Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Shree Jaisan Vijaysan Charit
Front matter
No text on this page.
No text on this page.
क्योकि-मम्यतय किसी-मत में-भेषमें-किरिया में या दोंग में नहीं है परन्तू-एक यथार्थ श्रद्धानमे है. जी जीवादि पदार्थोका निश्चयिक व्यवहारिक द्रव्यादि सामाग्रीके प्राप्ति के याग्य-पथार्थ (जेमाहे वैसाही) श्रद्धान (जान पने युक्त परितीत) करतेहै वोही सच्चे स मम्पनी कहलातेहें. कि जिनोंकी आमा रागदेष विषय कपाय मत मतान्तरके झगडेसे विग्न हा कृष्ण नग्न्द्रवत एकांत गुण संग्रह मेंही तत्पर रहती हैं. ऑग्वनीपर धाडे पडतेहैं." इस कहबत मुझवही ऐसेजोसम्यक्त्व रन रूप महानि चानक धारक होतहें, उनके माल का हरण करने नाश करने विना कारणही मिथ्यात्वीयों प य न करनहें. उनका मर्व स्वय हरण कर मरणान्ततक पहोंचा देतेहैं, परन्तु जिनोंने एहिक मुन्न मामग्रीको भणि भंगूर विनश्वर जानली है, वो ऐसे परम सुखदायि सम्यक्त्वका नाश कग्नाना दरम्हा परन्तु किचित मात्र वट्टामा नहीं लगने देतेहैं. इन गुणोंका हुबहु स्वरूप ई म मम्यतया मब" राममें जयसेण विजयसणके कथनकर दर्शाया गयाहै. इसके दो विभा- गाम मप्रथम मागम तो पुण्य परतापके दर्शाने वाली धर्म मिश्रित कोतक रूप कथाकी क थी. और दुसरे भाग में-सम्यक्त्ती के लक्षण आचरण और उनको सम्यक्तवं धर्मसे च लित करने मिथ्यात्वीयों कैसी योजना पर्यन्न करतेहैं, उससे सम्याक्त्वयों अपने प्राप्त -
No text on this page.
41
५., भाभी भी मानमरी माननी पीरमग विगा हानी)
4. भाभी श्री बावामी भाचार महीने (तारा)
भात श्री पायपर भी पसापरजी, बनार-गोरापूर दाशद)
भाजी श्रीरामारपरमी सांतर कुचंग-मारवार वारदाबाद)
भाबी बी एमपंदनी नीमग-गिरोरली गाणी.
भाभी भी भगनागम जी राबवेदनो. पाहोरी (दागद)
" भाभी ली दोरतगमनी मोगीमारजी मोरे (दाबाद)
भाभी श्री मोहनगरजी पन्दरापानी, पारोरी, (दाह)
• भारत की दोस्तामनी कशी मरजी नरह, यादगारी (दादा)
भाजी नगदी शिपमहापममी, भेरोगले (हंद्रासद)
इन समस्याकी नरफ मे यह ग्रन्थ अमुल्य भेट कर करतज्ञता हूइ ममझताहूं.
सतव्य परायणता का इच्छा
गजातसादर त्यालामुखदेव महायी चाला प्रमाद जोहरी.
(दकिंग ) दानाद नाकमान. बोगद २४४१ दीपवाली.
No text on this page.
. . २ मेमांश्रुत पहुं में थारे नयनां श्रुत १८ मर्षे स्पन्द प्रम पहूँगारे नणी पामुस्यु रण : ८० पामस्थ लग पाछे आवा आदि सो हर्षानन्द धाये पाछे आया आरीमो . ८ *. . ननुना मय " ८ ममा SEEEEEEEEEEEEE युक्ति दीपे पुक्ति १२ २ ८ भणी FREEEEEEEEEEEE जे FEEEEEE अज्ञान ८८ ० अपणु अपणो मंकीर्ण धारे ९० ९२ भंकीपी थापे कयो भाहरो ४|| मान मांग मगन " १० युगन्द्रिया गगन युगत्रिपा " १४ मान . फरराय १.१५ मध्ययनारथी १२१ পাখা १२८ मेनरपत १३. तोगीया २ मध्यग्मी आप पनपन नापीया मणीट जय जयवीर : .. आशा हडाइ योजता ठेर॥ नेठा कहा करमो आयो आज्ञा दहाइ आजता ॥आंफी॥ नेहा कहां फरमो आप १३२ १ नयवीर नंग हुवा मंग हुवा १. ७ परमानन्दा 113120 2. २ ॥२॥ पाप आश्चर्य पाश्चर्य नाक परमानन्दी गग ताका लागा माना भरलाइ इहापा 9 ८ . १३० भगा उहायो मिती रेख्या मिली देण्या " टांनी टोली " मुझमे १४५ ८ ." पणा गणी बनावं पणी रागी मॅटगार् यता, राहनी राप मठ गातु दाप खदाश्चर्य ८ ५ तू का पदावर्य घर गहा मुग चनापती शक्ति भोगवे MEEEEEEEEEEEEE मनुष्य " ८ ८ भीगये परिती पाय दुर चेतावना परिणति पाया। पिमोय विगोय ८ . " द रोहित स्थानक नागा . ९ स्थानके नाश रातका रायको अरोहित होइ गमा अमोल पि. . गयन
No text on this page.
4 , . । दाल ली। जादुपनि जीत्या जी। ये देशी॥ ममकिन शु- पदा निपार । नम० जो यांदित मुख दानार । मम ॥ टेर ।। 2 . र म यह । यु नामें लघु दीप । शोभे चेत्र गारि नदी में । ...": । मम ॥ १ ॥ भरत क्षेत्रकर्मभूमी को है। पांच मोजोयण मांय। ३ म । पट ६ खंड में दीपाय । मम ॥२॥ माढ़े पनीम देश थार in ममकार । नन्दीपुर नगर शिरोमणी है । विश्वानन्द दातार । ग: मन मन्दिर घरों में । शोभे स्वर्ग ममान । धन धान्य ऋद्धि पूर्ण ने सल्यान । मम ॥ ४॥ वक्री परचकी को जी। डर नहीं स" । नार बार अन्यायी जोनां। मिलेन नगर ममार।मम ॥ ५॥ दुर्मिन 'मना । दर रहे मदा काला धर्म पुग्य विद्या बली जी। यमे है नम ॥ ६ ॥ धर्म सिंह नाम नृपति जी । रूप नेज इन्द्र.ममान । •पाप नगरपो गri शरि नीमको भान । मम ॥७॥ पत्र पर पाले परजा . ।
No text on this page.
२ - . . गण म । 1. मांडलिक माता पात । मम ॥ १६ ॥ चतुप्पद नृप सिंह गांव नन्दन होय।शुरवीर भरी गंजना। मज्जन धर्मी मन मोय॥ ।। महा कहे महीपति। विज्ञानी वयण प्रमाण । पीडियों लग सा- मायका गजान । मम ॥ १८ ।। खुशी हुई पण्डित गया । नृप """] || Mumाय । गर्भपाले दोष टालती । रहा नित्यानन्द वृताय। मम ।। ।। "याम पमाय से। राजलक्ष्मी वृद्धि पाय । तीन माम यों वीतीया । माला प्रगटाप । मम ॥ २० ॥ पुरुष वेश शत्रमजी । करी मेना मंग पापारा बनने विष। शरमी घरतिधरे ते पार । मम ॥ २१ ॥अंग र. ९११ ग २१ । नृप जाणा डोहल का भेद । दी प्राज्ञा शीघ्र पूरिये । जो उपनी मन गमः । मम ॥ २ ॥ डोहलो पूर्वोहर्या मह । जाण्या उदर मे पुण्य हाल । सार यमान यांफनो लये। ये पभागी पहिली डाल । मम ॥ २३ ॥ दुद्दा ॥ मु. पार निम्प सादे नरदह (१४)प्रकारे दानापमानतो करनी मदा । धर्मात्मा को
No text on this page.
. 4 V मदा र मम नाली । मोचो जगजन देख ॥ इपं ॥१॥ श्रीमति नामे हो राणी नीमरी । दुमति पति मदाय ॥ इर्प ॥ रूपे मोहामणी हो गुण अलखामणी । कपट दपट में रमाय ॥ इपं ॥ २ ॥ निज २ मंचित हो पुण्य प्रमाण से । सुख, यश, धन जन पाय ॥ इ. ॥ मूर्य मिदा हो देखी सुख पारके । पुण्य विना कैसे सोथाय।।इ ॥ ॥ एकदिन सूनी हो सुखे निज मेज में । स्वप्न लियो सुखदाय । शभा भराणी हा मार्गी गणी निण विप । विषम नीवेड्योजी न्याय ॥ इपं ॥ ४॥ यों देख हर्षि हा जागी नविण । प्रीतम पाम जो श्राय । मधुर वचन से हो नृप को जगाविया गप्न चिरनन जणाय ॥ इपं ॥ ५॥ सुणी यानन्दि हो राजाजी यों कहे । पुत्र होवे- गा गाणयन्न । न्याय विशारद हो मजलस रंजणों।प्रजा तात महन्त ॥ ईपं ॥६॥ श्रीमति ही हो याई निजस्थान के।करे गर्भ प्रतिपाल । सुखे २ वीत्या हो माम मवा नौ नदा । जन्म्यों पुण्यवन्त चाल ।। इपं ॥ ७॥ जैसे पंक से हो कमलज नीपजे । मृतिका में जमे हेम ॥ चार समुद्र में हो मुक्ताफल हुवे । ए पुण्यात्म .
fa हवा नम ॥ 5 ॥ ८ ॥ पग्जिन जीमाह हो स्थापे नामने । गुण निष्पन्न 'न्याय- मण ॥ चंपकलना हो मुक्त गशी परे । वृद्धि होवे हर्षे सेण ॥ इपं ॥ ६ ॥ विज्ञावय में हा पढाह मवी कला । धर्म ज्ञान मन्मंग ॥ प्रवीन भया मो हो स्वल्प ही कालमें। कर मिटा उलग ॥ दृर्ग ॥ १० ॥ जय विजयने हो माय रमे मदा । लघु जाणी ते धर प्रम । परन्तु पगयाई हा जुदी २ नरतणी । पाये उतनो ही खेम ॥ इपं ॥ ११ ॥ जय विजय का हा एगय प्रवन अति । ते लगे दाम समान ॥ देखी श्रिमति हो चिन म प्रयन्न । ग्रान गेंद्र ध्याचे ध्यान । इपं ॥ १२ ॥ राजाधिपती हा होसी दाना बन्धुवा । मझ पा जन्म दुःख पाय ।। कोई उपाय हो हणायं दोनों भगी। ना मम पुत्र मुम्बी थाय । इपं ।। १३॥ छल छिद्र, बहु विय हो देखे दोडका । करे क.ह मागण उपाय ।। पुगय वनी जह बेहो जय विजय घणा । लागे नहीं एकी दाय । टप | १४ || चिन्तातुर्ग हो हुई श्रीमति घणी । अन्नादक नहीं भाय ।। निद्रा गंशाणी हा विशाणी मदा रहे । नयन नीर वहाय ॥ हर्प ॥ १५ ॥ एकदा . K थाइ हा एक जोगणी निहां । जाप्ते विद्या अनेक ।। श्रीमति पेखी हो लखी चिन नत्तिणे । बाल मा धरती विवेक ॥ इर्प ॥ १६ ॥ विद्या बल से हो जाणी में आपके । चिन मे चिन्ता है पूर ॥ मो प्रकाशी हो महारे सन्मुखे । करुं क्षिण- मे दुख दूर ॥ इ५ ॥ १७ ॥ इन्द्रवश प्राणू हो दीपक रवी करूं । हरू क्षिणे शत्र का पाण ॥ मत्य मी मानो हो कहनी माहरी । करुं तुम कह्या प्रमाण ॥ इपं ।। ॥ १८ ॥ निशंक होइ हो कहाँ मुझ मन तणां । तुम हम बीच भगवान ॥ तुम दुःख देना हा मुझ मन दुख घरे । दी है तिणी जवान ॥ इर्ग ॥ १६ ॥ गुणी- जन तुममा हो मिलीया हम भणी । तवही कही मन बात ॥ प्रभा न रखा हो हम जग कोड की । इम गणी ने प्रचात ॥ इपं ॥ २० ॥ इच्छित मिलीयो हो राणी ने प्रायने । ढाल दृमर्ग माय ।। ऋषि अमोल कहो पुण्य प्रतापसे । चि- घन मी विरलाय ॥ डम् ॥ २१ ॥ दोहा ।। श्रीमति ही श्रति । सुणी जोगण है ना वेण । नुधिन भोजन लइ हुवे । त्यो फल्या राणी नेण ॥ १॥ करामातण है जांगण भाणी । जाण। अनि हाश्यार ॥ भाग्ये अाइ माहेरे । हिये चिंतित करू पार ॥ ॥ मन्मानी घाणी जोगणी । ग्रामन ऊंच बैठाय । अन्न वमन इच्छित देह । माना नम उपजाय ॥ ३ ॥ नरमी कह थे ज्ञानी हो। जागयो महागं दुःख। जिम वाल्या तिमही वर्ग । अ मुझने मुख ॥ ४॥ दुःख मय दाम्या मन तणा। मानी जोगणी दपाय ।। किचित फिकर न कीजिये । यह तो महज उपाय ।। '॥ दान : गं । चार नवनि अन्यदा ममय ॥ ये देशी ॥ श्रीमति हर्षित हुई जाणी जागण कगमात ॥ हो भाइ ॥ जोगण पाण हर्पित हुइ । जन्म को याश्रप चटान । हो मार श्री ॥ ? ॥ कहे गणीजी देग्वियं । थोड़ा ही दिन के मांय ॥ हा वाद । माकं दोनों बन्धवा । कर्म में गुप्त उपाय ॥ हो भाइ श्री ॥ ॥ एकान्त जाय या भणी । दीनी तन सुखकार ॥ हा भाइ ।। और मामग्री मय दावी । विद्या माधन तोय हा भाई। श्री ॥ ३ ॥ जोगणी ग्रा- गयन जागण कया दवा प्रयत्न होय हो भाई । क्यों विंदार्ग मुझ भणी । कहे " कार्य में मांग हा पाई । श्री॥ ४ ॥ नमन करी कर जोड़ के। जोगण कर अ. ग्दाम । मा: मित्राणी श्रीमति तणी। पगे शाम तुम पास हो माई। । भर मन फेरी करी । जय विजय की बात कराय हो माई । राज faot .mमाण न । मा करो उपाय हो माई । श्री ॥ ६ ॥ ज्वाला भणे इण कायम । सामान दुध पाय हो वाई । कुमर दोनों महा पुग्यवन्त हैं । मार्या कि- मापा । नायर याई । श्री ॥ ७॥ दुख सुख रूप तन होवमी । तोपण राखण ता. मन हा याइ । उपाय र ऐमो हिने । होय श्रीमति चिन्तन हो बाई। श्री ॥ ।। म पानी मर्ग गई । जोगण राणी पाम श्राय हो भाई । कहे चिन्तित हरामी नम नागा । निद्ध हुबो कियो उपाय हो वाई । श्री ॥ ६ ॥ दोनों ही सुखे गगन मग ममम मांय हो भाई । कहे नृप को मावथ हुयो । न्याने घरो मुझ गाय हा भा। श्री ॥ १० ॥ में कुलदेवी तुम तणी । चाहूं कुल को खेम हो भाइ । या योग होत जाणं कोइ । तो नावं घर प्रेम हो भाई ।.श्री ।। ११ ॥
" जय विजय तुम तनुज दो। होमी तुमको दुःख कार हो भाई । निण कागण दोनों भाणी । शीघ्र न्हयावा मार हो भाई । श्री ॥ १२ बेरी और व्याधी अंकूर मे । करनी नन्तिण नाश हो भाई । तो पागल वधे नहीं । यह नीति बनन किया हा माई । श्री ।। १३ ॥ मत्य बात ये मान ज । करजे जो दिन वामहे नहीं बग फिर हे माहगे । यों कही देवी जाय हो पाई। श्री ॥ १.! . नव ही भगति । चिन्ता व्यापी अपार हो भाई। अनंभव बात की वाणं । देव मि. 'या न कर चार हां भाई । श्री ॥ १५ ॥ कहे श्रीमति ने जगाय ने । स्वप्न तणो विग्नत हा भाई । श्रीमति कहे मुझ ने यदा । ये ही स्वप्न पावंत हो गजा । श्री ॥ ॥ नृप कह असंभव वात ये । दोनों कुंवर विनयवंत हो राणी । कुल भूषणा द पाण विना । किम मुझ दुःख करंत हो राणी । श्री ॥ १७ ॥ राणी कहे ग्रहो नाथ जी । लाभ पाप को वाप हो राजा । होती पाई अनादि में। जाणों छो गान्त्र न ग्राप हो गजा। श्री ॥ १८ ॥ स्नेह मगपण लोभी न गिणे । राज लक्ष्मी के काज हो राजा । केई मयां मरसी केई । जो गफलत में रह्या हो गना। श्री ॥ १६ ॥ मन्देह नहीं अम्बा वयण में । चेता गई हित काम हो गजा । कालिज मुझ धूजी रह्यो । कुशल रखो ग्रहो राम हो राजा । श्री ॥ २०॥ मावध रहजो नाथजी । करो योग्य शीघ्र उपाय हो राज । तृतिय ढाल अमलिक मणी । राणी का चिन्तित थाय हो भाई । श्री ॥ २१ ॥ दोहा । गणा मुर्ग का बयाण मण । नृपति अति विस्माय । कूल भूपण मुझ नानड्या । 1 किग विध माया बाय । ॥ १ ॥ विप वृक्ष हाथे लगाविया । ते पिण नहीं कटाय। कल्प वृत्त मम तनुज दो। चिन गुन्हे किम मराय ॥ २॥ जन्म से श्राज दिवस लग कयों न कोई अन्याय । प्राण न उल्लंधी माहेरी । ते किम होवे दुःख दाय। ३॥ कदा गणी मांक वार में । बोले मिथ्या वेण । पण देवी क्यों मिश्या लवें। आश्चर्य अधिक एकाग ॥ ४॥ यो चिन्ता सागर विषे । राय गोता रह्या खाय । खाड कृप के म य रह्या । सुचे ना कोई उपाय ॥५॥ ढाल ४ थी । वेदरवी मे विक मन वस्या ॥ यह देणी ॥ उत्तम अपमान महे नहीं। नीच न लाज न श्राय हा लान । केगर्ग जाये एक बचन मे । वान धुकर्या बहु प्राय हो लाल । उत्तम ॥१॥ निश्चय मन महीपनि कायो । मारण में नहीं मार हो लाल । वस्यवृत्ति महारे करूं । ज्यों न होये काह विगाड हो लाल ।। उ० ॥२॥ निजर केदी कर के रग्बू । वाहिर न जान पाय हो लाल । विना चेतायां विन हुकम मे । महारे पास न याय हो लान्न । उ० ॥ ३ ॥ फिर किम दुःख देशी मुझ भणी । जचीयो एही उपाय हो नान्न ।। बान्नायो दरवान ने । शक हुकम यो फरमाय हो लान्त ॥ उ०॥ कुमग ने मर हुकम दिना। जान न देना बाहर हो लाल ॥ तसे न यावे मेरे कने। वान मन करना जाहर हो लाल ॥ उ ॥ ५ ॥ यो पुक्तो बन्दोवस्त करी । निश्रिन्त रहे गजान हो लान्न । प्रात तात चरण वन्दवा । कुंवर याया दोडी स्थान हो लाल ॥ 3 ॥ ॥ दरवान रोक्या तरिक्षण । कहे पूछ ग्रावू इणवार हो लाल । फिर आप अन्दर पधारजा । हुकम कियो दरवार हो लाल ॥ उ ७ ॥ खेदाश्रय ४ अनि पाइया। दोनों कुमर तत्काल हो लाल । किम अाजही रोक्या जावता । कांड हवाल हो लाल ॥ ३०॥ ८॥ श्रापण जाण अजाण में । कीनो नहीं को कमर हो लाल। पिना गुन्हें अाज अपणने । नृपति राख्या दूर हो लाल ॥ उ०॥ ६ ॥ अपनगन ग्थाननीण एकही । रहणा जुगतो नाय हो लाल || पुण्यें पाया गजाल विप । आगे भी पुण्य संग याय हो लाल । उ० ॥ १० ॥ अटन किया अन्य देश में । भाग्य परिक्षा होय हो लाल । चातुरी वल युद्धि वढे। यों चिन्तव ने दोय हो लाल ॥ ३० ॥ ११ ॥ परवश पणे इहां रहयो। यह तो मोटो दुःख हो लाल । परदेशे फिर प्रापण हिवा। भोग स्वेच्छा को सुख हो लाल । उ०॥ १२॥ निश- म बरमान मही करी । पड्या रहे तेही ठाम हो लाल । निति वचन ए है खरो । सुज्ञ ती लहे पाराम हो लाल ॥ उ ॥ १३ ॥ श्लोक ॥ त्रय स्थान न मुच्यते । काका का पुरुषा सुगा । अपमान त्रयो याति । मिह सत्पुरुषा गजाः * दाल ॥ इम मोची माहम घरी । याया मेहल के दार हो लाल ।
मावर करण पिता भणी । लोक रचा तेही वार हो लाल || उ० ॥ १४ ॥ ॥ नाक ॥ नन बन्नय महमे वृथयं । मग प्रगाणं निखिलान येहम । गुरूव धस्ताद का दशान । कगयो नि कुदृहपत्मगाथ ॥१॥ रत्नानि रत्ना करमा वमंस्था। 1. Ifय का दिन बनी। हानिम्तवें वह गुणेस्त्विमानी। भाविन भूवल्लभ मोलि में ।। • च दोन किन्नु कस्या । प्यन्यस्य यः क्षोभ करस्तवापि । गु- "" !: । थाम्न । नेपां गुणः स्वमहिम प्रवृति ॥ ३ ॥ ॥ अस्यार्थ ला. महार मानतुं । गं करूं सब का तोल हो लाल । ऊंच नीच नी.....|| fभी तुम होमी माल हो लाल ॥ उ०॥ १५ ॥ रत्नाकर रत्न पद का । मन कर मन अभिमान हो लाल । वे रत्ल रूठा जो तुझ थकी। तो । रहने प्रगान हो लाल ॥ उ० ॥ १६ ॥ पण दोष नहीं यह तुझ तणो । चहाना कानो नाम हो लाल ॥ गुणी गुण सर्व स्थान पामसी । वधे रन की गाम हा लाल ॥ ३० ॥ १७॥ यों कयो तीनों श्लोक को। पत्र चटायो द्वार हो लाल ॥ सुरत्व धरसिंह सारखा। चले दोनों कुमार हो लाल ॥ उ० ॥ १८ ॥ शकुन श्रेयकार तव भया। ऋद्धि सिद्धी दातार हो लाल ॥ समझा हर्षाया पणा । मीख्या कला के मझार हो लाल ॥ उ० ॥ १६ ॥ निश्चयवादी क्षत्रि कुली । उर सोच नहीं को लगार हो लाल ॥ विश्वास्या सुशकुन से । चलिया उत्महा थपार हो लाल ॥ उ ॥ २० ॥ पुण्यात्म पगले पगले । पावे सुख विशाल हो लाल । ऋषि यगोल ने यह कही । रसीली चौथी ढाल हो लाल ॥ उ० ॥ २१ ॥ ७ ॥ दुहा ।। जामान्तर नरपति तदा । संभार्या कुमार । बोलाया मिलिया नहीं । तय भय पायो अपार ॥१॥ रखे किहां ही गुप्त रही। करे - चिन्ती घात । हूंढावे अति खंत से । दारपाल तब भात ॥२॥ द्वार पत्र जे लगावियो । कहा सहु समाचार । नृप सामंत साये लही । तत्क्षिण श्राया द्वार ॥ ३ ॥ पढ़िया श्लोक तिहूं प्रकट तहाँ । श्रर्थ समझा सब भूप । परसंस्ये खुल्ले मुखे । हाहा युद्धि अनूप ॥ ४॥ चिन्ते नृपति श्रेय भयो । सहजे टलियो पाप । .
में भी यहां निचिन्त रहू । तेभी न पाया त्रास ।। ५ ॥दोना कुमर की मात सुण। दुःम्य ते पाह अपार । श्रीमति हर्षि घणी । करपा पुत्र सिरदार ॥ ६ ॥ चिन्तित न हुवे कोड को । होवे जो होण हार । श्रोताजन पागल सुणो । जय विजय अधिकार ॥ ७॥ ॥ ढाल ५ मी ॥ वालुहा तूं संग न जाजेरे । पाछो घर बगो पारे । यह चाल । पुण्य फल भव्य जन जोजो जी । पुण्य करवा उ. सुक होजो जी ॥ टेर ॥ जिग २ कुमर पागल बधे । तिम २ शकुन श्रेय थाय । चिन्ने हाण वन ने विपे । महा लाभ मिले किस्यो प्राय ।। पु० ॥ १ ॥ पागल विषम रम्य वन में । शीघ्र जावे देखत विनोद । मध्याने सुधित भया । लियो विश्राम धरी प्रमोद ।। पुण्य ॥ २॥ मिष्ट निरोग फल भोगव्या । पीयो शीतल फरणा को नीर । वात वनावे प्रेम की । वैठा तरु तल दोनों वीर ॥ पुण्य ॥३॥ दुपट्टा वीवाइयो । भुज उसीस्यो तल देय । थाक प्रमाद निवारने । तहां भूमी पे मृता नेय ।। पुगय ॥ ४ ॥ जैसे वक्त अाइ पडे । सुज्ञा होवे उसी प्रमाण । खेद न . । फल नही पाया पितान ।। पुण्य ॥ ५ ॥ लघु वन्धर निद्रित भया rafग निशिन्त । जय जी पड़े विचार में । पूर्व पश्चात् केइ चिन्तित ॥ ""। ॥ ॥ नीज पर ना वृत्त पे जी। यन युगल मुझे रेय । देखी दोनों ५.५१ : १३ । क्षणी कर जोड़ी केप ।। पु०॥७॥ पाणेश बाज अपने घरे । • 1 । । गत मार । ज्ञानी गुणी धर्मात्मा । योग्य करो यारो मत्कार ।। । यस कहं सुगुणी प्रिरा । वक्ते भली चेताड़ मोय । घर पाया मा या मागया। तोपु हिवणा दोर ॥ पु० ॥ ६ ॥ त्रिजगे मिलणी दोहली। नाम मुफ पाम । ते इनके अर्पण करी । हूं तो पूरुं गहारी पास ॥ पु० ।। || पा दमति मानव रूपे । प्रकटे जयजी ने पास । नमन कियो प्रेमातुरा। नरकर भरदार ॥ पु०॥ ११॥ भले पधार्या पाहुणा। ग्राज पवित्र प्रांगण कम जंगली भरिन्नी कर । तुम भुक्ता हो राज रिघ । पु० ॥ १२ ॥ अमू: जानु त्रिदं मुझ को । कमा करी करो अंगीकार । श्राप जैसा.पुण्यात्म के
No text on this page.
