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Disha Bodha
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दिशाबोधः
(सामाजिक उपन्यास)
श्रीराम शर्मा 'राम'
संगीता प्रकाशन
30/64, गली नम्बर 8, विश्वास नगर
गाहदरा, दिल्ली-110 032
सस्करण
पहला, 1989
प्रकाशक
सगीता प्रकाशन
30/64 गली नम्बर 8, विश्वास नगर,
शाहदरा, दिल्ली 110032
जोशी, क्ला सगम
आवरण
भारपण
मूल्य
रु.4500
मुद्रक
श्री महावीर प्रिंटिंग प्रेस
27/100 गली नम्बर 7, विश्वास नगर
शाहदरा, दिल्ली 110032
DISHA BODH
written by Shri Ram Sharma 'Ram'
Price Rs 45 00 Oal
दिशा बोध 1 नाम सुखिया था उसका, परन्तु वह वस्तुत दुखिया थी । जिन्दगी वा बाम सिर पर उठाए वह पथ की सकरी घाटिया को पार कर रही थी। कभी किसी पत्थर से टकराती, कभी पथ मे पडे शूल की पीड़ा से पैर को पपड कर रह जाती। उसके प्राणों की तडफ मन की टीस, सागर ये गहर अन्तराल की तरह स्वत ही गभस्थ हो जाती थी । वह न किसी से कुछ कह पाती, न सुन पाती। मानो वह निलय बनी, अपने-आप में उमड-घुमड पर रह जाती थी। पति के निधन के बाद, सुखिया के लिए मसुराल के द्वार अवरुद्ध बने थे । वकाव्य को प्राप्त हुई बहिन के पास जब भैया पहूचा, तो उसे सुनाकर सुखिया की मास ने कहा था, तू आया है तो ले जा अपनी बहिन को । यह ऐसी डायन आई इस घर मे, मेरे लाल को डस गयी यह कुलटा है, कुलच्छनी है, मैं इसे घर मे नही रख सक्ती । जब मेरा लडका नहीं रहा, तो उसकी बहू भी यहा नही रह सकेगी मुखिया का भया अभी युवक था । गरम खून था उसके शरीर मे । बहनोई के मरने का समाचार पाकर ही वह दौडा माया था। अभी दो वष पूर्व ही उसकी बहिन का विवाह हुआ था। सिर पर से पिता का साया हठ चुना था, वह अकेला ही परिवार की पतयार सम्भाले हुआ था। जब मुखिया की मास न क्टु वचन कहे, तो वह हत्प्रभ रह गया । तुरत सोम से भर उठा-मौसी मेरी बहिन का जीवन तो विगढ गया, बन तुम इस तरह के क्टु वचन कह कर उसके जरुम पर नमक मत छिडको । मैं इसे साथ ले जाऊगा । तुम बुलाओगी तो आएगी, अन्यथा उसी घर पर 5 । सपनों जीवन बिता दगी । दा राटी यहा भी मिलगी। सुखिया की सास का नाम था यशोदा । जब वह बहू के भया स बात कर थी, तो तभी, उसका पति रामदास घर म आया। उसके माते-आते बहू के भाई नरपत की बात सुन ली थी। घर के चौक मे आते ही बोला 'क्या भया, किसे दो रोटी दे रह हो । क्या अपनी बहिन को" नरपत बोला 'मौसी रहती है, मेरी बहन अशुभ है । यहा रहने याग्य नहीं । डायन है उसक वेट का डस गयी।' रामदास का मुह कडवा हो गया, 'राम | राम | कसी बात करत हो, तुम ! कोई बहू-बेटो अशुभ होती है, क्या । मेरा लडका तो अपनी मोत मरा था। उसका इतना ही अन जल था, इस धरती पर ।' उसने सास भरी ---'भगवान की लीला अपार है । उसका कोई पार नही पा सकता। भगवान का नाम सत्य है और सब मिय्या है। यशोदा बाली-'तुम बहू को जाने दो । कुछ दिन रह आएगी।' रामदास बोला-'अभी नही, बेटे को गए अभी महीना भी पूरा नहीं हुआ । लोग सुनगे, तो क्या वहगे । बेटे के मरत ही बहू को निकाल दिया, यही न ! कभी बुद्धि की बात भी कर लिया करो। यशोदा ने स्वर में तीव्रता लेकर कहा-मेरे पास बुद्धि पहा है । भाग्य कहा । मरा हाथी सरीखा बेटा चला गया, कम्बख्त औरत का इससे बडा सबूत और क्या होगा।' वह भाद्र हो उठी । उसके मन की 'क्या होठा पर उतर आई। वह रा पड़ी। रामदास बाहर की जार लौटा'शान्त पन, यशादा । अपन साथ मुझे भी परेशान मत कर । जव से मलखू गया है न आया जाता हन रात में सोचा जाता है । लगता है वह अपने साथ मेरा प्राण भी नाच कर ले गया । रामदाम दरवाजे पर खड़ा हो गया और मुड कर बोला-- 'आज मुझे लगता है, मैंने अपने मानम से उलीच उलीच कर अपना ममत्व उस मलखू को अर्पित क्यिा था । जाने कहा से वह सुदर पछी उड कर इस घर की डाल पर आकर बठ गया था। जब समय आया तो अपने वे सुनहरी पख पसार कर चला गया उसका प्राणपखेरू जाने किम दिशा की ओर उड गया । 6 रामदास के उस क्रुणा भरे क्थन से घर मे विवाद की छाया फल गयी। एक ओर बैठी सुखिया झुझक पडी थी । उसका तो सब कुछ चला गया था। कुछ दिन पूव, वह सुखी थी, सधवा थी, परतु पति के जाते ही, मानो उसका सवस्व लुट चुका था। अतएव, उसकी वेदना जसीम थी। ममुद्र की गहराई के समान थी। तभी नरपत ने कधे पर चादर रख ली और लाठी उठा ली । झुककर उसने मौसी के पैर छुए और बोला--- 'जब खबर दोगी, मैं आ जाऊगा । सुखिया को ले जाऊगा।' यशोदा मौसी चीख पडी-'अरे, तू भी मेरी भाषा म बोलता है । मेरा भाग्य तो भगवान ने फोर दिया, अब मेरा तमाशा क्या वनाता है।' नरपत बोला नही वह ओसारे मे बैठी सुखिया के पास पहुछ गया। उससे वोला में जाता हू । देर क्रुगा, तो धूप हो जाएगा। तू पत्र लिखवा देना । तेरा देवर तो पढता है, पत्र लिख लेगा।' वह चल दिया । बाहर बैठे रामदास के पास जाकर बोला-'अच्छा, मौसा । मेरी राम-राम ला । कोई काम हो तो लिख भेजना । मुझे अपना दास ममझना।' रामदास बोला-'आत रहो। मौमी के कहने का बुरा न मानना, वह या है ना, उसकी छाती पर चोट पडी ह । जवान लडका गया है । बडे जतन से पाला था, मलखू को । जादू-टोन भी कराती थी, पण्डित पडिय को भी दान-दक्षिणा देती थी । मलखू बचपन मे भडा बीमार रहा था, उसे रात रात भर लिए वठी रहती थी।' नरपत बोला-'मा का त्याग बहुत बडा होता है। रामदास ने सास भरी--'हा, भैया | इस जिदगी का कारवां एस ही चलता है । औरत मद सभी त्याग परत है, अपनी मन्तान के लिए।' यह वोलो-फिर भी हाय खाली के साली । अजीय सिलसिला है, इस जीवन का। भगवान की रचना को कोई समय नहीं पाता।' नरपत दोला-'मोमा, यह तो मराय है । एव आता हैं, एक जाता है। यह डेरा उखढता रहता है। अच्छा राम । राम । गमदास ने कहा-'राम राम । आत रहया । अपनी वहिन का चिन्ता न घरना । यह घर उसी का है । जगल के पेत भी उसके ह । मौमी की बात का पुरा न मानना।' 7 दिमी बा-बटा वा सुना नहीं, ये बदजात छोकर पनघट के चारातरफ गमदाम योला-'पशादा भले आदमी अब रास्ता पाटपर चलन छपहाना अपनी पगड़ी उतरवान'उसन हरका हटा दिया नरपत ने चिंचित खडे होकर बात सुनी और तेजी से आग वढ गया। गाव दूर नही था, लेकिन सूरज अपनी तेज गर्मी और धूप के साथ पर बढता आ रहा था। वह गाव से निकल कर अपने गाव की पगडण्डी पर चढ गया। उसी समय यशोदा घर के अदर से उठ माई । रामदास की चारपाई के पास जमीन मे बैठ कर बोली- तुम कहते तो हो, मैं पागल हू, मूख हू । लेकिन मैंने गलत नहीं कहा, दो-चार महीने बहू अपना मां के पास रह आती । उसके स्वर मे करुणा और व्यथा फूट पडी-- मेरा लडका क्या गया, अब हमारी सांसत मे जान आ गयी। जवान बहू है, अल्हड़ है । इस यह भी सऊर नही क्सिस बोले, किसस नही । घूघट काढने की ता इमन क्सम खा ली है । जाने माने क्या सिखाया । करम फूट गए मेरे तो, जा ऐसी बहू इस घर मे आ गयी रामदास हुक्का पी रहा था। वह प्रात का समय था । किसान अपने वेता मे चले गए थे। सब ओर सन्नाटा था। रामदास भी खेत पर जान सी बात मन म लिए था। परन्तु धूप बढ रही थी। उमका साहस घट रहा था । लकिन जब यशोदा न वहू की बात उठायी, तो वह विषाक्त भाव स मुस्वराया-सुन, यशोदा । तू अपनी बात भूल गयी। मेरी मा दिन मे कई बार मुझे टकोरती थी घूघट काढने के लिए । और अब तो युग ही बदल गया । शहर म ता कोई घूघट करता नही, गाव-देहात म अभी परदा चलता है । लेकिन इसस लाभ क्या है । पाप करने वाला मात पर दाम भी नहीं रूकता। पति की बात सुनकर यशादा चिढ उठी-'बस, बस तुम अपनी यह वेदान्ती यात रहन दो। थोडी बहुत लाज शरम रह गयी है, गाव-बस्ती म तो उम भी तुम सरीख मुधापाटी मिटार छोडेगे तभी तो गाव नगाडे पैदा हा चले हैं। अब तो पनघट पर भी जाने वा धरम नही, - . चकवर पाटन है । योई वर्षों वाला भी नहीं। बोई बोले भी, तो उगम पटन मातंगार रहत है।' 8 ?" और कहा- 'तुम ता लडया की बात कहती हा, सुना नही, जसपत की नहकी घर स गयी, ता लोट पर नहीं आई। तभी से घरवाली चारपाड पर पड़ी है। यशोदा बाली, 'वह लडकी तो खुद भागी थी। उस पर जवानी क्या आई, दीवानी बन चली थी । क्या पता है, वह जीवित भी है, या नहीं । शरम आइ हा, तो किमी युए-पायर में डूब मरी होगी। रामदास वोला-'बदमाश आदमी अपना मतलब निकलने पर औरत का मार भी दत है। उसी समय एक व्यक्ति उधर म निक्ला-चाचा, राम-राम? रामदास न कहा-'राम-राम, भैया कहो, रात तुम्हारी तरफ कैमा गोर उठा था 'यह रामपत की बहू है न, तो उसक घर पर दा बदमाश चढ आय । शराब पीय थ । रामपत की लडकी को बुला रह थे।' 'राम गम' यशादा ने कहा---'उस लडकी का तो विवाह हान बाला है । सुना है, लडवा रोक दिया है। 'हा याची । लेकिन लडकी खुद अपना चाल चलन ठीक नहीं रखती। जबान लडकी है, जब देखो पनघट पर या अपन खेत पर दिखायी देती है । शतान लडवे भार वी तरह उसके पारा और मडरात है। मां भी लडकी भी नही रोकती। उसकी सुनती भी नहीं। वह जागे बढ गया । तभी यशादा ने पति वी आर देगा । उसका क्या अभिप्राय था, राम दाम समझ गया। परतु वह कुछ कह नही पाया । कितु यशोदा बोली- यह नगी सलवार अब हमारी गदन पर भी चलेगी । मेरा लडका तो गया ही, यह जवान बहू सिर दद बनगी । हमारे मिर फुडवा देगी।' तत्क्षण ही रामदास बोला-'तू तो पगली है। सबको एक ही लाटी स हारती है। तुम्हारी यह अब ना समझ नही । बहू चाहेगी, तो मैं उसका दूसरा विवाह कर दूगा । अब तो इस गांव में शिक्षित औरतो को पढाया नाने लगा है । दस्तकारी भी सिखायी जाती है । तुम्हारी बहू भी मिला कावाम सीख लेगी, तो क्या बुरा है। चार अक्षर भी पढ लेगी। इतना सुनना था कि यशोदा निदन पडी-खाव पडे तुम्हारी बुदि 9 पर । कभी बहू का दूमरा विवाह कर दन का बात करत हा कभी पढाई सिलाइ वी । घर का काम कोन दयेगा । यव मुन्न म इतनी ताकत नही। पेत की कटाई मिर पर हैं । मैं घर दायूगी या मेत । तुम्हारी बातें बहू को इस धरती पर नहीं टिक्ने देगी। गमदास मुस्कराया-'तू तो बहू का उसने भैया क माप भेजती थी। वह चली जाती, ता कैसे काम चलाती । अब जमाना बदल गया है, यशोदा । अपन स्वाय के लिये बहू को अधेर म मत रठ । हमारी लडकी तो है नहीं, वहू की उमर भी अधिक नही इसकी जवानी को अममय ही मार दना शुभ नहीं " रामदास ने माम भरी-'रात मेरी चौधरी जगदेवा स वात हुइ थी। तुम्ह तो पता है उमका भा एक लडवा जवानी म मर गया था। उसका विवाह माल भर पहल हुना था। उसने अपनी छोटी -मी बहू की चूडिया नही तोडने दी । दूसरे गांव मे लडका दपा और बहू का विवाह कर दिया । जितना दान-दहन उम अपो लडने के विवाह पर मिला था, उतना ही, अपन पाम मे दिया । वह गहू अब दा बच्चो की मां है । जाती जाती है । चौधरी या घर अब उसका मैका बना है । बाल, चौधरी ने ठीक नही किया क्या । उस बहू की जिन्दगी मुधर गयी । यहा रहती, तो कोड की तरह उसम दिल दिमाग म सडात पदा हाती। ममूचे घर को सडा दती। चौधरी की जिगी बरबाद कर देनी । यही तो चौधरी ने मुय स कहा, भगवान न ता तुम्हारी बह के माय न्याय क्यिा नहीं, तुम उसकी जिदगी बरबाद न करना । वही दूसरी जगह वठा दना । पुरानी बातें अब नही रही, नय जमाने की आर देखना । मास रोक कर यशोदा न पति की बात सुन ली । वह चुप रही। रामदास बाला-यशावा, तू भी औरत है। जवानी के रग टग दख चुकी है । लडका हो या लड़की चढती धूप को अधा बना देती है । तव पाप-पुण्य लिप पुत का एकाकार हो जाता है। वासना का धुआ जब दिमाग म चढता है ता जिदगी की असलियत को नहीं देखने देता । बडे-बडे ऋषि मुनी और तपस्वी इम वाम वासना थी ज्वाला म भस्त हो गये वे अपना अस्तित्व नती रख मवें ।' तभी यशोदा तुना पडी-'बम चुप भी रहा। यह मब पट भरत के 10 की तरह जवानी सभी - 1 चाचले है । दो ममय खॉन का न मिले, ता इश्क मिजाजी धूल मे मिल जाती है। चाहे इस कान से सुनो चाह उस कान से, मैं बहू का दूसग विवाह नहीं करने दूगी। मैं नहीं कहूगी। वह खुद जाना चाहे, तो जाये । मेरा तो लडका चला गया, अब बहू को भी भेज दो। वह रहेगी, तो मुये उसी की मूरत में अपना लडका दिखायो दगा। यशोदा करुणाद्र हा उठी । आखें भर जाई । वह आचल म मुह डाल कर फफक पडी। सुखिया उस समय दरवाजे की आड म पडी थी। वह सास-ससुर की बात सुन रही थी। जब उमने यशादा का रोती पाया, ता स्वय भी प्रतिभूत हो उठी । वह दरवाजे म हटी और आगे बढ कर यशादा के पास पहुंच गयी। उमन कहा, उठा, जम्मा । घर म चलो । मैंने सब कुछ मुन लिया । वही होगा, जा कुछ तुम चाहोगी। जब भगवान ने मुझे इस घर की डयोढी पर चढ़ा दिया है, तव जयत्र नहीं जाऊँगी । मैं दा अक्षर पढी और भिलाई का काम मीखूगी।' 'वाह । शाबास, मेरी यहू ।' रामदास गागद हा उठा-'मुथे तुम स यही उम्मीद थी। दन लिया न, यह तरी सास जपने पापो में नुमे बमा बैठी है । यह गुस्सल तो है, लविन ममतामयी भी है।' मुखिया ससुर मे घूघट करता थी, लेकिन वोलती भी थी। तभी बाली -पिताजी, अम्मा का मुझ पर अधिकार है । मैं इनकी बहू भी है और बेटी भी। इस घर को छाडना मेरा धम नही । भगवान न जहा एक बार वठा दी, ता बैठ गयी । इतनी उमर मे, मैं व्याहता भी हुई और विधवा भी । अब मेर भाग्य म पनि का सुख नहीं, तो दूसरी जगह जाकर क्या यह स्थिति नहीं आ सकती। इमकी काई सीमा नहीं।' रामदास वै मन म बात थी कि यह द, यत् थाडी भावुकता है, वास्तविक्ता नही । आदश और ह और जिन्दगी में भी दखी-सुनी बात और । परतु वह अपनी बात राा गया । तभी वाला-' -'बहू, तरी वान तो सान की है। इस पर चल मके, तो अच्छा है। भगवान तुझे बुद्धि द। तू रहगी, ता हम ममगे हमारा मानू जीवित है। चार साल बाद तेरा दयर भी जवान हो जायगा । उसका विवाह भी होगा। माम बाद तू ही बुजुर्ग बनेगी इम घर की।' 11 - यशोदा घर म चल दी। सुखिया भी साथ थी। आंगन म चारपाई पडी थी, यशोदा बठ कर बोली-'देख, बर मिलखू का पिता भी ठीक मोचता है । मैं भी अपन स्वाथ के लिये जिदगी नहीं बिगाड सकती। अभी तेरी उमर ही क्या है ? नही बच्ची है । अभी तो बीम बग्म की भी नही । तू वही जायेगा, तो मैं तरा रास्ता नही रोकूगी।' किन्तु सुखिया बाली नही, वह चुपचाप आगन की दहलीज पर बैठा रही । उसके एक पर का अगूठा धरती पर चल रहा था । स्पष्ट था, मास-ससुर की वातो न उसकी सोई हुइ भावना का जगा दिया अतएव, उसके दिमाग म भूचाल उठ आया था । उमा न तो याग का पाठ पढा था, न त्याग का । यौवनमयी युवती के मानम की आकाक्षा उसवे भी पास थी । वह उसे आदोलित करती थी। अभी ता पति का मर परे नही हुई लेकिन रातो रात वह या तो रोती रहती या जागती । स्पष्ट था उन दिनो मुखिया पो भाग्य म शान्त नही थी। जब वह खेत पर जाती, भैम के लिय चारा काट कर लाती, ना तब रास्त मे जाते जात नाग जिस तरह का आवाज कशी करत । उसम, सुखिया के प्राणा म वरबस ही हिलोर उठ आती थी। मानो गार के वे युवा उसके पास काई अमूल्य वस्तु दयत ये । उमरे उठे हुए यौवन को धूरत थे । और वह सुखिया थी, निरी बेचारी | निरी निस्सहाय । भला उमका यौवन, उसके शरीर का वह उदात पक्ष कैसे घुमता । सुखिया उस किस प्रकार जोगा की आखो मे ओझन कर पाती । अतएव वह विवश थी । स्वय ही अपन आपसे हार मान बैठी थी। प्रकृति दत्त आशीप जब उमे प्राप्त या गुलाब की सुगध के समा। उसका यौवा सुगचित हा रहा था, तब 'न तो वह खुशनू का मार सक्ती थी, न अपन आपका । लोगो की आखें उस फ्माती थी। व उसे भयावह लगती थी। पनघट पर, या खेत पर जब कोई औरत उसकी जवानी या रूप का किसी दूसरी औरत में बवान करती, तो तब भी मुखिया अपने आप मे सुकट जाती थी। उस लगता अवश्य ही उसरे पास ऐसा कुछ है कि जिमे दस पाकर ये औरतें और मद उमरा उल्लेख करत हैं उमरे म जोर यौवन की प्रशशा करत . 12 उसी समय यशादा बोली-'बहू, मच कहा है विसी न, जिसके पैर न वट विवाई, वह क्या जान पीर पराईही, तेरा यह वैधव्य कैस कटेगा, आजक्ल यही बात मुझे रात-दिन संवाती है। ऐसा लगता है कि कोई जहरीला कीडा मेर प्राणी को कुलर रही है में किसी मे पहती नहीं, लेकिन बेचैन रहती है। मेरा मलखू तो गया, परन्तु अब उसके नाम पर बैठी हुई तू, तेरी जवानी, तरी रूप मेरे दिन को नोच-नोंच नेता है मैं मोच नही पाती क्या करू', तेरे लियः मलखू के चाचाले गलत तो कहा नहीं कि तेरा दूसरा विवाह कर दिया जाय तब न रहेगामि न बजेगी बासुरी हा, गाँव के लुगाडे तब भला क्या पायेंगे, इस घर पर क्या देखेंगे । तुये याद है ना, मामराज इमीलिए मारा गया कि लोग उसकी लडकी को उडा दना चाहत थे उन पर का धन तो गया ही, बाप भी गया । लडकी धनिया को गुण्डे कहा ले गये, आज तक पता न ही चला । सुना जाता है, धनिया ने ही उन गुण्डो को रास्ता बताया था। बाप को मरवा दिया था।' मुखिता कहना चाहती थी, सब को एक लाठी से मत हाँको । पर तु वह तब भी चुप थी। मानो उस समय कही अन्यत्र थी। यशादा बोली-'जमाना बहुत बदल गया है, बहू आज भैसके लिये चारा भी नहीं आया । अब तो धूप चढ भाई। चूल्हे मैं आग सुलगा दे। दाल रख दे। दोपहर बाद सेत पर चली जाना । अब आगे से मलबू का चाचा भैस का चारा ले आया करेगा। कभी मैं भी चली जाया करूंगी। तरा जगल जाना बन्द कर दूगी। सास के मन का भाव सुखिया नहीं समझ पाई । वह राटी बनाने के लिए पूल्हे के पास पहुच गयी। 2 रघुनायपुर गांव उस जिले में इस बात के लिये प्रसिद था दि वहाँ के डार और चोर दूर-दूर सक पहचते थे। भनेर बार पुलिस ने उस 13 । गाव वा घेरा डाला था । इ डाकूआ वे घरा की जमीन ता खोद डाली थी। कई व्यक्ति लम्बी सजा पाकर जेल मे बैठे थे और कुछ फामी पर चढा दिय गये थे । लकिन पुलिस की सख्ती के वावजूद भी रघुनाथपुर गांव के लोग हत्या, लूट और राहजनी सरीख खतरनाक कारनामा वा छोड़ने के लिय नन्पर नहीं थ ।माना उम गांव के पानी म ही यह असर था, अथवा वहा की मिट्टी म । जारावर एम ही मरवार और कुछ व्यक्निया म मे एक था। वह नया जवान था । कद्दावर पटठा था। देखन म सुदर । कि तु उम अल्प जायु म ही वह कई खून कर चुका था। लाख रुपय वा मात उसने विविध स्थाना पर जाकर लूटा था । जारावर ने अपना एक दल वन रखा था | उसा सगठन जभेद या। पुलिस की चप्टाएँ विपत रहती न जारावर पक्डा जाता, न उसका वाइ साथी । वह अविवाहित था। पुलिस का और गांव में लोगो का अनुमान था कि जारावर खूखार जोर नशस भेडिया तो ही, दुदकित भी था । वह शरावी था नारी-लोलुप था । विस्मय की बात यह थी कि अपन' गाव में उमन न तो किसी को सताया, न किसी के यहा डाका डाला । अपितु हाता यह कि जोरावर गाव के किसी भी निबल अथवा अशक्त परिवार की सहायता करना अपना मानवीय वर्तव्य मानता था। गांव की कई विधवाआ की उसने इसलिए मदद की, जाधिक कठिनाई प कारण वे अपनी पुत्रिया में विवाह नहीं कर पाती थी। पुलिम का विश्वास था कि जोरावर गांव म आता और किसी न किसी परिवार म त वितावर भार के मधेरे में अपने ठिकाने पर लौट जाता था। वह उमी परिवार का एव सदस्य था, जिसका मुखिया चाधरी रामदाम था। वह जोरावर का ताऊ था। इस पता था कि ताऊ पाप को पाप ही कहता ह, पुण्य नही । इसलिए पुलिस का भरोसा था कि रामदास इस बात का नहीं छुपायगा विजारापर घर पर आया या नहीं। वरावर मही उममा पर था । दरवाजे दो य लक्नि बीच की दीवार एक । मलखू मरा ता जारावर उस घर पर भात ही रा पडा था । वह रामदास के पर पक्र पर बोला था, मैं तुम्हाराहू सेवक हू। वह मलखू का अपना-वडा भाई मानता मा । उम रात जोरावर ने मुखिया कभी पैर पकडे थे और 14 भाभी कहकर उस सम्बोधित करता हुआ बाला-~'मैं तुम्हारा सवा हूँ । भाधी रात हाजिर रहूगा । और नोटा की एक बड़ी गड्डी सुखिया परो म रख कर तुरन्त ही उम घर में पलायन कर गया था। पुलिस का भरासा था कि ऐम अवसर पर जोरावर आयेगा, इसलिए जब वह अदर मकान म मुखिया के चरणो मे झुका था ता तभी, पुलिस का थानेदार गमदास के पास आकर बैठा था। दो घटे पूर्व ही, वह अपन पुत्र मतखू को चिता पर रख कर लोटा था । उसका पुत्र किस तरह जला, प्रचण्ड आग म विम प्रकार भस्मीभूत हुना यह करुण और व्यथापूण दृश्य रामदास को आसा मे तव भी घूम रहा था। उसी समय जोरावर दीवार फांद कर पलभर मे नौ दो ग्यारह हो गया था। निराश और चकित बना दरोगा उम मकान स लौट गया । रामदास उस समय स्वय करुणा स और मन स हा हावार से भरा था। वह दरोगा को कुछ बताने को स्थिति में नही था । वह लाचार था। विधवा के क्रूर पदाघात से स्वय तिलमिला उठा था। आश्चय की बात यह थी कि जब जोरावर गाव में आकर रामदास म मिला फिर ताई से, तो उसके बाद ही, एकान्त मे बठी सुखिया के पास जाते हो, करुणा से बनकर यह उठा था--'भाभी' मैं तुम्हारा सदा सेवक रहूगा । ये रुपय दिय जाता है किसी को बताना नहीं । यह सहायताथ नही, अधिकार है, तुम्हारा। जब जोरावर उस घर म पलभर मे पलायन कर गया, ता तभी, यशोदा ने मुखिया के पास आकर पूछा-'क्या कहता था, यह जारावर । अब तो इस घर इसका आना भी भयावह लगता है। मन कापता है।' सुखिया की करुणापूण आखें आसुओ से लालित थी । तब यशोदा पास पहुची, तो वह कुछ कह नहीं पाई, वेदना से परियुक्त आखें उपर उठा दी। वे उसके गोर गालो पर निकल आई थी। यशोदा लोट पड़ी और कहती गयी-'अब इस जारावर मे सतक रहना है। काला नाग है उमका डसा बचेगा नहीं हा, री बहू । जब मलखा था, तो वह जोरावर उसे अपना बडा भया मानता था । उसका मम्मान भी करता था। अब वह तो रहा नहीं। इसका रास्ता साफ हो 15 - " गया। अपना सगा सहादर है, ता इसमे बचकर रहा भी नहीं जा सकता। जानती तो है तू, तालाब में रह कर मगर मे बर नहीं किया जा सकता यह सम्बन जोरावर आदमी को तिनके की तरह तोड पर फेंर देता है जाने कितने घरो का नाश कर दिया, इस जल्लाद ने । यह ता आदमजोर ह । सुनती हू, श्मशान मे कुछ मुरदा खाने वाल जानवर रहते है लेकिन यहा तो यह जोरावर ही उसी समय रामदास घर में आया । कुछ देर पूर्व घर व आगन म औरतें एकत्र थी। उनम जारावर की मा भी थी। जब वे सब लौट गयीं तो घर में आते ही रामदास बोला-'सुनो यशोदा जब भगवान एक काम बिगाडता है, ता तब और बिगड जाते है। यह जारावर रूप बदल कर श्मशान म आया था । वहा भी पुलिस थी। लेकिन क्या मजाल वि काई उसे पहचान ले । बचपन म उसके एक हाथ की उगली क्टी थी न तो मैं उसी हाथ को देखकर पहचान बठा था। लेकिन चुप रहा । यहा घर आकर वह मेरे पैरो मे झुका था। यशोदा बोली-'मेरे पास भी आया । पर छू गया । कोठे पर बैठी बहू के पास भी गया था । उसने बहू से क्या कहा, यह तो मैंने नहीं सुन पायी । परन्तु यह सिलसिला अच्छा नहीं । माप से खेलना विपत्ति स खाली नहीं।' रामदास बोला--'कहता क्या, सात्वना दे गया होगा । अव उसका यहाँ माना अच्छा नही । मलखू या तो दूसरी बात थी। यशोदा ने सास भरी-'वह आए, तो उस राका भी नहीं जा सकता। लगा सहाछेर है, काई गैर नहीं। वह बाली-कोई भला आदमी हो तो समझा दिया जाए । वह तो जगली है । खूखार है। किसी की गदन मरोह देना उसके लिए कठिन नहीं। अजी उमके पास रिवाल्वर रहता है। यह गोलिया में भरा होता है । जब रात म चलता है तो स्टेनगन उसके साथ होती है । पई बार तो जोरावर भी पुलिस से मुठभेड हुई है, सदा बचकर निकल जाता है। हिम्मत की बात है आज भी पुलिस के सामने आया और चला गया। यशोदा बोली-'वह तो राक्षस है । अपनी जान हथेली परलिये ।
फिरता है। पुलिस भी डरती है उससे रुपया भी खाती है। कोई कहता था कि जोरावर भी थान म रुपया पहुचाता है। वह पिछला धानदार था न उसकी बेटी के विवाह मे पैमा दिया था।' रामदास बाहर की तरफ्लोट चला---'अधबहू को समझना है। यह जोकर जास्तीन का गाप है। इसका काटा नहीं बचेगा।' उसी ममय यशोदा न सुधिया को सुनाया-सव भाग्य की बात है। इन जोरावर के पैदा होने पर गाव भर की दावत की थी। पण्डित न मत्र देखकर बताया था, बडा भाग्यवान रहेगा तडका' वह बोली- 'खाक पडे उस पण्डित पर | मां न भी क्या जमा-एक डाकू । सुखिया बोली- यह किसी के हाथ की बात नही अम्मा । अम्मा कहना चाहती थी कि जोरावर की मा भी कम नही । बाप ने भी जिसवा लिया, दिया नही । लेकिन वह चुप रही, कुटुम्ब की बात थी। दीवार के भी कान होते है । उससे कहा-'बहू आगन म झाडू दे दे और देख, मुनेश भी शहर से आता होगा। आज उमका आखरी परचा था, तभी तो वह भैया की अर्थी के साथ नहीं जा सका । रोटी धढा दे पेट ता भरना है । मलखू के पिता ने तो आज सुबह से मुह मे टुकडा नही डाला । मेरी भी आतें सुकड रही है । बहू आगन की दहलीज पर बैठ गयी। बेटे की याद आयी तो भभूका-सा पेट मे उठा । वह रो पडी। तभी बोली-'हाय । मुझे क्या पता था कि मेरे बेटे को ऐसा बुखार चढेगा कि फिर उतरेगा नहीं । पानी की तरह पैसा बहा दिया । जिसने जो कुछ कहा, वही क्यिा । मैंन तो पडित-पडिया तक को नहीं छोड़ा। वह सब क्यिा, जो पहले नहीं किया था। बाहर से आता था, मुये पुकारता था। उसके मुह से निकला 'मा' मेर प्राणो म हलचल मचा देता था। मुझे भी 'बेटा' कहने लगता था कि सब कुछ पा गयी हू । धरती पर रहकर भी मैं आसमान मे उडी जाती सुखिया चूल्हे पर बैठी आग सुलगा रही थी। सास जो कुछ कह रही थी उससे वह भी दुखित थी। प्राणो में हलचल थी। मा का बेटा गया, तो वह भी पति विधवा बन गयी थी। पिछली रात मे ही मलखू बुखार 17 तो पहले " की गर्मी मे बडबडाया था। उसने आख खोलकर सुखिया को बुलाया था, अपने बाप के घर चली जाना । अकेली मत रहना । कोई दूसरा साथी ढढ लो, और तब सुखिया बीमार की चारपाई की पाटी पर अपना सिर पटक बठी थी। उसके मुह से हाय ! निकली थी। वह कुछ कह नही पाइ । समुद्र म उठे ज्वार-भाट की तरह उसके मनोलोक म भी भूचाल उठा था । वह उसे समुद्र की लहरा व समान कही-से-यही उछाल रहा था। वह वार-बार कहती और अपना मिर दीवार पर दे मारती । मुटिया न चूल्ह पर दाल रख दी और आटा गूथ दिया । उसी समय रामदाग का छोटा पुत्र शहर स लौट आया। भया को खाकर जैस वह लुट चुका था । उदास उमन बना, घर के जोमार म बठा था । तभी यशोटा पाम आई, अर, कुछ खा ले । मुह झुठला ल । सुबह से क्या कुछ पाया हागा तरा भैया ना गया, अब क्या वह वापिम आएगा। मुकेश ने छोटा पर मुह रहा था। वह रा रहा था। तभी रामदास ने पास आकर कहा-'यह रोना तो जिदगी भर का है । इस घर को दाग लग गया। अव तू उठ । दस, भय भी मुबह से भूखी पडी है। उसके सामने चारा डाल दे वह थोडा बहुत दूध दतो है भूखा पट होगा तो वह भी नहीं मिलेगा। मुक्श अभी पद्रह वप का था। पास के क्स्व म उसकी परीक्षा का सेटर था । उस दिन सुबह से निराहार था । उसका भया रात म मरा था। घर म बोहराम मचा था । रामदास की प्रेरणा पर मुकेश परीक्षा देन गया था। पैर नही उठन थे वस्बे की ओर परतु उसे जाना जरूरी था। परचा न देता तो वह ममूचा वप ववार जाता । लेकिन घर पर विपादमयी छाया फली थी। मुकेश न भाभी से कुछ कह पाया न मा से । घर मे वही एक छोटा था तो दोना मे लगता था । कोई वस्तु पान के लिए जिद्द करता था । तेविन उग दिन वह घर आया। और चुपचाप वट गया। जब पिता भम को चारा डालन या बात कही, तो वर उम काय वा राम्पादन करने लगा। मा ने कहा- भग का पानी पिला द वेटा । प्यासी हागी । विना बोलना जानवर है, इमको गुध तो स्वय लेनी होगी।' यशादा न पास ॥ 18 बैठे पति की ओर दखा-'उसने भी मुह नहीं झुकाया । चना-चबेन' लाऊ १ रामदास बाला- मेरा मन नहीं करता। आज खेत म पानी देने बाजोगरा आया था वह भी निकल गया।' यशोदा बाली-'तुम्ह तो खेत के पानी की सूयती है। मेरी तो दुनिया लुट गयी । यटा गया, सब कुछ चला गया।' गमदास वाला नहीं, यह स्वत ही द्रवीभूत बना पीडा का घूट भर कर रह गया । ऊचे स्वर म यशोदा बोली- वेटा मुवेश, देख तेरी भाभ ने चून्हा मुलगा लिया है । पिता की चिलम मे तमाखू आग रख दे। यह ता दिन मे दस बार हुक्का पिया जाता था, आज एक बार भी नहीं कुछ साया भी नही । जब भगवान हमारे खिलाफ है, तव भला क्सेि दोष दे। सब अपने मुकद्दर का सेल है।' रामदास बाला--'यशोदा, वह है न पडित चण्डीदाम, अर्थी के साथ गया था । जब लहर की चिता जल उठी थी, तो वह चण्डीदाम मेर पास जाकर वठ गया। वह बारह वष वाशी मे पहा था । वडा विद्वान है। भाग्य का हठा ह । गाव म पडा है । वही किसी शहर म होता, तो विद्वान पडित कहलाता । अच्छा पैसा माता ।' उसन सास भरी और कहा--- चौधरी रामदास, कहने का तुम वाप हा और जा चिता म जल रहा है, वह तुम्हारा बेटा, लकिन यह दुनिया के नात रिश्ते थोथे है, बेकार है। सबके अलग-अलग रास्त है । य दुनिया के सम्बव कच्चे धागे मे बधे ह । वह मुझे सात्वना द रहा था। यगोदा दा हा उठी-'अजी, छाता भी उस पडित की बात । उसका भी एक लडा मरा था। तब मैं गयी थी, उसके घर पर वह वेदान्ती पडित रो रहा था और छाती पीट रहा था। क्थनी और करनी म बला मतर हाता है । यह माया मोह मनका मताता है, जिसका जितना सम्बध है, पर उतना ही कालता है मालता है, छाती म दद पदापरता . रामदास न हुब म दम मारा और घना-सा धुआ ऊपर की तरफ छाडकर वोला-तू ठीक रहती है यशोदा । यह मायावी ससार है। 19 मेरा मलखु इधर कुछ समय से अजीव तरह का व्यवहार करन लगा था । पिछले दिनो जब खेत क्ट रहा था तो मेघा चमार उधर जा पहुचा। वह गरीव तो है ही, अपाहिज भी है । मलपून गेहू की बाला से बधी एक गठरी उसे उठा कर दे दी। वह चेता है न, तो उसन आकर बताया था। उसी ने कहा-'मलखू चौधरी का अब स्वभाव वदल चला है, पहले विमा को एक दाना भी नहीं देता था । गुर्राता था, मारता था।' यशादा बोली-'हा, अब उसकी ऐसी आदत बन चली थी। पहले तो मैं किसी का कुछ दे दती, तो डाटता था। वहता था, खेत वा दाना वडी मशक्कत से आता है । खून-पसीना एक होता है । आसमान आग उगलता है और धरती गरम तवे की तरह तपती है । किसान का शरीर झुलस जाता है । वडी मेहनत का दान है, किसाा का।' रामदास बोला-यह बात तो ठीक है । वडा थम की कमाई है, खेत की मिट्टी के साथ मिट्टी बनना पडता है, तब भी भगवान की इच्छा पर है । चार दान घर मे ना जायें, तो बडी बात समझो।' यशोदा ने सास भरी-- -'हा, यह तो है ही। अभी तीन वष ही वी. है, पकी फसल ओला ने चौपट कर दी थी। सए में एक आने का आआज भी किसाना के घर मे नही आया। उसने कहा-मलखू के चाचा, तुम्हारा वह बेटा तो जैस खुद समझ गया था कि अब उसे जाना है । इस ससार की सराय से उसका डेरा उखडना है। इसीलिए तो वह अब गुस्सा भी बहुत कम करता था। कोई कुछ मागता, ता दे दता था । पिछन दिना फसल का कई मन अनाज और धान उसन चुपचाप ही जान विस- क्सिका दे दिया था। वह तुमसे डरता था । मुझस भी लाख चुराता था। पर ने किसी आदमी को पता नहीं चलन देता था। रामदास ने स तोप की सास ली अच्छा करता था। अपना जम सुधारता था । इन्सान लेता तो है, दता नहीं । तुम्हारा बेटा दन लगा था, यही उसका पुण्य का काम था, इस वार मंदिर के पुजारी को भी उसने दा मन अनाज दिया था। पुजारी 7 स्वय मुयस कहा था। रामजी दास गरीय ता है ही पिता कुछ दिय, लहका का उसकी ससुराल भज रहा या। तुम्हार मलय का पता चला तो गाव र दुकानदार स एक साडी ले, 20 " घर रामजी दास की औरत को दे आया। पिछले दिना उम दुकानदार का स्पया दिया था।' यशोदा न पूछा---'तुम्ह कैसे पता चला 'अजी, बात क्या छुपी रहती है । स्वय दुकानदार ने मुझे बताया था। उसी न रहा था, अव तक मलबू चौधरी दिल का उदार हो चला है। भगवान भी उसे दे रहा है। पसल अच्छी उठ रही है।' यशोदा बोली-'इधर कई वप से भगवान ने कृपा की है। मलखू की मा, जैसी नीयत वसी वरपात | भगवान दयालु है । मब देखता है। उसी समय छाटा पुन घर म से आया, चाचा, राटी खालो । यशोदा बोली-~'अर, यही ला । पिछले दिना वर्षा क्या हुई इधन भी गीला हो गया । तरे चाचा घर म रोटी खायगे तो बहू घूघट करेगी, ध्रुप मे आखें खराव हागी।' मुकेश लौट गया । यशोदा भी उठ चली। जाकर दखा कि भैम ने चाग सा लिया था । वह यशोदा की ओर देख रही थी। शायद कुछ माग रही थी। रामदास बोला-~~'दिन छिप चला है, भैस का दूध निकाल ले।' लडवा मुकेश थाली मे दाल और रोटी लेकर आ गया । जब रामदास यान लगा, तो तभी पडोम वी हिरिया वहा आयी । वह वृद्धा थी। 'रामदास से साला बडी थी। उसे देखकर वह बोला-'आजा, चाची। रोटी खा ले।' 'खा, भया । भगवान ज्यादा द । उसन लम्बी सास ली और कहा ---इसी चबूतर पर मलयू बैठता था। दिखता था। सच्चा चौधरी लगता था। मैंने उसे पनी अनेला बैठा नही दया । कोई-न-कोई उसके पास बैठा दियाई दता था। यशोदा भी वहा आ गयी । वात सुपर बोली- चाची, वह पछी तो उड गया । अय जान विम पड की डाल पर जाकर बैठा होगा। रात जव प्राण निपल, ता उसने पहले उसने एक बार मेरी आर देखा था। 'मा' कह पर चुप रह गया था। जरूर उसके मन म तडप घो।' पतना कहत हो ही यशो मन मा मरण माय तिलमिला उठा । यह गे पड़ी। . तो समाप्त हुआ रामदाम बोला-'अब भगवान का नाम सो। प्राया परो वह मुदर पछी जहा जाए, मुग से रह । उगे शाति मिले । हमारा सम्बध हम न बाप रह 7 यह बेटा । यह इग मायाजाल स निक्न गया । जाने पहा गया।' हिरिया न रहा-'हा, भया । जब राप मांग है तब तर जहान है। हमारा सम्बध है, अगीय गोरगधा है, इस निगी का" उम ममय परवाह और चौपाय जगल से लौट रह थे । कुछ विमान घा पर हा रणे, बला यो हापत हुए अपन अपत परा की भार बढ़ रह ५ । गायें रमा रही थी और उनके बच्चे दौडन हुए अपनी माताआ ये साथ आग बढे जा रह ध । उगी ओर दग्रत हुए रामदास वाला~खा, चाची । यह मनुष्या की दुनिया है । यह भी अपना पराया ममझत हैं । बच्चे पिम तरह दौडन है अपनी माताना वो नार य माताए भी रिस तरह हुलसती है, अपन बच्चा को दप-दय । यदा अजीय समार है यह उमन कहा मुझे आज भी याद है, यह यशादा अपन मलखू के लिए प्राण तर निछावर करती थी। कभी उसे किसी प्रकार की शारीरिक बीमारी होती, तो रात भर लिए बैठी रहती। मैंन कई बार कहा, तू औलाद का क्या सहगी म्वय मर जायेगी तब न रहेंगा ढोल, न बजेगी बासुरी हिरिया बोली-'भया, ऐसा ही होता है। औरत पट पाडपर और सिर से कफन बाध कर औलाद जनती है, उसे जम दती है। तभी तो मा जमदात्री कहलाती है । मा बनन के लिए औरत अपना सवस्व अपण कर देती हैं। रामदास रोटी खा चुका था। लडका थाली और लोटा ले चला। तभी वह बोला- बेटा चिलम भी भर देना । अब पडगा रात भर नहीं सोया । सिर भारी है। शरीर टूट रहा है।' हिरिया ने माम भरो-'अब जिदगी भर मोत रहना । रामदास बाला नही। उनके मन मे था नाद तो चली गयी। KI भी गया । अब तो जिन्दगी का अपसाद, मन की पीडा और 22 न्यच्या का बोझ सिर पर ढोत रहना पडेगा बुढ़ापा से खराब होता है, यह मैंने स्वय देख लिया और समझा लिया, यह स्पष्ट था कि रामदास कोई अजूबा नही था। उसी मन म ममता का एक प्रगाढ श्रोत उफन रहा था। गत आधी से कपर जा चुकी थी। बाद निवल आया था। रामदाग उठ वठा । लाटी उठा ली। वह चारपाई छोट कर जगल की ओर चल दिया। जिधर उपके खेत थे, उससे कुछ दूरी पर हा श्मशान भमि थी कि जहाँ उसका मल अग्नि को समर्पित किया गया था। दूर से ही रामदास ने देखा कि एक चिता जल रही थी। उसमे त्या मुदा जल चुका था, क्वल कुछ माटी लकड़ियाँ चटख रही थी । हवा का स्पश पारर उस दिशा क अगर परम्पर टारा रह थे और दूर-दर तक प्रज्वलित होकर प्रवाश पर रह थ । बलात् रामदास के पैर उसी आर बढ गए । समीप जाकर उसने देखा और उस लगा कि बडा भयावह दश्य था वह । एक पट पर उल्लू बठा था और वह अपनी भारी आवाज म बोल रहा था । कही सियार चीत्वार कर रहा पा। रामदाम के पुत्र मल को चिता टण्डी पर चुकी थी। वेवल एक दो लमडियां अभी जलनी शप थी। रामदास दा पता या मि वह लगडियां जिस पड की थी, किसी समय स्वय मलखू उहे काट कर लाया था। उसका विचार था कि उस पड व गुर्दे बड़े वाम र थे । वह वाईस चिरवा पर उनकी अलमारी यायायगा। यथादा का मत था कि उन लाडी वाप बढामदा वन मा । घर की दोस्ती वस्तुएँ उमम रखी जा सकेगी। वितु जव स्वय मलघू वा निधन हुआ यो वे लबडी के गट्टे गारी मे डालसर श्मशान पहुंचा दिय गये । व मलय की छाती पर रसे गरे रामदाा अपन पुत्र मलखान-~मलबू की चिता पे ममीप खड़ा था। 23 साय साय करती ह्वा चल रही थी। वही दूर उक्त भार रह । अब रामदास उस स्थान पर पडा था, तो एम गीदड उस ओर जाया और रामदाम को खडा दप, किंचित रुका और फिर आगे बढकर अदश्य हो गया । उसको पता था । बचपन से सुनता आया था कि उस रात के मनाट म भूत प्रेत जलती चिता वे आरा-पाम घुमत हैं। वे नाचने हैं, क्लिक्लिाते हैं । चूकि रामदास जीवन म प्रथम बार के समय उस स्थल पर पहुचा था इसलिए, वह स्वत हो उन भूतो की वरपना करके सिहर उठा था। सयोग की बात यह थी कि उसी समय उस जलती चिता के ममीप उसे कई बैठा दिखाई दिया । तब परवस ही, वह भय से पाप उटा । श, वह उस स्थल से भाग जाता । परतु उमा पैर भारी हा गय थ । सुन पड़ गये थे । मुह सूय गया था। माखा के आग पधेरा छा गया। तभी आवाज आई-कौन, चौधरी रामदास-1 तब वह और अधिक सिहर उठा । कापती आवाज म वाला- हाँ, मैं रामदास । 'जन्छा पुत्र की जली चिता दसन आये हो । अब क्या रखा है। राख का ढेर है।' गमदास सम्भला कौन भगवाना- हा, चौधरी । वह व्यक्ति लाठी के सहार रामदास पास उठ आया । समीप आर बाला--'यह चिता मरी पत्नी की थी। हम दास का साठ साल का साथ । बड़ी फरमाबरदार थी। मदी हित थी। वह थी, तो मैं सब जोर से सिकुड पर उसो की मीमा मे बधा रहता था। गमदास बडे ममत्व के साथ मुस्कराया- मैंने भी तरी पत्नी का दखा ममझा था। कई बार खेत पर काम करने आई थी । मचमुच, पत्नी भक्त था। उसने सास भरी तो वह चली गई। कोई तकलीफ थी क्या अब तू अवेला और एकाकी बन गया। भगवाना बोला-'चौधरी, मैं तो जाति का चमार ह। जिदगी की बहुत कमजोर धरती पर खडा हू । जब मैं लडाई छिटने पर पोज म चला गया था तो घरवाली न कई चिट्टियां डलवाई , तुम लौट आना । 24 ।
