Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Minakhkhori

Yadvendra Sharma · 2011/03

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मिनखखोरी
यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र'
अरुण प्रकाशन, नई दिल्ली-24

1989/मूल्य
प्रकाशक अरण प्रकाशन, ए 47, अमर कालोनी, लाजपत नगर, नई
दिल्ली 1100241 प्रयम सस्करण
4000 रुपये
आवरण हरिप्रकाश त्यागी | मुद्रक एस० एन० प्रिंटस, नवीन
शाहदरा, दिल्ली-110032
MINAKHAHORI by Yadvendra Sharma 'Chandri
Rs 4000

N
जैन समाज से सम्मानित
युवा कार्यकर्ता ललित नाहटा
को आशीर्वाद सहित भेंट

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मैं इतना ही कहूगा
यह मग्रह मेरे राजस्थानी कहानी संग्रह का अनुवाद है
जो जमारो नाम से प्रकाशित है । इसे 'राजस्थानी भाषा
साहित्य एव सस्कृति' अकादमी न पुरस्कृत किया और
इसकी चद कहानिया हिदी अनुवादित होकर अत्यन्त
ही लोकप्रिय हुई। कई कहानिया तो अपने क्थ्य व शिल्प
के कारणआलोचका ने सराही भी। अब आपके हाथ इस
सौपकर मुझे प्रसनता हो रही है। अपनी राय देंगे।
-यादवेन्द्र शर्मा 'चद्र'
आशालक्ष्मी, नया शहर
बीनर-334001
(राज.)

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क्रम गोमली सतनडा हार दीवारे ही दीवारे बिखरी विखरी औरत एक और नगर म मानखो विनाश में जम जाखिरी पुतली नयाजम खोल उखडा-उखडा बदलते सम्ब ग्रहण करती दृष्टि चीचड सुख का सूरज जम मिनखखोरी 13 22 29 34 41 50 57 65 70 80 85 92 100 102 107 114 119

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मिनखरवोरी

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गोमली दोपहर । जलती धूप । स्तब्ध हवा । घुटन और उमस । शूयता और उदासी। ऐस अप्रिय मौसम म गोमली कुए की बायी छतरी से निकली। उसके सिर पर लोह की कढाइ थी। उसमे उपल भरे थे। कुआ। बद और जजर । उस दायें बायें दो छतरिया । बनावट सामती । ऊपर वे गुम्बद खण्डित । लगत थे- अब गिर तब गिरे। सूनी पगडडी भयानक गर्मी के कारण और सूनी हो गयी थी। एक आस पास कोई वस्ती नहीं थी। थाडी दूरपर थी निम्न जातियो की बस्ती। माली, स्वामी, भाट और सुनार भी। गोमली सुनारिन थी। अपने मुहल्ले की सबसे बदनाम और चरिनहीन युवती। उसन अपन पति के रहते हुए एक साईस स प्रेम कर लिया था। प्रेम ही क्या, उमन उस सग नया घर बसा लिया था। चूकि साईत गुण्डा था इसलिए मुहल्ल ने शरीफ लोग मुह पर ताले लगाय हुए थे। अगर वह कमजोर हाता तो मुहल्ले वाले उनका इस तरह रहना दूभर कर देते। उहे इतना तग करत कि मुहल्ला छोडकर जाना ही पडता । गोमली का कुछ कहना तो दूर रहा, बल्कि मुहत्ते वालो क हृदय म यह आशका थी कि कही गामली को कुछ कह दिया तो साईस धाधू खून-खराबी पर उतर जायेगा । इसलिए वे सभी बैमन मे गोमली वी उतनी ही इज्जत करत थे, जितनी एक सच्चरित्रा की। वैस गोमली मुहल्ले के दुःख दद म काम आती थी। हर एक के सक्ट म भागकर जाती थी।

14 मिनखखोरी धाधू विधुर था। उसकी बीवी जीवन-यात्रा की दा मजिलें तय कर एक्दम टूट गयी थी। विवाह के दो वय वाद उस हल्का सा बुखार आया। रात को धाधू न उस दूध पिलाकर सुलाया और सुबह उसकी नीद जमर नीद बन गयी। धाधू को उसके लिए पश्चाताप था, पर उमकी आखा में जासू नही जाय थे क्याकि उसे अपनी जोर पसद नही थी। उसव मन- प्राण म गगल सुनार की जवान वह गोमली का स्प बस गया था। वह मुग्ध हुआ छत पर वठा रहता था । उस महसूस होता था कि गोमली त पर अपन वाल मुखा रही है । उसक बाल इतने लम्बे है कि वे कमर वे नीच ता चल जाये है । उसके वाला का देखकर उसे उन कहानियो पर विश्वास हान लगा कि एक राजकुमारी हर रात खिडकी स जपन बाल लटका दती थी और उसका प्रेमी उमरे महल में केश पक्डकर चला जाता था। कभी कभी उस भ्रम सा होता था कि हवा म उसके वाला के इन की खुशबू वसकर उसे मदहोश कर रही है और वह प्रतिमा सा निश्चल बठा रहता गगला दुबला पतला और हरामखाऊ था। वह बिना मेहनत के जीवन गुजारना चाहता था। इतना ही नही बुरी संगत के कारण अपीम भी खाता था । अफीम की पिनक मवह निर्जीव-सा पड़ा रहता था और गोमली की मज ये फूल विना छुए ही मुरझा जात थे। वह गगले को कुछ नहीं रहती थी। घूघट मे लिपटी वह कोल्हू के बल की तरह काम करती रहती थी। सुबह वह उठकर कुए स पानी के मटके लाती थी। बाजार से सौदा लाती था। चक्की पीसती थी। गोबर थापती थी और बाद में वह उन कातने चली जाती थी। घूघट वह कभी नहीं उठाती थी। स्त्रिया उम लजीली रहती थी और ऊन के कारखाने का मालिक सेठ मनोहर सदा उम पर गिद्धन्दृष्टि लगाये वठा रहता था । कितु गोमली ने उसे कभी भी अवसर नही दिया । गोमली अपने काम से काम रखती थी। उस मजदूरी मे वास्ता या । हा, वह धारा मे जर परशान थी । धाधू उस छत से इशारे करता था। रास्त म घेरकर प्यार की प्राथना करता था। तब वह भयभीत हिरना-मी खड़ी रहती थी । वह उसकी किसी बात का उत्तर नहीं दती थी । धाधू उमरे मौन से परेशान हो जाता था।

गोमली 15 एक कोने अपनी पानी को मत्यु के दो माह बाद धाधू की दशा एक उमादग्रस्त प्राणी-सी हो गई। उसे लगने लगा कि वह पागल हो जायेगा । उमका सिर बिना गोमली के फ्ट जायगा । उभे उठन-बैठत गामली वा मुखडा लहरो के बीच झिलमिलात चाद की तरह लगा। आखिर एक दिन गोमली का हाथ पकड ही लिया। एसी ही एक दोपहर यी । जलता आकाश और जलती पृथ्वी के कारण पशु पक्षी भी नहीं दिख रहे थे । उस समय गामली लाल जाढनी में अपना सौदय बलकाती वाजार जा रही थी। धा न उसका पक्ड अपन घर म खीच लिया । वह कुछ वोल इमस पहल ही उसा उमक मुह पर हाथ रख दिया। पैसे गोमली उसकी गुण्डागर्दी स आतक्ति या ही। गोमली ने पहली बार अपना मौन तोडा। वह जाल सी मे खड़ी हो गई। उसक गोर ललाट पर पमीन की ब्दे चमक उठी । उसकी झील मी गहरी प्यारी आखो मे अपरिसीम दु ख झलक जाया । वह पम्पित स्वर म वोली, "परायी स्त्री के साथ जवरजन्ना (बलात्कार) करना धम नहीं है।' धाधू ने अपन हाथा को बुरी तरह झटकाकर कहा, "मैं तुम्हे चाहता हू, मैं तुम्हारे विना जिदा नहीं रह सकता। रात दिन तुम्हारा मुखडा गामली।" और वह आगे बढा । उसकी बाहो ने गोमली के रेशमी शरीर को लपेटना शुरू कर दिया। गामली न बडी दीनता मे कहा, 'भगवान ने तुम्ह ताकतवर इसलिए नहीं बनाया कि तुम दूसरा की इज्जत को धूल मिलाओ, भले नादमियो की पगडिया उछालो । यह अयाय है धाधू । दिल का प्यार मे जीता, तकरार से नहीं । जगर तुमने मर सग जबरजना काता म जपन शरीर को आग लगाकर मर मिट जाऊगी। गोमली की आखा मे आसू उभर आय । वह जोर से सिसक पडी। सिसक्कर उसन धाधू पी ओर देखा । धाधू को लगा ससार की सारी व्यथा गोमली की आखो म है। धीरे धीर वह शिथिल होने लगा। उसकी आत्मा उसे धिक्कारने लगी। उनकी वामना की चिनगारिया बुझने लगी । वह हवा की तरह गोमली के सामने से हट गया। गोमती ने गगले से शिकायत की कि वह धाधू को डाटे कि वह उसकी में 16 मिनपखोरी बीवी को आत-जात न छा करे । गगला गया भी धापू के पास । पर वावी की शिकायत न करके वह उसस दो रुपय उधार भाग लाया। उनदोपयो को उसने खूब शराब पी। उस मराब के नशे म उमन धाधू की बड़ी प्रशमा की और बोला "वह एक परीफ आदमी है। आज उसने मुये पिलाया। गगल के चेहर पर निलज्जता नाच उठी। गोमली का मन अपने पति र प्रति घणा से भर आया। उसे लगा कि यह कमा मद है ? इसमे जरा भी गरत नही। वायर और पौरपहान । धीर धीर गगल मे परिवतन आन लगा । आजक्ल उसके पास पयाप्त पैमा दिखता था । जब कभी भी गोमली पूछती थी, वह पहता था, "आज क्ल मैं सठ मनोहर के यहा काम करता हूँ ।' गोमली ने मजदूरी पर जाना वाद कर दिया। जव उसका पति कमाता है, तो वह जोरो क यहा मजदूरी करने क्या जाय? इधर उसने धाधू जीवन म वडा परिवतन देखा । आजकल वह बहुत सवेर तागा लेकर मजदूरी करने चला जाता था । किसी से झगडा फमाद नही करता था। उसकी जार देखता तक नही था। उस दिन की घटना के बाद गोमली के हृदय म एक कोमल भावना जम गइ था धाध के सन्व्यवहार और उपक्षा स वह और सजीव व मुखर हा गइ । कभी-कभी गोमली के मन म यह प्रश्न जाग जाता था 'आजकल धाधू छत पर क्या नही जाता उसकी आर क्या नहीं दखता ?' वह तब घटा छत पर बठी रहती थी कि तु धाधू छत पर नहीं आता था। जाता भी या तो उसकी ओर नहा दखता था । इसम गोमली के मन मे अपमानजनित पीटा की तहर उठ जाती थी। वह जावश म उमत्त-मी हा जाती थी। उसकी इच्छा होती थी कि वह धाधू वा हाय परडकर डाट कि वह उसकी आर क्यो नहीं दखता? वल तो उमन हद कर दी । वह स्नान करके छत पर चढी । धाधू छत पर पाडू लगा रहा था । गोमली सदा की तरह नहीं लजायी। वह कुछ क्षण तर पाडू लगान म त भय धाधू को दसती रही। देखत-देखते उसरा मन करण में भर जाया। वह भावनाभिभूत हो उठी। उसन जोर स गधारा। धाधू न उसकी मार एक उडती नजर फेंकी और वह अपन काम गामली 17 मे तमय हो गया। गोमली जल गई। गुरसे मे भर उठी। साथ ही एक विचित्र कारुणिक भावना से उसका अन्तर भर आया । वह माडी सुखाकर नीचे आ गयी। दोपहर। आज धाधू जल्दी आ गया । वह तागा खोलकर घोडे की मालिश करने लगाए गली मे सन्नाटा था । शून्यता थी। वह मालिश करके घोडे की पुए के पास ल गया-पानी पिलाने । तभी उसने देखा-गोमली मिर पर मटका रखे आ रही है । उसन अपनी दृष्टि सूने आकाश की ओर की। गीमली आई । उसने हौज मे मटका भरा । धाधू के मन म अन्तद्वन्द्व मच गया । उसकी इच्छा हुई, वह अगस्त्य मुनि की तरह दष्टि धूट म गोमली के सौदय-सागर कापी ल, पर उसने अपन मन के तूफान को रोक लिया। वह सब कुछ हार हुए जुआरी की तरह चला। दो पदम भी नही गया था कि गोमली ने पुकारा, 'मिजाज बहुत बढ गया है ? आख उठाकर देखते ही नही।" धाधू पे पाव रुक गए। "मटकी तोऊची करा दो।" धाधू उसके पास आया । मटकी को उठाया । क्षणभर मे उसकी दृष्टि उसने चाद-से मुख पर रुकी। गोमली के होठो पर शतानी भरी मुसान थिरक उठी। "तुम मुपसे नाराज हो।" ? "फिर आजक्ल इतने बदल क्यो गये हो" "तुम्हें पाने के लिए।" कहकर धाधू जल्दी से नीचे उतर गया। गोमलो ठगी-सी खड़ी रही। फिर वह चली-बहुत धीरे, माना उसके मन न धाधू ने प्यार को स्वीकार कर लिया हो। अधेरा मजगर की तरह बच्चे छोट मकाना को अपने म लील गया या। धाधु पारह बज वाला सिनमा यत्म बराव आया था। वह घोडे के गरीर पर हाथ फेर रहा पा। हाथ फेरपर घर के भीतर ग्या। ढिवरी

18 मिनखखोरी
जलायी।
तभी उसे कदमो की आहट सुनाई पड़ी।
"कौन?"
"मैं।"
"गोमली।'
*इतनी रात गये"
"मा नहीं माना । धाधू, तुमन मुझे प्रेम से जीत लिया। मैं हार गयी।
हार गयी।' वह रुआमी होकर उसके चरणाम वट गयी । उसके चेहरे
की वासना-जनित उत्तेजना और उद्विग्नता दिवरी के हलके प्रकाश मे स्पष्ट
लक्षित हो रही थी।
गोमली । तुम शादीशुदा हो।'
"प्यार के बीच शादी दीवार नहीं बन सकती।"
"तुम मुझे बहुत चाहती हो?'
"न चाहती तो इस तरह तुम्हारे पाव पड़ती?"
"क्तुि"
-
"मुझे अधिक मत सताओ। मैं सचमुच हार गई।"
"फिर तुम मेरे पास सदा के लिए चली आओ। छोड दो अपने पति
को।' धाधू ने दीवार की ओर मुह करके कहा ।
गामली की वासना एकदम गायब हो गई। वह झट से खडी होकर
वाली, "क्या?
"मैं चाहता हूँ, तुम सदा मर साथ रहा ।'
'नहीं-नही-नहीं।' वह एक्दम चीख-सी पड़ी।
"पडासी भी रहत हैं। उसन गोमली का सावधान किया।
'मोह ' तुम गुण्डे व गुण्डे ही हो । तुम्हारा दिल पत्थर बा टुरडा
है। और गामली चली आई।
धाधू वो वही गति थी। वही मौन और वही अतमुखता। अपन काम
से वाम 1 पर गोमली ने अपन हृदय की आवाज के विरुद्ध बगावत कर दी।
उसने भी वही रक्या अस्तियार कर लिया। वह भी धाघ से नहीं बोलेगा।

गोमली 19 वह गुण्डा है। उसमें कोई भी परिवर्तन नहीं आया। वह उसे भरे बाजार मे बदनाम करना चाहता है। नहीं, वह एसा नहीं करेगी। कितु एक घटना और घटी। धाधू विसी बारात मे बाहर चला गया था। गगला उस रात अफीम की पिनक म हात हुए भी जाग रहा था। लगभग बारह बजे किसी ने दरवाजा खटखटाया । गगला उठा । उमन क्विाड पोल। "आ गय मनोहर बाबू हा। "मैं लोटा नेवर जगल जाने का बहाना बना रहा हूँ। आप 7 " , 'आप चिन्ता न कर, वह कुछ भी नहीं रहगी। मैंने सारी बात पर रखी है। "मैं तुम्हारा सारा क्ज माफ कर दूगा। "और पचास रपय की बात " "वह भी गगला चला गया। चादनी के धुपले प्राशम सापी हुई गोमली का चेहरा साफ दिख रहा था। मनाहर उसके पास बैठ गया। गोमती न आयें योल दी। देया तो माटर के साथ राडी हो गयी। "तुम कौन हो?" "अरे मुगे नहीं पहचाना? क्या तुम्ह गगते न नहीं बताया कि आज मैं यहा आने वाला हूँ 21 पर गगन बी ओर पटी। यह बाहर पला गया है ।" सह मनोहर ने हमपर वहा "बलम में तुम्हें गहर से बाहर वानी कोठी म रगूगा । यहा मुझे धाधू मा वडा हर लगता है। 'महार उगा गोमती पा हाथ पकड लिया। गोमती में तन-यदा म आग लग गयो । उगन र कहा, "मता चाहा हैं तो समन वापस चले जाइय। और मरे हाय?'

20 मिनखखोरी "मैं कहती हू, चले जाइये । वर्ना मैं शोर कर दूगी। आदमियो को इक्ट्ठा करके आपको जलील करा दूगी। 'खूब । खसम बुलाता है और बीवी धमकी देती है। गोमली, मैं सेठ हूँ । धाधू के साथ रहा मे तुम दुखो के सिवाय कुछ नही पाओगी । मेरे सग चलो, आनद ही-आनद मिलेगा और तुम्हारा पति भी यही चाहता । 'आप चले जाइये।" उसन भडक्कर वहा । मेठ बदनामी व भय से चला गया । उसके जात ही वह फूट-फूटकर रोने लगी। गगना आकर चुपचाप सो गया। उस रात गोमली को नीद नहीं आयी। रात-रोत उसकी लाखें सूज गयी। सुबह गगले ने बेहयायी से कहा, "चाय" - गोमली ने उसको जोर जलती दृष्टि से देखा और चाय बनाने लगी। धाधू लौट आया । उसन कई बार गोमली से मिलने की चेष्टा की पर वह नहीं मिल सका। आखिर बात क्या है ? उसका हृदय धडकने लगा। वह गोमली को चादी की तश्तरी देना चाहता था जो उसे बारात मे मिली थी। वह तश्तरी बहुत सुदर थी। रात हो गयी। रात ढल गयी । दूसरी सुबह आयी। वह अपने मन को नहीं रोक सका । जसे ही गगला जगल गया, वसे ही वह गोमली के पास जा पहुचा । वह 'गगला गगला पुकारता हुआ घर मे घुस आया। सामने ही गोमली बैठी थी--मुरझाय फूल-सी। वह उसे देखकर हतप्रभ हो गया। 'क्या तुम बीमार हो ?' उसने अथभरी दृष्टि से पूछा । वह चुप रही । उसने अपनी दृष्टि दीवार पर जमा दी और पाव के अगूठे स जमीन कुरेदेने लगी। चुप क्या हो? बोलो न, तुम्ह मेरी क्सम । गोमली फूट-फूटकर रो पड़ी। उसकी सिसक्यिा हृदयविदारक थी। घाधू ने उस अपन सीन से लगाकर दुलारा । 'क्या बात है गोमली?" गोमली ने रात रोत सारी बातें सुनायी । धाध का मन भोध स भर गया। तश्तरी को जमीन पर फेंकता हुमा वह बोला, "मैं उसकी जान -- ५ । Pratiser women निकाल दूगा । उसके टुकडे-टुकडे कर दू" मामली काप उठी। "मैं उसकी आखे निकाल दूगा । तू चित्ता नकर, मैं तरावेदला लूगा।" कहकर धाधू बाहर चला गया। गोमली विमूढ-सी खडी रही दो पल । जब धाधू उसकी जाखा से ओझल हो गया तब उसे होश आया। वह बाहर की ओर भागी कितु धाधू चला गया था। वह क्या करे? वह किस तरह धाधू को रोके ? वह भवर म पडी नाव की तरह झूलती रही। फिर वह सेठ के ऊन के कारखाने की ओर भागी। वह जस ही वहा पहुची, उसने देखा- वहा भीड जमा थी। धाधू को कई आदमी पकडे हुए थे। सेठ के सिर से खून बह रहा था। धाधू के कान के पास भी खून की धारा बह रही थी और धाधू कह रहा था, "आग से उस रास्ते से गुजरा सेठ, तो जिदा नही छोड़ गा । भीम की तरह तेरा खून पी जाऊगा । गोमली को बेसहारा मत समझना।" और वह शेर की तरह दहाडता हुआ लौट आया। गोमली भी वहा से तुरन्त अदृश्य हो गयी। जब उसने घर में कदम रखा तब गोमली को अपने यहा बैठे पाया। वह उसे प्यार भरी नजर से देखता रहा, देखता रहा । खून को बद अब भी चू चूकर उसकी बनियान पर पड़ रही थी। गोमली का हृदय प्यार से भर आया । आखें आसुआ से भर आयो । वह धाधू से लिपटकर बोली, "मैं सदा के लिए तुम्हार पास आ गयी हू, मैंने पिछल सारे नात रिश्ते तोड दिये हैं । अब मैं तुम्हारी हू, केवल तुम्हारी। मैं तुम्हारी ही पली बनने के काबिल हू । इस रूप की रक्षा तुम्ही कर सकते हो। और वे उस दिन से एक हो गये । गगला दूसरे मुहल्ले म चला गया। कुआ बद हो गया। ('गोमलो' का अनुवाद) सतलडा हार दे की ठाकुर भुजसिंह पीठ तक्यि के सहारे एक्दम ढीले होकर पमर हुए थे। पखा हाप हापकर चल रहा था। ऐसे तीन पखे ब्रिटिश काल म उह तत्कालीन जिलाधीश रनाल्ड साह्य न भेंट किये थे। भेंट करत समय अत्यत प्रसन होकर व बोले थ, "वल भुजसिंह, तुम सचमुच अच्छे आदमी हो। तुम्हारा हृदय विशाल है। हमने जो चीज मागी, वह तुमन तुरन्त दी। मैं तुम्हारी 'मरबतडी को अपन साथ विलायत ले जाऊगा। वह एक कम्पलीट वूमन है। सरबतडी ठाकुर की दरोगिन की जवान बेटी थी। वस वह ठाकुर ही बेटी थी पर दरोगिन के पट से जम लेने के कारण उस ठाकुर की सगी बेटी का मान नहीं मिला था । सरबतडी जपूब सुदरी थी। साहब की नजर चढ गइ । बस माग ली। ठाकुर ने सरवतडी के बदले विलायती तीन पखे माग लिय । साह्न ने तुरत दे दिय। पर बडी ठकुरानी के सामने सरवतडी दहाड मारकर रोयी तो वह ठाकुर के पास आकर वाली थी "आपन यह पाप क्या किया? आपन सरवतडी उसके वाक्य का तीव्रता से काटते हुए ठाकुर न दात पीमकर कहा, चुप रहो । मुषे सलाह दने की कोई जस्रत नहीं ! तुम्ह क्या पता मैंने क्तिनी रारवतडिया पदा कर दी है। देख क्तिने शानदार पखे हैं वितायत में बने हैं क्लक्टर साहन ने भेंट दिये है । जात विरादरी मे मान बढ़ेगा।

झझा उठ गया। सतलडा हार 23. ठाकुर हर आगन्तुक के सामने इन पखो का साला जिव करते रह । । इस बात को पच्चीस साल हो गय थे। अग्रेज़ चले गये पर आकुराफी ठकुराई और मनोत्ति में काई विशेष परिवतन नहीं आयान बाहरी बदलाव से अबूझ कई लोग अपन ही सामन्ती परिवेश मे जीत ये जोर अपने मुर्दे मूल्यो की रक्षा कर रह थे। एक दिन उनके गाव का जौहरी मोतीचद उनर पाम आया। मोतीचद वा क्लकत्ता म हीरे-मोतिया का व्यापार था । समय-समय पर गाव आता-जाता था। ठाकुर से भी मिलता था। पिछली बार ठाकुर के पास आया था तब उसकी दृष्टि ठाकुर की सातवी पत्नी केसरदे पर पड़ी केसरदे अनुपम सुदरी थी। देखते ही युवा सेठ के मन में वासनाजनित लगावी इम बार उसकी सरदे से अप्रत्याशित भेट हा गयी और निगाहें टकरा गयी। दोनों के होठो पर एक अनचाही मुसकान नाच गयी। सठ सोचने लगा कि यह यहा सड रही होगी। तिल तिल पिंजर हो रही होगी । मैं इसे प्राप्त कर लू तो ? उसकी मनोवत्ति उजागर हुई कि संपली पल्ले तो रोई म भी। ठाकुर ने सेठ की आवभगती की। आदर से कहा, पधारो सठ जी पधारो। अर सेठ जी, कभी-कभी हमें भी कोई खास चीज दिखाया कीजिए। दिखाने के पसे ता आप नहीं लगे?' सेठ हस पड़ा । बाला, "सचमुच दिखाने के पैम तो नही लेंगे?" और उसने होरे मातिया की क्इ चीजें दिखलायी। उनमे एक सतलडा हार था। मात राडिया का हार अद्भुत था । उस देखत ही ठाकुर की आखें चमक उठी। लालच को स्फुलिगे आखो म दहा उठी । अपने भद्दे हाठा पर जाभ फिराकर वह बोला "यह हार पिता का है " 'पैमा की वात होडिए, पहले हार का देखिए। पसद आय ताले लोजिए बहुत महगा नहीं है।' ठाकुर मन-ही-मन बोला, 'समय की बात है वर्ना लठत भेजकर हार मगवा लेता पर अब आह । हार वास्तव म अद्भुत है। यदि मिल जाये । 1 24 मिनखखोरी तो दूसर ठाकुरो मे मान बढेगा । यह भेंट दे द तो ?' फिर घर-वाहर की बातें होने लगी। सेठ ने बातचीत के मध्य विना सिग केसरदे का कई बार नाम लिया । उसके अप्रतिम सौदय की प्रशसा की। जाने के पूर्व उसने फिर केसरदे के रग रूप की प्रशसा की। ठाकुर उस हार को मुफ्त म लेना चाहता था। उसके दिलोदिमाग में वह हार कोहरे की तरह छा गया था। तन-सोवणिया और मन मोवणिया हार था वह । उसने हार को लेकर उसकी प्रशसा मे फिर कई वाक्य साच डाले। यादो के सिलसिले में अचानक उस रेनाल्ड साहब की याद हो आयो। उमन तुरत सोचा कि यदि यह सेठ रेनाल्ड बन जाए तो? सेठ ने भी बार-बार केसरदे का नाम लिया है। ठाकुर के अन्तस मे ग्ग बिरगे ववण्डर उठन लगे । अधिक उत्तेजना व तनाव कारण वह सुस्त हो गया। उसकी झुर्रिया से भरी जाकृति बीमार सी लगने लगी। ठाकुर जैसे स्वप्न से जगा हा, इस तरह चौंककर बोला, 'सतलडा हार लाय हैं ?" हा। 'मैं उसे लूगा जरूर लूगा।' फिर उसने अपनी दासी को पुकार कर कहा, 'सुग्गा | तरी सबसे छोटी ठकुरानी को जाकर कह कि वह खुद शबत कर आये।" उस जाने के बाद ठाकुर फिर उस हार को लेकर सोचने लगा 'कितना मोल है हार, रानिया महारानिया ही ऐसे हार पहनती है । हीरा ऐसे चमक रहे है जसे बोल रहे हैं । ऐसे दपदप कर रहे है जसे मणिधर साप ने मणिया बिखेर दी हो । इस हार को लेना है पर मुफ्त में मिल जाये तो मजा आ जाये। यदि य सेठ भेट दे दे इसको क्या अतर पडेगा? ठाकुर सा क्या सोचने लगे" ठाकुर फस्स से हस पडा। फिर पल- नचाता हुआ बोला, 'सठ जी । मैं सोच रहा था। वह सभलकर यूठ बोला, कि समय क्तिना बदल .

