Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Samaj-ratna Shri Rajrup Tank Shrdanjali-smarika
Front matter
PRASTAR
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२५००वां
निर्वाणमहोत्सव
महासमिति
महावीर
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समस्त सदस्यों द्वारा
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समाज-रत्न
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श्री राजरूप टांक
श्रद्धांजलि-स्मारिका
अहं पंचहि ठाणेहि,
जेहि सिक्खा न लब्भई !
थंभा, कोहा, पमाएरणं,
रोगेरणालस्स एण वा !!
अहंकार, क्रोध, प्रमाद,
रोग और पालस्य, इन
पांच कारणों से
शिक्षा प्राप्त नहीं होती।
-भगवान महावीर
दिव्या-दीपिका संयुक्तांक
सत्र: 1987-88
प्रकाशक :
श्री वीर चालिका संचालक मण्डल
जयपुर
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प्रधान सम्पादक
हीराचन्द बैद
०
सम्पादक मण्डल
महावीर प्रसाद श्रीमाल
मोतीलाल भडकतिया
নিলভে জল,
डॉ शान्ता भानावत
श्रीमती उर्मिला श्रीवास्तव
श्रीमती सुलक्षणा जैन
सुश्री सरोज कोचर
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बरह
कायालय
श्री वीर वालिका शिक्षण सस्थान
कुदीगर मह का रास्ता
जोहरी बाजार, जयपुर
फान 45250,45194
मुद्रक फ्रेण्ड्स प्रिण्टस एण्ड स्टेशनस
जौहरी बाजार, जयपुर-302003
फोन 48904
॥ स्टरादकीय ਟਹਿਤ महान परम अद्धेय श्री राजरूप जी टांक जिन्हें हम सभी 'चाचा साहब' के नाम से सम्बोधित करते थे, पार्थिव रूप से आज हमारे बीच नहीं हैं। 27 अक्टूबर 1987 को ज्ञान पंचमी के दिन वे परम ज्योति में विलीन हो गये पर उनके महान् व्यक्तित्व का तेज और प्रकाश आत्मिक रूप से आज भी हमारा पथ प्रास्त कर रहा है और भविष्य में भी करता रहेगा। . आज से 63 वर्ष पूर्व जैन साध्वी श्री स्वर्ण श्री जी की प्रेरणा से टांक साहब ने स्त्री-समाज में धार्मिक जागरण एवं नैतिक शिक्षण की भावना से एक पाठशाला का शुभारम्भ किया था जो उनके अनवरत स्नेहपूर्ण सिंचन, अदम्य लगन और निष्काम सेवा भावना से आज श्री वीर बालिका शिक्षण संस्थान के रूप में स्ली-शिक्षा के क्षेत्र में अपनी महत्त्वपूर्ण सेवाएं दे रहा है। इस संस्थान के अन्तर्गत शिशु कक्षा से लेकर कला और वाणिज्य संकाय में स्नातक स्तर तक की अध्ययन-सुविधाएं सुलभ हैं। श्री टांक साहब ने स्त्री-शिक्षा के क्षेत्र में इस संस्थान का बीज-चपन ऐसे समय में किया जव सामान्य रूप से यह मान्यता थी कि एक घर में दो कलम साथ नहीं चल सकती, पर टांक साहव दूरद्रष्टा थे और बड़ी बारीकी से समय की नब्ज पहचानते थे। वे वावर यह महसूस करते थे कि जीवन एवं समाज रूपी रथ को सही रूप से चलाने के लिये स्ती और पुरुष रूप दोनों पहियों का समान रूप से शिक्षित एवं संस्कारित होना आवश्यक है। राजस्थान जैसे पिछड़े प्रदेश में स्त्री-शिक्षा के क्षेत्रों में किया गया यह कार्य उनका ऐतिहासिक एवं युगान्तकारी कार्य था। - .. (17 Pyar d M यह हमारा परम सौभाग्य रहा कि टाक साहय जैस समर्पित एव सेवाभावी व्यक्ति हमें सस्था कमली रूप में जीवनपयत मार्ग-दशन देते रहे। इनका व्यक्तित्य बहुआयामी या। सामाजिक जीवन का कोड ऐसा क्षेत नहीं था, जिससे व सक्रिय रूप में न जुड़े हुए हो। इसका परिणाम यह हुआ कि श्री वीर बालिका शिक्षण सस्था केवल पुस्तकीय ज्ञान दान तक सीमित न रही। सामाजिक प्रगति एव जीवन-उत्थान के लिए जितने भी गुण आकया है, उन सबके विकास पर सस्था द्वारा यरावर बल दिया जाता रहा। श्री टाक साहय का शिष्य परिवार काफी बड़ा है। जा भी उनके सम्पक में आया वह उनसे प्रभावित और प्ररित हुए विना न रहा। वीट वालिका शिक्षण सस्थान की वर्तमान एव भावी पीढी टाक साहब क सुगधित पुष्प ऑर प्रदीप्त जीवन दीप से सदगुणों की महक और ज्ञान का आलाक ग्रहण कर सक इसी उद्देश्य से वीर बालिका महाविद्यालय की दिव्या एव वीर बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय की 'दीपिका पतिका के सयुक्ताक क रूप में 'श्री राजरूप टाक अद्धाञ्जलि स्मारिक' का यह प्रकाशन किया गया है । यह श्रद्धाञ्जलि स्मारिका तीन खड़ों में विभक्त है। प्रथम स्मरण सस्मरण खण्ड में दश और समाज के विभिन्न सतों में काय करने वाले समाजसवियों शिक्षाविदों, विद्वानों व्यवसायियों सस्था क अध्यापक अध्यापिकाओं एवं छाताओं के प्रेरक प्रसग और भावपूर्ण सस्मरण सकलित हैं। जिनमें टाक साहब के जीवन और व्यक्तित्व क पष्ठ खुलते चलते हैं। द्वितीय 'समपण श्रद्धाञ्जलि बड' में विभिन्न समाजसेवी सस्थाओं और दश के प्रमुख व्यक्तियों के अहाजलि अश सवदना सदेश सकलित हैं । साथ ही जयपुर नगर की विभिन्न सस्थाओं द्वारा आयाजित सावजनिक अद्भान्जलि सभा में टाफ साहब क प्रति व्यक्त किय गय अअपरित हदयोद्गार भी अभिव्यजित है। टाक साहय की बहुमूल्य सवाओं के प्रति सम्मान प्रकट करने वाले विभिन्न अभिनदन पत्रों में स चयनित कुछ अभिनदन पत भी इस खड में प्रकाशित किये गय है। ततीय 'शिक्षण सस्था खड में श्री वीर बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय का वार्षिक प्रतिवेदन श्री वीर बालिका महाविद्यालय का प्रगति विवरण एव शिक्षण सस्थान में कार्यरत शसणिक एव अक्षणिक कर्मचारियों की सूची प्रस्तुत की गई है। इस श्रद्धाञ्जलि स्मारिका में टाक साहव क जीवन एय वीर बालिका शिक्षण सस्थान स सम्बंधित विशेष चित भी प्रकाशित किय गये हैं, जिनसे टाक साहब की पारिवारिक एव सावजनिक सेवारत जीवन प्राकी क भव्य एव प्ररणादायक दशन हात है। आशा है, यह स्मारिका टाक साहब की जीवन ज्याति का प्रकाश हमें सतत प्रदान कर हमारा पथ प्रदर्शन करती रहेगी। - एव -सम्पादक मण्डल अनुमणिका - स्मरण-संस्मरण खण्ड 1 4 5 7 १ 10 11 -श्री हीराचन्द बैद कुमारी भारती शर्मा -श्री दौलतमल भण्डारी ---श्री देवीशंकर तिवाड़ी श्री कलानाथ शास्त्री -श्रीमती शशि शर्मा श्री ज्ञानचन्द खिन्दूका -श्री राजेन्द्रकुमार श्रीमाल -श्री सौभाग्यमल श्रीश्रीमाल -श्री शीतलचन्द कोठारी -डॉ. श्रीमती शान्ता भानावत -श्री हीराचन्द वैद, मंत्री -~-डॉ. नरेन्द्र भानावत -श्री जगन्नाथसिंह मेहता 13 15 1 18 19 विरल-विभूति रत्न-पारखी सच्चे राजरूपजी थे तुम ! पुराने साथी राजरूपजी निष्ठावान सामाजिक कार्यकर्ता समाज-रत्न की स्मृतियां जन्मते है योगी ऐसे रत्न जगत् का ज्वाजल्यमान रत्न श्री राजरूपजी टाक और उनका परिवार संस्मरण अविस्मरणीय महामानव ! प्रेरणा और प्रकाश-पुञ्ज श्री वीर बालिका महाविद्यालय उदात्त जीवन मूल्यों के शिल्पी राजरूपजी का शिक्षा-प्रेम राज. नेत्रहीन कल्याण संघ एव संत महापुरुप श्री राजरूपजी प्राकृत भारती और राजरूपजी तुमसे महका यह उपवन विश्व मानव के लिये जो प्रेरणा बनकर जिए धर्मवीर व कर्मवीर यावरुवर्य श्री राजरूपजी टांक देश तथा समाज के विनम्न सेवक - 21 27 29 31 -श्री माणिकलाल कानुगा -म, विनयसागर 33 -श्रीमती सुधा शुक्ला 34 35 37 -श्रीमती उर्मिला श्रीवास्तव -श्रीमती कमला श्रीवास्तव -~-प्रवतिनी सज्जन श्रीजी म. मा. -धी युगल किगोर चतुर्वेदी 39 अनुक्रमणिका 43 45 47 49 50 ~श्री क्पूरच द पाटनी -श्री तेजकरण इडिया -श्री ज्योतिकुमार कोठारी ~~-डॉ कस्तूरच द कासलीवाल --श्री कन्हैयालाल लोढा -सुश्री सरोज कोचर -श्री मिद्धराज दड्ढा --श्रीमती पुष्पलता जैन -साध्वी अमितगुणा श्री ~श्रीमती वती जन -श्रीमती इदरजीत कौर प्रोबेराय 51 54 56 57 58 59 60 स्व राजरूपजी एव भगवान् महावीर विक्लाग सहायता समिति जि है जमाना याद करता रहेगा 'वसुघंव कुटुम्बकम्' के जीवत प्रतिमान अनुकरणीय व्यक्तित्व के धनी सेवामूर्ति श्री राजरूपजी टार गुणग्राही व्यक्तित्व के धनी स्वाधीनता सेनानी राजरूप टाक शुभ्र व्यक्तित्व निमल मन विरत विभूति यादो के घेरे में महामानव टाक साहिब मनुज सस्कृति मे कभी जमते ऐसे रत्न दिवाकर हैं अनुपम सह्योगी पुस्तकों के प्रति प्रेम अनायो के नाय हमेशा के लिए सो गए। सेवाभावी व्यक्तित्व हमारे पूजनीय चाचा साहब वे सूरज नूतन क्षमता के मनोहर अनमोल रत्नपारखी जिनकी प्रांतो मे वसता पा भावीजन का स्वप्न महान् नारी शिक्षा के प्रेमी उस अनन्त मौन का कुछ शेष है अनोखे व्यक्तित्व के धनी चाचा साहब सर्व समभाव समथक महामना चाचा साहब 62 --श्रीमती सुलक्षणा जन -श्रीमती वन्दना जैन -श्रीमती पद्या भार्गव ~श्री रामजीलाल शर्मा 63 65 -मन्जु गोयल 68 69 ~~~कल्पना चतुर्वेदी -वन्दना -राजश्री जन 71 73 -~श्रीमती शोभा सक्सेना 76 -पुप्पा श्रीवास्तव 77 78 79 -थीमती शशिबाला शर्मा -~मीना अग्रवाल ~कुमारी मीना जैन ---हाँ श्रीमती सरोज वर्मा 81 83 अनुक्रमणिका 2 समर्पण-श्रद्धांजलि खण्ड आचार्यों-संतों, राजनेताओं, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों, समाजसेवियो एव प्रमुख व्यक्तियो के प्राचार-विचार, उद्गार एवं अभिव्यक्त की गई भावनाओं का 85 सूक्ष्म दर्शन 112 113 दुष्यन्त टांक 118 119 संस्थानों की ओर से सवेदना-सन्देश प्रमुख व्यक्तियों के संवेदना-सन्देश ऐसे थे मेरे दादाजी अभिनन्दन-पत्र समाजसेवी श्री राजरूपजी टांक ऐतिहासिक यादगार सार्वजनिक श्रद्धांजलि-सभा में- अश्रुपूरित हृदयोद्गार 123 -श्री निर्मलकुमार शुक्ला ---श्री ताराचन्द जैन 124 125 ( शिक्षण-संस्था खण्ड -~-श्रीमती उर्मिला श्रीवास्तव 133 श्री वीर बालिका उ. मा. विद्यालय वार्षिक प्रतिवेदन श्री वीर बालिका महाविद्यालय प्रगति विवरण पक्षणिक एवं अनैक्षणिक कर्मचारियों की सूनी -धीमती डॉ. बान्ता भानायत 139 152 welammamteamRuruN arpan श्री वीर बालिका संचालक मण्डल जयपुर -पदाधिकारी एव सदस्य अध्यक्ष उपाध्यक्ष . मली सयुक्त मती कापाध्यक्ष सदस्थ श्री विमलचर सुराना श्री प्रेमपद धाघिया श्री हीराचद बंद भी दुलीचद टाक श्री महावीर प्रसाद श्रीमाल श्री मेहरचन्द घाघया आ छट्टनलाल घराठी श्री रतनपद कोठारी श्री शिखरचर पुगलिया श्री सुरेद्रकुमार गाला भीमातीलाल भडकतिया श्री जी एन शमा (विश्वविद्यालय प्रतिनिधि) श्रीमती कृष्णा थानवी (उप निदेशक, कालेज शिक्षा प्रतिनिधि) सुश्री सफिया इराकी जिला शिक्षाधिकारी (छात्रा) पदन सदस्य श्री तिलक राज जैन श्रीमती डॉ शान्ता भानावत श्रीमती उर्मिला श्रीवास्तव श्रीमती सुलक्षणा जन श्रीमती स्नहलता बंद श्रीमती पुण्यवती श्रीमती आशा हिंगड व्यवस्थापक श्री केसरीचन्द सुराना
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मानव सेवा के प्रति समर्पित एक महान व्यक्तित्व- श्री राजरूप टांक विरल-विभूति रत्न-पारखी - श्री हीराचन्द बैद HAL । श्री राजरूपजी टांक का नाम याद आते ही से छ: दशाव्दी से भी पहले जब वे मात्र 18 वर्ष जयपुर नगर की सार्वजनिक संस्थानों का सेवा कार्य के थे, उन्होंने महिला शिक्षा के क्षेत्र में एक व इतिहास नजरों के सामने क्रमवद्ध रूप से आने क्रांतिकारी कार्य में अपने आप को जोड़ दिया । उस लगता है । जयपुर नगर में समाज कल्याण कार्यो युग में यह कार्य न केवल कठिन अपितु पाश्चर्य देने में रत कौनसी संस्था रही है जिसमे श्री टांक वाला था। समाज में कोई लड़कियों को पढ़ाने को साहब का योगदान न रहा हो । वस्तुतः उनके देह, राजी ही नहीं होता था । उन्होने भविष्य को विलय से अनेक संस्थाये अपने को नेतृत्व विहीन जानकर अथक प्रयास किया । घर-घर जाकर लोगों महमूस कर रही है । उनको श्रद्धांजलि समर्पित को समझाया, बालिकायों को पढ़ाने के लिये करते वक्त हमे उनके चहुंमुखी व्यक्तित्व के अन्दर रोजाना मिठाई-नाश्ता देने की व्यवस्था की। दो झांककर देखना होगा।यों कहें कि उनका सार्वजनिक अध्यापिकाओं और आठ छात्रानों से प्रारम्भ यह जीवन आदर्श तो था ही, मूल मे तो वह एक खुली महिला शिक्षा संस्था आज राजस्थान की प्रमुख किताब था-जिसको हर व्यक्ति हर कार्यकर्ता देख- संस्था है जहाँ 3500 से भी अधिक छात्रायें पढ़कर अपने जीवन का सही निर्माण कर सकता प्रारम्भिक से स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त कर है । विधाता ने उनके रूप में एक ऐसे व्यक्ति को रही हैं। यह भी एक चमत्कार ही कहा जावेगा प्रदान किया था जो जीवन में उपयोगी हर क्षेत्र कि स्थापना से अब तक 63 वर्षों तक वे में मार्गदर्शक बन कर आगे की पक्ति में खड़ा इस संस्था के मंत्री रहे। और यह भी विधि का विधान ही माने फि संस्था के स्थापना दिवस ज्ञान वे एक गांव से शहर में एक जोहरी के दत्तक पंचमी को उन्होंने देह छोड़ा। मम्मा का संचालन पाये थे। ग्राम से प्राने वाला एक व्यक्ति इतना एक बात है, पर उसमें प्राग फूक देना दूसरी यात सुगम्यत, माहित्य-प्रेमी, शिक्षा-प्रेमी हो सकता है, है । अपने जीवन के प्रादों के अनुरूप मस्या को यह एमा विशेषता ही मानी जानी चाहिये । प्राज बनाने गायन उनीने नजोपा ! तिन उत्थान - दिवाई देता था। ॥
के साय ही प्राध्यात्मिर भावना यात्रामा मे जाग्रत सतोप होता था जब वे अपने पिसी शिष्य की होवे, यही लक्ष्य उनका रहा । उहाने अपने 63वें योग्यता व निपुणता के लिए युछ भी सुनते थे। वर्ष के प्रभिन दन समारोह में शिप्य परिवार द्वारा उन्होने इस व्यवमाय मोन मेवल व्यापार समर्पित 63 हजार की राशि अपनी इस प्रिय सस्था को तुरन्त ही दे दी और यही उद्गार प्रस्ट अपितु सवा के लिये भी उपयोग किया । अनेक प्रोपधिया इन रत्ला से उहाँन निर्माण पराई कि यह माइयो की राशि बहिनो के लिये काम जिसस पई असाध्य रोगियो पर उपयोग पर उन्हें पावे, उससे ज्यादा इसका उपयोग क्या हो सकता मारोग्य लाम प्राप्त कराया। है ? ऐसे पिता वीर वालिया विद्यालय को मिले, यह इस सस्था का कितना बड़ा सौभाग्य था। यह वे ज्वेन्म एमोसियेशन के जीप नेता रहे । इम राशि जिस भावना से चाचा साहब ने अपनी पुत्री व्यवसाय में रत लोगो म हित के लिये वे सदैव तत्पर सस्था को मेंट कर दी-वह फरवती होनी ही थी। रहते थे। सस्था न केवल प्रायिर मफ्ट से उबरी, बल्कि इस व्यवसाय के लिये उनकी सबसे बडो सेवा विकास का ऐसा माग खुला कि विद्यालय महा- रत्नव्यवमाय पर लियो उनकी पुस्तर है। विद्यालय बन गया। (Indian Gemology) हिदी और प्रप्रेजी दोनो पुरियो को सस्कारी बनाने का तो हर पिता का भाषाम्रो म यह प्रकाशित हुई । एक हिदी भाषी कर्तव्य बनता ही है, पर पुत्री को भी अपने जीवन- जौहरी व्यापारी द्वारा लिखित पुस्तक अमेरीका में निर्वाह के योग्य पादश व्यापारी याना ग्रावश्यक पाठ्य पुस्तक के रूप में मायना प्राप्त करे, यह है ही। इस क्षेत्र मे भी वे प्राज के युवक जौहरिया कितने बहे गौरव की बात है । के वास्तविक और सही पिता बने । बाज जवाहरात प्राज हमारे विद्यापी उनके लिए नतमस्तक हैं, व्यवसाय में लगे हजारो व्यक्ति उनके शिष्य हैं - समर्पित हैं । उहोंने न घेवल अपने जीविरोपार्जन उनसे शिक्षा नी है। हर प्रात, हर जाति, हर घम मे ही अपने का लगाया है अपितु सार्वजनिर क्षेत्र हर योग्यता का जौहरी उनका शिप्य बनने का को प्रनेर सस्थामा में अपने को जोड़ा है पोर गौरव प्राप्त कर सका। उनके यहां जवाहरात अनेक सस्थामा मे सेवारत हैं। शिक्षण को चलाने वाली यह पाठशाला पुरातन वे पेवल व्यापारी व शिक्षा प्रेमी ही नहीं थे, इतिहास के गुरुकुन जीवन की झाकी प्रस्तुत करती राजनैतिक क्षेत्र में भी सदव अप्रिम पक्ति मै रहे । वे थी। बाहर से आने वाले छात्र को न केवल शिक्षा गाधीवादी थे, जीवन भर बादी का प्रयोग किया। ही, उनसे मिली वरन् आवास, भोजन की व्यवस्था जयपुर राज्य के युग मे वे प्रजामण्डल के मस्थापक उनके घर पर नि शुल्प प्राप्त हुई। न कोई मेंट, सदस्य तो थे ही, वर्षों तक कोषाध्यक्ष रहे। कोई नमोई शुल्क । क्या मिल सकता है ऐसा उदाहरण भी सभा, सम्मेलन अधिवेशन हो, सदैव भोजन न केवल अर्थोपाजन या जीवन व्यवस्था उनके जिम्मे रही । यह सब काम इतनी निर्वाह के लिये उनका ध्येय था अपितु उनका मितव्ययता से किया कि सब ही सुदर व्यवस्था लक्ष्य हमेशा यह रहा कि मेरे पास काम सीखने इतनी सस्ती जानवर पाश्चम करते थे। सन् 1948 वाला व्यवसाय म निष्णात हा, चारित्रवान हो, में प्राजादी के बाद जयपुर में हुए काग्रेस के प्रधि व्यवसाय के नियमो का पूर्ण पालन करन वाला हो, वेशन को भोजन व्यवस्था प्राज भी सब याद करते उसकी बाजार मे साख हा, जवाहरात व्यवसाय के हैं। वे जयपुर राज्य की असेम्बली एव नगरपालिका हर अग का ज्ञान उसे प्राप्त हो और उहें बहुत के भी निर्वाचित सदस्य रहे। उन्होंने राजनतिक - इस युग 2 श्री राजरूपजी साहब को सब कोई आदर और प्रेम से चाचा साहब के नाम से सम्बोधित करते थे । वास्तव में वे सबके चाचा थे। उन्होंने जितने कार्यकर्ता आज समाज को दिये हैं, वे ही उनकी गरिमा जानने के लिये सक्षम हैं। श्री चाचा साहब के चले जाने से ऐसा मालूम हो रहा है जैसे एक मसीहा नहीं रहा, एक पिता नहीं रहा, एक नेता नहीं रहा, एक कार्यकर्ता नहीं रहा, सबको साथ लेकर चलने वाला व्यक्तित्व नहीं रहा । वे नहीं रहे पर अपने इतने स्मारक पीछे छोड़ गये हैं कि जो युग-युग तक उनको अमर बनाने में सहायक रहेंगे। कार्यकर्ताओं को सदैव सरक्षण व सहायता प्रदान मे सम्मिलित थे। स्वाध्याय भी निरन्तर चालू की। रहता था, साधु-साध्वियों के व्याख्यान-श्रवण में भी उनकी उपस्थिति सदैव देखी जा सकती थी। साधु- समाज कल्याण कार्यों में उनका अभूतपूर्व साध्वियों की सेवा (वैयावच्य) के लिये समाज योगदान रहा। भगवान् महावीर के 2500 वें निर्वाण वर्ष के आयोजनों मे वे प्रमुख सहयोगी में उनकी प्रसिद्धि थी । रोग ग्रस्त साधु-साध्वियों की सेवा के लिए उनका घर हमेशा खुला हुअा था। रहे । उसी अवसर पर उन्ही के निवास पर विक- धार्मिक साहित्य का अच्छा संग्रह उनके पास लागों के कल्याण हेतु श्री भगवान् महावीर विक- सुरक्षित था। लाग सहायता समिति के गठन का निश्चय श्री राजरूपजी साहब को सब कोई आदर था। वे इस समिति के अध्यक्ष भी रहे। नेत्रहीनो और प्रेम से चाचा साहब के नाम से सम्बोधित कल्याण के लिये भी वे सदा जागरूक रहे । करते थे । वास्तव में वे सबके चाचा थे। उन्होंने उन्होने न केवल राजस्थान नेत्रहीन कल्याण संघ जितने कार्यकर्ता आज समाज को दिये है, वे ही की स्थापना की बल्कि जीवन के अन्तिम काल तक उनकी गरिमा जानने के लिये सक्षम हैं। उसके अध्यक्ष भी रहे । अाज इस संस्था का अपना श्री चाचा साहब के चले जाने से ऐसा मालूम भवन उनका एक स्मारक बन गया है-उन्ही का हो रहा है जैसे एक मसीहा नहीं रहा, एक पिता साहस था कि बगैर किसी आर्थिक संसाधन के एक बढा भवन उन्होने नेत्रहीनों के लिए क्रय कर नहीं रहा, एक नेता नहीं रहा, एक कार्यकर्ता नही रहा, सबको साथ लेकर चलने वाला व्यक्तित्व नहीं दिया। मृत्युपरान्त अपने नेत्र भी उन्होंने दान कर दिये थे। गौ सेवा-हरिजनोद्धार के लिये भी रहा । वे नहीं रह पर अपने इतने स्मारक पीछे उन्होंने खूब कार्य किया-अनाथाश्रम के वे संस्था- छोड़ गये हैं कि जो युग-युग तक उनको प्रमर बनाने एक थे । जयपुर शहर की शायद ही कोई संस्था में सहायक रहेगे। हो जिसमे श्री राजरूपजी टांक की सेवायें न लिखी हम सब उनके बताये मागों पर चल सके, यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उन्होंने एक प्रादर्श हमें दिया है। काग ! हम उसे नमन गों। अब कुछ उनके निजी जीवन पर भी दृष्टि It is nice to be Important, but it टाने । वे एक धार्मिक विचारधारा के व्यक्ति थे। is much Important to be nice. { पूजन-सामायिक, प्रतिक्रमण उनके कार्यक्रम -~मंत्री, श्री धीर बालिका शिक्षा संस्था गई हो। । 3 सच्चे राजरूपजी थे तुम ! अदा, धार बनकर रजन दिव्य ज्योति हुई लुप्न, तुम बहिरतर में ऐश्वर्यो या शत शत प्रणाम तुम्हें जन-जन का । सचय परते रहते थे निश दिन । शत शत नमन तुम धीर-वीर को, तुम प्रतिजन में थे अपवा थे तुम मामूहिक भव, शत शत नमन तुम राष्ट्र-रत्न को, ऐहिर, पात्मिक सुख तुम जैसे पुरणार्थी स ही पा कोटि प्रणाम तुम समाजसेवी को, सभव, कोटि वदन तुम महान् व्यक्तित्व को। अमित तेज तुम, प्रभापूण तुम, जनगण जीवन, विश्वास-सूत्र मे, ज्याति पुन तुम, ज्योतियुक्त तुम सबके तन मन । बँधे हुये थे हम तुम्हारे सहचर, दीप्त प्रोजवल, तव वल प्रोज करें हम धारण हममे, विद्यालय और देश मे, शुद्ध मन्यु तुम, हम करें मयु से क्लुप निवारण, बोये थे तुमने प्रकाश के बीज अमर । तुम चिर सह. हम सहह्न पर सर्वे धोर मात बन, सेवाभाव के अपार सिधु म, पूर्ण बनें हम सोम, सत्य पय करें मापसे धारण । सरम तेरे, तुम सृजन-शक्ति के ज्योति चरएघर, धेय, शील, सारल्य, नम्रता, वनात थे रज पए वो, सत्य, प्रीति के थे तुम चेर। जह में जीवन, जीवन में मन, प्रावाश के उज्ज्वल नक्षत्र ये तुम, मन में संवारते थे स्वमन को। चमक्त रल थे तुम, ऐसी ज्योति वह माज युभी, सक्हो लोगो का अंधियारे मे रह गये हम सब मोर परिजन, सच्चे राजरूपजी ये तुम। लो दिव्य दीप बुझ गया माज, तुम शक्ति सना में वस, मात्र स्मृति लो वनकर रह गई मन मे । नवनीत हिम से लोक थे, शत शत नमन कर रही मृतिका, तुम मानवा मे उत्कृष्ट, शतशत नमन कर रही समोर, मानवीय भावो के साक्षात् रूप थे। शत-शत नमन कर रह थे तुम मित्र जन के, ज्याति-प्रीति के शक्ति प्रसर, शत शत नमन पर रहा मनल। तुम मन, बुद्धि, कर्मों मे समन्वय करते घे स्थापित, शत-शत नमन कर रही क्षिति, तुम मरुतमान ये ज्योतित पलो की उडान भर, परते हैं हम सब भी वादन, ले जाते थे प्रात्मा की प्राकाक्षानों को ऊपर। कोटि-कोटि सैकडो तुम कभी नहीं थे पीछे हटते, करते हैं हम मापको अपित । जीवन था तुम्हारा अटल निश्चय, -फुमारी भारती शर्मा द्वितीय वर्ष, फला वीर बालिया कॉलेज रत्ना में प्रिया पना नमन, 4 सादा जीवन उच्च विचार के प्रतीक पुराने साथी राजरूपजी 10 श्री दौलतमल भण्डारी जव में अपने विगत जीवन पर दृष्टि डालता उन्होंने किसी किस्म का भेदभाव नही किया और हूँ तो मेरे बाल्यकाल के साथियो में सबसे पुराने जो आया उसको उसकी लियाकत के मुताबिक साथी श्री राजरूपजी टांक को पाता हूँ। जब वे जवाहरात का काम सिखाया। उनका एक मुख्य और में 6-7 साल के थे तो हम दोनो श्री लीलाधर उद्देश्य यह रहा कि मेरे पास जो भी काम सीखने जी के उपाश्रय मे जो पाठशाला थी, उसमे पढते आये, वह कम-से-कम इतना तो सोख ले कि अपना थे। उनकी प्रतिभा तो उसी वक्त दृष्टिगोचर होती जीवन-यापन अानन्दपूर्वक कर सके । यो जैसा कि कहा गया है-"होनहार विरवान के समाज सेवा के क्षेत्र मे उनकी प्रवृत्ति मुख्यत: होत चीकने पात ।" शिक्षा तो उन्होने स्कूल तक बालिकाओं में शिक्षा का प्रसार करने मे थी। ही पाई लेकिन जल्दी ही उन्होंने जवाहरात के आज से करीब 63-64 वर्ष पहले उन्होने श्री वीर काम में निपुणता हासिल कर ली साथ-ही-साथ बालिका शिक्षण संस्थान की स्थापना की जो उन्होने बाल्यकाल से ही स्वयं को समाज सेवा के बढते-बढते प्राज वालिकामो के कॉलेज के रूप में कार्य में लगा दिया । जवाहरात के काम मे उनका है, जिसमें 3-4 हजार छात्राएं शिक्षा प्राप्त कर कोई मानी नहीं था। जयपुर शहर मे वैसे तो रही है। जयपुर शहर के परकोटे के अन्दर पन्ने का काम होता है लेकिन उनका विशद ज्ञान बालिकामो को शिक्षा देने वाली ऐसी संस्था की समन्त रत्नो के बारे मे था । उन्होने अपने ज्ञान स्थापना करना और विकास करना, उन सबका का उपयोग अपने लिए धनोपार्जन के लिए नही श्रेय श्री राजरूपजी टांक को है। शहर के अन्दर किया । जयपुर में जवाहरात के काम करने वाले शिक्षा का इममे बड़ा योगदान और किमी महा- मययुब गो की एक टोली बड़ी कर दी। प्राण भी नुभाव का नहीं है। उन्होंने बालिकामों को शिक्षा जसपुर के अन्दर बड़े-बड़े प्रनिद्ध जौहरी नजर या मुलभ फरादी और माय-ही-माय उनका हमेशा में जिन्होंने श्री राजपजी टाप में ही निक्षा यह ध्यान रहा कि यह शिक्षा उन्न तर की होने पोरा ली थी। जवाहरान पा काम निपाने में हुए भी मदनी होनी नाहिए। 5 झोपड़ी से महलो तक की यात्रा - गांव के साधारण परिवार मे जम लेकर श्री राजरूपजी टार अपनी लग्न, अध्यवसाय, परिश्रम और सेवा भावना से जयपुर शहर ही नहीं, अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के कमठ समाजसेवी, प्रबुद्ध कायकर्ता एवम् रत्नव्यवसायी थे। उनका रत्न विषयक ज्ञान अनुपम था। वे रत्न-शास्त्र की अनेकानेक पुस्तको के प्रणेता थे, जिनका व्यावसायिक जगत् मे बहुत बडा मान है । समस्त भौतिक सुख-साधनो से सम्पन्न होते हुए भी, उसके मद मे नही खोए । त्याग की तपोमूर्ति, सदव प्राणीमात्र की सेवा भावना एवम् उहें सुखी देखने के लिए, प्रत्येक पल तन, मन, धन से समर्पित रहे। वे अपने जीवन काल मे जवाहरात उद्योग के उत्थान व विकास हेतु अपना अपूर्व ज्ञान अपने साथी सहयोगी एवम् शिष्यो मे मुक्त हस्त से वितरित करते रहे। उनसे शिक्षण व दिशा वोघ पाकर प्राज अनेकजन रल व्यवसाय के विशेषज्ञ एवम् लब्ध प्रतिष्ठित व्यापारी हैं । प्रत्येक सेवाभावी संस्था से वे सदैव जुडे रहकर, उसे हर सम्भव सहायता प्रदान करते रहे । फलस्वरूप अनेक सस्थाएँ अाज विकसित होरर उनके द्वारा पोपित पावन उद्देश्यो की पूर्ति मे लगी हुई हैं । ये सस्थाएं उनकी चिरस्थायी स्मृति रूपक हैं । उनसे प्राज जन-जन प्रेरणा ग्रहण कर उनके निधन से सावजनिक सेवा व रत्नव्यवसाय मे एक अपूरणनीय क्षति हुई है। हमारी उहें अश्रुपूरित श्रद्धाजलि समर्पित है। -कन्हैयालाल घाटोवाला जवाहात मे उना इतना विशद् ज्ञान था श्री महावीर विक्लाग सहायता समिति के कि उहोने एक पुस्तक भी लिखी जिसका विमोचन सस्थापर सदस्यो मे वह एक थे और उसके वह करने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ और जिस अध्यक्ष भी रहे । राजस्थान नेत्रहीन कल्याण संघ रोज पुस्तक का विमोचन हुआ उस दिन उनके के वे अध्यक्ष भी रहे । जयपुर मे कोई ऐसा क्षेत्र शिष्या ने उनको 63 हजार रुपये की थली मेंट नहीं था जिसमे श्री राजरूपजी टाक ने भाग नहीं की थी, जो उन्होंने श्री वीर बालिका शिक्षण निया हो । मानवीय सेवा करना उनका सिद्धान्त सस्थान को समर्पित कर दी। था और वह अनवरत रूप से सावजनिक सेवा में सामाजिक क्षेत्र के साथ साथ उहोने राज लगे रहे । जव जब में उनका स्मरण करता हूँ तो नैतिक क्षेत्र में प्रवेश किया और जयपुर राज्य प्रजा मेरे सामने एक ऐसे व्यक्ति का चित्र प्रस्तुत होता मण्डल की स्थापना के समय से ही वे वर्षों तक है जिसने समाज की निष्काम भाव से जीवन इसके कोपाध्यक्ष के रूप में काम करते रहे। उनकी पर्यत सेवा की जो हम सबके लिए शिक्षाप्रद और विचारधारा गाधीवादी थी और श्रद्धेय श्री जमना- अनुकरणीय है । भगवान् उनकी पात्मा को शाति लालजी बजाज के स्नेह-पान थे । जीवन म उहोने दे और हम सबको प्रेरणा दे कि हम उनके जीवन सादगी को अपनाया और हर एक व्यक्ति के साथ से कुछ शिक्षा प्राप्त करके देश और समाज की भाईचारे का व्यवहार बनाये रखा। वे राजस्थान सेवा कर सकें। गौ सेवा संघ के वर्षों तक कोपाध्यक्ष रहे । -मूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश, राजस्थान उच्च न्यायालय 6 be al -- निष्ठावान सामाजिक कार्यकर्ता- श्री राजरूपजी टाँक - 0 श्री देवीशंकर तिवाड़ी श्री राजरूपजी टांक उन इने-गिने व्यक्तियों पर छापा मारा, उस समय राजरूपजी ने अपना मे मे एक थे, जिन्होने जीवन के अनेक क्षेत्रों में बहुत सा बहुमूल्य सामान अपने किसी सम्बन्धी के मफलता पाई। मेरा उनसे परिचय लगभग 50 भरोसे न छोड़कर मेरे भरोसे छोड़ा और वह वर्ष पूर्व एक मुकदमे के सिलसिले में हुआ, जो सामान मेरे पास कई महीनों तक रखा रहा । उनके विरुद्ध उस व्यक्ति ने न्यायालय मे प्रस्तुत राजरूपजी जवाहरात का व्यापार तो करते किया था, जिससे उन्होंने वर्तमान हवेली खरीदी ही थे, साथ ही उन्हें गांधीजी के रचनात्मक कार्य- थी। वादी का दावा था कि उसने पूरी हवेली क्रमो मे गहरी रुचि थी। अतः वे किसी-न-किसी वेची है, परन्तु हवेली के दूसरे चौक के वरन्डे की रूप मे गांधीजी के रचनात्मक कार्यों से जुड़े रहे । विडकी नहीं बेची । उस खिड़की तक पहुँचने और आजन्म उन्होने गौ-सेवा संघ की सेवा की और उपयोग करने की उसे सुविधा प्रदान की जावे । अतिम समय तक खादी और ग्रामोद्योग की गति- यह वाद वर्षो न्यायालय मे चलता रहा। वाद के विधियों से जुड़े रहे। अत होने पर हम एक-दूसरे के बहुत निकट पा जयपुर मे जब प्रजामण्डल की स्थापना गये और मेरा उनसे इतना निकट का सम्बन्ध हो पश्चात् राजनैतिक गतिविधियां चालू हुई तो वे गया कि वे मुझे अपने बड़े भाई के समान मानने उनसे भी जुड़ गये और प्रजामण्टन के निष्ठावान् नगे थे। उन्हे ऐसा विश्वास हो गया कि मुझमे कार्यकर्ता के रूप में कार्य पारते रहे। सन् 1948 पनि उनका शुभचिन्तक जयपुर में कोई नहीं में अखिल भारतवर्षीय काग्रेस कमेटी का जयपुर है। रानपणी जवाहरात का व्यापार करते थे। मे अधिवेशन हुग्रा, उन समय उन्होंने प्रतिनिधि मापार में पाई नर को गडबडियां हो जाया मण्डल के सदस्यों के भोजन की व्यवस्था में यहुन भारनी है। एक बार पुलिस ने उनके निवास स्थान कुछ काम किया। 7 मूक वेदना के रक्षक पीडित मानव की मुन पुकार, तुम रल पारसी सवश्रेष्ठ, रक्षा करते थे उसी काल । मानवता के हित चिन्तर थे। है मूव वेदना के रक्षक, सवेदनशील, परोपकारी, हारा या तुमसे महाकाल ॥1॥ स्वाध्यायी प्रात्म चिकित्सय पे ॥411 गौ रक्षक पाठक, मूक बधिर, तुम मूव वेदना सहते थे, मानव अपा में रक्षक थे। सवनी मा भर माती थीं। थे सबके पालनहार प्राप, साक्षात् भीष्म यी घर शया, शिक्षण संस्था के पोपर ये ॥21॥ स्मृति म सबकी तर पाती थी। जो अभाव से प्रस्न, व्यथित, हे मृत्यु जयी, ह पालजयी, उनके उर के नानी ध्यानी। घाडी हृदयो पर अमिट छाप । अव वाट जोहते वे तेरी, स्मृति मिटेगी कभी नहीं, क्व पायेगा करुणा-दानी ॥3॥ पाह मिट जायें स्वय प्राप ।।6।। –श्रीमती कमला श्रीवास्तव प्रध्यापिका, वीर गालिया विद्यालय, जयपुर तत्कालीन जयपुर सरकार को एक जौहरी सम्बध में एक पुस्तक नी उन्होंने लिसी, जिसरा का राजनैतिक क्षेत्र में काय करना अच्छा नहीं अंग्रेजी अनुवाद भी प्रकाशित हुआ। इम पुस्तक लगा और उस समय के अधिकारियो ने समाज म को विदेशो में सराहना की गई। इहें नीचा दिखान का पूरा प्रयत्न किया । उनकी सबसे बड़ी देन, जिसे समाज कभी तत्कालीन जयपुर मे नामी चोर और बदमाशो नहीं भूलेगा, वह थी-महिला शिक्षा के क्षेत्र मे । की पुलिस म हाजरी हुआ करती थी। प्रशासन ने उन्होंने प्राज के लगभग 50 वप पूर्व वीर बालिका राजरूपजी टाफ को भी उस श्रेणी म ले लिया। विद्यालय की स्थापना की, जिसने इस समय और प्राय नित्य ही रात्रि म उनके निवास पर विशाल रूप धारण कर लिया है। इस विद्यालय पुलिस उनकी हाजरी लेती थी। म प्राथमिक यक्षाम्रो से लेकर स्नातक तक पी राजस्पजी वास्तव में एक निष्ठावान् सामा- रक्षाएं चलती हैं, और इस सस्था निकली हुई जिक कायकर्ता थे, जिनके हृदय मे गरीबो के संबडो छात्राएं भाज सफल गृहिणी मोर प्रति दया यो । उहोने राजस्थान नेत्रहीन कल्याण माताएं हैं। सघ एव विक्लाग सहायता समिति की निरन्तर माज राजस्पजी नहीं रहे, उनकी याद रह सेवा की और इसके वे अध्यक्ष रहे। गई है । वे एक कुशल जौहरी, सच्चे मित्र, शिक्षा- राजरूपजी ने जवाहरात के धंधे में जो प्रेमी एव निष्ठावान समाज-सेवी थे। वे अपनी छोड गये हैं, जिससे उह सदा कुशलता एव नान प्राप्त किया उसे वे ग्राम जनता को देन से नहीं चूके । मंक्डा नवयुवको को रत्न निष्ठावान सामाजिक वायकर्ता के रूप में याद विज्ञान का प्रशिक्षण दिया, अनेक विद्यार्थी पाज किया जायेगा। राजस्थान के सफल जौहरी हैं। रत्न विज्ञान के -प्रमुख समाजसेवी एवं शिक्षाविद 1, म्यूजियम माग, जयपुर-4 - 8
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[पान मसी पी लाल बहादुर शास्ती ।
यी महागीर किनाग सहायता समिति के अन्यक्ष
श्री गजम्प टाक, भारत के गादपति श्री नीलम संजीव
जी का म्यागत करते हुए --- अभिनन्दन करते हुए ।
१ - * । WA 4 LA हर कार्य में सजग, हर कार्य में अग्रगी. श्री राजरूप टाक ने भारत के प्रधानमंत्री श्री नागजी साई देसाई को जवाहरात उद्योग के सवध मे प्रतिवेदन प्रस्तुत किया, साथ ही समस्यायो के निवारणार्थ उनसे । - - ट भगवनयकलाश्वासन भी न किया। Rame - + + । । । । T wp-imate- --PARMAnatok Ankaranayam Mauran+Mer 7- - matamdA -kamaAmotbA
जयपुर चैम्बर ग्राफ
के समारोह प भार
गष्ट्रपति श्री नीलम
रेडी-चैम्बर के पद
नियो मे मुन्द्र कुमा
एव श्री टाक मार
श्री टार माहबहार
पुस्तक "न्न प्रकाश
विमोचन करने हुए
गजस्थान के राज्यप
डॉ सम्पानन्द ।
श्मीर के यशस्त्री
श्री ननिह प्रस्तुत
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पुम्नर का अवलोकन
हुए, उने पटने हुए
ammar - 1 चाचा साहब की 6वी वर्षगांठ पर उनके गिप्य- परिवार ने राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री मोहनलाल सुखाडिया की अध्यक्षता में एक विशेष समारोह का प्रायोजन किया ! mar 1 . . । + marastra. -- . है उनी प्रबलन पर उप गिर न्यिाने वागमात्र को समान स्वरूप ( 2'- २. भी यानी की।
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जौहरी द्वय
जयपुर के प्रसिद्ध =
श्री गजमन मुरागा
श्री गजम्प टाक-राज
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महामहिम राज्यपान
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जाना प्रतिनी भी
श्रीजी व मृदुभापी श्री
प्रभा धीजी के मान्नि
एक विगेप ममार
आयोजन में
मार
समाज-रत्न की स्मतियाँ YA Dr श्री कलानाथ शास्त्री , वे जयपुर नगर के साथ समाज-रत्न श्री राजरूप चन्द्र जैन ने उच्चस्तरीय अध्ययन अनुसंधान संस्थान टाक की सेवायों का 80 वर्प का सम्बन्ध इतना जव स्थापित किया तो उसके प्रेरको मे भी टांक गहरा है कि सहसा यह विश्वास नहीं होता कि साहब थे । कुछ वर्ष तक मै इस संस्था का महा- जयपुर को तथा हम सबको छोड़ गये हैं । न सचिव रहा था। मुझे याद है प्रत्येक बैठक में टाक केवल रत्न व्यवसाय, कामगारों के प्रशिक्षण तथा साहव आते थे और हमे अाश्चर्य होता था कि उससे सम्बन्धित साहित्य-लेखन मे विचार, हिन्दी इतने व्यस्त होते हुए इतने व्यस्त होते हुए भी ये ऐसी हर बैठक में संस्कृत. प्राकृत, धर्म, जैन विद्या आदि क्षेत्रों में पहुंचने का समय निकाल लेते थे, चाहे थोड़े समय कार्यरत संस्थानों को प्रोत्साहन देने मे, नेत्रहीनों के लिए ही क्यो न हो। और विकलांगों की सेवा मे उनकी प्रेरणा और जयपुर में जितने साहित्यिक, सामाजिक या उनकी कर्मठता इतने लम्बे समय तक इस नगर धार्मिक वडे समारोह होते थे उनकी स्वागत समिति को देखने को मिली है कि उनकी स्मृतिया सदा मे या प्रबन्ध समिति में टांक साहब को सम्मानित अमर रहेगी। सदस्य के रूप से या संरक्षक के रूप में शामिल मेरा उनसे सम्पर्क मेरे बाल्यकाल से ही रहा। किया जाता था। श्री देवीशंकर तिवाड़ी, जो स्वयं मेरे पिता स्व. भट्ट मथुरानाथ शास्त्री उनके मित्रो यहां के नगर जीवन के एक स्तम्भ हैं, राजरूपजी मे से थे और कहा करते थे कि राजरूपजी इस के अभिन्न मित्र थे। ये दोनो अधिकांश संस्थानों नगर के सभी पुराने परिवारो के मित्र हैं । शायद और समितियो में साथ-साथ सम्मिलित रहते थे । ही कोई ऐसा पुराना प्रतिष्ठित परिवार हो, जो मुझे ऐसी सैकड़ो बैठकों की याद पा रही है जिसमे इनके कार्यों के सम्पर्क में न पाया हो । बाद में टांक साहव शामिल होते थे और प्रत्येक कार्य को अनेक संस्थानों के सदस्य के रूप मे जब में कार्य प्रोत्साहन और प्रशंसा देते थे। उनकी इन आत्मी- परने लगा तो उन सब सस्थायी के प्रेरक व्यक्तित्व यता और प्रशंसा से बहुत से काम बिगड़ते-बिगड़ते के रूप में एनसे सम्पर्क होता रहा । प्राकृत भारती भी बन जाते थे। स्था जो अब प्राकृत भारती अकादमी हो गई है, एक बार विनोद में उन्होंने कहा था कि जब स्थापित हुई थी तो इसके गुणग्राहक सचिव इतनी संस्थानों ने मुझे संरक्षक या कोपाध्यक्ष श्री देवेन्द्रराज मेहता ने कृपापूर्वक मुझे भी उग बनाया है और उन सब काम के लिए मैं सुने मन मन्या में सहयोगी बनाया। उसकी बैठकें सदा से अपनी प्रोर से जो प्रायिक सहयोग गम्भय हमा टांग मारव की हथेली में होती थी। प्रो. प्रवीए देता रहा है। और माप ही अन्य गम्पप्न व्यक्तियों - 9 से चदा मागने भी जाता रहा हूँ। अव यह हालत जन्मते है योगी ऐसे हो गई है कि जब भी किसी से मिलने जाता हूँ तो वे यही समझते हैं कि किसी सार्वजनिक कार्य | रत्न से एक रत्न राशि विलग हो कर खो गयी, के लिए चदा मागने आया होगा । इस विनोद के धवल ज्योति, परम ज्योति मे लय हो गयी। साथ वे यह अवश्य कहते थे कि इसका अथ यह तीन वर्षों की थी अटल वह साधना । नहीं है कि मैं ऐसे काम के लिए जाना बन्द कर फिर चल दिये थे प्राण पछी उड गगन मे । दूगा । यह काम तो मैं जीवन भर करता रहूंगा। जग सुधारक नाम पाकर, मर परके भी जो जी गये । पर चाहता यह हूँ कि मेरे साथ प्राप सब लोग भी रहें ताकि मैं नि सकोन किसी अच्छे काम की स्व समपित निष्काम कर्मी वकालत कर सकू। उनकी यह परोपकारी वृत्ति दोनो के सिरमौर वनकर जो जी गये। जयपुर भर मे स्मरण की जाती थी। इसका परि रो उठे थे देखकर, रणाम यह तो होना निश्चित ही था कि वे अजात- नारी हृदय की वेदना को, शत्रु रहते और यही हुआ । उनकी निदा करने विक्ल मानम छटपटाया, वाला कोई नहीं मिलेगा । ऐसा भी काई व्यक्ति विकलागो की वेदना पर, नहीं मिलेगा जो किसी न किसी प्रसग मे साव ले लिया था प्रण उसी दिन, जनिक जीवन में इनके निकट सम्पक म नही पाया नारी के उत्थान का। हो । इतने लम्बे समय तक खुले दिल से इतनी शक्तिशाली हाथ वनवर, व्यापक सावजनिक सेवाएँ करने वाले व्यक्ति विरले साथ दो गसे दलितो के वे ही होते हैं । उनके उठ जाने से ऐसा लगता है कि अशावतार इव धमस्य पूरा इतिहास उठ गया है । एक अध्याय ही नही जन-जन के प्राणाधार बनकर जो जिये, अनेक अध्याय ही समाप्त हो गये हैं। निरभिलापी, विरत सुख, वीर बालिका विद्यालय उनके द्वारा रोपा तल्लीन सेवा भाव में, गया ऐसा उत्कृष्ट कल्पतरु है जो गत 63 वर्षों स जुट गये जन-जा की सेवा में निरतर पनप रहा है और फलफल रहा है। एकजुट प्रयास से। इसका काय अव इतना बढ़ गया है कि यह महा- मनुज सस्कृति मे विद्यालय भी बन गया है और अनेक शाखाओ म कभी मरता न ऐसा व्यक्ति है, इसकी शक्षणिक प्रवृत्तियां चल रही हैं । जिस बदलते समान्त मूल्यो में लगन से इन्होन तन-मन धन से इसे सीचा है, वह जमते है योगी ऐसे । सभी सावजनिक जीवन में कायरत व्यक्तियो के श्रीमती शशि शर्मा लिए अनुकरणीय है । मुझ भलीभाति याद है कि अध्यापिका, वीर बालिका विद्यालय अपनी प्रतिम अवस्था मे रुग्ण होत हुए भी वे क्सिी प्रकार इस सस्था के ही नही अय सस्थानी होगी । निश्चय ही राजरूप टाक अमर रहेंगे । सामने वह छवि अाज भी उसी प्रकार जीवन्त के भी, जिनसे व जुड़े थे, समारोहो म जाते थे उनकी कमठता और उनकी समाज सेवा अमर और बड़े स्नेह से सहयोग देते थे। उनकी वह छवि आज भी मरी आँसो के सामन घूम जाती है । न रहेगी। जाने कितने एस व्यक्ति होंगे जिनकी आखो के -निदेशक, भाषा विभाग, जयपुर . . ।
रत्न-जगत् का ज्वाजल्यमान रत्न श्री राजरूप टांक 0 श्री ज्ञानचन्द खिन्दूका जिसने भी जन्म लिया है उसका मरण जौहरियों के साथ बैठकर पन्ने की खरड़ बनाया अवश्यम्भावी है किन्तु कुछ व्यक्तित्व ऐसे विलक्षण करते थे। प्रतिभाशाली होते है जिनके पार्थिव शरीर के जाने उन्होने रत्नव्यवसाय व रत्नपरीक्षा के पार- के बाद भी उनके कर्तृत्व और यश की गरिमा म्परिक तरीके से प्राप्त ज्ञान तक ही अपने को उन्हें दीर्घकाल तक जीवित एवं उनकी स्मृति को सीमित नहीं रखा अपितु प्राचीन ग्रंथों एवं अक्षुण्ण बनाये रखती है। अर्वाचीन पाश्चात्य प्रणाली में से वे निरन्तर खोज स्वर्गीय श्री राजरूप टांक ऐसे ही यशस्वी करते रहे और अपने अनुभव को नये आयाम देते व्यक्तित्व के धनी थे। राजस्थान के छोटे से गाँव छोटे से गांव रहे। इसी से प्रेरित होकर उन्होंने अपने जीवनकाल चिडावा मे श्री माणकचन्दजी श्रीमाल के घर में रत्नों का अभूतपूर्व संग्रहालय निर्मित किया जो जन्मे श्री राजरूपजी की स्कूली शिक्षा सिर्फ पाठवी सुगमता से अन्यत्र उपलब्ध नहीं है । श्रेणी तक ही रही, वहाँ से ये जयपुर में श्री उनका जीवन दर्शन एक निश्छल प्रवहमान छगनलालजी टांक के यहाँ गोद आये । जयपुर के धारा के अनुरूप था, जिसके तट पर जो भी पाया सुप्रसिद्ध जौहरी श्री रतनलालजी फोफलिया जैसे उसे अपनी प्यास बुझाने का ममान अवसर मिला अनुभवी एवं रत्नपारखी गुरु से इनने रत्नव्यवसाय और वह अपनी क्षमता के अनुसार अपने पात्र को का प्रशिक्षण प्राप्त किया। भरकर ले गया । यही कारण था कि उन्होने विना यह श्री टाक की मेहनत व निरन्तर अभ्यास किसी जाति व संप्रदाय की बाधा के युवको को का ही परिणाम था कि वे अपने गुरु से प्रदत्त रत्न उद्योग में प्रशिक्षण दिया। उनके शिष्यो की मान को बटाते रहे और रत्नव्यवसाय व रत्न संख्या लगभग एक हजार होगी। जयपुर रत्न परीक्षा के नये क्षितिज खोलते रहे । उद्योग का प्रमुख केन्द्र है। दुनिया के रत्न यद्यपि मुझे उनका विधिवत शिष्य होने का व्यवसाय के मानचित्र पर जयपुर को जो गौरवपूर्ण मौभाग्य प्राप्त नहीं हुग्रा तदपि उनका वात्सल्य अगगण्य स्थान प्राप्त है उनमें श्री टाक का तथा पौर स्नेह मेरे कंगोयं से ही मुझे मिलता रहा । इनके शिष्यों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। नब ये हमारे पिताश्री एवं ख्यातिनामा जोहरी यह प्रसन्नता की बात है कि उनके प्रधिकांस मिप्य स्वर्गीय श्री मगनमलजी माहब पटोलिया व अन्य प्राजन व्यवसाय में भी स्थानो पर बैठे हैं।
