Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Vaiyasik Nyay Mala
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॥ आमुख ॥ मानवधर्म तथा तत्त्वज्ञानका वेद ही उद्गमस्थान है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इस चतुर्विध पुरुषार्थको प्राप्तिका सही साधन वेदमे ही उपलब्ध होता है । इष्ट प्राप्ति तथा अनिष्ट परिहारके अलौकिक उपायोका केन्द्र वेद ही है। प्रत्येक दार्शनिकने स्वमत- को प्रमाणित करनेके लिए येन केन प्रकारेण वेदका ही सहारा लिया है । 'मन्त्रब्राह्म- णात्मको वेदः (माप० परि ३१ ) (वेदके दो विभाग हैं-मन्त्र भोर ब्राह्मण) देवताविशेषकी स्तुतिमे प्रयुक्त होनेवाले प्रर्थस्मारक वाक्यको मन्त्र तथा यज्ञानुष्ठानादिका विस्तारपूर्वक वर्गक ग्रन्थको ब्राह्मण पहते हैं। मन्त्रसमुदायको संहिता भी कहते हैं। ऋक् , साम, यजु पोर अथर्व भेदसे सहिताएं चार हैं । यह संहिता विभाग महर्षि वेद- व्यासने यज्ञ प्रादि मावश्यकतामोंको दृष्टिमें रखकर किया है। संहिता एवं ब्राह्मणात्मक वेदके अन्तिम भाग उपनिषद् हैं । जिनमें अध्यात्मविषयक गम्भीर विवेचन है । विषयकी दृष्टिसे वेदके तीन भाग हैं-कर्म, उपासना और ज्ञान । संहिता, ब्राह्मण तथा भारण्यकोमे प्रधानतया कर्मादिका प्रतिपादन होनेसे उनका कर्म भोर उपासनामें मन्तर्भाव है । प्रधानतया ज्ञानका विवेचन करनेके कारण उपनिषद् शानकाण्ड कहलाते हैं । भारतीयदशनके मूल सिद्धान्त उपनिषदोमें ही प्रतिपादित हैं । कर्मादि प्रधान होने- पर भी संहिता मादिमे विपुल अध्यात्म रहस्य उपलब्ध होता है। उपनिषद् प्रस्थान- त्रयोके अन्तर्गत प्रथम प्रस्थानके रूपमे गृहीत किये गये हैं । 'ऋचा मूर्धानं यजुषामुत्तमाङ्गं साम्नां शिरोऽयपणा मुण्डं मुण्डं नापोतेऽधीते वेदमाहुस्तमझं शिरश्छित्वा कुरुते कबन्धम् ।' (जो ऋग्वेदकी मूर्धा, यजुर्वेदके उत्तमाङ्ग, सामवेदके सिर और मथर्ववेदके मस्तकरूप उप- निषदोका मध्ययन न कर शेष वेद भागका अध्ययन करता है उसे श्रेष्ठ पुरुष प्रज्ञानी कहते हैं वह वेदका शिरश्छेदन कर उन्हें बिना सिरका घड [कबन्ध] बनाता है) इनमे ११ उपनिषद् बड़े महत्त्वके हैं। इनपर प्राचार्य शङ्करका भाष्य तथा उनके अनुयायी विद्वानो की व्याख्याएं हैं। छान्दोग्य और बृहदारण्यक तो एक ऐसी रणस्थली हैं जहां भाष्यकार- की लोह लेखनीने खुलकर अपनी मजेय शक्तिका परिचय दिया है । भर्तृप्रपञ्च जैसे जरठ वेदान्तियोको खूब खबर ली है। प्राचार्य शङ्करके इन दोनो उपनिषदोके भाष्यका अध्य- पन अत्यन्त मावश्यक है। द्वितीय प्रस्थान श्रीमद्भगवद्गीता है । तृतीय प्रस्थान महर्षि बादरायण-व्याम प्रणीत 'ब्रह्ममूत्र' है । जिसमे मापाततः विरोधी उपनिषद वायोका समन्वय एकमात्र प्रद्वितीय ब्रह्म में दिखलाया गया है तथा अन्य वार्षिक युक्तियोका खण्डन किया गया है।
२ - ब्रह्मसूत्रको रचनाका हेतु कालान्तरमें मोपनिषा सिदान्नोंमें मापाततः विरोष प्रतीव होने लगा उसका परिहार करने तथा एकवाक्यता स्थापित करने के उद्देश्य से भगवान बादरायणमुनिने ब्रह्मसूत्रोंकी रचना की। यह स्वल्प कलेवर अन्य ममस्त वेदान्त- सिद्धान्तोका पाकर है। समस्त उपनिषदोका मूत्रोद्वारा ब्रह्ममें समन्वय होने इस ग्रन्थका माम ब्रह्मसूत्र है । इमीको वेदान्तदर्शन पौर शारीरक-मीमांसा भी कहते हैं। वेदान्तदर्शन भारतीय अध्यात्मदर्शनका मुकुटमणि है। महपि पाणिनिने पाराशयभितु मूवोके नामसे उमका उल्लेख किया है और 'ब्रह्मसूत्रपदश्च (म० गी० १३।४) यह गीता वचन भी इन ब्रह्मसूत्रीका ही निर्देश करता है। इससे ब्रह्मसूत्रको रचना प्रचीन सिद्ध होती है। ब्रह्मसूत्रके प्रसिद्ध भाष्यकार नाम भाज्य-नाम मत भाप्यनाम मत शारीरकभाष्य केवलाद्वैत ६.थोषण्ठ शैवभाष्य शैवविशिष्टादत २. भास्कर भास्करभाष्य भेदाभेद ७. श्रीपति श्रीकरभाष्य धीरशंव विशिष्टादेव ३. रामानुज श्रीभाप्य विशिष्टादन ८, वनम अणुभाष्य शुद्धाद्वैत ४.मध्व সুমাত্র ६. विज्ञानभिक्षु विज्ञानामृत भविभागात ५. निम्बार्क वेदान्तपारिजात वैसाईत १०.बलदेव गोविन्दभाप्य पचिम्म भेदाभेद इन सभी भाष्पोंमें भगवान् पाद्य शङ्कराचार्य विरचित भाष्यको कोई तुलना नहीं कर मकता, विद्वत्ता पूर्ण इम भाष्यरचनामे प्राध्य-प्रतीच्य सभी विद्वान् समानरूपसे प्रभावित हैं और मुक्तकण्ठले प्रशंमा करते हैं । शावर मतानुसार सूत्रो और अधिकरणोकी संख्या क्रमश: ५५५ मौर १६१ है। ब्रह्ममूत्रमे चार अध्याय हैं और प्रत्येक अध्यायमे चार पाद हैं । प्रथमाध्यायका नाम समन्ययाध्याय है । जिसमें ममग्न वेदान्त-वाक्योका साक्षात् परम्पराले प्रत्यगभिन्न अद्वितीय ब्रह्ममै हारार्य से समन्वय दिखलाया गया है। द्वितीयाध्यायका नाम अविरोधाध्याय है । जिसमें स्मृति और तर्वादिसे मंभावित विरोधोका परिहार कर ब्रह्ममे अविरोध दिखलाया गया है । प्रथम दोनो पादोमे भगवान बादरायण मुनि और भगवान् प्राचार्य शङ्करने जिन व्यापक तथा अकाट्य युक्तियोसे प्रतिपक्षिय मिद्धान्तको जैमी भाभिक समीक्षा की है, वह विद्वानोंके प्रादरका विषय है। तृतीया- ध्याय का नाम साधनाध्याय है। जिसमे वेदान्त मम्मत सर्व साधनौका विचार है। इसमे जीवके परलोक गमन द्वारा वैराग्यका निरूपण, 'तत्, त्वम्' पदार्थ परिशोधन, निगुण- ब्रह्ममे भिन्न भिन्न शाखामोमें पठिन पुतरुन पदोका उपसंहार है, प्रमङ्गतः सगुणविद्यामे शालान्तरीय गुणोंका उपसंहार और अनुरसंहार निरूपित है और निर्गुण ब्रह्म विद्याम बहिरङ्ग साधन-प्रज्ञ, दानादि पात्रप कर्म और अन्नाङ्ग गाधन-शमन्दम. निदिध्यासन - - ३ मादिका निरूपण है । चतुर्याध्याप-फलाध्यापमें सगुण और निर्गुणविद्यारे फलविशेषका सालोपाङ्ग निरूपण तथा जीवन्मुक्ति, विदेहमुक्ति, जीवको उत्तान्ति,पितृयाण, देवयान- मार्ग और सगुण ब्रह्मको उपासनाके फलोंमे तारसम्पविषयक विचार है । ब्रह्ममूरके मध्ययनमे यह स्पष्ट है कि बादरायण मुनिसे भी पूर्वकालमे पनेक प्राचार्यनि वेदान्ततत्ववी मीमामा की है। परन्तु उन माचार्योको वे वृत्तियाँ मब उपलब्ध नहीं हैं । मे- (१) मारेप, इनका नाम एक वार (ब्रह्ममूत्र ३४४४) में निर्दिष्ट है । (२) पाश्मरम्प-इनका निर्देश दो वार (ब्रह्ममूत्र १।२।१६, १४:२०) मे मिलता है । इनके मतमे जीवात्मा तपा परमात्मामे भेदाभेद सम्बन्ध है । ये भेदाभेदवादी थे। (३) प्रोडुलोमि -इनका निर्देश तीन वार ( ब्रह्ममूत्र १४२, ३।४।४५, ४।४।६) मे है। इनके मतमे अवस्था भेदसे भेदाभेद है-संसारदशामे जीव पौर ब्रह्मका भेद मोर मोक्षदशामे प्रभेद है । ( ४ ) कार्णाजिनि-इनका नाम निर्देश (ब्रह्मासूम ३०) मे एक वार पाया है । ब्रह्ममूवमे 'रमणीयचरणाः' (छा० ५१०७ ) के ऊपर इनका विशिष्ट मत 1(५) काश स्न-(ब्रह्मसूत्र १।४।२२ ) इसमे परमेश्वर ही संसारमे जीवरूपसे प्रवस्थित है । जीव परमात्माका विकार नहीं है । भाचार्य शङ्करके शब्दोमें इनका मत अत्युनुमारी है, प्रतएव वह मान्य है। (६) जमिनि-इनका नाम ब्रह्म- मूत्रमे ११ वार माया है । ये चादरायण मुनिके साक्षात शिष्य माने जाते हैं। ये मीमा दर्शनके रचयिता हैं । (७) वादरि-पराशर-इनका उल्लेख (ब्रह्म-सूत्र १।२।३०, ३।१।११, ४१३७, ४।४।१०) में चार बार माया है। भद्वैतवेदान्तका मूलसिद्धान्त है प्रत्यगभिन्न ब्रह्मकी पारमार्थिक सत्ता पार पनेकात्मक जगत्को मायिकता। पात्मा अनुभूतिस्वरूप होनेरो स्वयंसिद्ध है। इस विषयमे 'सत्य शानमनन्तं ब्रह्म' इत्यादि घुति प्रमाण है । जीवनाकी एकता--लोकप्रगिद्ध जीव ब्रह्मका भेद पारमाधिक नही प्रत्युत मोपराधिक है । जीवब्रह्माय वेदान्तमिद्धान्त 'महं ब्रह्मास्मि' 'स प्रात्मा तत्त्वमसि' 'यदग्ने स्यामहं त्वं त्वं वा घा स्यामहम्' (ऋक्० ८४४॥२३ ) मादि श्रुतिवाक्यो में प्रति- पादित है । 'मनेन जोवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामस्पे व्याकरवाणि' (छा० ६।४।२) (जीव- रूपसे इनमे अनुप्रवेशकर मैं नाम-रूपको अभिव्यक्ति करु ) 'तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्' इत्यादि श्रुतिवाक्योमे ब्रह्मवा हो जीवरूपसे व्यपदेश है । एकमेवाद्वितीयम्' 'नान्योऽतो. स्वि द्रष्टा' "एको रुद्रो न द्वितीयोऽवतस्ये 'पुरुष एवेदं सर्वम् ' (पु० मू०२) 'मात्मवेदं सर्वम् ' 'ब्रह्मवेदं सर्वम् । नेह नानास्ति किञ्चन' इत्यादि तिवाक्य भेदका अपवाद करते हैं । अता उपाधिरहित जीव ब्रह्म ही है। इसी श्रुति मम्मन सिद्धान्तका ही भगवान् - माद्य शङ्कराचार्यने महपि बादरायण प्रणीत ब्रह्मसूत्रोपर किये अपने भाष्यमें सरल एवं गम्भीररूपसे प्रतिपादन किया है। उसी शाकुरभाष्यको ही मापार शिला बनाकर श्री भारतीतीर्थमुनिने 'वैयासिकन्यायमाला' अन्यकी रचना की है। यह अन्य सरल मुबोध संस्कृत भाषामे है । विषयके पाधारपर ब्रह्ममूत्र चार मध्याय, १६ पाद मौर कई अधिकरणों में विभाजित है। व्याम-बत न्याय-मधिकरणोंको माला होनेके कारण इम पन्थका नाम 'वैयामिकन्यायमाला' है। 'विषमो विशयों व पूर्वपक्षस्तपोतरम् । प्रयोजन संगतिश्च प्रायोपिकरण विदुः ॥ विषयः सन्देहः संगतिः पूर्वपक्षः सिद्धान्त इत्येवेकमधिकरणं पञ्चावयवं शेयम् ।। 'विषय, सन्देह, पूर्वपक्ष, सिद्धान्त प्रयोजन भोर संगति इस प्रकार विद्वान लोग इसे अधिकरणरूपसे जानते हैं। कोई इसे पश्चावयव भी कहते हैं । यह मधिकरणका सहरण है । प्रत्येक पधिकरणका श्री भारतीतीर्थमुनिने दो-दो शलोकोंमे सारगभित उपरोक्त अर्थका प्रतिपादन किया है, स्वयं ही उन श्लोकोंको ब्रह्मसूत्र शाकरभाष्य के अनुसार सरल एवं मुबोध संस्कृतभाषामें व्याख्याकर वेदान्त-प्रेमियोंका महान् उपकार किया है। वह व्याख्या संस्कृतमें है, अत: सर्वसाधारणको समझमे माना कठिन है, कोमल-बुद्धिवाले वेदान्त-प्रेमियोको उसका पनायास बोध हो, इसके लिए 'समादरणीय साहित्याचार्य पं. श्री श्रीकृष्णपन्त अध्यक्ष व सम्पादक अच्युतप्रन्धमाला पागणमो' के सप्रेम भनुरोधपर इस ग्रन्धरत्नपर राष्ट्रभाषामे मनुवाद तया टिप्पणीकर इस मरल व सुबोध किया गया है। भाशा ही नहीं विश्वास है कि इससे पाठकगण भधिक लाभ - उठायेंगे। ब्रह्ममून शावर भाष्यपर राष्ट्रभाषामे अनुवाद तथा भाष्यार्थको प्रतिस्पष्ट करनेके लिए अनेक दर्शनो व टोकाग्रन्योंके माधारपर 'सत्यानन्दीदीपिका' व्याख्या लिखी गई है । जो विद्वत प्रिय है, वह छात्र मौर वेदान्तप्रेमियो के लिए तो मत्यन्त उपयोगी है। सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखमाग्भवेत् ।। -स्वामी सत्यानन्द सरस्वती वैयासिकन्यायमालाया अधिकरणानुक्रमणिका प्रथमाध्यायप्रथमपादे- १ ब्रह्मणो विचार्यत्वम् । २ ब्रह्मणो लक्षणम् । ३ ब्रह्मणो वेदकर्तृत्वम् । ब्रह्मणो वेद कमेयत्वम् । ४ वेदान्वानां ब्रह्म कारत्वम् । वेदान्तानां ब्रह्मण्यवसानम् । ५ ब्रह्मण एव सच्छब्दवाच्यत्वम् । ६ ब्रह्मण मानन्दमयत्वम् ७ परमेश्वरस्यैव हिरण्मयपदवाच्यत्वम् । ब्रह्मण एवाऽऽकाशशब्दवाच्यत्वम् । ब्रह्मण एव पाएशन्दवाच्यत्वम् । १० ब्रह्मण एव ज्योति:शब्दाभिधेयत्वम् । ११ ब्रह्मण एव प्राणशब्दव्युत्पाद्यत्वम् । प्रथमाध्यायद्वितीयपादे- १ ब्रह्मण एव मनोमयस्वम् । २ ईश्वरस्यवात्त त्वम् । ३ जीवब्रह्मणोरेव गुहाप्रविष्टत्वम् । ४ ब्रह्मण एवाक्षिगतत्वम् । ५ परमेश्वरस्यबान्तर्यामित्वम् । ६ परमेश्वरस्यैव भूतयोनित्वम् । ७ परमेश्वरस्यैव वैश्वानरत्वम् । प्रथमाध्यायतृतीयपादे- १ ब्रह्मण एव शुभ्वाधायतनत्वम् । २ परमारमन एव भूमत्वम् । ३ ग्राण एवाक्षरत्वम् । ४ परब्रह्मण ईदातिकर्मत्वम् । ५ ब्रहाण एव दहराकाशत्वम् । ६ ईश्वरस्यवाक्षिपुरुषत्वम् । ७ चैतन्यस्य सर्वजगद्भासकरवम् । ८ परमेश्वरस्याइगुष्ठमात्रत्वम् । ६ देवादीनामप्यधिकारित्वम् । १० शूद्रस्य ब्रह्मविद्यायामनधिकारित्वम् । ११ ईश्वरस्यैव कम्पनहेतुत्वम् १२ ब्रह्मण एव ज्योतिष्ट्वम् । १३ ब्रह्मण एव नामरूपनिर्वाहकत्वम् । १४ ब्रह्मण एव विज्ञानमयत्वम् । प्रथमाध्यायचतुर्थपादे- १ कारणशरीरस्यवाव्यतशब्दवाच्यत्वम् । २ तेजोबन्नात्मकप्रकृवेरेवाजात्वम् । ३ प्राणादीनामेव पञ्चजनत्वम् । ४ जगद्योनी ब्रह्मण्येव वेदान्तवाक्य- समन्वय: । ५ परमारमन एव जगस्कर्तृत्वम् । ६ परमात्मन एव दर्शनयोग्यात्मत्वम् । ७ ब्रह्मण एवोपादाननिमित्तकारणत्वम् । 5 ब्रह्मण एव जगत्कारणत्वम् । द्वितीयाध्यायप्रथमपादे- १ सास्यस्मृतेर्वाध्यत्वम् । २ योगस्मृवेर्बाध्यत्वम् ।
२ वैयासिकन्यायमालाया . - २ लक्षण्यामामस्य जगत्वारखवावाय. ८ लयक्रमनिरूपणम् । करवम् । ६ प्राणादिसष्टौ प्रमनिरूपणम् । ४ कारणादादिमतैर्याध्यत्वामावः। १० जीवस्य जन्ममरणराहित्यम् । ५ द्वैतस्य भोक्त भोग्याकारमासमानत्वम् । ११ जीवस्य नित्यत्वम् । ६ ब्रह्मण्यद्वतस्यैव तात्त्विकत्वम् । १२ जीवस्य चिद्रूपत्वम् । ७ परमेश्वरस्य हिताहितमागिस्वाभावः। १३ जीवस्य सर्वगतत्वम् । अद्वितीयब्रह्मण एव नानाविधमृष्टि १४ जीवस्य कर्तृत्वम् । कर्तृत्वम् । १५ जीवस्याध्यस्तकर्तृत्वम् । ६ ब्रह्मणः परिणामित्वम् । १६ ईश्वरस्य जीवप्रवर्तक वम् । १० अह्मणोऽशरीरस्य॑व मायासद्भावः । १७ जीवैश्वरव्यवस्था। ११ तृप्तस्यापि ब्रह्मण एव जगत्वम् । द्वितीयाध्यायचतुर्थपादे-- १२ ब्रह्मणो वैपम्पनण्याभावः। १ इन्द्रियाणां परमात्मजन्यत्वम् । १३ निर्गुणस्यापि ब्रह्मणः प्रवृतित्वम् । २ इन्द्रियाणामेकादशत्वम् । द्वितीयाध्यायद्वितीयपादे ३ इन्द्रियाणामणुस्वम् । १ प्रधानस्य जगद्धे तुत्वाभावः। ४ प्राणस्य जन्यत्वम्। २ प्रह्मणो विमहशजगदुत्पत्तो काणादी. ५प्राणस्य तत्त्वान्तरत्वम् । पदृष्टान्तसद्भावः। ६ प्राणास्यारपुत्वम् । ३ परमाराटुकारणवादनिराकरणम् । ७ इन्द्रियारणा देवपरतन्त्रत्वम् । ४ वैनाशिकखण्डने समुदायासिद्धिः। ८ इन्द्रियाणा प्राणतत्वान्तरत्वम् । ५ विज्ञानवादनिराकरणम् । ६ ईश्वरस्यैव नामरूपव्याकर्तृत्वम् । ६ पाहताना सप्तमङ्गोनिराकरणम् । तृतीयाध्यायप्रथमपादे--- ७ तटस्थेश्वरवादनिराकरणम् । जीवोत्पत्तिवादनिराकरणम् । १ जीवस्य भूतसूक्ष्मवेष्टितस्यैव परलोक- गमनागमने। द्वितीयाध्यायतृतीयपादे २ स्वर्गादवरोहतो जीवस्य सानुशयत्वम् । १ माकाशस्प ब्रह्मजन्यत्वम् । ६ पापिनां स्वर्ग गत्यभावः। २ वायोब्रह्मजन्यत्वम् । ४ स्वर्गादवरोहै जीवस्याऽकाशादितुल्य- ३ सद्ब्रह्मणोऽजन्यत्वम् । त्वम्। ४ तेजसो ब्रह्मजन्यत्वम् । ५ स्वर्गादवरोहतो त्वराविलम्बी। ५ पपां ब्रह्मजन्यत्वन् । ६ स्वर्गादवरोहता बीहादो संश्लेषः । ६ पृथिवीमावस्यामशब्दवाच्यत्वम् । तृतीयाध्यायद्वितीयपादे- ও সঙ্কল্প হাতে। १ स्वप्नसृष्टमिथ्यात्वम् । C मधिकरणानुक्रमणिका २० निवेयोपसंहार: २१ "पिबन्ती' 'द्वा सुपर्णा' इति मात्रा- यस्य विद्यै क्यम् । २२ उपस्तकहोलयोविद्युक्यम् । २३ देहादित्यमण्डलवर्युपासनाया विद्या- २ सुपुतो जोवस्य हुत्स्थब्रह्मणवयम् । ३ सुप्तस्यैव जागरणम् । ४ मूर्षाया अवस्थान्तरत्वम् । ५ वाणो नोरूपत्वम् । ६ ब्रह्मणो निराकरणाविषयत्वम् । ७ प्रातिरिक्तवस्तुनिराकरणम् । ८ कर्माराषितेश्वरस्यैव फलदातृत्वम् । तृतीयाध्यायतृतीयपादे- १ सर्ववेदान्तप्रत्ययोपासनाया एकत्वम् । २ भावान्तरोक्तस्पाप्युपसंहारः। ३ उद्गीयविद्याया मिनत्वम् । ४ उद्गीथस्योकारविशेषणत्वम् । ५ वसिष्ठ वादीनामाहार्यत्वम् । ६ मानन्दादीनामुपसंहारः। ७ पुरुषस्य॑व ज्ञेयत्वम् । ८ ईश्वरस्यैव मशब्दवाचरवम् । ६ प्राणविद्यायामनग्नताबुद्धरेव विधेय- त्वम्। १० शाण्डिल्यविद्यायाः समानत्वम् । ११ नाम्नोर्व्यवस्था। १२ मभृत्यादीनामनुरसंहारः। १३ पुरुप विद्यायाविभिन्नत्वम् । १४ विधादिमन्त्राणा विद्याङ्गत्वनिराक- रणम्। १५ ज्ञानिनः कर्मणां हान्युपायने । विधूननशब्दस्य परित्यागार्थकत्वम् । १६ उपासकाना कर्मत्यागव्यवस्था। १७ आसनया ब्रह्मलोकगन्तृणामेव मार्ग- व्यवस्था। १८ सस्वेिवापामनासु मार्गकल्पना ! १६ तत्त्वज्ञानिना मुक्तिनयत्यम् । २४ सत्य विद्या। २५ ददरहार्दाकाशयोरुपमहारः । २६ उपवासे प्राणाहुतिलोपः। २७ पडावबद्धोपास्त्यनयत्यम् । २८ वायुप्राणोपासमपोः प्रयोगभेदः । २६ मनश्चिदादीना स्वतन्त्रत्वम् । ३. मात्मनो देहातिरित्तत्वम् । ३१ उक्यादिधियो शाखान्तरेऽनुवृत्तिः । ३२ वश्वानरविद्यायां समस्तोपासनम् । ३३ शाण्डिल्यादिविद्याना भिन्नत्वम् । ३४ महाविद्याया विकल्पनियमः । १५ लोकिकनीकेषु याथाकाम्यम् । ३६ कर्माङ्गप्रतोकेषु याषाकाम्यम् । हनीयाध्यायचतुर्थपादे- १ पात्मज्ञानस्य स्वतन्त्रत्वम् । २ कर्मत्यागिन एव ब्रह्मनिष्ठत्वम् । संन्यासिन एव ब्रह्मनिष्ठत्वम् । ३ रमतमत्वादीना ध्येयत्वम् । ४ पाख्यानस्य विद्यास्तुत्यर्थत्वम् । ५ भात्मज्ञानस्य कर्मानपेक्षत्वम् । ६ शानोलतो यज्ञशमदमाद्यपेक्षत्वम् । ७ मापदि सर्वानभोजनानुज्ञा । ८ यज्ञादीनामाश्रमविद्याभयहेतु वम् । ६ प्रनामिणोऽपि ब्रह्मज्ञानम् । १० मात्रमाणामवरोहनिराकरणम् । .
४ वैयासिवन्यायमालापा प्रधिकरणानुक्रमणिका ११ मध्यरेतमः पातित्यै प्रायश्चित्तम् । ३ प्राणाना जीवे ममः। १२ प्रष्टस्प तप्रायश्चित्तस्याप्यव्यदहा ४ शान्यज्ञानोपत्रान्तिमामात्यम् । यत्वम् । ५ उपामरस्य ब्रह्मरिण स्वरूपेण सपनिरा. १३ ऋविकावाङ्गप्यानस्य स्वामिगामि. परम् । एवम् । ६ गानिनः प्राणाना देहादनु तान्तिः । १४ मौनस्य विधेयत्वम् । • तत्वदियाना परमात्मन्येव लयः। १५ मावशुद्धरेद बाल्यशम्दाभिषयत्वम् । ८ तत्वविद्वापादिमयस्य निःशेषत्वम् । १६ पारमशानस्पैहिकामुमिकत्व व्यवस्था । ९ उपामोत्तान्तविशेषः । १७ मुक्त रेकविपश्यम्। १० परिमृतस्यापि रपम्पनुमारित्वम् । पतुर्याध्यायप्रथमपादे ११ ठत्वविदोदक्षिणायनेपि विचाफलम् । १ प्रणमननादीनामावृत्तिः । चतुर्याध्यापत्तीयपादे- २पारमत्वेन ब्रह्मणो ग्रहणम् । १ अधिरादिकस्यैव ब्रह्मलोरमागत्वम् । ३ प्रतीके हरष्टिनिराकरणम् । ४ उपास्य ब्रह्मदृष्टिः। २ बायोः मंनिवेशः। ५ मङ्गगेष्वादिरपादिपीकरणम् । ३ वरणादिलोकानां व्यवस्था । ४ पचिरादिनामाविवाहिकत्वम् । ६उपामन थामनावश्यकत्वम् । ७ उपासने दिगादिनियमनिराकरणम् । ५ कार्यव्रह्मण एवोत्तरमार्गगम्यत्वम् । ८ उपासनानामामरणावर्दनस्वम् । ६ प्रतीकोपासकाना ब्रह्मलोकगविनिरा- शानिना पापलेपनिराकरणम् । करणम्॥ १. ज्ञानिनः पुष्पलेपनिराकरणम् । चतुर्याध्यायचतुथंपादे-- ११ ज्ञानादनापपुण्यपापयोरेव निवृतिः। १ मुक्त नवीनत्वनिराकरणम् । १२ अग्निहोत्रादिनित्यकर्मणो नाशनिराक- २ मुक्त ब्रह्मभिन्नतानिराकरणम् । णम्। ३ सविशेषत्वादिव्यवस्थानिराकरणम् । १३ नित्यकर्मो विद्यासापनत्वम् । १४ पधिकारिणामपि मृक्तिम भव । ४ परलोकगोपासकस्य मोग्यवस्तुसष्टी सकल्पहेतुत्वम् । चतुर्थाध्यायद्वितीयपादे- ५ देहभावाभावयोरंच्छिकत्वम् । १ वागादीनां मनसि वृत्तिलयः । ६ शानिनोऽनेकदेहेषु मात्मकत्वम् । २ मनसः प्राणे लया। ७ शानिनो पगत्स्रष्टचनिराकरणम् । समातेय यासिन्यायमालाधिकरणानुक्रमणिका।
॥ ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमः॥ श्रीभारतीतीर्थमुनिप्रणीता वैयासिकन्यायमाला स्वामि-सत्यानन्द सरस्वती- वृत- भाषानुवाद-सहिता। अथोपोद्घातः प्रारिप्सितग्रन्थस्याविघ्नेन परिसमाप्तये प्रचयगमनाय शिष्टाचारपरिपाल- नाय च विशिष्टेष्टदेवतातत्त्वं गुरुमूर्युपाधियुक्त नमस्कृत्य ग्रन्थं प्रतिगानीते- प्रणम्य परमात्मानं धीविद्यातीर्थरूपिणम् । वैयासिकन्यायमाला श्लोक: संगृह्यते स्फुटम् ॥१॥ मीमासयेत्यभिधयोत्तरया प्रसिद्ध श्रीवादरायणमहर्षिविनिर्मितं यत् । मोहान्धकारविलयोष्णगभस्तिरूपं विद्योतते तदमलं निगमान्तशाखम् ॥१॥ साक्षादथ क्रमपरम्परया समस्तवेदान्तवाक्यनिवहस्य समन्वितत्वम् । प्रत्यद्वितीयरहितात्मनि पूर्ववर्त्यध्याये प्रदर्शितमसंशयतत्परत्वम् ।।२।। जाते समन्वयविधी दृशि संगरीणसद्ब्रह्मणि स्मृतिवितर्कविरोधजातम् । प्राशङ्कप तत्परिहति सृजता द्वितीयाध्याये विरोधरहितत्वमदशि पूर्णम् ।।३।। वैराग्यबोधनमनूद्य च तत्त्वमर्थो संशोध्य सम्यगविकारिचिदात्मविद्या. बाह्यान्नजातमवबोध्य लसत्तृतीयाध्यायेऽन्तरङ्गशममुख्यविधिन्यरूपि ॥४॥ प्रारम्भके विषयोभूत ग्रन्थके निर्विघ्न परिसमाप्ति, विस्तार प्राप्ति मौर शिष्टाचार परिपालन के लिए गुरुमूर्ति उपाधियुक्त विशिष्ट इष्ट देवता स्वरूपको नमस्कारकर इस प्रन्यके प्रारम्भको प्रतिज्ञा की जाती है। श्रीविद्यातीर्थरूपी परमात्माको प्रणामकर व्यास उक्त न्यायमालाका श्लोकोद्वारा स्पष्ट संग्रह किया जाता है ।।१।।
२ भाषानुवादसहिता [ उपोद्घात.] प्रणम्येति-व्यासेनोक्ता वैयासिवी वेदान्तवाक्याचं निर्णायकान्यधिकरणानि भ्याया , तेपामनुक्रमेण ग्रन्थन माला। यद्यप्येषा सूत्रभाष्यकारादिभि अप ञ्चिता, तथाऽपि सूत्रादीनामतिप्राज्ञविषयत्वान्मन्दबुद्धधनुग्रहाय इलोकैरेषा माला स्फुटं संगृह्यते ॥१॥ तत्रैकैकमधिकरण पश्चावपवम् । विषय सदेह संगतिः पूर्वपक्ष सिद्धान्त श्चेति पञ्चावयवा । तेपा संग्रहप्रकारं दर्शयति- एको विषयसदेहपूर्वपक्षावभासक । श्लोकोऽपरस्तु सिद्धान्तवादी संगतय स्फुटा ॥२॥ तत्रैकेकस्याधिकरणस्य सग्राहको द्वौ द्वौ श्लोको तयोराद्यश्लोकस्य पूर्वार्धन द्वाववयवौ सगृह्यते । उत्तराधनेक । द्वितीयहोरेन चेक । यद्यपि संगत्यात्य एकोऽवयव शिष्यते, तथापि प्रत्यधिकरण न पृथक्संग्रहोतव्यो भवति । सकृद्व्युत्पन्नस्य पुरुपस्य स्वयमेवोहितु शक्यत्वात् ॥२॥ साक्षादविधाय सगुणप्रतिपत्तिवृत्त्यावृत्त्या च निगुणचिति श्रवणादिबीजेः। पापादिलेपहिता कथिता चतुर्थऽध्याये जनस्य शुभजीवितमुक्तिरप्रया ॥५॥ शारीरकमीमासाधिकरण जालस्य या शुभा विवृति । जिज्ञासुप्रमदाथं रचिता योगीन्द्रभारतोमुनिना ॥६।। तस्या सुखावबुध्यै भाषामाश्रित्य राष्ट्रसम्मान्याम् । व्याख्या तनोति विशदा सत्यानन्द सरस्वती विमलाम् । प्रणम्येति-पाचार्य ध्यासमे उक्त होनेसे इसका नाम वैयामिकी है, वेदान्त { उपनिषद्) वाक्यार्थ निर्णायक अधिकरणोका नाम न्याप । उनका क्रमसे ग्रन्यन ही माला है। यद्यपि इसका सूत्र और भाष्यकार प्रादिके द्वारा विस्तार किया गया है, तो भी सूत्र भादि विशिष्टबुद्धि पुरुषके विषय हैं। मत मन्दबुद्धि पुरुषपर अनुग्रह करनेके लिए श्लोकोद्वारा इस मालाका स्पष्ट संग्रह किया जाता है ॥ १॥ इनमे से एक-एक भविकरण पाच अवयववाला है-यथा विषय, सदेह मगति पूर्वपक्ष मौर सिद्धान्त यह पाच अवयव हैं । उनके सग्रह प्रकारको दिखलाते हैं । प्रत्येक मधिकरणके मग्राहक दो-दो श्लोक हैं। उनमेसे एक श्तोक विषय, सदेह और पूर्व पक्षका अवभामक है और दूसरा श्लोक तो सिद्धान्तवादी है, शेष सगतियां तो स्पष्ट हैं ॥२॥ उस न्यायमालामें एक-एक अधिकरणके समाहक दो-दो श्लोक हैं। उनमेसे माद्य श्लोकके पूर्वाधसे विषय और सन्देह दो अवयव सरह किये जाते हैं। उत्तराध श्लोकसे
[ उपोद्घाता]
वैयासिकन्यायमाला
संगति विभज्य व्युत्पादयति-
शाखेऽध्याये तथा पादे न्यायसंगतयविधा
शास्त्रादिविषये ज्ञाते तत्तत्संगतिरूह्यताम् ॥३॥
शास्त्रप्रतिपाद्यम्, अध्यायप्रतिपाद्यम्, पादप्रतिपाद्यं चार्थमवगम्य शाखसं.
गतिरध्यायसंगतिः पादसंगतिश्चेति तिस्रः संगतय अहितुं शक्यन्ते ॥३॥
शास्त्रप्रतिपाद्यम्, अध्यायप्रतिपाद्यं च दर्शयति-
शास्त्रं ब्रह्मविचाराख्यमध्यायाः स्युश्चतुर्विधाः।
समन्वयाविरोधौ द्वौ साधनं च फलं तथा ।।४।।
सर्वेषा वेदान्तवाक्यानां ब्रह्मणि तात्पर्येण पर्यवसानं प्रथमेनाध्यायेन
प्रतिपाद्यते। द्वितीयेन संभावितविरोध. परिहियते। तृतीयेन विद्यासाधन-
निर्णयः । चतुर्थेन विद्याफलनिर्णयः । इत्येतेऽध्यायानामर्थाः ॥ ४॥
तत्र प्रथमाध्यायगतपादार्थावि भजते-
समन्वये स्पष्ट लिङ्गमस्पष्टत्वेऽप्युपास्यगम् ।
ज्ञेयगं पदमा च चिन्त्यं पादेष्वनुक्रमात् ॥५॥
पूर्वपक्ष एक अवयव, दूसरे श्लोकसे सिद्धान्त एक अवयव । यद्यपि संगति नामक एक
अवयव शेष रह जाता है, तो भी प्रत्यधिकरण पृथक् संग्रहीतव्य नहीं होता। एक बार
व्युत्पन्न पुरुष स्वयं ही समझ सकता है ॥२॥
संगतिका विभागकर व्युत्पादन करते हैं-
शास्त्रविषयक, अध्यायविषयक तथा पादविषयक न्यायसंगति तीन प्रकारको हैं ।
शास्त्र आदि विषय ज्ञात होनेपर तत्, तत् मंगतिको कल्पना करनी चाहिए ।। ३ ।।
शास्त्रप्रतिपाद्य, मध्यायप्रतिपाद तथा पादप्रदिपाद्य अर्थको जानकर शास्त्र-संगति,
अध्यायसगति तथा पादमंगति इस प्रकार तीन संगतियोकी कल्पना की जा सकती है ॥३॥
शास्त्रप्रतिपाद्य और अध्यायप्रतिपाद्य दिखलाते हैं-
ब्रह्म विचार नामक यह शास्त्र है, जिसमे चार प्रकारके अध्याय हैं । समन्वय
मध्याप, विरोध परिहार अध्याय ये दो, साधन प्रध्याय और फल प्रध्याय ये दो इस प्रकार
पार मध्याय है ॥ ४॥
सब वेदान्तवाक्योका ब्रह्ममे हो तात्पर्य से पर्यवसान है, यह प्रथम अध्यायसे
प्रतिपादन किया जाता है। दूसरे प्रध्यायसे अन्य मनोद्वारा संभावित विरोधोका
परिहार किया गया है। तीसरेसे विद्याके साधनोका निर्णय है भोर चतुर्थ से विद्याके
फलका निर्णय । ये मध्यायोंके प्रतिपाद्य मर्य (प्रयोजन ) हैं ॥४॥
भापानुवादसहिता [ उपोद्घातः ] स्पष्टब्रह्मलिङ्गयुपं वाक्यजातं प्रथमपादे चिन्त्यम् । तद्यथा-"प्रन्तरत- धर्मोपदेशात्" [ ० मू० १११ । २०] इत्यत्र सार्वयसात्म्यिसर्वपाप- विरहादिवं ब्रह्मणोऽमाधारणतया स्पष्ट लिङ्गम् । अस्पष्टब्रह्मलिङ्गत्वे सत्युपा- स्यविषयवाक्यज्ञातं द्वितीयपादे चिन्त्यम् । तद्यथा-धमाधिकरणविपये शाण्डिल्योपास्तिवाक्ये मनोमयत्वप्राणशरीरत्यादिवं सोपाधिक् ब्रह्मणो जीवस्य च साधारणत्वादस्पष्टं ब्रह्मलिन्नम् । तृतीयपादे त्वस्पष्टलिङ्गत्वे सति शेयब्रह्म विषयं वाक्यजातं चिन्त्यम् । तद्यथा-प्रथमाधिकरणे मुण्डकगतब्रह्मात्मतत्त्व- वाक्ये पृथिव्यन्तरिक्षप्रोतत्वं सूत्रात्मन: परब्रह्मए श्च साधारए त्वादस्पटं ब्रह्म लिङ्गम् । यद्यपि द्वितीयपादे पाठवल्लयादिगतबह्मतत्त्ववावयानि विचारितानि, तृतीयपादे च दहरोपासनवाक्यं विचारित तथाऽप्यवान्तरसंगतिलोभेन तद्विचारस्य प्रासङ्गिवत्वान्न पादार्थयो साकर्यापत्ति । इत्थं पादत्रयेए वाक्यविचार समापित । चतुर्थपादेनाव्यकादमजादं चेत्येवमादि संदिग्धं पदं चिन्तयम् ॥५॥ अव प्रथम अध्यायगत अर्धाता विभाग करते हैं- समन्वय अध्यायके प्रथम पादरी स्पष्ट ब्रह्मलिङ्ग युक्त वाक्योका विचार है। अस्पष्ट ब्रह्मलिङ्गके हानेपर भी उपास्यगत वाक्योका दसरे पादमे विचार है । तृतीय पादमें अस्पष्ट ब्रह्मलिङ्गक व क्योका शेय ब्रह्म विचार है। चतुर्थ पादमे अव्यक्त पद प्रजा पद विषयक विचार है। इस प्रकार चारों पादोंमें अनुमसे विचार किया गया है ॥५॥ स्पष्ट ब्रह्मलिङ्ग युक्त वाक्यसमुदायका प्रथम पादमें विचार है। जैसे-~-'मन्त. स्वधर्मोपदेशात्' (७० मू० १।१।२०) इसमें सर्वज्ञच-सर्वात्म व-सर्वपापरहितत्व मादि ब्रह्मकर ममाघारागुरूपसे स्पष्ट लिङ्ग है । मस्पष्ट ब्रह्मलिङ्ग होनेपर उपास्य- विषयक वाक्यममुदायका दूगरे पादम विचार है। जैसे- प्रथमाधिकरणके विपर- भाण्डिल्य उपास्तिवाक्यमे मनोमयन्द, प्रारपारीरत्व प्रादि सोपाधिक ब्रह्म और जीवके साधारण धर्म होनेसे अस्पष्ट ब्रह्मलिङ्ग है । तृतीयपादमे मस्पष्ट ब्रह्मलिङ्ग (ब्रह्मका स्पष्ट लिङ्ग होनेपर भी) होनेपर ज्ञेय ब्रह्म विषयक वाक्य समुदायका विचार है । जैसे- प्रथमाधिकरणमे 'यस्मिन्धो पृथवी चान्तरिक्षमोत मन सह प्राणैश्च स्' (मुण्ड० २।२॥५) इस मुण्डकगत ब्रह्मात्मतत्त्व वाक्यमे सूत्ररूप हिरण्यगर्भ और परब्रह्मका साधा- रण होनेसे पसष्ट अललिङ्ग है। यद्यपि द्वितीयपादमे कठवल्लीगत ब्रह्मतत्त्व विषयक वाक्योंका विचार किया गया है, और तृतीसादमे दहरोपासनवाक्यका विचार किया गया है, तो भी अवान्तरसगतिवे लोभसे उनका विचार प्राङ्गिक होनेसे पदार्थोकी - - [ उपोद्घातः] वैयासिकन्यायमाला ५ द्वितीयाध्यायगतपादार्थान्विभजते- द्वितीये स्मृतितर्काभ्यामविरोधोऽन्यदुष्टता। भूतभोक्तृथुतेलिश्रुतेरप्यविरुद्धता ॥६॥ प्रथमपादे---साख्ययोगकाणादादिस्मृतिभिः सांख्यादिप्रयुक्ततकैश्च विरोधी वेदान्तसमन्वयस्य परिहतः। द्वितीयपादे-साख्यादिमतानां दुष्टत्वं दर्शितम् । गृतीयपादे-पूर्वभागेन पञ्चमहाभूतध्रुतीना परस्परविरोध: परिहतः। उत्तर- भागेन जीवश्रुतीनाम् । चतुर्थपादे-लिनशरीरश्रुतीनां विरोधपरिहारः ।। ६ ।। तृतीयाध्यायगतपादार्थान्विभजते- तृतीये विरतिस्तत्त्वंपदार्थपरिशोधनम् । गुणोपसंहृतिर्ज्ञानबहिरङ्गादिसाधनम् ॥७॥ प्रथमपादे-जीवस्य परतोकगमनागमने विचार्य वैराग्यं निरूपितम् । द्वितीयपादे-पूर्वभागेन त्वंपदार्थः शोधितः । उत्तरभागेन तत्पदार्थः । तृतीयपादे- सगुण विद्यासु गुणोपसंहारो निरूपितः। निगुणे ब्रह्मण्यपुनरुक्तपदोपसंहारश्च । साकर्य प्राप्ति नहीं है । इस प्रकार तीन पादोसे वाक्योका विचार समाप्त हो गया । मौर चतुर्यपादसे अव्यक्त पद प्रजा पद इत्यादि सदिग्ध पद भी विचार करने योग्य है ॥५॥ द्वितीयाध्यायगत पदार्थोका विभाग करते हैं- द्वितीयाध्यायमे स्मृति एवं तर्कसे वेदान्त समन्वयपर वादियाद्वारा किये गये विरोधो का परिहार, अन्य मतोको दुष्टता-अप्रामाणिकता और भूतश्रुति, भोक्श्रुति एवं लिङ्ग- श्रुतिका अविरोध प्रतिपादित है ॥ ६ ॥ प्रथम आदमे साम, योग, कारणाद स्मृति और साख्यादिसे प्रयुक्त तर्कोद्वारा किये गये वेसन्त समन्वयपर विरोधोका परिहार किया गया है। द्वितीयपादमे साख्यादि- मत दुष्ट-अप्रामाणिक हैं दिखलाया है । तृतीयपादमे पूर्वभागसे पांच महाभूत श्रुतियों के परस्पर विरोधका परिहार किया गया है पोर उतरभागसे जीवश्रुति विषयक विरो- धका । चतुर्थपादमे लिङ्गश्रुतियोका विरोध परिहार किया गया है ॥ ६॥ तृतीयाध्यायगत पदार्थोक विभाग करते हैं- तृतीय साचन अध्यायमे वैराप निरूपण 'तत् त्वम्' पदार्थोका परिशोधन परापर ब्रह्मविद्याके गुणोका उपसहार तत्वज्ञानमे शमादि अन्तरङ्ग और यज्ञ आदि बहिरङ्ग साधनोका विचार है ॥ ७॥ प्रथमपादमे जीदके परलोक गमनागमन विषयक विचारकर वैराग्यका निरूपण किया गया है । द्विदीपपादके पूर्वभागसे 'त्वं' पदार्थ और उत्तरमागसे 'तत्" ६ भाषानुवादसहिता [उपोद्घाता] चतुर्थपादे च-निगुणज्ञानस्य बहिरङ्गसाधनभूतान्याश्रमयज्ञादीनि, मन्तरन्न- साधनभूतशमदमनिदिध्यासनादीनि च निरूपितानि ॥७॥ चतुर्थाध्यायगतपादाविभजते-- चतुर्थ जीवतो मुक्तिरुत्क्रान्तेगतिरुत्तरा। ब्रह्मप्राप्तिबहालोकाविति पादार्थमंग्रहः ॥८॥ प्रथमपादे-श्रवरणाद्यावृत्त्या निगुणमुपासनया सगुणं वा ब्रह्म साक्षाकृत्य जीवत: पापपुण्यलेपविनाशलक्षणा मुकिरभिहिता। द्वितीयपादे--म्रियमाण- स्योत्क्रान्तिप्रकारो निरूपितः। तृतीयपादे-सगुणविदो मृतस्योत्तरमार्गोऽभि- हितः । चतुर्थपादे-पूर्वभागेन निगुणब्रह्मविदी विदेहकैवल्यप्राप्तिरभिहिता। उत्तरभागेन सगुणब्रह्मविदो ब्रह्मलोके स्थितिनिरूपिता। एवं पादार्थाः संगृहीताः ॥८॥ सन्त्वेवं शास्त्राध्यापपादप्रतिपाद्या अर्थाः किं तत इत्यत ग्राह- अहित्वा संगतीस्तिस्रस्तथाऽवान्तरसंगतीः । ऊहेदाक्षेपदृष्टान्तप्रत्युदाहरणादिकाः पदार्थका शोधन किया गया है। तृतीयपादमे-मगुण विद्याप्रोमे गुणोके उपसहार और निर्गुण ब्रह्ममें अपुनरुक्त पदोका उपसहार निरूपित है । और चतुर्थपादमें निर्गुण ब्रह्मज्ञानमे बहिरङ्गसाधनभूत यज्ञादि पाश्रमकर्म और अन्तरङ्ग साधनभूत शम, दम, निदिध्यासन मादि निरूपित हैं।। ७ ।। चतुर्थाध्यायगत पदार्थों का विभाग करते हैं- चतुर्थाध्यायमें ब्रह्मका साक्षात्कार होनेपर जीवितावस्थामे मुक्ति, उपासकका मरणानन्तर उत्तरमार्गसे गमन, निर्गुण ब्रह्मविदको ब्रह्मप्राप्ति और सगुणोपासकको ब्रह्मलोक प्राप्तिका निरूपण है इस प्रकार पदार्थोका सग्रह है ।। ८ ॥ प्रथमपादों श्रवण आदिकी प्रावृत्ति निर्गुण ब्रह्म व उपासनामे मगुण ब्रह्मा साक्षात्कार कर जीवितावस्थामें पापपुण्य लेपको विनाशरूप मुक्ति कही गई है। द्वितीयपादमै घ्रियमाणका उत्क्रान्ति प्रकार निरूपित है । तृतीयपादमैं मृत सगुणोपासकका उत्तरमार्ग प्रतिपादित है। चतुर्थपादमें पूर्वभागसे निगुण ब्रह्मविद्की विदेह कैवल्य प्राप्ति कही गई है और उत्तरभागमे सगुण ब्रह्मोपासककी ब्रह्मलोस्में स्थिति निरूपित्त है इस प्रकार पदार्थोंका सग्रह किया गया है ।। ८॥ शास्त्रके प्रध्याय एवं पादोसे प्रदिपाद्य अर्थ भले ऐसे हों, किन्तु इमसे क्या ? इसपर कहते हैं- [ उपोदयातः] वयासिकन्यायमाला तद्यथा-ईक्षत्यधिकरणे-'तदेक्षत' इति वाक्यं प्रधानपरं ब्रह्मपरं वा, इति विचार्यते । तस्य विचारस्य ब्रह्मसंबन्धित्वाद्ब्रह्मविचारशानसंगतिः । 'वाक्यं ब्रह्मणि तात्पर्यवत्' इति निर्णयात्समन्वयाध्यायसंगतिः। ईक्षणस्य चेतने ब्रह्मण्यसाधारणत्वेन स्पष्टब्रह्मलिङ्गत्वात्प्रथमपादसंगतिः। एवं सर्वेष्वप्य- धिकरणेषु यथायथं संगतिनयमूहनीयम् । अवान्तरसंगतिस्त्वनेकधा भिद्यते-- पाक्षेपसंगतिदृष्टान्तसंगतिः प्रत्युदाहरणसंगतिः प्रासनिकसंगतिरित्येवमादिः ।। सेयमवान्तरसंगतिव्युत्पन्नेनोहितुं शक्यते। अतस्तां व्युत्पादयति- पूर्वन्यायस्य सिद्धान्तयुक्ति वीक्ष्य परे नये । पूर्वपक्षस्य युक्ति च तनाऽऽक्षेपादि योजयेत् ॥ १० ॥ तद्यथा प्रथमाधिकरणे 'ब्रह्मविचारशास्रमारम्भरणीयम्' इति सिद्धान्तः। तत्र युक्ति:-'ब्रह्मणः संदिग्धत्वात्' इति । द्वितीयाधिकरणस्य 'जगज्जन्मादि ब्रह्मलक्षणं न भवति' इति पूर्वपक्ष, । तत्र युक्ति:--'जन्मादेजंगग्निष्ठत्वात्' इति । तदुभयमवलोक्य तयोराक्षेपसंगति योजयेत् । 'संदिग्धत्वाद्ब्रह्म विचार्यम्' मुख्य तीन मगतियोका विचारकर तथा प्राक्षेप, दृष्टान्त, प्रत्युदाहरण आदि अवा- न्तर सगतियोका विचार करना चाहिए ॥ ६ ॥ जैसे कि ईक्षति अधिकरणमें 'तदक्षत' (उस ब्रह्मने ईक्षण किया) यह वाक्य प्रधान परक है वा ब्रह्मपरक ? यह विचार किया जाता है। वह विचार ब्रह्म सम्बन्धी होनेसे ब्रह्म विचार शास्त्र सगति है । 'वाक्यं ब्रह्मणि तात्पर्यवत्' (यह वाक्य ब्रह्ममें तात्पर्य वाला है ) इस निर्णयसे समन्वयाध्यायकी संगति है। ईक्षण चेतन ब्रह्ममें अमाधारण होनेसे स्पष्ट ब्रह्मलिङ्ग है, अतः प्रथम पाद सगति है। इस प्रकार सभी अधिकरणोमें भी यथायथ तीन सगतियोका विचार करना चाहिए । अवान्तर सगतिका तो भनेक प्रकारका भेद है-प्राक्षेपमगति, दृष्टान्तसगति, प्रत्युदाहरणसंगति इत्यादि । इम अवान्तर सगतिका व्युत्पन्नद्वारा ही विचार किया जा सकता है, अतः उसका व्युत्पादन किया जाता है ।।६॥ पूर्वाधिकरणमें सिद्धान्तयुक्तिको देखकर दूसरे अधिकरणमें पूर्वपक्षको युक्तिको देख उसमें आक्षेप मादिकी योजना करनी चाहिए ॥१०॥ जैसे कि प्रथम मधिकरणमें वह्मविचार रूप शास्त्रका प्रारम्भ करना चाहिए । यह सिद्धान्त है उसमें युक्ति दी गई है, ब्रह्म सदिग्य है । द्वितीय अधिकरणका 'जगजन्मादि' ब्रह्मका लक्षण नही हो सकता है, यह पूर्वपक्ष है, उसमे युक्ति है-जन्मादि जगत्के हैं, उन दोनोको देखकर उनमें प्राक्षेप सुगतिकी योजना करनी चाहिए। सदिग्ध होने के कारण ब्रह्मा विचार करना चाहिए। यह युक्त नहीं है। जन्मादि मन्य-जगत्
.
न्नेया।
भाषानुवादसहिता [ उपौयातः]
इत्येतदयुक्तम् । जन्मादेरन्यनिष्ठत्वेन ब्रह्मरणो लक्षणाभावे सति ब्रह्मव नास्ति ।
कुतस्तस्य संदिग्धत्वं विचार्यत्वं चेत्याक्षेपसंगतिः। दृष्टान्तप्रत्युदाहरणसंगती
चात्र योजयितुं शक्यते। 'यथा संदिग्धत्वेन हेतुना ब्रह्मणो विचार्यत्वम्, तथा
जन्माद्यन्यनिष्ठरवेन हेतुना ब्रह्मणो लक्षणं नास्ति' इति दृष्टान्तसंगतिः ।
'पथा विचार्यत्वे हेतुरस्ति, न तथा लक्षणसद्भावे हेतुं पश्यामः' इति प्रत्यु-
दाहरणसंगतिः । ते एते दृष्टान्तप्रत्युदाहरणसंगती सर्वत्र सुलभे। पूर्वाधिकरण-
सिद्धान्तवदुत्तराविकरणपूर्वपक्षे हेतुमत्वसाम्यस्य, उत्तराधिकरणसिद्धान्ते
हेतुभून्यत्ववेलक्षण्वस्य च मन्दरप्युरप्रेक्षितुं शक्यत्वात् । आक्षेपसंगतियथायोगमु-
पथ प्रासनिकसंगतिरुद्राहियते-देवताधिकरणस्याधिकारविचार-
रूपत्वात्समन्वयाध्याये गब्रह्मवाक्यविषये तृतीयपादे च संगत्यभावेऽपि
बुद्धिस्थावान्तरसंगतिरस्ति । तथा हि-पूर्वाधिकरणे 'अङ्गठमानवाक्यस्य ब्रह्मपर
खादङ्गुष्ठमारत्वं ब्रह्मणो मनुष्यहृदयापेक्षम्, मनुष्याधिकारत्वाच्छास्त्रस्य,
इत्युकम्। तत्प्रसङ्गेन देवताधिकारी बुद्धिस्यः। सेयं प्रासनिकसंगतिः । तदेवं
न्यायसंगतिनिरूपिता ॥१०॥
निष्ठ हैं । इसलिए वे बहाके लक्षण नहीं हो सकते, ऐसी स्थितिमें जब ब्रह्म ही नहीं है,
तब उमको सदिग्नता दथा विचार्यता कैसी? यह भाक्षेप मगति है। दृष्टान्त समत्ति
भोर प्रत्युदाहरण संगतिकी भी यहाँ योजना हो मकती है। जैसे संदिग्धत्वरूप हेतुसे
बह्मका विचार्यत्व
वैसे जन्मादिके अन्यनिष्ठन्वरूप होतुसे वे ब्रह्मने लक्षण नहीं हैं।
यह दृष्टान्तु मंगति है। जैसे विचार्यत्वमे हेतु है । वैसे ब्रह्मलक्षण के अस्तित्वमे हेतुको नहीं
देखते हैं, यह प्रत्युदाहरण मंगति है। ये दोनो दृष्टानसंगति और प्रत्युदाहरणमंगति
सर्वत्र मुलभ हैं । पूर्वाधिकरण मिद्धान्तके समान उत्तराधिकरण पूर्वपक्षमे हेतुमत्तारूपके
साम्पको भऔर उत्तराधिकरण मिद्धान्तमे हेतुगन्यवान वैलक्षपकी मन्दबुद्धि पुरुषो
द्वारा भी कल्पना की जा सकती है । प्रारमगतिको यथायोग कल्पना करनी चाहिए।
भब प्राममितिका उदाहरण देते हैं-देवताधिकरणाम देवता अधिकार विचाररूप है
भतएव ममन्वयाध्याममे जेय ब्रह्म वाक्य विषयक तृतीय पादमे संगितके प्रभाव
होनेपर भी बुद्धिम्य प्रवान्तर गंगति है, जैर अपमाधिकरणमे अंगुष्टमारवाकर ब्रह्म
विषयक है । मनुष्य हृदयापेक्षा ब्रह्म मात्र है, क्योंकि शाम मनुश्यका अधिकार
है यह बात कही गई है, उमो प्राजो देवताधिारण युद्धिस्थित है, यह पाक्षिक
संगति है। इस प्रकार न्याय मंतिका निरूपण किया गया है ॥ १०॥
[म०१पा० १ अधि०१] वैयासिवन्यायमाला - प्रथमाध्यायस्य प्रथमः पादः [भत्र पादे स्पष्टलिङ्गयुक्ताना वाक्याना विचार] ( इस पादमें स्पष्ट ब्रह्मलिङ्गयुक्त वाक्योका विचार है ) अथेदानी प्रत्यधिकरणमवयवचतुष्टयं श्लोकाभ्या सगृह्यते- (तन (प्रथमे ब्रह्मणो विचायत्वाधिकरणे) शास्त्रस्य प्रथम सूत्रम् ) (१ जिज्ञासा अधिकरण सू०१) अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥१॥ प्रथमाधिकरणमारचयति- अविचार्य विचार्य वा ब्रह्माध्यासानिरूपणात् । असदेहाफलत्वाभ्या न विचारं तदर्हति ॥ ११॥ अध्यासोऽहंबुद्धिसिद्धोऽममं ब्रह्म श्रुतीरितम् । संदेहान्मुक्तिभावाच्च विचार्य ब्रह्म वेदत ॥१२॥ अब प्रत्येक अधिकरणक चार अवयव दो श्लोको द्वारा सगृहीत किये जाते है- प्रथम अधिकरणकी रचना करते हैं- विपय-ब्रह्म विचारात्मक यह शास्त्र । सन्देह-ब्रह्म विचारात्मर यह शास्त्र प्रारम्भ करने योग्य है अथवा नहीं? पूर्वपक्ष -तम प्रकाशो समान परस्पर विरुद्ध स्वभाववाले जड देह आदि और चेतन प्रा मामे परस्पर अध्यासका निरूपण नही हो सकता, आत्मा ही ब्रह्म है, अपने प्रापमं किसीको कदापि सन्देह नहीं होता कि मैं हूँ कि नहीं, और अपने प्रापका सबको निश्चय भी है किन्तु मुक्तिम्पी फल नही दिखाई देता, इसलिए मन्देह और फलके न होनेपर यह शास्त्र प्रारम्भ करने योग्य नहीं है। सिद्धान्त-'प्रसङ्गो छय पुरुप ' 'अयमात्मा ब्रह्म' इस प्रकार श्रुतिमें ममङ्ग ब्रह्म ही मामा कहा गया है । लोकमे लोगोकी देह आदिम प्रात्मबुद्धि देखी जाती है । प्रत प्रसङ्ग ब्रह्म प्रात्मा है अथवा देह आदि आत्मा हैं, ऐमा सन्देह हो सकता है। मोक्षरूप फलमे श्रुति और विद्वानोबा अनुभव प्रमाण है। इस प्रकार सन्देह भोर फलक विद्यमान होनसे यह सिद्ध हुआ कि ब्रह्मके अपरोक्ष ज्ञानके लिए वेदान्त वावयोके तात्पर्यका निर्णयात्मक यह प्रस्तुत शास्त्र प्रारम्भ करने योग्य है अर्थात् मुमुक्षुमोको ब्रह्मज्ञानके लिए वेदान्तवाक्योका विचार करना चाहिए ॥ ११-१२॥
भापानुवादसहिता [भ० १ पा० १ अधि० १] "प्रात्मा वा अरे द्रष्टव्य: श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः" [ वृह० २१४१५] इत्यत्राऽऽस्मदर्शनफलमुद्दिश्य सत्साघनत्वेन श्रवणं विघीयते ॥ श्रवणं नाम वेदान्तवाक्यना ब्रह्मणि तात्पर्य निणेतुमनुकूलो न्यायविचारः । तदेतद्विचारविघायकं वाक्यं विषयः। न च-अयं विषय श्लोकयोन संगृह्रोत इति शङ्कयम्। सदेहसंग्रहेणैवार्थातत्संग्रहप्रतीतः । 'ब्रह्मविचारात्मक न्याय- निर्णयात्म शास्त्रमनारभ्यम्, प्रारभ्यं वा' इति संदेहः । पूर्वोत्तरपक्षयुक्तिद्वयं सर्वत्र सदेहबोजमुम्ने पम् । तत्र 'अनारभ्यम्' इति तावत्प्राप्तम् । विषयप्रयो. जनयोरभावात् । संदिग्धं हि विचारविषयो भवति । ब्रह्म स्वसंदिग्धम् । तथाहि तत्कि ब्रह्माकारेण संदिह्यते, प्रात्माकारेण वा। नाऽद्यः। “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" [ तैत्ति०२।१।१] इति वाक्येन ब्रह्मावारस्य निश्चयात् । न द्वितीयः । अप्रत्ययेनाऽऽन्माकारस्यापि निश्चयात् । अध्यस्तात्मविषयत्वेन भ्रान्तोऽहंप्रत्यय इति चेत् । न, अध्यासानिरूपणा । तम.प्रकाशवविरुद्ध- 'भात्मा वा परे द्रष्टव्य,' . ( याज्ञवल्क्य-है मैत्रेयी । प्रात्माका दर्शन करना चाहिए, मान्माका श्रवण-मनन और निदिध्यासन करना चाहिए) ऐसा श्रुतिमे प्रान्मदर्शन को उद्देश्यकर उसके सामनपसे प्रवण ( श्रोतव्यः ) का विधान किया जाता है । वेदान्त वाक्योका ब्रह्मम तात्पर्य निर्णय करने के लिए अनुकूल न्याय (प्रधिकरणो) का विचार श्रवण है। उसके विचारका विधायक वाक्य विषय कहा जाता है। तो यह शहा नहीं करनी चाहिए कि यह विषय उक्त दो श्लोकोद्वारा संग्रहीत नही किया जा माता. क्योकि मन्देहके सग्रहणसे ही मर्याद विषयक संग्रहकी प्रतीति हो जाती है । ब्रह्म विचारामक न्याय निर्णयात्मक यह शास्त्र भारम्भ करने योग्य है अथवा नहीं ? यह सन्देह है। पूर्वपक्षकी युक्ति और सिद्धान्त पक्षको युक्ति इस प्रकार दोनो युक्ति सर्वत्र स देहका वीज समझना चाहिए। यहाँपर प्रस्तुत शास्त्र भारम्भ करने योग्य नहीं है, ऐमा प्राम हुमा, क्योंकि उमक पारम्भ करनेके हेतु भूत विषय पौर प्रयोजन नहीं है। गदिम वस्तु हो विचारका विषय होती है। ब्रह्म तो अदिग्ध है। जैसे- पया ब्रह्म ब्रह्मरूपस मदिग्य है अथवा मा मरूपम ? पहला विकला तो युका नहीं है, पाकिमयं ज्ञानमनन्त ब्रह्म' (ब्रह्म माय शान मोर मनन्त है ) इम वाक्यमे ब्रह्मके स्वापा निश्चय होता है। दूसरा विकल्प भी युक्त नहीं है, कारण-'मैं हूँ इस प्रकार मा पम्पका भी निश्चय है । पदिपहो कि पात्मविषयक यह 'मह' प्रतीति देह मादि प्रनामामे अभ्यस्त होने प्रान्ति है, तो यह नहीं हो सकता, क्योकि प्रध्यासका निरूपण ही नहीं है। यतार और प्रागके समान परसर विरोधी स्वभाववाले पापौर चेतन देह पोर पा मारा मुक्ति मोर रजतके ममान परसर वाचम्या नामका [अ० १ पा० १ अधि० १ ] वैवासिन्यायमाला स्वभावयोजंडाजडयोदेहात्मनो शुक्तिकारजतबदन्योन्यतादात्म्याध्यासो न निरूपयितुं शक्यते । तस्मादभ्रान्ताभ्या श्रुत्यहप्रत्ययाभ्यां निश्चितस्यासंदिग्ध- त्वाद्विचारस्य न विषयोऽस्ति । नापि प्रयोजनं पश्यामः। उक्तप्रकारेण ब्रह्मा- त्मनि निश्चितेऽपि मुक्त्यदर्शनात् । तस्मात-ब्रह्म विचारानहम्' इति शास्त्र- मनारम्भरणीयम्, इति पूर्वपक्षः। अनौच्यते--शास्त्रमारम्भरणीयम् । कुतः। विषयप्रयोजनसद्भावात् । श्रुत्यहंप्रत्यययोविप्रतिपत्त्या संदिग्धं ब्रह्मात्मवस्तु । "अयमात्मा ब्रह्म" [ बह० २।५ । १६] इति श्रुतिरसङ्ग ब्रह्माऽत्मत्वेनोपदिशति । 'अहं मनुष्यः' इत्याचबुद्धिहतादात्म्याध्यासेनाऽऽत्मानं गृह्णाति । अध्यासस्य च दुनिरूपण- त्वमलंबाराय । तस्मात्संदिग्धं वस्तु विषयः । तन्निश्चयेन मुक्तिलक्षणप्रयोजन श्रुत्या विद्वदनुभवेन च प्रसिद्धम् । तस्मात् वेदान्तवावयविचारमुखेन ब्रह्मणो विचारार्हत्वाच्छास्त्रमारम्भणीयम् इति सिद्धान्तः ।। ११-१२ ॥ निरूपण नहीं किया जा सकता। इसलिए 'असलो ह्ययं पुरुप.' ( यह पुरुप प्रसङ्ग है ) "अयमात्मा ब्रह्म' 'यह प्रात्मा ब्रह्म है, 'मैं हूँ' इस प्रकार अभ्रान्त श्रुति और भनुभवसे निश्चितका सन्देह नहीं होता, मतः वह विचारका विषय नहीं है। प्रयोजन भी नही देखते हैं । उक्त प्रकारसे प्रात्मा ब्रह्म है ऐसा निश्चित होनेपर भी मोक्षरूप फल दिखाई नहीं देता है अर्थात् जन्म-मरणात्मक संसारको निवृत्ति नहीं होती। इमलिए 'ब्रह्म विचार करनेके योग्य नहीं अर्थात् यह प्रस्तुत शास्त्र प्रारम्भ करने योग्य नहीं है । यह पूर्वपक्ष है। इसपर कहते है-यह प्रस्तुत शास्त्र भारम्भ करने योग्य है। किससे ? इसमे कि विषय और प्रयोजनका सद्भाव है । श्रुति और 'अह' प्रत्ययको विरुद्ध प्रतीतिसे ब्रह्मात्म वस्तु संदिग्ध है। (यह प्रात्मा ब्रह्म है ) यह श्रुति अमङ्ग ब्रह्मको पात्मरूपमे उपदेश करती है । 'मै मनुष्य हूँ' इत्यादि 'मह' बुद्धि देह तादात्म्य अध्याससे प्रात्माका ग्रहण करती है । अध्यासका दुष्कर निरूपण तो अलेकारके लिए है अर्थात् अध्यामका दुष्कर निरूपण तो भूषण है दूषण नही। इसलिए सदिग्ध वस्तु विषय होती है। सदिग्ध वस्तु के निश्चयसे मोक्षरूप* फल वा विद्वान्के अनुभवसे प्रसिद्ध है । इसलिए वेद न्त- वाक्योके विचारद्वारा ब्रह्म विचारके योग्य है, अतः यह प्रस्तुत शास्त्र आरम्भ करने योग्य है। यह सिद्धान्त है ।। ११-१२ ।। * 'ज्ञानादेव तु कैवल्यम्' (मोक्ष तो ब्रह्मात्मज्ञानसे ही होता है) 'तमेव विदित्वाऽति- मृत्युमेति नान्यभन्या विद्यतेऽयनाय' (आत्माको ब्रह्मरूपसे जानकर ही मृत्युका १२ भापानुवादसहिता [अ०१ पा० १ अधि०२] (द्वितीये ब्रह्मणो लक्षणाधिकरणे सूत्रम् ) [२ 'जन्माधिकरण] जन्मासस्य यतः॥२॥ द्वितीयाधिकरणमारचयति- लक्षणं ब्राह्मणो नास्ति तिवाऽस्ति नहि विद्यते। जन्मादेरन्यनिष्ठत्वात्सत्यादेश्चाप्रसिद्धित: ॥१३॥ ब्रह्मनिष्ठं कारणत्वं स्यालक्ष्म स्रग्भुजङ्गवत् । लौकिकान्येव सत्यादीन्यखण्ड लक्षयन्ति हि ॥ १४ ॥ द्वितीय प्रधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-ब्रह्मका लक्षण हो सकता है अथवा नहीं ? पूर्व पक्ष-जन्मादि अन्यकेजगत्के धर्म है उनका ब्रह्मके माप क्या सम्बन्ध है और लोक प्रमिद्ध मत्य प्रादि भिन्न भिन्न पर्यो के वाचक हैं, उनसे अबण्ड ब्रह्म कैमे मिद होगा, इसलिये अप्रसिद्ध सन्यादि ग्रह्मरा लक्षण युक्त नहीं है। प्रतः ब्रह्मके तटस्थ और स्वरूप दोनो लक्षण नहीं बन साते । सिद्धान्त-यद्यपि जन्मादि जगन्के धर्म हैं, तो भी उनका कारण ब्रह्म है । जो मर्प है वही माला है, इस बाध समानाधिकरणसे ब्रह्मा तटम्य लाण सिद्ध होता है। अतिक्रमण करता है, मोक्षके लिए अन्य साधन नहीं है) 'भिद्यो हृदयान्यिश्विद्यन्ते सर्वमंशया: । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्ट परावरे (मुण्ड रारा ) ( उम परम पुरुषका साक्षात्कार होनेपर ब्रह्मज्ञानोको हृदयग्रन्थि ( चिजडग्रन्थि ) खुल जाती है, ब्रह्मात्मविषयक सव सन्देह मिट जाते हैं और सब कर्म क्षीण हो जाते हैं ) इयादि सिसे और 'अहं मनुरभवं सूर्यप्रच' (वृह० १।४।१०) ( वामदेव-में मनु हुआ और सूर्य भो) "तदुनमृपिणा गर्ने नु सनन्वेषामवेदमह देवाना जनिमानि विश्वा । शत मा पुर प्रयसोररक्षनर्घ श्वेनो जवमा निरदीयमिति । गर्भ एवंतच्छ- यानो वामदेव एवमुवाच" (ऐ० २१४१५) (गर्भमे रहते हुए ऋषि वामदेवने कहा कि मैं गर्भमे रहता हुआ भी इन सब देवताप्रोको उत्पत्तिको जानता हूँ और प्रौपनिषद् मान्मज्ञान मुझे प्राप्त हो गया है। ज्ञानोदयके पूर्व लोहनिमित सैकडो शृंखलामोसे मैं बन्धा हुअा था। अब जिस प्रकार जालको काटकर वाज-पक्षोविशेष निकल जाता है, उमो प्रकार ज्ञानके प्रभाव से मैं बन्धन मुक्त हुअा हूँ। १. पूर्व प्रधिकरणसे इसको भाक्षेपिकी संगति है।
[अ० १ पा० १ अधि० २] वैयासिकन्यायमाला स "यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत्प्रयन्त्य- भिसंविशन्ति, तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्म" [तैत्ति० ३ । १।१] इति 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" (तैत्ति० २।१ । १) इति वाक्यद्वयं विषय.) प्रयन्ति नियमाणानीत्यर्थः ! त 'श्रूयमाणं ब्रह्मलक्षण न घटते, घटते वा' इति संशयः । न घटते। तथा हि- जन्मादिकं तल्लक्षणम, उत सत्यादिकम् । नद्यः । तस्य जगनिष्ठत्वेन ब्रह्मसंबन्धाभावत् । द्वितीयेऽपि लोकप्रसिद्धस्य मत्यज्ञानादे: स्वीकारे भिन्नार्थवादखण्डं ब्रह्म न सिध्येत् । अप्रसिद्धस्य तु सत्यादेर्लक्षणत्व- मयुक्तम् । तस्मात्-तटस्थलक्षणं स्वरूपतक्षरणं च न विद्यते। अत्रोच्यते-पल्लक्षणं रूपानन्तभूतं सत्पदार्थान्तरव्यवस्थाहेतुः, तत्तटस्थ- लक्षणम् । जन्मादेरन्यनिष्टत्वेऽपि तत्कारणत्वं ब्रह्मणि कल्पनया संबद्धं तटस्थ- लक्षणां भविष्यति । "यो भुजग. सा वक्" इतिवत्। 'यज्जगत्कारणं तद्ब्रह्म' इति कल्पितेनापि वस्तुनोपलक्षयितुं शक्यत्वात् । भिन्नार्थानामपि पितृमुतभ्रा- भिन्न भिन्न पर्थवाची लौकिक सयादि भी प्रखण्ड ब्रह्मका लक्षित करते हैं प्रर्थात् उनका ब्रह्ममे ही पर्यवसान है। इससे स्वरूप लक्षण सिद्ध होता है। प्रत्यक्ष प्रादि प्रमाणोंसे प्रतीयमान इम जगत्का अभिन-निमित्तोपादानकरण ब्रह्म है ॥ १३-१४ ।। 'यतो वा इमानि भूतानि' ( जिमसे ये मम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं, जिमसे उत्पन्न हुए जोषित रहते हैं, जिसमें मरते हुए-लय होते प्रवेश करते हैं, उम्की जिज्ञासा परो, वह ब्रहा है ) 'मन्य' (ब्रह्म सत्य ज्ञान और मनन्त है ) ये दो वाक्य इस प्रधिकरणके विषय हैं। प्रयन्ति-'मरते हुए' यह अर्थ है । यहाँ सुना हुआ ब्रह्मका लक्षण घट सस्ता है अथवा नहीं ? यह संशय है । पूर्वपक्षी-नही घटता, जैसा कि क्या जन्मादि ब्रह्मका लक्षण है अथवा सयादि । पहला तो नहीं हो सकता, क्योकि जन्मादि जगत्के धर्म है उनका ब्रह्मके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है । दूसरा ये भी लोकप्रसिद्ध मन्यादि स्वीकार करनेपर मी भिन्न प्रर्थवाची हैं, मत: उनमे प्रखण्ड ब्रह्म सिद्ध नहीं होगा। इसलिये प्रसिद्ध मत्यादि ब्रह्मका लक्षण युक्त नहीं है। इसमे ब्रह्मके तटस्थ लक्षण और स्वरूप लक्षण नहीं हो सकते । सिद्धान्ती-इसपर कहते हैं जो लक्षण स्वरूपके अन्तर्भूत न होकर अन्य पदायों के व्यावृत्तिका हेतु हो वह तटस्थ लक्षण है। यद्यपि जन्मादि जगत् में रहते हैं तो भी उनका कारण ब्रह्म है, इस कलनासे सम्बद्ध तटस्थ लक्षण हो जायगा। जैसे जो सर्प है वह माला है । 'जो जगत्का कारण है वह ब्रह्म है। इस प्रकार कलित वस्तुसे भी उपलशित हो सकता है। जैसे भिन्न भिन्न अर्थवाचो पिता, पुत्र, भ्राता, जामाता १४ भाषानुवादसहिता [म. १ पा० १ मधि०२] जामात्रादिशब्दानामेदेवदत्तपर्यवसायित्वे यथा न विरोध., तथा लोप सिट- मिन्नार्थवाचिस-पादिशब्दानामराण्डब्रह्माययमायित्वे स्वपलक्षामिदिः। इत्युभयमप्युपपन्नम् ॥ १३ १४ ॥ (मृतीये ब्रह्मणो वेदवर स्ववेदेष मेयताधिकरणे सूत्रम्) । [ ३ 'पास्त्रपोनिस्वापिपरण] शास्रयोनित्यात् ।। ३॥ तृतीयाधिकरणस्य प्रथम वर्णनमारचयति- न वर ब्रह्म वेदस्य विवा पढे, न पर तत् । विरूप नित्यया वाचेत्येवं नित्यत्ववर्णनात् ॥१५॥ वर्ट निःश्वसितायुक्त नित्यत्वं पूर्वसाम्यत । सर्वावभासिवेदस्प पतत्वात्सर्वविद्भयेत् ॥१६॥ "प्रत्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेद, सामवेद " [वृहा २१४१०] इति वाक्यं विपय । 'परग्वेदादिषमस्ति तदेतस्प नित्यमिदस्य ब्रह्मणो निःश्वाम इवायत्नेन मिदम्' इत्ययं । ब्रह्म वेदं वरोति न परोति वा' पादि शब्दोका एक देवदत्तम पर्यवमान होनेपर कोई विरोध नहीं है, वैसे ही नामित भिन्न मर्षवाची सत्पादि शब्दोंका प्रखण्ड ग्रह्मम पर्यवमान होनेसे स्वरूप लावी सिद्धि होती है । इस प्रकार तटस्थ और स्वरूप दोनो सपण युक्त है ॥ १३ १४ ॥ तृतीय प्रधिकरणके प्रथम वर्णको रचना करते है- -ब्रह्म वेदवा कर्ता है कि नहीं। पूर्वपक्ष- 1-'वाचा विरूष नित्यया' इंग श्रुतिमे वेदके नित्यत्व वर्णन होनेसे ब्रह्म वेदका कर्ता नहीं है। सिद्धान्त-वेद ब्रह्मका निश्वास है ऐमा वर्णन होनेसे ब्रह्म वैदका कर्ता है। पूर्व कल्पके समान ही प्रकट होनेसे वेदको नित्य कहा गया है। सारे जगत्ती व्यवस्था पादिको प्रकाशित करनेवाले वेदका वर्ना होनेसे ब्रह्म सर्वज्ञ है ॥ १५ १६ ॥ 'अस्य महतो.' (इम महान् सत्यस्वरूप ब्रह्मका निश्वास स्थानीय है जो यह ऋादेद, यजुर्वेद, सामवेद है) यह वाक्य इस प्रधिकरणका विषय है । जो ऋग्वेद मादि हैं वह इस नित्य सिद्ध ब्रह्मके निश्वासके ममान विना प्रयामके सिद्ध हैं, यह मर्थ है। ब्रह्म वेदको करता है अथवा नहीं करता ? यह सन्देह है। १ पूर्व मधिकरणसे इसको एक फलत्व संगति है। । - [प्र० १पा० १ मधि० ३ ] वैयासिकन्यायमाला इति संदेह । न करोति । वेदस्य नित्यत्वात् "वाचा विरूप नित्यया" इत्यस्मिन्मन्ने विरूप' इति देवता संबोध्य 'नित्यया वाचा स्तुति प्रेरय' इत्येवं प्रार्थ्यते। नित्या वाग्वेद एव । अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयंभुवा । आदी वेदमयी दिव्या यतः सर्वाः प्रवृत्तय. ॥ इति स्मृते.। न वेदकतुं ब्रह्म । इति प्राप्ते, म.--ब्रह्म वेदस्य क भवितुमर्हति, कुत । नि श्वसितन्यायेनाप्रयत्नो- त्पत्यवगमात् "तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋच. सामानि जज्ञिरे" इति, सर्वेयजेहूं. यमानाद्यज्ञशब्दवाच्याद्ब्रह्मणो विस्पष्टमेव वेदोत्पत्तिश्रवणाच्च । अप्रयलोत्पत्त्यै- वार्थषु बुद्धघा रचितै कालिदासादिवाक्यैर्वेललण्यादपौरुषेयत्वम् । प्रतिसर्ग- पूर्वसाम्येनोत्पन्न। प्रवाहरूपेण नित्यता। सर्वजगद्वयवस्थावभासिवेदक स्व- निरूपणेन ब्रह्मरण सर्वज्ञत्वं निरूपितं भवति ॥ १५-१६ ॥ द्वितीयं वर्णकमाह- पूर्वपक्षी 1-ब्रह्म वेदको नहीं करता, क्योकि वेद नित्य है। "वाचा विरूप नित्यया" इम मन्त्रमे 'विरूप' इससे देवताका मम्बोधनकर अर्थात् यह विरूप' शब्द देवताका सम्बोधन है। (नित्य वेदरूपी वाणोसे स्तुतिकर ) इस प्रकार प्रार्थनाकी जाती है। नित्य वाणी वेद ही है । 'अनादिनिधना०' (ब्रह्माने प्रथम प्रनादि और अनन्त नित्य वरिणत वेदरूप दिव्य पाणीकी सृष्टि की जिसमे सारा व्यवहार प्रकाशित हुआ ) यह स्मृति है । प्रतः ब्रह्म वेदका कर्ता नहीं है। सिद्धान्त-ऐमा, प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-वहा वेदका कर्ता होना चाहिए, किससे? इससे कि निश्वसितन्यायसे अप्रयत्नसे उत्पत्तिवा अवगम होता है। 'तस्माद्यतात्सर्वहुत'० ( उस सर्वहुत यज्ञरूपी ब्रह्मसे ऋक् और साम उत्पन हुए ) इस प्रकार सर्व यज्ञोंसे माहूयमान यज्ञ शब्द वाच्य ब्रह्मसे स्पष्टरूपसे वेदोको उत्पत्तिका प्रवण होता है । ईश्वरने वेदोकी विना प्रयासके उत्पत्ति की, इस कथनसे प्रोंमें बुद्धि द्वारा रचित कालिदास प्रादिके वाक्योठे वैलक्षण्य होनेसे वेदोंमें अपौरुषेयत्व सिद्ध होता है अर्थात् मसारी पुरुपोद्वारा रचित वाक्य, पद • पदार्थ ज्ञान पूर्वक होते हैं। परन्तु वेदाकी रचना पूर्व कल्पके समान ईश्वरद्वारा केवल अभिव्यक्ति मात्र होती है, वह मनुष्य वाक्य रचनाके समान नहीं होती, इसलिए वेदोको अपौरुषेय कहा गया है। सम्पूर्ण जगवकी व्यवस्पाके प्रकाशक वेदके कर्तृत्व निरूपणसे ब्रह्ममे सर्वक्षत्व निरूपित होता है ॥१५-१६ ॥ हितीयवर्णक कहते हैं- भाषानुवादसहिता [म० १पा० १ अधि०३] प्रस्त्यत्यमेयताऽप्यस्य किंवा वेदेव मेयता। घटवसिद्धवस्तुत्वाद्ब्रह्मान्येनापि मीयते ॥ १७ ॥ रूपसिङ्गादिराहित्यानास्य मान्तरयोग्यता । तं वोपनिषदित्यादी प्रोफा वेदेव मेयता ॥ १८ ॥ "तं स्वोपनिपदं पुरुषं पृच्छामि" [ वृह० ३।२] इति शारल्यं प्रति याज्ञवल्क्येनोक्तवाक्ये परग्रह्मरूपस्य पृरुपरयोपनिपधत्वं प्रतीयते । तदावयं विषयः । तत्र- ब्रह्मणः प्रत्यक्षादिगम्पत्वमस्ति, न वा' इति संशयः। पूर्वपक्षस्तु विस्पष्टः। रूपरसाद्यभावान्नेन्द्रिययोग्यता। लिङ्गसादृश्यादिराहित्याच नानुमानो. पमानादियोग्यता। 'उपनिषत्स्वेवाधिगनः' इति व्युत्पत्त्या "नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम्" इत्यन्यनिषेधश्रुत्या च वेदेष मेयत्वम् । भाप्यकारैः 'जन्मादि' सूत्रे- 'श्रुत्यादयोऽनुभवादयश्च यथासंभवमिह प्रमाणम्' इत्यन्यमेयत्वमद्रीकृतम्, संशय-ग्रह्म पन्य प्रमाणोसे भी जाना जाता है अपवा येवल वेद प्रमाणसे ही अवगत होता है ? पूर्वपक्ष T-घट मादिके समान सिद्ध वस्तु होनेसे ब्रह्म प्रत्यक्षादि अन्य प्रमाणसे भी ज्ञात होता है। सिद्धान्त-रूप, लिङ्ग प्रादि रहित होनेमे ब्रह्ममें मन्य प्रमाएकी योग्यता नहीं है अर्थात् अन्य प्रमाणका विषय नहीं है, 'त खोपनिषदम्' इत्यादि घुतियोमे ब्रामें केवल वेद ही प्रमाण कहा गया है। तं त्वीपनिषदं ( उपनिषद् प्रतिपाद्य उस पुरपको में पूछता हूँ) इस प्रकार शाकल्यके प्रति याज्ञवल्क्यद्वारा उक्त वाक्यमे परब्रह्मस्प पुरप उपनिषद् वैद्य प्रतीत होता है । इसका 'त त्वो.' यह वाक्य विषय है । उसमे ब्रह्म प्रत्यक्षादि प्रमाणोसे गम्य है कि नहीं ? यह संशय है । पूर्वपक्ष वो स्पष्ट ही है । रूप, रस मादि रहित होनेसे ब्रहा इन्द्रियोद्वारा पानने योग्य नहीं है, लिङ्ग, सादृश्य प्रादि रहित होनेसे उसमें अनुमान, उपमान मादिको योग्यता नहीं है । 'उपनि- पदोसे ही अधिगत होता है, अतः ब्रह्म औपनिषद् है' इस व्युत्पत्तिसे 'नादेदविन्मनुते' (वेदको न जाननेवाला उस ब्रह्मतत्त्वको नहीं जानता ) इस अन्य निषेध श्रुतिसे ब्रह्म केवल वेद प्रमाणक सिद्ध होता है। यदि कहो कि भाष्यकारोंने श्रुदि प्रादि मौर भनुभव मादि यथा सम्भव ब्रह्ममें प्रमाण हैं, हममे अन्य प्रमाण विपया प्रतीकार की है, तो यह ठीक [अ० १ पा०१ अधि० ४] वैयासिकन्यायमाला १७ इति चेत् । बाढम् । प्रथमतः श्रुत्यैव प्रमिते ब्रह्मणि पश्चादनुवादरूपेणानुमानानु- भवयोरजीकारात् । अतो वेदेकमेयं ब्रह्म ॥३॥ ( चतुर्थे वेदान्ताना ब्रह्मकपरत्वाधिकरणे सूत्रम्) (४ समन्वयाधिकरण') तत्तु समन्वयात् ॥४॥ चतुर्थाधिकरणस्य प्रथमवर्णकमाह- वेदान्ताः क देवादिपरा ब्रह्मपरा उत। अनुष्ठानोपयोगित्वात्कादिप्रतिपादका. ॥१६॥ भिन्नप्रकरणाल्लिङ्गषटकाच्च ब्रह्मबोषकाः। सति प्रयोजनेऽनयंहानेऽनुष्ठानतोऽत्र किम् ॥२०॥ स्पष्टौ विषयसंदेही जीवप्रकाशकवाक्यानि कपराणि। ब्रह्मप्रकाशकवाक्यानि देवतापराणि । सृष्टिप्रकाशकवाक्यानि साधनपराणि । तथा सति वेदान्तनाम- नुष्ठानोपयोगित्वं भविष्यति । ब्रह्मपरत्वे त्वनुष्ठानासंभवानिष्प्रयोजनत्वं स्यात् । तस्माद् वेदान्ताः कतृ देवतासाधनप्रतिपादका.। है, क्योकि पहले तो अतिसे ही ब्रह्म भवगत हुआ पश्चात् मनुवादरूपसे अनुमान मोर अनुभवको मङ्गीकार किया है । अतः ब्रह्म केवल वेदसे ही जानने योग्य है ।। १७.१८॥ चतुर्थ प्रधिकरणका प्रथम वर्णक कहते हैं--- सन्देह-वेदान्त कर्ता, देवता आदि परक हैं अर्थात् वेदान्तवाक्य कर्ता, देवता प्रादिके प्रतिपादनद्वारा कर्मके अङ्गभूत हैं अथवा स्वतन्त्र ब्रह्म प्रतिपादन परक है? पूर्वपक्ष-वेदान्त स्वर्गादिक साधनभूत यज्ञादि अनुष्ठानमे उपयोगी कर्ता देवता प्रादि परफ हैं, साक्षात् ब्रह्म परक नहीं। सिद्धान्त-वेदान्त कर्मकाण्डके प्रकरणमे नही है, किन्तु उनका प्रकरण भिन्न है भोर तात्पर्य परिचायक उपक्रमादि पड़ियप हेतुप्रोसे भी वेदान्त साक्षात् ब्रह्मके हो प्रतिपादक हैं। अनर्थ निवृत्तिरूप प्रयोजनके विद्यमान होनेपर ब्रह्मका प्राधान्येन प्रतिपादन निष्फल नहीं है। वेदान्तोंको यज्ञादि अनुष्ठानोंमें उपयोगी का, देवता मादि द्वारा कोका अङ्ग क्यों माना जाय । विषय और सदेह स्पष्ट हैं, जोद प्रकाशक वाक्य कर्तुपरक हैं और ब्रह्म प्रकाशक धाक्य देवता परक हैं । सष्टिपरक वाक्य साधन परक हैं । ऐसा होनेपर वेदान्त (उपनिषद् १. पूर्व सूत्रके द्वितीय वर्णकमे इसकी माक्षेप संगति है, पूर्व अधिकरणसे इस द्वितीय वर्णकको प्रसंग संगति है। २ भाषानुवादसहिता [म० ११०१ पधि० ४] पत्रोच्यते-ब्रह्मपरा वेदान्ताः। कुतः। मिनप्रकरणपठिताना वेपो क. दिप्रतिपादकतया कर्मशेषत्वासंभवात् । तापनिश्चयहेतुलिरुपयेन महापर. स्वसंभवाच्च । लिमपट्र्फ पूर्वाचार्येदर्शितम्- उपक्रमोपसंहारावम्यासोऽपूर्वता फलम् । अर्थवादोपपत्ती च लिन तात्पर्यनिश्चये ॥ इति । "सदेव सोम्येदमग्र मासीत्" इत्युपनमः । "ऐतदारम्पमिदं सर्वम् । तत्सत्यं स मात्मा तत्त्वमसि" इत्युपसंहारः। "तयोग्रंह्मविषयत्वेनेकरूप्यमेकं लिनम् । मसकूत् "तस्वमसि'' इत्युक्किरभ्यासः । मानान्तरागम्यत्वमपूर्वस्वम् । एक. विज्ञानेन सर्वविज्ञानं फलम् । उत्पत्तिस्थितिप्रलयप्रवेशानियमनानि पश्चार्ष- वादाः । मृदादिदृष्टान्ता उपपत्तयः । एतेलिन ग्रह्मपरत्वं निश्चयम् । न चानु- वाक्य) अनुष्ठानके उपयोगी होंगे। वेदान्त ब्रह्म परफ होनेपर अनुष्ठानमें उपयोगके असंभव होनेसे निष्प्रयोजन होंगे। इसलिए वेदान्त कर्ता, देवता पौर साधन प्रतिपादक हैं। सिद्धान्ती-इसपर कहते हैं- वेदान्त ब्रह्म परक हैं। किससे ? इससे कि उनके भिन्न प्रकरणमें पठित होनेसे कर्ता मादि प्रतिपादनद्वारा मंके मन नहीं हो सकते । तात्पर्य निश्चयके हेतु छः लिङ्गोसे ब्रह्म परक ही संभव है। लिङ्ग पूर्वापार्योद्वारा दिखलाये गये है-'उपक्रमो.' ( उपक्रम, उपसंहार, पम्यास, पर्वता, फल, पर्षवाद, उपपत्ति तात्पर्य के निश्चयमें ये लिङ्ग हैं) 'सदेव.' (हे सोम्य श्वेतकेतु । उत्पत्तिके पूर्व यह सब सत् ही पा) यह उपक्रम है । 'एतदात्म्यमिदं सर्वम्०' (यह सब मात्मा है, वह सत्य है, वह मात्मा है, वह तु है) यह उपसंहार है। ये दोनों ब्रह्म विषयक होने से एक रूप हैं, पत: एक लिङ्ग है। 'तत्त्वमसि' का अनेक वार, पुनः पुनः (६ यार ) कपन पन्यास है। ब्रह्म वेदान्त अतिरिक्त प्रत्यक्षादि अन्य प्रमाणोंसे पगम्य है यह पपूर्वता है। एकके विज्ञानमे मबका शान फल है । उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय, प्रवेश और नियमन ये पांच अर्थवाद' हैं। मृत्तिका :पादि दृष्टान्त [जैसे एक मृत्तिका पिण्डके शानसे उत् कार्य घटादि सबका ज्ञान होता है, वैसे ही एक प्राके ज्ञानसे तदभिन्न भोक्ता, योग्य सबका ज्ञान हो जाता है ] उपपत्ति-युक्ति हैं। इन लिनोसे वेदान्त ब्रह्म परक है ऐसा हम निश्चय करते हैं, ] कर्मानुष्ठानके विना प्रयोजन ( फल ) नहीं है, यह कयन युक्त १. 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति' ( तैत्ति० ३।११) (जिससे ये सब प्राणी उत्पन्न होते है, जिससे उत्पन्न हुए शौमित रहते हैं, जिसमे मरते-लय होते प्रवेश करते हैं ) इस श्रुतिम ब्रह्मवै जगदकी [म०१ पा० १ मधि० ४ ] वैयासिकन्यायमाला १६ ठानमन्तरेण प्रयोजनामावः। 'नायं सर्पः' इत्यादाविव बोधादननिवृत्तेः संभवात्। द्वितीयं वर्णकमाह- प्रतिपत्ति विधित्सन्ति प्रह्मण्यवसिता उत। शासत्वात विधातारो मननादेश्च कीर्तनात् ॥२१॥ नाकतन्त्रेऽस्ति विधिः शानत्वं शंसनादपि। मननादिः पुरा बोधाद्ब्रह्मण्यवसितास्ततः ॥ २२ ॥ एकदेशी मन्यते ब्रह्मपरत्वेऽपि वेदान्ता न ब्रह्मण्येव पर्यवस्यन्ति । कि तहि पारोक्ष्येण ब्रह्मतत्त्वं प्रतिपाद्य पश्वादपरोक्षप्रतिपत्ति विदधति तथा च सति वेदान्ताना शासनाच्छास्त्रत्वमुपपद्यते। किंच 'श्रोतव्यः' इति श्रवणं नहीं है, क्योकि मे (यह सर्प नहीं है) इस ज्ञानसे भ्रान्ति जनित मयादिको निवृत्तिरूप फल देखा जाता है । वैसे ही जीव ब्रह्मक्य बोधसे यह प्रज्ञान जनित दुःखोको मस्यन्त निवृत्तिरूप फल संभव है ।। १६-२० ।। द्वितीय वर्णकको कहते हैं- सन्देह-वेदान्त वाक्य ( मात्मा वा भरे द्रष्टव्यः ) उपासनाका विधान करते हैं अथवा ब्रह्ममे उनका तात्पर्य है। पूर्वपक्ष--शासनसे वेदान्त, शास्त्र कहा गया है । 'पात्मा वा मरे षोतव्यः' इस प्रकार वेदान्त उपासनाके विषायक है, क्योकि 'श्रोतव्यः' से श्रवणका विधानकर 'मन्तव्यः' मादिसे मननादिका कथन है। तो इससे सिद्ध होता है कि वेदान्त उपासना परक हैं। सिद्धान्त--जो कर्ताके अधीन नहीं वह विधि नही हो सकती, सिद्ध वस्तुके कथनसे भी शास्त्रत्वको उपपति होती है। तत्त्वज्ञानके पूर्व मननादिका विधान है, इससे वेदान्त ब्रह्ममें ही तात्पर्यसे पर्यवसित है। एकदेशी मानते है-ब्रह्म परक होनेपर भी वेदान्त ब्रह्ममे ही पर्यवसित नही होते । किन्तु परोक्षरूपसे ब्रह्मतत्त्वका प्रतिपादन कर पश्चात् अपरोक्ष ज्ञानका विधान उत्पत्ति, स्थिति पर तय कहे गये हैं। 'तरसृष्ट्वा तदेवानुप्राविशद' (तैत्ति० १०६) ( इस सबकी रचनाकर उसमें प्रवेश किया ) यह ब्रह्मकी प्रवेश श्रुति है। 'यस्य पृथिवी शरीरं यो पृथिवीमन्तरो यमयत्येष त प्रात्मान्तर्याम्यमृतः' (बृह० ३१७१३) (जिसका रिपती, शहरीर है, जो उसके अन्तर रहकर पृथिधीका नियमन करता है वह तेरा पात्मा मन्तर्यामी ममत है ) यह नियमन प्रति है। इस प्रकार उत्पत्ति, स्थिति, लय, प्रवेश मौर नियमन पांच भर्थवाद हैं - मापानुवादसहिता [म०१ पा० १ प्रपि०५] शब्दज्ञानात्मकं विधायाय "मन्तव्यो निदिध्यासितव्य." इत्यनुभवज्ञानात्म मननादिवं स्पष्टमेव विधीयते। तस्मात्-प्रतिपत्तेविघातारो येदान्ताः, इति प्राते- यूम:-न प्रतिपत्तेनिधिः संभवति । तुंमवतुंमन्यपा का समापयत्याद- पुरुषतन्मत्वात् । पानत्वं तु नानुष्ठे यशासनादेर नियतम् । सिद्धवस्तुसंस- नेनापि तदुपपत्ते.। शादशाने जाते पश्चादनुभवारमयं मननादिवं विधीयत इति वक्तुं न युक्तम् । 'दशमस्त्वमसि' इतिवच्छब्दस्यैवापरोक्षानुभवजनक स्वेन पान्दवोधात्पुरेवासंभावनादिनिवृत्तये व्यापाररूपस्य पतन्त्रस्य मननादेवि. धानात् । तस्मात् "तत्त्वमसि' इत्यादयो वेदान्ता ब्रह्मण्यवसिताः॥४॥ (पञ्चमे ब्रह्मण एव सग्यश्वाच्यताधिकरणे पूत्राणि-) [५ सित्यधिकरण मू० ५-११] ईतते शब्दम् ॥ ५॥ गोपरचेन्नाऽऽत्मशब्दान् ॥ ६॥ सन्निष्टस्य मोतोपदेशात् ।। ७ ॥ हेयत्वावचनाच ॥ ८ ॥ स्वाप्ययात् ॥६॥ गतिसामान्यात् ॥१०॥ श्रुतत्वाच ॥११॥ पञ्चमाधिकरणमारचयति- तदेवतेतिवाक्पेन प्रधानं ब्रह्म वोच्यते । जानक्रियाशक्तिमत्वात्प्रधान सर्ववारणम् ॥ २३ ।। करते हैं, ऐसा होनेपर वेदान्तोको शासन शास्त्रत्व उपपन्न है । विज्ञ (श्रोतव्यः) इस प्रकार 'पवण' शब्द ज्ञानात्मक विमान कर मनन्तर मन्तव्यः निदिध्यासितव्यः' (मनन पौर निदिध्यासन करने चाहिए ) इस प्रकार अनुभव ज्ञानामक मननादिता स्पष्ट ही विधान किया जाता है। इसलिए येशन्त उपासनाके विधायक हैं। ऐमा प्राप्त होनेपर- सिद्धान्ती-हम कहते हैं-यहाँ उपामनाकी विधि नहीं हो सकती। विधिक करने न करने अथवा भन्यया करने में पुरुप समर्थ नहीं है, क्योंकि दिघि पुरुषके मघौन नहीं है । यह भी कोई नियम नहीं है कि केवल मनुष्ठेयके शासनसे ही शास्त्रत्व है। सिद्ध वस्तुके कथनसे भी शास्त्रत्व उपपन्न हो सकता है। शब्द ज्ञान उपन्न होनेपर पश्चात् अनुभवात्मक मननादिका विधान किया जाता है, यह फयन युक्त नहीं है, क्योकि ''दशमस्त्वमसि' ( दसवां तुम हो ) इसके समान शन्दको ही अपरोक्ष अनुभवके जनक होनेसे शाददोघसे पूर्व प्रमभावना पौर विपरीतभावनाको निवृत्तिके लिए कंकि मयीन व्यापाररूप मननादिका विधान है। इसलिए 'तत्त्वमसि' मादि वेदान्त ग्रामें हो वात्पर्य से पर्यवसित है ।। २१-२२ ।। १. पूर्वोक्त विषयका मनुवादकर भाक्षेपरूप भवान्तर संगठि कहते हैं।
