Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Indraprastprabhand
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राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला
प्रधान सम्पादका-पद्मश्री जिनविजय मुनि, पुरातत्त्वाचार्य
सम्मान्य सञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, बीरपुर
ग्रन्थाङ्क ७०
प्रजातकर्तृक
इन्द्रप्रस्थप्रबन्ध
प्रकाशक
राजापान राज्य सत्यापित
राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
जोपपुर (राजस्थान)
RAJASTHAN ORIENTAL RESEARCR INSTITUTE TODIIPUX
राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला
राजस्थान राज्य द्वारा प्रकाशित
मामायन; अखिल भारतीय तथा विशेषत: राजस्थानदेगीय पुरातनकालीन
संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, राजस्थानी, हिन्दी आदि भाषानिबद्ध
विविध वाङ्मयप्रकाशिनी विशिष्ट ग्रन्यावलि
मघान सम्पादक
पद्मश्री जिनविजय मुनि, पुरातत्वाचार्य
मम्मान्य संचालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोवपुर;
आँन र मेम्बर ग्रॉफ जर्मन ओरिएन्टल सोसाइटी, जर्मनी
निवृत्त गम्मान्य नियामक ( प्रॉनरेरि डायरेक्टर ),
भारतीय विद्याभवन, वम्बई; प्रधान सम्पादक,
सिंघी जैन ग्रन्थमाला, इत्यादि
ग्रन्थाङ्क ७०
अज्ञातकर्तृक
इन्द्रप्रस्थप्रबन्ध
प्रकाशक
राजस्थान राज्याज्ञानुसार
सञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
जोधपुर ( राजस्थान)
अज्ञातकर्तृ के
इन्द्रप्रस्थप्रबन्ध
सम्पादक
दशरथ शर्मा,
रोपर, इतिहास विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
प्रकाशनकर्ता
राजापान राज्याशानुसार
सञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
जोधपुर ( राजस्थान)
विक्रमार २०२०
प्रथमावृत्ति ७५०
भारतराष्ट्रिय पाब्द १८८५
खिम्ताद १९६३
मूल्य-२२५
मुर-मून पाठ पोर यतथ्य पादि-बान्त प्रेग, अहमदाबाद ।
पार टाटिम पोर परिशिष्ट प्रादि-यो हरिप्रसाद पारीप, सापना प्रेग, चोपपुर।
विषय - सूची
विपय
पृष्ठाङ्क
प्रधान सम्पादकीय किचित् वक्तव्य
...
१-२
प्रस्तावना
Ir
..
१-३०
...
३१-३३
इन्द्रप्रस्थप्रवन्ध
परिशिष्ट १-ख प्रति के अतिरिक्त श्लोक
परिशिष्ट २-ढीली [दिल्ली] स्थान की राजावली
परिशिष्ट ३-नामानुक्रमणिका
३४-३६
४०-४६
प्रधान संपादकीय किंचिद् वक्तव्य " हमारे परममित्र, इतिहासविद् बहुश्रुत विद्वान् डॉ दशरथ शर्मा राजस्थान के प्राचीन इतिहास के बडे स्वप्रतिष्ठ, मर्मज एव सशोधक पढित हैं । आपने चाहमानों के इतिहास विषयक 'अर्लि चौहान ढीनेस्टाज' (EARLY CHAUHAN DYNASTIES)* । नामक बडे महत्व की पुस्तक लिस कर, राजस्थान के प्राचीन इतिहास पर बहुतसी अभिनव और अमूल्य सामग्री उपस्थित की है । संस्कृत साहित्य के आप बहुत ही मर्मन मयापक एव अध्येता होने के अतिरिक्त प्राकृत, अपभ्रा और प्राचीन राजस्थानी साहित्य के भी उतने ही प्रौढ पटित एव गरेपक विद्वान् है । राजस्थान में निर्मित संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रश एव पुरातन राजस्थानी ग्रन्थों में से मापने अनेक नूतन एतिद्य तथ्य खोज सोज कर दत पूर्व अनेकानेक लेप और निनन्ध प्रकट कराकर, राजस्थान एव उससे सनद सामा प्रदेशों के ऐतिहासिक तथ्यों और प्रसगों पर नवीन प्रकाश डाला है। प्रस्तुत 'इन्द्रप्रस्थ प्राध' जो 'राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला' के एक पुष्प के रूप में प्रकट किया जा रहा है, आप की ऐसी ही गोधमय प्रवृत्ति का परिणाम है । प्रबन्धगत वस्तु का योग्य परिचय आपने अपने प्रास्ताविक मे आलेसित कर ही दिया है । प्रस्तुत प्राध का अध्ययन करने पर हमारे पास के संग्रह में भी, इस विषय पर प्रकाश डालने वाली कितनीक सामग्री पड़ी हुई है, जिसका हमें स्मग्ण हो माया। उसमे की कुछ सामग्री चुन कर हम इसकी अनुपूर्ति के रूप में दे रहे हैं, जिससे पाठको को प्रस्तुत प्रमघ के अध्ययन और विवेचन की दृष्टि से और भी अधिक कुछ जानकारी मिल सकेगी। हमारे खयाल से प्रस्तुत प्रान्य की रचना करने वाला जयपुर या आमेर का निवासी कोई दिगंबर जैनसंप्रदायानुयायी पडित है। वहा पर जो भारक लोक रहते थे उनके • S CHAND & CO DELIII -JULLUNDJIR,-LUCH VOW - शास्त्रसंग्रहों में स्थानीय और प्रादेशिक ऐतिहासिक घटनाओं और प्रसंगों के वर्णन की बहुतसी फुटकल बातें गुटकों आदि में लिखी मिलती हैं। इसी तरह श्वेतांवर-संप्रदाय के यतिजनों के शास्त्रसंग्रहों में भी ऐसी सामग्री यत्र-तत्र उपलब्ध होती है। खोज करने पर इस प्रकार की सामग्री का बहुत बड़ा संग्रह प्राप्त किया जा सकता है और उसके आधार पर हमारे प्राचीन इतिहास के अनेकानेक नूतन तथ्यों पर विशिष्ट प्रकाश डाला जा सकता है । इतिहासप्रेमी और खोजी विद्वानों से हमारी नम्र विज्ञप्ति है कि वे यदि इस प्रकार की सामग्री का संकलन करने का सुयोग्य प्रयत्न करेंगे तो उसे 'राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला' द्वारा समुचित रूप में, प्रकाशित करने का प्रयत्न किया जायगा । . अनेकान्तविहार, अहमदावाद. ता. १८, मार्च, १९६० -मुनि जिनविजय प्रस्तावनां । - प्रस्तुत 'इन्द्रप्रस्थ नामक प्रबन्ध का सम्पादन दो हस्तलिखिन प्रतियों के आधार पर किया गया है, जिनमें से एक दिगम्बर शास्त्रभण्डार, जयपुर की और दूसरी दिल्ली के अनेकान्त - सन्पादक श्रीपरमानन्दजी शास्त्री के सग्रह की है। हमने इस में पहली को 'क' और दूसरी को 'स' सज्ञा से निर्दिष्ट किया है । 'क' का कुछ आरम्भिक अग त्रुटित है। इसका मारम्भ पहले सर्ग के २१ - भोक से हुमा है । इसके अन्त में भी कुछ एसे श्लोको का अभाव है जो 'ख' में प्राप्त है । फिन्तु प्रति का यह अश सम्भवत अपूर्ण नहीं है। 'क' और 'य' प्रतियों की नकल किसी एक ही प्रति से की गई होगी। दोगों की अशुद्धिया एक है, दोनों में त्रुटित अश भी एक है। किन्तु 'ख' प्रति के लेखक ने अत में कुछ अश बढ़ा दिया है, जिस म कुछ का इन्द्रप्रस्थ - प्राय से प्राय सम्बन्ध ही नहीं है। 'ख' प्रति के लेखक या स्वामी के पास 'क' प्रति भी किसी न किसी समय रही होगी। उसन अन्तिम सर्ग के श्लोकों की मूल सख्याए बदल कर ऊपर का तर्फ 'क' प्रति के कुछ शोक जोड दिये हैं। यद्यपि यह इन्द्रप्रस्थप्रबन्ध दिल्ली के प्राचीन इतिहास का कुछ वर्णन प्रस्तुत करने की दृष्टि से रचा गया है पर इस को विशुद्ध इतिहास की पुस्तक मानना भूल होगी। वास्तव में उस का अधिक उपयोग उन ऐतिहासिक मान्यताओं के ज्ञान के लिये है, जो उस समय किंवदन्ती के रूप में प्रस्तुत हो चुकी थीं, चाहे वे सर्वथा कपित ही हों या अर्द्ध सत्य । प्रबध का रचनाकाल अठारवी ईस्वी अताब्दी के आसपास रहा होगा । 'क' में अन्तिम बादशाह का नाम 'जहानदार' और 'स' म 'फर्रुससियर' है। इस अन्तिम काल की अराजकता और गड़ाह का दोनों प्रतियों में स्पष्ट निर्देश है। मुगलों की शक्ति का क्षय हो चुका था । किसी दूसरी शक्ति ने उस का स्थान न लिया था। चतुर्थ सर्ग म 'फिल्ली-दिल्ली' का प्रसिद्ध कथानक देते हुए कुछ भविष्यवाणिया अवश्य दी गई हैं। उनके फयनानुसार मुसलमानों के बाद राइवराज, उसके बाद सिसोदिये और फिर मुसलमान दिल्ली पर राज्य करेंगे। इस कथन की तुलना 'पृथ्वीराजरासो' की भविष्यवाणी से की जा सकती है। यह निश्चित है कि इन्द्रप्रस्थाध की रचना से पूर्व पृथ्वीराजरासो अपना वर्तमान रूप ग्रहण कर चुका था। लोग उसे प्रामाणिक प्रथ भी मानने लगे थे। चतुर्थ सर्ग में 'दिल्ली-किल्ली' की फया और कुछ हिन्दी-पय रासो से उदृत हैं। लोग उस समय ४ विक्रमादित्य को परमार भी मानने लगे थे। उसकी जीवनी का आधार 'सिंहासन-बतीसी' और 'बेताल - पचीसी' जैसी कथाणं बन चुकी थीं (देखें चतुर्थ सर्ग, श्लोक १०)। पहले सर्ग में दिल्ली के ग्यारह नाम दिये है, शक्रपंथा, इन्द्रप्रस्था, शुभकृत् , योगिनीपुर, दिल्ली, दिल्ली, महापुरी, जिहानाबान, सुपेणा, महिमायुक्ता, शुभाशुभकरा । इन में जिहाना- वाद शाहजहानाबाद का भ्रष्ट रूप है । इसी सर्ग में पृथ्वी की रचना, जम्बूद्वीप, भरतक्षेत्र, चार युग और अन्तिम युग में छ संवत्-प्रवर्तकों के नाम हैं। दूसरे सर्ग में प्रथम संवत्सर - प्रवर्तक युधिष्ठिर का वंश वर्णित है | जनमेजय के बाद के नाम कल्पित हैं । दीपदयाल, भोपत, सुखमल्ल, भीखमगज, डूंगरसी, मुजाणसिंघ आदि शब्द इस कल्पना के दारिद्रय के द्योतक है। अन्तिम राजा का नाम नीलाधिपति है। हमने प्रवन्ध में सब राजाओं के नाम भिन्न टाइप में कर दिये है, जिससे पाठक सुगमता से इनके विषय में जान सके। तीसरे सर्ग में रामवंश का वर्णन है। इस का पहला राजा शंखध्वज नीलाधिप को युद्ध में मार कर गद्दी पर बैठा । यह परमार राजा के हाथों मारा गया । चतुर्थ सर्ग में संवत्सर-प्रवर्तक परमारवंशी विक्रमादित्य के वंश का वर्णन है । नाम कल्पित हैं । पाठकों की सुविधा के लिये ये अलग टाइप में कर दिये गये हैं। पांचवें सर्ग में तंवर-वंश का वर्णन है। इस का पहला राजा अनंगपाल था। इसी के सम्बन्ध में चतुर्थ सर्ग के अन्त में दिल्ली-किल्ली की कथा वर्णित है। प्रबन्ध की तंवर- वंशावली यह है- . - १ अनङ्गपाल ८ नरपाल १५ कंवरपाल २ विल्हणदे ९ वत्सराज १६ अनंगपाल ३ पृथक १० वीरपाल १७ तेजपाल ४ गंगेव ११ गोपाल १८ मोहपाल ५ सहदेव १२ तोल्हण १९ स्कंदपाल ६ श्रीयुतयुत १३ जुलखरी २० पृथीराज ७ कुंदयुत (8) १४ तसखरी किन्तु वंशावली में तंबरों की गणना उन्नीस ही अंकों में दी है, जिस से प्रतीत होता है कि या तो प्रथम अनंगपाल को गणना में छोड़ दिया गया है या वह कल्पित है। दूसरे अनगपाल की सत्ता इतिहास -सिद्ध है। पार्श्वनाथचरित (रचना संवत् ११८९) के रचयिता कवि श्रीधर ने उसके राज्य, राजधानी और एश्वर्य का अच्छा वर्णन किया है । इसकी नीति आदि के मूल्याङ्कन के लिये पाठक राजस्थानभारती, भाग ३, अङ्क ३-४ मे दिल्ली का तवर राज्य नाम का लेख पढ़ें। इस लेस के परिशिष्ट रूप में एक जहागीर के समय की और दूसरी संवत् १८४५ की तवरों की बगावरिया दी गई है । पहली वशाली और प्रध की वशावली में केवल अनगपाल प्रथम और द्वितीय के नाम एक से है । वाकी सन नाम भिन्न हैं। किन्तु संवत् १८४५ को वशावली से इसमें पयात नाम मिलते हैं। यह सादृश्य समय की आपेक्षिक सनिकटता के कारण संभव है । उसम बीस नाम हैं। प्ररन्ध का चौथा राजा वगावली का दूसरा राजा गगेव है। वशावली का तीसरा राजा पृथ्वीराज संभवत अनन्ध का तीसरा राजा पृथा है। सहदेव वशावली का चतुर्थ और प्रबध का पाचना राजा है। नरपाल का नाम वशावली का पाचवा है, किन्तु प्रपन्ध म श्रीयुतयुत और कुदयुत को बीच मे डाल कर नग्पाल को आठवें स्थान पर पहुचा दिया गया है। अन्य मिलते-जुलते नाम ये है- वराज प्रवध ९ वशावली ८ गोपाल ११ मनगपाल तेजपाल पृथ्वीराज २० २० प्राध के जुलग्वरी और तससरी आदि कुछ नाम विचित्र हैं। उन्हे कल्पित ही मानना होगा । इतिहास के अधकार में लोगों को केवल यह याद रहा कि सवरा क १९-२० । राजा थे। इनमें अनंगपाल की निश्चित सत्ता हर एक को मालूम थी। कुछ अय नाम भी सम्भवत उन्हे याद थे। बाकी की पूर्ति भाट-बुद्धि से उन्होंने की। इसी कारण से इन प्रबन्धों और वशावलियों के आधार पर सय की गवेपणा अत्यत कठिन पड़ती है। प्रबध और वशावलियों में इतिहाससिद्ध मदनपाल के नाम का कम से कम मदनपाल- रूप में अभाव है। यद्यपि खरतरगच्छगृहद्गुवावलि के आधार पर यह निश्चित है कि संवत् १२२३ में यह दिल्ली के सिंहासन पर वर्तमान था । प्रवध के कथन से ही नहीं, अन्य प्रमागों से भी सिद्ध है कि बीसलदेव ने दिल्ली - राज्य को हलगत किया था। मदनपाल और विग्रहराज की सम सामयिकता को देखते हुए हम इम से पूर्व भी समावना कर चुके हैं कि विग्रहराज ने मदनपाउको पराजित कर अपने अधीन किया होगा। संवत् १२८२ में " १२ " " " " नरेन्द्रप्रभसूरि द्वारा रचित 'अलकारमहोदधि' में उद्धृत निम्नलिखित श्लोक से यह धारणा कुछ और पुष्ट हो चली है- तस्मिन्नुदर्गरिपुवर्गजये निसर्गवैयग्रयानजनि विग्रहराजदेवः । यद्विग्रहं जगदसम्भविन विभाव्य बेरिखजोऽपि मदनोऽपि मदं मुमोच ।। इसकी अन्तिम दो पङ्क्तियां श्लेषयुक्त हैं । विग्रहराज, वीसलदेव का दूसरा नाम है। तीसरी पंक्ति में विग्रह का अर्थ 'शरीर' और 'युद्ध' दोनो हो सकते हैं। मदन का अर्थ कामदेव स्पष्ट है। किन्तु यह भी सम्भव है कि कवि का इंगित मदन या मदनपाल की तर्फ हो, जिसने विग्रहराज के जगदसम्भव युद्ध को देख कर मद का त्याग कर दिया। शायद यही मदनपाल प्रबन्ध का मोहपाल और वंशावली का मोहगपाल हो । प्रबन्ध ने और १८४५ की वंशावली ने पृथ्वीराज को अन्तिम तंवर - राजा माना है। ठकर फेरु ने पृथ्वीपाल तंवर की मुद्राओं का उल्लेख किया है । इसलिए इसका भी तंवर राजा होना असम्भव नहीं है । शायद इसीको, पृथ्वीराज चौहाण के समय के आसपास दिल्ली का राजा होने के कारण, भोले भाले लोग कुछ समय के बाद यह मानने लगे हों कि तंबरों ने दिल्ली का राज्य अपने दौहित्र पृथ्वीराज चौहाण को दे दिया था। प्रबन्ध में रासो की इस प्रसिद्ध वार्ता का उल्लेख नहीं है कि अनंगपाल पृथ्वीराज को दिल्ली का राज्य देकर तपस्या के लिये चला गया था। प्रबन्ध ने पृथ्वीराज तंवर को ही बीसलदेव चौहान द्वारा पराजित दिल्ली का अन्तिम राजा माना है। विषय अभी और गवेपणीय है । छठे सर्ग में चौहान - वंशका वर्णन है। राजाओं के नाम बीसलदेव, गंगेव, पहाड़ी, स्यामसु, विहाड़ी, गंगेव और पृथ्वीराज दिये हैं जो प्रायः ठीक हैं। पहाड़ी पृथ्वीभट द्वितीय का नाम प्रतीत होता है । स्यामसु से सोमेश्वर का नाम ग्रहण किया जा सकता है। विहाड़ी या वाग्मट कोई शायद सोमेश्वर का प्रतिद्वंद्वी हो । गंगेव गलती से छठे स्थान पर आगया है । पृथ्वीराज के पतन के कारण, कुछ तोड़ मरोड़ के साथ, वही है जो हमें अन्य ग्रन्थों में मिलते हैं। सातवें सर्ग में पठान - वंश का वर्णन है। कई नाम अशुद्ध और गलत क्रम से हैं। प्रबन्ध के रचयिता को पठानवंश का बहुत सामान्य ज्ञान था। आठवें सर्ग में लोदियों का वर्णन है । इसमें वैरमखान और तैमूर का लाना स्पष्टतः अशुद्ध है । प्रबन्ध ने बैरमखां को लोदीवंश का अन्तिम राजा और तैमूर को भारत में चकत्ता (मुगल) वंश का संस्थापक माना है।