सतलडा हार 25 गया है ? समय की शक्ति के समक्ष शूरमाओ को भी धूल चाटनी पड जाती है। आप तो जानते ही हैं कि हमारे घर की औरते खिड़की से थार नही सक्ती थी, आज कारो मे घूमती रहती हैं। यदि वडे अतिथि का वह आदर न करे तो अतिथि अपमान समझता है। आप कितने बड़े व्यापारी हैं पहले हमारी आप रैयत थी पर अब बरावर के आदमी बन गय है। यदि हमारे घर की प्रमुख सदस्या आपका आदर न करे तो आप बुरा मानेंगे न? कलकत्ते के क्तिने बडे जौहरी है आप? लीजिए, ठकुरानी जी आ गयी हैं।" ठकुरानी कसरदे की रग उडी साधारण पोशाक थी। बोर सिर पर बधा था। तभी ठाकुर को खो-खो करके खासी आने लगी । खखार थूकन के लिए वह लपककर बाहर चला गया । यह खासी उसने जान-बूझकर की या स्वाभाविक रूप से हुई मह कहना कठिन है। एकात पाते ही सेठ ने वह हार केसरदे के पावो मे डालत हुए कहा, "पहले मेरा मुजरा मानिए केसरद जी। फिर इस हार को देखिए ठाकुर- सा इसे लेना चाहते हैं ? मुथे सब पता है । मुझे शवत लाने के लिए तभी कहा गया है।' उसने तीव्र स्वर मे कहा। "फिर आप यह भी जान गयी होगी कि ठाकुर की नीयत क्या है? उसको नजर मे अपनी 'लुगाई' का मोल क्या है । एक पाच-दस हजार के हार के लिए उन्होने आपको मेरे सामन पेश कर दिया। यही उनकी नैतिकता है। मैं झूठ नहीं बोलता मैं भी पहली नजर म आपके अपूर्व रूप पर मुग्ध हो गया था। शायद प्रथम दृष्टि प्रेम इस ही कहते है ? मैं आपको चाहने लगा हू । और आपका यह लालची पति मर इस हार का मुफ्त मे लेना चाहता है यदि इसके बदले में आपको माग लू तो यह ना-ना कहत मुझे आपको दे सकता है। इसे हार चाहिए। यह हार को मुफ्त में पाना चाहता है । आप इस नरक से निकलकर मेरे साथ चलना चाहती हैं तो आप मुझे थोडे अतराल के बाद पान का बीडा देने आइए । मैं फिर आधी रात को महादेव पीपल पर इतजार कमगा। क्लबत्ते ले -

26 मिनवखारी
चलूगा। आप ठाकुर-मा की काई चिंता न करें। यह हार के बदले कुछ
भी दे सकता है । सोचिए मुये जाप बहुत पसद हैं।'
ठाकुर वे आत ही वेमरदे चली गयी।
ठाकुर फिर वठकर हार की बनावट की प्रशसा करने लगा, "यह हार
क्सिी नामी गिरामी सुनार का बनाया हुआ है ।"
सेठ दभ से बोला "यह विलायत का बना हुआ है।"
मेठ जानता था कि विदेश के नाम पर ठाकुर ने केवल विलायत का
नाम ही सुना हुआ है।
'मुझे पहल ही सदेह हो गया था। सच सठ जी विलायत के ठाट-बाट
ही निराले हैं । मेरे एक खास दोस्त थे रेनाल्ड। यह विलायती पखा है
न?" उसने पखे की ओर मकेत कर कहा, 'एसे तीन पम्बे मुझे रनाल्ड
माहब ने भेट दिय थे। जाज तक खराब नहीं हुए। हवा भी खूब दत
सेठ ने गव स कहा "मरा यह सतलडा हार ऐमा बना हुआ है कि
उमे सात पीढी पहनेगी आप चाह तो सतलडे के सात हिस्स करके अपनी
साता ठकुरानियो को पहना सकते है। वमा ही प्रभाव रहेगा, यही इसकी
विशषता है।
वेशक ।'
फिर वे इधर उधर की बातें करने लग । सेठ को सरदे का यग्रता
से इतजार था । वह सोच रहा था-पसे का दाव खाली नहीं जाना
चाहिए।
तभी केसरदे पान का वीडा लेकर जा गयी।
ठाकुर ने उल्लमित होकर कहा, 'यह बडी सली वाली लुगाई
सरद ने उस घणा भाव स देखा।
फिर वह लपककर भीतर चली गयी।
सठ न ठाकुर का हार मापत हुए कहा, यह हार आप रख लीजिए
पमा की चिंता करने की जरूरत नहीं। मुये रेनाल्ड से कम मत जानिए
भापती सरद हार से कम सुदर नही ।

ठाकुर बेह्याई से ही ही हसने लगा दूसरे दिन सुबह-सुबह वडी बूढी ठकुरानो बोध म भरी हुइ जाप आयी और गरज कर बोली, "वसरदे कहा है " नशे की पिनक म ठाकुर जिंदा मक्खी निगलत हुए योली, "मुझे क्या पता? मैं उमवे चीचड की तरह थोडे ही चिपका रहता है। "काना म कौर मत लीजिए ठाकुर सा। आपको सब पता है। आपको सतलडा हार मिल गया न? केसरद से अदला-बदली, छि ।' ठाकुर अपनी मजा गया। गालिया देता हुआ बाला, "पूसट, जवान ज्यादा बढ़ गयी क्या ? तू तो खुद कहती थी कि वेमरदे चाखी नहीं । छिनाल भाग गयी होगी।" अचानक गिरगिट की तरह रग बदलकर ठाकुर विनम्न स्वर में बोला 'मेठ ने मुझे यह हार भेंट किया है आखिर में उसका ठाकुर हून' मतलडा हार है-आप पहनेंगी इसे?" एक घुटी हुई चीख बूढी ठकुरानी के मुह मे निकली। आवाज भरी- भरी थी, 'मैं इम हार पर थूवती हू केसरदे की कीमत पर यह ठाकुर उसे चाटा मारता हुआ गरजा, "चुप रह चुडल बक-बक ज्यादा करन लगी है। गदन घड से अलग कर दूगा। एक भाग गयी उसस कौन मी कमी हो गयी आपके रावले म? एक की जगह दस ले आऊगा । जागीरदार-जमीदार और डेरावाली मे लडकियों की कोई कमी है। बकर-पत्यर समयत हैं हम वेटियो को। भलाई इसी म है कि इस बात को यही पर जमीदोज कर दो। समझी।" फिर वह अनत तृष्णा व लालच के साथ वोला, "यह हार क्तिना शानदार है। इसके हीरे तारो की तरह जगमग कर रह है। मुझे मेठ ने भेंट दिया है। वडा आदमी हू न? वम, इतना ही याद रख मेरी पतिव्रता।" ठाकुर न मूछा पर ताव दिया । उस समय चौकीदार भागकर आया। वह घबराकर बढे लगा, "ठाकुर-सा, तोरणद्वार के गुम्वद टूट गय

28 मिनखखोरी
।
हैं । पाल गिर गयी है।"
ठकुरानी चली गयी। ठाकुर अब भी हार को निहार रहा था । अपाम
वा टुक्दा मुह मे लवर सयत स्वर मे बोला, "अरे कोई मिनष और
जानवर तो नही मरा
एक लगडा और बहरा सनाटा पसर गया ।
('सतलडा' का अनुवाद)

दीवारे-ही-दीवारे दीवारा वे साय मन या विशेष जुडाय होता है, विपत मरा। मैंन रहा- जहा नौकरी की वहा-वहा मरा पेड-पौधे, फूल-मत्तिया, माड पनाह और मेजडे गूदी की जगह दीवारो से मरा विशेष और अधिन जमा १८ गपा । वही यही तो आवपत पहाडी पाटिया पमरी हुई मिग- मनमोहर धूप और हरे आपल को ओढे धरती जत्यन्त ही सन्दर न जान मेरा जुगय दीवारोस हो क्यो रहा । जब कभी मैं अपनी सहेलियो से तरह-तरह की नीद तो वे मुह टैर कर मुपे अपला निहारती रहती है आखो मे से अनेक प्रश्न निकल कर मेर चेहर पर हैं। फिर कभी-कभी एक सहेली पूछती, " दादा जैसी शोलें अच्छी नहीं लगी?" दूसरी उपहास भरे स्वर मेहदी - भाया?"

मिनखखोरी है, मेर शरीर पर मवादभरे घाव है। दीवारें ये दीवारें । उनके भीतर की घुटन और ऊब । पीडादायक यादे । ओह । क्तिनी मर्मान्तक वेदनाए भोगी है मैंने? वे वेदनाए वदनाए वे पीडाए वह अतीत मे खा जाती है । 'तू जपने को क्या समझती है?" एक पुरुप का दहाडता हुआ स्वर गूजा। "मैंने क्या क्सूर किया है जिससे आप इतने लाल-पीले हो रह हैं?" लुगाई का दवा स्वर। "अरे तू ता कानो म कौर लेने लगी।" 'मैं आपका मतलब नही समयी।" "मतलब बताऊ, भले घर की बहू होकर तूने खिडकी स सड़क पर थाका क्यू ? सच कहना झूठे का मुह काला होता है । सौगध खा मेरी। लुगाइ पागल की तरह कडक कर बोली "यह तो बडे आश्चय की वात है । आप मुझे जब जपनी लुगाई समझते ही नही फिर आप मुय पर स्वामीत्व क्यो जता रहे है ? जब आपसे मेरा कोई सम्बध नहीं फिर आपकी सौगध क्या खाऊ ?" "आह । बहुत कुतक करती हो।" पुरुप ने एक लम्बा सास लेकर कहा। थाडी देर ऊवा हुआ सनाटा पसरा रहा। फिर पुरुष के चेहरे पर कठोरता उभरी। वह लुगाई की ओर बदर की तरह झपटा । उस पर जम जमो के पुरुप अधिकार को जताता हुआ वोला, "तूने खिडकी से झाका कि नहीं? जवाव दे। 'याका।' पुष्प की आखें विस्फारित हो गयी। बोला "चोरी और सीना जारी । मैंन तुये मना कर रखा है न ? तू जानती है कि सामने मौन . क्या रहता ह? "जानती हूँ। पुष्प की आखा मे अगारे दहा उठे। वह बदहवाम-सा उसके बालो का निममता से पक्डार चीया, 'छिनाल राह । तेरी इन वही बडी दीवारें ही दीवारे 31 इधर-उधर शाक्ती आवा को फाड दूगा।" वह तडपती रही पर उसन इस बात कोनही स्वीकारा कि वह खिडकी बद रखेगी। सभवत वह उसके भीतर का विद्रोह था। क्यू आया था?" पुरुष न नया घर किराये पर ले लिया। इस घर की दीवारें बहुत अची थी। उन दीवारा पर रग तो नया था फिर भी प्लास्टर जगह जगह उतरा हुआ था। इस घर की साझ भी काली होती थी । सूरज क्व उगा, इमवा भी पता नहीं चलता था। एक छोटी-सी खिडकी थी उसम से दोपहर का धूप का टुक्डा आता या । सूरज ढलत-ढलते वह आगन में से हाता हुआ घुटना के वल चलत शिशु की तरह बाहर हो जाता था। थोडा समय बीता। एक दिन पुरुष अपनी छाती को फूलाकर श्रोध व घृणा मिश्रित स्वर मे बोला, "वह मरी अनुपस्थिति मे "मुझे पता नहीं, वह आपका मित्र है। मैं उसे अपमान करके कैसे निवान मरती हू ।" 'मैं सब जानता है । वह पहले मेरा दोस्त था पर अब वह तरा दास्त है। मैं त्रिया चरित खूब जानता हूं।" "तुम्हारा मतलब क्या है । ' लुगाईक तौर बदल गये । भौह तन गयी। झूठे और निराधार आरोप से उसके शरीर मे लालफलीता लग गये। "मैं मतलब समझाता है । वह मेरी अनुपस्थिति में क्य् आता है ? इसस यह सिद्ध नहीं होता कि वह सिफ तेरे लिए आता है ।" पुरुष अपनी सारी शिष्टता और धैय खो पठा। लुगाई विजली की तरह क्डक्कर बोली, 'साप बहुत ही घटिया स्तर के आदमी है । अपनी पत्नी पर इतना नीच आरोप लगाते हुए आपकी जीभ क्यू नहीं जली ?" पुरुप का आदिम पोश्य जाग गया। उसने अतिम शस्त्र प्रयाग म लिया यानी उमे जानवर बनकर पीट डाला । लुगाई अहिल्या बन गयी। राती गयी और पुरुष की नाइमाफी को नगा करती रही।

32 मिनखखोरी इस बार नया शहर और नया घर । इस घर की दीवारें ज्यादा ऊची नही थी पर उन दीवारो म एक भी छोटी-मोटी खिडकी नही थी। दीवारे पुरानी थी। उन पर काइ जमी हुई थी। कई जगह टेढी मेढी तरेडें थी। इस घर में किसी भी प्राणी का प्रवेश निपिद्ध थाहा, धूप और हवा जबरदस्ती घुस जाती थी । कभी-कभी वह पडोसिन को जरूर बुलाती थी। एक बार पुरप ने पडोसिन को देख लिया। शकालु पुरुप के मन मे सदेह के काटे उग आय । क्डवकर पूछा, "यह पडोसिन हमारे घर मे क्यू आती है ?' "मेरे काम से जाती है।" छोटा-सा उत्तर। "तुम्हारे काम से? "हर काम मर्दो को नहीं बताया जाता है।' "वयू नही बताया जाता? तुझे बताना होगा । मैं तरा स्वामी ह, पति । " वह लज्जा गयी । बहुत स्क्त हुए कहा, "मैं दो जीवा से हूँ। मैं मा बनने वाली है।" "क्या पुरप सुन हो गया । पलकें स्थिर । शरीर जडवत । वाज की तरह झपटता हुआ वह बोला, "तू क्से मा बन सकती है ' मैं तो निरोध मैन ता वच्चे न होने के सारे बदोवस्त कर रखे थे?" लुगाई का सारा अस्तित्व और गरत जसे आहत हो गयी। वह विद्रोहिणी की तरह खडी होकर वोली, 'तुमने मुझे समझ क्या रखा है ? तुम कहना क्या चाहत हो तुम मद सिवाय इसके कुछ और भी सोच सक्त हो' क्तिना पतन हो गया है तुम्हारा' एसा करो कि तुम में जरा भी दम है तो मुझे मार डाली पडे क्या हा? 7 मारा मारो मारा। अत म वह अत्यत ही अवश हो गयी थी। पुरप स्तबद्ध । निश्चल । हिना न हुला। 'मुम पर कीचड उडालन शम नही आयी' वह भहकी।

दीवार-ही-दीवारे 33 "हरामजादी ।" "मैं अब तुम्हारे साथ नहीं रह सकती। मैं यहा से चली जाऊगी।" लुगाई ने अपना निणय सुनाया। पुरुप चिल्लाया, "चली जा कूआ-खाड कर लेना, मर जा पर मुये अपना यह काला मुह मत दिखाना। वह भागना चाहती थी पर उसके चारो आर दीवारें खडी हा जाती थी। वह अपना अलग जस्तित्व कायम करन क लिए अलग घर बसाना चाहती थी पर दीवारें उसका घेराव कर लेती थी। वह सब-कुछ नगा करना चाहती थी पर नारी की इन सामाजिक मूल्या मे उसकी नाजुक स्थितिया दीवार बनकर उसका माग अवरुद्ध कर देती थी। वह असहाय-सी तडपती कि उसके चारो ओर दीवार ही दीवार है। तरह-तरह की दीवारें। विना खिडक्यिो व सुराखा की दीवारें। मजबूत और अटूट दीवारें। यादें मिट गयी। वस्तुस्थिति का क्टीला अहसास महसूसती हुई वह अपने अथुपूरित आखो को पोछकर अपने आपस बोली, "सच तो यह है कि मुझे इन दीवारो से जरा भी जुडाव नही है । मुझे घणा है इन दीवारो से । पर मैं का क्या? सोचते सोचत पाया कि अन्ततोगत्वा लडना ही पडेगा । जब अपने आपसे जुडाव नहीं है, फिर दूसरो से कैंस जुडाव हो सकता है ? फिर भी मुझे मालूम है कि इन दीवारा मे बद होने के बावजूद मुझे अपनी मुक्ति के दशन हो रहे है। मेरी तीखी निगाह इन दीवाराम दरार डालने लगी है । अभी दरारे कम हैं पर शीघ्र ही ये दरारे रास्त बन जायेंगी और मैं उसम स्वाधीनता प्राप्त कर लूगी। तब मुझे इन दीवारो की जगह हरे भर खेत, फूलो से भरी घाटिया, बफ से ढके पहाड, झीलें, नदिया, समदर, परने, धारे और प्रकृति की हर उस चीज स प्यार होगा जो स्वच्छद है। ये दीवारें टूटेंगी और अवश्य टूटेंगी। ('भीता ई भौता' का अनुवाद) विखरी-बिखरी औरत जिस तरह हजारा घरा के धुए मे साझ का दम घुटन लगता है उसी तरह जया सक्सेना का दम अपने छोटे से कमर म वठे-बैठे एकान्त से घुटने लगा। उसे महसूस हुआ कि दीवारें हाथ निकाल रही हैं और उस दबोचन की चेष्टा कर रही है। इसलिए वह घबराकर कमरे के बाहर आ गयी और खुले बरामदे मे पडी-खडी अजगर की तरह लम्बी लम्बी से लेन सगी, मानो वह अपने भीतर की धुटन का वाहर फेंक रही हो। आज सुबह से ही उसका मन उचाट हो गया था और घुटने लगा था। कारण धसे यथाथ के काफी नजदीक था, पर उमे आशा के विपरीत कचोट गया। उसके मातहत काम करने वाली मास्टरनी सरला ने स्कूल म उसे गौर से देखकर तपाक से कह दिया, "यदि आप बुरा न मानें तो मडम में एक बात क्हू "कहो "अव आप एजेड लगने लगी हैं। उम चेहरे पर दिखन लगी है। जरा गौर कीजिए आपका शरीर भी थुलथुला-मा हो गया है । वह कुछ जवाब दती, इससे पहले ही सरलातीर की तरह चली गयी। उमवे हाठा पर पसरी व्यग्य भरी मुस्कान को जया समय गयी। वह अजीव-भी पीडा म घिर गयी। घर जात ही उसन अपन आपका आदमकर शीश म ढाल दिया। उमन अपन जापको घूर घूरकर देखा । अगा की इस तरह जाच की मानो काइ परीददार हो और फिर वह सरला को उसकी अनुपस्थिति म एक भद्दी गाला दार बोली झूठी वही की जया तो सदाबहार है। सरला तुम " 1" बिखरी बिखरी औरत 35 । यूठ बोलती हो । मुझसे जलती हो।" और वह बाथरुम म चली गयी । हालाकि नहाने का समय नहीं था, फिर भी वह नहाने लगी। उसे एक विचिन सुखानुभूति हुइ । नहात नहात उसने तय क्यिा कि वह स्कूल फिर जाएगी। कुछ कागजा पर दस्तखत करने हैं । उसने अपन जापको सजाया । गुलाबी रंग की साडी पहनी । जचानक उसे प्यास का आभास हुआ। उसन फ्रिज खाला। फ्रिज से बदबू का भभका निक्ता, जिसन उसकी ना का घेराव कर लिया। उसका जी छोटा सा हुआ। उसे हात ख्याल आया कि उसन फ्रिज को पिछले कई सप्ताहा स साफ नहीं किया है । फिर वह फ्रिज का दखन लगी, रोटिया दही-बडे, सब्जिया बतरतीब स पडे थे। कई जगह तो दाल के छोटे विसर पडे थ । यह मिज की दुदशा पर तरस स भर आयी, साथ उसने अपन जापको आतसी हान के लिए लताडा-"इतना कीमती फिज और इतनी लापरवाही। मगर यह वाम तो उसने हरखी चपरासिन को सौंप रखा था । बस, उसन हरखी चपरासिन को हजारो गालियो से ढक दिया। एकाएक वह गमीर हो गयी। सहसा उसे हरखीका रजभरा तल्ख वाक्य याद हो आया। पल हो उगने वहा था, "बहनजी 1 आप हर चादी की चीज मलाह की पोल ठार देती है।" "कसे?" वह चौंर परी। "जरा देखिए न?' उमा फिज की आर इशाग किया, "सात-आठ हर या फिज और उसरे नीचे इटें लगा रखी हैं । शानदार पलग पर परगोश के रोए जसा गा है, पर चादर फटी हुई है। चाय प्याने घडे ही सुदर है, पर वेतली वाया दम 4 जमान की है। एक्दम यादी और 1 मुमो-मुची ।। यह माघ म भर गयी।हरवी वामन हो-गन टाटा लगी। दरअसल पैरा हरमी परासिा हो नहीं, जा भी चपरामिन पगसी उमवे घर आआहै. य उमये रहा ढग पी जहर जानाया यरत हैं। सती हर वस्तु म पोट पर निकाला है। इसीलिए वह हर एक बाहाटकर निकाल दती ।

36 मिनखखोरी इस तरह उसने हरखी को निकाल दिया। यह साचार वि वह बालन जागी दो टके की होकर उसके सामने चप्पर-चप्पर करती है । मेरी वाता का मखौल उडाती है और मुझे फूहड समझती है घमडी वही की । वह यह नही जानती कि जया सक्सेना एम० ए० बी० एड० है । हैड मास्टरना - जया काफी आवेश म भर गयी थी। वह आतरिक सघष म बाह्य स्थितियो को भूल रही थी। उसन जल्दी से कपडे पहने और वाहर जान की योजना बनान लगी। उसने दीवार पर लगी घडी की ओर देखा। वह सहसा झुझलाहट से भर गयी। घड़ी को कासती हुई वह फुफकार सी उठी 'यह घडी भी मरी मरी-मी चल रही है।" उमने तेजी स रिम्टवाच की ओर देखा। वह लम्बा उसास छोडकर वोली "ओह ! स्कूल का टाइम हो गया है।" वह तेजी से दरवाजे को ताला लगाकर अपनी साइक्लि की ओर बढी। ताला खोला और तेजी से स्कूल पहुच गयी। अभी उसने स्कूल की चारदीवारी मे पाव भी नही रखा था कि एक सम्मिलित ठहाका उसे सुनायी पड़ा। सरला सविता, पना जीनत और मास्टरनिया हस रही थी। वह जल भुन गयी। उसने आग्नय नेत्रा से उनकी ओर देखा। अपने कमर मे वैठत ही उसने जोर से घटी बजायी । चपरासिन से कहा, जाओ, सविता को बुलाकर लाना।' सविता न अदव से कमरे मे पहुचकर कहा 'आपने मुझे याद । फरमाया हा महारानी जी, मैं पूछ सक्ती हूँ कि तुम सब मुझे देखकर हसी क्या थी?' "आपको देखबर तो हम नही हसी थीं" वह भडक उठी तो वहा कोई गधी खडी थी? मेरे सामने झूठ बोलने की चेष्टा मत करो।' 'मडम ! आपको मैं सच कहती है कि हम आपको देखकर नही हसी थी।"

m जया बारूद म आग लगने की तरह भडक उठो;"यदि तुम सच बोलन हो तो खाओ अपने खसमो की सौगध। मैं सबको बुलाती हूँ। सारं शिक्षिकाए आ गयी। सविता ने सोचा कि अब सच बोलन मे ही फायदा है। पति की झूठ क्सम याने को कोई परिणीता तैयार नहीं थी। वह अपराधी को तरा नजर झुकार बोली, "आप माइड न करें, तो सच कह सकती है।" 'वको,' वह चिढकर बोती। जोनत ने मुलायम स्वर में कहा, "मडम आपने पावो मे तो साने की पायल पहन रखी है और उसके नीचे घिसी टूटी नाइनोल की चप्पल । बेचारी सोने की पायल रो रही है "बस, इसी बात पर हम हसी आ गयी। पना न जरा व्यग्य म कहा। "यू सिली मैं कभी भी तुम लागो को फसाकर चाज शीटस दे डालूगी।" "सॉरी मैडम " सब एक माय बोली। जया जल भुनकर रह गयी। उसका मूड पराव रहा। एक दिन जया सक्सेना साडी की जगह चुस्त सलवार-कुर्ते मे स्कूल आयो। उस दिन मास्टरनियो ने अपने मुह मे चावल रख लिये, पर छोकरिया हस बिना न रह सकी। उस पोशाक मे जया वा थुलथुला शरीर लगभग चीख रहा था और जया सक्सेना गव से, अपने परिवेश से कटकर कह रही थी, "पन्ना। इस पोशाक म मेरी उम्र दस साल कम लगने लगी वह हा महा मिलाकर बोली "हा मैडम, दस साल क्यू पूरे पद्रह माल और उमने वामन-रूम मे जाकर उसी अदाज से यह वाक्य कहा, तो सारी मास्टरनिया सीखी हो-ही परख हसन लगी। हसी न जया क बाना के दरवाजा पर दस्तक दी! वह तीर की तरह वामन म मे प्रवेश करके लाल पीली होती हुई बोली, "यह सरल है या ड्रामा पम्पनी ? हसन ता की तमीज नहीं? ननियो की तरह दात निवाल रही हो " .

38 मिनयखारी 7 7 मन गूगी हो गयी। उगी समय जया जी यपादार चपरासिननी यात न माग में घी का माम दिया 'बडी यहिनजी, य सब आपकी पोशाक पर हसी थी। 'क्या। वह चीखी। चपरामिन न यत्रवत सिर हिला दिया। वह ज्वालामुखी बन गयी। जार म पाव पटवर बोली, "मरी पोशाक पर हसी ? बोलो, यह वात मच्ची है। तुम सबकी जबाने मे चिपक गया दूसरा पर थूर उछालत हुए, तुम शरीपनादियो यो शम नहीं आती? जया वोलत-बोलन भर आयी। उसका पठावरोध हो गया, "मर भाग्य पर तो स्वय भगवान भी हसता है-फिर आप ? यदि तुम सबका मरी तरह ऊब खालीपन, धुटन एकात और एर एक पल विखरा हुआ जिन्दगी म मिलता तो कभी नही हसती तब दूसरो पर हसन का मम समझती । मुम बडा दुख है।' वह स्कूल से घर आ गयी। पलग पर घडाम से पड गयी-पट के बल मानो कोई पत्थर एकाएक गिर पा हो । वह अव्यक्त पीडा मे तडपन लगी। समय सरक्ता गया। उसका मन शात हो गया। फिर भी आसुओ के वादल उसक आगे आते-जाते रह। धीर धीर वह अपन आप पर केंद्रीभूत हो गयी। सोचन लगी---उसका सारा जीवन वतरतीब रहा है । एक्दम बिखरा बिखरा और मस्त यस्त । चुभन वाली बातो से भग भरा । बचपन स कर लाज तक उमा जीवन सही नहीं रहा । कहीं-न तो गलत सदभ और ठहराव सच वह एक विखरी हुई औरत है। गाय जमी मा थी उसकी। एक्टम सीधी सादी। उसके बाप न उसकी मा को एक पस वाली औरत के चार मे तलाक दे दिया। दसम उसका सारा बचपन धूल चाटता रहा । निर्देशनहीन हो गया। किशार होत-हात मा का स्वगवास हो गया। वह विना साय की हो गयी। सारी व्यवस्था विगड गयी। मौसी ने नौकरानी की तरह बर्ताव किया। महानगरो म मौसी को रोटी-कपडे के बदले एक नायरानी मिल गयी। उसकी दुत्वारे विखरी बिखरी औरत 39 । उपक्षाए व अपमानजनित यारणाओसी पीडा के कारण जया विक्षिप्त मी हो गयी। इन पीडादायक घरो में उसे पडोसी अमित ने प्यार दिया। वह उसके प्रेम को गह्वर-घूमेर घाटिया में खो गयी । मगर उमन भी जाधुनिक मम्बधो की रहस्यता म जया को उलयावर ठग लिया। फिर अमित ने अपने मा-बाप के कहन पर कही और शादी कर ली। तब जया को लगा कि वह रेगिस्तान म भटकी हुई है-मुष का अहमाम ता मगमरीचिता है वह टूटती टूटती पीडा का पिंडमार रह गयी । उसे लगा कि उसक आगे मरुस्थल ही-मरस्थल है-दलदल ही दलदल है | आखिर उसने अपन या सभाला और अतीत की हत्या करके नये रास्त पर चली। वी० ए०, बी०एड० करने के बाद वह नौकरी मे लग गयी । उस फिर एक पुरपमिला। वह उसके शाब्दिक इद्रजाल में फस गयो । उसब झूठे वायदा व वचना में आ गयी । वस्तुत जया का अन त स्नह प्रेम का प्यासा मन उस छलिय के छलावे में आ गया और उसन उससे शादी कर ली। उसने विवाह मडप के हवन की पवित्र जग्नि के समक्ष मन ही मन तरल प्राथनाए की थी-"हे अग्नि । मुझे एव मुखद शात और मही जीवन देना । मुपे अच्छे बच्चे देना अच्छी व्यवस्था दना ।' मगर शादी के च द माह बाद ही उसे अपना पति अजगर लगा। उसकी तनख्वाह को निगलने वाला अजगर । वह हमारा बहाने बनाकर जया से रुपन ऐठ लता था। उसक सम्बधा के नक्लीपन का उमे अहसास होन लगा। एक दिन तो वह एक व्यवसाय मे जवरदस्त घाटे की बात कहकर जया से गहन माग बैठा । जव गहन जया ने नहीं दिए तब उसने चुरा लिये । जया का हृदय विदीण हो गया। उमे लगा कि आदमी अजेय हो गया है। दोगला हा गया है। वणसर । इस पुरुष का कहा भी अपना जमीर नहीं है लतिकता नहीं है। वह एक औरत के लिए सिफ नजगर है, उसा अस्तित्वको गटकने वाला अजगर आखिर जया उममे अलग हो गयी। तलाक ले लिया अपने पति परमेश्वर से। फिर वही बेतरतीबी। अस्त-व्यस्त जीवन नीरसता और विखराव का एक पर्याय हो गया । सब कुछ भरा-भरा होने पर भी एक भीषण खाली-

40 मिनखखोरी
पन, एक अजीब थोथापन और काय-पद्धति ।
वह विचित्र व अज्ञात कुण्ठाओ से घिर गयी। आवल कावल प्रवत्तिया
जम गयी उमम । उन सबन उमे खोखला और विचित्र कर दिया। हर
सम्माहन के पीछे उसमे एक विरक्ति थी, जो उसके काय-क्लापा में प्रकट
होती रहती थी, जो उसकी हसी उडवाती थी।
वह अतीत से निकली, तो उसने अपने को रोते हुए पाया। उसने मह
धोया। बाल सवारे । हरे रंग की साडी पहनकर वह बाहर निकली।
सौ पचास कदम चलने पर अचानक रकी। ब्लाउज के दायो ओर
दखा तो वह हतप्रभ रह गयी--ब्लाउज वोदा था और पाख के नीचे पटा
वह स्वय हस पडी। उसके साथ ही उसे चारा ओर से रग विरा
अट्टहास सुनायी दिये।
अचानक उसकी आखा म आसू आ गये।
मच, यह बेतरतीबी उमकी अपनी नियति बन गयी है। वह फपर्व
फ्फ्कर रोन लगी । जया एक बिखरी विखरी औरत।
('आयल कावल का अनुवाद)

एक और नगर मे । मैंने दरवाजा खटखटाया । वह नीचे उतरती-उतरती रह गयी। मैंन किवाड दे मुराख में से देखा कि वह सुबक्-सो रही है। मैंन उस आवाज दी। कई बार आहिस्त-आहिस्ते पुकारा, पर उसन कोइ प्रत्युत्तर नहीं दिया। बल्कि वह पीठ किये हुए स्वय पो व्यवस्थित करती रही । फिर वह नीच उतरन लगी। उसके कदमो की आहट मुझे स्पष्ट सुनायी पड रही थी। उसके घर व चारो ओर गहरा सनाटा था क्योकि जो चारा ओर सेठो की हवेलिया थी, उनमे सिवाय नौकरो के काई भी नहीं रह रहा था। मैंन भी अपने को थोडा-सा एलट किया। उसने दरवाजा खोला । सदा की भाति आज उसके चेहरे पर गुलाब के फूलो की ताजगी नहीं थी, बल्कि लग रहा था कि किसी ने उसके चेहरे की रौनक को ब्लाटिंग पेपर से सोख लिया है। उसकी आखें रोने के कारण लाल हो गयी थी और उसम एक फलाव-सा आ गया था। मैंने उससे गम्भीरता से पूछा, "प्रभा, आज तुम उदास नजर आ रही हो? क्या कोई अशुभ वह बीच मे ही बोली, "नहीं तो मैं कहा उदास हूँ। मैं ता एक्दम . उसने सफल अभिनय करन की चेष्टा की पर वह सवथा असफल रही। उमके अतर की वदना उसक चेहर पर मुपरित हो गयी। उसन मुझे वठक मे चलन का सक्त किया। मैं जाकर एव सोफे म घस गया । मेर विना किसी अनुराध के चाय बनाने चली गयी। मैंने भी .