हम एक रोटी के दो हिस्म करवे पट भ ले। नत्र मैं भी फोन में नही टिक पाया । कई बहाने बनाय और त्याग पत्र ददर चला आया। रामदास बोला--'फोज मे रहता तायाम का जादमी बन जाता। तब ता तरा शरीर भी लम्बा चौडा था । छावर जवान था। अव पेंशन पाता । आज अपनी सरकार है ना, फौजिया या घडा सम्मान करती है। तू भी उनकी पक्ति में बडा होता । भगवाना क्षणिक चुप रह गया। तभी बोला- चौधरी में हैं तो गवार परतु इतना समझ पाया हू, जिदगी म यदि दा प्राणो मिलवार बैठ जाये, दोना ये प्राण मिल जाये, ता उसस बडा गुप इस धरती पर दूमरा नहीं। मेरी घरवाली एमी ही थी। मेर पथ पर अपनी आखें बिछाय रहती थी। अब मुझ स किसी किसान के यहा वाम ता होता नहीं, रापी और जूनी गाठन वा सामान लकर पाम ये कम्ब मे चला जाता हूँ । रुपया बारह आन ले आता है।' रामदास बोला-तरी घरवाली का नाम भागवती था न, 'भग्गो पहलाती थी वह । भगनाना बोला-'हा, चौधरी । उसका नाम भागवती था । मेरी तरह उसने भी बडा सघय लिया। विपत्तिया जब एक बार हम दानो के पैर पक्ड बैठी तो उमने छाडा नही । भागवती के चार लड़के और दो खडकियाँ पदा हुई थी । लहरिया ता है, लडका एक नही । दा तो जवान बनकर मरे थे । यमर टूट गई, बेचारे की । फिर भी उसे मेरा ही ध्यान रहा।' रामदास बोला---'ता इस समय क्मे आ गया। मैं तो खेता की तरफ गया था। इधर भी बढ़ आया।' भगवाना बोला-'चौधरी, मन नहीं माना । घर सूना था । चार पडोसी आ गये थे, तो उसकी लाश को अर्थी पर डालकर ले आय । लेकिन मुयें तो वह घर काटता है। डर लगता है। लोग कहत है कि शरीर से निकली आत्मा अमर होती है। वह मरती नहीं । वही दूर नहीं जाती। यहा मार मैं भी अपनी भागवन्ती की नात्मा को दख रहा था। उसी चिता की जलती हुई लकडियां चटख रही थी, ता मुझे लगा, 25
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क्सि पर छोड गई। जीत जी ता यह एमा नही करती थी। अभी पिछल दिना की बात है बीमार थी, आशक्त थी, लकिन जब उसन सुना कि मै बेसन का चीला खाना चाहता ह तो तुरत उठ बठी । चूल्ह म आग थी। उस पर तवा रखा और चीला बना डाला । बस, वही उमका अतिम समपण था। फिर चूल्ह पर नहीं बैठ पाई। रामदास बोला-'लेक्नि यहा इस भरी रात म क्या आ गया। डर नहीं लगा।' 'न चौधरी मैं अपनी भागवती को साथ देयता हूँ वह शरीर म मस्वस्म हुई है मन और जात्मा से नही। यह जार मेरे जाम-पाम होगी। 'अर पगले । मेरी तरह तू भी अभागा हे । में भी ता अपन मलयू को देवन यहाँ आ गया । यहाँ भला क्या रखा है राम का ढेर ह। उसने मास नरी-भरे भगवाना । यही तो भगवान की लीला है । उसका खेल है । यह जिदगी तो मेला है। तो विण्ड गया । वह फिर ही मिलता । पिसी झरे ज म म साथ होता हो, ता इस कौन जानता है। बडे बडे पडित भी सिर सपा कर रह गये । उस भगवाा का रहस्य नहीं पा सके। आ, चल गाव की तरफ लौट जा । अपर पर जाना पड ।' भगवाना विलख उठा--'अब मेरा कोई घर नहीं, चौधरी | घर ता घरवाली के साथ गया। वह क्या मरी मुग को मार गई । अब मैं उमी को याजता है । उसे पाना चाहता हूँ । जम्पर मेरा उगवा कइ जमा या साप रहा । मुझे भरोमा है वह अवेली देर तक नहीं रहगी । मुथे बुला लेगो । मेरा हाथ पक्ड लेगी। चौधरी रामदाम उग वद्ध भगवाना को देव स्वय भी करण हा उठा । उसके गल मैं कुछ आ गया। जब वह बार-बार थूक व साथ उसे मटक्ने लगा ता तभी दूर गडे मियार ने गोर मचाया । श्मशान ता यह भयावर दृश्य और अधिक कठोर हा उठा । तभी रामदास न गांव की ओर देखा-'मा चल मेरे साथ । आज पुछ गाया भी था या नहीं। भगवाना बोला-पल पडोम की बहू दो राटी दे गह थी व भी 27 रखी ह। पाइ नही गइ । गल म नहीं उतरी। लगता ह, भागवती गइ ता अब पाना भी गया। एमे ही एक दिन मर जाऊगा । पनी कोठरी मे मरा पड़ा हूगा । क्सिी पडौसी को सुध आएगी ता में भी इस धरती के टुकडे पर आ पडूगा । घर चल दिया। गाव के छोर पर आपर वह लक्डी का सहारा लिए अपने घर की आर चल दिया। लेकिन रामदास उस समय घर नहीं गया । उसकी इच्छा मदिर पर बठन की हुई। जाश्चय जा यक्ति कभी मदिर की प्रतिमा का हाथ जोडन नही आया । उस मदिर के चबूतरे पर भी आकर नही बैठा, वह तब उस रात के मनाट म मदिर ये बूतरे पर जा वठा। मदिर के द्वार सीक्चे के थ। मलाखो के पार दीपक जल रहा था। प्रतिमा का स्वरूप भी दिखाइ दे रहा था । देवता का वह मोदय माना उस कक्ष वन रामदास प्राणा म हलचल मचा उठा । उस लगा इस देव प्रतिमा म कुछ ता है । यह मदा सुहागिन है । मुस्वराती है। भक्तो आसू देखकर इसकी मुस पान ययापूव बनी रहती है रामदास को याद आया, एक बार उसकी पत्नी यशोदा न उसम कहा था यहा घर पर वठे हुक्का बजात हो सभी मदिर पर भी जाकर बठा करा । काई-न कोई क्था वाचक आता है तुम भी राम-नाम की कथा सुन आया करा । लकिन रामदास ने उस ममय मुह यनावर कहा था, यह सब ढाग है, मिथ्या है। यह भी पट भरन का एक तमाशा है । कभी भगवान शकर या राम का स्वरूप दर्शाया जाता है कभी भगवती जगदम्बा का है। यह किसी की समझ म नहीं आता।' तर उपेना स यशोदा वाली-'ता तुम्ह क्या अच्छा लगता है । यम जब देवा मेर ढूगे से लग वठे हत हा । बहुत हुआ ता अपने बच्चा को प्यार परन लगत हा मैं कहती है दुनिया इतनी छाटा नहीं है । बहुत बद्दी है । भगवान की लीना भा अपरम्पार है। बीबी बच्चे ता एक दिन नही ग्रंग, पक्नि भगवान का अमर गान सदा गूजना रहेगा सविन उस रान य समय जव कि स्वय रामदास व प्राणाया अदन उम व्यक्ति पर रहा था मन प्रदश समुद्र ो भूचाल की तरह कालाहल ग प्राप्त था ता तब वह स्वत ही बोला- हाय । वह बूढ़ा घमार मैं कहता हू यह सब कोरा रहस्य 28 भगवाना अपने मन की कितनी गहरी व्यथा को लिय इस रात के स नाट मे, पत्नी की जलती हुइ चिता व सामा बठा था और मैं, हा, र, रामदास' तू भी तो अब भगवाना की तरह अपनी मानसिक परुणा का लिय पुत्र की चिता के समीप जा घुडा हुआ था भला वहा अप क्या रखा था। हाउ-मॉस का शरीर भी नहीं था । वह भी जाग की लपटो में म्वाहा हो गया था। अव तो वहा राख का ढेर या । कल लाग जायेंगे और चिता पी उस गय मे स मलखू की च द हड्डिया चुग कर न जायेंगे तब उह गगा के प्रवाह म छोड, जायेंगे । वाह, र इसान | वाह रे ससार। तभी गमदाम ने मदिर के अदर जलत हुए दीपक की आर देखा। दवता की मुति तब भी मुसग रही थी मानो रामदास पर हस रही यो । जीवा मे प्रथम बार उसे नगा, वह भी वोरा अहम य है । घमण्डी हैं । स्वार्थो और स्वेच्छाचारी है। उसने स्मिी को नही वस्शा । स्वय अपने आप को ठगा, घरवाला को और गाव के समाज को ठगता रहा। रामदास स्वत ही सहम गया । मानो वह अपने-आपसे डर गया । मह स्वय ही भूत था। दुर्दा त भेडिया था। रामदास की स्वास रुक चली थी और आखा के समक्ष अधेिरा छा गया था। उसी समय उसकी आखो रे समक्ष माया, गांव का वह रणधीर, जिसे धोखे स छल से रामदास ने इसलिये मरवाया कि उसके हिस्से की जमीन वह स्वय हडपना चाहता था। रणधीर की औरत अभी जीवित थी। वह मजदूरी करके अपने बच्चो का पेट पालती थी। चूकि गाव मे उसी प्रकार का दम्भ और छल प्रपच चल रहा था। चोर चार मौसेरे भाई की परम्परा ने जोर बाध रखा था, इसलिए रामदास न निर्वाध रूप से अपनी जमीन बढा ली थी। रणधीर के पिता को कुछ रुपया उधार दिया था और उस कर लिया था इसलिए जब वह पिता मरा, ता उस से एक सप्ताह पूर्व हो, रामदाम उनके घर गया और उस वीमार पडे अशक्त व्यक्ति को धीरज देता हुआ बोला था, मैं तुम्हारे माथ हू, इस कागज की मियाद ममाप्त हो रही है। अगूठा लगा दा । मेरा रुपया तो जब मिलेगा, मिल जायेगा, तब ना मैं तुम्हारा खेत जोतता रहूगा खेत हरन 29 रणधीर व पिता ने जगूठा लगा दिया। तभी उसने कहा था रामदास चौपरी म नही वचूगा । डाक्टर नवाव द गया । तुम भैर वच्चा का ध्यान रखना । खत वापिन दे सको, ता दे दना। रणधीर रपया उतार दगा। अभी छोटा है IT दो वर्ष बाद खत तने लगगा। नदिन रणधीरका पिता ता चला गया। उसका घर अभावग्रस्त ता था ही अनाथ भी हो गया। तब रणधीर कोमा अपना खेत वापिस ने रामराम र पाम प ची तो मन विकृत भाष मुह बनाकर कहा था एर हार रुपय दिय थ चांदा वे मिका, सूद लगाकर वह द आलो और गत 7 लो । वितु उस वेचारी व पास रपया कहा था । जिन तरह पाली हाथ जाट मी तरह नौट गयी । सयाग की गात, उसी समय एज व्यक्ति आमदारा ६ पास आया और रहस्यभरी आय से चौधरी का दयपर वाला~मुना तो होगा तुझे, साप क वच्च साप हात हे केंचुए नरी। चौक कर रामदाम न वहाँ-क्या मतलब । मैं समया नहीं। एक माल बाद समझ जाआग, चौधरी | रामलखा वा बेटा रणधीर अब जवान हो चला है । एक दिन मदिर पर बेटा कह रहा था मेग पिता कभी मुक्रा नही। मार नही खायी। मैं चौधरी रामास मे खेत ले लूगा। छोडगा नही यह ता? ।धी सीधी ऊँगली स नहीं निकलता टेढी कर निकाला जाता है। मुनकर रामदान । हू किया और चुप रह गया । उमी सप्ताह रामलखा या वटा विस तह गायव हुआ, कहा गया इसका पता नही चला । उमपी मा पुनिम म गयी पर तु यहा भी धका मिल । पुलिस 7 उपभा निपायी गत्वना नहीं दी। तर गाव म यह वात पनी थी कि चौधरी रामदात न पुलिम वा रपया दिया था। लड़या उमी ने मरवाया और लारानी गपिना नीहागी। उग समय भार पीपीरी पट चला था। रामदास एक अपराधी न ममान अपन स्थान से उठा योर मदिर ये मौक्या पर अपना मापा पटप यटा । तभी चीप उठा-'म हत्यारा । पातर हू। रामलया का पुत्र रणधीर मैंन मारा, ता भगवान न मेरा पुत्र छीन कर दण्ड दिमा 30 है गाव नहीं जानता तो क्या हुआ भगवान जानता है, मरा मन जानता है मदिर मीचो पर रामदास ने अपना माथा जोर से पटक दिया था । उसके मन मा आवेग इतना तो था कि यह उसका आघात सहन नहीं कर पाया । सून निकल आया। वह रामदास में कुरते पर टमक गया । वह पीछे नहीं हटा, उमी घर के पास घडाम मे पछाड खा गया भार हो गया था। मदिर का पुजारी आ चुका था । विन्तु देवता के दशन करने वाले नर नारी यह देखकर चक्ति थे कि चौधरी रामदास मरा नहीं था । छित बना उम मदिर के द्वार पर पड़ा था । यसादा भी वहा आ गया । वह बिलय पही। गान की सहानुभूति सिमट कर उन दोना या ममर्पित थी। बाइ कह रहा था, हाय । चौधरी लडर की मौत या मदमा नहीं कर पाया सपिन उम भीड मे वीर मा भी था, जो कह रहा था, पाप का फल पाप ही होता 'पुण्य नही रणधीर कीमा अब रोत रात अधी हो चुकी है, अपन बेटे के लिय 4 हवा का एष याका आया और वह चौधरी रामदाम में मन का मन्तुलन खो बम था। रामदाम मदिर से उठाया, परन्तु घर भावर उमन वारपार पड ली। गांव में वैद्य ने यसादा पो दिलामा दिया, पुत्र की मौत रा गम बह गया , अ यया बाद अय राग नही । रेमिन धौधरी यार पार चौताया, विम्यारित वनारनपने चाग आरत्ता पाधि मान ये लिप दिया जाता, तादावी और म भी मुह फेर लेता था। जो व्यक्ति दिन में अन वार एका पोता, अब वह भी उस अच्छा नही माता था। 31 उस घर पर यशोदा , सिर पर एक नयी परेशानी मवार थी माना भूत की तरह उस स काई चिपट गया था। वह डरा रहा था। ससुर की उस नयी अवस्था को दर, मुरिया ने अपन पति के बिछाह का दद भुला दिया था। किसी औरत न उम रणधीर के मरन और उसकी मा के रोदन भर चौकार का हान बना दिया था। उसके मन में भी उस बात से प्रतिरोध पैदा हुआ था । युखिया को इस बात का पता था कि उसका पति मलखू अपने पिता की उस बुर्दाक्त अवस्था स, मन र भाव मे महमत नही था। उसने कई बार कहा था, वह जमीन लोटा दो जाय । उसमे बहुत अपमानित किया है । मूल और सूद दोना का भुगतान हो चुका है। परतु रामदास पुत्र की वात से महमत नहीं था। उनका मत था, इस तरह की उदारता और अव्यवहारिकता इसान को ऊपर नहीं उठने देती। उसे भूखा भारती है और उसने पुत्र के समक्ष ताव के कई उदाहरण पश कर दिय । लाला रामदत निधन से किस प्रकार धनिक बना, यह पुत्र को बताया । चौधरी जसपत केवल दस बीघे खेत का स्वामी था, अब पाँच सौ बीघे जमीन का गाव मे जमीदार है। लकिन पुन जवान था। उसका उदाम पल उज्जवल था। उस पता था कि पिता मे जिन कमिया के उदाहरण दिये, हे अभाव की अवस्था मे सुयी थे, सतुष्ट थे, परतु धनवान बने, तो जीवन की अशाति, यथा वह अपने साथ समेट बठे थे, लाला के पास धन था, परतु वह लकवा का रागी बन कर दो वष से बिस्तर पर पड़ा था। उसका पुन बाप की मौत चाहता था। पिता द्वारा उपाजित क्यिा धन वह न केवन अपना समया बैठा, अपितु पिना के रोग पर पैमा पच हो, यह उसे पस द नहीं था। फलस्वरूप पिता उस पुत्र की दष्टि मे उपेक्षा का पात्र या रहा जसप्त चौधरी, उसने जीवा की विवशता व्यथा और कायरता अस्थनीय थी। जब एक बार उमक घर पर डाका पडा, तो डाकू उसकी पानी को मार गये। उनका धन और जेवर लूट ले गये। यपि जसपत चौधरी जान से नहीं मारा गया रतु आसुओ ने उसको आये पाड दी थी, हाथ काट मर जाता तो चन पा सकता था दिय थे वह यतीम या 32 तब रामदाम झल्ला पडा था-- पडिताई का राग मत अलापो। अभी बम निदगीनामावस्य-नही जानते । समझते नही, यह मजिल क्सि डह पूरी- बिहामने कहा-'बेटा, जब मेर पिता मरे तो उनके पास लिई थे । अब भगवान की मौज है । पचास बीघे जण होगामीमा भाइयो के पास । मैं मर जाऊगा, तो तुम और मुकेश आधी आधाबाट लेना।' उसी समय मलखू कातर हो उठा-'आप बहुत आग की बात सोचत है । फ्ता नही, तब तक विस राजा का राज हो हा अभी अब तो लडाई होकर चुकी है। हिटलर मारा गया । दुनिया के बहुत से राज्य तवाह हो गय । भारत म भी जिस-जिमकी तूती बोलती थी, उनमे स एक भी दिखाई नहीं देता वापू । सूरज नहीं छिपता था अंग्रेजी राज्य मे । लेकिन अब देखो, क्या हाल है ? कछुवे की तरह ब्रिटिश राज्य सुक्ड गया है । गदन भी दिखाई नहीं देती। न पर और पजे-आधी दुनिया को ब्रिटिश राज ने कुतर लिया था अरे, ओ वेदाती के बच्चे । तू समझता क्यो नहीं, यह ससार परि- वतनशील है । यह राजा ब्रिटिश राज की वात लेता है, मैं कहता हू, वडे- बड़े योद्धा और शूरवीर तवाह हो गये । यह तो परिवतनशील ससार है । सब जानते हैं, यह ससार मिथ्या है । झूठो माया है फिर भी लोग हाथ पर-हाथ रखकर नहीं बैठ सक्ते। आदमी चलता है । सफर तय करता है । सुना नही, महान सिकन्दर का नाम । वह यूनान से चलकर भारत पर चढाई करने आया था। उसने बहुत से राजाओ को परास्त किया । उसका अपना इतिहास बना था। उसका शौय, उसका साहस इस और से उस ओर तक प्रचारित हो गया था । उसने इस देश की धरती को कपा दिया था। तभी तो सैक्डो वप बीत गये पर उसका नाम लिया जाता है । सुना नही, वीर योद्धा यसुधरा--- मलखू कुछ बोला नहीं। पिता से विवाद करना बेकार था, पिता ने दूसरा से जो कुछ सुना, वह जबान पर था, वहा जाता था। उसे पता था कि पिता अधिक पढ़ा लिखा नहीं, लेकिन दूसरो से सुनी वाणी को 33 दोहराता सरल काम था। यही उमया मिथ्याभिमान था। कदाचित सुपिया के अतिरिक्त अगर तिमी यो पता नहीं था कि मरन में दो दिन पूर्व स्वय मलसून सुप्रिया स कहा था इस घर का पाप जाने किस क्सिका मारेगा, 7 ड्रवेगा पाप जरुर फनगा और पूनगा। तब मुशिया बोली नही थी। आपने पापा के किमी कान म पति की उम अमरवाणी को छुपा बैठी थी। यह स्पष्ट था, पिता की तरह बेटा भी न तो माक्षर था, ना ही क्सिा मम्म समाज में उठता-बठता था। फिर भी, उसका हृदय पिता से अधिक निमल था। उसने किसी को ठगा नही लूटा नही । उसका उदात्त वक्ष ऊचा और विल था । फलस्वरूप, कई दिन के बाद रामदास स्वस्थ बना । अभी पुत्र को मर पूरा एक मप्ताह नही हुआ था, रामदास फिर यथापूव स्थिति से पहुच चुका था। रात आधी से अधिक जा चुकी थी। तभी सहसा यशोदा की आख खुली । तभी उम लगा कि घर में कोई जाया है और गया है। भतएव, वह सशक भाव म उठी और सवप्रथम उस आर गई जहा सुखिया सो रही थी । वह गहरी नीद म था ! उसके गले में बलगम बोल रहा था और वह खर्राटे ले रही थी। फिर वह बाहर के ओमार म पहुंची। दखा, रामदाम भी चादर ओढे सो रहा था। उससे कुछ फासले पर छोटे पुत्र मुक्श की चारपाई थी। वह निर्वाध रूप में नीद की सास भर रहा था। किन यशोदा के मस्तिष्क मशका था । उसका दिल तब भी घडर रहा था। उसी समय एर पराइ फिर सामने से निकली और गायव हा गई। सहसा कापत स्वर म यशादा चीख उठी--कौन ।' कि तु वहा कोइ या नही । दिखाई भी नहीं दिया । आवाज सुनकर रामदाग ने मुह स चादर हटाई–'क्या है । कोई है क्या ।' यशोदा पति की चारपाई निकट पहुच गई। वह बोली, 'दिखाई तो दिया नहीं । मुझे लगा कि घर में कोई आया था। अभा-अभी यहा भी पाइ आता नगा था।' रामाग उठ बठा। वह लाठी उठाकर ओमारे से बाहर निक्ल गया। जाकर दवा नि भम भी अपन सूट से बची थी। चौधरी यो घर से चबूतरे पर यहा देव, कुछ दूरी पर उपस्थित अपन ममान पर बटा 34 . शायर नाम का व्यक्ति बोला--'चौधरी, क्या बात है. आन लोक्हार भी नही आया । क्ल किमी नक्ब लगाने वाले चोर ने उसने इंटमारदा मी। सिर मचाट लगी थी।' कुछ पग रखकर गमदास उस शकर पास पहर्च भयो उसे बोला-~~-'तुम सोये नहीं।' शकर वोला-- 'कुछ सोया था, जाग गया | गास का रोगों इमलिए रात म भी चैन नहीं मिलता।' वह बूढा था, अशक्त था। रामदास न लम्बी सास भरी 'चचा, समय समय की बात है। तुम्हारा भा एक जमाना था।' शकर उत्माहित हो उठा-'तब तो आदमी को आदमी नही समझा जाता था । किमी ने जग आख दिखाई नहीं कि मैं लाठी उठा लेता था। अजीब दिन ये वे । क्हत है क्या जवानी अधी होती है, तो मैं भी अधा मना था। आज माचता हूँ, जिदगी का वह पक्ष भी जन्छा नहीं था। निदय था, पूर था। मैं आदमी नही बना, दानव बना रहा। रामदास लौट पडा और बोला, 'हा चचा । आसमान की चढती धूप और इन्सान की जवानी अच्छे-अच्छो के होश उड़ा देती ह, मैंने तुम्हारा वह समय देखा था।' वह फिर अपनी चारपाई पर आ गया। यशोदा तब भी वहा खडी थी। जब रामदास चारपाई पर जाकर बठा तो वह जल्दी से बोला- सुनी कुछ इस शकर चवा की वात । अव भक्ताई छाटता है। धर्मावतार बनता है । अब बूढा है ना, माम का रोगी है, तो अपने लिए पर पछताता है। जव जवानी थी, ता तीसमारखा बना था। आदमी का आदमी नहीं समयता था। यशोना बाली-'काई कसर नहीं करता। विमा । कहा तो है यदि जवानी मही बीत गई, तो वुढापा भी सही सलामत बीत जाता है मैं तो रोज दपती हू इस शकर को, रात मे चारपाई पर बैठा दिई नता है। अब घरवाली ता है नही, जिसे परवाह हो अपन आदमी की । वह होती, ता पास जाकर बह जाती । दिलासा दती। चिलम म तमापू और भाग ग्य लाती । बहू है, उसे क्या चिता ससुर मरे तो, जिये ता । 35 लडका भी पुर्राटे भर रहा होगा । अब चारा अक्ला है, एकाकी बना रामदास बोला-'यह शकर भी नाबदान का कीडा ह। घरवाली को कभी शात नही बठने दिया। आय दिन मारता था, लडता था। उसके सिर के बाल पकडकर खीचता था। यह ता पुरा नर पिशाच वना था, औरत के लिए। तब यशोदा के मन म बात उठी थी, औरत के लिए काई आदमी देवता या उदात्त नहीं बनता। क्मिी ने सच ही कहा है, गरीव की जोरू सबकी भाभी । और अब तो खाते-पीत धरा में भी औरत अपन आदमी की पर की जूती बनी रहती है कडवा और नीम चढा आदमी हो दूसरी औरता से इश्क लडाता हो, तो तव और अधिक शामत आती है, घरवाली की। उसने लम्बी सास भरी और छोड दी । तभी चौधरी ने पास बठी यशोदा की ओर दखा । उसने कहा- क्या सोचती हो । बडी लम्बी सास भरती हो।' तब यशोदा न मन की बात बदली नही । वह बोली-'औरत की जाति तो दुख महने के लिए होती है । याद है न, जब मैं तुम्हारे घर म आइ, तो कई वा तक कोई स तान न होन पर तुम्हारे पिता और मा दूसरा विवाह कर देने की बात सोचत थे । और जब बच्चे होने लगे, तो तुम मुझ पर गुर्रात थे, लडते थे । उन बच्चा का अभिशाप मानत थे। उसने कहा-'यह कहो, मरे चार बच्चे रहे नही । भगवान को प्यारे हो गये । और जब यह पाचवा पाला-पोसा नवान पठठा मलखू भी चला गया। एक दिन मदिर चली गयी थी, पडोसियो के साथ। कोइ पडित क्या कह रहा था तभी उसने बताया कि यह औरत मद का जोडा यो ही नही बन जाता 1 बड़े अच्छ सस्वार दाना को एक दूसरे से गाध पात हैं। दोनो जिन्दगी का लम्बा सफर साथ-साथ चलकर पूरा करत हैं ममता मोह, राग द्वेप, लेन-देन और जिदगी के समूचे व्यव हार साथ-माय मिलार निपटात है। जब दोना मे से एक छूटता है मर जाता है तो तव गौरत हो या मद । हाथ मलत है । पछतात है । याद करके सिर घूमते है । जपन किये पर रोत है । 36 रामदास बाला-हा, यशोदा बाद म मब पछताते हैं।' अजी कोई न भगवान को मानता है, न धम फो। यह कोई नहीं माचता यह जूडी का सयाग जान किस जम के लिए घरे अच्छे पुण्य प्रताप से प्राप्त होता है । य दा आत्माए सहज म नहीं मिल जाती। यह तो युग-युगो से चलता आया मेल मिलाप किसी न किसी जम म फिर गरीर म प्रवेश पर जाता है।' रामदास ने अपनी मफेद मूछा पर हाथ फेरा और कहा--'एष बात यहू । मुझे अपना मलखू स्वप्न म दिखाई दे जाता है । एसा लगता है वह मेरे आस-पास ही घूमता है। तभी मशादा उत्माहित से उठी-'मलखू व चाचा, यही तो आज दिखायी दिया। एक बार आख खुली तो फिर लगी नही। यहा ओसारे म भी कोई मेरी आयो के मामने घूम गया। रामदास बाला-'यह तरे मन का भ्रम था। जब आखो के सामने थाहरा छाया रहता है, तो कुछ माफ दिखाई नहीं देता । धुध में छाया नजर आती है।' उमने कहा-हा, तेरी यह बात तो ठीक है। औरत हो या मद, जीतजी अपनी आदमी पर को नहीं देख पाता । कोई सोचता नहीं, इस छोटी-सी जिदगी में कुछ कर ले, कुछ सोच ले' की बात लागा के दिल म नही उतरती।' वह बाला 'तू तो आदमी की बात करती है, याद है जग्गू की औरत ने क्या किया था ? अपने आदमी का जहर देकर मार दिया था।' तुरत ही यशोदा बाली-ता उसका परिणाम क्या रहा । खुद भी पक्डी गई और मुह लगा यार भी । दोना को काले पानी की मजा दुई थी । कम्बख्त ने अपना जीवन का बरवाद किया ही, पर भी दो रिया। बस, समझ ल भगवान का दिया यह जीवन कोई वामा नहीं। इसकी पूजा नहीं करता । इसे नावदान के पीहे की नाह गन्द पानी में फेंक देता है । वासना का शिकार बन जाना, मह यादमीर मौरत भी पीछे पीछे चलती है । वह भी अपनी प्रानी म कमी नहीं करती।' 37 उसी समय यशोदा के मन मे बात आई । आज यह मलखू पा चाचा वडा धर्मावतार बना है। पाप पुण्य की बात करता है । इसान के जम- जमा को भगवान का प्रसाद मानता है । वह महज भाव से मुसरा दी-'लगता है, अब तुम्हारा मन बदल रहा है। कुछ और साच रहा है । पुरानी चादर उतार दी है, नयी ओढी है।' इतना सुनार रामदाम स्वत ही खुला-'मैं आजकल मदिर पर चला जाता हू । वहा एक महात्मा आया है । वडी अच्छी बातें करता यशादा बोली-हा सुना तो मैंने भी। वह भा मुलफा पीता होगा। गाव के लाग ले जाने हगि।' 'नही नही यह धूनी रमाने वाला वाचा नहीं । वह तो गरुवे वस्त्र पहनता है । मदिर की कोठरी मे ठहरा है । यादराम लाला ल आया था।एष मास यहा प्रवास करेगा। फिर यहा म किमी तीय स्थान पर जायेगा। यशादा वोली- मुझे ता इन साधु-स यामिया पर भरोसा नहीं। बचारी समणी जाज तक सिर पक्डकर रोती है । एक नयी उमर का साधु आया था उमी के साथ लड़की भाग गयी थी। रामदास बाला-'और जमना का लडका भी ता भाग गया था क्सिी साधु के साय । दस वप वाद मदिर पर गया था। सिर की जटाए बढी थी। धूनी रमाता था । खूब सुलफा पीता था । मा बाप बहुत रोय थे उसके लिए परत उसे तो हराम के माल खान का मजा जा गया था। खुला बछेरा था सूट पर नही बध सकता था । अजी मुझे ता डर लगता है इन साधुआ से खुनी भी मिलेंग । बहू-बेटिया की जावरू उतारन वाले डक्त इन्ही साधुआ मे दिखाई देंगे।' चौधरी रामदास + मन में विपरीत वात थी । वह वाला-'जो कुछ मैं पहले नही समजता था यह अब मानता हू । मैं तुझे बता दू जिम दिन हमारा मनसू मरा था। उसी दिन भगवाना चमार की घरवाली भी नहीं थी । मैंने तुझे बताया नहीं, मैं उस रात श्मशान म चला गया इनम चार डाकू 38 था। वहां जाकर देखा कि भगवाना अपनी औरत की जलती चिता को देख रहा था। तब वह रो भी रहा था । मुह से कुछ कह भी रहा था।' यशोदा चक्ति हो उठी, उम रात मे । वह बूढा डरा नहीं । वह तो चल नहीं पाता, वहाँ कैसे पहुच गया । वुढापा खराब हो गया । वेचार का । भागवती बडी ममता रखती थी, अपन आदमी से । मेरे पास भी कभी-कभी आ जाती । मैं कुछ देती तो पल्ले मे बाध लेती । मलखू के विवाह पर चार लडडू और आठ कचौडी दे दी थी तो उह घर ले गयी । मैंने कहा था, यही खा ल तो वोली, न चौधरन । अपने आदमी के माथ खाऊगी। तब मैं उसे माग भी द दिया । और चार कचौरी दे दी थी। गमनास बोला, 'मचमुच उसे बडा लगाव था । अपनी घरवाली से । वह लाठी का सहारा लिए श्मशान में पहुंच गया । जा कुछ उसके मन म या, उज पिता ने पास वंट वर कहता रहा । उसे भगेमा या कि उसकी औरत सब बात सुनेगी।' पता था, हम दोना का साठ वष का साथ था । हम दोना गरेप ये सक्नि जब पास-पाम वठते,तो किसी अमीर से कम अपने को नहीं समझते थे । बखस, यशोदा हेंग दी-"पचमुच था तो उन दोना का एमा ही माथ । एक को ट्रसर के और चन नही मिलता था । जब भगवाना कस्बे में जाय जूती गाठन का बाम करता ता वह भागवती भी माथ जाती थी । वहा अपन आदमी का हाथ बटाती थी । बडी ममतामयी थी। वह भागवन्ती । जान मिस तरह चमार व घर म पहुच गयी । वह तो शरल सूरत की भी च्छी था। किनी बडे घर जान लायक थी। रामदास वाना--'सयोग ता उन दोना का था । जूडी वदी थी। वाना चमार था, गरीव था।तु भागवती को पार वह दिल से मालामाल बना था । दोना न एव दूमर ना मगहा था । ममता में पली थी, वह जोडी । उम्न कहा- मैं जव श्मशान म लौटा तो, तभी । रास्त म पडे मदिर पर जा बैठा था पान कमी हिलार मन मे आयो, मन्दिर वे मीराचा पर मिर पटव दिया । माथा फूट गया । लोह का मतास लगा था। तभी तो मैं वेहोश बना था । अचरज तो यह कि मैं 39 उसी रात उस भगवाना की प्रतिमा को अपन प्राणा म उतार पाया था उस रात ही मुझे सने कृत्या का ध्यान हो आया । मैंन कैसे-कैम काले कारनामे दिए वे सब मेरे हृदय पटल पर भूत प्रेत की तरह उतर आय थ । मैं काप गया था एकाएक यशोदा न पति का क धा पकडा अब छोडो इस बात को। देखो, तुम्हारा गला भर आया। रोना आ गया । लो, मैं चिलम भर लाती हू । तम्बाकू पीना और कुछ दर के लिए फिर मो जाना । यशोदा के जाते ही रामदास फिर पड गया । आखा म आसू थे और वह चादर से मह ढक कर किसी वालक व मसान फुफक पडा था 5 उन दिना सुखिया या मनस्ताज उत्तरोत्तर बढ रहा था । मलखू ये मामन जोगवर चोरी छिप आता था । और वह दवर के नात सुखिया स हस बोल जाता था । एव दा बार उसके लिए बनारमी साही भा ल आया था। चूकि वह उसी परिवार का एर मदस्य था इसलिए उमे आन से रोका भी नहीं जा सकता था । वस भी मलसू का जारावर से अधिक स्नह मम्बध था । जब भी आता छोट भाई वे नात मलख का बुछन्न छद जाता था। फ्लम्पा मलखू के निधन के बाद जव जागवर अपन घर या छन पादकर गाम म प्रविष्ट हुआ, ता उस समय यह सभी को और यार सुप्रिया पाम पहुचा । सदा पी भाति उसके पैर छूार पाच हजार काया की गडी उगकी गोद म रण कर बोला-भाभी मैं हू सागूनी और डार परतु तुम्हारा गवर हूँ । मसयू भया जहाँ गया है यहाँ म सोटा पर नहीं लाया जा माता । तुम्गर अभाव या पूर्ति भा में मीरमकता । यह कारमा । न ताऊ का बताना न ताई या । अब 40 तुम्हें अपनी जिन्दगी का दुख-सुख स्वय दपना पडेगा। यह स्वाथिया का समार है । यहाँ क्सिी का क्सिी मे कोई सम्बध नही । मब कुछ बनावटी है । स्वाथ पर आधारित है । जिस सम्मे के सहारे तुम क्डी थी वह टूट गया । भया मलखू सदा-सदा के लिए नाता तोड गया यह वेवल आश्चय ही था जिव जारावर उस घर की दीवार फांद कर अदृश्य हुआ तो तभी यशोदा न सुखिया के पास जाकर कहा। अरी, जारावर था? क्या कहता था। उसन सास भरा कहता क्या वह भी मलखू के लिए रोता होगा । बडा प्यार था दानाम । आखिर चाचा ताऊ के य दाना भाई थे। जब यशोदा घर के आगन म गइ तो मुखिया न अपना वक्ग खाला और कपडो के बीच म वह नाटा की गड्डी र दी। ताला लगा दिया। लेकिन उस दिन, सुखिया की छाती में जब एक बार धडकन उठी, तो वह सहसा शात नही यनी । मलखू के सामन जारावर आता था हसी मजान करता था। काई-न-काई सौगात भी भाभी के लिए ले आता था ता तव, सुखिया उस जयथा या अजूवा नहीं मानती थी। भाभी-देवर का नाता था, इमलिए जारावर के उस यवहार का सामान्य समयती थी। कितु उस दिन पाच हजार रुपय के नोट मानो उसकी आखो में जड रह थे । गल म कुछ आ गया था। वह सटका नही जा रहा था। एक अदृश्य भय सुखिया के मन का क्मिी कीडे के समान विरोद रहा था। वह उस पोटा दे रहा था । सुखिया के मन म बार बार आ रहा था। मुझे जोरावर मे रपए नहीं लेन थ । लिये भी तो अम्मा से कह देना था। जब वह चोर हो गई हैं । अपन आप म जपराधी बनी है। अभी ता पति को गय दर नहीं हुइ, अपना तमाशा बना देना चाहती है घर मै झाड लगाती, रोटी बनाती, भैस के लिए चारा काटती तो उसके मस्तिष्क म एक यही बात गूजती, जब तेरा क्या होन वाला है। सुखिया । क्या किसी का प्रेमिका बनगी रखैल बनगी इस तरह ता तू न दीन की रहगी न दुनिया की जोरावर डाकू है, खूनी है । शराब पीता है । वह देवता नही, दानव है औरत को अस्मत का लुटेरा एक दिन प्रात के समय रामदास घर मे आया और हाथ मे पक्डी लाठी 41 । । अब खेत कटेंगे । को एक पत्थर पर वजापर वाला-- मलखू की मां कहां है तू | मरी बात मुन।' यशोदा कोठे म बाहर निगल जाई। चौधरी बाला--- मैं अभी औरता के सूल म गया था। वहां की सब बात दउ आया और समय जाया । मलखू की बहू अब वहा जाया करेगी। चार अक्षर पढ लगी और मिलाइका काम सीख लेगी।' इतना सुनना था कि यशादा तमक उठी 'ता घर का काम कौन करगा । एक नौकरानी लाकर बैठा दो। जब मेरे शरीर म इतनी शक्ति नहीं कि इस घर १ बखेडे का महार मकूगी। एप काम ता है नही अनक काम है । किसान वा पर ह । जगल का भी काम अनाज जाएगा । घर पाधधा ता है ही भम का नाम है । उसका पेट न भरागे ता एक वूद दूध नहीं देगी। छाछ तर का तरसाग । जाह । मूख औरत जमान भर के काम गिन दिये तू न तो। बहू न होती तो क्या करती । अब इसकी भलाई की बात माच । पिफ चार घटे लगेग म्क्ल में । मै किमी चमार था चमारिन म बात कर लूगा। टमे जान दे । कुछ वन मके तो वनन दे । वह रामसहाय पडित है ना, रात देर तक मर पास वठा रहा । वडा सम पदार है वह । विद्वान ता है ही । बनाता था, बहू समयदार हागो तो जसना अलग स्चून चला मकेगी। सरकार भी मदद करगी । अब वह बेटी का जगल म खेत-क्यारी देखन का समय नहीं रहा। सुन लिया न, रहमत मिया की 7वान लडकी खेत पर मरी पड़ी थी। किमी न गडास भ चार टुकडे कर दिए थे उगवे । विसी वदद ने कम वदन के कपडे तब उतार दिए थे । नगा पड़ी थी। गदन कही धड वही । यशोदा बोली-'अजी, उमकी वात छाडो । जितन मुह तना बात । मुये ता बताया है कि वह लडी जाने विम किस स दास्ती गांठ बैठी थी। गाव ये लुगाडे उाये पोछे लग थे। मा-चार भी उनकी कमाई मात थे। मुनवर रामदाम डरा-मा हो उठा-तू औरत जात है I इगी नरह की बात बहती है । यह नहीं समझती। आज जमाना क्तिना 42 खराब है । जब गाव के जवान लडवे बदचलन बन चले है । तव भला घरा की वह-बेटिया किस तरह अपनी लाज रखेंगी सुबह शाम पनघट पर देखो, ये बदजात लडपे कुए के आस-पास मडरात रहते है। चौधरी नरपत ने एक बार कह दिया था तो अगले दिन ही उसके दोनो बैल खाल लिए। वह तो कई हजार की चोट सा गया और सुना है वह मेहतर है, बडा जवामद बना फिरता था, निहाला के लडके को डाट दिया था। उस से कह दिया था, गाव म बदमाशी करगा तो पुलिस के हाथो हवालात मे बद करा दिया जायगा हो तब एक सप्ताह भी नहीं बीता था, उसका खेत कटकर अभी मशीन पर नहीं गया था कि उसम आग लगा दी गई। वेचारे का हजारो रुपय का अनाज पलभर म राख का ढेर बन गया । उसे लडका का विवाह करना था वह स्त गया। यशादा दहलीज पर बैठी थी । पति की लम्बी बात सुनकर बोली नही, चुप रह गई। रामदास बाला-'तुम कल सुबह वहू का ल जाना । नाम लिखा आना । फोम का दस रुपया लगेगा, वह द आना । बहू को पुछ दिन वहा जान दा और देखा, क्या परिणाम निकलता है । अव तुम्हारा मुकेश भी वालेन में जायगा । वही रहगा । सप्ताह म जाया करेगा।' 'नो बस, एक में रह गयी इस घर की चक्की म पिमन के लिय। जिदगी तो बीत गयी, इस घर म मरत खपत अब बुढाप म भी चैन नहीं। रामदास न सास भरी~~-'भाग्य की बात है। हमारा-तुम्हारा मुक- हर अच्छा नहीं । जब इतनी लम्बी जिदगी कट गयी तो अब क्या है। थाडी सी फुलग रह गयी है । यह भी पट जायगी। 'अजी यही रटनी मुशिल है। बचपन गया, जवानी गयी लेकिन यह बुढापा चैन से नहीं क्टगा। भगवान जा अब और क्या क्या देखना पडेगा" रामदास व मन को यशोदा की वात छू गयो । उमे भी लगा, मच- मुच यह बुढापा बडा दुखदाई है । मलखू गया, तो हमारे पन में कील 43
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इस महीन में भी एक लडका मारा गया। सुना है, वह जिस लडकी से इश्क करता था उसका एक दूसरा चहता भी था, उसी ने मौका देखकर छुर से पट फाड डाला । कई दिन तक लाश खेत म पडी रही। चील- कौवे खाते रहे । जब बदबू फली तो तब बात फूटी थी।' रामदास बोला-~'मुझे पता है । गाव मे इश्क मिजाजी का दौर तजी से चल रहा है । बेशर्मी बढ रही है । लाज शरम जाती रही ।' चादराम का घर आ गया। वहां जाकर दखा कि पडोस का गजराज पुलिस ने पकड रखा था । पास के खेत से बक्सा बरामद कर लिया था। गाराज का इमका साथी फरार था। पुलिस के दरोगा न जब सब कैफि- यत बताइ ता दाना चौधरी उस गजराज को देखने लगे । वह हाथो में हयाडी पहने सर झुवाय बैठा था। कुछ फासल पर उसका पिता भी था । वह भी मिर झुकाय हुए था । वट न बाप को धरती में गाढ दिया था। दरागा बाला-'चौधरी इस गजराज का यह चौथा काम है । एक अपराध म तो यह छूट गया था । दो म सजा पाई । अव यह कम-से-कम चार वष को जेल म जायेगा। यह जवान गांव के चारा का सरगना बन चुका है।' जागीरसिंह ने पूछा-'यह कैसे पता चला कि इस गजराज ने चोरी की" दरोगा मुस्कराया, 'चौधरी हमारा यही तो दिन-रात का काम है। एक लडकी ने यह भेद खोता । वह उस सेत पर घास खोदने गयी थी यह गजराज उसे दख नहीं पाया। वहां से यक्मा उठाने गया था। पोडी ले गया था। उसका ताला तोडन को। लेकिन जब खेत से सक्स उठावर मला तो नापी घोस पडी चोर। चोर । हमारा सिपाही भी उस ओर योजन गया था।दरोगा बोला-'लेक्नि इम गजराज ने बुद्धिमानी की। हाप भी हपोडी सहकी ये सिर दे मारी । वह चीख पड़ी।पी आवाज सुनत ही मिपाही दोडा, एक और थादमी भी। यह गजराज उरा महोग मनी लड़की के सिर म इमली हथोडी मारने ही वाला था, उस सो को जान से मार दना पाहता था कि तभी 45 .