७ नवे सर्ग में तैमूर, वावर और हुमायू का वर्णन है । हुमायूं शेख से हार कर बलस चला गया। दशवें सर्ग में शेखों का राजवा है। इस का पहला राजा अलीसाहि गोरशाह के स्थान पर रस दिया गया है और शेरशाह को चौथा राजा बनाया गया है। वास्तव में इस वश का नाम 'शेग्व' नहीं, 'सूर' था। इसक प्रथम बादशाह शेरशाह न सन् १५४० से १५४५ तक राज्य किया। उसके बाद इस्लामशाह १५४५ से १५५२ तक गही पर रहा। यही प्रबन्ध का सलीमगाह है । वास्तरिक मुहम्मद आदिल को शायद 'अलीमहमद' में परिवर्तित कर वश का अन्तिम राजा माना गया है। ग्यारहवें सर्ग में मुगल (चकत्ता) श का वर्णन है । इसर जाति के हेम या हमू के इन्द्रप्रस्थ म राज्य का निर्देश ठीक है, चाहे वह इतने दिन तक वहा का स्वामी न रहा हो। अफवर का सिंहासनारोहण संवत् १६१३ ठीक है। उसका वि स०१६२४ (सन् १५६७) में चित्तोड जाना भी ठीक है । इसा वर्ष में चित्तौड़ पर घेरा डाल कर उसने सन् १५६८ के भारम्भ में चित्तौड़ को हस्तगत किया था । अकवर के राज्य के मुसशान्तिमय वातावरण का प्रबध में सक्षेप में सुदर चित्रण है। गोपाचल (ग्वालियर) और चित्रकूट का श्लोक ९ में फिर निर्देश है। ग्वालियर के विषय में इसके बाद प्रपन्ध में कुछ नहीं है। किन्तु 'अकबर- नामे से हमें ज्ञात है कि सन् १५६७ से पूर्व उस ने ग्वालियर पर अधिकार कर लिया था। सवत् १६३६ में चित्तौड की विजय का सवत् अशुद्ध है । उस से लगभग एक वर्ष पूर्व अकर ने कुम्भलमेर अवस्य जीता था। शायद प्रवधकार को उस का कुछ ज्ञान हो । नहागीर और शाहजहा के राज्यकाल का प्रबन्ध में ठीक ठीक निर्देश है । औरंगजेब का मृत्युकाल मी ठीक है। औरगजेन के बाद की अराजकता का प्रनयम अच्छा चित्रण है, किन्तु घटनाए किसी मश में कल्पित हैं। वहादुरशाह का राज्यकाल ठोक है। जहादारशाह ने ग्यारह महीने तक राज्य किया। प्राधिकार ने उसका राज्यकाल १ वर्ष १ महीना ३ दिन दिया है। 'ख' प्रति में कुछ अन्य घटनामों का वर्णन है। १७०७ के बाद भारत में अनेक युद्ध एप । प्रवध में केरल युद्धों के नाम दिये हैं। किस किस का युद्ध हुआ-पात का निर्देश नहीं है । श्लोक ३६, ४६, ४८ और ४९ में फच्चाहों का और श्लोक ३७ एव ४०३ में अम्बावती यानि आमेर का नाम भाया है । मेवाड़ का भी इतस्तत इन श्लोकों में नाम है। लोक ५१ में लिखा है कि मेवाड़पति दिलीपति होगा । चौहानों के पारे में भी उन्टी सीधी ८ कई बातें हैं । इन श्लोकों की वृद्धि न जाने किस की कृपा है । प्रति 'क' में इनका अभाव है। श्लोक ६१ में फर्रुखसियर का नाम दिया है। 'इन्द्रप्रस्थप्रबन्ध' के विषय का यह सामान्यत: निर्देश है। सम्पादित ग्रन्थ में संस्कृत की दृष्टि से अनेक अशुद्धियां हैं। इन में कुछ लिपिकारों की कृपा से हैं। किन्तु प्रबन्ध के रचयिता ने स्वयं शुद्र सस्कृत लिखने का प्रयत्न नहीं किया है। इस खिचड़ी संस्कृत की तुलना चारण एवं भाटों की ख्यातों और वातों आदि की संस्कृत से की जा सकती है। रचयिता का लक्ष्य मुख्यतः घटनाक्रम का निर्देश रहा है, भापा चाहे शुद्ध हो या अशुद्ध । अद्यावधि भप्रकाशित इस इन्द्रप्रस्थप्रबन्ध को पाठकों के सम्मुख तद्वत् रख रहे हैं । सुविज्ञ जन प्रबन्ध का समुचित प्रयोग करें। इतिहास के अन्धकार युग में यथाशक्ति यथा- ज्ञान इतिहास को प्रस्तुत करने का जो प्रयन्न इन प्रबन्धकारी ने किया है वह उपेक्षा की वस्तु नहीं है । उनसे हमें इतस्ततः अनेक तथ्यरल मिलते हैं। हमारा प्रयत्न इतने तक ही सीमित रहा है कि नीर - क्षीर विवेकी पाठकों के सम्मुख एक ऐसे प्रबन्ध को उपस्थित करें। ज्येष्ठ शु० पूर्णिमा, वि० सं० २०१५ चीर० नि० स० २४८५ । दशरथ शर्मा इन्द्रप्रस्थ प्रबन्धः। ॥ॐ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीसरस्वत्यै नमः ।। ॥ प्रथम सर्ग ॥ श्रीगणपति' गुरुन् नत्वा ब्रह्मविष्णुसरस्वतीः । ध्यात्वा नृपवर्णन च दिल्लीपुर्याः करिष्यति(ते) ॥१॥ इहैव जसवीपे विख्यात भुवनत्रयम् । मेरुसशोभित मध्य कल्पवृक्षसमन्वितम् ॥२॥ तत्र श्रीदेवनिर्माथि लक्षयोजनमानकृत् । तन्मध्ये देवताः कृत्वा ग्रामसख्या महीतले ॥३॥ चतुर्दश महाकोटिः लक्षश्चैव चतुर्दश"। अष्टाविंशत्सहस्राणि शतानां पञ्चकः स्मृतः ॥४॥ एकमप्तिमिता सख्या (१४१४२८५७१) त्रिग्राम उपरि स्थितः। जबूढीपे सदा काले देवस्थितिकृतामपि ॥५॥ मध्ये मेरु" सदाभाति ग्राम अर्द्धकृत मुदा"। तस्य क्षेत्रस्य मध्ये तु भरतक्षेत्र" राजते ॥६॥ आर्यदेशा द्विचत्वारि(४२) वर्तते" महीमंडले । तन्मध्ये शुभक्षेत्र देशः पाचालसजकः ॥७॥ शक्रपथा पुरी भाति इद्रराज्यकृता" तदा देवतावसतिस्तत्र धर्मनीतिस्तदा वटुः॥८॥ लाभाधिकः स्वसतोपस्वधर्मनिपुणा जनाः। कुटुम्बमित्रतो तोप' वचनसत्यता मुदा ॥९॥ दर्शनं वासुदेवम्य बलदेवजिनेश्वरः। महापुरुपसिद्धाना दर्शन तत्र विद्यते ॥१०॥ १ ति । ३ सरस्वती । ४ नृपयशवर्णन च। ५ पूर्या । ६ 'विष्यात । ८ मूल पाठ यही है। ९ देवता। १० चतुदस । ११ चतुर्दस । १३ मेरु । १४ पाठ यही है। १५ शुद्ध करनेसे दो भा होता है। १६ वर्तते । १७ देश नत्वा । न्वित । १२ पंचक । १८ कृत, २] इंद्रमस्थप्रवन्धः दानाधिक्यं सुखाधिक्यं मुक्तिश्च स्वर्गदायकः । ईतिभीतिभयं नास्ति सुभिक्ष वर्तते मही ॥११॥ यज्ञाधिक्यतरं तत्र वर्तते महीमण्डले । विघ्नकर्ता च कीनागः भयं यज्ञस्य कारकः ॥ १२॥ सुखं नानाविधं तत्र दुःखं स्वप्ने न दृश्यते । ईदृशी च पुरी भाति इंद्रराजकृता तदा ॥१३ ।। || दिल्लीनामानि ॥ शक्रपंथा इंद्रप्रस्था शुभकृत् योगिनीपुरः । दिल्ली दिल्ली महापुर्या जिहानाबाद इष्यते ॥ १४ ॥ सुपेणा महिमायुक्ता शुभाशुभकरा इति । एकादशमितनामा दिल्लीपुरीच वर्तते ॥१५॥ युगानां संख्यया तत्र लक्षसप्तदशं मुदा । अष्टाविंशत(ति)सहस्राणि (१७२८०००) कृतं सत्ययुगं मुदा ॥१६॥ मत्स्य-कच्छ - चराहाख्यः नृसिंहो वामनाभिधः। वैततेऽवतारस्तत्र पंचसंख्या महीतले ।। १७ ॥ द्वितीययुगसंख्या . लक्षद्वादशसंज्ञकं । सहस्रपपनवस्तत्र (१२०,६०००) त्रेतायुगमिहोच्यते ॥१८॥ परशुरामश्च रामश्च त्रेतायां वर्तते द्वयम् । महापुरुषराजेन्द्र दानी मानी महाबली ॥ ११ ॥ तृतीययुगसंख्या च अष्टलक्षमितं शुभं । चतुःषष्टिसहस्राणि (८६४०००) द्वापर युगमुच्यते ॥ २० ॥ तत्र कृष्णसदेवः अवतारो जायते भुवि । चतुर्थयुगसंख्या च लक्षचत्वारि संज्ञ(ख्यकः ।। २१ ।। द्वात्रिंशत्सहस्राणि (४३२०००) कलिनाममहायुगः । बुद्ध-कल्की द्वयं तत्रावतारो जायते मही ॥ २१(अ)॥ ३. "धिकत। ४ महि । ७. करामिति । ८. पुर च । १३. वतारो वर्तते । १४. संख्याश्च । १७. शुद्ध नहीं १. क्य । - ६.,नाम । १२ स्य । २. क्य । ९. सत । १०. मछ । ११. कछ । १५. सहश्र । १६. परसं । १८. सख्याश्च । १९. वतारा। किया जा सकता।
प्रथम सर्गः 1३ कलिमध्ये शाफमर्ताः' पसंख्या नृपसत्तमाः । आदौ चन्द्रेन्द्रप्रस्थश्च महारांजो युधिष्ठिरः ।। २२ ॥ उज्जैनी-विक्रमादित्यो द्वितीयों नृपसत्तमः । प्रतिष्ठानपत्तने च शालिवाहनंशाककृत् ।।२३।। सिंधु-सग वैतरु(र)ण्यां विजयो नन्दनो नृप । कनकगिरिपत्तने च नृपः नागार्जुनाभिघः ॥२४॥ कल्की राज्ञः(जा) भविष्यति । पन्नृपाः शाककर्ताश्च युगे कलिमहच्छुभे ॥ २० ॥ पचपचागल(लोक्षा च सहस्रपचविंशतिः । शतानि पचकस्तत्र उपरि पचविंशतिः ॥२६॥ एकेन समये तत्र सग्रामे नियते जनः । तदा शाक विजानीयात् कथित पूर्वसूरिभिः ॥२७॥ आदौ युधिष्ठिरशका अब्धि-अन्धि-ख वह्नयः(३०४४) । तत्पश्चाद् विक्रमो भूपः शकपच-त्रि भूमि च (१३८) ॥२८॥ श्रीशालिवाहननृपः अष्टादशसहस्र(१८०००)सु(युक) । शक एव विराज(ज)ते शालिवाहनज(ज:) कले(लो)" ॥२९॥ विजयो नदनो नाम शकः दशसहस्र(१००००)वत् । नृपनागार्जुनशकः लक्षचत्वारि (४०००००) सज्ञ(रय)का ॥३०॥ कल्की शकैक-दि-अष्ट(८२१) वर्षाणि कथयति च । कलिमध्ये भवेत् शाफः पदसल्या पडितोत्तम । ॥३१॥ अधाग्रे शृणु राजेन्द्र ! वशवर्णनमुत्तमम् । कलिकाले महारम्भे शक्रपये नृपः शुभः ॥ ३२॥ श्रीकृष्णवासुदेवाग्रे चशवर्णन कथ्यते । कवे(वि)धर्मध्वजो नाम इन्द्रप्रस्थमवधके ॥३॥ ॥ इति इन्द्रमस्थमसंध प्रथम सर्गः ॥ . काहो अकारान्त मानकर । २ "सत्तम । ३ 'पृश्य । द्वितीय । ७ दिसग छन्दोमग होता है। १. कले। ११ मा पाठ-इनि श्रीइप्रस्यप्रय प्रायस्पापन पनामस्मापनवर्णनो नाम प्रपमम ॥ोस ३६॥ - - - ४ महाराजा । ८ सहश्र । ११ स्प।
५] इंद्रप्रस्थप्रवन्धः || द्वितीयः सर्गः ॥ ।। अथ वंशवर्णनम् । अथ पाण्डवाः ।। तत्रादौ शक्रपंथायां इन्द्रो राज्यं करिष्यति । कलिकाले इन्द्रप्रस्थ इति नाम भविष्यति ॥१॥ पुनः पांडवभूपालाः राज्यं कृत्वा कलौ युगे । वर्षत्रयसहस्रश्च भवतीह न संशयः ॥ २॥ धर्मिष्ठः स्वजनः प्रीतिः स्वधर्मे मन म्]तिष्ठति । शीलवंत सुखोत्साही पांडवानां च राजते ॥ ३ ॥ आदौ युधिष्ठिरनृपः कृत्वा राज्यं च भूतले । त्रयत्रिंशत्स्वर्वर्ष च शक्रपये नृपोऽभवन ॥४॥ पश्चात् परीक्षितो राज्ञः(जा) त्रयत्रिंशतवत्सरः । मासैक-त्रिदिनैश्चैव(३३।१॥३) नृपश्रीधर्मनायकः ॥५॥ राजा जन्मेजयस्तत्र चतुरशीतिवत्सरः। मासपंच-दिनसप्तविंशतिस्तत्र(८४।५।२७) राज्यकृत् ॥ ६॥ राजा सोमधरस्तत्र द्वयशीति(८२)वत्सरः शुभः। मासाष्ट-दिनत्रिविंश(८२।८।२३) चतुर्थों वंशनायकः ॥७॥ राजा उत्तमचन्दश्च अष्टाशीतिश्च वत्सरः। द्विमास-दिनअष्टश्च(८८।२।८) पंचमो नृपतिर्भवेत् ॥ ८॥ राजा यदुरथइचैव वत्सरपंचसप्ततिः। मासत्रयं दिनाष्टौ च (७५।३।८) शक्रपंथे नृपोत्तमः ॥९॥ ततो दीपदयालाख्यः वत्सरपंचसप्ततिः (७५) । दिगमास-दिनअष्टौ च (७१।१०।८) सप्तमो राज्यनायकः ॥१०॥ राजा श्रीउग्रसेनाख्यः अष्टसप्ततिवत्सरः। माससस-दिनै रुद्र(७८१७११) संख्या चाष्टमगो नृपः ॥११॥ मंजुलपायनामाख्या एकाशीतिश्च वत्सरः। ईशमास-त्रिविंशाहा (८१।११।२३) नवमो राज्यनायकः ॥१२॥ सूरसेननृपस्तत्र वर्षश्च नवसप्ततिः (७९)। मासाष्ट-दिनश्चैव (७९।८।६) राज्यकृद् दशमो नृपः ॥ १३ ।। १. मनस्का विचित्र प्रयोग । : २. ख का पाठ परीछतो ।
द्वितीय सर्ग [५ श्रीभोपतिनृपः श्रीमान् वीष्टसप्ततिस्तथा । मास-पंचढयदिन(७८।५।२)राज्यकृत् नृपसत्तमः ॥१४॥ राजा श्रीनरजंघाल्यश्चतुपष्टिश्च वत्सर(र.)। दिनत्रय माससप्त(६४।७३)राज्यकृत् द्वादशो नृपः ॥१५॥ सुखमछमहाराजः द्विपष्टिवत्सरस्तथा। पचविंशदिनश्चैव (६२२०२०) राज्य कृत्वा च भूतले ॥१६॥ नृपः श्रीरणजीताख्यः पचपष्टिश्च वत्सरः । मामदिग्-दिननदद्धि (६५।१०।२९) चतुर्दशनृपः शुभः ॥१७॥ नरहरदेवश्च नृपः एकपष्टिश्च वत्सरः । दिगमास-दिनवेदश्च(६१।१०।४) नृप. पंचदशोऽभवत् ॥१८॥ श्रीमुचित्ररथो नाम त्रयसप्ततिवत्सरः। मासैकादश-वेदाहा (७३।११।४) नृपश्चन्द्रकलोऽभवत् ।। १९ ।। सूरनामनपस्तत्र वर्षाप्टसप्ततिस्तथा । दिनन्य राज्य कृत्वा (६८०२) स्वर्ग गन्ता च भूमिपः ॥२०॥ श्रीसोस( भाननृपस्तत्र पचागत्पचवत्सरः। अष्टमाम-दिनदाहा (५०1८।२९) अष्टादशनृपः स्मृतः ॥२१॥ नृपपर्यतनामाख्यः पंचाशत्वत्सराणि च । एकविंशदिनश्चैव मासाट (८०८।२१) स च राज्यकृत् ॥२२॥ दिपचाशत्वत्सराणि मप्ताहा नवमासकः (०२।९।७)। नृपश्रीमधुर्वतश्च राज्यकृत् विशमो नृपः ॥२३॥ नृपटोडरमल्लाख्य' चत्वारिंशाष्टवत्सरः । पचमाम-धृतिदिना (४८ादा१८) एकविंशत्तमो नृपः ॥२४॥ भाग्यमराजाख्यनृपः नवत्रिंशत्(च) वत्सरः। विशाहा सप्तमासश्च(३९।७२०)टाविंशो नृपराज्यकृत् ॥२५॥ नरहरराजाख्यनृपः पचचत्वारि वत्सर । मास एकादशस्तत्र (४५।११।०) राज्य का महीतले ।। २६ ।। राजा दायो नाम चतु'चत्वारि वत्सरः। मामाष्ट दिनसप्तश (४४१८७)राज्यं जिनमितो नृपः ॥ २७॥ 1 * . इंद्रप्रस्थप्रबन्धः सांगो नृप इन्द्रप्रस्थे पटपंचाशत्वत्सरः (१६००)। राज्यं कृत्वा महीं भुक्त्वा नृपस्तत्त्वमितोऽभवत् ॥ २८॥ हैटीराजा महीपृष्ठे चतुपंचाशवत्सरः। द्विदिनो दामासश्च (५४।१०।२) राज्यं पतिशमो नृपः ।।२९।। अहेटनरपंचाशवर्षमासैकपदिनः (५०।१।६)। राज्यं कर्ता महीं भोक्ता स सप्तविंशमो नृपः ॥ ३० ॥ नृपश्रीदत्तपर्याख्यः त्रित्रिंशत्वर्षाणि राज्यकृत् । जिनाहा नवमासश्च(३३१।२४) अष्टाविंशतमो नृपः ॥३१॥ भीमराजमहीपालश्चत्वारिंशत(च) वत्सरः। मासैकदिनसप्तश्च (४०१७) एकोनविंशमो नृपः ॥३२॥ नृपल मणसेनाख्यः वर्षनवचतुर्मिता। नवाहा राज्यं कर्तात्र (४९।०१२) नृपत्रिंशत्तमः शुभः॥३३॥ सूरसिंहमहाराजः त्रिमासवर्षविंशतिः। दिनं (२०१३।६) भूमि भोक्ष्यति एकत्रिंशत्तमो नृपः ॥३४॥ सूरसेनैकचत्वारि वर्षमासाष्टराज्यकृत् । जिनाहा (४१८२४) शक्रपये च राज्यं रदमितो नृपः ।। ३५ ॥ वीरसाहमहीपाल वर्षतिथिमित द्रुतम् । ईशमास-सप्तदिनं (१५।११।७) नृपती(पः त्रित्रिंशः)राज्यकृत्॥३६।। नृपः अखयराजाख्यः सप्तचत्वारि वत्सरः । मासाष्टत्रिदशाहानि (४७८११३) चतुत्रिंशत्तमो नृपः ॥ ३७॥ नृपः श्रीदत्तनामेन पंचचत्वारि वत्सरः । एकविंशदिनश्चैव नवमासश्च (४५।९।२१) राज्यकृत् ।। ३८ ॥ नृपः श्रीहरदत्ताख्यः त्रयोविंशतिवत्सरः। पंचविंशदिनहींना (२२।१।०) राज्यं कर्ता महीतले ॥ ३९॥ सिद्धपालमहीपालः सप्तचत्वारि वत्सरात् । तत्त्वसंख्यादिनस्तत्र (४७०।२६) सप्तत्रिंशत्तमो नृपः ॥४०॥ राजा पर्वतराजाख्यः चत्वारिंशच्च वत्सरः। विविंशाहा ग्रहैर्मासा(४०।९।२३) राज्यं कृत्वा च मेदिनी ॥४१॥ .