ढाल पंचम अमोलक भणी । श्रागे रसीली कथा मुख ॥ पु०॥ २१ ॥ ॥ दुहा ॥ जय जी मन थाणंदिया। पा लाभ अपरंपार । सूता लघु वंधव कने। रही न चिन्ता लगार ॥१॥ महा योपधी प्रभाव से । उपसर्ग न जरा होय । निशी मर्व तहां ही रहा । सुखपी कुमार दोय ॥ २॥ प्रात जय जी जागीया। विजय भणी जगाय । नित्य नियम स्थिरचित कियो। तेतले रवी प्रगटाय ॥३॥ प्रमानुर जयी हुई । लघु वन्धव को जणाय । पूर्व सुकृत्य यहां फले । श्रमूल्य त्रिवस्तु पाय ।। ४॥ यन युगल की भक्ति को । कह्यो सर्व विरतान्त । देखाई तीनों वस्तु ते । विजय भी अति हर्पत ॥ ५॥ ॥ ढाल ६ट्ठी ॥ पियाजी घांरा चित्त मांहे कांइ वसी । यह चाल ॥ देखोजी भाइ भाइतणी प्रीति । कहां दम्बिये जग में राति । देखो०॥टेर ॥ राजमन्त्र विधि सहित बताया। प्राण के प्रेम अति । प्रति श्रग्रह कर तास सिखाया.। देने राज क्षीति ॥ देखो० ॥१॥ कपट रहित सो मन्त्र यादकर । करता विचार चिति । राजघणी. जेष्ट बन्धव हाच यह शाम्र की नीति ॥ देखो० ॥ २॥ अति नम्र हो मिष्ट वयण से । यों । करना विनंनि । पिना मम जेष्ट राज योग्य तुम । अनादि यह वृति ॥ देखो० ॥ 3 ॥ में तुम मन्मुख मेवक सो रहे । ज्यों लक्ष्मण सीतापति । इसीलिये विद्या यह । याप मिद्रकर । होवो भू इन्द्ररति ॥ देखो० ॥ ४ ॥ जय कुमर लघु बन्धव नांह । बांडे कगण भूपति । बोले लूं किम् नहीं राज जोगो । न बोली जे अघटति ॥ दम्मा ॥ ५ ॥ अपन दोनों राज योग्य हां । लक्षण गुण ग्राकृति । दोनों मिल विद्रकग यह गिद्धी । रहकर पुक्त यति ।। देखो० ॥ ६॥ विजय वचन प्रमाण क.ग ये । बेटा जपनलिनि । लघु बन्धव के विश्वास काजे । जय करे ढोंग रीति ॥ दम्या ।। || मन्त्र जाप तो न करे किंचित । मुख हिलावे निति । देखो प्रेम जष्ट बन्धव का । निलभी ज्या जति ॥ देखो०॥८॥ तात ज्या भ्रात की याज्ञा पालन । विजय मदा स्थिरविति । यथा विधि साधे साविद्या । देखो लघुत्ल वी नानि ।। दवा ॥६॥ पग फिरण क्यों परिश्रम कीजिये । जो है वस्तु यति ।
मनी प्रार्थी डिये गगन में । चलिया शीम गति ॥ देखो।। १० ।। विद्याधर
मम किस प्रकार । क्रीडा करत तीति । संत सतीयों के दर्शन करते । सुने
व्यापार गानि ।। देखो० ॥ ११ ॥ क्षुधित हुवे तेहि मणी पसाये । नीपाय भोजन
इन्धान । शाल दाल पकान व्यंजन तोय । सरस सुखद बहुभांति ॥ देखो० ॥
• ॥ नम भूषण वन मजे सदा । दान पुण्य करते विति । देवसमा यो सुख
भोगवा । जाच ग्रानन्दे मिति ॥ ॥ देखो० ॥ १३ ॥ यो फिरता ते दिवस
माये । कामपुर ने अंकति । उतरे श्राइ वाग माही । हर्षे जो नगरा कृति ॥
या ॥ १४ ॥ माक्षात् जाने स्वर्गपुरी ये । दिव्य ज्योति झलकति । चिन्ते चित
में जर जाते वार । श्राज भाइ ले राजमति ॥ देखो० ॥ १५ ॥ पण यह तो गृहण
न करमी । महारी लज्जावति । इण कारण भेजू इणने ही पुर में । में यहां ही
लेयं रिश्रति ॥ देखो० ॥ १६॥ कहे भाइ में विश्राम यहां लेबुं । तुम जायो नगर
प्रति । अनोखी यस्तु मिले सो लाग्यो । ना कह जो थे. मति ॥ देखो० ॥ १७ ॥
थोड़ी वार मे में भी यावृंगा। विजय सरल प्रकृति । मानी वयण चाल कामपुर में । विमर्ग बान चिति ॥ देखो० ॥ १८ ॥ आये पुर में तापे घबराये । वैठे एकांत चीनि । मार्ग प्रना करे बड़े भाइ की। प्रेने नगर प्रति ॥ देखो० ॥ १६ ॥ पुगय फल ये हम। नगर के । होवे अत्री ही पति । कह अमोल सुणो अहो श्रोता । पट्टी दान हति ॥ देखो० ॥ २० ॥ दुहा ॥ ते अवमरे ते पुरपति । अपुत्र्यो मरण पाय । अन्यने गादी दिया विना । दहन क्रिया न थाय ॥ १ ॥ सामान्त मिल मामति की। पंच द्रव्य मंग लेय । फिरे तदा राजपुर विपे। पुग्यात्म कोह छेय ॥ ॥ गज लानमा बहुत घर । द्रव्य सन्मुख वठे पाय । मंचित विन किम पामाये । द्रव्य अप्ठा जाय ॥ ३ ॥ फिरता २ प्राविया। जहां बैठा विजय कुमार । देव जोग नम ऊपरे । वृठा द्रव्य श्रेयकार ॥ ४ ॥ गज गरज्यो हयवर हिंस्यो । कलश दुला गिर ग्राय । छत्र छयो चामर ढुले । सब सानन्द देख पाय ॥ ५ ॥ दाल 5 वी ॥ ग्राज ग्रानन्द घन जोगीश्वर पाया ॥ यह चाल ॥ पुण्यात्म को 12 ४ मुख मयाया। गज विजय पुण्य पर खायारे लो। सूंडे से गीरी कुंभ स्थले बैठाया । उंच उंची पद पायारे लो ॥ पुण्या० ॥ १॥ कुसुम वृष्टि सुर करी कुमर पर । गज भृपाण मजायारे लो । प्रत्यक्ष देव प्रभाव यह देख के । सज्जन सहु हर्षायारला ॥ पु० ॥ २॥ पुण्य पोरपा जाणी विजयते । जय २ शब्दे वधायारे लो। पंच शब्द वाजिब बाजे । विरुदा वली चोलायारे लो ॥ पु०॥३॥ रूप तंज बल्न याकृति निहाली। नम्या सामांत भूपालीरेलो । हर्षी मजा मुखे । चडीलाली । भांगी चिन्ता कंकालीरे लो ॥ पु० ॥ ४॥ श्राकाश में बोले दव वाणी । यह छे उत्तम प्राणारेलो । सहजन पाल जो राहनी बाणा चावा मुम्ब वाणीरे ल। ॥ पु०॥ ५॥ यों सुप अरिजन त्रास जो पाया । नमीया तत्क्षीण पायारे लो । पुरेन्द्र सम प्रताप जम्यो तस । मेहले चालण. सज थायारे लो ॥ पु०॥ ६॥ तव कहे विजये सब धैर्य धरीये । एक महारी कही करियेरे लो। मुझ जेन चन्द्रव गण गण दरिये। तास हकमें शनसनी गेलो॥४०॥ जो RE ।। यार ना ।। ५. ॥ ८ ॥ जय भाने जरा विमरे नाहीं । क्षीण २ चिन पाइर २. लग्याइ। पण रह्या पाने फमाइरे लो ।। पु० ॥ १५ ॥ 1 : ५ । नाति प्रमाणे चालेरे लो। मन्जन जन न घणाही सुहाये। १ . मन ।। || पु० ॥ १६ ॥ निज राज में हिंमा बन्य कराइ । कु. 111111 11:311 न्याय चाले ने सहुने चलाइ । यो सुखी करी प्रजा , ॥ दान शान विद्या शाल स्थापाइ । अनाथालय की Is | अमापन शाला थी। कीर्ति विश्व फेलाइरे लो॥पु० ॥१६॥ ५१ पमा । म न पाइ । पुनः ते पुण्य में लगाइरे लो। पुण्य से पुण्य की पाद या । पाप महा मुख दाइरलो ॥ पु०॥ १६ ।।.यो रहे इहां सदा सुख मा।। यो जयजीग: पद पाइंग्लो। सम्यक्त्व उलये ढाल यह मतमी । ऋषी भमानागार लो ।। पु० ॥ २१ ॥ दोहा ।। जयजी रही प्रत लिख विपे । देख्या मह मिन ॥ वधर भा यो लगी। हुवा रशी ने अत्यन्त ।। १॥ पण इच्छे नही मिनाग को । ग्ये न्हाग्य फंद मांय । विदेश कोतक देखन की । इन्छा निप्पल चाय ॥ ॥ हम चिन्ती मिल्या विना । चाल्या गगन मझार । कानक मिया जाय।। ग्राला न को लगार ॥३॥ उत्तमपुरे उतंग गीरे । गह् न यन मर पा । । उधि यादि स्थान के । विचरे इच्छे त्यांज ॥४॥ मणी प्र- भाष पुग्न । मनाथ मन का गर्व । पुगवात्मने पगपगे । वरते सदा ही पर्व ॥५॥ • || टाल - ची॥ श्रेणिकगय हूंरे ग्रनाथी निग्रंथ ॥ यह ॥ श्रोताजन सुणियों परय चिरनन । जयमाण कुमा पुगयवन्त ॥ श्रोता ॥टेर ॥ तिण अवसर मही मटण। नी । पर नगर प्रधान । गढ मढ मन्दिर मालीयाजी । अलकापुरी न ममान ।। बाना ॥ १ ॥ जंत्रमल नाम शोभतो जी । न्यायी तहां को नरेश । दाना भाा गाणनिलाजी । मुखद महु ने हमेश ॥ श्रो० ॥ २ ॥ जेत्री ग्रादि नानमा नी । अगना म्प शीलवान । पुत्र पांचमो ऊपरेजी । एक पुत्री गुण ग्यान ।। श्री ॥ ३ ॥ जंत्र श्री जीती लक्ष्मी जी । रूप कला बुद्धि तेज । शशी- वदनी ज्यों मुरांगना जी । पेखत उपजावे हेज ॥ श्रो० ॥ ४॥ तिणही पुर माहें रहे जी । कामलता वैश्या अनूप । रुपे लजाइ अपत्सरा जी। तेजे दीपे जैसे धूप ॥ श्री० ॥ ५ ॥ चन्द्राननी कुरंग लोचनी जी । शुक घ्राण अरुणोष्ट । कम्बू ग्रीवा उर उन्ननी जी । सुवर्ण वरण अंगोष्ट ॥ श्रो० ॥ ६॥ गजगमनी दंत दामनी जी। कामनी मोहन बल । पांचमो दिनार देवे सोही जी । भोगवे ताको देल ॥ श्रो० ॥ ५ ॥ जयकुमर पाया पुर विपे जी । ऊभा तस घर दार । नयन वयन लटका । करीजी । मोहित कीया कुमार ॥ श्रो० ॥८॥ यांची पट मांही गया जी । द्रव्य अपार तम दय । विलमे सुख पांच इन्द्रिका जी। सदा तहां सुखे रेय ॥ श्रोता ॥ ६ ॥ मणी तागे प्रशाद से जी। नित्य प्रत वहू मोलमाल । वस्र भूपण भोजन दिये जी । द्रव्य इच्छित तत्काल ॥ श्रो० ॥ १०॥ माता कामलता तपी जी। कपट कला की भन्डार । श्रका वृद्ध वये हुइ जी। जाग्यो लोभ अगार ॥ श्री. ॥ ११ ॥ एकदा सा चित चिन्तवे जी। मूर्स पुत्री मुझ । लुब्धि एक ही नर संगे नित्य तुझ जी । जाणे न कल को गुम ।। ओ० ।। १३ ॥ वोलाइ कहे पुत्री ने जी। अनिष्ट ययाण कमर । ने एक नर धारण कियोरी । फूली योवन के गरूर ॥ श्रो०॥१३॥ कुलाचार किम थे तज्या।। भंग कियों लियो नेम । पांचसो मोर दिवग। नाम्य ही की जाये प्रेम.।। श्रो० ॥ १४ ॥ कामलता देखाडीया जी । माणी भप वह मान्न । यका खुशी हुइ घणी जी । लोभित हो करे तोल ॥ श्रो० ॥ ॥ खाना हाथै ग्राीयो जी । कि हाधी लावे यह माल । विश्वासी पूछे पुत्री को जी । कहे देख्या जे हाल ॥ श्रो० ॥१५॥ सा कहे छोटा बटवा थी। काटटी माही जाय । वम्र भूषण भोजन दिये जी । क्षीण मांही ते लाय ॥ ओ० ।। ६ ।। 'नः कह अका पूछजे तूं । तास मोह उपजाय । यह करामात हाथे लगे ना । दरिद्र ....पणा विरलाय ॥ श्रो० ॥ १७ ॥ तनुजा कहे काई अड्यो जी। पनि ए वान । अनिष्ट लगे जाये तजी तो। मुझ से विरह न खमात ॥ श्रा ॥ || नियम से अधिको देवे जी । द्रव्य अापण नित्य तेय ।
.
iita }} में दागदा है जी । न लीजे कोइ को छेय ।। मो० ॥ १६ ॥
मंगगडी । भाइ कुमरजी पाम । अन्तर नहीं जणावतीजी नित्य
141 1३11म ॥ श्री० ॥ २० ॥ सुसंयोग्य पुण्ये लहेजी । लोभे मूलही
'..! टाल भगालजी। जो वो अफा का उपाय ॥ श्रो० ॥ २१ ॥
अयाने लागो भूतडी । लोभ तणो विकराल । बारम्बार कहे पुत्री
११॥ मद माल ॥ १॥ अग्रह अति जाणी मात को। एकदा अवसर
1. न.1 पर जय भणी । फरमायो गुप्त मोय ॥२॥ इच्छित वस्तु
नापन । जो ग्रन हम ताय । कहां से लागे स्वामीजी । सच्ची दो फरमाय ।।
: ॥ तय माना चिन चिन्तये । जो रायूं में छिपाय । तो तो भंग पडे प्रेम में।
पवा दुपार ॥ ४ ॥ गुप्त कहलो नहीं कोइने । नारी ने तो विशेष । उत्पात
२. प. । यह नीति निरेश ॥४॥॥ श्लोक ॥ न कस्यापि प्रकाशितः।
गृह मीणां विशेषत निस्से तथापि मनोरमीवस्यं किन कुर्वत ॥१॥७॥
दोहा ॥ पण यह वचन ने वीमरी । मोहमद छकी कुमार । वीतक वात दाखी मह । अग्रान्ड निनावा प्यार ।। ५॥ ॥ ढाल : मी ॥ मोक्ष पद पाये हो जिनन्द गुण गावनां । यह ॥ कपट कला देखोरे चतुर स्यातणी ॥ टेर ॥ कामनता नि न मानने मरे । कही मगली बात मांउ । ग्रमा सुणी ही घणी । गरे । त्यो पिन नीर खांड । क० ॥१॥ तेह मणीने हरण करण को । उत्सुक यया नम मन । बापट कला कलववा कारण । करवा लागी यतन ।। क०॥२॥ छन्न रिद नाय दग्य विजय का । मृशक मंजारी जेम । परन्तु मणी हाय नहीं ग्राय । चिन अग्वन ॥ क.॥३॥ तव समझी हो शार घणोये । मणी रसखे निज पाम । किगर्गत मुझ हात ए लागे । करूं केमो प्रयास ।। कप० ॥ ४ ॥ अवर निन्य कुमर पाम ग्राइ । भक्ति करे बहु कोउ । कला केलवी वस्य किया तम् । काग कर कपटी होउ ॥ क० ॥५॥ चन्द्रहांस मदिरा तस पाई। डाली । भग्म के मांय । निाग में प्रवस्य हुवा कुमरजी । तब ही ढिग याय ॥ क०॥
Fi in मणी गुप्त स्थान मे । तप पाई चित्त सेम । दिपा रखी तस गुम III लांग जम ॥ क० ॥ ७॥ कालन्तर ते नो उतरीयो । कुमर मा- समलना दिग मणी न पाइ ।संद पाया असमान ॥क०॥ ८॥ मन मनमम दलीयो । डाली ने मोह फास । मणी हरी कंकर धयों से पह' ।। . निराम ॥ ३० ॥६॥ ऐमी मदिरा वस्य में डाली । कापीले tel " ना मणी लेइ मुझ छोड्यो । करी यात्म वकसीस ॥क०॥ ॥ मारा पान उपर्जी चित माही । चिन्ता से प्रज्वले अंग । स्नेह बंध पड्यो । सामना ।। नयो न जाये संग ॥ क० ॥ ११॥ निद्रव्य नर कुमर ने जाणी भननमा बालाय । कह दारिद्री कहाड घर वाहिर । रहे कुल कृतव्य माय ।। ॥ ॥ १२ ॥ नियनीया से नेह करण को। नहीं अपणो अाचार । मान मि- टार में पाणी महारी । दे निकाल घर वहार ॥ क०॥१३॥ कामलता मा वचन सुगीन । मुरझापी मन माय । उत्तम कुमर के गुण में लोभाणी । बोले यो नर
No text on this page.
भग ॥ निगश अनि दुःग्य धरती । अन्य नर नहीं चित्त चाया ॥ क० ॥ २२॥ वीच घर उत्तम अाचरणी । यो पुण्यात्म पावे । हाल यह नवमी गाइ अमोलक शीघ्र शाल भग्य प्राव ॥क० ॥२॥ ॥ दोहा । गुप्त स्थान जयजी चिते । याच पान न । नीच नारी संगत करी। पायो में अपमान ॥१॥ अन्य महा मग। गह । छुट्यो प्रेमला संग ॥ नीच परमा हेरो । कियो मन इन ।। किहां जा किणने कहू । करूं अब कांद उपाय ॥ श्राफस्यो कर्म जान में । हे पप अव दरू कांच ॥ ३ ॥ विश्वासी मणी संगथी। छोट्या बंधव मग । ने गह सब मुख्य न्नड मुझ । अव होसी किस्यो ढंग ॥ ४ ॥ कर कपोल दृष्टि मही । नयाग नॉर बहाय ॥ देखो पुण्यात्म प्राणीया । शीघ्र ही सब सुख पाय ॥ ५ ॥ ढाल १० वी । ब्राह्मी ने सुंदरी दोनों बाइ । यहा हिवेतिण अवसर ने मांइ । जत्रमल गजारी जत श्री वाइ । खेले सखीयों ने मझारो ॥ पुण्य वन्त ने मुग्य मिले श्रयकारी ॥१॥ खेलती नदी ने तट थाइ । सखीयों साथ ते पण
No text on this page.
दवा नगर में दाढी पीटाड । इनाम श्रेष्ट कांजे जहारो॥ पु॥ १३ ॥ जो खुटी नही हामी अायुगमी । तो पुण्यात्म कोइक श्रासी । और तो वस्य नहीं लगारो ॥ ॥ १४ ॥ नरेश रे वान पंमद भाइ । तत्क्षीण हुकम सो फरमाइ । शीघ्र करा प्रसिद्ध नगर मझारो ॥ पु ॥ १५ ॥ जो वाह का दुःख गमावे । तेहने वाइ यह परणाये । दायजे दे कोड दीनारो ॥ पु॥ १६ ॥ योंही तव पउह वजावाइ । मुनी ललचाइ घाणा अायाह । पण पुण्य विन किम मिले ऐसी नारो॥ पु॥१७॥ जयजी उद्योपागा श्रवाण सुणी । तत्क्षणि हा चिन्ताधुणी ।मुझ पास ग्रोपधी. श्रेयकारी ॥ पु ॥ १८ ॥ पउह छवी राज में श्राया । केइ तरह ढोंग जमाया । आडम्बरे होवे मनवारो ॥ पु ॥ १६॥ोपधी पखाली पाणी मांही । दीनी कमरी ने पीलाइ । भाग्यो व्यन्त्र पाडी किलकारो॥ पु॥ २० ॥ तत्क्षीण कुमरी सावध । होइ । देखी परिवार मब हष्योंइ । प्रत्यक्ष देख्यो चमत्कारो॥ पु॥ २१ महा पुण्य वन्त जय जीने जाण्या । लक्षण संस्थान रूपे यह छाण्या। जोगी जोडीये करो A
No text on this page.
गाना॥ बाल ॥ नदा विहां टीन पाइपलाइ परागया। कहां गइ it] शाम हम यह भापा । न दग्यो भट जोगायो तव । तान ५il.1 पाया । मणी धोना कहे यार । धृत नेहने टेगरीयो ।॥ १॥ कुमर ६. नितने । विस २ होजोजी करी मिनन ॥ चाल ।। कपटीमित १३... मा गमाइपित सापणा । मेवा ना ययाग भाराधे करे कार्य बहुल ..! | पर पाना पातक करके चिन्ता ज्याला मिलगावई । कहे वहन मुणो साना मन भारइ ॥ २॥ शोक कियां में हो पायो न पार्माये । मम- परमल नामांए ।। वाल ।। नामी फल मिले ममता मे । योपथी २१ ५.१mयह गुणन्ति राज कन्या । पाणी ग्रहण इण से भयो । गयो मा। यह लाभ में हर्ष पावइ । कहे वक्ता सुणो श्रोना । समता से ३६ ।। ३ ॥ दर जो दोधी हो दिव्य मणी ओपथ । सो केने जाये हो । | पाइ पाए । चाल ।। पोशक बोड़नजारे कबहू । दोडी मिलेगा पुण्य थी। --
No text on this page.
-वि० पाउन । मागी अक्का डरी दिल में । धमकी राय जमाउनी । कहे वक्ता सुषो श्रोता । जयजी के पुण्य सहाही ने ॥ ७ ॥ देविक वस्तु हो धी प्राणी ने । इ. छित थाय । न श्राप अन्नाणी ने ॥ चाल ॥ अन्नाणी वैश्या ने तिस्कारी । कहे मम एकटा मिली । जावो देवो कुमरनेमणी । जो तूम चावो मनरली । नहीं तो पृगे विचार करजी । व हुवा राज अधिपति । कहे वक्ता सुणो श्रोता। जेष्ट दु- बायां कुगति ।। ८ ॥ अक्का घावरी थाइ कुमर कने । रुदन करती हो कर जाडी भाग ॥ चाल ॥ जोडी कर कहे कुमर से खमो अपराध देव मा. । हेगं । पर वम्य हुइ में मदिरा जोगे कियो गुन्हो बहु थायरो । ग्रहो नाथ हम थाप छन्डी । मन्डी प्रीति राज वाइसे । कहे वक्ता सुणा श्रोता। कोन हमारो महाड छे ॥ ० ॥ गज प्रतार से श्राप मोहित भया । गरीब की सेवा और सुख भूला गया । चाल ॥ भूलिया ज्यों स्वर्ग जाइ निज कुटम्ब भूले सही। त्यों हमा री मारन लोधी घणी किसी जावे कही॥पण हमारे याप एक हो । थाधार दूजा
No text on this page.