मधुर भाषी - आप एक सफल रत्नव्यवसायी थे। जयपुर में प्रापने काफी बडी सख्या मे लोगो को रत्नव्यवमाय मे दक्ष कर स्वावलम्बी बनाया। आप मधुर भाषी, मिलनसार, मरलस्वभावी थे । अपने सद्व्यवहार एव प्राक्पक व्यक्तित्व से प्रापने सभी को प्रभावित किया । प्रापने धार्मिक, सामाजिक एव व्यावसायिक गतिविधियों में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई। -~श्री महावीर जैन श्वेताम्बर मन्दिर, जयपुर रत्नपारखी श्री टाक मे व्यावसायिक निपुणता परिपद् के सदस्य के रूप मे भी वे जयपुर के एव मानवीय गुणो का अद्भुत सामन्जस्य था । नागरिको की सेवा करते रहे । राजस्थान चेम्बर व्यापार हो अथवा समाज सेवा, वे दोनो मे प्रभावी ऑफ कॉमर्म एण्ड इण्डस्ट्री, व्यापार, उद्योग रहे हैं । उनकी दानशीलता एव क्तव्यपरायणता का मण्डल, जयपुर चेम्बर ज्वलस असोसिऐशन, गो- लाम व्यापारिक संस्थाओ, शिक्षालयों एव चिकित्सा सेवा संघ आदि व्यापारिक संस्थानो के अध्यक्ष व के क्षेत्रो को समान रूप से मिलता रहा । अनेक उच्च पदो पर वे आसीन रहे। अनाभालय हो अथवा नेत्रहीनो का स्कूल, जरूरत- बोलचाल मे मृदुल और अत्यन्त व्यवहार- मद की मदद लिये उनके दरवाजे सदैव खुले रहते थे। इसी से प्रभावित होकर उन्हें 'समाज वुशल, विनोदी स्वभाव के श्री टाक बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। विद्वानो और सन्तजनो के प्रति उनके रत्न" तथा "समाज भूपण" आदि उपाधियो से हृदय मे अगाध श्रद्धा व प्रेम था, लगता है उनके सम्मानित किया गया। उनके शिष्यो ने उहँ शुभाशीर्वाद से ही श्री टार' जिदगी की बुलदियो 63,000/- की थली भेंट की थी जिसे उहाने पर चढते गये। सहर्ष महिला शिक्षा के लिए अर्पित कर दिया । प्रासरी दान के रूप में वे अपने नेत भी दान कर उनके द्वारा लिखित पुस्तक "इण्डियन गये जिससे किसी नेत्रहीन को लाभ मिल सके। जेमोलाजी" व "रत्नप्रकाश" का भारत में ही नहीं पद्यपि स्वतत्रता संग्राम मे जेल जानेवाले अपितु अमेरिका तथा यूरोपीय देशो मे जो सम्मान स्वतत्रता सैनिको की सूची में उनका नाम नहीं हुआ है उससे पुरातन भारतीय रत्न विशेषज्ञता था, फिर भी राजनैतिक क्षेत्र म वे काफी समय की प्रतिष्ठा बढी जिसके लिए श्री टाक की जितनी तक सक्रिय भाग लेते रहे । वे जयपुर राज्य प्रजा- प्रशसा की जावे, थोडी है। मण्डल से सम्बन्धित रहे और उहें सेठ जमनालाल ऐसे स्यातिनामा, रत्नपारखी, व्यवहारकुशल, बजाज जैसे देश भक्त का सान्निध्य प्राप्त होने का समाजसेवी के निधन से जो रिक्तता पाई है सौभाग्य मिला । वे जयपुर की प्रथम लेजिस्लेटिव उसकी पूर्ति होना अत्यन्त कठिन है । मैं इनके असेम्बली के सदस्य निर्वाचित हुए। जयपुर नगर गुणो के प्रति विनयावनत हूं। 0 12 भाई सा. श्री राजरूपजी टांक और उनका परिवार 1 श्री राजेन्द्रकुमार श्रीमाल 'विशारद' जैसे उत्तम धरती और उत्तम बीज ही फल के व्यापार के लिए कलकत्ता पधारे थे । तत्कालीन दायी उत्तम वृक्ष के मूल कारण हैं, ये उत्तम वृक्ष खेतडी नरेश ने उनको कलकत्ता पत्र लिखा कि. ही पर्यावरण की सुरक्षा करते है, सघन छाया यह एक बहुत ही गौरव की बात है कि चिडावा पथिको को शान्ति प्रदान करते है, हरीतिमा से से सर्वप्रथम आप जवाहरात का व्यापार करने नेत्र और मन को आनन्दित करते है और मधुर कलकत्ता पधारे है। इससे अपने कस्बे की बहुत फनों से आबालवृद्ध को पोषित करते है, यही बात शोभा बढी है। श्री राजरूपजी टांक के जीवन के सम्बन्ध में भी श्री रामप्रसादजी का विवाह चाकसू के कही जा सकती है। श्री हीरालालजी छगनलालजी की वहिन श्रीमती आपका जन्म वि. सं. 1964 मे श्रावण मगनवाई से हुअा था। श्री रामप्रसादजी के बडे बुदी 55 को चिड़ावा (शेखावाटी) के समाज के सुपुत्र श्री किशनचन्दजी का भी कलकत्ता मे अग्रणी श्री मारणकचन्दजी श्रीमाल के यहाँ हुआ जवाहरात के व्यापार मे विशिष्ट स्थान था। था। उनके पूर्वज श्री सांवतरामजी ठिकाना खेतडी उनके तीन सुपुत्र श्री भंवरलालजी, श्री छुट्टनलाल के दिवान थे । उन्होने तत्कालीन महाराजा जी एडवोकेट और राजेन्द्रकुमार है । उनके अजीतसिंहजी के निवास के लिए चिड़ावा मे अपने मझले सुपुत्र श्री मारणकचन्द्रजी का विवाह नीमा निवास स्थान में ही एक महल का निर्माण (जि. चूरू, राजस्थान) के प्रतिष्ठित कोठारी करवाया जो ग्राज भी श्रीमालो के मोहल्ले मे परिवार श्री केशरीचन्द्रजी की सुपुत्री घोटा बाई गीनूद है । उसमे पानी का प्रयोग छानकर करवाया के साथ हुया था। श्री माणकचन्द्रजी बहुत ही गा, यह उनकी विवेकपूर्ण अहिंसा का उदाहरण शांत स्वभावी व धार्मिक प्रकृति के व्यक्ति थे। वे । उन्होंने म झुनू मे एक वृहत् दादावाड़ी का हर वर्ष पर्युपण पर्वाधिराज पर अपनी प. पू. निर्माण भी करवाया जिसकी प्रतिष्ठा उनके मुपुन माताजी को कल्पसून सुनाने के लिए चिढावा श्री हरिनारायणजी ने कराई थी। श्री हरिनारायण पधारते थे । किसी विशेष कारणवश वे न पधार हो ठिकाना गेतली मे कामदार रहे व फौजदारी मयते तो उनके यशस्वी मुपुत्र श्री राजपजी टाया नया दिवानी का भार भी उनको मापा गया था। कल्पमूत्र वानन के लिए चिड़ावा पधारने, जिनको के प्रपोस श्री रामप्रसादजी गर्वप्रथम जवाहरात सुनने के लिए सभी वर्ग के व्यनि मम्मिलित होने .. । ! 13 थे। श्री मारणवच द्रजी के लघुभ्राता श्री लाभच द्र को सौंप दिया। श्री हीरालारजी या स्वगवास जी वीमारी का नि शुल दवाइया वांटते थे। उनके म 1963 में हुप्रा व उनके एव सुपुत्र श्री अनुज श्री फूलच द्रजी की घमपत्नी ने दीक्षा उमरावसिंहजी थे। श्री उमरावमिहजी में कोई ग्रगीकार की जो पुण्यधीजी के सिंघाडे म बुद्धि सतान नहीं थी। प्रत उन्होंने श्री पारमय द्रजी श्रीजी के नाम से विख्यात हुई। उहाँन समा को गोद लिया जो जवाहरात मा पाय र बल्याणजी रचित चत्य वदन चौबीसी का हिदी रह हैं। अनुवाद व च दवेवली (बधमान तप) की पुस्तकें श्री छगनलालजी मा विवाह जयपुर के प्रसिद्ध निखी जिसका प्रकाशन श्री जिन हरिमागर मूरि जौहरी और समाज मेवी मठ श्री येशरीचन्द्रजी भण्डार लोहावट से हुआ है। भूमल की वहन (सुपुत्री श्री मांगीलालजी, मालपुरा श्री माणक्च द्रजी के दो सुपुत्रिया व दो मुपुत्र निवामी) स हुआ था । स 1966 में श्री थे। बडे सुपुत्र श्री राजरूपजी अपन पिताजी श्री छगनलालजी का स्वगवाम हो गया। म 1967 माणकच द्रजी के ननिहाल चाकसू के सेठ श्री से दोनों भाइया या परिवार प्रतग हो गया। छगनलालजी के गोद चले गए थे, उसके बाद लघु प्रत श्री छगनलालजी की धमपत्नी श्रीमती गौरा सुपुत्र श्री सुमति द्रजी का देहान्त हो गया। भाई ने अपने नन्दोई श्री रामप्रसादजी ये पौत्र चारसू के सेठ दिलसुखरायजी के दा पुत्र (सुपुत्र श्री माणकच द्रजी) श्री राजरूपजी या श्री हीरालालजी छगनलालजी टाक हुए जिनका संवत् 1970 मे गोद लिया। प्रापका विवाह जन्म प्रमश वि म 1902 व 1917 मे हुमा । जयपुर के सुप्रमिद जौहरी श्री देवलच द्रजी म 1940 में प्राप चारमू से बम्बई पधारे तया धाधिया की सुपुत्री श्रीमती सिताव देवी मे मयद अपन व्यापार चातुरी से जवाहरात के काय में 1980 में हुमा था। प्रापरे पाच पुत्रियां व दा पुत्र लाखो रुपयो की सम्पत्ति अजित की। उस समय हैं । दोनो पुत्र जवाहरात के व्यापार में अपना भूलश्वर (बम्बई) म प्रापकी गद्दी थी व मोती के विशेष स्थान रखते हैं। बडे पुत्र श्री दुलीचन्द्रमा च्यापार म अपना विशिष्ट स्थान रखते थे। प्राप विवाह जयपुर का प्रसिद्ध पराना श्री नवरत्नमल 1953 म बम्बई से जयपुर पधारे तथा जो पर्नावट की सुपुत्री शातिदेवी से व छोटे पुत्र श्री कीर्तिचन्द्र वा श्री पारममलजी ढवढा मी जवाहरात का व्यापार प्रारम्भ किया। यहां भी उहीन कापी उन्नति को व बम्बई वाले सेठ सुपुत्री प्रमिला से हुआ। श्री दुलीच: के पान नाम से प्रसिद्ध ५ । प्राप दोना भादया न श्रीमालो पुत्रिया व एक पुत्र है । पुत्र का नाम धर्मेद्रकुमार के मदिर के पाम जयपुर में एक घमशाना है। श्री नीतिचद्र के एक पुत्री व एक पुत्र है। बनवाई जो आज भी सभी सुविधामा से युक्त है। पुत्र का नाम दुप्यन्त कुमार है। इनके पूजा व श्री सौभाग्यमलजी श्रीयीमाल के हम सब पू श्री भाई साहब यो राजरूपजी पूर्वजो ने भी चाक्सू म मदिर व दादावाडी का टाप के पदचिह्ना पर चलें व जीवन को सफल निर्माण कराया था। जिसको श्री राजरूपजी टाक बनावें, इही भावनामो के माय न व्यवस्था लिए श्री खरतरगच्छ सघ, जयपुर -62, गगवाल पाक, जयपुर म 000 14 -- संस्मरण . श्री सौभाग्यमल श्रीश्रीमाल - - श्रद्धेय टांक साहब का जन्म राजस्थान मे पूर्व इस परिवार का निवास स्थान प्राजकल के झुझुनू जिले मे चिड़ावा कस्बे मे हुआ था । पर वे धन्वन्तरी औषधालय एवं भेषजागार वाला पूरा बचपन में ही जयपुर मे मै. हीरालालजी छगनलाल भवन रहा है। धीरे-धीरे परिवार में विखराव जी टांक के यहां गोद आ गये, फलतः उनकी आया और भाइयो में अलगाव पैदा हुआ। फलतः शिक्षा-दीक्षा जयपुर मे ही हुई। जिस परिवार में सब अलग-अलग रहने लगे । यही समय था जव वे गोद आये, वह परिवार भी मूलत: जयपुर से मै. हीरालालजी छगनलालजी के उत्तराधिकारी सगभग 36 किलोमीटर दूर चाकसू कस्बे का रहने श्री राजरूपजी टांक ने भी अपने जीवन सग्राम में वाला रहा है । सयोग की बात है कि इस कस्वे प्रवेश किया। जैसा वे अक्सर कहा करते थे-प्रारंभ के ही मूल निवासी मेरे परिवार के पूर्वज भी रहे में रत्न व्यवसाय में उन्हें कई प्रकार की कठिनाइयों है. जहां हमारी जमीन, जायदाद आदि थे। मेरे का सामना करना पड़ा। पर वे अध्यवसायी थे। पिताजी से पूर्व परिवार चाकसू मे ही रहता था। उन्होंने कठिन परिश्रम और दृढता से उनका पिताजी ही रोजगार-व्यापार की दृष्टि से जयपुर मुकावला किया और उन पर शनैः-शनैः काबू मा बमे थे । एक ही कस्बे के निवासी होने से इस पा लिया। रत्न व्यवसाय में उनकी गहनतर पैठ युग में प्रापमी भाईचारे का व्यवहार होना एक होती गई और वे प्रमुख व्यवसायी बन गये । विगगता रही है। यह प्रक्रिया मेरे बाबा साहब सक रब निभी। किसी समय चाकसू कस्बे में श्वे व्यावसायिक जीवन के इस उज्ज्वल भविष्य और परिवारो की संख्या काफी अच्छी रही होगी। के समानान्तर उनके जीवन को अन्य धारायें भी की कारण था कि वहा का श्वे. जैन मन्दिर और अविरल गति से प्रवाहित होती रही उनमें से कति- सागाडी जी निर्माण में सभी का घनिष्ठ योग- पय प्रमुख थी जने : समाजसेवा की अदम्य भावना, स्वातंत्र्य प्रेम की प्रेरणादायी ललक, असहाय एवं मान रहा और प्राज भी वहां के उस समाज की संभव पूर्ण गाथा के प्रतीक स्वरूप ये दोनों स्थान असमर्थ युवाओं को अपने स्वय के पांवों पर सो होने में समर्थ बनाने का उत्स्ट माहग, महिला शिक्षा एवं जनजागरण का अलग जगाने को नि:- उठ कर पाया टांक परिवार जयपुर स्वार्थ लगन प्रादि । उन्होंने अपने जीवनमान में में भी पना गोरवणं ग्यान बना सका । वर्षों न नभी को मृतंम्प देने पर नको मृगन प्रिया- मार गाने हैं। । 15 स - थे। श्री माणकच द्रजी के लघुभ्राता श्री लाभच द्र को सौंप दिया। श्री हीरालालजी का स्वगवास जी बीमारी को नि शुल्क दवाइया वाटते थे। उनके 1963 मे हुमा व उनके एक सुपुत्र श्री अनुज श्री फूलच द्रजी की धमपत्नी ने दीक्षा उमरावसिंहजी थे। श्री उमरावसिंहजी के कोई अगीकार को जो पुण्यश्रीजी के सिंघाडे मे बुद्धि स तान नहीं थी । प्रत उहोने श्री पारमच द्रजी श्रीजी के नाम से विख्यात हुई। उहोंने क्षमा को गोद लिया जो जवाहरात का कार्य कर कल्याणजी रचित चत्य वदन चौवीसी का हिन्दी रह हैं। अनुवाद व च दकेवली (बधमान तप) की पुस्तकें श्री छगनलालजी का विवाह जयपुर के प्रसिद्ध निखी जिसका प्रकाशन श्री जिन हरिसागर मूरि जौहरी और समाज मेवी सेठ श्री केशरीचन्द्रजी भण्डार लोहावट से हुआ है। मूसल की बहन (सुपुत्री श्री मांगीलालजी, मालपुरा श्री माणक्चरजी के दो सुपुत्रिया व दो सुपुत्र निवामी) से हुआ था । स 1966 में श्री ये । बडे सुपुत्र श्री राजरूपजी अपने पिताजी श्री छगनलालजी का स्वगवास हो गया। स 1967 माणकच द्रजी के ननिहाल चाकसू के सेठ श्री से दोनो भाइयो का परिवार अलग हो गया । छगनलालजी के गोद चले गए थे, उसके बाद लघु प्रत श्री छगनलालजी की धमपत्नी श्रीमती गौरा सुपुन श्री सुमतिच द्रजी का देहा त हो गया। वाई ने अपने नन्दोई श्री रामप्रसादजी के पौत्र (सुपुत्र श्री मारणक्चद्रजी) श्री राजरूपजी को चारसू के सेठ दिलसुखरायजी के पुत्र श्री हीरालालजी छगनलालजी टाक हुए जिनका संवत् 1970 मे गोद लिया । अापका विवाह जन्म प्रमश वि स 1902 व 1917 मे हुआ। जयपुर के सुप्रसिद्ध जौहरी श्री वेवलच द्रजी म 1940 मे ग्राप चाकसू से बम्बई पधारे तथा धाघिया की सुपुत्री श्रीमती सिताव देवी से सवद अपने व्यापार चातुरी से जवाहरात के काय मे 1980 में हुआ था । आपरे पाच पुत्रिया व दो पुत्र लाखो रुपयो की सम्पत्ति अजित की। उस समय हैं । दोनो पुत्र जवाहरात के व्यापार मे अपना भूलेश्वर (बम्बई) में प्रापकी गद्दी थी व मोती के विशेष स्थान रखते हैं। बडे पुत्र श्री दुलीच द्रका व्यापार मे अपना विशिष्ट स्थान रखते थे। प्राप विवाह जयपुर का प्रसिद्ध घराना श्री नवरत्नमल 1953 में बम्बई से जयपुर पधारे तथा जी कर्नावट की सुपुत्री शातिदेवी से व छोटे पुत्र जवाहरात का व्यापार प्रारम्भ किया। यहा भी श्री कीर्तिचन्द्र का श्री पारसमलजी ढढ्ढा की उहोने काफी उन्नति की व वम्बई वाले सेठ के सुपुत्री प्रमिला से हुआ। श्री दुलीचद्र के पाच नाम से प्रसिद्ध थे । प्राप दोनो भाइयो ने श्रीमालो पुनिया व एक पुत्र है । पुन का नाम धर्मेद्रकुमार के मदिर के पास जयपुर मे एक घमशाला है। श्री कीर्तिचद्र के एक पुत्री व एक पुत्र है । बनवाई जो आज भी सभी सुविधागो से युक्त है। पुत्र का नाम दुष्य नकुमार है । इनके पूवजा व श्री सौभाग्यमलजी श्रीश्रीमाल के हम सब पू श्री भाई साहब श्री राजस्पजी पूर्वजो ने भी चाक्सू मे मदिर व दादावाडी का टाक के पदचिह्नो पर चलें व जीवन को सफल निर्माण कराया था। सको श्री राजरूपजी टाक बनावें, इही भावनाग्रो के साथ ने व्यवस्था लिए श्री खरतरगच्छ मघ, जयपुर -62, गगवाल पाक, जयपुर . 14 संस्मरण श्री सौभाग्यमल श्रीश्रीमाल M श्रद्धेय टाक साहब का जन्म राजस्थान मे पूर्व इस परिवार का निवास स्थान प्राजकल के मुनू जिले में चिडावा कस्बे मे हुआ था । पर वे धन्वन्तरी औषधालय एव भेषजागार वाला पूरा बचपन मे ही जयपुर मे मै. हीरालालजी छगनलाल भवन रहा है। धीरे-धीरे परिवार में विखराव जी टाक के यहां गोद आ गये, फलतः उनकी पाया और भाइयों में अलगाव पैदा हुया । फलतः शिक्षा-दीक्षा जयपुर मे ही हुई। जिस परिवार में सब अलग-अलग रहने लगे । यही समय था जव वे गोद आये, वह परिवार भी मूलतः जयपुर से मै हीरालालजी छगनलालजी के उत्तराधिकारी सगभग 36 किलोमीटर दूर चाकसू कस्वे का रहने श्री राजरूपजी टांक ने भी अपने जीवन संग्राम मे वाला रहा है । सयोग की बात है कि इस कस्वे प्रवेश किया । जैसा वे अक्सर कहा करते थे-प्रारंभ के ही मूल निवासी मेरे परिवार के पूर्वज भी रहे मे रत्न व्यवसाय में उन्हें कई प्रकार की कठिनाइयों है जहा हमारी जमीन, जायदाद आदि थे । मेरे का सामना करना पड़ा। पर वे अध्यवसायी थे। पिताजी से पूर्व परिवार चाकसू में ही रहता था। उन्होंने कठिन परिश्रम और दृढ़ता से उनका पिताजी ही रोजगार-व्यापार की दृष्टि से जयपुर मुकाबला किया और उन पर शनैः-शनैः काबू प्रा बने थे । एक ही कस्बे के निवासी होने से इस पा लिया। रत्न व्यवसाय में उनकी गहनतर पैठ युग में प्रापमी भाईचारे का व्यवहार होना एक होती गई और वे प्रमुख व्यवसायी बन गये । विशेषता रही है। यह प्रक्रिया मेरे बाबा साहब व्यावसायिक जीवन के इस उज्ज्वल भविष्य ना सूब निभी। किसी समय चाकमू कस्बे मे श्वे. चन परिवारो की संख्या काफी अच्छी रही होगी। के समानान्तर उनके जीवन की अन्य धारायें भी को कारण था कि वहा का श्वे. जैन मन्दिर और नविरल गति से प्रवाहित होती रही उनमें से कति- वादावाटी जैसे निर्माण में सभी का घनिष्ठ योग- पय प्रमुख थी जैसे : समाजसेवा की अदम्य भावना, मान रहा और प्राज भी वहा के उम समाज की स्वातंत्र्य प्रेम की प्रेरणादायी ललका, प्रमहाय एवं दंगर पूर्ण गाथा को प्रतीक स्वरूप ये दोनों स्थान असमर्थ युवानो को अपने स्वयं के पांवो पर पढ़े होने में समयं बनाने का उत्कट माहम, महिला शिक्षा एय जनजागरण का प्रलय जगाने की नि:- कामे उठ कर पाया टाक परिवार जयपुर स्वार्थ लगन प्रादि । उन्होंने अपने जीवनकाल में को पना गौरवपूर्ण स्थान बना मा । वर्षों न मभी गो मूतंप देने और इनको गुगल प्रिया- मान आने । 15 . विति का माग जमार प्रशस्त क्यिा-उनकी यह और वैचारिक सम्पक के अनेक अवसर आये । वे अनूठी साधना चिरस्मरणीय रहेगी, इसमें कोई दो कितने सहृदय एव क्षणा की मूर्ति थे, अज्ञात रूप मत नहीं हो सकते। से किस तरह जरूरतमन्दा तक सहायता पहुंचाते थे और फिर उममा उल्लेख नहीं करते थे। यह सामाजिक क्षेत्र का कार्यकर्ता होने के नाते अनोखी कला उहे याद थी । यह मानव सेवा उनसे मेरा सबमे पहला सापालार और सम्पर्क 'जन खूब बन पाई। नवयुवक महल जयपुर' के मच से प्रारम्भ हुआ। देशी रियासतो की प्रजा होने के कारण राष्ट्र मे उन दिनो उहें महिला शिक्षा की प्रेरणा प्राप्त हो रही जनजागृति वाले वातावरण को बनाने का हुई और एर प्रारम्भिक शाला के रूप मे धार्मिक काम हम लोगो के लिए इतना सरल नही या प्रत शिक्षण का एक विद्यालय उन्होंने चालू कर दिया। सामाजिक प्राति के माध्यम से, जिमकी भी इस उस विद्यालय ये मम्बध मे उनकी विस्तृत योज- युग में बडी आवश्यकता थी, विभिन्न समाज मुधार नायें थी पर शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले के कायमो को हाथ में लिया और उनके साथ सहयोगी की वे वही आवश्यक्ता अनुभव करते रहकर कई प्रकार के अनुभव प्राप्त किये । प्रारम्भ रहे होगे। से ही वे सादी पहिनते थे और रहन सहन और प्राचार-विचार में मरलता, सादगी हमारे लिए अपनी मूझबूझ से उहोने शिक्षा विभाग से प्रारम्भिक कक्षायो की मा यता प्राप्त करली, प्रत सदैव तदाहरण रहे। विद्यालय स्वय में मायता प्राप्त सम्था बन गया। जीवन में शिक्षा के क्षेत्र म काम करने का मेरा इस बीच मे उहोने देवयोग से मुझ से भी चर्चा इरादा बना जिसको उन्होने सदैव बल दिया और की। मैंने उनकी योजनाओं को सुना और समझा इम सम्बध मे उनका स्मरणीय साहचय प्राप्त एव अपने पूरे अनुभव के प्राधार पर अपने स्पष्ट होन का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ । प्रथम तो विचार उनके सामने रक्खे। हो सकता है उह वे उहोन मुझे उनके बड़े पुत्र श्री दुलीच दजी टाक उपयोगी लगे हो। उहोने मुझे वीर वालिका के लिए निजी शिक्षक रखना पसद दिया। मैंने विद्यालय की कायसमिनि मे एक सदस्य के रूप में कक्षा 6 से कक्षा 10 तक 5 वप उस चाय को चयनित रिया और इस मस्था से फिर 25वप किया। वह युग था जब शिक्षक और विशेषकर तक जुडा रकवा । उन अन्तिम वर्षों में तो मुझे निजी शिक्षक देवन वेतन भोगी अपने को नही सस्थाका अध्यक्ष भी बनाये रखा। माना करता था वरन् वह उम परिवार का अग वन जाता था। बालक की शिक्षा दीक्षा, देखभाल, इन 25 वपो म शनं शनै विद्यालय मिडिल, चरिम-निर्माण का गुरुतरभार प्रादेश-उपदेश तब हाई स्कूल फिर हायर सेकण्डरी स्कूल और अन्त प्रादि देन की जिम्मेदारी भी शिक्षक की ही मे डिग्री कॉलेज का स्वरूप लेता गया। इसमे जो थी। मुझे भलीप्रकार से याद है कि कई रातें मैंने भी योगदान मुझ से बन पडा हो उसके पीछे छात्र के अध्ययन, परीक्षा प्रादि म मदद के लिए उनका उत्साहित करते रहना और काम करा लेने उनके घर पर ही रह कर चिताई। तब उनका की उनकी अद्भुत कला का ही प्रतिफल मानना व परियार का जो सौहाद व मौजय प्राप्त हुआ चाहिये । इस मब मै जव जब आर्थिक समस्यायें करता था वह सदैव स्मरणीय रहेगा । इस 5 वर्ष सामने आई उन्होंने अपने प्रभाव और लगन से के कायकाल म उनके निकटतम सम्पक में ग्राने एव दूरदर्शिता को ध्यान में रखते हुए सदैव हल 16 बहुआयामी व्यक्तित्व सामाजिक, शैक्षणिक, व्यावसायिक, धार्मिक, रचनात्मक एवं राजनैतिक क्षेत्र में उनकी सेवायें अविस्मरणीय तथा प्रेरणा का स्रोत बनी रहेंगी। उन्होंने प्रारम्भ से ही सामाजिक कुरीतियों को दूर करने में साहसिक कार्य किया है । वे प्रत्येक व्यक्ति के दु.ख- दर्द में सहयोगी रहते थे। ----श्री श्वेताम्बर जैन श्रीमाल सभा (जयपुर) निकालने मे अदम्य साहस और दृढ़ता का परिचय कारण रत्न व्यवसाय मे प्रवेश कर सके और प्राज दिया। मेरी आदत के अनुसार जो भी योजना वे बहुसंख्यक लोग अच्छा प्रतिष्ठित जीवनयापन हाथ मे ली गई उसको छोटे पैमाने पर करके जाची कर रहे है। गई और एक वर्ष के गहन अध्ययन व अनुभव उनके द्वारा किये गये उपयोगी कार्यों की कहां वाद उसको विस्तृत रूप मे प्रारम्भ किया गया, तक गिनती की जाय, वे वास्तव में मानव-सेवा- फलतः असफलता पाने की सम्भावना भी नहीं भावी व्यक्ति थे, यही कारण था कि अपनी व्यवहार रही । इस प्रवृत्ति को श्री टांक साहब ने मान दिया कुशलता और सेवा भावना के कारण वे अत्यधिक और इसके कारण सस्था का विस्तार स्थायी एव लोक प्रिय हुए । दृढ़ता के साथ क्रमशः होता गया। मैं समझता हूँ उनके जीवन के अन्तिम वर्षों में एक बार इसका सुखद अनुभव उनको जीवन पर्यन्त रहा है । फिर उनके साथ रह कर समाज के वृहद् प्रयास को मेरे लिए यह सौभाग्य का विषय था। मूर्त रूप देने मे उनके संरक्षण का लाभ उठाया। हा ! यकायक संस्था की कार्यसमिति से मेरा जैन श्वे. समाज जयपुर की एक डायरेक्टरी बनाने अन्नग होने के निर्णय से उन्हें वड़ा अफसोस रहा का निर्णय श्री राजरूपजी साहब के घर पर 1984 होगा पर जो परिस्थितिया पैदा की गई, गलत- मे लिया गया-उनको प्रकाशन समिति का अध्यक्ष पाहमिया घडी गई, उनको देखते हुए मुझसा अदना निर्वाचित किया गया। उन दिनो भी उनकी व्यक्ति प्रात्मसम्मान प्रियता के मोह को संवरण अस्वस्था चल रही थी अतः सक्रियता तो उनके नहीं कर सका और निर्णय से वापस लौटने की लिए संभव नही थी पर उनका मार्गदर्शन और पृष्टता नहीं बन पड़ी । इसकी मुझे भी आत्म आशीर्वाद सदा मिलता रहा । यह वृहद् एवं कष्ट- साध्य कार्य उनके जीवनकाल मे ही सम्पन्न हो स्वातन्त्र्य प्रेम की भावना के अन्तर्गत जयपुर सका, इसकी उन्हे बड़ी प्रसन्नता थी। राज्य प्रजा मण्डल के कार्यक्रमों में उनका सहयोगी हमारा बड़ा दुर्भाग्य रहा कि अन्तिम समय में व उदार महायक के रूप मे सदा स्मरण किया कुछ महीनों से विगेपरूप से वे असह्य वेदना ने जना रहेगा। गांधीवादी विचारधारा के मदेव पीड़ित रहे । वे न वोलते न देखते अधिकतर बेमुध पारक के रूप में काग्रेस के भी वे सदस्य रहे और स्थिति में ही रहते रहे, अतः जो अन्तिम मद्- मगो महयोग-सहायता सदैव देते रहे । उन्होंने प्रेरणा का लाभ उनसे मिल नफना था, उसने गर्ग न मार्यानो की सहायता, पोपण प्रादि मे हम सब वचित रह गये। ये समाज के प्रकारान्तम्भ निराकर कार्य किये। रहेंगे और वर्षों अपने प्रकार से गय को प्रातापित भी प्रकार उपयुक्त विचारधारा असमर्थ शो करते रहेंगे । प्रमु! उन्हे पनीम शान्ति प्रदान मन दलाने मी दिशा में प्राज हजारो लोग उनके करे ।। -भूतपूर्व प्रायक्ष, श्री चोर बालिका शिक्षण संस्पान ग्लानि रहेगी। 17 अविस्मरणीय महा मानव ! 0 श्री शीतलचन्द कोठारी सज्जन सच्चरित्र कमठ एवम् महान् व्यक्तियो कैसे नुलाया जा सस्ता है ? वे इस उत्सव के का साथ चाहे थोडा हो रहा हो पर वह अपनी प्राए थे-जीवनी-शक्ति थे। उनके कारण इस एक अमिट छाप हृदय पर छोड़ जाता है। समय एक जनवरी के हमारे कायरम में उमग-उत्साह के शताश में भी वह व्यक्ति अविस्मरणीय हो जाता हंसी खुशी के चार चांद लग जाया करते थे । है । श्रद्धेय स्व श्री राजस्पजी टाक ऐसे ही मेर उत्मव तो अब भी होंगे-घूमना भी जारी ही लिये अविस्मरणीय महा मानव के रूप में हैं। रगा वितु श्रद्धेय राजम्प साहव टार की कमी मेरा उनसे मिलना प्रात भ्रमरण के समय हृदय चोटती ही रहेगी। हुया करता था । अपनी शारीरिक अशक्त अवस्था वे समाजसेवी थे, रत्नपारखी थे, साहित्य- से पूर्व वे नित्य ही प्रात रामनिवास बाग में भ्रमणाय सेवी थे यह तो उनका कृतित्व ही बोलता है। आया करते थे । यदाक्दा हम पुलिस मेमारियल वीर वालिका महाविद्यालय उनको कीर्तिपतामा पर भी मिल लिया करते थे। मिलते ही मुस्कराते है पर इन सबसे ऊपर वे एव स्नेही और हृदय मे हुए वे कुपाल क्षेम पूछते-बहुत धीरे और मधुर करुणा भरे व्यक्ति थे। मेरा तो उनसे अधिक बोलते थे। वार्तालाप में प्रात्मीयभाव टपक्ता सम्पर्क नहीं रहा, सह ब्रमण के अतिरिक्त किन्तु था जो प्रात शुद्ध समीर के अनुरूप ही जीवन- मेरे एक बार बीमार पड़ने पर वे कितनी बार दायी होता था। उनसे मिलकर एक स्फूति सी पूछने पाये, क्तिनी सहृदयता दर्शायी, क्या यह प्रतीत होती थी। विनोदी प्रवृत्ति के तो वे थे ही उनके व्यक्तित्व की महानता को महिमा मडित अत उनके विनोदी वार्तालाप से भ्रमण वा मानद नहीं करता वरुणा की यह भावना उनके मन चौगुना बढ जाया करता था । सुस्वास्थ्य के लिये मे सब प्रति थी। कभी भी केच-नीच परि- हंसना भी उतना ही आवश्यक है जितनी प्राण- स्थिति में वे तुरत सह्योगी के रुप में आ खडे वायु (प्रॉक्सीजन)। श्री राजरूपजी टान की हाते थे । स्नेह उनका स्वाभाविक गुण था। सद् सगति म हमे दोनो ही भरपूर मात्रा म प्राप्त उन्होंने व्यापारी क्षेत्र म सामाजिक क्षेत्र में, होते थे । अव उनके न होने पर प्रात कालीन राजनीतिक क्षेत्र मे, शिक्षा एवम् साहित्य के क्षेत्र वातावरण में एक रित्तता, एक प्रभाव, एक कमी म अपना सम्पूण योगदान दिया है, जो उनकी महसूस होती है। एम खालीपन सा प्रतीत होता महिमा और गरिमा को अक्षुण्ण बनाये रखेगा। है-वे पाद प्रात हैं, वे अविस्मरणीय हैं। नि सदेह वे एक अच्छे व्यक्ति थे, जिना हम भ्रमणार्थी वृद प्रतिवप एक जनवरी को व्यत्तित्व अच्छा बनने के लिये प्रयत्नशील व्यक्ति रामनिवास बाग में एक उत्सव प्रापस में मिल के लिये अनुकरणीय रहेगा। बैठकर मनाया करते हैं । इस सम्मेलन मे उनका मैं उनका शत शत वदन करता हूँ। उत्साह, उनका योगदान जो निरतर बना रहा, ~पल्पना, 251, जौहरी बाजार, जयपुर ? 18 प्रेरणा और 卐 प्रकाश पुञ्ज डॉ० श्रीमती शान्ता भानावत प्राचार्या, श्री वीर वालिका महाविद्यालय परस्परोपाही जीवानाम जयपुर के ही नहीं वरन् भारत के प्रमुख उनकी कोई व्यावसायिक दृष्टि नहीं थी। मंत्री के जौहरी, मूक समाज-सेवी एवं अनन्य शिक्षा-प्रेमी, रूप में कभी उनके मन मे अधिकार का भाव नहीं श्रद्धेय श्री राजरूपजी टांक आज पार्थिव रूप पाया। वे शिक्षक एवं छात्रा वर्ग को अपना स्नेह, हमारे बीच नही है । पर उनके जीवन और चरित्र प्रेम और आत्म-भाव ही बांटते रहे । मे जो विशेपताएँ थी उनके कारण वे आज भी वे पुस्तकीय ज्ञान से अधिक चरित्र-निर्माण हमारे मन-मस्तिष्क में वसे हुए है और सदा रहेंगे। को महत्त्व देते थे। कॉलेज में अध्ययनरत छात्राओं, 27 अक्टूबर 87 का दिन ज्ञान पंचमी का दिन प्राध्यापिकानों को सदैव सादी वेशभूषा में आने था। हम लोग श्री वीर बालिका शिक्षण संस्थान की प्रेरणा देते थे । कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनो एवं का स्थापना दिवस मना कर पूज्य टांक सा. फैशनेबल तड़कीले-भड़कीले वस्त्रों से उन्हे सख्त दर्शन करने उनके निवास स्थान पर गये थे । उस नफरत थी। समय उनकी श्वास गति कुछ तेज चल रही थी पर यह स्वप्न मे भी खयाल नहीं था कि यह ज्ञान शहर के निम्न मध्यम वर्ग के प्रति उनके मन ज्योति 15-20 मिनट पश्चात् ही परम ज्योति मे मे बड़ी सहानुभूति थी । महाविद्यालय भवन में विलीन हो जायेगी । टाक साहब को अक्सर ये स्थानाभाव होने के कारण एक बार उनके सामने शब्द गुनगुनाते हुए मैने कई वार सुना था 'भव शहर से बाहर कॉलेज भवन के लिए जमीन लेने अनन्त भभता थकां कीधो छे शरीर सम्बन्ध की वात चली तो उन्होने तुरन्त कहा-जो सम्पन्न प्रिविध विविध करी वोसरु........।' अपनी तीव्र घराने की बालिकाएं हैं वे काही भी जाकर पढ खांस गति के साथ वे अपने दैहिक, दैविक, भौतिक सकती हैं पर शहर की निम्न मध्यम वर्ग की नापो को मिटा कर जीवन-मुक्त पुरुप बन गये । वालिकानों के लिए शहर में कॉलेज चलाना पाव- श्यक है। अतः यह कॉलेज महर के बीच ही चलना प्राज से 63 वर्ष पूर्व स्त्री शिक्षा के लिए चाहिये । शिक्षण संस्था स्थापित करने का विचार उनके मन में पाया जो एक युगान्तरकारी कदम था। घदेय टांप माहब के मन में प्राधिक प्टि उनोने अपने तन, मन, धन से इन बीज को सीन में असमर्थ घालायो के प्रति पापी नहानुभूति पी। पर गे महाविद्यालय का रूप दिया। इसके पीछे बातचीत में किसी छात्रा के लिये यदि हम मह यह 19 समर्पित व्यक्तित्व आपने लगातार 63 वर्षों तक अथक परिश्रम, निष्ठा, मेवा एव निस्वाथ भावना से सस्था के विकास मे महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। आपके पितृतुल्य वात्सल्य एव प्रात्मीयता को प्राप्त कर मस्था ने अपनी चौमुखी प्रगति की । आप केवल शिक्षा-प्रेमी ही नही वरन् प्रमुख जोहरी व रत्न व्यवसायी, समाजसेवी, राष्ट्रीयकर्ता, गाधीवादी चिंतक व समस्त पीडित मानवता के प्रति मुक्त-भाव से समर्पित थे । उनका समस्त जीवन देश-प्रेम, परोपकार, स्त्री-शिक्षा, गरीबो व बेरोजगारो के लिए समर्पित था। -श्री वीर बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय, जयपुर । - । देते कि वह काफी गरीव है, तो वे उस छात्रा के टाक साहब विनादप्रिय स्वभाव के थे । जब लिए फीस से लेकर पुस्तको तक की व्यवस्था करने कभी उनकी गद्दी पर हम उनसे मिलने जाते तो के लिये तैयार रहते थे । गरीव शब्द का प्रयोग हमने उनको अपने प्रासपास बैठे लोगो से हंसी उहे पसन्द नहीं था। वे कहते किसी को गरीव मजाक करते भी देसा । वे कहा करते-ससुराल का न कहो । प्रार्थिक दृष्टि से असमथ व्यक्ति हो सकता मजा तो साम के जीवित रहने तक ही है । इस सदम है, गरीब नहीं। म मुझे उनके द्वारा कही गई एक सूक्ति याद प्रा चाचा साब परम दयालु, सवेदनशील और रही है- करुण हृदय थे। सर्दी के दिनो मे आवश्यक्तानुसार सासु जितरे सासरो, छात्रामो के लिए स्वेटर भिजवाने की पूछते रहते साला जितरे सास । थे । वे वग, जाति, सम्प्रदाय भाव से ऊपर उठे हुए साला के छोरो हुया, थे । सभी धर्मों के प्रति उनके मन मे आदर भाव हुई साख को खार। था। शुद्ध मन और सेवा भाव से वे दीन दुखियो की टाक साहब के सानिध्य में जीवनानुभव की सहायता करते थे । कभी अपना नाम नहीं चाहते थे। कई बातें सीखने को मिलती। वे चलते फिरते शिक्षा के साथ बढती हुई फैशन परस्ती और अनुभव-कोप थे। उनके निधन से एक निष्ठावान भौतिक चकाचौंध उह कतई पस द नहीं थी। वे शिक्षा-प्रेमी, एक कमठ समाज सेवी, एक अद्भुत सदैव जीवन में सादगी और स्वावलम्बन पर बल रत्न पारखी, एवं उदार मानव हृदय की अपूरणीय देते थे । महिलाएं पढ़ लिख कर अपन परो पर क्षति हुई है । मैं अपनी तरफ से एव समस्त महा. खडी हो और समाज सेवा के कार्यों में आगे बढ़ें, विद्यालय परिवार की ओर से दिवगत पात्मा के इसकी वे सदैव प्रेरणा देते थे । इस भावना से प्रति श्रद्धाजलि अर्पित करती हूँ और यही आकाक्षा सचालित जैन महिला उद्योग के द्र की प्रगति के बारे रखती हूँ कि उनको जीवत प्रेरणाएँ प्रकाश के मे वे समय समय पर मुझसे पूछा करते थे। वहीं रूप मे हमारा पथ पालोकित करती रहे। की निर्मित चीजो को स्वय प्रयोग मे लेते थे । 20 0 श्री राजरूप टांक की महिला शिक्षण क्षेत्र में अनुपम देन- श्री वीर बालिका महाविद्यालय, जयपुर . -- आज समाज मे कल्याणकारी कार्यों के लिये का एक युवक इस कार्य के लिये दृष्टिगोचर हुया नित्य ही नई-नई सस्थाओं का प्रादुर्भाव होता जिसने इस दायित्व को वहन करने का निश्चय रहता है और यह सब सामान्य सी बात हो गई भी किया और अपने को समर्पित भी कर दिया। । पर यह बात आज ही नहीं अपितु 6 दशाब्दि उस वक्त समाज के प्रागेवान थे श्री राजमलजी से भी अधिक पूर्व की कहानी है । वह ऐसा गोलेछा, श्री राजमलजी सुराना, श्री सोहनलालजी युग था जब वालको के शिक्षण की अोर भी गोलेछा, श्री घीसीलालजी गोलेछा, श्री रूपचन्दजी नागरिको का विशेष ध्यान नहीं था, फिर बालि- लूनिया । इन सवका पूर्ण हार्दिक सहयोग मिला पानी के शिक्षण की तो बात ही क्या ? पर यह इस युवक को जिनका नाम था श्री राजरूप टांक । घटना सन् 1925 की है जब एक जैन प्रार्या को ऐमा भान हुआ कि भविष्य मे बालिकानो के मात्र 8 छात्रायो और 2 अध्यापिकायो से शिक्षण वगैर समाज बहुत पीछे रह जावेगा । और यह पाठणाला प्रारम्भ की गई धूपियो की धर्मशाला उन्होंने मानस बनाया महिला शिक्षण का और मे । अादरणीय श्री चाचा साहव बताया करते म प्रोर प्रयास करने का । भूल मे काम शुरू करना थे कि यह कार्य उस काल में कितना कठिन था। था पराश्रित बहिनो के लिये अथवा उन बहिनो संरक्षको को समझायो---फिर छोटी-छोटी बालि- सं निये जो अपने भावी जीवन को आध्यात्मिक कायो को पढ़ाई के लिये प्रलोभन दो। वे कहते विकाग की ओर ले जाना चाहती थी और इसी थे कि मैं घर-घर जाता और बालिकानों को लिम मत्था का नाम 'प्राविकाश्रम' रखा गया। समझाता, सरक्षको को समभाना। बालियानो महामना थी जैन ग्रार्याश्री श्री स्वर्णधीजी को घर से लाते और वापर घर पहनाते । धीरे- म. मा. हम प्रयास में विशेष सफलता नहीं मिलने धीरे युग बदलने लगा, महिला शिक्षा की प्रोर गरि पर दम नया को वालिकाग्री के शिक्षा कार्य की नागन होने लगी। कभी-कभी तो अध्यामिलामो को मार दिया गया। प्रश्न या समाज में महिला को वेतन भी देना कठिन हो जाता था--किन्तु for नी प्रोर चि जागृत करने वाले प्रात्म- श्री चाना मायके सपने कमी मन्या मोगदान को। नौभाग्य में 17-18 वर्ष म्नर नोमिने नीदिया। मीरे-धीवालिकामा 17 उस वक्त भी यह सस्था जहा योग्य शिक्षण के प्रश्न था समाज मे महिला शिक्षण को प्रोर लिये आदर वाली थी वहाँ इस संस्था के रुचि जागृत करने वाले प्रात्मभोगी कायर्ता वापिकोत्सव भी काफी ख्याति पा चुके थे। को । सौभाग्य से 17-18 वप का एक युव राजकीय व सावजनिक स्तर पर होने वाले इस कार्य के लिये दृष्टिगोचर हुमा, जिसने सास्मृतिम वायत्रमा म इस मस्या की प्रच्ची धाक इस दायित्व को वहन करने का निश्चय भी जम चुकी थी। क्यिा और अपने को समर्पित भी कर दिया। ऐसे ही एक वार्षिकोत्सव की अध्यक्षता के उस वक्त समाज के प्रागवान थे श्री राजमल. जी गोलेघा, श्री घोसीलालजी गोलेचा, लिये सेठ थी सोहनलालजी दुगड को प्रामत्रित दिया गया । उनपी सस्था के साथ प्रति श्री स्पचन्दजी लुनिया । इन सबका पूण हादिर सहयोग मिला इस पुवक को जिसका प्रात्मीयता हो चुकी थी। वे नहीं चाहते थे कि यह सम्या इस छोटे से भवन मे चलती रहे और नाम था श्री राजएप टाक। वालिकामो का विकास रुका रहे । सस्था का भाग्य प्रवल था-भविष्य उज्ज्वल था। यकायक की सख्या बढने लगी। तब यह स्थान छोटा भी एर अच्छे स्थान के लिये बातचीत पाई । सेठ पहन लगा तथा एकान्त कौन म रहा हुप्रा भी दृष्टिगोचर होने लगा। समाज का पूर्ण सहयोग दुगडजी को जब यह समाचार दिया गया तो वे था हो । घी वालो के रास्ते म बाजार में समा फतेहपुर से तुरन्त जयपुर पाये । म्यान देवा, बढे प्रसन्न हुये और वार्षिकोत्सव की अध्यक्षता करते एक उपाथय था जो बन्द ही पहा था । श्री साहनमलजी गोलेचा व श्री हमीरमलजी की घोषणा भी की । उस उत्सव मे तत्कालीन हुमे उस स्थान की पूरी राशि अपनी पोर मे देने गोलेचा ने जिनकी व्यवस्था में यह उपाश्रय था। वही उदारता से इस सस्था को प्रदान कर दिया जयपुर रियासत के कई मत्री, अधिकारी य समाज के प्रमुख व्यक्ति उपस्थित थे । उनो द्वारा दिया मौर सस्था इस भवन मे मा गई । अब तक गया स्थान धीरे-धीरे विकास पाता गया और बालिवानी की सख्या 100-150 तक पहुंच गई थी, अध्यापिकासो की मस्या भी 10 तय पहुची प्रापके सामने है । क्रय करने के अगले वर्ष ही प्राज वीर बालिका विद्यालय भवन के रूप में थी। अब तक सस्था का सारा सचालन टोक सस्था इस भवन में प्रा गई। सस्था के इस भवन साहव ही कर रहे थे, पर अब उनका विचार हुग्रा म पाते ही मानो उसके विकास का माग खुल कि सस्था की जड़ें जम चुकी हैं-भविष्य में इस सस्था का भविष्य उज्ज्वल है अत एक तो इमका गया और मस्या निरतर बढती गई-भवन का विकास होता गया और इसके बावजूद वह हमेशा सुव्यवस्थित सचालक मण्डल बन, दूसरा राज्य घाटा पड़ता गया। सरवार से मदद (पाट इन ऐड) प्राप्त जी जावे । संचालक मण्डल का गठन हुआ~-श्री सोहनमलजी यह वह काल था जब देश आजादी प्राप्त कर गौनेचा, श्री राजमलजी सुराना, श्री सोहनलालजी चुका था। उस वक्त मचालर मण्डल की अध्यक्षता दुगड सदृश्य समाज के प्रागेवाना के साथ मुझ कर रहे थे प्रमुख सर्वोदयी नेता श्री सिद्धराजजी जैसे युवक का भी चाचा साहय जोडा, वह ढड्ढा । अब तक इस मस्था का नाम था जैन समय प्राज ले 42 वप पूब का था । राज्य श्वेताम्बर बर्नाक्युलर गल्स मिडिल स्कूल । सस्था सरकार से सहायता मिलने लगी। मुझे याद है के विकास के माथ इस सस्था को और भी अधिक 22 लोकप्रिय बनाने हेतु अध्यक्ष महोदय की प्रेरणा और सुझाव से संस्था का नाम श्री वीर वालिका यह वह काल था जब देश आजादी प्राप्त विद्यालय कर दिया गया । नाम क्या वदला संस्था कर चुका था । उस वक्त संचालक मण्डल की के ग्रह ही बदल गये । मिडिल से सैकण्डरी और अध्यक्षता कर रहे थे प्रमुख सर्वोदयी नेता फिर हायर सैकण्डरी तक यह सस्था गई। बोर्ड की श्री सिद्धराजजी ढढ्ढा । अब तक इस संस्था परीक्षाओं के परिणाम शत-प्रतिशत तक पहुंचे । का नाम था जैन श्वेताम्बर वक्यूिलर गर्ल्स जयपुर नगर में इस सस्था की साख बढ़ी, सरकार मिडिल स्कूल । संस्था के विकास के साथ और शिक्षा विभाग में भी खूब मान मिला। इस संस्था को और भी अधिक लोकप्रिय उस काल मे इस संस्था को प्रधानाध्यापिका के बनाने हेतु अध्यक्ष महोदय की प्रेरणा और रूप में एक ऐसी महिला मिल गई जो राष्ट्रपिता सुझाव से संस्था का नाम श्री वीर वालिका महात्मा गाँधी के पास 10 वर्ष तक रह चुकी विद्यालय कर दिया गया । थी। कर्मठ, सेवाभावी व वालिकानों के लिये मातृरूपा श्रीमती प्रकाशवती सिन्हा ने जिस योग्य शिक्षक, राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्तकर्ता लगन और निष्ठा से इस संस्था में कार्य किया श्री सौभाग्यमलजी श्रीश्रीमाल पाये । संस्था उसके लिये समाज उनकी सेवाओं के प्रति अति को आगे लाने में उनका अनुभव बहुत कृतज्ञ है। प्रभावी बना। श्री ढढ्ढा साहब के वाद श्री पूर्णचन्दजी जैन संस्था अपने जीवन के पचास वर्ष सफलता (टूकलिया) और फिर श्री जतनमलजी लूनावत के साथ पूर्ण करने जा रही थी, महिला शिक्षा के इस संस्था के अध्यक्ष रहे। उनके कार्य काल प्रति समाज मे काफी जागृति पा चुकी थी, फिर सस्था विकास के पथ पर अग्रसर होती रही। भी उच्च शिक्षा के लिये अभी समाज से यह छात्रायो की संख्या बढी, शिक्षिका परिवार बढा, मानस नहीं बन पाया था कि सरकारी कालेजों परीक्षाफल काफी उन्नत रहा । प्रतियोगितामो मे मे वालिकायो को भेजा जावे । सब ओर से दवाव माथ ही सांस्कृतिक समारोहो मे संस्था ने कीर्तिमान पाने लगा कि इस सस्था मे महाविद्यालय की पायम किये । इसी बीच सस्था की प्रधाना- कक्षाग्रो के शिक्षण की व्यवस्था की जाये । ध्यापिका श्रीमती प्रकाणवतीदेवी का असामायिक स्थान की कमी, प्रायिक विषमता, निष्ठावान अवमान हो गया । वडा गहरा आघात सस्था को कार्यकर्तायो की कमी बड़ी समस्या थी। कई बार । उसके बाद श्रीमती उर्मिला तो वेतन वितरण के लिये भी अर्थ की गवन्या श्रीवास्तव जो श्रीमती सिन्हा के पास कार्य कर कठिन हो जाती थी। इन सब परिस्थितियों में भी रसी घी को नम्या में प्रधानाध्यापिका का पद चाचा साहब ने जो माहस प्रगत किया, उसे मोपा गया । की लगन और निष्ठा से उन्होंने इस संस्था का वह भाग्य ही कहे । चाना माहय म वायित्व को सम्हाला और अाज तक बढे हमेशा यही कहते- यही कहते-पन्या का स्तर नही गिरना माग, गृमझ व योग्यता मे वे सस्था का पाहिये समाज की कोई बानिका प्रावि, कारणी में पढ़ाई में नित नही रहनी चाहिये । न पत्र माया को एक बहत बड़ा लाभ मिला जब परिस्थितियों में माया स्टार ने की मांग माना मन में अध्यक्ष पद पर जाने माने दिया, उसे हम भी गुला न माने । - मैलना पड़ा गंगासन कर रही है। 23 - सकते। के लिये समाज की ही एक प्रवुद व सेवाभावी । कई बार तो वेतन वितरण के लिये भी प्रर्य महिला डा० श्रीमती शाता भानावत की सेवायें की व्यवस्था कठिन हो जाती थी। उन सव प्राप्त करली गई। कला माय की इन पक्षाग्यो परिस्थितियों मे भी चाचा साहब ने जो के परीक्षा परिणाम इतने अाशाप्रद रहे कि साहस प्रदर्शित किया, उसे इस सस्था का यह परीक्षण के लिये चालू की गई इन कक्षानो को भाग्य ही कहें। चाचा साहव हमेशा यही स्थायी वनाने का साहस आ गया, पर समस्या थी कहते सस्या का स्तर नहीं गिरना चाह्येि, स्थान की । विभाग ने अयत्र भवन होने पर ही समाज की कोई वालिका आर्थिक कारणों से मायता देने की शर्त रखी। भवन की समस्या पढाई से वचित नहीं रहनी चाहिये । इन सब प्रामान नहीं थी पर मम्था व छानामो का भाग्य परिस्थितियो मे सस्या के स्टाफ ने जो प्रवल था। विद्यालय भवन के पीछे ही एक बहुत सहयोग दिया, उसे हम कभी भुला नहीं वहा भवन जो सिक्तरजी की हवेली कहलाती थी के लिये प्रस्ताव आया और चाचा माहब जो इस तरह के कार्यों से भी देर नहीं करते थे, तत्काल सौभाग्य से एक अवमर ऐसा आया, जिमसे मौदा तय कर लिया । पचासो किरायेदार इम इस मम्था की आर्थिक स्थिति सुधारने म चमत्कार- भवन में थे, खाली कराने की विक्ट समस्या थी। पूण घटना घटी । जयपुर के नागरिको की ओर से पर वाचा साहब का पुण्य और निष्काम सेवायें श्री राजरूप टाक का सावजनिक अभिनदन करने यहा काम पाई और भवन का एक बड़ा हिस्सा का निश्चय हुअा। इस अवसर का लाभ उठाकर खाली करा कर महाविद्यालय कक्षायें यहा लाने चाचा साहव के शिष्य जौहरियो ने उनके 63वें का निरणय सचालक मण्डल ने कर लिया । वप पर उनके चरणो में 63 हजार रु० को थली मेंट करने का तय किया । रवीद्र रग मच पर मस्था के पचास वप स० 2032 में पूरा हो प्रायोजित भव्य व शालीन समारोह मे चाचा साहब रहे थे । सचालक मण्डल ने विद्यालय परिवार के को 63 हजार रु० की थैली भेंट की गई। उमी माथ मिलकर स्वरण जय ती महोत्सव मनाने का वक्त मस्था को प्रधानाध्यापिका श्रीमती प्रकाशवती निणय लिया । इस महोत्सव के निमित पुरानी सिन्हा ने भाइयो की यह भेंट वहिनो के लिये स्मृतिया ताजा हो गयी-इम विद्यालय की चाचा साहब से माग ली। समारोह में ही वडी भूतपूर्व छात्रायें जो अब माता, नानी और दादिया उदारता से चाचा माहब ने वह थली वीर बालिका तक बन चुकी थी जुट गयी, स्वण जयन्ती महोत्सव विद्यालय को समर्पित कर दी। मानो, सस्था को की सफलता के लिये बहुत शालीन ममारोह छप्पर फाड़कर धन मिल गया । सस्था की प्राधिक इस अवमर पर आयोजित किये गये । एक स्थिति काफी हद हो गई । इससे शिक्षण को स्मारिका इस अवमर पर प्रकाशित की गई जो महाविद्यालय स्तर तर ले जाने का साहस सचालक विद्यालय इतिहास का एक सन्दर्भ अथ ही बन मण्डल मे पा गया। तुरत ही महाविद्यालय की गई । इम ममारोह के कारण सस्था के पुराने क्वायें चालू करने का निश्चय कर लिया गया। कायकर्ता पुरानी यात्रायें, पुरानी अध्यापिकाय स्थान की कमी माको सल रही थी पर दूसरा कोई एक साथ मिल बैठ, उन सबने सस्था को जो चारा न देसकर इमी भवन में दो शिफ्ट चलाकर आत्मीयता प्रदान की वह अनूठी तो थी ही, प्राण की कक्षायें चालू कर दी गई । प्राचाय पद यादगार भी थी। - 24 ---- -- i इस समारोह के बाद यह संस्था बहुत ही प्रसिद्धि मे आई । धीरे-धीरे महाविद्यालय मे भी धीरे-धीरे महाविद्यालय में भी संख्या बढ़ने माझ्या वढने लगी, आज तो यह 1300 तक पहुँच लगी और आज तो 1300 तक पहुंच गई है। गई है । महाविद्यालय मे कला और वाणिज्य महाविद्याल में कला और वाणिज्य दोनों दोनों सकाय चालू है । महाविद्यालय के पास संकाय चालू है । महाविद्यालय के पास अपना अपना एक वृहत् पुस्तकालय है, जिसका नाम श्री एक वृहत् पुस्तकालय है जिसका नाम श्री विचक्षण श्री जी स्मृति पुस्तकालय है । गृह विज्ञान विचक्षण श्री जी स्मृति पुस्तकालय है । गृह- के लिये भी सुन्दर व्यवस्था है । भारत सरकार विज्ञान के लिये भी सुन्दर व्यवस्था है । विश्व- के विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने भी इस विद्याल अनुदान आयोग ने भी इस महा- महाविद्यालय को मान्यता प्रदान कर दी है और विद्यालय को मान्यता प्रदान कर दी है। आर्थिक अनुदान भी प्रदान किया है । महाविद्यालय मे शिक्षण के अलावा भी अनेक प्रवृत्तियां चालू इस संस्था की गरिमा को यहां शिक्षण प्राप्त है । समय-समय पर बाहर के महान् विद्वानो व करने वाली छात्राओं ने अपने नये परिवारो में निष्णात व्यक्तियो के भापणों से छात्रायें जाकर बढ़ाया ही पर एक ऐसी उपलब्धि इस लाभान्वित होती रहती है । महाविद्यालय की सस्था को प्राप्त हुई जो संस्था की गरिमा व कक्षायो का परीक्षाफल भी शानदार रहता है । गौरव को चार चाँद लगाती है । इस संस्था मे जयपुर शहर की चारदिवारी मे यह एकमात्र शिक्षण प्राप्त अनेक छात्रायें आज जैन शासन की बालिका महाविद्यालय है । इससे नगर की श्रमणी शाखा में विद्यमान है । संयम-मार्ग पर मध्यमवर्गीय जनता को बहुत लाभ हुआ है । प्रारूढ ये सब प्रात्मायें जन शासन के लिये जो कार्य कर रही है, उनके लिये यह संस्था गौरव नैतिक उत्थान व आध्यात्मिक क्षेत्र मे भी क्यो न पावे । यह सस्था सदैव कार्यरत रही है । आज से करीव विदुपी साध्वी प्रवर्तिनी श्री सज्जनश्रीजी, 14 वर्ष पूर्व, जब जयपुर नगर में जैन साध्वी श्री आदरणीया श्री मणिप्रमाश्रीजी, श्री शशिप्रभा- निर्मलाश्रीजी, एम. ए. का चातुर्मास था, इस संस्था श्रीजी, श्री सुरेग्वाश्रीजी, श्री प्रियदर्गनाश्रीजी, में छात्रायो के लिये एक संस्कार अध्ययन सत्र का श्री विमलयशाश्रीजी, श्री हेमप्रभाश्रीजी आदि माथ 21 दिवसीय प्रायोजन किया गया था। जिसमें ही स्थानकवासी समाज मे श्री तेजवरजी व यहां को छायायो के साथ गुजरात से काफी संख्या तेरहपंथी समाज में श्री मूरजवरजी, श्री पान- में आई बहिनो ने भाग लिया था । संस्था कवरजी, श्री राजकंवरजी आदि का गिक्षण मी की मस्थापिका प्रेरक साध्वी श्री स्वगांधीजी संस्था मे हुया है । सस्था इन सब के प्रति म० मा० के शिष्या परिवार ने जिनमे विपकर नतमस्तक है। पन्य श्री ज्ञानश्रीजी म० मा०, श्री विनयश्रीजी म. ना०, श्री उपयोगीजी म० मा०, श्री व्यावहारिक शिक्षा के नाथ हायानो को विनाश्रीजी म० मा० का वरदहस्त ममा इन गंगीत व नृत्य का निभग नी व दिया जाता या पर रहा -समय-समय पर सभी ने मार्ग है । नन्या नी बाबानों या अपना बण्ड भी है। नविणे, निगमे यह नस्या गर्दव मही सेवा राष्ट्रीय पर्यों पर एवं महान् पुगो के प्रति नादती नही है। दिवली पर यहां नदेव प्रायोजनमाने रहते है। .net 25 सेवा के लिये समर्पित । स्वर्गीय श्रीमान् राजरूपजी सा० टाक जाति, धम व समाज से ऊपर उठकर मानव सेवा के प्रति पूर्णतया समर्पित थे । उनमे प्रास्था कूट-फूट कर भरी थी। प्रापका परिवार इसकी जीती जागती तस्वीर है। -तेरापथ युवक परिपद्, जयपुर पयु पण व महावीर जय ती जसे धार्मिक पवों पर सस्था वा इम वक्त वापिय व्यय 19,44,000 एव सामूहिर भोजो के आयोजना म यहाँ की र० है । वतमान म सम्था के अध्यक्ष प्रमुख व्यव- छायायें भाग लती रही हैं। सायी श्री विम नचदजी मुराना हैं । सस्था या स्थापना दिवम वातिर सुर 5 (ज्ञान पचमी) है। एन० सी० सी० व अग्निशमन, फस्ट ऐड, सस्था अपने जीरन के 63 वप पूरा कर रही है । एन० एम० एम० ग्रादि की यूनिटें भी सस्या म यह भी विधि का विधान ही पहें इस संस्था कायरत हैं । प्रतियोगिताप्रो म यहाँ नी वालिकायें के प्राण मसीहा ने पूरे 63 वप तर मयित्व का सदा प्रमुख स्थान पाती रही हैं । बाहर के भ्रमण भार वहन कर मस्या के स्थापना दिवस पर ही से नान बढे, इमलिय भ्रमण की भी व्यवस्था अपने देह या विमजन रिया । आज यह मस्था रहती है। उनमें चले जाने से अल्पकार महमूम कर रही है यहाँ की छात्रानो की पोशाक वही नुमावनी चाहे उनका नश्वर देह हमार मामने नहीं है पर व सुहावनी है । छाटी वालिकामा के लिये सफेद उनकी प्रात्मा जहाँ भी होगी, वहाँ से हम सबको नाउज व वेमरिया सर्ट तथा वडी वालियानो प्रेरणा प्रदान वरगी और वही हमारा साहस के लिये केसरिया चुन्नी व मफेद मिलपार कुरती । हागा, सम्बल होगा। सामूहिक प्राथना यहाँ की विशेषता है । वीर वालिका विद्यालय शिक्षण मम्थान वास्तव में प्राज टार सा० का जीवित स्मारक सस्था म शिशु से स्नातक के शिक्षण की है। उनके प्रति हम सबनी मच्ची श्रद्धाजलि यही व्यवस्था है-(क्ला और वाणिज्य विषय की) होगी कि उनके दम जीवित स्मारप या हम सडा कुल कथायें 15 हैं तथा संक्शन 55 है । वालि- रसें, मजबूत बनायें, इससे ही श्री चाचा साहन कात्रा की मग्मा शिशु कक्षा में 195, प्राइमरी मे की प्रा मा वो हम अपना समपरण अपनी कुम- 748, सण्डरी, हायर सकण्डरी म 1098, माजलि प्रस्तुत करन सच्चे अधिकारी बनेंग । महाविद्यालय म 1200 है । कुल मग्या छात्रामा वीर बालिया विद्यालय शिक्षण सस्थान की 3241 है । विद्यालयम शिक्षिकारो की संख्या आपको अपनी है । आइये, इसे मजबूत बनायें, तथा महाविद्यालय में प्रधानाध्यापिकानो जिससे हमारे समाज की भावी पीढी के प्रति की सम्या 28 तया कार्यालय व कमचारियो की अपना दायित्व पूरा पर मवें। सख्या 32 है। -होराचद वैद, मत्री 54 26 उदात्त जीवन मूल्यों के शिल्पी - - डॉ. नरेन्द्र भानावत किया। निष्ठावान शिक्षा-प्रेमी, कर्मठ समाजसेवी, महकते रहे। विचक्षण. रत्न-पारखी, उदात्त जीवन-मूल्यो के ' गिल्पी श्री राजरूप जी टाक पार्थिव रूप से प्राज टाक सा. अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त रत्न- हमारे बीच नही है, पर उन्होंने जीवन और व्यवसायी, रत्न-प्रशिक्षक और रत्न-पारखी थे। व्यवहार से जन-मन पर जो छाप अकित की है, अपनी अद्भुत प्रतिभा, अन्तर्मेदिनी दृष्टि और वह मदा अमर रहेगी। निर्मल चित्तवृत्ति से वे अनगढ पत्थरो में भी प्राण फूंक देते थे, उन्हे पारस का व्यक्तित्व प्रदान कर टांक सा. के सेवा कार्यो की सौरभ राजस्थान देते थे। सचमुच जो उनके सम्पर्क मे पाया, वह में ही नहीं, सम्पूर्ण भारत मे यहा तक कि विदेश पारस-स्पर्श से निखरता गया। सैकड़ों व्यक्तियो मे भी परिव्याप्त है। छात्र-जीवन से ही मैं टाक मा. को उन्होंने रत्न-पारखी बनाया और स्वावलम्बी का निष्काम समाज-सेवी एव कुशल रत्न-व्यवसायी जीवन जीने में आधारभूत सहयोग प्रदान के रूप में नाम सुनता रहा और जब जयपुर पाने पर सन् 1963-64 मे केरल के हिन्दी छात्रो का पकः दन जयपुर में अपनी यात्रा पर पाया और टाक मा. का पूरा परिवेश ग्रादर्ग गुरुकुन्न राष्ट्र-भापा प्रनार ममिति की राजस्थान शान्या के पद्धति का परिवेश था, जहा जीवन-निर्वाह के मारा उनके स्वागत में ग्रायोजित समारोह मे नाथ-साथ जीवन निर्माण की शिक्षा दी जाती श्री गजाप जी टांक को पहली बार देखा तो मेरे थी। टांक सा. मूलत: गिक्षा-गर कारप्रेमी थे। मान का ठिकाना नहीं रहा । मुझे यह जानकर वे ग्रहणी शिक्षा के साथ-साथ पावनी अत्यन्त प्रसन्नता पीर गोग्वानुभूति हुई कि जैन शिक्षा के पक्षधर थे । वे मानते थे कि नमान का एक व्यवसायी मेळ गप्ट्रभाषा हिन्दी मान यानरगा में उतर पर ही पाल्पामारी है. प्रमा प्रनार में प्राप्यतरिम रचि में जुड़ा बनता है और यह प्रयोग उनीने श्रीक्षा प्राकटरे वाद टांकमा. मे प्रायः नंद के क्षेप में उस समय किया, जब जियोलो सोमानीमांस उनमे गरिमामय निन्य अनेक पढ़ाना अच्छा नही अच्छा नही माना Pा करनी पालिी की मांनि विनी गो, टांकमा. ने दूनिया पर अनुमय किया 27 उज्ज्वल रत्न श्री राजस्प जो टार समाज के ऐसे उज्ज्वल रत्न थे जिनका प्रकाश पार अनेक वालक-बालिकानो ने युवानो ने, तथा प्रौढो ने भी अपने जीवन का निर्माण किया है । उनको सामाजिक सेवायें इतिहास के पन्नों पर स्वरांपरों में अक्ति रहेंगी। वे श्रीमाल समाज के भी रत्न थे। . -मध्यप्रदेश श्रीमाल हितषी सघ उज्जन हुमा। कि स्त्री जाति ही देहरी का दीपक है, जो सही टा सा का भारतीय साहित्य और मस्कृति मायने म प्रज्वलित हो गया तो उमसे समाज और के प्रति गहरा अनुराग था। प्राचीन विद्या और राष्ट्र, हर क्षेत्र में पालोक्ति हो उठेगा। उनके क्ला को आधुनिक सवेदना का रग-रूप देकर उसे द्वारा मस्थापित वीर वालिका शिक्षा सम्थान वतमान पीढी के समक्ष प्रस्तुत करने की उनकी स्त्री-जाति म प्रातरिक वीरत्व जगाने में सफल भावना बरावर बनी रहती थी । राजस्थान प्राकृत भारती अकादमी के वे अध्यक्ष थे। इसके माध्यम से यह काय पूरा हो, ऐसी उनकी टा सा बराबर यह कहा करते थे कि नान भावना थी। का मार प्रेम, करुणा और सेवा है। यद्यपि उहीन पुस्तकीय ज्ञान स्कूल स्तर तक ही प्राप्त किया विद्वाना के प्रति टाक सा के मन मे बडा था, पर सन्त-महात्माया के सत्मग और नियमित प्रादर और स्नेह भाद था । लोक और शास्त्र का स्वाध्याय से जो अनुभव प्राप्त किया, वह निज सुदीघ अनुभव और विशिष्ट ज्ञान होने पर भी वे शान बनकर सेवा कार्यों के रूप मे फूट पडा । टाक अपन को मदा जिनासु मानते रहे। जब भी मा ने वाहरी रत्नो को ही नहीं सहलाया-मवारा मिलना होना, वे शरीर और आत्मा दे भेद की वरन् हृदय-सिधु में निहित मानवीय सद्गुण रूपी वात अवश्य करते । सचमुच वे भेद विनानी थे समा, महिष्णुता, सहानुभूति, परोपकार जसे रत्नो और अपने जीवन को सार्थक बनाकर परम तत्त्व से प्रात्म-साक्षातार किया, परिणाम स्वरूप में के साथ अभेद हो गय । उनका जीवन हम सबके गरीबो के मददगार, नेत्रहीनो के नन और लिए खिला हुअा गुलदस्ता है, जो खुशबू ही खुशबू विक्तागो के सकल अग बन सके। सब प्रकार का वाटता है। भौतिक सुख-वभव होते हुए भी वे उसके भोक्ता नहीं रहे। उनको उपयोग-दृष्टि निमल रही। हमेशा उनका ध्यान निम्न मध्यवर्गीय परिवारो हिदी प्रोफेसर की पोर द्रित रहता और वे उनके सुख-दुख में राजस्थान विश्व विद्यालय हमेशा महभागी बनते। जयपुर - 28 राजरूपजी का शिक्षा-प्रेम श्री जगन्नाथ सिंह मेहता अध्यक्ष, माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, राजस्थान वहुमुखी प्रतिभा के धनी श्री राजरूपजी टांक साहब का जीवन सेवा के लिये समर्पित था । सा. को शिक्षा व स्काउटिंग से जुड़े होने के नाते दूसरो के दुःख व पीटा से उनका मन पसीज उनको मुझे निकटता से देखने का सुअवसर मिला जाता था । इसी कारण उनका स्काउटिग व गाइडिंग था। श्रद्धेय टाक सा. के लिये में केवल एक ही से विणेप प्रेम हो गया और वे स्काउटिंग व बात कहना चाहूंगा कि अधिकतर मनुष्य समाज के गाइडिंग संस्थान से जुड गये । स्काउटिंग के सेवा ऋगी रहते है परन्तु कुछ ऐसे विरले महापुरुप कार्यों में उन्होने तन-मन-धन से योगदान दिया। होते हैं जो नमाज को इतना दे जाते है, जिससे स्काउटिंग व गाटिंग अान्दोलन व शिक्षा जगत् ममाज यह महमून करने लगता है कि वह उनका उनकी सेवाप्रो को विस्मृत नहीं कर सकेगा। ऋगी है। श्री टांक मा. ना शिक्षा से बहुत प्रेम उनमे राष्ट्र-प्रेम व समाज-प्रेम कूट-कूट कर भरा था। उनकी यह मान्यता थी कि शिक्षा ही मानव था । वे गांधीवादी विचारक थे। देश की प्राजादी ग. विकार का प्राचार-स्तम्भ है। इसी भावना से के लिये भी उन्होंने योगदान दिया। वे सादगी, प्रेरित होकर उन्होंने विशेष म्प में स्त्री शिक्षा के रोवा, महिपणता, सरलता की प्रतिमूर्ति थे । क्षेत्र में जहां पर गिना की बहा प्रावश्यकता थी, भगवान महावीर विकलांग महायता समिति व पा में 63 वर्ष पूर्व श्री धीर बालिका शिक्षा राजम्मान नेत्रहीन कल्याण सघ एवं अन्य कई माधान को स्थापना की और उसको निरन्तर ऐसी पनान मेवाभावी मम्थायें हैं जिनमें ये जुड़े farन प्रारी शिक्षा देने के लिये वे हये थे। प्रसनको भीर मालिका निधना मनमे ग्रन्या योगदान गिनी भी मनुष्य का EET शिदिशातर पर ना किया, दूसरी जीवन को बनाने लिमा पारी माय घर उनकता का प्रपने पसे परोपर गौरममारको प्रपना मांगतान 2.9 रत्न-व्यवसाय के आधार-रतम्भ श्री राजस्पजी टाफ का जवाहरात व्यवसाय मे विशेष स्थान या, और ये रत्न व्यवसायियो मे प्रत्यात लोकप्रिय थे। वे रतन्ध्यवसाय की उन्नति के लिये सदर प्रयत्नशील रहे । जयपुर के रत्न-व्यवसाय के ये स्तम्भ ये। प्राज उनके अनेकों शिष्य इस व्यवसाय मे सफलता के उच्च शिखर पर प्रतिप्ठ हैं। उनका सक्रिय सहयोग एसोसियेशन को सदैव मिलता रहा है। वे एसोसियेशन के अध्यक्षा व मानद मत्री रह चुके हैं । उनके कायकाल मे एसोसियेशन ने असीम प्रगति की। जौहरी ही नहीं, जयपुर को जनता इस बात से भलीभांति परिचित है कि वे प्रमुख समाजसेवी, शैक्षणिक एव जन सेवा के क्षेत्र मे सदैव अग्रणी रहे । -ज्वलर्स एसोसियेशन, जयपुर दे सकें। टाक सा का सारा जीवन दूसरो के हमारे बीच से चले जाना वास्तव म बहुत दु सद जीवन को बनाने में व्यतीत हुा । करीब दो व समाज को वहुत वही क्षति है जिसकी पूर्ति हजार लोगा को रत्न व्यवसाय का शिक्षण दिया सम्भव नहीं है। व उह दक्ष व स्वावलम्बी बनाया। आज उनके श्रद्धय राजरूपजी टाफ के लिय जितना भी शिप्य न केवल जयपुर शहर में ही अपितु भारत पहें, उतना कम है। यदि में यह कहूँ कि वे एक वप व दुनिया के कई स्थानो पर कुशल जौहरी के महामानव थे तो काई अतिशयोक्ति नहीं होगी। रूप म अपना व्यवमाय चला रहे हैं । उहाने उनके प्रति सच्ची श्रद्धाजगि यही होगी कि हम इडियन जेमालोजी पर अग्रेजी व हिदी की पुस्तकें उनके वताय माग पर चलें और पीडित मानव की भी लिखी जो न केवल भारत वप म ही, बलि सेवा कर उनके दु ख को कम करने मे व शिक्षा अमेरिका के भी पाठ्यक्रम म सम्मिलित हैं । उह के क्षेत्र मे अपना सम्यि योगदान दें। अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। ऐसे व्यक्ति का 30 राजस्थान नेत्रहीन कल्याण संघ एवं वं संत महापुरुष स्व. श्री राजरूपजी टांक श्री माणिकलाल कानुगा राजस्थान बनने के बाद ज्योंही मैं 30 अगस्त, 1978 में लंगर के बालाजी के रास्ते में तिवाड़ी 1949 को जोधपुर से जयपुर आया तो मेरे परम जी के कारखाने का 805.43 वर्गमीटर का प्राधा हितपी श्री हजारीचद जी मेहता के सहयोग से वना व आधा खुला भवन एक लाख में खरीद कर सर्वप्रथम जयपुर के जिस महान् व्यक्ति से सम्पर्क हमेशा के लिए समस्या का समाधान कर दिया। हुया, वे थे गांधीवादी, जौहरी एव समाजसेवी धन कहा से जुटाया, किसने दिया और क्या चिड़ावा निवासी स्व. श्री राजरूपजी टाक । उनके किया ? यह सब विधि विधाता ही जाने या चेहरे की सहज मुस्कान और उनके व्यक्तित्व को स्वयं स्व. टांक साहब । शिक्षा प्रसार के क्षेत्र में देखकर मैं वा प्रभावित हुआ। कौन जानता था उनके समय में राजस्वान नेत्रहीन प्राथमिक कि एक दिन ऐसा आयेगा जब टाक साहब नेत्रहीन विद्यालय (विगिप्ट) खोला गया जिसमे आज कल्याण संघ के अध्यक्ष होगे और मुझे संघ का 40 विद्यार्थी विद्या अर्जन कर रहे हैं। नेत्रहीनों मंत्री बनकर उनके माथ कधे से कंधा मिलाकर को स्वावलम्बी बनाने हेतु कुर्सी, वैच बनवाई व कार्य करना पडेगा। स्व. श्री टाक साहब 1972 हाथकर्षा व्यवसाय प्रशिक्षण केन्द्र खोले । उन में कल्याण मंघ के अध्यक्ष बने । तव से मरण प्रशिक्षण केन्द्रो से काम सीसकर करीब 25 पर्यन्त उन्होंने नेत्रहीनो के कल्याण व विकास में विद्यार्थी सारे राजस्थान में अपना स्वरोजगार चला जिन लगन व नत्पन्ना मे तन-मन-धन एव समपित कर जीवनयापन कर रहे है। ऐसे अनेक रचनात्मक भावना ने मेवा गी, वह अनुकारणीय रहंगी। कार्यों में अभिरुचि रखने वाले ग्व. श्री टांक माहब 1977 के पहले नेगमीन वानका रहबास हेतु कभी नेत्रहीनों के हृदय सम्राट व ममीहा थे। उन्होंने पारगोट्या गाद बापू बाजार अन्धेरे पदान नेत्रदान के लिए 'नेन वैक' मोना। वे वयं पहले मेरो घोर कमी प्रमायालय में जापार गरा पनि थे जिन्होंने मृत्यु के बाद अपने नेत्र दान में मिनी पनी 17. श्री नरपानी जैग (नेपीन) देने की घोषणा की ! घोषणा के अनुसार दिनार . भीमरोगामी जैन (नेकीन)ो 27 अक्टूबर, 1987 को मृत्यु होने पर उनके दोनों मानाने में, में टांग मारय कर निकाल लिए गयेन 24 घंटो में दोनो को मन मानसी दिरयाग प्रारम-सनग पनियों की प्रान मया मानगिः मोर पिया। 1 फरवरी, पताल, जयपुर में प्रोनर टाकुन श्रेष्ट एवं - डॉ पार जी शर्मा द्वारा प्रत्यारोपण कर दिये की मृत्यु के दिन श्री जैन अकस्मात् सीरियस हो गये । यह है टाक साहब का अपूव त्याग नेत्रहीनो गये और प्रावेश में अपनी धमपत्नी (नेत्रहीन) मे के प्रति । धन एक धरोहर है, ऐसा उनका विश्वास रहने लगे-'टाक साहब के जनाजे म मैं स्वय था । गुप्त दान को वे सर्वोपरि समझते थे, जिसमे जाऊँगा एव अपनी श्रद्धाजलि दंगा।" पर विधिका दान लेने वाले की भावना पर लेशमान ठेस नही विधान देसिये । इधर टाम साहब को मृत्यु पहुचे । एक नेत्रहीन कायकर्ता को हाउसिंग बोर्ड और उसी घडी मे श्री जैन भवाई मानसिंह में मकान मिला पर इस दरिद्रनारायण के पास अस्पताल में भर्ती और दूसरे दिन टाल साहन की पसा देने को कहा ? यह बात उह मालूम पड़ी। मृत्यु का समाचार सुन 28 1087 दूसरे ही दिन रकम गुप्त रूप से जमा हो गई व सवेरे 6 बजे श्री जन साहन का स्वगवास । स्व रसीद नेत्रहीन के पास पहुचा दी गई। उसे रसीद श्री टाक साहव रविता व शेर के बहुत शौकीन थे। पाकर इतनी सात्वना मिली, जितनी सीता माता मैंन एक बार उनसे पूछा कि प्राप इन नेत्रहीना को अशोक वाटिका मे वीर हनुमान के हाथ से की समस्या में ज्यादा क्यो डूबे रहते हो, तो एक श्री राम द्वारा प्रेपित स्वरण मुद्रिका पामर मिली शेर सुना दिया- थी। इसी प्रकार जहा दो अचे कुमार-कुमारी का 'हम समा वफा ये परवाने, विवाह रचता, वहा स्वय जाते व विना नाम का हम मरन से कर डरते हैं । बद लिफाफा आशीर्वाद रूप देकर चले आते । पर जो प्राग लगी है इम तन में, कोमलता इतनी थी कि अघे वालको की बीमारी उस पाग से मेला करते हैं।' देसकर आँखा को गीली कर पठते। श्री भरोसी लालजी जैन (नेत्रहीन) जो कल्याण संघ की ऐसे हाय, वात एव हृदय के धनी, सेवा करन आत्मा थे व टाय साहब के अनय भक्ता मे से थे, की प्रेरणा के स्रोत स्व श्री टार साल की वे इनकी लम्बी बीमारी से बहुत चिन्तित रहते दिवगत प्रात्मा को नेत्रहीन परिवार व मेरा शत- थे । अभाग्यवश धी जैन का टाक साहब की मृत्यु शत प्रणाम व स्व श्री जैन माहब को श्रद्धाजलि। के दो महीने पहिले के सर हा गया । टाक साहब मत्री, राजस्थान नेत्रहीन फ्ल्यारण सघ, जयपुर 32 व्यागाजन - और बालिका विद्यालय के पद पर नाजधान के मी हन्दिच जोगी, माधीननी जगला, श्री गह- लास में, माघ स्त्रा के. पृ. मार त्रिन जान पर भी मैं AL - - ar २ . AR *dia AA+ गवान महावीर 2500 निर्वाण वर्ग के समारोह के आयो- की नचा श्री माह के निरन पर ही हवा करती न करने हो भी चन्दन मा. श्री केन्द्र नाज - 1 - * न + । १ * गनला टाव की 63वी चीन्द्र मन आधाजित नाति --न नमागह में श्री लिना विनायक किन चन्द -- r 1 - - + H kama है में - - ५ म S स नयपुर के भूतपूर्व महागजा पी भवानीसिंह में मिलकर कितने प्रसन दिनाई दे रहे है श्रीटाक माहव । जन्यानी शिक्षा मनी श्रीमती कमला में गम्भीर चर्चा कते दा, श्री वीर बानिया जिसमा मन्थायो " -निविरिया की जान- T! दने हए, श्री गज- . प प्राकृत भारती और राजरूपजी टांक म. विनय सागर निदेशक-संयुक्त सचिव, प्राकृत भारती थे ही। सका था। शासनपति-परम तीर्थंकर श्रमण भगवान 9 दिसम्बर, 1984 की साधारण सभा की बैठक महावीर के पच्चीसवी निर्वाण शताब्दी के में पुनः अध्यक्ष निर्वाचित हुए । अर्थात् संस्थान के पावन प्रसंग पर राजस्थान सरकार ने राज्यस्तर जन्म-काल से स्वयं के देहावसान तक ये अध्यक्ष पर शताब्दी समारोह समिति की स्थापना की थी। पद पर ही रहे। संस्थान के संरक्षक सदस्य तो इस समारोह समिति के एक प्रमुख सदस्य श्री राज- स्पजी टाक भी थे । समिति ने साहित्यिक योजना प्राकृत भारती से इतका अटूट, हार्दिक एवं के अन्तर्गत तीन पुस्तको के प्रकाशन का निर्णय घनिष्ठ सम्बन्ध था। वे इसे अपनी ही संस्था लिया था-1. कल्पसूत्र सचित्र, 2. राजस्थान का समझते थे । यही कारण है कि वे सर्वदा इसके जैन साहित्य और 3. राजस्थान की जैन कला पोषण एवं संवर्धन में प्रयत्नशील ही नही अग्नगण्य और स्थापत्य । प्रारम्भ के दोनों ग्रन्थों का प्रका भी रहे । उनका निरन्तर यही प्रयास रहता था, शन कार्य प्रारम्भ भी हो गया था, पर पूर्ण न हो विनम्र अनुरोध रहता था कि प्रकाशन हेतु इस प्रकार के ग्रन्थो को चयन कर प्रकाशित किये जायें शताब्दी समारोह वर्ष की पूर्ति पर समारोह कि यह संस्था/अकादमी सार्वजनीन एवं सर्वश्रेष्ठ समिति के सचिव श्री देवेन्द्रराजजी मेहता ने श्री बन जाये । उनकी मिलनसारिता, विचारणीलता. राजरूपजी टांक प्रभृति सदस्यों से परामर्श कर, सज्जनता एवं सहृदयता के कारण उनके समस्त "राजस्थान प्राकृत भारती संस्थान" की स्थापना प्रस्ताव सर्वदा सर्वसम्मति से स्वीकृत होते रहे । की थी। इन संस्थान का रजिस्ट्रेशन 21 फरवरी, मैंने देखा है कि प्राकृत भारती के साथ अटूट 1977 को करवा लिया गया था । (सन् 1985 प्रगाढता के कारण रुग्णावस्था में, उठने-बैठने की प्राकृत भारती अकादमी) उस समय श्री टांक असमर्थता के क्षणो में भी वे बैठक की अध्यक्षता ना. म संस्थान के संस्थापक सदस्य थे। करने में स्वयं को मौभाग्यशाली समझते थे। उन प्रागृत भारती के संस्थापन-काल से लेकर क्षणों में कटुता की गन्ध होने पर भी वे क्षमागील 26 अगटूबर, 1980 के पूर्व तक, सस्थान को ही बने रहते थे। मृग वाणी होने पर भी जब भी गमात बैटम श्री राजम्पनी टांग की मैं मिलता पा, मारो से ही प्राकृत भारती की पक्षता में ही गम्यम होती रही। 26 अगटूबर, जानकारी लेते पोर प्रगति मुनकर हादिक प्रसन्नता 1980ो मम्पान पो माधारण सभा में श्री प्रमुभव करते थे। डा. ग. धायक्ष पद पर निर्वाचित हए और, प्रारम्भ में वर्षों में मंरपा की प्राधिर में 33 तुमसे महका यह उपवन श्रीमती सुधा शुक्ला नारी शिक्षा के प्रवल समर्थक, रत्नों की जगमग दुनिया मे, तुममे महका यह उपवन, कितन रत्न मजाय, उद्यम, सस्कृति मानवता की, बने प्रवनय पिकतागा के, तुम ये एक अनोखी चितवन । जीवन ज्योति जगाये। मूर्य की प्रथम किरण बनकर, भून न पायेंगे हम तुमको, पलाया था चल तुमने, तेरी हर यादा म, बेरोजगारी प्रशिक्षा की, पत्रम वढंग हमारे, सीलन भरी गुफाम्रो म। उन स्वणिम राहा तुमने पिया था रोशनी का, वदना तुम शाना जीवन वी हर साम म, जन जन के तुम भाग्य विधाता, प्रट एक माम है, उहाँ गय तुम उम दुनिया में, रोशनी की चाह एक दिन मामी जाना, जीवन वी जटिल अपनी मजित को, पहती को तुमन सुनमाया, तेरी मजिल तक पहुंचाना । अपने जीवन को तुमन, जना गय जो दीप शिमा, माती सा मरा बनाया। उसको प्रज्वलित वरना, नैतिकता का मानवता से, प्रपन जीवन को भी था एक अनोखा नाना, तुम जैसा प्रादा जिसरा भेद बाज जही में बनाना। कोई नहीं कर पाता। -सहायक अध्यापिरा, घी वीर वा उ मा विद्यालय, जयपुर स्थिति सन्नोपजनक नहीं थी। सी स्थिति में जर भारती के सम्यापन 1977 में मैं मम्माय मयुक्त भी प्रावश्यक्ता . तो वे सहर्षे पूर्ति भी मचिव रहा और व अध्यक्ष रहे । इन दस वर्षों म करते थे। मेरा मम्पर घनिष्ठ हो गया था। मैंने अनुमद इममें सदेह नहीं कि श्री राजस्पजी टारके किया कि, उनके हृदय में घम, सेवा और माहित्य साहित्य-प्रेम के कारण ही उनके अध्ययीय काय वे प्रति श्रद्धा और अटूट निष्ठा थी और वे गुणा कान में प्राव भारती पल्लवित, पुष्पित होती हुई ये ग्राहह घे एव गुणीजना की स्लाघा करते थे। पलदायिनी सिद्ध हो चुकी है। परत उनके जीवन पनवे असामयिक निधन से प्राकृत भारती सध्या के पूब 38 पम्न प्रकाशित हो चुकी थीं। अकादमी की अपूरणीय क्षति हुई है । मैं अपनी श्री टार मा से मेरा व्यक्तिगत परिचय और से तथा प्राकृत भारती के समस्त मदस्या की सन् 1940 से रहा है, वह भी प्रगाद ! प्राकृत प्रोर से भावभीनी श्रद्धाजति अपित करता हूँ.0 34 विश्व-मानव के लिये जो प्रेरणा बनकर जिये श्रीमती उमिला श्रीवास्तव निष्ठा, करते है। महामहिम श्री राजरूपजी टांक उन महान् बालिकायो की शिक्षा की कल्पना करना भी विभूतियों में से एक थे जो प्रादर्ण एव सिद्धान्तो असम्भव था, उस समय अपने उच्च संस्कारो, की मौखिक व्याख्या ही नहीं करते वरन् उन्हे लगन तथा पूज्य साध्वी स्वर्ण श्री जी जीवन के ठोस धरातल पर साकार रूप प्रदान महाराज की प्रेरणा से अापने 17 वर्ष की अल्पायु आप जीवन को · आन्तरिक व वाह्य मे ही श्राविका आश्रम नाम से एक वालिकामो के अर्थात् विचार और व्यवहार, दोनों दृष्टियो से शिक्षण केन्द्र की स्थापना करवाई और संचालन पवित्र व आदर्शमय बनाने में विश्वास करते थे । का समस्त भार अपने किशोर कन्धो पर वहन आपने प्रारम्भ से ही अपने जीवन मे परिश्रम, किया और उसका सफलतापूर्वक आजीवन निर्वाह सच्चाई - व विनम्रता का पालन किया । अपनी किया। उन परिस्थितियों में जव न तो पढ़ने महनशीलता, सेवा व त्याग के बल पर जीवन के वाली बालिकाएँ ही सहजता से उपलब्ध होती थी कठोर अनुभवो को भी स्वीकार किया और शायद और न पढ़ाने वाली.अध्यापिकाएँ; तव पाप घर- इसी कारण अपने बहुपक्षीय कार्यक्षेत्र मे सामंजस्य घर जाकर वालिकामो को पढने के लिये बुलाकर स्थापित करने में सफल हुए । केवल इतना ही नहीं लाते थे व दिल्ली, आगरा, मथुरा ग्रादि नगर-नगर वरन् अपने सम्पर्क में आने वाले सभी व्यक्तियो को जाकर अध्यापिकाओं की खोज करते थे। निप्ठा व इतना प्रभावित किया कि आज हम सब एक ओर लगन तथा पारस्परिक सहयोग की भावना से यह उनके वियोग से दुःग्बी है तो दूसरी ओर उनके विद्यालय रूपी बीज दिन पर दिन अकुरित और सद्गुगो सद्भाव और सदाचरण का स्मरण हमे प्रस्फुटित होने लगा। इसके कलेवर, स्तर और प्रात्मगौरव और प्रात्मचिन्तन की ओर अग्रसर स्वरूप में भी विकास हुया किन्तु विकास के साथ करता है और पिछले पच्चीस वर्षों का अतीत प्रशासनिक और प्राथिक कठिनाइयो का सामना मजीव हो उटता है। करते हुए भी प्रापने अभिभावकों में अधिक टांक माहब मज्जनता, सौहार्द और स्नेह के शुल्क लेना स्वीकार नहीं किया क्योगि आपकी मुर्तिमान स्वरुप थे विशेषकर उपेक्षित व पीड़ित धारणा थी कि राष्ट्रीय विकास के लिये शिक्षा मानव समुदाय के प्रति उनके हृदय मे अपार सबको मुलभ और मन्ती होनी चाहिए। गांधीवादी पगा विद्यमान थी, जिसको उन्होंने अनेकानेका विचारक श्री टाफ माहब का कहना था कि उनका नमानसेवा, चारित्रिक विकाम, नैतिक मूल्यों की विद्यालय मध्यम वर्ग व निम्न वर्ग के लिये है, चारमा प्रोर शिक्षा विकास के म्प मे माकार मुविधाम्रो या धन के अभाव में किसी भी छात्रा iral पाने अनेकानेक मरगीय एव श्लाघनीय को अध्ययन में वचित न रमा माय । म दिया- माम में तकालीन प्रमान व अधकार परिस्थि लय के माध्यम में उन्होंने मेरो निर्णन प्रामा निनारी शिक्षा का प्रमय जगाया था। प्राज के जीवन को शानदान में भानोतिया में 63 नजन्मान में पिछले प्रदेश जो नियरहो दीपगिया कार राष्ट्र गौर - 35 . অশাল ম লান, মঘবিহু গী স্বর্নলিরা যা যা যা প্লাগা বা মার গীব গান্ধব दूर भगायेंगी। साथ ही प्राप शिक्षा के सेवन सवभूतेषु या परपति मा पण्डित' यी पापना पुस्तकीय स्वरूप के ममयक न होकर उमे श्रेष्ठ जिमने साथी वाययानी मौर अधीनस्थ बम प्रावरण, उन्नन नैतित्र मूल्य, सच्ची सेवा और चारियो को पारस्परिक स्नेह एव गाव मे बाप श्रम के प्रति निष्ठा और प्रादर के रूप में प्रति रमा। माधारण से माधारण व्यक्ति ये सुपन्दुस पलित देखना चाहत थे। इतने अनुमवी एव में सम्मिलित होपर वे उसे प्रारमवल व प्रेरणा विभिन्न क्षेत्री के माता होते हुए भी नन्ही-मुनी प्रदान करते थे। पापी इस सदाशयता एवं वालिकामा के हाया से निर्मित वस्तुप्रो की इतनी उदारता से मगटन, प्रेम और प्रात्मीयता स्पी मुक्तकठ से प्रसमा परते थे कि बनाने वाली व धना मे वापर शक्तिशाली होता पा । अपने घामामी और मागदशन करन वाली अध्यापिकामो ममचारियों या अधीनस्पोपा अभिवादन घेरतनी का उत्साह व उमग दुगुना हो जाता था। प्रात्मीयता और मपुर वचनों से स्वीार परते थे प्रौपचारिक शिक्षा से दूर होते हुए भी प्राप कि वे प्रसन्न और तनावमुक्त होकर इतक्य के प्रति शिक्षाविद्, शिक्षाशास्त्री व एक सच्चे शिक्षस थे। ममपिन हो जाते थे। इस सस्था का दीप जीवन, विमित स्वरुप और प्रादरणीय दार साहव मत्यन्त मृदु व मित सौहादपूरण वातावरण प्रापवे अटूट शिक्षा प्रेम मा भापी थे। मामाजिर, राजनैतिर, व्यावसामिण ही परिचायक है। एव मंगिय क्षेत्र की विशिष्ट उपलब्धिया श मस्था के विकास में पाप शिक्षा प्रेम के सार्वजनिक रूप में प्रचार करन से वे परहेज करते साथ-साथ व्यक्तित्व के महान् गुण भी सम्मिलित थे। पाप एक सच्चे और मूब सेवा ये विन्तु एक थे, जो पापो ए पाद के रूप में प्रतिष्ठित प्रगतिशील चिन्तक और मजग वाया । यही करते हैं । प्राज से 30-35 वप पूर्व की घटना है तर कि विद्यालय में होने वाले ममारोह में भी कि प्रध्यापिकामी ने उचित समय पर वेतन न पाए म्वागत, भाषण, परिचय व अन्य उपलब्धियो मिलने के कारण प्रारोग को, शायद कुछ कठोर के विवरण से दूर रहते थे । बहुत पाग्रह करने पर शब्दो मे ही प्रापरे सम्मुख प्रकट किया विन्तु आभार ये दो शब्द ही सब लिए प्राशीर्वाद और क्षमामूर्ति टाप साह्य 7 विना विमो प्रकार मार्गदशन का सम्बल होते थे। प्रतिवाद या मोघ किये अपनी टोपी उनके सम्मुख प्रा में जिम प्रभार सहन रभि सूय अपनी रस दो। विनम्रता की इस सीमा के प्रागे सवा सहन रश्मिया से एप और तो निधन बुटिया के मस्तक लज्जा से भर गया। ऐस अनव उदाहरणा भधवार को हरता है तो दूमरी पोर प्रति प्राणवान से यह सिद्ध होता है कि प्रापिर प्रशासनिक व पदाय के जीवन में प्राशा का मचरण पर प्रसर दिमागीय पठिनाइयों के बावजूद भी मापने सस्था प्रताप के साथ उदित होकर प्रपर प्रताप के साथ को प्राथमिक शाला से माध्यमिक, उच्च माध्यमिक ही प्रस्त हो जाता है, उसी प्रकार महामहिम प्रबर और स्नातक स्तर तक पहुंचाया। प्रतिभा के धनी शत-शत बालिवामा में प्यारे चाचा पाप जयपुर और राजस्थान की लगभग 30 साहब अपने व्यवहार से, अपने अटल सिद्धातो से, सस्थामा से जुड़े रह पितु आश्चर्य की बात है कि अपने प्रयासा से, अपने धर्मप्रधान विचारो से हमार इतनी सस्थानो के अधिकारी और सचालक रहने मानस पर एक एसो छाया प्रविन वर गये, जिस पर भी वही पर भी किसी प्रकार मा विराय या मुलाना नितान्त असम्भव है । o असतोप की भावना जाग्रत नहीं हुई। इसका ~प्रधानाध्यापिका, वीर वालिराउ मा विद्यालम 36 धर्मवीर व कर्मवीर श्रीमती कमला श्रीवास्तव . - सहायता देते। इस शहरी कोलाहल मे, हम तुमको भूले रहते है । को असमर्थ देख कर उन्होंने चाचा साहब के पास एकांत क्षणों मे राजऋषि, याद आपकी आती है ।। भेजा । चाचा साहब ने उस समय आर्थिक सहायता जीवन के व्यस्त क्षणों में जब भी अवकाश दी और हर माह उनकी सहायता करते रहे। मिलता है, चाचा साहव की याद में हृदय मे एक एक गरीव विधवा अपने बच्चो को लेकर टीस-सी हो जाती है। समाज एवं व्यापारी कर्ण- उनकी गद्दी पर गई, नौकरी तथा बच्चो के अध्ययन धारों ने उन्हें अनेक प्रकार की उपमानो से विभू- के लिए प्रार्थना की, उन्होंने उसे भी स्कूल भेज पित किया है, किन्तु मैंने लगभग 4 दशको से दिया । एक बार, एक अन्चे तवला मास्टर को उनके नेतृत्व में रह कर उनके व्यक्तित्व मे एक प्राग्रहपूर्वक नौकरी पर रखवाया, कोई भी पीडित सच्चे राजऋषि के दर्शन पाये है । सतयुग की अपंग, निर्धन, उसे स्कूल भेज देते या स्वयं प्राधिक गाथाये सुनते थे कि इस धराधाम पर एक से एक बढ़कर धर्मवीर, कर्मवीर, दानी, परोपकारी, न्यायी नित्य प्रति को जवाबदेही से तंग आकर एक अवतरित हुए है । वे सब अलग-अलग व्यक्तित्व दिन श्रीमती सिन्हा उनके यहाँ गई और बोली. किन्तु हमारे चाचा साहब में "भाई साहब ! ये स्कूल है या अनाथालय ? पाप ये सब गुण विद्यमान थे । वास्तव में वे सतयुगी किसी भी योग्य अयोग्य को वहां भेज देते है ।' मानव थे। वे बड़ी जोर से हंसे और बोले-"क्या कर कोई भी व्यक्ति अपनी समस्या लेकर जाता प्रकाश वहन, मुझमे इन लोगो की पीडा देखी नही तो पहले उसका दुःख-दर्द सुनकर उचित निर्णय जाती, कोई काम हो तो दे दिया करें।" उस व्यक्ति देते, उसकी समस्या हल करते । के योग्य काम न मिलने पर वे उसकी माणित एक बार, एक बूढे नंस्कृत के पडितजी ने उन्हें महायता करते थे। अपनी च्वधा मुनापर नोकरी को याचना की । किसी प्रकार से पीग्नि व्यक्ति उनके पास में पाचा माहब ने उन्हे म्यूल भेज दिया, तत्कालीन निराश नही लोटता था। उनका द्वार मवणे लिए प्रधानाचार्य श्रीमती प्रमाणयतीजी सिन्हा ने उन्हें समान मप में गुला था । पाहे वेगाना गा रहे. देगा, बम्पित यागी झावरचा देश भर में भी मो. ना. विधाममा ममा हो, या गडीपरपन. अपित हो गई। नंया गावं के लिए उन परितजी माविषः बार में न हों। देली-विदेशी रामागे लेकर प्रसिद्ध हुए, " समूह सबकी ओर से ध्यान हटा कर प्रागन्तुक से मनोयागपूर्वक ममस्त वायत्रम देखते थे। उसमे पाने का कारण पूटते, समस्या का समाधान उनका महान् व्यक्तित्व बन्दनीय तथा सराह- करते, प्राज की बात क्ल पर नहीं टालते थे। नीय था । रतन धनाढय, रत्नपारगी, लामों शिष्या तुरत निर्णय देत थे। के गुरु, शिक्षण संस्था ये मचालय होपर भी वे उनका कहना था कि "हम अपने विद्यालय क्तिने व्यवहार कुशल तथा निराभिमानी थे। को एक परिवार मानत हैं, किसी भी क्मचारी अपनी वषगाठ तथा परिवार म बाहिर कार्यों में शिक्षिका के भेदभाव या अ याय हम बरदाश्त नहीं प्राग्रहपूवव हम लोगा यो प्रामत्रित करते थे। वडे कर सकते।" प्रेम से विविध व्यजन मिलाते पोर वचा हुमा किमी शिक्षिका के परिवार म प्रायस्मिक भोजन अनाथालय के बालवृद म वितरित कर निधन हो जाने पर घर पहुंच कर सात्वना देते, देते थे। शिक्षिका बच्चे या पति अस्पताल में मघातिक उनकी सवेदनशीलता की भावना तो मैंने उस बीमारी से पीडित हो ता वे स्वय घर या अस्पताल दिन देखी वि बाढ के पश्चात् जब मैं उनके घर पहुँचत थे। गई तो वे बाढपीडित व्यक्तियो के लिए भोजन, अाप वडे विनोदप्रिय थे क्मिी भी हाम्य प्रमग वस्त्र, वतन मादि की पूर्ण व्यवस्था करवा रहे थे। पर वे उ मुक्त प से हंसते थे। विद्यालय में माना जीप आदि वाहनो म समस्त वस्तुयें भिजवा रहे उनके प्राण बमत थे । अपन व्यस्त कार्यक्रम से थे। मेरे पहुंचन पर वाले-"देसो जयपुर पा क्या समय निकाल कर वे स्कूल प्रात पानी आदि की सवनाश हुमा है । धन की हानि तो असा इतनी व्यवस्था देवते, पमे आदि की कमी देखकर या नहीं है पर यमलाजी चद्रकाता, उनपी माजी, स्कूल सम्बधी हर समस्या का समाधान करते, वेचार तेजकुमार ये दानो तीनो भाई विम प्रबार, शिक्षिकाना की कुशलता पूछन थे । हम पुरानी बह गये । उम दिन वे बढे दु पी थे। बाद म शिक्षिकानो का देखकर वडे गव से कहते-'ये उनके परिवार को कुछ महायता भी दी, ये स्वय हमारी नीव की इंटे हैं।" अपनी स्वाभाविय वाढपीडित क्षेत्र में जाते थे। उहोन मुझमे भी मुस्कान तथा मीठी वाणी से सभी को अपना मम पूछा, पाप उमी क्षेत्र म माई हो युछ चाहिये तो भाव प्रशित करत थे । ले जानो । पर मैंने श्रद्धापूर्वक ननमस्तक होकर आपके दनिक कायरम निर्धारित तथा निश्चित मना कर दिया। समय पर होते थे । प्रात भ्रमण व अवश्य जात थ । एसे महान् थे हमारे चाचा, माहर, स्व टार एक भयानक शीत म जब हम टिटुरते हुए स्कूल माहव, एसी महान् विभूति को शत शत प्रणाम । आते, चाचा साहब प्रफुल्ल तथा निर्विकार भाव हे महापप तुम घय हो, स एक मिनट रुककर अवश्य समाचार पूछते थे। पिन शब्दो मथद्धाजलि । तत्पश्चात् उपाश्रय म महाराज के दशन व प्रवचन कुछ पद सुमन ही चुनकर, का लाभ उठाकर अन जल गण करते थे। विद्या- तुमको अर्पित की है. पुप्पाञ्जलि ।' लय के धार्मिक, राष्ट्रीय आदि कार्यक्रमो अवश्य पधारते और वायत्रम की समाप्ति तक सहायक अध्यापिका -श्री वीर यालिया विद्यालय, जयपुर -- ग्राप 38 प्रतिनी सज्जन श्रीजी म. सा. श्रावकवर्य श्रीराजरूपजी टांक HITRAL शिक्षा देना और उन्हे अर्थ समझा कर उनकी श्रद्धा को दृढ करते रहते थे । जगत् नाम ही जीवो के गमनागमन और आयुस्थिति के अनुसार कुछ काल जीवन को सुख- दुःख के हिण्डोले में झुलाने का है । अनन्तकाल से अनन्त जीव जन्म लेते, कुछ समय सुख-दुःख की अनुभूति करते, अच्छे-बुरे कर्म करते है और उस शरीर का परित्याग (मरण) करके अन्य शरीर धारण करके उपर्युक्त कार्यों की पुनरावृत्ति करते रहते हैं। इनमें से कोई-कोई विरल जीव विशिष्ट योग्य होकर स्व-परहित साधन करके मानव जीवन को सार्थक कर चिरकाल पर्यन्त विश्व मे पादरणीय, स्मरणीय और अनुकरणीय बन जाते हैं । वे स्वय परम जिज्ञासु थे, यथा समय साधु- साध्वी, सत, महापुरुपो या विद्वद्जनो की संगति और तत्त्व ग्रन्थो का स्वाध्याय करना शोक सा ही था। उनको तत्त्वो की गहरी जानकारी दी। साथ ही जान का अभिमान नहीं था । मभी पूज्यजनो के साथ विनम्रता का व्यवहार, वरावर वालो के माथ उत्तम व्यवहार श्रीर छोटो के प्रति यात्मल्य भाव उनके उत्कर्ष की हार्दिक अभिलाषा उनके जीवन मे ग्रोतप्रोत थी। पने ही विरत्न व्यक्तित्व के धनी श्री राजम्प तिरेमठ वर्ष पूर्व जब स्वनामधन्या अद्भुत माहर थे । पूर्व जन्म और इस जन्म मे भी वे ममाजोन्नति के कार्यों में सनग्न अध्यात्म योगिनी गुमरकारों से नुमंत बने थे। उनका जीवन धर्म, मुविम्यात प्रवतिनी महोदया श्री सुवर्ग श्री जी राष्ट्र देश व समाज के लिये समपित था। उनके म ना. का मिप्या परिवार मा जयपुर पटापंगण जीवन में सर्वप्रथम स्थान धर्म का था। निद्रा न्यागने हमा और यहां श्राविकाधम ग्यापित करने की ही नवकार मंग का मरना करना, नित्य प्रमु प्रेरणा की। नबनुनार यहां के गणनामा प्रायम- न, मामापिष, दान प्रान, मंबा गाव उनका वर्ग श्री गजमनीमा सीता हमीमा निमिनियमच मतातियो को गनिया, श्रीन्द्रनानी मा.गा, औ गोन. भी से पानी पानिमारी नहीदिन गन्दीमा. गनिता भी गोमा 39 सच्चे समाज सेवी! भाई जो का मेरे प्रति बहुत स्नेह था। ये हर व्यक्ति के सुख और दुख में काम प्राते थे । स्वर्गीय भाई अभयकुमार का सहपाठी होने के नाते उहोंने मुझे भाई का प्यार दिया। वे सच्चे समाजसेवी थे । उहोंने हजारों नयपुयकों को जयाहरात का घधा सिखाफर काम में लगाया । शिक्षा के प्रति उनकी विशेष रूचि थी, राजनीति मे भी उनका विशेष स्थान था । प्रजामडल के काप में भी ये प्रागे होकर कार्य करते थे । राजस्थान ने व जयपुर सहर ने एक विशिष्ट सेवाभावी, समाजसेवी-पर दुस फातर-घ्यक्ति को सो दिया, जिसकी पूर्ति होना मुश्किल है। -श्री गोकुलप्रसाद शर्मा, यम्बई हास्पिटल, वम्बई । श्री रूपवादजी लूणिया प्रादि महानुभावो ने प्रेरणा सा से प्रापने पामिर मान प्राप्त किया था । पूज्या को शिरोधार्य कर यहां उक्त संस्था की म्यापना स्व श्री विचक्षण श्री जी म सा प्रादि के साथ मात्र 5 श्राविकानों को लेकर की गई । इसी को प्राय पान-वर्चा करने प्रवश्य पाया करते थे। वई वृहद् रूप देने की भावना से क्याशाला बनी। जिज्ञासामा का समाधान पारर परम प्रसन्न होते अत म सारा भार श्री राजरूपजी सा ने अपने थे। ऊपर लेकर सस्या का नाम वीर वालिका विद्यालय साधु-साध्वियो वे विहार में भी वे कई मीलो रखा और श्री हीराचदजी वद को सयुक्त मत्री बना तर पाते-जाते रहते थे। उनकी देव, गुरु, पम के कर इसकी उन्नति में तन, मन, धन से इतनी लगन प्रति पटल प्रता, भक्ति, निश्छल सेवा, जिज्ञासा से जुट गपे कि आज वह विराट रूप धारण कर शिशु प्रायमिक, माध्यमिक और महाविद्यालय के पूण तत्त्व चर्चा, विनम्रता प्रादि ऐसे अनुकरणीय रूप में जन-सेवा कर रहा है। इसका सारा श्रेय गुण हैं, जो हरेक व्यक्ति में नहीं मिलते। राजरूपजी सा को है। वे आज हमारे बीच नहीं हैं किन्तु उन्ही का साधु-सतो की सेवा में भी वे तन, मन, धन से पदानुसरण करने वाले उनके सुयोग्य सुपुत्र उनके तत्पर रहते थे। सामाय पाहार, पानी की सेवा स्थान की सुपूति कर रहे हैं। से लेकर चिकित्सा कराना, औषधि स्वयं के यहाँ शासन देव उनकी दिवगत प्रात्मा को शान्ति की मूल्यवान पिप्टिया, रस रसायनादि भी विना प्रदान करे। वे शरीर रूप में हमारे सामने नहीं हैं क्सिी साम्प्रदायिक भेद भाव के भेंट क्यिा करते पर उनका नाम और उनमें काम चिरयाल अमर थे। पूज्या परम विदुषी श्री विनय श्री जी म रहेगे । 40 SANT देश तथा समाज के विनम्र सेवक श्री युगलकिशोर चतुर्वेदी वयोवृद्ध हिन्दी-सेवी और वरिष्ठ पत्रकार अपने चौरासी वर्ष के जीवन-काल मे मै लाखो आया तो उस हैसियत से आपसे समय-समय पर ही लोगो के सम्पर्क मे आया हूँ, हजारों ही से मेरा मिलते-जुलते रहने के अधिक अवसर प्राप्त हुए, परिचय भी हुअा है, परन्तु उनमें से बहुत थोड़ी ही और तभी मैं आपके गुणो और विशेषताओं से विभूतियो का प्रभाव मेरे मन और मस्तिष्क पर परिचित होने में समर्थ हुअा था। एक समृद्ध और इतना पड़ा है जितना स्व. राजरूपजी टांक के सम्पन्न परिवार का सदस्य और जीवन की व्यक्तित्व का। शेष मे से अधिकाशतः विस्मृति के सभी सुविधाओं से युक्त होते हुए भी आप सदैव गहरे गर्त मे गिरकर लुप्त भी हो चुके है । सादा जीवन और उच्च विचारधारा का पालन करते रहे थे। जयपुर के ही नहीं, राजस्थान के सुप्रसिद्ध तथा सम्पन्न जौहरी होते हुए भी आप जीवनपर्यन्त स्वयं उच्च कोटि के रत्न-पारखी और रत्न राष्ट्र और समाज की सेवा मे ही जुटे रहे हैं । व्यवसायी होने के साथ-साथ आप रत्नो के प्रचारक वर्तमान शताब्दी के चौथी दशाव्दी के दौरान भी थे। रत्न-व्यवसाय से सबंधित प्रापकी रचित राजस्थान के अन्यान्य राज्यो के साथ जयपुर राज्य पुस्तकें अमेरिका आदि विदेशो में काफी लोकप्रिय में भी जनचेतना का उदय हुआ और यहाँ प्रजातत्र हो गई थी। नाम से राजनीतिक संगठन की स्थापना हुई। इतना ही नही, आपने रत्न-व्यवसाय मे नकली जिनमें आपने तन, मन और धन से पूर्ण सहयोग ही लोगों को इस प्रकार प्रशिक्षित रिया घा, दिया और वर्षों तक उसके कोपाध्यक्ष भी बने जिसने वे स्वतन्त्र में अपना धंधा कर मों। रहे । नदनन्तर मन् 1948 में जब प्रजा- मरान प्रादि के स्थान पर राजस्थान प्रदेश कांग्रेस जहा तक प्रापकी मार्वजनिक प्रवृत्तियों का कमेटी अन्तित्व में आई, तो पाप उममें भी उतने मंबंध है, पाप उनमें भी मदेव मनित्य बने रहे। ही उगाह में भाग लेते रहे। उस समय सन् 49 विपतः माप अपने हारा समापिन वीर ग्रानिका के गगभगबन पंनियों का नेग उत्त, काम विशालय, भगवान महावीर दिलांग माता मेटी मा प्रधान मन्त्री मनोनीत होगर जयपुर निति और राजदान नाीन माग गंध के * समन्वयवादी विचारक श्री टा सा० प्रमुख समाजसेवी, प्रतिनीय गुणों से घारपसहृदय, साधामिर, समवपवादी विचार प्रबल पोपक्ष थे। समाजको मानधतायादी विचारों को मोर अग्रसर करने वाले प्रमुख प्रेरक थे। . . --श्री जैन श्वेताम्बर तपागच्छ सघ, जयपुर सम्यापर मदस्य अपने जीवन के अन्त ममय तक वार को फोन कर उनी इम नशस गरराहार रहे थे। यो समाने या अनुराध लिया। अपने व्यक्तिव, जीवन और व्यवहार में प्राप पानीवालजी ने RT उस पार पडा कदम अत्यन्त विनम्र, उतार, दयालु मिष्टभाषी और उठाया । मापन पुलिस के उच्च पधिकारी का यह मिननसार थे। जैन धम के प्रति प्रापती अत्यात मादग दिया कि वह पूरी पोस लेपर शवयात्रा का प्रास्था और पूरी निष्ठा थी। साथ ही आप अय माग में ही रामदें, और चादपोल दरवाजे को धर्मों का भी ममान स्पस मादर करत थे। वद परादें । प्रापन यह भी तासीद दी प्राप प्रवल ममाज सुधारक भी थे, इसकी यदि इस वाय में दस पार प्रादमी मर भी जात हैं परिचायिका उस घटना का प्राजक्त बहुत कम तो भी महिला को बचाने के लिए ऐसा करना लोग ही जानते होंगे, जब आपन जयपुर म एक चाहिए। पुलिस अधिकारी ने वैसा ही दिया, महिला को सती होन से बचावर उसके जीवन की उग्न सशस्त्र पुलिस दल द्वारा मागे बढने हुए रक्षा पीपी। कठोर भादो में मादेश दिया कि "या तो समूची यह घटना सन् 1952 की है । उस समय भीड इंटरर वापस लौट जाए, प्रयया सबको राजस्थान के मुख्यमपी श्री टीकारापी पालीवाल गोलो से भून दिया जायगा ।" इस घेतावनी में थे। उस समय अग्रवाल समाज के एक व्यक्ति के मर मिलत ही वह जन समूह यहा से गापर हा गया । जान पर उसकी विधवा पत्नी को मती करानकी केवल मृतक व्यक्ति में परिवारजन ही उस शव को पूरी तैयारी कर ली गई थी और उसको शवयात्रा शमशान म दाह करने को ले गय और महिला को के साथ चादपोल बाजार के श्मशान पर रही पुलिस सरक्षण म सकुशल उनके घर पहुंचा दिया। धूमधाम से ले जाया जा रहा था, पूर माग म इम प्रकार श्री टाय की मुझ से उस निरीह वडा हुजूम था, अनेक लोग नारियन ज्यालत और और निर्दोष महिला की जान बच गई, जिसके "जय सतीमाता" के नारे साथ लगाते चल रहे थे। लिए बाद मे वह उनका पपवाद देती रही थी। जब यह सूचना श्री राजरूपजी टार को मिली तो प्रिययदा सदन, आपने तत्कालीन मुस्यमत्री श्री टीरारामजी पाली- प्रसोक मागं, सी स्कीम, जयपुर स्व. राजरूपजी टांक एवं भगवान् महावीर विकलांग सहायता समिति 3 श्री कपूरचन्द पाटनी, कर सलाहकार एवं समाजसेवी आदर, प्यार एव श्रद्धा से "चाचा साहव" जैन समाज द्वारा इतनी ही समरूप अभिदाय राशि के नाम से सम्बोधित स्व. टाक साहब बहुमुखी के रूप में एकत्रित कर एक कोप की स्थापना की प्रतिभा के धनी थे । जयपुर की अनेकानेक जाये, जिसके द्वारा विकलांगों को कृत्रिम अंग सेवोन्मुख सार्वजनिक संस्थानो से आप जुडे हुए निःशुल्क उपलब्ध कराये जावे । थे । भगवान् महावीर विकलांग सहायता समिति मुझे भी भगवान् महावीर निर्वाणोत्सव उनमे से एक प्रमुख संस्था है। समिति का सदस्य बनने का सौभाग्य मिला था । भगवान् महावीर का 2500वे निर्वाण वर्ष मैं उन सदस्यों मे से था जिनका मानना था कि बीसवी सदी मे जैन शासन की महत्त्वपूर्ण ऐति राज्य सरकार ने एक हाथ से 10 लाख की राशि हासिक घटना है। अहिंसा के अग्रदूत भगवान् स्वीकृत की तथा दूसरे हाथ से तुरन्त 2 लाख महावीर का निर्वाण वर्ष 1973-74 मे रुपये वापिस रख लिये। विकलांगों को कृत्रिम अन्तर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर अत्यन्त उल्लास अग उपलब्ध कराये जाने के कार्यक्रम की विस्तृत के गाथ मनाया गया । देश में केन्द्रीय एवं विभिन्न रूपरेखा के अभाव में कार्यक्रम की उपादेयता में राज्य सरकारों ने जैन समाज एवं सरकारी प्रति- सदेह था । किन्तु स्व. टांक साहब जिनका जोहरी निधियो की संयुक्त समितियां गठित कर पूरे वर्ष बाजार स्थित निवास स्थान निर्वाण समारोह के लिए प्रभावशाली कार्यक्रम तैयार किया । समिति की गतिविधियों का केन्द्र बन गया था जिसके लिए समुचित प्रार्थिक राशि भी उपलब्ध तथा जो स्वय इन कार्यक्रम का संचालन करने में नी गई। राजस्थान प्रान्त निर्वाण वर्ष मनाने में अग्रसर थे, ने कहा कि विकलाग भाल्यो को प्रमुख रहा । भगवान् महावीर का 2500वां निर्वाण कृत्रिम अग उपलब्ध कराना तथा उनकी प्रात्म- गमारोह समिति का गठन किया गया जिसमे स्व. निर बनाना भगवान् महावीर के निदानी के श्री राजरपजी टांका मम्मिलित थे । राज्य सरकार अनुकूल होगा। मभायें, जुलम व अन्य प्रायोजन में 10 लार की राशि न कार्य हेतु प्रायटित होंगे जो वर्ष ममाप्ति के बाद विस्मृत हो जायेगे । गरनेगी गोपणामी राशि में में 2 लाग विगलागीगी महावनामापिन पांपासी मी नानिमाय नगरानी गयी कि गाणं होगा जिगर द्वारा विकलांग आयुधांनी नियमित स्वाध्यायी ! 0 श्री टाक सा का समस्त जीवन जैन विद्या के प्रचार- प्रसार एव पीडित मानवता के लिये समर्पित रहा। वे नियमित स्वाध्यायी थे और जैन तत्त्वज्ञान को उन्होने जीवन में उतारा था। उनके लिये सच्चा ज्ञान पुस्तको मे नही, प्राणी मात्र के प्रति समभाव एव दुखियो के प्रति करुणा, सहानुभूति एव सेवाभाव में था। -डॉ० नरेन्द्र भानावत, महामन्त्री श्री अखिल भारतीय जैन विद्वत परिपद्, जयपुर निरन्तर सहायता होती रहेगी। भगवान् महावीर के पद का भार सम्भाला तथा दिनाक 31 माच, या 2500वा निवारण वप अमर हो जावेगा। 1987 तक इस पद को सुशोभित किया। इनकी यह कमजोर वग की सेवा का अभूतपूर्व काय निरन्तर अस्वस्थता के कारण इन्हे अध्यक्ष पद होगा। प्रत सरकार द्वारा उक्त प्रस्तुत प्रस्ताव भार से मुक्त कर परम सरक्षक पद से सम्मानित का विरोध नहीं किया जाना चाहिये परन् यह दिया। जिस पर यह दिवगत होन तक रहे । स्वागत योग्य है । रही समाज द्वारा समरूप श्रीमान् टाक साहव का योगदान समिति के मभिदाय राशि एकत्रित करन को शत पूरी करने विक्लागो के सेवा वाय मे चहुमुखी प्रगति में की बात । स्व टाय न हृढता पूर्वक कहा कि समाज अभूतपूर्व रहा है। जब तक वे स्वस्थ रहे, समिति इस काप म उदारतापूवा सहयाग करेगा। हा म समय समय पर पधार पर मागदर्शन करते थे भी यही। भानन फाना में 2 लाख की राशि तथा विकलागो की समस्यामा को समझकर समाज में एकत्रित हो गई। इस प्रकार से समाधान करत थे। उनकी अभिरुचि इस सस्था भगवान् महावीर विकलाग सहायता समिति के के कार्य मे स्मरणीय रहेगी। इन्होने ममिति को गठन के प्रस्ताव को स्वीकृति कराने तथा सुदृढ करन के लिये निजी योगदान तो दिया ही, क्रियान्विति म स्व टाक साहब का महत्वपूण अन्य प्रयास भी क्येि। योगदान रहा। भगवान् महावीर विकलाग सहायता समिति श्री भगवान् महावीर विक्लाग सहायता के नाम के साथ स्व श्री राजरूपजी टाक तथा समिति की स्थापना 30 मार्च, 1975 में हुई। उनका योगदान सदैव याद रहेगा । उसे भुलाया श्री राजरूपजी टाक इस सस्थापर सदस्यो मे से नहीं जा सकता। थे। माप समिति में प्रारम्भ से ही उपाध्यक्ष पद पर रहे । दिनाक 13 मई, 1984 से इन्होन अध्यक्ष - राजरूपजी -जिन्हें जमाना याद करता रहेगा श्री तेजकरण डंडिया प्रमुख शिक्षाविद् एव समाजसेवी मौत उसकी है जिसका जमाना करे अफसोस । यों तो दुनिया में सभी पाए हैं मरने के लिए ।। स्वर्गीय श्री राजरूपजी टांक ऐसी ही हस्तियो में से एक थे, जिनको जमाना याद करता रहेगा और जिनका अभाव हमेशा खटकता रहेगा। समाजोपयोगी कोन सा ऐसा क्षेत्र है जो उनके प्रभाव से अछूता रहा हो ? शिक्षा, समाज कल्याण, स्काउटिंग, विधवाओ, विकलांगों, मूक बधिरो, नेत्रहीनो की सहायता, बेरोजगारो को रोजगार, साहित्य रचना या शोधकार्य प्रादि सभी मे किसी न किसी रूप मे उनका योगदान रहा। प्राथमिक स्तर से प्रारम्भ होने वाली संस्था चोर बालिका विद्यालय का आज का महाविद्यालयीय विरुप उनके शिक्षा प्रेम, उनकी उदारता और उनकी सूझबूझ का एक जीता जागता उदाहरण है। वे न केवल इस संस्था के मंत्री ही थे अपितु वे ऐसे व्यक्ति थे जो इसके सब कुछ होते हुए भी अपने आपको कुछ नहीं समझते थे। सफलता का श्रेय दूसरों को ही देना उनकी आदत बन गई थी। वे व्यवमाय से रत्नपारखी थे और इसमें चीन प्रद्वितीय मफलता प्राप्त की थी परन्तु मानिनीनां परम करने में भी वे कम नहीं थे । ही कारण है कि दीर बालिका विद्यालय को उत्तम से उत्तम प्रधानाचार्यों और शिक्षको का लाभ सदैव मिलता रहा और यह संस्था निरन्तर फूलती और फलती रही। धुन के पक्के टांक साहब जब किसी काम को करना विचार लेते थे तो उनको न अपने स्वास्थ्य का ध्यान रहता था न वाधामो का भय । जो करना चाहते थे वो कर ही गुजरते थे । एक वार विद्यालय की छात्राओं का एक शिविर आमेर मे लगाया गया था और टांक साहब ने मुझसे यह चाहा था कि मैं शिविराथियो को सम्बोधन करू। संयोग कुछ ऐसा हुआ कि सम्बोधन के समय के बहुत पहले से ही वारिण ने अपना खूब रंग जमा रखा था। टेलीफोन व्यवस्था अस्त व्यस्त हो जाने से टाक साहब मे सम्पर्क नही हो सका और में यह समझ बैठा था कि आमेर जाना स्थगित हो गया होगा परन्तु देखता क्या हूँ कि पाचे घण्टे पहले ही टांक साहब की बार गेट पर मेरा इन्तजार कर रही है। बारिश होने हुए भी कार्यक्रम समय पर हो ही गया । विद्यालय के कार्यप्रमो में गः बार भाग लेने ना मुझे अवसर प्राप्त हुमा । मेरे लिए यह गुग व पापचर्य पा लि. टांक मात्र जमा छाया पनि सम्बन्ध होने हुए भी इन पापंप्रमों में उपम्पिा in . अनुकरणीय दान! राजस्पजी टाक ने दोनो नेत्र मृत्यु पश्चात् केन्द्र को उपहार स्वरूप दान मे देने की कृपा की। यह दान जहा अनुकरणीय है, वही औरो के लिए प्रेरणास्रोत भी है। अन्तिम समय में यह दान समाज सेवा का उत्कृष्ट उदाहरण है। -~महावीर इन्टरनेशनल नेत्र प्रत्यारोपण केन्द्र, जयपुर . रहकर शिक्षक और शिपाथिया को प्रेरणा प्रदान वह उसे बरे और अपने पैरों पर खडी हो" भोर करते थे। अपनी इम आत्मीयता से वे सहज रूप ऐमा हो हुप्रा । मे जन सहयोग भी प्राप्त कर लते थे। समाज के मैक्डो वाल वालिकामी को न वित अपन विद्यालय के लिए अपितु पिसी वेरोजगारी के दुप्चक्र से हटाकर रोजगार सर पर भी मस्था के लिए अपनी सेवाएं देने में उहें देने का श्रेय टाक साहब का प्राप्त है । प्राज इनके प्रमनता होती थी। एक बार उनकी तप्रियत द्वारा बनाए गए ये लोग स्वय में न केवल समय हैं कुछ नरम थी, मैं उनसे मिलन गया था। वाता हो अपितु दूसरे कई लोगो को अपने समान समथ बना वाता में महावीर स्कूल की एक समस्या का जिक देने को एव समाजोपयोगी कार्यों में योगदान देने छिड गया। जहां काम अटका हुआ था, मयोग में की क्षमता रखते हैं। वह व्यक्ति टार माहब का परिचित निक्ला । फिर यह सच है कि श्री राजरूपजी टाक हमारे क्या था टार मार खडे हो गए और मेरे मना वीच मे बाज नहीं रहे परतु उहोंने अपना जीवन करन पर भी उनस जाकर मिन ही लिए और अच्छी तरह जोया है और जो कुछ उहोंने किया ममस्या हल हो गई। है, वह चिरकाल तक उनकी याद ताजा बनाए टार साहब के मन म करुणा की भावना थी। रखेगा । कौन कहता है कि राजरूपजी टाक मर मौभाग्य से वे सम्पन्न भी थे और उदार भी थे। गए, वे तो अमर हो गए। परतु उनकी कोशिश यह रहती थी कि पात्र में मरने वाले मरते हैं लेकिन फना होते नहीं । हीनता की भावना न पनपे, वह सदा पराश्रित न वे हकीकत मे कभी हमसे जुदा होते नहीं। रह। एक बार एक व्यक्ति पिसी विधवा को ऐसे स्व श्री राजरूपजी टाम के प्रति अपनी सहायता दिलान के लिये उनके पास पहुचा। टार प्रादरपूर्ण श्रद्धाजलि अर्पित करते हुए उनकी माहब ने महानुभूति दशति हुए कहा कि "इस दिवगत पात्मा के लिए शाति प्राथना के साथ-- प्रकार को थोडी सी आर्थिक सहायता मे क्ब तक बी-18, राजेन्द्र माग काम चलेगा। उसके लिए कोई काम बता देते हैं, बापू नगर, जयपुर-302 015 46 'वसुधैव कुटुम्बकम्' के के जीवन्त प्रतिमान OM • श्री ज्योतिकुमार कोठारी शब्द। पूज्य चाचा साहिब के जीवन के अन्तिम वर्पो करने मे आनाकानी कर देता था और कह देता में मुझे उनके साथ रहने का गौरव प्राप्त हुआ। था कि क्या सभी का कार्य कर देना जरूरी है ? एक ओर यह मेरा दुर्भाग्य ही था कि उनकी पर इन वाक्यो से उन्हें महती पीड़ा होती थी। असाता, वृद्ध एवं रुग्णावस्था मे ही मुझे उनका जिस प्रकार धन का लोभी व्यक्ति धन कमाने मे सान्निध्य प्राप्त हुआ, वह भी बहुत ही अल्प समय न्याय-अन्याय कृत्याकृत्य का विचार नहीं रखता, मात्र 5 वर्षों के लिए । परन्तु दूसरी ओर मेरा ऐसे ही आप परोपकार के कार्य मे धन, शक्ति यहाँ यह परम सौभाग्य रहा कि इस समय आपकी तक कि शरीर की भी परवाह नहीं करते थे । कई निकटस्थ अतरगता मिली । मेरे प्रति चा'साहव के व्यक्ति उनके इन सद्गुणो का अपव्यवहार भी वात्सल्य के लिये 'पितातुल्य' शब्द शायद पर्याप्त करते थे, उन्हें ये बात विदित भी थी। कहने पर नहीं है । लेकिन उन्हे यदि 'मां' के स्थान पर रखा सदा ये ही कहते-"तुम उनकी वृत्ति मत देखो, जाये तो शायद उचित मूल्यांकन होगा। अपनी दया को देखो।" कितने महान् थे उनके ये आपका सामाजिक, व्यापारिक, राजनैतिक जीवन अत्यन्त गौरवशाली था । परन्तु आपके आपकी सहिष्णुता भी बहुत उच्च स्तर की अंतरग प्राध्यात्मिक जीवन के प्रकाश का ये सब थी। विशाल परिवार और विशालतर शिप्य एक तुच्छातितुच्छ, अणमात्र ही था । परिवार एवं विशालतम सस्था परिवार के साथ श्रापके प्राध्यात्मिक जीवन का वर्णन करने में मैं तो मर्वथा असमर्थ ही हूँ, परन्तु कहे वगैर संयोग सम्बन्ध होने के कारण जीवन में प्रतिनियत रह भी नहीं सकता हूँ। विपम वातावरण बनता रहता था, परन्तु प्राप उन परिस्थितियों में भी सदा अविचल चित्त रहते पृ. प्राचार्य हरिभद्र सूरि ने 'ललित विस्तरा' थे । चाहे कमा भी क्रोध का प्रसंग उपस्थित हो, नामक ग्रन्थ से तीर्थकरो के पूर्व जीवनी की विणे- रमा बताते हुए उन्हे "परोपकार व्यसनी कृतज्ञता आप क्षमामूर्ति ही बने रहते थे । पनमः" बनाया है। आपको भी मानो परोपकार यापके जीवन के कुछ महान् प्रगंगो को में करने का माध्यमन था। में भी मदा छाया की यहां स्मृनिनारयण सरना नाहगा । म मापो गाध रहा था। अपनी क्षुद्रवृत्ति के (1)में रहीं जा पाया, यन को परि- पारण प्रकार उन परोकार के कार्यों को चित, मनोमानी। श्री विनयमागरमीनमेग 47 सादगी एवं सरलता की प्रतिमूर्ति सादगी एव सरलता की प्रतिमूर्ति श्री टाक साहव का व्यक्तित्व बहुमुखी था । चाहे वह सामाजिक क्षेत्र हो अथवा राजनैतिक क्षेत्र, सभी क्षेनों मे उनके व्यक्तित्व की अमिट छाप देखी जा सकती है। सामाजिक क्षेत्र मे चाहे वह नेत्रहीनो से सम्बन्धित रहा हो अथवा शिक्षा का क्षेत्र हो, वीर वालिका विद्यालय की स्थापना तथा उसका वर्तमान स्वरूप उनके जीवन की वुलन्दियो की एक मिसाल है। व्यापार एव उद्योग के क्षेत्र में भी उनका जीवन पूर्णरूप से विकसित हुअा है। -फडरेशन ऑफ राजस्थान ट्रेड एण्ड इण्डस्ट्री, जयपुर परिचय पू चासाब से दिया और उन्होंने मुझे प० क्रीव एव घटे तक वे उस अवस्था म भी वगाल के गांव अजीमगज से यहां बुला लिया । निर्षिकार रहे । अत मे थक कर वह व्यक्ति वापस पहले ही दिन मुझे भोजन के लिए उहोंने एक चला गया। उनके उद्गार थे--"अपनी सामा होटल म भेज दिया, साथ था उनका नाकर जिसन यिक (48 मिनट का समभाव) हो गई।" पैसे अदा किये । लौटकर पान पर उहोन मुभमे वृद्धावस्था शारीरिक व मानसिक श्रम एव पूछा खाना कमा था। मैंने सहज ही जवाव दिया असाता के उदय से प्रापया शरीर जीरा हो चुका कि होटलो में मैं नहीं सा सक्ता हू । वहाँ का था। परतु उसका प्रापको कोई दुख नहीं था। भोजन श्रावक के लिए खाने योग्य नहीं होता। उह सिफ एक ही दुस था कि इस शरीर से धम उनका उत्तर था -"क्ल से तुम मेरे माय खाप्रोगे" की साधना व परोपकार नहीं हो सकता । मापन ऐमा या उनमा वात्सल्य और धर्म प्रेम । जह व चेतन का भेद विज्ञान पर लिया था-- (2) एक बार आप घर पर कई विशिष्ट प्रत सदा कहते थे, शरीर अपना काय करता है, सोगा के साथ किसी महत्त्वपूर्ण विषय पर चर्चा पर प्रात्मा अपना कार्य नहीं करती है । कर रह थे । इतने म कोई अत्यन्त कोघी व्यक्ति ऐसा था पू चा'साहब का दिव्य जीवन । प्रासर प्रापको अपशब्द कहने लगा। हम सब कुछ रहते वि प्रापने शाठ रहने का सकेन किया। - 48