भादमी की मदद म पर लिया । बागा भी हाय आ गया । यो वह बैठी है सहकी। मारी अभी दम-धारर यप या तो है। हाशमान ही पुलिम ना सिपाही माघ 7 आमा ।' चौधरी बाला-विगयो है यह लडवी।' तव याया गया-नत्थन मार पी । मुबह बेटी धाम ल आती, बाद ममा। वह पास बाजार में बचकर पर पाराम चलता नित्यन तो पिछन च मर गया था। या बेटी का छोड गया। एT सहसा है। वह पर स बाहर है। या अप ग अलग हा गया था। रोया रिपोट निचली पी, क्यान ल लिए थे। यह पाया और चल दिया । चौधरी याला-'पर चला कुछ पातीवर जाना।' नही चौधरी। अभी एव' और गह जाना है। वही ता डावा पड़ा है। एक मामी मारा गया । काफी सामान गया है उस घर मे। सुम्हार गाव पर जागर उन डना का सरदार था । डाने या मचालन नहीं कर रहा था। जागीरसिंह बोला-'वह भी इस गाव का क्लक है। अभिशाप बना है।' वह अपन पर की ओर चल दिया । प्रातमा समय था। चौरी रामदाम घर की और न जाकर जगल की ओर बढ़ गया । यह उगका दनिय काय था। अभी वह कुछ दूर गया था वितभी दवा कि एक बडे पड पर बहुत से पक्षी उड रहे थे। किसी चई पक्षी ने एक पारल के छोट बच्चे पजा म जकड लिए थे । वह एक डाल पर बैठकर उन बच्चो को गदन कुतर रहा था। भय पक्षी चोप रह थे । शायद व गुरगल व बच्चे और अपने 4 । उस ददना दृश्य को देख सहसा रामदास को लगा किएमा ही हा हाकार सवत्र है । ममानवीय शोर है। साभा यही करता है। एसा ही र दानव है। घरबम चौधरी का मन दहल गया । उमन गिल पर एक वाद दूसरी चोट पड़ रही थी। बुछ दर पूर्व जोरावर को बार उमक मन पर पोहर की तरह छा गई थी । वह जारावर जो भाइ का लडका था, वच- पन म उसको गोद म रोला था । परतु जब वह गार है। खूखार है। भा*मी का खून करता है । लागा के घर लूटता है । भले ही रामदाम 46 AM apriminaparna " का भाई अलग घर म रहता था परन्तु यून तो, उसकी छाती पर कांटे की तरह चुभ रही कसक थी, पीडा थी। रामराम गाँव की तरफ लौट पडारा कोरियाविन झन स्वत ही भीगी बिल्ली बन गया था । जवान न्यूडकरी दिल टट गया था। अब वह बूढा है। निरस्त्र है। निसा "जब राम दास गाव म पहुचा तो मनिर को ओर उसका ध्यान गया। वहा कुछ औरतें शिव को पिण्डी पर जल चढा रही थी। फूल-पत्त अर्पित कर रही थी। कुछ व्यक्ति मदिर के यदर थे । वह समय पूजा पा था । शायद आरती काया। पुजारी देवता की भारती उतार रहा था । घटी बजा कर शास्त्रीय श्लाक वाल रहा था। अपने स्वभाव के विपरीत रामदास मदिर पर हर गया । एक तरफ बैठ गया, तभी एक गढा औरत उमा पाग आकर रक गई, देखकर पाली, 'आज रास्ता भूल गय क्या? इस मंदिर पर कैसे आ गय रामदास ने उस सम्ध्रात महिला की ओर देखा-'राम राम चाची। उसने कहा---'खेतो की तरफ गया था। परो मे थकन आ गई। अब जला नहीं जाता, यहा बैठ गया। गोमती नाम की उस चाची ने कहा-'अब तुम सब राग द्वेष त्याग दो। मदिर पर आया करो। यहा वठा करो। देखा, तुम्हारा जवान लडका चला गया। हाथ मे आया पक्षी उड गया। तुम रह गये खाली के साली । अव भगवान का नाम ला । दो घडी या बैठकर शाति पाया करो। कभी-कभी यशादा ता आ जाती है। मैंन तो कहा था उससे, बहू का नी ले आया रे । अब उसके मन म बच्चे सम्बार पैदा करो। समझ ला, सबकी यही टप है। यही है, अन्तिम पटाव । चौरी रामदास का पता था कि वह गामती चाची स्वत हो समथ थी। उसके चार बेटे धा चारा रोजगारी। दो सेती मे लग थे, दो व्यापार म। पिछले हिना जब चारा भाइया म अपनी बहिन का विवाह तो दूर दूर तर एमा विवाह नहीं हुआ था । न ऐमा सन-देन विपी न किया था। यह गोमती चाची आर भी चारपाई पर बैठी पुत्रवती है। 47
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बहुओ पर हुक्म बनाती है । बैट आनाकारी हैं । रामदाम न बात बदली
नवदा कहा है ? अपनी समुराल म
हा भइया । अब बह वही है । लहया फौज म है न, अब वही दूर
पहाड पर उसका तबादला हुआ है । अब वह वा अपभर है।
रामदास बोला 'तुमन लडका अच्छा दण। पच भी काफी
किया।
'अरे भइया | सब लडका न लिया था। मुझे कुछ पता नहीं, क्या
क्या दिया।
रामदास वीला 'मुझे पता है एक लाख से ऊपर हाया खच हुआ
था । तुम्हारा बडा लडका सब कुछ बता गया था।'
उमी समय पुजारी परसाद कर वहा गया। रामदाम न दोना
हाय फ्ला लिय श्रद्धा स सिर झुका लिया । उसने जेब से रुपया निकाला
और पुजारी की थाली म डाल दिया।
गोमती बोली-पुजारीजी एक हजार समझना, इस एक सय
को । अव तुम्हारा एक नया ग्राहक बना है। गाव का चौधरी है।'
रामदास ने बात सुनी, तो खिलखिला पडा । उस समय वह सच
मुच ही मादातिरम हो उठा था।
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चित्रकार अपनी कूची से चित्र को अनेक रग भरता है । उस खुश
नुमाचित्र को देखकर क्लाकार प्रसन होता है । अपनी कृति पर गौरव
अनुभव करता है । मानो उसका कृतित्व ही उसने या तत्व की चासनी है।
उसमे निखार आता है । कदाचित् यही कारण था कि चौधरी रामदास
पुत्र की मत्यु के बाद जब गाव व देवालय पर जान लगा तो वह उसका
दैनिक यम बन गया था। घर पर एक पुगना नौकर था जगतू, पहले
वह मलय का सहायक था। अब उसी पर सेतो वा समूचा भार या
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पड़ा था। मलपू ईमानदार था, उस पर भरोमा था। घर का काम मास- वह देखती और वाहर या जगतू । रामदास अर बूढा हो गया था, सेता या काम करने योग्य नही था। इसलिए, वह या ता घर - यंठता अथवा मदिर पर । गांव में मिमी के यहा काई पारिवारियायोजन हा तो चौधरी वहा आता-जाता था। वितु नौधरी गमदास के मन म चोर की तरह एक यात बैठी थी। यपि उमने किसी पे ममक्ष प्रगट नहीं दिया, पर तु वह समस्या आपशित उमदे दिल और दिमाग म आवर भूचाल-मा राडा कर ली थी । उस समय वह स्वत हो यही से यही पहप जाता है माना धरती को छाड आकाश म उड जाता । यह यात प्राय प्रगट हा चुपी थी कि पौधरी रामदास का पुत्र सो गया, परतु वह पिता की कमर तोड गया। नाठी हाप गे लिये गीधा चलने वाला रामदास अब पमर भुपापर पलन लगा पा । अपनी जवानी में यह पित्तना कमजार और प्रगडालू था, यह सभी के समक्ष स्पष्ट पा। यह मवविदित पा मि चौधरी रामदाम यमी शिसी स मोधे मुह यात मही गरता पा। इसलिए भगवान पर भी इममा योई भरोसा नहीं था। औरत और पा यही उसय प्रिय विषय धे। सौभाग्य से अपनी जवानी में पगोदा गुदर ही थी, रामदास मन को छूती पी। उसर पाम पैसा भी यपोचित पा। कुछ मारी और धूर्तता से उपार्जित किया गया था । जय भाइयों म बटयारा हुमा सो रामाम न अपने हिस्म में अपना मशान परियादित पर निया था। उगम पृष्ठ पगा मगापा पा । जगत म जमीन भी वहा मी था। पौवन मा माय, दया और सदभावना उमयो सम म नहीं आती पौ । विगी प्रपम पम मही उमन समस सिसा पासा परन पा स्थान पर ही मरिरहो गपसा है। गमपरान मोर पटारापी भाग हो साठी गान से नहीं । राना, पौधरी गमदाम स्मारमा पर तो पा ही, हमीभीपार मानणारा पिपर उसका समानही माता पा, पगुता और दुर्भात मारा था यह गुगमता म ममा मेगा पा। गनिमा पो। कारा पुष मुर पहर बार पार में दामि हो गया पा! भान पर यह मा मनगाािदा। 49 । जय गय फूट लाइ थी। दो वष बाद यह जवान हो जान वाला था। चौधरी गमदाग की आवाया और कामना अब उमी पुत्र पर फद्रित थी । जमाकि माव या आम ग्विाज या सध्या र वाद पुरसटा हात ही घरा म दरवाजा लग जाते थे। गलिहारे म आदमी या औरत भी कम आत-जात थे । चौधरी रामदास जब घर म रोटी यान गया, तो तर सुखिया पर चूल्ह पर यठी राटी बना रही थी। दोपर प्रकाश उमवे मुह पर पड रहा था । यद्यपि वह समुर व समक्ष घूघट परती थी परन्तु उस समय पदाचित सध्या का झुरपुटा होन व वारण सुखिया का मुह खुला था । राटी सात हुए चौधरी ने कई गर मुह उठाकर बहू की और दखा । उसे दिखाई दिया कि उस गोरे मुह पर खून छलछला रहा या। यौवन वाल रहा था। माना वह चीत्कार कर रहा था । सुखिया की आखें भी बड़ी-बडी थी और नरम शिरप मानो भगवान ने अपने हाथ म सवाए था । जैसे-तसे रोटी खाकर रामदास खड़ा हो गया । दूर बठी पत्नी न कहा क्यो आज भूख नहीं थी क्या? बहुत कम खाया । आज तो बहू न तुम्हारी मर्जी का साग बनाया था। रामदास बोला-'भूख ही कम थी, साग तो अच्छा था।' वह वाहर बिछी चारपाई पर जा वठा । जब यशोदा चिलम म तम्बाखू और और आग रखकर बाहर गयी तो बलात चौधरी ने कहा-'बैठ जा रोटी खा चु? 'नही तो।' यशोदा ने कहा, जभी ठहर कर खाऊगी। जव यशादा चारपाई पर वठी तो चौधरी वोला-'देख यशोदा । जीवन तो हम दोनों का कट गया । कुछ सीधे चलते कुछ टेढे चलते जिदगी का सफर अब अपने अतिम मोड पर आ गया। तरी बहू सुखिया स्कूल म तो जाने लगी है मैंने सुना सीने पिरोने का काम भी करने लगी है । पहली क्तिाव भी समाप्त कर ती। लेकिन मैं अक्सर एक बात मन म लिए रहता है, हम दोनो इस बहू साय अयाय तो नहीं कर रहे ? यह भरी जवानी म खडी है । तप रही है। लगता है औरत का यौवन हमारी वह को तोड मरोड रहा है। वह आदोलित कर रहा है। 50 पति की बात सुनकर यशोदा ने मास भरी, तो पिया क्या जाय । तुम्हारी समझ मे आये, तो किसी के साथ बांध दो । इमका विवाह कर दो। तब न रहेगा बास न रहेगी वासुरी चौधरी रामदास उत्साहित हो उठा, हा मेरे मन म यही आता है । आज भी मै रोटी पाने बठा तो बहू का देख मेरी छाती मे काटा-सा उठ माया था । कम्बखत सुदर भी कम नहीं। जवान तो है ही। यशोदा बोली-- मैं देख रही थी कि तुम रोटी तो खा रह थे। लेकिन बहू की तरफ वार-बार मुह उठाकर दव रह थे। तभी तुमम आज याना नहीं खाया गया। जल्दी उठ आये । बहाना भूख न होने का नगा विचार। चौधरी बोला, 'और क्या करता । आज बहू को स्पष्ट दखा था। तभी तो मन म उछाला आया । बखस मैं अपने आप वोल पड़ा, अयाय पर रह है हम उम मासूम बहू के साथ । प्रकृति कुछ उममे भी चाहती है । उसकी भी माग है । यदि कल को वह जिदगी के इस नये मार पर फिमल जाय किसी के भाग जाय, तो तव बहू का कोई अपग न। दोपी हम होगे बहू रानी नही 'आतुर सार मे यशोदा बोली, 'हाँ हाँ, मैं अब गकती है। अब तुम्ने या बहू से वहती हूं कि वह दूमर आदमी का हाथ न पकड़े। 7 ठार समय की बलिहारी है। विधवा तो पहले भी होती पी उदार रहें। जैसी बात तुम करते हो, तब स्वप्न में भी नहीं मुनी पार्टी खा भी लो और मुह साफ का माफ हा, हमनरा दि क्वारी हो या विधवा, मुझे पाप का व्यभिचार - दी। मन की वासना कभी भी तप्त पीआ7-7. 77 rra न और किसी बात का उमरिमेंmarrचा पहा था। कपड में लिपटा था,77774 माना डूब कर भी नहीं मरती" रामदास उठ वटा दर दर- 7:दान “याय करो आप भी गनर 7ri - परतु बादमी अधिक है raf ॥
औरत का अपन जाल म फासता ह । शिवार एक बार उसा रजे म आया नही, फिर वह हलाल पर दिया जाता है औरत य पारा जा बुछ है, उम आदमी छीन लेता है ! उसी समय यशादा न पति वीबार दवा । माना उम फिर स अपने आदमी पा समझना चाहा। रामदास देख नहीं पाया, तब यशोदा मुस्करा दी थी । तनिव हस भी दी थी। उस मन म बात आई, आज तो यह चौधरी बडा देवता बना है। औरत की बसालत करता है । वह दिन भूल गया । जव पुतं की तरह औरत व पीछे घूमता था उसन पहा यह भी सच ह राड तो रडापा भाग ले, परतु रटुव चन लन दें, तब ता जिस पट का गभ उस दिन रोत म पडा था, उमका पता चल गया था। पर किसी ने कहा नहीं। सालग चौधरी की लड़की अपना पट यहा गिरा आई थी आतुर भाव म रामदास बोला-'हा, हा, किसी का भी हा। था तो क्सिी औरत का हो । चाह वह पवारी लड़की हो, या विधवा बहू जादमी अपनी कमजोरी पर लजाता नहीं, औरत लजाती है। उसे छुपाता है।' उसन पहा---'जब तुम आनी बहू की बात साचा । सचमुच, आज मुझस राटी नही पाई गई। बडी हलचल हुई मेरे मन म । मुझे लगा, मैं कोई वडा अपराध कर रहा हू अपनी बहू के माय | जसे मेरे कम थे, उसका फल तो मैं पा चुका । जवान वटा चला गया। अब अभी मैं कोई ऐसी भूल न कर पाऊ, यही बात मेरे मन को कचोटती है । कुरेदती - उसी समय यशोदा ने अपने मन की बात कही-'आज जोरावर भा जाया था। वह नीचे से नहीं कोठे पर से आया था। वही बहू का बुलाया । मैं चौव म थी, मुझसे तो 'ताई राम राम' कर रह गया। बहुत देर दोना मे बात होती रही। क्या बात हुइ भगवान जाने । चितित स्वर म रामदाम बाला-'यह जोरावर भी हमारे लिए एक क्लक है । एक बड़ी समस्या है । उस दिन दरोगा बताता क्या किसी गाव म डाका पडा । एक आदमी मारा गया। वह जोरावर का ही दल था। बहुत माल ले गया था, उम घर से । 52 यशोदा बोली-'जारावर जब भी गाव म आता है, याप को बहुत कुछ दे जाता है । वे दाना घर म भले ही न रखते हा, परन्तु भेटे से प्राप्त करने का चाल पहीन-चही गाडकर रखत हैं । हो सकता है, जोरावर का बाप किसी खेत मे गाडवर आता है । पुलिस ने घर का घमा चप्पा नो खाद डाला, कही कुछ हाथ नही लगा।' विकृत स्वर में चौधरी वाता-पिंसी-न विसी दिन यह जारावर मारा जायगा । पुलिस न एक लाख का इनाम घोपित किया है, इस पकहने के लिए सब जोर घेरा डाल रखा । यहा गाव म रात आने पर पुलिस वाले पड पर चढकर बैठते है । चालक जोरावर घर म म आता है।' यशोदा वाली~ 'बहिन के यहा पर्द वार गया है उस बहुत कुछ दे आया है।' 'अजी, इा चार डाकुआ व पाम बचता क्या है । औरत, शराब और पुलिस यही सब इनका पेमा खात रहल है । पम्बस्त, कभी-कभी तो भूखे रहते है। उसने कहा 'लेकिन इस जोरावर या बहू के पास आना ठीक नहीं। जब तक लडका था, तो इसका आना निभ जाता था। भाभी-देवर का नाता हममे तोडा नही जा सकता था। लेकिन अब तो वह विधवा है । जवान है । उसके यौवन की भी कोई कामना है जोरावर मुझे मिले ता मैं उसको कह दूगा । तुम्ह भी कह देना चाहिए। बुरा मानेगा, तो माने । हमे अपनी प्रतिष्ठा रखनी है।' यशोदा बालो-- मन तो बहू से कहा था। वह देना उस जोरावर मे अब यहां न आय । लक्नि बहू भी तो मेरी बात अनसुनी कर देती है। और अब ता जब से चार अक्षर क्या पढ़ें, अपने पो मास्टरनी समझ चठी है।" चौधरी ने बात सुनी तो हस दिया । वह खिलखिलाकर बोला- 'अब तुम्हारी ब* बच्ची नही । मैं स्कूल में गया था। अध्यापिका बताती थी, चौधरी तुम्हारी बहू सबसे होशियार है । अब छोटे कपडे सी लेती है। इसकी क्तिाब शुरू करेगी। बडा मन लगाती है। यशोदा उठ चली। चौधरी बोला--'रोटी खाकर आना। एक चिलम और भर दना ! अब रात मे नीद नही माती। कुछ देर के लिए 53 आख लग गई, तो बस । यशोदा बाली-- लब बुढापा है । जवानी ता गई । उम समय का नीद अब कहा मिलेगी। वह मौसम तो गया । वह बहार गई । जब तो पतझड है । सब आर मूसे पत्ते उड रहे है । चौधरी हस पडा-परी ! वाह । वेदाती जी । यशोदा बोली नहीं, घर में चली गई। तब तर बह मव काम स निपट चुकी थी। वतन भी माजपर रख दिय य । पत्नी के जात ही, सहसा चौधरी रामदास काप उठा। उस समय उसकी जिदगी का पाप बोलने लगा है । यह घर क्सिी जवान की चिता के समान धूपू करय जल उठेगा । उसी समय लाठी टककर चलता हुआ कोइ बूढा उधर मे निम्ला । देखकर चौधरी बाला-कौन?' मैं हूँ भगवाना । तुम्हारी जूतियो का दास ।' परे भगवाना तू । इस अधेर म | विधर म आया? भगवाना चौधरी के चबूतर के सामने खडा हो गया। तभी बोला चौधरी वह रहमान है ना, उसक पाम गया था। उसने जूतिया ठोष कराड थी। उसे दो रुपया देने थ।' 'ताले आया रपये" 'नहीं, चौधरी | कह दिया आज पसा पास नहीं। वह वाला 'इस रात म मैं न आता । चला भी नहीं जाता । लेकिन जाज निराहार रहार हा दिन निसालना पडा। जा बठ जा । म दखता हूँ कोई रोटा है या नही। और चौधरी ने यशादा को आवाज दी । वह तो आई नही ब" आई। चौधरी बोला-बहू यह भगवाना चमार भूखा है कही गया था, अपना उधार मागन । व मिला नहीं । रोटी हो तो दे । ग्रा लगा पाना पी लेगा।' गुखिया नोट गई । अभी उसन राटी नही पाई थी। वे सब राटी और माग उठा लाइ । भगवाना यो देवर वोली-खाला । पानी पी जर राम राम सेना। 54 जब रोटी खाकर और पानी पीकर भगवाना चलन का उद्यत हुआ तो बोला-'अब तो तुम मदिर पर जात हो। चौधरी । मै दर वठा देख लेता है। चौधरी ने कहा-~~-'हा, भगवाना ' मुझे लगा कि वहा जावर मन को कुछ शाति मिलती है।" भगवाना बोला-'चौधरी, तुमने भक्त रैदाम का नाम ता सुना होगा। वह भी गंवार था। वे पढा था। परन्तु भगवान का मान बना तो बडे-बडे पडित उसे अपना गुरू मानत है । एसी ही महिमा है उस भगवान की।' उसने “हा-'यह भी उस परमा मा पा प्रताप था मैं उस रहमान के पास गया इमवे रास्त से तौटना भी उसी तरफ स था। परन्तु इधर आ गया । तुम्हार मन म दया आई और मेरा खाली पट गर दिया। आज तो आसा में प्राण उतर आये थे चौधरी बोला-'तू इधर आ जाया कर । 'तुम्हारी दया है, चौधरी ।' भगवाना बोला- मुये भरासा है, वह खाली पेट उठाता है और पेट भरकर सुलाता है । वह बडा दयालु है । उसी समय यशादा बाहर आई। भगवाना का दखकर बोली 'अर, तूने रोटी खाई थी क्या । बह सब-वो-मव ल आई । उगा अपने लिए रखी थी। अभी खाई नहीं थी। 'भगवाना बोला-चौधरन, व' की एसी ही इच्छा होगा। 'अर यू कहना भगवान की इच्छा थी । यशोदा बोली-'बहू न भी ठीय दिया। एक दो नाती तो तरा पेट भी न भरता। भगवान। चुप रह गया। तभी चौधरी बोला- सब कुछ भगवान की मर्जी मे हाता है । उसके बगर पत्ता भी नहीं हिलता । यशोदा मुस्करा दी-'अब तुम मचमुच पडित बन चल हो । उनी भाषा म बोलत हो।' चौधरी ने कहा- अब मदिर पर पाता है, ता त मेरा मजा परती ह । हमी करती है। मैं सोचता है यह मष्टि यह गांव-जगत उसी परमात्मा की पल्पना । उसी की इच्छा है। 65 + जिल्नी सिलाई यशादा बोली-ऐसा को माचता ता नहीं। सब अधेर म मुढे है। पडित भी अपन मन के यहवार की छाया में इस जिदगी का दान है । अमीर और निधन इसीलिय तो दूर दूर पडे है। उसने कहा- यह भगवाना था। उसी घरवाली क्तिनी सतायी गयी, इस गाव के जमीदारो म । एक बार ता किसी न इतनी मारी वि अधमरी ममझकर सेत के डौल पर छाड दी थी। बचारा भगवाना पुलिस म रिपाट भी नही लसवा पाया। (हर गया) सोच लिया होगा, जल म रहकर मगर म वर हा, इस धरती पर पशु अधिर ह, दगान पम । जिम दे , वह पशुता का व्यवहार करता है । गक्षम बना है। उम ममय मुखिया भी बाहर थी दरवाजे की आड म खड़ी थी। वह चुपचाप रहकर साम-ससुर की बात सुा रही थी। यशोदा बोली- वह राडी है कुछ कहना है, क्या चौधरो ने मुह उठापर दया और कहा-'अरा, वैठ गावहू । तरी मास्टरनी कहती थी कि तुम्हारी बहू का दिमाग अच्छा ६ का वाम मीन जायगी। यहती थी अपडे की बटाई वा काम दर में आता है।' वह बोला-~-'अच्छा है वहू, तो कुछ सीव नगी यह तर काम आयेगा । दउ तो सही है तू, हम दोना बूढे हुए । यह घर तरी आर दखता है । तर मन म कुछ हा, तो दता दना । तरी इच्छा वा मारना मै पाप समयूगा । अब मै अनयवादी वात नही करगा। यशोदा वाली-सी बात करत हो, तुम । वह मन म क्या हाता' दुनिया में और भी बहुत है, मघवा है तो विधवा भी है। इस धरती मी फिमला पर सब तो नही फिसलती। अपन धम पर बहुत ही रहती है। चौधरी 'आतुर हा उठा--'हा, हा घम की शाखा वडाह । उसे पकड कर को भी इस भवसागर स पार हो सकता है। उमी समय आधी का तेज झोका आया। आममान में बादल जाय । यशोदा बोली-'शायद वर्षा होगी। वितु तभी चौधरी चौवा- कौन । जागन्तुक न पैर पकडे-महू, जोरावर " उमा बाहो म पक्डा 56
का
एर रहा बच्चा पास गडी मुपिया यो आर बरमा
पा ना। अपना हा वटा समझना, हिमो गई
बच्चा सौंपन हो हवा के समान गायर्य हा ममी । पद
गाला चली
देर तर चलती रहा। चौधरी गमःम और पद नाम का
भीषण विपाद मुनत रह और महमे हुए, अग्न परष्टि से सी
वो देखत रह
7
मन स और म म जारापर विशाल नदीदा गिरो व समान
दिखाई देता था। अनक प्रयन व भी सुखिया इस रहस्य को नहीं
ममझ पाइ दि जारावर यया है और क्या नहीं। वह दिन सुखिया की माया
के सामन मदा घूमता था कि जब वह विवाह के बाद स्वमुर गृह म प्रविष्ठ
हुई थी चूकि जारावर डाकू था, इसलिए पुलिस व भय से बारात मे नही
गया था। परतु जर सुखिया पति के घर म आ गट, तब सहमा, एक
सुदर, जवान युवर उसक समक्ष आ वडा हुआ । वह मुखिया के पैर
पकडवर बोला-'मरा नाम जोरावर है। तुम्हारा दाग हू । मलखू का
छाटाभा है।
उसी ममय, सुखिया को सास यशोदा पाम आवर बोली, 'बहू, यह
तरा दवर है । मल बडा भया है, इसका। यह मरे दवर का लडका है।'
जारावर ने रेशमी माल म बधे हाथ में दो कगन सुनिया की मार
वढा दिये-'यह मेरी भेंट है । स्वीकार करो।'
तब सहज भाव से मुखिया मुस्करा दी- मैं क्या है।'
जापना स्नेह । अपना प्यार । भाइया को मुझे भाभी मिल गई यह
मेरे लिए बहुत है।'
यशादा तव तक नट म मिठाइ ल जार'वह अपन इस दवर या
मुह झुठा दे। यह मिठाई खान को दे।' वह लौट गई।
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गुखिया न मिठाइ का एक टुकड़ा लिया और जोरावर ये मुह का तरफ बढावर वहा-'लो, ग्रामओ वर जी।' जोरावर ने वह मिठाई का टुक्डा या लिया और राडा होवर बोला-~~ अव जाता है। मैं सानामोश हू । इस जिदगी की डगर पर भटक गया है। आ सवा ता पिर आऊगा । विवाह में नहीं गया था। इमलिए आज आना पड़ा। मुखिया ने एक ही गाम म जपन मन की अनुभूति उडेल ना, तुम्हार भैया ने मुझे सब बता दिया है लकिन मैं चाहगी, दम भाभी के पास आना न भूलना । इम भी दार चाहिए । एमा मनाना और प्यार मै पगा देवर मुझे दमरा नही मिनगा। जोरावर मुस्कगया और उस घर म चना गया। यह बात दिन दिन पुरानी हा चतो पो। परतु मुखिया और जोरावर भगवान जान पिस भावनावश एक ट्मरे की आर खिचे जा रह थे। जोरावर डार था, शरावी था कर और ववर इमान म समाज के समक्ष खडा था कि तु सुपिया क प्रति वह क्यो गर्पित था इसे न तो स्वय जोरावर नान पाता था न सुपिया। यह स्पष्ट था सुखिया यौवन के जिस प्रखर आनोरम प्रभावित थी, कदाचित उमी अनुरूप जोरावर भी जवानी व चढत सुरज म तप रहा था। गाव म उस जसे सुदर और यौवन से पूरिन युवक बहुत कम थे । और जब यह घोडे पर चढा, हाथ म बदूक लिए किसी मुह्मि पर जाता, ता लगता मन म दफ्नाम गए सिकदर की आला जारावर व गरीर मप्रवश पा लिया था। वह जिधर भी निकलता लागा साम रुक जान । तम रु जात । औरतें दरवाजे की आट लपर उस दाती और अमित बन जाती । परन्तु वही जारावर जय मुखिया के पाग जाता ता उसक पैरा की रज अपन माथे म लगाता । नव मुखिया कहती थी मुझे लाज आता है, अपने पैर छुवात । लेकिन जारावर मुसराता 'भाभी तुम्हार पर छुत मेरी आत्मा यो सुख मिलता है। जानती तो हो तुम मैं खूनी है। इनानियत से दूर रहा है । परन्तु जवन्त तुम्हार पास आता हूँ, तो मन मे स्वत' ही गुहार उठती है कारवी वाणी फूट पडती है तुम देवी हा 58 दवी स्वम्पा हो। इतना सुनती तो सुखिया खिलखिला पडती। उसके मन मे वात आती। आदमी इसी तरह की बात करता है, किमी नयी नवेली को अपने जाल में फंसाने के लिए ! कितु ऐसी अशुभ बात वह मुह में नहीं निकाल पाती। कदाचित इसका कारण था, उसके सामने आये जारावर के चेहरे पर डोलता सारत्य भाव । सुखिया को लगता कि जोरावर जो कुछ भी हा, मेर लिए न ता चार है, न बदमाश ! यहा आकर इमकी दस्यु वनि भी मुह नहीं उठा पाती । शायद यहा आते-आत लाचार बन जाता है। जोरावर की जगह काइ और हो जाता है । एम ही समय एक बार जोरावर ने बताया था, मलखू भैया न मुपे मदा प्यार किया, उमन कभी भी मुझसे नफरत नही की । मवने मुझे त्याग दिया, लेकिन मलखू ने नहीं । वह मेरे कम स घणा करता था, मुझसे नहीं । जारावर ने अपनी एक पुरानी वात दोहराई 'भाभी एक बार मैं बीमार पड़ा था। बडी सराव जगह टिका था। वहा जहरील जानवर रेंगत य, शेर चीत भी पछाडत थे । पर तु मलखू उसी जगह भेर पाम जाता। गत के अधियार म जाता। मेरे लिए पल न जाता, दवा पहचाता । जब कि उसे पता था, उम भयावह स्थान के आस-पास पुलिस की गश्त लगती यो । वहा अनर डा रहत थे। उसी समय सुखिया न कहा--- तुम्हार भया न कभी भी मुझस तुम्हारी बुराद नही की। मुझम यह भी नहीं कहा, तुम्ह यहा आन म रोक दू। जोरावर ने बताया-'म जानता हू । ताऊ और ताई यो मेरा आना पमद नहीं जाता होगा।' सुखिया बोली-~~-'यह उनके मन की बात होगी। मुयम कुछ नही वहा।' यह भी बसे । मैं उनका मगा सहोदर है। वेटा - । नालायक है सरिन ताऊत्ताइ वा भक्त है। यह वात पुरानी हो चली थी । जारावर यदा-कदा आता और कुछ- न कुछ सुखिया भाभी को दकर चला जाता । फलस्वरुप उम यौवनमयी 59
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भी स्कूल खोल मकोगी। आमदनी का एक जरिया बन जाएगा। चौधरी बाला--'बडी समझदार है वह मास्टरनी | कहती थी, जब तुम्हारी बहू अपने काम म लगेगी तो कुछ और सोचन की सुध नहीं रहेगी। समझ गर्द न तू यशोदा, उसका इशारा था जवानी म औरत और मद फ्मिल जाते हैं, तुम्हारी वह वो एमा मौका नहीं मिलेगा।' यशोता न लम्बी साम भरी-हो, बात तो उसकी ठीक थी। वह का मन भी मिलाई म और पढाई म लगता है। रात म दीये की रोशनी म भी पढती है। पिछली बार जोरावर जाया था, तो कुछ स्तिावें द गया था।' रामदास बोला-'मेन वे कितावे देख ली है । मेरी बहू के कमर म जाना अच्छा तो नही था, लेकिन जब वह स्कूल गई थी तो तभी मैं घर में चला गया। वे किताबें गामने अलमारी म रखी थी, मैंन उठाली। सब धार्मिक कितावे थी । मैं तो उह पढा नही पाया, लेकिन समय गया, जोरावर अपनी भाभी के लिए उसके अनुरूप ही किताबें ल आया, था। उममे रामायण थी, भगवत् गीता थी और भारत की महान ऐमी किताबो से ही बहू वे विचार बदलेंगे।' यशोदा बोली-'जोरावर डाकू ही तो है, बुद्धिहीन नही । पच्छा पढा लिया है । डाकू न वनता तो किसी मरकारी दफ्तर का वाब बन जाता । मास्टर भी हो सकता था। इतनी बात सुनी, ता चौधरी न सास भरी- यशोदा, मैं इस जारावर को घर आने स नही रोक पाता, इसका कारण तो है। कह सकता हू, इस घर की प्राणरक्षा के लिए जोरावर ने गलत रास्ता पपडा। रामफल चौधरी के बेटे से तुम्हारे मलखू का झगडा हुआ था । जोरावर यदि उस समय खेत पर न पहुच जाता, तो रामफल का लडका तुम्हार मलखू को जिदान छोडता । उस समय दो बदमाश भी उनके साथ थे। रामफल बहुत देर से उस खेत पर निगाह लगाय था । पक्का बेइमान और कमीना । मेरे पिता जी ने मेरे विवाह पर पाच सौ रुपय रामफल से लिए थे। उसके बना दिए पाच हजार । हमारे पिता पढे लिये तो थे नहीं, अगूठा लगवा लिया। कोरे कागज पर क्या 61 ममझत मैं - लिया, इस भगवान ही जानता था।' यशोदा माम भरी तभीता आज उगर पाम गांव म नारा जमी है । आदमी आग-पौछ मी वान नहीं मोचता। बजार दो न क्या दमा है उस यूढे माप को। टिया पर पहा सह रहा है । हमारा रुपय डाक्टर गा चुवा है । उमरा बेटा मूरज ता जोरावर वी लाठी से मरा लकिन दो बेट तो भगवान ये वाप ग मर गए । एप पागल हो गया। तर यहुए राह पर बैठी । न वोर पानी दवा है न नाम नया रामदास का मन आकुन हो उठासी यात न घर मशोर विमी का घर बिग-ता दायर गुश मत हा । जब ना तरा भी घर विग' गया। यशोदा वोजी-भगवान का शुक्र था वि सूरज सत पर नहीं मरा । कइ महीन याद मरा था। लाठी को मार में सिर तो फ्टा, परतु टाव लग गए थे। उसी म मवाद पड गया। कोडे पदाहा गए । बहुत तडपर भरा था वह सूरजभान । उसी अपराध म जारावर दो साल कदखान म रहा था। रामदास न गहरी साम ली-'वह दा साल का बदखाना ही उसक लिए काला बन गया। वहा स पक्का डाकू बनकर निकला था। कई सरदार उसके बागी बन गए थे । जव वह जेल से छूटा, तो दिमाग म प्रतिरोध और प्रतिशोध का भाव लिए था। रामफल व घर को तबाह कर दन का भाव उसके मन में था। लेकिन, अब भगवान ने ही उस घर का विपत्ति के धेर म बद कर दिया, ता जोरावर क्या करता? वह चुप रह गया। यशोदा ने तभी ताना मारा~ लकिन तुम ता ऐस दयावत बा कि कई बार उम रामफल के पास गए थे । मैंने तो सुना एक वार कुछ रुपये भी दे जाय था तब रामदास सूख भाव स मुस्कराया---'यशोदा मुझे दम्रत हो रामफल रो पडा था। मेरी आखो के सामने ही उसने वह कागज फाड लिया जिस पर मेर पिता ने अगूठा लगाया था । उस समय वह बूदा गिडगिडावर बोला था सिफ पाच सौ रुपये दिए थे, तुम्हारे पिताजा 62 - को, पाच हजार नहीं । दो हजार स अधिक मेरे पास जा गया। जब न कुछ लेना है, न देना है। जिस खेत को तुम्हारे पिता ने रहन रखा था। उसे पाने के लिए मेरा बेटा मौत के मुह मे चला गया। लेकिन वह खेत जहा है, वही रहगा । वह तुम्हारा था अब भी तुम्हारा है। अफमोस यह है, तुम्हारा मलखू भी इस ससार म नहीं रहा ।' यशोदा तिलमिला उठी 'अव पनाए होत क्या, जब चिडिया चुग गई खेत ! सुनता हूँ उसकी एक बहू खराब निकल गई। इसकी बहुओ के भाई जमीन के मालिक बन बैठे ह । अव ता यही होगा । हराम का माल हराम मे जायेगा। चौधरी रामदास न हुस्के से चिलम उतार ली और वह यशोदा की तरफ बढ़ाकर कहा-'ल, जरा तम्बाखू रख ला । अव ता बहू ने चूल्हे मे आग सुलगा ली होगी । आज हुक्का भी नही पी मका । वह फरीदाबाद का नौवतराम था न, आज उमकी तेरहवी थी। वहां गया था। बेचारा भला आदमी या । भगवान की माया है, जम भर तो अभावग्रस्त रहा, अव उतरती उमर मे रुपया आया तो दिल का दौरा पडते ही मर गया । यह ह भगवान का करिश्मा ! उमका याय । सिके भाग्य में क्या लिखा है, कोई नही समय पाता?' अजी, फिर भी लोग नहीं मानत । इस पैसे के लिए भी जुलम करत है। अपन स्वाथ का पट भरने के लिए दूसरो का पेट काटत है । तुम माना या न मानो, वह चौधरी भी कम नहीं था । वह तो यह कहो, हाथ-पर पटककर भी उमके हाथ कुछ नहीं पडा । अब भी जो रुपया उसक पास जाया, वह साने वो औरत का था। लोग कहत हैं वह विधवा औरत डाकुआ न मारी, लेकिन मुझे भरोमा ह, वह इसी चौधरी की कारस्तानी थी। इमने दो बदमाग किराय पर दिए थे। रात के अधियारे में वह बेचारी मार दी गई। रामदाम बडुव भाव स बोला, 'नहीं, नहीं।' तुरत ही यशोदा बोली-'राम क्सम | उस गांव की दो औरतें इस गाव मे हैं । एक दिन सत पर उन दाना से बात चली पी। तभी पली खुली। एक तो चौधरी के पडोस की रहन वाली है । उमका तो यह भी 63 रहना था कि चौधरी न पुलिस का भी रुपया चढा दिया था।' मास भरसर चौधरी याला-वइ लाप की जायदाद थी।' यशादा बोली- वह भी नही या सया। साल की विधवा सुबह के समय चक्की पर आटा पीसन बैठी यो तभी गडासे म उमया मिर काट दिया गया । जव उगने भैम का चारा डालने के लिए दरवाजा खोला, तो तभी से बदमाश घर म घुस गये थ। उमने सास भरी-'तुम कहत हा, वह दिल का दौरा पडन म मरा न, न यह उम रुपय को, और जायदाद का हजम नहीं पर पाया। माल की पनी न उमा लडका गोट तो लिया, लकिन वह लडका भी पागल बना है । गार के गलियार म फिरता है। कभी पटेहाल भी नगेहाल चौधरी बाला- - नहीं वह सिर व कपर र आगमान की आर दखने लगा । यशादा चिलम लकर घर म चली गयी । जब वह चूरहे क पास जाकर चिलम म आग रखन लगी, तो तभी सुखिया बाली--'आज बहुत बात की पिताजी म ! म तो एक वार गयो, ता लौट आई। यशोदा बोली-- 'अरी बहू । कोई नयी बात तो थी नहीं, वही पुरानी घिसी-पिटी बातें । तू समय ले, इस दुनिया मे ही चन नहीं । यह औरत मद का समाज कहने को भगवान का भक्त है जात्मा-परमात्मा को समयता है, परतु मैं देखती हू, यह निरा क्साई है बर्वाद और क्रूर है। अपने स्वाथ का पट भरने के लिए आदमी को तिनके की तरह तोड देता है। सुखिया न बताया--'आज स्कूल में एक औरत बता रही थी कि कोई औरत बच्चा पदा करके खेत मे छोड आई थी। जानवरा ने वह खाया था। यशोदा का मन तिलमिलाया--'हा, हा, यह पाप भी इस धरती पर हाता है । क्या पता, वह क्सिी विधवा वा था या क्वारी का। उसने सास भरी ओ हा, वह पाप था। विसी ने छुपाया था। मुखिया योली- यह तो निमम हत्या है । जघय पाप है।' अरी बहू' इसे कौन मानता है। यह तो कुत्ते कुतियो का समाज बना है । आखो का पानी उतर गया। धम को लोगो न चुल्लू मे भर- 64 कर पी लिया । अब तो न औरल लगती है, न पादमी। वह चिलम लेकर जान लगी, तो बोली- "भैस की सानी कर देना। आज शायद मुकेश भी आएगा । कल रविवार है वह ता छुट्टी मनायेगा।' मुखिया बाली-'मुवेश आआ, तो उसे लड्डू बना दूगी। सुबह बिना कुछ पाय स्कूल जाता होगा। यशोदा वाली नहीं, बाहर चली गयी । जाकर देखा, उसका छोटा पुत्र मुकेश शहर से आ गया था। वह पिता के पास बैठा था। मां का देख वह -डा हो गया और पैर छूने नीचे युव गया। यशोदा बोली, 'खुश रहो, पूर पढो । आओ, भाभी के पास । उसके पैर छूबर अशीर्वाद पाप्त करो। तब मुकेश अपना झोला उठावर घर म चला गया। यह जात ही भाभी के परो म झुक गया । 8 जिस शिशु को जोरावर उस सुखिया को गोद में डाल गया, वर एक रहस्यपूण दृश्य तो था ही, अज्ञेय भी था, जोरावर आंधी के समान आया और उसी तेज झपाटे मे सुखिया से दूर हो गया। जिस वपडे म मच्चा लिपटा था, उसी मे एक पत्र और कुछ रपया था। पर मे जार जब मुखिया ने वह पत्र पढा, तो वह स्तब्ध रह गयी । एकाएक पुछ सोच नहीं पाई । तभी यशोदा ने घर मे जापर कहा-'अरी, यता तो, क्या लिखा है, पत्र में । क्सिया है, यह बच्चा । वहा से लाया है । मया धन-दौलत को लूटने वाला यह डायू अब दूसरी औरता ये बच्चे भी उस लगा । हाय, राम । बडा नृशस और क्रूर बन गया है, यह जोरायर ।" लेकिन उस समय सुखिया मोर थी। स्तब्ध भी बनी थी। माता समूचा ब्रह्माण्ड उसकी आबो पै ममक्ष धूम उठा था। वह बच्चे या अपने पास रसे या नहीं, इस बात का निश्चय करना भी उसपे लिए 65 दूभर हा गया था। एप, अनिश्चय की उम अवस्था म हो, उसन लम्बी साम भरी और आममान को ओर अपना मुह उठा दिया । यशोदा घर व दूमर कामा मे लग गयी थी। कुछ देर बाद ही वह फिर पति के पाम जा बैठी । घर म वह बच्चा क्या आया, यशादा के लिए भी एक समस्या बन गयी थी। उस जवस्था में ही यह दुरूह बनी थी । पास जात ही पति मे बोली-'इम कहत है, नाकाश म टूटी हुई आफत । मुझे लगता है, पुलिस में हुई मुठभेड में जारावर मी माग गया। अब तो बदून का गोली का स्वर नहीं सुन पडता।' चौधरी रामदास स्वय सहमा हुआ था । कातर बना था। पत्नी की बात सुनकर बोला- हा मुझे भी एसा लगता है, जोरावर नहीं रहा । वह पतिम की गालो से मरा होगा, तो उसकी लाश पुलिस के साथ गयी होगी। उस पर ता एक लाख का इनाम था। यशोदा बोली-'कमी जचरज की बात है न ता जोरावर की मा गगा घर से बाहर आई, न बाप । वे सोय नहीं होग, भाग रह हागे।' रामदास बोला 'यशोदा, यदि पुत्र काला नाग बनकर समाज को डसन लगे ता मा बाप भी उमसे दूर रहग ? तुझे पता तो है, जोरावर का वाप यादराम आये दिन थान मे बुलाया जाता है । घर का चप्पा चप्पा गोद डाला है पुलिस ने। तू भूली नही होगी एक-दो बार मुझे भी थान में बुलाया गया था। वह ता यह कहो, थानदार मुझे जानता था । दो-चार बात करके मुझे लौटा दिया। यादराम को तो एक बार हवालात मे बद कर दिया था। पुलिस ने मारा-पीटा भी था ।' लम्बी सास छोडकर यशोदा बोली-'औलाद सभी कुछ करा सकती है। आममान मे बैठा सकती है और धरती म भी गाड सक्ती है। मुझे तो 'म जोरावर का इस घर की डयौढी पर जाना पसद नहीं । बहू मे एक दो बार कहा भी कि कह दे उस डाकू मे, इस घर पर दया करें। हमारा वुढापा न बिगाड ।' उमने फिर सास खीची- भगवान जाने, बहू ने उससे कुछ कहा या नही । उसस कहती, तो वह रुक जाता इस दरवाजे पर न आता। रामदास हुक्का पी रहा था। उसका धुआं छोडकर वोला---'यशोदा, 66 यह भी नहीं हो मवता । गोश्त से नायून से अलग किया जायेगा। जागवर मेरा भी गोद खिलाया है। भाई का पुत्र है । इसी घर के भागन म सेलकर वहा वना है । उस न बहू रोनेगी, न तू ! हिम्मत हो, तो तू ही कहकर दन ल । शत वदता हू. जो तू उसे राय द ।' यशोदा वाली नहीं, चुप रह गयी । उसी समय एक व्यक्ति उधर स निक्ला। रामदास को घर के चबूतर पर बैठा दबकर बाला--'चचा राम-राम ।' उसने कहा-'आज तो सूब भिडत हुई, पुलिम मे और जारावर मे । कई पुलिस वाले घायल हो गय । जारावर को भी गोली लगी या नहीं, भगवान जाने । 'हा,-र, लखपत | यह कैसे हुआ। क्या जारावर लखपत वोला-जोरावर या पता नहीं कि वह मारा गया या बच गया।' उमो समय दो-तीन व्यक्ति और उधर आ गय । उही म स एक बोला-'जारावर बच निकला। वह आधी के जघड का लाभ उठा बठा । जसराम पे बारह बीघा सत पर यह मुठभेड हुई थी। जोरावर ईख के गनी को आड मे था। पुलिस ने उसया पीछा तो दूर मे किया " था। दूसरा वोला-'जारावर बचा नही । एव बार वह चीखा चिल्लाया या।' जरे, भैया । वह तो पुलिस के सिपाही की चीख थी। मैं तो वहीं पास मे अपन कुए पर था । आधी मे कुछ दिखाई नही दे रहा था। वह रछावर जवान जोरावर एक-दो पुलिम के आदमी की गदन मगड सक्ता पा। वह तो खूखार भेडिया है। जिसके दात मारेगा उसका गोश्त उतार लेगा। एक व्यक्ति वोला-'इमे कहत हैं एवं मछली ममूचे तालाव का पानी गदा कर दे। इस जोगवर के कारण गाव म पुलिम ने अप स्थायी डेरा डाल रखा है।' उससे कहा गया- लेकिन लाभ क्या, जोरावर ता आगाद वना रहता है। गाव म आता-जाता है। लोग सभयत होंगे विजारावर अपने 67 वह गव घर नही आना । जपन इस ताऊ स आर नहीं मिलता जगह जाता है। क्या मजाल, जा पोई उसर दिलाफ आना मुह मोल । सनका अपनी जान प्यारी है। जोरावर या भरा पिस्तौल घभी भी, कही भी आग उगल सकता है। वह ता आजाद पछी है । कभी धरता पर दिखाई देगा भी आसमान म एक-एक करके व सब आगे बढ गये । उस समय जाममान साफ था। तार निकल आये थे। हवा म ठण्ड थी। यशोदा बाली-'कही बूदें पडा रामदास वाला-जाजक्ल ओले भी पड़ मक्त है। दिन म गरमी अधिक थी।' यशोदा न अपन मन की बात फिर उठाइ-हा बताया नहीं इस बच्चे का क्या होगा । यह गाव है ? शहर नहीं। मद-औरत वहग, विधवा न अपने पेट से बच्चा ज मा है हा, किसी का मुह नही पक्डा जायगा। तब हमारे पास कहन को क्या रहेगा । या कहा तो, जोरावर की मा का बुलाकर बच्चा सौप दे।" रामदास बाला-"बहू क्या कहती है ? पहल उमका मत ला। जजी, वह क्या कहेगी। मेंन बात की, ता चुप बठी रही। जब उसक पास गयी तो बच्चे को रूई के फाहे से दूध पिला रही थी। जस उसी का बच्चा हो, बडी ममतामय निगाह से उसे दख रही यो । सिर पर हाथ फेर रही थी। मुझे लगता है, यह बालक अभी भी दो चार दिन रामदाम बोला'-अभी चुप रहो तल दखो तल की धार दखो। यशादा मुस्करा दी-सच कहा है किसी ने बुढाप मे भी इमान औलाद और धन म मुह नहीं मोडता । लगता है तुम्हे भी लालच जा गया।" रामदास बोला नहीं हुक्का पीन लगा । यशादा की बात में कितना तथ्य था वह उसकी गहराई मे खो गया। तह उसने मान लिया कि बुढाप म ममता का वेग बढ जाता है। जादमी उसी म खो जाता है । जिस वाण प्रस्थी की या सयासी की वात प्राय कही जाता है उस 68 था प्रत्यक व्यक्ति स्वीकार नहीं कर मवता, इस जीवन का दामन छोडना सुगम नही, वडे-बडे महार यी इस रास्ते पर जाकर हार मान चुके हैं। तभी बलात यशोदा वोली-'क्या सोच रहे हो? यह आधी पोई- न कोई रग जरूर लायगी । आज पडो के छोट-छोटे आम गिर गये होंगे। एस ही समझ लो, यह आया हुआ अधड इस घर मे भी कूडा करकट बढ़ गया है मेरा मन कहता है, जोरावर जिस बच्चे को द गया वह मानो खुद उसी का है, या उस नारी वा, जिसकी हत्या करके वह भागा इस आघी म यहा तक आया था। पुलिस पोछा न वरती होती, ता वह कुछ देर रुक्ता। बच्चे का इतिहास बताता । वह जान-बूझकर बहू की खाली गाद भर गया। यह भी हो कि पुलिस पीछा न करती, तो दूसरी जगह जाता।' रामदाम ने हुक्मा अलग कर दिया । वह उठ बठा । तभी बाला- यशादा, तू पिस उलयन म पड़ी है। चोर-डाकू तो नित्य इसी तरह के पुक्म करत ह । किसी का बच्चा उडाते है किसी का धन । एसे बेरहम इन्मान न भगवान को मानत है, न भावना को। वह तो पत्थर है, पत्थर । उस पर पानी नहीं टिकता।' यशोदा ने सास भरी और छोड दी । वह सहसा कुछ कह नहीं पाई। तब चौधरी रामदाम वाला -'मलखू की मा, मैं तो गवार हू, पढा. लिखा भी अधिक नहीं । लेकिन मेरे मन म प्राय यह बात आती है कि इन्सान भगवान तक को नही मानता । दूसरा का तो धोखा देता ही है, अपन का भी दता है उसे दखो न, लाला धनपत राय को। बूढा हा गया, मदिर पर जाकर शिवजी की पिण्डी पर जल चढाते हुए । गाव में मबसे बडा भजनान दी बना है। मदिर पर रपया भी लगाता है। प्राय दिन ब्राह्मणी का पिलाता है। तीथ स्थाना की भी यात्रा कर आया है। लेकिन क्या कभी उसके अपने मनप्राण मे भगवान का स्वरूप नखा। उस भावना का ममझा है । हर सुख की औरत सिर पटक्दा मा गई, लेकिन लाला ने उमका रहन रखा खेत नही नौटाया। दारी ग्यय बीस हजार का माल हडप गया।' 69 । यशोदा बोली-'संकहा औरता का जेवर उमन जपन यहा गिरवी रया है। जव डामा पहा तो एक वडा सन्दूय डाकू उठावर ल गए थे। लोगो का कहना है कि उमम सोने-चादी चे जेयर भर थे । वे सब गिरवी रखे थे। हा, हा, यही तो। लाला की बातें मेरा मन सालती हैं। एसा लगता है कि कोई जहरीला जानवर मेर प्राणा स कोई तरल पदाथ उलीच उलीच कर बाहर फेंग रहा है। रामदास वाला~-'मैं गवार है या, मदिर पर जाकर पूजा करनी भी नही जानता, लेकिन मैं इतना जर समझता हू इस ससार को वनान वाला, इम जीवात्मा का निर्माता कोई-न कोई है जरूर । उमी ने चोटी से लेकर हाथी तक का निर्माण विया है। जो सत महात्मा निर्माण पद को प्राप्त हुए हैं, मरने के बाद भी पूजें जाते है, उसके जीवन में कोई न कोई ऐसी सुगध जरूर थी कि जिसस इसानी समाज सुधत बना। उस पावन गगा म गाता मारवर मपने अपने का पसारना चाहा।' यशोदा बोली-'हम देवा देवता या सत महात्मा का पूरा कर सक्त है, स्वय वसे नहीं बन सकत । हम तो भगवान के वीडे ह सडाद में पडे रहना ही पम द करता है लाला धापत राय भी एक काडा है जहरीला । इमान को काटे तो वह बचेगा नहीं । बहुत मे स्त्री-पुरुष मार है इस लाला ने। रामदास ने लम्बा सास खीची-सभी एसे है । भगवान का पूजन करना भी एक ढाग है । अपने का धोखा देना है। समाज का ठगना है । यशादा बाली'-'अजी तुमा सुना नही गगा-यमुना म पेशाब- पाखाना बहाया जाता है। उस पवित्र दरिया का भ्रष्ट कर दिया है लोगा ने । अब गगा म स्नान करना धम का नाम नहीं।' उमने कहा- 'हमाग मलखू एक बार हरिद्वार गया था। क्हता था, जब मैंन हाया म गगा का जल लेकर पीना चाहा तो तभी पाखान का एक टुकड़ा उम जल म आ गया था। तब से वह गगा नही गया। चौधरी बोला--'मलखू की मा, यह इसान भी एक पावन दरिया है। गगा है। लेपिन इसके जीवन म भी अवसाद भरा है। गारगी से 70 घर में आजा रामदाम वाला- गराधार है । जान कितना जमा व मुपल पावर इमा। गन्त महामा व पद को प्राप्त होता है । वह अपने जीवन यी गगा म स्वय गोता मारता है, बल्कि जन जन यो पधारना चाहता है । वहा भगवाा है। इन मदिरा का निर्माण इसीलिए ता दिया कि इमान जन-जन ५ मैल धाने ये माय अपने आपका भी निखार द । उस सुदर मूर्ति २ अनुरूप अपन वो बना ले।' तभी सहमा यशोदा मुपला उठी-'यह नहीं होगा । इमान नहीं बदलेगा। यह तो पूडी वा ढेर बना रहगा।' उसी समय मह्मा चौधरी चोर उठा । दणा, सुखिया नहू द्वार पर आकर पडी थी । वह यगोदा को बुलासर कह रही थी अम्मा ? रोटो भी यनानी है । उस बच्चे को तुम ले लो। -'बह तूने क्या सोचा है अब यह तू पानगी। तू सहजेंगी। मुखिया जब मसुर मे बोनन लगी थी । धूघट ना कम काढती थी। स्वय रामदास का यह निर्देश था । स्वसुर की बात सुनकर वह बाली-- 'हा पिताजी । अब मैं स्वय पातूगी, इस वच्च को | समझ ला, यह मेरा है। एकाएक रामदाम बाला नही, चुप रह गया। तभी यशोदा चोली-- 'खूव सोच समझ ले बहू । बच्चे का पालना आसान नहीं । और अपना आग भी देख त । तू विधवा है, कच्चे धाग मे तरी जिदमा बधा है। रामदास न कहा-'हमारी यह मुख नही, समझदार ह । अपना भला-बुरा समझती है।' सुखिया बोली-'पिताजी जोरावर मुये यह वच्चा द गया है समय लो, मौप गया है । वह आयगा ता ले जाएगा। नही ता यह मेर पाम रहेगा। यशोदा बोली-'जोरावर अब नही आएगा। आज वह पुलिस की गोली से मारा गया होगा। वह नहीं बचा होगा। लेकिन सुखिया ने इस बात पर अपना मत व्यक्त नही क्यिा । उसन यह भी नहा बताया कि जोरावर अपने पत्र में क्या लिखार द 71 गया है। पितु यशादा ने पूछा-'वह पत्र भी ता द गया था। क्या लिखकर द गया" मुखिया ने कहा- कोई खास बात नहीं थी। यह लिखा था, बच्चा सौप रहा हूं, इसे पाल लना किसी का मत देना। इसी घर का बनकर रहगा। वाह-वाह वटा तीर मारा हरामजाद ने । रामदास बोला- उमन इस ममूचे घर को फमा दिया है । बहू को बदनाम कर देना चाहा तुर त ही यशादा बोली -'और नहीं तो क्या । चोर डाकू का धरम ता होता नहीं। एस लोगो के मन से न याय होता है, न दया। इन्सानियत का भाव ता उनर पास आय ही क्या । वे पूनी + लुटेर उस समय सुधिया का सास की बात पसद नहीं जाई । वह तुरत बोली-'अम्मा, यह बात चबूतर पर वठार नही यही जाता। 4 म चला । मैं रोटी बनाता हू, पिताजी को खिला दा।' यशोदा उठ तो चली पर तु सुखिया की बात उसे चुभ गद । उस लगा इस बहू को बच्चे से जोरावर मे जर काई लगाव है । उसके प्रति ममता हे । कदाचित यह वात चौधरी के भी मन म आई। तब मुखिया अपनी बात कहकर घर में लौट गइ थी। चौधरी न पत्नी को टकोरा सुन ली बहू का वात । समन त, हाथी के दात बाहर निकल जाय है । खतर को घटी बज चुकी है। यशोदा झुझला पडा । वह कुण्ठाग्रस्त बनकर बाली-जव तुम्ही ख ला। मिर पर तुमने चढाई है इस बहू का। यह तो बोल भी नही पाती थी। अब टपर-टपर बोलती है । एक की चार सुनाती है । अरी भाग्यवान | अब कब तक चुप रहोगी। उसे भी बोलना है । अपने मन का माव व्यक्त करना है । यह बुरा नही। पूघट काढकर घर म बठी रहना शाभाप्रद नहीं। र शोदा न आख तरेरी-मरी बात सुन लो । यह हालत रही तो 72 यह सीधी-मादा हू तुम्हारी नाा गटगी। 'गरी नाप तो यट गई, यITI जोरांट का भार या लहवा है ता, मेरा है तो, याइ अन्तर नहीं । वर ने PALIS आता , मैं देखता हूँ। मैं अमानही । मर मन को आंखें मामती माथे की भी। जा, पर म । रोटी दे। भूत लगी। तब यशोदा घर मचती गद। Sty 9 यस्तुत चौधरी रामनाम ना जीवन कभी भा सभ्य नहीं रहा । परन्तु जब में उसके पुत्र मलगू या प्राणात हुना, वह बडी तजी के साथ बदल चला था। पहन र समान दर्षालु, दम्भी और महत्वाकाक्षी नहीं रह गया या। अपनी जवानी य दिना म रामदाम लडाकू प्रवृत्ति का था। मुकदमे बाज था। पितु उसका जवान पुत्र क्या गया, रामदास का पिछला जीवन ही चला गया। अब वह पर दाश निव ये समान मदिर पर जाकर बैटना और वहा पर आए आग तुमा का भगवान के प्रति श्रद्धा भावना को देखकर म्वत ही विहराता । गाँव के छोटे बडे वे नर-नागे माना उमकी दष्टि म नजूबा थे, जलौरिय थे और वे सब उस मदिर पर आफर पाइ जलभ्य वस्तु पान के आकाक्षी बन थे। तब मोचता रामदास क्या इस पयर की प्रतिमा म काई इसकी जीवात्मा होगी। वह इन दशनार्थिया को आशाप प्रदान करती होगी। कि तु रामदास के मस्तिष्क म और मन म इस प्रकार की बल्पित बात नहीं उतर पाती थी। वह लागो की उस महत्त्वाकाक्षा की त्पना कर कभी हँसा ता नही, क्सिी के प्रति उपक्षा का भाव भी प्रदर्शित नहीं कर पाया, परतु वह स्वत ही विस्मित था। इस ऊहापोह मे लगा था, आखिर यह सब है क्या । लोग विस प्रेरणा से इस मन्दिर की ओर खिचे चल बात है। जबषि गाव का वह दव मदिर भव्य भी नही था । सौ-पचास वर्ष पूर्व वह वना 73 या। एक जमीदार ने बनवाया था। अब वह भी नहीं था। उसका ममूचा घर ही समाप्त हो गया था। रामदाम को पता था कि उस जमीदार की पत्नी धम परायणा थी। हरिद्वार, पाशी और त्रिवणी प्राय जाती थी। उसी प्रेरणा से मदिर बना था। स्वय जमीदार दव भक्त था न धार्मिक भावना का पोषक । वह रात दिन शराब के नशे म रहता । जनेक औरता स सबंध रखता । समूच गाव की आधी जमीन का वा वह स्वामी था। हाथी रखता घोडी रखता और मुदर बैला से मज्जित रथ म बठकर निक्ट के शहर में जाना उसमा प्रिय यमन था। एक दिन जब मदिर पर बैठे उम जमीदार का इतिहास रामदास में मन म उभरकर जाया तो तभी वह अत्यत विल भाव में मुस्कराया, जमीदार क्रूर था और उसकी पत्नी धर्मात्मा। कितना बड़ा तर था दोना म । ममझ गया कि उम जमीनदार के वट पात गए स्वय भी गया । उस जमीदार का वैभर भी श्मशान मे जलती चिता में समान धू धू करके ममाप्त हो गया। जब उस जमीदार का विशाल भवन खव्हर बना था। जहा रही रग रेलिया मनती थी, वहा अब गांव के किसान अपन बैल वा गाय भैग बाधत ! उस भूषड का अव काई स्वामी नहीं था। वह धरती अपने स्थान पर थी परतु उसका स्वामी नही था । जिम व्यक्ति का एक दिन गाव मे दबदबा था जब उसका न काइ नाम वा या न पानी देवा चूचि रामदास कभी मदिर पर नहीं जाया गया इसलिए जब वह वहाँ जाकर बठन लगा पडित द्वारा पठिन नथा सुनन लगा तो तब उम वह मर कौतुक का विषय लगता था। वह यह देखकर भी चकित था कि सभी इपाना के समान वह भी सीमावद्ध है। गांव म रहार भी उस छाट से मदिर का हस्य नही जान पाया । यगादा यदा रदा वहा जाती और लौट जाती। उसन भी भी अपन पति का मदिर पर जाकर दव-दशा परन व लिए प्रेरित नग दिया। पदाचित उम म्पय भी उम मदिर में प्रति अधिर अनुराग नहीं था। देवल रस्म पूरा करती था। क्सिान श्रीबेटा विमान य पर म आई, ता मुबह से शाम ता उर्म घर- बाहर में धाम फम रहना पडता। मंदिर पर जान की फुरमत नहीं 74 - थी। उन दिना मदिर पर एक साधु आया हुआ था। रामदाम दखता वि उस साधु के पास छोट-बडे मभी जात थे। स्निया भी आती। कुछ एसे भक्त भी उस माधु के पास गए थे कि जा साधु वे पास जाकर बठत और उगके लिए सुलफे की चिलम तयार करत । सवप्रथम माधु ही उस चिलम को पीता । उम चिलम मे ली निकालता। बहुत सा धुआ मुह म बाहर फेककर वह चिलम जपन भक्त की ओर बढा देता। चूकि गमदाम भी गांव का एक विशिष्ट व्यक्ति था, इसलिए आग तुम उम देयते और मन म कहत अन इम चौधरी को भी भगवान की शरण में आना पड़ा है। एक न एक दिन भगवान व दरवार म सभा का आना पडता है। कितु चौधरी की निगाह म अब भी वह नाटक था। तिमका वोइ दश्य मुहावना था, कोई रहस्यात्मक । वहाँ भगवान है या नहीं देगी औ मुक्यना मे वह उस स्थान पर जाकर वठता और मब देखता था। एक दिन जव चौधरी रामदाग वहा बैठा था ता तभी उगवा पडौमी नरायण वहा आया। वह नित्य नहीं जाता था, कभी कभी आता था । चौधरी के पास जाकर वह वाला—'यह गाधु पहुंचा हुआ पनीर है । आआ तुम भी। दो वात करो। माधु ग्रुश हा, तो अपनी धूनी का राय देवर ही पागल कर देगा।' चौधरी रामदास का ध्यान उस समय कही और था। जब पडोसी नारायण ने जपनी भावना व्यक्त की ता व सहज भाव स मुस्कगया- 'उसके नरायण, यह साधु तो सुलफाबाज है । तखो तो जाया स आग निकलती है। शरीर पर भभूत मिलता है, तो लगता ह जम कोई प्रेत हो। सिर की जटाएं भी इतनी बढा ली है कि धरती छती है । यह नग धडग साधु जो जरा सी लगाटी लगाय बठा ह और अग्नि स प्रज्वलित हुई धूनी पर बैठा सुलफे का धुआ उडाता है, मुझे तो यह सब समझ नही जाया । यह त्यागी साधु नही, बोझ है ममाज के कार यह मनता हूँ, कोढ है, इमानियत का। चौधरी की बात मुनत ही, नरायण का मितली-सी आई । वह रुक्ष भी बना । फिर भी वह अपने मन की बात रोक गया। वर साधु का 75 भक्त था। पिछली सध्या म वह पास प रम्बे म गया और वहां से माधु महायज्ञ के लिए सुलफा खरीदकर लाया था। वह उमकी जेब म या। जब उसने चौधरी की बात मुनी, तो बोला-'यह तो अपनी-अपनी भावना है चौधरी | मानो तो इमान भगवान है, नही तो माटी है । इन साधुजा का त्याग तो देखो, मर्दी, गर्मी और बरसात नगे बदन पर उतार दते है । किसी से कुछ मांगत नही भक्त स्वय ही भेंट पर जात चौधरी वोला- मैं तो कभी इस मदिर पर आया नही । लक्नि अब आकर दखता हू तो लगता है तुम्हार इग भगवान के दरबार में किमी वस्तु का अभाव नही रात तरे पडोस की यल्लू की मां बता रही थी गाव की औरतें इस माधु के लिए हलुवा, पूरी और खीर घर स तयार करके लातो है किसी दिन इम साधु न कहा होगा कि पकौडी देर से नही खाइ । तो कोई औरत घर मे पकौडी बनाकर न जाई नरायण एक प्रौढ व्यक्ति था। चौधरी की बात मुनकर बोला- “इन साधुआ के लिए किसी वस्तु का अभाव नहीं । य भगवान के भक्त ह। दूरदर्शी है । सभी वात करो उम साधु मे, ता पता चलगा कि यह तिना पहुचा हुआ फकार है । वह रामगुलाम है ना उसकी जौरत के बच्चा नहीं होता था । बहुत इलाज कराया सब बेकार गया। लेकिन इस माधु की एक चुटकी न बेचारी का अभाव दूर कर दिया चौधरी रामदास मुस्कराया--- तूने भा भभूत की चुटकी ली। चुछ अपना उद्धार क्यिा? नरायण + मन का स्वत्व नाग उठा--- मैं कुछ मागन नही आता चौधरी | य साधु भगवान के दूत ह, इनकी मेवा करना ही अपना धम मानता हू जाआ चलो तुम भी | माधु महाराज म मिला। बोलत कम है आस ब द क्एि रहत हैं । चौधरी हमा- अरे मूख । सुलफे का नशा बालन नहीं देता। आखें दो तो सुलफा व जलत अंगार जमा । तू जा । म भा कभी ना चठूगा। नरायण साधु के पास चला गया । चौधरी रामदा मदिर पर दर 76 - म बैठा था, उठवर जगल की आर चल दिया। उन दिना फमल क्ट रही थी, इमलिए तो की तरफ जाना भी जरूरी था। मलव थी मत्यु वाद यशोदा ने खेता पी दख रख का वाम स्वय करना जारम्भ नर दिया था। रामदास आशवन हा चना था। पुत्र के विछोह या दुख भी उमके पौरुप और पुरपत्ल को छान बैठा था । जब चौधरी अपन एक खत व डॉो पर जापर यहा हुआ, ता तभी, उम मा म बात आई वटा उलयदार मामला है इस धम भविा का, इन माधुगा का, इन मदिरोया । मैं तो इस रहस्य को समझ नही पाता एक माधु आया था इस मतिर पर । गाव की नई औरता को भ्रष्ट कर गया। एक लडकी का भगाएर ल गया। बाद मे सुना, वह सुलफा ता पीता ही था शराय का भी सेवन करता था। गाय के कुछ व्यक्तिया ने चाहा भी कि पुलिस म उसकी रिपोट वर दी जाय, परतु धम के ठेवेदारो न विसी को भी थान की आर नहीं गने दिया और तो और, वह जवान लडका राधेश्याम इसलिए कुछ लोगो ने मारा कि वह इन माधुओ का गाव म आना अशुभ मानता था। वह तो यह कहो, लोगो ने उमे बचा दिया, नहीं तो जान से मार दिया जाता बोलो, यह भक्ति यह भी नशा है ? जाति बिरादरी और धम ये ऐसे जहरील घूट ह कि पट म जाते ही, आदमी अपनी वास्तविकता सा बैठता है। दूसर शब्दो म कहा जाय तो वह आदमी भी नहीं रहता, पशु बन जाता है खेता से लौटकर जब काफी दिन चढे चौधरी रामदास घर लौटा तो तब तक सुखिया बहू स्कूल चली गयी थी। यशोदा घर क आगन म बठी गहू साफ कर रही थी। पास जात ही रामदास बोला-'उह बुढापा तो भा गया लेकिन घर का यह धधा नही छूटा । बह तो स्कूल गयी होगी।' यशोदा बोली-- मेरे भाग्य म आराम नहीं। जो थोडा-बहुत था वह कुछ भगवान न छीन लिया, कुछ तुमने I भला कोई सुने तो क्या कहे, बहूरानी तो स्कूल जाने लगी और सास घर का ध धा सहेजने बठ गयी । बोलो-'मैं आराम स करू ? कोई समय है मेर लिए, खटिया पर बठने का" है क्या? 77 उस समय चौधरी रामदाम के मन मे घर की बात नही थी। वह देर से मदिर की और साधु की बात म जटका था। तभी बात बदलकर बोला—'तुम मन्दिर पर गयी थी न, उस साधु से मिली थी" यशोदा ने दो-टूक जवाव दिया-'मेर पास इतना समय नहीं जो लुगाडो मे मिलने जाऊ । वह साधु क्या है मुझे तो कोइ लुगाडा लगता है । जि ह बेटा लेना हो या धन पाना हो वह जाये उम माधु के पास । अव मुझे क्या लेना दना मेरा तो हाथी सरीखा वेटा चता गया। हाथ खाली है, मरा। तोता उड गया।' यशोदा का स्वर भारी हो गया। गला रुध गया। चौधरी चुप रहा। बाहर की जोर जाता हुमा गोला- पाच बीघे का खेत अब टाई पर जा गया ह । जरा मी आग चिलम म रस दो। वह जात जात कर बाला-मैं भी आजकल मदिर पर जा बैठता हूँ। दवता की पूजा तो नहीं कर पाता परतु वहा बठन का मन करता है । लगता है, स्वत ही, मन से प या फौव्वारा छूटता है। मैं तो यह भी नहीं जानता कि भगवान है भी या नहीं, लकिन जन मद-औरत मदिर पर श्रद्धा के साथ जात है, तो लगता है कुछ न कुछ ह जरूर । उस देव- प्रतिमा म भगवान है । वह हसता है, मुस्कराता है। यशोदा बोली- 'तुम माना या न मानो भगवान तो है । यह आस माग, यह धरती, य जीव-जतु उसी ने ता वनाय ह । दया हमार दरवाजे पर गुलमोहर का पड, क्सि तरह फल फूल रहा है । फूलो से भरा है। दिन पूव उस पर एक भी हरा पत्ता नही था। मब झड गय थ। अब फिर वहार आई है उस पड पर | यह है, कुदरत का सल । बच्चा पट म पनपता है। पैदा होता है। बडा बनता है। यह सब भगवान काही तो दन । उमकी लीला है । चौधरी न साम भरी 'शायद । यादा न स्वर पर ार रिया-गापद नदी, मत्य ।" यह वाली- तुम मदिर पर जाया परो। मलयू गया है, तो तुम्हारा समर ताड गया । युद्धाप या आराम छि7 गया। मदिर पर जावराति मिलगी। सविन पौधरी बाला रही, वाहर चारपाई पर पा बठा। वर तर 78 अभी कुछ । .