42 मिापयोरी नहीं। प्राय जब प्रभा म यहता तभी यह नाय बनाती थी। उसन मरी पिन तीन वर्षों म गरी मित्रता थी। हमार गौच जौपचारिस्ता नाम की कोइ वस्तु नही रह गयी थी अय। आज यकायर त्वरा म सिसक्न का अभिप्राय मैं समप गया था। यह अपन अन्तर के मधप पर बार पाना चाहती है। थोड़ी देर म वह पुन आ गयी। उमवे हाथ म चाय पी थी। उमन मेरी आर प्रश्नभरी दष्टि स दया और मुस्वरान यी चेप्टा की। मैं उसकी नाटकीयता भाप गया, क्योकि उमम सच्चाई का जरा भी प्रभाव नहीं था। मुझे वह अब भी रोती रीती सी नजर आ रही थी। उसका गुलाबी मुखग आमुया की परत से ढका का लग रहा था। मैंन चाय का प्याला ले लिया । कुछ दर तक उसकी हरक्त करती हुई दोनो टागो को देखता रहा जो मज वे नीचे थी। "वया बात है ?" मैंन हठात पूछा। "कुछ नहीं।" 'वया झूठ बोलती हो?' मैंने चाय का घूट लिया । मेरा स्वर गम्भीर था। "कह रही हू वि कुछ भी तो नहीं है।" उसने अपने शब्दा पर दबाव देते हुए रहा। 'न बताना चाहती हो ता मत बताओ। मैं तुम्ह मजदूर तो नहीं कर सक्ता पर मुये दुख जरूर होगा । थाडा-सा इल फील भी।" मैंन उमवी जोर नहीं देखा जपनी दष्टि को प्याल पर जमाय हुए में चाय के घूट लता रहा। वम प्रभा मे मग आत्मिक लगाव था। सच कहू ता उसस में प्रेम करता था । वह मुझसे प्रेम करती थी। पितु उसका पति योगेश भी मरा मिन था। गहरा मित्र । इसलिए मरी सारी नतिक्ता मरे जोर उमवे सम्बधा के कारण भयभीत थी। यानी मन ही मन प्रभा से अगाध प्रेम करन हुए भी मैंन कभी भी उस प्रकट नहीं किया बल्कि एक चालाक आदमी की तरह श्रेष्ठ नतिक्ता व मित्रता प्रदर्शित करने वाले पदा के माध्यम से जात्मवचना करता रहा और उस धोखा ही देता रहा। ठीक इसस ही मिलती-जुलती स्थिति प्रभा के साथ थी। प्रभा वस भी अपने एक और नगर में 43 पति के प्रति नसीम प्रेम प्रदर्शित करती रहती थी। अपन-आपको ममार की सब सुखी पत्नी कहती थी। पति स सी चिपकी रहती थी जैम पर- छाइ । अपन पति की प्रशसा म वह सवश्रेष्ठ विश्लपणा को चुना दता थी। बहन का ताल्पय यह है कि वह अपन पति को प्रशसा और मतुष्ट जीवन ये चर्चों मे डूबी रहती थी। वैम प्रयोगाम भी वह यह सब प्रमाणित करती थी। सिनेमा पति के साथ, वाजार पति के साथ और किसी पार्टी म पति के साथ जात पति के विना घर से बाहर कदम नहीं। यही काण था कि मैने उसम कभी भी प्रम प्रस्ट नहीं किया। हालाकि वह बात-बात में मेरे हाथा को छू लती थी। मर पाव का अपन पाव से दवा देती थी, परन्तु वह इतना अनायाम और मुक्त भाव स होता था जिसके कारण मैं सहमत रहता था। इस पर उसको आखा में उमड़ता हुआ प्रेम का उफान और आमश्रण मुनस छिपा नही रह सका । आहिस्त आहिस्त मैं और प्रभा एक मौन प्रेम म वध गय। हम दानो इस बात के लिए भी सजग रहने से पि कभी कही किसी हरक्त रा भी योगस का यह शक न हो जाये कि हम एक-दूसरवा चाहत है। मुझम एक बुरी आदत है । हालाकि वह मेरा एक झूठ है, पर मै उसस अत्यन्त ही ग्रस्त हूं कि मैं नतिकता और आदश की बातें बहुत करता हूँ । मैं कई बार इस बात की भी घोषणा कर चुका है कि वह मित्र मित्र क्या जो मित्र की पत्नी स प्रेम करे। एसे मित्र वा जलील पर घर स धो मारवर निवाल देना चाहिए। वस्तुत मैंने एर चरित्रवान व्यक्ति का सुदर यान पहन रखा है। वह खोत अब इतना मजबूत हा गया है कि उसको उतारना हमे अपन आपका अनावन करना लगता है। इसीलिए मरा और प्रभा का प्रम आदगसूचक शब्दा वायोल पहने हुए धीमी धीमी गति में चल रहा था। मुझे सुवर्षिया सुनायी पड़ी। मैंन नजर उठाार देखा। प्रभा यताये की तरह पीस गयी थी। उसमा आफ्पा चेहरा अश्रुप्लावित था। मैन अपनी पाया प्याला मेज पर रख दिया। "मेन तुम्हारा चेहरा देयने ही जान लिया था कि आज पटित हुआ है। क्या मोई अशुभ समापार आया है." -- 44 मिनसखोरी - उसका प्याला भरा का भरा था। उसने एक घूट भी नहीं लिया था। चाय पर मलाई की हलकी पपडी जम गयी थी। मैंन उस और कुरेदा। इम बार वह विस्फोट कर गयी, "मेरा सारा जीवन ही अशुभ है एक अत्यत ही अशुभ और पीडादायक घटना । एक एसा बोझ जिम मैं लादकर चल रही है।' उसके इस बयान से मैं स्तब्ध रह गया। मेरी आयें विस्फारित हो गयी । मन सहमत-सहमत पूछा, "यह तुम कह रही हो?" "हा यह मैं कह रही हू । मैं याने श्रीमती योगश शर्मा । एष दुखियारी औरत ।' उसने अपने आसुओ को पाछा। वह अत्यत ही विपाक्त जान पडी थी। मुझे प्रमाण मित गया कि उसने भी मेरी तरह एक खोल पहन रखा है । अपन मूल अस्तित्व के विरुद्ध एक रग-विरगा खोल। उसकी आखें फिर भर आयी । रुधे कण्ठम्वर म वह बोली "हा, राजू मैंने अपने जीवन के पूरे दस सालो की हत्या कर दी है। दस ही क्या, मैंने अपने सपूण जीवन की हत्या कर दी है। ऐसा रद्दी और शक्की पति मैंने नही दखा।' मुझ पर आघात लगा। मैंने रुक्ते रुक्ते पूछा "वह तुम पर शक करता है, यह तुम कसे कह सकती हो? वह तो काफी प्रगतिशील विचार धारा का है। उसकी अण्डरस्टडिंग तो बहुत अच्छी है।' 'खाक अच्छी है। वह एक दकियानूमी आदमी। उसकी उदारता दूसरे लोगो के लिए ही है। मैं सच कहती हूं कि मैंने इस साथ जो बरस विताय हैं वे जबरदस्ती विताय हैं । वास्तविक प्रसन्नता से तो एक पल भी इसके साथ नहीं रह सकती। तुम्हारा दोस्त एक बूटा, खूसट, अठारहवा मनी का परम्परागत आदमी है ।" मैं कुछ कहू, इससे पहले वह पुन बोली 'तुम मुनकर हैरान होओग कि उसन मुझे तुमसे बोतने लिए मना कर दिया है। वह दिया है कि तुम्हार पास मरी अनुपस्थिति म वयो कोई नाता है । यान तुम मेरे पास क्या आत हा छि, यह काइ वात हुई। याई आदमी अपने मनपसन्द आमी म गप्पें नहीं मार सक्ता हस-बोल क्या - एक और नगर में 45 नहीं मक्ता "मैं तो आना वद कर दूगा।" मैंने तुरत अपना निणय सुनाया। "नहीं, नही, तुम्ह आना ही है। इस वार यह मैं सहन नहीं कर पाऊगी। दस वरसा म एसे पल मैंने कई वार सहे हैं। एक बार तो योगश न दर । मेरे एक रिश्तेदार को लेकर उसने ऐसी तनाव की स्थिति पदा कर दी कि मैंन आत्महत्या करने का निश्चय कर लिया। वह मुझम उन म भी छोटा था। चामिंग लडका था। वडी मजेदार वातें करता था। वात-बात पर चुटकुल मुनाता था। मैं उसके साथ कभी भी बोर नहीं होती थी। यह तुम स्वय जानते हो कि प्रकृति और प्रवत्ति म, मुझम और यागश मे काफी सतर है। वह नितात वोर आदमी है। उसे काट शौक नही । उसम कोई क्ला नहीं। सिफ एस क्ला है कि वह अच्छा-खामा कमा लेता है। आज तुम्ह उस क्टु सत्य से परिचित करा रही हू पि उमरी वनमान की सारी गतिविधिया मेरे दवावो के कारण हैं। सिनेमा देखना, मित्रो के यहा जाना, मेल जोल बढाना, नयी डिजाइन के कपडे पारा, सब मेर कारण । वरना यह आदमी सीधा दफ्तर से आ जाय, Tator बच्चा को लिये स्वय खिलौना बन जाय और सोन के पूर्व माहित सलवटें डालकर जीवन का चरम लक्ष्य पा ले । यह एक निताkram व्यक्ति है । इसे कमाने खाने और मुझे भोगने के अतिरिक्त किन्तु मैं इसके सवथा विपरीत हू । मुये बचपन से ही yिri रहने की आदत है। आखिर आदमी के जीवन और जीन more है? वह लडका मुयसे छोटा था । नाम था बाu.tr/t.. क्हता था। कदाचित उसने इस पवित्र रिश्त के माRiye कर ली थी पर मुझे वह अच्छा लगता था। आक्षक लगता था जितना आजकल तुम ला" देता था। वह मरे चेहरे की उदासी की परत का देता था। मैं सच कहती हूं कि मेरे मन म टप - जाग्रत नहीं हुई। "एक दिन मैं और वह बैठक मे दीparint चुटकुला सुनाया था। चुटकुला आज 46 मिनखखोरी प्रेमिका स पूछा, क्या तुमने अपने पिताजी को बता दिया है कि मैं लखक हू। प्रेमिका न स्नेहिल स्वर मे उत्तर दिया, 'नहीं, अभी तक मेन तुम्हार छोटे छोटे गुणो को बताया है जैसे शराब पीना, जुआ खेलना-यह बात सबस बाद म बताऊगी'।' प्रभा ने थोडा-मा हसने का प्रयास किया। मैं और आशीस खिलखिला रहे थे कि जाप श्रीमान् ने खलनायक की तरह प्रवश किया। मैंन उसका हाथ पकड लिया था। योगश देखकर लाल पीला हा गया। अपनी एम० ए० की शिक्षा और तहजीव सबको भुलातर वह निहायत ही असभ्य की तरह वोला, "यहा रडीखाना है क्या जो बहूदा की तरह हस रहे हो तुम दोनो? "हम दोनो सनाट म आ गये। आशीस पाचेहरा इतना सफेद हो गया था मानो उसका रक्त निचोड लिया गया हो। योगश न आव देखा न ताव, उमे घर के बाहर निकल जाने का आदेश दे दिया। उस चेतावनी दे दो नि वह भविष्य में इस घर में कदम न रखे और यदि वह रखेगा तो उम अपमानित होना पड़ेगा। इतना ही नही, उसने मुथ पर ऐसे एसे आराप लगाये कि मैं कह नही सकती। पर उन आरोपी का एक ही अथ था कि मैं एर बाजारू औरत हू । सच मैं ममन्तिम वेदना भोगती रही । मैंने दो रोज तक खाना नहीं खाया। जाखिर योगेश मेरी चापलूसी करने लगा। मुग उमन जबरदस्ती याना खिलाया। मुझसे क्षमा मागी। इस बीच मैंने मर जान की मोची, पर अपने वच्चा का देखकर मैं मर नहीं सकी। यह नारी न जान किन किन धनो से अटूट स्प से जुडी रहती है। यह मत ममनना कि नारी म विद्रोह नही है । राजू । नारी विद्रोह की पर्याय है, पर यह परणामयी भी है। उस अपना शोपण पराना आता है । वह अपने आपरो दबाती रहती है। पिर यागश न यहा बदली करा ली ताति आगम मुपा दुबारा न जुड गये । मोचों स्तिना दरियानूती है यह? और न ही जानन तिम्वय न अपनी प्रेम-पहानी सुनायी थी। नारी की गरिता भी अपरिमीम होती है । या यह वह रि पुरुष यह मानना लाया है कि नारी मगे दासी है। मरी भोग्या है। मेर पजा म दबोचा एक विवरना । यह रिसी-न विगी बिन्दु पर अपनी पराजय स्वीकार करगा हो। योगश न विवाह के पूर्व की अपनी प्रेम कहानी सुनायो। मैंने कई एक और नगर में 47 बार उसकी प्रेमिका स उसे मिलान म मदद की। मैन सोचा कि यह वेचारा आनद से जीया, परतु वह इसके शक्ती स्वभाव के कारण अलगाव कर लिया, फिर मरा हसना-बोलना भी इस सहन नही हुआ । राजू । तुम नहीं जानत कि मैन इन दस बरमो म कितनी पीडाए भोगी है ? यह मेरा पति 'पर-पीडक है। यह केवल मुझे रोटिया खिलाता है। रोटियो क बदले यह नारी महान् कष्ट भोगती है । अपने मूल अस्तित्व के विरद्ध जीती रहती उसन एक बार अपने चेहर का अपनी साडी के पल्लू से पाछा । उसकी चाय ठडी हा गयी थी। मरा भी चाय पीना वद हो गया था। ओह । जीवन की यह क्तिनी विडम्वना है कि हम जा जी रह है, वह मूलत नहीं जी रह ह । हम सव लोग कुछ और ही है। उसने अपना मौन तोडा, "क्ल की वात है । म और तुम दाना रात को काफी दर तक बठे थे। यागेश सिनेमा गया था, हीरक के साथ । उमन मुये एसा कहा था। दरअसल उसन मुझे धोखा दिया। वह तुम्ह और मुझे एकान्त मे पकडना चाहता था । वह यह जानना चाहता था कि तुम उसकी अनुपस्थिति में मर पास आत हो या नहीं? जव हम अपनी-अपनी बातो वे सुखा मे खोये हुए थे तो वह चोर की तरह आया था और जिन की तरह प्रक्ट हुआ था। हम चौंक गये थे । मैं अपन को अपराधिन महसूस करन लगी थी। मैं उसके स्वभाव और इस तरह की नीच प्रवत्तियो से परिचित थी। मैं ममय गयी कि हम दोना के बीच अब तनाव पैदा होगा।' 'पर मैंने तो तत्काल एसा कोई भी अनुभव नहीं किया। उसन तो मेर प्रति वाफी प्रगाढता जतायी थी।" "प्रदशन तो उसने भी ऐमा ही किया था पर तुम्हारे जाते ही वह मुझ पर वरम पडा । उसने मुझे क्ल फिर एक गिरी हुई औरत कहा । तलाक की घमवी दी। उगन यह भी कहा कि तुम्हारा पाव राजू के पाव से सटा हुआ था। मारी रात म दोना के बीच भीषण मधप मे व्यतीत हुई । सार बच्चे आशक्ति और डरे-डरे-से विस्तरो मे घुसे रह । मुझे विश्वास है कि मर बच्चे अपने बाप के आरोप का अय समय गये हैं। सुबह स्कूल जाने में पूर्व दोना लडको के मुह फूले हुए थे और उनका अपने डैडी के प्रति कोमल 48 मिनखघोरी रवया था। येवल मेरी नही बच्ची गुडिया उनास दास थी। यह मुथ बार-बार चाय पीने का अनुरोध कर रही थी। जाने से पहले मैंने उसस पूछा कि क्या मैं राजू या घर आन के लिए मना कर दू? गुम्सीने स्वर म कहा कि यह तुम स्वय जानो। मुझम पूछन यी योई जरत यााशने नहीं।' मैंने स्वय इस ममस्या का समाधान प्रस्तुत पिया, "प्रभा, मैं तुमस भविष्य म नहीं मिलूगा। हालावि हमने कभी भी अपवित्र रिश्ता म विश्वास नही दिया था फिर भी तुम्हार सुखद जीवन के लिए मैं यह त्याग कम्गा।' त्याग शब्द का प्रयोग भी कापी योखला था। वह कुछ देर तक सिर पक्डे हुए वढी रही। अचानक वह दढ स्वर म वोली 'एसा नहीं हो मक्ता । तुम आओग, जस्र आओगे । इस बार में उससे अलग हो जाऊगी। तलार ले लूगी । अपना जीवन निर्वाह स्वय पर लूगी। जव कुछ भी वरदाश्त नहीं होता।" मैं काप गया। मुझे लगा कि उसके विद्रोह के पीछे उसके नचेतन मन म साप की तरह कुडली मार बैठा हुआ मरा प्यार है । मैं स्वय बदनाम हो जाऊगा। मेरी प्रतिष्ठा, मान मर्यादा और शराफ्त का खोल उतर जायगा । मुये लोग अगुलो दिखा दिखाकर बतायेंगे कि यही है वह जिसने अपने दोस्त की पत्नी को उड़ा लिया, उसका घर तबाह कर दिया। मैं पसीने से लथपय हो गया । मुझमे जडता आ गयो वह मुझे घूर रही थी। उसकी आखें भर आयी थी। मैंने नजर झुका कर कहा, पर य बच्चे, लाग ओह । वह पागल की तरह चीख पडी "आग लगाओ इन सबको।' एक क्षणिव सनाटा । फिर वह सुवक्त सुबक्त बाली- तुम ठीक कहत हो? मैं कुछ भी नहीं कर सकती। पिछले बरसो की तरह जीती रहूगी, जीवन की महायात्रा तय कर लूगी। बस इसी तरह खाल पहनकर हसते-हमत महापीडालेकर मर जाऊगी। मैं योगेश से क्हूगी कि वह अपना तबादला करा ले। मैं फिर नये नगर म चली जाऊगी। मे फिर एक और नये नगर यही सिलसिला । समाज " वहा से एक और नये नगर

एक मारगर
मैं उठ गया। वह सुबक रही थी। मेरी इच्छा उसे चाहो म भरकर
सात्वना देन की हुई पर मैं ऐसा न कर सका । धीरे-धीरे उठकर चलाभाया
--एक अत्य त हो शरीफ आदमी की तरह।
(क र पछ अक' का नुवाद)।

. मानखौ वह खिड़की के बीच मे बैठ गया। सूय उग गया था। धूप उस बदन को स्पश करती हुइ कमरे में घुस गयी थी। उस धूप अच्छी लगी। वह दूर-दूर तक देखता रहा। जुहू के समुद्र-तट पर लेटे हुए विदेशी अध-नग्न जाडे उसे सहसा याद आ गये। क्ल वह जुहू के समुद्र-तट पर गया था । लहरो की अठखेलिया देखता रहा। देखत देखते सोचने लगा कि मनुष्य के सुख-दुःख इसी तरह अठखेलिया करते हुए जदश्य हो जाते हैं। वह जयपुर से कुछ दिनो पूर्व वम्बई आया था। उसे अपनी जाति, धम, सम्प्रदाय के बारे में कुछ भी पता नहीं था पर लीला मौसी विश्वास स कहती थी कि प्रवीण चोखी जाति का है । इसके लक्षण भी यही कहते हैं । वह उदास होकर कहती-बहुत वप पहले एक परदेशी आया था। उसक साथ उनकी पत्नी थी । इस बडे शहर म पैसे वाला वनने के सपन देखे थे। खूब महनत की। सपने सपन ही रह गये । विक्ट सघप न उन दानो को ताड डाला । फिर अचानक हैजे के प्रकोप म इस नही-सी जान को छोड़कर वे चल बस । हालाकि यह बात उसने अपनी सहेली से सुनी थी पर प्रवीण को श्रेष्ठ कुल का सावित करन के लिए उसन स्वय को उसम झूठ ही जोड लिया था। लीला मौसी ने ही प्रवीण को पाला-पोसा था। मौसी दयालु व परोपकारी थी । दूसरा की आग में हाथ डालने वाली। वह स्वय गील विस्तर पर सोयी और प्रवीण को मूसे पर सुलाया। प्रवीण भी लीला मौसी को साक्षात् दया की मूर्ति समझता था और उसे मा महता था।

मानखौ 51 । यदि लीला मौसी नहीं होती तो प्रवीण या तो किसी अनाथाश्रम मे होता मा सडका पर आवारा कुत्ते की तरह जिदगी बसर करता। उससे भी बुरी स्थिति उसकी हो सकती थी पर मौसी न उस मनुष्य बना दिया। उसका राम रोम मौसी का कृतज्ञ था। प्रवीण को आज भी सबकुछ याद है । एक दफे खेल-खेल मे प्रवीण का एक लडके से पगडा हो गया था। लडाई मे लडडू तो नहीं मिलते। गालिया और उलाहन । किसी लडके ने वा दिया था, "तू तो बिना मा-बाप का है। अनाथ है।" "मेरी मा का नाम लीला मौमी है ।' प्रवीण ने छाती ठगककर कहा, 'उसका पति मेरा बाप था। "भूठ । वह तुम्हारी जसली मा नहीं है। उसने तो तुझे केवल पाला- पासा है। यह सब मेरी मा मेरे बापू को बता रही थी।" प्रवीण का हृदय आहत हो गया । सूरत रोनी-रोनी हो गयी। वह जल्दी से मौसी के पास गया। सारी बातें पूछी । मौसी ने अत्यन्त धय से सारी बात सिलसिलवार बतायी कि तुम्हार असली मा-बाप कौन हैं ? पर प्रवीण को विश्वास नहीं हुआ । जब वह नहीं माना तो मौसी ने कह दिया कि वे शरीफ लगते थे। अचानक चल बसे। प्रवीण को मर्मान्तक वेदना हुई। उसके स्वभाव मे परिवतन आया। मट्रिक पास करके वह महनत मजूरी व टयूशन करके अपनी उदरपूर्ति करता रहा साथ ही साथ पढता भी रहा। जब वह वकालत की पढाई कर रहा था तब मौसी बीमार पड़ गयी। दम फूलने लगा । मौसी की पीडा प्रवीण से सही नहीं जाती थी। वह मौसी की रात दिन सेवा करता । उस महता, "मैं वकालत पास करवे एक अच्छी नौकरी कर लूगा तब मौसी मैं तुम्हें सेठानी की तरह सुख से रखूगा । तुम्हें फूला को सेज पर सुलाऊगा। दूध में कुल्ले क्राऊगा।' मौसी मुस्कराकर कहती, "लाडी ' तू मेरी चिता न कर, मैं स्वस्थ हो जाऊगी। तू मन लगाकर पढाई कर। यह वकालत की पढाई बडी कठिन होती है।" आखिर परीक्षा समाप्त हुई। परिणाम निकलने से पहले मौसी का 522 मिनखखोरी आ गया। स्वगवास हो गया । प्रवीण वे हृदय वो बडा आघात लगा। मौसी को लकर उसने जो जो सपन देखे थे वे समय ही टूट गये। उस अपन चारा ओर रेतीला प्रातर नजर आने लगा। वह दुष्पल्पना करता था कि वह रतील टीलो के बीच भूखा प्यासा भटक रहा है। उसका मन जयपुर से स्वने लगा। उसके पीछे एक कारण और भा था कि वह अपन अतीत को यही छोडवर दूर जाना चाहता था। तब वह बम्बई वम्बइ एक महानगर। वहा आदमी चीटियो की तरह जीता है। जानवर की तरह अधिकाश आदमी अपनी 'जूण जीता है । वहा की व्यवस्था में सारे के सार आदमी पणिया साप बन हुए हैं। एक-दूसरे के सास को पीकर वापसी म विष छोडते हैं। आदमी दूसरे को क्या स्वय जपन को नहीं पहचानता है । विचित्र नगर। प्रवीण एक ईसाई के घर पर 'पइगगस्ट' वनकर रहने लगा। पहली बार ही घर के मालिक रावट ने पूछा, 'तुम्हारे परिवार में कौन कौन हैं?" "एक मैं और एक मरा ईश्वर।" 'ओह । तुम्हारी जाति क्या है। ' जिसके मा-बाप का पता नहीं है, उसकी जाति क्या हो सकती है। उसका धम क्या हो सकता है।' वह उसके प्रति स्नह व दया से भर गया। उसने अपनी लगडी युवा बेटी डाली से परिचय कराया । जो अत्यन्त ही खूबसूरत और आवषर थी। कहा 'प्रभु ईसामसीह पर भरोसा रखो, वह तुम्ह एक शानदार नौकरी दिलायेगा।' प्रवीण को डाली पहली नजर मे ही अच्छी लगी। मधुर स्वभाव धीर और गम्भीर । उसम एक विचित्र-मी उत्साह भर गया। वह नौकरी की तलाश में निकल जाता था। महानगर को ऊची-ऊची इमारतो म स्थित छोट-बड दपतरो के क्विाड खटखटाने लगा । सब जगह एक नो ववेसी जगह खाली नहीं। - जवाब-'नो वन्नी

मानखौ 53
निरन्तर और अनवरत निराशा। उसका मन मरने लगा। विश्वाम
टूटने लगा। मपन बिखरन लगे। उसे नौकरी के सिलसिले में कुछ नये
सत्यो का बोध हुआ कि इस देश में कुछ पाने लिए केवल शिक्षित होना
ही जररी नहीं है बल्कि उसके पीछ श्रेष्ठ कुल, जाति, धम और सम्प्रदाय
की मोह भी जरूरी है । अनेक तोगो ने तो उसकी पढाई की जगह जाति-
धम के बारे में पूछा । आह | यह आदमी क्तिना वोना हो गया है, जाति
और धम के कितन छोटे छोटे टुकडो में वट गया है।
आहिस्ता-आहिस्ता उसमे एक नये तरह का आरोश भर गया । उसे
विचित्र-स प्रश्न घेरन लग । बकारी अभाव और टूटन
एक दिन नौकरी की तलाश के दौरान उसन ऊबकर एक कम्पनी के
मालिन को चिल्लाकर कहा, "मेरा केवल पढा लिखा, ईमानदार आदमी
हाना कोइ अपराध है, पाप है।'
मालिक न खलनायिकी अदाज में कहा, "जिस जादमी को अपनी
स्वय की जाति धम और घर परिवार का पता नहीं, उस पर विश्वास कैसे
दिया जा सकता है ? व्यापार मे स्तिनी गुप्त बातें होती है, दो नम्बर के
खात होत हैं गलत तरीके होत है । उसके लिए खानदान की पष्ठभूमि तो
चाहिए ही।
उसकी आशाए महानगर में खोने लगी।
उसे अपा आसपास एक अयायग्रस्त अधकार दिखायी देन लगा। वह
पागला की तरह भटकने लगा। उसकी जेबो मे बडे-बडे छेद हो गये थे।
वह दो दिनो से भूखा था। भूख और चिंताओ से वह विखर गया था। करे
तो क्या करे?
उसकी दादी बद गयी थी। राबट ने सारी स्थिति को समझा? उसने
उसे बुलाकर कहा, "कसे हा प्रवीण, काम धधा मिला?
'नही अकल ।'
"तुम जनलकी हो।"
'हां अक्ल
। पता नही, क्यो आदमी जाति-धम, खानदान के बारे
में पूछना है । मेरी योग्यता को क्या नहीं देखता?"