३ . - द्वितीय. सर्ग श्रीढुंगरसीहनृपः नवचत्वारि वत्सरः । द्विमास-दिनसप्तश्च (४९।१७) इन्द्रप्रस्थे च राज्यकृतं ॥४२॥ पृथ्वीपालश्च नृपतिः एकपचाशवत्सरः । ८ अष्टमास-दशाहानि (५१।८।१०) चत्वारिंशत्तमो नृपः ॥ ४३ ॥ प्रधानेन कृत राज्य नाम नारायणोऽभवत् । धर्मिष्ठः बुद्धिमान धीरः सग्रामेषु च दुर्जयः ॥४४॥ पश्चात् ब्रह्माउराजश्च पचत्रिंशच वत्सरः। एकविंशाह-मासत्रि (३५३।२१) राज्य कृत्वा च मेदिनी ॥ ४५ ॥ नृपहयातसिंहश्च सप्तविंशतिवत्सरः । (२७1०1०)। योगिनीपुरमध्ये च राज्यकृत् वशनायकः ॥ ४६॥ नृपवीरव(म)सेनारयः एकविंशतिवत्सरः। दिमास-त्रिदशाहा च (२१।२१३) राज्यकृद् योगिनीपुरे॥ ४७ ॥ नृपधनपतिस्तत्र वर्षपचत्रिसज्ञ(ख्य)कः। मामाष्ट-नक्षत्रदिना (३८1८८)गज्य भुक्त्वा महीतले ॥४८॥ महाबलनृपख्यातः पचचत्वारि वत्सरः। मासक-तिथिसख्याहा (४५११११५) राज्यकृत् इन्द्रप्रस्थ ॥ ४९॥ प्रत्युदग्नृपस्तत्र तत्त्वसख्या च वत्मरः। मासाष्ट-तिथिसरयाहा (२५।८।१५) राज्यभोक्ता भविष्यति ॥८॥ श्रीचित्रसेननृपतिश्चतुविशतिवत्सरः। त्रिविंशाहा च पद्माम (२४ावा२३) राज्यकृत् योगिनीपुरे ॥५१॥ नृप असरूपालाल्या वर्षसप्तदशस्तथा । त्रिमास-सप्तदिवस(१७३७)राज्य कृत्वा महीतले ।।०२॥ जितपाल्नृपस्तत्र धृतिसख्या च वत्सर । मासरुद्र-दशाहाइच (१८।११।१०) भुवो मडले राज्यकृत् ॥५३॥ नृपवलमुत्स्तत्र त्रिंशत्वाणि राज्यकृत् । दिवसैर्विशति (३०१०।२०) राज्य कृत्वा च महिमण्डले ॥५४॥ नृपमा द्विचत्वारि वर्ष मासश्च पचकः । दिनकराज्यकृतस्तत्र (४रान१) एकपचाममो नृपः ॥१५॥ 5 ८ द्रप्रस्थानान्धः श्रवणाख्यनृपः वर्षसप्तदिगमामयुग्मकः । एकोनत्रिंशच दिनः (१७।२९) गन्यकृद भुवि मण्डले ॥५६॥ नृपजीवनचित्राख्यः पइविंशवत्मरस्तथा । वेदमास ( २०) कृनं राज्यं इन्द्रप्रस्थ(स्थे) शुभे पुरे ॥५७।। सुरतजगनामाख्यः त्रिदशवर्षमासदिग। एकोनत्रिंशच दिना (१३।१०।२९) चतुःपंचासमो नृपः ॥ ५८॥ पंचत्रिंशच वर्षाणि मामक-दिन चकक (५१०१)। नृपसूरघटो नाम राज्यं कृत्वा महीतले ॥ ५ ॥ वर्षत्रिविंशनिसंख्या दिवसा(श्न) पसंख्यका (२३1०1८)। अदपतनृप इत्याख्यः राज्यकृत शक्रपथके ।। ६०॥ श्रीहरहरनृपस्तत्र द्विचत्वारिंशवत्सरः । ईशमास-जिनाहा (४२१।२४) म राज्यं कृत्वा च भूभुजः ॥३१॥ सुरंधनो नाम राजा पंचपंचाशवत्सरः। दिवसै पमिते (२००३) राज्यं कर्ता निर्विघ्नं सर्वदा ॥ ६ ॥ सुजाणसिंहनृपतिः एकचत्वारि वत्सरः। हिमामाष्टदिनश्चैव ( ४८) राज्यं कृत्वा च तिष्ठति ।। ६३ ॥ महीजनृपतिस्तत्र त्रिंशत्वष्टमासकः । त्रिविंशदिवसास्तत्र (३०८।२३) राज्यकृत् पष्टिमो नृपः ॥१४॥ श्रीनाथनामनृपति अष्टचत्वारि वत्सरः । पंचमास-तत्त्वदिना (४८।५।२६) राज्यकृत् योगिनीपुर ॥६५॥ जीवनपालाख्यनृप द्विचत्वारिंशवत्सरः । पड्मास-पंचदिवस (४२।६।५) द्विषष्टिसंख्यको नृपः ॥६६॥ श्रीमत् उदयसेनाख्यः सप्तत्रिंशत्(च) वत्सरः। पंचमास-जिनाहानि (३७५२४) त्रिषष्टिनृपराज्यकृत् ।। ६७ ।। अनंदजल इत्याख्यः चत्वारिंशच्च वत्सरः। बिमासैकदिनींना (४०।।२९) चतुपष्टिमितो नृपः ॥ ६८॥ अष्टाविंशतिवर्षाणि दिनैकमासदिग्मिता (२८।१०।१)। राजपालमही (भोक्ता पंचषष्टितमो नृपः ।। ६९ ।। ॥
A तृतीय सर्गः [९ नीलाधिपतिराजेन्द्र त्रिवर्षमासपंचकः (२०१०)। राज्य कृत्वा मही त्यक्त्वा पष्टिपट्सख्यको नृपः॥७० ॥ पाडवानां महावशे नृपनीलाधिपोऽभवत् । राज्यहानि कृत तेन रामवशी नृपोऽभवत् ॥७१॥ नीलाधिपतिराजेन सग्राम च कृतं बहुः । ससदश(१७)मितो युद्ध कृत तेन महीतले ॥७२।। पांडवाना महावंशे नीलाधिप महीभृतः। सग्राममध्ये स मृत्वा सेन्यामपि मृता बहुः ।।७३ ।। सप्ततिसहस्रसख्या(७००००)घोटकाया मृता जना। गजा शतमिता (१००)स्तत्र उप्ट्रा द्वाविंशनिशता (२२००)॥७॥ पदातयश्च एकोनत्रिंशत्सहस्र(२९०००)सख्यया । नीलाधिपति सह युद्धेन मृता सग्राममध्यके ।।७५ ॥ पांडवाना महावशे राज्य गत्वेन्द्रप्रस्थके ।। ७६ ।। || इति पाडवः ॥ ११५॥ । तृतीय सर्ग ॥ || रामशः ॥ अथातः रामवशी च राजा शवप्वजो जितः। सप्तत्रिंशत्सहस्रैश्च (३७०००)इन्द्रमस्थे पुरे गतः ॥१॥ छत्र च धारितं तेन शम्वध्वजमहीपतिः । चतुचत्वारिके वर्षे (४४००) राज्यकृद् योगिनीपुरे ॥२॥ दिल्लीनामश्च भवति तत्रैव राज्यकर्मणि । पुनश्च भूपतिस्तत्र दिल्लीराज्यं सुखेन सः॥३॥ एकदा समयेस्तत्र पमारो नृपविक्रम । आगतः स्वपुरात् तत्र उतनवाऽप्रसईके (2) ॥४॥ सग्रामश्चैककृत् तत्र पुनः सग्रामपंचकृत् । संखध्वजो नाम नृपः पतितस्तत्र सगरे ॥५॥ प्रति खति श्रीइद्रप्रस्थप्रक्थे पाहवयशराज्यरर्णनो नाम द्वितीय संग ॥ोक ॥
१० इंद्रप्रस्थप्रवन्धः लौकशीतिसहस्त्र(१८००००)अश्वा पतित संगरे । गजा सहस्त्र(१०००)संख्या च सहस्राष्ट(८०००)पदातयः ||६|| मृतो संखध्वजो राजा जितो विक्रमभूपतिः । संखध्वजगतं राज्यं विक्रमादित्ये तिष्ठति ॥७॥ ।। इति रामवंशी राज्य ?' ||११४॥ ॥ चतुर्थः सर्गः ॥ ॥ परमारविक्रमवंशः ॥ कृतयुगे बलिर्दाता चेतायां रघुनन्दनः । द्वापरे कर्ण विख्यातः कलिकाले च विक्रमः ॥१॥ दाता सूर दयालश्च परदुःखस्य भंजकः । दिल्लीशविक्रमादित्या उज्जेणीराज्यनायकः ।।२।। शकबंधी महीपाल शाककृत् तत्र भूपतिः । उज्जेणी वसता सम्यग् उद्धसा पुरयोगिनी ॥३॥ स्वल्पा वसति तत्रास्य संकति दुर्जनेन सा। राज्यं कृत्वा इन्द्रप्रस्थे वर्पत्रिनव(९३)संख्यकः ॥४॥ विक्रमादित्यराजेन्द्र पमारो नायक शुभः । प्रथमश्च भवेत् राज्य दिल्लीनाथश्च जायते ॥५॥ पैठानकोटिभूपाला निर्जिता नृपतिस्तदा । शस्त्रशास्त्रप्रभावेन रणे शरो नृपः शुचिः ॥६॥ परसैन्यपरामर्दी जीवन्मुक्ताश्च कोटिशः । चतुर्दशशतान्येव पंचाशप्तानि भारते ॥७॥ शकवंधी भवेद् राजा विक्रमाकों नृपोत्तमः । इष्टसिद्धि भवेत् तस्य स्मसाने निजितं रिपुः ॥ ८॥ योगिनीक्षेत्रपालाश्च सर्व देवा सुखप्रदा। अग्निवेतालवेताल सेवायां च प्रवर्तते ॥९॥ १. प्रति स्व-- इति श्रीइद्रप्रस्थप्रवधे रामशीराज्य वर्ननो नाम तृतीयसर्गः ॥ श्लोक १२२ ॥ १ चतुर्थ सर्ग सिंघासणवत्रीसी च वेतालपचविंशका । पचडातपत्रश्च चरित्र विक्रम शुभं ॥१०॥ तत्कृत यत्न केनापि तद्दत्त येन केनचित् । तत्साधितमसाध्य यदिक्रमार्केण भूभुजा ॥११॥ नृपविक्रमसेनोभूत् वर्षविंशदिनैककं (२००१)। राज्य कृत्वा मही भुक्ता द्वितीयो राज्यनायकः ॥१२॥ असमदपालनृपतिः वर्षपोडश(१६)कस्तथा । मासनववेददिना (१६।९।४) राज्यकृत् तृतीयो नृपः ॥१३॥ विक्रमसेननृपतिः असमंदेन मारितः। पश्चात् राज्य कृत तेन दिल्लीशो भविता भुवि ॥१४॥ चन्द्रपालनृपस्तत्र व कविंशतिर्मितः । अष्टादशदिन (२१।०।१८) राज्य कृतो वेदमितो नृपः ॥१५॥ एकोनविंशतिवर्षमासदिगदिनईश्वरा (१९।१०।११) । सदपालकृत राज्य पंचमो योगिनीपुरे ॥१६॥ देशपालोप्टादशश्च वत्सरा दिनद्वादशः (१८१०।१२)। कृतं राज्य मही भुक्ता पमारो पडसंख्यकः ॥१७॥ नरसिंहपालनृपतिः वर्षसप्तश्च राज्यकृत् (१७1०1०)। दानी मानी धनादयश्च विख्यातः सप्तमो नृपः ॥१८॥ वीरपालनृपस्तत्र वर्पदाविंशसख्यकः । । निमासदिनतत्त्वैश्च (२२।३।२५) राज्यकृत् अष्टमो नृपः ॥१९॥ रामपाल सप्तवर्षरुद्रमासत्रिदिदिना (७१।१३)। कृत राज्य मही भुक्ता नवमो सजको नृपः ॥२०॥ गोविंदपालनृपतिः अष्टविंशतिवत्सरः। मासैकनक्षत्रदिना (२८१२७) कृत राज्य महीतले ॥२१॥ रविवर्षपचमासश्च अष्टाविंशतिका दिना (१२।५।२८)। सत्यपालकृत राज्य रुद्रश्च नृपसिद्धिदः ॥२२॥ तीर्थपालनृपस्तत्र चतुर्दशाश्च वत्सराः। नवमासा दिविशारा (१४।९।२२) राज्य द्वादशसज्ञकः ॥२॥ . - १२] इंद्रप्रस्थप्रबन्धः हरपाल त्रिदशो वर्ष अष्टमास चतुर्दिन (१३३८४)। कृतं राज्यं महामानी संख्या त्रयोदशो नृपः ॥ २४ ॥ भीमपाल ईशवर्षदिगमासत्रिदशोदिनः (११।१०।१३) । कृतं राज्य महीपृष्ठे चतुर्दश नृपोत्तमः ॥ २५ ॥ नृपो मदनपालाख्य वर्षसप्तास्तथा । पट्मासतत्त्वदिवसा (१७।३।२५) राज्यं पंचदश स्मृतः ॥ २६ ॥ कर्मपालनृपस्तत्र वर्षपंचदशस्तथा । द्विमासदिवसास्तत्व (१५/२।२५) कृतं पोडशमं शुभ ॥ २७॥ नृपविक्रमपालाख्य एकोनविंशवत्सरः । ईश्वरोमासत्रिदिन (१९।११।३) क्रियते राज्य मेदिनी ॥२८॥ तिलोकचन्दनृपतिः द्विवर्षविंशतिर्दिनः (२०२०)। महीं भुज्यत छत्रेण अष्टादशमितो नृपः ॥ २९ ॥ विक्रमचन्दनृपतिः वर्षद्वादशसंज्ञकः । सप्तमासकोनविंशदिवसा (१२।७।१९) राज्य भोक्ष्यति ॥ ३० ॥ कमालचन्दनृपतिः द्विवर्षश्च दिनद्वयं (२०१२)। भोक्ष्यति खेकछत्रेण नृपति विंशमो शुभः ॥३१॥ रामचन्द्रनृपस्तत्र वर्षत्रिदश(१३)संज्ञकः । रुद्रमासाष्टदिवसा (१३३१२१८) क्रियते राज्यसत्तमः ॥ ३२ ।। नृपहरघरचंदाख्यः चतुर्दशाश्च वत्सरः । नवमासजिनाहानि (१४।९।२४) द्वाविंशो नृप राज्यकृन् । ३३ ।। कल्याणचन्दनृपतिः वर्षदिगमासपंचक । चतुर्दिनश्च (१०५।४) राज्यं च क्रियते योगिनीपुरे ॥ ३४ ॥ द्विमास षोडशो वर्ष पदिन प्रमितं शुभं (१६।२।६)। राज्ञा श्रीभीमचन्देन भोक्ष्यते योगिनीपुरं ॥ ३६ ।। लोकचन्दनृपः श्रीमान् वर्षषत्रिंशसंज्ञकः । त्रिमासैकदिनश्चैव (३६३१) ह्येकच्छत्रेण भोक्ष्यते ॥ ३६ ।। गोविन्दचन्दनृपतिः एकविंशतिवत्सरः। सप्तमांसकि(क) दिवसा (२११७११२) षइविंशो नृप भोक्ष्यति ॥३७॥ v चतुर्थ सर्ग कुवागोविन्दचदारख्य चक्क राज्यकृच्छुभः (१1०1०)। सप्तविंश नृपः श्रीमान् भोध्यति योगिनीपुर ॥ ३८ ॥ हरपरमनृपस्तत्र सप्तवर्षमासपंचकः । पोडशै दिवसे (७५१६) भोक्ष्यति शक्रपथके ॥ ३९ ॥ गोविन्दपरमो नाम वर्पविंशद्विमासकः। दिनसप्तदशस्तत्र (२०१२।१७) राज्य भोक्ष्यति भूपतिः॥४०॥ भवपरमनामेन तिथिवत्सरराज्यकृत् । माससप्तधृतिदिन (१५६७।१८) त्रिंशमो नृप भोक्ष्यति ॥४१॥ महापरमराजेन्द्र पडूवर्षमाससप्तकः । एकोनविंशदिवसा (६७१२९) भोष्यति एकत्रिंशकः ॥ ४२ ॥ जयसेनधृतिर्वर्षमासपचदिनद्वयं (१८।८।२) । भोक्ष्यति खेकछत्रेण द्वाविंशत्तमभूपतिः ॥ ४३ ॥ मलालसेनेनृपतिः वर्षार्कमाससागर । द्विदिन (१२।४।२) भोक्ष्यते राज्य त्रयत्रिंशत्तमो नृपः ॥४४॥ कपूरसेननृपतिः तिथिवत्सरसज्ञकः । सप्तमासश्च डिदिन (१५।७।२) भोक्ष्यते राज्य मेदिनी ॥ ४५ ॥ मधुसेनमहीपाल ईशवर्षत्रिमासकः। त्रयोदशदिन (११२३३१३) श्चैव ह्येकछत्राणि भोक्ष्यते ॥ ४६ ॥ देवसेनमहीपाल विंशवकमासका। नक्षत्रदिवसस्तत्र (२०११२२७) भोक्ष्यते मेदिनी वरा ॥४७॥ शुभसेन पचचर्प नवाहा दशमासक (५।१०।२) । उवा च भोक्ष्यते राजा सप्तत्रिंश नृपोत्तमः ॥४८॥ नृपजुगपालसेनाख्य वेदवांष्टमासकः । एकविंशदिन (४।८।२१) भोक्ष्य पृथ्वी एत्रिभूपतिः ॥ ४२ ॥ हरसेननृपस्तत्र वर्पढादशसज्ञक. । पचविंशतिदिना (१२।०।२०) स्तन खेकछत्रेण भोक्ष्यते ॥५०॥ १ मलीलसेन (ख) " - १४ ) इंद्रप्रस्थप्रबन्ध रहतसेनाष्टवर्षाणि मासैकादशकस्तथा । दिवसै पंच (८1१११५) भोक्ष्यंते एकछत्रेण मिदिनी ॥५१॥ द्विवर्ष लक्ष्मणसेन द्विमासाष्टदशैदिना (२०१८)। भोक्ष्यति योगिनीपुयाँ राज्यं तत्र मनोहरं ॥५२॥ दामोदरसेननृपः षविंशवत्सरः शुभः । द्विमास एकविंशाहा (२६।।२१) भोक्ष्यति मेदिनी शुभा ॥५३॥ नृपनराइणसेन वर्षाणि ईश्वरै शुभा । मासपंच षोडशाहा (११।५।१६) क्रियते राज्यमुत्तमम् ॥ ५४॥ माधोसिंघनृपस्तत्र वर्षसप्तदशैमितः । मासैकदिवसषभि (१७।१।६) भोक्ष्यते पृथवी शुभा ॥५५॥ अनीसिंघमहाराज वत्सराणि चतुर्दश । मासपंचमितं राज्यं (१४००) करिष्ये' योगिनीपुरे ।। ५६ ॥ राजसिंघः रविवर्ष त्रिमास जिनवासरा (१२।३०२४)। कृतराज्यः धराधीश महीतले मनोहरः ॥ ५७ ॥ नरसिंघः महावीर दिग्वर्ष मास अष्टकः । एकादशदिनास्तत्र (१०८।११) भोक्ष्यते पृथवी वरा ॥५८॥ धनवदसिंहनृपतिः पंचचत्वारि वर्षकः । तिथिर्दिना (४००।१५) भोक्ष्यते च राज्यं सद्योगिनीपुरे ॥१९॥ नृपश्रीजीवनसिघ द्विवर्ष मास अष्टकः। तत्त्वसंख्या दिनास्तत्र (२।८।२५) राज्यकृद् योगिनीपुरे ॥६॥ दिल्लीपति इति म कथितः राज्यनायकः । भोक्ष्यते छत्रधार्य च महापुरमनोहरः॥६१ ।। उदसा शक्रपंथा च जायते तत्र सा धरा । विक्रमादित्यवंशश्च कृतं राज्यं मनोहरं ।। ६२ ।। द्विनवसप्तअंकाश्च(७९२) तत्र राज्यं च भोक्ष्यते । उज्जयिन्यां स्थितास्तत्र इन्द्रप्रस्था वशीकृता ।। ६३॥ १. करिष्येद् २. वनवदसिंघ (ख) .