भी भ्रमित विस्मित था । जब यशादा चिलम भरकर लाई, तो बलात् चौधरी ने कहा-'सुनो यशोदा । किसी ने ठीक कहा है, बद्धावस्था मे घर से दूर हो जाना चाहिए। भगवत भजन करना चाहिए । मन शान्त रहता है।' यशोदा विकृत हो उठी-'तुमस कुछ नही होगा। तुम अब भी माया के चक्कर में पडे हो । अब तो तुम रात में भी सोते से उठ बैठत हो । जाने क्या मन मे लिय हो ।' चौधरी बाला- - मुझे प्राय मलयू स्वप्न में दिखाई देता है । अभी एक दिन वह स्वप्न मे आया और बोला -'जोरावर स कुछ न कहना । वह डाकू ता है, लेकिन दिल का साफ है ।' उसने यशोपी जोर देखकर कहा---'भता यह भी कोई सपन' था। एक दिन पूर्व कहा था कि जोरावर और सुखिया मन में स्नेह रखत है, एक मर के लिए । तो, वही बात मला न मपन मे कह दी। उसन वता दिया जोरावर अपनी भाभी से प्यार करता है ता करन दो। यह पाप नही। दोनों एक दूसर वो ममयत है । ठगी में नहीं आयेंगे । यशोदो न सास भरी-'भगवान जाने, क्या होगा? मुझे तो तुम्हारी इम बहू पर भरोसा नही । अब तो जारावर भी दिखाई नहीं देता । रात आई थी उसकी मा, रो रही थी। वह रही थी, मेरा मन कहता है, अब जोरावर जीवित नहीं । पहिले आता रहता था। लेकिन अब इतन दिन मे उसकी कोई सा-यबर ही ।' रामदाम वोला- अच्छा है, वह मर जाय । इस धरती का थोडा पाप तो क्टगा । कलक मिटगा।' अजी, तुम एसा मत कहो! जानिर है तो वह हमारा अश दानो के सदा पर छूता है।' वह बोली-'दख लो, लडका कमा गोरा- चिट्टा है। पब तो फार क्टग हो रहा है। मुकेश क्स्वे से दूध का डिब्बा लाता है, बहू उसी का दूध पिलाती है । 'क्यो, भैम का दूध तो है ? 'अजी यह मारी है। बच्चे का पेट बरदाश्त नही परता।' वह घर म लौट गयी। 79 हम
उगी गमप गुगिया राम से सौर आयो । या गा- मे मिप य
यो रामदाग यी पार बार मोनी-- अब मरा हो गया है।
अम्मा म हिस है।
रामदाग ने यणा गोद म मे लिया । यह सग दुसराता हुआ बाग
गया ये ! अय शतान या ग्या'तू । मैं मम गया, रिमया बेटा है
तू । और उगन फिर यच्चे मा गुरिया गा आर बढ़ा दिया ।
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सुपनन्दी मे मुखिया' बनवर भी चौधरी रामदास पी पुत्र-यधु
अपने आप म सन्तुष्ट थी। उसके शरीर का यौवन अभी यो-कारया बना
या। जवानी के उम चढाव वा बन सवर पर रखना मानो मुखिया ने
सीखा नहीं था। सिर के बाल विखरे रहत। रग गोरा था, गालो पर
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। लाली थी, लेकिन, उसे कभी साबुन स साफ वरना उसने नही सीखा । कभी-कभी यशोदा उसे टोप देती और क्हती, 'तू दो लोटे पानी से स्नान कर लेती है, कभी साबुन भी नहीं लगाती। मैं तुझे बालो म तल लगाते भी नहीं देखती। भगवान का दिया यह शरीर है, इसे सभालकर रखना जरूरी है । यह उसकी देन है।' तब सुखिया सहज भाव से मुस्कराती और हस देती। जब वह हसती तो लगता, श्वेत मोती बखेरती हो । एक दिन जब सास-बहू में यही बात चली तो तभी, सुखिया बोली-'अम्मा, इम औरतजात के लिये कभी चैन नहीं । साबुन स शरीर धाय, तो मौत, न धाय तो भी। मैं बाला म तल नहीं लगाती, तब तो औरते कहने से चूक्ती नहीं कि मैंने क्सिी योगिनी का रूप बना रखा है। यदि तेल लगाऊ, तो तब, यही कहा जायगा, मैं क्सिी मरदुवे को अपने जाल म फासन चला है । किसान की बेटी बनकर भी शहरातियो का मात करती है। ससुराल के घर म वह पहिला दिन था, जब कि सुखिया न अपन मन का रोप और दद सहसा व्यक्त किया था। सुखिया इतना भी समझती है और यह पाती है, यशोदा ने उसी दिन समझा था। वह बलात् सहम गयी। कुछ विस्मय म उस बहू को देखकर बोली-~'बहू, कहने वालो के हाय पक्डे जा सकते हैं, मुह नहीं पकडा जाता । लेक्नि सुखिया ने फिर तीर मारा- अम्मा, बाहर का जहरीला साप पक्हा जा सकता है, घर मे मारना आसान नही । उसके घूमन के बहुत रास्त हैं। यशोदा महम गयी। वह कुण्ठा से मर उठी। उसे लगा, कि इस सीधी-सादी बहू के मन मे काई बात है । जैसे कोई काला माप फन वंठा है । वह फूत्कार कर रहा है। किसी को गट लेना चाहता है। और वहा उस घर मे सिवा उसके कोई दूपरी औरत तो थी नहीं, जो उसके विरुद्ध थे, विषवमन करती हो । कदाचित इसी सम्भावना स भरकर वह बोली-'किसी ने कुछ कहा क्या तूने कुछ सुना" सुखिया बोली-'औरतो के स्कूल मे बीस-पच्चीस औरतें आती हैं। मवके अलग-अलग घर हैं। सबकी बातें और धातें भी अलग-अलग । 81 ? " मुझसे कहा जाता है, मैं अकेली क्या हू, इस जवानो को क्या मारती हूँ । जर तरी माम तुझ पर भरामा नहीं करती तो भला दूसरी औरतें मुझ पर यम निश्याम कर लेंगी कि तु इसी तरह मती-साध्वी बनकर जीवन विता दगी हा यह बच्चा भी जाने तू यहाँ से उठा लाई ? पता नहीं, किा डोम चमार वा है हा, जाजक्ल पाप बढ गया है ना, आय दिन मेत लिहान म वच्चे पडे मिलन है कोई क्वारी या, कोई विधवा का और तू बताती नहीं यह वच्चा कस मिला, कहा म मिला यशोदा न सास भरी-- वहू, यह तो गाव है, शहर नही। यहां ता पल पल की खबर एक दूमर को मिलती है। घर से घर मिले है, खेत स खेत मुखिया और खुली-'लेकिन इस धर की बात तो हवा की तरह उडती है। तुम एक की दस बातें बना आती हो, गाव की औरता म आखिर उमने गाला दाग दिया। हाय, राम ' आग पडे, तुप पर । तो तू समझती है, मैं यह सब बातें फैलाती हू । यशोदा लाल हो उठी-'कलमुही, तूने मेरा बेटा तो खा लिया, अब इस घर को भी खत्म कर देना चाहती है । सच कहा है किसी साड सयासी इनसे बचे तो ऐसे काशी उमी समय चौधरी रामदास घर मे आया । वह पत्नी को देखते ही बोला-'क्या चीखती है, भाग्यवान | तरा तो वेटा गया, इस बहू का तो पति चला गया औरत का सुहाग गया, सब कुछ गया एक बेटा और है, इस बहू का क्या है । लेक्नि यशोदा चीरा उठी-'मैं इस कुल क्लक्निी की सब बातें जानती हूँ। तुम ममझत होगे कि मैं अधी हू जोरावर क्यो आता है, इतना पर मैं अपनी अक्ल से साचती हू इतना मुनना था कि चौधरी रुष्ट हो उठा। वह लाठी धरती पर रखकर बोला-'राक्षसी, चुप नही रहोगी। सिर ताड दूगा। भरा बेटा तो गया ही तुझे भी समाप्त कर दूगा। तब भी यशोदा पीछे नही हटी । वह तडप उठी--'ल मार मेरे सिर म लाठी ! तू भी मन की निकाल ल । यह डायन सबको खा जायेगी। 82 ने राड, तरा ता - - घर की आवाज बाहर पहुच रही थी। दो-तीन औरतें आ गयी। एकदा आदमी भी। उसी समय सुखिया ने अपना मुह उपर उठाया और करुणाद्र बनी अपनी आखें चौधरी के मुह पर टिकाकर कहा-'पिताजी, मुझे मुक्त पर दा, मैं डायन और चुडल हू । तुम्हारा एक वेटा खा बैठी तो दूसरा भी खा सकती है। मुझे वाप के घर पहुचा दो। मुह मे कह दो, मैं स्वय चली जाऊगी । यहा दम घुट रहा है । सास रस रहा है । बडी घुटन है, इस घर मे। सवेदनशीलता अपनी सीमा लाप बैठी है कि तु बौधरी रामदाम गरज उठा, चुप रहो । चुप रहो ! इस घर का बरवाद होन से बचा लो, बहू' यह यशोदा दो लडको की मा तो बनी, लेकिन मौत की तरफ जाती-जाती भी औरत के मन की मलिन्ता, तुच्छता नहीं छोड़ पायी। यह विर्षली नागन है । कालुप भरा है, इमपे मनमा पति के स्वर के अनुरूप यशोदा भी तडक उठी 'हा, हा, मै कमीनी हूँ । डायन हूँ।' रामदास ने लाठी उठा ली। वह जसे ही यशोदा के सिर पर मारनी चाही, कि तभी, सुखिया बीच मे आ गयी । लाठी का वार उस पर पडा । गनीमत यह थी कि वह सिर के मध्य मे न लगकर एक तरफ लगी। खून निकल आया। सुखिया धडाम से पछाड खा गयी । घर में आंगन मे खून फल गया । एक औरत चीख पडी 'हाय राम ! यह तूने क्या क्यिा, चौधरी " दूमरा व्यक्ति बोला-'घोडे की बला तवेले वे सिर हा, मारने चला था, घरवाली को, बीच मे आ गयी बहू । चलो, झगडा शात हो गया । अब चौधरन अपनी भूल मान लगी।' यशोदा ने उस यक्ति की ओर पूरा 'दीनू तू वात नहीं समझता।" दीनू बाला-'चाची मैं सब समयता है । इस बहू का इतना क्सूर है वि अभी जवान है। देखत-सुनने म भली लगती है । अपने घर की चर्चा तू चलाती है कोई और नहीं।' उस समय चौधरी रामदास अपराधी के समान खडा था। एक औरत 83 । - न रेशम का कपडा जलाया था और बहू को कनपटी के पास हुए जख्म : भर दिया। उसे चारपाई पर लिटा दिया। एक अय औरत बोली-'दूध म हल्दी डाल कर दो। जब पर्ड रहने दो। रघुवीर डाक्टर अभी गाव मे होगा, उसे घुलापर दिया दो।' चौधरी रामदास ने पास पडे युवा पी आर देखा । उमस कहा- 'जरा देखो तो, डाक्टर को । घर पर हो, तो बुला ला।' युवक चला गया। उसी समय एक औरत यशादा वा लभ्य करत बोली-'चौधरन, जमाना खराब है। सोच-समयकर बोला कर । घर की बात बाहर मत निकाल । यब यह बहू इस घर की आबरू है । यह चाहे तो पलभर म सब कुछ मिटा दे। लडका गया, तो तेरा माग्य फूट गया। चलो, भगवान की यही पा है, दूसरा और है तरा लडका । अब उसे सहेज । भगवान से प्राथना कर । बहू का छाती से लगा।' चौधरी तब भी चुप था। यद्यपि उसके मन म बात थी कि यह यशोदा भगवान की पूजा क्या करेगी घर की आबरू पर कीचड उछालेगी। परन्तु वह बोला नहीं, बाहर चला गया। चबूतरे पर पड़ी चारपाई पर जा बैठा, उसको इच्छा थी कि कोई चिलम मे आग रख दे और वह तम्बाखू पीले। परतु उस समय तो घर में कोहराम उठा था। कोई चौधरी को अपराधी मानता था कोई चौधरन को । डाक्टर भाया, उसने सिर के खून की सफाई करके दो-तीन टीके लगाये और खाने का दवा दी । तभी एक व्यक्ति ने रामदास को बताया- आज तुम पर और इस घर पर बहुत बुरी गीरह आई थी बहू मर जाती और तुम दोनो पति-पत्नी गिरफ्तार कर लिये जाते 1 जानते ता हो । औरत की बुद्धि दूर तक नहीं देखती । तुम तो मद-मानुष हो मोचकर चलत । औरत पर लाठी क्या उठायो सिी मद पर उठाते । बूढे हो गये बदले नही। आश्चय चौधरी रामदास तव भी चुप था। वह सिर झुकाए बठा घर में से एक औरत बाहर आइ और बोली- ऐसा होता है, औरत का दिल, अब चौधरन बैठी रो रही है। कहती है, 'सब मेरा अपराध था। उसने कहा- औरत की जात ही एसी होती है। अपना हो या 84 पराया, बुराई करने से नहीं चूक्ती । यह चौधरन भी अपनी बहू का नहीं चन्शती । अब जगराम के अहाते मे औरतें कीतन करने लगी हैं। सौ- 'पवास औरतें आ जाती हैं । तो वहा भी राम-नाम के साथ, एक-दूसरे पर कीचड उछाली जाती है। उसकी बेटी ऐसे रहती है, और उसकी बहू ऐसे बस यही पुराण वहाँ बाचा जाता है। पहले मदिर पर कीर्तन होता था, तो वहा दस आदमी आ बैठते थे। इशारेबाजी करते थे। तभी नो वहां से हटाकर दूसरी जगह रखा गया। ममाज बेशम हो गया है, शाति से औरत को नहीं रहने देता।' पास खडा एक व्यक्ति बोला-चाची, उस कीतन में भी आशियाना गजलें और क्वालियां होती हैं । जवान लडक्यिा फिल्मी कलाकारो की तरह नाचती हैं।' 'हो, हो, यह भी चल पडा है, भया । जगराम चौधरी की बैठर में टी० वी० लग गया है । उसवे परदे पर औरतें जिस प्रकार का नगा नाच नापती हैं, वह सव गांव की जवान लवियां और बहुए देखती हैं।' 'अरे, खार पडे उस टी० वी० पर । जितना व्यभिचार और भ्रष्टा- चार बाकी रह गया है, वह टी० पी० फैला देगा। सरकार रुपया कमाती है और समाज की पहू-बेटियों का चरित्र जाता है। भला क्या मिलता है उमटीवी से" तब कहा गया--'चाची, टी० वी कुछ तो देता है । शानवद्ध न करता है । मनोरजन दता है।' 'यू कहना, टी० वी० बनान वाले कारखन रुपमा कमाते हैं और भरकार विनापनो से रुपया प्राप्त करती है। मैं भी कई बार देख माई हू, उस टी० बी के प्रोग्रामो को। अब तो गाव मे दूसरे भी लगाना चाहते है। लड़की के विवाह मे टी० वी० जरूर दिया जायेगा । लडका भी अपने विवाह मे टी० वी० प्राप्त करेगा।' 'अब हवा का रूख दूसरा है, चाची ! पहली बात गयी। सब एक एक कर उस घर से पलायन कर गये। तभी पडोसन एक लडके को देखकर चौधरी बोला-'जा, चिलम भर ला । जहा दूध गरम होता है, वही पर तम्बाखू होगा।' 85 लडका चिलम लपर चला गया। तभी चौधरी न सास भरी-'इस बहत हैं, हानी बलवान है। पर क्या हो जाय, पता नहीं ? मैं भी मूत्र बन गया, लाठी चला बठा सचमुच चौधरी का सिर चकरा गया। आखा म अधेरा छा गया। सामने गुलमाहर और नीम का पड पहा था। दानो वहार पर थे। गुल मोहर पर लाल लाल खुशनुमा फूल खिले थे और नौम पर ताजी निवा लिया, उस पर भी फूल आ रहे थे। किसी समय डाक्टर न चौधरी वा बताया था कि नीम के फूल की सब्जी बनावर खाय जा मक्त हैं । स्वास्थ्यप्रद रहते हैं । खून साफ करत हैं। लडका चिलम भर पर ल आया। जब चौधरी हुक्का पीन लगा, ता पडोस की रामप्यारी बुढिया बाहर आई और बोली-'अर तू यहा बठा हुक्का बजाता है । घर मे जा । सास बहू को समझा । अव दोनो रो रहा है। सास अपना अपराध मान रही है । लेकिन यह कहती है, न, अम्मा दोप मेरा या । मुझे सब-कुछ नही कहना था।' चौधरी रामदास न तम्बाखू का धुआ मुह से बाहर निकाला और बोला-चाची, उन दानो को अवेली छोड दो। जहरीला पानी आखा के रास्ते निकल जायेगा। दोनो स्वय शात हो जायेंगी। मलखू की मा बहू पर कीचड उछालती है। मैंने भी एक-दो जगह सुना है। और मैं कहता हू, बहू देवी है। ऐसी औरत हजारो मे नही मिलेगी। इसकी होती तो अब तक भाग जाती। मेरे मुह पर कालिस का पाता फैर जाती। लेकिन यह सुखिया बहू तो गज है, सती-साध्वी है। इतने दिन म कई क्तिाबें पढ़ चुकी है। सिलाई मे कई तरह के कपडे तैयार कर देती है। कुछ दिन म कताई भी सीख लेगी।' 'हा, हा, तेरी बहू भली है । बस समझ ल तर घर म देवी आर बैठी है। - चाची अब तो घर का सभी याम बहू करती है । मंस का चारा- दाना भी देखती है। सुबह को नौकर खेत पर जाता है तो उसे रोटा बनाकर देती है। फिर दो वक्त घर का खाना बनाती है । मलबू की मा ता अब कुछ नहीं कर पाती । मलखू क्या मरा वह भी मर गयी । वमर 86
टूट गयी।'
'हा, भया । वह मा है । उसका जवान बेटा गया है।
रामदास बोला-'लेकिन वह का तो सोहाग छिना है। उसका
जीवन-साथी गया है। उसका ता जम-भर का राना है।'
वृद्धा ने मास भरो और उस मकान के चबूतर स उतर गयो।
जब रामदास अकेला रह गमा, तो वह देशन लगा भैम खडी है।
उसकी खोर म चारा नही । एक घण्टे बाद ही उसस दूध लिया जायेगा
तभी नौकर चारा सिर पर रखे जगल से लौटा। चौधरी ने उसकी ओर
दखकर कहा---'सरजू भग क आग चारा डाल दे। भूखी पडी है।
और उमस पूछा---'कटाई कब शुरू होगी, गहू की ?'
मरजू बोला-'अभी तो एक सप्ताह चलगा। अभी पकन म देर
चौधरी बोला--अब तरा काम बढ़ गया ह। गत को एक दो
चक्कर लगा आया कर । गाव म मी दुश्मन है, सौ दोस्त । मुना है, किसी
न रामभजन का खेत काट लिया।'
'हा चौधरी । खेत भी काटा और मशीन स अनाज भी निकाल
लिया।
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'यह पता नहीं चला कि पिसका काम था
'अजी, पता तो सब चल गया। और कौन होता, छाटा भाइ था।
वह पिछल माल ही अलग हुआ था। शराबी है, जुआरी है । अलग होकर
भी बड़े भाई को सताता है।'
'बडा भाई मला है । भजनान दी है । जब देखो तब मदिर पर बठा
मिलता
'हा, चौधरी । वह तो देवता है । अब भी छोट भाई के बच्चे उसी क
पास खाते हैं, सोत ह । सरजू बोला-'छोटे भाई की बहू लडाका है।
फिर भी वडा भाई इतना उदार है कि पिछले दिनो छोटा भाई पुलिस न
जब गिरफ्तार रिया, तो बड़ा भाई थाने म गया था। छुड़ा लाया ।
अपराध इतना था कि जुआ खेलते पकडा गया। सुनता हू, बडे भाई के
पर पकडकर कसम खा बठा है, न जुआ खेलेगा, न शराब पीयेगा।
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अर, सरजू । यह शराब डायन है । जिसके मुह लगी, उन चौपट कर बैठी । जुआ भी ऐसा ही रोग हैं । तपदिक है।' 'सरजू बोला नही । वह भम को चारा डालन आग बढ गया। जब वह घर मे से बाहर आया, तो बोला-'बहूरानी खाने के लिय बुलाता है । जाओ घर मे। चौधरी रामदास वाला नहीं। वह लाठी पकडकर घर के चबूतरे से नीचे उतर गया । मरजू से कह दिया, अभी भूख नही । यदि घर पर जाकर बैठूगा । सुनता हू, कोई व्यक्ति आया है। अच्छी कया कहता है । आज दिमाग खराब हो गया, वहा जाकर योडी शाति पाऊगा। वह लाठी हाय म पक्डे आग बढ़ गया। 11 उन दिना मुखिया के मन मे पार-बार यह बात उठती थी कि जारावर वहुत दिना में नहीं आया। कई मास हो गये थे कि वच्चा सुखिया की देख रेख म पल रहा था। मानो वह उसी का बच्चा था। आश्चय की बात यह थी कि न तो सुखिया ने और ना ही उसकी सास यशोदा न जोरावर की मास इस बात का उल्लेख किया कि जो बच्चा उनके घर आ गया है वह जारावर से प्राप्त हुआ है । किन्तु जोरावर ने बच्चा देन के साथ जा पत्र सुखिया को दिया था, वह मानो जारावर के चरित्र का तो वणन करता ही था, बच्चे से निकास का इतिहास भी बताता था। मुखिया के नाम लिखे पत्र म जारावर न व्यक्त किया था यह बच्चा मेरा है । मरी प्रेमिका का है । हम दोनो न मन्दिर मे बैठकर विवाह कर लिया था। रितु इस बच्चे के प्रसव मे वह मालती नहीं रही। डाक्टरा न उसे बचान की चेष्टा की परन्तु वह रुकी नही, चली गयी । जोरावर ने बताया, मुझे चिता है कि इस बच्चे का पोपण क्स ? तुम्हार अतिरिक्त मेरा कोई विश्वासी नहीं। पुलिस का घेरा भी 88 अब सख्त हा गया है । मालती चाहती थी कि मैं डार का पशा छोड दू। अब मुझे उसकी स्मति जीवित रखनी है, तो इस पथ से दूर हो जाऊगा। या ता साधु बनूगा या पुलिस के समक्ष आत्म समपण कर देगा। - पत्र म, जारावर न यह लिखना भी अनुपयुक्त नहीं सममा वि वह मुखिया का मन से आदर करता आया है। उसे अपना जीवन अर्पित कर मपता है । जब मुखिया ने पत्र का वह अश पढा, तो यह अनायास ही अपने मन वे भावनालोक म खो गयी। उस ममय वह इस बात को नहीं छुपा सकी वि वह स्वत ही, जोरावर का अपना हितू मान बैठी थी। भल ही, उम अपना प्रेमी न माना हो, वितु अपने प्राणो की अनुभूति, ममता अनायास ही जारावर या अर्पित कर चुकी थी। सुखिया को पता था वि जोरावर डाकू तो वना, परन्तु सस्कारगत मन में पैदा हुई पुनीत भावना वह नही त्याग सका था। वह अनेर राता मे छुपकर मुखिया के व पास आया और दर तक उसके पास बैठकर एक बच्चे के समान कहने में ममथ बना था कि परिस्थिति ने मुझे डाकू और क्रूर बनाया, लेकिन, मर मानम का स्वरूप नहीं बदला । मैं तुम्हारे पास आपर एक अजीब प्रकार की अनुभूति प्राप्त करता हूं, भाभी । मलखू भंया ता गया, परतु तुम्हार पास बैठकर भी, लगता है मैं जीवन की पुनीत और शुभ भावना का स्वरूप देख पाता है। उससे मैं नया जीवन प्राप्त करता हूँ । तभी, सुखिया कहती, तो बताओ न, मैं क्या का तुम्हारे लिये ? मैं पास बैठी हू। अपित है।' किन्तु जोरावर का एक ही मत या, तुम सा पूरठीमती रहा, मैं यही चाहता हू । मैं तुम्हे पथ भ्रष्ट नहीं ऋगा, मामी। जब-जब मैं परेशान बनता हू, तभी तब, तुम्हारे पार आता है। यहा वैठकर मैं नसर्गीक सुख पाता हूँ । लगता ह, त्रिी मदमे दरी मम्पदा मुषे मिल चुकी हैं । मैं उसका दरमा मामा दममा स्वामी बना है। तब आल्हादित हा कृतिदिनास्ति हो उतनी हो इस सम्पदा के स्वामी बनम मे पा मुजेहे। वितु उगमा मानसि हिर - दिया था-'भाभी मालती नाम की जिस तरुणी स मैंन रात के मनाट मे देवता के समक्ष उसे वरण करन की प्रतिज्ञा की थी, यह सब तभी हुआ कि जब मैं तुम्हारी दुनिया म गो गया था। मुझे लगा, मुझे एक औरत चाहिए । एमा न हुआ, तो मैं अपनी कमजोरी तुम्हार ममक्ष पटक दूगा। मैं तुम्ह अपना महारा मानयर परड लूगा । और उसन बताया, मालती से मेरा दर म मम्बध था। उसके पास बैठकर मा शांति पाता था । वह बडी सरल थी, राहृदय थी । मैंन उम बता दिया या कि मैं डायू हू ववर और दुर्दात हू । कि तु वह इतना सुनकर भी, मदा मुस्कराती और कहती मैं तुम्हें कूर इन्सान नहीं रहने दूगी। तुम्हारे हृदय की ममता विरोद विरोद कर बाहर निकालूगी! म उसम गोता मारू गी । उसन ही मुझे विवश किया था कि मैं विवाह पर स् । अपने नाम की छाप उस मालती के हृदय पर लगा हू । मैं तेजी के साथ तुम्हारे रूप रस म डूब रहा था। कभी-वभी ता मुझे ऐसा लगता, जब जब तुम्हारे पाम जाकर बैठता, तो मेरा अस्तित्व नगण्य बनता जा रहा था। इस पत्र मे मैं तुम्हे इतना और बता दू कि मालती गरीब घर की बेटी थी । मैंने उसे ठगा नहीं। उसे प्यार किया था, छला नहीं। मैं तो उसका कही अयत्र विवाह करा दने की बात मोच रहा था। परतु जव तुम्हारे ममीप पहुचा मैं वामना का दाम बनन यो उद्यत था तो तभी उस मालती को मैंने अपनी पत्नी बना लिया था। वितु सेद है। भगवान ने उसे इस धरती पर नही रहन दिया । अपन पाम बुला लिया। मैंने उस मालती स तुम्हारा उल्लेख अनक बार किया था। जव प्रसव काल में उसकी अवस्था बिगडी, तो तब उसने मेरा हाथ पकडकर कहा था, मैं समझ गई, तुम उस सुखिया को भी प्यार परत हो। मेरा यह बच्चा उसी को सौंप दना । कह दना, वह विधवा बन गई है तो क्या एक बच्चे की मां तो कहलायेगी। इस बच्च यो सहन लेगी। उमी मालती का क्यन मैं पूरा कर रहा है यह बच्चा तुम्ह मौंप रहा हू अर जागे मेरी क्या स्थिति होगी, नही जानता। वेवल इतना वह मक्ता ह जब मैं डाकू का जपय कुत्य नहीं कर गा। अपने हथियार गगा म फेंक दूगा । साथिया को विदा वर दूगा। 90 सुखिया न वह पत्र अनन बार पढा और अपन बक्स के अदर सुरक्षित रूप से रख दिया । माना वह एक कीमती दस्तावज था। उस दखवर सुखिया का आनद प्राप्त होता था। जिस दिन स्वसुर की लाठी म उसके सिर में चोट लगी, तो उम रात म मी सुखिया ने वह पन बक्स स निकालकर पढा था। अब यह स्पष्ट था कि वह जारावर के लिए प्रतीक्षारत थी । उमसे कुछ कहना चाहती थी, कुछ सुनना चाहती थी। उसकी कठिनाई यह थी वि जोरावर के विषय मे वह किसी से भी कुछ नहीं कह पाती थी । न मास से, न जोरावर की मा म । किन्तु एक दिन सहसा पडोस की एक लडकी सुखिया क पाम जाई और चुप से वाली, 'भाभी, आज शाम के पुरपुटे में तुम शेर के कुए पर पहुच जाना । वहा जारावर आएगा। तुमसे मिलगा। अकस्मात उस बात को सुन, मुखिया न उम यौवनमयी लडकी की ओर देखा । मानो उसे समझना चाहा । जोरावर न उसके द्वारा ही क्या स दशा भेजा, यह भ्रमक विचार भी उसके मस्तिष्क म बिजली की तरह कौंध गया । कि तु लडकी ने स्वय ही सफाई दी-भाभी, भया जारावर हमारी बहुत मदद कर चुका है । तुम्ह तो शायद पता न हा मेरा पिता कई मास से विस्तर पर पड़ा है । जोरावर न बहुत सहायता दी, पिता के इलाज मे। तभी तो अव वह खेत में काम कर पाता है । जोरावर हमार घर कई कई दिन आकर ठहरता था। पुलिस को हम पर सदेह नही हो सकता था । आज भी जोरावर खेत पर मिला था। उसने पिता से वह दिया था, मैं शेरू के कुए पर मलखू की बहू की प्रतीक्षा करू गा। सहमी हुई सुखिया बोली-'वह यहाँ क्यो नही आया?' लडकी ने कहा---'पुलिस निगाह रखती है उसके मकान पर ।' 'लेकिन मा ता जानती है कि जारावर मारा गया।' 'हा, भाभी । यह सब पुलिम ने प्रचारित किया था। जोरावर का शक्ल में मिलता एक मरा हुआ आदमी पुलिस ने जोरावर के नाम में प्रचारित किया था। जोरावर पर एक लाख का इनाम था, वह थानेदार ने और सिपाहियो ने मिलकर वाट लिया।' लडकी लोट गई। उस समय सुखिया के मानस में एक अजीब प्रकार की हलचल आरभ 91 हो गइ थी। जिस कुरा पर जोरावर न उसे मिलन के लिए बुलाया था। वह गाव के बाहर था। घर से जात समय वह अपनी सास से क्या कहेगी, यह मो उमकी समझ मे नही आ रहा था। बाहर चबूतरे पर स्वसुर बैठता है, वह भी रोकेगा। वहगा, अधेरे म कहां जा रही है। किन्तु इस आपदा से भले ही वह छुटकारा पा ले, लेकिन गांव के अन्य लोग तो उसे देखेंगे । कोई औरत मिली, तो वह भी टाकेगी। पुलिस को दस बात का पता है कि जोरावर जब अपने घर आता है, तो मेरे पास भी आता है। मन की इसी ऊहापाह मे सुखिया न दिन बिता दिया। जब सध्या चा झुरपुटा आया, तो उसन वच्चे को कधे से लगाया । यशोदा से कहा--'अम्मा, मैं एव वे घर जा रही है। जल्दी लौट आऊगी। वह चल पडी । सयोग से उस समय चौधरी रामदास चबूतर पर नहीं था, मदिर गया था। निर्वाध रूप से सुखिया शेरू के कुए पर पहुंच गई। वहा पेड अधिक थे। दो-तीन ईख के खेत भी थे । जब सुखिया उस स्थान पर पहची, तो देखा, वहाँ कोई नहीं था। चारा और रानाटा था । माय माय करती हवा चल रही थी। उस अवस्था में सुखिया वरवरा ही सहम उठी । जब वह लौट चलने को उद्यत हुई, तो तभी, हाथ मे चिमटा और बढी हुई दाढ़ी वाला व्यक्ति उसके समक्ष आ खडा हुआ। वह आत ही बोला- इस जोरावर या नमस्ते स्वीकार करो, भाभी | और वह मुसराता हुआ अधिक समीप आ गया। सुखिया सहम भाव मे बोली-'तो तुम हा, जारावर । दाढ़ी-सी बढा ली। सिर वाल भी घटा लिए । हाय मे चिमटा ले लिया। उरान अनक निरपराध मारे ह । उनका धन सूटा है । सकिन तुम अपने, मो नही मार सक्त। पुलिस के हायो । बच्चा | द ला वही है । तुम मुझे माप अब फ्ला-फूलता यह तुम्हारा बच्चा चनन की सीय दो। जब कुछ सम्भले करतूतें बता देना हैवान बना। - 2 -- सहमा, जोरावर न जपना चिमटा एक कुए की मुडेल पर बनाया और कहा-~'भाभी अपने मन का यह गुस्मा मत निकालो। ऐसा तो तुमने बहुत बार कहा । अब मैं डार नही । खूनी नहीं । लुटेरा नही ।' तुरन्त ही सुखिया योली-'तुम जब भी सब कुछ हो । देवता नहीं हो। नर राक्षस भले ही न हो, लेकिन अच्छे इन्मान भी नही हो। तुमने मेरा मन तो अपनी ओर खीचा ही, उस बेचारी गरीब मा-बाप की बेटी मालती को भी अनमय मार दिया। भला उसन क्या देखा इस दुनिया मे जैसी आई वैमी गई।' लम्बी सास भरकर जोरावर बोला-'हां, भाभी में कसूरवार है। गुनहगार हू । मालती की मौत का कारण मैं हु ।' तदनुरूप, सुखिया ने भी सास भरी और छोड दी । तभी वह बोली- 'अव क्या है, तुम्हारे मन मे । क्या सयासी बनोग एसे ही रहोग। भला इस भेप म कब तक छुप रहोगे, यह तो तुम्हारा आत्मघात मरीजा कृत्य है । छल है, धोखा हैं।' जोरावर बोला-'भाभी, मैं आत्महीन हू, पुलिस के हाथो म नही जाना चाहता हूँ 'और तुम्ह पत्ता है, तुम पर मरकार ने जो इनाम घोषित किया था, वह पुलिस खा बैठी है । तुम्ह मरा हुआ घोषित कर दिया गया।' 'हा, भाभी मुझे उसका पता है। उसने बताया पल ही मैं उस थानेदार से मिला था। विश्वास करो मेरी बात पर, उमने मेरे पैर पक्ड लिए। गिडगिडापर बोला-'अभी भर हुए बने हो । समूचा याना गिरफ्त मे आ जाएगा । मवका मजा होगी।' 'और तुम यह पाप क्व तक छुपाये रहोगे।" 'अधिक देर तक नहीं।' जोरावर बोला-'यह स्पष्ट है, आत्म समपण करन 2 बाद भी मैं जेल से बाहर नहीं रह समूगा । लम्बी सजा पाऊगा । यह कह लो, कामी ये तख्त से बच जागा।' सुखिया भुध हो उठी-'तुम पुजदिल हो । तुम आदमी मार सक्ने हो, मर नही सरते।' जोरावर कुछ और आग बट आया। उसने अपने हाने से पिस्तीत 93 निकाल लिया और उसे सुखिया के आगे करता हुआ वोला-~'इमम कर्द गोलिया है । मुझ पर चला सक्ती हो।' जी हा | समझ ली न कोमल और कमजार औरत है । यह पिस्तौल नही चला सकती। और तुम्हें इसी पर नाज है। यह लोहे का टुकडा माथी बना है। इसी के बल पर तुमने लोगा का लूटा है । उनका खून क्यिा ह।' उसो तिरस्कार के माय जोरावर की ओर देखा-'जब तुम डाकू ये तो मैं तुम्हें अपना प्यार दन को उत्सुक थी। क्याकि तुम जो कुछ थे। समाज के सामने थे । तुम अपनी करतूत छुपा नही मका थे। पर तु अब तुम डाक ता रहे नहीं, इमान भी नही रहे । इम माधु वेप म अपन का धोखा दते हो समाज को दत हो। सबका बता दिया कि तुम जीरित नही, मर चुवे हो । जबकि तुम निर्जीव नही। क्सिी वे प्राणघातक नहीं, तो किसी के पोपक भी नहीं । वसी दुसह अवस्था है। यह तुम्हारी । अव तुम मद नही नामद हा । कायर हो। एकाएक जारावर क्षुब्ध हो उठा-भाभी।" भाभी ने कहा-'देखा, देवरजी | मैंने भी तुम्ह प्यार किया था। एक दिन और में आज भी भ्रम मे नही, तुम भी मेरी ओर खिंच आए ये। मेरे रुप और यौवन पर मरन लग थे । आश्चय है कि मैंने तुम्हारे मन की उस अवस्था को अशुभ नहीं माना । तुमने जो स्पया दिया, वह भी मैंने सहप स्वीकारा था। हालाकि मैं उसे पाप मानती थी। इसान य खून में भी रुपया समझती थी। लेकिन तुम्हारी वह भावना, अनुभूति और समपण की याचना मेरी दृष्टि म छोटी नहीं थी। तुम पहत तो मैं तुम्हारे माय उस घर से भाग आती। हो सकता है में भी डा बन जाती। डाकू की प्रेयसि कहलाती। धे-स धा मिलाकर चलती और बप चलाती। लेकिन अब देखती हू, तुम डर गए। अपन शाल पारनामो मे स्वय इतन प्रभावित हुए रियाप गए। गहम गए। उम गम्त स भटव गय । मद थे, तो पुलिस में लडकर मार जान या भारमममपण पर देन। उसन सामग जीवित रहोग । महमे रहोग । अपन-मा का यह नौं वना मागपि तुम हा जो 94 +m क्या रहा - पी। गोश्त नहीं पाया। मैं वातार दो विमानौरत के पास नही एका पिन वप जितन डावे हाने, उना मा काया धर्माप लामा गया। पांच लाख रुपया मेन प्राप्त दिया था, उमगे एक अपन कार व्यय नहीं दिया । भैया मलबूरी मोरने मुझे भेडिया। उस ससय जारावर का सिर झुका था। उसये सिर की जटाए धरती से लग गई थी। दाढी भी काफी बढी थी। सुखिया बोली- 'सो अपने लाल को। इसे चूम लो । प्यार कर लो। इसीलिए तो तुम आए हा। इस बच्चे की ममता तुम्हे खीच लाई हैं । जाने यहाँ से आए हा तुम । और उसने हाथ मे लिए झोले मे कुछ लड्डु, निकाले और नमकीन मठरिया । वह सब जोरावर की ओर बढाकर बोली-'मैं समझती तो थी कि तुम कभी न कभी जरूर आआगे । सयोग की बात है कि कल ही यह लडडू और मटठी बनाए थे। तव भी मेरे मन मे तुम्हारा ध्यान जाया था। जारावर योला---'हो, भूरा भी लगी है । आज सुबह से कुछ नही खाया । मुझे दूर मे आना पड़ा है। जरूरी काम था। यह किताव रखो बैंक की है। इममे मेरा रुपया जमा है । यह सब तुम्हारे नाम है। इस लडके व नाम है । उस मालती का एक भाई था, राहुल । इमदा नाम भी राहुल रखा है। सुखिया ने पूछा "क्तिना रुपया है?' 'दो लास । 'ह राम इतना रुपया था तुम्हारे पाम हा, भाभी । रुपया ता और भी था। वह जहाँ-वहाँ द दिया। जा लडकी तुम्हार पास गई, उसके बाप को भी दम हजार रसया लिया था। नई लडक्यिा वे विवाह मे रुपया लगा दिया। एक बार माथू भैया न मुझस वहा था कि गरीब विद्यार्थिया की भी मदद करना जरूरी है। इसके नाम से एक ट्रस्ट है, उसके माध्यम से विद्यार्थियों की महायता के जाती है । आज बताता हू तुम्हें, मलसू भैया के मरने के बाद मैंने र प्रदान किया था। 95 सुखिया मौन थी । गम्भीर भी । उम लगा दि अनुपम व्यक्ति उमर ममक्ष खडा था। वह अपन कुत्य का वणन कर रहा था। तभी सुखिया ने एक लडडू जाग बढाया और कहा- लो भाभी के हाथ म आलो।' जोरावर ने लडडू खा लिया। तभी बोला-'मैं अब दूर जा रहा हू भाभी | आया ता मिलूगा। हिमालय की गोद मे अनेक डाकू छुपे है। वे सभी सयासी है। त्यागी हैं । जब वे मानवता के अनुरागी हैं, अपन जापम नहीं। म उसी टोली म जाकर मिलूगा । उनसे पथ निर्देश करूगा। और उसने नीचे युक्कर सुखिया पर छू लिए और यहा- 'जो कुछ तुमने कहा, वह सब मेरे प्राणो म उतर गया। वह तुम्ही का कहना था किसी और को नहीं । अब जाऊगा । नमस्त। सुखिया स्तब्ध थी। उसके देखर-देखते जारावर अधेरे पथ पर जदश्य हो गया था। उसे लगा । पुनीत मानव उमसे दर हा गया था 12 की मृत्यु से जितना रघुनाथपुर गाव म जहा चार आदमी एक स्थान पर बठ कर हुक्का पीते होते, अय चर्चाआ के साथ प्राय चौधरी रामदास का नाम भी आ जाता। लोगो का मत था कि रामदास अपने बडे पुत्र दुखी हुआ, तो उसी का यह परिणाम है कि अव न तो खेत-क्यारी की बात सोचता है, न घर गृहस्थी की। जब देखा, तब मदिर पर वठा दिखायी देता है धम के नाम पर कभी एक पसा भी पच नहीं करता था, परन्तु अब यदि ऐसा कोई आयोजन हो तो खुशी से चदा देता है लड़के की बह को इतनी ढील दे दी कि वह अय की बहुमो के समान घूघट नहीं करती । सास की तरह वह भी आजाद है । एक बार जब गाव की चौपाल पर इस प्रकार की बात चली, तो तभी उन प्रौढ व्यक्तियो के पास बैठे एक युवक ने कहा-'मलखू की बहू 96 अब गाव की औरतो का पथ-प्रदशन करती है। पिछले दिनो जब गाव मे आय समाज का जलसा हुआ, तो वह मुह खोले उपदेशको और साधु- मन्यासिया को भोजन करा रही थी। गाव की जवान लडकिया उममे निर्देश पा रही थी। तब एक अय व्यक्ति ने कहा-'समुर तो मदिर पर जाता है। सनातन धर्मी बना है। एक घर म दो खेमे लगे है। बहू पूरव की तरफ जाती है, तो ससुर पश्चिम की तरफ । एक मूर्ति पूजा का सुण्डन करती है और दूसरा उस पूजा का ममथन ।' ---तो कहा गया-वाबा यह तो एक क्ची के दो फ्लक है । गलत सस्कारो को दोना काटत है।' एक वृद्ध व्यक्ति बोला-'मेरी रामदास चौधरी म पात हुई थी। वह भी सनातन धर्मिया को बहुत-सी बातें नहीं मानता, माधु सयासिया का महत्व नहीं देता। पिछले दिनो जिस साधु ने मदिर पर आकर धूनी जमायो थी, रामदाम ने उमका विरोध किया था। उसन गाव के बहुत से युवको को सुलफा पीना सिखा दिया था । सुनन म तो यह भी जाया कि वह शराब भी पीता था।' उमी समय एक युवक बाला~मैं एक सूचना देता हूँ, मलखू की बहू अब अपना स्कूल खोलेगी। सुनने में आया है कि उसने कपडा मीन की मशीनें मगा ली हैं। कुछ कितायें भी आ गयी हैं। उमन घर घर जाकर अपने मिशन का प्रचार किया है। चौधरी रामदास के मकान में एक बडा कमरा है, उसमे क्लासें लगेंगी । अगले महीन श्री गणेश हागा । कोई सरकारी अफ्सर उद्घाटन करेगा। सरकार स भी कुछ रुपया मिलेगा।' तव कहा गया-- और यह गाव का स्कूल क्या बदा जायगा? गाय के लोगा ने ही तो वह गोला था। 'अजी, उसमे अब दरार पर चली है। जिहोंने पहल युशी स वदा दिया अब बद कर बैठे हैं। बेचारी अध्यापिका को कई मास का वेतन नहीं मिला । पता चला है, स्कूल का अध्यक्ष चौधरी विक्रमसिंह अपनी पुत्र-यधू पा अध्यापन का काय देना चाहता है । उसरे मन म मानव या 97 खुल जायगा गया है । मुना है, अध्यापिका स्कूल छोड गयी । वह गाव म पलायन कर गयी। ता यह कहा, चौधरी रामदास न एक तीर स दो शिकार मार हैं। वहू भी काम से लग जायगी और चार पैसे की आमदनी का रास्ता भी बडा चालाव है, यह आदमी ।' एक अधेड आयु के आत्मा ने यह ताना मारा। तभी दूसग बोला-'मौजीराम, तुमन इस रामदाम को अभी समया नही । बडा पित ती है, यह आदमी जिदगी भर इसी तरह के पल से सेलता रहा। कितु उस व्यक्ति स वहा गया-बाप की चालाकी के कारण ही लहका चला गया। आप देखना, बहू भी हाथ म निक्ल जायेगी। पर्दा तो उसका उठ हा गया, अब मन का परदा बाकी है। वह भी किसी दिन उठ जायगा । गाव के जवान छारे रामदास की बहू वो धूर धूर कर देखत है। वह कबूतरी क्सिी दिन भी किसी दूसरे की छतरी पर जाकर बैठ जायगी। एक वद्ध न सास भरी-'यह तो होगा ही। मने ता आय ममाज के जलसे मे उम बहू का रग-ढग देख लिया था। अब किसी के लिए लाज शम तो उसकी आखो म रही नही । जब देखो, खिलखिला कर हसती है, घट फट बातें करती है। तभी वहा पर बैठा एक युवक तुनक उठा-'तुम भी कसी बातें करत हो, बाबा | क्या क्मिी जवान औरत का हसना या किसी गर से बात करना भी पाप ह । चौधरी रामदास के लडके की बहू गाव की शोभा हैं । उसन सिलाई का काम भी सीख लिया और पढन लिखन म भी अपने को पीछे नही रहन दिया । भला ऐसी कितनी औरतें है इस गाव मे " उसा समय एक व्यक्ति बाला-'अच्छा जनादन, तू ही बता, आने वाल कल म यदि उस बहू ने काई गलत कदम उठा दिया, तो क्या गाव के मुह पर कालिख नही लगेगी? चौधरी रामदास भी तब क्या जीवित रह पायगा भैया, गाव के रीति रिवाज के साथ चलना ही ठीक है। ननादन शहर के स्कूल में अध्यापक था। बी० ए० तक पढा था। 