुखाशः, सत्कविकाव्यवन्ध इवांबद्धतुहीनः, सत्पुरुष इव दोषानुबन्धरहितः, कैवर्त इव बद्धराजीवोत्पलमालः, समृद्धकासार- शकुनिसार्थ इव निन्दितमरुवकः, शक्र इवेन्द्राणीरुचितः. महावीर इवाधरीकृतदमनकः, खिङ्ग इवाम्लानसुभगो वसन्तकाल आजगाम । ६२० ) अतिदूरप्रवृद्धेन मधुना जगति को वा न विक्रियते यदति- मुक्तोऽपि सुनिरपि विचकास। कुसुमशरस्य नवचूतशरमूलनिलीन- मधुकरावलि पत्रेणेव रेजे । वृन्तनिर्गतविचकिलविवरे गुञ्जन्मधुकरो मकरकेतोस्त्रिभुवनविजयशङ्खध्वनिमिव चकार । नवयावकपङ्क- पल्लवितसनूपुरतरुणीचरणप्रहारानुरागवशान्लवकिसलयच्छलेन तमेव रागमुदवहदशोकपादपः । मधुरमधुध्वनितकामिनीमुखकमलेसङ्गानु- 1 -0 K, G परमृतसरनखरत्रोटिकोटि । ५ ... . २ A, B, H, K, G मदनरसपरवश० । ३ K, G प्रायवैहासिक उत्सुकषिद्गजनसमारब्धचर्चरीतालाकर्णन० । वास्तुक इव । K, G इवानववस्तुहिनिपातः । ६ B पिन इव । म खिड्ग इव । K, G षिद् इव । K, O मधुकरावलिर्नामाक्षरपङ्क्तिकरिव रेजे । ८. K वृन्तविनिर्गतविकचविचिकिलकलिकाविवरमन्जु०, A, B, H, K, G .परिपूरित० । H, K, G मुखक्मलगण्डपसेकादिव ।
२०.६२१.६२२] वासवदत्ता-नाम-कथा [२३ रागादिव तद्रसमात्नकुसुमेषु बिभ्रद्वकुलतरू 'रराजत। अन्तरा- न्तरानिपतितमधुकरनिकरकिर्मीरः कलिगुच्छोऽनिर्वाणमनोभव- चिताचक्रानुकारी पथिकजनदाहमुवाह । विकंचविचकिलराजिरलिकुल- शयलेन्द्रनीलमुक्तावलीव मधुश्रियो रुरुचे । 'विरहिणीहृदयमथनाय कुसुमशरस्य चक्रमिव नागकेसरकुसुममशोभत । पथिकहृदयमस्त्यं ग्रहीतुं मकरकेतोः पलार्वे इव पाटलिपुष्पमदश्यत । ६२१) कन्दर्पकेलिसंपल्लम्पटलाटीललाटतटविकटधम्मिलमलनमि- लितपरिमलसमृद्धमधुरिमगुणः, कामकलाकलापचारुसुन्दरीसुन्दर- स्तनकलशघुमृणधूलिपरिमलामोवाही, रणरणकरसितकान्तकुन्तली- कुन्तलोल्लासनसङ्क्रान्तपरिमलमिलितालिमाला मधुरतरझङ्कारमुख- रितनभस्तलः, नवयौवनरागतरलकेरलीकपोलपालिपत्रावलीपरिचय- चतुरः, चतुःषष्टिकलाकलापविदग्धमुखालवीनितम्बबिम्बसंवाह- कुशलः, सुरतश्रमवशांधीनीरन्ध्रपीनपयोधरभारनिदाधकणशिशि- रितो मलयानिलो ववी। ६२२) अत्रान्तरे वासवदत्तासखीजनाद्विदिताभिप्रायः शृङ्गार- शेखरः स्वसुतास्वयंवरार्थमशेषधरणितलभाजां भूभुजां सङ्गत- मकरोत् । ततो दग्धकृष्णागुरुपरिमलामोदितमधुव्रतमालाबहलगुम- गुमायितमुखरितं, अतिरसहासच्छटादीधितिपरिमिलितं, अनेक- १ H, K, 0 रराज । २ H, K, G विरहिणां । K शरशाणचक्रमिव । G शागचक्रमिव । Ha, Hb and Narasimha तकाटचक्रमिव । A बडिश इव । ५ A मिलिनमिलित । B धम्मिलमल्लिकामिलित । K, a have a diff reading कन्दर्प ... तटललितालकधम्मिलभार- बकुलकुसुमपरिमलमलेनसमृद्धमधुरिमगुण । ६ K, G रणरणकरसितापरान्तकान्तकुन्तलोलनसक्रान्तपरिमलमिलितालिमाला । P ०कलापदुग्धमुख० । H, K, O मालवनितम्बिनी । K, O आन्ध्रपुरन्ध्री० । १० K, G मलयमारुतो। ११ K, G राजपुत्राणामेकत्र मेलनमकरोत् । A, H, सङ्गममकरोत् । B मेकत्रसमागममकरोत् । . ३ ~ - , . २४ 1 महाकवि-सुबन्धु -विरचिता [६२२.६२३.६२४ कथालापविदग्धशृङ्गारमयजनसमाकुलं, 'दह्यमानसुगन्धसौरभाकृष्ट- पुरोपवनषट्पदकुलसमाकुलं, अर्जुनसमरमिव नन्दिघोषमुखरित- दिगन्तं मञ्चमारुरोह वासवदत्ता । ६ २३) तत्र केचित्कलाङ्कुरा इव विजितनगरमण्डनाः, अपरे पाण्डवा इव दिव्यचक्षुःकृष्णागुरुपरिमिलिताः, अन्ये शरदिवसा इव दूरप्रवृ- द्वाशाः, इतरेऽप्याहर्तुमुद्यता इव स्वबलार्थिनः, केचिद्व्याधा इव शकुनश्रावकाः, केचिदाखेटिन इव रूपानुसारप्रवृत्ताः, केचिज्जैमिनि- मतश्राविण इव तथागत [मत] ध्वंसिनः, केचित्खञ्जना इव सांवत्सर- फलदर्शिनः, केचित्सुमेरुपरिसराइव कार्तस्वरमयाः, केचित्कुमुदाकरा इव भास्वदर्शननिमीलिताः, केचिद धार्तराष्ट्रा इव विश्वरूपावलोकन- जनितेन्द्रजॉलोद्भूतप्रत्ययाः, केचिदात्मनिवारणबुद्धया बलवन्तोऽपि सुवाहाः, केचित्पाणिग्रहणार्थिनोऽप्यसुकर सन्यमानाः, केचिद्धरी- भूतापि स्थिराः, केचित्पाण्डुपुत्रा इवा [क्षहृदया]ज्ञानहतक्षमाः, केचिद् बृहत्कथावन्धिनो गुणाढ्याः, केचित्तिर्यग्गतयो गन्धवाहाः,केचित्कौरव- सैनिका इव द्रोणाशासूचकाः, केचित्कुमुदाकरा इवासोढभासःक्षण- मेवं स्थिता राजपुत्राः । सा च क्षणेनेकैकशः समवलोक्य कुमारिका तत्मात्कीरथाद्वततार । ६२४) अथ सा तस्यामेव रात्रौ स्वप्ने वालिनमिवाङ्गदोपशोभितं, कुहूमुखमिव हारिकण्ठं, कनकमृगमिव रामाकर्षणनिपुणं, जयन्तमिव वचनामृतानन्दितवृद्धश्रवसं कृष्णमिवंकं सहर्ष न कुर्वन्तं, महामेघमिव K, G ०दह्यमानमहिषाक्षादि । B, H व्याहन्तुमुद्यता. । K, G केचिदाखेटासक्ता इव । A, B केचित्सुखन्तना इव । H जनितेन्द्रजालप्रत्ययाः । K, O जालाद्भूतप्रत्यया । K, G केचित्करवाकरा इवासोढसूरभासः । K, G सा च क्षणेनैतानेकैकशः । H समवलोकय विरकद्ददयासौ कुमारिका तस्मात् कर्णवंशादवततार । K, G विरकहृदया सती तस्मात्कीरथादवततार । ९P हरिकण्ठ । १ २ ३ ४ ६ , । ८ - .
६२४.६२५] वासवदत्ता- नाम - कथा [२५ विलसत्करकं, [समुद्रमिव] 'महासत्त्वं, मालिन्या कथरिकया, तुङ्ग- भद्रया नासिकया, शोणेनाधरेण, नर्मदया वाचा, गोदया भुजया स्वर्वाहिन्या कीर्त्यां च पुण्यमयमिव, आदिकन्दं शृङ्गारपादपस्य, रोहण- गिरि सकलगुणरत्नसमूहस्य, प्रभवशैलं सुन्दरकथानदीनां, सुरभि- मासं बैदग्ध्यसहकारस्थ, आदर्शतलं सौजन्यमुखस्य, आदिकन्दं विद्यालनानां, स्वयंवरपति सरस्वत्याः, स्पर्धागृहं कीर्तिलक्ष्म्योः, आदिगृहं शीलसम्पदा, कोशमिच महासौन्दर्यस्य त्रिभुवनलोभनीया- कृति युवानं ददर्श । ६२५) स चिन्तामणिनानो राज्ञस्तनयः कन्दपकेतुर्नामेति सा स्वप्ने एवं नामादिकमनीपीत् । अनन्तरं 'अहो प्रजापते रूपनिर्माणकौशल- मिदं, लन्ये स्वत्यैव नैपुण्यस्य सौन्दर्यदर्शनोत्सुकमनसा कमलभुवा जगत्त्रयसमवाये रूपपरसाणूनादाय विरचितोऽयमन्यथा कथमयमस्य कान्तिविशेष' इति, वृथैव दमयन्ती नलस्य कृते बन[वास वैशस- मवाप,सुधैवेन्नुमती महिप्यप्यजानुरागिणी बभूव,अफलमिव दुष्यन्तस्य कृते शकुन्तलापि दुर्वाससः शापमनुवभृव, निरर्थकमिव मदनमञ्जुका नरवाहनदत्तं चकमे, निकारणमेवोरुगरिमनिर्जितरम्भा [रम्भा] नल- कूबरमचीकमत,विफलमेव धूमोर्णा स्वयंवरार्थागतेदेवग्रहगन्धर्वसहस्रेषु धर्मराजमकाक्षतेति बहुधिया चिन्तयन्ती चिरमुर्मुरमध्यभारूढेव वाडवाग्निशिखा [कवलितेव], कालाग्निरुद्रपावकग्रस्तेव, पातालगुहा- K, G समुद्रमित्र महासत्त्वम् । कीर्त्या च पुण्यमयमिवा० । It is rather strange that none of the ms of H has this reading H रूपपादपस्य । H रोहणगिरि शृङ्गाररत्नस्य । K, G सुन्दरकन्दर्पकथानदीनाम् । K कोशगृह महासौन्दर्यधनस्य मूलगृह शीलसपदः स्वयवृतपति कीर्त स्पर्धागृह लक्ष्मीसरस्वत्यो । P मृगसौन्दर्यस्य । K, G मश्रुणोत् । K मदनमञ्जरी। K, मागतेपु देवगणेषु धर्मराजमाचकाक्षे । A, B, H, K, I वहुविध । Before बहुविध K, a read 'निष्प्रयोजनमेव ऋद्धिर्गन्धर्वयक्षेषु कुवेरमाससाद । अहेतुकमेव पुलोमतनया देवेन्द्रासचित्ता वभूव ।' 1 १ A, B, Homit महासत्त्वं २ ३ ४ میں ८ ९ १० . २६ ] महाकवि-सुबन्धु-विरचिता [६२५ प्रविष्टेव, [शुन्यकरण] प्रामालिखितमिव, उत्कीर्णमिव, निगलितमिव, वज्रलेपघटितमिव, अस्थिपञ्जरप्रविष्टमिव, मर्मान्तरास्थितमिव, [भज्जा- रसशबलितमिव], प्राणपरीतसिव, अन्तरात्मानमधिष्ठितमिव, रुधि- राशयद्रवीभूतसिव, पललसंविभक्तमिव कन्दर्पकेतुं मन्यमाना, उन्म- तेव, बधिरेव, सूकेव, शून्येव, निरस्तकरणग्रामेव, मूगृहीतेव, ग्रह- ग्रस्तेव, यौवनसागरतरङ्गपरम्परापरिगतेव, रागरज्जुभिरपवारितेव, कन्दर्पकुसुमबाणैः कीलितेव, शृङ्गारविषघूर्णितेव, रूपपरिभावनशल्य- खिल्लितेव, मलयानिलाहतजीवितेव, प्रियसख्यनङ्गलेखे वित[मेहृदये पाणिपादंदुःसहो विरहसन्तापः, मुग्धे सदनमञ्जरि सिञ्च चन्दनोदकेन, सरले वसन्तसेने संवृणु केशकलापपाशम् , तरले लवङ्गवति विकिर केतकधूलिं, मालिनि अलं शैवलदलेन, चपले चित्रलेखे लिख चित्रे चित्तचोरं जनम् , भामिनि विलासवति विक्षिप मुक्ताचूर्णनिकरम् , रागिणि रागलेखे स्थगय नलिनीदलसमूहेन पयोधरभरम्, सुकान्ते कान्तिमति भन्दं मन्दमपनय वाष्पबिन्दून्, यूधिकालड्कृते यूधिके सञ्चारय नलिनीदलावातान् , एहि भगवति निद्रे अनुगृहाण माम् , धिगिन्द्रियैरपरैः, किमिति लोचनमयानि ममाङ्गानि विधिना न कृतानि, भगवन्कुसुमायुध तवायमञ्जलिरनुचरो भव भाववति तादृशे जने, [मलयानिल ] सुरतोत्कण्ठदीक्षागुरो वह यथेच्छमिति बहुविधं भाषमाणा वासवदत्ता सखीजनेन समं मुमूर्छ । H शून्यकरणग्रामे हृदये लिखितमिव । K has different line मदनदावाग्निशिखा- कवलितेव वसन्तकालाग्निगृहीतेव दक्षिणमारुतरुद्रपावकग्रस्तेव उन्मादपातालगृह प्रविष्टेव शून्यकरणग्रामेव वर्तमाना । K, G सिञ्चाङ्गानि चन्दनवारिणा । ३ H, K,G तरङ्गवती । A, B वामे मदनमालिनि वीजय शैवलदलेन । H, K, O- वामे मदनमालिनि कलय पलय शैवालकलापेन । K, G अनुवशो। K, G मादृशे । P omits मलयानिल । H मलयानिल सुरतसमुत्कण्ठादीक्षागुरो । A, B, H, K, a add अपगता मम प्राणा after यथेच्छ । ९ K, C संमुमूर्छ । ( १ २ ६ ८ वासवदत्ता नाम-कथा - ६२६ ६२७.६२८ ] [ २७ ६२६) अनन्तरं परिजनप्रयत्नोच्छवसितजीविता च, क्षणमतिशिशिर- घनसाररजोनिम्नगाकूलपुलिने, क्षणमतितुहिनजडमलयरैजसः सरि- परिसरे, क्षणमरविन्दकाननपरिचारितसरस्तटविटपच्छायासु, क्षणमनिलोल्लासितदलेषु कदलीकाननेषु, क्षणं कुसुमशय्यासु, क्षणं नलिनीदलस्रस्तरेषु, क्षणं तुषारसङ्घातशिशिरितशिलातलेषु परिजनेन नीयमाना, प्रलयकालोदितद्वादशरविकिरणकलापतीव्रविरहाग्नि- दह्यमाना सती, अतिकृशां विप्राणामिव तनुं बिभ्रती, प्रचलमन्द- मन्दान्दोलितदुःखसिन्धुतरलतरतरगच्छटाधवलहासच्छुरिताधरपल्लवं तन्मुखारविन्द,द्विजकुलमिव श्रुतिप्रणयि तदीक्षणयुगलं, सहजसुरभि- मुखपरिमलामोदमानातुकामा सुदूरनिर्गतनासावंशलक्ष्मीः, कलङ्क- मुक्तेन्दुकलाकोमला, पीयूषफेनपटलपाण्डुरास्यद्विजपङ्क्तिः, तदृष्ट- चरमनकामतिशयानं रूपं, धन्यानि तानि [स्थानानि] ते च जनपदाः, पुण्यनामाक्षराणि च तानि सुकृतभाञ्जि यान्यमुना परिष्कृतानीति मुहुर्मुहुः परिभावयन्ती, दिक्षु विलिखितमिव, नभस्युत्कीर्णमित्र, लोचने प्रतिबिम्बितमिव, चित्रपटलिखितमिव, पुरो दर्शितमिवेतस्ततो विलोकयन्ती व्यतिष्ठत । ६२७) अथ तस्याः सारिका तमालिका नाम तत्सखीभिः सहालोच्य कन्दर्पकेतोर्भावमाकलयितुं [4] स्थिता । आगता च मयैव सार्द्धमत्रैव तरोरधस्तिष्ठतीत्युत्तवा विरराम । ६२८) अथ सहर्षमुत्थाय मकरन्दो विदितवृत्तान्तां तमालिकामक- रोत् । सा च कृतप्रणामा कन्दर्पकेतवे पत्रिकामुपानयत । अथ स तां स्वयमवाचयत। H घनसाररसनिम्नगा । K, G घनसाररसाकुलनिम्नगा । २ A, B, H मलयजरससरित्परिसरे । K, G मलयजरससारसरित्परिसरे ।। ३ र कुसुमप्रवालशय्सासु । Also Hd but A, B omit it ५ K माघ्रातुकामेव सुदूरविनिर्गिता तन्ना (A सा नासा) सावशलक्ष्मी । ६ A, H प्रस्थिता । B प्रस्थापिता । K प्रेषिता । Hd सहर्षमुखोऽयम् । K सहर्ष समुत्थाय । K, अथ मकरन्दस्तामादाय पत्रिका विस्रस्य स्वयमेवावाचयत् । १ ४ ८ 1 प २८] महाकवि-सुबन्धु - विरचिता [ श्लो. १९६२९ ६३० ६३१ प्रत्यक्षदृष्टभावाप्यस्थिरहृदया हि कामिनी भवति । स्वप्नानुभूतभावा द्रढयति न प्रत्ययं युवतिः ॥ १९ ॥ ६ २९) तच्छ्रुत्वा कन्दर्पकेतुरमृतार्णवसग्नमिव सर्वानन्दानामुपरि वर्तमानो मन्दं मन्दसुत्थाय प्रसारितवाहुयुगलस्तामालिलिङ्ग । अथ तयैव साधं समासीनः किं वदति किं करोति कथमास्त इत्यादि सकलं वृत्तान्तं पृच्छंस्तां निशां दिनमप्यतिवाह्य चचाल कन्दर्पकेतुः । अत्रा- न्तरे भगवानपि मरीचिमाली एनं वृत्तान्तमिव कथयितुं मध्यमं लोक- मातरत् । ६३०) अथ वासरताम्रचूडचक्राकारः चक्रवाकचक्रसङ्क्रमितसन्ता- पतयेव मन्दिमानमुद्रहन्मन्दारस्तबकसुन्दरः,सिन्दूराहतसुरगजकुम्भ- विभ्रमं बिभ्राणः,ताण्डवचण्डवेगोच्छलितधूर्जटिजटाजूटकूटबन्धबन्धुर- विकटवासुकिभोगमणिताटङ्कसङ्काशनालिमण्डलः, सन्ध्यासन्धिनी- सरसयावकपटचारु:, वारुणिवारविलासिनीमणिकुन्तलकान्तिः, दिनकरच्छिन्नवासरकवन्धचक्राकारः, मधुपूर्णकपाल इव कालकपालिनः, अम्लानकुसुमस्तबक इव श्रियः, गगनाशोकतलयका [इव], कनक- दर्पण इव प्रतीचीविलासिन्याः, बलभद्र इव वारुणीसङ्गतः सरागश्च, बुर्विध इव परित्यक्तवसुः सविषादश्च, शाकय इव रक्तशुकधरः, संज्ञोपेतः भगवान् चरमार्णवपयसि तरलतरङ्गवेगोच्छलितविद्रुम- विकटाकृतिर्ममज्ज । ३१) क्रमेण च रजोलुठितोत्थितकुलायाथिकलहविकलकलविङ्क- कुलकलकलवाचालितशिखरेषु शिखरिघु, वसतिसाकाङ्क्षषु ध्वाक्षेषु, K, G वर्तमानमिवात्मान मन्यमानो । २ H, K, G वाहुयुगलस्तमालिकामालिलिङ्ग । ३ K, G त च दिवस तत्रैवातिवाह्य तस्मात्प्रदेशात्तया सहोच्चचाल ससुहृत्कन्दर्पकेतु । K, G ०मवततार । H, K, G कालकरवालकृत्तवासरमहिषस्कन्धचक्राकार । K, G गगनकपालिनो । P कालकपालिनोऽमला अम्लान० । A, B, Homit वलभद्र सज्ञोपेत. । K, सूरिरिव सज्ञोपेतः । K, G अपराकुपारपर्यसि । + ४ - ६ ७ ; ܟ ९ . - [३१] वासवदत्ता -नाम-कथा [ २९ अनवरतदह्यमानकालागुरुधूपपरिमलोद्गारेषु वासागारेषु, दूर्वान्वित- तटिनीबद्धगोष्टीकविदग्धजनप्रस्तूयमानकथाश्रवणोत्सुकशिशुजनकल- कलनिवारणकुपितश्राद्वेषु वृद्धेषु, आलोलिकातरलरसनाभिः कथितकथाभिर्जरतीभिरतिलघुकरताडनजनितसुखें, शिशयिषमाण- शिशुजने, विरचितकन्दर्पमुद्रासु क्षुद्रासु, कामुकजनानुबद्धय- मालदासीजनविविधाश्लीलवचनश्रुतिविरसीकृतसन्ध्यावन्दनोपविष्टेषु शिष्टेषु, रोमन्थमन्थरकुरङ्गकुटुम्बकाध्यास्यमानम्रदिष्टगोष्टीन- पृष्ठास्वरण्यस्थलीषु, निद्राविनिद्राणद्रोणकुलकलितकुलायेष्वाराम- तरुषु, निर्जिगमिषति जरत्तरुकोटरकुटीरकुटुम्बिनि कौशिककुले, तिमिरतर्जननिर्गतासु दहनप्रविष्टदिनकरकिरणासु इव स्फुरन्तीषु दीपलेखासु, मुखरितधनुषि वर्षति शरनिकरमनवरतमशेषसंसार- शेमुपीमुषि मकरध्वजे, सुरतारम्भाकल्पशोभिनि, शम्भलीभापित- भाजि भजति भूषां भुजिष्यजने, सैरन्ध्रीबध्यमानरशनाजालजल्पाक- जधनासु जनीषु, विश्रान्तकथानुबन्धतया प्रवर्तमानकथकजनगृह- गमनत्वरेषु चत्वरेषु, समावासितकुक्कटेषु निष्कुटेषु, कृतयष्टिसमा- रोहणेषु बहिणेषु, विहितसन्ध्यासमयव्यवस्थितेषु गृहस्थेवु, सङ्को- चोदञ्चदुच्चकेसरकोटिसङ्कटकुशेशयकोशकोटरकुठीरशायिनि षट्- चरणचक्रे,अथानेन प्रवर्तता [वमना] भगवता भानुना [आ] गन्त- व्यमिति सर्वपट्टमयैर्वसनैरिव मणिकुटिमाभिर्विरचितवरुणेन, भगवता कालेन कृत्सस्य दिवसमहिषस्य रुधिधारेव, विट्ठमलतेवाम्बरमहार्ण- वस्य, रक्तकमलिनीव गगनतडाकस्य, काञ्चनसेतुरिव कन्दर्पस्य, मञ्जिष्ठारागारुणपताकेव गगनयंतलस्य, लक्ष्मीरिव स्वयंवरगृहीत- K, G निविष्टविदग्धजन निवारणश्रद्धेषु वृद्धेषु । K, G जनितसुखे ताभिरनुगते । H निद्रालुद्रोणकुलकलितकुलायेषु कानननिकायेषु । K, G द्रोणकाककुलकलितकुलायेषु ग्रामतरुनिचयेषु । H, K, and a add further कापेयविकलकपिकु(लेवाश्रमतरुषु H) लकलिलेवारामतरुषु । H, K, G ०रशनाकलापजल्पाकजघनस्थला (स्थली-H)सु । K समासादितकुकुटेषु किरातगृहनिष्कुटेयु । ६K, चरमार्णवस्य । P, G काञ्चनसेतुरिव । । काचनसेतुरिव कन्दर्पगमनस्य । K, G काञ्चनकेतुरिव कन्दर्परथस्य । १ २ AN J ३०] महाकवि-सुबन्धु-विरचिता [६३१६३२ पीताम्बरस्य, भिक्षुकीव तारानुरागरक्ता, रक्ताम्बरधारिणीव भगवती सन्ध्या समदृश्यत । ६३२) क्षणेन च क्षणदारागरचनाचतुरासु सन्ध्याशिष्यास्विव वेश्यासु तुलाधारशून्यायां पण्यवीथ्यामिव दिवि, घनघनायमान- दलपुटासु पुटकिनीषु, तिमिरप्रतिहस्तेष्विव तत इतः परिभ्रमत्सु कमलसरसि मधुकरेषु, विकलकुररीरुतच्छलेन रविविरहविधुरासु विलपन्तीविव सरोजिनीषु, कमलिनीसन्ध्यारागरज्यमानसलिल- स्थितास्तु पतिविनाशहृत्पीडया दहनप्रविष्टास्विव कमलिनीषु, गणक- इव नक्षत्रसूचके प्रदोषसमये, हरकण्ठकाण्डकालिमसनाभि, दैत्यबल- मिव प्रकटनारकं, भारतसमरमिव वर्धमानोलूककलकलं, धृष्टद्युम्न- वीर्यमिव कुण्ठितद्रोणप्रभावं, नन्दनवनमिव संचरत्कौशिकं. कृष्ण- वर्मेवाखिलकाष्ठापहारकं, सगर्भमिव घनतरपाषाणकर्कशासु गिरि- तटीषु, सचक्षुरिव सुप्तसिंहनयनच्छविच्छटाकपिलिकेषु सानुषु, सजीवमिव तमोमणिभिः, संवर्धितमिवाग्निहोत्रधूमलेखाभिमासलि- तमिव कामिनीकेशपाशसंस्कारधूपपटलैः, उद्दीपितमिव घनतर- लीनमधुकरपटलमेचकितपेचकिकपोलतलदानधाराशीकरैः, पुञ्जीकृत- मिव विततमालतमालकाननच्छायास्लु, लीयमानमिव कजलरसश्याम- भोगिभोगेषु,प्रावरणमिव रजनीपांसुलायाः, पलितौषधमिव वृद्धवार- योषिताम्, अपत्यमिव रजन्याः, सुहृदिव कलिकालस्य, मित्रमिव दुर्जन- हृदयानां, बौद्धसिद्धान्तमिव प्रत्यक्षद्रव्यमपनुवानं तिमिरमजृम्भत। B स्वयवरगृहीतपीताम्बरा । H, K स्त्रयवरपरिगृहीतपीताम्बरा । After रकाम्बरधारिणीव, Hd K, and Gadd वारमुख्येव पल्लवानुरक्ता कामिनीव कालेयाताम्रपयोधरा वबेरिव कपिलतारका । ३ A, B, H, K, G घनघटमान० । K कूजितः । A, B, H omit कमलिनीसन्ध्याराग कमलिनीपु। K प्रतिफलितसन्ध्याराग० । K वर्षमानोलूकशकुनिकलकलम् । K, O कृष्णवर्मज्वलनमिव । H गुप्तसिंहनयनदीधितिच्छटाकपिलेयु । K, G सुप्तप्रवुद्धसिंहनयनच्छविच्छटाकपिलेषु । A in adscript कारक after संस्कार and H संस्कारागुरुधूमपटलै० । K, O .