चतुर्थः सर्गः उसा जायते तन शक्रपया महापुरः । तत्र निहणदेनाम तुंवरक्षत्रियः शुभः॥६॥ सामान्यश्च गृहस्थश्च पुरे तत्र वसेत् सदा। तस्य पुरोधात्मजश्च पुरी वाराणसीं गतः ॥६५॥ पठित ज्योतिप शास्त्र आगम यहवः श्रुत । सरस्वत्याः प्रसादेन महाविद्याधरोऽभवत् ।। ६६ ।। गृहागतः विप्रसुतः शुभेनि शुभवासर। मुहर्त साधित तेन यजमानगृहे गतः ।। ६७॥ भो विल्हणाख्य श्रोतव्यः यहास्य त्वद्गृहे नहि । मया च कुरुते तुभ्य अनगपाल भूपतिः ॥६८॥ त्वदंशे नैव श्रोतव्य कदाचिदपि वाक्यतः । स एव राज्य प्राप्यते मुहर्तस्य प्रभावतः ॥ ६९॥ दिल्लीपुर्या शुभेनि च राजमन्दिर वासयेत् । अभीचसमये तत्र पोल्या च धर धारयेत् ॥ ७० ॥ मप्ततोलकमानेन अंगुल एकविंशति । स्वर्णपील्या च कर्त्तव्य धरा पृष्ठे च धारयेत् ।। ७१ ।। समुहले वेदपाठे च धारयेद् धरणीतले । विक्रमादित्य राज्यात् स दिनवसप्त(७९२)वत्मरे ॥७२ ।। वैशाग्वमासे रम्ये च कृष्णपक्षे मनोहरे। प्रयोदश्या तिधौस्तत्र अभीच माधित शुभ ॥ ७३ ।। च्याम श्रीजगजोताख्यः अनगपाल तुवर । दिल्लीराज्य च शुभेऽनि दत्त च वेद विमयित् ॥७४ ॥ सा सिल्ली शेपनागस्य गिरसि क्षुभिता शुभा।' तदा व्यास वचं पक्ति राज्य च अचल भवेत् ॥७॥ त्वत्कृले मर्वदा राज्य स्थास्यति भुरि महले। दान र यहवस्तर दत्त न्यासस्य भूपनि ।। ७६ ॥ १ सिरे सा शुमिल।
१६]
इंद्रप्रस्थप्रबन्धः
आशीर्वाद तदा दत्तं चिरं जीव नृपोत्तमः ।
चिरं तव प्रभावोऽस्मिन् चिरं पालय मेदिनीम् ॥ ७७ ॥
दान मान कृतं तत्र स विप्रः स्वगृहे गतः।
क्षेत्राधिपश्च ये देवाः बुद्धिभ्रष्टं च कारयेत् ॥७८ ॥
अनंगपाल नृपतिः खिल्या उत्पादिता वराः ।
रक्ता भ्रताचरा क्षिल्ल्या:(?) स्वदृष्टया चैव पश्यति ॥७९ ।।
तदा मति तुंवरस्य चलिता विप्रवाक्यतः ।
आहृय पुनः विप्रस्य कथितं वृत्तान्तपूर्वकम् ॥ ८० ॥
तत्र किंक्रियते विप्रः त्वद्वाक्यस्य प्रमाणतः ।
मया हृता वुद्धिः भ्रष्टा खिल्लिका दिल्लिका कृता ॥ ८१ ॥
दिल्ली दिल्ली इति नाम पतिता पृथिवीतले ।
तदा व्यासो वचो वक्ति शृणु तुंवरभूपतिः ॥ ८२ ॥
अनंगपाल नृपति यद्बुद्ध्या त्वया कृता।
सा वुद्धि श्रेयसी नास्ति पुनः सा धरधारिता ॥ ८३ ॥
एकोनविंशत्यंगुल्या धरा पीठे गता शुभा ।
तदा व्यासो वचो वक्ति स्थास्यं एकोनविंशतिः ।। ८४ ॥
त्वहंशे वर्तते राजा स्थास्यंति पृथवीपतिः ।
आगमस्य प्रमाणेन वचनं कथितं वरं ।। ८५ ॥
तुंवरात् चहूआणश्च पठाणा मुद्गला वरा ।
लोदी च कच्छा सेषाश्च पुनश्च चकथा मता ।। ८६ ॥
स्थास्यति म्लेच्छा मेदिन्यां पश्चात् राजा भविष्यति ।
मांडवे सर्वम्लेच्छाश्च क्षयं यास्यति संगरात् ।। ८७ ॥
राइवंशा नृपास्तत्र भविष्यति च मेदिनी।
योगिनीपुरराज्यश्री भोक्ष्यति धेकछत्रतः ॥ ८८॥
सीसोद्या नृपतिस्तत्र.इन्द्रप्रस्थे भविष्यति ।
पुनः म्लेच्छा भविष्यन्ति दिल्यां च प्रवरे पुरे ॥ ८९॥
पंचमः सर्ग रे तुवर लोकवाक्यषट्पद - अनगपाल चकुवै(ववै)सति जोड सीउ कीली। मति हीण करी किल्ली तै ढिल्ली। कहै व्यास जगजोति अंग आगम हजाणुं । तुवर ते चहृवाण पुन्न होसी तुरकाणौ । माडव निकद दिल्ली धरा, एक राव जीव जगवै। नवसत अत मेवाड पति, एकछत्र महि भोगवै ॥१०॥ शतनवमिता संख्या पुनः सप्तश्च सयुता। अधिमासयुता मध्ये शाक विक्रमकालतः ॥९१ ।। तुंवरः स्थापितः सोऽपि अधिमासयुता अपि । योजनीया तदा तत्र म्लेच्छातो राज्य यास्यति ॥९२ ॥ ॥ इति परमारः २०६॥ । पचम सर्ग ॥ ॥ अथ तुवरः॥ एकोनविंशति राजा त्वत्कुले स्थास्यति नृपः। अनगपाले नृपतिः ढिल्या राजपतिर्भवेत् ॥१॥ आदौ विन्हणेदे नामः वर्ष एकोनविंशतिः । पचमासश्च त्रिदिन अष्टादशघटी (१९।०३।१८) मित ॥२॥ गंगेव नृपति वर्ष एकविंशति(त्रि)मासकः। त्रिदिनाष्टघटीसख्या (२।३।२८) राज्यकृद् योगिनीपुरे ॥३॥ एकोनविंशवर्षाणि दिना एकोनविंशतिः । मास षटू ईशघटिका (१९।१९।६।११) पृथकुँ राज्यकृद् भुवि ॥४॥ सहदेवें विशवर्षाणि सप्तमास तिथिर्घटी। नक्षत्रसख्या दिवसा (२०७१२७४१७)योगिनीपुरराज्यकृत् ।।५।। तिथिसख्या च वर्षाणि त्रिमासाष्टदिनैस्तथा । विघटी श्रीयुतैयुत (१५॥३॥८॥३) राज्यकृद् योगिनीपुरे ॥ ६ ॥ १ इति श्रीदप्रत्यप्रबधे पमारराज्यवर्ननो नाम चतुर्थ सर्ग ॥४॥ (ख)
१८ ]
इंद्रप्रस्थप्रबन्धः
वर्पचतुर्दश मासचत्वारि दिवसा नव ।
घटा नवमितं (१४।४।९।९) राज्यं नृप कुन्दयुतः कृतं । ७॥
नरपाल माससप्त वर्षपविशतिस्तथा ।
ईशाहा विंशघटिका (२६७।११।२०) राज्यकृत् सप्तमों नृपः ।।८।।
वत्सराज एकविंश वर्ष मासद्धयं तथा ।
त्रिदशाहा ईशघटचा (२१।२।१३।११) कृतं राज्यं मही मुदा ॥९॥
एकविंशतिवाणि मासपट् दिनपंचकः ।
ईशघट्था वीरपाले (२०६ावा११) राज्यकृत् योगिनीपुरे ॥१०॥
विंशवर्ष वेदमास वेदाहाय्घटी (२०१४।४।८) मता।
गोपाल नृपतिस्तत्र भोक्ष्यति पृथवी शुभा ॥११॥
तोहणे नाम नृपतिः धृतिवर्ष त्रिमासकः ।
पंचाहाष्टघटी (१८।३।५।८) तुल्य राजा रुद्रमितोऽभवत् ।। १२ ।।
जुलखरी विंशतिवर्षा दिगमास दिवसादयः(श)
षोडशघटिका वाच्या (२०११।१०।१६) नृप द्वादशसंज्ञकः ।।१।।
क्रमात् पोडशवर्षाणि वेदमास दिनत्रयं ।
घटचेक (२१।४।३।१) तसवरी नाम राज्यकृद् योगिनीपुरे ॥ १४ ॥
राजा कवरपॉलाख्यः एकविंशतिवत्सरः।
त्रिमास रुद्रदिवसाष्टघटी (२१॥३।११८) भोक्ष्यते मही ॥१५॥
अनंगपाले नृपतिः वर्ष एकोनविंशतिः ।
षड्मास धृतिदिवसा दिगघटी (१९।६।१८।१०)भुविभोक्ष्यते॥१६॥
तेजपौलश्च मासैक जिनवर्षश्च पदिनाः।
एकादशघटीमान (२४।१०।११) ह्येकछत्रेण भोक्ष्यति ।। १७॥
मोहॉल तिथि वर्ष त्रिमास ईश्वरा घटी।
दिवसा सप्तदश ख्याता(१वा।१७।११)मही भोक्ष्यति सो नृपः।।१८
स्कंदपोलाख्य नृपः नवमासार्कवास(वत्सरः।
षोडशाहा च (१२।९।१६।०) भोक्ष्यति महावलपराक्रमात् ॥१९॥
तुंवरपृथीराजाख्यः जिनवर्ष त्रिमासकः ।
षदिना सप्नदशक(२४।३।३।१७)घटिका महि भोक्ष्यति ॥२०॥
पष्ठ सर्ग, - एकोनविंश नृपतिः तुंवराणा कुले भवेत् । पुनश्च पृथीराजाख्यः भुवि मध्ये च वर्त्तते ॥२१॥ अजमेरात् गतस्तत्र चहूआंण नृपसत्तमः । । राजा वीसलदेनामः कुरुक्षेत्रे च आगतः ॥२२॥ वीसल-पृथीराजाख्यः समर च कृत बहुः । लक्षैकसंख्या सेन्या च एकपष्टिसहस्रकः(१६१०००) ।। २३ ।। पृथीराजस्य पाइर्वे च सेन्या च वर्तते तदा । चत्वारिंशत्सहस्राणि(४००००)चहआणा सेन्यया शुभा ॥२४॥ संग्राम च कृतं तन्न अतीच कुरुक्षेत्रके । लक्षसेन्या च पतिता तुवरो पतितो भुवि ॥ २५॥ अन्ये सर्व नृपा नष्टाः चहआण जितो नृपः। आगतस्तत्र ढिल्या च छत्र च धारित मुदा ॥ २६ ॥ ।। इति तुवरवश-राज्य ।। २३२॥' ॥ षष्ठ सर्ग ॥ अथ चहूआणः ॥ आदौ वीसलदेनाम रसवपैंकमासक । वेदाहा वेदघट्या च ( ६४) प्रथम राज्य वर्तते ॥१॥ गगेव पंचवर्षाणि दिमास त्रिदनस्तथा । एकादशघटीमान (दा२।३।११) द्वितीयो मही भुज्यते ॥२॥ पहाडी अष्टवर्षाणि मासैक दिनपचक। घटी एकमितं (८९१) राज्य तृतीयः कुरुते भुवि ॥३॥ स्यामसु सप्तवाणि वेदमास दिनदय । घव्यष्टमानमित्याहुः (७४।२।८) चतुर्थ नृप राजते ॥४॥ विहाडी वेदवर्षाणि वेदमास दिनाष्टक (१४८०)। घेकछत्रेण पृथवी भुज्यते पचमो नृपः ॥५॥ 1 इति श्रीइन्द्रप्रस्थप्रबधे तुवरराज्यवर्णनो नाम पचम सग ॥ (ख) २० ] . इंद्रप्रस्थप्रवन्धः गंगेव वहनिवर्षाणि मासक दिनपंचक । ईश्वरघटिकामानं (३।१५।११) पट्संख्य नृप राजते ।। ६ ।। पृथीराज महीपाल क्रमात् पोडशवत्सरः। एकविंशदिन स्तन मासक घटिकात्रयं (१३।१।२१।३) ॥७॥ पृथीराजस्य सेन्यायां सामंत षोडश स्मृतः । शत(१००)सूर महावीर्यः अन्यसेन्या स्थिता बहुः ॥ ८॥ कनवजस्थितराज श्रीजयचंद नृपोत्तमः । तत्पुत्री अतिरूपा च नाम संयोगिता वराः ॥९॥ अतिवलेन सा नीता सूरसामंतयोगतः । राष्ट्रवंशनृपस्तत्र जयचंद जितो न सः ॥१०॥ अतीवरूपा सा नारी किनरीव सची मता। वशीभूत स्थितस्तत्र गृहमध्ये वसेत् सदा ॥११॥ मासैः पंचदशै(१५)स्तत्र नागतो च गृहाद् बहिः । संयोगितासह प्रीतिः भोगं भुज्यति स नृपः ।।१२॥ वणिज् संकरनामाख्यकृतं च मनचिन्तितं । सूरसांवत सर्वेपि चिन्तावान् जायते तदा ॥१३॥ सूर सांवत मिलिता चिन्तामग्ना सदैव हि । एकेन दिवसे तत्र मारितं संकरस्य च ॥ १४ ॥ मृतं संकरदासं च पूर्वकर्मप्रसादतः। न गतिर्जायते तस्य स राज्ञा श्रूयते नहि ॥ १५ ॥ संकरात्मजसीहाख्यः कृतं गुप्तनिमंत्रिणं । नष्टः स चार्द्धरात्रेण परिवारसमन्वितं ॥१६॥ सेठौलान महाग्रामे परिवार धृतं मुदा। गतं स गजनीपुर्या साहाये कथितं तदा ॥ १७॥ त्वं सर्वत्र धराधीश महावलपराक्रमी । यदि इच्छसि त्वं राज्यं दिल्ली पुर्या नृपोत्तमः ।।१८।। तदा गच्छसि त्वं शीघ्रं प्राप्यसि राज्यमुत्तमम् । स्त्रीवशेन पृथीराज भवतीह न संशयः ॥१९॥ - सप्तमः सर्ग [२१ पठान गजनी गौरी चलितो गजिनीपुरात् । योगिनीपुरपार्वे च सेन्या सह स आगतः ॥ २० ॥ चत्वारिंशत एकयुक्तः सहस्र परिकीर्तितः । शतसप्तयुतस्तत्र पुनश्च व्यसप्तति (४१७७२) ॥२१॥ एताश्वासह आगत्य संग्राम च कृत बहु । सूरसावत सर्वेपि समर तत्र कारयेत् ॥ २२ ॥ वर्ष चत्वारि प्रमित समर तत्र जायते । पृथीराजो न जानाति युद्धं च अतिदारुण ॥ २३ ॥ सूरसावतसेन्या च बहु पतिता तस्य च । पृथीराज घराधीश पठानेन गृहीतवान् ॥ २४ ॥ चहआणपृथीराजस्य ढिल्लीराज्य तदा गतं । म्लेच्छराज इन्द्रप्रस्थे भविष्यत्तत्र योगतः ॥२५॥ ॥ इति चहूआणवशः ।। २५७॥ ॥ सप्तम सर्ग ॥ ॥ अथ पठान वा मुगलः ॥ विक्रमात् सप्तद्वि(न्धि?)बैक (१२२७(४८१)) वर्षे च प्रवरे वरे । चैत्रकृष्णत्रयोदश्या म्लेच्छराज्य च जायते ॥१॥ आदौ च गजनीगोरी वर्पसंख्या चतुर्दश। वाणमास त्यष्टिदिना घटिका च त्रयोदश(१४।५।१७।१३) ॥२॥ वर्षत्रय मासमेक त्रयोदशदिन तथा । घटीपचमित राज्य (३२१११३५) समसदीन फुर्वती ॥३॥ वर्पविंश निमास च दिनसप्त भमिता घटी (२०१३।७।२७)। कुतयदीनकृत राज्य तृतीयो योगिनीपुरे ॥४॥ एकत्रिंशत्मित वर्ष त्रिमास दिनदिगमित । एकोनविंशतिघटी (३२२१०।१९) पेरोजस्याह राज्यकृत् ॥ २० ॥ १ इति श्रीदप्रस्थप्रपथ चहवाणराज्यवर्ननो नाम षष्ठ सर्ग ॥ (ख) २२] इंद्रप्रस्थप्रबन्धः त्रयवर्ष द्वयं मासं एकादशदिनं तथा । एकविंशघटीमानं (३।२।११।२१) अमृतसाहि राजते ।। ६ ॥ एकत्रिंशमितं वर्ष मासपटू दिवसककं । भमितं घटिका (३शक्षाश२७) राज्यं अलावदीन भोक्षते ॥७॥ एकविंशति वाणि पंचाहा भमिता घटी (२१।०५।२७)। मिसरदीन कृतं राज्यं सप्तमो योगिनीपुरे ॥ ८ ॥ एकविंशति वर्षाणि षण्मास दिनमेककं । ऋक्षसंख्या घटी (२१।६।१।२७) राज्यं गयासीन कृद्भुवि ॥९॥ पुरसमसदीनाख्य चर्षक मासपमितं । तिथ्याहर्कघटीमानं (१६।१।१२) नवमो राज्य भोक्ष्यति ॥१०॥ जलालदीन षड्वर्प पड्मास षदिनस्तथा । घटिका दिग्मिता(६६।६।१०)स्तत्र राज्यकृद् योगिनीपुरे ॥११॥ रुकन्दीनाख्य षड्मास त्रयोदशदिनावधि । घटिका षड्मिता(०६।१३।६)राज्यं एकादशमितो नृपः ॥१२॥ आलादीन जलावदीन वर्ष एकोनविंशतिः । त्रिमास दिनतिथ्याश्च घटी.एकादश(१९।३।१५।११)स्मृताः॥१३॥ जंबूद्वीपे च बहुले मर्यादा च कृता बहु । आज्ञाकारि कृता राजा समरे दुर्जयो महा ॥ १४ ॥ सहस्रत्रय संख्या(३०००)च महीपाला सैन्यनायकः । एकचत्वारि एकश्च(१४१)गढाधीश नृप स्थिता ।। १५ ।। मार्ग सुचालितं तेन गढाधीशवरा नृपाः। लोभाधिक्यलावदीनः क्षमावान् नहि सर्वदा ॥१६॥ अलादीनलावदीन समुद्रसाधनार्थ सः। गतं समुद्रमध्ये च पुन स आगतो नहि ॥ १७॥ तस्यात्मज पूर्णभाग्य सुलतानअलावदी। राज्य स्थापितवान् सर्व मिलिता भूपतिर्वरा ॥१८॥ वर्षषड् मासषट्कं च दिनाष्ट घटीष्टकं (१६८८)। कृत राज्य सुलतानेन त्रयोदश नृपोत्तमः ।। १९ ।। ..