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हाई के तहत आमेर के शिविर में
साताराजी
की धर्मशाला के पीछे
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पिरीक्षण करने जाते हुए श्री
पटव साथ में विधायिका सुश्री
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प्राचार्या डॉ0 शान्ता
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वाल रश्मि सोसाइटी
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राष्ट्रीय सवा योजना
इकाई की छात्राओ को
सम्बोधित करते हुए
श्री टाक राहव ।
महाविद्यालय के
पुररकार वितरण
समारोह में
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श्री टाक साहब
१७ O डॉ. कस्तूरचन्द कासलीवाल अनुकरणीय व्यक्तित्व के धनी श्रद्धय स्व. श्री राजरूपजी टांक देश के उन भेंट हुई, यह तो मुझे याद नहीं है लेकिन 25-30 नर-रत्नों मे से थे जिनका समस्त जीवन देश, वर्षों से उनका मुझे स्नेह प्राप्त होता रहा । समाज एवं मानव मात्र की सेवा मे समर्पित था। जब कभी मीटिंगों मे वे मिलते, वे बड़ी प्रात्मीयता वे अनेक विशेषताओं के पुञ्ज थे। उनकी दृष्टि से बात करते और अपना सहज स्नेह उन्डेल देते मे न कोई छोटा था और न कोई वड़ा। अपने थे। वे अत्यधिक मिलनसार थे। सहज स्नेह को वे सभी पर समान रूप से उन्डेलते वे जयपुर नगर के अंगुलियों पर गिने जाने थे। उनका जीवन यद्यपि अनेक व्यस्ततायो से वाले सम्मानित नागरिक थे। उनकी कीर्ति एवं परिपूर्ण था लेकिन जो भी उनके पास किसी काम उनके प्रति जनसाधारण का प्रादर-भाव सदा को लेकर जाता तो वे उसके लिये सहज सुलभ बन उत्कर्ष को ही प्राप्त होता रहा, उसमें कभी अपकर्ष जाते और उसको सभी प्रकार का सहयोग देने में नही पा सका । वे कितनी ही संस्थानो के वे कभी पीछे नही हटते । संस्थापक, संरक्षक, अध्यक्ष एवं मंत्री रहे और उनका निवास सामाजिक संस्थानों की अपने विशाल व्यक्तित्व से सभी को आगे बढ़ाते मीटिंग्स प्रायोजित करने के लिये प्रमुख स्थान रहे। नगर की एवं नगर के बाहर की 50 से माना जाता था। मुझे भी बीसों वार उनके यहाँ भी अधिक संस्थानों को योगदान देते रहना, उनको प्रायोजित मीटिंगो मे भाग लेने का अवसर प्राप्त जीवन की एक बड़ी भारी विशेषता रही। श्राज होता रहता था। टाक सा. अातिथ्य के प्रेमी थे, वे हमारे बीच में नहीं हैं लेकिन उनके जीवन की इसलिये सभी कार्यकर्तागण उनके यहाँ जाकर उपलब्धियो की इतनी बड़ी सूची है कि प्रागामी उनके नातिथ्य का आनन्द लेते रहते थे। वे बड़े सैकड़ो हजारो वर्षों तक हमे उनका मार्गदगंन प्राप्त मधुरभापी थे । विद्वानो, समाजसेवियो एवं होता रहेगा। कार्यकर्तागों को वे बहुत अधिक पादर देते थे । उस महान व्यक्तित्व की पनी दिवंगत मात्मा यही कारण है उनका निवास ही नहीं, उनका के प्रति में अपनी हार्दिक श्रद्धाञ्जलि समपित जीवन भी नार्वजनिक जीवन बन गया था। करता है तथा उनकी युगों-युगो तक याद बनी पादरणीय दांप. सा. से मेरी प्रथम बार गाव रहे, यही भावना भाता है। 0 अमृत फलग, फिसान मागं, बरषत नगर, जयपुर - सेवामूर्ति श्री राजरूपजी टांक श्री कन्हैयालाल लोढा 1 श्री राजरूप जी सा टाक के जव मैं मवप्रथम जीवन मे से उतरे, उसमे हम स्वय व अन्य सव सम्पर्क मे पाया तो आपकी सहृदयता, सज्जनता, क्से लाभावित हो यह प्रेरणा प्राप मे सहज स्नेहशीलता, सरलता व सेवाभाव से अति प्रभावित ही जग जाती थी। फिर आप उसे मूतरूप देने के हुप्रा । मैंन देखा कि आपका हृदय किसी भी दुसी लिए सक्रिय हो जाते । विचार को प्राचार म को देसवर करुणा से भर जाता था और आप उतारने, कार्यान्वित करने की ऐसी विशेषता विरलो उसका दुख दूर करन के लिए सक्रिय हो जाते थे। मे ही देसी जाती है। माप तन मन से ही नही धन से भी उदारतापूर्वक आपने देखा कि जयपुर महानगर में आने वाले उसकी पूरी सहायता करते थे । सेवा का कोई भी घम वधुनो को आवास व भोजन के लिए बड़ी काय हो उसमे आप अपना महयोग देने को सदा कठिनाई उठानी पड़ती है। इसके लिए अापने एक तत्पर रहते थे। किसी को आजीविका दिलानी हा घमशाला का निर्माण किया परन्तु आपको इतन प्रयया यात्रवृत्ति देनी हा, उपचार कराना हो से सतोप नहीं था, आपकी भावना थी कि यहा कोई प्रयवा अय किसी प्रकार की सहायता की अपेक्षा ऐमा स्थान हो जहा भाग तुक बघुप्रो को प्रावास हो, माप अपना योगदान देने को हर समय तयार के साथ शुद्ध, सात्विक, सादा भोजन सस्ते में मिले रहते थे। सेवाभाव आपके जीवन का अग था । तथा समाज के युवर जो यहाँ कार्यरत हैं उहें माप अपने प्राय सब काम छोडकर पहले सेवा काय सहयोग देकर उनके प्रावास की व्यवस्था की जाय । करते थे । सेवामय स्वभाव होने के कारण ही आप इन कार्यों की पूर्ति के लिए अापने प्रयास प्रारम्भ पचासो सेवाभावी संस्थाना से जुड़े हुए थे । कोई कर दिया था परन्तु आपके अस्वस्थ हो जान से ये भी सेवा का काय सामने आता प्राप यथासम्भव काय पूर्ण नहीं हो सके। अब हम सब का क्तव्य उसमें सहयोग अवश्य देते थे । है कि आपके इन कार्यों को सपन्न करके आपकी मेवाभाव के साथ आप म ज्ञान की जिनासा भावना को कार्यान्वित करें। इससे आपकी दिवगत तथा अध्यात्म की भी बडी रुचि थी। मैं जब भी प्रात्मा को शाति व प्रसनता मिलेगी। यही हमारी मापने पास जाता, पाप किसी न किसी प्रकार के आपके प्रति सच्ची श्रद्धाजलि होगी।। ज्ञान व मध्यात्म चर्चा ऐट दैत थे। वह ज्ञान निज अधिष्ठाता, जैन सिद्धात शिक्षण संस्थान, जयपुर । 50 0 सुश्री सरोज कोचर गुणग्राही व्यक्तित्व को धनी 27 अक्टूबर 1987 ज्ञान पंचमी का दिन । चले गये। मैं सीढ़ियां चढने लगी। लेकिन जैसे ही ज्ञान की आराधना करके बाजार से तीन बजे घर ऊपर पहुँची, शून्य की ओर ताकता कमरा, एकाएक पहुंचने पर देखा कि सभी उदास, वेचैन एवं मौन वे पंक्तियां घूमने लगीं जिन्हें मै ही नहीं सभी चाचा है । सभी की मुख-मुद्रा को समझने में असफल साहव कहते थे और उनके लिए मैं अक्सर ये होने पर मैंने अपने पूजनीय पिता श्री से पूछा- पक्तियां दोहराती थी- अाज यह विषम स्थिति कैसे ? पिता श्री ने प्रत्यु- हो के मायूस तेरे दर से, कोई खाली नहीं गया । त्तर दिया-पूजनीय चाचा सा. नही रहे । मुरादे मिल गयी सबको, कोई खाली नहीं गया । ओह, यह क्या हो गया ? लेकिन आज तो सभी खाली जा रहे हैं । मूक कसे हो गया ? दर्शक एव शोकाकुल, मैं एक तरफ बैठ गयी। हृदय विदीर्ण करने वाला यह समाचार उनकी यात्म शांति हेतु मन ही मन में नमस्कार यह वज्रपात ! मत्र स्मरण कर रही थी कि एकाएक विचार पाया नहीं-नही, यह नही हो सकता । मेरे द्वारा इस कि चाचा मा. के पास से बाज नव वाली कहाँ प्रकार चीमने पर अश्रुपूरित नेत्रों से पिता श्री ने जा रहे हैं, उनके पार्थिव शरीर के हो तो दर्शन पुन: कहा-भानावत दीदी का फोन पाया था। नहीं कर पा रहे है। उन्होंने तो हमें जीवन को मवाद की पुष्टि के रूप में लगा कि अादरणीया महान् वनाने हेतु बहुत ज्ञान प्रदान किया है। ये तो प्रानार्या जी डॉ. भानावत दीदी का कथन असत्य हमारे जीवन के प्रेरणा स्रोत रहे हैं । यद्यपि नाचा नही हो सकता। किंफर्तव्यविमूढ मुझे पिता श्री सा. जन्म ने जन थे किन्तु उनके कार्य, उन पुश्य वाचा ना. के अंतिम दर्शनार्थ पाटोरिक्शा मे उपदेश और उनका व्यवहार गिसो मोगांता गे ने गर्थे । लेकिन तब तक सब कुछ ममाप्त । अंतिम नहीं बचा था । जो भी उनके द्वार पर प्राया उसने रन भी नहीं कर सकी । पिता श्री श्मशान भूमि ही उनका इने, और प्राशीचांद पापा भी पोर अग्रगर महाप्रयाण यात्रा में शामिन्न होने राजपूनाना में वितमित प्रदेश में मा, मान्यता 51 सेवामय जीवन भाई राजस्पनी के साथ का सम्वघ 50 साल से भी पुराना है। उहोंने सदा ही मुझे बडे भाई की तरह माना। उनका पूरा जीवन सेवा- मय रहा । शिक्षा के क्षेत्र में विद्यालय चलाया, अपगों के लिए पैर देने का केद्र बनाया, जैन समाज की सेवा तो को हो, उहोंने सभी को सेवा को । गो-सेवा के क्षेत्र में भी आगे रहे । राजस्थान गो-सेवा सघ के मैनेजिंग ट्रस्टी रहे । प्रकाल कार्यों में सहायता दी । गाधी, विनोवा के सर्वोदय कार्यों में उनको सदा ही रुचि रही। -राधाकृष्ण बजाज अखिल भारत कृषि-गो सेवा संघ थी कि एक घर मे दो पलम नहीं चलनी चाहिए। उतना ही पाय में तल्लीन देखकर मैंने कहा- अर्थात् रथ के दोना पहिये रूपी स्त्री पुरुष शिथित चाचा सा आपका स्वास्थ्य ठीक नहीं है प्रत नहीं होने चाहिये । पुरुप प्रधान समाज में मान आपको काय नहीं करके विधाम करना चाहिए। पुरुष ही शिक्षित हो । समाज की इस प्रकार को आपने तत्काल कहा-उत्तम काम करते रहना विषम एव दयनीय स्थिति मे परिवतन लाने हेतु चाहिये । काल की गति अत्यन्त विचित्र नारी शिक्षा का अलख जगाने के लिए प्रापने है। इसीलिए भगवान महावीर ने कहा था- श्री वीर बालिका शिक्षण संस्थान की स्थापना ही 'समय गोमय मा पमायए' उत्तम चाय के नहीं की, आजीवन मत्री पद पर आसीन रह कर लिए क्षण मान का भी प्रमाद नहीं करना चाहिए। पितृवत् दुलारिता, स्नेह एवं आत्मीयता से इस कहो कसे आए?--यह पूछने पर उनके समक्ष मेरे सस्था को वट वृक्ष का रूप प्रदान किया । पू चाचा द्वारा शिविर को सम्पूण योजना प्रस्तुत करने पर सा तो नारी शिक्षा के लिए नीव के पत्थर थे, आपने कहा-कार्य उत्तम है, लडकियो की भली सत्य निष्ठ कमयागी थे, गुणग्राही व्यक्तित्व के धनी भांति देखभाल करना, कोई भी लड़की वस्त्रो के थे, जन हितपी, सदावहार व्यक्ति, अमूल्य रत्न थे। प्रभाव में ठह से नहीं ठिठुरे, इसके लिए मैं वस्त, क्नि किन गुरणो को माला में पिरोऊ घूमने लगे स्वेटर एव रजाइयो का प्रबन्ध कर दू । कितने घटना चक्र चाहिए। उत्तम व्यवस्था हेतु यदि शिविर में अधिक पैसा खर्च होगा तो हम प्रवच कर देंगे । खाना सन् 1983 में राष्ट्रीय सेवा योजना इकाई उत्तम होना चाहिए। मैं स्वय शिविर पाकर का दस दिवसीय विशेष शिविर खेडी गाव मे देखू गा। निधारित समय पर शिविर प्रारम्भ होने मायाजित किया गया। मुझ पर आपका वरदहस्त पर देखा कि क्थनी-करनी मै अन्तर नहीं करने प्रापके प्रथम दर्शन से ही रहा, परिणामस्वरूप वाले परम पूज्य चाचा सा अत्यधिक अस्वस्य होते शिविर सम्बधी सम्पूण योजना से अवगत कराने हुए भी मात्र शिविर मे आये ही नहीं अपितु कापी एव मागदशन प्राप्ति हेतु में प्रापके निवास स्थान समय तक रुक कर हम सभी के जीवन के विविध पर गयी। वहाँ मापको मत्यधिक मस्वस्थ एव क्षेत्रो में विकास करने हेतु माग प्रशस्त क्यिा । 52 ~ पया सजाना ? वैभव एवं विलासिता में पले आपके जीवन, हम भविकों को चाहिये कि आपके द्वारा दिये गये व्यक्तित्व एवं कृतित्व को समझने-जानने की जिज्ञासा वचनों के अनुसार अपूर्ण कार्यों को पूर्ण कर सच्ची से आपसे मैंने एक बार पूछा कि भौतिकता की श्रद्धाञ्जलि अर्पित करें। पूज्य चाचा सा. अमर हो इस चकाचौध में, वैभव एवं विलासिता में पलने गये । उन्होने मानव कल्याण के लिए जीवन के पर भी आपके जीवन का प्रमुख ध्येय मानव सेवा विविध क्षेत्रों में जो महान् कार्य किये, वे सदैव चिर- किस प्रकार हुअा ? मुस्करा कर आपने प्रत्युत्तर स्मरणीय रहेगे । जिन-जिन संस्थानो से उनका दिया-कि इस शरीर रूपी मिट्टी को मिट्टी से सम्बन्ध रहा-उन सभी संस्थानों में समाज के इस जीवन को हीरे-जवाहारात से सभी भाई-वहिन अपना सहयोग प्रदान करते रहे, नहीं सजाकर सद्गुणों से सजाना है। जिससे ये संस्थाये पल्लवित, पुष्पति होती हुई निर्वाध गति से कार्य करें, यही उनके प्रति सच्ची वास्तव में विराट् व्यक्तित्व के धनी श्रद्धांजलि होगी। हृदय से उस महान् प्रात्मा के प्रापने सामान्य व्यक्ति को भी अपने प्यार प्रति हम सभी के श्रद्धा सुमन अर्पित है । पुनश्च- से प्राणवान बनाया। स्नेह एवं अपनापन देकर दुःपी तथा संकटग्रस्त व्यक्तियों की मदद की। स्तुत्य है, पाप साध्य है, जो अनाम है, कार्यक्षेत्र में सबको अपने साथ लेकर चलने में आप गति है, गणतव्य है, पाप ही विराम है। पानन्द की अनुभूति करते । सेवा के क्षेत्र में अपने सृष्टा की शक्ति है या महाप्राण है, परामे, बड़े-छोटे किसी में भी भेदभाव नही रखते । नीव के पत्थर आपको शत-शत प्रणाम है ।। निरन्तर निष्काम भाव-सरल हृदय से सबकी सेवर --प्राध्यापिका, संस्कृत विभाग करने वाले बाप हमारे जीवन के प्रेरणा स्त्रोत है। श्री वीर बालिका महाविद्यालय, जयपुर जयपुर-रत्न प्यापारी समाज में उनको सेवा यहत उल्लेखनीय रहो, उन्होंने फितना धम किया, जयपुर बाजार को एक प्रत्यात नाम दिया। चाचा साहय "जयपुर-रत्न" के रस में हमेशा-हमेशा के लिये अमर रहेगे, माग समाज व परिवार उन्हें रमेगा-हमेगा परिपे यार करता रहेगा। ---विजय हायमण्ड्स, यम्बई 0 श्री सिद्धराज ढड्ढा रवाधीनता सेनानी राजरूप टांक श्री राजरूपजी टाफ का व्यक्तित्व इतना बहु वीर वालिया विद्यालय के साथ साथ जिस मुमी था कि उसके क्सि पहलू का महत्त्व दिया दूसरे काम में शुरू के दिनो मे श्री राजरूपजी का जाय और किससे प्रारम्भ किया जाय, यह तय योगदान रहा, वह था जयपुर राज्य प्रजामण्डल । करना मुश्किल है । उनका मेरा सम्बध तो श्री राजरूपजी शुरू से ही गाधीजी के विचारों सामाजिक और सावजनिक कार्यों से परे, व्यक्तिगत स प्रभावित थे। सादी का उनका प्रत था हो । मैत्री का भी था। दोनो एक ही शहर के रहने प्रजा मण्डल के प्रारम्भिर दिनो मे ही उनका वाले, एक ही समाज के अग! लेकिन हम लोगा सम्पक स्व प हीरालालजी शास्त्री से हुआ। ने भी अपने समाज का न मवुचित दृष्टि से श्री राजस्पजी प्रजा मण्डल के एक मर समयक देखा न समझा। समय शक्ति, साधन आदि की और सेवा थे। सक्ट की हर घडी म उनकी दृष्टि से व्यक्ति को अपने काम की मर्यादा बाधनी मदद तैयार रहती थी। प्रजामण्डल जैसी राज पडती है, यह बात अलग है लेकिन श्री राजरूपजी नीतिक सस्था की गतिविधि के साथ जुडना सहज की दृष्टि किसी दायरे से बधी हुई नही थी। का काम तो था ही पर उसकी कमी श्री राजरूप बिना किसी भेदभाव के उनकी उदारता का स्पश जी मे नही थी। इस समय मुझे यह तो स्मरण हर क्षेत्र को होता था। नहीं है कि जयपुर राज्य प्रजामण्डल की ओर से फिर भी किसी एक सस्था के साथ उनका जो मत्याग्रह हुमा था, उसमे वे शरीप हुए थे या बहुत घनिष्ठ सम्बध था तो वह वीर बालिका नहीं । पर वे यरावर उसकी गतिविधियो से जुड़े विद्यालय । 60 वर्ष से ऊपर हुए तव वीर वालिका रहे, यह स्पष्ट है। वर्षों तक वे प्रजामण्डल के शिक्षण मस्थान की स्थापना हुई थी और श्री योपाध्यक्ष भी रह ।। राजरूपजी का मम्बध इम काम से शुरू से ही प हीरालालजी शास्त्री को अय अनेक रहा और वह अन तर कायम रहा । यह कहना नौजवाना की तरह हम लोग भी अपना गुरु मुश्किल है कि अगर श्री राजरूपजी की प्रेरणा, माग दशक मानते थे। राष्ट्र निर्माण की दृष्टि से उनका प्रभित्रम, उनकी मदद और उनका समर्थन शास्त्रीजी ने जव वनस्थली का काम शुरू किया प्राप्त न हुआ होता तो क्या इस शिक्षण संस्थान तो उसम भी श्री राजस्पजी का सक्रिय सहयोग का स्वरूप आज जमा होता? मिलता रहा। वास्तव में ऐसी कोई सावजनिक और 54 - वयोवृद्ध समाजसेवी - आप जयपुर के वयोवृद्ध समाजसेवी, देशभक्त, प्रमुख जौहरी व कुटीर उद्योगपति थे। आपने करीव एक हजार लोगों को रत्न व्यवसाय में दक्ष कर स्वावलम्वी बनाया। जयपुर राज्य की प्रथम विधान सभा के आप सदस्य बने व नगर परिषद् के वर्षों तक सदस्य रहे । युवावस्था में ही आप प्रजामण्डल में आ गये और कई वो तक उसके कोषाध्यक्ष रहे। -जयपुर चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एण्ड इण्डस्ट्री हैं प्रवृत्ति जयपुर मे शायद नही थी जिसके साथ स्मरण करते हैं । दुःखियो के प्रति करुणा सम्पर्क में आने पर उन्होने उसकी मदद न की श्री राजरूपजी का एक विशेष गुण था। किसी हो। जयपुर का अनाथालय, नेत्रहीन कल्याण भी पीड़ित, दुःखी, विकलाग व्यक्ति को देखकर संघ, आदि प्रवृत्तियों को उन्होंने प्रोत्साहन दिया उनका दिल पसीज जाता था। राजस्थान में और उनके संचालन में मदद दी। इसी प्रकार अकाल, अग्निकांड आदि से पीड़ित लोगो की भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति के सहायता के लिए जो राजस्थान रिलीफ सोसायटी गंगापक सदस्य और अध्यक्ष रहे । बनी, उसकी स्थापना में भी उनका पूरा योगदान व्यवसाय से वे जौहरी थे और उस क्षेत्र में था । वे उसके मंत्री रहे । भी वे ग्रगरणी रहे । इस क्षेत्र में उनकी दिलचस्पी मार्वजनिक कार्यों और मम्बन्धो की बात मे जवान व्यापार तक सीमित नहीं रही। रत्नो के अलग, उनके जीवन का एक प्राकर्षक पहलू था पारगी नो वे थे ही, रत्नो के शास्त्र का अध्ययन उनके व्यक्तिगत सम्बन्ध । वे बहुत मुश-मिजाज और जानकारी भी उनकी बहुत विस्तृत तथा और विनोदी थे। उनके पास प्राकर कोई भी, गरनी पी । रत्नों को सम्बन्ध में लिपी हुई उनकी याहे छोटा हो या बदा गा उनकी हम-उर, मुह पुग्नमा विदेशो में भी दिलनस्पी में नाव पटी फुलाये नहीं रह मरते थे। वे गुद्र हमले में जोर जानी : और एक मंदनं गन्य के तौर पर उनका दूगरो को हमाते थे । व्यक्तिगत सम्बन्धों में बहुत "मानहाना क्षेत्र में उनका सबसे बड़ा मधुर, दुग-दर में गाग प्राने वाले किया योगानमा निनोन गन में मंगलो कल्य उन मिल पा । ऐगे पनि मनान मोरान कमी जोग प्रौर च्यापार प्रौर मिनामा अनुभव जिनगी घा, ये परे afa और पग लिया। पपुर के माक्षी होगे। ऐगे मन लोगो को उनी नि योगा में भार मुर देनीगी। यदि के RE नगा 53 श्रीमती पुष्पलता जैन . शुभ्र व्यक्तित्व : निर्मल मन 'घय जन्म जगती तल तासू, जागृत हो उठती। इस प्रकार विनम्रता उनकी परहित सव निछावर जासू।' वाणी मे टपरती थी। उनकी जैसी देशभक्ति, विश्व की प्रसिद्ध रत्न नगरी जयपुर के प्रसिद्ध उना सा अनुपम त्याग, उनी विनम्रता, जाने माने प्रतिष्ठित रत्न पारखियो में महकते उनरी सी मृदुनता मिलना दुनम है। उन्हान मुस्कराते पूजनीय चाचा साहब ने परहित को मानव की पीडा यो सुगा और उमयी सहायता जीवन पा लक्ष्य बनाया। उन्होने दीन दु सियो की। उनका हृदय कोमल य नवनीत समान स्वच्छ के जीवन मे सरसता का सचार किया, लोक था। उनमें दयाद्रता थी। पिसी में सक्ट को भावना को पहचाना और स्त्री शिक्षा जगत् में एक देसर उनरे हृदय में करणा उत्पन्न हो जाती थी। महत्त्वपूर्ण काय पिया जो था -श्री वीर वालिका सहानुभूति उनम फूट-यूट कर भरी हुई थी। विद्यालय की स्थापना । वास्तव मे सतत साधना पाहत पीडिता तया दीन दु पियो की सहायता सफलता को जम देती है, यही कारण है कि करने में उहें मानद पाता था । पिसी को पीडित चाचा साहब श्री राजरूपजी टावे अथक प्रयासो करना, पिसी के प्रति अत्याचार करना, पिसी के से ग्राज श्री वीर बालिका सस्थान में लगभग 3500 साथ अयाय परना, भूठ बोलना, विश्वासघात छात्राएं अध्ययनरत हैं। आपका हार्दिक सहयोग करना, अपने क्तव्य से मुग मोडना मादि दुगुणा हमेशा इस सस्था को मिलता रहा जिसके परिणाम से वे बिल्कुल मुक्त थे । वे परोपरार, सेवा, पहिसा, स्वरूप यह सस्था अपने चरम उत्कप तक पहुंची। सहनशीलता, यायप्रियता, सत्यवादिता, योमलता, आज उनके आदश, उनके सिद्धात, मधुर हृदयो के विनम्रता, सहानुभूति प्रादि सद्गुणा पी सान थे। उच्चासनो पर सुशोभित होगे। अाज उनकी स्मृति वे स्वय एक मशाल थे जिहोन जलकर दूसरो को मात्र से हमारा मस्तक श्रद्धावनत हो जाता है। प्रकाशित दिया। उनका व्यक्तित्व महान् था। वे सादगी की इस प्रकार उहान पीडित, निराश एव मूर्ति थे । सफेद कुर्ता, सफेद टोपी और सफेद धोनी अधकार मग्न मानवता के मानस को दैदीप्यमान उनके वस्त्र थे जो उनके शुभ्र व्यक्तित्व और निमल कर सेवा, त्याग, दान एव सहयोग का अनूठा मन का परिचायक था। उनके चेहरे पर एक तेज, उदाहरण प्रस्तुत किया जिससे जा-जन के मानस माधुर्य और गम्भीरता थी जो वरवस व्यनि को म मानवीय संवेदना, सहानुभूति व सद्भावना अपनी ओर आकर्षित कर लेती थी। जब कभी मैं जागृत हो उठी। उनसे मिली, वे हमेशा मधुर मुस्कराहट पे साथ आज वे अपने जीवन के प्रादर्श का जो प्रकाश पूछने-"क्या बेटा। कोई दिक्कत तो नही और स्तम्भ छोड गये हैं वह हमे सदव कल्याण का काय ठीक चल रहा है ?" मैं हृदय से गद्गद् हो माग प्रदर्शित करता रहेगा। उठती और मन मे उनके प्रति एक श्रद्धा की किरण अध्यापिका, श्री वीर बालिका विद्यालय । 56 विरल विभूति - नहीं देते ? यूं तो दुनिया मे हर प्राणी जन्म लेता है, जीवन झुकता है वही तो पाता है । पर्वत अकड़ होकर जीता है और मौत की गोद में समा जाता है किन्तु ऊपर रहता है, उसे झरना तालाब नहीं बना सकता कुछ ऐसी विरल विभूतियाँ होती है जो मरने के किन्तु जो खाई बनकर रहता है उसे वह जल ने बाद भी सबकी स्मृति मे आती है । सराबोर करके तालाव बना देता है। स्मृति पथ मे उदारमना, विशालहृदयी श्री राजरूप जी टांक आ रही है वह प्यासी तश्तरी जो घड़े से कहती है- एक ऐसे उच्चतम व्यक्तित्व के धनी थे, जिनका भैया आप सबको अपना निर्मल जल देकर संतुष्ट व्यक्तित्व न केवल जयपुर के लोगों में ही अपितु करते है, उनकी प्यास बुझाते हैं, जबकि मैं आपके अनेक के दिलों में छाया हुआ था। निकट में रहती हूं तब भी मुझे आप विल्कुल जल हालांकि विभिन्न विद्वानों एवं लेखकों ने जिनकी यशोगाथा गाई होगी, मुझे इतना गाढ परिचय भी वहिन तश्तरी (Dish) की बात सुनकर भाई नहीं है किन्तु जयपुर प्रवास के स्वल्प परिचय की मधुर स्मृतियाँ पथ आते ही लेखनी रुक न घड़ा बोला-बहिन मैं तो सबको देता हूं, जी भर के पाई। देता हूं किन्तु मुझे भी इस बात का दुःख है कि तू प्यासी रह जाती है, चूकि तू मेरे सिर के ऊपर बात उस समय की है जब हम आठों साध्वियों जो रहती है। वता, मैं तेरी प्यास कैसे बुझा सकता की वर्षी तप की तपस्या चल रही थी। पारणा हेतु हूं हम हस्तिनापुर की ओर प्रस्थान कर रही थी, जब हां, तो यह एक रूपक हमें दिग्दर्शन कराता है गुलाबी शहर (जयपुर) में प्रविष्ट हुए, सोच रहे कि झुके बिना जल तो क्या कुछ भी नहीं मिलता, कि यहाँ कितने मन्दिर होगे?उपाश्रय कहाँ होगा? उमी प्रकार का विनम्र जीवन था हमारे श्रद्धे यरत्न कितना दूर ? इत्तफाक से उसी समय गाडी में श्री राजरूपजी टाक का, जो भौतिक समृद्धि में सभी बैठकर वे कही जा रहे थे, दृष्टिपात होते ही वे नीचे प्रकार से सम्पन्न होते हुए भी गुल्म वृक्ष की भांनि उतरे, सविनय पूछा-आप कहाँ पधार रही है ? हमने झुके हुए विनम्र रहते थे । साधु-सतो के प्रति अपार कहा, यात्मानन्द भवन । बोले, अच्छा, फिर सही भक्ति थी, उनके जीवन में चाहे किमी गच्छ या मार्ग-दर्शन कराके आप चले गये, तब तक हम उनके मम्प्रदाय के हों, गुग्णानुराग मे वे नतमस्तक हो जाने नाम से भी परिचित नही थे । किन्तु उनकी आकृति थे, उनकी आँखे नम जाती थी। धर्ममय जिनका ने प्रतीत हुया ये कोई जौहरी बाजार के जौहरी है। जीवन था, जो मात्र याहना नहीं जानते, जीवन में उस समय गमता मूर्ति पूज्य विचक्षरण श्री जी म. सा. अपनाते भी थे। मीलिए नो नंको मायामिक अस्वस्थ थी। अतः हम १५ दिन रुके एवं प्रतिदिन बन्धुग्रो को उन्होंने ग्राजीविका में लगा दिया था। नवायारी में उनके दर्शनार्थ जाया करते थे। इस ग्राज वो हमारे बीच नहीं होने हा भी उनसे गगी यीन याप कई बार हमारे पास पाये । की गुवान ने हमे ऊर्जा प्राप्त होती: । इन श्विगा की भटिकता, गरलता, उदारता, करपाता, प्रात्मा को शान्ति प्राप्त ही प्रो. श्री मनोनित वामयना आदि गुणों को पाया । हमने उन गुणो का विकाग ने ये पानिमा गुमो मे, बायको नदीक से देखा, कि उनगा जीवन माग्यन गुमो आमीना बने, नी ! पाः मोमानिया, अर्थात् नन विनम्न थे । जो ~याची प्रमित गुन्गा श्री ? 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0 श्रीमती पुण्यवती जैन यादों के घेरे मे जीवन एक यात्रा है । इस याना मे कितने ही चाचा साहब अपनी मोहनी मुस्कान के साथ कार लोग मिलते हैं, कुछ याद नहीं रहता, कितु से उतर रहे थे, पास आकर कहने लगे, "कैसी हो, कुछ असाधारण व्यक्तित्व ऐसे भी हाते कोई तकलीफ तो नही ? मेरे लायक कोई काय हैं, जो स्मृति पटल पर अपनी अमिट छवि हो तो बताना।" अक्ति कर देते है। पूज्य श्री चाचा साहब भी इसके पश्चात् जब भी कही भी देखते, चाहे ऐसे ही असाधारण व्यक्तित्व के धनी थे । विद्यालय स्कूल मे या रास्ते में सदव पूछते "कोई तकलीफ की प्रगति एव उनति आप ही के महान् प्रयासो तो नहीं, ठीक हो।" उनका अपनापन मुझे सदव का श्री फल है। इस विद्यालय के प्रत्येक सदस्य हिम्मत बधाता व मुझे ऐसा महसूस होता कि इस के साथ उनका ऐसा अपनत्व था, जिसे भुलाये ससार में मरा कोई अपना है, जिसे मेरे दुख दद नहीं भुलाया जा सकता। का अहसास है। मन का मारा बोझ उनकी मधुर घटना दस वप पुरानी है। मई 1977 म वाणी से न जाने कहा चला जाता । जब मेरे पति का हृदय गति रुस जाने से स्वगवास आप मे एक नही अनेक महान् गुण थे। मैं हो गया था। मैं अचानक अथाह वेदना के सागर उनका अपनी अल्प बुद्धि से वणन नहीं कर मे डूब गई। अपने जीवन व बच्चो के जीवन मक्ती। उनकी महानतापो को पाना मेरे लिए निर्वाह का गहन दायित्व था। जीवन अधकार असम्भव है। चाचा साहब के मधुर वचनो को पूण व एकाकी हो गया था। ऐसे समय मे पूज्य एव आशीर्वाद को यह विद्यालय क्या यहा का चाचा साहब की सवेदना मेरे लिए वरदान सिद्ध कोई सदस्य नहीं भुला सकता। उनके सहज, निमल एव पवित्र जीवन की पावन ज्योति हम 12 जुलाई 1977 की बात है। मैं अपने अपने अदर प्रज्वलित करने का प्रयास करें। प्रतीत के सयालो में खोई हुई, भारी मन से विद्या- यही हार्दिक श्रद्धाजलि उस महान् पुरुष के लय की ओर बढ़ रही थी। काल के कुचक्र ने लिए होगी। मेरे जीवन का स्वरूप, लभ्य और उद्देश्य ही बदल "जब तू पाया जगत मे, दिया था। मन में एक झझावात सा उठ रहा था हंसा, तू रोया। वि अचानक एक कार के पहिये चरमराते हुए ऐसी करनी कर चला, मेरे पास प्रारर रुके । विचार तद्रा भग हुई, जसे तू हंसा, जग रोया ।" ही सिर उठाकर देखा तो स्तब्ध रह गई। सामने - अध्यापिका, वीर बालिका विद्यालय जग 58 जाए ? 'वन्दनीय है वह दीपक जो, स्वयं बुझने से लिया । कितना कठिन कार्य था, किन्तु समाज-हित पहले दूसरे दीपक को ज्योतिर्मय कर दे ।' के लिए वे किसी कार्य को कठिन नहीं मानते थे। समाज के अनगिनत दीपों को ज्योतिर्मय करने महाविद्यालय के लिए सुविधाएँ जुटाने के प्रयत्नों वाले व्यक्तित्व के धनी, कुशाग्रबुद्धि, सहृदय, समाज की एक लम्बी दास्तान है, किन्तु उन्होने जो सेवी तथा भारतीयता के पोपक श्रद्धेय राजरूपजी निश्चय किया, उसे कर दिखाया । श्री वीर वालिका उ० मा० विद्यालय तथा टाक के विषय में कुछ लिखना यद्यपि मेरी अकिंचन लेखनी से सम्भव नही है। फिर भी उनके अपार महाविद्यालय उनकी लगन व परिश्रम का वट-वृक्ष स्नेह तथा आशीर्वाद ने मुझे कुछ लिखने की प्रेरणा है, जो निरन्तर समाज की नेवा करता हुआ दी है, इस लेखन-लोभ का संवरण कैसे किया उन्नति की ओर अग्रसर है । यहाँ के सभी कार्यकर्ता टांक साहिव के स्वप्नो को साकार करने में अपने को जी-जान से लगा कर धन्य मान रहे हैं । धन्य श्रद्धय टाक साहिब के सान्निध्य में मुझे पांच वर्ष कार्य करने का अवसर मिला । इस अतराल में है वह महान् अात्मा जो अपने त्याग, श्रम व लगन से इस राष्ट्र को पुष्पित, पल्लवित व समृद्ध कर मैंने पाया कि टाक साहिब के सम्पर्क में जो भी अनन्त मे विलीन हुए । अन्त मे श्रद्धा सुमन के रूप मे आया वह उनसे प्रभावित हुए विना न रहा । अपने प्रस्तुत है कुछ पंक्तियाँ अधीनस्थ कार्यकर्तामो तथा छात्रायो की प्रसन्नता के लिए कुछ भी करना उन्हें प्रिय था। वे किसी को असन्तुष्ट नहीं देखना चाहते थे। उनके व्यक्तित्व मे न दर्प था और न यात्मश्लाघा कराने का भाव । महामानव वे तो ऐसे संत थे जो समाज को ही सब कुछ देकर, इसे उन्नत बनाना चाहते थे । मुझे याद आ रहा है, कक्षा 11 की छात्राओं का विदाई समारोह । कक्षा हे परम पूज्य ! 11 की छात्राओं को वे भी आशीर्वाद देने पधारे निष्ठा, कर्मठता कार्यकुशलता के कमनीय, थे। विदाई कार्यक्रम के अन्त में छात्राएँ खूब रो कलेवर, मे शोभित तन-मन, रही थी। उन्हें रोते देखकर मैंने कहा-अब तो तुम निस्पृह ! लोग बढी कक्षा में जानोगी, तुम्हे इस अवसर पर नीतिन, निखिलजन प्रिय, मनहर शिशुजन, 'गुगी होनी चाहिए, रो क्यो रही हो ? वे बोली माया-ममता मे परे, नम्र अनि मन्त्र दीदी !हम यहाँ से नहीं जाना चाहते । मैने सहज साक्षी है वटुको के वृन्द, भाव में टालने के लिए कहा-तो टाक माहब से जिन्हें, Tht कि वे तुम्हारे लिए यही कॉलेज खुलवा दें । गुरु की गरिमा का ज्ञान, मका लेवे नादर गोल । मेरा कहना था कि छात्राएं टाक नाहिब के पान पाप थे भारत के लान, बन गई, पांव पटक-पटक कर बडे स्नेहिल भाव में कीजिए न्यीयन प्रजा मान । नगी-जमार लिए वहीं कॉलेज होना चाहिए, यही प्रार्थना हमार्ग, 7 गा में नही जागे । छात्रायो के आंसू व यहीं यानना मानी। विधान प्रति ग्रमार नेह दंगकर सरल हम -श्रीमती इन्दरजीत कौर प्रोवेगय जीवार माहित ने तुरन्त निर्णय दे दिया व अगले कीमत में मिस ने महाविद्यालय माप ले मनापीट टांक साहिब 59 मनुज संस्कृति मे कभी जन्मते ऐसे रत्न-दिवाकर है . श्रीमती सुलक्षणा जैन गजस्थान की भूमि ने कुछ ऐमो विभूतियो तो पापो छुना तप नहीं था। सादा जीवन, को जाम दिया जिहान परहित को अपने जीवन उच्च विचार आपके जीवन का लक्ष्य था। प्राज का लक्ष्य बनाया तथा परहित पर मवंम्व के इम भौतिर युग में जहा नैतिकता का पतन हो यौछावर कर दीन दु सियों के जीवन में मरमता चुवा है धर्म वधन ढीले हो गये हैं, मदाचारमा या सचार किया। स्वर्गीय श्रीमान् राजरूप जी स्थान पदाचार ने ले लिया है, तब भी प्रापका टार का नाम इनम अग्रगण्य है। इनका जम जीवन प्राध्यात्मियता से प्रोतप्रोत था। प्रात्मबल चिडावा म हुमा लेकिन नाना में यहा गोद पाने के ही प्रापरी शक्ति थी। कारण उनका जीवन जयपुर म ही व्यतीत हुग्रा जब उद्यम और धन या सगम होता है, तो परन्तु उनका जन्म स्थान से लगाव जीवनपर्यत समृद्धि स्वत पाव छुने लगती है, लेकिन आप बना रहा। मुझे याद है जब हम लोग कायम उमरी चकाचौंध से भी विरक्त रहे। करोडो की हतु छात्रामो की एक बस के साथ भुन्भन गये तो मम्पत्ति के मध्य रइते हुये भी मापका जीवन त्याग पाप भी हमार साय थे । वही से आप हम सर को और तपस्या का था। उस धन को मापने कभी अपनी जन्मभूमि चिढावा ले गये, जहा प्रापने ही ऐश्व का साधन नहीं बनने दिया अपितु अनायो वह स्थान दिखाया जहा आपका जम हुप्रा था नाय और अधों के नेत्र बनबर उसका प्रयोग किया और अपने बचपन में घटित कुछ घटनायें सुनाने-2 क्याति प्रापवे हृदय में क्या वा स्रोत था, सहानु- आप पात्म विभोर हो गय । भूति थो, त्याग था, जिसका मूर्तरूप प्रान हमार प्रापका कोमल हृदय नवनीत समा सामने है-~-अनाथाश्रम और नेग्रहीन विद्यालय । जो दयाद्रता से पूर्ण था। किसी को मक्ट में देते जयपुर की अनेको सम्मान के आप अध्यक्ष थे। हो आपके हृदय मे करुणा का भाव उत्पन्न हो आपा अध्यक्ष होना भी उस सस्या के लिये कितने जाता था। प्रात-पीडिता तथा दीन दुखियों पी गौरव की बात थी। सहायता करने में प्रापको भनाई मानद का निज इष्ट साधन के लिये प्रामास होता था। बाप तो आप से कोसा दूर ससार धारा में बहे । था, कठोरता से व्यवहार करना तो याप जानते पर नीर से नारज सदृश उसमे, ही नहीं थे। विनय की सापाद मूर्ति थे, अहवार ने अलिप्त बने रहे । था 60 किये। । अपने योवन काल में आप भी गांधीजी के क्योंकि प्रोसवाल परिवार की समृद्ध परम्परायें तो राष्ट्रीय विचारो से प्रभावित हुये। देश प्रेम का इसकी स्वीकृति ही नहीं देती। यह उनके खुले भाव जागृत हुआ और स्वतन्त्रता संग्राम में कूद मानस का परिचायक था कि जिसके कारण किमी पड़े। प्रजामण्डल की स्थापना की, जिसके माध्यम को भी उनसे बाते करने में संकोच नहीं होता था। मे आपने राजस्थान में अनेक प्रशंसनीय कार्य ऐसे ही मुझे याद है, जब हमारी पूर्व प्रधानाध्यापिका श्रीमती प्रकाशवती सिन्हा अनु- उस समय राजस्थान में नारी शिक्षा का पस्थित थीं, आप विद्यालय में प्राये और श्रीमती अभाव था, गिने-चुने विद्यालयों में ही इस शिक्षा उमिला जी को ऑफिस में बुलाया । वह पाकर का कुछ प्रवन्ध था। आपने नारी शिक्षा के लिये आपके पास की कुर्सी पर बैठ गई तो आपने कहा- विद्यालय की स्थापना की जहां अविद्या के अधकार उमिला जी ! पाप प्रधानाध्यापिका जी की कुर्सी में पड़ी हुई नारी को ज्ञान के आलोक मे लाकर पर क्यो नहीं बैठ रही क्योकि उनकी अनुपस्थिति मे खडा किया, । यह वही प्राइमरी विद्यालय है जो पाप ही उनका कार्य कर रही है। तो उमिला जी याज कालेज का रूप धारण कर चुका है। इस ने कहा-भाई साहिब, वह कुर्सी हमे कहा मिली है- स्थिति तक पहुँचने का श्रेय पापको ही जाता है तो मापने हंसते हुये कहा 'भई कुर्सी तो छीनी क्योंकि पापके सतत प्रयासो के कारण ही यह जाती है, मागने से थोड़े ही मिलती है।' यह थी अाज विशाल वट वृक्ष के रूप में है, जिसे आपने उनकी विनोद-प्रियता । ऐसी कितनी ही स्मृतिया तन, मन और धन से सीचा । अपने जीवन अपना आकार पाने के लिये उमड़ रही है । काल में रत्न विद्यार्थियों द्वारा अभिनन्दन मे मिली 63 हजार की राशि आपने उसी समय विद्यालय सस्था के स्थापना दिवस ज्ञान पचमी के पावन को भेट दे दी। ऐसी घटनायें बताती है कि पर्व पर आपके प्राणो का उत्सर्ग संस्था के लिये विद्यालय से पापका लगाव कितना था। यह इस प्रेरणास्पद प्रसग बन गया है । ऐसा प्रतीत होता है मंरथा का सौभाग्य था कि उसे प्रापका सरक्षण कि आपने अपने प्रादों, मकल्पो, मूल्यो एक एवं मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। अापके सेवा, त्याग, ग्राकाक्षायो को इस सस्था के साथ स्थायी रूप से गिक्षा-प्रेम, दूरदर्शिता एवं वात्सल्य भाव से यह जोड दिया है। हमे ग्राशा है कि श्रापको निष्काम माया मदेव अनुप्राणित रही तथा चहुंमुखी विकास कर्मठता, त्याग, विनम्रता और मृदुलता हमे प्राप की ओर अग्रसर रही। द्वारा स्थापित प्रादों, मूल्यो एवं प्राकांक्षाओं को माकार रूप प्रदत्त करने के लिये प्रेरित करती विद्यालय में कार्यरत प्रत्येक कार्यकर्ता मे रहेगी। अन्त में प्रकृति के नियमों को निरोधा व्यवहार बिल्कुल परिवार के मदम्य कर यही कहना पड़ता है पं. समान था। किसी भी सदस्य के सम्मुख पोई होता जहा पर मोर, भी समस्या होती तो वह नि.संकोच प्रापको कह दुख भी यहा अभियान । बना पोर प्राप को ध्यान से उनकी समस्या सुनते करनी স?নি प्रविगम, में उसका निगणारा भी करते । वाती ही वाता अपना निगमा काम ! 7 दिन मानिर में मुभा मे गने हुये कहने -अध्यापिका, वीर बालिका विद्यालय -गुलक्षणा जी ! छारम में से प्राई ?
अनुपम सहयोगी "मनुष्य वही जो मनुष्य के लिए मरें।" स्व श्री मैथिलीशरण गुप्त की यह पक्ति श्रीमती वन्दना जैन सोजयता को मति पादरणीय श्री राजपत्री सा टाक के विषय में सोलह प्राने मत्य है। इन पक्तिया को लियते हुए जही मुझे गौरव अनुभव हो रहा है वही दूसरी पार समोर लिवन म वावर वन रहा है। अपनी इस वार वुद्धि म आ चाचा मा के विषय म बुध लिपने का माहन मास्वामीजी की इन पक्तियों में जुटा पाई हूँ- "जिमि वाला वह तोतरि पाता, सुनहि मुदित पिता अरु माता।" पा चाचा सा समाज के एमे रल ये जिह छाटे पह, अमीर गरीव, हिध्य, सेवर ममी की ममान प्रशसा व प्रादर प्राप्त था। यूता में का तरी न हो, मैं अपने मन की बात नहीं चाचा मा को काफी ममय मे जारती हूं पितु वह पाती थी। पितु उनका सरल व्यवहार देख M Phil का लघु शाध प्रवध जब मैंन परम कर मैं अपनी गानो याममाधान परवा लेती विदुषी परम पूग्या माध्वी श्री विचषण श्रीजी थी। उहें देख कर ऐमा लगता था मानो षष्ट, म सा पर निमा, उम सितमिले म मग मम्पर दुम, द से वे परेशान नहीं बल्लि तरलीफ उन्हें कुछ ज्यादा ही बद गया। म मा मम्बर मे देश कर लजाती हैं। मैं ही नहीं बधि जो भी बहुत मारी जानकारियां मुझे आपमे मिली। अपनी समस्याएं लेकर प्राता था, चाहे वे प्रापिए वे प्रापन मरा काय मरत करन के निा पुम्न दी, हा या शिक्षा सम्प्रधी या जवाहरात सम्बधी, अपने अनुभव बताए तथा अन्य जिनसे भी मुझे सभी या ममाघान परत थे। गनी के माय उनका जानकारी मिल मरती थी, पापन वताया तया ममान व्यवहार था। उन जोगा या मरा मह्याग करन का भी प्राग्रह चाचा मा के पास बहुत-मा पाय रहता था पर वे हर वाय यो वसूची पूरा करते थे। उन्हें frतु जब में श्री विचरण श्रीजी के व्यक्तित्व छोटी वडी हर बात याद रहती थी। मुमें जब वे का अध्ययन कर रही थी तब परम पूज्या म मा यह 'ते कि में बन बताऊंगा या बल वाम व चाचा सा में माम्य नजर ग्राता था। चाचा करवा दूगा तब उहोने मेरे इस छोटे से गाम यो मा श्री विच नगण श्रीजी म सा के मानिध्य म कभी भी नहीं नगारा बलि मेरे पहुँचने पर मुझे रह, इसी स व्याधि में समाघि उहें मिली। यही पता चला कि मेरा कार्य मरन हो गया है। मेरे अध्ययन के ममय म चाचा सारा पाप हो वे सहयोग व माग दशन से में यह कार्य स्वास्थ्य ठीक नहीं था। वे चन पिर नहीं सकते मपनता पूत्र वर पाई, मैं उनमी कृतज हूँ। वे प तथापि अभी भी मैंने उनके चेहरे या मन म एक ऐमी मुगप ये जो ममाग में हमेशा महपती प्ट का अनुभव नहीं पाया। प्राप उसी महल रहेगी। भाव से मेरा पर प्रदशन करते रहे। पमी कभी मैं मोच म या यह मोच कर मि यहीं चाचा मा श्री वीर यालिरा महाविद्यालय, जयपुर दिया। नूतपूर्व छात्रा, 62 पुस्तकों के प्रति प्रेम D श्रीमती पद्मा भार्गव "प्रेम एक ऐसा वीज है, जो एक गर जम कर कार्यो मे, सस्थानो की सहायता करने में सदैव फिर बड़ी कठिनाई से उखड़ता है।" व्यस्त रही पे फिर भी ऐ सदैव यही इच्छा महान् साहित्यकार श्री प्रेमचन्द का उपर्युक्त रखते थे कि किस तरह वह घर के पुस्तकालय कथन श्रद्धेय चाचा साहब के व्यक्तित्व पर शत मे अच्छी से अच्छी पुस्तके एकत्रित करें। ये मुझे प्रतिशत घन्ति होता है। आपके हृदय मे प्रेम की अक्सर वीर बालिका उच्च मा. विद्यालय से बुलवा जड़े इतनी गहरी फैली हुई थी कि उन्होंने जीवन कर अपना पुस्तकालय ठीक करवाते थे और कहते के अनेक पक्षो को अपने आप में समाहित कर लिया थे कि जितनी भी पुस्तके कम हो पाए जयको संख्या था। जहां एक ओर दीन-दुखियों, अनाथो एवं मुझे बताइये। विकलागो के प्रति अापके हृदय मे अपार करुणा जब मैंने उन्हे पुस्तके कम होने की संख्या एवं प्रेम विद्यमान था, वही हीरे-जवाहरात, शिक्षा, बताई तो वह बडे सिन्न होकर बोले, “बहन जी चिकित्सा, राष्ट्रभक्ति एवं समाजसेवा के प्रति भी में क्या बताऊ, मैं उसमे अच्छी से अच्छी तथा गनी अगाध अनुराग विद्यमान था। इतना ही नहीं धर्मों की पुस्तकें रखना चाहता है, लेकिन गरी विभिन्न कलायो, धर्म, दर्शन, इतिहास एव पुराणो मे पुस्तके सुरक्षित नहीं रह पाती क्योकि यह Ph D. भी आपकी गहन रुचि थी। फिर भला पुस्तको के करने वाले तथा दूसरे पुस्तके पढ़ने के शौकीन प्रति यापकी उपेक्षा कैसे सम्भव थी? पुस्तके ले जाते है, परन्तु वापिन नहीं करते ।" "पुरतफें दे दर्पण है, जिनमे सन्तो और वीरो ग्राप मुझे बताइये मैं जहां से भी हो सकेगा र मनिक हमारे लिए प्रतिबिम्बित होते है ।" माएको पुग्नके मगवा कर दूगा। -गिल्बन इतना अधिका उनको पुस्तकों के प्रति प्रेम या । मान के महान आराधक शिक्षा-प्रेमी श्री टाक धर्म की तो गायद ही कोई पुस्ता जिगन मारव पुग्नकों से अत्यधिक प्रेम करते थे। पापका मगाने लो।। सयोंकि प्रम प्रति उनमें प्रारया हा पत्यन्त गहरा एवं नियमित स्वाध्यार का बहुत अधिक भी। निनी मानिने मारा:- रिलायक था। पाप अपने घर पर एक सुन्दर पुग्नशाना की माना करना गाने, यथापि कर मरने जा पर्मा याम इनाम: 40 -- भावाञ्जलि पूजनीय चाचा माहव समाज के उम्ग्यत रत्न, परोपकारी, सदाचारी, धम सहिष्णु, दानवीर व शिक्षा प्रेमी थे। उनकी एयछाया मे न घेवल बालक, युवा व युद्ध जन फ्ले फ्ले यल्लि उन सहयोग से सामाजिक, प्रायिय, राजनैतिक, शैधिर व व्यावमायिर क्षेत्रों मे बनो विभिन्न सस्यायें भी अपनी उन्नति को चरम सीमा पर पहनी। प्राज उही दिव्य पुरप के स्वगवास पर उनके व्यापक सम्पर, स्नेह और बहुआयामी व्यक्तित्व के कारण प्रनेर श्रद्धालुनों य सस्यानों ने विभिन्न क्षेत्रों से मवेदना संदेश भेजे, जिनसे उनके व्यक्तित्व की स्मृति पुर्गों तर हमारे मानस पटल पर रहेगी। . नहीं विश्वास विजय मे है, अपने घर म जो भी सस्ती-महगी पुस्तके होती थी शक्ति के पतन धम चलता, इमे महावीर पक्ष के लिए भेज देने थे क्योंरि उनको धम की पावन उज्ज्वलता मालूम था कि पुस्तकालय में पुस्तफै सुरक्षित घम जी घेय प्रगन करे। रहगी। वे कहते थे घम की पुस्तकों को में जिन्द दूसरो के दुम, तकनीफों को भुनने में भी ये वनवाकर रखना चाहता है क्योकि ऐमा माहित्य वही रुचि दिखाने थे। एक बार मैंन बातो ही वाजार में खरीदने पर भी नहीं मिलेगा और प्रागे वाती में कहा, "चाचा साहब । हम मालमारी की अाने वाली पीढी को शायद इमसे कुछ लाभ दो बहुत दिसत है. हमारे पास प्रालमारी नहीं है, मके। श्रापको यह पालमारी बहुत अच्छी है। उन्होंने तुरन देवर पुस्तके ही नहीं, उनसे कोई भी वस्तु नोरर को बुलवाकर उम प्रालमारी को श्री वीर मागन पर वे मना नहीं करते थे। एक बार यालिया विद्यालय में भिजवा दिया । ऐमे थे हमार उन्होंने मुझे बुलावर बहुत सारी धर्म की पुग्न दो चाना माह्य श्री राजरूपजी टाय।" और कहा, आप इसका एक अलग दक्ष बना । और उसका प्रनग नाम रखें 'महावीर पथ' । वे चाहते थे कि महावीर कम में सभी धर्मों पुस्तकालयाध्यक्ष, की अच्छी-मे अच्छी पुम्न होनी चाहिय । वह श्री वीर गतिका उ मा वि , जयपुर , 64
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। hin- Air around 24 1904 नॉ सरस्वती व চিলা-হিরো & লিয় समर्पित इस सस्था के कर्णधार श्री राजळप लाल ने सस्था के विभिन -मारोहो मे घोषणा बन अर्थ के अभाव से जत्राओ के अध्ययन के सी प्रकार का यवधान नहीं आने दिया जायेगा। [ आयोजित पधार रहे ह गजाय 2 श्री सोह OTUTE ESTE सं स्था 1 - 1 - स की राष्ट्रीय 1 गोकरी जार्यरत ई. से, नाटय श्री साजरनप MAR Makwaneupane temperwhelmewataraor । Armaan 4 + 4 Taar andmenued सरि ....... ... .. . २. ....., १ १ # , थ ८ F वी वापर ( गायण तुला १५ वि ग १०२) अयपुर का सिरियार AM PRO m . 3 :- । १ tamaA 4- . -- प T R - 471 4 1 मर्मी र प - Himग । TH गा गरे771 रम सर 77fr - मि . विचा Prif, शा 17-FUT रमनगर TTruff TIRIYA 117 TILIT रि" TR 7 11 गगनात मागर .in महिमा भाग ITTr समागिदाग 1 तिनमा गोरा HTTEE मर PIT-MIL MI7। गिरी Tरि पति-मरा frगा HIT TIMमग गा fram पासिया प्रापरमार गायो flim Im ग! Rf Tr-frir गरमा और ना HTI THRUTI मो -~मानन· fairma' समागम सभामा गुण। -- -- .