7 98 गांव म उस शास्त्रीजी कहकर पुकारा जाता था। वात सुनकर वह सहज भाव से मुस्कराया-'दुनिया बहुत मागे बढ गयी है बाबा | अब पीछे की ओर भत देखा। अभी वढो। जिसके क्दम रुकेंगे, वह एक व्यक्ति हो, या एव जाति, पिछड जायगा। आगे बढती हुई भीड म दव जायेगा । मलखू वो बहू न अच्छा रास्ता चुना है। अब तो वह इतना आगे बढ आई कि पिछले दिनो औरतो की सभा म भाषण दे बठी थी। मैं तो वहा था नहीं, लेकिन मेरी मा बताती थी दवी स्वरूपा है, वह चौधरी के लडने की बहू । वोलती है, तो लगता है, जैसे पासी वाली रानी हो । मुह पर तेज है। वाणी मे जोश ।' उसी समय एन बुजुग वहा जाय । प्रस्तुत वार्ता कान समयकर भी, उसन पूछा--'कमी चर्चा चल रही है ? क्या कोई नयी वात ?" एक न वहा-'अर ताऊ ! वह है , चचा गमदास के लडके की बहू अब वह इस गाव की नेता बाने चली है। सुधार की बागडोर सम्भाल रही है।' उस व्यक्ति ने अपना मफेद डाडी पर हाथ फेरा और कहा-' 'कोई- न कोई नेता तो होना ही चाहिए। सुनता हूँ, अब तो रामदाम भी महाराज बनन चला है सौ चूहे खाय, विलया चली हज्ज को। तभी व्हारा गूजा-वाह, ताऊ । तुमने तो आते ही वात वा तोड पर दिया। ऐमे देखी जाती हैं, पिसी इसान की तस्वीर ।' ताऊ अपनी प्रशस्ति सुनते ही, फूलकर कुप्पा हो गया। तुरन्त चोला-'भैया मैं तो और कुछ जानता नही, किसी दिन चौधरी रामदास मूड पपटकर रोयगा । किसी न कहा है न, कौआ चला हस की चाल बाप न मारी मेढकी, बेटा तीरन्दाज रामदास अपनी और पुरखो की बात भूल गया।' किंतु जनादन को उस बुजुग की बात पसद नहीभाई । वह तुरत गोला-'ताऊ, इस चौपाल पर यदि इसी तरह की बातें चलेंगी, तो एक दिन यहा विग्रह का अखाड़ा बन जायगा । लोग अपनी नांख का शहतीर तो देखते नहीं, दूसरे की लाय पा तिनका देखते हैं यह अच्छा नहीं। कोई यदि ठावर मार गिरता है, तो उसे सहारा दो, न वि उमकी पमर 99 । पर लात जमा दो।' 'तुम शास्त्री हो, भया । पढे लिसे हो। हम गवार भला क्या जाने ।' वृद्ध चौधरी बोला-'लेकिन यह समय लो, लीव ग हटकर चलना भी अच्छा नहीं।' जनादन बोला- यह बात मय पर लागू नहीं । जिना पास बुद्धि है। शक्ति है, वे अपना रास्ता अलग भी बना लेत ह । ऐम अनय सुधारवाला इस देश मे हुए हैं- स्वामी दयान दही को ला। गाधी को ला। इस देश मे प्रयक प्रात म ऐसे महापुरुष पैदा हुए है । उहांने देश को नया जीवन प्रदान क्यिा ह। यह वैभवपूण विश्व इन्सान को बुद्धि का चमत्कार ह । इन्सान ही देवता है भगवान है ।' उसन कहा--- हमारे गाव में टी० वी० लगे हैं। रडियो चलते है। ट्रक्टर काम करत हैं । टयूवेल पानी दते है । खेती में कितनी पद्धि हो गयी है । यह सब इसान की देन है । एक व्यक्ति बाला-- यह शास्त्री बच्चा को पढाता है, आदमिया को भी पढाता है । इससे ही जोता जा मकता।' बद्ध ताऊ बोला-'हा-हा, बहुत कुछ पढा है, इस शास्त्री ने । जमाना भी देखा है । हमारा क्या है, गवई गाव मे पडे हैं । काला अक्षर भस बरावर समझते हैं।' और उसन अपनी तरफ आगे हुक्के के नैचे को अपने मुह से लगा लिया। वह तम्बाखू का धुआ छोडकर जनादन की आर देखता हुआ बोला- भैया, अव में अस्सी वष का हा चला हू । देखता हूँ, गांव में जो रीति रिवाज पहले थे, वे अब नहीं रहे। शराब पीकर नौजवान गलिहारो म घूमते है । जब पनघट पर जवान लडकिया पानी भरले जाती हैं, तो मनचले छारे भी वहा जाकर मीटिया बजाते है भद्दे गान गाने हैं। यह भला क्यो है ? इस रफ्तार को काई रोक पाता है । जनादन बोला- यह गाव के समाज की सबम बडी कमजोरी का सबूत है। वे आवारा लडके आसमान से उतर कर नही आय, हमारे- तुम्हार घरा के हैं। परतु जब मा बाप का उन पर काई प्रभाव नहीं, तो भला गाव का कोई आदमी किस तरह इस गद प्रवाह का रोक पायेगा। साप के निल म कोई हाथ नही देगा। हालत यह है, न तुम मेरी मर 100 । महो, न मैं तुम्हारी बहू । जैसा चलता है, उसे चलने दो।' उसने कहा- 'अभी तक तो ये शराबी और मजनू घरी के बाहर अवाजा कशी करते है, वह दिन दूर नहीं कि जब घग में घुसकर उन लडकियो को पकडकर ले जायेंगे। एक व्यक्ति जो दर से चुप बैठा था, अपने स्वर पर जोर दकर बोला-'यह आज भी हो रहा है। भले घरो की लडविया खेतो पर नहीं जाती। किसान को अपना हल छाडपर, या दूसरा काम रोक कर रोटी खाने घर आना पडता है । दम घुट रहा है, इस गाव के वातावरण मै।' जनादन वोला- यह गदगी भल कहे जाने वाले घरो से आरम्म होती है । वे लडके यह शैतानी करत है । चोर चोर मौसेरे भाई भला, यौन उह रोके। उनके मा-बाप पुलिस पर प्रभाव रखते हैं, गाव पर रखत हैं । उनके पास पसा है, चार साथी है।' वात गम्भीर हो चली थी। सबके मुह पर उदामी थी । जनादन की बात सुनकर एक-दूसरे का मुह दखन लगे थे। उसी समय सहसा सब चौंक उठे। एक आदमी वहा आया और अपन स्वर पर जोर देवर बोला-'तुम सब यहाँ हो। जाकर देखो चौधरी रामदास के घर पर गाव इक्ट्ठा है । पुलिम आयी है।' जनादन ने पूछा-क्या हुआ 'हुआ क्या, अब तो गाव-चा गाव कमीना बन चला है। वह है ना, जगवीरसिंह या नवावजादा, शराब पोये रामदास के घर पहुच गया । यहा चौधरी नही । उसकी घरवाली भी नहीं थी। मलखू की बहू थी। जाते ही उसका हाथ पकड़ा और बोला-'तू चल मेरे साथ, तुझे अपनी चनाउगा।' 'अच्छा | इतना कह बैठा, वह नालायक ।' 'अजी, इतना कह पाता, तो तब भी सर थी । जय मलयू वी बह ने उसके मुह पर तमाचा मारा, तो वह छुरा मार बंठा । जब वह भागा, तो बहू न पयह लिया। पर की दहलीज म सुखिया ने उसे पटर दिया था। खून म लथपथ थी। मगर उसकी छाती पर चढ मंटो । 101 ܝܙ छीन लिया और बाघ ग मगर कहा-'याल, पार दू, तरा पेट । निकाल दू नग प्राण- वाह पाह ग्वग जनादन बोल उठा-'वह है, मदाना औरत? उमस कहा गया- गश्त लगाती पुलिस उधर आ निक्ली। वह लहका पनड लिया गया। उसी समय रामदाम भी आ गया। उसका घरवाली भी जगल म लौट आई।' सब लाग उठ चन । उधर ही बढ गय । जाकर दया, तो सचमुच, गाव का गान वहा एकत्र या। तब यह घर र जागन 4 चार म पडा थी। उसकी वाह म चाय लगा था। यापी पून निक्ला । तब तक डाक्टर पट्टी बाध चुया था। दरोगा मुखिया या बयााल रहा था। उसी स धव मे सुखिया न बताया, जब हमलावर पर म प्रविष्ठ हुआ, ता उसका दूसरा साथी बाहर खडा था। जब यह भागा, ता मैंन देख लिया था। लक्नि दरागा के ममान, वहा पर एकत्र गाव 7 अय स्त्री-पुरुष भी चकित थे कि वह युवक मुखिया के रूप-यौवन पर भल ही, यासक्त हुआ हो, परतु उसका आक्रमण एक अय उद्देश्य के लिय था, वह यक्ति गाव के उस जमीदार ने भेजा था कि जिसने गाव म सवप्रयम नारा समाज के लिय सिलाइ कढाई का स्कूल खोला था। उमी क बडे पुत्र ने प्रतिरोध व्यक्त करने के लिए सुखिया को निरस्त कर दना चाहा था। वस्तुत वह स्वय मुखिया के रूप का लालची था। एक-ना बार स्वय मुखिया से कह भी चुका था। परतु सुखिया न सदा ही उसक प्रति उपेक्षा दिखायी। उम तिरस्कृत भी किया उसी समय सुपिया का पता चल गया था कि वह नारी स्प का लाभी इतना कामाध बना कि स्कूल म आने वाली एसी अनेर नवयौवना थी कि जिह पाना वह अपना मानवाय धम मानता था। सुखिया न दरोगा को यह भी बताया कि स्कूल अध्यापिका न केवल त्याग-पत्र देकर उस स्कूल से पथक हुई, अपितु उसने सुखिया को यह सलाह दी थी, वह उस स्मूल र न आये । या तो अपना स्कूल खोल लो या घर बठ जाय । 102 उस समय चौधरी रामदार को मन स्थिति अत्यत दुरुह थी । वह वद्ध ता था, परन्तु उसकी नसो मे अभी सून था। वह चाहता था कि अभी उस जमीदार के घर जाय और उसवे पुत्र को पकडकर लाठी से धुन । जब गाव के व्यक्ति लोट पड़ें, वह आनामक भी पुलिस द्वारा हथकडी डालकर थाने ले जाया गया, तो तभी एक व्यक्ति न रामदास के पास आकर कहा--'यह लडका तो व्यथ मे माग गया, अपराध किसका था, मजा कौन पायेगा" रामदास तडप उठा-'म ऐसा नहीं सोचता। यह लडवा भी बचपाया है । शराब के साथ पैसा भी इस गाव मे खूब चलता है । वह व्यक्ति बोला,-'चौधरी, मेरा कहा मानो ता अपनी बह को रोक दा, स्कूल न चलाय। इस काण्ड की जड म तुम्हारी बहू का स्कूल खोलना है।' तीखे स्वर में रामदास बोला-'कल को यह भी कहा जायगा कि मैं गाव छोड दू। इस तरह पाप और व्यभिचार के समक्ष अपना सिर झुका दू । रामदास मर जायेगा, लेकिन यह सब नही करेगा। में कमीना नही, कायर नही। वह व्यक्ति चला गया। कि तु जब रात आई, घरा मे दीये जले, ता तभी एक अन्य व्यक्ति वहा आया और पांच हजार रुपये की गट्टी रामदास के सामन रख कर बोला---'चौधरी न दिया है, आज का मामला मत्म करने के लिए। उसने सुन तो लिया होगा, उसका लडका भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया । । रामदास ने नोटो की गड्डी उठायी और पास की नाली मे फेंवकर कहा---'मैं थूकता हू, इन रपया पर । तुम एक लायक आदमी की पैरवी करने आये हो मनाहर जाकर कह दो, गमदास जभी जीवित है ठण्डी लाश नहीं।' उसी समय यशोदा घर म बाहर निकल आई। वह जागन्तुन की ओर दखबर बोली- तुम्ह नहीं आना चाहिए था, मनाहर | यह आग सुलगाई गई है। अब इसे जलने दो । समझने दा।' मनोहर बाला-चाची, य दो यार तबाह हो जायेंगे।' 103 । 1 चाची ने कहा-'जब मेरे पास क्या है ? लडका गया । दूसरा है, वह अभी बच्चा है। कि तु रामदास तम उठा -'हमारे पास सब कुछ है । इस घर पर भगवान का हाथ है। अब मैं यही समझ पाया है। आज मेरी बहू ने वहादुरी का काम क्यिा । मैं उसे हृदय से शाबासी देता हूँ । मनोहर बोला-'समूचे गाव मे तुम्हारी बहू की प्रासा हो रही है । उस वीरागना बताया जा रहा है।' यशादा बोली- -पहल तो मै भी इस स्कूल के खिलाफ थी। परतु अब स्कूल जरूर चलेगा । गांव म गुण्डे पैदा हा गय ह, उनका भी सामना किया जायगा। मनाहर बोला- चाची, तुम्हारी बहू अदालत म जाकर वयान दे, यह भी शुभ नही होगा।' वह उठा और नाली के पानी म पडे नोटो का उठा लाया। चौधरी रामदास ने कहा- क्या शुभ है और क्या अशुभ यह मुझे ममझना ह । मेरी बहू ने उस बदमाश को छोड दिया, यह भी अच्छा नही किया। उसका पेट फाड देना था। मनाहर पदवे भाव से मुसराया-चौधरी, घर वरबाद हा जाता। वह ने बुद्धिमानी का काम किया। उम लडके का शम हागी, तो स्वय मर जायगा। गाव म मुह नहीं दिखायगा।' वह उस स्थान से चल तभी यशाना बोली-'क्या माचा था क्या हो गया। अब मुषे मुपेश की चिता है। वह अवेला हा, नदी तट से आता है। नाव भा देर दिया। मे आती है। - चौधरी गमदास न कहा-'यशादा, अजी अब ता मैंन समझा है नि भगयान है। वह मवका रक्षय है और पालप है। तुम पिता मत पग। यह नीली छतरी वाला सब दखता है।' तर यशोदा वाला नहीं, घर में चली गयी। 104 वह दी उम ममय यशोदा चुपचाप बठी पी। जव पहल गrata इमानदारी से नही कर मनन । गा मोटापगमा THE पहला पानेदार कई लाख स्पये इस इलाले गरि गया था। यह कहो, ऊचे अफमरा तय उमयी शिमायत पहन रही थी। इसलिए उसका तबादला किया गया था। डाये और चौरीको HILA धी। चली, तो उसने कहा-'वह दगेगा रिश्वतखोर ता पाही, म्यनिषा भी था । इलाके की बहुत-सी वह बेटियां उगन था। म यसागी भी।' कर बोली-'किमी न ठीक कहा है, वही जिन और पानी पानीमा जब रक्षक ही भक्षर यनें तर मग भलागा। लिग गाATH, HI चारी-डावे भी यद हो मयत है।' 'ताई, पुलिस का हिस्सा तो थाा म पहर जाता है। गवती में रहा---'वह जगनाहन, पसा चोर है रात म आवाज पटणी, उस। घर पर ! वह थाने म जाता है और दरोगा पी जय ग काय हाल भाता है । अन वह द्र जायर चारी करता है । दया नहीं, उगी मग ठाठ से रहती है। पिछन दिना उसके पडोस म बियाह था। में भी उधर गयी। देखकर चकित रह गयी, जगता मी यह गोगे या रागही पा औरता मे नाच रही थी। माथ पर पडा झूमर भी अपनी महार ६ रहा था।' एक औरत हस पडी-'हराम वा माल था-उरान पारा । पति चोरी कर लाये और बस अपाया न मजाये, भगा यह TO T होगा । एक एक कर औरतें उठ चली। सबस पीछे जय एक वद्धा उठकर चलने लगी, ता वह मुखिया की ओर देखकर बोली-'बह, जो बात चल पडी है, वह बढे नहीं। दो लडें तो दूसर तमाशा देखत हैं । मुझे ।। है, विक्रम या लडका गलती तो पर बैठा, लकिन अब पछता रहा उसने दिल पर गम बैठ गया है । और-तो-और, बहू भी बाप के माथ गयी। उस घर में पसा है ना तो उसका दुरुपयोग भी होता है। गलत आदमी है । बाप का पाप बेटा भोग रहा है । रात भी घर आया था। शायद पराब पीकर और खाना 107 अपगधा वन है। पाप और पुण्य चुल्लू म लेकर पी एक प्रौदा बोली-'हो, वह तुम्हारी बात कानून भी तो अपना काम करेगा । अपराधी वा दूसरी वोली-'युछ और भी सुना । म हवालात म जमानत पर आ ता गया, परतु घर से यह सुना जाता है कि उसकी बहू जपने बाप के गयी इस घर म सडाद है, बदबू है। यहां रहते स्वय आया और बेटी को ले गया। यह तोगत पहता था, मुझे पता नहीं था कि चौधरी है। वह तो अपनी बेटी का नया विवाह था।' 'अजी, एसा भी वही होता है। बार बार औरत बाजारू नही जा एक को छोड दूसरे में 'हा हा, यह बात तो ह । परतु उस , मडरा रह है। विश्रम का लडका थान म ऊट जब तर पहाड के नीचे से नहीं म जब पुलिस ने उसे हवालात म वन्द विया, पीटा भी गया। थानेदार ने बहुत भद्दी बातें पर गम बैठ गया। भय से ग्रस्त बना नमर कभी चारपाई से उठकर चल देता है । ७ है। उसकी छाती म भय और लज्जा का राम | राम । इसे कहते है मार आती ह ता वह आधी के झोवे की तरह सुना है चौधरी ने दरोगा को मोटी रकम नही ली गयी। उसन चौधरी पर दया की, 'हा जी | इसम क्या झूठ है। लडका दरोगा है । सुना है बडा सख्त है । इस इलाके में हटान के लिए इस नये दरोगा का यहा भेजा गया 'अजो वह नया खार गुण्डागर्दी हटायगा। 106 .
इमानदारी से नही भर मस्त । मय मोटापस कमाते हैं मना नही पहला थानेदार कई लाख पये इस इलाकामारि गया था। वह तो यह कहो, ऊचे अफसरो तक उनकी शिकायत पहन रही थी। इसलि उसका तबादला किया गया था । डाके गोरे-चौरी समर म.सी थी। उस समय यशोदा चुपचाप बठी थी। जप पहले पोनदार मी पान चली, तो उसने कहा-'वह दरोगा रिश्वतखोर ता था ही, व्यभिचारी भी था । इलाके की बहुत-सी बहू बेटिया उसने थान म बुलायी थी। यह वाली-'किसी न ठीक कहा है वही छिनडे और वही डोली के माय जब रक्षक ही भक्षक बनें तब कम भला हागा। पुलिस इमानदार हो ता चारी-डावे भी बाद हो सकत है । 'ताई पुलिस का हिस्सा तो थान म पहुंच जाता है । एक युवती न रहा'वह जगना है न, पक्का चोर है रात म जावाज पटती है, उसा घर पर । वह थाने म जाता है और दरोगा की जेव म रुपये डाल आता है । अब वह दूर जाकर चोरी करता है । देखा नही, उमकी बहू कम ठाठ से रहती है। पिछल दिना उसके पडोम म विवाह था। मैं भी उधर गयी। देखकर चकित रह गयी, जगना की वह मोने की तगडी पहन औरता म नाच रही थी। माथ पर पड़ा यूमर भी अपनी वहार दे रहा था। एक औरत हस पडी-'हराम का माल था-उमन पास | पति चोरी करके लाय और बस अपन कान सजाये, भला यह कैस न होगा। एक एक कर औरतें उठ चली। सबसे पीछे जब एक वड़ा उठकर चलने लगी, ता वह मुखिया की ओर देखकर बोली--'बह, जो बात चत पड़ी है, वह बढे नहीं। दो लडें, तो दूसर तमाशा देखत हैं । मुझे लगता है, विषम वा लडका गलती तो कर बैठा, लकिन अब पछता रहा है उसके दिल पर गम बैठ गया है । और-तो-और बहू भी बाप के माम चनी गपी । उस पर म पसा है ना तो उसरा दुरुपयोग भी हाता है । विक्रम स्वय गलत आदमी है। बाप का पाप बटा भोग रहा है। रात भी छोटा थानेदार उमर घर आया था। झापद गराब पीकर और खाना 107 वाकर गया था । बडा थानेदार भी नया है । वह विसी बडे बाप का वटा है । वही कुछ खाता-पीता नहीं।' सुखिया ने कहा-'वह ईमानदार है, भला आदमी है । छोट दरोगा ने रुपया साया है, बडे ने नहीं ! वह रिश्वत लेना पाप मानता है।' लक्नि बहू, तू औरतजात है । आदमी की तरह । थप्पड का जवाब घूसा, ऐमा मत समझना । तू तो दया, ममता ही इस गाव का देना। आज लोग तेरी तारीफ करते हैं।' यशोदा बोली- चाची यह बहू ता खुद कहती हैं, झगडा मिटाना चाहिए बहाना नही । क्ल वडा दरोगा आया था। वहता था, किसी म डरना नहीं । अपना बयान खुलकर देना । अपराधी को अपराधी बताना । इस गाव म जहर फैला है, उसे मिटाना जरूरी है। वद्धा ने कहा -'पुलिस तो अपना मुक्दमा बनाती है, उसे विगाहती नहीं । वह दरोगा तो पहा आT है फल नही । कभी भी दूमरी जगह चला जायेगा । देखती हो, क्तिन मुकद्दमेबाज पदा हो गय है इस गाव 'म । घर-के घर वरवाद हो गये । गाव का पसा शहर के वकीलो की जेब म जाता है या पुलिस के पाम। कोई न शकर म खा पाता है, न पहन “पाता है । गाव के आधे घर क्जदार बन हैं साहूकार । यशोदा ने सास भरी-'हा बुरा हाल है इम गाव का । घर घर म जाग सुलगी है। वृद्धा सौट गयी। यशाटा भी घर के काम म लग गयी। उन दिना उम अधिर व्यस्त रहना पड़ता था, उस समय चौधरी रामदाम खेत पर गया था । गहू की कटाई शुरु हो गयी थी । जब वह लौटा तो तब तक यशाला न रोटी बनाकर रम दी थी। उसी समय सुप्रिया न यशादा का नावान दो । जय वह निकट पहुंची, ता मुखिया वालो- जम्मा, नर्मदा नाई की बात तुमन भी मुनी । मैं समझती हूँ, बहुत अच्छी बात गयी, ताद । जैसी पनी उमर है उमकी, वम ही विचार है । आज सुबह गमसी आयी थी। वह भी बताती थी कि विक्रम चौधरी का लटना भयमात ता मना ही विमी रोग म ग्रस्त बना है। शराव न उम मौत मह म झोर दिया है । खून की उल्टी कर रहा है । 108 आतुर बनकर यशोदा बोली-'तो तरा दाप क्या है । तुझे क्या करना है" सुनकर सुखिया चुप रह गयी । उसी समय रामदास घर म आया । मास-बहू का बात करती देख, वह पास जाकर बोला-'क्या बात है। यशोदा । वह की कमी तबियत है । आज मो शहर से कुछ फल मगाय हैं अनार, सन्तरे । यह बहू का दना ।' यशोदा बाली-'अजी तुम्हारी बहू का तो आज एा और रोग लगा है। विश्रम वा लडका बीमार है ना, तो इसे चिन्ता है, उसक जीवन की । चलो पूछो इसस, तुपे क्या ? मरे तो, जिय तो। जो जमा ररगा, भोगेगा। हमार घर का तो वह सत्यानाश बग्न पर तुला या । बाप के पास हराम का पैमा है। बडी जायदाद है । बाप बट को जागे आसमान की ओर उठी है । उह क्या जरूरत है धरती की ओर देखन की । कौन पीडित है, कौन दुखी है, यौन भूपा है, न नगा ह, विक्रम और उसका बेटा-यह सब नहीं देख पाएग।' चौधरी ने सास भरी-'हा, मलखू की मा, यह पसा जहा पुण्य है, पाप भी है । यह इन्सान वा घरगलाता ह, रास्ते से दूर फेंक देता है । उसने कहा- अभी खेत पर शम्भूनाय मिला था। भला आदमी है। पढा लिखा है।' उसने भी मुझस कहा---'झगडा बढाना मत, घटान या प्रयत्न करना।' उसने बताया-'विक्रम अभी तक किसी चक्कर म नहीं फमा था । अब लड़ये पो मूखता ये पारण फस गया है । बात इतनी बढ़ी कि लडके का बहू घर छोड गया ! उसका पिता ऊचे विचारो का आदमी है । पैसे वाला ह ।' तभी यशोदा आतुर हो उठी-'मूल यात करो, क्या यहता था शम्भूनाप । मदारा स्वय विचलित हो उठा---'कहता था, दरागा स मिलयर मामले का खत्म करा दो। विक्रम चौधरी के सहये या अभयदादा।' उसने कहा-'मला यह बग होगा यूपपर नहीं घाटा जाना । जय हमारी बहू पर पातर प्रहार हुआ, तो मला हम किस प्रकार चुप बढे रह । मुझे पप्पट का जवाब घूसे से देना होगा । मैं विक्रम मोदित 109 आममान व तार दिखा दगा । 'अच्छा अच्छा, जब तुम स्नान कर ला । रोटी तयार ।' यशादा न कहा-'यह नादमी मदा एसी ही बात करता आया है। रात बाल बाल मेरी भम बच गयी थी। दा आदमीभम पास जाकर बडे थे। वह ता यह कहा उसी ममय मेरी जाप खुत गयी । बाहर गयी । मुझे दयत ही वे नौ दा ग्यारह हा गय । वह शम्भू है न, आज मुबह ही मुयस जाकर कह रहा था चाची विक्रम बूढा ता हो गया परतु उसके दाता का जहर अभी नहीं गया। अपनी वैठा म बठामह रहा था, रामदास का घर यरबाद कर दूगा बता दूगा उस बह का, वडी तीममार खा बनी है। उसका भा नाम निशान नहीं रहगा तुरन्त ही चौग्री तज हा उठा हा हा म सब जानता हूँ । वह अपनी बैठर मे बैटवर क्या रहता है। उस सुन लेता है । लेकिन इस ममय वह प्रतिशोध लन की बात नहीं सोच रहा । उसकी औरन रात दिन परेशान रहती है, अपने लडके की हालत देखकर | कर ही बाहर से राक्टर आया था। वित्रम भी याचव बना है, अपन लडये प्राणा व लिए। उसका कइ हजार रुपया खच हो चुका है। वह सुपिया के कमर न बाहर निकल गया । यशादा भी दूसरी ओर बढ गयी। उमी समय, सुखिया चुपचाप अपने विस्तर स उठी और चादर ओढ कर घर से बाहर शिकल गयी । जव दर वाद यशोदा उसके कमर म गयी, तो देखकर चक्ति हो उठी कि सुखिया की चारपाई खाली पड़ी थी। उसी क्षण वह पुवार उठी. -'अरे मल के चाचा या है ?' चौधरी पुन कमरे की ओर बढ आया-क्या कहती है तू । यह दवा याला पड़ी है यह चारपाई । जान वहा गयी है, यह यद पह हम यही या न रगेगी। जीत-जी मार दगी । यह नागन है इस घरमा डम नेगी।' चौधरी हतप्रभ हा उठा। वह स्वय विन बनवर वाला- भाग्य वान गात धन ! बिगड़ी बात को और मत बिगडने दे। अपन माप मेरा टापा आगनी भट्टी म मत शानद। 110 यशोदा वोली-'मुझे लगता है वह विक्रम रे घर की तरफ गयी होगी। तुम बैठो मैं जाती है।' 'नही, मैं जाऊगा । वहा गयी ता उसका सिर फोड दूगा । 'हान्हा, तुम तो यही करोग। मिर तोड सात हो, मोड नहीं मक्त ।' वह चल पड़ी। चौधरी रामदास भी लाठी पकडकर पीछे हो तिया । पर दूर नहीं था, पाा था। दोना उम भवन मे प्रवेश कर गय । चौधरी के मन मे प्राध था। उसने हाथ काप रह थे । पर भी भारी पड रह थ । किंतु जब दाना उस भवन म पहुंचे, ता चौधरी रामदाम व हाथ मे लाठी छूट गयी। वह चक्ति हा उठा । यशोदा के साथ उसन भी देखा । विक्रम का पुत्र सजय पलग छोडकर नीचे धरती पर बैठा था। उसने मुखिया क पर पक्ड लिए थे और रो पडा था । आश्चय । उम समय मुखिया भी जपन मन का उद्वेग नही गे पायी । वह भी रो पडी थी । विक्रम और उसकी पत्नी पत्थर की मूर्ति के समान एक्टव उम करुण दश्य का दख रह थे। सजय कह रहा था । 'मैं अपराधी हू । मुझे Pण्ड दो। मुझे मार दो।' और सुखिया उसके सिर के बालो पर हाथ फेरती हुई फफक पडी थी। रोती हुई कह रही थी, 'उठो शान्त बनो। इमान भूलें करता है और अपने को सुधारता है । उस ममय मुखिया के सास ससुर भी मूर्तिवत बने खडे थे । मानो वे निम्पाय बन थे । अब आम्रो म आसू ना गये थे । । । 14 घर लौटकर जब मुखिया जय फिर बिस्तर पर पड़ी, तो वह नि शक्त हो चली थी । जपन स्वभाव के विपरीत बनकर यशोदा न पास आकर कहा-यह तूने क्या क्यिा वह ! औरत की सव मान मर्यादा त्याग तभी रामदास भी घर म आ गया । उसने यशोदा की बात सुन ली। 111 वह बोला- -'इस बहू न मर्यादा ही नहीं त्यागी, हमारी नाम भी बाट दी । आज समूचे गाव म यह बात फैल गयी। अब औरत, मद अपन मुह की वात रागे नही, मयका सुनाकर यहग, चौधरी रामदस वे लडक की विधवा बहू न अपनी भी उतारी, सास-ससुर की भी उतार दी। उसन कहा-'मन में आता है इस औरत के टुकड़े कर दू । लाठी का एक ऐसा हाथ मारू कि इस प्राण निकल जाए।' उसी समय सुखिया न जपन मुह का कपडा हटाया । पहरा रहा थी । श्वसुर की बात सुनकर और अधिन फुफ्फ पड़ी। उनी अवस्था म बोली-लो, मुझे मार दा। तुम मेर श्वसुर हो, मेर पिता हो, अपन आधे भार का खुलकर उपयाग बरा । यहा मीखा है, तुमने । इस अयाय की जिदगी म यही समझा है। यशोदा पति वे और समीप आ गयी - 'तुम जाआ यहा से | झगडा मत बढाओ । देखते हो, विपत्ति की काली घटा इम घर पर छायी है । विपाद का धुआ भरा है हमारे प्राणी में । यह वहू इस घर का सफाया कर दगी । मरा लडका तो चला ही गया, अव यह हम पर भी आग के अगारे छोडेगी।' इतना सुनते ही सुखिया चीख उठी- अम्मा । मुझ पर दया करा । मुसे अकेला छोड दो । अब मैं जीवन नहीं चाहती, मुझे शान्ति से मरने दो।' उस समय रामदास कुछ और कहने चला था कि तभी गाव की दा तीन वदाए वहा आयौं । उही में एक थी विक्रमसिंह की चाची । वह गाव को एक सम्माननीय महिला थी । वृद्धा थी । घर के आगन मे जात ही बोली-री, रामदास की वह 'हा, चाची | आओ। वठो। 'कहा है तेरी बहू ! मैं भी तो देखू उसे । जाज इसने कमाल कर दिया। चाची बोली- सुनती हूँ, तरी बहू शक्ल-सूरत की अच्छी है और मन की भी अच्छी है । इस गवईनगाव की एक औरत गाव को जलन से बचा बैठी है मैं उसके चरणो म अपना सिर रखूगी।' उसने दूर खडे रामदास की ओर देखा-'आज तेरी बहू दवी स्वरूपा बनकर गयी थी, 112 " विक्रम के घर पर । चार दिन मे सजय न जाज कुछ खाया है। अब वह मरेगा नहीं, बच जायेगा। डाक्टर का कहना है, यही इलाज था उसका। अमत दे आयो है।' बद्धा अय औरता के साथ सुखिया की चारपाई के पास पहुच गयी। तब सुखिया न मुह पर कपड़ा डाल रखा था। तब भी उसकी आखे भरी थी। पास जात ही यशोदा बोली-'अरी बहू पर छू इनके ।' रितु उस चाची ने कहा-'नही नही, पर मुझे छूने चाहिए। कल ही तो मदिर पर कथा वाचता हुआ पडित कह रहा था, छोटी उम्र का आदमी या औरत कोई भली बात कहे या करे, तो उसका भी सम्मान करना चाहिए । उसके चरना की रज माथे से लगानी चाहिए। वह बोली-'रामदास की बहू, तुने यह बहू क्या पाई हीरा पाया है। यह तेरी बेटी भी है, बेटा भी है । आज समूचा गाव इसकी तारीफ कर रहा है। अभी गाव मे बडा दरोगा आया है, तो वह भी कह रहा है, एक सामाय किसान की औरत इतनी बुद्धिमान हो एसी कल्पना मैं नही कर सकता था।' तभी रामदास बोला-'चाची, इसे वहा नहीं जाना था। 'क्या नहीं जाना था, र। क्या इस गाव को जलने दिया जाता। तुम दो घरो मे झगडा चलता, तो गाव बैठ जाता। विक्रम का पैसा पानी की तरह बहता । और तू भी अपने खेत बेचने के लिए तैयार हो जाता। लोग राख का देर बना देते, इन घरो को बाह, री बहू | शाबाश भगवती आ बैठी थी, इसके मन में।' उसी समय गाव के कुछ व्यक्ति भी वहां आये । यहा दरोगा भी आ गया। वे सब घर के आगन मे आ गय । वहा आते ही दरोगा बोला- 'चौधरी रामदास । किसी जम के पुण्य प्रताप स तुम एसी बहू पा गय । तुम्हारे सब पाप धुल गये। बहू का उस घर जाना मानवीयता का सबसे शुभ उदाहरण है । ऐसा पाठ मैन कभी किताबा मे पढा या। सुना है तुम्हारी बह कुछ अधिक नही पढ़ पायो । निपट गवार है।' एक व्यक्ति बोला-'मजी वहा पढ़ पाती । बेचारी विवाह के कुछ समय बाद ही विधवा बन गयी। सास भी नहीं ले पाई। जिन्दगीमा 113 योझ मिर पर आ पड़ा है। सास-मसुर भी अब बूढे हा चले है । यह चौधरी रामदास अपने ममम का वडा अच्छा लठन पा! एक बार डाकुओ से अकेला लडा था। लेकिन अब क्या रहा, बूढ़ा हो गया। सिर के बाल सफेद हो गय, कमर झुक गयी। दरोगा ने अपन वग से एक कागज निकाला और उस रामदाम की भार बढापर वहा -'इम पर हस्ताक्षर पर दा । तुम्हारा मुकदमा समाप्त कर दिया। जो लडका जेल गया है वह भी आ जायेगा। विक्रम की चाची बोली-'दरोगा जी, बहू को समझा दो। अब भी रा रही है । यहती है, मास-ससुर को उसवी वात अच्छी नहीं लगी। दरोगा युवक था। चक्ति हा उठा-'ऐसा क्या। क्या चौधरी मुकद्दमा लडना चाहता था।' वह वोला-पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर नहीं किया जाता, चौधरी । पुलिस का आदमी ऐसी बात करना नहीं चाहता । कागज तुम्हारे हाय म है, दस्तखत न करना चाहो, तो मत करो। मुकद्दमा लडो। लेकिन यह समझ लो, तुम इस बुढापे में अपनी दुगती करा वैठागे । पता नही तुम्हारी बहू को किसने ऐसी सीख दी । जो बात इसने की वह अनमोल थी। उसकी काई कीमत नही थी। अब विक्रमसिंह और उसका पुत्र सजय सिंह तुम्हारी बहू के सरानीय गुलाम वन चुके है । उनका सिर झुका है । उहोने समूचे गाव वे समक्ष अपने को अपराधी स्वीकार क्यिा है।' रामदास ने एक व्यक्ति या कलम लिया और कागज पर दस्तखत कर दिया। तभी वह बोला-'अन्तत मैं गवार हू, दरोगा जी मेरी औरत भी गवार है। लेकिन जब मैं समझ गया, इस बहू ने गगा की धारा बन कर हम मबको पखार दिया सचमुच पडा उज्ज्वल चरित्र चित्रन हुआ है, इस बहू के माध्यम से।" उमी समय मुखिया उठ बैठो। उसने ससुर के पैरों म झुक्कर कहा, 'पिताजी, मैं नही जानती क्सिकी प्रेरणा से म उस पर पहुच गयी। जरूर भगवान ने ही मुझे आदेश दिया था।' दरोगा उस कमरे स वाहर निकल चुका था। सुखिया की बात मुनकर बोला-बेशर वह भगवान का निर्देश था। अब रो ओ मत 7 114 भगवान या नमन करो। उसने तुम्ह और इस पर का आग में जलने से उबार लिया । यदि ऐसा न होता, तो गाव मे विग्रह फैलता। तुम्हारा और अधिक अपमान हाता। पुलिस ममाज में एक सीमा तक अपना अधिकार रखती है। वह जन-जन की दरबारी नहीं कर मकती । यहा नापदान के कीडे उछलत । बदबू फैलात । तुमने चमवते सूरज की तरह सब कुछ साफ कर दिया।' उस समय देखा, चोधरी रामदास रो पडा था । उसकी पत्नी यशोदा भी अपनी बूढी आखा स खारी पानी वहा बैठी थी। देखकर, विक्रम की चाची ने कहा-'यह सब नही । अपनी दुबलता व्यक्त मत करो। शात बनो। बहू का भी आराम दो।' और वह अय औरता के साथ वहा म लोट पड़ी। जब घर म एकात हुआ, तो रामदास न पत्नी पी आर दखकर चहा-'जय बहू के खाने-पीने की सुध ले । भुपे बुद्धि तो आई, लेकिन देर म आई । आज जान क्या हान वाला था, इस घर मे । या तो वह न रहती, या मैं न रहता। यशादा बोली -'तुम ता नार पर गुस्सा रखत हो । बात को समझत नहीं।' जी, हा तू समझती है। पानी म आग तो तू लगाती है । तूने ही मुझसे कहा था, बहू ने नाक क्टा दी। अब क्ट गयी वो जोड ले । भरोगा भी समझदार है। किसी अच्छे पर ना लगता है।' 'अजी, यह कहो, आंधी आई यो, टल गयी। तुम बठ जाओ । मैं दूध लाती है, वह को अपने हाथ से पिलावर बाहर जाना । अभी इसरे मन मे गुस्सा है। हम दोनो ने सभी कुछ तो वह डाला । न आगा देखा, न पीछा, तुमने लटठ-सा मार दिया जाने मदिर पर जाकर क्या सुनते हो, क्या समझते हो" चौधरी बोला--'वहा कुछ नहीं मिलता, मलखू की मा का कोरा दिखावा है । अब मैं खेत पर काम तो कर नहीं मरता, समय वितान मदिर पर जा बैठना हू । वहा लुच्चे-गुण्डे सभी को देश पाता हू। जुल्फई छोर अब बहुत पहुचते हैं । वहा औरतो का कीतन होता है।' 115 UN ? यशोदा तुनक उठी--'सान कीतन होता है। जवान बहुए बन- मवर कर वहा जाती हैं। अब तो गाव मे लिपस्टिक्-पाउडर भी चल पडा है । जाखो पर काजल माथे पर बिदी पता नहीं, ये बहू किस यार को रिझान जाती हैं, उस मदिर पर । वहा पर बैठे जवान छाकरे भी ही हो और हा-हो करके हमते हैं । वेशम कही । वह दूध की हडिया से गिलास मे दूध ले आई। दूध म चीना घालती हुई बोली-'अव मुकेश भी आता होगा । वह अपनी भाभी के लिए सेव- सतरे लायेगा। आजक्ल अगूर भी आने लग है । कुल दस रुपय गिय थ तो सब कुछ ल आयेगा। चौधरी बाला-'आजक्ल दस रुपये म क्या जाता है वहन को दस रपये जाता है और माल एक रुपय के बराबर नाम बडे और दशन छोटे यशोदा दूध का गिलास कमरे म ल गयी। रामदास भी साथ था । वह गिलास को लेकर बाला-उठ बहू। दूध । आज मुझे भी गुस्सा आ गया। जान क्या बन गया 'अच्छा, अच्छा, अब गडे मुर्दे मत उपाडा । बहू को दूध दा । सुखिया बोली-'मेरी इच्छा नहीं, अम्मा । 'नही 1 बेटी । दूध पी ।' यशोदा न उसे उठावर बठी कर दिया। तभी रामदाग ने गिलास उसके हाया म दे दिया। जब वह बाहर जाने लगा तो बोला-'मलखू को मा, मेरी चिलम म आग रख देना । आज सुबह स तम्बासू नही पी सका। यशादा बोली-~-आज तो मैंन भी मुह म दाना नही डाला, पेट की आखें कुलबुला रही हैं। सुबह मुकेश को चार पराठे बना दिये 4 एक रय लिया या राहुल क लिए । वह पा गया और खेलन चला गया। रामदास बोला-वह कही नदी पर न चला जाये। एक बार मामराज का लडका नदी पर पहुच गया था। नाव म बठकर शहर जा पहुचा था । वह तो यह कहो, लोगा ने पहचान लिया कि किसका बच्चा है । आजकल नदी चढ़ी है । बडे जानवर भा तर आत हैं । यशादा बोली- एक बार मगरमच्छ दखा था। कुछ औरता ने नदा 116 में पैर रयत और नहात भी डर लगता है।' रामदास बाहर जा बैठा । उसी सशोदा ने मुखिया के मूखे बालो पर हाथ फेर कर कहा-'बहू, नाज सिर मे तेल लगाना । तू जरा भी ध्यान नही रखती, अपन शरीर का। देख ता, इसके घरो की बहुए किम तरह मन सवर कर रहती है।' तुरन्त ही मुखिया बोल पडी---'मैं किसके लिए श्रृगार करू गी, मा । तुम्हारा वेटा ता गया । सम्ब ध तोड गया। वह सुदर पछी अब जाने किस डाल पर जाकर बठा होगा? यशोदा ने साम भरी-'हा, बहू । अब वह पछी लौटकर नही जायेगा । भगवान का यह भी अजीब करिश्मा है । यहा जो भी आता है, नाटक वे पात्र की तरह अपना खेल दिखा जाता है । जव जाता है तो लोटता नहीं। न मा का नाता याद रखता है, न बीवी-बच्चो का" मुखिया बोली-'अम्मा, मैं भी आजकल इसी प्रकार की बात मोचती ह । कभी-कभी ता मन म एसा वैराग्य आता है कि सब कुछ छाड कर कडी भाग जाऊ । कही जाकर छुप जाऊ ।' यशोदा बोली--कहा जायेगी बहू । कहा छुपोगी। उस भगवान की दृष्टि सब तरफ जाती है । चीटी मे लेकर हायी तक उसकी नजर मे रहत सुखिया बाली-'अम्मा वह मास्टरनी विधवा थी। उसका पति वेदान्ती था। विद्वान था। एक बार उसी मास्टरनी ने बताया था । जीवन की सान मदिरो मे नही मिलता, जन-सेवा मे मिलता है। नर- नारायण या दशन निधन और पीडित की झोपडी म किया जा सकता यशोदा ने सास भरी- 'हा, बहू । सच यही है । मैं तुझे आज यताती हू, वह जगनदेई चमारी थी मा । जब उसका पति मर गया, तो वह मजदूरी करके अपना और बच्चो का पेट पालती थी। मेरे पास प्राय आती-जाती। कुछ काम र जाती, कुछ ले जाती। पिछले दिनो जब वह दर तर नहीं दिखाई दी, वो एक दिन खेत मे लौटती हुई मैं उसके घर जा पहुंची। यहा देखकर, मेरे पैरो की माटी निक्ल गयी कि जगनदेई 117 पटिया पर पड़ी थी। बीमार पड़ी थी। बच्चे रो रह थे । भूव से बिलबिला रहे थे । तब जाने क्या आया मेरे मन म, उसकी बडी लडकी को साथ ल आई। पांच सेर अनाज दे दिया। आटा द देती, वह था नहीं। उम दिन मर मन को वही राहत मिली। ऐसा लगा, मैंने कोई शुभ काम किया था। दा दिन बाद ही सुना वि जगनदेई नही रही। वह मर गयी । सब में जाने किम प्रेरणावश उगर घर गयी । घर से कफन का कपडा ल गयी। वहा जाकर लोगा म यह आई । चिता के लिए मेरे घर से पडे ल आयें, लकडी ले आयें । वाद म सुना उमो बच्चे मामा गया। वह घर बद हो गया। सुखिया ने कहा-'यम्मा, गरीबी का, दरिद्रता का और पीडा का कोई अन्त नही। मैन गरीब घरा की लडक्यिा यो सिलाई का काम सिखाना है। क्सिी मे कुछ लेना नही।' उस समय यशोदा के मन मे बात आई कि जब किसी से कुछ लगा नही, तो काम कसे चलेगा। परन्तु वह मन मे उठी बात रोक गयी। वह फिर चूल्ह वे पास पहुच गयी। तभी सुखिया के मन मे आया, मचमुच, एक तूफान आया था, इस घर पर, यह हट गया। मैंन भी नहीं समझा था कि छोटी-सी घटना कितना बड़ा काम करगी वह चिंगारी दो घरो को तो फूक ही दती, समूचे गाव म आग लगा देती विक्रम माल- दार है, गाव का जमीदार है। गाव के लोग उसका तो साथ देत ही, कुछ समझदार और नैतिक भावना के पोषक इस घर के भी मददगार बनते उस समय आगन की धूप चली गयी थी। अधेरा आ चला था। तभी द्वार पी ओर देखकर सुखिया चौंक उठी-'अरे, तुम तुम जोरावर और जोरावर तब उसने पाम आ गया था। . 118 15 जिस रहस्यपूण ढग में जोरावर उस घर म प्रविष्ट हुआ, उसे देख कर सुखिया विस्मित भाव म उसे देखने लगी थी । वि तु पास आते ही, जोरावर बोला-'आज मन करता है कि तेरे चरणा में अपना सिर झुका दू। ऐसा ज्ञान तूने यहा से पाया, यह देखकर भी चकित हू । तूने तो किसी बड़े धर्मात्मा को मात कर दिया । आश्चय तो यह है कि खुद वित्रम तेरे सामने झुक जाने को विवश हा गया । वह तो बडा जल्लाद है, क्रूर भावो से भरा है । तरे समक्ष इसका लड़का भी ऐसा कायर बना, भयातुर हुआ, यह भी एक चमत्कार था। सुखिया न व्यस्त वनकर कहा--'यह सब छोड ! यह पता, इस समय कसे आया अभी ता पुलिस गाव मे है । अभी तो रात भी नहीं आई, उजाला है।' जोरावर बोला-'मुझे आना था। मा ने सदशा भेजा था। उसमे पास मेरा पता था। तेरे माथ जो कुछ हुआ, यह भी उम आदमी ने बताया, जो मेरे पास गया था। मैं तो विक्रम के पुत्र को समाप्त करने भाया था। 'दुष्ट कही का । तू व्यथ ही सयासी वना है । अपन को धोखा दे रहा है । तरे मन का पशुभाव ही अभी ज्यो-का-त्यो बना है। गगा भ गोता तो मारा लेकिन मन का मैल नहीं घो पाया।' उदाम बनकर जोरावर बोला-'वह मैल इस जम म साफ नही होगा । वह पलप भाव बहुत गहरा है । मैंने बहुत खून किए हैं। इन्सान के घून की लाली अब मेरे दिल पर जम चुदी है।' 'ओह घष्ट वही वा " मुखिया न सुन्ध बनकर कहा यह हाल है, तो मेरे पास आना व्यथ है । अपना लिया हुआ रुपया ले जा । अपना पुत्र भी सम्माल । अब वह पैरो से चलता है। जब वाप डाय है. सा बेटा भी पिशाच बनेगा, इन्सान नहीं । वह तेरी छाया है समझा ।' विन्तु जोरावर तीखी बात सुनकर भी, उदास बना था। मानो 119 - जब तरा कायर हो चुवा था। उसन बडे सहज भाव मे कहा-नाज तू मुझसे नाराज है, सुखिया भाभी' उसन सास भरी कह ले जा तुझे कहना है । यह तरा अधिकार है। मैंने स्वय ही तेरे समक्ष आत्म समपण किया है। मैं तो मा का मदेश पाार आया था। मा ने जिस आदमी को भेजा उसन सब कुछ बताया। जिस लडके ने तुम्हार छुरा मारा, मैं उसे भी जान से मार देने की बात सोच बैठा था। कितु मा न जो कुछ बताया उससे मेरे मन के रोष पर घडो पानी पड गया। तू इतनी महान निक्लेगी इतना सोचना मेरे लिए कठिन था। मा ने बताया, विक्रम के घर तुम्हारा जाना समूचे गाव भी दप्टि म एक अलौक्कि घटना थी। उससे विक्रम का पुत्र तो मौत के मुह से निकला ही, गाव मे आने वाली आधी भी रुक गयी। विक्रम इस घर को सही-सलामत नही रहन दता। मुझे मा ने बताया है कि सजय की बहू भी उस घर को छाडकर चली गयी । वह भी अलौकिक नारी यो । उसकी आत्मा में बल था । तभी सहसा, सुपिया ने पहा--'मैं उस नारी को अपना गुरु मानती है । उसके त्याग की बात सुनकर ही, मैं उम घर जान की बात साच बैठी थी। मैंने सुन लिया था कि विक्रम का पुत्र शरावी और व्यसनी बनकर अपनी आत्मा का तेज खो बैठा पा। पुलिस ने उसे पक्डा और मारा भी तो वह अत्यधिक भयातुर हो उठा था । खून की उल्टी कर रहा या । सचमुच मौत ने उसका पैर पकड लिया था। जारावर उस समय अत्यधिक गम्भीर बना था। उसी अवस्था म बोला-'जव गाव का आदमी मर पास गया ता मैं हिमालय की तरफ जाने की तैयारी कर रहा था। कुछ दर बाद ही उस स्थान को छोड । देता। सुषिया न पहा - 'चलो यह अच्छा हुआ वि तुम आ गय । मिल गये । अब तुम अपन रास्त की ओर देखो। इस मुखिया को और इस गाव को भूल जाओ। वर सरत हो, ता अपना कल्याण पर लो । दखो, बाधा जीवन तो तुमने घरवाद कर लिया। जोरावर कुछ और पास आ गया और बाला -'भाभी, अब तुमसे दूर जान को मन नहीं करता। 120