54 मिनययोरी 'बेटा । आज के आदमी या हृदय तग हाता जा रहा है । वह बन्त ही स्वार्थी होता जा रहा है। बैरल जपने वार म माचता है।" प्रवीण लम्बा साग लेयर वाला, "अवत। सच बात तो यह है कि ईश्वर ने मर साथ यहुत बडा मजार दिया है। उमन मुपे जाति, धम और खानदान नहीं दिया। यहा पान से ज्यादा पानदान दया जाता है, गुग में अधिक वह किम परिवार का है, यह जाना जाता है, योग्यता की जगह रक्त क बार म पूछा जाता है। और मैं इन सबमे वचित व अपरिचित रावट कुछ देर तक साचता रहा । फिर वह सहमा याद करके बाला, 'तू डाली से मिल लेना । उमने तुम्हार लिए एक नौकरी ढूढी है।' प्रवीण ने उल्लासपूबर कहा, 'सच अक्ल ।" 'हा, प्रवीण ।" वह भागनर डॉली के पास गया। वह प्रेमपूर्वक उसका हाथ अपने हाथ में लेकर बाली, "प्रवीण | इतना मन छोटा मत करो। मसीहा। तुम्हारे सारे दुख दूर कर देगा। मैं तुम्हे गजटेड पोस्ट दिला मकनी हू पर अछी 'पर क्या? प्रवीण | तुम्हारी जाति धम या कोई पता नहीं है। मरी बात मानकर तू ईसाइ बन जा! तुपे धम मिल जायेगा साथ म एक नौकरी भी। वीण को लगा कि वह सहमा गैमचम्बर म फस गया है । इस भूमि पर धम की जगह मगरमच्छ रह गय ह जो हर मनुष्य को निगलकर उसे मनुष्य न रहन दे रह है। उसन सयम म कहा, "मुझे यह शत मजूर नहीं। हॉली धीरे से बोली ठडे दिन स माच पाखिर आदमी की कोई जाति और धम तो होना ही चाहिए, यह उसकी पहचान है। 'मैं तुम्हारी बात से महमत नही हू।' प्रवीण ने कहा, 'आदमी क्वल आदमी बना रहे यही श्रेष्ठ है। डाली। जादमी पर जब धम और जाति लाद दिये जात हैं तो वह निमम हो जाता है बौना हो जाता है, मैंन यह सत्य जान लिया है कि धम और धन के ठेकेदार आदमी को इमी तरह मानखौ 55 । बाटकर उनके सौहाद को मिटाते जा रहे है। डॉली । मैं सच कहता हू कि मैं तुम्ह बहुत प्यार करता हू । तुम्हार रोम रोम को चाहता हूँ । जबल का अहसानमद हू । आदर करता हूँ पर में यह ता सोच भी नही सक्ता कि मुये तुम इतनी ओछी बात कहोगी।" "उत्तेजित मत हाओ प्रवीण धय स साचो।' "साच लिया, डॉली, मोच लिया। कम-स-क्म मैं तुम्ह एसा नहीं समयता था। मैं तुम्हारा और तुम्हारे परिवार का अहसानम द हू । किराया नहीं दिया। मुफ्त म रोटिया तोडी। आखिर आप भी तो कुछ मुझमे चाहत होग? पर मैं सभी तरह से इतना दीन है कि आपनी पोली मे कुछ नहीं डाल पाऊगा।" तभी राबट ने प्रवेश क्यिा। उसने मारी बातें सुन ली थी। वह नाराजगी से बोला, "डाली । मैंने तुम्ह एसा नहीं समया था।" डॉली का चेहरा मफेद पड गया । नयना मे अपराध-योध की छायाए तैरन लगी। उसने सिर झुका लिया । "अक्ल | मै दो चार दिनो म यहा से चला जाऊगा । मैं वडा ही भाग्यहीन हू । मर जैसे व्यक्ति निरथक जम लेत हैं और निरथक मर जाते अक्ल रावट ने उसे स्नेह से अपने सीने से चिपकाकर कहा, 'बटे। ऐसा मत सोच । मसीहा बहुत दयालु है । ईश्वर ही सबको पालता है। सदा के घर में देर है पर अधेर नहीं। डाली गलत है। उसमें धय की विराटता ही लघुता है। धम इच्छा की वस्तु ह, अनिच्छा और विवशता स ग्रहण क्यिा गया धम तो अधम होता है। वह हृदय का सत्य नहीं है। हृन्य की स्वीति ही धम है वरना वह तो जबरदस्ती है । डॉली | तुम्ह प्रवीण से क्षमा मागनी चाहिए।" डाली शम से पानी पानी हो गयी। अक्ल ने फिर कहा, "आपसी प्रेम की यह शत सबसे तुच्छ है।' प्रवीण ने कहा, "डॉली को मैं चाहता हू । हृदय से प्रेम करता हूँ। कभी भी योग्य बना तो उसे अपने कलेजे की कोर बनाऊगा। धमका बीच 56 मिनखखोरी म नही लाऊगा। प्रेम से सब छाटे होते है न अक्ल ।" "हा, बेटा | तुम्हारी नौकरी लग जायगी। किसी ने कहा है न- ट्राई एण्ड ट्राई एगेन वाय, यू विल सक्सीड एट लास्ट प्रवीण के चेहरे पर एक नई रोशनी व तेज था। डॉली न समीप आवर कहा, "आई एम वैरी सॉरी मैं तुमसे मापी चाहती हू । मैं किसी और के बहकावे मे आ गयी थी।" उसने त्रास क्यिा जसे प्रभु से क्षमा माग रही हो। हवा का झाका आया। तेज झोका। खिडकी सहसा खुल गयी। धूप का वडा टुकड़ा हठात् कूटकर घुसा और तीनो को अपने में समेट लिया जन मानखौ (मानवता) धूम के रूप में आया हो । ('मानो' का अनवाद) विनाश मे जन्म यह किसी खास जगह और खास व्यक्ति को कहानी नहीं है । आप साच लीजिए कि एक ओर अधिकारो की माग के खातिर लडाकू मुद्रा म खडी हुई जुझारू भीड है । आक्रोश और क्रोध म तिलमिलाती हुई भीड | गूजते हुए आकाश मे बद नारे हैं। मुर्दावाद, हाय हाय नाश हो यह सर- कार निकम्मी है जोर-जुल्म की टक्कर मे हडताल हमारा नारा है। दूसरी ओर एक और रग को भीड है। सार्क और हरी वर्दी की भीड । बदूको, सगीनो लाठिया व आसू गैसा से लम भीड । हिंस्र व आत्रामक भीड । हर पल आडर का इन्तजार करती हुई भीड । खूखार भीड । वाहनो से थरथराती भीड। दो तरह की भीड है । दोना आमने-सामने हैं। नारे आकाश को दबोचने की चेष्टा कर रह थे। पहली भीड आग बढ रही थी। सामने नारो की हत्या करने के लिए गोलिया वेचैनी से इन्तजार कर रही थी। नारो के सिवाय उस जुलूम मे कुछ भी गतिविधि नहीं थी। अत्पत शान्त और सयत जुलूस । वह जुलूस अधिकारी का एक ज्ञापन देना चाहता पा । अपनी जायज मागो के लिए चेतावनीपूण ज्ञापन । नार बन्दूको के नजदीक आए दि एक नामालूम स्थिति उत्पन्न हो गई और वैवजह ही एक आडर गूजा । आवाज के साथ आस् गस के गाले पटने तग । निहत्ये लोग तितर बितर होर आयें मलने लगे। जुलूस और आग बडा तो बरतापूर्ण लाठिया दरसने लगी।

58 मिनखपोरी 1 शात जुलूम इस गलत आदेश से उत्तेजित सा हो गया । उहान दो चार सिपाहियो पर जवाबी वायवाही की और पत्थर बरसा दिए-जाधिर व भी महगाई के बोझ स दरे जले भुने और पीस्ति इसान थे। "पायर " यह शब्द नारा के बीच घुमावदार होकर फला। जसे दूसरी भीड इसके लिए कोई हल्ला अवसर मानो ढूढ रही थी। गोलिया, लाठिया और अमानुषिक अत्याचार सापा की तरह सरसराते हुए भीड को घेरन लग। जुलूम टूट गया। भीड आदमी के अस्तित्व में बदल गई। वह भागने लगी। सडको पर, अटटालिकाओ मे गलियो, कूचा, खेता-खलिहानो, मजदूर क्वाटरो में भागमभाग एक भीड को रोदने के लिए दूसरी भाड या पीछा चारा ओर त्राहि त्राहि चीकारें, रोदन चीखें। एक युद्धदश्य खट-खट खट् 'दरवाजा खोलो दरवाजा खोलो। एक घायल मजदूर न एक क्वाटर का दरवाजा पटखटाया। वह भयभीत था। उसक कपडे फ हुए थे। कही कही यून के धरे चमक रह थे। उसके दाए हाथ की उगलिया कटी हुई थी। उमरे पीछे दो दरिदे निम्म के भगीनधारी सिपाही लग हुए थे। वह आतस्वर म चिल्लाया "दरवाजा खोलो दरवाजा पोना व आ रह है । मुझे मार डालग । जल्दी करो। भडार यो आवाज के माथ दरवाजा खुला। वह चीयता चाहता था पर आतर से उसकी आवाज उसय गते म फस गई। दरवाजे म स दा सिपाही अपनी पटा के वटन बद करत हुए बाहर निकल रह थे। उह देखत ही दहशत स घिर गया । 'ह राम पलटवर भागा। एक सिपाही न तप्त हाने के बाद शाति से कहा "इन भूखा वाला ये पर म इतनी गुदर औरतें वहा से आ जाती हैं ? क्या जिस्म कहकर वह वापस मरने विनाश मजम 59 । - "लेक्नि तुम आदमी नहीं गेछ हा। दूमरे सिपाही ने कामुकता म मुस्कराकर कहा, 'इस तरह कभी तुम फस सक्न हा । कानून तुम्ह सजा दे मक्ता है। वह लापरवाही से वोला, “अपना-अपना शौक है। रही कानून की वात | अरे कानून अधा होता है वहरा हाता है वह केवल सबूत चाहना है और सब्त सिफारिशो व स्वार्थों में मिट जाते है।" 'सालो हुत्तो कमीनो । भीतर वाली युवती वाज की तरह पौस गालिया निकालती हुई जाई । उसके हाथ में लोहे की रडाही थी। उमने उसे चिथडे से पक्ड रखा था। वह अधनगी थी। उसके पाव के आग पोछे खून में बदशक्ल धब्वे थे । सिपाही उस ओर घूमे । युवती ने कडाही उन पर उछाल दी। कडाही म तेल था । उबलता हुआ तेल । थोडा एक सिपाही को आखो पर पडा और थोडा दूसरे की गदन पर । दोनो 'मर गए---मर गए' चिल्लाते हुए भाग । भागते हुए वे भी आदोशनकारियो की तरह भयभीत और आतरित लग रह थे। युवती अब भी गालिया निकाल रही थी। फिर उसने भडाक स दर वाजा बद कर लिया। चौथा क्वाटर उसके दरवाजे मे से एक मजदूर अपनी बीवी का हाथ पकडकर वाला, 'भागो जल्दी से भागो, वे हत्यार आ रहे है वह एक गेहुए रग की गभवती औरत थी। उसने देखा-वे सिपाही उस इलाके को इस तरह तबाह कर रह हैं जसे पाकिस्तान के सैनिशान वागला देश का क्यिा था । अजीब हात है ये सैनिक और सिपाही भी । न जाने कौन-सा भूत होता है इनमे ? जब भी इहे दमन करने का हुक्म मिलता है तब ये अपने सभी सम्बधो, परिवेश व अस्तित्वा सेक्टकर केवल न शसतापूर्वक हुक्म की तामील करन वाल हो जाते है। हृदयहीन गुलाम यात्र मानव । गभवती औरत अपने पति के साथ भागी। धाए । एक गोली आर। उसका पति पत्थर की तरह लुढक गया।

60 मिनपोरी 'नही-नही, इमे मत मारो भगवान के लिए रहम करो।" युवती चीनी। 1 । वह आहत आदमी अपन कलेजे यो पटपर बुझे हुए स्वर म बोला, 'तुम भाग जाओ। देर मत परो। य पिशाच मुझे जर मारेंगे म पर नुन्ह हर हालत म पाता है और मेर यच्च यो जम दना है । मर जाऊगा तो यह अत्याचारो के खिलाफ लहेगा। जालो भागो तुम्हें मरी समम ।" औरत भाग गई। जो मिपाही उमया पीछा कर रहे थे, व उसके पास आए। पापत मजदूर न बदले की भावना से उन तीनो को देखा। उनकी आवा म हिनता व साथ-साथ जजीव-गा औत्सुक्य था । शायद व आदमी के मरने की प्रक्रिया को देखकर पिसी आनद की अनुभूति करना चाहत हा तभी ता उन तीना न उसका घेराव कर लिया। वह घायल आदमी तडपन लगा। उसकी आखा म मत्यु का सत्रान, अपने जीवन की लाचारी, मौजूदा असहायता चमक उठी। "साला मर रहा है।" 'एक सगीन और चुभोओ। "खच्च् खच्च् ।' "आह "इस मादर की लुगाई कहा गई ? "वो भाग रही है। दूसरे ने घनी झाडिया की ओर समेत किया। 'पीछा करो ।'शू यता मे सवाद गूज रहे थे। वे तीन से पाच और पाच से सात हो गए। वे एक घर क आगे से गुजरे । एक घायल मजदूर घर की नाली म स बहते हुए पानी मे अपनी प्यास बुझा रहा था। उसका चेहरा रक्तरजित था। शरीर नगा था। वह बहुत प्यासा था। इसलिए उसने नाली के पानी के पहने जपने खून को चखा था । वह आदमखोर बन गया था। उसे अपने से घणा हुई थी। पर क्या कर वह ? खून उसके हाठो पर आ गया था और वह प्यासा था । 17 उसका आधा विनाश मजम 61 । "देखो बहन का जिदा है।" सातो उसकी पीठ पर अपने नालदार ज्ता की चोट मारत हुए चल गय । वह एक इसान आहे आह ।' की करण चीत्कार के साथ मर गया। उसकी औरत भागी जा रही थी । वदहवास और बेहताशा ! विराम- हीन और विना पीछे देखे । जगला। सडको । गलियारो। चौराहो। अपने बच्चे को जम देने के लिए वह भाग रही थी। जन- परत निरतर । उसे अपने पति की आज्ञा को पूरा करना था। वीहड़ खेत। चारो ओर खडखडाहट । लोहे के हेलमेट। पावो की चरमराहट । वह घनेपन के पीछे छुप गई । उसने देखा, चद घायल आदोलनकारियो को एक वाहन पर उतारा जा रहा है । वे असहाय हैं । अपग है । आहत है। उह पक्तिवद्ध सुलात हैं। एक आक्रोश से भरा आदोलनकारी जोर स चिल्लाया, "आइयमन फिर जम गया है । हिटलर का मानव सहार अभी जिन्दा है। मारो मारो । रौद डालो इसाना को पिशाचो।" सच उन हत्यारो ने नाजियो की तरह बडी निममता से ट्रेक्टर स उह रौंद डाला। हवा में गोलियो की धाए धाए गूज रही थी। वह गभवती औरत आखें मूदे खडी रही। उसने अपने दोनो हाया से झाड अखाडो को मजबूती से पक्ड रखा था। वह मन-ही मन शिव शिव कर रही थी। लेकिन उसे मरना नहीं था। उसे इन गोलियो के शिक्जे में भी नहीं आना था। उस जम देना था, एक नए इमान को-मरती हुई जिदगो म मे एव जमती हुई जिन्दगी को, ताकि सघप जारी रहे । वह फिर भागी। 'कौन भागा ? पक्डो खोजो " आवाज आई । जूता की चरमरा-

62 मिनसखोरी
हट वढी।
वह भागी जा रही थी। उसे अब दद होने लगा था। उसन अपने
दाना हाथो से अपने पेट को पकड लिया था। कोई चिल्लाया, "ठहर जाओ
वर्ना गोली चलाता हू।"
औरत नहीं रुकी। वह एक घाटी मे उतर गई। तभी दो आदमिया न
उमे छुप जाने को कहा । वे दोनो आदोलनकारी थे ।
वे झाडिया में भूखे सिंहो की तरह घात लगाने की मुद्रा मे खडे हो
गए।
एक ने अपनी उगलियो को बद किया । उह पुन खोलता हुआ बोला
'इतिहास अपनी पुनरावृत्ति कर रहा है।'
'जलियावाला बाग फिर अपनी कहानी दोहरा रहा है।"
'डायर? डायर का प्रेत हमारे सार सरकारी तत्र म आ रहा है।
दघा नहीं, हर सिपाही व अफसर जनरल डायर हो गया है। आदमियो
का इस तरह गोलियो से उडवा रह है जसे वे आदमी नही, खिलौ ने
"हिंसा का जवाव हिंसा से देन का समय चला गया है।"
वह तो निर्वीयता का प्रतीक है।
"फिर"
'हमे इह सबक सिखाना चाहिए।'
मवाद ही सवाद।
पत्ता की चरमराहट और खडखडाट नजदीक आती गई।
वह सिपाही सगीन परडे हुए था । बडबडाया, 'कहा है साली?
चवा जाऊगा
वह और आग बटा।
वे दाना मजदूर लपके और सिपाही की टार्गे पक्ड उसे गिरा दिया।
मिपाही इम अचानक हमले मे हक्का बक्सा हो गया।
सिपाही की सगीन गिर गई। वे दोनो अव उस पर हमले करते जा
रह थे। एक उसकी पीठ पर वठ गया।

विनाश मे जम 63
।
दूसरा चील की तरह वपटा। उसन सगीन ठा ली । वह सिपाही पर
टूट पड़ा। वह उस पाचन सगा। सिपाही आदोलनरारी की तरह चोखा,
"नही-नहीं, मुझे मत मारो मुझे मत मारो भगवान के लिए मत
मारो।"
पर उन दोना ने बहरा बनकर उस मार दिया।
अब व उस औरत की तरफ लपके।
एक ने धीरे से कहा, "वहिन ! तुम वहा हो? बोलो, हम तुम्हे इस
घाटो मे से सुरक्षित स्थान तक पहुचा देगे।'
दूसरा बाला, 'मा हमसे डरने की कोई बात नहीं है। हम ता
तुम्हार भाई ही हैं।"
वे दोनो आग बढ़े।
तभी उस औरत की हाफ्ती हुई आवाज आई "वही ठहर जाना । मैं
प्रसव वेदना से पीडित हू । लग रहा है-मैं मा बनने वाली हू।"
"तुम बच्चे को जाम दे रही हो?" एप ने उत्साह से पूछा।
'हा भाई पर तुम रुक जाओ । आह । है भगवान हाय मैं मर
रही हू
एक बोला, 'हिम्मत न हारा।
नए मनुज को जमने दो ।"
"हा, हा, जरूर पैदा करगी मेर स्वामी की यह आखिरी इच्छा
"ईश्वर को याद करो।" दानो ने एक माथ कहा।
'ओह मा मर रही हू?" फिर एव लम्वी तडफडाहट और एक
प्रशात मौन।
वे दोना सहमत-मकुचाते और कुछ कुछ डरते हुए उस औरत के पास
गए । स जोरत के पाम नया मनुज सोया हुआ था। जगह जगह खून के
धब्बे थे। वह औरत एक अलौकिक प्रसनता मे मुस्करा रही थी। उसकी
आकृति पर अपरिमित सन्तोप था।
"माशो, हम चलें।" एक ने कहा ।
"कहा?" औरत ने पूछा।

64 मिनखोरी
हम इन बच्चे
"एक नई राह से मुरक्षित स्थान पर।
पालेंगे। इसकी सुरक्षा करेंगे।"
और व औरत को सहारा देकर चल पडे । धीरे बहुत धीर।
गोलिया की आवाज अब भी आकाश म गूज रही थी।
('दात मेक जुल्म रो' का अनुवाद)

आखिरी पुतली राजा सिंहासन की जोर वढा कि कोई खिलखिलाकर हस पडा । राजा, समस्त मनीगण और अय सभासद चौंक पडे । व जरा भयभीत दष्टि स इधर उधर देखने लगे । यह हसी विलकुल विद्प भरी थी। राजा का अमा लगी। उसने प्रधानमत्री की ओर क्रोध भरी दष्टि से देखा । प्रधान- मत्री ने मत्रीगणो की और मत्रीगणो ने सभासदा की ओर । दखन का अभिप्राय स्पष्ट था कि यह गुस्ताख कौन है जो दरबार की मर्यादा का नहीं समझता? मगर राजा ने देखा कि सभी ने हसने से इन्कार कर दिया। वे भेडो की तरह प्रमश नकारात्मक ढग से सिर हिलाने लग । वे फिर दो कदम चले ही थे कि वही व्यग भरी खिलखिलाहट | इस बार सबकी आखो म प्रश्न तरकर सस्तो मे बदल गये । वे सरता से पूछने लगे कि यह बेहूदा दरबारी कौन है ? राजा का सयम जाता रहा । उसन ऊपर से शालीनता का प्रदशन करते हुए कहा, "यह तो मेरा अपमान है । एसी बेहूदी हरक्त पर मैं हसने वाले पी जुबान खिचवा सकता है। माना कि मैंने इस सिंहासन पर अनु- चित तरीके से कब्जा रिया है । हम लोगो की छीना यपटी के कारण पवित्र सिंहासन की 31 पुतलिया खण्डित हो गयी हैं तथा इम वेचारे महान सिंहासन के जस्थिपजर ढीले हो गये हैं मगर मरी इस असवधानिक हर पत से आप लोगा वे भी तो छोट सिंहासन बच गय हैं। वरना आप लाग सरराह चलते नजर आत रितु कोई मेरा चमचा इस बदगी सही, मैं बर्दाश्त नही कर सकता।" प्रधानमन्त्री ने अगद की तरह पाव पटक्कर कहा, 'वेहूदा सामने क्यो 66 मिनखखोरी ?" नही आता? यह सही है कि हम मक्कारी, अनतिकता व आदशहीनताक वन पर इस सिंहासन पर वठे हैं मगर है तो हमारी मिलीभगत ही। फिर एक-दूसरे पर विद्रूप भरी हसी क्या "जरूर हमारे साथ कोई दुष्ट प्रवत्ति का व्यक्ति है ।" 'यह हरक्त दलबदलू ही कर सकता है।" प्रधानमत्री न सोचकर कहा। दलबदलू बीच म ही वोला, "मैं भगवान की सौगध खाकर कहता हू कि मैंने यह हरक्त नहीं की।" प्रधानमत्री फस्स से हस पडा, "तुम और भगवान की सौगध? पता नही, तुमने सौगध को हलुवे की तरह क्तिनी बार खाया है।' नय राजा ने सवको निगाह म भरकर कहा, "दखो, मैंन क्तिनी जोर तोड के बाद इस सत्ता को पाया है। काइ सभासद झट से बोला, "आपने इस बार सत्ता को ग्रहण करक उसे द्रोपदी बना दिया है।" नया राजा चिढ गया, सत्ता को सदा स ही द्रौपदी समझता आया हूं। मैं इसका पाचवा स्वामी हू आप मत्रीगण एव सभासद भी तो इस का चीर हरने वाले है परन्तु बेहूदगी से हसना अनुशासनहीनता है । मैं गुप्तचर विभाग को आदेश दूगा कि यह पता लगाये वह बेहूदा कौन है फिर उस दरबार से अनुशासनहीनता के आरोप म निकलवा दूगा या हत्या करवा दूगा।" वे फिर सिंहासन की ओर बढने लगे कि वही खिलखिलाहट । इस बार खिलखिलाहट निरतर चली तो सबका ध्यान उस ओर गया । देखा तो ये लोग हतप्रभ रह गये। सिंहासन की आखिरी पुतली खिलखिलाकर हम रही थी। सब उसकी ओर चुम्बक की तरह खिंचे चले गये। सभी न लगभग एक साथ सोचा कि यह तो जादू हो गया । निर्जीव पुतली हसने लगी। राजा न हाट भरे स्वर मे कहा "तुम क्यो हस रही हो? क्या सचमुच हस रही हो। पुतसी ने आँखें मटकापर कहा, 'मैं तो आप पर हस रही है।"

आखिरी पुतली 67 " "क्यो? क्या हम स्वाग हैं पुतली ने अपने निवले होठ पर अशुली रखकर कहा "मेरे नये स्वामी । मैं इस सिंहासन की आखिरी पुतली हूँ। मुझसे पहले दूसरी 31 पुतलियो ने धम निभाया और उह बेमौत मरना पड़ा, क्योकि उहोने अपने अपने स्वामियो को उनके स्वार्थी, अविश्वामी, अनैतिक मत्रीगणा एव सभासदो से सचेत किया था और आपन उह बरहमी से तोड डाला।" "मगर । 'मेरे स्वामी, मैं पुतली हू । राजा विक्रमादित्य के समय से मैं अपना फज निभाती आयी हू कि इस सिंहासन पर बठने वाले को मै इसकी गरिमा बताऊ । हाय | इस सिंहासन की गरिमा तो जाती रही। अब तो इसकी 31 पुतलिया ही टूट गयी है। फिर भी अपनी परम्परानुसार आपको एक कहानी जरूर सुनाऊगी। बाद में जाप मुझे तोड सकते हैं । सुनो । एक जगल म चद सियार रहते थे। उनमे बडा ही सगठन था। उनसे जगल का राजा भी खौफ खाता था। सघे शक्ति कलौ युगे इस युग में जिसके पास मगठन है, उसके पास सब कुछ है। सियार जब निकलते थे तो एक साप दूसरे जानवर उस भीड से घबराते थे। दूसरो को जलन थी कि ये सियार होकर जगल पर शामन करते हैं ? "एक दिन एक गदरायी लोमडी को कौवा मिला । कौवे ने कहा, 'लोमडी वहन, तुम्हार होते हुए ये सियार जगल के राजा बने हुए हैं ? इस पथ्वी पर सबसे ज्यादा चालाक व अक्लमद तो तुम हो।' "लामडी ने कहा, 'मगर मैं क्या कर सकती हू कौवे भया?' " "अपनी जक्ल का परिश्मा दिखाओ।' "लोमडी ने सोचकर कहा, 'अच्छा बताऊगी।' "उसने काफी सोचकर एक पडयत्र दिया। वह सदा पाच-सात अय जानवरो को लेकर सियारो के पास पहुचती और कहती, 'ये आपके गुलाम बनना चाहते हैं। इस तरह उसन जनक नस्लो के जानवरो को सियारो के साथ मिला दिया और उन नय जानवरो न हर सियार मे गलतफहमी भर दी कि राजा बनने लायक तो आप हैं । गलतफहमी ने झगडै का रूप धारण किया। एक्ता टूटी तो लोमडी शेर को बुला लायी और शेर ने सियारो 66 मिनखखारी नही आता ? यह सही है कि हम मक्कारी, अनतिक्ता व जादशहीनता व वल पर इस सिंहासन पर वठे हैं मगर है तो हमारी मिलीभगत ही। फिर एक-दमरे पर विद्रूप भरी हसी क्या?" "जरुर हमारे साथ कोई दुष्ट प्रवत्ति का व्यक्ति है ।" “यह हरकत दलबदलू ही कर सकता है।' प्रधानमंत्री ने सोचकर कहा। दलबदलू बीच मे ही बोला, "मैं भगवान की सौगध खापर कहता हू कि मैंने यह हरक्त नहीं की।" प्रधानमत्री फस्स स हस पडा, "तुम और भगवान की सौगध' पता नही, तुमने मौगध को हलुवे की तरह वितनी बार खाया है नये राजा ने सवको निगाह में भरकर कहा, "दखो मैंन क्तिनी जोड तोड के बाद इस सता को पाया है। काइ सभासद झट से बोला, "आपन इस बार सत्ता को ग्रहण करक उसे द्रौपदी बना दिया है।" नया राजा चिढ गया, "मैं सत्ता को सदा से ही द्रौपदी समझता आया हूँ। मैं इसका पाचवा स्वामी हूँ आप मत्रीगण एव सभासद भी तो इम का चीर हरने वाले है परन्तु बेहदगी से हसना अनुशासनहीनता है । मैं गुप्तचर विभाग को आदेश दूगा कि यह पता लगाये वह बेहूदा कोन है। फिर उस दरबार से अनुशासनहीनता के आरोप मे निकलवा दूगा या हत्या व फ्रि सिंहासन को जोर बदन लग कि वही खिलखिलाहट | इस बार खिलखिलाहट निरतर चली तो मबका ध्यान उस ओर गया । देखा ता य लोग हतप्रभ रह गये। सिंहासन की आखिरी पुतली खिलखिलाकर हस रहो यो। सब उसको ओर चुम्बक की तरह खिचे चल गये । सभी न लगभग एक साथ सोचा कि यह तो जान हो गया। निर्जीव पुतली हसने लगी। राजा न डाट भरे स्वर म कहा "तुम क्यो हस रही हो? क्या सचमुच हस रही हो पुतलो ने आंखें मटकारबहा, 'मैं तो आप पर हस रही है।' करवा दूगा।

आखिरी पुतली 67 - "क्यो? क्या हम स्वाग हैं ?" पुतली न जपने निचले हाठ पर अगुली रखकर कहा "मरे नये स्वामी | मैं इस सिंहासन की आखिरी पुतली हू । मुझस पहले दूसरी 31 पुतलिया ने धम निभाया और उह वेमौत मरना पड़ा, क्योकि उहोने अपन अपने स्वामियो को उनके स्वार्थी, अविश्वामी, अनैतिक मत्रीगणा एव सभासदो स सचेत किया था और आपन उह बरहमी स तोड डाला।" "मगर ।" 'मेरे स्वामी, मैं पुतली हू । राजा विक्रमादित्य के समय से मैं अपना फज निभाती आयी हू वि इस सिंहासन पर बठने वाल को मै इमको गरिमा बताऊ । हाय । इस सिंहासन की गरिमा तो जाती रही। अब ता इसकी 31 पुतलिया ही टूट गयी है। फिर भी मैं अपनी परम्परानुसार आपको एक कहानी जरूर सुनाऊगी। बाद म आप मुझे ताड सक्ते है । सुनो । एक जगल मे चद सियार रहते थे। उनम बडा ही सगठन था। उनस जगल का राजा भी खौफ खाता था। सघे शक्ति कलौ युगे इस युग म जिसवे पास सगठन है, उसके पास सब कुछ है । सियार जब निकलते थे तो साथ दूसरे जानवर उस भीड से घबराते थे। दूमरो को जलन थी किये सियार होकर जगल पर शासन करते हैं ? "एक दिन एक गदरायी लोमडी को कौवा मिला । कौवे ने कहा, 'लोमडी वहन, तुम्हारे होत हुए ये सियार जगल के राजा बने हुए हैं इस पथ्वी पर सबसे ज्यादा चालाय व अक्लमद तो तुम हो।' लोमडी ने कहा, 'मगर मैं क्या कर सकती है कौवे भैया?" 'अपनी अक्ल का करिश्मा दिखा। "लोमडी ने सोचकर कहा, 'अच्छा बताऊगी।' "उसने काफी सोचकर एक पडयत्र किया। वह सदा पाच-सात अय जानवरो को लेकर सियारो के पास पहुचती और कहती, 'य आपके गुलाम बनना चाहते है। इस तरह उसन जनेक नस्लो के जानवरों को सियारों के साथ मिला दिया और उन नये जानवरो ने हर सियार मे गलतफहमी भर दी कि राजा बनने लायक तो आप है । गलतफहमी ने झगडे का रूप धारण क्यिा । एकता टूटी तो लोमडी शेर को बुला लायी और शेर ने सियारो एक 7 "नया शेर तो साड था जो शेर की खाल ओढे हुए था।इमक बाद 68 मिनखखोरी वो गुलाम बना लिया। जव उमन लोमडी को भी पजा दिखाना शुरू किया ता लोमडी घवरायो । शेर न तो यहा तप अत्याचार वरन शुरू कर दिया वि जव उस भूल लगती तो वह क्सिी जानवर को मारकर खा जाता । "जानवरा म हाहाकार मचा । वे लोग लोमडी के पास गय और उहोन यह आरोप लगाया कि उसके कारण शेर जगल का राजा बना आय वह अव मनमाने अत्याचार कर रहा है। 'लोमडी उदास-सी हो गयी। करे तो क्या? फिर भी उसने जावा सन दिया कि वह कुछ करगी, क्योकि कल शेर मुये भी खा सकता है। एक दिन लामडी आधी रात को इधर-उधर भागती हुई दिखाया पडी। कभी वह सियारो के पास जाती, कभी भालुआ के पास, हाथिया के पास और कभी भेडियो के पास । 'सुबह ही शेर ने दखा कि एक बहुत बडा शेर जगल के जानवरा के साथ आ रहा है। उसके आग-आग लोमडी चल रही है। 'लोमडी भागकर जायी और उसने कहा, 'शेर राजा भागो तुम्हार जानवरो न विद्रोह कर दिया है अब ये दूसरे बडे शेर राजा को साथ लिये हुए हैं । य सब मिलकर तुम्हारी हत्या कर देंग।' वचारा शेर भीड देखकर भाग गया। कभी जगल म अव्यवस्था फ्ल गयो । हर जानवर कुछ जानवरो को अपन पदा मे वरवे शेर की खाल जाड लेता था और राजा बन जाता था। यह तमाशा खूब चला और जगल म बरालक्ता फैल गयी। जगल के सारे जानवर दलबदलू, रगवदलू लालची और अवसरवादी हो गये। नित्य ही राजा बदल जाता था। 'ता तुम समझती हो कि मैं " राजा न व्यग्रता से कहा। पुतली सिलखितावर हम पड़ी। उसन उगली से कहा अपन पीछ राजा न पीच देखा तो हैरान हो गया। उसय सार मत्रीगण व सभा सद भाग गय थ । वेवल प्रधानमणी खडा-बडा सुबक रहा था। "ये लोग कहा गये?' राजा गुर्राया। देख राजा ।

