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Shree Gurugeeta

Bharat Dharma Mahamandal · 2009/10

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. श्रीभारतधर्म महामण्डलके सभ्यगण और मुखपत्र। श्रीमारतधर्मामहामण्डल प्रधान कार्यालय काशीसे पर हिन्दी भापाका और दूसरा अंग्रेजी भाषांकास प्रकार दो मासिक पन्न प्रकाशित होते है एवं श्रीमहामण्डलके अन्यान्य भापाय सुखपन श्रीमहामण्डलके प्रान्तीय कार्यालयोंसे.प्रकाशित होते हैं यथा:-कोलकत्तेफे तालियसे वंगला भोपाका मुखपत्र, फिरोजपुर (एक्षार) के कार्यालयसे उर्दू भापाका मुखपत्र और मेरठ के काया लबसे हिन्दीभाषाका मुखपन्न । श्रीमहामण्डलके पांच श्रेणीके सभ्य होते है, यथाः-स्वाधी नरपति और प्रधान-प्रधान धम्माचार्यगण संरक्षक होते ही भारतवर्ष के सब-प्रान्तोके बड़े बड़े जमीदार, से, साहुकार आदि सामाजिक नेतागण उस उस प्रान्तके चुनावद्वारा प्रतिनिधि सभा चुने जाते हैं। प्रत्येक प्रान्तके अध्यापक नाणगणमेले उस उस प्रान्तीय मण्डलके द्वारा चुने जाकर धर्मव्यवस्थापक सभ्य बना जाते हैं। सारतवर्ष लब प्रान्तीस पांच प्रकारके सहायक संर लिये जाते हैं, 'विद्यासम्बन्धी कार्य करनेवाले सहायक सन्य, धर्म कार्य करनेवाले सहायक सस्य, महामण्डल प्रान्तीयमण्डल और साखासमाओको धनदान करनेवाले सहायकसय विद्यादान करते चाले विद्वान् ब्राहाण सहायक सभ्य और धर्मप्रचार करनेवाले सार संन्याली सहायक सभ्य । पाँचवी श्रेणीके सभ्य साधारण सभ्य हो हैं जो हिन्दुमा हो सकते हैं । हिन्दु कुल कामिनीगण केवल प्रधर तीन श्रेणीकी सहायक-लया और साधारण सस्या हो सकती है। सब प्रकारके सभ्यों और श्रीमहामण्डलके प्रान्तीय मण्डल, शान संभा और संयुक्त संभाओंको श्रीमहामण्डलका हिन्दी अथवा अंग्रेज़ भापाका मालिफपत्र विना मूल्य दिया जाता है। नियमितरूप नियत वार्षिक चन्दा २) दो रुपये देनेपर हिन्दू नर नारी.साधार समय हो सकते हैं । साधारण सभ्योको विना मूल्य मासिकंपत्रिका के अतिरिक्त उनके उत्तराधिकारियोशी समाजहितकारी कोप द्वारा विशेष लाभ मिलता है। प्रधानाध्यक्ष श्रीभारतधर्ममहामण्डलं, प्रधान कार्यालय । जगतगंज, बनारस।

L
ॐ तत्सत् ।
* श्रीगुरुगीता
'भाषानुवाद और टिप्पणी एवं
भूमिका सहित।
श्रीभारतधर्ममहामण्डल के शास्त्रप्रकाश विभाग द्वारा'
श्रीविश्वनाथं अन्नपूर्णादानभंडार
के लिये प्रकाशित ।।
काशी
तृतीयावृत्ति ।
.
बी० एल० पावगी द्वारा
• हितचिन्तक प्रेस, रामघाट, बनारस सिटी
में मुद्रित ।
.
1
सन् १९२० ईस्वी।
All rights reserunt )
मूल्य।) चार पाना

१. श्रीमहामडिल के प्रधान पदधारिंगण। प्रधान सभापतिः- श्रीमान महाराजा बहादुर दरभंगा। सामिप्रति प्रतिनिधिसभा:- "श्रीमान् महाराजा वहादुर काश्मीर । उपसभापति प्रतिनिधिसभा:- श्रीमान् महाराजा बहादुर टीकमगढ़। प्रधान मंत्री प्रतिनिधि सभा:- श्रीमान् आनरेवल के. भी. रंगस्वामी आयकर जमीन्दार श्रीरंगम् । सभापति मन्त्रीसभा:- श्रीमान् महाराजा बहादुर गिद्धौड़। प्रधानाध्यक्षः- श्रीमान् पण्डित रामचन्द्र नायक कालिया जमीन्दार और आनरेरी मेजिष्ट्रेट यनारस । अन्यान्य समाचार जाननेका पता- जनरल सैक्रेटरी। श्रीभारतधर्ममहामण्डल, महामण्डलभवन, जगत्गंज, बनारस। , . सूचना। श्रीभारतधर्म महामण्डलले सम्बन्धयुक्त आर्यमहिलाहित. कारिणी महापरिषद्, आर्यमहिला पत्रिका, आर्यमहिला महाविद्या. लिय, उपदेशक महाविद्यालय, समाजहितकारी कोष, महामण्डल मेगजीन (अंग्रेजी), निगमागमचन्द्रिका, निगमागम बुडिपो, श्रीविश्वनाथ अन्नपूर्णा दानसण्डार, शास्त्रप्रकाशक विभाग, एरियन धोरो आदि विभागासे तथा श्रीभारतधर्म महामण्डलसे पत्र व्यवहार करनेका पता:- श्रीभारतधर्म महामण्डल प्रधान कार्यालय, महामण्डल भवन जगत्गंज, बनारस ।

ओ तत्सत श्रीगुरुगीता विज्ञापन भारत में महाले स्थान काट्यालय फाशी धामके शात्रप्रकाश विभाग द्वारा अव तक प्रकाशित छः गीताओं का हिन्दी शनुवाद सहित प्रकाशन होकर हिन्दी साहित्य भएडार और साथही साथ सनातनधर्म ग्रन्थमएडारकी श्रीवृद्धि हुई है। इससे पहले श्रीसंन्यास गीता सब प्रकारके संन्यासी और साधुसम्पदार्यो के लिये, सौर्य सम्पदायके लिये श्रीसूर्यगीता, वैष्णवसम्मदायके लिये श्रीविष्णुगीता, शाक्तप्तम्मदायके लिये श्रीशक्तिगीता, गाणपत्य सम्प्रदायके लिये श्रीधीशगीता और शैवसम्पदायके लिये श्रोशम्भुगीता हिन्दी अनुवाद सहित प्रकाशित की गई है। श्रव यह भीगुरुगीता जैसी अब तक कभी प्रकाशित नहीं हुई थी हिन्दी अनुवाद सहित 'तृतीयवार प्रकाशित की जाती है। सर्वव्यापक, सर्वजीवहितकारी और पृथिवी के सब धर्मों के पितारूप सनातन- धर्म में निर्गुण और सगुण उपासनारूप से प्रधान दो भेद हैं। यद्यपि बीजाविग्रह अर्थात् अवतार-उपासना, ऋपि देवता पितृ-उपासना और क्षुद्र तामसिक शक्तियों को उपासनारूप से सनातन धर्ममें सव अधिकारके उपासकवृन्दके लिये और भी कई उपासनाशैलियोंका विस्तारित वर्णन पाया जाता है। परन्तु लीलाविग्रह उपासना अर्थात अवतार उपासना तो. पञ्च सगुण उपासनाके अन्तर्गत ही है। श्रीविष्णुभगवान्, श्रीस्यभगवान्. श्रीभगवती देवी, श्रीगणेशभगवान् और श्रीसदा- शिव भगवान्, इन पञ्च सगुण उपास्य देवताओंमें सबके ही अवतारों का वर्णन शाखोंमें पाया जाता है, क्योंकि सगुण उपासनाकी पूर्णताका लीलामय स्वरूप के विना उपासक अनुमव नहीं कर सकता । अस्तु, लीलाविग्रहकी उपासना सगुण उपासनाकी पूर्णता के लिये ही होती है तथा प्रापि देव पितृ-उपासना और अन्य पुद्र उपासनाका अधिकार सकाम राज्यसे ही सम्बन्ध रखता है निगुण उपासना में सर्व साधारणका अधिकार होही नहीं सकता। निर्गुण उपा- सना श्ररूप, भावातीत, वाक् मन और बुद्धिसे अगोचर प्रात्मस्वरूपको उपासना है। निर्गुण उपासना केवल श्रात्मज्ञान-प्राप्त तत्वज्ञानी महापुरुषों तथा जीवन्मुक्त संन्या- सियों के लिये ही उपयोगी समझो जामकती है और केवल सगुण उपासनाही सव श्रेणी के उत्तम उपासकवृन्दके लिये हितकारी समझकर पूज्यपाद महर्पियों ने उसके सिमान्तों को अधिक पचार शानों में किया है। हाट के स्वाभाविक पन्न तत्वों के अनुसार पञ्च विभागों पर संयम करके पञ्च उपासक सम्प्रदाय के भेद कल्पना करते हुए पूर्वावाप्यों ने पञ्च सगुण उपासनाप्रणाली प्रचलित की है। विष्णु उपासकके लिये वैष्णव सम्पदायमणाली, सूर्य उपासक के लिये सौर्यसम्प्रदाय प्रणाली, शक्ति उपासक के लिये शाक्त सम्प्रदाय प्रणाली, गणपति, उपासकके जिये गाणपत्यसम्मदाय - . .

। 'प्रणाली और शिव उपासक के लिये शैवसम्प्रदाय प्रणाखी उन्होंने विस्तारित रूप से नाना-शा में वर्णन की है। प्रत्येक उपासक सम्प्रदाय के उपयोगी अनेक प्रापंसं. हिताएं और अनेक तन्त्र अन्य प्रादि पाये जाते हैं, यहां तक कि प्रत्येक सम्प्रदाय के उपयोगी उपनिषद् भी प्राप्त होते हैं। उसी शैली के अनुसार प्रत्येक सम्प्रदायके उपा- सक के विवि अपने अपने सम्ददायके प्रत्येक पचान अन्य है। अपने अपने सम्प्रदायक पंचा-प्रन्धों में से अपने अपने सम्प्रदायका गीतायन्य सबसे प्रधान माना गया है। विष्णुसम्प्रदायको श्रीविष्णुगीता, सूर्य सम्प्रदायकी श्रीसृप्यंगीता, देवीसम्प्रदाय को श्रीशक्तिगीता, गणपतिसम्प्रदायकी श्रीधीशगीता और शिवसम्पदायको स्रोशम्भु- गीता, ये पांचों अन्य प्रति अपूर्व उपनिपद रूपी हैं। इन पांचों ग्रन्यरत्नोंका प्रकाशन श्रमी तक ठीक ठीक नहीं था। यदिच देवीगीता और गणेशगीता नाम से कुछ ग्रन्थ प्रकाशित भी हुए हैं तो वे असम्पूर्ण दशामें प्रकाशित हुए हैं। श्रीमारतधर्म महामण्डल के शासप्रकाश विभाग तथा नुसन्धान विभाग द्वारा पांचों अन्यरत्न अपने सम्पूर्ण आकार में प्राप्त हुए हैं। ये पाँचों गीताएँ वेदविज्ञान, सनातनधर्म के अपूर्व रहस्य, गभीर अध्यात्म तस्त्र और पूज्यपाद महर्पियों के ज्ञानगरिमार्फ सिद्धान्तों से परिपूर्ण है, इन पांचों के पाठ करने से पाठक बहुत कुछ जान लाभ कर सकते हैं। निर्गुण ब्रह्म तथा उसकी उपासना का रहस्य, सगुण उपासना का महत्व और विज्ञान, वेद के कर्मकाण्ड उपासनाकाण्ड और ज्ञानकाण्ड का मर्म, सनातनधर्म के सब गभीर विहान्तों का निर्णय, अध्यात्मतत्व अधिदैवतत्र और अधिभूततत्व, यहाँ तक कि वेदका सार सव कुछ इन पञ्च गीतानों में प्राप्त होता है। जानकाण्डका दिन जिस प्रकार प्रहार है, उपासनाकाण्ड का विघ्न जिस प्रकार साम्प्रदायिक विरोध है उसी प्रकार कर्मकाण्ड का विघ्न दम्म है। कर्मकाण्डी इनका पाठ करनेसे , अपने दम्भको भूलकर भक्त बन जाएंगे, उपासकगण अपने तुदाशय और साम्प्रदा- यिकविरोधको भूलकर उदार और पराभक्तिके अधिकारी बन सकेंगे और तत्वज्ञानी के लिये तो ये पांचों अन्य उपनिषदों के सार रूप है। गृहस्थों के लिये ये पांच गीताएं परम मङ्गलकर और सन्यासियों के लिये अध्यात्नपथप्रदर्शक हैं । जिस प्रकार सन्न्यास- गीता प्रधानतः सकल सम्प्रदायक साधुसन्यासियों के हितार्थ प्रकाशित की गई: उसी प्रकार यह यीगुरुगीता भी सकल मकारके साधकोंके हितार्थ प्रकाशित हुई है इसके द्वारा चारों प्राश्रमकोंके साधक वृन्द समानरूप से लाभ उठावेंगे। श्रीभारतधर्म महामण्डलके शास्त्रप्रकाश विभागके अन्य ग्रन्थों के अनुसार इस ग्रन्थरत्नका सत्त्वाधिकार दीन-दरिद्रों के भरणपोषणार्थ श्रीविश्वनाथ अनपूर्णादान भण्डार को दिया गया है। इस पन्धके इस संस्करणके छापनका व्यय खैरोषढ़ राज्ये- श्वरी श्रीमारतधर्मलपी महाराणी सुरथकुमारी देवी के. एच. पो.वी. ई. महोदयाने प्रदान किया है। श्रीगुरु देव उनको नीगंग और दीर्घायु करें। विज्ञापन मिति । श्री काशी धाम विजया दशमी विवेकानन्द । संवत् १९७७ विक्रमी } श्रीगुरवे नमः। श्रीगुरुगीता की विषयानुक्रमणिका । भूमिका १-६ (१) श्रीगुरुदेवकी स्तुतिपूर्वक उनको प्रणाम, गुरुदीक्षा- की आवश्यकता, गुरुशक्तिका लक्षण, भगवान्का जगद्गुरु होना, शिक्षागुरु और दीक्षागुरुके लक्षण, शिष्यपरीक्षा और गुरु-अन्वेषण, सब धर्म सम्प्रदायोंमें गुरुदीक्षा विधान, ईश. शक्तिकी सहायता गुरुरूपसे प्राप्त होना और उससे उन्नति, ईश्वरका कारण और गुरुमूर्तिका कार्यरूप होना, वर्त्त- मान गुरुदीक्षारीतिकी कड़ी समालोचना और उसका दायित्व, गुरुकी व्यापकता और जब चाहे तब उनके दर्शन, गुरुदीक्षाको परमावश्यकता और उसका क्रम, गुरुमाहात्म्य, १-६ ऋपिगणकी जिज्ञासा । (२) ऋषिगणकी गुरुगीताविषयिणी सूतजीसे जिज्ञासा सूतजीकी आज्ञा । (३) कैलासशिखरपर शिवजीसे महादेवीकी गुरुगीता- विषयिणी जिज्ञासाका प्रसङ्गवर्णन और तत्सम्बन्धी प्राकृतिक शोभा और भगवत्स्वरूपवर्णन ८-१० महादेवीकी जिज्ञासा। (8) महादेवीकी महादेवसे गुरुगीताविषयिणी तथा देहीके ब्रह्ममय होनेके मार्गविषयिणी जिज्ञासा १०-११ महादेवकी आज्ञा। (५) गुरुशब्दके अक्षरोकाअर्थकथनपूर्वक गुरुमाहात्म्यवर्णन ११ महादेवीकी जिज्ञासा। (६) मायामोहित जीवोंकी जन्म मृत्यु जरादि से रक्षा कौन कर सक्ता है इस प्रकारकी महादेवीकी जिज्ञासा । १२ महादेवकी आज्ञा । (७) गुरुका. रक्षकत्व और गुरुके साथ भनवान्का अभिन्नत्व, ब्रह्माण्डका ईश्वरके साथ और गुरुका क्रियायोगके साथ सम्बन्ध,गुरुका विशेष पूज्यत्व और उनमें ब्रह्मभावना १३-१४ ...

... .... ... ... महादेवीकी जिज्ञासा। (८) गुरुका लक्षण और आचार्य और गुरुके भेद विषयिणी जिज्ञासा। महादेवकी आज्ञा । (९) गुरुका लक्षण, प्राचार्य और गुरुकी भिन्नता और उनके साधारण लक्षण और श्रेष्ठ लक्षण, • १५-१७ महादेवीकी जिज्ञासा। (१०) शिष्यलक्षणविषयिणी जिज्ञासा १७ महादेवकी आज्ञा । (१३)शिष्यलक्षण और उसका कर्तव्य एवं गुरुशुश्रूषाका फल १७-२३. महादेवीकी जिज्ञासा। (१२)-योगके लक्षण और भेदविषयिणी जिज्ञासा महादेवकी आज्ञा । (१३) मन्त्र हठ लय और राजयोगोंके लक्षण, अङ्ग, ध्यान और समाधि, तीनोमेसे किसी में पारङ्गत होनेपर राज- योगका अधिकार और उससे जीवन्मुक्तिकी प्राप्ति । .... २३-२० महादेवीकी जिज्ञासा। (४) उपासनाके भेद, उसकी विधिके भेद और दिव्यदेशोंके नामविषयिणी जिज्ञासा । २८-२8 महादेवकी आज्ञा । (१५) उपासनाके विस्तृत भेद, दिव्यदेश, भक्तिके भेद, भक्तोंके भेद और उपासकोंके भेदका वर्णन । महादेवीकी जिज्ञासा। (१६) गुरुमाहात्म्यविषयिणी जिज्ञासा । महादेवकी आज्ञा। (१७)गुरुमाहात्य और गुरुध्यानवर्णन । ३३-४० महादेवीकी जिज्ञासा। (८) परमात्मस्वरूपविषयिणी जिज्ञासा। महादेवकी आज्ञा । (१९) परमात्माके स्वरूपका वर्णन । ४०-४२ महादेवीकी जिज्ञासा। (२०) गुरुगीतामाहात्म्यविषयिणी जिज्ञासा । ४३ महादेवकी आज्ञा । (२१) गुरुगीतामाहात्म्यवर्णन । . ...

Pro.... . श्रीगुरवे नमः श्रीगुरुगीता भूमिका। अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् । ' तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ सनातन कालसे गुरुदीक्षाकी रीति इस पवित्र भूमिमें प्रच. लित है । शास्त्रों में ऐसा कथित है कि जैसे पाषाणपर बीज बोनेसे चीज अंकुरित नहीं होता वैसे ही विना गुरुदीक्षाके साधन करने से कदापि आध्यात्मिक उन्नति नहीं होसकी । थोड़ेसे ही विचार करनेसे शास्त्रोक्त इस महावाक्य का सिद्धान्त हो सका है। जबसे शिशुमें ज्ञान अंकुरित होता है, उसके अनन्तर जैसे जैसे उसके ज्ञान की वृद्धि होती जाती है, वह वृद्धि औरों के उपदेश से ही होती है; अर्थात् जैसे जैसे उस शिशुको उसके माता पिता प्रति. पालक वा विद्यागुरुगण उपदेश द्वारा जैसी जैली शिक्षा देते जाते हैं वैसे ही उस वालकमे ज्ञानको स्फूर्ति होती जाती है । अब देखिये कि वे उपदेशकगण उस शिशु के शिक्षा गुरु हैं, क्योंकि उन. उपदेशोंकी सहायताके विना उस' बालकको किसी प्रकारसे शानकी प्राप्ति नहीं होसकी थी । मन बुद्धि और इन्द्रिय आदि जबतक किसी प्रबल शक्ति से उत्तेजित, आकृष्ट वा चालित न किये जायँ तब तक ये कोई काम नहीं करसकते। अब जिस शक्ति द्वारा हम लोग उन्नतिकी और फिराये जाते हैं वही शक्ति हमारे गुरु हैं। चन्द्र, सूर्य, ग्रह, नक्षत्रादि, जिस महाशक्ति के इशितमानसे अपने श्रीगुरुगीता। कार्यपर लगे रहते हैं, वही जगत्की महाशक्ति जगद्गुरु हैं। इन्हीं जगद्गुरुके जानने के लिये जय जीवका मन व्याकुल होता है, उल व्याकुलताको करके इस घोर मायामय अन्धकार-पूर्ण संसार-पथको जो तत्त्वज्ञानी महापुरुप उपदेशरूप दीपक द्वारा सुगम कर देते हैं वही दीक्षागुरु हैं । अब विचार द्वारा यह प्रतिपन्न मुश्रा कि पिना दूसरेके उपदेशके जीप कुछ भी ज्ञान लाभ नहीं कर लका; चाहे सांसारिक ज्ञान हो, चाहे आध्यात्मिक शान हो, विना गुरु-उपदेशके किसी प्रकारका ज्ञान लास नहीं होलकता। शिक्षाके भेदसे शास्त्र में दो प्रकार के गुरु लिखे हैं, अर्थात् शिक्षागुरु और दीक्षागुरु । माता, पिता, आचार्यादि जो कोई लांसारिक ज्ञानको वृद्धि करने में सहायता करें वे शिक्षागुरु हैं: अर्थात् एक कीटसे लेकर समस्त ब्रह्माण्ड ही शिक्षागुरु होसका है; परन्तु दीक्षागुरु वे ही होसते हैं कि जिन्होंने जीवकी व्याकुलता देख कृपा कर आत्मोन्नति का पथ उसको दिखाया हो। गुरुदीक्षा वर्णन करते समय आर्य-शालौने आज्ञा दी है कि दीक्षाने पहिले श्रीगुरुदेव शिष्यकी न्यूनसे न्यून छः मास अथवा वर्ष काल पर्यन्त परीक्षा करले। और परस्परमें प्रीति तथा भक्ति होनेपर यदि गुरुदेव शिष्यको उपयुक्त समझे तो दीक्षा दान करें। और यह भी लिखा है कि शास्त्रविधिसे यदि शिष्यकी दीक्षा होगी तो अवश्य ही उस जिशानुका कल्याण होगा इसमें सन्देह- मात्र नहीं : परन्तु शास्त्रोने यह भी आज्ञा दी है कि श्री गुरुदेव की शक्ति का पार नहीं वे यदि इच्छा करें तो चाह जैसा अधिकारी हो, चाहे जैसा देश काल पात्र हो, चाहे शिष्यकी परीक्षा करें वा. न करे, वे सब समयमें, लब देशमें दीक्षा द्वारा शिष्यका कल्याण फरसक्त हैं । ग्रन्थोक्त गुरु-लक्षण तथा शिष्य-लक्षणके पाठ करनेसे जिन्नासुगणके हृदयमै प्रश्न उठसक्ता है कि यदि च.परमहानी श्रीगुरुदेव शिष्यके उन लक्षणों के द्वारा शिष्यको पहिचान सक्त हैं • परन्तु अल्पज्ञानी शिष्य कैसे सब समयमें एकाएक सद्गुरु के पहिचाननेमें समर्थ होलकता है । इस प्रकारके सन्देहोंके उत्तरमें गह कहा जासकता है कि यदिच शिष्य अल्पज्ञानी होता है तत्रच ज्ञानरूपी चैतन्य काप्रकाश सब जीवों में ही स्थित है, विशेषतःमनुष्य- Sim. + . भूमिका । गणमें इस प्रकाशकी श्रेष्ठता बुद्धिरूपले प्रकट है, इस कारणले ही मनुष्य सब जीवों में श्रेष्ठ और अपने सत् असत् कमौका दायित्व (जिम्मेवारी) रखनेवाला है; अर्थात् श्रान्त प्राणियों में एकमात्र मनुष्ययोनिवाले ही अपने किये हुए सदसम्मौका फल पाया करते हैं; अन्य प्राणिगण प्रकृतिके अधीन होकर कार्या फरते हैं इस कारण वे अपने किये हुए कम्मोका फल नहीं पाते। मनुष्य अपनी बुद्धि के आधीन होकर कार्य करता है इस कारण वह अपने किये हुए सत् अथवा असत् कर्मके बन्धनमें आ जाता है । यह बुद्धिकी स्वाधीनता सब प्रकारके मनुष्यों में ही सब समयमै न्यूनाधिक रहती है. इस कारण शास्त्रने आशा दी है कि जिज्ञासुको भी उचित है कि अपनी बुद्धि के अनुसार अन्धोक लक्षणोंको मिलाकर गुरु का अन्वेषण करे। जितने प्रकारके धर्म-सम्प्रदाय इस संसारमें देखने में आते हैं उन सबमें ही गुरुदीक्षाकी रीति अल्प अथवा अधिक रूपसे पाई जाती है। चाहे मुहम्मदीय धर्मके शरीअत, तरीकृत, मारफ़त और हकीकृत अधिकार हो, चाहे ईसाई धर्मके रोमन कैथलिक, ग्रीकचर्च अथवा पोटस्टन्ट सम्प्रदाय हो, चाहे जैनधर्मके श्वेता- म्बरी और दिगम्बरी आदि मतान्तर हो, चाहे बौद्धधर्मके उत्तर और दक्षिण अाम्नाय हो, सब धर्म-सम्प्रदायों में ही , गुरुदीक्षा- ग्रहणकी रीति अल्प अथवा अधिकरूपेण प्रचलित है। सब धर्मः मार्ग एकवाक्य होकर गुरुदीक्षाग्रहण करने में आज्ञा करते हैं परन्तु भेद इतना ही है कि अभ्रान्त वेद-प्रकाशित सनातन धर्म जिस प्रकारले गुरुकी महिमा और आध्यात्मिक उन्नति करनेमै गुरु- दीक्षाको आवश्यकताको विस्तृत और बढ़ रूप से वर्णन किया गया है; उस प्रकार वैशानिक भावपूर्ण वर्णन और कहीं देखनी नहीं आता । वेदका यही आशय है कि जीव अपने कर्मने अनुसार आवागमन चक्रमें सत् असत् फल भोग किया करता है, परन्तु कर्म स्वयं जड़ होने के कारण वे अपने आप फलकी उत्पत्ति नहीं करसक्त; जगत्कर्ता, जगत्पिता, सर्वशक्तिमान् परमेश्वर ही अपनी महाशक्ति द्वारा उन कस्मों के अनुसार जोषको सत् अलत् फल प्रदान किया करते हैं। यदिच, फलको प्राप्तिमें निज कर्म ही . . । - - । ४ श्रीगुरुगीता। कारणरूप हैं, तत्रच ईश्वर-शक्तिके विना कर्म-समूह अपने, फलं उत्पन्न नहीं करलकते । इली शैलीके अनुसार आध्यात्मिक उन्नति करते समय भी मनुष्यको ऐश्वरीय शक्तिकी सहायता लेनी पड़ेगी; परन्तु ईश्वर कुछ स्वयं मूर्तिमान होकर जीवको फलदान नहीं किया करते, जिस प्रकार परोक्ष रीति पर जगपिता पर.. मात्मा जगत्के सारे कार्य चलवा रहे हैं: उसी प्रकारकी रीति पर वे अपने जीवरूप अनन्त केन्द्रोमले किसी श्रेष्ठ पुरुषके केन्द्र-स्थित होकर गुरुरूपसे जिज्ञासुका कल्याण करके उसको निम्नतर आध्यत्मिक भूमिसे उच्चतर आध्यात्मिक भूमिमें पहुँचा दिया करते हैं। इस महाकार्यमें, इस जीव-हितकारी प्रधान कर्म- में, ईश्वर कारण भूमि और श्रीगुरुमूर्ति कार्य-भूमि है, इसमें सन्देहमान नहीं और इसी कारणसे गुरुदीक्षा और श्रीगुरुमा- हात्स्यकी इतनी महिमा भार्यशास्त्रोने गाई है। यदिच गुरुदीक्षाकी रीति प्राचीन भारतमें बहुत ही प्रचलित थी, सत्रच अव भी इस पवित्र भूमिमै कहीं कहीं, गुरुदीक्षाकी यथार्थ रीति स्वल्परूपेण प्रचलित है; किन्तु विशेषतः यह रीति लुप्त ही होगई है और कहीं कहीं यह पवित्र रीति स्वार्थ-परता मिलकर कुरीतिमें परिणत होगई है। अधिकतर ऐसा ही देखने में आता है कि शिष्य गुरुभक्ति कुछ भी नहीं रही, गृहस्थों में जैसे नाई धोबी आदि गृहस्थ-सेवक हुआ करते हैं वैसे ही गुरु भी एक समझे जाते हैं। जब कभी गुरुवंशके कोई आ जाते हैं तब उनकी वर्तमान हीन अवस्थाके अनुसार यफिञ्चित् कुछ देकर उनको विदा करदेते हैं और उनसे पुनः अपना कोई सम्बन्ध नहीं रखते अथवा उनको अपने घरमें रखकर उनसे गृहस्थ सेवकोंका कार्य लिया करते हैं। यद्यपि अधिक दोप इस समयमें .शियोका ही है क्योंकि वे न तो अपने आप आध्यात्मिक उन्नतिके लिये प्रयत्न करते हैं और न गुरुसेवाकी कुछ आवश्यकता समझते हैं ; तत्रच इस समय- के शिष्योंका ही केवल दोष नहीं कहा जासकता, गुरुगणने भी अपनी मर्यादाको त्याग कर दिया है और दीक्षा देना उदरपुर्ति करनेका एक व्यवसाय मान लिया है। कहीं कहीं यह स्वार्थ: परलो इतनी बढ़गई है कि प्रतिष्ठित गुरुवंशके निकट जन शिष्य . .