धूपपटल. । , १ २ - . . ६ ९ । h ६३३] वासवदत्ता-नाम-कथा [ ३१ ६३३) मुदितमिवातिमत्तमातङ्गमण्डलमनोहरगण्डमण्डले, फलित- मिवातिसान्द्रबहलच्छवितततमालकानेने, स्फुरितमिवातिकान्त- कान्ताजनघनतरकेशसंहतो, मलितमिवेन्द्रनीलमणिरश्मिभिः, अति- शयमांसलं तमोऽवटतटाटवीषु, साटोपमतिस्फुटपाटवोत्कटप्रकटवि- शङ्कटेकविटपोत्कटविनटितषट्पदालिघु, घनतरघोरं, अतिघस्मरविष- धरभोगभासुरं, मद्भरमत्तदन्तिदन्तद्युतितर्जनजर्जरम् । ततो निशा- करारम्भसमय इव संकुचत्कुवलयव्याजविरचिताञ्जलिपुटे नमति तमितिमिरे, क्षणेन च सन्ध्याताण्डवडम्बरोच्छलितमहानटजटाजूट- कूटकुटिलविवरचर्तिजनुकन्यावारिधाराविन्दव इव विकीर्णाः, दुर्धर- धरणिभारभुग्नभीमदिङ्मातङ्गमण्डलामुक्तशीकरच्छटा इवातितताः, अतिदवीयोनभस्तलभ्रमणखिन्नदिनकरतुरंगविसरवान्तफेनस्तबका इव [विस्तीर्णाः], गगनमहासरःकुमुदकाननसन्देहदायिनः, विश्वं गणयतो- विधातुःशशिकमठिनीखण्डेन तमोमषीश्यामेऽजिन इववियति संसार- स्थातिशून्यत्वाच्छून्यविन्दव इव वितताः, जगत्त्रयविजयनिर्गतस्य कुसुमकेतो रतिकरतलविकीर्णाजा इव, गुलिकास्त्रगुलिका इव पुष्प- धनुषः, वियदम्बुराशिफेनस्तबका इव, रतिविरचिता गगनाङ्गणे आत- पंणपश्चाङ्गुलय इव, व्योमलक्ष्मीहारमुक्तानिकरा इव, चन्द्रचिताचक्रा- हात्यावेगव्यस्ता कामकीकसखण्डा इव, तिमिरोद्गमधूमधूमलसन्ध्या- १ B, H, K, G कानने । 6 मिलितमिवे० । K, G उन्मीलितमिवे० । ३ , 0 द्युतितर्जनजरित दिवाकरोदयारम्भणमिव सकुचत्कुवलय असतां महत्त्वमिव तिर- स्कृतसकलान्तरं निमीलन्नीलोत्पलव्याजरचिताबलिपुटेन नमदिवागत निशापति तिमिरमना- यत । अथ क्षणेनेव सन्ध्याताण्डव० । A नमति तनीयसि तिमिरे । B ताम्यति तमीतिमिरे । H नतिमति तमोतिमिरे | Ha, Hb नमति नातितनीयसि तमोतिमिरे । Hg अवनमति तमोतिमिरे । K, G •तुरङ्गमास्यविवरवान्तफेनस्तवका इव विस्तीर्णाः । H, K, G शशिकठिनीखण्डेन । K, विलिखिताः । K, O रतिकरविकीर्णा इव लाजाजलयः 1 A विकीर्णा लाजजाला इव । A इव विकीर्णा. I K, G इव वितता । Ha, Hd, Hg, K, O हरकोपानलदग्धकामचिताचकाटिन्दोर्वात्यावेशविप्रकीर्णाः । ur ८ १० ३२] महाकवि सुबन्धु-विरचिता [ ६३३ ६३४.६३५ मलाहितगगनमहास्थलीमहाकटाहभृज्यमानस्फुटितलाजानुकारास्तारा व्यराजन्त । ताभिश्च श्वित्रीव वियदशोभत । ६३४) ततो दीर्घोच्छ्वासरचनाकुशलं सश्लेषबहुघटनापटु सत्कवि- विरचनसिव, चक्रवाकमिथुनमतीवाग्विद्यत । कमलिनीसञ्चरणलग्नम- करन्दबिन्दुलंबमधुकरमालाशबलगात्रं, कालपाशेनेव मूर्तरामशापेना- कृष्यमाणं चक्रवाकमिथुनं विजघटे। रविविरहविधुरायाः कमलिन्या हृदयमिव द्विधा पपाट चक्रवाकमिथुनम् । आगमिष्यतो हिमकरदयि- तस्य पार्थे संचरन्ती कुमुदिन्या भ्रमरमाला दूतीवालक्ष्यत । तारका- व्याजास्तगतस्य दिवाकरस्य शोकादिव ककुभो व्यरुदन् । भास्वतो निजदयितस्य विरहासिनवकिञ्जल्कराशिव्याजेन मुर्मुर इव नलिनी- कोशहृदये जज्वाल । रविरश्मिभस्मितनभोवनमषीराशिरिच, श्रुति- वचनमिव क्षतदिगम्बरदर्शनं, कृष्णरूपमपि तिरस्कृतविश्वरूपभावं, सद्योद्रावितराजतपट्टसमुद्रप्रवाह इव शावरमन्धकारमजृम्भत । ३५) क्षणेन च क्षणदाराजकन्याकन्दुक इव, कन्दर्पकनकदर्पण इव, उदयगिरिबालमन्दारस्तबकाकृतिः, प्राचीललाटकुसुमचक्राकारः, कुण्डलमिव नभश्रियः, दिव्य॑वधूप्रसाधिकाहस्तस्रस्तालक्तपट इव, गंगनसौधकनककुम्भ इव, प्रस्थानकलश इव त्रिभुवन विजयनिर्गतस्य मकरकेनोः, कन्दर्पकार्तस्वरतूणमुखचक्रकान्तितस्करः, प्राक्शैलशिख- राग्रारूढजवातस्कुसुमच्छविः, अच्छकुङ्कुमपिण्डपूर्णस्थित पात्र] इच निशाविलासिन्याः कुकमारुणश्वेत [स्तन कलश इव चाखण्डला- शायाः, उदयारुणमण्डलो रजनीपतिरभ्युदयमाससाद । १ Hb, Hc, Hf, Hh as also जगद्धर मृज्यमानरविकरधान्यार्धस्फुटितलाजवीजानुकारा । A, B, H सत्कविवचनमिव । K, G सत्काव्यविरचनमिव । Hc, Hg, Hh and K, G बिन्दुसन्दोहलुब्धमुग्धमुखरमधुकर० । B पिहितदिगम्बरदर्शनम् । H परिहृतदिगम्बरदर्शनम् । K, G अपितदिगम्बरदर्शनम् । ५ K, G प्राचीललनाललामललाटतटघटितबन्धककुसुमतिलकचक्राकार । ६ K, दिग्वधू० । K, G शातकुम्भकुम्भ इन गगनसौधतलस्य प्रस्थानमङ्गलकलश इव । K, O कन्दर्पकार्तस्वरतूणमुखमिव । The words प्राकूशैल .....निशाविभासिन्याः are omitted. A, B, H निशाविलासिन्याः । A कुलमारुणस्तनभर इवाखण्डलाशाया । K, कुङ्कुमारुणैकस्तनकलग इन आखण्डलाशानायाः। , २ ३ - ४ -- १० " ।
1 । " ६३६.६३७.६३८] वासवदत्ता-नाम-कथा [३३ ६३६) ततः कामिनीहृदयसकामित इव चकोराङ्गानानेत्रपुटपाटित इच रक्तकुमुदकोशकीट इव क्षीणतां जगाम क्षणदाकृतो रागः। ६३७) अनन्तरं शर्वरीवजाइनानिष्ठ्यूतनवनीतस्वस्तिक इव, कुसुम- केतोर्मुखच्छायामुद्रित इव, श्वेतातपत्रमिव मकरकेतोः, दन्तपालिचक्र इव वियन्महासेः, श्वेतचामर इव मदनमहाराजस्य, बालपुलिनमिव निशायमुनायाः, स्फटिकलिङ्गमिव गंगनतापसस्य, अण्डमिव कालो- रगस्य, कम्युरिव नभोमहार्णवस्य, चैत्यमिव मदनारिदग्धस्य मकर- केतो, चिताचक्रमिव कलकाङ्गारशबलं सङ्कल्पजन्मनः, गगनगामि- पुण्डरीकमिव, अम्बरमहार्णवफेनपुञ्ज इव, पारदपिण्ड इव काल- धातुवादिनः], राजतकलश इव दूर्वाप्रवालशबला, कन्दर्परथचक्रचारा, उद्याचलचूडामणिः, अम्बरमहाप्रासादपारावतः, ऐरावतकुम्भस्थल- मिव, भग्नशृङ्गपुराणगोमुण्ड इव, तारकाश्वेतगोधूमशालिनो नभाक्षेत्र- स्य, पाण्डुरराजतपात्रमिव सिद्धाङ्गनाहस्तस्रस्तो ग्रहपतिरुज्जगाम । यश्च पुण्डरीकं लोचनमधुकराणां, शयनीयसैकतं चित्तहंसानां, स्फटिक- न्यजनं विरहवहीनाम् ६३८) अत्रान्तरेऽभिसारिकासार्थप्रेषितानां प्रियतमान्प्रति दूतीनां द्वयर्थाः सप्रपञ्चा विकारभङ्गुराः प्रवादा बभूवुः । तथाहि । अवस्त्रीकृत- मात्मानं नाकलयसि तत्त्वतः । प्रस्तर इव क्रूरोऽसि । न चाकर्षकचुम्बक- K, चक्राशनानयनयुगलपीत इव रक्तकुमुदकोशालीढ इव । २ H, K, G .विष्कृतनूतन० । H मुद्रितमुकुर इव । K, G मुद्रित इव मुकुर । K ०महासे । ५ K, adds स्फाटिककमण्डलुरिव नभोवतिन । H कन्दर्परथचक्रचार अम्बरप्रासादस्य । K, G पुण्डरीकमिव गगनगामिगङ्गाया., फेनसञ्चय इव गगनमहार्णवस्य, पारदपिण्ड इव काल- धातुवादिनः, राजतकलश इव दूर्वाप्रवालशवलो मनोभवाभिषेकस्य, श्वेतृचक्रमिव कन्दर्परथस्य, चूडामणिरिव उदयगिरिनागराजस्य, श्वेतपारावत इव अम्बरमहाप्रासादस्य, गगनसरिद्धीत- सिन्दूर कुम्भस्थलमिवैरावतस्य, भुग्नश्रुङ्गपुराणगोमुण्डखण्ड इव ताराश्वेतगोधूमशालिनो नभःक्षेत्रस्य, मलयपिण्डपाण्डुरराजततालवृन्तमिव सिद्धाङ्गनाहस्तविस्रस्तं । ७, K adds "श्वेतशाणचक्र मन्मथसायकानाम् ।" after विरहवहीना । H तत्त्वतः । कान्त } K तत्त्वतः कान्त । . १ ३ - ६ . - . ५ + ३४] महाकवि-सुबन्धु विरचिता द्रावकेष्वेकोऽप्यसि, भ्रामकोऽसि परं किलव । धमार्थान्यप्रयुक्तः क्षेपणिक इव मुधा वाहिततरवारिस्त्वमसि | सखदमिव मनसा चिन्त- यसि दुर्लभाम् । सत्वसारचरितो रिपुमण्डलाग्रतो नितिमुपेत्य तिष्ठति। स खलु वीरः प्रतिपक्षस्य यः सम्प्रहारतः कुक्षरानयति। धृतोर- करवालसञ्चयोऽपि परमकाण्ड एव पतन्सहापदं विग्रहेण लभते । राज- सेन रहितो राजसे न रहितो ध्रुवम् । विशारदा विशारदाभ्रविशदा विशदात्मनीनमहिमानमहिमानरक्षणक्षमा क्षमातिलक ते वीरता वीरता मनसि भूतता भूतता वचसि । साहसेन सा सेन कमला कम- लालया जिता, सा त्वदर्पणा दर्पणाकारविमलाशया शयाजनिजित- किसलया सलयाङ्गुलिरिव विभ्रमेण विभ्रमेण गवाक्षशलाकाविवरं प्रति विलोकयन्ती विलोकयन्ती विनाशापमनुभवति दुग्वानि । जीव- नायक जीवनाय क इह नाश्रयति सुभगम्। अन्यास्तावदासतां दासतां पुरतोऽहमेव भजामि, मैत्र्यतो मैत्र्यतोऽस्तु । अजसारतः सारतः कि- मपि कन्दर्पकं दर्पकं न तनोपि विशेषतोऽशेषतः स्थितमेव मरणम् । शठधियां शोधन यशोधन प्रेमहाँर्यामहार्या समोत्कटाक्षः कटाक्षरा- विर्भूतदास्यास्तदास्याः परिजनाः। कमलाकृतिनारीणां कमलाकृति- नारीणां भवतामुखं मलिनितम् । विश्वस्य विश्वस्य व्यवस्थांसमासाद्य समासाद्यमनेककालं सङ्गीतसङ्गी तनुषेऽतनुपेकमनङ्गपुष्पेषु पुष्पेषुरुजा तरसा जातरसा मन्दाक्षमन्दा क्षणं भ्रमन्ती मुह्यति । कामधुराधरेण का मधुराधरेण युक्ता रजोराजिविशेषकेण सविशेषकेण मुखेन्दुनातव हृदि लग्ना म्रदिमाकरेण करेण स्वेदविन्दुपयोधरेण पयोधरेण वक्ष:- P क्षपणक । T, H_K, G क्षेपणिक इव । K, G सत्त्वसारचित्तो यो । H धीरताधीरता । Kधीरता धीरता । H ०साहसेनकमला कमलापराजितापराजिता । A विलोकयन्ती लोकयन्त्रितविनाशा विनागापमनुभवन्ती। H विभ्रमेण प्रतिगवाक्षशलाकाविवर विलोकयन्ती विलोकयन्ती त्वया विना साविना सायमनुभवन्ती दुखानि । K ०लोकयन्त्रितविनाशा | and explains लोकेन सखीजनेन यन्त्रितः प्रतिषिद्ध विनाश प्राणत्याग यस्या सा तादृशी । P विशेषतः शेषत । K ऽविशेषतः । H प्रेमहार्या महाशयोत्कटाक्षे । Ha, Hb प्रेमहार्यामहार्यासमोत्कटा: । B, He, Hd, Hf, Hh प्रेमहार्या समासमोत्कटाक्षः। प्रेमहामहार्या समासोत्कटाक्षः । .. १ २ ३ - ६ , . । 1 म , ६.३८ ६३९ ६४०] वासवदत्ता-नाम-कथा [ ३५ फलकाश्चनेन जितानाविलकाञ्चनेन । कामदारुण मदारुणनेत्रा स्मरमयं रमयन्तं त्वामदयं मयन्ती परमकमितारं वाञ्छति हारिणा - हारिणा स्तनकुम्भेन हारिणाक्षिरुचिहारिणा चक्षुषा हारिणा । अनन्तरं दुग्धार्णवप्रविष्टमित्र, स्फटिकगृहप्रविष्टमिव श्वेतद्वीपनिवाससुखमनु- भवदिव जगदामुमुदे। ३९) क्रमेण च विघटमानदलपुटकुमुदकाननकोशमकरन्दविन्दु- सन्दोहदोह्मधुकरकुलकलरुतमुखरितदिगन्ते, चन्द्रिकापानभरालस- चकोरकामिनीभिरभिनन्दितागमने, सुरतभरखिन्नपुलिन्दसुन्दरीस्वेद- जलकणिकापहारिणि प्रतिवाति सायन्तने तनीयसि निशानिःश्वास निभे नभस्वति कन्दर्पकेतुस्तमालिकामकरन्दसहायो बांसवदत्ताजन- कनगरीमयासीत्। : ६४०) अनन्तरं कैटकैकदेशविरचितकान्तनिहितमुक्तामकरन्दपद्म- रागशकलेन वासवदत्तादर्शनार्थमास्थितेन देवतागणेनेव जातवलयन परिगतम्, अनिलोल्लासिताभिनभस्तरमञ्जरीभिरिव तर्जयन्तीभिरिव गगनपुरश्रियं पताकाभिरुपशोभमान, पाडणप्रसृताभिः कपूरचन्दन- कुङ्कुमैलॉगन्धोदकरसपरिमलवाहिनीभिर्वाहिनीभिस्तटस्फटिकपदृसुख- -निषषणनिद्रायमाणाज्ञातप्रासादपारावतालिभिः प्रभ्रश्यत्तटविटपकु- सुमस्तयकितसलिलाभिरनवरतमजदुन्मदयुवतिजनजघनास्फालनो- च्छ्वसितशीकरनिकरस्नपितवेदिकाभिः, कर्पूरपूरविरचितपुलिनतल- निषण्णनिनदानुमीयमानराजहंसीभिः,विकचनीलोत्पलकाननदर्शिता- काण्डचक्रवाकतिमिरशङ्काभिः, युवतीभिरिच सुपयोधराभिः, सुग्रीव- युद्धकलाभिरिव कीलाललपितकुम्भकर्णाभिः, सागरकूलभूमिभिरिव K ०सन्दोहसान्द्रनिष्यन्दास्त्रादमुदितमधुकर० । २ र वासवदत्तानगरमयासीत् । A in adscript and B, H, K ०अभ्रलिहशिसरेण सुधाधवलेनैकान्तरनिविष्टकनक- मुक्तामरकतपद्मरागशकलेन वासवदत्तादर्शनार्यमुच्छ्रितदेवतागणेनेव शालवलयेन विरचितम् । This reading perhaps belongs to the time when the southern recension was attaining an independent existence aK begins the paragraph अथ स प्रविश्य कटकैकदेशे विनिर्मितम् । 1 ४ , H, K कनकशिलापट्टाकणप्रसूताभिः । - K कर्पूरफुकुमचन्दनलालवङ्गपरिमल० । , १ ३ । 44 . 1 -- , 1 ३६ ] महाकवि-सुवन्धु-विरचिता [६.४०.६४१ सुन्दरीपादपरागशबलाभिः; नवनृपतिचित्तवृत्तिभिरिव कुल्यायमान- करिणीभिः, शिखरगतमुक्ताजालव्याजेन युवतिजनदर्शनागतं तारा- गणमुबहद्भिः,काचकलशाकृतिमुद्रहन्तीभिः शिखिसंहतिभिरुद्भासितैः प्रासादैरुपशोभित, कालागरुकृपपटलैदर्शिताकालजलदोन्नाहम् , कचिद्- गम्भीरमुरजरवाहतमन्दमन्दनर्तितनीलकण्ठं, सायंसमयमिव निपतित- लोकलोचनं, जनकयज्ञस्थानमिव दारोत्सुकितराम, मानुषमिवाभिन- न्दितसुरतं', निधानमिव कौतुकस्य, आँवासमिव शृङ्गारस्य, कुलगृह- मिव विभ्रमस्य, सङ्केतस्थानमिव सौन्दर्यस्य, वासवदत्ताभवनं भवन- न्दनप्रभावो ददर्श। ६४१) द्रवसि द्रवसिन्धुतो निगलिते चपला चपलायते किमेषा। स्तवकस्तव कर्णत: पतितोऽयम् । सुरेखे सुरया सुरयाचनोचितश्री- स्त्वमसि । मैत्ता कलहे कलहेमदामकाञ्चीदामक्वणितैः स्मरमिवाह- यसि । मलये मलयेप्सितं दृशैवाधिगतासि। कलिके कलिकेतुमिमां मुखरां मुश्च मेखलां शृणुवः कलबल्लकीविरुतम् । मेखला मे खला न भवति, त्वमेव त्वमेव मुखरतया मुखरतया च । पतेऽत्र पतेदिय- मवन्तिसेनाकुसुमोपहारे मुग्धा तव कैतवरलं, लेवनि के वेपथुरेवाशयं A कुल्यायमानकरिणीभिरनेकाकाराभिरुपेतै । B नेकाकारिभिर्वापीभिरुपगोभित । H कुल्या- यमानकरिणीभिरनेकतराभिरुपशोमित। K, G कुल्यायमानकरिणीभिरनेकाभिर्नदीभिरुपशोभित। २ A, H, K, and G add उपान्तनिलीनाभिः । ३ B H, K, G कचिदनवरतदह्यमानकृष्णागरुधूमपटले .जलदसंनाहम् । B, K G रवाहूतसमदनीलकण्ठम् । H ० रवाहूतसानन्दनर्तितनीलकण्ठम् । H K, G सायन्तनसमयमिव । K, G add अरण्य मिवानेकसालशोभित । K, G आस्थानमिव । K, G सकलविभ्रमाणाम् । H बसि बसिद्धितो निगलिते । K भद्रे द्रवसि द्रसिद्धरगदिता । K सुकपोलरेखे । P मत्ता कलहे । K, G मलयेप्सित कुरु दृशेवाधिगतासि । K, पतेऽत्र पतेयमिति नागकुसुमोपहारेषु स्खलन्तीयम् । P कालनि । र तत्र कैतवरलम् । कलिलो निश्वासेर्वेपथुरेवाशय व्यनक्ति। वहतीव हतीरनालेखे तब वपु स्मरसायकानाम् । तत्र च हारलता पिहितापि हि तायते । उत्कलिके तवोत्कलिकाबहुले वदने वद नेत्रपयोजकान्ते किमुपमानमिन्दुरप्यायाति । , १ ४ ६ ७ 1 ८ ९ १० ११ १३ ११ । .
