Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Narmada Sundarino Ras
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blamerlookedeoicelerionlondences
श्री
पंडित श्री मोहन विजय विरचित
नर्मदा सुंदरीनो रास.
शीलं रक्षण माटे कुलीन स्त्रीना पवित्र पतित्र
ता. पणानो आबेहुब चितार
रसिक नीति ज्ञान
धर्म
व्यवहार संसारिक सुख
दुःखमा सद्बोध सद्वत्ति राखवा माटे
सुदृढ शिक्षा रूप..
सरस रसिक चमत्कृति युक्त सुशील कुली
न स्त्रीपुरुपोने हितोपदेशमय वे त्रण
प्रतिथी शुद्ध करी,
शाए नीमसिंह माणकें.
मुंबईमध्ये
निर्णयसागर मुद्रायंत्रमा छापी प्रसिद्ध कर्यो.
संवत् १९५४ असाड शुद ९ मंगलवार.
--
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॥ श्रीवीतरागाय नमः॥ यथ पंमित श्रीमोहनविजयविरचित नर्मदा.. सुंदरीनो रास प्रारंनः॥ .. ॥ प्रजु चरणांबुजरज तणी, वनीने होय ढोक ॥ मायो वली जग जेहनो, विहु अदरने श्लोक ॥२॥ धारक अतिशय एहवा, जिन सुरगिरि परें धीर ॥ हुं प्रणमुं ते वीरने, गौतम जास वजीर ॥२॥ कवि सुरतरु शोलाववा परनृत तनया पूत ॥ ज्ञान चंजने चंडिका, कृपा करी अति नूत ॥३॥ जड तालय मुजा नणी, जनु रूपा खयमेव ॥ शब्दोदधि तारण तरी, सा नारति प्रणमेव ॥४॥ गुरु गुण मणि हारावली, धरिये हृदय तटेण ॥ कीधो तजी पिपीलिका, मत्त मतंग जलेण ॥ ५॥ जिन गुणदर जारति सुगुरु, प्रणमी चरण रसेण ॥ धर्मोद्यम कीजे सदा, सवि सुख लहिये जेण ॥६॥ चार नेद ते धर्मना, दान शील तप नाव ॥ तेहमां शील विशेष ठे, कष्ट रलागर नाव ॥७॥ चनुश्रवण शीलें करी, (२) थयो कुसुमनी माल ॥ पावक पण पाणी थयो, शीलें सिंह शीयाल ॥ ७॥ शीलरूप सन्नाहथी, मन्मथ नृपनां बाण ॥ वेधी न शके वदने, रे मन मृषा म जाण ॥ ए॥ शीलतणे अधिकार अथ, नमया सुंदरि चरित्र ॥ रचीश शास्त्र अनुसारथी, वर्णव करी विचित्र ॥ १० ॥ सांजलजो श्रोता नरो, मित्र पुत्र स्थिर लाय ॥ पण पीतां करतां रखे, महिषी किन्नर न्याय ॥ ११ ॥ ॥ ढाल पहेली ॥ देशी चोपाश्नी॥ जंबूहीप जोयण एक लाख, साधक त्रिगुणी परि धिनी नाख ॥ देत्र सात तिहां अति विस्तार, ना म मात्र कहुँ तास विचार ॥ १ ॥ जरह औरवय पांच से बबीश, बकला तास उवरी सुजगीश ॥ हेम ऐरण्य बे सहसग गसत्त, पण जोश्रण पण कला पमत्त ॥ ॥ श्राव सहस चनसय एकवीश, एक कला हरि रम्यक जगीश ॥ तित्तिस सहस उसय चूल ह, चार कला ए मान विदेह ॥३॥ कुल गिरि ए द्वीप मकार, तास तणो हवे कहिश विचार ॥ जो यण एक सहस बावन्न, बार कला हिमशिखरी मन्न ॥४॥ सदा हेमवंत रूपी चार हजार, उसय दश ने
(३)
जोयण दश कला विस्तार ॥ निषध नील सोसहस
गसत्त, दोय कला ए गिरि पमत्त ॥५॥ संत्त पित्त
षट कुलगिरि दाख, मेलंतां होय जोयण एक लाख
॥जिनवर वचनें करीयें प्रमाण,तेहथी को नहिं अधि
को जाणं ॥६॥हवे जरहैजन पद वैदर्ज, मनुज लो
क शोनानो गर्न ॥ वन उपवनने गहन विशेष, तर
णि किरण करीन शके प्रवेश ॥७॥अति उत्तंग
शिखर गिरि तणां, खडहडें वहेतां रह रवितणा ॥
फरे तसमांनुं निफरणां जलेख, मानुं गंगाधर प्रक
व्यो अनेक ॥ ॥ अवनी वनिता नाल समान, रति
रमणीयक देश प्रधान ॥ नगरी वर्धमाना युतिदरी;
अलकानी शोना रहि परी ॥ ए॥शंकाये लंका वा
पडी, भूकी सुरनगरी त्रापडी ॥ सासय नगरीय वं
नामिनी कुंकुम विदिका ॥ १०॥ मंदिर.
सुंदर गढ भढ पोल, सोहे विजय तणी तिहां उल॥
वर्ण अढार वसे गुणवंत, निज निज धर्म सदा निव
हंत ॥११॥ अतिहि कृपण महिसुर तिस्या, विसर तो
क्षीरोदधि जिस्यां ॥ कडूश वाणी साकर जिसी, ते
हनी उपमा दीजे कीसी ॥ १५ ॥ एहवा मूढ रहे गह
गही, अवगुण सुंणंवो शीख्या नहीं ॥ हृदय कठोर
दिका, जू
.
(४) जेहवं नवनीत, हरिचंड नृप सरसी अप्रतीत ॥१३॥ जनाऽकिरण सारिखा, निर्धन धनद जिस्या पार ख्या ॥ वांका कमलनालिके तीर, निःस्नेही जिम ज ल ने खीर ॥ १४ ॥ निरुपकार जेम रंजाखन, अनि य तो जेम देवी नंन ॥ दुःखीयां जेम दो गुंदक दे व, विरुयां कामदेव अनिनेव ॥ १५ ॥ व्यवहारी व्यापारी वसे, धर्म कारजें सवि धस मसे ॥ परउप कारी परम प्रवीण, जिनवर वचन थकी. लयलीन ॥१६॥पजणी प्रथम ढाल रस मणी, नर्मदा सुंदरी सुचरित्र तणी ॥ श्रागल वात रसाल विशेष, कहे हवे मोहन तिहां नरेश ॥ १७ ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ प्रतिपाले पुरजन जणी, संप्रति नामें नूप ॥ रह्यो दर्प तजी काम नृप, देखी सुंदर रूप ॥१॥हरवा पुर्जनमहिघटा, अतुलीवल शार्दूल ॥ परिजन हंस रमाडवा, अनिनव गंगाकूल ॥२॥ अरियण सहिं ता नूप बल, सेवे गिरिदरी नूप ॥ जेम जल विह तो ग्रीष्मथी, वसे रहे जई कूप ॥३॥ ख्याग त्याग वाचा अचल, न्यायें निपुण नरिंद ॥ धवलीकृत दि ग दश जिणे, करी उदय जस चंद ॥४॥ रति रू .
(५) पा पट्टरागिणी, रतिसुंदरी नामेण ॥ कीधो मुख आजासथी, जांखो उम्पति जेण ॥ ५॥ एक पद उज्ज्वल करे, ननचर चंड प्रसिझ ॥ राणीमुख को ई अपर शशी, विहु पद उज्ज्वल कीध ॥ ६ ॥ ॥ ढाल वीजी॥ प्रवहण तिहांथी पूरीयुरे लाल ॥ ए देशी ॥ नगरनूपण सरिखो तिहां रे लाल, वृपनसेन सा र्थेश ॥ गुणवंता रे॥रयणायर सरिखो धने रे ला ल, जलदधि दाता विशेष. ॥ गु० ॥१॥ सांजल जो श्रोता जना रे लाल ॥ शीलतणो संबंध ॥गुणा सरस वचन रचना तिसी रे लाल, जेम सोनूंने सु गंध ॥ गु० ॥ सांग ॥ जलवट थलवटना करे रे लाल, अव्य वलें व्यवसाय ॥ गु० ॥ महिपति पण माने घणुं रे लाल, धने वश कोण. न थाय ॥ गुण ॥सांग ॥३॥ सोनुं रुपुं सामटुं रे लाल, मणि मा णिकना पुंज ॥ गु० ॥ कर धरे मोती. दासीयो रे लाल, परिहरि जाणी गुंज ॥ गुण ॥ सांग ॥४॥वी रमती तस गेहिनी रे लाल, लाजें नृतलोचन्न । गु० ॥ शील धर्मनी जाणीये रे लाल, अनिनव नू मि जतन्न ॥ गुण ॥ सांग ॥ ५॥ पतिनक्ति चंदान
(६)
नी रे लाल, कोपनो नहिं संसर्ग ॥ गुण ॥ गुणमणि
खाणी गोरडी रे लाल, रूपकला अपवर्ग ॥ गु०॥
सांग ॥६॥विलसे विविध ते दंपती रे लाल, सां
सारिक सुखलोग ॥ गुण ॥ रामा राम नीरोगता रे
लाल, लहीये पुण्य संयोग ॥ गुण ॥ सांग ॥ ७॥ चे
अंगज ने तेहने रे लाल, वीरसेन सहदेव ॥ गुंग ॥
दिनकर हिमकर सारिखा रे लाल, जोडे परम गुण
मेव ॥ गुण ॥ सांग ॥७॥ज्ञषिदत्ता वेटी सहजयी
रे लाल, किन्नरी सुंदरी अणुहार ॥ गु० ॥ बालपणे
सघली कला रे लाल, शीखी पूर्वसंस्कार ॥ गुत् ॥
सांग ॥ ए॥ज्ञषिदत्ता बिहु सहजथीरे लाल, हसेय
रमेय अति प्रेम ॥ गुण ॥ सोहे वे मोती वच्चे रे लाल,
राती चूनी जेम ॥ गुण ॥ सांग ॥ १० ॥ वीरमती
निजपुत्रीने रे लाल, बेसाडे उत्संग ॥ गु० ॥ नित्य
आभूषण नव नवां रे लाल, स्थापे नेहें अंग ॥ गुण
॥सांग ॥ ११॥ बालुडां जस आंगणे रे लाल, धूल
धूसर न रमंत ॥ गु०॥ कारागार आगार ते रे लाल,
जाणीयें अहो पुण्यवंत ॥ गु० ॥ सांग ॥ १५ ॥ हवे
अनुक्रमे वधती थई रे लाल, बाला मायारूप ॥ गु०
टाले नहिं निज देहथी रे लाल, लजादौम अनूप।।
गु०॥सां० ॥ १३॥ जनकें जणवा पाठवीरे लाल, सा अध्यापक गेह ॥ गुण ॥ जैनधर्म जलो अन्यसे रे लाल, लघुश्रमथी धरी नेह ॥ गु०॥ सांग ॥१४॥ कीले अहिंसा तटिनी तटे रे लाल, लीधो विनय कज गंध ॥ गु०॥ चाखी समकित सूखडी रे लाल, जाण्यो जैनप्रवंध ॥ गुण ॥ सांग ॥ १५ निष्ठा एक जि नधर्मनी रे लाल, मिथ्यात्वथी प्रतिकूल ॥ गुण ॥ वि कथा सर्व विरमी रही रे लाल, जेम दल गलित तांबूल ॥ गु०॥ सांग ॥ १६ ॥ पुत्री माही पेखीने रे लाल, हरखे तात अतीव ॥ गुणा तात प्रवृति स हु को करे रे लाल, धर्मकथा ते सदैव ॥गु० ॥ सांग ॥ १७ ॥ जेहवी संगति कीजीए रे लाल, तेह वा गुणनी केल ॥ गु० ॥ कुसुमनी संगतिथी तेलें रे लाल, पाम्युं नाम फूलेल ॥ गुण ॥ सांग ॥ १७ ॥ पामी वीरमती सुतारे लाल, यौवनवय सुकुमाल ॥ गु० ॥ मोहनविजयें वर्णवीरे लाल ॥ वीजी ढाल र साल ॥ गुण ॥ सांग ॥ १५ ॥ सर्व गाथा, ॥दोहा॥ सा पुत्री नवयौवना, देखी चिंते तात ॥.पुरमें को महेन्यसुत, जोश करूं जामात ॥१॥ पुर सघर्बु (७) वर कारणे, जोयुं करी तलास ॥ पण वर पुत्री सारि खो, न मल्यो कोश तास ॥२॥मिथ्यादृष्टि नयरमें, अ घणा धनवंत ॥ तस घर तनुजा थापतां, मन नवि धारे संत ॥३ ॥ केम दे श्रावक वालिका, मिथ्यात्वीने गेह ॥ केम दीजे चंकालने, वृंदा तरु ससनेह ॥४॥ मणि न जडे को लोहमें, म्हेली कुंदन पत्र ॥ वृषनसेन एम मनमें, बालोचे एकत्र ॥५॥ ॥ ढाल त्रीजी॥ हारे माहरे जोबनीयानो लटको दहाडा चार जो ॥ ए देशी ॥ हारे हवे श्राव्यो ए हवे रूपचंड पुरहुत यो ॥ वारु रे रुजदत्त नामा वाणीयोरे लो। हारे कां करवा वाणिज्य वर्षमान पुरमांहि जो, खेश्ने करियाणुं लोकें प्रमाणीयोरे लो॥१॥ हारे तेणे वेची साटी सयण वसाणानी कोडि जो, कीधा रे तेणे गांठे दाम सोहामणा रे लो॥ हारे जस पु ण्य सखा ने तेहने शी खोड जो, एके के पगले रे पुंज मणितणा रे लो॥२॥ हारे तेणे पहेरी अंबर सखरां चहूटामांहि जो, हिंडे ते मोडामोडे डेलशुरे लो॥ हरि परदेशीनी परगाममें एहिज रीति जो, फोगटीयो थर फूले धोबी बेलशुरे लो ॥३॥ हारे तेणे
(ए)
जमतां नमतां पुरमां कीधो मित्र जो, कुबेरदत्त नामा
एक व्यवहारीयोरे लो ॥ हारे तस मांहोमांहे वाकी
पूरण प्रीति जो, ससनेही नेहीनी वात नारीयोरे
लो॥४॥ हारे एम नांख्यु कुवेरे अहो अहो मित्र
रुदत्त जो, बंधाणी तुमसेंती माया आकरीरे लो॥
हारे तुम्हे परदेशीडा कामणगारां लोक जो,पंखीनी
पेरेजा न मिलो फरीफरीरे लो ॥ ५॥ हारे मेंतो
मित्रजी माहरा कहींयें था पुरमांहि जो, नेहडलो
नवि कीधोरे कोश्थी एवंडोरे लो॥ हारे मारी विन
ति मांनो श्रावो मंदिर मुफ जो, कां जो पोताना
करीने त्रेवडोरे लो॥६॥ हारे हुँ तो जाणीश की
धी मुझने करुणा जोर जो, प्राहूणला तुम जेहवा
किहांथी आंगणेरे लो॥ हारे तुम जेहवा नरथी
क्यांहथी एक घडी गोठ जो, जेह तेहथी वातडली
करतां नवी वने रे लो ॥ ७ ॥ हारे तुम्हे इहां तो
रदेता हशो कोश्कने गेह जो, तेहथी शुं घर लूंखें
कहोजी आपणुंरे लो॥ हारे तुमे रदेशो तेता दिन
करशुं गुजराण ज़ो, फेरीने शुं कहीयें तुमने घj
घणुंरे लो ॥७॥ हारे कोइ वातनो अंतर त्रेवडो
माहरा राज जो, करशुं जे का थाशे अमथी चा
ढूंकडा रे लो ॥
(१०)
करीरे लो ॥ हारे अमें बेशु सो सो लोटणां तुम्द
हजूर जो, कहियें पयललीया साहिव अनुसरी
रे लो ॥ए ॥ हारे तव वोल्यो ततक्षिण रुरुदत्त
हित लाय जो, नाइजी तुम्हें नांख्युं ते अमें शिर
धडे रे लो ॥ हारे कां तुम अम मेलो हू पूरव
लेख जो, दैवे ए मनगमतुं काम जर्बु कमु रे लो॥
॥१०॥ हारे जो तुमचो हेत डे अम उपर परिपूर्ण
जो, अलगा रहीयाश्री तोश्ये
हारे जूड़ गयण धनाधन उमदे नूतल मोरजो,
मंके रे ते तांडव रसवशे रूपडारे लो ॥ ११॥हारे
जुर्व किहां दिनकरने किहां कैरववन्न जो, तोहीपण
विकसे ते साचा नेहथी रे लो॥ हारे कांश क्यारे
कोश्थी टाक्ष्यो पण न टलंत जो, मानेतो मनमे
लो होय जेहथी रे लो ॥ १५ ॥हारे तुमें राजी जो
बो मुफथी आवे गेह जो, तो तुमने किमए 3
हवं कहो थोडे गजेरे लो॥ हारे एम कहीने रुष
दत्त आव्यो मित्रने गेह जो, लाखेणी मनुहारो ते
सखरी सजेरे लो ॥ २३ ॥ हारे रहियो ते परदेशी
मित्रना मंदिर मांहि जो, पोताना कुटुंबनी परे सहु
थक्ष रह्यां रे लो ॥ हारे ते खाये पीये नित्य नवला
,
(११)
आहार जो, - किणहि परे पर करीने नवी लह्यो रे
लो ॥१४॥ हारे ते वेगे रुरुदत्त एक दिन गोखम
कार जो, जूए पुरकेरी शोना नयणथी रे लो॥एतो
मोहन विजयें जांखी त्रीजी ढाल जो, स्नेहाली
हितकारी मीठी वाणियरे लो ॥ १६ ॥ सर्व गाथा॥
॥ दोहा॥
दीठी रुत्तदत्तें एहवे, ऋषिदत्ता सोत्साह ॥ स
खीयां संगें परवरे,घालिने गले वांहि ॥१॥ वाला
सघली विविहपरें,हसती रमती त्यांहि ॥एक एकने
ताली दीये, चाले चहूटा मांहि ॥२॥ जाणे शा
वक हंसना मानसरोवर पंति ॥ खेले मुख करी के
सरा, तिम वाला शोनंति ॥३॥ सा देखी परदेशी
यो, चिंते चित्तथी एम ॥ खेचरपुत्री नगरमा रमवा
आवी केम ॥४॥ के शुं प्रगटी पन्नगी, पुहवीतल
थी एह ॥ एतो कौतुक सारिखं, दीसे वे ससनेह ॥
॥५॥ एहवे तिण हिज अवसरे, मूर्गगत थयो
तेह ॥ धडहडीने धरणी ढल्यो, जिम गिरिवर शि
खरेद ॥ ६ ॥ मूर्बित देख्यो मित्रने, श्राव्यो कुवेर
वरवीर.॥ कीध सचेतन ततखिणे ढोली मंद
मी॥॥
(१५) ॥ ढाल चोथी॥ रंग रहो रे रस रहो रे फूल गुलाबरो ए देशी॥ बांधव कहो ए शुं हतुं, मूळ पाम्या एमहो रसीया रे मित्रजीरे नांखो मया करो ॥ए आंकणी ॥ ते कारण मूजने कहो, जाण्यु जाये जेम हे ॥र० ॥१॥ वगर कहे केम जाणीयें, पारका मननी वात हे ॥ रण ॥ खोली मन साचु कहो, जेम जाणुं परमार्थ हे ॥ र मी० ॥ ॥ जे कांश मूजयी सीजशे, ते तो करीश हुं काम हे ॥र०॥ वचन कुवेरदत्तनां सु णी, बोल्यो रुदत्त ताम हे॥ र ॥ मी० ॥ ३॥ श्र हो अहो सजान माहरा, अकथ कथा छे एह ॥ रण ॥ तो तुम आग जाखीयें, जो तुमथी होये तेह हे ॥ र ॥ मी० ॥४॥ नहिं तो कुण नांखे कहो, जल मे कंचन काल हे॥ र॥ फुःख ते श्रागल दाखीये, जे टाले तत्काल हें॥ र ॥ मी० ॥५॥ ते तो कोश नहिं जगतमें, जे जाणे. परपीर हे ॥र॥ गोष्टि न ती तेहथी कही, मनमेलू जे वीर दे ॥रामी॥६॥ रोग होवे तो वैद्यने, दाखीयें करी उपाय हे ॥ र ॥ पण ए अंतर गत तणी, कोइ थकी न कलाय ॥रण ॥ मी० ॥७॥ ते माटे तुमने किसुं, कहीयें कहो म , (१३) दाराज हे ॥ र० ॥ मन ए जाणे माहीं; वात सवे शिरताज हे॥ र ॥ मी ॥७॥ वोल्यो कुवेरदत्त फरी; कहो कहो मनमें हूंस हे॥ र ॥ जो न कहो मुऊ थागलें, तो वे तमने सूंस हे रण मीणा वचन सुणी एम मित्रनां, नांखे रुजदत्त लांख हे। र० ॥ हमणां शहां वेगे हतो, हुँ आपणे गोख हे ॥र ॥ मी० ॥१०॥ तेहवे में दीठी वालिका,.कि नरी सरखी एक हे ॥ र ॥ विस्मय हुँ पामी रह्यो देखी रूपविवेक दे॥ र ॥मी० ॥ ११॥ विधाता ए केम घडी शक्यो, एदवे रूपे एहरे ॥ र० ॥ एक ज वक्र विलोकतां, नवलो कीधो नेह रे ॥र ॥ मी ॥ १२ ॥ वाला ए प्रेमनी सांकली, सांकती ग ततखेव रे ॥ २० ॥ काम शिलीमुख देश गइ, किणही न जाण्यो नेद हे॥ र॥ मी० ॥ १३ ॥ साले ने नट सालसी, दण दण हियडा मांहिहे -॥रण ॥ वसती नगरीमां गश, चित्त चोरीने थांदि हे ॥ र ॥ मी ॥ १५ ॥ ए पुत्री डे केहनी, मित्र कहो मुजतेह हे ॥रण ॥ जिम ते वाला जोयवा, पोहचूं तेहने गेह हे ॥ र ॥ मी० ॥ १५ ॥ विण दी ते वालिका, कांश एह न सूहाय हे ॥र ॥
(१४) जलथी ते मीन वियोगीजं, तेहनी शी गति थाय हे ॥ र ॥ मी ॥ १६॥ कुबेरदत्त हवे वोलशे, वाणी अतिहिं रसाल हे ॥र॥ मोहन विजये सोहा मणी, नांखी चोथी ढालरे ॥र ॥ मी० ॥ १७ ॥ सर्वगाथा, ॥ दोहा॥ कुबेरदत्त हवे मित्रने, नाखे वचन सुरंग ॥ रे जाईए शो कस्यो, खोटो चित्त उमंग ॥१॥ वृषनसे ननी पुत्रिका, ए ऋषिदत्ता नाम, आज लंगण पर एणी नथी, सुकलीणी गुणधाम ॥२॥ जैनधर्म सम कित धरों, ने कन्यानो तात ॥ तेणें करी करतो न थी, मिथ्यात्वी जामात ॥३॥ समकितधारी एह वो, जो वर मलशे कोय ॥ तो ए तस परणावशे, दूधे पयतल धोय ॥४॥ तुमने अमने त्रेवडे, मि थ्यात्वीनुं रूप ॥ तो तस पुत्री उपरे, खोटी न करो चूंप ॥ ५॥ काम ए मुजथी नवि होये, रे सूरिजन महाराज ॥ लालच खोटी नहि दी, लाजें विणसे काज ॥६॥ ॥ ढाल पांचमी। नदी यमुनाके तीर, उडे दोय पंखीयां ॥ ए दे
(१५)
शी ॥ रुरुदत्तनी सुणी वाणी, तदा बानो रह्यो ॥पा
बो अदर एक, फरीने नवि कह्यो ॥ आलोचे मन
मांहि, उपाय को करूं ॥ कपटें पण सार्थेश तणी
पुत्री वरं ॥ १॥ जो श्ण अवसर माहरी, बुद्धि न
केलधुं ॥.तो पठे आवशे काम, कहे बल खेलतुं ॥
मित्र थकी तो एह, कारज नवी उघडे ॥ तो निः
खारथ कोण, पूंठे एहनी पडे ॥ ५॥ हुँ हवे माह
रीमेले, प्रपंच कर वहीं ॥ पण ऋषिदत्ता एह, वरेवी
में सही॥ निर्गत जे गजदंत, फरी पेसे नहीं ॥ के
की पीठ सुरंग, मटे नही लोकहिं ॥३॥ उद्यम वि
ण ए काम, किसी परें सीऊशे ॥ नारी होशे कंव
जेम जलें जीजशे ॥रण धण कण गुणमाट, विलंब
न कीजीये ॥ लासर नाखी वात, तेणे न पतीजीयें
॥४॥ए जिनधर्म श्रावक, केरी वालिका ॥ एड
ना जिननी वाणी, तणी प्रतिपालिका-॥ हूं तो श्राव
क धर्मनो, मर्म जाणुं नहीं ॥ मन तो वरवा काज,
रह्यं वे उम्मही ॥५॥ तेमाटे हवे साधु, समी
जाश्ने॥ शीखू गृहस्थ आचार, के उद्यम लाश्ने ॥
पठे शपिदत्ता तात, तणे संगें रहुं ॥ नोगवी कन्या
तास, वरी वांठित लहुँ ॥६॥ उठ्यो करी आलोच,
ला
, ॥ (१६) रुजदत्त एहवे ॥ पहेरी वस्त्रने जूषण,जे अंगें फवे॥ पहोतो पूबत पूबत, तेह उपासरे॥वंदी वेगे ताम, के साधु उपाश रे ॥७॥ गुरु पूढे महानुनाव, क हो कीहां रहो ॥ दीसो बो गृहस्थ विवेकी, नलो विनय वहो ॥ सांचलो तो कांश धर्म, कथा संजला वियें ॥ एके अदर सांजलीये, जो श्हां श्रावीयें ॥ तव बोल्यो रुरुदत्त, हसी कपटें करी॥ जी स्वामी उपदेश, दीयो मुफहित धरी ॥ धर्म कथाने काज, श्राव्यो बुं तुम कन्हे ॥ सीके जेहथी काज, श्रादे शो ते मुने॥ ए ॥ आरंज्यो उपदेश, गुरु तस श्रा गले ॥ते पण कपटी नीचे, नयणे सांजले ।गुरु क हे सघली वस्तु, अथिर करी जापीयें ॥ खार्थनूत संबंध, करीने प्रमाणीयें ॥ १०॥ ए संसार असार मां, कोश कोनुं नहीं ॥ साचो एक श्री जिनधर्म, सखाई बे सही ॥ जीव करेले पाप, कुटुंबने पोष वा ॥ पण नोगवतां पाप, न श्रावे संतोषवा ॥११॥ तरला तोय तरंग, तिस्यो धनगारवो ॥ बाजीगरना खेल,समो नव धारवो॥ए धन घरणी धाम, न कोश लश् गयो ॥ जिहां जश् उपन्यो त्यां हिं, तिहां तेह नो थयो ॥ १५ ॥ मृगतृष्णाने काज, फिरे मृग ,
(१७)
रीवडो॥ तेम धन तृष्णा माटे, अटे ए जीवडो
जेणे जिमणे हाथे, करी धन वापसुं॥ तेणे सुरगति
द्वार, सहि करी चमु ॥ १३ ॥ दान थकीज गृ
हस्थ, करे शुचि आतमा ॥ पुष्कर तप तपि शुरु,
हूये महातमा ॥ समकित रत्न अमूल, तणो खप
कीजीयें ॥ वली उपशमरस स्वाद, करीने पीजीये ॥
१४ ॥ एम निसुणी उपदेश, कहे रुमदत्त हसी॥
अहो गुरु समकितवात, हवे चित्तमा वसी । पांच
मी ढाल रसाल,आनंद उपजावती ॥ मोहन विजयें
रंग, कही मन लावती ॥ १५ ॥ सर्व गाथा:
॥ दोहा ।।
रुपदत्त कर जोडीने, नांखे गुरुने हेव ॥ सूधो
श्रावक मुजकरो, दीन दयालु देव ॥१॥दिन एता
नूलो जम्यो, पाम्यो हवे जिनधर्म ॥ शीखवो श्राव
कनी क्रिया, दया करी गुरु हर्म ॥२॥ मूक्यु हवे
मिथ्यात्वने, दीन. पिता महाराज ॥ उदय थयो
समकिततणो, अंतरंग दिनराज ॥३॥ सुगुरुये
जाण्यु ए सुगुण,दिसे मानव कोयलाल वरं श्रावक
करी, जेम लहुं कर्मी होय ॥ ४ ॥ श्रावकधर्म- तणी
किया, सयल शीखावी ताम । रुरुदत्त हरख्यो हि
, (१७) ये, सफल हशे हवे काम ॥५॥ जेम करिवरें पी धी सुरा, जेम पाखस्यो मृगराज ॥ तेम कपटी ठग चढ्यो, वरवाने ससमाज ॥६॥ ॥ ढाल नही॥ राजा जो मिले ॥ ए देशी ॥ रुदत्त विषये थ यो लीन, मांस पेशीथी जेहवोज मीन ॥ धिक् धिक कामने ॥ जेणे धूत्यो अखिल संसार, धिक् धिक का मने ॥ एयांकणी ॥ नर सुर असुर अपर पण जाण, कामें तास मनावी आण ॥धिणार॥ कौशिक दिन कर वायस चंद, देखी न शके कहे कविवृंद ॥ धिः ॥ पण कामी जन रजनी दीस, पेखे नहि नहिं ए जग दीश ॥ धि॥२॥ पंचानन करिवर श्रहि थोक, जीते जुजबलथी बहु लोक ॥ धिम् ॥ जे जरा नीरु जीते धरी टेक, नर कोडीमा कोश्क एक ॥धि॥३॥ परशस्त्र दे सूर सपराण, पण बेदे को मनमथ बा ण ॥ धि ॥ कामे कुण कुण न कर्यां काम, कामे न गंज्या तास प्रणाम ॥ धि॥४॥ हवे रुरुदत्त कृषिसंग निवारि, हू कपट श्रावक तेणी वार ॥ धि ॥ आव्यो वृषनसेन तणे गेह, मिलियों कपटी आणी नेह॥धि॥५॥ नीपट घणी कीधी मनुहार,
(ए)
दीवू शासन साथैशे तिवार॥धिणा कहांथी श्राव्या
जाशो किहां मित्र; नाम कहो तुम कवण पवित्र ॥
धि० ॥६॥ण मंदिर करुणा करी केम, नांखो
जेहथी जाणुं जेम ॥ धि० ॥ वोल्यो कपटी श्रावक
तेय, अंवर ठेहडो मुहडे देय ॥ धि ॥ ७ ॥ नयर
अमारं ए संसार, लाख चोराशी योनि आगार ॥
धि ॥ जीव संसारी ने ते मूळ, तुम्ह ते शुं राखी
ये गुद्य ॥ धि ॥ ॥ अनुक्रमें जैन नगर में दी,
चारित्रधर्म नृप नेटो ईठ ॥ धि ॥ सवोधनामा
तास प्रधान, दी, मुजने द्वादश व्रत दान ॥ धि
॥ए ॥ परणाववा मांडी दश वाल, पण में मन न
कर्यु ततकाल ॥ धि ॥ कीधो श्रावक मुझने तेण,
जिननक्तियुत परम गुणेण ॥ धि० ॥ १० ॥ श्म
नीसुणी चिंते सार्थेश, पूरण से श्रावक सुविशेष
धि०॥ अहो थहो जिनधर्मी वडनाग, परणीते
परण्यो वे कहेवो वैराग ॥ धि ॥ ११॥ धन धन
एहने सवि सुख होय, नव्य प्राणी दीसे वे कोय
धि० ॥ पुनरपि पूठे सार्थ एवाच,थहो धार्मिक तमें
वोल्या साच ॥ धि० ॥ १५ ॥ ए पुर घर नृप मंत्री
जात, ए तो तमे कही ज्ञाननी वात ॥ धि० ॥ पण
(२०) अव्यथी कहो नगरी नाम, सनिलिये श्रवणे गुण धाम ॥धि॥१३॥ आग्रह सार्थेशकेरो जाणि, वोदयो धूरत निगुण अयाण ॥वसिये रूपचंलपुर गाम,श्रावक रुदत्त माहरूं नाम ॥ धि॥ १५ ॥ इहां हुं श्राव्यो बुं वाणिज्य काज, तुमने श्रावक सुण्या महाराज ॥ धि॥ साधर्मीनी सगाई जाणि, श्राव्यो बुं मलवा शहां सुविहाण ॥ धि० ॥ १५ ॥ अमने मिथ्यात्वी नो न रुचे संग, जेम हंसने गमे न काककुरंग ॥धि॥ हरख्यो वृशनसेन ततकाल, पण नवि जाणे माया जाल ॥ धि० ॥ १६ ॥ धोकुं ते जेतुं दी दूध, धूर्तनी नक्ति विशेष प्रतिबुझ ॥ धि॥ पत्नणी रूडी बही ढाल, मोहनविजयें थर जमाल ॥ १७ ॥ सर्वगाथा॥ ॥ दोहा ॥ रुरुदत्त सार्थेशथी, करे धर्मनी वातः । कोइ जाणे जाणे नहीं, कपट राश्मात्र ॥१॥ वृषनसेन सार्थेश करे, व्रत पोसह पञ्चरकाण ॥ सामायिक खोटे मनें, ते धूरत महिराण ॥ ५ ॥ साथे थर सा र्थेशने, ते आवे गुरु पास॥ शिर धूणे ने सुणे कथा, जेम अहि नाद विलास ॥३॥ जिम प्रजुजी स्वामी J (१) तहत्त, धन साधू उचरंत ॥ मुख मीठो धीठो हिये, रुजदत्त कपट वहंत ॥४॥ पूठे वली वखाणमां, वारु गहन विचार ॥ माह्यो थई वेसे वचें, जोजो कपट आचार ॥ ५ ॥ दंनी मुख वोले दूरसुं, हिये इलाहल होय ॥ पूठसहित फणिनृत प्रत्ये, शिखी गलंतो जोय ॥६॥ रुपदत्त हवे अनुक्रमें, कहे सार्थपने ताम, हवे देजो मुफ श्रागना, तो पोहो चुं निज गाम ॥७॥ ॥ ढाल सातमी॥ गढ बुंदीरा हाडा वहाला, चलण न देगुं ॥ ए देशी ॥ निसुणी सार्थेश रुरुदत्त मुख वाणी, चा लशे सयण सयाणो हो ॥ रूपचंपुरवासी हो मि वजी माहरा, चलण न देगुं ॥ ए आंकणी ॥ एद वो सनेही वाहलो किहांथकी मलशे, धर्मी सुनग सपराणो हो ॥ रू० ॥ १॥ एतो सनेही प्यारो मु ऊघरे श्राव्यो, जेम बालसुघर गंगा हो ॥ रू.७ ॥ चीजा घणाए मल निगुण नदेजा, कुटिल उलंक अनंगा हो ॥ रू० ॥२॥ मिथ्यामतने एणे सुदणे न दीठो, केवली वयणे रातो हो ॥ रू० ॥ एहवो विचारी जगमांहि न कोई, केणे मि रहे ए जा
(२२)
तो हो ॥ रूप ॥३॥ पुत्री जो माहरी एने परणा
बुं, जोईए तेहवो जमाई हो ॥ रू॥ नाव नदी जो
ए वर मलियो, पुत्रीनी पूर्ण कमाई हो ॥ रू० ॥
४॥ एहने मूकीने बीजा केहने परणावं, तो सरे
काज प्रमाणे हो ॥ रूप ॥ ए ऋषिदत्ता वखतें आ
कष्यों, आव्यो वर श्ण टाणें हो ॥ रू॥ ५॥ पूटुं
एहने जश् गोद बिनाई, जो मुफ विनति माने हो
॥ रूप ॥ एह, आलोची रुजदत्त जणी पूजे, सार्थप
जश्ने बने हो ॥ रू० ॥५॥ पुत्री अमारी साजन
तमें हवे परणो, ए जे अरज अम केरी हो ॥रू॥
सेवा करुं साजन अमथी जे थाशे, ना न कहेजो
फेरी हो ॥ रूप ॥ ७॥ अमचा हियामां साजन तु
म गुण वसिया, तेणे करी कहीये डे ताणी हो ।
रूप ॥ पुत्री अमारी साजन बे दृढधर्मी, जोडी ए
सरस समाणी हो ॥ रूप ॥ ॥ एम सूणीने साज
न रुजदत्त हरख्यो, आपणा मनथी विचारे हो ।
रूप ॥ जिण उद्देसे साजन कपट करुं बुं, कीबूं पा
धरूं ते किरतारें हो ॥ रूपए ॥ आज अमीरसें
जलधर वूट्यो, मुंह माग्यो पड्यो पासो हो ॥रू॥
काकतालीनो साजन न्याय थयो ए, दूजे कोश्क तमा
,
• .
।
(२३)
सो हो ॥ रू० ॥ २० ॥ दणएक विलंबी साजन रु
अदत्त वोल्यों, शाहजी श्रमें परदेशी हो ॥ रू॥
जाण्या विहूणा साजन पुत्री केम देशो, जूर्ज हृदय
गवेपी हो ॥ रू० ॥ ११॥ सार्थपति नांखे साजन
तुमने पिठाण्या, गे साधर्मिक मोरा हो ॥ रूप ॥
रूप गुणे करी साजन जातिज जाणी, तेणेकरी क
रीये लिए निहोरा हो ॥ रूप ॥ १५ ॥ कन्या वस्या
विण तुमें किहां जाशो, नूलामणी नवि कीजे हो
॥ रू.० ॥ कपटी पयंपें साजन वारु वरेणुं, केम तुम
ने उहवीजे हो ॥रूप॥ १३॥ हरख्यो सुणीने सार्थ
प निज घरे आव्यो, कीधी सखर सजाई हो ।
रू० ॥ लग्न लेवाये साजन चोरी वनाई, वहेंचें बीच
बधाई हो ॥ रू० ॥१४॥ धवल मंगल साजन सखर
सोहाये, सोहेलां सखरां गवाये हो ॥ रू० ॥ गय
वरघोडे साजन लीध जमाइ, तोरण मोतीडे वधा
ई हो ॥रू॥ १५ ॥ होम हवन साजन तव निरमा
इ, द्विजमुख वेद पढाई हो ॥ रूप ॥ चार मंगल
साजन तिहां चरताई, अतिगत फेरा फराई हो ॥
रू.० ॥ १६ ॥ कपट श्रावक साजन साहस हेजे,
इपिदत्ता परणाई हो ॥ रू. ॥ ढाल सुरंगी साजन
-" (२४) सातमी नांखी मोहन वचन सवाई हो ॥रू॥१७॥ ॥ दोहा ॥ परणी कपटी श्रावकें, शषिदत्ता तेणीवार ॥ उ त्सव महोत्सव करी घणा, वरत्या जयजयकार ॥ ॥ १॥ धन बहु दीधुं दायजे, कापड नूषण कोडि ॥ रुदत्त दंनी तणा, पहोंता संघला कोक ॥२॥ दंनी सा कन्या वरी, गयो कुबेरदत्त पास ॥ वात कही सघली तिसे, आणी मन उदास ॥ ३ ॥ केह वि परणी कपटें करी, श्रावक पुत्री आज ॥ डे मु- जरो तुम मित्रने, अहो मित्र महाराज ॥४॥ कुवेर दत्त समरथ अक्ष, हस्थो करतल आस्फाल ॥ कहे धन्य धन्य तुफ बुद्धिने, कपट सरोवर पाल ॥ ५ ॥ दिन केते कपटी हवे, हाथ करी निजदाम ॥ शीख ग्रहे ससराझने, विनय करीने ताम ॥ ६ ॥ । ढाल आठमी॥ मारे आंगणेहो राज, बेला मारु वावडीजी ॥ ए देशी ॥ जो जो कपटी हो राज, कहे. करजोडीने जी ॥ निज ससराने हसी तेह, गुणवंता जी ॥ भूज दीजें हो राज, सदन नणी शीखडी जी॥ ए आंक णी ॥ इहां श्राव्यां हो राज, दिवस के थर गया ..