भूमिका । - •. . गण दीक्षाके लिये एकत्रित होते हैं तो उन सबोंको पशुदलकी नाई एकसत विठाकर और सबोंको एक ही मन्त्र सुनाकर तथा उनसे अपना वात्सरिक 'कर' ठहराकर उनको विदा करदेते हैं । इसी प्रकारसे अविद्याके कारण गुरु और शिष्य उभय सस्प्रदायमें ही घोर कुरीति आज दिन इस पवित्र भूमिमै व्याप्ति हो रही है। इस कराल कालप्रभाव पर ही ष्टि करके देवादिदेव महादेवजी ने श्रीपार्वतीजीसे कहा था कि- गुरवो बहवः सन्ति शिष्यवित्तापहारकाः । दुर्लभस्सद्गुरुदेवि ! शिप्यसन्तापहारकः ॥ हे देवि ! कलियुगमें शिष्यका धन हरणकरनेवाले गुरु बहुत होंगे परन्तु शिष्यके सन्तापहारी गुरुं दुर्लभ होंगे । आर्यजातिकी अब वर्तमान अवस्था कुछ ही हो, परन्तु विचारवान् पुरुषोंका यह विश्वास है कि यदि शिष्य अपने आपको उपयुक्त करले और त्रिताप के नाश करनेकी इच्छा उसमें प्रवल हुई हो तो निःसन्देह उसको सद्गुरुके दर्शन होंगे। जब यह स्थिर सिद्धान्त है कि गुरु- उपदेशके मूलमें श्रीभगवान हैं. तब गुरुदीक्षा द्वारा कल्याण प्राप्ति- के विषय में कोई सन्देह ही नहीं होसक्ता: परन्तु भेद इतना ही है कि शिष्य जैसा अधिकारी होगा उसी अधिकारका गुरु उपदेश उसको प्राप्त होगा । शिष्य में जितना संसार-वैराग्य होगा और वह जिस आध्यात्मिक भूमिमें स्थित होगा, उतनीही उपकारिता गुरु- उपदेश द्वारा उस को प्राप्त होगी। यदि शिष्य अपने आपको पहले उपयोगी करके जिज्ञासु वने, पीछे सद्गुरु अन्वेषण फरेतो ईश्वरभाव , पूर्ण इस विस्तृत संसारमें उसको सद्गुरु के अवश्य दर्शन होंगे इसमें संशय कुछ भी नहीं है। गुरुदीक्षाकी आवश्यकताके विषयमे वेदः तथा वेदसम्मत दर्शन, उपवेद, स्मृति, पुराण और तन्त्र आदि सत्र शास्त्र ही एक- वाक्य होकर कहते हैं, सघ श्रुति तथा महर्षि वाक्योंका यही सिद्धा- न्त है कि गुरुदीक्षा विना आध्यात्मिक उन्नतिके इच्छुक जिज्ञासु- का कदापि कल्याण नहीं होसत्ता । जितने प्रकारके सम्प्रदाय सनातनधर्म समाजमें स्थित हैं वे सब ही प्रथम गुरुदीक्षा ग्रहण ६ श्रीगुरुगीता। करनेकी आवश्यकता मानते हैं। चाहे भक्ति-मार्ग हो. चाहे शान- मार्ग हो, चाहे कर्मकाण्डी हो, चाहे ज्ञान काण्डी हो. सय सम्म दाय ही एकवाक्य होकर स्वीकार करते हैं कि प्रथम-गुरुदीक्षा ग्रहण करके तत्पश्वात् साधनमें प्रवृत्त होना उचित है । वैष्णव, सौर्य, शान, गाणपत्य तथा शैव, लब उपासक सम्प्रदाय ही स्थिर निश्चय करके यही उपदेश देते हैं कि गुरुदीक्षा विना सब प्रकार का साधन विफल होता है। उसी प्रकार मन्त्रयोग, हठयोग, लययोग और राजयोग, . इन साधनचतुष्टयके सव आचार्यगण ही ने मुक्तकण्ठ होकर साधन वर्णन करते समय यही कहा है कि विना गुरुदीक्षाग्रहण. विना गुरुलेचा, विना गुरुसङ्ग. विना गुरु-आज्ञापालन और विना गुरुउपदेश-अनुसार साधन के कोई मुमुक्षु भी अपना कल्याण साधन नहीं करसता है । प्रथम गुरुमेवा, तत्पश्चात् गुरु कृपा प्राप्ति, तत्पश्चात् गुरुदीक्षाग्रहण, तत्पश्चात् साधन-अभ्यास, क्रमशः इसी शैली के अनुसार जिज्ञासु आध्यात्मिक भूमिमें अग्रसर होता हुआ परम कल्याणरूपी मुक्तिपदको प्राप्तकरलेता है। गुरु ही . . मुख्य हैं। न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् । शिवशासनतः शिवशासनतः शिवशासनतः शिवशासनतः ॥ इति श्रीगुरुगीता भूमिका ।

ओं नत्लत् । श्रीमद्गुरुचरणकमलेभ्यो नमः । श्रीगुरुगीता भाषानुवादटिप्पणीसहिता। . ऋपय ऊचुः। गुहागुह्यतरा विद्या गुरुगीता विशेषतः । ब्रूहि नः भूत ! कृपया गृणुमस्त्वत्प्रसादतः ।। 2. ॥* ऋपिगण बोले। हे सूत ! धर्म दुर्शय है, विशेषतः गुरुगीता विद्या सब विद्याओं से अतिदुज्ञेय है, आपकी कृपासे हम उसको श्रवण करना चाहते हैं इस कारण उसका वर्णन कीजिये ॥१॥ * तीर्थपधान नैमिपारण्य तीर्थमं महर्षिगण प्रायः ही एकत्रित होकर धर्म- जिशामा, पम्म-विचार और जीवगण के हितार्थ धर्मप्रचार किया करते थे । इम प्रसमसे गुरुगीताका भी प्रचार हुया है। गुरु विना किसी प्रकार के ज्ञानकी प्राप्ति नहीं होसतो, इस संसारमै श्रीगुरुदेव अधिक कोई भी नहीं है, 'इस फारण महपिंगणने ऐसे मम्मानित और प्रशंसायुक्त वाक्य द्वारा सतसे गुरुगीताविषयक प्रश्न किया है।

८ श्रीगुरुगीता । सूत उवाच। गिरीन्द्रशिखरे रम्ये नानारत्नोपशोभिते । नानाक्षलताकीर्णे नानापक्षिरवैर्युते ॥ २॥ सर्व कुसुमामोदमोदिते सुमनोहरे । शैत्यसौगन्ध्यमान्द्याव्यमरुद्भिरुपवीजिते ।।३।।* अप्सरोगणसङ्गीतकलध्वनिनिनादते । -- - 4 . सूत बोले। कैलास पर्वतका शिस्बर अतिरमणीय स्थान है । वह स्थान नाना मणि रत्न आदियोंसे युक्त होकर अपूर्व शोभाको धारण करता है, बहुप्रकारके वृक्ष और लतासमूहसे वेष्टित है जिनमें अगणित विहङ्गमगण गान किया करते हैं । ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त, शिशर और वसन्त इन छाहों ऋतुओंमें जिस जिस प्रकार के उत्तम पुष्प खिला करते हैं वे सब ही इस मनोहर पर्वतमें सब समय प्रस्फुटित होकर मन-आनन्दकारी 'सुगन्धि विस्तार किया करते हैं। मन्द सुगन्ध और शीतल-गुणधारी वसन्त-पवन सदा प्रवाहित होकर व्यजनकारीका कार्य किया करता है ॥२-३ ॥ ऐसी अपूर्व भूमिको पाकर अप्सरा और गन्धर्वगण सदा गान, * महामाया धमाके पति प्रकृतिजयकारी सदाशिव के कैलाशलोकमें प्रकृतिमाता सदा पूर्णताको धारण करके उनकी सेवा करेंगी यह निश्चय ही है। जिन देवादिदेव महादेवने अपने तपःप्रभावसे त्रिलोकमुग्धकारी कामको सदा जय कर रक्खा है उनके लोकमें काम-सेवक ऋतुर्गण सदा श्राक्षाकारी रहेंगे इसमें विचित्रता होही नहीं सक्ती । तरलतरङ्गिणी पतितपावनी गङ्गा सदा एक ही भावसे कैलाश पर्वतमें शिवके थानन्द- वदनार्थ यह रही हैं, इस कारण वहांकी वायु शीतल है, उस पवित्र सुरनदी के अपूर्व प्रभावसे उसके तट पर नाना प्रकार के स्वर्गीय कनक चम्पक पारिजात आदि और जल में कनकपद्म और रजतकुमुद श्रादि दिव्य पुष्प नित्य विकसित रहते हैं, इस कारण वहाँकी वायु सुगन्धियुक्त है और उस देवनदीके दोनों तीर पर उनकी अद्भुत शक्ति के कारण नाना प्रकारके देवदारु तथा मन्दार, चन्दन, कल्पटन आदि रहने के कारण उनके मध्यमें घायु बहती हुई स्वतःही मन्दगुणको धारण कर लेती है ।

श्रीगुरुगीता। ९ M---- स्थिरच्छायाद्रुमच्छायाच्छादिते स्निग्धमज्जुले ॥ ४ ॥ मत्तकोकिलसंदोहसंधुष्टविपिनान्तरे। सर्वदा स्वगणैः सार्द्धमतुराजनिविते ॥ ५ ॥ सिद्धचारणगन्धर्वगाणपत्यगणैर्टते । , तत्र मौनधरं देवं चराचरजगद्गुरुम् ॥ ६ ॥ सदाशिवं सदानन्दं करुणाऽमृतसागरम् । कर्पूरकुन्दधवलं शुद्धतत्त्वमयं विभुम् ॥ ७ ॥ दिगम्बरं दीननाथं योगीन्द्रं योगिवल्लभम् । १ . वाद्य और नृत्यरूपी त्रिविद्यामे उन्मत्त रहते हैं और उस मधुर सङ्गीतकी ध्वनि प्रतिध्वनिले वह पर्वत निनादित होता रहता है। उस स्थानकी वह स्वर्गीय वृक्ष-छाया सदा स्थिर भावसे रहती है अर्थात् छओं ऋतुओंके बदलसे वृक्ष-पत्रोंके बदल होनेपर जैसे और वृक्षोंमें छायाकी न्यूनता होजाती है वहां वैसा नहीं होता, इस कारण ऐसी स्थिर छोया-युक्त वृक्षोंकी छायाले वह स्थान सदा सुन्दर और शीतल होरहा है । ऐसे सुन्दर भावको देखकर वहाँ कोकिल सदा प्रमत्त होकर गुंजारता हुआ फिरा करता है। वहाँ सब समय में ऋतुओंका राजा वसन्त अपने अनुचरगणको साथ लेकर विराजमान रहता है और वहां सिद्ध, चारण, गन्धर्व, गाणपत्य आदि शिवसेवकगण सदा निवास किया करते हैं। 'वहां एक दिन आशुतोष नित्यानन्दमय चराचर विश्वके एकमात्र गुरु श्रीमहादेव मौनभावको धारण करके बैठे हुए हैं। वे करुणारूप अमृतके सागर, स्वर्ग:मर्त्य-पाताल इन तीनों लोकोंके अधीश्वर, शुद्ध आत्मज्ञानमय, दोनजनोंके पवित्रका, नित्यमङ्गलदाता, सब जीवों में समान दृष्टि रखनेवाले, योगिगणमें श्रेष्ठ और योगिगणके परमप्रिय प्रभु हैं। उनका शरीर कपूर, स्फटिक और कुन्दपुष्पके नाई लावण्द्र युक्त है, जिस पर भस्मसे भूषित होकर और भी' शोभाको प्राप्त हुआ है, वे दिगम्बर अर्थात् वस्त्र आभरण रहित हैं, उनके - . . .

१० श्रीगुरुगीता । . --- गङ्गाशीकरसंसिक्तजेटामण्डलमण्डितम् ॥ ८॥ विभूतिभूषितं शान्तं व्यालमाल कपालिनम् । अन्धकारि त्रिलोकेशं त्रिशूलवरधारकम् ॥ ९॥ आशुतोपं ज्ञानमय कैवल्यफलदायकम् । निर्विकल्पं निरातङ्गं निर्विशेपं निरञ्जनम् ॥ १० ॥ सर्वेषां हितकर्तारं देवदेवं निरामयम् । कैलासशिखरासीनं पञ्चवक्र सुभूपितम् ॥ ११ ॥ सर्वात्मनाविष्टचित्तं गिरिजामुखपङ्कजे । प्रणम्य परया भक्त्या कृताञ्जलिपुटा सती ॥ १२ ॥ प्रसन्नवदनं वीक्ष्य लोकानां हितकाम्यया । विनयाऽवनता देवी पार्वती शिवमववीत् ॥ १३ ॥ श्रीमहादेव्युवाच। नमस्ते देवदेवेश ! सदाशिव ! जगद्गुरो ! । प्राणेश्वर ! महादेव ! गुरुगीतां वद प्रभो ! ॥ १४ ॥ मस्तक में जटाएँ लटपटायरही हैं, जिनमें होकर गंगादेवी अपनी लहर विस्तार कररही हैं, उनके गलेमें सर्पकी माला शोभायमान है, मस्तक में अर्धचन्द्रकी ज्वाला झलक रही है, उनके हाथमें श्रेष्ठ त्रिशूल शोभा को प्राप्त. होरहा है। उस समय जीवोंके मुक्तिदाता, निर्विकल्प, भयहारी, निरजन, सबके हित करनेवाले, देवादिदेव, : पञ्चानन कैलास पर्वत को शोभित करते हुए महामाया गिरजाके मुखकमलकी ओर प्रेम-वशीभूत और अनन्यचित्त होकर देखने लगे। तब विद्यारूपिणी उमादेवी परम भक्तियुक्त होकर जीवों के मङ्गलार्थ हाथ जोड़कर विनयके साथ हास्यवदन हो बोली॥४-१३॥ 'श्रीमहादेवी बोली। हे देवदेवेश ! हे सदाशिव ! हे जगद्गुरो ! मैं आपको प्रणाम करती हूँ, हे प्राणेश्वर.! हे महादेव ! मुझको गुरुगीता सुनाइये । हे श्रीगुरुगीता। ११ ----- केन मार्गेण भोः स्वामिन् ! देही ब्रह्ममयो भवेत् । त्वं कृपां कुरु मे देव ! नमामि चरणं तव ॥ १५ ॥ श्रीमहादेव उवाच । गुशब्दस्त्वन्धकारः स्याद्रुशब्दस्तनिरोधकः । अन्धकारनिरोधित्वादगुरुरित्यभिधीयते ॥ १६ ॥ गुकारः प्रथमो वर्णो मायादिगुणभासकः। रुकारो द्वितीयो ब्रह्म मायाभ्रान्तिविमोचकः ॥ १७ ॥ गकारः सिद्धिदः प्रोक्तो रेफः पापस्य दाहकः । उकारः शम्भुरित्युक्तस्त्रितयाऽऽत्मा गुरुः स्मृतः ॥ १८ ।।* - । स्वामिन् ! जीव कौन उपाय अवलम्वन करने से ब्रह्मपदको प्राप्त कर सक्ता है ? सो कृपा करके मुझसे कहिये । हे देव ! मैं तुम्हारे चरणों को वारम्बार नमस्कार करती हूँ॥१४-१५ ॥ श्रीमहादेव घोले । गु शब्दका अर्थ अन्धकार और रु शब्दका अर्थ तमका नाश करना है। इस कारण जो अज्ञानरूप अन्धकारको नाश करते हैं वेही गुरु शब्दवाच्य हैं ॥ १६ ॥ गुरु इस शब्दके प्रथम वर्ण गुसे माया आदि गुण प्रकाशित होता है और द्वितीय वर्ण रुसे ब्रह्ममें जो मायाका भ्रम है उसफो नाश होता है; इस कारण गु शब्द सगुणको और रु शब्द निर्गुण अवस्थाको प्रतिपन्न करके गुरु शब्द बना है ॥ १७॥ गकारका अर्थ सिद्धिदाता, रकारका अर्थ पाप- हर्ता और उकारका अर्थ शिव है अर्थात् सिद्धिदाता शिव और पापहर्ता शिव ऐसा अर्थ ग-3 और र-उ बोधक गुरुशब्दसे सम- झना उचित है ॥१८॥ * गुरु शब्दसे जगद्गुरु परमात्मा ईश्वरका ही बोध होता है। गुरु साक्षाव पर ब्रह्म है इसमें कोई सन्देह नहीं । सर्वव्यापक सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही इस संसारके मष्टि स्थिति और लयकता है, वे ही जीव पर कृपालु होकर जीवकी बुढिमें अपनी शक्ति विस्तारित कर जीवको निम्न ज्ञान-भूमिसे उन्नत जान-भूमिमें पहुंचा दिया १२ श्रीगुरुगीता। श्रीमहादेव्युवाच । मायामोहितजीवानां जन्ममृत्युजरादितः । रक्षायै कः प्रभवति स्वामिन् ! संसारसागरे ॥ ११ ॥ त्वत्तो नाऽन्यो दयासिन्धो ! कश्चिच्छन्नोति वै प्रभो ! । दातुं प्रतिवचश्चाऽस्य लोकशोकविमोचनम् ॥ २० ॥ त्रितापतप्तजीवानां कल्याणार्थ मंया प्रभो । विहितः सादरं प्रश्न उत्तरेणाऽतुगृहाताम् ॥ २१ ॥ श्रीमहादेवी वोली। 'हे नाथ ! मायामोहित जीयको जन्म मृत्यु आदिसे बचानेके लिये इस संसारमें कौन समर्थ है ॥ १६॥ हे कृपामय ! आपके विना और कोई भी इस लोकशोकविमोचन प्रश्नका उत्तर देनेवाला नहीं है ॥ २० ॥ त्रितापतापित जीवोंके कल्याणार्थ मेरे इस सविनय प्रश्नका उत्तर देकर मुझे आनन्दित करें॥ २१ ॥ करते हैं, वे दयामय ही गुरु-मृति धारण कर शिष्यको निम्न भूमिले त त भूमिमें खेंचकर चढ़ा लेते हैं, तब ही लघुशक्ति जीव गुरुशक्ति द्वारा श्राकृष्ट होकर ज्ञानभूमि- में उन्नतपदको प्राप्त होजाता है। सर्वशक्तिमान् परमात्मा ही जीवको उसके किये हुए सत असत कम्मोंका फल दिया करते हैं; मायालिप्त जीव जो कुछ फल भोगता है वह मायाप्रतीत परमेश्वर का विधान किया हुया ही भोगता है। परन्तु मायालिप्त होनेके कारण जीव ईश्वरके ऐसे कार्यको प्रत्यक्ष नहीं करसक्ता वे भी जो कुछ करते हैं यथाव- वही करते हैं किन्तु परोक्ष करते हैं; उसी रीति के अनुसार जीव को सद्गति दान करते समय प्रापही अपने और किसी जीवरूप केन्द्र में प्राविर्भूत होकर श्रीगुरुरूपसे जीव. का कल्याण किया करते हैं इस कारण श्रीगुरु ही मूर्तिमान् परबन्ध है इस में सन्देह मात्र नहीं। वे पापहर्ता, सिद्धिदात्ता, मुक्तफा, दयामय, शिवरूप ईश्वर ही शरीरमें आविर्भूत होकर सीगुरुदेव रूपसे जीवके पापों का नाश करके दीक्षादान द्वारा उसको उन्नत शानभूमिमें पहुंचाकर उस बन्धनप्राप्त जीवको मुक्तिपदमाप्तिका 'उपाय विधान करदेते हैं। भीगुरु देव ही सापाव ईश्वर पौर गुरुदीक्षा ही उनकी महाशत्ति है। है -

श्रीगुरुगीता।
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श्रीमहादेव उवाच।
संसाराऽपारपाथोधेः पारं गन्तुं महेश्वरि !।
श्रीगुरोश्चरणाऽम्भोजनाकैवैकाऽवलम्बनम् ॥ २२ ॥
सद्गुरो रूपमादाय जगत्यामहमेव हि ।
उद्धराम्यखिलाजीवान्मृत्युसंसारसागरात् ॥ २३ ॥
यो गुरुः स शिवः साक्षाद्यः शिवः स गुरुर्मतः ।
गुरौ मयि न भेदोऽस्ति भेदस्तत्र निरर्थकः ॥ २४ ॥
गुरुर्ज्ञानप्रदो नित्यं परमाऽऽनन्दसागरे ।
उन्मज्जयति जीवान्स ताँस्तथैव निमज्जयन् ॥ २५ ॥
गुरुस्त्रितापतमानां जीवानां रक्षिता क्षिती ।
सच्चिदानन्दरूपं हि गुरुर्ब्रह्म न संशयः ॥ २० ॥
यागस्तीह सम्बन्धो ब्रह्माण्डस्येश्वरेण वै ।
तथा क्रियाऽऽख्ययोगस्य सम्बन्धो गुरुणा सह ॥ २७ ॥
दीक्षाविधावीश्वरो वै कारणस्थलमुच्यते ।
गुरुः कार्यस्थलञ्चाऽतो गुरुर्ब्रह्म प्रगीयते ॥ २८ ।।
श्रीमहादेव बोले।
संसाररूप अपार पारावारसे पार करनेके लिये श्रीगुरुदेवके
चरणकमलरूप नौकाही एकमात्र उपाय है॥२२॥मैं ही गुरुरूपसे दृश्य-
रूपमें प्रकट होकर जीवोंका उद्धार संसारपारावार से, किया करता
हूँ॥२शाजो गुरु हैं वे साक्षात् शिव हैं और जो शिव हैं वे साक्षात् गुरु
है,गुरुमें और मुझमें भेद नहीं है, इनमें भेद मानना अनुचित है॥२४॥
गुरु शानदाता हैं, गुरु परमानन्दपारावार में उन्मज्जन निमज्जन
करानेवाले और गुरु त्रितोपसे जीवको बचानेवाले हैं इसी कारण
गुरु सचिदानन्दमय ब्रह्म है, इसमें सन्देह नहीं ॥ २५-२६॥ ईश्वरके ।
साथ जैसा ब्रह्माण्डका सम्बन्ध है, उसी प्रकार गुरुके साथ क्रिया
योगका सम्बन्ध है ॥ २७ ॥ दीक्षाविधिमें ईश्वर कारणस्थल और
- गुरु कार्यस्थल कहे गये हैं, इस कारण गुरु ब्रह्मरूप हैं ॥ २८ ॥

श्रीगुरुगीता। गुरौ मानुपबुद्धिन्तु पन्त्रे चाक्षरभावनाम् । प्रतिमासु शिलाघुद्धिं कु णो नरकं व्रजेत् ॥ २९ ॥ जन्महेतू हि पितरौ पूजनीयौ प्रयत्नतः । गुरुर्विशेषतः पूज्यो धर्माऽधर्मप्रदर्शकः॥३०॥ गुरुः पिता गुरुर्माता गुरुर्देवो गुरुर्गतिः । शिरे रुष्टे गुरुस्त्राता गुरौ रुष्टे न कश्चन ॥ १ ॥ श्रीमहादेव्युवाच । जगन्मङ्गलकृन्नाथ ! विशेषेणोपदिश्यताम् । लक्षणं सद्गुरोर्येन सम्यग्ज्ञातं भवेध्रुवम् ॥ ३२ ॥ आचार्यगुरुभेदोऽपि येन स्याद्विदितो मम । श्रेष्ठत्वं वा तयोः केन लक्षणेनाऽनुमीयते ॥३३॥ । । परमे जो लोग गुरुके विषय मनुष्यबुद्धि और मन्त्र के विषयमें अक्षरबुद्धि- और देवप्रतिमापापाणबुद्धि रखते हैं वे नरकगामी होते हैं ॥२६॥ माता और पिता जन्म देने के कारण पूजनीय हैं किन्तु गुरु धर्म और, अधर्म का ज्ञान करानेवाले हैं इस कारण उनका पूजन पितृगणसे भी अधिक यत्न करके करना उचित है ॥ ३० ॥ गुरु ही पिता हैं, गुरु ही माता है, गुरु ही देवता हैं, गुरु ही सद्गतिरूप श्वरके रुष्ट होने पर तो गुरु पचानेवाले हैं परन्तु गुरुके अप्रसन्न होनेपर कोई भी त्राणदाता नहीं है ॥ ३१ ॥ श्रीमहादेवी बोली। हे नाथ ! हे सर्वशक्तिमन् । हे सर्व ! आप जगत्के कल्या 'णार्थ मुझे ऐसे उपदेश दीजिये जिससे मैं श्रेष्ठ गुरुके लक्षण समझ स ॥३॥ और जिससे मैं यह भी समझ सकूँ कि गुरु और आचा- य॑में भेद क्या है और श्रेष्ठ गुरु तथा श्रेष्ठ प्राचार्य किन लक्षणोंसें पहचाने जासकते हैं ॥ ३३ ॥ 1.