. - ६४१] वासवदत्ता-नाम-कथा [३७ व्यनक्ति। वहतीव हतीरनङ्गलेखे स्मरसायकानाम् तव वपुरलसम् । पिहिताऽपि हितायते । उत्कलिके तवोत्कलिका महोमिः। बदने वद नेत्रपेयकान्तौ किमुपमानमिन्दुरप्युपयाति । वसतीव सतीत्रते तव हृदये कोऽपि । शतधा शतधारसारा वाचस्तवानुभूताः। केरलि करका- करकालमेघखण्डतुलामयमुल्लसितोत्फुल्लमल्लिकामालभारी तव याति कुन्तलकलापः । कुन्तलिके पुरगोपुरगोचराः श्रूयन्ते गीतध्वनयः। किमत्र कल्पयसि क्षणमीक्षणमीलनात् । अपि चटुलं चटुलम्पटं सखी- जनमायासयसि । मुरले स्तनता स्तनताडनेषु यत्सौख्यं लब्धं स्मरता स्मरतापनोदनं तदियं तेन वियुक्ता किं मुह्यसि । हतमोहतमो दयितः स्मरति स्म रतिप्रियं तव कौशलम् । नखराणां व्रणः स्मरजन्यां स्म रजन्यां कुरुते रुजं न ते । किं लोचनाभ्यां लोचनाभ्यां प्रीणिताखिल- जनेक्षणदेशः क्षणदेशः किं न पीयते । प्रियसखि मदनमालिनि मालिनि बिम्बाधरसङ्गत्यागेच्छया विरामं कुरु । मधुमदारुणमालवी- कपोलतलसमानोऽभ्रान्तसमानो रक्तमण्डलतया त्वया को विशेषः। कुरङ्गिके कल्पय कुरङ्गशावकेभ्यः शष्पाङ्कुरम् । किशोरिके कारय किशोरकप्रत्यवेक्षाम् । तरलिके तरलय गुरुसान्द्रधूपपटलम् । कर्पूरिके पाण्डुरय कपूरधूलिभिः पयोधरभारम् । मातङ्गिके मानय मातङ्गशिशु- याचनाम् । शशिलेखे लिख ललाटपट्टे शशिलेखाम् । केतकिके सङ्केतय केतकीमण्डपस्य दोहदम् । शकुनिके देहि क्रीडाशकुनिभ्य आहारम् । मदनमञ्जरि मञ्जरय सभामण्डपकदलीगृहम् । शृङ्गारमञ्जरि सङ्कल्पय शृङ्गाररचनाम् । सञ्जीवनिके वितर जीवज्जीवकमिथुनाय मरिचपल्लवम्। पल्लविके पल्लवय कर्पूरधूलिभिः कृत्रिमंकेतककाननम् । सहकारमञ्जरि K, d कुन्तलिके कुन्तलालकृते न च पुरगोपुरगोचरा. श्रूयन्ते सगीतध्वनय । किमत्र कलयसि ..मायासयसि । सुरते सुरते स्तनता स्तनताडनेषु यत्सौख्य ..नोदन तत्केन वियु. कासि । किं मुह्यसि महतो महतो दयित स्मरति स्म रतिप्रिय ..कौशलम् । नवनिशानख- कुरुते न रुजम् । तव ..प्रीणिताखिल .! २ B, K मधुमदारुण ..कपोलकोमललोलदलमण्डलतया लतया को विशेषस्तव । H मधुमदारुणमालवीकपोलतलसमानो लसमानो । ३ A, H, K O कृष्णागुरुधूपपंटलम् । K मीरय लतामण्डपम् । कदलिके विदलय कदलीगृहम् । ५ H, K.G केतकीकाननम् । १ राणा नखराणा व्रण . 1 ४ ३८ ] ܩ महाकवि:सुबन्धु-विरचिता [६४१.६४२ सञ्जनय सहकारसौरभं व्यजनवातेषु । मदनलेखे लेखय मदनलेखं मलयानिलस्य । मकरिके देहि मृणालाङ्कुरं राजहंसशावकेभ्यः । विलासवति विलासय मयूरकिशोरकम् । तमालिके परि] मलय मलयज- रसेन भवनवाटम् । काञ्चनिके विकिर कस्तूरिद्रवं काञ्चनमण्डपि- कायाम् । प्रवालिके सेचय घुसृणरसेन वालप्रवालकाननम् इत्यन्योन्य- प्रणयपेशलाः प्रमदानामालापकथाः शृण्वन् कन्दर्पकेतुर्मकरन्देन समं विस्मयमकरोन्मनसि "अहो भवनानामतिशायि सौन्दर्यम् । अहो शृङ्गाररचनाकौशलम् । तथाहि तत्काललीलादलितमालवीदशनकान्ति- कोमलकान्तदन्तघटितो मण्डपः । असावपि कर्पूरशलाकानिर्मितयन्त्र- पञ्जरसंयतः क्रीडाशुक इत्यादि परिचिन्तयन् प्रविश्य व्याकरणेनेव सरक्तपादेन, भारतेन सुपर्वणा, रामायणेनेव सुन्दरकाण्डचारुणा जङ्घायुगलेन विराजमानां, छन्दोविचितेरिव भ्राजमानतनुमध्यां, नक्षत्रविद्यामिव गणनीयहस्तप्रवणां, न्यायस्थितिमिवोद्योतकरखरूपां, बौद्धसगतिमिवालङ्कारप्रसाधितां, उपनिषदमिव सानन्दात्मकमुद्योत- यन्ती, द्विजकुलस्थितिमिव चारुचरणां, विन्ध्यगिरिश्रियमिव सु- नितम्बा, तारासिव गुरुकलत्रोपशोभिता, शतकोटिभूतिमिव मुष्टि- ग्राह्यमध्यां, प्रियङ्गुश्यामासखीमिव प्रियदर्शनां, ब्रह्मदत्तमहिषीमिव सोमप्रभा, दिग्गजकरेणुकामिवानुपमों, वेलामिव तमालपत्रसाधितां, अश्वतरकन्यामिव मदालसा वासवदत्तां ददर्श । ४२) अथ प्रीतिविस्फारितेन चक्षुषा पिवतः कन्दर्पकेतो हार चेतना K समार्जय, श्रमोदकविन्दून्सहकारसौरभव्यजनवातेन । A, B, H परिमलय | K लेपय । K, G अहोभुवनातिशायि सौन्दर्यम् । अहो शृङ्गारकलाकेलिकौशलम् । K, Gomit तथाहि तत्काल...मण्डप । ५, र महाभारतेनेव ।। H_K, छन्दोविचितिमिव । K न्यायविद्यामिव । P वौद्धस्थिति । वौद्धसङ्गतिमिवालङ्कारभूषिताम् । K, G have न्यायविद्यामिवोद्यंत- करस्वरूपा, सत्कविकाव्यरचनामिवालङ्कारप्रसाधिताम् ।। K उपनिषदमिव सदानन्दा, रविप्रभामिव लोकमुद्योतयन्ती । H शतकोटिमिव । K शतकोटियष्टिमिव । ११ K, a ०पमा, रेवामिव नर्मदाम् । १ 1. ' २ 4 । - - .. T , w + . - ८ ९ । + १० 1 - ४२.६४३ ] वासवदत्ता नाम कथा मूछगवेगः । तमपि पश्यन्ती वासवदत्ता मुमूर्छ । अथ मकरन्दसखी- जनप्रयत्नलब्धसंज्ञौ तौ एकासनमलचक्रतुः । ततो वासवदत्तायाः प्राणेभ्योऽपि गरीयसी सर्ववित्रम्भपात्रं कलावती नाम कन्दर्पकेतुमुवा- च । आर्यपुत्र नायं विस्रम्भकथानामवसरः । अतो लघुतरमेवाभि- धीयते । त्वत्कृते यानया वेदनानुभूता सा.यदि नभः पत्रायते सागरो लोलायते ब्रह्मा लिपिकरायते भुजगपतिर्वाक्कथकः तदा किमपि कथ- मप्येकैकैर्युगसहस्रैरभिलिख्यते कथ्यते वा। त्वया च राज्यमुज्झितम् । किं बहुनात्मा सङ्कटे समारोपितः । एषास्मत्स्वामिदुहिता प्रभातायां रजन्यां पित्रा यौवनातिक्रमंदोषशंतिना भयेन विद्याधरचक्रवर्तिनो विजयकेतोः पुत्राय पुष्पकेतवें पाणिग्रहणाय दातव्या । अनयाप्या- लोचितमद्य यदि तं जनमादाय नागच्छति तमालिका तदावश्यमेव मया हुतवहे शयितव्यमिति । तदस्याः सुकृतवशेन महाभागः इमां भूमिमनुप्रासः । अथ कन्दर्पकेतुः भीतभीतः सप्रणयमानन्दामृत- सागरोद्दामतरङ्गालहरीभिराप्लुत इव वासवदत्तया सहामन्त्र्य मकरन्द वार्तान्वेषणाय -तत्रैव नगरे नियुज्य भुजगेनेव सदागत्यभिमुखेन मनोजवनाम्ना तुरगेण तया सह नगरान्निरगांत् । ६४३) क्रमेण च जाङ्गलकवलाभिलाषमिलितनिःशङ्कशकुनिकुल- H सा यदि नभ -पत्रायते सागरो ..ब्रह्मायते लिपिकरो भुजगराजायते कथकस्तदा । K भुजगपतिर्वा कथकायते । K सागरो मेलानन्दायते . ; कथकायते । ३ K-आत्मास्याः सङ्कटे । K अवश्यमेवाश्रयाश आश्रयितव्य ।। A, B and H read तदेव यत्सांप्रत... ..विराम K, 0 सुकृतवशाच्च महाभाग. समागत । तदत्र यत्सांप्रतम् तत्र भवानेव प्रमाणमित्युक्त्वा विरराम । ६ After सदागत्यभिमुखेन K, G read सरित्पतिनेव शुक्तिशोभितेन विन्ध्यविपिनेनेव श्रीवृक्ष- लान्छितेन, हसेनेव मानसगतिना अरण्येनेव गण्डशोभितेन वनस्पतिने स्कन्धशोभितेन वज्रेणेवेन्द्रायुधेन । ७... जगाम । 14 K; ततं क्रमेण गन्यूतिमात्रमध्वान गत्वा नरजाङ्गल० ।। H, K, O कककुलसकुलेन । .१ - । २ . . -- . . - + ९ T . " ४०] महाकवि-सुबन्धु-विरचिता [६४३ सङ्कुलेन अर्धदग्धचिताचक्रसिमिसिमायमानविकटकटतृष्णाचटुलकट- पूतनोत्तालवेतालरवभीषणेन, शलशिखरारोपितशङ्कितवर्णकर्णनासि- काच्छेदधिरपटेलपतितभाङ्कारिभम्भरालीसम्भारभरितभूमिभागवी- भत्सेन, कटाग्निदह्यमानपटुचटन्नृकरोदिटकारभैरवरवेणं, शूलपाणि- नेव कपालबलिभस्मशिवावहिभूतिभुजगावरुद्धदेहेन, पुरुषातिशयेने- वानेकमण्डलकृतसेवेन श्मशानवाटेन गत्वा निमेषमात्रादिवानेकशत- योजन, प्रलयकालवेलामिव समुदितार्कसमूहां, नागराज्यस्थितिमिवा- नन्तमूलां, सुधर्मामिव स्वच्छन्दस्थितकौशिका, सत्पुरुषसेवामिव श्री- फलाढ्यां, भारतसमरभूमिमिव दूर रूढार्जुनां, पुलोमकुलस्थितिमिव- सहस्रनेत्रोचितेन्द्राणिकां, शूरपालचित्तवृत्तिमिव कैलितगणिकारिका, सज्जनसम्पदमिव विकसिताशोकसरलपुन्नागां, शिशुजनलीलामिव कृतधात्रीधृति, कचिद्राघवचित्तवृत्तिमिव वैदेहीमयीं, कचित्क्षीरसमुद्र- मथनवेलामिवोज्जृम्भमाणामृतां, कचिन्नारायणशक्तिमिव स्वच्छन्दा- पराजितां, कचिवाल्मीकिसरस्वतीमिव दर्शितेक्ष्वाकुवंशां, लङ्कामिव बहुपलाशशोभितां, धार्तराष्ट्रसेनामिवानुनशरनिकरपरिवारितां, नारायणमूर्तिमिव बहुरूपां, सुग्रीवसेनामिव पनसचन्दननलकुमुद्- सेवितां, क्वचिद् विधवामिव सिन्दूरतिलकभूषितां प्रवालाभरणां च, कचित्कुरुसेनामिवोलूकद्रोणशकुनिसनाथां धार्तराष्ट्रान्वितांच,अम्लान- जातिविभूषितामपि विरुद्धवंज्ञा, दर्शिताभयामपि भीषणां, सततहित- K रुधिरपटलपतनरवारिकरकोटिकपरकरालकौणपनृत्ततुमुलेन । भम्मरालीकेलिसमारभरित- भूमिभागवीभत्सेन । २ Hd K, G, add after भैरवरवेण, विवृतोल्कामुखीमुखोज्ज्वलज्ज्वलनज्वालाजटिलेन, आन्त्रतन्तुप्रोतकपालकलितकुचप्रालम्बडामरडाकिनीगणकृतकुणपविभागकोलाहलेन, आईसिरा- रचितविवाहमालप्रतिसरपिशाचमिथुनप्रदिक्षिणीक्रियमाणचितानलेन । [मण्डलकृतसेवेन] दण्ड- कारण्येनेव कवन्याधिष्ठितेन चक्रवर्तिनेव अनेकनरेन्द्रपरिवृतेन । K शतयोजनमध्वान गत्वा पुनरपि । H शूलपालचित्तवृत्ति० । K दर्शितगणिकारिकाम् । H फलितगणिकारिकाम् । H कुरुसेनामिव । . विरुद्धवंशा is accepted by P as also by all the mss of Hall except Hd, जगद्धर and नरसिंह । Against this Hal accepts अकुलीनवशाम् । K and a have अकुलीनवंशाम् । - १ ३ है ५ ६ - , , १४२६४३ ] वासवदत्ता नाम-कथा ८.४१ पथ्यामपि प्रवृद्धगुल्मां, षट्पदव्याप्तामपि द्विपदानाकुलां, द्विजकुल- भूषितामप्यकुलीनवंशां विन्ध्याटवी विवेश । अत्रान्तरे भगवत्यपि निशा तयोनिद्रामादाय जगाम । ६४३) क्रमेण कालकैवर्तन तमिस्रानायं प्रक्षिप्य गगनमहासंरसि सजीवशफरनिकर इवापहियमाणे तारागणे, रक्तांशुके विपमप्ररूढ- विसलंताशरयन्त्रानुगतशतपत्र पुस्तकसनाथे मकरन्दविन्दुसन्दोहनि- भरपानमत्तमधुकरमन्द्रमुक्तस्वनैः सवर्णमिव पठति विकचे कमलाकरे, भिक्षुकृषीवलेनेव कालेन तिमिरवीजेष्विव मधुकरेषु मधुरसकर्दमित- केसरपङ्केषु घनघटमानदलपुटेषु, रजोमुर्मुरसनाथमधुकरपटलानु- गतोद्दण्डपुण्डरीकव्याजाभूपमिव भगवते किरणमालिने प्रयच्छन्त्यां कमलिन्यां,रजनीवधूकरद्वयोच्छलितपैतन्मुसलाहतिक्षतान्तर उलूखल इव चन्द्रे, कण्डनविकीर्णेषु तण्डुलेष्विव तारागणेखून्मीलत्तु, सन्ध्या- ताम्रमुखेन वासरवानरेण नभस्तरुमारोहता, शाखाभ्य इव कम्पि- ताभ्यो दिग्भ्यो विकचप्रसून इव तारागणे इन्दुमण्डलफले च पतति, तारातण्डुलशवलं नभोऽङ्गणं स्फुरदरणतरुणचूडाचारुवदने वासरकृक- वाको चरितुमवतरति, मैत्सङ्गतिप्रसिद्धो वारुणीसमागमाद् द्विजपति- रेष पतिष्यतीति हसनत्यामिवाखण्डेलककुभि, कैराघातनिहतान्धकार- B पट्पदव्याकुलामपि द्विपदाकुला । २ Hall reads अनन्तर तयोनिद्रामादाय जगाम रजनी । before the words क्रमेण... K has अत्रान्तरे तयोनिद्रामादाय निशा जगाम । at the end of the previous paragraph H, K, G स्वधर्ममिव पठति विकचकमलाकरभिक्षी कृषीवलेनेव कालेन तिमिरवीजनिकरेष्विव मधुकरेषु मधुरसकर्दमितपरागपङ्केषु घनघटमानदलपुटेषु । K; O कुमुदाकरक्षेत्रेषूप्यमानेषु । but H घनघट्टमानदलेषु भ्रमरेषु व्याजात्पङ्कजेषूप्यमानेषु । K, कमलिनीतापस्या । ५ H, K, G ०पतत्प्रभातमुसलाहति । but A ० करद्वयाकुलितपतदशुक्रसंहतिः । ६ K, G विकचप्रसूननिकरे इव । H चन्द्रमण्डलफले च । K, G ०फले इवेन्दुमण्डले च । H, K, C तारागणशालितण्डुलशवल। K, G मत्सङ्गमादतिप्रवृद्धो वारुणीसङ्गमात् । H मत्सङ्गतिप्रवृद्धो। K आखण्डलाशायाम् । H, K, a अरुणकेसरिकराधातनिहता० । १ ४ - ' ८ ९ १० ११ ६ ४२] महाकवि-सुबन्धु-विरचिता [६४३ करीन्द्ररुधिरधाराभिरिवोदयगिरिशिखरनिर्झरधौतधातुरागैरिव, त्वङ्गा- तुरङ्गखरखुरपुटपाटितपद्मरागच्छायाभिरिवे, केसरिकरतलाहतमत्त. मातङ्गोत्तमाङ्गसङ्गलस्रसारणीभिरिव, त्रिभुवनकार्यसम्पादनप्रभावा- नुरागरसैरिव रक्तमण्डले, ताराकुमुदवनग्रहणाय प्रसारितहस्त इव कुंकुमरागारुणे, प्राचीविलासिन्याः पूर्वांचलभोगीन्द्रफेणार्पणे, गगनेन्द्र- नीलकनककिसलये, नभोनगरप्राचीकाञ्चनदीनारचक्रकुम्भे, प्राचील- लाटतटकुङ्कुमार्द्रबिन्दौ, सन्ध्यावाललतैककुसुमे, मञ्जिष्टारुणपदृसूत्र- सदृशे, संन्ध्यारुणगुम्फिते, प्राचीकाञ्चनदीनारचक्र इव वासरविद्याधर- सिद्धगुलिके, धातुरागारुणदिग्गजपादतलानुकारिणि विभावरीतिमिर- तस्करे भगवति भास्करे समुदयमारोहति, मञ्जिष्ठाचामर इव दिग्गजेषु, महाभारतसमररुधिरोद्गार इव कुरुक्षेत्रेषु, शक्रधनुःकान्तिलेप इव जलदच्छेदेषु, काषायपट इव शाक्याश्रममठिकासु, कौसुम्भराग इव ध्वजपटपल्लवेबु, फलपाक इव कर्कन्धुषु, कुङ्कुमच्छटारस इव व्योम- सौधाङ्गणस्य, सञ्चरदरुणयवनिकापट इव कौलस्य, बालप्रवालभङ्गारुणे प्रसरत्यातपे, क्षणेन च चक्रवाकचक्रवालहृदयशोकसन्तापहरणादिव, .१ A, B omit चौत and read धातुधाराभिरिव । H, K, G धौतधातुधाराभिरिव । K, G उदयाचलकूटकोटिप्ररूढजपाकुसुमकान्तिभिरिव पूर्वगिरिकेसरि० । K विगलढसृग्धारा । but B गलदसिधाराभारसरणीभिरिव । कुमारुग किरणे. । कनकदर्पण इव प्राचीविलासिन्या । H फणोपले । K ०फणामणौ । ६. H नभोनगरप्राचीरकनककुम्मे । K नभोनगरप्रारद्वारकनकपूर्णकुम्मे । - H, K तप्तलोह- कुम्भाकारे। H प्राचीललाटतटकुसुम्भाम्बुबिन्दौ । K प्राचीकुमारीललाटतटघटितकुङ्कुमतिलकबिन्दौ । H सन्ध्यावनलतैककुसुमे । H सन्ध्यारागगुणगुम्फिते प्राचीकाबनदीनारचक्र इव । K सन्ध्यारुणसूत्रप्रथितप्राचीवधूकाम्चीकाञ्चनदीनारचक्र इव । K reads before धातुरागा० -- कुमार इव संहृततारके, पद्मनाभ इवोल्लसितपने, अधग इव छायाप्रिये शक इव गोपती उदयगिरिधातुरागारुणः । H सुरराजगरासनकान्तिलेप इव । K सुरधनु कान्तिविलेप इव । K शाकयाश्रमशाखिगास्वासु । H, कालनर्तकस्य ! K, G कालनटत्य । H, K, G चाटुचटुलचक्रवाकहृदय .दहनसमर्पिततेज प्रवेशादिव । २ ३ ४ १० - ११ १२ १३ १४ શું કરૂ હુંeણ હું કય ] वासवदत्ता-नाम- कथा [ કરૂં दहनसमनुप्रवेशादिव,दिननाथकान्तोपलसङ्गमादिव,उत्तिष्ठमानमुष्ण- मुष्णरश्मेराश्रयति रश्मिसञ्चये कन्दर्पकेतुः सर्वरावजागरपरवश आहारशुन्यशरीरतया निश्चेतनः, अनेकयोजनशतभ्रमणखिन्नः, वास- वदत्तयाप्येवंविधया सह लतागृहे मन्दमारुतान्दोलितकुसुमपरिमल- लुब्धमुखरपरिभ्रमभ्रमरझङ्कारमनोहरे तत्कालसुलभया निद्रया गृहीतो निष्पन्दकरणग्रामः सुष्वाप । ६४४) ततो वणिजीव प्रसारिताम्बरे महादावानल इव सकलकाष्ठा- दीपिनि पतङ्गामण्डले मन्ध्यन्दिनमारूढे कन्दर्पकेतुः प्रियया विना लता- गृहमवलोक्योत्थाय तत इतो दत्तदृष्टिःक्षणं विटपेषु,क्षणं तरुशिखरेषु, क्षणमन्धकूपेषु, क्षणं शुष्कपत्रराशिषु, क्षणमाकाशे, क्षणं दिक्षु, क्षणं विदिक्षु भ्रमन्ननवरतदह्यमानहृयो विललाप । ६४५) हा प्रिये वासवदत्ते देहि मे दर्शनम् । किं परिहासेनान्तहि- तासि । त्वत्कृते मया यानि दुःखान्यनुभूतानि तेषां त्वमेव प्रमाणम् । प्रियसखे मकरन्द पश्य मे दैवदुर्विलसितम् । किं मया न कृतमवदातं कर्म । दुर्विपाका नियतिः । दुरतिक्रमा दुःकालगतिः। अहो ग्रहाणा- मतिकटु कटाक्षपातनम् । अहो विसदृशफलता गुरुजनाशिषाम् । अहो दुःस्वप्नानां दुनिमित्तानाश्च फलितम् । सर्वथा न कश्चिदगोचरो भवि- तव्यतानाम् । किं न सम्यगागमिता विद्याः । किं यथावन्नाराधिता गुरवः । किं नोपासिता वह्नयः। किं नाभ्यर्चिता देवताः। किमधि- क्षिप्ताः भूमिदेवताः । किमप्रदक्षिणीकृताः सुरभयः। किं न कृतः शरणेच्छुरभय इति बहुविधं विलपन्दक्षिणेन काननं निर्गत्य नव्य- नलनलदनलिनीनिचुलपिचुलेविडदबहुलेन,प्रचुरचिरिविल्वबिल्वोटज- कुटजरुद्धोपकण्ठेन, सोत्कण्ठभृङ्गराजरसितसुन्दरसुन्दरीवनेन, वितत- H: प्रियया विनाकृत लतागृह ।; also K कल्पवृक्ष इव सर्वाशाप्रसाधके पतामण्डले मध्य नभस्थलमारूढे कन्दर्पकेतु. प्रबुद्धः प्रियया विनाकृत लतागृह । B तरुगृहेषु । K क्षणमघःकूपेषु क्षणमूद्ध तरुशिखरेषु । ३K कृत परिहासेन । अन्तर्हितासि । K, G इति वहुविध विलपन् मरणेच्छु । ५ । पिचुलविदुलवकुलेन । K पिचुलवजुलसरलविदुलवकुलचिरिविल्वबिल्ववहुलेन । प्रचुर- विरचितविविघोटजकुटजरुद्धोपकण्ठेन । १ B २ , , " - ४४] महाकवि-सुबन्धु-विरचिता .