-वि०
दर दीर्जाये ॥ १३ ॥ उत्तम नर ते, प्रार्थना भंगे नहीं । श्राप हम इच्छा, यह
पूर्ण करा मही ।। चाल ॥ पूर्ण करो सब इच्छा महारी, मणी आप यह लीजीये।
मणी मेली कमर पासे हम घर पावन कीजीये। लेइ मषी कुमर हा परख्यो
कपट अक्का तणो । कहे वक्ता सुणो श्रोता । कुमर विचक्षण है घणो ॥ १४ ॥
प्रानि मंभार्ग हो कामलता तणी । कोप न कीघो हो हुलस्यो मिलवा भणी ॥
चाल ॥ मणी मिली प्यारी हिली । सुख सहू चिन्त्यो पावलो । कहे अवसर देख
थाम्युं । नुम पधारो निज स्थलो । अक्का घर गई खुशी थइ ॥ ढाल एका-
दश चिप । कहे वका सुणो श्रोता । जोडी यह अमोलक रिपे ॥ १५ ॥ दोहा ॥
अक्का गया तदनंतरे । कुमर पड्या मोह फंद । कामलता मन में वसी। धिक्क
काम मतिमंद ।। १॥ स्वसुर पक्ष निज कुल की। लज्जा मर्यादा तोड । काम
लता मदने चल्या । राज कन्या को छोड ॥ २॥ जयजी पाया देख के । ह-
प्यों गणिका परिवार । अति सन्मान दीधो सभी । श्राज तूठा किरतार ॥३॥
. वि० नित्य नवना सुख भोगवे । खान पान ने स्नान । गान तान गुलतान में । मग्न- ना मान गजान ॥१॥ जय जी की प्राज्ञा मुजव । मह रहे एक दिन । पुगवात्म ने कमी किमी । यानन्द मंगल नित्य ॥ ५॥ ढाल १सी ॥रे लाला निदीगो म. हागे वा जाणा ॥ यह ॥ रे भाइ कुमरी सुणी यों वारता । तुम पति गया पैश्या घागर भाइ । मुरलाह धगणी बढती। याती प्रारत करे वह पेर रे भाई। विकत यत्री जीवन ।। टेर ॥१॥रे भाइ शीतल पवन जल करी । ते नीण अन्तर ने मायरे माटे । मावध हो गती कहे । हिये महारी गति मी यायरे भाइ || शि- क. ॥ ॥ भाट येश्या व्यनी मुझपति । पइयो कामलता ने 'फन्द रे भाइ । नाज रखी नही कुन्न नणी । यया मोहोदय में अन्य रे भाइ ॥ धि ॥ ३ ॥रे भाहर कर मिर प्राथड़े बहे नेत्रे नीर परनाल रे भाइ । दामी दोडी गड़ भग पे । कद्या वाह का मह हाल रे भाइ ॥ धि० ॥ ४ ॥रे भाइ नृप शोकातुर गयो अति । बन्नी लजाणा घणो मन रे भार। मुझजमात नायिका घरे । कुननिन्द में अब ।
-वि जग जनर भाइ ॥ धि ० ५॥रे भाइ शीघ्र पापा कुमरी कने । लीनी खोला मे बैठायरे भाइ ॥ कर से प्राथू पूंछने । युचकारी कहे इमवायरे वाइ ॥ धि ॥ ६ ॥ रं वाइ फाकर किंचित करे मति । तुंछे मुझ जीवन प्राणरे वाइ ॥ पर्यन करी तुझ पनि भणी । देस्यूं थोडा दिने ठाम यानरे वाइ ॥ घि॥७॥प्रय रे भाइ सीवन कहे भूपति । शीघ्र जावो वैश्या ग्रावसरे भाइ ॥ तेडोधिकारी जमातने। लागे हम कुल ने कालासरे भाइ ॥ धि ॥ ८ ॥रे भाइ पायक लेइ प्रधाजनी । गया कामलतान घेर रे भाइ ॥ वाहिर रही मोटा साद से। कहे जयजीने यों टेर रे भाइ ॥ धि ॥ ६ ॥ अहो भाइ झट निकलो घर वारणे । छोडी नीच नारी नो संग रे भाइ । लज्जा धरो जरा कुल तणी । यों कैसे भइ मति भंगरे भाइ धि ।। १० ।। रे भाइ सुण के कुमर अति लाजीया । पझ्या फिकर समुद्र के 'मायरे भाइ ॥ धिक धिक मुझ व्यश्नी भणी । राय चाकर साथ चोलायरे भाइ ॥ धि ।। ११ ॥ र भाइ इण जाणे से मरणो भलो। कैसे जाके देखावं मम नविन . भाह ॥ सब नर्जनी में बनावगी । हुयो कुमर मने अनि दुम् रे भाइ ॥ धि । १२ ॥ रे भाट मही भाग दे वी मुझ भणी । ता पेटू में प्यार उदर भाई ॥ रा. जाजी किया जाणसी । निकल्या महारो जमाइ चुद्र रे भाइ । धि ॥ १३ ॥ २ भाह गन घर जाणा नहीं । बनी इहां पण रहाणो नयायरे भाइ॥ नन्ना जीवित दोह रहे । गमा कम में हिवे उपाय रे भाइ ॥ धि || १४ || मागी ताणे प्रभाव में । गया गगने ली दमंत्र र भाह ॥ म्रदेश की चोरी यकी । भीना भली कहे अन्यत्र र भार ।। चि ॥ १५ ॥रे भाइ श्राश्रयी गणिका चुप रही। प नाप गया प्रधाना भाट । बात चीनी कही जयवाणी । ते मुण विनम्या राजान र भाइ ।। ।। ।। भाट कुलवन्त कुमर लाजी गयो । हे पुगवन्त । भाट । सन्तानन कर मुझ लाडली । तुम ने कन्त मिलगी जरूरे भाइ । f} * ॥ ना.' गाण बन्न मन्जन वीमा नहीं। दुर्गामे नहीं गले प्रेमर भाइ । इत्या- दिया बचन थी । कमरी पाइ चित वमरे माह ।। पि ॥ १८ ॥ र भाइ राना विद्या भरपूर . पानगा। मान माय रे भाइ । वियोग भाले पति तपी। पण Im! नाणा ५ मा ।। पि० ॥ १६ ॥ यह सन्तराय कभी दटमी मुझ । मि. * 4 5 । शील पसाये सुन्न पामस्युं । रही दृढ पतिव्रत धाररे भाः ।।।३।। ।। र बाट भूमी मयन थाहार एक टंक तिज सिणगार धर्म ध्यान गायक भा? । समान कही ढाल वारमी । काइ विश्न तज्यां सूख पायरे माइ lifoli • हाहा । मणी प्रभाव कुमरजी । रूप परावती कोष । वृद्धवयी जागा वगपा । मामी मर मिध ॥ १॥ जटा मुट दीर्घ कावरी । भंवर भगवां भग। भन्मी ग्मी भाले निलक । वैराग्य नेत्र रक्त रंग ॥ २॥ गले दाम कर स्मर- पा। तुम्पि झाली कांग्य । चिमटा दंड करमे धरा । ईस नाम मुख भाख ॥ ३ ॥ लगोर , नग थनंग जय । पगमें ऊंच खडाव । पुष्ट ऊंच तन भाल दिव्य । करे मो रण में पडार ॥ ४ ॥ खेच्दा भूखग फिरे । पेसे पुर. वर ठाम ॥ भानन्द काल निर्गमे । शव कह पुण्प परिणाम ॥५॥ॐ॥ दाल १३ - ---- ht- वी । निन्दक → मनि मरजेर ॥ यह ॥ भविका पुगय बल देखाजी । गत वस्तु प्रापनि होय ।। देर ॥ एकदा गक बनके विषयजी । शकुन हुवा श्रेय कार । यर्थ ममझी ग्राश्रय लहाँ । हाण महा ग्रठवी ने मझार || म ॥ १॥ गत वस्तु कसे मिले। ये शान न निष्फन्न जाय ॥ म्यान मनोरम देलके वेठा तहां ध्यान लगाय ॥ म ।। ॥ २ }} चिन्य निहां यायो तदा जी कपटी अवधृत वेप । जय जी जोगी जो पायो । नमन किया विशेष ॥ भ ॥ ३॥ मेवा माचं याति हितजी । कुमर यान्नग्यायो नाम ।। बान प्रगट करी नहीं । नहीं पूगे जिहां लग ग्राम ॥ म ॥ ८ ।। दिग रह्यो गिय होय के जी। भक्ति करे अपार । जयजी भीनम पोपताजी। भोजनादि मत्कार ।। म ॥ ५ ॥ यण निपजाया नित्य दिये जी । इच्छित भोजन पान । कगमाति जोगी जाणनेनी । धूर्त हण्यों असमान ॥ ॥ ६॥ एकदा का- य माधवानी । कर गुरु ने प्रसन्न । कुमर मन तस पालखी । निज श्लाघा करे कथन । म ॥ ७ ॥ मंत्र जंत्र मणी पोपधी जय । मुझ से छिपी न लगार ।
जलवि० जो वहीये मी ही कहे । र्त ही करे उचार ॥ भ ॥ ८॥ श्वामीजी मुझ पास द जी । योपप एक अमूल । गुण विधि तस प्रकासीये । ते किम होवे मुझ अनु- . कृल ॥ भ ॥ ॥ कहाडी दी जोगी करेजी । कुमर देख होय । प्रत्यक्ष शकुन फलित थया । गइ औषधी मिली पुनः प्राय ॥ भ ॥ १०॥ जय पूछे सत्य की जाय । यह कहां से प्राइ तुझ पास धूर्त प्रति नरमी करी । कर जोडी करें - रदाम ॥ भ ॥ ११ ॥ श्वामी इहां से, सत योजने जी । रहे एक जोगी राज । में सेवा नम माचवी । ते प्रसन्न हुवा घणाज ॥ भ ॥ १२ ॥ तिण ए औषध मुझ दीवी जी । गुण पृथ्या कह्यो एम । जा तूं शीघ्र उत्तर दिशा । महा जोगी मिलेगा प्रभु प्रेम ॥ भ ॥ १३ ॥ ते कहेगा तुझने सहू । इस बूटी में गुण अपार । में यायो श्राप चरण में । फरमावो गुण जे सार ॥भ ॥ १४ ॥ एक प्रभाव तो इण तणोजी अनुभव हुवो है मोय । जव से ग्राइ मुझ कने । तब से मुझ मन खिन्न होय ॥भ॥ १५॥श्ररूण नयणे जय जी वहे रे दष्ट तं दिखता चोर । तर ही दुग्य यह तुझ नविन दिये । ये एक गुण हममें कठोर ॥ भ० ॥ १६॥ दगावाज तस्कर भागी यह । मनापे दिन गन । तूं निश्रय महाधूर्त है । कर पायो किनकी घात ॥ भ० ॥१७॥ यहां फल हम पाप का में, तुझे बतायु ग्राज । फिर यागे तूं नहीं करे । ऐसो महा कोड अकाज ॥ भ० ॥ १८ ॥ हम माची सुण विमम्यो अति । भये थरवरी यूटी अंग । योपर्धी छोड भागी गयो । कुमर न किया तम संग ।। भ० ॥ १६ ॥ पापी पापादय की पीडा महज पाय । धर्मी के धर्म प्रमाद से जी। महजे जाय बलाय ।। भ० ॥२०॥ माणी औषधी गढ़ पुनः मिलीजी । जयजी अति हाय । पुगय फल दावाणी । ढाल नेरे अमोलक गाय ।। भ० ॥ २१ ॥ ॥ दाहा । प्रदेश के प्रयास को । दःग्य नहीं बंद लगार । सार हुवो फिरवा तणो । वस्तु पाया अंग- कार ॥ १ ॥ जो कार्य पापिष्ट को । दुःख का कर्ता होय । सोही कार्य पुगयवन्त के । सम्म कारक लो जाय ॥ २॥ निकले थे अपमान से । लज्जित हो दुःखपाय। कागण में कार्य पक्यो । महाग्रीषधी मिली प्राय ॥ ३॥ हर्पित हो आगे चले ।
. form भार । देसन होस्य परी गरी । मिटा मन उत्मार ॥ ४॥ स्थिर रहने १. हा । माही बने उपाय । इजिन फले पुण्यात्म के । मुणजो विन लगाय ।।... 6 वी ॥ दण मरपरीयारी पाल ऊभी दो नागरी ॥ यह ॥ निए या माय । भमड रिभृक्षिती । हो सुजाण । भूमंड विभूनिती । सर्गपुरी साहार गर्ग र भोगरति ॥ हो सुजाण ।। नगरी के भोगवति ॥ ऋद्धि मे करी gre" दना ॥ ही सु०॥ चूर्ण ॥ भवन वाग निवाण सोभे लोभ इन्द्रतां । हार ॥ नाम ।। १ ॥ सुभाग नामे राजिन्द्र । नरेन्द्र ने मारीखों ।। हो सु०॥ २१ ॥ . २३२ नानि मे निपुण । जाणे नर पारखो ॥ होसु० ॥ जाणे ॥ भोगदनि पटना । मामार मुरी ममी ।। होल० ।। पाका ।। शील रूप गुणखान । मुजन न मन रमा ॥ होमु० ॥ मम ।। २ ॥ तास उदर उत्पन्न । रल मम बालका.॥ हाए । रत्न ।। भोगिनी तम नाम सख्य मुख मालिका ॥ दोसु० ॥ सुरू । गुण कला किया मडार । विनय शील जिममणी ॥ होसु० ॥ उपचये हुइ दिव्य रूप ।
हुमिन अंग कामणी ॥ हांमु०॥ हुल ॥ ३ ॥ मज मोलेह सिणगार । भार बम भपाणः ॥ हामः ॥ भार ॥ मात पठाइ तान पास । वर दो मुल नणी । होमु०॥ वर ॥ कन्या कप वय जाय । गय चिन्तातुर भया ॥ होमु० ॥ राय ॥ किमको एगणाय बाग । म गाण गाणमया ।। हो० ॥ मर्व ॥ ४॥ जो गुणवन्त मिले जोग । भाग सग्य पारट । हामु० ॥ भोग ॥ अप लनणी मंयोग । जन्म दुःखे जावड़ ॥ सागः ॥ जन्म ॥ पत्री को देह मीग्य । मचीव बोलाइया । हासु०॥ मची ॥ धूया वर विनार । एकान बटाविया ॥ होमु० ॥ एक ॥ ५ ॥ तेतले अचिन्त्य व्याल । वि. कगल नहां यावाया ॥ होमु०॥ विक ।। कुमरी जाती थी मेहल मांय । रने में मांचाचिया ॥ हाम० ॥ रम्त । मुरगाह पड़ी भुंपूट । टूटे ज्यो तमलता। होमु०॥ टंट ॥ दाद दामी भृप पाम । दाबी कुमरी कथा ।। हासु० ॥ दाखी ॥ ६॥ मुण भप ग्राश्रय पाय । बंद अति लावीयो । होमु० ॥ खेद ॥ तरिक्षण पाया तहां नाय । दीया थग्गीयो । होसु० ॥ हीयो ॥ सब पाया तही दोड । छोड काम अ.पि. ज ने ॥ होसु० ॥ छोड ॥ बोलाया भोपा वैद्य । लैइ सब साज ने ॥ होसु०॥ लंड ॥ ७ ॥ मंत्र जंत्र जडी जाण । वैद्यादि घणा भावीया ॥ होसु० ॥ वैद्य ॥ अपणी सब करामात । उमंगै यजमावीया ॥ होसु०॥ उमं ॥ किया बहुत उपचार। लगार लगे नहीं ॥ होसु० ॥ लगा ॥ श्राये उनकी उमंग । मेहनत निष्फल गइ। होसु० ॥ मेह ॥ ८ ॥ श्रात अति करे राय । निरासा धारी मने ॥ होसु०॥ निग ॥ चिन्त में क्या होय । सचीव नरमी भने ॥ होसु० ॥ सची ॥ कोह यन्न करो शीघ्र राय । ज्यों रल यह रहावाइ ॥ होसु० ॥ ज्यो ॥ बहु रत्न वसुंधरामाय । उपकारी को पावई ॥ होसु ॥ उप ॥ ६ ॥ उद्घोषणापुर:माय । राप करावई । होसु ॥ राय ॥ करे मुझ तनुना खुशाला तास परणावइ । होसु॥ नाम ॥ पडह वाजायो पुर माय । श्राय उमंगी घणा । होसु ॥ तेतले.जयजी तहां प्राय । शब्द सुण पडा तणा॥ होसु ॥ शब्द ॥ १०॥ देखाने चमत्कार । रूप वायनो कियो । होसु ॥ रूप ॥ लघु देही दीपे पुष्ट । बरणे सांवलियो । होसु ॥ वरणे ।।
१३ शुभ यम मजा नन । जेष्टिका कर विपे । होसु ।। जैष्टि ।। चंदन तिलक लिलाट । मान्न गन में दिशं | होसु ॥ माल ॥ ११ ॥ एक हाथे करताल । बजावे चूपसे । हाम ॥ वजा ।। दृनं हाथे फिरे माल । चले भक्त रूप से ।। होसु चले । पाये मध्य बजार । दम्याग लोक बहू जम्पा ॥ होस । देख ।। हंसे हंसाये सब तांय । वावन जी मन रम्या ॥ होम् ।। वाय ॥ १२ ॥ पडह वाजतो सुण । कारण सब पूछिया. ।। हास्य ।। कार || विम्तारी हुद बात । मत ने जन किया होसु ॥ भक्त ॥ वावनो कह कर ग्रागम । निणेक के मायने ।। होसु ॥ क्षीण ॥ देखो करामात मुझ । सर्व नहीं प्रायन । हाम् ।। मर्च ॥ १३ ॥ सवी कहे भाजी मन । भक्तणी चाविया ॥ होम ॥ मा ॥ गय कन्य जोग जोडी । येही जग पाविया ॥ होसु ।। येही ॥ वर्गया चिन केगे ग्य । सुरूपा इन सारखा । होसु ॥ सुरू ॥ यों हंसे सब लोक । क्या जान पाग्ग्वा ॥ हासु ॥ क्या ॥ १४ ॥ कितनेक दाने शाणे प्राय । शिना देव हनी ॥ होगु ॥ शिक्षा ।। गये करामाति बहुत हार । तो थारी चली किसी ॥१॥ माग ।। मन फर फोकट फंद । अरमान तूं पावमी । होम् ॥ यप ।। 11. नम पी । पई पस्तावमी ।। होमु । पछे ॥ १५ ॥ तव कह हंसीने पाय। .. गाय न कीजिये । होसु ॥ श्रन्त ॥ जरूर परणमी एह । इच्छा पूर्ण ।।३३॥ २ ॥ इच्छा ॥ यो हंमता पाया राय पाम । अरदास वावनो करे । १२ || मर ।। म पर वी विप दूर । वरने दृढ रीजिये । होसु ॥वच ॥ १६ ॥ 1 ils पापा कुमरी कन ॥ होमु ॥ पाया ॥ बूटी ली कर मांय । " गा पहने । हालु ॥ ढोंग ॥ मोठे स्थान चादर ढोंग से पावइ । होसु । ..ग ॥ पर दार अनन । यादि मंगावइ ।। होस ॥ श्रादि ॥ १७ ॥ उदक मिश्रि नभा र । पृढे भूपमे तिहां ।। होम् ॥ पूर्व ॥ उद्घोषण पुर माय । किसा धापन रिया । होम ॥ कमा ।। भूप कहे करो याराम । जरूर परणावस्युं हो। जरूर ॥ पारन कह दृढ रखो यवन । वदे जिन भावस्यं ॥ होसु ॥ परे ।। १॥ पडरना मम मंत्र । पाणी मो पारियो । होसु ॥ पाणी॥ ताही क्षीण के माप । में विक विष मह विग्नावियो । होसु ॥ विप ॥ निद्रागत की पेर कुमरी सावध हुइ॥होसु॥ कुम ॥ हप्यों मव पग्विार । चिन्ता ग्रारत गइ ॥ होसु ॥ चिन्ता ॥ १६ ॥ नरवर पुरजन मी । ग्राश्रर्य अति पाविया ॥ होसु ॥ प्रा॥ वावनजी की करामात । मी मम्माीया ॥ हाम ॥ मवी ॥ करामाती वावना भक्त । विरला जग तुम मम ॥ होम ।। वि०॥ चमत्कार प्रत्यक्ष । देख सब मन रमा । होसु ॥ देख ॥ २०|| ई)मा 'फली पर माय । हमक शरमावीया ॥ होसु ॥ हंस ॥ पुग्य पसाये जयजी का हुवा चावीया ॥ होम् ॥ हुवा ॥ यह हुइ रिवी ढाल । रसाल कोतक नाणी ॥ होस ।। ग्मा ॥ कहे अमोल अणगार । अागे मीठी घणी ॥ होसु ॥ यांग ॥ २० ॥ ३ ॥ दोहा ॥ नव जीवन कन्या लियो । हप्यों सब परिवार । चावन मा. नणा मवी । मान्यों अति उपकार ॥ १ ॥ प्रार्ति टली आँखो खुली। हया गय ने विचार ।। ग्रहो प्रभु इण स्थान । वचन पडे कैसे पार ॥२॥ चन्द्र कला मम वाह मुझ । यह राहू प्रत्यक्ष । गुण अन्तर मही अन्त लिख ।
दि. कमे जाडे ए दक्ष ॥ ३॥ अजय गति करतार की । विरूप श्रपों गुण ॥ गुणी यह रत्न थमोल है । चिन्ता में पडयो निपुण ॥ ४॥ वोल्या भी पलटे नहीं। जं क्षत्री मुख वेण ॥ खाड थाड विच में पत्र्यो । कीजो किस्यो थव सेण ॥५॥ E || ढाल १४ वी ॥ तावडो धीमो सो पडजे ॥ यह०॥वडे नर वचन को निभावे हो। बई नर० ॥ पुण्यवन्त तो नाना कहता। अलभ्य लाभ पावे ॥ टेर ॥ वचन भंग से यश भंग होवे । परतीत नहीं राही ॥ विन प्रतीत अपमानी बने ते मुरदा तुल्य थाह ॥ बडा ॥ १॥ कन्या का संचित प्रमाणे । पति मिल्यो यह श्राइ । यत्न महारा चले किसा यहां । होत यसो थाइ ॥ बडा ॥२॥ प्रातुरः होइ बोले बावनो । वचन पार पाडो॥ नहीं तो में जावं निज स्थाने । मन की वाहिर काडो । वडा ॥ ३॥ राजाजी दिगमुढ हो रहीया । हां ना नहीं वोले॥ चिन्ता सागरे गोता खावे । केह विचार तोले । वडा ॥ ४॥ तव वावन कहे चिन्ता मत करो। में भी योंही जाणू ।। मुझले राज कन्या नहीं शोभे । क रूप तन न्हा.