- [[अ० १ पा० १ अधि०५ } क्यासिकन्यायमाला २१ ईक्षणाच्चेतनं ब्रह्म क्रियाज्ञाने तु मायया। आत्मशब्दात्मतादात्म्ये प्रधानस्य विरोधिनी ॥२४॥ छान्दोग्ये षष्ठाध्याये-'सदेव सोम्येदमन आसीदेकमेवाद्वितीयम्' इति प्रस्तुत्य 'तदक्षत बहु स्या प्रजायेय' इति 'तत्तेजोऽसजत' इति श्रूयते । तत्र सांख्या मन्यन्ते-सच्छब्दवाच्यं सर्वजगत्कारणं प्रधानम् । न तु ब्रह्म, प्रधानस्य सत्त्वगुणयुक्ततया परिणामितया च ज्ञानशक्तिक्रियाशक्तिसंभवात् । निगुणस्य कूटस्थस्य ब्रह्मणस्तदसंभवातदिति । अत्रोच्यते-ईक्षितृत्वश्रवणाच्वेतनं ब्रह्म सच्छब्दवाच्यम् । अचेतनस्य प्रधानस्येक्षितृत्वायोगात् । ज्ञानक्रियाशक्ती तु ब्रह्मरिण मायया संभविष्यतः किंच 'अनेन जीवेनाऽऽत्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवारिण' इति नामरूप- पांचवे प्रधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-'तदक्षत' यह वाक्य प्रधानको जगत्का कारण कहता है अथवा ब्रह्मको ? पूर्वपक्ष-'ज्ञानशक्ति भौर क्रियाशक्तिशाली होनेसे प्रधान ही जगत्का कारण है' निगुण कूटस्थ ब्रह्म नहीं। सिद्धान्ततिमे ईक्षण कर्ता ही जगतका कारण कहा गया है, इससे चेतन ब्रह्म ही जगतका कारण है। अति अप्रतिपादित अचेतन प्रधानमे ईक्षणकर्तृत्व सभव नहीं है। ब्रह्ममे ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति मायासे हैं। यदि अचेतन प्रधान जगत्का कारण माना जाय तो जगत् कारणमे प्रात्मशब्दका प्रयोग और तादात्म्यका उपदेश विरुद्ध हो जायगा। छान्दोग्यके छठे अध्यायमे 'सदेव सोम्येदमन' (हे मोम्य श्वेतकेतु । उत्पत्तिके पहले यह सब एक अद्वितीय सत् ही था ) ऐमा प्रस्तुतकर 'तदक्षत०' ( उसने ईक्षण किया, बहुत होऊ, उत्पन होऊ उसने तेजको उत्पन्न किया ) ऐसी ति है। इसपर साख्य मानते हैं-जगत्का कारण सत् शब्द वाच्च प्रधान है ब्रह्म नहीं, क्योकि प्रधान सत्त्व गुण युक्त और परिणामी होनेसे उसमे ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्तिका संभव है। निगुण कूटस्थ ब्रह्ममे उनका संभव नहीं है। यह पूर्वपक्ष है । सिद्धान्ती-इसपर कहते है-(तदक्षत ) श्रुतिमे ईक्षण कतृत्व श्रवणसे चेतन ब्रह्म ही सत् शब्द वाच्य है, क्योकि अचेतन प्रधानमे ईक्षितृत्व पयुक्त है। यदि कहो कि निर्गुण निष्क्रिय ब्रह्ममे ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्तिका संभव नहीं है, तो इसका समाधान यह है-ज्ञानशक्ति मोर क्रियाशक्ति ब्रह्ममें मायासे हो जायगी। दूसरी बात-'मनेन जीवना०' ( उस परदेवताने विचार किया कि मैं इस जीवरूप २२ भाषानुवादसहिता [भ०१ पा० १ मषि०६] व्याकर्ती जगतारणदेवता स्ववाचकेनामशब्देन चेतनं जीवं व्यपदिशति । तथा 'तत्त्वमसि' इति चेतनस्य श्वेततोगत्कारणतादात्म्यं गुरुरुपदिशति । तदुभयमप्पचेतनस्य प्रधानस्य जगत्कारणत्वे विरुध्यते । तस्मात्-चेतनं ब्रह्म सपन्देनोच्यते ॥५॥ (पप्ठे ब्रह्मण मानन्दमयताधिकरणे मूत्राणि-" (६ मानन्दमयाधिकरण मू० १२-१६) आनन्दमयोऽभ्यासात् ॥ १२॥ विफारशब्दान्नेति चेन्न प्राचुर्यात् ॥ १३ ॥ तदेतुव्यपदेशाच्च ॥ १४ ॥ नेतरोऽनु- पपत्तेः ।। १५॥ मान्नवर्णिकमेव प गीयते ॥ १६ ॥ भेदव्यपदेशाच्च ॥१७॥ कामाच्य नानुमानापेक्षा ।।१८।। तस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ॥ १६ ।। पाठाधिकरणमेवदेशिमतेनाऽऽह- संसारी ब्रह्म वासनन्दमय: संसायंयं भवेत् । विकारार्थमयटदादात्प्रियायवयवोचितः ॥ २५ ॥ अभ्यासोपक्रमादिभ्यो ब्रह्मानन्दमयो भवेत् । प्राचुर्यार्थो मयटशब्दः प्रियाद्याः स्युरुपाधिगाः ॥ २६ ॥ अपनी मात्मासे प्रवेश कर नाम भोर रूपको प्रकट करूं) इस प्रकार युतिमें नाम रूपको प्रकट करनेवाले जगत्के कारणरूप देवता (या) ने स्व याषक पात्मशम्दसे घेतन जीवका व्यपदेश (निर्देश ) किया है। इसी प्रकार 'तत्त्वमसि' (वह तू है ) इम तिमें चेतन श्वेतकेतुको गुरू जगत् कारणके तादात्म्य (मभेद) का उपदेश करते हैं। यदि सास्य सिद्धान्तानुसार प्रचेतन प्रधानको जगतका कारण माने तो उक्त दोनों बातें विरुद्ध होगी । इमलिए चेतन ब्रह्म ही (सदेव सोम्य ) यहाँ सत् शब्दसे कहा जाता है ।। २३-२४ ॥ छले मधिकरणको एकदेशो मवसे कहते है- (प्रथम वर्णक) सन्देह-पानन्दमय जीव है भयका ब्रह्म ? पूर्वपक्ष-विकारार्थक 'मयदप्रत्ययके योगमे तया प्रिय मादि प्रवयवोके कथनसे मानन्दमय जीव है। सिद्धान्त अभ्यास, उपक्रम मादि हेतुमोसे मानन्दमय ब्रह्म ही है । यहाँ 'मयट्' प्रत्यय का प्रयोग प्राचुर्य अर्थ में है और प्रिय आदि अवयव भानन्दमयके उपाधिरूप विज्ञानमयके हैं।
- [म०१ पा० १ मधि०६] | वैयासिकन्यायमाला २३ तैत्तिरीयके देहप्राणमनोबुद्धपानन्दरूपा अन्नमयप्राणमयमनोमयविज्ञानम. पानन्दमयसंज्ञकाः पञ्च पदार्थाः क्रमेणकैकस्मादान्तराः पठिताः। तत्र-'सर्वान्तर 'मानन्दमय: संसारी, परमात्मा वा' इति संदेहः। 'संसारी' इति प्राप्तम् । कुतः ? मानन्दस्य विकार मानन्दमय इति ध्युत्पत्ते संसारिणि संभवात् । अविकृते तु परमात्मन्यसौ न संभवति । किंच तस्य प्रियमेव शिरः । मोदो दक्षिणः पक्षः । प्रमोद उतरः पक्षः । प्रानन्द आत्मा । ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा' (२५) इत्यानन्दमयस्य पश्चावयवा उच्यन्ते। अपेक्षितविषयदर्शनजन्यं सुखं प्रियम् । सल्लामजन्यो मोद । तद्भोगजन्यः प्रमोदः। सुषुप्त्यादी भासमानमज्ञानोपहितं सुखसामान्यमानन्दः । निरुपाधिकं सुखं ब्रह्म। प्रियादीनां पञ्चावयवाना शिर मादिरूपत्वं प्रतिपत्तिसोकर्याय कल्प्यठे। पक्षित्वेन कल्पितस्याऽनन्द- मयस्य शिरः पक्षौ च, इत्यवयवत्रयम् । प्रारमशब्देन मध्यशरीरं चतुर्थावयवत्वे- नोच्यते, पुच्छमपरभागः । प्रतिष्ठा पादौ । अयं पञ्चमोऽवयवः । च निरंशस्य परमात्मनोऽवयवा युक्ताः । तस्मात्संसार्यवाऽनन्दमय इत्येवं प्राप्ते- ब्रूमः-प्रानन्दमय: परमात्मा । कुतः १ अभ्यासात् । 'सैपाऽनन्दस्य तैत्तिरीयकमे देह, प्राण, मन, बुद्धि मोर मानन्दरूप भन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और प्रानन्दमय नामवाले पांच पदार्थ ( कोश ) क्रमसे एक-एकके अन्तर पठित हैं । उन सबके ( अन्योऽन्तर पात्माऽनन्दमयर ) प्रान्तर मानन्दमय जीव है अथवा परमात्मा, ऐसा सन्देह है। पूर्वपक्षी 1-प्रानन्दमय जीव है, ऐसा प्राप्त होता है । किससे ? इससे कि भानन्द- का विकार आनन्दमय है, इस प्रकारको व्युस्पत्तिसे मानन्दमय संसारी हो सकता है। मविकृत परमात्मामे यह नहीं हो सकता। दूसरी बात-'तस्य प्रियमेव शिर:०' (पानन्दमयका प्रिय ही शिर है. मोद दक्षिण पक्ष है, प्रमोद उत्तर पक्ष है, प्रानन्द मात्मा है, ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा है ) इस प्रकार प्रानन्दमयके पांव अवयव कहे जाते हैं। ईन्छिन विषयके दर्शन जन्य सुख प्रिय है, उसके लाभसे जन्य सुख मोद है, उसके भोगसे जन्य सुख प्रमोद है । सुषुप्ति प्रादिमे प्रज्ञानमे मावृत्त भासमान सामान्य सुख मानन्द है । निरुपाधिक सुस्र ब्रह्म है । प्रिय मादि पांच अवयवोमे शिर भादि रूपता शानको सुकरताके लिए कल्पना की गई है । पक्षी रूपसे कल्पित मानन्दमयके शिर मौर दो पक्ष इस प्रकार तीन अवयव । भात्मशब्दसे मध्य शरीर चतुर्थ अवयव कहा जाता है। पुच्छ दुसरा भाग है दोनो पाद प्रतिष्ठा है, यह पांचवा अवयव है। मंगरहित परमात्माके मवयव युक्त नहीं है। इसलिए जीव ही पानन्दमय है । ऐसा प्राप्त होनेपर- सिद्धान्ती कहते हैं-भानन्दमय परमात्मा ही है। किससे ? भन्याससे । 'सैपा०' भाषानुवादरहिता [म. १पा० १ अपि०६] मीमांसा भवति' 'एतमानन्दमयमारमानमुपसंमामति' इत्यादिनानन्दमयोऽभ्य- स्यते । अभ्यासच तात्पपलिनम्। तात्पर्य प येदान्तानां ब्रह्मण्येय-ययो. घाम । किंच 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इति ब्रह्मोपक्रमात्-'इदं सर्वमहनत' इति सर्वस्रष्ट त्वादिभ्यश्चाऽऽनन्दमयो ब्रह्म। न ब्रह्माणि मपदमादानुपपत्तिः, प्राचुर्यापरवर्स मवात् । प्रियाद्यवयवा पपि विपयदर्शनाद्युपापिता मविष्यन्ति । तस्मात्परमारमाऽनन्दमय इत्येक्देगिनां मतम् । इदानों स्वमतानुसारेणाधिकरणं रज्यते- प्रन्यानं स्वप्रधान वा ब्रह्म पुच्छमिति धृतम् । स्यादानन्दमयस्यान्न पुच्छेश्नत्वप्रसिद्धितः ॥२७॥ लाज लासंभवादन पुच्छेनाऽधारलक्षणा। पानन्दमयजीवोऽस्मिन्नाथितोऽतः प्रधानता ॥२८॥ 'ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा' इति य संग्रह्म,तविमानन्दमयस्यानत्वेन निदिश्यते, (यह पानन्दको मोमासा [पूजित-विचार होती है) 'एतमानन्दमयमा०' (उम पानन्दमय मात्माको प्राप्त होता है ) इयादिसे मानन्दमयका प्रम्याम किया जाता है। भम्यास वासर्यका लिङ्ग है । वेदान्तोका तात्पर्य यह्ममें ही है, ऐमा हम यह युके हैं । विघ 'मत्य शानमनन्त ब्रह्म' इस तरह ब्रह्मके उपक्रमसे मोर 'इदं सर्वमहजत.' (यह सब उत्पन्न किया) इम सर्व स्रष्टत्वादिके प्रभ्यामसे मानन्दमय ब्रह्म है । मोर ब्रहामे 'मयट्' प्रत्ययको मनुपपत्ति भी नहीं है, क्योंकि प्राचुर्य मर्पमें भी 'मपद' प्रत्ययका प्रयोग मंभव है। प्रिय मादिभवयव भी विषय दर्शन मादि उपाधिसे हो जाउंग । इसलिए भानन्दमय परमात्मा ही है, यह एक देशियोका मत है। [एक देशो मतमे सूत्रका मयागुत पर्ष किया गया है, मागे सूत्रका लाक्षणिक मर्य किया जा रहा है ] ॥ २५-२६ ।। मब मपने सिद्धान्त भनुमार मधिकरणको रचना करते हैं- (द्वितीय पर्णक) सन्देह-'ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा' इस श्रुतिवाक्यमे उक्त ब्रह्म भन्यके मनपसे प्रतिपादित है आपका स्व प्रधानतासे । पूर्वपक्ष-ब्रह्म मानन्दर्भयका अङ्ग है, क्योकि लोकमे पुच्छ देहके मङ्गल्पसे प्रसिद्ध है। सिद्धान्त-ब्रह्म पानन्दमयकी पूंछ नहीं हो सकती है, इसलिए यहाँपर पुष्य शब्दका लक्षणासे प्राधार मर्य है । भानन्दमय जीव ब्रह्मके माधित है । प्रतः ब्रह्म स्व. प्रधानसे कहा गया है।
। म०१ पा० १ अधि०७] वैयासिकन्यायमाला २५ उत स्वयं प्राधान्येन प्रतिपाद्यत इति संशयः। आनन्दमयस्यावयवत्वेन-इति तावत्प्राप्तम् । लोके पुच्छशब्दस्यावयववाचित्वेन प्रसिदत्वात् । उच्यते-न पुच्छशब्दोऽवयववाची, किंतु लालवाची । न चाऽऽनन्दमयस्य लागलं संभवति । लाशूलस्य गवादिलक्षणान्नमयावयवत्वादानन्दमयस्यावय- वत्वायोगात् । अतः पुच्छशब्देन मुख्यार्थासंभवे सति योग्यतावशादत्राऽऽधारो लक्ष्यते। । ब्रह्म आनन्दमयस्य जीवस्याऽधारः, तत्कल्पनाधिष्ठानत्वात् । न च मानन्दमयः परमात्मा, प्राचुर्यार्थस्वाकारेऽप्यल्पदुःखसद्भावप्रतोते । तस्मात्- जीवाधारो ब्रह्म प्राधान्येन प्रतिपाद्यते। तथा च- 'प्रसन्नेव स भवति, असद्ब्रह्मेति वेद चेत् । अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद सन्तमेनं ततो विदु (तै० २।६ ) इत्यादि ब्रह्माभ्यास. 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' (तै० २१ ) इति ब्रह्मोपक्रम- श्वानुकूलो भवति ॥६॥ ( सप्तमे परमेश्वरस्यैव हिरण्मयपदवाच्यताधिकरणे सूत्रे--)। (७ अन्तरधिकरण सू० २०-२१ ) अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ॥ २०॥ भेदव्यपदेशाचान्य. ॥ २१॥ 'ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा' इम वाक्यमे जो ब्रह्म श्रुत है, क्या वह मानन्दमयके मङ्गरूपसे निर्दिष्ट है अथवा स्वय प्रधानरूपसे प्रतिपादित है ? यह सशय है । पूर्वपक्षी -ब्रह्म प्रानन्दमयके अवयवरूपसे निर्दिष्ट है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योकि पुच्छ शब्द पवयव वाची रूपसे लोकमे प्रसिद्ध है। सिद्धान्ती-कहते है-यहाँ पुच्छ शब्द अवयववाची नहीं है। किन्तु लागुल (पूछ ) वाची है। मानन्दमयको पुच्छ नही हो सकता। क्योकि पुच्छ तो गौ मादि रूप अन्नमयका अवयव है मानन्दमयको प्रवयवका योग नहीं है। प्रत. पुच्छ शब्दसे मुख्यार्थ (पूछ) के प्रमभव होनेपर योग्यतावश यहाँ लक्षणासे प्राधार भर्य है । ब्रह्म प्रानन्दमय जीवका आधार है मौर जीव कल्पनाका मधिष्ठान है। इसलिए मानन्दमय परमात्मा नही है । प्राच्यार्थ स्वीकार करनेपर भी (प्रचुरके विरोधी ) अप दुखके सद्भावको प्रतीति होगी। इसलिए जोवका प्राधार ब्रह्म प्रधानरूपसे प्रतिपादित है । जैसे कि-'प्रसन्न व' (ब्रह्म मसत् है, ऐमा यदि जानना है तो वह प्रसत् ही होता है । 'ब्रह्म सत् है' ऐसा यदि जानता है तो उसे सन्न समु. ) इत्यादि ब्रह्मा अभ्यास है। (ब्रह्मवित् परम तत्त्वको प्राम होता है ) यह ब्रह्मका उपक्रम मनुकूल होता है ।। २७ २८ ॥ सप्तम भधिकरणकी रचना करते हैं- भापानुवादसहिता [ म०१ पा० १ मषि०.] सप्तमाधिकरणमारचयति- हिरण्मयो देवतात्मा किंवाऽसौ परमेश्वरः। मर्यादापाररूपोक्तेदवतात्मैव नेश्वरः ॥ २६ ॥ सात्म्यिात्सर्वदुरितराहित्याच्चेश्वरो मतः । मर्यादाचा उपास्त्यर्थमीशेऽपि स्पुरुषाधिगाः ॥ ३०॥ छान्दोग्यस्य प्रथमाध्याय उद्गीथोपासनायामुपसर्जनान्युपास्यान्यभिधाय प्रधानमुपास्यमभिधातुमिदमाम्नायते-'अप य एपोऽन्तरादित्य हिरण्मय पुरुषो दृश्यते' इति । तत्र-प्रादित्यमण्डले विद्याकर्मातिशयवशाकश्चिज्जीवो देवमा- वमुपेत्य जगदधिकारं निष्पादयन्नवतिष्ठते। ईश्वरश्च सवंगतत्वान्मण्डलेऽपि वर्तते । अतस्तयोः संशयः । तत्र देवतात्मा' इति तावत्प्राप्तम् । कुतः । मर्यादा. धाररूपाणामुच्यमानत्वात् । “ये चामुण्मात्पराञ्चो लोकाः, तेपा चेष्टे देवका- मानां च" इत्यैश्वर्यमर्यादोक्तिः। 'अन्तरादित्ये इत्याधारोक्ति:" "हिरण्मयः' सन्देह-'मथ य एषोऽतरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते' क्या इस अति वाक्यमे पठित यह हिरण्मय पुरुष देवता है पथवा यह परमेश्वर है ? पूर्वपक्ष-उसके ऐश्वर्षकी सोमा, उसके पापार और रूप कहे गये हैं। इससे हिरण्मय पुरुष देवतात्मा ही है, परमेश्वर नहीं। सिद्धान्त-श्रुतिमे सर्वात्मक भौर सर्वपाप रहितत्व कथनसे हिरण्मय पुरुष परमेश्वर ही है। (जीव सर्वात्मक और सर्वपापशून्य नहीं हो सकता ) यद्यपि मर्यादा मादि साक्षात् ईश्वरमे नही हैं, तो भी उपाधिगत मर्यादा मादि ईश्वरमे उपासनाके लिए होंगे। घान्दोग्य उपनिषद्के प्रथम अध्यायमें उद्गीयोपासनामें गौण उपासनापोका विधान- कर प्रधान उपास्यका मभिधान करनेके लिए 'भय य एषोऽन्तरादित्ये०' (पादिस्यमण्डलके मन्तर्गत जो यह हिरण्मय पुरुष दिखाई देता है ) यह युति है। यहाँ मादित्यमण्डलमें विद्या और कर्म के प्रतिशय वश कोई जीव देवभावको प्राप्त होकर जगतके अधिकारका निष्पादन करता हुआ रहता है, और सर्वव्यापक होनेसे मादित्यमण्डलमे ईश्वर भी रहता है, पतः दोनोंमें संशय है। पूर्वपत्ती-'प्रय य एषो' इस वाक्यमें उक्त हिरण्मय पुरुष देवतात्मा है, ऐसा प्राप्त होता है । किमसे ? इमसे कि मर्यादा, प्राधार भोर रूप कहे गये हैं। 'ये चा- मुष्मात्पराश्चो० (मादित्यस्य पुरुष मादित्य लोकसे जो कोई ऊर्ध्व लोक हैं उनका मौर देव भोगोका ईश्वर है ) यह ऐश्वर्य मर्यादाका कथन है । 'अन्तरादित्ये०' यह माघारकी उक्ति है। "हिरण्मयः' (ज्योतिर्मय) यह रूपका कथन है । सर्वेश्वर, सर्वापार, परहित [प०१ पा० १ मधि०८] वैयासिकन्यायमाला इति रूपोक्तिः । न हि सर्वेश्वरस्य सर्वाधारस्य नीरूपस्य परमेश्वरस्यैश्वर्यमर्या- दाधाररूपाणि संभवन्ति । तस्मात्-देवतात्मा, इति प्राप्ते- उच्यते-हिरण्मय ईश्वरो भवेत् । कुतः । सर्वात्मत्वश्रवरणात् । "सेवक, तत्साम, तदुक्यम्, तद्यजुः, तद्ब्रह्म" इति वाक्ये तच्छब्दः प्रकृतं हिरण्मयं पुरुषं परामृश्य तस्य ऋक्सामाद्यशेषजगदात्मकत्वमुपदिश्यते । तच्चाद्वितीये परमेश्वरे मुख्यमुपपद्यते। न तु सद्वितीयायां देवतायाम् ।तथा-'सएप सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदितः" इति श्रूयमारणं सर्वपापराहित्यं ब्रह्मणोऽसाधारणं सिनम् । यद्यपि देवताया. वर्मण्यनधिकाराक्रियमाणकरिष्यमाणपापयोरभावः । तथाऽप्यसुरादिजनितदुःखसद्भावात्तदेतुभूतं जन्मान्तरसंचितदुरितमनुवर्तत एव । मर्यादाधाररूपाणि तूपाधिधर्मतया सोपाधिके परमात्मन्युपास्ये वर्तितुमर्हन्ति । तस्मात्-ईश्वरो हिरण्मयः ॥ ७ ॥ (मष्टमे ब्रह्मण एवाऽऽकाशशब्दवाक्यताधिकरणे सूत्रम् )। (८ अाकाशाधिकरण सू०२२) आकाशस्तल्लिङ्गात् ।। २२ ॥ अष्टमाधिकरणमारचयति- प्राकाश इति होवाचेत्यत्र खं ब्रह्म वाऽत्र खम् । शब्दस्य तत्र रूढत्वाद्वाय्वादेः सजनादपि ॥३१॥ परमेश्वरको ऐश्वर्यमर्यादा, माधार और रूप नही हो सकते। इसलिए 'हिरण्मय पुरुप' देवता ही है । ऐमा प्राप्त होनेपर- सिद्धान्ती--कहते हैं-हिरण्मय ईश्वर होना चाहिए । किससे ? सर्वात्मत्व- श्रवणसे । 'संवा ' ( वही ऋक् , वही साम, वही उक्थ, वही यजु, वही ब्रह्म है ) इस अतिवाक्यमें 'तत्' शब्दोसे प्रकृत हिरण्मय पुरुषका परामर्श कर उसको ऋक् , साम मादि सम्पूर्ण जगदात्मकत्व उपदेश किया जाता है। वह ( जगदात्मकत्व ) अद्वितीय परमेश्वरमे ही मुख्यरूपसे उपपन्न होता है, द्वत सहित देवतामे नहीं। तथा 'स एप'. (वह सब पापोंसे मुक्त है ) यह यमाण सर्वपापरहितत्व ब्रह्मका मसाधारण लिङ्ग है । यद्यपि देवतामे यज्ञादि कर्ममे अधिकार न होनेसे क्रियमाण ( वर्तमान ) मोर भविष्यमें होनेवाले पापोका प्रभाव है, तथापि मसुर मादि द्वारा उत्पन्न दुःखोके सद्भावसे उसके हेतुभून जन्मान्तरमे संचित पाप रहते ही हैं । मर्यादा, प्राधार पौर रूप तो उपाधिके धर्म होनेसे सोपाधिक उपास्य परमात्मामें रहने पाहिए। इससे हिरण्मय परमेश्वर है ।। २६-३०॥ मष्टम मधिकरणको रचना करते हैं- ३० भाषानुवादसहिता [अ०१पा०१ मधि०६] आकाशवाश्यादुत्तरस्मिन्वाक्ये प्रस्तावनाम्नः साम मागस्य देवता प्रस्तोत्रा पृष्टायामुपस्तियत्तरं ददौ । तत्रत्यं वाक्यमेतत्-"प्राण इति होवाच । सर्वारिण हवा इमानि भूतानि प्राणमेवामिसंविशन्ति । प्राणम्युजिहते। सैपा देवता मस्तावमन्वायत्ता" इति । तत्र 'प्राणशब्दार्थो मुखबिलान्ततिवायुः, ब्रह्म वा-इति संदेहः । मुखबिलान्तवर्ती वायुभवेत् । सर्वभूतलयस्य तत्र सुसंपाद- स्वात् । सुषुप्तिकाले सर्वभूतसाराणामिन्द्रियाणां प्राणवायो प्रविलया- दिति प्राप्ते- उच्यते-इन्द्रियमात्रलयपरत्वे व्याख्यायमाने 'सर्वाणि हवा" इत्यसो सर्वशब्दः संकुचित. स्यात् । भावाशशब्दवत्प्राणशब्दोऽपि श्रौतरून्येवकाराम्या ब्रह्मवाचकः । अस्ति हिं प्राणशब्दस्य ब्रह्मरिण श्रौतरूढिः । "प्राणस्य प्राणम्" इत्यत्र ब्रह्मविवक्षया द्वितीयप्राणशब्दप्रयोगात्-ईश्वर. प्राणः ।।६।। ( दशमे-ब्रह्मण एव ज्योतिः पान्दाभिधेयत्वाधिकरणे मूत्राणि )। (१० ज्योतिश्चरणाधिकरण मू० २४-२७) पूर्वपक्ष-सुपुप्तिमे सब भूतोको सार भूत इन्द्रियाँ प्राणवायुमे लीन होती हैं, पतः यहाँ प्राण वायुविकार है। सिद्धान्त-पदि यहाँ इन्द्रिय परक लय मानें तो 'सर्वाणि हवा इमानि' इस सर्व लय अतिका संकोच करना पडेगा। श्रतएव माकाश शब्दके समान प्राण शब्द भी चौतरूढिसे ब्रह्मका ही वाचक है। प्राकाश वाक्यके पनन्तर वाक्यमें प्रस्ताव नामक सामभागके देवताके प्रस्तोताके द्वारा पूछनेपर उपस्ति ( चाक्रयण ) ने उत्तर दिया। वहाँपर यह वाक्य है--'प्राण इति होवाच.' (प्राण है ऐमा उपस्तिने कहा ) 'सर्वाणि ह वा०' (ये सब भूत प्राणमें हो लय होते हैं, प्राणमे ही उत्पन्न होते हैं, वही देवता प्रस्तावमे भनुगत है ) यहाँ प्राण शब्दका प्रर्य मुल छिद्रवर्ती वायु है अथवा ब्रह्म? यह सन्देह है। पूर्वपक्षी-मुख धिद्रवर्ती वायु है, क्योकि मब भूतोका लय उसमें अच्छी तरह संपादन हो सकता है । सुषुप्तिकालमे सब भूतोके सार भूत इन्द्रियोका प्राणमें विलय होता है। ऐसा प्राप्त होनेपर- सिद्धान्ती कहते है-पदि सुषुप्ति अवस्थाको लेकर इन्द्रियमात्र लय परक व्याख्यान करें तो 'सर्वाणि हे वा०' यहाँ यह 'सर्व' पद सकुचित होगा। मतः पाकाश शब्दके समान प्राण शब्द भी श्रौतरूढि और 'प्राणमेव' 'एवकार' के द्वारा ब्रा वाचक ही है। प्राणशब्दको ब्रह्ममें श्रौतरूति है। प्राणस्य प्राणम्' (प्राणका प्राण ) यहाँ परब्रह्म विवक्षासे द्वितीय प्राण शब्दका प्रयोग है । इसलिए प्राण ईश्वर है ॥३३-३४॥
. [अ० १ पा० १ अघि०१०] वैयासिकन्यायमाला ज्योतिश्चरणाभिधानात् ॥२४॥ छन्दोभिधानान्नेति चेन्न तथा घेतोर्पणनिगदात्तथा हि दर्शनम् ॥ २५ ॥ भूतादिपादव्यदेशोपपत्तेश्चैवम् ॥२६॥ उपदेशभेदानेति चेनोभयस्मिन्नविरोधात् ॥२०॥ दशमाधिकरणमारचयति- कार्य ज्योतिरुत ब्रह्म ज्योतिर्दीप्यत इत्यदः। ब्रह्मणोऽसंनिधेः कार्य तेजोलिनवलादपि ॥ ३५ ॥ चतुष्पात्प्रकृतं ब्रह्म यच्छब्देनानुवस्यते। ज्योतिः स्याद्धासकं ब्रह्म लिङ्गं तूपाधियोगतः॥ ३६॥ छान्दोग्यस्य तृतीयेऽध्याये गायत्रीविद्यायो हदयच्छिद्रोपासनमभिधायेद- माम्नायते-"मथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते" इति । तत्र घलोकात्परं दीप्यमान वस्तु किं कार्यरूपं नेत्रानुग्राहकं तेजा, उत ब्रह्म, इति संशयः । 'कार्यम्' इति तावत्प्राप्तम् । ब्रह्मणोऽसंनिहितत्वेन वाक्यस्य ब्रह्मपरत्वायोगात् । दशम मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह -'प्रय यदत. परो दिवो ज्योतिदीप्यते' इस श्रुति वाक्यमे उक्त ज्योति: कार्य ज्योति है अथवा ब्रह्म? पूर्वपक्ष- तब्रह्म मसनिहित है, प्रत 'इदं वाव तदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे ज्योति:' इस अतिमें जठराग्निके साथ अभेदरूप तेजोलिङ्गके बससे अतिमे कार्यज्योति ही कही गई है। सिद्धान्त-'पादोऽस्य सर्वा भूतानि०' इस पूर्व श्रुतिमें चतुप्पाद ग्रहा हो प्रकृत है । उसोको यहाँ 'यदतः परो०' मे 'यत्' शब्दसे अनुवृत्ति होती है, ज्योतिका अर्थ भासक है, ब्रह्म जगत्का भासक है। तेजो लिङ्गको तो उपाधिविशिष्ट ब्रह्ममें कल्पना की जाती है, पता उक्त श्रुतिमे ज्योति ब्रह्म ही है। छान्दोग्योपनिषद्के तीसरे अध्यायमे गायत्री विद्याके हृदय छिद्रकी उपासनाको कहकर पति कहती है-'प्रथ यदतः०' (जो इस चुलोकसे परे ज्योति दीप्त होती है)। यहाँ-धुलोकसे परे जो दीप्यमान वस्तु है क्या वह नेत्रोका सहायक कार्यरूप तेज है प्रपदा ब्रह्म है ? यह संशय है। पूर्वपक्षी-वह कार्यरूप तेज है, ऐसा प्राप्त होता है। क्योकि ब्रह्म मसनिहित है. इससे "मप यदतः परो' यह वाक्य ब्रह्म परक होना युक्त नहीं है । तेजः परक तो उपपन्न होता है । कारण, उसके लिङ्गका सद्भाव हैं । 'इदं' वावः' (वह यही है जो कि पुरुष प ३२ at Makar भाषानुवादसहिता '[म.१पा० १ अषि ११] तेजः परत्वं तूपपद्यते । तल्लिङ्गसद्भावात् । “इदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तःपुरुषे ज्योतिः" इति धूयमाणो जाठराग्न्यभेदस्तेजोलिङ्गम् । अत्रोच्यते-असिद्धोऽ संनिधिः । पूर्वस्मिन्गायत्रोखण्डे-'पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ।' इति चतुष्पदो ब्रह्मणः प्रकृतत्वात्। तस्य चात्र प्रकृतवाचिना यच्छ- ब्देनानुवर्तनात्। 'प्रस्य ब्रह्मणः सर्वाणि भूतान्येकांश:' पादत्रयोपलक्षित- मनन्तस्वरूपं द्योतनात्मके दिवि स्वस्मिन्नेवावतिष्ठत इत्यर्थः । न च ज्योतिः- शब्दस्य ब्रह्मणि वृत्त्यनुपपत्तिः। भासदत्ववाचित्वात् । ब्रह्मणो जगद्धासक- त्वात् । तेजोलिङ्गं त्वौपाधिके ब्रह्मण्यवकल्प्यते । तस्मात्-ज्योतिब्रह्म ।। १० ।। (एकादशे ब्रह्मण एष प्राणशब्दव्युत्पाद्यत्वाधिकरणे सूत्राणि)। (११ प्रतर्दनाधिकरण सू० २८.३१) प्राणस्तथाऽनुगमात् ॥ २८॥ न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेद्ध्यात्मसंबन्धभूमा ह्यस्मिन् ॥ २६ ॥ शखादृष्टया तूपदेशो वामदेववत् ॥ ३० ॥ जीवमुख्यप्राणलिङ्गान्नेति चेन्नोपासात्रैविध्यादाश्रितत्वादिह तद्योगात् ॥३१॥ एकादशाधिकरणमारचयति- (देह ) के भीतर ज्योति है भर्पात् जठराग्नि है ) यह श्रयमाण जठराग्निके साथ मभेद तेजोलिङ्ग है। सिद्धान्ती-इसपर कहते हैं-उक्त प्रनिधि प्रसिद्ध है, क्योंकि पूर्वगायत्री खण्डमें-'पादोऽस्प०' (समस्त प्राणी ब्रह्मका एक पाद (एक अंश) है और इसके सीन पाद मात् पादत्रयमे उपलक्षित ब्रह्मा मनन्तस्वरूप प्रकाशमान द्युलोकमें अपनी-महिमा में प्रतिष्ठित है) म प्रवार चतुष्पाद ब्रह्म प्रवृत है। यहाँ उसकी प्रकरणवाची "यत्' शब्दसे पनुवृद्धि है । सम्पूर्ण प्राणी इस ब्रह्मका एक अंश है, पादत्रयसे उपलक्षित मनन्तस्वरूप प्रकाशमान चुलोकमे स्वमे ही प्रतिष्ठित है) यह श्रुत्पर्प है। ब्रह्ममें ज्योति शब्दको वृत्तिकी मनुपात्ति नहीं है, क्योंकि ब्रह्म भासकत्वका वाचक है, ब्रह्म पगतका 'भासक है । वेगोलिङ्गको भी घोपाधिक ब्रह्ममें कल्पना की जाती है। इसलिए 'यदतःपरी' पहाँ उक्त ज्योति ब्रह्म ही है ।। ३५-३६ ।। १. 'मय यदतः परो दियो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठषु सर्वतः पृष्ट प्वनुत्त मेपूतमेषु लोकप्पिद वाव' (पा. ३१३७ ) (धुसोकसे परे विश्वसे-प्राणिवर्गसे ऊपर, सर्वोत्तम उतष्ट लोगों को ज्योति प्रकाशित होती है वह यही है) २. 'तस्य भासा सर्वमिदं विभाति' (कठ० ६।१५) उसके प्रकाशसे यह सारा जगत प्रकाशित होत है ऐमो पुति भी है।
[भ०१पा०१मपि० ११] वैयासिकन्यायमाला प्राणोऽस्मीत्यत्र वाविन्द्रजीवब्रह्मसु संशयः। चतुरा लिङ्गसद्भावात्पूर्वपक्षस्त्वनिर्णयः ॥ ३७॥ ब्रह्मणोऽनेकलिङ्गानि तानि सिद्धान्यनन्यथा। अन्येपामन्यथासिद्धेव्युत्पाद्यं ब्रह्म नेतरत् ।। ३८ ॥ कौषीतकोनामुपनिषदीन्द्रप्रतर्दनाख्यायिकायां प्रतदनं प्रतीन्द्रो वकि- 'प्राणोऽस्मि प्रजात्मा तं मामायुरमृतमित्युपास्व' इति । तत्र चतुर्विधलिङ्गयशा- चतुर्धा संशयः। 'इदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति' इति प्राणवायोलिङ्गम् । 'अस्मि' इति धक्तुरिन्द्रस्याहंकारवाद इन्द्रलिङ्गम् । 'वकारं विद्यात्' इति वक्त त्वं जीवलिङ्गम्। 'मानन्दोऽजरोऽमृतः' इति ब्रह्मलिङ्गम् । तत्र प्राब- ल्यदौर्बल्यविवेकाभावादनिर्णय इति पूर्वपक्षः । सिद्धान्तस्तु-सन्त्यत्र ब्रह्मरणोऽनेकलिङ्गानि । तद्यथा--'त्वमेव मे वृणीष्व यं स्वं मनुष्याय हिततमं मन्यसे' (२।१) इति हिततमत्वमेकं लिङ्गम् । 'यो मां एकादश मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-'प्राणोऽस्मि' इस अतिमे प्राण शब्द वायुका, इन्द्रका, जीवका अथवा ब्रह्मका वाचक है? पूर्वपक्ष-उक्त श्रुतिमें चारोके लिङ्ग विद्यमान होने से किसीके विषय में भी निश्चय नहीं हो सकता। सिद्धान्त-यहाँ ब्रह्मके अनेक लिङ्ग हैं वे प्रन्ययासिद्ध भी नहीं है, मता वे प्रबल हैं। वे प्राण, इन्द्र, जीवके पक्षमे मन्ययासिद्ध हैं प्रर्थात् समन्वय नही हो सकते, इसलिए दुईस हैं । परन्तु प्राण, इन्द्र, पोर जीवके लिङ्गोका ब्रह्ममे समन्वय हो सकता है। इसलिए यहाँ प्राण शब्दवे ब्रह्म ही व्युत्पाद्य है, प्राणवायु प्रादि नहीं। कोषोतकि उपनिषझे इन्द्र और प्रतर्दन माख्यायिकामे प्रतर्दनके प्रति इन्द्र पहता है-'प्रायोस्मि.' (मैं प्राण है, प्रज्ञात्मा हूँ, उम मुझकी प्रायु, अमृतरूपसे उपासना कर) यहाँ चार प्रकारके लिङ्गोंके बलसे चार प्रकारके संशय होते हैं । यथा 'इदं शरीर' (इस शरीरको पकड़कर उठाता है) यह प्राणवायुका लिङ्ग है । 'अस्मि' (मैं हूँ) वक्ता इन्द्रका 'महंकार बादमें' इन्द्रका लिङ्ग है। 'वक्तार विद्यात्' (वक्ताको जानो) यह वक्तृत्व जीवका लिङ्ग है । यहाँ इन चारो लिङ्गोमे कौन लिङ्ग प्रबल है और कौन दुर्बल है इस प्राबल्य मोर दौर्बल्य भेदके न होनेसे निर्णय नहीं हो सकता है कि प्राण- शब्द क्सिका ग्रहण करना चाहिए । यह पूर्वपक्ष है। सिद्धान्तीयहाँ ब्रह्मके अनेक लिङ्ग हैं। जैसे कि त्वमेव मे०' ( तुम ही वह वर - भाषानुवादसहिता (म०१ पा०१ अधि० ११] विजानीयात् । नास्य केनचन कर्मणा लोको मोयते न मातृवधेन। न पित- वधेन' इति ज्ञानमात्रेण महापातकाद्यलेपोऽपरं लिङ्गम् । एवमन्यान्यपि लिना- न्युदाहतंव्यानि । न चैतानि प्राणेन्द्रजीवपक्षेषु कथंचिदप्युपपादयितुं शक्यन्ते । प्राणादिलिङ्गानि तु ब्रह्मण्युपपद्यन्ते । प्राणादीनां ब्रह्मबोधद्वारत्वात् । तथा सति ब्रह्मलिनानामनेकत्वादनन्यथासिद्धत्वाच्च प्राबल्यम् । तस्मात्-ब्राँ वात्र व्युत्पा. धम्, न प्राणादीति सिद्धम् ॥ ११ ॥ इति श्रीभारतीतीर्थमुनिप्रणीतायां वैया सिकन्यायमालायां प्रथमाध्यायस्य प्रथमः पादः॥१॥ आदितः प्रधिकरणानि सूत्राणि ३१ ३१ पत्र पादे . दीजिए जिसको तुम मनुष्यके लिए मत्यन्त हितकारक समझते हो ) यह हिततमत्व एक लिङ्ग है । 'यो मा विजानीयात०' (जो मुझको बानेगा, उसका मोक्षरूपी लोक मातृदध, पितृवधरूप किसी कर्म नष्ट नहीं होता ) इस प्रकार मानमानसे महापातक पादि पापोंसे पलिप्त होना यह टूमरा लिङ्ग है । इस तरह अन्य लिङ्ग भी उदाहरण- रूपसे देने चाहिए। ये उक्त लिङ्ग प्राण, इन्द्र पौर जीव पक्षमें किसी प्रकार भी उपपन्न नहीं हो सकते, किन्तु प्राण मादिके लिङ्ग तो ब्रह्ममें उपपन्न हो सकते हैं । क्योंकि प्राण मादि तो ब्रह्म शानके द्वार हैं। ऐसा होनेपर ब्रह्मलिङ्ग भनेक पौर पन्यपामिद्ध न होनेसे प्रवल है। इस लिए यहां ब्रह्म ही व्युत्पाद्य है, प्राणादि नहीं ? पह सिट हुमा ॥ ११॥ इति घी भारतीतीर्थ मुनि प्रणीत वैयासिक-न्यायमालाके प्रथमाध्यापके प्रथमपादका 'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती' कृत भाषानुवाद ॥१॥ - [म०१ पा०२ अधि० १] वैयासिकन्यायमाला ३५ अथ प्रथमाध्यायस्य द्वितीयः पादः (पत्रास्पष्टब्रह्मलिङ्गयुक्तवाक्यानामुपास्पब्रह्मविषयाणां विचारः) (इस पादमें उपास्य ब्रह्म विषयक मस्पष्ट ब्रह्म लिङ्ग युक्त वाक्योंका विचार है ) (प्रथमे ब्रह्मण एव मनोमयत्यावधिकरणे सूत्राणि-)। (१ सर्वत्र प्रसिद्धपधिकरण सू०१-८) सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात् ॥१॥ विवक्षितगुणोपपत्तश्च ॥२॥ अनुपपत्तेस्तु न शारीरः ॥३॥ फर्मक व्यपदेशाच्च ॥४॥ शब्दविशेषात् ॥५॥ स्मृतेश्च ॥६॥ अर्भकोकस्त्वात्तव्य- पदेशाच नेनि चेन्न निचाय्यत्वादेव्योमवर ॥७॥ संभोगप्राप्तिरिति चेन्न वैशेष्यात् ॥८॥ द्वितीयपादस्य प्रथमाधिकरणमारचयति- मनोमयोऽयं शारीर ईशो वा प्राणमानसे। हृदयस्थित्यरणीयस्त्वे जीवे स्युस्तेन जीवगा। ॥१॥ शमवाक्यगतं तद्धितादिरपेक्षते। प्राणादियोगश्चिन्तार्थाश्चिन्त्यं ब्रह्म प्रसिद्धितः ।।२।। छान्दोग्यस्य तृयीयेऽध्याये शाण्डिल्यविद्यायामिदमाम्नायते-'मनोमय प्राणारीरो भारूपः' ( १४०२) इति । तन 'जीव ईशो वा' इति संदेहः । द्वितीय पादके प्रथमाधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-'मनोमयः प्राणथरीरा' इस विवाक्यमे उक्त ममोमय जीव है वा परमेश्वर ? पूर्वपक्ष-प्र -प्राण और मनका सम्बन्ध, हृदयमे स्थिति, मतिसूक्ष्मत्व जीवमे रहते हैं, इससे वे जीवमें समन्वय हो सकते हैं, मत. मनोमय जीव ही है। सिद्धान्त-'मनोमयः' पदगत ( मयट् ) तद्धित प्राणशरीर पदका वहुव्रीहि समास "सर्व पल्विदं ब्रह्म' इस शम वाक्यमे प्राप्त ब्रह्मको अपेक्षा करते हैं। ब्रह्ममें मन पौर प्राणका सम्बन्ध ध्यानके लिए है। सब वेदान्तोमें उपास्वरूपसे प्रसिद्ध ब्रह्म ही मनो- मयादिपसे उपास्य है। छान्दोग्यके तृतीय प्रध्यायमें शाण्डिल्यविधामें यह अति है-'मनोमयः०' (मनोमय, प्रकाश स्वरूप धपा प्राण शरीरवाला है ) यहाँ मनोमय मादि शब्दसे जीवका ग्रहण है अथवा ब्रह्मका ? यह सन्देह है।
d61 मापानुवादसहिता [अ० १ पा० २ अघि १] इति तावत्प्राप्तम् । मन संबन्धादीनां जोवे सुसंपादत्वात् । 'मनसो विकारो मनोमयः' इति मनःसंबन्धः। 'प्रारगः शरीरमस्य' इति प्राणसंबन्धः । न चेदं द्वयमीश्वरे सुसंपादम्। 'अप्राणो ह्यमना. शुध्नः' इति निषेषात् । तथा- 'एष म आत्माऽन्तहृदयेऽपीयान्' इति श्रूयमाणं हृदयेऽवस्थानम्, अरणीयस्त्वं च निराधारस्य सर्वगतस्प न कथंचिदुपपद्यते । तस्मात्-जीव इति प्राप्ते- ब्रूम.-'सवं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत' ( १४.१) इत्येतस्मिञ्शमविधिपरे पूर्ववाक्ये श्रूयमाणं यद्ब्रह्म, तदेव 'मनोमयः प्राण- शरीरः' इत्येताभ्या तद्धित बहुव्रीहिन्या विशेष्यत्वेनापेक्ष्यते । शमवाक्यस्याय- मर्थ-'यस्मात्सर्वमिदं ब्रह्म तज्जत्वात्तल्लत्वात्तदनत्वाच्च तस्मात्सर्वात्मके ब्रह्माणि रागद्वेषविषपासंभवादुपास्तिकाले शान्तो भवेत्' इति । एतद्वाक्यगते ब्रह्मरिण विशेष्यत्वेनान्विते मनोमयवाक्यमपि ब्रह्मपरं भविष्यति । न च ब्रह्मणो मनःप्राणसंवन्धाद्यनुपपति.। निरुपाधिके तदनुपपत्तावपि सोपाधिकस्योपास्यस्य पूर्वपक्षी -'मनोमयः' भादि शब्दसे जीवका ग्रहण है, ऐमा प्राप्त होता है, क्योकि मनके सम्बन्ध प्राणके सम्बन्ध भादिका जीवमें भली-भांति समन्वय हो सकता है । 'मनका विकार मनोमय है। यह मनका सम्बन्ध है। 'प्रारण शरीरवाला' यह प्राण मम्बन्ध है । यह दो ईश्वरमें अच्छी प्रकार समन्वय नहीं हो सकते, क्योकि 'अप्राणो' (ईश्वर प्राण रहित, मन रहित और शुद्ध है ) इस प्रकार निषेध किया गया है । तथा 'एष मे पात्मा०' (यह मेरा मात्मा मेरे हृदयमें अतिसूक्ष्म है ) इस तरह अयमाण हृदयमें अवस्थिति, मणीयस्त्व, निराधार और सर्वगत ब्रह्ममे किसी प्रकार भी उपपन्न नहीं हो सकते। इसलिए जीव ही ग्राह्य है। ऐमा प्राप्त होनेपर- सिद्धान्ती हम कहते हैं--'सवं खल्विदं (निश्चय मह सब ब्रह्म है, क्योकि यह जगत् उससे उत्पन्न हुआ है। उसमें लीन होता है और उसमे चेष्टा करता है, इसलिए उसकी शान्त मना होकर उपासना करे ) इस गम विधि परक पूर्ववाक्यमे घयमाण जो ब्रह्म है, वही 'मनोमय , प्राणशरीरः' इन तद्धित और बहुव्रीहि समास घटित पदोंके द्वारा विशेष्यरूपमे अपेक्षित है । उक्त शम दाक्यका यह अर्थ है, क्योकि "यह सब ब्रह्म है, उससे उत्पन्न हुअा है, उसमे लय होता है, उसमे चेष्टा करता है। इसलिए सर्वात्मक ब्रह्ममें राग द्वेष विषयक प्रमभव होने के कारण उपासना कालमे शान्त हो। इम वाश्यात ब्रह्ममें विशेष्यरूपसे प्रन्वित होनेपर मनोमय वाक्य भी ब्रह्म परक हो जायगा। ब्रह्ममें मन और प्राणके मम्वन्य प्रादिको अनुपपत्ति नही हो सकती। यद्यपि साधिक ब्रह्ममें इनको अनुमति है तो भो सोराधिक उपास्य ब्रह्मो ध्यानार्थ .
[ अ० १ पा०२ अघि २] वैयासिकन्यायमाला चिन्तनार्यतया तदुपपत्तेः। तस्मात्-सर्वेष्वपि वेदान्तवाक्येषु यद्ब्रह्मोपास्यत्वेन प्रसिद्धं तदेवात्राप्युपास्यम् । न हि कचिदपि वेदान्ते जीवस्योपास्यत्वं प्रसिद्धम् । ततो 'ब्रह्ममैव' इति सिद्धान्तः ॥ १॥ (द्वितीये ईश्वरस्यैवात्तृत्वाधिकरणे सूत्र-) ( २ मतृधिकरण सू० ६-१०) अत्ता चराचरग्रहणात् ॥६॥ प्रकरणाच ॥१०॥ द्वितीयाधिकरणमारचयति- जीवोऽग्निरीशो वाऽत्ता स्यादोदने जीव इप्यताम् । स्वाद्वतीति श्रुतेवह्निर्वाऽग्निरनाद इत्यतः ॥ ३ ॥ ब्रह्मक्षत्रादिजगतो भोज्यत्वात्स्यादिहेश्वर।। ईशप्रश्नोत्तरत्वाच्च संहारस्तस्य चात्तृता ।। ४ ॥ कठवल्लीपु द्वितीयवल्लयवसाने पठ्यते- यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत प्रोदनः। मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्या वेद यत्र सः ॥ (२५) इति । दोनोका सम्बन्ध हो सकता है। इस लिए सब वेदान्न वाक्योमे जो ब्रह्म उपास्यरूपसे प्रसिद्ध है वही यहां भी उपास्य है । वेदान्तमे कहीपर भी जीव उपास्यरूपसे प्रसिद्ध नहीं हैं । इसलिए यहाँ ब्रह्म हो मनोमय प्रादि रूपसे उपास्य है । यह सिद्धान्त है ।।१।। द्वितीय अधिकरणकी रचना करते हैं सन्देह-'यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च' इस मन्त्रमे प्रोदन भक्षणमै प्रतीयमान अत्ता- भक्षक जीव है, अग्नि है अथवा परमेश्वर है। पूर्वपक्ष-यहां जीव भोक्ता है, क्योकि 'तयोरन्यः पिप्पलं स्वात्ति' (दोनोमे एक (जीव ) मधुर कर्मफल मोक्ता है ) इस श्रुतिमे जीव भोक्ता कहा गया है, अथवा अग्नि भोक्ता है, क्योकि 'अग्निरन्नादा' (अग्नि भन्न भक्षक है ) इममें अग्नि अन्न भक्षक कही गई है। सिद्धान्त-ऋतिमे 'ब्रह्म-शत्र' पद उपलक्ष्यक हैं मर्यात् ब्रह्म क्षत्र आदि सारा जगत् भोज्य होनेसे यहाँपर अत्तारूपये ईश्वर ही ग्राह्य है। किञ्च उक्त वाक्य ईश्वर विषयक प्रश्न के उत्तरमे कहा गया है। सारे जगत्का संहार ईश्वर करता है, भवः संहार कर्ता होनेसे भी ईश्वर ही प्रत्ता है। कठवल्लीको दूमरी वल्लीके अन्तमे पढते हैं- 'यस्य ब्रह्म च०' (ब्राह्मण, क्षत्रिय दोनों जिमके प्रोदन-भात स्थानीय हैं, मृत्यु जिसके भक्ष्यका संस्कार करनेवाला अर्थात् घृत स्थानीय है। वह पुरुष जहाँ भाषानुवादसहिता [अ०१ पा० २ मषि०२] प्रयमर्थः–'ब्रह्मणक्षत्रिय जातो यस्योदनस्थानीये, मृत्युश्चोपसेचनस्था- नोयः, स पुरुषो यत्र वर्तते तत्स्थानम् । 'इदमित्यम्' इति को वेद । न कोऽपि जानातीत्यर्थः । अत्र-मोदनोपसेचनशब्दाभ्यां कश्चिद्भसक: प्रतीयते । जीवः, अग्निः, ईशो वा, इति त्रेधा मंदिह्यते । जीव इति तावत्प्राप्तम् । कुतः । 'तयो- रन्यः पिप्पलं स्वाति' (मु० ३।१ ) इति जीवस्यात्तत्वश्रणवात् । अथवा वहिर्भवेत्, "अग्निरम्नादः" इत्यत्त त्वावगमात् । इति प्राप्ते- उच्यते-ब्रह्मक्षत्रयोरुपलक्षणत्वेन कृत्स्नं जगदिह भोज्यत्वेनावगम्यते । नहि तादृशस्य भोज्यस्येश्वरादयोऽत्ता संभवति । किंच- अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् । अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद ।। ( क० २११४) इति धर्माधर्मकार्यकारणकालनयातीते परमेश्वरे नचिकेतसा पृष्टे सति "यस्य ब्रह्म च" इति वाक्येन यम उत्तरं ददो। तस्माद्-ईश्वरोऽत्र प्रतिपाद्यः । रहता है। उसे यथार्थरूपसे कौन जानता है ? अर्थात् मदतिरिक्त कोई भी नहीं जानता है ) यह भर्थ है-'प्राह्मण-क्षत्रिय जाति जिमके प्रोदन स्थानीय है । मृत्यु मोदनके लिए उपसेचन-घृत स्थानीय है, वह पुरुष जहाँ रहता है, उस स्थानको 'इदमित्यम्' यथार्यरूपसे कौन जानता है ? कोई भी नहीं जानता है ऐसा पर्य है। यहाँपर मोदन पौर उपसेवन शब्दोंसे कोई मझक प्रतीत होता है। वह जीव है, अग्नि है मथवा ईश्वर है ? इस तरह तीन प्रकारका सन्देह होता है। पूर्वपती-वह भक्षक जीव है, ऐमा प्राप्त होता है । किमसे ? इमसे कि 'तयोऽन्यः' (दोनोंमें एक मधुर पर्मफल भोका है ) यहाँ जीव मक्षक सुना जाता है प्रयदा पनि हो, क्यों कि 'पग्निरमादः' (भग्नि मन भक्षक है ) इसमे पग्नि भसक भवगव होती है । ऐमा प्राप्त होनेपर- सिद्धान्ती कहते हैं-यह्म मोर क्षत्र पद उपलक्षणरूप होनेसे सम्पूर्ण जगत् पही भोग्यरूपसे अवगत होता है। इस प्रकारके भोग्यका भोक्ता ईश्वरसे भिन्न नहीं हो सकता किंच- 'अन्यत्र धर्माद (धर्म भोर अधर्मसे भिन्न, कार्य कारणमे पृथक्, भूत, भविष्यद उषा वर्तमान भिन्न जिम वस्तुको भाप मानते हैं उमका मेरे लिए उपदेश कीजिए ) इस प्रकार धर्म, धर्म, पार्य, कारण, भूत, भविष्यत् तथा वर्तमानसे प्रतीत परमेश्वरके विषयमें नचिकेतामारा प्रश्न किये जानेपर 'यस्य ब्रह्म.' इस वाक्यद्वारा पमने ॥ अ०१ पा० २ अधि० ३] वैयासिकन्यायमाला ३६ 'मनश्ननन्योऽभिचाकशीति' (मु० ३१) इतीश्वरे भोक त्वं निषिध्यत इति चेत्, तांत्रात्तृत्वं नाम संहत त्वं भविष्यति। तच्चेश्वरस्य सर्वेषु वेदान्तेषु प्रसिद्धम् ॥२॥ (तृतीये जोवब्रह्मणोरेव गुहाप्रवेशाधिकरणे सूत्रे-) ( ३ गुहा प्रविष्टाधिकरणमें सू० ११-१२) गुहां प्रविष्ठावात्मानौ हि तदर्शनात् ॥११॥ विशेषणाच ॥१२॥ तृतीयाधिकरणमाचरयति- गुहां प्रविष्टौ धीजीवी जीवेशी वा हृदि स्थितेः। छायातपाभ्यां दृष्टान्तादीजीवी स्तो विलक्षणौ ॥५॥ पिबन्ताविति चैतन्यं द्वयोर्जीवेश्वरी ततः । हृत्स्थानमुपलब्ध्यै स्याद्वैलक्षण्यमुपाधितः ॥ ६॥ कठवल्लीष्वेव तृतीयवल्ल्यादौ श्रूयते- ऋतं पिबन्ती सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपो ब्रह्मविदो वदन्ति पश्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥१०॥इति। उत्तर दिया। इससे प्रतवाक्य में भक्षकरूपसे परमेश्वर ही प्रतिपाद्य है। यदि कहो कि 'मनश्ननन्योऽभिचाकशीति' ( उसमे अन्य-ईश्वर न भोक्ता हुमा केवल देखता रहता है ) यह श्रुतिवाक्य ईश्वरमें भोक्तृत्वका निषेध करता है । तब तो यहां प्रत्तृत्वका अर्थ संहार कर्तृख होगा। वह तो ईश्वरके लिए सब वेदान्तोंमे प्रसिद्ध है ॥२॥ तृतीयाधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-'ऋतं पिबन्तीः' इस श्रुतिमे प्रविष्ट बुद्धि और जीव हैं अथवा जीव भोर परमेश्वर हैं ? पूर्वपक्ष-हृदयमे स्थिति कही गई है और घाया एवं प्रातपरूप दृष्टान्तसे कहे गये हैं, मतः परस्पर विलक्षण वुद्धि और जीव ही प्रविष्ट हैं । सिद्धान्त-पिबन्ती' इस द्विवचनसे दो चेतन जीव और परमेश्वर ही प्रतीत होते हैं, हृदय स्थान उपासनाके लिए कहा गया है। छाया एवं प्रातपके समान जीव भोर परमेश्वरका परस्पर वलक्षण्य सोपाधिक और निरुपाधिक रूपको ले कर है। कठवल्लीको तृतीय वल्ली आदिमे श्रुति है- 'ऋतं पिबन्ती' (ब्रह्मवेत्ता लोग कहते हैं कि शरीररूप गुहाके भीतर प्रकृष्ट ब्रह्म स्थानमे प्रविष्ट हुए अपने कर्मफलको भोगनेवाले छाया पौर घामके समान परस्पर विल- क्षण दो ( तत्त्व ) हैं । यही बात जिन्होंने तीन वार नाचिकेवाग्निका चयन किया है ४० भाषानुवादसहिता [अ० १ पा० २ अधि०३] अयमर्थ -'सुकृतस्य' फलभूतं यदाह्मणादिशरीरं तत्परस्यार्घ परब्रह्मण उपलब्धिस्थानम् । तच्च परमम्, विद्याधिकारहेतुशमदमाद्युपेतस्वात् । तादृशस्य शरीरस्य मध्ये स्थित हृदयपुण्डरीकं गुहा ता प्रविष्टौ। यद्वा-ऋतशब्दवाच्यं कर्मफलं पिबन्ती छायातपवत्परस्परविलक्षणो वेदविदो वदन्ति, इति । 'तो दो बुद्धिजीवी जीवेशो वा' इति संदेह । 'बुद्धिजीवी' इति प्राप्तम् । तयोः परिच्छिन्न- योगुहाप्रवेशसंभवात् । जडाजडरूपत्वेन च्छायातपवद्वलक्षरगण्याच्च । अत्रोच्यते-'पिबन्ती' इति द्विवचनेन द्वयोश्चेतनत्वं प्रतीयते । तत:- चेतनाविह जीवेश्वरौ भवत.। सर्वगतस्यापीश्वरस्य हृदयेऽवस्थानमुपलब्ध्ये वर्ण्यते । मोश्चेतनत्वसाम्येऽपि सोपाधिवत्वनिरुपाधिक्त्वा-या वैलक्षण्यमुप- पद्यते ॥३॥ (चतुर्थे ब्रह्मण एवाक्षिगतत्वाधिकरणे सूत्राणि-) (४ अन्तरधिकरण सू० १३.१७) अन्तर उपपत्ते ॥१३॥ स्थानादिव्यपदेशाच ॥ १४ ॥ वे पश्चाग्नि उपासना करनेवाले भी कहते हैं )। इसका यह अर्थ है- पुण्य कमौका फल-भूत यो ब्राह्मण प्रादि शरीर हैं वे प्रकृष्ट पर ब्रह्मका उपलब्धि स्थान हैं। ब्रह्म- विद्यामें अधिकारके हेतुरूप शम, दम प्रादि साधनोसे युक्त होनेके कारण यह शरीर श्रेष्ठ है । ऐसे शरीरके मध्यभागमे स्थित हृदयकमल रूप गुहामे प्रविष्ट है । अथवा "ऋतं पिबन्ती' इस 'ऋत' शब्द वाच कर्म फलको भोगनेवाले छाया और धामके समान पर- पस्पर विलक्षण हैं, ऐसा ब्रह्मज्ञानी तथा कर्मानुदान करनेवाले गृहस्थ कहते हैं । इसमे सन्देह होता है कि वे दो बुद्धि, जीव हैं अथवा जीव और परमेश्वर हैं। पूर्वपक्षी-गुहामे प्रविष्ट बुद्धि और जीव हैं, ऐसा प्राप्त होता है, क्योकि उन दोनो परिच्छिनोका ही गुहारूम अल परिमाणवाले स्यानमे प्रवेश हो सकता है। किंच जड तथा चेतनरूप होनेके कारण छाया और घामके समान बुद्धि और जीव परस्पर विलक्षण भी हैं। सिद्धान्ती-इमपर कहते हैं-'पिबन्तो.' इस द्विवचनसे दो चेतन प्रतीत होते हैं। इससे वे चैतन जीव और ईश्वर हो सकते हैं । यद्यपि मर्व व्यापक ईश्वरका अल्प- स्थान युक्त नहीं है, तो भी उपलब्धिके लिए हृदयमे ईश्वरकी स्थितिका वर्णन किया जाता है। यद्यपि दोनोमें चेतनत्व ममान है तो भी जोर आविहित भोर ईश्वर उपाधिरहित है, इस प्रकार दोनोमे लक्षप्प युक्त है, प्रन जाव और ईश्वर ही हृदय- रूपी गुहामे प्रविष्ट हैं ॥ ३ ॥ १. कठवालोमाये तु-'पत्रिन्यायेन सुतस्य स्वयकृतस्य कर्मण' इत्युपलभ्यते ।
[अ०१ पा० २ अधि० ४ ] क्यासिकन्यायमाला सुखविशिष्टाभिधानादेव च ॥ १५ ॥ श्रुतोपनिषत्कगत्य- भिधानाच्च ॥१६॥ अनस्थितेरसंभवाच्च नेतरः॥१७॥ चतुर्थाधिकरणमारचयति- छायाजीवो देवतेशी वाऽसौ योऽनरिण दृश्यते । प्राधारदृश्यतोक्त्येशादन्येपु निषु कश्चन ॥७॥ कं खं ब्रा यदुक्त प्रादेवाक्षण्युपास्यते । वामनीत्वादिनाऽन्येषु नामृतत्वादिसभव ॥८॥ छान्दाग्यस्य-चतुर्थाध्याय उपकोसलविद्यायामुपकोसलं शिष्यं प्रति सत्य- कामो गुरुराह । तनत्यं वाक्यमेतत्-य एपोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते, एप मात्मेति होवाच, एतदमृतमेतद्ब्रह्म (४।१५।१ ) इति । तत्र चतुर्धा संशये सति 'अक्षणि सर्वदृश्यमाना छाया' इति तावत्प्राप्तम् । प्रक्ष्याधारत्वदृश्यत्वयोस्तस्यामपि स्पष्टत्वात् । यद्वा जीवोऽयं भवितुमर्हति । रूपदर्शनवेलाया तस्य चक्षुष्यवस्थि- चतुर्थ अधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह ~~'म एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते' इम धुतिमे प्रतिपादित प्रक्षिपुरुष छायात्मा है, जीव है, देवता है अथवा परमेश्वर है ? पूर्वपक्ष-प्रक्षि पुरुषका नेत्र आधार कहा गया है और वह दृश्य भी कहा गया है । अतः परमेश्वरसे भिन्न छायात्मा आदि तीनामें से कोई एक है। सिद्धान्त-'के ब्रह्म, ख ब्रह्म' इस पूर्व वाक्यमे जो ब्रह्म कहा गया है वही वाम- नीयत्वादि गुणोसे नेत्रमे उपास्य कहा गया है, क्योंकि घायात्मा प्रादि तीनोंमे अमृत- त्वादि गुणोका सभव नही है । अतः तीनोका अक्षि पुरुष वाक्यसे उपदेश नहीं है । छान्दोग्यके चतुर्थ अध्यायमे उपकोसलविद्यामे उपकोमल शिष्यके प्रति गुरु सत्यकाम कहते हैं-वहीका यह वाक्य है-य एपोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते' (जो यह नेत्रमे पुरुष दिखाई देता है, यह प्रात्मा है, यह ममृत है, यह ब्रह्म है, ऐसा गुरुने कहा ) इसमे वह अक्षिपुरुप छायामा है, जीव है, देवतात्मा है अथवा परमेश्वर है । इस प्रकार पार प्रकारका सन्देह होने पर- पूर्वपक्षी -वह पुरुप सबके द्वारा आपसे देखी गई छाया है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योकि नेत्र प्राधार और दृश्यत्व दोनो छायात्मामे सष्ट प्रत्यक्ष हैं। मथवा वह जोव हो सकता है, क्योकि नेन्द्रियद्वारा रूपको देखते समय उनको चक्षुमे स्थिति होनेसे वह मन्वय-व्यतिरेक द्वारा दृश्य भी होसकता है। अथवा देवता हो सकता है, क्योकि 'मादि- त्यश्चर्भूत्वा.' (मादित्यने चक्षु इन्द्रिय होकर नेत्र गोलकमे प्रवेश किया) ऐसी श्रुति है।
४२ भाषानुवादसहिता [प०१ पा०२ अपि०४] तत्वेनान्वयव्यतिरेकाम्या दृश्यमानत्वात् । अथवा देवता स्यात् । 'मादित्यवशु- भूत्वाऽक्षिरिण प्राविशत्' इति दर्शनात् । सर्वथा न परमात्मा। तस्याऽधारत्व. दृश्यत्वास भवात् । तस्मात्-छायाजीवदेवेषु यः पोऽप्यस्तु । इति प्राप्ते दम -"ग्रह्म" "सं ग्रह्म" इति सुमरूपम्। भाकाशवपरि. पूर्ण यद्ब्रह्म पूर्ववाक्येनोक्तम्, तदेव 'य एपोऽदिशरिण' इति प्रवृतवाचरेनेतन्छ- ब्देन परामश्यााण्युपास्यत्वेनोपदिश्य वामनीत्व भामनीत्वसंपद्वामत्वादिगुणा- नुपासन ( ना ) यापदिशति । वामनीत्वं कामप्रापरत्वम् । मामनोत्वं जगद्धा- - सकत्वम् । सयद्वामत्वं प्राप्तवामत्वम् । एतगुणेरुपास्यब्रह्मणः सोपाधिनस्थादक्ष्या- धारत्वं पात्रदृष्टया दृश्यमानत्वं च न विरुध्यते। छायाजोवदेवतेपु स्वभूतस्या- भयत्वादीनि न संभवन्ति । तस्मात्-ईश्वरोऽत्रोपास्यः ॥४॥ (पञ्चमे परमेश्वरस्यैवान्तमिताधिकरणे मूत्राणि-) [५ मन्तर्याम्यधिकरण मू०१८-२० ] अन्तर्याम्यधिदैयादिषु तदर्मव्यपदेशात् ॥ १८ ॥ परमात्मा तो कदापि नहीं हो सकता, क्योकि उसमें माधारत्व और दृश्यत्व संभव नहीं है अर्थात् उसका कोई भाधार नहीं है भोर वह दृश्य नहीं है । पतः धाया, जीव भोर देवता इन दोनोंमे से कोई एक है। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-'क ब्रह्म वं ब्रह्म' इस प्रकार सुम्वरूप भाकाशके समान परिपूर्ण जो ब्रह्म पूर्व वाक्यमे कहा गया है। उमौका य एषोऽ- क्षिणि.' इममें प्रवृत वाचक 'एतत्' शब्दसे परामर्श कर वह पशु इन्द्रियमें उपास्य है, ऐमा उपदेश कर वामनीत्व भामनीत्व सयामत्व मादि गुणोको उपासनाके लिए गुरु उसका उपदेश करते हैं। दामनीत्व-कामोका प्रापक, मामनीत्व-प्रवभासक होना, मयतामत्व-प्राप्त काम होना, इन गुणोसे उपास्य ब्रह्ममें सोपाधिक होनेसे पक्षि-भाषा- रत्व और शास्त्रदृष्टिसे दृश्यत्व विरुद्ध नही हो सकते अर्थात् सोपाधिक ब्रह्मका प्रक्षिमाधार हो सकता है और वह शास्त्र दृष्टिसे शेय भी हो सकता है। परन्तु छाया, जीव और देवता इन तीनोमें श्रुत्युक्त अमृतत्व, ममयत्व भादि धर्म नहीं हो सकते। इसलिए 'पक्षिणि' पहाँपर पक्षिपुरपसे परमेश्वर ही उपास्य है ॥४॥ पंचम प्रधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-'यः पृथिवीमन्तरौ' इस श्रुतिमें जगत्का षो मन्तर्यामी कहा गया है, क्या प्रधान है, जीव है भयदा ईश्वर है?
[म. १ पा० २ मधि० ५ ] वैयासिकन्यायमाला न च स्मार्तमतद्धर्माभिलापात् ॥ १९ ॥ शारी- रश्चोभयेऽपि हि भेदेनेनमधीयते ॥२०॥ पश्चमाधिकरणमारचयति- प्रधानं जीव ईशो वा कोऽन्तर्यामी जगत्प्रति । कारणत्वात्प्रधानं स्याज्जीवो था कमणो मुखात् ॥ ६ ॥ जीवैकत्वामृतत्वादेरन्तर्यामी परेश्वरः। द्रष्ट त्वादेनं प्रधानं न जीवोऽपि नियम्यतः ॥१०॥ बृहदारण्यके तृतीयाध्याये याज्ञवल्क्य उद्दालकं प्रत्याह-'यः पृथिवीमन्तरी यमयत्येष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः' (७६) इति । तत्र -पृथिव्यादिजगत्प्रति योऽन्तर्यामी श्रूयते तस्मिस्त्रेधा संशये सति 'प्रधानम्' इति प्राप्तम् । तस्य सकल- जगदुपादानत्वेन स्वकार्य प्रति नियामकत्वसंभवात् । अथवा जीवोऽन्तर्यामी । स हि धर्माधर्मरूपं कर्मानुष्ठितवान् । तच्च कर्म स्वफलदानाय फलभोगसाधनं जगदुत्पादयति । अतः कर्मद्वारा जगदुत्पादकत्वाजोवोऽन्तर्यामी । इति प्राप्ते मा-'एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः' इत्यन्तर्यामिणो जीवतादा- पूर्वपक्ष-सकल जगत्का कारण होनेसे प्रधान मन्तर्यामी है अथवा धर्माधर्मरूप कर्मोके अनुष्ठानद्वारा जगत्का उत्पादक होनेसे जीव मन्तर्यामी है। सिद्धान्त-'एष त प्रात्मान्तर्याम्यमृतः' इस श्रुतिमे जीवमे प्रभेद तथा अमृतत्व परमेश्वरमे ही उपपन्न होते हैं, अतः अन्तर्यामी, द्रष्टा, श्रोता कहा गया है, मतः अचेतन प्रधान अन्तर्यामी नहीं हो सकता और नियम्य होने के कारण जीव भी अन्तर्यामी नहीं हो सकता, इससे यह सिद्ध हुआ कि परमेश्वर ही अन्तर्यामी है। बृहदारण्यकोपनिषद्के तृतीय अध्यायमें याज्ञवल्क्य उद्दालकके प्रति कहते हैं-'या पृथिवीमन्तरो यमयति.' (पृथिवीके अन्दर रहकर जो पुरुष पृथिवीका नियमन करता है, वह तेरा प्रात्मा है, अन्तर्यामी और ममृत है ) यहाँ श्रुतिमे पृथिवी मादि सम्पूर्ण जगत् का जो अन्तर्यामी कहा गया है, इसमे तीन प्रकारका संशय होता है, क्या मन्तर्यामी प्रधान है, जीव है मथवा परमेश्वर है ? पूर्वपक्षी-अन्तर्यामी प्रधान है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योकि वह सारे जगत्का उपादान कारण है, इससे वह अपने कार्य के प्रति नियामक हो सकता है। मथवा जीव मन्तर्यामी हो सकता है, क्योकि वह धर्माधर्मरूप फर्मका अनुदान करनेवाला है। वह कर्म अपने फल देने के लिए फलोपमोगके साधनभूत जगत्को उत्पन्न करता है। प्रतः कर्मद्वारा जगदके उत्पादक होनेके कारण जीव अन्तर्यामी है। सिद्धान्ती-ऐमा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-'एषत पारमा' इस श्रुतिमें मन्तर्यामी - ३ भाषानुवादसहिता [अ० १ पा० २ अधि०६ ] त्म्यममृतत्वं च श्रूयते। तथा पृथिव्यन्तरिक्षादिषु सर्ववस्तुष्वन्तर्यामित्वोपदेशेन सर्वव्यापित्वं प्रतीयते। तेभ्यो हेतुभ्योऽन्तर्यामी परमेश्वरः । न च प्रधानस्यान्तर्या- मित्वं संभवति । 'अदृष्टो द्रष्टा, प्रश्रुत: श्रोता' इति द्रष्ट त्वयोवृत्वाद्यवगमाद- चेतनस्य प्रधानस्य तदसंभवात् । नापि जीवोऽन्तर्यामी। 'य आत्मानमन्तरो यमयति' इति.जीवस्य नियम्यत्वश्रवणात् । तस्मात्-अन्तर्यामी परमेश्वरः ॥५॥ (षष्ठे परमेश्वरस्यैव भूतयोनित्वाधिकरणे सूत्राणि) [ ६ अदृश्यत्वाधिकरण सू० २१-२३ ] अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः ॥ २१॥ विशे- पणभेदव्यपदेशाभ्यां च नेतरौ ॥ २२ ॥ रूपोप- न्यासाच ॥२३॥ प्रकरणत्वात् ॥२४॥ षष्ठाधिकरणमारचयति- भूतयोनिःप्रधानं वा जीवो वा यदि वेश्वरः। प्राद्यौ पक्षावुपादाननिमित्तत्वाभिधानतः ॥ ११॥ मे जीवसे प्रभेद और अमृतत्व कहा गया है और पृथिवी, अन्तरिक्ष आदि सब पदार्थोमें अन्तर्यामोका उपदेश है, इससे सर्वव्यापक प्रतीत होता है, इन हेतुपोंसे परमेश्वर ही अन्तर्यामी है । प्रधान मन्तर्यामी नही हो सकता, क्योकि 'प्रदृष्टो०- ( वह दृष्ट नहीं है किन्तु द्रष्टा है, वह धुत नहीं है किन्तु धोता है ) इस प्रकार अन्तर्यामी द्रष्टा, धोता आदि कहा गया है, अत: वह अचेतन प्रधानमें संभव नही है। इस प्रकार जोव भी अन्तर्यामी नहीं है। क्योंकि 'य प्रात्मानम०' (अन्दर रहकर जो मामा-जोवका नियमन करता है) इस तरह श्रतिमें जोव नियम्य कहा गया है। इससे सिद्ध हुमा कि परमेश्वर ही अन्तर्यामी है।॥ ५॥ छठे मधिकरणकी रचना करते है- सन्देह-'तदव्ययं यद्वयोनि परिपश्यन्ति धीराः' इस श्रुतिमे उक्त भूतयोनि प्रधान है, जीव है पथवा परमेश्वर है ? पूर्वपक्ष-योनि शब्दक अर्थ है-उपादानकरण और निमितकारण । मतः अगदूपसे परिणत होनेवाला प्रधान जगत्का उपादान कारण होनेसे भूतयोनि है । अथवा धर्माधर्मरूप कर्म के द्वारा जगतका निमित उत्पादक होनेसे जीव भूतयोनि है । इम लिए उपादान मोर निमिवकारणके मभिधानसे प्रधान प्रयवा जीव भूनयोनि है। १. मस्य सूत्रत्वं वेवलं रङ्गनाथेन वृत्तिकृताङ्गोकृतम् । भाष्यतोऽपि प्रतीयते । भामठीबारादयो भाष्यव्याख्यावारोऽन्ये वृत्तिकृतश्चास्य भाष्यपन्यत्वमेवगट्ठी- कुर्वन्तीति ध्येयम् ।
[म०१ पा० २ मधि० ६ ] वैयासिकन्यायमाला ईश्वरो भूतयोनिः स्यात्सर्वज्ञत्वादिकोतनात् । दिव्यायुक्न जीवः स्यान प्रधान मिदोक्तितः ॥ १२ ॥ मुण्डकोपनिषदि श्रूयते-"तपव्ययं तद्भतयोनि परिपश्यन्ति धीराः" ( ११६) इति । तत्र त्रैघा संशये सति प्रधान जीवो वा, इति पक्षद्वयं ताव- माप्तम् । योनिशब्दस्योपादाननिमित्तलक्षणार्थद्वयवाचित्वात् । प्रधानस्य विश्वाकारेण परिणममानस्योपादानत्वात्। जीवस्य च धर्माधर्मद्वारेण निमित्तत्वात् । अत्रोच्यते- य: सर्वज्ञः सर्ववित्, यस्य ज्ञानमयं तपः' (१२६) इति सामान्याकारेण सर्वज्ञत्वम् । विशेषाकारेण सर्ववित्वम् । पर्यालोच- नात्मकं तपश्च । इत्येतादृशस्य ब्रह्मलिङ्गस्य कीर्तनाद्भूतयोनिः परमेश्वरः। न च जीवस्य भूतयोनित्वं युक्तम्। दिव्योह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः'।२-२। इति बाह्याभ्यन्तरव्यापित्वजन्मराहित्ययोः श्रुतत्वात्परिच्छिन्नस्य जन्मा- दिमतो जीवस्य तदसंभवात् । नापि प्रधानस्य भूतयोनित्वं युक्तम् । “मक्षरा- सिद्धान्त-'य: सर्वज्ञः सर्ववित्' मादि धुतिमे ब्रह्मके धर्म सर्वज्ञ व आदिके कथनसे परमेश्वर ही भूतयोनि है । 'दिव्यो ह्यमूर्तः पुरषः' इस प्रकार भूतयोनिमे दिव्यत्व आदिके कपनसे परिच्छिन्न तथा जन्ममरण युक्त जीव भूतयोनि नही है । तथा 'अक्षरात्परतःपर।' इस भेदके कथनसे प्रधान भी भूठयोनि नहीं है। मुण्डकोपनिषद् -'तदव्ययं तद्भूतयोनि०' (जिस भूतयोनिको विद्वान लोग जानते हैं वह अव्यय है ) यह ध्रुति है, यहाँपर तीन प्रकारका संशय होता है कि क्या भूतयोनि प्रधान है, जीव है मथवा परमेश्वर है ? पूर्वपक्षी- --प्रधान पथवा जीव भूतयोनि है, इस प्रकार दो पक्ष प्राप्त होते हैं, क्योंकि योनि शायद उपादानकारण मौर निमित्तकारण रूप दो प्रोंका वाचक है। सम्पूर्ण विश्वाकारसे परिणत प्रधान उपादानकारण है और जीव धर्माधर्मरूप कर्मद्वारा जगत्का निमित कारण है। सिद्धान्ती-इमपर कहते हैं-'य: सर्वज्ञः०' ( जो सर्वज्ञ भौर सर्ववित् है जिसका तप केवल ज्ञानरूप ही है ) 'सब पदार्थोको जो सामान्यरूपसे जानने के कारण सर्वज्ञ और विशेषरूपसे जाननेके कारण मर्ववित है । ज्ञानात्मक ही तप है।' इस प्रकारके सर्ववेतृत्व भूतयोनि परमेश्वर ही है । जीव भूतयोनि होना युक्त नहीं है। 'दिव्यो ह्यमूर्तः' ( वह स्वप्रकाश पूर्ण प्रत्यगात्मा, सर्वव्यापक एवं जन्म रहित है ) इस प्रकार मूतयोनिमें सर्वव्यापकस्व जन्मरहितत्व कहे गये हैं, वे परिच्छिन्न जन्मादि युक्त जीवमे संभव नहीं भाषानुवादसहिता [अ० १ पा०२ मधि००] सरतः परः" इत्यक्षरशब्दवाच्यात्प्रधानाद्भेदेन भूतयोनेः परत्वाभिधानात् । तस्मादीश्वरो भूतयोनिः ॥६॥ (सममे परमेश्वरस्यैव वैश्वानरत्वाधिकरणे मूत्राणि-)। [७ वश्वावराधिकरण सू० २५-३३ ] वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् ॥ २५ ॥ स्मर्यमारण- मनुमानं स्यादिति ॥ २६॥ शब्दादिभ्योऽन्तःप्रतिष्टानाच नेति चेन्न तथादृष्टथुपदेशादसंभवात्पुरुषमपि चैनमधी- यते ॥ २७॥ अत एव न देवता भूतं च ॥ २८ ॥ साक्षादप्यविरोधं जैमिनिः ॥ २६ ॥ अभिव्यक्तरित्याश्म- रथ्यः ।।३०॥ अनुस्मृतेर्बादरिः ॥ ३१॥ संपत्तरिति जैमिनिस्तथा हि दर्शयति ॥३२॥ आमनन्ति चैनमस्मिन् ॥३३॥ सप्तमाधिकरणमारचयति- वैश्वानरः कौक्षभूतदेवजीवेश्वरेषु कः । वैश्वानरात्मशब्दाभ्यामीश्वरान्येषु कश्चन ॥ १३ ।। द्युमूर्धत्वादितो ब्रह्मशब्दाच्चेश्वर इष्यते। वैश्वानरात्मशब्दौ तावीश्वरस्यापि वाचकौ ॥ १४ ॥ हैं, प्रधान मो भूटयोनि नहीं हो सकता, क्योकि 'अक्षरात्परतः परः" इस तरह जो अक्षर शब्द वाच्य प्रधानसे भिन्न भूतयोनि पर-उत्कृष्ट कहा गया है । इमसे परमेश्वर ही भूतयोनि है ॥६॥ सप्तम भधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-मात्मानं वैश्वानरमुपास्ते' इस अतिमे उक्त वैश्वानर जठराग्नि है, भूताग्नि है, देवता है, षीय है अथवा परमेश्वर है ? पूर्वपक्ष-वैश्वानर शब्द जठराग्निमें, भूताग्निमे एवं देवतामे रूढ है भोर मात्मशब्द जीवका वाधक है, मता ईश्वरसे भिन्न इन चारोमे ही कोई एक वैश्वानर शब्दवे कहा गया है। सिद्धान्त--'वैश्वानरस्य मूर्धव' (वैश्वानरका द्युलोक मस्तक है) इत्यादिसे वैश्वानरके पवपदोंका वर्णन है पौर 'को न पात्मा' कि ब्रह्म' इस प्रकार ब्रह्म एन्द ईश्वरमें इष्ट है। इस तरह योगचिसे वैश्वानर शब्द भौर मुस्थवृत्तिसे पारमशब्द पे दोनों ईश्वरके वाचक है।
४७ [म०१ पा० २ अधि०७] वैयासिकन्यायमाला छान्दोग्यस्य पश्चमाध्याये वैश्वानरविद्यायामाम्नायते 'प्रात्मनं वैश्वानर- मुपास्ते' (१२२२ ) इति । किमयं वैश्वानरः कुक्षिस्थितोऽग्निः किंवा भूताग्निः, आहोस्वित् प्रादित्यदेवता किंवा जीवात्मा, अथवा परमात्मा, इति संशयः । तत्र वैश्वानरसाब्दवशादाद्यं पक्षत्रयं प्राप्तम् । 'प्रयमग्निर्वैश्वानरो योऽयमन्तः पुरुषे ( येनेदमन्नं पच्यते )' (बृ. ५९ ) इति श्रुतौ वैश्वानरशब्दो जाठराग्नी प्रयुक्तः । 'विश्वस्मा अग्नि भुवनाय देवा वैश्वानरम्' (ऋ० १० सं० १०१६८१८) इति बाहोऽग्नी प्रयुक्तः । “वैश्वानरस्य सुमतौ स्याम्" इति देवताया प्रयुक्तः । प्रतः पात्रयमुपपद्यते। प्रात्मशब्दस्य जीवे रूढत्वाज्जीवो वा वैश्वानरः स्यात् । न त्वीश्वरः, तद्गमकाभावात् । इति प्राप्ते । ग्रूमः-वैश्वानरो ब्रह्म भवितुमर्हति । द्युमूर्धत्वादिश्रवणात् । 'तस्य ह वा एतस्याऽऽत्मनो वैश्वानरस्य मर्धेव सुतेजाः' (१८०२) इत्यादिना द्युलोकाद्य- शेषजगतो वैश्वानरावयवत्वं श्रयते। न चैतदीश्वरादन्यत्र संभवति । किंच "को न आत्मा, कि ब्रह्म" इति ब्रह्मशब्दश्वेश्वरे मुख्यः । वैश्वानरशब्दस्तु छान्दोग्योपनिषद्के पांचवें अध्यायमे वैश्वानरविद्यामे यह श्रुति है-'मात्मानं वैश्वानरमुपास्ते' (जो वैश्वानरको भात्मरूपसे उपासना करते हैं ) यहाँ संशय होता है कि क्या यह उक्त वैश्वानर शब्द उदरस्थ जठराग्नि है, भूताग्नि है, प्रादित्य देवता है, जीवात्मा है मयदा परमात्मा है ? पूर्वपक्षी-यहां वैश्वानर शब्दके प्रयोगसे प्रथम तीन वैश्वानर हैं, ऐसा प्राप्त होता है। क्योकि 'प्रयमग्निर्वैश्वानरो' ० ( यह अग्नि वैश्वानर है जो यह शरीरके भीतर है, जिससे यह खाया हुमा अन्न पचता है ) इस प्रकार श्रुतिमें उक्त वैश्वानर शब्द जठराग्निमे प्रयुक्त है। "विश्वस्मा' ( देवतामोने सब भुवनोंके लिये वैश्वानर भग्निको दिवसोका चिह्न बनाया अर्थात् सूर्य बनाया ) इस श्रुतिमे वैश्वानर शब्द बाह्य-लौकिक पग्निमें प्रयुक्त है । 'वैश्वानरस्य' (वैश्वानरको सुमतिमे हम लोग रहें अर्थात् हम लोगोके प्रति वैश्वानरकी अच्छी बुद्धि हो ) इस श्रुतिमें वैश्वानर शब्द देवतामे प्रयुक्त है। प्रतः पहलेके तीन पक्ष उपपन्न होते हैं । अथवा जीव वैश्वानर हो सकता है, क्योकि मात्म- शब्द रूढ है। परन्तु ईश्वर तो वैश्वानर नहीं हो सकता, कारण, उसका बोधक कोई शब्द नहीं है। ऐसा प्राप्त होनेपर- सिद्धान्ती-हम कहते हैं-वैश्वानर ब्रह्म ही होना चाहिए, क्योकि द्युलोक मूर्षा है, इत्यादि श्रुति है । 'तस्य ह वा'• (उस वैश्वानर पात्माका मस्तक प्रति तेजस्वी है) इत्यादिसे द्युलोक मादि सम्पूर्ण जगत् वैश्वानरका भवपवरूपसे सुना जाता है। वह . .