[४५ वेत्रवततिवातावरणतरुणवरुणतरुस्कन्धसमुन्नभृङ्गगोलकेन, गोला- गूलभग्नगलन्मधुपटलरसासारसिक्ततरुतलेन,तालहिन्तालपूगपुन्नाग- नागकेसरघनेन, घनसारमल्लिकाकेतककोविदारमन्दारबीजपूरकजम्बीर- जम्बूगुल्मगहनेन, प्रत्यूहदांत्यूहव्यूहकुहरितभरितनदीनलनिकुञ्जन, पुजिताकुण्ठकण्ठकलकण्ठाध्यासितोदामसहकारपल्लवेन, चपलकुलाय- कुकुटकुटुम्बसंवाहितोत्कटविकटेन, कोरकनिकुरुम्बरोमाञ्चितकुरव- कराजिना, रक्ताशोकपल्लवलावण्यविलिप्यमानदशदिशा, विकसित- केसररजोविसरवर्धमानवासरधूसरिमभारण, परागपिचरमञ्जरीयुज्य- मानमधुपम शिञ्जितजनितजनमुदा, मद्जलमेचकितमुचुकुन्दस्कन्ध- काण्डमथ्यमाननिःशङ्ककरिकरटकण्डूतिना, कतिपयदिवसप्रसूतकुकुंटी- कृतकुटजकोटरेण, चटकसञ्चार्यमाणचतुरवाचाटचाटकरक्रियमाण- चाटुना, सहचरीचारणचञ्चुरेचकोरचुञ्चुना,शैलेयसुकुमारशिलातल- सुखशयितशशशिशुना, शेफालिकाशिफाविवरविस्रब्धवर्तमान- गौधेरराशिना, निरातङ्करङ्कुणा, निराकुलनकुलकेलिना, कलकोकिल- कुलकवलितसहकारकलिकोद्मेन, सहकारारामरोमन्थायमानचमर- यूथेन, श्रवणहारिसनीडगिरिनितम्बनिझरनिनादनिद्रानन्दमन्दाय- मानकरिकुलकर्णतालदुन्दुभिना, . समासन्नकिन्नरीगीतरवरममाण- H, K, G भृगरोलेन । २ Hd नारिकेलकरकेलिराजतालीतालकृतमालतमाललवलीपूग० । K प्रवृद्धनारिकेलकङ्कलिराज- तालीतालतमाल धनेन ३ After गहनेन K, G read further पवनसंवाहितानेकपनसविटपिविटपेन । A, B, H, K, G अप्रत्यूह । ५ K, G चपलकुलायकुक्कुटकुटुम्बाध्युषितोत्कटानेकविटपेन । H प्रविकसितकेसररजोविसरधूसरिमभरेण । K प्रविकसितकेसरकुसुमकेसररजोविसरधूसरितपरिसरेण । K परागपुञ्जपिचरसिन्दुवारमञ्जरीरज्यमानमधुकरम शिन्जितर्जानतमुदा, लवड्गचम्पकमधूकत- माललोध्रकर्णिकारकदम्बकदम्बकेन । H मुममानमधुकर० । H स्कन्धकाण्डकथ्यमान० । K मदजलमेचकितगण्डकाषमुचुकुन्दकाण्डकथ्यमान० । H कुकुटीकुटीरीकृत० । H •चारणचुन्चुचतुरचकोरचुच्चुना । , १ ur . ९ ० ११ वासवदत्ता नाम • कथा [४५ रुरुविसरेण, क्षतहरितहरिद्राद्रवरज्यमानवराहपोतपोत्रपालिना, गुञ्जा- पुञ्जगुञ्जज्जाहकजातेन, दशनकुपितकपिपोतऍटकपाटितपाटलकीटपुट- सङ्कटेन, कुलिशशिखरखरनखरचयप्रचण्डचपेटपादितमत्तमात- रक्तच्छटाच्छुरितचारुकेसरभासुरकेसरिकदम्बकेन महासागरकच्छ- प्रान्तेन कतिपयदूरं गत्वा, अतिचपलवीचिपचयतया ताण्डवोद्दण्डदो:- पण्डखण्डपरशुविडम्बनापण्डित, वारुणीविजयपताकाभिरिव शेष- कुलनिर्मोकमञ्जरीभिरिव शशाङ्कपरिशेषपरमाणुसन्ततिभिरि फेन- राजिभिरुपान्तरामणीयकं, अपरमिव गगनं अवनीतलमवतीर्ण अच्छार्णवच्छलादुच्छलच्छीकरकणनिकरनिभेन नभश्चरान्मुक्ताफलै- रिव विलोभयन्तं, अभयाभ्यर्थनागतानेकपक्षक्षितिधरभरितकुक्षि- भागं, सँगरसुतखातकं, उत्खातपारिजातं, अभिजातमणिरत्नाकर, करिमकरकुलसङ्कुलं, शैकुलकवलाभिलाषि, सञ्चरन्ननचक्रं, अस्तमित- तिमिनिलकुलकन्दलीवलयावलीविलुलितलवलीलवङ्गमातुलुङ्गगुल्म, ऊर्मिमारुतमर्मरिततरलतरोत्तालतालीतरलतरलितजलमानुषमिथुन- मृदिततलपुलिनबालशैवालं, प्रवालाकुरकोटिपाटितमुखखिन्नशनख- खरनखरशिलालिखिततटलेख,खगेश्वरगोत्रपत्ररथपटलकलिलसलिलं, अद्याप्यनिर्मुक्तमन्दरमथनसंस्कारमिवावर्तभ्रान्तिभिः, सापसारमिव "फेनैः, ससुरामोदमिव वेलाबकुलगन्धैः, सरोषमिव गर्जितः, - १ 1 ४ A, K, G, कुहरित० । २ A, K, G गुजाकुञ्जपुजितजाहकजातेन । ३ H दशनकुपितः । K, G दशदशन० । H ०कपिकपोतनखकोटिपाटितपाटलकीटपुटसखुलेन । K ०पेटकनखकोटिपाटितपाटलीपुटकीटसङ्कटेन । ५ H, K, G मातशकुम्भस्थल० । ६ H, K, कच्छोपान्तेन । K ०प्रचयप्रहतप्रपातया । K मजरीभिरिव सुधासहचरीभिरिव ज्योत्स्नासहोदरीभिरिव । H, K, G सन्ततिभिरिव लक्ष्मीलीलातर्पणधाराभिरिव जलदेवताचन्दनविच्छित्तिभिरिव । K सगरसुतविसरसमुत्खात, वडवामुखवारिजात, सुरपत्युपात्तपारिजात । K, G शकुनिकुला० । A नखनखरशिखारलिततटलेख । B शिखालिखिततटलेखम् । १३ K, a सितफेनसञ्चये । A, K, G ससुरागन्धमिव । - ८ १० ११ ४६ ] महाकवि -सुबन्धु -विरचिता [६४५६४६ सखेदमिव 'निःश्वसितैः, सभ्रूकुटीवन्धमिव तरङ्गैः, आलानस्तम्भमिव रामसेतुना, कुम्भीनसीकुक्षिमिव लवणोत्पत्तिस्थानं, व्याकरणमिव विततस्त्रीनदीकृत्यबहुलं, राजकुलमिव दृश्यमानमहापात्रं, हस्तिवन्ध- मिववारिगतानेकनागमुच्यमानत्कार, विश्वामित्रपुत्रवर्गमिवाम्भोज- चारुमत्स्योपशोभित, सत्पुरुषमिव गोत्राश्रयं, साधुमिवाच्युतस्थिति- रमणीयं, सुनृपमिव सज्जनक्रमकरं, कृतमन्युमिव करतोयाप्लुतमुख, विरहिणमिव चन्दनोदकसिक्तं,विलासिनमिव नर्मदावगतं, उद्धृतकाल- कूटमपि प्रकटितविशराशिं, अतिवृद्धमपि सुन्दरीपरिगतकण्ठं, सुरो- त्पत्तिस्थानमप्यसुराधिष्टानं जलनिधिमपश्यत् । ६४६) अचिन्तयचाहो मे कृतापकारेणापि विधिनोपकृतिरेव कृता यदयं लोचनगोचरतां नीतः समुद्रः। तत्र देहमुत्सृज्य प्रियाविर- हाग्निं निर्वापयामि । यद्यप्यनातुरस्यात्मलागो न विहितः तथापि कार्यः। न खलु सर्वः सर्व कार्यसकार्य वा करोति । असारे संसार केन किं नाम न कृतम् । तथाहि । गुरुदारहरणं द्विजराजोऽकरोत् । पुरूरवा ब्राह्मणधनतृष्णया विननाश । नहुषः परकलत्रदोहदी महाभुजंग आसीत् । ययातिराहितपाणिग्रहणः पपात । सुद्युम्नः स्त्रीमय इवा- भवत् । सोमस्य प्रख्याता जन्तुवनिर्धगता । पुरुकुत्सः कुत्सित इवासीत् । कुवलयाश्वो नाश्वतरकन्यामपि परिजहार । नृगः कृकला- सतामगमत् । नलं कलिरभिभूतवान् । संवरणो मित्रदुहितरि विक्लव- K, G नागनि श्वासै । २ H सभ्रूकुटीभङ्गुरमिव । K, G सभ्रभङ्गमिव तरङ्गै । ३ Komits वितत । H ०फूत्कारम् । ५ K, G नर्मदानुगत, राशिमिव समीनकुलीरं, शृङ्गारिणमिव अनेकमुक्कालतमुद्धृतः । & A, B, K, G तदन देहं त्यजामि । K, G न खलु सर्व सर्ने कार्यमेव करोत्यसारे ससारे । केन किं नाम न कृतम् । H ०ग्रहण । K भुजङ्गतामयासीत् । १० B राहितब्राह्मणी । K ययाति कृतवाह्मणीपाणिग्रहण । G (कृतपुरोहितसुतापाणिग्रहण ।) H, K सोमकस्य० । but Ha, Hb, Hg यमस्य । H अश्वतरकन्यामपि जहार | K, G. जगाम ।' १३ H संवरणो । शम्बरो acc. to Ha, Hb, HC, Hd, He, Hi, Hg, Hh. १ ४ ९ . .६४६६४७६४८] वासवदत्ता-नाम कथा [७ तामगात् । दशरथ इष्टरामोन्मादेन मृत्युमवाप । कार्तवीर्यो गोब्राह्मण- पीडया पञ्चत्वमयासीत् । मनुः सुवर्णव्यसनी ननाश । शन्तनुरति- व्यसनाद्विपिने विललाप । युधिष्ठिरः समरशिरसि सत्यमुत्ससर्ज । नास्त्यकलङ्कः कोऽपि प्रायः। 'देहत्यागे न कलङ्की भवामीति विचिन्त्य कुररखरनखरशिखरखण्डितपृथुलपृथुरोमांविलं,अविरलशकुलशल्क- सङ्कुलजलनकुलकुलोचारं, क्रोष्टुकुलोच्छिष्टविकटकर्कटकर्परपरम्परा- परिगतप्रान्तं, अतितरलतरजलरयललितचटुलशफरकुलकवलनकृतं, अतिनिभृतवकशकुनिनिवधवलितपरिसरं, अतिचपलजलकपिकुल- विहरणललितसलिलकणनिकरजडितपरिमलितशिशिरितं,अनुदिवस- निपततितरुणवनमहिषशृङ्गशिखरलिखितविषमतटं, अनवरतचरद- सितमुखचरणविहगनिवहमधुरनिनदमुखरितं, अहिमकरकिरणरुचि- जलमनुजशयनमृदितजलधरणीतलं, अतिवहलमदजलशवलकरटतट- करिवरशतनिपतितमधुकरनिकरमधुरविरुतरतकर, अतिजवनपवन- विधुतजलविनटननिपतितमणिगणपरिगतपरिसरं, जलनिधिभुजग- निर्मुक्तनिर्मोकपदृमिव, दर्पणमिव वसुन्धरायाः, स्फटिककुहिममिव वरुणस्य पुंलिनतलमाससाद । ४७) ततः कृतस्नानादिर्जलमवतरितुमारेभे शरीरत्यागाय । ६४८) अथ सानुग्रहेषु ग्राहेषु, निर्मत्सरेषु मत्स्येषु, अक्षुद्रेषु क्षुद्रेषु, वत्सलेषु कच्छपेषु, अक्रूरेषु नक्रेषु, अभयङ्करेषु मकरेषु, अमारेषु शिशुमारेषु, आकाशात्सरस्वती समुदचरत् । आर्य कन्दर्पकेतो पुनरपि तव प्रियया सङ्गमो भविष्यतीत्यचिरेण । तद्विरम मरणव्यवसाया- H, K, G तदहमपि देहमुत्सृजामि । A अविरतशकुलशल्कसङ्गुलजलनकुल० । B सङ्खलजलनकुलोच्चार । H पृथुरोमाविल शल्कजलनकुलोच्चार । K, O पृथुरोमशल्कसङ्कुल सङ्कुलितजलनकुलकुलोचारशारम् । ३ H, K कोष्टुकुलोत्सृष्टः । K कणनिकरपरिमिलनशिशिरिततमालतलम् । ५ A, B, H, K, G महिषगवलशिखर० । H •जलधिजलपटलविनटननिपतित० । K, O०जलविघटननिपतित० । H विपुल पुलिनजलमाससाद । A विपुल पुलिनतल । K, G वरुणस्य कमलवनमिव सपद्म- राग वनप्रदेशमिव सविद्रुमलत कातरमिव सदरम् विष्णुमिवानेकमुक्कोपेत पुलिनतलमाससाद । K, G अनिच्छेषु कच्छपेषु अक्रुरेषु नकेषु । . १ - २ ४ ६ ८ , , ८ ४८] महाकवि सुबन्धु -विरचिता [६४८१४९६५०६५१ दिति । तदुपश्रुत्य मरणारम्भाद्विरराम । पुनः प्रियया समागमाशया संस्थितिहेतुभूतमशनं चिकीर्षुः कच्छोपान्तभुवं जगाम । तत्र तत इतः परिभ्रमन् फलमूलादिना बने वर्तयन्काल निनाय । ६४९) एकदा तु कतिपयमासापगमे काकलीगायन इव समृद्धनिम्न- गानदः, सन्ध्यासमय इव नर्तितनीलकण्ठः, कुमारमयूर इवे समृदश- रजन्मा, महातपस्वीव प्रशमितरजाप्रसरः, तापस इव धृतजलदकरकः, प्रलयकाल इव दर्शितानेकतरणिविभ्रमः, निरुपद्रवकाननोद्देश इव धनोत्सुकितसारङ्गः, रेवतीकरपल्लव इव हलिघृतकरः आजगाम वर्षासमयः। ६५०) निभिन्नमेघनीलोत्पलकानने क्रीडासरसीव नभसि स्मरस्य रत्ननौकेव, कुलटलक्ष्मीमातङ्गकन्यानर्तनचलरज्जुरिव, नभासौध- तोरणमालिकेव, प्रवसता निदावेन दिवःपयोधरे स्मरणाय क्षता नख- पदावलिरिच, गगनलक्ष्मीरत्नरशनामालेव, नेभोमन्दारकुसुममञ्जरीव, रतिनखमार्जनरत्नशलाकेव, रत्नशुक्तिरिव कुसुमकेतोरिन्द्रधनुर्लता रराज। ६५१) अतिवेगनिपीतजलधिशङ्खमालामिव बलाकाच्छलादुद्रमन्नि- वादृश्यत जलधरनिकरः। आपीतहरितैः कृष्णासु केदारिकाकोष्टिकासु समुत्फलद्भिर्जातुशवलैरिव द१रैर्विद्युता समं चिक्रीड वर्षाकालः । H शरीरस्थितिहेतुमाहार । शरीरस्थितिहेतुमशन । २. र कच्छोपान्तवन । H कियन्त काल । K कालमनेक निनाय । H सन्नद्धनिम्नगानदः । K समारूढशरजन्मा । A हलधृतिकर. 1 H, K हलिधृतकर. । Hc adds रावण इव समेघनादो विन्ध्यगिरिरिव सघन । K adds लङ्केश्वर इव समेघनादो विन्ध्य इव घनश्याम । K विभिन्न कानननीले . कनकरलनौकेव । H जलदलक्ष्मी । K जलदकाल० । A दत्तनखक्षतालीव । H, K दत्ता । H नखक्षतावलीव । K गगनलक्ष्मीवन्धुरशना । H नभोमन्दारतरुसुन्दरकलिकामालेव । K नभोमन्दारसुन्दरकलिकेव । १२ र रत्नमयी विलासयष्टिरिव । १३ H, K समुत्पतद्भिः । but K समुत्पतद्भिर्द१रशिशुकैर्जातुर्नयतैरिव । " १ ३ ४ ६ ८ १० " ६५१६.५२ ] वासर्वदचा-नाम-कथा [४९ विदीपकजलनिचयनिकषोपले इव मेघे समयसुवर्णकारनिकषित- सुवर्णलेखेव तडिदशोभत । विरहिणां हृदयं विदारयितुं करपत्रमिव कुसुमायुधस्य क्रकचच्छद्मशोभत । जलदारुणि लोलतडिल्लतापत्र- निपातविदारिते वेगधूताश्चूर्णचया'इव जलरेणवो बभुः। विच्छिन्न- दिग्वधूहारमुक्त इव खरपवनवेगभ्रमितघनघरघनसञ्चूर्णितास्तारा- निकरा इव भुवनविजिगीषोर्मकरध्वजस्य प्रस्थानलाजाञ्जलय इव करका व्यराजन्त । ५२) अनन्तरमखञ्जखञ्जरीटे अकुञ्चितक्रौञ्चसञ्चारे, निर्भरभरद्वाज- द्विजवाचाटविटपे', पात्रभ्रान्तशुककलमकेदारे, प्रवेशितावेशिकराज- हंसे, कंसारिदेहातिद्युतले, हंसतूलतुलितराजज्जलमुचि, सन्द्रिी- कृतेन्दुमहाकामुकमुदि, मधुरमधुतृणवीरुधि, सरससारसरसितंसार- कासारे, कशेरुकन्दलुब्धपोत्रिपोतपौत्रोत्खाततटतडागसञ्चरन्माएं- पुत्रिकापत्रीपटलमधुरसाध्वनिविहितमुदि, कथितकदम्बे कम्बुद्विषि, प्रसृतविसप्रसूने, चकितचातके, विरलवारिदे, तारतरतारके, वारुणी- चारुचन्द्रमसि, स्वादुरससलिले, स्फुरितशफरतकुंवकोटे, धूकमण्डूक- मण्डले, सङ्कोचितकञ्चुकिनि, काञ्चनच्छेदगौरशालिनि, क्रोश- K रविदीपंकजलितमेघनिकषोपले। २ र केतकीपुष्पमशोभत । ३ H, K तडिल्लताकरपत्रदारिते । K जलकणाः । Hc and K add « नवशाल सेन्द्रगोप महीमहिलाया शुकाशश्यामल लाक्षारसाङ्कित स्तनोत्तरीयमिवालक्ष्यत । मेघकुम्भसलिलै पृथिवीनायिका स्नपयित्वा प्रावृट्चेटिकाया गताया स्वच्छाम्बरं दर्शयन्ती शरच्चेटिका समाजगाम । ६ H, K पटु (तर) प्रभप्रभाते । K उद्घान्तशुककुलकलकलसङ्गुलकलमकेदारे, प्रवेशितराजहसे। A, B, K हसकुलतुलित० । A मन्दीकृतेन्द्रमहाकार्मुक० । र सान्द्रीकृतेन्दुमहसि, गामुकजनमृदितमधुतृणवीरुधि । H, K सुरससार० । H मत्स्यपुत्रिका | H accepts it against his mss A, C, D, E, F, H. H बकानोके । K बकालिके । K धूक० । K कशेरुकन्दलुब्धपोत्रिपात्रोत्खातसरस्तरभागे, चकितचातके, विरलवारिदे, तारतरतारके, वारुणीतिलकचन्द्रमसि स्वादुतरसलिले स्कुरितशफरकवलननिमृतबकालिके । "१ १ ८ । - - १० ११ । १२ ।
। ५०] महाकवि-सुबन्धु - विरचिता [ $५२६५३६५४६५५ दुत्क्रोशे, सुरभिगन्धिसौगन्धिकगन्धहारिहरिणाश्वे कुमुदामोदिनि कौसुदीकृतमुदि, निबर्हवहिणि, कूजत्कोयष्टिके, धृतधार्तराष्ट्र, हृष्ट- कलमगोपिकागीतसुखितमृगयूंथे, कथाकृतकिंशुके, म्लापितमालती- लतामुकुले, बन्धूकबान्धवे, सञ्जातकमुञानके, विसूत्रितसौत्रामण- धनुषि, स्मेरकाश्मीररजापिञ्जरितदिशि, विकस्वरसरे शरत्सम- यारम्भे कन्दपंकेतुः परिभ्रमन् शिलामयीं पुत्रिकां कौतुकेन, मोहेन, शोकेन, वेगेन स्वप्रियानुकारिणीति हस्तेन पस्पर्श । ६५३) अनन्तरं स्पृष्टमात्रा सा शिलामयीं मूर्तिमुत्सृज्य, पुनर्वासव- दत्तास्वरूपमापेदे । तामवलोक्य कन्दर्पकेतुरमृतार्णवमग्न इव सुचिर- मालिङ्ग्य पप्रच्छ । प्रिये कथय किमिदं वृत्तान्तम् । ६५४) सा तु दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य कथयितुमारेभे। आर्यपुत्रा- पुण्याया मम मन्दागिन्याः कृते महाभाग उज्झितराज्य इति एकाकी जन इव वाङ्मनसयोरगोचरं दुःखमनुभूतवान् । अनेकदिवसानाहार- शून्यतया कृशतरो निद्रान्ते यदि कदाचित् फलमूलादिकं मिलति तदा शरीरस्थितिं करोतीति विचिन्त्य फलान्वेषणायोपवनतरूनवलोकयन्ती कतिपयनल्वगोचरमगच्छम् । ६५५) क्रमेण च गुल्मान्तरितक्रियमाणकायमानिकं, विरच्यमानेश्वर- K दरदलितकुमुदामोदिनि । K निर्गलितवहवहिणि । ३ र धृतधृतिधार्तराष्ट्रे । H reads after this as - कथीकृतयूथिते म्लायमानमालतीमुकुले सुजातके । K • मृगयूथे, विसूत्रितशतमखधनुषि, स्मेरकाश्मीररज पिञ्जरितदशदिशि विकस्वर- कमले वन्धूकवान्धवे शरत्समयारम्भे विजृम्भमाणे कन्दर्पकेतुस्तत इत दृष्ट्वा मम प्रिया ...णीति करेण पस्पर्श । B अथ शिलास्वभावमुत्सृज्य । H, K शिलाभावमृत्सृज्य । र प्रत्युवाच । K महाभागो भवानुत्सृष्टराज्य एकाकी परिभ्रमन् . अवाङ्मनसगोचरं ..अनुवभूव । अथोपवासादिना कृशतरो मूलफलादिनार्यपुत्र आहार करोतीति विचिन्त्य । K उपवासादिना तृषातुरे भवति निद्राधान्ते प्रथमप्रबुद्धाह भवत फलमूलादिकमाहरिष्यामीति विचिन्त्य । ९ K omits तरुगुल्मान्तरित ....विपणिकेतुवश । and instead' has 374 Totes तरुगुल्मान्तरित सेनानिवेश दृष्ट्वा । H Pमानिकनिकेतन ।। १ २ ...सजात- ५ ६ १० -- -- ६५५६५६ ] वासवदत्ता नाम कथा [ ५१ गृहं, अवतार्यमाणकण्ठालक, आरभ्यमाणपटुकटुकं, व्यवस्थाप्यमान- वेश्यासंनिवेश, श्रूयमाणतुरगहेषारवं, वाद्यमानविश्रामढक्कापुष्कर, अन्विष्यमाणस्वादुसलिलाशयं, उद्दिश्यमानविपणिकेतुवंश, सेना- सन्निवेशमपश्यम् । तमवलोक्याहमचिन्तयम् । किमयं ममान्वेषणाय तातस्य व्यूह आहोस्विदार्यपुत्रस्य वाहिनीसम्भार इति चिन्तयन्त्यां मयि परिचारककथितोदन्तोमामुद्दिष्य सेनापतिर्धावितः। ततोऽनन्तरं किरातसैन्यसेनापतिस्तादृश एव सेनासमन्वितो मृगयाव्याजेनागतः सोऽपि धावितः। ५६) अनन्तरं चिन्तितं मया। यद्यहमार्यपुत्राय कथयामि तदा एकाकी एभिरवश्यमेव हन्तव्यः। अथ न कथयामि तदाहमेवेभिहन्त- व्येति चिन्ताक्षण एव द्वयोः सैन्ययोयुद्धमभूदेकामिषाभियुक्तयोर्गु- ध्रयोरिव । ततः प्रवृत्तप्रतिशरासारदुर्दिनहृतदिनकरकिरणे, रथकर्म- विशारदहिरैदकरदूरोत्क्षिप्तखड्गधरसुभटाश्लिष्यमाणविद्याधरविभ्रमे, समरदर्शनसश्चरदनेकनभश्चरचारणचक्रवॉले, वेतालसमानान्तस्कन्ध- कवन्धचक्रक्रियमाणचारुप्रचारे, चारभटखड्गखण्डितद्विरदपादसमाप्त- पिशाचीकोलूखलाभरणकौतुके, सैंमुत्फुल्लफलकिनि, नदन्नान्दीके, १ २ ३ H ०पटकुटीक । H and K omit तमहम...यम् । K ममाकर्षणाय । H व्यूह समायात' । ५ म आर्यपुत्रस्य । K आर्यपुत्रव्यूहः । ६ H इति विचारयन्ती मा । K इति चिन्तयन्ती मा । H, K चारकथितवार्तः । K धावति स्म । ९ ततोऽन्य किरातसेनापतिस्तादृश एव तयाभूतया सेनयान्वितो मृगयां गतः सोऽपि तच्छृत्वा धावति स्म । Instead of अनन्तर चिन्तित मया......Hध्रयोरिव K reads अथैकामिषलुब्ध- योध्रयोरिव तयोर्युद्धमासीत् । ११ H द्विरददन्तद्वयो० । K द्विरददूरोत्क्षिप्त० । १२ -H ०नभश्चरचारण० । १३ K चकवाले चरञ्चारुभट......भरणकौतुके । १४ H समुत्पतदतिनिनदनान्दीके । K कौतुकाकृष्टजनकृतवदननान्दीके । . ।