(२५) जी॥ तुम साथें थयो बहु नेह ॥ २ ॥ मूळ ॥१॥ माहरे मंदिर हो राज, जोतां हशे जे वाटडी जी॥ वली आवशुं इण पुरमांहे ॥ गुण ॥ दिशि खांट्या इं हो राज, शहां तुम शुं मलीजी ॥ घणुं जाणजो थोडा मांहि ॥ गु० ॥मू॥२॥ अम लायक हो राज, होय कारिज जि कोजी ॥ लखी मोकलजो तुम्हे तेह ॥ गु० ॥ अमथी अंतरहो राज, तुमे मत रा खजो जी, थे तो नवल निवाहो नेह ॥ गु० ॥ मू॥ ॥३॥ तिहां रह्या पण हो राज, अमें दुं तमारडा जी, तुमे कीधा महोटा अम्म ॥ गुण ॥ माहरे नयरे हो राज, किवारे पधारशो जी, जो न आवो तो तुमने सम्म ॥ गुण ॥ मूळ ॥४॥ एणी पुरमांहे हो राज, श्रम सुखीया थया जी, रखे मूको कदीरे वी सार ॥ गु० ॥ तुम जहेवा हो राज, धर्म सनेही नवि मीले जी, कुंण मलशे अमथी एवार ॥ गुण ॥ मू॥५॥ जिनयात्रा हो राज, समयें संचारशुं जी ॥ तुमे साह जी सुगुण विश्राम ॥ गुण ॥ एम कपटी हो राज, करे लटपट घणीजी ॥ सूण। वो व्यो वृपत्नसेन ताम ॥ गु० ॥ ॥ ६॥ किहां चा लशो हो राज, करी प्रीत एवडी जी ॥ मूखे कहो - .. (२४) सातमी लांखी मोहन वचन सवाई हो ॥रूण॥१७॥ ॥ दोहा॥ परणी कपटी श्रावकें, शषिदत्ता तेणीवार ॥ उ त्सव महोत्सव करी घणा, वरत्या जयजयकार ॥ ॥ १ ॥ धन बहु दीधुं दायजे, कापड जूषण कोडि ॥ रुदन्त दंनी तणा, पहोंता सघला कोर ॥२॥ दंनी सा कन्या वरी, गयो कुवेरदत्त पास ॥ वात कही सघली तिसे, आणी मन जब्बास ॥३॥ केद वि परणी कपटें करी, श्रावक पुत्री आज ॥ वे मु- जरो तुम मित्रने, अहो मित्र सहाराज ॥४॥ कुवेर दन्त समरथ थक्ष, हस्थो करतल आस्फाल ॥ कहे धन्य धन्य तुफ बुद्धिने, कपट सरोवर पाल ॥ ५ ॥ दिन केते कपटी हवे, हाथ करी निजदाम ॥ शीख ग्रहे ससराकने, विनय करीने ताम ॥ ६ ॥ ॥ ढाल आग्मी। भारे आंगणेहो राज, बेला मारु वावडीजी ॥ ए देशी ॥ जो जो कपटी हो राज, कहे करजोडीने जी ॥ निज ससराने हसी तेह, गुणवंता जी ॥ मूज दीजें हो राज, सदन नणी शीखडी जी ॥ ए आंक णी ॥ इहां श्राव्यां हो राज, दिवस के थक्ष गया (२५) जी॥ तुम साथें थयो बहु नेह ।। गु ॥ मू०॥ १॥ माहरे मंदिर हो राज, जोतां दशे जे वाटडी जी ॥ वली आवशुंण पुरमांहे ॥ गुण ॥ दिशि खाट्यां डं हो राज, श्हां तुम शुं मतीजी ॥ घणुं जाणजो थोडा मांहि ॥ गुण ॥॥॥ अम लायक हो राज, होय कारिज जि कोजी. ॥ लखी मोकलजो तुम्हे तेह ॥ गु० ॥ अमथी अंतरहो राज, तुमे मत रा खजो जी, थे तो नवल निवाहो नेह ॥ गु०॥ मू०॥ ॥३॥ तिहां रह्या पण हो राज, अमें दुं तमारडा जी, तुमे कीधा महोटा अम्म ॥ गु० ॥ माहरे नयरे हो राज, किवारे पधारशो जी, जो न आवो तो तुमने सम्म ॥ गु० ॥ मू॥४॥ एणी पुरमांहे हो राज, श्रम सुखीया थया जी, रखे मूको कदीरे वी सार ॥ गु० ॥ तुम जहेवा हो राज, धर्म सनेही नवि मीले जी, कुंण मलशे अमथी एवार ॥ गु० ॥ मू॥ ५॥ जिनयात्रा हो राज, समयें संचारशुं जी ॥ तुमे साह जी सुगुण विश्राम ॥ गुण ॥ एम कपटी हो राज, करे लटपट घणीजी ॥ सूणी वो व्यो वृपत्नसेन ताम ॥ गुण ॥ मू०॥६॥ किहां चा लशो हो राज, करी प्रीत एवडी जी ॥ मूखे कहो
(२६)
बो जी जाशुं हवे ॥ गुण ॥ अम उपरे हो राज, थर
जाउँ सुखें जी ॥ पण चलण न देशुं देव ॥ गुण ॥
मू० ॥ ७॥ फरी गोठडी हो राज, किहांथी तुमार
डीजी ॥ ए तो बनतां बनी गश् गोठ ॥ गुण ॥ अमे
कोथी हो राज, नहीं तो करां प्रीतड़ी जी, जे पव
ने न पडे कोउ ॥ गुण ॥ मू० ॥ ७॥ तुमे स्वामी हो
राज,अौं अमीरस बोलता जी॥तेणे माहीं हेलव्यु
हीर ॥ गुण ॥ नहिं तो कोश्ने हो राज, धीरु केम
बांहडी जी ॥ अमें श्रावक धर्मी धीर ॥गुमाए।
अमें तमने हो राज, दीधी एक पुत्रिका जी, कि
स्यो पडदो राख्यो नांहि ॥गु०॥ एम निःस्नेही हो
राज, तुमे पर देशीया जी ॥ द्योबो हली मली बेह
दूसाह्य ॥ गु० ॥ मूग ॥ १० ॥ जली जाणी हो राज,
तुमारी प्रीतडी.जी, हवे चालो बो माया लाय ॥
गुण ॥ सुंदर मंदिर हो राज सवि, जे तुमारडां जी
तूमें रहो रहो महाराय ॥ गु० ॥ मूम् ॥ ११॥ तव
रुजदत्त हो राज, बोल्यो हसी शाहशुं जी ॥ हठ
केरुं नहीं ले काम ॥ गुण ॥ अमें लागर हो राज,
वेपारी वाणीया जी ॥ अडे कारज बहूलां धाम
॥ गुण ॥ मू॥ १५ ॥ वली मिलशुं हो राज, जो
,
(२७) ३ खरो नेहलों जी ॥ पण हवणां तो दीजें शीख ॥ गु० ॥ सत साखें हो राज पसरजो साहिवाजी, तुमें जीवजो कोडि वरीस ॥ गु० ॥ मूळ ॥ १३ ॥ वेसी तव सार्थपें हो राज, सोंपी निज पुत्रिका जी ॥ तस शीखडी दीधी ताम ॥ गुण ॥ शुज शुकने हो राज, तदा संप्रेडिया जी, सहु साजन करे गुणग्राम ॥ गु० ॥ ॥ १४ ॥ वेसी रथमें हो राज, रुरुदत्त निजपुर चालियाजी ॥ कही आग्मी हो राज, स खूणी सोहामणी जी ॥ ए तो मोहन विजयें ढाल ॥ गुण ॥ मू० ॥१५॥ ॥ दोहा॥ ऋषिदत्ता रुरुदत्त विहु, पंथे वहे सोत्साहि ॥ अ नुक्रमें पहोतां हेज नरी, रूपचंजपुरमांहि ॥ १ ॥ कुटुंव सयल हर्षित ययु, रुजदत्त आव्यो जेण ॥ साथै झपिदत्ता निरखी,हरख्यो अतिहिं तेण ॥२॥ सासूने पाये पडी, सासू सुकुलिणी ताम ॥ वडां वडेरां श्रादिदें, सहुने कीध प्रणाम ॥ ३॥ वेठी मंदिर हेज जरी,कीयां जोजन सार॥रुदत्त पण कपटगृह, जम्यो हस्यो तेणीवार ॥४॥ अतिप्रीतें पति प- रे (२७) झिनी, जोगवे नोगप्रकाश ॥ दो गुंदक सुरनी परें, विलसे लबिविलास ॥५॥ ॥ ढाल नवमी॥ गढडामांहे फूले सही हाथणी ॥ ए देशी ॥ आचार घरना सा तव देखीने, मनडामांशोचे वारं वार ॥ माहरे प्रीतमीए नेसहि तो कैतव केलव्यु, हूंतो श्रावक केरी बालिका, एहोनो तो महेश्वर श्रा चार ॥ मा ॥ १ ॥ सहितो ए कपटी श्रावक यने परणीवाहीने एणे कूड ॥ माण ॥ जली हूं जुलवाणी दीसुं एहथी, धुरथी में नवि जाण्युं कूड ॥ मा० ॥२॥ धूतारे नाखी मुजने फंदमां, तेहनो हुँ केहो करीश उपाय ॥ मा० ॥ माहरुने पिहर रद्यं वेगखें, सुःखद्धु ए जाइ केहने कहाय ॥ माग ॥३॥ सुरतरु जाणी में वाथ जरी हती, थई नि वड्यो नाह बबुल्ल ॥ मा० ॥ दीसे बे बाहेर फररा फूटरा, नीतर सुरपति मदिरा मूल ॥ माण ॥ ४ ॥ कर तो में होंशे करी घाट्यो हुतो, जाणीने लीली नागरवेल ॥ मा० ॥ पण तो ए निवडीयों कौअच वेलडी, खलढुंती आवी मलीयो खेल ॥ मा०॥ ५ ॥ न मिटे क्यारे विधिना अदरा, पडद्यं पातुं कपटी .
(ए)
हाथ ॥ महारो धर्म हुँ केण परे करूं, अहो अहो
श्री जिनवर जगनाथ ॥ मा॥६॥ केम करी रा
खी शकीय जालवी, एकण म्यानमें वे करवालः ।।
मा० ॥ प्रीतम एहवे अवसर प्रावियो, नीरखी स
चिंते ते सुकुमाल ॥ मा ॥ केम तमें वनिता या
मण दूमणां, श्रावो
माहरे नयणे श्राज ॥माणा
कीणेजी निहेजें तुमने दूहव्यां, मुफ जणी तुमे दा
खो तेहं समाज ॥ माण ॥ ७॥ आपणे खामी ठे
कहो केहनी, पहेरीने नूपण नव नव रंग ॥.मा ॥
कपूरकेरा तूमें करो कोगला, खेलो साहेली केरे सं
ग ॥ मा ॥ ए॥ हियडो मेलोरी पीहरतणो, म
त तुमें आणो आतमराम ॥ मा०॥ निवहो आपण
दें करे लेश्ने, आपणा मंदिर केलं काम ॥ मा० ॥
१०॥ यौवनलटको दहाडा चारनो, अवसर केहो
धर्मनो श्राज॥मा ॥आगलें सुख दुःख केणें दी
उडं, केणे वली दीगे धर्मसमाज ॥ मा० ॥ ११ ॥ के
म करी कीजे दोहिलो श्रातमा, पामीने मानवनो
अवतार ॥ मा० ॥ मूरख जे कोई काई लेहेता नथी,
ते नव लेवे सरस आहार ॥मा० ॥१२॥ एहवा
सांनतीने पीयुना वोलडा,हारीने वेठी धर्म रतन्न ।
(३०)
ततक्षण लागे संगति नीचनी, जो करी रहीये को
डी यतन्न ॥ मा० ॥ १३ ॥ सवृक्षपुष्पसौरन्य, दान
दानैकतत्परः॥ शबेन मिवितो वायुदौगंध्यं किमु ना
श्रुते ॥ हुश् मिथ्यातणी पियुना प्रसंगथी, मानव जो
जो कर्मनां काम ॥ मा॥ पीयूष केलं गरल थई
गयुं, ऐ ऐ मोह महावलधाम ॥ मा ॥ १४॥ आग
ल होशे सवि वातो जली, हर्षशुं निसुणो वाल गो
पाल ॥ मा० ॥ मोहनविजयें नांखी हेजशु, अनि
नव नांखी नवमी ढाल ॥मा०॥ १५ ॥ सर्व गाथा,
॥ दोहा॥
सुख जोगवतां विविहपरें शषिदत्ताने एक, पुत्र
रत्न हू जलो, सुंदररूपविवेक ॥ १॥ कीधा उ
त्सव नवनवा, दीधां जाचक दान ॥ नात संतोषी
श्रापणी, वहेंच्यां फोफल पान ॥२॥ नाम उव्यु
वरमुहूरतें, तास महेश्वरदत्त ॥ रूपवंत विद्यानिलो
निरुपम गुणसंसत्त ॥ ३॥ दूजे तेह अनुक्रमें,
यौवनवय उन्मत्त ॥ सहू वखाणे नयरमें, धन्य महे
श्वरदत्त ॥४॥ नमया सुंदरीनो हवे, सांजलजो
अधिकार ॥ अति रसीली बे कथा, शीलोपरि सु
विचार ॥५॥
(३२). ॥ ढाल दशमी॥ नानो नाहलोरे ॥ ए देशी॥ पीयर ऋषिदत्ता तणे रे जाडे सहदेव,साजन सांजलो रे ॥ ए आंकणी ॥ तस दयिता ते सुंदरीरे,जेहवी सिंधुसुता स्वयमेव॥१॥ अनुक्रमें गर्न धस्यो तिणे रे; सूचित सुपनाहार ॥ सा॥ जेम जेम गर्न वधे चलो रे तेम तेम हर्प अ- पार ॥ सा ॥२॥ अति न हसे अति नवि सुवे रे, अति चपल न चाले चाल ॥ सा ॥ अति वरकी बोले नहीं रे, अति घणुं न करे ख्याल | सा॥३॥ वात जो चुंजे गर्जिणीरें सुत होय कुब्ज के अंध ॥ ॥ सा०॥ कफवत जोजने पांमुरोरे, पीतवंत पांमु प्र बंध ॥ सा॥४॥ अति लवणे अगवल हरे रे, अति शीतदें होय वाय ॥ सा अति जनुं हरे वीर्यने रे, थतिकामें गर्न हणाय॥ सा ॥५॥ दिवसे जो सूवे गनिणारे, निझाबु होय जात ॥ सा ॥ नयनांजन थी चीपडो रे, रुदने गलित अगवात ॥ सा ॥३॥ स्नान लेपन पुःशीलियोरे, कुष्टि तेलायाम ॥सा॥ इसवाथी रसना तालवु रे, दंतोष्ठादिक श्याम ॥ सा॥७॥ चपलगतें चंचल हुवेरे, शुष्काहारें मूढ ॥ सा॥ होवे प्रलापें अतिवके रे, अति निसुएये नि
।
(३२)
गूढ ॥सा॥७॥ इति सुश्रुत शारीरमें रे, लांख्यो
गर्न विचार ॥ सा ॥ अनुमाने ते ग्रंथनें रे, पाले
गर्न सा नार ॥ सा ॥ ए॥ जेहने उदरें अपुत्रीयो,
उपन्यो होय जो जात ॥सा०॥गाल माटी ठीकरा
रे, आहारे तेहनी मात ॥ सा ॥ १७ ॥ पुण्यवंत
गर्ने उपन्यो रे, करे शुनकरणी मात ॥ सा ॥ रुडा
ज दोहला उपजे रे, शास्त्रमें एम कही वात ॥ सा०
॥ ११॥ अनुक्रमें सुंदरी नारीने रे, दोहद उपन्यो
अहीन सा॥ सप्रिय रमुं गयंवर चढीरे, नर्मदा
तटिनी पुलीन ॥ सा ॥ १२ ॥ दीनने दान दिलं
जोश्तुंरे, पूरूं एह जमाह ॥ सा ॥ दोहद ए मुज
चित्तना रे, जश्ने विनवं नाह ॥ सा ॥ १३ ॥ हं
सतणी गतें चालतीरे, पहोती प्रीतम पास ॥ सा० ॥
वस्थ थई दोहद कह्या रे, करिकरिवचन विलास ॥
सा०॥ १४ ॥ पियु रंज्यो दोहद सुणी रे, दयिताने
दीध दिलास ॥ सा ॥ ए तुम इबा पूरशुं रे, क
रशुं एह तमास ॥ सा ॥ १५॥ जो कशी होश
होये वली रे, मुकने दाखो तेह ॥ सा ॥ ढाल
कही दशमी नली रे, मोहन विजय तेह ॥ साण
॥ १६ ॥ सर्व गाथा ॥
.
(३३) ॥ दोहा॥ सहदेवें आण्यो तुरत, दंती शुमादंग ॥ हिमगि रिवांधव जाणीयें, के धराधरपिंड ॥ १॥ सोहे रदन रयणे जड्या, अति विस्तार अदीप ॥ मार्नु गंज दाढा उपरे, बप्पन्न अंतरछीप ॥२॥ ऊच्च कपोल थकी करे, वहे मदधारा नूर ॥ ऊलटयो पद्मजह थकी, सिंधू गंगापूर ॥३॥ करीकरी इंदीवरें, चि त्रित तनु उत्तंग ॥ मार्नु लताविझुम तणी, तरे प योधितरंग ॥ ॥ गजने गले घंटावली, जीलती नीली फूल ॥ सरवर तट हरीयां वचें, दर्डर उहके अमूल ॥५॥ वीरसेन सा सुंदरी, वेठी गयंवर पी व पाम्यो तंट ते नर्मदा, अति रमणीय ३० ॥६॥ ॥ ढाल अग्यारमी॥ अमदावादना खेड्या रे, वालम वहेला श्रावजो रे ॥ हारे मारी मीउडा वोली · नार, काजल थोडे रो हो सार ॥ ए देशी ॥ नर्मदा नदीने तीरे रे, गयंवर वीफस्यो रे ॥ जंडा घनशुंगज गललो कस्यो रे ॥ तेणे गजे धूएयुं धडहड अंग, करतो धूसर हो जतरंग ॥ अंकुशीयानी जीके रे, ते वश आणीयो रे ॥१॥ अंरहो परहो फेस्यो रे, गंज तेहने तटें ३ (३४) रे॥ सूंढे ग्रहीने महीरुह थांबंटे रे ॥ तव तिहां बीहती सुंदरी नारी, पीयुने करती बहु मनूहार, सुंदर तरुनी बायें रे, तुमें छीप राखजो रे ॥२॥ गजने पीयुडे पाण्यो रे ते तरु हेग्ले रे ॥ लांची सांकल रे, नूतल खलनले रे ॥ मदर राख्यो ति हां जीजीकार, नामिनी जासे हो जरतार, करिव रियाने जमो रे, जइ जल कीलीएं रे ॥३॥ प्रम दा पीयुडो बेहु रे, गजथकी उतस्यां रे ॥ नमया त टनी साहमा संचस्यां रे ॥ जिहां करे हंस मयूर ट कोर, जाणीयें रण कण रणके जोर, नूपुरियां अति रुडां रे वहे तेह वजाडती रे ॥ ४ ॥ जलना पूरमां होवे रे बहुल पंपोटडा रे, सूर्यना दीधिति रे, फल हले रुथडा रे, एतो मानुं तटिनी कंठें हार, तेहनां दीपे हो नंग सार ॥ हरि हरियाली 5ढी रे, जा पीयें उढणी रे ॥ ५॥ मत्स्यना पुबथी उडे रे, ज लना बिंवा रे ॥जीणा जीणा श्रेणे जूजुआ रे, ए तो मार्नु सास्यां केशे केश, उज्ज्वल दधिसुत हो मुविशेष, सारसीश्राला पाले रे सारसुडा चूगे रे ॥ ६॥ नीरना पुरमें मार्नु रे अंबुज उफण्यां रे, गुणथी लीना मधुकर रणजण्या रे ॥ एहवी सा न
(३५)
दी सुंदरी देखि, पामी मनमां हर्ष विशेष ॥धसमसी
ने ते पेठी रे, जीलवा कारणे रे ॥७॥ सजनी सा
हेली संगें रे किन्नरी आंटती रे, मांहोमांह जल
निर्मल बांटती रे ॥ के ग्रहे करथी कैरव कोष मु
ख, द्युतिये देती हो छुने दोष॥ काजलीयाली नेणे
रे, नर्मदा हारथी रे ॥ ७ ॥ तरती आवडती पडती'
रे केश्क उठती रे, जाणीए पन्नगी जल अंगूरथी
रे ॥ एम तिहां रमती रसजरी नारि ॥त्रट त्रट
त्रूटे मोतीहार, मोतीयंडांने लोने रे सफरी तरव
रे रे ॥ ए ॥ रमत रमतां थाकीरे सघली सुंदरी रे,
कांठे उनी जेहवी पुरंदरी रे ॥ सुंदरी नीचोवें ति
हां वेण, फणिपति जीत्यो जाणीए जेण, रेसमीया
ली पहेरी रे वीजी पटोलियो रे ॥१॥ उमके वमके
चाली रे प्रणमे नाहने रे, स्वामी पूस्खो तमे ए उ
त्साहने रे ॥ पण वली होंश के मुजने एक, प्रो
तो कहिये हो सुविवेकः ॥ तमने जो नवि नाखु
रे तो केहने कडं रे ॥ ११ ॥ माहरो जोरो चाले रे
पीयु तुम पागलें रे, जेणी रीतें वायूँ तेमतेमही व
ले रे॥ एम कही सुंदरीकरी मनोहार ॥ तव तिहां
वोल्यो हो जरतार, हियडलानी वातो रे, नारी मुफ
॥ (३६) ने कहो रे ॥ १२॥ पैसो खरचे थाशे रे तो होश पू रशुं रे, बीजुं गुणवंती बल नहिं दूरशुं रे ॥ तेणे एम निसूणी पीयुनी वाणी, बोली सुंदरी हो जोडि पा णि ॥ नाहलीया एणे तीरे रे एक पूर वासीये रे ॥ १३ ॥ उंचा उंचा रूडा रे महोल बनावीये रे, र मवा अहोनिशि इण तटें श्रावीये रे ॥ एवी श्छा मु क मनमांहि,पूरो पीयुडा हो सोत्साहि ॥ प्रीतमीए तिण वेला रे, आरंज आदस्यो रे ॥ १४ ॥ केटला दिनमा तेणें रे नयर वसावीयु रे, रुडा रुडा लोकने वास वसावीयु रे ॥ एतो कही सरस अग्यारमी ढा ल, मोहन विजयें हो सुविशाल ॥ सरसाली अति मीउडी रे, आगल वातडी रे ॥१५॥ सर्व गाथा. ॥दोहा॥ वस्युं नर्मदापुर नहुँ, नर्मदा तटने तीर ॥ उ ज्ज्वल जिनमंदिर कयां, जिम दीराब्धि दंभीर ॥ र ॥ जिन मूर्तिनी स्थापना, कीधी लाल निमित्त ॥ जाव सहित दंपती करे, नवली पूजा नित्त ॥ ३ ॥ काशमीरज चंदन कुसुम, धूप दीप उपचार ॥ न क्ति विशेषे खारथ करे, ए श्रावक आचार ॥३॥ एम दोहद पूरण कख्या, नारीना नव रंग ॥ सहदेवें सू N (३७) परें किया, अधिकाधिक उठरंग ॥४॥ एहवे र हेतां अनुक्रमें, गर्नतिथि थ जाम ॥ सुंदर नारी एं प्रवर, पुत्री प्रसवी तांम ॥५॥ ॥ ढाल वारमी॥ मोतीयारां हे कुमख मखां ॥ए देशी ॥ अथ वा घरे श्रावोजी आंवो मोरीयो ॥ ए देशी ॥ सह देवने दीधी वधामणी, घरें प्रसवीजी पुत्री. रतन्न । सही इवां ए रंग वधामणां, तव हरख्योजी शाह शिरोमणि, अति पुलकित हू तन्न ॥ स ॥१॥ मणि सोनुं रुघु सामढे, तस दासीने कीध पसाय ॥ सणा कस्खों जैरण जाचक लोकने,जेम आतम शक तें देवाय ॥ स ॥२॥ कस्यो उत्सव पुत्रीनो अनि नवो, जेम' अंगज आवे कराय ॥ स ॥ वती घर घर गुडी उबले, घर आंगणे गीत गवाय ॥ स ॥ ३॥ पुर्वानां तोरण वांधीयां, वीच सुरतरुंदल लहकंव ॥ स० ॥ कुंकुमना करतल दिधला, नला फूल फगर महकंत ॥सणा॥ मणि मोतीनां हो टोमे गूंवखां, - गोखें चंदन जरीयां माटः ॥ स ॥ नेरी ढंगल तव हडहडे, · उड़ी गुंजाला गुंजे थाट ॥ सण ॥ · ॥५॥ जन्ममहोत्सव पुत्रीतणो, सहदेवें कीधो वि
..
(३७)
शेष ॥ सम्॥ जिन साजन सवि संतोषियां, दिन
उचित उचित सुलेष ॥ स ॥६॥ सहदेव कुटुं
बनणि कहे, तमें सांजलो माहरी वात ॥ स ॥
ज्यारे सुता एहनी मातने, हूंती गर्ने विमल विख्या
त ॥ सण ॥ ७ ॥ त्यारे एहवो डोहलो उपन्यो, ए
हेनी जननीने अहो वीर ॥ स ॥ गयंवरने खंधे
चढी करी, ज खेळु हो नर्मदा तीर ॥ स॥७॥
वली तेणें तटेंनगर वसा विएं, अतिरूडुं नर्मदा नाम
॥ सण ॥ जो मनमां आवे सहु तणा, जो दोहद
गुण अनिराम ॥ स ॥ ए॥ हवे कहो तो ए पुत्री
नुं दीजीयें, वर नर्मदासुंदरी नाम ॥ स० ॥ दोहद
सघला में पूरिया, घरे प्रसवी पुत्री ताम ॥ सम् ॥
१० ॥ कहे कुटुंब सयल हर्षे करी, एहनुं एहिज उ
त्तम नाम ॥ स ॥ नाम नर्मदासुंदरी स्थापिने,
सहू पहोता निज निज धाम ॥ स ॥ ११ ॥ सा
सुंदरी पुत्री नणी, लेश गोद रमाडेसुगेल ॥ सम्॥
सिंचे पय पाणी पानश्री, जिम श्रमीए सुरतरु वेल
॥ स० ॥ १५॥ आन्नूषण दिव्य अंगें उव्यां, फ
रके टोपी फरकशी शीष ॥ स ॥ बेल पाये घूघरी
घमघमे, देखी जननी पामे हीस ॥ स ॥ १३ ॥
N
(३ए)
घर आंगणे दोडे धुंटणे, दण रोवे कण हसे तेह
॥ स० ॥ कहे मुखथी खमां खमां, मावडी करि क
टि तटे श्राणी नेह सारा वली निर्मल नीरें न
वरावती, बुचकारती माय जे मयाल ॥स०॥ मोहन
विजयें वर्णवी, ए कही वारमी ढाल ॥ स० ॥ १५
॥ सर्व गाथा.
॥ दोहा ॥
वाघे नमया सुंदरी, रुपरंग गुण प्रेम ॥ ए रज
नीपति वीजनो, दिन दिन वाधे जेम ॥१॥जे
णे पालपणायकी, जोया ग्रंथ अनेक ॥ लक्षण शा
स्त्र तणी यई, वरदायी सुविवेक ॥२॥ निर्विकार
जस नयन युग, रसना सुधा सरीस ॥ हियडे विपय
नी वांवना, सुपने नहिं सुजगीश ॥३॥ योवन ऊल
क्युं देह उपरें, उप्यु सुंदर रूप ॥ मुखपर निवसी अ
रुणता, लठित पयद अनूप ॥ ४ ॥ हांसूं श्रधरें वीश
मे, खड़ा लंगर पाय ॥ सा नमया योवन जणी, मि
ली जुजयुग सुविनाय ॥५॥ हवे श्रोताजन सांजसो,
जावी कया विचार ॥ मन माने ते कीजीए, पण हो
य ते होवणहार ॥६॥
(४०)
॥ ढाल तेरमी॥
सनेही वाला लागो ने न तोडो॥ ए देशी ॥
हवे ते ऋषिदत्तानारी, सुणी ते नमया सुंदरी सारी
रे ॥ सनेही क्यारें मलशे सुज
जिनधर्मी ॥ करेया
लोच एम गुण करमी रे॥सणा में एहवं एमगुं कीg,
जे जैनधर्म तजी दी● रे ॥ स ॥१॥ निज कुलमार
गयी ए चूकी, जिननक्ति में करवी मूकी रे ॥ स०
वली नाहने वचने नूली, तजी कल्पमंजरी ग्रही
मूली रे ॥ स ॥२॥ वर समकित रतन में खोयु,
जुङ मिथ्या काच वखोऊ रे ॥ स ॥ तजी अमीय
महामद पीछू, वड बेदी ओट्टीपण की● रे ॥ स ॥
॥३॥ उन्मूली सूरतरु ओप्यो, तिण स्थानक विष
तरू रोप्यो रे ॥ स ॥ शुजकुंनि कुंजस्थत वेसी,
थइ चरणचारी हवे एसी रे ॥ स ॥ ४ ॥ तजी
संगति हंस सुरंग। कस्यो काक कुटिल प्रसंग रे ॥
स ॥ जमु मानसरोवर गंभी। जल निबर क्रीडा
मांगी रे ॥ स ॥ ५॥जलो मोतीनो हार निवारी,
गले गुंजमाला दिलधारी रे ॥ स ॥ सहि मृगमद
पुंज विपोही, हवे अविकर निकरें मोही रे ॥ स ॥
॥ ६ ॥ वर श्रावक कुलमें श्रावी, तो एसी कुबुकि
(४१)
कमावी रे ॥ स ॥ घj धर्मथी चाली.आडी, निज
कुलने लाज लगाड़ी रे ॥ स ॥ ७॥ घर समकित
रत्न में आएयु, पण स्थिर राखी नवि जाएयु रे ॥
॥ स ॥ एक मिथ्यात्वी समकितधारी, ए वेहु
में वे अंतर जारी रे ॥ स ॥ ७॥ कीहां मंदर
सरपव दाणो, कीहां जलनिधिकूप अयाणो रे ॥सण॥
किहां नृपप्रमदाने दासी, किहां ग्रामीण किहां
पुरवासीरे ॥ स० ॥ ए॥ किहां अलसिक ने अहि
राजा, किहां ढका ने धन गाजा रे ॥ स ॥ किहां
मृगपतिने किहां शृगाल, किहां वावल सुरतरु डाल
रे ॥ स० ॥ १० ॥ किहां वायस ने किहां केकी,
किहां अविवेकी ने विवेकी रे.॥ स ॥ किहां दिन .
करने किहां खजु, किहां आदर ने किहां दूर्ल रे॥
॥ ११॥ किहां कृपण ने किहां धनदाता, किहां
कष्ट अने किहां सुखशाता रे ॥ सण ॥ किहां रंक
ने किहां पुरराव, किहां शोचना शुङ खन्नाव रे ॥
स० ॥ १२ ॥ किहां रजनी ने किहां दीस, किहां
प्रेत ने किहां जगदीश रे ॥ स ॥ किदां मणिरत्न
ने किहां लघु चीडी, किहां कुंजर ने किहां कीडी
रे ॥ स० ॥ १३ ॥ तिम जगमें समकित सरिखो,
(४२) कोइ बीजो पदारथ न नीरख्यो रे ॥ स ॥ में श्र तिहीं कस्यो अविचास्यो, जे जैनधर्मने निवाखो रे ॥ स० ॥ १४ ॥ मुऊ माता पिता जो ए लदेशे, तो कांगें कां कहेशे रे ॥ स ॥ नहीं रही होय वात ते बानी, थर गइ होशे कांना कानी रे ॥ स०॥ १५ ॥ सही नाखशे पितर ते वाढी, मूने पत्र सटितपरि काढीरे ॥ स ॥ में रे कर्म कस्यां शां पहेला रे, थर धर्मथकी अलगी वहेला ॥ स ॥ ॥ १६ ॥ गुणहीन कुटिल अटारी, मुफ सरिखी नहिं को नारी रे ॥ स ॥ ए तेरमी ढाल सवा, कहे मोहन विजय वनाइ रे ॥ स ॥ १७ ॥ ॥ दोहा ॥ ऋषिदत्ता करकमल पर, स्थापी वर मुखचंड ॥ नीर टवके नेणथी, जे पुराणे संग ॥१॥ रुदत्त दीठी एहवे, श्राव्यो नारी नजीक ॥ नांखे किम तुम नामिनी, नूतल वली हो लीक ॥ ५॥ उंचं जून अंगना, निरखो नीबूं केम ॥ दीसे वे मुख दा हडे, शशीकर उदयो जेन ॥३॥ तव बोली तरुणी तिसे, रे रे पियु प्राणेश ॥ अंगज सुंदर आपणो, पाम्यो यौवन वेश ॥४॥ मुफ बांधवने बालिका, .