मापानुवादसहिता [प्र०१पा०२ अधि०७]
योगवृत्त्या ब्रह्मणि वर्तते। विश्वश्चासौ नरश्च विश्वानरः। सर्वात्मकपुरुष
इत्यर्थः । विश्वानर एव वैश्वानरः । प्रात्मशब्दश्च जीववब्रह्मण्यपि वर्तते ।
तस्मात्-वैश्वानरः परमेश्वरः ॥ ४ ॥
इति श्रीमारतीतर्थमुनिप्रणीताया वैयासकन्यायमायां प्रथमाध्यायस्य
द्वितीय: पाद ॥२॥
अत्र पादे
मादितः
अधिकरणानि
सूत्राणि
३३
ईश्वरसे भिन्नमें सम्भव नहीं है । किञ्च 'को न प्रात्मा' कि ब्रह्म' (हमारी आत्मा कौन
है, ब्रह्म क्या है ? ) इस प्रकार ब्रह्म शब्द ईश्वरमे मुख्य है, वैश्वानर शब्द तो
योगवृत्तिसे ब्रह्ममें है । 'विश्व ही यह नर वैश्वानर है, अर्थात् सर्वात्मक पुरुष' यह अर्थ
है' विश्वानर ही वैश्वानर है और भात्मशब्द जीवके समान ब्रह्ममे भी प्रयुक्त है।
इससे वैश्वानर परमेश्वर ही है ॥७॥
इति श्रीभारतीतीर्यमुनिप्रणीत वैयासिकन्यायमालाके प्रथमाध्यायके तृतीयपादका
'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती' कृत भाषानुवाद ॥३॥
अथ प्रथमाध्यायस्य तृतीयः पादः
[पत्रास्पष्टब्रह्मलिङ्गना प्रायो शैयब्रह्मविषयाणा विचार]
(इस पादमें जेय ब्रह्म विषयक अस्पष्ट ब्रह्म लिङ्गोका प्राय: विकार है )।
(प्रथमे ब्रह्मण एव घुम्वाद्यायतनत्वाधिकरणे सूत्राणि-)।
(१ घुम्बाधिकरण सू० १-६)
घुभ्वाद्यायवनं स्वशब्दात् ॥१॥ मुक्तोपसृप्यव्य-
पदेशात् ॥२॥ नानुमानमतच्छब्दात् ॥३॥ प्राण-
भृच्च ॥४॥ भेदव्यपदेशात् ॥ ५॥ प्रकरणात् ॥ ६॥
स्थित्पदनाभ्यां च ।। ६॥
प्रपमाधिकरणभारचयति-
मूत्रं पधान. गेले 'युन्याधायसनं भवेत् ।
श्रुतिस्मृतिप्रसिद्धियां भोवतृत्वाच्चेश्वरेतरा॥१॥
[अ०१ पा० ३ अधि० १ ] वैयासिकन्यायमाला नाऽद्यो पक्षावात्मशब्दान्न भोक्ता मुक्तगम्यतः। ब्रह्मप्रकरणादोशः सर्वज्ञत्वादितस्तथा ॥२॥ मुण्डकोपनिषदि श्रूयते-- यस्मिन्द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्रारणेश्च सर्वेः । तमेवैकं जानथाऽऽत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ।।(२२२१५) इति। 'धुलोकभूलोकाशेपं जगद्यस्मिन्नाधारे प्राश्रितम्, तमाघारमेकमेवाऽऽ- स्मानं जानीथ, न त्वाश्रितं पृथिव्यादि। इतोऽतिरिक्ता अनात्मप्रतिपादिका- स्तर्कशास्त्रादिवाचो विमुञ्चथ, अपुरुषार्थत्वात्, इत्यर्थः । अत्र ( संशयः कि शुभ्वाद्यायतनं मूत्रात्मा, किंवा प्रधानम्, अथवा भोक्ता, माहोस्विदीश्वरः, इति संदेहः । सूत्रात्मा स्यात् । “वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः परश्च लोक: सर्वाणि च भूतानि संदृब्धानि भवन्ति' (बृह० ३।७१२) इति श्रुति- प्रथमाधिकरणकी रचना करते है- सन्देह-'यस्मिन्द्यौः पृथिवी' इत्यादि श्रुतिमें उन द्युलोक आदिका आधार सूत्रात्मा (हिरण्यगर्भ ) है, प्रधान है, जोव है अथवा परमेश्वर है ? पूर्वपत-श्रुति-प्रसिद्धि, स्मृति-प्रसिद्धि और प्रात्मशब्दसे ज्ञात होता है कि ईश्वरसे भिन्न सूत्रात्मा, प्रधान अथवा जीव शु-भू भादिका प्राधार है। सिद्धान्त-श्रुतिमे मात्मशब्द होनेके कारण सूत्रात्मा और प्रधान यु-भू मादिका प्राधार नहीं हो सकते, जीव भी माधार नहीं हो सकता, क्योंकि उक्त प्राधार मुक्त पुरुपोसे प्राप्य कहा गया है। ब्रह्मका प्रकरण होनेसे ब्रह्म प्राधार है तथा सर्वशत्य आदि धर्म ब्रह्ममे ही युक्त हैं। अतः यु, भू प्रादिका प्राधार ब्रह्म ही है। मुण्डकोपनिषदमे 'यस्मिन्यो:०' ( जिसके दुलोक, पृथिवी, अन्तरिक्ष मन सहित सब इन्द्रियाँ माश्रित हैं उस एक माधारको ही प्रान्मा जानो, माश्रित द्यु, पृथिवी आदिको नहीं, मनारम प्रतिपादक तर्कशास प्रादि वाणियोको छोड़ो, यही मोक्षका हेतु (माधार है ) यह श्रुति है । 'धुलोक, भूलोक प्रादि सारा जगत् जिस प्राधारके आश्रित है । उस एक माधारको ही प्रात्मा जानो, प्राश्रित द्यु भू आदि को नही, इमसे भिन्न अनात्म प्रतिपा- दक तर्कशास्त्र प्रादि वाणियोको घोडो, क्योकि वे पुरुषार्थ नहीं हैं।' यही अर्थ है। इसमें संशय होता है कि क्या द्यु, भू आदिका प्रायतन सूत्रत्मा है, अथवा प्रधान है, जीव है वा ब्रह्म है ? ऐसा सन्देह है । पूर्वपक्षी -मबका आधार मूत्रात्मा है। क्योंकि 'वायुना वै.' (हे गौतम ! सूत्रा- स्मावायुसे यह लोक, परलोक, सब भूत गूंथे हुए हैं ) इम श्रुति प्रसिद्धिसे सूत्रात्मा वायु ४
-
भाषानुवादसहिता [अ०१पा० ३ मधि० १]
प्रसिद्धपा वायो. सूनात्मनो शुभ्वाद्यायतनत्वावगमात् । प्रधानं वा स्यात्,
तस्य साख्यस्मृतिप्रसिद्धपा सर्वाधारत्वावगमात् । भोक्ता वा स्यात्, तमेवैवं
जानथाऽश्मानम्' इत्यात्मशब्दात् । इति प्राप्ते-
बूम :-न तावदाद्यो पक्षी सभवतः, उक्तस्याऽन्मशब्दस्य तयोरसंभ
पात् । नापि भोक्ता।
यदा पश्य. पश्यते रुमवणं कर्तारमीशं पुरुपं ब्रह्मयोनिम् ।
तदा विद्वान्पुण्यपापे विधूय निरजन पर साम्यमुपैति ।। (मु० ॥३)
इति
धुम्वाद्यायतनस्य मुक्त पुरुषप्राप्यत्वश्वणाद्धोक्तुर्जीवस्य
तत्प्राप्यत्वासंभवात् । 'वस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति'
इश्यक विज्ञानेन सर्वविज्ञान मुपान्तम् । 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' इत्युपसंहृतम् ।
ततो ब्रह्मप्रकरणाद्भतयोन्यधिवरणोत्तरार्वज्ञत्वादियुक्त रपि ब्रह्मैव शुभ्वाधा-
यतनम् ॥१॥
(द्वितीये परमात्मन एव भूमत्वाविकरणे सूत्र )
(२ भूमाधिकरण मू० ८६)
भूमा सप्रसादादभ्युपदेशात् ॥ ८॥ धर्मोपपत्तेश्च ।। ६ ॥
द्वित्तीपाधिकरणमारयति-
शु, भू मादिका आयतन भवगत होता है । अथवा प्रधान मायतन सकता है, क्योंकि
वह सामस्मृतिकी प्रसिद्धिसे सबका प्राधार भवगत होता है । अथवा जीव हो सकता
है, क्योकि 'तमैक.' ( उसी एक्को प्रात्मा जानो) इसमें मामशब्द है ।
सिद्धान्ती-ऐमा प्राप्त हानेपर हम कहते हैं-प्रथम दो पक्ष वायु और प्रधान
माधार नहीं हो सकते, क्योकि दोनोंमें प्रात्मशब्दका मभव नहीं है । जीव भी माघार
नहीं हो सकता, क्योकि 'यदा पश्प' (जब साधक कर्ता ब्रह्मयोनि नियन्ता ज्योति
स्वरूप पुरुषको देखता है, तब ब्रह्मविद पुष्प पापसे मुक्त होकर मायातीत परम ब्रह्मको
प्राप्त होता है ) इस प्रकार धु, भू आदिका प्राधार मुक्त पुरषोंसे प्राप्य सुना गया है,
परन्तु भोक्ता जीव तो मुक्त पुरुषोंने प्राप्य नहीं हो सकता । 'कस्मिन्न ।' (हे भगवन् ।
किससे ज्ञात होनेपर यह सब विज्ञात हो सकता है ) इस प्रकार एकके ज्ञानसे सबके
शानका उपक्रम है। 'ब्रह्मवेद' ( ब्रह्मको जाननेवाला ब्रह्म ही हो जाता है ) इस तरह
उपसहार किया गया है। प्रत ब्रह्मका प्रकरण है और भूदयोनि अधिकरणमे उक्त सर्व
इत्यादि ब्रह्मने सगत हैं, इसलिए छु, भू प्रादिका माधार ब्रह्म ही है ॥ १॥
[प्र०१ पा० ३ अधि०२] वैयासिकन्यायमाला भूमा प्राण: परेको ग प्रश्नप्रत्युक्तिवर्जनात् । अनुवातिवादित्वं भूमोक्तेश्वासुरेव सः॥३॥ विच्छिद्यैप विति प्राणं सत्यस्योपक्रमात्तथा। महोपक्रम प्रारमोक्ते रीशोऽयं द्वैतवारणात् ॥ ४॥ छान्दोग्ये सप्तमाध्याये नारदं प्रति सनत्कुमारो नामादीन्युत्तरोत्तरभूयासि बहूनि तत्त्वान्युपदिश्यान्ते निरतिशयं भूमानमुपदिशति-'यत्र नान्यत्पश्यति । नान्यच्छणोति नान्यद्विजानाति स भूमा' (७१२३३२४) इति । तत्रभूमशब्दवाच्ये । द्विधा संदिग्धे सति 'प्राणः' इति तावत्प्राप्तम् । प्रश्नप्रत्युक्तिवर्जनात् । पूर्वेपुट नामादितत्त्वेषु 'अस्ति भगवो भूयः' इति नारदः पदे पदे पृच्छति । सनत्कु- मारश्च 'मस्ति' इति प्रतिवक्ति। एवं च प्रश्नप्रतिवचनपूर्वकतया नामादीनि प्राणान्तानि तत्त्वान्युपदिश्य प्राणस्योपरि विनैव प्रश्नमत्युक्तिभ्यां भूमान- मवतारयति । अतः प्राणभूम्नोर्मध्ये विच्छेदकस्याभावात्प्राण एव भूमा। द्वितीयाधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह -'यत्र नान्यत्पश्यति' इत्यादि तिवाक्यमें प्रतीयमान भूमा प्राण है अपवा परमात्मा? पूर्णपक्ष-प्राणके उपदेशके अनन्तर उससे प्राधिक्यका प्रश्न मोर उनर नहीं है और प्रतिवादिलकी मनुवृत्ति कर भूपाका उपदेश है, इस कारण वह भूमा प्राण है। सिद्धान्त-एप तु वा प्रतिवदति' इसमे इम 'तु' शब्दमे प्रकरणुका विच्छेदकर 'य: सत्येनातिवदति' इसमे सत्यशब्दसे अग्निम अवान्तर प्रकरणका प्रारम्भ है, तथा महोपक्रममें मात्मशब्द है, एवं 'यत्र नान्यत्पशति' इससे Tसका निषेध किया गया है, मतः यह श्रुत्युक भूमा परमात्मा ही है। छान्दोग्यके सप्तम अध्यायमे नारदके प्रति सनत्कुमारने नाम मादिसे उत्तरोत्तर अधिक बहुत तत्त्वोका उपदेश कर अन्तमे 'यत्र नान्यत्पश्यति०' (जहाँ अन्यको नही देखता, मन्यको नहीं सुनता, अन्यको नहीं जानता वह भूमा है ) निरतिशय भूमाका उपदेश किया है। यहाँपर भूमा शब्द वाच्य प्राण प्रौर परमात्माके विषयमे सन्देह होने पर- पूर्वपक्षी-प्राण भूमा है, ऐमा प्राप्त होता है, क्योकि इससे प्रागे प्रश्न और उत्तर नहीं हैं ? पूर्व प्रतिपादित नाम मादि तत्त्वोमे नारदने पद-पद पर पूछा है कि ( हे भगवन् ! इससे भी बड़ा है ? ) सनत्कुमारने उत्तर दिया कि 'मस्ति' है। इस प्रकार प्रश्न और प्रतिवचन पूर्वक नाम प्रादिसे लेकर प्राण पर्यन्त तत्त्वोंका उपदेश कर प्राणके कपर प्रश्न मोर उत्तरके विना ही भूमाका अवतरण किया है। प्रवः प्राण ५२ भाषानुवादसहिता [प्र. १ पा० ३ प्रधि०३] विच प्राणतत्त्वमुपदिश्य प्राणोपासक तयाऽतिवादित्वनामय मुत्तमभिधाय प्रकरण विच्छेदशवानिवृत्तये तदेवातियादित्वमनुवत्यं भूमानमुपदिसन्पारण- मनोरभेदं गमयति । तस्मात्प्राणो भूमा। इति प्राप्ते यमः-प्रयं भूमा परमेश्वरः । कुतः। 'एप तु वा प्रतिवदति यः सत्येनातिवदति' ( ७१६१) इत्यत्रातिवादित्वहेतु प्राणोपारानं तुम्देन व्यावरयं मुख्यातिवादित्यहेनोर्ब्रह्मणः सत्यशम्देन पृथगुपत्रमात् । तया परमोपक्रमे 'सरति शोषमात्मवित्' (१३) इति वेद्यतया परमात्मोच्यते । तथा 'पा नान्यत्पश्यति' इति द्वैतनिषेधेन भूम्नो लक्षणमभिधीयते । तस्मात्-अद्वेतः परमात्मेव भूमा ॥२॥ (तृतीये ब्रह्मण एवाक्षरताधिरणे मूत्राणि) [३ पायधिकरण गु० १०.१२] श्रतरमम्बरान्तधृतेः ॥ १० ॥ सा प प्रशासनात् ॥ ११॥ अन्यभावव्यावृत्तेश्च ।। १२ ।। मृतीयाधिकरणमारचयति- प्रक्षरं प्रणवः किंवा ब्रह्म लोकेशाराभिधा। वणे प्रसिद्धा तेनाय प्रणवः स्यादुपास्तये ॥५॥ और भूमाके बीच में प्रकरणका विच्छेद नहीं है, इससे प्राण भूमा है । किश्च प्राण तत्त्वका उपदेश कर प्राणोपरामको भनिवादिव नामक उत्कर्प कह कर प्रकरण विच्छेद की शङ्काकी निवृत्तिके लिए उमो प्रतिवादित्वको अनुवृत्ति कर भूमाका उपदेश करते हुए प्राण मोर भूमामे भभेद बोप कराया है । इसमे प्राण ही भूमा है। सिदान्ती-ऐमा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-यह अत्युक भूमा परमेश्वर है, क्योकि 'एष तु वा०' (परन्तु वही प्रतिवादी है जो मत्यसे प्रतिवादी है ) इममें पति- वादित्वके हेतुभूत प्राणोपासनाको 'तु' शब्दसे व्यावृत्ति कर मुख्य प्रतिवादित्वके हेतु भूत ब्रह्मका सत्यशब्दसे उपक्रम किया है। इसी प्रकार परमपक्रममे 'तरति शोक्मा- स्मवित्' (मात्मवेत्ता शोकसे मुक्त हो जाता है ) यहाँ परमात्मा हो वेद्यरूपसे कहा गया है । तथा 'जहाँ भन्यको नहीं देखता' यहाँ दंतके निपेवसे भूमाका लक्षण कहा है । अतः यह सिद्ध हुआ कि मद्वितीय परमात्मा ही भूमा है ॥२॥ तृतीयाधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह--'एतद्वैतदक्षरं गागि' इत्यादि श्रुतिमै पठित 'अक्षर' प्रोकार है मषवा [ म०१ पा० ३ अधि० ३] वैयासिकन्यायमाला अव्याकृताधारतोक्त: सर्वधर्मनिषेधतः । शासनाद्दष्टतादेश्च ब्रह्मवाक्षरमुच्यते ॥ ६ ॥ बृहदारण्यके तृतीयाध्याये गार्गी प्रति याज्ञवल्क्य पाह-'एतद्वै तदक्षरं गागि ब्राह्मणा मभिवदन्ति, अस्थूलमनण्वहस्वम्' (३८10) इति । अत्र अक्षर- शब्देन प्रणवो ब्रह्म वाऽभिधीयते' इति संदेहे 'प्रणव.' इति प्राप्तम् । कुतः । लोके 'येनाक्षरसमाम्नायमधिगम्य' इत्यादी वर्णऽक्षरशब्दप्रसिद्धः। प्रणवा- सरस्यानोपास्यतया वक्तव्यत्वात् । इति प्राप्ते- म:-ब्रह्मवाक्षरशब्दवाच्यम् । कुतः। 'एतस्मिन्सल्वक्षरे मायेकाश प्रोतश्च प्रोतश्च' (३७) इत्याकाशशब्दवाच्यमव्याकृतं प्रत्यक्षरस्याऽs- धारतोक्तेः। प्रणवस्य तदसंभवात्। किंच 'अस्थूलमनवहस्वम्' इत्यक्षरे सर्वसंसारधर्मा निषिध्यन्ते। तथा 'एतस्य वाऽक्षरस्य प्रशासने गागि सूर्याचन्द्रमसो विधृतो तिष्ठतः' (३८) इति तस्यैवाक्षरस्य जगच्छासि- तृत्वमुच्यते। तथा 'तद्वा एतदक्षरं गार्ग्यदृष्ट द्रष्ट्र प्रश्रुतं श्रोत' (३।८।११) पूर्वपक्ष--लोकमे 'अक्षर' पद वर्ण-प्रोकारमे प्रसिद्ध है। इससे यहाँ 'अक्षर' से मोकार हो उपास्यरूपसे कहा गया है । सिद्धान्त--'मदार' भन्याकृत आकाशका प्राधार सब धर्मोस मतीत सम्पूर्ण जगत्का शासक एवं दृष्टा कहा गया है, इससे अक्षर ब्रह्म ही कहा जाता है। बृहदारण्यके तृतीय मध्यायमे गार्गीक प्रति याज्ञवल्पयने कहा-(हे गार्गी ! यह वही भक्षर है जिसे ब्राह्मण न स्थूल कहते हैं न सूक्ष्म और न ह्रस्व )। यहाँ 'अक्षर' शब्दमे मोकारको कहा जाता है अथवा ब्रह्मको ? ऐसा सन्देह होने पर-- पूर्वपक्षीयहाँ 'अक्षर' शब्दसे मोकारका हो अभिधान है, ऐमा प्राप्त होता है ? क्योंकि लोकमे 'येनाक्षरसमाम्नायमधिगम्य' इत्यादि स्थलोमे अक्षर शब्दकी वर्णीम प्रसिद्धि है और यहाँपर प्रणवाक्षर उपास्यरूपसे कहा गया है । ऐसा प्राप्त होनेपर-- सिद्धान्ती हम कहते हैं-ब्रह्म अक्षर शब्द वाच्य है, किससे ? इससे कि 'एतस्मिन्बल्वक्षरे.' ( हे गार्गी । इस अक्षरमे प्राकाश-प्रव्याकृत श्रोत प्रोत है) इस श्रुतिमे 'अक्षर' आकाश शब्द वाच्य अव्याकृतका आधार कहा गया है। वर्णरूप ओंकारमे यह संभव नहीं है । किन-'अस्थूलमनवहस्त्रम् (स्थूल नही पाणु, नहीं, हस्व नही है ) इस श्रुतिले प्रशरमे संसारके सब धोका निषेध किया गया है । तथा 'एतस्यैवाक्षरस्य' (हे गार्गी । सूर्य और चन्द्रमा उमी अक्षरके शामन-माशामें प्रवधृत होकर रहते हैं। इस प्रक्षर सारे जगत्का शासिता कहा जाता है । एव 'तद्वाएतदक्षर' १५. भाषानुवादसहिता [अ० १ पा० ३ मधि०४] इत्यादिना द्रष्ट त्वादिकं प्रमाणाविषयत्वं चाऽऽम्नातम् । तदेत्सवं न प्रणव- पक्षेऽवकल्प्यते । तस्माद्-यौवाक्षरम् ॥ ३ ॥ (चतुर्थे परब्रह्मण ईक्षतिकर्मता ( ध्येयता) धिकरणे सूत्रम् ) [४ ईक्षतिकर्मव्यपदेशाधिकरण सू० १३ ] ईक्षतिकर्मव्यपदेशात्सः ॥ १३ ॥ चतुर्थाधिकरणमारचयति- त्रिमात्रप्रणवे ध्येयमपरं ब्रह्म वा परम् । ब्रह्मलोकफलोक्त्यादेरपरं ब्रह्मगम्यते ॥७॥ ईक्षितव्यो जीवधनात्परस्तत्मत्यभिज्ञया । भवेद्धपेयं परं ब्रह्म कममुक्तिः फलिष्यति ॥८॥ प्रश्नोपनिषदि थूयते 1-'य: पुनरेतं त्रिमाणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरु- पमभिध्यायोत' (२५) इति । तत्र ध्येयं वस्तु हिरण्यगर्भायमपरं ब्रह्म, उत परं ब्रह्म' इति संशये सति 'अपरम्' इति तावत्प्राप्तम् । कुतः। 'स ( हे गार्गी । वह भक्षर द्रष्टा है किन्तु महष्ट-उसे कोई देख नहीं पाता वह श्रोता है, परन्तु उमे कोई सुन नही पाता ) इत्यादि श्रुतिसे वह द्रष्टा, श्रोता और प्रत्यक्षादि प्रमाणोका पविषय कहा गया है। परन्तु यह सब प्रणव-भोकार पक्षमै नही हो सकता, इससे ब्रह्म ही अक्षर है ।। ३ ।। चतुर्थाधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-'यः पुनरेतं.' इस श्रुतिके तीन मात्रावाले प्रणवमे पर ब्रह्म ध्येय है अथवा अपर ब्रह्म अर्थात् प्रोकारका अपरब्रह्म रूपसे ध्यान करना चाहिए अथवा परब्रह्मरूपसे ? पूर्णपक्ष-ब्रह्मलोक गमन रूम सीमित फलके कथनसे ज्ञात होता है कि यहाँ अपर ब्रह्म ही ध्येय है। सिद्धान्त-वाक्य के अन्तमे सर्वोत्कृष्ट विराट हिरण्यगर्भसे भी उत्कृष्ट-साक्षा- करणीय कहा गया है। पर मोर पुरुष शब्दोसे उमौकी प्रत्यभिज्ञा होती है। ब्रह्म ध्यानका ब्रह्मलोक प्राप्तिमात्र फल नहीं है किन्तु अन्तमे मुक्ति है अर्थात् क्रमसे मुक्तिरूप फल है। प्रतः परब्रह्म ही ध्येय है। प्रश्नोपनिषदें 'यः पुनरेतं ' ( जो उपासक त्रिमानाविशिष्ट '' इम अक्षरद्वारा इस पर पुरुषका ध्यान ( उपामना ) करता है ) ऐसी शुनि है। यहाँपर ध्येय वस्तु हिरण्यगर्भ मंज्ञक अपर ब्रह्म है अथवा परब्रह्म ? ऐमा सशय होनेपर पूर्वपक्षी-कहते हैं कि उक्त वाक्यमे अपर ब्रह्म ही ध्येय रूपसे कहा गया है' ऐमा प्राप्त होता है। क्योंकि 'स सामाभिः०' (वह उपासक सामद्वारा ब्रह्मलोकमे पहुं-
।
Sunt
अ० १ पा० ३ अधि०५] वैयासिकान्यायमाला
सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकम्' (प्र० ५।५) इति कमलासनलोकप्राप्तिफल-
श्रवणात् । परब्रह्मध्यानस्य परमपुरुषार्थस्य तावन्मात्रफलत्वानुपपत्तेः। परं
पुरुषम्' इति परशब्दविशेषणमपरस्मिन्नपि ब्रह्मण्युपपद्यते । तस्यापीतरापेक्षया
परत्वात् । इति प्राप्ते-
ब्रूम-परमेव ब्रह्माभिध्येयम् । कुतः। ईक्षितव्यस्य परस्य ध्येयत्वेन प्र-
त्यभिज्ञानात् । 'स एतस्माज्जीवधनात्परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते' (प्र० ४।४ )
इति वाक्यशेपे श्रूयते । तस्यायमर्थः-य उपासनया ब्रह्मलोकं प्रातः स
एतस्मात्सर्वजीवसमष्टिरूपादुत्कृष्टाद्धिरण्यगर्भादप्युत्कृष्ट सर्वप्राणिहृदये शयानं
परमात्मानं पश्यति, इति । तक्षितव्यो यः परमात्मा स एव वाक्योपक्रमे
ध्यानविषयत्वेनाभिप्रेत इत्यवगम्यते । परपुरुषशब्दाभ्या तस्य प्रत्यभिज्ञानात् ।
न च ब्राह्मलोकप्राप्तिमात्र फलम्, क्रममुक्तिसम्भवात् । तस्माद्ब्रह्मैव
ध्येयम् ॥४
(-५
(पञ्चमे ब्रह्मण एव दहराकाशत्वाधिकरणे मूत्राणि-)
(५ दहराधिकरण सू०१४-१८ )
दहर उत्तरेभ्यः ॥१४॥ गतिशब्दाभ्यां तथा हि दृष्टं लिङ्गं
च ।। १५ ।।धृतेश्च महिम्नोऽस्यास्मिन्नुपलव्धेः ॥ १३ ॥
चाया जाता है ) इस श्रुतिमे उपासकके लिए ब्रह्मलोक प्राप्तिरूप फल कहा गया है।
परब्रह्मका ध्यान परम पुरुषार्थ है उसका फल केवल ब्रह्मलोक प्राप्ति संभव नहीं है।
'परं पुरुषम्, इस श्रुतिमें 'पर' पद विशेषण भी अपर ब्रह्म में उपपन्न होता है, क्योकि
वह भी अन्योको अपेक्षा पर ही है। ऐसा प्राप्त होनेपर-
सिद्धान्ती हम कहते है-यहाँपर परब्रह्म ही ध्येय है। क्योकि इक्षितव्य
परको ध्येयरूपसे प्रत्यभिज्ञा होती है । 'म एतस्माजीवधनात्.' (वह उपासक इस
जीवधन स्वरूप हिरण्यगर्भसे भी उत्कृष्ट सब शरीरोमे अनुप्रविष्ट परमात्माको देखता
है ) ऐमा वाक्यशेपमें सुना जाता है। उसका यह अर्थ है-जो उपासक उपासनाद्वारा
ब्रह्मलोकमे पहुंचता है, वह इस मर्व जीव ममष्टिरूप उत्कृष्ट हिरण्यगर्भसे भी उत्कृष्ट
सब प्राणियोके हृदयमे वास करनेवाले परमात्माको देखता है । यहाँ पर ऐसा ज्ञात होता
है कि साक्षात्कार करने योग्य जो परमात्मा कह गया है वही वाक्यके उपक्रममे ध्येय-
रूपसे अभिप्रेत है, कारण कि 'पर' और 'पुरुष' शब्दोमे उसको ही प्रत्यभिज्ञा होती है।
केवल ब्रह्मलोक प्राप्तिमात्र ही उसका फल नहीं है, क्योकि उसके मनन्तर क्रम मुक्तिको
संभावना है । इमसे यहाँ ब्रह्म ही ध्येय है ॥४॥
मापानुवादसहिता [अ० १ पा० ३ मषि०५) प्रसिद्धश्च ॥ १७ ॥ इतरपरामर्शात्स इति पेन्ना- संमवात् ॥१८॥ पश्नमाधिकरणमारचयति- दहरः को वियज्जीवो ब्रह्म वाऽकारारादतः। वियत्स्यादथवाल्पत्वश्रुतेर्जीवो भविष्यति ।।६॥ बाह्याकाशोपमाने न द्युमूम्यादिसमाहितः। मात्माभहतपाप्मत्वात्सेतुत्वाच्च परेश्वरा ॥१०॥ छान्दोग्यस्याष्टमाध्याये श्रूयते-'अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म, दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः, तस्मिन्यदन्तः, तदन्वेष्टव्यम्, तताव विजिज्ञा. सितव्यम्' (८।१।१ ) ब्रह्मण उपलब्धिस्थानत्वेन शरीरं ब्रह्मपुरम् । तत्राल्पं हृदयपुण्डरीक वेश्म यदवतिष्ठते, तस्मिन्वेश्मन्यल्प आकाशो वर्तत इत्यर्थः । तत्राकाशस्य त्रेघा संशये सति 'वियत्' इति तावत्माप्तम् । श्रावाससदस्य वियति रूढत्वात् । यद्वा दहशब्देनाल्पत्वोक्तेः परिच्छिन्नो जीवो भविष्यति न तु ब्रह्म। पंचमाधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-'मय यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दह' इस श्रुतिमे उक्त दहर भूनाकाश है, जीव है अथवा ब्रह्म है। पूर्वपक्ष -दहर भूताकाश हो सकता है, क्योकि तिमे भाकाश शन्द कहा गया है, माकाश शब्द भूताकाशमे प्रसिद्ध है। अपना जीव दहर होगा, क्योकि घुतिमे वह मल्प कहा गया है। सिद्धान्त-बाह्य माकाशके साथ उपमा देने, द्यु, भूमादिका माधार होने, अत्यन्त पाप राहित्य मादि धमोसे एवं लोकमर्यादापोंका संस्थापक होनेसे दहर परमेश्वर छान्दोग्योपनिषद्के पाठवें अध्यायमे श्रुति है-'प्रथ यदिदम स्मिन् ' ( इस ब्रह्म पुरमे जो छोटा सा हृदय कमल रूप है, उसमें छोटा-मा आकाश है, उसके मन्तर जो है यह मन्वेषण योग्य और विशेषरूपमे जिज्ञासितव्य है) 'ब्रह्मको उपलब्धिका स्थान होनेसे शरीर ब्रह्मपुर है, उसमे हृदयकमल स छोटा-सा गृह है, उस गृहमे छोटा-सा प्राकाश है, यह अत्यर्थ है । यहाँपर आकाशमे सन्देह होता है कि वह भूताकाश है जीव है अथवा ब्रह्म है, इस तरह तीन प्रकारका सन्देह होने पर- पूर्वपली -कहना है कि वह भलाकार, ही है, क्योंकि भाकाश शब्द भूताकाशम 'यावान्वा प्रयमा- [म०१ पा० ३ अधि०६] वैयासिकन्यायमाला इति प्राप्ते बम :-ब्रह्मेवाऽऽकाशशब्दवाच्यम् । काशस्तावानेषोऽन्तहदय प्राकाशः' (८1१।३) इति प्रसिद्धेन वियतोपमित- त्वात् । न हि वियतो वियदुपमानं संभवति । नाप्यल्पपरिमाणो जीवो वियत्परिमाणेनोपमातुं शक्यः । लौकिकरूढिस्तु श्रौतरूढ्या परिहता। किंच 'उभे अस्मिन्द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते' (८।१।३) इत्यादिना द्यावापृथिव्याद्यशेषजगदाधारत्वं दहराकाशस्य श्रूयते । 'प्रथैप आत्माऽ- पहतपाप्मा' (२५) इत्यात्मत्वमपहतपाप्मत्वं च । सेतुर्विधृतिः' इति जगन्मर्यादानामसाकर्याय विधारकत्वलक्षणसेतुत्वं च, तस्मादेतेभ्यो हेतुभ्यः परमात्मा ॥ ५॥ (प४' ईश्वरस्यैवाक्षिपुरुषत्वाधिकरणे सूत्राणि) उत्तराच्चेदाविभूतस्वरूपस्तु ॥ १६ ॥ अन्यार्थश्च परामर्शः ॥ २०॥ अल्पश्रुतेरिति चेत्तदुक्तम् ॥ २१ ॥ पष्ठाधिकरणमारचयति- ग्य प्रात्मा स - रूढ है। प्रथवा दहर शब्दसे अल्पत्वके कथनसे परिच्छिन्न जीव हो मकता है, ब्रह्म तो कदापि नही हो सकता। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं--ब्रह्म ही आकाश शब्द वाच्य है, क्योकि 'यावान्वा अयमकाश:०' (जितना बड़ा यह बाह्य प्राकाश है उतना ही बडा यह भीतरका प्राकाश है ) इम श्रुतिमे प्रसिद्ध बाह्य माफाशसे उसकी उपमा की गई है। प्राकाशसे ही माकाशकी उपमा देना सभव नहीं है। अल्प परिमाण वाले जीवकी विशालतम परिमाणवाले माकाशके साथ उपमा नहीं दी जा सकती। जो यह कहा गया है कि प्राकाशशब्द भूतकाशमे प्रसिद्ध है, इस उक्त लौकिक रूढिका ध्रुति प्रसिद्धसे परिहार किया गया है। किंच ( जिसके अन्तर द्यु, और पृथिवी दोनो स्थित हैं ) इत्यादि श्रुतिसे दहराकाश द्यु, पृथिवी आदि सकल जगत्का आधार कहा गया है। 'अर्थप०' (यह मात्मा पाप रहित है ) इसमे प्रात्मत्व और पाप रहितत्व धर्म कहे गये हैं । 'म आत्मा० ( यह आत्मा जगत्की मर्यादाप्रोको नष्ट न होने देने के लिए धारणकर्ता सेतु है ) इस श्रुति वाक्यमे जगत्की मर्यादामोके प्रमंकरके लिए विधारकत्वरूप सेतु कहा गया है। इमलिए इन उक्त हेतुप्रोसे दहराकाश परमात्मा ही है ॥ ५॥ छठे अधिकरणकी रचना करते हैं- १. भाष्करके मतमे यह पृथक् अधिकरण नहीं है, उनके मतमे १४ से २१ सूत्र तक एक ही मधिकरण है।
५८ भापानुवादसहिता [अ०१पा०३ अधि०६] य प्रजापतिविद्याया म कि जीवोऽयदेश्वरः। जामत्स्वप्नसुषुप्तोक्नेस्तनाओव इवोचित ॥११॥ ग्रात्माहतपाप्मेति प्रक्रम्यान्ते स उत्तम । पुमानित्युक्त ईशोऽत्र नामदाधवयुद्धपे ॥ १२ ॥ दहरविद्याया उपरि प्रजापतिविद्यापामिन्द्र विरोचनप्रजापतिसंवादे धूयते- 'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते, एप प्रारमेति होवाच' (छा० ८७४) इति। तत्र-'जीवात्मा' इति प्राप्तम् । कुत। अवस्यानयोपन्यासात् । 'पक्षिणि पुरुष " इति जागरणोपन्यास । 'य एप स्वप्ने महीयमानश्चरति' इति स्वप्नोपन्यास । 'सुप्तः समस्तः संप्रसन्न स्वप्नं न विजानाति' ( छा० ८।११।१ ) इति सुपुप्तोपन्यासः । एयमवस्थानय उपन्यस्ते सत्यवस्थावाजीवो ग्रहीतुमुचित ईश्वरस्यावस्था- राहित्यात् । - सन्देह-प्रजापति विद्यामे जो पुरुष कहा गया है क्या यह जीव है अथवा ईश्वर । पूर्वपक्ष -जाग्रत, स्वप्न मोर मुषुप्ति मवस्थाएं कही गई हैं, मत. उन अवस्थामों वाला जोव ही उक्त विद्यामें प्रतिपादित है। सिद्धान्त-युतिमे 'यभारमापहतपाप्मा' ऐसे ब्रह्मका उपक्रम कर 'म उत्तम पुरुष इस प्रकार उपम हार में भी परमेश्वर ही कहा गया है। जापत मादि अवस्याप्रोका उपदेश परमेश्वरके बोपके लिए है। मत दहराकाश परमेश्वर है। दहर विद्याके मनन्तर प्रजापति विद्यामे इन्द्र, विरोचन मोर प्रजापतिके संवादमें 'य एपोक्षिणि' (जो यह चक्षुमें पुरुष दिखाई देता है, यह मात्मा है, ऐसा प्रजापतिने कहा ) उक्त तिमे प्रतिपादित पुरुष जीव है अथवा परमेश्वर ? यह मन्देह होनेपर- पूर्वपक्षी-यह उक्त पुरुष जीवात्मा है, क्योकि तीन भवस्थापोंका उपन्यास है । 'मक्षिणि पुरुप ' इस प्रकार जाग्रत् भवस्थाका 'य एष स्वप्ने महियानश्चरति०' (यह जो स्वप्नम वासनामय विषयोसे पूज्यमान विचरता है) इस तरह स्वप्नावस्थाका 'सुप्त समस्त सम्प्रसन स्वप्न न विजानाति०' (जब पुरुप गाढ निद्रामे सोता है उसको सब इन्द्रियाँ अपना अपना व्यापार लाग देती हैं, प्रसन्न रहता है, स्वप्नको नहीं देखता) इस प्रकार मुषुप्ति अवस्थाका उपन्याम है। इस प्रकार तीन अवस्थाप्रोका उपन्यास होनेपर यहाँ अवस्थामवाले जीवका ही प्रहण युक्त है। ईश्वरका नहीं, क्योकि वह ठीन अवस्थाप्रोसे रहित है।
५६ [म० १ पा० ३ अधि०७] वैयासिकन्यायमाला इति प्राप्ते ब्रूमः-ईश्वरोऽन ग्रहोतभ्यः । कुतः । 'य प्रात्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युः' (छ० ८१) इति परमात्मानमुपक्रम्य 'स उत्तमः पुरुषः' । इत्यनेन परमात्मन एवोपसंहारात् । न चैवं सति जागरणाद्युपन्यासवैयथ्यंम् । शाखाचन्द्रन्यायेन परमात्मबोधोपयुक्तत्वात्, तस्मादीश्वरोऽक्षिपुरुपः॥ ६ ॥ (सप्तमे चैतन्यस्य सर्वजगद्भासवत्वाधिकरणे सूत्रे ) (७ मनुकृत्यधिकरण सू० २२-२३ ) अनुकृतेस्तस्य च ॥ २२ ॥ अपि च स्मयते ॥ २३ ॥ सप्तमाधिकरणमारचयति । न तत्र सूर्यो भातोति तेजोन्तरमुतात्र चित् । तेजोभिभावकत्वेन तेजोन्तरमिदं महत् ।। १३ ॥ चित्स्यात्सूर्याद्यभास्यत्वातादृक्त जो प्रसिद्धितः सर्वस्मात्पुरतो भानात्तद्भासा चान्यभासनात् ॥ १४ ॥ मुण्डकोपनिषदि श्रूयते- न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते है-यहाँ ईश्वरका ही ग्रहण करना चाहिए, क्योकि 'य पात्मा'( यह प्रात्मा पापरहित, जरा रहित, मृत्यु रहित है ) इस प्रकार परमात्माका उपक्रमकर 'स उत्तमः पुरुषः' इससे परमात्माका ही उपसंहार किया गया है । ऐमा होनेपर भी जाग्रत् प्रादि अवस्थानोका उपन्यास व्यर्थ नहीं है, क्योकि शाखाचन्द्रन्यायसे उनका कयन परमात्माके बोधके लिए उपयुक्त है। इसलिए मक्षिपुरुष परमेश्वर ही है ॥ ६॥ सप्तम प्रधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-'न तत्र सूर्यो भाति०' इत्यादि तिमे प्रतिपादित जगद्भासक सूर्यादिसे अतिरिक्त कोई दृष्टिगोचर तेजस्वी पदार्थ है अथवा चेतन ब्रह्म ? पूर्वपक्ष-मूर्य प्रादि तेजका अभिभावक होने के कारण यह मूर्यादिसे प्रनिरिक्त कोई विपुल तेज हो सकता है। मिद्धान्त--सूर्य प्रादिसे भास्य न होने, सूर्य प्रादिको अभिभूत करनेवाले किमी मन्य तेजके अप्रसिद्ध होने, सबसे पहले भान होने एवं अपनी भासे अन्य सबको भामित करनेके कारण उक्त ७ तिमे कथित जगद्भासक चिद्रूप ब्रह्म ही है। मुण्डकोपनिषद्म श्रुति है--'न तत्र सूर्यो भाति०' (वहाँ उस प्रात्मस्वरूप ब्रह्ममे न सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा, न तारा, न विद्युत् प्रकाशित होती है । इस लोकिक भाषानुवादसहिता [प्र. १ पा० ३ प्रषि०७] तमेव भान्तमनुभाति सर्व तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ (२०१०) इति । मयमर्थ:-'तत्र पूर्वप्रवृते ज्योतिपा ज्योतिपि चन्द्रसूर्यादयो न भान्ति, किंतु तमेव ज्योतिपा भासकं पुरतो भासमानं पदार्थमनु सब जगद्गाति । भास. नदशाया न स्वतन्त्रेण मानेन जगद्भाति । किं तर्हि तस्य भासकपदार्यस्य भासा सर्वमिदं विभाति' इति । 'अस्मिन्यावये श्रूयमाणं जगद्धासकं कि सूर्यादिसदृशं चाक्षुष तेजोन्तरम्, उत चैतन्यम्' इति संशये 'तेजोन्तरम्' इति प्रप्तम् । कुतः सूर्यादितेजोभिभावकत्वात् । महतस्तेजस: संनिधौ स्वल्पं तेजोऽभि- भूयते । यथा सूर्यसंनिधौ दोपः । तथा च सूर्यादीनां यदभिभावकं तरसूर्यादि- भ्योऽप्याधिक तेजोन्तरमेव । इति प्राप्त उच्यते-सूर्यादिभिरभास्यतया ध्रयमाणं वस्तु चेतन्यम् । कुतः । सूर्याधाभिमावकस्य महतस्तेजोन्तरस्याप्रसिद्धत्वात् । विच 'तमेव भान्त- मनुभाति सर्वम्' इति सर्वस्मात्पुरोभासमानत्वं चैतन्यधर्मः । तथा 'तस्य भासा अग्निके विषयमे तो फिर कहना ही क्या है । उम ब्रह्मके प्रकाशित होने से हो सब प्रकाशित होता है और यह सब कुछ उसीके प्रकाशसे प्रकाशमान है) इस मन्त्रका यह मर्थ है--'पूर्व प्रकृत सब ज्योतियोको ज्योतिको लोक प्रमिद सूर्य, चन्द्रमा प्रादि ज्योति प्रकाशित नही कर सकती, किन्तु सूर्य आदि सब ज्योतियों के भामक उसी मलौकिक पदार्थके पहले मा- सित होनेपर ही सारा जगत् प्रकाशित होता है । जगत् अपनी प्रकाशन दशामे अपने स्वतन्त्र प्रकाशसे प्रकाशित नहीं होता, किन्तु उम सर्वभासक पदार्यके भासे ही यह सब प्रकाशित होता है। यहापर इस श्रुति वाक्यमें श्रयमाण जगदामक क्या सूर्यादिके समान प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाला कोई अतिरिक्त तेज है अथवा चैतन्य ब्रह्म है, ऐमा संशय होनेपर- पूर्वपक्षी- यह अन्य तेज ही है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योकि वह सूर्य भादि तेजो को अभिभूत करनेवाला है । महान तेजके संनिधिमे स्वल्प तेज अभिभूत होता है, जैसे सूर्य के सामने दीपक । इससे सूर्यादिको अभिभूत करनेवाला सूर्य प्रादिसे भी अधिक कोई अतिरिक्त तेज है। सिद्धान्ती--ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं--सूर्य मादिसे भी प्रभास्य होनेसे य- माण वस्तु चैतन्य ब्रह्म ही है । किससे ? इससे कि सूर्य प्रादिको अभिभूत करनेवाला कोई अन्य महा तेज प्रसिद्ध नहीं है। किंच ( उमौके प्रकाशित होनेसे मव प्रकाशित होता है ) इसे सबसे पहले भासना चैतन्य ब्रह्मा ही धर्म है। तथा-'उमके प्रकाशसे यह सब प्रकाशित होता है' इस प्रकार प्रकाश और अप्रकाशरूप सारे जगतका भासक चतन्य [अ० १ पा० ३ अघि०८] वैयासिकन्यायमाला समिदं विभाति' इति प्रकाशाप्रकाशरूपसर्वजगद्भासयत्वं चैतन्यधर्म एव । तस्माच्चैतन्यं वाक्यप्रतिपाद्यम् ॥ ७ ॥ (मष्टमे परमेश्वरस्याङ्गठमात्रत्वाधिकरणे सूत्रे ) (८ प्रमिताधिकरण सू० २४-२५ ) शब्दादेव प्रमितः ॥ २४ ॥ हृद्यपेक्षया तु मनुप्याधिकारात् ॥ २५ ॥ अष्टमाधिकरणमारचयति- अंगुष्ठमात्रो जीवः स्यादीशो वाल्पप्रमाणतः। देहमध्ये स्थितेश्चैव जीवो भवितुमर्हति ॥ १५॥ भूतभव्येशता जीवे नास्त्यतोऽसाविहेश्वरः । स्थितिप्रमाणे ईशेऽपि स्तो हृद्यस्योपलब्धितः॥१६॥ कठवल्लीषु चतुर्थवल्लपामाम्नायते- अंगुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य प्रात्मनि तिष्ठति । ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते ॥ (२०१।१२) इति । तत्रांगुष्ठमात्रो जीवः । कुतः । 'अंगुष्ठमात्रः' इत्यल्पप्रमाणत्वात् । 'मध्य प्रात्मनि तिष्ठति' इति देहमध्यदेशावस्थानाच्च । का ही धर्म है। इससे यह सिद्ध हुमा कि उक्त वाक्यमे चैतन्य ब्रह्म ही कहा गया है ॥७॥ मष्टमाधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-'अंगुष्ठमात्र पुरुषो मध्य मात्मनि तिष्ठति०' इस श्रुतिमे उक्त अंगुष्ठमात्र पुरुष जीव है अथवा परमेश्वर ? पूर्वपक्ष-अंगुष्ठके समान अल्प परिमाण होने और देहके मध्यमे रहनेके कारण उक्त पुरुष जीव ही हो सकता है। सिद्धान्त-जीव भूत एवं भविष्यत्का शासक नही हो सकता अतः वह ईश्वर है, हृदयमें ईश्वरकी उपलब्धि होती है, इससे हृदयमे स्थिति और मंगुष्ठके समान परिमाण ईश्वरमें भी संभव हैं, इसलिए उक्त वाक्यमे अगुष्ठमात्र पुरुष परमेश्वर ही है । कठोपनिषद्की चतुर्थ वल्लीमें-'गुष्ठमात्रः पुरुषो०' (अंगुष्ठमात्र पुरुष देहके मध्यमें रहता है, वह भूत और भविष्यत्का स्वामी है । ऐसा ज्ञात होनेपर जीव अपना रक्षण नहीं चाहता ) यह छवि है। सन्देह-यहां उक्त पुरुष जोय है अथवा ईश्वर ? पूर्णपक्षी-यहाँ उक्त अंगुष्ठमात्र पुरुष जीव है, क्योकि 'अंगुष्ठमात्रः' इस प्रकार पल्प परिमाण मौर 'मध्य पात्मनि तिष्ठति देहके मध्यदेशमें स्थिति कही गई है।
R ६२ भाषानुयादसहिता [म०१ पा० ३ अपि t] इति प्राप्ते प्रम.-परमारमाऽनप्छमात्रः। पुतः। 'ईशानो भूतभव्यस्य' इत्यतीतानागतजगदीशितृत्वश्रवणात् । नचेमिहत्यं जीवेऽस्ति, जीयस्यैशि- तव्यत्वात् । अल्पप्रमाणत्वं देहमध्येऽवस्थानं चेश्वरस्यापि गंभवतः । हृदय- पुण्डरीके ब्रह्मण उपसम्भात्तदपेक्षया तदुभयसंवोतनात् । तस्मादंगुष्ठमात्रः परमेश्वर. ॥८॥ ( नवमे देवादीनामप्यधिकारिवाधिकरणे मूवारिण) (६ देवताधिकरण ग० २६-३३ ) तदुपर्यपि यादरायणः संभवात् ।।२६॥ विरोधः कर्मणीति चेन्नानेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात् ॥ २७ ॥ शब्द इति चेन्नातः प्रभवात्प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ।। २८ ।। अत एव च नित्य. त्वम् ॥२६॥ समाननामरूपत्वाच्चाऽवृत्तावप्यविरोधो दर्शनात्स्मृतेश्च ॥३०॥ मयादिप्यमभवादनधिफारं जैमिनि. ॥ ३१ ॥ ज्योतिपि भावाच ॥ ३२ ॥ भावं तु यादरायणोऽस्ति दि ॥ ३३ ॥ नवमाधिकरणमारचयति- नाधिक्रियन्ते विद्याया देवा. विवाऽधिवारिणः। विदेहत्वेन सामथ्र्यहानेपामधिनिया ॥१७॥ प्रविरुद्धजातवादिमन्त्रादेदहसत्त्वत अथित्वादेश्य सौलभ्याद्देवाधा अधिकारिण ॥ १८ ॥ सिद्धान्ती-ऐमा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं--प्रगुष्ठमात्र परमात्मा ही है, क्योंकि 'ईशानो भूतमम्यस्य' (वह भूत पौर भविष्यत्का शामिता है ) यह ति उसे प्रतीत मोर भविष्यत् जगत्का शामिता कहती है । जीव शामिता नही हो सकता है, क्योकि जीव स्वय शास्य है । अल्पपरिमाण एवं देहके मध्य में स्थिति ईश्वर में भी संभव है। ब्रह्मकी हृदयकमलमें उपलब्धि होती है, इसलिए हृदयकी अपेक्षा ईश्वरमें दोनोंका कथन किया गया है । मत अगुठमात्र पुरुष परमेश्वर ही है ॥ ८ ॥ नवम मधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-ब्रह्मविद्यामे देवता अधिकारी हैं अथवा अधिकारी नहीं हैं ? पूर्णपक्ष-शरीर और सामर्थ्यके न होने से उनका ब्रह्मविद्या में अधिकार नहीं है । सिद्धान्त-प्रमाणान्तरसे प्रविरुद्ध अर्थवाद प्रादि एवं मन्त्रादिसे ज्ञात होता कि देवता शरीरवाले हैं, पर उनमें अषित्वादि सुलभ हैं, इससे देवादि ब्रह्म विद्यामें अधिकारी हैं।
। [म०१ पा० ३ अघि०६] वैयासिकन्यायमाला बृहदारण्यके प्रथमाध्याये श्रूयते-'तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्, तथीणाम्' (बृह० १।४।१०) इति। 'देवानां मध्ये यो ब्रह्म बुबुधे स एव ब्रह्माभवत्' इत्यर्थः । तत्र देवर्षयो विद्याया नाधिकियन्त इति प्राप्तम् । कुतः। 'अर्थी समर्थो विद्वाञ्शास्त्रेणापयुदस्तोऽधिक्रियते' इत्युक्तानामधिकार. हेतूनामशरीरेषु देवेश्वभवात् । न च मन्त्रार्थवादादिभ्यो देवाना विग्रह- वत्त्वम् । विध्येकवाक्यतापन्नानां मन्त्रादीना स्वार्थ तात्पर्याभावात् । इति प्राप्ते ब्रूमा-त्रिविधो ह्यर्थवादः । गुणवादोऽनुवादो भूतार्थवादश्चेति । तथा चाह- विरोधे गुणवादः स्यादनुवादोऽवधारिते। भूतर्थवादस्तद्धानादर्थवादविधा मतः ॥ इति। बृहदारण्यकोपनिषद्के प्रथम अध्याय में 'उद्यो यो०' (देवतामोमे से तथा ऋषियोमे से जिस जिसने ब्रह्मको जाना यह ब्रह्म ही हो गया ) यह ध्रुति है। 'देवतामोके मध्यमें जिसने ब्रह्मको जाना वही ब्रह्म हुआ, यह भर्थ है। यहाँपर- पूर्वपक्षी -कहता है कि देवता भौर ऋषियोका ब्रह्मविद्यामे अधिकार नहीं है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योकि अर्थी, समर्थ, विद्वान्, शास्त्रसे अनिषिद्ध ही अधिकृत होता है। इन उक्त अधिकारके हेतुप्रोका शरीर रहित देवतायोमे संभव नहीं है। मन्त्र एवं अर्थवाद आदिसे भी देवतामोका शरीरवत्त्व जाना नहीं जा सकता है । क्योकि विधिक साथ एक वाक्यताको प्राप्त हुए मन्त्रादिका स्वार्थमे तात्पर्य नहीं हो सकता। सिद्धान्ती-ऐमा प्राप्त होनेपर हम कहते है-अर्थवाद तीन प्रकारका है-गुणवाद, मनुवाद पौर भूतार्थवाद । अब इन्हे इस प्रकार कहते हैं-'विरोधे गुणवाद:०' (प्रत्य- क्षादिके विरोधमे गुणवाद, प्रत्यक्षादि प्रमाणोसे निश्चित अर्थमे अनुवाद, जहाँपर दोनो न हों वहाँ भूतार्थवाद, इस प्रकार अर्थवाद तीन प्रकारका है ) यथा-'प्रादित्यो यूप।' (मादित्य यज्ञस्तम्ब है ) ( 'यजमानः प्रस्तर.'-कुशमुष्टि है ) इत्यादि अर्थवादोमे प्रत्यक्ष विरोध है, क्योकि आदित्य यज्ञस्तम्ब, यजमान कुशमुष्टि नही हो सकता। अत: प्रादित्यादि शब्दोंसे मादित्य मादिके समान यागका निर्वाहक गुण लक्षित होता है। यह गुणवाद' १. जिस वाक्यका अर्थ प्रत्यक्षादि प्रमाणोसे विरुद्ध हो वहां विरोध परिहारार्थ गौणी वृत्ति मानकर समाधान किया जाता है। यथा 'मादित्यो यूपः' इस स्थलमें प्रत्यक्षादि प्रमाणोसे यूप और मादित्य दोनोका भेद प्रतीत होता है, इससे दोनोमे प्रभेद विरुद्ध है। यूपमें जो प्रादित्यका तेजस्वित्व गुण है । उस गुणसे यह मर्यवाद प्रवृत्त होता है, तो यहाँ 'मादित्यो यूपः' का 'प्रादित्य सदृशो यूप:' यह अर्थ है, इन ६४ भाषानुवादसहिता [अ० १पा० ३ अघि०६] 'प्रादित्यो यूपः' 'यममान: प्रस्तरः' इत्यादिपु प्रत्यक्षविरोधे सत्यादित्यादि- वद्यागनिर्वाहकत्वगुण प्रादित्यादिशब्दरुपलक्ष्यत इति गुणवादः। 'मग्निहि- मस्य भेषजम्' 'वायुवै क्षेपिष्ठा देवता' इत्यादिषु मानान्तरसिद्धार्थानुवादित्वादनु- वादत्वम् । तयोरुभयोः स्वार्थे तात्पर्य मा भूत् । 'इन्द्रो वृत्राय वज्रमुदयच्छत्' इत्यादिवविरुद्धेवननुवादेषु च भूतार्थवादेषु स्वतः प्रामाण्यवादे स्वार्थे तात्पर्यस्य निवारयितुमशक्यत्वात्पदैकवाक्यतया स्वार्थेऽवान्तरतात्पर्य प्रतिपाद्य पश्चाद्वाक्य- कवाक्यतया विधिपु महातात्पर्य भूतार्थवादाः प्रतिपद्यन्ते। मन्त्रेष्वप्ययं न्यायो योज्यः । तथा च मन्त्रार्थवादादिबलाद्देवादीना विग्रहवत्त्वे सति श्रवणादिषु सामर्थ्य सुलभम् । अथित्वं चैश्वर्यस्य क्षयित्वसातिशयत्वदर्शनान्मोक्षसाधन- ब्रह्मविद्याविषयमुपपद्यते। विद्वत्ता चोपनयनाध्ययनरहितानामपि स्वयंभातवेद- स्वात्सुलभव। तस्माद्देवाना विद्याधिकारोन निवारयितुं शक्यः। यद्यप्यादित्यादि- देवतानामादित्यादिध्यानमिधासु सगुणब्रह्मविद्यासु ध्येयानामन्येषामादित्यादी- नामसंभवात्, प्रादित्यत्वादिप्राप्तिलक्षणस्य विद्याफलस्य सिद्धत्वाच्च माऽस्त्व- धिकारा, तथाऽपिनिगुणविद्यायामधिकारे को दोषः । तस्मादस्त्येवाधिकारः।। है । 'अग्निहिमस्य भेषजम्' (अग्नि जाडेको प्रोपधि है) 'वायुर्वेक्षेपिष्टा देवता' (वायु शीघ्र गाभी देवता है) इत्यादि अर्थवाद स्थलोमे प्रत्यक्षादि प्रमाणोसे सिद्ध मर्थका अनुवादादि होनेसे यह अनुवाद है। जहां गुणवाद और भनुवाद इन दोनोका स्वार्थमे तात्पर्य न हो 'इन्द्रो वृत्राय' (इन्द्रने वृत्रासुरको वचसे मारा ) इत्यादि प्रत्यक्षादि प्रमाणोसे अविरुद्ध एवं प्रत्यक्ष प्रादिमे ज्ञायमान अर्थका अनुवाद न करनेवाले भूतार्थवादोके स्वतः प्रामाण्यवाद मौर स्वार्थमें वात्यर्यका निवारण नही किया जा सकता। भूतार्थवाद पकवाक्यतासे स्वार्थमें अवान्तर तात्पर्यका प्रतिपादन कर पश्चात् वाक्य कवाक्यतासे विधियोंमे महातारपर्य को प्राप्त करते हैं। मन्त्रोंमे भी इसी न्याय की योजना करनी चाहिए । इस प्रकार मन्त्र भौर प्रर्थवादोके बलसे देवतादिका शरीर है यह सिद्ध होनेपर वेदान्त श्रवण मादिमे उनकी सामर्थ्य सुलभ है, ऐश्वर्य नश्वर और सातिशय है, यह ज्ञान होने के कारण मोक्ष एवं उसके साधन भूत ब्रह्मविद्या विषयक उनका मर्थित्व युक्त है । उनके उपनयन, वेदाध्ययन प्रादि न होनेपर भी वेदका स्वतः भान होनेके कारण उनमे विद्वत्ता भी सुलभ ही है । इसलिए ब्रह्मविद्यामे देवतामोका अधिकार किमीसे भी निवारण नहीं किया जा सकता। यद्यपि अन्य ध्येय मादित्यादिके न होने एवं भादित्य- त्वादि प्राप्ति रूप विद्याफलके सिद्ध होनेके कारण प्रादित्यादि देवतामोका आदित्यदि तीनो वार्दोका स्पष्टीकरण ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्यपर की गई 'सत्यानन्दी-दीपिका' पृष्ट २६४ में द्रष्टव्य है।
. [म०१ पा० ३ अधि० १० ] क्यासिकन्यायमाला (दशमे शूद्रस्य ब्रह्मविद्यायामनधिकाराधिकरणे सूत्राणि ) ( १० * अपशूद्राधिकरण मू० ३४-३८) शुगस्य तदनादरमवणात्तदाद्रवणात्सूच्यते हि ॥ ३४ ॥ क्षत्रियत्वगतेश्योत्तरत्र चैत्ररथेन लिङ्गात् ॥ ३५ ॥ संस्कारपरामर्शात्तदभावाभिलापाच्च ।। ३६ ॥ तदभाव- निर्धारणे च प्रवृत्तेः ।। ३७ ॥ श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषे- धात्स्मृतेश्च ।। ३८॥ दशमाधिकरणमारचयति- शूद्रोऽधिक्रियते वेदविद्यायामपवा नहि। अत्रैवणिकदेवाद्या इव शूद्रोऽधिकारवान् ॥ १६ ॥ देवाः स्वयंभातवेदाः शूद्रोऽध्ययनवजनाद। नाधिकारी श्रतो स्मात त्वधिकारो न वार्यते ॥२०॥ छान्दोग्यस्य चतुर्थाध्याये संवर्गविद्यायामाम्नायते 'माजहारेमाः शूद्र, अनेनेव मुखेनाऽऽलापयिष्यथा.' (११५ ) इति। जानश्रुति म कश्चिच्छिष्यो गोसहस्र ध्यान मिश्रित सगुणोपासनाप्रोमे भले अधिकार म हो तो भी निर्गुण ब्रह्मविद्यामें उनके पधिकार माननेमें कोन दोष है ? इससे ब्रह्मविद्यामे देवतामोका अधिकार है ॥६॥ दशम मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-वेदविद्या में शूद्रका अधिकार है अथवा नहीं ? पूर्वपक्ष-जैसे वणिकेतर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंसे भिन्न देवतामोका ब्रह्मविद्या में मधिकार है, वैसे ही शूद्र भी वेदविद्यामे अधिकारी हो सकता है । सिद्धान्त-देवता स्वतः वेद ज्ञानवाले होते हैं, शूद्रके लिए वेदाध्ययनका निषेव है। प्रतः शूद्रका वेदमे अधिकार नहीं है, किन्तु स्मात ज्ञानमें उसके अधिकारका निषेध नहीं किया जाता। छान्दोग्योपनिषद्के चतुर्थ अध्यायमें संवर्गविद्यामें 'प्राजहारेमाः शूद्र०' (हे शूद्र । सहस्र गायें प्रादि जो तुम उपायन लाये हो, इसी कन्यारूप उपायनद्वारा मेरे चित्तको प्रसन्न- * पूर्व प्रधिकरणके साथ इस अधिकरणको प्रासङ्गिक संगति है। १. सुदु ह जानश्रुतिः पौत्रायणः षट् शतानि गा निष्कमश्वतरीरथं तदादाय प्रतिचक्रमे सं हाभ्युवाद । रक्वेमानि पट् शतानि गवामय निष्कोऽयमश्वतरीरथो नु म एता भगवो देवता शाघि यां देववामुपास्स इति । तमु ह पर प्रत्युवाचाह हारेत्वा शुद्र तवैव मह गोभिरस्त्विति तदु ह पुनरेव जानश्रुतिः पौत्रायणः सहस्र गवां निष्कम- श्वरीरयं दुहितरं तदादाय प्रतिचक्रमे (छा० ४।२।१-२) यह वहाँका प्रकरण है । ५ भाषानुवादसहिता [अ०१ पा० ३ अधि० १०] दुहितरं मुक्ताहारं रथं कांचिग्रामांश्चोपायनत्वेनाऽऽनीय रैक्वनामानं गुरुमुप- ससाद । तत्र रैवववचनमेतत्-'हे शूद्रजानश्रुते, इमा गोसहस्राद्या प्राहृतवानसि, अनेनैव दुहित्राद्युपायनमुखेन मच्चित्तं प्रसाद्योपदेशयिष्यसि' इति। तत्र 'शूद्रोऽपि वेदविद्यायामधिकारवान्' इति प्राप्तम् । अत्रैवणिकदेवदृष्टान्ताच्छूद्रस्याप्यत्रे- वणिकस्य तत्संभवात् । इति प्राप्ते ब्रूम:--अस्ति देवशूद्रयोर्वैपम्यम् । उपनयनाध्ययनाभावेऽपि स्वयंभातवेदा देवाः । तादृशस्य सुकृतस्य पूर्वमुपाजितत्वात् । शूद्रस्तु तादृशसुकृत- राहित्यान्न स्वयंभातवेदः। नापि तस्य वेदाध्ययनमस्ति, उपनयनाभवात् । प्रतो विद्वत्तास्यस्याधिकारहेतोरभावान्न श्रोतविद्याया शूद्रोऽधिकारी। कथं तर्हि-उदाहृते वाक्ये जानश्रुतिविषयः शूद्रशब्दः, यौगिकोऽयं न रूढ इति ब्रूमः। 'विद्याराहित्यजनितया शुचा गुरु दुद्राव' इति शूद्रः । न च रूढ्या योगापहारः । रूढेरत्रासंभवात् । अस्मिन्नुपाख्याने क्षत्प्रेरणाद्यश्वर्योपन्यासेन जानश्रुतेः क्षत्रियत्वावगमात् । ननु 'शूद्रस्य वेदविद्यायामनधिकारे सति कर उपदेश करामोगे ) यह अति है । जानश्रुति नामक कोई शिध्य सहन गायें, कन्या, मोतियोंका हार, रप, कुछ ग्राम उपहाररूपसे लेकर रवद नामक गुरुके समीप गया । वहाँपर रैक्वका वचन यह है-'हे शूद्र जानश्रुति ! सहस्र गौ प्रादि जो तुम उपायन लाये हो। इसी कन्या मादि उपहार द्वारा मेरे चित्तको प्रसन्नकर उपदेश करात्रोगे।' पूर्णपक्षी-यहाँ शूद्र भी वेदविद्यामे अधिकारी है, ऐसा प्राप्त होता है । जैसे त्रिवर्ण रहित देवता धादिका ब्रह्मविद्यामे अधिकार है, वैसे ही पत्रवणिक शूद्रका भी ब्रह्म- विद्या में अधिकार संभव है। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते है-देवता और शुदमें वैषम्य है। उप- नयन, मध्ययनके न होनेपर भी देवता इस प्रकारके पूर्वजन्म उपार्जित सुकृतसे स्वतः वेदोंके ज्ञानवाले होते हैं । शूद्र सो उस प्रकारके मुकृतसे रहित है, अतः उसे स्वयं वेद ज्ञान नहीं होता । उपनयनके न होने से उसके लिए वेदाध्ययन भी नहीं है। इसलिए विद्वत्तारूप अधिकार हेतुके प्रभाव होनेसे शूद्र श्रोतविद्यामे अधिकारी नहीं है । तो फिर उदाहृत वाक्यमे जानश्रुतिके लिए शूद्र शब्दका प्रयोग कैसे किया गया ? इमपर हम कहते हैं- यह शूद्र माब्द यौगिक है रूढ नही । 'विद्या न होनेसे उत्पन्न शोकसे गुरुके पास गया' इससे शूद्र पान्द कहा गया । मौर रूढिसे यौगिक पर्थका बाध नहीं हो सकता, क्योंकि कढिका यहाँ संभव नहीं है। इस उपाख्यानमें सारथि भेजना आदि ऐश्वर्य के पपनसे प्रतीत होता है कि जानश्रुति क्षत्रिय थे। शूद्रका वेदविद्यामे अधिकार न होनेसे ।
.. । [अ० १ पा० ३ मधि० ११ ] वैयासिकन्यायमाला ६७ मुमुक्षायां सत्यामपि मुक्तिनं सिध्येत' इति चेत्, न। स्मृतिपुराणादिमुखेन ब्रह्मविद्योदये सति मुक्तिसिद्धः। तस्मान्न शूद्रो वेदविद्यायामधिनियते ॥१०॥ ( एकादश ईश्वरस्यैव कम्पनहेतुताधिकरणे सूत्रम्) [११ कम्पनाधिकरण सू० ३६] कम्पनात् ।। ३६॥ एकादशाधिकरणमारचयति-- जगत्कम्पनकृत्प्राणोऽशनिर्वायुरुतेश्वरः मशनिर्भयहेतुत्वाद्वायुर्वा देहचालनात् ॥ २१ ॥ वेदनादमृतत्वोक्तेरीशोऽन्तर्यामिरूपतः भयहेतुश्चालनं तु सर्वशक्तियुतत्वतः ॥ २२ ॥ कठवल्लीषु पष्ठवल्लयामाम्नायते- यदिदं किंच जगत्सवं प्राण एजति निामृतम् । महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ (६२) इति । अयमर्थ:-नि.सृतमुत्पन्नं यदिदं जगत्सर्व प्राणे निमित्तभूते सति कम्पते। तच्च प्राणशब्दवाच्यं वस्तूयतं वचमिव महाभयहेतुः । एतत्प्राणशब्दवाच्यं ये मोक्षकी इच्छा होनेपर उसकी मुक्ति सिद्ध नहीं होगी । ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, क्योकि स्मृति, पुराण मादि द्वारा ब्रह्मविद्याके उदय होनेपर मुक्ति सिद्ध है। इससे शूद्र वेदविद्यामें अधिकारी नहीं है ॥१०॥ एकादश प्रधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-'यदिदं विच जगत्सर्वम्' इस श्रुतिमें जगत्को कम्पित करनेवाला प्राण वच है, वायु है अथवा ईश्वर है ? पूर्वपक्ष-भय जनक होनेके कारण प्राण वज है अथवा देहका संचालक होनेसे वायु हो सकता है। सिद्धान्त-उक्त प्राणके ज्ञानसे मोक्ष प्राप्ति कही गई है, इससे वह ईश्वर ही है। वह मन्तर्यामी रूपसे भयका हेतु है और सर्वशक्ति सम्पन्न होनेसे देहादिका संचालक भी हो सकता है। कठोपनिषद्को छठी वल्लीमे श्रुति है-'यदिदं किंच०' ( उत्पन्न हुमा यह सारा जगत् निमित्त भूत प्राणके रहते चेष्टा करता है, वह महान् मयरूप पोर हाथमें उठाए हुए वजके समान है जो इसे जानते हैं वे अमर हो जाते हैं) 'उत्पन्न हुमा यह सारा जगद निमित भूत प्राणके रहते ही चेष्टा करता है । वह वस्तु जो प्राण शब्द वाच्य कही गई .. ६८ मापानुवादसहिता [म०१ पा० ३ प्रधि० १२] विदुः, ते मरणरहिता भवन्ति' इति । तत्र जगत्कम्पनकारिणि प्राणे या संदिग्धे ससि 'प्रधानिः' इति तावत्प्राप्तम्। कुतः ? 'महद्भयम्' इति भपहेतुत्व- धवरणात् । वायुर्वा भविष्यति । 'प्राण एजति' इति प्राणशब्दवाच्यस्य देहादि- चालनकतृ त्वावगमात् । इति प्राप्ते घूम --ईश्वरः प्राणशब्दवाच्यो भवितुमर्हति 'म एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति' इति तद्वेदनादमृतत्वोक्तः। भपहेतुताऽप्यन्तर्यामिरूपेणेश्वरस्य मवि- प्यति । 'भीषाऽस्माद्वातः पवते' (तै० ।।१) इति श्रुत्यन्तरात् । देहादि. कम्पनत्वं च सर्वशतित्वादीश्वरस्योपपद्यते । तस्मात्-ईश्वरः प्रारणशब्दवाच्यः ॥ ११ ॥ (द्वादशे ब्रह्मण एव ज्योटिष्ट्वाधिकरणे सूत्रम् ) [१२ ज्योतिरधिकरण सू०४० ] ज्योतिर्दर्शनात् ॥ ४०॥ द्वादशाधिकरणमारचयति- परं ज्योतिस्तु सूर्यस्य मण्डलं ब्रह्म वा भवेत् । समुत्यायोपसंपद्येत्युक्त्या स्यादविमण्डलम् ॥ २३ ॥ है प्रहार करने के लिए हाथमें उठाए हुए वजके समान महान मयका हेतु है प्राण शब्द- वाच्य उस पदार्थको जो जानते हैं, ये ममर हो जाते हैं। यह मर्य है । जगत्को चेष्टाके कारणभूत प्राणमें तीन प्रकारका सन्देह होता है-वह प्रशनि (प ) है, वायु है मपवा ईश्वर है। पूर्वपक्षी-वह वध है, ऐमा प्राप्त होता है, क्योकि 'महद्भपम्' इस प्रकार मय. का हेतु सुना गया है । भयवा वायु हो सकता है, क्योंकि 'प्राण एजति' इससे प्राणशब्द वाच्य देहादिका संचालन कर्ता अवगत होता है। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-ईश्वर ही प्राणशब्द वाच्य हो सक- ता है, क्योंकि य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति०' (जो उसे जानते हैं वे अमर हो जाते हैं) इस तरह उसके ज्ञानसे अमृतत्व कहा गया है । भय हेतु भी ईश्वरमैं अन्तर्यामीरूपसे हो सकता है, कारण--'भीषाऽस्माद्वातः पवते.' ( इसके भयसे वायु चलता है ) यह मन्य श्रुति है । देहादिका कम्पन भी सर्वशक्ति सम्पन्न होने के कारण ईश्वरमे उपपन्न होता है । इससे प्राणशब्द वाच्य ईश्वर ही है ॥ ११ ॥ द्वादश अधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह -'एष सम्प्रसादो०' इस श्रुतिवाक्यमें पठित 'परज्योति' पद सूर्यमण्डलका वाचक है मथवा ब्रह्मका ?
[म० १ पा० ३ अधि० १२] वैयासिकन्यायमाला ६६ समुत्थानं त्वंपदार्थशुद्धिर्वाक्यार्थबोधनम् । संपत्तिरुत्तमत्वोक्त ब्रह्म स्यादस्य साक्षितः ।। २४ ॥ छान्दोग्येऽष्टमाध्याये प्रजापतिविद्यायामाम्नायते-'एष संप्रसादोऽस्मा. च्छरोरात्समुत्थाय परंज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः पुरुषः' (८।१२।३) इति । अस्यायमर्थ:-सम्यकप्रसीदत्यस्यामवस्थायाम्, इति संप्रसादः सुषुप्तिः । तस्यामवस्याया तद्वाञ्जीव उपलक्ष्यते। 'एष जीवोऽस्माच्छरीरात्समु- त्याय' इति । शेपं सुगमम् । तत्र ज्योति.शब्दवाच्ये द्वेघा संदिग्धे सति 'रवि- मण्डलम्' इति तावत्प्राप्तम् । कुतः ? 'शरीरात्समुत्याय ज्योतिरुपसंपद्य' इति 'देहानिर्गत्य ज्योति प्राप्नोति' इत्युच्यमानत्वात् । ब्रह्मप्राप्तौ निर्गमाभावात्प्राप्त- प्राप्तव्यभेदानुपपत्तेश्च । इति प्राप्ते ब्रूम.-ज्योति शब्दवाच्यं ब्रह्म स्यात् । कुतः ? 'स उत्तमः पुरुष." :" इत्युतमपुरुषकोतनाद्रविमण्डलस्य तदयोगात् । 'यो वेद-इदं जि- पूर्वपक्ष 1-'इम शरीरसे निकलकर नौर पर ज्योतिको प्राप्तकर' इस कथनसे प्रतीत होता है कि पर ज्योति मूर्यमण्डल है सिद्धान्त-पहार समुत्थानका अर्थ निर्गमन और सम्पत्तिका अर्थ प्राप्ति नहीं है, किन्तु 'वं' पदार्थ-जीव का शोधन-स्थूल, मूक्ष्म और कारण शरीरोसे विवेक समुत्थान है मौर शोषित 'स्व' जोवका ब्रह्मरूपसे ज्ञान सम्पत्ति है। श्रुतिमें 'उत्तमः पुरुषः' इस प्रकार उत्तमत्ताके कयनसे एव सर्वसाक्षी होनेसे पर ज्योति ब्रह्म ही है। छान्दोग्यके प्रष्टम अध्यायमे प्रजापतिविद्यामे श्रुति है-'एप सम्प्रमादो०' (यह जोव इस शरीरसे समुत्यानकर पर ज्योतिको प्राप्तकर अपने रूपसे अभिनिष्पन होता है वह उत्तम पुरुष है ) इसका यह अर्थ है-'जिस अवस्थामे जीव अच्छी तरह प्रसन होता है वह संप्रसाद-सुषुप्ति प्रवस्या है। उस अवस्यामे उस अवस्थावाला जीव मप्रसाद शब्द से लक्षित होता है' 'यह जीव इस शरीरसे समुत्यानकर' शेष सुगम है। यहाँ ज्योति शब्द वाच्यार्थमे दो प्रकारका सन्देह होता है कि वह मूर्यमण्डल है अथवा ब्रह्म ? पूर्वपक्षी -यहा ज्योति शब्द वाच सूयमण्डल है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योकि 'शरीरासमुत्थाय ज्योतिरसपय.' 'शरोरसे निकलकर ज्योतिको प्राप्त होता है' ऐसा कहा गया है। ब्रह्म प्राप्तिमे निर्गमन नहीं होता, कारण-प्राप्तिकर्ता मौर प्राप्तव्यमें भेद नहीं है। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-ज्योतिशब्द वाच्य ब्रह्म ही है, क्यो- कि 'स उत्तमः पुरुषः' इस प्रकार अतिमे 'उत्तम पुरुष' का कथन है, उसका सूर्यमण्डलसे । भाषानुवादसहिता [प्र० १ पा० ३ अधि० १३ ] प्राणि-इति, स मारमा। यो वेद-इदं शण्वानि-इति, स मारमा' इत्यादिना घ्रात-घ्राण-प्रेय, श्रोत-श्रवण-श्रोतव्यादिसासिवमात्मनः श्रूयते । तदेकवा. क्यतया ज्योति.शब्दवाच्यं ब्रह्म । यदुक्तम् 'शरीरात्समुत्याय ज्योतीरूपं संपघ' इत्येतद्वयं ब्रह्मपक्षे न संभवति-इति । तदसत् । न ह्यत्र समुस्थानं निर्गमनम् । कि तहि ? त्वंपदार्थस्य जीवस्य शरीरत्रयाद्विवेकः । नाप्युपसंपत्तिा प्रातिःकि हि ? तस्य शोधितत्वंपदार्थस्य ब्रह्मत्वेनावबोधनम् । तस्माद- ज्योतिबा ॥१२॥ ( त्रयोदो ब्रह्मण एव नामरूपनिर्वाहकताधिकरणे सूत्रम् ) (१३ अर्थान्तरत्वव्यपदेशाधिकरण सू०४१) आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् ॥ ४१ ।। त्रयोदशाधिकरणमारचयति वियद्वा ब्रह्म वाकाशो वै नामेति श्रुतं, वियत् । अवकाशप्रदानेन सर्वनिर्वाहकत्वत. ॥ २५ ॥ निर्वोढत्वं नियन्तृत्वं चैतन्यस्यैव तत्त्वतः । ब्रह्म स्याद्वाक्यशेपे च ब्रह्मात्मेत्यादिशब्दत. ॥ २६ ॥ सम्बन्ध ही नही घटता। 'जो जानता है कि मैं इसे मूघता हूं वह पात्मा है'। 'जो जानता है कि मैं इसे सुनता हूँ वह आत्मा है' इत्यादिसे प्रात्मा नाता घ्राण ध्रय, श्रोता, पवण, श्रोवन्य प्रादिका साक्षी सुना जाता है। श्रुतिके साथ एक वाक्यता करने से ज्योति शब्द वाच्य ब्रह्म ही सिद्ध होता है। जो यह कहा गया है कि 'शरीरात्ममुत्याय ज्योति- रुपपद्य' ये दोनो ब्रह्मपक्षमे शभव नहीं हैं । वह कथन ठोक नहीं है, क्योकि यहाँ समु. त्यानका पर्य निर्गमन नही है, किन्तु 'त्व" पदार्थ जीवका स्थूल, सूक्ष्म और कारण न तीनो शरीरोंसे विवेक है मौर उपसपत्तिका अर्थ प्राप्ति भी नही है, किन्तु उस शोधित 'त्व' पदार्थ जीवका ब्रह्मरूपसे ज्ञान । इससे सिद्ध कि यहा वाचक है ॥ १२॥ प्रयोदश अधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-'माकाशो वै नाम०' इम श्रुतिमे पठित माकाश भूनाकाश है अथवा ब्रह्म ? पूर्वपक्ष -अवकाश प्रदानद्वारा सबका निर्वाहक होनेसे श्रुतिमे उक्त भाकाश भूता- काश ही है। सिद्धान्त-यहा निर्वाहकत्वका अर्थ नियन्तृत्व है वह परमार्यत: चैतन्य ब्रह्ममें ही है। वाक्यशेषमे ब्रह्म, प्रात्मा इत्यादि शन्द हैं, प्रत श्रुत्युक्त प्रकाश ब्रह्म ही है । हुमा ज्योति शब्द ब्रह्मका ही
[म०१ पा० ३ अधि० १३ ] वैयासिकन्यायमाला
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छान्दोग्यस्याप्टमाध्यायस्यान्ते श्रूयते-'माकाशो ह वै नामरूपयोनिहिता,
ते यदन्तरा तद्ब्रह्म, तदमृतं स मात्मा' (८१४।१ ) इति । प्रस्यायमर्थ:-
प्राकाशाख्यः कश्चित्पदार्थः स च जगद्रूपयो मरूपयोनिर्वहिता निर्वाहकः ।
ते च नामरूपे यस्मादाकाशाद्भिन्ने। अथवा-यस्याऽऽकाशस्यान्तराले यतते ।
तदाकाशं मरणरहितं ब्रह्म, तदेव 'प्रत्यगात्मा' इति । तत्र 'प्राकाशो ह थे
नाम, इति यच्छ्रतं, तद्वियत्स्यात् । 'नामरूपयोनिवहिता' इत्युक्तस्य निर्वा-
हकत्वस्यावकाशप्रदातरि वियति संभवात् ।
इति प्राप्ते ब्रूमः-अत्र निर्वाहकत्वं नाम नावकाशप्रदानमात्रम् । किंतु
नियामकत्वम् । सर्वप्रकारनिर्वाहकत्वस्य नियन्तृत्वान्तर्भावात् । तच्च नियन्तृत्वं
चेतनस्य ब्रह्मणो युज्यते । श्रुत्यन्तरे च श्रूयते-'मनेन जीवेनाऽऽत्मनाऽनुप्रविश्य
नामरूपे व्याकरवारिण' (छा० ६।३।२) इति न हि वियतोऽचेतनस्य नियम्य-
विशेषानजानतो नियन्तृत्वं संभवति । तत् प्राकाशं ब्रह्म स्यात् । किंच वाक्यशेपे
"तग्रह्म तदमृतं स प्रात्मा" इति ब्रह्मत्वामृतत्वात्मत्वानि श्रूयन्ते । ततोऽपि
ब्रहीवाऽऽकाशम् ॥ १३ ॥
छान्दोग्योपनिषद्के अष्टम अध्यायके अन्त मे श्रुति है-'आकाशो ह वै.' (निश्चय
माकाश नामक कोई पदार्थ नाम और रूपका निर्वाहक है, वे नाम-रूप जिसके मान्तर हैं
पथवा उससे भिन्न हैं, वह ब्रह्म है, वह अमृत है वह प्रात्मा है ) इसका यह अर्थ है-
'माकाश मामक कोई पदार्थ है वह जगद प नाम-रूपका निर्वहिता-निर्वाहक है । वे नाम-
रूप जिस माकाशसे भिन्न है अथवा जिस आकाशके भीतर रहते हैं, वह आकाश मरण-
रहिव ब्रह्म है, वही प्रत्यगात्मा है।'
पूर्वपक्षी -यहापर 'आकाशो ह वै नाम०' इस श्रुतिमे जो प्राकाश कहा गया है वह
भूताकाश है, क्योकि 'नामरूपयोनिहिता' इसमे कथित निर्वाहकत्व अवकाश देनेवाले
भूताकाशमे समव है।
सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-यहापर निर्वाहकत्व अवकाश प्रदान-
मात्र नहीं है, किन्तु नियामकत्व है । क्योकि सब प्रकारका निर्वाहकत्व-नियन्तृत्वके अन्त-
भूत होता है । वह नियन्तृत्व चेतन ब्रह्ममें ही युक्त है। कारण कि 'अनेन जीवेना.' (इस
जीवरूपसे प्रवेशकर नाम-रूपको व्यक्त करूंगा) ऐसी अन्य श्रुति है। नियम्य पदायाँको
न जाननेवाला अचेतन भूताकाश नियन्ता नहीं हो सकता। इससे श्रुत्युक्त माकाश ब्रह्म
ही है । किंच 'तद्ब्रह्म तदमृतं स पात्मा' इस प्रकार वाक्पशेषमें ब्रह्मत्व, अमृतन्त
प्रात्मत्व धर्म कहे गये हैं । इससे भी उक्त प्राकाश ब्रह्म ही है ॥ १३ ॥
७२ भाषानुवादसहिता [म०१ पा० ३ मषि०१४ ] (चतुर्दशे ब्रह्मण एव विमानमय वापिकरणे सूत्र) (१४ सुषुप्त्युत्तान्त्यधिकरण मू० ४२ ४३ ) सुपुप्त्युत्नन्त्यो देन ॥ ४२ ॥ पत्यादिशब्देभ्य ॥४३॥ चतुर्दशाधिकरणमारचयति- स्याविज्ञानमयो जीवो ग्रह वा जीव इप्यते । पादिमध्यावसानेषु ससारप्रतिपादनात् ॥ २७॥ विविच्य लोक्ससिद्ध जीव प्राणाद्युपाधित । ब्रह्मत्वमन्यतोऽप्राप्त बोध्यते ग्रह नेतरत् ॥ २८ ॥ बृहदारण्यके चतुयध्याये श्रूयते-'योऽय विज्ञानमय प्राणेषु हृद्यन्तज्योति पुरुष समान सन्नुभौ लोकावनुसचरति, (बृह० ४१३१७) इति । प्रस्यायमयं- विज्ञानमयो लिङ्गशरीरमय तेन स्थूलदेहव्यतिरेद सिद्ध । प्रारणेषु चक्षुरादोन्द्रि येषु प्राणादिवायुपु च । हृद्यन्त वरणे सप्तमीविभक्त्याधारस्वनिर्देशादाधेयस्य पुरुषस्येन्द्रियवायुमनोतिरिक्तत्व सिद्धम् । अन्त शब्देन धोवृत्तिभ्य कामसकल्ला दिभ्यो व्यतिरेक सिद्ध । बुद्धिपरिणामरूपारणा तासा वृत्तीना बहिर्भावात् । एव च सति स्थूलदेहेन्द्रियेभ्य प्राणवायुम्योऽन्त करणत्तवृत्तिभ्यश्च व्यतिरिक्त, तेषा साक्षित्वेन चिज्ज्योति स्वरूप पुरुष इत्यक्त भवति । स च पुरुषो लिन्नश पतुदश मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-योध्य विज्ञानमय प्राणेषु यह घुत्युक्त विज्ञानमय जीव है मषवा ब्रह्म ? पूर्वपक्ष-प्रादि मध्य एव अन्तमें जोवका प्रतिपान है अत विमानमय जोध सिद्धान्त-ति लाक सिद्ध जावको प्राण प्रादि उपाधियो से पृथककर उसमें ब्रह्म का बोध कराती है । अन्य प्रमाणमे अनात ब्रह्मा ही बोध होता है जीवका नहीं। वृहदारण्यकके चतुय अध्यायमे योऽय विनामया' (यह जो प्राणोमे बुद्धिवृत्तियोका साक्षीभूत हृदयके अतर्गत विज्ञानमय ज्योति स्वरूप पुरुष है वह लिङ्ग शरीरके समान होकर इम लोक और परलोक दोनो लोकोमें सचार करता है ) यह अति है। इसका यह मय है-विज्ञामयका अथ लिङ्ग शरीरमय है इसमे स्थूल देहसे भिन सिद्ध होता है। प्राण पशु प्रादि इन्द्रिय प्राण आदि वायु भत करणमे यहां मप्तमी विभक्तिका अथ माघार कहा गया है अत प्रापार पुरुष स्थूल शरीर इद्रिय वायु मनसे भिन सिद्ध होता है । म उ करण शब्दसे काम शकलादि बुद्धि वृत्तियोंसे भिन सिद्ध होता है । बुद्धि के परिणामरूप वे वृत्तिया उससे बाहर हैं । ऐमा होनेपर स्थूल देह इन्द्रिय, प्राण वायु १ काम सक्यो विचिकित्सा पद्धाश्रमावृतिरपूविहाँधी(रियेतत्मदं मन एव' -[ म०१ पो० ३ अघि० १४ ] वैयासिकन्यायमाला रोरतादात्म्याध्यासेन लिङ्गशरीरेण समानः सनिहलोकपरलोकावनुसंचरति, इति, तत्र विज्ञानमयो जीवो भवितुमर्हति । ज्योतिर्ब्राह्मणशरीरब्राह्मणयोरादि- मध्यावसानेषु संसारस्यैव प्रपञ्च्यमानत्वात् । मादी तावत् "उभौ लोकावतु- संचरित" इति संसारोक्तिः स्पष्टा । मध्ये च संप्रसादस्वप्नान्तबुद्धान्तकण्डिका- भिरवस्थानयं प्रपञ्च्यते । अन्तेऽपि "स वा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो मनोमयः प्राणमयः' इत्यादिना सोपाधिकस्वरूपवर्णनेन संसार एवोच्यते । तस्मात्-जीवः। इति प्राप्ते ब्रम.-न तावज्जीवोऽत्र प्रतिपाद्यः, लौफिकादहंप्रत्ययादेव सिदत्वात् । किमर्थं तहिं जीवाद्यभिधानमिति चेत् । प्राणाद्युपाधिभ्यो विवेक्त - मादावभिधानम् । मध्येऽप्यवस्थात्रयसङ्गराहित्यं दर्शयितुमभिधीयते । अन्त तूक्तजीवस्वरूपमनूद्य तस्य ब्रह्मत्वं प्रतिपाद्यते । ब्रह्मत्वस्य मानान्तरेणाप्राप्त- स्वात् । तस्मात्-ब्रह्मात्र प्रतिपाद्यम्, न तु जीव इति सिद्धम् ॥ १४ ॥ - अन्त.करण और अन्त:करणको वाम मादि वृत्तियोसे भिन्न एवं उनके साक्षीरूपसे चेतन ज्योतिःस्वरूप पुरुष है, यह अभिप्राय है। वह पुरुष लिङ्गशरीरमे तादात्म्याध्याससे लिङ्गशरीरखे समान होकर इस लोक और परलोकमे सचार करता है। पूर्वपक्षी यहां विज्ञानमय जीव होना चाहिए, क्योकि ज्योति ब्राह्मण और शरीर- प्राह्मणके ग्रादि-उपक्रम, मध्य और भन्तमे जीवका ही विस्तारसे कथन है। आदिमे- ( दोनो लोकोमे संचार करता है ) इस प्रकार जीवका कथन स्पष्ट है। मध्यमे सुषुप्ति स्वप्न और जाग्रत् कण्डिकाप्रोसे तीन प्रयस्थानोंका विस्तार है । अन्तमे 'स वा अयमा- त्मा( यह मात्मा ब्रह्म है, विज्ञानमय-मनोमय एवं प्राणमय है ) इत्यादिसे उपाधि सहित स्वरूपके वर्णनसे संसारी ही कहा जाता है, इससे विज्ञानमय जीव है, सिद्धान्त-ऐसा प्राप्त होमेपर हम कहते हैं-विज्ञानमय शब्दसे यहां जीव प्रति. पाद्य नहीं है, क्योकि वह तो लौकिक 'प्रह' प्रत्ययसे पूर्व ही सिद्ध है। तो किस लिए जीवा- दिका कथन हैं ? यदि ऐसा कहो तो प्राण प्रादि उपाधियोसे भिन्न समभाने के लिए आदिमे कथन है। मध्यमे तीनो अवस्थामोंसे सम्बन्ध रहित दिखलानेके लिए प्रभिधान किया गया है। मन्तमे वो जीवस्वरूपका मनुवाद कर उसमें ब्रह्मत्व प्रतिपादन किया जाता है। ब्रह्मत्व तो अन्य प्रमाणसे प्राप्त नहीं है । इससे यह सिद्ध हुआ यहां विज्ञानमय शब्दसे ब्रह्म ही प्रतिपाद्य है जोव नही ।। १४ ।।
भापानुवादसहिता [म०१ पा०४ अधि०१] इति श्रोमारतीतीयमुनिप्रणीतायां यासिकन्यापमालाप प्रपमाघ्यायस्य ततोयः पादः ॥३॥ मादितः माधिकरणानि ३२ সুয্যি ४३ १०० मत्र पाद (अथ प्रथमाध्यायस्य चतुर्शः पादः)। (मर प्रधानविषयत्वेन संदिह्यमानानामव्यतागादिपदाना पिन्तनम [प्रधानविषयक हैं ऐसे सन्देहमे युक्त भव्यक्त मजा पादि पदोका इस पादमें विचार है) (प्रथमे कारणशरीरस्वायत्तशम्दवापताधिकरणे सूत्राणि) [१ भानुमानिकाधिकरण मू० १-७] आनुमानि कमप्येकेपामिति पेन शरीररूपकविन्यस्त- गृहीतेदेशयति च ॥ १॥ सूक्ष्मं तु तदहत्वात् ।। २ ॥ तधीनत्वादर्थवत् ॥३॥ शेयत्वावचनाच्च ।। ४॥ वदतीति चेन्न प्राज्ञो हि प्रकरणात् ।। ५॥ प्रयाणामेव चैवमुपन्यामः प्रश्नश्च ।। ६ ।। महद्वय ॥७॥ चतुर्थपादस्य प्रथमाधिकरणमारचति- महतः परमव्यक्त प्रधानमयवा वपुः। प्रधानं साख्यशास्त्रोक्ततत्वानां प्रत्यभिज्ञया ॥१॥ इति श्री भारतीतीर्थ मुनि-प्रणीत वैयासिकन्यायमालाके प्रथमाध्यापके तृतीय पादका 'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती' वृत भाषानुवाद ॥ ३ ॥ चतुर्थपादके प्रथम मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह -'महतः परमव्यक्तम्, इस श्रुतिमै पठिच 'भव्यक्त' शब्द प्रधानका वाचक है भथवा शरीरका? पूर्वपक्ष -साख्य शास्त्रमें पठित महत, भव्यक्त भोर पुरपको प्रमशः प्रत्यभिज्ञा होने ज्ञात होता है कि पव्यक्त शब्द प्रधानका प्रतिपादक है। -- [अ० १ पा० ४ अधि० १] वैयासिकन्यायमाला श्रुतार्थप्रत्यभिज्ञानात्परिशेषाच्च तद्वपुः। सूक्ष्मत्वात्कारणावस्थमव्यक्ताख्यां तदहति ॥२॥ कठवल्लीषु तृतीयवल्लपामाम्नायते "महतः परमव्यक्तमव्यतात्पुरुषः परः' ( ३१११) इति । पत्र-प्रव्यक्तशब्देन सांख्याभिमतं प्रधानमभिधीयते । कुतः ? प्रत्यभिज्ञा- नात् । महदव्यक्तपुरुषाः साख्याशास्त्रे परापरभावेन यथा प्रसिद्धाः, तथैव श्रुतौ प्रत्यभिज्ञायन्ते । तस्मात्-अव्यक्तशब्दवाच्यं प्रधानम् । इति प्राप्ते ब्रूमः-प्रव्यक्तशब्दवाच्यं वपुभंवितुमर्हति । पूर्ववाक्योक्तशरीर- स्यात्र प्रत्यभिज्ञानात् । पूर्वस्मिन्वाक्ये शरीरादीनि रयादित्वेनोक्तानि- प्रात्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु । बुद्धि तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ इन्द्रियाणि हयानाहुविषयास्तेषु गोचरान् ॥ (३३४ ) ॥ इति तानि पूर्ववाक्योक्तानि वस्तून्यस्मिन्वाक्ये प्रत्यभिज्ञायन्ते । इन्द्रियेभ्यः परा ह्या अर्थभ्पश्च परं मनः । सिद्धान्त-श्रुत्यर्थकी प्रत्यभिज्ञासे पोर परिशेषसे भी यह शरीर ही अव्यक्त शब्द वाच्य है। कारणावस्थामे विद्यमान यह शरीर सूक्ष्म होनेसे भव्यक्त संज्ञक होना चाहिए। कठवल्लीको तृतीय वल्लीमें 'महतः परमव्यक्तम्' (महत्से अव्यक्त श्रेष्ठ है और अन्यातसे पुरुष श्रेष्ठ है ) यह श्रुति है । यहाँपर सन्देह होता है कि भव्यक्त शब्द प्रवानका वाचक है अथवा शरीरका पूर्वपक्षी- 1-प्रव्यक्क शब्दसे साख्याभिमत प्रधानको कहा जाता है, क्योकि उसकी प्रत्यभिज्ञा होती है । सांख्याशास्त्रमें जैसे महत्, अव्यक्त भोर पुरुष पर और अपरभावसे प्रसिद्ध हैं, वैसे ही श्रुतिमे उनकी प्रत्यभिज्ञा होती है, इसलिए अव्यक्त शब्दवाच्य प्रधान ही है। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-शरीर ही अव्यक्तशब्द वाच्य होना चाहिए, क्योकि पूर्व अतिवाक्यमे उक्त शरीरको यहाँ प्रत्यभिज्ञा होती है। पूर्ववाक्यमे शरीर आदि रथ आदि रूपसे कहे गये है- 'मात्मानं रथिनं विद्धि०' (प्रात्माको रथी, शरीरको रथ, बुद्धिको सारथि और मनको लगाम जानो एव इन्द्रियोको प्रश्व और विषयों को उनके मार्ग कहते हैं ) इन पूर्व वाक्योक्त पदार्योकी इस वाक्यमें प्रत्यभिज्ञा होती है-
भाषानुवादसहिता [अ० १ पा० ४ मधि०१)
मनसस्तु परा बुद्धिबुद्धरात्मा महापरः।।
महत. परमव्यक्तमव्यतात्पुरुषः परः।। ( ३२३१० ) इति
स्मार्तप्रत्यभिज्ञानादपि श्रोतं प्रत्यभिज्ञानं प्रत्यासन्नत्वात्प्रबलम् । नन्वेवमपि
बहूना प्रत्यभिज्ञायमानत्वाच्छरोरमेवाव्यक्तशब्दवाच्यम्, इति कुतो विनिगमः
'परिशेषात्' इति ब्रूम.। तथा हि-पूर्वस्मिन्याक्य इन्द्रियार्थमनोबुद्धिशब्द-
निर्दिष्टा. पदार्या उत्तरस्मिन्वाक्ये तैरेव शब्दनिर्दिश्यन्ते पूर्वत्राभिशब्देन
निर्दिष्ट वस्तूत्तर पुरुषशब्देनोपदिष्टम् । उत्तरवाक्ये महच्छन्देन यदुक्तम् तत्पूर्व-
वाक्ये बुद्धिशब्देन संगृहीतम्, बुद्धिहि द्विधा-अस्मदादीनां बुद्धिरेका, तत्कार-
एभूता हिरण्यगर्भबुद्धिरपरा महच्छन्दवाच्या। तयो पूर्वत्रैकत्वेन निर्दिष्टयोरुत्त-
रत्र भेदेन निर्देश । एवं सति पूर्ववाक्ये शरीरमे परिशिष्टम् । उत्तरवाक्ये
चाव्याकशब्द परिशिष्यते । न च-एवं परिशेपेऽपि शरीरस्य स्पष्टत्वादध्यक्त-
शब्दवाच्यत्वमनुपपन्नमिति शड्कनीयम् । कारणावस्थापन्नस्य शरीरस्य सूक्ष्म-
त्वेनास्पष्टतयाऽव्यक्तशब्दार्हत्वात्। तस्मादव्यक्तशब्दवाच्यं वपु ॥ १॥
'इन्द्रियेभ्यः परा०' (इन्द्रियोसे विषय पर हैं, विषयोसे मन पर है, मनसे बुद्धि पर
है, बुद्धिसे महान मारमा पर है, महत्से अव्यक्त पर है, अव्यक्तसे पुरुष पर है ) साख्य-
स्मृति प्रत्यभिज्ञानसे सन्निहित होनेके कारण श्रोत प्रत्यभिज्ञान प्रवल है।
सिद्धान्ती-यदि कहो कि श्रोत प्रत्यभिज्ञान प्रबल होनेपर भी बहुतोंके प्रत्यभिज्ञान
होनेपर केवल शरीर ही अन्यक्त शब्दवाच्य है, इसमे कोन निर्णायक है ? 'परिशेषसे
ऐमा हम कहते हैं। जैसे कि पूर्व वाक्यमे इन्द्रिय, मर्य, मन एवं बुद्धि शब्दोसे निर्दिष्ट
पदार्थ, उत्तर वाक्यमे उन्हीं शब्दोसे निर्दिष्ट किये गये हैं। पूर्ववाक्य मात्मशब्दसे निर्दिष्ट
वस्तु उत्तर वाक्यमे पुरुष शब्दसे उपदिष्ट है । उत्तर वाक्यमे जो 'महत्' शब्दसे उक्त
है, वह पूर्ववाक्यमे बुद्धि 'शब्दमे सगृहीत है । बुद्धि दो प्रकारको है-एक हम लोगोको
बुद्धि और दूसरी उमको कारणभूत हिरण्यगर्भकी बुद्धि जो महत् शब्द वाच्य है । उन
दोनो बुद्धिप्रोका पूर्ववाक्यमें एकत्देन निर्देश है, उत्तर वाक्यमे भेदमे निर्देश है । ऐसा
होनेपर पूर्ववाक्यमे केवल एक शरोर शेष रह जाता है, उत्तर वाक्यमें अव्यक्त शब्द
शेष रह जाता है । ऐसा परिशेष होनेपर भी शरीर स्पष्ट व्यक्त होने के कारण अव्यक्त
शब्द वाच्य नही हो सकता ? ऐसो शङ्का नही करनी चाहिए, क्योंकि कारणावस्था-
पन्न शरीर सूक्ष्म होनेके कारण स्पष्ट है. अतः वह अव्यक्त शब्दके योग्य है, इससे यह
कि व्यक्त शब्द वाच्य शरीर हो है ॥१॥
[म. म०१ पा० ४ अधि०२] वैयासिकन्यायमाला (द्वितीये तेजोबनात्मकप्रकृतेरेवाजात्वाधिकरणे सूत्राणि ) (२ चमसाधिकरण सू० ८-१०) चमसवदविशेषात् ॥८॥ ज्योतिरुपक्रमात्तु तथा हधयित एके ॥६॥ कल्पनोपदेशाच्य मध्वादिवद- विरोधः ॥ १०॥ द्वितीयाधिकरणमारचयति- अजेह सांख्यप्रकृतिस्तेजोबनात्मिकाऽथवा। रज प्रादौ लोहितादिलक्ष्येऽसौ सांख्याशास्त्रगा ॥३॥ लोहितादिप्रत्याभिज्ञा तेजोबन्नादिलक्षरणाम्। प्रकृति गमयेच्छौतीमजावलृप्तिमधुत्ववत् ॥४॥ श्वेताश्वतरोपनिषदि चतुर्थाध्याये श्रूयते-"प्रजामेकां लोहितशुक्लकृष्णा- म्" (४१५ ) इति । अत्र-अजाशब्देन सांख्यशास्रोका प्रधानशब्दवाच्या प्रकृति- विवक्षिता, अथवा छान्दोग्यश्रुतीवुक्ता तेजोबन्नात्मिका प्रकृतिः, इति संदेहे 'प्रधानम्' इति तावत्प्राप्तम् । कुतः ? सत्त्वरजस्तमोगुणात्मत्वप्रतीतेः । यद्यपि लोहितशुक्लकृष्णवर्णा एव श्रूयन्ते, न तु गुणाः, तथाऽपि लेहितादिशब्दगुणा द्वितीय पधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-'मजामेका लोहितशुक्लकृष्णाम्' इस श्रुतिमे उक्त प्रजाशब्द सांख्याभि- मत प्रकृतिका वाचक है अथवा तेज, जल और भन्नरूप प्रकृतिका ? पूर्वपक्ष-लोहित शुक्ल एवं कृष्ण शब्दोसे रज, सत्त्व और तमोगुण लक्षित होते है, मता सांख्यशस्त्रोक्त प्रकृति अजा है। सिद्धान्त-छान्दोग्य घुतिमें लोहित शुक्ल एवं कृष्णकी जो प्रत्यभिज्ञा है वह क्रमशः तेज, जल और मनरूप है । मतः वह तेज, जल और अन्नरूप प्रकृतिका ही प्रकृत घुविमें अजा शब्दसे बोध कराती है । अतः प्रकृतिमै प्रजात्वकी कल्पना मादित्यमें मधु- स्वकी क्ल्पनाके समान है। श्वेताश्वतरोपनिषद्के चतुर्थ अध्यायमें 'अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णाम्' (लोहित, शुक्ल एवं कृष्णरूप एक मजा ) यह श्रुति है। यहाँपर प्रजाशब्दसे सांख्यशास्त्रोक्त प्रधानशब्द वाच्य प्रकृति विवक्षित है अथवा घान्दोग्य अत्युक्त तेज, जल एवं अनामिका प्रकृति ? ऐमा संदेह होनेपर । पूर्वपक्षी-यहाँ प्रजाशब्दसे प्रधान विवक्षित है, ऐमा प्राप्त होता है, क्योकि सत्त्व, रज एवं तमोगुणरूप प्रतीनि होती है । यद्यपि लोहित, शुक्ल मौर कृष्ण वर्ण हो
भाषानुवादसहिता म०१ पा० ४ मधि०२]
लक्ष्यन्ते । तय लोहितशब्देन रजकत्वसाम्याद्रजोगुण उपलक्षितः । शुक्लशब्देन
स्वच्छत्वसाम्यारसत्त्वगुणः । कृष्णशब्देनाऽबरकत्वसाम्यात्तमोगुणः । एवं सति
शास्त्रान्तरप्रतीतिनुगृहीता भवति । तस्मात्प्रधानम् ।
इति प्राप्ले बम:-"यदग्ने रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपम्, यच्छुक्लं तदपाम्,
यत्कृष्णं सदनस्य, (या०६।४६) इति धान्दोग्य तेजोवनात्मिकायाः प्रकृते.
लॊहितशुक्लकृष्णरूपाणि श्रुतान्येवात्र प्रत्यभिज्ञायन्ते। तत्र यौतमत्यामिझाया।
प्राबल्यात, लोहितादिशब्दानां मुख्यार्थसंभवाच तेजोवनात्मिका प्रकृतिरजेति
गम्यते। यद्यपि प्रजाशब्दरधागवाचित्वानोक्तप्रकृती रूढः, नापि न जायते'
इति योगा संभवति, तेजोबनानां प्राणो जातत्वात्तथापि च्छागत्वमुकप्रकृती
सुखावबोधाय परिकल्प्यते । यथाऽदित्यस्यामधुनो मधुत्वम् । 'मसौ वा प्रादि-
त्यो देवमधु" इत्यादिवाक्येन परिकल्पितं तद्वत् । तस्मात्तेजोबनारिमका प्रकृति-
रमा, न सांस्योपसंग्रहादपि ॥२॥
(तृतीये प्राणादीनामेव पञ्चजनत्वाधिकरणे मूत्राणि)
(३ संख्योपसंग्रहाधिकरण सू० ११-१३ )
सुने जाते हैं गुण नहीं, तो भी लोहितादि गब्दोसे गुण ही लक्षित होते हैं। रागोत्पा-
कत्वरूप सादृश्यसे लोहित पादसे रजोगुण लक्षित होता है । स्वच्छन्दरूप सादृश्यसै शुक्ल
शब्दसे मत्वगुण मौर पावरक्त्व सादृश्यसे वृष्णशब्दमें ठमोगुण लक्षित होता है, ऐसा
होनेसे शास्त्रान्तर-शाखन्तर प्रवीति अनुगृहीत होती है। इसलिए यहाँ मजाशब्दसे
प्रधान अभिप्रेत है।
सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं--'मग्निका जो रोहित रक्तरूप है
वह तेजका रूप है, जो शुक्लप है वह जलका, जो कृष्णरूप है वह मनका है,
छान्दोग्यमे तेज, जल एवं अन्नामिका प्रकृतिके लोहित शुक्ल वृष्णरूप सुने गये ही यहाँ
अतिमे प्रत्यभिज्ञात होते हैं । यहाँ प्रोत प्रत्यभिज्ञा प्रथल है। लोहित मादि शब्दोका
मुख्याथ संभव होनेसे तेज, जल एवं प्रनात्मिका प्रकृति ही यहाँ पजाणन्दसे ज्ञात होती
है। यद्यपि भजाशब्द बकरीका वाचर होनेसे उक्त प्रकृतिमे रूढ नहीं है । और न जायते'
'मजा' (नहीं उत्पन्न होती ) इस व्युत्पत्तिसे योगिक भी सम्भव नहीं है, क्योकि तेज,
जल और अन्न तो ब्रह्मसे उसन्न हुए हैं। तो भी उक्त प्रकृतिका अनायास बोष होनेके
लिए उसमे छागत्वको कल्पना होती है। जैसे 'असो वा मादित्यो देवमधु०' (यह मादित्य
देवमधु है ) इत्यादि वाक्यसे भमघु मादित्यमें मघुत्वकी कल्पना की गई है । इससे तेज,
जल एवं अन्नात्मिका प्रकृति ही मजा है। सांख्यके उपमंग्रहसे प्रकृति प्रजा मन्द वाच्य
नहीं है ॥२॥
७६ [म०१ पा० ४ मधि० ३ ] वैयासिकन्यायमाला न संख्योपसंग्रहादपि नानाभावादतिरेकाच ॥ ११ ॥ प्राणदयो वाक्यशेपात् ॥१२॥ ज्योतिपैकेपाम- सत्यन्ने ॥ १३॥ तृतीयाधिकरणमारचयति पश्च पश्चजनाः सांख्यतत्त्वान्याहो श्रुतीरिताः। प्राणाद्याः सौख्यतत्वानि पश्चविंशतिभासनात् ॥५॥ पंचविंशतेर्भानमात्माकाशातिरेकतः । संज्ञा पंचजनेत्येपा प्राणायाः संज्ञिनः श्रताः॥६॥ बृहदारण्यके चतुर्थाध्याये श्रूयते- यस्मिन्पंच पंचजना प्राकाशश्च प्रतिष्ठितः। तमेव मन्य प्रात्मानं विद्वान्ब्रह्मामृतोऽमृतम् ।। (४।४।१७) मस्यायमर्थ:-'पंच पंचजना आकाशश्च यस्मिन्नाश्रिताः' तमेवाऽऽप्रयभू- तमात्मानममृतं ब्रह्म मन्ये । 'इत्यं विद्वानहममृतो भवामि' इति । तत्र 'पंच- पंचजनाः' इति प्रोक्ताः पदार्था कि सांख्यशास्त्रोक्ततत्त्वानि, अहोस्विच्छ्र ति- प्रोकाः प्राणचक्षुाश्रोत्रमनोन्नसंज्ञका इति संदेहे, साख्यतत्त्वानि इति तावत्प्राप्तम्। तृतीय माधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-'यस्मिन् पञ्च पक्षजना' इस श्रुतिमें साख्याभिमत तत्त्व कहे गये है पपवा प्राण मादि पांच कहे गये हैं। पूर्वपक्ष-उक्त श्रुतिमें पञ्चविंशति ( २५) संख्याका भान होता है, इसलिए सांस्योक्त वत्त्व कहे गये हैं। सिवान्त-उक्त तिमें केवल पच्चीस संख्याका भान नहीं होता, क्योंकि प्रारमा और पाकाश अतिरिक्त-मधिक कहे गये हैं। 'पञ्चजन' यह संशा है, प्राणादि संजी- नामी हैं, इस लिए मतिमें प्राणादि कहे गये हैं। बृहदारण्यकके छठे अध्यायमे श्रुति है- 'यस्मिन्पञ्च पञ्चजना०' (पांच पञ्चजन और आकाश जिसके माश्रित हैं उसी प्राश्रयभूत पात्माको में प्रमृत ब्रह्म मानता हूं, इस प्रकार जाननेवाला मैं अमृत ही हूँ) इसका यह अर्थ है-'पांच पञ्चजन पौर प्राकाश जिसके प्राश्रित हैं, उसी प्राश्रयभूत मात्माको मैं अमृत ब्रह्म मानता हूँ, इस प्रकार जाननेवाला मैं अमृत ही हूँ, यहाँ पर 'पञ्च पञ्चजनाः' इस प्रकार उक्त पदार्थ क्या साख्य शास्त्रोक्त तत्त्व हैं अथवा घु त्युक्त प्राण, पशु, श्रोत्र, मन मोर मन्नसंजक हैं । यह सन्देह होनेपर।
1 भापानुयादसहिता (म०१ पा०४ प्रषि०३] कुतः पंचविंशतिसंख्याया: सास्यशास्त्रासिटाया पत्रावमासनात्। तथा हि- 'पंच पंच' इति शब्दद्वयं धूयते । तत्रैकेन पंचशब्देन तस्याता पंचसंख्या विवक्षिता। द्वितीयेन पंचसंख्याविपयापरा पंचसंख्या विवक्षिता तथा प 'पंचसंख्याविशिष्टानि तत्वपंचवानि' इत्युक्तं भवति । ततश्च पंचभिः पंचको पंचविंशत्यवमासनात् । सास्यतत्त्वानो प्राप्ती ग्रूमः यद्यपि पशसस्याविषयाऽपरा पश्नसंख्या- श्रूयते, तथाऽपि न पश्चविंशतिरिय भवितुं शक्नोति । पचविंशतिसंख्याना तत्त्वानामात्रयत्वेनाऽवमासनात् । नायभारमा पञ्चविंशत्यन्तःपाती। तपा च सति 'एकस्यैवाऽधेपत्वमाधारत्वं च' इति विरोधप्रसन्नात् । माकाशोऽप्यपर: श्रूयते। न च तस्यापि पश्चविंशत्यन्तःपातित्वम् । 'मावाशश्च' इति पृपः निर्देशसमुच्चयपोविधानात् । तत मात्मावाशाम्यां सह सप्तविंशतिसंपत्तेन साख्यतत्त्वानामत्रावकाश:। यस्तहिं वाक्यार्थः ? उच्यते--पशजनशब्दोऽयं समस्तः संज्ञावाची। 'दिक्संस्ये संज्ञायाम' (पा० सू० २।११५० ) इति समा- सविधानात् । तत: पश्चजनसंतवाः पदार्था: पशुसंख्यावा इत्युक्त भवति । पूर्वपक्षी-माख्य शास्त्रोक्त तत्त्व हैं, ऐमा प्राप्त होटा है। क्योंकि सांस्यपास्त्र प्रसिद्ध पञ्चविंशति मश्या यहाँ अवभामित होती है। जैसे कि 'पञ्च पश' इस प्रकार दो शब्द मुने जाते हैं । उनमेमे एक “पञ्च' शब्दखे सांस्य तत्त्वगत पञ्चसंख्या विवक्षित है। दूमरे 'पञ्च' शब्दसे पञ्चसंख्या विषयक दूसरी पंच संख्या विवक्षित है। इसमें पंचसंख्या विशिष्ट वत्त्वपंचक ऐसा अर्थ होता है। इससे पाच पंचकोसे पंचविंशति (पचीस संख्या प्रवमामित होती है। सिद्धान्ती-मात्य-तत्त्वोंके प्राप्त होनेपर इम कहते हैं—यधपि पत्र संख्या विष- यक दूसरी पञ्चरास्या सुनी जाती है, तो भी यह पञ्चविंशतिसख्या नहीं हो सकती, क्यो- कि पञ्चविंशति सख्यावाले तत्वोका मात्रयरूपसे मात्माका भान होता है। यह मात्मा पञ्चविंशति सस्थाके भन्तर्भून नहीं है । यदि पन्तद्व मानें तो 'एकमें हो मापार-भाधेय- भाव होनेवे विरोध प्रसङ्ग होगा। और इससे पृथक् दूसरा माकाश भी सुना जाता है। वह भी पञ्चविंशति संख्याके अन्तर्गत नहीं हो सकता, क्योंकि 'पाकाशन' इस प्रकार पृथक् निर्देश और समुञ्चयका विधान है। इससे मारमा मौर प्राकाशके साथ सप्टविशति (२७) का ज्ञान होने से साख्यशास्त्रगत पञ्चविंशति सत्त्वोका यहाँ अवकाश नहीं है । तब वाक्यका भयं क्या है ? कहते हैं-यह समस्त पञ्चजन शब्द संज्ञा पाचक है । क्यों- कि "दिसंख्ये संज्ञायाम्' (दिशा भौर सख्या वाचक शब्दोका सज्ञार्य में सुबन्त उत्तर पदके साथ समास होता है ) इस प्रकार समासका विधान है। इससे पञ्चजन संशावाले 1 पदार्थ पाञ्च सख्यक है, ऐसा पर्थ होता है। सज्ञी तो वाक्यशेषसे प्राण भादि समझने वास्यशेपः। प्राणादीनां पश्चानां साक्षी चिदात्मा द्वितीयः प्राणादिशब्दरभि- म. १ पा० ४ मषि०४ ] वैयासिकन्यायमाला अज्ञिनस्तु वाक्यशेपात्प्राणादयोऽवगन्तव्याः। 'प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चपुरुत प्रोत्रस्य श्रोत्रमुताग्नस्याप्त मनसो ये मनो विदुः' ( बृह० ४।४।१५) इति घीयते। तस्माद्वाक्यशेषात्प्राणादयः पश्नजना भवेयुः ॥३॥ (चतुर्थे जगद्योनौ ब्रह्मण्येव वेदान्तवाक्यसमन्वयाधिकरणे सूत्रे) (४ कारणत्वाधिकरण मू०१४-१५) कारणत्वेन चाऽऽवाशादिपु यथाव्यपदिष्टोक्तः ॥ १४ ॥ समाकर्षात् ॥१५॥ चतुर्थाधिकरणमारचति- समन्वयो जगधोनी न युक्तो युज्यतेऽथवा । न.युक्तो वेदवाक्येषु परस्परविरोधतः ॥ ७॥ सर्गक्रम विवादेऽपि नासौ स्रष्टरि विद्यते । अव्याकृतमसत्प्रोक युलोऽसौ कारणे ततः ॥ ८॥ योऽयं वेदान्तसमन्वयो जगत्कारणविषयः सार्धेखिभिः पादैः प्रतिपादित- स्तमाक्षिप्प समाधातुमयमारम्भः । न युक्तोऽयं समन्वय इति तावत्प्राप्तम् । कुतः । वेदान्तेषु बहुशो विरोधप्रतीते: प्रामाण्यस्यैव दुःसंपादत्वात् । तथा हि- - चाहिए । 'प्राणस्य प्राणम् (प्राणका प्राण, पक्षुका , प्रोत्रका थोत्र, भन्नका मन्न भोर मनका मन ऐमा जो जानते हैं) यह वाक्यशेष है । प्राण प्रादि पांचोका साक्षी चि- पारमा द्वितीय प्राणादि शब्दोसे अभिहित है। इसलिए वाक्यशेषसे प्राण प्रादि पांच -पञ्चजन होंगे ॥३॥ . चतुर्य प्रधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-जगत्के कारणमे वेदान्तोका समन्वय युक्त है अथवा नहीं ? पूर्वपक्ष-वेदान्तवाक्योंमे परस्पर विरोध होनेसे समन्वय युक्त नहीं है। सिद्धान्त-सृष्टिके क्रममें विवाद रहनेपर भी स्रष्टामे विवाद नहीं है । 'प्रसत्' शब्दका अर्थ मव्याकृत कहा गया है, इसलिए जगत्कारणमें वेदान्त-वाक्योका समन्वय साढे तीन पादोसे जगदकारण विषयक जो यह वेदान्तोका समन्वय कहा गया है। उसपर प्राक्षेप कर समाधान करनेके लिए इस अधिकरणका प्रारम्भ है- पूर्वपक्षी 1-जगद कारणमें वेदान्तोंका यह समन्वय युक्त नहीं है, ऐसा प्राप्त होता [म०१ पा०४ अधि० ५] धैयासिकन्यायमाला ८३ मसतः सज्जायेत" इति श्रुत्यन्तरेणाभावस्य कारणत्वनिषेधात् । तस्मात- एकवाक्यतायाः सुसंपादत्वाद्युक्तो जगत्कारणे समन्वयः॥४॥ (पञ्चमे परमात्मन एव जगत्कर्तृत्वाधिकरणे मूत्राणि)। जगद्वाचित्वात् ॥ १६ ॥ जीवमुख्यप्राणलिङ्गाने ति चेत्त- द्वथाख्यातम् ॥ १७ ॥ अन्यार्थ तु जैमिनिःप्रश्नव्याख्या- नाभ्यामपि चैवमेके ॥१८॥ पञ्चमाधिकरणमारचयति- (५ बालाक्यधिकरण सू० १६-१८) पुरुषाणा तु कः कर्ता प्राणजीवपरात्मसु । कर्मेति चलने प्राणो जीवोपूर्व विवक्षिते ॥ ६ ॥ जगद्वाची कर्मशब्द घूमात्रविनिवृत्तये। तत्कर्ता परमात्मैव न मृषावादिता ततः ॥ १०॥ कौषीतकिब्राह्मणोपनिषदि बालाकिनाम्ना ब्राह्मणेनाऽदित्यादिषु पोडशसु पुरुषेषु ब्रह्मत्वेनोक्तषु राजा तानिराकृत्य स्वयमाह-'यो वै बालाके, एतेषां पुरुषाणां कर्ता यस्य वै तत्कर्म, स वै वेदितव्य.' (४।१६ ) इति । अत्र रेषा मभिधान है, जो 'मसत्' शब्दसे अभिधान है वह मव्यातके अभियानके अभिप्रायसे है। अत्यन्ताभावके अभिप्रायसे नहीं है। क्योकि 'कथमसतः सज्जायेत.' (भला असत्से सद कैसे उत्पन्न होगा ? ) इस प्रकार अन्य श्रुतिसे प्रभावमे कारणत्वका निषेप किया गया है। इसलिए एक वाक्यताका संपादन होनेसे जगत्कारणमें वेदान्त वाक्योका समन्वय युक्त है ।। ४॥ पञ्चम मधिकरणको रचना करते है- सन्देह-'यो वै बालके एतेषा कर्ता यस्य वैतत्कर्मः' इम श्रुतिमें उक्त पुरुषोका कर्ता प्राण, जीव और परमात्मामें से कौन है ? पूर्वपक्ष-कर्म शब्दसे चलनात्मक क्रिया कही गई है, प्रतः प्राण पुरुषका कर्ता है प्रथवा कर्म शब्द अपूर्वका वाची होनेसे जीव कर्ता है । सिद्धान्त-पुरुषमात्रकी निवृत्तिके लिये 'यस्य वैतत्कर्म' यहाँ कर्मशब्द जगतका पाचक है, इस लिए पुरुषोंका कर्ता परमात्मा ही है, इससे पजामें मृपावादिस्य नहीं है। कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद्मे बालाकि नामक ब्राह्मणके मादित्य मादि सोलह पुरुषोंको ब्रह्मरूपसे कहनेपर राजाने उसका निराकरणकर स्वयं कहा-'यो (हे बामाकि ! जो इन पुरुषोंका कर्ता है, जिसका यह जाटप कर्म है, उसका ज्ञान प्राप्त भाषानुवादसहिता [म०१ पा० ४ अधि०५] संशये सति 'प्राण' इति तावत्प्राप्तम् । कुतः। कर्मशब्दस्म चलनवाचित्वात् । देहादिचालनस्य प्राणसंबन्धित्वात् । अथवा पुरुषाणा कर्ता जीवो भवेत् । कुत.। कर्मशब्दस्यापूर्ववाचित्वात् । जीवस्य चापूर्वस्वामित्वात् । सर्वथा न परमात्मा। इति प्राप्त बम-नान कर्मशब्दश्चलने वर्तते। नाप्यपूर्वे। फित्वयं जगद्वाची। 'नियत इति कर्म' इति व्युत्पत्तेः। सति जगद्वामित्वे मंशब्द. सप्रयोजनो भविष्यति। पुरुषमात्र त्वशद्वानिवृत्त्यर्थत्वात्। तथा च श्रुतिवाक्या- क्षराण्येवं योजयितव्यानि-हे बालाके, त्वदुक्ताना पुरुषाणा पौडशाना य: कर्ता स एव वेदितव्य. । न तु ते पुरुषा.। अथवा किमनेन 'पोडशाना कर्ता' इति संकोचेन एतत्कृत्न जगद्यस्य कार्य स एव वेदितव्य इति । कृत्स्नजगत्क- तृत्वं च परमात्मन एव । न जीवप्राणयोः । एवं सति राज्ञो मृपावादित्वदोपो न भवति । 'ब्रह्म ते अवाणि' इति प्रतिज्ञाय पोडश पुश्यान्ब्रुवतो बालाके "मृषा वै किल" इत्यनेन मृपावादित्वमापाद्य राजा स्वयं ब्रह्म विवक्षुर्यदि करना चाहिए ) यहाँ दोन प्रकारका सशय होठा कि पुरुषोका कर्ता प्राण है, जीव है मथवा परमात्मा है। पूर्वपक्षी -माण पुरुषोंका कर्ता है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योकि कर्म गन्द पलन निया वाचक है। देहादिका चालन प्राणके सम्बन्धसे होता है अपना पुरुषोंका कर्ता जीव होगा, क्योंकि कर्म शब्द अपूर्वका पाची है । जीव मपूर्वका स्वामी है। परमात्मा तो किसी प्रकार भी कर्वा नहीं हो सकता। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-यहाँ कर्म शब्द न चलन क्रिया रह रहा है और न अपूर्वमे । किन्तु "क्रियत इति कर्म' ( जो किया जाय वह कर्म है ) इस व्युत्पत्तिसे यह कर्म शब्द जगत्का वाचक है। कर्म शब्द जगत्का वाचक होनेसे पुरुषमात्र कर्तृत्वको शङ्का निवृत्त्यर्थ होता हुआ सार्थक होता है। इसलिए श्रुतिवाक्यके मक्षरोंकी इस प्रकार योजना करनी चाहिए । 'हे बालाकि । तुममे कथित सोलह पुरुषोंका जो कर्ता है वही वेदितव्य है न कि वे मोलह पुरुष' । अथवा 'सोलह पुरुषोका कर्ता इस संकोच करनेसे क्या, 'यह सारा जगत् जिसका कार्य है जीव मौर प्राण नहीं। ऐमा माननेपर राजामें मृपादादित्व दोष भी नहीं भाता। 'ब्रह्म ते ब्रवाणि (बालाकि- है राजन् । मैं तुमको ब्रह्म कहूंगा) ऐसी प्रतिज्ञा कर सोलह पुरुषोको कहते हुए बालाकिमें 'भूषा व किल' (जो तुम कहते हो वह मिथ्या है ) इससे मृपादादित्वका मापादन कर स्वप ब्रह्मको कहनेको इच्छा रखनेवाला राजा यदि प्राण मोर जीवको कहे तो बालाकिके [ म०१ पा० ४ मधि० ६ ] वैयासिकन्यायमाला प्राणजीवी ब्रूयात्, तदा बालाकेरिव राज्ञो मृपावादित्वं स्यात् । तच्चायुक्तम् । तस्मात् -वाक्योक्तो जगकर्ता परमात्मेव ॥५॥ (पष्ठे परमात्मन एव दर्शनयोग्यात्मत्वाधिकरणे सूत्राणि ) (६ वाक्यान्वयाधिकरण मू० १६-२२) वाक्यान्वयात् ॥ १६ ॥ प्रतिज्ञासिद्धेर्लिगमाश्मरथ्यः ॥ २० ॥ उत्क्रमिष्यत एवंभावादित्यौडुलोमिः ॥२१॥ अवस्थितेरिति काशकृत्स्नः ॥ २२ ।। पष्ठाधिकरणमारचयति- आत्मा द्रष्टव्य इत्युक्तः संसारी वा परेश्वरः। संसारी पतिजायादिभोगप्रीत्याऽस्य सूचनात् ॥ ११ ॥ अमृतत्वमुपक्रम्य तदन्तेऽप्युपसंहृतम् । संसारिणमनूद्यातः परेशत्वं विधीयते ॥ १२॥ बृहदारण्यके चतुर्थाध्याये मैत्रेयी भार्या प्रति याज्ञवल्क्यः पतिरुपदिशति- "मात्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः" (४।५।६) इति । अत्राऽऽत्मनि द्वेघा संदिग्धे सति 'संसारी' इति तावत्प्राप्तम् । कुतः-"न वा परे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवति, पात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति" समान राजा मृषावादी हो जायगा। परन्तु वह युक्त नहीं है । इससे विषाक्य उक्त जगत्कर्ता परमात्मा ही है ।। ५ ॥ छठे अधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-'मात्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इस श्रुतिमे उक्त द्रष्टव्य मात्मा जीव है अथवा ब्रह्म? पूर्वपक्ष [--उक्त भात्मा जीव है, क्योकि श्रुत्युक्त पति, जाया मादि भोग पदार्थोकी प्रोतिसे तद्युक्त जीवको ही सूचना होती है । सिद्धान्त-वाक्यके उपक्रममे अमृतत्व कहा गया है, उपसहारमे भी अमृतव कहा गया है । इमसे ससारी जीवका मनुवादकर उसमे ब्रह्मत्वका विधान है। इसलिए उक्त द्रष्टव्य पात्मा ब्रह्म ही है। बृहदारण्यकोपनिषद्के चतुर्य अध्यायमे अपनी भार्या मैत्रेयोके प्रति पति याज्ञवल्क्य उप- देश करते हैं-'प्रात्मा वा अरे द्रष्टव्य..' (हे मैत्रयो ! प्रात्माका दर्शन करना चाहिए, उसका श्रवण, मनन और निदिध्यामन करना चाहिए ) यहां द्रष्टव्य प्रात्माके विषयमे दो प्रकारका सन्देह होता है कि उक्त मात्मा जीव है अथवा ब्रह्म ?