१ ६२] महाकवि-सुबन्धु-विरचिता [६५६६५७६५८ कान्दिशीकभीरुणि रेणखले, सृगालीप्रार्थनीयेष्वामिषपिण्डेष्वित्र वत्स- दन्तक्षतेषु तृणेष्विव, जिह्मगदष्टेष्विव शरीरेष्वनास्थां कलयन्तः, समं हिषां धनुषां च जीवाकर्षणं चक्रुः। ६५७) त्यागिन इव दानवन्तो मार्गणसन्तापमसहन्तः महामृगाः उत्कुपिता इव क्षमां मुञ्चन्तस्तुरगा रेजुः । कर्णाभ्यां पैरपरिवाश्रवण- कुतूहलिभ्यां, नेत्राभ्यामालोकितसाधुविपत्तिभ्यां, मी चास्थाने प्रणमता त्यक्तोऽहमिति हर्षादेव ननत चिरं कवन्धः । ६५८) ततः परिहासेनेव चक्षुषी पिद्धता परापवादश्रवणारुणेव श्रोत्रवृत्ति स्थगयता, सोन्मादेनेव वायुवेगविक्षिप्तेन, पलितङ्करणेनेव सुरयोषितां, अन्धङ्करणेनेव योधानां, तिमिरेणेव समरप्रदोषस्य, पति- तेनेव विमुक्तगोत्रेण, मीमांसकदर्शनेनेव तिरस्कृतदिगम्बरदर्शनेन, सत्पुरुषेणेव विष्णुपदावलम्बिना समरजेन रजसा जजॅम्भे। K प्रस्कन्नक्लीवजने, रणोद्यतजितकाशिनि रणखले, सृगालिकासंगालप्रार्थनीये० । २ H, K omit वत्सदन्तक्षतेषु तृणेष्विव । ३ र श्वित्रदुर्भगेष्विव शरीरेषु । H जीवाकृष्टिं योधाश्च । K जीवाकर्षण योधाश्चक्रु । H, ( मार्गणसम्यातमसहन्तः । समृद्धविलासिन इव शृङ्गारशोभिता सहेमकक्षाश्च (K सहेम- कक्ष्याश्च ) सदारामा इव कदलीराजिताः । निशा (K निशानिवहा) इव नक्षत्रमालोप- शोभिता दिवसा (K शरदिवसा) इव उल्लसत्पुष्करा (K समुल्लसत्पद्मा) महामृगाः वभुः । उत्कुपिता (उत्क्षिप्ता H) पयोधय इवावर्तशोमिन सोर्मयश्च, उद्यानोद्देशा इव समल्लिकाक्षाः कुलालगृहा इव अभिनवभाण्डहारिणः रत्नाकरा इव सदेवमणयो -लेखा इव सेन्द्रधृतयः (सेन्द्रायुधवृद्धयः क्षीवा इव पानभूषिता' - K)। H श्रुतपरपरिवादाभ्या । K श्रुतपरापवादाभ्यां । H, K खलोदयसाधुक्षयसाक्षिभ्यां अक्षिभ्या, अस्थानेऽपि नमता मूर्ना । म विमुक्तोऽहमिति। K नमता मूर्धा कीर्तयता चाकीर्तनीयान्यास्येन च, वियुक्तोऽह दिष्ट्येति हर्षादिव । B, H, K .श्रवणभीरुणा । After विमुक्तगोत्रेण K reads कुनृपतिनेव नक्षत्रपथगामिना, कलिङ्गेनेव कृतधूम्यारुचिना राजसेनेव व्यवहितसत्त्वेन, अविनीतेनेव समुद्धतेन, असजनेनेव पिहितसत्पथेन रणजेन रजोजातेन विजजम्मे । Also Hc, B omit मीमासकदर्शनेन...विष्णुपदावलम्बिना । H adds कश्चिदाम इव रावणवधमकरोत् कश्चित्कृष्ण इव (अनन्तरं च नारायण इव कश्चित् - K) also K- नरकच्छेदमकार्षीत् । कश्चिद्वौद्धसिद्धान्त -इव क्षपितश्रुति- वचनदर्शनोऽभवत् । कश्चित्क्षपणक इव कटावृतविग्रहोऽभवत् । (कश्चित्सुरापद्विज इव पपात । -K) ६ ८ 1 ६५८ ६५९६६० ] वासवदत्ता -नाम-कथा ५३ तत्र समरसम्भारे कश्चिदाशङ्कितोरुभङ्गः सुयोधन इव योधः पयसि विवेशाकश्चिच्छरतल्पशयोभीष्म इव चिराय श्वसनासीत्। कश्चित्कर्ण इव विक्लवीभूतसर्वाङ्गः शक्तिमोक्षणमकरोत् । ततो विध्वस्तध्वजपर्ट पतत्पताक 'च्युतचापचामरापीडं स्खलत्खड्गधेनुकं तत्समस्तसैन्य- मन्योन्य निधनमवाप । ६५९) अनन्तरं यस्याश्रमस्तेन मुनिना पुष्पादिकमादायागतेन प्रतिपन्नसर्ववृत्तान्तेन ममायमाश्रमो भग्न इति शिलामयी भवेति शप्ताहम् । अनन्तरं वराकी बहुदुःखमनुभवताति करुणयार्थपुत्रस्य स्पर्शावधि शापान्तमकरोत् । ६०) ततः कन्दर्पकेतुः समागतेन मकरन्देन वासवदत्तया सह स्वपुरं गत्वा हृदयाभिलषितानि तानि तानि सुरतसुखान्यनुभवकालं निनाय ॥ इति महाकविसुबन्धुविरचिता वासवदत्ता नाम कथा समाप्ता। १ ३ 20 ur K adds कश्चिद्राघव इव रावणवधमकरोत् । २ र व्यूहचारिभटकम्पितखड्गधेनुक तत्समस्तमुभय मिथो जगाम हनन सैन्यम् । H स्खलत्खड्ग निधनमवाप सैन्यम् । K तत' । ५ H, K क्षणेन । H बहुदु खमनुभवन्ती मा विलोक्य आर्यपुत्रकरस्पर्शावधि शापान्तमकरोत् । •K बहुदु खमनुभवतीत्यनुग्रहादार्यपुत्रकरुणया च स मुनिर्याच्यमान आर्यपुत्रहस्तस्पर्शावधिक शापमकरोत् । K श्रुतवृत्तान्तेन समागतेन । H ययाहृदयाभिलषितानि सुखान्यनुभवन् काल निनाय । K हृदयाभिलषितानि सुरलोकदुर्लभानि सुखानि ताभ्या सहानुभवन् कालमनेक निनाय । प्रत्यक्षर लेपमयप्रपञ्चविन्यासवैदग्ध्यनिघि प्रवन्धम् । सरस्वतीदत्तवरप्रसादश्चक्रे सुबन्धु सुजनैकवन्धुः ।। K इति पासवदत्ता समाप्ता । -H इति महाकविसुबन्धुविरचिता वासवदत्ता समाप्ता । Hd इति श्रीवररुचिभागिनेयमहाकविसुवन्धुविरचिता० । Hall's all mss read आख्यायिका Instead of कथा. -- r 1 Appendix 1 Subandhu and Bana (N B - - The references to Harşacharita are from the Nirnaya Sāgar, Bombay, edition 1946 and those to Kadambarl are from Peterson's edition, 1885 ) V P 1 Vasavadattā, page, line, H P 1 – Harşacharita, page, line , K, P 1 -- Kādambari, page, line | भूतिमलिनो . दर्पणमिव तं कुरुते दग्धभूत्या परुषीकृतान राजवल्लभानु- तथा तथा निर्मलच्छायम् । पसर्पतः। H. P. 222. 1 17 V P. 2. 1 6 2 अभूदभूतपूर्वः . . 'क्षमानुगतोऽपि क्षमाभाजः आश्रितनन्दनाः । सुधर्माश्रितो' राजा चिन्ता- H P401.2 मणिर्नाम । V P 3 1. 10 3 पृथुरपि गोत्रलमुत्लारणाद्विस्तारित पृथुरिव पृथिवीपरिशोधनावधान- भूमण्डलः। V P. 4 1 6 सङ्कलितसकलमहीभृत्लमुत्सारणः । H, P. 208 1. 15 4 यस्य च रिपुवर्गः सदा पार्थोऽपि धनञ्जयान्महाभारतरणयोग्यम् । न महाभारतरणयोग्यः । H P. 76. I. 4 V P 5. 1 3 5 मधुरिव नानारामानन्दकरः । तत्र चैवंविधे नानारामाभिरामकुसुम- V. P.5 1. 14 गन्धपरिमलसुभगो यौवनारम्भ इव भुवनस्य। H P. 97. 1. 1 6 तस्य च पारिजात इवाश्रित. क्षमाभाजः आश्रितनन्दनाः । नन्दनः | V. P. 5.1 12. H P. 40. 1. 2 7 a यस्य च. वनलता इवोत्क- उह्यमान इवोत्कलिकाबहुलेन तरुण्य रतिसरसेन । H P. 37. 1. 12 स्पृहयाश्चक्रुः। V. P. 6 1 13 b वसन्तवनराजिग्विवोत्कलिका- बहुलालु। V. P 8.1 14. 8 यस्य च ... करतलताउनभीतैरिव निर्दयकरतलताडनभियेव कापि गते मुकाहारः पयोघरपरिसरो मुक्तः। हृदये। H P. 182. 1. 13 V. P. 6. 1. 19. लिकासहस्रसड्डुलाः [ ५५ 10 । 1 । भ्यां भ्याम् । Appendix 1] वासवदत्ता-नाम-कथा- 9 जघनमदननगरतोरणेन । धर्म (मदन V.L)नगरतोरणस्तम्भ- V. P 9 1 3 विभ्रम विभ्राणा जवाद्वितयम् । H P. 8 1. 11 विधातुरतिपीडयतः हस्तपरामर्श मन्ये च मातङ्गजातिस्पर्शदोषभयाद- जनितपरिक्लेशेनेव क्षीणतरतामुप- स्पृशतेयमुत्पादिता प्रजापतिना अन्यथा गतेन मध्यभागेनालवृताम् । कथमियमक्लिष्टता लावण्यस्य । न हि V. P, 9. 1 10 करतलस्पर्शक्लेशितानामवयवानामीदृशी भवति कान्तिः । K.P 11 122-K P. 12. 1, 2 11 हारलतामृणाललोभनीयचक्रवाका कान्तोच्चकुचचक्रवाकयुगलविपुल- उद्भासमानां स्तना पुलिनेनार स्थलेन । V. P 10 1 5 H. P. 22 1 18 12 दशनरत्नतुलादण्डेन नयनसेतुसमु आयतनयननदीसीमान्तसेतुबन्धेन द्धतबन्धेन यौवनमन्मथचारणवरण्ड- ललाटतटशशिमणिशिलातलगलितेन केनेव नासावंशेन परिष्कृताम् । कान्तिसलिलस्रोतसेव द्राधीयसा नासा- V P. 10 1 16 वंशेन शोभमानम् । HP. 22 1.6 13 स्तम्भनचूर्ण मिवेन्द्रियाणां वशीकरणमन्त्रमिव मनसः, स्वस्था- कन्यकामपश्यत्स्वप्ने । वेशचूर्णमिवेन्द्रियाणाम् । V. P. 11. 1.9 H P 23. 1. 18 14 अथ तां प्रीतिविस्फारितेन पिव अथ सरस्वती प्रीतिविस्फारितेन निव चक्षुषा । चक्षुपा प्रत्यवादीत् । V, P. 11. 1. 14 H P 36 1 11 15 रतकील श्व जघन्यकर्मलग्नोऽपि जघन्यकर्मलग्नमात्मानं ताडयतः । हेपयति साधून् । H. P 222 1 14 V. P. 12. 1. 21 16 तदधुना यदि त्वं सहपांसुक्रीडित सहपांशुक्रीडापरिचयपेशलः प्रेया- समंदुःखसुखोऽसि तदा मामनु- सखीजनः । HP 17. 1 10 गच्छेत्युक्त्वा . पुरानिर्जगाम । V. P 13.1 16 17 a अकुलीनोऽपि सद्वंशभूपितः । दिव्ययोषितमिवांकुलीनाम् । V P. 14 1 18 K. P. 11.1 15 b,अम्लानजातिविभूपितामपि विरुद्धवंशाम् । V. P. 40. I. 18 । "- - 2 . ५६] वासवदत्ता -नाम-कथा [ Appendix 1 c द्विजकुलभूपितामप्यकुलीन- वंशाम् । V P 41. 1 2 18 a यायजूकेनेव सुरतार्थिना । असुरश्रीरिव सततनिन्दितसुरता। V. P 18 1 12 KP 12 13 b मानुषमिवाभिनन्दितसुरतम् । V. P.36 1 6 19 जातिहीनता दुष्कुलेषु न पुष्प- मधुमासकुसुमसमृद्धिमिव विजा- मालासु। V. P. 20. 1. 19 तिम् । K. P. 11.1 17 20 पुलोमतनयेवानन्दितसहस्रनेत्रा सहस्रनेत्रदर्शनयोग्यां-दुहितरम् । वासवदत्ता नाम तनया बभूव । H. P 135 1.2 V. P. 21. 1. 14 21 अथैकदा तु विजृम्भमाणसहकार- टड्कारक्रियमाणसंज्वरे । कोरकनिकुरुम्बनिपतितमधुकरमा- H P. 209. 1. 4 लामदहकारजनितपथिकसंज्वरः । V P 21 1. 18 22 कैवर्त इव घद्धराजीवोत्पलमालः । अवधतानेहसा च तत्रैवायमानन्दित- V P 22 1. 12 ज्ञातिवर्गो बालस्तारकराज इव राजीव- लोचनो राजगृहे । H P. 26 1. 16 23 केचित्पाण्डुपुत्रा इवाक्षहृद्याज्ञान वलं अवशाक्षहृदयं कलिरभिभूत- हतक्षमाः। V. P 24 1 13. बान् । H P. 89 11 24 a यौवनसागरतरङ्गपरम्परापरि तरन्तमिव यौवनोदधिम् । गतेव । V. P. 26 1,6 HP 139 1.3 b अहो प्रजापते रूपनिर्माणकौश अहो विधातुररस्थाने रूपनिष्पादन- शलमिदम् । V. P 25 1 10 K P. 11 120 25 द्विजकुलमिव श्रुतिप्रणयी तदीक्षण श्रुतिप्रणयिमिः प्रणवैरिव कर्णाव- युगलम् । V P 27. 1 9 तंसकुसुममधुकरकुलैरुपास्यमाना । H. P.9 16 26 धन्यानि तानि स्थानानि ते च पुण्यभाजि भजन्ति अभिख्यामक्ष- जनपदाः, पुण्यनामाक्षराणि च राणि । तानि सुकृतभाजि। H. P. 25 1.19 V. P. 27. 1. 13 27 अत्रान्तरे भगवानपि मरीचिमाली अत्रान्तरे सरस्वत्यवतरणवार्तामिष एवं वृत्तान्तमिव कथयितुं मध्यमं कथयितुं मध्यमं लोकं अवततारांशु- लोकमवातरत् । V P. 28. 1 7 मालिः। H P. 14. 13 प्रयत्नः । 1 है - Appendıx 1 ] वासवदत्ता-नाम-कथा [ ५७ 28 अथ वासरताम्रचूडचक्राकारः चक्र पाटलितवपुष्युदयाचलचूडामणौ वाकचक्रसङ्क्रमितसन्तापतयेव म- जरत्कृकवाकुचूडारुणपुरःसरे । न्दिमानमुद्वहन्मन्दारस्तबकसुन्दरः। H P. 18. 1.2 V. P. 28. 1 9 29 a मधुपूर्णकपाल इव कालकपालिनः। रुद्रभिक्षादानशौण्डपुरमथनमुक्तमुण्ड- V. P. 28. 1 14 शिरानाडिरुधिरपूरणशोणितकपिल क- पालकपर इव पैतामहः । H P. 257. 1 15 b नायमुपदेशकालः । पच्यन्त इवा दूरातीतः खलूपदेशकालः । हानि क्वथ्यन्त इवेन्द्रियाणि । पच्यन्त इव सेनानि । उत्क्वथ्यत इव V. P. 13. 1 14 हृदयम् । K P. 156 1.6. 30 क्रमेण च रजोलुठितोत्थितकुलाया चाणोऽपि नित्य चौतारकृटकोम- थिकलहविकलकलविङ्ककुलकलकल- लातपत्विषि निर्वाति वासरे, अस्ताचल- वाचालितशिखरेषु शिखरिषु, चस कूटकिरीटे निचुलमञ्जरीभासि तेजांसि तिसाकाङ्क्षपु ध्वाङक्षेषु, अनवरत- मुञ्चति वियन्मुचि मरीचिमालिनि, अति- दह्यमानकालागुरुधूपपरिमलोद्गारेषु रोमन्थमन्थरकुरनकुटुम्बकाध्यास्थमान- वासागारेषु, दूर्वान्विततटिनीवद्ध- म्रदिष्ठगोष्ठोनपृष्ठास्वरण्यस्थलीपु, शो- गोष्ठीकविदग्धजनप्रस्तूयमानकथा- काकुलकोककामिनीकूजितकरुणासु तर- श्रवणोत्सुकशिशुजनकलकलनिवार- गिणीतटीषु, वासविटपोपविष्टवाचा- णकुपितश्रद्धेपु वृद्धेपु, आलोलिका- टचटकवक्रवालेण्चालवालावर्जितसेकज- तरलरसनाभिः कथितकथाभिर्जर- लकुटेपुनिष्कुटेषु, दिवसविहतिप्रत्यागतं तीभिरतिलघुकरताडनजनितसुखे, शिशयिषमाणशिशुजने, विरचितक- प्रसृतस्तनं स्तनन्धये धयति धेनुवर्ग- मुद्गतक्षीरं क्षुधिततर्णकवाते, क्रमेण चा- न्दर्पमुद्रासु क्षुद्रासु, कामुकजनानुब- स्तधराधरधातुधुनीपूरप्लावित इव लो- ध्यमानदासीजनविविधाश्लीलवच- हितायमानमहसि मजति सन्ध्यासिन्धु- नश्रुतिविरसीकृतसन्ध्यावन्दनोपवि- पानपाने पात्तने मण्डले, कमण्डलुजलशु- प्टेषु शिष्टेषु, रोमन्थमन्थरकुरङ्ग- चिशयचरणेषु चैत्यप्रणतिपरेपु पाराश- कुटुम्बकाध्यास्यमानम्रदिष्ठगोष्ठीन- रिपु, यक्षपात्रपवित्रपाणौ प्रकीर्णबहिष्यु- पृष्ठास्वरण्यस्थलीपु, निद्राविनि- तेजसि जातवेदसि, हवीपि वषट्कुर्वति द्राणद्रोणकुलकलितकुलायेवाराम- यायजूकजने, निद्राविगाणद्रोणकुलक- तरुपु, निर्जिगमिषति जरत्तरकोटर- लिलकुलायेषु कापेयविकलकपिकुलेष्वा- कुटीरकुटुम्बिनि कौशिककुले तिमिर- तर्जननिर्गतासु दहनप्रविष्टदिनकर- रामतरुपु निर्जिगमिपति जरत्तरुफोटर- किरणासु इव स्फुरन्तीपु दीपले- कुटीरकुटुम्बिनि कौशिककुले मुनिकर- खासु, मुखरितधनुपि वर्षति शरनि- सहस्रप्रकीर्णसन्ध्यावन्दनोदविन्दुनिकर 1 वता ५८] महाकवि-सुवन्धु-विरचिता [ Appendix 1 करमनवरतमशेपसंलारशेमुषीमुषि- इव दन्तुरयति तारापथस्थली स्थवीयसि मकरध्वजे सुरतारम्भाकल्पशोभिनि, तारकानिकुरुम्बे अम्बराश्रयिणि शर्व- शम्भलीभापितभाजि भजति भूषां रीशबरीशिखण्डे, खण्डपरशुकण्ठकाले भुजिष्यजने, सैरन्ध्रीवध्यमानरश- कवलयति बाले ज्योतिःशेषं सान्ध्यमन्ध- नाजालजल्पाकजघनासु जनीपु, कारावतारे, तिमिरतर्जननिर्गतासु दहन- विश्रान्तकथानुबन्यतया प्रवर्तमान- प्रविष्टदिनकरकरशाखास्विव स्फुरन्तीपु कथकजनगमनत्वरेषु चत्वरेषु, समा- दीपलेखासु, अररसम्पुटसक्रीडनकथि- चासितकुक्कुटेपु निष्कुटेपु, कृतयष्टि- तावृत्तिष्विव गोपुरेपु, शयनोपजोषजुषि समारोहणेपु बहिणेषु विहितस- जरतीकथितकथे शिशयिषमाणे शिशु- ध्यासमयव्यवस्थितेषु गृहस्थेषु, जने जरन्महिषमषीमलीमसतमसि जनि- सङ्कोचोदञ्चदुच्चकेसरकोटिसङ्कट- कुशेशयकोशकोटरकुटीरशायिनि तपुण्यजनप्रजागरे विजृम्भमाणे भीषण- पट्चरणचक्रे, अथानेन प्रवर्तता तमे तमीमुखे मुखरितविततज्यधनुषि [वर्मना] भगवता भानुना [आ] वर्षति शरनिकरमनवरतमशेषसंसार- गन्तव्यमिति सर्वपट्टमयैर्वसनैरिव शेमुषीमुषि मकरध्वजे रताकल्पारम्भ- मणिकुट्टिमाभिविरचितवरुणेन, भग- शोभिनी शम्भलीभाषितभाजि भजति कालेन कृत्तस्य दिवस- भूपां भुजिण्याजने सैरन्ध्रीवध्यमानरश- महिपस्य रुधिरधारेव, विद्रुम- नाजालजल्लाकजघनासु जनीषु . . । लतेवाम्बरमहार्णवस्य, रक्तकमलि- (H. P. 80 18 नीव गगनतडाकस्य, काञ्चनसेतु- H P 81 1 11) रिख कन्दर्पस्य, मतिष्ठारागारुण- पताकेव गगनहर्यतलस्य, लक्ष्मी- रिव स्वयंवरगृहीतपीताम्बरस्य, भिक्षुकीव तारानुरागरक्ता, रक्ता- म्बरधारिणीव भगवती समदृश्यत। (V. P. 28 1. 20 -V. P. 30 1 2.) अत्रान्तरे सरस्वत्यवतरणवार्तामिव कथयितुं मध्यम लोकमवततारांशुमाली। क्रमेण च मन्दायमाने ...वासरे. सायन्तने तनीयसि निशानिःश्वासनिमे नभस्वति सोचोदञ्चदुश्चकेसरकोटी- सङ्कटकृशेशयकोशकोटरकुटीशायिनि पटवरणचके .....सावित्री. सरस्वतीमवादीत् । (H P. 14 1.3- H. P. 16 1 10.) सन्ध्या .