(४३) नमयासुंदरी नाम ॥ तेपण थ नवयौवना, अप्सरा जेम अनिराम ॥ ५॥ आपण श्रावक होत तो, तो ते नमया वाल ॥ परणावत पीयु आपणा, पुत्र जणी ततकाल ॥६॥ ॥ ढाल चौदमी॥ गाढा मारुजीहो नानक उडे लाठी चगें, श्रम ली पीवे कलाल रे। गाढामारु अति उन्मादी माह रो साहिवो॥ ए देशी ॥ मोरा पियुजी आपण थ्यात्वी वाणीया, ए सावय लोक रे ॥मो॥ लेख लख्यो ते लानी, एहमां न को संदेह रे॥ मो० ॥ खे॥ मोरा ॥ पुत्रने ते पुत्रीजणी परवानो नहिं योग रे ॥ मो० ॥ १॥ते नमया आपण घरे, आवे तो पूरण नाग्य रे ॥ मो॥ हुँ पण जाई नवि शकुं, लाधतो कोई नथी लाग रे ॥ मो॥ ले॥ मो॥ २॥ तुमनें तिहां जो मोकलुं, तो पण सरे नहिं का म रे ॥ मो० ॥ते तुमने धारे नहीं, जाणो ठगे गु एधाम रे ॥ मो॥ लेण । मो० ॥३॥ तुमें बोमा एस मोटिका, तुमची केही वात रे ॥ मो० ॥ तुम गुण जाणी वालिका, किम नवि परणे जात रेमोग ॥ ले ॥ मो० ॥ ४॥ तुम जेहवा धूरत तणो नाणे (४४) केम विश्वास रे ॥ मो० ॥ शेकीने जे वावियें, लहि जे केम कण तास रे॥ मो० ॥ ले ॥मो ॥५॥ कीधा तस तुमें दोहिला, तेहनी हवे शी आशरे, दा ज्यो जे पय पीवतां, ते फूंकी पीवे बास रे ॥ मो० ॥ लेण ॥ मो॥६॥ वचन सुणी वनिता तणां, बोल्यो रुअदत्त नाम रे ॥ मोण ॥ जे होणी ते हो गर, तेह नुं हवे शुं नाम रे ॥ मो॥ ले ॥ मो० ॥ ॥ जे तिथि गश्ते ब्राह्मणा, वांचे नहीं नियमेव रे ॥ मोण॥ कीधुं ते नवि शोचीए, खरूं ते होशे ते देव रे। मो० ॥ लेप मो० ॥७॥ होशे नमया बाल नो, आपणा सुतथी सबंध रे ॥ मो॥ तो अणचिं त्युं हो यशे, पाणिग्रहण ससंध रे ॥ मोण ॥ ले०॥ मो॥ ए॥ माणस हाथे न वातडी, हाथे विधाता नाथ रे॥ मो॥ जावीथी डाह्यो नहि को, न मटे लेख लख्या जेह रे ॥ मो ॥ लेण॥ मो ॥ १० ॥ जो ते नमया सुंदरी, जो नहीं परणे जात रे ॥ मो॥ तो शुं रहेशे कुंवारडो, एशी गली वात रे ॥ मो ॥ ले॥ मो॥ ११॥ कहे ऋषिदत्ता नाथने, ए स हि साची वाच रे ॥मो ॥ दंत दे ते चाववा, दे ते साची वात रे ॥मो ले॥मो॥११॥ एतो (४५) प्रत्यक्ष पार, नावीनो संसार रे॥ मो॥ चमे मि थ्यात्वी हुँ श्राविका, केम थयां स्त्री जरतार रे ॥ मो॥ ॥ मो ॥१३॥ जे लख्या विधियें श्र करा, ते कुण टाले ऊत्ति रे ॥ मो॥ एहवे रमतो श्रावीयो, पुत्र महेश्वर दत्त रे ॥ मो॥ ॥ मोग ॥ १४ ॥ कर जोडी कहे तातने, करो तो केहो वि चार रेः ॥ मो० ॥ केम सचिंती मुक मावडी, कहो मुफने एणी वार रे । मो० ॥ ले ॥ मोम् ॥ १५ ॥ केणे उहवी एवडी, के केणे दीधी गाल रे ॥मो॥ हर करी मांड्यु पूठवा, जननी उमनी नीहाल रे ॥ मोगा ले। मो० ॥ १६ ॥ नाखशे रुदत्त वोल डा, सांजव्य सुत सुकुमाल रे॥ मो० ॥ नांखी मनो हर चाँदमी, मोहन विजयें ढाल रे ॥ मो॥ ले० मो० ॥ २७॥ सर्व गाथा. ॥ दोहा ॥ रे वत्स मामो ताह्रो, नाम नलो सहदेव ॥ तस घर पुत्री नर्मदा,अठे सयल गुण मेव ॥१॥ काने निसूणी नर्मदा, तव माताए आज ॥ तेहने तुफ प रणावबा, वांठे ठे माताज ॥२॥ हुँ तिहां नवि जा ईशकुं, में तिहां केतव कीध ॥ यश् श्रावक तुऊ (४६) मायने, परणी जग प्रसिद्ध ॥३॥ ते तो पुत्री तुक जणी, कहो सुत सोंपे केम ॥ तुज जननी ते शोकमें, चिंतातुर जे एम ॥४॥ पुत्र कहे हुँ तिहां जश्, प रणीश करी प्रपंच ॥श्रम कुल एहिज रीत , तेह मांशी खलखंच ॥५॥शकट जरी बहु वस्तुथी, तुरत महेश्वरदत्त ॥ चाल्यो श्राव्यो अनुक्रमे, वर्धमान पुर ऊत्त ॥६॥ मामाने दीधी खवर, जे श्राव्यो ना ऐज ॥ ते निसुणी घर तेडियो, ईषत आणी हेज॥७॥ ॥ ढाल पन्नरमी॥ श्राव्य धूतारा नंदनारे, तें धूत्युंगोकुल गाम ॥ ए देशी ॥ हिये आलिंगीने मख्या जी, मामो ने नाणे ज॥ केम कृपा करी पत्तन एणे, जी नांखो श्राणी हेज ॥१॥आव्य धूतारा रुजना रे, तुं कुशल कहे वात ॥ एक वेला ताहरे तातें, देखाड्या पराक्रम ॥ तुमें पण जे गेहे पधास्या, शुंजी करशो तेम ॥२॥ अमे एकज वार धूताणा, हवे धूताशुं केम ॥ जाण्यो ग्रह पीडे नहिं क्यारे, जे ऊखाणो एम ॥३॥श्रा॥ पावक उपरे काठनी हांडी, चढे एकज वार, तारक बिंबे हंस नोलाणो, मोती न चूगे फेरः ॥श्रा॥४॥ हमणां तो आपणे ने सगाई, मया करो महाराज ॥ N
एम मूसे लोक
(४७)
एक सदन शाकिनी पण गेडे, श्राणी संवंधनी ला
ज ॥आ ॥५॥ चक्री पण तेम चक न मूके, वांध
वताने जेम ॥ पोतानुं वली पारकुं प्रीठे, पशुउँ पण
ए तेम ॥ ॥ ६ ॥ तुमें जे पुरमांहि वसो बो
साचं कहो ससनेह, वे सघलां ए लोक धूतारां, के
तुमारं गेह ॥श्रा०॥ लुमा प्राप्ति अन्य व्यापि
रे, शुं कांश नवि थाय ॥ जे
पराया,
केम ए आवे दाय ॥श्रा० ॥॥॥ नीचे थानने
सांजली बोल्यो, मामाजी महाराज ॥ ए उवेखो
. कांश अलेखे, आंगण श्राव्या बाज ॥ श्राप ।
॥ ए॥ एक जूंडे शुं सघलां गूंडां, जाणो जो देव
दयाल ॥ आंगलि पांचे होवे न सरखी, कोइ मोटी
को वाल ॥ आ ॥ तात सरीखो जात न जाणो,
के धनी के रंक ॥ रावण मंदिर. पुंजतो वायु,
हनुए लीधी लंक ॥ आप ॥ ११ ॥ वसुदेवने कंस
नरेशे, राख्यो कारागार ॥ काट्यो तिहाथी पुत्र
मुकुंदे, मातुल . दीध प्रहार · ॥श्रा ॥ १५ ॥ न
होवे पुत्र में ताततणा गुण, मानी व्यो निर्धार ॥दो
जीहो विपथी जन पीडे, कीधो मणि उपकार॥याण
॥ २३॥ खारो पयोनिधि मानव जाणे, पुत्र शशी
(४०) सुधाकंद ॥ जो सघलाए होवे सरखा, तो जगे केम दिणंद ॥श्रा० ॥ १४ ॥ मामा तुमथी मादरे तातें, खाट्या दीसे दोष ॥ पण तुमने था, घटे जारी, थाणीजे नहिं रोष ॥ श्रा०॥ १५ ॥ जंघ उघा डतां पोता केरी, पोताने आवे लाज ॥ हूश् ते दूश् पण दवे मोसुं, माफ करो महाराज ॥ आ ॥ १६ ॥ तात अमारो हुँतो मिथ्यात्वी, पण तुम बेहेन प्रसं ग ॥ बीजा धंधा भूकीने हवे, जैन धरमथीरंग ॥ २७ ॥ हरख्यो मामो ते निसुणीने, उलस्यो अंगो अंग ॥ मातुल मलीयो नाणेजथी त्यारे, कोमल दीयु आलिंग ॥ ॥२७॥ वस्तु वखारे पाणी उ तारी, सुंदर जोजन कीध ॥ वेंची साटी तेह वसा एं, दाम सवाया लीध ॥ आ॥१ए। मामाथी म ब्यो एकंगो, नाणेजो धूतधमाल ॥ मोहन विजय रु डी.नांखी, पन्नरमी. ए ढाल ॥आ॥२॥ सर्व गाथा... ॥ दोहा ॥ रंज्यो तस गुण देखिने, मातुल चित्त अनंत ॥ पूजे निज नाणेजने, तेडीने एकंत ॥१॥रे वत्स तुऊने जे रुचे, मागी ले तुं तेह ॥ संकोचाश्श मा सुत्नग, ए ले ताहरूं गेहः ॥ २ ॥ श्म निसुणी बोले (४ए) तुरत, इसी महेश्वरदत्त ॥ खामी तुम्म . पसायथी, सघली ते संपत्त ॥३॥जो:करुणा पूरण करो, शकि त जो द्यो मूज ॥ तो ए नमया सुंदरी, परणावो कहूं गूज ॥४॥ एहज़ अर्थेहुं शहां, श्राव्योतुं महारा ज ॥ हवे जेम जाणो तेम करो, वांहि ग्रह्यानी लाज ॥५॥ ॥ ढाल सोलमी॥ गश्ती पीयरीएने आविती रीसा॥ ए देशी ॥ वाणी सुणीने वोल्यो तिहां सहदेव, तुंतो मिथ्यात्वी अमें श्रावक सुसेव ॥ महारा जाणेजा हो राज ए हेर्बु म वोल ॥१॥ तुफजनक गयो अमने नोलाय, ते उपरें पुत्री केम देवराय ॥ म ॥ एक वेला दा जयो ऽधथी जेह; ठास नणी फुकी पीये तेह ॥मा॥ विषधरथी जे वीहिनो कोय, दोरडीये कर घाले. जोय ॥ मा० ॥२॥ विलखे वदने तब कहे जाणेज, एम एकाएक केम तजो हेन । म ॥ तुम नगिनी नुं पयोधर खीर, में पीधुं थश्ने धीर । म ॥३॥ ते केम होश्श - मिठादी, पठे तो तुमे ठो. सु गुण गरि ॥ म० ॥ तुमे जाणो जे खलं अहो हित वान, गज केम आवे काल्यो कान॥म ॥४॥मा m (५०) तुलें नाणेजसु चारु गंह, नर्मदासुंदरीनो कीधो वि वाह ॥ म० ॥ परण्यो सयल मनोरथ सिक, काचित दीवसे सीखडी लीध ॥म ॥ ५ ॥ नर्मदासुंदरी देश संग, अनुक्रमे आव्यो निजपुर खंग ॥ म ॥ मात पिताना प्रणम्या पाय, पगे लगाडी सा हित लाय ॥ म॥५॥ ऋषिदत्ताए नमया बाल, दीठी सुपरें नयणें निहाल ॥ मा० ॥ कुशलप्रश्न पूज्या तेणी वार, सज थ कह्यो सयल विचार ॥म ॥७॥ न मैदासुंदरी महेश्वरदत्त, जोगवे लोग विविध बहु जत्त ॥ म॥ दंपती प्रीति परस्पर लीन, जेहवी प्रीति होवे जल मीन ॥ म०॥ ७॥ एकदा नर्मदा विनवे शाह, खामी जैनधर्म वाह वाह ॥मोरा सहे जाहो नाह, कुमति निवार ॥ ए आंकणी॥ जिनवर नक्ति करे निशदीव, दीवे मूरती सुप्रसन्न होय जीव ॥ म०॥ए। जिननी नक्ति रावण ऐकंत, ती र्थंकर पद श्राप्यु कहंत ॥ म॥ जिनदरिसणथी हूये उधार, देश अनारजें आईकुमार ॥म॥१॥ जिनपूजा फल अधिक अनंत, शिवसुख साधन बें एकत ॥ म॥ जेणे जिननक्ति न कीधी सार, तो धिक तस मानव अवतार ॥ म ॥१९॥ तरण ताः
(५१)
रण प्रजु कडेवाय, सेवे सुर नर जेहना पाय ॥मणा
जिन दरिसण ते शिव सोपान, जिनयी वीजा केही
मान ॥ म० ॥ १५ ॥ कुण ब्रह्मा कुण विष्णु महेश,
वीतरागथी नहिं ते विशेष ॥ म ॥ तुलसी पीपल
पूजे लोक, खोटा प्रयास नियामक फोक मण॥१३
जे देवताने प्रमदाथी प्रेम, केम ते तरशे वली ता
रशे केम ॥ म ॥ क्रोधादिक वर्जित महानाग, ते
तो एक अठे वीतराग ॥ म० ॥ १४ ॥ निसुणी न
मैदासुंदरीनी वाण, कंतें जिनधर्म कीध प्रमाण ॥
म० ॥ इपिदत्तादिक कुटुंच सकोय, जिननक्तितें
वेगं होय ॥ मग १५ ॥ स्थापी जिनप्रतिमा सहु
गेह, पूजे प्रतिदिन आणी नेह ॥मा टल्यु मिथ्या
त्वने प्रकाश्युं समकित, श्रावक हुई महेश्वरदत्त ॥
म ॥ १६ ॥ करणी उत्तम करतां दिन जाय, धर्मः
यकी नित्य रुडुं.थाय ॥ म ॥ मोहन विजये थर
उजमाल, नांखी सुंदर शोलमी ढाल ॥म ॥१७॥
सर्व गाया ॥
॥ दोहा ।।
एकदिन नमया सुंदरी, सोल सजी शणगार ॥
वेगी निज वातायने, थः श्रानाथागार ॥१॥
(५५) दर्पण लेई करकमल, निज थानन निरखंत ॥ सहि यर पण तस रूपने, पेखी अति पुलकंत ॥२॥ तं वोलेकरी मुख नखु, अति सुशोनित अंग ॥ वि ब्रम चारु विलासथी, बेठी धरी उमंग ॥३॥ ए हवे रवि मंगल गयण, मध्ये श्राव्यो जाम ॥ मास खमण पारण मुनि, गोचरी पहोतो ताम ॥४॥ ॥ ढाल सत्तरमी॥ अरणिक मुनिवर चाल्या गोचरी ॥ ए देशी॥ पावक जेहवो रे श्रातप परजले, पूहवी देवाय न पायोरे ॥ बादरकायारे ता पराजव्यो, गयाए ते जायो रे ॥१॥ गति कोश् श्रनिनवी, जगमें क मनी ॥ सवि चितदमें जाणेरे ॥ विणजोगवियां रे बूटे नहीं, कवियणे एम वखाणे रे ॥ गण ॥२॥ तेणे अवसरें पुरमें परवस्था, व्रतधर सुंदर एह खूला पयतल ऊन्ही वालुका, तो पण निश्चल नेह रे॥ग०॥३॥जग्न शकटपरे अस्थि खडहहे, दाम उदर दृग नीचे रे ॥ जयणायें करी हलूए पय ग्वे, प रसेवे ग्रुश सिंचे रे॥ ग०॥४॥ धन्य धन्य एहवारे जगमें मुनिवर, जे परने हित वांजे रे, निज काया ने रे जाणे कारिमी, तप तापें तनु ती रे ॥ग० ॥ रे॥
(५३)
॥५॥ जिणे अवसर सुखीया जीवडा, वेसी शीतल
वामे रे ॥ तिणे अवसर विचरे संयमि, तो न्यायें
शिव पामे रे ॥ ग ॥ ६॥ ते मुनि घर घर निदा
कारणे, खप करे तप जप पूरो रे॥ गुणमणि रोह
'ण साधु शिरोमणि, नहि कोश् वाते अधूरोरे॥
गः ॥ ॥ कुःसह तडके रे साधु पराजव्यो, निर्वल
थके श्रम कीधो रे ॥ नर्मदामंदिर गोखने ठायडे,
विसामो क्षण लीधो रे । ग० ॥ ७ ॥ नमयासुंदरी
साधु अजाणती, नाख्युं मूखयकी पीक रे ॥ ला
ग्यो ततक्षण मुनिने नालंतरें, तिलक परे थयुं ठी
करे ॥ गण॥ ए ॥ लागत वांता रे मुनि तिहां चम
कियो, शुं आकस्मिक एह रे ॥ केणे नाख्यु रे मुफ़
शिर उपरे, निरखे ऊरध तेह रे ॥ ग० ॥ १० ॥ दी
ठी गोखे रे नमयासुंदरी, थयो आक्रोश मुनीशोरे ॥
रे रे अधमे रे ए ते शुंकयु, अशुचि कयु ए शीपो
रे ॥ गण॥११॥ ए किहां पातक तूटिश चापडी, ए
शो गारव तूफरे, न करे को मुनिने श्राशातना, तेह
करी ते थबूऊरे ॥ ग० ॥ १५ ॥ ताहरी उपर दीसे
कंतनु, मान तेणे घणुं माची रे। तोतुं होजे रे ना
श्र वियोगिनी, वाच यई श्रम साचीरे॥ ग॥१३॥
. (५४) मुनिनी वाणी रे सुणी नणकारे, गोखतले तव जो युं रे॥ तव तिहां दीगो रे मुनि कोपांतरु, शाप दीयं तो पलोयुं रे ॥ ग० ॥ १४ ॥ नूंहुं कीg रे में मुनि उहव्यो, कीधी अवज्ञा नारीरे ॥ फल कडवां रे नो गवतां दृश्, हुं निगुणी को नारी रे ॥ गण॥ १५ ॥ नाह वियोगणी होजो जे कडं,ते केम फरशे वाचारे ॥ वाचा खोटी खोटा जनतणी, ए तो मुनिजन सा चा रे ॥गण॥१६॥ जश् खमाई रे मुफ अपराधने, वि नवु विनति विशाल रे ॥ मोहनविजये रे नांखी हेजथी, सुंदर सत्तरमी ढाल गारजासर्व गाथा ॥ दोहा॥ मेडीथी जे ऊतरी, आवी साधु समीप ॥ विधिशुं वांदीने कहे, अहो जवसायर छीप ॥ १ ॥ ढुं जिन धर्मी श्राविका, मुनि उपरे अति प्रेम ॥ रोष तजो मुनिरायजी, शापो डो मुज केम ॥२॥ जीहांथी वहार जोश्ए, तिहांथी आवे धाड्य ॥ दीजे दोष ते केहने, जो फल खाशे वाड्य ॥३॥ए संसार असा रमें, ग्रहीए जस आधार ॥ ते जो विरूऊं वांबशे, किम ऊगे दिनकार ॥४॥ हुँ तमथी जेहवी करूं, 1 . (५५) श्रण समजे अविचार ॥ पाडं तेमहीज तुम्हे करो, तो शुं अंतरचार ॥५॥ ॥ ढाल अढारमी॥ हांजी वारा वजारमां, हांजी मुने जेहन दे व लाय, तोरे संग चालुं रे, लालमल जोगीया ॥ ए देशी ॥ हांजी हूं निर्जागिणी मानवी, हांजी तमें गे गिरुश्रा साध,तोरी वलिहारी रे मुनिवर माहरा ॥ हांजी तुमने में कीधी आशातना, हांजी खमजो ते निरावाध ॥ तो ॥१॥ हांजी- तुमे ठगे करुणा सायरु, हांजी कहुँ गोद विवाय, ॥ तो ॥ हांजी शाप न दीजें मुझने, हांजी मुफथी केम सहाय ॥ तो० ॥ ॥ शत्रु प्रत्ये कोपे नहिं, हांजी वांधवथी न मुजाय ॥ हांजी शाप न दे तनु पीडतां, हांजी मुनिवर तेह कहाय ॥ तो ॥३॥ हांजी चंदनने जो. पीडीयें, तो दीये सामी सुवास ॥ तो॥ हांजी यंत्रमें पीलीयें शेलडी, हांजी तो पण ये रस खास ॥ तो ॥ ४ ॥ हांजी रंजा खंन जो वेदीयें, हांजी तो पण फल दे नूरि, ॥ तो॥ एगीस्था साधुनी हांजी शास्त्रमें कही ससनूर ॥ तो० ॥ ५ ॥ हांजी लागे नहीं नाखी थकी, सूरज साहामी खेह ॥तो (५६) हांजी शी कटकी कीडी परें, हांजी राखो धर्मसने ह ॥ तो॥६॥ हांजी में तुमने वेद्या नहीं, हांजी लागो हश्ये पीक ॥ तो ॥ हांजी माहरा अवगुण साहमुं, हांजी न जू समता नीक ॥ तो ॥७॥ हांजी वचन सूणीने एहवां, हांजी वोल्यो मुनिवर तेह ॥ तो० ॥ हांजी रे वत्से रे नावुके, हांजी सां नव्य वाणी एह ॥ तो॥ ७ ॥ हांजी साधु न दीये पीडियो, हांजी कोईने उःसह शाप ॥ तो॥ हांजी तेहना जो मुखथी नीकले, हांजी साधुने नहीं तोय पाप ॥ तो ॥ ए ॥ हांजी जे में नाख्युं विजो गणी, हांजी तुमने आणी रोष ॥ तो ॥ हांजी ते तुऊ पूरव जन्मना, हांजी दीसे सवला दोष तो ॥ १७ ॥ हांजी ताहरी लावीयें मुझने, हांजी एह वो वोलाव्यो वोल ॥ तो हांजी नहिं तो माहरा वक्रथी, हांजी नीसरे केम अतोल ॥ तो ॥११॥ हांजी तेमाटे तुं ताहरा, हांजी जोगव्य पूरव कर्म ॥तो॥ हांजी नोगव्य तु ताहरां कस्यां हांजी दाण एक कुण दीये शर्म ॥ तो ॥ १५ ॥ हांजी लोग वीश तुं ताहरूं कह्यु, हांजी तेहमां कां दिलगीर ॥ तो ॥ हांजी नोगवाये कृत्य पारकू, हांजी तो
(५७)
इजी तेहनी पीर ॥ तो ॥ २३ ॥ हांजी लणीयें
जेह, वाविए, हांजी तेहनो किहो विचार ॥ तो॥
हांजी ठूटे नहीं विण जोगव्यां, हांजी जिन कडं,
सूत्र मकार ॥ तो ॥ १४ ॥ हांजी धरियें धीरज
चित्तमें, हांजी होशे ते परमानंद ॥ तो ॥ हांजी
एम कहीने तस गेहथी, हांजी विचस्या अन्यत्र
मुनीं ॥ तो० ॥ २५ ॥ हांजी मुनिना पयरुह अनु
सरी, हांजी नमया श्रावी गेह ॥ तो० ॥ हांजी
ढाल कही ए अढारमी, हांजी मोहनविजयें एह१६
॥दोहा॥
एड्वे नमया सुंदरी, चिंते चित्त मकार, हवे झुं
थाशे श्रागले, हे हे सरजनहार ॥१॥ में एदवू
शुं पूरवें, की, कर्म अनंत ॥ जे अणचिंत्यां मूजने,
शापी गयो मुनि संत ॥२॥ जे जल जलणने उप
शमे, ते जल दे गयो दाह॥ कोपे नहीं क्यारें मुनि,
ते कोप्यो निर्वाह ॥३॥ कां वेठी हती गोखडे,कां
चाव्यां तंबोल, जे अनुकूल सहुतणो, ते मुनि थयो
प्रतिकूल ॥ ४॥ कीस्यु ललाटे लिख्यु हशे, श्रागल
नावी नाव ॥ जे जिन जाणे ते खरं, न मटे सहज
खन्नाव (पागंतर, कहेवा हवे विलाव)॥५॥.
(५७) ॥ ढाल उंगणीशमी॥ तीनो रे मन मोहन जिनसें ॥ ली ॥ ए देशी। जाणे रे कोइ मननी जाणे ॥ जाण ॥ हुँ वेती हती गोखें सुखमें, आव्या किहांथी ए मुनि टाणे ॥ जा ॥ केणी. सहीये पण न जणाव्यु, जे मुनि उन्ना ले एण गणे ॥ जाण ॥ १॥ अमें तो न जाण्यं सही नांखे, तें न जाण्यु तो कुण जाणे ॥ जाण ॥ कीधो तें अपराध सखीरी, नाहक नेलां शुं श्रमने ताणे ॥ जा ॥२॥ एहवां सज़नीनां वयण सुणीने, बोली नमया ाली उखाणे ॥ जाण ॥ क्यां तमने वहेनी ॐ कहुं बु, बींकतां दं कां अप्रमाणें ॥ जाण ॥३॥ दाऊया उपर खार न दीयो, आवो रीसा मां वेसो बिठाणे ॥ जा॥ जोगवी लेश कां तुमे वीहो, मा हरा लखीया लेख प्रमाणे ॥ जाण ॥४॥ एम कहे तां नयणेथी बूटे, आंसुधारा मेघ समाणे ॥ जा ॥ जेम जेम मुनिनां वयण संजारे, तेम तेम फुःखडं हियडामां आणे ॥ जाण ॥५॥ लोटे धरणी अब 'ला बाली, देश संजनी बांह सराणे ॥ जा ॥ शाप संनारे आकुल थाइ, नाके जिण विध आवे. दाणे ॥ जाण ॥६॥ गती बले ने ताती होवे, जेम को (एए) तीलमें घाती घाणे ॥ जाण । म म कर एव९ सही उनांखे, लाज वडेरानी का नाणे ॥ जा ॥७॥ता हरु उःख अमें सही नथी शकतां, आलि तुं अमने जे आवे लाणे ॥ जाय ॥ नावी तारी नली ते व हेनी, सुख ठेवली सुख होशे विहाणे ॥ जाण ॥ ॥ आव्यो एहवे महेश्वर पीयुडो, नारी दुःखणी देखी पूजा ॥ दयिता :खिणी कातुं दीसे, कहे मुफने तुझ खडं शुं ॥ जा ॥ए ॥ वात कही निज पीयुडा आगे, जाण्यं जुःखनुं कारण ना हैं॥ जाण ॥ दयिताने तव दीधो दिलासो, तेडी आणी मंदिर मांहे ॥ जाण ॥ १० ॥ ते दिनथी श्रा रंजी नमया, पालंती जिननी श्राणा रुडे ॥ जा ॥ महासती सुखमें निगमे दीहा, पूरव कर्म करयां ते सूडे ॥ जा ॥११॥ पोपे पात्र संतोपे मनमें, अवि नय करता हैयुं धूजे ॥ जा० ॥ नव नव संचित पा प निवारे, एदवा देव नणी नित पूजे जा॥ १५ ॥ पुण्य करे जिन पंथे चाले, तेहथी नव दुःख जाये विलयें ॥ जाण ॥ सुंदर उंगणीशमी ए नांखी, श्रोता सुणजो माहेनविजयें ॥ जा ॥ १३ ॥ सर्व गाथा | (६०) ॥दोहा॥ एक दिन नमया नारीने, कहे महेश्वरदत्त ॥ पर ही जाशुं प्रिये, हवे धन देतें ऊत्त ॥१॥ तिहां जश् अव्य कमावशुं, आवशुं तुरत गेह ॥ साचवजो तुमें श्हां रही, जैन धर्म ससनेह ॥२॥को वाते मनश्री तुमें, दुःखी न होजो नारि ॥ मिलशुं तुम ने हेज नणी, जो करशे किरतार ॥ ३ ॥ परदेशे ज इए अबों, करगुं तिहां व्यापार ॥ तिहांथी बहु धन आणशें, राखशुं यहां व्यवहार ॥ ४ ॥ ते माटे तरु णी तुमें, हसी दीयो श्रादेश ॥ जेम प्रवहण सज कीजीयें, लेश्य वस्तु अशेष ॥ ५॥ कंत. वचन नि सुणी करी, बोली नमया वाल ॥ केम परदेशे पधा रशो, अहो नाह सुविशाल ॥६॥ ॥ ढाल वीशमी ॥ अम्मां मोरी अम्मां हे, अम्मां मोरी जीलण गश्ती तलाव हे ॥ हे मारंडे मेंवासी मेंरा ताणीया हे ॥ ए देशी ॥ पियुडा मोरा पियुडा रे, पीयुडा मो राजो तुमें चालो परदेश हे ॥ हे मुजने जलावो केहने उलवे हे ॥ पि०॥ पि ॥ काया जिहां तिहां बांह हे, हे तेम प्यारो ने प्यारी जोगवे हे।
(६१)
पि ॥. पि ॥ १॥ हुँ पण आवीश साय हे, हे
वाटेने करेगुं वाला चाकरी ॥ पि ॥ पि० ॥ पि०॥
तुम विण केम गमे दीह हे, हे माग्लडी होवी
ज्यु जल विण श्रातूर हे ॥ पि० ॥ पिं० ॥२॥घडी
ठ मास थाय जेह हे, हे नाह रहो जो अलगा न
यनथी हे ॥ पि ॥ पि०॥ तुम विरह न सहाय
हे, हे केतुं नां करीने वेणथी है ॥ पनि॥पि॥
॥३॥ साधूए कह्यु ने जे मुजने एम हे, हे थश्श
वत्से कंतवियोगिणी ॥ पि० ॥ पि ॥ तेहवा कथ
नथी केम हे, हे अलगी रहुं तमने अवगुणी हे ॥
पि ॥ पि०॥४॥ मुझने तुमचो आधार हे, हे
विगर आधारे शहां केम रहुँ ॥ पि० ॥ पि० ॥ देखी.
पेखीने काय हे, हे विरह वन्हिथी कहोने का द
डं ॥ पि० ॥ पि० ॥ ५ ॥ जो नहीं तेडो साथ हे, हे
कदेशे नहीं कोतुमने रूअडा। पिापिणानारी नरा
खवी दूर हे, हेजे कहीए पंथी सूअडा हे॥पिणापि॥
मनडं ले जशो संग है, पीजरी ने रहेशे वाल
मजी हां। पि० ॥ पि०॥ रढ करी रही सहु जोर
हे, हे तो तुमें मूकीने जाशो किहां ॥ पि० ॥ पिण
॥ ७॥ नाह कहे अहो नारी हे, हे काम दोहेढुं
,
.
॥
(६२)
अलगा पंथनुं ॥ पि० ॥ पि० ॥ कंते कही घणी वात
हे, हे तोही न माने काई अंगना ॥ पि०॥ पि ॥
॥७॥ वनितानो आग्रह जाणी हे, हे संगें तेड्यानी
कंते हा नणी ॥ पि०॥ पि०॥ नर्मदासुंदरी ताम
हे, हे उनसित हुश्मनमांहे घणी ॥ पि० ॥ पि० ॥
॥ ए॥ तत्दाण महेश्वरदत्ते हे, जरीने करीयाणुं प्रव
हण सज कस्यां ॥ पि० ॥ पि ॥ पडहो वजायो पुर
मांहि हे, हे वचन सुरंगां ए एहवां उचस्यां दे ॥
पिन ॥ पि० ॥ १०॥ शा महेश्वरदत्त हे, हे यवनछीपें
काले चालशे दे ॥ पिण॥ पि ॥ जे कोश् श्रावणहार
हे, हे होय ते वेगा होजो अनालसें, ॥ पि पि०॥
॥ ११॥ पडह सुणीने लोक हे, हे यवनही जावा
संमुह्यां ॥ हूवो जाम प्रनात हे, हे लोक सायरनो
तट घेरी रह्यां ॥ पि० वि० ॥ १२ ॥ एहवे महे
श्वरदत्त हे, हे जिनवरपूजा करे कुसुम पांखडी ॥
सुंदर लोजन कीध हे, हे मात पितानी लेश शीखडी
॥ पिण् ॥ पिण् ॥ १३ ॥ नर्मदासुंदरी साथ हे, हे
महेश्वरदत्त आव्यो प्रवहण में जिहां ॥ पि० ॥ पिणा
साथै सयण अनेक हे, हे आव्या संप्रेषणे नेहव
शे तिहां ॥ पि॥ पि०॥१४॥ पुरजन कहे मुख एम
॥
.. (६३) हे, हे होजो मंगल माल हे, ॥ पि पि०॥ मोहन विजयें एम हे, हे पजणी सदुणी वीशमीढाल हे॥ पिपि ॥ १५ ॥सर्वगाथा ॥ ॥ दोहा॥ शीख लही साजन तणी, परिकर रूडा प्रसंग ॥ चाल्यो जलवट ऊपरे, महेश्वरदत्त सुरंग ॥ १ ॥ यान हकाखां जलधिमां, खेंच्या सढ ने दोर ॥ मा. गै मालमी मालम करे, कूवा थंना जोर ॥ २॥ प. रट्यां पोत पयोधिमें, गति अति. चंचल धीर ॥ ता. एयो जेम कोदंडथी, तूटे जेहवो तीर ॥३॥ नीर मय दीसे धरा, ऊपर तो आकाश ॥ गिरिवर तरु. वर नगरवर, ते तो प्रवहण वास ॥४॥ अश्हों छ पर कारणे, जल मध्ये पविसंत ॥ पारत्रिलोकी प. तिवसु, पण नय नवि निवहंत ॥ ५॥ पेट अधम ज गमा प्रसिझ, पेट वडो पतहीन ॥ जल थल गिरि उलंघवे, मुख जंपावे दीन ॥६॥ ॥ ढाल एकवीशमी॥ दिल लगा रे वादल वरणी ॥ ए देशी॥ चाल्यां रे वादण वाये हंकास्यां, दोडे जेम मन चाले ॥ इ. वे जोजोरे कौतुक थाशे; सांजलतां शुंजाशे ॥हा॥ .
, (६४) कंत महेश्वर नमया नारी, वेगं गोंखे जे महाले ॥ ह ॥ १॥ आसो मासनी चांदनी बटकी, था व्यो चंड मथाले ॥ह ॥ दंपती वाहणमां मूखड़े काढी, जलचर खेल निहाले ॥हा॥२॥ वाय फको ले जलचर उबले, नौतन नौतन देखे ॥ ६॥ गाजे गुहिरे सादे दरीयो, घोष जलद किह लेखे ॥ ह. ॥३॥ उज्वल रजनी ने, उज्ज्वल चंदो, उज्ज्वल जलनिधि वेला ॥ ह ॥ उज्ज्वल जलचर दंपती उ ज्ज्वल, सयल उज्ज्वल थयां नेलां ॥ हा ॥४॥ दंपती कौतुक रसथी लुब्धां, बेग ज्युं अनिनव वाडी ह० ॥ एहवे कोशएक पुरुष वाहण, मांहे वीण व जाडी ॥ ६ ॥५॥ वाय राग केदारो मारु, पर जी मधुरे टीपे ॥ ह ॥ जाणे विंड सुधाना बूटे, एक एक टीपे टीपे ॥ ६ ॥६॥ कोश्क तेणे गति अनिनवी वाइ, नारदथी पण रूडी ॥ ७ ॥ मानव मूर्तीगत परें हुआं, एहमांवात न कूडी ॥ ह ॥ जेहवी वीण वजाडी तेहवे, गाये उंचे सादें। ह ॥ वाहणमाहे जे रसिया वालम, मोह्या तेहने नादें। ह॥७॥ रुपें ना कुण नवि मोहे, विषधर ते प ण डोले ॥ ६ ॥ नादें तृणचर जेह ने मृगलां, आपे , N (६५) प्राण अमोलें ॥६० ॥ए ॥ नादें देव विमानने स्थने, नाद अनोपम दीसे, वेधकनुं मन नादें वे धाये,नादे तन मन हीसे ॥ ॥१॥ जाणपणुं ज गमां ठे दोहिलं विरलो जाणे कोश् ॥हणा पण तस नादे प्रवहण लोको, चित्रपर रह्या हो ॥ ६॥११॥ नाद ते पंचमो वेदज कहीये, जे जाणे ते जाणे ॥ हए ॥ वोघां नादनी गति शुं बजे, फोकट ते ताणे ॥ह ॥ १२ ॥ तेहनां गीततणो जणकारो, पडी नमया कानें, ॥ ह ॥ रंजी मनमें तस प्रीनी, मोही तेहने तानें ॥ द० ॥ १३ ॥ नाह लणी कहे जलचर क्रीडा, जावा द्यो कडं मानो, ॥ ह ॥ सां जलो वीण तणा फणकारा, कोश्क वाये जे ठानो। ह ॥ १४ ॥ कोश्क चतुर शिरोमणी दीसे, वाह वा रूडं वाये, हा आपणने तो वगर पैसे, सांग लतां शुं जाये॥ ह ॥ १५ ॥ कंत प्रियाना कथनथी निसुणे, राग नणी एक तानें, ह ॥ धूम्यो. रागें जेम कोई घूमे, घायल शरने लागे, ॥ ६ ॥ १६ ॥ दाखवशे हवेनमयासुंदरी,नाहनणी चतुराई ॥हण॥ एकवीशमी ढाल कीलंती, मोहनविजयें गाई । ६० ॥ १७ ॥ सर्व गाथा.
॥ , ॥ दोहा॥ नमषा लक्षण दक्षिणा, जाणे नेदश्रनंत ॥चिंते मुजचतुराश्ये करूं सहेजो कंत ॥ १॥ कहे नमया निज नाहने, जे ए गावे गीत ॥ विण दी। कहो तो कहुँ, रूप रंग गति रीत ॥२॥ कंत कहे कामिनी कहो, कांश करो जो जोर ॥ चतुराई जे अंगमें, ते दाखो एकवार ॥३॥ बोलीनमयासुंदरी, रे पीयु गाय क एह ॥ श्यामरंग शोजा सुजग, कुब्जरूप में देह ॥॥ स्थूल हस्त गुद्ये मशक, रक्त नेत्र ससनेह ॥ त रुण वर्ष छात्रिंशनो, चिन्ह सयल ने एह ॥५॥ वचन सुणी वनिता तणां, ताम महेश्वरदत्त ॥ चित्त थकी चिंते इस्यु, थर तरुणीथी विरत्त ॥ ६ ॥ ॥ ढाल बावीशमी॥ चंदन राखो बोजी राज, मीठडा मेवा बो॥ ए देशी.॥ वाणी सुणी नमया तणीरे, शोचे महेश्वर दत्त ॥ सहितो ए गायकथकी, कां नारी संसत्त ॥१॥ माहरी मानिनी हो राज,सही तो धूतारी ॥ चंदन शी बोले के राज पणं विष तोलें , एहनी कहाणी बे राज, ते हवे जाणी बे ॥ ए आंकणी ॥ नहिं तो केम जाणे त्रिया रे, रुप रंगनी रीत ॥ ल 4 (६७) लना लुब्धाणी खरी, कांय करी कुब्जथी प्रीत ॥ मा० ॥॥ एहने तो हुँ जाणतो रे, सुकुलीणी शिरदार ॥ पण ए. कुलटा निवडी कांई, निःस्नेही • अवतार ॥ मा० ॥३॥ महासंती करी.जाणतो रे, पण, फेरव्यु सत एह ॥ जेम वखाणी खीचड़ी कांक्ष, दांते वलगी तेह ॥ मा० ॥४॥ यई गोधूम अम हियडे रे, पेठी प्रमदा सार.॥.पण मांडो थनि सरी कांश, ऐ ऐ .सर्जनहार ॥ मा॥५॥जो जो एहनी कपटता रे, तृणसम गणीयो मुज ॥चोरी दृष्टि सहू तणी, कांगायकथी करी गुन ॥ मा ॥६॥ सगुणी पांखें नीगुणी नली रे, राखी हुती निजहित लाय ॥ लाख जतन करी राखीए, का जाति.खंला वन जाय, मा० ॥ ॥ धोए दूधे कागडीरे, पण हंसली नवि थाय ॥ कुंदन खोले रासनी कांई, न होय पयल गाय ॥ मा० ॥ ॥ वेसाडीए सेजे शू नीरे, नहिं सुरकन्या होय ॥ मीठी न होये लींवडी कांश साकर सींचे कोय ॥ मा॥ ए. एनारीने शुं करुं रे, ना पयोधिमांहिः॥ के करूं चूर्ण ख डंगथी कांश के परिहरियें क्यांहि ॥ मा ॥१७॥ तेह सोनुं शुं कीजीए रे,जेहथी त्रूटें कान ॥ पेटें कांच -- (६०) ननी बुरी कांक्ष, धोंचे कोण नादान ॥ मा ॥ ११ ॥ नारीने न जणावीयु रे,निज हियडानुं अहेज॥प्रीत थयो गायन मिव्यु कांश, दी चिन्ह समेत ॥मा॥ ॥१॥ मनमें सही निश्चे थयुं रे, ए कुलटा शिरताज॥ पणं एहने न जणावयूँ कांश, मुष्टि नली वत्सराज, माण ॥ १३॥ एहवे कूवा थंजयी रे, बोल्यो मालिम ताम ॥ राखो रे नियामको कांश, प्रवदण एणे उगम मा ॥ १४ ॥ नांगर नाख्युं नीरमें रे, वाहण राख्यां छीप ॥ सढ दोरा संकेलजो कोई, श्राव्यो राक्षस छीप ॥ मा ॥ १५ ॥ मीठलजल नरो प्रवहणे रे, को थाउँ सऊ॥ वचन सुणीने बीपीया कांई, पहोता महादेधि मन ॥ माण ॥ १६॥ तेहीज डीप तणे तटें रे, आव्यां बाल गोपाल ॥ मोहनविजयें निर्ममी कांइ, ए बावीशमी ढाल ॥ मा० ॥ १७ ॥ सहू सर्व गाथा. + ॥ दोहा॥ रादस छीपतणे तटे, उत्तरीया सवि लोक ॥ ज लधणने कारणे, बूटा थोका थोक ॥१॥ प्रवहण माहे ततहण, जरीयु निर्मल नीर ॥ समिधादिक पण संग्रह्यां, सजा थया वर वीर ॥२॥ नोजनहे (६ए) तें परवख्या, लोक सयण तिण उगम ॥ एहवे बल साध्यो नलो, महेश्वरदत्तने ताम ॥ ३ ॥ “कहे न मयाने हे प्रिये, जश्ये वनह मकार ॥ तुरत फरी ने आवशु, होशे जमण तैयार ॥४॥ देखशुं कि हां ए छीपने, फरी फरी नयणे तेह, जीव्याथी जो युं नलूं, मान वचन धरी नेह ॥५॥ अति गोली नमया सती, कपट न जाणे तास ॥ साथै थप्राणे शने, श्रावी वनह निवास ॥६॥ ॥ ढाल त्रेवीशमी॥ देशी विंदलीनी ॥ करथी कर ग्रही आडे, निज त्रियने वनहं देखाडे हो ॥ कंत महाकपटी ॥.रे :प्र मदा तुमें देखो, ए सायरतट सुविशेषो हो ॥ कं ॥१॥ठे तरु केहवा ऊंचा, जेम वासगमणीना ए. पे खो पहोंचा हो ॥ कं० ॥ तरुथी वेति वीटाणी, जे म अहिंसाधर्मथी जाणी हो ॥ कं॥ ॥ ए सुर तरु मन मोहे, जगतीशिरबत्र ज्यु सोदे हो ॥ कं० ॥ केहबु वे वन ए दीकुं, मुजने लाग्युं मीतुं हो ॥ कं० ॥३॥ चालो तमें आगल नारी, तीहां होशे कौतु क जारी॥ कं० ॥ दंपती आघां चाल्यां, वर कदली वनमें माल्यां हो ॥ कं ॥ ४॥रंजा पवनें कोले, , (७०) तस दीरघदल बहु डोले हो कं० ॥ लुंबी खूबी रहीयां, फल मोटा रस महम हियां हो ॥ कं० ॥५॥ महोटुं सर जले जेजरीयु, जेम नानकडो ए दरीयो ॥ कं ॥ शीतल नूमी जे सूहावे, पंखीपण रमवा आवे हो ॥ कं० ॥ ६ ॥ ते सरपाले बेग, पियु प्र मदा बीहु एकेठां हो ॥क ॥ पीयुडे मांडी माया, पण कांशए न जाणे जाया हो ॥ कं० ॥ ॥ गूढ कपट कुण जाणे, ब्रह्मापण नविहुँ पीडाणे हो ॥ कंग ॥ प प्रमदा पजणे, पियु पोढो जागीस हवे खांणे हो ॥ कं ॥ ७॥ कहे पीयु पोढो नारी, यहां बेगे ढुं धीरज धारी हो ॥ कं ॥ पोढी नाह नरो सें, तेणे सुख निखा ग्रही होंशे हो ॥ कं ॥ ए ॥ व निता सूती जाणी, चिंते पियु कपटनो खाणी हो॥ कंग ॥ जो हणुं एहने तेगें, तो पातक लागशे वेगें हो ॥ कं ॥ १०॥ एह सूती ने नारी, जो मुंकुं तो होये सारी हो ॥ कं० ॥ एहने श्हां परिहरवी, श्हां ढील न कां करवी हो ॥ कं ॥ ११॥ कर्म कहो केम चूके, जुई प्रमदा प्रीतम मूके हो ॥ कं० ॥ नु जंगनी ब्रांते बाला, जून नाह तजे सुकुमाला हो । कं ॥ १२ ॥ वनिता मूकी वनमें, कां करुणा ना १ ,
(७१)
वी मनमें हो ॥ 5 ॥ दोड्यो वांधी मूठी, फरी न
करे नजर अपूरी हो ॥ कं० ॥ १३॥ नारी. जवेखी
नाखी, जेम घृतमांथी मांखी हो ॥ कं ॥ प्रवहणे
दोड्यो आवे, जून केहवी बुद्धि उपावे हो.॥ कं ॥
१४ ॥ वोल्यो श्वासे जराणो, हलफलतो मांड खेदा
पो हो। कं॥ रे लोको सज थाउँ, एणे प्रवहणे
दोडी जाउं हो ॥ कं० ॥ १५ ॥ ताणो पट शुं विचा
रो, जलनिधिमा पोत हंकारो हो ॥ कं० ॥ ..जोज
न वहाणमां करशुं, पण ना हाथकी वलशुं हो
॥ कं० ॥ १६ ॥ ढील करोडो कांश सज था वहे
ला नाश हो ॥ कं०॥ एह त्रेवीशमी ढाल, : कहीं
मोहन विजयें रसाल हो ॥ कं० ॥१७॥ सर्व गाथा..
॥दोहा॥
पडतो धूजतो थको, कहे महेश्वरदत्त ॥ जूढ,ए
आवे असे, रजनीचर के ऊत्त ॥१॥ दंतुर वली
दीरघ अधर, कर श्रायुध विकराल ॥ केश विटे
कांवरे, जे आवे ऊंघाल ॥२॥ ऊडे रज अंबरे,
चरणे धमके नूर ॥ आवे ठे उतावलो, जेम पयो
निधि पूर ॥३॥ शुं वल कीजे एहथी, एह पुलिंद
प्रचंम ॥ मुफ वनिताने पापीए, कीधी खंडो खंड ॥
(२) ॥ ४ ॥ नाहो श्राव्यो तुम कन्है, कहुँ बुं न करो वा र ॥ प्रवहणमां बेसी तुरत, जो वंडो हित सार ॥५॥ बीहिना लोक इस्यु सुणी,बेग प्रवहणमांहि ॥ कपटी पण बेठो तुरत, सयण वच्चे सोत्साहि ॥६॥ वाहण चाल्यां जलधिमां, मूक्यो तेहज हीप ॥ ज न वनिता कुःख वारवा, आव्या तास समीप ॥७॥ ॥ ढाल चोवीशमी॥ - उग्रसेन नृपनी तनुजाशुं रंगें राज, तथा नरवर साजी॥ एदेशी॥ते महेश्वरदत्त धूतारो राज, मांड्या फंद प्रचारारे॥किहां ग सा नारी रे ॥ ए श्रांकणी ॥ सयण आगल ते रुदन करतो, राज गेडे आंसु धारा रे ॥ कि ॥१॥ कूटे गती धरणीए लोटे रा ज, मूखथी कहे प्रिया प्रिया रे ॥ कि० ॥ लीधी व निता कांश उदाली राज, ए शुं कलुं दश्या रे ॥ कि० ॥२॥ हमणां हुँती मुख आगल रुडी राज, एम ए किहां गश् नाशी ॥ कि ॥ हमणां का नथी बोलती मोसुं राज, थकां बेठी मेवासी रे ॥ किन ॥३॥ तें शुं माहरो मोह न आण्यो राज, एका ए क ग बोडी रे ॥ कि० ॥ हियडामां तुं खटकीश कांते राज, जिम रही नाली जंड़ी रे ॥ किपः ॥४॥ .