. श्रीगुरुगीता। १५ श्रीमहादेव उवाच । सर्वशास्त्रपरो दक्षः सर्वशास्त्रार्थवित्सदा । सुवचाः सुन्दरः स्वंगः कुलीनः शुभदर्शनः ॥ ३४ ॥ जितेन्द्रियस्सत्यवादी ब्राह्मणश्शान्तमानसः । मातृपितृहिते युक्तः सर्वकर्मपरायणः ॥ ३५ ॥ आश्रमी देशवासी च गुरुरेवं विधीयते । आचार्यगुरुशब्दौ द्वौ क्वचित्पर्यायवाचकौ ।। ३६ ।। एवमर्थगतो भेदो भक्त्यपि तयोः क्वचित् । उपनीय ददद्वेदमाचार्यः स उदाहृतः ॥ ३७॥ यः साधनप्रकर्षार्थ दीक्षयेत्स गुरुः स्मृतः । औपपत्तिकमंशन्तु धर्मशास्त्रस्य. पण्डितः ॥ ३८ ॥ . श्रीमहादेव बोले। सर्वशस्त्रोमें पारङ्गत, चतुर, सम्पूर्ण शास्त्रोके तत्त्ववेत्ता और मधुर वाक्य भाषण करनेवाले, सब अङ्गोंसे पूर्ण और सुन्दर, कुलीन अर्थात् सत्कुलोद्भव और दर्शन करने में मङ्गलमूर्ति हो ॥३४॥ इन्द्रियाँ जिनकी सब अपने वशीभूत हो, सर्वदा सत्यभाषण करनेवाले हो, ब्राह्मणवर्ण हो, शान्तमानस अर्थात् जिनका मन कभी चञ्चल नहीं होता हो, माता पिताको समान हित करनेवाले हों, सम्पूर्ण कम्र्मों के अनुष्ठानशील हो ॥३५॥ गृहस्थ, वानप्रस्थ, ब्रह्मचर्य और संन्यास, इन आश्रमों में से किसी आश्रमके हो एवं भारतवर्ष- निवासी हो, इस प्रकारके सर्वगुणसम्पन्न महात्मा गुरु करने योग्य कहे गये हैं। प्राचार्य और गुरु ये दोनों कहीं कहीं पर्यायवाचक शब्द हैं ॥३६॥ तथा कार्य के वैलक्षण्यसे कभी कभी आचार्य और गुरु इनमें भेद भी है । उपनयन कराकर जो शिष्यको वेदका उपदेश करते हैं वे प्राचार्य है ॥३७॥ और आध्या. त्मिक उन्नति के लिये जो शिष्य को दीक्षा देते हैं वे गुरु हैं । सम्पूर्ण १६ श्रीगुरुगीता। .. व्याचष्टे धर्ममिच्छूनां स आचार्यः प्रकीर्तितः । सर्वदर्शी तु यः साधुर्मुमुक्षूणां हिताय वै ॥ ३९ ॥ व्याख्याय धर्मशास्त्राणां क्रियासिद्धिमयोधकम् । उपासनाविधेः सम्यगीश्वरस्य परात्मनः ॥ ४० ॥ भेदान्प्रशास्ति धर्मज्ञः से गुरुः समुदाहृतः । सप्तानां ज्ञानभूमीनां शास्त्रोक्तानां विशेषतः ॥ ४.१ ।। प्रभेदान यो विजानाति निगमस्याऽऽगमस्य च । ज्ञानस्य चाऽधिकाराँस्त्रीभावतात्पर्य्यलक्ष्यतः ।। ४२ ।। तन्त्रेषु च पुराणेपु भाषायास्त्रिविधांसृतिम् । सम्यग्भेदैर्विजानाति भाषातत्त्वविशारदः ॥ ४३ ॥ निपुणो लोकशिक्षायां श्रेष्ठाऽऽचार्यः स उच्यते । . पञ्चतत्त्वविभेदज्ञः पञ्चभेदां विशेषतः ॥ ४४ ॥ सगुणोपासनां यस्तु सम्यग्जानाति कोविदः । चातुर्विध्येन विततां ब्रह्मणः समुपासनाम् ॥ ४५ ॥ वेद और शास्त्र आदि में सुपण्डित हों और उनका औपपत्तिक शान शिष्यको करावें वे श्राचार्य कहाते हैं । जो सव्वदर्शी साधु मुमुक्षुओंके हितार्थ चेदशास्त्रोक्त क्रियासिद्धांश और परमेश्वरकी उपासनाके भेदोंको यथाधिकार शिष्यों को बतला उनको गुरु कहते हैं । दर्शनशास्त्रोंकी सात भूमिके अनुसार जो वेद और शास्त्र के सकल मेदोंको जानते हो । अध्यात्म अधिदेव एवं अधिभूत नामक भावनयको भलीभांति समझते हो और तन्त्र एवं पुराणोकी समाधिभाषा, लौकिकमापा और परकीयभाषा, : इनसे भलीभांति परिचित रहकर लोकशितामें निपुण हो, वे ही श्रेष्ठ आचार्य कहे जाते हैं। पञ्चतत्वके अनुसार जो महापुरुष विष्णूपासना; सूर्योपासना, शक्त्युपासना, . गणेशोपासना और शिवोपासनारूप पञ्च सगुण उपालनाके रहस्योंको पूर्ण लमझते हो। और जो योगिराज मन्त्रयोग, हठयोग, लययोग, । . . . .

. श्रीगुरुगीता। १७ -- , गम्भीरार्थी विजानीते बुधो निर्मलमानसः । सर्वकार्येषु निपुणो जीवन्मुक्तास्त्रतापहृत् ॥ ४६॥ करोति जीवकल्याणं गुरुः श्रेष्ठः स कथ्यते ॥ ४७ ॥ श्रीमहादेव्युवाच। संच्छिप्यलक्षणं नाथ ! मुमुक्षूणां त्रितापहृत् ! । गुरुंभक्तस्य शिप्यस्य कर्त्तव्यञ्चापि मे वद ॥४८॥ मुमुक्षुभिश्च शिप्यैः कैः शुभाऽऽचारैरवाप्यते । आत्मज्ञानं दयासिन्धो ! कृपया ब्रूहि तानपि ।। ४९ ॥ येन ज्ञानेन लब्धेन शुभाऽऽचारान्वितैर्दुतम् । मुच्यते बन्धनान्नाथ ! शिष्यैः सद्गुरुसेवकैः ॥ ५० ॥ श्रीमहादेव उवाच । शिष्यः कुलीनः शुद्धाऽऽत्मा पुरुपार्थपरायणः । अधीतवेदः कुशलो दूरमुक्तमनोभवः ॥५१ ।। हितैपी प्राणिनां नित्यमास्तिकस्त्यक्तवञ्चनः । राजयोग, इन चारोंके अनुसार चतुर्विध उपासनाको जानते हों ऐसे शानी, निर्मलमानस, सर्व-कार्य में निपुण, त्रितापरहित, जीवोका कल्याण करनेवाले जीवन्मुक महात्मा श्रेष्ठ गुरु कहलाते हैं ॥३-४७॥ श्रीमहादेवी वोली। हे नाथ ! हे मुमुक्षुओंके त्रिताप दूर करनेवाले ! मुझे आप कृपा करके कहें कि श्रेष्ठ शिष्यका लक्षण क्या है और गुरुभक्त शिष्यका कर्तव्य क्या है और किन किन आचारोंके.पालन करनेसे मुमुक्षु शिष्य प्रात्मशान लाभ करके मुक्त हो सका है ॥४-५०॥ श्रीमहादेव वोले। शिष्य कुलीन शुद्धात्मा और पुरुषार्थ परायण होना चाहिये। वह अधीतवेद हो, कुशल (चतुर) हो, कामी न हो, प्राणियों का २॥ 1 - . .

. १८ श्रीगुरुगीता। v... स्वधर्मनिरतो भक्तया पितृमातृहिते स्थितः ॥ ५२॥ गुरुशुश्रूषणरतो वाङ्मनःकायकर्मभिः। . शिष्यस्तु स गुणैर्युक्तो गुरुभक्तिरतः सदा ॥५३ ।। धर्मकामादिसंयुक्तो गुरुमन्त्रपरायणः । सत्यबुद्धिर्गुरोर्मन्त्रे देवपूजनतत्परः ॥ ५४ ॥ गुरूपदिष्टमार्गे च सत्यबुद्धिरुदारधीः। अलुब्धः स्थिरगात्रश्च आज्ञाकारी जितेन्द्रियः ॥ ५५ ॥ एवंविधो भवेच्छिष्य इतरो दुःखकद्गुरोः । शरीरमर्थ प्राणांश्च गुरुभ्यो यः समर्पयन् ॥ ५६ ॥ गुरुभिः शिष्यते योगं स शिप्य इति कथ्यते । दीर्घदण्डवदानम्य सुमना गुरुसन्निधौ ॥ १७ ॥ . आत्मदाराऽऽदिकं सर्व गुरवे च निवेदयेत् । आसनं शयनं वस्त्रं वाहनं भूषणाऽऽदिकम् ।। ५८ ॥ हितेच्छु हो, आस्तिक हो, प्रवञ्चक न हो, स्वधर्मनिरत हो, भक्ति- पूर्वक माता पिता के हित में स्थित हो,मन वचन और शरीर तथा कम्मों से गुरुसेवापरायण हो, गुणसम्पन्न हो, गुरुभक्त हो, धादिसम्पन्न हो, गुरुदत्त मन्त्र के जपादि में प्रवृत्त हो,गुरुदत्त मन्त्र में श्रद्धालु हो, देवपूजापरायण हो, गुरुपदिष्टमार्ग में सत्यबुद्धि हो, उदार हो, लोभी न हो, शरीर जिसका चञ्चल न हो, गुरुका प्राक्षाकारी हो, जितेन्द्रिय हो, इस प्रकार का शिष्य होना चाहिये। इससे विपरीत गुण का होने पर गुरुको दुःख देनेवाला वह होगा।शरीर अर्थ और प्राणों को गुरुके अर्पण करके गुरु से शिक्षा प्राप्त करता है इसी कारण शिष्य कहा जाता है । शिष्य को गुरु के सन्मुख दीर्घ दण्डाकार होकर प्रणाम करना उचित है और असंकुचित चित्त ले.अपनी आत्मा, स्त्री, पुत्र,कन्या श्रादि को गुरु के अर्पण करना उचित है। शिष्य- साधक होकर अर्थात् गुरुदीक्षा ग्रहण करके गुरु के प्रीत्यर्थ आसन, . शय्या, वस्त्र, पाइन और भूषण आदि उनको अर्पण करे। गुरु का श्रीगुरुगीता। १९ -AAR . साधकेन प्रदातव्यं गुरोः सन्तोपकारणाव । गुरुपादोदकं पेयं गुरोरुच्छिष्टभोजनम् ॥ ५९ ॥ गुरुमूर्तेः सदा ध्यानं गुरुस्तोत्रं सदा जपेत् । अर्दध्वं तिष्ठेद्गुरोरने लब्धाऽनुज्ञो वसेत् पृथक् ॥ ६० ॥ निवीतवासा विनयी प्रहस्तिष्ठेदगुरौ परम् । गुरौ तिष्ठति तिष्ठेच्चोपविष्टेऽनुज्ञया वसेत् ॥ ६१ ।। सेवताऽङ्ग्री शयानस्य गच्छन्तञ्चाऽप्यनुव्रजेत् । शरीरं चैव वाचं च बुद्धीन्द्रियमनांसि च ॥ ६२॥ नियम्य प्रालिस्तिष्ठेद्वीक्षमाणो गुरोर्मुखम् । नित्यमुद्रितपाणः स्यात् साध्वाचारः सुसंयतः ।। ६३ ।। आस्यतामिति चोकः सन्नासीताऽभिमुखं गुरोः । हीनान्नवस्त्रवेशः स्यात् सर्वदा गुरुसन्निधौ ।। ६४ ॥ चरणामृत पान, गुरु-उच्छिष्ट भोजन, सर्वदा गुरु-मूर्ति ध्यान और सदा गुरुस्तव पाठ करना शिष्य को उचित है गुरु के सन्मुख शिष्य. को खड़ा रहना उचित है। पश्चात् गुरु-आशा ग्रहण करके पृथक आसन पर बैठना युक्तियुक्त है; गुरु के. सम्मुख शिष्य को अपना शरीर वस्त्र से आच्छादित कर विनयी और भययुक्त हो अवस्थान करना उचित है। गुरु के खड़े होने पर शिष्यको उसी क्षणमें खड़ा होना उचित है, पुनः गुरु के उपवेशन करने पर उनकी आज्ञा लेकर बैठना उचित है,गुरुके शयन करने पर शिष्य उनकी चरणसेवा करे और गुरुके गमन करने पर उनके पश्चात् गमन करना उचित है। शिष्य को उचित है कि वह अपने शरीर, वचन, बुद्धि, चक्षु आदि इन्द्रियगण और मनको संयम कर श्रीगुरुदेवके मुखारविन्दकी ओर देखता हुआ हाथ जोड़कर खड़ा रहे । शिष्यको उचित है कि वह सदाचारसम्पन्न होकर शरीर इन्द्रियादिको संयम करताहुश्रा हाथ जोड़कर सदा गुरुके सम्मुन खड़ा रहे और जब वे निज मुखसे कहे कि बैठो तब ही उपवेशन करे शिष्य जब गुरुके समीप जाय ।

। श्रीगुरुगीता। उत्तिष्ठेव प्रथम चाऽस्य चरमं चैव संविशेत् । दुष्कृतं न गुरोर्च्यात क्रुद्धं चैनं प्रसादयेत् ।। ६५ ।। परिवादं न शृणुयादन्येपामपि कुर्वताम् | नीचं शय्यासनं चाऽस्य सर्वदा गुरुसन्निधौ ॥ १६ ॥ गुरोस्तु चक्षुर्विषये न यथेष्टाऽऽसनो भवेत् । चापल्यं प्रमदागाथामहंकारं च वर्जयेत् ॥ ७ ॥ नाऽपृष्टो वचनं किंचियानाऽपि निषेधयेत् । गुरुमूर्ति स्मरेन्नित्यं गुरुनाम सदा जपेत् ॥ ६८ ॥ गुरोराज्ञां प्रकुर्वीत गुरोरन्यं न भावयेत् । गुरुरूपे स्थितं ब्रह्म माप्यते तत्प्रसादतः ॥ ६९ ॥ तो गुरुसे होन अन्न उसको भोजन करना उचित है और उनके पह. ननेके अपकृष्ट वन अलंकार आदि उसको धारण करना उचित है। शिष्यको गुरुसे पहले शय्या त्याग करना और गुरुसे पीछे शय्या पर' शयनार्थ जाना उचित है। शिष्यको उचित हैं किगुरुका कोई दुष्कार्य प्रकाश न करे,गुरुके कुपित होने पर उनको प्रसन्न करने की चेष्टा करे और अन्य पुरुष यदि गुरु-निन्दा करता होतो उसको श्रवर्णन करे। शिष्य को उचित है कि गुरु के समीप में नीची शय्या पर शयन करे, नीचे आसन पर उपवेशन करे और उनके सम्मुख यथेष्टासन न हो; अर्थात् गुरुके सन्मुख हाथ पैर आदि फैलाय कर यथेच्छा से न बैठे शिष्य को गुरु के सन्मुख चपलता, नारी-सम्बन्धिकथन और अहंकार त्याग करना उचित है, गुरुको विना पूछे कोई बात करनी उचित नहीं है और गुरुके किसी कार्य को निषेध करना भी उचित नहीं है। सर्वदा गुरुमूर्तिध्यान, सर्वदा गुरु-नामजप और गुरु-आशा पालन शिष्य को करना उचित है; और गुरुके सिवाय और किसी की चिन्ता करना अनुचित है। गुरु-मुख स्थित परब्रह्मतत्त्वं गुरुप्रसाद से ही लाभ हुआ करता है, इसकारण अपने आश्रम विद्या और. जातित्व-अभिमान और कीर्तिअभिमान नादि को त्याग करके गुरु. शरणागत होना ही उचित है, अर्थात् "मैं उच्च वंश का हूं, संसारमें . - श्रीगुरुगीता . जात्याश्रमयशोविद्यावित्तगर्वं परित्यजेन । गुरोराज्ञां प्रकुर्वीत गुरोरन्यं न भावयेत् ।। ७ गा. गुरुवक्के स्थिता विद्या गुरुभक्त्याऽनुलभ्यते । तस्मात् सर्वप्रयत्नेन गुरोराराधनं कुरु ॥ ७१ ॥ नोदाहरेदस्य नाम परोक्षमपि केवलम् । न च वाऽस्याऽनुकुर्वीत गतिभापितचेष्टितम् ।। ७२ ॥ गुरोर्यत्र परीवादो, निन्दा वाऽपि प्रवर्तते। कर्णौ तत्र पिधातव्यौ गन्तव्यं वा ततोऽन्यतः ॥ ७३ ॥ परीवादात् खरो भवेत् श्वा वै भवति निन्दकः । परिभोक्ता भवेत्कृमिः कीटो भवति मत्सरी ॥ ७४ ॥ गुरोः शय्याऽसनं यानं पादुकोपानपीठकम् । स्नानोदकं तथा छाया कदापि न विलन्येत् ॥ ७५ ॥ मेरी ऐसी कीर्ति है" इत्यादि 'अहंकारभावोंको त्याग करके सदा गुरुको ही आश्रय समझता रहे ॥ ५१-७० ॥ केवल गुरु-भक्ति द्वारा ही गुरुमुखस्थिता परमा विद्या; अर्थात् जिस विद्या द्वारा ब्रह्मपद लाभ होता है वह विद्यालाभ होसक्ती है, इस कारण पूर्ण यतके साथ गुरुदेव की आराधना करना उचित है ॥७१ ॥ गुरुके पीछे भी गुरु- का अधूरा नाम अर्थात् उपाधिसे धजित नाम उच्चारण करना उत्तम शिष्यको कभी उचित नहीं है। गुरुदेवके चलने कहने और कार्य करने आदिका अनुकरण दिखाना उचित नहीं है ॥ ७२ ॥ जहाँ गुरुका प्रतिवाद अर्थात् साक्षात्मे दोषवर्णन, निन्दा अर्थात् असा- क्षात्में दोष वर्णन आदि अकीर्ति कथन हो वहां शिष्यको उचित है कि अपने हाथ द्वारा कानोको बन्द कर ले अथवा वहांसे उठकर स्थानान्तरमै चलाजाय ॥ ७३ ॥ शिष्य यदि गुरु-वाक्य का प्रतिवाद करे तो वह परजन्ममें गर्दभ, यदि निन्दा करे, तो कुकुर, यदि अन्यायरूपले गुरु का धन भोग करे तो कृमि और यदि गुरुका खयं द्वेषी हो तो कीट होता है ।। ७४ ॥ शिष्यको उचित है कि गुरु-शय्या, आसन, यान, काष्ठ-पादुका, पीढी, स्नानीयजल और छाया उलाहन ३॥ . . , १ .२२ श्रीगुरुगीता। गुरोरग्रे पृथक् पूजामौद्धत्यं च विवर्जयेत् । दीक्षां व्याख्यां प्रभुत्वं च गुरोरने परियजेत् ।। ७६ ।। ऋणदानं तथाऽऽदानं वस्तूनां क्रयविक्रयम् । न कुर्याद्गुरुणा सार्दू शिष्यो भृत्वा कदाचन ॥ ७७ ॥ पुत्रैश्च पूजितस्तातः शिष्यैश्च पृजितो गुरुः । आज्ञया कुरुते कर्मा पुत्रः शिप्यश्च भृत्यवत् ॥ ७८॥ न प्रेरयेद्गुरुं तातं शिष्यः पुत्रश्च कर्मसु । । गुरवे देवि ! पित्रे च निसं सर्वस्वमर्पयेत् ॥ ७९ ॥ स च शिष्यः स च ज्ञानी य आज्ञा पालयेद्गुरोः । न क्षेमं तस्य मूहस्य यो गुरोरवचस्करः ॥ ८० ॥ गुरोहितं प्रकर्त्तव्यं वाङ्मनाकायकर्मभिः । अहिताऽऽचरणावि ! विष्टायां जायते कृमिः ॥ ८१ ॥ यथा खनन खनित्रेण नरो वार्याधिगच्छति । न करे ॥ ७५ ॥ गुरुके सन्मुख गुरुके सिवाय और किसीकी पूजा, गुरुके लन्मुख धृष्टता प्रकाश, उपदेश देना, शास्त्र-व्याख्या करना और प्रभुत्व प्रकाश करना शिष्यको उचित नहीं है ।। ७६ ॥ शिष्य होकर गुरुके साथ ऋणदान,ऋणग्रहण और द्रव्य-सम्बन्धीयनायविक्रय आदि कार्य करना उचित नहीं है ||७७॥ पुत्रको पिताकी पूजा और शिष्यको गुरुकी पूजा करना उचित है ।पुनको और शिष्यको उचित है कि वेभृत्य की नाई उनकी आशापालन करें ॥७८॥ पुत्र पिताको और शिष्य गुरुको कभी किसी कार्यमें न नियुक्त करे । उचित है कि पुत्र पिताको और शिष्य गुरुको सर्वस्व समर्पण करदेवे॥७९॥ जो मनुष्य विना विचार करते हुए: गुरुकी आशा पालन किया करता है वही यथार्थ में शिष्य है और वही यथार्थमै ज्ञानी है और जो गुरुवाश्यम अश्रद्धा करता है उस मूढ़का कभी मङ्गल नहीं होता ॥ ८॥ हे देवी शिष्य-. को उचित है कि वाक्य, मन, शरीर और कर्म-द्वारा गुरुका हित अनुष्ठान करे, जो शिष्य गुरु-अहिताचारी होता है यह दूसरे जन्म- में विष्ठा-कीट होकर जन्म ग्रहण करता है ।। १॥ जैसे कोई मनुष्य - - श्रीगुरुगीता। AN . तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूपुरधिगच्छति ।। ८२ ॥ आसमासः शरीरस्य यस्तु शुश्रूषते गुरुम् । “स गच्छत्यअसा विमो ब्रह्मणः सम शाश्वतम् ॥ ८३॥ श्रीमहादेव्युवाच । विश्वात्मन् ! महायोगिन् ! दीनबन्धो'! जगद्गुरो!। त्रितापादक्षितुं जीवानेतुं मुक्तेः पदं तथा ॥ ८४ ॥ योगमार्गमचारोऽत्र गुरुभिर्यः प्रकाशितः । तल्लक्षणानि भेदाँश्च कृपया वद मे प्रभो ! ॥ ८५ ॥ श्रीमहादेव उवाच । मन्त्रयोगो लयश्चैव राजयोगो हठस्तथा । योगश्चतुर्विधः प्रोक्तो योगिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ ८६ ॥ * खनित्र यन्त्र द्वारा मृत्तिका खनन करते करते जल प्राप्त कर लेता है वैसेही जो शिष्य गुरु-सेवामें रत रहता है वह गुरुकी सारी विद्या लाभ करने में समर्थ होजाता है ॥ २॥ जो ब्राह्मण मृत्यु समय- पर्यन्त श्रीगुरु-सेवामें अनुरक्त रहता है वह देहान्तरके पश्चात् ब्रह्मलोकमें गमन करता है इसमें कोई भी सन्देह नहीं ॥३॥ श्रीमहादेवी बोली। हे योगियोंके ईश्वर ! हे विश्वके आत्मा ! हे जगद्गुरो ! जीव- को त्रिंतापसे बचाने और मुक्तिपद में पहुँचाने के लिये आपने जो योगमार्गका प्रचार गुरुके द्वारा जगत्में प्रकाशित किया है उसके कितने भेद हैं और उनके लक्षण क्या है ? सो वर्णन करके मुझे कृत- कृत्य कीजिये॥८४-८५॥ श्रीमहादेव वोले । तत्त्वदर्शी योगियों ने मन्त्रयोग, हठयोग, लययोग और राजयोग, इस * मन्त्रयोग, हठयोग, लययोग और रानयोग, ये चार प्रकारको पृथक् पृथक् साधनप्रणाली हैं। सव सम्प्रदायके उपासकों के लिये ही सब साधन उपकारी हैं। केवल पृथक् धक् प्रकारके अधिकारीके खिये ये पृथक् पृथक् योग-साधन-मार्ग वताये . - २४ श्रीगुरुगीता। - नामरूपात्मिका सृष्टिर्यस्मात्तदवलम्बनात् । बन्धनान्मुच्यमानोऽयं मुक्तिमाप्नोति साधकः ॥ ८७ ॥ तामेव भूमिमालम्ब्य स्खलनं यत्र जायते उत्तिष्ठति जनस्सर्वोऽध्यक्षेणैतत्समीक्ष्यते ॥ ८८ ॥ नामरूपात्मक वैर्वध्यन्ते निखिला जनाः । अविद्याकलिताश्चैव ताहप्रकृतिवैभवात् ॥ ८९ ॥ आत्मनस्सूक्ष्मप्रकृतिम्मत्तिञ्चाऽनुसृत्य वै । नामरूपात्मनोश्शब्दभावयोरवलम्बनात् ॥ ९० ॥ यो योगः साध्यते सोऽयं मन्त्रयोगः प्रकीर्तितः । पाणाऽपाननादबिन्दुजीवात्मपरमात्मनाम् ॥ ९१ ॥ मेलनाघटते यस्मात्तस्माद्वै घट उच्यते । आमकुम्भमिवाऽम्भःस्थं जीर्यमाणं सदा घटम् ।। ९२ ।। योगानलेन संदह्य घटशुद्धि समाचरेत् । प्रकारले चार प्रकारका योग वर्णन किया है ॥ ८६ ॥ सृष्टि नाम- रूपात्मक होनेके कारण नाम रूपके अवलम्बनसेही साधक सृष्टिके बन्धनसे अतीत होकर मुक्तिपद प्राप्त कर सक्ता है ॥ ७ ॥ जहां मनुष्य गिरता है उसी भूमिके अवलम्बन से पुनः उठ सक्ता है ॥८॥ नाम-रूपगात्मक विषय जीवको बन्धन युक्त करते हैं, नाम रूपात्मक प्रकृति-वैभव जीवको अविद्यासे ग्रास करे रहते हैं | म सुतरां अपनी अपनी सूक्ष्म प्रकृति और प्रवृत्ति की गतिके अनुसार नाममय शब्द और भावमय रूपके अवलम्धनले जो योगसाधन किया जाय उसको मन्त्रयोग कहते हैं । प्राण अपान, नाद बिन्दु और जीवात्मा परमात्माके संयोगसे बनता है इस कारण उसे घट कहते हैं। जलमें स्थित कच्चे घड़े के समान नाश होते हुए घटको सदा योगरूपी अग्निसे पकाकर घटशुद्धि फरनी चाहिये । घटका योगके साथ गये हैं। श्रेष्ठ गुरुगण इन चारों प्रकारके योगसाधन रहस्यको जानत है और जैसा शिष्य अधिकारी होता है वैसा ही उपदेश दिया करते हैं।