Appendix 1 ] वासवदत्ता-नाम-कथा [५६ 31 क्षणेन च सन्ध्याताण्डवडम्बरो नृत्योद्धृतधूर्जटिजटाटवीकुटजकुड्म- च्छलितमहानट जटाजूटकूटकुटिल- लनिकरनिर्भ .....तारागणे । विवरवर्तिजहुनुकन्यावारिधारावि- H. P. 15. 1. 10 न्दर इव विकीर्णाः । V. P. 31. 1 8. 32 अनन्तरं बालपुलिनमिव निशा- प्रतनुतुहिनकिरणकिरणलावण्यालो- यमुनायाः ...ग्रहपतिरुजगाम कपाण्डुन्याश्याननीलवीरमुतकालिन्दी- V. P. 33 1 5. कूलबालपुलिनायमाने शातक्रतवे क्रश- यति तिमिरमाशामुखे । H. P. 15.1 14. 33 क्रमेण च. सुरतभरखिन्नपुलि वनदेवता कुचांशुकापहरणपरिहास- न्दसुन्दरीस्वेदजलकणिकापहारिणी स्वेदिनेव सावश्यायशीकरे...वनानिले। प्रतिवाति सायन्तने तनीयसि नि- H P 117. 1 1 शानिःश्वासनिमे नभस्वति । V P.35 18 सिद्धपुरपुरन्ध्रिधम्मिलमल्लिकागन्ध- ग्राहिणि सायन्तने तनीयसि निशा- निःश्वासनिभे नभस्वति । H P. 15. 1. 8. - 34 तारामिव गुरुकलनोपशोभितां वा- सवदत्तां ददर्श । V P. 38 1 16 पृथुकलत्रश्रियो यत्र च ..... प्रौढाश्च प्रमदाः । H P. 98. I. 3. N 35 तारातण्डुलशवलं नभोऽङ्गणं स्फुर जरत्कृकवाकुचूडारुणारुणपुरस्सरे दरुणतरुणचूडाचारुवदने वासर- विरोचने । कृकवाको चरितुमवतरति । H P. 18 1.3. V P. 41.1 15 36 अनन्तरं कतिपयनल्वशतमध्वानं अस्ति पूर्वापरजलनिधिवेलावन- गत्वागस्त्यवचनसमाहृतब्रह्माण्डगत- लग्नामध्यदेशालङ्कारभूता मेखलेव भुवो शिखरसहस्रः, कन्दरान्तरलतागृह- वनकरिकुलमदजलसेकसंवर्धितैरतिवि- सुखप्रसुप्तविद्याधरमिथुनगीताकर्ण- कचधवलकृसुमनिकरमत्युच्चतया तारा- नसुखितचमरीगणमारणोत्सुकित- गणमिव शिखरदेशलग्नमुद्वहद्भिः पाद- शवरशतसम्बाधकक्षतटः, कटककरि- पैरुपशोभिता मदकलकुररकुलदश्यमान- कराकृष्टभग्नस्यन्दमानहरिचन्दना- मरिचपल्लवा करिकलभकलमृदिततमा- पल्लवमचयेन - ६०] महाकवि-सुबन्धु-विरचिता | Appendix 1 मोदवाहिगन्धवाहसुरभितशिलातल', लकिसलयामोदिनी मधुमदोपरक्तकेरली- सुदूरपतनभग्नतालफलरसाईकर कपोलकोमलच्छविना सञ्चरद्धनदेवता- तलास्वादसोत्सुकशाखामृगकदम्ब चरणालक्तकरक्षितेनेव कः, प्रलम्वमाननिझरवरसविधोप- सञ्छादिता शुककुलदलितदाडिमीफल- विष्टजीवञ्जीवकमिथुनलिह्यमानवि- द्रवार्दीकृततलैरतिचपलकपिकम्पित- विधफलरसामोदसुरभितपरिसरः, कोलच्युतपल्लवफलशवलैरनवरतनिष- सरभसकेसरिसहस्रखरनखरधारा तितकुसुमरेणुपांनुलैः पथिकजनरचित- विदारितमत्तमातगकुम्भस्थलग- लवगपल्लवनस्तरैरतिकठोरनारिकेलकेत- लितमुक्ताफलशवलशिखरतया शि- कीकरीरकेसरपरिगतप्रान्तैस्ताम्बूलील- रोलग्नं तारागणमिवोहहन् , सुग्रीव- तावनद्धपूगखण्डमण्डितैर्वनलक्ष्मीवासभ- ऋक्षगवयशरभकेसरिकुमुदसेव्यमा- वनर्विराजिता लतामण्डपैन्मदमात- नपादच्छायः, पशुपतिरिव नागनिः- हकपोलस्थलगलितमदसलिलसिक्तेनेव श्वाससमुत्क्षिप्तभूतिः, जनार्दन इव निरन्तरमेलालतावनेन मदगन्धिनान्ध- विचित्रवनमालः, सहसकिरण इव कारिता नखमुखलग्नेभकुम्भमुक्ताफल- सप्तपत्रस्यन्दनोपेतः, विरूपाक्ष इव लुब्धैः शवरसेनापतिभिरभिहन्यमानके- सन्निहितगुहः शिवानुगतश्च, कामीव सरिशता प्रेताधिपनगरीव सदासंनिहित- कान्तारोपरलानुगतः समदनश्च, मृत्युभीपणा महिपाधिष्ठिताच समरोद्य- श्रीपर्वत इव सन्निहितमल्लिकार्जुनः, तपताकिनीव बाणासनारोपितशिली- नरवाहनदत्त इव प्रियङ्गश्यामा- मुखा विमुक्तसिंहनादा च कात्यायनीव सनाथः, शिशुरिव कृतधात्रीधृतिः, प्रचलितखगभीपणा रक्तचन्दनालङ्कृता वासरारम्भ इवारुणप्रभापाटलित च कर्णीनुतकथेव संनिहितविपुलाचला पत्रवनराजिः, कृष्णपक्ष इव बहुलता- शशोपगता च कल्पान्तप्रदोपसन्ध्येव गहनः, कर्ण इवानुभूतशतकोटी- प्रवृत्तनीलकण्ठा पल्लवारुणा चामृतमथ- दानः, भीष्म इव शिखण्डीमुक्तैरर्ध- नवेलेव श्रीमोपशोभिता वारुणीपरि- चन्द्रराचितः, कामसूत्रविन्यास इव गता च प्रावृडिव घनश्यामलानेकशतह- मल्लनागघटितकान्तारसामोदितः, दालङ्कृता च चन्द्रमूर्तिरिव सततमृक्ष- हिरण्यकशिपुरिव शम्बरकुलाश्रयः, सार्थानुगता हरिणाध्यासिता च राज्य- गैरिकरागव्याजादुपरिरविरथमार्ग- स्थितिरिव चमरमृगवालव्यजनोपशोभिता मार्गणार्थमिवारुणेनोपास्यमानः, समदगजघटापरिपालिता च गिरितनयेव शिखरगतसूर्याचन्द्रमस्तथा विस्ता- स्थाणुसगता मृगपतिसविता च जान- रितविलोचनोऽगस्त्यमार्गमिवोद्वी कीव प्रसूतकुशलवा निशाचर परिगृहीता क्षमाणः, स्नस्तान्त्रनाल इव जरदज- च कामिनीव चन्दनमृगमदपरिमल- गरभौगैः, कुम्भकर्ण इव दन्तान्तरा- वाहिनी रुचिरागुरुतिलकभूषिता च लगतवानरव्यूहः, पिण्डालक्तकाङ्कि- सोत्कण्ठेव विविधपल्लवानिलवीजिता तपदपङ्क्तिसूचितसञ्चरितशचीपति- समदना च बालग्रीवेव व्याघ्रनखपङ्क्ति- वारविलासिनीसङ्केतकेतकीमण्डपः, मण्डिता गण्डकाभरणा च पानभूमिरिव अकुलीनोऽपि सद्वंशभूषितो, दर्शि प्रकटितमधुकोशकशता प्रकीर्णविविध- + - 1 , Appendix-1 ] वासवदत्ता- कथा नाम ताभयोऽपि मृत्युफलदायी, सप्र कुसुमा च क्वचित्प्रलयवेलेव महावराह- स्थोऽप्यपरिमाणः, सनदोऽपि दंष्ट्रासमुत्खातधरणिमण्डला कचिद्दश- निःशब्दः, भीमोऽपि कीचकसुहृत , मुखनगरीव चटुलवानरवृन्दभज्यमान- पिहिताम्बरोऽप्युल्लसदंशुको विन्ध्यो तुगशालाकुला क्वचिदचिरनिर्वृत्तविवाह नाम महागिरिरदृश्यत । भूमिरिव हरितकुशसमित्कुसुमशमीप- (V P 13 1 18-V P 14 1.21) लाशशोभिता क्वचिदुद्वृत्तमृगपतिना- दभीतेव कण्टकिता क्वचिन्मत्तेव कोकिल- कुलप्रलापिनी क्वचिदुन्मत्तेव वायुवेगकृत- तालशब्दा क्वचिद्विधवेवोन्मुक्ततालपत्रा क्रमेण च जागलकवलाभिलाष- क्वचित्लमरभूमिरिव शरशतनिचिता मिलितनिःशङ्कशकुनिकुलसङ्घलेन क्वचिदमरपतितनुरिव नेत्रसहस्रसङ्घ- अर्धदग्धचिताचक्रसिमिसिमायमान- ला क्वचित्पार्थरथपताकेव वानराकान्ता विकटकटतृष्णाचटुलकटपूतनोत्ताल- क्वचिदवनिपतिद्वारभूमिरिच नेत्रलता- वेतालरवभीषणेन, शूलशिखरारोपि शतदुष्प्रवेशा क्वचिदम्बरश्रीरिक व्याधा- तशङ्कितवर्णकर्णनासिकाच्छेदरुधिर- नुगम्यमानतरलतारकमृगा क्वचिद्- पटलपतितभावारिभम्भरालीसम्भा- गृहीतव्रतेव दर्भचीरजटावल्कलधारिण्य- रभरितभूमिभागवीभत्सेन, कटाग्नि- परिमितबहुलपत्रसंचयापि सप्तपर्ण- दह्यमानपटुचटन्नृकरोटिटवारभैरव- भूषिता क्रूरसत्त्वापि मुनिजनसेविता रवेण,शूलपाणिनेव कपालबलिभस्म- पुष्पवत्यपि पवित्रा विन्ध्याटवी नाम । शिवावह्निभूतिभूजगावरुद्धदेहेन, पु- (K. P. 19. I 1-K P 20 I 15) रुपातिशयेनेवानेकमण्डलकृतसेवेन श्मशानवाटेन गत्वा निमेषमात्रादि- वानेकशतयोजनं, प्रलयकालवेला- मिव समुदितार्कसमूहां, नागराज्य- स्थितिमिवानन्तमूलां, सुधर्मामिव स्वच्छन्दस्थितकौशिकां, सत्पुरुष- सेवामिव श्रीफलाट्या, भारतसमर- भूमिमिव दूरप्ररूढार्जुना, पुलोमकुल- स्थितिमिव सहस्रनेत्रोचितेन्द्राणिकां, शूरपालचित्तवृत्तिमिव फलितगणि- कारिकां, सजनसम्पदमिव विक- सिताशोकसरलपुन्नागां, शिशुजन- लीलामिव कृतधात्रीधृति क्वचि- द्राघवचित्तवृत्तिमिव वैदेहीमयीं, कचित्क्षीरसमुद्रमथनवेलामिवोज्जृ- म्भमाणामृतां, क्वचिन्नारायणशक्ति- मिव स्वच्छन्दापराजिता, क्वचिद्वा- - . + .. ] ननाश । ६४] महाकवि-सुबन्धु-विरचिता [ Appendix 1 38 तथाहि । गुरुदारहरणं द्विजराजो 'तात वाण द्विजानां राजा गुरुदार- ऽकरोत् । पुरुरवा ब्राह्मणधनतृष्णया ग्रहणमकात् ि। पुरुरवा ब्राह्मणधन- विननाश । नहुपः परकलत्रदोहदी तृष्णया दयितेनायुशा व्ययुज्यत । नहुपः महाभुजग आसीत् । ययातिराहि- तपाणिग्रहणः परकलत्राभिलापी महाभुजङ्ग आसीत् । पपात । सुहम्नः स्त्रीमय इवाभवत् । सोमस्य प्रख्या- ययातिराहितब्राह्मणीपाणिग्रहणः पपात। ता जन्तुवधनिपुणता । पुरुकुत्सः सुशुम्नः स्त्रीमय एवाभवत् । सोमकस्य कुत्सित इवासीत् । कुवलायाश्वो प्रख्याता जगति जन्तुवनिर्वृणता । नाश्वतरकन्यामपि परिजहार । नृगः मान्धाता मार्गणव्यसनेन सपुत्रपौत्रो कृकलासतामगमत् । नलं कलिर- रसातलमगात् । पुरुकुत्सः कुत्सितं कर्म भिभूतवान् । संवरणो मित्रदुहितरि तपस्यन्नपि मेकलकन्यकायामकरोत् । कु- विलवतामगात् । दशरथ इटरामो- न्मादेन मृत्युमवाप । कार्तवीर्यो चलयाश्वो भुजगलोकपरिग्रहाश्वतर- गोब्राह्मणपीडया पञ्चत्वमयासीत् । कन्यामपि न परिजहार । पृथुः प्रथम- मनुः सुवर्णव्यसनी पुरुषकः परिभूतवान्पृथिवीम् । नृगस्थ शन्तनुरतिव्यसनाद्विपिने विल- कृकलासभावेऽपि वर्णसंकरः समदृश्यत। लाप । युधिष्ठिरः समरशिरसि सौदासेन नरक्षिता पर्याकुलीकृता सत्यमुत्ससर्ज। नास्त्यकलङ्कः को- क्षितिः। नलमवशाक्षहृदयं कलिरभि- ऽपि प्रायः। (V P 46.1 14-V.P. 47. 1. 4) भूतवान् । संवरणो मित्रदुहितरि विक्ल- बतामगात् । दशरथ इष्टरामोन्मादेन मृत्युमवाप | कार्तवीर्यो गोब्राह्मणातिपी- डनेन निधनमयासीत् । मरुत्तः इएवहु- सुवर्णकोऽपि देवद्विजबहुमतो न बभूव । शन्तनुरतिव्यसनादेकाको वियुक्तो वाहि- न्या विपिने विललाप। पाण्डुर्वनमध्य- गतो मत्स्य इव मदनरसाविष्टः प्राणा- मुमोच । युधिष्ठिरो गुरुभयविषण्ण- हृदयः समरशिरसि सत्यमुत्सृष्टवान् । इत्थं नास्ति राजत्वमपकलङ्कमृते देव- देवादमुतः सर्वद्वीपभुजो हर्षात् । (H P. 87 ] 9-H P. 90 1. 5) -- Appendix 1 ] वासवदत्ता-नाम-कथा, [६५ 39 सुनृपमिव सजनक्रमकरं ..जलनिधि- मपश्यत् । V. P. 46 16 क्लेशबहुलमपि तपाकरणमिव क्रम- कारिणं कल्याणानां...कटकं जगाम । H. P. 213. 1. 11 40 आपीतहरितैः कृष्णासु केदारिका कृतकालसंनिधानामिवान्धकारित- कोष्ठिकासु समुत्फलद्भिर्नातुशवलैरिव ललाटपट्टाष्टापदाम् । द१रैविद्युता समं चिक्रीड वर्षाकालः। H P.9 1 13 V P. 48. 1 17 41 आर्य कन्दर्पकेतो पुनरपि तव प्रियया वत्से महाश्वेते न परित्याज्यास्त्वया सङ्गमो भविष्यतीत्यचिरेण । तद्विरम प्राणाः। पुनरपि तवानेन सह भविष्यति मरणव्यवसायादिति। K P. 170 1 11 V. P. 47. 1 20 अनन्तरं चान्तरिक्ष क्षरन्तीवामृत- मशरीरिणी वागथूयत । वत्से महाश्वेते पुनरपि त्वं मयैव समाश्वासितव्या वर्तसे। K. P. 317. 1 16 समागमः। - 42 त्यागिन इव दानवन्तो मार्गणसन्ता पार्थिवोऽपि गुणमयः करिणामिव पमसहन्तः महामृगाः उत्कुपिता इव दानवतामुपरि स्थितः H P. 197 1. 8 क्षमां मुञ्चन्तस्तुरगा रेजुः । V. P.52 1 4 43 शरतल्पशयो भीष्म इव चिराय बहुशरशयनसुप्तोत्थितोऽपि हसन्निव श्वसनासीत् । V P. 53. 1. 2 शान्तनवम् । H P. 211. 1 4 44 अनन्तरमखञ्जखमरीटे अकुञ्चित- अथ कदाचिद्विरलितबलाहके, चात- क्रौञ्चसञ्चारे, निर्भरभरद्वाजद्विजवा- कातङ्ककारिणि क्षणत्कादम्बे, दर्दुरद्विषि, चाटविटपे, पात्रभ्रान्तशुककलमके- मयूरमदमुषि, हंसपथिकसार्थसर्वातिथौ, दारे प्रवेशितावेशिकराजहंसे कंसा• धौतासिनिभनभसि, भास्वरभास्वति, रिदेहातिधुतले, हंसतूलतुलितराज- शुचिशशिनि, तरुणतारागणे, गलत्सु- जलमुचि, सान्द्रीकृतेन्दुमहाकामु-' नासीरशरासने, सीदत्सौदामिनीदामिन, कमुदि, मधुरमधुतृणवीरुधि सरस- दामोदरनिद्वादुदि, द्रुतवदूर्यवर्णाणसि, सारसरसितसारकासारे कशेरुकन्द घूर्णमानमिहिकालघुमेघमोघमघवति, नि- लुब्धपोत्रिपोतपौत्रोत्खाततटतडागस- मीलनीपे, निष्कुसुमकुटजे, निर्मुकुल- ञ्चरन्माषपुत्रिकापत्रीपटलमधुरसाध्व- कन्दले, कोमलकमले, मधुस्यन्दीन्दीवरे, निविहितमुदि कर्थितकदम्बे कलाराहादिनि, शेफालिकाशीतलीकृत- कम्बुद्विषि प्रसृतविसप्रसूने, चकित- निशे, यूथिकामोदिनि, मोदमानकुमुदा- चातके, विरलवारिदे, तारतरतारके, वदातदशदिशि, सप्तच्छधूलिधूसरित- - १ [ Appendix I -- ६२] महाकवि सुबन्धु-विरचिता ल्मीकिसरस्वतीमिव दर्शितेक्ष्वाकुवं- शां, लद्वामिव बहुपलाशशोभितां, धार्तराष्ट्रसेनामिवार्जुनशरनिकरप- रिवारिता, नारायणमूर्तिमिव बहु- रूपां, सुग्रीवसेनामिव पनसचन्दन- नलकुमुदसेवितां,क्वचिद् विधवामिव सिन्दूरतिलकभूपितां प्रवालाभरणां च, क्वचित्कुरुसेनामिबोलूकद्रोण शकुनिसनाथां धार्तराष्ट्रान्वितां च, अम्लानजातिविभूपितामपि विरुद्ध- वंशां, दर्शिताभयामपि भीपणां, सततहितपथ्यामपि प्रवृद्धगुल्मां, पट्पद्व्याप्तामपि द्विपदानाकुलां, द्विजकुलभूपितामपि अकुलीनवंशां विन्ध्याटवी विवेश । (V P.39 1. 17-V. P.41 1. 