ET राधव नरमी या नु ॥ वडा ॥ ५॥ में दुर्भागी हीण अंगी ने । रंभा- किम दीजे ॥ हंसली ग्रीवा वायम बन्धन । श्रन्याय किम कीजे ॥ वडा॥६॥ जो कदापि श्राप जवरी से। पुत्री मुझ देशो । अङ्गीकार मो नहीं कियो तो। क्या शोभा लेशो ।। बडा ||७॥ मामन्त परजा प्रावरण चालेगा । ते सहार न जाशे। इस कारण मुझ ना कहो नां । मब जन सुग्य पामे ॥ वडा ॥ ८ ॥ सुन्दर मुझ से ग्रही न जाये। कारण मव जाणं ॥ चतुर मोड प्रोडण को जितनी । तित ना पग ताणे ॥ वडा ॥६॥ भाग्य पार जो वस्तु इन्छ । सो मूर्व जग मांइ । इसलिये में पर' नाहीं। फिकर नजी गह ॥ बडा ॥ १० ॥ वचन सुगड यो सुन वावन का । सब अार्य पाया। प्रत्यक्ष वमकार यह देखो । निर्विषयी निर्माया || वडा ।। ११ ॥ ॥ श्लोक ॥ कचिन गुणः गगी नरा । तत् गुणवन्त कचित् ॥ तत्वा गुणवन्त गुणे रक्ता । स्व बान्न ॥ तुम मम गुणवन्ता निलोभी। न मिले जग खोले । वडा ॥ १२॥ निश्चय . । पुत्री नुमको ही देगूंगा । वचन म्हारा पानू ॥ प्राण जावो पण वचन न जावो । उत्तम गति नालं ।। वडा॥१३॥ राम लक्ष्मण वचन पालन । वन में वास कीना। रिश्रन्द्र दाग ननुज पंच कर । मेहतर घर लीना ॥ वडा ॥ १४ ॥ यों अनेक ; दृष्टान्न दे भएन । व्यावन हट करीयो ॥ तव सामान्त कुटम्ब बदल कर । ना कागे भगया ।। वडा ॥ १५ ॥ सवही वयण सुणी असुन कर । लग्नोत्सव मंडा. यो । वाव नजी को मौकब काजे । द्रव्य अति दीलायो ॥ बडा ॥ १६ ॥ नवरंग महल दीया ग्न को । हय गय आदि सारा । उत्तम लम महूर्त देखायो । श्रावो मनी प्यारा ॥ वडा ॥ १७ ॥ द्रव्य तहां सर्व जोग या मिले । बने सज्जन केइ । मिली महेली मङ्गल गावे । गगन गरजेइ ।। वडा ॥ १८ ॥ वाजिन वाजे विविध प्रकारे । वन्दोला फिरता । देख विद्रूप हंस्ये बहू कोतकी । केइ अाश्चर्य धरता ।। वडा ॥ १६ ॥ यों अानन्दे लग्न दिन पाया। सजी अति सजाइ । गजारूढ हो चलीये यावती । सवा वर्षात ॥ वडा ॥ २०॥ लग्न मंडपे थाया: भराया।
- हा ॥१॥ मम्जन पुरजन माग । दाल चतुर्दश कही अगोलक । अव देखो नमनाग ।। • ॥ दाहा ॥ गजकन्या भी मज हुइ । ग्राइ मंडप मांग । गायन कर पण न।। मात्र रह साधर्य पाय ॥१॥ पाणी ग्रहण करो नृप कहे । नन चायन कर गय । म नही जागा सुन्दरी । क्यों जवरीय परागार ॥ २ ॥ महीपन कहे जागा नया । मन दी तुम नाय । अटल वयाग मुझ ना किर। जो कभी मेक कम्पाय || १ || र नर निज अंगना । कहां देनी के नाय । मा कहे ग्राग दुकम fa । सागपाय ।। ८॥ कुमी को पूरे कहे । गह मुफ मोड गमान । ननर गनग । ग्राप ममा लिया जान ॥५॥॥ दाल ? मी॥ पान माग समय निनका ।। यह ॥ अहो सुज्ञजन ग्राज यानन्द धन । नगर म टप व पारन । मय से नर्व मुख जन पाये। दिन २ वो पुगगाइ राज ।। यह ॥ ॥ या दनी अनि जय हर्षाया । परीक्षा पूरी थाइ । महा गत्यवन्तो निनापान जागया । नाही राणी बाइ राज ।। ग्रहो ॥ २॥ निन स्वरूप नाप्रगट - ।। पापनका योल्याइ । यहाँ भूपादि मुणियो गर्दनन । कई मुझ मन जे Pा | महा ।। ३ ।। कुरूप कन्या रल ग्रहयो । नीति मे युक्तो नाहीं । इम- नयम Tamil म वनु नलरुंबर माइराज ॥ अहो ।। ४ ।। सत्य प्रभाव तुमारो सा५ मा ३ा दरशाइ । मन मिले कुछ कर मको नहीं । पण मेरे में कैसे पा । म ५ ॥ नर दही वांछित फलदाता । जो कर जाने कमाइ । भानप मष दवा मग । मह भ्रमना विरलाइ होराज ॥ ग्रहो ॥ ६॥ नगर गाहर घर लम्बा नाडी । दो एक साड विणाइ । वावनो चन्दन वन्ही प्रजालो। शाम का यह नजाइ हाराज ॥ अहो ॥ ७॥ ज्वाला स्नान किया मुझ तनका पानमा: । दिर तुम याइ सुशी ते पर" । इममें शंका नाही होराज ॥ महा ॥ ८ ॥ नवा कई यह मरणो चहारे।यग्नि में कौन उवाइ । मन ममझायो परनमानी । बाद में मनल दीपाइ होराज ॥ अहो-॥६॥न्हाइ पोइ गन्ध सगाई । यस भूषण मजाइ । कजरा रूद हो यानित्र नाद । म जन मे परवयां हागन ॥ यहा ।। - ॥ अपूर्व प्राथर्ग जन देखन को । आगे २ पाइ । कोडों गम नम्या यही कप। कोतक कौन न चहाइ होगज ॥ अहो ॥ ११ ॥ ध्याना गगन न... नव । टिग उ.मो न म्हाड । कड़ अचंभे केड़ सेदाधर्य । देखे दृष्टी गागर॥ या ॥ १२ ॥ मग गंत्र सर्व देवता । जाड़ पङयो कुंड मांड । TER या पनि ना तहां । किम जीवन यह ग्राइ हांगन ॥ अहो ॥१३॥ ..", 1 दा नमा वन । बाहिर ग्राऊ भाई । गानन्दाधर्य गढ़ पाई। इस ", . . . . || अहो ।। १४ ॥ प्रोपी महिमाए । विधानल की । ना- ': गार । सना भूपाण मूल रूप नव । अधिक रहा मो भाई होगज }} घर ।। '' || नृपद नम अति मत्कारी । पूछकर ही लाइ । बावनी ब. नारा. करण । माची देवो फरमाइ हांगज ॥ अहो ।। १२ ।। मल मंडाणाने यागी रागन यथा नाय दीनी लुगाइ । मंत्र प्रापी मागी प्रमावे । निन्लिन का सियाराज ॥ अहो । १७ ।। मुणी वाणी अति विस्मय मानी । जग २ -- । -- 11 माह । धन्य २ नर महापुण्यात्मा। धन्य वाइ की पुण्याइ होरान ॥ग्रहो । अनि उन्मरे पुनः शहर में लाया । दिया तेही मेहले उतराइ । सर्व जन गमन • म्याने । वायुजों कीती फैलाइ होराज ॥ ग्रहो ॥ १६ ॥ तीनों रत्न पगा। में जय । रखे फिर जाय खोवाइ । रहे थानन्दे मज्जन सम्बन्धे । दम ग्लिाड होराज ॥ अहो ॥ २० ॥ ढाल दश पर पांच शिरोमणी । प्रमाना. गाइ । श्रोता भरीये सुष्टात्य खजाने । पुण्याइ काम आइ होराज ॥ ॥ दोहा ॥ पुनः प्रति ग्राइंबर कियो । जयती और पुरराय । भागना पत्रा जय भगी । शुभ लग्ने परणाय ॥ १॥ शतगज तुरंग सहनदश । दापजाम दिया गय । गाम जागीर दीया घणा । हाथ खरच के तांय ॥२॥ महापर गाम दम्पति । जोडी जोगी मिली धाय । स्वामी नहीं कोई सुसकी। मनिन मम फल पाय ।। ३॥ नित्य नवला मुग भोगये। दोगुंदक सुरमार । माणी पमाय मामुग्री । हाये मय नैयार ॥ १ ॥ भोगो गोपे अन्यने । देइ इच्छित दान ।
होनहार यागे सुनो । श्रांना लगाइ ध्यान ॥ ५ ॥१॥ ढाल १६ मी ॥ महार अाज अानन्द ना दिन छनी ।। यह ॥ पुगयवन्त बोल मह नहींरे । चातुर ने चिन्ना हाच महीर ॥ पुगय ॥ १॥ एकदिन मजाइ उत्तम मजीरे । निकल्या फिरवा जय जी पुरमा गार ॥ पुग्य ॥ २ ॥ हय गय पायक बाजा वहूर । शोभे राज मारवा नम गहरे ॥ पुण्य ॥ ३ ॥ मध्य बजार जब मो यावी यारे । पुरजन देवण अनि लाभाची यार ॥ ३ ॥ ४ ॥ ठठ जम्यो बजार के मायनेरे । जोवे गोरडीयों गाव ग्राया नर ॥ पु ।। ५ ॥ तामें नारी एक बोली जो रामभीरे । ऊंचे थर करी व्यां मुने मवीर ॥ पु ॥ ६॥ क्या देखो मवी ऊपर चडीरे । ग्रपणा राय जमाइ ये खबर पड़ी ॥ ॥ ॥ घर जमाइ सदाइ रहे इहारे। किस्यो देखणो यह जाये किहांग ॥ पु ॥ ८ ॥ शब्द म्पश्योए जय कानमारे । लज्जा पाया चिन्ते नीति मानमार ॥ पु ॥ ॥ 8 ॥ श्लोक ॥ उत्तमा स्वगुणे म्याता मध्यमा स्तुपितुर्गुणे । यधमा मातुन्ने म्याता म्बसुरेर धमाधमा ॥१॥ । ढाल ॥यों विचार मुख नीची किया । क्रिडा उत्सहा सब भागी गयोरे ॥ पु॥ १० ॥ धिक मुझ बुद्धि ने अरु गिद्ध नेरे । में तो गमाइ लाज काज सिद्धिनरे ॥ पु ॥ ११ ॥ जैसा हर्प में गया था बलमारे । तेमा शोग से पाया पाछा मेहलमारे ॥ पु ॥ १२ ।। एकान्त बेठा चिन्ता मागरे पड्यारे । अपमान दुःख अति तस मन नड्यारे ॥ पु ॥ ५३ ।। इहां म्हणो मुझने जुगतो नहींरे । जावू कामपुर विजय पासे सहीरे ॥ प ॥ १४ ॥ पुनः चिन्ने तहां कैसे जाइयेरे । ते है राजा किम दास होय राहीयेरे ॥ ५ ॥ १५ ॥ मत्री माधी में भी वर्गु राजीयोरे। स्वेच्छाए रहूं विन लाजीयोरे ॥ प ॥ १६ ॥ यो विचारी मंत्र संभारीयोरे। पण हृदय तास विसारीयोरे ॥ पु १.७ ।। भृल्या प्रमाद याद ग्रावे नहींरे । पश्चाताप अति पावे तवहीरे ॥ पु॥१८ ॥ हाहा अनर्थ यह में मोटो कियोरे । महाराज दाता मंत्र भूली गयोरे ॥ पु॥ १६ ॥ विजय विना यह तंत्र मिले नहींरे । जाणो भाइ पास अवतो सहीरे ॥पु ॥ २० ।। मुझ प्रमाद गुझने नीचो कोरे । पड्यो व्यश्न वश.तेहथी स्ववश योरे ॥ -- 14 ।। ५ ।। : 21 पनाह लाभ क्या लीनीयरे । महागजा वन ना उगार की- या। 7 ! : या निश्चिन्त हुया मनग्गी दानमार । अमोल पाशा फले • नकार || ॥ २३ ॥ ॥ दोहा । रूप पगनी प्रथम में । देणं ... यापन कर्ग । पार्दा इन्छिन बम ॥ ? ।। मागी प्रभाव नन्नी " बनाय । शम्र वन मीया तने । भाने तिलक लगाग ।। २ ।। नकी गन स्ट्रानो मान्न । कर बहुग्गी टीपणा । जानोड़ गनडाल ।। - । -3 , म र चानीया । उता कामपुर पार । मिलिया ही विजयको । पर अपना ।। 2 म पग्निा कागणे । को बनन ऊनार । ते लागी पिनय प्राचार ।।? ॥ दाल मी ॥ नागदनग नगद । पट: I - जाग्ग विद्यावन । नुमाबंधन दोगी. राजिन्द । तात अपमाने ना का । मागमन अनि होयही राजिन्दा । मुगायो हमारी वारना ॥ ये ॥१॥ बनम रद्र घट क. नन्न । ग्या मुघ निशी प्रारही गजिन्द । तीन नम्ही तुम माना प
.
4"] । यदर गंतुष्ट पाय होराजिन्द ।। सुणी ॥ २॥ जेष्ट भाइ कपटे गया।
। यहां राज हो राजिन्द ।। कहो में कहूं मो मत्य है । राख्या वीत-
। हामिन्द ॥ मुणी ॥ ३ ॥ सुणी विजय वीतक कया। श्राश्चर्य अधिको
: १.३न्द ॥ मही ज्ञानी ये पूरी गुनी । भाइ गुन चित प्राय होराजिन्द ॥
।। ६.दय भरणी मोह वस्ये । नेत्रे नीर वर्षाय होराजिन्द । पूचे प्रति नर-
#!'' ५ । मभ यधव के किणठाय होज्ञानी । सु ॥ ५ ॥ कव दिन ऐसो ऊगसी।
म. ५ यमझ भ्रात होतानी ।। शाम बतायो मुझ भणी । अति उपकार मोपे
पाहाताना ॥ सु॥ ६॥ कहे नीमति फीकर तजो । जयसेण सदा जय माय
गजिन्दा विदगमणी के प्रशाद से।ताम कमी कछु नाय होराजिन्द॥सु॥७॥
मामयम लगा रगादुष्कर मिलण नुम तापहोराजिन्द॥क्या फरांगा तिणसे मिली
। नमन हमीद काय होराजिन्द॥९॥८॥यो सुण दिलगीर हुवा अति।कहे तम विन
in गुम होतानी । मफल दिन ने जाणम्यूदेिवस्यूं बंपर मुख होवानी। मु॥६॥
। न निर्मान भाग विद्या बन्ने । देवता को महाय हो गजिन्द ॥ कही तो गुलाई 'अगा। नम बन्यत्र नाग माय हो राजिन्द ।मु०॥ १० ॥ परन्तु उनके ना। नमन हायगा दुःग्य हो राजिन्द । कारण जेष्ट ने तुमयी। इच्छा चाग की 11 सम्पदा गजिन्द ॥ मु० ॥ ११ ॥ तुम हित भणी पहिना काई । ना प्रवरा सग्य चाय हा गजिन्द ॥ ना दोनों रही जुजुवा । जिनमे वियन नहीं पाय । गान् ॥ गुः ॥ १२ ॥ यह प्रश्न न छोडक । अन्य पृछा सुन्य उपाय नन् । या माण कर विजय जी देव किम यों चोलो विवुधराय हो जानी ॥ सः ||: ।। मनलवी प्रीति विष । इन बनने पड है विरोध हो जानी ॥ मत्य पाति तनक मने । नाम न कीजिये बोध हो नानी ॥ सु०॥ १४ ॥ यह मंपति मन भाट को। अपंग कराण ने तैयार हो जानी ॥ पण पांच नहीं मुझ वन्यया । निलामी गण ग्रागार हा ज्ञानी ॥ मु० ॥ १५ ॥ जगे तात लयु वाल का सुखी म मरमाः जाय हा ज्ञानी ॥ त्यों इन राज में भोली । गया मुझ बिटकाग हो .. - चि ज्ञानी मु० ॥ १६ ॥ यह राज नहीं महरो। में नहीं मालक याम हो ज्ञानी ॥ मि- लिया नहीं भाई मुझ भणी । जो वाया घणा ताम हो ज्ञानी ॥ सु० ॥ १७ ॥ निगमा हद मुझ अति । तव परवश करने काम हो ज्ञानी ॥ वैठो में राजगादीये। अभिग्रहधार्ग तामहो ज्ञानी ॥ लु० ॥ १८ ॥ जहांलग भाइजी नहीं मिले । छत्र धरु नहीं माम हो ज्ञानी । चामर वीजायो नहीं। राज चिन्ह तजते दीस हो ज्ञानी ॥ १० ॥ १६ ॥ उमंग घणी मन मिलण की। पण नहीं सुण्या समाचार हो ज्ञानी। : जो तुम जागा नो शीघ्र कहो । मानुगा अति उपकार हो ज्ञानी ॥ सु० ॥ २० ॥ या माग जयनी खुशी हुवा । अष्टादशमी यह ढाल हो ज्ञानी ॥ अमोल ऋपि कह आग साणा । दोनों प्रगट मिले उजमाल हो ज्ञानी ॥ सु०॥ २१ ॥ दोहा ॥ निमन्तिक कह विजय को । प्राकाण विद्या वल ॥ जयजी वन्धव तुमारडा। ग्रावे । नीण में चल ।। सु० ॥ १॥ भूप कहे शीघ्र ते करो। देगा.वांछित इनाम ॥ इममुण नाई निमन्तियों । अदृश्य होगयो ताम ॥ २॥ नेमन्ति रुप छोडी करी।
मृलग रूपे थाय ।। वन भूपण दीपना । मानात इन्द्रमाय ॥३॥ मगन गे उत्तर क
यावाया। विजय मभा के मझार । अचंग महजन अति । देख के गह चमत्कार
॥४॥ विजय पैछानी भ्रात को। यानन्द अंग न माय ।। उमंगी या पल्या चरण में।
यांश्रुय ते धोवाय ।। ५. ॥ ॥ ढाल ॥ १६ वी ॥ पोप दशमी दिन प्रानन्दकारी
॥ यह ॥ मज्जन सुपात्र मिल मुख होवे भारी॥ते जाने बानी के तम यात्मार्गटिंग।
उद काटी गंम गया विकमारी । नत्रमे वर्ष हा का वारी । धन्य दिन घडी ग्राज
हमारी । कुशले भट्य जष्ट भ्रातारी।। मन्नन ॥१॥ दोनों उत्तमाम ने वेठा बरोबर।
अनिमेष रहे अापम में निहारी । जय कुमर निज पीती हकीकत । गया उचित
भाइ अागे उचारी ॥ म०॥ २ ॥ विजय नरमी कहे राज मंभालो । में तो नंगा
में रहूंगा तुमारी ॥ जो जोग मो तम स्थान ही सोहे । ढील विचार न कीजे ल.
गारी । स० ॥ ३॥ जय कहे तुझ उपार्जिन मुझ । योग्य नहीं लगा नीति वि.
चारी । भूल्यो मन्त्र पुनः याद कराया । यह भक्ति मादो हिरे यारी ॥ म०॥४॥
पिन अनि थग्रह कीयां राज लियो नहीं । तव राज मन्त्र दीयो तस सुनारी ॥ धारी मन्त्र भाड कुशल पूछता । तत्क्षीण उडगया गगन मझारी ॥ स०॥ ५॥ भोग- वती नगरी में पाया । जहां महेल हे निज इक्त्यारी ॥ एकान्त रही ते मन्त्र ने माद्यो । जमी विधी यक्ष पास से धारी ।। स०॥ ६॥ भोगवति पुरपति की सभा मे । पाया निमित ज्ञा। का धारी ॥ कहे नृपति से सुणो होवो सावध । वात चनावं एक चमत्कारी ॥ स०७ ॥ इसी वक्त तुझ पाटवी कुंजर । उन्मत होवे जो मद छक छारी ॥ तो तुम बात मानो मुझ साची । श्राज सेही दिन सात मझारी ॥ म० ॥ ८ ॥ थारो अायुर्वल पूर्ण होगा। इसमें संशय नहीं लगारी ॥ होण- हार टले नहीं टाल्यो । पुक्क देखो में ज्ञान लगारी ॥ स०॥ ६॥ हितेन्छु हो शीघ्र ग्रावो यहां । ले निजात्म काज सुधारी ॥ दान धर्म सुकृत्य सु करणी। करना मो करले वक्त है यारी ॥ स०॥ १० ॥ इतने में तो सुण्यो. सहाय करो शीघ्र । गज मद छक करे जुलम अपारी ॥ सुणपर तीत्या वयण ज्ञानी का।
जागया ताम परम उपकारी ॥ स०॥ ११ ॥ निश्रय में ग्रव दिन सात में । पर पगलाद जाम्यू वाद्धि मारी ॥ जो कुछ करना होवे मा करलं । जोः पर भव मग याचे म्हाग। म० ॥ १२ ॥ निमन्त बानी को मंतुष्ट कीना । ततो गया स्व- वान दाग ॥ गयनी ज्ञान दया धर्म उन्नति । कीनी लीनी खरची टकारी ॥ ५ ।। १ ।। जयजी को बोलाके पयंप । हिये मुफ त्राद्धि सह तुमारी।। द्रव्य मं- माना ना पाला । ग्राना मुम देवो इन वारी। ॥ म ॥ १४ ॥ अचमी नरमी जय ना उचार । चिन्त यह क्या ग्राप विचारी ॥ रायजी वान प्रकाशी निमः लनी । नव निण गज ऋद्धि स्वीकारी । स० ॥ १५ ॥ पुरपति तब ऋद्धि, त्या- गी। जिनेन्द्र पपित दीना धारी ॥ एकान्त स्थान ग्रामण द्रढ स्थापी । हुवा यानम्न मर्मागरी मारी ॥ स० ॥ १६ ॥ पदस्थ से पिण्डस्थ में पेठा । रुपस्थ ध्या- ना रूपानी नार्ग ॥ यो धर्म ध्यान रमे वर्या शुकल । नपक श्रेणी चडे शीघ्रतारी. । म ॥ ?" ॥ वेद कपाय कीया जीणमें क्षय । सयोगी केवल ज्ञानी भयारी ॥
. 14 21 ३२६ । अर्जरीगर हुवा प्रवीकार्ग । म०॥? || मीजी 1. नन । जगत् व्यवहार योग्य माचव्यारी ॥ धोदय कियो 14 जगमे विस्तारी ।। म ॥ १६ ॥ अनित्य घायु जाणीयों कर.' । '' ! ३१ ला सवारी ॥ सफल अवतार नाम जगमाइ । मे भोग्य- ।।?ल उनीगी धर्म पुण्य फल । दाबण ऋषियमोल ऊ- • ' : RIT मधव । जयजी पुण्य को रद्या दीपारी ॥म० ॥२१॥ । म प्रसाद ने । जयजी पाय राज ॥ होणहार होवे जिसा । ॥ एकदा मंभारी युगदिया । जयपुर नृपती धीय ॥ ११ २.२१ ११ १२५ । लाग्यो अन्तम जीय ॥२॥राज मंभलाई मचीव को। 11 : । र ॥ ग्यपर माये मुसे चली। उतरे गाम के वार ॥३॥ मा. 1 मग पाया । समग को ममानार ॥ सुणी नृपादि हर्पिया। जयजी ५१ मार ॥ ४ ॥ मनपनादि परिवारने । मिनाया जाइ जमात ॥ सुमनन . Pos -RS विक ७३ M संयोग में । कान नहीं होत ॥ ५ ॥ उत्सवे लाया पुर विपे । मिल दम्पति सुखी हाय ॥ रहे मुग्य में जयजी इहां । हिवे धर्म कथा सुणो लोय ॥ ६ ॥ ॥ ढाल २० वी ।। दन्नाली लालन की ॥ यह ॥ पुगगाइ जयजीकी । सुणो २ हो भवीका चिन नाय ।। पुगय ॥टेर ॥ तिण अवसर पधारीयाजी । जयपुर वाग मझार ॥ चगाण कगण गुण मागनी । मुनिवर बहु परिवार ॥ पु०॥ १॥ वनपालक सज हाय के जी। गज शभा में ग्राय ॥ दी बधाइ मुनि ग्रावीयाजी। सुणी सत्र अति पांग ॥ १०॥ ॥ मी साजाइ राजवीजी। ले संग सेना सज्जन ।। बंद्या या मुनियर भणीजी । नमे ही वहु पुरजन ॥ पु० ॥३॥ परिपद बैठी भरायके जी। जग नारण मुनि गय । वागयों धर्म उपदेशने जी । अहो सुपो भव्य चित्त लाय ॥ पु० ॥ ४॥ नित्य अमार संसार में । मिल्यो मतलवी सब परिवार ॥ क्षीण भगर गर्गर यह जी । मुरजाहो किसे ही विचार ॥ पु०॥ ५॥ पुण्य संचातो मिनी मायाय । पुण्य खुटे विरलाय ॥ पुगय छत्ने सुकरणी करे तो । अजरामर पन जाय ॥ पु० ॥ ६॥ बनी वक्त में सबी बने जी। विगड्या बने न काय ॥ पणी • म सधाग्लो तो । फिर पस्तायो न धाय ।। पु०॥७॥ इत्यादि गुरु देश- ना 11 । अमन पृष्टि मम ॥ मुरजा मिथ्यात्वी जवामीया जी। भव्य चंपक गइ रम ॥ ५ ॥ ॥ सम्यक्त्व प्रत केइ पर्याजी । वैराग्या नृपाल ।। वंदी मुनि मव निज । ग? ।। याया फिरी तत्काल ॥ पु ॥ ६ ॥ चिन्ने पुत्र मो होय के जी। एकही हा ग । जोग ।। जयजी सहू गुण मंपनाजी । देवू गजगुण छोग ॥ पु॥१०॥ शाध चलाइ जप भणीजी । दर्शायो ते विचार ॥ मो कहे सह सला लेइजी । करो राम सम्मकार ॥ पु ॥ ११ ॥ राणी पुत्रों मंत्रीने जी । कही उपजी सो बात। जना मया के मन विरेजी । जयजी ने गादी वेठात ॥ पु॥ १२ ॥ जेत्रमल राजे. अम । कर महात्मय दिक्षा लेय ॥ अंग एकादश मीवीया । फिर तप दुकर मा- इयो नग ॥ पु ॥ १३ ।। मंचित कर्म खपाय के जी। पाया केवल ज्ञान ॥ धणा । भगी को नारक जी । पायापद निर्वाण ॥ पु॥ १४ ॥ जन्म प्रमाण ते नरतणोजी।
झ अवमरे का उद्धार ॥ जेत्रमल पिराज त्यों ते । पाचे सुख श्रेयकार ॥ पु ॥ १५ ।। जयपुर पनि जयजी भयाजी । मंभाली राज लगाम ॥ संतोष्या सव साजना जी । अपि युक्त जे ठाम ॥ पु ॥ १६ ॥ धर्म कामार्थ साधताजी । सुख से रहे जयगय ॥ टाल वीम अमोलक कहेजी । पुगये सुख मवाय ॥ पु॥ १७ ॥ दाहा । जिस दिन मे जय कुमरजी । तज्यो कामलता गेह । तिमदिन से पति- । बता मम । अभिग्रह धररही तेह ॥ १ ॥ स्नान भूषण मही वस्त्र तज्या । न कियो | सम्म याहार ॥ एकान्त वाम मयन धरा। अल्पभापी प्राचार ॥ २॥ अका सम- जाये घाणी । ते माने नलगार । मांस द्वादश वीतीया । तव सुपीया समाचार ॥ ३ ॥ जयजी जयपुर पनि भया । उमंगी मिलण तेवार ॥ प्राका लाइ वेठाय के । शिविका में दरवार ॥ ४ ॥ बीती बात कही भूपने । सत्यवन्ती तस जाण । गर्यो अन्तेउरी विपे । प्रेमे पोपी प्राण ॥ ५ ॥ ॥ ढाल २१ वी ॥ वामग्मनि नाम जिनंदजी की ॥ यह ॥ जय विजय नृपति का पुण्य भारी ॥जय॥
टर ॥ दो देश अधिपति भया जयसेनजी । गुणवन्ती मिली तीन नारी ।। जय ।। ॥ १॥ नीन मिद्धी तीन लोक में अपर बल । विलसे सुखसो सुरसारी ॥ जय ॥ ॥ २ ॥ एक दिवम चन्धु याद आयो । ऋद्धि युत मिलणो हिवे जारी ॥ जय ॥ ६ ॥३॥ वहृत विछोहा रद्या इत्ना दिन । अवतो रेवां एक ठारी ॥ जय ॥ ४ ॥ श्रामंचन तब गज भोलायो। नीति रीति सब तारी ॥ जय ॥ ५ ॥ जोर योग्य बन्दवम्त मव करीयो । कराइ सेना सज सारी ॥ जय ॥६॥ तीनों राणी न माथही लाना । और ऋद्धि वह श्रेय कारी ॥ जय ॥ ७ ॥ शुभ महूर्त प्रयाण कयों नव । हयगय ग्थ दल परिवारी ॥ जय ॥ ८॥ पाहूणाचारी करता मार्ग में । पुर २ पनी घर मनवारी ॥ जय ॥ ६ ॥ सुखे २ यो मुकाम करता । पाया काम पुर माम मांग ॥ जय ॥ १०॥ समाचार ये पाया विजयजी। अनन्द पाया था पारी ॥ जय ॥ ११ ॥ शीघ्र हुकम कीयो करो सजाइ । नगरी स्वर्ग मी सिणगारी जय ॥ १२ ॥ श्राप सवी परिवार संघाते । मन्मुख याया पाय चारी ॥ जय ।। - 1 ।।१॥ दम्य जष्ट भाड उमंग भगइ । जा पड्या चरणां मझारी । जय ।। उठाह जय हृदय में माट्या । गर्क प्रेमरत गुलतारी ॥ जय ॥ १५ ॥ मेमांश्रुत कहे | चिन्य गा वजी। में दुःख पाया अपारी ॥ जय ॥ १६ ॥ ग्राज कृतार्थ मग न कोना । याद गन्मुम्ब दयालारी ॥ जय ॥१७॥ दोनों प्रारूढ हुवा एकही गा पर । ची शी मम शामतारी ॥ जय ॥ १८ ॥ सब परीवारे चल मध्य बजार ॥ सत्र गश चमर दुलारी ॥ जय ॥ १६ ॥ सहकारों मोती गेह वर्षाया। माभागणी निया र धार्ग ।। जय ॥ २० ॥ ग्राया मेहल में राज सभा में । सिंहा- माग दीप दाना चटार्ग ॥ जय ॥ २१ ॥ सुखे २ दोनों रहे एक स्थाने । लघु जेष्ट यनज्ञा मार्ग ॥ जय ॥ २२ ॥ देख भक्ति तुष्टया जयजी विजय पर । मणी ग्रोषध नम म्मर 'यार्ग ।। जय ॥ २३ ॥ निश्चिन्त रहे सुख भोगे इच्छित । राज तिहूं को मभाग ॥ जय ॥ २४ ॥ ढाल इपीसी गाइ अमोलक । पुण्य फल सदा मुखकारी ॥ जग ॥ २५ ॥ ३ ॥ दोहा ॥ एकदा विजय रायजी। सुख सेजा के माय । सृता शन धिम निश । सप्न अचिन्त्यो श्राय ॥१॥ जयात नयरा स्वग सा। ३. राजा गुण धार ॥ विजिया तनुजा तेहनी अतुल्य गुणागार ॥ २ ॥ म: नहनी । रुचो अजव रंग ढंग । राज राजेश्वर बहू मिल्या । धरता 1 ग ॥ ३ ॥ मर्व राजा को परहरि । विजया वरी विजय तांय ।। हमें स्पन्द घनन भया । तरक्षीण जाग्रत थाय ॥ ४ ॥ तत्क्षीण उठ बैठा हुवा । श्राश्चर्य यान मन लाय। कि हां विजीया किहां जयंतीपुर । किम स्वप्न यह मुझ थाय ॥५॥ ॥ ५ मा ॥ न्यालदे की देशी में ॥ सुपजो कथा पुण्यशालीनी जी भाइ । पगय मदा सम्बदाय ॥ पुण्यवन्त ने पुण्यवन्त मिले जी । जो दूर देशे ही रहाय । ॥ सा ।। 1 । चिन्ते थपिन्त स्वप्न यावीयोजी कांई । यह तो खोटो नहीं थाय ॥ जाा भाइनी रजा लइ जी । ले। सप्त अजमाय ॥ सुण ॥२॥ प्राते जणायो जय भागाजी भाइ । दी थाना तत्काल ॥ मणी प्रभाव गगति जी। गया जय. नि चाल ।। सुण ॥ ३॥ चिन्ते इण रूप में मुझबरे जी काइ। तामे आर्य .