। श्रीगुरुगीता। २५ . 1 घटयोगसमायोगाद्धठयोगः प्रकीर्तितः ।। ९३ ।। मन्त्राद्धठेन सम्पाद्यो योगोऽयमिति.वा प्रिये!।। हठयोग इति प्रोक्तो हठाज्जीवशुभमदः ॥ ९४ ॥ हठयोगेन प्रथमं जीर्यमाणामिमां तनुम् । द्रढ़यन्सूक्ष्मदेह वै कुर्य्याद्योगयुजं पुनः ॥ ९५ ॥ स्थूल सूक्ष्मस्य देहो वै परिणामान्तरं यतः । कादिवर्णान्समभ्यस्य शास्त्रज्ञानं यथाक्रमम् ॥ ९६ ॥ यथोपलभ्यते तद्वत्स्थूलदेहस्य साधनैः । योगेन मनसो योगो हठयोगः प्रकीर्तितः ॥ ९७ ॥ ब्रह्माण्डपिण्डे सदृशे ब्रह्मप्रकृतिसम्भवात् । समष्टिव्यष्टिसम्बन्धादकसम्बन्धगुम्फिते ॥ ९८॥ ऋपिदेवाश्च पितरो नित्यं प्रकृतिपूरुपौ। तिष्ठान्त पिण्डे ब्रह्माण्डे ग्रहनक्षत्रराशयः ॥ ९९ ॥ पिण्डज्ञानेन ब्रह्माण्डज्ञानं भवति निश्चितम् । गुरूपदेशतः पिण्डज्ञानमाप्त्वा यथायथम् ॥ १.४० ॥ सम्बन्ध होनेसे हठयोग कहा जाता है अथवा मन्त्रयोगकी अपेक्षा यह योग हठसे सम्पादन किया जाता है इसी कारण हे प्रिये ! इसको हठयोग कहते हैं । यह शीघ्र जीव-कल्याणकारी है ॥ १०-६४ ॥ नाश होनेवाले इस शरीरको पहले हठयोगसे दृढ करके फिर सूक्ष्म शरीरको योगयुक्त करे ॥ ९५ ॥ स्थूल शरीर सूक्ष्म शरीरका परि.. णाममात्र है। जैसे कादि वोका अभ्यास करके यथाक्रम शान. शान प्राप्त होता है उसी प्रकार स्थूलदेह के साधनोंसे सूक्ष्म शरीर- का जो योगसाधन है यही हठयोग है ॥ २६-९७ ॥ ब्रह्मशक्ति प्रकृति से उत्पन्न होने के कारण ब्रह्माण्ड और पिण्ड समान हैं और समष्टि व्यष्टि सम्बन्ध में गुम्फित हैं ॥ ६ ॥ ब्रह्माण्डकी तरह पिण्डमें भी ऋपि, देवता, पितर्, प्रकृति, पुरुष, ग्रह, नक्षत्रादि सव नित्य स्थित हैं ।। ९९ ॥ पिण्डके ज्ञानसे ब्रह्माण्डका ज्ञान अवश्यही हो जाता है। - २६ श्रीगुरुगीता। ततो निपुणया युक्त्या पुरुपे प्रकृतेर्लयः । लययोगाऽभिधेयः स्यात् कृतः शुद्धैमहर्षिभिः ॥ १०१ ॥ भवन्ति मन्त्रयोगस्य पोड़शाङ्गानि निश्चितम् । यथा सुधांशोर्जायन्ते कलाः पोड़श शोभनाः ॥ १०२ ।। भक्तिः शुद्धिश्चाऽऽसनश्च पञ्चाङ्गस्याऽपि सेवनम् । आचारधारणे दिव्यदेशसेवनमित्यपि ॥ १०३ ॥ प्राणक्रिया तथा मुद्रा तर्पणं हवनं वलिः । यागो जपस्तथा ध्यानं समाधिश्चेति पोड़श ॥ १०४ ॥ पट्कर्माऽऽसनमुद्राः प्रसाहारः माणसंयमश्चैव । ध्यानसमाधी सप्तैवाङ्गानि स्युहठस्य योगस्य ॥ १०५ ॥ अङ्गानि लययोगस्य नवैवेति बुधा विदुः । यमश्च नियमश्चैव स्थूलसूक्ष्मक्रिये तथा ॥ १०६ ॥ प्रत्याहारो धारणा च ध्यानञ्चापि लयक्रिया। समाधिश्च नवाङ्गानि लययोगस्य निश्चितम् ।। १०७ ॥ ध्यानं वै मन्त्रयोगस्याऽध्यात्मभावाद्विनिर्गतम् । परानन्दमये भावेऽतीन्द्रिये च विलक्षणे ॥ १०८ ॥ गुरूपदेशले पिण्डज्ञानको यथावत् प्राप्त करके तय सुकौशल पूर्ण युक्तिसे पुरुपमें प्रकृतिका जो लय करता है उसको लययोग महर्षि लोग कहते हैं ।। १००-१०१॥ मन्त्रयोग सोलह असले सुशोभित है, जैसे चन्द्रमा सोलह कलाओंसे सुशोभित है ॥ १२ ॥ भक्ति, शुद्धि आसन, पञ्चाङ्गसेवन, आचार, धारणा, दिव्यदेशसेवन, प्राणक्रिया, मुद्रा, तर्पण, हवन, बलि, याग, जप, ध्यान और समाधि, मन्त्रयोगके ये षोडश अङ्ग हैं ॥ १०३-१०४ ॥ षट्कर्म, श्रासन, मुद्रा, प्रत्याहार, प्राणायाम, ध्यान और समाधि, ये सात हठयोगके अङ्ग हैं ॥ १०५ ॥ “यम, नियम, स्थूल क्रिया, सूक्ष्म क्रिया, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, लय. क्रिया और समाधि, ये नव लययोगके अङ्ग हैं ॥ १०६-१-७॥ अध्या- . त्मभावसे ही मन्त्रयोगके ध्यानोंका आविर्भाव हुआ है । गम्भीर, श्रीगुरुगीता। २७ -~- . भ्रमद्भिः साधकश्रेयोवाञ्छद्भिर्योगवित्तमैः । उपासनां पञ्चविधां ज्ञात्वा साधकयोग्यताम् ॥ १०९ ॥ मन्त्रध्यानं हि कथितमध्यात्मस्याऽनुसारतः । वेदतन्त्रपुराणेषु मन्त्रशास्त्रप्रवर्त्तकैः ॥ ११० ।। वर्णितं श्रेयइच्छद्भिर्मन्त्रयोगपरस्य वै । ध्यानानां वै बहुत्वेऽपि तत्प्रोक्तं पञ्चधैव हि ॥ १११ ॥ तेषां भावमयत्वेन समाधिरधिगम्यते । मन्त्रयोगो हठश्चैव लययोगः पृथक् पृथक् ॥ ११२ ॥ स्थूलं ज्योतिस्तथा विन्दु ध्यानं तु त्रिविधं विदुः । स्थूलं मूर्तिमयं प्रोक्तं ज्योतिस्तेजोमयं भवेत् ।। ११३ ।। विन्दु विन्दुमयं ब्रह्म कुण्डली परदेवता । सृष्टिस्थितिीवनाशानां हेतुता मनास स्थिता ॥ ११४ ॥ तत्साहाय्यात्साध्यते यो राजयोग इति स्मृतः । मन्त्रे हटे लये चैव सिद्धिमासाथ यत्नतः ॥ ११५ ।। अतीन्द्रिय, नाना वैचित्र्यपूर्ण और परमानन्दमय भाषराज्यमै भ्रमण करते हुए पञ्चोपासना के अधिकारानुसार विभिन्न साधकों के लिये विभिन्न प्रकार अध्यात्मभावपुलके आदर्शपर मन्त्रयोग-ध्यान विधि- हैं । श्रात्मतत्त्ववेत्ता महर्षियोंने मन्त्रयोगियों के कल्याणार्थ वेद पुराण और तन्त्रों में अनेक रूपोंका वर्णन किया है। वे सबध्यान बहु होने पर भी पञ्चोपासनाके अनुसार पञ्च श्रेणी में विभक्त हैं। लबध्यान ही अभ्रान्त भावमय होने के कारण समाधि देनेवाले हैं। मन्त्रयोग, हठयोग और लययोग, इनका पृथक् पृथक् क्रमशः स्थूलध्यान, ज्योतिान और बिन्दुध्यान है । स्थूलध्यान मूर्चिमय है, ज्योति- ध्यान तेजोमय है और बिन्दुध्यान बिन्दुमय ब्रह्मा है। यहां कुल- कुण्डलिनी परदेवता है । सधि स्थिति और लयका कारण मनमें स्थित है उस मनकी सहायतासे जो योगसाधन किया जाय वह राजयोग कहाता है । मन्त्रयोग, हठयोग और लययोग इनसे किली बद्ध हुए ।

२८ श्रीगुरुगीता । 4 पूर्णाऽधिकारमाप्नोति राजयोगपरो नरः । समाधिर्मन्त्रयोगस्य महाभाव इतीरितः ॥ ११६ ॥ हठस्य च महाबोध: समाधिस्तेन सिध्यति । प्रशस्तो लययोगस्य समाधिर्हि महालयः ॥ ११७ ॥ विचारबुद्धेः प्रधान्यं राजयोगस्य साधने । ब्रह्मध्यानं हि तद्धयानं समाधिनिर्विकल्पकः ।। ११८ ।। तेनोपलब्धसिद्धिहि जीवन्मुक्तः प्रकथ्यते । उपलब्धमहाभावा महावरोधान्त्रिताश्च वा ॥ १.१९ ॥ महालयं प्रपन्नाश्च तत्त्वज्ञानाऽवलम्वतः । योगिनो राजयोगस्य भूमिमासादयन्ति ते ॥ १२० ।। योगसाधनमूर्धन्यो राजयोगोऽभिधीयते ॥ १२१ ॥ श्रीमहादेव्युवाच । योगेश ! जगदाधार ! कतिधोपासना च के। तद्विधेर्भगवन् ! भेदा मुक्तिमार्गप्रदर्शिनः ॥ १२२ ॥ में भी यत्नपूर्वक सिद्धि (पूर्णता ) प्राप्त करके राजयोग साधन करने वाला मनुष्य पूर्णाधिकारको प्राप्त होता है । मन्त्रयोग की समाधि महाभाव, हठयोगपती महाबोध और लययोगकी समाधि, महालय नामसे अभिहित होती है ॥ १०-११७ ॥ राजयोगके साधन में विचारबुद्धिकी प्रधानता है और उसका ध्यान ब्रह्मध्यान कहांता है और निर्विकल्प समाधि उसकी समाधि है। उस समाधिको '. प्राप्त होकर योगी जीवन्मुक्त कहाता है । महाभावको प्राप्त मन्त्रयोगी, महाबोधको प्राप्त हठयोगी, महालयको प्राप्त लययोगी, ये सब ही तत्त्वज्ञानके अवलम्बनले राजयोगकी भूमिको प्राप्त होते हैं। योग- साधनोंमें जो परम प्रधान है वह राजयोग नामले अभिहित होता है.॥११८-१२१ ॥ श्रीमहादेवी बोली। हे योगेश्वर | जगदात्मन् । उपासना फितने.प्रकार की होती है, ।

श्रीगुरुगीता। . - तस्याः के दिव्यदेशाश्च दिव्यभावेन भास्वराः। तत्सर्वं कृपया.नाथ ! बदम्ब वदतां वर ! ॥ १२३ ।। श्रीमहादेव उवाचं । सगुणो निर्गुणश्चाऽपि द्विविधो भेद ईय॑ते । उपासनाविधेवि ! सगुणोऽपि द्विधा मतः ॥ १२४ ॥ सकामोपासनायाश्च भेदा यद्यपि नैकशः । परन्त्वनन्यभक्तानां जनानां मुक्तिमिच्छताम् ॥ १२५ ।। भेदत्रितयमेवैतद्गहस्यं देवि ! गोपितम् । वक्ष्ये गुप्तरहस्यं तद्भवती भाग्यशालिनीम् ॥ १२६ ॥ समाहितेन शान्तेन स्वान्तेनैवाऽवधार्यताम् । पञ्चानामपि देवानां ब्रह्मणो निर्गुणस्य च ॥ १२७ ।। लीलाविग्रहरूपाणाञ्चेत्युपास्तिस्त्रिधा मता । विष्णुः सूर्यश्चशक्तिश्च गणाधीशश्च शङ्करः ॥ १२८ ।। पञ्चोपास्याः सदा देवि ! सगुणोपासनाविधौ । एते पञ्च महेशानि ! सगुणो भेद ईरितः ॥ १२९ ॥ मुक्ति-पथ-प्रदर्शक उपासनाविधिके भेद क्या क्या हैं और उपासना दिव्यदेश क्या क्या हैं सो वर्णन करके मुझे सफल-मनोरथ कीजिये ॥ १२२-१२३ ॥ श्री महादेव वोले । उपासनाके दो भेद हैं। यथा-निर्गुण उपासना और सगुण उपासना । सगुण उपासनो दो प्रकारक्षी है ॥ १२४ ॥ यद्यपि सकाम उपासना के और भी अनेक भेद हैं परन्तु मुक्ति की इच्छा रखने वाले अनन्य भक्त के लिये केवल ये तीनं ही भेद हैं । यह तुमसे मैं गुप्त रहस्य कह रहा हूँ। सावधान होकर सुनो। निगुण उपासना, सगुण पशोपासना और लीला-विग्रह-उपासना, इस प्रकारसे तीन भेद माने गये हैं। शिष, गणेश, शक्ति, सूर्य और विष्णु, ये पश्च उपास्य सगुण रूप पञ्च सगुणोपासनाके माने गये हैं। ये पाँधों .. । - . श्रीगुरुगीता । सच्चिदानन्दरूपस्य ब्रह्मणो नात्र संशयः। निर्गुणोऽपि निराकारो व्यापकः स परात्परः ॥ १३०॥ साधकानां हि कल्याणं विधातुं वसुधातले । विभर्ति सगुण रूपं त्वत्साहाय्यात्पतिव्रते ! ॥ १३१ ॥ यथा गवां शरीरेषु व्याप्तं दुग्धं रसात्मकम् । परं पयोधरादेव केवलं क्षरते ध्रुवम् ॥ १३२ ।। तथैव सर्वव्याप्तोऽपि देवो व्यापकभावतः । दिव्यषोड़शदेशेषु पूज्यते परमेश्वरः ॥ १३३ ॥ वयम्बुलिङ्गकुड्याने स्थण्डिलं पटमण्डले'। विशिखं निसयन्त्रञ्च भावयन्त्रश्च विग्रहः ॥ १३४ ॥ पाठश्चाऽपि विभूतिश्च हृन्मूख्ऽपि महेश्वरि !। एते षोड़श दिव्याश्च देशाः प्रोक्ता मयाऽनघे! ॥ १३५ ॥ यद्यच्छरीरमाश्रिस भगवान्सर्वशक्तिमान् । सच्चिदानन्दमय ब्रह्मकेही सगुण भेद हैं यह निस्सन्देह है । परमात्मा निराकार निर्गुण और व्यापक होने पर भी साधकके कल्याणार्थ तुम्हारी सहायताले सगुणरूप.धारण किया करते हैं ॥ १२५-१३१ ॥ जिस प्रकार गायके सव शरीरमें रसरूपसे दुग्ध व्याप्त है परन्तु केवल स्तनके द्वारा ही वह निःसरण होता है, उसीप्रसार परमात्मा सर्वव्यापक होने परमी सोलह दिव्य देशों में पूजे जाते हैं ।।१३२-१३३॥ वह्नि, अम्नु, लिज, स्थण्डिल, कुड्य, पर, मण्डल, विशिख, नित्ययन्त्र, भावयन्त्र, पीठ, विग्रह, विभूति, नाभि, हृदय और मूर्दा, ये सोलह दिव्य देश कहाते हैं। इन सोलह दिव्य देशों में जैसा गुरूपदेश हो साधक परमात्माकी पूजा करके मुक्तिपद लाभ करता है ॥१३४-१३५॥ जिन अवतार शरीरोंकोधारण करके सर्वशक्तिमान भगवान तुम्हारी * सनातनधर्मावलम्बी मूर्तिकी पूजा नहीं करते हैं परन्तु इन सोलह दिव्यदेशों में सर्वव्यापक परमात्माकी पूजा करते हैं। इन सोलह दिव्यदेशोंमेंसे मूर्ति एक दिव्यदेश है। , श्रीगुरुगीता। . वती! विविधा लीला विधाय वसुधातले ॥ १३६ ॥ जगत्पालयते देवि ! लीलाविग्रह एव सः । . 'उपासनाऽनुसारेण वेदशास्त्रेषु भूरिशः ॥ १३७ ॥ लीलाविग्रहरूपाणामितिहासोऽपि लभ्यते । तदुपासनकञ्चाऽपि सगुणं परिकीर्तितम् ॥ १३८ ॥ विष्णोः सूर्य्यस्य शक्तेश्च गणेशस्य शिवस्य च । गीतासु गीता ये शब्दा विष्णुसूर्यादयः प्रिये ! ॥ १३९ ॥ ब्रह्मणश्चाद्वितीयस्य साक्षात्ते चापि वाचकाः। भक्तिस्तु त्रिविधा ज्ञेया वैधी रागात्मिका परा ॥ १४० ॥ देवे परोऽनुरागस्तु भक्तिः सम्पोच्यते बुधैः । विधिना या विनिता निषेधेन तथा पुनः॥ १४१ ॥ साध्यमाना च या धारैः सा वैधी भक्तिरुच्यते । ययाऽऽस्वाध रसान्मक्तेर्भावे मज्जति साधकः ॥ १४२ ॥ . रागात्मिका सा कथिता भाक्तियोगविशारदैः । पराऽऽनन्दमदा भाक्तः पराभक्तिर्मता बुधैः ॥ १४३ ॥ सहायतासे नाना लीला करके संसारकी रक्षा करते हैं वे रूपही लीला- विग्रह कहाते हैं । पञ्चोपासनाके अनुसार वेद और शास्त्रोमें अनेक लीला-विग्रह धारणके इतिहास पाये जाते हैं उनकी उपासनाभी सगुण उपासना कही जाती है ॥ १३३-१३८ ॥ शिवगीता (शम्भुगीता) गणेशगीता (धीशगीता ) देवीगीता (शकिगीता) सूर्यगीता और विष्णुगीताके प्रतिपाद्य शिव, गणेश, देवी, सूर्य और विष्णु, ये सब एक ही अद्वितीय परब्रह्मके ही वाचक हैं । भक्तिके तीन भेद हैं, यथा-वैधी भक्ति, रागात्मिका भक्ति और पराभक्ति । अपने इष्टदेवमें ऐकान्तिक अनुरागको धीर पुरुष भक्ति कहते हैं । विधिनिषेध द्वारा निर्णीत और साध्यमान भक्तिको वैधो कहते हैं! भक्तिरसका आस्वादन कराकर साधकको भावविशेषमें निमग्न करानेवालीभक्ति रागात्मिका कही जाती है। परमानन्दप्रदा भक्ति . .