भाषानुवादसहिता [अ० १ पा० ४ अधि०७] इत्यादिवाक्यैर्भोगप्रीतियुक्तस्यात्मन: संसारित्वसूचनात् । अयमत्र वाक्यार्थ:- 'पत्यो प्रीतिं कुर्वती जाया न पत्युः सुखाय प्रीति करोति, किंतु स्वसुखायैव । एवं पतिपुत्रादयोऽपि स्वस्वभोगायैवेतरत्र प्रीति कुर्वन्ति, इति भोगश्च नासन्न- स्येश्वरस्पावकल्प्यते, तस्मात्-संसारी। इति प्राप्ते ब्रूमः एतद्वाक्योपक्रमे मैत्रेयी 'वित्तसाध्येन कर्मणा किं ममाम- तत्वं स्यात्' इति पप्रच्छ । याज्ञवल्क्यस्तु "अमृतस्य तु नाशाऽस्ति वित्तेन" इति अमृतत्वं प्रत्याशाऽपि कर्मणा नास्ति' इत्युत्तरमाह। ब्राह्मणावसानेऽपि "तावदरे खल्वमृतत्वम्" इत्युपसंहृतम् । अत उपक्रमोपसंहारवशादमृतत्व- साधनमात्मज्ञानमत्र प्रतिपाद्यम् । जीवात्मज्ञानं च नामृतत्वसाधनम् । तस्मात- भोगप्रीतिसूचितं जीवमनू द्य तस्य ब्रह्मत्वं प्रतिपाद्यते ॥ ६ ॥ (सप्तमे ब्रह्मण एवोपादाननिमित्तकारणत्वाधिकरणे सूत्राणि) (७ प्रकृत्यधिकरण सू० २३-२७ ) प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुरोधात् ॥ २३ । अमिध्यो- पदेशाच ॥ २४ ॥ साक्षाचोभयाम्नानात् ॥ २५ ॥ आत्म- वृत्तेः परिणामात् ॥ २६ ॥ योनिश्च गीयते ॥ २७ ॥ पूर्णपक्षी-जीव है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि 'न वा अरे' (भरे मैत्रेयी ! पत्नीको पतिके काम ( सुख ) के लिए पति प्रिय नही होता किन्तु अपने काम ( सुख) के लिए पति प्रिय होता है. ) इत्यादि वाक्योंसे ज्ञात होता है कि भोगोंमे प्रीति युक्त उक्त द्रष्टव्य मारमा जीव ही सूचित होता है । ( न वा अरे) यहा इस वाक्यका यह अर्थ है-'पतिमें प्रेम करती हुई जाया-स्त्री पतिके सुखके लिए नहीं करती किन्तु अपने सुखके लिए ही एवं पति पुत्र मादि भी अपने अपने मुखके लिए ही अन्यत्र प्रेम करते हैं । ऐमा भोग तो मसङ्ग ईश्वर के लिए युक्त नहीं है। इसलिए उक्त द्रष्टव्य प्रात्मा जीव ही है । सिद्धान्ती-ऐमा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं--उक्त वाक्यके उपक्रममे मैन योने पूछा कि क्या वित्तसाध्य कमसे मुझे अमृतत्व प्राप्त होगा? याज्ञवल्क्यने उत्त वितसे या वित्ताप कर्मस अमृतत्वको प्राशा नहीं है, कर्मसे अमृतत्वको तो प्रत्याशा भो नही है। ब्राह्मणके अवसान ( समाप्ति ) मे भी 'एतावदरे खल्वमृतत्वम्' (है मैत्रयो ! यही अमृतत्व है ) ऐमा उपसंहार किया गया है। प्रतः उपक्रम और उपसंहार के बलसे यही प्रतीत होता है कि अमृतत्वका साधनभूत प्रात्मज्ञान ही यहा प्रतिपाद्य है । जीवात्मज्ञान अमृतत्वका साधन नहीं है। इससे भोगप्रीतिसे सूचित जीवका अनुवादकर उसमें ब्रह्मत्वका प्रतिपादन है । मतः उक्त द्रष्टव्य मात्मा ब्रह्म ही है ।। ६ ।। कहा कि ५७ म०१ पा० ४ अधि०७ ] वैयासिकन्यायमाला सप्तमाधिकरणमारचयति- निमित्तमेव ब्रह्म स्यादुपादानं च वीक्षणात् । कुलालवन्निमित्तं तन्नोपादानं मृदादिवत् ॥ १३॥ बहु स्यामित्युपादानभावोऽपि श्रुत ईभितुः । एकबुद्धघा सबंधीश्च तस्माद्ब्रह्मोभयात्मकम् ॥ १४ ॥ जगत्कारणत्वप्रतिपादकानि सर्वाणि वाक्यानि विषयः। तत्र 'किं ब्रह्म निमित्तकारणमेव, उतोपादानकारणमपि' इति संदहे निमित्तकारणमेव इति तावत्प्राप्तम् । कुतः। 'तदेक्षत' इति सृज्यकार्यविषयपर्यालोचनश्रवणात् । पर्यालोचनं च निमित्तभूते कुलालादावेव दृष्टम् । नोपादानभूतमृदादो। तस्मा- निमित्तकारणमेव । सन्देह- इति प्राप्ते ब्रूमः- 'तदेक्षत बहु स्यां प्रजायेय ( छां ६।२।३ ) इतीक्षितुरेव प्रकर्षणोत्पत्त्या बहुभावः श्रूयते। तत उपादानत्वमस्ति । किंच 'येनाश्रुतं श्रुतं सप्तम अधिकरणको रचना करते हैं- -ब्रह्म जगत्का निमित्तकारण ही है अथवा उपादान भी? पूर्णपक्ष-श्रुतिमे सृज्यमान पदार्थोंका ईक्षण कहा गया है, इसलिए कुलाल (कुम्हार) मादिके समान ब्रह्म निमित्तकारण है, मृदादिके समान उपादानकारण नहीं है । सिद्धान्त-श्रुतिमे ईक्षण कर्ता 'बहु स्याम्' ( मैं बहुत होऊ ) इस प्रकार उपा- दान कारण भी कहा गया है और श्रुत्युक्त एक विज्ञानसे सर्वविज्ञान उपादान कारणके ज्ञानसे ही हो सकता है, प्रतः ब्रह्म जगवका निमित्त कारण और उपादान-कारण उम- पात्मक ( दोनो) है। जगत्के कारणका प्रतिपादन करनेवाले सब वाक्य इम मधिकरणके विषय है। क्या ब्रह्म केवल निमित्तकारण ही है अथवा उपादानकारण भी ? यहां इस प्रकार सदेह होनेपर- पूर्वपक्षी |--ब्रह्म केवल निमित्त कारण ही है, ऐसा प्राप्त होता है। क्योकि श्रुतिमें 'वदक्षत.' इस प्रकार सुज्यमान कार्योंके विषयमे पर्यालोचनका श्रवण है। पर्यालोचन तो केवल निमित्तकारणभूत कुलाल आदिमे ही देखा गया है, उपादानकारणभूत मृत्तिका मादिमे नहीं। इससे ब्रह्म केवल निमित्त कारण ही है । सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-'वक्षत.' ( उसने ईक्षण किया कि मैं बहुत होऊ उत्पन्न होऊ) इस प्रकार ईक्षण कर्ताका ही प्रकर्ष उत्पत्तिसे बहुभाव श्रुतिमे कहा गया है । इसलिए वही उपादान कारण है। किंच येनात्रु तं श्रुतं भवति.'
पंप भाषानुवादसहिता [अ०१पा० ४ अषि०५] भवति' ( छा० ६।११३) इत्यादि ब्रह्मण्येकस्मिञ्छुते सति 'अश्रुतमपि जगन्छु- तमेव भवति' इति प्रतिपाद्यते। तदेकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं च। तच्च ब्रह्मरण: सर्वोपादानत्वे सति ब्रह्मव्यतिरेकरण कार्याणामभावादुपपादयितुं सुशकम् ! केवलनिमित्तत्वे तु सर्वेषु ब्रह्मव्यतिरिक्तेषु सत्सु कथं नामैकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं प्रतिपाद्यते । तस्मादुभयविधकारणं ब्रह्म ॥ ७ ॥ (भष्टमे ब्रह्मण एव जगत्कारणत्वाधिकरणे सूत्रम् )। (८ सर्व व्याख्यानाधिकरण सू० २८) एतेन सर्ने व्याख्याता व्याख्याता ॥२८॥ अष्टमाधिकरणमारचति- अण्वादेरपि हेतुत्वं श्रुतं ब्रह्मरण एव वा। वटधानादिदृष्टान्तादण्वादेरपि तच्छुतम् ॥ १५॥ शून्यावादिष्वेकबुद्धया सर्वबुद्धिर्न युज्यते। स्युब्रह्मण्यपि घानाद्यास्ततो ब्रह्मैव कारणम्॥ १६ ॥ वेदान्ता विषयः। तत्र किं ब्रह्मण इव परमाणुशून्यादीनामपि श्रौतं कारणत्वमस्ति, अथवा सर्वत्र ब्रह्मरण एव कारणत्वं प्रतिनियमिति संशयः । इत्यादिसे एक ब्रह्मके भुत होनेपर प त भी जगत् श्रुत ही होता है और उस एकके विज्ञानसे सबका विज्ञान हो जाता है, ऐसा प्रतिपादन किया जाता है। वह तभी उप- पादन हो सकता है जब कि ब्रह्म ही सबका उपादान हो और ब्रह्मसे भिन्न कोई कार्य न हो । ब्रह्म यदि केवल निमित्त कारण हो तो सब कार्योको ब्रह्मसे भिन्न होनेपर एक वि- ज्ञानसे सर्व विज्ञानका प्रतिपादन कैसे किया जा सकता है । इसलिए ब्रह्म ही दोनो प्रका- रका कारण है ॥७॥ अष्टम अधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-श्रुतिमे प्रणु आदि भो जगत्कारण कहे गये हैं अथवा केवल ब्रह्म ही ? पूर्वपक्ष-तिमे वटवीज मादि दृष्टान्तोंसे प्रतीत होता है कि अणु प्रादि भी जग- के कारण कहे गये हैं। सिद्धान्त-एक विज्ञानसे मर्वविज्ञान शून्यवाद, अनुवाद पादिमे उपपन नहीं हो सकता है। वटबीज प्रादि दृष्टान्त ब्रह्ममें भी हो सकते हैं, इसलिए ब्रह्म ही जगरका- इस प्रधिकरणके वेदान्त वाक्य ही विषय हैं । यहापर यह मंशय होता है कि क्या लेाके ममान परमारगु, शुन्य प्रादि भी श्रुतिमे कारण कहे गये हैं अथवा सर्वत्र ब्रह्म हो प्रतिनियत कारण कहा गया है ?
[म०.१ पा० ४ अधि०८] वेयासिकन्यायमाला
भण्वादेरपि कारणत्वं श्रौतम् । वटघानादिदृष्टान्तश्रवणात् । तथा हि छान्दोग्ये
पछाध्याये श्वेतकेतुं प्रत्युपदिशन्नुद्दालक: सूक्ष्मतत्त्वे स्थूलस्य जगतोऽन्तर्भावं
प्रतिपादयितुं महावृक्षगभितानि वटबीजानि दृष्टान्तत्वेनोदाजहार। अतस्तादृशाः
परमाणवो दार्टान्तिके श्रुता भवन्ति। शून्यस्य तु "असता इदमग्र मासीत्"
(छा० ६।२।१) इति साक्षादेव कारणत्वं श्रुतम् । स्वभानमेके कवयो वदन्ति,
कालं तथाऽन्ये' इति स्वभावकालपक्षी श्रुतौ । तस्मात्परमाण्वादीनामपि श्रोतं
कारणत्वम् ।
इति प्राप्ते ब्रूमः-एकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं शून्यादिमतेषु नोपपद्यते ।
शून्यादिभिरजन्यस्य ब्रह्मणः शून्यादिज्ञानेनाज्ञतत्वात् । धानादृष्टान्तस्तु ब्रह्मण्य-
पोन्द्रियागम्यतया सूक्ष्मत्वादुपपद्यते। असच्छब्दस्य नामरूपराहित्याभिप्राय-
श्चतुर्थाधिकरणे वर्णितः। स्वभावकालपक्षो तु पूर्वपक्षत्वेन श्रुत्योपन्यस्तो।
तस्माद्ब्रह्मव श्रुत्यभिहितं जगत्कारणं न परमाण्वादोनोति सिद्धम् ॥ ८॥
इति श्रीभारतीतीर्थमुनिप्रणीताया वैयासिकन्यायमालायां
प्रथमाध्यायस्य चतुर्थः पादः ।। ४ ॥
समाप्तश्च प्रथमोऽध्यायः॥१॥
पूर्वपक्षी-परशु प्रादि भी श्रुतिमे कारण कहे गये हैं, क्योकि वटबीज प्रादि दृष्टा-
न्तोका धवण है। जैसे कि छान्दोग्यके छठे भध्यायमे श्वेतकेतुके प्रति उपदेश करते हुए
उद्दालकने सूक्ष्मतत्त्वमें स्थूल जगत्के अन्तर्भावका प्रतिपादन करनेके लिए महावृक्षमित
वटवीज दृष्टान्तरूपसे कहे गये हैं। इसलिए महाकार्य गर्भित परमाणु दान्तिकरूपसे
श्रुतिमे कहे गये हैं । 'मसद्वा इसमग्न आसीत०' (यह सारा जगत् उत्पत्ति के पूर्व प्रसत्
था ) यह यति साक्षात् ही मसतको जगत्का कारण कहती है । 'कुछ विद्वान लोग स्व-
भावको जगत्का कारण कहते हैं, कुछ दूसरे लोग कालको जगत्का कारण कहते हैं। इस
प्रकार श्रुतिमे स्वभाव और काल पक्ष भी कहे गये हैं । इसलिए परमाणु मादि भी जगत्के
कारण श्रुति सिद्ध हैं।
सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-एक विज्ञानसे सर्वविज्ञान शून्यादि-
मतोमे उपपन्न नही होता है । क्योकि शून्य प्रादिसे अजन्य ब्रह्म शून्य प्रादिके ज्ञानसे
प्रज्ञात है। वटबोज दृष्टान्त तो ब्रह्ममें भी इन्द्रियागोचर और सूक्ष्म होने के कारण उप-
पन्न हो सकता है । असत् शब्द नाम रूप रहित भव्याकृतके अभिप्रायसे है, ऐसा इम
पादके चतुर्थ अधिकरणमें वर्णन किया गया है । स्वभावपक्ष और कालपक्ष तो श्रुतिमे
पूर्वपक्षरूपसे कहे गये हैं । इसलिए श्रुत्युक्त जगत्का उभयात्मक कारण ब्रह्म ही है पर-
माणु मादि नहीं ॥८॥
६० भाषानुवादसहिता [अ०२ पा० १ अघि०१] अत्र पादे अधिकरणानि सूत्राणि पादितः ४० १३५ २८ अथ द्वितीयाध्यायस्य प्रथमः पादः द्वितीयस्य भविरोधाख्याध्यायस्य प्रथमपादे सांख्ययोगकाणादादिस्मृतिभिः सौख्यादि- प्रयुक्ततकश्च देतान्तममन्वयविरोधपरिहारा । पविरोध नामक द्वितीयाध्यायके प्रथम पादमें सांख्य, योग, फाणादादि स्मृतियों मौर सारूप मादि द्वारा प्रयुक्त वर्कोसे वेदान्त समन्वयपर किये गये विरोधोका परिहार है। (प्रथमे साक्ष्यस्मृतेर्बाध्यत्वाधिकरणे सूत्रे)। स्मृत्यनवकाशदोशप्रसङ्ग इति चेन्नान्यस्मृत्यनवकाश- दोषप्रसङ्गात् ॥ १ ॥ इतरेषां चानुपलब्धेः ॥ २॥ प्रथमाधिकरणमारचयति साख्यस्मृत्याऽस्ति संकोचो न वा वेदसमन्वये। घमें वेदः सावकाशः सकोचोऽनवकाशया ॥१॥ प्रत्यक्षश्रतिमूलाभिर्मन्वादिस्मृतिभिः स्मृतिः । अमूला कापिली बाध्या न संकोचोऽनया ततः॥२॥ श्री भारतीतीर्थ मुनि प्रणीत वयासिकन्यापमालाके प्रथमाध्यायके चतुर्थ पादका 'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती' कृत भाषानुवाद 11 ४ ॥ "समाप्तश्च प्रथमोऽध्यायः॥१॥ प्रथम अधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-वेदसमन्वयका सांख्यस्मृतिसे संकोच होता है पथवा नहीं ? पूर्वपक्ष-वेद धर्ममें सावकाश है। मतः निरवकाय सांध्यस्मृतिसे वेदका संकोच सिद्धान्त -प्रत्यया श्रुतिमूलक मनु भादि स्मृतियोसे मूल श्रुति रहित कपिलम्मति बाध्य है। पतः मास्यस्मृतिसे वेदका संकोच युक्त नहीं है।
[म०२ पा० १ अपि०१] वेयासिकन्यायमाला पस्मिन्पादे सर्वेष्वधिकरणेषु पूर्वाघ्यायोक्तः समन्वयो विषयः। तत्रास्मि- नधिकरणे वैदिकस्य समन्वस्य सांख्यस्मृत्या 'संकोचोऽस्ति न वा' इति संदेहः । 'संकोचोऽस्ति' इति तावत्प्राप्तम् । कुतः। साह्यस्मृतेरनवकाशत्वेन प्रबलत्वात् । सांख्यस्मृतिहि वस्तुतत्त्वनिरूपणायेव प्रवृत्ता, न त्वनुष्ठेयं धर्म क्वचिदपि प्रतिपादयति । यदि तस्मिन्नपि वस्तुन्यसो बाध्येत, तदा निरवकाशा स्यात् । वेदस्तु धर्मब्रह्मणो प्रतिपादयन्ब्रह्मण्येकस्मिन्बाध्यमानोऽपि धर्मे सावकाश: स्यात् । तस्मादनवकाशया स्मृत्या सावकाशस्य वेदस्य संकोचो युक्तः। इति प्राप्ते ब्रूम:-- साख्यस्मृत्या वेदस्य संकोचो न युक्तः । कुतः, मन्वादि स्मृतिभिब्रह्मकारणत्ववादिनीभिर्बाधितत्वात् । प्रबला हि मन्वादिस्मृतयः, प्रत्यक्ष- वेदमूलकत्वात् । न तथा कपिलस्मृतेः प्रधान कारणवादिन्या मूलभूतं कंचन वेदमुपलभामहे, दृश्यमानवेदवाक्यानां ब्रह्मपरत्वस्य पूर्वमेव निर्णीतत्वात् । तस्मान सांख्यस्मृत्या वेदस्य संकोचो युक्तः ॥१॥ (द्वितीये योगस्मृतेर्वाध्यत्वाधिकरणे सूत्रम् )। एतेन योगः प्रत्युक्तः ॥ ३ ॥ द्वितीयाधिकरणमारचयति- इस पादके सब अधिकरणोका पूर्वाध्यायमे उक्त समन्वय विषय है। यहाँपर यह सन्देह होता है कि इस मधिकरणमे वैदिक समन्वयका साख्यस्मृतिसे संकोच होता है मथवा नही? पूर्वपक्षी -संकोच होना युक्त है ? क्योंकि सास्यस्मृति निरवकाश होनेसे प्रबल है, साल्यस्मृति तो केवल वस्तुतत्त्वका निरूपण करनेके लिए प्रवृत्त हुई है । कहीपर भी मनुष्ठेय धर्मका प्रतिपादन नहीं करती। यदि वह उस वस्तुतत्त्वके प्रतिपादनमे भी बाधित हो तो निरवकाश होगी। वेद वो धर्म भोर ब्रह्म दोनोका प्रतिपादन करता है। एक ब्रह्मके विषयमे बाधित होनेपर भी धर्ममे वह सावकाश है। इसलिए निरवकाश सांख्यस्मृतिसे सावकाश वेदका संकोच युक्त है। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हे--सास्यस्मृतिसे वेदका संकोच युक्त नही है, क्योकि सास्यस्मृति ब्रह्मको जगत्का कारण प्रतिपादन करनेवाली मनु मादि स्मृतियोसे बाधित है। जिस प्रकार मनु प्रादि स्मृतियां प्रत्यक्ष वेद मूलक होनेसे प्रबल है, उसी प्रकार प्रधान कारणवादी कपिल स्मृतिको मूलभूठ कोई अति हमे उपलब्ध नहीं होती। कारण कि दृश्यमान वेदवाक्योका ब्रह्मपरत्व पूर्वमे ही निर्णय किया जा चुका है। इसलिए सास्यस्मृतिसे वेदका संकोच युक्त नहीं है ।।१।। द्वितीय प्रधिकरणकी रचना करते है- - - [प्र०२ पा० १ अधि०३] वैयासिकन्यायमाला मासेति योगे तात्पर्यम् । प्रधानादीनि प्रतिपाद्यतया प्रतिजज्ञे। किं तहि द्वितीयपादे यमादिसाधनप्रतिपादके हेयं हेयहेतु हानं हानहेतुं विवेचयन्प्रसङ्गा. सांख्यस्मृतिप्रसिद्धानि प्रधानादीनि व्याजहार। ततो न तत्र 'तात्पर्यम् । तस्मान योगस्मृत्या वेदस्य संकोचः ॥२॥ (तृतीये लक्षण्याभासस्य जगत्कारणत्वावाधकरवाघिवरणे सूत्राणि) न विलक्षणत्वादस्य तथात्वं च शब्दात् ॥४॥ अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् ॥ ५॥ दृश्यते तु॥६॥ असदिति चेन्न प्रतिषेधमात्रत्वात् ॥७॥ अपीती तद्वत्प्रसङ्गादसमञ्जसम् ॥८॥ न तु दृष्टान्त- भावात् ॥ ६॥ स्वपक्षदोपाच्च ॥ १०॥ तर्काप्रतिष्ठाना- दप्यन्यथाऽनुमेयमिति चेदेवमप्यविमोक्षप्रसङ्गः॥११॥ तृतीयाधिकरणमारचयति- वैलक्षण्याख्यतरण बाध्यतेऽथ न बाध्यते । बाध्यते साम्यनियमात्कार्यकारणवस्तुनोः ॥ ५॥ मृद्घटादौ समत्वेऽपि दृष्टं वृश्चिककेशयोः । स्वकारणेन वैषम्यं तर्काभासो न बाधकः ॥६॥ 'अचेतनं जगच्चेतनाद्ब्रह्मणो न जायते, विलक्षणत्वात् । यद्यस्माद्विलक्षणं, मादिकी प्रतिपाद्यरूपसे प्रतिज्ञा नहीं की है, किन्तु यम नियम प्रादि साधनोके प्रतिपादक द्वितीयपादमे हेय (दुःख) हेयहेतु (दु.खका हेतु-अविद्या अथवा दृश्य और द्रष्टाका संयोग) हान(कैवल्य) हानहेतु ( विवेकख्याति ) का विवेचन करते हुए प्रसङ्गसे सांख्यस्मृति प्रसिद्ध प्रधान मादि कहे गये हैं, इससे प्रधान भादिके प्रतिपादनमे योगशास्त्रका तात्पर्य नहीं है । इसलिए योगस्मृतिसे वेदका संकोच युक्त नहीं है ॥२॥ तृतीय मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-वेदसमन्वयका वलक्षण्यरूप वर्कसे बाघ होता है प्रयवा बाव नहीं होता है? पूर्णपक्षकार्य और कारणभूत वस्तुपोका साम्यनियम होता है, प्रवः समन्वय बाधित होता है। सिद्धान्त-घटरूप कार्य यद्यपि अपने कारणभूत मृत्के ममान देखा जाता है, तो भी वृश्चिक मौर केशरूप कार्य अपने कारणसे विषम देखे जाते हैं, इसलिए लक्षण्य तर्का- भास वाधक नही है। - ६४ भाषानुवादसहिता [अ०२पा० १ अधि०४] तत्तस्मान जायते, यथा गोमहिपः' इत्यनेन तकरण समन्वयो बाध्यते। इति प्राप्ते ब्रूमः-'ये ये कार्यकारणे ते ते सलक्षणे' इत्यस्या व्याप्ते- वृश्चिकादौ व्यभिचारो दृश्यते। अचेतनागोमयादृश्विकस्य चेतनस्पोत्पतेः। चेतनासपादचेतनाना केशनखादीनामुत्पद्यमानत्वात्। अतो वेदनिरपेक्षः शुष्कतों न क्वापि प्रतितिष्ठति । तदुक्तमाचार्य:- यत्नेनानुमितोऽप्ययं कुशलेरनुमावृभिः। अभियुक्ततरैरन्यैरन्यथैवोपपाद्यते॥इति। तस्मात्-प्राभासत्वाद्वैलक्षण्यहेतुर्न बाधकः ॥३॥ (चतुर्थे काणादादिमतैर्बाध्यत्वाभावाधिकरण सूत्रम् ) एतेन शिष्टापरिग्रहा अपि व्याख्याताः ॥१२॥ चतुर्थाधिकरणमारचयति- बाघोऽस्ति परमाण्वादिमतेनॊ वा यतः पटा। न्यूनतन्तुभिरारब्यो दृष्टोऽतो बाध्यते मतेः ॥७॥ शिष्टेष्टाऽपि स्मृतिस्त्यक्ता शिष्टत्यक्तमतं किमु । नाती बाघो विवत तु न्यूनत्वनियमो न हि ॥८॥ अचेतन अगत् चेतन ब्रह्मसे उत्पन्न नहीं होता, क्योकि जगत् ब्रह्मसे विलक्षण है। "जो जिमसे विलक्षण होता है वह उससे उत्पन्न नहीं होता, जैसे गौसे महिष' इस तकसे ममन्वय वाषित है। यह पूर्णपक्ष है। सिद्धान्ती-ऐसा प्रात होनेपर हम कहते हैं-- 'जो जो कार्य-कारण है वे वे समान- रूप है' इस व्याप्तिका वृश्चिक मादिमें व्यभिचार देखा जाता है, क्योकि मचेतन गोमयसे चेतन वृधिकको उत्पत्ति होती है भोर चेतन मनुष्यसे अचेतन केश, नख भादि उत्पन्न होते हैं। मता वेद निरपेक्ष पावतर्क कहींपर भी प्रतिष्ठित नहीं है । इस विषयमे भाषा- धोने कहा है--'यलेनानुमितो.' ( अनुमान करनेवाले कुशल पुरुषोंसे यलपूर्वक को पर्थ मनुमानद्वारा मिद किया जाता है, उसे उमसे भी अधिक कुशल मन्य तीक्ष्ण बुद्धिवाले मन्यया कर देते हैं) इमलिए वैलक्षण्य हेतु तर्कामास होनेसे समन्वयका बाधक नहीं है ॥३॥ चतुर्थ पधिकरएकी रचना करते हैं- सन्देह-परमाणु मादि पादी काणा मादि मतोसे वेद समन्वयका बाप होता है पपया नहीं? पूर्वपक्ष-सोकमें देखा गया है कि पट अपनी पपेता मल्प परिमाणवाले सन्तुपोंसे उत्पन्न होता है, प्रतः परम महत्परिमाणवाला ब्रह्म किसी कार्य द्रव्यका कारण नहीं हो सकता, इसलिए काला मादि मतोंसे ब्रह्ममे वेद समन्वयरा बाघ होता है। .
- [अ०२ पा० १ अधि०४] वैयासिकन्यायमाला ६५ सांख्ययोगस्मृतिभ्यां तदीयतर्केण बाधो मा भूताम, करणादबुद्धादि- स्मृतिभिस्तदीयतर्केण च समन्वयोऽपि बाध्यताम् । करणादो हि महर्षिः पर. माणूनां जगत्कारणत्वं स्मरति स्म। तक च तस्मिन्नर्थे प्रोवाच-विमतं सघणुकादिकं स्वस्मान्यूनपरिमाणेनारब्धं कार्यद्रव्यत्वात्, यथा तन्तुभिः पट:' इति । बुद्धश्च भगवतो विष्णोरवतारोऽभावं जगद्धेतुं स्मरति स्म । तक च तदनुकूलमाह-विमतं भावरूपं जगदभावपुरःसरं भावरूपत्वात् । यथा- 'सुपुतिपुरःसरः स्वप्नप्रपञ्चः' इति । तस्मात्तैः प्रवलैः करणादादिमतैर्बाधितः। इति प्राप्ते, वूमः-यदा वैदिकशिरोमणिभिः पुराणक भिस्तत्र तत्र प्रसन्नादुदाहृता। प्रकृतिपुरुषादिप्रतिपादिका सांख्ययोगस्मृतिर्जगत्कारणविपये दौर्बल्येन परित्यक्ता, तदा निखिल शिष्ट रुपेक्षितानां कणादादिमतानां दोबल्य- मिति किमु वक्तव्यम् । न खलु ब्राह्मपायादिपुराणेषु क्वचिदपि प्रसङ्गावध- गुकादिप्रक्रियोदाहृता। प्रत्युत-हेतुकान्बकवृतींश्च वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत् ।' सिद्धान्त-जव शिष्ट सम्मत स्मृति ही निराकृत हो गई, तब शिष्टोसे मपरिगृहीत- वजित मतके विषयमें कहना ही क्या है। विवर्तवादमे यह नियम नही है कि कार्यसे कारण मल्प परिमाणवाला हो। इसलिए काणाद मादि मतोंसे प्रद्वैत ब्रह्ममें वेदसमन्वय- का बाध नहीं होता। सांख्य, योग स्मृतियोंसे मोर उनके सर्कोसे वेद समन्वयका बाघ भले ही न हो, किन्तु करणाद, बुद्ध मादिको स्मृतियों और उनके तकर्यास वेद समन्वयका वाध होना चाहिए । महषि कणादने कहा है कि परमाणु जगत्के कारण हैं । इस विषयमे–'विमतं. (विवादास्पद द्वपणुकादि अपनी अपेक्षा अल्पपरिमाणवाले द्रव्यसे उत्पन्न हुए हैं, कार्यद्रव्य होने से, जैसे तुन्तुमोसे उत्पन्न पट ) यह तर्क-अनुमान भी कहा है। भगवान् विष्णुका मवतार बुद्ध प्रभावको जगत्का हेतु मानते हैं । 'विमत०' (विमत मावरूप जगत् ममावसे उत्पन्न है, भावरूप होनेसे सुषुप्तिपूर्वक स्वप्न प्रपञ्चके समान ) इस प्रकार तदनुकूल वर्क कहा है। इसलिए इन प्रबल कणाद मादि मतोसे वेद समन्वय बाधित है। सिद्धान्ती-ऐमा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-जब वैदिक शिरोमणि पुराण कर्ता- पोसे प्रसङ्गवश वद तत् स्यानोंमें उदाहृत प्रकृति पुरुष प्रादिको प्रतिपादिका सांख्य- स्मृति पौर योगस्मृति जगत्कारण विषयमें दुर्बल होने के कारण त्याग दी गई हैं। तब अखिल शिष्टोंसे उपेक्षित कणाद प्रादि मत दुर्बल हैं, इनके त्यागके विषयमे तो फिर क्या कहना चाहिए ? ब्राह्म, पाय आदि पुराणोमें किसी प्रसङ्गवश कहीपर भी द्वषणुक मादि प्रक्रियाका उदाहरण नहीं है । किन्तु इसके विपरीत ‘हेतुकान्वकवृत्तीश्च' ( हेतु वादी मोर बक वृत्तिवालोंका तो वाणीमात्रसे भी उपचार नही करना चाहिए ) इस - भाषानुवादसहिता [म०२ पा० १ अधि०५] इति बहुशो निन्दोपलभ्यते। यस्तु न्यूनारभ्यत्वनियम उक्तः, नासो विवर्तवादेऽस्ति दूरस्थस्य पर्वतानस्थित महद्भिवृक्षरत्यल्पदूर्वानभ्रमस्य जन्यमान- त्वात् । यदपि-प्रभावपुर.सरत्वानुमानम्, तत्रापि साध्यविकलो दृष्टान्ता । सुषु- तेरवस्थास्वेवावस्थानादात्मनः सद्रूपस्यान्नीकरणीयत्वे सति स्वप्नस्याप्य- भावपुरःसरत्वाभावात् । तस्मात-एतैर्मतैर्नास्ति वाधः ॥४॥ (पञ्चमे द्वैतस्य मोक्तृभोग्याकारभासमानत्वापिकरणे सूत्रम् ) भोक्त्रापत्तेरविभागश्चेत्स्याल्लोकवत् ॥ १३ ॥ पश्चमाधिकरणमारचयति- अद्वैतं बाध्यते नो वा भोक्तृ मोग्यविभेदतः । प्रत्यक्षादिप्रमासिद्धो भेदोऽसावन्यबाधकः ॥ ६॥ तरङ्गफेनभेदेऽपि समुद्रेऽभेद इष्यते। भोक्तभोग्यविभेदेऽपि ब्रह्माद्वैतं तथाऽस्तु तत् ॥१०॥ समन्वयेनावगम्यमानमद्वेत प्रत्यक्षादिसिद्धेन भोक्तृभोग्यभेदेन बाध्यत इति चेन्न । तरनादिरूपेण भेदस्य समुद्ररूपेणाभेदस्य च दृष्टत्वेन भेदाभेदयोविरोधा- प्रकार बहुतसे निन्दावचन उपलब्ध होते हैं । यह जो कहा गया है कि कार्यद्रव्य अपनी प्रपेशा पल्प परिमाणवाले द्रव्यसे उत्पन्न होता है, यह नियम विवर्तवाद में नहीं है । क्योकि पर्वतके अग्रभागमे स्थित महान वृक्षोम दूरस्थ पुरुषको दुर्वाग्र भागका भ्रम होता है । जो प्रभाव पूर्वक जगदुत्पत्तिका अनुमान कहा गया है। वहापर भी साध्य शून्य दृष्टान्त है अर्थात् दृष्टान्तमें साध्य ही नहीं है । सुषुप्ति अवस्थामोमें अवस्थित सद्रूप मारमा को मङ्गीकार किया गया है, मतः स्वप्न भी प्रभाव पूर्वक नहीं है । इसलिए इन कणाद पादि मतोंसे घेद समन्वयका पाप नहीं है ।।४।। पञ्चम मधिकरणकी रचना करते हैं-- सन्देह-मोक्ता मोग्य आदि भेदसे प्रवत बाधित होता है मघवा नहीं? पूर्वपन–प्रत्यादि प्रमाणोसे मिद भेद अद्वतका बाधक है। सिद्धान्त-जैसे तरङ्ग फेन प्रादिमें परस्पर भेद होनेपर भी उनके साथ समुद्रका प्रभेद ही मभिप्रेत है, वैसे ही मोक्ता, मोग्य आदिमें परस्पर भेद होनेपर मो उनके साप मदत ब्रह्मका तो मभेद ही है। पूर्वपक्षी-वेदान्त समन्वयसे प्रतीयमान भटका प्रयक्षादि प्रमाणोंसे सिद्ध भोना भोग्य मादि भेद वाघ होता है ? मियादी-गेमा यदि को को छक रहीं है, क्योकि रङ्ग, नामादि रूपसे भेद ६७ [अ०२पा० १ अधि० ६] वैयासिकन्यायमाला भावात्। भेदाभेदविरोधव्यवहारस्याकारभेदेनापि रहितेऽत्यन्तमेकस्मिन्नपि वस्तुनि सावकाशत्वात् । तस्माद् ब्रह्माकारेणाद्वैतम् । भोक्सभोग्याकारेण द्वैतम्, इत्याकारभेदावयवस्था सिद्धो न कोऽपि बाधः ॥५॥ (पप्ठे ब्रह्मण्यद्वतस्यैव तात्विकत्वाधिकरणे सूत्राणि) तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः ॥१४॥ भावे चोपलब्धेः ॥१५॥ सत्त्वाच्चावरस्य ॥१६॥ असद्व्यपदेशान्नेति चेन्न धर्मान्तरेण वाक्यशेषात् ॥१७॥ युक्तेःशब्दान्तगच्च ॥१८।। पटवच्च ॥ १६॥ यथा च प्राणादि ।॥ २०॥ पठाधिकरणमारचयति- भेदाभेदो तात्त्विको स्तो यदि वा व्यावहारिको। समुद्रादाविव तयोर्वाधाभावेन तात्त्विको ॥ ११ ॥ वाधितौ श्रुतियुक्तिभ्यां तावतो व्यावहारिको। कार्यस्य कारणाभेदादद्वेतं ब्रह्म तात्त्विकम् ॥ १२ ॥ स्पष्टो संदेहपूर्वपक्षो। 'नेह नानाऽस्ति किंचन (बृह० ४।४।१६) इति धुति दं बाधते। युक्तिश्च परस्परोपमर्दात्मकयोर्भेदाभेदयोरेकत्रासंभवः । एकस्मिश्चन्द्रमसि द्वित्वासंभवात् । यदुक्त पूर्वाधिकरणे-पाकारभेदाढ़ेद इति । तदप्यसत् । अद्वैतवस्तुन्याकारभेदस्यैवाप्रतिपत्तेः । समुद्रादौ तु दृष्टत्वाद- समुद्ररूपसे प्रभेद देखनेसे भेद पौर प्रभेदमे विरोध नहीं है । भेदाभेद विरोष व्यवहार तो प्राकारभेदसे रहित केवल एक वस्तुमे भी सावकाश हो सकता है । इसलिए "ब्रह्म- रूपसे प्रत, भोक्तृ, भोग्यरूपसे ढंत है। इस प्रकार भाकारभेदसे व्यवस्था सिद्ध होने- पर मतका कोई बाध नहीं है ॥ ५॥ छठे प्रधिकरणी रचना करते हैं- सन्देह-कार्य और कारणमे भेद एवं अभेद पारमार्थिक है अथवा व्यावहारिक ? पूर्वपक्ष-जैसे समुद्र, तरङ्ग भादि भेद मोर अभेदमे स्पष्ट कोई विरोध नहीं है, वैसे ही उनका कही बाध न होनेके कारण दोनो पारमार्थिक हैं । सिद्धान्त--भेद और प्रभेद श्रुति और युक्तियोसे बाधित हैं, अत: दोनो व्यावहारिक हैं। कार्य कारणसे भिन्न नहीं है, इस लिए अद्वितीय ब्रह्म ही पारमार्थिक है । सन्देह मोर पूर्वपक्ष स्पष्ट हैं । 'नेह नानाऽस्ति०' (पद्वितीय ब्रह्ममे किंचदपि नानात्व नहीं है ) यह अति भेदका बाध करतो है । परस्पर उपमर्दात्मक-विरोधी भेद मोर मभेद एकत्र नही रह सकते हैं, यह युक्ति भी है, क्योकि एक चन्द्रमा कमी दो नही हो ७ १८ भाषानुवादसहिता [प्र०२ पा० १ अधि०६] भ्युपगम्यते। 'न हि दृष्टेऽनुपपन्न नाम' इति न्यायात् । प्रत्रापि ब्रह्माकार- जगदाकारी दृष्टो-इति चेत्, न । ब्रह्मणः शास्त्रकसमधिगम्यत्वात् । तस्मात्- श्रुतियुक्तिबाधितत्वाद्वयवहारिको भेदाभेदौ । कि तहि तत्त्वम्-इति चेत् । अद्वैतमेव तत्त्वम्, इति ब्रूमः। कार्यस्य कारणानतिरेकेण कारणमात्रस्य वस्तुत्वात् । तथा च श्रुतिमृत्तिकादिदृष्टान्तै: कारणस्यैव सत्यत्वं प्रतिपादयति- "यथा सोम्यकेन मृत्पण्डेिन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्यात् । वाचाऽरम्भणं विकारो नामधेयं मृतिकेत्येव सत्यम् । एवं सोम्य स आदेशः" ( छा० ६।१४) इति । अस्यायमर्थः-प्रौढो मृत्पिण्ड: कारणम् । तद्विकारो घटशरावादयः। तत्र मृतस्त्वन्यत्, घटादीनि चान्यानि वस्तूनि इति ताकिवा मन्यन्ते । तत्र घटादीनां पृथग्वस्तुत्वनिरासाय विकारशब्देन श्रुतिस्तान्युदाहरति । मृद्वस्तुनो विकाराः संस्थानविशेषा घटादयो न पृथग्वस्तुभूताः। यथा देवदत्तस्य बाल्ययौवन- स्थाविरादयस्तद्वत् । सति घटाद्याकारप्रतिभासदशायामपि मृन्मानं स्वतन्त्रं वस्तु। ततो मृद्यवगतायां घटादीना यत्तात्त्विक स्वरूपं तत्सर्वमवगतम् । । सकता, पूर्व अधिकरणमें जो यह कहा गया कि प्राकार भेदसे भेद है, वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अद्वितीय पदार्थमे आकार भेद नहीं हो सकता। समुद्र प्रादिमें तो दोनो देखे जाते हैं, मतः स्वीकार किया जाता है। क्योंकि 'नहि दृष्टेऽनुपपन्न नाम' (प्रत्यक्ष दृष्टमे कुछ भी अनुपपन्न नहीं है ) यह न्याय है। यदि कहो कि अद्वितीय वस्तुमें भी ब्रह्माकार और जगदाकार देखे जाते हैं, तो यह युक्त नहीं है, कारण कि ब्रह्म तो केवल एकमात्र शास्त्र से अधिगम्य है, प्रत्यक्ष दृष्ट नहीं है । इस कारण भेद और प्रभेद श्रुति पौर युक्तियोसे बाधित होने से पारमार्थिक नही हैं किन्तु व्यावहारिक हैं। तब तत्व क्या है ? ऐसा यदि कहो तो हम कहते हैं कि मद्वैत ही तत्त्व है, क्योकि कार्य कारण भिन्न नहीं हैं, इससे केवल कारण ही वस्तु सत् है । 'यथा सोम्यकेन.' (हे सोम्य ! जैसे एक मृतिका- पिण्इसे सब मृत्तिकाके विकार ज्ञात हो जाते हैं कि विकार केवल वाणीके पात्रयभूत नाममात्र हैं, सत्य तो केवल मृतिका ही है ) इस प्रकार मृतिकादि दृष्टान्तोसे कारणको ही सत्य प्रतिपादन करती है । इस श्रुतिका यह मर्थ है-वडा मृत्तिकापिण्ड कारण है, घट, शराव प्रादि उसके विकार-कार्य हैं । यहाँ मृत्तिका भिन्न है पौर घट पादि पदार्थ भिन्न हैं, ऐसा तार्किक मानते हैं । घट प्रादि पृषक पदार्थ हैं, इसका निराकरण करनेके लिए श्रुति विकारशब्दसे उनका उदाहरण देती है। मृद्वस्तुके विकार घटादि केवल मस्थान विशेष हैं पृथक् वस्तुभूत नहीं हैं। जैसे देवदत्तकी बाल्य, यौवन, वार्धक्य मादि प्रवस्याविरोष हैं । ऐमी स्थितिमे घटादिके प्राकारसे प्रतीत दशामें भी केवल मृत्तिका ही स्वतन्त्र पदार्थ है । इमलिए मृत्तिकाके अवगत होनेपर उमके विकारभूत घटादिका जो [म० २ पा० १ अधि०७ ] वैयासिकन्यायमाला प्राकारविशेषो न ज्ञायत इति चेत् । मा ज्ञायता नाम । तेषामवस्तुभूतानाम- जिज्ञासाहत्वात् । चक्षुप प्रतिभासमाना अपि विकारा निरूपिताः सन्तो मृद्वध- तिरेकेण न स्वरूपं किंचिल्लभन्ते। 'घटोऽयं, शरावोऽयम्' इति वानिष्पाद्य- नामधेयमानं लभन्ते। अतो निर्वस्तुकत्वे सस्युपलभ्यमानत्वरूपेण मिथ्यात्व- लक्षणेनोपेतत्वादसत्या विकारा: मृत्तिका तु विकारव्यतिरेकेणापि स्वरूपं लभत इति सत्या। तथा ब्रह्मोपदेशोऽवगन्तव्य.। ब्रह्मणि मृत्तिकान्यायस्य, जगति घटादिन्यायस्य योजयितुं शक्यत्वात् । तस्माज्जगतो ब्रह्माभेदादद्वैतं ब्रह्म तात्विकम् । एवंविधविधारशून्यानो पुरुषाणामापातदृष्टया वेदेनाभ्युपेताद्वि- तोयब्रह्मपतिपत्तेः प्रत्यक्षादिभिर्भदप्रतिपत्तेश्च सद्भावात्समुद्रतरनन्यायेन भेदा. भेदाववभासेते । तस्माद् व्यावहारिकाविति स्थितिः ॥ ६॥ ( सप्तमे परमेश्वरस्य हिताहितमागित्वाभावापिकरणे सूत्राणि ) इतरव्यपदेशाद्विताकरणादिदोषप्रसक्तिः ॥२१ । अधिकं तु भेदनिर्देशात् ।।२२।। अश्मादिषच्च तदनुपपत्ति. ॥२३॥ सप्तमाधिकरणमारचयति- हिता क्रियादि स्यान्नो वा जीवाभेदं प्रपश्यतः। जीवाहितक्रिया स्वार्था स्यादेपा नहि युज्यते ॥ १३ ॥ वात्त्विक स्वरूप है वह सर्व भवगत हो जाता है। यदि कहो कि माकार विशेष ज्ञात नहीं होता ? मत ज्ञात हो । वे विकार पवस्तुभूत हैं, मत. वे जिज्ञासाके योग्य भी नही है। चक्षु इन्द्रियसे भासित विकार निरुपित होते मी उनका मृत्तिकासे भिन्न किंचदपि स्वरूप उपलब्ध नहीं होता । 'यह घट है' 'यह शराव है' इस प्रकार केवल वागिन्द्रियमे उचार्यमाण नाम-मात्र प्राप्त करते । मतएव जो वास्तविक स्वरूप रहित हो मोर उपलभ्यमानरूप वाला हो वह मिथ्यात्व लक्षण युक्त होता है, इससे विकार मिप्या हैं। मृत्तिका तो विकारके विना भी स्वरूप प्राप्त करती है, इससे वह सत्य है। इस प्रकार ब्रह्मके विषयमें समझना चाहिए । क्योंकि मृत्तिका न्यायकी ब्रह्ममें पोर घटादि न्यायको जगदमें योजना हो सकती है। इसलिए जगत् ब्रह्मसे अभिन होने के कारण अद्वितीय ब्रह्म ही पारमायिक तत्त्व है। इस प्रकारके विचारोसे रहित पुरुषोके लिए पापात सा. धारण दृष्टिमे वेदमें प्रतिपादित अद्वितीय ब्रह्मका भी ज्ञान होता है, प्रत्यक्षादि प्रमाणोसे भेद भी प्रतीत होता है, इसलिए समुद्र तरङ्ग न्यायसे भेद मोर मभेद दोनों प्रतीत होते हैं । इमसे ये दोनों व्यावहारिक हैं यही वस्तु स्थिति है ।। ६॥ सप्तम अधिकरणकी रचना करते हैं- भाषानुवादसहिता [अ०२ पा० १ अधि०८] अवस्तु जीवसंसारस्तेन नास्ति मम क्षतिः। इति पश्यत ईशस्य न हिताहितभागिता ॥ १४ ॥ परमेश्वरो हि केषाचिज्जीवानां संसारसकाना वैराम्यदिकं हितं न निर्मि- मोतेऽहितं च नरकहेतुमधर्म निर्मिमीते। निर्मिमाणश्च स्वस्य जोवेरभेदं सर्वज्ञतया पश्यति । तस्मात्स्वस्यैव हिताकरणमहितकरणं च प्रसज्येयाताम् । एतच्च न युक्तम् । न हि प्रेक्षावान्कश्चित्स्वस्य हितं करोत्यहितं वा करोति । तस्माद्धिताकरणादिदोषः। इति प्राप्ते बम:-सर्वज्ञत्वादीश्वरो जीवसंसारस्य मिथ्यात्वं स्वस्य निर्लेपत्वं च पश्यति । अतो न हिताहितभाक्त्वदोपः॥ ७ ॥ (अष्टमेऽद्वितीयब्रह्मण एव नानाविधमृष्टिकर्तृत्वाधिकरणे सूत्रे ) उपसंहारदर्शनान्नेति चेन्न क्षीरवद्धि ॥ २४॥ देवादि. वदपि लोके ॥२५॥ अष्टमाधिकरणमारचयति- संदेह-जीवोसे अभेद देखनेवाले ईश्वरमे हिताकरण प्रादि दोष प्रसक्त होगे कि नहीं पूर्वपक्ष-जीवके अभिन्न होने से हिताकरण-अहितकरण मादि दोप ईश्वरके ही होंगे, परन्तु ऐमा होना युक्त नहीं है, इसलिए ईश्वरको जगत्का कारण मानना युक्त नहीं है। सिदान्त-जीवका संसार अवस्तु-मिथ्या है, उससे मेरी कोई हानि नही है, ऐसा जाननेवाले ईश्वरमें हिताकरण, अहितकरण दोप लागू नहीं होते। पूर्वपक्षी-परमेश्वर मंसारमे भासक्त कुछ जीवोके लिए वैराग्यादि हितका निर्माण नहीं करता और नरकके हेतुभूत अधर्म का निर्माण करता है, निर्माण करता हुआ भी सर्वज होने के कारण अपने से जीदोका प्रभेद देखता है। इससे अपनेमे ही हिताकरण मौर महितकरण प्रसक्त होगे, परन्तु मह युक्त नहीं है । ऐमा कोई भी बुद्धिदान नही है जो पपना ही हित न करे पोर अहित करे । इसलिए परमेश्वरमें हितावरणादि दोष प्रमत होंगे। सिद्धान्ती-ऐमा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-ईश्वर सर्वज्ञ होनेके कारण पौवके संसारको मिया मोर मरनेको निलेप देखता है । इसलिए ईश्वरमें हिताहितभागी दोष नहीं है ॥७॥ मटम प्रधिकरणकी रचना करते हैं-- [अ० २ पा० १ मधि० ८ ] वैयासिकन्यायमाला न संभवेत्संभवेद्वा सृष्टिरेकाद्वितीय... नानाजातीपकार्याणां क्रमाज्जन्म न संभव ॥ १५॥ अद्वैतं तत्वतो ब्रह्म तच्चाविद्यासहायवत् । नानाकार्यकर कार्यक्रमोऽविद्यास्थशक्तिभिः॥१६॥ "एकमेवाद्वितीयम्" इति ब्रह्मणः स्वगतसजातीयविजातीय भेदैः शून्यत्व- मवगम्यते । स्रष्टव्यानि चाकरावाय्वग्न्यादीनि विचित्राणि। नाविचित्रे कारणे कार्यवैचित्र्यं युक्तम् । अन्यथैकस्मादेव क्षीराषितैलाद्यनेकविचित्रकार्यप्रसङ्गात् । कमश्चाऽकाशादीना श्रुत्याऽवगम्यते। न च तस्य व्यवस्थापकं किंचिदस्ति। तस्मादनेककार्याणां क्रमेण जन्माद्वितीयब्रह्मणो न संभवति । इति प्राप्ते ब्रूमः-यद्यपि तत्वतो ब्रह्माद्वैतम्, तथाप्यविद्यासहायोपेतमिति श्रुतियुक्त्यनुमवैरवगम्यते "मायां तु प्रकृति विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्" इति श्रुतेः। मायैवाविद्या। उभयोरप्यनिर्वचनीयत्वलक्षणस्यैकत्वात् । न च मायाझोकारे देतापत्तिः । वास्तवस्य द्वितीयस्याभावात् । अत एकमपि ब्रह्मा- सन्देह-एक अद्वितीय ब्रह्मसे सृष्टि हो सकती है अथवा नहीं ? पूर्वपक्ष [-नाना जातीय-विविध कार्योंको क्रमसे उत्पत्ति एक अद्वितीय ब्रह्मसे नहीं हो सकती। सिद्धान्त-यद्यपि परमार्थतः ब्रह्म एक है, तथापि वह अविद्याकी सहायतासे नानाविध कार्योको उत्पन्न कर सकता है। अविद्याकी शक्तियोसे कार्यक्रमको व्यवस्था हो सकती है। पूर्वपक्षी-'एकमेवाद्वितीयम्' इस श्रुतिसे ब्रह्म स्वगत, सजातीय और विजातीय भेदोसे रहित प्रतीत होता है। मष्टव्य पदार्थ प्राकाश, वायु, अग्नि प्रादि तो विचित्र हैं। कारणके भविचित्र होनेपर कार्य विचित्र हो यह युक्त नही है। अन्यथा केवल एक दूधसे ही दधि, तैल मादि अनेक विचित्र कार्यका प्रसङ्ग होगा। भाकाश प्रादिका सृष्टिक्रम श्रुतिसे अवगत होता है। किन्तु उपक्रमका कोई व्यवस्थापक नही है । इसलिए मनेक कार्योको क्रमसे उत्पत्ति अद्वितीय ब्रह्मसे नही हो सकती। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं- यद्यपि परमार्थतः ब्रह्म एक है, तो भी 'माया तु' (मायाको प्रकृति जानो, महेश्वरको मायावो जानो ) इस प्रकार श्रुति, युक्ति और अनुमवसे ज्ञात होता है कि वह अविद्यारूपी सहायकसे युक्त है। माया ही प्रविद्या है । अनिर्वचनीयरूप लक्षण दोनोमें है, अतः दोनो एक ही हैं। मायाको मङ्गोकार करनेपर भी द्वैतको मापत्ति नहीं है, क्योकि वास्तविक द्वितीय पदार्य नहीं है।
१०२ HISH ताम०२पा०१ -०६ विद्यासहायवशातानाकार्यकरं भविष्यति । न च कार्यक्रमस्य व्यवस्थापका भावः । अविद्यागताना शक्तिविशेषाणा व्यवस्थापकत्वात् । तस्मादद्वितीयब्रह्मणो नानाकार्याणां क्रमेण सृष्टिः संभवति ॥८॥ (नवमे ब्रह्मणः परिणामिरवाधिकरणे सूत्राणि ) कृत्स्नप्रसक्तिनिरवयवत्वशब्दकोपो वा ॥ २६ ॥ श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात् ॥ २७॥ आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि ॥ २८ ॥ स्वपक्षदोपाच्च ॥ २६ ॥ नवमाधिकरणमारचति- न पुक्तो पुज्यते वाऽस्य परिणामो न पुज्यते । कााद्ब्रह्मानित्यताप्तेरंशात्सावयवं भवेत् ॥ १७ ॥ मायाभिर्बहुरूपत्वं न कान्निपि भागतः। युक्तोऽनवयवस्यापि परिणामोऽन मायिकः ॥१८॥ प्रारम्भरणाधिकरणे ( २।११६ ) कार्यकारणयोरभेदः प्रतिपादित: मतो न वैशेषिकवदारम्भवादो ब्रह्मवादिनोऽभिमतः। तस्मात्क्षी दधिन्यायेन परिणामोऽ- भ्युपगन्तव्यः। तत्र कि ब्रह्म कात्स्न्येन परिणमत उतैकदेशेन । नाऽऽद्यः, इसलिए ब्रह्म एक होते भी अविद्याको सहायतासे भनेक कार्यों को करनेवाला हो सकता है। कार्यक्रमके व्यवस्थापकका प्रभाव भी नहीं है, क्योकि अविद्यागत शक्तिविशेष ही कार्यक्रमका व्यवस्थापक है। इसलिये मद्वितीय ब्रह्मसे नानाकार्योको क्रमसे सृष्टि हो सकती है ॥ ८॥ नवम अधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह ब्रह्मका परिणाम होना युक्त है मथवा युक्त नही है। पूर्वपक्ष-यदि ब्रह्मका समूर्णरूपसे परिणाम हो तो ब्रह्म भनित्य हो जायगा, मोर यदि अंशतः परिणाम हो तो सावयव हो जायगा, इसलिए ब्रह्मका परिणाम युक्त नहीं है। सिद्धान्त-ब्रह्मकी माया शक्तियोसे बहुरूपता होती है, सम्पूर्णरूपसे प्रथवा अंश- रूपसे नहीं होती। निरवयव ब्रह्मका भो मायिक परिणाम युक्त ही है। पूर्वपक्षी-प्रारम्भाधिकरणमे कार्य और कारणका प्रभेद प्रतिपादित है, इसलिए घशेषिकके समान ब्रह्मवादीको मारम्भंवाद स्वीकृत नहीं है, अतः क्षीर-दधिन्यायसे परि- णाम स्वीकार करना चाहिए । यहापर क्या ब्रह्म सम्पूर्णरूपसे परिणत होता है अथवा एकदेशी ? प्रथम पक्ष ठीक नहीं है, क्योकि सम्पूर्णरूपमे परिणाम होनेपर ब्रह्म [म०२ पा० १ अधि० १० ] वैयासिकन्यायमाला मशेपपरिणामे ब्रह्मणः क्षोरवदनित्यत्वप्रसङ्गात् । द्वितीये सावयवत्वप्रसन्नः । सस्मान्न परिणाम.। इति प्राप्त व्रमः -'इन्द्रो .मायाभिः पुरूरूप ईयते' इति श्रुतेब्रह्मणो माया- शक्तिभिजगद्पपरिणामः। न त्वसौ वास्तवः । तेन कृत्स्नैकदेशविकल्पयो- नावावकाशः । तस्माधुज्यते परिणामः ॥६॥ ( दशमे ब्रह्मणोऽशरोरस्यद मायासद्भावाधिकरणे सूत्रे ) सर्वोपेता च तदर्शनात् ॥ ३०॥ विकरणत्वान्नेति चेत्तदुक्तम् ॥ ३१॥ दशमधिकरणमारचति- नाशरीरस्य मायाऽस्ति यदि वाऽस्ति न विद्यते। ये हि मायाविनो लोके ते सर्वेऽपि शरीरिणः ॥ १६ ॥ बाह्यहेतुमृते यद्वन्मायया कार्यकारिता। ऋतेऽपि दहं मायैवं ब्रह्मण्यस्तु प्रमाणतः॥ २० ॥ लोके मायाविनामैन्द्रजालिकाना शरीरित्वदर्शनादशरीरस्य ब्रह्मणो माया न संभवति। क्षीरके समान मनित्य हो जायगा, दूसरे पक्ष माननेपर सावयव हो जायगा। इसलिए ब्रह्मका परिणाम युक्त नहीं है। सिद्धान्ती-ऐमा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-'इन्द्रो मायाभिः पुरूरूप ईयते' परमेश्वर माया शक्तियोसे अनेक रूपवाला होता है ) इस श्रुतिसे प्रतीत होता है कि माया शक्तियोसे अनायास ही ब्रह्मका जगद्र पसे परिणाम होता है, यह परिणाम वास्तव से नहीं है । इससे सम्पूर्णरूपसे परिणामका वा एकदेशये परिणामका यहा भवकाश ही नही है । इसलिए ब्रह्मका एतादृश परिणाम.युक्त है ॥ ६ ॥ दशम अधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-शरीर रहित ब्रह्ममें माया है अथवा नही ? पूर्वपक्ष-लोकमे जितने मायावी ऐन्द्रजालिक हैं, वे सब शरीरधारी हैं । अतः शरोर रहित ब्रह्ममे माया नही रहती है। सिद्धान्त-जैसे बाह्य साधनोंके बिना भी ऐन्द्रजालिक मायासे विविध पदार्थोकी रचना कर लेते हैं, वैसे ही 'मायिनं तु महेश्वरम्' इस श्रुति प्रमाणसे शरीरके विना भो ब्रह्ममे माया हो सकती है। पूर्वपक्षी-लोकमे मायावी ऐन्द्रजालिकोमें शरीर युक्त दर्शन होनेसे माया हो सक- वी है, किन्तु शरीर रहित ब्रह्ममे मायाका संभव नहीं है।
१०४ भाषानुवादसहिता[प्र०२ पा० १ अधि० ११] इति प्राप्ते ब्रूमः-गृहादिनिर्मातॄणां स्वव्यतिरिक्कमृद्दारुतृणादिबाह्यसाधन- सापेक्षत्वदर्शनेऽप्येन्द्रजालिकस्य वाह्यसाधनने रपेक्ष्येण यथा गृहादिनिर्मातृत्वम्, तथा लौकिकमायाविनः शरीरसापेक्षत्वदर्शनेऽपि ब्रह्मणो मायासिद्धयर्थ तदपेक्षा मा भूत् । अथोच्येत-ऐन्द्रजालिकस्य बाह्यहेतुनेरपेक्ष्येण निर्मातृत्वे प्रत्यक्ष प्रमाणमस्ति, तहि ब्रह्मणोऽपि शरीरनैरपेक्ष्येण मायासद्भावे "मायिनं तु महेश्वरम्” इति ध्रुति: प्रमाणमस्तु ॥ १०॥ (एकादशै तृप्तस्यापि ब्रह्मण एव जगत्स्रष्टुत्वाधिकरणे सूत्रे ) न प्रयोजनवत्त्यात् ॥३२॥ लोकवत्तु लीलाकैवल्यम् ॥३३॥ एकादशाधिकरणमारचयति- तृप्तोऽस्रष्टाऽयवा स्रष्टा, न स्रष्टा फलवाञ्छने। अतृप्तिः स्यादवाच्छापामुन्मत्तनरतुल्यता ॥२१॥ लीलाश्वासवृथाचेष्टां अनुद्दिश्य फलं यतः। अनुन्मतेविरच्यन्ते तस्मात्तप्तस्तथा सृजेत् ।। २२ ।। 'प्रानन्दो ब्रह्म' (तै० ३१६) इति श्रुतेनित्यतृप्तः परमेश्वरः । तादृशस्य सृष्टि- सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं—यद्यपि गृह निर्माण करनेवालोंको अपनेसे अतिरिक्त मृत्तिका, लकडी, तृण प्रादि वाह्य साधनो की अपेक्षा देखी जाती है, वो भी ऐन्द्रजालिकको जैसे बाह्य माधनोकी अपेक्षाके विना गृह आदि निर्माण का देखा जाता है। लोकिक मायावी ऐन्द्रजालिकोको कार्य निर्माणमे शरीरको अपेक्षा देखने में पाती है, उसी प्रकार ब्रह्मको मायाको सिद्धिके लिए शरीरको मपेक्षा नहीं होती। यदि कहो कि ऐन्द्रजालिकको वाह्य साधनोको अपेक्षाके विना गृह निर्माण कर्तृत्वमे प्रत्यक्ष प्रमाण है, तो ब्रह्मको भी शरीरको अपेक्षाके विना मायाके सद्भावमे 'मायिन तु महेश्वरम्' यह अति प्रमाण है ॥१०॥ एकादश मधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-नित्य तृप्त ब्रह्म स्रष्टा है अथवा स्रष्टा नहीं है ? पूर्वपक्ष-ब्रह्म स्रष्टा नहीं है, क्योंकि फलको इच्छा होनेपर उसमें मतृप्ति हो जाय- गी, यदि फलको इच्छा न हो तो उसमे उन्मत्त नरतुल्यता हो जायगी। सिद्धान्त -जैसे लोला, श्वास प्रश्वास प्रादि फल शून्य चेष्टाएं फलोद्देश्य विना विवेकी लोगोसे भी की जाती हैं, वैसे हो नित्य तृप्त ब्रह्म भो किमी फलेच्छाके विना जगतकी सृष्टि करता है। पूर्वपक्षी-~'मानन्दो ब्रह्म' (ब्रह्म प्रानन्द वन है) इस प्रकार अतिसे यह प्रतीत - [म०२ पा० १ अधि० १२ ] वैयासिकन्यायमाला विषयायामिच्छायामभ्युपगम्यमानायां नित्यतृप्तिाहन्येत। अनभ्युपगम्य- मानायां त्वबुद्धिपूर्विका सृष्टिं विरचयत उन्मत्तनरतुल्यता प्रसज्येत् । इति प्राप्ते घूम.-बुद्धिमद्भिरेव राजादिभिरन्तरेण प्रयोजनं लीलया मृगयादिप्रवृत्तिः क्रियते । श्वासोच्छ्वासव्यवहारस्तु सार्वजनीनः । व्यर्थचेष्टाश्च बालकैः क्रियमारणा बहुशो दृश्यन्ते । तद्वन्नित्यतृप्तोऽपीश्वर: प्रयोजनमन्तरेणाप्य- नुन्मत्तः सन्नशेषं जगत्सृजते ॥ ११ ॥ (द्वादशे ब्रह्मणो वैपम्यनेण्याभावाधिकरणे सूत्राणि ) वैपम्यनैपुण्ये न सापेक्षात्यात्तथा हि दर्शयति ॥ ३४ ॥ न कर्माविभागादिति चेन्नानादित्वात् ॥ ३५ ॥ उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च ॥३६॥ द्वादशाधिकरणमारचयति- वैपम्याद्यापतेन्नो वा सुखदुःखे नृभेदतः। सृजन्विषम ईशः स्यान्निधूणश्चोपसंहरन् ॥ २३ ॥ प्राण्यनुष्ठिनधर्मादिमपेदयेश: प्रवर्तते । नातो वैषम्यनेघृण्ये मंसारस्तु न चाऽदिमान् ॥ २४ ॥ होता है कि परमेश्वर नित्य तृप्त है । ऐसे परमेश्वरमे सृष्टि विषयिणी इच्छा यदि मानी जाय, तो नित्यतृप्तिका व्याघात हो जायगा। यदि इच्छा न मानी जाय तो अबुद्धि पूर्वक सृष्टिकी रचना करते हुए ब्रह्ममे उन्दत नरतुल्यता प्रसक्त होगी। सिद्धान्नी--एमा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-बुद्धिशील राजा प्रादिको भी प्रयो- जनके विना लीला-क्रीडासे शिकार प्रादि करनेमे प्रवृत्ति देखी जाती है। श्वास-प्रश्वास व्यवहार तो सर्वलोक प्रसिद्ध है। बालको द्वारा बहुत की गई व्यर्थ चेष्टाएं देखी जाती हैं । उसीके समान नित्य तृप्त ईश्वर प्रयोजनके विना भी विवेकीकी तरह सम्पूर्ण जगत्की सुष्टि करता है ॥११॥ द्वादश मधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-ब्रह्ममें वैषम्य आदि दोषोकी प्रसक्ति होगी प्रयवा नहीं ? पूर्वपक्ष-मनुष्य मादिके भेदसे सुख-दुःख मादिकी सृष्टि करता हुमा ईश्वर विषम होगा और सबका संहार करता हुभा निघृण ( निर्दयो) होगा। सिद्धान्ती-प्राणियोद्वारा अनुष्ठित धर्म मादिको अपेक्षासे ईश्वर सष्टि प्रादि करनेमें प्रवृत्त होता है, इससे वैषम्य मौर नेप्य दोष नही हैं मोर संसार धनादि है। पूर्वपक्षी-ईश्वर देव प्रादिको अत्यन्त मुखी उत्पन्न करता है, पशु मादिको अत्यन्त भावानुवादसहिता [अ० २ पा० १ अधि० १२] . ईश्वरो देवादोनत्यन्तसुखिनः सृजति, पश्वादोनत्यन्तदुःखिनः, मनुष्यान्म- ध्यमान । एवं तारतम्येन पुरुषविशेषेषु सुखदुःखे सृजन्नीश्वरः कथं विषमो न स्यात् । कथं नोचेरप्यत्यन्तजुगुप्सितं देवतियंड्मनुष्याद्यशेषं जगदुपसंहरन्निघणो न भवेत् । तस्मात्-वैषम्यनेंघृष्ये प्रसज्येयाताम् । इति प्राप्ते घूमः न तावदीश्वरस्प वैषम्पप्रसन्नोऽस्ति । प्रारिपनामुत्तमम ध्यमाधमलक्षणवैषम्ये तत्तत्कमणामेव प्रयोजकत्वात् । न चैतावतेश्वरस्य स्वात- न्त्र्यहानिः। अन्तर्यामितया कर्माध्यक्षत्वात् । नन्वेवं सति घट्टकुटीप्रमातन्याय प्रापद्यते। ईश्वरे वैपम्यं परिहतुं कर्मणां वेपम्यहेतुत्वमुक्त्वा पुनरीश्वरस्य स्वातन्त्र्यसिद्धये तत्कर्मनियामवत्वेऽभ्युपगम्यमाने सत्यन्ततो गत्वेश्वरस्यैव वैषम्य. प्रसन्नात् । नायं दोषा। नियामकत्वं नाम तत्तद्वस्तुशक्तीनामव्यवस्थापरिहार- मात्रम् । शक्तयस्तु मायाशरीरभूताः । न तासामुत्पादक ईश्वरः । ततश्च स्वस्व- शक्तिवशात्कर्मणा वैषम्यहेतुत्वेऽपि न व्यवस्थापकस्येश्वरस्य वैषम्यप्रसङ्गः। दु:खी और मनुष्यको मध्य-सुख दुःख साधारण उत्पन्न करता है। इस प्रकार तारतम्यसे पुरुष विदोषोमे सुख दुःव उत्पन्न करता हुमा ईश्वर विषम कैसे नहीं होगा ? और नीचोंसे भी अत्यन्त जुगुप्मित-घृणित देव पशु-मनुष्य मादि सम्पूर्ण जगत्का संहार करता हुमा निए क्यो न होगा ? इसलिए ईश्वरमे विषमता और निघुणता-निर्दयता दोष प्रसक्त होंगे। सिद्धान्ती-ऐमा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-ईश्वरमें वैषम्य दोप प्रसक्त नहीं है, क्योकि प्राणियोंके उत्तम-मध्यम और अधम रूप वैपम्यमे उन उनके कर्म ही प्रयोजक हैं । इमसे ईश्वरको स्वतन्त्रता नष्ट नहीं होती, क्योकि वह अन्तर्यामी होनेसे कर्माध्यक्ष है। यदि ऐसा हो तो घट्टकुटोप्रभातन्याय प्रसक्त होगा क्योंकि ईश्वरमें वषम्य परिहार करनेके लिये कोको विषमताका हेतु कहकर पुनः ईश्वरको स्वतन्त्रताको सिसिके लिए उसे कर्म नियामक माननेसे अन्ततोगत्वा ईश्वरमें ही वैषम्य प्रसङ्ग होगा। यह दोष नहीं है, क्योकि नियामकत्वका अर्थ उन-उन वस्तु शक्तियोकी अव्यवस्थाका परिहारमात्र है। शक्तियां तो मायाके शरीरभूत हैं, उनका उत्पादक ईश्वर नहीं है। इसलिए अपनी अपनी शक्तिके वश कर्म वैपम्यके हेतु होनेपर भी उनके व्यवस्थापक ईश्वरमे पैपम्प प्रसङ्ग नहीं है। महार तो सुपूप्तिके समान दुखका कारण नहीं है । १. यथा घट्टे पर्वतीयविषममार्गे राजकरादातुः कस्यचिदाजपुरुषस्य कुटी वर्तते । तत्र करदानभयेन रात्री मार्गान्तरेण चलिनुस्य सार्थस्य मार्गभ्रान्त्या प्रभाते तवाऽs- गमन तदद।
[अ०२ पा० १ अधि० १३ ] वैयासिकन्यायमाला १०७ संहारस्य सुषुप्तिवदुःखाजनकत्वात् । प्रत्युत सर्वक्लेशनिवतंकत्वात्सघृणत्वमेव । नन्ववान्तरसृष्टिषु पूर्वपूर्वकर्मापेक्षया सृजत ईश्वरस्य वैषम्याभावेऽपि प्रथम- सृष्टी पूर्वकर्मासंभवाद्वैषम्यदोषस्तदवस्थ इति चेत्, न। सृष्टिपरम्पराया प्रनादि- त्वात् । 'नान्तो न चाऽदिः'। (गीता १५॥३) इत्यादिशात्रात् । तस्मान कोऽपि दोषः ॥ १२॥ (त्रयोदशे निर्गुणस्यापि ब्रह्मणः प्रकृतित्वाधिकरणे सूत्रम् ) सर्वधर्मोपपत्तेश्च ॥३७॥ प्रयोदशाधिकरणमारचयति- नास्ति प्रकृतिता यद्वा निगुणस्यास्ति नास्ति सा। मृदादेः सगुणस्यैव प्रकृतित्वोपलम्भनात् ॥ २५ ॥ भ्रमाधिष्ठानताऽस्माभिः प्रकृतित्वमुपेयते। निर्गुणेऽप्यस्ति जात्यादी सा ब्रह्म प्रकृतिस्ततः ।। २६ ॥ प्रकृतित्वं नाम कार्याकारेण विक्रियमारणत्वम् । तच्च लोके सगुण एव मृदादावुपलब्धम् । ततो न निगुणस्य ब्रह्मणः प्रकृतिता। इति प्राप्त ब्रमः-यद्यपि 'प्रक्रियते विक्रियतेऽनयेति प्रकृतिः' इति व्युत्पत्त्या विक्रियमाणत्वं प्रतीयते । तथाऽपि तद्विक्रियमाणत्वं द्वेधा संभवति-क्षीरादि- किन्तु उसके विपरीत सब क्लेशोका निवर्तक होनेसे दयालु ही है । ऐसा यदि कहो कि मवान्तर सष्टियोमे पूर्व पूर्व कर्मकी अपेक्षासे सृष्टि करते हुए ईश्वरमे वैषम्य न होनेपर भी प्रथम सृष्टिमे पूर्व कर्मके प्रसंभव होनेसे वैषम्य दोप ज्योका त्यो है ? तो यह कथन युक्त नहीं है, क्योकि सृष्टि परम्परा अनादि है । इसमे 'नान्तो न चादिः'' (न इसका मन्त है मौर न प्रादि है ) इत्यादि स्मृति प्रमाण है। इससे ईश्वरमे कोई दोष नही है ॥१२॥ त्रयोदश भधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-निर्गुण प्रकृति उपादान कारण हो सकता है अथवा नहीं ? पूर्वपक्ष-लोकमें मृत्तिका मादि सगुण ही उपादान कारण उपलब्ध होते हैं, मतएव निर्गुण उपादान कारण नहीं हो सकता है। सिद्धान्त-हम भ्रमके मधिष्ठानको प्रवृति मानते हैं। निर्गुण जाति आदि भी प्रकृति हैं । इमसे ब्रह्म प्रकृति हो सकता है। पूर्वपक्षी-कार्यके आकारसे विवृत-परिणत होने वाली वस्तु प्रकृति है, लोकमे सगुण मृतिका प्रादिमे ही प्रवृतित्व उपलब्ध है, इसलिए निर्गुण ब्रह्म प्रकृति नहीं है। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होने पर हम कहते है यद्यपि 'प्रक्रियते विक्रियतेजया'
भाषानुवादसहिता [प्र०२ पा० १ अधि० १३]
वत्परिणामित्वेन वा, रज्ज्वादिवभ्रमाघिष्ठानत्वेन वा। तत्र निगुणस्य
परिणामित्वासंभवेऽपि भ्रमाधिष्ठानस्वमस्तु ! दृश्यते तु निगुणे जात्यादी
भ्रमाधिष्ठानता । मलिनब्रह्मणं दृष्ट्वा 'शूद्रोऽयम्' इति भ्रान्तव्यवहारदर्शनात् ।
तस्मानिर्गुणमपि ब्रह्म प्रकृतिरिति सिद्धम् ॥ १३ ॥
इति श्रीभारतातीर्थमुनिप्रणोताया वैयासिकन्यायमालायां
द्वितीयाध्यायस्य प्रथमः पादः ।।१॥
मादितः
अधिकरणानि
३
५३
सूत्राणि
३७
१७२
पत्र पादे
"जिमसे प्रकृत-परिणत अथवा विकृत किया जाय' इम व्युत्पत्तिसे कार्याकारसे प्रकृत-
परिणत होनेवाली वस्तु हो प्रकृति प्रतीत होती है, तो भी वह विकृत होना दो प्रकार
से संभव है। दूध प्रादि दही प्रादिके रूपमे परिणत होने के समान अथवा रज्जु प्रादि
सर्प आदि भ्रमके अधिष्ठान होनेके समान । यहाँ पर यद्यपि निर्गुण ब्रह्म परिणामी
मही हो सकता, तो भी भ्रमका अधिष्ठान तो हो ही मकता है। निर्गुण आति प्रादि
भ्रमके अधिष्ठान देखे जाते हैं। क्योकि मलिन ब्राह्मणको देखकर 'यह शुद्र है' ऐसा
भ्रमात्मक व्यवहार देसा जाता है। इससे निगुण ब्रह्म भी प्रकृति है यह सिद्ध हुमा ॥१३॥
इति श्री भारतीतीर्य मुनि-प्रणोत वैयासिकन्यायमालाके द्वितीयाध्यायके प्रथम
पादका 'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती' कृत भाषानुवाद ॥१॥
. म०२ पा०२ अधि० १] वैयासिवन्यायमाला १०६ अथ द्वितीयाध्यायस्य द्वितीय पाद (भत्र पादे सांख्यादिमताना दुष्टत्वप्रदर्शनम् ) [ इस पादमे साख्य मादि मतोका दुष्टत्व प्रदर्शन है ] (प्रथमे प्रधानस्य जगद्धेतुत्वाभावाधिकरणे सूत्राणि )। रचनानुपपत्तेश्च नानुमानम् ॥१॥ प्रवृत्तेश्च ॥२॥ पयोम्बुवच्चेत्तत्रापि ॥३॥ व्यतिरेकानवस्थितेश्वानपेक्ष- त्वात् ॥ ४ ॥ अन्यनाभावाच न तृणादिवत् ॥५॥ अभ्युपगमेऽप्यर्थाभावात् ।। ६॥ पुरुपाश्मवदिति चेत्त. थाऽपि ॥ ७ ॥ अङ्गित्वानुपपत्तेश्च ॥८॥अन्यथाऽ नुमितौ च प्रशक्तिवियोगात् ॥ ६॥ विप्रतिषेधाचासम- असम् ॥१०॥ द्वितीयपादस्य प्रथमाधिकरणमारचयति- प्रधान जगतो हेतुनं वा सर्वे घटादया। अन्विता सुखदु खाद्यैर्यतो हेतुरतो भवेत् ॥ १॥ हेतुर्योग्यरचनाप्रवृत्त्यादेरसभवात् । सुखाद्या प्रान्तरा बाद्या घटाद्यास्तु कुतोऽन्वय ॥२॥ सुखदु खमोहात्मकं प्रधान जगत प्रकृति । जगति सुखाद्यन्वयदर्शनात् । घटपटादय उपलभ्यमानाः सुखाय भवन्ति । उदकाहरणप्रावरणादिकारित्वात् । द्विदीय पादके प्रथम मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह- -प्रधान जगदका हेतु है अथवा नहीं ? पूर्वपक्ष-पट, पट पादि सब पदार्थ सुख-दुःख और मोहसे युक्त हैं, प्रत ज्ञात सुख-दुख मोहात्मक प्रधान जगतका हेतु है। सिद्धान्त-विचित्र जगत्की रचना और उसमें प्रवृत्तिका सभव न होनेसे अचेतन प्रधान जगदका हेतु नहीं है । सुख दुख मादि प्रातर हैं और घट, पट मादि बाह्य हैं, मतः घट, पट प्रादि सुख दुःख मौर मोहसे युक्त कैसे हो सकते हैं । सांख्य-सुख, दुख मोहात्मक प्रधान जगदका उपादान कारण है, क्योकि जगत्में सब पदार्य सुख, दुख मादि युक्त दिखाई देते हैं । प्राप्त हुए घट, पट मादि पदार्थ मुखके लिए होते है अर्थाद उनसे सुख होता है। क्योकि उनसे जललाना, शरीर न होता है भाषानुवादसहित [अ०२ पा०२ अधिः १] त एव घटादयोऽन्यैरपहियमाणास्तस्यैव दुःखजनकाः । यदोदकाहरणादिकार्य नापेक्षितं तदा सुखदुःखे न जनयन्ति, केवलमुपेक्षणीयत्वेनावतिष्ठन्ते । तदिदमुपे. क्षाविषयत्वं मोहः । 'मुह वैचित्ये' इति घातोमोहशब्दनिष्पतरुपेक्षणीयेषु चित्तवृत्त्यनुदयात् । अतः सुखदुःखमोहान्वयदर्शनात् 'प्रधान प्रकृतिः' इति सांख्या मन्यन्ते। इति प्राप्ते ब्रूमः-न प्रधानं जगहेतुः । देहन्द्रियमहीधरादिरूपस्य विचित्रस्य प्रतिनियतनानासनिवेशविशेषस्य जगतो रचनायामचेतनस्य प्रधानस्य योग्य- त्वासंभवात् । लोके हि प्रतिनियतकार्यस्य विचित्रनानाप्रासादादेरातिबुद्धि- मत्कनुकत्वोपलम्भात् । मास्तां तावदियं रचना, तत्सिद्धी प्रवृत्तिरपि नाचे. तनस्योपपद्यते । चेतनानषिष्ठिते शकटादौ तददर्शनात् । अथ पुरुषस्य चेतनस्य प्रकृत्यधिष्ठातृत्वमभ्युपगम्येत तहि असनत्वं पुरुषस्य होयेत इत्यपसिद्धान्ता- पत्तिः। यदुक्तम्-सुखदुःखमोहान्विता घटादय इति, तदसत्। सुखादीन मान्तर- त्वाद्धटादीनां वाह्यत्वात् । तस्मान्न प्रधानं जगहेतुः ॥ १॥ (द्वितीये ब्रह्मणो विसदृशजगदुत्पत्तो काणादीयदृष्टान्तसद्भावाधिकरणे सूत्रम् )। महहीर्घवद्वा हस्वपरिमण्डलाभ्याम् ।। ११ ॥ पाच्छादन प्रादि कार्य होते हैं । जब उन्हीं घटादिको कोई चुरा ले जाता है तब उसीको दुःख देते हैं। जिसे जल लाना आदि कार्योकी अपेक्षा नहीं है तब उसे सुख-दुःख उत्पन्न नहीं करते, किन्तु केवल उपेक्षणीयरूपसे स्थित रहते हैं । यह उपेक्षाका विषय हो मोह है । 'मुह वैचित्ये' वैचित्यार्थक मुह धातुसे मोह शब्दको निष्पत्ति हुई है। उपेक्षणीय वस्तुप्रोंमे चित्तको वृत्ति उदय नही होती। भतएव सब पदार्थ सुख, दुःख मौर मोहसे युक्त देखनेसे प्रधान जगत्का कारण है, ऐसा साध्य लोग मानते हैं। सिद्धान्तो---ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-प्रधान जगत्का हेतु नहीं है, क्योकि देह, इन्द्रिय, पर्वत मादि विचित्र मसाधारण विविध अनेक अवयव संघटन-विशेषोसे पुत जगतकी रचना करनेके लिए प्रधानमे योग्यता नहीं हो सकती । लोकमें भनेक विचित्र महल पादि प्रतिनियत कार्य के निर्माता प्रत्यन्त बुद्धिवान ही उपलब्ध होते हैं। इस प्रकारको रखना हो रहने दो, परन्तु उम रचनाकी सिद्धिके लिए प्रचेतनमे प्रवृत्ति भी उपपन्न नहीं होती, क्योंकि चेतनसे प्रतषिष्ठित गाड़ी पादिमें प्रवृत्ति नहीं देखी जाती है। यदि चेतन पुरुषको प्रधानका अधिष्ठाता स्वीकार करें तो पुरुषकी प्रमङ्गताको हानि होगी, इमसे तो पपसिद्धान्त प्रमक्त होगा। जो यह कहा गया है कि घट, पट पादि सुख-दुख मोहसे युक्त हैं, यह ठीक नहीं है, क्योंकि सुख-दुःख भादि मान्तर है पोर घट, पट पारि वाहा है। इससे प्रधान जगदका हेतु नहीं है ॥ १ ॥ वे [म०२ पा० २ अधि०२] वैयासिकन्यायमाला द्वितीयाधिकरणमारचयति- नास्ति कारणाददृष्टान्तः किंवाऽस्त्यसदृशोद्भवे । नास्ति शुक्लपट: शुक्लात्तन्तोरेव हि जायते ॥३॥ अणु द्वषणुकमुत्पन्नमनणोः परिमण्डलाद । प्रदीर्घावधणुकाद्दोघं त्र्यणुकं तन्निदर्शनम् ॥ ४ ॥ पूर्वस्मिन्पादे चेतनाद्ब्रह्मणो विलक्षणमचेतनं जगजायत इत्यत्र सांख्या- न्प्रति लोकसिद्ध गोमयवृश्चिकादिनिदर्शनमभिहितम् । तावता सांख्यैः क्रियमाण- स्याऽक्षेपस्य परिहतत्वात्स्वपक्षसाधनसंपन्नं परपक्षदूपणं चास्मिन्पादे प्रक्रम्य पूर्वाधिकरणे साख्यमतं दूषितम् । इत परं वैशेषिकारणां मतं दूषयितव्यम् । तन्मतस्य च प्रक्रियाबहुलत्वात्तद्वासनावासितः पुरुषस्तत्प्रक्रियासिद्धविलक्षणो- त्पत्तिदृष्टान्तमन्तरेण ब्रह्मकारणवादं न बहु मन्यते। अतो "विसदृशोत्पत्तो कारणादमतसिद्धो दृष्टान्तोऽस्ति न वा' इति विचार्यते । 'नास्ति' इति तावत्प्राप्तम् । यतः शुक्लः पटः शुक्लेभ्य एव तन्तुभ्यो जायते नतु रक्तेभ्यः । तस्मानास्ति । द्वितीय मधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह- -प्रसदृश उत्पत्तिमें कारणादमत सिद्ध दृष्टान्त है अथवा नहीं है ? पूर्वपक्ष-नहीं है, क्योकि शुक्लवस्त्र शुक्ल तन्तुप्रोसे उत्पन्न होता है। सिद्धान्त-पारिमाण्डल्य परिमाणवाले अरसुपरिमाणसे भी सूक्ष्म परिमाणवाले परमारणुप्रोसे भरगुपरिमाण घरगुक उत्पन होता है और अणुपरिमाणवाले द्वघरगुक्से महत्परिमाण व्यणुक उत्पन्न होता है, मतः असदृशको उत्पत्तिमें फाणादमत सिद्ध दृष्टान्त है। पूर्वपादमे चेतन ब्रह्मसे विलक्षण प्रचेतन जगत् उत्पन्न होता है, इस विषयमे माख्योके प्रति लोक प्रसिद्ध गोमय-गोबर और वृश्चिक-विच्छुका दृष्टान्स कहा गया है । उसीसे साख्योद्वारा किये गये प्राक्षेपका परिहार होनेपर भी स्वपक्ष साधन सम्पन्न पर- पक्ष दूषणका इस पादमें उपक्रमकर पूर्व अधिकरणमे साख्यमतको दूषित किया गया है। इमके अनन्तर वैशेषिकोका मत दूपरणीय है । वैशेषिक मतके क्रिया बहुल होने के कारण उसकी वासनासे वासित पुरुष उमकी प्रक्रियासे सिद्ध विलक्षण-विसदृश उत्पत्तिके दृष्टान्तके विना ब्रह्म कारणवादको भादर युक्त नही मानेगा। प्रतः विसदृश उत्पत्तिमे काणादमत मिद्ध दृष्टान्त है अथवा नहीं ? ऐसा विचार किया जाता है । पूर्वपक्षी-नहीं है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योकि सुबलपट शुक्ल तन्तुभोसे हो ११२ भाषानुवादसहिता [अ० २ पा० २ अधि० ३] - इति प्राप्ते ब्रूमः-अस्त्येव विसदृशोत्पतो दृष्टान्तः। तथा हि-परमारणवः पारिमाण्डल्यपरिमारणयुक्ताः, न त्वणुपरिमाणयुक्ताः, द्वाभ्यां च परमाणु: भ्यामणुपरिमाणरहिताभ्यामणुपरिमाणोपेतं द्वघणुकमुत्पद्यते । इदमेक निदर्शनम् । तथा ह्रस्वपरिमाणोपेतं दीर्घपरिमाणरहितं पणुकम् । तादृशेभ्यो विसदृशेभ्यस्त्रिभ्यो दूधणुकेभ्यो दीर्घपरिमारणोपेतमणुपरिमाणरहितं त्र्यणुक- मुत्पद्यते । इदमपरं निदर्शनम् । एवमन्यान्यपि तत्प्रक्रियासिद्धानि निदर्शनान्यु- दाहतंव्यानि ॥२॥ (मृतीये परमाणुकारणवादनिराकरणाधिकरणे सूत्राणि )। उभयथाऽपि न कर्मातस्तदभावः ॥ १२ ॥ समवायाभ्यु. पगमाच साम्यादनवस्थिते. ॥ १३ ॥ नित्यमेव च भावात् ॥ १४ ॥ रूपादिमत्त्वाच्च विपर्ययो दर्शनात् ।। १५ ।। उभयथा च दोपात् ॥ १६ ॥ अपरिग्रहाचात्यन्तमन- पेक्षा ॥ १७॥ मृतीयाधिकरणमारचयति- जनयन्ति जगन्नो वा संयुक्ताः परमाणव!। आद्यकर्मजसंयोगाड्यणुकादिक्रमाजनिः ॥५॥ उत्पन्न होता है, रक्त सन्तुषोंसे नहीं। इसमे प्रतीत होता है कि विसदृश उत्पत्ति, काणादमत सिद्ध दृष्टान्त नहीं है। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-दिसदृशकी उत्पत्तिमे दृष्टान्त है ही. जैसे कि परमारपु पारिमाण्डल्य परिमाणयुक्त है भरशु परिमाण युक्त नहीं है । मातु- परिमाण रहित दो परमाणुओंसे प्रस्तुपरिमाणयुक्त द्वयणुक उत्पन्न होता है। यह एक दृष्टान्त है । ह्रस्व परिमाणयुत्त द्वधरणुक दीर्घपरिमाण रहित है। इस प्रकारके तीन विसदृश द्वापरयुकोसे दीर्घपरिमाण युक्त अणुपरिमाण रहित श्यणुक उत्पन्न होता है । यह दूमरा दृष्टान्त है । इस प्रकार वैशेषिकोको प्रक्रियामै प्रसिद्ध मन्य दृष्टान्त भी उदाहरण- रूपसे देने चाहिए ॥२॥ तृतीय मधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-मयुक परमाणु जगत्को उत्पन्न करते हैं अथवा नहीं ? पूर्वपक्ष-सृष्टिके पूर्वमें माद्य कर्म बन्य मयोगसे युक्त परमासुमोसे परपुकादिके क्रमसे जगत्को उत्पत्ति होती है । सिद्धान्त-रह कर्म सनिमितक है अथवा मानिमित्तक है, इत्यादि विकल्पोंके होने [म०२ पा० २ अधि० ३] वैयासिकन्यायमाला मित्तं दृष्टम, सनिमित्तानिमित्तादिविकल्पेष्वाधकर्मणः । असंभवादसंयोगे नयन्ति न ते जगत् ॥ ६ ॥ प्रलीने पूर्वसिद्धे जगति यदा महेश्वरस्य विसृक्षा भवति तदा प्राणिकम- वशानिखलेषु परमाणुष्वाद्यं कर्मोत्पद्यते । तस्मात्कर्मण एक: परमाणुः परमाण्वन्तरेण संयुज्यते । तस्माच्च संयोगावयणुकमारभ्यते । तेभ्यषिभ्यो द्वपणुकेभ्यस्त्र्यणुकम्, इत्यादिक्रमेण जगदुत्पत्तो बाधकाभावात्संयुक्ताः परमाणवो जगन्ननयन्ति। इति प्राप्ने ब्रूमः-यदेतदाचं कर्म तग्निनिमित्तं सनिमित्तं वा । निनिमित्तत्वे नियामकाभावात्सर्वदा तदुत्पत्तो प्रलयेऽपि तत्प्रसङ्गः । सनिमितत्त्वेऽपि तन्नि- अदृष्ट वा। न तावदृष्टम् । प्रयत्नस्याभिघातस्य वा शरीरोत्पत्तेः प्रागसंभवाद। ईश्वरप्रयत्नस्य नित्यस्य कादाचित्काधकर्मोत्पत्ति प्रत्यनियामक- त्वात् । नाप्यदृष्टमाद्यकर्मनिमित्तम्। मात्मसमवेतस्यादृष्टस्य परमाणुभिर- संबन्धात्। अत एवमादिविकल्पप्रसरे सत्याद्यकर्मासंभवान्न परमाणुसंयोगो जायते । ततः 'संयुक्तेभ्यः परमाणुभ्यो जगन्जनिः' इति मतं दुरापास्तम् ॥३॥ पर भाद्य कर्मके भसंभव होनेसे संयोग न होनेपर संयुक्त परमाणु जगत्को उत्पत्ति नहीं कर सकते। पूर्वपक्षी-पूर्व सिद्ध जगत्के लीन होनेपर जब परमेश्वरको सृष्टि करनेकी इच्छा होती है, तब प्राणियोके कर्मवश सम्पूर्ण परमाणुनोमें प्राद्य कर्म उत्पन्न होता है। उस कर्मसे एक परमाणु अन्य परमाणुसे संयुक्त होता है। उम संयोगसे इधयुकका भारम्भ होता है, उन वीन घरगुकोसे एक त्र्यणुक उत्पन्न होता है, इत्यादि क्रमसे जगद की उत्पत्ति होने में बाधकके न होने के कारण संयुक्त परमाणु जगत्की उत्पत्ति करते हैं। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-जो यह माद्य कर्म है वह सनिमि- तक है अथवा प्रनिमित्तक है ? यदि मनिमित्त है तो नियामकके न होनेसे सदा उसकी उत्पत्ति होनेपर प्रलयमें भी जगदुत्पत्तिका प्रसङ्ग मायगा । यदि सनिमित्तक है तो वह निमित दृष्ट है अथवा अदृष्ट ? दृष्ट निमित्त तो हो ही नहीं सकता, क्यों कि प्रयल मथवा मभिघातका शरीरकी उत्पत्तिके पूर्व संभव नहीं है । ईश्वरका प्रयत्न नित्य है, अतः वह कादाचिल्क पाद्य कर्मकी उत्पत्तिके प्रति नियामक नहीं हो सकता। मदृष्ट भी माद्य कर्मका निमित नहीं है, क्योंकि भात्मामें समवाय सम्बन्धसे रहनेवाले महष्टका परमाणु- भोंके साथ सम्बन्ध ही नहीं हो सकता । इत्यादि विकल्पोंके प्रसर होनेपर पाद्य कर्मके संभव न होनेसे परमासुमोंका संयोग ही उत्पन्न नहीं होता। इसलिए संयुक्त परमाणु- मोसे जगत्को उत्पत्ति होती है, यह मत दूरसे ही मपास्त है ॥३॥ * ११४ भाषानुवादसहिता [अ०२ पा० २ मषि० ४] ७॥ (चतुर्थे वैनाशिकखण्डने समुदायासिद्धयधिकरणे सूत्राणि) समुदाय उभयहेतुकेऽपि तदप्राप्तिः ॥१८॥ इतरेतरप्रत्यय- त्वादिति चेन्नोत्पत्तिमानिमित्तत्वात् ॥१६॥ उत्तरो- त्पादे च पूर्वनिरोधात् ।। २० ।। असति प्रतिज्ञोपरोघो योगपद्यमन्यथा ॥ २१॥ प्रतिसंख्याप्रतिसंख्यानिरोधा- प्राप्तिरविच्छेदात् ॥ २२ ॥ उभयथा च दोपात् ।। २३ ।। आकाशे चाविशेषात् ॥ २४ ॥ अनुस्मृतेश्च ।। २५ ॥ नासतोऽदृष्टत्वात्।।२६उदासीनानामपि चैसिद्धिः॥२७॥ चतुर्थाधिकरणमारचयति- समुदायावुभौ युक्तावयुक्तो वाऽगुहेतुक । एकोऽपरा स्कन्धहेतुरित्येवं युज्यते द्वयम् स्थिरचेतनराहित्यात्स्वयं वाऽचेतनत्वतः । न स्कन्धानामधूना वा समुदायोऽत्र युज्यते ।।८।। बाह्यास्तित्ववादिनो बौद्धा मन्यन्ते-द्वौ समुदायौ बाह्य प्राभ्यन्तरश्चेति। तत्र बाह्यो भूनदीसमुद्रादिक ।प्रान्तरश्चित्तचैत्यात्मक.। तदेतत्समुदायद्वयमेवा- शेषं जगत् । तत्र बाह्यसमुदाये परमारणवः कारणम् । ते च परमाणवश्चतु- विधा-केचित्कठिनाकारा पार्थिवाख्या.। अपरे स्निग्धा आप्याः। मन्ये चोष्णास्तेजसाख्या । अन्ये चलनात्मका वायवीया । तेभ्यश्चतुविधेभ्यः चतुर्थ पपिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह १- बाह्य मोर पाम्यन्तर ये दो समुदाय युक्त हैं अथवा युक्त नहीं हैं । पूर्णपक्ष-एक परमाणु हेतुक समुदाय भौर दूसरा स्कन्यहेतुक समुदाय, इस प्रकार दोनो समुदाय युक्त है। सिद्धान्त-सघातकी उत्पत्तिमें निमित्तभूत स्थायी चेतनके न होने से पोर स्वयं प्रवेतन होनेसे स्कन्धों और परमाणुमोंका समुदाय होना युक्त नहीं है । बाल पदार्शस्तित्ववादी बौद्ध मानते हैं कि दो समुदाय हैं-बाह्य और माभ्यन्तर। उनमें से पृथिवी, नदी, समुद्र मादि बाघ समुदाय है, चित्त और चैत्यरूप मान्तर समुदाय है, ये दो समुदाय ही सारा जगत है। यहां बाह्य समुदायमें परमाणु कारण है। ये परमाणु चार प्रकार के हैं-उनमें कठिन माइदिवाले पार्थिव परमाणु कहलाते हैं । दूसरे स्निग्ध परमारतु जलीय हैं, अन्य उष्ण परमाणु वैजप्स हैं दूसरे पलनात्मक पर- माणु वायवीय है। युगपत् पुीभूत इन चार प्रकारके परमाणुषोसे बाह्य समुदाय [प्र०२ पा०२ अधि०५] वैयासिकन्यायमाला परमाणुभ्यो युगपत्पुञ्जीभूतेभ्यो बाह्यसमुदायो जायते । प्रान्तरस्य समुदायस्य स्कन्धपश्चकं कारणम् । रूपस्कन्धः, विज्ञानस्कन्धः, वेदनास्कन्धः, संज्ञास्कन्धः संस्कारस्कन्धश्चेति पनस्कन्धाः। तत्र चित्तेन निरूप्यमाणाः शब्दस्पर्शादयो रूपस्कन्धः । तदभिव्यक्तिविज्ञानस्कन्धः। तन्नन्यं दुःखं वेदनास्कन्धः। देवदत्तादि- नामधेयं संज्ञास्कन्धः। एतेषां वासनाः संस्कारस्कन्धः । तेभ्यः पञ्चभ्यः पुञ्जी- भूतेभ्य आन्तरसमुदायो जायते । तस्मात्-युज्यते समुदायद्वयम् । इति प्राप्ते ब्रूमः-किमणूनो स्कन्धानां च संघातोत्पत्ती निमित्तभूतश्चेत- नोऽन्योऽस्ति, किंवा स्वयमेव संहन्यते । प्राद्येऽपि चेतनः स्थायी, क्षणिको वा । स्थायित्वे-अपसिद्धान्तः।क्षणिकरवे प्रथमस्वयं लब्धात्मकः पश्चात्संघातोत्पत्ति करोतीति वक्तुमशक्यम् । द्वितीये तु-अचेतना: स्कन्धा प्रणवश्च नियामक चेतनमन्तरेण प्रतिनियताकारेण कथं संहन्यन्ताम्। तस्मान्न युक्तंसमुदायद्वयम्।४। (पञ्चमे विज्ञानवादनिराकरणाधिकरणे सूत्राणि )। नाभाव उपलब्धे ॥ २८ ॥ वैधाच न स्वप्नादिवत् ॥ २६ ॥ न भावोऽनुपलब्धेः ॥३०॥ क्षणिकत्वाच ॥३१॥ सर्वथाऽनुपपत्तेश्च ॥ ३२ ॥ पश्चमाधिकरणमारचयति- उत्पन्न होता है । प्रान्तर समुदायके पांच स्कन्ध कारण हैं। रूपस्कन्ध, विज्ञानस्कन्ध, वेदनास्कन्ध, मशास्कन्ध और संस्कारस्कन्ध इस प्रकार पाँच स्कन्ध हैं। उनमे चित्तसे निरूपित किये जानेवाले शब्द, स्पर्श प्रादि रूपस्कन्ध है, उनको अभिव्यक्ति विज्ञान- स्कन्ध है, उससे जन्य दुख वेदनास्कन्ध है, देवदत्त प्रादि नाम संज्ञास्कन्ध है और इन को वासना संस्कारस्कन्ध है । पुञ्जीभूत इन पांचोंसे प्रान्तर समुदाय उत्पन्न होता है। इससे दो समुदाय युक्त हैं। सिद्धान्त-ऐमा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं--प्रणुप्रोको पौर स्कन्धोकी संघा- तोत्पत्तिमें क्या निमित भूत चेतन पन्य है अथवा वे स्वयं ही संघीमूत होते हैं । माद्य विकल्पमें भी चेतन स्थायी है अथवा क्षणिक ? यदि उसे स्थायी मानो तो सिद्धान्तको हानि होगी, क्षणिक मानो तो पहले स्वयं प्रात्मलाभ कर पश्चात् संघातोत्पत्ति करता है, ऐमा नही कहा जा सकता है । दूसरे पक्षमें प्रचेतन स्कन्ध मोर परमाणु नियामक चेतनके विना प्रतिनियत माकारसे किस प्रकार संघीभूत होगे। इसलिये दो समुदाय युक्त नहीं हैं ॥ ४॥ पञ्चम मधिकरणकी रचना करते हैं- मापानुवादसहिता [अ०२ पा०२ प्रषि०५] विज्ञानस्कन्धमानत्वं युज्यते वा न युज्यते। युज्यते स्वप्नदृष्टान्ताबुद्धव व्यवहारतः ॥ ६ ॥ प्रवाधास्वप्नवैषम्यं वाह्यार्थस्तूपलभ्यते । बहिर्वदिति तेऽप्युक्ति तो धीरर्थरूपमाक् ॥ १० ॥ केचिौता बाझार्थमपलपन्तो विज्ञानमा सत्त्वमाः । न च तत्र व्यव. हारानुपपत्तिः। स्वप्ने वाह्याननपेक्ष्य केवलया बुद्धधा व्यवहारदर्शनात्तथैव जाग्रद्ध्यवहारस्याप्युपपत्तेः । तस्मात्--विज्ञानस्कन्धमात्रत्वं युज्यते । इति प्राप्ते ब्रूमः-विषमो हि स्वप्नदृष्टान्तः। प्रवीघदशायां स्वप्नस्य बाध्यमानत्वात् । जाग्रव्यवहारस्य च न क्वचिद्वाचं पश्यामः । न च वाहाप- सद्भावे प्रमाणाभावः, उपलब्वेरेव प्रमाएत्वात् । उपलभ्यन्ते हि घटादयो बहिष्ट वेन । अयोच्यैत-बुद्धिरेव वाह्यघटादिवदवभासते। तथा चाहः- घदन्त यतत्त्वं तदविंदवभासते' इति । एवं तहि त्वदुक्तिरेव वाहार्थसद्भावे प्रमाणमिति ब्रूमः । क्वचिदपि माह्यार्थाभावे तद्व्युत्पत्तिराहित्यात् 'बहिवंत' सन्देह-विज्ञानस्वन्धमानव युक्त है अथवा नहीं ? अर्थाद केवल विज्ञान ही है बाह्य पदार्थ नहीं है, विज्ञानवादी बौद्धका यह मत युक्त है अथवा युक्त नहीं है ? पूर्वपक्ष-स्वप्न दृष्टान्तसे केवल बुद्धिसे हो व्यवहार होता है, मत विज्ञानस्कन्ध- मात्रत्व युक्त है। सिद्धान्त-स्वप्नदृष्टान्त विषम है, क्योंकि जाप्रद व्यवहारका बाध नहीं होता और बास पदार्थ तो उपलब्ध होता है और 'बहिर्वत्' यह तुम्हारी उक्ति भी है, अतः वुद्धि पदार्यरूप नहीं है। कोई बौद्ध बाह्यार्थका पालाप करते हुए केवल विज्ञानमात्र ही तत्त्व कहते हैं । उसमें व्यवहारको अनुपपत्ति भी नहीं है। क्योकि जैसे स्वप्नमें बाह्यार्थको प्रपेक्षा न कर केवल बुद्धिसे व्यवहार दिखाई देता है, वैसे ही जान व्यवहारकी भी उपपत्ति होगी। इससे विज्ञानस्कन्धमात्रत्व युक्त है। [यह योगाचारका मत है ] सिद्धान्ती-ऐमा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं -स्वप्न दृष्टान्त दिपम है, क्योकि जापदवस्था, स्वप्न व्यवहारका बाघ होता है जापद् व्यवहारका कहीं पर भी हम बाघ नहीं देखते हैं । और बाह्यार्थके सद्भावमें प्रमाणका मभाव भी नहीं है, क्योकि उपलब्धि ही प्रमाण है 1 घट प्रादि पदार्य बाह्यरूपसे उपलव्य होते ही हैं। यदि कहो कि बुद्धि ही बाध घटादिके समान अवमामित होती है। क्योकि 'यदन्तशेयतत्त्वं (जो मान्तर जयतत्त्व है वह बाहके ममान अवभासित होता है ) ऐमा कहते हैं। ऐसी स्थिति में [अ०२ पा० २ प्रधि० ६ ] क्यासिकन्यायमाला इत्युपमानोतिनं संगच्छेत । तस्मात् बाह्यार्थसद्भावाद्विज्ञानमात्रत्वं न युक्तम् ॥५॥ (षष्ठे माहताना सप्तभङ्गीनिराकरणाधिकरणे सूत्राणि ) नैकस्मिन्नसंभवात् ॥३३॥ एवं चाऽऽत्माकात्य॑म् ।।३४॥ न च पर्यायादप्यविरोधो विकारादिभ्यः ॥ ३५ ॥ अन्त्यावस्थितेश्चोभयनित्यत्वादविशेषः ।। ३६ ॥ षष्ठाधिकरणमारचयति- सिद्धिः सप्तपदार्थाना सप्तभङ्गीनयान्न वा। साधकन्यायसद्भावात्तेपा सिद्धौ किमद्भूतम् ॥ ११ ॥ एकस्मिन्सदसत्त्वादिविरुद्धप्रतिपादनात् प्रपन्यायः सप्तभङ्गी न च जीवस्य सांशता॥ १२ ॥ आर्हता मन्यन्ते जीवोऽजीवश्चेति द्वौ पदार्थों । जीवश्चेतनः शरीरपरिमाणः सावयवः। अजीव षड्विधः। तत्र महीधरादिरेकः। प्रास्रवसंवरनिर्जरबन्ध- मोक्षाख्या पश्च। 'प्रास्रवत्यनेन जोवो विषयेषु' इत्यास्रव इन्द्रियसंघातः' । 'संवृणोति विवेकम्' इत्यविवेकादि संवरः। 'निशेपेण जीर्यत्यनेन काम- क्रोधादिः' इति केशोल्लुश्चनतप्तशिलारोहणादिकं तपो निर्जरः। कर्माष्टकेनाऽऽपा- तुम्हारी उक्ति ही वाह्यार्थके सद्भावमे प्रमाण है, ऐसा हम कहते हैं । बाह्यार्थ के प्रभावमें कहीपर भी उसकी व्युत्पत्तिके न होनेसे 'बहिर्वत्' यह उपमानोक्ति संगत नही होगी। इसलिए बाह्मार्थक सद्भाव होनेसे विज्ञानमात्रत्व युक्त नही है ॥ ५ ॥ पष्ठ अधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देश--सप्तमङ्गी नयसै सात पदार्थोंको सिद्धि होती है अथवा नहीं ? पूर्वपक्ष--मप्तभङ्गी रूप साधक न्यायके अस्तित्वसे सात पदार्थोंको सिद्धिमें माश्चर्य ही क्या है। सिद्धान्त--एक जीवरूप वस्तुमे सत्त्व और प्रमत्व प्रादि विरुद्ध धर्मोके प्रतिपा- दनसे सप्तभङ्गोरूप न्यायाभास है और जीवमे मावयवता नहीं है। पाहत लोग ऐसा मानते हैं-जीव और अजीव (जीव-भिन्न ) इस प्रकार दो पदार्थ हैं। उनमें जीव चेतन शरीरपरिमाणवाला और सावयव है तथा मजीव छ। प्रकारका है। उनमे पर्वत मादि एक है, एवं प्रास्रद, संवर, निर्जर, बन्ध भौर मोक्ष नामके पांच मौर हैं। जीव जिससे विषयोमे प्रवृत्त होता है, वह पासव-इन्द्रिय मपात है। विवेकको प्रावृत्त करनेवाले अविवेक पादि मंचर है। काम, कोष आदि जिमसे सर्वात्मना जीर्ण हो-केशोको नोचना, नप्त शिलापर प्रारोहण प्रादि तप " ११८ भाषानुवादसहिता [अ० २ पा० २ अधि०६] दिता जन्ममरणपरम्परा वन्धः । चत्वारी घातिकर्माणि पापविशेषरूपाणि। चत्वारि चापातिकर्माणि पुण्यविशेषरूपाणि। शाम्रोक्तोपायेन तेभ्योष्टभ्यः कर्मभ्यो विनिर्गतस्य जीवस्य सततोवंगमनं मोक्षः । त एते सप्त पदार्थाः सप्त मनोरूपेण न्यायेन व्यवस्थाप्यन्ते । स्यादस्ति, स्यान्नास्ति, स्यादस्ति च नास्ति च, स्यादवक्तध्यः, स्यादस्ति चावक्तव्यश्च, स्यान्नास्ति चावक्तव्यश्च, स्यादस्ति च नास्ति चावक्तव्यश्च, इति सप्तमङ्गीनयः । अयमर्थ:-स्याच्छब्द ईषदर्थवाची निपातः। प्रतिवादिनोऽपि चतुर्विधाः-सद्वादिनः, असद्वादिनः, सदसहादिनः, अनिर्वचनीयवादिनश्चेति । पुनरप्यनिर्वचनीयमते मिश्रितानि सदादिमतानीति त्रिविधा वादिनः। तानेता सप्तविघान्वादिनः प्रति सप्तविधान्यायाः प्रयोक्तव्याः। तद्यथा-सद्वादी समाग- निर्जर है । पाठ कौमे मंपादित जन्म-मरण परम्परा बन्ध है । पाप विशेषरूप चार घाती कर्म हैं और पुण्य विशेषरूप चार प्रघाती कर्म हैं। शास्त्रोक्त उपायसे उन माठ कर्मोसे निर्मुक्त जीवका सतत ऊर्ध्व गमन मोक्ष है। ये सात पादार्थ सप्तमङ्गोरूप न्यायसे व्यवस्थापित होते हैं। 'स्यादस्ति, स्यानास्ति, स्यादस्ति च नास्ति च, स्यादव- क्तव्यः, स्यादस्ति चावक्तव्यश्च, स्यानास्ति घावक्तव्यश्च, स्यादस्ति च नास्ति चावक्त- व्यश्व' (किमी प्रकारसे है, किसी प्रकार नहीं है, किसी प्रकारसे है भी और नही भी है, किमी प्रकारसे प्रवक्तव्य है, किसी प्रकारसे है भी और प्रवक्तव्य भी है, किसी प्रकारसे नहीं है और प्रवक्तव्य भी है, किसी प्रकारमे है, नहीं भी है और प्रवक्तव्य है ) इस प्रकार यह सप्तभङ्गी न्याय है । इसका अभिप्राय यह है कि 'स्याव' शब्द निपात है पोर इसका अर्थ 'कथंचिद' है । प्रतिवादी भी चार प्रकारके हैं--सद्वादी, प्रसद्वादी, सदसद्वादी और भनिर्वचनीयवादी । अनिर्वचनीयमतमें मिश्रित सदादि मत दोन प्रकारके हैं। उन सात प्रकारके वादियोके प्रति सात प्रकारके न्याय प्रयोग करने (ज्ञानावाणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय और प्रान्तर्य । तत्त्वज्ञानसे मुक्ति नही होती यह प्रथम, द्वितीय-प्राईततन्त्रके श्रवणसे मुक्ति नहीं होती, तृतीय- बहुत वीर्थकर प्रद- शित मोक्षमार्गो विशेषावधारणका न होना, चतुर्थ-मोक्षमार्गको प्रवृत्तिमे विघ्नकरण, ये चार श्रेयके घातक होनेके कारण घाती कर्म कहे जाते हैं) (वेदनीय, नामिक, गोत्रिक और प्रायुष्क । प्रथम मुझे ज्ञावन्य तत्त्व है ऐसा अभिमान, द्वितीय--मैं इस नामवाला है ऐसा अभिमान, तृतीय-मैं देशिक अहटके शिष्यवशमें प्रविष्ट हुमा हूं ऐसा अभिमान, चतुर्य-पारीर स्थिति के लिए कर्म करता। तत्वज्ञानके अनुकूल होने के कारण ये चार मघाती कर्म कहे जाते है ) इसका विशेष विस्तार ब्रह्मसूत्रशानुरभाष्यको 'सत्यानन्दी-दीपिका' मे द्रष्टव्य है।