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तो छोट बैठा । जपन साथिया को भी छुट्टी द दी, लेकिन मैं शान्त नही । मेर मन का भय दूर नहीं । मन का कालाहल परेशान करता है।' वह भय तुम्हें खा जायगा ।' सुखिया बाली-'पिछली बार तुमन कहा था कि हिमालय की कदरामा मे बहुत से खूखार डाकू छिपे है । वे भगवान का भजन करत हैं । मैं समझती हू, वे अब भी अपने जीवन यो व्यथ खो रहे है । उहनि पुलिस से और समाज से अपने को भले ही दूर कर लिया हा, लेकिन अपने मन म भर पापा के बोझ से पृथक नही हुए। वही अवस्था तुम्हारी है। किय गय वीभत्स कम तुम्ह चैन नहीं लने देंगे । तुम्हार हृदय को छलनी यना देंगे। तुम जीवन भर अशात रहाग । रात के अधेर म पहाड का पत्थर भी तुम्ह भरा देगा। वह भी तुम्हारा शत्रु दिखायी दगा। 'तो मैं क्या करू भाभी | सचमुच में परेशान हू । पत्थर के समान कठोर बनी सुखिया बोल पडी-'तुम्हारा एक ही माग है । यदि तुम उस पर जा मक्ते हो, तो जाओ। तभी तुम निभय होग। -'तुम मुझे । महसा जोरावर बोल उठा-वह कौन-सा माग? 'आत्म समपण का माग । निग्रह का माग ।' वख्स जोरावर तीव्र हो उठा- भाभी। 'हा, देवरजी । सुखिया के स्वर मे जसे शहद घुला था--' प्यार करत हो न । अपनी प्रेयसि बनाना चाहत हो । तो मैं ही तुमसे यह बात कह सक्ती हूँ। तुम्हारे रोग का उपचार यही है । यह जहर भी है और अमत भी। कुदरत न तुम्हारे समक्ष ये दोना प्याले रख दिये है, जिसे चाहे ग्रहण कर लो।' निश्चय ही उस समय जोरावर कुण्टाग्रस्त बना था । नमी बाला- तू तो पडितो सरीखी बात करती है भाभी | बोल तो, यह यहा मीखा विमने यह सबक दिया । सुखिया बोली- मैं जानती हूँ तुम्हार सस्कार अच्छे नहीं । अभी और तुम्हें विपत्ति के दिन देखने हैं । लगता है तुम जीवन भर पथ प्रष्ट राही की तरह इधर-उधर मारे-मारे पिरोगे। 122 का ता जीवन ममाप्त किया ही, अब मुझे नष्ट बग्न पर आमादा हा। लेकिन म तुम्ह प्यार कर सकती हूँ, आत्म-समपण नही पर सवती। ममय-समय पर तुमन जितना रुपया मुझे दिया है, वह ज्या-का-त्यो रणा है, उसे अपन बाम मे नही लाऊगी । वह या ता तुम्हार पास वापिस जायेगा, या तुम्हारे पुत्र के काम आयगा ।' उसने यहा- मैं तो चाहूगी कि तुम्हारा यह भ्रष्ट पसा राहुल के भी पाम आय । वह पैसा उसम दूर रह । वह पैसा इन्मान ये पून स भरा है। उस पमे का मात्विक भाव नष्ट कर दिया गया । काश । तुम आदमी बनत । तुम भी इमानियत का मवय सीखत । तुम भी यह जानत यह धरती का इमान स्तिना सघप परता है, दो रोटी पान के लिय । इसीलिय इसान देवता बना है भगवान बना है जोरावर चीख उठा-'भाभा । उमन पाल म पिस्तौल निवाल लिया । वह सुखिया की आर तान पर बोला-'मैं तुझे भी ममाप्त कर दूगा, औरत ' तुझे प्यार क्या किया, गले म एक साप डाल लिया। तून मुझ पागल कर दिया है । मूख ममझ लिया है। उस पिस्तौल को देखत ही सुखिया ने अपनी छाती की बॉडी के बटन खोल दिय । छाती नगी करके बोली-'ले, मार द गोली, चला दे । तू खूनी है ना, तुझे खून करने की आदत है । इमान का खून पीना ही तून मीखा है । मेरा भी पून पी ल ।' उसी समय कमरे से बाहर चौक म यशोदा आ गयी। वह बोली- 'अरी बहू । क्या है । कौन है। क्सिस बात करती है, तू ?' सुखिया ने तुरन्त स्वर पर जार दिया--'अम्मा कोई नहीं।' यशोदा कब्जे में व्यस्त थी। फिर बाहर चली गयी। तभी सुखिया बोली-'मारना है, तो मार दो। यहा स जाओ। फिर कभी आना और अपने सभी पसे ल जाना । पुत्र को भी ले जाना । मैं बहुत बोली हू। अव थक चुकी हू । चुप रहना चाहती हूं।' वह पड गयी । मुह पर धाती का पल्ला डाल लिया। उसी समय सुखिया को लगा जारावर न अपना सिर उसके पैरा पर रखा था। जब उसने फिर मुह से धोती हटायी, तो तब तक जोरावर उस क्मर से जा चुका था। वह दीवार फादकर अपने घर 123 . मे पहुंच गया था। दखत ही मा वाली- अर, आ गया तू | मिल जाया भाभी म। यह ममझ ल, मुखिया गरीखी औरत कठिनाई स दिखाई देगी। में ता जब नब उसे पती हु, ता लगता है, कोई देवी स्वरूपा औरत मुझे रिसाई रती है। जोरावर बाला नहीं, चुप रह गया। मा न कहा-'कुछ खा ले । देख, मैंन तरे लिये हलुवा बना दिया है । दूध भी ठडा किय देती है।' कि तु जोरावर गम्भीर बना था । वह कुछ कहने की स्थिति म नहीं या। अभी कुछ दर पूर्व वह सुखिया के समक्ष जिस अजूवा का प्रदान पर आया वह शूल की तरह उसकी छाती में चुभ रहा था। मा तश्तरी म हलुवा ले आई और गिलास मे दूध । जोरावर भूखा तो था ही, खान नगा। उसके झोल में कुछ रुपया पडा था, वह मुखिया को दना था परन्तु मा अवसर नही आया, वह रुपया ज्या का-रया लौट आया। एक बार उसके मन म आया कि रुपया मा को दे द, परन्तु यह विचार भी हवा की तरह निकल गया। हलुवा खाकर और दूध पीकर जब वह चलन से उद्यत हुआ, तो तब अधेरा ना गया था। उस घर के पीछे कोई घर नहीं था। उसी का खेत था । जोरावर वे घर आने-जाने का यही गस्ता था। जब वह उधर वढा, तो मा बोली-'अभी जायेगा, तू | पिता से यहीं मिलेगा । जब उनसे काम नहीं होता । नौकर रखा है, तो वह भी ठीक से काम नहीं करता, आय दिन रुपया मागता है । अब क्ब जायगा तू जारावर बाला-कुछ पता नहीं। हो सकता है, अब न आ पाऊ ।' मा सम्भल गयी--कसी बात करता है र । तू घर का तो रहा नही, अब बाहर भी नही रहगा। वह बोली-'मैं अब अधिक' जीवित नहीं रहूगी ! मेर पीछे कुछ भी करना । मुझे दिखायी देता रह । यहा आता रह ! तू आ जाता है, तो लगता है, मरे मूखे प्राणा म हरियाली आ गयी । मुझे जीवन मिला है । जारावर न सास भरी-'मा, इस जावन का कुछ पता नहीं। यह 124 । । , योला-'यही क्या पता था कि मैं टापू बनूगा । खूनी कहलाऊगा, माथी वहत ह कि मैन बहुत रपया लूटा । परतु मैं तो सोचता हू, रुपया भरो ही आया हो, इमानियत का भाव मेरे पाम नही आया। काई भला कम भी मुझसे नहीं हो पाया। मा ने कहा- देख, तरी वहिन राधा भी बहुत याद करती है । जब उसका पत्र आता है, तो तरा उल्लेख जरूर होता है।' जोरावर विषाक्त हो उठा-' - 'वह मुने याद नहीं करती, मर द्वारा दिय गय रुपये का याद करती है । तुम भी इस जोरावर को इमलिये याद करती हो नि हजारा रपया तुम्ह दिया है । तुम्हारे पास इतना जेवर ह कि उसरा उपभाग नहीं कर सकती। तभी मा न धूरवर जोरावर की ओर दया । जसे अपन उस पुत्र का ममपना चाहा । पहचानना चाहा । मानो अब तक उसका वास्तविक म्प वह नहीं देख पाई थी। उसे समझ नहीं पाई। तभी बोली-'मुथे रुपया नहीं चाहिए वेटा चाहिए । परतु तू तो खूनी बना है, डाकू बना है । बोल तो तूने अपनी इस मा के साथ याय किया है। तून पुत्र के धर्म का पालन किया है । मा के जिस पेट से तू पदा हुआ है, उस पर लात मार बैठा है। मा को घायल क्यिा है। तडपाया है । ले जा, अपना पंसा । यह सोने चादी का जेवर भी ते जा। दरिया मे फेंक आ। मेरा बेटा मुझे दे जा।' जोरावर मा के पास पहुंच गया । तभी बोला-'मा, तुम बह रही हो । वास्तविकता से दूर हो। तुम्हे हाड मास का बेटा नहीं चाहिए, पसा चाहिये । वह मैंने तुम्हे दिया है । खूब दिया है । तुम एक जीवन क्या, कइ जीवन भर बैठकर खा सक्ती हो।' उमने कहा---'मैं जानता हू पिताजी नाम मात्र की खेती करते हैं । पुलिस को और गाव वे समाज को धोखा देते है। किसी से यह कहने की हिम्मत नहीं रयत कि उनके डाकू पुत्र ने बहुत धन दिया है। वह उनके पास सुरक्षित है। मा कातर हो उठी-भरे बेटा ! आज तू कसी बातें कर रहा है? तर मा-बाप को वेटा चाहिए, डाके का घन नहीं। वह बोली- 'जन 125 । बचपन म तू मरी गाद म बैठता था, ता में विहसती थी । आलाडित हाती थी। गव से फूली नही समाती थी। अपने को भाग्यवान मानती थी लेक्नि जाज क्या तीन म रही, न नरह म । ममाज की औरता को अपना मुह नहीं दिखा पाती । कही आती जाती नहीं । मैं खूनी और डाकू पुत्र यो मा हूँ न ' तूने मेरा सिर झुकाया है। मरा सम्मान अपने परा स द दिया है मा का अभिमान छीन लिया ह तूने । समझ ल, मैं तर दिये धन पर थूक्ती हूँ । उस माटी का ढेर मानती हूँ । उस ममय जोगवर बोला नही, मिर युवाये खडा रहा। उसकी मा ने जीवन म पहली बार मत्य का उदघाप किया था । अपने पुत्र को पूनी और कायर बताया था। उमी व मुह पर कहा था, सूने समाज के समक्ष मुझे अपराधी बनाया है। मेग गौरव छीना है । मा का अभिमान पद दलित किया है। उसी समय मा बोली -सुन र जोरावर । आज तून अपने दम्भ का उधोप किया है। मा स कहा है कि इतना रुपया दिया कि खच नहीं किया जा सकेगा यही ना ! तू अपने रुपये को ल जा और किसी और का दे आ । मैं तो यही चाहूगी कि तू लोट आ। घर का काम देख । विवाह कर । बच्चे पैदा कर। इस घर को वश चेल बढा। उसे पानी दे । देख, यह घर अव बरवाद हो चला है । तरे पिता जिस दिन जायेंगे तो उसी दिन यह घर बाद हो जायेगा । मैं भी अव देर तक नही रहूगी। बुढिया हूँ, थक चुकी हू । तेरे पिता लाठी के सहार चलते है । शरीर चलता रहे । इसलिए थोडा बहुत खा लेत ह । आश्चय कि जोरावर तब भी पत्थर की मूर्ति के समान खडा था। उम इस बात का पता था कि मा ने पुत्रवती बनने के लिए बड़े प्रयत्न क्यि थे। लेकिन जब पुत्र पैदा हुआ, तो वह डाकू बना, इसान नही। दुर्दा त भेडिया। तभी उमने लम्बा सास भरी और मा की ओर दया । मचमुच उसकी आयें भर आयी थी । उसक प्राणो का कोलाहल वढ गया या। उसकी पाहा चेहरे पर उतर आयी थी। मानो कोई उसके सिर पर हयोडा बजा बठा था। वह निमम था, व्यथित था। मा ने कहा-'बेटा, अब भी ममय है अपने को बदल दे । नहीं तो, 126 इस मा का मार द । ममाप्त कर द । इस पर की दुनिया का।' जोरावर जागे वढा और मा के पैर छूकर वहा से जाने को प्रस्तुत होता हुआ वाला---'अब यही होगा, मा तुम्हारा क्थन सत्य होगा।' वह दीवार पर चढा और भावे दखते-देखते दूमरी तरफ कूद गया। वहा गाव समाप्त था। चारा ओर जगल-ही-जगल था। जोरावर झाड यखारो मे भरे पथ पर आगे बढ गया था 16 जारावर जिस ढग से सुखिया क पास जाया और बातो-बाता मे अपना पिस्तौल दिखाकर मार देने की धमकी दे वठा, वह सब सुनिया के लिए अकल्पित तो था ही, घृणा भी था। देर हो गयी कि जोरावर उस घर से पलायन करवे अदृश्य हो चुका था । परन्तु देर तक सुखिया क मस्तिष्क मे वह अभद्र दृश्य घूमता रहा । फलस्वरूप, उसका मन भी कला बना था। तभी अपनी चाल मे तेजी लिए एक युवती वहा आई और बोली- 'क्यो भाभी, तुम्हारे पास एक साधु आया था। अभी जब पुलिस का आदमी आया है वह कह रहा है, शायद जोरावर अभी मरा नही, जीवित है । वह साधु बना है।' सुखिया बोली-'यहा कोई साधु नही आया । उसका काम भी क्या था।' 'अरी भाभी । यह न पूछ कि उसका क्या काम था । डाकू वही भी पहुच सकता है। छुप सकता है। उस युवती ने कहा-'अभी मेरी मा सेत से भस के लिए चारा लायी है । उसी ने बताया कि चौपाल पर दरागा बठा है । तुम्हें पता तो होगा ही रि पुलिस ने जोरावर को मार देने का दावा किया है, घोषित इनाम भी पा लिया। वह थान के सव नादमियो म बट गया। अब बडा थानदार तो बदल गया, दूसरा आया है । अभी छोटा दरोगा है। कुछ सिपाही भी है । सुनती ह दे भी 127 , - बदले जायेंगे । जा साधु गाव म जापा, जोरावर से उसकी मूरत मिलती थी। साधु भी शरीर का लम्बा चौडा जवान था।' सुखिया ने फिर भी अपन मुह पर एमा भाव व्यक्त किया कि माना वह पूण स्प म अनजान हा । उमन बहा-'मैं ता बिस्तर पर गडी है। अम्मा भी बच्चे को लेकर कही वाहर गयी है । पिताजी मेत पर हैं। जाजक्ल कटाई चल रही है न इसलिये उनका भी घर पर बठना नही होता। उसने बात बदली-'मढवा, तू सुना अपनी बात । जब कब ना रही है अपने पिया व घर । पिछने दिना ता मुना या वि मसुराल वाते तेने आ रह है। 'हा भाभी । एमा यात ता चली थी । लकिन उह पिमी दूसर शहर म जाना था, नौकरी का इण्टरव्यू दने के लिये जब शायद अगल महीन जा रहे हैं।' सुखिया ने चुटकी ली, जब ता तरा मन नही लग रहा होगा। 'ऐसी बात तो नहीं भाभी ।। 'अरी मैं सब जानती हू । लडकी का जसे ही विवाह हुआ वह पति की उसके घर की बात सोचने लगती है । जसली टिकाव तो वही है न । लडकी की जात का एसा ही जीवन है । इसकी काई जाति नही, कोई देश नहीं । जहा गयी, वही की हो गयी। वही उसका धम है, वही जाति युवती ने सास भरकर कहा-'हा, भाभी । ऐसी ही स्थिति है, इस औरतजात की।' वह बोली-'तुम सावधान रहना । पुलिस मतक है। तुम्हारा तो देवर है ना जोरावर, कभी भी जा सकता है।' सुखिया न स्वर पर जोर दिया-यहा क्या आयेगा | क्या काम है उसका युवती चलन को उद्यत हुई और बोली-'काम तो उसका है। तुम भाभी लगती हो । सलोनी और सुदर हा । भाग्य की बात है कि वैधव्य भी तुम्ह मिला है । जीवन एकाकी बना है । जोरावर डाकू ही तो है वसे सुदर है, बलिष्ठ है। आज भी वह जवान औरता के लिए आकर्षक बना है। . " 128 मुखिया को उस यौवनमयी मेनका का कयन ऐसा लगा कि मानो वह उसके मन के बुझत दीपक म तेल डाल रहा हो । उसे प्राणवान बनाने मे समय हो । पिछले वप ही उस मेनका का विवाह हुआ था। बडी चचल बहा हसोड । विवाह से पूर्व उसके विषय मे नाना प्रकार की बातें चलती थी। उमे जिस जिस की प्रेमिका बताया गया था। यद्यपि मेनका का रग माफ नहीं था, कुछ क्लास पर था। परतु किसी ने ठीक कहा है, जपानी मे गधी भी परी लगती है। यही अवस्था उस मेनका की थी। यौवन उभार पर, जाखें बडी-बडी । जैसे क्रैली का फूल । उसने सुखिया की मनचाही बात कह दी थी। जोरावर जवान भी था सुदर भी था। वह सुखिया के मन मे घुस कर बैठ चुका था । परन्तु दोनो में से एक भी, एक-दूसरे की तरफ बढने को तत्पर नही था। यद्यपि वधव्य पाकर सुखिया एकाकी हो उठी थी, वह रातो-रात जागकर आसमान के तार गिनती थी। परतु उसकी संवेदनशीलता नारी की परम्परा और रेखा का पार करने के लिए तत्पर नही थी। और जब से उसने यह सुन पाया कि जोराबर एक अस नारी से विवाह कर बैठा है, उसके अतस्थ होने पर बच्चा स्वत ही, सुखिया की गोद में दे बैठा है, तब से मानो वह सुखिया न तो यौवन मयी नारी रह गयी थी, न रूप रस की खान । वह केवल एक नारी थी। अवस्मात ही उस पर जोरावर न उत्तरदायित्व का बोझ डाल दिया था। उसने स्वत ही सुखिया मे कहा था, अब तू मा है केवल मा । यह बच्चा तुझे सौपने का अर्थ ही यह है कि तेरे जीवन का हल्कापन नष्ट हो जाय । तेरे मन म यदि कोई भावना हो, जपेक्षा हो ता भी समय की धाराम डूब जाय उमने मेनका स कहा - बटन | चली जाना । आज तो आई है इतने दिन बाद । जब ससुराल जायेगी, तो भगवान जाने कब लौटना हो । नारी तो पराधीन है। पराजित है।' मनवा बठ गयी और सास भरकर बोली-'हा, भाभी । मच्चाई । सुखिया बोली-'लेकिन औरत इसी म मानद पाती है। पति पावर मा-बाप को भूल जाती है । बचपन के साथी भी याद नही आत । 11129
घर के आल-दिवाल भी रास्त पर से उतर जात है।'
सूसे भाव से मेनरा मुसराई–वेशक । वास्तविकता यही है।'
सुखिया बाली-'तुझे पति अन्छा मिला है। पढ़ा लिया है। किमी
दफ्तर मे काम करगा।'
मनका बोली-'अभी तक ऐमा ही दीखता है। भाग्य की बात
भगवान जाने।'
परी पगली | भाग्य तो बनाया जाता है । औरत मद दोना प्रयत्न
करते हैं । यह जिदगी तो सपो का समूह है । औरत मद गाडी के दो
पहिये है । देखा मा, सुदामा का घर । पति-पत्नी ने पति को किस प्रकार
ऊपर उठाया। दोनो ने रात दिन काम किया और गाव के समाज म
अपना स्थान बना लिया। इसे कहते है पौरुप । सुदामा ने अपने पाप का
कर्जा भी उतार दिया । साहूकार के पास रखा अपना खेत भी छुडा
लिया । कई साल से उमकी फसल अच्छी हो रही ह । भाग्य साथ दे रहा
उसी समय यशादा घर म आई। वह राहुल को मुखिया के पास
छोटकर बोली-'बहू, अब इसे सम्भाल । बहुत तग करता है। गाव मे
अब खोमचे वाल आने लगे हैं तो यह भी जिद्द करता है । मलखू के
पिता ने चार आने के पानी के बतासे तो खिला दिये, फिर भी उसका पट
नही भरा।
मुखिया बोली-'अव यह चटोरा हो गया है । पिटेगा।'
राहुल बोला-'नही मा । मैं मार नही खाऊगा।'
'तो जिद्द क्यो करता है, नालायक कही का।
तब राहुल अपना मुह सुखिया की छाती पर डालकर कुछ बोला
नही चुप रह गया।
मेनका बाली-- अच्छा, भाभी। जब चलूगी ।
सुखिया बोली-~-'आज।
तभी यशोदा ने मेनका की मार देखकर कहा-'अरी चौपाल पर
भीड कसी थी। दरोगा भी आया बठा था।
मेनका बोली-'ताई, पुलिस को सदेह है कि जोरावर भाया था।
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वह मरा नहीं, अभी जीवित है।' यशोदा ने विस्मय के साथ कहा-'इतने दिन हो गये और वह अभी जीवित ह न, न, पुलिस को धोखा हुआ होगा।' 'भगवान जान, ताई। बात यही थी। पशादा बोली-"उसके मरन की ता गाव म मिठाई वट गयी। सुनती हू, उस रात बहुतो ने खूब पाराब पी थी। पुलिस को भी पिलायी थी। 'हा, बात तो सब हो गयी ताई। मुरदा भी जल गया, उसकी तरहवीं भी हो गयी। वह उठ चली। तभी यशोदा के मन में आया कि सुखिया से पूछे--'तेरे पास तो जोगवर नहीं आया। परतु वह मुह की बात रोप गयी । वह जानती थी, बहू कुछ नहीं बतायेगी । अतएव वह लौट गयी । बच्चा राहुल भी फिर बाहर की तरफ भाग गया। किन्तु तभी सुखिया के मानस मे भूचाल- सा उठा । वह उस परवस ही, क्सिी तिनवे के समान उडाने लगी। वह स्वत ही अपने-आप म खिन बनी थी। गली जा रही थी कि उसने जो कुछ जोरावर से कहा, वह टोक नहीं था। मेरी तरह वह भी मुझे प्यार करने लगा था । जव तब मेरे पास आकर बैठता, तो जाने किस गहरी भावना के साथ मेरी आर देखता था। तभी-तब मैं उसकी उस पैनी दृष्टि को नहीं देख पाती थी। सहार नही सक्ती थी। मुझे लगता जोरावर पी व आखें मेर प्राणो में घुस रही थी। वहा हा हा कर पैदा कर रही थी। वह मेरे लिए क्तिना तमय था, मर्पित था। इतना मैंने समझ लिया था । और उसकी यह चालाकी किसी भी दूरदर्शी व्यक्ति में पम नही पी दि उसने मुझको अपने-आपसे बाधने के लिए अपना बच्चा मेरी गोद में डाल दिया था शायद जोरावर न समझ लिया होगा कि मैं कभी भी चली जाऊगी। इस घर को छोड जाऊगी आश्चय तो यह, उसने एक बार भी अपने मुह से यह नहीं कहा कि वह मेरे प्रति समर्पित है, जागस्य प्रहरी के समान मेरे जीवन के चारो ओर घूम रहा है मुझे अपनी समझ बैठा है । आश्चय की बात तो यह है कि उसने विमी को भी नहीं बताया कि उसकी एक प्रेमिका थी विवाहिता थी। यह 131 - राहुल उसी का बच्चा है । कसा यूठा प्रलाप ह यह मेरा कि गाव मे, पडोम मे यह प्रचारित किया है वि नदी किनारे यह बच्चा मिला था और- ता-और , स्वयं अपने मास-ममुर से भी मैंने यही कहा राम राम क्सा सफेद झूठ है, यह । धोखा ह । छूल है । इस क्पट को नारा म इतने झूठे प्रलाप मुन पाये, लेकिन इससे बडा यूठ भी काई होगा, मैं नहा जानती। पता नहीं इतना बड़ा पाप मैं क्या ढो रही है । मैं किस नदश्य भावना पर आश्रित हू । मुझे न दिन में चैन मिलता ह न रात म नीद जाती है। ससुर ने मुझे नया माग निर्देश दिया और सिलाई के स्कूल में दाखिल करा दिया । कि तु उस दूत लुटेरे जोरावर ने तो सबमे बडा सेल खेला है। मेरे माथ कि मैं उम्मीद बनकर कही का न जाऊ । यौवन के सलाय मे बहकर कही दूर न निकल जाऊ । जवानी की गहराई न डूब न जाऊ अरे जोरावर | जाने तू किन दूपित मस्कारवश डा बना है। खूनी बना है । इसानियत का लुटरा बना है । मैं तो तरी पूजा पर सक्ती हूँ। भला क्सिको पता है कि तू डाने का रुपया निधना पाहिता और अभावग्रस्त लोगा म वाटता है। कई लाख रुपय का ट्रस्ट बना रखा है, गरीव विद्याथियो लिए तूनाएर प्रतीत सयामी ह । तू एक मन्चा मानव है। मुखिया उठकर वठ गयो । उसन अपने दाना हाय सिर याला म द लिए । उन वालो को मानो नोचने लगी। उसे यह अच्छा नहीं लग रहा या, मन म तलखी आ गयी थी कि वह जारावर का जान क्या कुछ यह वठी थी । उसे कायर बार बुजदिल बना बैठी थी। काश | वह अपने का नाच पाती। झिंझोड पाती। अपना गला घाट पाती । उम एस। वल्पना वरपे बन्छा लग रहा था कि यदि जोरावर अपनी पिस्तोल म भरी गाली मुय पर छाइ दता, तो मेर साय याय करता । मुझे जीवन दान देता । परतु हाय । वह ऐमा नहीं कर पाया। यह भी ममता और मोह का शिकार बना था। मैंने देग लिया था कि जब उसो मुप पर पिस्तौल ताना तो उसाा हाय बाप रहा था। मुझे तो लगा कि वह लोह पाटुादा उमय हाय में छूटवर धरती पर गिर पडे गा नि सह, वह मुझे मार ही सकता था । इतना बलिष्ठ नहीं था। वह गर 132 गा। उस आग्नय शस्त्र से किमी का भी मार सकता था। परन्तु उसका मन शरीर के बल के ममान बलवान नहीं था। वह मन से दुबल था प्रतिशोध ल माता था, द नहीं सकता था। वह असामा य नही था । नामान्य व्यक्ति । ममान अपने जीवन की नाव को से रहा था। उसकी 'नाव पुरानी पड चली थी। पनवार भी कमजार थी। उस लकडी को चीडान खा लिया था इन्सान ना पून परन वाला पर्थिव आत्मा से और मन से हीन वोगा, बलवान नहीं। यह आसुरी शमित टायर म भरी हवा के समान कुछ दूर तक मजिल पूरी करती है, कभी भी बीच राम्न न समाप्त हो जाती है सुखिया खुल पडी । यह रोती हुई बोली-'यदि जोरावर मेरे जीवन 'यी रक्षा के लिए यह बच्चा मुझे मौंप सकता है, तो मैं भी उमे प्राणवान बनाने के लिए यह सव बहूगी जो उसके लिय शुभ होगा। यह मन मे रागी है विपाक्न बना है, उसे स्वस्थ बनाना न पेवल उसके हित की बात है अपितु मेर लिए भी शुभ है । उसन मेरे लिए कुछ त्याग किया है, तो मैं भी अपने नापको उस पर विसर्जित पर दूगी गाव की घटना गुनन ही यह दौडा आया। निश्चय ही। वह एक-दो व्यक्तिया का खून पर दता। मेरे लिए पागल कुत्ते की तरह जाने विम विमको जहरील तो से मार लेता तभी यशोदा वहा जाई। वह सुखिया का रोगी दख, एकाएक हत्प्रभ ह गमी। तभी आग वढयर बोली-~'अरी, बहू ! क्या आ गया तेरे मन M मक्या याद आया। तभी मुखिया पुपर पडी- अम्मा, म बडी दुखी हू । मःमरना चाहती हूं । तुम मबके लिए बाझ बनी हूँ। अम्मा ने कहा-'तू तो पगली है, देव, मुकेश शहर से आया है । नेरे लिए न जान क्या-क्या ने आया है। सुबह उसके पिता ने सौ रुपयवा नाट दिया था, तो सब खच पर आया। राहुल वे लिए भीग और नंदा का कपडा लाया है और तुम्हार लिए पल मिठाई । एव मूती धोती भी ले आमा। सुखिया ने वहा-'अम्मा, मुकेश तो पगला है। इतना खर्च 133 .
आया । यह धोती तुम ललना। तुम्हारे पाम नहीं है । यह धोती भी फट चली है। कई जगह पवद लगाये हैं।' 'अरी, मेरा क्या है बहू ! मैं तो फ्टी पुरानी पहनकर ही गुजारा कर - लूगी।' उसी समय मुकेश घर म आया। वह मुखिया क पर छूकर बोला-- 'धाती देख ले भाभी। तुम्हे पसद आयगी। सुखिया बाली-'मुकेश भया, वह धोती अम्मा को देना । देखो, अम्मा पे पास दूसरी धोती नहीं। यह फट चली है। जब ईख का पमा आयगा, तो तब मेरा और तुम्हारा कपडा आ जायगा। पिताजी का भी सिर या सपट्टा फट चला है । कुरता और धोती का पपडा भी चाहिए। पिताजी चार आदमियो म जाकर बठते हैं, उह शऊर का कपडा पहनना जरूरी है। मुकेश बोला-'भाभी, तुम सबकी फिक्र करती हो, अपनी नहा । यशोदा बोली-'बेटा, यह थोती अब तरी भाभी के लिए ठीक नही, अब तो मामूली औरतें भी टेरतीन और रेशम की धोती पहनती है । और तरी भाभी सो अब गाव मभी छोटे-बड़े व्यक्ति की निगाह म वा चुकी है। गाव की औरतें भी इसे अजूबा समझती हैं । गभी कहती है तुम्हारे घर मे यह बहू क्या आई, आममान से उतरकर काई देवी अ गयी। मुखिया ने महा-'अम्मा, मुझे आसमान मे मत चटा दो। सब प्रम मे है। मैंने कोई अजूना काम नहीं दिया। जो सडका मेर छुरा मारकर भागा था। वह तो खुद शराब के नशे म था । ठार मार गिर पड़ा था। उसषा छुरा मेरे हाप आ गया। यह न गिडगिहाता, हाथ न जाहता तो मैं यह छुरा उसके पेट में घुसेड देती। मैं भी उस ममय पागल यन युभी पी। हमलावर रा सामना परना मेरा घम था।' मुकेश बोला-'भाभी, यह बान शहर म पहुंची है । पर्चा का विषय बनी है। हमारा प्रिमिपल महता पा शायद ऐमी बहादुर औरत को मरसार पुरस्कृत करेगी। तभी ता मारता 1 महावा मिलेगा। अब ममात्र बदल रहा है, यम्मा । इमान करवट ल रहा है। प्रतिराध और प्रतिश्मिा माररभ हो पुती है। भर इन्मान पहले से ममान औरल पर 134 अयाय नहीं कर मक्ता। सुखिया हस पडी-'अम्मा, हमारे दवर अव मारहो, गमा स यशोदा बोली-'अब बच्चा नहीं रह गया है, मघात है। दो साल बाद घर का बाश भी उठा लेगा।' मुकेश बाला---'अम्मा, यू कहा न, मुझे काल्हू का बैल बनाया जायेगा । हल मे जोता जायगा।' मा ने सास भरी-वेटा, यह सभी इन्सानो का दस्तूर है। औरत भी कोल्हू का बल बनती है। दिन रात घर के धधो म लगी रहती है।' वह बोली-'अव तू डाक्टर के पास जा । यही कर जायेगा, तेरी भाभी का अभी जख्म भरा नही, हरा है। वाह उठती नहीं । तेरी भाभी विस्तर छोडे तो मुझे छुट्टी मिले । मुझे तो घर और बाहर का सब काम देखना पडता है । डाक्टर के पास से यार भैस को सानी कर देना । अब दूध वम देती है। आजवल तुझे भी नहीं मिलता । तेरे पिता को भी नहीं। बहू को भी दिया जाता है, या राहुल को।' सुखिया बोली-मिरा दूध बद कर दो, मा । मुकेश को दो। यह पढता है। दिमाग पर बोश पडता है।' उसी समय चौधरी रामदास घर म आया और बोला-'मलखू की मा, चौधरी विक्रम आये हैं, बहू को देखने । कमर मे कुर्सी डाल दे।' लाठी के सहार विक्रम माया और बोला-'नहीं, नही, यह मेरा घर है, किसी गैर का नहीं। और उसने फलो की झोला आगे बढ़ा दिया । 17 बूदा वित्रम फुर्सी पर बठ गया। वह मकान पर विहगम दृष्टि डालता हुआ बोला-'कसी अजीब बात है, इस पर पर कभी नहीं था पाया । यह छोटा-सा पर है, अच्छा है। यहा बैठने को मन करता है। 135 उसन कहा--'चौधरी रामदास, जम क जहां अच्छाइ है, वहीं बुराइ भा है । अच्छाई तो यह है कि पैसा आदमी को एक-दूसरे के पास ले जाता है और बुराई यह है दूर-दूर भी कर देता है । कच-नीच, छोटा-बड़ा यह पमा ही सिखाता है। मेरा कैसा वडा अपराध है कि तुम्हारा मलधू मरा तो मैं यहा तक नहीं आ पाया । कई दिन बाद मुझे पता चला था। रामदाम प्रस्तुत बात को टाल गया। वह बोला-~-'दूध लोग या चाय। चौधरी वाला-एक प्याला चाय ल लूगा ।' रामदास न कहा-'अब गाव म विग्रह अधिय बढ गया है । आज की नयी सन्तति मुधारवादी नही, वह सम कुछ न्याय चाहती है। अब तो नमस्कृति की बात सोची जाती है न धम की । गाव के मदिर पर भी गुण्डागर्दी वढ चली है । और तो और, गाव के गलियार में शराब बिक्ती है । जुआ खेला जाता है। कोई जवान बहू-बेटी नियने ता आवाजक्शी की जाती है । जाज तुम यहा किस प्रकार आ गय, यही अचरज की बात है। गाव के पण्हरी छोर पर तुम्हारा विशाल भवन है, मैं मममता ह वहा मे भी निकलते नहीं। अब तो तुम्हारा वुढापा आ गया, जवानी में भी गाव मे क्सिी है यहा नही आत-जात थे । चाय आ गयी और चौधरी ने चुस्की ली। तभा वह चौधरा रामदास की ओर दनकर बोला- तुम ठोर कहते हो, चौधरी । उसने बिस्तर पर पडी सुखिया की आर इशारा क्यिा-'तुम्हारी इस बहू न मुझे बुढाप म साख दी है। वह सकता हू इसने समूचे गाव या पथ प्रदशन किया है । मुझे भी रास्ता दिखाया है। उसन फिर चाय पी और कहा-'मैंने तुम्हारे पास पाच हजार रुपये भेजे थे, वह तुमने नाली म फेंक दिय थे 1 जिसने मुयसे जाकर कहा, तो तभी, मैंने स्वय अनुभव क्यिा या, तुम स्वाभिमानी हा, सच्चे मद हा । लकिन रुपये तो मैं आज भी लाया हू, रिश्वत के रूप म नही, बहू को शाबासी देन के रूप मे ! ये रुपय स्कूल म लगाना। स्कूल चलाना । नारी समाज में यह बहू कुछ काम पर सकगी। इसम प्रतिभा है, आज है। गत सजय की बहू' भी मा गयी। वह गुसियारा तो है परतु बहुत ऊची बात सोचती है । वह भी 136 तुम्हारी बहू 4 माय साम व गो। एप-दा दिन म अपनी साम व माय यहा यायेगी। चौधरी रामदास बोला---पयन दा आशीश दा । 'हा, हा यह तो दूगा हो । अब म तुम्हारा हूँ, रामदाम | उमा कहा--जीवन ती से जा रहा है। जस्सी वष का पार कर चुका है। कभी भी इम गाव स चला जाऊगा। वह चाय का अन्तिम घूट लेकर -~'तुम्हारी बहू न रास्ता दिया है । पसा कुछ नहीं, 'नगण्य है । वास्तविक बात है हमारी भावना की । अब मैं यूता ह न, तुम्हारी बहू आगोश पर जा रहा है। इन रुपया को इनाम समझो, मेरी आर से । पर मुझे पता चला है, यडे दगेगा न तुम्हारी रह की बडी प्रशसा लिन भजी है, अपन अधिकारिया न पाम । हो माता है, जिले के सदर मुकाम मे बडे अधिागे आयें । तुम्हारी यह पुरस्कृत करें। बुछ और नारिया भी आग आयें गमाज म काम करें, यही बहे दरोगा की अपेक्षा है। वह मी बड़े घर का है। रिश्वत लेना पाप मानता है।' उमने जैव से पाच हजार रुपय की गडडा निवाली और मुखिया र सिरहान रख दी। मुखिया मुह पर धाता का परला डालकर पड़ी थी । जब चौधरी ने स्पय रमै, तो वह महसा उठ बैठी और आना हाय चौधरी पैसे की आप रहावर हाथ जोडने लगी। विक्रम बाला---'तू बहादुर है। तुझ पर यह समूचा गाव गव मर मरता है। जब मरा सजय ठीक है। भी आयेगा, इस ओर । अब उसन राव पीनी छाड दी, वडी वीमती गव की बातले इक्ट्ठी कर रखी थी उसने, सब तोड दी। शराब नाली म बहा दी। उसके साथियों म जव एव भी ऐसा नहीं होगा, जो शराब पीयगा। मेरा घर न बना था गहू, तून स्वग बना दिया ।। चौधरी उठ चला । वह घूघट वाढे गडी यशोदा को दखबर बाला, 'वडी भाग्यवान है तू ऐसी बहू ढदन में भी नहीं मिलती। यही तरी बेटी है, बेटा है | सम्भाल कर रखना' इस बहू को, कीमती हीरा है।' वह लोट पडा । गमतरम दूर तक साथ गया । रास्त में ही वित्रम बोला-~- जब हमको बदल दना चाहिय, अपन जीपको। तभी गाव वा भला दोगा । तुम्हारी बहू न बहुत ऊचा काम किया है । यह तोस तल 137 .