आखिरी पुतली 69
"वे नम्बरून भाग गये। वहत थे कि हम राजा अभी से आखें दिखाने
लग, बाद मक्या गत करेंगे?"
राजा झपटकर मिहामन पर बठन लगा तो पुतली ने रोष दिया, 'ऐसे
मत वठो ' इस सिंहासन पर बिना बहुमत के वाई नहीं बठ साता । मैं उसे
वठने भी नही दूगी। मैं इसकी रक्षक हू में ही नम राजा की चूडिया
पहनता हूँ। अभी मैंन तुम्हारी चूडिया पहनी ही पी पर अफ्मोस मुझे
फिर चूलिया बदलनी पड़ेगी।
उमी समय पुराना राजा नाटा की वर्षा करता आ गया। उसके साथ
वही मनीगण व सभासद ये जा थोडी दर पहन पिछल राजा के साथ थे ।
पुतली ने पीडा से मिर पीटते हुए कहा, "हाय
मुझे आज फिर वे
चूडिया तोडनी पडेंगी जिहे मैंने आज ही पहना है । एक दिन में दो बार
है भगवान । यह कौन-स जम का पाप है ?
('छकडली पुतली का अनुवाद)
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"आप जानते हो कि शेफालीका भाई यहा एडवोकेट है। उसने शेफाली नया जन्म उस दिन दफ्तर म प्रयम यरत ही टाइपिस्ट मिम यस्तूरा न मुस्करात हुए बताया मर एव पूज 'क्या? उसन मिगरेट यो एशट्रे म पड-राडे युझान हुए कहा। उमकी दष्टि कस्तूरा वी दष्टि से एक्दम चिपप-सी गई थी। 'एक खास यूज है।" उसन भी उसरी जिनामा कोजाग्रत परत हुए मिस उपमा क्ल अचानव मिसेज हो गइ ।' वह जारचय म डूब-सा गया। ' मैं सच यह रही हू । क्त उमन चुपचाप कोट मरिज कर ली। यह क्स हो सकता है ? कस्तूरा, तुमन जस्र कोइ अफवाह मुना "नही सर, मुये शेफाली ने कहा है । अपना वाया हाथ फेरा। फिर अथ भरी मुसकान होठा पर लाकर बोली, वह उपमा । वाट ? , होगी" कस्तूरा न टाइपराल्टर पर । को यह बताया है। वह बिलकुल उत्तजित हो गया। उमन गुस्स के मारे अपन हाठ भीच लिय। अपने कैबिन म घुमत हुए उसन एक गदी गाली निकाली। फिर कुर्सी पर बैठकर टेलीफोन करने लगा । रिसीदर को गल के नीचे दवाया। माउथ-पीस उसक होठा स चिपका हुआ था। डायल कर उसने अपन को शात क्यिा। कुछ पलो के बाद उसने पूछा 'हैलो, उपमा रहा हू । उपमा, मैं क्या सुन रहा है? क्या यह सच है कि तुमन शादी कर मैं राजन बोल ली? जी।

नया जम 71 "जी?" उसकी आखे विस्फारित हो गई । कुछ पलो के लिए उस पर विमूढता छाई रही। फिर उसकी आकृति का मुलायम रंग उड़ने लगा। उस पर कठोरता छाती गई । वह विपाक्त स्वर में बोला, “यू झाड ? तुमने मुझे धोखा दिया । तुमने मुपसे वादा किया था कि मैं आपकी तीना फिल्म पूरी होने तक शादी नहीं करूगी। शादी क्रूगी भी तो आपसे पूछकर ।" उसका चेहरा लाल हो गया था। वह पिर फटी हुई आवाज मे बोला, "तुम बोलती क्या नहीं ? जानती हो, जैसे ही दशको और फिल्म बाला को मालूम होगा वसे ही तुम्हारी सारी इमेज मिट जाएगी। सारा चाम सारा आक्पण समाप्त हो जाएगा क्यो कि जिस हीरोइन ने शादी की, वह फिल्म इंडस्ट्री से आऊट हो गई।" "अब तो सब कुछ हो चुका है और मैं इसे पसद भी करती है। तभी विनय ने प्रवेश किया। विनय लेखक था। उसकी कई कहानिया पर फिल्म बन चुकी थी। कुछ हिट भी हुई थी। उसक कुछ प्रयागवादी चित्रो ने फिल्म जगत मे नई परम्परामआयोजम भी दिया था उपमा उमकी वडी इज्जत करती थी। विनय न सिगरट मुलगाकर कहा, क्या बात है राजन साहब, फोन पर क्मिसे गरमा गरम बहस हो रही है। काफी उत्तजित लग रह है।" विनय एक सोफे की कुर्सी पर बैठ गया। राजन ने एक पल विनय की आर देखकर कहा "उपमा न क्ल कोट मैरिज कर ली है। "क्या ?" विनय को जैसे विश्वास ही नहीं हुआ। "उमन शादी कर ली। मिस्टर जशोक शर्मा से, वह इजीनियर है।" राजन 7 उत्तेजित स्वर मे पुन कहा। "यह तो अच्छी बात है।' विनय ने विनयपूवक कहा। 'खाक अच्छी बात है।' राजन लगभग चीखत हुए बोला, "मरा तो भट्टा वैठ गया। क्ल जसे ही लोगा को यह मालूम होगा वैसे ही उनमे तरह- तरह की शकाए तैरन लगेंगी। कम से-बम दो-तीन साल तक तो शादी के लिए और रक जाती।" "अरे भाई, हम अपना स्वाथ देखते हैं और वह अपना ! उसका भी अपना भविष्य है। राजन साहब जवानी बीत जान पर कौन क्सिको वह जानती थी कि राजन एक बडा निर्माता है। वह उस अपनी 72 मिनसपोरी पूछता है। यहा तय कि जाहीरोइन पलॉप हो जाती है उस भी काई रोटा तो क्या घास भी नहीं टालता।' पर अभी विनय अच्छा चला, एक बार उपमा स मिल लें। जाप मर साथ चलिए न विनय वाबू । ‘चलिए।' थोडी दर म वो उपमा के घर पहुचे। उपमा न माग म सिदूर भर रखा था।हाथा म क्गन चमक रह थे । उमन उन दाना वा स्वागत किया। विठाया। नौकरानी को चाय बनाने का कहा। गजन ने छूटत ही कहा, "तुमने मुझसे शादी न करन का वायदा किया था । उपमा, फिल्म कोई क्वाडी की दूकान नहीं है । यह कराडो का धधा है । इसम एक-एक चीज को लोग आक्त है ।" दखिए, जब शादी हो गयी सो हो गयी।" उपमा न कहा, 'फरे वापस नही हो सकते । हा, मै आपकी फिल्मे पूरी कर दूगी । आप विश्वान रखिए।' 'इससे काम नहीं बनेगा मेरी सारी पहले की पब्लिसिटी गबग जायगी। हा, जव आप इस शादी को गुप्त रखें।' इम वात पर उपमा झल्ला पडी। बोली, "आप क्या बच्चो-सी बातें करते हैं । ऐसा नहीं हो सकता।" राजन उठ गया । श्रोध मे फुत्कारपर वोला, उपमा । तुमन भरे साथ अच्छा बरताव नही क्यिा है। मैं भी तुम्हारे अनुबध पर दोबारा सोचूगा। अभिनत्रियो की कमी नहीं है । एक ढूढो, हजार मिलती है।' राजन काफी गुस्से म भर गया । वह उठकर चला गया । उपमा उदास हो फिल्मा में से निकाल देगा । उमे आज इस स्थिति तक पहुचान वाला राजन ही है। क्या सोचन लगी?' विनय ने उसक गभीर मौन बातोडा। 'सोच रही हू विव्यक्ति और परिवार व सम्बध मर गए है । जीवित रह गए हैं स्दाय स लिपटे रिश्त । आदमी कवल अपना मुप चाहता है।

यह हर पीमत पर अपने महमानो यो भुना चाहा ह मिला कि रातन व मुझ पर अहसान है पर इसका मतलब यह नहीं हमार अपन निजी मुख ही नहीं।" विनय न याद है कई माह पहले एक दिन उमेरा भाई मोवामान गया । दवा के पस नहीं थे । परेशान उपमा गाद व पास गई। शाद फिल्मा मवाद लिखता था । शरीफ और सुशील था। कई बार उमन उपमा का अपनी पीवी के द्वारा कहलाया था कि यह फिल्मा म काशिश कर। उस अवश्य चांस मिनेगा । पर उपमा ने उस पर गौर नहीं दिया। लेकिन भाई के पामारी उपभा को विवश पर दिया। वह शाद स कुछ रपए ल लाइ, शान ने फिर अपनी राय दोहराई। उपमा न उस पर विचारा । एक दिन वह चुपचाप शाद के साथ राजन व पास पहुंची। राजन न उस देखा । वद, नाक-नक्श,आखें और रग । शत प्रतिशत फिट तुरन्त ही दूसरे दिन बुलाया, हजार रुपय माहवार पर दफ्तर म रख लिया। एक छोटा-सा कमरा सान्ताकुज मदिला दिया। मिलसिला चल पड़ा। राजन ने अपनी नई फिल्म की धापणा की। हीरोइन का चुनाव करना था। नदा का नाम प्रस्तावित किया गया। शाद ने राजन स कहा कि वह उपमा को ले ले । राजन ने कहा कि उपमा में ऐसे गुण कहा? वह दफ्तर मे ही ठीक है। उपमा को बरदाश्त कहा ? पर शाद ने बता दिया था कि हीरोइन बनकर लाखो रुपये कमाना आसान नहीं है, उसके लिए बडे त्याग की जरूरत है। त्याग शब्द के निहित अथ को वह जल्दी ही समझ गई। त्याग का एक ही अथ था-शरीर का त्याग। स्वय का समषण । वह हिचक गई । घर लौट आई। पहली बार उदास उदास-मी खिडकी भ वठ गई । मा ने पूछा, "क्या बात है बेटी?" 'राजन साहब मुझे हीरोइन नही बना रहे है।' "क्या "मा, यह लाइन बहुत ही ग दी है।" उसने साचा कि मा उसब जवाब से खुश होगी। साचेगी कि उसो वटी धाम और नतिकता पर चलन वाली है, पर मा उल्टी उदास हा गई । उसको आकृति जीव भावो से घिर गई, माना उसकी बेटी जान ग्थकर और उपमा इमकी आर " 74 मिनपखोरी आने वाली समद्धि को ठुकरा रही है । और ता और, दूसरे दिन उसकी मा स्वय राजन के पास पहुंच गई। राजन न वह दिया कि वह हीरोइन बना मक्ता है, उसकी एव एक चीज हीरोइन बनन व काविल है पर उमक लिए थोडी तहजीब, थोडा एडवास होना जारी है। जरा भी प्रयत्नशील नहीं है । वह तो घर स दफ्तर और दफ्तर से घर। मा लौट आई। उपमा पराठे सेंक रही थी। मा न जलन स्वर में रहा, जिदगी भर खाना ही बनाती रहोगी या कुछ और करोगी? आज राजन तुम्हारी वडी शिकायत कर रहा था ।" उसन फिर जात्मविश्वास के माथ कहा, "मा । यह सब लोग "मोह । तुम समपती क्या नहीं कि यदि एक फिल्म चल गइ तो मारी गरीबी मिट जाएगी । जरा सोचो, तुम्हारा त्याग मारे परिवार का एक नई जिदगी देगा।" इसके बाद सन महसूम क्यिा विघर का एक एक सदस्य उस ताने मारन लगा है। हर पल तनाव से भर जाता था। लगता था कि वह इस घर को सुख मे नही जीन दती। वाप न तो एक दिन बहुत ही जली-कटी मुना दी। मझली वहन न छोटी बहन से कहा-"सती सावित्री तो नहीं लगती, मट्रिक पास को हजार रुपए या ही नही मिलते " उसे लगा था कि उसके जिस्म से हजारो विच्छू चिपक है। फिर उसे अपनी मा, उस वश्या की मा की तरह लगने लगी जो अपनी वेटी को गदगी म डालन के लिए मजबूर करती है, जब वह नाचनी है तब वह बैठी-वठी पान लगाती है । एक्दम काइया । उसे मा से घणा हो गयी। उसे वाप बाप नही लगा। एक अजीब-सी धणित कल्पना की अपने बाप के लिए। फिर वह अजनवी बन गइ। परिवार की भीड म उमन अकेलेपन की निर तर जहमान क्यिा । जाखिर वह टूट गयी, चली गयो रमन क पास। साफ-साफ कह दिया कि वह हीराइन बनेगी किसी भी कीमत पर बनेगी। राजन ने उसे रात को बुलाया । यह जगह वर्ली सी फेम पर थी। यह आलीशान फ्लंट मिस्टर गोपी का था । गोपी भी कभी प्रोडयूसर था। पर आजकल जरा क्डकी मे था। कुआरा और अकेला था । एक्दम अवेला।

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76 मिनामागे
ना की दवीरत दयो। ननन मन निता नीति पी। उपमा
-टिप जान मनका कर दिया किरपा या घर में काहान
मच या मावि मनोकामा रसदार न दन्टाल
जाया था। उनन नार कर दिया कि पदिमाग नहीं पता
ना वन इन्टारमेट नहीं दर।
दस हजार पपा का जान हुए देखकर घर वाले नाराज हो “ए ।
रहान उपमा का तह-तरह ने मनाया कि वह रोटा पर पी जाए पर
उपना न नाफ-साफ कह दिया कि उनके अजा में दर्द है वह बार नहीं
जा सकती। बाउटडोर की शूटिा है, पंनिल भी हो जाएगी।
इम रनर कदाद उपमा नदेवा कि उनके पासबधी एकदम अपरि
चित हो गए हैं । उनके चेहरो पर वही क्रूर तटस्थता वाद हैं जो प्राचीन
कान म गुलामा के मालिकों के चहरा पर होती थी। सभी उन तिरस्कार
की नजर म दखन लग और मा तो एक्दम डायन-मी बन गई। गाली
गीत निकालन लगी-"वदमाश वही को काम से जी चुराती है साली
का मार-मारकर घर से निकाल दूगी। सुख मे रोटिया क्या मिलन लगा
हैं, नालायर का दिमााही खराब हो गया है।'
उपमा कुछ नहीं वाली। उस इतना बहसास हो गया कि उसकी मा
उम जम दर भी उसकी अपनी मा नहीं है। वह एक कुटनी । से सिफ
पैमा चाहिए, पैमा।
इस तरह घर का एक एक सदस्य नगा हो गया या उनके शब्द ना हो
गय थे उपमा का हृदय पीडाओ का सागर हो गया था।
वह घर म निकल पड़ी थी घूमती रही थी । शराब पीती रही । फिर
चनी आई जुह व शात और एकात तट पर ।
वहा चुपचाप बैठ गई थी।
माम वा मुरत आहिस्ता आहिस्ता जल-समाधि ले रहा था। लहरो
पर चमकती विरणाव चिलके मनमोहर लग रहे थे।
वह माचती रही। उम नगा कि इस समद्ध और भर पूर जीवन मे
उमत्रा अपना काई नहीं है । मार स्वाय और अपो तुपये प्रेमी हैं । जिन
दिन वह काम बद पर दगी, उस दिन से लोग उस युजलाई कुतिया की

नया जम 77 तरह घर से निकाल फेंगे । फिर हीरोइन का जीवन होता ही क्तिना ह? नायिका की उम्र पाच-दस साल । फिर वह इतनी भावाभिभूत हो उठी कि उम बूदो का स्पश भी महसूस नहीं हुआ। उस जपन घर वाना के चहर बरले हुए ला। मुखौट रहत हुए बहुरूपिए । उसका बदन अनात भय के कारण पमीन पसीने हो गया । वह अपन को बुढिया समझने लगी। उसे नयात्र जान याद आई जो आजकल बोरीवली म एस पच्ची खोली म जीवन बिता रही थी। क्या जमाना था नवाव जान का? अपन जमाने की विख्यात अभिनत्री । क्तिना दुपात? ता क्या उमका भी यहीं अत होगा। उसे लगा कि उसके सार अग अलग हो गए है । तभी रिसी ने मधुर स्वर म पुकार कर उसका ध्यान भग विया, "माफ कीजिएगा, जाप उपमाजी है?" उपमा ने दया--एक गोरा चिट्टा युवक झुका हुआ खडा है। उसकी कालीबाली बडी-वडी आखो मे जात्मीयता दहा रही है। उसके साथ एक जवान लडकी भी खडी है । वह भी मुसकरा सी रही है। "मैं अशोक शर्मा हूँ । इजीनियर है । यह मरी बहन सुपमा है । आपकी बडी फन है । आप इसकी प्रिय कलाकार है।' उपमा ने बडी औपचारिक्ता से हाथ जोड दिए, सुपमा बोली, "हमारी कॉटेज पास ही है। आप चलिए न? हमे बडी प्रसनता और गौरव होगा। चलिए न।" अशोक न भी अनुरोध में कहा, "चलिए न, आपकी बडी कृपा होगी।" उपमा ज्यादा सोच विचार नहीं सकी। चुपचाप चल पडी। अशोर वे घर में उसकी मा, उसकी छोटी दो बहनें और एक छोटा भाई था । अशोक के पिता मर चुके थ, आजक्ल परिवार का सारा जिम्मा अशोक पर था। व से अशोक के पिता भी एक अच्छे सरकारी अफ्सर थे। थोड़ी ही देर म उपमा उस परिवार से बहुत घुल मिल गई। उमन अशोर की मा मे ममता या समदर पाया। फिर क्या, उपमा जव तब आने लगी । क्षण भर की मुलाकात प्रेम मे बदल गई । अशोक और उपमा अनचाहे किसी अटूट बंधन में बंधते रहे । दानो की स्थिति बडी नाजुव हो गद ।

78 मिनसखारी अशोक अथाह प्रेम के सामने उपमा अपने को अपराधिन समझने लगा। जव एप दिन जशोर न विवाह का प्रस्ताव रखा तब उपमा रो पडी । अशा ने बत म जिद पक्ड ली । उपमा ने कहा, "मैं झूठ नही बोलूगी अशोर । शरीर की पवित्रता मेरे पास नहीं है । क्ल लोग तुम्ह तान मारेंगे, उन्हें तुम नही सह पाओग। फिर मुझे छोड दोगे।" अशोक बोला, 'मैं तुम्हारे बारे मे सब कुछ जानता हूं उपमा । मैं एक ही बात कहूगा कि तुम जिस पल से मुझे प्रेम करती हो, उस पल से आज तक तुमने सच्चा विश्वास ही दिया। मैं तुमसे विवाह करूगा, जवश्य गा।" उपमा ने उसके पाव पकड लिये। लेक्नि उपमा २ घर मे हगामा हो गया। वे लोग भूखे बाज की तरह उपना पर टूट पडे। क्तिन ही गदे शब्दो का प्रयोग किया उसके लिए। उपमा चुपचाप । वह साल भर तर अशोक के साथ अपने को एडजस्ट करती रही, शराब पीना छोडा, सिगरेट पीना छोडा चाह न उसम आमूलचल परिवतन की क्षमता पदा कर दी। लेकिन उसके घर वाले दिन प्रतिदिन उसवे कट्टर शत्रु बनते गए। "हम रिसी भी कीमत म यह विवाह नहीं होने देंग । हम अशोक को जान से मरवा देग। तुम्हें घर वालो पर दया नहीं आती?' एक दिन तो मा ने उसे पीट दिया। दिन भर ताले मे बद रखा। उमका धय टूट गया। शेष स्नेह का एक क्तरा भी उसके अन्तस में सूर्य गया। अवसर मिलत ही वह भागी। चुपचाप एक फ्लट ले लिया। चुपचाप अशोर स विवाह कर लिया। कोट मरिज यदि शेफाली का भाई नहीं कहता तो यह राज, राज ही रहता। पर अब वह राज आम चचा बन गया एक दुल्हन बनने की था। सारी फिल्म इण्डस्ट्री में एक ही चर्चा यो उपमा ने शादी कर ली। अतीत गाया सत्म हो गई । विनय को सिगरट जलत-जलत अगुली यो छू वटी । वह चिढ़क पडा। उपमा ने बताया 'ये सारे लोग मेरे भविष्य-मुख, सतोप और जीवन का नहीं देयते। ये देखत हैं अपने सुय । सम्बध क्तिने बदल गए हैं। - नया जम 79 लगता ह रिश्त रिश्त न रहकर स्वाथ की डार बन गए है । क्तिनी मर्मान्तक पीडा होती ह जब नादमी ऐस सम्बधा के बारे म सोचता है । कहा है मा- बाप, कहा है भाई-बहने? सव मर चुके है जि दे ह–स्वाथ । जाज मैंन विवाह कर लिया तो सारे लोग बौखला उठे। पर, मैं नवाव जान नही होना चाहती। मैं जीवन म एक व्यवस्था चाहती है, वह मैंन कर ली । अब भाड मे जाए घर वाले। विनय न दखा एक दृढता है उपमा के चेहरे पर । ('खो जमरो' का अनुवाद) खोल वह अपन शहर व घर स सारी सामयिव स्थितिया व मूल्या कवि विद्रोह करक हिप्पी जीवन या एक दिन महानगर म गुजारन के लिए म वठ गया ताकि उस जीवन की प्रत्यभ अनुभूति र सरे । उसकी बहुत भारी थी और वह चौवीस घण्टे एक वादशाह की तरह व्यतीत । सकता था। उसने अजीव ढग की पोशाक पहन रखी थी। पजामे पट साधारण-सी स्पोट स शट । हिप्पिया स ही बिखरे लम्बे से बाल । पी की कमानी का रगीन चश्मा। पावा मे साधारण चप्पल जिन पर हल्द हल्ला मल जमा था। उसने अपनी पीठ पर थला लटका रखा था जो उसके विदेशी हाने भ्रम पैदा कर रहा था। थैले म सिफ चादर व एक तौलिया था। वह ट्रेन से उतरा और स्टेशन को अपनी नजर मे भरने लगा । उन यह निश्चय कर लिया था कि वह जभिव्यक्ति की आधुनिकतम श जपनाएगा और श दा व वाक्या का प्रयोग नए ढग से करेगा। इसी मार म उमन सोचा यहा जादमी कीडे मकोडे की तरह रेंग रहे हैं, विभि मोटी-पतली जावा जागस म लड रही है और सिलखिलाहट खा मायिकाला की तरह लगती है। उसे अपन पर गव हुआ । उमने वहा' घुटनदार हवा की सास पीकर कहा, ' मरे देश के लाग बौन हैं । वह भी म घस गया। तभी उसने पाम से एक महिला गुज जिसके ५ रीर म लवेंडर की जगह पसीन की नमकीन यू ला रही थं उमने रत्त भम श द उछाता। Tद महिला पर तीमे पत्थर की त -- .

खाल 81 गिरा। महिला ने देखा । नजरेटर राइ । वह युवती काफी पतली थी । रग भी काला था, पर उसके नाक-नक्श आचपक थे। वह उसकी तीखी नजर मे यंप गया । दूसरी ओर मुह करके सिगरेट सुलगाने लगा। धुए को पीते हुए उसने खामा और सोचा कि भैस वेवत शरीर से नही गध स भी हो। वह रिंगचू रिंग रेंगने लगा। यकायक उस पर कई आवाज आक्रमण करती हुई सी लपकी--"पक्डो-पक्डो चोर-चोर" एक आदमी भीड मे गेंद की भाति उछाने लगा और फिर जाल म पछी की तरह फम गया। चार पक्ड लिया गया था। वह जवान था। आक्पर था। कपडे फैशनेबुलें थे। उसने सोचा, वेचारा कोई बेकार युवक । जरूर फावा स प्रताडित वाद ग्रेजुएट होगा। वह युवती रोगी की तरह हाफ रही थी। दमे के रागी की तरह । वह चीख रही थी पर उसके आधे शब्द गले मे ही भर रहे थे। "यह चोर है, इसने मेरा बटुआ छीन लिया। इसकी जेबे देखिए।" युवती हाफती हुई चीखी। युवक काफी तटस्थ था। उसके चेहरे पर भय नाममात्र को नहीं था। अलबत्ता उसके होठ क्सिी देशभक्त प्रातिकारी की जावट-भरी मुस्कान से रगे थे। जब रेलवे का एक सिपाही उधर आन लगा तब उसने विचित्र स्टाइल से अपनी जेब मे से एक बटुआ निकालकर युवती की हथेली पर रख दिया । युवती ने बटुआ हाथ मे लेकर देखा । खोलकर देखा । तेज निगाह से उस युवक की ओर देखा। दोनो की नजरें आपस मे चिपकी । उसने सोचा--- यही से दोना मे प्रेम हो जाए तो एक नई ढग की प्रथम भिडत । एक नया आरम्भ। "चोर वही का, हट्टा-कट्टा होकर मजदूरी क्यो नही करता?' एक बूढी आवाज उन पर रगी। वह धुझलाया एकदम बोदा और वासी सवाद। पुलिस आई। लोग आच लगने पर शहद की मक्खियो की तरह बिखरने लगे। उसने खडे-खडे फिर अपने अनुमान को कष्ट दिया। जरूर । यह सिर स पाव तर काप वह उमी रेस्तराम घुस गया। अपनी जबरदस्त 82 मिनपगारी अभावग्रस्त जिगित बार पुयर है। भी मिपाही न उमगार पर हाय मारा, 'क्या व दिनार कुमार म यचा पिर स्टान पर आ गया।" उमा बाला की लालीप की तरह थी। 'मालिर यहां घ घा गानदार चलता है।' वर बरे विश्वास और निर्भीरता स वाला। "यम्बप्त पोयर ।" गिपाही युदबुदाया। पोछे म अचाना रिमी न उमेधसामारा।पसमपल म वह स्शन से बाहर निकल आया। अचानक उसन यह अभय रिया रि यह सारा इलाका मुर्दाघर है। लोग चलती फिरती सारों हैं-जिदा मुहै-यह युदबुदाया। एर फारमोटर धडधडाता हुआ उमर सामन आया । उस महम्म हा वह उमर नीच आरर रौंदा जाने वाला वह अव सडक पर था। ट्रपिर भीड मिश्रित ध्वनियों का कोलाहल । उमदे दिमाग म अपन नापको भीड म गुम परने का मक्स पदा हुना पर उसके पट यो भूख ने एक पल म उसे एक रेस्तरा के आगे ला पटका। पटपूजा प्रथमोधम । उसने सोचा। उसी पल टोकरी की तरह एक वस्तु उसके सामन आकर पडी, चमकदार । उसन देखा-वह कोई विदेशी हिप्पी था। हिप्पी क्पड झाप्ता हुआ उठा गदा, गदे कपडे और नग पाव। उसने दुकानदार को आदर भाव म देखा । शान से मुस्कराया और सलाम ठोककर चलता बना। "थैक्यू-यक्यू , हिप्पी बडबडाया। दुकानदार गाली देत हुए परे ढोल की तरह बजा, "न जान क्तिन भुकाड आजक्ल इण्डिया म इम्पोट हो रह है। मार खा लेंग पर पसा नही देंगे। बेशरम कही के। उसने भौह नचाकर कहा, "मूल्या के प्रति शानदार विद्रोह, आगोश आवेश भूख को मिटाने के लिए उसने आमलेट चार टोस्ट और एक काफी का आडर दिया। उ हे निगल कर सिगरेट जलाता वह बाहर निकलने लगा। उठा।

खोल 81 - "दो रुपय तीस पैस ।" वरा चिल्लाया। उसने पैट के पीछे वाली जेब मे हाथ डाला। उसे लगा, एक पल को उमको मात ठहर गयी । जेब म बदुआ नही था। तब उसने इधर-उधर निगाह दौडायो। चीखना चाहा, 'चोर-चोर पक्डो-पक्डो।' पर वह स्टेशन नही रस्तरा था । उसके रोम रोम स पानी चून लगा। तुरन्त उसे वह हिप्पी याद आया । कूडे की टोरी के तरह फेंगा गया वह । मुझे भी साहस स काम लेना चाहिए-उसने सोचा। तभी दुकानदार व्यग्य से बोला, "साहब की पाकेट मारी गयी है बटुआ निकल गया है ।" वह कहने को उद्यत हुआ कि सचमुच उमका बटुआ निकल गया है जिसमे शानदार ढग से एक दिन गुजारने जितना रुपया था, पर वह कुछ भी नी वह मका, बल्कि दुकानदार गुस्से के स्वर मे पुन बोला 'बम, आप अपनी जवान पर लगाम रखिए मैं आप मव लागो की तरफीव खूव समयता है । जैसा गोरा वसा काला, पर मैं बार-बार ग्राहक को धक मारकर या बेइज्जती करके चुप नही होन जा रहा समझे उसन जोर से पुकारा। उसन दुकानदार को सब-कुछ बताना चाहा--पैसा के बारे में, अपन इरादे के बारे मे, रितु मुह पर मनो किसी न प्लास्टर चिपका दिया था। नौकर रामधन आनामक मुद्रा मे आकर पडा हा गया। दुकानदार ने रामधन को हुक्म दिया, 'फामूला नम्बर तीन सो तीन पला झपक्ते रामधन ने उसकी स्पोटस शट खोल ली-चादर - जनार रामधन " छीन ली। 'ये ये ।' “य दोना सिफ दो रपये में बिकेंग-कितने रद्दी विस्म वे है।" दुकानदार ने उपेक्षा भाव से कहा। वह भयभीत हो गया। उस हिप्पी का फेजा जाना स्मरण हो आया या। वह दुम दबाकर भागा, लोगो की आख और कई तरह व अट्टहास उसका पीछा कर रह थे। अब वह सही ढग म महानगर में लोगा क आक्षण का केंद्रबिदु हा गया। नगे बदन पर लटका हुआ थला । वडे-बडे बेतरतीब बाल । लडकिया उस देवकर रोमाचित हो रही थी। 'इण्डियन हिपी' जो उससे मिलते 81 मिनखखोरी थे, व जग्रेजी म बोलत थे जस हिप्पियो की भाषा अग्रेजा ही हो । पर वह गोरे हिप्पियो की तरह हसकर, तटस्थ रहार, प्रसन्न होकर न तो जवाब दे पाता था और न सवस वेखवर निर्भीक होकर चल सकता था । उम बार बार अपने बदन पर कोई भारी खोल ओडे होन का भ्रम होता था। वह अपने शरीर पर हाथ लगा लगाकर देखता ओ, यह तो नगा है-विलुल फिर उसन क्या आद रखा है। वह इसी बात स परशान था । उम कई विदेशी हिप्पी लडवलडपिया मिले। वे हर हालत म खुश थ, मस्त थे और निश्चित थे। वे इस इण्डियन हिप्पी के साथ लम्बे पल गुजारना चाहते थे, पर बह सबस क्तरापर भाग रहा था--गलियो, सडका और चौराहा पर किसी परिचित व आत्मीय चेहरे की तलाश म जिससे वह कुछ उधार लेकर यहा स वापस जा सक-पर वह किसी क्षण भी उस बोझिलपन से मुक्त नहीं हो पाया जो उसके नगे शरीर पर क्सिी खाल के रूप मे ओढा हुआ था। भारी भारी था। वह क्या है-वह क्या है वह बार-बार सोचता। वार-चार अपन नगे शरीर को छता। फिर भी वह एक परिचित चेहरे की तलाश में चला जा रहा था, आदमी दर-आदमी। वह अब एक ही चेहरे की तलाश में था, एक आत्मीय चेहरे की। (खोल का अनुवाद) उखडा-उखडा लगभग आधा घटे से वह मेज पर झुका हुआ वठा था । बीच-बीच में कुछ क्षणा के लिए अपनी कमर सीधी करता था और सैल्फ म भरी पुस्तको पर नजर डालकर ललाट पर सलवटें डालता था फिर अपने सामने पड़े कागज पर लिखने बैठ जाता था। अभी तक काफी लिख लिया था-रात दिन दिन रात दिन-दिन-दिन रात, महानगर सत्रास, ऊव, खालोपना भोग, बोध शोध, खोज, रोज-बकवास । इन पर उसने गहरा क्रॉस लगा दिया। निव को कई बार रगड-रगड- करक गहरा कास । इतना गहरा क्रॉस कि नीचे का कागज एक दो जगह फट भी गया था। इधर वह लाख कोशिशो के बाद भी कोई नयी कहानी नहीं लिख पा रहा था। पता नही उसे क्या हो गया है। शायद वह कुठित हो रहा है । शायद उसकी तमाम इच्छाओ पर रोलर चल गया है । वह सोचता है कि वह एकदम मरा तो नही, मरा-सा जर हो रहा है। उसका दाया गाल और गले के नीचे का हिस्सा मेज से चिपका हुआ थ । टबल क्लाय सदा खराब हो जात थे इसलिए उसने उससे ऊबकर इस वार अपनी राइटिंग टेबल पर सनमाइका लगा लिया था। एक नयी डिजायन का सनमाइका। सफेद सनमाइका पर हलके हलके वाले बादल के टुक्डे विखरे विखर । यह अपन आप मे खोया बहुत दर तक यू ही पूर्ववत मुद्रा म चिपका रहा। जब उसने अपनी गरदन उठायो तो उस महसूस हुआ कि वह कुछ रो लिया है । तुरत उसने अपने लिखे कागज पर दृष्टि डाली। देखा, सद , ।