- [अ० २ पा० २ अधि०७] वैयासिकन्यायमाला ११६ त्याऽहंत प्रति कि स्वन्मते मोक्षोऽस्ति' इति पृच्छति । तत्राऽहंत उत्तरं ब्रूते 'ईपदस्ति' इति । एवमन्यानपि वादिनः प्रति 'स्यान्नास्ति' इत्यादीन्यु- दाहर्तव्यानि । तावता वादिनः सर्वे निविण्णा: सन्तो नोत्तरं प्रतिपद्यन्ते । अतोऽस्य सप्तभन्नीरूपस्य साधकन्यायस्य सद्भावाज्जीवादीनां सप्तपदार्थानां सिद्धौ किमत्राऽऽश्वयंम् । इति प्राप्ते ब्रम:--सप्तभनोरूपोऽयमपन्यायः। एकस्य जीवपदार्थस्य सद्वादिनं प्रति सद्रूपत्वम्, असद्वादिनं प्रत्यसदूपत्वं च, इत्येवमादिविरुद्धधर्ममति- पादकत्वात् । न च जोवस्य मावयवत्वं युज्यते, अनित्यत्वप्रसन्नात् । तदनित्यत्वे च मोक्षः कस्य पुरुषार्थ: स्यात्। तस्मात्-न्यायाभासेन सप्त भग्याख्येन जीवादिपदार्थानां न सिद्धिः॥६॥ (सप्तमे तटस्थेश्वरवादनिराकरणाधिकरणे सूत्राणि) पत्युरसामञ्जस्यात् ।। ३७॥ संघन्धानुपपत्तेश्च ॥ ३८॥ अधिष्ठानानुपपत्तेश्च ।। ३६ ॥ फरणवच्चेन्न भोगादिभ्यः ॥४०॥ अन्तवत्त्वमसर्वज्ञता वा ।। ४१ ।। सप्तमाधिकरणमारचयि- तटस्थेश्वरवादोऽयं स युक्तोऽय न युज्यते । युक्तः कुलालहटान्तानियन्तृत्वस्य संभवात् ॥ १३ ॥ चाहिए। जैसे कि सद्वादी भाकर महतको पूछता है कि 'क्या तुम्हारे मतमें मोक्ष है ? तब महत उसका उत्तर कहते हैं-'स्यादस्ति' 'कथंचिद् है'। इस प्रकार अन्य वादियोके प्रति 'स्यान्नास्ति' इत्यादि न्यायोके उदाहरण देने चाहिए। इसीसे सब वादी लोग दुःखी होकर उत्तर नहीं पा मकते हैं । अतः इस सप्त भङ्गोरूप साधकन्यायके मस्तित्वमें जीव आदि सप्त पदार्थों की सिद्धिमे यहां पाश्चर्य ही क्या है। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-यह सप्तमङ्गो न्याय वस्तुतः यह न्याय नहीं किन्तु प्रपन्याय है। क्योकि एक जीवपदार्थको सद्वादीके प्रति मोर असद्वादीके प्रति भसद्रूप इत्यादि विरुद्ध धर्मों का प्रतिपादक है। जीवका सावयवत्व भी युक्त नहीं है, क्योकि जोवको सावयव माननेमे पनित्थत्व प्रसङ्ग होगा। उसके प्रनित्य होनेसे मोक्षरूप पुरुषार्थ किसको होगा ? इसलिए सप्तमङ्गो नामक न्यायाभाससे जीव भादि पदार्थोकी सिद्धि नहीं हो सकती ॥ ६ ॥ सप्तम मधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह -यह तटस्थ ईश्वर कारणवाद युक्त है अथवा युक्त नही है ? पूर्वपक्ष-कुंभकारके दृष्टान्तसे ईश्वरमे नियन्तृत्वके संमवसे युक्त है।
। - १२० भाषानुवादसहिता [अ०२ पा०२ अधि०५ न युक्तो विषमत्वादिदोपाद्वेदिक ईश्वरे । अभ्युपेते तटस्थत्वं त्याज्यं श्रुतिविरोधतः ॥ १४ ॥ पूर्वाध्यायस्योपान्त्याधिकरणे 'जगतो निमित्तमुपादानं चेश्वरः' इत्याग- मबलाद्यदुक्कम, तदेतदसहमानास्ताकिकाः शैवादयः केवलं निमित्तत्वमीश्वरस्य मन्यन्ते । युक्ति चाहु-यथा कुलालोऽनुपादानभूतो दण्डचक्रादीन्नियच्छन्कर्ता भवति, तथा तटस्थ ईश्वरः । इति प्राप्ते ब्रूमः-न युक्त केवलनिमित्तत्वम् । वेपम्यनेण्यदोषस्य दुष्परि- हरत्वात् । कथं तर्हि त्वया दोपः परिहृत इति चेत् । प्राणिकर्मसापेक्षत्वात्' इति ब्रूमः। तपारवे चागमोऽस्माकं प्रमाणम् । त्वयाऽप्यन्ततो गत्वाऽऽ गमश्चेदगीक्रियते, तर्हि तटस्थत्वमीश्वरस्य परित्याज्यं स्यात् । “बहु स्या प्रजायेय” इत्युपादानश्रुत्या विरोधात् । तस्मान्न युक्तस्तटस्थेश्वरवादः॥७॥ (प्रष्टमे जीवोत्पत्तिवादनिराकरणाधिकरणे सूत्राणि ) उत्पत्त्यसंभवात् ॥ ४२ ॥ न च कर्तुः करणम् ॥ ४३ ॥ विज्ञानादिभावे वा तदप्रतिषेधः ॥४४॥ विप्रतिषेधाच्च ॥ ४५ ॥ अष्टमाधिकरणमारचयति- सिद्धान्त -वेद प्रतिपादित ईश्वरमें विषमता प्रादि दोषोसे तटस्थ ईश्वर कारणवाद युक्त नहीं है और श्रुतिविरोषसे त्याज्य भी है। पूर्वाध्यायके उपान्ती अधिकरणमे – ईश्वर जगत्का निमित्त पोर उपादान कारण है । ऐसा जो शास्त्रबलसे कहा गया है। इस मतको न सहन करनेवाले ताकिक, शैव आदि ईश्वरको केवल निमित कारण मानते हैं । युक्ति भी कहते हैं-जैसे अनुपादान भूत कुलाल दण्ड मादिका नियमन करता हुमा घटादिके प्रति केवल कर्ता है, वैसे ही तटस्प ईश्वर अनुपादान होता हुमा का है। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-ईश्वर केवल निमित्त कारण युक्त नहीं है, क्योंकि वैषम्य मोर नधुण्य दोपोका परिहार दुष्कर है, तो तुमने उस दोषका परिहार कैसे किया ? ऐसा यदि कहो तो हम कहते हैं कि ईश्वर प्राणियो कोको अपेक्षा करता है ऐमा माननेमे हमको शास्त्र प्रमाण भी मिलता । अन्तोगत्वा यदि तुम भी शाग्नको मङ्गोकार करोगे तो ईश्वरमे तटस्थत्वका परित्याग करना पड़ेगा। कपोकि 'बहु वा प्रजायेय. (बहुत होऊ उत्पन्न होऊ) इस प्रकार ईश्वरको उपादान कारण कहनेवाली श्रुतिके साथ विरोध है । प्रतएव तटस्य ईश्वर कारणवाद युक्त नही है ॥७॥ अष्टम मधिकरणकी रचना करते हैं- - [म०२पा० २ अधि०८] वैयासिकन्यायमाला १२१ जीवोत्पत्त्यादिकं पञ्चरात्रोक्त युज्यते न वा। युक्त नारायणव्यूहतत्समाराधनादिवत् ॥ १५॥ युज्यतामविरुद्धांशो जीवोत्पत्तिनं युज्यते । उत्पन्नस्य विनाशित्वे कृतनाशादिदोषतः ॥ १६ ॥ पाश्चरात्रा भागवता मन्यन्ते-'भगवानेको वासुदेवो जगदुपादानं निमित्तं च। तत्समाराधनध्यानज्ञानेर्भवबन्धच्छेदः। तस्माच्च वासुदेवात्संकर्षणाख्यो जीवो जायते। जीवाच्च प्रद्युम्नाख्यं मनः । मनसश्चानिरुद्धाख्योऽहंकारः। त एते वासुदेवादयश्चत्वारो व्यूहाः सर्वात्मका इति । तत्र वासुदेवं तत्समाराधनादिकं च श्रुतेरविरोधादभ्युपगच्छामः। यत्तु जीव उत्पद्यते, इत्युक्तम् । तदसत् । कृतनाशाकृताभ्यागमप्रसङ्गात् । पूर्वसृष्टौ यो जीवस्तस्योत्पत्तिमत्त्वे प्रलयदशाया तस्मिन्विनष्टे सति तत्कृतधर्माधर्मयोरफल- प्रदत्वेन विनाशः प्रसज्येत । अस्मिश्च पल्प उत्पद्यमाननूतनजीवस्य धर्माधर्मयोः पूर्वमननुष्ठितयोः सतोरिह सुखदुःखप्राप्तिभंवतीत्यकृताभ्यागमः प्रसज्येत । तस्मा- ज्जीवोत्पत्त्यादिकं न युक्तम् ।।८।। सन्देह-पञ्चरात्रमे प्रतिपादित जीवकी उत्पत्ति प्रादि युक्त हैं पथवा नही ? पूर्वपक्ष-जैसे वासुदेव और उसकी प्राराधना युक्त है, वैसे ही जीवको उत्पत्ति मादि भी युक्त हैं। सिद्धान्त-विसे भविरुद्ध अंश वासुदेव और उसकी पाराधना तो भले युक्त हो, परन्तु जीवको उत्पत्ति युक्त नहीं है, क्योकि उत्पन्न पदार्थका विनाश होनेपर कृतनाश पौर प्रकृताम्यागम प्रादि दोष होगे। मागवत संप्रदायो पाञ्चरात्र मानते हैं-भगवान् वासुदेव एक है मौर वह जगत्का उपादान और निमित कारण है। संसार बन्धका नाश उसकी मारधना, ध्यान और शानसे होता है। उस वासुदेवसे संकर्षण नामक जीव उत्पन्न होता है, जीवसे प्रद्युम्न नामक मन, मनसे अनिरुद्ध नामक अहंकार उत्पन्न होता है। वे वासुदेवादि चार व्यूह सर्वात्मक हैं। सिद्धान्ती-उनमे वासुदेव और उसकी आराधना भादि श्रुतिसे अविरोधी होनेके कारण हम स्वीकार करते हैं। परन्तु जो यह कहा गया है कि जीव उत्पन्न होता है, वह ठीक नहीं है, क्योकि कृत कर्मका विना फल भोगे नाश और मवृत कर्मफल की प्राप्ति का प्रसङ्ग होगा । पूर्व दृष्टिमे जो जीव है उसको उत्पत्ति मानो तो 'जो उत्पन्न होता है वह विनाशी होता है। इस न्यायसे प्रलयदशामे उसका नाश होनेपर उसके द्वारा किये गये धर्माधर्मका फल दिये विना ही नाश प्रसक्त होगा। इस कल्पमै उत्पन्न हुए नदीन - १२२ भाषानुवादसहिता [अ० २ पा० ३ मधि० १] इति श्रीभारतीतीथमुनिप्रणीतायां वैयासिकन्यायमालायां द्वितीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥२॥ प्रत्रपादे पादितः प्रधिकरणानि सूत्राणि अथ द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः पादः (प्रथम भाकाशस्य ब्रह्मजन्यवाधिकरणे सूत्राणि ) न वियदश्रुतेः॥ १॥ अस्ति तु ॥२॥ गौश्यसंभवात् ॥ ३ ॥ शब्दाच्च ॥४॥ स्याच्चैकस्य ब्रह्मशब्दवत् ॥५॥ प्रतिज्ञाहानिरव्यतिरेकाच्छब्देभ्यः ॥ ६॥ यावद्विकारं तु विभागो लोकवत् ॥७॥ तृतीयपादस्य प्रथमाधिकरणमारचयति- व्योम नित्यं जायते वा हेतुत्रयविवर्जनात् । जनिश्रुतेश्च गौणत्वान्नित्यं व्योम न जायते ॥ १॥ जीवको पूर्वमें मनुष्ठित न हुए धर्माधर्मसे सुख-दुखरूपी फलकी प्राप्ति होगी, इस प्रकार भक्ताम्यागम दोष प्रसक्त होगा, इसलिए जीवको उत्पत्ति मादि युक्त नहीं हैं ॥८॥ इति श्रीमारतीतीर्यमुनि प्रणीत वयासिकन्यायमालाके द्वितीयाध्यायके रिसीय- पादका 'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती' पृत भाषानुवाद ॥ २॥ (पत्र पादे पचमहाभूठजीवादिश्रुतीना विरोधपरिहारः।) [ इस पादमें पाच महाभूत मोर पोवादि ऋतियोके विरोधका परिहार है ] तीसरे पादके प्रथम मधिकरकी रचना करते हैं- सन्देह 1-पाकाश निरय है अथवा उत्पन्न होता है ? पूर्वपस-उत्पत्ति अतिके गौण होनेसे फोर कारणत्रयका प्रभाव होनेसे माकाश नित्य है उत्पन्न नहीं होता।
म०२ पा० ३ मधि० १] वैयासिकन्यायमाला एकज्ञानात्सर्वबुद्धेविभक्तत्वाजनिश्रुतेः विवर्ते कारणैकत्वाद्ब्रह्मणो व्योम जायते ॥२॥ तैत्तिरीयके "तस्माद्वा एतस्मादात्मन प्राकाशः संभूतः (ते० २।१ ) इति श्रूयते । तत्राकाशं नित्यं न तु जन्मवत् । कुतः। आकाशोत्पादकस्य सम- वाय्यसमवायिनिमित्ताख्यकारणत्रितयस्य दुःसंपदत्वात् । 'संभूतः' इति जनि- श्रुतिस्तु संप्रतिपन्नब्रह्मकायंवद्व्योम्नि सत्ताश्रयत्वगुणयोगात्प्रवृत्ता। तस्मादना- द्यन्तं व्योम न जायते। इति प्राप्ते, व्रमः-एकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं तावदशेषेषु वेदान्तेपु डिण्डिमः । तच्च व्योम्नो ब्रह्मकार्यत्वे मृद्घटन्यायेन ब्रह्माध्यतिरेकादुपपादयितुं सुशकम्, नान्यथा। किंच 'पाकाशं जायते, विभक्तत्वात्. घटवत्'। नचायमसिद्धो हेतुः। वाग्वादिलक्षण्यस्याऽऽकाशे प्रसिद्धत्वात्। न च ब्रह्मण्यनेकान्तिकत्वम् । सर्वात्मकस्य ब्रह्मणा कस्माञ्चिदपि विभक्तत्वस्य दुर्भणत्वात् । जनिश्रुतिश्यो- त्पत्तिवादिन्यनुगृहीता भवति । यत्तु कारणत्रितयासंभव इत्युक्तम् । तदसत् । सिद्धान्ती--माकाश उत्पन्न होता है, क्योकि एकके विज्ञानसे सबका विज्ञान, विमक्तत्व, उत्पति प्रतिपादक श्रुति है, इसलिए विवर्तवादमे कारणैकत्व ब्रह्मसे आकाश उत्पन्न होता है। तैत्तिरीयकमे 'तस्माद्वा०' ( उस प्रात्मासे भाकाश उत्पन हुआ) ऐसी श्रुति है। यहाँ प्राकाश नित्य है, उत्पन्न नहीं होता। क्योंकि प्राकाशके उत्पादक समवायी, प्रसम- वायी पौर निमित्त नामके तीन कारणोका संपादन दुष्कर है । 'पाकाशः संभूतः' इसमे 'संभूतः' यह उत्पत्ति अति संप्राप्त ब्रह्मकार्य के समान आकाशमें भी सत्ताश्रयत्व गुणके योगसे प्रवृत्त हुई है । इसलिए माकाश मनादि, मनन्त है उत्पन्न नहीं होता। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-सम्पूर्ण वेदान्तोंमें यह प्रसिद्ध घोष है कि एकके विज्ञानसे सबका विज्ञान होता है । इसकी-एकके विज्ञानसे सबके विज्ञानको उपपत्ति, मृद्घटन्यायसे पाकाशको ब्रह्मका कार्य माना जाय तो मच्छी तरह हो सकती है, भन्यया उसकी उपपत्ति नही हो सकती है। इस विषयमे अनुमान भी हो सकता है । 'माकाश उत्पन्न होता है, विभक्त होनेसे, घटके समान ।' यह विभक्तत्व प्रसिद्ध हेतु नहीं है, क्योकि पाकाशमें वायु मादिका लक्षण्य प्रसिद्ध है । ब्रह्ममे अनेकान्तिकत्व व्यभिचार भी नहीं है, क्योकि सर्वात्मक ब्रह्मका कहींपर भी विभक्तत्व कथन दुष्कर है। उत्पत्ति प्रतिपादक संभूतः' यह उत्पत्ति शुति भी अनुगृहीत होती है । जो यह कहा गया है कि कारणत्रयके संभव न होनेसे प्राकाशको उत्पति नहीं हो सकती, यह भी ठीक नहीं है । यद्यपि मारम्भवादमे कारणत्रयको अपेक्षा है तो भी विवर्तवादमे उनकी १२४ भाषानुवादमहिना | म०२ पा०३ अपि०२] पारम्भवादे वितयापदायामपि पिवतंयादे तदनपेक्षस्यात् । तस्मात-एतेभ्यो हेतुभ्यो अमरगः पारणाव्योम जायते ॥१॥ (तीये पापोब्रह्मजन्यावापिपरणे गूत्रम् )। एतेन मातरिश्या व्याख्यात. ॥८॥ द्वितीयाधिकरणमारचयति- वायुनिस्यो जायते या घान्दोग्येऽजन्मोतनात् । सैपाउनस्तमिता देवतेत्युक्तेश्च न जायते ॥ ३ ॥ धृत्यन्तरोपसंहाराष्ट्रगीण्यनस्तमययुति. वियदज्जायते कायु: स्वरूपं प्रक्ष पारणम् ॥ ४ ॥ तैत्तिरीयक एव-"मानाशाद्वायु " इति ध्यते । सेपमुतात्तितिायो। छान्दोग्ये सृष्टिप्रकरणे तेजोयानानामेवोत्पत्तेरभिधानात् । ननु पचिदग्रवणमन्यत्र श्रुतं न वारयितुमुत्महते' इति न्यायेन तैत्तिरीयनुते फुतो गौग्गत्वमिति चेत् । 'पुरयन्तरदिरोपात्' इति म । बृहदारपवे-"सेपाऽनस्तमिता देवता यदायु पपेसा नहीं है। इसलिए एपके विज्ञानम सर्व विज्ञान, विभनन्य, उपरिघुति और विवर्तवादमें कारयजयको पनेपना, इन हेतुमासे कारण बने पाका उम्पन्न होता है ॥१॥ द्वितीय प्राधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-वायु नित्य है मथवा उनान होता है। पूर्वपक्ष-पान्दोग्योपनिषदमें वायुको उत्पत्ति न कहने से और वृहदारण्यक, 'मैपा- निस्तमिता देवता' (यह वायु पविनाशो देवता है ) इम कयनसे प्रतीत होता है कि पायु उत्पन्न नहीं होता है। सिद्धान्त-त्तिरीय अतिके वाक्पका धान्दोग अमहार करनेमे "मनस्तमय' मुख्य नहीं है, माकाशके ममान वायु उत्पन्न होता है। माकाशरूपापन्न ब्रह्म उसका कारण है। तैत्तिरीपको 'माकाशद्वायु (माकाशसे वायु उत्सान होता है) ऐमो युति है, परन्तु यह उत्पत्ति अति गौणो है। क्योंकि धान्दोग्यमें सष्टि प्रकरणमें तेज, पल भोर मन की उत्पत्तिका हो मभिधान है । यदि कहो कि कहींपर (छान्दोग्यमें वायुको उत्पत्तिका) मश्र- वण मन्यत्र तित्तिरीयमें) उत्पत्तिका निवारण नहीं कर सकवा, इम न्यायस तैत्तिरीय थुति कैसे गौण ? तो इसपर हम कहते हैं कि श्रुत्यनारसे विरोष है। वृहदारणकमे 'सैषा०' (जो वायु है वह भविनाशो देवता है ) यह श्रुति वायुकै विनाशका प्रतिपेप [प्र०२ पा० ३ अधि० ३] वैयासिकन्यायमाला १२५ ( १३२२२) इति वायोविनाशप्रतिषेधात् । उत्पत्तिमत्वे च तदयोगात् । तस्मान्न जायते वायुः। । इति प्राप्ते घूम:-छान्दोग्ये जन्माश्रवणेऽपि गुणोपसंहारन्यायेन ते- तिरोयवाक्यस्येतरत्रोपसंहारे सति श्रुतमेव च्छान्दोग्ये वायुजन्म । अनस्तमय- श्रुतिस्तु न मुख्या। उपासनाप्रकरणपठितत्वेन स्तुत्यर्थत्वात् । आकाशेत्पत्तिहे- तवश्वात्रानुसंधेयाः। न च वायोराकाशकार्यस्वेन ब्रह्मण्यनन्तर्मावाद्ब्रह्मज्ञानेन वायुज्ञानं न सिध्येदिति राङ्कनीयम् । पूर्वपूर्ववार्यविशिष्टस्य ब्रह्मण उत्तरोत्तरका- यहेतुत्वस्य वक्ष्यमाणतया वियद्रूपापन्नस्य ब्रह्मरण एव वायुकारणत्वात् । तस्माद्वायुर्जायते ॥२॥ (तृतीये सद्ब्रह्मणोऽजन्यत्साधिकरणे सूत्रम् ) असंभवस्तु सतोऽनुपपत्तेः ॥६॥ तृतीयाधिकरणमारचयति- सद्ब्रह्म जायते नो वा कारणत्वेन जायते । यत्कारणं जायते तद्वियद्वाय्वादयो यथा ॥५॥ करती है । यदि वायुको उत्पत्ति मानी जाय तो उक्त प्रतिषेव नही घटेगा। इससे वायु उत्पन्न नहीं होता। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-छान्दोग्यमें वायुके जन्मका श्रवण न होनेपर भी गुणोपसंहार न्यायसे तैत्तिरीयक वाक्यका छान्दोग्यमे उपसंहार करनेपर घान्दोग्यमें भी वायुका जन्म शुत ही है। वायुको प्रविनाशी कहनेवाली श्रुति मुख्य नहीं है, क्योंकि उपासना प्रकरणमे पठिन होनेके कारण वह स्तुत्यर्थक है। माकाशो- त्पत्तिके हेतुभोंका यहाँ अनुसंधान करना चाहिए-वायु माकाशका कार्य होने के कारण ब्रह्मके पन्तर्भाव न होनेसे ब्रह्मज्ञानसे वायुका ज्ञान सिद्ध नहीं होगा, ऐमी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योकि पूर्व-पूर्व कार्य विशिष्ट ब्रह्म उत्तरोतर कार्यका हेतु है, ऐसा मागे कहनेको इज्छासे प्राकाशापन्न ब्रह्म ही वायुका कारण है। इससे सिद्ध हुमा कि उत्पन्न होता है ॥२॥ तृतीय मधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-सद्ब्रह्म उत्पन्न होता है अथवा नहीं ? पूर्वपक्ष-सद प ब्रह्म कारण होने से उत्पन्न होता है, क्योकि जो कारण है वह उत्पन्न होता है, जैसे प्राकाश, वायु मादि कारण होते उत्पन्न होते हैं । सिद्धान्त--सद् प ब्रह्म उत्पन्न नहीं होता, क्योकि असत् सत्का कारण नहीं है, घायु १२६ भाषानुपादसहिता [म०२पा०३ प्रषि०४] असतोसारणत्वेन सादीना सत उमद्भवात् । ध्याप्तरजादिवाक्येन वाधात्सन्नव जायते ॥६॥ छान्दोग्ये--"सदेव सौम्येदमग्र मासीत्" ( पारा१) इति श्रूयते । 'तत्सद्रूपं ब्रह्म जन्मवद्भवितुमर्हति, वारणत्वात्, वियद्वत् । इति प्राप्से घूमः-सद्रूपं अझ न जायते। कुत-तज्जनयस्य वारणस्य दुनिरूपत्वात् । तथा हि-न तावदसवारणम्। 'क्थमसत. सज्जायेत' इति निषेधात् । नापि सदेव सत. वारणम् । प्रारमाश्रयापत्तेः । नापि वियदा दिकं सत. कारणम् । वियदादीना ततः सतो जायमानत्वात् । या तु व्याप्ति- 'यद्यत्कारण, तत्तज्जायते' इति, सा 'स वा एप महानज मात्मा (बृह० ४।४।२२) इति श्रुतिबाध्या, तस्मात्-सबहा नैव जायते ॥३॥ (चतुर्थे वेजसो ब्रह्मजन्यत्वाधिकरणे सूत्रम्)। तेजोऽतस्तथा शाह ॥१०॥ चतुर्षाधिकरणमारचयति- ब्रह्मणो जायते वहिर्वायोर्वा ब्रह्मसंधुतात् । तत्तेजोऽसृजतेत्युक्त ग्रंह्मणो नापतेऽनलः ॥७॥ माकाश मादिको सदमे उत्पत्ति होती है, जो कारण है वह उत्पन्न होता है' इस व्या सिका 'म वा एप महानजः' इस तिसे बाघ होता है। पूर्वपक्षी-छान्दोग्यमें-'सदेव' (हे मोम्य | उत्पत्तिके पहले यह सब सब ही या ) यह श्रुति है । 'यह सद्रूप ब्रह्म, जमवाला होना चाहिए, कारण होनेसे, पाकाशके समान" इस अनुमानसे ब्रह्म उत्पत्तिमान होगा। सिद्धान्ती-ऐमा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं- सद्रूप ब्रह्म उत्पन्न नहीं होता, क्योकि उसके कारणका निरूपण दुष्कर है। जैसे कि प्रसत् तो ब्रह्मका कारण नहीं है कारण कि अमत्से मत् कैसे उत्पन्न होगा। इस प्रकार निषेध है। सब ही पदका कारण नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसा मानने में भामाश्य दोष प्रसक्त होगा। पाकाश पादि भी मत्के कारण नहीं हैं, क्योंकि भाकाश पादि तो सबसे उत्पन्न होते हैं। 'जो जो कारण है वह वह उत्पन्न होता है। यह को व्याप्ति है, वह भी 'सवा एष' (यह महान पात्मा जमरहित है ) इस श्रुतिसे वापित है। इससे यह सदूप ब्रह्म उत्पन्न नही होता ॥३॥ चतुर्थ प्रधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-पग्नि ब्रह्मसे उत्पन्न होती है अथवा घायुरूपापन्न ब्रह्मसे । पूर्वपक्ष-'तत्तेजोऽसजत.' ( उसने तेजको उत्पन्न किया ) इस श्रुतिसे तो पग्नि हासे उत्पन्न होती ज्ञात होती है। सिद्ध हुमा [म०२ पा० ३ मधि०५] वैयासिकन्यायमाला १२७ वायोरग्निरिति श्रुत्या पूर्वश्रुत्यैकवाक्यतः । ब्रह्मणो वायुरूपत्वमापन्नादग्निसंभवः ॥ ८॥ छान्दोग्ये-"तत्तेजोऽसजत' इति तेजसो ब्रह्मजत्वं धूयते । तैत्तिरीयके- 'वायोरग्निः' इति वायुजत्वम् । तत्र 'वायोः' इति पञ्चम्या आनन्तर्यार्थस्यापि संभवात्केवलब्रह्मजन्यं तेजः। इति प्राप्ते वूम:-अनुवर्तमानेन संभूतशब्देनान्विताया 'वायोः' इति पञ्चम्या उपादानार्थत्वस्यैव मुख्यत्वात् । उभयोः श्रुत्योरेकवाक्यत्वे सति वायु- रूपापनाद्ब्रह्मणस्तेजो जायत इति लभ्यते ॥ ४॥ (पञ्चम प्रपां ब्रह्मजन्यत्वाधिकरणे सूत्रम् )। आपः॥११॥ पश्चमाधिकरणमारचयति- ब्रह्मणोऽपा जन्म किंवा पहनग्नेिलोद्भवः । विरुद्धत्वानीरजन्म ब्रह्मणः सर्वकारणात् ॥६ ।। सिद्धान्त-'वायोरग्निः०' (वायुसे अग्नि उत्पन्न होती है ) इम श्रुतिके साथ पुर्व श्रुतिकी एक वाक्यता होनेसे वायुरूपापन्न ब्रह्मसे मग्नि उत्पन्न होती है। पूर्वपक्षी-छान्दोग्यमें 'तत्तेजोऽसृजत०' ( उसने तेजकी सृष्टि की ) यह श्रुति अग्निको ब्रह्म जन्य कहती है, भौर तैत्तिरीयकमें 'वायोरग्निः' ( वायुसे भग्नि उत्पन्न हुई ) वायुसे अग्नि उत्पन्न हुई सुनी जाती है । 'वायोः' इस पञ्चमीका मर्थ मानन्तर्य भी हो सकता है पर्थात् वायुके अनन्तर पग्नि उत्पन्न होती है, इसलिए तेज केवल ब्रह्मसे जन्य है। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-अनुवर्तमान संभूत:' शब्दसे मन्वित 'वायोः' इस पञ्चमीका उपादानरुप ही मुख्य अर्थ है । दोनो श्रुतियोकी एक वाक्यता होनेपर वायुरूपापन्न ब्रह्मसे तेज उत्पन्न होता है, ऐसा अवगत होता है ॥४॥ पंचम प्रधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देहब्रह्मसे जलका जन्म है प्रथवा पग्निसे । पूर्वपक्ष-अग्निसे जल उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि दोनोंका परस्पर विरोष है, इसलिए सर्वकारण ब्रह्मसे जलका जन्म है । सिद्धान्ती-'प्रग्नेरापा (पग्निसे बलको उत्पत्ति है ) इस श्रुतिसे मग्निरूपापन्न महसे जलका जन्म है । सूक्ष्म पपश्चीकृत अग्नि मोर जलका परस्पर विरोध भी नहीं है। 'यद्यपि 'तदपोन्सजत०' ( उसने जसको सृष्टि की ) 'भग्नेरापः' (अग्निसे जब 1 ता भाषानुवादसहिता [ म०२ पा०३ प्रधि०६] प्रग्नेराप इति श्रुत्या ब्रह्मणो वहां पाधिकात् ।। अपां जनिविरोधस्तु सूक्ष्मयोर्नाग्निनीरयोः ॥ १०॥ यद्यपि तदपोऽसजत' (छा० घारा३ ) 'अग्नेराप' इत्युभयोरछान्दोग्य- तैत्तिरीययोस्तेजोजन्यत्वमेवापां श्रूयते तथाऽपि न तद्युक्तम् । निवरयं निवर्तकयो- रग्निजलयोविरुद्धयोनं हेतुहतुमाद्भाव इति पूर्वपक्षः । पञ्चीकृतयोदृश्यमानयोविरोघेऽप्यपश्चीकृतयोः श्रुत्येकसमधिगम्ययोविरोध- कल्पनायोगान् । संतापाधिक्ये स्वेदवृष्टय शवदर्शनाच्च । श्रुतिद्वयानुसारेण तेजो रूपापन्नाद्ब्रह्मणोऽपा जनिरिति सिद्धान्तः ॥ ५॥ (पठे पृथिवीमात्रस्पानशब्दवाच्यताधिकरणे सूत्रम्)। पृथिव्यधिकाररूपशब्दान्तरेभ्यः ॥ १२ ॥ षष्ठाधिकरणमारचयति- जन्तेति श्रुतमन्नं यवादिकम् । पृथिवी वा यवाद्येव लोकेऽन्नत्वप्रसिद्धितः ॥ ११ ॥ भूताधिकारात्कृष्णस्य रूपत्य घवणादपि । तथाद्भधा पृथिवीत्युक्तेरन्नं पृथ्व्यन्नहेतुतः ॥ १२ ॥ उत्पन्न होता है ) छान्दोग्य और वैत्तिरीय इन दोनो उपनिषदोंमें जल भग्निसे उत्पन्न हुप्रा, ऐसी श्रुति है । तो भी यह युक्त नहीं है। क्योकि नाश्य पौर माशकरूप परस्पर विरोधी पग्नि और जलका कार्य-कारणभाव नही हो सकता । यह पूर्वपक्ष है। पञ्चीकृत दृश्यमान अग्नि और जलमें परस्पर माश्य-नाशकरूप विरोध होनेपर भी अपञ्चीकृत केवल श्रुतिसे ज्ञात होनेवाले अग्नि और जलके विरोधकी कल्पना नहीं हो मकती है। एवं तापके पाधिक्यमे स्वेद और दृष्टिको उत्पत्ति देखी जाती है। इसलिए उक्त दो श्रुतियोंके अनुसार अग्निरूपापन्न ब्रह्मसे जलको उत्पत्ति होती है। यह सिद्धान्त है॥५॥ षष्ठ अधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-'ता अन्नमसजन्त' ( जलने अन्नको सृष्टि की ) इस श्रुतिमें पठित 'मन्न' शब्द पद पादिका वाचक है अथवा पृथिवीका ? पूर्वपक्ष–अन्न शब्द यव मादिका ही वाचक है, क्योकि लोकमे पवादिको ही भन्नरूपसे प्रसिद्धि है। सिद्धान्त-अन्न शब्द पृथिवीका ही वाचक है। क्योकि महाभूतोका प्रकरण है। कृष्णरूपका पवरण है, 'अदम्या पृथिवी' (जलसे पृथिवी उत्पन्न हुई ) ऐसी श्रुति है। .
- [म०२ पा० ३ अधि०७] वैयासिकन्यायमाला छान्दोग्ये-"ता अन्नमसजन्त" ( ६।२।४ ) इत्यद्भयोऽन्नस्य जन्म श्रूयते । तत्राग्नशब्दस्य लोकप्रसिद्धधा व्रीहियवादिकमर्थः । इति प्राप्ते ब्रूमः-पृथिव्यत्रानशब्दार्थः। पञ्चमहाभूतसृष्टेरधिकृतत्वात्। किंच 'यदग्ने रोहितं रूप' तेजसस्तद्रूपम्' यच्छुक्लं तदपाम्, यत्कृष्णं तदन्नस्य' (छा० ६।४।१ ) इति कृष्णरूप पृथिव्यां बहुलमुपलभ्यते, नतु व्रीहियवादो। तथा 'अद्भयः पृथिवी" इति तैत्तिरीयकश्रुत्येकवाक्यताबलादत्रान्नं पृथिवी। न चान्नशब्दस्य तत्र प्रवृत्त्यनुपपत्तिः। कार्यकारणयोरनपृथिव्योरभेदविवक्षया तदुपपत्तेः । तस्मादन्नं पृथिवी ॥ ६॥ (सप्तमै मोपाधिकब्रह्मण एव कार्यकारणत्वाधिकरणे सूत्रम् ) तदभिध्यानादेव तु तल्लिङ्गात्सः ॥ १३ ॥ सप्तमाधिकरणमारचयति- व्योमाद्या: कार्यकर्तारो ब्रह्म वा तदुपाधिकम् । व्योम्नो वायुर्वायुतोऽग्निरित्युक्तःखादिकता ।। १३ ॥ मौर पृथिवी अन्नको हेतु है-कार्य और कारणको अभेद विवक्षासे अन्न पृथिवी है, यह कथन युक्त है। पूर्वपक्षी-छान्दोग्यमे 'ता अन्नमसृजन्त.' ( जलने अनकी सृष्टि की ) इस श्रुति वाक्यमें जलमे मनका जन्म सुना जाता है ) यहां पर अन्न शब्दका अर्थ लोक-प्रसिद्धिप्से यव धान मादि है। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-यहाँ अन शब्दका प्रथं पृथिवी है, क्योकि महाभूतोकी सृष्टिका प्रकरण है। किंच 'यदग्ने रोहित०' (अग्निका जो रक्तरूप है वह तेजका रूप है, जो शुक्ल रूप है यह जानकर है, जो प्रारूप है वह भन्नका है ) यह श्रुति है । कृष्णरूप पृथिवीमे बहुधा उपलब्ध होता है, यव, घान प्रादिभे नही । तथा 'प्रया पृथिवी' इस तैत्तिरीयक श्रुतिके साथ एक वाक्यताके बलसे यहाँपर अन्न पृथिवी ही है। और अन्नशब्दकी पृथिवीमें प्रवृत्तिकी अनुपपत्ति भी नहीं है, क्योकि कार्य कारणरूप अन और पृथिवीको अभेद विवक्षापे वह-प्रवृत्ति हो सकती है । इसलिए अन्न पृथिवी है अर्थात् अन्नशब्दसे पृथिवी ही विवक्षित है ॥ ६ ॥ सप्तम अधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-माकाश प्रादि स्वयं ही कार्यके उत्पादक हैं अथवा आकाश आदि उपाधिक ब्रह्म? पूर्णपक्ष-'प्राकाशाद्वायुयोरग्निा' (प्राकाशसे वायु और वायुसे मग्नि उत्पन्न हुई) इस प्रकार श्रुति कथनसे केवल आकाश प्रादि ही कार्य के उत्पादक है।
१३० । भाषानुवादसहिता [अ० २ पा० ३ अघि०८] ईश्वरोऽन्तर्यमयतीत्युक्त यॊमाद्यपाधिकम् ब्रह्म वाय्वादिहेतुः स्यात्तेजनादीक्षणादपि ॥ १४ ॥ पूर्वाधिकरणेषु पूर्वपूर्वकार्पोपाधिकाद्ब्रह्मण उत्तरोत्तरकार्योत्पत्तिः, इति यदेतत्सिद्धवत्कृत्य सिद्धान्तितम्, तदयुक्तम् । 'माकाशाद्वायुः। वायोरग्निः' इत्यादौ ब्रह्मनिरपेक्षात्केवलाद्व्योमादेरुत्तरकार्योतिश्रवणात् । इति प्राप्त बम:-"य प्राकाशमन्तरो यमयति, यो वायुमन्तरो यमयति" (बृह० ३१७) इत्यादिनाऽन्तर्यामिब्राह्मणे व्योमादेः स्वातव्यं निवारितम् । यथा 'तत्तेज ऐक्षत (छा० ६२६३) 'ता आप ऐक्षन्त' (छा० ६।२।४ ) इति तेज आदेरीक्षणपूर्वकं स्रष्ट्रत्वं श्रूयते । तच्वेक्षणं चेतनब्रह्मनिरपेक्षाणामचेतनानां न संभवति । तस्मात्-व्योमाधुपाधिकस्य ब्रह्मण एव कारणत्वम् ॥ ७ ॥ (मष्टो लयक्रमनिरूपणाधिकरणे सूत्रम् )। विपर्ययेण तु क्रमोऽत उपपद्यते च ॥ १४ ॥ प्रष्टमाधिकरणमारचयति- सूष्टिक्रमो लये ज्ञेयो विपरीतक्रमोऽथवा। क्लुप्तं कल्प्याद्वरं तेन लय सृष्टिक्रमो भवेत् ॥ १५ ॥ सिद्धान्त-ईश्वर अन्तर्यामी है, इस कथनसे और तेज मादिके ईक्षण पूर्वक स्रष्टुत्वके क्थनसे भी यह प्रतीत होता है कि भाकाश आदि उपाधिक ब्रह्म ही वायु मादिका हेतु है। पूर्वपक्षी--पूर्व अधिकरणोंमे पूर्व पूर्व कार्योपाधिक ब्रह्मसे उत्तरोत्तर कार्यको उत्सत्ति होती है, ऐमा जो सिद्धवत् मानकर सिद्धान्त किया है, वह ठीक नहीं है। क्योकि 'प्राकाशाद्वायु:०' (भाकाशसे वायु, वायुसे अग्नि उत्पन्न हुई) इत्यादि श्रुतियोमें ब्रह्म निरपेक्ष केवल आकाश प्रादिसे उत्तरकार्य-वायु आदिको उत्पत्ति कही गई है। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-'य माकाशमन्तरो' (ो भाकाश के मान्तर रहकर भाकाशका नियन्त्रण करता है, जो वायुके प्रान्तर रहकर वायुका नियमन करता है) इत्यादि ति बाक्यसे अन्तर्यामी ब्राह्मणमे पाकाथ प्रादिकी स्वतन्त्रताका खण्डन किया गया है। तथा 'तत्तेज ऐक्षत०' ( उस तेजने ईक्षण किया, उस जलने ईक्षण किया) इस प्रकार श्रुतिमें तेज भादिके ईक्षण पूर्वक सष्ट त्वका प्रतिपादन है। वह ईक्षण चेतन ब्रह्म निरपेक्ष भवेतन प्राकाश प्रादिमें संभव नहीं है। इस लिए आकाश प्रादि उपाधिक ब्रह्म ही कारण है ॥ ७ ॥ अष्टम मधिकरणकी रचना करते हैं- " [अ०२ पा० ३ अधि०६] वैयासिकन्यायमाला १३१ हेतावसति कार्यस्य न सत्त्वं युज्यते यतः। पृथिव्याप्स्विति चोक्तत्वाविपरोतक्रमो लये ॥ १६ ।। आकाशदिकमः सृष्टी वलुप्तः । अतः प्रलयेऽपि स एव क्रमः । इति प्राप्ते ब्रूमः-प्रथमतः कारणे लोने सति निरुपादानाना कार्याणां कंचित्कालमवस्थानं प्रसज्येत । किंच- जगत्प्रतिष्ठा देवर्षे पृथिव्यप्सु प्रलीयते। ज्योतिष्याप. प्रलीयन्ते ज्योतिर्वायो प्रलीयते॥ ( वायुः प्रलीयते व्योम्नि तच्चाव्यक्त प्रलीयते । इति पुराणे विपरीतक्रमस्योक्तत्वावलुप्त एवायं क्रमः । तस्मात्सृष्टिविप- रीतेन पृथिव्यादिक्रमेण प्रलीयते ॥६॥ (नवमे प्राणादिसृष्टी क्रमनिरूपणाधिकरणे मूत्रम् ) अन्तरा विज्ञानमनसी क्रमेण तल्लिङ्गादिति चेन्ना- विशेषात् ॥ १५॥ नवमाधिकरणमारचयति- किमुक्तक्रमभङ्गोऽस्ति प्राणाद्यैर्नास्ति वाऽस्ति हि। प्राणाक्षमनसा ब्रह्मवियतोमंध्य ईरणात् ॥ १७ ॥ सन्देह-जो सृष्टिक्रम है वही क्रम प्रलयमे भी समझना चाहिए अथवा विप- रीत क्रम? पूर्वपक्ष-कल्पनीय क्रमको अपेक्षा निश्चित क्रम श्रेष्ठ है, इससे प्रलयमे सृष्टिक्रम होना चाहिए अर्थात् सष्टिक्रमके अनुसार ही प्रलयक्रम भी होना चाहिए । सिद्धान्त-कारणके न होनेपर कार्यका अस्तित्व युक्त नहीं है। पृथिवी जलमें लीन होती है, इस प्रकार त्रुतिकथनसे प्रलयमे सृष्टिक्रमसे विपरीत क्रम है। पर्वपक्षी-सृष्टिमे आकाशादिश्रम निश्चित है, अतः प्रलयमे भी वही क्रम युक्त है । सिद्धान्ती--ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं--पारणके पहले लीन होनेपर उपादान रहित कार्योको कुछ कालतक स्थिति माननी पडेगी। किंच 'जगत्प्रतिष्ठा.' (हे नारद ! जगत्को प्रश्रयभूत पृथिवी जलमे लीन होती है, जल अग्निमें लीन होता है, अग्नि वायुमे लीन होती है, वायु प्राकाशमे लीन होता है और प्राकाश अव्यक्तमै लीन होता है ) इस प्रकार पुराणमे क्रमके उक्त होने यह प्रलयक्रम कनृप्त ही है । इस- लिए सृष्टिक्रमसे विपरीत पृथिवी आदिके क्रमसे प्रलय होता है ॥८॥ नवम प्रधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह- --प्राण प्रादि अतिसे पूर्वोक्त सृष्टिकमका भङ्ग होता है अथवा नहीं ?
भाषानुवादसहिता [५०२ पा० ३ पधि०१] प्राणाचा भौतिता भूतेप्यन्तभूताः पृषक्रमम् । नेन्टरयतो म महोऽस्ति प्राणादौन क्रमः श्रुतः॥१८॥ मुण्डकोपनिपदिश्रूयते- एतस्माजायते प्राणो मन. सन्द्रियाणि च। सं यायुज्योतिरापः पृपियो विश्वस्य पारिणी ।। २१३ ॥ इति । तत्र प्राणादीनां वियदादिभ्यः पूर्व श्रूयमाणत्वादाफाशादिकः पूर्वोपष्टि- क्रमोभज्येत । इति प्राप्त यूम:-'मन्नमर्य हि सोम्य मनः, भापोमयः प्राणः, तेजोमयी पाक (घा० ६०५०४ ) इति प्रारादीनां भौतियत्वप्रवणाद्भतेष्वेवान्तवन पृषकक्रमो नापेक्षितः । न प मुण्डक्श्रुतिः प्रमवाचिनी 'माकाशद्वायुः, वायो- रग्निः' (० २।१ ) इत्यादाविव क्रमस्याप्रतीयमानत्वात्, उत्पत्तिमा केवलं छूते । तस्मानानया शुरया पूर्वोक्तक्रममनोऽस्ति ।।६।। (दशमे पोवस्य पन्ममरणराहिन्याधिकरणे मूत्रम् ) चराचरव्यपाश्रयस्तु स्यातद्वपदेशो मातस्तद्भावमा- वित्वात् ॥ १६ ॥ पूर्वपदा-प्राणा, इन्द्रिय पोर मनरा ब्रह्म भौर भाषाशके मध्य में पपन होनेसे उक्त सष्टिकमका भङ्ग है। सिद्धान्त-प्राण भादि भौतिक होनेमे भू के भन्तर्भूत हैं, अतः वे पृषक उत्पत्ति क्रमकी इच्छा नहीं करते, इसलिए उक्त सष्टिकमका भङ्ग नहीं है । प्राण मादिका पतिमें कम नहीं कहा गया है। मुण्डकोपनिषद् -'एतस्मात्रायते प्राणो०' (पारमासे प्राण, मन, सव इन्द्रियाँ और माकाश, वायु, अग्नि, जल भोर विश्वको धारण करनेवाली पृथिवी उतान होती है ) पूर्वपक्षी कहता है कि यहाँपर प्राण मादिका मानाश मादिके पूर्वमें श्रवण होनेसे मा- काशादिका पूर्वोक्त सष्टिनम भङ्ग होता है। सिद्धान्ती-ऐमा प्राप्त होनेपर हम क्ढे हैं-'मन्नमय हि.' (हे सोम्य ! मन मन्नमय ही है, प्राण पलमय है, वाणी तेजोमयो है ) इस प्रकार प्राण मादिमै भौति- कत्व श्रवणसे भूतोर्मे अन्तर्भाव होनेसे पृथक्क्रम अपेक्षित नहीं है । मुण्डक अति प्रम वाचक नहीं है, क्योकि 'मामशादायुः' वायोरग्निः' (भाकाशसे वायु, वायुरू भग्नि) इत्यादिके समान उममें क्रमको प्रतीति नहीं होती, वह दो केवल उसचिवो कहती है। इमलिए इस मुण्डक अतिसे पूर्वोक्त क्रमका भंग नहीं है ।।६ ॥
[म०२ पा० ३ अधि० १० ] वैयासिकन्यायमाला
१३३
।
एवं
दशमाधिकरणमारचयति-
जोवस्य जन्ममरणे वपुपो वाग्मनो हि ते।
जातो मे पुत्र इत्युक्तेर्जातकर्मादिस्तथा ॥ १६ ॥
मुख्ये ते वपुषो भाक्ते जोवस्यैते अपेक्ष्य हि।
जातकर्म च लोकोक्तिर्जीवापेतेतिशास्त्रतः॥२०॥
लोके 'पुत्रो मे जातः' इति व्यवहाराच्छास्त्रे जातकर्मादिसंस्कारोक्तेश्च
जन्ममरणे जीवस्य ।
इति प्राप्त बमः-जीवस्य मुख्यमरणागीकारे कृतनाशाकृताभ्यागमप्रस-
अस्य दुनिवारत्वाद्देहगते एव जन्ममरणे जीवस्योपचर्यते । प्रौपचारिके ते
प्रपेक्ष्य लोकव्यवहारकर्मशास्त्रयोः प्रवृत्तिः। उपनिषच्छास्त्रं तु 'जीवापेतं वाव
किलेदं म्रियते, न जीवो म्रियते' इति जीवविमुक्तस्यैव शरीरस्य मुख्यं मरणम-
भिधाय जीवस्य तन्निराचष्टे । तस्मादपुषो जन्ममरणे ॥ १० ॥
(एकादशे जीवस्य नित्यत्वाधिकरणे सूत्रम् )
नाऽऽत्माऽश्रु तेनित्यत्वाच्च ताभ्यः ॥ १५ ॥
एकादशाधिकरणमारचयति-
दशम अधिकरणको रचना करते हैं-
सन्देह --जन्म और मरण जीवके होते हैं मथवा देहके ?
पूर्वपक्ष--'मेरा पुत्र उत्पन्न हुआ' इम लौकिक कथनसे वथा शास्त्रमे उक्त जातकर्म
पादि सस्कारोसे प्रतीत होता है कि जीवके ही जन्म-मरण होते हैं।
सिद्धान्त-उक्त जन्म-मरण देहके मुख्य हैं जीवके गौण हैं, गौण जन्ममरणको
अपेक्षासे ही लोक व्यवहार और जातकर्म होते हैं, क्योकि 'जीवापेतं.' (जीव शून्य
शरीर मरता है जीव नहीं मरता ) ऐसी श्रुति है ।
पूर्णपक्षी-लोकमें 'पुत्रो मे जातः' ( मुझे पुत्र उतन्न हुथा ) इस व्यवहारसे और
शास्त्रमे जातकर्मादि संस्कारोके कथनसे जन्म-मरण जीवके होते हैं।
सिद्धान्तो-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं--जीवका मुख्य मरण अङ्गीकार
करनेपर कृत कर्मका फल भोगे विना नाश और अकृत कर्म फलकी प्राप्तिका प्रसङ्ग
दुनिवार है, प्रतः देहगत जन्ममरणका हो जीवमे उपचार होता है । गौण जन्म-मरणको
प्रपेक्षासे हो लोक व्यवहार और कर्मशाषको प्रवृचि होती है। उपनिषद शास्त्र नो
'जीवापेतं वावः' (जीव शून्य शरीर ही मरता है जीव नही मरता ) इस प्रकार जीव
रहित शरीरका मुख्य मरण कहकर जीवमे मरणका निराकरण करता है। इसलिए
शरोरके ही जन्म मरण होते हैं ॥ १० ॥
। १३४ माषानुवादसहित [अ०२ पा० ३ अधि० ११] कल्पादौ ब्रह्मणो जीवो वियद्वज्जायते न वा। सृष्टेः प्रागद्वयत्वोक्तेर्जायते विस्फुलिङ्गवत् ॥ २१ ॥ ब्रह्माद्वयं जातबुद्धो जीवत्वेन विशेत्स्वयम् । औपाधिकं जीवजन्म नित्यत्वं वस्तुत: श्रुतम् ।। २२ ॥ "एकमेवाद्वितीयम्" इति सृष्टेः प्रागद्वयत्वं धूयमाणं ब्रह्मव्यतिरिक्तस्य जीवस्यानुत्पत्तो नोपपद्यते । श्रुतिश्च विस्फुलिङ्गदृष्टान्तेन जीवस्योत्पत्ति प्रति- पादयति-"यथाऽग्ने. क्षुद्रा विस्फुलिगा घ्युच्चरन्ति, एवमेतस्मादात्मनः सर्वे प्राणाः सर्व लोकः सर्वे वेदा. सर्वाणि भूतानि सर्व एव प्रात्मानो व्युच्चरन्ति" (बृह० २१११२० ) इति । तस्मात्यल्पादौ वियदादिवब्रह्मणो जीवो जायते । इति प्राप्ते बम.--यदद्वयं ब्रह्म तदेव जातायां बुद्धौ जीवरूपेण प्रविशति । 'तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्' (ते० २।६) इतिश्रुतेः। अतो जीवानुत्पत्ती पश्रुतिविरोधः । विस्फुलिङ्गध्रुतिस्त्वोपाधिकजन्माभिप्राया प्रवृत्ता । अन्यथा कृतनाशादिदोपस्योक्तत्वात् । वस्तुतत्वाभिप्रायेण तु नित्यत्वं श्रुतिते-"नित्यो एकादश अधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-कल्पके प्रारम्भमे ब्रह्मसे जीव आकाशके समान उत्पन्न होता है वा नहीं ? पूर्णपक्ष--सृष्टिके पूर्व प्रद्वितीयत्वके क्थनसे ज्ञात होता है कि चिनगारियोंकी भांति जीव ब्रह्मसे उत्पन्न होता है। सिद्धान्त---बुद्धि के उत्पन्न होनेपर अद्वितीय ब्रह्म ही जीवरूपसे स्वयं प्रविष्ट होता है, जीवका जन्म प्रोपराधिक है वस्तुत: ध्रुतियोंमें वह नित्य कहा गया है । पूर्णपक्षी-'एकमेवाद्वितीयम्' (एक ही अद्वितीय है ) इस प्रकार सृष्टिके पूर्व श्रयमाण अद्वितीयत्व ब्रह्मसे अतिरिक्त जीवको उत्पत्ति न माननेपर उपपन्न नहीं होता। और अति विस्कुलिङ्गो दृष्टान्ठसे जीवकी उत्पत्तिका प्रतिपादन करती है-'ययाने' (जैसे अग्निसे छोटी छोटी चिनगारियाँ निकलती हैं, वैसे ही इस मात्मासे सब प्राण- इन्द्रियाँ, सच लोक, सब वेद, सब भूत और ये सब आत्माएं निकलती हैं ) इससे ज्ञात होता है कि कल्पके मादिमे प्रकाशके समान जीव ब्रह्मसे उत्पन सिद्धान्ती-ऐमा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं--जो अद्वय ब्रह्म है वही दुद्धिके उत्पन्न होनेपर जीवरूपसे प्रवेश करता है। क्योकि 'तत्सृष्ट्वा०' (उसकी रचना कर वही जीवरूपसे प्रविष्ट हुआ ) ऐमी श्रुति है। अतः जीवको उत्पत्ति न होनेपर भी सृष्टि के पूर्व में मद्वितीय ब्रह्म प्रतिपादक श्रुतिका विरोध नहीं है। विस्फुलिङ्गति तो भोपाधिक ( बुद्धि ) जन्मके अभिप्रायसे प्रवृत्त हुई है । अन्यथा इतनाश-अकृताम्यागम दोष कहे गये हैं । नित्यो० (आत्मा नियोंका नित्य और चेतनोका चेतन है ) यह . - [अ०२ पा० ३ अधि० १२] वैयासिकन्यायमाला १३५ नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्" इति । तस्मात्कल्पादौ जीवो नोत्पद्यते ॥ ११ ॥ (द्वादशे जीवस्य चिद्रूपत्वाधिकरणे सूत्रम् )। ज्ञोऽत एव ॥ १८॥ द्वादशाधिकरणमारवयति- अचिद्रूपोऽथ चिद्रूपो जीवोऽचिद्रूप इष्यते । चिदभावात्सुषुप्त्यादी जाग्रच्चिन्मनसा कृता ।। २३ ।। ब्रह्मत्वादेव चिद्रूपश्चित्सुषुप्तौ न लुप्यते। द्वैतादृष्टिद्वैतलोपान्नहि द्रष्टुरिति श्रुतेः ॥ २४ ॥ ताकिका मन्यन्ते-सुषुप्तिमू समाधिषु चैतन्याभावादचिद्रूपो जीवः । जागरणे चाममनःसंयोगाच्चैतन्याख्यो गुणो जायत इति । तदसत् । चिद्रूपस्य ब्रह्मरण एव जीवरूपेण प्रवेशश्रवणात् । न च चैतन्यं सुपुप्त्यादौ लुप्यते । सुषुप्त्यादिसाक्षिस्वेनावस्थानात् । अन्यथा सुषमादिपराम- योगात् । कथं तहि सुपुप्त्यादी द्वैताप्रतीतिरिति चेत्, 'द्वतलोपात्' इति ब्रूमः । तथा च श्रुति: 'यद्वै तन्न पश्यनि पश्यन्वै तन्न पश्यति । न हि द्रष्टुष्टेवि. श्रुति तो वस्तुतत्त्वके अभिप्रायसे जीवको नित्यता प्रतिपादन करती है। इससे यह सिद्ध हुआ कि कलाके प्रारम्भमे जीव उत्पन्न नहीं होता ॥ ११ ॥ द्वादश प्रधिकरणको रचना करते हैं-- सन्देह-जीव चेतनरूप है अथवा अचेतनरूप ? पूर्वपक्ष-जीव अचेतन अभिप्रेत है, क्योकि सुषुप्ति आदि भवस्थापोंमे चेतनका प्रभाव है और जामत् अवस्थामे जो चेतनता दिखाई देती है। वह प्रात्मा और मनके संयोगमे उत्पन्न होती है। सिदान्त-जीव ब्रह्म स्वरूप होनेसे ही चिद्रप है वह सुषुप्तिमे लुप्त नहीं होता, सुषुप्तिमै ढंत प्रपञ्चके सुप्त होनेपर दैतको प्रतीति नही होती । परन्तु 'न हि द्रष्टु' (द्रष्टाको स्वरूपभूत दृष्टिका लोप नही होता ) क्योकि ऐसी श्रुति है । ताकिक लोग मानते हैं-सुषुप्ति, मूर्छा और समाधिमे चैतन्यका प्रभाव होनेसे जीव चैतन्यरूप नही है, जाप्रदवस्थामें प्रात्मा मोर मनके संयोगसे चतन्य नामक गुण उत्पन्न होता है। सिद्धान्ती -यह ठीक नहीं है, क्योकि चिद्रूप ब्रह्मका हो जोवरूपसे प्रवेश श्रुतिमे कहा गया है। भौर चैतन्य सुपुति प्रादिमे लुप्त नहीं होता, क्योकि सुषुप्ति प्रादिके सासीरूपसे अवस्थित है अन्यथा सुषुप्ति मादिका स्मरण नहीं होगा। भला तब सुषुप्ति मादिमे द्वतकी प्रप्रतीति क्या होती है ? यदि ऐसा कहो तो हम कहते है कि द्वैतके लोप
भापानुवादसहिता [अ० २ पा० ३ अधि० ११
परिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात् । न तु तद्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्त
यत्पश्येत्" (बृह० ४।३।२३) इति । अस्थायमर्थ:-तत्र सुषुप्तो जीवः किमपि
न पश्यति, इति यल्लौकिकैरुच्यते, तदसत् । पश्यन्नेव जीवस्तदानी न पश्यति,
इति भ्रान्त्या केवलं व्यपदिश्यते। कथं तद्दर्शनमित्यत्र हेतुरुच्यते-द्रष्टुरात्मनः
स्वरूपभूताया दृष्टेलोपो नहि विद्यते। विनाशरहितस्वभावत्वात् । अन्यथा
लोपवादिनोऽपि नि.साक्षिकस्य लोपस्य वक्तुमशक्यत्वात् । कथं तहि लौकिकानां
'न पश्यति' इति भ्रम इत्यत्र हेतुरुच्यते-ब्रह्मचैतन्यादन्यत्क्रियाकारकफलरूपेण
विभक्त जगदाख्यं यद्वितीयं वस्तु, बन्नास्ति। तस्य स्वकारणे लोनत्वात् ।
अतो जागरणवद्रष्टदृश्यदर्शनव्यवहाराणामभावात् 'न पश्यति' इति लोकि-
काना भ्रम इति । तस्माच्चिद्रूपो जीवः ॥ १२ ॥
(त्रयोदशे जीवस्य सगंगतत्वाधिकरणे मूत्राणि )
उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम् ॥ १६॥ स्वात्मना चोत्तरयोः
॥ २० ॥ नाणुरतच्छतेरिति चेन्नेतराधिकारात् ॥ २१ ॥
स्वशब्दोन्मानाभ्यां च ॥ २२ ॥ अविरोधश्चन्दनवत्
॥ २३ ॥ अवस्थितिवशेष्यादिति चेन्नाभ्युपगमादि हि
॥२४॥ गुणाढा लोकवत् ॥ २५ ॥ व्यतिरेको गन्धवत्
॥ २६ ॥ तथा च दर्शयति ॥ २७ ॥ पृथगुपदेशात् ॥२८॥
होने से द्वतकी प्रतीति नहीं होती। इस विषयमे “यद तन पश्यति०' ( सुपुप्तावस्थामें
वह जो नहीं देख ना सो देखता हुआ ही नही देखता अर्थात् मुप्तिमे स्वरूपज्ञान है
किन्तु विशेष ज्ञान नहीं है, द्रष्टाको दृष्टिका कभी लोप नही होना, क्योकि वह अविनाशी
है, उस समय उमसे अन्य विभक्त द्वितीय नहीं है, जिसे देखे ) यह ध्रुति भी है। इसका
पर्य यह है -'उस सुपुप्तिमें जीव कुछ भी नहीं देखता ऐसा जो लोग कहते हैं, वह युक्त
नहीं है, क्योकि देखता हुपा हो जोव उस समय नही देखता, यह केवल भ्रान्तिमे ही
कहा जाता है, तो उसका दर्शन ज्ञान कैसे होता है ? इमपर हेतु कहते हैं--द्रष्टा
मात्माको स्वरूपभूत दृष्टिका लोप नही होता, क्योकि वह अविनाशी स्वभाव है,
मन्यथा लोपवादी भी नि:माक्षिक लोप नहीं कह सकेगा, तो लौकिक जनोंको नहीं
देखता है' यह भ्रम कैसे होता है । इस विषयमे हेतु कहते हैं-चनम्य स्वरूप ब्रह्मसे
भिन्न क्रिया, कारम-साधन, फल रूपसे विभक्त जगत् नामक जो द्वितीय वस्तु है वह नहीं
है, क्योंकि उस समय वह अपने कारणमे लीन है । इमलिये उस समय जागरणके
समान द्रष्टा, दृश्य भौर दर्शन व्यवहारोके मभावसे 'न पश्यति' (नहीं देखता है } ऐमा
लौकिक जनोको भ्रम होता है । पतएव जीव पतन्य स्वरूप है ॥ १२ ॥
१३७ [म०२ पा० ३ मधि० १३ ] वयासिकन्यायमाला तद्गुणसारत्त्वात्तु नव्यपदेशः प्राज्ञवत् ॥ २६ ॥ याव. दात्मभावित्वाचन दोपस्तदर्शनात् ॥ ३०॥ पुंस्त्वादि. वत्तस्य सतोऽभिव्यक्तियोगात् ॥ ३१ ॥ नित्योपलब्ध्य- नुपलब्धिप्रसङ्गोऽन्यतरनियमो वाऽन्यथा ॥ ३२ ॥ त्रयोदशाधिकरणमारचयति- जीवोऽणुः सर्वगो वा स्यादेपोऽणुरिति वाक्यतः । उत्क्रान्तिगत्यागमनश्रवणाचाणुरेव सः ॥ २५ ॥ साभासबुद्धयाऽणुत्वेन तदुपाधित्वतोऽणुता। जीवस्य सर्वगत्वं तु स्वतो वहात्वत. श्रुतम् ॥ २६॥ "एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः" इत्यणुत्वं श्रुतम् । “अस्माच्छरीरा- दुत्कामति" इत्युत्कान्तिः "चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति" इति गतिः । "तस्मा- लोकात्पुन रेति" इत्यागमनम् । ना त्क्रान्त्यादयः सर्वगतस्योपपद्यन्ते । मध्यम- परिमारणस्प तदुपपत्तावप्याश्रुतिविरुध्यते । अनित्यत्वं च दुरिम् । तस्माद- गुर्जीवः। इति प्राप्ते ब्रूमः-चैतन्यप्रतिबिम्बसहिता बुद्धिरसर्वगता तदुपाधिकत्वा- त्रयोदश प्रधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-जीव अणु है अथवा सर्वगत-विभु ? पूर्वपक्ष-'एषाऽरपुरात्मा' ( यह प्रात्मा भरणु है ) इस श्रुति वाक्यसे उत्क्रमण और आगमनके प्रवणसे ज्ञात होता है कि जीव प्रणु ही है। सिद्धान्त--चैतन्य प्रतिविम्ब सहित बुद्धि प्ररपु है, उस धुद्धि उपाधिके कारण जोव अणु कहा गया है। ब्रह्म स्वरूप होनेसे स्वयं जीव तो सर्वगत है, ऐमा धुतिसे प्रतिपादित है। पूर्वपक्षी--'एपोऽणुरात्मा०' (यह पारमा मरणु मतिशुद्ध चित्तमे जानने योग्य है) इस प्रकार श्रुतिमे जीव मरणु कहा गया है । 'अस्माच्छरोरादुकामति' ( इम शरीरसे उत्क्रमण करता है ) इस श्रुतिमे जीवका उत्क्रमण कहा गया है। 'चन्द्रमसमेव.' ( वे सब चन्द्रलोकको ही जाते हैं) यह गति है, और 'तस्माल्लोकात्पुनरैति' (चन्द्रलोकसे फिर पाता है ) इस तरह यह पागमन सुना जाता है। सर्वगत विमुके उत्क्रमण आदि नहीं हो सकते, यद्यपि मध्यम परिमारणवालेके उत्क्रमण भादि हो सक्ते हैं, तो 'एष अगुरात्मा' इस पर प्रतिवादक श्रुतिसे विरोष है और जीवमे अनित्यत्व दुरि है। इमसे जोव प्रणु परिमाण है। सिद्धान्तो-ऐना प्राप्त होने पर हम कहते हैं-चैतन्य महित बुद्धि सर्वव्यापक नहीं (श्वे० १३८ भाषानुवादसहिता [म०२ पा०३ प्राध० १४] जीवस्यागुत्वोत्क्रान्त्यादय उपपन्नाः । स्वतस्तु जोवस्य ब्रह्मरूपत्वात्सर्वगतत्वम् । "स वा एप महानज प्रात्मा" (बृह. ४।४।२२) "सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा" ०६।११ ) इत्यादौ सर्वगतत्वं श्रुतम् । तस्मात्सर्वगतो जीवः ॥ १३ ॥ (चतुर्दशे जीवस्य कर्तृत्वाधिकरणे सूत्राणि )। कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात् ॥ ३३ ॥ विहारोपदेशात् ॥ ३४ ॥ उपादानात् ।। ३५ व्यपदेशाच्च क्रियायां न चेन्निर्देश- विपर्ययः ।। ३६ ॥ उपलब्धिवदनियमः ॥ ३७ ॥ शक्ति- विपर्ययात् ।। ३८ ॥ समाध्यभावाच्च ॥३६॥ चतुर्दशाधिकरणमारचयति- जीवोऽकर्ताऽथवा कर्ता धियः कर्तृत्वसंभवात् । जीवकतया किं स्यादित्याहु सास्यमानिनः ॥२७॥ करणत्वात की यागश्रवणलौकिका.। व्यापारा न विना क; तस्माज्जोवस्य कता ।। २८ ।। 'बुद्धे. परिणामित्वेन क्रियावेशात्मकं कर्तृत्वं संभवति, न त्वसमस्या- त्मनः' इति यत्साख्यैरुक्तम् । तदसंगतम् । करणत्वेन वलुप्तशक्तिकाया बुद्धे. कशक्तिनं कल्पयितु है। उमसे उपहित होने के कारण जीवमे अगुत्व, उत्क्रमण आदि उपपन्न होते हैं। स्वयं जीव तो ब्रह्मरूप होने से सर्वगत है। 'स वा एष' ( यह आत्मा महान् और जन्म रहित है ) 'सर्वव्यापी०' (वह सर्वव्यापक और सब प्राणियोका भन्तरात्मा है) इत्यादि श्रुतिमे वह सर्वव्यापक कहा गया है। इससे [ मिद्ध होता है | जीव सर्व- व्यापक है ॥१३॥ चतुर्दश मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-जीव प्रकर्ता है भयवा कर्ता ? पूर्वपक्ष [-साख्य सिद्धान्ती कहते हैं कि जब युद्धि की हो मकती है तब जीदको कर्ता क्यो माना जाय। सिद्धान्त बुद्धि करण होनेसे कर्ता नहीं हो सकती, याग, श्रवण पोर लौकिक कृप्यादि व्यापार कर्ताके विना नहीं हो सकते हैं, इसलिए जीव ही कर्वा है। बुद्धि परिणामिनी है, अतः उसमें कर्तृत्व हो सकता है, परन्तु ममङ्ग पारमामे कर्तृत्व संभव नही है। इस प्रकार जो साख्यवादियोंने कहा है। सिद्धान्तो वह ठीक नहीं है, क्योकि करणरूपसे कप्त शक्तियाली बुद्धिमें कर्तृ- [म०२ पा० ३ अधि० १५ ] वैयासिकन्यायमाला शक्या। कुठारादावदर्शनात् । बुद्धः वतृत्वे करणान्तस्य कल्पनीयत्वाच्च । न च मा भूत्कतेंति वाच्यम् । पूर्वकाण्डोक्तयागादिव्यापाराणामुत्तरकाण्डोक्त- श्रवणादिव्यापाराणां लौकिककृष्यादिव्यापाराणां च क सापेक्षत्वात् । तस्मा- जीवः कः ॥ १४ ॥ (पञ्चदशे जीवस्याध्यस्तकर्तृत्वाधिकरणे सूत्रम् )। यथा च तक्षोभयथा ॥४०॥ पञ्चदशाधिकरणमारचयति- कर्तृत्वं वास्तवं किंवा कल्पितं वास्तवं भवेत् । यजेतेत्यादिशास्त्रेण सिद्धस्याबधितत्वतः ॥२६॥ प्रसङ्गो हीति तद्वाधात्स्फाटिके रक्ततेव तत् । अध्यस्तं धीचक्षुरादिकरणोपाधिसंनिधेः॥३०॥ पूर्वाधिकरणे प्रतिपादितस्य कत्वस्य बाधाभावाद्वास्तवम् । इति प्राप्ते ब्रूम:-"असङ्गो ह्ययं पुरुषः" इति श्रुत्या कर्तृत्वसङ्गो बाध्यते । अतो यथा जपाकुसुमसनिधिवशात्स्फटिके रक्तत्वमध्यस्तं तथाऽन्तःकरणसंनिधि- वशाकर्तृत्वमात्मन्यध्यस्यते ॥ १५ ॥ शक्तिकी कल्पना नही की जा सकती है, कारण कि कुठार पादिमें ऐसा नही देखा जाता है। यदि बुद्धिको की माने तो अन्य कारणकी कल्पना करनी होगी। तब कर्ता ही मत हो। ऐसा नही कहना चाहिए, क्योकि कर्मकाण्डमे उक्त याग मादि व्यापार वेदान्तमें उक्त श्रवण प्रादि व्यापार पोर वृष्यादि लौकिक व्यापार सर्वदा कर्ताको अपेक्षा करते हैं, इस लिए जीव ही कर्ता है ।। १४ ॥ पञ्चदश प्रधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-प्रात्मामें कथित कर्तृत्व सत्य है अथवा कल्पित ? पूर्वपक्ष-'यजेत' इत्यादि शास्त्रसे सिद्ध कर्तृत्व अबाधित होनेसे वास्तविक है । सिद्धान्त-'प्रसङ्गो हि०' इस शास्रसे कर्तृत्वका बाध होनेसे स्फटिकमें रक्तताके समान बुद्धि, चक्षु प्रादि करणरूप उपाधिको सन्निधिसे मात्मामे कर्तृत्व मध्यस्त है। पूर्वपक्षी-पूर्व अधिकरणमे प्रतिपादित कर्तृत्वका बाध न होनेसे प्रात्मामे कर्तृत्व वास्तविक है। सिद्धान्ती-ऐमा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-'प्रसङ्लो ह्ययं पुरुषः' ( यह पुरुष प्रसङ्ग ही है ) इम श्रुतिसे प्रात्मामे कर्तृत्व सम्बन्ध बाधित है। प्रतः जैसे जपाकुसुमके संनिधानसे स्फटिकमै रक्तत्व प्रध्यस्त है, वैसे ही अन्तःकरण के सानिध्यसे प्रात्माने कर्तृत्व अभ्यस्त है, वास्तविक नहीं ॥१५॥ - १४० भाषानुवादसहिता [८०२ पा० ३ मषि०१६ ] (योडश ईश्वरस्य जीवप्रवर्तकदाधिकरणे सूरे)। परातु तच्छुतेः ॥ ४ ॥ कृवप्रयत्नापेक्षस्तु विहितप्रति- पिडावयादिभ्यः॥४२॥ पोडशाधिकरणमारचयति- प्रवर्तकोऽस्य रागादिरीशो वा रागतः कृपौ। दृष्टा वृत्तिपम्यमीशस्य प्रेरणे भवेत् ॥३१॥ सस्येषु वृष्टिवजीवेष्वीशस्याविषमत्वतः । रागोऽन्तर्यान्यधीनोऽत ईश्वरोऽस्य प्रवर्तकः ॥ ३२ ॥ लोके कृषोवलादीनां रागद्वेपावेव प्रवतको दृष्टौ । तदनुसाराद्धर्माधर्मवत - जीवस्यापि तावेव प्रवर्तकावभ्युपेयौ। ईश्वरस्य प्रवर्तकत्वे काश्चिज्जीवान्धर्म प्रवर्त- यति, काश्चिदधर्म, इति वैषम्य दुर्वारम् । तस्मान्नेश्वरः प्रवर्तकः। इति प्राप्ते ब्रूम-न तावदीश्वरस्य वैषम्यदोपप्रसङ्गः । वृष्टिवत्साधारण- निमित्तत्वात् । यथा वृष्टे : सस्याभिवृद्धिहेतुत्वेऽपि व्रीहियवादिवपम्ये वीजानामेव निमित्तत्वम्, तथेश्वरस्य 'यथायथं जीवाः प्रवर्तन्ताम्' इत्यनुज्ञया साधारण- प्रवर्तकत्वात् । असाधारणप्रवर्तकत्वेऽपि न वैषम्यम् । पूर्वकृतवमरणां वासनानां पोडश अधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-जीवके प्रवर्तक राग प्रादि हैं अथवा ईश्वर ? पूर्वपक्ष--कृपिमे रागमूलक प्रवृत्ति देखी जाती है, ईधरको प्रवर्तक माननेपर ईश्वरमे वैषम्य प्रमक्त होगा, अतएव जीवके प्रवर्तक राग प्रादि हैं ईश्वर नहीं। सिद्धान्त-सस्यो-वायोंमें दृष्टिके ममान जीवोंमें ईश्वर विषम नहीं है, और राग प्रादि अन्तर्यामी ईश्वरके अधीन है, अतः जीवका प्रवर्तक ईश्वर है। पूर्वपक्षो-लोकमें राग, द्वेष ही वृपिकोके प्रवर्तक देखे जाते हैं। उमीके अनुमार धर्म और अधर्म करनेवाले जोदवे भी वे ही प्रवर्तक स्वीकार किये गये हैं। यदि ईश्वर प्रवर्तक हो तो कुछ जीवोंको घर्भमे प्रवृत्त करता है और कुछ एकको अधर्ममे, इम प्रसार ईश्वरमें विषमताका निवारण नहीं हो सकता, इमसे ईश्वर जीवका प्रवर्तक नहीं है। सिद्धान्तो-ऐमा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-ईश्वरको वपम्प दोष प्रसङ्ग नही होता, क्योकि वह वृष्टिके समान सबके प्रति साधारण निमित्त है, जैसे वृष्टि सब धान्योंके प्रति वृद्धिका समान होतु होनेपर भी व्रीहि-यान, यवादिकी विषमतामें उनके बीज ही निमित्त हैं, में ईश्वर 'पया योष जीव प्रवृत्त हो' इस प्रकारको अनुज्ञासे साधारण प्रवर्तक है । यदि ईश्वरको अपाधारण प्रवर्तक माना जाय तो भी उसमें 'विषमता नहीं [१०२ पा० ३ अपि० १७ ] वैयासिकन्यायमाला च वैषम्यहेतुत्वात् । कर्मणां फलहेतुत्वमेव, न कर्मान्तरहेतुत्वमिति चेत् । सत्यम् । सुखदुःसरूपस्य स्वफलस्य प्रदानाय जीवं व्यापारयत्सु कर्मस्वर्थात्कर्मा- न्तरमपि निष्पद्यत इति दुर्वारं तदेतृत्वम् । वासनानो तु साक्षादेव कर्म- हेतुत्वम् । तथा चेश्वरस्य कुतो वैषम्यप्रसङ्गः। यत्तु रागस्य प्रवर्तकत्वनिदर्शन- मुदाहृतम्, तत्तथाऽस्तु।न तानतेश्वरस्य प्रवर्तत्वहानिः। सन्तिर्यामिरणेश्वरेण रागस्यापि नियम्यमानत्वात् । तस्मादीश्वरो जीवस्य प्रवर्तकः ॥ १६ ॥ ( सप्तदशे जीवेश्वरव्यवस्थाधिकरणे सूत्राणि) अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा चापि दाशकितवादित्वम- घीयत एके ॥४३॥ मन्त्रवर्णाच्च ॥४४॥ अपि च स्मर्यते ॥ ४५ ॥ प्रकाशादिवन्नैवं परः ॥ ४६ ।। स्मरन्ति च ॥ ४७ ॥ अनुज्ञापरिहारौ देहसंवन्धाज्ज्योतिरादिवत् ।। ४८ ॥ असंततेश्याव्यतिकर ॥४६॥ श्रआमास एव च ॥५०॥ अदृष्टानियमात् ॥५१॥ अभिसंध्यादिष्वपि चैवम् ।। १२ । प्रदेशादिति चेन्नान्तर्भावात ।। ५३ ॥ सप्तदशाधिकरणमारचयति। किं जीवेश्वरसांकय व्यवस्था वा श्रुतिद्वयात्। अभेदभेदविषयात्सांकयं अंशोऽवच्छिन्न आभास इत्यौपाधिककल्पने । जीवेशयोर्व्यवस्था स्याज्जीवानां च परस्परम् ॥ ३४ ॥ है क्योंकि पूर्व कृत कर्म और वासनाएं वैषम्यके हेतु हैं। यदि कोई ऐसा कहे कि कर्म फलके हेतु हैं कर्मान्तरके प्रति हेतु नहीं हैं। यह ठीक है, परन्तु सुख दुःखरूप अपने फल देने के लिए जीवकी प्रेरणा करते हुए कर्म अर्थत; कर्मान्तरको उत्पन्न करते हैं, मता अन्यकर्मके प्रति उनमें कारणत्व दुर्वार है। बासनाएं तो साक्षात ही कर्मकी हेतु हैं। तो इस प्रकार ईश्वरमे वैषम्य प्रसङ्ग कैसे होगा ? जो रागमें प्रवर्तकत्वका दृष्टान्त उदाहृत किया किया है । वह भले वैसा ही हो। परन्तु उससे ईश्वर में प्रवर्तकत्वको कुछ हामि नहीं है, क्योंकि अन्तर्यामी ईश्वर द्वारा यमका भी नियमन होता है। इससे ईश्वर ही जीवका प्रवर्तक है ॥ १६ ॥ सप्तदश प्रधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह है--क्या जीद मौर ईश्वरका परम्पर माडूयं है अथवा दोनो अतियोसे कोई व्यवस्था हो सकती है। न निवार्यते ।। ३३ ॥
भाषानुवादसहिता [म०२ पा० ३ अधि०१७) "तत्त्वमसि" इत्यादिश्रुति वेशयोरभेदं प्रतिपादयति । "मात्मा वा परे द्रष्टव्यः' इत्यादिना द्रष्ट्रद्रष्टव्यरूपेण भेदः प्रतीयते । तथा च सति भेदश्रुतिबलात् 'जीवो नास्ति' इत्यपलपितुमशक्यम् । अभेदयत्या वेश्वरात्स्यवत्वेन व्यवस्था- पयितुं न शक्यते । तस्माद्विद्यमानस्य जीवस्येश्वरेण साक्यं दुर्वारम् । परस्परं च जोवानामोश्वरादभेदद्वारा साक्यमानुपतिवम् । तस्मात्--ब्रह्मवादिनी न जगव्यवस्था। इति प्राप्ते धूमः--यद्यपि गोहितवज्जीवेश्वरयोरत्यन्तभेदो वास्तवो नास्ति, तथापि व्यवहारदशायामुपाधि ल्पितं भेदमाश्रित्य शाखाणि धा जोवं निरूपपन्ति । 'ममेवाशो जीवलोके जीवभूत. सनातनः' (गी० १५५७) इत्यंशत्वमवगम्यते । 'स समानः सन्नुभो लोकायनुसंचरति' इति धुतो विज्ञानमयस्य जीवस्य विज्ञानशब्दवाच्यया बुद्धधा समानपरिमाणनिर्देशा- घटाकाशवदवच्छिमात्वं प्रतीयते। पर्वपक्ष-पभेद अति और भेद थुतिके विषय होनेसे जीव मौर ईश्वरके साइर्यका निवारण नहीं हो सकता। सिद्धान्त-अंश, अवच्छिन्न मोर मामाम इस प्रकार मोपाधिक कल्पनामोंने जोन और ईश्वरको तया परस्पर जीवोकी व्यवस्था हो सकती है। अतः सार्य पूर्वपक्षो–'तत्त्वमसि' इत्यादि श्रुति जीव और ईश्वरका भभेद प्रतिपादन करती है। "पारमा वा परे द्रष्टव्यः' इत्यादि छु तिमे द्रष्ट द्रष्टव्यरूपसे भेद प्रतीत होता है। इम प्रकार भेद श्रुतिके बलसे 'जीव नहीं है। इस प्रकार मपलाप नहीं कर सकते मीर 'तत्त्वमसि' इत्यादि मभेद ७ तिमे जीवको ईश्वरसे पृयग्रूपसे व्यवस्था नहीं कर सकते। इसलिए विद्यमान बीवका ईश्वरके साथ साडूर्य दुर है । परस्पर जीवोका ईश्वरसे प्रभेद द्वारा सामूर्य मानुपङ्गिक है । इमसे ब्रह्मवादी जगत्को व्यवस्था नही कर सकता। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-यद्यपि यो और महिपके समान जीव और ईश्वरका प्रत्यन्त भेद वास्तविक नहीं है, तथापि व्यवहारदशामें उपाधि कल्पित भेदका माश्रय कर शास्त्र तीन प्रकारसे जीवका निरूपण करते हैं। 'ममैवांशो.' (जीवलोकमें यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है ) इससे जीव ईश्वरका अंश भवगत होठा है । "स समानः०' (वह विज्ञानमय-बीय बुद्धिके सदृश होकर दोनों लोकोमें संचार करता है ) इस अति विज्ञानमय जीवका विज्ञान शब्द पाध्य बुद्धिके साथ तुल्य परिमाणके निर्देशसे घटाकाशके समान अवचिन्न प्रतीत होता है । 'एक एव तु ' (एक १४३ अ०२पा० ४ मधि० १] वैयासिकन्यायमाला एक एव तु भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः। एकघा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ।। इत्याभासत्वमवगम्यते। तस्मात्सुलभैव ब्रह्मवादिना जीवेश्वरव्यवस्था। जीवानां च परस्परमनेकजलपात्रस्थबहुसूर्यप्रतिविम्बवद्व्यवहारव्यवस्था सुत. रामुपपद्यते । तस्मान्न कोऽपि दोष इति सिद्धम् ॥ १७ ॥ इति थीभारतीतीर्थमुनिप्रणीतायां वैयासकिन्यायमालायां द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ।।३।। अत्र पादे आदिता प्रधिकरणानि १७ মুয়ি ५३ ३७० ७८ अथ द्वितीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः (पत्र पादे लिङ्गशरीरश्रुतीना विरोधपरिहारः) [ इस पादमे लिङ्गशरीर श्रुतिमोके विरोधका परिहार है ] (प्रथम इन्द्रियाणां परमात्मजन्यत्वाधिकरणे सूत्राणि )। तथा प्राणाः॥१॥ गौण्यसंभवात् ॥ २ ॥ तत्प्राक्श्रुतेश्व ॥३॥ तत्पूर्वकत्वाद्वाचः॥४॥ चतुर्थपादस्य प्रथमाधिकरणमारचयति- किमिन्द्रियाण्यनादीनि सृज्यन्ते वा परात्मना। सृष्टेः प्रागृपिनाम्नैषा सद्भावोक्तेरनादिता ।। १ ।। ही भूतात्मा प्रतिभूतमें व्यवस्थित है जलचन्द्रके समान एक होता भी मनेक प्रकार दिखाई देता है। इस शास्त्रसे अवभासत्व अवगत होता है । ) इससे ब्रह्मवादीके लिए जीव भोर ईश्वरकी व्यवस्था सुलभ है । मोर जीवोको परस्पर अनेक जल पाओमें सूर्य के भनेक प्रतिबिम्बोंके समान व्यवहारव्यवस्था सुतरा उपपन्न होती है। प्रतः कोई भी दोष नहीं है, यह मिद्ध हा ॥१७॥ इति श्रीमारतीतीर्थमुनि प्रणीत वैयामिकन्यायमालाके द्वितीयाध्यायके तृतीय पादका 'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती' कृत भाषानुवाद ।। ३ ।।
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भाषानुवादसहिता [प्र. २ पा० ४ मषि०२
एकबुद्धधा सर्वबुद्ध तिकत्वाजनिश्रुतेः।
उत्पद्यन्तेऽथ सद्भाव: प्रागवान्तरसृष्टितः ।।२।।
'ऋषयो वाव तेऽग्रे तदासीत्, (तदाहुः ) के ते ऋषय इति । प्रारणा वा
ऋषयः' इति श्रुत्या सृष्टेः पूर्वमिन्द्रियाणां सद्भावावगमादनादित्वं तेषाम् ।
इति प्राप्ते ब्रूमः--एकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं तावदिन्द्रियाणामनुत्पत्तो न
घटते । तथा 'पन्नमयं हि सौम्य मनः। आपोमयः प्राणः तेजोमयी वाक्' इति
भूतकार्यत्वमिन्द्रियाणां श्रूयते । एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च'
(मु० २।१।३ ) इति स्पष्टमेवेन्द्रियाणां जन्मश्रवणम् । यत्तु सृष्टेः प्राक्सद्भाव-
वाक्यम् । तदवान्तरसृष्टिविषयतया व्याख्येयम् । तस्मादिन्द्रियाणि परमात्मन
उत्पद्यन्ते, ॥ १॥
(द्वितीय इन्द्रियाणामेकादशत्वाधिकरणे सूत्रे )।
सप्त गतेविशेपितत्वाच्च ॥ ५॥ हस्तादयस्तु स्थितेऽतो
नैवम् ॥ ६॥
द्वितीयाधिकरणमारचयति-
सप्तकादश वाक्षारिण सप्त प्रारणा इति श्रुतेः।
सप्त स्यु घनिष्ठेषु छिद्रेषु च विशेषणात् ।। ३ ।।
चतुर्थ पादके प्रथम मधिकरणकी रचना करते हैं-
सन्देह-क्या इन्द्रियाँ अनादि हैं अथवा परमात्मासे उत्पन्न होती हैं ?