श्री रामजी लाल शर्मा हमेशा अनाथों के नाथ के लिए सो गए ! ने 8 जुलाई 1984 की बात है, मेरी शारीरिक प्रार्थना सुन रहे थे । वच्चे बड़े ही सुन्दर स्वर मे एव आर्थिक परिस्थिति ठीक नही होने के कारण गा रहे थे । तुम्ही हो माता, पिता तुम्ही हो- आगे शिक्षा अध्ययन हेतु जयपुर आया । सर्वप्रथम प्रार्थना सभा के बाद व्यवस्थापक ने मेरा स्वयं का चौडा रास्ता स्थित श्री हिन्दू अनाथाश्रम जयपुर में परिचय श्री टाक साहब को बताया। मेरी शारी- गया। शाम का समय था, अनाथ बच्चे-बच्चियाँ रिक परिस्थितियो को देख कर श्री टांक साहब एक कतार मे बैठे थे, सामने व्यवस्थापक, परि कहा-"मैने सर्वाधिक प्रेम तीन प्रकार के मनुष्यों में चारिका व अन्य कर्मचारीगण बैठे हुए थे । थोड़ी किया है-1. अगहीन व्यक्ति, 2. विधवा स्त्री, देर में सफेद टोपी लगाये, धोती व कुर्ता पहने हुए, 3. अनाथ बच्चे । ये तीन तरह के प्राणी समाज एक हाथ मे छडी लिये हुए श्री राजरूपजी टाक एवं कुटुम्ब के लिए बोझा बन कर रहते हैं, लोग अाश्रम मे पहुंचे। मैने अपने परिचित बच्चो से पूछा इनको नफरत की निगाहो से देखते है, लेकिन मेरा यह कौन साहब है ? तब एक बालक एकाएक बोला- दृष्टिकोण लोगो से अलग है। स्वय के बच्चों व यही हमारे मालिक है। थोड़ी देर बाद बच्चो ने परिवार का पालन-पोषण तो दुनियां में सभी करते सायकालीन प्रार्थना प्रारम्भ की........." हैं परन्तु सेवा का वास्तविक रुप उक्त तीन प्रकार तुम्ही हो माता, पिता तुम्ही हो, के प्राणियो की सेवा करने मे है ।" श्री टार माह तुम्ही हो बन्धु, सन्या तुम्ही हो । जैसा कहते, वैसा ही करते तुम्ही हो माथी, तुम्ही महारे, श्री टा7 साहब के निवास पर जयपुर गे कोई ना अपना, सिवा तुम्हारे ।। बाहर जाने वाला व्यनि, पाता और यह करना तुम्ही हो माता, पिता तुम्ही हो । कि मेरे पास किराये पो लिए पैना नही:-"म पर बच्ने उक्त प्रार्थना गा रहे थे तो मैंने अपने गेठ जी अपने मुनीमजी मे गहने, फला जगाः का ना में माना यह प्राधना ईयर के लिए नही श्री किराया मानूम गे पोरगी फिराया बाग 1ो टाला माहब न लिए की जा रही है । उनसे 5 गपये प्रधिाम पनि कोदयो। पर टांग माय गुग्ध मुद्रा में बैठे बच्चो की पदि कि गोगरी वा पो नि 65 रत्न-व्यवसाय के विश्वविद्यालय O श्री राजस्पनी टाक प्रमुख जौहरी होने के साय साथ देश-विदेश मे रत्न उद्योग एवं व्यवसाय के विश्वविद्यालय के स्प मे स्याति प्राप्त व्यक्ति थे। श्री राजरपजी ने अपने जीवनकाल में विना जातिगत भेदभाव के अनेक व्यक्तियो को रत्न उद्योग एव व्यवसाय को शिक्षा दी। -राजस्थान चंम्बर प्रॉफ कॉमस एण्ड इण्डस्ट्री आता तो सेठजी पूछते-क्तिन पढे लिखे हो- एक वार श्री हिदू अनाथाश्रम जयपुर के थोडा बहुत लिख सक्त हो-सम्बन्धित व्यक्ति के पदाधिकारियो की मीटिंग प्रायाजित की जा रही हाँ कहने पर सेठ साहब सर्विस के लिए वीर थी, जिसम सस्था की गतिविधियो से श्री टार वालिका विद्यालय में भिजवा देत और तत्कालीन साहब को अवगत कराया जा रहा था । टार साहब प्रधानाध्यापिका श्रीमती प्रकाशवती सि हा से बहत ने समस्त गतिविधिया घ्यान पूवर सुनी और उप इनको कोई काम दे दो। जिसका एक उदाहरण स्थित सदस्यो व कर्मचारियों से कहा-मैं सस्या मेरा स्वय का है। मुझे टार साहव न श्री वीर की समस्त काय व्यवस्था से बहुत सुश हूं लेकिन बालिका विद्यालय मे कनिष्ठ लिपिक के पद पर मेरे दिमाग में एक शब्द प्रसरता है । वह शब् है लगाया और जब मेरा राजकीय सेवा में जाने का 'अनाथ बच्चे'। सेठजी ने अध्यक्ष पद से बोलते हुए अवसर पाया तो मुझे नहीं जाने दिया और यही कहा-अनाथ कौन है, आप लोग क्सिको प्रनाथ कहा-तेरी हर इच्छा की पूर्ति में स्वय करूंगा, फिर समझते हो ? मरी निगाह में कोई अनाथ नहीं तुम सरकारी नौकरी मे क्यो जाना चाहते हो ? है । जिन बच्चो के माता पिता नहीं हैं, वे सब मेरे यदि कोई नेत्रहीन व्यक्ति श्री टाक साहब के वच्चे हैं । मै उनका पालन पोपण करूंगा । जहाँ पास आता तो उसको राजस्थान नेत्रहीन कल्याण सस्था के नाम का सवाल है, मेरी राय में इस सघ जयपुर मे भिजवा देत और यदि कोई अनाथ सस्था का नाम श्री हिदू अनाथाश्रम से बदल कर बच्चे लेकर उनके पास अाता तो श्री हिंदू बाल सेवा सदन कर दिया जाय तो इसम रहने अनाथाश्रम जयपुर मे भिजवा देते । सेठ साहब के वाले बच्चो के दिमाग से यह वात निकल जायेगी सरक्षण मे बहुत सी सस्थाएं चल रही थी जो कि हम अनाथ है-कुछ सदस्यो न टाव साहब की मानव सेवा के हर काम को हर सम्भव पूण करती बात का समर्थन किया लेकिन राजकीय कठिनाइया थी-श्री टाक साहब का इन सस्थागो से जुडने के कारण यह सम्भव नहीं हो सका। का मान यही कारण था कि वे किसी के दुख को श्री राजरूपजी टाक साहब रोज सुबह वाग मे दख नहीं सकते थे । दुखी व्यक्तियो की समस्यामा घूमने जाते थे । वहा जो भी परिचित व्यक्ति उनसे का समाधान करने के लिए वे क्मिो न किसी मिलता तो वे हमेशा दूसरो के दुस-दद की बात सामाजिक सस्था मे पदाधिकारी अवश्य रहते थे। क्यिा करते थे । अनाथ बच्चो की पढाई लिखाई 66 -- और उनको रोजगार के अवसर दिलवाने के लिए साथ में पाये सज्जन की तरफ इशारा करते हुए हमेशा चिन्तित रहते थे। कहा-आप लोग इन्हे प्रणाम करिये । इन पर एक बार एक सज्जन टांक साहव को वाग मे सब बच्चे एक दूसरे को देख रहे थे परन्तु एक मिला, वह भी अपनी चार पुत्रियों सहित वाग मे छोटा सा बालक जिसकी आयु 33 वर्ष के लगभग घुमने आया था । श्री टांक साहब के पास में बैठ थी, उस सज्जन की बड़ी लडकी के पास गया और कर बोला-क्या सोच रहे हो सेठ साहब ? चार बोला—यह मेरी जीजी है । उस लड़की ने बच्चे लड़कियां होने के बावजूद भी मै आपकी तरह नही को गोद में लिया और वह रो पड़ी और बोली- सोचता । टाक साहब ने मुस्करा कर कहा-- इतने बच्चों मे यह अकेला वच्चा मेरे पास पाया आपके केवल चार लड़किया है, मेरे तो 40 लड़के- है, हो सकता है यह मेरे पूर्व जन्म का भाई है । लडकिया है और एकान्त में बैठकर उनके भविष्य हम चार वहिने है, हमारे कोई भाई नहीं है । टांक की बात सोच रहा हूँ । आगन्तुक सज्जन ने साहब यह बच्चा हमको दे दीजिये । इस पर टाक आश्चर्य से कहा-यह तो बड़ी विचित्र बात है । साहब ने सहर्ष वह बालक उनको दे दिया। कहने आप अपने 40 लडके-लड़किया बतलाते हो, कोई का सारांश यह है-टांक साहब अनाथ बच्चों के स्कूल तो नही खोल रखा है ? इस पर टाक साहब पालन-पोपण के साथ-साथ अगर कोई गोद लेना ने कहा 40 बच्चो का स्कूल हर कोई खोल सकता चाहता था तो बच्चो के भविष्य के लिए गोद भी है लेकिन चालीस बच्चो का पालन-पोपण हर कोई दिला देते वे । नही कर सकता । आखिर सेठ साहब बाग से ही आज श्री टाक साहब के नहीं रहने से उनके उस सज्जन को उनकी चार पुत्रियो सहित समाज, परिवार को तो गहरा आघात पहुचा ही अनाथाश्रम मे ले गये और कहा यह मेरे चालीस है साथ ही अंगहीन व अनाथ बच्चे भी सोचने लगे लड़के-लडकियां है । आप इन्हे अच्छी तरह गिन है कि हमारा मालिक हमेशा के लिए सो गया जो लीजिये । सुबह का समय था । वच्चे अपने दैनिक किसी के जगाने मे भी नही उठेगा । कार्यक्रम के अनुसार प्रार्थना के लिए एकत्रित हुए ऐसी महान् अात्मा को मैं अपनी हार्दिक और फिर वही प्रार्थना गाई- श्रद्धाजलि अर्पित करता हू और ईश्वर से प्रार्थना तुम्ही हो माता, पिता तुम्ही हो करता हूं कि वह मुझे ऐसी शक्ति प्रदान करे, जिममे तुम्ही हो बन्धु, सखा तुम्ही हो मै उनके उपदेशों का पालन मदेव करता रहूं । प्रार्थना के बाद जैसे ही बच्चे टाक साहब को प्रगाम करने के लिए पागे बढ़े-टाक साहब -लिपिक, वीर बालिका विद्यालय ने सक्रिय कार्यकर्ता 7 श्री राजरूपजी टांक राजनैतिक, धार्मिक, शैक्षणिक व मामाजिक संस्थानों से जीवनपर्यन्त जुटे रहे । पापने राष्ट्र एवं समाज को अनुपम व सक्रिय सेवा की। K श्री स्वर्ण मेया मंस्था, जयपुर Answx 67 सेवाभावी व्यक्तित्व असहायो के शरग दाता, महयोग दिया। श्री राजम्प जी टाप विस्तामा विकलागो के थे प्राणाधार । की सेवा हतु महावीर विक्लाग सहायता समिति के शत शत छोटी वालाग्राम, अध्यक्ष बने और विरलागापो म्वायसम्बी बनाया। होता जिनका मपना साकार । हरिजना ये वग भेद यो माप्त परन हेतु अपना जिन्होंने शिक्षा के हीर वो, गम्पूण मह्याग प्रदान किया। इहा नारी निभा जाना, पहचाना और परमा। पर प्रत्याधिय बल दिया पोर नारी शिक्षा हतु वीर युग-युग के नान दिवार को, वालिया शिक्षण संस्था की स्थापना मी, जहाँ माज जिमन जन जन तक पहुचाया। 3500 छापापा को शिक्षा दी जा रही है । य नारी मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज म शिवा प प्रबन ममथक थे। ये गरीबों के हितपी थे रहत हुए समाज के हर क्षेत्र म अपना मह्योग देवर और मम्याग्रा पर पापिय मस्ट पाने पर स्वय व लेकर अपना जीवन व्यतीत करना है। इसी के पास से यायपनामा यो वेतन दिया करते थे। प्रकार समाज के क्षेत्र म पाम वरन वाले और श्रीमान् राजस्पजी टार नतिर व धामिर अपना सम्पूण जीवन समाज के व्यक्तियो का महयाग शिक्षा पर बल दिया। इहोंने इस बात पर बल देने म लगा देन वाले एक कमठ पुरंप का नाम दिया कि बच्चो मे नैतिक शिक्षा का विकास हो । श्री राजरूप टार हमारे इतिहास मे ममादरणीय जौहरी व ममाजसेवी होने के साथ ही इहैं है । मभी जगह इह सम्मानित पिया जाता ज्योतिष शास्त्र का भी शान या। इसी पारण इन्होंने ज्यातिप से रत्न का क्या सम्बध है, इस पर एक श्रीमान् राजरूपनी टाक का जम एक साधारण पुस्तक की रचना की, जिसरा अंग्रेजी में अनुवाद परिवार में हुआ था लेकिन बाद में एक उच्च किया गया । ऐसे महान् व समाज के हितपी थे। घरान म गोद प्राय, जहा से इहोन मम्य शिक्षा श्री राजाजी टाप ने अपन याय यो लग्न व निष्ठा प्राप्त की और अपना जीवन रत्ना को परपन मे के माथ करते हुए 27 अक्टूबर, 1987 यो हमेशा नगाया । ये हीरे के प्रमुख जौहरी थे। इह हीर के लिये यह दिव्य आत्मा इम ससार से लुप्त हा परवन का विशेष ज्ञान था । इहाने हजारो नव गयी। वे अपन कमों द्वारा हमेशा के लिय अपनी युवका को रत्न व्यवसाय की शिक्षा दे कर स्वाव यादो के महारे अमर वैल पी भांति अमरता का लम्बी बनाया, जिससे समाज मे इहे तीन वार प्राप्त हो गये। 'समाज-रत्न' से विभूपित किया गया । जोहरी होन क माय-माथ इनका समाज के प्रति अटूट प्रेम था। दलाने सदैव समाज के हर क्षेत्र म अपना सम्पूर्ण XIth B रहा है। -मजु गोयल 68 हमारे पूजनीय चाचा साहब अनेक महापुरुषों, मनीपियों, राजनेतायो, द्वारा किये गये महान् कार्यों के पीछे एक स्त्री होती दार्शनिको के कारण प्राचीन काल से ही भारत भूमि है, उसी प्रकार इस विद्यालय की स्थापना के पीछे उर्वरा तथा मंगल विधायिनी रही है। यहाँ की थी "साध्वीस्वर्ण श्री जी' । उनकी प्रेरणा से मन विगेपता है सामान्य से अधिक की ओर बढना, 1925 में आठ बालिकायों द्वारा यह विद्यालय यही कारण है कि अत्यन्त सामान्य परिवार एवं प्रारम्भ किया गया, जहां बालिकामो को धर्म की परिवेश मे पैदा होने वाले तथा विकसित होने शिक्षा दी जाती थी। चाचा साहब उन विकट वाले व्यक्ति महान् पदों तक पहुंच गए। ये सब परिस्थितियों में जब स्त्री शिक्षा को पाग माना उन व्यक्तियों ने अपनी लगन, श्रम तथा पतिभा जाता था, वे घर-घर जाकर यह प्रायह कारते थे कि पं. बल पर किया। ऐसे ही थे हमारे विद्यालय के नारी शिक्षा उनके लिए महत्त्वपूर्ण अंग है । अतः महामहिम मत्री श्री राजरूपजी टांक । बच्चो को शिक्षित कराने के लिए विद्यालय में भेजें। धीरे-धीरे इस विद्यालय में छात्रो की न्या राजरूपजी टांक "चाचा सार" के नाम से पनिट थे । उनका जयपुर मे ही नहीं वरन् विदेशो बढ़ती गई। प्राधुनिक युग मे यह बदक्ष का रूप में भी नाम था। हमारा विद्यालय श्री वीर धारण कर चुका है। चाना नारय श्री मेनन पारिका विद्यालय जिमने चाचा गाह्न तगरण सफल हुई। वे हगंगा दावापो को उन्नति गरने पी प्रेरणा देने थे। धम्या मे वृद्धावस्या तक जुड़े रहे, उन्होने म विचार न अपना जीवन न्यौछावर मार दिया । चाना नामोनिसियार धोने में लेगार वृक्ष बनने तया का श्रेय नागा मी में भी अपना मोगटान दिया। सारी Tोही दिया जाना। जैसा कि प्राचीन मनाचाधम नामापा मना- ཚལ༔ ༑ རྩf I हर महान् प्रादमी शिमा । उसने रिटवार दर: नि: 69 प्रथम विधान सभा सदस्य स्व श्री टाक साहब अपने जीवन काल में विभिन्न सामाजिक मं व्यापारिक सस्यामों से जुड़े रहे तथा राज्य को विधानसभा के सद भी रहे। आपके द्वारा सन् 1975-76 मे राजस्थान सर्राफा सघ वार्षिक जनरल अधिवेशन जो कि अजमेर मे प्रायोजित किया। था को अध्यक्षता भी की गयी यो।-सघ अापके विचारों से लानावित रहा है। -थी राजस्थान सर्राफरस व किये। वे विक्लागा के लिए बहुत चिन्तित थे। विदेशो मे भारत की प्रतिष्ठा के लिए उस उन्हान महावीर विक्लाग समिति को अपना पूरा अनेकानेर काय क्यि । अपने मृदुल स्वभाद सह्योग प्रदान किया। वे उनी हर जरूरत पूरी कारण उहोंने मवका मन मोहित कर रखा4 करन का प्रयत्न करत थे। यदि काई उनके पास इही श दो से हम उह भावभीनी श्रद्धाजलि श्री मदद मागने चना जाता तो उसको निराश नहीं करत हैं। लौटाते । "Some men are born great, नुवा वै माने हुये जौही थे। रत्नो के सम्बघ मे Some are made great, पीथे। उहाने एक पुस्तक लिखी जो विदेशो मे पढाई जाती Some are those on whom है। रत्ना को परख में प्रवीण होने के कारण उहें Greatness is thrust upon' विदेशो में पुरस्कृत भी किया गया। वे अपने प्रिये गये कार्यों से महान् बनें। नान पचमी के पावन अर्थात् कुछ जन्म से महान् होते हैं, कुछ पद पर उहांने इस विद्यालय की स्थापना की व परिश्रम से महान् होते हैं, कुछ ऐसे व्यक्ति हैं नान पचमी के दिन विद्यालय जब अपना 63 वा जिन पर महानता थोपी जाती है । स्थापना दिवम मना रहा था, उसी दिन बीमार होने के कारण चाचा माहब परलोक सिधार गए। चाचा माच अनुभवी तथा मुलझे हुए व्यक्ति थे। F -कल्पना चतुर्वेदी XI-C 70 वे सूरज नूतन क्षमता के वे प्रतिरूप नये युग के, वे सूरज नूतन क्षमता के। थे वे भंडार ममता के, थे वे प्रहरी समता के । मनुप्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज मे रहकर ही वह अपने उज्ज्वल भविष्य के निर्माण हेतु समाज के प्रत्येक सोपान पर अपने कदम बढ़ाता है तथा उसकी सीमायो में बँधकर प्रत्येक अच्छे-बुरे कार्य करता है । उन्ही रास्तो मे से कुछ अपने दायरे मे सिमट कर रह जाते है और कुछ अपने उस स्वहित के दायरे से बाहर निकलकर परहित के बारे में सोचते है। ऐसे ही परहित चिन्तको में से एक थे श्रीमान् राजरूपजी टाक । साधारण घर मे जन्म लेने के बाद भी उन्होंने मेहनत, लगन एवं निष्ठा द्वारा पत्थर से पानी निकाल दिया और उस श्रमरूपी अमृत जल से सवको सरोवार कर दिया। अपनी लगन एवं निष्ठा को कायम रखते हुए उन्होने अपने रत्न व्यवसाय को आगे बढ़ाया और उन्हें अपने परिश्रम का फल अमेरिका में गोल्ड मेडल के रूप में मिला । अपने व्यक्तित्व की सूक्ष्म तलवार के लिए उन्हें ऐसी म्यान मिली कि लोग उनके कार्यों को देखते रह गये। जिस प्रकार पौधा लगाते वक्त माली उसके फल की कामना नहीं करता, उमी प्रकार आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न होने पर प्रापने अनेक छोटे-छोटे पौधे स्पी संस्थानों की स्थापना की जिसने आज वटवृक्ष का रूप ले लिया है, जिसकी छाया ग्राज अनेक पथिको तया पक्षीजन अानन्द पहुचा रही है। उन्ही पौधो मे में है श्री वीर बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय । नारी शिक्षा के प्रबन ममर्थक श्री टाक. जी गा स्वप्न या किनारी भी उन गिधा प्राप्त गरे । पुरुषो के समान संधे से कंधा मिनारर नन मो। विकालागी प्रचल पाय धी गरी जीवन भर उनसी गगामी सारे सपना वन्दना XI-बो प्रादर्श व्यक्तित्व • यो वीर बालिका शिक्षण सस्थान के संचालक मडत को यह समा मस्या के सत्यापन सदस्य, मत्री, कर्मठ समाजसेवी, प्रादश व्यक्तित्व के धनी श्री राजस्पनो टा के निधन पर हार्दिक शोक प्रगट करता है । इस सस्था के उत्थान व विकास मे उनका प्रति महत्व का योगदान रहा है। जीवन के प्रतिम क्षणों तक इस सस्था के प्रति उनस उरसगं भाव हम सब के लिए प्रति प्रेरणाप्रद बना है। --श्री वीर वालिका सचालक मडल महारा देकर इस बात का भी दुग नहीं होने सोने हुए अकुर फूटने लगते थे, जिसकी मूसलाधार दिया frवे ममात्र के पथित अग है। यह वर्षा से सुप्त पृथ्वी पर मानों वमन आ जाता हो । बहन म रा भी अनियोनि नहीं होगी कि प्राज यदि यह जीवन सुनी वनस्थली है तो श्री रात्र उन ये ना रहने में वो सभी बेमहारा हो गये स्पजी चुना हुआ गुनदस्ता थे। अपने कार्यो एवं और न लिए दम प्रारमय जीवन में मैवाग्रा के द्वारा प्रापने जीवन रूपी इस उपवन का पराग निमार म्बय परम ज्योति म लीन हो हंग-मरा रखा तथा उनके रहते विभिन्न प्रकार र वि। रन यवनापमन्याति अजित करने पर पुष्प इमम विकसित हुए । अपने बाद अब उपवन महान ज्यातिष एव रन राशि में क्या मम्बय है, को देव-रख का भार वह हम पर छोड गये हैं, इन पर पुम्नर नियो, निमका पाद में प्रोजी देखना यह है कि हम उपवन को कितनी देव रस अनुवाद प्रा । गरीवा के हिनपो, नतिश शिक्षा कर पात हैं व क्तिने पुप्पों को मिलने का अवसर पर मर्यायिक दर देन वान श्री राजपत्री जीवन देते हैं। जैसे मागर को याह को नापना रष्टिन मर परोपकार में लोह। है, उमी प्रमार रातरूपजी के जीवन की शनाक मानव या गैवन नश्वर है, जो पाया है गुम्पन में बाँधना नितान असम्भव है । मानव तो निश्चित ही एक दिन वह जायेगा लेरिन प्रदेष मानव है, प्रयत्न करना उसका नंन्य है। अन में गजापनी भनी विशषतामा में वारण हम विर इन्हीं कुछ शब्दा द्वारा उप कमयागी प्रमिा मार नर माद प्रागे। गौम से दाय ममार में पुजारी एव समाजसेवर का नतमस्तक हर मत म बार किसी गना में ही हृदय में सन प्रणाम करती हूँ। 72 Her" का ज्योति मोती की, बनकर चमका जौहरी "राज" उनसे सिंचित वृक्ष खडा है, याद दिलाता उनके काज ।" जन्म-मरण हमारे जीवन का एक अद्भुत नाटक है, जो बिना लेखक के रचित हो जाता है । जब नव जीवन प्राप्त होता है तो उल्लास, उमंग में हमारे उद्गार प्रकट होते है । मरण, मुख मुद्रा को मलीन कर जाता है, ऐसा लगता है जाने वाले के साथ हमारा सुख, जैन सब चला गया और हम गम के गहरे सागर मे डूब जाते है। जब अपना ही कोई निकटतम प्रिय हमसे विछड़ कर महान् विभूति श्रीमान् राजरूपजी टाका के बारे मे अगर मै लिखने की कोशिश करती हूं तो समझ लीजिये कि मूर्य को चिराग दिखा रही हूं। वे कर्मठ थे, जो दिन-रात परहित के लिए जागृत रहते थे । वे ऐसे मूक स्तम्भ थे जो सम्पर्क मे ग्राने वाले हर व्यक्ति को प्रेरित करते थे। इसी माली ने एक ऐमी पुप्प-वाटिका की रचना की थी जो शताब्दियो तक महकती रहेगी। मुझे सौभाग्य प्राप्त हुया कि मै इनकी पुप्प-बाटिका मे कुछ समय के लिए पुप्पो की सुगन्ध के मध्य क्रीडा कर सकी। वो पुप्प और उनकी मुगन्ध मुझे आज तक पथ दिग्या रहे है । सदियो का • राजश्री जैन मनोहर अनमोल रत्न-पारखी - चिरनिद्रा में लीन होता है तो आँखों के समक्ष इतिहास हमे बताता है कि जिस बाग का मानी 'तमस' छा जाता है। परोपकारी हो तो उसमे परे वृक्ष, पुष्प, सताएं कौन जानता था कि ज्ञान पंचमी को ज्ञान प्रादि हमेशा परोपकार परते हैं। नाना नाय पुग पारोपित करने वाला तपस्वी कृपक हमरो द्वारा रचित वीर वाटिका में अध्यापिणारी पूर, बहुत दूर चला जायेगा । घेदना को सहज-भाव तताएं, कार्यगई पी बन, विकास रपी प्रमुन, महने वाला वह योगी हमने दूर तो चला गया गभी मुझे अपनी भीनी-भीनी मा में प्रसारित निगारे कानो को एक मधुर नगीत दे गया करते रहते है। उनकी जीत लिाग की भी मांव प्रेरणा देता है कि-"अपने लिए नहीं, कि या विद्यालय बट-गा को 1 गिला म त तिमी देवो, यानन्द प्रायेगा।" यायों में एनितर भाग लेने समाः नगर यो मुगन्धित करंगे दाना वा शिक्षा परिकार भी गंगा उनके नाम: पारी पोर मुगध विनर रहमेशा के लिए को, गा, गला in मनोगमा । जगपुर नगर प जैन समाज की A - 1 उन्नति के पथ पर प्रवाध गति से बढता जाएगा, को सहारा देवर उठाना ही उनके जीवन का लक्ष्य क्योकि मानयता की नव कापलो को ज्ञान के जल था। पाप महावीर विक्लाग महायता समिनि मे स सोचकर देशभक्त, विद्वान् तथा नताप्रो रूपी भी अध्यक्ष थे । कोढियो के लिए आपने एक सुमना को विकसित कर उनको परोपकार, सहानु प्राश्रय स्थल बनवा रखा है। अन्धो मे क्ला- भूति, सप्रेम भावना, सहृदयता के सुगन्धित रग म प्रतिभा को पहचान कर आपने उसे उजागर किया। रग पर ममाज को चार चाद लगाने के लिए जाने क्तिने अधो, लगडो लूलो, कोढियो, तैयार रहना है । उ होंने वीर बालिका विद्या असहायो के सहारा बने । ना केवल निकटवर्ती लय या इतनी लगन, परिश्रम व नियमितता से व्यक्ति का वरन् बाहर से आने वाले धमबघुनो मिचित पिया कि वह आज एक घना वृक्ष वन कर के लिए धमशाला वनाई । मदिरो की देख-रेख सरको सुखद छाया प्रदान धरता है । इस विद्या- वी । मैंने अपनी जानकारी तक उनको सबसे लय पी नीव इतनी मजबूत कर गये कि इसको अच्छा जौहरी देखा है । ये ना केवल हीरे जवाह पोई पाधी नूफान, अकाल बाद भी नष्ट ना कर रात के पारखी थे वरन् मानव-मन के भी अद्भुत सरेंगे। पारग्वी थे । वे रहते थे- म चाचाजी को अधिय निक्ट से तो नहीं "जीवन तो वैसे ही वधु, कप्टो का इतिहास है, परतु थोडा बहुत अवश्य जानती थी। वे हमेशा साहस का अश्व थाम ले, पतझड भी मधुमास है, मुझे प्रेरणा देते रहते थे । उनको देग्यवर मुझे युद्ध जीतता वही व्यक्ति माहस जिसके पास है।" ऐसा प्रतीत होता था कि वे कमवीर पुरुष अपना जीवन से दुखी, बोभिल, पीडित व्यक्ति उनके मुग त्याग कर दूमरा की प्रसन्नता के लिए सभाग्री पास मलीन मुम मुद्रा लेकर जाता और कुछ देर म उपस्थित रहत थे। कई बार धार्मिक संस्कार बातें करके लौटना तो चेहरे पर जोश, खुशी झल- द्वानते थे। मेरी सास्कृतिक क्षेत्र म रुचियो व क्ती थी। मैं सोचती थी कि यह अद्भुत ब्रह्मा प्रतिभाप्रा की दिल पोल कर प्रशमा तथा सराहना विना पाच तत्त्वो के किस प्रकार इनके जीवन से परत थे। मेरा कोई नाटक वे देखते और उसके मधुमास भर देता है। उनके हृदय मे जीव मान बाद जब मिलते तो उसी नाम से पुकारते थे जो के लिए दया थी। वे पशु-पक्षियो को भी पाराम भूमिका में नाटर म निभाया करती थी। मुझे देने के लिए तत्पर रहते थे। आपकी वाणी में बहुत गुशी होती है कि मैं ऐसे प्रबुद्ध, सेवारत, जादू था । ये उच्चकोटि के वय थे। बिहारी की समठ व्यक्ति की इतनी समीपता पा सकी। चाचा तरह इनके वक्तव्य भी नावक के तीर थे। वह नहरू की तरह वे जगत् चाचा बन गये । बच्चे, महान् प्रात्म-ज्ञान का दीपक स्थान-स्थान पर जन पूरे, युवक सभी उहे चाचाजी रहते थे। के मन को प्रभु भक्ति, प्रेम, ममता और सत्य के न पेवल शिशा के क्षेत्र में यह सत प्रागे ये प्रलौकिक प्रकाश से भर देते थे । चाचा साहब गुणा से भी सम्पन्न थे। धन धाय प्रतिभा सम्पन व्यक्तिव के धनी थे । उहोंने स परिपूर्ण होने पे माप प्राप निधनो व असहायो धार्मिक आदशों की प्रतिष्ठा कर राजनीति के क्षेत्र पो पोडा ये ममम घे। पाप प्रति व्यवहारकुशल मे मफलता प्राप्त की थी। उनकी दृढता हमारा थे । वृद्ध से माय वृद्ध, युवक के साथ युवक, बालक प्रेरणा स्तम्भ है । प्रापचे नेतृत्व मे अनेक सस्थाएं से ताप वालपन यी मसरिया भनेर बार प्रापरे प्रगति के पथ पर अग्रसर हुई । प्रापन जिस किसी प्रदा पत्तित्व में मैने पाई। की सहायता की, उसको स्वय के परा पर खडे होन 4 एर पच्छे राजनीतिन कहलाए । दूमरो की प्रेरणा दी । आपने जो भी मस्थाएं प्रारम्भ की - - वरन् पामिर 74 सौम्य पुरुष - श्रेष्ठीवर्य श्री राजरूपजी साहब टांक का देहावसान दिनांक 27 अक्टूबर, 1987 को हो गया, इसका गहरा दुःख हुमा । श्राप अभूतपूर्व राष्ट्रभक्त, सेवाभावी, धर्म परायण, विश्वविख्यात रत्न-पारखी, कर्तव्यनिष्ठ, सौम्य पुरुष, कर्तव्य-परायण शिक्षा प्रेमी होने के साथ-साथ गुरुदेव के परम उपासक थे। आपने विभिन्न धार्मिक, सामाजिक, शैक्षणिक एवं व्यावसायिक संस्थाओं के प्रतिष्ठित पदों को सुशोभित किया था । प्रापका दादा श्री जिनदत्त सूरिश्वरजी की पुण्य भूमि अजमेर स्थित दादाबाड़ी में भवन निर्माण, शिक्षण छात्रवृत्ति, निराश्रित सहायता. निवृत्ति श्राश्रम, पूजा-सेवा एवं स्वामी वात्सल्य में सदैव अविस्मरणीय सहयोग रहा था । -श्री जिनदत्तसूरि मण्डल, दादावाड़ी, अजमेर स्वप्नों को पूरा करने को लगे है । यहाँ पर अच्छे कार्यकर्ता खड़े किये जो उनके अधूरे स्मरणीय बन गई । हमारा कर्तव्य है कि हम आपके पादों पर चल कर नव निर्माण करे । आपके तन में व्याधि, मन में समाधि थी। भगवान उनकी प्रात्मा को शान्ति प्रदान करे तथा मृत्यु के कुछ दिन पूर्व प्रापका स्वास्थ्य बहुत खराब हम सबको यह शक्ति दे कि उनके मार्ग पर चनार रहा था। लेकिन आप मूक साधना मे लीन उनके द्वारा चालू कार्यों को पागे बटावें । मैं उन रहते थे । माहसी पुरुप की तरह सभी कष्टों को महान् योगी के चरण-कमलो में जत-मन वन्दन *... भाव गे महते रहे । आखिर उन्होने कष्टों के साथ उन्हें श्रद्धाजलि अर्पित करनी। पर विजय प्राप्त कर ली और चिर निद्रा में निहित में गये । अाज ऐसे महान् कर्मवीर हमारे मध्य -भूनपूर्व छात्रा की, नकिन उनकी यादें, बाते, कृतियाँ, निर- श्री चोर बानिया विशालय me- 75 जिनकी ऑखो मे बसता था भावीजन का स्वप्न महान् • श्रीमती शोभा सक्सेना एक लम्बे अतराल के पश्चात् जसे ही विद्या मुझे याद अाता है । ग्राज से तीन वप पूर्व लय परिसर की परिधि मे पहुँची, उसी क्षण मुझे का ममय, जब वे अमाध्य रोग से ग्रस्त होकर भी ऐसा अहसास हुआ, मानो विद्यालय का प्रत्येक टैक्सी के द्वारा विद्यालय के स्थापना दिवस समा- अस्तित्व कुछ दुख भरी व्यथा को अपने नीरव- रोह में उपस्थित हुए । अपनी अपार वेदना भाव से व्यक्त कर रहा हो । वातावरण वी वो एक चिर परिचित मुस्वान से मानो छिपाते म्तब्धता ने मन के द्वार पर दस्तक दी, प्राशका हुए बोल उठे थे- -सब कुछ ठी तो है, कही ने पट खोले और एक दुस भरी वेदना हमारे कोई कमी तो नहीं । सामने उभर कर पाई । हमारे पूज्य, प्यारे, विद्या शतशत वालिकामो का मन उनकी इस बात य के आधार स्तम्भ, ममाज के क्णधार, नारी से प्रसनता से खिल उठता था। जागृति के भविष्यदृष्टा श्रीमान् राजरूपजी टाक आज फिर विद्यालय में एक समारोह का हम इस असार ससार म छोडकर असीम अतराल प्रायोजन था । सम्पूर्ण विधिया पूर्ववत् थी परतु म कही विलुप्त हो गय । कुछ क्षण के लिए ऐसा सभी की आखें कही कुछ तलाश रही थी। किसी अहसास हुआ, मानो अपने शरीर का कोई महत्त्व. को देख पाने या असफल मा प्रयास कर रही थी। पूण अग क्ट कर अलग हो गया हो । वह तलाश थी पूज्य चाचा साहब की मैं भूल नही पाती उन क्षणों को जब जव नारी जागृति के क्षेत्र में महान् प्रयास करने विद्यालय में किसी समारोह का आयोजन होता वाले जन-जन के सहायक को आज भला हम पैसे था। परिवार पालक पिता की भाति उनकी उप भूल सकते हैं ? जो इस अन त सृष्टि मे नाशवान् स्थिति अनिवाय रूप में होती थी तथा जिस प्रकार शरीर से मरकर भी अपने महान् कम भाव से एक पिता स्नहासिक्त भाव से अपने फलते फूलते अमर हो गये। परिवार को देखकर खुशी से झूम उठता है । उसी पाप जग से जो गये, प्रकार अपने वालिका परिवार को उत्तरोत्तर वढते अजेय इसान की तरह ।। हुए देख कर, स्नेहासिक्त हाथ मस्तक पर रखकर मरण के इस रण मे, पूछा करते ये-कोई दुख तो नही । तब ऐसा अमरण आपण तनी कमान की तरह ।। आभास होता था माना सभी पीडा धुल चुकी हो । ~अध्यापिका, श्री वीर बालिका विद्यालय 76 नारी-शिक्षा के समाते है। प्रेमी गिक्षित न रह जाये, यही चिन्ता उन्हे सालती हमारी इस विद्यालय रूपी बगिया को महकते कई वर्ष हो गये, भिन्न-भिन्न प्रकार के पुष्पो से सुगन्धित इस बगिया के माली को काल के क्रूर हायो ने हमारे वीच से उठा लिया। जिस प्रकार एक माली अपने द्वारा सिजोए पुष्पों को देख कर मन ही मन पुलकित होता है उसी प्रकार इस विद्यालय परिवार (श्री वीर बालिका) का संरक्षण करने वाले थे, हमारे चाचा साहब (श्री राजरूपजी टाक) । अपने जीवन काल मे आप विभिन्न शैक्षिक संस्थानो से जुड़े रहे, पर वीर बालिका, तो आपके लिए परिवार स्वरूप थी। इस सस्था को फलता- फूलता देख कर आप ऐसे प्रसन्न होते थे जैसे माता- पिता अपनी सन्तान की प्रगति को देख कर फूले नहीं पाप स्त्री-शिक्षा के पक्षधर थे। श्री वीर बालिका सस्था इसी उद्देश्य से स्थापित हुई कि शहर की छात्राएं इससे लाभान्वित हो सके। वे चाहते थे कि छात्रायो का सर्वागीण विकास हो । शिक्षा के साथ-साथ उनमे अनुशासन,आध्यात्मिकता, परोपकार, त्याग जैसे गुणो का बीजारोपण हो, जिस संस्था के संस्थापक का समस्त जीवन ही प्रकाशवान हो, एक जाज्वल्यमान नक्षत्र ही नहीं, ग्राभाशील शशि सा शीतल तथा आलोकपुज, रवि या प्रपर और तेजोमय हो । उसके द्वारा संचालित गस्या तो अपने आप मे एक आदर्श होगी। आप छात्रानो की हर सुविधा का ध्यान रखते थे। जो छात्राये उन्हें आर्थिक स्थिति से पिछड़ी नजर आती, उनकी मदद वे ऐसे करते थे कि उन छात्रानो को यह आभास न हो पाये कि वे अन्य डाबानो से कमजोर है। वे उनके लिए यूनिफार्म, कीम, स्वेटर, पुस्तको आदि का पहले ही प्रवन्ध धारा देने थे। कोई भी छात्रा पैसो के अभाव में सम्पर्क में आता, उनके इन सद्गुणों की एक अमिट छाप अपने साथ ले जाता । स्वर्गीय चाचा सा० जव भी विद्यालय के किसी उत्सव मे पधारते थे, सबका मन श्रद्धा से भर उठता था। वे विद्यालय के हर उत्सव मे आते थे और मनोयोग पूर्वक पूरा उत्सव देखते थे। यहां के संचालक तथा शिक्षिकानो की प्रशंसा करते, तथा कलाकारो को अपने पास से पुरस्कृत करते थे। राजरूपजी एक महान् दिव्यात्मा पुनप थे। उन पर भगवान महावीर, बुद्ध व गांधी की धार थी। राजस्थान उनके त्यागमय जीवन कोमटा याद रखेगा । उनका जीवन सदा हमारा मार्ग-न करता रहेगा। -पुप्पा श्रीवास्तव अध्यापिका, श्री वीर बानिया विशाला - नती थी। प्रार अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के जोहरी थे पर हृदय पल मगल, उदार व मृदभापी थे। जो भी उनके 77 मौन का कुछ शेष है - भभावात मे टूट कर विखर न जाये । उस अनन्त "दशक घम लक्षण" की अनुपालना मे रत वह अपरिग्रही यद्यपि लक्ष्मीपति रहे परतु अपरिग्रह के सिद्धात को सर्वोपरि मानते हुए उन्होंने अपना जीवन एक जीव मुक्त मयासी की श्रीमती शशिवाला शर्मा भाति व्यतीत किया। निश्छल चरित्र, कम काण्डा श्वेत वस्त्रा से पाच्छादित, श्वेत पयक पर की कट्टरता से करोडो मील दूर, उन क्मयोगी अरस्थित, अन मीलित नेतो से साधक किसी गहन की जीवन शाला कर्मों के बंधन से कुछ इस समाधि म तल्लीन, गहन वेदना रूपी गरल के प्रकार बद्ध थी कि उन्होंने "खुद जियो औरो को चूंट को छा कर पीते हुए उन कालजयी, धम भी जीने दो" के इम महामत्र को कर्म भूमि म प्राण, प्रात स्मरणीय श्रीमान् राजरूपजी टाक उतारते हुए अनेक जीवन से हारे, निराशा धारणात् धम की उक्ति के जीव त प्रतिमान थे। के गहन अधेरे मे डूबते-उतरते लोगो को स्व- अपन अघखुले अघरो से जीवन के अवसान रोजगार हेतु प्रशिक्षित करके इस उक्ति को ययाय वाल म जो घम प्राणमयी शिक्षा देना चाहते थे सिद्ध कर दिखाया कि- वह शिक्षा मानवीय सृष्टि के लिए महानतम शिक्षा "अन्नने क्षणिका तृप्ति, यावत् जीव च विधया।" थी, पर तु काल के बूर पजा ने मध्य मे ही उनकी जिस प्रकार एक प्रज्ञावान व्यक्ति मथित दधि इम अमिट अभिलापा को दबाने का प्रयास किया, से नवनीत को ग्रहण करता है उसी प्रकार परतु उनके हृदयोदगार आज भी उनकी कम- "सार-सार समुद्र कृत्य" के कथनानुसार उन्होन स्थली में कार्यरत प्रति व्यक्ति के क्मठ हाथो से धम की गूढनम शिक्षा को ही ग्रहण किया। निकल कर मुखरित हो रहे हैं। उनके प्रत्येक धर्म मे उत्पन विकृतियो को उहोंने दूर मे ही प्रयास ने उपनिपद् के उस महान् मत्र को त्याग दिया। चरितार्थ पिया है.-"चरवति चरेवति इसी जीवन की सही शिक्षा, नैतिक सदाचरण की का परिणाम या कि वह अपने आप में एक शिक्षा है, इस मिदात के समथक श्रीमान् चाचा अनुपम दृष्टान्त थे। साहब ने शिक्षा के अन्तर्गत धार्मिक शिक्षा पर जैन धम मे मम्बद्ध होकर भी उस महा प्राण बहुत अधिक वल दिया। को धर्मों और वर्गों की प्राचीरें क्सिी सीमा में पौर अत मे यह कष्ट तो शरीर का धर्म है, वाघ नहीं मकी । धर्म को मावभौमिक एव कर्मों का अनुवध है, मानव जीवन की नियति है, चिरन्तन सत्ता के रूप में स्वीकारते हुए उहोंने ऐमा मानते हुए वह महान् प्रात्मा छक कर हर उस महान् धम को स्वीकारा, जो विश्व के ममस्त पीडा, हर वेदना को पीती रही उसके । मुख से उफ घमों में सर्वोपरि है। वे उस महान् मानवतावादी न निकला । वे सृष्टि से विलग हो गये परतु अपने धम के ममय रहे, जिसमे वाक् ताव की पोहा मिद्धा तो से विलग कभी नहीं हुए । अाज उनके तीण शर की पोडा से कहीं अधिक होती है । इसी सिद्धा त, उनके देखे गये स्वप्न हमारे लिए का परिणाम था कि वह जन जन के मानस की एक चुनौती बनकर खड़े हैं। उनकी स्मृति हमारे पीडा के सहायक तो बने परतु उनकै अतस् की लिए तभी सही सिद्ध होगी, जवकि हम उनके मन्ननम भावना यही रही कि कहीं किसी मानस स्वप्न को मावार कर दिखायेंगे। का मन लगे, कही किसी की वेदना प्रभावो के घ्यारयाता,श्री धीर या उ मा विद्यालय, जयपुर - 78 भारत की पावन भूमि पर अनेक महान् पुरुपों जौहरियों मे थे । आप रत्न परखने की कला में ने जन्म लिया उनमे से बहुमुखी प्रतिभा के धनी दक्ष थे। आपने इण्डियन जेमोलोजी (Indian वाचा साहब एक थे । सादा जीवन व उच्च विचार Gemology) पर अग्रेजी और हिन्दी मे एक के धनी श्री टाक साहब राष्ट्रीय विचार धारा के पुस्तक लिखी जो अमेरिका की एक संस्था जी. सर्व-धर्म समभावी कर्मठ समाजसेवी थे । धार्मिक आई. ए. के पाठ्यक्रम में है। महिष्णुता का भाव आपकी रग-रग मे व्याप्त था । चाचा साहब को रत्न-व्यवसाय के लिए 3 चाचा साहब भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गाधी वार पुरस्कृत किया गया । 2 वर्ष पूर्व अप्रेल में की धर्मनिरपेक्षतावादी नीति के समर्थक थे । चाचा इण्डियन जेम्स एण्ड डायमण्ड व कलर एसोसियेशन साहव प्रत्येक वर्ग के व्यक्ति हिन्दू हो या मुसलमान, अमेरिका न्यूयार्क में आपको आपकी उल्लेखनीय उसे अपना शिष्य बनाते थे। सेवायो के लिए स्वर्ण पदक द्वारा सम्मानित किया चाचा साहव का जन्म श्रावण बदी 15 सम्वत् गया । आपको लेख मे Dean of Jaipur Gem- 1964 को चिडावा राजस्थान मे मारणकचन्द Dealers की उपाधि से सम्बोधित किया गया । श्रीमाल के यहाँ हुआ था । मात्र 6 वर्ष की उम्र यह तो आम बात है कि किसी अध्यापक के मे ही वे अपने पिता के नाना श्री छगनलालजी शिष्य हो, परन्तु किसी व्यवसायी के शिप्य होना टाक के यहाँ गोद आ गये थे। बड़ी बात है । चाचा साहव ने सैकडो लोगो को चाचा साहब ने कक्षा 8 तक नियमित अध्ययन रत्न-व्यवसाय का प्रशिक्षण देकर उन्हे न केवल किया तत्पश्चात् 14 वर्ष की आयु मे ही भारत अपने पैरों पर खडा किया वरन् उन्हे श्री सम्पन्न स्वतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़े । आपने प्रजा- बनाकर समाजसेवा के क्षेत्र मे भी अग्रसर किया। मण्डल की स्थापना मे सहयोग दिया एवं इसके आपने रत्न-व्यवसाय की शिक्षा हेतु अपने घर पर कोपाध्यक्ष भी रहे । अापने भारत की आजादी ही एक केन्द्र की स्थापना की । चाचा साहब स्वयं अान्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। आप निष्णात रत्न पारखी थे। जयपुर राज्य की प्रथम विधान सभा के निर्वाचित श्रद्धेय श्री राजरूपजी टाक महिला गिक्षा के क्षेत्र मे भी सक्रिय रहे । आप जयपुर नगर मे श्रद्धेय चाचा साहब देश-विदेश के सुप्रसिद्ध महिला शिक्षा की मशाल प्रज्वलित करने वालों में सदरयो मे से एक थे। अनोखे व्यक्तित्व के धनी चाचा साहब 79 राष्ट्र भक्त • वह स्वयं एक सस्या थे। न जाने कितनी सस्थायें उनके द्वारा संचालित व अनु- प्रेरित यों । वे एक महान् धार्मिक महानु- भाव थे। वे एक महानतम समाज सेवक, परोपकारी राष्ट्रभक्त थे । उनको सेवायें चिरकाल तक जन-जीवन के हर पहलू मे स्मरण की जाती रहेंगी। से एक थे । इसका जीवत उदाहरण श्री वीर वातिका विद्यालय है। जिसकी स्थापना 63 वप पूर्व साध्वी श्री स्वरण श्रीजी के उपदेशो से प्रेरित होकर की गई थी। दुखी, पीडित व विकलाग व्यक्ति को देवार आपका हृदय पसीज जाता था। आपने विक्लागों की सेवा हेतु 'महावीर विकलाग महायता समिति' की स्थापना की व इसके सस्थापर एव अध्याय रहे । आपने नेत्रहीनो के कल्याण हेतु 'राजस्थान नेत्रहीन कल्याण सघ' को अपना सह्याग दिया तथा प्रतिम समय तक अध्यक्ष पद पर रहे। आपको पीडितो का मसीहा भी कहा जाता था। महामहिम चाचा साहब धार्मिक व अध्यात्म प्रिय व्यक्ति थे। सभी धमों के प्रति प्रापके मन मे पादर का भाव था। जैन धम के नियमो के आप पालन कर्ता थे। आप सादगी, सेवा, सहि ष्णुता व सरलता की प्रतिमूर्ति थे । पाप गावीजी के अनय भक्त थे। खादी आपका वाना व सेवा आपका व्रत रहा है । आपके "वसुधैव कुटुम्बकम्" के विचार थे अर्थात् अाप सारे ससार को अपना परिवार समझते रहे थे। चाचा साहब ऐसे व्यक्ति थे जिहोने एक ही क्षेत्र में नहीं वरन् अनेक क्षेत्रा में वचस्व प्राप्त किया । इतिहास पढने व लिखने वाले व्यक्ति तो बहुत होते हैं, परतु अपना इतिहास स्वय बनाने वाले व्यक्ति बहुत कम होते हैं । इतिहास बनान वाले व्यक्तियो मे ही चाचा साहब की गणना की जाती हैं। यही महान व्यक्तित्व स्वास्थ्य खराब होन के कारण दिनाक 27 1087 को ज्ञान पचमी के दिन परलोक मिधार गये, यह सभी लोगो के लिए वडे शोक की घटना है । हमारे समाज का एक सूर्य सदा के लिए अस्त हो गया। -मीना अग्रवाल, Ith C -श्री अखिल विश्व जैन मिशन, निवाई (टोंक) 80 सर्व समभाव सम पर्थक 0 कुमारी मीना जैन XI C R - चाचा साहव का नाम लेते ही ऐसा अनुभव चाचा साहब का जन्म श्रावण वदी 30 सवत होने लगता है मानो किसी वीतराग, शान्त एवम् 1964 को चिड़ावा राजस्थान के प्रमुख व्यवसायी सरल संन्यासी का नाम लिया जा रहा हो और श्रीमाल के यहाँ हुआ। 6 वर्ष की उम्र में ही सहसा एक भोली-भाली निश्छल, निष्कपट, राजरूपजी टांक जयपुर की प्रमुख फर्म 'श्री हीरा- निर्दोप, सौम्य मूर्ति सामने आ जाती है। भागीरथी लाल छगनलाल' के यहाँ गोद आ गये । यहाँ के पवित्र जल के समान उनका पुनीत एवम् इन्होने जयपुर के प्रमुख जौहरी व रत्न-पारखी अकृत्रिम अाचरण आज भी हमारे हृदय को पवित्र श्री रतनलालजी फोफलिया को रत्न-परीक्षा के बना रहा है। वह उन निःस्पृही व्यक्तियों में से थे, लिए अपना गुरु बनाया और अल्पकाल में ही जो वैभव एव विलासिता के रहते हुए भी पूर्ण ये गुरु की कृपा और अपनी प्रतिभा के बल विरक्त होते हैं : चाचा साहिब गीता में वर्णित पर रत्न-परीक्षकों में दक्ष गिने जाने लगे। इसके अनामक्त कर्मयोग की साक्षात् प्रतिमूर्ति थे । वाद इन्होंने जवाहरात के उद्योग को अपना प्रमुख कार्यक्षेत्र बनाया। शीघ्र ही आप अपनी बुद्धि बहुमुखी प्रतिभा के धनी, प्रमुख समाजसेवी, चातुर्य से विदेशों मे प्रमुख रत्न-पारसी के रूप राष्ट्रभक्त एवं देश के ख्याति प्राप्त प्रमुख जौहरी से पहचाने जाने लगे । श्री राजरूपजी टांक का कार्तिक शुक्ला 5 (ज्ञान विदेशों से इनके पास परीक्षा के लिये रल पचमी) मंगलवार, दिनांक 27-10-87 को मच्याह्न मे उनके निवास स्थान जयपुर में स्वर्गवास भेजे जाने लगे। इन्होने रत्नों पर Indian Gemology नामक पुस्तक लिखी। जिनकी ग्याति पूरे विश्व में फैली । अमेरिका मे तो उगे पाठ्य- श्री राजरूपजी टाक की मृत्यु से हमारे देश क्रम विषय के रूप में प्रमुख स्थान मिला है, ने पर प्रमूल्य रत्न को खो दिया है जिसे कई जवाहरात व्यवसाय के लिये गौरव की बात है। राजरूपजी टाक ने विभिन्न प्रान्नो व जानियों गया। गों नपा प्राप्त करना कठिन है । 81 कर्मठ समाजसेवी - स्व श्री रानरपजी टाक साहब के निधन से राजस्थान का एक महान एव मठ समाजसेवी, धमनिष्ठ, शिक्षाप्रेमी व्यक्तित्व का प्रभाव हो गया है । टांक साहय राजस्थान और मुख्यतया जैन समाज को एक विशिष्ट हस्ती थे । अनेक मानवीय गुणों से प्रतकृत टर साब का अनेर शिक्षण संस्थानों से घनिष्ठ सम्बप या। ---श्री पदमावती जैन बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय के विद्याथियो का रत्न-व्यवसाय का प्रशिक्षण स्वर्ण पदर में सम्मानित किया गया। भारतीय दिया। इनके द्वारा प्रशिक्षण प्राप्त करन वाल रत्न निर्यात मवद्ध न परिषद् द्वारा रत्नो के मर्वोच्च करीब 1000 विद्यार्थी थे। जिनमें अना न इस निर्यात के कारण आपको तीन बार सम्मानित व्यवसाय में कीर्तिमान स्थापित किया । राजरूपजी किया गया। विदेशी भी प्रापसे प्रति प्रभावित हुए टाक ज्वेलस एसोसियशन के अध्यक्ष भी रह । हैं । अमेरिका के 'माहन ज्वेलस' नामक पत्रिका के सम्पादय श्री हायर हप्ठ तो प्रापस जयपुर राजरूपजी टाक जवाहरात की शिक्षा मिलने को आये और अपनी पत्रिका में चाचा महिनामो को भी देना चाहले थे। उनका कहना था कि महिलाए पुरुषा से आगे बढ सकती हैं । लेकिन साब के सम्ब ध में लेय लिखते हुए चाचा साहब महिलामो का जवाहरात को शिक्षा देन के सपने को को Dean of Jaipur Gem Dealers से मम्यो वे घिन पिया। साकार नहीं कर सके। जौहरी राजरूपजी टार का जवाहरात के चाचा साहब प्रमुम रल-पारखी व जोही क्षेत्र में प्रमुख योगदान रहा है । जिस प्रकार दीपक थे लेकिन वे तो हमारे लिए एक रत्न से बढकर अधेरे में प्रकाश फैलाकर उजाला कर देता है उसी अमूल्य रत्न थे, उस अमूल्य रत्न के प्रयाश का साया प्रकार चाचा साहब न अनर को जवाहरात वा हमारे सिर पर नहीं रहा लेकिन उनके पादश मदा ज्ञान देकर उनके जीवन को दैदिप्यमान कर हमारे हृदय में दीपक के समान प्रकाश देत रहो। दिया। चाचा साहब का 2 वर्ष पूर्व ही अमरिका के यूयाक नगर में रत्न व्यवसाय की सस्था द्वारा 82 - डॉ. श्रीमती सरोज वर्मा 1 महामना चाचा साहब 4 निरन्तर प्रवहमान, गतिशील इस सृष्टि में पूज्य चाचा साहब के सान्निध्य मे रहकर, मानव आता है और चला जाता है किन्तु कुछ एक शिक्षिका के रूप मे उन्हे निकट से देखने के महामानव इस छोटी-सी जीवन-यात्रा मे इस अनेक अवसर मुझे मिलते रहे है । सन् 1955 संमृति के अनन्त मार्ग पर अपने श्रेष्ठ कर्मों के मे वीर बालिका स्कूल मे हाई स्कूल की छात्रायो ऐसे चरण-चिह्न छोड़ जाते है, जो पथ-प्रदर्शक के लिए अग्रेजी की शिक्षिका के रूप मे मेरी प्रकाश-स्तंभ बनकर भावी सतति का मार्ग प्रशस्त नियुक्ति हुई थी। उनकी महानता एव निरभि- करते रहते है । चाचा साहव ऐसे ही महामानव मानता के प्रथम दर्शन मुझे तभी हुए । सभी थे। शिक्षिकामो को वे पूर्ण सम्मान देते थे। वे मीधी-सादी वेशभूपा, धवल खादी के वस्त्र सस्था के संस्थापक है, सरक्षक है, ऐसा अहम् और मन भी वैसा ही धवल । सादा जीवन और उनमे कभी नही था । मुझे स्मरण है उनकी उच्च विचार की जीवन्त साकार प्रतिमा थे वे । पुत्रियों की शिक्षिका होने के नाते मैने यह कभी उनका व्यक्तित्व प्राचीन और नवीन का सुन्दर अनुभव नही किया कि वे अपनी सन्तान के लिए समन्वय था । एक ओर वे प्राचीन भारतीय कोई विशेष सुविधागो की अपेक्षा रखते हो । गंस्कृति और धर्म के पुजारी थे तो दूसरी ओर चाचा साहव की इस महान् सफलता में गांधीजी के क्रांतिकारी विचारो के पोपक, शोपित चाची का भी सक्रिय योगदान रहा है । मुझे याद पक्षधर । एक कर्मठ कार्यकर्ता के रूप मे है, स्कूल में प्राय. वे पाया करती थी । हम उन्हे सदैव कार्य मे संलग्न देखा जा सकता था । अध्यापिकाग्रो के साथ उनका व्यवहार अत्यन्त उनके व्यक्तित्व में कुछ ऐसा अपनापन था कि वात्सल्यपूर्ण और म्नेहपूर्ण रहा करता था । गोभी अभावग्रस्त व्यक्ति उनके पास नि.मकोच अपने हाथ से बनी स्वादिष्ट वस्तुएं गिनाने का रहन जाना था । अनेक बार ऐसा हुआ कि वे उन्हें बहुत शौक था । उन्ही दिनो (1956-57) मनमद लोगों को काम पर रख लेते थे सांगानेर मे एक सामाजिक गिविर लगा था। किसी कोई प्रावश्यकता नहीं होती थी और उस शिविर मे चाची भी ग्राई थी। शिविराथिको पिने पास से उन्हें आर्थिक सहायता देते थे, के प्रति उनका वात्सल्यपूर्ण व्यवहार मुझे पार यनि-विशेष के अहम् को ठेस न लगे । भी याद है। अपने हाथ में प्रमरम बना ना -- 83 जर तक मवको परोस नहीं लेती थीं तब तक अन्य कोन हो सकता है हरिजन सस्थाए, विध उह अच्छा नहीं लगता था । चाचीजी और वाश्रम, अनाथाश्रम, नेत्रहीन विद्यालय, गोमाला, चाचा मार के इस स्नेह ने ही कदाचित उम महावीर विक्लाग समिति इत्यादि अनेक संस्थानों ममय में सवतो वाघ कर रसा । चाचा सार मे उन्होंने मूक समाज सेवी की भाति काय स्यिा के सद्गुण उनकी सतानो में ययावत हैं । उनके है । यह वग उनका सदा सर्वदा ऋणी रहेगा। सुपुन और सुपुत्रिया मभी वढे विनीत, विनम्र, उनका अधीनस्य क्मचारी वर्ग क्या कभी मृदुभापी एव व्यवहार-कुशल हैं । उनके व्यक्तित्व की सदाशयता को भूल सकता महिना शिक्षा को वे बहुत महत्त्व देते थे। है। उनमें इतना अपनत्व था कि सभी बिना किसी वे प्राय रहा करते थे कि लडकी के हाथ मे भेदभाव के अपनी समस्याएं उनसे नि सकोच पूरे परिवार की बागडोर होती है । भावी सतति वहा करते थे और सदैव पिता का सा प्राश्वासन का निर्माण वही करती है अत उसका शिक्षित तथा बड़े भाई का सा सहयोग प्राप्त करते थे। होना पारश्यक ही नही, अनिवाय है । इमी एव प्रकार का सात्विक वातावरण उह सदव विचारधारा से प्रेरित वे महामना सदैव महिला घरे रहता था और ऐसा अनुभव होता है मानो शिक्षा के लिए जूझ्ने रहे । रूढियो से ग्रसित वही उनके समस्त शिव-मकल्पो एव सफलतामा जिस समाज मे रह कर इस सुकृत्य के लिए वा प्राधार था। उहोने जो सधप किया, उसकी प्राज कल्पना उनमे अदम्य साहम या, विपम माथिक भी नहीं की जा सकती। सन् 1925 से प्राज परिस्थितियो मे भी वे मडिग रहते थे। सौभाग्य तक जो अथक, सतत, एकनिष्ठ प्रयास उहोने से उहे पादरणीय हीराच दजी भाई साहब जसे रिया, उसी का पुण्य फल वीर बालिका शिक्षा यमठ एव एकनिष्ठ सहयोगी भी प्राप्त थे, जिन्होंने मम्यान है जहा आज हजारा छानाए शिक्षा लाभ उन्हें सदेव अनवरत सहयोग दिया । अपनी कर रही हैं। मूभवूझ एव दक्षता से चाचा साहब विषम स्थिति इस सस्था की सफलता का श्रेय उहोंने कभी का कोई न कोई समाधान निकाल ही लेते थे। अपने पर नहीं लिया । वे यही कहा करते थे कि हम लोगो को ऐसा लगता था कि हर समस्या का यह मब आप लोगो का ही प्रयास है । मैं तो समाधान उनके पास है। बिना पढा निवा व्यक्ति हूँ। वे ऐसे निरभिमानी व्यक्ति थे। चाचा साहव अाज हमारे बीच नहीं हैं, ऐसा सामान्य-जन का हिन ही उनके लिए सर्वोपरि की भाति वे मदा सर्वदा अपने शुभ कर्मों द्वारा लगता ही नहीं, वे अमर हैं। एक प्रकाश स्तम्भ व्यक्ति उह कहा करते थे कि जितना म्पया आपने ग्यच वरके महाविद्यालय, हमारा पथ-प्रदर्शन करते रहेंगे । हृदय की अपार शहर के बीच म वनवाया है उतने व्यय में आप श्रद्धा सहित नत-मस्तक होकर प्रत मे मैं यही शहर के बाहर सुदर व आकर्षक स्थान पर पहूंगी- महाविद्यालय, भवन का निर्माण करवा सक्त हैं। हे । युग द्रप्टा, हे । युग सृष्टा, इसके लिए हर बार वे यही कहते थे कि यह दो युग युग तक हमको प्रकाश तुम । बॉलेज शहर के सामान्य-जन की कयाम्रो के नत मस्तक सब प्राज खडे, लिए है जो दूर जापर ज्ञानोपार्जन नहीं कर करते तुमको शत-शत प्रणाम हम ॥ सरनों । सामा य-जन के लिए इतना सोचने वाला ~~~हिन्दी प्राध्यापिका, वीर बालिका कलिन था । वहुत 84