... (३) - एम दुःख कारीमुं मांमी वेो राज, लोक सयल प्रति बूजे रे ॥ कि ॥ शुं कुःख एवडु मनमां व होडो राज, माह्या आगम सुफे रे ॥ कि ॥ ५ ॥ जेह गयो ते पागे नावे, तो इःख केहy कीजें रे ॥ कि० ॥ दैव थकी वल नांही कोचं, होवे तो व हेंची लीजें रे ॥ कि० ॥६॥ जिन चक्री हरिवल वलिराजा, केश गया एणी वाटें रे ॥ कि ॥ ते तु म.उखड्डु कां न जाणे, तो शुं होवे उचाटे रे ॥ कित ॥ ७॥ जाणता हूंता ज्ञान लहंता, एम श्र जाण का हूऊ रे ॥ कि० ॥ मानो वचन अम फि .. कर निवारो, देश जल मूखड़े धूर्ज रे ॥ किम् ॥७॥ शीप सलामत पाघ घणेरी, जाणता नथी एउ खाणो रे ॥ कि० ॥ वचन सुणीने निर्दयी राज, हुं में सहेज सपराणो रे ॥ कि ॥ ए ॥ कीधुं नोज न मनमांहे सुहातुं राज, मूकी नारी विसारी रे ॥ कि० ॥ जे निःस्नेही तस माया न होये राज, स स्नेही मायाधारी रे ॥ कि० ॥ १० ॥ जे विश्वासी घात उपावे राज, धिक धिक तास जमारो रे ॥ कित ॥ शह परजव पापें पीडाये, ते सहु सहि अवधारो रे॥ कि० ॥ ११॥ अनुक्रमें प्रवहण तरतां पहो , विक सवि फांखा थया (४) तां, यवन छीपने तीरें रे ॥ कि ॥ उतस्यां सहु ज न सायर कंठे, श्राव्या नरपति नीरें रे ॥ कि ॥ १५ ॥ महेश्वरदत्ते नेटणुं मेव्यु रोज, नृप आगल अनिनवेरुं रे ॥ कि ॥रीऊयो महिपति दीधो दि लासो राज, करो व्यवसाय घणेरो रे॥किम् ॥१३॥ नृप आदेशे महेश तिवारें, पुरमा वेच्यां वसाणां रे ॥ कि ॥ कीधा गांठे दाम दुणा राज, परखी परखः नाणां रे ॥ कि० ॥ १४ ॥ निगम्या केताएक दिवस तीहां राज, प्रवहण वली सज कीधां रे ॥ कि ॥ खेड्यां प्रवहण महोदधिमांहे, निजपुर साहामां सीधां रे ॥ कि ॥ १५ ॥ जर दरिये जव प्रवहण श्राव्यां राज, पूरे पवनें प्रेस्यां रे ॥ कि ॥ देवग तेथी पोत सविहु, गिरि कुंडलमां घेख्यां रे ॥ कि० ॥ १६ ॥ प्रवहण पर्वत परें स्थिर रहीयां, फरहरे पं चरंग नेजा रे ॥ कि ॥ ढाल चोवीशमी मोहनें नांखी, सहु हुँसे निसूणी सहेजा रे ॥ किण ॥१७॥ ॥ दोहा॥ वहाण रंधाई रह्यां, न होय वायु प्रसंग ॥ ना प्रवहण जन श्रातुर हुआं, उद्यम न चढ्यो हाथ ॥
(७५) चिंतातुर चिंते सहू, शुं करशुं जगनाथ ॥ २ ॥ ना वथी उतखो एकलो, तेह महेश्वरदत्त ॥ ततदाण गिरि उपरें चढ्यो, कौतुक देखण ऊत्त ॥३॥ तिहां एक दी देहरु, उंची धज लहकंत ॥ दोय नगारां देहरे, अति आगल दीपंत ॥ ॥ दीनं तेह महे श्वरें, लीधी. गेडी हाथ ॥ नीशाणे दीधी तिहां, ग रज्यो जूधर नाथ ॥ ५ ॥ जवक्यो निपट गृहाथ की, उड्यो. विहंग नारंग ॥ पसस्यो पंखतणो पव न, अति चंचो ब्रह्मंड ॥६॥ ॥ ढाल पचीशमी॥ नंद सलूणा माहरा नंदना रेलो ॥ए देशी ॥ ना रंड पंखीना वायसूं रे लो, तेणें हीलोल्यो सायरुरे लो। गिरिकुंडलथी नीकल्या रे लो, प्रवहण पंथ दिशा चव्यां रे लो ॥१॥ कहे जन वहाण तो वह्यां रे लो, शेव तो गिरि उपरे रह्या रे लोकीहांथी ए मेलो होय रे लो, वाट एहनी घरे जोश्शे रे लो॥२॥ वाहणं पण नवि फरे फरी रे लो, कोश व हु रहियो गिरिरे लो॥अनुक्रमे प्रवहण नावीयांरे लो, रूपचंपुर श्रावियां रे लो॥३॥ खबर हुई रुजद तने रे लो, प्रवदण अाव्यां पत्तने रे लो॥ लोक स . , (७६) हूने जणावीयु रे लो, महेश्वरदत्त तो नावीयो रे लो ॥४॥ ऋषिदत्तादिक दुःख धरे रे लो, पुत्र न श्राव्यो घरे रे लो ॥ प्रवहणजन सवि धनीपणे रे लो, पोहता घर आप आपणे रे लो ॥५॥ हवे ते महेश्वरदत्तनी रे लो, वात कहुँ अति नूतनी रे लो॥ तस्यो गिरिवरथी वहीरे लो, पण प्रवहण दीसे नहीं रे लो॥६॥ ऊनो चिंतातुर होवतो रे लो, नयणे दश दिशि जोवतो रे लो॥ एकलडो नीति धरे रे लो, आप उपाय घणा करे रे लो। किहां घर किहां पुर किहां पिता रे लो, किहां मा ता बंधु किहां बंधुता रे लो ॥ ७॥ श्हां हवे केह ने जलवे रे लो, कर्म कीधां ते नोगवे रे लो॥॥ नूख्यो तरष्यो एकलो रे लो, चटके जेम को वेख लो रे लो ॥ वनफलमाटे घणुं नम्यो रे लो, सांज थक्ष रवि प्राथम्यो रे लो॥ ए॥ पेठो तरुने कोटरे रे लो, नूख्यो तिहां निझा करे रे लो ॥ एहवे ते तरु उपरें रे लो, देवदेवी वातो करे रे लो ॥ १० ॥ कंचन छीप विनावीये रे लो, कौतुक जोवा जाइए रे लो॥ एम कही अंबर वृदने रे लो, ते उडाड्यो तत दणे रे लो॥११॥ जरदरीये गया जेहवे रे लो, जा n ॥ (39) ग्यो महेश्वरदत्त तेहवे रे लो॥श्रालस मोडवा ऊम ह्यो रे लो, तेहवे सायरमां पड्यो रे लो॥१२॥ पड तां जलथी आफल्यो रे लो, मगरें ततदण ते गल्यो रे लो। केतक दिन मत्स्य जबल्यो रे लो, रूपचंड पुरें नीकल्यों रे लो॥ १३॥ धीवरे तास नीहालियो रेलो, ततक्षण उदर विदारीयो रे लो ॥ तेमाहेथी महेश्वरदत्त नीकल्यो रे लो, धीवरे नृप पागल ते ध स्यो रे लो॥ १४ ॥ उलख्यो लोके एहवे रे लो, स ज कस्यो नृपे तेदने रे लो। आमंवरे घेर मोकट्यो रे लो, कुटुंव मनोरथ त्यां फल्यो रे लो ॥ १५ ॥ ढाल कहि पचवीशमी रे लो, मोहनने मनमें गमी रे लो. ॥ हवे नमया सुंदरीतणी रे लो, वात कडे मीठी घणी रे लो॥ १७ ॥ सर्व गाथा. ॥ दोहा॥ जागी नमया सुंदरी, तिणी वनमें तेवार ॥ जोडे पण दीगे नहीं, पासे निज जरतार ॥१॥ ऊठी शंवर सज करी, दीधो पियुने सादः ॥ पालो कोई वोल्यो नहीं, तव दूर्ज विपाद ॥२॥ केम नवि दीधो नाहले, प्रत्युत्तर मुफ हेव ॥ सही प्रचन्नरह्यो हशे, वे हांसीनी देव ॥३॥नमया.उंच खरें करी (30) बोली वनमा एम॥बना जे. रहो हो बूपी, ढूंढी का ढीश तेम ॥४॥ एम कही कदलीवनविषे, पेठी नमया नारी ॥ थालें कहे में दीउडा, में उन्ना नी र्धार ॥ ५॥ कपट न जाएयु कंतनुं, जोली नमया नाम॥ केहवु ए कंतारमें, करी गयो जे काम ॥५॥ ॥ ढाल बवीशमी॥ चंदलीया धूतारडा रे ॥ए देशी ॥ नाहलीया निःस्नेही एम का बूपी रह्यो रे, नारीयें धीर न धराय रे ॥रामतनी वेलाए रामत कीजीए रे, विण अवसर केम थाय रे ॥ ना ॥१॥अबलानी धीर जनुं शुं जूठ पारखं रे, अबला बल कुण मात्र रे॥ श्रावोने वालमीया तुमची वाटडी रे, जोतां हशे संयात्र रे ॥ ना ॥२॥ हांसीथी वीखासी प्रीत मजी हूवे रे, मानो प्राण आधार रे ॥ इण वनमें हांसीनो वेला शी अ रे, हांसी एहवी निवार रे॥ ना० ॥ ३॥ एम करतां तिहां पीयुडो केमही बोल्यो नहीरे, चिंते नमया नारी रे॥ सहीतो वन मांहें बेह दे गयो रे, ए कपटी जरतार रेना॥४ वालमना पाय जोती. सायरने तटें रे, आवी जोवे जामरे ॥ एके को नावड तिहां दी नहीं रे, थर HP (पुए) चिंतातुर ताम रे ॥ नाय॥ फिट फिट रें निःस्नेही निर्गुण नाहला. रे, धिक धिकं मुफ अवतार रे॥ उतारी कूपमां मूकी दोरडी रे, कापे एहवो कवण गमार रे॥ ना ॥६॥ में तो शुं कां तुमने कहीए दूहव्यो रे,शुं तुफ उकट्युं एंड रे॥ करुणा ए शुं नांवी तुऊ हियडे रे; एह शो कारिमो नेह रे ॥ ना.॥७॥ वदीए ने तुऊ गती - वत्र सरीखडीरे, दोड्यो जे घरणी मूकीरे ॥ परिहरतां केम चाव्युं मनडु ताह रुंरे, दीवी शी मुफमां चूक रे ॥ ना ॥७॥ नेहड लो न शक्यो नाहलीया नीवाहिने रे, दीधो अचिं त्यो वेह रे ॥ रे रे किम विधाता हाथे घडे रे, ए हवा नर निःस्नेहं रे ॥ नाप ॥ ए॥ एहवी जो न करे तो:तारीरे, उठी कला नवि थाय रे ॥ पण दीसे वे निर्दय हियडे रे, एहवं तुक न सुहाय रे ॥ ना० ॥१॥ नां तुंकर जोडी दैवमें ताहरो, केहो उलव्यो ग्रास रे॥मुझने जे तें मेव्यो एहवो नाहलो रे, एतुमने शावासरे। ना० ॥११॥ धुरथी जो वालमीया कूड हुँ जाणती रे, तो कांश नावत साथ रे ॥ रेहती हुँ मंदिरमें छुःख नवि देखती, नित्य पूजत जगना थ रे॥ ना॥१२॥ पेहलां तो जल पीधुं पठे घर पूीयु
(10)
रे, हुईं जेतुं लखीयु ललाट रे ॥ मुनिवरनुंजे नांख्यु
तेह खलं थयुं रे, जल वही श्राव्यु वाट रे ॥ ना०
॥ १३ ॥ दैवे जो पांखडली दीधी होत जो रे, तो
जश् मलती कंत रे॥ केम जश्ने मलीयें श्राडो सा
यरु रे, सायरु तेम तदंत रे ना ॥१४॥ पियुडा
ने उलूंडी आवे मनमें रे, नारी निगमे केम दीह रे
॥ उपाडी नाखी विरहपयोधिमां रे, मीतुं बोलतो
केम जीह रे ॥ ना॥ १५ ॥ थानारुं ए सख्युं एहद्
नाग्यमां रे, वालिम ताहरो विजोगरे ॥ शहां को
कोश्नो वांक कोइ नहीं रे, पूर्व कर्मनो लोग रे ॥
ना॥ १६ ॥ जंगलमें पण मंगलमाला होयशे रे,
शील थकी सुविशाल रे॥ पनपी एमनमानी डबीश
मी रे, मोहन विजयें रसाल रे॥नाण॥१७॥ सर्व गाथा॥
॥ दोहा॥
नमया बेह देश गयो, नाह मदेसरदत्त ॥ श्रब
ला फूरे एकली, सायर तट संसत्त ॥१॥ विरह म
होजो केहने, विरह उस्सह दीप ॥धरणी पण शत
खंड हुवे, जल विरहे किठ॥२॥ ववह विरह अ
थाह जल, थाह न लग्ने कोय॥कां न हुईं ताहरु मि
लण, जंगल नेटण होय ॥३॥ जिहां विरहानल प
, (२) रंजले, तिहां नर केहो नूर ॥ ये दावानल जिहां, तिहां केम होय अंकूर ॥४॥ मानव कवणं सही शे के, विरह जुयंगम फल॥ नाली जंडी नीकले, पण न लहुं विरहासत ॥५॥ विरह वज्र वंचे कवण, विरह दुःख न सहाय ॥ जाख लताथी वीउडे, तेम तेम पुर्वल थाय ॥६॥ ॥ ढाल सत्त्यावीशमी॥ शुक देव कहे रे उपाय, तुमें सांजलो परीक्ष त राय ॥ ए देशी ॥ हवे नमया सुंदरी नार, मूके नयणथी आंसूधार ॥ पडी शोचना सरित मकार, · विरहें थव्याकुती रे ॥ कुण जाणे. पराश् पीर ॥ जस वीचे ते सहेज शरीरं, विरहीनो विरह गहीर॥ वि ॥ १॥ फिरे वनमां मृगली जेम, जिहां विरह तिहां धीरज केम ॥ जीहां प्रीत तिहां गति एम ॥ वि० ॥२॥ करी प्रीति निवाहे कोय, करी - एकं गो ताणे लोय॥ पठी तेहनी एहं गति होय ॥वि॥ ॥३॥ एकंगो पतंगने नेह, थई रसीयो ऊंपावे देह ॥ पण दीपक न गणे तेह ॥ वि०॥४॥ करी प्रीत निवाहे कोय, तेतो विरलो कोश्क होय ॥ तंस पीजे पयतंत धोय ॥ वि०॥५॥ जे उत्तम जननी ।
(२) प्रीति, तेहनी तो जगमांय प्रतीति, खलनी तो वि परीत रीति ॥ वि०॥ ६ ॥ दे एम बेह करी विश्वा स, वह्यो नार जननीयें तास ॥ ते तो एमही उदरे दशमास ॥ विण ॥७॥ एम रटती फीरे वनमांही, तास संग सखी नहि पाहि ॥ पडतां रहे वृद संबा हि ॥ विणा ॥ कहे हृदयने रे चंड, कांश न होय विरहे शतखंड ॥ केम वहीश तुं दुःख करंगविणा ए ॥ अयि प्राण कहुँ खं तुम्म, नहिं वालम निकट निस्सम्म ॥ कहेवाशो केहना इम्म ॥ विष ॥ १० ॥ कांई सरजी एणे संसार, निर्नागिणी एहवी नारि॥जे ह तजी एम जरतार ॥ विण ॥११॥रे धरणी न दे को माग, पियुविरह वाई गयो खाग ॥ जून कपटी ए लाध्यो शो लाग ॥ विण ॥ १२ ॥ ए वनमां- कव ण आधार, पीयर के कोष हजार॥गति के करि श किरतार ॥ वि०॥ १३ ॥ पुरुषे पण नाण्यो प्रेम, गयों वालिम मूकी एम ॥ तस रूंधी न राख्यो केम ॥ वि० ॥ १४ ॥ थ वैरण निंद पुरंत, जेणे राख्यो उलवी कंत ॥ एम कही नमया विलपंत ॥ वि० ॥ १५ ॥ पूरवे में कीधां पाप, होशे दीधा कोश्ने शा प॥तेह प्रकट्या श्रापो आप ॥ विण ॥ १६ ॥ दीधा 5 - (३) होशे आले दोष, पीधा होशे आलें कोश ॥ तो जो गवतां केहो शोष ॥ विण ॥ १७ ॥ कस्या हशे कान नदाह, मृग माया हशे फंदमांह, विल पूस्या हो शे नीरप्रवाह ॥ विण ॥१७॥ कस्या वालक मात विगेह, वेच्यां होशे आयुध लोह, कस्या होशे सा धु कोह ॥ विण॥ १५ ॥ सूची अणीये अनंता जीव, कस्या चूरण कंद दहेव ॥ कीधा होशे आहोर सदै व ॥ वि० ॥ २० ॥ गो कन्या नूमि अलीक, होशे वोल्यां नवातरे वीक ॥ फल तेहनां एह नजीक - विण ॥२१॥ करी उद्यम करुं धनजाल, 'थई वेगे हुईश रखवाल ॥ ली, होश्य में ते उदाल॥विणारा वावस्यां होशे अणगल नीर,ग्रही धान्या पंजर की र ॥ रंग्यां होशे रातां हीर ॥ वि॥ २३ धरणीतुं वि दास्यु पेट, शरसंधि रमीयां खेट॥कस्यां शातनंपातन पेट ॥ वि० ॥ २४ ॥ परदारा संगति कीध, रस रंजी वारुणी पीध ॥ सेव्यां होशे व्यसन प्रसिद्ध ॥ वि॥ २५ ॥ तिथिपर्व जाणी कस्यां नंग, करी होशे के ली अनंग ॥ वली मिथ्या वादि प्रसंग ॥ वि॥६॥ जिनमतथी कस्यो विषवाद, गुरुजनना. कस्वा अप वाद ॥ दूउ होशे संतविषाद ॥ वि० ॥ २७ ॥ एम . (४) निंदे पुरातन कर्म, दृढ धारे जिनवरधर्मलहिये जे हथी संपत्ति शर्म ॥ वि० ॥२७॥ ए सत्यावीशमी ढाल, कही मोहनविजयें विशाल ॥ कहुं श्रागल वा त रसाल ॥ विशए॥ सर्व गाथा ॥ ॥ दोहा॥ चार प्रहर दिन वन नमी, पियु विण विण साहि त्य ॥ महासती दुःख देखीने, प्राथमियो श्रादित्य ॥१॥थई रजनी उदयो शशी, विहंग करे विश्राम ॥ पसरी दशदिश चंजिका, उज्ज्वल शीतल दा म ॥२॥ लता गुम्छमाहे वसी, नमया सुंदरी ता म ॥ नयणे नावे नीअडी, मध्यरयणी थश् जाम ॥३॥ पियुविरहे तलपे घj, जलविण जेहवं मीन ॥ जिम जिम नेही सांजरे, तेम तेम जपे दीन ॥॥ रे रे चं द कलंकीया, लाज न आवे तुज ॥ अबला जाणी ए कली, शुं संतापे मुज ॥ ५ ॥ जो पीयुमेलो तुं करे, तो तुफमार्नु पाड ॥ नित दे श्राशीष तुज, करी रा खुं मनवाड ॥ ६ ॥ ॥ ढाल अध्यावीशमी ॥ गोकुल गामने गोंदरे रे, श्राशी खूटा खूट मारा वाहला रे ॥ए देशी ॥ एकलडी सायरत
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(५)
रे, नमया माऊम रात ॥ मारा वाला रे, मुने
दीये उलंजडा रे, मीउडी मीठडी. वात ॥ मा॥.
॥१॥ चांदलिया धूतारडारे, निर्दय निगेर कठोर
मा ॥ विरहीया विरह जगाडतोरे, चंचल चित्तडा
चोर ॥ मा॥ चां० ॥२॥ लोक कहे तुझमें सुधा
रे, ते तो मुधा में दीव ॥ मा० ॥ जाणुं हुं हुं मुज
जाणतो रे, तुजमां गरल गरिह ॥ मा ।चां।
॥३॥ सायर पुत्र तो तुं नहीं रे, तुं वडवानलनी
जाति ॥ मा॥ ताहरूं नाम दोपाकरुं रे, तेहज़
साची विख्यात ॥ मा० ॥ चांग ॥ ४॥ हियडे तुं
रखे फूलतो रे, जे मुफ माने वे ईश ॥ माण ॥ प्रद्यु
विष पीयुपने तज्यु रे,शंकर तो ठे वालिश ॥ मा० ॥
चांग ॥ ५ ॥ ताहरेज नाग्य ए राहुने रे, दैवें न
दीधुं पेट ॥ मा ॥ नहीं तो होत तुं पाधरो रे,
एम पुःख देत न नेट ॥ मा० ॥ चांग॥६॥क्यारे
क़दीय तुं उगमे रे, दिनयर केरी सेज ॥ मा ॥
जाय ठे किहां माटीपणुं रे, कां नथी करतो तेज ॥
मा० ॥ चां० ॥ ॥ एहवो जोरावर जो. अठे रे,
रवि शशि संगम रात ॥ माण ॥ त्यारे का नथी ऊ
गतो रे, जाणी में ताहरी वातः ॥मा ॥ चां ॥७॥
7 (७६) दीसे वे शीतल दीसतो रे, पण पावकथी पुरंत ॥ मा० ॥ मोढुं दही जेम पीवतां रे, जेम होय शीत लदंत ॥ मा ॥ चां०॥ ए॥ कांश्क करुणता राखी ये रे, कविण न थए मामूर ॥ मा० ॥ तो जग दीश जलूं करे रे, साहिव हाजरा हजूर ॥ माण ॥ चां॥ १०॥ कांश्क कीजे संसारणुं रे, कांश्क कीजे उपकार ॥ मा ॥ दीजे जश्ने उलंजडो रे, जिहां होय मुफ जरतार ॥ मा॥ चांग ॥ ११॥ मुंडा तुं अंबर संचरे रे, तुजने शी लागे वार ॥ मा ॥ नाह कठोर मेहली गयोरे, जो तुं नयण उघाड ॥ मा ॥ चांग ॥ १५ ॥ जे. कोय वेरी करे नहीं रे, तेम करी नागे कंत ॥ माण ॥ जो तुं मेलावो मे लवे रे, तुं मुफ वीर महंत ॥ माण ॥ चांग ॥ १३॥ एम विलपे ते व्याकुली रे, तेहवे विदाणी रातरे ॥ मा० ॥ चंद बूप्यो रवि ऊगम्यो रे, सुंदर हू प्रना त ॥ माण ॥ चांग ॥ १४ ॥ वही गुबथी नीकली रे, आवी महोदधि तीर ॥ मा ॥ निसासो जरती थ कीरे, त्यां कुण जाणे पीर ॥ मा ॥ चां० ॥ १५ ॥ पियु पियु करी नमया रडे रे, नाह मलो एक वार ॥ मा॥ वली चित्तडाथी चिंतवे रे, किहां मले व (७) नह मकार ॥मा ॥ चांग ॥ १६ ॥ जेह हाथी महेली गयो रे, त्रेवडी इंसांतुंस ॥ मा ॥ ते पियु केम आवी मले रे, म कस्य मुधा मनढुंस ॥ मा॥ चांग ॥ १७ ॥ उखडं श्हां कोण सांजले रे, रोये न लाने राज ॥ मा ॥ मोह तेणे नाणी रे, श्यो ने तेहथी काज ॥ मा० ॥ चांग ॥ १७ ॥ जीहां ती हां शील सखार्छ रे, शीलथी मंगलमाल ॥ मा॥ मोहनविजयें नली कही रे, अव्यावीशमी ढालं ॥ मा०॥ चां ॥ १५ ॥ सर्व गाथा. ॥ दोहा ॥ हवे तो नमया सुंदरी, मनमां धीरय दिछ । हवणां मलशे वालमो, प्रेम विबुक प्रसिद्ध ॥१॥ जे ते कम्म उवधियो, तेहना नोगव्य जोग ॥ गति ए संसारनी, क्षण वियोग क्षण योग ॥२॥ नोगव्य तुं ताहरां कस्वां, कां तुं धरे विपाद ॥ जे जेहवं फल वावियें, तेहवो तास सवाद ॥३॥ जो ते वावी कोदरी, शाल तुं केम लणेश ॥ पामीश क मल किहां थकी, पर जो तुं खणेश ॥ ४ ॥ मुजने मुंनिये कयु हतुं, कंत विगेहो जेह ॥ पूरव कर्म तणे वशे, उदये आव्यो तेह ॥५॥प्रेम करी पलटे 1 (ज) नहीं, ते विरलो संसार ॥ पण श्हां प्रेम किशो करे, जीहां कृतकर्म प्रसार ॥६॥ ॥ ढाल उंगणत्रीशमी॥ कोई आण मेलावे साजनां ॥ ए देशी ॥ हो उठी नमया सुंदरी, सायर तटथी एह हो॥श्रावी क दली वन्नमां, दीj सरोवर तेह हो ॥ १॥ शील स खा होशे, एहने वनह मकार हो ॥ मलशे वाह लां मानवी, होशे जयजयकार हो ॥शी॥२॥ वेठी सरोवरने तटे, हियडे खटके शाल हो ॥ शहां पर हरीगयो पियुडो,आण्यु कांश न वाल हो॥शी॥३॥ एह कदलीना गेहमां, रहेता लागे बीक हो॥उपहेली गिरिकंदरी,दीसे बेनजीक हो ॥शी तजी सर वर ग्रही कंदरा, पेसी लीधो विश्राम हो । निर्मल जलें नरी नानडी, मुख पखाव्युं ताम हो ॥ शी० ॥ ५ ॥ जे वनफल जूई पड्यां, ते लेश कीध आहा र हो ॥ पवित्रपणे शुद्ध चित्तथी, ध्यान धरे नव कार हो ॥ शी ॥६॥ एहज मंत्र प्रनावथी, अ हि थयो फूलनी माल हो ॥ कुष्ट गयो जपतां थकां, पाम्यो सुख श्रीपाल हो ॥ शी० ॥ ७॥ शिवकुमारे ए मंत्रथी, जटिलनो पुरिसों कीध हो ॥ जिनदासें , (ए) महावन्नथी, वीजपूरक फल लीध हो ॥शी ॥७॥ पाम्यां निखने नीवडी, मंत्रथी सुरना लोग हो । गगनें उडती मोसली, एहज मंत्रने योग हो ॥ शी ॥ ए ॥ हवे ते-नमया नारीने, पीयु विण दीरघ दीह हो ॥ वरस जीसी थाये घडी, उपनी एहवी एह हो ॥शी ॥ १० ॥ निशि वासर नेही विना, होवे अ ति प्रलंव हो ॥ पूजूं जिन जेम सांजले, इहां कोश जो लाने विंच हो । शी ॥ ११ ॥. गिरिवरमें नम या जमे, घणीए कीधी तलास हो ॥ तोही पण जिन राजनी, मूरत न मली तास हो॥ शी० ॥ १२ ॥ फि रिपाठी ग कंदरा,माटी जल ले। हाथ हो ॥ मन मानीतो तेहनो, निपायो जगनाथ हो ॥ माटी त णो निपजावियो, नानकडो प्रासाद हो ॥ तेहमां प्रजु पधराविया, गाती सुकंठें नाद हो ॥शी॥१३॥ स्थाप्यु नाम युगादिनु, हरखी घणुं मनमांह हो । वनफल वनमां फूलडां, ढोके नित्य सोत्साह हो । शी॥ १५॥ नावे नावे नावना, कहे हो जिन अनु कूल हो॥ माहरा नाह तणी परें, रखे होता प्रतिकूल हो ॥ शी ॥१५॥जो वे करुणा ताहरी, तो वे मं गल माल हो ॥ मोहनविजयें नली कही, उंगण ५ , (ए) त्रीशमी ढाल हो ॥शी० ॥ १६॥ सर्व गाथा ॥ ॥ दोहा॥ वीतरागने विनवे, देव शिरोमणि देव ॥ ए वनमा पा किहां, तुम पद पंकज सेव ॥१॥ मीठी कूई कर चढी; खारा दरीया मद्य ॥ ए वेलाए तुं मल्यो, परम सनेही मुद्य ॥२॥ मात पिता वांधव खसा, ससरो सासू कंत ॥ फुःखमांहि होय वेगलां, एक तुं सखा नगवंत ॥ ३ ॥तुं करुणानिधि तुं विबुध,तु ज गुण अपरंपार ॥ नव सायरमां मूवतां, तुज पद पद्म आधार ॥४॥ एम जन्म सुकियारथो, करती नमया नित्य ॥ नूथी लही वनफल जमे, धरती ता पस वृत्ति ॥५॥ वस्त्र तणी बांधी धजा, दरी जर्क बहु वान ॥ काननमें नमयासुंदरी, एम करे गुजरान ॥६॥ ॥ ढाल त्रीशमी॥ देशी वीडीयानी हारे लाल नमया सुंदरीनो पि ता, निज नयरथी चढीयो जहाजरे लाल ॥ सिंहल छीपनी साह्मो, सुंदर व्यवसायनें काज रे लाल ॥१॥ हुँ बलिहारी रे शीलनी, नहि शीलसमो जग कोय रे लाल ॥ जेह थकी वनमें शहां, मनमेलु मेलो होय रे लाल ॥ ढुं० ॥२॥हां ॥ प्रवहण तरतां नीरमें,
(ए)
ते पाम्यां निशाचर बीप रे लाल ॥ नमया तातें रे
पोतने, सायर तटे राख्यां लीप रे लाल ॥ ९ ॥३
। हांग ॥ प्रवहण हुँती उतयां, जल इंधण सेवा
लोक रे लाल ॥ सायरतटे नमया पिता, वेठो तिहां
विटाइ लोक रे लाल ॥ ९॥ ॥ ४॥ हां॥ दीकुंक
दलीवन तिहां, अलगाथी नयणे तेण रे लाल ॥जोवा
कारण संचस्यो, एकलो न जाणे कोण रे लाल
॥९॥हांणा दीगं तेणें धरणी तलें, वनितानां पग
लां गोण रे लाल ॥ चिंते शहां ए वनमां, रहती हशे
नारी कोण रे लाल ॥ हुं॥६॥ हां ॥ दीसे वे पग
लां तुरतनां, हमणां गश्दीसे ठे नारी रे लाल ॥
होशे कोश्क वियोगिणी, अथवा किन्नरी अनुहार
रे लाल | हुँ॥हांणा एम चिंती उतावलो, चाल्यो
नमयानो तात रे लाल ॥ कदलीवन मूकी करी,
गयो मुंगर निकट विख्यात रे लाल पहुंानाहां॥
तिहां एक तेणे दीठी. धजा, फरहरती पक्न प्रका
श रे लाल ॥ जाणुं सही हा कोश्नो, रदेवानो
दीसे वे वासरे लाल ॥ढुंगापाहांगा विण जाण्ये के
म कोश्ना, मंदिरमाहे दीजे पाय रे लाल. ॥ मा
ह्यानी एह रीत ठे, - विणतेडे कीमही न जवाय रे
रे , (ए) लाल ॥ हुं ॥ १७ ॥ हां ॥ संकोचाईने रह्यो, ए कलो कंदरा बार रे लाल ॥ कान देश्ने रे सांजले, तिहां वयणतणा जणकार रे लाल ॥ हुं० ॥११॥ हांग ॥ कोश्क नूट्युं वे मानवी, यहां वसियुं दीसे में तेह रे लाल ॥ लोक दिशा जमी ए ध्वजा, फर हरती कंदरा गेह रे लाल ॥ हुं ॥ १५ ॥ हांग॥ कान देश वली सांजव्यु, नर किंवा नारी एह लाल ॥ हलुवे जेम तिहां सांजले, तेम साद उल खीयो तेह रे लाल ॥ हुं॥१३॥ हांग॥ मूळ पुत्री जे नर्मदा, ते सरखो दीसे वे साद रे लाल ॥ ते केम संजवियें हां, एम मनथी करे विसंवाद रे लाल ॥ १४ ॥ हां ॥ होय किंवा नहिं होय, मुफ पुत्री नमया एह रे लाल ॥ वीजी कुण माही असी, एम बोले मीठी जेह रे लाल हुँ॥१५॥ हां॥ पेगे कंदरीमांहे धसि, दीठी निज पुत्री नेण रे लाल ॥ तातें बोलावी वालिका, अति मीठे मनोहर वयण रे लाल ॥ हुं० ॥ १६ ॥ हां ॥ नमया जो जो बोलशे, निज तातथी वेण रसालरे लाल ॥ रंग रली. ए त्रीशमी कही मोहन विजयें ढालरे ॥ लाल ॥ हुँ० ॥ १७ ॥ सर्वगाथा , (एई) ॥ दोहा॥ नमयाए दीगे पिता, हर्षित मनमां जोर ॥धा राधर देखी. जिस्यो, तांडव मांडे मोर ॥१॥ क्षणे क करी बालोचना, ए सुहणुं के साच ॥ कीहांथी ए वनमें पिता, ए शो दीसे साच ॥२॥.के कोई वनदेवता, प्रगट्यो गुफा मकार ॥ दीसंतो दीसे पि ता, पण केम करूं जुहार ॥३॥ वोल्यो तात सुता प्रत्ये,रे वत्से सुण वात ॥ चित्तथी शी करे शोचना, हुँ बु ताहरो तात ॥ ४॥ शुं तुं उलखती नथी, तुज जनक सहदेव ॥ ताहरो साद सुणी हां मि लवा श्राव्यो हेव ॥ निश्चय जाणी नर्मदा, ऊठी प्र णम्या पाय ॥ श्रालिंगीने जनक पण, मल्यो हेज न समाय ॥६॥ ॥ ढाल एकत्रीशमी। तुम चरणे मेरो चित्त लीनो॥ ए देशी ॥नमयां सुंदरी तातने कंठे, लागी बगती जराणी उत्कंठें । प्रजु जे करे ते मानी दीजें ॥ नयन यकी फरे आंसु धार, जाणे त्रूटो मोती हार ॥ प्रण॥१॥ गदगद करथी बोली न शके, हियडं दुःख ते केम करहि शके ॥०॥ तव तेड्ने तातें बुचकारी, एव९
ऐ मदारी पत्री
(एच)
पुःख केम करे विचारी ॥॥॥ण की
श्ण वनमें तुं केम बे, कहे मुजने जेह जेम ते ॥
॥प्रणापासे नहीं कोई संग सहेली, किहां गयो वा
लम तुझ महेली ॥ प्रण ॥३॥ में तुज उत्तमने
परणाश, तिहांथी तुं शहां किण विध आ॥प्र॥
कहे तव नमया तातने वाणी, केती कहुं हुं कर्म क
हाणी ॥ प्रण॥४॥ जव हुँ परणी पीयु गुण जोती,
राखतो तव पीयु अंबर धोती ॥ प्र॥ ते इहां बेह
देश गयो वनमें, करुणा किमपि न श्राणी मनमें ॥
प्रण॥५॥ में एम पीयुडानुं कूड न जाण्यु, जोले ना
वें साचुं पिबाएयु ॥ प्रण ॥ शहां एकलडी दिहडा
गालु, वनफलथी ए पिंगने पालुं ॥ प्र० ॥६॥ तमे
शुं करो वली शुं करे पीयुडो, पूर्व कीधां नोगवे
जीवडो ॥ प्रण ॥ नालमें जेह लख्युं ते लहीए, अंत
र्गतनी केहने कहीए ॥ प्र॥ तुमे जाएयु हशे मा
हरी वाला, परण्या पजे सुख लहेशे ते वाला ॥प्रका
पण जो माहरा वखतमें न लिखियो, वांक नहीं में
कोश्नो परखियो ॥प्र॥ ७ ॥ तातें निसूणी पुत्री
वाणी, सांजलतां तिहां गाती नराणी ॥ प्र॥ ऐ
(एए) केवां ॥4॥ ए॥ में विण जाणे करी मूर्खाइ, जे एहवा कपटीने परणा॥ प्र॥ एम कही हियडे लगाडी वाला, रखे दुःख धरती हवे गुणमाला ॥ प्रज-॥ १० ॥ नमयाने तव आणंद हूजे, मुखडाने तव दीधो पूर्व ॥ प्र॥ मनमेलू मले एहवे टाणे, ते सुख विहु मन के जिन जाणे ॥ प्र॥ ११ ॥ ताटी लहेरी जेम सायर केरी, वुझा जलधर पवनें फेरी ॥ ॥ तेहथी अति टाढो वाहला मेलो, ते साचुं रखे जूवमें नेलो ॥ प्र० ॥ १२ ॥ तातजी तुमे शहां जिनवर नेटो, जव लव कुःखडां वीणेकमां मेटो ॥ प्रा॥ तात कहे शहां जिनवर किहांथी, के हे पुत्री प्रगट्या ठे यहांथी ॥ प्र० ॥ १३ ॥ ततण ते प्रतिमा दरसा, इंगुल तेलनो दीप वनाई ॥ चैत्यवंदन चित्त चोखे की, दरिसणपीयूष नयणे पीयूं ॥ प्र० ॥ १४ ॥ तारण तरण तुं जिन कहेवाये, रवामी कीसी जो तुं प्रसन्न थायें ॥ प्रण॥ खामी नि रंजन निपट नीरागी, तुम चरणथी अम प्रीतडी लागी॥प्र० ॥ १५॥ आप तस्या. तिम अमने ता रो, तुं शिववनिता देवणहारो ॥ प्र॥ जगमांहे न हि को तुम सम दाता, तुं नले जायो धन धन (ए६) तुम माता ॥प्र०॥ १६ ॥ नमया तातें जिनस्तुति कीधी, समकित सुखडी रूडी लीधी ॥ प्र०॥ मोह नविजयें मन स्थिर राखी, ढाल नली एकत्रीशमी नांखी॥प्र० ॥ १७ ॥ सर्व गाथा ॥ ॥ दोहा॥ नमयातातें जिनस्तवन, कीबूं रूडी रीत ॥ पुत्रीने एवं कहे, अंतरंग धरि प्रीत ॥ १॥ जो तुक पियुडे परहरी, एहवा वनह मकार ॥ तुं ते उपरे प्रीतडी, नाणीश कोश्वार ॥२॥ श्रापणने चाहे घj, क्षण दण में सो वार॥श्रापण तेहने चाहीयें,मान्य सुता निर्धार ॥३॥ हाथ नमे जो कोश्ने, वहेंत नमे तो कोय ॥ दिलजर दिल ने जिहां तिहां, एम नांखे सहु लोय ॥४॥ जावा दे जो ते गयो,म करिश फिकर लगार ॥ श्राव्य संघाते माहरे, बोडी परो कंतार ॥ ५ ॥ सिंहल द्वीप थई पत्रे, पहोचशुं श्रापणे गेह ॥ तिहां वेठी तुं पालजे, शील धर्म ससनेह ॥६॥ जो मेलो लीख्यो हशे, तो तुऊ मलशे कंत॥ नहिं तो बेठी मंदिरें, नजजे जिन जगवंत ॥७॥ ॥ ढाल बत्रीशमी। श्राउ टकारो कंकण रे, नणदल गणक रह्यो मो A ॥ (ए.) स वाहः॥ कंकण मोल लीळ ॥ ए देशी ॥ तात व चनथी नर्मदा रे, सूरिजन हर्पित थर मनमांहि ॥ गोरडी गुणवंती, जेहने ठे शीयल सन्नाह ॥ गो॥ (जेहनेते शीत सहाय पागंतरे) तातं. संघातें ते संचरी रे ॥ सू० ॥ आवी प्रवहण ज्यांहि रे ॥ गो ॥जे॥ १ ॥ परिहयुं वन जिम तद नवें रे. ॥सूणा उत्कट खर्गावास ॥ गोण ॥ वेळी तेह विछोहमें रे ॥ सू० ॥ तात संघातें उल्लास.. ॥ गो० ॥ जे०॥ ॥५॥ जोजन कीधा लावतां रे ॥सू पहेख्यो नौ तन वेप ॥ गो॥ जो सन्माने ठोरडं रे ॥ सू० ॥ तेहमां केहो विशेप.॥ गो॥ जे० ॥३॥ वेगं स घलां मानवी रे ॥ सू० ॥ प्रवहणमादे जे वार ॥ गो० ॥ मूक्यो पोत खलासीय रे ॥ सू०॥ महो दधि मद्य ते वार ॥ गो ॥ जे० ॥ ४ ॥ जेहवो वेग उतावलो रे ॥ सू०॥ त्रूटे तंती तार ॥गो ॥ श्र धिके वेगे तेहथी रे ॥ सू० ॥ प्रवहण करे रे प्रचार ॥ गोगाजे-॥-५॥ सिंहलही जाता थकां रे ॥ सू०॥ पवन थयो प्रतिकूल ॥ गो॥ पवने प्रेयां श्रावियां रे, अनुक्रमें बव्वर कूल ॥ गोंण जे ॥६॥ देखी बब्बर कूलने ॥ सू॥ बीप्यां . ॥ बीप्यां प्रवहण तुंग
(ए७)
॥ गो॥ मेंरा सायरने तटे रे ॥ सू० ॥ ताण्या वर
पंचरंग ॥ गो ॥ जे ॥७॥ सहित सुता नमया
पिता रे ॥ सू० ॥ आव्यो मेरा मांह ॥ गो ॥ बे
सारी नमया नणी रे ॥ ॥ एकांते सोत्साह
॥ गोण ॥ जे ॥ ७॥ जोजन प्रमुख जलां कस्यां
रे, नमयादिकें तेणी वार ॥ गो ॥ प्रहर दिवस
जब पाबलो रे ॥ सू० ॥ शोचे शाह तेवार ॥ गोण
॥ जे ॥ ए ॥ नमयाने मूकी इहां रे ॥ सू० ॥जेटुं
बब्बर नूप ॥ गोण ॥ पुरमे वली रोजगारनुं रे
॥ सू०॥ दीसे बे केहबुं खरूप ॥ गो ॥ ॥ जेव
॥ १० ॥ अंबर पहेस्यां सुंदर रे, पहेस्या नर शृंगार
॥ गो॥ बीबूं अमूलक नेटणुं रे ॥ सू० ॥ साथै
सवि परिवार ॥ गो ॥ जे ॥ ११ ॥ पुत्रीने कहे
पेखजो रे ॥ सू० ॥ पट मंडप मनुहार ॥ गो० ॥
आवीश हुँ हमणां फरी रे ॥ सू० ॥ जाउंडं नयर
मकार ॥ गो० ॥ जे ॥ १२ ॥ एम कही नमयानो
पिता रे ॥ सू॥ परिवखो परिकर साथ रे॥गो॥
एम पहोंतो दरबारमें रे ॥ सू० ॥ जिहां बेगे नृप
नाथ ॥ गोगाजे॥ १३ ॥ बत्रीश राजकुली सजी रे
॥ सू॥ ॥ वच्चे मकरध्वज राय ॥गो ॥ नमया तातें
-
(एए)
पाधरा रे ॥ सूत्र ॥ प्रणम्या पुरपति. पाय ॥-गो
जे० ॥ २४ ॥ परदेशी व्यापारियो रे ॥ सू० ॥ जा
णी नृप दे मान ॥ गो० ॥ आदरथी ग्रयु नेटणुं रे .