पूर्वपक्ष-सृष्टिके पूर्वमे ऋषि नामसे इन्द्रियोका अस्तित्व कहा गया है । अतः
अनादि हैं।
सिद्धान्त-इन्द्रियों उत्पन्न होती हैं, क्योकि एक विज्ञानसे सर्व विज्ञान, भूत-
कार्यत्व मोर उनकी उत्पत्ति श्रुति है। सृष्टिके पूर्वमे उनका सद्भाव भवान्तर सृष्टिके
अभिप्रायसे है।
पूर्वपक्षी-ऋषयो वाव.' ( उत्पत्तिके पूर्व में वे ऋषि ही मसत् थे, वे कहते हैं-
वे ऋषि कौन हैं ? वे ऋषि प्राण-इन्द्रियां ये ) इस अतिसे सष्टिके पूर्वमें इन्द्रियोका
मस्तित्व अवगत होता है, प्रतः वे प्रनादि हैं उत्पन्न नहीं होती।
सिद्धान्तो-ऐमा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-यदि इन्द्रियोकी उत्पत्ति न मानें तो
एक विज्ञानमे सर्व विज्ञान न घटेगा । तपा 'मन्नमय हि' (हे सोम्य ! मन मन्नमय है,
प्राण-इन्द्रियाँ जलमय हैं, वाणी तेजोमयी है ) इस प्रकार ग्रुति इन्दियोंको भूतोंका
कार्य कहती है । 'एतस्मानायने ' ( उस मात्मासे प्राण उत्पन्न होता है, मन मोर
सब इन्द्रियाँ ) यह श्रुति इन्द्रियोंका स्पष्ट जन्म प्रतिपादन करनी है। पोर जो सृष्टि के
पूर्व में इन्द्रियोके मस्तित्वका वाक्य है । उसको भवान्तर दृष्टि परत्वसे व्याख्या करनी
चाहिए. प्रता इन्द्रियो परमात्मासे उत्पन्न होती है ॥१॥
[म०२ पा० ४ अधि०२] वैयासिकन्यायमाला प्रशीर्षण्यस्य हस्तादेरपि वेदे समीरणात् । ज्ञेयान्येकादशाक्षाणि तत्तत्कार्यानुसारतः॥४॥ सप्तैवेन्द्रियाणि । कुतः। "सप्त प्राणाः प्रभवन्ति" इति सामान्यश्रुतेः । "सप्त वै शोषण्याः प्राणा:" इति शिरोगतसप्तच्छिद्रनिष्ठत्वेन विशेषितत्वाच्च । इति प्राप्त बूमः-शिरोनिष्ठेभ्य इतराणि हस्तादीन्यपि वेदे समीयन्ते । "हस्ती चादातव्यं च । उपस्थश्वाऽऽनन्दयितव्यं च" *इत्यादिना। तथा घ वेदानिश्चये सत्येकादगव्यापाराणा दर्शनधधरणवारणास्वादनस्पर्शनाभिवदना- दानगमनानन्दविसर्गध्याननामुपलम्भात्तत्साधनत्वेन 'इन्द्रियाण्येकादश' इत्य भ्युपगन्तव्यम् ॥२॥ (तृतीय इन्द्रियाणामरगुत्वाधिकरणे सूत्रम् )। अण्वश्च ॥७॥ तृतीपाधिकरणमारचयति-- द्वितीय प्रधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-इन्द्रियां सात हैं पथदा एकादश ? पूर्वपक्ष-इन्द्रियो सात हैं, क्योंकि 'सप्तः प्राणा' ऐसौ श्रुति है, पौर मस्तकके सात छिद्रोक भाषारपर वे इन्द्रियाँ विशेषित है । सिद्धान्त-मस्तकके छिन्द्रोंके विना मन्य हस्त मादिका वेदमें कयन है, पता व वत् कार्य के अनुसार एकादश इन्द्रिया जाननी चाहिए। पूर्वपक्षी-इन्द्रियो सात ही हैं, क्योकि 'सप्त प्राणाः०' ( उससे सात प्राण उत्पन्न होते हैं ) यह सामान्य बुति है, और 'सप्त वै.' (निश्चय सात ही मस्तफस्य प्राण- इन्द्रियाँ है ) इस प्रकार मस्तक गत सात छिद्रोंमें विशेषित है। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-मस्तक निष्ठ इन्द्रियोंसे अतिरिक्त हस्त मादि भी वेदमें कहे गये है। 'हस्त और मादतव्य ग्रहण करने योग्य वस्तु, उपस्थ पोर पानग्दयितव्य, पायु और विसर्जनीय, पाद मौर गन्तव्य-स्थान इत्यादि श्रुतिसे कहे गये है। इसलिए वेदसे निश्चय होनेपर 'दर्शन, श्रवण, घाण, पास्वादन, स्पर्शन, ममिवदन, पादान, गमन, यानन्द, विसर्ग पौर ध्यान इस प्रकार एकादश व्यापारोंके उपलब्ध होनेसे उनके साधनरूपसे ईन्द्रियाँ भी एकादर है, ऐसा स्वीकार करना चाहिए।२। सृतीय प्रधिकरणको रचना करते हैं- * मादिना "पायुश्च विसर्जयितव्यं च । पादौ च गन्तव्यं च" इति भाष्यदर्शितं ज्ञेयम् ।
ग माषानुवादसहिता [प्र०२पा० ४ मषि० ३] व्यापीन्यणनि वाक्षाणि सांख्य व्यापित्वमूचिरे। वृत्तिलामस्तत्र देहे तत्र कर्मवशाद्भवेत् ॥ ५॥ देहस्थवृत्तिमद्भागेष्वेवाक्षत्वं समाप्यताम् । उत्क्रान्त्यादिश्रुतेस्तानि पनि स्युरदर्शनात् ॥६॥ 'सवंगतानामिन्द्रियाणां तत्तच्छरीरावच्छिन्नमदेशेषु तत्तज्जीवकर्मफलो- पभोगाय वृत्तिलाभो भवति' इति यत्सांख्यैरुक्तम् । तदयुक्तम् । कल्पनागौरवप्रसमात् । देहाच्छिन्नवृत्तिमद्भागैरेवाशेषध्यवहार. सिद्धी किमनया वृत्तिरहितानां सर्वगतानामिन्द्रियाणां कल्पनया। किंच भूतिमत्कान्तिगत्यागतीर्जीवस्य प्रतिपादयति । ताश्च सर्वगतस्य जीवस्य न मुख्याः संभवन्तीति मुख्यत्वसिद्धपर्थमिन्द्रियोपाधिः स्वीकृतः । यदि सोऽप्युपाधि: सर्वगतः स्यात्, कुतस्तह रकान्त्यादयो मुख्याः संभवेयुः। तस्मादसर्वगतान्यक्षाणि। मध्यमपरिमाणेष्वेवादृश्यत्व विवक्षया सूत्रकारेणाणुशब्द प्रयुफः ।। ३ ।। (पपुणे प्रारणस्य जन्यताधिकरणे धूतम् ) श्रेष्ठश्च ॥८॥ सन्देह-इन्द्रियां व्यापक हैं अथवा परषु ? पूर्वपस-उस-उस देहमें कर्मको सामर्थ्यसे वृत्तिलाम होता है, अतः इन्द्रियाँ व्यापक हैं, ऐसा सास्य कहते हैं। सिद्धान्त-देहस्थ वृत्तिमद्भागोंमें ही इन्द्रियत्व समाप्त हैं, बाहर नहीं हैं। इसलिए इन्द्रियो मणु हैं, क्योंकि उस्लान्ति प्रादि श्रुति है भोर वे भप्रत्यक्ष हैं। सांस्य जो कहते हैं--पर्वगत इन्द्रियोको सत्-तत् शरीरावच्छिन्न प्रदेशों में तत्-तव बीवके कर्मफल उपभोगके लिए वृत्तिलाभ होता है । सिद्धान्तो-वह युक्त नहीं है, क्योंकि ऐमी अल्पना करनेसे गौरव प्रसंग है। पदि देहावच्छिन्न वृत्तिमद्भगों द्वारा ही मम्पूर्ण व्यवहारकी मिद्धि हो सकती है, तो वृत्ति रहिव सर्वगत इन्द्रियोंकी इस कल्पनासे क्या प्रयोजन ? किन घुति बीवको उत्क्रान्ति, गति मोर पागतिमा प्रतिपादन करती है। मगत जीवको मुख्य नहीं हो सकती। पतः मुख्यत्व सिद्धिके लिए इन्द्रियरूप उपाधि स्वीकृत की गई है । यदि वह उपाधि भी सर्वगत हो, तो उत्तान्ति मादि मुख्य से होंगे? इमसे इन्द्रियाँ प्रध्यापक हैं। मध्यमपरिमाणों में अदृश्यत्वको विवक्षासे सूत्रकारने प्रणुशन्नका प्रयोग किया है ॥३॥ चतुर्ष पधिकरणकी रचना करते हैं- १. 'प्राणो वाव ज्येा ग्रेटा (घा. श) इति श्रुतिनिर्देशः । ग - -- [म०२ पा० ४ मधि० ४] वैयासिकन्यायमाला १४० चतुर्थाधिकरणमारचयति-- मुख्या प्राणः स्यादनादिर्जायते वा न जायते । पानीदिति प्राणचेष्टा प्रावसृष्ट! श्रयते यतः ।।७।। पानीदिति ब्रह्मसत्त्वं प्रोक्त वातनिषेधनात् । एतस्माज्जायते प्राण इत्युक्त रेष जायते ॥ ८ ॥ मुखबिले संचरन्नुच्छुवासकारी यो वायुः स प्राणः सोऽनादिः । कुतः। "नासदासीत्" इति सूक्त "पानीदवातम्" इति 'पानीत्' शब्देन सृष्टः प्राक्पा गचेष्टाश्रवणात् । इति प्राप्ते ब्रूमः-'पानीत्' शब्दो न प्राणव्यापारं वक्ति। "मवातम्" इति तग्निषेधात् । किं तहिं ब्रह्मसत्त्वं ब्रूते । "सदेव सोम्येदमप्र प्रासीत्' इत्या- दिभिः सृष्टिप्रागवस्थाप्रतिपादकश्रुत्यन्तरैः समानार्थत्वात् । 'एतस्माज्जायते प्राणः (मु० २।१।३) इति श्रुतिस्तु स्पष्टमेव प्राणजन्म प्रतिपादयति । तस्मादि- न्द्रियवत्प्रापो जायते ॥४॥ सन्देह -मुख्य प्राण मनादि है अथवा उत्पत्र होता है ? पूर्वपक्ष -प्राण उत्पन्न नहीं होता मर्यात पनादि है, क्योंकि 'मानीत्' इस शब्दमे सृष्टिके पूर्व में प्राणकी चेष्टा सुनी जाती है। सिद्धान्त 'पानी' शब्दसे ब्रह्मकी सत्ता कही गई है और प्राणके व्यापारका निषेध किया गया है, एवं 'एतस्माजायते प्राणः' इम श्रु विसे प्राणकी उत्पत्ति स्पष्ट है । इसलिए प्राण उत्पन्न होता है। पूर्वपक्षी-मुखविवरमे संघार करनेवासा उच्छ्वासकारी जो वायु वह प्राण है। वह अनादि है, क्योंकि 'नासदामीत्' (प्रसत् नहीं था ) इस सूक्तमे 'मानीदवताम्' (यह अकेला वात वजित था ) इसमें 'मानीव' शब्दसे सृष्टिके पूर्वमे प्राणका व्यापार सुना जाता है। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-'पानीत' शब्द प्राणके व्यापारको नहीं कहता, क्योकि 'अवातम्' इस श्रुति वाक्यसे उसके व्यापारका निषेध है। किन्तु ब्रह्मकी सत्ताको कहता है, क्योकि 'सदेव मोम्य'० ( हे सोम्य ! उत्पत्तिके पहले यह सब ही था ) इत्यादि तिके साय सृष्टिके पहले अवस्था प्रतिपादक मन्य श्रुतियोका समान पर्ष है । 'एतस्माजायते' ( उससे प्राण उत्पन्न होता है) यह युति तो स्पष्ट ही प्राणोत्पत्तिका प्रतिपादन करती है। प्रतः इन्द्रियोंके समान प्राण भी उत्पन होवा है ॥४॥ सद भाषानुवादसहिता [अ०२पा० ४ अधि०५] (पञ्चमे प्राणस्य तत्त्वान्तरताधिकरणे सूत्राणि) न वायुक्रिये पृथगुपदेशात् ॥ ६॥ चक्षुरादिवत्तु तत्सह- शिष्टयादिभ्यः ॥ १०॥ अकरणत्वाच्च न दोपस्तथा हि दर्शयति ॥ ११॥ पञ्चवृत्तिर्मनोवद्व्यपदिश्यते ॥ १२ ॥ पश्चमाधिकरणमारचयति- वायुतिक्रिया वाऽन्यो वा प्राणः श्रुतितोऽनिलः । सामान्येन्द्रियवृत्तिर्वा सांख्यैरेवमुदीरणात् ॥६॥ भाति प्राणो वायुनेति भेदोक्त रेकताश्रुतिः । वायुजत्वेन सामान्यवृत्ति क्षेष्वतोऽन्यता ॥१०॥ बाह्यवायुरेव वेणुरन्ध्रवन्मुखच्छिद्रे प्रविश्यावस्थितः प्राणनाम्ना व्यपदि- श्यते। न तु प्राणो नाम किंचित्तत्वान्तरमस्ति। कुतः । यः प्राणः स वायुः' इति श्रुतेः अथवा पञ्जरस्था यथा बहवः पक्षिणः स्वयं चलन्ता परमपि चालयन्ति, एवमेकादशाक्षाणि स्वस्वव्यापारद्वारा देहं चेष्टयन्ते । तत्र देहवाल- नाख्यो योऽयं सर्वेन्द्रियसाधारणो व्यापारः स प्राणो भविष्यति । तथा च सां ख्यरक्तम्-'सामान्यकरणवृत्ति: प्राणाद्या वायवः पञ्च, इति । तस्मान तत्त्वा- न्तरं प्राणः। पश्चम मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह प्राण वायु है, इद्रियोका सामान्य व्यापार है अथवा उन दोनोंसे पृथक सत्त्व है? पूर्वपक्ष-'या प्राणा सपायुः' इस श्रुतिसे प्राण वायु है मथवा इन्द्रियोंका सामान्य प्यार है, क्योकि सांपोंने ऐसा कहा है। सिद्धान्त--'प्राणो वायुना माति' ( वायुसे प्राण अभिव्यक्त होता है) इस प्रकार अतिमें वायु मोर प्राणका भेद प्रतिपादित है, पोर 'य: प्राणः सः वायु:' यह एकता प्रतिपादक ऋति कार्य कारणके मभेदसे उपपन्न होगी । इन्द्रियोंका सामान्य व्यापार भी नहीं है, मतः वायु पोर इन्द्रियों के सामान्य व्यापारसे प्राण पृथक् है । पूर्वपक्षी-बाह्य वायु ही बेणु छिद्रके समान मुस्तविवरमें प्रवेशकर स्थित हमा प्राण नामसे कहा जाता है। किन्तु प्राण नामका कोई पृथक पदार्थ नहीं है, क्योंकि 'या प्राणः स वायुः' (जो प्राण है वह वायु है ) ऐसी ऋति है। अपवा जैसे पिंजरेमें स्थित महत पक्षी स्वयं पलठे हुए पिंजरेको भी चलाते हैं। वैसे ही एकादश इन्द्रियाँ पपने अपने व्यापारद्वारा देहको चेष्टित करती हैं। उसमें जो यह देहका पासन है वह सब इन्द्रियोका सामान्य व्यापार है। वहीं प्राण है। जैसे कि 'सामान्यकरण- [म०२ पा० ४ अषि०६] वैयासिकन्यायमाला इति प्राप्ते भ्रूमः-"प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः । स वायुना ज्योतिषा भाति च सपति च" (छा० ३.१८॥४) इति श्रुत्यन्तरे चतुष्पाब्रह्मोपासनप्रसझे. नाऽऽध्यात्मिकमारणस्याऽघिदेविकवायोश्चानुग्नाह्यानुग्राहकरूपेण भेदः स्पष्टमेव निर्दिष्टः । अत: "य: प्राणः स वायुः" इत्येकत्वश्रुति: कार्यकारणयोरभेदवृत्त्या नेतव्या। यत्तु सांख्यरुक्तम् । तदसत् । इन्द्रियाणां सामान्यवृत्त्यसंभवात्। पक्षिणा तु चालनान्येकविधानि पसरचालनस्यानुकलानि, नतु तथेन्द्रियाणां दर्शन- श्रवणगमनादिव्यापारा एकविधाः । नापि देहचालनानूकुला । तस्मात्तत्त्वान्तरं प्राण इति परिशिष्यते ॥५॥ (पष्ठ प्राणस्यागुत्वाधिकरणे सूत्रम् ) अणुश्च ॥ १३॥ पष्ठाधिकरणमारचयति- प्राणोऽयं विभुरल्पो वा विभुः स्यात्प्लुष्युपक्रमे । हिरण्यगर्भपर्यन्ते सवंदेह समोक्तितः ॥११॥ वृत्तिः' (करणोंका सामान्य व्यापार प्राण अपान मादि पाच वायु हैं ) इस प्रकार सापोने कहा है। इसलिए प्राण अन्य तत्व नहीं है । सिद्धान्ती-ऐमा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-'प्राण एव०' (प्राण ही ब्रह्मका चौथा पाद है, चायुरूप ज्योतिद्वारा अभिव्यक्त होता है और तपता है ) इस प्रकार अन्य विमें चतुणाद ब्रह्मकी उपासनाकै प्रसङ्गमे प्राध्यात्मिक प्राणका मौर माधि- दैविक वायुका उपकार्य-उपकारकरूपसे भेद स्पष्ट ही निर्दिष्ट है। अत: 'य: प्राणः स वायुः' यह मभेद प्रतिपादक श्रुति कार्यको कारणके मभेदवृत्ति ममझनी चाहिए। 'सामान्यकरणवृत्तिः' यह जो सांस्योने कहा है वह प्रसङ्गत है, क्योकि इन्द्रियोंकी सामान्यवृत्ति नहीं हो सकती। पक्षियोमे तो पिञ्जरेके चालनके अनुकूल एक प्रकारके बालनरूप व्यापार हो सकते हैं। परन्तु इस प्रकार इन्द्रियोके दर्शन, श्रवण, गमन मादि व्यापार एक प्रकारके नहीं हैं और वे देह चालनके अनुकूल भी नहीं है। इससे प्राण पृथक् तत्त्व है। यह परिशेष है ॥ ५ ॥ षष्ठ मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-यह प्राणु विनु है अथवा परिच्छिन है ? पूर्णपक्ष [-व्यापक है, क्योकि प्लुषि मोर मशकसे लेकर हिरण्यगर्भ पर्यन्त सब देहोमें समानताका कथन है। * 'भात्यभिव्यज्यो । मभिव्यक्ता मस्तमति कार्यक्षमो भवतीत्यर्थः' इति रत्नप्रभा ।
भाषानुवादसहिता [प्र०२ पा० ४ मधि०७ समष्टिव्यष्टिरूपेण विभुरेवाऽघिदेविकः। आध्यात्मिकोऽल्पः प्राणः स्याददृश्यश्च यथेन्द्रियम् ।। १२ ।। प्लुपि म मशकादपि न्यूनकायः पुत्तिकाख्यो जोषः। तमारभ्य सर्वात्म- कहिरण्यगर्भपर्यन्तेषु देहेषु तैस्तैहै। समत्वं प्राणस्य श्रयते–'समः प्लुपिणा समो मशकेन, समो नागेन, सम एभिघिमिर्लोकी समोऽनेन सर्वेण' (बृहक १३३२२) तस्मातु-व्यापी प्राणः। इति प्राप्ते ब्रूमः-अधिदैविकस्य हिरण्यगर्भप्राणस्य समाष्टिरूपेण व्यष्टिरू- पेरण चावस्थानाविभत्वमस्तु । 'वायुरेव व्यष्टि, वायुरेव समष्टि.' इति श्रुतेः । तदेव विभुत्वं—'समः प्लुपिणा' इत्यादिश्रुतावुपासनाथ प्रश्चितम् । अध्या- स्मिकस्तु प्राण इन्द्रियवददृश्या परिच्छिन्नश्च ॥ ६ ॥ ( सप्तम इन्द्रियाणा देवपरतन्त्रताधिकरणे सूत्राणि) ज्योतिराद्यधिष्ठानं तु तदामननात् ॥ १४ ॥ प्राणवता शब्दात ॥ १५ ॥ तस्य च नित्यत्वात ॥ १६ ॥ सप्तमाधिकरणमारचयति- स्वतन्त्रा देवतन्त्रा वा वागाद्याः स्युः स्वतन्त्रता । नो चेद्वागादिजो भोगो देवाना स्यान्न चात्मनः ॥ १३॥ सिद्धान्त-अधिदैविक प्राण समष्टि-व्यष्टिरूपसे व्यापक ही है । परन्तु प्राध्यात्मिक प्राण तो इन्द्रियोके समान परिच्छिन्न और अदृश्य है। पूर्णपक्षी-प्लुषि-मशकसे भी छोटा पूत्तिका नामक जीव है, उससे लेकर सर्वात्मक हिरण्यगर्भ पर्यन्त सब देहोंमें उन उन देहोके साथ प्राणके तुल्यत्वका श्रवण है । 'समः प्लुषिणा.' (पूत्तिकाके समान, मच्छरके समान, हाचीके समान, इन तीनो लोकोके और इन सबके समान ) इससे प्राण व्यापी है । सिद्धान्ती-ऐमा होनेपर हम कहते हैं-आधिदैविक हिरण्यगर्भकमाएकी समष्टि और व्यष्टिरूपसे मवस्थिति होनेसे यह भले ही व्यापक हो, क्योंकि 'वायुरेव.' (वायु ही व्यष्टि और वायु ही समष्टि है ) ऐसो श्रुति है । वही विमुत्व समः प्लुषिणा' इत्यादि अतिमे उपासनाके लिए प्रपञ्चित है। प्राध्यात्मिक प्राण तो इन्द्रियोके समान मदृश्य पौर परिच्छन्न है ॥६॥ सप्तम भधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-वाक् प्रादि इन्द्रिया स्वतन्त्र हैं अथवा देवताके अधीन ? पूर्वपक्ष- स्वतन्त्र हैं, यदि स्वतन्त्र नहीं हैं तो वाक् भादि इन्द्रिय जन्य भोग देव- तापोको प्राप्त होगा जीवात्माको नहीं।
[म०२ पा० ४ अधि०८] यासिकन्यायमाला १५१ -- श्रुतमग्न्यादितन्त्रत्वं भोगोऽन्यादेस्तु नोचितः। देवदेहेषु सिद्धत्वाज्जीवो भुक्त स्वकर्मणा ॥१४॥ वागादीन्यक्षारिण स्वस्वविषयस्वातन्त्र्येण प्रवर्तन्ते, न तु देवतापरतन्त्राणि । अन्यथा वागादिजन्यस्य भोगस्य देवाना भोक त्वान्न जीवात्मनो भोग: स्यात् । इति प्राप्ते ब्रूमः-'अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशत्' इत्यादी वागादीनाम- गन्याद्यनुगृहीतत्वं भ्रूयते। ततो देवतापरतन्त्रैर्वेन्द्रियवृत्तिः। न चेतावता देव- तानामत्र भोक त्वम्, महापुण्यफलं देवत्वं प्राप्तानामधमभोगस्यानुचितत्वात् । देवतादेहेषु परमभोगस्य सिद्धात्वाच्च । मनुष्यादिजीवस्तु देवप्रेरितेप्यक्षरापादितं भोग स्वकर्मफलतया भुक्त इत्युपपद्यते । तस्माद्देवतापरतन्त्राणोन्द्रियाणि ॥७॥ (पष्टम इन्द्रियाणा प्राणात्तत्त्वन्तरत्वाधिकरणे सूत्राणि) त इन्द्रियाणि तद्वथपदेशादन्यत्र श्रेष्ठात् ॥१७॥ भेदश्रु ते ॥१८॥ वैलक्षण्यात् ।। १६॥ प्रष्टमाधिकरणमारचयति- प्रारणास्य वृत्तयोऽक्षाणि प्राणात्तत्त्वान्तराणि वा। तद्रूपत्वश्रुते. प्रारनाम्नोत्तत्वाच्च वृत्तयः॥ १५॥ सिद्धान्त-वागादि इन्द्रियाँ परतन्त्र हैं, क्योकि श्रुतिमे वे अग्नि प्रादि देवतामों के मधीन कही गई हैं, भोग भी अग्नि प्रादि देवतामोको उचित नहीं है, क्योकि उनका भोग देव देहोम मिद्ध है । अतः जीव ही स्वकर्मानुसार भोग भोगता है। पूर्वपक्षी-वागादि इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयमे स्वतन्त्र रूपसे प्रवृत्त होती हैं। देवताके मधीत नही हैं । अन्यथा वागादि जन्य भोगकै देवता भोक्ता होगे जीवात्माको भोग प्राप्त नही होगा अर्थात् जीव भोक्ता नही होगा। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-'अग्निर्वाग्भूत्वा०' (अग्नि वाणी होकर मुखमें प्रविष्ट हुई ) इत्यादि पुतिमे वागादि इन्द्रियां अग्नि आदि देवतामोसे अनुगृहीत ज्ञात होती हैं । प्रतः देवतामोके अधीन ही इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति होती है। इससे यहाँ देवतामोमे भोक्तृत्व नहीं है। महापुण्य फलरूप देवत्वको प्राप्त करनेवालोके लिए मधम भोगकी प्राप्ति अनुचित है, क्योकि उनका देवदेहोमें उत्तम मोग सिद्ध है। मनुष्य मादि जीव तो देवोसे प्रेरित इन्द्रियोसे सम्मादित अपने कर्मका फल भोगते हैं, ऐसा उपपन्न होता है । इसलिए इन्द्रियाँ देवपरतन्त्र हैं ॥७॥ मष्टम अधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-इन्द्रियाँ प्राणको वृत्तियों है भयवा प्राणसे पृथक् तत्त्व हैं।
मापानुवादसहिता [अ०२ पा० ४ अधि०८) श्रमाश्रमादिभेदोके गाणे तद्पनामनी। मालोचत्वेनात्यानि प्रारी नेतासदेहयोः ॥ १६ ॥ वागादीन्यक्षाणि मुख्यप्राणवृत्तयो भवितुमर्हन्ति । कुतः । तेषां प्रारूप- त्वश्रवणात् "हन्तास्यैव सर्वे रूपमासमिति। त एतस्यैव सर्वे रूपमभवन्" (बृह- १३३१२) इति श्रुतेः किंच प्राणशब्देनैव तानि लोके व्यवह्रियन्ते निय- माणस्य नाद्यापि प्राणा निर्गच्छन्ति" इत्यादौ । श्रुतिश्च वागादीनां प्राणनाम- कतामाह--- ह.-"न वै वाचः, न चक्षूपि, न श्रोत्राणि, न मनासि, इत्याचक्षते । प्राणा इत्येवाऽऽचक्षते" इति । तस्मान प्राणादन्यानि तत्वानि । इति प्राप्ते ब्रमः-"तानि मृत्युः श्रमो भूत्वोपयेमे। तस्माच्छ्राम्यत्येव वाक' (बृह० १६५।२१) इत्यादिना वागादीना स्वस्वविषयेषु धान्तिमभिधाय 'मथेममेव नाशप्नोत्' योऽयं मध्यमः प्राणः'यः संचरंश्चासंचरंश्च न व्यथते' इति प्राणस्य स्वव्यापारे श्रान्त्यमावमाह अयमेको भेदः । तथा प्राणसंबादे वागादिनिर्गमन- प्रवेशयोहस्य मरणोत्थानाभावमभिधाय प्राणनिर्गमनप्रवेशयोमरणोत्याने पूर्वपक्ष- इन्द्रियां प्राणकी वृत्तियां हैं, क्योंकि तद्पताको श्रुति है और प्राण शब्दसे इन्द्रियों का व्यवहार होता है। सिद्धान्त-इन्द्रिया प्राणसे पृथक हैं, क्योकि श्रम मीर प्रश्रम आदि भेदका कथन है, मठएव प्राणरूपता और प्राण नाप जो इन्द्रियोंमे कहा गया है वह गौण है। भौर पालोचकरूप होनेसे इन्द्रिया पृथक् हैं, और प्राण देह और इन्द्रियोका नेग है। पूर्वपक्षी-वागादि इन्द्रिया मुख्यप्राणकी वृत्तिया हो सकती हैं, क्योंकि उनमें प्राणरूपताको अति है । 'हन्तास्यव० (हर्ष । हम सब इन्द्रियाँ इमी प्राणके रूप हो, वे सब इमी प्राणके रूप हो गये ) ऐमी श्रुति है। किच लोकमें प्राणशब्दसे इन्हीं इन्द्रियोंका व्यवहार होता है-मरनेवालेके अभी तक प्रारण नहीं निकलते हैं, इत्यादिमे । और न वाच: न वाणो हैं, न चक्षु हैं, न श्रोत्र है. न मन हैं, ऐसा कहते हैं, प्राण हैं, ऐसा ही कहते हैं ) इसलिए इन्द्रियाँ प्राणसे अन्य तत्त्व नहीं है । सिदान्ती-ऐमा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-'तानि मृत्यु:०' (मृत्युने धर्म होकर उनको व्याप्त किया, इमर्स वाणो श्रान्त होती है ) इत्यादि अतिसे वाक् भादि इन्द्रियोंके अपने-अपने विषयमें प्रमको कहकर 'प्रथममेव.' ( परन्तु यह मध्यम प्राण मृत्युसे मातान्त नहीं होता, जो देहादिमें मंचार करता, मंवार नहीं करता हमा भी श्रान्त नहीं होता) इस प्रकार यह श्रुचि प्राणको स्वव्यापारमे धमका प्रभाव कहती है। यह एक भेद है । इसी प्रकार अति प्राणमबादमे वागादिके निर्गमन पौर प्रदेशमें देहके मरण मोर उत्थानका मभाव कहकर प्राणके निर्गमन मोर प्रवेशमें मरण मोर उत्थान [म०२ पा० ४ अधि०६] वैयासिकन्यायमाला १५३ दर्शयति । मत एवमादिभेदोक्तेर्वागादीनो प्राणरूपत्वं प्राणनामत्वं च गौणम् । भूत्यन्यायेन प्राणानुवर्तित्वात् । व्यवहारभेदश्च भूयानुपलभ्यते। स्वं स्वं विषय परिच्छिद्याऽऽलोचकानीन्द्रियारिण, प्राणस्त्वक्षाणां देहस्य च नेता। तस्मात्- बहुवैलक्षण्यात्प्राणात्तत्त्वान्तराणीन्द्रियाणि ॥ ८॥ (नवम ईश्वरस्यैव नामरूपव्याकर्तृत्वाधिकरणे सूत्राणि) संज्ञामूर्तिक्तृप्तिस्तु त्रिवृत्कुर्वत उपदेशात् ।। २० ॥ मांसा. दिभौम यथाशब्दमितरयोश्च ॥२१॥ वैशेप्यात तद्वाद- स्तद्वादः॥२०॥ नवमाधिकरणमारचयति- नामरूपव्याकरणे जीवः कर्ताऽथवेश्वरः। अनेन जोवेनेत्युक्तेर्व्याकर्ता जीव इष्यते ॥ १७ ॥ जीवान्वयः प्रवेशेन संनिधेः सर्वसर्जने। जीवोऽशक्तः शक्त ईश उत्तमोक्तिस्तथेक्षितुः ॥१८॥ ईश्वरेण पञ्चभूतेषु सृष्टेषु मौतिकयोदृश्यमानयोर्महीधरादिनामरूपयोर्जीव एव स्रष्टा स्यात् । कुत: 'पनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि' (छा० ६३२) इति जोवरूपस्यैव सृष्टावन्वयश्रवणात् । दिखलाती है। इसलिए इत्यादि भेदके कथनसे वागादिमे प्राणरूपता और प्राण शब्द व्यवहार गौण हैं । इन्द्रियाँ भृत्यन्यायसै प्राणका अनुवर्तन करती हैं, प्राण मौर इन्द्रियों- का बहुन व्यवहारभेद उपलब्ध होता है। अपने-अपने विषय परिच्छेद द्वारा इन्द्रियाँ मालोचक हैं । प्राण तो इन्द्रियो और देहका नेता है । अतएव अत्यन्त लक्षण्यसे प्राण से इन्द्रियाँ भिन्न तत्त्व हैं ।। ८॥ नवम भधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह -नाम और रूपके व्याकरण-स्थूलीकरणमें जीवकर्ता है अथवा ईश्वर है ? पूर्वपक्ष--'अनेन जीवेन' इस श्रुतिकथनसे जीव ही व्याकर्ता इष्ट है । सिद्धान्त-नाम पोर रूपका व्याकर्ता ईश्वर ही है, क्योकि सब वस्तुप्रोको सृष्टिमें जीव समर्थ नहीं है किन्तु ईश्वर ही समर्थ है, और 'मनेन जीवेन' इत्यादि श्रुतिमे उत्तम पुरुषको उक्ति ईश्वरमें घटती है । जीवका अन्वय संनिधिसे केवल प्रवेशके साथ है । पूर्वपक्षी-ईश्वरद्वारा पांच भूतोके उत्पन्न होनेपर दृश्यमान भौतिक महीघर मादि नाम-रूपका स्रष्टा जीव हो है, क्योकि 'अनेन जीवेन' (इस जोवरूपसे मनुप्रवेशकर नाम-रूपका व्याकरण करू ) इस प्रकार सृष्टिमें जोवरूपमे ही मन्वयका श्रवण है।
भाषानुवादसहिता [प्र. २ पा० ४ अधि०६] इति प्राप्त ब्रूमः-"जीवनानुप्रविश्य” इति प्रवेशेनेव जीवोऽन्वेति, सैनि- हितत्वात् । 'जीवेन व्याकरवाणि' इत्युक्तो व्यवहितान्वय: स्यात् । नहि जीवस्य गिरिनदोनिर्माणे शक्तिरस्ति । ईश्वरस्तु सर्वशक्तियुक्तः । “पराऽस्य शक्तिविवि- धैव श्रूयते" इति श्रवणाद। किंच 'ध्याकरवाणि' इत्युत्तमपुरुषोऽपोश्वरपक्षे समञ्जसः । तस्मादीश्वर एव नामरूपयोः स्रष्टा । कथं तर्हि घटपटादौ कुलालाद- निर्मातृत्वम्। 'ईश्वरप्रेरणात्' इति ब्रूमः। तस्मादीश्वर एव सर्वकर्तति सिद्धम् ।। इति श्रीमारतीतीर्थमुनिप्रणीतायां वैयासिकन्यायमालायां द्वितीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः॥ ४ ॥ द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः॥२ मादितः प्रधिकरणानि सूत्राणि ३६२ अत्र पादे २२ सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-'जीवेनाऽनुप्रविश्य' इस प्रकार प्रवेशके माप ही जीवका सनिधिसे मन्वय है। 'जीवेन ब्याकरवाणि' ऐसा कहनेपर व्यवहितका अन्वम होगा। जीवको पर्वत, नदी भादिके निर्माण में शक्ति नहीं है, ईश्वर तो मर्वशक्तिमान है, क्योंकि “पराऽस्य.', (इस ईश्वरकी पराशक्ति भनेकरूपोंमें श्रवण होती है ) ऐसौ श्रुति है । विच 'ध्याकरवाणि' यह उत्तम पुरुष मो ईश्वरपक्षामें संगत है। इसलिए नाम-रूपका स्रष्टा ईश्वर ही है, तो घट, पट मादिके प्रति कुलात मादिमें निर्मातृत्व कैसे है ? ईश्वरकी प्रेरणासे, हम ऐसा कहते हैं। इससे यह सिद्ध हुमा किमकका का ईश्वर ही है।" श्रीभारतीतीर्यमुनि-प्रणोतवयासिकन्यायपमालाके द्वितीयाध्यायके चतुर्ष पादका स्वामी सत्यानन्द सरस्वती' कृत भाषानुवाद ॥४॥ द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः।
[अ०३ पा० १ मधि० १ ] वैयासिकन्यायमाला अथ तृतीयाध्यायस्य प्रथमः पादः ये साधनाख्यायध्याये प्रथमपादे गत्यागतिचिन्तावैराग्यनिरूपणविचारश्च) [साधन नामक इस तृतीय अध्यायके प्रथमपादमे जीवको संसारगति, भागविका विचार मौर वैराग्य निरूपण विचार किया जाता है। (प्रपमे जीवस्य भूतसूक्ष्मवेष्टितस्यैव परलोकगमनागमनधिकरणे सूत्राणि) तदन्तरप्रतिपत्तौ रहति संपरिष्वक्तः प्रश्ननिरूपणाभ्याम् ॥ १॥ यात्मकत्वात्तु भूयस्त्वात् ।। २॥प्राणगतेश्च ॥३॥ अग्न्यादिगतिश्रु सेरिति चेन्न भाक्तत्वात् ।। ४ ॥ प्रथमेऽ- श्रवणादिति चेन्न ता एव ह्युपपत्तेः ।।५।। अश्रु तत्वादिति चेन्नेष्टादिकारिणां प्रतीतेः ॥ ६॥ माक्तं वाऽनात्मभावि. त्वातथा हि दर्शयति ॥७॥ तृतीयाध्यायस्य प्रथमपादे प्रथमाधिकरणमारचयति- प्रवेष्टितो वेष्टितो वा भूतसूक्ष्मैः पुमान्व्रजेत् । भूतानां सुलभत्वेन यात्यवेष्टित: एव सः॥१॥ बोजाना दुर्लभत्वेन निराधारेन्द्रियागते. । पञ्चमाहुतितोक्तेश्च जोवस्तैर्यातिवेष्टितः ।।२।। पूर्वपादप्रतिपादितप्राणोपाधिको जीव शरीरान्तरमाप्तिवेलायामितो निर्ग- च्छन्भाविशरीरयोजेः सूक्ष्मभूतैरवेष्टितो गच्छति। पञ्चभूताना सर्वत्र सुलभ- स्वेनेतो नयनस्य निरर्थकत्वात् । तृतीय प्रध्यायके प्रथम पादमे प्रथम मधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-जीव मरनेके मनन्तर भूतोसे प्रवेष्टित जाता है अथवा वेष्टिव ? पूर्वपक्ष [--वह प्रवेष्टित ही जाता है, क्योकि मूक्ष्म भूत सर्वत्र सुलभ हैं। सिद्धान्त-जीव सूक्ष्म भूतोसे वेष्ठिन-युक्त हो जाता है, क्योकि भूतोके सुलभ होने- पर भी देहके बीजभूत सूक्ष्मभूत सर्वत्र दुर्लभ हैं, निराधार इन्द्रियोको गति नही होती, पौर पञ्चम पाहुतिकी उक्ति है । पूर्वपक्षी-पूर्वपादमें प्रतिपादित प्राणोपाधिक जीव अन्य शरीरकी प्राप्तिके समय इस शरीरसे निकलते हुए भावी शरीरके बीजभूत सूक्ष्मभूतोसे मवेष्टित होकर जाता है, क्योकि पांच भूत सर्वत्र सुलभ हैं, इसलिये उनको यहाँसे माय ले जाना निरर्थक है।
१५६ भाषानुवादसहिता [अ० ३ पा० १ मधि०२] इति प्राप्ते ब्रूम:-भूतमात्रस्य सुलभत्वेऽपि देहबोजानि न सर्वत्र सुलभानि। तस्मादितो नेतव्यानि । किंच जीवोपाधिभूतेन्द्रियाणां भूताधारमन्तरेण पर लोकगमनं न संभवति । जीवदशायामदर्शनात् । श्रुतिश्चेवमाह--'पश्चम्यामाहु- तावापः पुरुषवचसो भवन्ति' (छा० ५।६।१) इति । अस्या प्रयमर्थ:-ह्युलोक- पर्जन्यपृथिवीपुरुषयोपितः पञ्च पदार्था उपासनायामग्नित्वेन परिकल्पिताः । तेष्वग्निपु स्वर्गाय गच्छन्पुनरागच्छंश्च जीव आहुतित्वेन परिकल्पितः । इष्टापू संकारी जीवः स्वर्गमारुह्योपभोगेन कर्मणि मोणे पर्जन्ये पतित्वा वृष्टिरूपेण भूमि प्राप्प, अन्नद्वारेण पुरुषं प्राप्य रेतोद्वारेण योषितं प्रविश्य शरीरं गृह्णाति । ततोऽशब्दोपलक्षितानि देहबीजानि पञ्च भूताति जीवेन सह धुलोकादिपञ्च- स्थानेषु गत्वा पञ्चमस्थाने शरीरभावं प्राप्य पुरुषशब्दवाच्यानि भवन्तीति । तस्थाठोजेष्टित एव परलोकं गच्छति ॥१॥ (द्वितीये स्वर्गादवरोहतो जीवस्य सानुशयत्वाधिकरणे सूत्राणि) कृतात्ययेऽनुशयवान्दृष्टस्मृतिभ्यां यथेतमनेवं घ॥॥ चरणादिति चेत्रोपलक्षणार्थेति काणजिनिः॥6॥ श्रानर्थक्यमिति चेन्न तदपेतत्वात् ॥१०॥ सुकृतदुष्कृते एवेति तु पादरिः॥ ११॥ सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं--सामान्यभूत सर्वत्र सुलभ होनेपर भी देहके बीजभून सूक्ष्म भून सर्वत्र सुलभ नहीं है, इमसे यहाँमे ले जाने चाहिए। किंच जीवके उपाधिभूत इन्द्रियोका भूतोके आपारके विना परलोक गमन संभव नहीं है। क्योंकि जीवनदशा ऐमा देखा नहीं जाता। 'पशम्यामाहुली' (पाचवी माहुतिमें जल शरीरमंजक होता है ) यह श्रुति भी ऐसा ही कहती है। इसका यह मर्थ है- स्वर्गलोक, मेघ, पृथिवी, पुरुष और स्त्री ये पांच पदार्थ उपासनामें पग्निरूपसे कल्पित है । उन अग्नियोमे स्वर्गके प्रति जाता और प्राता हुप्रा जीव आहुतिरूपसे परिकल्पित है। इष्टापूर्तकारी जीव स्वर्गमे जाकर उपभोगद्वारा पुण्यकर्म क्षीण होनेपर मेघमे गिरफर वृष्टिरूपसे पृथिवीको प्राप्तकर पुनः मन्नद्वारा पुरुषको प्राप्तकर, पुन: रेतद्वारा खीमे प्रवेशकर शरीरका ग्रहण करता है । इसलिए अपशब्दसे उपलक्षित देहके बीजरूप पाँच भूत जीवके साथ स्वर्गलोग भादि पांच स्थानोमे जाकर पांचवे स्थानमे शरीरमाव प्राप्तकर पुरुष शरीर शब्दवाच्य होता है। इससे बीज रूप सूक्ष्मभूति वेष्टित जीव परलोक जाता है ॥१॥ द्वितीय मधिकरणकी रचना करते हैं- [म०३ पा० १ प्रधि०२] वैयासिकन्यायमाला १५७ द्वितीयाधिकरणमारचयति- स्वर्गावरोही क्षीणामुशयः सानुशयोऽथवा । यावत्संपातवचनारक्षीणानुशय इष्यते ॥ ३ ॥ जातमात्रस्य भोगित्वादेक भव्ये विरोधतः । चरणश्रुतितः सानुशयः कर्मान्तरेरयम् ॥ ४॥ स्वर्गमुपभुज्य ततोऽवरोहन्पुरुषो निरनुशय इहागच्छति । अनुशयो नाम कर्मशेषः । 'जीवमनुशेते' इति व्युत्पत्तेः । न च स्वर्गादवरोहतोऽनुशयः संभवति । अनुशेयफलस्य सर्वस्य तत्रैवोपभुक्तत्वात् । अत एवावरोह विषया श्रुतिः-'याव- संपातमुपित्वाऽयैतमेवाध्वानं पुननिवर्तते' (छा० ५११०१५) इत्याह । 'संपतत्य. नेन कर्मणा स्वर्गम्' इति संपातः कर्मसमूहः। संपातमनतिक्रम्य यावत्संपातं निःशेष फर्मफलं भोक्तुं तत्रोपित्वेत्यर्थः । तस्मात्कमशेषरहितोऽवरोहति । इति प्राप्ते ब्रूमः-स्वर्गार्थमनुष्ठितस्य कर्मणः साकल्येनोपभोगेऽप्यनुपमुक्तानि संचितानि पुण्यपापानि बहुन्यस्य विद्यन्ते। अन्यथा सद्यः समुत्पन्नस्य बालस्येह सन्देह-स्वर्गसे लौटनेवाला जीव निरनुशय- शेप कर्मरहित माता है अथवा सानुशय-शेषकर्म सहित ? पूर्वपक्ष-अनुशय रहित भाता अभिप्रेत है, क्योकि 'यावत्संपात०' ऐसा श्रुति- वाक्य है। सिद्धान्त-अन्य कर्मोसे यह जीव सानुशय पाता है, क्योकि जन्म लेते बालकको सुख, दुःखका अनुभव होता है और एक ही जन्ममें सब कर्मानुशयका भोग होता है, इस मतमें विरोध है एवं चरणति है। पूर्वपक्षी-स्वर्गका उपभोग कर स्वर्गसे प्राता हुमा पुरुष अनुशय रहित संसारमें माता है । 'जीवमनुशैते' इस प्रकारकी व्युत्पत्तिसे अनुशय शब्दका अर्थ कर्मशेष है। स्वर्गसे अवरोहण-मानेवालेका मनुशय नही हो सकता है, क्योकि अनुशयका सब फल स्वर्गमें ही मोग लिया गया है, अतएव अवरोह विषयक श्रुति-~'यावत्संपातमु.' (वहाँपर नि.शेष कर्मफलके भोगके लिए रहकर अर्थात् कर्मोके क्षय होनेतक रहकर वे पुन: इसी मार्गसे जिम प्रकार गये थे उमी प्रकार लौटते हैं ) ऐसा कहती है। संपत- त्यनेन कर्मणा स्वर्गम्' 'जिस कर्ममे स्वर्गको प्राप्त होता है' वह संपात-कर्म समूह है। 'संपातका प्रतिक्रमण न कर यावत्मपात-निःशेष कर्म फल भोगनेके लिए वहाँपर रहकर' ऐमा प्रर्य है। इससे जीव कर्मशेष रहित ही लौटता है। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं--स्वर्गके लिए अनुष्ठित कर्मका पूर्ण- रूपसे उपभोग होनेपर भी अनुपभुक्त संचित बहुत पुण्य पाप कर्म इसके विद्यमान है, भाषानुवादसहिता [प्र.३ पा० १ अघि०३] जन्मन्यनुष्ठितयोधमाधमयोरभावात्सुखदु.खोपभोगो न स्यात् । यत्पत्र कैधिदु- च्येते-एकस्मिञ्जन्मन्यनुष्ठितः कर्मसमूह उत्तरस्मिन्नेव जन्मन्युपभोगेन क्षीयत इति । तदसत्। इन्द्रादिपदप्रापकाणामश्वमेघादीनाम्, विड्वराहादिदेहनापकाणा पापाना च युगपदुपभोगासंभवेन 'एकभाविक: कर्मानुशायः' इति मतस्य विरुद्ध- त्वात् । ततश्च कस्मिजन्मन्यनुष्ठिताना मध्ये कस्मिंश्चिज्ज्योतिष्टोमादिकमरिण भुक्तऽपि कुतो न कर्मान्तराण्यवशिष्येरन् । यावत्संपातशब्दश्च स्वर्गप्रदकर्मविषयो नवितरकर्मविषयः । श्रुतिश्च स्वर्गादवरुह्य पंचम्थामाहुती शरीरं गृह्णता पुरु- पाणां तद्धत्वोः पुण्यपापयोः सद्भावं दर्शयति–'य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह पत्ते रमणीया योनिमापोरन्ब्राह्मणयोनि वा क्षत्रिययोनि वा वैश्ययोनि वा, मथ इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूया योनिमापोरञ्श्वयोनि वा शूकर- योनि वा चाण्डालयोनि वा" (छा० ५३१०७) इति । रमणीयचरणाः सुकृत- कर्माएः। कपूयचरणाः पापकर्माण. 'अभ्याशो ह यत्' इत्यव्ययसमुदायस्य क्षिप्रत्वमथं तदेवं सानुशया अवरोहन्तीती स्थितम् ॥ २॥ ( तृतीपे नापिना स्वर्ग गत्पमादाधिकरणे सूत्राणि) अनिष्टादिफारिणामपि च श्रुतम् ।। १२ ॥ संयमने त्वनु- भूयेतरेपामारोहावरोही तद्गतिदर्शनात् ॥ १३॥ स्मरन्ति पन्यथा तत्क्षण उत्पन्न बालकको इस जन्ममे धर्माधर्मके अनुष्ठान न होनेसे सुख-दुःखका उपभोग नहीं होगा। जो कोई इस विषयपर कहता है-एक जन्ममे मनुष्ठित कर्म समूह भागेके जन्ममें उपभोगसे क्षय होता है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि इन्द्र मादि पदके प्रापक मश्वमेघ मादि मौर विधवाराह आदि देहवे प्रापक पाप कर्मोके युगपद उपभोगका प्रसंभव होनेसे 'ऐकभदिक. कर्मानुशय' इस मतमें विरोध है। इससे एक जन्ममें मनुष्ठित कर्मोके मध्य में किमी ज्योतिष्टोम मादि कर्म के मुक्त होनेमें भी कर्मान्नर क्यों नहीं पवशेष रहें ' 'यावत्मपात' शब्द तो स्वर्गप्रद कर्म विषयक है, इतर कर्म विषयक नहीं है, 'य इह रमणीयचरणा: (उन भनुशयी जीवोंमें जो यहाँ पुष्प कर्म करनेवाले होते है वै पीघ्र ही उत्तम योनिको प्राप्त होते हैं, वे ब्राह्मण्योनि, क्षत्रिपयोनि भपवा वैश्य. योनि प्राप्त करते हैं तथा जो यहाँ प्रशुभ प्राचरण (पापकर्म ) वाले होते हैं वे तत्काल पशुम योनिको प्राप्त होते हैं, श्वयोनि, सूकरयोनि अथवा चाण्डालयोनि प्राप्त करते है ) इस प्रकार यह अति स्वर्गसे मानेके मनन्तर पाचवी माहुतिमें शरीर प्रहण करने. वाले जीवोंके शरीरके हेतुभूत पुण्य-परपका सद्भाव दिखलाती है। रमणीयचरण-सुद्धत वर्म, कम्पधरण पापकर्म, "अम्पायो ह यत्' इस प्रपयन समुदायका प्रतिशीघ्र पर्ष है। इससे हमा कि जीव सानुगय ही स्वर्गसे भवरोहण करते हैं ॥ २ ॥ . यह सिद्ध [प्र० ३ पा० १ अधि० ३] वैयासिकन्यायमाला . च॥ १४ ॥ अपि च सप्त ॥ १५॥ तत्रापि च तद्वचा. पारादविरोधः ।। १६ ॥ विद्याफर्मणोरिति तु प्रकृतत्वात् ॥१७॥न तृतीये तथोपलब्धेः ॥ १८॥ स्मयतेऽपि च लोके ॥ १६ ॥ दर्शनाच्च ।। २०॥ तृतीयशब्दावरोधः संशोकजस्य ॥२१॥ मृतीयाधिकरणमारचयति- चन्द्र यातिन वा पापी ते सर्व इति वाक्यतः। पञ्चमाहुतिलाभार्थ भोगाभावेऽपि यात्यसौ ॥ ५॥ भोगार्थमेव गमनमाहुतिय॑भिचारिणी। सर्वश्रुतिः सुकृतिना याम्ये पापिगतिः श्रुता ॥ ६ ॥ "ये वै के चास्माल्लोकात्प्रयन्ति चन्द्रमसमेव ते सर्वेगच्छन्ति" (कोपी० १०२) इति श्रवणाचन्द्रलोकाख्ये स्वर्ग पापिनोऽपि गतिरस्ति । यद्यपि पापिनस्तान भोगो न संभवति, तथाऽपि पुनरागत्य शरीरग्रहणे चश्चमाहुतिलाभाय स्वर्ग- गतिभ्युपेया। इति प्राप्ते ब्रूम:-भोगार्यमेव हि स्वगंगमनं न पश्चमाहुतिलाभार्थम् । पञ्चमाहुतेव्यभिचारित्वाद । द्रोणादीनां योपिदाहुतरेभावात् । सीतादीनां पुरु- । तृतीय प्रधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-पापी चन्द्रलोकमें जाता है अथवा नहीं ? पूर्वपक्ष-जाता है, क्योकि 'वे सर्वे' ऐसा तिवक्य है, यद्यपि वहाँ भोगका प्रभाव है तो भी पांचवी पाहुतिके लाभार्थ वह वहाँ जाता है । सिद्धान्त-भोगके लिए ही स्वर्ग गमन है और पाचवी पाहुतिमें व्यभिचार है, पतएव 'ते सर्वे' यह अति सुकृति पुरुषों के लिए है, इससे पापी यमलोकमें जाता है, स्वर्गमें नहीं, ऐसी अति है। पूर्वपक्षी--'ये 4 के.' ( जो कोई इस लोकसे प्रयाण करते हैं वे राब चन्द्रलोकमे 'ही जाते हैं ) इम श्रुतिसे यह ज्ञात होता है कि चन्द्रलोक नामके स्वर्गमे पापी लोग भी जाते हैं, यद्यपि पापी लोगोका स्वर्ग में भोग नहीं हो सकता, तथापि पुनः पाकर शरीर प्रहाण करनेके लिए पाचवी माहुति लामार्थ स्वर्ग गमत स्वीकार करना चाहिए। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-मोगके लिए ही स्वर्ग गमन है न कि पांचवी माहुति लाभके लिए, क्योकि द्रोण मादिमें योषित् स्रोल्प पाचको भाहुतिका प्रभाव है, सीता मादिमें तो पुरुष माहुतिका भी प्रभाव है, "वे सर्वे' यह सर्व अति न भापानुवादहिता [म०१ पा०१ पि०४] पाहतेरप्यभायात् । ते सये, इति' सर्वश्रुतिरतु मुरतिविषया । पापिना तु यमलोके गतिःपता-"वैवस्वत मंगमनं जनानी या राजानं हविषा दुपस्मत" इति पापजनेगन्तव्यं यम प्रोणयत, इत्यर्थः । तस्मान पापिनां स्वर्ग गतिः ।।३।। (पशु स्वर्गावरोहे घोषवाशाशारिपुत्पत्यापिकरणे पुत्रम् ) सामान्यापतिरुपपत्तेः ॥ २२॥ चतुर्षाधिकरणमारचयति- वियदादिस्वरूपत्वं सत्याग्यं वावरोहिण।। वायुमंत्वेस्पादिवाश्यात्तत्तद्भावं प्रपपते ॥७॥ सवरसूक्ष्मो वायुवशो युचो धूमादिमिर्मवेद । मन्यस्यान्यस्वरूपत्वं मुख्यमुपपद्यते ॥८॥ स्वर्गादवरोहपार एवं धूयने-'प्रतमेवाप्यानं पुननिवर्तते यपेतमारा. मावापाद्वायु वायुमूत्वा धूमो भवति पूमो भूत्वानं मयति, मधं मूस्या मेपो भवति मेपो मूस्या प्रवर्षति" (घा०५।१०।५-१) इति । यपेतं ययागतं सपेरपर्यः। पत्र स्वर्गादवरोहतो जोवस्यावासादिस्वरूपरवं भवति । 'वायु- भूत्वा इति तत्तद्भावप्रतिपत्तेः श्रुतत्वात् । तो सुति पुरष पिक है । 'वैवस्वत संगमनम्' (पापीरनोंका यमासय स्थान है, पापियों के सम्यग्गम्य यमराजको हविषमे प्रगान करें) इस प्रकार यह पति पापोजनाका पमलोसमें गमन रहती है। पारीजनोंसे गन्तव्य यमरो प्रसन्न करें। पहप है। इसलिए पापो लोगोंकी स्वर्ग गति नहीं है ॥३॥ चतुपं पधिकरणको पना परते है- सन्देह-स्वर्गसे पवरोह करनेवाले पीर पापा पादिके स्वरूपको प्राप्त होते हैं अपवा उनके साम्यको? पूर्वपा-धापुर्भूया' इरपादि वाक्यसे ऐमा प्रतीत होता है कि तत् तत् भावको प्राप्त होते है। सिद्धान्त-अन्य मन्यका स्वरूप मुख्य नही हो सकता। किन्तु भाकाशके समान मूक्ष्म, वायु पर मोर धूम मादिसे युक्त होता है। पूर्वपक्षो-स्वर्गमे पवरोहका प्रकार इस प्रकार मुना जाता है-'भपतमेवाध्यान, (कर्म फम भोगानन्तर पुनः इसी मार्ग से जिस प्रकार गया था उसी प्रकार लौटता है, वह पहले पाकाशको प्राप्त होता है, पाकायसे वायुको, वायु होकर वह चूम होता है, पौर घूम होकर मन होता है, मन होकर मेष होता है, मेष होकर दरसता है) 'मषेव-यपागते' जैसे गया वैसे ही यह पर्य है। यहाँपर स्वर्गस लोटनेपाने जीपका [१०३ पा० १ अधि०५] वैयासिकन्यायमाला इति प्राप्ते घूम:-प्रन्यस्यान्यस्वरूपत्वासंभवादाकाशप्रतिपत्तिामाका- शवत्सोक्षम्यं रूपं विवक्षितम् । वायुभावो वायुवशता। धूमादिभावो धूमादिभिः संपर्कः, इति निर्णयः ॥४॥ (पञ्चमे स्वर्गादवरोहता त्वराविलम्बाधिकरणे सूत्रम् नातिचिरेण विशेषात ॥ २३ ॥ पश्चमाधिकरणमारवयति- प्रोह्यादेः प्राग्विलम्बन स्वरया वाऽवरोहति । तत्रानियम एवं स्पानियामकविवर्जनात् ।। ६ ।। दुःखं ग्रोहादिनिरिणमिति तत्र विशेपितः। विलम्बस्तेन पूर्वत्र वराऽर्थादवसीयते ॥ १० ॥ प्रवर्षणानन्तरं व्रीह्यादिभाव आम्नायते-" त इह व्रीहियवा ओषधिवन- स्पतयस्तिलमापा इति जायन्ते" ( छा० ५।१०।६) इति । प्रागेतस्माद्ब्राह्मादि- भावादाकाशादौ विलम्बत्वरयोनियामकाभावादनियति. । इति प्राप्ते ब्रूमः-ग्रीह्यादिभावमभिधायानन्तरम् 'प्रतो वै खलु दुनि- आकाश मादि स्वरूप होता है, क्योकि 'वायुर्भूत्वा' यह अति तद् तद् भाव-स्वरूप बोपन करती है। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं--पन्यमें मन्यको स्वरूपताका संभव न होनेसे माकाश प्रतिपत्तिसे माकाशके समान सूक्ष्मरूप विवक्षित है । वायुभावसे पायुक्शठा, धूमादिभाव-धूमादिसे संपर्क, ऐमा निर्णय है ॥ ४ ॥ पंचम भपिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-व्रीहि मादि भावसे पूर्व भनुशयी पाकाश मादिमेसे विलम्बसे अवरोह करता है अथवा अतिशीघ्रतासे । पूर्वपक्ष- इस विषयमें अनियम ही है, क्योकि नियामकका प्रभाव है । सिद्धान्त चीहि मादि भावसे निकलना करिन है, क्योंकि अविमें वहापर विलम्ब विशेषित कहा गया है। इससे पहलोमें अर्थात् सिद्ध होता है कि भाकाश मादिसे शीघ्र उत्तरता है। पूर्वपक्षी-प्रवर्षणके मनन्तर व्रीहि प्रादि भावकी श्रुति है 'त इह वीहियवा०' (वे अनुशयी जीव यहा घान. यब प्रोपष, वनस्पति, विल. माषरूपमे उत्पन्न होते हैं ) इस व्रीहि मादि भावसे पूर्व माकाश प्रादि भावोमेसे जीवके शीघ्र अथवा विलम्बसे पवरोहमे नियामक न होनेसे अनिर्णय है।
१६२ भाषानुवादसहिता [अ०३ पा० १ अपि०६] प्रपतरम्' (या० ५।१०।६) 'योह्यादिभावाप्तिगमनं दुचाकम्' इति युवती श्रुतिःह्यादौ विलम्बनं विशेषयाति । ततोऽर्थात् 'पूर्व त्वरा' इत्यवसीयते ॥५॥ (षष्ठे स्वर्गादवरोहतां व्रीह्यादौ मलेपाधिकरणे सूत्राणि ) अन्याधिष्ठिते पूर्ववभिलापात् ॥ २४ ॥ अशुद्धमिति चेन्न शब्दात् ॥ २५ ॥ रेतः सिग्योगोऽथ ॥ २६ ॥ योने: शरीरम् ॥ २७ ॥ षष्ठाधिकरणमारचयति-- मोह्यादो जन्म तेपा स्यात्संश्लेपो वा जनिभवेत् । जायन्त इति मुख्यत्वात्पशुहिंसादिपापतः ॥ ११ ॥ वैघान्न पापसंश्लेपः कर्मव्यापृत्यनुक्तितः। 'श्वविप्रादो मुख्यजनौ चरणव्यापूतिः श्रुता ॥ १२ ॥ प्राकाशादाविव ब्रोह्यादौ न संश्लेषमात्रम्, किंतु योह्यादिरूपेण मुख्यं जन्म विवक्षितम् । “जायन्ते" ति श्रवणात् । न च स्वर्ग सुकृतफलमनुभूया- वरोहतः पापफलरूपस्य स्थावरजन्मनोऽसंभव , तदेतो। पशुहिंसादेविद्यमानत्वा- मुख्यं जन्म। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-श्रीहि भादि भावको कहकर 'मतो वै.' (निश्चय ही यहाँसे निकलना भतिकठिन है) 'द्रोहिं आदि भावसे निकलना दुष्कर है' ऐमा कहती हुई अति प्रोहि प्रादिमे विलम्ब विशेषिक्त प्रतिपादित करती है। इससे पर्यात वीहि प्रादि भावोसे पूर्व प्राकाशादिमें से प्रतिशीघ्रता निश्चित होती है ।।५॥ पष्ट मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह -उन अनुशयी जीवोका प्रीहि प्रादिमे मुख्य जन्म है अथवा संसर्गमात्र है । पूर्वपक्ष -मुख्य जन्म है, क्योकि 'जायन्ते' ऐसी श्रुति है और पशुहिंसादि पापका योग है। सिद्धान्त-वैध-विहित होनेसे पशुहिंसा आदिसे पापका सम्बन्ध नहीं है और कर्मके व्यापारका कथन नहीं है, वान, विष आदिमे ही मुख्य जन्म है। ब्रीहि आदिमें नहीं, क्योंकि चरण-कर्मका व्यापार श्रुत है । पूर्वपक्षी 1-पाकाश आदिके समान ब्रीहि मादिमे संसर्ग मात्र नहीं है। किन्तु व्रीहि आदि रूपसे मुख्य जन्म विवक्षित है, क्योकि 'जायन्ते' यह ध्रुति है । स्वर्गमें पुण्य फलका अनुभवकर अवरोह करनेवालोंको पाप फलरूप स्थावर जन्मका प्रमभव नहीं है, क्योकि स्थावर जन्मका हेतु पशुहिंसा प्रादि विद्यमान हैं । अतः मुख्य जन्म है । -
[अ०३ पा० २ मधि०१] वैयासिकन्यायमाला
१६३
हति प्राप्ते यूम:-वैधत्वान्न पशुहिंसादितः पापम् । अत: 'जायन्ते' इति
श्रुत्या संश्लेषमा विवक्षितम्, न तु मुख्यं जन्म । फर्मव्यापारानभिधानात् ।
यत्र तु मुख्यं जन्म व्यवस्थितम्, तत्र कर्मव्यापारमभिधत्ते-रमणीयचरणाः,
कपूयचरणाः' इति । तस्मात्स्वर्गादवरोहतां व्रीह्यादौ संश्लेपमात्रमिति स्थितम् ६
इति श्रीभारतीतीर्थमुनिप्रणीतायां वैयासिकन्यायमालायां
दतीयाध्यायस्य प्रथमः पादः
प्रादिता
अधिकरणानि
सूत्राणि
२७
३१६
1
प्रत्र पादे
( अथ तृतीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः )
(प्रत्र पादे तत्वपरिशोधनविचार)
[ इस पादमे 'तत्, त्वम् पदार्थ परिशोधनका विचार है ]
(प्रथमे स्वप्नसृष्टेमिथ्यात्वाधिकरणे सूत्राणि)
संध्ये सृष्टिराह हि ॥ १॥ निर्मातारं चैके पुत्रादयश्च
।। २॥ मायामानं तु कायनान भिव्यक्तस्वरूपत्वात्
॥३॥ सूचकश्च हि श्रुतेः, आचक्षते च तद्विदः ॥४॥
पराभिध्यानात्तु तिरोहितं तनो ह्यस्य बन्धविपर्ययो
॥५॥ देहयोगाद्वा सोऽपि ॥६॥
द्वितीयपादे प्रथमाधिकरणमारचयति-
सत्या मिथ्याऽथवा स्वप्नसृष्टि सत्या श्रुतीरणात ।
जाग्रद्देशाविशिष्टत्यादीश्वरेणेव
निर्मिता ॥१॥
सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-शास्त्र विहित होनेसे यागमे पशु-
हिंसादिसे पाप नहीं होता। अत: 'जायन्ते' इस श्रुविसे संमर्गमात्र ही विवक्षित
मुख्य जन्म नहीं, क्योकि कर्मव्यापारका अभियान नहीं है, जहा मुख्य जन्म व्यवस्थित
है, वहां 'रमणीय करणाः, कपूयकरणा:, इस प्रकार कर्म व्यापारका पमिधान है।
इससे यह सिद्ध हुमा कि स्वर्गसे अवरोह करनेवाले अनुशयी जीवोका व्रीहि प्रादिमे
केवल संसर्गमात्र है॥६॥
इति श्रीमारतीतीर्षमुनि-श्रणीत बयासिकन्यायमालाके तृतीयाध्यायके प्रथम
पादका 'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती' वृत भपानुवाद ॥ १ ॥
॥२॥ भाषानुवादसहिता [प्र. ३ पा०२ अधि०१] देशकालधनौचित्याद्वाधितत्वाच सा मृपा। प्रभाषौफेद्वैतमात्रासाम्याज्जोवानुवादतः "मथ रयान् रथयोगान् पथ: सृजते' इति श्रुत्या स्वप्ने रथादीना सृष्टि- रीरिता, मतो वियदादिसृष्टिवयवहारदशाया सत्या भवितुमर्हति । न च जाग्रद्देशस्य स्वप्नदेसास्य च वंचिद्विशेष पश्याम. । तत्लाले गोजनादीनां तृप्या- धर्थक्रियाकारित्वात् । अतो 'विमता सष्टिः सत्या, ईश्वरकत्वात्, वियदादि- सृष्टिवत्' । इति प्राप्ते ब्रूमः-स्वप्नसृष्टिमृपा। कुत. । तदुचितदेशकालाघसंभवात् । न हि केशसहस्राशपरिमितनाडीमध्ये गिरिनदोसमृद्रादीनामुचितो देशोऽस्ति, महानिशीथेशयानस्य सूर्यग्रहणोचित पालोऽस्तिानाप्यनुपनीतस्य बालस्य पुत्रो- त्सवादिहर्ष निमित्तान्युचितानि । किंच स्वप्नोपलब्धान पदार्थाना स्वप्न एवं बाधो दृश्यते। कदाचितरुत्वेनावसीयमानः पदार्थस्तदेव गिरिवेनावासितो द्वितीय पादमें प्रथम अधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-स्वप्न सृष्टि सस्य है अथवा मिथ्या है ? पूर्वपक्षा -सत्य है, क्योंकि पति कहती है । जापत् देशके ममान स्वप्नसष्टि ईश्वर द्वारा ही निर्मित है। सिद्धान्त-पप्नसृष्टि मिथ्या है, क्योंकि देश-काल मादिका मौचित्य नहीं है, बाधित है एवं प्रभावका कथन है, सासाम्यमात्र जीवका अनुवाद य एष' इत्यादिसे होता है। पूर्वपक्षी -'प्रय रथान.' (वह रथ, रपके घोडे पोर मार्ग उत्पन्न करता है ) इस अतिसे रथ मादिकी सष्टि कही गई है, अतएव माकाश प्रादि स ष्टिके समान व्यवहार दशामें सत्य हो सकते हैं, क्योंकि जामन् देश और स्वप्नदेशमें कुछ भी विशेष नहीं देखते हैं । स्वप्नकालमें भोजनादि तृप्ति प्रादि मर्य क्रियाकारी भी हैं । मत: 'विवादास्पद स्वप्नसृष्टि, सत्य है, ईश्वर कढक होनेसे, भाकाश मादि सष्टिके समान।' सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-स्वप्नसृष्टि, मिथ्या है, किसले ? इससे कि उसके उचित देश-काल प्रादिका सभव नहीं । केशके सहस्रभागके समान परिमित अतिसूक्ष्म नाडीके मध्यमें गिरि, नदी आदिका उचित देश नहीं है। अन्धकार की रातमें शयन करनेवालेको सूर्य का ग्रहण उचित काल नहीं है । उपनयन संस्कार रहित बालकके पुत्रोत्सव मादि हर्ष के उचित निमित्त भी नहीं हैं। किञ्च स्वप्नमें उपलब्ध पदार्थोंका स्वप्न में ही बाघ देखा जाता है । कदाचित् जो तरुरूपसे निश्चित पदार्थ है दहीगीररूपसे निश्चित होता है । जो यह कहा गया है कि स्वप्नसृष्टिको श्रुति कहती - [प्र० ३ पा० २ अधि०२] वैयासिकन्यायमाला भवति । यदुक्तम्-'स्वप्नसृष्टि ध्रुतिवू'ते' इति । तत्र साऽपि श्रुतिरमावपूर्वि- कामेव सृष्टिमाह "न तन रयाः, न रथयोगाः, न पन्यानो भवन्ति। 'मथ रथान् रथयोगान्पथ सृजते" इति । प्रतो वस्तुतोऽसन्तो रथाद्याः शुक्तिकारज- तवदवभासन्त इति श्रुतेरभिप्राय.। यदपि जाग्रत्साम्पमुक्तम् । तदप्यप्रयोजकम् । अनुचितदेशकालादेर्भूयसो 'वैषम्यस्योक्तत्वात् । यदपि-ईश्वरनिर्मितत्वमुक्तम् । तदप्यसत् । 'य एप सुप्तेषु जागति कामं कामं पुरुषो निमिमाणः' (क०८) इति जीवस्यैव स्वप्ननिर्मातृत्वेन श्रुत्याऽनूद्यमानत्वात्। तस्मात्स्वप्नसृष्टि- {था ॥१॥ -- (द्वितीये सुषुप्तो जीवस्य हृत्स्थब्रह्मणक्याधिकरणे सूत्रे )। तदभावो नाडीपु तच्छुतेरात्मनि च ॥७॥ अत. प्रबोधोऽ- स्मात्॥८॥ द्वितीयाधिकरणमारचपति- नाडीपुरोतद्ब्रह्माणि विकल्प्यन्ते सुपुप्तये समुचितानि वैकार्थ्याद्विकल्प्यन्ते पवादिवत् ॥३॥ समुचितानि नाडीभिरुपसप्य पुरीतति । हृत्स्थे ब्रह्मरिण यात्पैक्यं विकल्पे त्वष्टदोषता ॥ ४ ॥ है । वहाँ वह अति भी प्रभाव पूर्वक ही सृष्टि कहती है-" न तत्र रया' (पहा रथ नहीं हैं रथके घोडे नहीं हैं, वह रप, रथके घोडे और मार्ग उत्पन्न करता है ) प्रता वस्तुतः न होते हुए भी रथ मादि शुक्तिका रजतके समान अवभासित होते हैं। ऐसा श्रुतिका अभिप्राय है । यद्यपि जापनका साम्य कहा गया है, तथापि वह प्रयोजन रहित है। क्योंकि अनुचित देश कालादिका बहुत वैषम्य कहा गया है। जो यह कहा गया है कि स्वप्नसृष्टि ईश्वर निर्मित है वह भी असत् कारण कि 'य एष सुम्नेषु०' ( इन्द्रिय आदिके सुप्न हानेपर जो यह पुरुष अपने इच्छित पदार्थोका निर्माण करता हुअा जागता रहता है ) इस प्रकार अतिमे जीव ही स्वप्नसृष्टिका निर्मातृरूपसे अनूद्यमान है। इस- लिए स्वप्नसृष्टि मिथ्या है ॥ १॥ द्वितीय प्रधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-नाडी, पुरीतद और ब्रह्म ये तीन सुपुप्तिके लिए कल्पित हैं अथवा समु- ञ्चित हैं ? पूर्वपक्षा -~यव प्रादिक समान विकल्पित हैं, क्योंकि नाडी आदिका एक ही प्रयो- जन है। सिद्धान्त-नाडी मादि सुषुप्तिके लिए समुचित हैं, क्योकि नाडीद्वारा जीव भाषानुवादसहिता [प्र. ३ पा० २ अधि० २] "प्रासु तदा नाडौषु सृप्तो भवति" (छा० ८।६।३ ) इति श्रुती सुषुप्तिकाले नाडीप्रवेशो गम्यते । 'तामिः प्रत्यक्सप्य पुरीतति शेते' (बृह० २।१।१६) इति श्रुती पुरीतति तदाश्रितत्वं प्रतीयते 'य एषोऽन्तहदय आकाशस्तस्मिञ्चोते' (बृह० २११११७ ) इति श्रुत्यन्तरादाकाशशब्दवाच्यब्रह्माश्रितत्वं प्रतीयते तान्येतानि नाड्यादिस्थानानि विकल्पितानि भवितुमर्हन्ति, एकप्रयोजनस्वाद । यथा 'बीहिभियंजेत्, यवैयंजेत' इत्यत्र पुरोडाशनिष्पादकत्वस्य प्रयोजनस्थे- करवेन विकल्प प्राश्रितस्तथाऽत्रापि सुपुप्याख्यं प्रयोजनमेकम । तस्मात्- 'कदाचित्पुरीतति स्वपिति, कदाचिनाडीषु स्वपिति, कदाचिद्ब्रह्मणि' इति नाड्यादीना विकल्पः। इति प्राप्ते ब्रमः--एकप्रपोजनत्वमसिद्धम् । पृथगुपयोगस्य सुवचत्वात् । तथा हि-नाट्यस्तावच्चक्षुरादिषु संचरतो जीवस्य हृदयनिष्ठं ब्रह्म गन्तुं मार्गभूता भविष्यन्ति । अत एव श्रुत्यन्तरे---'ताभिः प्रत्यवसृप्य' इति तृतीयया साधनत्वं नाडीना श्रुतम् । हृदयवेष्टनरूपं तु पुरीतत्प्रासादवदावरक भविष्यति । ब्रह्म तु मनकवदाधारः । अतो यथा द्वारेण प्रविश्य प्रासादे पर्य शेते, तथा गमन कर पुरीतत्से वेष्टित हृदयमे स्थित ब्रह्ममे ऐक्यको प्राप्त होता है, विकल्प माननेपर तो मष्ट दोप प्रसक्त होंगे। पूर्वपक्षो-'मासु तदा०' ( उस समय यह इन नाडियोमै प्रविष्ट होता है ) इस प्रतिमें जीवका मुपुप्तिकालमें नाडोप्रवेश ज्ञात होता है, ताभि: प्रत्यक्सप्प.' ( उन नाहियोंसे निकलकर पुरोत, शयन करता है ) इस श्रुतिमे पुरीतत्मे जीवका पानि तख प्रवोठ होता है । 'म एषोऽन्तहदय' (जो यह हृदयमें प्राकाश है उसमे मोठा है ) इम मन्य त्रुतिसे भाकाशशब्द वाच्य ब्रह्माश्रितत्व ज्ञात होता है। अतः ये सब नाड़ी भादि स्थान विकसित होने चाहिए, क्योकि एक ही प्रयोजन है। जैसे 'श्रीहिभि- यजेत०' (पोहि-धानसे पाग करे भयवा यवोसे याग परे ) यहाँपर पुरोडाश निष्पादन- रूप एक प्रयोजन होनेसे विकल्पका माधय लिया गया है, से ही यहा भी सुपुप्ति नामक एक ही प्रयोजन है । इसलिए कमी पुरोखत्में सोता है, कभी नाडियोमे मोवा है पौर कभी ब्रह्ममें, इस प्रकार नाही मादिका विकल्प है। सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं--परन्तु एक प्रयोजन मिट है, क्योकि उनका पृथक उपयोग मुवचन है, जैसे कि नाडियौ तो चक्षु मादिमें संचरणशील जीवके हत्यनिर ब्रह्मके प्रति गमन के लिए मार्गमूत हैं, अनुएव अन्य निमें 'उन नादियोंद्वारा निवलकर' इस तृतीया विक्तिद्वारा नाडियो गाधन मुनी जाती है। हृदयके वेष्टनरूप पुरोट छो महलके समान भावाक होगा ब्रह्म को मञ्चके समान माधार है। पतएव
.
[म०३ पा० २ अधि० २] वैयासिकन्यायमाला
१६७
नाडोभिः प्रत्यवसृप्य पुरोतति ब्रह्माणि जीव: पायिष्यत इत्युपकारभेदानाड्या-
दीनां समुच्चयः । सुषुप्तो ब्रह्मणि जीवावस्थाने कुत प्राधाराधेयभावो न प्रति-
भातीति चेत् । 'एकीभावात्' इति ब्रूमः। यथा सोदककुम्भस्तडागजले प्रक्षिप्तो
मग्नो न पृथग्भाति, तथाऽन्त.करणोपाधिको जीव पावरकाज्ञानसंहिते ब्रह्मरण
मग्नत्वान पृथगवभासते। अत एव श्रुत्यन्तरे सुषुप्तो जीवस्य ब्रह्मणा सह
तादात्म्यप्रपतिपत्तिमाह-‘सता सोम्य तदा संपन्नो भवति' (छा०६।८।१ )
इति । यस्तु विकल्पस्त्वमोक्तः, सोऽष्टदोषग्रस्तत्वादनुपपन्नः । तथा हि-यदा
जीवो नाडीपु सुप्तो भवति, तदा परीतद्ब्रह्मवाक्ययोःप्राप्तं प्रामाण्यं परित्यक्तव्यं
स्यात्, अप्राप्तं चाप्रामाण्यं स्वीक्रियेत, यदा पुन: पुरीतद्ब्रह्मणोः शेते, तदा
पुरीतद्ब्रह्मवाक्ययोः पूर्वत्यक्त प्रामाण्यं स्वीक्रियेत, पूर्व स्वीकृतं चाप्रामाण्यं
परित्यज्येत, इति प्राप्तपरित्यागः, अप्राप्तस्वीकारः, त्यक्तस्वीकारः, स्वीकृतपरि-
त्यागश्चेति दोषचतुष्टयं पुरीतद्ब्रह्मवाक्यकोटौ। तथा नाडीवाक्यकोट्यामपि
दोषचतुष्टये योजिते सत्यष्टौ दोषाः संपद्यन्ते । तस्मात्- समुच्चय एव प्राह्यो
मतु विकल्पः ॥२॥
( तृतीये सुप्तस्यैव जागरणाधिकरणे सूत्रम् )
जैसे द्वारमे प्रवेशकर प्रासादमे पर्यङ्कपर सोता है, वैसे नाडियोद्वारा गमनकर पुरीतदमें
ग्रह्ममे सोवेगा । इस प्रकार उपकारके भेदसे नाडी मादिका समुच्चम है। सुषुप्तिमे यदि
ब्रह्म जोवका प्रवस्थान हो तो आधाराधेयभाव क्यो नही भासता है ? यदि ऐसा कहो
तो हम कहते हैं कि उस अवस्थामे एकीभाव है, जैसे तालाबमे प्रक्षिप्त उदकसे भरा
कुम्भ दूबनेपर पृथक् प्रतीत नहीं होता, वैसे ही मन्तःकरणोपाधिक जीव भावरक
मशान सहित ब्रह्ममे मग्न होनेपर प्रयक् प्रवभासित नहीं होता। मतएव 'सता सोम्य'
(हे सोम्य ! सुषुप्ति कालमे जीव सद्ब्रह्मके साथ सम्पन्न होता है) इस प्रकार अन्य अतिमें
सुप्ति कालमे जीवको ब्रह्मके साथ तादात्म्य प्रतिपत्ति कही गई है। तुमसे जो विकल्प
कहा गया है-वह पाठ दोपोसे ग्रस्त होनेके कारण पनुपपन्न है जैसे कि जीव जब
नाडियोमें
i सुप्त होता है तब पुरीतन् और ब्रह्मवाक्योमे प्राप्त प्रामाण्यका परित्याग होगा
और अप्राप्त प्रप्रामाण्य स्वीकृत करना होगा। जब पुन: पुरीतत् पौर ब्रह्ममे शयन करेगा
तब पुरोतत् मोर ब्रह्मवाक्योमे पूर्वमे त्यक्त प्रामाण्य स्वीकार करना होगा तथा पूर्वमे
स्वीकृत प्रप्रामाण्यका परित्याग होगा। ईम प्रकार प्राप्तका परित्याग और मप्राप्तका
स्वीकार, त्यक्तफा स्वीकार भौर स्वीकृतका परित्याग । चार दोष पुरीतव पौर ब्रह्मवाक्य
कोटिमे होगे, इस प्रकार नाडीवाक्य कोटिमै भी ये चार दोपोकी योजना करनेपर
पाठ दोष प्रसक्त होते हैं। इससे ममुच्चय ही ग्राह्य है विकल्प नहीं ॥२॥
- १६९ भाषानुवादसहिता [अ०३ पा० २ अधि०३] स एष तु कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः ॥६॥ तृतीयाधिकरणमारचयति- यः कोऽप्यनियमेनात्र दुध्यते सुप्त एव था। उदबिन्दुरिवाशक्तनियन्तु कोऽपि बुध्यते ॥५॥ कर्माविद्यापरिच्छेदादुदबिन्दुविलक्षणः । स एव बुध्यते शास्त्रात्तदुपाधेः पुनर्भवात् ॥६॥ यथा समुद्रे प्रक्षिप्तो यो जलबिन्दुः स एव नियमेन पुनरुतमशक्यस्तथा सुषुप्तो ब्रह्म प्राप्तो यो जोवः स एव बुध्यत इति नियन्तुमशक्यत्वाद, यः कोऽपि बुध्यते। इति माते ब्रूम:--विषम उपन्यास. । चियो जीवः कर्माविद्यावेष्टितो ब्रह्मणि निमजति, उदबिन्दुस्त्ववेष्टितः । इति वैषम्यम् । यथा गमोदकपरिपूर्ण पिहितद्वारः काञ्चनकुम्भः समुद्रे निक्षिप्तः पुनरुद्धृियते, तत्रत्य गाजलं तदेव तृतीय अधीकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-सुषुप्तिके अनन्तर अनियमसे जो कोई भी जागता है अथवा सोया हुमा ही जागता है? पूर्वपक्ष-जमे समुद्री प्रक्षिप्त जलबिन्दुके नियमन करने की शक्ति नहीं है अर्थात् पुन: उसीका उद्धरण नही हो सकता, पैसे ही ब्रह्ममे लीन जीवका पुनः उठना संभव नहीं है, पतः भन्य कोई भी जीव उठता है। सिद्धान्त-कर्म और अविद्याके परिच्छेदसे जल बिन्दुका दृष्टान्त विषम है, मतः पही जीव जागता है, क्यो कि 'त इह व्याघ्रो वा' इत्यादि शास्त्रसे यह सिद्ध होता है कि जिस उपाधिमै युक्त जीव सुषुप्तिमे जाता है उमी उपाधि विशिष्ट ही जीवका उसी शरीरमै पुनर्भव है। पूर्वपक्षी-जैसे जिस जलबिन्दुका समुद्रमे प्रक्षेप किया गया हो उसोका नियमसे पुनः उद्धरण नहीं किया जा सकता, वैसे ही मुप्तिमे जो जीध ब्रह्मको प्राप्त हुआ है वही पुनः जागता है। ऐसा नियम नही किया जा सकता है। अतएव जो कोई भी जीव जागता है। सिद्धान्ती-ऐमा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-यह उपन्याम विपम है अर्थात दृष्टान्त और दाष्टान्तिकमें अत्यन्तभेद है । क्योकि कर्म और अविद्यासे चेष्टित चिद्रूप जीव ब्रह्ममें ही लोन होता है और जलबिन्दु तो क्सिीसे वेष्टित समुद्रमे लीन नहीं होता, इससे यह दृष्टान्त विषम है । किञ्च जैसे गड्ढाजलसे परिपूर्ण मुख बन्द सुवर्ण कुम्भ यदि समुद्रमे प्रक्षिा हुआ पुनः उदृत ( निकाला ) किया जाय तो कलशस्थ वही गङ्गाजल ।
[प्र०३ पा० २ अधि०४] वैयासिकन्यायमाला १६६ पुनदिवेक्तुं शक्यते, तथा स जीवः प्रतिबुध्यताम् । मत एव श्रुतिराह--'त इह ध्यानो वा सिंहो वा वृको वा वराहो का पतङ्गो वा दंशो वा मशको वा यद्यद्भवन्ति तत्तदा भवन्ति' (घा० ६३ ) इति । व्याघ्रादयो ये जीवाः सुषुप्तेः पूर्व पच्छरीरं प्राप्य वर्तन्ते, त एव जीवाः सुपुसेगरि प्रबुध्यमानास्तदेव शरीरं प्राप्नुवन्ति' इत्यर्थः । न च सुषुप्तो ब्रह्म मासस्य जीवस्य मुक्तवत्पुनरुद्ध- यानुपपत्तिः । प्रवच्छेदकस्योपाधेः सत्त्वेन तदुद्भवे जीवोद्भवसंभवात् । तस्मात् य: सुप्तः स एव प्रतिबुध्यते ॥३॥ (चतुर्थे मूर्याया प्रस्थान्तरताधिकरणे मूत्रम् ) मुग्धेऽर्धसंपत्तिः परिशेषात् ॥ १०॥ चतुर्थाधिकरणमारयति- कि मूछका जाग्रदादो किंवाऽवस्थान्तरं भवेत् । अन्याऽवस्था न प्रसिद्धा तेनैका जागदादिषु ॥७॥ न जाग्रत्त्वयोरेका द्वैताभानाम्न सुप्तता। मुखादिविकृतस्तेनावस्थाऽन्या लोकसमता॥८॥ पुनः पृषर किया जा सकता है । इस प्रकार मुधुप्तिमे कर्म और विद्यासे वेष्टित सोपा जीव वहो उठता है । अतएव 'त इह व्यानो वा०' ( वे इस लोकमे ध्यान, सिंह, भेडिया, शूकर, कीट, पतङ्ग, डांग अथवा मजवर जो जो भी [ सुषुप्ति मादिसे पूर्व ] हुए होते हैं वे ही पुनः हो जाते हैं ) यह अति ऐसा कहती है । 'व्याघ्र प्रादि जो जीव सुप्तिके पूर्व को शरीर प्राप्त कर रहते हैं, वे ही जीव सुषुप्तिके अनन्तर जागते हुए उमो शरीरको पुनः प्राप्त होते हैं' यह मर्थ है । ऐसी शड्डा भी नहीं की जा सकती कि सुषुप्तिमें ब्रह्मको प्राप्त जीवका मुक्तो ममान पुन. उद्भप नहीं हो सकता, क्योकि मवच्छेदक उपाधिके विद्यमान होनेपर उस उपाधिके उद्भव होनेपर जीवका उद्भद संभव है । अतः जो सोया है वही नीव जागता है । यह सिद्ध हुआ ॥३॥ चतुर्थ अधिकरणको रचना करते हैं-- सन्देह--मूर्धावस्था क्या जापत् प्रादि अवस्थामोके मन्नन है अथवा अन्य अवस्था है। पूर्वपक्ष-लोकमे नापत मादिमे भिन्न अवस्था मप्रसिद्ध है, मत: जायत् आदिमे मूर्चा एक अवस्था है। सिद्धान्त-मूळ जापत और स्वप्नावस्पामें भी एक भवस्था नहीं है, क्योकि उम पवस्थामे द्वतका भान नहीं है, मुषुप्ति भी नहीं है, क्योकि मुप्त पादिमे विकार भासता है। प्रतः मूचा लोक सम्मत अन्य अवस्था हो है ।
"
१७०
भाषानुवादसहिता [अ०३ पा० २ प्रधि०४]
जागरस्वप्नसुपुतिभ्योऽन्यस्या अवस्थाया अप्रसिद्धत्वान्मू या जाग्रदादा-
चन्तर्भावः।
इति प्राप्ते झूमः-परिशेपाचवस्थन्तरमभ्युपेयम् । न वावजाग्नत्स्वप्नयोर-
न्तर्भाव । द्वैतप्रतीत्यभावात् । नापि सुषुप्ती, विलक्षणत्वात् । सुप्तः पुमान्प्रसन्न-
वदनः समश्वासो निष्कम्पारो भवति । मूछिनस्तु विकृतमुखो विषमश्वासः
शरीरकम्पादियुक्तः । यद्यपि जाग्रदादिवनंदिनत्वाभावाप्न मूर्छाया बालकादिपु
प्रसिद्धिरस्ति, तथाऽपि कादाचिस्की मूविस्थां विज्ञाय वृद्धचिकित्सन्ते।
तस्मात्-अन्येयमवस्था।
तदेवमधिकरणचतुष्टयेन त्वंपदार्थ. शोधितः। तत्र स्वप्नसृष्टेमिथ्यात्वेन
सुखदुःखकर्तृत्वाद्यवभासेऽपि जीवोऽसन ऐवेति शोधितम् । सुषुप्तौ ब्रह्मेश्येत
तदेवासगरवमनुभाषितम् । तस्यैव पुनः प्रतिबोधेनानित्यत्वाशङ्का निराकृता।
मू-विचारेण श्वासादिसर्वव्यवहारलोपेऽपि मरणे जीवनाशो नाऽऽशयनीय
इति दशितम् ॥ ४॥
जाप्रद, स्वप्न और सुपुप्तिसे अन्य अवस्था लोकमें मप्रसिद्ध है, अनः मू: जापत
मादि इन तीनोंमेसे एक अवस्था है।
सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं--परिमेषसे नीन अवस्थामोसे
मूळ पृथक अवस्था स्वीकार करनी चाहिए, मूर्छाका जानन और स्वप्नमें अन्तर्भाव
नहीं है, क्योकि मूमि द्वतको प्रतीति नहीं है। सुपुमिमे भो अन्तर्भाव नहीं है, कारण
कि विलक्षण है। सुम पुरुष प्रसन्न वदन समश्वास, कम्पन रहित शरीरवाला है
मूछित तो विकृत मुख, विषम श्वास [ श्वासोकी विषम गति ] पोर परीर कम्पन मादि
दोषोंसे युक्त है। यद्यपि भूछा जाग्रन् मादिके समान प्रतिदिन नही होती, अतः मूछी
बालकादिमें प्रसिद्ध नहीं है, तो मी कादाचित कभी-कभी मूर्धावस्थाको जानकर
वृद्ध लोग उसको चिकित्सा करते हैं। प्रतः यह मूर्धा अवस्था अन्य अवस्थामोसे
पृषक है।
इस प्रकार चार अविकरणोंसे 'त्वं' पदार्थका योयन किया गया है। उसमें स्वप्न-
सृष्टि मियारूपमे निश्चित होनेपर मुख दुख कर्तृत्वका प्रयभाम होनेपर मी "जीव
प्रमङ्ग ही है' ऐमा शोषित किया है। मुष्ठिमै ब्रह्मके साप ऐक्यसे वही प्रमङ्गत्व
मनुमादित है। उमका हो पुनः प्रतिदोष होनेमे पनित्यत्वको शक्षा निराहत की गई है,
मच्चोंके विचार द्वारा यह दिखलाया गया है कि श्वामादि सर्वव्यवहारका लोप होनेपर भी
मरणमें जीव नागरी पता नहीं करनी चाहिए ॥ ४॥
[८० ३ पा० २ अधि० ५ ] वैयासिकन्यायमाला १७१ (पञ्चमे ब्रह्मणो नीरूपत्वापिकरणे सूत्राणि) न स्थानतोऽपि परस्योभयलिङ्ग सर्वत्र हि ॥ ११ ॥ न भेदादिति चेन्न प्रत्येकमतद्वचनात् ॥ १२ ॥ अपि चैवमेके ॥ १३ ॥ अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात् ॥ १४ ॥ प्रकारावधावयय॑म् ॥ १५॥ आइ च तन्मात्रम् ॥ १६ ॥ दर्शयति चाथो अपि स्मयते ॥ १७ ॥ अत एव चोपमा सूर्यकादिवत् ॥१८॥ अम्बुवदग्रहणातुन तथात्वम् ॥१६] • वृद्धिद्वासमाक्त्वमन्तर्भावादुमयसामञ्जस्यादेवम् ॥२०॥ दर्शनाच्च ॥ २१॥ पञ्चमाधिकरणमारचयति- ब्रह्म कि रूपि चारूपं भवेन्नीरूपमेव वा। द्विविधश्रुतिसद्भावाद्ब्रह्म स्यादुभयात्मकम् ॥६॥ नोरूपमेव वेदान्ते: प्रतिपाद्यमपूर्वतः। रूपं त्वद्यते भ्रान्तमुभयत्वं विरुध्यते ॥ १० ॥ "तदेतच्चतुष्पाद्ब्रह्म" इत्यादिश्रुतयो रूपवद्ब्रह्म प्रतिपादयन्ति । 'अस्थूल- मनणु" इत्यादिश्रुतयो नोरूपम् । तस्मात् वस्तुत उभयात्मकं ब्रह्म। इति प्रासे बम.--नीरूपमेव शास्त्रप्रतिपाद्यम् । मानान्तरासिद्धत्वात् । जगत्क स्वादिरूपयुक्त तु ब्रह्म 'क्षित्यादिकं सक के कार्यत्वात्' इत्यनुमाने- पशम प्रधिकरएकी रचना करते हैं- सन्देह-व -क्या ब्रह्म रूपवान पोर रूपरहित उभयात्मक है अथवा रूपरहित है? पूर्वपक्ष-दोनों प्रकारको श्रुतियोके सद्भाव होनेसे ब्रह्म रूपवान पोर रूपरहिन- उभयात्मक है। सिदान्त-वेदान्तोसे नीरूप ही प्रतिपादिन है, क्योकि अपूर्व-प्रमाणन्तरागम्य है, कहीपर रूपवान श्रवण तात्पर्य वृत्तिसे नहीं अपितु केवल अनुवाद करता है, मता ब्रह्ममें रूपवत्ता भ्रम है, क्योकि उभयात्मकत्व विरुद्ध है। 'तदेतचतुष्पाद ब्रह्म' ( ब्रह्म चतुषाद है ) इत्यादि पतिया यत्र तत्र उपासना कालमें रूपवद् ( सविशेष ) ब्रह्मका प्रतिपादन करती हैं और 'अस्थूलमना' (न स्थूल है और न मग्गु है ) इत्यादिश्रुतिया नौरूप-निविशेष ब्रह्मका । इसलिए वस्तुनः ब्रह्म उभयात्मक है। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-नीरूप-निविशेष ब्रह्म ही वेदान्तशास्त्रमे प्रतिपाय है । क्योकि दिव्यो ह्यमूतः पुरुषः स बाहाम्यन्वरो एज:' -
भाषानुवादसहिता [अ०३ पा० २ अधि०४]
जाग्रत्स्वप्नसुपुतिभ्योऽन्यस्या अवस्थाया अप्रसिद्धत्वान्म या जाग्रदादा-
वन्तर्भावः।
इति प्राप्ते ब्रूमः-परिशेषादवस्यन्तरमभ्युपेयम् । न तावज्जाग्रत्स्वप्नयोर-
न्तर्भाव । द्वैतप्रतीत्यभावात् । नापि सुषुप्तो, विलक्षणत्वात् । सुप्तः पुमान्प्रसन्न-
वदन- समश्वासो निष्कम्पशरीरो भवति । मछिलस्तु विकृतमुखो विषमश्वासः
शरीरकम्पादियुक्त । यद्यपिजाप्रदादिवनंदिनत्वाभावाप्न मूर्छाया बालकादिषु
प्रसिद्धिरस्ति, तथाऽपि कादाचित्की मूविस्थां विज्ञाय वृद्धश्चिकित्सन्ते।
तस्माद-अन्येयमवस्था।
तदेवमधिकरणचतुष्टयेन त्वंपदार्थ शोषितः । तत्र स्वप्नसृष्टैमिथ्यात्वेन
सुखदुःखक त्वाद्यवभासेऽपि जीवोऽसङ्ग ऐवेति शोधितम् । सुषुप्तौ ब्रोक्येन
तदेवासङ्गत्वमनुभावितम् । तस्यैव पुनः प्रतिबोधेनानित्यत्वाशङ्का निराकृता।
मू विचारेण श्वासादिसर्वव्यवहारलोपेऽपि मरणे जीवनाशो नाराङ्कनीय
इति दर्शितम् ॥ ४॥
जाग्रत, स्वप्न और पूप्तिसे अन्य अवस्था लोकमें मप्रसिद्ध है, अतः मूर्छा जाग्रव
प्रादि इन तीनोमेसे एक अवस्था है ।
सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं--परिशंपसे तीन अवस्थामोंसे
मूर्छा पृथक् अवस्था स्वीकार करनी चाहिए, भू का जाग्रत् और स्वप्नमें अन्तर्भाव
नहीं है, क्योकि मूमि द्वतको प्रतीति नहीं है। मुषुप्तिमें भी अन्तर्भाव नहीं है, कारण
कि विलक्षण है। मुप्त पुरुष प्रसन्न वदन समश्वास, कम्पन रहित शरीरवाला है
मूर्मित तो विकृत मुख, विषम श्वास { श्वासोको विषम गति ] और शरीर कम्पन भादि
दोपोंसे युक्त है। यद्यपि मूर्छा जाग्रन प्रादिक ममान प्रतिदिन नहीं होती, प्रतः मूर्चा
चालकादिमें प्रसिद्ध नहीं है, तो भी कादाधिक कभी-कभी मूविस्थाको जानकर
वृद्ध लोग उनकी चिक्मिा करते हैं। अत: यह मूर्छा अवस्था अन्य अवस्थामाँसे
पृथक है।
इस प्रकार चार अधिकरणोंमे 'त्व' पदार्थका शोधन किया गया है। उसमें स्वप्न-
सृष्टि मिथ्यारूपसे निश्चित होनेपर मुख दुख कर्तृत्वका प्रवभास होनेपर भी 'जीव
प्रमङ्ग ही है' ऐसा शोधित किया है। मुषुप्तिमे ब्रह्मके साथ ऐक्यसे वहीं पसङ्गव
भनुमाबित है । उमका हो पुनः प्रतिबोध होनेसे अनित्यत्वको शहा निराकृत की गई है,
मूछकि विचार द्वारा यह दिखलाया गया है कि श्वासादि सर्वव्यवहारका लोप होनेपर भी
मरणमे जीव नाशको शङ्का नहीं करनी चाहिए ॥४॥
१७१ प्र० ३ पा० २ अधि० ५ ] वैयासिकन्यायमाला (पञ्चमे ब्रह्मणो नीरूपत्वाधिकरणे सूत्राणि) न स्थानतोऽपि परस्योभयलिङ्ग सर्वत्र हि ॥११॥ न भेदादिति चेन्न प्रत्येकमतद्वचनात् ॥१२॥ अपि चैवमेके ॥ १३ ॥ अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात् ॥ १४ ॥ प्रकाशवच्चावैयय॑म् ।। १५ ।। आह च तन्मात्रम् ॥ १६॥ दर्शयति चायो अपि स्मयते ॥ १७ ॥ अत एव चोपमा सूर्यकादिवत् ॥१८॥ अम्बुवदग्रहणातुन तथात्वम् ॥१६॥ वृद्धिहासभाक्त्वमन्तर्भावादुमयसामञ्जस्यादेवम् ॥२०॥ • दर्शनाच्च ॥ २१॥ पश्चमाधिकरणमारचयति- ब्रह्म कि रूपि चारूपं भवेन्नीरूपमेव वा। द्विविधश्रुतिसद्भावाद्ब्रह्म स्यादुभयात्मकम् ॥६॥ नीरूपमेव वेदान्तः प्रतिपाद्यमपूर्वतः। रूपं त्वनूद्यते प्रान्तमुभयत्वं विरुध्यते ॥१०॥ "तदेतच्चतुष्पाद्ब्रह्म" इत्यादिश्रुतयो रूपवद्ब्रह्म प्रतिपादयन्ति । 'अस्थूल- मनणु" इत्यादिश्रुतयो नीरूपम्। तस्मात्-वस्तुत उभयात्मकं ब्रह्म। इति प्राप्ते ब्रूमः-नीरूपमेव शास्त्रप्रतिपाद्यम्। मानान्तरासिद्धत्वात् । जगत्कर्तृत्वादिरूपयुक्त तु ब्रह्म 'क्षित्यादिकं सकतृक कार्यत्वात्' इत्यनुमाने- पञ्चम प्रधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-क्या ब्रह्म रूपवान् और रूपरहित उभयात्मक है अथवा रूपरहित है ? पूर्वपक्ष-दोनों प्रकारको श्रुतियोके मद्भाव होनेसे ब्रह्म रूपवान पोर रूपरहित- उभयात्मक है। सिद्धान्त-वेदान्तोसे ब्रह्म नीरूप ही प्रतिपादित है, क्योकि अपूर्व-प्रमाणन्तरागम्य है, कहीपर रूपवान् श्रवण तात्पर्य वृत्तिसे नही अपितु केवल अनुवाद करता है, मता ब्रह्ममे रूपवत्ता भ्रम है, क्योकि उमयात्मकत्व विरुद्ध है। 'तदेतचतुष्पाद ब्रह्म' (ब्रह्म चतुष्पाद है ) इत्यादि अतिया यत्र तत्र उपासना कालमें रूपवद् ( सविशेष ) ब्रह्मका प्रतिपादन करती है और 'अस्थूलमनरगु०' (न स्थूल है पोर न परशु है ) इत्यादिश्रुतिया नीरूप-निविशेष ब्रह्मका । इसलिए वस्तुनः ब्रह्म उभयात्मक है। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-नीरूप-निविशेष ब्रह्म ही वेदान्तशास्त्रसे प्रतिपाद्य है । क्योकि [ दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः स बाह्याभ्यन्तरो हजा' કર भाषानुवादसहिता [अ० ३ पा० २ अधि०६] माप्यवगन्तुं शक्यते । अत एवोपासनायानूद्यते न तु तात्पर्येण प्रतिपाद्यते। न च अनुमानशास्त्रसिद्धयोरुभयोर्वास्तवत्वम्, एकस्मिन्वस्तुनि सरूपत्वनीरूप- त्वयोविरुद्धत्वात् । तस्मात्-प्रतात्पर्यविषयस्य सरूपत्वस्य भ्रान्तत्वान्नीरूपमेव वस्तुतो ब्रह्म ॥५॥ (षष्ठे ब्रह्मणो निराकरणाविषयात्वाधिकरणे सूत्राणि ) प्रकृतेतावत्त्व हि प्रतिषेधति ततो ब्रवीति च भूयः ॥२२॥ तव्यक्तमाह हि ॥ २३ ॥ अपि संराधने प्रत्यक्षानुमाना- भ्याम् ॥ २४ ॥ प्रकाशादिवाचावैशेष्यं प्रकाशश्च कर्मण्य- भ्यासात् ॥ २५ ॥ अतोऽनन्तेन तथा हि लिङ्गम् ॥२६॥ उभयव्यपदेशात्त्वहिकुण्डलवत् ॥ २७ ॥ प्रकाशाश्रयवद्वा । तेजस्त्वात् ॥ २८ ॥ पूर्ववद्वा ॥ २६ ॥ प्रतिषेधाच ॥३०॥ पधाधिकरणमारचयति- ब्रह्मापि नेति नेनोति निषिद्धमथवा न हि । द्विरुक्त्या ब्रह्मजगति निषिध्यते उभे अपि ॥ ११ ॥ वाप्सेयमितिशब्दोक्ता सर्वदृश्यनिषिद्धये। अनिदं सत्यमत्य च ब्रह्मैकं शिष्यतेऽवधिः ।। १२ ।। (वह निश्चय ही स्वयं प्रकाश, भमूर्त, बाह्य भीतर विद्यमान तथा मज पुरुप है )] इत्यादि प्रमाणान्नरो-अन्यत्र तियोंसे ब्रह्ममे रूपवत्त्व प्रसिद्ध है। जगकर्तृत्वादिरूप विशिष्ट ब्रह्म तो क्षिति प्रादि, सकर्तृक हैं, कार्य होनेसे' इस अनुमानसे भी अवगत हो सकता है, अतएव उपासना, वह रूप अनुवादित है। परन्तु तात्पर्य से उपवत्त्व प्रतिपादित नहीं है, किन्तु अनुमान और शास्त्रने सिद्ध उमयात्मकत्व वास्तविक नही है। क्योकि एक वस्तुमे सस्प और नीरूपरव विरुद्ध है। इमलिए तात्पर्यका पविषय सरूपत्व प्रान्त होनेसे वस्तुतः ब्रह्म नीरूप ही है ॥ ५॥ पष्ट मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह --'नेति नेति' इस वाक्यसे ब्रह्मका भी निवेव होता है अथवा नहीं ? पूर्वपक्ष--'नेति नेति' इस प्रकार द्विरुक्ति होनेसे ब्रह्म मौर जगद दोनोका निषेध होना है। सिद्धान्त-~-सम्पूर्ण दृश्य निषेधके लिए 'इति' शब्दसे कपित 'नेति नेति' यह दीप्मा-दो वार कथन है। इसलिए 'इ' शब्दका भविषय मत्यका भी सत्य प्राषिरूप एक ब्रह्म ही पशिष्ट रहता है मर्याद उमका 'नेनि' मादिमे निषेव नहीं होता है।
१७३ [म०३ पा० २ मधि०६] वैयासिकन्यायमाला 'दे वाव ब्रह्मणो रूपे मूतं चैवामूतं च' इत्येतस्मिन्ब्राझो महता प्रबन्धेन पृथिव्यप्तेजोलक्षणं मर्तरूपं वाय्वापाशलगममर्तरूपं प्रपनय तदन्ते ब्रह्मोपदेष्ट - मिदमुक्तम्-'प्रथात प्रादेशो नेति नेति' इति । अस्यायमर्थ:-'प्रथ रूपद्रय- कथनानन्तरमरूपिणो ब्रह्मणो वक्तव्यत्वात् 'नेति नेति' इत्ययं ब्रह्मोपदेश इति। तत्र पूर्वपक्षी मन्यते -प्रथम नेति शब्देन जगत एकस्यैव निषेध्यत्वे द्वितीयो 'नेति' शब्दो निरर्थक: स्यात् । अतो द्वितीयेन ब्रह्मापि निषिध्यते । इति प्राप्ते यूमः-न तावद्वितीयस्य निषेधस्य वैयथ्यं, वीप्सार्थत्वात् । सत्यां च वीप्सायां यद्यदृश्यते, इति शब्दनिदेशाहं च तत्सर्वं ब्रह्म न भवतीति निपिदं भविष्यति । विना तु वीप्सामेकेन नकारेण मूर्तामूर्तयोः प्रकृतत्वेनेति- शब्दनिर्देशाहयोनिषेधे सति मर्ताद्यभावस्य मूलाज्ञानस्य चानिषिद्धत्वात्तयोब्रह्मत्वं प्रसज्येत । ननु सत्यामपि वीप्सायामस्त्येव दोषः। वीप्साया निरङ्कुशत्वाद्- ब्रह्मापि निषिध्यत इति । तन्न, ब्रह्मणो दृश्यत्वाभावेन निषेध्यसमपकेतिशब्दा- नहत्वात् । किंच 'प्रथात प्रादेशः' इति महता संरम्भेण ब्रह्मोपदेष्टु प्रतिज्ञाय तदेव ब्रह्म निषेधन्ती श्रुतिः कथं न व्याहन्येत । वाक्यशेषश्च न ब्रह्मनिषेधे 'दे वाव०' (ब्रह्मके दो ही रूप हैं मूर्त और अमूर्त ) इस ब्राह्मण में महान् प्रबन्ध. प्रयलसे पृथिवी, जल और तेज स्वरूप मूर्तरूप और वायु और प्राकाशरूप प्रमूर्तरूपका विचारकर उसके मन्तमे ब्रह्मके उपदेशके लिये 'प्रथात प्रादेशो' ( अब इसके अनन्तर 'नेति नेति' यह ब्रह्मका प्रादेश है ) ऐसा कहा गया है । इसका यह अर्थ है-दो रूपोंके कथनके अनन्तर रूपरहित ब्रह्मके वक्तव्य कोटिमे होनेसे 'नेति-नेति' यह ब्रह्मोपदेश है । इसमें पूर्वपक्षी ऐसा मानता है कि प्रथम 'नेति' शब्दसे यदि एक ही जगदका निषेध किया जाय, तो द्वितीय 'नेति' शब्द निरर्थक हो जायगा, इसलिए द्वितीय 'नेति' शब्दसे ब्रह्मका भी निषेच होता है। सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-~-द्वितीय निषेत्र व्यर्थ नहीं है, क्योकि उसका प्रयोजन वीप्सा है। वीप्मा होनेपर जो जो दृश्य है और 'इति' शब्द निर्देशाह है, वह सब ब्रह्म नहीं हो सकता, इस प्रकार निषिद्ध होगा। यदि वीप्सा न हो वो एक 'नकार' से प्रकृत इति शब्दसे निर्देशाई मूर्त और अमूर्तका निषेध होनेपर मूदि प्रभाव और मूलाज्ञानका निषेध न होने से दोनोंमे ब्रह्म व प्रसक्त होगा। वीप्साके होनेपर भी दोष है ही, क्योकि वीप्सा निरंकुश है, इससे ब्रह्मका भी निषेध होगा? यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योकि ब्रह्म दृश्य न होनेसे निषेध्यसे सम्बन्धित 'इति' शब्दके योग्य नहीं है। किञ्च 'प्रथात मादेशः' इस महान समारोहसे ब्रह्मके उपदेशको प्रतिज्ञा कर यदि उसी ब्रह्मका निषेव करे तो श्रुति अपने ही अर्थका विनाश क्यों नहीं करेगी !