श्रीगुरुगीता। . - या प्राप्यते समाधिस्थैर्योगिभिर्योगपारगैः । त्रैगुण्यभेदात्रिविधा, भक्ता वै परिकीर्तिताः ॥ १४४ ॥ आत्तों जिज्ञासुरार्थार्थी तथा त्रिगुणतः परः । पराभक्त्यधिकारी यो ज्ञानिभक्तः स तुर्यकः ।। १४५ ॥ उपासकाः स्युत्रिविधास्त्रिगुणस्याऽनुसारतः । ब्रह्मोपासक एवान श्रेष्ठः प्रोक्तो मनीपिभिः ॥ १४६ ॥ प्रथमा सगुणोपास्तिरवताराऽचनांश्च याः । विहिता ब्रह्मवुद्धया चेझैवाऽन्तर्भवन्ति ताः॥४७॥ सकामबुद्धया विहितं देवर्षिपितृपूजनम् । मध्यमं मध्यमा ज्ञेयास्तत्क रस्तथा पुनः ॥ १४८ ॥ अधमा वै समाख्याताः क्षुद्रशक्तिसमर्चकाः । प्रेतायुपासंकाश्चैव विज्ञेया ह्यधमाऽधमाः ॥ १४९ ।। सर्वोपासनहीनास्तु पशवः परिकीर्तिताः । ब्रह्मोपासनमेवाऽत्र मुख्यं परममङ्गलम् ॥ १० ॥ पराभक्ति कहाती है जो योगमें कुशल योगिग़णको समाधिदशामें प्राप्त होती है । भक्त त्रिगुणभेदसे त्रिविध होते हैं, यथा-आर्च, जिज्ञासु, अर्थार्थी और चतुर्थ ज्ञानी जो त्रिगुणातीत है। ज्ञानी भक्त ही पराभक्तिका अधिकारी हो सक्ता है ॥ १३६-१४५ ॥ त्रिगुणभेदसे उपालक तीन प्रकार के होते हैं । ब्रह्मोपासक सबमें श्रेष्ठ है ऐसा , विद्वद्गणने कहा है ॥ १४६ ॥ ब्रहाधुद्धिसे प्रथम सगुणोपासक अर्थात् पञ्चदेवोपासक और ब्रह्मवुद्धिसे द्वितीय सगुणोपासक अर्थात् अव- तारोपासक इसी श्रेष्ठ श्रेणी में हैं ॥१४७॥ सकाम बुद्धिसे ऋषि देवता और पितरोंकी उपासना करनेवाले द्वितीय श्रेणी (मध्यम श्रेणी) के हैं और जुद्र शक्तियोंकी उपासना करनेवाले तृतीय श्रेणी (अधम श्रेणी) के हैं। उपदेवता प्रेतादिककी 'उपासना इसी निम्न श्रेणी (अधमाधम श्रेणी) की समझी जाती है। जो किसी उपासनाको नहीं करते हैं वे पशु हैं । प्रथम श्रेणीकी उपासना अर्थात् ब्रह्मोपासना -- श्रीगुरुगीता। . निःश्रेयसकरं ज्ञेयं सर्वश्रेष्ठं शुभावहम् ॥ १५१ ॥ श्रीमहादेव्युवाच। यथा में गुरुमाहात्म्यं सम्यग्ज्ञातं भवेत्सभो !। तथा विस्तरतो नाथ ! तन्माहात्म्यमुदाहर ॥ १५२॥ सद्गुरोमहिमा देव ! सम्यग्ज्ञातः श्रुतो भुवि । अज्ञानतमसाऽऽच्छन्नं मनोमलमपोहति ॥ १५३ ॥ श्रीमहादेव उवाच । गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुरेव परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १५४ ॥ अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् । तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १५५ ॥ अज्ञानतिमिराऽन्धस्य ज्ञानाजनशलाकण । चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः १५६ ॥ ही परम कल्याणप्रद और निःश्रेयसकर होनेके कारण सर्वश्रेष्ट जानने योग्य है॥ १४८-१५१ ॥ श्रीमहादेवी वोली। हे नाथ | गुरुदेवकी महिमा जिससे मैं भली प्रकारसे समझ सकू, इस कारण गुरुदेवकी विस्तृत महिमा वर्णन करके मुझे कृतार्थं करें ॥ १५२-१५३॥ श्रीमहादेव बोले। गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु, गुरु ही शिव और गुरु ही परब्रह्म हैं,ऐसे श्रीगुरुदेवको नमस्कार है। जो अखण्ड मण्डलरूप इस स्थावर जङ्गमात्मक संसारमें व्याप्त हो रहे हैं उन परमात्माके परम पदका दर्शन जो कराते हैं। ऐसे श्रीगुरुदेवको नमस्कार है। जिन्होंने ज्ञान- रूप अजनकी शलाका द्वारा अज्ञानरूप अन्धकारसे अन्धे जीवके नेत्रों को खोल दिया है ऐसे श्रीगुरुदेवको नमस्कार है ॥ १५४-१५६॥

श्रीगुरुगीता। - स्थावरं जङ्गम.व्याप्त यत्किञ्चित्सचराचरम् । तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १५७ ॥ चिन्मयं व्याप्नुवन्सर्च त्रैलोक्यं सचराचरम् । तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १५८ ॥ . सर्वश्रुतिशिरोरत्नविराजितपदाऽम्धुजः ।. वेदान्ताऽम्बुजसूर्यो यस्तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १५९ ॥ चेतनः शाश्वतः शान्तो व्योमाऽतीतो निरञ्जनः । विन्दुनादकलातीतस्तस्मै श्रीगुरवे नमः ।। १६० ।। ज्ञानशक्तिसमारूढस्तत्त्वमालाविभूपितः । मुक्तिमुक्तिप्रदाता च तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १६१ ।। अनेकजन्मसंप्राप्तकर्मवन्धविदाहिने । आत्मज्ञानप्रदानेन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १६२ ।। शोषणं भवसिन्धोश्च ज्ञापनं सारसम्पदः । आकाशके सहित जड़ और चेतन जो कुछ पदार्थ हैं उनमें जो परमा- त्मा व्याप्त होरहे है उनके चरणकमलोका दर्शन जिनके द्वारा मिला है, ऐसे श्रीगुरुदेवको नमस्कार है ॥ १५७ ॥ जो स्थावर जङ्गमात्मक त्रिलोकमै व्याप्त होरहे हैं और जो शुद्धज्ञानमय हैं ऐसे परमात्माके चरणकमलोका दर्शन जिनके द्वारा हुआ है उन श्रीगुरुदेवको नमस्कार है |॥ १५ ॥ जिनके चरणकमल-युगल समस्त श्रुतियोंके शिरोमणिरूपले विराजित हैं,जो वेदान्तरूप अमल कमलके विकसित फरनेमें कमलपति सूर्य हैं ऐसे श्रीगुरुदेवको नमस्कार है ॥१५॥ जो। पुरुष चैतन्यरूप, नित्य, शान्त, आकाशले भी परे और निरसन है, जो प्रणव ज्योति और कलाम्मे अतीत हैं ऐसे श्रीगुरुदेवको नमस्कार है ॥१६०॥ जो शान-शक्तिकी पूर्णताको पहुँचे हुए हैं और तत्त्वरूप माला से विभूषित हैं और भोग और मोक्ष प्रदान करने में समर्थ हैं, ऐसे श्रीगुरुदेवको नमस्कार है।। ६२ ॥ जो प्रात्मशानदान द्वारा बहु जन्मजन्मान्तरके फर्मरूप बन्धनको दग्ध किया करते हैं ऐसे श्री. गुरुदेवको नमस्कार है ॥ १६२ ॥ जिनके पादोदक पान करनेसे पूर्ण- श्रीगुरुगीता। ! . गुरोः पादोदकं सम्यक् तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १६३ ॥ * न गुरोरधिकं तत्त्वं न गुरोरधिकं तपः। 'तत्त्वज्ञानात्परं नाऽस्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १६४ ॥ मन्नाथः श्रीजगन्नाथो मद्गुरुः श्रीजगद्गुरुः । मदात्मा सर्वभूतात्मा तस्मै श्रीगुरवे नमः ।। १६५ ॥ ४ . गुरुरादिरनादिश्च गुरुः परमदैवतम् । गुरोः परतरं नाऽस्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १६६ ॥ ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम् । रूपेण भवसमुद्र सूख जाता है और तत्त्वज्ञानरूप सारवान् सम्पत्तिकी प्राप्ति हो जाती है ऐसे श्रीगुरुदेवको नमस्कार है ॥१६३॥ तत्त्व अर्थात् ब्रह्मशान श्रीगुरुसे अधिक नहीं हैं, तपस्या भी श्रीगुरुसे अधिक नहीं है और जिस गुरुतत्त्वज्ञानसे अधिक और इस संसारमें कुछभी नहीं है ऐसे श्रीगुरुदेवको नमस्कार है॥१४॥ मेरे नाथ ही जगत्के श्रीनाथ! ईश्वर हैं, मेरे श्रीगुरु ही जगद्गुरु हैं, मेरो आत्मा ही जगत्के सब प्राणियोंका आत्मा है, सो ऐसे श्रीगुरुदेवको नमस्कार है ।। १६५ ॥ गुरु ही सबके आदि हैं, उनसे आदि कोई भी नहीं है, गुरुही देवता. ओके देवता हैं, गुरुसे श्रेष्ठ कोई भी नहीं है, ऐसे श्रीगुरुदेवको नमस्कार है ॥ १६६ ॥ गुरु-मूर्ति ध्यान ही सब ध्यानोका मूल है, * विना गुरुके ज्ञानकी प्राप्ति होही नहीं सक्ती,विना तत्वज्ञानके भगवद्भक्ति, भगव- दर्शन और मुक्ति प्राप्त होना दुर्लभ है; इस कारण श्रीगुरुदेव ही भगवदर्शन और भगवत्प्राप्तिरूप मुक्ति प्राप्त करानेके कारण हैं। जब देहधारी गुरु-मूर्तिमें लोकनाथ श्रीभगगन आविर्भूत होकर शिष्यकी शक्ति के अनुसार उपदेश दान द्वारा उसका कल्याणं किया करते हैं, तब गुरुकी और श्रीभगवान्की एकता स्थापन हुई, इसमें कोई भी सन्देह नहीं । श्रीगुरुदेव ही मुक्तिदाता हैं, श्रीगुरु महाराज ही मूर्तिमान. ब्रहा है, यही वेदका सिद्धान्त है। जव श्रीगुरु द्वारा ही ब्रह्मज्ञान और साधन तप श्रादिकी प्राप्ति होती है तब गुरु ही सबसे अधिक हुए, श्रीगुरुदेवसे अधिक इस संसारमें कुछ भी नहीं हो मक्ता । xजगद्गुरु ईश्वर ही गुरु हैं। गुरुएक अद्वितीय हैं, अर्थात वह एकमात्र जगद्गुरु ही जगवके समस्त जिज्ञासुगएके उपदेश दाता हैं। वह अद्वितीय परम ज्ञानमय परमात्मा समानरूपसे सब भूतों में व्यापित हैं। . 1 .

श्रीगुरुगीता। - . मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ॥ १६७ ॥ सप्तसागरपर्यन्ततीर्थस्नानादिकैः फलम् । गुरोरशिपयोबिन्दुसहस्रांशेन दुर्लभम् ॥ १६८ ॥ गुरुरेव जगत्सर्वं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम् । गुरोः परतरं नाऽस्ति तस्मात् सम्पूजयेद्गुरुम् ।। १६९ ॥ ज्ञानं विना मुक्तिपदं लभते गुरुभक्तितः । गुरोः परतरं नाऽस्ति ध्येयोऽसौ गुरुमार्गिणा ।।१७० ।। गुरोः कृपाप्रसादेन ब्रह्मविष्णुसदाशिवा। सृष्ट्यादिकसमर्थास्ते केवलं गुरुसेवया ॥ १७१ ॥ देवकिन्नरगन्धाः पितरो यक्षचारणाः। मुनयोऽपि न जानन्ति गुरुशुश्रूपणाविधिम् ॥ १७२ ।। * गुरुके श्री चरणकमलकी पूजा ही सब पूजाओंका मूल है, गुरुषाक्य ही सब मन्त्रीका मूल है और गुरुकी कृपाही मुक्ति प्राप्त करनेका प्रधान कारण है ॥१६७॥ सप्त समुद्र पर्यन्त तीर्थों में स्नान करनेसे जो फल लाभ होता है, गुरुके चरणकमलोंके एक पिन्दु चरणामृत पान करनेसे उसले अधिक फल होता है, इस कारण गुरुपादपश. • जल सहस्र-अंशेन पवित्र और' दुर्लभ है ॥ १६८ ।। गुरुही ब्रह्मा, विष्णु और शिव, इन निदेवरूपोंसे समस्त विश्व में व्यापित हैं,गुरुकी: अपेक्षा और कोई श्रेष्ठ नहीं है इस कारण गुरुकी पूजा करना सदा' उचित है।।१६६॥ गुरुके प्रति भक्ति करनेसे ज्ञान के विना भी मुक्तिपद लाभ होसक्ता है। श्रीगुरुदेवसे परे और कुछ भी नहीं है. इस कारण । गुरुपथावलम्बी साधकगणको ऐसे गुरुदेवका ध्यान करना उचित है ॥१७०।। ब्रह्मा, विष्णु और शिव ये तीनो देवता केवल एकमात्र श्रीगुरुदेवकी कृपासे ही और गुरुसेवाके फलसे ही 'सृष्टि, पालन और प्रलय क्रिया करने में समर्थ हुए हैं ।। १७१ ॥ देवतागण, किन्नर. गण, गन्धर्वगण, पितृगण, यक्षगण, चारणगण और मुनिगण कोई * श्रीगुरुदेव जब सबसे बड़े हैं तब उनकी सेवा कौन करनेमें समर्थ होसता है ? अर्थात गुरुसेवा अतिशय कठिन है।" ।

श्रीगुरुंगीता। ३७ न मुक्ता देवगन्धाः पितरो यक्षकिन्नराः । ऋषयः ससिद्धाश्च गुरुसेवापराङ्मुखाः ।। १७३ ॥ श्रुतिस्मृतिमीवज्ञाय केवलं गुरुसेवया । ते वै सन्यासिनः प्रोक्ता इतरे वेषधारिणः ॥ १७४ ॥ गुरोः कृपाप्रसादेन आत्मारामो हि लभ्यते । अनेन गुरुमार्गेण आत्मज्ञानं प्रवर्त्तते ॥ १७५ ।। * सर्वपापविशुद्धात्मा श्रीगुरोः पादसेवनात् । सर्वतीर्थावगाहस्य फलं प्राप्नोति निश्चितम् ॥ १७६ ॥ यज्ञत्रततपोदानजपतीर्थाऽनुसेवनम् । गुरुतत्वमविज्ञाय निष्फलं नाऽत्र संशयः ॥ १७७ ।। मन्त्रराजमिदं देवि ! गुरुरित्यक्षरद्वयम् । भी गुरुसेधाकी विधि नहीं जानते॥१७२॥ देवगण, गन्धर्वगण, पितृ- गण, यक्षगण, किन्नरगण, ऋषिगण और सब सिद्धगण के बीच में जो. कोई गुरुसेवापराङ्मुख हो सो कदापि मुक्ति-लाभ करने में समर्थ न होगा ॥१७३|| जो वेद और स्मृति आदि शास्त्र न पढ़कर और केवल गुरुसेवा द्वारा काल व्यतीत करते हैं वे भी संन्यासी कहाते है और जो लोग संन्यासी होकर गुरुसेवा नहीं करते वे केवल वेषधारी मात्र हैं ॥१७॥ केवल गुरुकृपाके बलसे ही आत्माराम पद लाभ होता है, गुरुपथ अवलम्बन द्वारा ही आत्मज्ञान उदय होता है ॥१७॥ श्रीगुरु देवकी चरण सेवा करने पर जीवात्मा सब पापोंसे मुक्त और पवित्र होजाता है और सर तीर्थों में स्नान करनेसे जितना फल होता है उसको उतना फल लाभ होता है इसमें कोई सन्देह नहीं ॥ १७६ ॥ गुरुतत्त्व न जानकर जो यज्ञ, व्रत, तपस्या, दान, जप और तीर्थ- स्नान आदि कार्य करते हैं वह सब निष्फल होता है इसमें कोई भी सन्देह नहीं ॥ १७७ ॥ हे देवि !"गुरु " यह दोनों अक्षर सब मन्त्रों- * इसमें कोई सन्देह नहीं कि जगद्गुरु श्रीभगवान् की कृरासे ही जीवगण आत्मा- रामरूप मुक्तिपद प्राप्त करते हैं, और इसमें भी सन्देहमात्र नहीं कि साक्षात् भगवद्- रूप श्रीगुरुदेवकी सेवामें युक्त होकर उनके उपदेश किये हुए पथ पर जो चलता है वही श्रात्मक्षान, लाभ करसता है। . J ३८ श्रीगुरुगीता। श्रुतिवेदान्तवाक्येन गुरुः साक्षात्परं पदम् ॥ १७८ ॥ गुरुर्देवो गुरुधों गुरुनिष्ठा परं तपः । गुरोः परतरं नास्ति नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् ।। १७९ ॥ धन्या माता पिता धन्यो धन्यो वंशः कुलं तथा । धन्या च वसुधा देवि ! गुरुभक्तिः सुदुर्लभा ॥ १८० ॥ शरीरमिन्द्रियमाणा अर्थस्वजनवान्धवाः । माता पिता कुलं देवि ! गुरुरेव न संशयः ॥ १८१॥ आजन्मकोव्यां देवेशि ! जपत्रततपःक्रियाः। एतत्सर्वं समं देवि ! गुरुसन्तोपमात्रतः ।। १८२ ॥ विद्याधनमदेनैव मन्दभाग्याश्च ये नराः । गुरोः सेवां न कुन्ति सत्यं ससं वदाम्यहम् ॥ १८३ ।। गुरुसेवापरं तीर्थमन्यत्तीर्थमनर्थकम् । . से श्रेष्ठ हैं । श्रुति और वेदान्तवाक्य द्वारा यही निश्चय कियागया है कि गुरु ही साक्षात् परमपद है। अर्थात् श्रीगुरुदेव ही ब्रह्मरूप हैं ॥१७८॥ गुरु ही देवतारूप, गुरु ही धर्मरूप और गुरुमै निष्ठा ही परम तपस्यारूप है इस कारण गुरु की अपेक्षा श्रेष्ठ वस्तु और श्रेष्ठ तत्व और कुछ भी नहीं है।९७९॥ हे देवि!गुरुभक्ति दुर्लभ है जिसके हृदयमें वह भक्ति उदय हुभ्रा करती है उसकी माता धन्य है, पिता धन्य है, उसका वंश और कुल धन्य है और वह जिस पृथिवीमें वास करता है वह पृथिवी भी धन्य है ॥ १० ॥ हे देवि शरीर, इन्द्रिय, प्राण, अर्थ, अपने स्वजन, सुहृत्, माता, पिता और कुल यह सब ही गुरुस्वरूप हैं इसमें कोई भी सन्देह नहीं ॥ ११॥ है देवेशि ! कोटि कोटि जन्म में जो जप, व्रत,तपस्या और सक्रिया का अनुष्ठान किया जाता है, एकमात्र श्रीगुरुदेवकी सन्तुष्टता हीसे उन सबके समान फल लाभ हुआ करता है ॥ १८२॥ जो मनुष्यगण विद्या और धन आदि के अहंकार से गुरुसेवा नहीं करते मैं सत्य सत्य ही कहता हूं कि उनका भाग्य मन्द है ॥ १३ ॥ हे देवि गुरुसेवा ही सकल श्रीगुरुगीता। सर्वतीर्थाश्रयं देवि ! सद्गुरोश्चरणाम्बुजम् ॥ १८४ ॥ * गुरुध्यानं महापुण्यं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् । वक्ष्यामि तव देवेशि ! शृणुष्व कमलानने ! ॥ १८५ ॥ प्रातः शिरार्स शुक्लाब्जे द्विनेत्रं द्विभुज गुरुम् । वराऽभयकरं शान्तं स्मरेत्तन्नामपूर्वकम् १८६ ॥ वामोरुशक्तिसहितं कारुण्येनाऽवलोकितम् । प्रियया सव्यहस्तेन धृतचारुकलेवरम् ॥ १८७ ।। वामेनोत्पलधारिण्या रक्ताऽऽभरणभूपया ज्ञानाऽऽनन्दसमायुक्तं स्मरेत्तन्नामपूर्वकम् ॥ १८८ ॥ अखण्डमण्डलाऽऽकारं व्याप्तं येन चराचरम् । तीर्थोकी अपेक्षा प्रधान तीर्थ है, गुरुके सम्मुख और तीर्थ वृथा हैं, सद्गुरुके पादपन ही और तीयोंके अवलम्बन हैं ॥१८॥ हे कमला- . नने ! हे सुरेश्वरि ! मैं तुम्हारे निकट गुरु-ध्यान कहता हूँ श्रवण करो। इस गुरु-ध्यानसे महापुण्य लाभ होता है और एकाधारमें यह भोप और मुक्ति प्रदान किया करता है ॥ १५ ॥ वे मस्तकस्थि- त सहस्रदलकमल पर विराजित हैं, उनके दो नेत्र और दो बाहु है 'और जो अपने दो हाथों में से एकमें घर और दूसरेमें अभयको धारण कर रहे हैं; ऐसे प्रशान्तमूर्ति गुरुदेवका नामोश्चारणपूर्वक प्रातःकालमें स्मरण करना उचित है ॥ १८६ दयापूर्ण दृष्टिले समस्त संसारको देख रहे हैं, उनके वाम उरु पर उनकी शक्ति देवी विराजित हैं, जो देवी रक्त अलंकारसे भूषित हैं, जिनके वाम हस्तमें कमलपुष्प है और जो अपने दक्षिण हस्तले निजपतिके चारु कले. वरको धारण कर रही हैं। इस प्रकारके ज्ञानानन्द पूर्ण गुरुदेवको चिन्तन करना उचित है ॥१८७-१८८ ॥ संख्या १८६ श्लोकसे अचम्म के साधन में श्रीगुरुदेव ही कारण है,इस कारण उनकी सेवा से सर्वोत्तम फल की प्राप्ति हुआ करती है। तीर्थादि धर्म जगत में अद्भुत और तुरन्त फलके 'दाता हैं. परन्तु जब धर्मसाधनमें श्रीगुरुदेव ही कारण हैं तो उनकी सेवा से जो फल को प्राप्ति हुआ करती है उसके समान तीर्थसेवन का फल कदापि नहीं होसक्ता और इसी कारणसे गुरुचरणोंकी भक्ति विना कोई तीर्थं भी फजदान में समर्थ नहीं होते। . .

" श्रीगुरुगीता । तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ।। १८९।। नमोऽस्तु गुरवे तस्मै इष्टदेवस्वरूपिणे । यस्य वाक्याऽमृतं हंन्ति विषं संसारसंज्ञितम् ॥ १९० । श्रीमहादेव्युवाच । मदेकहृदयाऽऽनन्द ! जगदात्मन् ! महेश्वर !। उपास्यस्य रहस्यं मे माहात्म्यञ्चापि सद्गुरोः ॥ १९१ ॥ वर्णितं यत्त्वया नाथ ! कृतकृत्याऽस्मि साम्भतम् । भूयोऽपि श्रोतुमिच्छामि त्वन्मुखाजगदीश्वर ! ।। १९२ ॥ परतत्वैकरूपस्य तत्त्वाऽतीतपराऽऽत्मनः । समासेन स्वरूपं मे वर्णयित्वा कृपां कुरु ॥ १९३ ।। श्रीमहादेव उवाच । स एक एव सद्रूपः सत्योऽद्वैतः परात्परः । स्वप्रकाशः सदा पूर्णः सच्चिदानन्दलक्षणः ॥ १९४॥ निधिकारो निराधारो निर्विशेपो निराकुलः । लेकर १८८ तकमें जिस प्रकारका ध्यान वर्णित है उस रीतिपर , श्रीगुरुदेवका ध्यान करना उचित है; तत्पश्चात् मानस उपचार द्वारा गुरुपूजा करके पुनः उपर्युक्त श्लोक-द्वय द्वारा श्रीगुरुदेवको प्रणाम करना उचित है । इन दोनों श्लोकोमसे पूर्वका अर्थ होचुका है, इसकारण पुनरुक्ति नहीं कीगई दुसरेका अर्थ यह है, इष्टदेव स्वरूप उन श्रीगुरुदेवको नमस्कार है कि जिनका वाक्यामृत संसार. रूप विषको नाश करता है ॥१८९-१६० ॥ श्रीमहादेवी वोली। हे जगदात्मन् ! हे महेश्वर ! हे मेरे हृदयनाथ। आपने जो इस लमय गुरुदेवका माहात्म्य और उपास्यकारहस्य सब कुछ वर्णन किया जिस- से मैं कृतकृत्य हुई। अब जगदाधार तत्वातीत परमतत्त्वरूपी परमात्मा- का स्वरूप संक्षेपरूपसे वर्णन करके मुझे कृतार्थ कीजिये। १६१-१९३॥ श्रीमहादेव बोले। वह एक, अद्वितीय, सत्य, नित्य, परात्पर, स्वप्रकाश, सदापूर्ण और सचिदानन्दरूप है ||१६४ा वह निर्विकार, निराधार, निर्विशेष, श्रीगुरुगीता। ४१ . गुणातीतः सर्वसाक्षी सळत्मा सर्वग्यिभुः ॥ ११५ ॥ गृढः सव्येषु भूतेषु सर्वव्यापी सनातनः । सन्द्रियगुणाभासः सर्वेन्द्रियविवर्जितः ॥ १९६ ॥ लोकाऽतीतो लोकहेतुरवाङ्मनसगोचरः। स वेत्ति विश्व सर्वज्ञस्तं न जानाति कश्चन ॥ १९७ ॥ तदधीनं जगत्सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् । नदालम्बनतस्तिष्ठेदवितमिदं जगत् ।। १०८ ।। तत्सत्यतामुपाऽऽश्रित्य सद्वद्भाति पृथक् पृथक् । तेनैव हेतुभूतेन वयं जाता महेवारि ! ॥ १९९ ॥ कारणं सर्वभूतानां स एकः परमेश्वरः । लोकेपु सृष्टिकरणात्सप्टा ब्रह्मति गीयते ॥ २० ॥ विष्णुः पालयिता देवि ! संहर्ताऽहं तदिच्छया । इन्द्राऽऽदयो लोकपालाः सर्वे तद्वशर्तिनः ॥ २०१।। स्त्रे स्वेऽधिकारे निरतास्ते शासति तदाज्ञया । निराकुल, गुणातीत, सर्वसाती, सर्वात्मा, सबोको देखनेवाला और व्यापक है ॥१९५॥ वह सर्वव्यापी सनातन गूढभावले सब जीवों में अवस्थित है, सम्पूर्ण इन्द्रिय-लियों का प्रकाशक होनेपर भी समस्त इन्द्रियोंसे रहित है ॥१९६॥ वह लोकका कारण होने पर भी लोकसे प्रतीत है और वह मन और वचन दोनों से परे है, वह सर्वश सबको जानता है परन्तु उसको कोई नहीं जानता ॥ १९७ ॥ चराचरपूर्ण त्रैलोक्य उसके आधीन है उसीके अवलम्बनसे यह अवितपर्य विस्तृत जगत् ठहरा हुआ है ॥ १६ ॥ यह असत्य जगत् उसीकी सत्यता पाकर सत्यके ऐसा पृथक् पृथक् शोभता है, महेश्वरि ! उन्हीके द्वारा हमलोग उत्पन्न हुए हैं ॥ १९९ ॥ वही एक परमेश्वर सब प्राणियों का कारण है, लोक सृष्टि करनेके कारण वह सृष्टिकर्ता ब्रह्मा कहा जाताहै ॥२०॥ हे देवि ! उसी की इच्छासे विष्णु पालन तथा मैं संहार करता हूं, इन्द्रादिक देवता सब उसी के वशवी हैं ॥ २०१॥ और उसकी प्राशाले अपने अपने .