2.) - -- 37 किं न कृतः शरणेच्छुरभय इति अथ क्रमेण गच्छत पव तस्य अन- बहुविधं विलपन्दक्षिणेन काननं वकेशिनः कुड्मलितकर्णिकाराः प्रचुर- निर्गत्य नव्यनलनलदनलिनीनिचुल- चम्पकाःस्फीतफलेग्रहयः फलभरभरित- पिचुलविडदबहुलेन, प्रचुरचिरि- नमेरवः नीलदलनलदनारिकेलनिकराः विल्वविल्योटजकुटजरुद्धोपकण्ठेन, हरिकेसरसरलपरिकराः कोरकनिकुरु- सोत्कण्ठभृङ्गराजरसितसुन्दरसुन्दरी- म्वरोमाञ्चितकरयकराजयः रक्ताशोकप- वनेन, विततवेत्रवततिवातावरण- ल्लवलावण्यलिप्यमानदशदिशः, प्रविक- तरुणवरुणतरुस्कन्धसमुन्नद्धभृङ्गगो- लकेन, गोलाद्र्लभग्नगलन्मधुपटल- सितकेसररजोविसरबध्यमानचारुधूस- रसासारसिक्ततरुतलेन, तालहि रिमाणः स्वरजासिकतिलतिलकताला, न्वालपूगपुन्नागनागकेसरघनेन, घन- प्रविचलितहिङ्गवः, प्रचूरपूगफला, प्र- सारमल्लिकाकेतककोविदारमन्दार- सवपूगपिङ्गलप्रियङ्गवः परागपिञ्जरित- बीजपूरकजम्बीरजम्बूगुल्मगहनेन, मञ्जरीपुञ्जायमानमधुपमञ्जशिआजनितज- प्रत्यूहदात्यूहव्यूहकुहरितभरितनदी- नमुदः, मदमलमेचकितमुचुकुन्दस्कन्ध- नलनिकुखेन, पुचिताकुण्ठकण्ठकल- कण्ठाध्यासितोद्दामसहकारपल्लवेन, काण्डकथ्यमाननिःशङ्ककरिकरटकण्डू- चपलकुलायकुक्कुटकुटुम्बसंवाहि- तयः, उड्डीयमाननिःशकचटुलकृष्णसार- तोत्कटविकटेन, कोरकनिकुरुम्वरो- शावसकलशाद्वलसुभगभूमयः, तमः माञ्चितकुरबकराजिना, रक्ताशोक- कालतमतमालमालामीलितातपाः, स्तव- पल्लवलावण्य विलिप्यमानदशदिशा, कदन्तुरितदेवदारवः, तरलताम्बूलीस्त- -- - चाटवः, - ~~~~~ -~-~~ Appendix 1] वासवदत्ता-नाम-कथा [६३ प्रविकसितकेसररजोविसरवर्धमान- म्वजालकितजम्बूजम्बीरवीथयः, कुसुम- वासरधूसरिमभारेण, परागपिञ्जर- रजोधवलधूलीकदम्बचक्रचुम्बितव्योमा- मञ्जरीयुज्यमानमधुपमअशिञ्जितज नः, बहलमधुमोक्षोक्षितक्षितयः, परि- नितजनमुदा, मदजलमेचकितमुचुः मलघटितघनघ्राणतृप्तयः, कतिपयदिवस- कुन्दस्कन्धकाण्डमथ्यमाननिःशङ्क- सूतकुक्कुटीकुटीकृतकटजकोटराः, चट- करिकटकण्डूतिना, कतिपयदिवस- कासञ्चार्थमाणवाचाटचाटकरक्रियमाण- प्रसूतकुक्कुटीकृतकुटजकोटरेण, चट- सहचरीचारणचन्चुरचकोर- कसञ्चार्यमाणचतुरवाचाटचाटकैर- चञ्चव, क्रियमाणचाटुना, सहचरीचारण- निर्भयभूरिभुरुण्डभुज्यमान- चञ्चुरचकोरचुञ्चना, शैलेयसुकुमा- पाककपिलपीलवः, सदाफलकट्फल- रशिलातलसुखशयितशशशिशुना, फलविशसननिःशूकशुकशकुन्तशातित- शेफालिकाशिफाविवरचित्रध्धवर्त शलाटवः, शैलेयसुकुमारशिलातलसुख- मानगौधेरराशिना निरातङ्करकुणा, शयितशशशिशवः, शेफालिकाशिफा- निराकुलनकुलकेलिना, कलकोकिल- विवरविन्धवर्तमानगोधेरराशयः, नि- कुलकवलितसहकारकलिकोद्गमेन, सहकारारामरोमन्थायमानचमरयू- रातकरङ्कवः, निराकुलनकुलकुलकेलयः, कलकोकिलकुलकवलितकलिकोद्गमाः, थेन, श्रवणहारिसनीडगिरिनितम्ब- निर्झरनिनादनिद्रानन्दमन्दायमानक- सहकारारामरोमन्थायमानचमरयूथाः, रिकुलकर्णतालदुन्दुभिना, समासन्न यथासुखनिषण्णनीलाण्डजमण्डलाः, नि- किन्नरीगीतरवरममाणरुरुविसरेण, विकारवृकविलोक्यमानपोतपीतगवयधे- क्षतहरितहरिद्राद्रवरज्यमानवराह- श्रवणहारिसनीडगिरिनितम्ब- पोतपोत्रपालिना, गुजापुञ्जगुअजाह- निरनिनाद निद्रानन्दमन्दायमानकरिकु- कजातेन दशनकुपितकपिपोतपुटक- लकर्णतालदुन्दुभयः, समासन्नकिन्नरो- पाटितपाटलकीटपुटसङ्कटेन, कुलि- गीतरवरसमानरुरवः, प्रमुदिततरतरक्ष- शशिखरखरनखरप्रचयप्रचण्डचपेट- वः,क्षतहरितहरिद्राद्रवरज्यमाननववरा- पाटितमत्तमातङ्गरक्तच्छटाच्छुरित- चारुकेसरभासुरकेसरीकदम्बकेन हपोतपोत्रवलयः, गुजाकुञ्जगुजजा- महासागरकच्छप्रान्तेन कतिपयदूरं हकाः, जातीफलकसुप्तशालिजातकवल- गत्वा .....। यः, दशनकुपितकपिपोतपेटकपाटित- (V.P. 43.1 20-V P.45.1 5) पाटलमुखकीटपुटकार, पुरस्तादर्शन- पथमवतेरुस्तरवः । (H P 234 1 1-H. P. 235. 1 13) नवः, १ ६६ ] महाकवि - सुवन्धु-विरचिता [ Appedixi वारुणीचारचन्द्रमसि, स्वादुरसस- समीरे, स्तयकितयन्धुरयन्धृकायध्यमा- लिले, स्फुरितशफरतकुंवकोटे, धूक- नाकाण्डसन्ध्ये, नीराजितवाजिनि, उद्दाम- मण्डूकमण्डले सोचितकञ्चकिनि, दन्ति नि, दर्पक्षीयौक्षके, क्षीयमाणपक- काञ्चनच्छेदगौरशालिनि,कोशदुत्क्रोशे चकवाले,बालपुलिनपल्लवितसिन्धुरोधसि, सुरभिगन्धिसौगन्धिकगन्धहारिहरि- परिणामाश्यानश्यामाके, जनितप्रियछु- णाव, कुमुदामोदिनि, कौमुदीकृत- मञ्जरीरजसि, कटोरितनपुसत्वचि, कुसुम- मुदि, निबर्हवहिणि, कूजत्कोयष्टिके, स्मेरशरे शरत्समयारम्भे . बाणः यगात् । धृतधार्तराष्टे, हटकलमगोपिकागीत H. P 83. 1 5-HP 84 1 4 सुखितमृगयूथे, कथाकृतकिंशुके, म्ला- पितमालतीलतामुकुले,वन्धूकवान्धवे, सातकमुञानके, विसूत्रितसौत्रा- मणधनुपि स्मेरकाश्मीररजापिञ्ज- रितदिशि, विकस्वरसरे, शरत्स- मयारम्मे, कन्दर्पकेतुः पुत्रिका . हस्तेन पस्पर्श । V P 49 1 8-V P.50 1 7 + . . 1 - न - Appendix II Index of Verses - Verse No 7 Page - 2 N 11 16 16 3 -- 2 12 2 18 20 15 16 1 अतिमलिने कर्तव्ये भवति 2 अविदितगुणापि सत्कविभणितिः 3 उत्कर्णोऽयमकाण्डचण्डिमकटुः 4 कठिनतरदामवेष्टनलेखा- 5 करवद्रसहशम खिलं भुवनतलं 6 खिन्नोऽसि मुश्च शैलं 7 गुणिनामपि निजरूपप्रतिपत्तिः 8 जीवाकृष्टिं स चक्रे मृधभुवि 9 पश्योदञ्चदवाञ्चदञ्चितवपुः 10 प्रत्यक्षरभावाप्यस्थिरहृदया 11 भवति सुभगत्वमधिकं 12 विध्वस्तपरगुणानां 13 . विषधरतोऽप्यतिविषमः 14 : स जयति हिमकरलेखा 15 सरस्वतीदत्तवरप्रसादश्चके 16 सा रसवत्ता निहता 17 सुराणां पातासौ स पुनरति- 18 हरिखरनखरविदारित- 19 हस्त इव भूतिमलिनो 19 28 -- 5 9 2 N 6 4 - 13 N 10 2 17 20 14 16 8 2 ।
६८] महाकवि - सुबन्धु -विरचिता [ Appendix II 1814 Sanskrit Index [ The nos refer to page and line in Vasavadattā ] अकाण्डचण्डिमका 1617 अनुगतदक्षिणसदागति 6.10 अकाण्डे 345 अनूरुकशाभिघात 19.14 अकार्षीत् 1711 अनैषीत् 11.21 अकालसन्ध्याविभ्रम 1916 अन्तःसरल 3.11 अक्षतदश 6.4 अन्तक 5.6 अखज 498 अन्तरित 28 अगस्त्य 36 अन्धकरण 52.10 अगस्त्यमार्ग 1415 अन्धासुर अग्नितुलाशुद्धि 41 अपहनुवान 30.20 अग्निहोत्र 3014 अपसार 4517 अङ्गद 11.3,24.18 अपसरस्संहति 21.11 अचलाधिकलक्ष्मी 52 अभिभूति 11.8 अजानुरागिणी 2514 अभिसारिका 7.11 अजीर्णविकार 1217 अभूतपूर्व 3.1 अञ्जसारतः 34 13 अभ्रविशदा 34.6 अतनुषेक 3418 अर्जुनसमर 25.2 अतरल 3.12 अर्धचन्द्र 14.12 अतरलमध्य 6.2 अर्धयाममात्रखण्डित 17.14 अतिक्रान्तकन्यातुला 111 अर्धशफर 16.2- अतिक्रान्तदमनक 6.12 अयासीत् 35.11 अतितनीयस्तया 7.13 अरिष्ट 19.19 अतिपुण्यैकहृदय 206 अलक्तपट 3216 अतिमलिन 2.3 अलङ्कारप्रसाधिता 3814 अतिमुक्त 2216 अवटतटोटवी 314 अदिति 19.21 अवत्सु 7.16 अधररागता 21.6 अवन्तिसेना 3616 अधरीकृतदान 1216 अवश्यायोच्छलित 4.10 अनङ्गलेखा 268 अविदितगुणा 2.11 अनङ्गवती 21.12 अशोक 22.20; 40.11 अनन्तभोगी 35 अश्रौषीत् 25.10 अनन्तमूला 40.7 अश्लीलप्राय 22.7 अनातुर 4612 अश्वतरकन्या 3819, 46.18 अनिरुद्ध 39; 11.1 अष्टमूर्ति 205 अनियोद्धावनरसान्तर 12.5 अष्टादशवर्षीया 1113 थनुक्षण 8.11 असाधुजनोचितचरित 12.3 T 1 Appendix II ] वासवदत्ता-नाम-कथा असांप्रत अनसारणी आखण्डलककुभू आखण्डलाशा आखेटिन आतर्पणपञ्चाकुल मात्मघोषमुखर आदिकन्द आधूत आनकदुन्दुभि आन्ध्री आपातमधुर आवद्धतुहिन आम्लानसुभग आर्यपुत्र आरामतह आलानस्तम्भ आलोलिकातरल आविलकाञ्चन 19.14 1621 1.13 38.13 1014 8.8 20.17 3814 10.13 - 1.7 . 13.10 उत्तम्भितजलद 42.3 उत्तरगोग्रहणसमरभूमि 41.17 उत्तुंगश्यामलकुचा 32.20 उद्योतकर 24.7 उद्वमत् 31.17 ' उद्वेल्लद् 12.15 उत्प्रेक्षा 253 उपनिपद 12.9 उपान्तलोहित 34 उमा 23 13 उल्लसदंशुक 12.8 उलासितगोत्र 2211 उल्लासितरति 2214 उलूखल 394 उपा 29.8 पकायतनशाला 46.1 एकासन 29.3 एणतिलक 351 एला 499 कक 3.6 कङ्केलि 36 कङ्केलिगुच्छ 5.6; 126 कच्छप 512 कच्छोपान्त 31.5 कजल 2514 कजलरसश्याम 2411 कज्जलव्याज 234; 313 कटक 2213 कटकसञ्चारिणः 471 कटाग्नि 5.15 कण्टकयोग 43.22 कण्ठालक 1213 कण्डनविकीर्ण 1919 कण्डूति 6.13 कणाटीन आवेशिक - आशान्तरक्षण आशाप्रसाधक आश्रयाश आश्रितनन्दन आहितुण्डिक इन्दुमती' इन्द्रजाल इन्द्रनील इन्द्राणीरुचित इटरामोन्माद ईशानभूतिसञ्चय उचैःश्रवा उत्कर्णकेसर उत्कलिका उत्कलिकाबहुल उत्कीर्णा 1420 21:15 515 41 11 11.1 11 10 392 19.6 3516 29 22.6 23.2 7-13 47.19 482 1.8 30.17 7.13 13.21;35.12 4.9 404 . 3.14 511 41 12 45.10 , 16.4 45.4 29.14 + 814 कदम्बक -4 11.18 कथकजन - ७० । महाकवि - सुबन्धु - विरचिता [ Appendix || . करण, कथाकृत 50.3 कषाययति कथालापविदग्धशृङ्गारमयजन 24.1 कम्बिका कन्दपैकेतु 64; 259 कम्यु 17 13; 12 2; कम्वुद्विष् कन्दर्पमुद्रा 29.5 कंस कन्दर्पसायक 11.2 कंसाराति कन्दान्तर 1319 कर्कट कन्यातुलारोह 2015 कर्कन्धु कनकदर्पण 24.15; 32.15 कर्ण कनकपरुवक 91.2 कर्णीरथ कनकमृग 2419 कर्दमित कपोलपालि 2311 कर्पर कवन्ध 52 7; 7.2 कर्पूरशलाका कवरिका 251 कर्मठ कम्पिततटा 193 कार्तस्वर करका 37-5, 49.6 काव्यादर 15.4 कालागरु करपत्र 492 कामधुराधरेण करपत्रदारण 42 कायमानिक करबदर 1.1 कामिनीगण्डुषसीधु करवाल 345 कान्तिमती करालायते 133 काथ्यालङ्कारेषु कलकण्ठ 221 कालकपालिन् कलङ्काहार 33.8 काकलीगायन कलप्रलाप 71.0 काञ्चनमण्डपिका कृलम 49-9 काटव कलवित 2820 कात्यायनी कलहायमान 17.15 कान्दिशीक कलहंस 158, 222 काननरुचि कलाकुरा 244 कामसूत्रविन्यास कलावती 393 कामुकजन कलि 58 कालकैवत कलिकेतु 36 13 कालक्षपणकपिण्ड कवयः 11 कार्तवीर्य कशिपुक्षेत्रदान 3.2 कार्तस्वर कशेरुकन्द 491.2 कार्पटिक कपण 3.1 काव्यकथा 129 2020 337 49.13 24208 517 34 476 42.13 532; 1411 2417 710 47.6 389 711 249 35 36.4 34.19 5017 225 26.14 2018 2814 484 384 .12.8 191 52.1 13.1 1412 295 414 7.6 47.1 24.9 7.12 7.12 , १ Appendix 11 ] वासवदत्ता- नाम कथा [७३ काव्यजीव काष्ठा काष्ठापहारक कापायपट किसल्क कितव किन्नरीगीत किर्मिर রিয়র किरातसैन्य किशोरक कीकसखण्ड कीचकसुहत् कीलाल कीलित कुक्कुट कुकुटी कुडुमपिण्ड कुटन कुंदाल कुन्तली कुन्द कुम्भकर्ण कुम्भसम्भव कुम्भीनसीकुक्षि कुमारमयूर कुमुदवनबन्धु कुमुदिनीनायक कुरवक 187 कुवलयापीड 5.17 437 कुवलयाश्व 4618 30.12 कुशलव 51' 42.12 कुशेशय 99.17 32 10 कुसुमकेतु 3.9 1717; 34.1 कुसुमपुर 1815 4417 कुसुमशरासन 68 232 कुहकुहाराव 1515 165 कुहूमुख 2419 517 कृकलासता 4618 37 16 कृकवाकु 41.16 31 18 कृत्रिमकेतककानन 37.22 14.20 कृतकान्तारतरङ्ग 611 35 22 कृतयुग 6.17 10.1 कृष्ण 3.3, 20.3; 24.20 45.6 कृष्णरूप 32.13 4510 कृष्णवर्मा 56; 30.12 32 19 कृष्णागुरु 245; 237 4323 केतक 453 1220 केतकदल 10.11 239 केतकधूलि 26.11 1015 केतकीकानन 1512 1416; 35 22 केदार 499 16.10 केदारिका 4817 462 केरली 2311;37.4 48.5 केशनिर्मोक 89 51; 66 केशपाशदर 87 79 केशपाशसंस्कारधूपपटल 3015 456 केसर 458 47.5 कैतवकैरल 3616 306 कैवर्त 2212 42 11 कैलास 513 36.1 कोकनद 1911 48.61 कोकिप्रयतमा 9.3 कोटककुटुम्बिनी 161 15.17 कोण 31 6.15 - . कररीरुत कुरुक्षेत्र कुल्यायमानकरिणी कुलटेलक्ष्मी कुलाय कुलाल कुलोचार 45.6-- - 47,6 कोदण्ड ७२ ] महाकवि--सुबन्धु - विरचिता [ Appendix 11 कोयष्ठिक कोविदार कोष्टिका कौरवन्यूह कौरवसैनिक कौशिक कौसुम्पराग क्रकचच्छद क्रीडाशकुनि क्रोडाशुक क्रोडीकृतसुतनु क्रोष्ट कथ्यन्ते क्वाथ किपाम् खजना: खखरीट खर्माभाव खलव्यसनाकुर स्वरसंयोग स्नातक खिङ्ग खिङ्गजन खिल्लित गगनाशोकतरु गणक गणनीयहस्तश्रवण गणिकारिका गन्धवाह . 50.2; 162 गुणाढ्य 45.3 गुमगुमायित 48 17 गुरुकलत्रोपशोभित 61 गुरुदारहरण 24 14 गुल्म 24 गुलिकास्त्रगुलिका 4212 गीत 49.3 गृध्र 37 19 गृहशुक 38 10 गृहीतगुरुकलत्रानुशय 518 गैरिकराग 476 गोत्रोद्धरण 13.14 गोदा 13.9 गोप 20.18 गोपति 248 गोमुण्ड 16.4;- 498 गौधेर 211 गोष्ठीन 13.2 नहग्रस्त 315 ग्रहमयी 15.4 ग्राह 22 14 घटितसन्धिविग्रह 22.7 घनघटमान 10.1 घनघनायमान 2815 घनघरघट्टन 308 घनाघन 3813 घस्मर 40.10 घुसूण 13S1 घुसूणरस 1813 चक्रधर 144 चक्री 10.12 चकोराङ्गना 3410 चक्षुर्वन्धनमहौषधि 2414 2317 3816 4614 41.1 31.15 21.2 51.11 81.2 910 14.13 4.3 252 1.4 18.9 33.12 4414 297 26.6 115 4218 59 419 305 49.5. 18.9 315 23.9 38.5. 12.13 5.8 33.1 11.12 45.12 55.11 37.7 19.1 गवय गवाक्ष गवाक्षशलाका गाणिकय गान्धार 176 चञ्चुर गान 2020 चटक 21.1 चटुलम्पट 45.1 चण्डाभिधाना .