'सप्तम सर्ग
अन
.
.
सुलतान अलावदीन अपुत्रो जायते तदा ।
लघुभ्रातृ कुतनदीन राज्यस्थापितवान् तदा ॥२० ।।
स्थानस्था ये गढाधीशा आज्ञा च नहि मानिता ।
में चतुर्दिश स्थिता भूपा स्वस्वराज्य प्रकुर्वति ॥ २१ ॥
ये दुर्मदा नृपास्तत्र नागतास्तत्र सन्निधौ ।
शतकोश(१००)समीपे सा कस्मिन् कस्मिन् प्रमाणकृत् ॥ २२ ॥
केचित् वाक्य इति ब्रूयात् पठानो मुगलस्तथा ।
शेप अन्येपि म्लेच्छा सद्वला राज्य कुर्वति ।। २३ ।।
एकादशमिता सख्या राज्यकृद् योगिनीपुर।
॥ २४॥
विक्रमात् त्रिनवत्रयोदश (१३९३) ।
राज्य स्थापित स च म्लेच्छनायकः ॥ २५ ॥
आदौ कुतबदीनारय वेदवर्ष हिमासकः ।
दिदिना रुद्रघटिका (४।२।१०।११) योगिनीपुरराज्यकृत् ॥२६॥
गरासदीनाख्य नृपः अधिवर्षाधिमासकः ।
एकादश दिनास्तत्र घटी एकोनविंशति (४१२१९)॥२७॥
महमदहठीनाम सप्तविंशति यत्सरः।
त्रिमामश्च तिथिदिना सप्तसरया घटी(२७३।१५७)मिता ॥२८॥
मासपच त्रिदिवस नाडिका सप्तभिर्मिता (101३७)।-
{ " तुगलसाहिं नामा च चतुर्थ राज्यनायकः ।। २९ ।।
सार्द्धषण्मास सख्या च घटी पचदशस्तथा (०६।१०।१५)(१) ।
पवकसाहित्पति पचमः स धराधिपः ॥३०॥
नृपो दौलिनग्यानारायः सप्नवकमासकः ।
धृतिदिनैकघदया च (७१२१८३१) सय्या रसमितो भवेत् ॥ ३१॥
अष्टवर्पाष्टमासश्च दिना धृति घटीद्वय (८1८1१८२)।
कृतः खिजरखानाख्य सप्तमः म्लेच्छनायकः ॥ ३२॥
रुड़वश्वरामामः दिवमा एकोनविंशतिः ।
घटीदशमित राज्य (११।११।११।१०) पानममारस शुमः॥ ३३ ॥
२४ ] चंद्रप्रस्थप्रबन्ध नृप महममदसाहि रविवकमासकः । दिनेक सप्तघटिका (१२।१।१७) नवमो राज्यनायकः ॥ ३४ ॥ अलावरदीखांन संज्ञो त्रिमास दिवसा दया । नवसंख्याघटी (०।३।१०।२) तत्र राज्यकृद्योगिनीपुरे ।। ३५॥ एकस्मिन् समये तत्र श्रीमल्लाभपुरे वरे । अकस्मात् शिवरूपेण कर्मयोगेन आगतः ॥३६॥ लोदीगृहे गतः सोऽपि लोदी भक्ति कृता बहुः । तुष्टमानवचं ब्रूयात् शृणु त्वं म्लेच्छनायक ।। ३७ ।। तुष्टमाने मया दत्तं राज्यं वंशचतुष्टयम् । इंद्रप्रस्थपुरीमध्ये राज्यनायक त्वं भव ॥ ३८॥ इदं वचनं संभाप्य सं(स)योगी अतरिष्यभूत् । न दृष्टः स पुन योगी तदा वाक्य प्रमाणकृत् ।। ३९॥ अजीनअलावदी नाम लोदी मनसि चिन्तितं । सप्तदशशतस्तत्र पंचाशीतिश्च (१७८५) संज्ञकः॥४०॥ सेन्या च संख्या संजाता आगतो योगिनीपुरे । अलावरदी नृपः सोऽपि एकस्मिन, दिवसे ततः ॥४१॥ नगराद् यहि आगत्यः कृतमाखेटकं शुभं । अकस्मात् आगतो लोदी संग्रामस्तत्र जायते ॥४२॥ न ज्ञातं कपटस्तत्र भग्ना सेन्या पुरं दिसि । एकषष्टिसहस्राणि (६१०००) संख्या सैन्या पलायिताः॥४३॥ पठानं मारितं तत्र जितो लोदी महाबली । गतं राज्यं पठानस्य लोदी राज्यं प्रवर्तते ॥४४॥ ॥ इति पठानवंशराज्यः ।। ३०१॥' १. स. इति पठानराज्यवर्णनो नाम सप्तमः सर्गः ।
अष्टम सर्ग [२५. ॥ अष्टम सर्ग ॥ ॥ अथ लोदी॥ अजीत अलावढीस्तत्र चर्प सप्तदश स्मृतः। मासैक दिवसाष्टौ च (१७।१।८।०) राज्यकृत् प्रथमो नृपः ॥१॥ श्रीवहगे(डोलपास्तत्र त्रिवर्षश्च द्विमासकः। नवाहा पच घटिका (१२।२०) द्वितीयो म्लेचराज्यपः॥२॥ साहिसिफारचैव चर्प अष्टादश स्मृतः। मासक पट्दिनस्तत्र पटिकैका (१८।१।६।१) च राज्यकृत् ॥३॥ श्रीवीरमखास्तत्र वपैक (१1०1०1०) राज्यकृद् मुदा । योगिनीपुरमध्ये च लोदी चत्वारि सजकः ॥४॥ एकस्मिन् दिवसे तत्र गजनी नाम महापुरी । चकत्या वसति(वशज)स्तत्र नामा तिमिरलिंगा ॥५॥ छागछागी च वह्व. गृहे तिष्ठति सर्वदा । शतवेद(४००)मिता सख्या वर्तते च गृहांगणे ॥६॥ तत्र पुर्या च सदाा भवतीह चतुप्पथे। म्लेच्छरूपेण भिक्षुः स मुखे सभापित इद ॥७॥ अर्द्धसेरममाणेन भ्रगीना च जल शुभ । घृतसक्करसंयुक्तं रोटिका यः प्रदापयेत् ॥ ८॥ तस्याह दीयते राज्य मान पड्वशक शुभ । दिल्लीपति करिष्येह नात्र कार्या विचारणा ॥२॥ प्रभातममयादक्ति न दत्त केनचित् तदा । स एव तिमिरोलिंग वनाद् गृहे समागतः ॥१०॥ माता सहश्च कथितं वचनं भिक्षुकस्य च । माना आज्ञां च कृत्वान् मामग्री सहितो गतः ॥११॥ धृत भिक्षुमुग्यस्याग्रे भुक्तं च शुभयोगतः। तुष्टमान यच वक्ति दत्त राज्यादिवशकः ॥ १२ ॥ - २६] इंद्रप्रस्थप्रवन्धः भिक्षु अदृश्यतां याति चकत्था स गृहागतः । छागछागी च विक्रीता अश्चाश्च किंकराः कृताः ॥ १३ ॥ नित्यैक दिकला तस्य वईते च दिने दिने । सेना च तत्र संजाता चकत्थानां समीपके ॥ १४ ॥ पंचविंशसहस्राणि तथा पंचशतानि च । द्विपंचासन्मिता(२०५५२)संख्या आगतो योगिनीपुरे ॥ १५ ॥ संग्रामं च कृतं तत्र संख्या एकोनविंशतिः । मृतो वीरमखास्तत्र जितो तिमिलिंगकः ॥ १६ ॥ ॥ इति लोदीवंशः ॥ ३१७ ॥ ॥ नवमः सर्गः ॥ ॥ अथ चकत्था । विक्रमसमयात्तत्र त्रिपंचपंचचन्द्रमा (१५५३)। वैशाखमासे रम्ये च कृष्णपक्षे त्रयोदशी ॥१॥ दिल्ली नाम महापुर्या चकत्या राज्यनायकः । आदौ राज्यकृतस्तत्र पराक्रमसमन्वितः ॥२॥ आदिः तिमिरलिंगाख्यः वर्ष पंचदशस्तथा। मासैक पंचदिवसः घट्यष्टकमिदं नराः(तदा) (१५।११५१८) ॥३॥ द्वितीयो ववरो नाम पंचविंशतिवत्सरः । पंचमास द्विविंशाहा द्वाविंशतिघटी (२०१५।२२।२२) मता॥४॥ समर्थसागर सोपि ज्ञानवान् स विचक्षणः । महावली मतीश्रेष्ठो योगिनीपुरमंडले ॥५॥ हिमाऊ नामतस्तस्य पुत्रो विजयकृद् वशी। गोडपर्यंतराज्यश्री दाता (भोक्ता) समरदुर्जयः ॥ ६ ॥ हमाऊ वर्ष चत्वारि मास पंच दिनत्रयं । त्रिघटी च मिता संख्या (४।५।२३) आदौ च राज्यकृद् मुदा ॥७॥ १. इति श्रीइद्रप्रस्थप्रवधे लोदीवशराज्यवर्णनो नाम अष्टम. सर्गः (ख)। -
दशम सर्ग
[ २७
एकदा कर्मयोगेन शेस पूर्वदिशि स्थितः ।
आगतश्च महापूर्या बलात् राज्य गृहीतवान् ॥८॥
चकत्या सगतास्तत्र वलम्वनाम पुरे चरे ।
तस्याधिप. स गजनी परिवारश्च रक्षितः ॥९॥
तत्र जलाल संजातः जन्म च गजनीपुरे ।
राज्यश्च क्रियते शेस ढिल्लीपुर्या स उत्तमः ॥१०॥
॥ इति चकत्थाः ॥३२७ ॥
॥ दशम सर्ग ॥
॥ अथ शेखाः॥
पड्वर्पश्च अलासाहि मासक दिवसा नव ।
त्रयोदश घटी मान (६।१।९।१३) प्रथमो शेख राज्यकृत् ॥१॥
सलेमसाहाख्य नृपः सप्तवर्ष दिनाष्टकः ।
मास पच ग्रघटी(७1८1८1१)द्वितीयो म्लेच्छ राज्यकृत् ॥२॥
पीरोजसाहि पण्मास त्रिदिन घटिका नव(०६।३।९)।
सेरसाहि दशानि च घटी सप्त(०1०1१०७)प्रमाणकः ॥३॥
अलीमहम्मद सोपि विधुवकमासकः ।
त्रयोदश दिनास्तत्र(१।१।१३।०)राज्यकृत् पचमो नृपः
चलम्वस्याधिपस्याग्रे हमाऊ वाक्यमब्रवीत् ।
त्वदाजा च मया दिल्या पा(या)स्यति पृथवीपते ॥८॥
सहस्राणि द्विचत्वारि(४२०००)सेना दत्ता धराधिपः ।
सग्राम च कृत तत्र इन्द्रप्रस्थपुरे बहिः ॥६॥
भलीमहमदो नाम मृतस्तत्रैव सगरे ।
जितो हमाऊ नृपतिः दिल्लीपुर्या ततो गतः ॥७॥
॥ इति शेखबशराज्यम् ।। ३३४॥
१ इति श्रीइद्रप्रस्थप्राधे चक्त्ताराज्यप्रपमरर्णनो नाम नवम गर्ग । (ख)
२ इति श्रीइदस्यप्रवथे शेपराज्यवर्णनो नाम दशम सर्ग (च)
॥४॥
२८ ]
इंद्रप्रस्थप्रवन्धः
॥ एकादशः सर्गः ॥
। पुनः चकनाः ॥
वक मास पंचश्च त्रयोचिंगति बामरा (शमा२३।०) ।
हमाऊ च कृतं राज्यं इन्द्रप्रस्थ पुरे वरे ॥१॥
इसरज्ञाति- बणिक हेमूनामश्च राज्यकृत् ।
पंच मास दिन सप्त (०१५।७।०) योगिनीपुरमध्यगः ॥२॥
गतो वाक्यश्च गजनी- राज्यकृत वणिको वरः ।
आगतो च जलालाख्यः अकवर संज्ञको नृपः ॥३॥
विक्रमसमयात् त्र्येक पोडश(१६१३)संख्यक वत्मरः ।
मासफाल्गुनकृष्णस्य पक्ष तिथि त्रयोदशी ॥ ४ ॥
राज्यं स्थापितवान् तत्र महायल पराक्रमी।
विक्रमान्धि बिपट् चैके(१६२४) चित्रकूटपुरे गतः॥५॥
जलाल मापतिर्भावि अर्कलब्धवरोत्तमः ।
व्यासवाक्यरुचिः श्चेमा(श्रीमान् ) दयालुरवनिपतिः ॥६॥
गोविप्रे न भवेत् पीडा कसा(ला)वपि न पापकृत् ।
गंगायमुनयोः प्रीतिकारी कारुण्यसागरः ॥७॥
अगम्यागम्यध्वंसी च धनधान्यसमृद्धिवान् ।
जलालस्य शुभे राज्ये दुःखिता न च मेदिनी ॥ ८॥
गोपाचल-चित्रकटे संग्रह क्रियते नरैः ।
स जलालः चित्रकूटे दिल्याः चैव गतो द्रुतं ॥ ९ ॥
विक्रमात् षनिषट चैके(१९३६) चित्रकूटपुरं जितः ।
स्थापितं तत्र राज्यं स्वं ढिल्लीपुरे स आगतः ॥ १० ॥
अकव्वरजलालस्याष्टकचत्वारि वत्सराः।
नवमासैकदिवस विघटी(४८।९।१।२)राज्यकृद् धरा ॥ ११ ॥
द्विविंशतिश्च वर्षाणि मासमेक दिनत्रयम् (२२।१।३।०)।
जहांगीर कृतं राज्यं धरापृष्ठे मनोहरः ॥ १२॥
एकादश सर्ग [२९ वर्ष द्वात्रिंशतश्चैव मास सप्त ऋतुर्दिना । त्रिघटी(३२।७३) च साहिजिहा राज्य कृत धरणीतले ॥१३॥ अवरगसाहि नामाख्यः वर्षाणि नववेद कृत् । नवमासश्च भदिन(४९।९।२७० राज्य कृत् योगिनीपुरे ॥१४॥ महामानी बली सूर याक्यनिर्वाहकारकः । अवरगासाहि नामा च यवनो स कलौ युगे ॥ १५ ॥ विक्रमसमयात् त्रिपट उपरि सप्तदश स्मृत (१७३६)। मासि फाल्गुनामावास्या गतो च परलोक सः ॥१६॥ सप्तवशभवा सिद्धि यद्दत्त भिक्षुरूपिणा । चकत्ता'म कृतस्तत्र राज्य च योगिनीपुरे ॥ १७॥ । अष्टम आलमारयश्च भविता जगतीतले । न गतो इन्द्रप्रस्थं च न भवेत् राज्यनायकः ॥१८॥ दक्षिणादागता म्लेच्छा सग्राम च कृत यह । स म्लेच्छ जितवान् पूर्वः पश्चात् दक्षिणदिग्गतः ॥१९॥ आगतो मयदेशे च स देश उद्वसीकृतः। उपद्रवयुता तत्र सर्वत्राभूदु वसुन्धरा ॥ २० ॥ कोश विंशतिप्रमाणेन ग्राम एको न दृश्यते । ॥२१॥ अग्निप्रज्वालिन ग्राम स्थाने स्थानेषु मडले । गतेन चलितो मार्ग दुर्भिक्षे बहवो मृताः ॥२२॥ क्वचिन् तृषामृता लोका क्षुधया चैव पीडिताः। नरनारी गवाश्चाद्या स्थाने स्थाने क्षय गताः ॥२३॥ बहादर इति नाम विख्याताः भविता भुवि । यास्यति दक्षिणे देशे तत्र स्थाने मार्गणे ॥ २४ ।। सर्वे नृपा च बहवः आगताः स्वगृहे सकृत् । स्वस्वपुर च भ्रातृस्व सर्व एकत्र जायते ॥२५॥ बहादराख्ययवनः कुटुम्बसरितस्तदा। मृतो दक्षिणमध्ये च ईदृशी भविनव्यता ॥२६॥ ।
३० ] . इंद्रप्रस्थप्रबन्धः बहादरस्य च वर्ष मासैक दिन सप्नकं । कृतं च स्वल्पगज्यं च अष्टम नृपनामभाक् ॥ २७ ॥' सप्तमास दिनं सप्त नष्ट राज्यं भविष्यति। न कोऽपि इन्द्रप्रस्थे च यवनो राज्यनायकः ॥ २८ ॥ व्यासवाक्यप्रमाणेन मांडवे दक्षिणे मृताः । यवना दुर्मदा दुष्टाः पापिष्टाश्च क्षयं गताः ।। २२ ।। पश्चात् उत्पद्यते चैव अंतरिक्षत(?न)रो वरः । भोक्ष्यते ह्येकछत्रेण पट्वर्षाणि दिनत्रयम् ॥ ३० ॥ वहादर पंच वर्ष द्विमास दिन सप्तकम् । कृतं पुरी विना राज्यं योगिनीपुर नामतः ।। ३१ ॥ पश्चात् साहिजिहांदार वक मास इंदुभाक् । त्रिदिनं राज्यसंख्या च भवतीह न संसय ॥ ३२॥ ४ ।। इति चकत्ता-वंशः ।। ३६६ ।। १. ख का श्लोक ६४ । २. ख का लोक ६५ । ४. ख का श्लोक ५९ । ५. ख का श्लोक ६० । ३. ख का कोक ६६ ।
परिशिष्ट [१ परिशिष्ट क प्रति के श्लोक के बाद ख प्रति में ये श्लोक और हैं नवरंगसाहिसमयात् युद्धसत्या च कथ्यते । भविष्यति युद्धमध्ये यश चत्वारि तत्र च ॥ २७ ॥ अथातः विक्रमनृपात् विपट्सप्तचद्रमा (१७६३) । फाल्गुनकृष्णपक्षात् सयुद्धसख्या महीतले ॥२८॥ प्रथमः दक्षिणदेशे भविता यवनाधिपः । द्वितीयः पूर्वमध्ये च पुरे च धवले शुभः ॥ २९॥ रेवे(बै राडदेशे तृतीयः मुथराया समीपके । देवकन्यापुरीपाचे पचमः स प्रकीर्तितः ॥३०॥ सभरावतीमध्ये च पटसंख्यः समरः स्मृतः। कामावतीपुरीपाघे सप्तमश्च उदाहृतः ।। ३१ ।। अष्टमो सभरिसरे पुनः कामावती पुरी। इद्रप्रस्थात् योजन पट् युद्ध पच्छिम जायते ॥ ३२ ।। ततो ढियोजने तत्र पुनः सग्राम कृत् भुवि । दक्खिणे चैव सग्रामस्तत्र च महतो भवेत् ॥३३॥ फुरुक्षेत्रे मरचैव इद्रप्रस्थपुरीमपि । अर्गलारय पुरे तत्र भविता युद्धसमतः ॥ ३४ ॥ भवेत्स मरुधरे खंडे सग्रामत्रयसबलात् । वैराटपुरतः त्रयस्थयोजनश्च तदा भवेत् ॥ ३० ॥ कुशवशभवा राजाः बुद्धिभ्रष्टात् न जीतयेत् । पुनः दक्विणयोर्मध्ये पुन. कामावती चु(पु)री ॥३६ ।। पुनः अम्यावतोपुर्या युद्धव्य भविष्यति । मैदपाटे मद्देशे युद्ध चत्वारि जायते ॥ ३७॥ श्रीमल्लामपुरे रम्य अतीवयुद्धकृद् व्य ॥ ३८॥' १ एक पक्कि नहीं है।