86 मिनखोरी । बुछ लिदा हुना उमक पसीन से धुधला और फल गया है । उसके लिख एक-दो शब्द नय ही अथ दन लग गय हैं। अश्लीलता भरे नय जय । वह भी उह प्रश्नभरी नजर मे कुछ क्षणातक निहारता रहा। फिर भीतर ही- भीतर हस पड़ा। सहसा उसे ख्याल आया कि उसे या तो चाय पीनी चाहिए अथवा मिगरट क्यापि इमी तरह एव नुस्ती, टूटन और विखराव कम हो सकता है । पर उसन दग, उमवे स्टीव म तल नहीं है और साता सिगरेट की डिविया म चादी क कागज के सिवाय कुछ भी नहीं है। हा दरवाने के कोन म एग-ट्रे सिगरेट व जले हुए टुक्डा से इस तरह घिरा था जस बोई स्वीमिंग पुल असय्य पाल वाता की गोरी छोरिया से घिरा हो । वह एश-ट्रे व जल हुए टुक्डा को देखता रहा और मोचता रहा क्या इह नये ढग से ग्रहण किया जा सकता है ? क्या ये जल हुए निगरट के टुकडे नया आब्जर्वेशन नहीं दे सक्ते? इन गोरी देहा से भी अलग। पहानी यही स शुभ की जा सकती है। एक महानगर ये पलट का रोहिंग-बम-ड्राइग-बम-स्लीपिंग-बम-मयाडयाना । रा भौर में भी घिरा हुआ अक्ला जादमी । उसके पास जले हुए सिंगरट ये टुक्ड माना जली हुई बननियारपटित व्यक्तित्व । अभावो और एकात की पीडामा लिप- पुत अनय टुबडे । हर टुकडा सत्राम और अताट स पिर जीवन का प्रतीर। उसन उस फिर काट दिया। य नन्द यापी बासी हा चुप हैं । उमने हटात् उन पर ही गहग कॉम लगान हए माचा। हालामि वह इन शरदा के वार म एम एम पदमा प्रमाग परना चाहता पाना पावर औरता लिए प्रयोग म साया जाता है, पर ग म पविता जग मम्द प्रयागासी बहुत यम छूट रहती है और उगम लागा की भसार प्रतिप्रिया गुनन पा साहम भी नहीं था। परप्रांग पर IT रितन ही पॉग लगाता गया। मत म यह गरमाएररा भरपर उठ गया।

उखडा उखडा 87 वह कमरे के बाहर बरामदे में आ गया। बरामदा छाया वस्त्र पहन चुका था और सामने वाली खिडकी म कोई शक्ल नही थी। हालाकि वह फिल्मी गीतो का निहायत ही बचकाना सृजन मानता आया है, पर अभी उसे न जाने क्या सूझा कि वह धीरे-धीरे अपने वसुर गल मे गुनगुना उठा--- 'सामने वाली खिडकी म एक चाद का टुकडा रहता है, अफसोम है कि वह हमसे कुछ उखडा-उखडा रहता है ।' उसने सोचा कि उखडा का प्रयोग थोडा जाधुनिक है। तभी उस खिडकी मे एक न पसद आने वानी शक्ल आकर फस गयी जिससे उसके सौदय-बोध पर कुछ फटन-जसा धमाका हुआ। और, दिल की पखुरिया छितरा गयी। उसने क्षोभ भरी दष्टि से उस शक्ल को पूरा। चाद के टुक्ड की जगह भस की वेटी खडी थी। उस लडकी की मा । उसन थूकते हुए वुद- बुदाया-"दो सीग हो जाते तो एक आफ्षक भस बन जाती। अच्छी कीमत होती।" उस देखकर वह प्राय गभीरता से सोचता था कि आदमिया म भी भैसा अवश्य हुआ करता है वग्ना उस खिड़की से गाली-गलौज के छोटे एक दो बार दिन म उड कर उसके बरामदे में जरूर आ पडत । एसी काली रद्दी और मोटी औरता के साथ क्से कोई जिंदगी व्यतीत करता है? इसके साथ का एक-एक पल तनाव और खीझ मे लिथड। हुआ हाना चाहिए, पर उमे इस बात से बहुत ही हताश होना पड़ा कि खिड़की के भीतर रहन वाले मोटे दपति कभी जार स वोलत तक नहीं । हा चाद का टुक्डा फ्भी-कभी उसडी-उखडी भापा म जरूर बोलता सुना जाता है। वह उसकी आवाज सुनत ही वरामदे में आ जाता है क्योकि उस मालूम है कि जब चाद का टुक्डा उखडा हुआ होता है तो बार-बार सिड की मजा आकर थूकता है और वह उसके साथ कई तरह के मानसिक सबध फौरन स्थापित कर लेता है। उसकी इच्छा हुई कि वह चाद के टुकड़े पर कोई कहानी लिसे । उसने लिखना शुरू किया--एक खिडकी । उसके नीचे चौखट म जडी हुई एक सुदर आकृति । बडी-बडी आखो मे खीझ की गहराई । वह बार-बार अपने होठ को चूसती है। होठ के चूसन की कल्पना के साथ उस अपनी मोटी शादीशुदा प्रेमिका की याद आ गयी, जो उसको खिडकी के ठीक 88 मिनखाखोरी सामने रहती है, पर अभी उसका पलट वद था। शायद उसका वहमी पति 'वकील साहब' पर महोवह प्राय होठ चूसती है। होठ चूसन की जादत से उसे वडी घिन है। ऐमी घिन है कि उसका जी मितलाने लगता है। किसी किसी लडकी को होठ चूसते देखार उसके मन म एक ऐसी वितप्णा जागती है कि उसकी इच्छा कुछ घट किसी औरत को देखने तक को नहीं होती। पर उसे अपन पर इसलिए जाश्चय जाकि उसने एसी घणास्पद क्ल्पना अपनी क्था नायिका पर क्यो की ? उसने फिर कहानी पर कास बना दिया। रद्दी । उसने इस शब्द को उगला। अव वह सवथा वोर हो चुका था और उसे यह लगा कि कभी कभी आदमी के लिए अवेलापन उसके हजारो क्षणा की हत्या करने की क्षमता रखता है। वह घटो से इस कुर्सी से चिपका है। उसक "हिप्स' तप गये हैं और जापो मे एक पोडा सी होने लगी है । आखिर व फाउटेनपेन को, जो चीन का बना हुआ है, उसे बद करके रख देता है। यह पेन उसके एक असमिया दोस्त ने भेजा था। खूब वढिया चलता है यह पेन जिसका मक पाकर पेन जैसा है। पता नहीं, वह इस पन को लेकर अपन को सहसा क्यो अपराधी समझने लगा? यह चीनी पेन । उसन यह महसूस किया कि चीनी एग्रेसन के दिनो मे अगर गुप्तचर विभाग उसके कमरे की तलाशी ले लेता तो उसे डी० आई० आर० के अतगत बद तो नहीं करता, पर उस पर सदेह जरूर किया जा सकता था। "सचमुच हममे कुछ भी राष्ट्रीयता नहीं है । हमारा राष्ट्रीय चरित्र स्वाधीनता के बाद बना ही नही।" और उसन यह उपदेशात्मक वाक्य दोहराकर पैन को धीरे से मेज के नीचे विछ कालीन पर फेंक दिया। हा, फेंक्त हुए उसे कुछ गौरव-सा अनुभव जरूर हुआ। अब उसको सिगरेट पीने की बडी इच्छा हुई। दिमाग काफी थका थका लगा। कुछ बोझिलपन भी बढ गया था। वह नाइट सूट में बाहर निकल जाया। सुबह म वह कुछ लिखना चाहता था, इसलिए वह ड्रेस भी नहीं बदल सका। वह नीचे उतर आया। उसकी इच्छा हुई कि इजीनियर की बीवी से योडी गप्प मार ले पर वह दरवाजे पर खडी नहीं थी और उसकी हिम्मत उसे पुकारन की नहीं हुई । वह इस मामले म अपने को बडा उखडा-उखडा 89 घाचू समझता है--डरपोक और पिछडा हुआ, क्याकि इजीनियर की वीवी तो जब उसकी जररत समझती है तो उसे आवाज लगा देती है और जब तक वह उसके पास नहीं जाता, जब तक वह दरवाजे के बीच फसी हुई मिलती है। वह सिगरेट का पैकेट लेकर वापस इजीनियर बीवी के पलटक खुले दरवाजे म झाकता हुआ अपने फ्लैट पर लौट आया। आकर कुर्सी मे वापस धस गया। वह रह-रहकर खीझ म भर उठा कि वह इजीनियर की बीवी के पास धडल्ले से क्यो नही जाता? उसने अपने पर आरोप लगाया कि वह बहुत ही दब्बू और कायर है। साथ ही उसने इजीनियर की वीवी पर भी यह आक्षेप किया कि वह उससे मन बहलाकर याने जपने फालतू समय का साहित्य-चर्चा द्वारा श्रेष्ठतम उपयोग करके कह देती है-'अरे मै तो भूल गयी कि मुझे उनकी टरेलिन व्हाइट पैट पर आयरन करना है। और वह उसकी उपस्थिति के अस्तित्व को सहसा नकार करके अपने काम मे लग जाती है और वह कुढता-सा वापस आता है । हालाकि उसके मन मे एक चीज तब भी जमी रहती है-इजीनियर की बीवी के पट की गोल-गोल नाभि । वह जब जब इजीनियर की बीवी वे यहा जाता है, तब- तब वह उसकी गहरी नाभि को लुक-छुपकर जरूर देखता है और अजीब नगी उत्तेजित कल्पनाओ मे खो जाता है। सिगरेट से अगर उगली नही जलती तो वह जोर गहरा डूबता, पर जलन के अहसास के साथ वह चौक पड़ा और उसी सिगरेट में सिगरेट जला- कर पुन बरामदे मे आकर खडा हो गया। खिडकी अब बद हो गयी थी । वद खिडकी को देखते ही उसे और अधिक बोरियत महसूस हुई। उसने निणय क्यिा कि वह कल वापस अपनी ड्यूटी ज्वाइन कर लेगा। आदमी निठल्ला बठकर अपने पर अधिक अत्याचार करता है। क्या करे वह मारे दिन? कम- से-कम दफ्तर मे अखबार की यूजें तो बनाता है । टलोप्रिंटर की खट-खट सुनता है। सहवमचारियो की ऐसी-की-तैसी तो करता है । अभी उसे यह भी महसूस हुआ कि उसे अपने दफ्तर में पत्रकारिता की शिक्षा ने वाली अपणादत्त से विवाह कर लेना चाहिए। क्यो उसन उसे निराश किया? क्म-मे-कम वह इस क्मर म उसके माथ कुछ न कुछ खटपट तो जर 90 मिनषखोरी करता गुस्मा करता, प्यार करता, बच्चे पैदा करता, कुछ न कुछ अच्छा- दुरा चलता रहता। बड़ी भूल की उसने । अपणा न स्वय कहा था-'में जापमे शादी करना चाहती हू मिस्टर।' वह इम सीधे प्रस्ताव म पल सहमा विमूढ हो गया, बाद में उसन उस सावली वितु अत्यत आपक, बडी-बडी जाखा वाली अपणा को कोरा उत्तर दे दिया--'वह क्मिी लडकी को कानून और अधिकारी की बदौलत अपने पास नही सुला सक्ता। रूपड भापा म जवाव । अपणा ने अपन लिए शीघ्र ही दूसरे लडके की व्यवस्था कर ली क्याकि अब वह अकेली नहीं रह सकती थी। उसने सबको बता दिया था कि वह जल्द से जल्दी शादी करगी । वह अपन एकाकीपन से घबरा गयी है ऊव चुकी है। वह काफी उदास हो गया था। उसे अपणा का इस तरह विवाह करना बदले की भावना लगा। जपणा न उससे प्रतिशोध निया। उसे पराजित क्यिा। वह बहुत हताश हो गया-इस विचार से। कुछ आगोश और तनाव से फिर भर गया फ्लस्वस्प उसन अपने हाथ का सिगरेट बिना पिये ही फें दिया। सिगरेट पक्कर वह पलग पर दोनो टागें कची करके पड गया । आखें मूद । य ही। फिर उठा। इजीनियर की बीवी के दरवाज की आर दखा । वह वद था। दुखी हा गया। वरामद म आकर वह चाद के टुकडे के साथ मानसिक विहार करन लगा। सडको पर, रेस्तराओ म, भीड म, अपन कमरे म। और जान कहा कहा वह चाद के टुकडे साथ घूमता रहा। उस अपनी यूठी उडानें तनावा का कम करती हुई लगी। तभी उसकी मोटी प्रेमिका ने अपने पलटवे चोर म से खडे होर उसे आने का इशारा दिया। वामना म लथपथ इशारा। हालाकि उसने कुछ दिन पूर्व सोच लिया था कि जब वह उधर नही जायेगा, पर अभी वह अपने-आपम इतना जबरदस्त वीर था कि धीर धीरे नीचे उतरने लगा। मोचन लगा-थोडी देर वाद वह अपने को उत्तेजना में डुवा दगा। एक माटी औरत को वाहा के सवथा ठडे घेरे मे । विचित्र है वह ! कुछ भी म्वस्य नहीं कर सकता। शायद यह भीतर ही भीतर बिखर गया है। टूट

उखडा उखडा 91
गया है । वह नहीं जायगा। कभी नहीं जायगा उस मुटल्ली के पास । लौटते
समय वह कितनी जबरदस्त वितृष्णा से भरा होगा। उमे अपन जाप पर
ग्लानि होती है। और उसन अपने नापको इसके बावजूद भी एक सुत्र
दरवाजे के सामने पाया।
('अक उथपियोडो' का अनुवाद)

बदलते सम्बन्ध वहा, मैंने मिगरेट का पवेट खोलकर देखा । पैवेट म मिगरेट नहीं थी । नया पपेट खरीदने हेतु मैंने अपनी जेबें सम्भाली, तो मुझे महसूस हुआ कि मरी मारी जेलो मे वडे-बडे छेद हो गये हैं, अत मैं अत्यन्त ही निराश हो गया। पिताजी 2 लाख मना करने के बावजूद भी मरी सिगरेट पीने की आदत कम होने के बजाय वढती गई है। एक बार जब मेरे पिताजी ने सिगरेट पीने की हारियो के बारे मे एक लम्बा भाषण दिया, तो मैंने अत्यत लापर- वाही से "अब तो मेरी पीने की आदत ही बन गई है। सिगरेट के विना अब मैं अपने को नामल नही रख सक्ता, दिमाग में टेशन रहता है।' इस पर मेरे पिताजी बहुत ही नाराज हुए थे। उनकी नाराजगी सिगरेट पोन से अधिक मेरी दीठता व जशिष्टता को लेकर थी कि आखिर मैंने अपने बाप के समक्ष इस तरह सीधा जवाब कसे दे दिया? और तो और, इस प्रसग को लेकर मेरे पिताजी कुछ दिन काफी उत्तेजित रहे और उहोंने मरे परिचितो के बीच मुझ पर थूक तक उछाला । मरे तथा मेरे पिताजी के सम्बधो के बीच तनाव का सबसे बड़ा कारण यह है कि मेरे पिताजी मुझे अभी तक वच्चा समझते हैं--ऐसा नादान बच्चा जिसे दुनियादारी का ज्ञान हो न हो । परतु मैं ईमानदारी से स्वी कार करता हूँ कि मुझे सब बाता का काफी ज्ञान है । मैंने अनेक उपन्यास एम परे है जिनम प्रेम के अदभुत पत्र व नुस्खे दिये हुए है । जव से मेवस क्याए पढ़ी हैं तब से नर-नारी के बीच वे सम्बधा की बारीरिया का भी अधिक जान गया हू । भूखी पोढी व श्मशानी पीढी न मुये यौन सम्बधी नय नय शब्द सिखा दिये है। एसी स्थिति में भी मर पिनाजी कहते है कि बदलत सम्बन्ध 93 । मुये सासारिक ज्ञान नहीं है। हा, एक बात और है कि हमारे घर म नारी नाम की कोई चिडिया नहीं है । जब से माताजी का दहान्त हुआ है, तब से मेर पचास-वर्षीय वाप ने नारी गृह प्रवेश वर्जित कर दिया है। यानी घर म जो एक तीस-वर्षीया काली क्लूटी नौकरानी थी, उसका भी पत्ता काट दिया गया है। मन तव अपने काना से सुना था, जब मेरे पिताजी अपने दोस्त को कह रह थ- "हालाकि मेरा बच्चा अभी तक दुनियादारी के मामले में बिलकुल बच्चा है, पर उस 'डायन' का क्या भरोसा?" प्राय इधर कुछ दिनो से वे मुझे गलत सगति और ब्रह्मचय पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप स जारदार उपदेश देते रहत हैं । इधर उधर जाने नहीं देत। ऐस रखते है माना म पिंजरे का क्वूतर हू । पर मैं विद्रोही बनता जा रहा हूँ, चारी छिप चतुराई स सार काम करता रहता है। मैं कुछ-न-कुछ एसी हरकत अवश्य ही करता रहता है जिससे मर पिताजी अशात रहते हैं। पर मेरे एक नये कदम ने भरे पिताजी को तोड दिया है । वह आदमी पीडा, लज्जा, आक्रोश से बिखर गया है । बात कुछ ऐसी ही थी। पिताजी मुये सिफ हाथ-खच के दस रपये दिया करत है। आप ही सोचिये, दस रुपयो मे क्या आता-जाता है आजक्ल ? इसलिए मैं कभी कभी सफाई से पाच-दस रुपये उनकी जेब मे से निकाल लेता हूँ। उस दिन मैंने इस ध्येय से जसे ही उनकी जेब मे हाथ डाला, वसे ही उसमे से एक खत निक्ला । खत देखते ही मैं भाप गया कि हस्ताक्षर औरत व है । सूधन पर मुझे एहसास हो गया कि खत मे कोमल-कात पदावली भी है । बस, मैंने अपनी उत्सुकता को ठण्डव दी। पत्र खोलकर पढा । मैं हरान हो गया कि वह पत्र एक युवती का लिखा हुआ था और उसने इस बात का सकेत क्यिा था कि वह मेरे पिताजी से शादी की इच्छुक है । उसका रग स्प अच्छा है । बत से यह मालूम हुआ वि इसके पहले लम्बा पत्र यवहार हो चुका है- उमरे और मेरे पिताजी के बीच । मेरे भीतर विस्फोट सा हुआ-सदा सयम और ब्रह्मचय की बात करने वाले मेरे बाप दुबारा शादी करेंग और वह भी उन्नीस साल की युवती से । यह अन्याय है। गलत है। मैंने खत को कई बार पढा । उसका मनन किया। मुझे पता लगा कि आज वे साढे- . - 94 मिनवसारी सात बजे नगर के बेहतरीन रेस्तरा 'शालीमार' म उस लडकी से मिलेंग। डबी ने अपना चित्र नही भेजा था पर मेरे बाप न अपना चित्र उसे भेज दिया था, जिसे उस युवती ने पसद भी कर लिया था। मैंने सोचा कि वह क्तिनी घटिया किस्म की युवती होगी जिसने पमद भी किया है, तो एक पचास साल के वुडढे को। जाने क्या मुझे 'सगम' चित्र वा वह गीत याद आ गया कि 'मैं क्या करू राम, मुझे बुडढा मिल गया', और यह दिमाग खराब युवती जान बूझकर बूढे या चित्र पसद करती है । जस्र इस एब नामल युवती को देखना चाहिए । मैंन जल्दी से कपडे बदले। पिता के उस खत का एक बार फिर पढकर उसे वापस उनकी जेब मे डाला और घर से बिना पिता से पूछ-ताछे गायब हो गया। हा, जान मे पहल पिता की भीतरी जेब को जरूर अच्छी तरह देख लिया था, जिसमे सौ रुपये थे। मैंने सौ रुपय स पचास रुपये बडी शान से भेटस्वरूप ले लिये, क्याकि बाप का माल अपना माला मैं उस रेस्तरा म पहुच गया। उसके आगे-पीछे व्यय के चक्कर काटता रहा । हालाकि उस समय पाच वजे थे, मैं शो म के आगे यू ही खड़ा होकर अपने वक्त की हत्या करता रहा । यहा तक कि मैंने सडक पर एक पूरा मजमा ही देख डाला । इस तरह मैंने सात बजा दिए। इस बीच मैंन उन युवती से किसी भी तरह के सम्बध हाने के बारे मे गम्भीरता से नहीं सोचा था । एक हल्का-सा विचार आया कि देखें पचास साल के आदमी का प्रेम पत्र लिखने वाली युवती कौन है ? मुझमे गहरी जिज्ञासा जगाने वाली बात थी यह । मैं ठीर सात बजे शालीमार रेस्तरा के गेट के आग गुडा हा गया और ठाठ से गोल्डफ्लक सिगरेट पीने लगा। टेरलिन पेट पर काटन-टरलिन की गहरी पीली शट मुझे खूब जच रही थी। पहले मैं घडी वायें हाथ की क्लाई म बाधता था, पर आज वह दाइ क्लाई मे पूल रही थी। मुझे वार-चार यह बात स्ट्राइव कर रही थी कि मैं आज पहली बार एक एसी युवती से मिल्गा जो बुड्ढे से शादी करने की इच्छुत्र है। यह भी सही है कि मैं आज पहली बार, किसी जवान युवती स मिलूगा । मुझे यह अपना दुस्साहस-सा लग रहा था । मैं वार बार रोमा चित हो जाता था। पुलक से भर जाता या । सामने दूर तक मेरी दष्टि जा बदलते सम्बध 95 यह समये रही थी । दष्टि के दायर मे क्इ चेहर आ जा रह थे । मै बार-बार उस युवती की प्रतीक्षा कर रहा था । जान वाली हर युवती को दख-दखकर मुझे रोमाच हो जाता था । खत म एक रहस्य की बात एसी थी, जिम मैं आपको वाद म बताऊगा। थोड़ी देर के लिए मै चन स्मोकर वन गया । एव पर एक सिगरेट पीता रहा । अचानक भीड मे कई चेहरा मे मुझे मेर पिता का चेहरा दिखाइ पडा। चेहग उभरकर इतना बड़ा हो गया, मानो वह चेहरा सारी भीड के चेहरो को निगल रहा हो। एक बार मैं भी सहम गया कि यह चेहरा मेरे चेहरे को भी निगल लेगा पर बाद म मैन अपने का जरा बोल्ड किया और आकाश की जोर नजर करके मैं दाशनिक की मुद्रा मे धूम्रपान करने लगा। कुछ क्षणो के अतराल र वाद मैन जपन पिताजी की ओर देखा । वह लगभग आधे फर्लाग दूर की दुकान के खम्भे की ओट मे खडे-खडे मुझे चोर की तरह देख रहे थे । मैंन भी उस ओर नजर दौडाई । वह झट से खम्भे की आट मे हो गए । मैं भी इम तरह तिरछी नजर से अपने बाप की हरक्त को देख रहा था कि वे वि मेरा ध्यान कही और है। मैंने देखा, मेर पूजनीय पिता बडे ही अशात हैं और कुछ हडबडा रहे हैं । उनका चेहरा चेहरा न रहकर जावाश का एक टुक्टा हा गया है जिस पर हर पल एक इद्रधनुप बनता है, दूसरे पल मिट जाता है । वे बार-बार इधर आने का कदम बढाते हैं, पर मेरे कारण वापस खीच लेते हैं। 'वाह, क्या शानदार पोशाम उन्होन पहनी है 1 पैट और जापपुरी कोट । सार बाल खिजाब से काले । उपर की जैव मे सफेद रूमाल।' गानदार मक्अप, जिमन उनकी उम्र पाच साल कम कर दी थी। मैंन एक बार अपन याप यो जरा भरपूर नजर से देखने की योशिश की पर वह खन्भे की ओट हो गए। यही जिदगी की ट्रेजडी है। जब और किसी को देखना चाह तो वह आपस छिप जाय और जाप उसे न देखना चाहें, तो वह आप सामन हर घडी पडा रहबर अपा थोबडा दिखाता रह । यह भी सही है कि मैं अपन बाप को भरपूर नजर से नहीं देख पाया। समय को तो चलना ही था। सात-वीन हो गए । मैन बटम रस्तरा म प्रवेश दिया और एक कोने वाली मेज पर बैठ गया ।

96 मिनयवोरी अब मैं उम रहस्य का बता रहा है, जिसकी उत्सुक्ता मैंन कुछ दर पल आप म जगा दी थी । वह रहस्य यह था कि पहचानन के लिए भर पिताजी ने लिया था कि व गुलाब का फूल लगायेंग । चूषि मर कोट नहीं था, बत मन उस गुलाव का हाथ म ल लिया। हाथ म लेकर इधर उधर उगलिया म नचाता रहा । थोडी दर याद एक युवती न प्रवेश किया । युवती गहुए रग भी थी पर उसका बदन जत्यात ही मासल और तराशा हुआ था। मेर हाथ म गुलाब का फूल दयार वह मरी आर गौर स दखन लगी, फिर मुसराती हुइ मरे पास आई । उमन निहायत ही मधुरता स मरे बाप का नाम लिया। में मुसराया। इस पर वह मरे पास वठ गइ और वाली "मैं आपनो तुरन्त पहचाा गई-~-एक पल म ! मैंने जान लिया वि आप ही वे है । यह गुलाब का फूल ।' "थंक्यू । वह वठत ही बोली, "परतु आपने मुझे अपनी तस्वीर वडी पुरानी भेजी है।" "नही तो ।" मैंने अनजान बनने का अभिनय किया। "देखियन कहकर उसने बड़ी सहजता से अपने पस मे से एक तस्वीर निकाली । तस्वीर देखत ही मैं समझ गया कि यह तस्वीर मेरे पिताजी की तब की है जब वे मुझसे एक-दो साल ही छोट थे । मेरी शक्त पिताजी से काफी मिलती-जुलती है और उस तस्वीर से साफ साफ लगता है कि किसी को भी इस तस्वीर से मेरा थोडा भ्रम हो सकता है। उसकी ओर भेद भरी दष्टि से देखकर मैं मुस्कराया और तस्वीर को उसके हाथ से लेकर अपनी जेब म डालते हुए बोला, 'मैं आपकी अपनी लेटस्ट फोटो दूगा । यह शायद जल्दबाजी म गडबडी हो गई है। हा मेरा असली नाम भी दूसरा है। भला मेरे पिताजी का नाम मेरा नाम कसे हो मक्ता है ? यह तो एक मजाक था। मैंने हसने की व्यथ चेष्टा की। उसने एक बार मुझे तीखी प्रेम भरी दष्टि से देखा और मजाक भर स्वर में कहा, "अब भी मुझे तस्वीर ही लेनी पडेगी? मैं जरा झेप गया और किंचित नाटकीयता से वोला, 'नही मडम अव हम आपको कुछ और ही देंगे।" इसके बाद हम इधर-उधर की बातें करते बदलते सम्बध 97 रह-गम्भीर और हल्की बाते, बाते, बातें और सिफ बात । उसन मुझे यह भी बताया कि में अच्छे प्रेम-पत्र लिख लेता हूँ । उसके खुलकर बातें करने के पीछे मेरे पिता के शानदार प्रेम-पत्र हो सकन हैं । खर, मेन स्वीकारा कि मैं श्रेष्ठ प्रेम पत्र लिख लेता है। फिर हम दोनो भावी जीवन की गहरी याजनाओ मे धुल गये । मुझे हर लमहा एसा महसून हाता या कि मैं सुखा के सागर मे वह रहा हूँ । जीवन में पहली बार लडकी स भट और वह भी इतनी खुलकर । सच, जिदगी म औरत से बडी कोई भी नियामत नहीं है । औरत जीवन मे तुरन्त जनक अलमस्त क्षणो की रचना घर डालती है । मैंन मन ही मन यह निश्चय किया कि में इससे शादी करूगा । बडी चार्मिग लेडी है। उसी समय मैने देखा कि मरे सम्माननीय पिता न रेस्तराम प्रवेश विपा है । उनका चेहरा तनाव स घिरा था और उनकी भाषा मे माक्षान् घणाजा विराजी थी। मैंन उहे देखकर अनदेखा कर दिया। वे चार की खोज में तैनात सिपाही की तरह मेर पास आए और मरी समीप वाली टवुल पर जजनवी से बठ गए। मैंने एक पल उनकी ओर देखा। फिर सिग रेट पीने लगा। उनकी गिद्ध दृष्टि से साफ लग रहा था कि वे मुझे वच्चा चबा जायेगे । पर मैंन सयम से काम लिया और अजनबी होकर अपनी प्रेमिका को प्यार से देखने लगा, क्योकि थोडी-सी बातो से यह साफ हो गया था कि उसे मेरा हर प्रस्ताव माय होगा । वह युवती ने जाने से चाय बनान लगी थी। मैंने एक बार फिर अपने बाप की ओर देखा। वाप ने एसे गदन को झटका दिया मानो वह मुझे कह रह है कि ठहर बच्चू, तुझे वाद में देखूगा । पर मैं उसे गौर से अलपन देखता रहा, मोचना रहा, कितना चालान और मफेदपाश है यह मरा बाप, और खुद इस उम्र मे 1 फाटो भी क्या छाटकर भेजा है? कोई बात नहीं । देखत जाइये श्रीमान जागे पया होता है । मेरे पिताजी । आपको यह जानकर प्रस नता ही होगी कि यह युवती बहू बनकर आपके घर अवश्य आएगी, पर आपकी नहीं, मेरी बहू धनकर । यानी आपरे बेटे की बहू अथात पुत्रवधू । मैंने मन ही-मन घोषणा की। "क्या देख रहे हो उस आदमी मे?" उस युवती ने मेरा ध्यान भग 4 ।