काम था। जान कम इसक दिमाग म बात आयी। तुम्हारी बढ़ मेरे घर न जाती तो लडका नही बचता। पंसा प्रत्येक जगह पाम नहीं देता। तुम्हारी बहू पा पौरप अजेय था, अनोखा था। जब तुम घर जाओ। मैं चला जाऊगा। रामदास नकहा जच्छा राम राम।' 'राम राम, चौधरी । वह नाग बढ़ गया । रामदाम भी घर की आर नही लौटा, अपने सेतो का आर चल पडा । उमने दूर से देखा पि चौधरी वित्रम का फाम लहलहा रहा था। दखकर यह वोला, 'पसे गेहू गाव म किमी नही होंगे। भाग्यशाली ह, विक्रम | 'वह तनी रा जाग बढ गया। उसय मन म बात थी कि जब भगवान दता है, तो छप्पर फाडकर देता है एक समय बहुत बुरा आया था, इस वित्रम या । गाय से उजड जान वाला था । परतु अपन को सम्भाल वठा। यही से रपय की मदद मिल गयी, तो विपत्ति क उस अधर मे पार हो गया। तब मुना था इसपी ससुराल न मदद की थी। वह घर भी पुराना है किमी राजा से कम नही । बडी बात समझो कि जो आज बहू का पाच हजार रुपये द गया । अब झगडा तो पाई रहा नही । दरोगा लिय-पढ गया था । बोडी- कोही पर जान दन वाला नाज इतना उदार बना शायद घर पाली ने वहा होगा । हा सकता है इस काम मे बेटा भी अगुवा बना हो । धूप तज हो चली थी। चौधरी रामदाम एक पट के नीचे बसा हो गया । आखा के सामने ही उसप खेत थ । अब उसके पास अधिय जमीन नही थी। थोडी जमीन मलखु को बीमारी म वेच दी थी । स्वय तो बव काश्त कर ही पाता, बटाइ पर करता था। बटाईदार जितना द दे, यह उस पर निमर था। रामदास जहा सडा था, वही पर उसके गेहू स्टकर लाये जाते थे। महीना दीय चलती थीं। उस समय यशोदा जयान थी। गांव से पिया के लिए रोटी, छाछ लाती थी। रामदास रोटा खाता और यशोदा के रूप का रसपान करता था। अभी भी यशोग मिडवती, गेटी खाते हो या मुझे दखत हो । एम समय मे एक ही याम हाता है दो नहीं। तर रामदाम आइस हा उठता 1 वह मस्ती म भर जाता । अमहानि । 138 बनार रहता है, मन करता है, तुपे दरो जाऊ । फ्मोस तो यह है रितू औरतजान है। साका होती तो साथ में काम करता । कम माया मिलाकर चलता।' नब सोदाहस पडतो 'ममा लो, मैं तडना है। यही ता, साप काम यर । मुझे तो घर में जाकर बंटना है नहीं वहा भी काम करना उमो समय रामदाम को दृष्टि पटन एव तो पर गयी, दा पसी परम्पर चोच मिलाये बैठे थे। उनकी आखें बद थी ।नजाने वे दोना किम नमगार मे खो गये ५ । रामदाम एक्टा दष्टि मे देयता रहा। यह मोचन लगा, द | आदमी मी एसा ही सुख प्राप्त पर सरता। यहा न अभियान है,न आशरा हा, यह विक्रम चौधरी रात म ठीव से सो नहीं पाता । या तो विस्तर पर बैठा रहा है, या घूमता है । नौवर हाय म दूक लिये रात भर पहरा देता है । भला पूछे कोई इतना बड़ा विशाल भवन बनवाकर क्या पाया, इसने पुरखा ने ! आर यदि बनवाया जाय, ता लाखा स्पया लग। इटा वा भट्टा भी अपना लगाया था। पैसे की बात है मकान के सामने ही फाम है। वाग है । तरह-तरह के आम सोची और सन्तरे पैदा होने हैं। शहर के बडे-बडे अधिकारियो को डाली भेजता है, जो भी वहा अफमर आता है, इसी ने यहा ठहरता है चौधरी रामदाम लौट पडा। जब वह गाव मी तरफ जा रहा था, तो एक व्यक्ति सामने से आता दिखाई दिया। वह भी पिसान या । अपना खेत देखन जा रहा था पाम जाकर वह बोला-जाज मंस आय चौधरी रामदास बोला-'चला आया था, खेत देखन।' 'इस बार ता तुम्हार खेत की फमल अच्छी है। 'हा, अभी तक तो ठीक है। सौन है, तुम्हारा बटाईदार-रामभरोसे।" 'हा, अभी तर तो गही है। आदमी ता भला है । नवनीयत भी है। 'अजी, क्या खा भला है। मेरे इन सेतो की बदौलत दा भैसें पाता 139 - । दूर्व वचता है । भमा का चारा इही खेता म जाता है।' उस व्यक्ति ने कहा---'चौधरी यह सब ता हागा। घाडी घास म यारी करे ता भूपी मर जाय । रामभरासे का भैसें दूध इही सेतो की चौलत देती है । वह वाला-~-'अब तो तुम्हारा छाटा लडका बडा हा चला है ! खुद काश्त कराओ । बटाईदार से कुछ मिलता नहीं।' 'अरे, भैया । मलवू क्या मरा, मेरा, भाग्य फूट गया। मैं निरस्त्र हो गया । बूढा है इसलिए काम नहीं होता। छोटा लडका खेती नहीं करगा। यह तो मेहनत का काम है। मिट्टी क माथ मिट्टी बनना पडता है।' 'हा चौधरी | यह तो सही है । मुझको ही दवा, दोना लडर लगत है घरवाली लगती है। और मैं भी इन्ही खेतो व चारो तरफ घूमता है। वडी मेहनत का धा ह यह किमानी का। चौधरी रामदाम बोला-'लकिन विमान फिर भी नहीं साचता। वल के साथ काम करन वाना अपना दिमाग भी बैल सरीखा रखता है। बात-बात पर लडाई झगडे और थाना कचहरी इस क्सिान की मेहनत को कमाई शहर वाला की जेब म जाती है। बात मुनकर आग तुक चुप रह गया । तभी वह अपनी लाठी एक इट पर बजाकर बोला- लेकिन चौधरी, तुम्हार मलखू की वह बडी समझ- दार क्लिी। तुम्हारी ता गाव के बड़े घर से लहाई छिड गयी थी बहू न यह बचा दी। शिवा की तरह जहर का घट स्वय पी लिया। दोना घरा को बचा दिया । मैंने सुना है दरोगा भी तुम्हार पक्ष में था । विक्रम का हजारा रुपया पानी में चला जाता, और-ता और यह भी बात उड चली यो रि चौधरी विक्रम का पुत्र पुनिम न मारा था। वह अपमान को वरदास्त नहीं कर पाया । खून की उटी करन लगा था। लेकिन तुम्हारे मलयू की यह चुटीली धनपर भी वहा गयो । उसके मन मे वठा भय दूर रायी शाबाश उम औरत का । जब भी नहीं चार आदमी बठन तो यह यात चलती है। अब ता सुनत है, विक्रम न अपने को बल दिया है। चेता चमार की लडकी का विवाह था। बारात वा ठहरन के लिए कोई जगह नहीं था। चौपाल म बारात आकर नहीं ठहरी। लपिन विक्रम चौधरी न जब यह यात मुनी, ता चना का बुलाया जाना दावान 140 अपना मध्यस्थ बनाया, यह अच्छा नहीं दिया। यादमी माने चादी के गमदाम चारपाई पर वैट गया और बोला--'कालेज कासर्ना वोन यशोदा दोली-बहू कहती है, मुकेश का सच वह दी। चौधरी तीखी भाव में मुस्कराया- 'वह कैमे देगी। उनकी क्या बरगनाश्त होती है। दुकान चलती है या कारखाना? यशोदा में महा-कुछ भी हो, जव लहका पढना चाहता है, तो गगन चुलवा दिया । वागत के लिए दवेल भी गलना हा । सुदनी चना दे पर गया और कुछ देलाया गमदान बाला-अब स्वय बूदा हा गया है। न भी पहन चाहिये । शहर में एक वडा वगना बनवा रखा है, मुना हरि तहमा वहा रहा । अव वह गाव में रहना पसंद नहीं करता । कहता है, दहा असभ्या दौर जाली लोगों की जमात है। लेकिन उसकी मा इतर दिनार है। वह अपने पति को उक्माती है । उसके बच्चे शहर के सत में पटन है। उनकी दव-रेख के लिए आदमी रहना पड़ता है। हम मोटर जाती है और वच्चा का ले आती है। तब रमने कह गया-~-चौधरी, सब माया का सल है। चौगरी विन्म गार के लोगा बानी विरादरी मानता है 1 विमी म भाईचा। ग्यता है । वह अपन को श्रेष्ठ ममयता है । वह चल दिया । तव गाव की आर चलते हुए, गमदान के मन म बात उठी इत इन्सान में एकता मे हो ? भाईचारा कसे हा। यहा तो सब अलगअना हैं। निमाग अलग, सोचन का ढग अलग। उमन पर तेज रिये चौर बोला- 'यह पैमा ही मर विग्रह करता है। हमारे पुरखो ने इस पैतनो सिक्कों का समय लगा। मखारने नोट जापन शुरू कर दिये हैं, ताव भी जमीक्षेत्र हाने लग युना नही 'किमी न कई हजार सये * नाट चूल्ह की जड म माह दिये। जव निकाले, तो वहा मिट्टी का पुराना हाय लगा। नोट दीमक ने चाट लिय । पर जाकर दमा कि चबूतर पर मुकेश और उसमी मा । उसको मा ने कहा-'तुम्हारा वटा पाम हो गया। अब कालेज म जायगा। परदात मरगा।' 141 मैं पदाना पड़ेगा। हम अपना घर या शव कमरर देंगे । भग I दूध बच दिया जाएगा । उसको आमदनी म मुपेग व सेगा। 'जी हा । गत को जरा मा दूध मिल जाप सो तुम यह भी बद पर लगी। गमदाम योला-'यह यान सुनन म ना अच्छी लगती है, परन्तु इसमा व्यवहार स्वरूप क्या है। उमन पहा-'मैं आज मेता पर गया था। पमल अच्छी है। परन्तु हम क्या मिलगा।ग भगयान जान ।' यशोदा वालो- अर मैं पहल म अधिक चोरनी हो गयी यभी-कभी अधेरै म मेत दा आती है । जब पटेंगे गह, तो अपना अधिक समय वही पर दूगी । अपामामने अनाज का बटवारा यरूगी। मैंने देख लिया ह । गमभरोस गाला है। उसकी वह भी मार है। और-तो जौर, उसके बच्चे अप्रेरे उजाल मे सेत मे यरसी काट नात हैं। तभी नाभस पल रही हैं। कई-बार हजार की है, वे भम। मुक्श बोला-'आप न चाह ता मैं पढ़ ना ब द पर दूगा । वस अब खेती में कुछ मिलता नहीं । पसा चाहिए आदमी चाहिए। धीज, मार और पानी के लिए पैसा चाहिए।' 'हा बेटा । तू ठीक रहता है । अब खेती करना भी एप व्यापार है। मवकी शक्ति इस काम मे यारगर नही हा मक्ती । तू पठ। ची ए कर लेगा, तो कही किसी अच्छी नौकरी पर लग जाएगा। मुकेश बोला 'यह भी जरूरी नही पिताजी । सव सयाग की बात . में चौधरी रामदास न पुत्र को ओर देखा, उसे सराहा । लडका शऊर का वात कर रहा था। समझदार हो चला था। उसी समय एक व्यक्ति वहा आया और हाथ मे लिया अधबार दिखाता हुआ बोला-लो, पढो चौधरी पुलिस के सदर मुकाम जोरावर न आत्म-समपण कर दिया । अपना गोलिया से भग पिम्तोल पुलिस कप्तान को मौंप दिया चौधरी रामदास बिस्फारित हा उठा। वह कभी उस आदमी का देखता, कभी पास घडी यशोदा को । तप मुकेश वह अखबार लेकर घर म दोड गया, भाभो के पास 142
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-- क्यिा अपन जापयो जीवन की गगा म डुवो। उन दुहप पर मे अपन या पथक कर ले। यो रात दिन सुपिया के प्राणा म जहरीला धुआ घुट रहा था। वह स्वत ही तडपती। किसी घायल पछी की तरह पर फडफडाता। निश्चय ही उन दिना सुखिया अपधिर पीडित थी । उमको कठिनाई यह थी कि जपन मन की कथा विमी के ममक्ष प्रक्ट भी नही कर मक्ती थी। म अवस्था म उमे भ्रष्ट रहा जाता। कुल लिविनी बताया जाता । और कोई कुछ कहता या नहीं, परतु यशोदा नाच नोचक उस घायल बना दती । मुखिया को पता था कि उसका मसुर निपट जनाडी था। निरक्ष तो था ही बुद्धिहीन भी था। वह गवार ग्वालिय के समान, आदमी को दार की तरह हारता था । वात-बात म लाग उठाता था। आय दिन वह यशोदा म लडता था। गालिया वक्ता था। इमलिए घर मे और बाहर काद भी व्यक्ति या औरत एसा नहीं थी कि जिसस सुखिया अपन मन की बात कह पाती। वह निपट एकाकी थी। यद्यपि वह गाव था । वहा स्त्री पुष्पो का ममाज था, लक्नि सुखिया का अपना कोई भी हितू ही दिपार पडता था। वहा ऐसा शुभेच्छु नहीं था वि सहानुभूति के साय सुखिया को बात सुन ले और उचित राय दे। किन्तु एक दिन जब सुखिया देर तक चारपाइ से नहीं उठी, ता यशोदा उमक पास आई । वह अपने म्वर म नितात ममता का भाव लेकर बालो-'बहू, आज उठेगी नही । दप, दिन चढ गया। चौपाये भी जगल को चले गये। किसान अपने हल न गये । तर पितानी भी चाय का एक प्याला पीकर सेतो की तरफ गय हैं । जव गहूया की कटाई शुरू हो गयी है । वहा एक का रहना जरूरी है। तू उठ, मुह-हाथ धो। तेरे स्कूल का भी ममय हो जायगा । मुझे भी मता पर जाना है। दाल राटी बना लेना।' सुपिया उठ बैठी। परतु वह उदाग था। उसकी याखें भी लाला साल दिखती थी । यही देखकर यशादा बाली-'क्या बात है बहू, आज कल तू उदाम रहती है। बोल तो, बुध मन म लिय है । वह अशा विग लिय आता है । क्या उसम स्कूल का का काम लेती है।' मुखिया न बताया- आजरल अशा य स्वसपा छुट्टिया है । 144 वह मुये कुछ देर के लिए पढ़ा जाता है। वह अध्यापक है, इसलिा पढाई की बला समझता ह।' 'हा, यह तो है, बहू । परतु उसे भी ममझकर रहना है। यह अशोक अग्रेजी स्कूल का मास्टर है, मुझे तो एसे लोगो स डर लगता है। उस समय सुखिया को यह अच्छा नहीं लगा कि अम्मा मभी पर मदह करती है । एक दिन वह जगजीवन आया था, ता उस पर भी शक परने लगी थी । जब तर वह मेर पाम बठा रहा, भर चारा ओर चक्कर काटती रही मडी हुई नाली इस अम्मा के मन मे पाप ही भरा है। बदबू है, सडाद है। भला पूछे बोई इमसे जब किसी के मन म कोई आवाक्षा पैदा होगी, ता क्या यह राय लेगी चारा तरफ की दीवारे गडी पर भी उसे नही रावा जा सकता वहा से जाती हुई यशोदा चोली-'जल्दी कर | अब मुकेश की भी जुटटी हो जायेंगी । वह भी खेत पर आता-जाता रहगा । तुझे ता वह भी पढा सवेगा । दस जमात पढ़ चुका है, अब ग्यारहवी मे जा रहा है । दो- तीन वष बाद बी० ए० पर लेगा । अव तर तो यह किसान या घर था, लेक्नि आगे इसका रूप बदल जायगा । भर में मेज कुर्सी लग जायेंगी सोफा और न जान क्या-क्या हा रात कह तो रहे थे मुकेश के पिताजी, मुकेश की बहू चेपढी नही होगी । अब तू पढी लिखी होती ता मास्टरनी हो जाती । हाकिम हुक्काम सभी तो तरे पक्ष मे है । तारीफ करते हैं । यशोदा बाहर चली गयी। चबूतर पर किसी से बात करने लगी। उसकी आवाज सुखिया के काना मे भी आती रही। तभी वह स्वत ही बोली--'न जाने किस धातु का गला बना है इस अम्मा का । जब दखो दोलती रहती है। इस घर मे दानो का गुस्सा तेज है पिता का गुस्सा भी नाक पर रखा रहता है । निपट गवार है दाना। जिदगी पानी म बहा दी। एक बार भी नहीं सोचा कि इसान पिस प्रकार तरक्की करता है । अपना माग प्रशस्त करता है। लोग कही-से-कही पहुच गये और ये दोनो कूप-मण्डूप बने हैं । बाप-दादा द्वारा अजित थोडी- सी जमीन है । उसी पर इस गृहस्थ की गाडी को खीच रहे है वेचारा मुकेश पटा कुरता पहने स्कूल जाता था। मैंने जब कपडा दिया, तो 145 तब, दसरा कुरता मिल पाया । यदि मैं न रहू ता जारावर का लडका भी भूख म बिलबिलाता फिर । यह रहा जाता है, विमवे साथ खेलता है, यह जानन की क्सिी की आवश्यकता नहीं । मैं ता चाहती थी कि राहुन अपाठियान पर जाये । जारावर वे माता पिता इस बालक को रखें। परन्तु जागवर का मेरा यह विचार पमद नहीं था । वह यह भी नहीं चाहता कि उसक माता पिता को पता चले कि राहुल उमका बच्चा है। सस्वार अच्छे नहीं ह इन वुजुगों के । जारावर ने जिस लड़की को अपनी पनी बनाया, वह किसी अच्छी जाति की तो थी नहीं शायद अत्यन थी। य दोना परिवार यदि यह मय जान लें, ना इस राहुल का रहन | लिए न यहा जगह मिलगी, न वहा जोरावर व घर पर । बडे म्लच्छ विचार ह इन लोगा ये । इह पसा चाहिए, आदमी नहीं । जारावर की मा ने एक बार भी आकर नहीं कहा कि मेरा जोरावर अव नहीं मिलगा इम जीवन म मुझे दिखायी नहीं दगा। खाक पडे इस मा बेटे के सम्ब पर । लगता है, यह औरत भी नही समझतो विन जाने क्सि सस्कारवश वह एक बच्च की मा बनी है। धम जोर सस्कृति का स्वर अब औरता पे प्राणों में नहीं गूज्ता । ऐसी मा का नहीं झकझोरता। बट या मुह नेसने के लिए याकुल नही परता । उमी समय पडोम की एक युवा लडका आयो । सुखिया को एकाकी देखकर बोली- -'अब तुम्हारा बहुत काम बढ गया है, भाभी | चाची ता वेत की तरफ जा रही थी।' सुखिया न कहा-'हा, कटाई चल रही है ।' 'हा, भाभी । यही दिन है जब किसान अपनी महनत के चार दाने घर म लाता है । बाल-बच्चा की गुजर करता है । इही दिनो शादी- ध्याह भी किय जात है । अजीव जिदगी इस इसान की। कशमकश से परिपूरित " सुखिया मुसरा दी 'अब तो तू भी गगा की धार पर चढ़ा दी गयी है। ब्याह हो गया तो जिम्मेदारी का बोझ सिर पर उठाने को बाध्य होगी। सहकी का नाम रामी था। वह बोली 'भाभी, पहा मा-बाप 146 । पर भी क्या चन स रोटी मिलती है । सुवह उठो तो चक्की पर बैठो। फिर चूल्ह पर । झाडू बुहारू दो। एक काम तो नहीं अनेक काम है। रात को जब चारपाइ पर पडती है तो कमर टूट जाती है । उपर से तुर्रा यह कि क्मिी छोट भाई-बहिन का पाम सुलाओ। टट्टी कर द, तो माफ परो । पेशाव कर द, तो कपडे बदलो।' मुखिया हम पड़ी-गमी, मा-बाप का पर ही लडकी का स्कूल है। रही से सोख कर जाती है । खाना बनाना भी मा-बाप के घर सीखती उम पर भी, तमाशा यह साम महारानी की दस बातें सुनो। पति देवता यो खुश करने के लिए गत की रानी बनो । माग चोटी करा । माग मे सिदूर भगे। माथे पर बिदी और अब तो लिपिस्टिव पाउडर लगाना भी जावश्यर वन गया है। आसा मे काजल लगाना भी जरूरी ह।' वह हम पडी । रामी भी हस दी। वह बोली आज पुरानी बातें से याद आ गयी।' सुजिया बोली-'मैंने यह सब नही किया । सुविधा नहीं थी । माग नहीं थी। तुम्हारे भया तो मीधे-मादे थे । घर मे हात तो रोटी खाकर पड जात । जब मैं घर ये कामा मे निपट कर जाती, ता खर्गटे भरत होते । मैं जगाती, तो जागत ।' रामी हसती 'असली वात रोकती हा भाभी।' 'अरी अमली क्या, नक्ली क्या ? मेरा सोहाग तो कुछ दिन पा पा। बसत की बहार की तरह आया और निकल गया। अब वहार के दिन तो तुम्हारे हैं। सुना, कब प्रोग्राम है पिया वे पर जाने का।' रामी बोली-'भाभी नयी नौकरी ली है । वहा रहन को जगह मिलेगी, तो जाना होगा। आजवल शहरा म यह सस वडी परेशानी सुखिया बाली- अब जिदगी का मजा नही न्हा । सोहाग र दिन भी हवा की तरह आते हैं और निफ्स जाते हैं। पिमी को बैन नहीं। उसने कहा-'म स्कूल के काम से पुछ घरा मपाती हू, जब यहा के फरुण दृश्य देखती हू, तो अपनी पीडा भूल जाती है । तोमरी गली में एर घर है, रामदीन का। उसका सडवा महश अभी कुछ दिन हुए 147 - अपनी बहू को लाया है। लेकिन सिर मुडात ही बचार के सिर पर बाल पडे । इधर बहू को लाया, उधर नौकरी छूट गयी । लाला को एक सस्ता आदमी मिल गया। जिस दिन में उस पर गयी, ता दो दिन की भूखी थी उस महेश की बहू । घर मे दाना नही था । साम श्वसुर उस ताडना द रहे थे, यह कम्बस्त है, दुर्भागी है । तब मुझसे रहा नहीं गया । बढी लताड दी, उस महेश के बाप को और मां को । पाच रूपय मेरे पास थे, वह दे आई।' रामी ने कहा-'भाभी, घर घर यही अवस्था है । मर घर के बरा- वर म एम रहता है। बचार ने खेत काटा, अनाज निकालन व लिए रखा । किसी ने जलती हुई बीडी फेंर दी। रात म तज हवा चली। सब राख हो गया। वह इन्ही गर्मियो में लडकी का विवाह करने की बात मोच रहा था । परतु सब धरा का धग रह गया। अब राटी के लाले पड गय । रात मेरी मा उसकी बह को याडा सा आटा द आयी था। अव लोग सोच रहे हैं कि परस्पर चदा करें और उसकी लडकी ये हाय पील पर दिय जाए । विवाह की तिथि भी तय कर दी थी।' सुखिया ने गहरी मास भरी-हा, बीवी । दुखा की कोई सामा नहीं । विस पर किस विपत्ति का पहाड ट्टे, कोई नहीं जानता। उसने रोटी बनाकर कटोरदान म रख दी। फिर अपन को तयार करने के लिए चल पडी। जब सुखिया स्नान करके और कपडे बदलकर तयार हुई तो तभी सास-ससुर घर में आये । यशादा ने घर के चौव म पडी कहा-'वहू, मैं तुमम सुबह कहती थी न, इन आजकल + लडका का कोई भरोसा नही । दख रामनरायन को लहकी रात स गायव ह । वर हिमाशु है न वह उस पढाता था। रात स वह भी घर पर नहीं।' सुनकर सुखिया चवित बनी-'पुलिस म रिपोट कर दो होगा' लहवा या बाप रिपाट करने तो जा रहा था परतु मोगा न राप दिया । लडका भी ता कुटुम्बी था । एव जाप दिवाए तो नगी दूसरी दिनारा तो नगी उस ममय चौधरी घर म जाया। बोला-राटीदा। भूख लगी है। । हाकर न बहू der 148 नर सुप्रिया न रोटो परोम दी और पौधरी से सामने रख दी। यशोदा वोतो-'पासपस गाव मे क्या हो रहा है, यह मैंने बहू का बता दिया है। चौधरी वाला--'तू तो पागल है । इतनी बडी दुनिया है । पुछन गुरु तो होगा ही। जब हवा ऐसी चल रही है, तो बौन रोग समेगा?' उसने कहा-'अभी चार दिन हुए मन्दिर पर भी एा घटना घटी थी। मन्दिर पर एक माधु आ गया था। किसी ने उसे मदिर मे पौधे एम गहढे म पडे देग लिया था एव लडकी पे साथ। यह सारी जिसरी थी उससा तो नाम लिया नहीं गया । साधु को मारा पीटा । यह येणारा उना गया। - - 'तो तुम उमे 'बचारा बहते हो। उसका गला पाट ना पाहिए या।' 'जो हा ! तुम्हारा राज हो तो यही सब पलेगा। पया सदमी पा पोई दोष नहीं। जवान लडकिया दीवानी बनी फिरती हैं, गाय पे गलि हागे मे । उह भी ता मजा मिलनी चाहिए। लेशिरा पोर पोर राब मोमेर भाई' Tी पहायत सरिताय हो रही है। परम धैठपर लोग गराव पीते है । बच्चे-बच्चिया सब देखते है । मुझे पता चल गया था कि वह लडकी विराकी था। वाप जमाने भर के ऐब हैं। शराबी है, नुभारी है और दूसरोपी बहू-बेटियो यो हप गाो याला यशोदा ने पहा-'रणजीत होगा?" 'भरी छाड न? तू तो बाल की गान निमालती है। पाला भार या, तुझे क्या ।" 'अजी सोचना तो सबका पडता है । गाय पी पेटी, रायपी पेटी ।' 'अब वह जमाना नहीं रहा ।' पौधरी गटा हो गया । मुह साफ पर जब बाहर चला तो पहता गया, गिसग मे आग रप दे । और उमन स्वर पर जोर दिया-'बर तर सूल पा रामय हो गया । भौगों आन लगी है। स्य, अशोर भी आ गया।' अशोष' शब्द यशाल पेमा म अटय गया । परतु उसी पहा युछ ही। जय गुखिया सिलाई ये पमर म गयी, तो यह मशीन भोगा' 149 .
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- सुनिया ने कहा-'गटी तो कई दिन म ल जाते हैं । मुझसे ता आज कहा, नहीं तो चुपचाप निकालकर ले जान थे।' यशोदा का मन व्याकुल हो उठा । उस कुछ मदह हुआ और चुप चाप घर मे निक्लार तोता घर की योर चल पडी। गाय के बाहर जहा महा हुआ पानी भरा था, बदबू उठती थी, उसी के समीप तोता का घर था। घर क्या था, माटी या धगेदा था। कोठरी के द्वार पर जात ही, यशोदा ने देखा कि उगवा पति रामदास उस बूढे तोतः का बैठाकर अपने हाथ से रोटी खिला रहा था। यशोदा के लिए वह बड़ा ही अकल्पित दृश्य था । आखें भर आइ । वह अत्याधिर अनुभूति स आविझत हो उठी । उसकी इच्छा आई कि अदर जाये, परन्तु वह बाहर से लौट पड़ी। उसे लगा कि उसका पति अय बदल रहा है। जीवन भर यह उसे जिग रास्त से नटाने का प्रयत्न करती रही, अब यह स्वत ही उमसे हट रहा है। पशु भाव छोड रहा है और सात्विक स्थान प्राप्त कर रहा है। उसे पता था कि यह ताता नित्य ही मदिर पर जाता और चबूतर पर व तरफ बैठा थाखें वद क्येि, दोना हाया की तालिया बजाता हुवा हरे रामा, हर राम का जाप करता था। जब अधिक बूढा हो गया है। अशक्त हो चला है । दिवाई भी कम देता है। घर लौटार यशोदा न सुखिया को बताया कि अब तरा ससुर मीग मारने वाला भैसा नहीं रहा, सीधा-मादा आदमी बना है । उम तोता पा अपने हाथ मे रोटा खिला रहा है।' मुखिया बोली-'अम्मा, ममय व कुछ कराता है। जामी भी यदलता है।' यशोदा बाली-मुझस नहीं कहा और घर से चुपनाप राटी न जा कर तोता यो सिलाइ जाती है। मुखिया हस दी-'तुम रोज दती अम्मा । गेटी ले जात देख झगडा वरती।' नही री । मैं ऐमी मूख तो नही । यह तो पुण्य का काम था । मुखिया बोली-'तुम भिखारी का ता दो चुवटी आटा दे नहीं पाती, रोटी क्सेल जाने देती। 151 " बात कडवी थी, लक्नि माप थी। यशादा चुप रह गयी, वह नौकर व लिग गटी लेकर खत की तरफ ल दी। उमी ममय बाली-'तू कही जाए, तो बाहर का कुण्डा लगा पाना । तय, तेरा घर घर जाना अच्छा नहीं लगता। बर तुझे घर का काम करन का भी ममप नहीं मिलता। इस तरह से काम चलगा मुखिया वाती-~'अम्मा, जब ता काम परला शुरू किया ह, तब उम आर भी दखना पड़ेगा।' यादा दर मे जा यात मन म लिय थी, जब वह वह बठी, नो वह चुप नहीं रही। वह यी बात मुनकर वाली-'तव तो घर का काम करन के लिए किमी नौकर या नौवरानी की दरवार होगी। अपने ममुर स पहना घर का इन्तजाम करें। मैं जगल के खेत भी देन और घर का काम भी मम्भालू, यह मुझ रा नहीं होगा।' वह चली गयी। तभी सुनिया के मन म आया, इस अम्मा को मग " नही। काइ आमी मुझस आवर बाल ता वह भी लगता। वह अशोक आता है तो इस अम्मा की । गडता ह । इसका वस नहीं चलता, मर परा म जजीर बद पर दे और ताला लगा द घर पहुच गयी। आखो म दख आई कि रोटा और जल्दी-जल्दी घर के काम निपटा कर जब मु लिए धोती बदलने लगी, ता स्वत ही बोला, " अम्मा इनय पट म चार रहता है। जब वह मिलाई की मशीनें गाफ करन लगी ता बोली, मैं जाऊगा । घर म विद्राह ना होगा, बात का नहीं सकती। वट जारावर मेर वहन पर ही आत्म क्या पता मरवार उम कौन-सा दण्ड देगी। जारावर अब झासीनही जा मक्ता, लम्बी सजा गंगा, तो जी जेल से मुक्त कर दिया जा मरवार ने बहुत से पूती डार अवधि स पूर्व ही छाह 152 दया, क्तिनी ज ५ प दिया है और वे बाहर जारर अपना सरकार के काम करन लग है मरवार के समक्ष उनक सुधार का लक्ष्य है, न कि प्रतिशोध का यह सयाग की बात थी कि उसी समय नीचे से जगधर की आवाज आई-भाभी है क्या " पर कमरे म सुखिया न कहा- 'ऊपर आआ, भैया " जगधर ऊपर आ गया । वोला- आज छुटटी थी। तुम्हाग जावेदन पन जेल अधिकारिया के पास पहुंच गया। मिलाई करन वालो में ताऊ गमदाम का भी नाम है। सूत्र भाव से मुखिया मुम्बरा टी-- भगवान जान वह जायें या नही। जगधर बाला--'मैन नाम लिख दिया था। न जाय, उनकी इच्छा । चन शायर नृम्हागजकन जाना पसदन आता। मुखिया बाली-- भैया वडी कठिनाई है। अभी कुछ दर पहन अम्मा लडार गयी है । कहती है तग घर घर जाना शुभ नही । घर का का काम कौन करें? उसने कहा काद पूछे इनम, मिलाई पे स्कूल स जो पमा जाता ह, वह ता लत बुग नहीं लगता और मेरा इस काम म लगना पमद नहीं आता । अब तो घर का आधा खच यह स्कूल वहन करता है । मुरश की पढाई का वच, मुखे देना पडता है। जगधर वाला- भाभी, यह जगली लोगा की वस्ती है। यह अच्छा हुना कि तुमन अपन आपका ऊपर उठा लिया। इस ब धेरे से बाहर कर लिया । मचमुच, तुमन इस जीवन की धारा मे अपन आपका पखाग है। तुम्ह वैधव्य तो मिला नविन किमी दूसरे जन्म के मस्कारो ने तुम्ह उजागर बनाया है। मुखिया महज भाव स मुस्वग दा । मोती सरीख दाता से हस दी। तभी उसर मन म आया कि जगधर से कह दे, मैन उम जोरावर को भी बवर और दुर्दान्त बने खूनी जीवन से बाहर निकाला है। वह मेर अनुरोध हर ही जात्म ममपण कर बैठा है । परतु मन का वह उद्गार वह राक् बैठी । वह तुरत ही समय गयी रि मुह स निकली बात उमरे लिए काल बन जायेगी। यह जगधर गान म फला देगा और तिल का 153 जाए, वात कडवी थी, लक्नि माफ थी। यशादा चुप रह गयी, वह नौकर लिए गटी लेकर सती तरफ ल दी। उसी समय बाली-'तू यही तो हर या कुण्डा लगा जाना । दग, तेरा घर-घर जाना अच्छा नहीं लगता। जब तुझे घर का काम करन का भी ममय नहीं मिलता। इस तरह कसे काम चलेगा?' मुखिया बानी- अम्मा, जय तर पाम परला शुभ दिया ह, तव उम ओर भी दराना पड़ेगा।' यशादा देर से जो बात मन म लिय थी, जव वह कर वठी, तो वह चुप नहीं रही। वह की बात सुनकर बाली-'तव तो घर का काम करन के लिए विमी नौकर या नौवगती की दरकार होगी। अपने ममुर स कहना घर या इन्तजाम बरें। मैं जगल के खेत भी दे और घर का काम भी मम्मालू, यह मुझ से नही हागा।' वह चली गयी। तभी सुबिया रे मन म आया, इस अम्मा को मेग काम पसन्द नहीं। कोई जादमी मुझमे आयर बोले तो वह भी इसे अच्छा नहीं लगता। वह अशाक आता है तो इस अम्मा की आपो म शूल की तरह गडता है । इसका वस नहीं चलता, मेर पैरा म जजीर डाल द । कोठे में वद कर दे और ताला लगाद देखा, क्तिना चालाक है तोता घर पहुच गयी। आखो! सरख आइ मि रोटी वही गयी ह या वही । जल्दी-जल्दी घर के काम निपटा कर जब मुखिया स्कूल म जान के लिए धोती बदलने लगी, तो स्वन ही बोली, मिजाज की गयी है, यह इसक पट मे चौर रहता है। जब वह ऊपर कमरे में जारर सिलाई की मशीने माफ करने लगी ता बोली, मैं जोरावर वे पाम जरूर जाऊगी। घर म विद्राह नो होगा, बात का बतगड बनगा, परतु मैं रूक नही सक्ती । वह जारावर मेर कहन पर ही आत्म समपण कर बैठा है। क्या पता मरकार उमे कौन-मा दण्ड देगी। जगधर बताता था कि जोरावर अब झासी नहीं जा सकता, लम्बी सजा पायगा । चाल चलन ठीक होगा, तो जटी जेल से मुक्त कर दिया जायगा जगधर कहता था, मरकार ने बहुत से खूनी डाकू अवधि से पूर्व ही छाड दिरा है, उ ह समझा 152 दिया है और वे बाहर जागर अपना सरकार के काम करन लग है मरवार के समक्ष उनके सुधार का लक्ष्य है, न कि प्रतिशोध का। यह सयोग की बात थी कि उसी समय नीचे से जगधर की आवाज आर-भाभी है क्या ।" ऊपर कमरे म सुखिया न कहा- 'ऊपर आआ, भया । जगधर ऊपर आ गया। बोला-'जाज छुटटी थी। तुम्हारा जावेदन पत्र जेल अधिकारिया के पास पहुंच गया। मिलाई कग्न वालो म ताऊ रामदाम का भी नाम है। सूख भाव म मुखिया मुम्बरा श्री~~ भगवान जान, वह जायें या नहीं। जगधर बाला-'मन नाम लिख दिया था । न जाय, उनकी इच्छा। न्म गायन तुम्हारा को जाना पस द न आता। मुखिया वाली--'भया बड़ी कठिनाई है। अभी कुछ तर पहल अम्मा लटरर गयी है । कहती है, तरा घर-घर जाना शुभ नही । घर का का काम कान करें?' उसने कहा या पूछ इनम, मिलाई ये स्कूल से जो पमा जाता है, वह तो नत बुग नहीं लगता और मरा इस काम म लगना पम द नहीं आता। अब तो घर का आधा सच यह स्कूल वहन करता है । मुश की पढाइ का बुच, मुये दना पडता है । जगधर बाला-भाभी, यह जगली लोगा की वस्ती है । यह अच्छा हमा वि तुमने अपन आपको ऊपर उठा लिया। इम बट घेरे से बाहर कर लिया। सचमुच, तुमन इस जीवन की धारा म अपन आपका पखारा है । तुम्ह वधव्य तो मिला क्नि विमी टूमर जाम के मस्कारो ने तुम्ह उजागर बनाया है। मुखिया सहज भाव से मुस्वरा दा । मोती मरीखे दाता से हस दी। नमी उस मन म जाया कि जगधर स कह दे, मैन उम जोरावर को भी ववर और दुन्नि वने खूनी जीवन से बाहर निकाला है। वह मेर अनुराध हर ही आत्म ममपण कर बठा है । परतु मन का वह उदगार वह राक बठी । वह तुरत ही समझ गयी कि मुह स निक्ली वात उमक लिए काल बन जायेगी। यह जगधर गाव म फना दगा और तिल का 153
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आदमी या तिनावी तरह तोडा, वहा रहकर वे गिडगिडात रहत है,
याचक की तरह दात निचोरत ह काण, उसी जेल में सुखिया पहुच
पाती । अब वह उम दिन का वापग फिर कर नहीं देव सक्ती कि जब
मवप्रथम जोरावर उसके पास आया था। यह उसके विवाह के पूर्व ही
डाकू बन चुका था । पितु जब मुखिया सुहाग पी चूड़ी पहनकर उस
का पति मलखू जोरावर रा हाथ पक्डे वहां आया था । उनने सुखिया
को बताया था यह है, तुम्हारा देवर । नाम जोरावर । चाचा का लटका
सुनते ही सुखिया मुस्करा दी-'अच्छा ता तुम्ही हो, इमान या
गाजर म्ली की तरह काट देने वाले।'
जारावर बोला-'यह बात ता फिर कभी की ह, भाभी । अब ता
मरा प्रणाम ला । यह भट ला।' और उसने रेशमी रुमाल म बधे मोन
करनजडित वगन सुनिया की ओर बढा निम य । कपनो को दय,
सुखिया न बहा -'मुये डर लगता है।
'किसस? इन गना स, या मुझग
सुखिया लजा गयी--तुमस ता डर नही लगगा। इन वगना म
लगता है । जाने किमके हैं ? यहां मनाये है ? किराने होंगे? वह मार
दी होगी, उसषा पून पर दिया होगा।'
जागवर हमा--'नही, भाभी | यह ता एक सूदखोर की तिजोरी
से आये है । वह जम्न मारा गया। मेरी पिस्तौल की एक ही गोती मे
उभवा काम तमाम हो गया ।'
है राम, । बडे पत्थर हो तुम । लगत ता एम नहा।'
मलखू पास खण था । बोला-'दिल का कोमल है, यह जोरावर ।
हमारे पापा ने दो घर पर गिय थे। मैं ता नाहगा, इन दा घरा की
दीवार तोड दी जाय । दो घर एव हो जायें।'
जोरावर बोला-'समय आयेगा ता य घर एक बन जायगे। वीच
की दीवार गिरा दी जायगी।'
मुपिया हर्षित हो उठी-'बडा शुभ दिन होगा वह उसने कहा-
और करनी होगी। यह डाकू का पशा भी छोष्ट दना पडेगा।'
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ताद बनाकर पहना दि मैं उस जाराव को प्यार करती है। उमा समय तीन-चार युवा लडक्यिा और वहुए आइ । जगाधर उठ चला। जान- जाते वोला-'जब आवेदन का उत्तर आयेगा, तो मैं मवर वर दूगा । वैस अब म जल्दी नहीं आ पाऊ गा। शायद मेरा तबादला अयन हा जायेगा । अव पत्नी का गाव म छोड जाऊ गा । वह भी तुम्हारी शिष्या बन गायेगी। अच्छा है सिलाई का काम मीख लेगी।' मुखिया बोली-'यह धधा बुरा नही । मैं स्वय वीम रुपय नित्य Tमा नती हू । दा ब्लाऊज तैयार कर दिये ता इतन म्पय कही नहीं गये। म्यूल स जो पीस मिलती है, वह जलग । कुछ बहुए और लडक्यिा मुफ्त मधाम सीखती हैं। वे गरीब है और छोटी जाती वी होमगार ने जा महायता दी, उममे मशीन और इसका मामान आ चुका है।' गदगद् बनकर जगधर बोला--भाभी, तुम अपूव हो। समूचा गार तुम्हारी प्रशसा करता है।' उसन रहा-बुरा न मानो तो एक बात पहू, तुम्हें ससुगल अच्छी नहीं मिली । ये माम-ससुर दखन म हाड चाम वादमी तो हैं, लेकिन है पशु तुम्हाग ममुर तो पूरा जगली है । माम ईपालु और कुटिल ।' मुखिया न गहरी माम भरी और छोड दी। जब जग पर वहा म जाने लगा, ता वह उस बड़े रहस्यमय ढग से रखती रह गयी। जब तर वह सीढिया मे उतरा नही, मुखिया उसके जूता की पद चाप मुनती रही । उसी ममय एक युवा लडकी बोली-'इम जगवर वी बह मा मिलाई का काम मीपेगी, बल रहती थी। सुखिया ने कहा-जो भी आये उसका स्वागत है । किन्तु उस समय वह यौवनमयी मुखिया गाव से दूर, कल्पना व रहार उम जेल वे द्वार पर जा पहुची थी जिसर अदर जारावर बरी या जीवन व्यतीत कर रहा था। वह लौहार क्तिना पटोर था कि गुमिया अपनी शक्ति लगावर भी उम नहीं गात मानी थी। वह कभी निसी जेल य द्वार पर नहीं गया। परन्तु मुन रमा था कि यहा हथियार बद सिपाही रात दिन पहग लगात ह । काई परिदा भी वहा पर नहीं मार गमता । उम जेल म खमार दी यद रत है। जिहान कभी 154 7 आदमी को तिना की नरह ताहा, वहा रहार वे गिडगिडात रहन है, याचक की तरह दात निचोरत है काश, उमी जेल म सुखिया पहुंच पाती । अब वह उस दिन का वापग फिर कर नहीं देख सक्ती कि जव मवप्रथम जोरावर उसके पास आया था। वह उसके विवाह के पूर्व ही हार वन चुका था । यि तु जब सुखिया सुहाग की चूडी पहनकर उम का पति मलखू जोरावर का हाथ पक्टे वहा आया था । उनने मुखिया को बताया था यह है तुम्हारा देवर ! नाम जारावर । चाचा का लडका है मुनत ही मुखिया मुस्करा दी-'अच्छा, ता तुम्ही हो, इसान का गाजर मूली की तरह काट देने वाल । जोरावर बोला---'यह बात तो फिर भी की है भाभी । अब ता मग प्रणाम ला । यह भेट लो। और उसने रशमी रुमाल म बधे मोन थेरनजडित मगन सुप्रिया की ओर बढा दिये थे । उा कगना को देख, मुखिया न रहा -~-'मुये डर लगता है। विसस? इन वगनो से, या मुझरा सुखिया लजा गयी-'तुमस ता डर नहीं लगगा। इन कंगना म लगता है। जाने किसके ह? कहा गजाय ह किराने होंगे? वह मार दी होगा, उसवा पून पर दिया होगा।' जोगवर हमा-'नहीं, भाभी । यह ता एक सूदखोर की तिजोरी से आये है । वह जरर मारा गया। मेरी पिस्तौल की एक ही गोली म उसवा काम तमाम हो गया। | बडे पत्थर हो तुम । लगत ता एम नहीं।' मलखू पाम खा या । बोला--'दिल का कोमल है, यह जोरावर । हमारे पापा ने दो घर पर दिय थे। मैं तो नाहगा, इन दा परा की दीयार तोड दी जाय । दा घर एष हा जायें।' जोगवर बोला-'समय आयेगा तो य घर एक बन जायगे 1 बीच की दीवार गिरा दी जायगी।' सुयिया हपित हो उठी--'बडा शुभ दिन हागा वह उसने कहा- 'एक बात और करनी होगी । यह डाकू या पशा भी छोर दना पडेगा।' 155 'ह राम, 'हा, भाभी । समय आयगा ता यह भी छूट जायगा । भगवान की इन्छा सर्वोपरिह । उगी के निर्देश पर हमारी जिदगी का कारवा बनता बलात सुदिया उम भूतकाल की बात को एकाएक छाड वैठी । एक लटबी उसके पास आकर पडी यी और कह रही थी, 'बहिन जी आप मेरी बहिन की फार गी दना । उसका क्या दना होगा, बता देना। मुखिया जैम आममान मे धरती पर आ गिरी हो । चौंककर लडकी कीजार दखने लगी। तब भी वह जम जाग्रत स्वप्न नख रही थी। जोगवर नित नित उसकी ओर बढ़ रहा था। वह बरबस ही उसक प्राणा म घुम जाना चाहता था । वह जवान जोर वलिष्ठ तो था ही, मुदर भी था। सुखिया जब-तव उम दखती, अपन ममक्ष उस खडा पाती, तो वे क्षण उम जलभ्य लगत । मानो वे उसके जीवन के श्रेष्ठ पभ य । उसे विधाता न उम सौगात के रूप म न्यि थ । कि तु सुखिया अपने उन दिना का महेत पर प्राणो क परकाटे मे छुपाकर रख सस्ती थी। किमी को बतान या निखान की स्थिति म नहीं थी। और जब उसन स्वय जोरावर 7 मुह स यह सुन पाया कि वह एक कुमारी म विवाह कर चुका है । उसी का पुत्र सुप्रिया का मापता है, तो तब उम यौवनमयी सुखिया के मन लोक म हा-हानगर ता उठा, वह उम रोमाचित भी कर बैठा, परतु उम पीडा को, अपने मानस अभाव को एक बार भी जोरावर को नही यताया । उम पर यह प्रदर्शित या प्रक्ट नहीं किया कि वह भी उमे प्यार करती है वह भी नारी की अनुभूति और अभिसार की भावना उम समर्पित कर चुकी है । मुखिया के मन का और जीवन का यह मयम जपून तो था ही, निस्पह भी था। कदाचित इसी भारना के सहार वह जागवर व बच्चे को छाता मे लगा वठी थी उसे पाल पोम रही था। मामने मुडी लगी ने फिर कहा-'हा, क्या कहती हा वहिनजी । कुछ माच रही हो। मचमुच मुखिया लजा गया । उम लड़की म वाली- 'हा, क्या कहा नुमन । 156
लडकी न पड़ा दियापर कहा-'इम फार की बात । क्या दना
होगा।'
मुखिया न यहा- आज बना दूगी। जो कुछ टगी तरी मा, 7
लूगी ।' और वह बरयम मुस्वग कर रह गयी ।
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वह दिन ता सुम्बिया लिए निता त अपूव था। जब पाम में पस्व
म उम एव आयाजन म आमपित क्यिा गया। वहा जिले के अनेर
विशिष्ट मरसारी अफ्मर उपस्थित थे। गाव के भी कई जमीदार पहुच
हुए थे । चौधरी विक्रम और उसका पुत्र भी था । एक मत्री ने मुखिया
या पाच हजार रुपय का चर प्रदान किया और कहा, यह युवती हमारे
भमाज की शाभा है । जिम प्रकार इमन अपन आत्रामक को पक्डा, वह
॥ सगीय काय था। म त्री न नारी समाज का आवाहन क्यिा
और चाहा, समाज म नारिया अपना पौरप प्रदशित परें । गुण्डा ना
मामना करे, उह आगे न बढने दें।
मुखिया के साथ चौधरी रामदाम और मुकेश भी था। जब वे उस
जलमे से लौट चले, तो तभी मुखिया वोली - 'पिताजी जाज क्रम
आय हैं तो कुछ खरीद लें। तुम्हारा कुरता फट रहा है । सिर का
दुपट्टा भी जीण हो चला ह कुछ कपल खरीद लिया जाय । यह मुकेश
जब कालज जाने लगा है, तो इसे भी शऊर का कपडा चाहिए।
रामदास बोला 'जब गेह घर म नाया है। कुछ बेच दिया
जायगा । अब पसा आयेगा, तो तब कुछ खरीद लिया जायेगा। इस
मुकेश की मा के पाम भी धोती नही, तो उसे भी कुछ लिया
जायेगा।'
सुखिया ने कहा-'दुकान पर चला । रुपया मेर पाम है । गाव स
चलत समय मुझे ध्यान या। और वह स्वत ही बजाज की दुवान की
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सरप पर चली । तब रामनाम अवरोध नहीं कर पाया । स्पष्टत वह अभावग्रस्त या । गत रात म ही वह यशादा घर के अभाव की बात कर रहा था। नर यशोदा ने कहा था, 'रुपया ताह-यह पास । "तना कमाती है हर माग, यह कहा जाता है । कुछ थोडा मा * देती ह जत्रत पड़ने पर । तब रामदाम ने कहा था, 'मैं रहू म युछ नहीं माग मवता। उसने परिश्रम का पमाह वर उमीका - यह सुनार यणोटा युग मे भर उसी थी। वह तुरत बोली, 'नोयरी विक्रम ने पाच हमार दिया, वह भी उमी पर है । म धमात्मा बनने म क्या नहीं चलेगा, तुमने बर का बहुत सिर पर चढा लिया है। यह दती हूँ एव दिन तुम्ह मूड पपहार राना पडेगा। यह सुनत ही, नौधरी गमदाम क्षच हा उठा या । तुरत बोला- 'तू मूखा है। तो मन म ईपी है, कुण्ठा है । यती नही, बहू की जवानी पानी ग बही जा रही है । उसका पति चला गया। मरी जवानी म विधवा बना गया । उग पर तमा।' यशोदा तुना उडी-'आ हा तुमा बहू की जवानी और विधवा बनन की बात तो उठा दी। कभी यह भी सोचा, जिस लडने को मन नो मास पट म रजा, पाला-पामा वह मेरी छाती पर घूमा मारकर चला गयी। मरमन को पीडा क्मिी ने समझी है।' उम ममय मुखिया पर की दहलीज मे खड़ी थी। वह मास श्वसुर की बातें सुगमता से सुन रही थी। तभी यशोदा न कहा-'तुम्हारी बहू की करतूत मेरी दखी-सुनी हैं । तुम्ह तो लाज आती ही, परतु मैं अपना मास रोके पड़ी हूँ। तुम्हार भाद का लडका जारापर कब क्य यहा आया है यह मैं सब देख चुकी है। लपिन चुप रही। अपने दुरदिना वो मार स स्वप घायल बनी आश्चय, चौधरी 'रामदाम तब भी चुप था। वह अपने प्राधी स्व भाव के विपरीत बना शान्त भाव से हुको म घूट भर रहा था। यशोदा पति से कुछ नही सुा पायी, तो वह स्वदः । बोली- हे र है, पर की यह अवस्था रही, तो वह मभी को 1
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- - 'पिताजी सुखिया का स्वर बाहर आया । 'अरी, उठन | देख, कितना दिन चढ आया । आज वम्ब म भी जाना है ।' रामदास जहरीला पट भर बाहर की तरफ चल दिया। उसने घर की डयोढी मे खडे होकर वहा- जग मेरी चिनम म बाग रख द । एक प्याला चाय भी दद।' वह बाहर चबूतर पर जा बैठा। निश्चय ही उम समय उसे सुखिया का साते रहना नितात अशुभ लगा। परतु वह थक चुका था। साप बूढा हा गया था। अब उसके मुह म दात नहीं रह गय थे । फुफकारना भी उसकी शक्ति म पर था। जब यशादा चिलम भर कर लायी तो तभी रामदाम बोला तरी सब बात सही है, यगोदा । म भी सब कुछ देखता हू। बहू अब हमारी पक्ड से बाहर है । दख, जाज जिस जायोजन म यह निमप्रित की गइ है वह भी अपूव है । एसा सौभाग्य प्रयक औरत का नमीब नहीं हाता, न् चुपचाप अपना रास्ता तर्क कर रो । मैं भी बूढा हूँ । एक न एक दिन इस घर की बागडोर टस बहू के हाथ म आयगी। इसी को यह घर चलाना पडेगा । जा एक प्याला चाय और ले जा। कलेजा निक्ला जा रहा है। यशोदा चोली- चूल्ह म बाग सुलगा दी है। जब शहर जाना है तो चार पराठे बना दूगो, एक दो या जाना । अचार रख द्गी । मुक्श भी तो जायेगा। भाभी दवर मे गत वातें चल रही थी मेरी कोई वान माने या न मान, भाभी की वात जर मानगा । कारज जाता है, ना भाभी से कुछ कुछ ले जाता है।' 'यह अच्छा है । भाभी-नवर का व्यवहार मधुर हा, ता इस घर के लिए शुभ रहेगा। वह हुक्का पीन लगा। जब यशोदा घर म लौटी तो विस्मित बनकर दखन लगी, मुकेश चूल्हे व पाम बैठा भाभी के साथ हस वाल रहा था और चाय क साथ पराठा खा रहा था । वह कह रहा था-'आज मुझे पट वा और बुश घट या क्हडा दिलाना, भाभी अब मैं अच्छे कपडे वा पैण्ट लाऊगा । गाव के दर्जी का कपडा नही दूगा ।" तर सुखिया कर रही थी-'अच्छा अच्छा, तू मनपसद कपडा र 160 ना। अपनी इच्छा मत मारना ।' तभी यशोदा पास पहुचकर बोली- क्या र, पिताजी का चाय नहीं देगा। चाय के साथ पराठा भी देकर आ खुद । खाने वठ गया । स्वार्थी रही वा। मुकेश तो कुछ बोला नही, लेकिन सुखिया ने कहा---तुम पिताजी से बातें कर रही थी । अब दे आयेगा 1 ला, अब तुम आ गई हो तो द आओ । यह खाते हुए क्या उठेगा ।' उसने प्याले म चाय और तश्तरी मे पराठा रख दिया । जब यशोदा बाहर की आर चली, तो मुकेश बोला- देखा भाभी, मा को पिताजी का ध्याय रहता है हमारा नहीं।' सुखिया हस पडी-'ऐसा ही होता है रे । पति पत्नी का सम्बध अधिक निक्ट का होता है । किसी ने कहा तो है, मा के बाद पत्नी ध्यान रखती है अपने पति का कोई और नहीं।' मुकेश बोला-'ये सब स्वाथ का सम्बध है, भाभी ।' 'अरे स्वाथ तो सब कुछ है ही ! यह ससार इसी भावना पर टिया है । यह अशुभ नहीं । स्वाथ ही प्रेम पैदा करता है । यही तो लगाव ह, एक दूसरे को आर्पित करने का । ले, एक पराठा और ल जा पिताजी को।' जब मुकेश पराठा लेकर बाहर गया तो देखा, वहाँ पिता के पास एक-दो व्यक्ति आ वठे थे। वे सब नगर म सम्पन्न होने वाल आयोजन की चर्चा कर रहे थे। एक आदमी यशोदा से कह रहा था, तुम भी चलना, चाची तुम्हारी बहू ने इस घर का तो मुह उजाला किया ही, गाव भी उजागर कर दिया। इस आयोजन का समाचार सभी अपवाराम निकलेगा । तुम्हारी बह का फाटो भी छपमा ।' वह बोला-'इसे कहत हैं समय की बलिहारी। तुम्हारी बहू को भगवान ने ऐसा साहस दिया, अपना पौरुष प्रदर्शित किया, यह कम साहस की बात नहीं यो । कोई दूसरी औरत होती, तो छुरा खापर भी मुह न उठा पाती । भय से स्वय ही मर जाती। रामदास ने चाय पी ली और पराठाखा लिया । वह यशोदा की ओर देखकर वोला-'बहू से कहो, तैयार हो जाये । दम बजे का समय 161 रसाद । हम जल्दी पहुचना है । उदी पर नाव का इतजार करना पडेगा।' उसमयहा गया'चाधरी विक्रम भी तो जायगा । उसपी मोटर म जाना । गाडी ता पुल स जायेगा।' 'नही भया । वह बड़ा आदमी है । हमे तो अपनी औरगत देयकर चलना पडेगा। अजी, उसपे लडके की बदौलत तो यह सब हो रहा है । वह गुण्डे को न भेजता तो क्या यह सब होता। उसने भाग्य ही बदल दिया तुम्हारा । इस कहते हैं, बुल दो पर चमक्ता सितारा।' रामदाम ने यात मुन ली, चुप रह गया। आग तुर एक-एक कर लौट चने । उसी समय मुकेश घर म में आया और बोला-'चलो चाचा । भाभी तैयार हैं। चौधरी न जूती पहन ली, सिर पर दुपट्टा रख लिया और हाथ में लाठी सरर चल दिया । तीना नदी वी आर बढ़ चले । जब वे सब मोहल्ले से निकले तो कई औरता न मुखिया को टोका, 'अच्छा जा रही है, न मिठा' लाना । अकेली मत खा जाना । जब यह आयोजन समाप्त हुआ और सुखिया पिता-पुत्र को लेकर बजाज की दुकान पर पहुची, तो उसने कई सारुपये का कपडा खरीदा। यशोदा के लिए एक रशमी साडी ली एक सूती । पिता-पुत्र को कपडा दिलाने के साथ अपने लिय भी एय धोती खरीद ली। राहुल के लिए भी नर और कमीज का पडा । उस समय रामदास चुप था। घर मे कपडे की आवश्यकता थी, यह वह यनुभव कर रहा था । परन्तु बहू अपर लिए और सबवे लिए कपडे ले रही थी, यह सब उसे पसदन था। मानो उसब घर म एक नया दस्तूर शुरू हो रहा था । यह उसके पुरुषत्व पर और स्वाभिमान पर चोट कर रहा था। जब वे लौट चले तो मुकेश बोला-भाभी मिठाई नहीं लोगी। परसाद तो वाटोगीन" 'क्सि बात का रे 'वाह, तुम्हे बहादुरी का काम मिला है। इसको मुशी तो सबका 162 -- होगी न ।। 'अच्छा र । बाल क्या लगा? दप, वह है हलवाई की दुकान । सेर भर जलेबील ले।' 'नही भाभी | जलेवी नहीं कलाद।' 'अरे कलावद क्तिनो को बाटेगा।' रामदाम बोला- थोडा परनाद मदिर पर भी चढा आना । बूदी ले ला।' मुखिया न पा निकाने और मुकेश मे कहा---'दा मेर लेना। तुझे क्लार द पम द है, ता वह भी ले लेना।' दिन ढलते वे मब गाव मे लौट आए । घर पर आते ही यशोदा न एक लिफाफा मुखिया के हाथ पर रखा, यह जेल में आया है । जोरावर ने कुछ लिखा होगा। दस तो क्या लिखा है।' मुखिया ने लिफाफा खोलकर देखा । जेल अधिकारी का पत्र था। जोरावर से मुलाकात के लिए दिन और समय नियत किया था। तब मुक्शन भी वह पत्र पढा और सवको आगत पत्र का उद्देश्य बता दिया। सुनत ही यगोदा बोली--'हाय राम | अव यह बहू जेल पर भी जाएगी। वहा क्या भले घरो की औरतें जाती होगी।' पत्नी की बात सुनत ही रामदास वाला~-जरी पगली | भर तू इस बहू को पहली आखो स मत देख । आज मत्री कह रहा था। ऐसी बहादुर औरतो को घर से बाहर निकलकर जनता का काम करना चाहिए । उने जनता के वोटो से जिताकर असेम्बली मे भेजना चाहिए।' उस समय सुखिया धर म जा चुकी थी। वह दख रही थी कि कई सौ रुपये वात-की-बात मे चले गए। कपडा भी आना था। जो पैसा वह बचाकर लाई वह उसी स्थान पर सुरक्षित रूप से रख दिया गया वि जहा उसका सचित कोप था ।, वह कमरे के एक कोन म माटी हटाकर हडिया में रखा गया था। उसी हडिया म शेप रुपये रखकर वहा माटी का समवार कर दिया और अपने आप कहा, यह रुपया यहा नहीं रखना चाहिए। यह स्थान सुरक्षित नहीं । सब पसाबको मे डालना पडेगा।' उसी समय घर के बाहर चबूतरे पर पति पली मे विवाद चला 163 था, यह जेल पर जाय या नहीं। पति रामत था, जाएगी। पिन मशोदा अपनी बात पर अड़ी थी बढ़ गी, तो मैं अपन प्राण गो दूगी । तुमन बहा छट र दी है, इस औरत या । भय नाप गटन म दर रही।' लेकिन रामदास वा मत था-नाप तो पट गर,पर इस पर " वागडार भी बहू के हाथ म ली गई। 21 घर में चले लम्ब विवाद और विग्रह न एक गहरी खाइ पोद दा था उस खाई के एक विनार मुखिया थी और दूसरी ओर यशोदा । पुराने और नये विचारो का मधप ही उम घर म विवाद का कारण बना था। रामदास दुमई की तरह कभी बहू की आर झुक्ता कभी अपनी पत्नी यशोदा की ओर। उस विवाद की जड म था जोरावर । यद्यपि अब वह जेन मे बद था, परतु यशादा को लगता कि वह कालफूट की तरह उस घर का अस्तित्व समाप्त करन पर तुला था । उसके बेट की बहू को जोरावर साफ सटक जाना चाहता था। वह उसके प्रभाव म थी । यद्यपि यशोदा ने कई बार सुप्रिया से कहा था कि वह जारावर चोरी छुपे घर म आता है, मुझे अच्छा नहीं लगता । वह डाकू है। सूनी है। दुराचारी है। मेरा लद्धका मर गया तो इसका यह अथ नहीं कि इसकी विधा बहू के मन पर कोई दूसरा छा जाये । लुक् छुपकर उसके पास आकर बैठे। लपिन जब-तब यशाना ने अपना प्रतिरोध व्यक्त किया, तो तभी तब सुखिया ने साफ कहा-'तोरापर टाय है ता, खूनी है ता है तो अपना हो जश । खेद है । मगा-महार है। उसे मे रासा नाय । विस मुह में कहा जाय। एक बार उसने माप कह दिया था'अम्मा, जोरावर को तुम रोक मरती हा नो रोक दो। मैं कुछ नहीं कहूगी। 164 । और वह की उम स्पप्ट बात को सुन यशोदा क्षुब्ध हो उठी थी- *हा, तू क्यो कहांगी। राड, माड, सयासी की कहावत तो जानी पहचानी समय गई, तू भी इस घर का मुह काला करेगी। उस दिन सुप्रिया स्वभाव के विपरीत चीख उठी थी-~मा, ऐसी अशुभ वात मुह स मत निवाला । लोक-लाज को ताक पर मत रख दो। सुनते रो यशोदा ने अपने माथे में हाथ मारा-'हाय राम । कसा चीखती है । देखो, ता कैसी जबान चलाती है। और वह स्वत ही उस विवाद को बीच मे छोड वाहर दरवाजे पर जा बैठी थी। तब यह बात यशोदा ने और चौधरी रामदास ने दर तक मन से नहीं निकाली कि माम वह के उस विवाद म दो दिन तक उस घर व क्षितिज पर विपाद के काले बादल मडराते रह थ। यदि रामदास मध्यस्थ न बनता, ता मुखिया न ता राटी खाती और न ही घर का कोई काम कर पाती। वह दो दिन तक भूखी पडी रही । न घर म याड-बुहाम दो, न रोटी बनाई। लेकिन तीसर नि स्वय रामदास ने स्थिति को सम्भाला। बहू को समझाया। उस अवसर पर यशोदा को भी बुग भला कहा। यद्यपि यह स्वय जगली था लडाकू स्वभाव का था, परतु उस दिन पूरा व्यावहारिक और राजनीतिक बनकर अपन-आपको घर का मरपन सिद्ध करन म सफन वना था। उस अवसर पर वह सुखिया की भावना का ममथक भी था और विरोधी भी। जोरावर उस परिवार का अआ था। इमलिए उसका बहू के पास आने का अधिकार था, परतु उममा यह भी मत था कि वह मना बेकार है जा कान फाई डाकू और खूनी जोरावर इस परिवार के लिए शुभ नही हो मक्ता। वह जिसके पास बठेगा । वह भी कानूनी अपराधी बनेगा । पुलिम उस बख्शेगी नहीं। माप म खेलने वा अथ था, अपने प्राणा को खतर मे डालना नेक्नि वह बीती बात अव भुता दी गई थी। जब जोरावर स जेल मे मिलन वी वात आई सुखिया न चुपचाप ही जेल अधिकारियो को आवेदन पत्र भेजा, तो तव सध्या के झुरपट मे जब रामदाम रोटी खापर हुक्का पी रहा था, यशोदा ने पास आकर कहा-'देखा, यह है बहू का रग रूप । मैं कहती थी, चुप-चुप जोरावर की ओर इम बहू की माठ- 165 गाह चलतीथी न जाने जापस म क्या कुछ कहा जाता था ! जब जेल पर जाकर उसमे मिलन की बात मूझो है । जिस बात को गाव नहीं समाता था । अब समझ जायेगा । घर म न तुमसे सलाह को, न मुझसे शट से लिखकर भेज दिया यह कई लडके पास आकर बैठते हैं, वे ही यह सलाह देते हागे इस घर में आग लगे और वे हाथ सके, या भला बिसे बुरा लगगा रामदास उठकर बैठ गया और वाला- अब त यह पता, जब हाथी के दात बाहर निकल आते हैं, तो वे क्या पिर अदर हो जाते है अब बहू इस घर के दायरे से बाहर निकल धुकी है । सुता नहीं मापन जो बच्चे देती है उसम से कुछ सा जाती हैं। जो बच्चे उसकी कुण्डली मे याहर निकल जात है, वे बचे रहत है। वे नाग बनत ह और इमान के लिए बाल सिद्ध होते है । बम, ममझ ल, तरी यह वह इस घर की कुण्डली से बाहर जावर न तेरी बात सुनेगी न मेरी। मैं भूला नहीं है इस बात को, जब इस जोरावर के नाम पर यह न दा दिन तक रोटी नही खाई थी। घर म क्लेश किया था । मैंन तभी समझ लिया था, अब इस घर की हवा बदल गई । म बूदा हो गया, तू बुढिया। जब इस घर के दिन मीधे होते, तो तुम्हारा हायी सरीता पटा कंस मर जाता ! इस पर या चिराग ता उसी दिन युग गया था यशोदा वाली-तो तुम्हारा मतलब है वह वा जैल पर जाना होगा । उम डाव म मिलना जरूरी होगा।' रामदाम ने गहरा मास ली-'हा मलख की मा । अब हालात बदन 'ता अोली जाएगी या साथ म काद और" रामदास बोला-'अर्जी म मेरा नाम लिखा है । मुझका हो जाना पडेगा।' 'तो तुम भी मिलाग उस गुनी से। 'नहीं नहीं यह मुलारात बरगी। में ता उसको मूरत भा दखनी नही चाहता। 'उराब मा-बाप नहीं जाएग पका 166 .