३२] इंद्रप्रस्थप्रवन्धः पुनः संभरितो युग्मयोजनं उत्तरादिभिः । संग्रामवयसद्धीर्यों भविता नत्र भूपतिः ।। ३१॥ पुनः अम्बावतीपुर्याः योजनाष्टक कृणगः । दशयोजनपूर्वश्च युदय भविष्यति ॥ ४०॥ भवितात्र संग्राममतीय शुप्तसंज्ञकः । पुनः पूर्वदिशिस्लष्ट (तस्य) युद्ध चत्वारि जायते ॥ ४१ ॥ द्वियुद्धं दक्विणे कूण त्रियुद्धं पछिमादिभिः एवं युद्ध द्विचत्वारि वर्षे सार्दाष्टके भवेत् ॥ ४२ ॥ अतीव सप्त युद्धं च जायते तत्र सस्वरा । धवलपुरे च संभरे च कुरुक्षेत्रे च दवणे ॥ ४३ ।। मेदपाटे मध्यदेशे पुनः उग्रपुरे शुभे । एते सप्त महद् युद्ध भविता यवनाधिपात् ।। ४४ ॥ किंचिन्न्यूनश्च जायते संख्याश्चैव चतुर्दशः। एकोनविंशाधमयश्च पुनः कृद महत् ।। ४ ।। संवत् संख्या विक्रमाच पंचषट् सप्तचन्द्रमा (१७६५) । यावत् स राजा बलवान् कुशवंशभवा नृपाः ।। ४६ ॥ पश्चाद युद्धद्वये तत्र निर्वला जायते तदा। चहवाणै सुखसंपत्तिः भविष्यति न संशयः ॥१७॥ चहवाण बलतोत्र कुशवंशसुखं भवेत् । यवनः पुनः संग्राममारितं प्रवलं तदा ॥४८॥ कुशवंशः पुनस्तत्र जितवान् जगतीतले । राष्ट्रवंशश्च सद्भूपः कुशवंशनृपोत्तमः ॥४९॥ मेदपाटपतिस्तत्र नृपाणामाज्ञया जगत् । प्रवर्तते महीपाल वर्ष चैक प्रमाणकः ॥ ५० ॥ पश्चादिल्लीपतिस्तत्र मेदपाटपतिर्भवेत् । क्रमेण राष्ट्रवंशश्च कुशवंशोद्भवा नृपाः ॥५१॥ चालुक्यः चहृवाणश्च भविता सद्बली नृपः । चहूवाणः संभरिपुर्या नृपतिस्तत्र जायते ॥५२॥ H १ बहादुर पचवर्ष २ परिशिष्ट-१ [ ३३ च पाण सभराधीश भविष्यति महीपति । चित्रकूटपुरमपि वसिष्यति महच्छुभम् ॥५३॥ सोसोद्या नृप धर्मज्ञ पुरे च वसति सदा । पुन यादयभूपाला पमारा नृपधार्मिका ।। ५४ ।। धरापृष्ठे भविष्यति राज्ये धर्मिष्ठवान् भवेत् । खीचीगोड़महीपाल राज्य स्वस्व करिष्यति ॥ ५५॥ शृणु राजनिमित्त च दिल्लीपुर्या भविष्यति । नवरगसाहिवशश्च फ्रमेण क्षय यास्यति ॥ ५६ ।। वर्ष पोडशमध्ये च चाप्टवश भविष्यति । एव भूत्वा च सग्राम स्थाने स्थाने भविष्यति ॥५७ ।। सप्तवशभवा सिद्धि यद्दत्त भिक्षुरूपिणा । तसिद्धि पूर्णता याति पश्चाद् द्वे च भविष्यति ॥५॥ ॥५६।। पश्चात् साहिजिहादार ॥६०॥ मध्ये विमासो अवर एक राज्य पुनर्भवेत् । पश्चात् पटवर्प माससप्त राज्य फरकसेनक ॥ ६१ ।। द्विमासमध्ये द्विनृप द्विवर्षे च त्रयो नृपा एव सपूर्णता याति दिल्लीपुर्यामधीश्वरा ॥६२ ।। पचमास दिन सप्त नष्ट राज्य भविष्यति । पश्चात् द्विवश उत्पत्ति अतरिक्षतरोवर ॥६३ ।। राज्य कृत्वा च दिक्सख्या वर्प दिल्लीधराधिप । पश्चात् उत्पद्यते राजन राजा धर्मेण तत्पर ॥६४ ॥ शतनवमिता सख्या पुन सप्तश्च सयुता अधिमासयुता मध्ये शाकविक्रमकालत ॥६५॥ तुवर स्थापित सोपि अधिमासयुता अपि । योजनीया तदा सवत् म्लेच्छतो राज्य यास्यति ।। ॥ इति श्रीइद्रप्रस्थप्रवध चिकत्ताराज्यवर्णनो नाम एकादश सर्ग ॥ १ देखें प्रयच का ३२ वां सोन। २ देखें प्रवधका ३३ वा श्लोर। प्रबध का ३० या श्लोक। ४ बदल कर सम्या ६७ की गई है और बीच में प्रबध के श्लोक २७-३० ऊपर की तरफ दिय गये हैं। उनकी संख्या ६४, ६६ है। सख्या ६८ की गई है। बदल कर परिशिष्ट २ [मून प्रत्य फे मुद्रण मो अनन्तर श्री अगरचन्दजी नाहटा वोकानेर ने यह सामग्री भेजी जो सघन्यवाद परिशिष्ट के रूप में यहां दी जा रही है। प्र.सं.] अथ ढीली स्थान को राजावली लिक्ष (ख्य)ते तोमरवशे संवत् ८३६ आदि राणा जाजू १ वाजू २ राजू ३ सीहा ४ जबालु ५ शोहरु ६ जेहरू ७ बच्छहर ८ पोपलु : रावलुपिणपालु १० रावल तोहणपालु ११ रावल गोपाल' १२ रावलु सलक्षणु १३ रावल जयपालु' १४ रावल फम्बरू (कुंवर) पालु. १५ रावलु अनंगपालु' १६ रावलु तेजपाल' १७ रावल मदनपालु १८ रावलु कृतपालु १६ राबलु लखण- पालु २० रागा पृथ्वीपालु २१ एती राजाबली ॥ छ। ततः सवत् १२१६ वर्षे तोमर राजानुपसते चोहारण वंलि रावलु वीसल राजु लियो १ अमरगगेय २ पोयड' (पृथ्वीराज द्वितीय) ३ सोमेसरू'' रावल १. नियम माहिब की प्राकियोलाजिकलस आफ इण्डिण नामक पुस्तफ की जिल्द प्रथम, पृष्ठ २४६ में ११-१२ ३ नम्बर पर 'गोपाल' नाम पाया जाता है । २. उक्त पुस्तक मे १३ वें नवर पर 'सल्लक्षपाल' दिया है। ३. उक्त पुस्तक में १४ वें न. पर 'जयपाल' नाम दिया है। ४. उक्त पुस्तक मे १५ वे न. पर 'कुंवरपाल' नाम दिया है ।' यह नाम गुटके में कुछ अशुद्ध रूप में लिखा गया है। ५. उक्त पुस्तक में १६ वें न. पर अनगपाल का नाम दिया है और इसका राज्यपाल १६ वर्ष ६ महीना और १८ दिन बतलाया है । गुटके मे भी यह नाम १६ वें नंबर पर है। ६. यह नाम वालियर को त्य त मे पाया जाता ७. २० वें नबर पर 'पृथ्वीराज' नाम दिया है और उसका राज्यकाल २२ वर्ष २ महीने १६ दिन बतलाया है ।- देखो, ना. प्र. पत्रिका भाग १, पृ ४०५ । ८ श्रीमान योझाजी ने तोमर वंशियो से चौहानो द्वारा दिल्ली लेने का समय वि. सं. १२०७ के लगभग बतलाया है। ६. यह अर्णोराज का पुत्र ग्रोर जगदेव का छोटा भाई था। वीर तथा पराक्रमी था और अपने ज्येष्ठ भ्राता से राज्य छीन कर उमका अधिकारी बना था। - देखो, भारत के प्रा राज , १, पृ. २४५ । १०. यह विग्रहराज (वीसलदेव चतुर्य) का पुत्र था और अपने पिता के बाद राज्य का उत्तराधिकारी था। प्रवन्धकोप के अत को वशावली में इस वीसलदेव के वाद अमरगंगेय को अविकारी होना लिखा है ११ प्रबन्धकोश की वशावली में अमरगगेय के बाद पेथडदेव का अधिकारी होना लिखा है। यह जगदेव का पुत्र और वीसलदेव का भतीजा था । इसने अमरगंगेय से राज्य छीना था और यह पृथ्वीराज द्वितीय कहलाता है। - परिशिष्ट-२ [३५ पोयर' (पथ्वीराज तृतीय) का रावल बाहलु नागयो (नागदेव) ७ रावल पृथ्वीराज' ८ इतने चौहाण हुए। सवत् १२४६ वर्षे चत्र वदि २ तेजपाल ढोली लई, पृथ्वीराज को सेवकु वखीसलपात को पुनु दिवाकर बाघ लियौ।' सवत १२४६ चैत्र सुदि २ सुलिता सहाबुद्दीन (शहाबुद्दीन तुर्फवश) गजनी तहि प्रायो। १४ वरसि (वर्ष) राजु कियो । सवत् १२६३ वर्षे सुलितानु कुतुबद्दीन एवक* गुलाम वश राजु वर्ष ३ । सवत् १२६६ वर्षे सुलितानु समसुदन' (शमसुद्दीन अल्तमश) वर्ष २६ राज ज्य कृत। सवत् १२८२ वर्षे राजा पेरोशाहि (फिरोजशाह) राज्य कृत" मास ६ वर्ष ३ । सवत् १२६७ सुलिटानु मोजुदीन (मुइजुद्दीन बहरामशाह) वर्ष ३ राज्य कृत। १ यह अर्णोराज का ततीय पुत्र था और पृथ्वीराज द्वितीय का चाचा था। पृथ्वी राज द्वितीय के बाद उसके मत्रियो द्वारा राज्य का उत्तराधिकारी घोपित किया गया था। • इन तीन राजामो काम या कोई उल्लेख नहीं मिलता। ३ सवत् १२४६ मे विस तेजपाल ने दिल्ली ली और दिवाकर ने उसे पर बांधा, यह कुछ मालम नहीं हो सका। ४ महा म गौरीगर हीराचंदजी प्रोभा कृत राजपूतान या इतिहास प्रथम जिल्द के परिशिष्ट न ६ मै दिल्ली के सुलताना वी वशावली मे शहाबुद्दीन गौरी का राज्यकार वि० ० स० १२४६ मे १२६२ ता १४ वप तलाया है । प्रत दोनों का समय परस्पर मिल जाता है । ग्रागे ने नोट इसी सावली के प्राधार से दिए गए हैं। ५ मोमाजी यी उवत वगावली मे कुतुबुद्दीन ऐन पे बाद वि० स० १२६३ से १२६७ ता पारामशाह के राज्य करने का उल्लेख किया गया है। यह उल्लेख गुटवे की गजायली में नहीं है। ६ शायली में वि० स० १२४७ से १२६३ तब शमसुद्दीन मल्तमश के राज्य का उल्लेख किया गया है। ७ उपयुक्त घशावली म रूपनुद्दीन फीरोजगाह पा वि० स० १२९३ वें में गज्य पारना मतनाया है और उमी स० १२८३ मे रजिया वगम के राज्य करने का उल्लेप दिया गया है। परतु गुटक म पराज या फीरोजशाह का ही ३ प ६ महीना राज्य बना लिसा है, जानिय है। # यमावली मै मजुद्दीन बहरामगाह का राज्यकाल वि० स० १२६७ मे १२६E TT दो वप बतलाया है, पर तु गुटरे को राजावनी मे ३ वप लिया है।
परिशिष्ट-२ ( ३ संवत् १६६६ वर्षे सुलितान अलावदी (अलाउद्दीन मसूदशाह) राज्यं कृतं' धरस (वर्ष) २ सवत् १३०१ सुलितानु नसीरदी (नासिरूद्दीन महमूदगाह) वर्षे २१ राज्य कृत' । स० १३२३ चैत्र वदि २ सोम दिने सुलितानु ग्यासदी बलिवड (ग्यासहीन वलवन) वर्ष २ राज्यं कृतः । सं० १३४३ वर्षे फाल्गुन वदी ६ शुक्रदिने सुलितानु मोजदी (मुइजुदीन कैकवाद) वर्ष ३ राज्यं कृतं । सं० १३४६ वर्षे फाल्गुण सुदी ६ शुक्रदिने सुलितानु समसदी (शमसूद्दीन) वर्ष २ राज्य कृतं । सं० १३४८ वर्षे ज्येष्ट सुदी ५ सोमदिने सुलितानु जलालदी (जलालुद्दीन खिलजी वश) वर्ष ६ मास ३ राज्य कृत । सं० १३५६ वर्षे कातिक सुदी ११ भौम दिने सुलितानु रूकनुदी (रूपनुद्दीन) मास तीन राज्य कृतं । सं० १३५४ वर्षे पौष सुदी ८ भीम दिने सुलितानु अलावदी (अलाउद्दीन मुहम्मदशाह) वर्ष १६ मास ३ दिन १५ राज्यं कृतं । सं० १३७३ वर्षे माघ सुदी ६ भौम दिने सुलितानु पुत्र ल्हौवी रागी छोतमदे को पुत्र सहावदी (शाहा- बुद्दीन उमरशाह) मास ३ राज्यं कृतं । १ इसका राज्य वि० स० १२६६ से १३०३ तक ४ वर्ष रहा है। - देखो राजपूताने का इतिहास, भाग, १ परि नं. ६ । २ अोझाजी की उक्त वगावली में इसका नाम नामिरूद्दीन मुहम्मदशाह दिया है और राज्यकाल वि० स० १३०३ से १३२२ तक १६ वर्ष वतलाया है । ३. उक्त वंशावली मे इसका नाम गयासुद्दीन बलवन है और राज्यकाल वि० स० १३२२ से १३४४ तक २२ वर्ष बतलाया है। ४ उक्त वशावली मे इसका नाम मुइजुद्दीन कैकवाद है और राज्य-समय वि० सं० १३४६ तक दिया हुआ है। ५. इसका नाम उक्त वंशावली में नहीं है । ६. इसका वंश 'खिलजी' है और नाम जलालुद्दीन फीरोजशाह पाया जाता है। इसने वि० ० स० १३४६ मे १३५३ तक राज्य किया था । ७ रुकनुद्दीन का दूसरा नाम इब्राहिमशाह है और राज्यकाल उक्त वशावली मे वि० सं० १३५३ मे दिया है, जिससे भी मालूम होता है कि इसने कुछ महीनो ही राज्य किया था । ८ उक्त वंशावली के अनुसार इसका नाम अलाउद्दीन मुहम्मदशाह था। इसने वि० स० १३५३ से १३६२ तक १६ वर्ष राज्य किया है। गुटके में १६ वर्प से ३।। माम अधिक वतलाया है। ६. उक्त वंशावली में इसका वंश 'खिलजी' है और नाम शहाबुद्दीन उमरशाह दिया हुया है। - परिशिष्ट-२ [३७ सवत् १३७३ वर्षे फाल्गुन यदी (श)नि दिने मुलितानु प(खु)सरोखानु राज्य कृत' नाम नसीरदी वर्ष ४ । स० १३७७ वर्षे अश्वनि सुदी ३ सु(शु)क दिने सुलितानु ग्यासदी वर्ष ४ राज्य पृत' । तुगलकु तर मास ८ राज्य कृत समत १३८२ वर्षे ज्येप्ट सुदी ३ गुरौ दिन सुलितानु महमद वप २७ राज्य कृत' । स० १४०६ वर्षे श्रावण सुदी ८ शनि दिने मुहरम तेरीक २१ कातिक बदी ४ सु(शु)क दिने सुलितान पेरोसाहि राज्य कृत' । वर्ष ३७ मास ३ दिन ११ राज्य कृत । सवत १४४६ काति वदी ४ शुक्र दिो सुलितानु तुगलसाहि राज्य कृत' । मास ५ । स० १४४६ वर्षे चैत्र सुदी ८ भुलितानु अबूकसाही महमूदशाही राज्य कृत' । स० १४४७ वर्षे अश्वन सुदी ११ वर्ष १ मास ७ दिन ७ राज्य कृत' । तत मल्लू राज्य कृत । पश्चात दौलतिपा (खा) ८ राज्य १ १ इसका शुद्ध नाम नासिरुद्दीन सुशरोशाह था। राजपूताने के इतिहास वाली वशावली में इससे पहले कुतुबुद्दीन मुवारिक्शाह का नाम और दिया हुमा है और उसका राज्यकाल वि० सं० १३७२ से १३७७ तक बतलाया है । गुटकों को राजावली मे यह नाम नहीं है। पितु नासिरहानशाह का राज्यपाल ४ वष बतलाया है । जबपि वशावली में वि० स० १३७७ में ही कुछ समय रहा है, क्योकि स० १३७७ मे तुगलक वश का राज्य हो गया था। २ उक्त वशावली मे इसका नाम गयासुद्दीन तुगलक प्रौर राज्यकाल वि० स० १३७७ से १३८१ तक लिखा है। ३ इसे मुहम्मद तुगलक रहते है और इसका राज्यसमय उक्त वशावली म वि० स० १३८१ से १४०० तक २७ वष पाया जाता है जो गुटके के उक्त समय से मिल जाता है। ४ इसे फिरोजशाह कहते हैं। क्शावली में इसका वि० स० १४०८ से १४४५ तक ३७ वप राज्यकाल पाया जाता है । गुटके में उल्लिपित समय भी मिल जाता है और यह प्रामाणिक मालूम होता है। ५ उक्त वंशावली के अनुसार यह तुगलक शाह द्वितीय है। इसका राज्यकाल वि० स० १४४५ मे हो कुछ समय तक रहना बतलाया है। ६ रुपत यशावली में प्रदूशाह मुहम्मदशाह नाम दिये हैं, जो गुटवे के नामों से मित्र जाते हैं। ७ दशावली में सिक् दरशाह, महमूदशाह नसरतशाह, महमूदपाह (द्वितीय) के नाम पौर पाये जाते है । मोर इन सब का राज्यकाल वि० स०१४४६ स १४५६ तप ११ वप दिया है। गुटके में यह नाम नहीं है इससे मालूम होता है कि उसमें कोई भूत अपवा टिजर हुई है। ८ उपत गायली में दौलतखो लोदी का राज्यपाल वि०० १४६६ से १४७१ तक दिया है।