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श्री राजरूप टांक के सम्बन्ध में- LC ग आचार्यों-संतों,राजनेताओं,साहित्य- कारों, बुद्धिजीवियों, समाजसेवियों व्यक्तियों के आचार- विचार, उद्गार एवं अभिव्यक्त की गई भावनाओं का सूक्ष्म दर्शन- एवं प्रमुख A महाजन के अनुरूप सुश्रावक श्रीमान् राजरूपजी सा. टांक का दुःखद समाचार जाना। वे एक चलती-फिरती स्कूल की तरह से थे। उनके जीवन प्रसगो से आने वाले पीढ़ी के जवानों को प्रेरणा लेनी चाहिये । एक सुन्दर-सज्जन-धर्म श्रद्धालु व्यक्ति थे। अच्छे सामाजिक कार्यकर्ता भी थे। देश के उद्योग विशेषकर जवाहरात के व्यवसाय में उनका अच्छा योगदान रहा है । एक महाजन के अनुरूप उनका व्यावहारिक जीवन रहा है। उनके चले जाने से जैन श्वेताम्बर श्री संघ, जयपुर को बहुत योग्य व्यक्ति की कमी हुई है, जिसकी पूर्ति निकट भविष्य में होना सम्भव नही दिखता है । उनकी आत्मा को परमशांति मिले, यही शासन देव से नम्र प्रार्थना है । -प्राचार्य पद्मसागर सूरि, बम्बई धन्य जीवन श्री वीर बालिका शिक्षण संस्थान के प्राण, समाज-रत्न धावया, कुल-भूषण श्री राजनाजी माहव टाक, जो विश्व के विख्यात जीहरी थे, मानव मात्र की सेवा तन-मन-धन से करते-रो प्रायुष्य समाप्त करके सेवा के क्षेत्र मे अपूर्व उदाहरण बन गये। मेरे बिछडे हुए मेवा प्रेमी गेली पाद सताये। ग्वरतरगच्छ के एक महान् डायमण्ड का वियोग सदा मटकता रहेगा। हमारे बगान के सावी ने अपना जीवन सार्थक बनाया, योग्यता प्राप्त सज्जनों को प्रेस्टी रन्न भान ६ गये, अन्य जीवन । -प्राचार्य जिन उदयसागर मूरि, जबलपुर 35 देव, गुरु, धर्म के उपासक तत्त्व रमण शुचि ध्यान भणी जे पादरे । ते समता रस धाम स्वामि मुद्रा वरे ।। -श्रीमद् देवचन्द्रजी तत्त्व की रमणता की झलक जिस महानुभाव के चेहरे पर सदव प्रतीत होती थी, दिन आता के प्रति पूर्ण समर्पित भाव को जिहोने अपने जीवन में उतारा था, साधु-साध्वियों को शिक्षा एव औपघ आदि के लिये आप सदैव तत्पर रहत थे। गच्च और समाज के पाप महारत्न ये । उन महानुभाव का अभाव हमारे मन को सदैव उदास बनाता है । ऐस पुण्य आत्मा, शासन वे रत्न, पुण्य श्लाक श्रीमान् राजम्पजी सा टाक की परम पुनीत आत्मा शीघ्र शाश्वत मुख को प्राप्त करे, ऐमी परम कृपालु जिनेश्वर देव से प्रार्थना करता हुआ, मैं इस महान् दिवगत आत्मा को श्रद्धाजलि अपण करता हूँ। -~-जयानन्द मुनि, इन्दौर अपूरणीय क्षति समाज रत्न श्री राजरूपजी टाक की स्मृति में स्मृति विशेपार प्रकाशित हो रहा है, जानकर प्रसन्नता हुई । श्री टाक साहब का जीवन व्यापक उपयोगिता लिए हुए था। जैसे नदी का पानी, वृक्ष वा फल व सूय का प्रकाश सबके लिए हाता है, वैसे ही श्री राजस्पजी साहब का शरीर, बुद्धि, धन, अधिकार प्रादि जीवन की समस्त शक्तिया समाज, शहर, प्रात आदि के लिए काफी उपयागी थी। उन्होंने अपन जीवन में अनेक सस्थाग्रा के मक्रिय कायकर्ता रहकर अपनी सेवाएं प्रदान की। वीर वालिका महाविद्यालय के सर्वाङ्गीण विकास मे, प्रारम्भ से लेकर स्याति प्राप्त अवस्था तक में उनका विशेष योगदान रहा । पारिवारिक, सामाजिक, व्यापारिक क्षेत्र म प्रमुखता एव यश अजित बरने के साथ-माय धार्मिक क्षेत्र मे भी वे अग्रणी रहे । जिन दशन, गुरु भक्ति, स्वाध्याय, सामायिक प्रादि शुभ प्रवृत्तियाँ उनकी दनिक चर्या म प्रमुख क्तव्य थी। मैंन उनका अपने साध्यो जीवन के इकत्तीस वप में अनेक गर देखा ही नहीं, विशेष परिचय भी रहा-कई वार स्वाध्याय प्रवृत्ति मे उनके विचारो की गहराई ज्ञात होती थी । शिक्षा व चिकित्सा में वे विशेष रूप से भावनाशील थे । विनय विवेक उनकी प्रवृत्तियो मे प्रत्यक्ष परिलभित हाता था । मैं टाक साहब के व्यक्तित्व को जब अनेक प्रकार से व्यापक उपयोगी अनुभव करती हूँ तब मुझे जयपुर संघ के मध्य उनका देह विलय एष अपूरणीय क्षति महसूम होता है। उनकी सद्गत प्रात्मा को चिर शाति, सहज प्रात्म सुख प्राप्त हो-ऐसी शुभकामना । -साध्वी मणिप्रभा श्री 86 - अमृत पुरुष थे परम पूज्य गुरुदेव स्व. प्राचार्य भगवन्त श्री जिन कान्तिसागर सूरीश्वरजी म. सा. के प्रति उनका समर्पण भाव व लगाव अद्वितीय था । वे एक कर्मठ कार्यकर्ता, समाज नेता व विशिष्ट सूझ- बूझ के धनी थे । उनका पूरा जीवन परोपकार के प्रति समर्पित था। मध्यवर्गी स्वधर्मी वन्धुत्रों के लिये वे साक्षात् अमृत पुरुप थे । उनका सम्पूर्ण जीवन आदर्श था । उनकी स्मृति ने प्रकाशित हो रही यह स्मारिका उनके जीवन के हर नयनाभिराम पहलू को प्रकाशित करेगी व पाने वाली पीढ़ी को नया प्रकाश देगी। मैं यही कामना करता हूँ। -मुनि मणिप्रभ सागर - स्व-पर प्रकाशक 'चा.' सा. गुलाबी नगरी (जयपुर) के जाने-माने जौहरी, जिन्हें लोग 'चा.' साहब के नाम से जानते हैं । वे जयपुर के ही नही अपितु समस्त जौहरी समाज के रत्न-पारखियों मे सर्वोत्कृष्ट पारखी जाता थे । भारत मे ही नही अपितु विदेश मे भी उन्हें रत्न-पारखी विशिष्ट जौहरी के रूप में सम्मानित किया गया-जिस सम्मान को 'चा.' सा. की अस्वस्थता के कारण उनके सुयोग्य पुत्र श्री दुलीचन्द जी ने स्वीकारा। 'चा.' सा. जिनके जीवन के दोनों पक्ष सम थे। स्व-पर कल्याण मानो उनके जीवन का शृंगार था। जिनेन्द्र भक्ति, जिन-वाणी-वाचना (स्वाध्याय), उसकी गहराई मे गोते लगाना, उन पर गम्भीर चिंतन, साधु-साध्वियो के साथ धर्मगोष्ठी उन्हे प्रिय थी, समाज कल्याण मे भी उनका विशिष्ट योग रहा-समाजसेवा में जिन्होने विशेष रूप से श्री वीर बालिक महाविद्यालय सम्भाना तथा अन्य कई सस्थानो को भी सम्भाला, कितने ही बन्धुयो को जिन्होने रत्न-पारखी बना- अर्थोपार्जन योग्य बनाया। उनका जीवन स्व-पर प्रकाशक, दीपक तुल्य था-मात्र स्व या मात्र पर ही को न अपनाते हुए समान रूप से दोनो मे जीवन जीते हुए । जयपुर का अमूल्य रत्न, कोहिनूर हीग (आज) समाज के बीच से उठ गया पर उसका प्रकाश आज हजारो में जगमगा रहा है। वे गये पर रोशनी छोड़ गये । जैन समाज के धार्मिक क्षेत्र में भी उनके तुल्य अध्यात्म रस निमग्न व्यक्ति इने-गिने ही मिलेगे-उनका जीवन सभी लिए प्रेरणास्पद बने....इसी मगन्न कामना माथ। -विचक्षण पद रेणु साध्वी विद्य त् प्रभाश्री वीर वालिका विद्यालय की (भूतपूर्व छात्रा) बीना टांक धर्मप्रियता प्रशंसनीय थी श्री राजपजी टांक का स्वर्गगमन का पत्र मिला। शामन की गेवा, धर्मप्रियता प्रशंसनीय को को प्रात्मा को शान्ति मिले । -साध्वी देवेन्द्र श्री, हाटपिपल्या 87 । आदमी की पहचान सूरत नही, हृदय का विस्तार है ! - गुलाब विवमित होता है । उमरा प्राकार और रूप-रग जन-मन को मोहित करता है। उममी सौरभ मन मस्तिष्क को ताजगी देती है । यदि उममे से मुगध निकाल दी जाय तो रग रूप का क्या मूल्य हो सकता है ? कुछ भी नहीं । यही स्थिति व्यक्ति की है । शरीर क्तिना ही मनोज्ञ क्यों न हो? सुगठिन भी हो, क्या मूरय है उमका मूल्य होता है इसान की इन्मानियत का, मानव की मानवता का, व्यक्ति के व्यक्तित्व का। श्रीमान् राजरूपजी सा टाक ने जो ख्याति प्राप्त की है, उमका साल श्रेय उनकी सतत अध्ययनशील प्रवृत्ति, चितन मनन एव ज्ञानवधन की पिपामा वो है। वरुणा एव प्रेम की साक्षात् मूर्ति ही थे। वे ज्ञान, स्नेह व वात्सल्य के समुद्र थे। उनके जीवन म कभी उफान-उत्तेजना का नहीं दवा । उनके तेजस्वी चेहरे पर हर क्षण मधुर मुसान रहती थी। हृदय के कण-कण मे धम के प्रति अटूट श्रद्धा थी। आप देश के सुप्रसिद्ध जौहरी थे । रत्नों के पारखी तो थे ही, अध्यात्म साधना में भी भेद विनान के पारखी थे । समाजसवी व उदार हृदयी थे। सभी धर्मों के प्रति आपके मन में समान पादर था। श्राप में सादगी, सेवा भावना और सरलता थी। अाप अपने जीवन काल मे भगवान् महावीर विक्लाग सहायता समिति के अध्यक्ष थे । राजस्थान नेवहीन कल्याण संघ के अध्यक्ष थे। आपकी विचारधारा गाधीवादी थी। प्रजामण्डल के दोपाध्यक्ष भी ये । पाप कमठ वायकर्ता थे। व्यक्ति के शरीर पर काल का प्रभाव पड़ता है, जीणं होना यह शरीर पुद्गल का स्वभाव है । विचार, चितन, ज्ञान विमान प्रात्मा का धम है । प्रात्मा का न जम होता है और न कभी मृत्यु, जो जम लेता है वह अवश्य मरता है। समाज रत्न श्रीमान् टाक् सा नश्वर शरीर के न रहने से सार्वजनिक सेवा प्रादि का प्रभाव सटकता रहेगा। प्रादमी की पहचान मूरत नहीं उमया सद्व्यवहार है । शस्त्र की पहचान चमक नहीं, उसकी धार है। तुम माना या न मानो मेरी वात- धार्मिक की पहचान, उपामना नहीं, हृदय का विस्तार है ।। -विचक्षण शिशु साध्वी सुदर्शनाश्री 88 स्व-जीवन धन्य मृत्यु घ्र व सत्य है-जाना निश्चित है, जाने के पहले तैयारी करके जाना है खाली हाथ नहीं जाना है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण समाजसेवी, कर्मठ कार्यकर्ता श्री राजरूपजी टांक है । श्री टाक साहब खाली हाथ नही गये है --- पूरी तैयारी के साथ रवाना हुए है। वे समाज-रत्न स्थूल शरीर से हमारे समक्ष नहीं रहे किन्तु इनके कीर्तिस्तम्भ रूप, जन-सेवा, राष्ट्र-सेवा, धार्मिक, नैतिक, सामाजिक एवं व्यावहारिक क्षेत्र मे सच्ची लग्न, सच्चे त्याग से किये हुए कार्य युगो-युगो तक चिर- स्यायी रहेगे । चिरकाल तक करोड़ो जिह्वा श्रद्धान्वित होकर इस मृत्युञ्जयो समाज-रत्न के गीत गायेगी। अाज वे हमारे बीच मे से उठ गये, उसका सभी को दुख है । परन्तु मैं उनके परिवार एवं मित्र वर्ग से कहूंगी कि श्री टांक साहब की मृत्यु को शोक एवं मातम में नही बदले । आवश्यकता इस बात की है कि उन्होंने अपने स्वजीवन को समाज की सेवा में अर्पित करके धन्य बनाया है, अतः हम यह समझने का प्रयत्न करे कि आप क्या थे, अपने देश, जाति, धर्म, शिक्षा एवं समाज के लिये प्रापने क्या किया। उनकी उच्च भावनाओ को साकार रूप देकर उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करना हम सबका कर्तव्य है। यही उन्हें हमारी सच्ची श्रद्धाञ्जलि हो सकती है । उनकी प्रात्मा परम दिव्यता को प्राप्त करे, इसी मगल कामना के साथ । -साध्वी चन्द्रप्रभा श्री कामना यह जानकर प्रसन्नता हुई कि श्री राजरूपजी टांक को पुण्य स्मृति में श्री वीर बालिका भिक्षण संस्थान द्वारा स्मारिकर कर प्रकाशन किया जा रहा है । मै प्रकाशन की सफलता की कामना करता हूँ। ---शिवचरण माथुर मुख्यमंत्री, राजस्थान सरकार, जयपुर - दुःखियों के प्रति संवेदनशील स्व. श्री टांक जयपुर के हर क्षेत्र की संस्थानो से जुड़े हुए थे। उन्होने अपने जीवन में जारो लोगो का दुःख दर्द सुना, समझा व सहयोग दिया। उनके द्वारा रत्न-व्ययमाघ पर निजी * पुग्नक अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर चुकी है। श्री टांक के निधन से सार्वजनिक सेवा में क्षेत्र में गदा उनसे जुड़ी संस्थानों के जीवन में एक रिक्तता सी भा गई है। जिसकी निकट भविष्य में पनि होना असम्भव सा लगता है। स्व. श्री टांक के जीवन से हम सबको प्रेरणा लेकर उनका अनुसरण करना ही उनके प्रति हम सबकी सच्ची श्रद्धांजलि होगी । --गिरिराजप्रसाद तिवारी अध्यक्ष, राजस्थान विधान सभा, जयपा 89 1 प्रत्येक को प्यार दिया श्रद्धेय श्री राजस्पजी टाम के व्यक्तित्व से ही हमेशा ममाजसेवा की प्रेरणा मिलती रहेगी । श्री टाक ने जीवन भर गाधीवादी विचारधारा के अनुरूप काय किया और धार्मिक और आध्यात्मिक क्षेत्रा में अपनी सेवा व महिष्णुता से समाज के "प्रत्येक व्यक्ति को प्यार" दिया और उसके विकास मे महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। श्रद्धेय टाव साहब के निधन से जो कमी पाई है उसकी पूर्ति अत्य त कठिन है । जिन सस्थानी से वे जुड़े रहे, यदि वे श्री टाक साहव द्वारा बताये हुये माग पर अग्रसर होती रह तो अवश्य ही अपन लक्ष्य को प्राप्त कर सकगी। श्रद्धेय श्री टाक साहब को अपनी श्रद्धाजलि अर्पित करता हूँ। -किशन मोटवानी उपाध्यक्ष, राजस्थान विधान सभा, जयपुर गौरवमय जीवन श्री राजरूपजी टाक को मैं बहुत लम्बे समय से जानता हूं। क्योकि वे काग्रेसी एव एवं महान् समाजसेवी व्यक्ति थे। मेरा और उनका बहुत लम्बे अर्से तक सम्पर रहा। राजस्थान का मैं काग्रेस का बहुत लम्बे अर्मे तक अध्यक्ष था, तब उनसे मेरी बहुत बातें होती रहती थीं। जयपुर जसे शहर का सगठन चलान मे सक्रिय थे। पर मुझे इस बात का पूरा ज्ञान था कि राजनीति भी उनकी किसी पद को हासिल करने की नही थी, बल्कि लोगो की सेवा करने के लिए थी। वे ज्यादातर समाज हित मे चलने वानी मम्थानो का मचालन करने में ही अपना समय लगाते थे । श्री टाफ साहब द्वारा स्थापित और सचालित श्री वीर बालिका शिक्षण मस्थान, जो उ होने 63 सान पहले शुरू किया वह छोटा सा अकुर आज कितना बडा पौधा बन गया कि आज उसमें साढ़े तोन हजार छात्राएं पढती हैं । उम्र भी ईश्वर कृपा से उहोने अच्छी प्राप्त की क्योकि वे ईश्वर के भक्त थे । उहाने करीब 50 सावजनिक मस्थानो का सचालन करने का भार वहन किया । उनका गौरवमय जीवन रहा है । यहाँ तक कि उहान मरने के बाद भी अपने नत्र नेत्रहीन लोगों के लिए द दिय । मितना ऊँचा दर्जा उनके खयालातो का था। यह सब कुछ उनकी आज्ञा से ही उनके परिवार वाला ने किया। मैं भी स अवसर पर स्वर्गीय आत्मा को श्रद्धाजलि अर्पित करता हूँ। नाथूराम मिर्धा विधायक एव प्रदेशाध्यक्ष (लोकदल), जयपुर स्वय मे जनसेवी संस्था स्व श्री राजस्प टाक जयपुर राज्य प्रजामण्डल के सस्थापक सदस्य थे और जीवन पयन्त जनसवा म लगे रहे । स्व श्री टाक का आदश जीवन हम सभी को, जो सावजनिक क्षेत्र में कायरत है, युगो युगो तक प्रेरणा देता रहगा। मेरी विनम्र राय म स्व श्री टाक व्यक्ति न होकर स्वय में एक जनसेवी मस्था ही थे । उनकी पावन स्मृति मे मेरे शत शत प्रणाम । -अशोक गहलोत अध्यक्ष, राजस्थान प्रदेश काग्रेस कमेटी, जयपुर 90 एक नई दिशा दी श्री राजरूपजी टांक से मेरा निकट का सम्पर्क रहा है। वे जयपुर नगर के विकास के सम्बन्ध में बहुत चिंतित रहते थे । जवाहरात उद्योग को उन्होंने एक नई दिशा दी है। इस उद्योग में काम करने वाले व्यक्तियों के प्रशिक्षण की व्यवस्था कर उन्होने इस उद्योग को न केवल व्यापक ही बनाया बल्कि इस उद्योग के कारण जयपुर नगर की ख्याति को भी और आगे बढ़ा दिया । सामाजिक क्षेत्र मे भी वह बहुत ही अग्रणी रहे है । उनके निधन से बहुत बड़ी क्षति हुई है। मै उनकी प्रात्मा की शाति के लिए परमपिता परमात्मा से प्रार्थना करता हूँ। -भैरोंसिंह शेखावत नेता, प्रतिपक्ष, राजस्थान विधान सभा मिलनसार व्यक्ति थे स्वर्गीय श्री राजरूपजी टाक स्वतत्रता सेनानी थे। आपने आजादी की लडाई मे प्रजा- मण्डल मे रहकर भाग लिया था। पाप प्रजामण्डल को आर्थिक सहायता देते और दिलवाते भी थे । आपसे मेरा परिचय उसी समय जयपुर में हुआ था। आप सुप्रसिद्ध जौहरी, शिक्षा-प्रेमी, समाजसेवी एव मिलनसार व्यक्ति थे । अाप पीडितो के प्रति खास सहानुभूति रखते थे। आपने रत्नो पर पुस्तक भी लिखी है जो अमरीका में प्रामाणिक पुस्तक मानी जाती है। आपसे मेरे मधुर सम्बन्ध मृत्युपर्यन्त बने रहे। समाज को अापके जीवन से प्रेरणा ~कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी सम्पादक, दैनिक नवज्योति, जयपुर नेता खो दिया उनके जाने से समाज के एक पथ-प्रदर्गक वरिष्ठ नेता एवं धर्मनिष्ठ न्यनित्य को गो दिया। उनके स्थान की पूर्ति होना अब सम्भव नहीं है । लनी चाहिये । । -विजयसिंह नाहर पूर्व सांसद, भूतपूर्व उप मुख्यमंत्री, पश्चिमी बंगाल पूर्ति होना बड़ा कठिन है श्री राजाजी मा. हाक एम. महान विभूति में। उसने En मी एव उस्मयों में देखा । वे अपनी निगा यानी । उनकायमान मन नमाज को नोxिfor: । दिनम जैन । rem.riyal सच्चे श्रावक श्री राजरूपजी टार मच्चे मायने म प्रावर थे, जिन्होने जीवन पयत समाज की ममस्यापों में वार म सोचा और उनके निराकरण के उपाय किये । अनेक मस्थामा को प्रापने अपने तन मन धन स मीचा जो आपकी सच्ची स्मारक है। इन मस्यायो को भलीभाति चलाना और इनम नये मायाम जोडना हम सबकी जिम्मेवारी है और उनके द्वारा निर्मित परम्परामो को जो कि उन्होंने निजी एक मावजनिक जीवन में समाज के मामन रसी, उन पर चलते रहना ही उनके प्रति एक सजी श्रद्धाजलि होगी। -जे के जैन निदेशक, राजस्थान राज्य मभिनेक्षागार, बीकानेर सक्रिय योगदान भाई श्री राजरूपजी मेरे ममकालीन ममाजसेवी महान् एव उच्चकोटि के व्यक्तित्व वाले धामिक एव अध्यात्मप्रिय व्यक्ति थे। अपने मभी साथियो के साथ उनकी प्रात्मीय प्रेम एव सद्भाव था । वे जीवनपयन राष्ट्रीय विचारो से प्रोत प्रोत रहे और जयपुर नगर में चलने वाली कोई भी जन हितकारी सस्था शायद ही है जिसम रचि सेकर उसे यया सम्भव योगदान नहीं दिया हो। राष्ट्रीय स्तर एव जयपुर राज्य प्रजामण्डल के तत्वावधान मे चलाये गये सभी प्रादोलनों में उनका सक्रिय योगदान रहा । अपने व्यवसाय की उन्नति में तो सदैव लगे रहे और रत्न-व्यवसाय से जुड़े अमस्य लोगो ने उनके अनुभव से लाभ उठाया और जयपुर का नाम ऊंचा किया। वीर बालिका शिक्षण सस्थान जैसी उच्चकोटि की मस्था की स्थापना उनके त्याग एव अनवरत परिश्रम का ज्वलत उदाहरण है, जो जयपुरवामियो लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत रहेगा । मेरी यह हाकि अभिलाषा है वि भाई श्री राजरूपजी की स्मृति में उनकी सेवाप्रो के अनुरूप जयपुर में कोई उच्च काटि का स्मारक बनाया जाये ताकि ग्राने वाली पीढ़ियों के लिए वह सदैव एक ज्योति-बिम्ब का काय करता रहे। -~-वशीलाल लुहाडिया कार्यकारी अध्यक्ष, राज प्रदेश स्वतत्रता सैनिक सगठन, जयपुर A Gentleman Shri Raj Roopji was a gentleman to the core and endeared himself tt every one who came in Contact with him We in the podar family had as yot know special feeling and sentiments for him -Kantikumar R Podai Podar Chambers Jaipu 92 Kind Hearted If I Correctly remember, I was his third student. Prior to me were Parashji Dagha and Shantichandji Kala, who were also sitting with me then there with him for lessons. He was very open, Kind hearted and generously helpful to all us and to every body in his life time. Rasiklal Chimanlal Mehta सादा जीवन उच्च भावना भाई श्री राजरूपजी टांक जयपुर नगर के प्रमुख जौहरी, समाजसेवी, शिक्षा प्रेमी, सद्धमं- श्रद्धालु, राष्ट्र हितैपी, धनिक वर्ग के किन्तु "सादा जीवन, उच्च विचार वाले" निराभिमानी व्यक्ति थे। सामाजिक क्षेत्र मे रूढियो और गलत परम्पराग्रो के वे विरोधी थे। जहाँ तक मुझे स्मरण है, सहपाठी तो हम नही थे । उम्र में वे मेरे से कुछ बडे, लेकिन "हम उन्न" से ही थे। सामाजिक और धार्मिक क्रान्ति के समर्थक होने के कारण हम परस्पर नजदीक पाये । जैन नवयुवक मण्डल के ये कोपाध्यक्ष तथा मैं मत्री के रूप मे, मानद सहयोगी हम वर्षों रहे होगे ! वाद में, भिन्न क्षेत्र होते हुए भी पचास से अधिक वर्ष यह मित्रता पूर्ण सहयोग हमारा चला। व्यापार-व्यवसाय मे व्यवहार-शुद्धि के वे पो हिमायती थे । जवाहरात के धंधे में अपनी किणीर और तरुणों को उनकी "गद्दी" से प्रशिक्षण मिला । शिक्षा क्षेत्र में सामान्य पाठशाला में महा- विद्यालय तक एक संस्था को पहुंचाने के लिए निरन्नर तन-मन-धन मे वे प्राजीवन महायता, मंरक्षक रहे । सैकड़ों, हजारों "वीर बालिकाएँ" न गंस्था की देन है। श्री राजम्पनी अनेक मन्यानो मे पदाधिकारी, सदस्य, विपनया पोषाध्यक्ष रहे। श्री गजाजी नही अर्थ में रखन-पारगी में--प्रगती मारणा पन्ना मादि में नो मानव गुगो की नो । सन-पानी में नप में नमी प्रदस्त्रिीय मानि होगा, यपुर नगर में लिए गली - म्यान, ही नितानी नाममा जागर ifr: मी निको पीटा, -- -~पूर्णनन्द जैन Swamiri विशाल Reी, र A Great Humanist With the demise of Raj Roopji Saheb the country has lost a great scion He was a multifaceted personlity He was a teacher a statesman a social worker and above all a great humanist He was a freedom fighter, an educationist (he started a Girls High School and took keen interest in it), an administrator a Gandhian crusading for the decentralised economy His greatest contribution was to spread the knowledge and keep it flowing It was a guru-disciple tradition In spite of busy schedule he would always spare a few hours to impart knowledge about gems to those who came to learn I believe if ever Ivan Elich the great Chilean educationist promoted the idea of de-schooling the school it would have been due to his seeing Indian tradition of passing the knowledge to disciples Students would learn much more at the feet of such Gurus than they would have learned in the best of the schools He was a GEM EXCELLENCE amongst the gem merchants of this country The trade owes much to this great man in our business Kantı Lal Chordia अदम्य इच्छा शक्ति स्वर्गीय श्री राजरूपजी टाय ने पिछले 63 वर्षों की दीघ अवधि में महिला शिक्षा जगत् म जो योगदान दिया, वह चिर-स्मरणीय रहेगा। आपने वीर बालिका शिक्षण सस्थान के माध्यम से महिला शिक्षा के अन्तगत एक नई दिशा प्रदान की। आपने इस सस्थान को प्राथमिक शिक्षा से महाविद्यालयी शिक्षा स्तर का जो स्वरूप प्रदान किया उससे वतमान में लगभग 3500 छात्राएं लाभावित हो रही हैं । आपका यह योगदान निश्चय ही एक महान् व्यक्तित्व की अदम्य इच्छा शक्ति का परिणाम है। स्वर्गीय श्री राजरूपजी टाक केवल शिक्षा क्षेत्र में ही अग्रणी नहीं रहे, अपितु शारीरिक रूप से विक्लाग व्यक्तियो के प्रति भी आपका हृदय द्रवित रहा, जिसके परिणामस्वरूप महावीर विकलाग समिति की स्थापना हुई जो "जयपुर फुट" बना कर आज सम्पूर्ण विश्व मे प्रख्यात है । में व्यक्तिगत रूप से उस वहु आयामी व्यक्तित्व के प्रति अपनी श्रद्धाजलि अर्पित करती हूँ। उनके द्वारा प्रतिपादित काय निरतर गतिशील रहें, यही मेरी कामना है । -सुश्री धी प्रदा सयुक्त निदेशक (महिला) शिक्षा, अजमेर वृत्त, जयपुर 94 उनकी बड़ी इज्जत थी श्रीमान् राजरूपजी टांक के साथ हमारा तीस बरस का सम्बन्ध रहा है। हमने उनके साथ हरीविहार धर्मशाला, पालीतारणा और अखिल भारतीय खरतरगच्छ सघ के कार्यों के साथ-साथ काम किया । वे दीर्घ-ष्टि और सरल-स्वभावी थे। वे सबका मन जीत लेते थे। हमारे सघ मे उनकी बड़ी इज्जत थी। उनकी कमी को पूरा करना मुश्किल है। उनका हमारे पर बहुत प्रेम था, वह हमेशा याद आता है । उनकी आत्मा को गुरुदेव शान्ति देवे । -शान्तिलाल पारख प्रमुख, श्री जैन श्वे. खरतरगच्छ जैन संघ, वडोदरा - सरल हृदयी मेरा टांक साहब से सम्पर्क भूतपूर्व जयपुर राज्य के प्रजामण्डल तथा प्रवर्तित कांग्रेसी नेता रूप मे हुया था और उसके बाद उनके साथ स्नेह एव सम्पर्क उत्तरोत्तर बढ़ता ही गया। मैंने उनमे एक विशेष गुण यह देखा कि वे दूसरो की बातो को बड़े आराम से तथा प्रादरभाव से सुनते थे और अपने से बनती सहायता, चाहे वह किसी रूप मे हो, करने को उद्धत रहते थे। ऐसे सरन्न- हृदयी व्यक्ति समाज मे बहुत कम मिलते है और ऐसे व्यक्तियो की मेवा से समाज का सम्मान वढना है । अहिंसा को उन्होने अपने जीवन का अंग बनाया । वे मृदुभाषी और परिग्रह से निप्त होते हुए भी जीवनयापन मे अपरिग्रही थे। वे जैन-दर्णन के ज्ञाता थे और बाध्यात्मिक दृष्टि से मोक्ष माप्ति के लिए पाराधना एवं साधना करते थे । --पुखराज सिंघी शेठ कल्याणजी परमानंदजी पेढ़ी, सिरोही सच्चा स्मारक वर्गीय श्री राजाजी टांक ने अपने जीवन-पान में दो समय ना राष्ट्र, समाज और धर्म की निग्या नया की। ग्राम भी उग मतान् गायकी नामानामा मागत का बरे व्यापारी मोर मनपरीक्षा के बारे पनि थे । उनी अवागत पर निगम में मागना दी । उनी गमग 2-3 मारो गोया RT FAAT Afrrari नाराका सर पर माना mirrnार सपना गियाना। -~-दौलाना न ne streeta Amir fat लोकसेवी महापुरुष श्री टाक साहर बडे सात्विक तथा लोक्सेवी महापुरुष थे। मादा जीवन एवं उच्च विचार उनके जीवन का अादश रहा। वे लोकप्रिय, मृदुभाषी एव मिलनसार थे । श्रोध तथा अभिमान से मदा दूर रहते थे। उनका जीवन धार्मिक एवं आध्यात्मिर था। प्रारम्भ से ही मानव सेवा एव विशाल दृष्टिकोण को लेकर अग्रसर होते रहे । उहोने साहित्यिक, राजनीतिक एवं सामाजिक क्षता मे अपनी प्रतिभा, नि स्वार्थ सेवा तथा परोपकारिता का अद्भुत परिचय दिया । भगवान् महावीर का 2500वां निर्वाण महोत्सव बहुत ही शालीनता से सम्पन्न होने म अापका उल्लेखनीय योगदान रहा है। राष्ट्रोद्धार के कार्यों में भी आप मदैव अग्रणी रहे हैं । युवका को स्वावलम्बी बनाने की दिशा म आपने हजारो युवको का रत्न व्यवसाय का शिक्षण देकर उह स्वरोजगार म लगाया। आपका समस्त जीवन सेवाकार्यों में व्यतीत हुआ। अनकानेक संस्थानों न आपका सम्मानित किया 'समाजरत्न' आदि उपाधियो से विभूपित किया । -रतनलाल छाबड़ा मनी राजस्थान जैन समा, जयपुर अनूठा व्यक्तित्व श्रद्धेय टार सा का वडा ही विशाल दृष्टिकोण रहा । जिस-जिस सस्था को प्रापने प्राशीर्वार रूप वरद हस्त प्रदान किया, वे सब सस्थाएं आज फल फूल रही है और जन मानस की सेवा कर श्री जिनदत्तसूरि मण्डल, अजमेर को भी प्रापका पण सरक्षण मिलता रहा। आपने छात्रवृत्ति योजना, दादा मेला एव भोजनशाला को अत्यत स्नेह से अपनाया तथा मागदशन प्रदान किया। दादा मला, 1986 के शुभ अवसर पर अखिल भारतीय श्वेताम्बर जैन खरतरगच्छ महासंघ के अध्यक्ष श्रीमान् मोहनचदजी सा दडढा की अध्यक्षता में श्री जिनदत्तमरि मण्डल,, अजमेर द्वारा प्रापका हार्दिक अभिनदन कर मान पत्र प्रदान किया गया । श्री जिनदत्त विचषण जैन निवृत्ति प्राथम, दादावाडी, अजमेर में भी आपका सक्रिय योगदान रहा। श्री टाक सा के अनूठे व्यक्तित्व एव तदनुरूप कृतित्व का गुणगान करने में प्रत लिमे जा सकते हैं। आज उनके नहीं रहने से धम, समाज सेवा कार्यों मे एक बडी कमी हो गई हैं जा निकट भविष्य म पूरी नहीं हो सकेगी। हमारी सच्ची श्रद्धाजलि तो यही रहेगी कि हम उन सादगी व समताधारी जीवन से सोख लेवें तथा उनके चरण चिह्नो पर चलकर धम, समाज एवं जनहितकारी मेवा कार्यों में सक्रिय तन, मन, धन से निष्काम योगदान देते रह । -अमरचन्द लूणिया प्रध्यक्ष, श्री जिनदत्तसूरि मण्डल, दादाबाडी, अजमेर 96 अभिलाषा विविधता में एकता की भावना को प्रत्यक्ष रूप से प्रकट करने वाले इस महामानव ने जयपुर में इतने जौहरी पैदा कर डाले कि यह गुलावी नगरी जौहरियों की नगरी कहलाने लगी। जात-पांत व ऊंच-नीच का भेद-भाव न रखते हुए जो भी सीखने अाया, उसे जवाहरात व्यवसाय मे योग्य बनाने वाले इस मनीपी से मै अत्यधिक प्रभावित था । जहाँ भी वे मिलते, अनायास ही उनके चरण-स्पर्श हेतु मस्तक झुक जाता था । उनकी कार्य-पद्धति, प्रसंग-सृष्टि, जीवनादर्श, मधुर-मुस्कान आदि अद्भुत गुणो को हम जीवन में उतार सकें, यही अभिलापा है । -एच० के० पोद्दार प्रधान सम्पादक, राजस्थान व्यापार उद्योग पत्रिका राष्ट्रप्रेमी और समाजहितैषी रत्न-पारखियों में अग्रणी स्व. सेठ राजरूपजी टांक अपने ढग के एक वेजोड इन्सान थे । वे सरलता, सादगी और साधुता की प्रतिमूर्ति होने के साथ-साथ राष्ट्रप्रेमी और समाजहितैपी मानव थे। सादा जीवन और उच्च विचारो के प्रतीक थे। उनका जीवन अनुकरणीय था। वे अनेक मानवीय गुणों से अलकृत आदर्शोन्मुख व्यक्ति थे। उनका जीवन कल्याणकारी मानव का जीवन था। स्वहित और विकास का ध्यान रखने के साथ-साथ जनकल्याण और राष्ट्रोत्थान की भावना से भी अोतप्रोत थे । जयपुर राज्य प्रजामण्डल के कोषाध्यक्ष के रूप मे टाक साहब ने जयपुर मे जन जागरण और राजनैतिक चेतना का प्रसार करते हुए, राजस्थान मे स्वतत्रता की लहर उत्पन्न करने में अपनी विचारधारा के बल पर उत्कृष्ट राष्ट्रभक्त और जनसेवक का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया था। शिक्षा के प्रति आपके हृदय में अनन्य अनुराग था । शिक्षा के प्रचार और प्रसार मे आपने अपने जीवन का पर्याप्त समय लगाया। वीर बालिका शिक्षण संस्था बालिकाओं की अनुपम सेवा कर रही है । प्राथमिक शिक्षा से लेकर स्नातक कक्षानों का पठन-पाठन इस सस्था के माध्यम से हो रहा है। यह टांक साहब के जीवन की एक विशिष्ट उपलब्धि है। अनेक शिक्षण संस्थानो के आप पदाधिकारी और परामर्शक थे, इससे लगता है कि मूल मे टांक साहब सच्चे शिक्षक थे । टाक साहब निष्ठावान कार्यकर्ता ही नहीं अपितु कर्मठ नेता भी थे । भारत जैन महामण्डल, अनिल विश्व जन मिशन, अहिंसा इन्टरनेशनल आदि संगठनो मे आपको उच्च स्थान प्राप्त था। उन्नपारखी के रूप मे आपका सम्मान यूरोप और अमेरिका आदि मे भी हुआ । इससे पता लगता वाम्लव मे टांक साहब वेजोड इन्सान थे । टाक साहब ने किसी विश्वविद्यालय की कक्षाओं में अध्ययन करके दिगियां नहीं प्राप्त की श, पर हिन्दी और अंग्रेजी का आपको अच्छा ज्ञान था। विचार व्यक्त करने में माधुर्य और प्रमाः गुणों का पुट हमेशा उनकी भाषा मे रहता था । -माणिकचन्द्र जन श्री पदमावती जैन बालिका उ. मा. विद्यालय, जयपुर 97 आदर्श और यथार्थ का समन्वय स्व सेठ राजरूपजी टाक का नाम राजस्थान की राजनीति में उन्नायको मे बहे गौरव के साथ याद किया जाता है। जयपुर राज्य प्रजामण्डल के अग्रणी नेता स्व हीरालालजी शास्त्री और कपू रचन्द्र जी पाटनी, श्री टाप साहब की यायक्षमता और सह्योगात्मक भावना की वही इज्जत करते थ । टाक साहब का अदम्य उत्साह और सूझबूझ वास्तव में प्रशसा की वस्तु मानी जाती थी। विद्यालयो मे आपन केवल कक्षा 8 तक अध्ययन किया था, कितु पाप हिदी और अग्रेजी दोनो भापाया में अपने विचार प्रक्ट कर सकते थे। जवाहरात के क्षेत्र मे तो प्रापका नाम सदा अमर रहेगा। पापो संबडो नवयुवरी को रत्ना का ज्ञान प्राप्त कराके उनका माग प्रशस्त किया । वास्तव मे टार साहब का जीवन प्रादश और यथाथ का सम वयात्मक जीवन था। उनके निधन से जयपुर की कई सामाजिए और शिक्षण सस्थानो को बड़ा धक्का लगा है । वीर बालिका शिक्षण सस्थान के तो वे प्राण थे। -नि ना गुप्ता प्राचाय, अप्रवाल कॉलेज, जयपुर उल्लेखनीय विभूति अनेक मानवीय गुणो से विभूपित व्यक्ति के विषय मे क्या लिखा जाय, पुछ समझ में नहीं प्राता । स्व टाक साहब की गणना राजस्थान की उल्लेखनीय विभूतियों में की जाती है । वे राष्ट्रीय विचारधारा से प्रातप्रोत, शिक्षाप्रेमी, मानव कल्याण की भावना से परिपूण मानव थे। उनका जीवन एक प्रकार से सच्चे सत पुरुप का जीवन था। सत विनोगग भावे ने लिसा है कि वास्तविक सत वह है जो समाज से कम से कम लेता है और अधिक से अधिक समाज को देता है। श्रद्धेय राजरूपजी साहब टाक सरलता, त्याग, उदारता और साधुता की प्रतिमूर्ति थे । उनका समग्र जीवन देशहित, समाजोत्थान और शिक्षा के विस्तार और विकास में समर्पित रहा । शिक्षण सस्थानो और मुख्यत महिला शिक्षा के क्षेत्र मे तो वे अग्रणी रहे। वीर बालिका शिक्षाण सस्था के तो वे प्रारा स्वरूप रहे । -सुमित्रा छाबडा प्रधानाध्यापिका, श्री पदमावती जैन बालिया उ मा वि , जयपुर शिक्षा-प्रेम का जीता जागता उदाहरण शिक्षा का क्षेत्र हो चाहे सेवा का हो, चाह स्वाटिंग का हो, चाहे खादी ग्रामीण उद्योग का हो, महावीर विकलाग का हो चाहे नेत्रहीनो का हो-वे तन मन, धन से उनके साथ लगे रहे और सबकी मन से सेवा की। वे स्वय में एक मस्था थे। वीर बालिका विद्यालय व महाविद्यालय उनके शिक्षा प्रेम का जीता जागता उदाहरण है। -जगन्नाथसिंह मेहता अध्यक्ष, माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, राजस्थान, अजमेर 98 एक अविस्मरणीय व्यक्तित्व वयोवृद्ध प्रमुख समाजसेवी, जयपुर ही नहीं सम्पूर्ण भारत के मूर्धन्य जौहरी, मूर्धन्य जौहरी, राष्ट्रभक्त, स्वनामधन्य श्री राजरूपजी टाक, जो अब हमारे बीच नही रहे है, का जीवन वस्तुतः हर मानव के लिए प्रेरणास्रोत बन गया है। उन्होंने आजन्म अपने अथक परिश्रम, सेवा, त्याग व दानवीरता से जन-समुदाय के हृदय पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। अल्प आयु मे ही हीरे, रत्नो, जवाहरातो के व्यवसाय में मूर्धन्य स्थान प्राप्त कर लेना आप जैसे पारखी की व्यवसाय के प्रति अटूट निष्ठा का ही परिचायक है। जयपुर नगर के एक प्रमुख जौहरी श्री छगनलालजी टांक के घर गोद आए इस छोटे से लाल ने अपने को मूल्यवान हीरे-जवाहरातो से भी अधिक महत्त्वपूर्ण सिद्ध किया। जिस कुशलता से आपने एक हजार से अधिक शिष्यो को अपने प्रभावी प्रशिक्षण से कुशल जौहरी बनाया व उनका विश्वास जीता, इससे उनकी लोकप्रियता का सहज ही ज्ञान हो जाता है । श्री राजरूपजी टांक सा. का जीवन अदम्य साहस का भी प्रतीक है। स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व जब स्वतन्त्रता आन्दोलन में संलग्न क्रान्तिकारियों की धरपकड़ का काम जोरो पर था और अग्रेज सरकार की दृष्टि मे किसी भी क्रान्तिकारी को शरण देना कानूनी अपराध तो था ही साथ ही अपनी मृत्यु को घर बैठे बुलावा देने जैसा था, फिर भी परम साहसी टाक साहब ने राष्ट्रभक्ति का परिचय देते हुए अनेक क्रान्तिकारियों को अपने भवन में संरक्षण प्रदान किया। जयपुर राज्य मे जब प्रजामण्डलो का निर्माण हुआ तो श्री टांक साहब प्रजामण्डल के कोपाध्यक्ष बनाए गए । राजस्थान विधानसभा के वे सदस्य भी निर्वाचित हुए थे। स्वर्गीय टांक साहब जीवन भर विभिन्न धार्मिक, सामाजिक, शैक्षिक एवम् व्यापारिक संस्थानो मे उच्च पदो पर प्रतिष्ठित व कार्यरत रहे । यह उनकी बहुमुखी प्रतिभा ही थी कि भगवान् महावीर विकलांग सहायता समिति, महावीर इण्टरनेशनल, राजस्थान नेत्रहीन कल्याण संघ, अपिल भारतीय खरतरगच्छ सघ, जयपुर खरतरगच्छ संघ, ज्वैलर्स एसोसिएशन, राजस्थान प्राइवेट शिक्षा गघ व अन्य कई सघो के प्रमुख संचालको मे वे अग्रणी रहे। आपको 'समाज-रत्न' व 'समाज-भूपगा' की उपाधियो से भी अलकृत किया गया था। समाज सेवा आपके जीवन का मूलमन्त्र था। आपने हर अभावग्रस्त की सेवा करना अपना परम कर्तव्य समझा । COMMENDABLE He has lived a full life and useful too for the trade of gems and jewels. His services in the social field was also commendable, Arjun Kotwani Advocates & Tax Consultants 7-JHA-44, Jawahar Nagar, Jaipur-302 00.4 99 लोहे की लकीर "भाईजी" सच्चे अर्थो मे प्रवीण जौहरी थे, जिह केवल वैजान मणि-माणिक्यो की ही नहीं, अादमी की भी सच्ची परप थी, उनकी कसौटी पर परीक्षण के दौर से गुजरी विमी भी वस्तु की उनके द्वारा ग्रासी गई "यीमत" लोहे की लकीर मानी जाती रही-दुनिया म यह सौभाग्य विरले ही पाते हैं । "भाईजी" उनमे से एक थे। उनकी प्रतिभा को न केवन उनके गृह नगर जयपुर, राजस्थान प्रात और भारतवप ने ही प्राका अपितु मुल्क की सरहदा के पार अमरिया, इगलण्ड और जापान जैसे देशो में उनकी प्रतिमा सम्मानित हुई । इस सदम मे व भारती के सच्चे सपूत सावित हुए । जहां तक समाज और राष्ट्र या उमरी देन का प्रश्न है, उनके द्वारा स्थापित और कुशलता एवं निष्ठापूर्वक सचालित सस्थाग्रा का प्रश्न है-अगर गिनाने लगू तो फेहरिस्त बहुत लम्बी हो जायेगी -अलबत्ता उन्होने अपने पीछे वे जीव त स्मारक घोडे हैं जो समय के फलप पर न केवल अमिट रहेंगे बल्कि पान वाली पीढिया के लिय प्रकाश स्तम्भ का काम करेंगे । वे सही मायना मे "दोनब घु" थे-दीन होना की सहायता करते समय "अहसान" का बोध उनके पाम तक नही पटका-वे ता पाजीवन इमे अपना यतव्य मानवर निभाते चले गय -एक फंच लोसाक्ति स्मरण हो पाती है-"देते समय नजरें झवाये रखो तापि लेने वाले यी शम न देख समो" इस लोकोक्ति को उडान अपने जीवन मे चरिताय किया। उनके द्वारा किये गये गुप्तदान की साक्षी दीन दलितो की ये बस्तिया है जो उनकी पदचाप तर पहचानती थी-ऐसे 'प्रोपडदानी" सदियो शताब्दिया वाद ही पदा होते हैं । -जौहरी रूपचन्द बंद लाडनू सहदय श्री राजरूपजी व्यापारी होते हुए तपस्वी, मनस्वी, सहृदय व्यक्ति थे। वे सत्यनिष्ठ, क्तव्यनिष्ठ, सदाचारी, तथा जनहित में ही कार्यरत रहे । -के सी जोशी, IRS 38, अशोक नगर, इलाहाबाद 100 उत्कृष्ट शिक्षा-प्रेमी स्मृति अंक रूप मे किसी संस्था द्वारा अपनी स्मारिका का प्रकाणन बड़ा ही श्लाघनीय कार्य है । इससे उस संस्था के प्रति उस व्यक्ति विशेष के लगाव तथा उस व्यक्ति के व्यक्तित्व में उत्कृष्ट शिक्षा-प्रेमी होने के भाव की पुष्टि होती है। मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई है कि अपने पोपक श्री राजरूपजी टांक के बहुआयागी व्यक्तित्व को उजागर करने के लिए श्री वीर वालिका शिक्षण संस्था एक रमृति अंक का प्रकाशन कर रही है । यह एक सराहनीय कदम है और प्रेरणास्पद भी क्योंकि इससे वालिकामों के जीवन निर्माण मे एक नई चेतना जागृत होगी। यह स्मृति अंक सुन्दर व अनुकरणीय होगा-ऐया मेरा विश्वास है। जिस निष्ठा व लगन से श्री राजरूपजी टांक ने इस संस्था के निर्माण व विकास में योग दिया है- वह स्तुत्य योग्य है । यद्यपि एक उत्कृष्ट जोहरी और शिक्षा-प्रेमी का रप में श्री टांकजी अाज शरीर से हमारे बीच नही हैं किन्तु श्री वीर बालिका जैमी उत्कृष्ट शिक्षण गरया महिलामो में शिक्षा का प्रकाश फैलाते रहने के लिए जयपुर नगर में मजीव रूप में पड़ी है, जो उनकी स्मृति को सदा ताजा बनाये रखेगी। दिवंगत विभूति को शत-शत प्रणाम ! -बलवीर सिंह जिला शिक्षा अधिकारी, जयपुर मृदु भाषी श्री राजरूपजी टांक मृदुभापी एवं सरल स्वभाव के व्यक्ति थे । निग्वायं ममानमेवा भावना उनमें कूट-कूट कर भरी हुई थी। श्री वीर बालिका शिक्षण संस्थानों के संदर्भ में मुझे उनग मिलने का मौभाग पिष्ट 15 वर्षों में कई बार मिला। वे इन शिक्षण संस्थानों के वियाग बार में होगा नितिन थे और उनके विकास के मार्ग में आई किसी भी बाधा को तुरन्त हल करने के दिए ये हमेशा तत्पर रहते थे । ऐने नमाजसेवी को मरी मादर श्रद्धान्जलि । Audiom -धार... गर्ग पारन्टेन्ट सेवाभावी अपने शरीर में गम्यायों को अधिक से अधिर, मेगा frame a ril में निला एक प्रमें में गबन किया free Trint को भावना को गुनगर शनीमा नटना गा । जय जET मार नम्बर वेद नहीं रहा और न fritin; ft.ru मंचायोग प्रग्नित्य देगा। - -गंगवास , हर रचनात्मक कार्यकर्ता स्व० श्री राजरूपजी मेरे पुराने साथियो में एक घनिष्ठ मित्र थे। उन्होंने प्रजामण्डल व काग्रेस के उद्देश्यो की पूर्ति के लिए एक कमठ और रचनात्मक कार्यकर्ता के रूप में निजाम सेवा भाव से सावजनिक कई काय, जैसे हरिजनादार, गरीबों यी सहायता, विकलाग सहायता, समाजसेवा, नारी शिक्षा प्रसार आदि बहुत से कार वही लगन और उत्साह के साथ किये थे। मापने आजादी की लड़ाई में वहा भारी योगदान दिया, पाप गांधीवादी विचारधारा के अधिक समयक रह हैं। कार्यों म सावजनिक मस्थामा के यन के उपयोग का बहुत खयाल रखते थे। आप देश के सुप्रसिद्ध जोहरी और रत्न-पारसी थे, रत्त व्यवसाय में प्रापसे कई व्यक्तिया ने रत्न शिक्षण प्राप्त किया तथा रलो के सम्बध में एक पुस्तक भी लिसी है। -हनुमानप्रसाद शर्मा गोविरगढ़, जयपुर एक विशाल कल्पवृक्ष म्ब० श्री राजरूपजी टार वेवर एक साधारण नागरिक या व्यक्ति नहीं थे। वे स्वय में एक विशाल क्ल्पवृक्ष और मस्थान थे । उहान अपन दीप-जीवन काल में राष्ट्र, धम, व्यापार, समाज. जाति और शिक्षा के क्षेत्रा में निस्वाथ सेवा की। वे गांधी विचारधारा के मानन वात थे । प्रजामण्डल की स्थापना के साथ वर्षों उसके कोपाध्या भी रहे । श्री वीर बालिका शिक्षण सस्थान के विकास म उनका बडा यागदान रहा। गुलाबचन्द जैन स्वत प्रता सेनानी, दिल्ली बहुआयामी व्यक्तित्व पूज्य चाचा साहब श्री राजरपजी टाय का व्यक्तित्व रहुआयामी है । कहते हैं लक्ष्मी और सरस्वती का वर होता है परन्तु वे तो इस असभाव्य व भी विलारण सगम थे। वे इन दोनो के पुन्ज थे, इसीलिए उहाँने जीवन भर दाना का जीभर लुटाया । जिसे भी छुपा उसे सोना बना दिया और जो भी उनके सानिध्य म बैठा उसे सरस्वती की निमल धारा में प्रवगाहन करा दिया । मबसे विशेष बात जो उनम थी, वह यह थी कि उन्होंने अपने कल्याण के साथ-साय सुन्दर समाज का निर्माण भी कर दिखाया ऐसा समाज जो उनके ऋणो से युगो-युगो तक उऋरा नहीं हो सकेगा } वे धर्म, पति, पथ और सम्प्रदाय निरपेक्षता के सच्चे प्रतीक थे । उहोंने गृहस्थ मे रह कर ही सयामी का सा जीवन व्यतीत किया। उनके एव उनके परिवार की कौतिमय सुवास समय के साथ माथ बढ़ती रहे, इसी मगल कामना के साथ। शान्तिस्वरूप गुप्ता उपनिदेशक (सादी) जिला उद्योग के द्र, कोटा-324007 102 . त्यागमूर्ति को नमन मेरा परिचय श्रद्धेय राजरूपजी टांक से जुलाई, 1970 में हुआ । उनके सरल स्वभाव और चमकते हुये व्यक्तित्व से मैं अत्यन्त प्रभावित हुा । मेरा टांकजी से सम्बन्धित फर्म हीरालाल छगनलाल टांक से प्रायकर विभाग के अधिकारी के नाते सरकारी सम्बन्ध था। इसी के माध्यम से मेरा टांकजी के सुपुत्र श्री दुलीचन्दजी तथा परिवार के अन्य लोगो से सम्पर्क हुग्रा । ऐमी परिस्थिति मे प्रायः लोग व्यक्तिगत सम्बन्ध स्थापित करने मे डरते या हिचकते हैं । लेकिन मैंने देखा कि राजरूपजी की स्पष्टवादिता, सत्यनिष्ठा और व्यवहार की कोमलता मेरे सरकारी काम में सहायक ही रही है । इसलिए मेरे सम्बन्ध टांक परिवार से वेधड़क व्यक्तिगत हो गये, जो ग्राज तक चल रहे हैं । श्रद्धय राजरूपजी टाक की महानता थी कि उन्होने कभी अपने तथा फर्म के काम के लिए मुझसे जिक्र तक नहीं किया । जिस व्यक्ति में इतना संयम हो, आत्मविश्वास हो और सत्य-निष्ठा हो उसका काम स्वय होता है और वह नमन का पात्र है। राजनीति में सक्रिय होकर भी उन्होने किसी पद की अपेक्षा नहीं की । समाजसेवी, त्यागी व दानी होते हुए भी कभी व्यर्थ की प्रशसा या ख्याति पाने की इच्छा नहीं की। ऐसे त्याग-मूर्ति पर जयपुर को ही नहीं बल्कि सारे देश को गर्व होना चाहिए । डा० मोहनसिंह विश्वेन कारपोरेट टैक्स प्लानिंग एडवाइजर, उत्तर प्रदेश, लखनऊ पुण्य श्लोक पुण्य श्लोक श्री राजरूपजी टाक सच्चे मायने मे समाजसेवी थे, जिन्होने सदा ही गरीबो की सहायता की । वे एक बड़े जौहरी थे । वे रत्न-पारखी ही नहीं वरन् आदमियो की परीक्षा करने वाले थे। उन्होने समाज की जीवन में बहुत सेवाये की जिसका ज्वलत उदाहरण वीर बालिका विद्यालय, नेत्रहीन कल्याण संघ जैसी संस्थायें उनकी सदा ही प्राभारी रहेगी। चाचा राजरूपजी टांक ग्रन्धो के मसीहा थे । वे एक महान् फल एव छाया से युक्त वृक्ष के समान थे, जिनकी छाया में अनाथ, नेत्रहीन व वे-सहारा बालक-बालिकायो को सहायता व अध्ययन का मागं मिलता था । उनके न रहने से बड़ा अन्धकार मा हो गया है । भगवान ऐसा व्यक्ति और दे कि प्रकाश हो । शरीर से ही नही रहे पर अपने कार्यों से सदा अजर अमर है । -द्वारकेशलाल भट्ट (नेत्रहीन मानव), जयपुर जैन समाज के गौरव वे धार्मिक वृत्ति प्रौर निष्काम मेवा भावना मे युक्त स्व० श्री राजरूपजी टाफ जयपुर जंग समान से गौरव थे। उनकी स्वर्गीय ग्रात्मा के प्रति मेरी हार्दिक श्रद्धाञ्जलि । -विरधीलाल सेठी चयोयस समाजसेवी, जयपुर 103 भले इन्सान नियम है विधाना पा, सभी प्रापर चले जाते । मगर कुछ लोग हैं ऐसे, जो जाकर भी नहीं जाते। वे अवतार होते हैं और विद्वान् होते हैं। दयालु, लोकप्रिय, सत्यपाल, भले इन्मान होते हैं । वे रहते पास हैं हरदम, मगर न देस पामागे । टटोनोगे जो दिल अपना, तो उसको दिल में पायोगे । –छैल बिहारी होस्टल वार्डन, नेत्रहीन कल्याण संघ, जयपुर आदर्श महानुभाव परमवद्धय श्री राजरूपजी टाक से मेरा निक्ट सम्बन्ध लगभग पच्चीस वर्षों से था। उनकी प्रसिद्धि ही उनसे सम्पर्य करने का कारण बनी। मुझे जयपुर के एक व्यापारी ने एक मौद मे गलत बता कर कीमती भुगतान कर दिया था, जिसकी कोई लिखा पढी का सबूत मेरे पास नहीं था । वेवल विश्वास पर ही लेन देन हुआ था। इतने में व्यापारी की नियत वदल गई थी। मेर साथिया ने श्री राजरूपजी टाक का नाम बतलाया और विश्वास दिलाया कि वे ही ऐमे प्रभावशाली व्यक्ति हैं जो विना लिखा-पढी के इस मामले को सुनमा सक्ते हैं । मुझको प्राश्चर्य हुआ कि उनके व्यक्तित्व के प्रभाव से उस व्यापारी ने अपनी गलती स्वीकार की और हमारी स्पर्म का मुझे पेमेट वापस दिला दिया । उनके स्नेह और प्रेम के अनेक प्रकरण मेरी स्मृति मे भरे हैं जिनको लेखनीवद्ध परने में एक पुस्तिका का रुप हो जावेगा। में श्री टाम्जी को एक धमनिष्ठ, प्रादश महानुभाव के रूप में वन्दना करता हुआ हार्दिक श्रद्धान्जलि अर्पित करता हूँ। -त्रिलोकचन्द्र सेठ, बरेली कर्मयोगी परम श्रद्धेय श्री राजरूपजी टाक कर्मयोगी थे । काम करने में उनका विश्वास था। सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र मे निष्ठा, श्रद्धा एव समर्पित भाव से काय कर उसे हिमालय की ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया । चह शिक्षा क्षेत्र हो, व्यवसाय हो, राजनैतिक हो, धार्मिक हो, हिदी-प्रचार हो, गौवंश का सवधन हो, नेत्र सेवा हो, विक्लाग सेवा हो, मन्दिरो एव दादावाडिया रा निर्माण हो आदि । जिस सस्था के सदस्य एव पदाधिकारी वने, अपने कतव्या का पूर्ण निर्वाह विया, काम में विश्वास दिया, फल की इच्छा नहीं की। -हजारीमल बाठिया, कानपुर - 104 निस्वार्थ सेवा श्री राजरूपजी टांक जयपुर की जानीमानी उन हस्तियो मे से थे जिनसे राजस्थान का समस्त संस्था जगत् परिचित था । प्रदेश के परमार्थ के क्षेत्र में काम करने वाली जो भी संस्था उनके पास आती थी, वह कभी भी निराश नहीं लौटती थी। 