काय ।। कम्पो वर्गु जो मुजवरे जी । तो मत्य म्वन जगाय ॥ मुण ॥४॥ मणी प्रभाव नब कयां जी भाइ । विप कुञ स्वरूप ॥ कृव मोटी उर पृष्ट जी । - गणा तन ममा ॥ सुण ! ५॥ एकाण पंग लंगडा वगया जी भाड़ । पेट गया पानाल ।। कर पग दुर्बल बाँकडा जी । चाल डगमग बाल ॥ मुण ॥६॥ चीबदी ग्राग्वा बैठी नाशीका जी कांड । श्लेपम तामे मडडाय ॥ दंत तीन मुख बाहर जी । लांबा होट हलाय ॥ मुण ॥ ७ ॥ मस्तक मूंछ ने दाढीना जी कांड। कबग विषया वाल । फटे मलीन वन तन मनी जी । पडे मुख माह से लाल ॥ म. ॥ - ॥ जटीका महाही कर विप जी कांड । इगमग चल्या जाय ॥ शीशु पाच देग्यवा जी । हम ग्राप ताम हंसाय ।। सु० ॥ ६ ॥ सवरा मंडप में पेमीया जी । हंसाया मत्र जन जाय ॥ सब से ऊंच प्रासन कियो जी। कम्बले ढांगयो माय ॥ मुः ॥ ? || ता ऊपर विराजीया जी कांड़ । मुझे देता नाव || अवलो कना मव भूप को जी । जाणाना परपण भाव ॥ सु० ॥ ११ ॥ मना लोक कई नानी कांइ । यही २ रूप प्रधान । परणन् यावा पद्मणीजी । वणकर वीदरा- जन ॥ मुः ॥ १२ ॥ ते हट कर कहे परणस्यूं जी काइ। निश्चय हूं विजीया तांय ।। हम मा मा गंमा घणाजी । देखो अवी क्षीण मांय ॥ सु ॥ १३ ॥ राते कुलदेवी म्वप्न में जी कांइ । चेतायो विजीया तांय ॥ वरजे कूरूप कूबडा भणी जी। जो पण सुम्न चहाय । सु ॥ १४ ॥ कुमरी रख्यो ध्यान में जी । न्हाइसजी : मिणगार ।। दासीयों पृन्दे परिवरीजी । नेपुरने झणकार ॥ सु ॥ १५ ॥ हरती ! मन नयन महतणाजी कांइ । पेठी मंडप मांय ॥ वेधारणी दरसावतीजी । रूप नृप यादी मामाय ॥ सु ॥ १६ ॥ नम ऋद्धि कीर्ती नृपों कीजी काइ । सुणाती थागं जाय ।। कुमरी परे नहीं कोयनेजी । वडो रही चिन ध्याय ॥सु ॥ १७॥ था जिम नृप मन्मुखे जी कांइ । हमें दीये तस नूर ॥ तजीने गांगल संचरेजी। नव शाकी होर उतरे ज्या पूर।।सु०॥१८॥तेतले वीजय कुब्ज यावीया जीकांइ वेत्र भागनिनजो दाने नहीं मराव नीनो यक्रिनोटोपनास -- थाकी पीजी इम ऊचरे जी वाइ। मवमे अधिक गुणधाम ।। वरनो तो पर ये कबडोजी। नहि मिन्न मा अन्य ठाम ॥ सु ॥२०॥ दासी वेण देवी केणी जी। कुज गले द्वानी वरमाल ॥ ऋपि श्रमाले थार्थयनीजी। कांइ। भाषी यह वारवी दाल ।। सु॥२१॥ * ॥ दोहा ।। मर्व गय अमुरत भये । कहे मुर्ख कन्या येह ।। मरोल मम महीपति ननी । वायम भिन्नु के धयों नेह ॥१॥ पण जुगतो नहीं राय ने । देनी नीच जाति न वान्न ।। योगी लो कुज कने थकी शीघ्रये वरमाल॥२॥ कोपातुर यदे नवरा । छोड कज वरमाल ।। तुम जोगी कन्या नहीं। भाग्य प्रमाणे चाल ॥३॥ कुज उत्तर याप नही । नव प्रति लाइ गम । कहे रे अर्ण वरमाल शीघ्र । नहीं तो वेदां सीस || ममना मायर झाले कुजजी । वदे नहीं एकवार ॥ धैर्य मे धोका टले । जगन लाग यांच ॥५॥॥ ढाल २३ वी॥ राघव ग्रावीया हो । यहः॥ राजिन्द प्रावीया हा। होकर मवही शूर टर। लेड़कर करवाल नागी। बोले बचन विकराल । अरे धीठा हीये चीठा । छोउ शीघ वरमाल रा०॥२॥ गार वयाण नब कुज गा। हो हन भागी राय ॥ निज देव पर रोश करो तुम । मुझ पर किया या वाय ॥ रा०॥ २ ॥ खोटा कर्म तुमारडा । न लगी पद्मणी हाय । फोकट गम क्या काम भावे । भरो वायु की वाथ ॥ रा० ॥ ३॥ यो दुर्गम वयण सुण म । यान प्रज्वल्या अंग ॥ कुमरी को कर घर खेंची । वडयो कुञ्ज को रंगा॥ ।। ८ ॥ श्रोपधी निज मनन में घर ॥ जेष्टिका दृढ कर सहाय कूटवा लगा मया गय का । ज्यों नरीयों को जमराय ॥रा० ॥५॥ ते उलट खड्ग हणे पन का । जरा न लागे घार ॥ कुब्जे मार्या पड्या धरणी । पाश्चर्य धरे. सव राय ॥ १० ॥ ६ ॥ मृगपति देख मृग भागे । त्यों भग्या नृपाल ॥ केइक लंगडा लला भइया । कंइ ढिग पहोंता काल ॥ रा०॥७॥ खेदाश्चर्य घर कहे सुज्ञ नय । यह नर नहीं कोई देव ॥ महा जोपा वीरे हराया। एकडले इण हेव ॥रा ॥ ८ ॥ मबन अतिचिन चिन्ता धरता । थर २ अंग थरराय ॥ मान मरद्या पाहाणा का । शरमाया गर राय ॥ रा०॥ ६॥ कन्या तान.भया चिन्तातुर ।
पुत्री देयं किम नांय कम्ज ने देतां राय कोप । निद्या जग फलाय ।। गय को देनां कुब्ज कोपे । करे मब मंहार ॥ दिग मुटु मम होकर बैठी। सुचने काह विचार ॥ ग०॥ ११ ॥ विन्न में मन्तांप करने । नमथी उतयों विमान || नहीं उतर एक ग्यचर नरमी । करजोड़ी वंदेवाण ॥रा॥१२॥ अहो विजय नरेन्द्र । जयचन्न । वना मनाई। ग्राय ॥ राय भूषण मौली मनी मम । बढो तेज प्रताप ॥ गः ॥ १३॥ कुन चिन्त दान इच्छक । बोले विरुदावली होय ॥ दान ग्रापण कर लिया था। फिर नरमी कहे माय ॥गागिर्ग नावं दक्षिण श्रेणि में। गायक न्या महाए । प्रजामि विद्या प्रागी। पूछ वर घर चूप ॥गा?'|| मुरी मम् | महिमा अापकी । वराणी मुाण हागय ॥ तंडवा मुझ वहां पठागी । पधारो गाध महागय । ग० ॥ १६॥ यो विनंती बहु विध करतो । तवही तान मग्याय। दमग खचर ग्राकर उता। वाल्या विजय का वधाय ॥ रा०॥ १७॥ उत्तर श्री विद्याधरनाथ की । कंन्य गुण रूपे अपार ॥ रोहणी सुरी ने पूछा वर निज।
. शाप बसण्या अपार ॥रा० ॥ १८॥ बोलावा में सचीव प्रायो। शीघ्र चलो गयनाथ ।। कुन्जजी रहे मौनधारी। सब देख प्रति अचंभात ॥ रा०॥ १६ ॥ यह नहीं कुब्ज के नरेन्द्र को ॥ विजय विधान प्रसिद्ध ॥ खेचर पत युग सेव चहावे ।। तो नर है को विध ॥ रा० ॥ २० ॥ कौन कहां का कुञ्ज क्यों बने । संशयी पानन्द विशाल ॥ ऋपि अमोल पुण्य प्रताप की | कही त्रीवीस ढाल || रा०॥ ॥ २१ ॥ ॥ दोहा ॥ अवसर पोलखी विजयजी । कुन्ज रूप कियो दूर ॥ पूरेन्द्र सम मूल रूपे रह्या । दीपे झलहल नूर ॥ १ ॥ सर्व नरेन्द्र पाइ नम्या । अहो पुण्य कृपा निधान ॥ अजा जे गुनो हुवो माफ कर । बने रहो मैहरवान ।। २ ॥ युग सेवर करे विनंती। शीघ्र चलो महाराय ॥ विजिया तात प्रणमी कहे । परण्या विना न जवाय ॥३॥ मानी विजयजी अर्ज ते । नभचर रखे सा. दर ।। परण्या पिजीया ठाठ से । दम्पति आदि प्रेम भर ॥४॥ परसंस्ये सब पाइ युद्ध । फिया राजेन्द्र भरतार ।। मुखे रहे विजयजी तहाँ । पेचर वान विसार ॥ ५ ॥ ॥ दाल 2 बी ।। जिल्ला की देशी में || नत्र नहीं खबर विजय ने विषया जाणा हो ॥ पुगय फल सुग्वदाय ॥ तय नहीं चंचर विजय ने विमा जाणी हो । गमिन्द ॥ प्राया चनदा नमी विजय मधु वाणी हा ।। पुगर फल ।। याया चनवा नमी चीनये मधु वाणी हो ॥ राजिन्द ॥१॥ यहां प्राय सुवमें नधि दमन भल्या दीगो म्वामी हो ॥ पुगय० ॥ यहा० ।। ग० ॥ इम मुगा विज- यजा चिन म गरम अति पामी हो ॥ पुगय० ॥ इम० ॥२॥ तम मायही जावा गाय हा मज मा थाइ हो ॥ पुगय० ॥ तमः ॥ रा०॥ पत्नी म्पनर ने योग्य वचन म समझाइ हो ॥ पुगय० ॥ पत्नी ॥ ग०॥३॥ वेट विमान असमाने पन्य ने चाल्या हो ॥ पुगय० ॥ वंठ० ॥ ग०॥ गीरी बताड़ रूपा का पहाड । निहाल्या हो ॥ पुग्य० ॥ गिरी० ॥ रा०॥ दक्षिण अगिये पचास नगर लगी। | गाम हो । पुगय० ॥ द० ॥रा०॥ जगती बागीचा युगल खेचर देखी लाभ हो ॥ परायः ॥ ज० ॥रा० ॥ ". ॥ जयतीपुर जयन्त राज गभा पागा हो । गुगग ॥ ज० ॥रा० ॥ उतर्या विमान से माधव समान शोभाया हो ॥ पुण्य० ॥ उ०॥ रा०॥ ६॥ खेचर पति सपरिवारे उछरंगे बघाया हो ॥ पुण्य० ॥ खे० ॥ रा०॥ घणेही मन्मान से ऊँचे श्रासन बैठाया हो ॥ पुण्य० ॥ घणे० ॥रा०॥७॥ अनि अाडम्बर लगोत्सव को कराइ हो ॥ पुण्य० ॥ अति० ॥रा०॥ जयती नाम वाइ विजय ने परणाइ हो । पुण्य० ॥ ज० ॥ रा० ॥ ८ ॥ कन्यादान सु- प्रमान देवन की वारे हो ॥ पुण्य० ॥ कन्या०॥ रा०॥ प्रज्ञाप्ति महाविद्या दीवी : सुग्धकार हो । पुण्य० ॥ प्रज्ञा० रा०॥६॥ और यथा विधी सुसरे जमाइ स- न्मान्य हो । पुगय० ॥ पोर० ॥ रा०॥ अपूर्व लाभ ले अनन्द विजय अति मान्या हो ॥ पुगय० ॥ अपू०॥ रा०॥ १०॥ सर्व सुख में लीन स्वलाकाल तहां रंड हो । पुण्य० ॥ मर्व० ॥ रा० दूसरे विद्याधर युत नृप सम्मती लेइ हो ॥ पुण्य ॥ दृम० ॥ रा० ॥ ११ ॥ बैठ विमान में पुनः श्रममान मे चाल्या हो ।। पुण्य० ॥ बैठ०॥रा०॥ उत्नर श्रेणि साठ नगर का ठाठ निहाल्या हो । पुण्य० ॥ उत्त०॥
गः ॥ ॥ विजर्यात नगर ऋद्धि, मिद्धि भर में पधार्या हो ॥ पुण्य० ॥ वि०॥ ग ॥ विजगन्न भपन हर्पत विजयजी ने जोह हो । पुगय० ॥ विज० ॥ राजि० ॥ १३ ॥ पग यात्म जमाढ ने लियसा वधाइ हो ॥ पुगय० ॥ पुण्या० ॥ रा०॥ अनि ग्रारम्बार विजयन्ति वाह परणाइ हो ॥ पुगय० ॥ अतिः ॥ रा०॥ १४ ॥ महाविद्या नम गहाणी नाम मु दीनी हो ॥ पुगय० ॥ महा० ॥रा० ॥ यति ग्रा. नन्द विजयजी गृहाण नम कानी हो ॥ पुगय० ॥ अति० ॥ रा० ॥ १५ ॥ थोडे कान नहीं रह पुनः कर्ग नैयारी हो ॥ पुगय० ॥ थोडे । रा० ॥ निजपुर जाने म्पसमद रजा गृही जहाग हो ।। पुगय० ॥ निज० ॥ रा० ॥ १६॥ गजगाजी दार दामी गगन चारी दीना हो ॥ पुगय० ।। गज० ॥ रा० ॥ सब ऋद्धि से परि- वया नम मार्ग लाना हो ॥ पुगय० ॥ सब० ॥ राज० ॥ १७ ॥ पुनः जयन्ति याया सम्र में रहा या हो ॥ पुगय० ॥ पुनः० ॥रा०॥ तहां से भी ऋद्धि - धिक याग मिधाया हो । पुगय० ॥ तहां ॥रा०॥ १८ ॥ जयन्ति विजन्ति नाग या मग ममानी हो ॥ पुण्य० ॥ जय० ॥ रा०॥ काम देव ने रति प्रीति नारा मा जानी हो ॥ पुण्य० ॥ काम० ॥ रा० ॥ १६ ॥ योर सब ऋद्धि नज वल कर शोभे हो ॥ पुण्य ॥ थोर ॥ रा०॥ ऐमे ठाठ से काम पुरे चल पाया हो ॥ पुण्य ॥ ऐमे ॥ रा० ॥ २० ॥ पुर वाहिर उतरीया खबर संचरी- या ।। ।। पृगय ॥ पुर० ॥ रा०॥ लोक सय अाश्चर्य भरीया देखन हरीया हो। १३ ॥ ॥ जाणी जयजी सेना मंगल ताम सजाइ हो ॥ पुण्य ॥ जाणी॥ ग. ॥ म में पाया लीना लघु वन्धव वधाइ हो ॥ पुण्य ।। सा० ॥ रा० ॥ २२ ॥ नगग मिणगार गोरडी गीन उचारी हो ॥ पुण्य ॥ नग ॥ रा० ॥ दोनो गज ग्राम्ट पम्या मय परिवारी हो ॥ पुग्य ।। दोनों ।। रा०॥ २३ ॥ देखी खेचर भू- चा अनि विम्मा हो ॥ पुण्य ॥ देखी ।। रा०॥ मोतीयों का मेह वीड़ राय वधा- व हो । पुगए ।। मोती ॥ रा०॥ २४ ॥ पाया मेहल मेहल मांही सुखे सहू साथ रहार हा ॥ पुगय । भा०॥रा०॥ वीती वारता भ्राता ने वीजय सुनाइ हो ।
No text on this page.
लटता बोमता वामना ठाकरा । जायजों खबर तात यावे ग्रहीया ॥१॥पा- नाप प्रताप महा पुण्य वलीया तणा । अरि हरी जय श्री वेग पावे ॥ टेर ॥ शूर ने चार मणधीर राणा मिली । जोर को तोर अधिको जपावे ॥ श्राताप ॥२॥ भागीया गीया आया नरेन्द्रपे। दल बल छल रोशे जगावे ॥ सुपी धर्मराय भगय कोप अनि । हे कोन दुष्ट मुझ सामे श्रावे ॥ग्रा०॥३॥ सजी सब फोज रख चीज लडवा नणी । खोज खोवा दुष्ट परी नर नो ।। गज रथ पालखी भेट शूरा मी । शर ज्या गाजीया मेघ भरनो ॥ श्रा० ॥४॥ मयंगल मद भर्या । सिणगारी मज कर्या । श्याम घटा छाइ ज्यों माधव श्रावे ॥ गुल गुलाट गीरव विद्युत होदा चमक । लम्ब घण्टा घोर नाद थाये ॥ श्रा..! ५ ॥ तुरंग कुरंग ज्यों चपल पग स्थिर नही । गमाल चौफाल हणणाइ रहीया ।। पालाण मजबूत रजपूत बैठा मी । शम्र सम्बन्ध कर सज थड़या ।। ग्रा०॥६॥ रथ संग्रामी सजा। झण- गाट अरि लजा । जरी खोल पचरंगनेजा फरके । राणा वेठा मांय खेंची धनुष्य जमाय । मारे अर्ग जग लारे न सरके । ग्रा०॥७॥ वक्तर संगीन रंगीन नयन गंश में । झल झले अम्मी न ली भाला कर में । शूर रस में छके वके अरी नोभवा । पर ग्ग पुर गणतूर रम्मै ॥ ग्रा० ॥ ८॥ यों चतुरंगी बहूजंगी सेना वन।। धर्म गजा नाणी चीज चाली ॥ पाइया कटक जहां प्रतिष्ट कुमर का । गण में चौगान विशाल भाली ॥ ग्रा०॥ ६ ॥ रणां गण झडावीया। सड चडा- वाया । निगाण मग या दोनों राजा ॥ शम्र अत्र सजी थइ २ नाचे शूरमा । चान उजाउ गणतर बाजा ॥ ग्रा०॥ १० ॥ दयाल जय विजय यों देख चित्त चिन्तये । विन काम घमशाण महा अभी थावे ॥ महा पाप संग्रही निश्चय जावे मग । नहीं कर यह अकृत्य भावे ॥ग्रा० ॥ ११ ॥ पापणी सेना को ना कही नदन की ॥ दोनों याद अागे ऊभा जो रहीया ॥ प्रति पक्ष तेन छंछेडी कू वेण कहे । एक वाज़ मंग्राम चालूनी थड़या ॥श्रा० ॥ १२ ॥ धर्मराय सेन रोश कर दाग्य शा कुमर पर ॥ोगधी महीमा कर नहीं लागे॥ मेघ धारा ज्यों व शस्त्र मना पर ॥ दन पाश्चर्य नर्व मन जागे ॥ प्रा० ॥ १३ ॥ पाये शस्त्र सव संग्रही ने टग कियो । नि शम्र हुइ पिता सेना जारे ॥ शूर मगदूर क्या करे शस्त्र विना। घर २ कर्मत इत उत सो निहारे ॥ ग्रा०॥ १४ ॥ लेइ गदा दोनों बंधव लगे माग्ने । मना निराधार ने भागी त्यारे । धर्म राज लगे भागने कुमर जो लागने । मन्सुम्य ऊभा अकर तारे ॥ श्रा०॥ १५ ॥ ग्रहो वृद्धि राजीया। वालसे भागीया नाजीया केगे दंग जाने ॥ कौन गुने जय विजय अपमानीया । शीघ्र फरमावे । यहाज म्हाने । ग्रा० ॥ १६॥ सो वीज वाये सो फल अव यावीये। दोप जणायो कुमर कंग ॥ विन न्याय किये कयो रोपीय पुत्र से । जानवा चावे हमसोइ वेरो। ॥ श्रा० ॥ १७ ॥ यों वचन सुणी चमक्या तव धरा धणी। बेर लेवण येह कुमर अाया । उमंग्यो प्रेम प्रेक्षी पुत्र यण निज । अजान अपराध हुवा कहे क्षमाया ॥ ग्रा० ॥ १८ ॥ मंक्षेप में वात दर्शाइ वीमा तनी । देवी कुरापात ये घात थाती। तुम गया नन्तर जाणी खरी चरा मुह । तव महारी घणा जली छाती ॥ था०॥
॥ चौकम करावी पावी नहीं तुम खवर । भारत घर अाज तक रहीया । तुम पुगयान्म मिल्या चमत्कार कर । हर्षे हीय न समाय भइया ॥ ग्रा०॥ २० ॥ हृदय चपी दोनों गर्क भया सुख में । मपूत पेखी सब हर्ष लाये । तो खुशी मा- वित्र की कमी वगणवी।। ढाल पचीम अमोल गावे ॥ग्रा०॥ २१ ॥3॥दोहा॥ सन्नता पखी तात की। हां दोनों कुमार ॥ चरणे पडी अर्जी करे । हम गनगार अपार ॥१॥ नाहक सताया अापने । कर अविनय भरपूर ॥ सब अप- गध माफी कगे । मावित्र मतिये भर ॥२॥ नृपति कहे संतोप ने । गुन्हो न हुवो नगार । उचाल्यो कुल माहेरी । गाल्यो अरि अहंकार ॥३॥ मह पहचानी राज पत्र । हपित हुवा अपार ॥ मंगलतूर वजन लगे। परसरे सवी कुमार ॥ ४॥ खेचर भनर पत भया । विद्या वलीया अपार ॥2॥जीत्या प्रवल मेना ने। हिंसा न कीनी लगार ॥ ५ ॥ ॥ ढाल २६ मी ॥ जीयो हो जीवो वीरा ॥ यह ॥ हया हो हप्या मजन सर घणा जी । प्रेक्षी जय विजय की रिद्धजी ॥ जोयो हो जोयो 15 । । प्रत्यक्ष चमत्कारन जा। विद्या घणा छ सिद्धजा ॥ हप्या ॥ १॥ अरा जन हा अग जन सुने लाजीया जी।सज्जन पाया थाणंद जी॥वाँटी हो बांटी वधाइ प्रेम की जी । अाज मिल्या सुख सम्बन्ध जी ॥ हा ॥२॥ मुहूर्त हो मुहूर्त शुभ ! तव पाइयो जी । विबुद्ध कहे पुकार जी ॥ पेसण हो पेसण पुरमे अवी करोजी। मुहर्न विजय श्रेयकार जी ॥ हा ॥ ३ ॥ वेठा हो वैठा रायजी कुंजरे जी । दोड पाम कुमर बैठाइ हो । मान हो माने सुख अति मन विपे जी । छत्र सिर चमर वीजाय हो ॥ हा ॥ ४ ॥ सेना हो सेन सब हुइ एकठी जी। खेचर चाले । बग माय हो । भूचर हो भुवर चाले भूपरे जी । ठाठ अनोखो देखाय हो । हा ॥ ५ ॥ वाजे हो वाजे अम्बर गर्जावीयो जी । हर्प निशाण कर राय हो । वाल हो वोले विरुदावली घणाजी । वन्धीजन पुण्य सरसाय हो ॥ हा ॥६॥ लीधा हो लीधा बधाइ गोरडीजी । शुद्ध द्रव्य गीत मिणगार.हो ॥ चल्या हो चाल्या मध्य रथी जी । परवरी महू परिवार हो ॥ हा ॥ ७॥ निरखे. हो.नि.