परिशिष्ट-२ M कृत । सवत् १४७२ खदिरखान राज्यं कृतं वर्ष ७ । संवत् १४७६ वर्षे वैशान्य मुमारसखान राज्यं कृत' वर्ष ११ । संवत् १४६० वर्षे फाल्गरण मुदी ११ शुक्रा दिने महमूदताहि जनकम् (?) वर्ष १२ राज्यं कृतं' । सवत् १५०२ वर्षे अलावदी मास ३ । अमानतखां वर्ष ६ राज्यं कृतं । सवत् १५०८ वर्षे वैशाय नुदो ३ बुलितानु बहलोलनाहि पठाणु लोदी राज्य कृतं वर्ष ३८ मास २ दिन ८ राज्य कृतं । उवत् १५४६ वर्षे मार्गसिर मासे मुलितानु बराहिमु राज्य कृत वर्ष ८ मास ५ राज्यं कृतं । संवत् १५८२ वर्षे वैशाख मुदी ८ पातिमाहि बगल' सुगल काबुल तहिं आया राज्यं करोति इदानीं । छ। राज्यं कृतं वर्षे ६ दिन । संवत् १५८८ व पोह यदि हमाऊ पातिसाहिम राज्यं करोति वर्ष ८ मास... राज्यं क्रियते। सवत् १५६७ वर्षे ज्येप्ट मध्ये नसूर का पुत्र साहि बालमु राज्यं करोति । संवत् १५६६ सलेमताहि राज्यं कृतं'' वर्ष ६ ma-NAMA mome १. इसका नाम खिजरखां और वंश संयद चा, और गजपममय ७ वर्ष सं० १४७१ से १४७८ तक रहा है, ऐमा उपत वगावली में जाना जाता है । २. यह मुजुद्दीन मुबारकशाह कहलाता था। गत वशावली में उसा। राज्यसमय वि० स० १४७२ से १४९० तक पाया जाता है । ३. इसे मोहम्मदशाह कहते थे, उक्त वंशावली में इसका राज्य १० वर्ष वि० सं० १४६० से १५०० तक दिया है। ४. यह अालमशाह फहलाता था उचत वंशावली में इसका वि० स० १५०० से १५०८ तक आठ वर्ष बतलाया है जब कि गुटके मे ३ मास, पश्चात् अमानतखां का राज्य ६ वर्ष करना लिखा है। प्रोझाजी को वंशावली में इसका कोई उल्लेख नहीं है । ५-६. इन दोनो का राज्यपाल रक्त वशावली में मिल जाता ७ इसका नाम इब्राहीम लोदी था, और उक्त वंशावली में राज्यकाल वि० सं० १५७४ से १५८३ तक दिया है। ८. उक्त वंगावली में इसका राज्यकाल वि० सं० १५८३ से १५८: तक ४ वर्ष - दिया है। ६. इसका नाम हुमायू था और वंश 'सूर' कहलाता था। उक्त वंगावली के अनुसार इसका राज्य वि० सं० १५८७ से १५६६ तक रहा ! १०. दंशावली मे हुमायू के बाद इसलाशाह का राज्य वि० ६० ६६०२ से १६०६ तक करना लिखा है।
परिशिष्ट-२ F३६ स० १६०८ व पेरोसाहि राज्य कृत' दिन १० । स० १६०८ अदनी' राज्य कृत वर्ष ४ । सवत् १६९२ आसोज यदि २ हुमाउ राव सेत राज्य हिंदू (?) सवत् १६१२ फागुण वदि २ अकउर राज्य करोति । स० १६६२ काति सुदि १४ अकबर को पुत्र साह सलेम राज्य करोति । स० १६८५ साह सलेम को पुनु शेरशाह' सुलतान राज्य करोति । १ नशायली म मुहम्मद आदिलशाह नाम दिया है और राज्य अगल वि० स० १६०६ से १६१० तक यतलाया है। २-३ ये धोनों नाम वशावली में नहीं पाये जाते वितु उसमे इब्राहीम सुर और सिरदरशाह सूर म दिय हैं । हुमायू दूसरी पार गद्दी पर वठा था। इसका यश मुगल पहा जाता है। ४ यह पावरमाह पहलाता था वहा राजनीतिश और योग्य शासक था। ५ इसे जहागीर कहते हैं। ६ यह शाहजहां के नाम से मपाहर पा । पावनी मे अनुसार इसका राज्य दि० स० १६८५ से १७१५ तक रहा है।
परिशिष्ट ३ नामानुक्रमणिका क्रमांक - प्रकवर३६ प्रवरगनाहि २६ -- -- ३३ प्रसमपान ११ ३४ अहंटनर ३५ प्रारामशाह ३५ ३६ पानियोलॉजिवनम पॉप इंडिया ३४ ane पालम २६ आलमगाह ३८ ४० उद्रप्रस्थ २,४,१०,१४,१६,२१, २ अकबरगाह ३९ ३ अकद जलाल २८ यसवराजा ५ जीन अलावदी २४ ६ अदनी ३६ प्रदपन ८ अनीमिय १४ ६ अनगपाल १५,१६,१७, १८,३४ अनगपाल तुंवर १५ ११ अनगपानु ३४ १२ अनंदजल ८ १३ अबूकगाह मुहम्मदवााह ३७ १४ अफसाहि ३७ १५ अमरगंगेय ३४ १६ अमानतसा ३८ १७ अमृतसाहि २२ १८ अम्वावतीपुरी ३१, ३२ १६ अर्गलापुर ३१ २० अाराज ३४, ३५ २१ अलाउद्दीन मसूदगाह ३६ २२ अलाउद्दीन मुहम्मदगाह ३६ २३ अलादीन जलावदीन २२ २४ अलादीन लावदीन २२ २५ अलावदीन २२, २३ २६ अलावदी, अलाउद्दीन मुहम्मदशाह ३६ २७ अलावदी सुलतान २२, २५, २५ २८ अलावरदीखान २४ २६ अलीमहमद २७ ३० अलीसाहि २७ ४२ इन्द्रप्रस्थपुर २७ ४२ इन्द्रप्रन्यपुरी २४, ३१ ४३ इन्द्रप्रस्यप्रबंध ४८ इब्राहिम लोदी ३८ ४५, इब्राहिमशाह ३६ ४६ इयाहिम सुर ३६ ४७ दसलागाह ३८ ४८ उग्रपुर ३२ ४६ ग्रमेन ४ ५० उग्जयिन् १४ ५१ उज्जेगो १० ५२ उज्जनी ३ ५३ उत्तमचन्द ४ ५४ उदयसेन ५५ उलावदि सुलीतान ३६ ५६ प्रोमा जी ३४, ३५ ५७ अोइर ३४ ५८ कच्छ १६ ५६ बनकगिरिपत्तन ३ परिशिष्ट-३ [४१ क्रमांक कमाक 1 कनवज २० ६१ कनिंघम ३४ ६२ पपूरसेन १३ पमा ७ ६४ कमालपद १२ ६५ पम्बरू (कुवर) पालु ३४ ६६ पमपाल १२ ६५ पल्यागचद १२ ६८ कवरपाल १८ ६६ कायुल ३८ पामावती ३१ ७१ कुतबदीन २१, २३ ७२ बुतुबुद्दीन ऐबक ३५ ७३ कुतुबद्दीन सुलितान ऐवक ३५ ७४ कुतुबुद्दीन मुवारिक्शाह ३७ ७५ कुदयुत १८ ७६ कुरक्षेप १६ ३१, ३२ ७७ कुवरपाल ३४ ७८ वुधागोविच द १३ ७६ वुशवश ३२ तपातु ३४ ८१ कृपपदेव २ ८२ कृष्णवासुदेव ३ ५३ खदीरखान ३८ ८४ खानमारस २३ ८५ सिजरसान २३ १६ खिजरसा सैयद ३८ ८७ खिलजी ३६ ८८ सीची मह सीली १५ ६० पुरदममरादीन २२ प (सु)सरोमानु ३७ ६२ गङ्गा २८ गगर १७१६ २० १४ गजनी २० २१, ३५ ६५ गजनीपुर २१ १६ गयासदी। २२ १७ गयासुद्दीन तुगलक ३७ ९८ गयासुद्दीन बलवन ३६ Ek गरासदीन २३ १०० गुलाम वश ३५ १०१ गोड ३३ १०२ गोपाल १८, ३४ १०३ गोरी, गौरी २१ १०४ गोविदचद १२ १०५ गोविन्दपरम १३ १०६ गोविदपाल ११ १०७ गौरीशकर हीराचदजी अोझा महाम ३५ १०८ ग्यासदी ७ १०६ ग्यासदी सुतितान वलिवड ३६ (ग्यासद्दीन बलवन) ११० ग्वालियर ३४ १११ पत्थिा २५, २६,२७ ११२ चक्था १६ ११३ चद्रपाल ११ ११४ चहूनाए १७, ३२, ३३ ११५ चहूप्राण १६ ११६ चालुक्य ३२ ११७ चित्रकूटपुर ३३ ११८ चित्रसेन ७ ११८ चोहारा ३३ १२० चौहान ३४ १२१ छीतमदे ३६ १२२ जाजोत १५ १२३ जगजोति व्यारा १७ १२४ जगदेव ३४ १२५ ज मजेय १२६ जम्बूद्वीप १२२ १२७ यचद २० ८० परितिष्ठ-३ terne १६२ तुरफागो १७ १६३ तर १५, १६, १७, १६, ३३ २०१४ TWAN A १६५ तोमर ३४ १६६ तोमर मा ३४ १६७ तोहारा १८ १६८ तोहणपाल ३४ १६६ दपषण ३२ १४ नान (जलालुदीन १४. मनपा ६ १४२ १७१ दशवा५ १७२ दामोदरसेन १४ १७३ दिल्ली २,६, १५, २६ १४४ दिल्लीपति ३२ १६५ दिल्लीपुर २० १७६ दिल्लीपुरी १. २, १५, २७, ३३ १७७ दिल्लीराज्य १७८ दिवाकर ३५ १७६ श्रीपदयाल ४ १८० देवकन्यापुरी ३१ १८१ देयमेन १३ १९२ देशापान ११ १३ दौeni, मोदी ३७ १८४ शौतिपा (मा) ३७ १८५ धोनतिमा २३ १६ पनपतो १८५ पर्याग १४ १५ 11. १४. म; १४१ १६ २६.११.५,२७,२८ xxgita A * ke . 7 * है परिशिष्ट-३ [४३ कमाक क्रमांक १६७ नाराइणसेन १४ १९८ नवरगसाहि ३१, ३३ १६६ नसरतशाह ३७ २०० नसीरदी ३७ २०१ नसीरदी सुलितानु (नासिरुद्दीन महमूदशाह) ३६ २०२ नागद्यो (नागदेव) ३५ २०३ नागाजुन ३ २०४ नाथ ८ २०५ नारायण ७ २०६ नासिरूद्दीत सुशरोशाह ३७ २०७ नासिरूद्दीन मुहम्मदशाह ३६ २०८ नासिरूद्दीनशाह ३७ २०९ नीलाधिप २१० नोलाधिपति २११ पन्चदण्डातपत्र ११ २१२ पठाणु ३० २१३ पठान १६, २१, २३, २४ २१४ पमार६,३३ २१५ परशुराम २१६ परीक्षित ४ २१७ पवत ५ २१८ पयतराज ६ २१६ पहाडी १६ २२० परकमाहि ३० २२१ पाचाल १ २२२ पाहवमपाल । २२३ पिहरणपालु रावन ३४ २२४ पौषड (पृथ्वीराज द्वितीय) ३४ २२५ पापरू (पथ्यौराज तृतीय) ३५ २२६ पीपलु ३४ २२७ पीरोजसाहि २७ २२८ पयकु राज्य १७ २२६ पृषीराज २०, २१ २३. पृषीराज पहूण २१ २३१ पयोराजा १८, १६ २३२ पच्चीपाल २३३ पृथ्वीगल राणा ३४ २३४ पृथ्वीराज ३४, ३५ २३५ पृथ्वीराज द्वितीय ३४, ३५ २३६ पेषडदेव ३४ २३७ परोजस्याह २१ २३८ परोसाहि ३६ २३६ पेगेसाहि सुलितानु ३७ २४० पठान १० २४१ प्रतिष्ठानपत्तन ३ २४२ प्रत्युदर ७ २४३ प्रबधकोष ३४ २४४ फरकन २३ २४५ फिरोजशाह ३७ २४६ फोरोजसाहि ३७ २४७ बम्वरुपातशाहि ३८ २४८ ग्रह्माउर ७ २४६ बलख २७ २५० बलव१ २५१ वाहलु ३५ २५२ बहलोलसाहि ३८ २५३ बहादुर ३३ २५४ भरतक्षेत्र १ २५५ भवपरम १३ २५६ भीखमराज ५ ५७ भीमचद १२ २५८ भीमपाल १२ २५६ भीमराज ६ २६. भोपतिनप ५ २६१ मञ्जलपाय ४ २६२ मयुरा ३१ २६३ मदनपाल १२ २६४ मदनपालु ३४ २६५ मधुवत ५ परिघाट-३ 04444 २२ यमुना २८ and RE * -- ३०१ युधिष्टिर ३, ४ ३०५ पोमिनोप्यात १० ३०६ योगिनीपुर २, ७, १०, १३, १४, १६.१८.२१, २२, २३, २४, २६, 14 2:00 १ म A । २: ३७ २. ३: - . . . ३०७ रश्मिा वेगम ३५ ३०. रणजीत ५ ३६ रनमेन १४ ३१. रास्वंग १६ ३११ गजपान ८ ३१२ राषपूताने पासिहाग ३५ ३१३ राजगिरा १४ ५ AN - . . ran - , ४ 12 ३१७ गायन ३४ ३१८ गयमेत ३६ ३११ सय ३३ ३२० रसगुनी नमिता ३६ (टीन) ३२१ ग २ ३२२ नु मेरोजना ३५ १२ जानतीन गग६ . . Pix परिशिष्ट-३ । ४५ क्रमात क्रमांक ३३२ वरवीसलपाल ३५ ३३३ वराहिमु ३८ ३३४ वल्लक ३३५ वव्वर २६ ३३६ यहगे (डी)लपा २५ ३३७ यहादर २६,३० ३३८ वाजू ३४ ३३६ वाराणसी १५ ३४० वासुदेव १ ३४१ जिक्रम ६,१० ३४२ विक्रमचद १२ ३४३ विक्रमपाल १२ ३४४ विक्रमसेन ११ ३४५ विक्रमादित्म ३,१०,१४ १५ ३४६ विक्रमाय १० ३४७ विगहराज (विसलदेव चतुथ)३४ ३४८ विजय ३ ३५६ विहगद १५ १७ ३५० विहाडी १६ ३५१ वीरपाल ११,१८ ३५२ वोरमखा २५, २६ ३५३ वीरव (म)रीन ७ ३५४ वीरमाह ६ ३५५ वोसलदे १६ ३५६ वीसलदेव ३४ ३५७ वीसनराज गवलु ३४ ३५८ वेतालपविशका ११ ३५६ पतरु (२)ो ३ ३६. मेरारपुर ३१ २६१ व्यास १५ ३६२ व्यास जगजोति १७ ३६३ वापया३+१३ १४, १५ ३६४ साषापुरी १.२ २६५ पासप्वज २६९ रामसुद्दीन अल्तमा ३१ ३६७ शहाबुद्दीन ३५ ३६८ शहाबुद्दीन उमरशाह ३६ ३६६ शालिवाहन शात् ३ ३७० शाहजहा ३६ ३७१ शुमसेन १३ ३७२ शेख २७ ३७३ शेरशाह सुलतान ३६ ३७४ श्रवण ३७३ श्रीयुत १७ ३७६ सत्यपाल ११ ३७७ सपाल ११ ३७८ समसदीन २१ ३७६ समसदी सुलिसानु (गमसुद्दीन) ३६ ३८० समसुदन सुलितान (शमसुद्दीन अल्तमश) ३५ ३८१ सलक्षण ३४ ३८२ सलेमसाह २७ ३८३ सलेमसाहि ३० ३८४ सल्लक्षपाल ३४ ३८५ सहदेव १७ ३८६ सहायुद्दीत सुलितान ३५ (शहादुद्दीन तुकं यदा) ३८७ सहावदा (शाहायुद्दीन उमराह)३६ ३८८ साहमलम ३६ ३८६ साहिलालमु ३० ३६० साहिजिहा २६ ३६१ साहि जिहादार ३०, ३३ ३६२ सागो ६ ३६३ मिदरशाह ३७, ३० ३६४ सिर दरसाहि २५ ३६५ सिपासणवत्रीसी ११ ३६६ सिद्धपाल ६ ३६७ सिंधु २ ३९८ सीमोचा १६, २३ ३६६ सोहा २०, २४ -
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४.३ नागपनी?