। भेदसंगती। भाषानुवादसहिता [अ०३ पा० २ प्रषिक ७ संगच्छते। वाक्यशेषे च "अथ नामधेयं सत्यस्य सत्यम्" इत्यादिनाविवक्षितस्य ब्रह्मरणो लोकिवसत्यागिरिनदीसमुद्रादेरधिकमात्यन्तिकं सत्यत्वं सूचयितुं नाम निर्दिष्टम् । सर्वनिषेधपक्षे सर्वमप्येतत्कथितं स्यात् । तस्मान्न ब्रह्म निपिध्यते ॥६॥ (सप्तमे ब्रह्मातिरिक्तवस्तुनिकरणाधिकरणे सूत्राणि ) परमता सेतून्मानसंपन्धभेदव्यपदेशेभ्यः १३१ ॥ सामा- न्यात्तु ॥ ३२ ॥ बुद्धयर्थः पादयत् ॥ ३३ ॥ स्थान- विशेषात्प्रकाशादिवत् ॥ ३४ ॥ उपपत्तेश्च ॥ ३५ ॥ तथाऽन्यप्रतिषेधात् ॥ ३६॥ अनेन सर्वगतत्वमायाम- शब्दादिभ्यः ॥ ३७॥ सप्तमाधिकरणमारचयति- वस्त्वन्यद्ब्रह्मरणो नो वा विद्यते ब्रह्मणोऽधिकम् । सेतुत्वोन्मानवत्त्वाच्च संबन्धाद्धेदवत्त्वतः ।। १३ ॥ धारणात्सेतुतोन्मानमुपास्त्ये उपाध्युद्भवनाशाभ्यो नान्यदन्यनिषेधता ॥१४॥ यदेब्रह्म 'नेति नेति' इति दृश्यप्रतिषेधेन व्यवस्थापितम्, तस्मादपि ब्रह्मणोऽन्यद्वस्त्वस्तीत्यभ्युपगन्तव्यम्। कुतः। सेतुत्वादिव्यपदेशेभ्यः । “प्रथ पौर इस प्रकार ब्रह्मका निषेध करनेपर वाक्यशेष भी संगत नहीं होगा क्योंकि वाक्य- शेषमे 'अप नामधेय सत्यस्य मत्यम्' इत्यादिसे विवक्षित ब्रह्मके गिरि, नदी, समुद्र मादि लौकिक सत्यकी अपेक्षा अधिक भात्यन्तिक सत्यत्व सूचित करने के लिए नामका निर्देश किया गया है। सर्व निषेध पक्षमें तो यह सर्व भी व्यर्थ होगा, मतएव 'नेति' से ब्रह्मका निषेध नहीं है ॥ ६ ॥ सप्तम प्रधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-ब्रह्मसे अन्य वस्तु है अथवा नहीं ? पूर्वपक्ष-ग्रहासे अन्य वस्तु है, क्योंकि ब्रह्ममें सेतुत्व, उन्मान, सम्बन्ध पौर भेदका व्यपदेश है। सिद्धान्त-जगदविधारणसे सेतुत्व, उपासनाके लिए उन्मानका कपन है, उपाधिके उद्भवसे भेदका मोर उपाधिके विनाशसे सम्बन्धका व्यपदेश है , प्रतएव पन्यके निषेधसे ब्रह्मसे अन्य वस्तुनहीं है। यद्यपि 'ति मेति' इस प्रकार दृश्यक प्रतिषसे ब्रह्म व्यवस्थापित किया गया है, उपापि ब्रह्मसे अन्य वस्तु है, ऐसा स्वीकार करना चाहिए । किससे? इससे कि सेतुत्व - १७५ [म०३ पा० २ अधि०७] वेयासिरन्यायमाला य मात्मा स सेतुविधृतिः" इति मेतुत्वं व्यपदिश्यते। तत्र यथा लोके पारा- वारवाअलस्य विधारकः सेतु, तं च सेतुं तीा द्वितीयं जागलं प्रतिपद्यते, तथा ब्रह्मणोऽपि सेतुत्वेन जगद्विधारकत्वाद्ब्रह्म ती| गन्तव्येनान्येन केनचि- द्भवितव्यम् । तथोन्मानव्यपदेशोऽपि ब्रह्मण श्रूयते-'चतुष्पाद्ब्रह्म षोडशकलं ब्रह्म' इति तच्चोन्मानं सद्वितीये गवादी दृष्टचरम्, न त्वद्वितीये कुत्रचित् । तथा संबन्धव्यपदेशोऽपि ब्रह्मणः श्रूयते-"सता सोम्य तदा संपन्नो भवति" इति । स च संबन्धः सद्रूपाद्ब्रह्मणोऽन्यस्य विद्यमानतायामवकल्प्यते। तथा "प्रात्मा वा अरे द्रष्टव्य." इति द्रष्ट्रद्रष्टव्यभेदव्यपदेशोऽपि । तस्मात्-नाद्वि- - तीयं ब्रह्म। - इति प्राप्ते ब्रूमः-न तावद्ब्रह्मणः सेतुत्वं मुख्यं संभवति । मृद्दारुमयत्व- प्रसन्नात् । केनचित्सेतुसानान्येन सेतुत्वविवक्षायां विधारकत्वमात्रं विवक्षितम् । न तु सद्वितीयत्वम् । 'सेतुर्विधति.' इति श्रवणात् । उन्मानं तूपास्त्यै व्यपदिश्यते, तत्प्रकरणत्वात्, न तु तत्त्वावबोधार्थम् । भेदव्यपदेशश्योपाध्युद्भवमपेक्ष्य घटावा. मादिका व्यपदेश । 'मथ य आत्मा' (जो पात्मा है वह विधारक सेतु है ) इस घुतिसे सेतुत्वका व्यपदेश है। यहाँ लोकमे जैसे जलका विधारक पारावारवान् सेतु होता है, उस सेतुको पारकर दूसरे जागल-देशको प्राप्त होता है । वैसे ब्रह्म भी सेतुरूपसे जगद्विधारक है, अतः ब्रह्मको पारकर किसी अन्य गन्तव्यका प्राप्त होना चाहिए । इस प्रकार 'चतुष्पाद ब्रह्म' (ब्रह्म चतुष्पाद है, ब्रह्म षोडशकलामोवाला है ) इस श्रतिसे ब्रह्ममे उन्मानका व्यपदेश भी है। वह उन्मान सद्वितीय गो प्रादिमे दृष्ट है। कहीं भी मद्वितीय वस्तुमै नही है। तथा 'सता सोम्य' (हे सोम्य | सुषुप्तिकालमें सबके साथ सम्पन्न होता है) इस श्रुतिसे ब्रह्ममे सम्बन्धका व्यपदेश भी है । यह सम्बन्ध रादूप ब्रह्मसे पन्य वस्तुके विद्यमान होनेपर ही हो सकता है। इस प्रकार 'मात्मा वा परे०' (हे मैत्रेयो । प्रात्मा द्रष्टव्य है ) इससे द्रष्ट पौर द्रष्टव्य रूपसे भेदका व्यपदेश भी है । इसलिए ब्रह्म प्रद्वितीय नहीं है। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-ब्रह्ममें मुख्य सेतुत्व मम्भव नहीं है, क्योकि यदि ऐसा माना जाय तो ब्रह्ममे मृद और दारुमयत्व प्रसङ्ग होगा। किसी सेतुके सादृश्यसे सेतुत्वको विवक्षामे विधारकत्व मात्र विवक्षित है, सद्वितीयत्व नहीं, क्योंकि 'सेतुर्विवृतिः' (विधारक सेतु है ) ऐमी अति है। उन्मान तो उपामनाके लिए व्यपदिष्ट है, कारण कि उपासनाका प्रकरण है, तत्त्वके ज्ञानार्थ नहीं है। भेदव्यप- देश दो उपाधिके उद्भवको अपेक्षामे घटाकाश महाकाशके समान उपपन्न होता है। सम्बन्ध व्यपदेश उपाधि विनाशकी अपेक्षा घटनाश होनेपर घटाकाग महाकाशके समान भाषानुवादसहिता [अ०३ पा० २ प्रधि०८ .] शमहाकावदुपपद्यते। संबन्धव्यपदेशश्चोपाधिनाशमपेक्ष्य घटमङ्गे घटाकाशमहा- काशवदुपचयंते। तस्मात् -ब्रह्मव्यतिरिक्तवस्तुसाधकहेतूनामन्यथासिद्धत्वात् । "एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म" इत्यन्यवस्तुनिषेधाच्चाद्वितीयमेव ब्रह्म ॥७॥ (अष्टमे कर्माराधितेश्वरस्यद फलदातृत्वाधिकरणे सूत्राणि) फलमत उपपत्तेः ।। ३८ ॥ श्रुतत्वाच ॥३९ । धर्म जैमिनिरत एव ॥ ४० ॥ पूर्व तु बादरायणो हेतुव्य- पदेशात् ॥ ४१ ।। अष्टमाधिकरणमारचयति-- कमेव फलदं यद्वा कर्माराधित ईश्वरः। अपूर्वावान्तरद्वारा कर्मणः फलदातृता ।। १५ ।। प्रचेतनात्फलासूतेः शास्त्रीयात्पूजितेश्वरात्। फालान्तरे फलोत्पत्तनापूर्वपरिकल्पना ॥ १६ ॥ अनुक्षणविनाशिनोऽपि कर्मणोऽपूर्वव्यवधानेनापि कालान्तरमाविफलादार- स्वसमपादोश्वरकल्पने गौरवम् । इति प्राप्ते ब्रूमः-अचेतनस्य कर्मणोऽपूर्वस्य वा तारतम्येन प्रतिनियतं फलं दातुं न सामय॑मस्ति । लोके सेवादिक्रियायामचेतनायां तददर्शनात् । ततः सेवितराजवत्पूजितेश्वरास्फल सिद्धिरभ्युपेया। न च कल्पनागौरवम्। पारसिद्ध- उपचार हाता है। इसलिए ब्रह्मके भनिरिक्त वस्तुके माधक हेतुमोके अन्यपामिद्ध होने और 'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म' इससे अन्य वस्तुके निषेपसे एक ही पद्वितीय ब्रह्म है' यह सिद्ध है ॥७॥ मष्टम मधिकरणकी रचना करते हैं सन्देह-फलदाणा कर्म ही है अथवा कोसे माराधित ईश्वर ? पूर्वपक्ष-अपूर्व प्रदान्तर द्वारा कर्म ही फलदाता है, ईश्वर नहीं। सिद्धान्त-पचेतन कर्म फलदाता नहीं हो सकता, मतएव कर्म द्वारा माराधित शास्त्र प्रमाण सिद्ध ईश्वर ही कालान्तरमें फलदादा होगा, इसलिए मपूर्वको कल्पना यद्यपि कर्म दाणिक है-प्रतिक्षण विनाशी है, तो भी मपूर्वद्वारा कालान्तर भावी फलदाता हो सकता है। प्रवः ईश्वरको कल्पना करनेमें गौरव है। सिदान्ती-ऐसा पूर्व पक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-प्रचेवन गर्म प्रपदा पपूर्व में तारतम्यसे प्रतिनियत फल देनेकी सामर्थ्य नहीं है, क्योंकि लोक सेवा पादिमचेतन छियामि यसा देखा नहीं जाता है । इमसे सेवित राजाके ममान पूजित ईश्वरसे फल- - ] [अ० ३ पा० २ अधि०८ वैयासिकन्यायमाला १७७ त्वेनेश्वरस्याकल्पनीयत्वात् । 'एप ह्येव साध, कर्मधारयति तं, यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीपते। एप उ एवासाधु कर्म कारयति तं, यमधो निनीपते' इति श्रुति- रोश्वरस्यैव धर्माधर्मयोः फलदातृत्वं तत्कारयितृत्वं चाभिदधाति । सति चेश्वरस्य प्रामाणिकत्वे तवैव प्रत्युताश्रुतस्यापूर्वस्य कल्पने गौरवं भवेत् । तस्मात्कर्मभिराराधित ईश्वरः फलदाता। तदेवमधिकरणचतुष्टयेन तत्पदार्थः शोधितः । तत्र प्रथमेन ब्रह्मणो नीरूप- त्वम्, द्वितीयेन निषेधाविषयत्वम्, तृतीयेनाद्वितीयत्वम्, चतुर्थेन व्यवहारदशायर्या कर्मफलदातृत्वम्, शाखाप्रचन्द्रन्यायेनोपलक्षणत्वाय प्रतिपादितम् । इत्येवं 'तत्त्वंपदार्थों शोधितौ' इति स्थितम् ।।८।। इति श्रीभारतीतीर्थमुनिप्रणीतायां वयासिकन्यायमालायां तृतीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥२॥ आदितः अधिकरणानि १०१ सूत्राणि ४१ ३६० अत्र पादे सिद्धि माननी चाहिए मोर ईश्वरके माननेमें कल्पना गौरव भी नहीं है, क्योकि शास्त्र सिद्ध होनेसे ईश्वर प्रकल्पनीय है। 'एष वि०' (यही जिसे इन लोकोंसे ऊपर ले जाना चाहता है उससे साधु कर्म कराता है और यही जिसे नीचे ले जाना चाहता है उससे प्रमाषु कर्म कराता है) यह अति ईश्वरको ही धर्माधर्मका फलदाता और उसका कारयिता कहती है । इस प्रकार ईश्वर प्रामाणिक सिद्ध होनेपर अब तुमको ही प्रत मपूर्वको कल्पना करनेमे गौरव होगा। इससे यह सिद्ध हुआ है कि कोसे पाराधित ईश्वर ही फलदाता है। इस प्रकार चार मधिकरणोसे 'सद' पदार्थ शोधित किया गया है। उनमें प्रथमसे ब्रह्ममें नीरूपत्व, द्वितीयसे निषेधाविषयत्व, तृतीयसे अद्वितीयत्व और चतुर्थसे व्यवहार- दशामें कर्मफल दातृस्व शाखाचन्द्रन्यायसे उपलक्षणत्वके लिए प्रतिपादित है । इस प्रकार "तन्' पौर व पदार्थोका शोधन किया गया है, यह सिद्ध हुप्रा ॥८॥ इति श्री भारतीतीर्थमुनि प्रणीत वैयामिकन्यायमालाके तृतीयाध्यायके द्वितीय पादका 'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती' वृत भाषानुवाद ॥२॥ १२ + १७८ भाषानुवादसहिता (4० ३ पा० ३ अधि०१] (अथ तृतीयाध्यायस्य तृतीयः पादः) (प्रत्र परापरब्रह्मविद्यागुणोपसहारविवरणम् ) { इस पादमें पर और अपर ब्रह्मविद्याके गुणोके उपमंहारका विवरण है ] (प्रथमे सर्ववेदान्तप्रत्ययोपासनाया एकत्वाधिकरणे सूत्राणि ) सर्ववेदान्तप्रत्ययं चोदनाद्यविशेपात् ॥१॥ भेदान्नेति चेन्नैकस्यामपि ॥२॥ स्वाध्यायस्य तथात्वेन हि समा. चारेऽधिकाराच सववव तनियमः ॥३॥ दर्शयति च ॥४॥ तृतीयपादस्य प्रथमाधिकरणमारचयति- सर्ववेदेष्वनेकत्वमुपास्तरयवैकता। भनेकत्वं कोथुमादिनामधर्मविभेदतः ॥ १॥ विधिरूपफलेकवादेकत्वं नाम न श्रुतम् । शिरोवाख्यधर्मस्तु स्वाध्याय स्यान्न वेदने ॥२॥ छान्दोग्यबृहदारण्यकयोः-पश्चान्युपासनमाम्नायते। तदेकं न भवति, नामभेदात् । 'कौथुमम् ।' इति छान्दोग्यगतस्य नाम । 'वाजसनेयकम्' इति बृहदाण्यकगतस्य नाम । तथोपासनान्तरेषु योजयितव्यम् । धर्मभेदोऽप्युपास- नाभेदगमकः शिरोवतलक्षणो सुपडकन्नतशाखायां भ्रूयते-- तेषामेवैता ब्रह्म तृतीय पादके प्रथम मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-सब वेदान्तोमे उपासना भनेक हैं प्रपवा एक ? पूर्वपक्ष-अनेक हैं, क्योकि कोथुम आदि नाम पौर शिरोव्रत मादि धर्म भिन्न-भिन्न हैं। सिदान्त-सब वेदान्तोंमें उपासना एक है, क्योंकि विधि, रूप मौर फल एक है, भोर नाम श्रुति प्रतिपादित नहीं है, शिरोवन नामक धर्म स्वाध्यायका अङ्ग है उपासना. का नहीं, पत: उपामना एक ही है। छान्दोग्य मोर वृहदारण्यक में पञ्चाग्नि नामकी उपासना सुनी जाती है, परन्तु नामके भेदसे यह एक नहीं है- कोयुम' यह धान्दोग्यगत उपासनाका नाम है और 'वाजसनेयक' बृहदारण्यका आसनाका नाम है। इसी प्रकार अन्य उपामनापोंमें भी योजना करनी चाहिए। धर्म भेद भी उपासनाके भेदका बोधक है। गिरोदरूप विषयमें "तेषा- मेवता' (जिन्होंने विधिवत् शिरोयनका अनुष्ठान किया है उन्हींसे ही यह इह्मविधा १८० भाषानुवादसहिता [अ०३पा० ३ अधि०२] (द्वितीये शाखान्तरोक्तस्याप्युपसंहाराधिकरणे मूत्रम् ) उपसंहारोऽर्थाभेदाद्विधिशेषवत्समाने च ॥५॥ द्वितीयाधिकरणमारचयति- एकोपास्तावनाहार्या आहार्या वा गुणाः श्रुतौ। अनुक्तत्वादनाहार्या उपकार. श्रुतैगुणः ॥३॥ श्रुतत्वादन्यशाखायामाहार्या अग्निहोत्रवत् । विशिष्टविद्योपकारः स्वशाखोक्तगुणेः समः ॥ ४ ॥ वाजसनेयके प्राण विद्यायामधिको गुणो रेतमाख्यः श्रुत.-"रेतो होच्च- काम" इति । नासो छान्दोग्ये माणविद्यायामुपसंहर्तव्यः । अत्रानुक्तत्वात् । विद्योपकारस्त्वत्र श्रुतैरेव प्राणवागादिभिगुगर्भविष्यति । इति प्राप्ते घूम:-एतच्छाखायामश्रबणेऽपि शाखान्तरे श्रुतत्वादुपसंहार्य एव । अग्निहोत्राद्यनुष्ठानेषु शाखान्तरोत्तगुरणयुक्ततयेवानुष्ठानदर्शनात् । न च स्व. शाखोक्तगुणैरेव विद्योपकारसिद्धौ गुणोपसंहारी निरर्थक इति वाच्यम् । 'कर्म- भूयस्त्वात्फलभूयस्त्वम्' इति न्यायेन स्वशाखोक्तगुणवत्परशाखोकगुणानामप्युप. कारकत्वात् । तस्माद् गोपसंहारः वर्तव्यः ॥२॥ द्वितीय प्रधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह--एक उपासनामें श्रुत गुणोका अन्यत्र उपसंहार ( ग्रहण ) करना चाहिए पथवा नहीं? पूर्वपक्ष-गुणोंका उपमहार नहीं करना चाहिये, क्योकि उनका श्रतिमें कपन नहीं है, मोर तगुणोंसे ही उपामनाका उपकार होगा। सिद्धान्त-अन्य शाखामें गुणोका श्रवण होनेसे मग्निहोत्रके समान उन गुणोंका एक उपामनामे उपमहार होना चाहिए, क्योकि विशिष्ट विद्याका उपकार स्वशाखोक्त गुणोंके समान है। मतः गुणोका उपसंहार युक्त है। वाजमनेयकमे प्रायविद्या रेतो होयकाम' इत्यादिसे रेत नामक अधिक गुणवत है, वह छान्दोग्य प्राणविद्यामें उपहार योग्य नहीं है, क्योकि वह यहाँपर उक्त नही है। विद्योपाकार तो यहाँ थुत प्राण, वाग मादि गुणोंसे होगा। सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्षा प्रास होनेपर हम कहते हैं-यद्यपि इस भाषामें मत्र, हैं तथापि प्रन्यवाखामे त होनेमे उन गुणोंका उपसंहार होना चाहिए। क्योंकि पग्निहोत्र मादि मनुष्ठानोंमें मन्य भासामे उक्त गुणोंसे युक्तरूपसे अनुष्ठान देखा जाता है। पानी गासामें उक्त गुणोंने विद्योपकार मिद होनेपर गुणोपमहार निार्थक है, देसीशद्वा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि कर्म के प्राधिक्यसे फलका माधिक्य होता है, इस [म० ३ पा० ३ अवि०३] यासिकन्यायमाला (तृतीय उद्गीविद्याया भिन्नताधिकरणे सूत्राणि) अन्यथात्वं शब्दादिति चेन्नाविशेपात् ॥ ६॥न या प्रकर- रणभेदात्पगेवरीयस्वादिवत् ॥ ७॥ संज्ञातश्चेत्तदुक्तमस्ति तु तदपि ॥८॥ तृतीयाधिकरणमारचयति- ऐका मिनाऽयवोद्रीविद्या छान्दोग्यकाण्वयोः। एका स्यान्नामसामान्यासंग्रामादिसमत्वतः ॥५॥ उद्गीथावयबोकार उद्गीतेत्युभयोभिदा। वेद्यभेदेऽर्थवादादिसाम्यमत्राप्रयोजकम् 'उद्रीयविद्या' इति समाख्याया एकत्वाच्छान्दोग्यकाण्वशाखयोवियेत्य- मुचितम् । अथ ममाख्या न श्रोती, तथाऽपि श्रोता: संग्रामादय उभयत्र समानाः । तथा हि-छान्दोग्ये देवासुरभाव क्रमेण सात्विकेन्द्रियवृत्तीनां तामसेन्द्रियवृत्तीना चाझीकृत्य तत्संग्राम निरूप्य वागादिदेवानामसुरघिद्धत्व- मुक्त्वा प्राणस्यैव तदविद्धत्वमुक्तम् । एतत्सर्व काण्ववेदेऽपि समानम् । तस्मात्- उभयत्र विद्येश्यम् । पारसे अपनी शासामे उक्त गुणोके समान अन्य शाखामे उक्त गुण भी उपकारक होते हैं, इससे गुणोंका उपसंहार ( पहण ) करना चाहिए ॥२॥ तृतीय प्रधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-धान्दोग्य और वृहदारण्यकमें कचित्त उद्गीय विद्या एक है अथवा भिन्न है ? पूर्वपक्ष-एक है, क्योकि ममान नाम है और मग्राम प्रादि भी समान हैं। सिद्धान्त-उद्गीय विद्या भिन्न है, क्योकि उद्गीयावयव ॐकार और उद्गता इन दोनोका भेद है, वैदके भेद होनेपर संग्राम प्रादि अर्थवादको समानता विद्या के एकत्वमें प्रयोजक नहीं है। 'उद्गीयविद्या' इस प्रकारका नाम छान्दोग्य मोर बृहदारण्यकमे एक होनेसे दोनोमे उगीयविद्या एक ही उचित है। यद्यपि नाम श्रोत नही है, तथापि श्रोत संग्राम मादि दोनोंमें ममान हैं । जैसे कि छान्दोग्यमे सात्विक इन्द्रियवृत्ति पोर तामस इन्द्रियवृत्तियोमे क्रमशः देवासुरभाव अङ्गीकार कर उनके मामका निरूपणकर वाग् प्रादि देव असुरो- पापोस विव-युक्त हुए यह कहकर प्राणका हो अविद्ध कहा गया है । यह सब बृहदा- रम्पकमे भी समान है। उससे दोनोमे विद्या एक है ।
१८२ भाषानुवादसहिता [अ०३ पा० ३ अधि० ४] इति प्राप्ते ब्रूम:-मिन्नेयमुद्गी-िया । वधम्बर भिन्नत्वात् ! छान्दोग्य तावत्सामभागविशेष्यस्योद्गाथस्वादयच झोका : स एव माणदृष्टयोपासनीयः। काण्ववेदे तु कृत्स्नोद्गीयभक्तेयं -द्गाला, गिन्द्रिय प्रेर: प्राण स उद्गात त्वेनोपास्य इति वेद्यभेदः । यत्त समामा माम्यमुशम् तदायोगाम्, अर्थवाद- स्वात् । यदपि प्रागास्यासुर विद्धत्व मावन श्रेष्टरम् ! चिप्सस्यम्, तथा:- प्पुक्तस्य वेद्यभेदस्पानिराकरतात्-भिन्नवोद्गो यावद्या ॥ ३ ॥ (चतुर्थ उद्गीथस्योकारविरोपरा वाधिारणे गुगम् ) व्याप्नेश्च समझ-सम् ॥ ६॥ चतुर्थाधिकरणामारचति- विमधामोऽथवा बाध ऐक्यं वाऽप विशेष ता। अक्षरस्यान नास्त्यैक्यं नियतं हेहभान ॥७॥ वेदेषु व्याप्त आकार द्गीथे । दोप्यते । अध्यासादो फलं कल्प्यं निकष्टामदागा l 'ग्रोमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासात' (1० १.१११) १६ रागोययो. सामा- सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त हानेपर हम • दते है-वह उद्गापविद्या भिन है, क्योकि वेद्य-उपास्यका स्वरूप भिन्न भिन्न है । छान्दाग्यमे ता मिभाग विशेष उद्या- वयव योकार है और वहीं प्राणाप्टस आगनाय है । काण्ववदावाखा वृहारण्यक- में सम्पूर्ण उद्गीय भतिका जा उद्गाता वाम् । इन्द्रियार प्रत प्राय है, वह उद्गान- रूपसे उपास्प है, इस प्रकार वद्यका भेद है। पोर ..ग्राम धादिका ममता विद्याक एकत्लकी साधित कही गई है। वह अवामान म उद्गाविद्याके एक बने प्रयोजक नहीं है । यद्यपि प्राण गमुरोस पात्रा ना हान श्रd है और वह उपास्य है, तो भी उक्त वेद्यभदका निराकरण नहा है. गमे विद्या मिन्न हो है ।। ३ ।। चतुय मधिकरणको रचना करते है-- सन्देह--'मोमिन्येतदक्षरमुद्गाचमुगामात' इम अतिम अक्षर और उद्गोयका सामानाधिकरण्य प्रतात हाता है, क्या वह न है, बाध है, ऐक्य है अथवा विशेषण है। पूर्वपक्ष-यहा कि पक्षका नियम नहा हा २५ i, iTAIमन हतु नहा है । सिद्धान्त --उद्गीय शब्द ५हा प्रसाशपण है, . गदयकार भक्षर व्याप्त है, प्रध्यास मादिम फलका बना है पार पसरसन नष्ट लाया है । इसलिए विशेषण पक्ष मगत है। 'मामित्येतदक्षरमु०' (ॐ इस उद्गापिक्व भारी आमना करनी चाहिए ) [प्र० ३ पा० ३ अधि० ४ ] वैयासिकन्यायमाला नाधिकरण्यं श्रूयते। तत्र चतुर्धा संशयः । तथा हि-"नाम ब्रह्मेत्युपासीत" इत्यत्र नाम्नि ब्रह्मदृष्टपध्यासाय सामानाधिकरण्यं श्रुतम् । तथा बाधादिष्वप्यु- दाहियते-'यश्चौरः स स्थाणुः' इति चौरत्वस्य बाधः । 'यो जीवस्तद्ब्रह्म' इत्ये. कत्वम् । 'यप्नीलं तदुत्पलम्' इति विशेष्यता। अतोऽक्षरस्य चतुर्घा संदेहे सति 'इदमेव' इत्यत्र नास्त्यध्यवसाय: । नियामकस्य हेतोरभावात् । इति प्राप्ते ब्रूमः-प्रक्षरस्योद्गीथेन विशेष्यता नियन्तुं शक्यते । ओंकारी हि ऋग्यजुःसामसु त्रिपु पठयते। तत्र 'कस्योपास्यत्वम्' इत्यपेक्षायाम्, 'उद्गीथ- भागस्थितस्य, न वितरस्य' इति सामवेदगतस्य विशेषणीयत्वात् । अध्यास- बाधेक्यपक्षेपु फलमपि कल्पनीयं प्रसृज्येत, स्वतन्त्रोपासनत्वेन फलस्याऽऽकाङ्- क्षितत्वात् । विशेषणपक्षे तु वक्ष्यमाणरसतमत्वादिगुणोपासनाय प्रतीकत्वेनो- कार उद्गीथेन विशेष्यते न तु स्वतन्त्रमुपासनम् । ततो न पृथक्त्वं कल्पनीयम् । ननु उद्गीथशब्द: कृत्स्नभक्तिवाचकः । प्रोकारस्तु तदवयवः । एवं चोंकारं विशेष्टुमुद्गीथशब्देन तदंशलक्षणा स्वीकरणीया स्यात् । बाढम् । तथाऽप्यध्या. इस प्रकार प्रक्षर और उद्गीथका सामानाधिकरण्य सुना जाता है । यहाँपर चार प्रकार- का संशय होता है, जैसेकि 'नाम ब्रह्मेत्युपामीत' यहाँपर नाममे ब्रह्मदृष्टिके प्रध्यासके लिए सामानाधिकरण्य श्रुत है । इस प्रकार बाध प्रादिमें मी उदाहरण हैं-'यौरः स स्थाणुः' ( जो चौर है वह स्थाणु है ) यहा चोरत्वका बाघ है। 'यो जीवस्तब्रह्म' (जो जीव है वह ब्रह्म है ) यह एकत्व है। 'यन्नील तदुत्पलम्' यह विशेपण विशेष्य भाव है । इस प्रकार अक्षरमे चार प्रकारका संदेह होनेपर इनमेसे यही गृहीत हैं, ऐसा यहा कोई निर्णय नहीं है, क्योकि इस विषयमे कोई नियामक हेतु नही है। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते है-अक्षरको उद्गीयके साथ विशेष्यता नियमित हो सकती है अर्थात् उद्गीथ और अक्षरका परस्पर विशेषण विशेष्य- भाव हो सकता है। क्योकि ॐकार ऋक्, यजु भौर साम तीनोमे पठिन है, उसमे कौन उपास्य है इस प्रकार अपेदा होनेपर उद्गीथभागमे स्थित मोकारको पपेक्षा है मन्यकी अपेक्षा नहीं है । इस तरह सामवेदगत विशेषण हो सकता है। प्रध्यास, बाघ मोर ऐक्य पक्षोमे फलकी कल्पना भी प्रसक्त होगी, क्योकि स्वतन्त्र उपासना होनेसे फलको माकाङ्क्षा होती है। विशेषणपक्षमे तो वक्ष्यमाण रसतमत्वादि गुणोकी उपा. सनाके लिए प्रतीकरूपसे ऊंकार उद्गीथसे विशेषित होता है किन्तु स्वतन्त्र उपासना नहीं है इससे पृथक् फलको कल्पना भी नहीं है । परन्तु उद्गीथ शब्द सम्पूर्ण भक्तिका वाचक है और मोकार तो उसका भवयव है । इससे उद्गीय शब्दके साथ मोकारको विशेपित करनेके लिए उद्गीयावयवमे लक्षणा अवश्य स्वीकरणीय होगी ? ठीक है। तथापि मापानुवादरहिता प्र०३ पा० ३ अधि०५] सपक्षात्समीचीनो विशेषणपक्षः । प्रध्यासपक्षे तु यथा विष्णुशब्दः स्वार्थ सर्व परित्यज्यार्थान्तरभूता शिलाप्रतिमां लक्षपति, तयोद्गीपशब्दोऽयोति विश्कर्षः। अंशलक्षणायां तु स्वार्थेकदेशस्यैव परित्याग इति संनिकपः। प्रोंकारादितर- दक्षरजातं यदस्ति सोभ्यं परित्यक्तव्यस्तदेवदेशः। तस्माद्वेदान्तरगतोकारव्या- वृत्यर्थमुद्गीयावयवत्वेनैतदक्षरं विशिष्यते ॥४॥ (पञ्चमे वमिष्ठत्वादोनामाहार्यताधिकरणे सूत्रम् सर्वाभेदाद-यनेमे ॥ १०॥ पश्चमाधिकरणमारचयति- वसिष्टत्वाद्यनाहायमाहायं वैवमित्यतः । उक्तस्येव परामर्शादनाहार्यमनुक्कितः ॥६॥ प्राणद्वारेण बुद्धिस्थं वसिष्ठत्वादि तेन तत् । एवंशब्दपरामर्शयोग्यमाहायमिष्यते 18011 प्राणविद्याया छान्दोगा काण्वाश्च वसिष्ठत्वप्रतिष्ठादिकान्गुणानामन्ति, न स्वेतरेयककोपीतक्यादयः तत्र वसिष्ठत्वादिकं नोपसंहर्तव्यम् । कुतः । 'प एवं वेद' इत्येवंशब्देन ततच्छाखोक्तगुणानामेव परामर्शात् । अध्यासपक्षसे विशेषणपक्ष समीचीन है। मध्यास पक्षमे तो जिस प्रकार विष्णुशब्द सब स्वार्थका परित्यागकर अन्यार्थभूत शिलाको प्रतिमाका लक्षणसे वोध कराता है । इस प्रकार उद्गीथ शब्द भी होगा, तब तो विप्रकृष्ट लक्षणा होगी। अंशलक्षणा-अवयव लक्षणामें तो स्वार्थ के एक देशका परित्याग है, अत: सनिपृष्ट है । मोंकारसे भिन्न जो अक्षर समुदाय है, वह परित्याज्य है, यह मोकार एकदेश है। इससे मन्य वेदगत मोकार की व्यावृत्ति के लिए उद्गीथावयवरूपसे यह मोकार अक्षर विशेषित होता है ॥४॥ पञ्चम प्रधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-वसिष्ठत्व भादि गुणोका ग्रहण करना चाहिए अथवा नहीं ? पूर्वपक्ष-'एवम्' शब्दसे उक्तका ही परामर्श होनेसे वसिष्ठत्व भादिके उक्त न होनेसे उपसंहारके योग्य नहीं हैं। सिद्धान्त-वसिष्ठ प्रादि प्राण द्वारा वुद्धिस्य हैं, अन्य नही, अत: वे वमिष्ठत्व प्रादि "एवम्' शब्दसे परामर्श के योग्य हैं, इसलिए उनका उपसंहार करना चाहिए । प्राणविद्यामें छान्दोम और काम वसिष्य प्रतिष्ठादि गुणोको कहते हैं और ऐतरेयक एवं कोषोतकी प्रादि नहीं कहते हैं। ऐसी परिस्थितिमें वमिष्ठ व मादिका ऐतरेयक प्रादि प्राणविद्या में उपसंहार करना चाहिए कि नहीं? ऐसा सन्देह होने पर पूर्वपलमे ऐतरेयक प्रादिमें वापरख प्रादि गुणोका उसंहार नहीं करना चाहिए।
प्र० ३ पा० ३ अधि०६] वैयासिकन्यायमाला इति प्राप्ते ब्रूम:--उत्तगुणवदनुक्ता मपि गुणा एवं शब्दपरामर्शयोग्याः । कुतः । गुणिनः प्राणस्य त्वेन तद्द्वारा गुणाना बुद्धिस्थत्वात् । यथा देवदत्तो मथुरापामध्यापयन्दृष्टः पुनमाहिष्मत्यामनध्यापयन्नप्यध्यापवत्वेनेव प्रत्यभिज्ञा यते, तथा छान्दोग्पादो वसिष्ठत्वादिगुणयुक्ततयोपलब्ध., पुनरैतरेयादो केवल उपलभ्यमानोऽपि तद्गुणविशिष्टतयैव बुद्धिस्थो भवेत् । तस्मात्-एवं पशब्दपरा- मर्शयोग्यत्वाद्वसिष्ठत्वादिकमुपसंहर्तव्यम् ॥५॥ (पष्ठ मानन्दादीनामुपसहाराधिकरणे सूत्राणि ) आनन्दादयः प्रधानस्य ॥ ११ ॥ प्रियशिरस्त्याद्यप्राप्तिरुप- चयापचयौ हि भेदे ॥१२ ।। इतरे त्वर्थसामान्यात् ॥१३॥ 'पष्ठाधिकरणमारचयति- नाऽऽहार्या उत वाऽऽहार्या पानन्दाद्या अनाहृति । वामनीसत्यकामादेरिवतेषा व्यवस्थिते. ॥११॥ विधीयमानधारणा व्यवस्था स्याद्यथाविधि । प्रतिपत्तिफलाना तु सर्वशाखासु सहृतिः ॥ १२ ॥ क्योकि 'य एव वेद' इसमे पठित 'एवम' शब्दसे तत्-तत शारखामें उक्त गुणोका ही परामर्श होता है। सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्ष होनेपर हम कहते हैं---उक्त गुणोके समान मनुक्त गुण भी 'एवम्' शब्दसे परामर्श के योग्य हैं। क्योकि गुणीभूत प्राणके एकरूप होनेसे प्राण द्वारा गुण बुद्धिस्थ होते हैं। जैसे मथुरामें पढाता हुआ देखा गया देवदत्त पुन कदाचित् माहिष्मतिमे पढाता हुआ नहीं देखा जाय तो भी अध्यापकरूपसे उमका प्रत्य- भिज्ञान होता है। वैसे छान्दोग्यादिमे वसिष्ठत्वादि गुण युक्ततया उपलब्ध प्राण पुन ऐतरेय प्रादिमे केवल उपलब्ध होनेपर भी वसिष्ठ-व प्रादि गुणोसे युक्त ही बुद्धिस्थ होते हैं । इमलिए 'एवम्' शब्दसे परामर्श योग्य होनेसे वसिष्ठत्वादि गुणोका ऐनग्य आदिको प्राणविद्यामे उपसहार करना चाहिए ॥ ५॥ षष्ठ भधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देश-तत्तिरीयककी परब्रह्म विद्यामे पठिन मानन्दादिका ऐतरेयकादिमे उक्त परब्रह्मविद्यामे उपसहार होना चाहिए अथवा नही ? पूर्वपक्ष-प्रानन्दादिका उपसहार नहीं होना चाहिए, क्योकि उनको व्यवस्था वामनी, सत्यकामादिके समान हो सकती है। सिद्धान्त-विषियमान धोको व्यवस्था सगुणविद्या में विधिके अनुसार होगी, फनवाले प्रानन्दादिसा तो मभी गावापामे उपमहार होना चाहिए । प- मापानुवादसहिता [अ०३ पा० ३ प्रषि००) 'प्रानन्दो ब्रह्म' (ते० ३११०) 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म (ते. २१) इत्या. नन्दसत्यत्वादस्तैत्तिरीयके परनझविद्याया पठपन्ते, ते 'प्रज्ञानं ग्रह्म" इत्या- येतरेयकादिप्रोक्तासु परब्रह्मविद्यासु नोपसंहतंव्याः । वामनीत्वादिवद्वयवस्यो. पपत्ते । “एप उ एव वामनी, एष उ एव भामनी' इति कामनेतृत्वमास- क्वादणे गुणा उपकोसलविद्यायामाम्नाताः। "सत्यकामः सत्यसंकल्पः" इति सत्यकामादयो गुणा पहरविद्यार्या समाम्नाताः। तत्र यथा परस्परं गुणानुप- संहार एवमानन्दादीना व्यवस्थास्तु । इति प्रासे झूम-विषमो दृष्टान्तः । वामनीत्वादिना ध्येयत्वेन विघीयमान. त्वाद्यथा विधि व्यवस्था युक्ता। प्रानन्दादयस्तु प्रतिपत्तिफला इति न विघीयन्ते। अतो व्यवस्थापविध्य भावात्प्रतिपत्तिफलस्य सर्वत्र समानत्वाचाऽऽनन्दादय उपसहर्तव्या ॥॥ ( मप्तमे पुरुषस्यैव शेमताधिकरणे सूत्रे) आध्यानाय प्रयोजनाभावात् ॥ १४ ॥ श्रात्मशब्दाच्च ॥ १५ ॥ सप्तमाधिकरणमारचयति- सर्वा परम्पराक्षादे या पुरुष एव वा। ज्ञया सर्वा श्रुतत्वेन वाक्यानि स्युर्वहूनि हि ॥ १३ ॥ 'पानन्दो ब्रह्म' 'मन्य ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इस प्रकार मानन्द, सत्यत्वादि तैत्तिरीयक परब्रह्मविद्या में पठिन हैं । वे 'प्रज्ञान ब्रह्म' इत्यादि ऐतरेयक मादिम शोक्त परब्रह्मविद्यामे उपसहारके योग्य नहीं हैं, क्योकि उनको व्यवस्था वामनीत्व आदिके समान हो सकती है । 'एप उ एव वामनी' एष उ एव भामनी इस प्रकार कामनेतृत्व-कामपितृत्व भामकरव मादि गुण उपकोसल विद्यामें कहे गये हैं 'सत्यकाम सत्यसङ्कल' इस प्रकार सत्य काम आदि गुण दहरविद्यामें कहे गये हैं । जैसे यहा परस्पर गुणोंका उपसहार नहीं है, वैसे प्रानन्दादिको भी व्यवस्था होगी अर्थात् उनका भी परस्पर तैत्तिरीयक मोर ऐतरेयकमे उक्त परब्रह्मविद्याने उपमहार नहीं होगा। सिद्धान्तो-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-यह दृष्टान्त विषम है, क्योकि वामनात्वादि ध्येयरूपस विधियमान हैं, मत उनको व्यवस्था विधिके अनुसार युक्त है । प्रानन्दादि तो ज्ञान फलवाले हैं, प्रत उनका विधान नहीं है । इमलिए व्यव- स्थापक विधिक प्रभावमे जानफलवाले सर्वत्र समान होनेसे प्रानन्दादिका उपसंहार होना चाहिए ॥६॥ सप्तम प्रधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-इन्द्रिय मादिकी सर्व परम्परा शेयरूपसे प्रतिपाय है अथवा केवल पुरुष ही श्रुति प्रतिपाद्य है।
रुप [अ०३ पा० ३ अधि० ७] वैयाशित यायमाना १८७ पुमर्थ पुरपज्ञान या श्रुतो महान् । तदोषाय श्रतोऽशादिवेद्य एव पुमास्तत ॥ १४ ॥ वठवल्लीषु पठ्यते-- इन्द्रियेगा परा ह्या अर्थेभ्यश्च पर मनः। मासस्तु परा TARमा महान्पर ।। महत पर व्यक्तम यतात्परुप परा। पुरुषाय पर 'ि4. I Hठा सा परा गति ॥ ( ३३१०।११ ) इति । अस्यायमय - मामा विषयानभि प्य पश्चादिन्द्रियैर्वाद्यान्विपयानाप्नोति। तन नाशिपयेभ्य द्र राना 7 त्वात्परत्व प्रसिद्धम् । इद्रियेभ्यश्चाभिल प्यमाणत्वदापना प्रया । तेभ्योऽप्यभिलाषामिका मनोवृत्तिरा न्तरा । वत्त पियत्ति । भ्यन्तरा। बुद्धेरपि बुद्धघु पादानभूतो महच्छ ब्दाच्यो हेरण्यगभ' मन्य रा । मह ऽपि तदुपादानभूतमव्यक्ताख्य TITI मानवर दधिष्ट न मतश्चिद्रूप पुरुषोभ्यन्तर । पुरुपादभ्य- रन । 1- तारतम्यस्य विश्रान्तिभूमिा। पूर्व 1-न्द्रि दकी गवररम्परा ही ज्ञ यरूपसे प्रतिपाद्य है क्योकि वह श्रुत है और प्रने दाक्य भा हैं। मिदान- ग्रामजान परषाथ * उमम महान् यन शृति प्रतिपादित है। प्रत इन्द्रिा का परम ग भी पुरपके ज्ञान के लिए 7 है श्रत वेवल पुरुप ही येद्यरूपम नि पाद्य है इ यानि परम्परा नही । इद्रि भ्य परा (इद्रिकी अपे। उनक विषय पर मूक्ष्म अथवा श्रष्ट हैं विषयो मे मन पर है म13 पुद्धि पर ह प्रौर घुद्धिसे भी महान आमा ( महतत्त्व ) उ वृष्ट मूक्ष्म है मम व्यक्त ( मूनप्रति ) पर है और अव्यक्तरो भी पुरुप पर है पुरपस पर कुछ नी है । वहा ( मूक्ष्म व 1) पराकाष्ठा और वही परा गति है ) इस प्रकार कठव लामें कहा गया है। रमवाय अर्थ है- मनुष्य मनसे विषयोकी अभिलापाके प्रन तर इन्यिो द्वारा बाध विषया माथ मब व करता है। उसमे बाह्यविषयोकी अपेक्षा द्रियाँ या तर है म उनमे परव प्रसिद्ध है। इद्रियोंसे अभिलष्यमाण दशापन विषय या नर है उत्ग भा अ भलाषामिका मनोवृत्ति पातर है वृत्तिसे भी वृत्तिवातो वुद्ध प्रम्य तर हे युद्धमे बुद्धिका उपाानभूत महत् शब्वाच्य हिरण्यगभ रूप प्रा मा अभ्यन्तर है महत्स भी उना उपादान भूत अव्यक्त नामक मूलाज्ञान अन्य तर है। अयक्तस भो उमका अधिष्ठान भूत चतन्यस्वरूप पुरुष अम्प तर है पुरुषम नाई भी प्रा तर नहीं है । पुरुप हाम्य र तारतम्यत्री विश्राम भूमि है । -
१८८
भाषानुवादसहित [अ० ३ पा० ३ मधि०७]
पुरुषावामे परमो गन्तभ्यश्च' इति । तम यमा पुष्प. प्रत्या तात्पर्यण
प्रतिपाद्य , एवमिन्द्रियादिपरम्पराऽपि प्रतिपाद्यय । अन्यथा तदुपन्यारावय-
यात् । बहूना प्रतिपादने वाक्यभेद स्यादिति चेत् । बाढम् । सन्त्येव तानि
यहूनि वाक्यानि । एषवाक्पत्यासंभवात् ।
इति प्राप्ते घूम-पुरुषज्ञानस्यारोपसंमारनिदानभूताज्ञाननियतकत्वात्पुरप
एव शेपतया प्रतिपाद्य, । अत एव वाफ्यशेपे पुरुषशानायव महता प्रयानेन योग
उपदिष्ट
एप सर्वेषु भूतेषु गूढारमा न प्रवाशते ।
दृश्यते स्वप्रथया बुद्धपा सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिमि. ॥ इति ।।
प्रस्यायमर्थ:-'सर्वाभ्यन्तरत्वेन गूढोऽयमात्मा बहिर्मुखानान प्रकाशते। मन्त-
मुंखा ये सूक्ष्मतत्त्वदर्शनशीलास्तैोगाभ्यासेनेकाप्रपमापनया बुद्धधा सूक्ष्मव-
स्तुधिपयया द्रष्टुं शक्यते' इति । न च पुरुषस्यैव प्रतिपाद्यत्वे परम्परोपदेशवै-
यथ्यम् । बहिसस्य वितस्य पुरुषप्रवेश प्रति परम्पराया सायनत्वात् । तस्मा-
पुरुष एवं ज्ञातव्यः । ७॥
इमलिए 'पुरुषार्थका परमो गन्तव्य' ( मोशकामनापाल द्वारा परम पुरुषको पानना
पाहिए ) इस प्रकार मन्य पति कहती है। पूर्वपक्षी-जिस प्रकार यहाँ पुरुष तात्पर्य
वृतिगे अति प्रतिपाद्य है। इस प्रकार इन्द्रियादि परम्परा भी तात्रवृत्ति पति
प्रतिपाद्य है, पन्यथा इद्रिादि परम्पराका उपन्याम व्यथ हो जायगा। यदि कहो कि
भनेकार्य प्रतिपादनमें पावरभेद होगा तो ठोर है, क्योकि ये बहुत वाप है ही, पव'
उनकी एकवाक्यता हो ही नहीं सकती।
सिद्धान्ती-ऐमा पूर्व प्राप्त होनेपर हम कहते हैं -पुरुपज्ञान सम्पूर्ण संसारके
कारण भूत प्रज्ञानका निवर्तक होनेमे पुरुष ही भयरूपमे पति प्रतिपाद्य है। अतएव
वाक्यशेष में पुरुपज्ञान के लिए महान प्रपलसे योग का उपदेश किया गया है । 'एप सर्वेषु०
(सम्पूर्ण भूतोमे छिपा हुमा यह मा मा प्रकाशित नहीं होता, यह सूक्ष्मदर्शी पुरुषों
द्वारा अपनी तीव्र और मूक्ष्म बुद्धिमे ही देखा जाता है) इसका यह प्रर्य है- सर्वाम्मतर-
रूपसे छिपा हुआ यह प्रारमा वहिमुख पुरुषों के लिए यह प्रकाशित नहीं होता । जो
सूक्ष्म तत्वदर्शन शोल अ-तमुम्न हैं उन्ही द्वारा योगाभ्याससे एकाग्रतापन्न मूक्ष्मवस्तुविष
यक बुद्धिसे देखा जा सकता है। केवल पुरुषक श्रुतिप्रतिपाद्य होनेमे इन्द्रियादि परम्परा
उपदेश व्यर्थ नहीं है, क्योंकि बहिर्मुख रितका पुरुष प्रवेशके प्रति उक्त परमरा माधन
है । अतएव पुरुष ही ज्ञातव्य है ॥ ७॥
१८६ [अ० ३ पा० ३ अधि०८] वैयासिय न्यायमाला (मष्टम ईश्वरस्यवाऽऽत्मशब्दवाच्यताधिकरणे मूत्रे ) आत्मगृहीतिरितरवदुत्तरात् ॥१६॥ अन्वयादिति चेत्स्या- दवधारणात् ॥ १७॥ अष्टमाधिकरणमारचयति- प्रात्मा वा इदमित्यत्र विराटस्यादथवेश्वरः भूतासृष्टर्नेश्वरः स्याद्वाद्यानयनाद्विराट् ॥ १५ ॥ भूतोपसंहृतेरीश: स्यादद्वैतावधारणात् । अर्थवादो गवाद्युक्तिब्रह्मात्मत्वं विवक्षितम् ॥ १६ ॥ "प्रारमा वा इदमेक एवान पासीत् (ऐ०११) इत्यत्र विराडेवाऽऽस्मशब्दवाच्यो नेश्वरः । कुतः। 'स ऐक्षत्, लोकान्नु सजै' (ऐ० १।१ ) इति पञ्चभूतसृष्टिम- नुक्त्वा लोकमात्रसृष्टेरभिधानात् । ईश्वरप्रकरणे तैत्तिरीयच्छान्दोग्यादिषु भूतसृष्टपभिधानदर्शनात् । "ताभ्यो गामानयत्" (ऐ० २१२ ) इति प्रोक्तं गवा- द्यानयनं शरीरिणो विराजो घटते, न स्वशरीरस्य परमेश्वरस्य । इति प्राप्ते ब्रूम -'एक एवाग्र प्रासीत्' इत्यद्वैतावधारणादीश्वरोऽनाऽऽत्म- शब्दार्थः । तथा च सति शाखान्तरोक्तभूतसृष्टिरपोपसंहतुं शक्यते । यत्त गवा. मष्टम अधिकरणको रचना करते है- सन्देह- -'प्रात्मा वा इदमेक'० इस श्रुतिमें प्रत्मशब्दसै विराटका ग्रहण है अथवा ईश्वरका ? पूर्वपक्ष-विराट्का ग्रहण है ईश्वरका नही, क्योकि गवानयन भादि शरीरसे ही हो सकता है और भूव सृष्टिका निरूपण नही है। सिद्धान्त-विराटका ग्रहण नही, किन्तु ईश्वरका ही ग्रहण क्योंकि पढतका अवधारण होने और भूतोका उपसंहार होने मे ब्रह्मात्मा ही विवक्षित है, गवानयन भादि कयन तो प्रर्थवादमात्र है। 'मात्मा वा इदमेक'० (सृष्टिके पहले एक पारमा ही था ) यहाँ विराट् ही प्रात्मा शब्दवाच्य है ईश्वर नहीं। किससे ? इससे कि 'स ऐक्षद०' ( उसने ईक्षण किया कि मैं लोकोकी सष्टि करू') इस प्रकार पांच भूतोको सृष्टि न कहकर केवल लोष्टिका ही क्थन है । तत्तिरीय, छान्दोग्य प्रादिमे ईश्वरवे प्रकरणमें भूत सृष्टिका अभिधान देखा जाता है। 'ताम्यो' (उन देवतामोके लिए गौ लाया ) यह कहा गया गो प्रादिका मानयन गरीर सहित विराट्में ही घटता है शरीर रहित परमेश्वरमे नही । सिद्धान्तो-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-एक एवान मासीत्' इस प्रकार भद्वैतका अवधारण होनेसे यही ईश्वर ही प्रात्मशब्दका अर्थ है अर्थात् मात्मशब्द १६० भाषानुदादमाहिता [अ०३ पा० ३ अधि०८] द्यानयनम् । तदर्थवादरूपम् । तदनस्य स्वातन्त्र्येण पुरुषार्थत्याभावात् । प्रथ भूतार्थवादत्वं मन्येथास्तहिं विराडादिधारा परमेश्वर एव गादिामानयतु अथ धू यमागस्य गवानयनप्रपञ्चस्यार्थवादत्वे श्रुतेनिमक्षितार्थः कोऽपि न सिध्ये. दिति चेत् । न, जीवनीक्यम्य विवक्षिाद। "प्रात्मा " इत्युपक्रम्य स एतमेव पुरुपं ब्रह्म ततमपश्यत्' (ऐ० १॥३॥१३ ) प्रगानं ब्रह्म" (ऐ २०१४ ) इत्युपसंहारात् । तस्मादीश्वर एवाऽऽत्नशब्दवाच्यः । द्वितीयवर्णकमाह-- द्वयोवस्त्वन्यदेक वा पाण्वच्छान्दोग्यपष्टयोः । उभयत्र पृथग्वस्तु मदात्मभ्यामुपरमात् ।। १७ ।। साधारणोऽयं सच्छब्दः म आत्मा तत्त्वमित्यतः। वाक्यशेषदात्मवाची तस्माद्वम्त्वेक मेनयोः।। १८ ।। काण्वपष्ठाध्याये "कतम मात्मा, 'इत्याग्मात्मा पश्चिनः । छान्दोग्य- दाच्य है इमलिए अन्य शाखामे उक भूत सटिका यहाँ उपमहार हो सपना है, जो गवादिक्षा प्रानयन है वह केवल अर्थवादमा है। उनका ज्ञान स्वतन्त्र पुरुषार्थ नहीं है। यदि भूतार्थवाद मानो तो भी विराट् पाद द्वारा परमेश्वर ही गवादि लाएगा। ध्यमाण गवानयन प्रपञ्च अर्थवाद होनेपर तो श्रुतिका कोई भी विवक्षितार्थ सिद्ध नहीं होगा, यदि ऐमी शङ्का करो तो नहीं करनी चाहिए क्योंकि जीव ब्रह्मकी एकता विविक्षित है । 'मान्मा वै.' इस प्रकार उपक्रमकर म एतमेव' (इस प्रगर उसने इस पुरुषको ही पूर्णतम ब्रह्मरूपसे देखा, प्रज्ञान ब्रह्म है ) ऐसा उपसंहार है। इमसे ईश्वर ही प्रात्मशब्दवाच्य है ॥ ८॥ द्वितीय वर्णक कहते हैं- सम्देह--बृहदारण्यक और धान्दोग्यके छठे अध्यायमे जो प्रात्मा और सत्वा वर्णन किया गया है, वे दोनों एक ही हैं अथवा पृथक् पृथत् ? पूर्वपक्ष-छान्दोग्यमे 'स्व' शब्दमे और वृहदारण्यक्म 'पारमा' शब्दसे उपत्रम होनेसे दोनो स्थलोमै पृथक्-पृथक् वस्तु है । सिद्धान्त--'सत्' शब्द यद्यपि प्रात्मा और अनात्मा दोनोका बाचक होनेसे माधारण है, तथापि 'स भागमा तत्त्वमणि' वह प्रात्मा है, तू वह है ) इस दाययोयमे मात्माका वाचक होना चाहिए। इससे बृहदारण्यर और छान्दोग्यमें 'आत्मा' और 'सत्' एक ही वस्तु है । बृहदारण्यकके छठे प्रघ्यायमे 'क्तम नामा' (यामा बौन है) इस प्रकार भारम्भकर प्रात्माका विस्तृत वर्णन किया गया है, टान्दोग्यके छठे अध्यायमे तो 'सदेव- - [म० ३ पा० ३ अधि०६] यासिकन्यायमाला १६१ पष्ट तु 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत् ( ६।२६१ ) इत्युपत्रम्य सास्तु प्रपञ्चितम् । न लोके सच्छब्दात्मशब्दो पर्यायो । तस्मात्-वस्तुभेदः । इति प्राप्ते ब्रमः-सच्छब्दोऽयमात्मानात्मसाधारणत्वात्संदिग्य.। स च वाक्य- शेषे ' स पात्मा तत्त्वमसि (६८७) इति श्रवणादात्मवाची भविष्यति । तस्मात्-एकमवोभयत्र वस्तु ॥८॥ ( नवमे प्राणविद्यायामनग्नतावुद्ध रेव विधेयत्वाधिकरणे सूत्रम् ) कार्याख्यानादपूर्वम् ॥ १८॥ नवमाधिकरणमारचयति- अनग्नबुद्धचाचमने विधेये बुद्धिरेव वा। उभे अपि विधीयेते द्वयोरत्र श्रुतत्वतः ।। १६ ॥ स्मृतेराचमनं प्राप्तं प्रायत्यार्थमनद्य तत् । अनग्नतामतिः प्राणविदोऽपूर्वा विधीयते ॥ २० ॥ प्राणविद्यायां वाक्यशेपे यते--"अशिष्यन्नाचामेत् । अशित्वा चाऽचा सोम्येदम०'( हे सोम्य । सृष्टिके पहले यह सब सत् ही था ) इस प्रकार उपक्रमकर सव वस्तुका ही विस्तृत वर्णन किया गया है। लोकमे 'सत्' और 'प्रात्मा' शब्द पर्यायवाची नहीं है। प्रतः दोनो वस्तुप्रोमै भेद है । सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेवर हम कहते हैं- यद्यपि यह 'सत्' शब्द मात्मा मोर अनात्मा दोनोंमे साधारण होने से किमका वाचक है, इस प्रकार संदिग्ध है, तथापि वह 'स मात्मा तत्त्वमसि' इस वाक्य शेषमे इस प्रकार श्रवण होनेमे पात्माका वाचक होगा। इससे बृहदारण्यक और छान्दोग्य दोनोंमें 'मद' और 'मात्मा' एक ही वस्तु है ।।८॥ नवम अधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-'अशिष्यन्नाचमेत' 'प्रशित्वा चाचमेत्' 'एतमेव तदनमनग्नं कुरुते' (भोजन करनेके पूर्वमे पाचमन करना चाहिए और भोजनकर माचमन करना चाहिए, इसी प्राणको उस पाचमनसे हम प्राच्छादित करते हैं ऐसा मानते हैं ) इस श्रुतिमे प्राणकी मनग्नता बुद्धि मोर माचमन दोनोका विधान है अथवा केवल मनग्नता बुद्धि ही विधेय है? पूर्वपक्ष-इस श्रुतिमें प्राणको प्राग्नता बुद्धि और प्राचमन दोनोका श्रवण है, अतः यहाँ दोनोंका विधान प्रतीत होता है। सिद्धान्त-शुद्धताके लिये स्मृतिसे आचमन प्राप्त है उसका अनुवादकर प्राणो- पासनाके प्रति प्राणोपासक अपूर्व होनेसे अनग्नता बुद्धिका विधान करते हैं।'
१६२ भाषानुवादसहिता [म० ३ पा० ३ मधि०१०] मेत् । एतमेव तदनमनग्नं कुरुते" इति । तत्र प्राणस्यानग्नताबुद्धिराचमनं चेत्यु- भयं विधेयम् । द्वयोः भूतत्वात्। इति प्राप्ते बूमः--"अप्राप्ते शास्त्रमथंयत्" इति न्यायेन मानान्तराप्राप्त. मनग्नताचिन्तनमेव विधेयम् । भोजनात्प्रागूध्वं चाऽऽचमनीयास्वप्नु वासोबुद्धि कृत्वा तेन वाससा प्राणस्यानग्नत्वं ध्यायेदित्यर्थः । प्राचमनं तु शुद्धपर्यतया स्मृतिबलादेव प्राप्तमिति न विधीयते । न च तस्याः स्मृतेरियं युतिमू लमिति शंकनीयम् । वर्णाश्रमधर्मप्रकरणत्वाभावेन भिन्नविषयत्वात् । मूलभूतं (तु] श्रु त्यन्तरमनुमेयम् । तस्मादाचमनस्य प्राप्तत्वादनग्नताबुद्धिरेव प्राणोपासक प्रति विधेया ।।६।। (दशशे शाण्डिल्यविद्यायाः समानताधिकरणे सूत्रम् ) समान एवं चामेदान् ।। १६ ॥ दशमाधिकरणमारचयति- शाण्डिल्यविद्या काण्वानां द्विविधेकविधाऽथवा। द्विरुक्तेरेकशाखायां वे विद्ये इति गम्यते ॥ २१ ॥ 'बृहदारण्यककी प्राणविद्यामे' वाक्यशेषमें 'पशिष्यन्नाचमेव' ( भोजन करनेके पूर्व माधमन करना चाहिए, भोजनके अनन्वर पाचमन करते हैं, वे उसी प्राणको मनग्न करते है ) ऐसी जूति है। उक्त प्रतिमें प्राणकी मनग्नता बुद्धि पौर पाचमन इन दोनोंका विधान है पथदा केवल मनग्नता बुद्धिका ? पूर्वपक्षी-दोनोका विधान है। क्योंकि दोनोंका श्रवण है। सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-'मप्रा शास्त्रमर्पवत्' (पप्रास विषयमें गास्त्र सार्थक होता है ) इम न्यायसे पन्य प्रमाणसे अप्राप्त मनग्नता चिन्तन ही यहाँ विधेय है। 'भोजनके पहले और भोजनके मनन्तर पाचमन योग्य जलमें वस्त्र बुद्धिका उस वस्त्रये प्राणको मनग्नताका ध्यान करना चाहिए' ऐमा मर्थ है। पाचमन तो शुद्धिके लिए स्मृति बलसे ही प्राप्त है, इसलिये उमका विधान नहीं किया जाता है, उम स्मृतिको यह श्रुति मूल है, ऐसी भाशवा नहीं करनी चाहिए, क्योकि घर्णम धर्मका प्रकरण में होने से भिन्न विषय है। उक्त स्मृतिको मूलभूत दूसरी श्रुतिका अनुमान करना चाहिए। इसलिए पाचमन स्मृतिसे प्राप्त होनेसे अनग्नता बुद्धि ही प्राणोपासकके प्रति विधेय है ॥६॥ दगम अधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह काण्वों को शाण्डिल्यविशा दो प्रकारको है भयवा एक.प्रकार की ? पूर्वपक्ष--एक शाखामें पुनरुक्तिके भय से दो विद्याए हैं, ऐसा ज्ञात होता है।
[अ० ३ पा०३ अधि० ११] वेयासिकन्यायमाला भवेत् । एकामनोमयत्वादिप्रत्यभिज्ञानतो विद्याया विधिरेका स्यादन्यत्र गुणे विधिः ॥ २२ ॥ काण्वानामग्निरहस्यन्नाह्मणे शाल्डिल्यविद्या पठ्यते-स प्रात्मानमुपासीत मनोमये प्राणशरीरम्" इति । तथा तेषामेव बृहदारण्यके सैव विद्या पठिता- 'मनोमयोऽयं पुरुषो भाः सत्यः (बृह०५।६।१) इति । तत्र पोनरुक्त्य मयाद्विद्याभेदः । इति प्राप्ते ब्रूमः-मनोमयत्वादिकस्य वेद्यस्वरूपस्य प्रत्यभिज्ञानादेकैव विद्या । न च पुनरुक्तिः । एका विद्या विधायापरत्र तदनुवादेन सत्यत्व- सर्वेशानत्वादिगुणानां विधातुं शक्यत्वात् "मग्निहोत्रं जुहोति, दध्ना जुहोति" इत्यादिवत् । तस्मात्-एकविधैव शाण्डिल्यविद्या ॥ १० ॥ (एकादशे नाम्नोर्व्यवस्थाधिकरणे सूत्राणि ) संयन्धादेवमन्यत्रापि ॥ २०॥ न वा विशेषात् ॥ २१ ॥ "दर्शयति च ।। २२॥ एकादशाधिकरणमाचरयति- संहार: स्याव्यवस्त्या वा नाम्नारहरहं त्विति । विद्यकत्वेन संहारः स्यादध्यात्माधिदैवयोः ॥ २३ ॥ सिद्धान्त-मनोमयत्व मादिके प्रत्यभिज्ञानसे एक ही विद्या है, एक शाखामें-भग्नि- रहस्य ब्राह्मणमें विद्याकी विधि है पौर मन्यत्र बृहदारण्यकमें गुणकी विधि है । कायोके अग्निरहस्य ब्राह्मणमे शाण्डित्यविद्या 'स प्रात्मानमुपासीत' (यह मनोमय प्राण शरीर, प्रकाशरूप प्रात्माको उपासना करे ) इस प्रकार पढ़ी जाती है। उसी प्रकार उन्हींको बृहदारण्यकमें वही विद्या 'मनोमयोऽयं०' (प्रकाश ही जिसका सत्य. स्वरूप है, ऐसा यह पुरुष मनोमय है ) इस प्रकार पढी गई है। इस लिए यहाँ पुनरुत्तिके भय से विद्या भिन्न है। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं--मनोमयत्वादि वेद्यस्वरूपके प्रत्यभिज्ञानसे एक ही विद्या है। यहां पुनरुक्ति भी नहीं है, क्योकि एक स्थलमें विद्याका विधान कर अन्यत्र उमके अनुवादसे 'अग्निहोत्रं जुहोति' 'दना जुहोति' ( पग्निहोत्र होम करे, दघिसे होम करे ) इत्यादिके समान सत्यत्व-सर्वेश्वरल मादि गुणोफा विधान हो सकता है। इससे शाण्डिन्यविद्या एक प्रकारको ही है ॥१०॥ एकादश प्रधिकरणकी रचना करते हैं- - सन्देह-'प्रहः' और 'प्रहम्' इन दोनों नामोंका दोनों स्थलोमें उपसंहार होना चाहिए अथवा व्यवस्था होनी चाहिए, अर्थात् जो वहाँपर वहाँपर हो हो। पूर्वपक्ष-एक विद्या होनेसे अध्यात्म मौर अधिदैव नार्मोका दोनों स्थलोमे H उपमहार है।
१६४ भाषानुवादसहिता मि०३ पा० ३ मधि० ११ ] तस्योपनिषदित्येवं मिन्नस्थानत्वदर्शनात् । स्थितासीनगुरूपास्त्योरिव नाम्नोव्यवस्थितिः ॥२४॥ बृहदारण्यके सत्यविद्यागमाघिदेविवस्य पुरपस्याऽदित्यस्य 'महः' इत्येत- माम ध्यानायोपदिश्यते । भाध्यात्मिकस्य त्वक्षिपुरुषस्य 'महम्' इत्यतेनाम । तत्र विद्यकत्वेन द्वयोर्नाम्नोः पुरुषद्वयं उपसंहारः। इति प्राप्ते यूम:-'य एप तस्मिन्मण्डले पुरुषः' इत्युपक्रम्य तस्योपनिषदहः' (बृह० ५।५५३ ) इति तच्छब्देन मण्डलस्थमेव परामृश्य तस्यैव नामविशेष उपदिष्टः । तथा 'योऽयं दक्षिणेभन्पुरुषः' इत्युपक्रम्य 'तस्योपनिषदहम्' (यह ५।५४) इति तच्छब्देनाक्षिनिष्ठमेव परामश्य नामविशेष उपदिष्टः । मतो विद्यैकत्वेन वेद्यस्य सत्यास्यस्य ब्रह्मण एव वेऽपि स्थानविदोषे कटाक्षेण नाम. विधानादाध्यात्मिकाघिदेविकयोव्यवस्थिते नामनोन तु तयोरुपसंहारोऽस्ति । यथा लोके पास्यस्यैकत्वेऽपि तिष्ठतो गुरोयं उपचारो नासावासीनस्य युज्यते । मासीनस्य य उपचार: पादभ्यन्नादिनासो तिष्ठतो भवति, तहत् । तस्मात्-नाम्नीव्यवस्था द्रष्टप्पा ॥११॥ सिद्धान्त-- 'तस्य उपनिषद् ( उसका उपनिषदलहस्य नाम महा मोर महम है) इस प्रकार भिन्न स्थान देखने से बैठे हुए खडे हुए गुरुको उपामनाके समान दोनों नामोंकी व्यवस्था है। बृहदारण्यकमें सत्यविद्या में मधिदैविक भादित्य पुरुषका 'महः' यह नाम पानके लिए उपदिष्ट है भोर माध्यात्मिक प्रक्षिपुरुषका 'महम्' यह नाम उपदिष्ट है। यहाँपर एक विद्या होनेसे दोनों नामोंका दो पुरुषोंमे उपसंहार है। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते है - एष.' (षो यह इस पादित्य मण्डलमें पुरुष है ) ऐमा उपक्रमकर 'तस्योपनिषदहः ( उसका उपनिषद् नाम महः है ) इस प्रकार श्रुतिस्थ 'सत्' शब्दसे मादित्य मण्डल स्थित पुरुषका ही परामर्श कर उसोका नाम विशेष उपदिष्ट है । वैसे योऽयं (जो यह दक्षिण नेत्रमें पुरुष है) ऐमा उपक्रमकर 'तस्योपनिषदहम्' ( उसका नाम महम है ) यहां श्रुतिस्प "aव' शब्दसे पक्षिनिष्ठ पुरुषका परामर्शकर नाम विशेषका उपदेश किया गया है। इसलिए विद्याके एक होनेसे वेद्य सत्य नामक ब्रह्मके एक होनेपर भी किसी स्थान विशेषमें केवल कटाकसे नामके प्रभिधानसे माध्यात्मिक और प्राधिदैविक नामोको व्यवस्था हो सकती है । परन्तु उनका उपसंहार नहीं हो सकता । जैसे लोकमें उपास्य गुरुके एक होनेपर भी खरे हुए गुरुके लिए जो उपचार है, वह बैठे हुए गुरुके लिए युक्त नहीं है। बैठे गुरुके लिए पैर दबाना प्रादि जो उपचार है वह खडे गुरुके लिए नहीं होता, येसे प्रकृतमे भी समझना चाहिए । इसमें नामोको व्यवस्था समझनी चाहिये ।। ११ ॥
हम० ३ पा० ३ अधि० १२] वैयासिकन्यायमाला 5 (द्वादधे संभृत्यादीनामनुपसंहाराधिकरणे सूत्रम् ) संभृतिधुच्याप्त्यपि पातः ।।२३। द्वादशाधिकरणमारचयति- माहार्या वा न वाऽन्यत्र संभृत्यादिविभूतयः । पाहार्या ब्रह्मपर्मत्वाच्छाण्डिल्यादाववारणात् ॥ २५ ॥ असाधारणधर्माणा प्रत्यभिज्ञाऽत्र नास्त्यतः। अनाहार्या ब्रह्ममारसंबन्धोऽतिप्रसञ्जकः॥ २६ ॥ रासायनीयाना खिलेषु पठ्यते "ब्रह्मज्येष्ठा वीर्या संभृतानि ब्रह्माने ज्येष्ठ दिवमाततान" इति । मस्यायमर्थ:--'यानि लोके वीर्यरिण हरिहकमलासना- दिदेहेषु प्रतिद्धानि, तानि सर्वाणि ब्रह्मपुरःसराप्येव संभृतानि संभवन्ति । नहि सशक्तिकं ब्रह्मानपेक्ष्य वीर्याणि संभवन्ति । तच्च ब्रह्म ज्येष्ठ पूर्व दिवं व्याप्या. वस्थितम्' इति । पत्र-प्राधिदेविकस्य ब्रह्मरण: संभृतिाव्याप्त्यादयो गुणा उपास्यत्वेनावगम्यन्ते । शाण्डिल्यादिहरादिविद्यास्वाध्यात्मिक हृदयान्तर्वति ब्रह्मोपास्यतया श्रुतम् । तत्र ब्रह्मण एकत्वात्संभृत्यादयो गुणाः शाण्डिल्यदह- रादिविद्यासूपसंहर्तव्या। द्वादश प्रधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-शाण्डित्यादि अन्य विद्याभोमें संभृति प्रादि गुणोका उपसंहार करना पाहिए अथवा नहीं ? पूर्णपक्ष-संभृति मादि ब्रह्मधर्म है, मत: उनका शाण्डिल्यादि विद्यामोंमें उपसंहार होना चाहिए। सिद्धान्त-शाण्डिल्यादि विद्यामोमें उन सम्मृति भादि प्रसाधारण धर्मोकी प्रत्य- मिना नहीं होती, मतः वे उपसंहारके योग्य नहीं है मौर ब्रह्ममात्रका सम्बन्ध पति- प्रसक्त है। राणायनीयों के खिलोमे 'ब्रह्मज्येष्टा वीर्या०' (ब्रह्म ही जिनका कारण है, ऐसे परात्रम विशेष आकाशको उत्पन्न करना, निविघ्न समृद्ध हुए वह ज्येष्ठ ब्रह्म देवतामोको उत्पत्तिके पूर्व स्वर्गमें व्याप्त हुमा ) ऐमा पढ़ा जाता है। इसका यह अर्थ है-'लोकमें हरि-हर कमलासन ब्रह्मा प्रादि देहोमें जो प्रसिद्ध वीर्य हैं, वे सब ब्रह्मके ही प्राधारपर निर्भर रह सकते हैं, क्योकि शक्ति सम्पन्न ब्रह्मकी अपेक्षा किये विना वीर्य नहीं रह सकते । वह ब्रह्म ज्येष्ठ है पूर्व द्युलोकको व्यासकर मर स्थित है' यहाँ साधिदैविक ब्रह्मके सम्भूति, धुव्यानि पाहि गुण उपास्यरूपमें अवगत होते हैं। शाण्डिल्यादि, हरादि विद्या- मोमें माध्यात्मिक हृदयान्तवंती ब्रह्म उपास्यरूपसे श्रुत है। यहां ब्रह्मके एक होनेसे साभृति मादि गुण शाण्डिल्य, दहर मादि विद्यामोंमे उपसंहार करने चाहिए 1 - गम्यते ॥२७॥ भाषानुवादसहिता [प्र० ३ पा० ३ मषि०१३] इति प्राप्ते नमः-न तावरसं मृत्यादिगुणानामन्यतमोऽपि शाहिस्यादिविधा- सूपलभ्यते । अतो विपित्वप्रत्यभिज्ञानामावादगुणा नोपसंहृतव्याः । बीक- स्वमात्रेणोपसंहृतौ न क्वाप्यनुपसंहार इति प्रसन्नः। तस्मात्संभृत्यादेोप- संहारः ॥ १२ ॥ (त्रयोदर्श पुरुषविद्याया विभिन्नाताधिकरणे मूत्रम) पुरुषविद्यायामिव ऐतरेषामनाम्नानात् ।। २४ ॥ प्रयोदशाधिकरणमारचति- पुंविधैका विभिन्ना वा तैत्तिरीयवताण्डिनोः । मरणावभृथत्वादिसाम्पादेवेति बहुना रूपभेदेन किचित्साम्यस्य वाचनात् । न विद्येश्यं तैत्तिरीये ब्रह्मविद्याप्रशंसनात् ॥२८॥ प्रस्ति तैत्तिरीये पुरुषविद्या--'तस्यैव विदुषो यज्ञस्पामा यजमानः' इति। तथा ताण्डिशाखायामपि श्रयते-'पुरुषो वाव यज्ञः' इति । सेयमेकेव पुरुषविद्या । 'यन्मरणं तदवभृथः' 'मरणमैवावभृया' इत्युभयत्र समानधर्मश्व- गात् । प्रातः सदनादीनां च समानत्वाद । सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं--सम्भृति मादि गुणोंमरी एक भी शाण्डिल्य मादि विधामोमें उपलब्ध नहीं होता है। मतः विधाके एक्त्तकी प्रत्यभिज्ञा न होनेसे सम्भूति पादि गुणोका उपसंहार नहीं करना चाहिए । ब्रह्मके एकत्व मानमे उपसंहार होनेपर कहीं पर भी मनुपसंहार न होनेका प्रसङ्ग होगा । इमसे सम्भूति मादिका उपसंहार नहीं है ॥ १२ ॥ प्रयोदश प्रधिकरणकी रचना करते है- सन्देह-तैत्तिरीयक भोर ताण्डी शाखामें पठित पुरुषविद्या एक है भयवा भिन्न है ? पूर्वपक्ष-दोनो मरणरूप भवभृपत्व मादि धर्म समान हैं, ऐसा ज्ञात होता है। सिद्धान्त-रूपभेदके बाहुल्यो किञ्चित् माम्य बाधित है, पता विद्या एक नहीं है, तैतिरीयकमें तो केवल ब्रह्मविद्याकी प्रशंसा है। उत्तिरीयमे 'तस्यैवं विदुषो.' ( उस ऐसा जाननेवालेके यशका मारमा यजमान है ) ऐमी पुरुषविद्या है। उसी प्रकार ताण्डी शाखामें भी 'पुरुषो वाव यज्ञ:'( पुरुष ही यज्ञ है ) ऐसी श्रुति है । सो यह एक ही पुरुषविद्या है, क्योकि 'जो मरण है वह मपभृय (स्नान ) है. 'मरण ही प्रभूध है, इस प्रकार दोनों में सदनों का प्रदरखा है। और सवन मादि भी समान हैं। w- ।
१९७ ०३ पा० ३ अधि०१४ यासिकन्यायमाला इति प्रासे यूमः-वेद्यस्य स्पस्य सुवानन्न भेदः श्रूयते । तया हि-'विदुषो पो यज्ञस्तस्य यज्ञस्यात्मा' इति तैत्तिरीयके व्यधिकरणे पाठयो। अन्यया प्रात्मा यजमानः' इति व्यापातात् । "विद्वानेव यज्ञः, स एव यजमानः' इति कायं न ध्याहन्येत । ताण्डिना तु पुरुपयज्ञयोः सामानाधिारण्यं श्रुतमित्येको रूपभेदः । प्रात्मयजमानदिकं च सर्वत्र श्रुतम्, ताण्डिना नोपलभ्यते । यत्तु ताण्डिनामुपलभ्यते त्रेधाविभत्तस्यायुषः सचनमयत्वमित्यादि, तन्त्र किंचिदपि तैत्तिरीयके पश्यामः । अतो मरणाव थत्वाधल्पसाम्यबाधाद्विद्ययो)द एवो. चितः। अपि च न तैत्तिरीयारणामुपासनभिदम्, कि तर्हि ब्रह्मविद्याप्रशंसा 'तस्यैवं विदुषः' इति ब्रह्मविद उत्कथंयात् । तस्मात्र विद्यैश्यशङ्काया पाय- वकाशोऽस्ति ॥१३॥ (चतुर्दश देधाधिकरणे सूत्रम) वेधार्थभेदात् ।। २५ ॥ चतुर्दशाधिकरणमारचयति-- वेधमन्नप्रवर्यादि विद्यागमथवा न तु। विद्यासंनिधिपाठेन विद्याने मन्त्रकमणी ॥२६॥ सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते-वेवरूपका अधिक भेद यहाँ मुना पाता है। जैसेकि विद्वान जो यश, उस यज्ञका प्रारमा' इस प्रकार तैत्तिरीयकमें व्यषिकरण पत्री है, अन्यथा 'पारमा यजमान' इसके व्यापातसे 'विद्वान ही यश है और वही यजमान है' ऐसा व्यापात क्यो न होगा । और ताण्डी शाखावालोके तो पुरुष पौर यशका सामानाधिरण्य श्रत है, यह एक रूपभेद है 1 मात्मा यजमान है इत्यादि तो सर्वत्र श्रुत है, परन्तु ताण्डोशाखावालोके उपलब्ध नहीं है । जो ताण्डियों के तीन प्रकार- से विभक्त प्रायुष्यके तीन सबन मादि उपलब्ध होते हैं, किन्तु उनका किश्चिद् भी तैत्ति- रोयकमे हम नहीं देखते हैं। प्रतएव मरणावस्यत्व मादि मल्प माम्यका बाप होनेसे विद्याका भेद मानना ही उचित है । तैत्तिरीयकोकी भी यह उपासना नहीं है, किन्तु ब्रह्मविद्याकी प्रशंसा ही है । 'तस्यैवं दिदुष:०' ( ऐसा जाननेवाले उस विद्वानके ) इससे ब्रह्मविदकर फेवन उत्कर्ष मूचित होता है। इसलिए यहा एक विद्याको शङ्काका भी अवकाश नही है ॥ १३ ॥ पतुर्दश मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-वेधर्मत्र प्रवर्मावि दिवाके पङ्ग पयवा नहीं ? पूर्वपक्ष-विधाको सनिधिो राठ होनेने मन्त्र भोर कर्म (वेधमन्त्र प्रवर्य मादि । विधाके पङ्ग हैं। -- 1 हानी भाषानुवादसहिता [प्र. ३ पा०३ प्रषि०१५] लिङ्गेनान्यत्र मन्त्राणां वास्येनापि च कर्मणाम् । विनियोगारसंनिधिस्तु बाध्योऽसो नाग्नता तपोः॥३०॥ प्रापर्वणिकानामुपनिषदारम्भे "सर्व प्रविध्य हृदयं प्रविध्य" इत्यादय माभिचारिवमन्त्राः पठिताः । काण्वानामुपनिषदादो प्रवग्यंग्राहाणं पठितम् । एवमन्यत्राप्युदाहर्तव्यम् । तत्र विद्यासंनिधिवशान्मन्त्रामगोविद्यास्वम् । इति प्राहे ग्रूमः-हृदयवेधादिमन्त्राणां लिबादभिचारकर्मणि विनियोगः । प्रवग्यस्य "पुरस्तादुपसदा प्रवृति" इत्यग्निष्टोमे विनियोगो दृश्यते । 'लिा. वाक्ये च निघेलीयसी' इति पूर्वकाण्डे श्रुतिलिझाधिकरणे व्यवस्थापितम् । तस्मान्न विद्यानत्वं मन्त्रकर्मयोः ॥१४॥ (पञ्चदशे शानिनः कर्मणां हान्युपायनाधिकरणे मूत्रम् )। तूपायनशब्दशेषत्वात्कुशाच्छन्दःस्तुत्युपगानव- त्तदुक्तम् ॥२६॥ पञ्चदशाधिकरणमारचयति- प्रथमवर्णकमाह- उपायनमनाहायं हानायाहिपतेऽथवा । प्रश्रुतत्वादनाक्षेपाद्विाद्याभेदाच्च नाऽहतिः।। ३१ ॥ सिद्धान्त-लिङ्गरूप प्रमाणसे मन्त्रोका वाश्यप्रमाणसे कमौका अन्यत्र विनियोग होनेसे संनिधि बाधित है, अतः उन दोनों को विद्या के प्रति प्रङ्गत्व नहीं है । ' प्रापर्वणिकोके उपनिषद्के पारम्भमें 'सर्व प्रविष्यः' (हे देव ! मेरे शत्रुके सब भङ्गोको छिन्न-भिन्नकर विशेषतः हृदयको विदीर्ण कर ) इत्यादि माभिचारिक मन्त्र पढ़े गये हैं। काण्वोंके उपनिषद्के भादिमें प्रवर्य ब्राह्मण पढ़ा गया है। इस प्रकार भन्यत्र मी उदाहरण समझने चाहिए। इससे यहां विद्याकी संनिधिमे पाठ होनेसे मन्त्र पौर कर्म विधाके मङ्ग हैं। सिद्धान्ती--ऐसा पूर्व पक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-लिङ्गके पलसे हृदय वैधादि मन्त्रीका प्रभिचार कर्ममे विनियोग है और प्रवर्यका 'पुरस्तादुपसर्दा प्रवृक्ति' इससे अग्निष्टोममें विनियोग देखा जाता है । तिङ्ग और वानय संनिधिसे बलवान हैं । इम- प्रकार पूर्वकाण्डमें 'श्रुतिलिङ्ग' मधिकरण में व्यवस्था की गई है। इसलिए मन्त्र भोर कर्म विद्याके अङ्ग नहीं हैं ।। १४ ।। पञ्चदश भधिकरणकी रचना करते हैं-प्रथम वर्णक कहते हैं- सन्देह -उपायनका उपमहार नहीं करना चाहिए अथवा हानके लिए करना पाहिए?