50 से अधिक संस्थानो से तो वे सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे । जयपुर के प्रमुख रत्न-व्यवसायी होते हुए भी स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान जयपुर प्रजा मण्डल के सक्रिय कार्यकर्ता और कोषाध्यक्ष रह कर उन्होने सचमुच साहस का परिचय दिया था। देश की आजादी के बाद कांग्रेस के सत्ताधारी नेतानो तक ने धीरे-धीरे खादी और विशेपतया गांधी टोपी पहनना छोड़ दिया था। पर टांक साहव अन्तिम समय तक खादी और गांधी टोपी पहनते रहे । टांक साहव के देहान्त से जयपुर के सार्वजनिक जीवन को जो क्षति हुई है, उसकी पूर्ति होना कठिन है । उनकी निस्वार्थ सेवा के लिये उन्हें न केवल जयपुर का जैन समाज एवं उनके द्वारा शिक्षित और दीक्षित लगभग 2000 रत्न-पारखी वरन् राजस्थान भर का संस्था-परिवार उन्हें वर्षों तक स्मरण करता रहेगा। -बी. एल. पानगड़िया, जयपुर शुभ चिन्तक अनोखे व्यक्तित्व, बहु अनुभवी, सरल स्वभावी एवं अन्तर्राष्ट्रीय शुभ चिन्तक श्री राजस्पजी टांक से गत अनेक वर्षों से अखिल भारतीय श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ महासंघ की बैठको के अन्तर्गत परिचय रहा । वहुत समीप से उनकी कार्यप्रणाली, मधुर भापा एवं प्रातिथ्य सेवा से अत्यन्त प्रभावित हुआ । अनेक धार्मिक कार्यक्रमों एवं अजमेर दादाबाडी के प्रसंगो मे मार्गदर्शन एवं प्रोत्साहन मिला । खरतरगच्छ की गतिविधियों, संगठन, उद्देश्यो, कार्यों में विशेष रुचि रही। -राजेन्द्र नाहटा, भोपाल समय और अनुशासन के पक्के श्रद्धेय श्री राजरूपजी टांक उन महान् विभूतियों में से एक थे, जो गुणो की पान को जा सकते है । उनकी उदारता और प्रेम बड़े से लेकर छोटे मानवो के दिल को स्पर्श कर जाना या। उन्होंने उनके सम्पर्क मे पाए हुये हरेक व्यक्ति की तन-मन-धन से सेवा करते हमारे समक्ष एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया है । उन्होने समाज, धर्म और शिक्षण क्षेत्र मे अमूल्य मेवायें प्रदान कर अपना नाम रोशन कर दिया है । प्राप समय और अनुशासन के पक्के अनुयायी थे । आज के समय-चन में प्राप मारे साथ नहीं है, लेकिन आपके बताये हुये प्रादर्शों को अपनाते हुये अपना जीवन मानव-मेवान पतीन र यही प्रापको आज के दिन सच्ची और बहुमूल्य श्रद्धाञ्जलि होगी । माग्ने गन्तिम समय में नान गरचे हम मनको रोशनी की एक नयी राह दिया है जो मेरा र करनी रहेगी। -भगवानजी नाई वीरपाल शाह, अहमदाबाद 105 स्वतत्रता सेनानी खरतरगच्छ में हिदुस्तान के जाने-माने प्रागेवान एव जयपुर के विख्यात जोहरी तथा म्वतनता सेनानी, जयपुर जैन समाज के सिरमौर वयोवृद्ध श्री राजरूपजी टाक हमारे बीच नहीं रहे। अापने अनेक जन अजन वधुप्रो को जवाहरात का प्रशिक्षण देकर उहें जवाहरात के व्यापारिक क्षेत्रो में स्वावलम्बी बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। प्रापके सिमाये हुए क्तिने जौहरी लग्वपति नही बल्कि बरोडपति भी बने हुए तथा देश विदेश में उच्चकोटि के जवाहात के व्यापारी के रूप म प्रसिद्धि पा रहे हैं । -~-सुरेन्द्रसिंह लोढा सम्पादक, घमण भारती, प्रागरा सादा जीवन, उच्च विचार श्री राजरूपजी टाक पुरानी पीढी के कमठ सामाजिक व राजनैतिक कार्यकर्ता थे । जब से मैंने उहें देखा तब से वे पादतन शुद्ध खादी ही पहनते थे। राष्ट्रीय काग्रेस के पक्के सत्रिय कायर्ता थे। 'योग कमसु कौशलम्' का उह प्रतीक कहा जा सकता है । वे अपने काय में अद्वितीय कुशल थे । उहोने हजारो युवको को जवाहरात के काम मे योग्य बनाया । उहोंने कभी भी अपने मुंह से अपनी वडाई नहीं की। उह धनवान होने का घमण्ड नही था । सादा जीवन उच्च विचार का उहे प्रतीक कहा जा सकता है । उनके निधन से मैंन तो अपना वडा भाई ही खोया पर तु देश ने एक कमठ सामाजिक व राजनैतिक कायकर्ता खो दिया । जयपुर के जौहरी ममाज से एक अद्वितीय कुशल गुरु सदैव के लिए विदा हो गया । उनका निधन विश्व के जान माने जौहरियो के लिए प्रभाव पैदा कर गया । --श्रीचन्द मेहता, जोधपुर अनुकरणीय एव अभिनन्दनीय टाक साहब का जीवन हमारे लिए अनुकरणीय अभिनदनीय रहेगा। -प्रासकरण गुलेछा, मैलापुर, मद्रास अद्वितीय कार्य श्री राजस्प जी मा का व्यक्तित्व महान् था। उनमे देश प्रेम व शासनसेवा, समाजसेवा शिक्षा प्रेम आदि एक साथ बहुत से गुण विद्यमान थे और इमी से उन्होने सभा क्षेत्रो मे अद्वितीय काय किये थे । उहाने अपने कार्यों से समाज पर अमिट छाप छोड़ी है। -कालूराम बाफना, बालाघाट 106 सच्चा सेवक समाज का ही नहीं मानव मात्र का सच्चा सेवक हमारे बीच से उठ गया, जिसकी पूर्ति होना कठिन है। ---सुशीलचन्द्र लूणावत, भोपाल . सदा स्मरणीय श्री राजरूप जी टांक सा. ने जो सेवायें समाज में समर्पित की है वे सदा स्मरणीय रहेगी। -पुखराज सिंघी, सिरोही संस्था-निर्माता टांक साहब ने इस भव में कई आत्मानों का उत्थान किया, प्राजीविका की व्यवस्था की । अनेक संस्थानों का निर्माण किया । वीर बालिका स्कूल का उदाहरण हमारे सामने प्रस्तुत है । -~-गुरु विचक्षण विजयेन्द्र, टोंक चहुँमुखी प्रतिभा श्रीमान् टांक सा. का व्यक्तित्व चहुंमुखी प्रतिभा सम्पन्न था। उन्होने स्वतन्त्रता संग्राम मे नहां अभूतपूर्व योगदान दिया, वहां अाजादी के पश्चात् भी जन-सेवा की। लोक-कल्याण मे सदैव तत्पर रहे। --भंवरलाल, भीलवाड़ा स्मृति हमेशा रहेगी उनकी स्नेह, उदारता, मार्ग-दर्शन की स्मृति हमेशा बनी रहेगी। मूलचन्द भंसाली, कोटा महान् हस्ती ओहरियो मे व चितन करने वालो मे एफ महान् हरती की कमी हो गई। -मिलापचन्द गोलेछा, अहमदाबाद 107
महान्
क्षति
श्री राजरूप जी के निधन से जैन समाज ही नहीं वरन् सभी के लिए महान् क्षति हुई है।
वै मानव सहायर के प्रतीक थे।
-गौतमचन्द गोलेछा, टाटानगर
महान् आत्मा
वे महान् आत्मा थे। पये में उनका नाम विदेशो तक में मशहूर था। समाजमेवा पौर
धार्मिक कार्य मे वे हमेशा आगे रहे हैं।
-मारणकचन्द भडारी, जोधपुर
कर्मनिष्ठ
श्री चाचा साहब क्मनिष्ठ एव धमनिष्ठ व्यक्ति थे। परोपकार की भावना हर समय
विद्यमान रहती थी।
-शिववल्लभ द्विवेदी, न्यावर
अनमोल हीरा
हमारे खरतर गच्छ समाज ने एक अनमोल हीरा खो दिया, जिसरी क्षतिपूर्ति नहीं हो
उक्ती।
-सेठ मगलचद चम्पालाल, ब्यावर
अमर हो गये
मेरा उनसे बहुत अच्छा सम्पर्क था। मैं उनके जीवन के विषय में जितना जान पाया,
मेरे
हिसाव से वे अमर हो गये।
-माणकचद वेगाणी, बीकानेर
श्रेष्ठ शिक्षक
भारतवष के जौहरी समाज ने एक श्रेष्ठ शिक्षक तथा सामाजिक निस्वार्थ कायर्ता
खो दिया है।
-लालचन्द कोठारी, बीकानेर
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सच्चे जौहरी वे न केवल सच्चे जौहरी थे बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में भी खासकर नेत्रहीनो की शिक्षा के लिए बहुत अच्छा सहयोग कर रहे थे। -विजयसिंह नरवत, मकोर रत्न चला गया समाज का एक रत्न चला गया। समाज को बहुत चोट पड़ी है। शान्तिलाल पारश्वकर, बड़ौदा Father of Gems He was a Father of gems and jewellery trade too. His memorics and work will always be remembered by millions. -Yeshwantlal Jwaveri, Bombay Always Remembered His work-enthusiastic nature and helping every man who comes in business will always be remembered by many jewellers. -Suresh R. Kothari, Pondicheri महान् पुरुष अाज जैन समाज ने एक बहुत ही बेशकीमती रत्न खो दिया है। ऐसे रत्न समाज को विरले ही मिलते हैं । केवल जैन समाज ने ही नही समस्त देश से एक ऐसा प्रतिभाशाली महान् पुरुष उठ गया है, जिसकी पूर्ति होनी बहुत ही मुश्किल है । उनकी देश के लिए की गई सेवाएं अक्षुण्ण हैं। पन्नालाल मूलचन्द बोथरा, बीकानेर पूर्ण निष्ठावान् उन्होंने तन, मन, धन से हमारे तीर्थ को समय-समय पर पूरा योगदान दिया। ये गमा:- ल्ल थे। उन्होंने अपने जीवन-काल में अपने समाज के हजारों बच्चो को रोजगार दिया। ये प्रति पूर्ण निष्ठावान थे। -सोहनराज मेहता, जोधपुर 109
अमर है
राजरूप जी सा अमर हैं। जिनका जीवन लोगो की भलाई में व्यतीत हुआ है । हजारा
लडबा को हीरे की उन्च शिक्षा दिला कर जीवन के मागदशन में प्रवेश कराया है।
--लूणकरण कुन्दनमल मेहता, इन्दौर
श्रागे बढाया
उहोंने जीवनपर्यन्त समाज की सेवा की। राजनीति मे मागे बढयर भाग लिया। देश की
ग्राजादी के लिए काम किया और व्यापार में भी लोगो को आवश्यक शिक्षा देकर भागे बढाया।
-नाहटा, दिल्ली
रत्न व्यवसाय के द्वार सभी के लिए खोले
हमे रह-रह कर स्मरण हो पाता है कि उन्होंने बिना किसी भेदभाव के जवाहरान व्यवमाय
के द्वार सभी के लिए सोत दिए । इसे भी गोपनीय रखने का प्रयास नही किया ।
-चन्द्रकान्त,
बम्बई
रत्न खो दिया
जौहरी समाज के प्रति आपकी सेवानों को मुलाया नहीं जा सकता। पाज इस समाज ने
एक रत्न खो दिया है।
-~-धर्मनारायण कडेल, मद्रास
नाम ऊँचा किया
उ हाने निष्काम भाव से धार्मिक, सामाजिक कार्य किये व व्यवसाय जगत म नाम ऊंचा
किया है । वे सदा हमारी प्रेरणा के स्रोत रहेंगे।
~नौरतमल चपलोत, गुलाबपुरा
उच्च विचारक
उन जैसा श्रेष्ठ उच्च विचारस दानवीर, कृपालु, दूर देशी, गाधीवादी व्यक्ति समाज के
लिए गौरव था।
-मिलापचन्द जैन, कमलचन्द जैन, दिल्ली
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बेमिसाल उदाहरण
सेठ सा. के कार्यों को एवं उच्च आदर्शों को कभी भुलाया नहीं जा सकता । रोठ सा. मा
मिप्य परिवार एक ऐसा बेमिसाल उदाहरण है कि यदि हर व्यक्ति इस तरह दूसरो को अपना हुनर
सिखाने लग जावे तो देश का कल्याण हो जावे ।
मसीहा
वे धर्मात्मा, समाजसेवी, समाजरत्न एवं पीड़ितो के मसीहा थे।
---सज्जनसिंह चौरडिया, रतलाम
उच्चकोटि के शिल्पी
स्वर्गीय राजरूप जी अत्यन्त उच्चकोटि के शिल्पी और कलाकार थे। उनके निधन र
में मात्र उनके परिवार ने ही नहीं, बल्कि समूचे देश ने एक बहुमूल्य रत्न पो दिया है। प्राणा
उनके द्वारा प्रशिक्षित सैकड़ों शिल्पकार उनकी परम्परा और ख्याति को जीवित रखेंगे।
-हीरालाल चन्द्रकुमार सोमानी, पालकत्ता
अनमोल
श्री राजरूप जी ने देश और समाज के लिए जो मेवायें दी हैं ये अनमोल ! #क्षा
को जो शिक्षा उन्होने विद्यार्थियों को दी है, उसमें उनका याथिक जीवन ही बवान गया।
पारसमल नंटारी, गियाना
श्रीमान राजरूपजी टाक के देहावसान पर प्राप्त
संवेदना-सन्देश
( सस्थानो की अोर से )
1 अखिल भारतीय श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ महामघ, मालीवाड़ा, दिल्ली-6
2 श्री श्वेताम्बर जैन संघ ट्रस्ट, सतना (म० प्र०)
3 राजस्थान सस्कृत ससद, सरस सदन, गणगौरी बाजार, जयपुर
4 जयपुर शहर जिला काग्रेस कमेटी (प्राई), जयपुर
5 श्री मुनि सुव्रत स्वामी जन श्वेताम्बर देरासर ट्रस्ट, मालपुरा
6 राष्ट्रीय मजदूर काग्रेस, राज० शाखा, जयपुर
7 'जय' साहित्य मसद, जयपुर
8 राजस्थान राज्य भारत स्काउट व गाइड, जयपुर
9 सरदारशहर नागरिक परिपद, जयपुर
10 रामचद्र श्रीप्रकाश, कानपुर
11 श्री जैन श्वेताम्वर खरतरगच्छ सघ, जयपुर
12 जयपुर चम्बर आफ कामस एण्ड इण्डस्ट्री, जयपुर
13 तरुण समाज, जयपुर
14 श्री श्वेताम्बर जैन श्रीमाल सभा, जयपुर
15 जन युवा परिपद, जयपुर
16 जैन श्वेताम्बर सप, जवाहर नगर, जयपुर
17 राजस्थान चैम्बर, जयपुर
18 राजस्थान रेडीमेड गारमेट्स डीलस एसोसियेशन, जयपुर
19 भगवान महावीर विक्लाग सहायता समिति, जयपुर
20 स्वण नूतन बिहार, पालीताणा
21 इण्डियन एयरलाइस, जयपुर
22 देहली ज्वेलर्स एसोसियेशन, देहली
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पूज्य चाचा साहब के देहावसान पर दूर-दूर से संवेदना-सन्देश प्राप्त हुये, जो उनके व्यापक सम्पर्क, स्नेह भाव और बहु-आयामी व्यक्तित्व को प्रकट करते हैं । . श्रीमान् अमरनाथ हांडा प्रकाशचन्द मानमल शिखरचन्दजी चौधरी कानपुर विलोरा बम्बई भगवानदास टण्डन " इलाहाबाद इन्दौर उदयपुर मद्रास गिरधारीलाल श्रीमाल " हिम्मतसिंह बावेल प्रासकरण गोलेछा गनपतसिंह श्रीमती अनोखीदेवी श्रीमान् हिम्मतलाल बहरोड़ बहरोड़ खंभात बम्बई भोपाल घनश्याम जवेरी राजेन्द्र नाहटा बीकानेर जयपुर गौरीपुर प्रहमदावाद पालीताना हैदराबाद " मोतीलालजी कर्नल भवानीसिंह प्रासकरण कोठारी जीतुभाई विमलचन्द श्रीमाल " सुरेन्द्र लुणिया धीरेन्द्र दोशी मारणकचन्द वेताला नेमीचन्द अमरचन्द चोपड़ा " बसन्तलालजी , भंवरलाल गोलेखा " सुदर्गन डांगी " महेन्द्रकुमार जैन कलकत्ता धमतरी " बम्बई रायपुर । . 113 " " " " श्रीमान् निर्मलचन्द लोढा बलरत्ता " रणजीतसिंह भाटिया कलकत्ता कुदनलाल लालुभाई वम्बई जयच दलाल चौरडिया नागौर जगन्नाथ भण्डारी जोधपुर " सोनकरण मरोटी पानदीलाल शोभाराम डोसी महिंदपुर ध्वजाचद भण्डारी जोधपुर " एम० जी० शाह बम्बई , महावीरप्रसाद श्रीमाल चिहावा प्रकाशजी बम्बई श्रीमती इद्रजीत कौर वनस्थली विद्यापीठ श्रीमान् मोहनच द ढड्टा मद्रास हेमन्तकुमार शेसावत , कातिलाल छोटेलाल बम्बई नेमकुमार जन जयपुर राजमाना गायनीदेवी जयपुर श्रीमान् रामावतार कलरत्ता शाखा प्ररधक, स्टट वर ग्राफ बीकानेर एण्ड जयपुर चारसू श्रीमान् राजेन्द्रकुमार ए० शाह बम्बई फतेहमल सुजानमल लोढा टोर जयपुर प्रद्युम्नमिह धौलपुर पदमचद जन " " " शिवकुमार " , कलकत्ता रायकुमार राजेन्द्रकुमार शाह " मोनल, अतुन एम० कोठारी राजे द्रकुमार ठाड्डा " मुकुनदाम गोकुलदास राठो बप्पालाल बम्बई चम्बई बम्बई " व्यावर वम्बई 114 प्रभा एण्ड आनन्द वंगलौर धीरज पुष्पा वम्बई श्रीमान् विनयचन्द, प्रकाशचन्द खवाड़ मगनलाल जयसिंह लाल " बाबूलाल सी० मेहता , हीरालाल छगनलाल किरन श्रीमान् फकीरचन्द गाँधी भगवानदास सेठिया " अरुण आर० मेहता " जवाहरलाल देवेन्द्र कोठारी , मदनसिह राठौड़ जी० एल० मेहता " दिलीप बाबूलाल प्रवीण भाई वम्बई बम्बई बम्बई बम्बई बम्बई बम्बई बम्बई वाड़मेर बम्बई नयी दिल्ली " झालावाड़ निमागढ़ कलकत्ता बम्बई सूरत कलकत्ता " सुधीन्द्र रायपुर लखनऊ कलकत्ता " डी० सी० चोपड़ा इब्राहीम " महेन्द्र भाई , सुरेन्द्र कुमार " हस्तीमलजी गादिया इफजी ककूजी पहमदाबाद उज्जैन " हंसराज जोधपुर बड़ीदा छाजेड (विजयवाग) पन्नालाल संजयकुमार सत्येन्द्र चतुर्वेदी जमनादास पटेल अलवर खंभात डी० पी० राय " कुशलसिंह भागनपुर 115 पानीताना श्रीमान् सुरेश भावसिंहजी पण्डा जम्मू मद्राम सत्य भूपण मानिक चद पृथ्वीराज खूपचद सागरी बसरमा " दीनु भाई गज कुमार बम्बई यम्बई " जय ती भाई अमृतलात भावेरी नोपन राय श्रीमाल गोपीचद छुट्टन नाल जन रामनिवाम सीत दाम रामसिंह शकरनाल रायसोनी जयपुर अजमेर बम्बई जयपुर " प्रतापगढ़ " जमनादास ग्वालियर " " राधेश्याम लपनक " रतनना अग्रवाल पानपुर महमदावाद दीपर हुनीसिंह रमेश टण्डन लखनऊ " पूनमचन्द श्रीप्रकाश बम्बई राज बहादुर जगमोहन कपूर नयी दिल्ली नयी दिल्ली " " महेन्द्र दोशी मलाड कोटा " मद्रास वी० पार० मेहता माधुरी एण्ड विन्दु मिलापचद्र रूपचद्र श्रीमान् धर्मेंद्र कुमार मद्रास " दाऊ जी बम्बई चिरगांव, बम्बई बम्बई मन्नालाल नागदा " वीरेद्र मुकीम सम्पत एण्ड मेहता " बम्बई 116 श्रीमान् दौलत राम जैन माकडी अमरचन्द झारझूड के० के० दोपी प्रातमचन्दजी ग्वालिया, बम्बई वम्बई " व्यावर मद्रास अहमदाबाद मद्रास एस० एम० मेहता एस० एम० पटेल प्यारेचन्द डांगी ” कपूरचन्द्र श्रीमाल , जवाहरलालजी राक्यान मुकुलदास गोकुलदास पारस भण्डारी हैदराबाद देहली व्यावर सिवाना " वम्बई कलकत्ता दिल्ली कान्तिलाल नेमचन्द मोतीलाल कस्तूरीलाल पन्नालाल नाहटा , हीरालाल सोमानी " सज्जनसिह चोरडिया चन्द्रकान्त अानन्दकुमार किशनलाल सीताराम कलकत्ता रतलाम वम्बई " मद्रास " इन्द्रप्रस्थ जैम्स दिल्ली पारसमल धर्मचन्द विलाड़ा गुलाबपुरा इन्दौर कलकत्ता नौरतनमल चपलोत , लूणकरण मेहता जैम कम्पनी वापा लाल भाई लाल्स जैम्स एक्सपोर्ट धान्धिया ब्रदर्स गौतम ब्रदर्स कलकत्ता ग्रागरा कलकत्ता यम् 000 117 यह समीचीन है कि पृथ्वी मूरमायुक्त है । सद गुण सम्पन्न पुरुषार्थी मानवीय सवेदानाओ के कारण सूरमा होते हैं । जन हितार्थ जमे मेरे दादाजी भी सूरमा ही थे। "उदार चरितानाम् तू वसुधैव कुटुम्बकम्" भावना से प्राविभूत दादाजी ने धार्मिक, सामाजिक, व्यावसायिक, राजनैतिक तथा शैक्षिक क्षेत्र म मानवीय संवेदनाग्रो का पूरा पूरा ध्यान रखा । प्रत्येक क्षेत्र मे दादाजी ने अपने सदाशयी, सहिष्ण, सवेदना और मानवीय दृष्टिकोण से अपनी छाप छोडी। जो भी मिला, पाया और उनका अपना हो गया। सभी अपने आपको उनके निकट मानते थे। - सौम्य स्वभावी रत्न पारखी दादाजी ने मानव सेवा मे परम आनन्दानुभूति पाई । क्षणभर के लिए भी कभी उनकी क्रुद्ध भावमगिमा दृष्टिगोचर नहीं हुई। स्वयभू होकर भी कर्मवीर, जिज्ञासु भावना के प्रेरक थे। गाधी दर्शन से प्रभावित दादाजी मनुष्य मान की सेवा से ईश्वर की प्राप्ति सम्भव समझते थे। धर्म, जाति, मानवता के परम पुजारी की साक्षात् मूर्ति को कभी अडचन न डाल सकी । दान- वीर की तरह उनकी सदाशयता सभी के लिए, सभी क्षेत्रो मे सुलभ थी। हम आपके कृत्य से गौरवावित हैं, ऋणी हैं । मैं आपके पदचिह्नो का अनुसरण ही जीवन को साथकता समझूगा । यही मेरी सुमन अभिलाया उनके चरण-कमलो मे समर्पित है । ऐसे थे मेरे दादाजी -दुष्यन्त टाक 118 श्री राजरूप टांक का समय-समय पर अभिनन्दन किया गया। न सिर्फ भारत में अपितु विदेश में भी आपको सम्मान स्वरूप प्रशस्ति-पत्र प्रदान किये गये। स्मारिका के तीनों कवर पृष्ठों के अतिरिक्त दो अभिनन्दन-पत्र यहाँ अविकल रूप से प्रकाशित किये जा रहे हैं- 00001 श्री राजरूपजी टाँक को विभिन्न क्षेत्रों में उनके द्वारा की गई सेवाओं के उपलक्ष में जयपुर के नागरिकों की ओर से अभिनन्दन-पत्र प्रिय पुरुष! जयपुर के इतिहास में आज का दिन बहुत दिनों तक स्मरण किया जायेगा, जब यहाँ के हर वग और हर श्रेणी के प्रमुख नागरिक अपने एक ऐसे नगर-बन्धु का सम्मान करने के लिए एकत्रित हुए हैं जो अपने मानवीय गुणों के कारण, और विगत तीस वर्षों से हर क्षेत्र में और हर समय में उत्साह पूर्वक सेवाकार्य के कारण, सारे नगर में परमप्रिय और परम प्रतिष्ठित है । आप इस समय किसी ऐसे पद पर आसीन नही हैं जो ऐसे सम्मान-समारोहों का अभ्यस्त होता है, फिर भी नगर के ऊचे से ऊंचे पदासीन-व्यक्ति अाज अापका अभिनन्दन कर रहे हैं, यह आपकी लोकप्रियता का ऐसा प्रमाण है जो स्वय सुस्पष्ट है। पारखी पुरुष जयपुर के निर्माण के समय से अब तक के इतिहास में इस नगर की यह विशेषता रही है कि यहाँ विभिन्न क्षेत्रों में प्रवीण एवं कुशल व्यक्ति इसके जन-जीवन को ऐसा जाज्वल्यमान करते रहे कि इसका प्रकाश और प्रभाव देश के सब भागों में ही नहीं, विदेशो में भी, अनुभव किया जाता रहा है। इस दृष्टि से जिस क्षेत्र में इस नगर ने सबसे अधिक प्रतिष्ठा प्राप्त की वह है जवाहरान का उचोग और व्यवसाय । मूल्य और गुण दोनों में इस सर्वश्रेष्ठ वस्तु व व्यापार का इस नगर में सर्वाधिक विकास हुअा, और यह यहाँ की परम प्रतिष्ठित परम्परा बन गयो । ऐसी मुस्थापित परम्परा को भी पाप नया जीवन, नया स्वरूप और नया विकास दिया । 119 परमाया पुरुष इस एक उपलरि के लिये ही प्राप दन नगर के गौरवशाली इतिहाम में मदा गौरव के साय याद दिये गयेंगे, लेकिन इन नगर, और इस क्षेत्र में, मामाजिक जीवन या कोई मा नहीं है, जिससे पिरले पच्चीस-नीस वर्षों में आपकी नवं-मुनम उदारता और मव प्रमिद सरसता का लान नहीं मिला हो । प्रापवे इन गुणा में जिन सम्याप्रो और सगठनो ने अपने को अग्रमर और उन्नत किया उनन राजनतिक, सामाजिक, शरिणा, धामिन, व्यावमायिक तया और प्रना क्षेत्रा की इतनी मस्याए हैं कि उनको एक जाह गिनाना एक प्रकार से इन वर्षों का पूरा इनिहाम दुहराना हो जायेगा। उसकी आवश्यकता नहीं है, चू दि ग्राप म्वय अपनी महायता और सेवा में प्रयत्नों को परोक्ष रखने के प्रति अत्यन प्राग्रही रहे हैं और पार भी हम आपकी इस भावना का प्रादर करना चाहेंगे । प्रेरक पुरुष आप उन विग्ने पुरुषों में हैं जिहें सब को तया सव श्रेणियों के ही नहीं, मन पीढ़ियों के म्त्री-पुरुषा में काम करन, पोर मयो महायता ही नहीं, प्रेरणा देन का मुयश प्राप्त हुआ है। व्यापारिया तथा व्यवसायियों के तो मार अग्रज बन ही गये हैं. पला-बारीगरी के क्षेत्र में भी प्रापरा यादान ऐमा रहा है कि कम में रम जवाहरान के मारे काम के क्षेत्र में लो ममी लोग पापरी पादर और म्नह मे देखते हैं। इस क्षेत्र में एक ऐसी पीढी को मापने अपने पैरो पर ऐमा महा दिया है कि इनमें से अनेक की विदेशी तर में प्रतिष्ठा प्राप्त है। महिला निक्षा के माध्यम मे मापने अपन प्रगतितर विचारों का घर-घर में पहुंचाया है, और मातामों के माध्यम से अनेक घरों को प्रभावित पिया है । प्रापी शिष्य परम्परा अभी भी शावत और मजीव है, यह मदा प्रापरी स्मृति का इमी प्रकार बनाये रसुंगी। आपने जो कुछ अपने जीवन म अजिन किया रमे दे देकर ही अपने जीवन को एमा बना लिया है कि इमे सहज ही उदाहरण और प्रेरक कहा जा मरना है। टांक साहन हम प्राज यहा एवरित हारर अापकी ६४वीं वप गांठ पर दीर्घ, मुखद प्रौर माल जीवन की उत्तरोत्तर वृद्धि की हार्दिक कामना करते हैं । हम हैं, विमलचन्द सुराना प्रेमचन्द धाधिया एवम् श्री राजरूप टांक अभिनन्दन समिति की ओर से शिष्य परिवार देवीशकर तिवाडी वंद्य गोपालदत्त भत्री दिनाक १३-१२-७० प्रध्यम 120 . ने गयणता और वात्सल्य भाव अमृत कुम्भ क सुसहएय बने हैं । जयपुर ही नही भागद सच्चे रत्न-पारखी चहुमुखी प्रतिभा के धनी - कर्मठ जन-सेवक वात्सल्य मूर्ति समाजरत्न श्री राजरूप टांक की सेवा में सविनय सप्रेम समर्पित अभिनन्दन-पत श्रावक रत्न: विश्ववात्सल्य के महान् प्रणेता भगवान महावीर के शासन मे जन्म पाकर आपने अपने कार्यों व सेवाओं से जो आदर्श प्रस्तुत किया है उससे सारा समाज गौरवान्वित हुया है । जीवन के प्रारम्भिक काल से आज तक बरावर पाप सव ही प्रकार के सेवा कार्यों में अग्रणी रहे है । आपका जीवन सेवा का प्रतिरूप बन चुका है। जैन धर्म में आपकी अटूट श्रद्धा रही है जप-तप-स्वाध्याय आदि की विभिन्न प्रवृत्तियाँ आज भी औरों के लिये अनुकरणीय बन रही है। जैन समाज आपके जीवन मे श्रद्धा-विवेक और कर्तव्य के सुन्दर समन्वय को पाकर आपको सुश्रावक के रूप में मान्य करता रहा है। अाप पूर्ण देशभक्त रहे है-जयपुर मे प्रजामण्डल के जन्मदाताग्रो में प्रापका मुख्य स्थान रहा है । गांधीवादी विचारधारा के प्रवल समर्थक साथ ही रचनात्मक कार्यो मे आपकी अनन्य निष्ठा अाज भी युवको के लिये प्रेरणारूप है । शरीर से पूर्ण स्वस्थ न होते हुये भी प्राकृतिक प्रकोपों से पीडित (अकाल पीडित, अग्नि पीड़ित, बाढ़ पीड़ित) व्यक्तियों के लिये आप तुरन्त सेवा हेतु पहुंच जाते है । अभावग्रस्त लोगो के लिये आपका द्वार सदैव खुला है । आपने अनेक नेत्र केम्पो के माध्यम से रोगियो को दृष्टि प्रदान की है । नेत्रहीन व्यक्तियों के तो आप मसीहा है । जयपुर नेत्रहीन कल्याण संघ की स्था के प्राप प्राण है । अनाथाश्रम के सस्थापक, साथ ही हरिजन कल्याण कार्य में अग्रसर है ही। गायो के प्रति आपकी निष्ठा अनुपम है । गौशाला संघ के प्रेरणास्रोत रहे है । जयपुर की रचनात्मक कार्य करन वाली शायद ही कोई ऐसी संस्था होगी जो आपसे सम्बन्धित न हो। शैक्षणिक क्षेत्र मे आपकी सेवायो की तुलना करना भी कठिन है । अाप द्वारा संचालित श्री वीर बालिका महाविद्यालय व सम्बन्धित ज्ञान संस्थान ग्राज जयपुर के लिये गौरव रूप बन चुके है । लार ५४ वर्ष से अाप इस संस्था को नेतृत्व प्रदान कर रहे हैं। जयपुर शहर की चारदिवारी में मध्यम वर्ग की बहिनो के शिक्षण के लिये यही एकमात्र महाविद्यालय स्तर की नग्था है। हजागे- गार बालिकाये इस संस्था से लाभान्वित हो रही है । बहिनो को व्यावहारिक शिक्षण के साथ भाइयो को व्यवहारकुशल व्यापरी बनाने में प्रापती परमार्थी पुरुष : ज्ञान पीयूष : वात्मल्य मूति चाचा साहव : 121 अनक स्याना मे प्राय माहों युवा प्रापरे पास शिक्षण पार न केवल स्वावलम्बी बने हैं अपितु जवाहरात क्षेत्र मे कीर्तिमान कायम कर चुके हैं। ग्राप सच्चे पलापारपी है, पापने 'रल-परीक्षा' पुम्नर निखी है जो अमेरिकी विश्वविद्यालयों में मान्य हो चुकी है। प्राज ये मशीनी युग में भी रत्नों के परीण मापनी राय माय की जाती है। प्रापमा सग्रहालय देश विदेश के प्रबुद्ध वग के लिय प्रारपण की वस्तु बनी है। प्रायुर्वेद चिकित्सा पारसी रत्ना के माध्यम से आपने असाध्य रोगा के मफलतापूर्वक निदान क्यि हैं । साधु सतों के लिये प्रापना प्रौषध वैद्र मदेव बुता रहता है। आपने इम मम्र में अनेक नई पोजें भी की है। रोगिया के प्रति प्रापती करुणा अनुपम है। भगवान् महावीर विष नाग महायता ममिति के प्राप प्रमुग यायकर्ता है। सात्विक प्रकृति के धनी आपका सदंर माय म विश्वास रहा है नाम में नहीं। आपकी सदाशयता मस्थानो को नव- जीवन प्रदान करती है । प्राप 'भुन जायेंगे पर टूटेंगे नहीं' के सिद्धान में मदय प्रास्यावान रहे हैं । अापकी भाषा मदेव हित मितप्रिय रही है। प्रापो सरल स्वभाव व नियाम सेवा से सभी प्रभावित रहे हैं। प्रापकी जीवनचर्या भी नियमिन है। वस्तुत प्राप प्राचीन मम्वृति व नवीनता के अनुपम मिश्रण हैं । टार धमशाला अापकी ओर से समाज को मेंट की हुई सुदर मस्या है, यह केन्द्र स्थान में है, ग्रीष्म ऋतु म हजारा व्यक्ति यहाँ से जन प्राप्त करते हैं, महान् सेवा व पुण्य या वाय प्रापकी प्रेरणा से चल रहा है। जन-जन प्रिय जयपुर या प्रत्येक नागरिव रिसी न रिमी रूप म प्रापरे मम्प मे पाया है, कुछ वप पूर्व प्रापका नागरिक अमिन दन जयपुर का प्रमुख प्रायोजन बन चुका है। राजनीतिर क्षेत्र में प्राप गाधी- वादी व्यक्तित्व के रूप मे-सामाजिक क्षेत्र में प्रमुख समाजमेवी के रूप मे-शरिणर क्षेत्र में सरस्वती वे महान् उपासक के रूप में प्रभावग्रस्त लोगों म मानवता के रक्षक के रूप में यायकर्तानी में नेतृत्व प्रदाता के रूप में एव शिष्य परिवार में यात्मल्यदाता के रूप में आप सदैव देखे जा सकते हैं। पापा यह सम्मान मत्य शिन मुदरम् के मुरम्य वातावरण ये सजन हेतु है। समाज ने प्रापमे बहुत कुछ चाहा है और प्राप्न भी किया है। प्रापसी समाज के प्रति मूक मेवायें सदैव प्रेरणा दायी बनी हैं और बन रही हैं। मानवता के परम पुजारी का प्रमिन दन पर सारा समाज प्राज गौरवान्वित हो रहा है। राजस्थान न समा विनीत भारत जैन महा मण्डल भ० महावीर विकलांग सहायता रामलीला ग्राउह-महावीर जय ती १९८१ समिति 122 समाजसेवी श्री राजरूपजी टांक - जयपुर जैसी महानगरी में कतिपय महानुभाव ही ब्रह्म मुहूर्त की पुरवाई का आनन्द रामनिवास वाग मे उठाते रहे है, वे इस बात के साक्षी है कि किस तरह से सज्जनवृन्दों का एक काफिला प्रतिदिन ठहाकों एवं नित्य नये-नये स्मरणों के साथ वाग के परिवेश को सुशोभित करता था- उन्हीं के अगुवा श्री राजरूपजी टांक समय की नियम बद्धता से जुड़े हुए अपनी सज्जनता एवं सरलता से भ्रमण प्रेमियों को सुवासित किये हुए थे। उनकी कार काफिले के पीछे-पीछे खाली चला करती थी। वाग के परिसर को पार करने के उपरान्त ही समाजसेवी श्री राजरूपजी उसका उपयोग करते थे। तिमिर के इस घोर भौतिकवादी अन्धकार मे श्री राजरूपजी ऐसी दीपशिखा थे जिन्होने गांधी- वादी नैतिक मूल्यों को न केवल जीवन में प्राचरित किया वरन् महिला शिक्षा विकलांगों की सेवा एवं प्राकृतिक चिकित्सा के वे सजग हिमायती थे। वापूनगर स्थित प्राकृतिक चिकित्सालय से उनकी प्रगाढ़ता रही। भारतीय वेशभूपा से सुसज्जित, सुसम्पन्न जौहरी श्री टांक ने जवाहरात के व्यवसाय मे जयपुर के सैकड़ों बच्चों को प्रशिक्षित कर जवाहरात के व्यवसाय में उन्हें निःस्वार्थ भाव से प्रतिष्ठित रोजगार मे लगाया । आज भी गुरु शिष्य परम्परा से जवाहरात का प्रशिक्षण पाने वाले जौहरी जानते है कि श्री टांक माह प्रशिक्षणार्थियो को चुनने में कितने पारखी थे। नारी शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने वीर बालिका स्कूल एवं महाविद्यालय की स्थापना अपने स्वयं के निजी श्रम से की। प्रारम्भिक अवस्था मे तो महिला शिक्षिकाओं को उन्होने निजी तौर पर तैयार कर लड़कियों को पढ़ाने हेतु प्रोत्साहित किया, उसके फलस्वरूप उनके द्वारा लगाया गया वृक्ष पुष्पित होकर अपने सुगन्ध से सबको मुवागिन कर सम्माननीय श्री राजरूपजी टाक. २ पत्ति को निहार रहा है । ० श्री निर्मलकुमार शुक्ला विपश्यना 'योगाचार्य' 123 । sar ऐतिहासिक यादगार - जयपुर मुन्य रूप से 'जवाहरात व्यवसाय' के लिए विश्व विख्यात है । वतमान मे जवा हरात उद्योग को सर्वोच्च स्थान पर लाने का सारा श्रेय श्रीमान् राजरूपजी टाक को ही जाता है । अापने गुरु परम्परा का निर्वाह करते हुए, अथक परिश्रम व लगन से जवाहरात व्यवसायियो व शिल्प कारा को तराश कर विश्व मे इस उद्योग में कातिकरी परिवर्तन किया, इस फातिकारी परिवतन को आगे बढाने के लिए "रत्न तथा प्राभूपण निर्यात सवधन परिषद" वाणिज्य मत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रायोजित प्रथम "रत्न शिल्पी प्रशिक्षण विद्यालय" की स्थापना, उच्च स्तर पर उच्च तकनीक प्राप्त रत्न-शिल्पियो को तैयार करने के लिए की गई। "रत्न-शिल्पी प्रशिक्षण विद्यालय" को आपकी सेवाग्रो का पूरा मौका मिला । वृद्धावस्था पान पर भी आपका मन जवाहरात उद्योग को एक कदम और आगे बढाने व विश्व मे उच्च तकनीक प्राप्त शिल्पकारो को तैयार करने का चितन व मथन चला, उसकी साकार रूप में परिणती हुई" रत्न शिल्पी प्रशिक्षण विद्यालय मे, आपने उदार हृदय से शिल्पकारो को नई तकनीक से अवगत करवाया। प्रापका जवाहरात शिक्षा जगत् मे मगठित रूप मे अतिम सफल ऐतिहासिक यादगार । प्रयास रहा । ताराचन्द जैन प्रशिक्षक 124 Karnasiya सार्वजनिक श्रद्धांजलि सभा में । अश्रुपूरित हृदयोद्गार → सुबोध विद्यालय - के प्रांगण में प्रायोजित सभा में ह . प्रवेश करते हुए माननीय मुख्य न्यायाधीश श्री गुमानमल लोढ़ा एवं समारोह चाचा साहब को श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुये माननीय के - प्रायोजक मुख्य न्यायाधीश श्री गुमानमल लोढ़ा इस अवसर पर विभिन्न संस्थानों के पदाधिकारियों एवं विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा प्रगट किये गये विचार है ३ मान योनि में. पावन पर्यभाग नमी दिन जमार नगमाणिो से माग में fam नागिनोगता मारत TE: Taman : fr:ruitी 7. Ritikriyaf. T . + नागरिका एव पूज्य चाचा सा मे जुडी अनेर और भी प्रधिर बढा दिया । सर्वाधिक नियान के सम्याग्रा के सदस्यो एव पदाधिकारियो ने अपने कारण आपको तीन बार मम्मानित किया गया। हृदयोद्गार व्यक्त किये। 'ममाज रत्न' और 'ममाज विभूपण' को उपाधि सभा का प्रारम्भ श्री हीराचन्दजी वैद न शोर मे मम्मानित चाचा माहब ने जिम क्षेत्र पर अपना मतप्त वाणी मे कुछ इस प्रकार कहत हुए क्यिा वरद हस्त रप दिया वह मदा-सदा के लिए सभम कि जम तो सभी वा महात्सव म्प होता है परन्तु हो गया। ऐसे प्रात म्मरणीय परम पूज्य चाचा ससार में कुछ ऐमी भी हस्तियां होती हैं जिनरी मा के प्रति जयपुर नगरवासियो ने यदा मुमन मृत्यु भी महोत्सव बन जाया करती है । मजोर-जो हार गूया है, उमम विचार म्पी पुष्पी की लडी कुछ इस प्रकार है । पूज्य चाचा सा युग पुरुष, परणामूर्ति व पीडिता के ममीहा थे। अाज हमारे मध्य वे श्री दौलतमल भडारी भौतिक शरीर स विद्यमान नहीं हैं परन्तु उनमें मेरा श्री राजरूपजी टार के माप 70-72 HTAT -- । श्रद्धाजलि सभा में मच पर विशिष्ट व्यक्तित्व मिद्धात हमारे पथ प्रदशक सिद्ध होंगे। अाज मे माल मे भी ज्यादा पुराना सम्बध था । मैं और 63 वप पूर्व महिला शिक्षा की ममस्या को देखते वे तीसरी, चौथी कक्षा में लीलाधरजी वी पाठ हुए उहोंने श्री वीर बालिका विद्यालय की शाला में पढते थे । उहें न केवल रत्न-व्यवसाय म्थापना की। महात्मा गाधी की भांति अपने का ही पूण नान या अपितु हर क्षेत्र मे वह नान सम्पूण जीवन का पर सेवा हेतु समर्पित कर के धनी थे। उनके साठोपरात समारोह में मेरे द्वारा उनकी लिखी हुई पुस्तक का विमोचन अपने व्यवमाय को अतराष्ट्रीय गौरव प्रदान करवाया गया । मुझे ऐसा लगता था कि वे न केवल करने वाले महामना चाचा साहब लेखन एव ज्ञान रत्न पारखी ही थे अपितु उहें ज्योतिष शास्त्र के क्षेत्र म भी कुछ पीछे नहीं रहे। अमेरिका का भी पूरण ज्ञान था। वे एक ऐसे निष्क्लर जसे ख्याति प्राप्त स्थल से स्वर्ण पदक प्राप्त कर अमूल्य मोती थे, जिनवा ताज मारणव का था अापने जयपुर एव रत्न-व्यवसाय के गौरव को तथा जिनकी हीरे जैसी पनी दृप्टि थी। उन्होंने दिया। 128 - विना किसी भेदभाव के सभी लोगो को व्यवसाय श्री देवेन्द्रराज मेहता के क्षेत्र मे पारंगत किया। वे कहा करते थे कि (महावीर विकलांग समिति) जो एक बार मेरे पास आ गया, उसकी रोजी- मेरा उनसे परिचय एक सामाजिक कार्यकर्ता रोटी की व्यवस्था होकर ही रहेगी। आज उनके के रूप में हुआ था। उनसे बढ़कर गमाजवी प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि जो मुझे आज कोई नजर नहीं आता। जिम मन्या कार्य वह अधूरे छोड़ गये हैं उन्हें हम पूरा से वे जुड़ जाया करते थे उसकी प्रामाणिकता करें। स्वतः सिद्ध हो जाया करती थी। एक बार श्री देवीशंकर तिवाड़ी विदेश मे यूनीसेफ संस्था की वार्ता मे मुभने पूया मेरा उनसे सम्पर्क लगभग 55 वर्ष पुराना गया कि अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त प्रापी संस्था में लोगों को विश्वास कैसे हो जाता है- था जवकि मैं एक मामूली सा वकील और वे "मैंने उत्तर दिया-जहाँ श्रीमान् राजरूपजी टाक मेरे मुवक्किल थे। धीरे-धीरे हम इतने निकट इतने वर्षों से इस संस्था के अध्यक्ष हैं वहीं लोगो अाते गये कि हम परस्पर गहरे मित्र बन गये । का इस संस्था पर विश्वास स्वतः हो जाता है।" मैंने हर क्षेत्र में कार्य किया। क्या सामाजिक, क्या राजनैतिक, क्या शैक्षणिक, उन्होने हर क्षेत्र श्री तेजकरण डण्डिया मे मेरा लगातार हर प्रकार का साथ दिया । समाज का प्रत्येक व्यक्ति स्वयं के लिये जीता है 'यादगानी मौत उसकी होती है जिनका जमाना अफसोस करे', श्रीमान राजरपजी टाक परन्तु वे समाज के प्रत्येक वर्ग, प्रत्येक व्यक्ति के लिए जिये। अाज महिला शिक्षा ही उन महा- की मृत्यु भी कुछ इगी प्रकार की थी। उन्होंने क्या शैक्षिक, क्या धार्मिक, बया राजनिया, गया मानव का जीवन्त स्मारक है। उनके प्रति सच्ची श्रद्धाजलि यही होगी कि आज हम उनके गुणो को सामाजिक सभी क्षेत्रो में अपना पूर्ण उमा दिवाया। उन्होंने गही प्रथों में समाज में अपना धारण करें। उन्होंने जिन व्रतो को अपने जीवन में जीवन जिया । समाज में जो ग्राज जन धारण किया था हम उनकी अनुपालना करें । चले जाने में प्रभाव पदाप्रा, ब, प्रभाय अपूरणीय है। श्रीमान् राजम्पनी टांक में मेरा निकट का श्रीमती टॉ.गान्ता भानावन मम्मकं था। वे वर्ग भदों मे कपर उठकर जीने (प्राचार्या, श्री धीर बालिका माशिवाय) वाने महामानव धे। यह उग बान का प्रत्यक्ष सरलता, मादी गाना गात प्रमाण है कि आज मैंकदो हजारों पर पूज्य पापा गा, जि: पनामा उमरे जिन्य-परिवार यहाँ उपस्थित है। उनमा था। निमे प्रगना fr बार हिममें नम हो हाना का, , प्रामा। 1; 17 लिए उनी कामगा का चोर गामा मा fr: पना बा । उन्होन माग rail बनाया । यस न. Tzmi ! 11.:: : - : ; श्री सिद्धराज ढढ्ढा - .
कोई ऐमी छाना तो नहीं जो अपनी प्रार्थिर नही होता था कि हम किमी प्रमुख रत्न व्यवसायी स्थिति के कारण अध्ययन से वचित रह जाये । के पाम बैठे हैं बल्कि अपने ही किसी परिवार क साथ ही आर्थिक दृष्टि मे कमजोर छात्रामो की बुजुग सदम्य के माय मिलकर बैठे हो। मदद करते समय वह वार वार सभी को सचेत श्री कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी करते हुए कहा करते थे कि कही किसी को इस (नवज्योति) बात का अहमास न हो कि उसकी मदद की जा प्रजामण्डल के प्रादोलन के समय से मरा रही है। ऐसे उस महामानव को भूल जाना भला कसे सम्भव है ? उनका मम्पक था। वे एक स्वत यता सनानी, देश भक्त, समाजमेवी, स्त्रीशिक्षा प्रेमी व समाज श्री उमरावमल चौरडिया सुधारप के रूप में विद्यमान थे। उन्होंने कभी (फैडरेशन ऑफ राजस्थान) किसी को नुकमान नहीं पहुँचाया । वे बहुत लोक कसा अनूठा, कसा अनोखा, कैमा मनोहारी प्रिय थे। मुझे जयपुर में रहते हुए कई वष व्यतीत व्यक्तित्व था, श्रीमान् राजस्पजी टान का जिहोंने हो गये परन्तु मैंन अाज तक किमी की मृत्यु पर सम्पूण समाज को गरिमामय रूप प्रदान किया। इतनी मात्रा में लोगो को एकत्रित होते हुए नहीं जयपुर नगर का प्रत्येक मानव उनके गौरव की देखा। गरिमा से गौरवावित होकर उनके सदेशो की महक से महक उठा है। उनका जुभारू व्यक्ति व श्री राजकुमार काला ही हमारा पथ प्रदर्शक बने, यही उनके प्रति सच्ची (राजस्थान जैन सभा) श्रद्धाजलि होगी। श्री राजरूपजी टाय के चले जाने से एसा श्री कन्हैयालाल जैन (राजस्थान चैम्बर) लगता है मानो एक व्यक्ति नहीं अपितु समूची सस्था उठ गयी हो। मेरा उनसे घनिष्ठ सम्पक जिमका प्रेरणामय जीवन निवलो वा सम्बल था । उनके पास जो कुछ होता वह लोगो को बन गया वह व्यक्ति कभी मर नहीं सकता है, सुले हाथो से दिया करते थे। उनके अधूरे काय, मरकर भी वह अपने गुणो के कारण अमर है । उनका जीवन यशस्वी जीवन था। दुराग्रह, ग्रापसी उनकी अधूरी धारणा को पूरा करना ही उनके प्रति श्रद्धाजलि है। मनमुटाव को दूर करवाना उनके लिए अति सहज काय था। उनके व्यक्तित्व को अपने जीवन में श्री मानसिंहका (राजस्थान चैम्बर) धारण करना ही उनके प्रति श्रद्धाजलि होगी। एक महान् सत, क्मप्रेमी, धमनिष्ठ, रत्न श्री कपूरचन्द पाटनी पारखी, समाजसेवी की यादें इतिहास के रूप मे मृत्यु उमकी महान् पहलाई जाती है जिसम अमर हो गयी। उनके गुणो को अपनाना और वह स्वय हमता है और समाज रोता है । उह काय क्षेत्र में परिणत करना ही सच्ची श्रीमान् राजरूपजी टाक की मृत्यु भी समाज के प्रद्धाजलि होगी। लिए वुद इस प्रकार की थी। उहोन प्रत्येक श्रीमती उर्मिला श्रीवास्तव क्षेत्र मे निष्ठा के साथ काय किया। वे विकलांगा (प्रधानाध्यापिका, श्री वीर वा उ मा के पैर, अनाथा के नाय, प्रधा की आंखें थे। विद्यालय, जयपुर) उनके पास बठते हुए कभी इस प्रकार का प्राभास जिहोने विविध प्राचीरो को तोडकर अपन - । 130 करुणा के द्वार सभी के लिए खोल दिये, जिन्होने उनका जबरदस्त हाथ था । वे बिना किसी शक अपने जीवन से उन लोगो के जीवन को आलोकित के हर व्यक्ति की हर प्रकार से मदद किया करते किया जो कि अभावो के अधेरे मे जी रहे थे, थे । एक बार हकीम इजवी के परिवार मे शादी ऐसे महारत्न की मृत्यु हमारे लिए एक ऐसा थी। यद्यपि वे अस्वस्थ थे, फिर भी अपने दोनों सदमा है जिसे सहन करना नितान्त कठिन है । साहबानों के साथ लड़खड़ाते कदमों से उन्होने उनके प्राणों का उत्सर्ग हमारे लिए एक चुनौती शादी मे प्रवेश किया । कौमी एकता जैसी है । हम उनके गुणों को अपना कर उनके अधूरे संस्थाओं को उनका वरदहस्त प्राप्त हो जाने के स्वप्नो को पूरा करेगे तभी हम उनके प्रति अपनी कारण आज तक उन सस्थाओं पर आँच नही मच्ची श्रद्धाजलि व्यक्त कर पायेगे। आई। । श्री सुभाष गंगाहर डॉ. नरेन्द्र भानावत उनके जीवन में भगवान् महावीर की दो उत्तराध्ययन सूत्र में दिव्य सदेश देते हुए,भ० वाणी देखने को मिली। प्रथम-महादानं और महावीर ने कहा है कि-"जैसे सुई के साथ धागा होने पर सुई गुमती नही है ठीक उसी दूसरी-उचित पात्र को दान । बड़े-से-बड़े दान को देते समय भी उनके मन में नाम की लिप्सा प्रकार जीवन के साथ श्रुत ज्ञान का सम्बन्ध होने पर श्रुत ज्ञान उसे भटकने नहीं देता ।" श्रीमान् क्षणिक भी नही थी। वे जब तक जिये तब तक राजरूपजी टांक ने अपने जीवन मे इस युक्ति को क्षमाशीलता, संवेदनशीलता को अपना कवच पूर्णतः चरितार्थ किया था । वे आध्यात्मिक बनाकर रहे। मवेदना के धनी तत्त्वान्वेपी थे। जीवन-रत्नाकर श्री चुन्नीलाल ललवानी के मथनकर्ता थे। लौकिक रत्न ज्ञान के साथ- (पशु क्रूरता निवारण समिति) माम यात्मोत्थान रूपी रत्न ज्ञान को भी उन्होने धारण किया । वे सही अर्थों में भगवान् महावीर के उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यह होगी कि सिद्धान्तो के समर्थक थे। उनके पास जो कुछ था आज हम अपने हर सम्भव प्रयत्न से अभयदान उसे उन्होने मुक्त हस्त से दूसरो के लिए एवं जीव दया के व्रत को धारण करे । नृटाया। श्री भंवरलाल शर्मा (विधायक) श्री हरिश्चन्द्र बडेर इतिहास का अध्ययन तो सभी किया करते धापनी गद्दी को विलक्षण वरदान था। जिस हैं, परन्तु कुछ युग पुरुषो का चरित्र कुछ इतना व्यक्ति ने यदि थोड़े समय के लिए भी प्रापसे ज्ञान अधिक अनुकरणीय होता है कि वे स्वयं इतिहास मार किया, वह अपने क्षेत्र में पारंगत हो जाया के अमिट पृष्ठ बन जाया करते हैं । श्रीमान् चाचा सा. का भी चरित्र एवं कृतित्व कुछ इतना * मामा । उनका विनोदी ग्वभाव था, जिसकी विलक्षण था कि वे स्वयं इतिहास बन गये । मंत्री कालो मुषो से प्राज मुखरित हो उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम 1 प्रारमर पर भी अगर है। उनके गुणों को अपने जीवन मे उतारें। श्री मुहम्मद सईद खान (कौमी एकता) श्री गुमानमल लोढ़ा (मुख्य न्यायाधीश) मागम उचोग एवं जयपुर के विकास में चाचा सा. जैसे समाजसेवी, कर्मठ कार्यकर्ता 131
एव सज्जन पुरुप का योग समाज के लिए वरदान ने चाचा सा में मार्यो यो गुचारु रूप स चलान
मिद होता है । उनके प्रति हमारी सच्ची हेतु "मित्तावदेवी राजस्प ट्रस्ट' यो स्थापना
श्रद्धाजलि यही होगी कि हम उनके पादों एव यी पोपणा की। जिसका उपयोग समाजको पोहित,
गुणा को अपनायें तथा उनके कार्यों एवं भावनामो निधा व दुजी जनता में पल्याण हतु होगा।
का पियावित रूप देन का प्रयास गरें।
प्रापर मिप्य परिवार यो पोरस प्रापये प्रशिष्ट
पार्यों को गति देत हतु एस पोर ट्रस्ट की स्थापना
प्राभार प्रदशन
पी घोषणा भी की गई जिमम समस्त शिप्य परिवार
पूज्य चाचा सा वे ज्यप्ठ पुत्र श्रीमान् न मामध्य रे मनुसार राशि देन पी घोषणा
दुलीच द टाप ने अपने टार परिवार की मार
यी है । इमी नावाजति के साथ हमारी ऐसी
से उन सभी सस्थामा व प्रय गणमा य लोगो अभिभावना है कि ईयर उनी विगत प्रात्मा
तथा वक्तामो के प्रति प्राभार प्राट पिया, यो पूण शान्ति प्रदान गरे । साथ ही उनके
जिन्हाने उनके प्रति श्रद्धा सुमन समर्पित किये।
जीयनादश हमारे जीवन में युगों युगो तर पप
इस श्रद्धाजलि सभा में श्री दुलीचद माह्य
प्रगा।
थद्धाजलि सभा पा सचालन श्री राजाप टांक
के शिष्य थी हीराचद चंद ने किया।
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1 . । -- 1 श्री वीर बालिका संचालक मण्डल पदाधिकारी , A -- श्री विमलचन्द सुराना, अध्यक्ष श्री प्रेमचन्द धांधिया, उपाध्यक्षा -o-porn-IN nantar N ANAAN- S , श्री हीराचन्द वेद, मन्ती श्री दुलीचन्द टांक, संयुक्त मन्ती भी Mer मा .. -rrrrrrrrom - Mara Amravakal Aion हो. भीगती प्रान्ता भानावत भी चोर बालिका महाविद्यालय tal... ... ... ... ... ..., -ne
समय-समय पर महाविद्यालय मे पधारे
हुए
श्री सत्यनारायण गायका
डॉ राजेदनमा
पती सत्यनारायण
मायाका
भट्टारक घारुकति
मुडयिद्री
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डॉ काता आहजा
श्रीमती आर पी अग्रवाल
डॉ प्रतिभा जैन
श्रीमती ऊनियान
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डाक एस माथुर
डा एम सी खण्डलवाल
डा एम एल आसवाल
डॉ आर एन Eि
-- . विशिष्ट विद्वानों एवं अतिथियों सोचन - - -- . . . त . Hari... Wri श्री विष्णु प्रभाकर श्री मेघराज 'मुकुल श्री भगवतीप्रसाद वरी श्री 7. unti " -- . . 7 । . स. महावीरराज गेलडा 1 श्री एन. के. सेठी श्री, 4 + ......