४२४ मंरि ३२
४२५ भरिपुरी ३२
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४३० मा २६, २७, २८
४३१ पामित्र
४३५ पाउ १२
४३६ रमेन १३
४३५ मनगर ३८
४३६ रिमाट २६
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४८१ माकपालमा ३०
४५२ सय २६
४४२ मगर २८
१४४ एंट्री
.
राजस्थान सरकार
।
राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
(Rajasthan Oriental Research Institute )
जोधपुर
मात्र
quen
सूची-पत्र
गाडास्थान पतित चन्द्रमाला
प्रधान सम्पादक
पद्मश्री जिनपिजप मनि, पुरातत्वाधार्य
-
सितम्बर, १९६३ ई०
- राजस्थान पुरातन ग्रन्थ-माला प्रधान सम्पादक-पद्मश्री मुनि जिनविजय, पुरातत्त्वाचार्य प्रकाशित ग्रन्थ १. संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश १. प्रमाणमजरी, ताकिचूडामणि सर्वदेवाचार्यकृत, सम्पादक - मीमांसात्यायकेसरी पं० पट्टाभिगमगास्त्री, विद्यासागर । मूल्य-६.०० २. यन्त्र राजरचना, महाराजा-सवाई जयसिंह-कारित। मम्पादक-स्व. पं० फेदारनाथ ज्योतिर्विद, जयपुर। मूल्य-१.७५ ३. महपिकुलवैभवम्. स्व० पं० मधुसूदननोझा-प्रणीत, भाग १, सम्पादक-म० म० प० गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी । मूल्य-१०.७५ ४ महपिफुलवैभवम्, स्व० पं० मधुसूदन ओझा प्रणीत, भाग मूलमानम् सम्पादक-पं० श्रीप्रधुम्न ग्रोभा। मूत्य-४.०० ५. तर्कसंग्रह, अन्नभट्टकृत, सम्पादक-डॉ. जितेन्द्र जेटली, एम.ए., पी-एच डी., मूल्य-३.०० ६. फारकसंवधोद्योत, ५० रभमनन्दीकृत, सम्पादक-टॉ० हरिप्रसाद शास्त्री, एम. ए., पी-एच. डी.। मूल्य-१.७५ ७. वृत्तिदीपिका, मोनिकृष्णभट्टकृत, सम्पादक-स्व.पं. पुरुपौत्तगदार्मा चतुर्वेदी, साहित्याचार्य। मूल्य-२.०० ८. शब्दरत्नप्रदीप, अज्ञातकर्तृक, सम्पादक-डॉ. हरिप्रसाद साम्बी, एम. ए , पी-एच.डी.। मूल्य-२.०० है. कृष्णगीति, कवि सोमनाथविरचित, सम्पादिका-डॉ. प्रियवाला माह, एम. ए., पी-एच. डी, डी. लिट् । मूल्य-१.७५ १०. नृत्तसंग्रह, अशातकतक, सम्पादिका-डॉ. प्रियवाला शाह, एम. ए., पी-एच. डी., मूल्य-१.७५ ११. शृङ्गारहारावली, श्रीहर्षकवि-रचित, सम्पादिका-डॉ. प्रियवाला शाह, एम. ए., पी-एच.डी., डी.लिट् । मूल्य-२.७५ १२. राजविनोदमहाकाव्य, महाकवि उदयराजप्रणीत, सम्पादका-प० श्रीगोपालनारायण बहुरा, एम. ए., उपसञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर । मूल्य-२.२५ १३. चक्रपाणिविजय महाकाव्य, भट्टलक्ष्मीधरविरचित, सम्पादक-पं० श्रीकेगवराम कागीराम शास्त्री। मूल्य-३.५० १४. नृत्यरत्नकोश (प्रथम भाग), महाराणा कुम्भकर्णकृत, सम्पादक-प्रो. रसिकलाल छोटा- लाल पारिख तथा डॉ. प्रियवाला शाह, एम. ए., पी-एच. डी., डी. लिट् । मूल्य-३.७५ १५. उक्तिरत्नाकर, साधसुन्दरगणिविरचित, सम्पादक-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजयजी, पुरा- तत्त्वाचार्य, सम्मान्य सचालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर । मूल्य-४.७५ १६. दुर्गापुष्पाञ्जलि, म०म० पं० दुर्गाप्रमादद्विवेदिकृत, सम्पादक-पं० श्रीगङ्गाधर द्विवेदी, साहित्याचार्य । मूल्य-४.२५ १७. कर्णकुतूहल, महाकवि भोलानाथविरचित, इन्ही कविवर की अपर संस्कृत कृति श्रीकृष्ण- लीलामृत सहित, सम्पादक-प० श्रीगोपालनारायण बहुरा, एम. ए., १८. ईश्वरविलासमहाकाव्य, कविकलानिधि श्रीकृष्णभट्ट विरचित, सम्पादक-भट्ट श्रीमथुरा- नाथशास्त्री, साहित्याचार्य, जयपुर । स्व. पी. के. गोड़े द्वारा अंग्रेजी मे प्रस्तावना सहित । मूल्य-११.५० १६. रसदीपिका, कविविद्यारामप्रणीत, सम्पादक-पं० श्रीगोपालनारायण वहुरा, एम.ए. २०. पद्यमुक्तावली, कविकलानिधि श्रीकृष्णभट्टविरचित, सम्पादक-भट्टश्रीमथरानाथ- मूल्य-२.०० शारत्री, साहियाना! २१ काव्यप्रकाशसंकेत, भाग १ भट्टसोमेश्वरकृत, सम्पा०-श्रीरसिकलाल छो० पारीख, अंग्रेजी में विस्तृत प्रस्तावना एवं परिशिष्ट सहित मूल्य-१२.०० डी. लिट् । . मूल्य-१.५० मूल्म-४० " " " २० काव्यप्रकागत, भाग २ भट्टयोमेश्वरस्त, सम्पा.-पोरसिकलाल छो० पारीय, मूल्य-८२५ २३ घस्तुरत्नशेष, अनातरतुप, सम्पा०-डॉ. प्रियाला शाह । मूल्य-४०० २४ वाकण्ठवधम, ५० दुर्गाप्रमा-द्विवदित, सम्मा०प० श्रीगङ्गाधर द्विवेदी । मूल्य-४०० २५ श्रीभुवनेश्वरीमास्तोत्र, समाप्य, पृथ्वीधराचायरिरचित, अवि पद्मनाभन भाष्य. सहित पूजापश्नाजादिसवलित । सम्पा०- श्रीगोपालनागयण बहुरा। मून्म-३ ७५ २६ रलपरीगादि सप्तप-माह टार फे विरचित, सशोधक-पपत्री मुनि जिन. विजय, पुरातत्या गाया मूल्य-६२५ २७ स्ययमबद, महापवि स्वयभूत, मम्पा० प्रो० एच डी वैतगार । विस्तत भूमिका (माजी में) एवं परिनिष्टादि सहित मूल्य-७७५ २८ यत्तनातिसमुध्यय पथि यिरहारचित, मूल्य-५ २५ २६ एपिदपण, अज्ञातक्त का मूल्य-६०० ३० रामसपा महमोमे रहत सम्पा.-पानी मुनि जिनविजय । मूल्प-२ २५ २१ त्रिपुरामारती मत्तय, लघुपण्डितविरचित सम्मा० मूल्य-१५ २२ पदापररनमन्जूषा ५० वृष्णमित्रविरचिता, सम्पा० मूल्य-३७५ ३३ पृतमुक्तावली, कपिकनानिधि पोपणभट्ट वृत, स. ५० भट्टीमयुगाय पाली। मूल्य-३ ७५ ३४ प्रत्यप्रयप, सम्पा०-टो दशरप शर्मा। मूल्य-२२५ २ राजस्थानी और हिदी ३. पाहवेप्रम प, महार यि पदमनापिरपिरा, सम्पा०-प्रो० में थी प्याम एम ए। मूल्य-१२२५ ३६ पयामना रोता, पवियर जान रचित, सम्पा.-डॉ दशरय पार्मा पौर श्रीप्रगरपद नाहा। मूल्य-१७५ १७ सावा रासा, पारमा पविया गावानदानविरक्ति, सम्पा०-योमहताबपद सारंट। मूम-३७५ ५. पाकीदासरी पात, दवितो यापीदासरपिन, सम्पा०-श्रीनरोत्तमाम मामी, एम ए., विद्यामहोधि मूल्य-५६० २९ रामरमानी मारिस्परापर, भाग १. गा.-श्रीनगेतमाम स्यामी, एमए । मूल्य-२२५ ४. राजस्थानी शाहिरपमर, भाग २. सम्मा-श्रीपुपयोत्तमलाल मेनारिया, एमए, माहिरपरल । मूल्य-२७५ ४१ योग पस्पलमा, नवीदागाय गरस्वतीविरचित, सम्पा.-श्रीमती रानी सामी. पुमारी पूरायन । मन्य-२०० ४. जगलपिसारा, महाराज पुष्पौनिहाा, सम्मा-श्रीमती रानी लक्ष्मीकुमारी चूगयत। ४. भगतमालपत्री पारा, गम्पा.-श्री राजजी उस्ग्यल। गूल्य-१७५ ४४ रामापान पुराणस्य गदिल समिति प्रपोशी गधी भाग है। मूल्य-१७५ ४५ नाम प्रायविद्या प्रतिष्टा एम्नतिधित प्रापोंगो गधी, माग २॥ मूम्प-१२०० मूल्य-७५० ४६ माना मारो गर, माग १, मुश्ता णगोत गम्मा०-धारठीप्रमाद गारिया। २, vergreer Tी बात, नगा-श्री गोमाराम माम् । गुल्प-२५ Mami AIAITH प्राप-पुषो भाग १, ० नयी मूरिधानपिजय 1-1. " पानी न प्राय-गधी, भाग २-TO-पी पुग्णातममाम मनारिया एम, मूद-२५ 18 hr. P.मा.-dirat सम्भोमारी मदत । म- ५० 1 .grlfranो डिजाभूषण - गना गापा-योगांनारायण सर, rौर श्रीपरमोमोति मूल्य-६२५ [ ३ ] ५३. सूरजप्रकास, भाग १-कविया करणीदानजी-गल, सम्पा०-धी सीताराम लाळम । मूल्य-८.०० ५४. २ मूल्य-६.५० मूल्य-६.७५ ५६. नेहतरग, रावराजा बुर्मिहकृत-मम्पा०-श्रीरामप्रमाद दाधीच, एम.ए. मूल्य-४.०० ५७. मत्स्यप्रदेश को हिन्दी-साहित्य को देन, प्रो. मोतीलाल गुप्त,एम.ए.,पी.एच डी. मूल्य-७ ७५ ५८. वसन्तविलास फागु, अनातक, सम्पा०-श्री एम. मी. मोदी। मूल्य-५.५० ५६. राजस्थान में संस्कृत नाहित्य की खोज-एम. प्रार. भाण्टारसर, हिन्दी-अनुवादक यो ब्रह्मदत्त त्रिवेदी, एम. ए., माहित्याचार्य, काव्यतीर्थ मूल्य-३.०० ६०. समदर्शी प्राचार्य हरिभद्र, श्रीमुम्बलालजी सिंघवी, मूल्ग-३.०० प्रेसों में छप रहे ग्रंथ संस्कृत १. शकुनप्रदीप, लावण्यगरिचित, सम्पा०-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजय । २. बालशिक्षाव्याकरण ठकुर संग्रामसिंहरचित, सम्पा०-पायी मुनि श्रीजिनविजय । ३. नन्दोपात्यान, अनातकर्तक, सम्पा०-डॉ० बी जे. मांगरा। ४. चान्द्रव्याकरण, प्राचार्य चन्द्रगोमिविरचित, सम्पा०-या बी. डी. दोगी। ५. प्राकृतानन्द, रघुनायकवि-रचित, सम्पा०-पघश्री मुनि श्रीजिनविजय । ६. कविकौस्तुभ, पं० रघुनाथरचित, सम्पा०-श्री एम. एन. गोरे । ७. एकाक्षर नाममाता-सम्पाo-मुनि श्रीरमणिकविजय । ८. नत्यरत्नकोश, भाग २, महाराणा कुभकर्णप्रणीत, मम्पा०-श्री आर. मी. पारिस और डा. प्रियवाला शाह। ६. हमीरमहाकाव्यम्, नयचन्द्रमरिकृत, सम्पाo-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजय १०. स्यूलिभद्रकाकादि, सम्पा०-डॉ० आत्माराम जाजोदिया। ११. वासवदत्ता, मुंबन्धुकृत, सम्पा०-डॉ० जयदेव मोहनलाल गुस्ल । १२. प्रागमरहस्य, स्व० पं० सरयूप्रमादजी द्विवेदी कृत, मम्पा०-त्रो० श्रीगङ्गाधर द्विवेदी। राजस्थानी और हिन्दी १३. मुहता नैणसीरी रयात, भाग ३, मुहता नैरणमाकृत, नम्पाo-श्रीबद्रीप्रसाद साकरिया । १४. गोरा बादल पदमिणी चऊपई, कवि हेमरतनकृत सम्पा०-श्रीउदयसिंह भटनागर, एम.ए. १५. राठौडारी वंशावली, सम्पा०-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजय । १६ मचित्र राजस्थानी भाषासाहित्यग्रन्थसूची, सम्पा०-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजय । १७. मीरां-बृहत्-पदावली, स्व० पुरोहित हरिनारायणजी विद्याभूपण द्वारा संकलित, सम्पा०-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजय । १८. राजस्थानी साहित्यसंग्रह, भाग ३, संपादक-श्रीलक्ष्मीनारायण गोस्वामी । १६ रुक्मिणी-हरण, सायाजी झूला कृत, सम्पा० श्री पुरुषोत्तमलाल मेनारिया, एम.ए.,सा रत्न २० मन्त कवि रज्जब : सम्प्रदाय और साहित्य, डॉ० व्रजलाल वर्मा । २१. पश्चिमी भारत की यात्रा, कर्नल जम्म टाड, हिन्दी अनु० श्रीगोपालनागयण बहुरा, एम.ए. २२. बुद्धिविलास, ववतगम भाहकृत, मम्पाo-श्रीपद्मवर पाठक, एम ए. २३. प्रतापरासी, जाचीक जीवण कृत, सम्पा०-प्रो. मोतीलाल गुप्त, ए. ए., पीएच.डी. अंग्रेजी 24. Catalogue of Sanskrit and Prakrit Manuscripts Part I, R.O.RI. (Jodhpur Collection ), ed., by Padamashree Jin vijaya Munis. Puratattvacharya 25. A List of Rare and Reference Books in the R.O.R.I., Jodhpur, compiled by PD Pathak, M.A. विशेष-पुस्तक-विक्रेतायो को २५% कमीशन दिया जाता है । --
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