४२.
श्रीगुरुगीता।
त्वं पुरा प्रकृतिस्तस्य पूज्याऽसि भुवनत्रये । २०२ ।।
तेनाऽन्तर्यामिरूपेण तत्तद्रिपययोजिताः ।
स्वस्त्रकर्म प्रकुर्वन्ति न स्वतन्त्राः कदाचन ।। २०३ ।।
यद्याद्वाति वातोऽपि सूर्यास्तपति यद्भयात् ।
वर्षन्ति तोयदाः काले पुप्प्यन्ति तरवो बने ।। २७४ ।।
कालं कलयते काले मृत्योर्मुत्युर्भियो भयम् ।
वेदान्तवेद्यो भगवान्यत्तच्छन्दोपलाक्षतः ॥ २०५ ॥
सर्वे देवाश्च देव्यश्च तन्मयाः सुरवन्दिते !।
आब्रह्मस्तम्बपर्य्यन्तं तन्मयं सकलं जगत् ॥ २०६ ॥
तस्मिंस्तुष्टे जगतुष्टं प्रीणिते प्रीणितं जगत् ।
तदाराधनतो देवि !.सबैपां पीणनं भवेत् ॥ २०७ ॥
'तरोर्मूलाऽभिपेकेण यथा तभुजपल्लवाः ।
तृप्यन्ति तदनुष्ठानातथा सर्वेऽमरादयः ।। २०८ ।।
अधिकारों में रहकर जगत्का शासन करते हैं। तुम उसकी प्रधान
प्रकृति हो इसलिये तीनों भुवनमें तुम पूज्य हो। २०२ ॥ हम उस
अन्तर्यामीसे उन २विषयों में नियोजित होकर अपने २ काय्यौंको
करते हैं कोई भी कभी स्वतन्त्र नहीं है। २०३ ॥ जिसके भयसे वायु
चलती है, सूर्य तपता है, मेघ वर्षते हैं और समयपर वृक्ष पुष्पित
होते हैं, जो प्रलयकालमें कालको भी कवलित करजाता है और जो
मृत्यु की मृत्यु एवं भयका भी भय है ॥ २०४-२०५ ॥ जो वेदान्तवेद्यं
प्रभु यत् और तत् शब्द से उपलक्षित होता है हे देववन्दिते ! देवि!
सम्पूर्ण देव और देवीगण तथा ब्रह्मले लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त
जगत् तद्रूप है ॥ २०६ ॥ उसके सन्तुष्ट होनेसे जगत् सन्तुष्ट और
उसके तृप्त होनेसे जगत् तृप्त होता है; हे देवि ! उसी.की आराधना
से सब तृप्त होते हैं ॥२०॥ जैसे वृक्षके मूलमें सिञ्चन करनेसे उसके
शाखा पल्लव सब तृप्त होते हैं उसी प्रकार : भगवानके अनुष्ठानसे
सष देवगण तृप्त और प्रसन्न होते हैं ॥ २० ॥

श्रीगुरुगीता। ४ - श्रीमहादेव्युवाच । संसाररोगहन्नाथ ! करुणावरुणाऽऽलय !। गुरोर्माहात्म्यपूर्णा या गुरोगीता सुवर्णिता ॥ २०९ ॥ तत्स्वाध्यायस्य माहात्म्यं फलश्चापि विनिर्दिश । जीवमङ्गलमेतेन कृपातोऽतः कृपाऽर्णव । ॥ २१० ।। सम्यगविविच्य संवर्ण्य विनोदय दयार्णव !। त्वते को हि देवेश ! शिक्षा मेऽन्यो विधास्यति ॥ २११॥ , श्रीमहादेव उवाच । इदं तु भक्तिभावेन पठ्यते श्रूयतेऽथवा । लिखित्वा वा प्रदीयेत सर्वकामफलमदम् ।। २१२ ।। गुरुगीताऽभिधं देवि ! शुद्धं तत्वं मयोदितम् । भवव्याधिविनाशार्थ स्वयमेव सदा जपेत् ।। २१३ ॥ गुरुगीताऽक्षरैकैकं मन्त्रराजमिदं पिये । अनेन विविधा मन्त्राः कलां नाईन्ति पोड़शीम् ॥ २१४ ॥ श्रीमहादेवी वोली। हे कृपानिधे । संसार-दुःखके मेटनेवाले ! गुरुमाहात्म्यपूर्ण गुरुगीताका जो आपने वर्णन किया, इसके पाठका क्या माहात्म्य है सो कृपापूर्वक जीवोंके कल्याणार्थ वर्णन करके मुझे सुखी करिये। हे देवेश! आपके विना और कौन मुझे शिक्षा देगा ।। २०६-२११ ।। श्रीमहादेव बोले। इस गुरुगीता को भक्तिपूर्वक पाठ, श्रवण अथवा लिखकर दान करनेसे सकल प्रकारकी वासनां पूर्ण होती है ॥ २१३ ।। हे देवि! 'संसाररूप रोगसे मुक्त होने के निमित्त इस गुरुगीता नामक पवित्र तत्त्वको मैंने प्रकट किया है। शिष्यगणको उचित है कि वे स्वयं इसको सर्वदा पाठ करें॥ २१३ ॥ हे प्रिये । इस गुरुगीताका एक एक अक्षर एक एक प्रधान मन्त्ररूप है, इसके सिवाय और और मन्त्र-समूह इसके षोडश अंशके तुल्य भी नहीं हैं ॥ २१४ ॥ . ।

४४ : श्रीगुरुगीता। ww : .. सर्वपापहरं स्तोत्रं सर्वदारिद्रयनाशनम् । अकालमृत्युहरणं सर्वसंकटनाशनम् ॥ २१५ ।। यक्षराक्षसमूतानां चौरव्याघ्रभयाऽपहम् । महाव्याधिहरव विभूतिसिद्धिदं ध्रुवम् ॥ २१६ ॥ मोहनं सर्वभूतानां परं वन्धनमोचनम्. । देवभूनप्रियकरं लोकान्स्ववशमानयेत् ॥ २१७ ॥ मुखस्तम्भकरं नृणां सद्गुणानां विवर्द्धनम् । दुष्कर्मनाशनञ्चैव सत्कर्मासिद्धिदं भवेत् ॥ २१८ ।। भक्तिदं सिद्धयेत् कार्य नवग्रहभयाऽपहम् । दुःस्वप्ननाशनश्चैव सत्कर्मप्तिद्धिदं भवेत् ॥ २१९ ।। सर्वशान्तिकरं नित्यं वन्ध्यापुत्रफलेपदम् । . यह गुरुगीता सब प्रकारके पापोको नाश करती है, सकल प्रकारके दारिद्रयको दूर करती है, अकाल मृत्यु निवारण करती है और सब विपदोको नाश कर देती है ॥ २१२ ॥ इस गुरुगीता पाठसे यक्ष, राक्षस, भूत, चौर और व्यानं आदिका भय नहीं रहता; इससे 'महान्याधिका नाशे और सम्पत्तियोकी. प्राप्ति हुआ करती है ॥२१६॥ यह गुरुगीता सकल जीवोंका मन मुग्ध करती है, संसारबन्धन- से मुक्तिलाम करनेका प्रधान उपाय है और देवता और राजागणकों प्रसन्न करनेवाली है और जो मनुष्य इसको पाठ करता है वह सकत लोकों को अपने वशमें करलेता है ॥ २१७ ॥ यह गुरुगीता बादी मनुष्यगण की चाशक्तिको निरोधक, सारे सद्गुणों की वर्धक, पाप-कम्ौको विनाशक और धर्म कर्मको फल-प्रदानकारक है ॥२१८॥ इस भक्तिप्रद, नवग्रह-भयनिवारक गुरुगीता पाठ करने. से अभिलषित काय्यं सिद्ध होते हैं, इसके पाठ द्वारा दु:स्वप्नों का और सत्कर्मका तुरन्त फल प्राप्त हुआ करता है ॥ २१२॥ :. इस गुरुगीताकै पाठ करनेसे सर्वदा जीवगण विपद्से बच सक्त है और इसके पाठ करनेसे वन्ध्या नारी पुत्रफल प्रसव करती है 1 दोष दूर -- श्रीगुरुगीता। अवैधव्यकरं स्त्रीणां सौभाग्यदायकं परम् ॥ २२० ॥ आयुरारोग्यमैश्वर्यपुत्रपौत्रादिवर्द्धकम् । निष्कामतस्त्रिवारं वा जपन्मोक्षमवाप्नुयात् ।। १२१ ॥ सर्वदुःखभयं विघ्नं नाशयेत्तापहारकम् । सर्ववाधाप्रशमनं धर्माऽर्थकाममोक्षदम् ॥ २२२ ॥ यो यं चिन्तयते काम स तमाप्नोति निश्चितम् । कामिनां कामधेनुश्च कल्पितं च सुरद्रुमः ॥ २२३ ॥ चिन्तामणि चिन्तितस्य सर्वमङ्गलकारकम् । जपेच्छाक्तश्च शैवच गाणपत्यश्च वैष्णवः ॥ २२४ ॥ सौरश्च सिद्धिदं देवि ! धर्मार्थकाममोक्षदम् । संसारगलनाशाऽथै भवतापनिवृनये ।। २२५ ॥ और नारीगणकी वैधव्य-यन्त्रणा दूर होजाती है और वे परम सौभाग्यको प्राप्त होजाती हैं॥ २२० ॥ कामनाशून्य होकर इस गुरुगीताको थोड़ा भी पाठ करनेसे आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, पुत्र और पौत्र आदिकी वृद्धि होती है और वह पाठ-कर्ता अनायास- से ही मोक्ष पद प्राप्त करने में समर्थ होजाता है ॥ २२१॥ इस सन्तापहारी गुरुगीताके पाठसे . सकले प्रकारका दुःख, भय और विधन नाश हो जाता है; सफल प्रकारको विपदोंकी शान्ति होती है और धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूपी चतुर्वर्ग लाभ होता.. है ।। २२२ ॥ जो मनुष्य जिस प्रकारकी कामना करके ल गुरुगीता- का पाठ करता है, वह उसी फलको प्राप्त करता है इसमें कोई भी . सन्देह नहीं। यह गुरुगीता कामीगणके लिये. कामधेनु और कल्पित कल्पवृक्षरूप है; अर्थात् सकाम होकर पाठ करने से इसके द्वारा कामनाकी सिद्धि होती है और निष्काम होके पाठ करनेसे मुक्ति- पदकी प्राप्ति होती है ॥ २२३ ॥ देवि ! यह गुरुगीता धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप चतुर्वर्ग प्रदान करती है, यह चिन्तामणिरूप: होकर चिन्तन किया हुआ अर्थ प्रदान करती है और सबै प्रकारके मकलोका कारण है इस कारण क्या शाक्त, क्या वैष्णव. क्या - श्रीगुरुगीता गुरुगीताऽम्भास स्नान तत्त्वज्ञः कुरुते सदा । योगयुञानचित्तानां गीतेयं ज्ञानवद्धिका ॥ २२॥ त्रितापतापितानाच जीवानां परमौषधम् । संसाराऽपारपायोधौ मज्जतां तरणिः शुभा ॥ २२७ ।। देशः शुद्धः स यत्राऽसौ गीता तिष्ठति दुर्लभा । तत्र देवगणाः सबै क्षेत्रपीठे वसन्ति हि ॥ २२८ ।। शुचिरेव सदा ज्ञानी गुरुगीताजपेन तु । तस्य दर्शनमात्रेण पुनर्जन्म न विद्यते ॥ २२९ ।। सत्यं सत्यं पुनः सत्यं निजधर्मो मयोदितः । गुरुगीतासमो नाऽस्ति सत्यं सत्यं वरानने ! ॥ २३ ॥ इति श्रीगुरुगीता समाप्ता। शैव, क्या गाणपत्य और क्या लौर्य, सब प्रकार के उपासकगण ही इसके पाठ-द्वारा सिद्धि प्राप्त करसक्ते हैं। तत्त्वज्ञानी मनुष्यगण, संसार- तापके विनाशार्थ और भव-दुःख-निवारणार्थ इस गुरुगीताल्प. तरङ्गिणीमें सदा स्नान किया करते हैं। यह गीता योगाभ्यासनिरत व्यक्तियोंके लिये ज्ञानवर्द्धिनी है ॥२२४-२२६ ॥ त्रितापतापित जीपों केलिये यह परम औपधरूपा है और संसार महासागर में डूबने वालोंके लिये यह शुभ नौका है ।। २२७ ।। यह सुदुलमा गुरुगीता जिस स्थानमें रहती है उस स्थानको परम पवित्र, लिंद्ध स्थान और पीठस्थान के तुल्य समझना उचित है; उस स्थानमें, सकल देवतांगण श्रीकर वास किया करते हैं ॥ २२ ॥ ज्ञानी मनुष्यगणे गुरुगीताको पाठ करके सदा पवित्र रहते हैं, ऐले. पवित्र मनुष्योंके र्शन करनेसे पुनः जन्म ग्रहण करना नहीं पड़ता है ॥ २२ ॥ हे. चारुमुखि ! मैं पुनः पुनः कहता हूं कि यह परमात्मरूप स्वधर्म जो मैंने तुम्हारे निकट वर्णन किया वह सत्य ही है; इस गुरुगीताके भी पदार्थ नहीं है, यह वाक्य सत्य सत्य ही --- . - । इति श्रीगुरुगीता समाप्ता। -- श्रीविश्यमायो जयति। धर्मप्रचारका सुलभ साधन। समाजकी भलाई ! मातृभाषाकी उन्नति !! . देशमयाका विराद आयोजन !!! इस समय देशका उपकार किन उपायोस हो सकता है ? संसा- पोल सरसे उस छोरतफ चाहे किसी चिन्नाशील पुगपसे यह प्रश्न कीजिये, रसर यही मिलेगा कि धर्मगायके प्रचारसंक्यिोकि भर्मन ही संसारको धारण कर रपमा । भारतवर्ष जिसी समय संसारका गृग था, आज वर अधापतित और दीन दीन दशामें क्यों पा रहा सफा भी उस यही है कि पद धर्मभायको सो प्रेमा। यदि हम भारतसे ही पूछे कि तू अपनी उन्ननिके लिये हम. से गया चाहता है ? तो पर यही उत्तर देगा कि मेरे प्यारे पुत्रो ! धर्ममाय की वृद्धि करो । संसारमें उत्पन्न होकर जो व्यक्ति कुछ मी सकार्य करनेको लिये उद्यत हुए हैं, उन्हें इस बातका पूर्ण अनु. भव किसे कार्यों में कैसे दिन और कैसी याधाएँ उपस्थित इसा करती हैं। यद्यपि धौर पुरष उनकी पर्वाह नहीं करते और : ययासम्मय उनसे जाम ही उठाते हैं, तथापि इसमें सन्देह नहीं कि माया में उन विघ्न राधाओंले कुछ हायट अवश्य ही हो . जाती है। श्रीभारतधर्म महामण्डल धर्मकार्य में इस प्रकार अनेक बाधा होने पर भी पद उस जनसाधारणका हित साधन करनेका सर्वशक्तिमान भगवान सुप्रनसर प्रदान कर दिया है। भारत सधार्मिग नहीं ६, हिन्मुजाति धर्मपा जाति है, उसके रोम- रोम में धर्मसंस्कार प्रोतप्रोत है। यह अपने रूपको-धर्म- भायज्ञो-भूता रही है। उसे अपने स्न्यो पहिवान करा देना- धर्मभान स्थिर रखनादी श्रीमानतधर्ममहामण्डलका एक पवित्र और प्रशान उदेश्य है। यह प्रार्य १६ वर्ग से महामण्डल कर रहा है और ज्यों की उलंज्ञो अधिनयर मिलेगा, त्यो साँप जोरशर से यह काम करेगा। सका विश्वास किसी । - ... •. . (२) उपायसे देशका सञ्चा उपकार होगा और अन्त में भारतं. पुनः 'अप गुरुत्वको प्राप्त कर सकेगा। इल उद्देश्य साधनके लिये सुलभ दो ही मार्ग हैं। (१) उपर्व शको द्वारा, धर्मप्रचार करना और (२) धर्मरहस्य सम्बन्ध मौलिक पुस्तकोंका उद्धार और प्रकाश करना । महामण्डलने प्रथा मार्गका अवलम्बन आरम्भले ही किया है और अब तो उपदेश महाविद्यालय स्थापित कर महामण्डलने वह मार्ग स्थिर. और परिष्कृत करलिया है । दूसरे मार्गके सम्बन्ध भी यथायोग्य उद्योग प्रारम्भसे ही किया जा रहा है। विविध ग्रन्थों का संग्रह और निर्माण करना, मासिक पत्रिकाओं का सञ्चालन करना, शास्त्रीय प्रन्योंक आविष्कार करना. इस प्रकारके उद्योग महामण्डलने फिये है और उनमें सफलता भी प्राप्त की है। परन्तु अभीतक यह कार्य संतोष जनक नहीं हुआ है । महामण्डलने अब इस विभाग को उन्नत कर का विचार किया है। उपदेशकों द्वारा जो धर्मप्रचार होता है। उस का प्रभाव चिरस्थायी होने के लिये उसी विषयकी पुस्तकोंक प्रचार होना परम आवश्यक है; क्योकि वक्ता एक दो चार जो कुल सुना देगा, उसका मनन विना पुस्तकोंका सहारा लिये नहीं है सकता। इसके सिवाय लब प्रकार के अधिकारियों के लिये एक वक्त कार्यकारी नहीं हो सकता। पुस्तकप्रचार द्वारा यह काम सहल ई जाता है । जिसे जितना अधिकार होगा, यह उतने ही अधिकारक -पुस्तकें पढ़ेगा और महामण्डल भी सब प्रकार के अधिकारियों में योग्य पुस्तके निर्माण करेगा। सारांश, देशको उन्नति के लिये, भारत गौरवकी रक्षाके लिये और मनुष्यों में मनुष्यत्व उत्पन्न करने के लिए महामण्डलने अवं पुस्तक प्रकाशन.. विभागको अधिक उन्नत कर नेका विचार किया है और उसकी लर्वसाधारणसे प्रार्थना है घि ये ऐसे सत्कार्य में इसका हाथ बटावें एवं इसकी सहायता कर अपनी ही उन्नति कर लेनेको प्रस्तुन हो जायें। : श्रीभारतधर्ममहामण्डल के व्यवस्थापक 'पूज्यपाद श्री १०८ स्वामी शानानन्द जी महाराजको 'सहायताले काशीके प्रसिद्ध विद्वा - नौके द्वारा सम्पादित होकर प्रामाणिक, सुबोध और सुदृश्यरूपसे - यह प्रन्थमाला निकलेगी। ग्रन्थमालांके जो ग्रन्थ छपकर प्रकाशित हो चुके हैं उनकी सूची नीचे प्रकाशित की जाती है। - -- 1 " - स्थिर ग्राहकों के नियम । (१)स समय इमारी प्राधमालामें निम्नलिखित अन्य प्रका- शित एम. - " मंत्रयोगतिमा (भाषानुवादसहित ) भक्तिदर्शन (भाषाभाष्यसदिन ) १) योगदर्शन (भाषामान्यसहित नूतन संस्करण) २) नवीन प्रियीण भारत १) देवीमीमांसावर्शन प्रथम भाग (भाषाभाष्यसदित) फलिघुगण ( भागनुवादसहित) उपश पारिजात (संस्थत ) गीतायली নাম মনে হয় १) सन्स गाना (भानुपादसहित): 111) गुरुगीना । भानुवादसहित नृननसंस्करण ) धर्मकल्पद्रुम प्रथम सगड २) द्वितीय खगड तुनीय खगम २) খ গয়ঃ २) पसम खराव २) पटसगट श्रीमद्भगवद्गीता प्रथम स्वगड (भाषामाग्यसहित) २) सूर्यगीता (भापानुवादसहित ) शम्भुगोता मापानुवादसहित) त्तिगाना (भावानुवादसहित) भीमगीता (भापानुवादसहित) 1) विष्णुगीना (भाषानुवादसहित ) (:) इनमें से जो कमसे कम ४) मूल्य की पुस्तके पूरे मूल्यमें खरीदेंगे अथवा स्थिर ग्राहक होनेफा चन्दा १) भेज देंगे उन्हें शेष और आगे प्रकाशित होनेवाली सव पुस्तके मूल्यमें दी जायंगी। (३) मिथर ग्राहकों को मालामें नथित होनेवाली हर एक 4 .

। पुस्तक खरीदनी होगी। जो पुस्तक इस विभाग द्वारा छापी जायगी वह एक विद्वानोको कमेटी द्वारा पसन्द करा ली जायगी। (४)हर एक ग्राहक अपना नम्बर लिखकर या दिखाकर हमारे कार्यालयसे अथवा जहाँ वह रहता हो वहां हमारी शाखा हो सो घहांसे, स्वल्प मूल्य पर पुस्तके खरीद सकेगा। (५)जो धर्मसभा इस धर्मकार्यमें सहायता करना चाहे और जो सज्जन इस ग्रन्थमालाके स्थायी ग्राहक होना चाहे घे मेरे नाम पत्र भेजनेकी कृपा करें। गोविन्द शास्त्री दुगवेकर, অথর হানুমায় শিখা श्रीभारतधर्ममहामण्डल प्रधान कार्यालय, जगतगंज, बनारस। . इस विभाग द्वारा प्रकाशित समस्त धर्मपुस्तकोंका विवरण । सदाचारसोपान । यह पुस्तक कोमखमति बालक बाहि- काओंकी धर्मशिक्षाके लिये प्रथम पुस्तक है। उर्दू धौर बंगला भाषामें इसका अनुवाद होकर छपचुका है और सारे भारतवर्ष इसकी बहुत कुछ उपयोगिता मानी गई है। इसकी पांच आवृत्तियां छपचुकी हैं। अपने बच्चोंको धर्मशिक्षाके लिये इस पुस्तकको हर एक हिन्दूको मँगवाना चाहिये । मूल्य-) एक आना। कन्याशिक्षासोपान । कोमलमति फन्याओंको , धर्मशिक्षा देने के लिये यह पुस्तक बहुत ही उपयोगी है। इस पुस्तकफी बहुत कुछ प्रशंसा हुई है। इसका बंगला अनुवाद छप चुका है। हिन्दु- मात्रको चपनी अपनी कन्याओकोधर्मशिक्षा देने के लिये यह पुस्तक मैंगवानी चाहिये। धर्मासोपान । यह धर्मशिक्षाविषयक बड़ी उत्सम पुस्तक है। पालकोको इस धर्मका साधारण शान मती भांति हो जाता मूल्य .

. । । - गये है। ( ५ ) यह पुस्तक क्या बालक बालिका, क्या वृद्ध स्त्री पुरुष, सबके लिये यहुत ही उपकारी है। धर्मशिक्षा पानेकी इच्छा करनेवाले सजन भवश्य इस पुस्तकको मँगाये। मूल्य 1) चार आना। प्रामचर्यलोपान । ब्रह्मचर्य्यवतकी शिक्षाके लिये यह ग्रन्थ बहुत ही उपयोगी है। सय ब्रह्मचारी प्राश्रम, पाठशाला और स्कूलों में इस प्रन्यकी पढ़ाई होनी चाहिये । मूल्य) राजशिक्षासोपान । राजा महाराजा और उनके कुमारीको धर्मशिक्षा देने के लिये यह ग्रन्थ बनाया गया है; परन्तु सर्वसाधा. रणकी धर्मशिक्षाके लिये भी यह ग्रन्थ यहुत ही उपयोगी है। इसमें सनातनधर्मके अज और उसके तत्त्व अच्छी तरह बताये मूल्य ३) तीन श्राना। साधनसोपान । यह पुस्तक उपासना और साधनशैलीको शिक्षा प्राप्त करने में पातही उपयोगी है । इसका चंगला अनुवाद भी छपचुका है। बालक बालिकाओंको पहलेहीले इस पुस्तकको पढ़ना चाहिये । यह पुस्तक ऐसी उपकारी है कि चालक और वृद्ध समानरूपसे इससे साधनविषयक शिक्षा लाभ कर सके हैं। मूल्य २) दो आना। शानसोपान । सनातनधर्मके शास्त्रोका संक्षेप सारांश इस प्रथम वर्णित है। लव शास्त्रोका कुछ विवरण लमझने के लिये प्रत्येक सनातनधर्मावलम्बीके लिये यह ग्रन्थ बहुत उपयोगी है। मूल्य।) चार आना। धर्मप्रचारसोपान ! यह ग्रन्थ धर्मोपदेश देनेवाले उपदेशक और पौराणिक पण्डितोंके लिये बहुतही हितकारी है। मूल्य ३) तीन आना। उपरि लिखित सय ग्रन्थ धर्मशिक्षाविषयक है इस कारण स्कूल, कालेजऔर पाठशालाओंको एकछे लेने पर कुछ सुविधा से मिल सकेंगे और पुस्तक विक्रेताओंको इनपर योग्य कमोशन दिया जायगा। उपदेशपारिजात । यह संस्कृत पद्यात्मक अपूर्व ग्रन्थ है। सनातनधर्म पया है, धर्मापदेश किसको कहते हैं,सनातनधर्मके सय शास्त्रों में क्या विषय हैं, धर्मवक्ता होने के लिये किन योग्यताओं के - होनेकी आवश्यकता है इत्यादि अनेक विषय इस ग्रन्थ में संस्कृत विद्वान्मानको पढ़ना उचित है. और धर्मवक्ता, धरोपदेशक, पौराणिक परिडत आदिके लिये तो यह ग्रन्थ सव 'समय : साथ रखने योग्य है। मूल्यं ॥).बाठ आना! इस संस्कृत ग्रन्थके अतिरिक संस्कृत भाषामें योगदर्शन, लांख्यदर्शन, दैवीमीमांसादर्शन आदि दर्शन सभाप्य, 'मन्त्रयोग- संहिता, हठयोगसंहिता, लययोगसंहिता, राजयोगसंहिता, हरिहर- ब्रह्मलामरस्य, योगप्रवेशिका, धर्मसुधाकर, श्रीमधुसूदनसंहिता आदि ग्रन्थ छप.रहे हैं और शीघ्रही प्रकाशित होनेवाले हैं। कल्किपुराण । कल्किपुराणका नाम लिने नहीं सुना है। वर्तमान समयके लिये यह बहुत हितकारी अन्धे है। विशुद्ध हिन्दी अनुवाद और विस्तृत भूमिका सहित यह अन्य प्रकाशित हुआ है। धर्मजिज्ञासुमात्रको इंस अन्धको पढ़ना उचित है। मूल्य १) एक रुपया। योगदर्शन | हिन्दीभाष्य सहित । इसप्रकारका हिन्दी भाष्य और कहीं प्रकाशित नहीं हुआ है । सब दर्शनों में योगदर्शन सर्ववादि. सम्मतं दर्शन है और इसमें साधनके द्वारा अन्तर्जगत्के सब विषयोंका प्रत्यक्ष अनुभव करादेनेकी प्रणाली रहने के कारण इसका पावन और भाष्य एवं टीका निर्माण वही सुचारु रूपने करसता है जो योग क्रियासिद्धांशका पारगामी हो । इल भाष्यके निर्माणमें पाठक उत्त.. विषयकी पूर्णता देखेंगे । प्रत्येक सूत्रका भाष्य प्रत्येकं सूत्रके श्रादि में भूमिका देकर ऐसा क्रमबद्ध शनादिया गया है कि जिससे पाकोको मनोनिवेश पूर्वक पढ़ने पर कोई असस्वद्धता नहीं मालूम होगी और ऐसा प्रतीत होगा कि महर्षि सूत्रकारने जीवोंके कमाभ्युदा और निश्रेयलके लिये मानो एक महान् राजपथ निर्माण कर दिया है। इसका द्वित्तीय संस्करण छपकर तयार है, इसमें इस सांयको और भी सुस्पष्ट परिवर्द्धित और सरल किया गया है। मूल्य २) रुपया। नवीन दृष्टिमें प्रवीण भारत । भारतके 'प्राचीन. गौरव और आर्यजातिका महत्त्व जानने के लिये यह एक ही पुस्तक है। मूल्य १) एक रुपया। .. - , , । ..