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वाह रे सपूत ।
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दानवीर सेठ स्व श्री साहनलालजी ने
श्री वीर बालिका विद्यालय भवन का क्रय
कर सस्था का समर्पित कर दिया। कुछ वर्षों
तक आप इस सस्था क अध्यक्ष भी रह ।
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माध्यमिक शिक्षा बाड की वष 1987 की कक्षा X वाणिज्य वग की वरीयता सूची में
विद्यालय की छाता अनु गायल का चतुथ स्थान प्राप्त करन पर विद्यालय की आर
से सम्मानित करते हुय सयुक्त निदशिका महिला शिक्षा सुश्री धी प्रदाजी ।
.
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. स्त्री-शिक्षा के क्षेत्र में एक प्रेरणास्पद संस्था- . उपेक्षित एवं अभावग्रस्त नारी वर्ग को स्वावलम्बी, सुसंस्कारी बनाना जिसका ध्येय- श्री वीर बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय श्री वीर बालिका उ. मा. विद्यालय जैन श्वेताम्बर समाज द्वारा संचालित महिला शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणीय संस्था है । बीसवी शताब्दी के प्रारम्भ में जैन साध्वी श्री स्वर्ण श्री जी महाराज के कार कमलों से नैतिक संस्था के रूप मे 10-12 छात्रानो से वि. सं. 1982 में कार्तिक शुक्ल पक्ष की पगमी, मगलवार के दिन इस ज्ञान मन्दिर की स्थापना हुई। कर्मठ कार्यकर्ता और रचनात्मक रप्टिकोण के धनी स्व. श्री राजरूप जी टांक साहब के नेतृत्व मे यह संस्था विकासित होकर प्राज गुलाबी नगरी जयपुर में श्रेष्ठ विद्यालय के रूप में गोभित है। इसके निर्माण इसके निर्माण मे पापा अभूतपूर्व योगदान रहा है। लगातार 50 वर्षों से जो स्नेह और प्रात्मीयता इस संस्था को मिली है उनी के परिणामस्वरूप आज यह गंस्था उन्नति के उच्चतम शियर पर पहुँच सकी है। यह संस्था जी शिक्षा के क्षेत्र में एक प्रेरणास्पद मंस्था रही है जिसने छात्रामों में सरलता, सादगी, अनुशासन एवं उन्नादनों को प्राप्नावित कर उनके अज्ञान को दूर कर उनका शैक्षणिक तथा चारित्रिक विकान किया। संस्था का उद्देश्य : सन्कारशील एवं नरिम निर्माण की शिक्षा की व्यवस्था गरने के साथ ही छायो गवांगीण विधान के लिये हर सम्भव प्रयत्न यारना गया का परम उगा रहा है। वानिकामीको पुनलीयमान प्रान करने यो माय-गाय उनमें नंतिम निक्षा, उदात्त भावनाणे, पारम्पति योग, नियमितता, गौन्दय अभिव्यनि नाम गलमूदगी क्षमनाप्नो पा विधाम करणे हा उनले दौर गरनाको काम करना। गेवन निया, निधादियनरमाकाय - पान को न मे समा गाला. त्य, नंगीन यादि freी भी Gia fa mi ri ni frợ gia; } ; F = * * antar एपमा fruitm कदा मुगिजमानामा 1 मनि पानमा म TREETrframent -- .
एव सुसम्यारों का परिचय देती रही हैं। स्या का जीवन अपना कर जन शासन म मज्जन श्री जी, श्री मणिप्रभा श्री जी, जी एव हेम प्रज्ञापी जी प्रमुख हैं। क्तयों, दानदानानो एव शिक्षा शास्त्रियों राज्य मरवार की सहायता 1946 से हो म को देखते हुए यह सतोपजनक नही टार समाज में गणमाय व्यक्ति रहै हैं । 1, म्ब श्री राजमन जी सुराणा, स्व श्री य श्री सिद्धगज जी ढढ्ढा, श्री पूराचद्र य परिवार कभी नहीं भुला सक्ता जि होने साव के प्रमुख शिष्य श्री विमलच द जी । उपाध्यक्ष हैं। मूभ बूझ के धनी 40 वर्ष रस वप स या के मत्री पद को सम्हाला मयुक्त मनी पद को स्वीकार रिया के महावीर प्रमाद जी श्रीमान प्रामीन हुए। . तिा कायक्रम, परीक्षा परिणामों में निर तर प्रगति होती यत होने के कारण छात्रा सख्या वतमान श्रेष्ठ विशेषतायें हैं। पिछल लगभम 10 वर्षों से करते रहना भी विशिष्ट उपलब्धि है। मत हा- अनुशासन, नियमित अशु गोयल ने 904% मा प्राप्न कर बाड की - स्थान प्राप्त कर विद्यालय का गौरव-बढाया है। । गणित सा ज्ञान, अौजी, चित्रकला एव कार्यानुभव तक इसी विषया के साथ म मस्कृत, गृह-विज्ञान एव 134 नंगीत विषय का भी अध्ययन कराया साय नन्ना एवं चाणिज्य वर्ग का चामाग्रीको अभिगरि एवं कार्यक्षेः विषयो का चयन किया गया है शास्त्र, हिन्दी, चहीखाता, च्या गया है। माय ही सामान्य ज्ञ की जाती है। विद्यालय में छात्राट विद्यालय समय के बाद प्र कराया जाता है- (३) खो-खो (2 पुस्तकालय-वाचनालय पुस्तकालय विर मस्तिक की क्षमता पर प्रवृत्तियों के गुमंचालन ध्यान में रखते हुए विद्या किया जाता रहा है। विशेष ध्यान रखा जाता निर्वागा कल्यागा पर वि मक्ष भी न्यापित किया सी भी व्यवस्था है जि पौर मानिक पत्र-पत्रि छात्रा-सहायता : चन समाज की शिक्षा प्रदरद्ध रायरथा प्रदान कर बुक बैंक: ( नाना। 35 छायामा विद्यालय गण मर छात्रवृत्तिया विद्यालय में अनेक प्रकार की छात्रवृत्तियो की व्यवस्था है। बोर्ड की परीक्षा में येष्ठ परीक्षा परिणाम प्राप्त करके प्रथम 250 छात्र छानायो को वरीयता सूची में स्थान प्राप्त करने वाली प्रतिभाशाली 8-10 छात्रानो को प्रतिवप राष्ट्रीय यात्रवृत्ति प्राप्त होती है । शान्तिनाथ चरिटविल ट्रस्ट द्वारा 9 छात्रानो को 3600/रु को छात्रवृत्तिया प्रदान की गई । शिक्षक वग की ओर से भी प्रतिवप प्रतिभाशाली एव जरूरतमद 4 छानामो को धानवृत्तिया प्रदान की जाती हैं। इसके अतिरिक्त राज्य सरकार की ओर से मिलने वाली विभिन्न छात्रवृत्तियो जमे-मृत राज्य कर्मचारी छात्रवृत्ति, ऋण छात्रवृत्ति, स्वत त्रता संनानी एव भूतपूर्व सैनिक छात्रवृत्ति से यात्राए लाभावित होती हैं। सदन व्यवस्था हर वर्ष की भाति इस वर्ष भी हमारे विद्यालय में सदन व्यवस्था की परम्परा यथावत स्प से सफलतापूर्वक चल रही है। इन सदनो का उद्देश्य विद्यालय में अनुशासन, सास्कृतिक, शैक्षणिक, विभिन्न गतिविधियों को सुचारू रूप से संचालित करना तथा विद्यालय के विकास मे सहयोग देना है। हर सदन के काय को चार-चार अध्यापिकानो में विभक्त किया गया व एक शिक्षिका सदन की इन्चाज के रूप में नियुक्त की गई। कक्षा 6 से लेकर 11 तक छायानो को चार सद नो मे विभक्त किया गया। इस प्रकार 15 जुलाई को विद्यालय को सुचारू रूप से चलाने हेतु निम्न सदनो की स्थापना की गई- मैत्रीय सदन -श्रीमती स्वरण भागव (प्रभारी) पदमिनी सदन-श्रीमती पुष्पा जैन (प्रभारी) सरोजनी सदन–श्रीमती वीना कानूनगो (प्रभारी) विचक्षण सदन-श्रीमती राजकुमारी सोनी (प्रभारी) प्रत्येक सदन की निवाचिन छात्रा मत्री प्रत्येक कक्षा मे से दा दो छात्रानो को अपने कार्य को मुव्यवस्थित रूप से करने हेतु सहायक के रूप में चयन करती हैं । इस प्रकार सदन व्यवस्था द्वारा छानाग्रा में प्रात्म-निर्भरता, सहयोग, अनुशासन आदि की भावना का विकास किया जाता है । गाइडिंग हमारे विद्यालय में 3 अक्टूबर, 1975 से गाइडिंग की व्यवस्था चली आ रही है। गाइडिंग का प्रमुख उद्देश्य छात्रानो म पात्म निमरता, सेवा भावना, मितव्ययता, पवित्र आचरण, मद्भावना, पारस्परिक प्रेम का विकास करना व उनमें सास्कृतिक आदान प्रदान द्वारा उनके मानमिक ज्ञान को विकसित करना है। विद्यालय का अपना एक बैड भी है जो प्रमुख धार्मिक प्रायोजनो में भाग लेता रहा है । कार्यानुभव प्राधुनिक समय म शिक्षा तथा रोजगार की एकरूपता होना आवश्यक होती है। विद्यालय स्तर पर कायानुभव विषय के अन्तर्गत विभिन प्रकार के माधारण उद्योग सीख कर बालिकाओं में मामाजिक एव उत्सादन कार्यों में रुचि उत्पन होती है। श्रम के प्रति निष्ठा एव सकारात्मक समान वित्रमित होता है तथा परस्पर सहयोग से काय करने की प्रवृत्ति का विकास होता है । 136 4 विद्यालय में माध्यमिक स्तर पर सिलाई, कढ़ाई क्रोशियां, मिट्टी के खिलौने बनाना तथा चाम प्रादि बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, राजस्थान अजमेर के "समाजोपयोगी उत्पादन कार्य एवं समाज सेवा" विषय के अन्तर्गत विद्यालय पाठ्यक्रम मे अनेक प्रवृत्तियो का समावेश किया जाता है । अनुभव कार्य के क्षेत्र में छात्राओं को सावुन, डिटरजेन्ट पाउडर, वाम, वेसलिन, शर्वत, टमाटर मॉस, प्राचार मुरब्बे आदि बनाना सिखाया जाता है । बालिकायो की रचनात्मक प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुए गुड़िया बनाना, मुतली व जोरी का काम, रंगजीन का काम तथा अनुपयोगी सामग्री से साज सजावट की वस्तुएं बनाने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। शिविर का प्रायोजन इस वर्ष समाजोपयोगी उत्पादक कार्य एवं समाजसेवा शिविर का आयोजन 15 मार्च से 19 मार्च तक किया गया। इसमें नवीं कक्षा की छात्राओं को राज्यो का प्रतिनिधित्व करते हुए, उन्हे पाठ समूहों में विभक्त किया गया जिनके नाम निम्नलिखित हैं (1) जयसिंह (2) कालिदास, (3) ऑ० किचलू, (4) महात्मा गाधी, (5) नेहरू, (6) विश्वेसरैया, (7) रवीन्द्र नाथ टैगोर व (8) लाला लाजपतराय । कैम्प के दौरान छात्रायो मे भावात्मक एव राष्ट्रीय एकता की भावना उत्पन्न करने हेतु अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये गये। अपने-अपने दल के अनुसार छात्रानो ने अपने राज्य की जलवायु, भौगोलिक स्थिति, रीतिरिवाज व अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों के अनुनार कारले तयार की संचार के साधन, वाद्ययन्त्र, राज्य और राज्यों की राजधानियां, विटामिन, प्रिया और क्रिया के भेद, वृक्ष और प्रदूपण आदि कार्यों पर संकलन कार्य करवाया गया । कम्प के दौरान गैटोर की छत्रियां, पानफवाग, अामेर व सोल के हनुमानजी प्रादि स्थानो पर बालाओं को शैक्षणिक भ्रमण हेतु ले जाया गया । साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियां: शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य छात्राओं का सर्वांगीण विकास करना है। इसी उघय पीतानि गु विद्यालय में विभिन्न प्रवृत्तिया यथा निवन्ध लेखन, वाद-विवाद, गाविता प्रनियोगिता, प्रग्नोशार, अन्यारी. महान व्यक्तियों की जयन्तियां, नाटक, मूक प्रभिनय, पिनिम वगण, नग्य, निमसला प्रतियोगिता मादिगा प्रायोजन किया जाता है। म व श्री जैन श्वेताम्बर माध्यमिक विद्यालयारा प्रायोजित याद-विवाद प्रतियोगिता में हमारी मंजु गोपल प्रथम व निवन्ध प्रतियोगिता में कुमारी निधि प्रथम रही। गम्यागमा भामा प्रायोजित निबन्ध प्रतियोगिता मे गुमारी वन्दना शर्मा प्रथा की। गद्रमान प्रभार refr दनित व विमा प्रतियोगिता में कुमारी वन्दना गर्मा ने प्रथा मान चोर मानो योनि मां बना पुरसार प्राप्त किया। नीर amlner for Hair {मा rifगना नेपाल प्राय रिया !
रेडकास द्वारा आयोजित वाद-विवाद व निवध प्रतियोगिता में नमश कुमारी ज्योति व कुमारी वन्दना शर्मा प्रथम रही। इसी प्रकार जिला स्तर प्रतियोगिता में निवन्ध में कु मीना मामनानी, चिलयला मे कुमारी अनिला, एकाभिनय म कुमारी विजयलक्ष्मी प्रथम व विचित्र वेशभूषा में कुमारी प्राभा द्वितीय रही । भगवान महावीर की पावन जय ती के अवसर पर स्कूल में प्रायोजित वाद विवाद तियोगिता में कुमारी नीतू व एक्ता प्रथम रही। कम्प्यूटर प्रशिक्षण • ममय की प्रगतिशीलता व व्यावमायिक उ नयन को देखते हुए विद्यालय में कम्प्यूटर शिक्षा का प्रशिक्षण प्रारम्भ किया गया है जिसमे लगभग 50 छात्रायें प्रशिक्षण प्राप्त कर 21वी मदी की चुनौतियो को स्वीकार करने के योग्य बन रही हैं। कम्प्यूटर कास ग्रीष्मावकाश में भी छात्राओं के लिए उपलब्ध रहेगा। शिक्षक सम्मान सस्था केवल छायाग्रो के सवागीण विकास व उनके कल्याण हेतु ही चितित नहीं है वरन् यहा काय करने वाली अध्यापिकानों के प्रति सम्मानजनक व सहायता पूरण दृष्टिकोण अपनाया जाता है । सस्था में कायरत कमचारियो के लिए विशेष परिस्थिति में आर्थिक सहयोग की योजना है। अध्यापिकानो के विद्यालय से अवकाश ग्रहण करने के अवसर पर उनकी मेवानो का भव्य समारोह में अभिनन्दन तो किया ही जाता है, साथ ही एक अच्छी राशि मेंट रूप में भी प्रदान की जाती है । श्री वीर बालिका मचालक मण्डल द्वारा इस उच्च मा० प्रा० विद्यालय के साथ ही महाविद्यालय का सचालन किया जाता है। इस प्रकार इस सस्या के माध्यम से शिशु से स्नातक स्तर तक के शिक्षण की व्यवस्या है। इस सस्या के माध्यम से आज मध्यम वर्गीय परिवारो की 3500 छात्रायें शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। सस्या का यह निश्चय है कि अथ के अभाव में किसी भी हाना के अध्ययन में व्यवधान नही आन दिया जायेगा । वस्तुत यह सस्या माता सरस्वती व महिला शिक्षा के लिए मर्पित है । इम प्रकार इन समस्त उपलब्धियों व सफलतापो के उपरात भी मस्या को एक बहुत वही क्षति उठानी पडी है । सस्था के मन्त्री, पोषक एव मस्थापक परम प्रादरणीय श्रीमान् राजरूपजी टार का निधन स्थापना दिवस के दिन हो गया । स्थापना दिवस एव ज्ञान पचमी के पावन पव पर प्रापरे प्राणो का उत्सग मस्था लिए प्रेरणास्पद प्रमग वन गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि पूज्य चाचा साब ने अपने प्रादर्णी माल्पो, मूल्यो एव आकाक्षाप्रो को इम सस्था के माय स्थायी रूप से जोड़ दिया है। परम पिता परमात्मा म प्रायना है कि वह इस दिव्य विभूति की महान् प्रात्मा को चिरशान्ति प्रदान करे तया हमे वह शक्ति प्रदान करे कि अापके उच्च प्रादों एव मानवीय मूल्यो का अनुकरण करत हुए विद्यालय और समाज के विकास में अपना योगदान कर सकें। -उर्मिला श्रीवास्तव प्रधानाध्यापिका 138 जैन साध्वी श्री स्वर्ण श्री जी म. सा. की प्रेरणा से संस्थापित शहर को चार-दोवारी में स्थित एक मात्र शिक्षा संस्था श्री वीर बालिका महाविद्यालय प्रगति विवरण 000000 श्री वीर बालिका महाविद्यालय शहर की चार दीवारी में स्थित - एक मात्र बालिका महा- विद्यालय है । इसका प्रारम्भ 1 अगस्त, 1974 से हुआ। यो तो श्री वीर बालिका विद्यालय के रूप में इस शिक्षण संस्था का बीज वपन 63 वर्ष पूर्व जैन साध्वी श्री स्वर्ण श्री जी म. मा. की प्रेरणा से हुआ था । उसी पौधे ने पल्लवित, पुष्पित और विकसित होकर महाविद्यालय का रूप लिया है। इस शिक्षण संस्था मे शहर के मध्य रहने वाली मध्यमवर्गीय परिवार की 1250 छात्राएं कला एवं वाणिज्य संकाय में अध्ययन कर रही हैं । यह कॉलेज राजस्थान विश्व विद्यालय (अब अजमेर विश्व- विद्यालय) से मान्यता प्राप्त है । विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से इसे मूल अनुदान और विकास अनुदान प्राप्त हुमा है। महाविद्यालय में परीक्षा परिणाम अच्छा रखने के लिये हम सतत प्रयत्नशील रहते हैं । विभिन्न सनों में छात्रानो की प्रवेश संख्या एवं परीक्षा परिणाम इस प्रकार रहे फला एवं वाणिज्य संकाय में छात्राओं की संख्या एवं परीक्षा परिणाम फला संकाय--- कक्षा प्रवेश संख्या उत्तीय प्रतिमा 1982-83 184 77.0% 118 76.09 137 1983-84 प्रथम वर्ष द्वितीय वर्ष नृतीय वर्ग प्रथम वर्ष द्वितीय वर्ष तीर या 203 77.00 143 4 105 90.00 4 139 प्रवेश सत्य 92 प्रथम वर्फ प्रथम वर्ष 1984-85 प्रथम वर्ष 230 870% द्वितीय वर्ष 141 920% तृतीय वर्ष 105 920% 1985-86 प्रथम वर्ष 257 90 5% द्वितीय वर्ष 168 878% तृतीय वर्ष 122 913% 1986-87 प्रथम वर्ष 247 899% द्वितीय वर्ष 189 940% तृतीय वर्ष 122 930% 1987-88 प्रथम वप 242 प्रतीक्षित द्वितीय वर्ष 205 तृतीय वफ 155 वाणिज्य सकाय- कक्षा उत्तीय प्रतिशत 1982-83 90% 1983-84 77 91% द्वितीय वर्ष 85 73% 1984-85 प्रथम वर्ष 242 90% द्वितीय वर्ष 149 71% तृतीय वप 59 87% 1985-86 प्रथम वर्ष 227 99% द्वितीय वर्ष 206 72% तृतीय वर्ष 106 91% 1986-87 प्रथम वप 228 81% द्वितीय वर्ष 226 59% तृतीय वर्ष 172 94% 1987-88 प्रथम वर्ष 259 प्रतीक्षित 209 तृतीय वप 136 अध्ययन विषय महाविद्यालय में वला सकाय के अतर्गत सामाय हिदी सामाय अंग्रेजी, भारतीय सभ्यता एव सस्कृति का इतिहास इन तीन अनिवाय विषयो के अतिरिक्त ऐच्छिक विषयो म हिदी साहित्य, मम्कृत, इतिहाम, अयशास्त्र, समाज शास्त्र, गृह विज्ञान, राजनीति शास्त्र विषयो का अध्ययन होता द्वितीय क्प " . 140 - - है । वाणिज्य संकाय मे प्रथम वर्ष मे अनिवार्य विषयों में सामान्य हिन्दी, मामान्य अगेजी एवं भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास अथवा अग्रेजी टंय ण एवं शीघ्रलिपि व द्वितीय एवं तृतीय वर्ष वाणिज्य में अनिवार्य विषयों मे ABST, EAFM, एव Bus. Adm. व वैकल्पिक विषयों में विक्रयकला, अग्रेजी स्टेनो टाइपिंग तथा COM विषयों का प्रावधान है। स्वर्ण विचक्षण पुस्तकालय :- श्री वीर बालिका शिक्षण संस्थान की प्रेरक पूज्य गुरुवर्या स्व. माच्ची श्री स्वर्ण श्री जी और उनकी शिष्या जैन कोकिला प्रवर्तिनी साध्वी श्री विचक्षण श्री जी म. सा. के विलक्षगा व्यक्तित्व को ध्यान में रख कर कॉलेज पुस्तकालय का नाम स्वर्ण विचक्षण पुस्तकालय रखा गया है । महाविद्यालय पुस्तकालय मे विभिन्न विषयों की 10,000 पुस्तकें है । पुस्तकालय का विकास हो, इस दृष्टि से निरन्तर प्रयास जारी है। वर्तमान सत्र में पाठवें विश्व पुस्तक मेले में करीदन 40,000/- रु. के संदर्भ ग्रंथ जिनमे हिन्दी विश्व कोश, हिन्दी शब्द सागर, हिन्दी साहित्य का वृहद इतिहास, एनसाइक्लोपिडिया ऑफ ब्रिटेनिका एव एनसाइक्लोपिडिया ऑफ सोशल मासेज तथा अन्य कई महत्त्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ खरीदे गये हैं। वाचनालय :- संसार की नवीनतम घटनाओं, स्थितियो, विचारधारागों, परिवर्तनो और उपलब्धियो में छात्रा समुदाय परिचित होता रहे, इसके लिये महाविद्यालय में वाचनालय की व्यवन्या है । यही विभिन्न विषयो से सम्बन्धित 57 पत्र-पत्रिकाएं आती है । बुक बैंक :- पुस्तकालय के अन्तर्गत बुक बैक की व्यवस्था है। इसके माध्यम से कॉलेज की जरूरतमंद नया योग्य छात्रानो को पाठ्य पुस्तके निःशुल्क प्रदान की जाती हैं। बुक बैंक को समृद्ध बनाने में नमाजसेवी संस्थाओं एव विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से महयोग मिला है। विभिन्न पत्रों में पुग्नको एव छामाग्रो की संख्या इस प्रकार रही बुक बैक से सहयोग लेने वाली छात्राएं 1984-85 1985-86 298 1986-87 415 }987.88 200 छात्रा परिषद् : महाविद्यालय की शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक प्रवृत्तियो को गुवार 7 मे मनावित करने पर उसमे नानामो को मल्योगी बनाने की दृष्टि में छात्रा परिषद का गठन नामानिमा - सन गम्नर नंग 113 289 100 115 85 :- 1985-86 (कला मंकाय)- 78 रमि नगेना, उपाध्यक्ष गुर तीनला, ति, का...' ra, मानिक मानव समा चतुर्वेदी, सोपाध्यक्ष मंजीत कौर, मोन!
1986-87- अध्यक्ष सविता शर्मा, उपाध्यक्ष पाशारानी अग्रवाल, सचिव सगीता राणावत, सास्कृतिक सचिव सुमन कावरा, श्रीडा सचिव मजु भालानी । 1987-88- अध्यक्ष सुधा शर्मा उपाध्यक्ष मजु पारीक, सचिव निशि सक्सेना, सह-सचिव कृपा पालही. वाल कोपाध्यक्ष इदु शर्मा, क्रीडा सचिव मुनीता मित्तल । 1985-86 (वाणिज्य सफाय)- अध्यक्ष कुमारी शोभा सक्सेना, उपाध्यक्ष मीना अजमेरा, सचिव अलका टाक, सह सचिव विनीता जन, कोपाध्यक्ष ज्योति धाधिया, कार्यकारिणी सदस्य सगीता मेहता, क्षमा अरोडा, मनोज विजय । - 1986-87- अध्यष सुथी क्षमा अरोडा, उपाध्यक्ष रानी अजमेरा, सचिव अलका टाक, सह सचिव इद्रा दुगड, कोपाध्यक्ष वीना गनवानी । 1987-88 अध्यक्ष अरुणा पवार, उपाध्यक्ष सजना पटोलिया, सचिव शिवानी सोलकी, सह सचिव चचल लता अग्रवाल, कोषाध्यक्ष तारा शर्मा। शैक्षणिक प्रवृत्तियाँ महाविद्यालय मे छायाप्रो की बौद्धिक प्रगति हेतु विशिष्ट विद्वाना के व्याख्यानो का आयोजन किया जाता है । महाविद्यालय म विभिन विषयो के विद्वानो को निमन्त्रित किया गया, जिनका विवरण निम्न प्रकार है- व्याख्यानदाता का नाम विपय दिनाक श्री सत्यनारायण गोयनका विपश्यना साधना और शिक्षा विपश्यना पाचाय, बम्बई 2 फादर मैथ्यू ईसा मसीह का जीवन दशन 20 1284 प्राचाय, सेण्ट जेवियर स्यूल, जयपुर 3 श्री भीमराज कोठारी ईसाई धम मे सेवा भावना 20 1284 प्रसिद्ध रत्न व्यवसायी, हागकाग 4 डॉ नवीन कुमार वज. ईसा मसीह और जन समाज 201284 रीडर, समाज शास्त्र विभाग राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर 5 श्री प्राई के शर्मा अग्रेजी व्याकरण 8185 रीडर, अग्रेजी विभाग राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर 1 . 142 अग्रेजी व्याकरण 9.1.85 अंग्रेजी व्याकरण 10.1.85 13.1.85 पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में संगीत की उपयोगिता महिलाएं और कानून 18.1.85 विश्व-मानचित्र 22.1.85 6. श्री ए. एल. शाह रीडर, अग्रेजी विभाग राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर 7. डॉ. एस सी. सिंह रीडर, अंग्रेजी विभाग राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर 8. सुश्री शारदा मिथा संगीत प्राध्यापिका महारानी कॉलेज, जयपुर 9. श्री भगवती प्रसाद वेरी भूतपूर्व न्यायाधिपति 10. श्री हरिशंकर शर्मा सहायक प्रोफेसर भूगोल राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर 11. डॉ कान्ता पाहूजा प्रोफेसर, अर्थशास्त्र विभाग राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर 12. श्री महेन्द्र रायजादा प्राचार्य, गवर्नमेट कॉलेज, डीग 13. श्री टी. सी. टिक्कीवाल सहायक प्रोफेसर, समाज शास्त्र विभाग राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर 14. डॉ. प्रभुदत्त शर्मा प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर सातवी पचवर्षीय योजना 23.1.85 हिन्दी साहित्य में भक्तिकाल 25.1.85 सामाजिक सर्वेक्षण 12.10.85 मानव अधिकार 10.1285 जनमंचार माध्यम 28.2.85 15 माजीप मिन्हा एफडेमिक एडिटर, N.C.E.R.T., दिल्ली पत्रकारिता पीर मन-जागरण 28.2.85 16. रामजीलाल जांगिड पाट्य नाम निदेशमा, भारतीय भाषा पन- भारतीय जननचार माधान, नई दिल्ली काग्निा पाठ्यक्रम, 17. भीमपला, मुगुल गिदगद और नाहितागर भारतीय शनि पीरमा हिदी साहित्य का प्रादिकाल 10885 माहित्य विश्लेपण, पावारा मसीहा 16985 के विशेप मदम में देश एवं विदेश नीतियो का तुनना 24985 त्मक अध्ययन स्वतता मग्राम और गांधी दर्शन पायपर प्रणाली 10186 लागत लेसान 22186 18 डॉ लक्ष्मी नारायण दुवे रीडर, हिदी विभाग सागर विश्वविद्यालय 19 श्री विष्णु प्रभाकर प्रसिद्ध साहित्यवार, दिल्ली 20 डॉ सी एम जन डीन पत्राचार अध्ययन संस्थान सुखाडिया विश्वविद्यालय, उदयपुर 21 डॉ प्रतिभा जन रोडर, इतिहास विभाग राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर 22 श्री एल पार मंत्री रीडर, वाणिज्य विभाग राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर 23 डॉ एम एल ओसवाल रीडर, लेग्या एव सास्यिकी राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर 24 डॉ डी सी जन विभागाध्यक्ष, लेसा एव सास्थिती राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर 25 डॉ एम एल शर्मा प्रो पयो गोजी विभाग सवाई मानसिंह चिकित्मालय, जयपुर 26 श्री के सी बडर प्रसिद्ध रत्न व्यवसायी एव समाजसेवी, जयपुर 27 डॉ आर एन सिंह निदेशक, पोद्दार प्रवध संस्थान, जयपुर 28 डॉ एम सी खण्डेलवाल प्राचार्य बामस कॉलेज राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर 29 डॉ राजेन्द्र शर्मा अध्यक्ष हिदी विभाग राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर प्रवेक्षण 23186 रक्तदान जीवनदान 28286 मानव अधिकार और समाज सेवा 1386 प्रवन्ध व्यवस्था की उपयोगिता 30986 30986 वतमान मे प्रवध व्यवस्था का महत्त्व साहित्य और समाज 11086 144 10.11.86 चरित्र निर्माण मे नारी की भूमिका सातवी पंचवर्षीय योजना 27.1.87 30. चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी जी श्री जनमठ, मूडबिद्री 31. डॉ एम. डी. अग्रवाल रीडर, इ. ए. एफ. एम. राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर 32. डॉ एस. पी. जैन रीडर, राजनीति शास्त्र विभाग राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर 33. पंडित रविशंकर जी महाराज न्यायपालिका की स्वतन्त्रता 4.2.87 सुखी जीवन कैसे जिये? 2.12.87 कलकत्ता 34. श्री मनुभाई शाह उपभोक्ता संरक्षण 30.1.88 विजिटिंग प्रोफेसर, आई. आई. एम. अहमदाबाद 35 श्री मेहरचन्द धाधिया जीवन में शिक्षा का महत्त्व 27.2.88 रत्न-व्यवसायी, जयपुर 36. डॉ महावीर राज गेलड़ा स्त्री शिक्षा और समाज-निर्माण 27.2.88 सयुक्त निदेशक, कॉलेज शिक्षा निदेशालय शिक्षण शुल्क मुक्ति :- महाविद्यालय में अध्ययनरत प्राथिक दृष्टि से असमर्थ छात्रानों को शिक्षण शुल्क में भी राहत प्रदान की गई । सन् 83-84 मे 36 छात्राओं, 84-85 में 32 छात्रायो, 85-86 मे 32 छात्रायो, 86-87 मे 30 छात्रायों और 87-88 में 43 छात्राओं का शिक्षण शुल्क माफ किया गया । प्राथिक सहायता : महाविद्यालय में अध्ययनरत जरूरतमंद छात्राओं को श्री शान्तिनाथ जैन चेरिटेबल ट्रस्ट मे 85-86 में 10 छात्रानों को, 86-87 में 8, 87-88 में 9 छात्राओं को प्रति वर्ष 500 २० प्रत्येक छात्रा को प्रदान किये गये । सत्र 87-88 मे भवरलाल श्रीमाल चेरिटेबल ट्रस्ट मे दो छानाम्रो को प्रत्येक को 460 रु० की आर्थिक सहायता प्रदान की गई । सांस्कृतिक एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ :- पुस्तकीय ज्ञान के माथ-साथ छात्रायो में साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं कलात्मक गनिमी का विशाम हो, इस दृष्टि से विभिन्न परिपदो के तत्वावधान में प्रति वर्ष निबन्ध, परनिन करानी, "विना, आशुभाषण, वाद-विवाद, अल्पना, रंगोली, मेंहदी-मांडना, एकन्न नृत्य, गायन, विचित्र वन- प, समूह गान, मुहावरे एवं लोकोक्तियां प्रादि प्रतियोगिताएं प्रायोजित की जाती । विगत मतों प्रतियोगितामो में निवन्ध के विषय इस प्रकार रहे- राष्ट्र निर्माण में विद्यार्थियों का योगदान, कवि मुनि, बोध, पानीमा प्रेगनन्द, पामा गमगाट गुरनः व्यक्तित्व एवं कृतित्व, जैन धर्म का भारतीय गति एवं नमाज पर प्रमाय, म - 115 कवि , श्रीमती इदिरा गांधी व्यक्तित्व एव कृतित्व, अनेकता मे एक्ता हिद की विशेषता, नागरिक प्रशासन सेना पर निर्भर होता जा रहा है, मेरा प्रिय साहित्यकार, हिदी कहानी का विकास, भारत मे वेरोजगारी एव जनसंख्या वृद्धि । जयन्तियाँ महापुरुषो के जीवन मे प्रेरणा मिले, इस दृष्टि से महाविद्यालय में ईसा मसीह, महात्मा गाधी, गुरु गोवि दसिंह, रानी लक्ष्मी बाई, श्रीमती इदिरा गांधी प्रादि जयन्तियां मनाई गई। अन्तर्महाविद्यालय प्रतियोगिताएं - वाद विवाद प्रतियोगिताएं- महाविद्यालय मे जन जागृति परिषद् के सह्योग से प्रति वप अन्तमहाविद्यालय वाद विवाद प्रतियोगितात्री का आयोजन किया जाता है। सत्र 84-85 में 21-12-85 को महाविद्यालय मे 'नारी ही नारी का शोषण करती है' विषय पर अन्त महाविद्यालय वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया गया । जिममे जयपुर के कॉलेजो एव विश्वविद्यालय की 23 टीमो ने भाग लिया । चन वैजयन्ती पुरस्कार महाराणी कॉलेज को गया। वीर बालिका महाविद्यालय की छात्रा कुमारी सुजाता मा तृतीय रही। इस अवसर पर मुख्य अतिथि थे श्री मुश्ताक अहमद राकेश, निदेशक, आकाशवाणी जयपुर एव अध्यक्ष पी डॉ श्रीमती पवन सुराणा, अध्यक्ष, जमन विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, नयपुर । सत्र 86-87 मे 31 जनवरी, 87 को 'मानव से नहीं मशीन से ही भारत समृद्ध हो सकता है' विषय पर अन्त महाविद्यालय वाद विवाद प्रतियोगिता आयोजित की गई। इस प्रतियोगिता म इसी महाविद्यालय की छात्रा कुमारी इद्रा दुगड, प्रथम वष वाणिज्य और कुमारी लनिता शर्मा प्रथम वप क्ला ने चल वैजयन्ती पुरस्कार प्राप्त किया परन्तु अतिथि सस्था होने के कारण यह पुरस्कार क्नोडिया महिला महाविद्यालय को प्रदान किया गया । कुमारी दद्रा दुगड को द्वितीय पुरस्कार प्राप्त हुमा। इसकी अध्यक्षता श्री उमरावमल ढढ्ढा, अध्यक्ष सुवोध शिक्षा समिति ने की तथा मुख्य अतिथि थी डॉ प्रतिभा जैन, रीडर, इतिहास विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर। राज्य स्तरीय अन्तर्महाविद्यालय निवन्ध प्रतियोगिता सन 86-87 मे बढते हुए पर्यावरण प्रदूषण को ध्यान में रखते हुए राज्य स्तरीय अन्तमहा. विद्यालय निवघ प्रतियोगिता आयोजित की गई, जिसका विषय था 'पर्यावरण सुधार युग धम' । इस प्रतियोगिता में पूरे राजस्थान से विद्यार्थियो ने भाग लिया। प्रथम पुरस्कार 151 रु०, द्वितीय पुरस्कार 131 ८०, तृतीय पुरस्कार 101 रु० एव पाच सात्वना पुरस्कार 51-51 रु० के प्रदान किये गये। , महाविद्यालय की छात्रानो ने समय-समय पर अन्तमहाविद्यालय स्तर पर आयोजित साहित्यिक सास्कृतिक-कायक्रमो में भाग लिया, इसका विवरण इस प्रकार है- 146 1984-85 स्थान चल वैजयन्ती पु० कुसुम कावरा को व्यक्तिगत द्वितीय पुरस्कार प्रथम स्थान छाना का नाम प्रतियोगिता का नाम संस्था 1. कु. कुसुग कावरा वाद-विवाद प्र० अग्रवाल कालेज (तृतीय वर्ष कला) कु. निकहत फातिमा (तृतीय वर्ष कला) 2. फु. मीना पानीवाल एकाभिनय अग्रवाल कालेज (प्र. व. वाणिज्य) 3. . कु. विचित्र वेशभूपा अग्रवाल कालेज पु. इन्द्रा पंजावी (द्वितीय वर्ष कला) 4. गु. कुसुम काबरा एवं साथी समूहगान अग्रवाल कालेज 5. कु. मतोप शर्मा संस्कृत गीत प्रतियोगिता राजस्थान कालेज (नृतीय वर्ष कला) अनिता चड्ढा प्रथम स्थान द्वितीय स्थान सांत्वना पु० 1985-86 वाद-विवाद प्रतियोगिता दि. जैन गंस्कृत कालेज चल वैजयन्ती वाद-विवाद प्रतियोगिता मतमांड कालेज चल वैजयन्ती 1. कु. सुजाता झा एव मु. पारवा लालचदानी (वृत्तीय वर्ष माला) 2. गु. गजाना झा एवं गारवालानदानी 3. माना मा 4. नारदानालनमानी (मृतीय वर्ग पा) पाद-विवाद प्रतियोगिता वीर वालिसा कालेज वाद-विवाद प्रतियोगिता जयपुर जेमीज तृतीय সখ খান माग 1986-87 भाषण प्रतियोगिता महिना समिति राज. वि. वि. गन वैजयन्ती (नातिर) मृतीय पुरणार (Arefun) , गाद दिनानिगिना दापन पर दामिना भीरचातिना दि. मारना ० Hal घन जी * - * 1987-88 वाद-विवाद प्रतियोगिता जेसीज क्लव, जयपुर द्वितीय स्थान 1. मपिता मर्मा (द्वितीय वर्ष क्ला) 25 दादुगर प्रथम स्थान (दिनीय कर वापिग्म) 3 पु म्न सता गमा (Fi या पना) वा विवाद प्रतियोगिता राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, जयपुर निवघ प्रतियोगिता बडेलवाल वय महाविद्यालय प्रथम स्थान पिकनिक अध्यापन शाप माय-माप छापामो के मनोरजन के लिये पिपनिर का मायोजन भी रिया जाता रहा है । कला एव वाणिग्य समाय मे विभिन्न सत्रों में विभिन्न स्थानो पर पिरनिर का मावादन दिया गया। 84-85 मगीन हनुमान जी 85-86 में वियेगी, धापरवाहा 86-87 में गगन बाप, बैराठ बाघ 87-88 में नई नाप । শণির সুদ मात्र 1987-88 में महाविद्यालय की 47 यात्रामों का एक दन श्री राधामोहन लाल जी गुजा, प्रभारी याजिम्प मराय रे नेतृवम 24 12 87 से 29 12 87 तक ऐतिहासिक स्थलो का मग परन हा रवाना हुमा। इस दन ने रागरपुर, मालू देलवाडा मन्दिर, मचल गट, सनसेट पा, नसी नीन, उदयपुर, चितोड प्रादि स्थानो वा भमरा दिया । महाविद्यालय पत्रिका 'दिव्या' पर गिरा स्या में उसको वापिर पत्रिका का अपना एक विशेष महत्त्व होता है । यह माग हिममें पूरी जिमग मम्या प्रतिविम्ब दंगा जा सकता है। महाविद्यालय की मीनिमा दिसा' है। यतमान सत्र में रिया' मा पर सस्था में मन्त्री प्रद्धेय श्री राजरूप जी रारी पसानि मारिए रेम्प में प्रकाशित दिया गया है। रोनर गैतार भी गिरा महत्वपूर्ण भाग है। महाविद्यालय में और गेम्स के रूप में टेक्तिः सण, मिरज, करम पादिमी पाया है। पोजना मच पाराम सारनाथा ये प्रति प्रतिगारसमा एक क्रियाविनि में प्रनि योरित चेतना RET में बोरनार को एर दराई मक्रिय रूप से मन् 1981-82 में यार 148 - .. रत है । इम इकाई के तहत निबन्ध, सामान्य ज्ञान, प्रश्नोत्तर प्रतियोगिता, चार्टस्, मेपम्, बेकारी सामग्री से उपयोगी सामग्री का निर्माण आदि प्रतियोगिताएँ प्रायोजित की गई । हम इकाई के तहत विगत वर्षों मे निम्नलिखित सर्वे कार्य करवाये गये- 83-84 : कुण्डा ग्राम एक सर्वेक्षण (आमेर तहसील) । 84-85 : डेयरी विकास कार्यक्रमो के प्रभावों का मूल्याकन : अार्थिक एवं सामाजिक सदर्भ में । 85-86 : बगरू कस्वे के वस्त्र व्यवसाय के संदर्भ मे श्रमिको की समस्याओं का अध्ययन । 86-87 : वैको की रोजगार योजनाएँ जीवन स्तर सुधारने मे कहां तक सहायक है ? चीमू गांव के विशेष सदर्भ में। 87-88 : ग्रामीण क्षेत्र मे (पी.एस.सी.एस.) प्राथमिक कृषि सहकारी समिति की भूमिका (सांगानेर सहकारी समिति के विशेष सदर्भ में) । राष्ट्रीय सेवा योजना इकाई : महाविद्यालय मे 8-10-1980 से राष्ट्रीय सेवा योजना की एक इकाई कार्यरत है । प्रारम्भ मे इस इकाई में 50 छात्राएं थी पर आज 168 छात्राएं कार्य कर रही है । इस इकाई का उद्देश्य छात्रानो मे परस्पर प्रेम, स्नेह, सौहार्द, श्रम के प्रति निष्ठा, स्वावलम्बन, सेवा, राष्ट्र-प्रेम आदि भावों को जाग्रत करना है । इस इकाई की कार्यक्रम अधिकारी सुश्री सरोज कोचर, व्याख्याता सस्कृत विभाग, के नेतृत्व मे कार्यक्रम इस प्रकार सम्पन्न हुए :- सत्र 83-84 मे नियमित गतिविधि के अन्तर्गत अभिरुचि कार्यशाला में विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण दिये गये । वस्ती के निवासी उत्तम साहित्य पढ सके, इसके लिए चरित्र निर्मागा मे सम्बन्धित पुस्तके चल पुस्तकालय के माध्यम से वितरित की गयी। महाविद्यालय के मौन्दर्य मे विधान हेतु स्वच्छता, वानिश आदि कार्य हुए तथा स्थान-स्थान पर महिला सम्मेलन आयोजित करके मास्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये गये। जिसमे गलता रोड, पूर्वी साइड गगा बक्श का गन्ना, हरिजन के कुए का रास्ता, चादपोल बाजार, सत्यमाई महाविद्यालय, जवाहरनगर, बजाजनगर, मजदूर नगर मुख्य स्थल थे। सास्कृतिक कार्यक्रम के पश्चात् स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारी देने के साथ-साथ मेडिकल कालेज के पी. एस एम. विभाग द्वारा वहाँ के निवासियो ग निशुल्क स्वास्थ्य परीक्षण कराया गया। अक्टूबर माह मे बाल-रश्मि मोगाटी, गी में दम दिवसीय विशेष शिविर प्रायोजित किया गया। जिसमे छायायो ने कारीनी जमीन कोरने पत्यारिया बनाते हुए 35 हजार पौधो की नर्सरी तैयार की। शिविर में प्रानः तालमेली गाम ए प्राम-पास के क्षेत्रों में प्रभात फेरी निकाली गई तथा वही पर शाम तो बड़ा ही मागणी एव निराकरण के मुभाव से सम्बन्धित सास्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये गये । विनेर यो गार कनियागियों का स्वास्थ्य परीक्षण भी करवाया गया। एक दिवगीय निवि बना मानेर भावाली मे कंटीली पाम हटाते हुए पत्थर ग्रादि हटाने का कार्य किया गया । अन 83 मे कोयम्बदर में प्रायोजित राष्ट्रीय गमिनार में 3 घासाघी मेलामा मागी गरोज कीनर ने भाग लिया। कानावाम पास, जाट के 149 - सन 84-85 में नियमित गतिविधि के अतगत त्यौहारो के महत्त्व को समझाते हुए रक्षाव धन, स्वाधीनता दिवस, निसमिस डे, लोहडी त्योहार, मकर समाति, गणतन्त्र दिवस आदि के पर्वो पर उनसे सम्बन्धित कायक्रम आयोजित किये गये। रक्षा बन्धन के अवसर पर छानानो को राखी बनाने का प्रशिक्षण दिया तथा राखिया बनाकर विक्रय की, जिससे 1051 रु० को शुद्ध श्राय हुई जो छानामा के कल्याणाथ व्यय की गई। दीपावली के अवसर पर छापामो को मोमबत्ती, दिममस डे एव नव वर्ष के उपलक्ष्य मे छानायो को शुभकामना मे सम्बधित कार्ड बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। अभिरुचि कायशाला के अन्तमत छात्रानो को पेंटिंग, मोती के प्राभूपण, हस्तशिल्प से सम्बधित गृह सज्जा की सामग्री का निर्माण, कढाई एव मेहदी का प्रशिक्षण दिया गया । वरवा बस्ती मे छानामो ने मेहदी लगाने का प्रशिक्षण दिया एव मेहदी लगाई। मोहनवाडी स्थित दादावाडी मे 90 छानामो का दस दिवसीय विशेष शिविर लगाया गया। जिसमे छानामा ने क्टीली घास, पत्थर आदि हटाकर 1 वग किलोमीटर का मैदान साफ किया । इसके अतिरिक्त 1000 मीटर लम्बी और 3 मीटर चौडी जमीन पर मिट्टी डालते हुए भूमि को समतल किया । इस शिविर के तहत वरवा बस्ती मे मोम- बत्ती बनाने एव मोती के आभूषण का प्रशिक्षण देते हुए वहा का सामाजिक, प्रार्थिक सर्वेक्षण किया। वस्ती निवासियो के व्यावहारिक ज्ञान के विकासनाथ वस्ती में विभिन्न विद्वानो के व्याख्यान आयोजित करवाये गये। सत्र 85-86 में 150 छात्रानो की इस इकाई के तहत जल महल मे लगी जल कुम्भी हटाने म जून जुलाई की भीषण गर्मी मे 40 छानानो द्वारा काय किया गया। राखी, मोती के प्राभूपण, मिट्टी के खिलौने, वेकार सामग्री से उपयोगी सामग्री निमारण आदि का छायायो को प्रशिक्षण दिया गया । सवाईमानसिंह अस्पताल मे भर्ती छात्रा कु. सगीता उपाध्याय की किडनी के इलाज हेतु 500 रु० की राशि एकनित करके दी गई। 12 सदस्यो ने रक्तदान दिया एव 53 छात्रामा का रक्त ग्रुप परीक्षण करवाया गया । स्वत त्रता सेनानियो के जीवन पर भापण, निवध एव चित्रकला प्रतियोगिता आयोजित की गयी । शिकारियो के मोहल्ले की महिलामो से सम्पक करके उहे सस्कारित जीवन जीने की प्रेरणा दी गयी। सन 86-87 मे नियमित गतिविधि के अतगत सामुदायिक विकास काय, श्रम के प्रति निष्ठा, मानवीय गुणो का विकास आदि कार्यों को करते हुए 87 छात्राया का एक विशेष शिविर मोहन- बाडी मे आयाजित किया गया जिसमे छात्रानो ने श्रमदान कर तीन सौ फीट लम्बी कच्ची सडक का निर्माण किया । आसपास की वस्तियो मे साहित्यिक एव सास्कृतिक कायक्रम प्रस्तुत किये, साथ हो महदी, मोती के आभूपण, सावुन, सफ आदि के निर्माण का प्रशिक्षण दिया गया । सत्र 87-88 मे इस इकाई के तहत प्रत्येक वृहस्पतिवार को विचार गोष्ठी का आयोजन क्यिा गया जिसमे सामाजिक कुरीतियो के निवारण म राष्ट्रीय सेवा योजना की भूमिका, राष्ट्र विकाम मे युवा वग की भूमिका, महिला विकास और एन एस एस, पर्यावरण सुधार, मानव धम, जीवन मे अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकात, प्राथमिक चिकित्सा आदि विषयो पर विचार विनिमय क्यिा गया। इसी इकाई के तहत प्रतिदिन प्रात काल प्रायना सभा का आयोजन किया जाता है। 150 छात्राओं के लिये अभिरुचि कार्यशाला का आयोजन किया गया जिसमें मोती पुवाई, कार्ड बनाना, सिलाई, कढ़ाई, पर्स एवं थैले बनाने का कार्य सिखाया । दिनांक 12 जनवरी से 19 जनवरी तक सतसांई कालेज में प्रायोजित सास्कृतिक कार्यक्रम में भाग लिया। दिनांक 13 फरवरी को अकाल राहत कार्यक्रम के तहत पशुमो के चारे के लिये 251/-रु० का आर्थिक सहयोग प्रदान किया गया । महाविद्यालय में अध्ययनरत अथवा भूतपूर्व 10 छात्रायो को स्वावलम्बी बनाने का लक्ष्य रहा। -- प्राभार-प्रदर्शन- सस्था के कार्यों को सुचारु रूप से चलाने में मुझे संचालक मण्डल के सभी पदाधिकारियों, प्राध्यापिका बहिनों, बन्धुओं एव कार्यालय कर्मचारियो का पूरा-पूरा सहयोग प्राप्त हुआ है। सबके प्रति बहुत-बहुत अाभार । शिक्षण संस्था का महत्त्वपूर्ण अंग है हमारी छात्राएं। प्रत्येक गतिविधि में इनके अनुशासित जीवन पद्धति से सस्था गौरवान्वित हुई है । अतः सभी छात्राएँ धन्यवाद की पात्र हैं । मैं सभी के उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करती हूँ। यह सत्र जहाँ संस्था की उपर्युक्त विभिन्न उपलब्धियो को लेकर आया, वही इसी सत्र में हम संस्था के प्राद्य संस्थापक एवं मन्त्री श्री राजरूप जी टांक को खो बैठे । 27 अक्टूबर, 1987 को प्रापका असामयिक निधन हो गया । आप सदैव संस्था को तन-मन-धन से सीचते रहे । अापका पार्थिव शरीर अब हमारे बीच नहीं है पर आपकी प्रेरणा और वात्सल्य भाव हमारा मार्ग प्रशस्त करता रहेगा । महाविद्यालय परिवार आपकी अनवरत रूप से की गई निष्काम सेवायों के प्रति श्रद्धानत है। श्री वीर बालिका शिक्षण संस्था का उद्देश्य नारी शक्ति को जागृत, विकसित और सुसंग्का- रिन बनाकर प्रगतिशील समाज के नव-निर्माण मे उसे सक्रिय और सजग बनाना है । इस उद्देश्य की प्राप्ति में आप सब तन-मन और धन से हमारे सहयोगी बनें, पती अन्यधना है। शान्ता भानावत মণা शैक्षणिक एवं अशैक्षणिक कर्मचारियो की सूची श्री वीर बालिका महाविद्यालय, जयपुर शैक्षणिक विभाग-- " . . श्रीमती डॉ शान्ता भानारत, एम ए, पीएच डी, प्राचार्य " स्नेहलता बद, एम ए (समाज शास्त्र व हिदी), अध्यक्ष समाजशास्त्र विभाग , लक्ष्मी श्रीवास्तव, एम ए, अध्यक्ष, इतिहाम विभाग डॉ मरोज वर्मा, एम ए पीएच डी, अध्यक्ष, हिदी विभाग मुश्री मराज काचर, एम ए , एम फ्लि, अध्यक्ष, मस्कृत विभाग श्रीमती विमला शमा एम ए, एम फिल, अध्यक्ष, अग्रेजी विभाग " सुनीला जैन, एम एम सी , अध्यक्ष, गृह विनान विभाग सुश्री मन्जु जन, एम ए अध्यक्ष, अयशास्त्र विभाग श्रीमती हा कमलेश तिवाढी एम ए पीएच डी , व्याख्याता, इतिहास विभाग " हरजिदर कौर, एम ए, एम पिन अध्यक्ष, राजनीति विनान विभाग डा मुकुल मिह, एम ए , पीएच डी , व्याभ्याता, हिंदी विभाग इद्रा शर्मा एम ए , व्याख्याना, समाजशास्त्र विभाग " पुष्पलता जैन, एम एस मी , व्याख्याता, गृह विज्ञान विभाग सविता किशोर, एम ए , एम फ्लि, व्यास्याता, राजनीति शास्त्र विभाग रीता शर्मा एम ए व्याख्याता, इतिहास विभाग श्री राधामाहनलाल गुप्ता, एम कॉम , एल एल बी शिक्षाशास्त्री, प्रभारी वाणिज्य सकाय मुश्री शशि भागव, एम कॉम , व्यास्याता, व्यावसायिक प्रशासन " मुन्नी मित्तल, एम कॉम , एम ए (प्रय शास्त्र) एम फिल, व्याख्याता, प्रा०प्र० एव वित्तीय प्रवध श्रीमती निगा भारिल्ल, एम कॉम, व्याख्याता लेखा एव व्यावसायिक साख्यिकी - " 152
श्रीमती अञ्जु कादारा, एम. कॉम, व्याख्याता, लेखा एवं व्यावसायिक शांत्यिको
शारदा तिवाड़ी, एम. कॉम, व्यारयाता, आर्थिक प्रशासन एवं वित्तीय प्रबन्ध
सुश्री ललिता शर्मा, एम. कॉम, व्याख्याता, व्यामवायिक प्रशासन
ज्योत्स्ना श्रीवास्तव, एम. कॉम, व्याख्याता, अार्थिक प्रशासन एवं वित्तीय प्रबन्ध
• नीति श्रीवास्तव, एम. कॉम, व्याख्याता, लेखा एवं व्यावसायिक मांन्त्यिकी
अलका जैन, एम. कॉम, व्याख्याता, व्यावसायिक प्रशासन
कार्यालय कर्मचारी-
-
श्रीमती सत्यवती शर्मा, पुस्तकालयाध्यक्ष
डॉ. कोकिला जन, वरिष्ठ लिपिक
श्री विमलकुमार जैन, वरिष्ठ लिपिक
राजेन्द्रप्रमाद वर्मा, कनिष्ठ लिपिक
राजेन्द्रसिंह गोखरू, कनिष्ठ लिपिक
, महेगामार व्यास, कनिष्ठ लिपिक
चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी-
श्रीभ्यामनिह राजावत, चुक लिपटर
धर्मचन्द लोहा, दपतनी
रामगोपाल गर्मा, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी
जोलनप्रमाद शुगता, जोडीदार
गर मोरिया, ननु भंगी पानंगा
" गुमागमा
तीनी वा
H
.
M
श्री वीर बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय हायर सेकेण्डरी विभाग . " " " - . शैक्षणिक विभाग-- श्रीमती उर्मिला श्रीवास्तव एम ए वी एड , प्रधानाचार्य " सुलक्षणा जन एम ए वी टी, व्याख्याता स्वदेश नागिया एम ए डिप्लोमा आर्ट, व्याम्याता राजकुमारी एम ए वी एड , व्यारयाता शशिवाला शर्मा एम ए वी एड व्याख्याता स्वरण भागव एम ए बी एड , व्यास्याता रतना स्वरूप एम ए वी एड , कनिष्ठ व्यारयाता नदूदेवी वर्मा वी म्यूजिक, कनिष्ठ व्याख्याता , पुष्पा जैन एम ए बी एड , कनिष्ठ व्याख्याता " उर्मिला कक्कड एम ए बी टी, कनिष्ठ व्यारयाता श्री त्रिलोक्कुमार गुप्ता एम एस-सी , बी एड , कनिष्ठ व्यास्याता श्रीमती निमला माथुर बी ए वी एड , सहायक अध्यापिका मालतीलता जैन मैट्रिक, सस्कृत शास्त्री, सहायक अध्यापिका , पुष्पा श्रीवास्तव एम ए बी एड , सहायक अध्यापिका वीना कानूनगो एम ए बी एड , सहायक अध्यापिका सुधा शुक्ला एम ए वी एट, सहायक अध्यापिका शोभा सक्सेना बी एस सी , बी एड , सहायक अध्यापिका श्री राजेन्द्रकुमार डागी, सगीत विशारद, तबला वादक, सहायक अध्यापक सुश्री रजना यादव एम कॉम बी एड , कनिष्ठ व्याख्याता " सगीता सौगानी एम कॉम , कनिष्ठ व्यारयाता श्रीमती रेणू कुम्भट वी ए बी एड , महायक अध्यापिका सुश्री प्राभा सहाय बी एस-सी , सहायक अध्यापिका श्रीमती प्रमिता भागव एम ए बी एड , सहायक अध्यापिका कल्पना जैन वी एस सी , सहायक अध्यापिका किरन वत्रा वी ए बी एड , सहायक अध्यापिका श्री मालीराम शर्मा एम ए बी एस-सी बी एड , सहायक अध्यापर " - " - " . 154 श्रीमती नीना जन बी. कॉम., सहायक अध्यापिका गुश्री मुनीना बी. एम-मो. बी. एड., अहायक अध्यापिका रश्मि सरसेना एम. कॉम, महायक अध्यापिका कार्यालय कर्मचारी- - श्री नेमीचन्द सोगानी, इण्टर कॉमर्स, मुख्य लेखक रामजीलाल शर्मा, हायर नेकेण्डरी, कनिष्ठ लिपिक श्रीमती पना भार्गव, बी. ए. लाइब्रेरी सर्टिफिकेट कोर्स, लाइब्रेरियन - चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी- श्री लल्लूलाल, चौकीदार देवीलाल मिडिल, सेवक श्रीमती पन्नी वाई, सेविका কম স্না स्वरपीवाई पापा बाई शान्ता हरिजन, रवीपर . श्री वीर बालिका प्राथमिक विद्यालय प्राथमिक विभाग नक्षणिक विभाग- , श्रीमती पुण्यवती जैन, मैट्रिक प्रो. सू., प्रधानाध्यापित , नया गाना, मदिरा, पन. टी. नी., सहायक अध्यापिका मानदेनी नागेना, मैट्रिक एम. टी. नी. महायत प्रध्यापिका प्रागेट, हायर मंगे, एम. टी. नी., माया प्रचारिता मना, की, न भी... मामा पापापिता मोरm. n. थी , मा. प्रामाणि स, श्री. दी... महिला TER, ".... Tum ::mi :: ..., "...मी. Mail + श्रीमती माधवी भागव, बी एस सी वी एड , सहायक अध्यापित , पूनम सक्सेना, एम कॉम , वी एड , सहायर अध्यापिका " सविता भार्गव, एम ए बी एड , सहायक अध्यापिका सुश्री कमलेश पावा, बो ए, एस टी सी , महायक अध्यापिका शिखा जैन, द्वितीय वप वाणिज्य, सहायक अध्यापिका मीना चौहान, एम ए, सहायक अध्यापिरा " अन्नू मल्होत्रा, बी कॉम , सहायक अध्यापिका श्रीमती पुष्पा निगोतिया, वी ए बी एड , सहायक अध्यापिका कमला श्रीवास्तव, साहित्यरत्न, सहायक अध्यापित चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी- " " श्रीमती प्रेम संन, सेविका अनीता मण्डल, सेविका श्री वीर बाल निकेतन शिशु विभाग शैक्षणिक विभाग- सुश्री विमला चटर्जी, इण्टर माण्टेमरी मुख्याध्यापिका श्रीमती स तोप जैन, मैट्रिक, सहायक अध्यापिका सुश्री तारा वोहरा, मैट्रिक, सहायक अध्यापिका श्रीमती ममना अग्रवाल, एम ए , सहायक अध्यापिका चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी- श्रीमती कमला दाइ, सेविका नगीना वाइ, सेविका " 156
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