98 मिनखखोरी दिया। मैंन एक मिनट सोचा। फिर कहा -'देख रहा हू कि इस आदमी के वाल काल नहीं, सफेद है । इसने काफी अच्छी तरह खिजाब लगाकर जवान बनने की कोशिश की है। भई मेकअप का चमत्कार भी क्या चमत्कार है युवती ने चाय की चुस्की लेकर कहा, 'मुझे उसक अगले दो दात भी बनावटी लग रहे है।" वेशक!" मैंने जोर से कहा, "और कपडे भी काफी लूज हैं । लगता है जवानी म सिले थे।" मेरे पिताजी उठे और फिर आग्नेय नत्रो मे मुये देखवर बैठ गए। व उत्तेजित लग रहे थे। युवती भाप गई। वह जानकर उसकी ओर मुस्कराई। मर पिताजी कुढ गए । उहाने अपना मुह दूसरी ओर घुमा लिया, युवती न विनम्र स्वर म कहा, "क्ड वा सत्य कहकर किसी का दिल नहीं दुखाना चाहिए । तुम्हें मालूम नहीं कि बुढापे मे तष्णाए बढ जाती हैं, विचित्र रूपा मे उभरने लगती हैं । जाओ उनसे माफी मागो किसी बुजुग का अपमान नहीं करना चाहिए।" उसने हल्का उपहास किया। मैंने देखा कि मेरे पिताजी का चेहरा सहसा पीला हो गया है और उनके बाल सफेद हो गये है। वह अपने असली रूप मे आ गए है । वे पट से उठे और हमे घणा भरी नजर से देखते हुए गेट की ओर चले गए। युवती ने उनकी बार देखा और वह मर पिताजी के बार मे छाटे शब्दा का प्रयोग करती रही । मैं चुप रहा। कुछ अतराल के बाद वह वोली, 'शायद तुम्हें मेरी बात बुरी लगी। चलो मुझे माफ करो। और देखो, मने तुम्हार बार मे कितना सही सोचा था | मैं जानती थी कि तुम मेर सपना के अनुरूप होग-एकदम जवान । मजबूत काठी वाले । मुझे तुम्हारे खत में ही यह एहसास हो गया था कि तुम मर लिए एक उपयुक्त पति होगे।" मेरा मन एक अजीब सी अस्पष्ट अज्ञात स्थिति मे खो गया। एक विमूढता-सी मुझ पर छाई रही।

बदलत सम्बध 99 यकायक मैंन गट की ओर देखा । मरा बाप अब भी वहा खडा था। इस बार उसकी आखो म क्रोध की जगह कोमल पाचना थी । पता नही, मेरे मन में बठा शैतान कहा धूप के टुकडे की तरह गायब हो गया था। एक आद्रता-ही-आद्रता थी मुझमे । तभी उसन तनिक झल्लाकर मेरे बाप की जोर देखकर कहा, 'मारो गोली इस बूढे को।" मैंने उसके लिपस्टिक सने मुलायम होठो के आगे अपनी अगुली रख दी। वह चुप हो गई । मैंने देखा, मेरा बाप चला गया है और मै उदास- उदास उसके साथ चाय की चुस्किया ले रहा हू । (बाप अर बेटो' का अनुवाद) ग्रहण करती दृष्टि । मकान । एव पिडकी का चौपटा । हरे पुल विचाट । ए7 पलग ५ पाछे पपडिया। उतरी दीवार। फिर मरी दष्टि पलग पर । पलग पर मटमली चादर । एव पटी औरत । पलग से सटी-मटी । गुमसुम । उसकी पीठ । क्षुकी गदन । ऊच हाथ । गिरत हाथ । पलग । चादर । औरत का आग्ने । बीमार-चीमार जाखें। चादर पर जमी आखें। चादर पर पव्वे । धवा पर जमी उसकी निगाह । अब मरी दष्टि म उसकी गदन का पिछला हिस्मा । उस पर पसरा हुआ धूप का टुक्डा । दातो के निशान । निशान का छूती उसकी पतलीयेचन उगलिया। अब मेरी दष्टि म उस औरत का बीच का हिस्सा | उसकी मली बोडिस ! टूट टूटे बाद । साडी की सलवटें । अस्त व्यस्त । फिर पलग। चादर । मला विस्तर । दो हाथ । चादर का वह हिस्सा जहा चमकते चाय की तरह ये धब्बे । उगलिया, हरवत करती उगलिया। धब्वे मसल हुए धब्वे । उदासीनता। आखें । उदास चेहरा । आखो म आसू । खाली हाथ । प्राथना की तरह उठे हाथ । बपनिया। वच्चे । एक, दो, तीन, चार । बदरग चहरे । रद्दी चेहर । सिरा की भीड । औरत । जासू भरी आख । सिरा पर हाथ । वच्चो के मुह खुलत मुह मा मा दा हाथ । हाथो म डबल रोटी। बच्चे । चेहरे । खुश चेहरे । दागे। गायब होनी टागें । सनारा । सिफ औरत । पत्थर की तरह चल पडी औरत । थुक्ती औरत । हाथा मे विस्तर । खाली पलग। विस्तर । उल्टा जसमा ।

ग्रहण करती दृष्टि 101
विस्तर । नई चादर । मब ठीर।
फ्लती दृष्टि म पूरा पलग । पलग पर वही मुरयाई औरत । लटी
औरत ।
-
खिडनी पर वठी धूप । एक मद । बठती औरत । उठती औरत ।
उखडी उनासीन औरत । उसका सूखा चेहरा । पाउडर-नीम-स्नो से बदला
चेहरा । एक नई आकृति । मद । उसके कोट की जेब । जैन म हाथ । हत्या
म कुछ नोट । औरत की हथेली म पसरा नोट। औरत की छाती। ब्लाउज ।
नोट पनी उगलिया । ब्लाउज मे धसी उगलिया।
औरत। गाल । दोचिपके चेहर । शरीर पर शरीर । औरत का चेहरा।
पसीन स पदरग चेहरा । आदमी का उत्तेजित चेहरा। नानदित चेहरा ।
औरत का चेहरा । मुर्दा-बेजान चेहरा। वह कोई और, वह कोई और
शरीर से अलग वह कही और एक चेहरे के दो रग विचित्र ।
खडी हुई औरत । रग बदलती उसकी आखें । घणा मे डूबी उसकी
आखें। मुझ पर झपटती-सी आखें। औरत की गदन । खिडकी के बाहर
गदन । थूकना । थूव । बद खिडकी हरे क्विाड । बद
मुर्दा । मुर्दा । उदास उदास
(जिठ निजर टिक' का अनुवाद)

चीचड । तडके सुबह की अनचाही हलचल होने लग गई थी । गोपाल क्ल रात सबकी आखो म धूल थोक्कर अधिक मात्रा मे दार पी आया था जिससे उसकी बीमारी बढ गई थी। डॉक्टर न उसे पहले ही कह दिया था और स्पष्ट शब्दा मे कह दिया था कि दारू तुम्हारे लिए जहर के बराबर है । फिर वह रात भर तडपता रहा । करण अदन करता रहा । उसकी सबसे बडी लडकी जीवली वीमार-मी घुटनो के बीच सिर डालकर एमे वठी थी जैसे उसके शरीर मे भूनापन भर गया है, वह जीते जी भर गई है । उसके चारा ओर की हवाए जपग हो गई है। उसकी सालकी' (एक तरह का कमरा) म श्मशान-सा सनाटा पसरा हुआ था । एक बास को लटकाकर उस पर रजाइया रखी हुई थी। खूटियो पर कपडे टगे हुए थे। एक आल म चिमनी रखी हुइ थी जिस पर धुए की लकीर काफी ऊचाई तक फ्ली हुई थी। दूसरी ओर एक शीशा दीवार में चिपकाया हुआ था। जीवली के आसपास मात बच्चे सोए हुए थे। चार बढें और तीन भाई । उसके पास वाली सालको म उमकी मा अपन दास्वाज पति की पीठ पर हाथ फेर रही थी। उसे सात्वना भरे शब्दो से लाद रही थी। ऐसी तनावपूण स्थिति मे मोहल्ल का 'मोडा बाबा' जीवली के पास लकडी ठरकाता हुआ आया। बोला, 'कानो म रूई ठूसकर क्यो वैठी है ? तेर धाप की हालत चोखी नहीं है।' वह फटे हुए ढोल ज्यू कश स्वर म बोली, 'तो मैं क्या करू? में कोई डागधर, वद्य हू जो उसका इलाज कर दूगी?"

चीचड 103 मोडे बाबा ने इससे पहले जीवली को इतना तिक्त वोलते हुए कभी नहीं देखा था। उस आश्चय हुआ । वह उसे कुत्ते की तरह तीखी निगाह म घूरने लगा। जीवली का चेहरा एक्दम उदास था और अब जूता मे पिटा पिटा सा लग रहा था मानो वह आतरिक रूप से अत्यत ही दुखी हो। "अरी बावली," बाबा अत्यन्त ही आत्मीय होकर बोला, "जब तू ही पल्ला खीचकर बठ जायेगी तो उस निखटटू को कौन सभालेगा? उमका स्वभाव तो कुत्ते की पूछ की भाति है। यदि वह सीधी हो तो उसका स्वभाव सुधरे। फिर भी समझदार लोगो को अपना फज निभाना ही पडता है। कितने भाई-बहन हैं तुम्हारे । उनका भी तुम्ह ख्याल रखना 7 जीवली अगार ज्यू भडक उठी, "मेरी बला से, इह रास्ता म कटारे लेकर बिठा दो।" उसका सक्त सव बच्चो की ओर था । फिर उसक नयन डबडबाए । गले म सुबक्यिा भर गइ । दो-चार पल रकवर बोली, "मुयम भी तो जीव है । मैं कोई पत्यर की नहीं हूँ । बाप यदि बाप न बन तो दुश्मन भो तो न वने ? वाबा, मैं ऊव गई हू, थव गई है मुयस अब नहीं सहा जाता इह मिट जान दो ।" वह फफक पड़ी। तभी एक बीमार-चीमार-मी दुबली-पतली लुगाई नाय तर का घूघट निकालकर दरवाजे के अगाडी खडी हो गई। उसका मुख पीला पीला था, जम वह पई दिना स वीमार हो। गडढे की तरह आखें पिचवे गाल सारा शरीर तिनक की तरह पतला और पट' पट अब भी दाल की तरह फूला हुआ था । उम देखन ही हृदय म कुछ पिघलन-मा लगा। धूप उमा पीछे थी जिसमे उमी आदमपद छाया जीवली पर पड रही थी। जीवली न धीमे-धीम अपनी दृष्टि ऊची की । मा स नजर सकरात ही एक विचित्र-सी हलचल उसके हृदय म होने लगी। मा प्रापना. भर स्वर म वाली, ' मैं तुझे हाय जोह रही हू बेटी, इस बार तू मेरी विनती पर अपन पिता को किसी डागधर को दिखा दे । उमरा इस तरह तडपना मुशसे नहीं देखा जाता।"

104 मिनखखोरी जीवली न पुन मा की ओर देखा, अनगिनत दुखा स विधी हुइ अनमनी और उदास। औरत के रूप में एक्काल । एक प्रेतात्मा। "तू कह तो मे तरे पाव पक्ड लू,' मा भीतर स टूटकर बिखर गइ। बाबा बीच मा वोला, "अब उठ जा वेटी। पर । तुसे जम दन वाली मा ही तेर पार पट रही है । एसी पत्थर न वन और वह सोचन लग गई कि इस मा ने उसे जम देकर इस भूमि पर एक पत्थर ही वढाया । मुये क्या सुख है ? मेरे पदा होन की क्या साथक्ता है ? क्या मतलव? "चल, लाडली चन।" उसकी मा ने फिर प्राथना की, "मैं तर जाग झोली फलाती हू, तुझसे दया की भीख मागनी है।" जीवनी अपन आतरिक विरोधा के बावजूद उठ गई। बाप के नजदीक जाकर देखा उसके मुह और हाथ पाव सूज गए थे । वह एक शब्द भी नहीं बाली । करणा से भर भर आई। फिर ओढना लेकर चल पड़ी। उसकी जेब मे एक भी पसा नहीं था। वह इधर उधर पाच दस रपया के लिए धक्के खाती रही। फिर वह अपने सेठ के बेटे के पास पहुची जहा वह मजूरी करती थी । उसका रग सावला था पर देखने म वह अत्यंत आवषक लगती थी। सेठ के बेटे म उस देखत ही ताजगी भर गई। बोला, "कसे आई जीवनी, तेरा मुह उतरा हुआ क्यू है ? सब अच्छे भले तो है?" जीवली न उमकी ओर देखा । वह उमे साप लगा। बार-बार हाठी पर जीभ फिराने वाला साप । जीवली उसे मूल रूप से घणा करती थी पर बुरे वक्त वही काम आता था । अत विनती भरे स्वर म बोली, "कवर साब | बाप की तबियत बहुत खराब है। दस-बीम रुपये दे दें तो कृपा हागी। मजूरी मे क्टवा दूगी।" वह इधर-उधर की बातें करता रहा । कभी ना और कभी हा। थोड़ी देर बाद जीवली लाश बन गई। पत्यर । फिर जीवली को लगा कि वह जमीन मे धस रही है । उस पर पहाड टूट रहा । । . मध्या तक उसके पिता की हालत कुछ ठीक हुइ । वह अपन विस्तर म घुम गर्द । मा न लाख जनुरोध-अनुनय किय कि तुझे जितनी भूष हो चीचड 105 उतनी ही रोटी खा ले पर उमने रोटी का मुह ही नहीं लगाया । उसे बार- बार महमूस हाता था कि उसक चाग आर आग लगी हुई है, धुआ है, दलदल ही दलदल है जिसमें उसका जी घुट रहा है। वह क्या नहीं इन सबको छोड़कर कुए म कूद जाती? इम जीवन से तो मौन भली है। माय रात म धुल गई । सार बन्च उमरे नासपास पावर पो गए जीवली सोचने लगी, ये कम वधन है। यह बाप क्यो दारु पीता है ? क्या दाम् के अभाव मे स्प्रिट पीता है ? क्या नही इम सिपाही पकडता और क्या यह इतने बच्चे पैदा करता है और सबम पीडादायक बात तो यह है वह खुद इन सबरे लिए ज्या मर खप रही है । हजार वार बाप को सममा दिया नि यदि तू नहो कमा सकता है तो बच्चे भी पैदा न वर? अस्पताल जाकर समझ आ ताकि मा वेचारी तो इस दुखदायी रोग से मुक्त हा जाए। पर बाप नहीं मानता वह भर-भर आई। इन सब स्थितियो, अभावो एव दायित्वा के पीछे उसका विवाह नहीं हुआ। ऐसी विक्ट और भाव अस्त दशा को देखकर ही तो उमन परमे स कह दिया था। मैं अभी शादी नहीं करूगी तू जरा विचार यदि मैं अभी इस घर को छोड दूगी तो मेरे सारे भाई-बहन भूखो मर जाएग । मेरी मा जीत जी मर जाएगी। यह घर चौपट हो जायगा।" फिर परमा इन्तजार करता-करता थक गया । उसन किसी अन्य लडकी से शादी कर ली। उसका प्यार हालात की बलिवदी पर चढ गया। उस दिन जीवली अपना सिर पीट पीटकर सन्नाटे मे रोई थी। फिर भी वह किसी अदश्य शक्ति से बधी हुई थी। तभी तो इस घर को नहीं छोड पाई। आहिस्ता-आहिस्ता उसे प्रतीत हुआ कि वह दुधार गाय है। कोई उसके एक पल के सुख को भी नहीं देखता। मा-बाप और भाई-बहन सबके सब उमका शोषण कर रह है। उमन अचानक महमूम किया कि उसके सारे शरीर पर चीचड-ही-चीचड (रक्त चूमने वाला छाटा कीडा) चिपक गए है ये घर वाले आदमी नहीं चीचड है उसका खून पीन वाने चीचड । वह आकुल व्याकुल हो गई । एक विनष्णा म भर गई । मैं मबको मसलकर रख दूगी। घणा ही घणा। उसी पल उसकी मा आई 1 वोली, "लाडो, तेरा छोटा भाई भूखा है,

106 मिनखखोरी
?
जावर दूध तो ला दे । सयानी वटी है न?"
वम, वह ज्वालामुखी की भाति भडक उठी, 'आप सब लोग मुझे
निगल वयो नही जाते ? आप लोग मेरा खून क्या पी रह है? मुझ पर मिट्टी
का तेल डालकर जला क्या नहीं देते?"
वह सुबक-सुबकर रोन लगी ।
मा उसको नाराजगी से डरकर वहा से चली गई।
विचित्र स नाटा पमर गया। न जाने क्यो जीवली खडी हो गई।
या नवत् उसने ओढना लिया। हाथ म पीतल की पतीलो लेकर अपनी मा
के व्यथित चेहरे को देखकर वह अबोली-अबोली आसू पोछती दूध लन के
लिए निकल गई।
फिर उमे सहसा महसूम हुआ कि उसके तमाम शरीर पर चीचड ही-
चीचड चिपक गए हैं। खून चूसन वाल चीचड जो और एक अदश्य
अजगर न उमे अपन म लपेट लिया है।
('चीचड' का अनुवाद)

सुख का सूरज उमे देखत ही मेरे भीतर पीडा-सी होने लगी। उमये चेहरे की हवा ही बदल गयी थी । वह एक्दम प्रेतात्मा-मी लगने लगी। मैं स्तब्ध-मा पडा रहा । फिर उसकी नोरानी मेघली स पूछा, "यह कितने दिनो से बीमार मेधली न मेरी ओर देखा और उसे अपनी दृष्टि में भरती हुई वह बाली, “य बहुत दिनो से बीमार है. पुवर-मा | आपो तो पता ही है कि आजाल बहन जी हर बात को अजीब ढग से करने लगी हैं। इतनी असामा य हो गयी है कि मैं कुछ यह भी नही सक्ती। हर सही बात का गलत समझती है । सारे ममया-वुया वर हार गये पर बह्न जी अपना हठ नहीं छोड़ रही है। कोई कुछ भी कहे एव कान से सुनती है और दूसर कान स निकाल देती है। बार बार गुस्से में एक ही बात कहती है--मर लिए तो सार के-सार श्मशान घाट पहुंचे हुए है। मैं जब किसी स कोई सम्बध रखना ही नहीं चाहती तो य क्या मुझे तग वरते है साये की तरह पीछे लग रहते हैं । कभी मैं इन सबकी मिट्टी खराब कर दूगी।" "पर बात क्या हुई मैंने मेघली से पूछा, “सुन मधली तू चमली बहन जी वी बहुत ही पुरानी आदमण (नौकरानी) हो। मुये सारी बात सच-सच बता कि मामला क्या है?" यानो।' पमली न राहत हुए बीच मे कहा। मधली ने पट से चम्मचे से पानी पिलाया। चमली ने एक पल के लिए मुझ पर निगाह डाली और नयन मूदकर पूछा, "कौन है ? यदि मर घरवाले आये हैं तो उन्हें धक्का मार कर निकाल दो। ये सार लोग कमीन - 7 108 मिनखखोरी गयी है। है मुये गीली लक्डो की तरह खोखली करपे मारना चाहत है । पर अब भै मब कुछ समझ गयी है। इनका बनावटी प्रेम, खोखले सम्बध झूठा अपनापन । मै अब इन जाल में फसना नहीं चाहती।' उसका सास फूलन लगा । वह हाफ्ती रही। मेधली ने बताया 'बहन जी । यह तो गोविद जी हैं ?" "गाविद जी।' उसके हताश मन मे सहसा उल्लास जागा । बोली, 'जाप क्व आय? अभी आया हू पर आपन क्या दशा बना ली है। सूख कर काटा हो इस तरह अपने आप पर अत्याचार करना ठीक नहीं है। मरना आसान थोडे ही है।" चमेली न बुझी बुझी उदास उदास आखो से मेरीजोर देखा। यक्ति म्बर में कहा 'गोविद जी | जीना तो उमसे भी कठिन है । मर जीने की क्या साथकता है ? अथहीन जीना भी कोई जीना होता है।" उसे सहसा जोर से खासी आयी। इतनी भयानक खासी थी कि उसकी आकृति ताम्रवर्णी हो गयी। लगा क्लेजा मुह से बाहर आ जायेगा । पासी रुकने पर वह फिर हाफने लगी। मरे देखते-देखते वह अचेत हो गयी। मैं घबरा गया था। उसे झिंझोडा पर उसे होश नहीं आया । फोन करवे एम्बुलेंस भगवायी । उसे अस्पताल मे भरती कराया। खूब सवा की मैंने ? रात को रात और दिन को दिन नहीं समपा मने ? लम्बे उपचार के बाद वह स्वस्थ हुई । उसके चेहर की मुदनी गायब हो गयी। एक दिन उसने मुझसे कहा, "आपन मुझे क्यो बचाया ? मेरा जीवन मत्यु समान है । एक्दम नीरस और ठहरा-ठहा। सच कहती है कि मेरे चारा ओर जोको का साम्राज्य फला हुआ है। मेरा सारा लहू पोने वाली । - वह टपटप जामू गिराने लगी। वसे मैं उसका सारा जीवनवृत्त जानता हूँ। उमरे पदा होत ही घर म कजीव मा मनापन और मुदापन छा गया था। दाद-दादी को ज्याही पता चला दि एक पाती और आ गयी है, त्योही वे उमर मरन की दुकामना सुख का सूरज 109 करने लगे। सारा दोष उसको मा क सिर पर थापा गया कि उसकी काख मे बैटा नही हा सक्ता । कोख बेटियो से भरी है। हालाकि उमकी मा सतान पदा करते-करते हार चुकी थी बार बार अपने पति से प्राथना करती थी कि वह उम पर दया करें। जब उसकी कोख थक गयी है, छातिया का दूध भूख गया है पर उसका बाप नहीं माना । सयाग से सानना घटा हुआ। तब उसे भी जरा सुख मिला। पर वच्च पदा करन ना सिलसिला बद नहीं हुआ । जब कभी भी उमकी मा परिवार कल्याण की वात करती, उसके मास ससुर आगबबूला हो जात थे। उसे डाट-उपट देते थ । जत म नौवी सतान पर उसकी मा चले बसी। चमली तब खूब रोयी थी। सवम पीडादायक विम्मय भरी बात तो उस वह लगी कि उसका बाप फिर शादी करन की इच्छा रखता था पर नी वच्चा के बाप को कौन जपनी वटी देता? फिर बनिया मे । दादी का तो वुढापा ही खराब हो गया था। सारे बच्चे पिल्लो की तरह रोते रहते थे, उससे चिपटत रहत थे और वह दादी झुझला झुझला कर किसी को नह करती तो किसी का पीट देती थी दादी का जीवन नारकीय यत्रगाआ से भर गया था। यह बात सोलह आना सच है कि बनिये का भाग्य पत्ते के नीचे रहता है। पत्ता हटा और भाग्य चमके । चमेली क बापू के भी भाग्य चमक उठे। धधा नच्छा चल पडा। लक्ष्मी दौड-दौड कर उसके घर मे वास करने लगी। देखत देखत वह लखपति हो गया । हा इस बीच चमेली के दादा-दादी चल बसे। उसके बाप ने गुपचुप ढग स एक गाव की अत्य त गरीब लडकी स उसी के गाव जाकर विवाह कर लिया। विवाह का सारा खच उसने उठाया और ऊपर से नक्द तीन हजार उसके मा चाप को दिय । जब अचानक उसका बाप दुल्हन लकर घर आया तो बच्चे स्तब्ध रह गये। मोहल्ले में गर्मागम चर्चा फैल गयी। बच्चो और नयी मा बीच जरा भी तालमेल नहीं बैठा। परिणामस्वरूप एक घर कदा घर हो गये। धीरे धीरे इन बच्चो और उसप बाप के बीच दूरिया जम गयी। सम्बध धुधलाने लगे। वैपम्य बढ़ने लगा। झगडे उगन लगे।

110 मिनखखोरी । आहिस्ता-आहिस्ता नयी बहू य पोहरवालो का शिफ्ना घर पर कमन लगा । व्यापार म घाटा हो गया। तगिया और अभाव जमकर बढन लग । परिणामत चमली का अध्यापिका वनना पहा क्योकि वही अपन भाई-बहनो म शिक्षित व समयदार थी। नौकरी के अलावा वह रात दिन टयूशन करती थी। कठोर सधप और मन के साता सागरो का सुया वर उसने दायित्व को निभाया परिवार का पोपण किया। दो भाई कमान लगे। इस वीच सौतली मा के भी चार बच्चे हो गये । बाप जसे इन परिस्थितियो म थप गया, अभावो से घिर गया । चमलो स्वयं को भूलकर परिवार का पापण करने लगी। चार बहना की शादिया हो गयी। पाचवी बहन अध-पागल थी। वमान वाले भाइयो के भी विवाह गये। थोडी-सी शाति का आभास हुना। सुख का स्पश हुआ। लम्बे सघप वे वाद शाति का अहसास । लम्ने जद्दोजहद के बाद पुमत के क्षण । ठहरा समय । अचानर वह उठी। स्नान दिया। फिर जमेले मे दपण लकर बैठ गयी। पहली बार उसके भीतर की औरत को अपने वाहर की औरत को सूक्ष्मता से देखने की पुमत मिली। जोह । क्या वह वही चमेली है। चमेली पुरप-गध स सुवासित तन वाली चमेली । यह तो वह नहीं है। दपण म तो कोई और चमेली है। उमका अन्तस मौन आतनाद कर उठा। पानीदार चेहरा सूख गया था। उदास, उदास । उसे लगा कि वह श्रीहीन हो गयी। यौवन जैसे अस्त हात सूय की काति जसा हो गया है। उसने एक एक अग का देखा । पीडा की लहरें उनके भीतर दौडने लगी। वह कितनी कमजोर हा गयी है । आक्षण हीन वह भीतर ही भीतर रोने लगी। आह । एसी कातिहीन लडकी स शादी कौन करेगा? घर परिवार के भारी दायित्वो के पीछे वह अपन को भूल गयी। उसकी सास घुटन लगी। उसने सोचा कि यदि उसका विवाह शीघ्र नहीं हुआ तो उने अखनकुवारी रहना पड़ेगा। फिर उसन अपने भाइयो व पिता को कई बार परोक्ष रूप से कहा और सकेत किये। वह बार-बार चिंतातुर हो जाती कि उसका यौवन का रप प्रौढता के ।

सुख का सुरज 11 रतीले टीवा म खाता जा रहा है। पर किसी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। सभी उसे अधिक कमान के लिए उक्सात रहत । एक बार उसने अपनी भाभी से कहा, "इस घर की गाडी अपनी पटरी पर आ गयी है। मेरी उम्र भी ।" भाभी सक्त की सारी बात विस्तृत रूप से जान गयी। उसन अपन पति से कहा, 'ननद वाई सा की शादी क्यो नहीं करत?" भाई बोला, "वह शादी नहीं करगी।" "आपका किसने कहा?" "कहना कौन, मैं सब समझता है।" "नहीं जी, आप जल्दी से कार लडका दूढिय।" 'व्यथ का दिमाग चाटा मन कर।" भाई ने अपनी पत्नी समल्ला- कर कहा, "तुममे अक्ल तो जरा भी नहीं है। जरा सोच, इतनी कमजोर और साधारण छोरी से शादी कौन करेगा? दो चार जगह बात भी चलाई पर लाग इमे टी० वी० को मरीज समझत हैं या फिर ढेर सारा हज मागत हैं।" फिर चमली ने अपनी दूसरी भाभी वो भी इशारा किया। दूसरी भाभी चमनी की प्रशंसा के पुल बाधकर बोली, "मेरी ननद बाई ! हम सब तो आपकी हर बात मानत है । मैं आपके भाई से बात क्रूगी।' पर उसने अपन पति से कहा कि आप ऐमी गलनी मत करना । यदि चमली वाइ का विवाह हो गया तो अपने घर में दो-तीन हजार का पाटा हा जायगा । बस आप क्वल विवाह करन की बात का जबानी जमा-खच करें।" धीरे धीर चमेली को ऊब, धुटन और अकलापन बढता गया । रात के सन्नाटा म वह इतनी ममातक उत्तेजित पलो से घिर जाती थी। उसे नीद नही जाती थी। कभी उसे सघप अच्छा लगता था, पर अब वह उबाऊ लगने लगा। प्राय हर ऐसे दायित्व से वह ऊबने लगी जो उसे एक दिन और बूढी बनाता था। उसे इस घर से विदा होकर अपने पति के घर की स्वामिनी बनने की इच्छा रहती थी। उसने स्वय इस ओर प्रयास किया। प्रेम करने की ओर बढी, पर प्रेम व मित्रता तो एक सीमा तक लोग करने 112 मिनसखोरी का तत्पर थे पर विवाह के नाम से पीछे हट जात थे । प्रत्येक दुबल, काल सामा य पुरुष को भी जति सुदर स्त्री चाहिए थी। अत में वह घार अवमाद भरे एकाता मे समस्त हो उठी । वह स्पष्ट म्प से अपन भाइयो को शादी के लिए कहा लगी। भाई उस झूठे जाश्वामना स विलमाते रहे। उम निराधार आशाए वधात रह । धी-- धीर वह जसलियत समझ गयी। घरवाला का घटिया स्वाथ जान गया। वह खूब रोयो। आहिस्ता आहिस्ता वह अजीव कुठाग्रस्त विद्रोह से घिर गयी । एक दिन उसने घोपणा कर दी कि वह अपना जलग घर बसाएगी। घर मे हलचल हा गयी । एक ने कहा "बिना शादी घर अलग बसाना ठीक नही । अमली औरत पर हजार यूठी ताहमतें लगायी जा सकती है।' उस खूब रोका गया पर वह नहीं रुकी। घर से अलग हो गयी। जवेला घर । अवेली वह । सन्नाटा । ऊब, घुटन खालीपन । वार वार दपण मे मुह दखकर चिढना, कुढना । वह एक विचित्र दहगत स घिरती गयी। अपन ढलत रूप यौवन की पीडा को वह पलभर भी नहीं भूली । उसे समया तर महमूस होने लगा कि उसका जीवन एक सजा है । एक लाश जिसे वह स्वय अपने क्धे पर रखकर ढो रही है । वह बीमार हो गयी। अपने आप पर अत्याचार व अयाय करने लगी। जथहीन जीवन । मैं स्वय जानता हूँ कि चमली उस विदु पर आवर खडी हो गयी है जहा से उसका पीछ लौटना असभव है। धीरे धीर नीरस और बेहूदी जिदगी कवण रण को रोदती वह मत्यु के निकट पहुच जायगी । एक सामा य जीवन की जगह एक शापित जीवन । फिर भी मै ममय-समय पर उस कहता रहता था चमली । गलत मघप का कोई अथ नहीं है। इससे ता निष्फल की प्राप्ति होती है । जव अधेर व लम्ब रास्ते हा तो साहस पर प्रकार की ओर वडना चाहिए। प्रकाश फ्लदायक हाता है । अयमय होता है। चिमय होता है ।