( ७ ) श्रीभारतधर्ममहामण्डलरहस्य । इस ग्रन्थमें सात अध्याय हैं । यथा-आर्यजातिको दशाका परिवर्तन, चिन्ताका कारण, व्याधिनिर्णय, औषधिप्रयोग, सुपथ्यसेवन, वीजरक्षा और महायज्ञ- साधन । यह ग्रन्धरल हिन्दूजातिकी उन्नतिके विपयका असाधारण ग्रन्थ है । प्रत्येक सनातनधर्मावलम्बीको इस ग्रन्थको पढ़ना चाहिये । द्वितीयावृत्ति छप चुकी है, इसमें बहुतसा विषय बढ़ाया गया है । इस ग्रन्थका आदर सारे भारतवर्ष में समान रूपसे हुआ है। धर्मके गूढ़ तत्व भी इसमें यहुन अच्छी तरह से बताये गये । इसका बंगला अनुवाद भी छप चुका है । मूल्य १) एक रुपया । निगमागमचन्द्रिका । प्रथम और द्वितीय भागकी दो पुस्तके धर्मानुरागी सजनोंको मिल सकती हैं। प्रत्येक का मूल्य १) एक रुपया । पहले के पाँच सालके पाँच भागों में सनातनधर्म के अनेक गूढ़ रहस्यसम्बन्धी ऐले २ प्रवन्ध प्रकाशित हुए हैं कि आजतक वैसे धर्मसम्बन्धी प्रयन्ध और कहीं भी प्रकाशित नहीं हुए हैं । जो धर्मके अनेक रहस्य जानकर तृप्त होना चाहे वे इन पुस्तकोंको मँगाये। मूल्य पांचो भागों का २॥) रुपया। भक्तिदर्शन । श्रीशाण्डिल्यसूत्रों पर बहुत विस्तृत हिन्दी भाष्यसहित और एक अति विस्तृन भूमिकासहित यह ग्रन्थ प्रणीत हुश्रा है। हिन्दीका यह एक अलाधारण ग्रन्थ है। ऐसा भक्तिसम्ब- न्धी अन्य हिन्दीमें पहले प्रकाशित नहीं हुआ था । भगवद्भक्तिके विस्तारित रहस्योंका ज्ञान इस ग्रन्थके पाठ करनेले होता है। भक्तिशालके समझने की इच्छा रखनेवाले और श्रीभगवान्में भक्ति करने वाले धार्मिकमानको इस ग्रन्थको पढ़ना उचित है। मूल्य १) गीतावली । इसको पढ़नेसे लङ्गीतशास्त्रका मर्म थोड़े ही समझमें आसकेगा। इसमें अनेक अच्छे अच्छे भजनोका भी संग्रह है। सङ्गीतानुरागी और भजनानुरागियोंको अवश्य इसको लेना चाहिये। मूल्य ॥) पाठ आना। मन्त्रयोगसंहिता । योगविषयक ऐसा अपूर्व अन्य माज तक प्रकाशित नहीं हुआ है। इसमें मन्त्रयोगके १६ अङ्ग और क्रमशः उनके लक्षण, साधनप्रणाली आदि सब अच्छीतरहसे वर्णन किये . 1 - । । - गये हैं। गुरु और शिष्य दोनों ही इससे परम लाभ उठा सकते हैं। इसमें मंत्रोका स्वरूप और उपास्यनिर्णय बहुत अच्छा किया गया । घोर अनर्थकारी साम्प्रदायिक विरोध के दूर करने के लिये यह एकमात्र ग्रन्थ है। इसमें नास्तिकोंके मूर्तिपूजा, मन्त्रसिद्धि आदि विषयों में जो प्रश्न होते हैं उनका अच्छा समाधान है। मूल्य १) एक रुपयासान। तत्त्ववोध । भाषानुवाद और वैज्ञानिक टिप्पणी सहित । यह मूल ग्रन्थ श्रीशङ्कराचार्यकृत है । इलफा वंगानुवाद भी प्रकाशित हो चुका है। मूल्य =) दो आना। देवीमीयांसा दर्शन प्रथम भाग । वेदके तीन काण्ड हैं। यथा:-कर्मकाण्ड, उपासनाकारटं और शानकारड' । शान काण्डका बेदान्त दर्शन, कर्मकाण्ड का जैमिनी दर्शन, और भरद्वाज दर्शन और उपासनाकाण्ड का ग्रह अङ्गिरा दर्शन है। इसका नाम वैवी मीमांला दर्शन है। यह अन्य आज तक प्रकाशित नहीं हुआ था। इसके चार पाद हैं. यथा:-प्रथम रसपाद, इस पाद में भकिका विस्तारित विज्ञान वर्णित है। दूसरा सृष्टिपाद, तीसरा स्थिति पाद और चौथा लयपाद, इन तीनों पादोंमें देवीमाया; देवताओके भेद; उपासनाका विस्तारितं वर्णन और भक्षि और उपासनाले मुक्तिकी प्राप्तिकालय कुछ विज्ञान पर्णित है। इस प्रथम भागमै इस दर्शन शालके प्रथम दो पाद हिन्दी अनुवाद और हिन्दी भाष्यसहित प्रकाशित हुए हैं। मूल्य १॥) डेढ़ रुपया। श्रीभगवद्गीता' प्रथमरखण्ड ।' श्रीगीताजीक्षा अपूर्व हिन्दी भाष्य यह प्रकाशित हो रहा है जिसका प्रथम खण्ड, जिसमें प्रथम अध्याय और द्वितीय अध्याय का कुछ हिस्सा है प्रकाशित हुआ है। आज तक श्रीगीताजी पर अनेक संस्कृत और हिन्दी भाष्य प्रकाशित हुए हैं परन्तु इस प्रकारका भाष्य आज तक किसी भाषामें प्रका शित नहीं हुआ है । गीताका अध्यात्म, अधिदैव, अधिभूतरूपी त्रिविध स्वरूप. प्रत्येक श्लोकका विविध अर्थ. और सब प्रकारक अधिकारियों के समझने योग्य गीता-विज्ञानका विस्तारित विवरण इस भाष्यमें मौजूद है। . मूल्य: १). एक रुपया मैनेजर, निगमागम बुकडिपो, महामण्डलभवन, जगतगंज, बनारस सप्त गीताएँ। पञ्चोपासनाके अनुसार पाँच प्रकारके उपासकों के लिये पांच गीताएं-श्रीविष्णुगीता, श्रीसूर्यगीता, श्रीशक्तिगीता, श्रीधीशगीता और श्रीशम्भुगीता एवं सन्न्यासियों के लिये लन्यालगीता और साधकों लिये गुरुगीताभापानुपाद सहित छप चुकी हैं।श्रीभारतधर्म महामण्डलने इन सातगीताओका प्रकाशन निग्न लिखित उद्देश्योसे किया है-म, जिस साम्प्रदायिक विरोधने उपासफोको धर्मके नामसे ही अधर्म हञ्चित करनेकी अवस्थामै पहुंचा दिया है, जिस साम्प्रदायिक विरोधने उपासकोंको अहंकारत्यागी होने के स्थानमै घोर साम्प्रदायिक अहंकारसम्पन्न बना दिया है, भारतकी वर्तमान दुर्दशा जिस साम्प्रदायिक विरोधका प्रत्यक्ष फल है और जिस साम्प्र. दायिक विरोधने साकार-उपासकोंमें घोर द्वषदावानल प्रज्वलित कर दिया है उस साम्प्रदायिक विरोधका समूल उन्मूलन करना और य, उपासनाके नामसे जो अनेक इन्द्रियासक्तिकीचरितार्थता. के घोर अनर्थकारी कार्य होते हैं उनका समाजमें अस्तित्व न रहने देना तथा ३ य, समाजमे यथार्थ भगवद्भक्तिके प्रचार द्वारा इह- लौकिक और पारलौकिक अभ्युदय तथा नियस-प्राप्तिम अनेक सुपिंधाधोका प्रचार करना। इन सातो गीताओं में अनेक दार्शनिक । तत्व, अनेफाउपासनाकाण्डके रहस्य और 'प्रत्येक उपास्य देवकी उपासनाले सम्बन्ध रखनेवाले विषय सुचारुरूपले प्रतिपादित विये गये हैं। ये सातों गीताएं उपनिषद्प हैं । प्रत्येक उपासक अपने उपास्यदेवकी गीतासे तो लाभ उठावेगा ही, किन्तु, अन्य चार गीताओंके पाठ करने भी वह अनेक उपासनातत्त्वोको तथा अनेक वैज्ञानिक रहस्योको जान लगा और उसके अन्तःकरणमें प्रचलित साम्प्रदायिक ग्रन्थोंसे जैला विरोध उदय होता है वैसा नहीं होगा और वह परमशान्तिका अधिकारी हो सकेगा। सन्न्यास गीतामें सब सम्प्रदायोंके साधु और सन्यासियों के लिये सर्व जानने योग्य विषय सन्निविष्ट हैं | सन्यासिगण इसके पाठ करनेसे विशेप ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे। गृहस्थोंके लिये भी यह अन्ध धर्म- शानका भाण्डार है। श्रीमहामण्डलप्रकाशित गुरुगीताके सरश अन्य आज सक फिली भाषा प्रकाशित नहीं हुआ है। इसमें गुरु शिष्य .. 4 . (१०) लक्षाण, उपासनाका रहस्य और भेद, मन्त्र हठ लय और राजयोगों लक्षण और अन्ग एवं गुरुमाहात्म्य; शिष्यफर्तव्य, परम 'वत्त्वका स्वरूप और गुरुशब्दार्थ आदि सब विषय स्पष्टरूपसे हैं । मूल, स्पष्ट सरल और सुमधुर भापानुवाद और वैज्ञानिक टिप्पणी सहित यह ग्रन्थ छपा है। गुरु और शिष्य दोनोंका उपकारी यह ग्रन्थ है। इसका अनुवाद वंगभाषामें भी छप चुका है। पाठक इन सातों गीताओको मंगाकर देख सकते हैं, ये छप चुकी हैं । विष्णुगीताका मूल्य ।।) सूर्यगीताका मूल्य ||) शक्तिगीताका मूल्य ॥) धीशगीताका मूल्य ॥) शंभुगीताका मूल्य ॥) सल्यालगीताका मूल्य ) और गुरुगीताका मूल्य ।) हैं । इनमेसे पञ्चोपासनाकी आंचगीताओं में एक एक तीनरंगा विप्णुदेव सूर्यदेव भगवती और गणपतिदेव तथा शिवजीका चित्र भी दिया गया है। मैनेजर, निगमागम बुकडिपो, महामण्डलभवन, जगत्गंज बनारस . धार्मिक विश्वकोषं । (श्रीधर्मकल्पद्रुम.) यह हिन्दूधर्मका अद्वितीय और परमावश्यक अन्य है.। हिन्दू जातिकी पुनरुवतिके लिये जिन जिन श्रावश्यकीय विषयोंकी जरूरत है उनमें से सबसे बड़ी भारी ज़रूरत एक ऐसे धर्मग्रन्थकी थी कि जिसके अध्ययन-अध्यापनके द्वारा सनातन धर्मका रहस्य और उसका विस्तृत स्वरूप तथा उसके अझ, उपांगोका यथार्थ ज्ञान प्राप्त हो सके और साथही साथ नेदो और सच शानोंका आशय तथा वेदों और सब शास्त्रोम कहे हुए विज्ञानोंका याकाम स्वरूप जिज्ञासुको भलीभाँति विदित हो सके। इसी गुरुतर' अभावको दूर करने के लिये भारतके प्रसिद्ध धर्मवक्ता और श्रीभारतधर्म महामण्डलस्थ उपदेशक महाविद्यालयके दर्शनशास्त्र अध्यापक श्रीमान् स्वामी दयानन्दजीने इस ग्रन्थका प्रणयन करना प्रारम्भ किया है। इसमें वर्तमान समयके भालोच्य 'सभी विषय विस्तृत- रूपसे दिये जायंगे। अबतक इसके छः खण्डोमै जो अध्याय , - . - - प्रकाशित हुए है वे ये है:-धर्म, दानधर्म, तपोधर्म, फर्मयज्ञ, उपासनायज्ञ, शानयक्ष, महायश, वेद, वेदाङ्ग, दर्शनशास्त्र (वेदोपाङ्ग) स्मृतिशास्त्र, पुराणशास्त्र, तन्त्रशाल, उपवेद, ऋपि और पुस्तक, . साधारण धर्म और विशेष धर्म, वर्णधर्म, आश्रमधर्म, नारी- धर्म ( पुरुषधर्मसे नारीधर्मकी विशेषता), आर्य जाति, समाज और नेता, राजा और प्रजाधर्म, प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्म, सापद्धर्म, भक्ति और योग, मन्त्रयोग, हठयोग, लययोग, राजयोग, गुरु और दीक्षा, वैराग्य और साधन, आत्मतत्व, जीवतत्त्व, प्राण और पीठतत्त्व, सृष्टि स्थिति प्रलयतत्व, ऋपि देवता और पितृतत्त्व अवतारतत्त्व, मायातत्व, त्रिगुणतत्त्व, विभावतत्त्व, कर्मतत्त्व, मुक्ति तत्त्व, पुरुषार्थ और वर्णाश्रमलमीक्षा, दर्शनसमीक्षा, धर्मसम्प्रदाय- समीक्षा, धर्मपन्थसमीक्षा और धर्ममतसमीक्षा । आगे बण्डों में 'प्रकाशित होनेवाले अध्यायों के नाम ये हैं:-साधनसमीक्षा, चतुर्दशलोकसमीक्षा, कालसमीक्षा; जीवन्मुक्ति-समीक्षा, सदाचार, पञ्च महायज्ञ, आनिरुकृत्य, पोडश संस्कार, श्राद्ध, प्रेतत्व और परलोक, सन्ध्या तर्पण, ओंकार-महिमा और गायत्री, भगवन्नाम माहात्म्य, वैदिक मन्त्रों और शास्त्रोका अपलाप, तीर्थ. महिमा, सूर्यादिग्रह-पूजा, गोलेवा, संगीत-शास्त्र, देश और धर्म सेवा इत्यादि इत्यादि । इस ग्रन्थसे आनफलके अशास्त्रीय और विज्ञान रहित धर्मग्रन्यों और धर्माप्रचारके द्वारा जो हानि हो रही वह सब दूर होकर यथार्थ रूपसे सनातन वैदिक धर्मका प्रचार होगा। इस ग्रन्थरतमें साम्प्रदायिक पक्षपातका लेशमात्र भी नहीं है और निष्पक्षरूपसे लप विषय प्रतिपादित किये गये हैं जिससे सकल प्रकारके अधिकारी कल्याण प्राक्ष कर सकें। इसमें और भी , एफ विशेषता यह है कि हिन्दूशास्त्रके सभी विज्ञान शास्त्रीय प्रमाणों और युक्तियोंके सिवाय, आजकलकी पदार्थ विद्या ( Science ) के द्वारा भी प्रतिपादित किये गये हैं जिलले आजकलके नवशिक्षित पुरुष भी इससे लाभ उठा सकें। इसकी भापा सरल, मधुर और गम्भीर है। यह अन्य चौसठ अध्याय और पाठ समुल्लासोंमें पूर्ण होगा और यह वृहत् ग्रन्थ रायल साइजके चार हजार पृष्ठोसे अधिक होगा तथा बारह खण्डौमें प्रकाशित होगा। इसी के अन्तिम खण्डमें आध्यात्मिक शब्दकोष भी प्रकाशित करनेका विचार है।

इसके छः सण्ड प्रकाशित हो चुके हैं। प्रथम खण्डका मूल्य २), विचीय का१॥), तृतीयकार), चतुर्थकार), पंचमकार) और पाठवा) है। इसके प्रथम दो खण्ड पढ़िया कागज पर भी छापे गये हैं और दोनों ही एक बहुत सुन्दर जिल्द में पांधे गये हैं। मूल्य ५) जासचा खराड यन्त्रस्थ है। मैनेजर, निगमागम बुक्डीपो, महामण्डलभवन, जगतगंज, बनारस । अंग्रेजी भाषाके धर्मग्नन्थ । . श्री भानधर्म महामण्डल शास्त्रप्रकाश विभाग द्वारा प्रकाशित सब संहिताओं, गीताओं और दार्शनिक ग्रन्थोंका अंग्रेजी अनुवाद तयार हो रहा है जो फ्रमणः प्रकाशिग होगा । सम्प्रति अंग्रेजी भाषामें एक ऐसा ग्रन्थ छप गया है जिसके द्वारा रूय अंग्रेजी पढ़े व्यक्तियों को सनातन धर्मका महत्व. उसका सर्वजीवहितकारी स्वरूप, उसके सब बहोका रहस्य, उपासनातरव, योगनत्व, कात और सृष्टितत्व, फर्मतत्त्व, वर्णाश्रमधर्मतत्व इत्यादि सब बड़े बड़े विषय अच्छी तरह समझमे आजावें । इसका नाम. ध इटरनल रिलिजन है। इसका मूल्य रायलएडीशनका ५) और साधारणफा३) । जिल्द बंधी हुई हैं और दोनों में सात निवर्ण चित्र भी दिये हैं। भैनेजर, निगमागम बुडीपो महामण्डलभवन, जगतगंज, बनारस । * The World's Eternal Religion. A Uniquo work on Hinduism in one volume, containing 24 Chapters with tri-colour illustrations, glossary. eto. No work has bitherto appeared in English that gives in a suggostive manner the val oxpositon of the Hindu religion iu all its plasus. This book bas perfcotly supplied of long-felt want. The names of the . (.१३ ) elhapters are as followst- 1. Fon-rord, 2. jniversal Religion, 3. Classification of Religion, 4. IAK of Karina, 5. Worship in all it: phases, 6. Protico of Yoga through Mantras, 7. Practice of Yoga ilurougla puysical exercise, 8. Practicc of Yoga through finor force of Nature. 9. Yoga throngle power of reasoniug. 10. The Mystic Circle. 11. Love and Pryorion, 12. Planos of Knowledge, 13. Time, sunco, arcation. 14. Tho Ocvult frorla, 25. Erolution and Reincarnation, 16. Hinda Philosophy, 17. The System of caster and stages of Life, 18. Foman's Dharinn, 19. Image Worship, 29. The great Sacrifices, 21. Hindu Scriptares, 22, Liboration, 23. Eduention,24. Reconciliation of all Roligions.--The followers of all religions in the world will profit. by the light the work is intended 10 give. Price oloth hoanu, suprrior edition, Rs. 5, postage natra. Apply to the Manager, Nigamagnm Book Depot, dabwinnnat Buildings, Jagatganj, Bename, विविध विषयों की पुस्तकें। असभ्यरमणी ) अनार्यसमाजरहस्य B) अन्त्येष्टिकिया ।) 'आनन्न रघुनन्दन नाटक 1) श्राचारप्रवन्ध १) इलिशप्रामर ।) उपन्यास कुम :) एकान्तवासी गांगी) कलिकपुराण उर्दू) कार्तिकप्रसादकी जीवनी) फाशीमुक्ति विवेका)गोवंशचिकित्सा). गोगीतापली-) ग्वीसेफमेजिनी 1) जैमिनीसूत्रा) तर्कसंग्रहा-)दुर्गेश- नन्दिनी द्वितीय भागादेवपूजन) देशीकरघा ॥) धनुर्वेद संहिता) गधीन रत्नाकर मजनावली ) न्याय दर्शन--पारिवारिक प्रवन्ध १) प्रयाग महात्म्य ॥2) प्रवासी =) धारदमासी -) बालहित -)॥ भक्तसर्वस्व ) भानगोरक्षाप्रकाश मजरी ) मागल भजी) मेगास्थनीजका भारतवर्षाय वर्णन ) माखदेव पराजय ) रागरत्नाकर २) रामगीता ) राशिमाला ॥ पसन्तटार :) पारेन्डेस्टिनकी जीवनी १) धीग्धाला वैष्णवरहस्य ॥ शारीरिक- भाष्य । शालीजीके दो व्याख्यान ) सारमबरी) सिमान्तकौमुदी २)सिदान्तपटल) सुजान चरित्र २) सुनारी) सुरोष माकरण।)

- - (१४ ) सुश्रुत संस्कृत ३) संध्यावन्दन भाष्य ॥) हनुमज्ज्योतिष' =) हनुमान- चालीसा) हिन्दी पहिली किताब ) क्षत्रियहितैपिणी ।) नोट-पचीस रुपयोंसे आधिककी पुस्तक खरीदनेवालेको योग्य कर्माशन भी दिया जायगा। शीघ्र छपने योग्य ग्रन्थ । हिन्दी साहित्यकी पुष्टिके अभिप्रायले तथा धर्मप्रचारकी शुभ वासनासे निम्नलिखित ग्रन्थ क्रमशः हिन्दी अनुवाद सहित छापनेको तैयार हैं। यथा:-भाषानुवाद सहित हठयोग संहिता, सरद्वाजकृत कर्ममीमालादर्शनके भाषाभाष्य- का प्रथम खण्ड और सांख्यदर्शनका भाषाभाष्य । मैनेजर, निगमागम युडीपो, महामण्डलभवन, जगत्गंज. बनारस श्रीमहामण्डलका शास्त्रमकाशविभाग । यह विभाग बहुत विस्तृत है । अपूर्व संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेजीफी पुस्तके काशी प्रधान कार्यालय (जगत्गंज) में मिलती हैं । बंगला सिरीज कलकत्ता दफ्तर(श्चहूबाजारस्ट्रीट) में और उर्दूसिरीज फीरोजपुर ( पक्षाब) दफ्तर में मिलती है और इसी प्रकार अन्यान्य प्रान्तीय कार्यालयों में प्रान्तीय भाषाओंके अन्यों का प्रबन्ध होरहा है। सेक्रेटरी श्रीभारतधर्म महामण्डल, जगत्गंज बनारस। श्रीमहामण्डलस्थ उपदेशक-महाविद्यालय । श्रीभारतधर्ममहामण्डल प्रधानकार्यालय काशी में साधु और गृहस्थ धर्मवक्ता प्रस्तुत करनेके अर्थ श्रीमहामण्डल- उपदेशक महाविद्यालय नामक विद्यालय स्थापित हुश्रा है। जो साधुगण दार्शनिक और धर्मसम्बन्धी झान लाभ करके अपने साधु- जीवनको कृतकृत्य करना चाह और जो विद्वान् गृहस्थ धार्मिक शिक्षा ताम करके धर्मप्रचार द्वारा देशकी सेवा करते हुए अपना जीवन निर्वाह करना चाहे वे निम्नलिखित पते पर पत्र भेजें। प्रधानाध्यक्ष, श्रीभारतधर्ममहामण्डल प्रधान कार्यालय, जगत्गंज, बनारस (छावनी)। - - , . .