Appendix II ] वासवदत्ता-नाम-कथा [ ७३ चत्वर चतुम्पष्टिकला चन्द्रचमूरु चपलायते चपेट चमरीगण चर्चरीगीत चलरज्जु चलरागता चपक चाटक चारभटाहकार चार्वाक चिताचक्र चित्रलेखा चिन्तामणि 'चिरिविल्व चीत्कुर्वद् -चुञ्चु चुम्बक चूर्णचय चूचुकमुद्रा चैत्य छन्दोविचिति छलनिग्रहप्रयोगाः जघन्यकर्मलग्न जनकभू जनकयज्ञस्थान जनता जन्तुवधनिपुणता जनार्दन जनितशिव जनितानिरुद्धलील जनितेये जम्बीर जम्बू वूनरखण्ड १० 29 15 जयलक्ष्मी 23 12 जरत्करी 1915 जरती 3610 जलकपि 453 जलदकरक 13.20 जलदेवता 228 जलदोन्नाह 4811 जलमानुष 21.2 जलौक 78 जवातरुकुसुम 45 11 जनुकन्या 7.3 जागल 314 जातुशबल 23 3, 338 जाहक 2611 जाह्नवी 259; 3.12 जिघृक्षा 43.22 जिह्मग 16 20 जीवजीवकमिथुन 45 12 जीवञ्जीवकमिथुन 33 18 जीवाकर्षण 494 जीवाकृष्टि 912 जीवितेशपुर 337 जैमिनिमतश्राविणः 199; 38 12 टड्कारभैरव 3.13 डस्वर 12.21 ढक्का 44 तक्राट 366 तटावट 1020 तडिल्लता 46 17 तथागतमतध्वंसिनः 146 तमालकानन 513 तमालिका 68 तमितिमिर 11.15 तमोमषीश्याम 453 तर्कु 454 तरत्पत्ररथ 15.14 तरुणसुरमिथुन 7.4 20.19 264 478 486 1514 364 4514 1812 3219 319 3917 48 18 452 1818 18 522 3721 141 523 20.10 813 247 404 318 512 12.14 1513 493 248 30.17 3510, 2717 318 3113 49.15 71 15.13 ७४] [ Appendix II ताडक ताऱ्या तारानुरागरका ताल तालफल तालफलरस तिक तिथिपर तिमिशिल तिमिरतर्जन तिमिरप्रतिहस्त तुगभद्रा तुरगविसर तुलाधारशून्य तुलादण्ड तृष्णाचडल तोरण तोरणमालिका त्वगत् त्रिशङ्क दक्षिणसमीरवाण दत्तकपाट दधिधवल दन्तपालिचक्र दन्तमणिरक्षासिन्दुर दन्तुरित दमयन्ती दमनक दर्दुर दर्पण दर्शितशोन्नति दशरथ दशान्तमुपगत दहन दात्यूह दामवेष्टन महाकवि-सुबन्धु - विरचिता 7.8 दामोदर 517 दारोत्सुकितराम 38.16 दिग्गजमदलेखा 30.1 दिगम्बरदर्शन 45.2 दिग्विनिश्चय 13.22 दिति 128 दिनारम्भलक्ष्मी 129 दिलीप 18.3 द्विगुणरुचि 45 13 दीनार 29.10 दुग्धमुग्घदशन 30.5 दुर्वर्णयोग 25 2 दुर्वासा 31.11 दुर्विध 304 दुर्वणित 1016 दुःशासन 40.1 दुष्यन्त 10.18 दूती 48 12 दूरप्ररूढार्जुन 42.2 दैवदुर्विलसित 5.5 दोषानुबन्धचतुर 224 दोषण्ड 11 20 युतितर्जनजर्जर 75 द्रावक 334 द्रोणप्रभाव 108 द्रोणाशासूचक 71 द्विजकुलस्थिति 4.5; 25 13 द्विजिह्वसङ्ग्रहीति 2214 घनद 40.18 धर्मराट् 26 धात्रीधृति 4.9 धातुराग 5.10, 10 10 धार्तराष्ट्र 7.17 धीः 307 धूमल 1515, 454 धूमोर्णा 15 धूसरिम 1.6 366 21.9 32.133 52.10 20.16 1313 166 5.11 1.10 426 810 2020 2515 2817 22.4 42 2515 32.8 409 4314 1212 456 31.6 341 3011 2415 3415 315 18 2; 20.5 2049 25.18 14 10 421 2410 23 3118 2517 458 ។ - - Appendix 11 ] वासवदत्ता-नाम-कथा [ ७५ . 4673 . धृतराष्ट्र 3.10 नारायण धृष्टद्युम्न 3011 नारायणमूर्ति ध्वास 2821 नारायणशक्ति नकुल 44.14 नासावंश नकुलद्वेषी 2.2 नासावंशलक्ष्मी नक 4719 नास्तिकता नकचक्र 45.12 निकषोपल नक्षत्रविद्या 38 13 निकुरुम्व नखमार्जनरत्नशलाका 4814 निकृन्तति नखर 37 10 निखाता नदेशजप्रशसी 12.13 निचुल नन्दगोप 59 निजरूपप्रतिपत्तिः नन्दिघोप 4 22 नितम्वनिमय 'नयनच्छविच्छटाफपिलिकेपु 3013 निदाघदिवस नयनसेतुसमुद्धतवन्ध 1016 नियोग नर्मदा 252 निति नरवाहनदत्त 14.9, 2515 निर्जिगमिपति 45, 57; 25 13; 43 22 निर्मलच्छाय नलकूपर 17 1; 25 16 निर्मलीकृत नलनिकुञ्ज 161 निर्मोकपट्ट नलद 4322 निर्वाण नल्वगोचर 5016 निरगात् नल्वशत 1318 निरस्तकरणग्राम नवकाः 29 निवासिजन नवनीतस्वस्तिक 333 'निशान्तपथचारि नवनुपतिचित्तवृत्ति 361 निशुम्भ नवमालिका 21 10 निष्कुट नवयावक 22 18 निव्पन्दकरणग्राम नहुष 46.15 निपिद्धाशेषपरिजन नागकेसर 453 निस्त्रिंशत्व नागकेसरकुसुम 235 निहता नागनिःश्वाससमुत्क्षिप्तभूति 146 नीचदेश नागराज्यस्थिति 407 नीलकण्ठ नान्दीक 5256 नृकरोटि नानारामानंदकर नानासवासक्त 185 नुत्यत्कबन्ध नाराच 620 नृसिंह 3.3 40.16 40.13 10.17 27.10 3.14 491 83; 8.7 1221 118 4322 213 19.5 1211 314 20.4 299 26 22 4715 1012 39.16 26.5 189 8.1 18.17 2915 17.13; 43.6 1120 21.7 29 1211 485 40.4 46.18 166 32 -- । 514 नृग t ७६ ] महाकवि-सुबन्धु-विरचिता [ Appedix l1 204 412 4322 नेत्रपेयकान्तो नेत्रोत्पाटन नोद्रेक न्यायस्थिति पक्ष्मल पञ्चत्व पटुकटुक पटुचटन् पट्टाकण पण्यवीथी पत्रायते पनस पयोधरपरिसर परशु परागपिचर परिखावलय परिणयपराङ्मुखी परिणामविरस परिणाह परीवाद पलल 373 पाचक 316 पावकाग्रेसर 413 पिचुल 38.13 पिण्डालक्तक 1011 पिशाचीकोलूखल 20 13 पिशुन 511 पिहिता 404 पुटकिनी 35.15 पुण्यरज्जु 304 पुण्यवेणि 39.5 पुण्डरीकाक्ष 40.16 पुत्रिका 619 पुनर्भूपरिग्रह 12.19 पुन्नाग 458 पुरगोपुर 96 पुरन्ध्री 21.16 पुरुकुत्ल 1417 5116 22 37.2 305 193 19.6 19.11 50.6 4.6 40113; 452 37.6 21.7 4617 4614 358 47 16 409 2114 51.2 153 39.10, 18.3 15.6 45.2 46 10 1219 पुरुरवा 7 पलाव । 9.12 पुलिन्दसुन्दरी 314 पुलिनतल 264 पुलोमकुलस्थिति 236 पुलोमतनया 229 पुष्कर 529 पुष्करप्रादुर्भाव 30.18 पुष्पकेतु 176 पुष्पिताना 3512 पूय 145 पृथु 23.6 पेचकि 24.13 पोताधान 129 पोत्रपालि 105 पोत्रिपोत 74 प्रचेतसा 516, 22.2 प्रणयपेशल 134 प्रतिपक्षलक्ष्मी 339 प्रतीष्ट 5.12 प्रत्यक्षद्रव्य पलाश पलितरणेन पलितोषध पल्लवोज्ज्वल पझरागशकल पशुपति पाटलिपुष्प पाण्डपुत्र पादपराग पादपप्रसव पादालक्तक पार्थ पारद पारदपिण्ड पारिजात 3016 ~ 162 451 491 1823 204 38-6 -201 2012 । य 30.20 Appendix 111 वासवदत्ता-नाम-कथा [ ७७ 3814 216 वौद्धसङ्गीति 7.11 वौद्धसिद्धान्त 106 ब्रह्मदत्तमहिपी 15.1 भरत 6.13 भरतचरित 4017 भरद्वाज (bird) 156 भगुरत्व 20 2 भद्रश्रियम् 33.18 भम्भराली 32.17 भवनन्दनप्रभाव A 496 भाकूट 1 प्रत्यक्षर प्रबुद्धाध्यापक प्रयागतरुफल प्रवृद्धगुल्मतया प्रवालहारिण्यः प्रवालाभरणा प्रहर्पिणी प्रशस्तकेदार प्रस्तर प्रस्थानकलाश प्रस्थानलाजाजलय: प्रसाधिका प्रसादिताश प्रसारितवाहुयुगल प्रावरण प्रासादपारावत प्रियमुश्यामा प्रिय दुश्यामासखी प्रीतिविस्तारित फलकिन् फलपाके फेनस्तवक बकद्वेषी घकुल यकोट यद्धभुजङ्ग वन्धुतापदर्शन बन्धूक बलभद्र यलभित् यदुधातुविकार विभूमः विल्व वीजपूरक वृहत्कथानुवन्धिनः वृहत्कथालम्व बृहन्नला 32.16 भाकारि 66 भागीरथी 1117 भासराग 3018 भासुर 33.11; 35.17 भास्वतालबारेण 14.9 भार्गव 3817 भारत 1114 भारतसमर 51.16 भारतसमरभूमि 42 13 भिक्षुकी 76; 31 11 भिक्षुकृपीवल 126 भीमसेन 22.5, 23.1 भीष्म 49.15 भुग्न 1813 भुजवल्लीझणत्कार 12 19 भुजियजन 504 भुवनतल 28 16 भूततो 204 भूतिमलिन 151 भूरिशाखालङ्कृत 13 भृङ्गराज 4322 भृङ्गगोलक 453 भृज्यमान 24 14 भोगावास 1720 भ्रमरमाला 311 भ्राजमानतनुमध्या 30.20 3817 45; 183 19.16 499 213 1220 403 368 158 403 1912 712 316 115 510, 1010 42; 3811 3.10 16.6, 409 301 418 203 54, 14 1138 532 14 8.8 2913 11 348 2.5 176 43.23 451 321 8.10 32.8 38.12 . 1 - 2 1- - ७८ ] महाकवि - सुवन्धु - विरचिता [ Appendix 11 H . - V भ्रामक 341 मरुदेशटक्कयात्रा 16.22 मकर 47.19 मरुवक 2213 मकरकेतु 69 मलयानिल 2314 मकरन्द 12 1; 1611; 17 10; 17.13, मल्लनाग 14.12 17.15, 35.10 39.14 मल्लिका 45.3 मञ्च 24.3 मल्लिकार्जुन 14.9 मञ्जरय 37.20 मल्लिकामालभारी 37.5 मञ्जिष्ठा 2922 मषीराशि 32.11 मञ्जिष्ठाचामर 42.10 महाकटाह 32.1 मठेषु 7.11 महानट 31.8 मणिकुट्टिमाभिः 29.16 महानटबाहु 1813 मण्डलभ्रमणकथक 12.15 महानदीन 414 मत्स्य 47 18 महामद 34.5 मदनकान्ता 1118 महावलि 1921 मदननगर 93 महाभारत 54 मदनमञ्जरी 269 महावराह 43 मदनमञ्जका 25.15 महाशृङ्गारी 2210 मदयन्ती 352 महास्थली 321 मदनरय 225 महिपमहासुर 1817 मदनलेख 381 महेश्वर 513, 62; 189 मदालसा 3819 माघविरामदिवस 188 मधु 37.17 मधुच्छत्र 7.7 4811 मधुधारा 211 मातरिश्वा 12.7 मधुपूर्णकपाल 2814 मातुलुङ्ग 4513 मधुव्रतमाला 2317 मानुष 366 मन्दर 5.14, 5.13 मायाजन्मने 410 मन्दाक्षा 20.11 मन्दाक्षमन्दा 3419 भारागम 21.4 मन्दार 453 मालतीमाला 2.12; 87 मन्दारस्तवक 3215 मालवी 23.12; 37.13, 38.7 मन्मथमहानिधिमन्दिर 94 मालिनी -251; 2610 मन्दिमान 717; 12 18 मालिनीसनाथा 199 मन्मथेन्द्रजालिन् 11.12 भाषपुत्रिका 49.13 मनु 472 मांसलित 30.14 मनोजवनाम्नातुरगण 39.16 मीनमिथुनकुलीरसंगत 154 मरिचपल्लव 37.21 मीमांसकदर्शन 52.10 514 मातङ्गशिशु मातङ्गकन्यानर्तन 1 812 मार्गण ३ Appendix II ] वासवदत्ता-नाम-कथा [७९ - मीमांसान्याय 15.2 रजनीपांसुला मुकुरतल 214 रजोराजिविशेषक मुक्ताफलशयल 14.3 रणखल मुखमदनमन्दिर 10.18 रणरणक मुचुकुन्द 45.9 रक्ताम्बरधारिणी मुजानक 504 रक्तांशुकधर मुदाकर 9.1 रक्ताशोक मुर्मुर 9.2; 2518; 32 10 रत्ननौका मुरज 365 रत्नशुक्ति मुष्टिग्राह्यमध्या 3816 रतकील मुसलाहति 41 11 रतिकलह मूच्छाधिगम 21.1 रतिप्रिय मृधभुवि 20.10 रतिसुखप्रद मृपा 21 रम्भा मेचकित 3016; 459 रवि मेनका 76 रशनाबन्ध मेरु 3.8 रसवत्ता मोहनशक्ति 119 रसाअनसिद्धि म्लानिमान 8.3 रहितासु नदिमाकर 3421 रागरजु यक्षवलि 12.15 रागविकृति यन्त्रपअर 3810 रागसागरवेणिका ययाति 46.16 रागेपु यवनिकापट 4214 राघव यवर्स 131 राघवचित्तवृत्ति यशोदा 5.9 राजसेन यशोदानन्द 34 राजिल यटिसमारोहण 2915 राजीवोत्पलमाल यामवती 75 राम यायजूक 18 12 रामदर्शितभक्ति यावक 2218 रामशाप युवतिप्रसव 4.1 रामानन्दी यूधिक 2614 रामायण यौवननर्तकलासिकाभ्यां 1019 रामाश्रित रक्षितगु 511 रावणभुजवन रङ्कु 4414 राहु रजतशुक्ति 1.8 रिपुसुन्दरी 3018 3420 52.1 239 301 2817 457 4811 4814 1221 21.5 6.8 3.9 25.16 38 215 2.9 11.6 92 515 21.3 1018 21.1 44 4012 346 163 22.12 511 4.5 325 62 38.11 1911 21 15 5.7 6.18 ८० ] महाकवि - सुबन्धु - विरचिता [ Appendix II । रुरुविसर रुपानुसारप्रवृत्त रेवती रेवा रोमन्थायमान रोमलतालवाल रोमावलीलताफल लक्षदानच्युति लक्षाति लवङ्ग लवगपति लवण लवली लब्धप्रवेश लाजा लाटी लिपिकरायते लेखा लोलायते लोहितेनाधरेण वनमहिष वनिताजन वर्णग्रथना वरुण वरण्डक वराहपोत वलिविभङ्ग वल्लकीविरुत वशीकरणचूर्ण वसन्तसेने वसुदेव वन्दनेक्षण घंशपत्र वंशप्रदीप वाक्कथक वाचालतुलाकोटि वात्यावेग 45.1 वान्त 247 वानरसेना 488 वामनलीला 168 वामाध्वा 44 15 वारिविरह 94 वालिनम् वाल्मीकिसरस्वती 20.18 वाहिततरवारिः 20.11 वाहिनीशत 4513 वाहिनीसम्भार 26.10 वासरताम्रचूडचक्राकार 46.2 वासवदत्ता 4513 वासागार 12.1 वासागारकुसुम 31 15 वास्तविक 23.7 विकचकुमुदाकर 396 विकर्तन 15 विक्रमादित्य 39.6 विकारभङ्गुर 11.4 विकासित 47 10 विगलितकुन्द 69 विचकास 2017 विचकिल 35 विजघटे 1017 विजयकेतु 45.1 विजयपताका 1021; 16 विजृम्भितवृहन्नला 3614 विट 104 विडद 2610 वितत 33 वितर्कदोला 11.2 विदग्धजन 155 विदिक्षु 63 विद्याधरमिथुनगीत 396 विद्रुमलता 86 विद्रुमशकल 31 18 विनटन 3111 11.3 10.21 1217 12.11 *24.18 40.14 342 37 515 28.9 2114 29.1 8.4 2210 91 ' 175 210 3317 110 84 22.16 2217 326 3910 11.8 1622 17.1 4322 1.4 123 292 11 18 13.19 2920 10.10 4714 , .
Appendix II ] वासवदत्ता-नाम-कथा [८१ . - विनटित विनिद्राण विन्ध्य विन्ध्यगिरिश्रियम् विन्ध्याटवी विन्यासवैदग्ध्यनिधि विपणिकेतुवंश विप्राणा विवुधालय विमावरीरक्त विभावरीवध्वाः विरचितवरुणेन विरसीकृत विराटलक्ष्मी विरूपाक्ष विलसत्करक विलासवति विलिखिताम् विवस्वतेन विशङ्कट विशारदा विश्वकर्मा विश्वकर्मावलापन विश्वरूपभाष विश्वरूपावलोक विश्वामित्रपुत्रवर्ग विषघूर्णित विषतरुप्रसव विषधर विषसरसि विष्णु विष्णुपद घिसङ्कटास्यकुहर विस्तृतकरसंपदे विस्तारितपरगुण विहारस्थली वृत्तविलास 31.5 वृद्धश्रवसम् 298 वृद्धवारयोषित् 14.20 वृश्चिकरविस्थिति 38.15 वृषध्वज 17.4, 41 23 वृषवर्धितरुचि 2.16 वृषहानि 513 वृषोत्पादी 277 वृपोत्सर्ग 3.8 वेतालरव 12.19 वेत्र 7.8 वेद 29.19 वेलाबकुल 29.6 वेश्या 173 वेश्याजन 1213; 147 वेश्यासन्निवेश 251 बैकुण्ठ 26.11 वेदग्ध्यसहकार 11 18 वैदेहीमयी 188 वैयात्यवचन 30.5 व्याकरण 34.6 शक्तिमोक्षण 3.8 এক 1213 शक्राश्व 32 13 शकुन्तला 24 10 शकुनश्रावक 24.20 3018 11.1 4.11 18.7 213 3.12 20.15 40.2 45.1 176 45.18 304 18.14 51.2 175 255 4012 8.11 38.10, 46.3 53.3 2213 12.13 25.15 24.7 45.12; 475 558 205 40.2 11.1; 112 14.17 1411 20.8 38.16 16.7 416 1313 18.3 46.4 शकुल 26.7 शङ्कर 12 10 शकितवर्ण 21 शची +- - 1115 शचीपतिवारविलासिनी 5.18 शतकोटिदान 516, 52.12 शतकोटिप्रणयिता 16.14 शतकोटिभूति 612 शतपत्र 19 शतपत्रपुस्तक 11.10 शतमन्युसमाकुल 15.7 शत्रुघ्न ११ [ Appendix Il ८२] महाकवि - सुवन्धु -विरचिता शन्तनु 47 2 शूरपालचित्तवृत्ति शनैश्चरेणपादेन 114 शूलघात 54 शूलसंयोग शान्तनव 49 15 शृगालवध शफर शफरकुल 47.7 शङ्गारशेखर शफरनिकर 415 शेफालिका शफरशतसंवाघ 13 20 शेमुषीमुपि शम्भली 39.12 शेषमधुभाजि शयनीयसैकत 3314 शैल शरद्वासरलक्ष्मी 812 शोण शरहिवसाः 245 श्मशानवाट शरन्मेष 516 श्रमगाः शरभ 14.5 श्रीपर्वत शरभेद 2016 श्रुतिवचन शरयन्त्र 41.6 श्लेषबहुघटना शर्वरी 65 प्लेषमयप्रबन्ध शर्वरीव्रजाङ्गना 33.3 श्वित्री शशिकठिनीखण्ड 31 13 वतदीप शखिरुचाम् 2.8 श्वेतगोधूम शठपाडर 37.15 श्वेतातपत्र शाकय 28.17 सगरसुत 42 12 सचित्रका शाखामृग 141 सत्कविकान्यवन्ध शाण 31 सत्कविभणिति शान्तनव 5.18 सत्कविविरचन शालभलिका 1721 सत्कारप्रवण शिखण्डि 1411 सत्पात्र शिखरिणी 15.6 सत्यभामा शिखिसंहति 363 सतामरस शिथिलभुजः 13 सद्गति शिफाविवर 4513 सदागति शिशयिषमाणशिशुजन 29.4 सदीश्वर शिशुमार 4720 सपोत 1817 शुम्भ सप्तपत्रस्यन्दन शुत्कार 464 सप्तर्षिमाला अन्यविन्दव 31.14 सप्रस्थ शर्पयति 131 समकरप्रचार 4010 2016 41 58 203; 23.15 45.13 2912 7.8 1.3 252 40.5 135 148 3213 323 2.16 322 35.4 3312 33.4 45 11, 19.3 2111 22.11 211 32.3 183 4.14 203 228 411 6.10; 39 15205 81 शाकयाश्रममठिका 414 147 195 1419 3.7 [८३ 2.15 181 511 185 6.7 4616 408 311 3811 361, 469 3811 185 19 20.2 Appendix Il ] वासवदत्ता-नाम-कथा समजुघोपा 2111 सुजनैकवन्धु समरसर 73 सुतलसंनिवेश समुद्र 104 सुदक्षिणा सर्पपस्नेह 127 सुदर्शन सरक्तपाद 3811 सुदूरवर्तितजीवन सरल (वृक्ष) 4011 सुधुम्न सरस्वती 1.2; 2 15 सुधर्मा सराजिनी 307 सुधर्माश्रित सलिलमुचाम् 28 सुन्दरकाण्डचारु सहकारकोरक 21.17 सुन्दरी (tree) सहपाँसुक्रीडितसमदुःखसुखः 13 16 सुन्दरीवन सङ्कल्पजन्मा 33.8 सुपर्व सङ्कल्पतुलिका 17.12 सुप्रतीक सङ्कल्पवृत्ति 117 सुभगत्व सङ्केतभूमि 116 सुभद्रा समयान्तर 20.13 सुबन्धु सङ्गत 23 16 सुबाहु सञ्ज्वर 2118 सुमन्त्र सन्ध्यासन्धिनी 28 12 सुमनोहर सन्दोह 8.2 सुमित्रा संवरण 46 19 सुमुख संस्थिति 48 2 सुमेरु संसारभित्तिचित्रलेखा 111 सुयोधन संहतसुकेशी 21 11 सुयोधनधृति सागरशायी 35 सुरतसुख सानन्दात्मक 3814 सुरतोत्कण्ठदीक्षागुरु सारस 158 सुरभियानविकल सार्वभौमयोग 49 सुवर्णकार सारिका 7.11 सुशर्मा सांवत्सरफलदर्शिनः 248. सूक्ष्ममतयः सिद्धगुलिका 429 सूर्याचन्द्रमस्तया सिन्दूरतिलक 40 17 सैरन्ध्री सिमिसिमायमान 401 सोम सुग्रीव 113, 144 181 सोमप्रभा सुग्रीवयुद्धकला 35 22 सौकर्यसमासादित, सुग्रीवसेना 4016 सौगन्धिक सुजन 19 सौत्रामणधनुः 215 6.2 5.10 412 510 518 53, 249 53.1 1021 5311 2618 12.16 49.1 6] .1.2 1414 29.13 4617 3818 33 501 50.4 - ८४ ] सौधकनककुम्भ स्तम्भनचूर्ण स्त्रीनदीकृत्य स्थैर्य स्फटिककुट्टिम स्फटिकन्यजन स्फारत्स्फुरत्केसर स्मरजन्या महाकवि-सुबन्धु-विरचिता [ Appendix II 32.17 हरिवंश 15.3 11.9 हलि 48.8 463 हिन्ताल 45.2 617 हिमकरलेखा 1.7 47 15 हिमकरोद्योत 110 33.15 हिमालय 5.12; 4.10; 1617 हिरण्यकशिपु 14.13 37.10 हृच्छयचातुरिकाविभ्रम 103 27.5 हृच्छयविलासिनः 1011 14.15 12 16 हृदयाभिलषितानि 53.11 37.1 क्षणदा 30.3, 8.11 37 क्षणदानन्दकर 5.1 309 क्षणदानप्रिय 3.8 14 क्षणदेश 3712 13.21 क्षीरोद 5.14 501 क्षुद्र 47.18 451 स्त्रस्तर स्वस्तान्त्रनाल स्ववशालोलमुख हती हरकण्ठकाण्डकालिम हरि हरिचन्दन हरिणाश्व हरिद्रा Corrections (Nos. refer to page and line in Vasavadatta) Incorreot Correot 95 गगनचन्द्रमण्डल .. जघनचन्द्रमण्डल ..... 11.12 त्रिभुवनविलोचनमृष्टिमिय त्रिभुवनविलोभनसृष्टिमिव 17.12 निष्यन्दकरणग्राम' निष्पन्दकरणग्राम 18.4 मर्मनेदिनापि अमर्ममेदिनापि 22.11 इवायदतुहीन इवारदतुहिन 23.6 पाटलिपुष्पमदश्यत । पाटलिपुष्पमदृश्यत । 27.21 पत्रिकामुपानयन । पत्रिकामुपानयत् । 27.22 सयमनाचयत । स्वयमवाचयत् । 29.15 समाचाम्लियपटेगु समानासितकुपुटेपु 29.16 गांची......उस्टीरगायिनि सन्त्रोचो.. ...कुटीरशायिनि 7 - J