रख गोग्य मे गोग्डी जी। मर्ग थी प्रज गर्व हा ।। दवा विजय नीजी । गलीया शत्रु गर्व हो ॥ हायी ।। - ॥ प्रायही प्राय राज गभा विप जी । वटा मा यया योग म्यान हो॥ भाख हो भासे मचीन जग रायनों जी । माणी यो सब देड कान हो ॥ हार्या ॥ ६ ॥ पुगयी हो पुगी अदि पग- पगे जी । पाव पुगयात्म प्राण हो ॥ जयजी ने जयजी विजयजी राजीया जी। उहाथी किया प्रयाण हो ॥ हा ॥ १०॥ मागे हो मार्ग यन मनुष्टीया जी। दीधा नीन ग्तन हो॥ पाया हो पाया राज तिहं मोटका जी । वली संपत दामपन हो ॥ हा ॥ ११ ॥ दावी हो दाबी वर्ग पत्र दोइनी जी। सुगी मन याश्रय पायही ॥ यायुहो आयु सुख गिर्गना रहोहो । पाशीर्वाद मुणाय हो । हः ॥ १२ ॥ पहोता हो पता सह निज २ घरे हो । अठाड़ महोत्व कराग हो । दुःखीया हा दुःखीया मह सुखीया कीया हो । दान धर्म फेलार हो । ह० ॥१३॥ पाया हो पाया दोनां वन्यया जीनिज २ माता ने पाम हो। प्रणम्या होम या गाया मंग लेहो । विरह दुःख कीया नाश हो ॥ ह० ॥ १४॥ पूनज हो पत्र सपना देखता हो । जननी अति सुख पाय हो । याशीर हो याशीरवादे नापीया जी । हृदय मह ने लगा यहां ॥ ३० ॥ १५ ॥ दीधा हो दीधा मेहल श्रेय ग्ल्याजी मह मन्य मामग्री मजाय हो । परिवर्या हो परिवर्या मत्र परिवारथी हो। दोनों रहे. सग्य माय हो ॥ ४० ॥ १६ ॥ जोइहो जोइ रचना कुमर की हो । श्रीमति मन मुरझाय हो । आधार हो याबीर राज वीये ही हुवा हो । मुझव्यर्थ गयो उपाय हो।।। ॥ होनब हो होनय कोण दाली मके हो । पुण्यात्म सुख पाय हो ॥ यों जाणा हो या जाणी सुम्ती रही हो। मनही मन समजाय हो ॥ १८ ॥ कुमरी हो कमर जी माणाद्रभाव धी हो । माघे इष्ट सब काम हो। तोपे हो तोपे सब सम्जन भणी हो । पूरी इच्छित हाम हो।ह... १६॥ जावे हो जाये गगने 11 उडी कर्गनी । कर मह राज संभाल हो। रहवे हो रहा पिता की छांह में हो। मदाचित उजमाल हो । ह ॥ २० ॥ विनमे दो पिलमे गुख म्यग ममा हो ।
.... . ग्राम ।। '; चार पीटाना || पभागही पनगरि समान काही। पागल .. || .' In ॥ दोहा ॥ निण अनार मदने । नागिन मनियर मंगे। करना परम उसकार ॥ ॥ नारा मटागज ॥ दायां नृपादि गुणी । यो मिली माटे जादा .: व परिवार की। वाला सुन व्यायान । मनानादि ...न गजान ॥३॥ पाउन यह गहा गागात बीग बंदीय । दर्गमी लोग ? || पमिटठी म. ...: F.. न मगाय ॥ जीवां दिन। मनीगदला गरमाग ', या नन नांदय बाल गहनाको नानी मानी। गया दान में पाया हा ॥लायो । टं। निर्माणमा माननी। पाना । ना गया ।। ।। मागपन सत्र मुगया । अपी ने मामाहा ॥ना ॥ १ ॥ पटन भाव परणागलागी । गवाहबरमा जानो हो । बीग मंगाना मा. ।।
थी पाई । "द गर जाणो हो । ला० ॥ २॥ वणी चक्रे जो चेते सुधारे । मामग्री निय लगार हो । तो जालभ दुःख क्षीण में गमाइ । श्रनयानन्द पावे हो ॥ ला। ॥ इत्यादि उपदेश सुणी । सहु सभा प्रति हाइ हो । सम्यक्त्व प्रत यथा गाय भानग । निज म्धान भाइहो । लामो ।। ४ ॥ संवेगे भीना धर्म राजा। प.। नाम पर अरजी हो । राज पुत्र न देइ यासुं । संयम लेवा मरजी हो ॥ना ॥ ५ ॥ यथा मुख करो मुनि फरमावे । धर्म में ढील न कीजो हो । बंदी गुरु ना गम याया । धर्मे मन भीजो हो ॥ ला० ॥ ६ ॥ जय विजय जय जो पर बालाइ । गज ये तुम संभारो हो । तुम सम सुपुत्र में पायो । करूं मुधारा हो । ला० ॥ ७ ॥ दोनों कहे पाप पुण्य पसाये । राज सम्पत हम पाया हा ॥ यो गज दयो जयधीर ने । हो मा चहाया हो । ला०॥८॥ तव नृप नीनी राणी बोलाइ । वैराग्य यात जपाइ हो । जन्म मुधारूं वणी वक्ता तुम इच्या फांद हो ॥ ला० ॥६॥ प्रभोनर यहता हुरा नन्तर । नीनो रागया वैरागी हो ।। कई. हम किमधिक कगं ग्बी। श्राप जाचा त्यागी हो ॥ ला॥ १० || तय • नपान कह. गणधार न । गज मंभला भाइ हो ॥ जय विजय तो पाया राज अन्य । ये तुम. नांद हो ॥ ला० ॥ ११ ॥ जयधीर कहे जयवीर पिता मम । हु तो राज न लेम्य हो ॥ विजय वगंवर भात भक्ति में । सदाही रहस्यूं हो ॥ ला० ॥ १२॥ मत्र की मन्ना में विजय कुमर ने । जवरी में गादी बैठाया हो ॥ तानमात का दीना ग्रान्गय । जयत्री मन्हाया हो । ला०॥ १३ ।। मत्र परिवार बाग में पाया । मेमार्ग व न जाया हो ॥ धारी मुनि वेप लीनी दीक्षा । जग दुःख छिटकाया हो ॥ ला ॥ १४ ॥ मत्र परिवार चित्त थारत धरतो । फिर कर निज गृह पाया हा ॥ मं मारे गुण रहता सुख में । जगरूढ सहाया हो । ला०॥ १५॥ तीनो मना रही मतीयों मांह । मुनि श्राचार्य ढिग रहा इहो । प्रथम ज्ञान सीखे अति चंप। जमित दाताह होला०॥ १६ ॥ नन्तर दुपर करणी करता। वाह्य अभ्यन्तर शुद्ध हो ॥ दृष्टि लगाइ निर्माण पन्थे । जो दाखी युद्ध हो । ला०॥
म १७॥ धर्म अपि धर्म ध्यान से चढीया । शुक्ल वरी शक्ल भैया हो । कर्म हटाइ केवल पाई । मुक्ति गैया हो ॥ ला०॥ १८ ॥ सतीयों ऊंचे स्वर्ग सिधाइ । थोडे भव मुक्ति पाइ हो ॥ जन्म सफल जो प्रात्मा तरे । अवसरे भाइ हो ॥ ला॥ १६ ।। ममकिन उन्मव जय विजय रासे । पुण्य अधिकार खण्ड पहलो हो । ढाल मनाइम नाना ग्ममय कीनो मेलो हो। गुरु प्रसादे कहे अमोलक । पुण्य का संचय कर्गय हो ॥ नो जय विजय कुमर के जैसे । सुख शीघ्र वरीये हो ॥ला०॥२१॥ । ॥ हर्ग गान छन्द ॥ श्रीममकितीत्सव सर्व सुखकर पुण्य फल दर्शाइया ॥ जय विजय दोना पुगय प्रतापे । अख्खूट ऋद्धि सुख पाइया । ऐसा जाण सुखार्थि प्राण निर्वद्य पुगय मंग्रह कगे। कहे अमोलक तस पसाये, धर्मकर शिव सुख वरो॥१॥६॥ परम पूज्य श्रीकहानजी ऋपिजी महाराज के सम्प्रदाय के बाल ब्रह्मचारी मुनिश्री श्रमोन्नक ऋषिजी महाराज रचित-समकितोत्सव-जय विजय बग्त्रि का पुण्य अधिकार नामक पूर्वाध खण्ड समामम् ॥
- " श्री सदगम या नमः "ममकितीत्सव" जयसेण विजयसेण चरित्र का सम्यक्त्व अधिकार नामक दिनीय उत्नगर्घ खगड प्रारंभ ॥ दोहा ॥ प्रणमुं सिद्ध साधु चर- | | सम्पति गुरू पाय | विघन हरे मङ्गल करे । द्वितीय खगड वरणाय ॥१॥ समान माल पम वन का । व्रत शाग्य कीर्ती पान ॥ यश बुसुम फल मोक्ष दे। जागा मनि मान ॥ ॥ विजयसण सम्यक्त्व द्रढ़ । पाली संकट मांय ॥ गृहेवासे 4. न कही। पाय मुख्य शाश्वताय ॥ ३ ॥ ऋद्धि वृद्धि हुइ बहू । यशः सुख वि- गर ॥ प्रमाद ना चिन चटक धर । कथा सुणो धर्म धार ॥ ४ ॥ जय नृपति पर गर । पिजय अनुज्ञाये रेय ॥ प्रीति पयोदक सारखी। अन्तर छे फक्त दय ॥ ॥ चीना बहन काल वृत ते । ऐमी तरह सुख पाय ॥ एकदा विजय कुमार न । पत्रात म्मरण ग्राय ॥६॥राज देइ सचीव को। में लुब्धा यहां पाय॥ अत्र गाव जाका नहां । मंतोष परजा तांय ॥ ७॥ ॥ ढाल १ ली ॥ सैयां ये माय से लगा उस दिन को ॥ यह ॥ सुणोजी भाइ विजय चरित्र सुखकारी॥ -- टेर ॥ प्रान ममय श्री विजय भूपति । करी शृंगार शोभारी ॥ सु० ॥ १॥ प्रेमो. सुक विनययन कहे जय से । कामपुरे रहवा हुइ इच्छारी ॥ सु० ॥२॥ इच्छा हाव मा हुकम फरमावा । हूं इच्छु अाज्ञा तुभारी ॥ सु० ॥ ३॥ जाण अातुर नम मधुग बद जय । कीजे जो तुमे सुखकारी । सु०॥ ४ ॥ सुणी हर्षाया ल- ग्कर मनाया । बबर भचर तेही वारी ॥ सु०॥५॥ बन्ध्यादि सव जन ने संतो. पा। माथ लीना नानों नारी ॥ सु० ॥ ६ ॥ शुभ मुहूर्त प्रयाण कीया सव । सुग्वे मुकाम करनाग ।। मु०॥७॥ पाया कामपुर ढिग जाणी प्रजा। हर्पित हुइ अपार्ग ।। मु० ॥ ८ ॥ पुर मिणगारा स्वर्गपुरी सम । प्राये सन्मुख सज थारी ॥ मु० ॥ ६ ॥ लंगये बधाइ विजय भूप ताइ । मोतीयन मैह वारी ॥ सु०॥१०॥ मपग्विार मुख रहे विजयी । कामही पुर के मझारी । सु० ॥ ११॥ वन्धु वि: । योग बटके जयजी चित्त । मिलण मन उमंगारी ॥ सु० ॥ १२ ॥ नयधीर को राज मंमलाया । दानी मब मुकत्यारी । सु०॥ १३ ॥ निज परिवार सम्पति सर्व
No text on this page.
7 1।।।।। - माण फिरार्ग ॥ सु० ॥ २८ ॥ नाना विधी ऋद्धि सिद्धी ले । ':' ' ... ... नाम ।। म.. ॥ २६ ॥ उत्सव पाया काम पुरे सह । महश्र सोले 1 ।। म ॥ ॥ कामपुर का नाम बदल कर । विजयपुर नाम • IT मा ॥ सब नृपन करीया विदा तव । यथा योग रीति सतकारी .. पर जाद दोनो की । कीर्ती जग विस्तारी ॥ सु०॥ ३३ ॥ । १.१॥ ना ।। गाट । अब कह धर्म कथारी ॥ सु०॥ ३४ ॥ उत्तरार्घ 1. परम । र अमोल उचारी ॥ सु०॥ ३५॥ ॥ दोहा ॥ ते ३. म। म | गण कर मृपि सर्वज्ञ ।। लाभ स्थानक मो विचरते। तार ते 11 T ... || भव्य पर योदय प्रावीया। विजयपुरी के वहार ॥ उतर नपान र जा लट । विजय उद्यान मझार ॥ २॥ माली ही मज हुइ। नृपति ममा म भाय । जिन युन वधाइ दे । धागे मर्वत महाराय ॥३॥ नृपादि मुण भागन्दिगा । मिहामण में उनर ॥ तद्दी मे चंदन करी मुनि भणी । प्रेमोत्सुक । - - न .. हो र ॥ ४ ॥ अर्धवारे कोड हीरण तणी। माली को बक्साय ॥ वस्त्रा भंपणे नाप नम । काधा नाम बादाय ॥ ५॥ ॥ ढाल २ री ॥ बन्धव बोल मानो हा ॥ यह ॥ सर्वज्ञ मुनि ग्रागम लखी। दोनों भूप हाया हो ॥ धन्य दिन है याज का । गम - विकमाया हो ॥ भविक ममकित पाराघो हो ॥ अाराधे सुर नम् विम।। ग्रान्म कार्य माधो हो । भविक ॥ १ ॥ मेना मजन महू सज किया। विधी वंदन चाल्या हो ॥ पुरजन जनी वह तंघहुवा । जतना में हाल्या हो। भ० ॥ ॥ दी मान वाहाण नन्या । मुख यत्ना कीनी हो । तिवुत्ता विधी वंदन कियो । मनि गाण रंग भानी हो ॥ भ० ॥ ३॥ यथा योग्य वेठा मह । ज्ञान सुणन का रमाया हो । परोपकारी मुनिवरा । बोधन तर चमीया हो ॥ भ० ॥ ॥ अहो भव्या इन यात्म ने । भव भ्रमण के मांही हो ॥ अनन्त पुद्गल परावृतीया । दुर्लभ दही पाइ हो ॥ भ०॥ ५ ॥ उपना क्षेत्र ग्रार्य विपे । उत्तम कुल अवतारो हो । प्रायु दीर्घ पुराण इन्द्रिय । देही निर्विकारो हो ॥ भ०॥६॥ मिल्या निग्रन्थ का 4 गुरु गिरवा । जिन वाणी सुणीज्यो हो ॥ श्रद्धो परतीतो रोचवो । करणी शक्ति थुणी जो हो ॥ भ० ॥ ७ ॥ धर्म मूल सम्यक्त है । शुद्ध श्रद्धा धारो हो । परम दुर्लभ जिनवर कही । पाया भवो दघि पारो हो ॥ भ० ॥ ८ ॥ स्वल्प क्रिया श्रद्धा महिता होवे महाफल दाता हो । अभव्य तपी श्रधा वीना । अनन्त मंमार्ग रहाता हो ॥ भ० ॥६॥ नक विना चन्द्राननी । चन्द्र विन जिम रजनी हो ॥ रम वती सव रम विना। विन प्रीति ए सजनी हो । भ० ॥ १० ॥ जिम पना फीका लगे। तिम धर्म की करणी हो ।। श्रधा विना निसार है। नहीं पार उतरनी हो ॥ भ० ॥ ११ ॥ इण कारण धर्म इच्छु यों। प्रथम खत सुधारी हो ॥ शुद्ध होइ समकित लइ । धर्म बीज फिर डारो हो । भ०॥१॥ व्यवहारी समकिती पहिले वनो । सत सठ गुणवन्ता हो ॥ परमार्थिक परिचय करी । परमार्थ वरन्ता हो । भ०॥ १३ ॥ वमनी पाखण्डि संग तजो। यह चउ श्रद्धा धारो हो । क्षुधित भक्ष कामी कामीनी । मेये ज्ञानी ज्ञान वारो
No text on this page.
नीम कांडीयो । हाट भाजन जैसी हो । धर्म की समकित गिणे । छ स्थानक गनी हो ॥ म० ॥ २३ ॥ प्रात्मा है सदा शाश्वती । कम करती भुक्ति हो ॥ भा. वना निश्रय य रख । त्रिरत्ने मुक्ति हो ॥ भ० ॥ २४ ॥ यह व्यवहार सम्यक्त्व । के। मन मठ गुण पात्र हो ।। भावे अनन्तानुवन्धि चोकडी । त्रिमोह नपाये हों ।। भ० ।। २५ ।। अहंत देव निग्रन्थ गुरु । दया धर्म व्यवहारे हो । देवात्म गुरु ज्ञान ने । धर्म शुद्ध भाव धारे हो ॥ भ० ॥ २६ ॥ सम्यक्त्व धर्म ढायया । देशना ये फरमाड हा ॥ खण्ड दूजे ढाल दूसरी । ऋपी अमोलक गाइ हो ॥ भ० ॥ २७ ॥ ॥ दोहा ॥ श्रोता त्रप्त्या मम्यक्त्व सुधा । अत्यन्त प्रानन्द्या मन ॥ अपूर्व भाव श्रवणे हुवा । अाज दीहाडो धन ॥ १॥ राजेश्वर जय विजय युग। पाया हाय प्रकाश ॥ उत्सुक हो लुली २ नमी । प्रणम्या करे अरदास ॥२॥ स्वामीजी कृपा करी । कहां भवन्तर विध ।। संजोग वियोग हम किम लीयो । कैसे मिली यह रिद ॥ ३ ॥ उपकार कारण जाणके। श्री सर्वज्ञ भगवन्त ॥ पूर्व भव जय - नविन विजय को। देखा जमा कयन्त ॥४॥कराणी भरणा विश्वम । ल , :... नाय । प्रत्यक्ष दीये पारखा । नृपादि सर्व सभाय ॥ ५ ॥ ॥ ढाल ३ री ॥ जय जिनगया २ ॥ यह ॥ सुणो सुणो भाइ २ । पूर्व भवों की सुकृत्य कमाइ ॥ मागा ॥ श्रां ॥ भृतिलकपुर नगर भलेरो । धन धान्य ऋद्धि, सुख घणरो ॥ सुणी ॥ १ ॥ अर्ग जय भूप रुधारणा राणी । बुद्धि विजय प्रधान गुण खाणी ॥ सु०॥ ॥ नहीं रह ऋद्धिवन्त व्यापारी । भानु भमर नाम भाग्य धारी । सु०॥३॥ श्राद्ध पक्ष पर्व एकदा प्राया। जीन व्यवहार मुक्त निपाया ॥ मु० ॥ ४ ॥ तात निथी हानी न दीहाडे । मित्र स्वजन भिन्नुक जामाडे ॥ सु० ॥ ५॥ नीर पुरी रमान जामा । तब श्वानी एक तहां चल पावे ॥ सु०॥६॥ परमानन्दा भाज- न मुख डाला । देखा दोनों भाइ शेशे हुवा काला ॥ सु०॥७॥ जेष्टिक सजोर कम्मर मार्ग । धरणी पडी मूर्चित तेवारी । सु० ॥ ८ ॥ तव एक भैसी दोड तहां अायो । दुर्वल थाक भूखे घबरायो ।। सु० ॥६॥ पाडो कुत्ती दोनों रोने लागा। 4
पूर्व भव का नह तम जागा ।। सु०॥ १० ॥ नरवाणी से म्हेसो उचारे । देखे ताक
मव पाश्रय पारे । सु० ॥ ११ ॥ सुणे पण पूरी समझ न पाये। भेद जाणन मवी
के मन चावं ॥ मु० ॥ १२ ॥ भव्य भाग्ये श्रुत कवली याया । देवी सर्व अनि
हपाया ।मु०॥ १३ ॥ भानु भमर लुली वंदना कानी । शुद्ध भिन्ना उलट भार
म दानी ।। मु० ॥ १४ ॥ फिर कहे कृपा करी प्रकाशो । पूर्व प्राज यह देखो
नमामा ।। म० ॥ १५ ॥ पूर्व ज्ञाने उपयोग लगाइ । कहे मुनि मुनो कर्म कयाइ ।।
मु० ॥ १६ ॥ पाडा पिता कुनि तुम माजी । जिमका अाज यह श्राद्ध कियाजी ।।
मु० ॥ ॥ मात भयो मे प्रीति इनकी जाणो । भवोभव पाइ रोगी हाणो । गु०
॥ ॥ महा मिथ्यात्व पाया विश्ववादो । हुवा दुर्बल वोज तुम लादो ॥ सु०॥
१६ ॥ निजक काम निज पीडाणी । सुणी नाम इहागो लगाणी ॥४०॥ २० ॥
अकाम कर्म लहथया । जाति स्मरण ज्ञान दोनों लेया ॥ मु० ॥ २१ ॥
कह भमा कुनि नारी नांइ। धिकार पडझे ये पुत्र कमाइ ॥ १० ॥ २२ ॥
पापा नाम भोजन निपजाया । लादी लाय मुझ जरा न चखाया ।मु०॥ ॥ य नार बाड कम्मर नोडाइ । दोष ने किनका स्वकर्म कमाइ ॥ मु० ॥ ॥ दाना गमी का रहा बातां । रखे संशय तुम जरा मन लाता ।। सु०॥ - }} निधान बना पाडा नुम ताइ । तो मत्य ये समझ जो भाइ ।। सु०॥ ५. प. गाशाला पग थी कुचरे । खोदी देवे भानु द्रव्य निमरे ।। सु०॥ २७ ॥ पनीन पार माय बान जागाह । भानु मंतोप्या दोनों के तांड़ ।। सु० ॥ २८ ॥ दाना नियन पि पावरिटकाइ । मुनि बोध सम्यक्त्व पायाइ ॥ सु० ॥ २६ ॥ पार का जन धमन धायर्या । मुनि उपकार करीनं पधार्या ।। सु० ॥ ३० ॥ ढाल नाम प्रमालक गाड । मन्मंगति महालाभ दाताई ॥ सु०॥३१॥६॥दोहा॥ भयर मान दाना मिनी । कर तिर्यंच की मेव ।। खान पान वत्य भूम से । पोये नन अहमय ॥ १॥ नायंच दोनों ज्ञानवन्त । पाले सम्यक्त्व शुद्धः । यथा उत्रित करणा करे । धर्म में प्रर्ग बुद्ध ॥ २॥ श्रायु अन्ते अणसण करी । प्रथम स्वर्ग यह । मकार ।। देव देवी पणे ऊपना । जाणी ज्ञान मझार ॥ ३॥ तत्क्षीणे प्राइ पुत्र प। दमाइ निज रिद्ध ॥ सम्यक्त्व धर्म पमाये मे । इव्या तिरे यह विध ॥ ४॥ पन्य न फल देगा धर्म का । धर्मी हुवा घणा लोक । सुरसुरी स्वर्ग गया। भोगवे पुगग का नाम ॥ ५ ॥ ॥ ढाल ४ चौथी। मानव जन्म २ रन तेने पायोरे॥ ममपिन रत्न २ मदा सुखदाइजी । धारो भव्य हुलसाइ ॥ १०॥ टेर ॥ भमर भान धम पाप फल देख्या । प्रत्यक्ष परिचय लेख्याजी॥ अति चित्त हर्षाया। धन्य २ मानगया । मुम्ब पन्धे लगाया ॥ सम ॥ १ ॥ अति दुर्लभ येह अवसर पाया । लेप लावा चिन चायोजी ॥ यो घरी उत्साहो । शुद्ध सम्यक्त्व गाहो । ल बनादि लाहो ॥ म०॥२॥ दान देव पर्वे शील पाले । तर करे धर्म उजमा- लजी । पण कर्म गनि भारी । वक्ते फिरे ग्राडी पारी । देवे युद्धि विगाड़ी॥ म० ॥ ३ ॥ मन गहि धर्म जाणे साची। प्रमाद वध्यो पड्या काचाजी । भोग सुम्ब ललनाड । रह्या मोट मरझाइ । करणी करी ढीलाइ ॥ स॥ ॥ मुनि 11 दरममाण करवा न जवाह । नो धर्म श्रवण कसे थाइजी ॥ हे समकित सेठा रहा। घर पाट वटा । कर अन्य में बटा ॥ म० ॥ ५ ॥ दोनों भाइ के दो दो लुगाइ । नामा यम यममा हो । मुमंगति मे लगाडी । धर्म ज्ञान सिखाडी । करी सम- गाटी ।। म ॥६॥ उन २ दोनों वाइ के दो दो महेली । तास ते धर्म म ॥ न पाण होगह शाणी । मत्य जिन मार्ग को जाणी। धर्म ग्रात्म oi! मी ॥ ॥ ७॥ एकदा कोइ पावाडी बायो। भानु संग विवाद मचा- या ..।। नाकपटी पगं ॥ जेमा महत को छुगे । करी चरचा कूरो ॥ स०॥ ८ ।। सिन बन गंका भान ने ग्राइ । पण किमी को नहीं जणाहजी ॥ नहीं परणाम निन्दे । नही बन्द निकन्दे। मन में रम्यो मन्दे ॥म० ॥६॥ केताक काल ने विमगई । फिर जांग वगयो तमो ग्राइजी। फिर शंका भराह ॥ यों तीन यार भगह । गया कम वन्धाह ॥ म०॥ १०॥ एकदा जेष्ट भानुनी नारी । ऊभी या पर दागन। ॥ नहां बाइ मतराणी । बोलावे सेठाणी। कोह कार्य प्रेराणी ॥ २०॥ गण शेठाणी गुमराइ भराणी । वाले जेसे ताणीजी ॥ तूंचे नीच जात नारी। हम मंग नहीं करां थारी । वोलत भावे लजारी ॥१०॥१२॥ नित्य लेजाये तूं पशुरि युहारी । क्या करे बरोबरी म्हारीरी। इम वह धिकारी। मन मत्मर भरारी । नीच गोत्र पन्ध्यारी ।। म० ।। १३ ॥ पाली समकित निर्मल रवहीं । भायु पन्त लयो जयहीजी ॥ प्रथम स्वर्ग मझारी । देव देवी ऊपनारी। सद्धि पुगयानुमारी ॥ म०॥ १४ ॥ थायुपल्यापम पूर्ण कराइ। यहां पाइ सहू मिल्याइनी । भानु जय नृर धइया। भमर विजय लघु भैया । पूर्व प्रेमे लुब्धेया ॥ म०॥ १५ ॥ तीनों तत्व तुम शुद्ध पाराया। ता पुण्य त्रिखण्ड साध्याजी। नीनों रल पायाइ । मणी चौपधी मंत्र ताइ । ए कुछ धर्म पल्याई । स० ॥ १६ ॥ भानु जिन बचने शंफ लाया । जयजी तीन वक्त दुःख पाया जी। भमर की शुद्ध श्रथा । तो नहीं पाइ वापा । संच्या सम सुम्स लाघा ॥ स० ॥ १७ ॥ कुल मद कीनों सरूपां वाइ। तेहमे वेश्या पर जाइ जी। कामलता फहाइ । पूर्व प्रेम वि० १?" अाकांड़ । मिल्या जयजी ग्राइ । हुइ पफी मगाइ ॥ स०॥ १८ ॥ यार मन्जन मिल्या मत्र भाइ । न्यारा २ दीना बताइ जी। मुणीयों जिन वाणी । इहायों करे सय प्रागी। बात मेन्दी लगाणी ॥ १० ॥ १६॥ मति ज्ञाना वरण कम थया। जाति स्मगण ज्ञान लया जी ॥ सुणी जेमी जाणाणी। अति हीये हाणी । द्रढ़ सम्यक्त्व ग्रहाणी ॥ म०॥ २० ॥ श्रावक का व्रत सब प्रादरीया। शमा मांगन बहु कर्गया जी ॥ ढाल चतुर्थी थाइ । ऋपि अमोलक गाइ । धर्म सदा सुखदाइ ॥ मम ॥ २१ ॥ ३ ॥ दोहा ।। श्री जिनजी रहे तहां लगे । सेवी विजय राजान ।। तत्वार्थ धारण किया। निमंशय मतिमान ॥ १॥ जिनजी विचरे जिन पदे । नन्तर विजय राजान ॥ अमरी पडह बजावीयो । तीनों खण्ड के म्यान ॥२॥ नवकार यावं जहन ताम माफ कीयो दाण ॥ ज्ञान शान महू स्यात कर । धमा नति मंडाण ॥३॥ धर्म अर्थ काम मेवता अपना नन्दन तीन ॥ नन्द यानन्द मुन्दर श्री । कीया धर्मार्थ प्रवीन ॥ ४ ॥ धर्म जग मंडण करो । रहे महू सम्ब 4 पाय ।। अव परिक्षा सम्यक्त्व की । जिनेन्द्र सुरेन्द्र कथाय ।। ५ ।। ढाल ५ मी ॥ जनाजी के गम की देशी में ।। तोजी महा विदेह क्षेत्र के विपे । चोथो प्राग मदा यो परतायतो ॥ विजय पुष्कलावति शोभती। तहां विचरे सिम- । घर जिनगय ता ।। मर्वज्ञी सर्व दर्शनी । सुरेन्द्र नरेन्द मुनिन्द्रे पूजाय तो ॥ दे- शना मुणन को ग्राीया । सुधर्मा स्वर्ग पति एकदाय तो समकित की महिमा मागो ।। १ ।। गन्द्र दाहिण दिगपति । भरत क्षेत्र पर श्रति अनुराग तो॥ प्रश्न पृढे नमन करी। मुझ को 'फरमायो ग्रहो वीतराग यतो ॥ इस काले को भरत में । है धर्मात्मा सो महा भाग्य तो। पाले सम्यक्त्व निर्मली। प्राणान्त न लगावं जग दाग तां ॥ सम ॥ २ ॥ वागरे जिन विजय पुरपति । विजयराय शुद्ध सम्यकवी जाणती । देव दानव चला न सके। न लगावे दोष जावे कदा प्राणनी ।। कुदव गुरु इच्छे नहीं। शंका कंखा कोइ न शके प्राण तो। यो सुणी हा देविन्द्री । बन्दी स्वर्ग गया वेठ विमाण तो॥ सम ॥ ३॥ मुधर्मी सभा
No text on this page.