सुख का सूरज 113
वह क्षणिक सतोप से घिर जाती। मुस्कराती। मैं सोचता कि शोषण
इम नारी-आत्मा को कभी सुख मिलेगा सुख का मज दिखेगा।
रिवतन का सूरज दिखेगा।
मेरा हृदय कहता-जरूर दिखेगा क्योकि जिस तरह अधेरा चिरतन
ही है, उसी तरह कुछ भी चिरन्तन नहीं ।
('सुख रो सूरज' का अनुवाद)

जन्म उसकी आखो के आगे तितलिया-सी उडने लगी। आसुआ की तितलिया। उसने अपना चेहरा हलिया मे छुपा लिया। फिर वह छत पर चली गयी क्यापि जागन का घुटन भरा सन्नाटा उसे उवाने लगा था। आज सुबह स ही वह उवन लगी थी। जपने परिवेश और यथाथ स । उस मत्य मे जिसका अनुभव आज उसे पहली बार हुआ कि वह केवल भोगने की वस्तु है । इस अहसास ने उसे विध डाला। उसका चुभनशील अहमाम उसे वार बार सतान लगा । क्षुध करने लगा। आज ही उमे लगा कि प्रवृति मनुष्य के प्रति विद्रोह करती रहती है । चाहे यह विद्रोह मिट्टी के घर की तरह भले ही मिट जाए पर वह होता निश्चय ही है। कभी-कभी अनायास एसा कुछ भी होता है जिसका पूर्व अनुमान जरा भी नही होता। जाग कुछ एसे ही पल छिन उसके तथा उसके परिवार के बीच पदा हो गय थे। जचानक और जनायास । उस समय उसम वह विचित्र जुझार. पन जम गया था। वह मारीमान मर्यादा को खडखड करने चीख पडी थी- आप लोगा म कोई भी आदमी नहीं है । सबके सब वसाई है। आप मुझे तदपा तडपा कर मारना चाहते है । खूब सताते हैं लाप, पर अब मुयस आपके अत्याचार नहीं सहे जाते ? मुझ आप लोगो के बीच रहना ही नहीं है। उसने क्रोध को चरम सीमा पर पागल की तरह अपनी सास का डाकिन कह दिया। तब उसके पति ने उसे छिनाल, मालजादी और राड तक कहार खूब मारा । उसके अग-अग को आहत कर दिया।

जम 115 वह रूठ कर और अनगल अलाप कर पास के बारें में जाकर बठ गयो। साझ होन लगी थी। राख के रग का फीका अधेरा धीर-धीरे शाक के ओढन लालर-सा हाने लगा। प्रकाश के टुबडे नटखट चिडियाओ की तरह फुदक्-पुदक्कर भागने लगे। वह उन सबको देख रही थी। अधेरा काजल सा काला हा गया। लालटन दीयो व चिमनियो का प्रकाश बि िदया की तरह दूर-दूर चमकन लग थे। वह अपने आप मे लीन थी। वह तो पीडादायक स्मतिया म डूबी हुई थी। उस अपना अतीत याद आया कि दसवी की परीक्षा दन के पूर्व ही उसे मालूम हो गया था कि उसका विवाह होना तय हो गया है। उसे जत्यत ही आश्चय हुआ और उसने यह निश्चय किया कि वह इस विवाह का विरोध करगी। उसने स्पष्ट शब्दो मे कहा--"म जब तक दसवी पास नहीं वस्गी तब तक विवाह नही वरूगी। मारवाडी समाज म उसकी यह साफगोई इकलाब की तरह लगी। घर म एक हगामा मच गया। उस मा बाप का लगा कि उनकी बेटी का चरित्र ठीक नहीं है। इतनी लम्बी जीभ अच्छ धराना की छोरियो की नहीं हानी । कही इस छारी ने अपनी बहन की तरह अनुचित कदम उठा लिया तो खानदान की नाक कट जायगी। क्या इस घरान की सारी छारिया गडबड हैं? इन पर प्रतिबंध लगाना ही होगा। यह सच था कि उसकी बड़ी बह्न जपन प्रेमी के साथ भाग गयी थी। प्रेम विवाह कर लिया था। इसका कारण था कि उसकी बहन शिक्षित थी। भावुक थी। इतनी अधिक संवेदनशील थी कि जरा सी भी अनुचित बात उस लग जाती थी। जब उसकी बहन को यह पता चला कि उसका विवाह ठेठ गव के एक खानदानी अमीर घराने के एस लडके के साथ हो रहा है जा अगूठा छाप है। परचून की दुकानदारी करता है। पुडिया बाघता है तो उसका मन आहत हो गया। वह महानगर में जमी, पली और बही 116 मिनखखोरी हुई। उसने मैटिक पास क्यिा! उसे साहित्य मे रुचि यो। चित्रकारी का शौक था। ऐसी स्थिति मे उसने विवाह करने से इकार कर दिया। तब उसके पिता ने धरती और आकाश एक कर दिया। उसने कहा, "तरा दिमाग पराब हो गया है । अच्छा घराना है । मालदार है।' "नही बापू । मैं तो शादी देव स क्रूगी।' "पागल है । तू जाति की ब्राह्मण और वह धोबी। मुझे जीत जी मारेगी क्या उसकी बहन ने कहा, "गाधी जी ने कहा है कि जाति, धम यूठे है । आदमी पहले आदमी है। फिर मेरा व देबू का आपस मे मन मिलता है । वहावत है-मन मिलिया तो मेला नही तो अवेला।" तब उसके बाप ने उसे अनाप-सनाप गालिया दी। उसे जान से मारने की धमकी दी। फिर क्या था? उसकी बहन भाग गयी। बालिग थी। दोना ने प्रेम विवाह कर लिया। देवू प्रोफेसर था । कुछ दिनो बाद उसकी बहन भी टीचर बन गयो । आनदमय जीवन गुजारते थे दोनो। और वह बेचारी? उसे डाट कर धमका दिया गया कि उसे अपनी बहन के पदचिह्ना पर पदापि नहीं चलने दियाजायेगा। उसके घर वाले सावधान हो गये। उसका घेराव रखने लगे । चुपचाप क्लक्त्ता से बीकानेर आये और फटाफ्ट विवाह कर दिया। वह विवाह के बीच पत्थर की मूर्ति की तरह रही। मौन और निस्पद । निरपेक्ष स्थिति थी उसकी । विवाह के बाद जब वह अपनी ससुराल नापासर आ गयी। छोटा-सा गाव । रेतीला और सूखा । उसे अनिच्छा से घाघरा, ओढना, कुर्ती पहननी पडती थी। मुहागरात ही उसके सवेदनशील तथा भावुक मन को सप्टि ध्वम हो गयी। उसके पति ने आते ही उसके तन उपवन की फूल-पत्तियो को निममता से तोड डाला। फिर तो हर रात अबोलेपन म उसका एक वस्तु की तरह उपभोग । एक भावनाहीन सिलसिला।

जम 117 उसे विश्वाम हा गया कि वह एक वस्तु है जिसका उपयोग अपनी. अपनी तरह से पति, देवर, ननद, जेठ-जेठानी सास और ससुर करते हैं । तब वह अपन आपसे अजनबी हो गयो । कभी कभी लगता था कि वह एक जीवित लाश है, यात्रिक पुतली है जो दूसरो के हुक्म पर चलती फिरती है। यह स्थिति ददनाक थी। एक मनुष्य अपनी लाश ढोने की दशा मे मवाद भरे जख्म की पीडा भोगे । फिर अनिच्छा स एक पर एक सतान का जम । उसका मन प्राण निर्जीव हो गया। जब कभी भी वह जसा यत्रणाआव ऊबर कठोर शब्द बोल लेती तो घर मे उसने प्रति धणा की चादरे तन जाती थी । उसक मा-चाप से लेकर उसकी धोबी से विवाहिता बड़ी बहन तक का इतिहास पढा जाता था। कह दिया जाता था। यह भी कभी वहन की तरह भाग जायगी। अरे यह खानदान ही भगोडा का है। हम तो फम गये। तब वह भीतर ही-भीतर कुढती रहती। अगीठी ज्यू जलती रहती। न भागती और न किसी को सम्वेदना पाती। हा, वह अपने नह-नह चार बच्चा का जवश्य स्नेह पाती। ये अबाध बच्चे उसे बार बार पूछते, 'मा क्या रोती है। तुझे बापू क्यो डाटते हैं । तुझे दादी क्यो गालिया देती है ? वह बच्चो को चिपका कर फफक पडती थी। अधेरा गहरा हो गया था। वह अपने में लीन थी। तभी सबसे छाटा वच्चा जोर-जोर से रोने लगा। उसका ध्यान टूटा । वह हडबडा कर उठ बठी। उसके मुह से एक उसास निकल गयी-"ओह । नन्हा रो रहा है।' वह निबल हो गयी । भीतर स पिघलने लगी । जुडाव के पख पसरन लगे। वह उठी। जान लगी कि रुक गयी। अपन आपको डाटा-जब पति ही सुख नहीं देता फिर उसके पैदा करने वाले ये बच्चे क्या सुख देंगे? वह वापस बठ गयी। तभी उसके पति ने पुकारा, "सुनती हो, सबसे छोटा रो रहा है । क्रोध को छोडकर उस सभालो।" वह चुप रही। उसका पति एक हाथ मे लालटेन लेकर आने लगा। उसके दूसरे हाथ म सबस छोटा बच्चा था । वह धीर धीर उसके पास आया । वह दारू पिये 118 मिनखखोरी हुए था। उसवी आयाम निगल जान की दहब थी। वह अपनी रूठी हुई पत्नी को तरह तरह के प्रलोभना व आश्वासना से मनाता रहा। उमे जबरदस्ती अपन कमरे म ले आया। पति न उमकी गोद म बच्चे को दे दिया जो उसकी सूखी छातियो को चूसता हुआ सो गया । उमे अपनी, एक नारी की दयनीय स्थिति पर रोना आ गया। वह सुबक सुबक कर रोने लगी। रोती रोती सोचती जा रही थी-लुगाई का जमारो (जम) व्यथ है, एक दासता है, एक अभिशाप है। उसके सारे बच्चे आ-आवर उससे लिपटन लगे । उसका पति उसकी प्रतीक्षावरन लगा-साप बनकर। ('जमारो' का अनुवाद)

मिनखखोरी
"हुकी"
"बोल ।"
"एक वात पूछना चाहता हूं।"
"पूछ।"
"तू मुझसे प्रेम करती है ?"
"परेम नहीं करती ता तर सग नठ (भाग) कर थोडे ही आती।
"पर तू बार-बार प्रेम क्यो करती है ?"
'कहा करती हू ? मनमाफिक मद की तलाश थी मुझे देख बिठला,
मैं वसी पढी लिखी नही हू । मैं पोथो क्तिाको की बातें भी नहीं जानती पर
मैं इतना जानती हू कि आदमी घडी घडी वही काम करता है जो उसके
हिये को भाता है।
'लकिन सयाने लोग कहते हैं कि औरत जीवन में एक बार ही प्रेम
करती है।"
"जो कहत है उह कुछ पता नही। व सब सुनी-सुनाई कहते है । अरे
विठला | अपने गाव की गिरजडी है न, वह राड मालजादी, मुझे उपदेश
देने लगी कि तू एक मिनख की चीचड ज्यू-क्यू नहीं चिपक्ती। जबकि तू
जानता है कि गिरजडी ने कभी भी मही काम नहीं किया। मैंन उसे
फटकारते हुए कहा-अरी घाट-घाट पानी पीने वाली । मैं तेरी तरह छान
ओले (चुप छुप) काम नहीं करती, जो भी करती हू चौडे चौगान करती
"पर यह औरतजात पर धब्बा है।"

120 मिनसखोरी 'क्यू ध वा है । जो मेरी जमी लुगाई में सग भाग वर जाता है उस मरद पर धब्या क्यू नही लगता' सुन विठला, मैं तरे सग इन आलतू फालतू बाता वी झाय झाय म उलझने के लिए नही आई है । मैं तेर सग एक शहद-सा मीठा जीवन जीन आइ है। सच्ची तू मेरे मनमाफिक मरद है न? पडिया को पाग मत कर आग की बात कर पीच मत देख ।' "शायद तू नहीं जानती ।" क्या नही जानती ? सहम क्यो रहा है ? वता "कि आदमी की बार बार पीछे देवन की आदत हाती है।" "तो सू भी बार-बार पीछे देखेगा? विठला । यदि ऐसा करेगा तो सब गडवडा जायेगा । तुझे आज जितनी बार भी पीछे देखना है, देख ले। फिर मैं तुझे कभी भी पीछे नहीं देखन दूगी । मुर्दे उखाडने वाले जिंदो को राजी नही रख सकते । पलट पलटकर पोछे देखने वाले आगे नहीं बढ सरते । तुझे मेरे सग आगे बढना है या नहीं ?" "वढना है पर ।" "विठला | क्या तू मुझे बिस्तर बनाने के लिए लाया था? लाय (आग) उडी हो जाने के बाद तुझम खोट पैदा हो गई है।" "नही। "तू झूठ बोलता है यदि मेरे सग तूने चालबाजी की तो ठीक नहीं रहेगा । मैं अब वापस गाव नही आ सकती। तरे साथ मैने गाव की काक्ड (सोमा) के बाहर पाव रखा है। घर परिवार और दूसरे खसम से नाता तोडा है। फिर मुझे पीछे देखन को जरा भी आदत नहीं है। जो बीत गया, वह बीत गया।" "मैं यब पछता रहा हूँ। "मुझे भी पछतावा है । मै ऐसे कायर कपदो कुत्ते के सग भागो हू जो साला थोडे दिनो मे ही मदान छोडन लगा है। "नहीं हुवो, बात यह है कि तू मिनखखोरी है तुझ पर कसे भरोसा किया जा सकता है।" 'तुम सब कुत्तो की औलाद लुगाईखोरे नहीं हो। इस लुगाई का खाया उसे काटा इसे चाटा उसे नाचा छि" मिनखखोरी 121 "इस खिटकी को बद कर दो।" "क्यो?" "डाफर से रोम रोम खडा हो गया है । इस मरी ठड को आज ही अपना नगापन दिखाना था।" 'सुन, मेर पास आजा, यह नीली लोई है न, मेरी पहली सास के हाथ की बनाई हुई है। वह अच्छी कारीगर थी। इसम ठड नही लगती। बहुत गम है।" "नही, तेर साथ लोड मे अपने का मन नही करता । तू रीस न करतो भीतर की बात कहू ।" "वह । जरा भी रीस नही करूगी। मेरे होठो पर सच्ची हसी है।' "तेरे पास चाकू तो नहीं है ?" "नहीं।" "और कोई ।" "अरे नासपीटे । तेरे जसे मरदो के ठिकाने लगान के लिए मुझे चाकू- छुरी की दरकार ही नहीं पड़ती।" "फिर? "जिह अपने आप मरने की जादत है, उह मैं क्यो मारू "तो क्या तून अपने पति सावला को बिना चाकू मारा था "नहीं, मैंने उसे नहीं मारा था। मुझ पर झूठा दोप लगाया गया था। तभी तो कोरट कचेडी मे मुझे छोड दिया गया । बाइज्जत बरी कर दिया गया।" 'फिर उसकी हत्या क्सिने की ?' "उसके चाचा के बेटे न जोरू का नही, जमीन का झगडा था सावला बेईमान था। लुच्चा था। दूसरो को ज्ञासा देवर रपये ऐंठ लता था।" "लोग कहते हैं कि उसकी हत्या म तरा हाथ था। "भूठ । लोगा की अदाजा पर दौडन की आदत है । वस दौटत रहत " " "पिर तू उसस नाराज क्यो थी?"

122 मिनखखोरी वह मिनप नहीं था।' क्या था वह 'कुत्ता।" "कुत्ता" -- नही गडा।" "गा ।" 'नही अजगर "अजगर ।" 'दरअसल यह रीछ था एक वदवूदार घिनौना रीछ एक तरह से उसम कई जानवरो का मिलाजुला असर था।' 'तूने उसकी हत्या नही की ? सच कहती है ?" 'मैं यूठ नहीं बोलती और न ही मैं सतियो वाला स्वाग रचती मैं कुलटा हू छिनाल जरूर हूँ पर कहा ? तुम लोगो के बीच । पर मैं सती हू अपने हिय के बीच । मैं वही करती हूँ जो मुझे अच्छा लगता है बिठला । पहले तू साप-सापिन पकडता था न ?' "हा।" । "फिर तूने इतना बहादुरी का काम क्यो छोड दिया?' उसम हर घडी जान को खतरा रहता था और मैं जल्दी से मरना नहीं चाहता था हुकी । मुये मौत से बडा डर लगता है।' 'फिर तू जल्दी मरगा। जो जिमम डरता है वह उसे जल्द दबोचता है । सुन, दारू पीएगा ?" "नहीं।' क्यो? 'कम से कम तरे साथ तो दारू आग से नहीं पोऊगा। 'दारू पीने के बाद तू बहुत नगी हो जाती है और बाद में मुझे हत्यारी भी लगती है। 'हत्यारी । "हा, क्ल तरे सग पीने के बाद मैं बहुत ही भयभीत हुआ था क्योकि --- , मिनषखोरी 12312 तेरे हाथ मे एक रस्सी थी। मुझे बार-बार लगा कि तू अभी मेरा गला, घोट देगी।" "नही रे बिठला म क्सिी वे सग एसा खतरनाक सलूक नहीं कर सकती । फिर तू मुये चोखा लगता है मैंने तुझसे परम किया है इस वास्त म तुझसे ब्याह नही करूगी मैं केवल तुझसे परेम करना चाहती हू। परेम ताकि तू पति होकर मुझे तडातड बेत से पीट न सके, मेरे मग जबरदस्ती न कर सके सच तुझे एक भेद की बात बताती है घणे सारे मरद पति बनते ही जानवर हो जाते हैं मैं तो कहती हू कि लुगाई को घरवाली बनना ही नहीं चाहिए । घरवाली बनते ही वह लुगाई से जूती वन जाती है।' "अरे अरे ।' 'इतने घबरा क्यो गए "देखो उस कोने मे टिपरली विच्छू को निगल रही है।" 'छिपकली बहुत जहरीली होती है।" 'बिच्छू उसको डक क्या नहीं मारता? मारता जरूर होगा पर छिपकली पर वह असर नहीं करता होगा।" 'क्तिने घिनौनेपन से बेचारे बिच्छू को निगल रही है यह छिपकली बडी ददनाक मौत भोग रहा है यह विच्छू, तुम उसे छुडवा दो। मरा मन पसीज रहा है।" 'मैं क्या छुडवा दू? तुये दया आती है तो तू ही यह पुण्य कमा ल, विठला । मुये तिलचट्टो से बहुत घिन लगती है।" "कही तू मुझे तिलचट्टा तो नहीं समझती?" "नही रे तू तू मुझे लगता है।' ?" 1 - 'ऐस दीदे फाड फाडकर न देख सच बताती है तू मुये गिद्ध लगता है।" 'गिद्ध । "हा, तेरा मास नोचने का अदाज निराला है। सावला रीछ था और 124 मिनखखोरी । मूला ऊट । फिर वे मेरी हडडी-पसलिया बहुत तोडते थे। मूला न तो आछेपन की हद कर दी ब्याह के तीसरे महीन ही उसन मुझसे मेरे वाप वे दिए पच्चीस रुपय वड भालपन स मागे थे कि उसे धधे म पैसा की जरूरत है, वह ठवेदारी करगा, पर मैं उसकी नीयत समझ गई तू तो जानता है कि मेर बाप ने साला भीख माग मागकर ये पसे इक्ट्ठे दिए थे । सो मैंन साफ इनकार कर दिया इसके बाद तो उसने वात-वेवात पर मुये बाजरे के खिचड़े की तरह छेडना शुरू कर दिया घुमा फिराकर बस रपय ही मागता था और मैं जानती थी कि रपये लेने के बाद यह मुझे लात मारकर घर से बाहर अनगढे पत्थर की तरह फेंक देगा। मैन उम एक फूटी कोडी भी निकालकर नहीं दी तब उसने मुझे मजूरी पर भेजना चाहा उस चोट्टे ने हुक्म दिया कि तू कमाकर ला घर की गाडी चल नही रही है पर मैंने उसे ठेंगा दिखाते हुए कहा कि मैं यह काम नहीं क्स्गी मैं तो घर मे ही पाव पसार पर सोऊगी। मुझसे घर और बाहर दोना जगहो के छाती कूटे नही हो सक्ते बिठला यह मरद जात है न, यह खाली लुगाई को नफे के लिए ही काम में लाना चाहती है । बडी कुत्ती है यह मरद जात लुगाई को झाडू से लेकर बिस्तर तक तो बना सकती है, पर उस हवा और धूप नहीं बनने देती पर मैं हवा और धूप बनकर जिदा रहना चाहती हूँ सुन मैं तुये नहीं छोड़ सकती तरे लिए मैं चीचड है । समझे" 'हुको।" 'हू। 'तू दारू क्यो नही पीती, अभी क्तिनी कडाके की ठड है।' "पीऊगी तो तेरे सग पीळगी । यदि मैं पीने के बाद हत्यारिन भी लगती हू तो भी तुझे अपने शरीर की कसम खाकर वहती हूं कि तेरी हत्या सपने में भी नही करगी। तू मुझे बहुत चाखा लगता है २ । आ आ तू तो शेर की जगह गोदड निकला। ले दारू पी अमली केसर-स्त्री "तू लाई कहा से? 'आख मारकर ।"

मिनखोरी 125 क्या" "यूठ नहीं बोलती रात को पीने की तलब हुई मैं खरीदने गई तो दुकानदार मेरे जग-अग को भूखे भेडिए की तरह देखन लगा। सच्ची कहती हू वि मरी नीयत मे कोई खोट नहीं थी। बस यू ही केवल मस्ती मारने के लिए मैंने उसे आख मार दी बिठला सेठ साला गढगढ झट से वाला--भीतर आ जा आ न 1 मैने बातल उठाकर कहा फिर आऊगी मुस्कराकर आ गई वह साला गोधे (साड) की तरह मुह पोला करके मेरी ओर देखता रहा वितना चमत्कारी है यह लुगाई का शरीर बिठला?" ।' "अब तो भरोसा करके दारू पी ले।' "नहीं, मुये गाव जाने द हुकी।" "गाव? क्यो रे गिद्ध ?' "तेरे होठो पर खतरनाक मुसकान है।" "खरी-खरी सुनेगा अब तो गाव तेरे फरिश्ते ही जायेंगे, बिठला । तू बाका मर्द है मैं तो तेरे सग भागकर आई हू मुझे तुझसे सच्चा परेम है । मैं तुझे नही छोड़ गी। तुझे जीवन भर मेरे सग रहना है रहना पडेगा ।" "यह तो तेरी जोर-जबरदस्ती है।" "अभी तो मैं तुझे परेम से कहती हू वर्ना यह रस्सी है न हर काम के लिए काफी है।' "क्या तू मुझे जान से मारेगी? तू रस्सी को उगली के ऊपर क्या लपेट रही है । इस रस्सी को फेंक दे। मुझे तो लगता है कि तू मर गले क चारो ओर रस्सी लपट रही है। हसती क्यो है?' "नासपिटे । मुझे लगता है कि तेरा जी मुझसे भर गया है । तरे परेम का नशा उतर गया है। पर तूने मेरा नशा बडा दिया है देख कितने दाग है मेरे शरीर पर। यहा तो चक्दा भी जम गया है । गिद्ध है न तू मुझे गिद्ध अच्छे लगते हैं। तु भी अच्छा लगता है यदि वन मेरे साथ कपट किया तो मैं काली मा की तरह तेरा खून पी जाऊगी। तू जाने का नाम - ।

126 मिनखखोरी मत लेना । तरा हुक्का-पानी में चलाऊगी । उमर भर तेरा पट भत्गी। तू जानता नहीं कि मैं कभी भी पीछे नही देखती । जिसे छोड आई वहा वापस नहीं लौट सकती।' "मुझे तुझसे हरदम डर लगने लगा है।" 'कपट करने वाले का दिल कमजोर हो जाता है।" "मैं तरे सग एक शत पर रहूगा। 'कह।' 'तू रस्सी और चाकू को कभी भी हाथ नहीं लगायेगी।" 'फिर सब्जी कौन काटेगा?" में। फिर शत मजूर । आ अब तू दारू पी मुझस एक वायदा कर कि अब तू कभी भी पीछ की ओर नही दखेगा। बिठला, अच्छी औरत तभी अच्छी रह सकती है, जब उसे कोई अच्छा मरद मिले । मैं दो मरदा से ठगी गई हू सताई गई है । कब तक कितना सहती। जहिल्या तो नहीं हू। पर तेरे सग उमर-भर निभाऊगी तुझे नही छाडू गी। परेम करती रहूगी।" "एक बात मुन इस तरह रहने मे क्या लाभ जब मैं मौत को अपने मिर पर हरदम नाचते हुए देखू ? सच, मैं पिछले कई दिना से मुर्दा होता जा रहा हूँ। 'कुछ भी समझ म तुझे नही जाने दूगी -जा बाजार से नमकीन और खाना ल जा जल्दी जाना भागने की कोशिश न करना जा-जा चला गमा । आने म बडी दर कर दी गोदन ने, अभी तक नही माया डरपास सचमुच मुदा हो रहा है फिर साला मरे सग भागा ही क्या? साथ-माथ जीवन जीने की बातें ही क्या की? समझी, वह मेरे जिस्म का पाने के लिए ही मेरी हा म हा मिलाता रहा है। यह गोरा चिट्टा गद्दे + माफ्र मरा जिस्म आ गया नासपीटे वठ दारू पी यह छुपा क्या रहा है ? मच वोल क्या है ? में मैं क्या तुझे मेरी सोगन किय गोलिया क्सि चीज की हैं।" 'नशे वी में पिछले कई दिनो से पब गया हूँ, ऊब गया हूँ डर मिनखखोरी 127 भाग जा गया हूँ सोचता हूँ कि मर जाऊ । तू प्रेम नहीं करती, अत्याचार करती है, यदि मैं गिद्ध हू तो तू अजगरिनी है।" "समझी तू मरेगा ओ मेरे यार, तू आत्महत्या करना चाहता है ? ओ ना-ना-ना जा, मैंने तुर्य छाडा मुक्त किया मैं जरख नहीं हू--- हुकी हू, हुकी । एक लुगाई, तरी भायली (प्रेमिका) परेम की भूखी तुझस मैंन सच्चा परेम किया है । शायद आग किसी से न कर सक शायद फिर मुझे वही जीवन मिले जो मैंने भोगा है लुगाद जात चिडिया की तरह अपनी मर्जी से नहीं उड सकती है । जा -भाग जा अभी इसी वक्त आज मैं दाम् अकेली पीऊगी खडा क्या है गीदडे भाग जा निकल यहा से वर्ना धक्के मार मारखर निकाल दूगी तुये अब डरन को जरूरत नही हुकी वापस गाव की काक्ड में भी कदम नही रसगी वह गाव के लिए मर चुकी है जा रहा है ल य सौ रुपये ल जा रास्त भखायेगा क्या? अब रोता क्या है वपटी? नहीं मुझे छूना भत, तुपसे नाते रिश्ते खत्म में तुझे कभी भी माफ नहीं कर सकती। तू हरामजादा है, सपेर की औलाद नही, यदि होता तो नागिन का क्या वश म नहीं कर सकता? चला गया वपटी, कायर, डरपार चला गया ओह हुवी, तू औरत क्या बनी क्या बनी यदि मुपे भी ईश्वर मिलगा तो उसका गला पाडकर पूछूगी कि तून मुझे औरत क्या बनाया क्या बनाया ? अरे हुकी, तरी आखा म आमूहुकी, तूने हर लडाई हसरर लड़ी है, फिर आज रोती क्या है ? लड़ हुवी लड विठला । मैं मिनग- पोरी नहीं है। कोई भला मरद मिलेगा तो में भी भली हो जाऊगी । आहे यह दारू पितनी अच्छी चीज है सब कुछ विधरा देती है। वियरा दती । ('मिनखसोरो' अनुवाद) 00

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Minakhkhori

Author
Yadvendra Sharma
Title
Minakhkhori
File name
Minakhkhori
Text
OCR done
Citation
1965
Published
2011/03
Publisher
Arun Prakashan Lajpat Nagar New Dehli
Language
Sanskrit
Pages
129
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551272
Barcode
4990010032030.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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