॥ सू० ॥ नूपें दीधां पान ॥गो ॥ जे ॥१५॥ कुशला
खाप परस्परें रे ॥ सू० ॥ पूढे आणी प्रेम ॥ गो॥
पुरमांहे व्यापारनी रे ॥ सू० ॥ मागी आणा तेम
॥गो ॥ जे० ॥ १६ ॥. प्रणमी नृप नमयापिता रे
॥ ॥ श्राव्यो श्रापणे गम ॥ गो॥ ढाल
कही वत्रीशमी रे ॥ सू० ॥ मोहने एह अभिराम
॥ गो ॥ जे ॥ १७॥.सर्व गाथा. .
॥दोहा॥
वेच्यां नमयाने पिता, करियाणां पुरमांहि ॥ दा
म.कस्या-गांवें जला, परखी पारखमांहि ॥१॥ पुर
मांहे कीरति थई, 'नमया जनकनी जोर ॥ एहवो
कोण अपत्य ठे, जे होये गुण चोर ॥ ॥ सुपुरुप
जिहां जाये तिहां, पामे श्रादर मान ॥ नागरवती
मान लदे, जाते तो ठे पान ॥३॥ तृणचर नानि
थकी थई, मृगमदनी शी जाति ॥ पण जो गुण वे
तेहमें,तो. जग विख्याति.॥ ४ ॥ नमया तात-नि
रंतरे, श्रावे नृप दरवार ॥ वव्वरमांहे दिन थया,
,
,
. बी हरतरगच्चीव शान मन्दिर, जयपुर (१०० बहुला हेज नंमार ॥ ५ ॥ नमया केरामा रहे, ता त करे संजाल ॥ वालमने संजारती, निगमे दिवस विशाल ॥६॥ ढाल तेत्रीशमी॥ सलूणी जोगण रूडी बे ॥ ए देशी ॥ बब्बर कू लमांहिं वसे बेहारिणी गणिका एक ॥ जेदथी पुरंद र श्रप्सरा,रही हारी तेहथी विवेक ॥ कर्मनी गति न्यारी बे, अरे हां जूळ विचारी वे ॥१॥ ए श्रां कणी ॥ हारिणी जन मन हारिणी साची, कारिणी मोह प्रपंच ॥ प्रगट कपटनी तेह सारिणी, वधा रिणी प्रीति रोमंच ॥ क ॥२॥ मधुर वयण वली नयण थनोपम, सयण करे क्षणमांहि ॥ प्रगटी मयणतणी नली, ए तो रयणि उद्योत विनाहि ॥ कण् ॥३॥ गणिका रयण तणी बे कणिका, ला वण्य श्रणिका समान ॥ अमृतनी बे वेलडी, स्नेह यंत्रनी क्षणिका निदान ॥ का ॥४॥ नारी नृत्य : कारीयो हारी, एहवी अटारी तेह ॥ विषय कटा री विनावरी, शील शूरने कंपावे तेहः ॥ करा ॥५॥ कामि जनने मनमें सरखी, विषय जननी संसार ॥ एहवी गणिका रूयडी, जस हाथे घडी किरतार ... -- ..
(११) ॥ कम्॥ ६ ॥ वव्वर रायें तेहथी दीधी, ठत्र धारिनी सेव ॥ धरणीधव माने घणुं, एह विषयी जननी टेवं ॥ कण ॥ ७॥ एक दिन नृप कहे ते ग णिकाने, माग्य कांक मुफ पास ॥- तुफ गुणें रीज्यो हुँ घणो, हुँ पूरुं ताहरी आश ॥ क० ॥७॥ गणिका कहे सुणो नयर नरेश्वर, जो 3 करुणा तुझ ॥ तो उणती ठे केहनी, महाराज मंदिरें मूक ॥. क ॥ ए॥ पण एक मामु पसाय तुमारो, सारो मोठं काम ॥ जे सारथवाह आपणे, श्हां घडवा श्रावे दाम ॥ का ॥ १० ॥ तेह अगेत्तर सहस सो वनना, आपे मुफ दीनार ॥. आवे मंदिरं माहरे, सुख नोगवे जेह सार ॥ कण ॥ ११॥ ते मुफ मंदिर जो नवि श्रावे, तो देवू तस अपमान ॥ जो मुफने माग्युं दीयो, तो देउँ एह दिवान ॥ क ॥१२॥ नृप कहे जोली ए शुं मागे, जो मागे ते प्रमाण ॥ जे कडं ते लेजें सुखे, कुंण रंक श्रने कुंण राण ॥ कम् ॥१३॥ नृपना वयणथकी ते गणिका, श्रावे जे ' सारथवाह ॥ लेवे धन ते पासथी करे, केलि अनंत उत्साह ॥क० ॥ १४॥ हारिणी गणिकायें श्राव्यो जाणी, नर्मदासुंदरी तात.॥ जे किरतारें जला क
(१०२)
स्या, तस गनी केम रहे वात ॥ कण ॥ २५ ॥ ग
णिका मिलवा थातुर इश्, तेम वली धननो लोन ॥
जो जो एह संसारमां, नथी दीसतो लोचनो थोज
॥ कण् ॥ १६ ॥ लोन जूमो ते गुहिर महोदधि,
कोश्क लाने पार ॥ ढाल कही तेत्रीशमी, ए मो
हन विजयें सार ॥ कण् ॥ १७ ॥
॥ दोहा॥
हवे ते गणिका हारिणी, आलोचे स्वयमेव ॥ चे
टी गुण पेटी नली, ते तेटी ततखेव ॥१॥रे चेटी
सायर तटें, पटकुल ताण्यो जेण ॥ तेहने जेम तेम
नोलवी, मंदिर आणो तेण ॥॥ जो ते नाकारो
कहे, तो तुं कहेजे एम ॥ अम मंदिराव्या विना,
रे नर जाश्श केम ॥३॥ मुखा अठोत्तर
सहस,
हेमतणी अम देह ॥ अम स्वामिनी मल्या पठी,
जे जाणे ते करेह ॥४॥ चेटीने एम शीखवी, मूकी
तेणें विख्यात ॥ ते पण आवी पाधरी, ज्यां ने न
मयातात ॥५॥ करीप्रणाम ऊनी रही, दासी करे श्र
रदासौअहो सार्थ गणिका तिणे, मूकी बे तुम पास
॥६॥ जे दिन तुमने सांजव्या, ते दिन हूंती तेह ॥
मिलवा मन तरसै घणुं, निपट बंधाणो नेह ॥७॥
- (१३) ॥ ढाल चोत्रीशमी.॥ ... वेडो नांजी ॥ एदेशी ॥नमया तात ते 'दासी वयणे, घणुं श्रघणु ए खेदोणो, परदारानी संगतिः निसुणी, हियडे अति शरमाणो ॥१॥ अलगी रहेने हारे कहेनी ठे तुं दासी, अ० ॥ हारे शी मांडी कू डनी फांसी ॥ अ॥ हारे तुं दिसती नथी विश्वासी थए श्रांकणी॥ अरे दूती किहां तुं हुंती, थर धूती. जे श्रावी ॥जारे अवती देश जूती, चढशे नूति साची ॥१०॥२॥श्रमें व्यवहारी किम-परनारी, से जोय विचारी॥ खारी विषयी विषय कटारी, मतवारी धूतारी ॥ १०॥३॥ अमें संतोषी हुँ निज दारा, केम से, परदारा ॥ नोगवतां निर्धारा सारा एहनां फल खारां ॥१० ॥४॥ पररामाना जे हने नामा, जन्म्या तेह निकामा.॥मुख सामा जोई नवि पाम्या, धन्य जे एम तजे वामा ॥१०॥५॥ अमें श्रावक आगमनावक, नावक मिथ्या अराति॥ परदारा पावकमां. पगलां, देतां केम वहे ठाती ॥ श्र०॥६॥ दानवराय अटका वंका, शूर पण धरता शंका ॥ दाशरथीयें देई.मंका, लंका कीधी पंका ।।. ॥७॥ पदमोत्तर जस थविचल उत्तर, सायर इत्तर , (१०४) श्रामो ॥ तेह निरुत्तर कीधो मुकुंदें, परत्रिय अयस अखाडो॥०॥७॥रे दासी तुं कुबुद्धिनी मासी, एम नकीजें हांसी॥ आशा शी विशवासी नोली, कहीये वात विमासी श्रण ॥ ए ॥ तुज उकुराणी वेश गवाणी, श्रमे वाणियाणी जाया ॥ अमथी ए केम हुवे कमाणी, जाणी वादल बाया ॥ अ० ॥१॥ नमया तातनी,निसुणी वाणी,अति विलखाणी चेटी। चित्तथी जाण्यु कांहुं श्रावी, मायने पेटें बेटी ॥श्र० ॥ ११ ॥ कहे कर जोडी तहें निगोडी, कां नांखो जवखोडी ॥ होडी मुझ स्वामिनी जोडी, गोर डियो ने थोडी॥ अंग ॥१॥ ए अंगना जेणे अंगी यें, अंगें नविश्रालिंगी ॥ नवरंगी नवि जिणे अनु षंगी, तेह कुरंगी प्रसंगी ॥ १० ॥ १३ ॥ नारी ना गकुमारी सारी, ना तेह उवारी ॥ जेणे हाथे ए गणिका संवारी, धातानी बलिहारी॥०॥ १४॥ जे परदूणा, श्रावे सयाणा, इणपुर लेश वसाणां ॥ ते मंदिर गणिकाने श्रावे, एहवी महीपति आणा ॥ श्रण ॥ १५ ॥ सहस एक या अधिकेरा, श्रापे ते दीनार ॥ नहीतो तेहने नवि दिये जावा, जाषित लखत जे सार ॥॥१६॥ चेटीनी निसूणीने वाणी, (१५) नमयातात जे कदेशे॥ ढाल कही. चोत्रीशमी रूडी, मोहन हेजें लहेशे॥॥ १७॥ ॥ दोहा ।। जांखे नमयानो पिता, चेटी निसुण विचार ॥ कहो उकुराणीने लियो, जोश्य तो दीनार ॥ १॥ तु मथी बीजी वारता, श्रमथी तो नवि थाय ॥ एम कहेजे मीठी गिरा, तेह कहेतां शुं जायः॥ २॥ राजा पण कोपे नहीं, कागलियाना कान ॥ ते माटे कहेजे घj, चेटी तुं कर्तुं मान ॥३॥ चेटी श्रावी दोडती, निज उकुराणी पास ॥ ए सारथपति स्वा मिनी, दीसे को दास ॥४॥ मिलवाने वांठे नहिं; तुझ सरी जे पात्र ॥ ए श्रण बोलाव्यो ज लो, घर जेहवी नहिं यात्र ॥ ५॥ एणे तो , एहवं कडं, लागे ते व्यो दिनार ॥ पण परदारा प्रीतडी, करतां केम व्यवहार ॥ ६ ॥ '. ॥ ढाल पांत्रीशमी-॥ चुनी चुनी कलीयां में सेज वीठांउ, फुलारी गज राह ॥ माहरा मारुडा; पाणीमारो उमको वाजे ॥ ए देशी ॥ जा रे चेटी तेडी श्रावो, जेम सारथवा हः॥ मारा पंथीडा जोगीडा कांय न श्रावो, श्रावो (१०६) माहारा राज ॥ निपट न खोजी थाङ गए श्राकणी॥ कहेजो स्वामी मया करो मोसुं, मंदिर करो गज गाह ॥ मा॥१॥ तुमयी नला जला सारथवाह, श्रांगण श्रमचे श्रायामा॥ दीसो डो तेहथी चतुर घणेरा, फोगट शी करो माया ॥ मा ॥२॥ हूकम अ मूज नरवर केरो, लेजंडं तिण दीनार ॥ मा॥ नहीं तो अमारे घेर कोण आवे, श्रमे गणिका श्रव तार ॥ माण ॥३॥जो तमे माहरे गेह न श्रावो, तो किम लेज दीनारमाण मन माने तो करजो क्रीडा, पण श्रावो एक वारं ॥मा॥॥ वयणथी न होवे मेलो, तस धनें केम मन माने ॥मारे रे दासी खासी माहरी, एम तुं कहेजे बाने॥ मा॥५॥ श्रावी दासी तरत उजाणी, जिहां बेचीवरगेह ॥माण् अहो सार थपति विनति मानो श्रमथी श्राणो नेह ॥मा० ॥६॥ मूक ठकुराणी घणुं लुब्धाणी, तुमढुंती निर्धार ॥ मा० ॥ मंदिरसुधी तो करो करुणा, साथे लेश दी नार ॥ मा ॥ ७॥ वातडीए तो एम मत वाहो, एम केम मूके कोय ॥ मा ॥ हे प्रिय प्रेम एम बनी थावे, वाते वडा नवि होय ॥ मा० ॥७॥ जो मन माने तो तिहां रहेजो, पराणे न होवे श्री '- (१७) त ॥ मा आगाम वसे नहिं वांध्ये कणवी, जिहां तिहां एड् ते रीत ॥ मा० ॥ ए॥जो तुमें नहीं था वो तो तुमने, चालवा नहिं दे राय ॥ मा० ॥ नाने महोढे तुमची आगल, शी कहुं वांत वनाय ॥माण ॥ १० ॥ शाहें आलोचीने जोयु, एतो गणिका जा ति ॥ मा ॥ नर सुर असुर ते पार न पामे, जे ए हना अवदात ॥ मा० ॥ ११॥ जे कोइ नारी थकी हं ताणे, ते सम मूढ न कोय ॥मा॥ अपर वली तस गायुं गाये, ते पण तेहवों होय ॥ मा० ॥१॥ करीए आपणा मननुं जाएयु, ताणीय नहिं को साथे ॥ मा० ॥ शुं करे कामिनी जो होय आपणुं, मन९ श्रापणे हाथे ॥ मा० ॥ १३ ॥ दासी वयर्षे जनक नमयानो, ले तुरत दीनार ॥ माय ॥ श्रा व्यो दासी साथे सुंदर, गणिकाने श्रागार...मा॥ ॥ १४ ॥ गणिकायें आसन वेसण दीर्छ, घणी करी मनुहार ॥ मा० ॥ नले तुमें स्वामी महेल पधास्था, मोहोटी करी किरतार ॥माण॥१५॥ एवडी शी करी खांचा ताणी, कनडीथी महाराज ॥ मा॥ नृपनो हुकुम अने हुँ चाहूं, तो तुमने शी लाज ॥ मा । ॥ १६ ॥ साकर घोले मुखथी गणिका, सारथवाह (१७) निहाले ॥ मा ॥ मोहन विजये रूडी नांखी, पांत्री शमी ए ढाले ॥मा ॥१७॥ सर्वगाथा ॥ दोहा॥ गणिकाए मांया घणा, हाव नाव धरी वाच ॥ पण नोलववा शादने, सा नवि लाने दाव ॥१॥ शाह तिहां मन दृढ करी, वेगे चित्र समान ॥ व चन सुणी गणिका तणां, एकरंगे दीये कान ॥२॥ जिहां शीलसन्नाह वर, तिहां कुसुमायुध वाण, कि मपि न जोरो करिशके, मन माने तेम ताण ॥३॥ नमयातात कहे तहां, रे गणिका अवधार ॥ लट पट: जावा दे परी, ए व्यो तुम दीनार ॥ ४ ॥ श्रमें श्रावक जिन रायना, परदारा परिहार ॥ देखी पे खी श्रम थकी, केम होये एह श्राचार ॥५॥ मान्य कडं तुं माहरु, अमे श्राव्या श्रागार ॥ नईं थयु तुमने मख्या, सोप्यां तुम दीनार ॥ ६ ॥ ॥ ढाल बत्रीशमी॥ अमे महीथारु श्रादि जुगादि, तुं कीदांनो डे दाणी रे ॥ ए देशी ॥ कहे दासी हारिणी गणिका ने, रही श्रवणमा पेसी रे ॥ एहने मेरे कामिनी रूडी, मनोहर नानडे वेशें राज ॥ १ ॥ हूं तो एह
(१०ए)
ने मटके मोहीरे ॥ देही कुंकुमने बान; जेही रे
अप्सराने मानः ॥ हुं० ॥ ए आंकणी ॥ नयण देश्ने
घडी धातायें, कदेतां नावे लासे रे ॥ आज तो व
धती दीठी आना, काले कीहां तेनासे राज ॥हुं०
॥२॥ नांगकुमारी देवकुमारी, तेम ए मानवनी: कु
मारीरे ॥ अहो उकुराणी वाला उपरें, नाखं तेह उ
वारी राज ॥ हुँ ॥३॥ शुं जाणुं एहनी के पुत्री
किंवा एहनी नारी रे ॥ में तो नोले नावें दी,
पण नावे ते निरधारी राज ॥ ९॥ ४ ॥ ते कन्या
जेमतेम करता, आपण मंदिरें आवे रे ॥ कल्पल
ता सम इवित दाता, दीव्हीज सुदावे राज ॥ हुँ
॥५॥ ए हरिणादी २ श्रमृतथी, नीसरी दीसे
आखी रे ॥ जो एहमां कांश कूडं नाखं, तो सरजण
हार वे साखी राज ॥ ढुं० ॥ ६॥ एमही पण ए
सारथवाहो, थापणे वश नवि होंशे रे॥ तो तमे
कांये नूलो उकुराणी, नारी न यो कां खोंची राज
९० ॥ ॥ काम सरे वली मान वधे तेम, लोके
नवि होय हांसी रे॥ श्रने वली सारथवाह न जा
णे, तो तमने शावासी राज, हुं० ॥७॥ गणिका
दासी वयण सुणीने, रही दण एक तिहां गनी रे,
(१९०)
मीठी मीठी वातो मांडी, शाह थकी अनिमानी
राज ॥ हुंग ॥ ए॥ स्वामी किण नयरें वसो बो, शी
खबरो
तुम
केरी रे ॥ दीसो बो दृढधर्मी सारा,
कीर्ति
तुम
अजिनेरी राज ॥
हुंग
॥ १७ ॥ मुद्धी
केणे एह घडी , कुंदन पण ले सारो रे ॥ मणा न
श्री कारीगरमांदे, धन्य एहनो घडनारो राज ॥
॥ ९ ॥ ११ ॥ सोवनकार हाना मूरख, एहवी
न घड़े कोई रे ॥ काढी आलो मुफने जोवा, तत
क्षण देश जोई राज ॥ हु० ॥ १२ ॥ जो कारीगर
एहवो होये, तो एहवी घडावु रे ॥ चोयफेर मूजिने
चूनी, उल उले जडा, राज ॥ हुँ ॥ १३ ॥नमया
तातें ते गणिकाने, दीधी मुडिका काढीरे ॥ दण
एक तो रसनायें वखाणी, श्रांगलीए करी गाढी
राज ॥हुँ॥१॥ दासीने गणिकायें तेडी, ए मुखी तुं
खेजे रे ॥ जाजे सीधी एहने मेरे, तेह नारीने देजे
राज ॥ हुँ ॥ १५ ॥ कहेजे सार्थप तुऊने तेडे, श्रा
मेली सहिनाणी रे ॥ जूलवणीमां नांखी तेहने,
श्राण जे ईहां सपराणी राज ॥ हुँu ॥ १६ ॥ दासी
पहोती मेरा सामी, कर ग्रही मूखी राखी रे ॥ ए
,
(१९९१) वत्रीशमी ढाल सोहाती, मोहनविजयें नांखी राज। हुं० ॥ १७ ॥ सर्व गाथा ॥दोहा॥ गणिका तो वेठी करे, मीठी मीठी वात ॥ कपट नजाणे तेढ्नु, नमयाकेरो तात ॥१॥ नमया सुंदरी नेकने, दासी श्रावी तेह ॥ करी प्रणाम ऊनी रही, जांखे एम धरी नेह ॥२॥ सारथ वाह तुमारडे, शुं थाये कहो मूक ॥ नमया कहे माहरो पिता, ए संबंध अगुद्य ॥३॥ दासी कहे धन्य तुमपिता, तुंठे पुत्री जास ॥ उदधितणी पुत्री रमा, तेहवो तुऊ थानास ॥४॥श्रमघर तात तुमारडो, वेगे मांनी गुद्य ॥ तिहाथी तुमने तेडवा, एम मूकी ठे मुफ ॥ ५ ॥ ते रखे जूळ मानती, यो सहीनाणी एह ॥ तात हाथनी मुखिका, एम कही दीधी तेह ॥६॥ ॥ ढाल साडत्रीशमी॥ सखीरी आयो वसंत श्रटारडो ॥ ए देशी ॥ सखीरी दासी कहे. नमया नणी नमया नणी उगे होय अंसूर ॥ सुगुण जनमोदना ॥ स० ॥ ता त जोता हशे वाटडी ॥ वा ॥ मंदिर पण ठे दूर ॥
(११२)
सुण ॥ स ॥१॥ नहिं श्रावो हमणां तुमे ॥ ह॥
तातजी करशे रीश ॥ सु ॥ स ॥ वीजो फेरो मू
जने ॥ मूग ॥ विशवावीश ॥ सु० ॥ स ॥२॥श्र
म उकुराणीने पुत्रिका ॥ पु०॥ ने अति माही तेह
सुण ॥ स ॥ तातें तस देखी करी ॥ दे ॥ तुमने
संजास्यां एह ॥ सुत ॥ स॥ ॥ ३ ॥ तात कहे मुज
बालिका॥वा॥श्रति माही गुणवंत॥सुसाश्रम उ
कुराणी पण कहे।पणामुक पुत्रीअतिसंतासुण्सा।
पुत्रीमाटें परस्परें ॥ ५० ॥ परठी तेणे होम । सु० ॥
स० ॥ हुकम तेणें बीहु मेलव्यो ॥ मे ॥ केहमां
दीजें खोड ॥ सु॥ स॥५॥ तातें तेणे कारणे ॥
का॥ मूजी दीधी मुफ ॥ सु॥ स०॥ तत्क्षण मूकी
तेडवा ॥ ते॥ अहो नमया कहुं तुज ॥ सु० ॥
सण ॥६॥जोउ निहाली मुलिका, ॥ मु०॥ जे तुम
तातनुं नाम ॥ सु०॥ स० ॥ कूड अमें केम नांखीए
नां ॥ सोने न लागे श्याम ॥ सुण ॥ सम्॥७॥ जो
जूठ करी. त्रेवडो॥ ॥ तो कांश न उलखे एह ॥
सु० ॥ स ॥ कर कंकण शी पारशी॥ श्रा॥जोवी
पडे जे जेह ॥ सुण ॥ सं०॥७॥नमया सुंदरी मुधि
का ॥ मु०॥ देखी वांच्यु नामः ॥ सु॥ स ॥ तात
( १९३) तणा करनी खरी॥क॥ में उलखी अलिराम ॥ सु०॥ स० ॥ ए.॥ तात वचन केम लोपियें ॥ लो॥ एम कस्यो मनथी विचार ॥ सु०॥ साग णिका कूड न जाणियुं ॥न० ॥ नमयायें तेणी वार ॥सु०॥ स० ॥१०॥ दासी साथे संचरी॥ सं॥न मया सुंदरी तेह ॥ सु० ॥ स ॥जेम को नर जाणे नहीं॥जातिण विधे आणी गेह ॥सु॥स० ॥१॥ वेसारी प्रवन्न उरडे ॥5॥नमयाने सोत्साह ॥सु॥ सम्॥ खवर करी गणिका जणी ॥ ग॥ दासीयें स मस्यामांहि ॥ सु॥ स० ॥ १२॥ नमया पासेंथी मुखिका ॥ मुलीधी करीने प्रपंच ॥ सु०॥ स॥ दीधी गणिकाने दासीयें ॥ दा० ॥ जून कपटीना सं च ॥ सु० ॥ स०॥ १३॥ सोपी नमया तातने ॥ तारा ॥ पाठी मुखिका तेइ ॥ सु०॥ स ॥ मलशे कारी गर एदवो ॥ए॥ तोजी मगावशुं एह ॥ सु० ॥ सप ॥ १४ ॥ मेरे पधारो सादिवा ॥ सा ॥ करवो दशे रोजगार ॥ सु० ॥ स० ॥ राखजो श्रम ऊपर मया ॥ ज० ॥ सोंपो थमने दीनार ॥ सु० ॥ स० ॥१५॥ गणिका वयणे हरखियो ॥६॥नमया केरो तात ॥ मु० ॥ स०॥ सूंपी दीनार जठ्यो तदा ॥ ज०॥ देई ८ (११४) आशिष विख्यात ॥ सुण ॥ स ॥१५॥ आव्यो शा इ उतावलो ॥ ज० ॥ मेरे थई उजमाल ॥ सु० ॥ स ॥ ए कही साडत्रीशमी ॥ सा ॥ मोहन विजयें ढाल ॥ सु॥ स ॥ १७॥ सर्व गाथा ।। ॥ दोहा॥ आव्यो नमयानो पिता, मेरामांहि जेवार ॥न मया सुंदरी पुत्रिका, दीठी नहीं तेवार ॥ १॥ अर ही परही अंगजा, जो घणुं ए तेण ॥ पण नमया लाने नहीं, खबर न जाणी केण ॥ ५ ॥ शाह करे आलोचना, कुण अपहरी गयो एद ॥ एम अण चिं ति किहां गई, हूंती पुत्री जेह ॥३॥ बब्बर कूलें घर घरे, जोई नमया तात ॥ पण नमयानी सोहणे, को इन जाणे वात ॥४॥सेवकने उलंजडा, देवे नमया तात।। मेंराथी मुज अंगजा, किणे अपहरी वात ॥ ५॥ शुं जाणुं सेवक कहे, अमने न थ व्य क्ति॥मानवतो कुण अपहरे,थर को दैवी शक्ति ॥६॥ ॥ ढाल आडत्रीशमी॥ फूलडी काजल सारे राज, देखो नमर नजारा मासारे राज॥मृग नयणी नागरी फूली ॥ ए देशी ॥नमया तात विचारे राज, दण दणमें पुत्री संना , कहो
( १९५)
रे राज, केम विसारे, कहो ॥ गुणवंती ॥ए आंक
णी ॥ कर्म कठिन धीय केरां ॥ राण॥ केहवी करे
घेरां ॥राण ॥ कि ॥१॥ एक तो पीयुडे मूकी।
रा० ॥ वनमाहीथी विगर सलूकी ॥ रा कि० ॥ हुँ
तिहांथी लश्श्राव्यो।रागातो तेसूतो सिंह जगाव्यो
॥राण ॥ कि ॥२॥ अपही जे ले गयो को
॥रा ॥ पुरमांहिंतो घणुंए जो ॥ रा॥ कि० ॥
पुत्री गश् वली हासो ॥ राण ॥ एतो कोश्क हुई त
मासो ॥ रा॥ कि ॥३॥ दुःख धरतो ते व्यवं
हारी॥रा ॥ तिहां-तेड्या ताम वेपारी ॥ रा॥
कि ॥ वेची करीयाणां सीधां॥ राण ॥मुह माग्या
पैसा सीधा ॥.राण ॥ किम् ॥ ४॥ प्रवहण सविस
ज कीधां ॥राण ॥ सवि साथ वेसारी लीधां॥राण
॥ कि० ॥ वव्वर कूल निवारी ॥ रा० ॥ प्रवहण ते
मेटयां हकारी ॥ रा॥ कि० ॥५॥ अनुक्रमें नरु
अच्च आव्या ॥ रा०॥ सायर तटें पोत दीपाव्यां
॥ रा० ॥ कि० ॥ नृगुकठमांही धर्मधारी ॥ रा॥
जिनदास थठे व्यवहारी ॥ राण। कि० ॥ ६॥ न
मया तातनो तेही ॥रा ॥ परिपूरण अठेय स
नेही ॥रा ॥ कि० ॥ वाहणने आव्यां जाणी,
(१९६)
॥ राण ॥ ते सांहमो श्राव्यो सपराणी ॥ रा॥ कि
॥ ७॥ हियडे हियडु नेली ॥राण ॥ तीहां मि
लिया बेहु मन मेली ॥ राण ॥ कि० ॥ नमया तात
उसासें ॥रा ॥ घर तेडाव्या जिनदासें ॥रा ॥
किम् ॥ ७॥ सुजग रसोइ कीधी ॥रा ॥ जीमवा
ने थाली दीधीरा कि० ॥ नोजन करीने उव्या
॥ रा ॥ फोफल पण उपर घूट्यां ॥ रा ॥ कि०
॥ ए ॥ बिहु मित्र वेगा एकांते ॥राण ॥ अन्योन्य
हूआ उद्यांते ॥ राण ॥ कीम नमया सुंदरी केरी॥
राण ॥ कही वातो अति अभिनेरी ॥ राम किम् ॥
१७ ॥ नमया पुत्री माहारी ॥रा॥ अहो मित्र नत्री
जी ताहरी ॥रा ॥ कि० ॥ बब्बरकूल कलो ॥
रा० ॥ तिहां अपदरी लेइ गयो को ॥ राण कि
॥ ११ ॥ ढुंढी आपणें साथै ॥ राप ॥ पण पुत्री न
श्रावी हाथे ॥ रा ॥ एक तिहां गणिका कह
॥रा ॥ मुक तास नरुसो श्रावे ॥राणाकिणा १ ॥
मानी जे तास राजाए ॥ रा॥ होवे तो केम क
हाये ॥ राण ॥ कि० ॥ जो तमे तिणी पुर जावो ॥
राण ॥ तो मुझ पुत्रीनी खबर लेश श्रावो ॥राण ॥
कि ॥ १३ ॥ मानीश पाड तुमारो ॥ राण ॥ श्हां
.
(११७) कीजें काज मारो ॥ राण ॥ कि ॥ पुत्री दुःख के म सहीयें ॥ रा ॥ अंतर गतिनी केहने कहीयें ॥रा ॥ १४ ॥ कही जिनदास सनेही ॥रा ॥ अमे कारज करशुं एही ॥ रा० ॥ कि॥ एम शुं वे ए वढावो ॥ रा ॥ फोगट शुं पाड चढावो ॥राण॥ किम् ॥ १५ ॥ जाश चव्बर कूलें ॥ रा० ॥ तिहां रहीश वेप अनुकूलें ॥ रा॥ ॥ किए ॥ उलवी नमया जिहांथी ॥राणा लेश श्रावीश तेहने तिहाथी राण ॥ कि० ॥ १६ ॥ जो नमया लेई श्रावु ॥ रा॥ तो मित्रनो मुजरो पावं ॥ रा॥ कि० ॥ मोहने मन स्थिर राखी ॥ रा०॥ आडत्रीशमी ढाल ए नांखी ॥रा॥ कि० ॥ १७ ॥ सर्व गाथा. ॥ दोहा॥ नमया तांतें मित्रने, एम कही संदेश ॥ निज. प्रवहण सङ कस्यां, पाम्यो आप निवेश ॥१॥ सयल कुटुंब मिट्यां तिहां, नमया जनकें ताम ॥ व. ब्बर कूलतणी कही, वीतक वातो ताम ॥२॥ कहे कुटुंब न करो कीसी, फीकर तुमे मनमांद ॥ जयूँ इशे मिलशे सुता, करो देज सोहि ॥३॥ एह वे नस्यच नयरधी, पोत नरी सुविलास ॥ चव्बर ( १९०) कूल दिशाजणी, चाट्यो ते जिनदास ॥ ४ ॥ सायर लहर ऊकोलथी, चाले प्रवहण अनुकूल ॥ ते श्रनु में आवीया, तरतां बब्बर कूल ॥ ५॥ जिनदास लेई नेट', नेव्यो बब्बर राय ॥ पाम्यो मान महो सवें, तिम पंचांग पसाय ॥ ६ ॥ ॥ ढाल उगणचालीशमी॥ हरीयामन लाग्यो, ए देशी ॥ नृप श्रादेशे नग रमां, वणिज करे जिनदास रे॥नेही केम वीसरे ॥ वचन संजालुं मित्रनु, हियडामां सुविलास रे ॥ ने॥ १ ॥ सहदेवें मूजने शहां, पुत्री जोवा काज रे ने ॥ मूक्यो पोतानो गणी, हेतु जाणी आज ॥ ने० ॥२॥ में पण मित्रने कडं अबे, आणीश पुत्री तूफरे ॥ ने ॥ ते तोडं जूली गयो, मांड्यो व्यापार अबूऊ रे ॥ ने ॥ ३ ॥ जाणतो हशे मित्र माहरो, जे एह मुफ जिनदास रे ॥ ने ॥ बब्बरमां क रतो हशे, मुज पुत्रीनी तलास रे ॥ ने ॥४॥ ते मुऊने नवि सांजरे, गाजे ने रोहिण मांहिरे, ॥ ने ॥ ए मुझने जुगतुं नहिं, केलQ प्रपंच काई रे ॥ ने ॥ ५ ॥ जिहां मनमेलो आपणो तेहथी केम हुवे कूड, रे ॥ ने०॥ लोक उखाणो एम कहे.