ताही सुर मुझ नाम कहात तो॥ यों अभिमान निश्रय करी। तत् क्षीण चल कर भरत में प्रात तो सम॥७॥ समण भूत प्रतिमा धारी। जुलक श्रावक का रूप बनाय हो। निर्ममत्व अल्प परिग्रही। सर्व शास्र कोजाण कहाय तो॥जाणे दुकर क्रिया तप करी । हाड पिंजर कियो नन सुकायतो ॥ अाडम्बर अधिको करी । "जैन परिडत” नाम प्रसिद्धी पाग तो । सम ॥ ८ ॥ ग्रामादि में विचरता । बहू मगडाणे विजयपुर श्राय तो ॥ मुणी श्रावक घणा हपीया। वन्दे नमें धर्म स्था. नक लाय तो । इर्या सोधत चालता.! आया नृप पोपध शाल माय तो। लेइ रजा तिहां उतरीया । दया क्षमा शील शुद्ध जणाय तो ।। सम ।। ६ । लोलपी नहीं रमना तणा । भिक्षावृति से लेवे लुख सुख याहार तो ॥ उदेशीक नित्य पिगड वर्जता । ऐपणा अधिक कठिण याचार तो ॥ सद्बोध करे विविध परे । गहन शास्त्रार्थ करे विस्तार तो ॥ हेतु कथा मे रुवावइ । गाये राम रागे ललकार ता ।। सम ।। १० । परिपद घणी प्रकविइ । त्याग प्रभावना हो उपकार तो।
T
विजयगय माण हपीया । मिलाण पाया पोपध शाल मझार तो ॥ सुखशाता पूछ
विगतीया । न भी मुग्य पृछे मधुर उचार तो ॥ लोक प्रसंस्या करे घणी । ते
निजामन दर विकार ना ।। मम ॥ ११ ॥ ज्ञान क्रिया व्यवहार शुद्ध । उपकारी
गगी नप नम जाण ना ।। गम्या तहां अग्रह करी । वृद्धि करण सुकृत्य धर्म ज्ञान
ना। ग्राप भी याप को अवमरे । धर्म चरचा करे कर पेछान तो ॥ बुगला
मा. या अनवाणा । मोहाया को मेवा मन्मान तो ॥ सम ॥ १२ ॥ माया वीछले
म: का । ना अन्य की क्या कथा कहाय तो ॥ गुणानुरागी रीजे गुण लखी।
'वान ना जागाय ना ॥ पंचमी ढाल अमोलक कथी । श्रोता सुणो आगे
चिन लगाय ना । अहत रचना रच अमुर ते । विजय निकन्द मिथ्याकन्द तांय
ना । मम ।। १३॥ ॥ दोहा । विजयराय निजवस्य करण । देवते रचे उपाय।
गम कप अन वन्नी ढिग । रही ज्ञान धार पाय ॥ ? ॥ गहन रेश शाम्रज
नाणी । एकान्त नृपने रताय । प्रश्नोचर करे रायजो। ते भी तेसी पूछ प्राय ॥२॥
अपूर्व लाभ ज्ञान को लही । अानन्दे राजान ॥ अहोनिश तस सेवा करे । सुर नहीं दे पहचान ॥ ३॥ काल बहुयों वीतीयो । प्रतीत्या भूपाल ॥ विनीत शिष्य पर देवना । ववन करे अंगीकार ॥ ४ ॥ निज वस्य भयो जाणी रायने । साधन इष्ट नेवार ॥ विरूधा चरण करे देवता । ते सुणो सुज्ञ नरनार ॥ ५॥ ॥ ढाल ६ टी ॥ पाठ कृया नव चावडी ॥ यह ॥ श्रावक कहे सुणो चित्त दे ॥राजेश्व- रजी ।। जैनधर्म श्रेयकार ॥ अहो धरणी घरजी ॥ पण अनमिलती कथनी घणी ॥ गजेश्वरजी ॥ अव ते में करुं उचार ॥ अहो धरणी धरजी ॥१॥सिद्ध अन- न्ता होगया ॥ राजे० ॥ हुवे हे होसी अनन्त ॥ ग्रहो ध०॥ जीवरासी संसारी जी ॥ राजे०॥ कदापि नहीं घटन्त ॥ अहो घ० ॥ २ ॥ राय कहे तुम माभलो ॥ ये श्रावकजी ॥ श्रीमत तहामेव सत्य ॥ ग्रहो सुणो श्रावक जी ॥ व्यवहार श्रव्यवहार रामजी ।। सुणो श्रा० ॥ दोपरुपी जिन गत ।। ग्रही सुणा ॥३॥ श्रव्यवहार रामी से नीकली ।। सुपो।। व्यवहार रामी ॥ उत्सर्ग जो ग्राय ॥ अहो ॥ तास संख्या ए जिन कही । मुणो ।। ते कमी नहीं थाय ॥ ग्रहा ॥ ४॥ जितने जीव शिव पद लहे ॥ सुणो ॥ तितने व्यवहारी होय ॥ यहा । ग्रव्यवहार अनन्त सदा रहे ॥ सुणो ॥ सर्वज्ञ रहे सब जाय ।। अहो । '. ॥ भपधारी देवता कहे ।। राजे ॥ माधु महाव्रत के धार ।। ग्रहो । तीन करण नान जांग में || राजे ॥जीव हिंमा परिहार ॥ अहो ॥६॥ करे गमनागमन नदी ऊन ॥ राजे ॥ तहां निश्रय जीव हणाय ॥ अहो ॥ प्राशा दी जिन एह- वी ॥ गजे ॥ विरुद्ध प्रत्यन यह देखाये ॥ अहो ॥ ७ ॥ भूप कहे नहीं संकीये ॥ म यह निवार ॥ अहो ॥ ८॥ अपवाद को प्रायश्रित लहै ।। सुणो ॥ कारण रु करण उपकार ।। ग्रहों ।। अटका काम चालण कह्यो। सुणो ॥ पण हिंसक आज्ञा मधार ॥ अहो ॥ ६ ॥ जैसे पिता कहे पुत्र ने ॥ सुणो । मत कर ख्याल कि नान ॥ ग्रहो । जो न रहो जावे तुझयी ॥ सुणो ॥ तो एक घडी पर मत बोल -वि० ॥अहो ॥ १०॥ यह हेतु जिन पिता परे ॥ सुणो ॥ समण पूत्र सम जाण ॥ यहां ॥ नहीं निभे तो सो निमाववा ॥ सुपो ॥ अपवाद भाल्यो भगवान ।। ग्रहो ॥ ११ ॥ भेषधारी सुर किर कहे ॥ राजे ॥ लोटा घडा कूवा मांय ॥ग्रहो॥ पाणी के जीव असंख्य है ॥ राज ॥ सब बरोवर केसे थाय ॥ १२ ॥ तर्क करी भूधव कह ॥ सुणो ।। ज्यों लाख श्रोपधी का तेल ॥ ग्रहो ॥ मासा तोला शेर मण विष ॥ सु० ॥ लाखही योषधी मेल ॥ अहो ॥ १३ ॥ श्रन्य हेतु वली यह है ॥ सु०॥ एक दश सत सहश्र लाख ॥ ग्रहो ॥ सब ही संख्याता सब कहे ।। सु० ।। तैम अमंन्याता भाख ॥ ग्रहो ॥ १४ ॥ सुर यह अद्धि सये ॥ रा०॥ पण पंचा- स्ति काय ॥ अहो । तास श्राधार सब जीव ने ॥ रा०॥चल स्थिर विकाश क्षय जाय ॥ अहो ॥ १५ ॥ तेतो दृष्टी श्रावे नहीं । सु० ॥ ते कसी तरह मे म. नाय । श्रहो ॥ नरेन्द्र कहे जिन वचन में ।। सु०॥ फरक पाव रति नाय ॥ यहो ॥ १६ ॥ अरूपी सो कहे सूत्रमें ॥ सुणो ॥ मो निजरे केमे श्राय ॥ अहो ॥ पण
No text on this page.
No text on this page.
No text on this page.
परबीन ॥ शंकिन कांचित न हुवे । लियो शुद्ध मत चीन ॥ ३॥ परन्तु प्रत्यक्ष दाखवी । जैन की विपरीत रीत ॥ चलावू जो इण भणी । तोही महारी होवे जीत ।। ४ ।। मिश्या वचन सुरेन्द्र को । किया विना न जवाय ॥ यो द्रढता फिर चिन धर्ग ॥ वाले मो सुणी वाय ॥ ५ ॥ ॥ ढाल ७ वी ॥ सखी पणीया भ. ग्न के माजाण ॥ विणजाग के राग में ।। तुम तुणीयो जी राय हमारी । कौन जैन धर्म शुद्ध धार्ग ॥ टेर ॥ भेष धारी सुर कहे मधु वाणी । धन्य तुमने जैनागम : रहस्य जाणाजी । जाब तुम बुद्धि की वलीहारी ॥ कौन ॥ १॥ जिन वचन सच में श्रया । मुझ. मंशय अाप मव मरद्याजी ॥ अपूर्व युक्ति जमारी ॥ को० ॥२॥ जैन मत मत्य जग माहीं । अन्य नहीं इण सहीजी ॥ पण कौन सामर्थ्य पाल. वार्ग ॥ को॥३॥ राय कह चौसंघ अराधे । यथा शक्ति क्रिया सव साधे जी। दखा माधुजी शुद्ध ग्राचारी ॥ को० ॥ ४॥ महा व्रतादि क्रिया महा पाले । जि- नाज्ञा प्रमाणे वालेजी । श्रन्यमत में न कोड़ इसारी ॥ कोन ॥ ५॥ तव सुर
No text on this page.
में मुनिवर नोलेजी छत्ती त्यागी क्या करे इच्छारी ॥ कौ० ॥१५॥ संयम निर्वाह कारा पापे । केइ तपस्या कर तन शोपेजी। ज्ञानी ध्यानी वैयावची उपकारी ॥ को० ॥ १६॥ खोटी दृष्टि कर नहीं देखे । नारी मात्र मा 'नकर लेखेजी । है माधुमति सना ब्रह्मचारी ॥ को० ॥ १७ ॥ महासतीयों केई गुणवन्ती । सूत्रार्थ गुरु मुग्य मीग्वतीजी । तासो श्राप तिरे पर तारी॥ को० ॥ १६ ॥ जे श्राविका ज्ञान गुगवन्नी । ते केदक संयम थाचरन्ती जी । केइ देवे सती सन्त ने सातारी ॥ को० ॥ ॥ ज्ञान से गुण वृद्धि पावे । यो जाण मुनि पढाचे 'सुणावे जी ॥ पापी पाग धेरै चित्त मझारी ॥ कौ०॥ २१ ॥ देव कहे में भी संयम पाल्यो। वद्याभ्यान्नर भिन्न निहल्यो जी ।। तहसे श्रावक भेप लीयो धारी॥को० ॥ २२ ॥ में कदापि न वोलं झूठो । नहीं साधु पर में रुठो जी। जैसी देखी तैसी ऊचारी ॥ को ॥ २३ ॥ जो भेला रहे सो जाणे । भोला भेदन सके पेछाणे जी। जो गम्ब शुद्ध व्यवहारी ॥ को० ॥ २४ ॥ प्रथम परिक्षा कीजे । फिर श्रीलंभो मुजने
No text on this page.
. . ।। || पानी भी मंग धाइ। आमा बागमभाग । न :: .... 13 हार ॥ जरा ।।१॥ मर मुनिवर्ग के नाइ । नादि मां वंद्याइ। . . २९ रहाइ । बेटा मर गए योग्य स्थाने । उमंग मुनि वाणी सुगवाने भावार्य मदोष परमारे । तत्वार्य गहन दावे । ते सुगम करी थाना नल्लीन होरे मुऐ के । प्रात्म हित ले नामे गुण के ॥ जरा .':रया सूर दृढडाइ। उत्नग एकान्त स्थपाइ। न अपवाद जरा '• • मा माश्चर्य पाया। कहे धन्य जग मुनिराया ॥ जरा ॥४॥ :: पान । मून ऐना दोष टाले। मो टोटो क्यों करणी में घाले । 3 ५. म हा परमापा । दान महात्म व द्रढ़ाया ॥ जरा ॥ ५॥ श्रावक वना । जो भेर पारी पालताइ। ये उत्कृष्ट श्रावक कहाइ || गाणी भमी देसी रहना ॥ जरा ॥६॥ for : ! | it in it if the .
No text on this page.
रामगनपाइ ॥ प्रायजी भी मंग धाइ। माय मर बाग मझारे । पंच मागम पाम्य पारे ।। जरा ॥ १ ॥ मय मुनिवरों के नाइ । नृगादि म बंद्याइ। Pा रहाइ । वेठा सब गण योग्य स्थाने । उमंग मुनि वाणी सुणवाने ।। ... ।। - ।। भावार्य सदोष फरमावे । तत्वार्य गहन दावे । ते सुगम करी । गमा३ । पाता तल्लीन होरे मुणे के । अात्म हित ले तामे लुण के ॥ जरा it . ॥ मात्र तिरिया सव द्रढडाइ। उत्मर्ग एकान्त स्थपाइ । न अपवाद जरा । श्राना गुण माधर्य पाया। कहे धन्य जग मुनिराया ॥ जरा ॥४॥ जा मग धार पर गाले। सूक्ष्न ऐमा दोष टाले। मो टोटो क्यों करणी में घाले । भार फल मति ही फरमापा । दान महात्म खूब द्रढाया ॥ जरा ॥ ५॥ श्रावक की किरिया पताइ । जो भर पारी पालताइ। ये उत्कृष्ट पायक कहाइ ॥ सुणी मर पन्य र तम कहना । भेषधारी भूमी देखी रहता ॥ जरा ॥६॥ फिर मम्यः कल की मरमाइ । जो नृपत चिन में पाई । केद रागणीयों भी मुगाइ ॥ इत्यादि
No text on this page.
मग तो भरम भत दरशाह ॥ जरा ॥ १३॥ तुप माव परिना करस्यूँ । जो शुद्ध सगा भन्दा । तो चरण में मायो घरस्युं । दिखते हैं मरीखे मणी थोर कांच । माम हर लग जब मात्र ॥ जरा ॥ १४ ॥ राय कहे इतनो मत तानों जा भर है. रतन गुण ज्ञानो। दीया है तैमा ही व्याख्यानो। बोली से भेद सर्व पिशा परिक्षा क्या कीजे || जरा ॥ १५ ॥ श्रावक कहे श्रभी गाना । गुप्त राते इहां चल पायो। फिर प्राचार गोचार बतायो । तो मालम मही पड़ जामी । मानो इति वात मेरी खासी ॥ जरा ॥ १६ ॥ ऐमी यानो सुर पनाह । भायो सो उपाश्रय माही। नृप निज मन्दिर यहां ताई । थागे परिक्षा दिखाये गाइ । दाल वसु अमोल ऋषि गाइ ॥ जरा ।। १७ ।। दो- ।। ।। जामिनी जाम जदा गाइ । सुर भूपत ढिग भाय । कहे चाला श्रय याग में । दमण किरिया मुनिराप ॥१॥. राय कहे क्या देखिये । देसे व्याख्यान मांप । पिद पे मते माह के पातक भात्म भराय ॥२॥ देव कहे ये ही जाल
No text on this page.
यागाय: म ... नो । मुणों ॥४रही सुरेन्द्र को ग्राम । कहां विटा ॥ मगम ने ए कर्म विमाम । क्यों करो उनम करणी को नाम। !! न दिसत हो जानी गुणी भरणीयां ।। कम ज्ञानी हो गुण ने .. " आप कान कायां । थक हाथ लगी मंयम मणीयां ॥ मु० ।। ५ ।। 1 ।। ३ प सरपर बैठे। गादी तज करडे लेटे । मिहामण नज बैठे ।" । ॥ मम सम में रही इंटे ॥ सुणो ॥ ७॥ अमृत ढोली विप क्यों ५ ।। ५। भरमन नज कम्बल मींवा । इन कर्मे भोगवमो घणी रीयो । जो सम 38 Mar ॥ सुणो ॥८॥ अनन्त मंमार भ्रमण करमो। नरक निगाः म पनमामा । फिर मम्यक्त्व दीपक नहीं करमो । जो ऐना कर्म से नहीं । एमा । ग! ॥ अनि मुशकिल नरकुल पायो । अति दुकर जैन कुले पापा । ना भार. पणो के नायो । अनि २ दुर्लभ माधु यायो । मुणो ॥ १० ॥ गोकगान निन्तामणी पाइ । निण कंकर जणी गमाइ । तेमे नुम तणी यह
No text on this page.
४ को नुम पालमा । गुम देव यों पोल ॥१॥१॥शरल स्वभाव है म्हारो । करण न जाण कपट ॥ वाद्याभन्तर एक सो। न र पाय दपट ॥ २ ॥ परभव को डर मुझ अनि म न माया लगार ॥ पेखो जरा अागे वढी । वृद्ध मुनि श्राचार ॥ ३ ॥ सुण चित चमक्या महीपति । श्रावक कर धार्यो ताम। चलो देखें थगे वला । कम मुनि गुण धाम ॥ ४॥ वृक्ष छांय में छिपत सो। देखे भागे जाय ॥ अर्थाटन एखी कृत्य को। पाश्चर्य अति चित पाय ॥ ५ ॥3॥ 2 ढाल ॥ १० वी ॥ चतनी, वारणे मत जावोजी ॥ यह ॥ राजेश्वर द्रढ़ सम्यक्च के धारीजी । देखी देवमाया नडिग्यारी ॥ टेर ॥ एक साधुजी जूवा खेलरे । चौक नी दुर्फा डाव में लेरे । हार जीत में धन घणो देले ॥राजे०॥ । ॥ एक मुनि श्रामिम धिरे । घणा मशाला युक्त सवादरे । करे परसंस्था कर्म बान्धे ॥ राजे० ॥ २ ॥ एक मदिरा मीसी ले श्रायारे । सा प्रारोगी तवहीं मुर- बायारे । नाचे गावे चंग बजाया ॥ राजे० ॥२॥ एक जति रम्या वैश्या रमाइरे ।
No text on this page.
६ . नव नगर म नाल्या यार । मन- माहात मुरझायार ॥राज ॥ १३ ॥ तव श्रावक कह फरमावारे । मे कन्यो सो- देख्यो उपावोरे । मुझम वचने परतीत जरा लावो ।। रा० ॥ १४ ॥ राय कहे प्राचार्य जो मोटारे । सो-तो कधी न करें कर्म बोटारं । ये नो मिल्या कुमति घाल्या गोटा ॥ रा० ॥ १५ ॥ यों वोलता मेहल पाम थायार । निहां भाचार्य निकलता देखापारे । पैठाण्या प्रकाश के मांया । गज० ॥ १६ ॥ मो ती अन्तेवर में से पावरे । एक राणी ने साथ लेजावेरे । दबी राय अनि शरमावे ॥ रा०॥ १७ ॥ पण मोनं नृपति तब राखेरे । कोन विष्टा में फथर न्हावरे । विप्त पामी कृत कर्म पाखे ॥राजे॥१८॥ व किन का जाय पूकारे । बलायु हुवा लूटासरे। सब खोटा. मिल्या. कैसे वारू ॥ राजे० ॥ १६ ॥ यह ता टग की टोती देखाइरे । नहीं जैन मुनि. निश्चय थाइरे ॥ करूं उपावजों कुमत विरलाइ.॥रा०॥ २० ॥ ढाल दशमी अमोलक गावेरे । देवराजा को चित्त चलावरे । धन्य-विजय-वक्ते द्रढ़ रहावे ॥राजे०-1॥ २१ ॥3॥दोहा॥
اما ، | . अटे पर तीन चित रचे । याराध में निज सत्व ॥ सत्य ॥ ४ ॥ कदा एक हीरो योटा दिख । मब बांटा जाणा नाय ॥ खोटा सो तो खोटा ही है । खरा खोटा नाथाय ।। सत्य ॥ ५ ॥ एक वक्त लूटा मार्गे । दूजी वक नहीं जाय। तो रस्ता मत्र बन्ध हव । जगढी नाश पाय ॥ मत्य ॥ ६॥ परम मार्ग वीतराग को। । घागा पालापहार ॥ यह टोली मिली पाखंडी की । दुजा नहीं इणसार ॥ सत्य ५॥ महानि घणा भरत में । शुद्ध पाले श्राचार ॥ तैसेही सतीयां घणा । उनको महाग नमस्कार ।। मत्य ॥ ८॥ श्रवधि ज्ञान देवे देवता । नृपति स्थिर परिणाम ॥ पावट पर्या दृढ घणा हुवा । देव विस्मय रयो पामे ॥ सत्य ॥ ६॥ प्रकट कह. मागी गयी । गी अवगुण न जोय । थे तो फस्या हो दृष्टि राग में । शुद्ध मान कमी होय ॥ मन्य ॥ १०॥ जैसे कामी कामान्ध हो । न देखे नारी अवगुण । तिम जिन मन गचिया । विणमी मति जो निपुण ॥ सत्य ॥ ११ ॥ : कुपी धर्म न गृही मके । मुपक्षी सो ग्रह झट । अन्तर नेण खोली. जोयो।
No text on this page.
. १०. ॥ गयी प्राया निज महल में । धरता चित्त चमत्कार (धूतं साधु ने श्राव. क. माँ । पटक चिन मझार ॥ सत्य ।। २१ ॥ सदाश्वर्य यह अति । ऊंच श्रात्म या पाय । श्रद्धा विना रूले चउगते । सत्य श्री जिनवाय ॥ सत्य २२ ॥ यों भा. निमल भावना । धन्य विजय नृपाल । प्रत्यक्ष विपरीती जो दृढ रहा। श्रमो. ल एक दश ढाल ॥ मत्य ॥ २३ ॥ दोहा ॥ चित में चिन्ते असुर ते। निष्फल हुवा मो उपाय । परपर कर सह दाखव्या । तेह से स्थिर रह्या भाव ॥१॥ अव बाना घर परे । न्हावी शंकट पूर ॥ जो फिर बढ किम रहा कुमति ये चिन्ती यो पर ।। २ ।। मब मुगे सुता निशी विपे ।। तब देव स्वप्न मझार । राय सची. व मामन्त को । कहै दिव रूप निजधार ॥ ३॥ शीघ्र सावध होवो सहू तुमे । जो इन्छो हो सुग्ख ॥ तो क्यण सत्य मानजो। तुम पुर पर श्रावे महा दुःख ॥ ४ ॥ नाग कुमार कोपित हुवा । करेगा विधन अपार ॥ प्राते पूजो नाग मूरती। ना परनी चेनचार ॥५॥०॥ढाल १२ वी ॥ श्रावक.श्रीवीरना जम्पाना
No text on this page.