( १५ ) श्रीभारतधर्म महामण्डल में नियमित धर्म चर्चा श्रीभारतधर्म महामण्डल धर्मपुरुषार्थ में जैसा अग्रसर हो रहा . है, सर्वत्र प्रसिद्ध है । मण्डल के अनेक पुरुषार्थों में 'उपदेशक महा- विद्यालय की स्थापना भी गणना करने योग्य है। अच्छे धार्मिम .. वको इसमें निर्माण हुए, होते हैं और होते रहेंगे ऐसा इसका प्रवन्ध हुआ है। अब इसमें दैनिक पाठ्यक्रम के अतिरिक्त यह भी प्रबन्ध हुआ है कि रात्रि के समय महीने में दस दिन व्याख्यान शिक्षा, दल दिन शास्त्रार्थ शिक्षा और दस दिन सङ्गीत शिक्षा भी दी जाया करे। वक्तृता के लिये संगीत का सांधारण शान होना आवश्यक है और इस पञ्चम वेदका'(शुद्ध सङ्गीत का) लोप हो रहा है। इस कारणं : व्याख्यान और शास्त्रार्थ शिक्षा के लार्थ सङ्गीत शिक्षा का भी समा. वेश किया गया है। सर्व साधारण भी इस धर्म चर्चा का यथा समय उपस्थित होकर लाभ उठा सकते हैं। निवेदक सेक्रटरी महामण्डल, जगत्गंज बनारस। हिन्दूधार्मिक विश्वविद्यालय । (श्री शारदासण्डल) हिन्दू जातिकी विराट् धर्मसभा श्रीभारतधर्म महामण्डलको यह विद्यादान विभाग है। वस्तुतः हिन्दूजातिके पुनरभ्युदय और ': 'हिन्दूधर्मको शिक्षा सारे भारतवर्ष में फैलाने के लिये यह विश्व- विद्यालय स्थापित हुआ है। इसके प्रधानतः निम्न लिखित थाँच कार्य विभाग हैं। (१) श्री उपदेशक महाविद्यालय (हिन्दू कालेज ओफ दिवि निटी) इस महाविद्यालयके द्वारा योग्य धर्मशिक्षक और धर्मों पदेशक तयार किये जाते हैं । अंग्रेजी भाषाके बी. ए. पास अधयो संस्कृत भाषा के शास्त्री आचार्य आदि परीक्षाओंकी योग्यता रखने -- 3 । चाले परिडत ही छान रूपसे इस महाविद्यालयमें भरती किये जाते है। छात्रवृत्ति २५) माहवार तक दी जाती है। (२) धर्मशिक्षाविभाग | इस विभाग द्वारा भारतवर्ष के प्रधान प्रधान नगरों में ऊपर लिखित महाविद्यालय में परीक्षोत्तीर्ण एक एक पण्डित स्थायीरूपले नियुक्त करके उक्त नगरोके स्कूल, कालेज. और पाठशालाओमें हिन्दूधर्मको धार्मिक शिक्षा देनेका प्रपन्न किया जाता है। परिडतगण उन नगरों में सनातनधर्म का प्रचार भी करते रहते हैं। ऐसा प्रवन्ध किया जा रहा है कि जिससे महामण्डलके प्रयत्लसे सब बड़े बड़े नगरों में इस प्रकार धर्म केन्द्र स्थापित हो और यहाँ मालिक सहायता भी श्री महामण्डलको ओरसे दी जाय। (३) श्री आर्यमदिलामहाविद्यालय सी इसी शारदामरावका अंग समझा जायगा.और इस.. महाविद्यालयमें उच्च जातिकी, विधवाओं के पालन पोषपाका पूरा प्रबन्ध करके उनको योग्य धर्मो- पदेशिका, शिक्षयित्री और गवर्नेस आदिके काम करनेके 'उपयोगी बनाया जायगा। (४) सर्वधर्मसदन (हाल आफ श्राल रिलिअन्त) इस नामसे यूरोप-महायुद्ध के स्मारक रूपए फ संस्था स्थापित फरनेका प्रबन्ध हो रहा है । यह संस्था श्रीमहामण्डल के प्रधान कार्यालय तथा उपदेशक महाविद्यालयके निकट ही स्थापित होगी। इस संस्थाके एक ओर सनातन धर्मके अतिरिक्त सब प्रधान.२.. धर्ममतोके उपासनालय रहेगे जिनमें उक्त धम्मोंके जाननेवाले एक एक विज्ञान रहेगे। दूसरी ओर सनातनधर्मके पोपासनाके घाँच देवस्थान और नीलाविग्रह उपासना आदि देवमन्दिर रहेंगे। इली संस्थामै एक वृहत् पुस्तकालय रहेगा कि जिसमें पृथिवीं भरके सब धर्ममतोके धर्मग्रन्थ रखे जायंगे और इसी संस्थाले संश्लिष्ट एक व्याख्यानालय और शिक्षालय (हाल)रहेगा जिसमें उक्त विभिन्न धम्मों के विद्वान् नथा सनातन धर्म के विद्वान्गण यथाक्रम ध्याख्यानादि देकर धर्मलम्बधीय अनुसन्धान तथा धर्मशिक्षा कार्यकी सहायता करेंगे। यदि पृथिवीके अन्य देशोले कोई विज्ञान काशी में आफर इस सर्वधर्मासदन दार्शनिक शिक्षा : लाभ करना প্রায় ৪া দ্বন্ত ঋী চাঞ্চল্প।

. (.१७ ) (५) शास्त्र प्रकाश विभाग। हल विभागका कार्य स्पष्टही है इस विभागसे धर्मशिक्षा देने के उपयोगी नाना- भाषाओंकी पुस्तके तथा सनातनधर्मकी सव उपयोगी मौलिक पुस्तके प्रकाशित हो रही है और होगी। इस प्रकारसे पाँच कार्यविभाग और संस्थाओं में विभक्त होकर श्री शारदामण्डल सनातनंधम्मावलम्बियोंकी सेवा और.' उन्नति करने में प्रवृत्त रहेगा। प्रधानमंत्री श्रीभारतधर्म महामण्डल प्रधान कार्यालय, बनारस। श्रीमहामण्डलके सभ्योंको- विशेष सुविधा। हिन्दू समाजकी एकता और सहायताके लिये विराट् आयोजन। श्रीभारतधर्ममहामण्डलं हिन्दू जातिको अद्वितीय धर्ममहा. : सभा और हिन्दू समाजकी उन्नति करने वाली भारतवर्षके सफल प्रान्त व्यापी संस्था है। श्रीमहामण्डलके सभ्य महोदयोंको केवल धर्म शिक्षा देना ही इसका लक्ष्य नहीं है, किन्तु हिन्दू समाजको उन्नति, हिन्दूसमाजकी दृढ़ता और हिन्दू समाज पारस्परिक प्रेम और सहा यताकी वृद्धि करना भी इसका प्रधान लक्ष्य है इस कारण निम्नलि- खित नियम श्रीमहामण्डलकी प्रबन्ध-कारिणी सभागे बनाये हैं। इन नियमों के अनुसार जितने अधिक संख्यक सभ्य महामण्डलमें सिम्मिलित होगे उतनी ही अंधिक सहायता महामण्डलके सभ्य महोदयोको मिल सकेगी। ये नियम पेसे सुगम और लोकहितकर बनाये गये हैं कि श्रीमहामण्डलके जो सभ्य होंगे उनके परिवारको बड़ी भारी एककालिक दानकी सहायता प्राप्त हो सकेगी। वर्तमान हिन्दूसमाज जिस प्रकार दरिद्र होगया है उसके अनुसार श्रीमहा. मण्डलके ये नियम हिन्दू समाज के लिये बहुत ही हितकारी हैं इसमें सन्देह नहीं। . ।

. , श्रीमहामण्डलके मुखपत्र सम्बन्धी उपनियम । (2) धर्मशिक्षाप्रचार, "सनातनधर्मचर्चा, सामाजिकउन्नति, सद्विद्याविस्तार, श्रीमहामण्डलके काय्याके .,समाचारोंकी प्रसिद्धि और लभ्योको यथासम्भव सहायता पहुँचाना श्रादि लक्ष्य रखकर श्रीमहामण्डलके प्रधान कार्यालय द्वारा भारत के विभिन्न प्रान्ती.. में प्रचलित देशभाषाओं में मासिकपलं'. नियमितरूपसे प्रचार किये जायेंगे। (२) भी केवल हिन्दी और अंगरेजी-इन दो भाषाओंके दो मासिकपत्र प्रधान कार्यालयले प्रकाशित हो रहे हैं । यदि इन नियमोके अनुसार कार्य करने पर विशेष सफलता और सभ्योंकी विशेष इच्छा पाई जायगी तो भारतके विभिन्न प्रान्तोंकी देश भाषाओं में भी क्रमशः मासिकपन प्रकाशित करनेका विचार रक्ता गया है । इन मासिकपत्रों में से प्रत्येक मेंम्बरको एक 'एक मासिक- जो वे चाहेंगे, बिना मूल्य दिया जायगा । कमसे कम दो हजार लभ्य महोदयगण जिस भाषाका मासिक पत्र चाहेंगे, उसी भापाम. मालिकपन प्रकाशित करना प्रारम्भ कर दिया जायगा, परन्तु जबतक उल भाषाका मासिकपत्र प्रकाशितं न हो तब तक...श्रीम. हामण्डलका हिन्दी अथवा अंगरेजीका मासिकपा विनामूल्य दिया जायगा। (३) श्रीमहामण्डलके साधारण सभ्योको वार्षिक दो रुपये. चन्दा देने पर इन नियमोंके अनुसार सब सुविधाएँ प्राप्त होगी। श्रीमहामण्डलके अन्य प्रकार के लभ्य जो धर्मोन्नति और हिन्दु समाजकी सहायताके विचारले अथवा अपनी सुविधाके विचारसे इस विभागमै स्वतन्त्र रोसिसे कमसे कम दो रुपये वार्षिक नियमित चन्दा देगे वे भी इस कार्य विभागकी संब सुविधाएँ प्राप्त कर सकेंगे। (४) इस विभागके रजिस्टरदर्ज सभ्योको श्रीमहामण्डलके अन्य प्रकारके सभ्योंकी रीतिपर श्रीमहामण्डले सम्बन्धयुरू. सव पुरुसकादि अपेक्षाकृत स्वल्प मूल्य पर मिला करेंगी। समाजहितकारी.कोष (यह कोष श्रीमहामण्डलंके सब प्रकारके सभ्योके जो इसमें "- - सम्मिलित होंगे-निर्वाचित व्यक्तियोको आर्थिक सहायताके लिये खोला गया है) (५)जो सभ्य नियमित प्रतिवर्ष चन्दा देते रहेंगे उनके देहान्त होने पर जिनका नाम ये दर्ज करा जायंगे, श्रीमहामण्डल के इस को द्वारा उनको आर्थिक सहायता मिलेगी। (६)जो मेम्बर फमसे कम तीन वर्ष तक मेम्बर रहकर लाफा- न्तरित हुए हो, फेवल उन्हीं के निर्वाचित व्यक्तियोको इस समाज- हितकारी कोपकी सहायता प्राप्त होगी, अन्यथा नहीं दी जायगी। (७) यदि कोई सय महोदय अपने निर्वाचित व्यक्ति नामको श्रीमहामण्डलप्रधान कार्यालयके रजिस्टर में परिवर्तन कराना चाहेंगे तो ऐसा परिवर्तन एफवार विना किसी व्ययक किया जायगा । उसके बाद वैसा परिवर्तन पुनः कराना चाहे तो।) भेजकर परि. वर्तन करा सकेंगे। :: (८) इस विभागमें साधारणसभ्यों और इस.फोषफे सहायक अन्यान्य सभ्योंकी भोरसे प्रतिवर्ष जो भामदनी होगी उसका आधा अंश श्रीमहामण्डलके छपाई-विभागको मासिक पत्रों की छपाई और प्रकाशन आदि कार्यके लिये दिया जायगा। बाकी आधा रुपया एक स्वतन्त्र फोप में रखा जायगा जिस कोषका नाम" समाजहित कारी कोप होगा। ...:, (९)"समाजहित फारी कोय " का रुपया बैंक ऑफ बंगाल अथवा ऐसे ही विश्वस्त बैंक रपमा जायगा। (१०) इस कोषके प्रयाध लिये एक खास कमेटी रहेगी। (११) इस कोषकी मामदनीका आधा रुपया प्रतिवर्ष इल कोपके सहायक जिन मेम्बरों की मृत्यु होगी, उनकै निर्वाचित व्य. क्तियों में समानरूपले बाँट दिया जायगा। (१२) इस कोषमें बाकी आधे रुपयोंके जमा रखनेसे जो लाम होगा, उससे श्रीमहामण्डल के कार्यकर्तायों तथा मेम्बरोंके क्लेशका विशेष कारण उपस्थित होने पर उन क्लेशोंको दूर करनेके लिये पामेटी व्यय कर सकेगी। (१३) किसी मेम्बरकी मृत्यु होने पर यह मेम्बर यदि किसी महामण्डलकी शामासभाका सभ्य हो अथवा किसी शायासमाके : . ।

.. निकटवर्ती स्थानमें रहने वाला हो तो उसके निर्वाचित व्यक्तिका फर्ज होगा कि वह उक्त शाखासभाकी कमेटीफे मन्तव्यती नकल श्रीमहामण्डल प्रधान कार्यालयमै भिजवावे। इस प्रकारसे शाखा सभाके, मन्तव्यको नफल आने पर कमेटी समाजहितकारी कोषसे सहायता देनेके विषय में निश्चय करेगी। (१४) : जहाँ कहीं संभ्योको इस प्रकार की शाखालाकी साहायता नहीं मिल साती है या जहाँ कहीं निकट शास्त्रासमा नहीं है ऐसी दशामें उस प्रान्तके श्रीमहामण्डलके प्रतिनिधियोमेसे फिसीके अथवा किसी देशी रजवाड़ोंमें हो रहा उक्तं दार के प्रधान , कर्मचारीका सार्टिफिकेट मिलने पर सहायता देनेक्षा प्रवन्ध किया जाएगा। (२५) यदि कमेटी चित समझेगी तो बाला २. खबर मंगाकर सहायताका प्रवन्ध कारेगी, जिससे कार्यमै शीघ्रता हो। अन्यान्य नियल। (१६)महामण्डलके अन्य प्रकारके सभ्योस ने जो महाशय हिन्दूसमाजकी उन्नति और दरिद्रोंकी सहायता विचारसे इस कोषमै कमले कम २) दो रुपये सालाना सहायता करने पर भी : इस फण्ड से फायदा उठाना नहीं चाहेंगे वे इस कोषके परिपोषक समझे जायंगे और उनकी नामावली धन्यवादसहित प्रकाशित की जायगी। (१७) हर एक साधारण मेम्बरको-चाहे स्त्री हो या पुरुषः- प्रधान कार्यालयले एक प्रमाणपत्र-जिसपर पञ्चदेवताओंकी मूर्ति और कार्यालयकी मुहर होगी साधारण मेम्बरके प्रमाणपसे. दिया जायेगा। (१८) इस विभागमें जो चन्दा देगे उनको नाम नम्बरसहित. हर वर्ष रसीदके तौर पर वे जिसं 'भाषाका मासिकपन लैंगे उसमें छापा जायगा । यदि गल्तीले कितीक्षा नानान. छपे तो उनका फर्ज होगा कि प्रधान कार्यालयमें पत्र भेजकर अपना नाम छपया क्योंकि यह नाम छपना ही रसीद समझी जायगी। ( १९) प्रतिवर्ष का चन्दा २) मेम्बर महाशयों को जनवरी महीनेमें आगामी भेज देना होगा। यदि किसी कारण विशेषसे ..

जनवरीके अन्त तक रुपया न आवे तो और एक मास अर्थात् फरवरी मास तक अवकाश दिया जायगा, और इसके बाद अर्थात् मार्च महीने में रुपया न आने से मेम्बर महाशयका नाम काट दिया जायगा और फिर वे इस लमाजहितकारी कोषसे लाभ नहीं उठा सकेंगे। (२०) मेम्बर महाशयका पूर्व नियम के अनुसार नाम कर जानेपर यदि कोई असाधारण कारण दिखाकर वे अपना हक सावित रखना चाहेंगे तो कमेटीको इस विषयमै विचार करने का अधिकार मई मास तक रहेगा और यदि उनका नाम रजि. टरमें पुनः दर्ज किया जायगा तो . उन्हें ।) हर्जाना समेत चन्दा अर्थात् २०) डेकर नाम दर्ज करा लेना होगा । २१) वर्षके अन्दर जब कभी कोई नये मेम्बर होंगे तो जन- को उस सालका पूरा चन्दा देना होगा । वर्षारम्भ' जनवरी से समझा जायगा। (२२) हर सालके मार्चमै परलोकगत मेम्वरोके, निर्वाचित व्यक्तियोको समाजहितकारी कोप' की गतवर्षकी सहायताबांटी जायगी; परन्तु नं. १२ के नियमके अनुसार सहायताके बांटनेका श्रधिको कमेटीको सालभर तक रहेगा। (२६) इन नियमोके घटाने-बढ़ाने का अधिकार महामण्डल. को रहेगा। (२४) इंस- कोष. की सहायता 'श्रीभारतधर्म हामण्डल, -प्रधान कार्यालय, काशी' से'ही दी जायगी। सेक्रेटरी, श्रीभारतधर्ममहामण्डल, जगत्गंज, बनारस। श्रीविश्वनाथ-अन्नपूर्णा-दानभण्डार । श्रीभारतधर्ममहामण्डल प्रधान कार्यालय काशीमें दीनदुःखि- योंके क्लेशनिवारणार्थ यह लमा स्थापित की गई हैं। इस समाके द्वारा अतिविस्तृत रीतिपन शास्त्र प्रकाशनका कार्य प्रारम्भ किया. गया है। इस लमाके द्वारा धर्मपुस्तिका पुस्तकादि यथासम्भव विनामूल्य वितरण करनेका भी विचार रखा गयाहै । इस.दानमः .

एडारके द्वारा महामर, राप्रकारात तत्त्ववोध, साधुओका कर्तव्य, धर्म और धर्मादानधर्म,नारी धर्म, महामण्डलकी आवश्यकता आदि कई एक हिन्दीमापाझे धर्मग्रन्थ और अंग्रेजी भाषाके कईएक हैक्स विना मूल्य योग्य पात्रोको बांटे जाते हैं। पत्राचार करनेपर विदित हो सकेगा। शास्त्र प्रकाशनी आमदनी इसी दानभण्डारमें दीनदुःखियोके दुःनमोचनार्थ व्यय की जाती है । इस सभामें जो दान करना चाहे या किसी प्रकार पत्राचार करना , चाहे वे निम्न लिखित पते पर पत्र भेजे। सेक्रेटरी, श्रीविश्वनाथ-अन्नपूर्णा दानभण्डार, श्रीभारतधर्ममहामण्डल, प्रधान कार्यालय, जगतगंज, बनारस ( पावनी आय्येमाहलाके.नियम। -श्रीआर्य्यमहिला हितकारिणी महापरिपद्की मुखपत्रिकाके : रूपमें आर्य महिता प्रकाशित होती है। २-महापरिषद्की सब प्रकारकी सभ्या महादयाओं और सभ्य . महोदयोको यह पत्रिका विना मूल्य वीजाती है। अन्य ग्राहकोंको ६)वार्षिक अनिम देने पर प्राप्त होती हैं । प्रति संख्याका मूल्य १॥)है। ३-पुस्तकालयों ( पब्लिक लाइब्रेरियों) याचनालयों ( रीडिंग रूमों ) और कन्यापाठशालाओंको सेवल ३) वार्षिकम ही दी जाती है। ४-किसी लेखको घटाने-बढ़ाने का प्रकाशित करने न करनेका सम्पूर्ण अधिकार सम्पादिका की है। ५-योग्य लेखको तथा लेखिकाओंको नियत पारितोषिक दिया जाता है और विशेष योग्य लेखको तथा. लेखिकाओको अन्यान्य प्रकारले भी सम्मानित किया जाता है। ६-हिन्दी लिखने में असमर्थ मौलिक लेखक लेखिकाओके लेस्रोका अनुवाद कार्यालयसे कराकर छापा जाता है। ७-माननीया श्रीमती सम्पादिकाजीने काशीके विद्वानोकी. एक -समिति स्थापित की है; जो पुस्तके आदि समालोचनार्थ कार्यालयमें पहुचेगी. उनपर यह समिति विचार करेगी । जो पुस्तके आदि ४ योग्य समझी जायेंगी उनके नाम, पता, औरः विषय आदि आर्य- 1. महिला प्रकाशित कर दिये जायंगे! ..

- 4. (२३ ) समालोचना पुस्तक, लेखा परिवर्तनकी पत्र-पत्रिकाएँ, कार्यालय-सभ्यन्धी पत्र, छपने योग्य विज्ञापन और रुपया तथा महापरिषत्सम्बन्धी पत्र आदि सब निम्न लिखित पते पर आने चाहिये। कार्याध्यक्ष, आर्यमहिला तथा महापरिषत्कार्यालय, श्रीमहामण्डल भवन, जगत्गज, बनारस। आर्यमाहिला महाविद्यालय । इस नामका एक महाविद्यालय ( कालेज) जिसमें विघया. आश्रम भी शामिल रहेगा श्रीआर्यमहिलाहितकारिणी महापरिषद् नामक सभाके द्वारा स्थापित हुआ है जिसमे सत्कुलोद्भव उच्च जातिकी विधवाएँ मासिक १५) से २०) तक वृत्ति देकर भरती की जाती है और उनको योग्य शिक्षा देकर हिन्दू धर्मको उपदेशि- का, शिक्षयित्री आदि रूपसे प्रस्तुत किया जाता है। भविष्यत् जीविकाका उनके लिये यथायोग्य प्रबन्ध भी किया जाता है। इस विषयमें यदि कुछ अधिक जानना चाहे तो निम्न लिखित पते पर पत्र व्यहार करें। प्रधानाध्यापक. आर्यमहिला महाविद्यालय -महामण्डलं भवन जगत्गंज बनारस। एजन्टोंकी आवश्यकता। श्रीभारतधर्म महामण्डल और आर्यमहिलाहितकारिणी महापरिषद्के मेम्बरसंग्रह और पुस्तकविक्रय · आदिके लिये भारतवर्ष के प्रत्येक नगरमें एजण्टोंकी जबरत है । एजन्टोको अच्छा पारितोपिक दिया जायगा । इस विषयके नियम श्रीमदामण्डल प्रधान कार्यालय में पत्र भेजनेले मिलेंगे। सैनोटरी श्रीभारतधर्म महामण्डल जगतगंज.नारस . " .. + انس भारतधर्म प्रेस। : ''.. मनुष्यों की सर्वाङ्गीण उन्नति लिखने पढने ले होली. हैं । पहिले समय में शिक्षा प्रचारका कोई. सुलभ ला- धन नहीं था, परन्तु वर्तमान' लमय में शिक्षा वृद्धिके जितने लाधन उपलब्ध हैं, उनमें प्रेस सब बढ़कर है। सनातन धर्म के सिन्हान्तों का प्रचार करने के लिये श्री इस साधन का अवलम्बन करना उचित जानकर श्री भारतधर्म महामण्डल ने निजका भारतधम्म नामक प्रेस। खोल दिया है । इसमें हिन्दी, अंग्रेजी और उर्दू का सब प्रकार का काम उत्तमता से होता है । पुस्तक, पत्रिकाएँ, हेडपिल, लेटरप्रेनर, वालपोस्टर्स, चेक, बिल, हुण्डी, रलार्दै, रजिस्टर फार्म आदि छपवाकर इस प्रेस की छपाई की सुन्दरता का अनुभव कीजिये। पन्न व्यवहार करने का पता:- मैंनेजर भारतधर्मप्रेस महामण्डल भवन जगत्गंज, बनारस । हितचिन्तक मेंस, गमघाट, काशी में मुद्रित । : man- श्रीआर्यमहिला-हितकारिणी महापरिषद् । कार्यसम्पादिकाः-भारतधर्मलक्ष्मी खैरीगढ़राज्येश्वरी : महाराणी सुरथ कुमारी देवी. 0. B...एवं, हर हाईनेस धर्म सावित्री महाराणी शिवाकुमारी देवी, नरसिंहगढ़ ।.. भारतवर्षकी प्रतिष्ठित रानी-महारानियो तथा विदुषी भद्रसहिला- "ओके द्वारा, श्रीभारतधर्म-महामण्डलकी निरीक्षकतामे, आर्यमाता ओंकी उन्नतिकी सदिच्छासे यह महापरिपद् श्रीकाशीपुरीमें स्थापित की गई है। इसके निम्नलिखित उद्देश्य है:- (क) आर्यमहिलामोफी'. उन्नतिके लिये नियमित कार्यव्य- संस्थाका स्थापन (से.) श्रुति-स्मृति प्रतिपादित पवित्र नारी-धर्मका : भचार (ग.) स्वधर्मानुशल स्त्रीशिक्षाका प्रचार (घ) पारस्परिक प्रेम स्थापित कर हिन्दूसतियों में एकताकी उत्पत्ति () सामाजिक कुरीतियोका संशोधन और (च) हिन्दीफी उन्नति करना तथा (छ) इन्ही उद्देश्यों की पूर्तिके लिये श्रन्यान्य आवश्यकीय कार्य करना । परिषद्के विशेष नियम-:-१.म-ससी सब प्रकारको सभ्या. ऑको इसकी मुखपत्रिका आर्यमहिला मुक्त मिलेगी। य-स्त्रियाँ- . ही लभ्याएँ हो सकेगी । ३य-यदि पुरुष भी परिषद्की किसी वरहकी सहायता करें तो के पृष्ठपोषर्क समझे जायेंगे और उनको भी पत्रिका. मुक्त मिला करेगी। ४ र्थ-परिषद् की चार प्रकारकी, अभ्याओंके ये नियम है- क) कमसे कम १५०) एकवार देनेपर "आजीवन-सभ्या' (ख) १०००) एक ही बार वा प्रतिमास ११) देने पर "संरक्षक- सभ्या (ग):१२) वार्षिक देने पर सहायक सभ्याग और (घ) y) वार्षिक देनेपन वा अलमर्थ होनेले ३) ही वार्षिक देने पर सहयोगिसभ्यो" आर्यमहिला मात्र बन सकती हैं। पत्रिका-लस्बन्धी तथा,महापरिपत्स्यन्धी सर तरहके पत्रव्य- हार करने का यह पता हैं:-. महोपदेशक पण्डित रामगोविन्द त्रिवेदी वेदान्तशास्त्री कार्याध्यक्ष आर्यमहिला - 'तथा आर्यमहिला हितकारिणी महापरिपत्कार्यालय, श्रीमहामण्डल-भवन जगतगंज, बनारसं ।

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Shree Gurugeeta

Author
Bharat Dharma Mahamandal
Title
Shree Gurugeeta
File name
Shree Gurugeeta
Text
OCR done
Citation
1920
Published
2009/10
Publisher
Benares City, Hitchintak Press
Language
Sanskrit
Pages
79
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Vaidik sahitya
DLI number
345513
Barcode
99999990233852.00
Scanning centre
Banasthali University
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