१९ए) जिहांकूड तिहां धूड रे ॥ ने ॥ ६ ॥-उतारे कूप कविचें जो सूरिजन सिरदार रेः ॥ ने ॥ नेह वि खूधां मानवी, ते केस करे नाकार रे ॥ ने० ॥७॥ नेह महाधन जगतमां, जो करी जाणे कोय रे ॥ ने ॥ फोगटीयांनो नेहलो, निर्वाहो नवि होय. रे ॥ ने ॥ ७॥ दिये जूदा होते जूदा,तेहथी केम पति आयरे ॥ ने ॥ साचा स्नेहि सजन तणी, ले दे लोक वलारे ॥ ने ए ॥ शापुरुपनी प्रीतडी, जेदवी पहाणे रेह रे ॥ ने ॥ भोग प्रीतडी जे हवी, पावशें जीरण गेहरे ॥ ने ॥ १० ॥ करिय जरंसो श्रापणो, खोलें दी, शीपरे ॥ ने ॥ कूड जो करीये तेहथी, तो केम सहे जगदीशरे ॥ ने ॥ २१॥ नेह तणे वशें हलधरे, कंधे राख्यो मुकुंद रे॥ ने ॥ नाद तणे नेहकरी, हरिण पडे ठे फं दरे ॥ ने ॥ १५ ॥ कहेवायें न एकना, फरीये जे गेह गेह रे, ॥ ने ॥ ते जूठा माणसथकी, केम निवहाये, नेह रे ॥ ने ॥ १३ ॥ चंच पडे पीडाय बहु, गयणे जो उमदे नहि मेह रे, ॥ ने ॥ गंगा जल नवि पीये, जूवो चातकनो नेह रे॥ नेण॥ १४ ॥ जो. पंकज नवि संपजे, जिहां सरवर अवतंसरे ॥
(१२०)
ने ॥ अवर कुक्कुटनी परें, न खणे ते कहियें हंस रे
॥ने॥ १५ ॥ तेमाटे संसारमां, नेद अनोपम वस्तु
रे ॥ ने ॥ जे नेही हो आपणा,अहोनिश कुशला
अस्तु रे ॥ १६ ॥ नेहींनी जे पुत्रिका, जो नयर
मकार रे ॥ ने ॥ ढाल ए उंगणचालीशमी,
कही मोहने शिरदार रे ॥ ने० ॥१७॥ सर्व गाथा॥
॥ दोहा॥
बब्बरकूलें घरोघरे, जोयुं ते जिनदास ॥ पण ते
नमया सुंदरी, नावी मूज तलास ॥१॥ सूरिजन
आगल हुँ खरो, केम थाश्श हेव ॥ उरग बड़े
दरीनो हां, न्याय मिल्यो जगदेव ॥२॥ तो पण
उद्यम कीजीये, उद्यम वडो संसार ॥ विण धेनु
उद्यम थकी, पय पीवे मांजार ॥३॥ ते जिनदास
अहोनिशे, जोवे नगरागार ॥ हवे श्रोताजन सांजलो,
नमयानो अधिकार ॥४ जे दिन नमयानो पिता,
चाल्यो आपण देश ॥ ते दिनथी हर्षित थई, ग
णिका चित्त विशेष ॥ ५ ॥ अति धूतारी ने हारि
णी, चिंते चित्तमकार ॥ मुझ आयत्ते. ए निश्चे,
हुश् हवे ए नार ॥६॥
(११) ॥ ढाल चालीशमी॥ वीण मा वाईशरे,विठल वारुं तुजंने ॥ ए देशी॥ पेखो निगुणीरे केहबु कहेठे गणिका ॥ गंगारो जघाडी काढी, वाहिर नमया वणिका ॥ पे० ॥ ए श्रांकणी ॥ हियडाथी गाढी आलिंगी, सिंहासन वे साडी, हारिणीए नमयानी आगल, कारमि माया देखाडी ॥ पे० ॥२॥ ताहरे तातें माहरे मंदिर, पुत्री तुजने वेची ॥ ते तुजने कांई न जणाव्यु, जनक वडो तुज पेची ॥ पे० ॥३॥ रे पुत्री तुं जोय विचारी, तात संबंध तें दीमें ॥ रेनोली एणे संसारे, स्वारथ सहुने मीठो ॥ पे० ॥ ४ ॥ तुक सरखी पुत्री वेचंतां, एहनु मन केम चाट्युं ॥ अमे दयालु परोपकारी, मुह माग्यं धन आट्यु ॥ पे ॥ ५॥ देख लूच्चाइ ताहरा तातनी, नाम न पूगं फेरी ॥ तातें कीचूं जहेवू तुऊने, तहेवू न करे वैरी ॥६॥ एदेवो कुण ठे वेचे परघर, जे श्रापणडां बोरु ॥ मायायें नवि बोडे अलगांवावरु श्रांने ढोरु ॥ पे० ॥७॥ अमें तो तेदने घणुंए वास्यो, पण तेणे न कयुं वायुं ॥ ताहरे तातें धनने अरथें, कीधू अति अविचायुं ॥ पे० ॥ ७॥ निज वालक
घोली
(१२)
प्रतिपालवा माटें, हरणी सिंहथी घाये ॥ तेहथी
पण तुऊ तात नीपावट, घणुंय को शुं थाये ॥
पे० ॥ ए ॥ एतो जलु जे माहरे मंदिर, वेची मद
जर माती ॥ जो बीजे वेचत तो ताहरी कहे ने शी
गति थाती ॥ पे० ॥ १० ॥ एहवं जरुर पड्यु हतुं
केवु, जे तुझ वेची तातें ॥ हुँतो राखीश पुत्री
करीने, माहरे तो श्राव्युं धातें ॥ पे० ॥ ११ ॥ तुं
मूक पुत्री हुँ तुऊ माता, ए सघलुं ताहरूं ॥तुं
माहरें हुं हुं ताहरे, एहवं मन ने महारुं ॥ पे० ॥
॥ १२ ॥ माहरे तूऊ उपरें नथी कोई, तुं घरनी
उकुराणी ॥ जे तुं देश ते डं वेश्श, में एकतारी
आणी ॥ पेण ॥ १३ ॥ प्राण तणी परें तुऊने राखीश,
श्श, पाणी मागीश ज्यारें ॥ पे० ॥ २४ ॥ हथेलीनी
गयामांहे, अहोनिश राखीश तुऊने ॥ जे कोश् वातें
कुःख तुं पामे, देजे उलंना मुजने ॥ पे० ॥ १५ ॥ दा
सीयो ताहरी खिजमत करशे, हुकम हुकममें रहे।
तुं कहीश ते निर्वहेशे सघलुं, ताहरूं खुंथु ख
मशे ॥ पे ॥ १६ ॥ हुँ पण बुं राजा सरखी, रखे
कां प्रीती बीजी ॥ मुफ पुत्री जाणीने तुऊने,
-
(१५३) सहुको करशे जीजी ॥ पे०. ॥ १७ ॥ जोडं तुफथी अंतर राखं, तो परमेश्वर साखी ॥ ए चालीशमी ढाल सनूरी, मोहन विजय नांखी ॥०॥ १७ ॥ ॥ दोहा॥ वचन सुणी गणिकातणां, नमया थइ निसनेह ॥ चित्तथी करे विचारणा, एम शुं कहे एह ॥१॥ धन शुं थोडं ते घरे, जे एम वेचे तात ॥ हिये उपावी एहवी, केम मनाये वात ॥२॥ दासी मूकी एणीए, मूफने राखी गेह ॥ तात नणी विप्रता रियो, एहनुं कारण एह ॥३॥ अनुमाने जोतां थकां, दीसे गणिका एह ॥ मायायें करी मुफ थकी, मांडे फ़गे नेह ॥४॥ गणिकायें नमया जणी, लही उदासी जाम ॥ मीठे वचनें चड वडी, मुखथी वोले ताम ॥ ५॥ रे पुत्री . चिंता तंजो, हसो रमो हित थाणि ॥ परिकर निकर दे पद्मिनी, पोतानो करि जाणि ॥६॥ ॥ ढाल,एकतालीशमी.॥ : देशी हमीरियानी ॥ कहे गणिका नमया जणी, सांनल माहरी वात ॥ सुरंगी ॥ खोटी शीकरे शो चना, जृमी केहनो तात ॥ सु ॥ १॥ मान वचन - (१२४) तुं मादरूं, जोगव्य सुंदर लोग ॥ सु०॥ ए टाएं रखे चूकती, करीश सनेही संयोग ॥ सु० मा॥२॥ वनना कुसुमतणीपरें, जोवन एलेम खोय ॥ ए अव सर कुण निर्गमे, एहवो ने मूरख कोय ॥ सु० ॥ मा० ॥३॥ एक जोबनने पाहूणो, केतादिन विलं बाय ॥ सु० ॥ एह कपूरतणी परे, क्षणमें उमीजाय ॥सुमा० ॥ ४॥ चंपक वरणी देहडी, फरी फरी किहां पामीश ॥ सु॥ ले लाहो जोबनतणों, जो बुद्धि दे जगदीश ॥ सु०॥ मा ॥ ५॥ जोवन एह गया पड़ी, कहे मुझने तुं शुं करीश ॥ सुण ॥ तुंतो मांखीनी परें, बेठी हाथ घसीश ॥ सु०॥ मा॥६॥ चतुराश तुफ जेहवी, तेहवोज पुरुष अमूल ॥सु॥ गणिकाकुल मारगतणां, कारज कस्य तु कबूल ॥सु॥ माण ॥ ७ ॥ आशा अमें तुज ऊपरे, राखी ने मेरु समान ॥ सु ॥ श्राशाए इंडों अनल तणां, महोटां होवे निदान ॥ सु॥ मा ॥७॥ श्राशा प्रथम देई करी, जे तो करे निराश ॥ सु० ॥ धिक धिक जीवित तेहन. जे नवि पूरे आश ॥ सु० ॥ माण ॥ ॥ ए ॥ जे अमें नीधी तुऊने, ते तो एहजः माट ॥ नाकारो जो केहिश तुं, केम पोसाशे घाट ॥ सु० ॥
. (१२५) मा० ॥ १० ॥ मुखने पूठी जोजन करों, तनुने पू बीने पहेर ॥ सुप ॥ जाय तु रथमें वेसीने, वन ज- पवनने शहेर ॥ सु० ॥ मा ॥ ११ ॥ तेल फूलेलने अगरजा, तेहमां रहो गरकाव ॥ सु॥ नवनवरंगें हसो रमो, पान सोपारी चाव ॥ सु० ॥ माम् ॥१५ वचन सुणी गणिकातणां, बोली नमया ताम ॥सु॥ वाई तुमें श्रण वोल्यां रहो, ए तुमचुं नहीं काम ॥ सु० ॥ मा० ॥ १३॥ हुं व्यवहारीनी पुत्रिका, तुमे तो गणिका निदान ॥ सु०॥ ए अणघटतुं कां करो, कांश्क राखो शान ॥ सु ॥ मा ॥ १४ ॥ जावा यो नोलामणी, अमें तुक वाल गोपाल ॥ सु ॥ जोजंतुं कुल साहमुं, नहितर देश्श गाल ॥ सु० ॥ मा० ॥ १५ ॥ वाड जो गलशे चीनडां, तो रखवा लशे कोण ॥ सु ॥ कहिये एहवं वरे पडे, जेवं आ टे खूण | सु ॥ मा ॥ १६ ॥ नीचे वाहनें केम च डे, जे चढिया सुंढाल ॥ सु ॥ मोदनविजयें नली कही, एकतालीशमी ढाल ॥ सु०॥ मा० ॥ २७ ॥ ॥ दोहा ॥ नमयाने गणिका कहे, पुत्री निसुण जगीश ॥ आहुं थाहुं वोलतां, एम केम तुं वूटीश ॥१॥ जे u , (१५६) केड्ये लाग्यां खरां, ते तुक तजशे केम ॥ विगर दि सासायें अली, अमने तुं मत बेड ॥ ५ ॥ जेह पड्यु मादल गले, दैवतणुं तु जोय ॥ विणवाये केम बूटीये, एम जांखे सहु कोय॥३॥ जास वशे जे को पड्या, बगेड्या हीज बुटाय ॥ ते जे कहे ते कीजीयें, एम कीधे झुं थाय ॥४॥अंगीकार करो तुमे, था मंदि र श्राचार ॥ जेद कहो ते ऊगरे, मानो एह मनुहार ॥५॥ नमया तव विलखी थई, मुख मेहले निःश्वास ॥ फुःखजर दाजी विरहिणी, ऐ ऐ करे विषास ॥६॥ ॥ ढाल बहेंतालीशमी ॥ घेरी घेरी पण घेरी रे, मोकुं या विरहाने घेरी ॥ ए देशी ॥ घेरी घेरी पण घेरी रे, मुने ए गणिकाए घेरी। मु॥ एक तो महारे कंते मुझने, वनमां की धी अनेरी॥ तास संदेशो न आव्यो मुझने, केणे न कह्यो फेरी रे ॥ मु० ॥ १ ॥ मात पिता पण दूरे रहीयां, केही विध होशे मोरीरे ॥ मुणा नूरकी नां खी एणे गंजेरी, मेरे मूकी चेरी रे ॥ मु॥२॥ मे कांश दैवनी कीधी दीसे, मोटी चोरी हेरी रे ॥ सां जले कुण कहुं हुँ केहने,माहरा मनडा केरी रे ॥मुण ॥३॥ कल्प लताशी पहेली करीने, कीधी दीसे कंथेरी
(१७)
रे॥मुणानादवियोगे हियडामांहि खटके खरी खरेरी :
रे.॥मु॥४॥ए गणिकाने वशे हुँ श्रावी,निसरी न
शकुं अवेरी रे ॥मुणा जेहथी शील रतन रहे माहरु,
केही बुद्धि अनेरी रे ॥ मु० ॥५॥ जिहां गये रहे
शील सलूएं, कोण देखाडे ते शेरी रे ॥ मु०॥ दैव
श्रटारो शीयल उदालण, गणिका किहांथी उदेरी रे
॥ मु॥६॥खारो ऊमो नीम नवो दधि, शीलता
मीठी बेरी रे ॥ मुण॥ नमया विलपे जेम मृग विलपे,
देखी दूर थाहेरी रे ॥ मु॥७॥ ए तो माहरु कडं
न माने, मांनी वेठी वखेडी रे ॥मु० ॥ जे को
नारी धूतारी जगमां, तेहमां एह वडेरी रे ॥मु० ॥
॥ ७॥ नांखे नमया सांजल गणिका, मुफथी रहेजे
परेरी रे ॥ तहारं कीतुहीज पामीश, आवीश जो
तुं धारेरीरे ॥ए ॥ शीलरतन राखवा कारण, नाखी
तास नीरी रे ॥मु॥ निसूणी गणिका घणुंए कूदी,
कठी जेहवी वठेरी रे ॥ मु०॥ १० ॥ बोली गणिका
रे रे वाला, तुं शुं श्रमग्री जलेरी रे॥ मु० ॥ तुं जो
वनर्नु फल शुं जाणे, वे तुं हजीथ अलेरी रे ॥मु॥
॥ १४ ॥ फूल गुलावनी शी गति जाणे, दीठी जेणे
कणेरी ॥ मुण्॥ दोहिली आवे तनुचतुराश, मूढमति
,
(१२)
जो घणेरी रे ॥ मु० ॥ १५ ॥ कूपक मेमक सायर
केरी, जाणे शुं ते लहेरी रे ॥ मु ॥ देव कुसुमनो
स्वाद शुं जाणे, चाखी जेणें वहेरी रे ॥ मु०॥१३॥
लाम समावी लामकवाही, मायें तुऊने उनेरी रे ॥
मु॥ त्यारे बोले जे एम तुं त्रटकी, होये जीन्न ठ
बेरी रे ॥ मुण् ॥ १४ ॥ जो जो नमया बुद्धि उपा३,
राखशे शील अप्रकंपी रे ॥ मु०॥ मोहन विजयें ढा
ल अनोपम, वहेंतालीशमी जंपी रे ॥ मु० ॥ १५ ॥
॥ दोहा॥
कहे नमया गणिका नणी,म म कर फूठी वात
तुब वचन केम जंपियें, केम करीये परतात.॥ १ ॥
ते ताहरां कीधा करम, जोगव्य तुं मतिमंद ॥ पण
बीजाने शावती, पाडे एहवे फंद ॥॥ तीन पंचासां
ताहरे, जीवq दीसे तुद्य ॥ दीये जे जे कारणे;ए शी
खामण मुद्य ॥३॥ वरसे शशी अंगारडा,पयोधि गं
मर्याद ॥ नासे सिंह शियालथी, सुधा निवारे
स्वाद ॥४॥ जो ते सघलां नीपजे, ते सांजल अवली
ल।परनरथी परवश हुई, सतियो न मूके शील ॥५॥
ते माटे तुऊने किशु, कडं घणुं हित लाय ॥ तुं रहेजे
जात थकी, नाखू गोद बिबाय ॥६॥
(१२ए) ॥ ढाल तालीशमी॥ हुँ तुफ वारं कान जावा दे ॥ए देशी॥ हुं तुज वारुं गणिका जावा दे, माहरो सनेही वाहलो रह्यो ठे दूर रे ॥ मूक मारो केडलोने, रही ९ हजूर रे॥ मुने जावा दे ॥ हुं॥ कां नवि जाणे मुंडी, कारिमो संसाररे, रे रे तुं दाऊलाने कां दीये खार ॥ मू॥ हुं० ॥ १॥ जेहने सूहायें तेहने लांखीयें एह रे, सूणी एहवी वातडीने कंपेठे देह ॥ मू० ॥ गणिकायें विचाखु एतोसीधी नविजोय रे, एहने देखाडु-नीति तो वश होय ॥ मू०॥ हुँ॥२॥ नांडनी नेंस मांगे प्रासुए तेह रे, तिलने पीट्याविना नव ये. सनेह ॥ मू ॥ सीधी आंगलीए क्यारे, नवि नीकले वीर रे॥ हां कोण गोडावाने आवे ते नीर ॥ मू ॥ ० ॥ ॥३॥ माहरे वशं श्रावी तें किहां जाय रे, एक वार पूवं एहने वातडी वनाय ॥ मूग ॥ पेट पढुंसी शाने शूल उपाय रे ॥ कडुलं महोरं जोतुं अतिमथ्यु थाय रे ॥मूाहुंगा जी जी करतां तुंतो थायदे शेर रे, कांश हठ एवडो तुंताणे ले फेर ॥मू॥ नहिंतो हुँए तुने चावकानी ठगेर रे, बाली एणी कोटडीमां कूटी श जोर ॥ सू० ॥ हुं० ॥५॥ एहवे गणिकानी कूखें . ९ (१३०) उपन्युं शूल रे, जीवडलो मोघो हू तस प्रतिकूल ॥ मू ॥ शील सुरंगा केरो महिमा जगमाय रे, शील सखाइ तेहने केम छुःख थाय ॥ मूळ ॥ ९॥ ॥ ६ ॥ गणिका तो पहोंती तिहाथकी कोश्क गतिमांय रे, जेह जे करे ने तेहने शी गति थाय॥मू॥ उनी श्रा लोचे नमया सुंदरी ताम रे, थोडेशे हेतें ए तेणे इयां कस्यां काम ॥ मूण ॥ हुं ॥ ॥ जगमां जीव्यानो जनने एह विश्वास रे, मांडीने वेसे बे एवी फूठी फूठी श्राश, ॥ मू॥ हवणां ए वेही हूंती होयने नाथरे, पण को सनेही एहने नवि हुढं साथ ॥ मू ॥ ९ ॥ ७ ॥ ऐ ऐ केहवो वे एहवो जूठो संसार रे, मूकीने जोवंता गइ एहवां श्रागार ॥ मू० ॥ जूगनो नरूंसो एतो केटलो करायरे, साचा रे सनेही मोटा खोटा ह्या जाय ॥ मू०॥ हुंगाणा एहवी रे उन्नी नर्मदा नारी रे, गणिकानो रा जाने पहोतो संदेशो तेवार ॥मू॥ राजाए विचास्युं एहवं ए गणिकाकेरो माल रे, श्राव्यो ने अजाण्यो हाथ हुआ निहाल ॥ मूग ॥ हुं० ॥ १० ॥ जग मां जीव्यानो महोटो नेहो निर्धार रे, नहीं तो निःस्नेही सहूको वीणके मकार ॥ मूग ॥ सेवकने - (१३१) संप्रेष्या नूपें गणिकाने आगार रे ॥ श्राव्या ते दोडता तिहां न कस्यो विचार ॥ मू॥ हुँ ॥१९॥ धसमसता पेग ते जेहवे गेह मकारी रे, तेहवे तिहां दीठी नयणे नर्मदानारी ॥ मू० ॥ पडि श्रा लोचें नोला तस देखी देहं रे ॥ सहुको विचारे कुंण अंगना एह ॥मूणाहुं॥१॥ हारिणीय दासी सुरंगी, एहवी राखीठे आगार रे, जश्ने राजाने के हीयें, एहनो तेह विचार रे ॥ मूा सेवक तो सहु कोय पाठा आव्या दरवार रे, राजाने पयंपे एहवं करी मनुहार ॥ मूहुं॥१३॥ हारिणी जे गणिका ते तो, पोदती परलोक रे ॥ पण केम लीजें एहनी, मायानो संजोग मू॥ एहने आवासें एहयी रूडी एक नारी रे, दीसे वे अमीणे जाणे राख्यो एणे भार ॥ मू० ॥ ९ ॥ १४ ॥ एहने जो नयणे देखो, ' श्रावे तव दाय रे ॥ वीजीतो तारीफी एहनी, केटली कराय ॥ मू० ॥ नांखी सुरंगी चंगी, तालीशमी ढाल रे ॥ मोहनना कह्याथी वातो, लागे ठे रसाल ॥ मृ०॥ ९ ॥ १५ ॥ सर्व गाथा ॥ ॥ दोहा ॥ कहे नूपति निज सचिवने, जे गणिकाने गेह ॥
म " (१३२) सुंदर एहवी त्रिया, तेडी श्राणो तेह ॥१॥हा रिणी सरसी जोइ ए, तो ते तेहने गम ॥ श्रापण तेहने राखियें, दीजे बत्री काम ॥२॥ सजिव नृपति आदेशथी, आव्यो गणिका गेह ॥ दीवी नमया सुंदरी, मनोहर गौरी देह ॥३॥ कहे सचिव न मया नणी, रे सुकुक्षिणी नार ॥ तूगे परिपूरण खरो, तुझ ऊपर किरतार ॥४॥ वव्बरकूल नरेश नी, कस्य उलग मनरंग ॥ प्राणतणीपरें राखशे, रहेजो सदा अनुषंग ॥ ५ ॥ धण कण कंचन वसन गृह, जे गणिकाने गेह ॥ ते सवि तुऊने सोंपशे, मान्य वचन मुफ एह ॥६॥ ॥ ढाल चुम्मालीशमी॥ काली ने पीली वादनी ॥ए देशी.॥ नमया स चिव कह्या थकी साजनां, शोचे चित्त मकार ॥ वि षयातुर राजा थयो साजनां, ऐ ऐ सरजणहार ॥ जोजो रे हवे नारी चरित्र, करशे नमथा नार ॥२॥ ए आंकणी ॥ नृप पासें ले जाशेसाणा मंत्री वीश वा वीश ॥ राजा मुजने प्रार्थशे ॥सा॥ त्यारें हुं शुं करीश ॥ जो॥॥श्यो जोरो अवलातणो साना शील हुं राखीश केम ॥ परवश पडीयां मानवी ॥
(१३३)
सा॥ कुण विध राखे नेम ॥ जो ॥३॥ अणवोली
नमया रही॥ सा ॥ नांखे हो मंत्री ताम ॥रे गुण
वंती गोरडी॥ सा॥ केम एम. वेठी श्राम ॥जो
॥४॥ वेसो एणे सुखासनेसा ॥ खोटा म करो
विचार ॥ राजाने श्रावी मलो ॥सा॥रहो अहनिश
दरवार ॥जो॥५॥ अति हठ ताणी मंत्रीए ॥साणा
ततक्षण नमया नार, वेगडी ऊपाडीने सा॥ सुंदर
रथह मकार ॥ जो॥६॥ परवश ए नमया पडी-॥
सा ॥ अतिही धरे मन लाज, जाणीयें पंजरमां प
ड्यो। सा॥ वनवासी मृगराज ॥ जो ॥७॥ पर
म मंत्र मनमें गणे, चौद पूरवनो जे सार ॥ रथ वेठी
आवी सती, एहवे चहूटा मार ॥ जो ॥७॥ त
व तिहां शीलने राखवा ॥सा॥ नमयायें कीधोवि
चार ॥ जो उल इहां को करूं ॥साणा तो रहे शील
उदार ॥ जो ॥॥ दोहा॥ बुद्धि शरीरां नीपजे, जो
उपजे ततकाल ॥ वानर वाघ विलोवियो, एकलडे
शीयाल ॥जो॥ १० ॥ बुद्धिथकी मंत्रीश्वरे ॥ सा ॥
नोलव्यो यद जमाल ॥ बुझिहरी कपि रोलिया ॥
सा॥ एकलडे शीयाल ॥जो॥११॥नमया राख
ण शीलने ॥ सा ॥ मंत्रीने विप्रतार ॥ रथकुंती कूदी
(१३४) पडी, परवरि खाल मकार ॥ जो० ॥ १२॥ कादवथी तनु लीपीयु ॥ सा ॥ देखे लोक समक्ष ॥ जाणीने घहेली थ६ ॥ सा ॥ जाणे वलग्यो यद ॥ जो ॥ २३॥ चीर पटोली कंचुकी ॥ साकीधां ते खंडो खंड ॥ जाणीने कांश्क कहे ॥ सा॥ मुखथी करे आ कंद ॥ जो ॥१४॥बीहाडे लोकोनणी ॥ सा ॥ बू टा केश कराल ॥ क्षिण हसे क्षिणके रुवे ॥ सा॥ दणके विलोके खाल ॥ जो० ॥ १५ ॥ एम असमं जस देखीने ॥ सा०॥ मंत्री विनवे नूपाल, स्वामीजी ते सुंदरी॥सा ॥ थक्ष दीसे ले कराल ॥जोगार॥ रूप अनोपम बे घj॥ सा॥पण तस परवश देह, ते केमही साजी हुवे ॥ सा ॥ तो बहु उपजे स नेह ॥ जो ॥ १७ ॥ मंत्री वचन सूणी करी ॥ साग ॥ आलोचे महीपाल, मोहनविजयें वर्णवी ॥ सा ॥ चुम्मालीशमी ढाल ॥ जो ॥ १७ ॥ सर्व गाथा ॥ ॥ दोहा॥ महीराज मंत्री नणी, कदे सांजव्य मुज वेण ॥ नारीने साजी करे, एहवो कोश बे सेण ॥१॥ नूपें पड़ह वजावियो, बब्बरकूल मजार ॥ जे नमया साजी करे, ते लदे लाख दीनार ॥२॥ एहवे (१३५) केणे ब्राह्मणे, पडह ठग्यो तेणीवार ॥ एहने हुं सा जी करूं, एहमे किस्यो विचार ॥३॥ नृप सेवक ब्रा ह्मण जणी, आण्यो राजा पास ॥ महाराज ते ना रीने, तेडावो आवास ॥३॥ नृपें अनुचर तेडवा, मूक्या तास तिवार ॥ पकडीने दरवारमां, आणी नमया नार ॥५॥ एक अलोधी उरडी, वेसाडी तिण मांहि ॥ आव्यो ब्राह्मण मंत्रवी, नमया पास सोत्साहि ॥ ६ ॥ दूर विसा लोकने, ब्राह्मण पूरी कार ॥ नमयाने साजी करें, जोजो मूढ गमार ॥७॥ ॥ ढाल पिस्तालीशमी॥ सादेवा मोतीडोने हमारो जीवनां मोती ॥ ए देशी ॥ ब्राह्मण नोलो नेद न लेहेवे, नमया आ गल धूप उखेचे ॥ नर्मदा नवरंगी, सलूणी शील सुप्रसंगी ॥ मंत्र जणीने जजणी नाखे, सती शि रोमणि सर्वे सांखे ॥ नर्मदा नवरंगी ॥१॥ सुंदरी जाणे ब्राह्मण नोलो, फोकट श्यो मांड्यो वे एरोलो ॥ना जेम जेम ब्राह्मण उजे दूणे, तेमतेम सा उत्त मांग धधूणे ॥न॥ २ ॥ एहवे नमया बुद्धि उपावे, काढीदंत ब्राह्मण परधावे॥नावीहीनो वांडव ऊठी लाग्यो, काश्क पहेमु काश्क नागो॥न॥३॥द्वार
,
(१३६)
उघाडी ब्राह्मण दोड्यो, जाणीये वालीथी. रेवत
बोड्यो । न० ॥ आगलें मंत्रवी पूंठल नमया, चहुँ
टा लगे एम करतां तेसुं गया ॥ न ॥ ४ ॥ लोकें
तेह ब्राह्मण जगास्यो, जून मंत्रवादीए मंत्र हका
खो ॥ न ॥ नमया जिन गुण कंठे गाये, जाणीयें:
सुकंठे कोश्क मोरली वायें ॥ ५ ॥ वव्वर चहूटे न
मे थ धीठी, एहवे जिनदासे ते दीठी ॥ न० ॥
पुरजन अलगा करीने पूजे, कहे सुंदरी कारण एह
\॥ न ॥६॥ जिनना गुण तुं गाय बे रूंडी,
तो केम एम पुरमें नमे जूझी ॥ना बाहेर एहवी
अंतर माहि, तो एम लोक का मूक्यां वाही ॥ना
॥ दीसे श्रावक कुलनी जा, साच कहो मुफ श्रा
गल बाइ ॥ना ने कोण तुं पुत्री केहनी, जाएंबु
हुँ तुं ले रे जेहनी ॥ न ॥७॥ हुं पण श्रावक बुं सू
ण बहेनी, मूळ श्रागल तु साचुं कहेनी ॥ न॥ कहे
नमया हलूए शुं फेरी, ए शी वेला पूज्या केरी ॥
न०॥ ए॥जो तु साचो जिननो पंति,तो मुज पूब
जे कहेशं एकति ॥न॥ जे अवसर प्री ते माह्यो,
जे नवि जाणे ते फोकट वाह्योन ॥ १० ॥ तव
जिनदास गनो थर रहीयो, नमया नेद न कोश्ने
-(१३७) कहियो ॥ नमया पूंठ जमे निशदीहे, पण नवि बोलावे करि जीहे ॥ ११॥ नमया नमे पुरमांदे एकाकी, जाणीये परम महारस ठाकी ॥ न ॥रा जा के उपाय करावे, पण नमयाने लेखे नावे ॥ ना ॥ १५ ॥ आणत मूकने कोण गवाडे, जाणीने जंघे तेने कोण जगाडे ॥ न ॥ एहवे कौमुदी म होत्सव आवे, पुर जन सघला वनमां जावे ॥ना १३ ॥ नमया पण जिनवरने गेहें, ऊनी स्तुति करे पूरण नेहें ॥ न पूंठले पण जिनदास आव्यो, नम याथी धर्म सनेह उपाव्यो।न॥ १४ ॥ नमया आधु पाएँ जोश, जिनदास हूंती वातें दूश् ॥ न ॥ हूं वर्धमान नयरनी वासी, माहरो जनक सहदेव वि सासी ॥ न ॥ १५ ॥ परणी सूजने सकोगे नाहे, पण ते मूकी गयो वनमांदे ॥ न०॥ तिहां मुज तात मल्यो अणजाणी, तिहाथी शहां श्ण पुरमांहे आणी ॥नण॥ १६ ॥ लवी गणिकाए मूजने राखी, राख्यु शील एम करी सुसाखी॥नमा पिस्तातीशमी ढाल सवाझसुंदर मोहन विजयें गाइ ॥ न ॥ १७ ॥ ॥ दोहा॥ नमयाने जिनदास कहे, हुँ पण नाखू सच्च ॥
(१३). पुत्री हुँ जिनदास अर्बु, नयर जिहां नरुअञ्च ॥१॥ ताहरे तातें मूजने, कही तहारी सवि वात ॥ ढुं हुं नेही तेहनो, मध्यंतर विख्यात ॥ २ ॥ तुऊने जोवा कारणे, हुं हां आव्यो एम ॥ में पण तुज राखी गुप्त करी, कहो प्रगट हुश् केम ॥३॥ हवे तुं मु जने मली, न धरिश केहनी बीक ॥ तुं मत जाणे एकती, तुं मूज नजीक ॥४॥ तुं ने पुत्री मुज तणी, मुजथी म करीश लाज | जेम तेम करी संगे करिश, जो करशे जिनराज ॥५॥ एम कही जिनदास ते, आव्यो तुरत वखार ॥ दाम सयल गांठे करी, वाहण कस्यां तैयार ॥ ६ ॥ ॥ ढाल बेंतालीशमी॥ फांकरीया मुनिवरनी देशी ॥ राजायें तव सांज व्यु जी, प्रवहण सजे जिनदास ॥ सेवक मूकी तेह ने जी, तेडाव्यो निज पास ॥१॥ गुणमणि गोरडी नमया सुंदरी नारी, ए आंकपी ॥ कहे जिनदास नरेसरने जी, फरमावो महाराज ॥ केम मुंजने ते डावियो जी, सेवक मूकी आज ॥ गु० ॥ २॥ कहे नृप कारज माहरु जी, सांजली करजे तुं एक ॥ श्हां एक नमया सुंदरी जी, ते अति ले निर्विवेक ॥गुणा
(१३ए)
॥३॥ चौहटे गलीयें चाचरें जी, ते अति करे तो
फान ॥ वीहाडी वीहती नथी जी, फरती करती
तोफान ॥ गु० ॥४॥ नयर कमु ण नारी जी,
वानर वनह समान ॥कोश्याडो नवि उतरे जी, ए
नमयाहो तान ॥ गुण ॥५॥ ते माटे तुमे एहने जी,
घाली पोतमकार ॥ कोश परदेशे मूकजो जी,
सापण परें निरधार ॥ गुं० ॥६॥ठे परदेशी पाहु
रणी जी, यश् वदी एहवे वेश ॥ एहनी कुंण करे
चाकरी जी, लेइ चालो परदेश ॥ गुण ॥७॥ कहे
जिनदास हसी करी जी, वारु जी महाराज ॥ परवश
नमया नारीने जी, प्रवहण गर्बु आज ॥ गु० ॥॥
करी प्रणाम नररायने जी, जव्यो ते जिनदास ॥
धसमसतो हेजे जस्यो जी, आव्यो नर्मदा पास ॥
॥ए ॥ जव्य पुत्री मुंफ प्रवहणे जी, श्रावी वेसो
हेवः॥ नमया निसुणी दोडती जी, जश् वेठी तत
खेव ॥ गुत् ॥ १० ॥ नवरावी नमया नणी जी, प्रग
ट्यु रुप यत्न ॥ जेम कचरो धोया पठी जी, फलहले
जेह रत्न ॥ गुण ॥ ११ ॥ वेसाडी महोत्सवें जी,
पेहराव्या शणगार ॥ मुंहगा नांड तणी परें जी,
राखी तेणीवार ॥ १५ ॥ प्रवहण ताम हंकारियांजी,
, (१४०) सयल मनोरथ सिझ ॥ नर्मदापुरवर आवीयां जी, जीतना जंगी दीध ॥ गु ॥ १३ ॥ उतस्यां प्रवहण थकी जी, नमयाने ससनेह ॥ अति उत्सव आडं बरे जी, आणी तातने गेह ॥ गुण ॥ १४ ॥ नमया देखी तातने जी, उलटियो उबरंग ॥ सयल कुटु म्बतणां तिहांजी, हरख्यां अंगोअंग ॥ गुण ॥१५॥ हेज तणां आंसु फरे जी, अमीये उठ्या मेह ॥ न मया आनंदशुं वसे जी, निज माताने गेह ॥ गु॥ ॥ १६॥ हसे रमे क्रीडा करे जी, टाल्यो फुःख जं- जाल ॥ मोहनविजयें वर्णवीजी, बेंतालीशमी ढाल ॥ गु० ॥ १७ ॥ सर्व गाथा. ॥ दोहा॥ नमया तात जणी तिहां, सोपीने जिनदास ॥ चाट्यो तिहांथी अनुक्रमे, आव्यो निज आवास ॥ ॥१॥नमया ताततणे घरे, रहे सदा मनरंग ॥ स हीशु क्रीडा करे, निर्विकार निःशंक ॥ साधु अवज्ञाथी इणे, केतां सहियां दुःख ॥ पण एक शी ल सहायथी, पुण्ये पामी सुख ॥३॥ तात कहे नमया नणी, रे पुत्री तुज कंत ॥ कहेतो तेडावू श्हां, मूकीने उदंत ॥४॥ पीयु गुण संजारे सती, - (१४१) रही अणवोली ताम ॥ तात सुता मन राखवा, नी- पाव्यु जिनधाम ॥५॥ अति उत्तम उन्नत सुलग, जिन मूर्ति तस मद्य ॥ नमयां नित्य पूजा रचे; वा जा गाजां सब ॥६॥ ॥ ढाल सुडतालीशमी॥ कानुडो तो वेण वजावें कालिंदीने कांठे ॥ ए देशी ॥ वर्धमानपुर परिसरमांहि, एहवे सद्गुरु आव्या ॥ पंचाचार विचारे पूरा, सहुकोने मनना व्या ॥१॥ नमया तात कुटुंव संघातें, गुरु चरणां बुज नेट्यां ॥ जेहना दरिसण दीग हूंती, नव , नव पातक मेट्यां, ॥२॥ धर्माशीष सूरीश्वर नांखे, सहुको आगल वेगं ॥ गुरु उपदेश तणा मंदिरमां, जवियण हेते पेगं ॥३॥ धर्मोद्यम कीजे रे प्राणी, सुणीए जिनवर वाणी ॥ अमिय समाणी सजुरु शिक्षा, धारीजें हित आणी ॥४॥ जाणेने ए जीव विचारो, वे सघलुंए मोरं ॥ पण अत्यंतर नि- रखी जोतां, शुं देखे ते तोरूं ॥५॥.तात जातने मात सुता पति, ठे विपरीत सगाई॥ पण अंतर मेही मदमातो, तेणे रह्यो लयलाइ ॥६॥ पोतानोकरी गणीयें जेहने, ते होवे साहमो वेरी ॥ संसार
(१४२)
तणी गति एहवी, वली गति कर्मह केरी ॥७॥
काची काच घटी समकाया, कूडी शी तस माया॥
पंथीपरें विसामो जगमें, कुण पुर्वल कुण राया ॥
॥७॥ संसार विचारी जोतां, वाजीगरनी बाजी
क्षणभंगुर अनित्य पदारथ, तो पण होवे राजी॥णा
जेम वंध्याए सुहणे दीठो, जाणे सुत मुज आयो ।
दी, नाम विश्वंजर एहनु, हालरुए हुलरायो॥१०
जव सा जागी रोवा लागी, किहां गयो में दी।
ते जेम खोटुं तेम जग खोटो, पण विषया रस
मीगे ॥११॥ इंस जाल विद्या रमनारा, रवि सेवक
थर फूफे ॥ अंगकरंग घणाघण वीस्था, जाण तो
साचुं बूजे ॥ १२ ॥ नारी पति साथे पावकमां, पेसी
वली सती थाये ॥ ए कूडं तो नहीं केम साचुं, करीने
कोश्थी गहायें ॥ १३ ॥ पाणीना पोंटा जेहवी,
जेम पाणीमांहे पतासो ॥ जेम काचो घट नीरें न
रियो, तेवो देह तमासो ॥ १४ ॥ समकित विण ए
जीव विचारो, दोडे डे हा हुँतो ॥ एणे एकेही
नवि मूक्यो, एके गम अबूतो ॥ १५ ॥ करशे धर्म
ते सुखियां थाशे, दीधो एम उपदेश ॥ रोमांचित
सवि पर्षद हूई, थयो समकित उपवेश ॥ १६ ॥
(१४३) नमया अति हरखी हश्यामां, निसूणी वयण रसा ल ॥ मोहन विजयें रूडी नांखी, सुडतालीशमी ढाल ॥ १७ ॥ सर्व गाथा. ॥ दोहा॥ नमया तात तिणे समे, कर जोडी कहे एम ॥ मुफ पुत्री नमया सती, यश् वियोगिणी केम ॥१॥ पूरवनव एवं किस्यां, कीधां कर्म अघोर ॥ जे एम शहां तिहां रडवडी, गुंमी तूटे दोर ॥ पागंतरे गिरि वन गुहिर कठोर ॥२॥ गुरु कहे देवाणुप्रिय, सांजलो कडं विरतंत ॥ तुझ पुत्री ते महासती, गुण एड्ना अनंत ॥३॥ कीधां कर्म न लूटीयें, विणनोग व्ये कहाय, पूरव नव नमया तणो, सांजलजो हित लाय ॥४॥ ॥ ढाल अडतालीशमी ॥ वाधाराना वनरी॥ ए देशी ॥ गिरि वेताट्य प चास जोयणनो, पोहलो तेह प्रमाण्यो हे॥ससनेही नमया पूरव नव उपदेशे, तेम उंचो पण वीश जोय णनो, श्रागम मांहि वखाण्यो हे ॥ ससनेही ॥१॥ तास शिखरश्री नर्मदा तटिनी, पसरी एह जलपूरी है। स० ॥ सायरपूर नदी अवगणती, विमल कम (१४४) ले ससनूरी हे ॥स॥ २ ॥ ए तटिनीनी हुती अधि ष्ठाता, नर्मदानामे देवी हे ॥ स ॥ रूडे रूपें रमज म करती, कुसुम कुटुम्बे सुसेवी हे ॥ स ॥३॥ एकदा नर्मदा नदी उपकंठे, धर्मरुचि मुनिराया हे ॥ स ॥ निर्मल मन मुनिरह्या काजसग्गे, कोमल कमल ज्यू काया हे ॥ स० ॥४॥ लागे ताप तपननो तातो, बूटे अति परसेवो हे ॥स॥ एणीपरें वैराग्य दशायें, चाखे तपनो मेवो हे ॥सण॥५॥ ऊनो ल्याई ध्याननी ताली, नासायें हग स्थापी हे ॥सा मुनि सादात्पणे प्रतिज्ञासे, उपशम रसना व्यापी हे । स॥६॥ नर्मदा देवीये मुनिने दीठो, देखी रोष न राणी हे ॥ स ॥ चिंते माहरा तटने कंठे, कुण ए कुत्सित प्राणी हे ॥ सण ॥ ७॥ सहेली काया वली मेले कपडे, मुज तटिनी अन्नडावे हे ॥स ॥ एहने वेहवराचं वहेतां जलमां, दील मेदूं रीसावी हे। स० ॥ ७ ॥ मुनिने दोलवा देवी विरचे, वाघ सिंह विकराल हे ॥ स ॥ करी जंजा पुत्र उबाली, ते साहमी ये फाल हे ॥ स ॥ ए॥थ गज शुमा दं में ग्रहीने, मुनिने उंचो उबाले हे ॥ स० ॥ पण मुनि अचल महाचलनी परें, ध्यानथी मन नवि टाले हे॥
(१४५)
॥ स॥१०॥ तव सादेवी मुनि मुख पेखी,चिंते केम .
नवि कंपे हे ॥सणा एम पराजविये ने तो पण, कडवू
वयण न जपे हे ॥ स ॥ ११॥ धन्य धन्य एहने ए
हवी धीरता,सा पूढे कर जोडी दे॥सा कुंण तुं खा
मी इहां केम ऊनो, कहो मुनि श्रामलो गेडी दे ॥
स॥१५॥ कदे मुनि अमें साधु जिणंदना, पंच मे
हाव्रतधारी हे ॥ स ॥ ध्यान धरी ऊना तुं सुंदर,
निरखी नूमिका सारी हे ॥ १३ ॥ देवी कहे अहो
साहु शिरोमणि, खमजो मुज अपराध हे ॥स ॥
अबुद्धि जेम अगाध
दे ॥ स ॥ १४॥ मुनि कहे अमने क्रोध न होवे,
खंति तणाटुं अच्यासी हे ॥ स० ॥ एश्ये लेशे सां
जदयु नरगें, जे जीव सहे नरगावासी हे ॥ स० ॥
१५ ॥ नेही निस्नेही बिहु ने सरीखा, अमें लेखवीयें
एम दे ॥ स० ॥ जे जेहवू करशे तेहबुं ते लहेशे, प
ण अमे को केम हे ॥ स० ॥ १६ ॥ नमया देवी सु
प्रसन्न यश्ने, सांजली वचन रसाल हे ॥ स ॥ मो
हन विजय मीठी . नांखी, अडताशमी ढाल हे ॥
स॥ १७ ॥ सर्व गाथा ॥
में तुमने एहवा
नवि जाण्या,
, (१५६) ॥ दोहा ॥ नमया देवी आगले, कहे. तपोधन ताम ॥ प्रा णीने नवि पीडीयें, अहो सूरि विण काम ॥ १ ॥ दया सुधा कुंमी अडे, जगमांहि निःशंक ॥ तिहां म जान करतां मिटे, कल्मष तणूं कलंक ॥ ॥ काम दुधा सम ए दया, इडित सुख दातार ॥ सकल ध में अग्रेसरी, नांखे जगदाधार ॥३॥ दया विहणा बापडा, चङ ग माहे जमंत ॥ दया धारि शिव नारिथी, अहोनिशि लील करंत ॥ ४ ॥ जे निर्दय निठुर निगुण, ते केम लहेशे गण ॥ केम जलथी श्रावे तरी, अति ऊंचो पाषाण ॥५॥ सदयी जे विनीचे गई, पामे पण शिव होय ॥ नारें बूडे तुंबिका, पण आवे तरि सोय ॥ ६ ॥ ॥ ढाल उंगणपचासमी ॥ मागे महिडारो दांण, धूतारडो मागे महिडारो दाण ॥ ए देशी ॥ सुंदर दे उपदेश, रे मुनीश्वर सुंदर दे उपदेश ॥ सुललित मीठी वाणी रे, जयं कर टालें दुरित कलेश ॥ जीव सयलनो सारिखो रे, कीडी तेम मातंग ॥ थोडे धणे पुदगलें थयुं, श्हां नाहनुं मोटुं अंग रे ॥ सुंग ॥१॥ आलया
-
(१४७)
हुँती उरडे रे, उरडाहूंती गेह ॥ श्यत्तावछिन्न अ
जुबालड़ें, पण दीपक तेहनो तेह ॥सुं॥२॥पूरा
एं सहेजें गले रे, एतो पुजल धर्म ॥ पण जो ह.