।
नहीं जी। सप्न निमन्तिक वात ॥ होणहार मो होवमी। जो जिनजी देख्यो
मानात ॥ धन्य ॥ ८॥शुभा शुभ कर्म उपार्जिया। ते भोग्या ही छुट को होय ।
क्षणिक सुख ने कारणे । कोन मूर्ख सम्यक्त्व विमोय ॥ धन्य ॥ ६ ॥ देव फस्या
कम काम में ते। मानव ने कैसे छोडाय ॥ इम निश्रय श्रवलम्बिने । निश्चिन्त
रह्या विजयराय ॥ धन्य ॥ १० ॥ सचीव सामान्त शाहजन मिली । करे नृप से
नमी यरदाम ॥ पधारो नाग पूजवा । ज्यों उपद्रव होवे नाश । ध० ॥ ११ ॥
राय कहे कमोदय । नहीं देव टालण सामर्थ ॥ सम्यक्त्व रत्न गमाववो । न करूं
में यह अनर्थ ॥ ५० ॥ १२ ॥ दुःख सुख देव न दे सकेजी। कर्म संचित फल
पाय ॥ यह अनुज्ञ शास्त्र की ते । येहीज वक्त काम प्राय ॥ धन्य ॥ १३॥ तत्वज्ञ
घमी हुइ तुम । कैसी देवो मुझ यह सीख ।। माल संभालो थापणो। ज्यों आगे
न पावे तीख ॥ धन्य ।। १५ ॥ इत्यादि सुन सह चुप हुवाजी। निज २ स्थाने
जाय ॥ तत्वीण राय भवन में। बहूत फणी घर प्रकट थाय ॥ धन्य ॥ १५ ॥
No text on this page.
४४ मामन्त मिल । ममजावे बहू भांत ॥ सुज्ञ नृप अवमर लखी। स्वीकारो अवदात ॥ १ ॥ पूजा करो फणिन्द्र की । ज्यों होवे उपसर्ग दूर ॥ कारणे को दोपण नहीं। मानों केण हजूर ॥ २॥ कान न घरे नृप विनंती । तव सह अति अकुलाय ॥ रीमा कह धिक हट यह । अवसर पोलखो नाय ॥३॥ समज्या समजावा किसो । कीजो ऊंडो विमास । निजात्म सज्जन तणो। हाथे मत करो नाशा॥ ४॥ महा अनर्थ होवे जह से । ते तजो समझी मन ।। संसारार्थ साधने । करो नाग पूजन ॥ ५ ॥ ॥ ढाल १३ वी ॥ जिनेश्वर मोहणी जीत्याजी ॥ यह ॥ राजेश्वर सम- कित धारी हो । के धन्य जीत्या उपसर्ग भारी हो । टेर ॥ सचीव सज्जन श्रादि मह मिली हो । समझाया बहू भांत ॥ नहीं मानी राजिन्द्रजी हो । होणहार सो थात ॥ राजे ॥ १॥ राज का रायन स्वप्न में जी। कहे सुर कोपित होय ॥ हं भी हर्टीला भूपति । क्यों श्रभिमान ने घर खोय ॥ राजे ॥ भूल्यो सम्यक्त्व भ्रम मे । मुझमे मिथ्यात्वी. देव बणाय ॥ सब माने तूं माने नहीं । छक्यो ऋद्धि गर्व के
No text on this page.
..
T
१३ दलग अत्यन्त ॥ राजे ।। ११ ॥ अनन्त पुण्ये समफिन मिली।
..। २. ! . मुरा काज ॥ इम निश्चय कर स्थिर रह्या । नहीं पूजा फणीन्द्र
॥ ॥ दियमादय राय भवन में । एक दीर्घ मर्प प्रगटाय ॥ श्याम
।। मर्व जननं भर उपजाय ॥ रा०॥ १३ ॥ जेष्ट पुत्र को डंकीयो
। हाल ॥ मजन परिजन मिल करी। करे रुदन पाकन्द अम.
।। कर धग रहे राय को । अव शीन चलो महाराय ।। पूजा
प' नो अनर्थ मोटो धाय ॥ रा०॥ १५ ॥ राय न माने कोह
।'' '' यो डक ॥ ने भी पड़ी मुग्दाय के । रायजी तो वैठा नि-
। अनि ममजा मह मिली । भूप कान घरे नहीं वात ।। तय
'ननी। नहीं पडयो मुरबान ॥रा०॥ १७ ।। तीनों राणी
म . साडयां नाग कार ।। छेउं पड्या सुरवाय ने। कुटुम्ब कोपित
॥धिकारण लग्या रायने । राय कहे ममता रम्बो मन ।।
-
समपर
No text on this page.
. माल माल कंठ में । वाले विश्वासु वोल ॥ २॥ कावड खन्ध है नाग की । पुंगी मधुग बजाय । भृजंग रमे तस तन परे । प्रत्यक्ष परिचय देखाय ॥३॥ दर्श देख गारुडी को । मंतोषाणा सब मन ॥ यह तो निश्रय टाल से । प्रापणा सर्व विधन ! ॥॥॥ ढाल १४ वी॥ विणजाराः ॥ यह० ।। सुणो श्रोता हो ॥ सर्वजन खुशी यनि होय । मन्कार कियो गारुडी तणो॥सुणो श्रोता हो । सुणो श्रोता हो॥ यावी ऊग महाभाग्य। तुम दीठा हमने अानन्द घणो॥सुणो॥१॥सुणो ।कृपा करी इणवार। कगमान देवावीय ।। सुणो ॥ सुणो । उतारो छेऊ को जेहर । हमारी चिन्ता गमा- वीय ।। मुणा ।।२।। मुणो ॥ करस्यां खुशी तुम ताय । मांग सो सो देस्यां सही ॥ सु- गो ॥ मुणो ॥ उपकार होमी भार । जीवित लगे भूलस्यां नहीं । सुणो।। ३ ।। मुणो भाइ हो । गारूडी छेऊं ने देख । कहे यह विप विषम यति ॥ सुणो भाइ । हो । सुग्गा भाइ हो । अमाद्य सो दिखे यह । तो भी यता मुझ शक्ति ॥ सुणो ४॥ सुणो ।। मैं जाणू अनेक उपचार । निर्विप निश्रय करस्यूं सही ॥ सुणो । 4 ।
No text on this page.
. गा। गनमम्कार । अत्यन्त नरमी अरजी करे ॥ सुणो ॥ नाग रायाहो नम मामय दर । मोटा मोही क्षमा धरे ॥ नाग० ॥ ११ ॥ नाग ॥ जो नमे गरगार पाय । नो अपराध भृले मयी । नाग० ॥ जेष्ट तणी यह हे रीत । तेही पाप नाग प्रथा ॥ ना० ॥ १२ ॥ नाग० ॥ फरमायो आप हुकम । सोही कराई " ना नाग ॥ हिंय नजो मर रोम । बारम्बार सो इम भने ॥ सुणो॥१३॥ गार । मन नया मब जगत् । यह शुष्क काष्ट ज्यों नमे नहीं ॥ गारु०॥ गार ।।।पः ..। कर नमस्कार । तो मन दुःख हरु मही ॥ गारु०॥ १४ ॥ गणE IN | गाड़ी को खुश होय । नमन करो नाग रायने ॥ सुणो रायारे ।। गुणा ।। वाट हट मय खेर । अवी दुःख जाये विरलायने ॥ सुणो रा०॥ १५ ॥ गारटी हो ।। नृप कह सुण मुझ वात । उठ जा तूं थारे घरे ॥ गारु० ॥ गाम । जो मा अभीमानी देव । विना काम अनर्थ करे ॥ गारु० ॥ १६ ।। । गाम० ॥ येई। कदव लक्षण । तास चंदन में नहीं करूं।नहीं इण लोक की पास। -
No text on this page.
No text on this page.
No text on this page.
T । . 1 प्रभाइ मे रंलो ।। अहो मागो श्रोताजी । मुर पाम्यो ।। नहीं अजमें द्रढ नाइ में रेलो ॥ १६ ॥ अहो । द्रढ़ मही मम्यस्य धर्म ग्रारामधारेला ॥ अहो ।। यह हुइ प्रमाला मर चना मान नाधवरे लो ॥ २० ॥6॥ ': । राणी विनर ना वचन ।। चीडायो अति चिन में। पनि भोलीया • कदाही दयाहीन ॥ निज हिता + ।' पान ।। २ ।। खोटो भव्य नव्य ताहारे । होतो दीमे .: । बानेमाल पंसल ॥३॥रोगी रोटा वचनने । जो र गग द्वि दुवा । महा पीडा पावंत ॥ ४ ॥ नेमेही नुझे र नगराय !! इन यह वडो गाला। छोड चल्यो मन की। मुम, विनतडी अवधारो पनि ॥ यह ।। मान 11.3: . ददलाइ । रानी मवाद प्राणान्न । टेर । गागड़ी जाना .
No text on this page.
मम म्थानी नशी वन्धी जकडी । कीनो सर्व ग्रंग डंस ॥ योर अनेक लघु सर्प थाट । वाटया नृप अवगंश ॥ देख ॥ ६ ॥ चुट २ नृप तन ने तोडी। करे रक्त मांग ग्रहार मेरु ज्यो दृढ ध्यानस्थ नृप हो । स्मरण करे नवकार ॥ १०॥ महा विष पमग मव ही नन में । दवाग्नि मा करूर ॥ जाने वज्र प्रहार करे है । को- 'या मघाव के अमर । देवो ॥ ११ ॥ तीक्षण शस्त्रे अरी तन काटे । त्यों फटने लगा नन ॥ महा भयानक भोगे जो जाने । के जाने भगवन ॥ देखो ॥ १२ ॥ २ थर तन मव कम्पे । तरर २ छूटे रक्त ॥ तड २ सय नाडी टूट । जेहर चढा अनि श। ॥ देगा ॥१३॥ प्रक्षक को वाले जेष्ट नागमो । देखो दुष्ट के हवाल । म्ब जन पुरजन प्रादि जो रचना । दिग मुढ हुवे अमराल ॥देखो ॥ १४ ॥ प्रति वदन में मरहाट पई । पाडे भयानक चीम ॥ देखे सो अति त्रासित होवे । देव काप क्या जाम ॥ देखो ॥ १५ ॥ हरीत बदन दशन कृष्ण भये । तडफे जल किन मान ॥ मानान नरकमी वंदन । अनुभव जाणी ते दिन' । देखो ॥ १६ ॥ य वापरामा म भयो । यो मत्य कथन भगवन्त । इसमें अनन्त गुणी | बटन माग वार अनन्त । देखो ॥ १७ ॥ इन विचार में मन रमावे । • पवार । गणी पूत्रों छही मृत्यू पाये । करो ले जा मंझार यः ॥' || नन अंग पर नार के जैसे । बीता नृप मन परीताप ॥ '? पार पनी मे । कर नवकार को जाप ॥ देखी ॥ १६॥ ज्या २ ...माया या भाव निर्मल ।। अधिक २ अस्तिक जिनी के । वचन . : 13 न । दम्या ।। - ॥ महा मंकट में महा स्थिर रहे । धन्य विजय नृपाल ॥ ? यमान वनगा या यात्म । यह पोडशमी ढाल ॥ देखा ॥ २१ ॥३॥ || ना समय नही गाडी । धुणावतो निज मीश ॥ विजयराय ढिग पाया । मना दया जीम त्रासित मुद्रा मे कहें। अरे अब तो जरा नमान ... नाग देव ने । क्यों गमावै प्रान ॥ २ ॥ अति दुर्लभ 1: पगय “ । अव वक्त यह पाय ॥ ले लावा दीर्घ श्रायु वर। 1
No text on this page.
No text on this page.
-
N
.
".
२१:। । जाण ॥ इसमें भी कभी होय अनन्त गुणी । तो
। सो ॥ १३ ॥ हे माम तो काल बीतमी । म्हारे मने
२६ का दुम भोग । ना ही ने दृटे धर्म को नानी ॥
दुख वृद्धि पारे । त्यों ज्यादा सुखकारक जाणं ॥
" हिचित मंदन ग्राणं ॥ देखो ॥ १५ ॥ ज्यों
काही मुख अधिको पाम्यूं। याही जो सर्व कर्म
।। म जाभ्यू ॥ देखो ॥ १६॥ इनमे अनन्त गुण ॥
म नरम माही ॥ नर्क में दुःख अनन्त गुण अधिका ।
गा: E ARE || देवा ॥ १७ ॥ मम्पन्न भङ्गे । नरक निगोद के भव
प्र.न. करन । म निर्मले किंचित दुःख सही । महा दुःख मेटी
TTER. दया । = ॥ पावश्य अनन्त दुःय महे जहां निर्जरा हुइ
३.मा १३ भाप्रपलाम को अयमर यह मुझारोप कोई ने जरा मत देशो। देखो
No text on this page.
-- . 'ग 14 - नाद र विजयराय को। दुंदवी रया बजाइर्जा ।। धन्य ॥१॥ :: पट कराया । सुगंधी जल वर्षाइ ॥ रत्नाभूषण वन अत्युत्तम । .गाइजी ॥ धन्य ॥ २॥ अनेक रूपकर विचित्र देव का । गगन ': पशि प्रकार विजय गुण गावे । वाजिन विविध वजाइजी ॥ मन्त्र महो २ द्रढ़ना । जे विजयराय में पाइ ॥ ते नहीं पाये ..। . - विजय तान भाइजी ॥ पन्य ॥४॥ कांडॉरूप कर कोडों 1174 गाण न कहाही ॥ अाज पवित्र होई चरण भेटी । यों कही मा म ! | पाय ॥ ५॥ महा दिव्य रूप बत्र भूषणघर । मुक मुगट पद १ 01 पन्ना नमो देव मुझ । महा अपराध कीघाइजी ।। धन्य ॥ ६ ॥ १२. म मामुन अभी । मत्य विरतन्त दर्शाइ ॥में परमस्या किसी कर • । नामपर जिन मराइहो ॥ धन्य ॥ ७॥ प्रथम स्वर्गानि जिन बन्दन गये ins पुरानानि माइ ॥ मीमन्धर मे इन्द्र प्रभ किया । को मध्यपत्ती भरत
No text on this page.
. । नग प्रत्यक्ष देखाइ॥ प्रमाण जन्म जैन कुल धर्मने । जे जगे तुम Vit. 11 । य ॥ १६ ॥ में महादुष्ट कुदव दयाहान । जुलम अति कीघाइ ।। " ! राम ने । मंताप्या कुटुम्ब महाइजी ॥ धन्य ॥ १७ ॥ पण तुम . .. :ना में । देष जरा न लायाइ ॥ ऐमी द्रढता किंचित मुनि में । तो ....हाही हो ।। धन्य ॥ १८ ॥ अहो नरेन्द्र धर्मेन्द्र कृपालु । मुझ रंक बमा २ यह सर्व गुन्हाने । अर फिर करूंगा नाहीं हो॥धन्य। । म यजाम नमा किंकर पर । दो माफी दान महाही ॥ एह उपकार न महर करा महाराइहो । धन्य ।। २० ।। मुझ लायक चाकरी फर- मग मुझ नाइ ।। ढाल अष्टदश माहीं अमोलक । मानन्दाचर्य वर ना.11 एन्य ॥ २१ ॥७॥ दोहा ।। संतुष्टी नृप कहे देव को । तुम अपराध नलगार । महाग वन्ध्या भोगया । न करो कोई विचार ॥ १॥ सुर तरु चि. नामी थी । अधिक जिनेश्वर धर्म । मो फल्यों मुझ हृदय विगे। इममे न
No text on this page.
• ! र पनि मोह घटाने । देड पुत्र को राज । मयं प्रपंच को छोडी करी
. . . . उगाज | HIE का प्रत वारेही घास । त्यों मुघरे कुछ काज
. पान नया पोपी पारी ने । वारो अहार निपजवाप । भाइ पुत्रना
परिवार निमार । अनि पडम्बर नन्दकुमर ने राज तखुन
..: ॥ ८ ॥ फिर लेड मर्य की मो याज्ञा । धर्म उपकरण लेये ।
27 करता रेय ।तर जान्बा मात्र प्रमाणे । करे नित्य
१५ ॥ ५ ॥ ज निज निज कुटुम्ब के घर में । उनके निमित में
रूप नहीं जाइ । माग बांडे जेवार वान ध्यान में म.
.... न करे लगारहो । नाग। ॥ ६ ॥ गदा मन्या ममय वि.
.' ' : पाम कर । नीना मनोर्थ चिन्तवना ने दीना म्यिर ध्यान
मानवमा नेवारे एका हे तरजी ॥ सुमो ॥७॥ अहो प्रभु
है। मामा मय मागर । प्रागो जैन धर्म 1 विना कर गद भार थी।
.
--
"
।
या शिव सम्ख पर्म । तप जप किरिया की न जरूरत घरे द्रढ एकात्मा हो ॥ तुम ।। अष्टादश दोपण रहित मो। अरिहंत देव कहाय। शुद्धाचारी निर्ममत्व धरी निग्रन्थ गुरु गिनाय । मर्व जीवों को एकान्त सुखदाई । धर्म जिनाज्ञा मांय हो। ॥ माणा ॥ ॥ यह व्यवहारी धर्म तिहुं । तत्व को भव्य जीवो अाराधे त्रिशल्य त्रिकगण म त्यागे । जार जैन मत लाधे । यथा शक्ति वाम किरिया निपाइ । अान्मार्थ को माधे हो ॥ तुम ॥ १० ॥ निजात्म निज गुण में तल्ली न हो। ही निश्चय देव जानो । आत्मा ज्ञानानन्दे रमण करे । गुरु तेही पहछानो । पर परिणति तज निज परिति ये । रमे सोही धर्म मानो जी ॥ तुम ॥११॥ यह निश्च- यिक नीनो तत्व अद्धि । यथा शक्ति में पाल्या। परन्तु ममत्व शरीर की न घटी नामे मंयम न धार्या । धिकार होवो मेरे प्रमाद को । भव भमण नहीं टाल्या हो ॥ नम ॥ १० अनित्य पदार्थ तन अशुचि । कुटम्ब स्वार्थी सारा । शरणदाता काट होवे नाहीं । दुःख निवारण हारा ॥ पुद्गलानन्दी होकर प्रात्मा अपना भान -- रिमा:।॥ नम ।। १३ ॥ इत्यादि चिन्तवन करत श्रममत स्थान पाई ।। भागे जप धणि पाडपनी । कपाय लाय बुझाई ।। क्षीण मोह को कियो विजय जी। का पान म रमाईयाजी। तुम ॥ १४ ॥ घोर अन्धारी रात्री मांइ । अनन्त भानु ५. माः ॥ वनज्ञान और केवल दर्शन । विजय थात्मे प्रकटाइ । जो वस्तु महा पए म पार । मा महजे हाथ श्राइजी ॥ तुम ॥ १५ ॥ पिता से पुत्र यों भविष गिनीज । मो संयम ले केवल पाय । इनने तो गृहस्थाश्रम माहा । यान में केवल कमाया । यों पुण्य की उत्कृष्टता देखो । ध्यान वली कमा भाया हो ।। तुम ।। १६ साधुलिंग सामणपति देवता तत्तीण लाइ दीना। गृही वम परिहर विजय।। ताहे धारन कीना । ढाल उन्नीसवी कही अमोलक विजयी चिन्तिन लानाजी ।। तुम ॥ १७७ दोहा ॥ केवल महीमा करन को। सुग्गण थनि उमगाय । गगने वाजे देव दुंदुभी। जय २ शब्द गर्जाय ॥१॥ पुरजन कौतुक देयके । अति पाश्चर्य मन लाय । कोन पाये केवल इहां । दर्शने . ना गम धाय ॥ २ ॥ याये पोपप गाल में । विजय प्रापि वर देख । जाने यही साली । पाये हा विशेष ॥ ३॥ दिन कर भी तब प्रगटा । मिल सज्जन स- च याय । पुरजन यादि परिपदा । बहुत ही तहां भराय ॥ ४ ॥ जग तारन जिन गया। धर्म देशना फरमाय । सो सुणियो ओता सवी । लेजो यात्मे रमाय ।। ।। || * गाल २० मी ।। में मुख देख्यो गोडी पारस को ॥ यह ॥ चेतो चतुर मार मार कन्य धागे । घम मे खेवा पारजी ॥ टेर ॥ चार अंग अति दुर्लभ जगमें या नर अवतारजी ॥ ॥ १।। नव घाटी में अनन्त परावर्तन । किया जन्म पगा' धार जी ॥ चतो ॥ २॥ अनन्त पुगये नर हुवा । पिन सूत्र सुणवो हुफर मारती ।। चना ॥३॥ मिथ्या वाणी खोटी कहानी । सुण अनंतवारजी ॥ चेतो 11 || श्रीजिनवाणी माणके अद्धे । सोही सम्यक्त उचारजी॥चेतो॥५॥ कुश्रद्धा पोर चार मिया शल्य मोभमा अनन्त संसार जी ॥ चेतो ॥ ६॥ चोथा बोल श्रद्ध क. पगना । यथा शक्रियानुसार जी ॥ चतो ॥७॥ ज्ञान सहित चारित्र पाले 17 तो । हो जावे खेवा पार जीवतो ॥ ॥ क्षमा मुक्ति अज्जु ने मार्दव । ला घव गन्य मंयम भार जी ।। चे० ॥६॥ तप ज्ञान ब्रह्मचर्य धारे तो। निश्चय खेवा पार जी ॥ २०॥ १०॥ ज्ञान दर्शन चरन त्रय रत्न यह । करे यात्म निस्तार जी ॥ चे० ॥ ११ ॥ यात्मिक गुण तज प्रपति रमणता । सोही. रुलावनहार जी ।। च० ॥ १२ ॥ ममत्व बन्धे जो बन्धे जकडी। वो केसे छुटकार जी ॥ चे०॥ १३ ॥ जो छन् अरोहीत मच्छ पर । तम खुल्ला शिव द्वार जी ॥ चतो० ॥ १४ ॥ यह तन प्रन्यन अशुचि का कूडा । धर्म करे तो होचे उद्धार जी॥ चेतो ॥ १५ ॥ अयार में मार निकले मो निकालो। जो तुम हो होशार जी ॥ चे० ॥ १६ ॥ यही नन है. मोक्ष को कारण । कार्य हेतु सो लेयो धार जी ॥०॥ १७ ॥ श्र- पूर्व पार महा लाभ दाता । येह अवमर श्रेषकार जी ॥ चेतो ॥ १८॥ शलभ्य नाम लभ्य हुवो लूटो । मरणो अभी ही विचार जी ॥ चेतो ॥ १६॥ गइ वक्त पुन याव न किमपि खोया मोन जी
No text on this page.
No text on this page.
No text on this page.
जी । एक लज वर्ष अायु पार अनसनी हो द्रढासनी । किया अघातिक कर्म छार जी ॥ पधारे मोक्ष मझार जी। हुवे अजरामर अविकार जी ॥ अनन्त अनय सालीन मार जी। कृत कृतार्थता यही धार जी ॥श्री ॥८॥ जय पराय यदि हा जी । पहोंना सर्वार्थसिद्ध मांय ॥ एकावतारी उत्कृष्ट सुखी । महा विद में मान भिधाय जो ॥ और सवी स्वर्गे जाय जी। अतुल्य महा सुख भनाय जी ॥ घोडा ही मवन्तर मांय जी । पामसी शिव सुख सदाय जी ॥ श्री ।। ६ || ग्राम मदनी विशुद्ध करी । तामे विनय वीज पोवाय ।। शील कोट से घर कर । विविध ज्ञान वाचा बनाय जी ।। महाप्रत वाडी फूलाय जी । समता पहाड मावदाय जी ॥ क्षमा रूप नीर भराय जी। वैराग्य रंग दे घोलाय जी ॥ श्री ॥ १० ॥ मदरोध पिचकारी भर करी । सुमति गुप्ति सहेली संग ।। समाय वाजिन झाग कार मे। हुवे अनहद नाद में चंगजी । खेले उत्सव विजय सुरंगजी पाय मा सम्व अभंगी। वनो यही ग्राम प्रसंगजी ।। श्री ॥ ११ ॥ ज्यों विजय जी ,
No text on this page.
जी । हो मर्व लाभ दातारजी। येही प्राप्त पदार्थ सारजी ॥ श्री ॥ १५ ॥ श्रीवीर निर्वाण मंवत्मरा चीते चौवीस सो सप्तवीस । विक्रम उन्नीससो अठावने देश दक्षिण सुपुनीश जी ॥ घोड नदी ग्राम धर्माधीश जी॥ रहे चतुर मांस सु जगी- म जी । शुभ विजय दशमी के दीस जी। यह पूर्ण हुइ मुझ जगीस जी ॥ श्री ॥ १६ ॥ मती शिरोमणी महासती जी। श्री रामकवर जी जान । तस अनुज्ञ ए. रच्या । यह सम्यक्त्वोत्सव मण्ड जी ॥ सम्यक्त्व सब गुणों की खान जी । चिन्तामणी काम कुंभ समान जी ॥ पूरे इच्छा देइ इष्ट दान जी । जय जय सदा अमोल धर्मवान जी ॥ श्री समकित उत्सव सुखदा सदा ॥ १७ ॥ ॥ कळश ।। हरीगीत छन्द ।। ॐ नमो ग्रह सिघ सहू । सर्वज्ञ प्रणित जैन धर्म जी ।। चारों शरण येह सदा.मुझने । वांछितासुख देवे परम जी ।।
No text on this page.
No text on this page.
No text on this page.