रामदास क्षुब्ध हा उठा--'और मोई नहीं जाएगा। बाप ता जेल के नाम से डरता है।' यशोदा ने चुटकी ली-'वेट की कमाई तो खूब खाई। वह दोलत जमीन मे दाबकर रख ली। गम नही आई, डाकू का माल खाते ।' 'ओ-हो । तू तो वाल की पाल निकालती है। रामदाग बोला- 'जोरावर तुझे कुछ देता तो क्या फेंक देती? पैसा सभी को प्यारा होता 'और लोग क्या रहगे, जब सुनेंगे कि तुम वा' को कर जेल पर गए हो, उस जोरावर स मिलने ।' रामदास तीखा हो उठा-'तो मैं क्या कर ? कह दिया जब इस घर की वागडोर मेरे या तेरे हाथ म नही, बहू के हाथ मे है । आज कह सौ रपये या कपडा लाई है । मेरा-तुम्हारा दलिददर भी दूर कर दिया । मेरा दो कुरतो का पहा है । साफा अलग है। तेरी भी दो घोतिया है, ब्लाउज का कपडा भी। मुकेश तो उछलता है कि अब उसकी पैट बनेगी और अशअट । वह भी एप नही दो दा । मैंन कहा भी, इतना खध करना ठीक नही, तो बहू ने कहा-'यह मुकेश कपडे जल्दी फाडता है। खेलता-कूदता है । बहू ने अपनी भी एक या दो साडी ली थी।' यशादा ने सांस भरी- हाँ, यह सब तो है परतु मेरा कलेजा दहलता है। यह बहू तेजी से उस जोरावर की तरफ जा रही है । इतना तो समयती है कि अब वह वाहर नहीं जाएगा। फासी नहीं पाएगा, लम्बी सजा तो पाएगा। वह मरने म पहले बाहर नहीं आ सकेगा। रामदास न भी सास खीची और पहा-हा, हात तो एमे ही है । बहुत अपराध है उस नाम पर।' 'क्या जी यह क्या सूझी उसे कि आत्म समपण कर बठा । उस दिन गाव के बाहर पुलिस ये घेरे म जापर भी निकल गया । कई सिपाहियो को घायल कर गया। रामदास बोला-'उनम से एक मिपाही तो अस्पताल म मर गया था।' 'हाँ, यही ता । पुलिस भी उसके नाम स घबराता थी। यह भी 167 मुना था कि कुछ पुलिम वाले उमारी मदद करत थे । 'वेशक । यह बात सही थी। रामदास योला-'पिछल माल जव थानेदार की लड़की का विवाह हुआ, ता जोरावर न लडके को स्कूटर दिया था । वह शायद दस हजार मे ऊपर आया या । लडकी का साडी और हाथ की गोो की चूडिया दी।' तो उसने दरोगा की लहकी ये विवाह वा दावत मोवाइ होगी?' क्या नहीं ? मैंी ता सुना उस गत मे उसने साथिया सहित खूब शराब पी थी। थाने के आसपास की किमी मकान म रहा था।' सूखे भाव से विपाक्त बनकर यशोदा मुस्करा दी-'इसे बहत हैं, वही छिनरे सो गली के साथ रामदास हम पडा--'इमका नाम दुनिया है। इस समझना कठिन है। 'म तर मैं पढ़ और माप वे भट्ट म हाय तू द यह कहावत ता सुनी होगी। इस गाव म ऐमे कद आदमी हैं कि जा जोरावर यो मुखबरी करत थे। पुलिम की सव रिपोट उमवे पाम पहुचात थे। हा हा, ऐस ता कई ह । तिलकधारी है । और-तो-और, मदिर का पुनारी भा है । जिस रात पुजारी की लडकी का विवाह हुआ, जारावर गाव मे था । पुलिस भी थी । आख मिचौनी की तरह दोना एक दूसर को देखकर छुप रहे थे। यशादा उठ चली । घर में जाकर देखा, सुखिया सो गइ था । बच्चा भी पाम मे मो रहा था। चादनी रात थी । चाद की चादनी सुखिया के मुह पर पड रही थी। उसका गोरा शरीर, यौवन स भरा बदन देखत ही यशोदा की छाती पर धूसा सा नगा । वह सब भूल गयी वि यह बहू जोरावर की तरफ खिंच रही है । तव स्वत ही उसके मन मे आया, कोई आए, उस कोर दिवाइ दे, तो इस बहू का हाथ पक्डा दगी इसकी यह सुहावनी जिदगी बरवाद नही हाने दगी यशादा चारपाई पर पड गई । कुछ ही देर म सो गई । कि तु वह दर तर सा नही पाई । वलात चौक्कर जाग गई। वह पिस्फारित बन पर चारा आर देखने लगी। चारो ओर स्वेत चादनी फैली थी। बड़ा मुहावना मौसम था । स्वप्न म ही यशोदा न देखा कि वह नव-वधु वन- 168 । पर उस घर म आई थी। यह एसी ही चादनी मतिपकी के चारपाइ पाग खड़ी थी। पति कह रहा था, आ वठणा। द बार बार नहीं जिन्दगी नाएगा, यह मौमम यह तेरी जवानी यह रूपहली चादनी की यह सबम बडी नियामत हैं मौगात है, प्रकृति की 'ह राम कहा-की पहा पहुच गई म तो । ऐमो गहरी नाद आई।' यशादा न कहा---'वही जजीव राने थी वे भी और यह मलखू का चाचा हिरण सी तरह चौकडी मरता फिरता था, मेरी चारपाई में चारो जोरा जातमी कोन मा की शरम थी न बाप की। सारी ला ताज नाम पर उठाकर रादीथो जब तोपहर वा खत पर रोटी लेकर जाता तो तब भी मुझे दखवर अगडा भरता था भगवान ही जात किस तरह सत पर काम करता होगा यशोदा ने बात छोड दनी चाही ! उमन दूर साती हुई सुखिया की आर देखा । वह वसुध थी। छाती पर स धोती हटी थो। कसी हुइ छातिया मानो उसकी अगिया के कपड़े का फाडकर बाहर निकलना चाहती थी भरी जवानी थी उसकी । इतना दर यशादा के मन मे आया कि मुखिया के पाम जाए । तकिए पर बिखरे उस जूडे वे बालो को हाथ म ल ल और चूम ल । उम यान जाया, उसकी लडकी शारदा यदि जीवित हाती तो इतनी ही बडी होती। ऐसी ही शक्ल-सूरत की होती। यशोदा के मन म आरहा था। सचमुच बडी दुर्भागी है, यह सुखिया। इसया नाम तो 'दुखिया होता तो ठीक था। भला क्या देखा इमने ससुराल म घर आकर । इससे शरीर स हल्दी ना उबटन भी नहीं छूटा कि भगवान न विधवा वना दी। अच्छा ही हुआ कि यह सिलाई का पाम सीख गई। चार पंस कमान लगी। हमारा क्या है, आज है क्ल नहीं। जो इसमे भाग्य म होगा मिना ! यहभागगी ! उसन पहा-'अव हा वह के आसार तो अच्छे दीखा है । इसके पास हुनर ह, पार पस है । वाई भी मिल जाएगा । औरत का रूप और यौवन तो एसा चुम्बर ह वि दूर राडे आदमी को भी अपनी ओर खीच लेता है हा, इस सुखिया मे वह क्ला है। वह मिथ्या है इसके पास यशोदा पिर पड गई। सा गई। प्रात' जव दर में जाम खुली ता 169
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बाहर की वात चूल्ह पर बैठी सुखिया के भी काना म पढी। वह
वोली-'अम्मा, जरा सुनो तो कौन मर गया।'
यशोदा बोली-'मैंने बात सुन ती। वह रोता था न, वह मर
गया। न उसका वपन है न चिता के लिए इधन । पीसी सता रहा है,
दो चौधरियो के पास गया और खाली हाथ लौट आया।'
हे राम । ऐसे मालदार लोग भी एक पाई नहीं दे पाए।' सुखिया
योली-'लो जम्मा । पिताजी को क्लेवा ले जाओ। उनसे कह दो मै
कफन के लिए चादर दे दूगी।'
यशोदा बाली हमार पिटार म उपल (कण्डे) ल लिए जाग ।
याम हो जायेगा।'
सुखिया ने कहा- मेर पास कुछ रपये रपे है मदिर पर परमाद
चढाने के लिए । इससे वडा मतिर और पुण्य का काम जोर कौन सा
हाग।। मैं वे स्पये ६ दूगी।'
यशादा वाहर गई जोर सुखिया की बात कह आइ । लौटकर वाली
चादर दे दे। रपये भी निकाल दे। मैं बद विटारा खोले देती हू। दा
जादमी आग और कण्डे चादर मे बाधार ते जाण ।
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जन्तत वह दिन जा गया कि जब चौधरी गमदाम और उसके
पुत्र की बहू सुखिया जिले की सदर जेल म जाने को उद्यत हुए। जिम
युवर वे द्वारा जावेदन पत्र दिया गया था वह जिन म ही कायरत था।
सुखिया न उसम कह दिया था यह गाय का मामला है इस बात का
अपो तक ही मामित रखना जरूरी है । पर तु यह युवक तो अपना प्रण
निभान म मफल हो गया, नितु जव यशोदा की और रामदास की
जोरावर प्रकरणको लेकर बात चली, तो जोरावर की मा न सुन ली
थी। वह घर के बाहर आवर भस का दूध निकाल रही थी । जव तोगवर
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या क्इ बार नाम उसक काना म जाता ता वह चाप उठी वह । यशोदा की भस की जाड मे जाकर खडी हो गइ। फलस्वरूप, वह पनि पत्नि के मध्य चलती सभी बातें सुगमता म सुनने म सक्षम थी। यह सब विदिन था कि यशोदा और जारावर की मा गगा म कइ वप स बालचाल बद थी। उन दोना नारियो क वमवरूप न इन दा परिवारो का पृथक तो क्यिा हो, मन से भी जुना कर दिया पा। परतु जोरावर उम घर आता था । वह माता पिता की आकाक्षा का सवथा उपक्षा कर वठा था । मलयू में उसका अत्यधिध स्नेह था। उसे बडा भया मानता था। परतु प्रात हाा ही जारावर बी मा उस घर आई जार मीधी यशादा के सामन खडी कर बोली-'यह कौन स ज म ९ बदने । रही हा जेटानी । तुम्हारी बहू जारावर से जेल म मिलन जा रहा है । जेठ जी भी जा रह है। उपक्षा भाव स यशामावाली. [--- म इस विषय मे कुछ नही जाती। जेठ मे बात कर।" 'उनसे क्या वात कर । साप या मोसी ता तुम हो ।' तव यशादा दुध हो उठी-- जवान सुधारकर वाल । माप की मौसी हागी तेरी मा तरा पाप कि तु गगा गरज उठी- मैं इस मिली भगत का खूब जानती हू । वह को आग बढा दिया है । मेरा लडका शिवम्मा ता वना ही, तुम्हारी चट्ट ने अपने रूप के जाल में भी फ्माया है। अब तव तो मै चुप थी परतु अव कहती है तम्हारी बहू न सापन बनकर उमे उमाहे । उमस म्पया कमाया है। इतना सुनना था कि यगोगा आप म बाहर हो गन् । उसका हाथ उटा और तड मे गगा के मुह पर तमाचा मारपर वाली हरामजादी बक्वाम करती है । कब-क्व वा वर निकालन नाई है तू। अपने लडके पर तो गार चला नही यहा बदतमीजी की बात करने आ पहुची। चुदल वही वा। 172 1 । गगा वा ऊँचा स्वर था। वह उस पति क यान म मा जा पहुचा। यद्यपि वह कमजोर था, परतु लाठी निकाल लाया । रामनगम चबूतर पर हुका पो रहा था। उस पास आत ही वाला - देखा भया, जय हमाग तुम्हारा मेल नही वालचाल नहीं, तब जारावर के पास जान रीवात क्यो है । इतने वर्षों की चुप्पी के बाद फिर पानी म जाग लगाई जा रही है । भाभी को समझा ला । मेरा लडका ता कैदखान चला ही गया । अव हम म मे कोई वहा न जा बैठे। यह ममश ला । रामदाम विस्मित था। पर की आवाज वह भी सुन रहा था। परतु यह पता नहीं था जोरावर १ नाम पर यह सब हो रहा था । छाट भाई का उग्र दय, वह स्वभाव के विपरीत बनकर बोला-- जगधर, तुम किम किस पर वधन लगाआग । तुम्हारे लडके स काइ मिलन जाता है, तो तुम्ह आपत्ति क्या । तुम चाहत हा, उसका कोई मिलन वाला न हा । काइ मित्र या सखा न हो। वह तुम्हारा पुत्र है, दुश्मन नहीं । बहू उसके पास जाना चाहती है, ता जान दो। मैंने तो उसे नहीं रोका । यह काम मेरा था। मरी प्रतिष्ठा का सवाल था। जगधर चुप रह गया । वितु रामदास घर म गया और जगधर की रहू वा टोक्कर बोला-'गगा, तू उल्टो गगा वहाती है । जो बात तू करती है, वह यशोदा को करनी चाहिए थी। मुझे वहनी यो । सुखिया हमारी बहू है । इस घर की इज्जत है। लेकिन जब यह स्वय जारावर से मिलन को उत्सुक है ता हम क्यो रोकें । वहा जेल म उसके पास धन तो है नहीं जा मिलाई करके कोई ले जायेगा । यह बहू भी उस लिए कुछ नही ल जा मकती। जारावर डाकू और खूनी है। उस पर सगीन मामला है। वाहर के लोग उसे कुछ भी खाने को नहीं दे सक्त।' गगा अपने जेठ से बोलती कम थी। घूघट करती थी। उस समय उसके मन का जोश निकल चुका था। जेठ के घर म आते ही रहा-सहा पानी भी जाता रहा । वह लौट चली । तज चाल से चलकर अपने घर म जा बठो। वहा जाते ही पति से बाती-'मलखू की बहू भी बडी चुडैल है । एक शब्द भी नहीं बोली । मैं तो उसी को सुनाने गयी थी। उम मफेद कबूतरी ने जरूर लडके पर डोरे डाल है । 113 । . । जगधर बाला -'सब चकार हजोरावर जेल स बहार नहीं आयगा । हमन तो समझ लिया कि वह गया। भगवान का प्यारा हो गया। हमारा भाग्य ही खोटा था। घर म एक लडका पैदा हुआ तो वह भी डाकू और खूनी बना है । मेरा तो गाव म निकलना भी दूभर हो गया है । जाने कितनी बार थान म गया । वहा पुलिम न प्रताड़ित किया भगवान बचाये ऐम जीवन म ऐसी औलात से गगा बोली-'औलाद के कारण ही ला तुम्ह मुह की नानी पड़ी' जा कुछ न मुनना था वह भी सुन जाई । और देखो सी बात वह चुडल वह चुपचाप कमरे के दरवाजे पर पडी रहो । दौरानी जिठानी की राडाई दराती रही। जगधर वोला-तुझे नहीं जाना था। भया न जा चुछ पहा उम सुनकर तो मुझे भी शमिदा बनना पडा उमवा कहना ठीक ही था। लज्जा उमे आनी चाहिए थी न विहाको । हमारा तो लडका है। चाह जमा है, मद बच्चा ता है। उमवी तो बहू है। विधवा है । कोई जवाप है उसके पाम, गाव के किसी भी आदमी की बात का कि वह क्यो मिलन जा रही है । क्या स्वाथ ह उसका । वह औरत बेशम है। नगी हो चुकी है, मेर वेट के पीछे दीवानी बनी है । उसने अपन घर का लाज भी उतार फेवी है गगा ने पति को घुरा-'यही गात ता मैं कहने गयी थी। लेकिन जेठानी ने तो सब पट मे उतार ली। डकार तक नहीं ली । मैं समझ गयी जेठ जिठानी यह मामने झुक गय हैं । वह चार पैस कमाती है ता उनके मुह बद करवठी है । अजी, क्या न झुक्त । दो सौ रुपय माहवार सरकार देती है। बहू सिलाई का काम करती है, उसकी आमदनी अलग । वम-स कम तीस चालीस बहुए और जवान लडक्यिा आती है, उनकी पीस अलग । बीस ग्पय माहवार सबउ । लिया जाता है। कितनी चतुराई है, जब स्कूल खोला, तो दस रुपय माहवार 4 । बढत-चढत इतने हो गय।' 'तुम दस रूपय को बात कहत हो, स्कूल खोलत समय मुफ्त में शिक्षा देने की बात थी।' हा, यही । वह क्या है, कामधेनु गाय है। आम-वे-आम, गुट 174 लिया क दाम ! नाममान के लिए मुफ्त म दो चार औरता को सिलाई मिखाती है। इसे कहते है भाग्य की करामान। इसका लडका भी कालज में चला गया। वह चुपचाप मेर पाम आता है और कुछ-न-कुछ खा पी जाता है । मुकेश का मटठा पीने का शौक है, ताजी निकला पी जाता है । मैं साथ मे गुड की डली भी दे दती हू । वह तो कहता है समय आएगा, मैं वीच की दीवार ताड दूगा । दाना घर एक कर दूगा । 'अजी जब नदी की धारा पट गयी ता क्या मुडता है। जगले दिन सुखिया का श्वसुर के पास जाना था, तो वह अधेरे म नदी पर पहुच गयी । हाल में ही रामनाम न कह दिया था कि गाव का कोइ आदमी न टा+ । सुखिया "हुल का भी तयार कर लिया था। उसे नय कपडे पहनाये थे, सिर के बाल क् से सवार थ । आख मे स्याही लगा दी थी। यशादा के करन पर एक मिर पर स्याही का टीका लगा दिया । लडका शक्ल सूरत का अच्छा था । इसलिए कही नजर न लग जाए, इस बात का सदह यशोदा को हो गया था । दोपहर होने तक वे लोग जेन के द्वार पर पहुच गये । समय पर जावाज लगी । रामदास वोगा-'बहू, तू जा । मैं यहा वठा हू । लड़ने को ले जा।' सुखिया उस लौह-द्वार पर पहुंच गयो । जब यह फाटक के पदर गयी ता एव और सीवचा का द्वार उसे मिला । वही पर उसे स्कना पड । कुछ ही देर म वेडिया म जकडा जारावर वहा जाया । उसे देखते ही सुखिया नीचे झुकी और उसके पर छूर जव सीधी खड़ी हुई, तो जोरावर मुस्वराया-'यह उल्टी गगा बहा दी है तुमने । मुये तुम्हारे चरण छून थे। तुम्हारी प्रेरणा से मैं यहा आया हू । वडा अच्छा व्यवहार किया जा रहा है मेरे साथ । अभी मुकद्दमा गुरू नहीं हुआ। कब होगा, यह भी नहीं कहा जा सकता। यहा एक अलग मजिस्ट्रेट नियुक्त होगा। दूसरे देश से युद्ध चल रहा है, तो सरकार का ध्यान उघर है । कुछ पुराने डाकू युद्ध के काम में लगे हैं। वे मार्च पर लड रहे 175 इतना सुनत ही सुखिया गदगद हा उठी-'तुम भा 7 लिए जाओगे क्या 'नहीं, नहीं, मैं ता नया हू। मर अपराध भी जप य है ।' सन यहा पच्छा ही हुआ कि मैं जेल म आ वटा । यहा निचितता है कोई भय नहीं । कही छुपने का सवाल नहीं । सूबह जेलर आता है तो बडे शालीन भाव से बात करता है। शुर म मैं पिस कोठरी में रखा गया, वह काल कोटरी थी। परतु जल्दी ही यहा में बदल दिया गया आम कैदिया से कम मिलना हाता है, फिर भी मुझे यहा मानमिक मुम मिला है । डाका डाल कर, विमी राखून करके लगता था कि मैं इन्सान नहीं, पशु था, राक्षस था। तुमने मुझे इस पथ स हटाने का प्रयल विना, इस कारण मैं तुम्हारा जम गम का आमारी हूँ। यह सीत्र किसी और ने नहीं दी। शायद लाग मुझसे डरते थे। मुझे खूखार भेडिया मानत थे । उसन रहा-'अब यह राहुल भी बडा हो चला है । तुम यह मानना कि यह तुम्हारा ही पुत्र है। चोरी के मामल म गाय का हिरिया कुम्हार यहा जाया है, कैदी बनकर । उसने बताया था कि तुम्हारा स्कूल खूब चल रहा है ।' यह कहते ही उसने सुखिया की वहता आखो पर जेल का पहना हुआ कुरत का एक भाग रखा। तभी बाला रोना व्यय है, भाभी । हम दानों ने जान क्सि शुभ घडी म एक दूसरे को देखा था । जय भैया मलखू था, ता तब मैं अपने मन की भावना व्यक्त नही कर पाया । जब यह मग ना तब भी तुम्हारा वैधय देखकर मैं कराह उठा था । तुमसे न कुछ अपेक्षा कर पाया, न कह पाया। तभी तो मैंने एक अन्य युवती से विवाह कर लिया था । यह केवल इस कारण था कि मैं अपने मन की दुबलता तुम पर व्यक्त न कर बैठू । तुम्हारी जीवन के प्रति प्रगट हुई निष्ठा का मैं पतित करने की क्षमता रखता था । डाकू बनकर भी, ऐसा गाव मेरे मन मे था।' सुखिया की आखें तब भी प्रवाहित थी। उस गालोपर तर रही थी। तभी जमादार मापा और बोला- चलो जवान । समय हा गया। जोरावर वाला- भाभी, अब यहा मत जाना । शायद मैं स्थाना- तरित कर दिया जाऊ । यहा गर्मी अधिक है। 176 पाती है। सुखिया ने दहा-'देयो, तुम मेरे अवलम्ब हो। जेल म रहो या वाहर, मेरे अपन हो । मुझे पैसा नही चाहिए, भावना चाहिए । वह तुमने मुझे दी । तुम मेरे कहने से आत्म समपण कर चुके हो, एक जघन्य कृत्य से दूर हो गये हो, यही मेरे लिए बहुत है। वह मकती है। मेरे सोहाग का यह भबस बडा मि दूर है जो तुमने मेरी माग मे लगाया है। मै नारी हू, तो पुरुष चाहती हू । लेकिन जिस आकाक्षा से नारी पुरष की लोलुप बनती है वह अपेक्षा मुझ म नही । मुझे पुरुष की अनुभूति चाहिए। प्रेरणा चाहिए । उगके जीवन जा सच्चा सत्प चाहिए । यह बच्चा तुमने मेरे पास छोडा है तो मुझे मा कहता है । इतना सुनकर मैं सुष मैं चाहती हू तुम जीवन के पुनीत लक्ष की ओर बढते रहो। तुम भी इस बात को समझो गगा की धारा के समान ही यह जीवन है । यह परम है, पुनीत है । इस भावना की रक्षा करो। अपनी इस आकाक्षा को पूरी करने के लिए यह सुखिया वडे से बडा त्याग करने के लिए तत्पर रहगी।' वह नीचे झुकी और पिर जोरावर के परो को छू कर बोली-'अव शुझे लगता है कि तुम एव सच्चे मद हो । तुम जीवन की पूजा करनी जानते हो । जीवन को समझते हो।' जोरावर बोला-ताई और ताऊ को प्रणाम वहना । तुम चाहो तो मेरी मा लौर पिता को भी मेरा अभिवादन वहला भेजना। सुखिया बोली-'तुम्हारे ताऊ तो बाहर बैठे हैं। उनका दिल कच्चा है, तुम्हे देखत ही रो पड़ेंगे। चाचा और चाची के पास मैं स्वय जाऊगी क्ल चाची आकर लडी थी कि मैं क्यों जा रही हू उसके पुत्र के पास । उह भला क्स बताती कि उनका पुत्र मेरा भी कुछ है। जोरावर बोला-मां नादान है पगली है। उसने कहा-'भाभी एक बात कहता हू उसे मान लेना । विचार करना । अच्छा यही है कि तुम अपना दूसरा विवाह कर लेना । भावना मे मत बहना । मैं तो अब बाहर आ नही सकता । आपा भी तो तय तक बूढा हो जाऊगा । वमर झुक जायगी, जीवन बेकार हो जाएगा सुखिया सूखे भाव से मुस्करा दी अभी तो इतनी बात पही तुमरो वही बात मैं अपने से कहती हू । जीवन एव पूजा है। साधना है। मुझे 177 ।
भी यह अवसर मिला है। पांच-दम वप के वाद बूढी हो जाऊगी। हो सकता है तब तक मर भी जाऊ । जो वात मर मन म आ गयी है, तुम सोचते हा मैंने पदा की है। यह भी भगवान की वाणी है, उसी की आवाज है। मुझे आदमी नहीं चाहिए जो औरत को भोगे । आम की गुठली की तरह चूसे। मुझे भावना की अपक्षा है । वह मैं पा चुकी हूँ। इसीलिए तो मैं निर्वाध वनकर अहने पथ पर बढी जा रही हू । तुम्हार पास तक आयी हू, समाज का सभी नीति तोड आयी है। जोरावर वाला -तुमने गाव म जिस साहस का प्रदशन किया, वह अपूर्व था, वदनीय था । मुझे एक एक बात का पता है।' वह भी भगवान का आशीप था। जाने किस प्रकार मेरे प्राणों म बल आया।' जारावर बोला- मैंने जेल अधिकारिया को पत्र दिया है, जिला धीश के नाम । मेरा ट्रस्ट अभी तर गुप चुप चल रहा था। लेकिन अब उसे प्रकाश म उतारा है। जिलाधीश उसका अध्यक्ष हो और मत्री भार का एक विशिष्ट व्यक्ति पाच जादमिया की एक समिति होगी उसम एक तुम्हारा भो नाम होगा।' सुखिया बोली- वह रपया सरवार जब्त कर लेगी। नही नहीं, वह ट्रस्ट के अधीन है। मैंने जेलर से बात कर ली है। वह ट्रस्द अभी वाजाप्ता नही, अब आगे उसे स्थायी रूप दिया जा सकेगा।' जमादार वाला-'अब चलो जवान । 'हा-हा चला।' जोरावर ने सुखिया से विदा ली और बच्चे का गाल थपथपाया । वह हाथ जोडकर उस स्थान मे पीछे हट गया। सुखिया द्वार के बाहर निकल आइ । जव वह घास मे बठे रामदास के पाम पहुंची शो वह बाला-'बहुत देर की । इतनी देर मिलाई नहीं होती। और तुम रो भी रही हो। याखें अब भी भरी हैं। वह खडा हो गया और कहने लगा-भाग्य की बात है, जोरावर मरीखा लडका गाव में दूसरा नही । बुद्धिमान भी है, सुदर भी है । ठीक कहा है क्सिी न-इसान को उसके सस्कार बनाते हैं । उसी को हम भाग्य 178 कहते है। आओ बस अडडे पर चल । गाडी मिल जायगी। शाम तक गाव में पहुच जाएगे। 23 एक दिन जब चौधरी रामदास हाथ मे लाठी लिए अपन खनावी तरफ जा रहा था, तो तभी पीछे से गाव वे एरा नौजवान भगवत 7 आवाज दी--'अरे ताऊ जरा सुनना । आवाज सुनी तो रामदास रुक गया। पास आत हुए भगवत की ओर देखने लगा। वह शहर म किसी आफिस मे वाबूगिरी करता था। जच्छी कमाई करता था। पिछले दिना जब उसने अपनी बहिन का विवाह किया, तो अच्छे-अच्छे नाक वाले देखते रह गये । वहिन का बडा अच्छा दहेज दिया । लडका भी ऊचे घर का मिला । उस विवाह की एक विशेषता यह थी कि वराती केवल गिनती के आय थे । शहर के बडे-बडे आफीसर और रईस उमदा उस उत्सव म सम्मिलित हुए थे। बाजा भी अग्नेजी नहीं था, गांव का था, ढाल ढपरा । फिर भी उस विवाह की शोभा देखते बनती थी। जब भगवत पास आया तो हाथ में लिया अखवार दिखाकर बाला-'ताऊ, कमाल कर दिया जारावर न । उसका जेल का रिकाड इतना अच्छा बना है कि जेल अधीक्षक ने उस फौज मे जाकर शत्रु से लडने की सिफारिश की है। फौज का कमाण्डर उसकी निशानबाजी देख कर पक्ति बना था। आशा यही है कि वह फौज मे लडन के लिए भेज दिया जायेगा-वहा शत्र की गोली खाकर मरा तो मुक्ति पा जाएगा। और जीवित रहा, तो सरकार उसके सभी अपराध क्षमा कर देगी। वह फिर गाव म लौट आएगा। यह मब आज के समाचार पत्र म आया अपनी बात कहकर भगवत अपने रास्त पर चला गया । उस समा चार से रामदास को इतनी प्रसनता हुई कि खेत पर न जाकर घर की 179 ओर मुड गया । वह सीधा घर म जावर ऊचे स्वर से बाला -'मल की मा। मलखू की मां यशोदा ऊपर कोठे पर गोवर के कण्डे पाच रही थी पति की आवाज सुनकर बोली-'यया है ? कैसे चीख रहे हो ? मैं ठाली नही बैठी काम मे लगी है।' 'अरी, भागवान यहा ता आ। तेरी बहू कहा है । उसे भी बुला। यशोदा ने कण्डे पाथने वद कर दिये । वह चौक के ऊपर छज्जे पर खडी होकर बोली- 'क्या है क्या बात है ऐसी अछूवा, जो सुनाने को वेताब हो । बहू तो अपनी क्लास मे है । उसे बाहर से आवाज दो। चौधरी बाला-'आओ। बहू का भी बुला लो । वात ऐसी है कि तुम्ह गिना बताए रहा नहीं जायगा। बहू का भी बताना जरूरी ह । देखा जाए, तो बात उसी का है, न मेरी है, न तुम्हारी । यशोदा आयो स हस दी-ऐसी क्या बात है। वह वाली-'अव तुम पहली बहुत बुझात हो । वात ता वतात नही । मैं कोठे पर से काम छोडवर आ गयी। कई दिन का गोबर पड़ा था । बहू तो हाथ लगाता नहीं मुझको ही करना पडता है। एक तो वह थी ही कामचोर, तुमने और अधिक सिर पर चढा ली है। जब मैं मर जाऊगी तो देखना कैसा छटाक आध पाये घोसी से ल लिया करना और चाय बनवा कर पी लना । अब चोधरी को रोटी भी चुपडी जाती है । दाल म भी दो चार वूद पड जाता है। सुवह को गरमा गरम पराठा खा लिया जाता है। 'ओ हो, तूने तो भागवत ही खोल दी । अरी, भागवान | जिस गाव म मुर्गा नती बाला तो क्या वहाँ दिन नहीं निकलता । तू समझती है मैं बैठा कहूगा । मेग वात गाठ म बाध ले । तुझस पहल जाऊगा । तेरा चूडिया टूटेंगी और मेरी अर्थी पर रखी जाएगी। यशोदा लाल आखें निकाल वठी- यह अपशकुन की बात छोडो। सुबह-सुबह मेरा दिमाग खराब मत करो। तुम्ह तो कोई काम है नहीं। बस, हुक्का पीना या गप्प मारना । मेर तो हजार काम हैं । बहूजी जव दूध पियोगी 180 से सिलाई की क्लास खोल बैठी है, उहाने घर के कामा से छुट्टी पा ली है। साच लिया है न, घर मे नौकरानी है, मरेगी और खपेगी।' सयोग से उसी समय मुखिया ऊपर कमरे में उतर आई। उसे देखते ही यशोदा बोली-'लो आ गपी बहू भी । अब वताओ, क्या बात है चौधरी बोला-'मुनो बहू अभी भगवत आया था। उसके पास जसवार था। जेल व अधीक्षक ने जोरावर की तारीफ लिवकर कार अधिकारिया के पास भेज दी ह । सुना है फौज के कप्तान न उसका निशाने बाजी देवर प्रशसा की है । उम्मीद यह है कि जोरावर का शायद जेल से निकालकर लडाई के मोरच पर भेज दिया जाय ।' 'है, गम । भगवान बडा माय करता है । अच्छा है लड़का इस मुसीबत मे निवल गया।' यशोदा के चेहर पर प्रसनता थी । वाणी म हेप। चौधरी बाला-~~ मलखू की मा, मोरच पर लडका यदि वह जीवित रहा तो उसे जेल में नहीं रखा जाएगा। सरकार उसे क्षमा कर देगी।' यशोदा बोली मैंने तो सुना है कि सरकार अपराधिया को क्षमा वरन व साथ कुछ काम करन के लिए रुपया देती है । जमीन दती है।' उसी समय सुधिया पत्थर क समान मूर्तिवत खडी थी। पर के अगूठे से जमीन कुरेद रही थी। रामदास बोला-'भाग्य बहुत बड़ी चीज है, मलखू की मा । आदमी वही-स-कही पहुच जाता है। मेरा मन चाहता है कि जोरावर तरक्की करगा । वह गाव का और इस जिले का विशिष्ट व्यक्ति बनेगा । उसकी मा के वाना भी यह बात पहुचा देना । बाप मे भा पहला भेजना। 'अजी, गगा ता फाड खान को आती है।' वह वोली-'अब त तुम्हारा मुकेश भी कालेज के लडको मे फोजो क्वायद करता है । भाभी ने लड मगडकर कुछ रुपये ल गया था वर्दी बनवाने के लिए। वह 181
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पडेट वार है। उगम भर्ती हुआ है। नाम नी ता एम रम हरि समपे
नहीं जात । अब अगले मही रही पहाट पर जायगा । वहा मम
लगगा। न जाने क्या-क्या बातें परता है, भाभी में । मैं सोहा दोनो की
रिट पिट समझ नहीं पाती।'
रामदाग बाहर की लार उल दिया और कहता गया- 'अव खेत
पर नी जाळ गा। एस चिलम तम्बाय भर . ता पोवर मदिर पर
जाऊ गा । कुछ दर वहा जापर बठूगा।'
तभी मुपिया बोली-जेल म जोरावर इस बात का जिपर करता
था। पिन नभी पता गया है नि वह मोर्चे पर भेज भी दिया जाएगा।
यहा जाना भी पानी से बदतर है । जो यहा जाता है बडे भाग्य समझा
वि लौट आये। कोई मरता है और कोई अधमरा बनकर अस्पताल म
पडा मिसक्ता है।'
यशोदा ने मास भरी- 'हा, वह 1 जा फौज म भर्ती हावर
जाते हैं जोखिम का आधार ही उह उस ओर खीच कर ले जाता है।
सुखिया बोली-'अम्मा उसम अपना भला भी होता है और
परमाय भी । देश की रक्षा ता फौज या सिपाही करता है । वह अपने
अपने प्राण हथेली पर लिय रहता है । वह यहादुर है । दश का प्रहरी
यशोदा बहू की मब बात नही ममम पाई। वह बाहर गयी और
हुको से चिलम उतार लाई । उसम तम्बाकू रखा और और आग रखकर
चिलम हुक्के पर रख आयी। उसी समय सुखिया अपनी क्लाम म गयी
और एक युवा लडकी को अपने पास बुलाकर बोली-'रमिया तरा भया
तो घर होगा । रे ये पाच रुपय । वह हलवाई की दुवान स पाच सय
की नुक्ती दाना ले आयगा।
रमिया श्वेत दाता से हम पडी-'क्या रोगी इतनी नुक्ती
का?
सुखिया बोली-~कुछ बाटनी ह । कुछ मदिर पर चढानी है। तू
जा।
रमिया चली गयी तभी सुखिया स्वत ही बोली-'यह अच्छा
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समाचार है। सुखकर है । भगवान वटा दया है।' सध्या होते ही वह नुक्तीदाना सुखिया ने यशोदा का दिया और कहा--'अब मदिर पर पुजारी पूजा करेगा । यह मिठाई ते जाओ। कुछ देवता पर चढा देना, कुछ वहा पर आये बच्चो को बाट देना।' आश्चय, यशोदा ने कोई टिप्पणी नहीं की। वह पति के पास जा कर बोली-'आओ, चलते हा, मदिर पर । बहू परमाद बाट रही है । यह नुक्तीदाना मगाया है।" प्रसन भाव म गमदास वाला- अच्छा तो है । बहू को सवस वडी खुशी हुई है लकिन सुबह ता मह से भी नही बोली।' 'क्या बोलती । सास श्वसुर के सामने चुप रहना ही ठीक था। यह समझ ले, अब बहू की मनचीती होगी, हमारी तुम्हारी नहीं । यशोदा बोली-'यह सब देखकर तो मेरा मन कापता है।' 'तू तो मूख हे । जोरावर गैर नही। उसका देवर है । जो तर मन म है वह मेरे भी पास है । लेकिन चूप रह । बहू की खुशी में ही अपनी खुशी समझ ।' वह बोला--'जेल पर जाने का मतलब क्या था । इतनी बात न समयी जाय तो क्या भगवान आकर समझाएगा। चल मदिर पर । खुशी की बात है, परसाद बाटना ही चाहिए, यही क्या कम है कि बहू स्वय न जाकर तुम्हे भेज रही है । यह आदर भी कम नही । दाता द और पल्ला पसारकर लो।' दोनो चल दिए । परसाद कुछ देवता को चढाया, कुछ वहा पर एकत्र वच्चो जोर स्त्रियो को वाट दिया। आश्चय रामदास या यशोदा ने परसाद वाटने का उद्देश्य नहीं बताया। उनसे पूछा भी गया ता टाल दिया। अभी पूरा सप्ताह नही बीता था कि सार गाव मे यह खबर विजली की तरह फल चुकी थी कि जोरावर शत्रु से लड़ने के लिए मोर्चे पर भेज दिया गया । इस बात को वीत अभी सप्ताह हुआ था कि शहर में प्रकाशित कइ अखवार गाव म आ गए, जोरावर बडी बहादुरी के साथ युद्धरत है। सरकारी अधिकारियो मे उसकी मुक्त कण्ठ स प्रशसा की जा रही है । स्वय फौज के अफ्सर उस जवान को पाकर गौरवान्वित 183 - लाक्न एक दिन नगर म और गा म यह समाचार फैलत दर नहीं लगी शत्र दल जिस स्थान पर बब्जा करना चाहता था, वह विफल कर दिया गया। वहुत मे शत्रु मार गय, सय सामग्री छोडकर भाग गए । परतु अपन दश की मुहिम पर नियुक्न जोरावर घायल हो गया। वह फौजी अस्पताल म दाखिल कर दिया गया । डाक्टरा ने उसका एक हाथ काट दिया। सुखिया ने कुछ दिन क लिए अपना सूल बद कर दिया था। उसो जपना भैया बुलाया था और उसके साथ माता पिता से मिलने चली गयी थी। वितु अपने गाव म कुछ दिन रहकर वह जोरावर के के पास पहुच गयी थी । एक मास अस्पताल मे रहकर जोरावर स्वस्थ हो चला था। सरकार ने उसे गाव जाने की अनुमति दे दी थी । जब वह अस्पताल से मुक्त हुआ, तो तभी यह समाचार मिला, सरकार ने जोरावर का विशिष्ट पदक और सम्मान प्रदान करने का निश्चय क्यिा है । उसे अपने ही गाव में सो वीघा जमीन दी है और एक लाख रुपया। सुखिया एक सप्ताह से जारावर के पास थी। उसके बाए हाय को वाह +धे से काट दी गयी। गोलियो के आघात शरीर के उसी भाग पर हुए थे ! जब सुखिया गाव लौटी तो वह एकाकी नहीं थी, जोरावर साथ था। सरकार ने उसे मभी अपराधो से मुक्त कर दिया था। जब वह गाव मे आया, तो उससे पूर्व ही सुखिया ने और निकट के थानदार ने गाव म प्रचारित कर दिया था, जोरावर आ रहा है । उमका सम्मान किया जाना जरूरी है । अतएव नदी तट पर गाव का जन-समूह एकत्र था। गाव के युवको ने उसका विशेष सम्मान करन का निश्चय किया था। नाव से उतरत ही जोरावर फूलो की माला से लाद दिया गया। उस समूह म जोरावर के माता पिता तो थे ही, रामदास और यशोदा भी थी। नाव से उतरते हो जोरावर ने रामदास और यशोदा की चरण रज ली। वह दूर पठे माता पिता के चरणो मे झुक गया। गाव निवा 184
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लाकन एक दिन नगर म
लगी शत्र दल जिस स्थान ।
कर दिया गया। वहुत से
गए । परतु अपने देश की मु
वह फौजी जस्पताल में दाखि-
हाथ काट दिया।
-
सुखिया ने कुछ दिन
उसन उपना भैया बुलाया था
चला गयो थी। कितु अपने
के पास पहुच गयी थी । एक
हो चला था । सरकार ने उ
वह अस्पताल से मुक्त हुआ,
जोरावर का विशिष्ट पदक
है । उसे अपने ही गाव में
स्पया।
सुखिया एक सप्ताह से
बाह कधे से काट दी गयी।
हुए थे । जब सुखिया गाव लो
था। सरकार ने उसे मभी ।
आया, तो उससे पूर्व
गाव म प्रचारित कर दिया
किया जाना जरूरी है। अतए
या । गाव के युवको ने उसका
था । नाव से उतरते ही जोरा
उस समूह म जोरावर के मात!
भी थी। नाव से उतरत हो जा
रज ली। वह दूर पहे मातri
गाव में
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पडी कर दी थी, मैं उसे तोड दूगा । माता-पिता क समान ताऊ और
ताई भी मेरे पूजनीय है, मैं उनकी सेवा मे अपने को अपित कर दूगा।'
युवको ने जोरावर को कधे पर उठा लिया और सभा का ममापन
करने से पूर्व चौधरी विक्रम ने कहा-'हम वद्ध हुए। अब मजिल के
अन्त पर आ गए । अब युवको का समय है। अब इही का उत्तरदायित्व
है, गाव को और जन-जन को दिशा बोध प्रदान करें।
श्री राम शर्मा राम
135-87
श्याम नगर,
लिसाडी गेट, मेरठ-2
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