णीए हाथथी, ते तो वांधे निकाचित कर्म रे ॥
सुं० ॥३॥ जोगद विहु इंडीतणा, एम लांखे जि
नराय || अव्यजिया, नावेंडिया, वली अव्यथी
नेद वे थाय रे ॥ सुं० ॥ ४॥ नावेंडिया वे नेद
थी, लब्धि तथा उपयोग ॥ लब्धि कहीयें तेहने,
जे होये आचरण वियोग रे ॥ सुं ॥ ५॥ उपयो
गयी नार्वेजिया रे, एगंदियादिक जीव ॥ पंच
विपय तमतपणे, ते अनुनवे अतुल श्रा जीव रे
॥सुं॥ ६ ॥ जेम कन्या नूपण सजी रे,
आरूढ ॥ वदन जरी तांबूलथी, सा संचरी होय
अमूढ ॥ सुं० ॥ ७॥ श्रावे जिहां कूषक नयो रे,
पारदनो द्युतिवंत ॥ तस उपकंठे ऊनी रहे, सुख
सधुरो शब्द कहंत ॥ सुंण् ॥ ७॥ शब्द सुणी क
न्या नणी रे, ग्रहबाने रसराय ॥ दोडे उपांग विना
तिहां, एम उपयोग इजिय कहाय रे ॥ सु० ॥ ए॥
वती वकुलादिकं वृक्षने रे, सिंचे गंगातोय ॥. पण
मदिरा सिच्या विना, तस कुसुम कुरंब न होय ॥
तुरग प्रति
(१४०)
सुंध ॥ १० ॥ एकेडिय उपयोगथी रे, जाणजो सु
ख सुख एम ॥ जास करण वधतां हूझ, तेह जा
णे नहिं कहो केम रे ॥ सुं ॥ ११॥ मनमें करुणा
राखिये रे, सेवीजें मुनिलोय ॥ चिंतामणि सेवीजे
तो, अर्थिने सुप्रसन्न होय ॥ सुं० ॥ १५ ॥ चोथु
शौच दया तणुं रे, सहु कोय पूरे साख ॥ ते माटे
कहुं बुं सूरि, मनमांहे दया तुं राख रे ॥ सुं० ॥
१३ ॥ अमे उपशम संयम धरु रे, क्रोध न करूं ति
लमात्र ॥ क्रोधी क्रोध करंतडां, वणसाडे प्रीतिर्नु
पात्र रे ॥ सुंग ॥ १४ ॥ क्रोध शमे धरतां दमा रे,
खंतें क्रोध न थाय ॥ तृण विण ममलें जर पड़यो,
पण आफूरडो अनि उलाय रे ॥ सुं० ॥ १५ ॥ नम
या देवी मुनितणा रे, लति लति प्रणमे पाय ॥ अ
हो तपसी कीजें जलो, मुझ ऊपर कोय पसाय रे
॥ सुं० ॥ १६ ॥ सोंपी समकित वासना रे, देवी
नणी हित लाय ॥ ढाल गणपञ्चासमी, कही
मोहन विजयें बनाय रे ॥ सुं०॥ १७ ॥ सर्व गाथा. ॥
॥ दोहा॥
सा देवी उपदेशथी, अतिही थप्रवीण ॥ सा
धु अवज्ञाथी कहो, शुं शुं होशे प्रदीण ॥ १ ॥ दे
(२४ए.) वी साधु परानवें, निर्धन निगुण सरोग ॥ श्ह नव परनव ते लहे, वाहलातणो वियोग ॥२॥ सा धु अवज्ञा फल सुणी, कंपी सुरी अतीव ॥ पातक ए विण. जोगव्यां, केम बूटशे जीव ॥३॥सा न मया देवी चवि, मणुय लोग उपन्न ॥ नामे नमया सुंदरी, महासती धन्य धन्य ॥ ४ ॥ पूर्व कर्म थ की एणे, पाम्यो कंत वियोग ॥ विकल थई वन वन जमे, पुनरपि थई अशोग ॥५॥ नमया पूरव नव सुणी, थ मूलांगत एम ॥ दीगे पूरव नव न लो, सुगुरु नांख्यो जेम ॥६॥ ॥ ढाल पचासमी ॥ :: कान्हजी मेहलोने कांवली रे ॥ ए देशी ॥ नम था आवी मंदिरें रे, मुनिनी सुणी वाणी ॥ मनश्री मांनी विचारणा रे, जो जो कर्म कहाणी ॥१॥ वलिहारी सुगुरुनी रे ॥ जेह जन दरिसण पामे, रहे श्रलगा संसारथी रे ॥ विषय जालने सामे ॥ हुँ ॥ ॥२॥ सदन संबंधि सहोदरा रे, तेहथी खोटी शी माया ॥ खारथनां सहु को सगां रे, नवि को एना कहेवाया ॥ ९॥ ३ ॥ वाहलाढूंती वाहलोरे, तेजो माहरो न हुवो ॥ वीजो तो कोण होयशेरे, कर्मनी
॥
(. १५०)
गति ए जुवो ॥ हुं ॥ ४ ॥ दावानल जेम परजले
रे, एह संसार असारो ॥ अलगो रहे ते ऊगरे,
नहिं तो नहिं को आरो ॥ हुँ॥ ५ ॥ एहमां जो
संजम आदरं रे, खरं एह के जोतार्नु ॥ आग व
दंते खूपडे रे, निकट्युं ते पोतानुं ॥ हुं ॥ ६ ॥ ता
तने नमया विनवे रे, द्यो मुऊने आदेश ॥ जो अनु
मति होय तुम तणी रे, तो ग्रहुँ मुनिनो वेश ॥ हुँ॥
॥७॥ तृप्त थर नव नोगवी रे, नथी हुँ अणतृप्ति ॥
पामि परीक्षा सहु तणीरे, एम वचनें प्रीबवती ॥
हुँ॥ ॥ तात कहे नमया नणी रे, श्यो बे अवसर
ताहरो ॥ जेह तुं संयम आदरें रे, मोह गंमीने मा
हरो ॥ ९ ॥ ए॥ संयम डे अति दोहिलो रे,
नथी खेल हांसीनो ॥ जेम बेगे मणिधर रे, जेम अ
तुल खजानो ॥ हुं॥ १० ॥ को दांते मीणने रे,
लोहचणा चावे ॥ संयम वेलु कवल जिस्यो रे, नीर
सो कोने नावे ॥ हुँ ॥ ११॥ लेवो मणि वासुकी
तणो रे, नरवी आनथी वाथ ॥ कोपातुर मृगपति
तणा रे, मुखें घालवो हाथ ॥ हुँ० ॥ १५ ॥ खड्गनी
धारा उपर रे, होंशे कहो कोण चाले ॥ विफरिया
वनगज जणी रे, पंगू नर किम जाले रे ॥ हुँ॥१३॥
(१५१) ए जेम सघलुं दोहिर्बु रे, तेम संजम ने तेहवो ॥ वेगं बेग उपन्यो रे, केम वैराग्य एहवो ॥ढुं॥१४॥ ग्रीष्म ऋतुने तावडे रे, अणुवाणे पगे फिरशोकाय सुकोमल एहवी रे, केम गोचरी करशो ॥ हुं ॥१५ वावीश परिसह आकरा रें, ते केम करी सहेशो.॥ जारं महाव्रत पांचनो रे, केही विधं वद्देशो ॥ हुँ । ॥ १६ ॥ योग. युक्तिनी योजना रे, योगेश्वरें तेने जाणी ॥ मोहनविजयें पचासमी रे, वारु ढाल व खाणी ॥ हुँ ॥ १७ ॥ सर्व गांथा । ॥ दोहा ॥ रण रसिया रणमंडलें, पाठा न दिये पाय- ॥ नि रति संयम पालवा, हाम तेणे न घलाय ॥१॥ संयम तो सुरगिरि शिखर, उंचो अपरंपार ॥ तिहांथकी जे कोइ लडथड्या, नूला नमे संसार ॥२॥ मटक विरागी होयता, संयम तो न पलाय ॥ वाजीगरना नृपतिसम, राज्य कितो निवदाय॥३॥संयम सोहिलो जो हुवे, तो सहु पाले एम ॥ तरुण नाव. संयम पणे, संय्यम ग्रहशो केम ॥४॥ वोली नमया सुं दरी, अतिलूखो परिणाम ॥ संयम लेता वारीयें, ए नाहिं उत्तम काम ॥.५ ॥ वालक वीहाव्यो रहे, (१५२) अझाने करी एम ॥ पण संयम रसलालची, वचनें बीहे केम ॥६॥ ॥ ढाल एकावनमी॥ चंदनरी कटकी नली॥ए देशी ॥ संसारनां सुख दाखवी, शुं नोलावो को तात, मनडं हो रा ज, सुगुण संयम पर माहीं ॥ मूरखनु हित का करो, किजे पंडित बोल ॥ म ॥ सु॥१॥रोगी कडवे औषधे, निश्चे होय नीरोग ॥मणा पण मीग आहारथी, केम नीरोगनो योग ॥ म ॥ सु० ॥ ॥२॥ कर्मतणो रोग टालवा, संयम औषध जेम॥ म ॥ पण मीगे नाकारडो, करमनें कहीयें केम ॥ म ॥ सु॥३॥ चाले जे बुद्धि पारकी, ते सम मूढ न कोय ॥म ॥ करीयें जे मन साखि थे, तो तो मनवांडित होय ॥ म ॥ सु ॥४॥ हुँ संयम अरथी थर, लेश्श संयम नार ॥ म ॥ तुम वचनें चायूँ हवे, तो कुण होय आधार ॥ म ॥ सुः ॥ ॥५॥ तात श्रागल नमया कहे, लोक अनुपम एम ॥ म ॥ चारित्रथी राची थकी, आणी परम विवेक ॥ म ॥ सु० ॥६॥ तत्त्वातत्वविचाराय, स्वैव बुद्धिादमा नृणां ॥ परोपदेशो विफलो, यथाऽ (१५३) सौधनदत्तवत् ॥ १॥ पूर्वढाल ॥ तात कहे नमयां जणी, ते कुंण हतो धनदत्त ॥ म० ॥ कहे मूकने समजाववा, एम कहे उत्सुत्त ॥ म ॥ सु०॥ ७ ॥ खोटुं ना केम पिता, साचो ले तेह संबंध ॥ मं० . तात आगल नमया कहे, धेनदत्तनो संबंध ॥ म॥ सुण ॥ ७॥ नयर विशाला सुंदरु, तिहां वसतो, धनदत्त ॥ म ॥ लबी परिगल मंदिरें, यौवन वयं उन्मत्त ॥ म ॥ सु॥ ए ॥ तात जरातुर तेहनो, अवयव थयो वलहीन ॥म ॥ उपनी मस्तक वे दना, तेणें तेह जांखे दीन ॥ मण ॥ सु ॥ १० ॥ तेंड्यो तेणे धनदत्तने, साड्यो निज पास ॥ म ।। कुःख निवेद्यं पुत्रने, सुत सुणि करिय विखास ।। मणासु ॥ ११॥ तात जरातुर तरफडे, पण शांता नवि पामंत ॥ म ॥ धनदत्त तात मुख देखीने, गदगद कंठे कहंत ॥ म ॥ सुण ॥ १५ ॥ रेरे तातं तुमारडी, केही अवस्था एह ॥ म० ॥ जे कांश मन डॉमें हुवे, कहो तेम करीये तेह ॥ म ॥ सु० ॥ ॥ १३ ॥ कांई एम दुःख लोगवो, कहो जे हुई वात म॥ वचन सुणी धनदत्तनां, मंद स्वरें कहे तात ॥म ॥ सु०॥ १४ ॥ रे सुत में धन मे
(१५४)
लव्यु, ते करी कूड प्रपंच ॥ म ॥ लही पापानु
बंधनी, एहमां नहीं खलखंच ॥ म ॥ सु० ॥ १५ ॥
में लडी नवि वावरी, सातें क्षेत्र मजार ॥ म ॥
ते लही शा कामनी, जो नवि हुवे उपगार ॥मा
सु० ॥ १६ ॥ विलसी हिज लबी नली, जाणे बाल
गोपाल ॥ भ॥ मोहनविजयें वर्णवी, एकावनमी
ढाल ॥ म ॥ सु० ॥ १७ ॥ सर्व गाथा.
॥ दोहा॥
बोली जूगं मोटकां, में ए मेट्या दाम ॥ पण ए
साथे कोश्ने, नवि आया विरजाम ॥१॥ सोवन
सुंगरियो करी, लोजीजने अनंत ॥ पण एक कटको
हेमनो, लेश न गयो को संत ॥२॥ कूपक जलने
अव्य ए, नित नित जेम ववराय ॥ तेम तेम बिहु
खूटे नही, शास्त्रे एम कहाय ॥३॥ ते कारण अं
गज तमे, धन जे आपणे गेह ॥ सुकृतने वासें
सदा, वावरजो धरि नेह ॥४॥जो धन वावरशो
तमे, तो गति लहेशे जीव ॥ नहिं तो तुमने साल
लो, परितापीश सदैव ॥५॥ धनदत्त नाम कहे
पिता, मनमां हु प्रसन्न ॥ धर्म गम तुम मेलवू, वा
वरशुंए धन्न ॥ ६॥
( १५५)
॥ ढाल वावनमी॥
केसर वरणो हो काढी कसुंवो माहा लाल ॥
ए देशी ॥ सुतने वयणे हो जनक प्रसन्नो, माहरा
लाल ॥ ते सुरलोकें हो तुरत उपन्नो ॥ माहरालाल ॥
कांति अनोपम हो सुरपुर नूपण ॥ मा० ॥ निर्मल
देहीहो, नहीं को दूषण ॥ मा० ॥ १॥ धनदत्त हि
यडे हो, ताम विचारे ॥ मा ॥ कोश् गति तातें
हो, कृत स्वीकारे ॥ मा॥ जगस्थिति दीसे हो, अ
रघटमाला ॥ मा० ॥ उपजे विणसे हो, वस्तु विशा-
ला । मा० ॥२॥ पण मुफ तातर्नु हो, विण संजा
व्यु ॥मा॥दान प्रचारूं हो, कुल अजुवायूँ ॥मा॥
जे गयो परघर हो, फेर न आवे ॥ मा० ॥ धनदत्त
मनडुं हो, एम समजावे ॥मा०॥३॥ अवनीत
लमांहे हो, जे धन हुँतु ॥ मा॥ एणे वाहिर हो,
कीबूं अतुं तुं ॥ मा० ॥ शत्रुकारें हो, ते धन खरचे
मा० ॥ उलट अधिको हो, पण नवि विरचे ॥माणा
॥४॥ साते देने हो, अति धन वावे ॥माण ॥
पूर्ण कमाणी हो, सबल उपावे ॥ मा० ॥ तेणे ना
कारो हो, मुखश्री न सात्यो । मा०॥ कृपणपणाने
हो, दूर निवास्यो ॥ माण ॥ ५ ॥ वेहेंता जलधि हो,
ये बेहु सरीखो ॥ मा॥ श्रावे ते कनेहो, श्रीं श्रा कष्यों ॥ मा॥प्राप्ति जेहवी हो, तेहबुं पामे ॥मा०॥ पण नवि वारे हो, तेवहु आमे ॥ मा॥६॥ कीर्ति प्रसरी हो, धनदत्त केरी ॥ मा०॥ वाजे जगमां हो, कीर्ति नेरी ॥ मा०॥ सोखी हरखे हो, कीर्त्ति कसके मा० ॥ दोषी नर ते हो, देखी न शके ॥मा ॥७॥ विप्र महोदय हो, ऐहवे नामें ॥माण ॥ अति खल निवसे हो, तिण हिज गामे ॥ माण ॥ धनहत्तसाथे हो, करी मित्राय ॥ मा ॥ वातें रीजवे हो, करी पवित्राय॥ मा० ॥ ७ ॥ खलने मलतां हो, वार न लागे ॥ माण ॥ काम सस्याथी हो अलगो नागे॥ माण ॥ गरल अपूरव हो, खल निर्वासे ॥मा ॥ श्रवण पहोते हो, विष प्रतिनासे ॥ ए ॥ विप्र प्ररू पे हो, मित्र महारा ॥मा ॥ अमे शुज वांबक हो, अहोनिश तहारा ॥ मा ॥ तुझ सुख सुखिया हो, पुण्य पवाडे ॥ मा॥ होय जो कूवे हो, आवे श्र वाडे ॥ मा ॥ १०॥ एम धन उपरे हो, कां तुं रूगे॥ मा॥ पुंठ विचारी हो,जोय अपुगे ॥मा॥ जो धनधोरणि हो, ताहरे होशे ॥ माण ॥ तो तुज साहमुं हो, कोहु जोशे ॥माण ॥ ११॥ धनविण
(२५७)
मानव हो, कोडि न पावे ॥ मा० ॥ साहमा सधनी
हो कोडि लपावे ॥ मा० ॥ निर्धन नरने हो, कोश
न धीरे । मा० ॥ धनने श्रादर हो, सहु को उदीरे॥
॥ मा० ॥ १५ ॥ उरगकलेवरहो, कोथी होवे मा॥
पण निर्धनने हो, कोश् न जोवे ॥ मा॥ पुरुप वि
नूपण दो धन कहेवाये ॥ मा० ॥ प्रजुता विजुता
हो धनयी थाये ॥ मा॥ १३ ॥ धन बिहु श्रदर
हो, पण गुण मोटो ॥ मा० ॥ धनवंत साचो हो,
वीजो खोटो ॥ मा॥ प्रनु निर्मव्ये हो एकज पूजा
ये । मा० ॥ पण नर वीजो हो अव्य सराये ॥मा०
॥ १४ ॥ पूरवपुण्ये हो, तुं धन पायो ॥ मा० ॥ राखी
न जाणे हो, कोय उगायो॥ माण ॥ देतां न कहे
हो, कोई नाकारो ॥ मा॥ धन सदु वांठे हो, थाप
पियारो ॥ मा॥ १५ ॥ मित्र विद्वणो हो, इम कुण
कद्देशे ॥ मा० ॥ रूई जुई हो, तुं निर्वदेशे ॥मा
मारी शिक्षा हो, धनदत्त मानो ॥ मा०॥ एम कही
वाडव दो, रदियो बानो मा॥१६॥ धनदत्त मनमा
हो,एम विचारे माा दान देयंतो हो,कोइ न वारे
॥मानांखी रुडी हो, ढाल बावनमी ॥ मा० ॥
मोदन पिजय हो, विनयत थनमी।मा ॥ १६ ॥
(१५७)
॥ दोहा॥
ए वाडव माहरो खरो, नेही इण संसार ॥ धन
पणं कां नथी मागतो, कहे बे हित उपगार ॥१॥
एणे मुफ साचु कत्यु, हुँ तो दीजंतुं दान ॥ पण धन
विहूणा लर हुवे, नीरस तरण समान ॥२॥ धनदत्त
ब्राह्मण वचनथी, परिहमु देवू दान ॥ लोन दशा
पसरी खरी, नीचसंगति निदान ॥३॥ संगति उ
त्तम कीजीयें, तो अश्ये वरवीर ॥परिखा जल गंगा.
गयु, तो थयुं गंगानीर ॥४॥ जो जो संगति नी
चथी, आपद असी अमेल ॥जो खलसंगति आदरे,
तो निष्फल नागरवेल ॥ ५॥ धनदत्त धन ढगला
करी, राख्या मंदिरमांहि ॥ नाकारो शीख्यो फरी,
विप्र वचनथी त्यांही ॥६॥
॥ ढाल पलभी॥
सासू पूले बहु वात ॥ माला किहां रे, ए
देशी ॥ मूर्ख मित्रनी वातो रे, कहो कुण माने रे ॥
एक अज्ञानिनी टोली रे, करे कुण काने रे ॥ ए
आंकणी ॥ धनदत्त ब्राह्मणथी जरमाणो, वाहला
मारा नवि मनमें शरमाणो ॥ लाज तणी तेणे
वात न राखी, यशनो रत्न गमाणो रे ॥ का ॥१॥
(१५ए) दान देयंते वधती हुती, लबी परिंगल गेहें रे, दान निवारे धनदत्त साथै, लच्छी थर निःस्नेही रे ॥ का ॥२॥ दानें लबी होय मद माती, विण दानें कृश थाये रे ॥ जोजनथी तनु पुष्ट होय तेम, जोजन विण न चलाये रे ॥ का ॥३॥ मणि माणिकने सोनुं रूपुं, एहथी रीशें जराणां रे ॥ श्याम वर्ण को धग धगता, हुश् अंगार समाणा रे ॥ कण् ॥ ४॥ जलवट थलवट केरी लठी, तिणे ग ति जलनी कीधी रे ॥जो जो धन दत्त मूढ पणाथी, दरिद्धीने साह्य दीधी रे ॥ क० ॥ ५ ॥ सुगुण सहो दर सयल सनेही, तेणे पण हित चोचु रे ॥ दीवं तिहां तेणे धनदत्त छारें, दान विटपि विण मोखं रे॥ का ॥६॥ धनदत्त निर्धनने वशे नोलो, न . मतो पुरमा लाजे रे॥ पूर्व लाज अ धनदत्तनी, जेह करे ते बाजे रे ॥ कण् ॥ ७॥ विप्र म होदय एहवे अवसर, धनं दत्त मंदिर आव्यो रे ॥ निर्धन दीगे तेणे नयणे, ‘सान करी समजाव्यो रे ॥ कण्॥७॥ एह शी सूरि जन ताहरी अं वस्था, ए शुं दैवें की, रे॥ रोहण शैल समो रय णायर, पुंज जलाली लीधो रे ॥ क ॥ ए॥ नेत्र (१६०) सजल थ धनदत्त बोल्यो,रे रे मित्र शुं कहीये रे॥ अतरर्गतनी कहो कुण जाणे, जेह लख्यु ते लहीयें रे ॥ कण ॥ १० ॥ वाहला मित्रजी जश्ये परदेशें, तिहां जश् उदर जरीशुं रे ॥ शुं करीये कहो केहने कहीये, मूल मजूरी करीशुं रे ॥ क० ॥ ११ ॥ देशे चोरी विदेशे निदा, एहवो बोल्यो उखाणो रे ॥ पण एकलडां केम सुहाये, हियडे विचारी जाणोरे॥ कम् ॥ १२ ॥ विप्र कहे सुण धनदत्त नाई, एक लडो केम डोडु रे, जो कांश काम पडे जो ताहरे, शीषसहित तनु ओ९ रे ॥ कण्॥ १३ ॥ पण तुं मा हरा कथनमा रहेजे, धनदत्त कहे पण वारुरे ॥ ते बेहु चाल्या परदेशे, पेट जरा सारु रे ॥ का॥१४॥ मूकी देश विदेशे पोहता, धनदत्त वाडव साथें रे ॥ पणं को उद्यम संपति केरो, नावे तेहने हाथेरे ॥ कम् ॥ १५ ॥ जे जे वाडव विधि प्रकाशे, धनदत्त तेह विधि चालेरे॥ पण पूर्वापर ते न विचारे,पाडो उत्तर नालेरे॥ १६॥ जो जो नमया ए दृष्टांतें, तात जणी समजावे रे॥श्रतिहि सुललित ढाल त्रेपनमी, मोहन कही समजावे ॥ क०॥ १७ ॥ सर्वगाथा ॥ , (१६१) ॥ दोहा॥ .. एक दिन वनमा चालतां, तृषावंत धनदत्त ॥ मि त्रकने मागे तिहां, पय पीवाने ऊत्त ॥१॥ मित्र कहे शहां वेश्य तुं, हृदय धरीने धीर ॥ वनमांहें सरवर थ की, लेश् आई हूं. नीर ॥२॥ वेसाडी धनदत्तने, कोश्क तरुवर गंहि ॥ विप्र मित्र जल कारणे, गयो गहन वनमांहि ॥३॥ न मिट्युं जल ते विप्रने, चिंते, मनमां ते एम ॥ विण. पाणी निज मित्रने, वर्दै न देखाडु केम ॥ ३ पूलथी धनदत्त हवे, मित्र त णी जोर वाट ॥ जल नाव्युं दी तेणे, चिंते हृदय निपाट ॥ ५॥ हलूये उव्यो तिहां थकी, एकाकी धनदत्तावनमाहे नूलो जमे,जिम करिवर जन्मत्त॥६॥ ॥ ढाल चोपन्नमी ॥ मुजरो ल्योने जालिम जाटणी ॥ ए देशी ॥धन दत्त नोलो जी वनमा जमे, करवा विप्रनी शुद्धि । तुमें फल जो जो नीचसंगति तणां ॥ ए आंकणी ॥ संगति नीचनी होये अलखामणी, प्राये निर्धन नि qछि ॥ तु॥१॥ वनमें पारधीया खेटक रमे, वग ना मांडीने फंद ॥ ताणे वाण ते मृगवध कारणे, वेग ते मतिमंदः ॥ तुपः॥२॥ मृग पण श्राव्या तृण चं
(१६५)
रता तिहां, पारधी फंद नजीक ॥ एहवे धनदत्ते ते
अजाणते, कीधी उत्तम बींक ॥ तु ॥३॥ बीके नागा
ते मृग पाबा फस्या, दोड्या पारधि ताम ॥ रुष्या बोले
मृग केणे त्रासव्या, करघु केणे वैरीन काम ॥तु॥॥
धनदत्त दीगे पारधीये तिहां, पकड्यो दोडीने ताम॥
नाख्यो मेदिनी लात प्रहारथी, कीधो हृदय अकाम
तु०॥ ५ ॥ रे रे फंद पड्या मृग त्रासव्या, तेहनां
यह फल जोय.॥ बांधी चाव्याजी तरु शाखांतरें, पा
रधी न रह्यो जी कोय ॥ तु ॥६॥ धनदत्त श्राफ
ले बल घणुं करे, बोडी न शकेजी बंध ॥ कीणही
वाटाउये नवि तस दीवडो, कुसुम जिस्यो निर्गंध।
तु ॥७॥ एहवे वाडव वारि ले करी, थाव्यो प्रथ
म तरुपास ॥ तेणे नवि दीठो तिहां धनदत्तने, तव
ते करेजी विखास ॥तु॥७॥ श्रनुपम दीगो ते ध
नदत्तने, तव ते दीगे बांध्यो जी मित्र ॥ केणे माहरो
मित्र पराजव्यो, कांश्क दीसे ले चरित्र ॥ तु ॥ए॥
बोड्यो मित्रने शाखाथकी, पूज्यो बंधविचार ॥ धन
दत्त नांखेजी वाडवागलें, व्याध तणो अधिकार॥
तु ॥ १० ॥ नांखे वाडव धनदत्त श्रागलें, एम नवि
कीजे अबूझ ॥ पुरबाहेर नर देखी तिहां, बोलीयें न
(१६३)
ही कहूं तुफ ॥ तु ॥ ११॥ दीवे मारग सीधा चा
लीयें, तो कुण दूदवे एम ॥ मान्यु धनदत्तें कडं वि
प्रतुं, चाट्या आगल जेम ॥ तु० ॥ १ ॥ श्राव्या
कोश् पुरवर परिसरें, दीतुं सरोवर एक ॥ रजक नि
हाल्यो वस्त्र तिहां धोवता, धनदत्त चिंते विवेक ॥
तु०॥ १३॥ हलूए हलूए सरोवर संचस्यो, केहें
रह्यो कांश विप्र ॥ दीगो रजके धनदत्त आवतो, साद
मो दोड्यो जी क्षिप्र ॥ तु ॥ १४ ॥ पकड्यो रजके
धनंदत्तने, तथा रजक कहे मुख एम ॥ दिवस घणा
नो करतो तस्करी, पकड्यो जाश केम ॥ तुमार५॥
काले बेश गयो वस्त्रनी ग्रंथिका, वली तुं श्राव्यो ठे
श्राज ॥ चोरतुं वितक तुकने विताडगुं, बलशे त्यारे
तुफलाज ॥तुम॥१७॥ रजकवचनें धनदत्त चिंतवे,
कुण चोर वे कुण ।। मोहनविजयें ढाल चोपन्नमी,
पजणी परम अनूण ॥ तु ॥ १७ ॥ सर्व गाथा.
॥ दोहा ॥
रे रजक कुंण चोर ठे, मारुं धनदत्तनाम ॥ नग
री विशालायें रहूं, व्यापारी अनिराम ॥ १॥ दैव
वशे यहां आवियो, अणवोल्यो इण वाम ॥ मित्र
महोदय कथनथी, कीधां सवि आयाम ॥२॥ विन
हुँ
(१६४) महोदय पण तुरत, आव्यो सरोवर पाल ॥ मुकाव्यो बंधन थकी, धनदत्तने सुविशाल ॥३॥ तिहाथी बिहु नेही निगुण, पाम्या एक कांतार ॥ विण संवल विलखा जमे, धन विण कवण श्राधार ॥४॥ वन फुल फल सुवृदनां, तेह तणो आहार ॥धनदत्त तात तणो हवे, सांजलजो अधिकार ॥ ५॥ प्रथम स्वर्गे श्रयो देवता, थयु जे अवधिज्ञान ॥ पूरवनव दीगो तिणे, प्रगट त्रिदश विज्ञान ॥६॥ ॥ ढाल पंचावनमी॥ थाहरा मोहला उपर मेह, फरूखे वीजली ॥ ए देशी॥ देखी विलोकें ताम, अवधि शाने करी॥ हो लाल ॥ अ॥ दीगे धनदत्त पुत्र, पूरव जव अनुस री॥ हो ॥ पू० ॥ ऐ ऐ माहरु वेण, निवाही नवि शक्यो॥ हो निः॥ दानांगणवड वीर यश्ने, नवि टक्यो ॥ होण्॥ थ० ॥१॥ वाडव वयणे एह, नोला णो बापडो॥ हो ॥ नो॥ वनचर परें वनमांहि, फरे ने उफाफलो॥ हो ॥ फ० ॥ मूढ पराइ बुकें, लहे. अप बाजना ॥ हो ॥ लण ॥ हजीय नथी कर ए, हृदय बालोचना ॥ हो ॥ हृ ॥ २ ॥ सम जावु धनदत्त, उपाय कोश्क रची ॥ हो ॥ ज ॥ तो
(१६५)
ए पण उर्जन संग, रह्यो । अति पची ॥ हो ॥
र०॥ एम आलोची देव, विमान तजी करी॥ होण
॥विण ॥ आव्यो वनह मकार, प्रवोध रसें नरी
होगाप्रण॥३॥ फोरवी शक्ति सुरंग, थयो व्यवहारि
यो । होण् थ ॥ दिव्य वसन द्युतिमंत, शृंगारे शृं
गारि ॥ हो ॥ शृंग ॥ पोउ नरी तिहां रयण, त
णि तेणे सांमटी ॥ हो ॥त॥ पदेख्यां ढलतां वस्त्र, .
सुरंग सूधां हठी ॥ हो ॥ सुण ॥४॥ रुप अनो
पम ताम, श्स्यो देवे कस्यो ॥ हो ॥ ३० ॥ वेगे
अह उपकंउ, सुनरनीरें जयो॥हो ॥ सु ॥ ह
रि नव पल्लव गुळ, तणा कुंजांकुरा ॥ हो ॥ तम् ॥
परिमल मुखरित नूरि, सलूणा मधुकरा होणास
॥५॥सुर जोवे धनदत्त, तणी तिहां वाटडी ॥ हो
॥त ॥ हजीय न आव्यो मूढ, कुसंगी प्रीतडी ।
हो ॥. कुछ ॥ हुई ते धनदत्त, तृषातुर एहवे ॥
हो ॥ तृ॥ दीगे दूरथी तेह, नस्यो उह तेहवे
॥ हो ॥ ज०॥६॥ दोडी आव्यो नीरहेते, ते अह
ऊपरे॥ हो ॥ तेण ॥ जेम कीधुं जलपान, चोलाव्यो
ते सुरें। हो ॥ वो ॥रे रे वटाज पंथ, जुल्यो झुं
श्रावियो । हो० ॥जु॥ दीसे वे तुं कुलवंत, तो कां
१
(१६६)
एम नावियो । हो ॥ तो ॥७॥ बेसो यहां विश्राम,
करीने जाय जो ॥ हो॥ कण ॥ वचन उलंघी मुज,
गमार न थाय जो होगा धनदत्त तास वचन,
रह्यो धीरज धरी॥हो ॥रा जो जो विबुधे ताम,
विबुधता शी करी हो॥ वि० ॥ ॥ धनदत्त देखे
तेम,सुरेश्वरहित धरी॥हो॥सुनाखी उह मांहि
रयण, अंजलि जरी जरी॥होणा॥ एम असमं
जस देखी, कहे धनदत्त इस्यु होणाकणारे व्यव
हारी ए काम, करे बे तुं किस्युं होगाक॥ ए. ॥ दे
खी पेखी रयण, महे केम नाखीयें ॥ हो ॥
ज०॥ सुख दुःख अव्यने काज, सवे हुँ सांखीए
॥ हो ॥ स ॥ के को प्रेत विशेष, थयो ने तुऊ
ने ॥ हो ॥ १० ॥ जे कांश हृदयमें वात, हवे ते
कहो मुजने ॥ हो ॥ हूण् ॥ १० ॥ बोलोबो माह्यां
वेण, करो कां ग्रथलता हो ॥ क० ॥ उपहासीथी
केम, तमे नथी बीहता ॥ हो ॥ त ॥ तव सुर
बोल्यो एम, वचन रचना करी ॥ हो ॥ व० ॥ रे
एंथी वड वीर, कहुं तुक हित धरी ॥ हो ॥ कण
॥ ११ ॥ हुं बुं सारथवाह, रयण संग्रह घणो ॥ होग
॥ र ॥ एक ने माहरे मित्र, योगीज सोहामणो
।
है।
(१६७) ॥ हो ॥ यो ॥ तेणे मुझने रत्न देखी, कडं एहवं ॥ हो ॥ कण् ॥ माने माहरो बोल, तो हुँ तुमने कढुं ॥ हो ॥ तो ॥१२॥ ए वन गहन मकार, एह अह रूयडो ॥ हो ॥ ए ॥ सुंदर सलिल गंजीर, पद्म अह जेवडो ॥ हो ॥ प०॥ तास तणे उपकंग, रयण लेश नावियें ॥ हो ॥ र ॥ अंजलि नरी जरी कोटिश, तेहमें वाविये ॥ हो ॥ ते ॥१३॥ 'एक वरस मर्यादि, लगण तिहां स्थिर करी होणा लम् ॥ प्रगटे अहथी ताम, रयणनी उंगरी॥ हो ॥ र० ॥ मित्र वचनथी आज, यहां दुं श्रावियो । हो ॥ ३० ॥ सयल रयणनो पुंज, जहांतरे वावियो ॥ हो ॥ ७० ॥ १४ ॥ होशे रयणनो शैल, प्रजा कर रूयडो ॥ हो ॥ प्र॥ साचो माहरो मित्र, कहे केम कूयडो ॥ हो ॥ का ॥ वोल्यो धनदत्त ताम, घणो पुलकित थ ॥ हो ॥ १ ॥ ताहरी सारथ वाह, कहुं केम बुद्धि किहां गश् ॥ हो । क० ॥ १५ ॥ कहिं प्रहमा रत्न, जग्यां तें सानयां ॥ हो ॥ ज० ॥ फेरी शी तसंाश के, जे गांगें ग व्यां ॥ हो ॥ जे० ॥ ते नूख्यो ताहरो मित्र, जे तु ऊ जनेरी ॥ हो ॥ जे० ॥ तुं नोलो जे. तास, व
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1-
(१६)
चन नवि फेरव्यो ॥ हो ॥ व० ॥ १६ ॥ मानीश
ऐहवा मित्र, तणी जोशीखडी ॥ हो ॥ त ॥ मा
गीश सारथवाह, नली तुं जीखडी ॥ हो ॥ जा
॥ पंचावनमी ढाल,
मोहन विजयें कहीं ॥ हो ॥
मो० ॥ जे को निपुण शिरोमणि, तेणे तो शही
॥ हो ॥ ते ॥ १७ ॥ सर्व गाथा. ॥
॥ दोहा ॥
वणिक रूपें कहे देवता, सांजल्य तुं धनदत्त ॥
पर उपदेशे कुशल तुं, दीसे ने उन्मत्त ॥१॥ पर्वत
पर जलती बहु, नयणे निरखे लोय ॥ पण पयतल
बलतां थकां, मूढ न देखे कोय ॥२॥ पर अवयु
ए राई. सरस, करे सुरशैल समान ॥ निज अव
गुण मंदर समां, राई करे अयाण ॥३॥ एक वा
र तुं ताहरी, गति सामुं तो जोय ॥ त्यार पड़ी पर
बूजिये, एम माह्यो शुं होय ॥ ४ ॥ धनदत्त तव नि
सुणी करी, कहे तव सुरने एम ॥ शीखामण देतां
थका, रीष चढावो केम ॥५॥ वचन मांनो जो
माहरूं, तो सुखी होउ महाराज
हुँ तो हेत माटे
कहुं, तव बोल्यो सुरराज ॥६॥
(१६) : ॥ ढाल ठपन्नमी॥ जटीयाणीना गीतनी अथवा सुरती प्यारी लागे जिनजी ताहरी ॥ए देशी॥ धनदत्तने एम नांखे हो, व्यवहारी रूपें देवता ॥ रे लड़क मतिहीन, प्रथ मज तुं जुलवाणो हो, तेह तो तुं नथी शोचतो, कां न संजारे दीन ॥ धम् ॥ १॥ हुँ तो जोगी व यणे हो, रयण वली आव्यो वाववा ॥ तो ते वास्यो मूऊ ॥ वाडवनी तुं शीखें हो, जे एम वनमा रड वडे, तो कुण वारशे तुफ ॥ध ॥२॥ तुऊने जे को ताते हो, नोबुडा वचन कडं हतुं, न कसु ते नि हि ॥ वांजणनां वचनथी हो, धूताणो एम नूलो लमे, इजीय नथी लाजतो थाह ॥ध ॥३॥ ते माटें कहुं तुजने हो,धनदत्तजी लुसु.ममानशो, कहे वाये ए रूढ ॥ हुँ नोलवाणो केहवो हो, जोलवाणो तुं ए विप्रथी, मूढ हूं किंवा तुं मूढ ॥ ध० ॥४॥ पर उपदेशें माह्यो हो, ते कारण तुने हुँ कहुँ । जोतुं संजाली पूंच॥जे कां तुज आगल हो, विण पूठ्ये जे में उपदिश्युं, ए साचूं के फूठ ॥ध ॥५॥ में तो जोगीवचनें हो, प्रहमांहि रत्न जे बोसस्यां ॥ पण तुं विचारी जोय ॥ वाडवना कह्याथी : हो, तें , (१७०) हज पुण्य प्रमार्जियुं, वली जम्यो उर्जग होय ॥३॥ ॥६॥ जो होश्ये निकलंक हो, तो परतुं कलंक प्रका शियें॥करी जाणो निर्धार, ते कारण तुमे जाउँ हो। नूलशो पुरनी वाटडी, खोटा न करो उपचार ॥ ध० ॥ ७ ॥ धनदत्त तिहां मनमांहि हो, आलोचे जंमी आलोचना, ए केम लहे मुक वात ॥ एणे जे मूफ नाख्यु हो, ते साची सघली. वातडी, खोटा नहिं श्रवदात ॥ ध ॥ ॥ वाडवने को बुब्धो हो, में तातनुं वचन विसारियुं, नलो चूल्यो हुँ जोर ॥ मूरखने वली होवे हो, माथे मोटां शिंगडां, कहेने कहुं करी शोर ॥ध ॥ ए॥ मानव तो नवि दीसे हो, दीसे डे ए तो देवता, नहीं तो जाणे केम ॥ सारथवाहने जांखे हो, धनदत्त बेहु कर जोडीने, प्रगट प्रकाशी. प्रेम ॥ध ॥ १० ॥ तमे कोण बो बुद्धिवंता हो,मुज पागल साचुं नाखजो, दाखो प्रगट स्वरुप ॥ धनदत्तना कथनथी हो, सा थपनो दंन विसर्जियो, कस्युं सुररूप अनूप ॥ ध ॥ ॥ ११ ॥ निर्मल देही जेही हो, फाटिकनी जाणे म यूषिका, अंबुज परिमलपूर ॥ जूषणने संजारे हो, संपूजीत तन सोहामणो, तेजें न जिते सूर ॥
(१७)
ध०॥ १२ ॥ धनदत्तने सुर नांखे हो,. सांजस्य हुँ
तुं ताहरो, पूर्व नवनो तात ॥ सुरपुरनें. सुरतीला
हो, जोगवतां अवधि प्रयुंजीयो, दीग तुज अवदात
॥ध ॥ १३ ॥ पूरव नवने नेहें दो, तुऊ प्रति
वोधन श्रावियो, सारथवाहने वेशाहमांहे मणि
कपटें हो नाखिने, तुज समजावियो अहो, हित
शीख विशेष.॥ ध० ॥ १४ ॥ केम करीने चालीजें
हो, बालूडा बूझें पारकी, कीजें मन अनुजाय ।
घणी घणी शी फेरी हो, नांखीजे तुजने शीखडी,
तुजने कहुं हुं न्याय ॥ध ॥ १५ ॥ सुरवरने व
चनें हो, प्रतिज्यो धनदत्त हियडे, दीगे तात
'सनेह ॥ देवें एक अनिमेपे हो, वनहुँती धनदत्त
श्राणीयो, जीहां पूरव निज गेह ॥ ध १६ ॥ गृह
मांहे मणि माणिक हो, सोनुं ने रूपुंसामटुं, प्रग
ट्यो फाकफमाल ॥ उपन्नमी रतनाली हो, सुगुणीने
हेतें ए कही, मोहनविजयें ढाल .॥ ध० ॥ १७ ॥
सर्व गाथा ॥
॥ दोहा ॥.
ते सुरवर धनदत्तने, सोपी, धण कण धाम ।।
प्रतिवोधी सुरपुर रमा, आजरणीकृत ताम ॥१॥
(१२) धनदत्ते सुंदरपरें, मननुं चिंतव्यु कीध ॥ अवसाने सुख अनुनव्यां, सकल मनोरथ सिक॥॥अथ शति पर्यंत ए कह्यो, धनदत्तनो अवदात ॥ नमया कर जोडी कहे, श्रवण अतिथि करो तात ॥३॥ विना वचन जिनराजनां,जे परछिराचंत ॥ तेहनी गति धनदत्त जिम, जाणो तात महंत ॥ ४॥ ए जणे नमया सुंदरी, तात नणी तिणिवार ॥ आणा यो चारित्रतणी, मानीशए उपकार ॥ ५॥जो पुत्री करी त्रेवडो, तो पूरो मननो कोड ॥ श्रालंबन यो अडवड्यां, विनति करूं कर जोडि ॥६॥ ॥ ढाल सत्तावनमी ॥ यतणीनी देशी ॥ कहे नमयाने जनक ते वारे, ग्रहो चारित्र का अविचारें, बहु ऋतुमा यति व्रतमें रहे, तुफथी थाशे ए किम सदेवू ॥१॥ प्रसरे हिम ऋतु चिहुपासे, शालि मंजरी फुलें उबासें ॥ माले आरुढा जन सोहे ॥ पशुपंखी पडतां टोहे ॥ ॥२॥ पुरवरसी वन शोजा दीसे, परिजन वन माहे जगीशे ॥ नट वंश चढीने खेले, दाता पण दान उकेले ॥३॥ केश ताजा पोंख आरोगे, म सखी कर संपुटने योगें ॥ कहो ए मुनिवेषमें किहां (१७३) श्री, शिक्षा ग्रहेवी जिहा तिहाथी ॥४॥ दोहा।। दीक्षा शालि विकाश तम, मल्यो दपकसंयोग ।। परिग्रह योगक पंखीया, वारीश थई अशोक ॥५॥ हृदयदेश शोनावशुं; कर्म नटावा खेल । जोशुं देशं दान पण, मोदतणा रस मेल ॥६॥ पूरवपुण्य सा दातना, कारी निश्चय व्यवहार ॥ एम करी हिम ऋतु निर्गमे,जे सूधा अणगार ॥॥ पूर्वढाल । रुतु शिशिर शीतल वा वाशे,विणवसने शी गति था। कृष्णागर केरी अंगीति, मुनिपासे किहायेदीती ॥॥ श्रति उन्हुँ नोजन जमवू,वली आसव पानें रमवू॥ घणी दीरघ शिशिरनी रजनी, कहो जाशे केम विण सजनी ॥ ए॥ वरतेल तंवोल विलास, अति शोनि त उचित श्रावास ॥ मुनिमुखाए किहांथी ए तु जने, मुनिमारग पूढे तुं मुजने ॥ १० ॥ दोहा ॥ नमया कहे ऋतु शिशिरमें, जे ले विपया शीत ॥ निर्विकार उढीश वसन, जेहनी सवल प्रतीत ॥११॥ ध्यान तणी अंगीउडी, नोजन तेम संतोष ॥ श्रास वसमता पी जतां, करशुं काया पोप ॥ १५॥ माया रजनी अति विपुल, शुद्ध वनावें क्षीण ॥ उदासी ..न तेलांग तिम, प्रमा तंवोल-प्रवीण ॥ १३॥ मंदिर (१७४) उच्च विवेकनु, काया वली उबोल ॥ एम शिशिर निर्वाहशु, करशुं रुचि कबोल ॥१४॥ पूर्वढाल ॥ वली तेमज वसंतऋतु श्रावे, तव किसलय तेम तरु जावे॥ वागे चंग मृदंग सुरागें, वली टोली गावे फागें ॥१५॥ बांटे केसर जरी पीचकारी, तेम लाल गुलाल नरना री॥ करे नाटक बत्रीश बझ, ते तो मुनिवेषं नविकी ध ॥१६॥दोहा॥ तप नवकिसलय तरु थयो,श्रावश्यक वाजीत्र ॥ अध्ययनादिक फागगति, केसर क्रिया वि चित्र ॥ १७॥ मार्दव लाल गुलाल बहु, परिसह ना टक कीध ॥ शतुवसंतमांहे अहो, मुनिने ए अनि षिक ॥ १७ ॥ पूर्व ढाल ॥ ऋतु ग्रीष्म तपन तपे जोर, तेम लूक वहे चिहुं ओर ॥ रस करीये घोली रसीलो, सुणीये कंश पिकवचन रसास ॥ १७ ॥ तेम करे विलेपन चंदननां, ते शीतल पवन विजनना ॥ साकर जल नेली पीजे, एम ग्रीष्मनो लाहो लीजें॥ ॥ २०॥ दोहा ॥ क्रोधातप कृश खंतिथी, खूक लो ननी जेह ॥ आदरशुं निःस्पृहता, वसशुं संयमगेह॥ ॥ २१ ॥ अनुन्नवरस सहकार रस, कोकिल जिनवर वाणी ॥ चंदन सत्य विलेपनां, उपशम व्यंजन जा णी ॥ २२॥ गुरुयाणा साकर विनय, नीरतणु नित्य (१७५) पान ॥ एम करी ग्रीष्म ऋतु लणी, निर्व हिशुं धरि मान ॥२३ ।। पूर्व ढाल ॥ ऋतु वर्षाघन ऊड ममें, धारा अनिमेप न खंझे ॥ शिखी दाजुर चातक बोले, कामी काम पण खोले ॥२४॥ गुणिजन 'आलापे महार, वली सुंदर नेम आहार ॥ वहे सरिता ह रिता तेम धरणी, केम निर्वदशो चरण आचरणी॥ ॥ २५ ॥ दोहा ॥ मोहमहाघननी ठटा, धरशुं खूप संवेग ॥ अशा विहग उद्घोषणा, खोली मने धरि नेग ॥ २६ ॥ राग महार सद्याय ने, निःशंकी आहार ॥ संत्य नदी मुनिगुण हरित, ए पावस प्रतिचार ॥२॥ पूर्वढाल ॥ ऋतु शरदें कमल शशी ऊगे, वधे तेज नयन कर पूगे॥ ऊरे पीयूष शुक्ति समाय, तस, विंडुनां मौक्तिक थाय ॥श्णा योगीश्वर ग्रह नवरात्रि, करे याग यगन संयात्री ॥मली कन्या गरबो गाइ, करी मंगल दीपक नाइ ॥रए॥ अति म होत्सव आणा प्रयाणां, संयमिने क्यांधी सयाणां ॥ वसती वाहिर एकाकी,न फरे पुनि जेम ए रांकी॥३०॥ दोहा॥समकित शशी अजुवालडो,तास तत्व ज्ञानांश। झान नियम निर्मल थशे, लोकालोक प्रकाश ॥३१॥ दयाशुक्तिमांहि अचल, मौक्तिक धर्म सशुद्ध ॥
(१७६) नवयोगी नव वाडि ते, नव रात्रि प्रति वुद्ध ॥ ३२ ॥ जोली कन्या नावना, जिन गुण गरवा केली.॥ में गल दीपक परम पद, कर्म नटाव अहेलि ॥ ३३ ॥ वियावच्च श्राएं नलु, थविर तथा मुनिनाद ॥ शिशिर ऋतुयें मुनिवर करे, एम महोटा उ त्साह ॥३॥ पूर्व ढाल॥ कह्यो षटे ऋतुनो एह वि वाद, नवि पामी नमया विषवाद ॥ नमया चारि त्रनी अरथी, रागी पूरण मुनिवरथी ॥ ३५ ॥ध न्य धन्य ते नव जय बंडे, मुनि वेशे श्रादर मंडे ॥ कही सत्तावनमी ढाल, एह मोहन विजयें रसा साल ॥३६॥ सर्व गाथा ॥ ॥ दोहा॥ तातें घणुंये प्रीवी, पण नवि माने तेह ॥ तातें अनुमति दीधली, नमयाने धरी नेह ॥ १ नमया अति रंजी हिये, तनू हुवो रोमंच ॥ उमाही दी दा नणी, करे नहीं खल खंच ॥२॥ तातें पुर श णगारियु, तिहां हय गय रह जोडि ॥ अति उत्स व अष्टाहिका, मांझे होडा होड ॥ ३ ॥ दया पटह पुर फेरव्यो, दीधा अर्थीदान ॥ सयण सयल नेला हुवां, दीधां तिहां बहु मान ॥४॥ बेठी नमया (१७७) सुंदरी, शिविकाए सोत्साहः ॥ तूरि तणां निर्घोष व हु, गय गयणांगण तांह ॥५॥ पुरजन कौतुकं पे खवा, मलियां थोका थोक ॥श्राव्यां श्म गुरु संन्नि धि, जोडीने कर कोक ॥ ६ ॥ ॥ ढाल अछावनमी॥ ते तरीया ना ते तरीया ए देशी ॥ आर्य से हस्ती सूरीश्वर चरणे, प्रणमी नमया विनवेरे ।। आपो मुझने चारित्र खजानो, अवसर श्राव्ये एह वे रे ॥१॥जयवंता विचरो जंगमांहें ॥ ए.आंकणी ॥ जे अनुसरे मुनि मुसारे, तास चरणरज तिलक करीजे, सेवियें यश् अकुला रे ॥ ज ॥२॥ गुरु स हदेवतणी ग्रहे आणा, सघलें अनुमति दीधी रे॥ अहो नावुके अहो नमयासुंदरी, प्रीति संयमयी कीधी रेंज ॥३॥ मन थिर ले किंवा नथी ता हरु, संयम अति दोहिलु रे ॥ सायर जल तर वे जुजाथी, निःस्पृहने ठे सोहिर्बु रे ॥ ज ॥४॥ सिंद थाने ल्यो गे संयम, सिंह. थश्ने निर्वहेजो रे, जो न पाली शको प्रव्रज्या, तो गृहवासे रहेजो रे:॥ ज० ॥ ५ ॥ नमयासुंदरी विनवे गुरुने, खामी कांहे विहाडो रे ॥ साहमुं वल वंधावी मु १२ (१७) ऊने, निझाबुने जगाडो रे ॥ ज० ॥६॥ माहरु मन ले दृढ संयमथी, हुं श्रावी तुम चरणे रे ॥ चारित्रथी केम होश्श चंचल, उलखो एहवे आ चरणे रे ॥ ज ॥ ॥ नमयायें जूपण सयल ज तास्वां, परिहरी लोन अथुनो रे ॥ वासदेपथी थाल नरीने, तात समी ऊनो रे ॥ ज० ॥ ७ ॥ केशजाल मस्तकथी बुंच्या, जाल महामोह दावे रे॥ आचारय करवा संग्रहीने, नर्मदा मस्तक नावे रे॥ जण ॥ ए ॥ धर्म सिंधुर कुंनस्थल वेग, गुरु एम देशना सांखे रे, पंचशालि कण जेम महाव्रत, जे ग्रहे ते सुख चाखे रे ॥ ज० ॥ १० ॥ एह संसार असार विचारी, पालजो सूची दीक्षा रे ॥पंच म हानत नार निर्वहेजो, ए सहगुरुनी शिक्षा रे ॥ज ॥ ११॥ प्रणम्या पुरजन नमयाने चरणे, आंसुऊरं ते नयणे रे ॥ अहो नमया धन्य धन्य तुम जीवित, एम उज्ञापे वयणे रे॥१॥ राखजो धर्म सनेह अम उपर, वंदावजो वली अमने रे ॥ केम विसरशे, घणुं विनवीयें झुं तमने रे ॥ ज ॥ ॥ १३ ॥ सहदेवादिक नयणथी वरसे, आंसूमि जलधारा रे ॥ नांखे नमया साधवी तेहने, मीगं तुम गुण मीगा
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(१७ए.)
वचन उदारा रे ॥ ज ॥ १४ ॥ धर्मोद्यम करजो
सहु प्राणी, एम, कही दीधी शीखो रे ॥ नमयाने
श्राशीप कहे एम, जीवजो कोडी वरीसों रे ॥ जज
॥.२५ ॥ जनकादिक सहु मंदिर श्राव्या, हवे सह
गुरुजल्बासें रे, नमया साध्वीने हित आणी, सोपी
सांधवी :पासे रे.॥ज ॥ १६ ॥ साधु मारग शी
खाव्यो वारु, करे जिन आगल साखी रे॥ अहा
वनमी ढाल सखूणी, मोहन विजयें जांखीरे ॥ ज ॥
॥ १७॥ सर्व गाथा ॥.
॥ दोहा॥
अहनिश साध्वी नर्मदा, करे ज्ञान अभ्यासाचा
रिन चंद्र प्रद्योतथी, करे मन कुमुद विकास ॥१॥
जयणा. गंगा सुरसरी, जिहां हित प्रगटतरंग ॥
तीहां कीले थर हंसली, करे पवित्र निज अंग ॥२॥
अंबर मुनि आचारनां, नक्ति तणो मुख कोश ॥
संवर केसर घोले वहु, विनय पखाले अदोप ॥३॥
स्तवना कुसुम मनोहरु, समकित दीप उद्योत ॥
अक्षत अनुनव रूपना, ध्यान धूप सिकोत ॥४॥
एम पूजा जिनराजनी, साहसथी नितमेव ॥ रचे
कर्म चकचूरवा, सा साध्वी :नितमेवः ॥ ५ ॥
, .. (१०) ॥ ढाल जंगणसामी॥ आश् श्राश् हो ढोला श्राश् हो श्रावण त्रीज, माहरी प्रोले पडहा वाजीया होराज ॥ वारी जालं राज, जीवनप्यारा राज ॥ लाडीरा लाडा राज ॥ राज मृगानयपीथी मांमयुं रूसणुंजी ॥ वा ॥ जीव न ॥ लाडी ॥रा॥ ए देशी ॥ मांम्यो मांम्यो हो तेणे नमयाए पूरण प्रेम, रतनानी सुमति गुप्ति सा हेलीशुंजी ॥ बांड्यो बगड्यो हो तेणें कुमति सा हेली संग, लय लागी ते अलबेलीगुंजी ॥ १ ॥ कस्युं मननावें, नमयाए कुमतिथी रूसणुं जी ॥ ए श्रांकणी, तास मंदिर हो नहीं सुंदर नामें आरंज, तेहनी तो बोडी शेरडी जी ॥ आवी बेठी हो तव उपशम गेह, जस संयमशेरी न वेरडी जी ॥ क०॥ ॥२॥ तव जयणाने हो कर्तुं नमयायें बेनडी मूज, श्हां कुमतिने हो मत देजो पेसवा जी ॥ मुफ नो लावी हो एवं एता दीद, अनंत स्थिरताए न दीधी बेसवा जी ॥ कण् ॥३॥ एहवे कुमतिए हो मेली हिं सा दासी कुरूप, नमयाने घणु विप्रतारवा जी॥कांश नोली हो बांडे बालपणनो नेह, ससनेही केम केम वीसारवां जी ॥ कण ॥४ तेहने अहिंसायें हो (१२) कही कडुवा कडुवा वोल, घर वाहेर काढी गर्ल हब देश्ने जी ॥ कहे कुमतिने हो तेह, दासी अहिं साए मुज, कहे नांडी वडे आवडे जी ॥कण॥५॥ थर कांखी हो कटुकवचनें कुमति तेवार, नमयाने मूकी संचारवा जी ॥ करे सुमतिथी हो नित रंग कहोल, श्रुतज्ञाननी गोष्टि विचारवा जी ॥॥६॥ मति झानने हो तिहां वेंच्यां फोफल पान, बहु हूवां रंग वधामणां जी ॥ तव उपन्यु हो नमयाने अवधिज्ञान, मोहादिक हुवां दयामणां जी ॥ कण्॥ ॥ ७॥ हवे अनुक्रमें हो, करे नूतल तेह विहार, हू महासती ताम पवत्तणी जी ॥ पडीवोहें हो, जवि चातुर नवियण वृंद, देवे देशना अतिही सोहामणी जी ॥ क॥ ॥ जेणे सांजली हो तस देशना श्रवणे नव्य, तेणे जाण्यु पीयुष पीधधुंजी॥ जस दीधी हो मुख धर्माशीष मनोज्ञ, ते. तो अं व्यय जीवित दीधटुंजी ॥ कण ॥ ए॥ वहु साहू पीहो, मली महासतीने परिवार, एक एकथी अधिक गुणें करीजी ॥ तपें कीधो हो जेणे पावन आपण देह, उपदेश महारयणे जरी जी ॥ का।। ॥ १० ॥ नमयो महासती हो, पामी सहगुरुनो श्रा
(१२)
देश, रूपचंड नयर शोलावियु जी ॥ वसती या
चीने हो निज नाह पिताने समीप, पवत्तणीए नाम
न जणावियु जी ॥ कण ॥११॥ दीधी वसति हो तेणे
पवत्तणी अवधार, तिहां निवसी नमया सती जी ॥
पय वंदण हो आवे नयरना लोक, नवी उलखी
केणे एक रती जी ॥ क.॥ १५ ॥ पुरमांहे हो नली
पसरी एहवी वात, साहुणीनो संघाडो आथियो
जी ॥अतिज्ञाता हो तप संजम शुद्ध विवेक, उप
शमथी आतम नावियो जी ॥ कण ॥१३॥ देखी
दर्शन हो कीजें आपणां नेत्र पवित्र, एम नविजन
लोक वातो करे जी ॥आवी पर्षदा हो तिहां दे
शना सुणवा काज, कथा उपदेशे नमया तदा जी॥
का ॥ १४ ॥ एक रंगें हो सहुः सांजलो वाल गोपाल,
थ रसिया हियडे गहगही जी ॥ कहे मोहन हो
जंगणसामीढाल,श्रोता रे सुपरें सर्दहीजी॥क॥१५
॥ दोहा॥
धर्मोद्यम कीजे नविक, धर्म प्रथा प्रसिक ॥ जि
नवर धर्म की लहे, शछि वृद्धि नव निझ ॥१॥कर्म
जाल बंधे मुधा, जीव थई अज्ञान ॥ पण मूंशा रहे
तेहमों, इंज जाल समान ॥॥ धर्म तणी नाते करी,
(२३) धरे अधर्मने जीव ॥ काच कामली रोगें. ग्रहे, शंख विचित्र तदीव ॥३॥ हसतां अथवा क्रोधथी, वंध निकाचित कर्म ॥ केम बूटे विण जोगव्यां, साख जरे जिनधर्म ॥४॥पामे पूरवकर्मथी, सती पण अप वाद ॥ कर्म विपाक ग्रही जता, केम करियें विपवाद ॥५॥ अठतां पण सती जणी, चोहटे जेह कलंक। ते नर विलसे वापडा, नववारिधि निःशंक ॥६॥ । ढालं सामी॥ कर्म परीक्षा कारणं कुमर चट्योजी ॥ए देशी ॥ कहे दृष्टांत तिहां धनवती तणो, पति प्रतिवोधंवा काज ॥ पोष्यों अनुत रस देशना विपेजी, निसुणी नर नरराय ॥ १॥ कर्म कुटिलयी वलं नहीं कोर्नु जी, शिवपुर पंथ विशाल ॥ आठ लूटांक ते हेरे हे. 'रणांजी, करी परिकर जंघाल ॥ कं०॥२॥ शावस्ती नगरीय वसतो हुतोरें, व्यवहारी पुण्यपाल ॥ धन वती तेहनी अनोपम अंगना जी, मुख्य सती सुवि शाल ॥ का ॥३॥ अनुक्रमें कंथ विदेशे चालतां धनवतीनी तेणीवार ॥ दीधी जलामण आपणा मि त्रनेरे, उपस्थित करण रोजगार ॥ कण् ॥ ४ ॥ केता दिवस पठी धनवती जणी जी, प्रार्थे कंथनो मित्र । , , (१४) सुख जोगव्य तुं मुंऊथी सुंदरी रे, यौवन कस्य तुं पवित्र ॥ कण् ॥ ५॥ निज्रव्यो धनवतीए तेहने जी, ते पण पाम्यो रोष॥ तेणे पुरमे कही कही शाकिनी जी, दीधो सतीने दोप॥ कण्॥६॥ न शके नयरी माहे फरी सतीजी, तिहां पण पीहर गइ परगाम ॥ते धनवती निजबंधू घरे वसे जी, जो जो कर्मनां काम ॥ कण ॥ ७॥ धनवती बंधू सुतने हुलरावती जी, ना खती निःश्वास ॥ तिहां पण प्रार्थे विषय सुख कार णे जी, निज सहोदरनो दास ॥ का ॥ ॥ तेहने पण सतीये निलियो जी, दास थयो विणप्रेम ॥ दासे बाल विणाश्यो क्रोधथी जी, सा हुलरावती जे म ॥ कण ॥ ए. ॥ प्रात थयो धनवतीये बालने जी, दीगे विनाश्यो जाम ॥ करी आक्रंद कुटुंब सवि मेलव्यु जी, श्राव्यो दास पण ताम ॥ कण ॥ १० ॥ दास कहे सहू लोको सांजलो जी, ए सतीनुं विरु क॥ कहो कूण सोंपे सुत शाकिनी कन्हे जी, जेम मांजारने दूध ॥ क० ॥ ११ ॥ शावस्ती लोकें मली एहने जी, काढी वनह मकार ॥ कीहाथी आवी रंगा शाकिणी जी, बांधवने श्रागार ॥ कण् ॥ १२ ॥ अति शरमाणी ते धनवती सती जी, परिहरी पी (५). हर ताम ॥ श्रावी एकांते गहनवनांतर जी, वडतले ग्रह्यो विश्राम ॥ कण् ॥ १३॥ गुहड विहंग रयणी जर तरुशिरें जी, सहित वालक परिवारः॥ वीट नि चय देखीने वाचडां जी, गुण पूढे तेणीवार ॥ क.॥ ॥१४॥ कुष्ट शमे ते विट प्रजावधीजी, पंखीपति कहे एम ॥ धनवतीये गुण जाणी संग्रही जी, विट जणी धरी प्रेम ॥॥१५॥ तिहांथी आवी को पुरवरे जी, कीधो पुरुपनो वेश ॥ टाले कुष्ट.ते वीट प्रयोगथी जी, यश थयो देश विदेश ॥ कण॥ १६ ॥ मोटा म होल वनाव्या मोजमां जी, चाहे बाल गोपाल । मोहन विजयें ए जणी साठमी जी, श्रोता. सांजलो थे उजमाल ॥ ० ॥ १७॥ सर्व गाथा. ॥ दोहा॥ एहवे धनवती वलहो, श्राव्यो निजपुर जाम ॥ पण मंदिरमा अंगना, तेणे नवि नीरखी गम ॥२॥ प्रीव्यो मानव मूखथकी, दयितानो अधिकार ॥ श्र ति फांखो हूउं थको, पहोतो. मित्र धार ॥ ५॥ दी : " .. गे कुष्टी मित्रने, सती कलंक प्रत्नावः ॥ पुण्यपाल समन्यो हिये, कुटिल सुढदनो दावं ॥ ३ ॥ एहवे पुरमांहे कद्यु, वेद्य विदेशे एक ॥ टाले कुष्ट उपाय (१६) थी, जन्मांतरिय विवेक ॥॥ पुण्यपाल निज मित्रने, तेडी चाले जाम ॥ सती बंधुनो दास पण, कुष्टी श्रा व्यो ताम ॥ ५ ॥ विहुने तेडी अनुक्रमें, आव्या ते परदेश ॥ जेणे पुर धनवती रहे, रचि पुरुषनो वेश ॥६॥ वालम दीठो श्रावतो, पामी परमानंद । पण पियुने समकाववा, रचशे रामा फंद ॥६॥ ॥ ढाल एकसठमी। अणसणरा हो योगी॥ ए देशी ॥ कहे पुण्यपाल तदा कर जोडी, तुज कीरतें श्राव्यो लु दोडी रे ।। वैद्य जी करो करुणा ॥ ए आंकणी ॥ ए बेहु कुष्टीने 'साजा कीजें, वली मूख मागो ते दीजें रे ॥वै॥१॥ सा कहे वैद्यरूप ते नेही, करुं औषधी पण निःस्पृही रे ॥ वै ॥ पण ए रोगी साचुं कदेशे, तो एहने औषध गुण देशे रे ॥ वै ॥२॥ सहु सांजलतां कहेतां जो लाजे, तो बेसो एण बाजे रे ॥ वै॥ ॥ पड दो रहे जेणे वाते करीयें, नवि दंन को अनुस रियेंरे ॥ वै० ॥३॥ को धनवतीनो नेद न जाणे॥ सवि सत्य करी प्रमाणे रे ॥ वै ॥ उठी पुण्यपाल ते अलगो बेगे, तेह चिकित्सक पडदे बेठगे रे ॥ वै॥ ॥ ४॥ कहे पुण्यपालने हलू विख्यातो, तुं सु TF (१७) एजे कुटिलनी वातोरें॥वै ॥ एम कही थावे वैद्य फरीने, वर औषध फांट नरीने रे ॥ वै० ॥ ५ ॥ -रे रोगीयो नहि जूठे राचूं, केम रोग थयो कहो 'साधु रे ॥वै ॥ वोल्यो प्रथम पीयुमित्र कुसंगी, कहुं प्रगट सुणो एक रंगे रे ॥ वै० ॥६॥ ए पुण्य पालतणी हुंती नारी, नामे धनवती मनोहारी रे ॥ वै० ॥ कामवशे में प्रार्थी तेहने, करी वेहेन गणी. हुती जेहने रे ॥ वै॥ ७॥ माहरूं वचन नहि मान्यु तेणे, में आण्यो रोप हियडेरे ॥ वै ॥ कही कही शाकिनी घणुं अवहेली, एतो लाजी गश् पुर महेली रे॥वैजाजूठ कलंक चढाव्यु माटे,कुष्ट रोग शरीरें उच्चाटे रे॥वैणा एम तेहने तव अणवोल्यो राख्यो। तेह दास जणीसंजाख्यो रे॥वै॥ए ॥ में पण याची तेहज नारी, तेणे निग्यो मुजने नारी रे ॥वै॥में तव शेवनो तनुज विणाश्यो, वली शाकिनी दोप प्र काश्यो रे ॥वै ॥ १५ ॥ निकली तिहाथी अतिहीं सजाती, तेनी खवर किसी न जणाती रे वैणा कर्म कहाणीए केहने कहीयें, हवे तुमे कहो ते वहीये रे ॥वै॥॥ ११ ॥ पडदांतरे ते वातो जाणी, पुण्यपालें कंधरा धूणी रे ॥ ३० ॥ मुफ कामिनीने कलंक दीg, , (१७) यश मित्र ए शुं काम कीधुं रे ॥ वै॥ १५ ॥ एहवे धनवती पडदे आवी, ते बेहुनी वातो जणावी रे ।। वै ॥ पेठी घरमां वेश उतास्यो, स्त्रीवेषं वपु शण गायो रे ॥ ३० ॥ १३ ॥ रम ऊम करती पियुने चर रणे,सा प्रणमें जरी आजरणे रे ॥वैगाउँलखी प्रमदा पोता केरी, वधी प्रीति लता अधिकरी रे ॥३॥९॥ औषधे बेहुनो रोग गमाव्यो, एम गुणसजननो गणाव्यो रे ॥ पुण्यपाल निज धनवती संगें, व्यो शावस्ती मन रंगें रे॥ साची सती करी पुरमें जाणी, जेणे विसारी अपवाणी रे ॥ वै ॥ अनुक्रमें धन वती शिवसुख पामी,एम नमया कहे गुणधामी रे॥ वै ॥ १५ ॥ कहे मदेश्वरदत्तनी श्रागे, सतीने पण लंउन लागे रे वै ॥ ए एकसठमी ढाल सुरंगी, कहे मोहन सुगुण प्रसंगी रे ॥१६॥ सर्व गाथा ॥ ॥ दोहा॥ कहे नमया पवत्तणी, कर्म तणी गति एम ॥ जेणे धर्म न अन्यस्यो, ते गति लेहशे केम ॥१॥ ते श्री जिनवर धर्मना, शास्त्रमाहे अधिकार ॥ चौदरा ज्य ए शास्त्रथी, प्रगट लहीजें सार ॥२॥ नरय मणुअतिरिय देव गइ, इसीधारा पर्यंत ॥ नाण हुवे (ए) ए शास्त्रथी, गीतार्थ होय गर्जत ॥३॥ कोश्क एहवां शास्त्र, जेह नणे अद्याप ॥ खरथी लक्षण जाणिये, रूप रंग गुण व्याप ॥४॥ पण खरंलक्षण वातडी, मूरखने न कहाय ॥ साहामो गुण अवगुण करे, अहिपय पाननो न्याय ॥ ५॥ तेह कारण श्रुति शास्त्रनो,करजो खप सहु लोय ॥जेहथी उत्तम संपदा, एह कथायी होयं ॥६॥ ॥ ढाल वासठमी॥ कपुर होय अति ऊजलो रे॥ए देशी ॥ महेश्वरदत्त -चित्त चमकीयो रे, निसुणी कथा कबोल ॥धन्यधन्य एम पवत्तणी रे, धर्मथी रंग चोल रे ॥१॥ चेतन चेते नहीं कां मूढ, लही उपशम अगूढ रे ॥चे॥ पण एणे स्वरलदण लडं रे, ते साचो उबास ॥ महेश्वरदत्तें मांमियो रे, नमयानो पश्चात्ताप रे ॥ चे० ॥२॥ सही मुज नमया अंगना रे, नणी दशे लक्षण शास्त्र ॥ गायन लक्षण कयु हतुं रे, वेठे ते यानपान ॥ चे ॥३॥ पण में मूढ अजाणते रे, कीबूं अधमर्नु काम ॥ वनमां सतीने परहरी रे, घई निष्कृप अनिराम रे ॥ ॥ ४ ॥ मुफ वनिता हती महासती रे, पण हुं थयो अज्ञान ॥ मुफ सरीखो %3D महेश्वर मुफ कीजीए रे, ज्ञान दर्शन चारित्र ॥ नम (१०) संसारमें रे, निघुण नहि को निदान रे ॥ चे० ॥५॥ शी गति थ हशे तेहनी रे, रजनीचरने दीप ॥ अहो अहो हुँ महापातकी रे, तुब मति उद्दीप रे ॥ चे॥६॥ अति चिंतातुर कंथने रे, देखी पवत्तणी ताम ॥ कहो तुमें चिंतातुरा रे, अहो महानुनाव आम रे ॥ चे ॥ ७॥ कहे महेश्वर कर जोडीने रे पूरवलो उदंत, आंसु करते लोयणे रे, नारी गुण विलपंत रे ॥ चे॥७॥ बोली ताम पवत्तणी रे, तेह हुँ अवर न कोय ॥जे तसे विसर्जी वनमां रे, नयण उघाडी जोय रे ॥ चे॥ ए॥ ताहरो दोष नहीं कि शो रे, ए मुफ कर्मनो दोष ॥ शुं फुरेने बापडा रे, हुं नथी धरती रोष रे॥चे॥ १७ ॥ आपवीती वातो कही रे, महेश्वरदत्त ते सर्व, आदखं में साहुणी पणुं रे, बांडी क्रोध ने गर्व रे॥चे०॥ ११॥ श्रावी हुं शहां तुऊने रे, अतिबोधनने काज समज तुं गति संसार नीरे, उलख तुं जिनराज रे॥चे॥ १२॥नर्मदासुंदरी उलखी रे, लाज्यो महेश्वरदत्त ॥ निज अपराध खमा वियो रे, लह्यो वैराग्य जन्मत्त रे ॥ चे॥ १३॥ कहे या कहे सूरि अड़े रे, श्रार्यसुहस्ती पवित्र रे ॥ चे॥
(११) ॥ २४॥ शपिदत्ता.पण शुन परेरे, अति पामीप्रति वोधः॥ चारित्र लेवा सूंडियां रे, टालि सयल विरोध रे॥ चे ॥१५॥ अनुक्रमे विचरंता आविया रे, आ यसुहस्ती गुरुराय ।। महेश्वरदत्त हरख्यो हिये रे, इषिदत्ता हित लाय रे ॥चे ॥१६॥ दीदा बेहु ए आदरी रे, ठोडी सयल जंजाल ।। मोहन विजयें नली कही रे, ए वासवमी ढाल रे ॥ चे ॥ १७॥ ॥ दोहा॥ ज्ञपिदत्ता दीक्षा ग्रही, पाले निरतीचार ॥ आयु वशे जश् उपनी, निर्जरने आगार ॥१॥ मुनि महेश्वरदत्त पण, दिदातणे प्रताव ॥ नवसायर हे लांतरे, वेसी धर्मने नाव ॥५॥ अनुक्रमें पाम्या पु एयथी, सुरपर्यंत संयोग ॥ विलसे निजदेवी थकी, विषयादिकनो नोग ॥३॥ जो जो नमया महा सती, करियो ए उपकार॥ महापतित पतिने कियो, महोटो सुर शिरदार ॥ ४ ॥ सुंदर नमया महासती, वसुधा करे विहार ॥ करे मार्तड प्रनापरें, चवि. कैरव विस्तार ॥५॥ कहेणी रहेणी विहु सरिस, तेह. वो नाण प्रकाश ॥ कर्मतणी करे निर्जरा, उपश मने आवास ॥६॥.. ' , ॥ ढाल त्रेसठमी॥ ॥ राग धन्याश्री ॥ नमया सुंदरी महासती, सू धो संयम पाले जी ॥ध्यानानल संयोगें सुपरें, कर्म समिध प्रजाले जी॥ नार॥ अवधि ज्ञान तणे अनु सारें, आयुष कर्म विचारी जी ॥ मास तणी हित श्रा णी दाखे, संलेषणा सुखकारी जी ॥ न० ॥२॥ लाख चोराशी जीव खमावी, सम जावें मन श्राणी जी ॥ शुद्ध देव गुरु धर्म त्रि करणे, निश्चल चित्ते ध्या जी ॥ तृप्ति नाव जाव्यो मन शुकै, परम म होदय पा जी ॥३॥ नमया सुंदरी ताम वियो, पोहती निकट सुर लोक जी ॥ देवपणे सुर सुख लीलायें, जोगवे अतिहें अशोक जी ॥ न० ॥ ४ ॥ पंमित तांडव नित्य अखंमित, देव पडह पट वाजे जी ॥ विविध तूरिनिर्घोष प्रसारें, विबुध गृहांगण गा जे जी ॥ न ॥५॥ एम सुपर्व तणी प्रजुतार, नो गवे महासती जीव जी ॥ पुनरपि मानव जव पडि वजशे, महा विदेहे तदीव जी ॥ न॥६॥ लद्देशे नृप पदवी ससलूणी, जीतशे अरियण वृंद जी ॥ विषय तणां सुख निज वनिताथी, अनुन्नवशे एह अमंद जी ॥ न ॥ ७॥ सह गुरु वाणी श्रवणे सु - (१९३) एशे, जाणशे अथिर संसार जी ॥ परहरी राज्य रा मा तेम प्रमदा, थांशे शुचि अणगार जी ॥ न ॥ ॥ पालशे निरतिचारे संयम, अष्ट कर्म कृश करशे जी ॥ केवल ज्ञान महासुख दाता, तेह ति हां अनुसरशे जी ॥ न ॥ ए॥ करशे सुरवर क मलनी रचना, देशना मधुरी देशे जी ॥ अक्षय प दवी अदय लीला, परमोदयथी लहेशे जी ॥ नण ॥ १० ॥ एह चरित्र नमया सतीनु, शील संबंधै गा. युं जी ॥ जाणी गेहली नमया थश्ने, राख्युं शील सवायुं जी ॥ न० ॥ ११ ॥ एह संबंध ठे शील कुला में, जो जो सुगुण जगीसे जी ॥ जरदेसर वाहुव लि वृत्ति, प्रगट संबंध ए दीसे जी॥न॥ १५ ॥ ए. संबंध ठे साचो पण कोई, कल्पित करी मत जाणो. जी ॥ आविर्भूत संबंध अपर जे, कवि रचना ते प्र माणो जी ॥ न ॥ १३॥ धन्य धन्य नमया महा। सती केरी, सरस कथा में गाइजी ॥ कीधी पावन सुंदर रसना, सरस सुखदं उपाइ जी ॥ न० ॥१४॥ एह महासतीनी परें को, पालशे शील अनंग जी ॥ ते पण वांठित सुख अनुन्नवशे, लेहशे ज्ञान तरंग जी ॥ न० ॥ १५ ॥ चोथु ब्रत निवृत्तिनुं कार (१७४) ण, तेम सौलाग्य प्रदाता जी ॥ यति उपदेशे एम सुखहुंती, शील महोदय शाता जी ॥ न ॥ १६ ॥ नमयासुंदरी केरुं रच्यु , चरित्र अनोपम एह जी ॥ कवि कुल को हांसी न करजो, करजो शुचि ससनेह जी ॥ न ॥ १७॥ मेंतो सुकवि जरुसो श्रा णी, रास रच्यो बे साचे जी॥ नहीं तो शी मति मा हरी जे हुं, होड्य करुं करी वांचे जी ॥ नण॥ १७ ॥ तेह कारण ए रास रसीलो, नमया सुंदरीकेरो जी ॥ कंवानरण पणे सहु करजों, पण दूषण मत हेरो जी ॥ न ॥ १५ ॥ विधिमुख शिवमुख ऋषि इंछ ( १७५४) संवत संझा एहजी ॥ मास पोष वदी तेरश दिवसें, उशना वार गुण गेह जी ॥ नण ॥ २० ॥ तुंगया नगरी उपमा पामे, समी नयरी सु विशेषे जी ॥ चतुरपणे चोमासु कीg, सद्गुरुने आदेशे जी॥ न० ॥१॥ तप गन गगन विकाशन दिनमणी, विजयरत्नसूरि राजें जी ॥ रचना रास तणी ए कीधी, आग्रह संघने काजें जी॥न ॥२॥ श्री विजयसेन सूरीश्वर सेवक, कीर्ति विजय उव द्याया जी ॥ तस पद पंकज षट्रपद उपमा, मान वि जय कविराया जी॥ न ॥२३॥ जास शिष्य क