है [म०३ पा० ३ मधि० १५ ] वैयासिकन्यायमाला १et विद्याभेदेऽप्यर्थवाद माहायः स्तुतिसाम्यतः । हानस्य प्रत्यभिज्ञानादेकविंशादिवादवत् ॥ ३२॥ शाटचायनिनः पठन्ति-"तस्य पुत्रा दायमुपयन्ति, सुहृदः साधुकृत्याम, द्विषन्तः पापकृत्याम्" इति । अस्थायमर्थ:-ज्ञानिनः पुत्रस्थानीयाः सर्वे प्राणि- नस्तदीयं वित्तस्थानीय कर्म यथायोग्यं गृह्णन्ति' । ताण्डिनस्तु पठन्ति-"अश्व इव रोमाणि विधूय पापं चन्द्र इव राहोर्मुखात्ममुच्य धूत्वा शरीरम्" (छा०८।१३।१) इति। तथाऽऽथरिणकाः पठन्ति-"तदा विद्वान्पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परं साम्यमुपैति" इति निरञ्जनो भाविजन्मकारणरहितः। साम्यं ब्रह्मस्वरूपमि. त्यर्थः । तत्र तत्वज्ञानिनः पापपुण्यपरित्यागप्रतिपादिकासु श्रुतिपु परित्यक्तयोः पुण्यपापयोरितरपुरुषस्वीकारो नोपसंहर्तव्यः । त्यागश्रुतिपु क्वाप्यन्यस्वीकार- स्यायुतत्वात् । अश्रुतमप्याक्षिप्यत इति चेत् । न । अनुपपत्तेरभावात् । इतरस्वी- कारमन्तेणापि ज्ञानिनां परित्याग उपपद्यत एव । किंचेतरस्वीकारवाक्यं पूर्वपक्ष-श्रुत न होने से प्राक्षेप न होनेसे, विद्याका भेद होनेसे उपायनका उप- संहार नही करना चाहिए। सिद्धान्त-विद्याका भेद होनेपर भी अर्थवादमे उपायनका उपसंहार करना चाहिए, क्योकि स्तुति साम्य है और एकविंशादि अर्थवादके समान हानकी प्रत्यभिज्ञा होती है। शाट्यायनी शाखावाले 'तस्य पुत्रा०' (मृतक ब्रह्मज्ञानीके पुत्र-शिष्य धन प्राप्त करते हैं, सुहृद पुण्यकर्म और शत्रु पापकर्म प्राप्त करते हैं ) ऐमा पढते है। इसका यह अर्थ है-जानौके पुत्रस्थानीय सब प्राणी उसके वित्तस्थानीय कर्मोका यथा योग्य ग्रहण करते हैं। ताण्डी शाखावाले तो 'प्रश्व इव रोमाणि' (जिस प्रकार पश्व अपने रोएं झाहकर-रोमकम्पन द्वारा श्रम मौर धूलि प्रादि दूरकर निर्मल हो जाता है, वैसे ही हार्द ब्रह्मक ज्ञानसे धर्माधर्मरूप पापको भाडकर तथा राहुके मुखसे निकले चन्द्रमाके समान मनर्थ के आमयभून इस शरीरका त्यागकर कृतकृत्य हो ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है ) ऐसा पढते हैं। इस प्रकार आथर्वणिक--'तदा विद्वान्पुण्यपापे०' ( तब विद्वान पुष्पपापसे मुक्त होकर परात्पर दिव्य निरञ्जन पुरुषके स्वरूपको प्राप्त हो जाता है ) यहाँपर तत्त्वज्ञानी पुरुष पुण्यपापके परित्यागको प्रतिपादक श्रुतियोंमें परित्यक्त पुण्य- पापका जो इतर पुरुष द्वारा स्वीकार है उसका उपसंहार नहीं करना चाहिए, क्योकि त्यागतियोमे अन्य स्वीकारका कही पर भी प्रवण नहीं है । यदि कहो कि मश्रुतका भी प्राक्षेप किया जाता है, तो यह युक्त नहीं है, क्योकि अनुपपत्ति नहीं है, मन्य दारा - २०० भाषानुवादसहिता [म. ३ पा० ३ अघि० १५] सगुणविद्यायो पठितम त्यागवाक्यं तु निगुणविद्यायाम । तस्मारकेवलायो हानी थूयमाणायामुपायनं नोपसंहर्तव्यम् । इति प्राप्ते धूमः-सत्यं विद्याभेदोऽस्ति । अत एव न वयमुपायनमनुष्ळे. यधर्मतयोपसंहरामा । किवर्षवादत्वेन । यथा श्रयमारणेन पृण्यपापपरित्यागेन ब्रह्मविद्या स्तूयते, तथेतरस्वीकारेणापि स्तोतुं शक्यत एव । नचार्थवादस्वमाण हानोपायन त्योः स्वाय तात्पर्याभावः । मानान्तरसिद्धिविरोधयोरभावन भूतार्थवादत्वात् यत हानश्रुतिपु न काप्युपायनं श्रुतमित्युतम् । तदसद, कोषो- तकोश्रुतौ हानोपायनयोरुभयोरवगमात्-"तरसुकृतदुष्कृते विधूनुते । तस्म प्रिया ज्ञातयः सुतमुपयन्ति अप्रिया दुष्कृतम्" इति । तसत्र, प्रह्मलोकमाप्ति- वेलायामित्यर्थः । एवं च सति कोपतिवीश्रुतस्य हान स्याऽयवणिकताण्डि- शाखयो। प्रत्यभिज्ञानात्वीपोतकीप्रोस्स्योयायनस्योपसंहारो युक्तः । ननु प्रयं- वादान्तरापेक्षोऽयंवादो न क्वचिदृष्टचर इति चेत्, न । सामोपास्तिस्तावकत्वेन श्रुतस्य 'एकविंशो वा इतोऽसावादित्यः' (छा० २०१०५ ) इत्यर्थवादस्यैक- स्वीकार न होनेपर भी शानियोंका परित्याग उपपप्त होता है। विश इतर स्वीकार- राय सगुणविद्यामें पठित है भोर त्यागवाक्य तो निर्गुणविद्यामे पठित है, इसलिए केवल हानकै पमाण होनेपर उपायनका उपमहार नहीं होना चाहिए। सिद्धान्तो-ऐसा पूर्णपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - यह सत्य है कि विद्याका भेद है । मतएव हम उपायनका भनुष्ठेय धर्मरूपसे उपमंहार करना नहीं चाहते, किन्तु पर्थवादरूपसे जैसे श्रयमाण पुण्यपापके परित्यागसे ब्रह्म विद्याको स्तुति की जाती है, वैसे मन्य द्वारा स्वीकार करनेसे भी ब्रह्मविद्याकी स्तुति की जा सकती है। पर्पवाद- मानसे हानोपायन श्रुतिका स्वार्थमे तात्पर्याभाव नहीं है, क्योकि अन्य प्रमाण पौर प्रसिद्धि विरोधके न रहने से वह भूतार्थवाद है । जो यह कहा गया है कि हान श्रुतियोमें कहीपर भी उपायन श्रुत नहीं है- वह युक्त नहीं है, क्योकि पापोतकी श्रुति हान मोर उपायन दोनोका भवगम है 'तत्सुकृतदुष्टते.' (वहाँ सुकृत मार दुष्कृतका हान करता है उसके प्रिय ज्ञातिवाले सुकृतको प्राप्त करते हैं और शत्रु पापकर्मको ) । 'तत्-तत्र ब्रह्म लोककी प्राप्तिके समय यह अर्थ है । ऐसा होने पर कौपीठकीमें श्रन हानका मापर्वणिक और ताण्डिशाखामें प्रत्यभिज्ञा होनेये कोपीतकोमे उक्त उपायनका उपसंहार करना युक्त है । परन्तु अन्य प्रर्थवादसे सापेक्ष मर्यवाद कहीपर नही देखा गया है। ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, क्योंकि सामकी उपासनाका स्तावक्रूपसे चूत 'एकविंशो वा.' (इस लोकसे वह मादित्य निश्चय ही इसकीया है ) इस प्रर्थवादमे एकविंशत्व निर्णय ।
T [म० ३ पा० ३ माघ० १५] वैयासिकन्यायमाला २०१ विशस्वनिर्णयाय तैत्तिरीयकगतसत्रप्रकरणस्यार्थवादापेक्षत्वात् । "द्वादश मासा, पञ्चतंवा, त्रय इमे लोकाः, असावादित्य एकविंशः" इति हि तत्र संख्यानिर्वाह उक्तः। तस्मादर्थवादत्वेऽप्युपायनमुपसंहर्तव्यम् । द्वितीयवर्णकमाह- विघूननं चालनं स्याद्धानं वा चालनं भवेत् । दोधूयन्ते ध्वजाग्राणीत्यादी चालनदर्शनात् ॥ ३३ ॥ हानमेव भवेद्वाक्यशेषेऽन्योपायनवात् । कर्ता न ह्यपरित्यक्तमन्यः स्वीवतुमर्हति ॥ ३४ ॥ सुकृतदुष्कृते विघूनुते' (को० ११४ ) इत्यत्र विधूननशब्दस्य दोयूयन्ते' इत्यादाविव चालनमः, नतु परित्यागः। इति प्राप्ते बम:-वाक्यशेषे श्रूयमाणस्येतरस्वीकारस्य विना परित्यागमनु- पपत्तेश्चालनवार्चिना विघूननशब्देन परित्याग उपलक्ष्यते ॥ १५ ॥ (पोडश उपासकाना कमत्यागव्यवस्थाधिकरणे सूत्रे ) सापराये तर्तव्याभावात्तथाह्यन्ये ॥ २७ ॥ छन्दत उभया. विगेघात् ॥ २८॥ के लिए तैत्तिरीयक गत सत्र प्रकरण में स्थित अपवादको अपेक्षा है-'द्वादश मासा:०' ( वारह वर्ष, पांच ऋतु, तीन ये लोक मौर यह मादित्य इक्कोसा है ) इस प्रकार उस स्थलमे साख्य का निर्वाह कहा गया है। इससे यह सिद्ध हुमा कि मथवाद होने पर भी उपायनका उपसंहार करना चाहिए। द्वितीय वर्णक कहते हैं- सन्देह-विधूनन शब्दका अर्थ चालन है अथवा हान-त्याग ? । पूर्वपक्ष-विघूनन शन्दका अर्थ चालन है क्योंकि 'दोधूयन्ते ध्वजाग्राणि' (ध्वजाके अग्रभागको चालन करते हैं । इत्यादिस्थल में हान शब्दार्थ चालन देखा जाता है । सिद्धान्त-विघूनन शब्दका अर्थ हान है, क्योकि वाक्यशेषमे अन्य उपायनका प्रवण है जबतक कर्ता परित्याग न करे तबतक अन्य स्वीकार नहीं कर सकता है। 'मुकृतदुष्कृते विधूनने०' यहाँपर विधूनन शब्दका 'दोधूयन्ते' इत्यादिके समान चालन अर्थ है. परित्याग नही। सिद्धान्ती-ऐमा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-वाक्यशेषमें श्रूयमाण हानका स्वीकार परित्यागके बिना नहीं हो सकता है। अतः यहाँ चालनवाची विधूनन शब्दसे परित्याग ही उपलक्षित होता है ॥१॥ पोडश अधिकरणकी रचना करते हैं- ।
-- J २०२ भाषानुवादसहिता [प०३ पा० ३ प्रषि०१६] पोहशाधिकरणमारचयति- पर्मयागो मार्गमध्ये यदि वा मरणात्पुरा। उत्तीय विरजा त्यागस्तपा थोपीतकोयुतेः ॥ ३५ ॥ कर्ममाप्यफ्लामावान्मध्ये साधनवजनात् । ताण्डिधुते. पुरा त्यागो याध्य: पोपीतकोकमः ॥ ३६ ॥ पूर्वाधिकरणोक्तः सुकृतदुष्कृतपरित्यागो प्रक्षलोकमार्गस्य मध्ये भवितु. महति । तल्लोकसमीपवतिनद्युत्तरणानन्तरं तच्छ्रवणात् । स मागच्यति विरा नदी ता मनसेवात्येति तत्सुकृतदुप्फते विघूनुते'.(यो० ११४ ) इति । तस्मान्मार्गमध्ये परित्यागः। इति प्राप्ने घमः-प्रझलोकमार्गमध्ये प्रामाप्तिव्यतिरिक्तस्य सुकृतदुष्कृताभ्यो प्राप्तव्यफलस्याभावात्तयोनंदीपर्यन्तनयनं निरकम् । किंध मरणालापरि- स्यक्तयो. सुकृतदुष्कृतयोगिमध्ये परित्यागस्य साधनं न संमवति । देहराहित्य साधनस्यानुष्ठातुमशक्यत्वात् । न च मरणात्पुरा तत्त्यागे प्रमाणाभावः। 'मन्व सन्देह ब्रह्मलोकमे जाते समय मार्गमे कर्मका त्याग होता है प्रपया मरणसे पहले। पूर्वपक्ष-ब्रह्मलोकमें जाते विरजा नदीको पारकर मार्गके मध्यमे कर्मका स्याग होता है, क्योंकि ऐसा कहनेवालो कोपोतकी युति है। सिद्धान्त-कर्म से प्राप्य फलका प्रभाव होनेसे भोर मार्गके मध्यमें सापनके न होनेसे मरणसे पूर्व ही कर्मका त्याग होता है । क्योकि कोपोतकी घुस्युक्त क्रम नाण्डि. श्रुतिसे बाध्य है। पूर्व मधिकरणमें उक्त सकृत-दुष्कृतका परित्याग ब्रह्मलोक मार्गके मध्यम होना चाहिए, क्योकि ब्रह्मलोकके समीपवती नदीके पार करनेपर ही कर्मत्यागका धवण है- 'स मागच्छति' (वह विरजा नदीको माता है उस नदीको मनसे ही पार करता है भोर उससे वहां मुकृत, दुष्कृतका परित्याग करता है ) इमसे प्रतीत होता है कि मार्ग के बीचमे ही कर्मका त्याग करता है । सिद्धान्ती-ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-- ब्रह्मलोकके मार्गके बीचमे ब्रह्म प्राप्तिसे मतिरिक्त सुकृत भौर दुष्कृत कर्मसे प्राप्तन्य फलका प्रभाव होनेसे कर्मोका नदी पयन्त नयन निरर्थक है । किञ्च मरणके पूर्व मे परित्यक्त सुकृतं मोर दुष्कृतका मार्गके मध्यमे परित्याग करनेमे कोई साधन नहीं हो सकता। क्योकि देहके बिना मापनका अनुष्टान नहीं हो सकता। मरणके पहले कर्मके परित्यागमे कोई प्रमाण नहीं है । ऐसा [म०३ पा० ३ अधि० १७) वैयासिकन्यायमाला २०३ इव रोमाणि' (छा० ८।१३।१ ) इति ताण्डिश्रुतौ तदवगमात् । तथा च श्रुत्या 'नदोमुत्तीयं परित्या:' इत्ययं कोपीतकीप्रोक्तः क्रमो बाधनीयः । तस्मान्मरणा- मागेवोपास्ये साक्षात्कृते तयोः परित्यागः ॥ १६ ॥ ( सप्तदश उपासनया ब्रह्मलोकगन्तृणामेव मार्गव्यवस्थाधिकरणे सूत्रे ) गतेरर्थवत्त्वमुभयथाऽन्यथा हि विरोधः॥२६॥ उपपन्नस्तल्लक्षणार्थोपलब्धेर्लोकवत् ॥३०॥ सप्तदशाधिकरणमारचयति- उपास्तिबोधयोर्माग: समो यद्वा व्यवस्थितः। सम एवोत्तरो मार्ग एतयोः कर्महानवत् ॥ ३७॥ देशान्तरफलप्राप्य युक्तो मार्ग उपास्ति' । प्रारोग्यवद्बोधफलं तेन मार्गों व्यवस्थितः ॥ ३८ ॥ चतुर्याध्यायस्य तृतीयपादे वक्ष्यमाणोऽचिरादिमागं. सगुणब्रह्मोपासकस्य निगुणब्रह्मतत्त्वविदश्च समान एव । सुकृतदुष्कृतकमहानवत्समानत्वसंभवात् । इति प्राप्ते ब्रूमः--उपास्तिप्राप्यस्य ब्रह्मलोकफलस्य देशान्तरवर्तित्वाद्युक्त नहीं कहा जा सकता, क्योकि 'अश्व इव रोमाणि' इस ताण्डि तिसे कर्मत्याग पवगत होता है। इसी प्रकार श्रुतिसे 'नदीमुत्तीर्य परित्यागा.' ( नदीको पारकर कोका परित्याग होता है ) यह कोशोतकीमें उक्तक्रम बाध्य है मर्याद कौपीतकीका सामान्य वर्णन क्रमवर्णनका साधक नहीं है । इसलिए मरणसे पूर्व ही उपास्यके साक्षात्कार होने पर सुकृत और दुष्कृतका परित्याग होता है ॥१६॥ सप्तदश मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह- -उपासना मौर तत्त्वज्ञानका मचिरादि मार्ग समान ही है अथवा पृथक् ? और दुष्कृत कौक त्यागके समान इन दोनोका मचिरादि मार्ग समान ही है। सिद्धान्त-उपासनानोमें देशान्तर रूप फल प्राप्तिके लिए मार्गकी कल्पना युक्त है, गानका फल तो रोग निवृत्तिके समान प्रविद्याकी निवृत्ति ही है, इससे मान छान्दोग्यके चतुर्थ अध्यायके तृतीयपादमे वक्ष्यमाण अचिरादिमार्ग सगुण ब्रह्म उपासक पौर निर्गुण ब्रह्मतत्त्वविद के लिये समान ही है, क्योकि सुवृत और दुष्कृत कर्मके त्यागको भौति दोनोमें समानता संभव है। सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्ष होनेपर हम कहते हैं-उपासनारी प्राप्य ब्रह्मलोक रूप पूर्वपक्ष-सुकृत व्यवस्थित है।
२०४ भाषानुवादसहिता [प्र० ३पा० ३ मपि०१८' स्तत्र मार्ग: 1- यज्ञज्ञानफलं तु रोगनिवृत्तियदविध निवृत्तिमात्रमिति तत्र मार्गेण करणीयं स्यात् । तस्मात्--उपासनस्यैव, न तु शानिन इति व्यवस्थितो मार्गः ॥ १७॥ (अष्टादरी सर्वास्येवोपासनामु मार्गरसनापिकरणे सूत्रम् ) अनियमः सर्वासामविरोध: शब्दानुमानाभ्याम् ॥ ३१॥ अष्टादशाधिकरणमारचयति- मार्ग: श्रुतस्पलेष्वेव सर्वोपास्ति' वा भवेत् । युतेष्वेव प्रकरणादि-पाठोश्य यथाऽन्यथा ॥ ३६॥ प्रोको विद्यान्तरे मार्गों ये चेम इति वाक्यतः। तेन बाध्यं प्रकरणं द्विपाठश्चिन्तनाय हि ॥ ४०॥ छान्दोग्ये पश्चाग्निविद्यायामुपोशल विद्यायो घोसरमार्गः पठितः । शाण्डिल्यवैश्वानरादिविद्यासु न पठितः। तथा च प्रकरणवशाचासु विद्यासु ध्रुतस्तास्वेव मार्गो ध्यवतिष्ठते, न त्वन्यत्रोपसंहर्तव्यः । उपसंहारे प सकुत्पठित. स्यैव सर्वत्रोपसंहतुं शक्यतया विद्याइये पाठो निरर्थक: स्यात् । तस्मात्-श्रुत- स्थलेष्वेव मार्गः। देशान्तरवर्ती है, मतः यहाँपर मार्ग होना युक्त है। किन्तु बह गानका फल तो रोगको निवृत्तिके समान केवल भविद्याको निवृत्तिमान है, इकलिए यहाँपर मार्गका क्या प्रयोजन है, मतएव चिरादि मागं उपासकके लिए है ज्ञानीके लिए नहीं, इस प्रकार मार्गकी व्यवस्था है ॥ १७ ॥ मष्टादश मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-युठि प्राप्त जिन विद्यामोंमे पचिरादि मार्ग चुत है, उन्हीं सगुण उपासनामोंमे मचिरादि मार्ग व्यवस्थित है अथवा सब पामनाभोंमें ? पूर्वपक्ष-प्रकरणसे जिन उपासनामोमें मचिरादि मार्ग श्रुत है उन्होंमें उसकी व्यवस्था है। यदि सब उपासनाप्रोमें उसकी व्यवस्था हो तो दो विद्यामोंमें उसका कपन व्यर्थ हो जायमा। सिद्धान्त-'ये चेमे' इस वाक्यसे अन्य विद्याम अचिरादि मार्ग कहा गया है, इससे प्रकरण बाध्य है, दो वार पाठ तो उपास्य मार्गके चिन्तनके लिए है। छान्दोग्यमे पञ्चाग्नि विद्या भौर उपकोथलविद्यामें उसर मार्ग परिरादि मार्ग पठित है, शाण्डिल्य, वैश्वानर आदि विद्यामोमें पठिन नहीं है। प्रकरणवश बिन उपास• नामोमे भनिरादि मार्ग श्रुत है उन्हीं आसनामोर्मे ही मार्ग व्यवस्थित है, उसका मन्य उपासनामामे उपसंहार नहीं हाना चाहिए। यदि उपसंहार माने तो एक बार पठितका .
[प्र० ३ पा० ३ पघि०१६] वैयासिकन्यायमाला २०५ इति प्राप्ते घूम.-पश्चाग्नि विद्यावाक्यशेषे पश्चान्यूपासवानामुत्तरमार्ग युवती श्रतिविद्यान्तरशालिनां च मुरात एवाचिरादिमागंमुदाजहार-'तद्य इत्थं विदुः, ये चेमेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युपासते, तेऽचिपममिसंभवन्ति' (छा०५।१०।१) इति । प्रस्यायमर्थ:- :--'म उपासका इत्यं पञ्चाग्नीनुपासते, ये चारण्ये श्रद्धा तप इत्येवमादिधर्मयुक्ताः सन्तोऽप्युपासनान्तरेषु प्रवर्तन्ते, ते सर्वेऽप्यचिरादि- मार्ग प्राप्नुवन्ति इति । ततश्च मागंप्रतिपादकवाक्येन प्रकरणं बाधितव्यम् । न च द्वि.पाठवैयच्यम्, उपास्यगुणचिन्तनार्थत्वोपपत्तेः । तस्मात्सर्वोपास्तिपूत्तरी मार्गोऽवगन्तव्यः ॥१८॥ (एकोनविंशे तत्त्वज्ञानिना मुक्तिनैपत्याधिकरणे सूत्रम् ) यावदधिकारमपस्थितिराधिकारिकारणाम् ॥ ३२ ॥ एकोनविंशाधिकरणमारचयति- ब्रह्मतत्त्वविदो मुक्ति: पाक्षिकी नियताऽथवा । पाक्षिक्यपान्तरतमा प्रभृतेजन्मकीर्तनात् ॥४१॥ ही सर्वत्र उपसहार किया जा सकता है तो दो विद्यामोमे उसका पाठ निरर्थक हो पायगा । इसलिये श्रुत स्थलोमें ही प्रचिरादि मार्ग व्यवस्थित है। सिद्धान्ती-ऐस पूर्वपदा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं--पश्चाग्नि विद्याके वाक्यशेपमें पश्चाग्निके उपासकोके लिये पचिरादि मार्गको कहती हुई श्रुति तद्य इत्थं विदु' (वहाँ । इस लोकके प्रति उत्पित हुए अधिकारी गृहस्थोमे जो इस प्रकार पञ्चाग्निको जानते हैं ) "ये पेमेऽरण्ये० (और जो प्रारण्य से उपलक्षित वैखानस और परिव्राजक त्रिदण्डी बद्धा पौर उपसे उपलक्षित ब्रह्मका ध्यान करते हैं, वे प्रति मार्पयो प्राप्त करते हैं ) इस तरह अन्य विद्यावालों के लिए मुखसे पचिरादि मार्गका प्रतिपादन करती है। इसका यह पर्थ है--जो उपासक इस प्रकार पञ्चाग्निकी उपासना करते है और जो भरण्य में श्रद्धा, तप इत्यादि घोसे युक्त होते हुए भी अन्य उपासनामोमें प्रवृत्त होते हैं, वे सभी प्रचिरादि मार्गको प्राप्त होते हैं। इससे मार्ग प्रतिपादक वाक्यसे प्रकरणका बाघ होना चाहिए। दो बार पाठ भी व्यर्थ नहीं है, क्योकि उपास्य गुण अथवा मार्गके चिन्तनके लिए उसकी उपपत्ति है। इसलिये सभी सगुण उपासनामोमें अचिरादि मार्ग जानना पाहिए ॥१८॥ एकोनविंश पधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-ब्रह्मतत्त्व शानियोको मुक्ति पक्षको-अनियत है अथवा नियत है। मत पञ्चाग्निविदो गृहस्थाः, ये चेमेऽरण्ये वानप्रस्था. परिवाणराध मह नैष्ठिक- ब्रह्मचारिभिा श्रद्धा तप इत्येवमाधुपासते । प्रधाना! तपस्विनश्वेत्यर्थः । .
२०६ भाषानुवादसहिता [५०३ पा० ३ प्रषि० १९] नानादेहोपमोठयमीशोपास्तिफलं तुषाः। मुक्त्वाऽपिकारिपुष्पा मुध्यन्ते नियता ततः ॥ १२॥ पुराणेषु अपान्तरतमा नाम घेदप्रवर्तक माचार्यों विष्णोराशया द्वापरान्ते कृष्णद्वैपायनरूपेण शरीरान्तरं जपाहेति स्मयते । सपा सनत्कुमारः सन्दरूपेण पार्वतोपरमेश्वराभ्यामजायत। एवमन्येऽपि वसिष्ठादयस्तत्वज्ञानिन एव सन्त- स्तर सन शापद्वारा स्वेच्छपा वादारीरान्तराणि जगृहरिति स्मरणान्मुकिस्त- त्वविदो पाक्षिकी। इति प्राप्ते मे-य एते स्वयौदाहता। पुरुषास्ते सर्वे जगनिर्वाहकारिणः। ते च पूर्वस्मिन्वल्पे महता तपसा परमेश्वरमुपास्यास्मिन्वल्पे नानादेहोपभोग्यम- धिकारिपदं भेजिरे। क्षीणे' प्रारब्धे कर्मणि मोक्ष्यन्ते । तपाऽनारत्यकर्मणा तत्वज्ञानेन दाहस्य निवारयितुमशक्यत्वात्तस्वविदां मुधिनियतैव ।। १६॥ (विचे निषधोपसंहाराधिकरणे मूत्रम् ) मक्षरधियां त्वविरोध: सामान्यतद्भावाभ्यामीपसदपत्तदुक्तम् ॥ ३३॥ पूर्वपक्ष-ब्रह्मतत्त्ववेतामोंकी मुक्ति पनियत ही है, क्योंकि मान्तरतमा मादिका जन्म कहा गया है। सिद्धान्त-ईश्वरोपासना पन्य भनेक शारीरोंसे भोक्तव्य फनके उपभोगके मनम्बर सत्वज्ञानी परिकारी पुरुष मुक्त होते है, पता तत्त्वज्ञानियोंकी मुक्ति नियत है। पुराणोंमें मपान्तरतमा नामवाले वेद प्रवर्तक पाचार्यने दापुरके भन्ठ, भगवान विष्णुको मामासे इष्पदैपायनके पसे पन्य शरीरको प्रहण किया, ऐमा सुना पाता है। इस प्रकार सनत्कुमार कन्दरूपसे पार्वती मोर महेश्वरसे उत्पन्न हुए। एवं अन्य वसिष्ठ धादि तत्वज्ञानी होते हुये भी शापवश पथवा स्वेच्छासे तत्र पत्र प्राय शरीर प्रहण किये, ऐमा भी मुना जाता है । इससे सत्त्वविदोंको मुक्ति पनियत है ।' ! सिद्धान्ती-ऐमा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-जो सुमने इसने पुरुषोषा उदाहरण दिया है ये सब जगत के निर्वाह करनेवाले हैं। वे पूर्वकल्पमें महान तपमे परमेश्वरको उपासनाकर इम कल्पमें अनेक देहोंमे उपभोग्य अधिकारी पदको भोग रहे हैं। मन्तमें प्रारम्पकर्म के क्षीण होनेपर मोसको प्राप्त करते हैं। तत्वज्ञानवे मनारब्धकाँका पाह निवृत्त नहीं किया जा सकता, प्रतः तत्त्वज्ञानियोंकी मुक्ति नियत ही है ॥१६॥ १. 'तस्य वावदेव चिरं पायन विमोक्ष्येऽथमपत्स्य इति' (घा० ६१४२ )"ब्रह्मणा सह ते सर्व संप्राप्त प्रतिसपरे। परस्यान्ते कृवात्मानः प्रविशान्ति परं पदम् ।। तो पो देवानां प्रत्यदुष्यत स एव तदाभवत्सपर्षीणां सपा मनुष्याणाम् । (बृहा- पारिज, स्मृति प्रमाण है। - 1.
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[अ० ३ पा० ३ अवि० २०] वैयासिनन्यायमाला २०७ विशाधिकरणमारचयति- निषेधानामसंहारा संहारो वा न संहति । मानन्दादिवदात्मत्वं नेपा संभाव्यते यतः ।। ४३ ॥ श्रुतानामाहूतानां च निषेधानां समा यतः। प्रात्मलक्षणता तस्माद्दाठायास्तूपसंहृतिः ॥४४॥ 'अस्थूलमनण्वह्रस्वम्' (बृह० ३६८) इत्यादिना ब्रह्मावबोधनाय गार्गी- ब्राह्मणे केचिनिषेधाः श्रुताः। तथा च कठवल्लीपु-'अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम्' (३३१५) इति । एवमन्यत्राप्युदाहर्तव्यम् । तत्र निषेधानो परस्परमुसंहारी नास्ति।मानन्दसरयत्वादिधर्मवदात्मस्वरूपत्वाभावेनोपसंहारे प्रयोजनामावाद । इति प्राप्ते ब्रूमः-यथास्वशाखायां श्रयमाणानां निषेधानामात्मस्वरूपत्वा- भावेऽप्यास्मोपलक्षफरवम्, तथा-शाखान्तरेभ्य उपसंहृताना निषेधानामपि तत्समानम् । न च स्वशाखोकनिषेधेरेवोपलक्षणसिद्धावितरोपसंहारवैयर्थ्यम् । इतरोपसंहारस्य दायित्वात् । अन्यथा स्वशाखायामपि द्वित्वप्रतिषेधमात्रेण तस्सिदावितरवेययं प्रसज्येत । तस्मानिषेधा उपसंहर्तव्याः ॥२०॥ सन्देह-'प्रस्यूलम०' इत्यादि निषेधोका उपसंहार होता है अथवा उपसंहार पूर्वपक्ष-उपसंहार नहीं होता, क्योकि मानन्दादिके समान इनमें पात्मत्व संभव नहीं होता? नहीं है। - सिद्धान्त-जैसे स्वशाखामें श्रुत निषेध भात्मस्वरूप होते हुए भी भात्माके लक्षक हैं, वैसे ही मन्य शाखामे उपसंहृत निषेध भी उनके समान लक्षक हैं। इसलिए दृढ़ताके लिए उनका उपसंहार होना चाहिए। 'मस्थूलमनबह्रस्वम्' (न स्थूल न प्रणु और न ह्रस्व है ) इत्यादिसे ब्रह्मके मवदोषके लिए गार्गीब्राह्मणमें कुछ निषेष सुने जाते हैं । इस प्रकार 'मशब्दम् (शब्द रहिव स्पर्शरहित रूपरहित मव्यय है ) इत्यादिसे कठवल्लीमे सुने जाते हैं। इस प्रकार मन्यत्र भी उदाहरण समझने चाहिए । परन्तु यहाँ निषेधोका परस्पर उपसंहार नही होता है, क्योंकि मानन्द, सत्यत्व प्रादि धर्मोके समान प्रात्मस्वरूप न होनेसे उनके उप- संहार होनेमें कोई प्रयोजन नहीं है। सिद्धान्तो-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं जैसे अपनी शाखामे धूय- माण निषेध मात्मस्वरूप नहीं है, तो भी मारमाके उपलक्षक हैं, वैसे ही अन्यशाखामें उपसंहृत निषेध भी उनके समान ही उपनक्षक हैं ।। स्वशाखाओंमें उक्त निषेपोसे ही उपलक्षणको सिटि होनेपर इसरोका उपसंहार निष्प्रयोजन है, यह शङ्का ,युक्त नहीं है, क्पोंकि इतरोका उपसंहार दृढताके लिए है। अन्यथा स्वशाखामें मी दो वीन निषेध +1 २०८ माषानुवादसहिता [म०३ १०३ मधि०२१] (एकाविशे मन्त्रस्यस्य विस्यवापिकरणे मूत्रम्) इयदामननात् ॥३४॥ एकविंशाधिकरणमारपयति- पिबन्ती दा सुपर्णति द्वे विद्ये प्रयवेकता। भोकारो भोवनभोफाराविनि विद्ये उभे इमे॥४५॥ पिबन्ती भोग्नभोकारावित्युकं हि समन्यये। इयत्तापरयभिज्ञानाविका मन्त्रयोदयो। ॥४६॥ "ऋतं पिबन्तो सुकुतस्य लोके' इत्यम्मिन्मन्ने द्विवचनेन व्योमोंवत्वं प्रतीयते । 'हा सुपर्णा' इत्यस्मिन्मन्ने 'तयोरल्या पिप्पलं स्वात्ति' इत्येवस्यैव पर्मफल भोवस्त्वम् । इसरस्य तु 'पनश्ननन्योपभिचारशीति' इत्यमोक्तृत्वम् । ततो येद्यस्वरूपभेदाद्विद्याभेदः । इति प्रामः-प्रथमाध्यायस्प द्वितीयपादे हनीपाधिकरणे-'पियन्ती' इति सदस्य जीवाशपरत्वेन मोका भोकारावयं इत्युक्तम् । अतो न वेदमेदः । द्विस्वसंख्या धोमपत्र प्रत्यभिज्ञायते । तस्मादेश विधा ।।२१।। मानसे कार्यमिदि होनेपर भन्योंका पेपर्य प्रसत होगा। इससे निषेपोंका उपसंहार करना चाहिए ॥२०॥ एकविश पधिकरणको रचना करते है- सन्देह-'कृतं पिबन्ती' 'दा सुपर्णा' इस प्रकार दो विधाएं प्रतीत होती है अपवा एक पूर्वपक्ष-एक अतिम दो भोक्तामोंको दूमरो बुष्टिय एक भोक्ता मोर एक प्रभोक्ताको प्रतीतिसे ये दो विद्याएं है। सिद्धान्त-समन्वपमै 'पिवतो' इस सन्दका मर्य भोक्ता पोर पभोक्ता किया गया है। भोक्ताका दोनोंमें प्रत्यभिज्ञान होता है, इसलिए दोनों मन्त्रोमें एक ही विद्या है। 'ऋतं पिबन्तो.' (ब्रह्मवेता कहते है कि शरीरमें वुद्धिरूप गुहाके भीतर प्राट ब्रह्म स्थानमें प्रविष्ट हुए अपने कर्मफलको भोगनेवाले धाया मोर पातपके समान परस्पर विससण दो-तत्त्व-३ ) इस मन्त्रमें द्विवचनसे दोनोंमें भोक्तृत्व प्रतीत होता है | ar सुपर्णाः' (दो सुन्दर पंखवाले) इस मन्त्रमें 'तयोरन्या (उनमें से एक तो क्षेत्रश स्वादिष्ट कर्मफल भोगता है ) एकमे हो कर्मफल भोपतृत्व मोर पन्यमें 'मनश्ननन्यो- दूसरा कर्मफल न भोगकर केवल सासोपसे देखता रहा है ) इस प्रकार प्रमोक्तृत्व प्रतीत होता है । इससे वेद्यस्वरूपके मेदसे विद्याका भी भेद है। सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते है--ब्रह्मसूत्रके प्रथमाध्यापक द्वितीयपादके तृतीय भषिकरणमें पिबन्ती' इस शब्दको जीव भोर ब्रह्मपरकं मानकर -- [अ० ३ पा०३ अधि० २२] वैयासिकन्यायमाला २०६ (द्वाविंश उपस्तकहोलयोविद्युक्यापिकरणे सूत्रे) अन्तरा भूतग्रामवत्स्वात्मनः ॥ ३५॥ अन्यथा भेदानु- पपत्तिरिति चेन्नोपदेशान्तरवत् ॥ ३६॥ द्वाविंशाधिकरणमारचयति- विद्याभेदोऽथ विद्यैक्यं स्यादुपस्तकहोलयोः । समानस्य द्विराम्नानाद्विद्याभेदः प्रतीयते ॥४७॥ सर्वान्तरत्वमुभयोरस्ति विद्यकता ततः। शवाविशेपनुत्यै द्विःपाठस्तत्वमसीतिवत् ।। ४८ ॥ "यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरः” इत्येकस्या शाखायामे- वोषस्तव्राह्मणे कहोल ब्राह्मणेच पठितम् । 'भपरोक्षात्' इत्यत्र विभक्तिव्यत्ययेन 'अपरोक्षम्' इत्यर्थः। तयोरुभयोर्ब्राह्मणयोरन्यूनानतिरिक्ततया पठितस्य वाक्यस्य पोनरुक्त्यपरिहाराय विद्यामेदः । इति प्राप्ते ब्रूमः-द्वयोरपि ब्राह्मणयोः सर्वान्तरत्वं प्रतिपाद्यते । तच्चैक- स्मिन्नेव वस्तुनि संभवति । द्वयोस्तु वस्तुनोरेकतरस्य बहिर्भावोऽवश्यंभावी। तस्मात्सर्वान्तरस्य वेद्यस्यैकत्वान्न विद्याभेदः । न च पुनरुक्तिः । यथा शाखान्तरे उसका अर्थ मोक्ता पोर पभोक्ता, ऐसा किया गया है, प्रतएव वेधका भेद नहीं है। इयत्ता-द्वित्वसंख्या तो दोनों स्थलोमें प्रत्यभिज्ञात होती है। इसलिए एक ही विद्या है ।२१॥ द्वाविंश प्रधिकरणकी रचना करते है- सन्देह- -उपस्त मौर कहोल ब्राह्मणोमे विद्याका भेद है अथवा विद्या एक है ? पूर्वपक्ष- -समान वस्तुके दो वार कथनसे विद्याका भेद प्रतीत होता है। सिद्धान्त - दोनों ब्राह्मणोमें सर्वान्तरत्वके होनेसे एक विद्या है । शङ्का विशेषकी निवृत्तिके लिए 'तत्त्वमसि' प्रादि वाक्यके समान दो बार पाठ है। अतः पुनरुक्ति नहीं है। 'यरसाक्षादपरोक्षाब्रह्म' (जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है, जो प्रात्मा सर्वान्तर है ) इस प्रकार एक ही शाखामे उपस्त और कहोल ब्राह्मणोमें पठित है। 'अपरोक्षाद' इसमें विभक्तिके व्यत्याससे 'अपरोक्ष' ऐसा अर्थ 1 उन दोनो ब्राह्मणोमें न न्यून न पधिक समानरूपसे पठित वाक्यकी पुनरुक्तिके परिहारके लिए विद्याभेद मानना चाहिए। सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-दोनों ब्राह्मणोमे भी सन्तिरत्वका प्रतिपादन है। यह एक ही वस्तुमे हो सकता है। दो वस्तुभोंमें एकका बहिमाव अवश्यंभावी है । इममे सर्वान्तर वेद्यके एक होनेसे विद्याकै भेद नहीं है।
२१० भाषानुवादसहिता [प्र० ३ पा० ३ अपि० २३] तविशेषाद्वापनुत्यर्थम् "तत्वमसि" इति नवत्य उपन्यस्तम्, तथाऽनाप्यु. पपत्तेः । उपस्तयाक्षणेन देहाघारमत्वगतामोद्यते। वहौलग्राहाणेन देहादि. व्यतिरित्तस्य प्रावमापाद्यते। याश्योपयोस्तपादर्शनात् । तस्मात्-एका विद्या ॥२२॥ (त्रयोविरो देहादियमण्डलवायुामनाया विणभेदापिकरणे मूत्रम् ) व्यतिहारो विशिंपन्ति हीतरषत् ।। ३७ ।। प्रयोविंशाधिकरणमारचयति- व्यतिहारे स्वात्मरव्योरेवघा पोस्त द्विधा । वस्त्वेक्यादेकधेक्यस्प दाढाय व्यतिहारगीः।। ४६ ॥ ऐवयेऽपि व्यतिहारोक्त्या धोवधेशस्य जोवता। युक्तोपास्य वाचनिकी मूर्तिवद्दाढ्यं माथिकम् ॥ ५० ॥ ऐतरेयके पठ्यते-"तद्योऽहं सोऽमो योऽसौ सोऽहम्'' इति । मस्यायमर्ष:- 'य एप देहेन्द्रियसाक्षी जीवात्मा स एवाऽदित्यमण्डलवर्ती परमात्मा। पुनरूक्ति भी नहीं है, क्योंकि जैसे पन्पशाखामें उस गदा विशेषकी निवृत्तिके लिए 'तत्त्वमसि' इस वाक्यका नौ वार उपन्यास किया गया है. वैसे यहाँ भी उपपन्न सकता है। उपस्तब्राह्मणसे देह मादिमे प्रात्मलकी शवा निवृत्त की जाती है और कहोल ब्राह्मणसे देह भादिसे व्यतिरिक्त वस्तुमें ब्रह्मत्वका भापादन किया जाता है, क्योकि वाक्यशेषोंमे ऐमा ही देखा जाता है । इमसे ज्ञात होता है कि विद्या एक ही है ।। २२ ।। त्रयोविंश पधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह--स्वदेह और ररिमण्डलमें भन्योऽन्य व्यविहारमें एक प्रकारको बुद्धि- उपासना है अथवा दो प्रकार को पूर्वपक्ष-वस्तु एक होनेमे एक प्रकारको ही बुद्धि होनी चाहिए, व्यनिहार पपन तो वस्तुको दृढताके लिए है। सिद्धान्त-ऐक्य होनेपर भी व्यतिहार उक्तिमे दो प्रकारको बुद्धि होनी चाहिए पोर ईश्वरमें जीवत्वका प्रतिपादन उपासनाके लिए युक्त है। वाचनिकी मूतिके समान दृढता तो आर्थिक हो सकती है। ऐतरेयकमें-'तद्योऽहं सोऽसौ.' ( जो मैं हूँ वही भादिन्यमण्डलस्थ पुरुष है पौर जो वह है वह मैं है ) ऐमा पठिन है। इसका यह अर्थ है---'जो यह देह, इन्द्रियका माक्षी जीवात्मा है, वही पादित्य-मण्डलवी परमात्मा है, जो प्रादित्यमण्डलवर्ती है [ ० ३ पा० ३ मधि० २३ ] वैयासिकन्यायमाला मण्डलवर्ती स एवास्मद्देहादिवर्ती' इति । तत्र स्वदेहरविमण्डलयोरन्योन्यव्यति- हारे श्रूयमारणेऽपि जीवब्रह्मक्यलक्षणस्य वस्तुन एकत्वादेकधैव बुद्धिः वर्तव्या। न च व्यतिहारपाठवेयध्यम् । एकस्यापि वस्तुनो दााय तदुपपत्तेः । इति प्राप्ते घूमः-न खल्विदं तत्वावबोधप्रकरणम् । येनेकत्वप्रतिपत्ति- दर्दान्यं मपेक्षते। कि तहि सगुणोपास्तिप्रकरणम् । उपास्तिश्च यथावचन मनु- ष्ठेया। ततो व्यतिहारेण द्वेघा बुद्धिः कर्तव्या। नन्वेवं सति जीवस्य ब्रह्मक्य- मुत्कर्षाय कल्पते, ब्रह्मणस्तु जीवक्यमपकर्षाय स्यादिति चेत् । नायं दोषः। यथा देहादिरहितस्याप्युपासकचित्तस्थैर्याथं चतुर्भुजाष्टभुजादिमुत्युपदेशेऽपि नापकर्षस्तथा वचनवलादीशस्य जीवत्वोपासनेन तव का हानि । यद्युपासनाय व्यतिहारेऽनुष्ठीयमानेऽज्जिीवब्रह्मणोरेकेत्वप्रतिपत्तिढा भवेत्तहि चरितार्थाः संपद्यामहे । तस्मात्-व्यतिहारेण द्विधा बुद्धिः कर्तव्या ॥ २३ ॥ (चतुर्विशे सत्यविद्याधिकरणे सूत्रम् ) सैव हि सत्यादयः ॥ ३८॥ चतुविशाधिकरणमारचयति- वही हमारे देहादिमें रहनेवाला है।' यहापर अपने देह और रविमण्डलका अन्योऽन्य व्यतिहार धूयमाण होनेपर भी जीवब्रह्मक्यरूप वस्तुके एक होनेसे एक प्रकारको बुद्धि- उपासना करनी चाहिए। व्यतिहार पाठ व्यर्थ नहीं है, क्योंकि एक वस्तुको दृढताके लिए भी उपपन्न हो सकता है। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-यह प्रकरण तत्त्वके प्रवबोधके लिए नहीं है। जिससे कि एकत्व प्रतिपत्तिको दृढताके लिए अपेक्षित हो, किन्तु यह सगुण उपसनाका प्रकरण है। उपासना तो वचन-श्रुतिके अनुसार अनुष्ठेय है। इसलिए व्यतिहारके द्वारा दो प्रकारको उपामना करनी चाहिए। परन्तु ऐसा होनेपर जीवका ब्रह्मक्य तो उत्कर्ष के लिए हो सकता है किन्तु ब्रह्मका जीवैक्य तो अपकर्षके लिए होगा, ऐसा यदि कहो, तो यह दोष नहीं है, क्योकि उपामकके मनको स्थिरताके लिए देहादि रहित ब्रह्मका भी चतुर्भुज, अष्टभुज प्रादि मूतिरूपसे उपदेश होनेपर भी अपकर्ष नहीं है, वैसे ही अति बलसे ईश्वरको जीवरूप उपासनासे तुम्हारी कौनी सी हानि है ? उपासनाके लिए अनुष्ठीयमान व्यतिहारमें यदि अर्थात् जीव ब्रह्मकी एकत्व-प्रतिपत्ति दृढ हो जाय तो हम कृतकृत्य हो जायगे। इसलिए व्यतिहारसे दो प्रकारकी उपासना करनी चाहिए ॥ २३ ॥ चतुर्विश प्रधिकरणकी रचना करते हैं- ११२ नापापादहिया [.०३ पा० ३ मपि०] हे सत्यविवे एरा या पारम्पादियारपयोः । फलमेनामे सोरजपालापहो. पम् ॥ ११ ॥ प्रतापपणादेवा पापातोऽधोपलम् । प्रपंवादोऽपवा मुस्पो पुषोऽपिपलाः॥ ५२ ।। पहदारण्यके अपने-"ग यो हैनन्महास प्रपम । सत्य ब्रोलि, जयनो. मानोपान" इति । यहां पूग्यम् । प्रपम हिरण्यगर्भपेण प्रथममुपमित्यर्पः। अनेन वापरम सत्यविद्या प्रतिपाय पधादिदं मतिराने-'तपत्तरमरपम् । भयो स पादिरपो य एष एतस्मिन्मण्डमे पुरो पयार्य दक्षिणेशपुरष.' इति । तत्तत्यर्थः । एवं दाययोक्त मरपनिये हे गवतः । एता। फलभेदाद । पक्षवाक्ये लोगजपः फममुरुम। रविवारये प "हति पाप्मान जहानि प" इति पापमातलाएं पृषा फर्म धूपते । तस्मात-पिपाभेदः। इति प्राप्ते अमः-एये देयं सत्यविधा। "तपत्तत्मरयम्" इति प्रबुत सरपं ब्रह्मानूय "ममी म मादित्य.” इति रविरूपत्ववर्णनात् । न चात्र फनभेदोति । सन्देह -या पोर रवि पादिमायोगे दोगपरिधाएं प्रतीत होती है पपा एक? पूर्णपा-मोक पर पोर पापनाग पन भेदसे दो बारशेये दो विधाएं समझनी चाहिए। सिद्धान्त---एक ही दिया है, क्योंमिशा पारर्पण है, रविरूपमा वर्णन है। पापपात तो उपमनारा फ्स होोसे पवारमार है । अपना अधिकारी पसार होने. से मुख्य उपासना विधि धृहदारण्यामें-'सपो.' (पो कोई अधिकारी हम महत, धूम्प प्रथम उत्पन्न हुए सरप पहातो हम प्रकार जानता है वह इन सोरोंको षय परा है) ऐगा मुना पाता है । 'पक्ष-पून्य, प्रपमज हिरण्यगर्भपसे प्रपम उत्पन्न ऐमा पर्व है। इस मापसे सत्य. विधाका प्रतिपादनकर मनन्तर विद्यतत्सत्यम' (यहाँ पो यह सत्य है वह यह मादिग्य है पो यह इस मण्डलमें पुरुष है जो यह दक्षिण नेत्रमें पुरुष है ) यह प्रतिपादन दिया जाता है । 'हद-तत्र-उसमें यह मर्प है। इस प्रकार दो वाक्योंसे उक्त सत्यदिवाएं दो हैं । क्योंकि फ्लका भेद है । पक्षपास्यमे तोरणय फल कहा गया है पौर रविषाक्य, 'हन्ति पाप्मान जहाति.' (वह पापका नाश करता है ) इस प्रकार पापनाशरूप पृथक फल सुना पाता है । इममे विधाका भेद है। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं--यह सत्यविधा एक ही है। 'तपत सत्यम्' इससे प्रल मत्य ब्रह्माका अनुवाद कर 'प्रसो ग मादित्यः' इससे रविरूप- त्वका वर्णन किया है । यहाँपर फलका भेद नहीं है, क्योकि पापनाश उपासनाका फल [प० ३ पा० ३ प्रधि० २५ ] वैयासिकन्यायमाला २१३ पापघातस्योपास्तिफलत्वेनार्थवादत्वात् । 'अङ्गेषु फलश्रुतिरर्थवादा' इतिन्याये- नाविवक्षितत्वात् । अथवाऽत्रोपासनायामधिकार्यश्रवणाच्छूयमारणफलस्यैव कामोपबन्धमध्याहृत्याधिकारिणि कल्पयितव्ये सति 'पापातलोकजयकाम उपासीत' इयि वक्त शक्यत्वाद्विशिष्टफलस्य विवक्षितत्वम् । तस्मादेकवेयं सत्यविद्या ॥२४॥ (पञ्चविशे दहरहार्दाकाशयोरुपसंहाराधिकरणे सूत्रन ) कामादीतरत्र तत्र चाऽऽयतनादिभ्यः॥३६॥ पञ्चविंशाधिकरणमारचयति- असंहतिः संहृतिर्वा व्योम्नोदहरहादयोः। उपास्यज्ञेयभेदेन तद्गुणानामसंहतिः ॥ ५३॥ उपास्त्ये क्वचिदन्यत्र स्तुतये चास्तु संहतिः । दहराकाश आत्मैव हृदाकाशोऽपि नेतरः ॥ ५४॥ छान्दोग्ये "दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः' इति हृदयान्तर्गतत्वेन श्रुतस्य दहा- काशस्य सत्यकामत्वादयो गुणा उक्ताः । बृहदारण्यके तु-“य एषोऽन्तहृदय आकाशः" इत्युक्तस्य हार्दाकाशस्य वशित्वादयो गुरणा उक्ताः । तत्र न परस्पर- गुणोपसंहारः । दहराकाशस्योपास्यत्वेन, हार्दाकाशस्य ज्ञेयत्वेन विद्याभेदात् । है, मतः अर्थवाद है। 'मङ्गेषु फलश्रुतिरर्थवादः' (अङ्गोंमे फलति अर्थवाद है ) इस न्यायसे वह अविवक्षित है। मथवा इम उपासनामे अधिकारीका श्रवण नहीं है, मतः ययमाण फलके ही 'कामोपबन्धका-इच्छाविषयत्वका प्रध्याहार कर अधिकारीको कल्पना होनेपर 'पापनाश और लोकजयको कामनावाला उपामना करें इस प्रकार कह सकनेसे विशिष्ट फल विवक्षित है । इसलिए एक ही यह सत्यविद्या है ॥ २४ ॥ पंचविंश प्रधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-मत्यकामत्व, वशित्व प्रादि गुण जो दहराकाश और हृदयाकाशके हैं, उनका परस्पर उपसंहार करना चाहिए अथवा नहीं ? पूर्वपक्ष-उपास्य और ज्ञेयके भिन्न होने से उन गुणोका उपसंहार नहीं हो सकता। सिद्धान्तकही पर उपसनाके लिए और अन्यत्र स्तुतिके लिए उपसंहार होगा हो, दहराकाश प्रात्मा ही है और हृदयाकाश भी अन्य नही है अर्थात् प्रात्मा ही है। छान्दोग्यमे 'दहरोऽस्मिन्नन्नराकाशः' ( इस हृदय में जो सूक्ष्म माकाशाख्य ब्रह्म है ) इस प्रकार हृदयान्तर्गतरूपमे शुत दहराकाशके सस्यकामत्व मादि गुण कहे गये हैं, पोर बृहदारण्यकमे तो य एषोऽन्तहृदय प्राकाशः' ( हृदयके अन्तर जो यह माकाश है ) इस तरह उक्त हृदयाकाशके वशित्व प्रादि गुण कहे गये हैं। इससे यहां परसर गुणोंका २१४ भाषानुवादसहिता[म०३ पा० ३ मषि० २६ ] इति प्राप्ते यूम:-तत्र वशित्वादीनां दहाकाश उपसंहार उपास्पे भविष्यति । सत्यकामत्वादीनां तु हााश उपसंहार स्तुत्यर्थः । न च प्रयो• जनवत्वेऽपि विद्यामेदो दुष्परिहर इति वाच्यम् । विद्याभेदेऽप्युमयनाऽऽकाशश- ब्दवाच्यस्याऽश्मन एक्त्वात् । दहवाशस्य तावदात्मत्वं दहराधिकरणे- (७० सू०२।३५ ) वरिणतम् । हार्दाकाशस्यापि "महानज मात्मा" इत्युपक्रमा. दात्मत्वमवगन्तव्यम् । तस्मादुमयत्रोपसंहारः ।। २५ ।। (पशि उपदासे प्राणाहुवितोपाधिकरणे मूत्र ) आदरादलोपः॥ ४० ॥ उपस्थितेऽतस्तद्वचनात् ॥ ४२ ॥ पदिशाधिकरणमारपपति- न लुप्यते लुप्यते वाप्राणाहुतिरमोजने। न लुप्यतेऽतिथे: पूर्व मुजोतेत्यादरोफितः ।। ५५ ॥ भुज्याप्नोपजीवित्वात्तलोपे लोप इष्यते । भुतिपक्षे पूर्वमुक्तावादरोऽप्युपपद्यते ।। ५६ ॥ छान्दोग्ये वैश्वानरविद्यावाक्यशेपे-"या प्रथमामाइति जुहुयात, तां उपसंहार नहीं हो सकता है, क्योकि यहाकाश उपास्यस्पसे मोर हृदयालाश शेयरूपसे कहा गया है। इसमे विद्याका भेद है। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं यहापर यशित्व भादि गुणोका दहराकाशमें उपमहार उपासनाके लिए होगा। और मत्यकाम प्रादि गुणोंका हृदयाकाशमें उपमहार तो स्तुतिके लिए होगा। उपासना मोर स्तुतिरूप प्रयोजन होनेपर भी विद्याका भेद दुष्परिहार्य है, ऐमा नहीं कहना चाहिए। क्योंकि विद्याभेद होनेपर भी भाकाश शब्द वाच्य मात्मा दोनों स्थलोंमे एक है। दहराकाश भात्मा है । इसका 'दहराधिकरणमें वर्णन किया गया है । हार्दाकाश भी 'महानत्र भात्मा' इस उपक्रमसे मात्मा पवगत होता है, इससे दोनो स्थलोंमे उपसंहार है ॥ २५ ॥ पदिश मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-भोजनके प्रभावमें प्राणाहुतिका लोप होता है अथवा लोप नहीं होता। पूर्वपक्ष–भोजनके प्रभावमे प्राणाहुतिका लोप नही होता, क्योकि 'अतिथिके पूर्व भोजन करे' इस प्रकार भादरोक्ति है। सिद्धान्त- भोजन के लिए उपस्थित भानका प्राणाहुति उपजीवी है, मनः भोजनका लोप होनेपर प्राणाहुति का भी लोप इष्ट है। भोजन पक्षमे पूर्व भोजनमें भादर भी उप- पन्न होता है । इससे भोजनके प्रभाव में प्राणाहुतिका लोप होता है। अान्दोग्यमे वैश्वारनरके वाक्यशेपमें --'यो प्रथमामाहुति'। उस समय वह मोती [म० ३ पा० ३ अघि०२७ ] वैयासिकन्यायमाला २१५ जुहुयात्प्राणाय स्वाहेति" इति प्राणाहुतयः पठ्यन्ते । तत्र केनचिनिमित्तेन भोज- नलोपेऽप्युपासकस्य प्राणाहुतिनं लुप्यते। "पूर्वोऽतिथिभ्योऽभीयात्" इत्यति- यिभोजनात्पूर्वमुपासकस्य यजमानस्य भोजनं प्रतिपादयन्त्याः श्रुतेः प्राणा- हुतावादरदर्शनात् । तमादरं प्रख्यापयितुमेवातिथिभोजनस्य प्राथम्यं निन्दति- 'यथा ह वै स्वयमहत्वाऽग्निहोत्रं परस्य जुहुयात्, तादृक्तत्स्यात्' इति । तस्मा- प्राणाहुतेरलोपः। इति प्राप्ते ब्रूमः-'तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमीयम्' इतिभोजनार्थान्नस्य होमद्रव्यत्वश्रवणाद्भोजनलोपे द्रव्याभावादाहुतिलुप्यते । भादरस्तु भोजनपक्षे प्राथम्यविधानाय भविष्यति । तस्मात्-भोजनलोपे प्राणाहुतिलृप्यते ॥२६॥ ( सप्तविशेऽङ्गावबद्धोपास्त्यनयत्याधिकरणे सूत्रम् ) तन्निर्धारणानियमस्तदृष्टः पृथग्ध्यप्रतिबन्धः फलम् ॥ ४२ ॥ सप्तविंशाधिकरणमारचयति- नित्या अन्नावबद्धाः स्युः कर्मस्वनियता उत । पर्णवरक्रतुसंबन्धो वाक्यानित्यास्ततो मता. ॥ ५७ ॥ जो पहली पाहुति दे उसे 'प्राणाय स्वाहा' ऐसा कहकर पाहुति दे ) इस प्रकार प्राणा- हुतिका पाठ किया गया है । यहांपर किसी निमित्तसे भोजनके लोप होनेपर भी उपा- सककी प्राणाहुति लुप्त नहीं होती, क्योकि 'पूर्वोऽतिषिम्योऽश्नीयात्' (अतिथिके पूर्व भोजन करे ) इस प्रकार प्रतिथि मोजनके पूर्व उपासक यजमानके लिए भोजनका प्रति- पादन करनेवाली श्रुतिसे प्राणाहुतिमे प्रादर दिखलाया गया है । उस प्रादरकी प्रसिद्धिके लिए ही अति मतिथि भोजनमें प्राथम्पकी निन्दा करती है । 'यथा ह वै.' (जैसे अपने अग्निहोत्र होमको विना किये दूसरेका अग्निहोत्र होम करे, वैसे ही वह है ) इससे मोजनके अमावभे भी प्राणाहुतिका लोप नहीं है । सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-'तद्यद्भक ' (मतः भोजन के समय जो अन्न पहले पाये उमका होम करना चाहिए ) इससे भोजनार्थ भन्न होम- द्रव्य है, ऐमा श्रवण होनेसे भोजनके लोप होनेपर द्रव्यका प्रभाव हो जानेमे पाहुति लुम होती है । प्रादर तो भोजन पक्षमे प्राथम्य विधानके लिए होगा। इससे यह सिद्ध हुमा कि भोजनका लोप होनेपर प्राणाहुतिका लोप होता है ।। २६ ।। सप्तविंश अधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-कर्माङ्गोसे सम्बन्धित उपासनाएं नित्य हैं पर्यात् नियमसे मनुष्ठेय हैं अपवा काँमे मनियत हैं ?
भाषानुवादसहिता [:०३ पा० ३ अधि० २७] पृषवफलश्रुतेर्नेता नित्या गोदोहनादिवत् । उभी कुरुत इत्युक्तं कर्मोपास्यनुपासिनोः ॥ ५ ॥ उद्गीथादिषु वर्मानेषु प्रतिमादिवत्प्रतीकमूतेषु विघीयमाना देवतोपास्त. योऽन्नायबद्धाः । ताश्च कर्मस्वनुष्ठीयमाने कर्मानवनियमेनानुसातव्याः। कम- प्रकरणमारभ्याध्ययनामावेऽपि वाक्यारकतुसंबन्धोपपत्तेः । यथा यस्य पर्णमयो जुहूर्भवति' इत्पनारम्यापीतस्याप्यव्यभिचारिजुहूद्वारा वाक्याकतुसंबन्धस्तथा 'य एवं विद्वानुद्गायति, य एवं विद्वान्साम गायति' इत्यादिप्वध्यमिचरित. ऋतुसंवन्धिसामोद्गीपादिद्वारा तदुपासनाना तुरांबधा प्रतीयते । तस्मात्कर्मसु नियती उपस्तियः। इति प्राप्ते यूमा-गोदोहनादिवदनियता उपास्तयः । यथा 'चमसेनापः प्रणयेत्, गोदोहनेन पशुकामस्य', इत्यत्राप्रणयनमाश्रित्य विघीयमानमपि पूर्वपक्ष-पर्णताके समान ऋतुके साथ वाक्य द्वारा उनका सम्बन्ध है, अतः वे कौमें नित्य नियमसे मनुष्ठेय समझनी चाहिए। सिद्धान्त-पृथक्-पृथक् फलके श्रवणसे गोदोहनकै ममान ये उपामनाएँ नित्य नही है, क्योंकि 'उभी कुरुत.' (दोनों-उपासक भौर भनुपासक कर्म करते है ) इस प्रकार उपासक मोर मनुपामक दोनोके लिए कर्म कहा गया है, इससे कर्माङ्गोसे सम्बन्धित उपासनाएं हैं। प्रतिमादिके समान प्रतीकभूत उद्गीथ भादि कर्म के प्रङ्गोमे विघीयमान देव तो पासनाएं मङ्गोमे सम्बद्ध हैं, इसलिए मनुष्टीयमान पोमे कर्माङ्गके समान नियमतः उनका अनुष्ठान करना चाहिए । यद्यपि कर्मप्रवरणका प्रारम्भकर उनका अध्ययन नहीं किया गया है, वो भी वापसे प्रतु सम्बन्ध हो सकता है। जैसे 'यस्य पर्णमयो।' (जिसकी जुहू-यज्ञपात्र पर्णमयो पलाम की होती है ) इस प्रकार पनारम्याधीत होने- पर भी (पर्णमयीत्वको ) भव्यभिचारी जुह द्वारा वाक्यसे प्रतुके साय सम्बन्य है, वैसे ही 'प एवं.' (जो इस प्रकार जाननेवाला उदगान करता है, जो ऐमा जानकर सामका गान करता है ) इत्यादिमें व्यभिचार रहित ऋतु सम्बन्धी साम और उद्गीथ द्वारा उन उपासामोका कतुके साथ सम्बन्ध प्रतीत होता है । इससे उपासनाए काँमें नियमत प्रास हैं। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते है-गोदोहनके समान उपासनाएं मनियत्त हैं । जैसे 'चमसेनाप' प्रणयेत्' 'गोदोहनेन पशुकामस्य' (चमस-यज्ञपात्रसे जल- का प्रणयम-नयन करे, पशुकामनावाला गोदोहन नामक पात्रसे करे ) इस प्रकार यहाँ- ।। ५६ ।। [म०३ पा० ३ अधि० २८] वेयासिकन्यायमाला २१७ गादोहनमनत्वर्थत्वादैच्छिकम्, न तु प्रणयनादिवप्नियतम् । तथा कर्मानान्या- श्रित्य विधीयमाना उपास्तयो न त्वाः, किंतु पुरुषार्थाः । कर्मफलात्पृषकफ- । लश्रवणात्। 'वर्षति हास्मै' इति पञ्चविधे सामनि वृष्टिदेवतामुपासीनस्य कामवृष्टिः क्रतुफलात्पृथवफलत्वेन श्रूयते । किंच 'तेनोभो कुरुतो यस्त्वेतदेवं वेद, यश्च न वेद' इत्यस्मिन्ननावबोपास्तिवाक्यशेष उपासकानुपासकयोरुपास्या- पारभूतेन तेनाङ्गेन कर्मानुष्ठानं विस्पष्टमाम्नायते । तस्मात्कमस्वनियता उपास्तयः॥२७॥ (अष्टाविंशे वायुप्राणोपामनयोः प्रयोगभेदाधिकरणे सूत्रम् ) प्रदानवदेव तदुक्तम् ॥४३॥ अष्टाविंशाधिकरणमारचयति- एकीकृत्य पृथग्वा स्याद्वायुप्राणानुचिन्तनम् । तत्त्वाभेदात्तयोरेवीकरणेनानुचिन्तनम् अवस्थाभेदतोऽध्यात्ममधिदेव पृथक्श्रुतेः । प्रयोगभेदो राजादिगुणकेन्द्रप्रदानवत् ।। ६० ॥ पर मप्रणयनका प्राश्रयणकर विधियमान भी गोदोहन व्रत्वर्थ न होने से ऐच्छिक है। मप्रणयन मादिके ममान नियत नही है । वैमे कर्मके भङ्गोका माश्रयकर विधीयमान उपासना क्रत्वर्थ नहीं हैं किन्तु पुरुषार्थ हैं, क्योकि उनका कर्मफलसे पृथक् फल श्रवण है। 'वर्षति हास्मै' इस तरह पाँच प्रकारके साममे वृष्टि देवताकी उपासना करनेवाले ऐच्छिकवृष्टि ऋतुफलमे पृथक् फलस्वरूपसे सुनी जाती है, किञ्च 'तेनोभी कुरुतः ' (जो उद्गीथके अवयवभूत इस प्रक्षरको रसतमत्वादि विशिष्ट जानता है अथवा जो नही जानता वे दोनो ही उनके द्वारा कर्म करते है ) प्रङ्गाश्रित इस उपासना वाक्यशेषमे उपासक और अनुपासक्के लिए उपास्यके माधारभूत उस मनसे कर्मका अनुष्ठान स्पष्टरूपसे कहा गया है। इससे कर्मोमे उपासनाए अनियत हैं ॥ २७ ॥ मष्टाविंश भधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-वायु मोर प्राणका चिन्तन एकरूपसे करना चाहिए मथवा पृथग्रूपसे ? पूर्वपक्ष-वायु मोर प्राणका अनुचिन्तन एकरूपसे करना चाहिए, क्योकि वे दोनो एक ही तत्त्व हैं। सिद्धान्त--अध्यात्म मौर मषिरूप अवस्था भेदसे उनका पृथक् चिन्तन है, क्योकि ऐसी श्रुति है, और राजा आदि गुणवाले इन्द्रके प्रदानके समान प्रयोगका भेद भी युक्त है। - २१८ भाषानुवादसहिता म०३पा० ३ प्रधि० २६ ] संवर्गविद्यायाम्-अघिदैवं वायुरुपास्यत्वेन श्रुतः, अध्यात्मं च प्राणः । तत्र माणस्य वायुकायस्वेन तत्त्वभेदाभादुमयोरेकीकरणेन चिन्तनम् । इति प्राप्ते घूम:-तत्त्वभेदाभावेऽपि कार्यत्येन कारणत्वेन चावस्थाभेदस्य सद्भावात् 'इत्यधिदेवम् । अथाध्यात्मम्' इति विविच्य पृथगनुचिन्तनाय श्रुतिविविनक्ति। तस्मात्-इन्द्रप्रदानवत्प्रयोगभेदो द्रष्टव्यः । यथा-'इन्द्राय राजे पुगेडाशमेकादशकपालम्, इन्द्रायाधिराजाय, इन्द्राय स्वराज्ञे' तीन्द्रस्यै- कत्वेऽपि राजादिगुणभेदात्पृथक्पुरोडाशप्रदानं कृतम्, तथा एकस्यापि पायु. तत्वस्य स्थानभेदात्पृथचिन्तनं भविष्यति ॥ २८॥ ( एकोनत्रिशे मनश्चिदादीनां स्वतन्त्रताधिकरणे मूत्राणि ) लिङ्गभूयस्त्वात्तद्धि बलीयस्तदपि ॥४४॥ पूर्वविकल्पः प्रकरणात्स्याक्रियामानसपत्॥४५॥ अतिदेशाच्च ।।४६|| विधैव तु निर्धारणात् ।। ४७॥ दर्शनाच ॥ ४ ॥ श्रुत्या. दिवलीयस्त्वाच्च न धाधः ॥ ४६॥ अनुषन्धादिभ्यः प्रशान्तरपृथक्त्ववदृष्टश्च सदुक्तम्॥५०॥न सामान्या- दप्युपलब्धेमृत्युवन्नहि लोकापत्तिः ॥ ५१ ॥ परेण घ शब्दस्य ताद्विध्यं भूयस्त्वावनुबन्धः ॥५२॥ एकोनत्रिंशाधिकरणमारचयति- संवर्गविद्या में मधिदैव वायु भौर अध्यात्म प्राण उपास्यरूपसे व्रत हैं। यहाँपर प्राण वायुका कार्य है, इसलिए तत्त्वका भेद नहीं है, इससे दोनोका एकीकरणरूपसे चिन्तन करना चाहिए। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-यद्यपि तत्वका भेद नहीं है, तथापि कार्यरूप और कारणरूप अवस्था भेदका मद्नाव होनेसे 'यह मषिदेव है, मनन्तर अध्यात्म है, ऐमा विवेचनकर पृथक् अनुचिन्तनके लिए श्रुति ही विवेक-भेद करती है । इसमे इन्द्रप्रदानके समान प्रयोग भेद जानना चाहिए। जैसे 'इन्द्राय राशे० ( इन्द्र राजाके लिए, इन्द्र अधिराजके लिए और इन्द्र स्वराजके लिए ग्यारह कपालवाला पुरोडाश तीन फ्रोडाशवाली इम इष्टिमे सब देवतामोको हवि प्राप्त कराने के लिए एक माथ ही पुरोडाशोका अवदान करता है ) इमसे इन्द्रके एक होनेपर भी राजा मादि गुणके भेदसे प्रथक् पुरोडाशका प्रदान किया गया है। वैसे घायुतत्वके एक होनेपर भी स्थानके भेदसे पृथक चिन्तन हो सकेगा ॥ २८ ॥ एकोनविंश प्रधिकरणको रचना करते हैं- । ।
२२० मापानुवादसहिता [म. ३ पा० ३ अधि० २६) नामग्नित्वेन वर्णनात् । तस्मादेवं विदे स्वपतेऽपि तानेतानग्नीन्सर्वदा सर्वाणि भूतानि चिन्वन्तीति । अत्र यावजीवमग्नीनामविन्टेदेन नैरन्तयं प्रतीयते। तच्च विद्यास्वातन्त्र्ये लिङ्गम् । पमंशेपत्वे हि क्मणो यावजीवं नैरन्तर्यामा- वात्तच्छेपारणा मनश्चिदादाना कथं नैरन्तयं स्यात् । तच्च लिन प्रारणादलोया। तस्मात्स्वतन्त्रा इति चेत् । नायं दोषः। अन्यादानरूपत्वेन लिनस्पतस्य दुर्वलत्वात् । तथा हि-द्विविधं लिगम्-सामय्यंमन्यादर्शनं चेति । तत्र विघ्यु- देशगत लिन्नं सामध्यम् । तच्च स्वातन्त्र्येण प्रमाणम् । अथवादगतं स्वन्योप- वाक्ये दृश्यमानत्वादन्यार्थदर्शनम् । तच तात्पर्यरहितत्वाप्न स्वातन्त्र्येण प्रमा- एम्, किंतु प्रमेयस्तावकप्रमाणान्तरे केवलमुपोबलकं भवति । एवं च सत्मत्रो- दाहृतलिङ्गस्य दुर्बलत्वात्प्रकरणात्कमशेषा मनश्चिदादयः । इति प्राप्ते ब्रूमः-म तायदत्र शाब्दो विधिरुपलभ्यते । लिमादेरश्रवणाद । कि तार्थवादसामर्थ्यादुन्नेयो विधिः । तथा च फलप्रतिपादरस्तावकवाक्याना रात्रिसत्रन्यायेनाधिकारिसमपरणपर्यवसानादशेषमप्येतवाह्मणं विधिरूपं भवि- प्यति । ततोविध्युद्देशगतत्वेन लिन्नस्य प्रावल्यम् । विच"ते हैते विद्याचित एव" । - वाक् मादि वृत्तियां सर्वदा प्रवृत्त हैं। कारण कि साधारणरूपसे पुरुपके मन मादि वृत्तियोका मग्निरूपसे वर्णन है। इससे ऐसा जाननेवालेके सोनेपर भी इन पग्नियोंका सर्वदा सब भूत चमन करते हैं । यहाँ जीवन पर्यन्त पग्नियोके विच्छेद न होनेसे नरन्तर्य प्रतीत होता है । वह विद्याके स्वातन्त्र्यमे लिङ्ग है । कमशेपत्वमै तो जीवनपर्यन्त कर्मके निरन्तर न होनेसे उसके शेषमून मनश्चित मादि कैसे निरन्तर होगे, मौर वह लिन प्रकरणसे बलवान है। जैसे कि लिङ्ग दो प्रकारका होता है-सामर्थ्यरूप और अन्यार्थदर्शनरूप । उनमें विधि उद्देश्यगत लिङ्ग सामर्थ्य है, वह स्वन्त्ररूपसे प्रमाण है। पर्थवादगत तो प्रत्यशेष वाक्यमे दृश्यमान होनेसे पन्यार्थदर्शन है। वह तात्पर्य रहित होने से स्वतन्त्ररूपसे प्रमाण नहीं है, किन्तु प्रमेयके स्तावक मन्य प्रमाणमे केवल सहायक होता है। ऐसा होनेपर उदाहृत लिङ्गके दुर्वल होने से प्रकरणसे मनश्चित मादि कर्मशेष हैं। सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-यहा शादविपि उपलब्ध नहीं होती, क्योकि लिड, लोट् भादिका श्रवण नहीं है, किन्तु मर्थवादके सामर्थ्यसे विधि स्वीकार्य है । तथा च फलके प्रतिपादक स्वापक वाक्योका गत्रिसत्र न्यायसे अधिकारीके समर्पणमे पर्यवसान होनेसे यह सम्पूर्ण ब्राह्मण भी विधिरूप होगा। इससे विधि उद्देश्यगतरूप होनेसे लिङ्ग प्रबल है। श्चि 'ते हैते.' ( वे ये विद्या चित् ही हैं ) इस [म०३ पा० ३ अधि० ३० ] वैयासिकन्यायमाला २२१ इत्येव श्रुत्या धर्मानत्वं व्यावर्तते। तथा "विद्यया हैवेत एवंविदश्चिता भवन्ति" इति वाक्यमपि स्वातल्यगमरम् । तस्मत्-श्रुतिलिङ्गवाक्यैः प्रकरणं बाधित्वा स्वतन्त्रविद्यात्मवत्वं मनश्चिदादीनामभ्युपगन्तव्यम् ।। २६ ।। (विशे मात्मनो देहातिरिक्तवाधिकरणे सूत्रे)। एक आत्मनः शरीरे भावात् ॥ ५३॥ व्यतिरेकस्तद्भावा- भावित्वान्नतूपलब्धिवत् ॥ ५४॥ त्रिंशाधिकरणमारचयति- मात्मा देहस्तदन्यो वा चैतन्यं मदशक्तिवत् । भूतमेलनजं देहे नान्यत्राऽऽत्मा वपुस्ततः ।। ६३ ।। भूतोपलब्धिभूतेभ्यो विभिन्ना विषयित्वत । सेवाऽऽटमा भौतिकाईहादन्योऽसौ परलोकभाक् ॥ ६४ ॥ 'मनश्चिदादीना क्रत्वयंता नास्ति, किंतु पुरुषार्थत्वम्' इत्युक्त सति 'कोऽसौ पुरुष.' इति प्रसङ्गाद्विचायते। तदेतदधिकरणं पूर्वोत्तरयोरुभयोर्मीमासयोः शेषभूतम् । स्वर्गमोक्षभागिन प्रात्मनः प्रतिपाद्यत्वात् । तत्र बौद्धा लोकायतिका: देह एवात्मेति मन्यन्ते। अन्वयव्यतिरेकाभ्या चैतन्यस्य देह एवोपलम्भात् । ७.विसे कर्माङ्गत्वकी व्यावृत्ति होती है, वैसे 'विद्यया है वै.' ( इस प्रकार जाननेवाले उपासकके लिए ये अग्नियाँ विद्यासे ही संपादित होती हैं ) यह वाक्य भी स्वातन्त्र्यका बोधक है। इससे युति, लिङ्ग मोर वाक्यसे प्रकरणका बाधकर मनश्चित् प्रादिको स्वतन्त्र विद्यात्मक स्वीकार करना चाहिए ॥ २६॥ विश अधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-शरीर ही मात्मा है अथवा उससे अन्य है ? पूर्वपक्ष-मदशक्तिके ममान भूतोके सम्मेलनमे देहमें चैतन्यशक्ति उत्पन्न होती है, इससे शरीर ही प्रात्मा है, उससे मतिरिक्त प्रात्मा नहीं है। सिद्धान्त-मूतोकी उपलब्धि भूतोसे भिन्न है, क्योंकि वह विषयी है, प्रत वही उपलब्धि हो मारमा है, यही परलोकका भागी और भौतिक देहसे पृथक् है । मनश्चित् प्रादिको क्रत्वर्यता नहीं है, किन्तु पुरुषार्थता है, इस प्रकार गत मधि- करणमें उक्त होनेपर "पुरुष कौन है ?' इस प्रकार प्रमङ्गसे विचार किया जाता है। क्योंकि इसमे स्वर्ग और यह प्रषिकरण पूर्व और उत्तर दोनों मोमांसोका प्रङ्गभूत पोसके भागी अधिकारी प्रात्माका प्रतिपादन किया जाता है। यहाँपर देह ही भात्मा है। इस प्रकार बौद्ध-लौकापतिक मानते हैं । क्योकि मन्वय-व्यतिरेकसे चैतन्यका देहमें २२२ भाषानुवादसहित] [२०३१०३ पषि०३१] '. सति हि देहे चैतन्यमुपलभ्यते, न त्वसति । न च चैतन्यस्य जात्यन्तरतया देहव्यतिरिक्त प्रारमत्वं शनीयम् । प्रमुख नागवल्लीचूर्णाना संयोगान्मदशक्ति- रिव देहाकारपरिणतेभ्यो भूतेभ्यो जायमानं चैतन्यं यं नाम जात्यन्तरं स्यात् । तस्माच्चेतनो देह पात्मा । इति प्राप्ते घूम:-पृथिव्यादीना भूतानामुपलब्धिभूतेभ्यो व्यतिरिका भवितुमर्हति । विपयित्वात् । 'यद्यद्विपयि तत्तद्विपयाद्वपतिरिक्तम् । यथा रूपा- चक्षुः । सपासति सादृशचैतन्यमात्मतत्वं वदन्तं प्रति कर्य भौतिकदेहरूपत्व. मापद्येत । सत्येव देहे चैतन्यमुपलभ्यते, नासति' इति यावन्वयव्यतिरेवावृक्तो तत्र व्यतिरेकोऽसिद्ध असत्यपि देहे परलोकगामिन श्विदात्मनः शाश्णोपल. म्भात् । शास्त्रस्य च प्रामाण्यं समर्थनीयम् । सत्यपि मृते देहे चैतन्यानुपलब्धे- श्वान्वयासिद्धिा ॥३०॥ (एकत्रिंश उत्पादिपियः शालान्तरेऽनुवृत्त्यधिकरणे सूत्रे) अनावपतास्तु न शाखासु हि प्रतिवेदन ॥ १४ ॥ मन्त्रादिवद्वाऽविरोधः ।। ५६ ॥ एकनिंशाधिकरणमारयति- ही उपलम्भ होता है। देहके रहते ही चैतन्य उपलब्ध होता है देहके न रहते पवन्य उपलब्ध नहीं होता। चैतन्यको अन्य जाति मानकर देहसे भविरिक्त पात्मा है, ऐसी शदा नहीं करनी चाहिए, क्योकि क्रमुक, नागवल्ली चूर्णके संयोगसे उत्पन्न मदशक्तिके समान देहाकारसे परिणत भूतोसे जायमान चैतम्य जात्यन्तर कैसे होगा ? इसलिए चेतनदेह ही भान्मा है। सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-शथिवी मादि मूतोकी उपलब्धि भूतोसे मतिरिक्त होनी चाहिए, क्योकि वह विषयी है । 'जो जो विषयी होता है वह यह विषयसे पृथक् होता है जैसे रूपसे घक्षु । ऐसा होनेपर इस प्रकारके चतन्यको मात्मतत्व कहनेवालेके प्रति भौधिक देहरूपता कैसे प्रान होगी। देहके रहते ही चतन्य उपलब्ध होता है न रहनेपर नहीं, ये जो मन्वय व्यतिरेक किये गये हैं, यहांपर व्यतिरेक प्रसिद्ध है, क्योकि देहके न रहनेपर भी परलोकगामी चैतन्यात्माका शास्त्रसे शान होता है। शास्त्रका प्रामाण्य तो समर्थनीय है, इस प्रकार अन्वय भी प्रसिद्ध है, क्योंकि मृत देहके होनेपर भी चैतन्यकी उपलब्धि नहीं होती। इससे देहसे पृथक् मात्मा मानना चाहिए ॥ ३० ॥ एकत्रिंश अधिकरणकी रचना करते हैं- - [म० ३ पा० ३ मपि० ३२ ] यासिकन्यायमाला २२३ उक्यादिघी: स्वशासाने वेवान्यत्रापि वा भवेत् । सांनिध्यात्स्वस्वशासाङ्गप्वेवासी व्यवतिष्ठते ॥६५॥ उक्योद्गीथादिसामान्यं तत्तच्छन्दः प्रतीयते। श्रुत्या च संनिधे घस्ततोऽन्यत्रापि यात्यसो॥६६॥ मन्नावबद्धोपासनेषु-उक्थशास्त्रात्ये कर्मापृथिव्यादिदृष्टिरेतरेयोपनिषदि श्रूयते । उक्थं तु कोपोतक्यादिशाखान्तरेष्वपि विहितम् । तत्र पृथिव्यादिष्टिरेत- रैयगतोक्य एवं व्यवतिष्ठत उत कोपोतक्यादिष्वनुवर्तते' इति संदेहे सति संनिहितत्वात्स्वशाखायामेव व्यवतिष्ठते । इति प्राप्ते ब्रमः-उक्थशब्दस्तावन्मुख्यया वृत्त्या सवंशाखागतमुक्थसा मान्यमाचष्टे । तत उक्थश्रुतिवशात्सर्वशाखागतोक्त्यशास्त्रेष्वनुवृत्तिः प्राप्ता । श्रुतिश्च संनिघेवलीयसी। तस्मात्क्वचिद्विहिताधीः शाखान्तरेष्वनुगच्छति ॥३१॥ (दानिशे वैश्वानरविद्यायां समस्तोपासनाधिकरणे सूत्रम् ) भूम्नः क्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा हि दर्शयति । द्वात्रिंशाधिकरणमारचपति- ध्येयो वैश्वानरांशोऽपि ध्यातव्यः कृत्स्न एव वा। अंशेपूपास्तिफलयोरक्त रस्त्यंशधीरपि ॥ ६७॥ सन्देह-स्वशाखाङ्गोमे ही उद्गीथादियुद्धि है पथवा अन्यत्र भी ? पूर्वपक्ष–मानिध्यसे स्वस्वशाखाङ्गोमें ही उद्गीथादि बुद्धि व्यवस्थित है। सिद्धान्त-उन उन शब्दोसे उक्थ मौर उद्गीय मादि सामान्य प्रतीत होते हैं, इमलिए श्रुतिसे सानिध्यका बाप है, इससे उद्गीथादिबुद्धि मन्यत्र प्राप्त हो सकती है । कर्माङ्गोसे सम्बन्धित उपासनामोमें उक्थशस्त्र नामक कर्माङ्गोमे पृथिवी मादि दृष्टिकी ऐतरेयोपनिषद्हें श्रुति है । उक्य तो कौषीतकी मादि अन्य शाखामोंमे भी विहित है। यहाँपर पृथिवी मादि दृष्टि ऐतरेयगत उक्थमे ही व्यवस्थित है अथवा कोषोतकी मादिमे भी अनुवृत्त होती है ? ऐसा सन्देह होनेपर पूर्वपक्षी कहता है कि मन्निधिसे स्वशाखामें ही व्यवस्थित होती है। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-उक्थ शब्द तो मुख्य-वृत्तिसे सर्वशाखागत उवथ सामान्यको कहता है। इससे उक्थ श्रुतिसे सर्वशाखागत उक्थशास्त्रोमें अनुवृत्ति प्राप्त होती है, श्रुति संनिधिसे बलवती है, इससे क्वचित विहित होनेपर भी बुद्धि अन्य शाखामों में भी अनुवृत्त होती है ।। ३१ ।। द्वात्रिंश ३२ मधिकरणकी रचना करते हैं- 1. सन्देह-वैश्वानरके अंशकी उपासना करनी चाहिए अथवा समस्त वैश्वानरकी उपासना करनी चाहिए?
२२४ भाषानुवादसहिता [म०३ पा० ३ अधि० ३२] उपक्रमावसानाम्यां समस्तस्यैव चिन्तनम् । अंशोपास्तिफले स्तुत्यै प्रत्येकोपास्तिनिन्दनात् ॥ ६८ ।। वैश्वानरविद्यायां विरारूपवैश्वानरस्य धुलोकसूर्यवाय्वाकाशोदवषिष्यो मूर्धचक्षुःमारणमध्यशरीरमूत्रस्थानपादरूपेण ध्यातव्यांशा निरूपिताः। तेपा- मंशानामपि प्रत्येवं स्वातन्त्र्येणोपासनं विद्यते। उपास्तिशब्दस्य फलकथनस्य च प्रत्येकमुपलभ्यमानत्वात् । तथा हि-"प्रौपमन्यव व स्वमात्मानमुपा.से" इति, 'दिवमेव भगवो राजनिति होवाच" इति प्रश्नोत्तराभ्या धुलोषमात्रो- पास्तिरवगम्यते । तस्मात् "तव सुतं प्रसुतमातुसं कुले दृश्यते" इति सुतादि- शब्दवाच्यानां सोमयागविशेषाणां संपत्ति फलत्वेनावगम्यते । एवमंशान्तरे- दाहर्तव्यम् । सर्वावयवसमष्टप पासनं "तस्य ह वा एतस्याऽऽत्मनो वैश्वानरस्य" इति वाक्य दोपे विस्पष्ट प्रतीयते । तस्माद्व्यस्तोपासनं समस्तोपासनं चोभयं विवक्षितम् । पूर्वपक्ष-मंगोंकी उपासना और फलका भी कथन है, इसलिए व्यस्त और समस्त- की उपासना विवक्षित है। सिदान्त-उपक्रम पोर उपसंहारसे समस्तकी ही उपासना विवक्षित है। ध्यस्तकी उपासना और उसका फल स्तुतिके लिए है, क्योंकि प्रत्येक व्यस्त उपासना को निन्दा की गई है। वैश्वानरविद्या में विराटुप वैश्वानरके घुलोक, सूर्य, वायु, पाकाश, उदक और पृथिवीका पूर्धा, चक्षु, प्राण, पौर मध्यशरीर, मूत्रस्थान, पाद भादि रूपसे ध्यान करनेके योग्य अंश निरूपित किये गये हैं । उन अंशोंमें भी प्रत्येकको स्वतन्त्ररूपसे उपासना विद्यमान है, क्योंकि उपास्तिशब्द मौर फलक्थन प्रत्येक में उपलब्ध होता है। जैसे कि "पोपमन्यव क०' ( उपमन्यु पुत्र । तुम किस मारमाकी उपासना करते हो) इस प्रकार राजा अश्वपतिके प्रश्न करनेपर "दिवमेव भगवो०' (हे पूज्य राजन ! मैं धुलोक्की उपासना करता हूँ' ऐमा उमने उत्तर दिया ) इस प्रकारके प्रश्न और उत्तरसे चुलोक मात्रकी उपासना मवगत होती है। उसो प्रकार 'तस्माव-तव सुत.' ( इसीसे सुम्हारे कुलमें सुत-खण्डित सोम-द्रव्य, प्रसूत और पासुत देखे जाते हैं ) इससे सुत मादि शब्द वाच्य सोमयाग विशेषोंको सम्पत्ति फलरूपसे अवगत होती है। इसी प्रकार पन्योंमे भी उपासना पोर फलका उदाहरण समझना चाहिए। मवियव समष्टि उपासना तो 'तस्य ह वा. ( उस वैश्वानर पारमाका ) इस वाक्य शेषमें विस्पष्ट प्रतीत प्रोत्री है। इस पस्तापातमा मार तमस्तोपासना दोनों विवाक्षित है।
[प्र० ३ पा० ३ मधि० ३३ ] क्यासिकन्यायमाला २२५ इति प्राप्ते ब्रूमः-समस्तोपासनमेव विवक्षितम्, न तु व्यस्तोपासनम् । कुतः। उपक्रमोपसंहाराभ्यामेकवाक्यत्वावगमात् । उपक्रमे तावत् । "को न मात्मा किं ब्रह्म" इति कृत्स्नमेव ब्रह्मोपास्यत्वेन विचारयितुं प्रक्रान्तम् । उप- संहारेऽपि "तस्य ह वै" इत्यादिना समस्तोपासनं विस्पष्टमभिधीयते । तथा च सत्यंशोपास्ति' पृथगभ्युपगम्यमानासु वाक्यभेदः प्रसज्यते । पृथगुपास्तिफलकथनं तु कैमुतिकन्यायेन स्तुत्यै भविष्यति । अथ बहूपास्तिलाभाय वाक्यभेदोऽप्यभ्यु- पगम्यते, तदा प्रत्येकोपास्तिनिन्दावचनानि कथं समर्थयेथाः। निन्यन्ते हि प्रत्येकोपास्तयः । "मूर्धा ते व्यपतिष्यत्" इति शिरोमानोपासनं निद्यते । तस्मा- समस्तोपासनमेव विवक्षितम् ॥ ३२॥ (यस्त्रिंशे शाण्डिल्यादिविद्यानां भिन्नताधिकरणे सूत्रम् ) नाना शब्दादिभेदात् ॥ ५८ ।। त्रयस्त्रिशाधिकरणमारचयति- न भिन्ना उत भिद्यन्ते शाण्डिल्यदहरादयः । समस्तोपासनश्रेष्टपाबौक्यादप्यभिन्नता ॥ ६६ ॥ कृत्स्नोपास्तिरशक्यत्वाद्गुणैब्रह्म पृथक्कृतम् । दहरादीनि भिद्यन्ते पृथवपृथगुपक्रमात् ।। ७० ॥ सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-समस्त उपासना ही पिव- क्षित है, व्यस्त उपासना नही। किससे ? इससे कि उपक्रम और उपसंहारसे एक वाक्य- ता अवगत होती है । उक्रममें तो 'को न प्रात्मा कि ब्रह्म' (हमारा प्रारमा कौन है मौर ब्रह्म क्या है ? ) उपसंहारमे भी 'तस्य ह वै' इत्यादिसे विस्पष्टरूपसे समस्त उपा- सनाका मभिधान है। ऐसा होनेपर यदि ग्रंश उपामनाएं पृथक् स्वीकार की जाये तो वाक्यभेद प्रमत होगा। पृथक् उपासना फल कथन तो कौमुतिकन्यायमे स्तुतिके लिए हो जायगा । यदि अनेक उपासना लाभके लिए वाक्यभेद भी स्वीकार किया जाय तो प्रत्येक उपासनाको निन्दाके लिए प्रयुक्त वचनोका कैसे समर्थन करोगे । प्रत्येक उपासना- की निन्दा की जाती है । 'मूर्घा ते व्यपतिष्यत्' (यदि तुम मेरे पास न पाते तो तुम्हारा मस्तक गिर जाता ) इस प्रकार शिरमात्र उपासनाकी निन्दाकी जाती है । इससे समस्त उपासना ही विवक्षित है ॥ ३२ ।। त्रयस्त्रिश मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-माण्डिल्य दहर मादि उपासनाएं मभिन्न है अथवा भिन्न हैं ? पूर्णपक्ष-समस्तोपासनाके श्रेष्ठ होनेसे मौर ब्रह्मका ऐक्य होनेसे भी वे उपासनाएं पभिन्न हैं।
२२६ भाषानुवादसहिता (म०३ पा० ३ मषि० ३४] छान्दोग्ये शाण्डिल्यविद्यायामधुविद्येत्यादय: पठिताः। तथा शाखान्तरेप्वपि । तत्र पूर्वाधिकरणन्यायेन समस्तोपासनस्य श्रेष्ठत्वाद्वेद्यस्य ब्रह्मण एक्त्वाच सर्वासामेव विद्यात्वम् । इति प्राप्ते घूम:-प्रनन्तासु विद्यास्वेकीकरणेनानुष्टानं तावदसमिति विद्याभेदोऽभ्युपगन्तव्यः । न च वैद्यस्य ब्रह्मण एवं शश्नीयम् । गुणभेदेन भेदोपपत्तेः । न चैकेवस्या विद्याया इयत्ता निश्चेतुमशक्या । प्रत्येकमुपप्रमोपसं- हारयोस्तनिश्वायत्वात् । तस्मात्-विद्यानां नानात्वमिति ॥ ३३ ॥ (चतुस्त्रिरोऽहाविद्याया विकल्पनियमाधिकरणे सूत्रम् ) विकल्पोऽविशिष्टफ्लत्वात् ॥५६॥ चतुस्विशाधिकरणमारचति- ग्रहंग्रहेष्वनियमो विकल्पनियमोऽथवा। नियामकस्पाभावेन याथाकाम्य' प्रतीयताम् ।। ईशसाक्षात्कृतेस्त्वे विद्ययैव प्रसिद्धितः। अन्यानर्थवयविक्षेपो विकल्पस्य नियामको ।। ७२॥ सिद्धान्त-सम्पूर्ण उपासनाएं करनेमें भममर्थ होनेसे और गुणोंसे ब्रह्मका भेद होने से भिन्न भिन्न उपक्रम होनेसे दहर पादि उपासनाएं मिन भिन्न हैं। छान्दोग्यमे शाण्डिल्यविद्यामे मधुविद्या प्रादि पठिन हैं. इसी प्रकार अन्य शाखापोंमें भी। यहापर पूर्वाधिकरण न्याय से समस्तोगसनाके ष्ठ होनेसे वेद्य ब्रह्मके एक होनेसे सबमे एक विद्यात्व है अर्थात् सब विद्याएं अभिन्न हैं । सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-मनन्त विद्याभोका एकी- करणकर अनुष्ठान करना मर्वया मशक्य है, इसलिए विद्याका भेद ही मानना चाहिए। वेद्य ब्रह्मके एकत्वको शङ्का नही करनी चाहिए, क्योंकि गुणभेदसे भेद हो सकता है, पौर एक-एक विद्याकी इयत्ता-परिमाणका निश्चय नहीं किया जा सकता, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योकि प्रत्येकका उपक्रम भौर उपसंहार ही उस इयत्ताका निश्चायक है। इससे विद्याएं नाना-अनेक हैं ।। ३३ ।। चतुर्विंश अधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-प्रहग्रह उपासनामें अनियम है अर्थात् यथेष्ट उपासना है अथवा नियमसे विकल्प है? पूर्वपक्ष-नियामकके न होनेसे महग्रहोपासनामें अनियम है अर्थात् यथेष्ट प्रतीत होती है। सिद्धान्त-एक विद्यासे ही ईश्वरका साक्षात्कार होता है, यह प्रसिद्ध है, प्रतः म० ३ पा० ३ अघि० ३४ ] वैयासिकन्यायमाला २२७ द्विविधान्युपासनानि-प्रहंग्रहाणि प्रतीकानि चेति । आत्मनः सगुणत्वो- पासनेष्वहंग्रहस्य चतुर्थाध्याये वक्ष्यमाणत्वात्तान्यहंग्रहाणि । अनात्मवस्तुनि देव- तादृष्टपा संस्कृत्योपास्यमानानि प्रतीकानि । तत्राहंग्रहेषु शाण्डिल्यविद्याधु- पासनेषु, एवं द्वे बहूनि चौपासनानि याथाकाम्येनानुष्ठेयानि । विकल्पस्य नियामकाभावात् । न हि शाण्डिल्योपासनं दहरोपासनमन्यद्वा, एकमेवानुष्ठेयं नेतरदिति विकल्पनियमे विचित्वारणमस्ति। तस्मात्--यायाकाम्यम् । इति प्राप्ते बम:-प्रन्यानर्थक्यं तावदेवं नियामकम् । तथा हि-ईश्वर- साक्षात्कार उपासनस्य प्रयोजनम् । तच्चैकेनैवोपासनेन सिध्यति । तत्रान्यो- पासनवैपथ्यंम् । किंचोपासनेषु न प्रमाणजन्य साक्षात्कारः। कि तहि निरन्तर- भावनया ध्येयतादात्म्याभिमानः । स चाभिमान एकमुपासनमनुष्ठाय तत्परित्य- ज्यान्यत्र प्रवर्तमानस्य पुरुषस्य चित्तविक्षेपात्कथं नाम दृढीभवेत् । तस्मादानर्थ- क्यविक्षेपयोनियामकत्वाद्विकल्पो नियम्यते ॥ ३४ ॥ (पञ्चात्रिशे लौकिकप्रतीकेषु यायाकाम्याधिकरणे सूत्रम् ) काम्यास्तु यथाकामं समुच्चीयेरन्न वा पूर्वहेत्वभावात् ।।६०॥ अन्य उपासनाकी निरर्थकता और विक्षेप ये दोनो विकल्पके नियामक हैं, इसलिए महग्रह उपासनानोमें विकल्प है, यथाकाम अनुष्ठान नहीं है । उपसनाए दो प्रकारकी हैं, एक महग्रह और दूसरी प्रतीक । प्रात्माकी सगुण उपा- सनाभोंमे महंग्रह पतुर्थाध्यायमे जो वक्ष्यमाण है, अतः वे प्रहंग्रह उपासनाएं हैं । प्रनारम वस्तुमें देवतादृष्टिसे संस्कार द्वारा जो उपास्यमान हैं, वे प्रतीक हैं । उसमे शाण्डिल्यविद्या मादि महंग्रह उपासनाप्रोमे एक, दो अथवा अनेक उपासनाएं इच्छानुसार मनुष्ठेय हैं, क्योकि विकल्पका नियामक नही है । शाण्डिल्य उपासना, दहर उपासना मथवा अन्य उपासना इनमेमे एक ही उपासना करनी चाहिए मन्य नही, इस प्रकारके विकल्पनियममें कोई कारण नहीं है । इससे इच्छानुसार प्रनियम ही प्राप्त है । सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-प्रन्यका मानर्धक्य ही विकल्पमें एक नियामक है । जैसे कि ईश्वरका साक्षात्कार ही उपासनाका प्रयोजन है। वह तो एक ही उपासनासे सिद्ध होता है, तब ऐसी परिस्थितिमें भन्य उपासना व्यर्थ है। किञ्च-उपासनानोमे प्रमाणजन्य साक्षात्कार नहीं होता, किन्तु निरन्तर भावना करनेसे ध्येयवस्तुमे तादात्म्याभिमान होता है । वह अभिमान यदि एक उपासनाके अनुष्ठान करते उसका परित्याग करे और अन्य उपामनामे प्रवृत्त हो तो पुरुषके चित्त- विक्षेप होनेसे दृढ़ कैसे होगा ? इससे मानर्थक्य और विपरूप नियामक होनेसे विकल्प नियमित है ॥ ३४॥ .
२३०
भाषानुवादसहिता [म०३ पा०४ प्रषि० १]
इति प्राप्ते घूम:-"ग्रहं वा गृहीत्वा चमसं वोमीय स्तोत्रमुपाकुर्यात्स्तुतम-
नुशंसति" इत्यादी यथा ग्रहस्तोत्रशंसनादीनां नियतः पौर्वापर्येण सहभाव:
श्रुतो न तथोपासनेषु श्रूयते । तस्माद्विकल्पसमुच्चययोर्यायाकाम्यम् ॥ ३ ॥
इति श्रीभारतीतीर्थमुनि प्रणीतायां यासिन्यायमालायां
तृतीयाध्यापस्य तृतीय पाद: ।।३।।
अन पादे
३६
मादितः
१३७
अधिकरणानि
सूत्राणि
अथ तृतीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः
[प्रत्र निर्गुणविद्याया अन्तरङ्गबहिरङ्गसाधनविचारः]
(इम पादमें निर्गुण विद्याकै अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग साधनोंका विचार है )
(प्रथमे पुरुषार्थाधिकरण पात्मज्ञानस्य स्वतन्त्रताधिकरणे सूत्राणि )
पुरुषार्थोऽता शब्दादिति बादरायणः ॥ १॥ शेषत्वात्पुरु-
पार्थवादो यथाऽन्येष्विति जैमिनिः ॥२॥ आचार-
दर्शनात ॥३॥ तच्छ तेः॥४॥ समन्वारम्भणात ॥५॥
तद्वतो विधानात् ॥ ६॥ नियमाच ॥७॥ अधिकोप-
देशात्तु बादरायणस्यैवं तद्दर्शनात् ।। ८॥ तुल्यं तु दर्शनम्
16 असार्वत्रिकी ॥१०॥ विभागः शतवत ।। ११ ॥
सिद्धान्तो-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-'ग्रहं गृहीत्वा' ( यज्ञपात्र-
का ग्रहणकर अथवा चमसपात्रका उन्नयनकर स्तोत्रका प्रारम्भ करे तथा स्तुतका शसन
करे ) इत्यादिमें जैसे प्रह, स्तोत्र, शंसन आदिका नियमसे पौर्वापर्यरूपसे सहभाव ऋत
है, वैसे उपासनानोमे नही सुना जाता। इसलिए विकल्प अथवा समुच्चय इच्छानु-
सार है॥ ३६ ॥
इति श्रीभारतीतीर्थमुनि-प्रणीत वैधासिकन्यायमालाके तृतीयाध्यायके तृतीय-
पादका 'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती' कुन भाषानुवाद ॥३॥
[अ०३ पा० ४ अधि० १] वैयासिकन्यायमाला २३१ अध्ययनमात्रवतः ॥१२॥ नाविशेषात् ॥ १३ ॥ स्तुतयेऽ- नुमतिर्वा ॥ १४ ॥ कामकारेण चैके ॥१५॥ उपमर्दै छ ॥१६॥ ऊर्ध्वरेतःसु च शब्दे हि॥१७॥ तृतीयाध्यायस्य चतुथंपादे प्रथमाधिकरणमारचयति- कत्वर्थमात्मविज्ञानं स्वतन्त्रं वात्मनो यतः। देहातिरेकमज्ञात्वा कुर्यात्क्रतुगं ततः॥१॥ नाद्वेतघीः कर्महेतुर्हन्ति प्रत्युत कर्म सा। प्राचारो लोकसंग्राही स्वतन्त्रा ब्रह्मधीस्ततः ॥२॥ प्रात्मनो देहादिव्यतिरेकज्ञानमन्तरेण परलोकगामित्वानिश्चयाज्ज्योतिष्टो- मादिप्रवृत्तिरेव न स्यादिति ऋतुषु प्रवतंकवत्त्वेनोपनिषदमात्मतत्त्वज्ञानं न कर्माजम् । इति प्राप्ते म:-द्विविधं देहव्यतिरिक्तात्मज्ञानम्-परलोकगामिकात्म- विज्ञानमेकम्, द्वितीयं ब्रह्मात्मतत्त्वज्ञानं चेति । तत्र कात्मज्ञानस्य प्रवर्तकत्वेऽपि नाद्वैतब्रह्मतत्त्वज्ञान प्रवर्तकम् । प्रत्युत क्रियाकारकफलनिषेधेन निवर्तकमेव । ननु तत्वविदामपि जनकादीना कर्मप्रवृत्तिलक्षण प्राचारो दृश्यते । बाढम् । तृतीय अध्यायके चतुर्थ पादमें प्रथम अधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह -प्रात्मज्ञान क्रत्वर्थ है अथवा स्वतन्त्र है ? पूर्वपक्षा-देहसे अतिरिक्त पात्मा है, ऐसा ज्ञान प्राप्त किये विना ऋतुमें किमी पुरुपको प्रवृत्ति नहीं होती, इससे प्रात्मज्ञान क्रतुका प्रङ्ग है। सिद्धान्त-अद्वैत पात्मज्ञान कर्मका हेतु नहीं है, प्रत्युत वह कर्मका नाश करता है, जनक प्रभृति तत्त्वज्ञानियोका प्राचार लोक संग्रह के लिए है। इससे प्रात्मतत्त्व- शान स्वतन्त्र पुरुषार्थका साधन है, ऋतुका अङ्ग नहीं है । 'मात्मा देहसे अतिरिक्त है' इस प्रकार ज्ञानके विना परलोकगामित्वका निश्चय न होनेसे ज्योतिष्टोम प्रादिमे प्रवृत्ति नहीं होगी, इमलिए ऋतुप्रोमे प्रवर्तक होनेके कारण मोपनिषद् प्रात्मतत्त्वज्ञान कर्मका मङ्ग है। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं- देहसे व्यतिरिक्त प्रात्मतत्त्व- ज्ञान दो प्रकारका है । एक परलोकगामी कर्तृरूप प्रात्मविज्ञान और दूसरा ब्रह्मारमतत्त्व. शान । उन दोनोमे प्रथम कर्तृरूप प्रात्मज्ञान भले प्रवर्तक हो तो भी अद्वैत ब्रह्मतत्त्वज्ञान प्रवर्तक नही है । प्रत्युत क्रिया, कारक और फलके निषेवसे कर्मका निर्वतक ही है । यदि कहो कि तत्त्वविद् जनक मादिमे भी कर्म प्रवृत्तिरूप प्राचार देखा जाता है। ठीक है, २३२ भापानुवादसहिता [4०३ पा० ४ अधि०२] लोकसंग्रहार्थमयमाचार: स्यात् । यदि तत्वविदामपि मुक्तये कर्माण्यनुप्ठेयानि स्यु, पथं तहि प्रजादिवैयथ्यं तिरुपपद्यते । "कि प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्माऽयं लोक.' इति । पारमतत्त्वस्वरूपस्य लोकस्यापरोक्षरवे सत्यना- रमलोकसाधनभूताया. प्रजाया येयथ्यं धूयते । एवं विमर्षा वयमध्येष्यामहे, किमी वयं यक्ष्यामहे' इत्यादाहरणीयम् । तस्मादात्मतत्त्वज्ञानं स्वतन्त्रं पुरुषार्थसाधनम्, न तु कर्मानम् ॥ १॥ (द्वितीये परामर्शाधिकरणे सन्यामिन एव ब्रह्मनिष्ठताधिकरणे सूत्राणि) परामर्श जैमिनिरचोदना चापवदति हि ॥ १८ ॥ अनुष्ठेयं बादरायणः साम्यश्रुतेः ॥१९॥ विधिर्वा धारणवत् ॥२०॥ द्वितीयाधिकरणस्य प्रथमवर्णनमारचयति- नास्त्यूवरेताः किंवाऽस्ति नास्त्यसावविधानतः । वीरघातो विधे. वलुप्तावन्यपड़ावादिगा स्मृतिः ॥ ३ ॥ अस्यपूर्व विधेः क्लुप्तेर्वीरहाऽनग्निको गृही। अन्धादेः पृथगुक्तत्वात्स्वस्थाना श्रूयते विधि. ॥ ४॥ पूर्वाधिकरणे-स्वतन्त्रमात्मविज्ञान मित्युक्तम् । चाऽऽमविज्ञान- उनका यह प्राचार लोकर्मप्रहके लिए है। यदि तत्त्वज्ञानियोको भी मुक्तिके लिए धर्म अनुष्ठेय होगे तो प्रजा मादि वैयर्थ श्रुति कैसे उपपन होगी, कि प्रजया करिष्यामो०' (हम इस प्रजासे क्या करेंगे प्रर्यात् इनसे क्या प्रयोजन है, जिन हमको यह प्रात्मलोक अभीष्ट है । ) इससे आत्मतत्वस्वरूप लोकके अपरोक्ष होनेपर अनारमरूप लोकसाधन भूत प्रजाका वैयऱ्या मुना जाता है । इस प्रकार 'किमर्था०' ( हम किसलिए मध्यन करें, किसलिए यज्ञ करें ) इत्यादि ऋतिया उदाहरणीय हैं, इसलिए मात्मतत्त्वज्ञान स्वतन्त्र ही पुरुषार्थका साधन है फर्मका अङ्ग नहीं है ॥१॥ द्वितीय अधिकरणके प्रथम वर्णककी रचना करते हैं- सन्देह--ऊर्ध्वरेता मन्यामाश्रम है अथवा नही है ? पूर्वपक्ष-नही है, क्योकि उमके लिए विधि वाक्य नही है, और वोरहा' इत्यादि श्रुतिसे गृहस्थाश्रम मात्रका विधान है, स्मृति मादिमें कहींपर मन्यासाश्रमका जो श्रवण है वह मध, पङ्गु, मादि व्यक्तियोके लिए है। मिदान-प्रद विधि हानेसे सन्यासाश्रम निश्चित है मार 'वोरहा' इत्यादि वाक्य अग्निरहित गृहस्थक लिए है। अन्ध, पड़ गु, मादिका पृथक् कथन है, स्वस्थ पुरुषोके लिए सन्यासाश्रमकी विधि श्रुति है। पूर्व अधिकरणमें प्रात्मज्ञान स्वतन्त्र है, ऐमा कहा गया है। वह मात्मज्ञान ऊर्म- तस्य - [अ०३ पा० ४ अधि०२] वैयासिन्यायमाला स्योर्ध्वरेतःस्वाश्रमेषु सुलभत्वादाश्रमसद्भावश्चिन्त्यते। तत्र नास्त्युर्ध्वरेताः, इति प्राप्तम् । कुन:। विध्यभावात् । छान्दोग्ये-'यो धर्मस्कन्धाः । यज्ञोऽध्ययन दानमिति प्रथमः । तप एव द्वितीया । ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयः' इत्यत्र यज्ञाद्युपलक्षितगार्हस्थ्यस्य, तपः शब्दलक्षितवानप्रस्थत्वस्य, नैष्ठिकब्रह्मचर्यस्य परामर्शमात्र गम्यते, न तु विधिरुपलभ्यते । न चापूर्वार्थत्वेन विधिः कल्पयितुं राक्या। 'वीरहा वा एष देवाना योऽग्निमुद्वासयते' इत्यग्न्युद्वासनलक्षितस्य गार्हस्थ्यपरित्यागस्य निन्दितत्वात्। "चत्वार आश्रमा" इति स्मृतिस्तु ग हस्थ्यधर्मानधिकृतान्धपड्यादिविषया भविष्यति । न ह्यन्धस्याऽऽज्यावेक्ष- पोपते कर्मण्यधिकारोऽस्ति । नापि पड्गोविष्णुक्रमाद्युपेते कर्मण्यधिकारः । तस्मात्-चक्षुरादिपाटवयुक्तस्याऽऽत्मज्ञानोपयुक्त ऊर्ध्वरेता आश्रमो नास्ति । इति प्राप्ते ब्रूमः-प्रस्त्यूवरेता आश्रमः । विध्यश्रवणेऽप्यपूर्वार्थत्वेन विधे कल्पयितुं शक्यत्वात् न च वीरघातदोषः। उत्सन्नाग्निगृहस्थविषयत्वाद्वीरह- त्यायाः। यत्त्वन्धादिविषयत्त्वं स्मतेरुक्तम् । तदसत् । “अथ पुनरव्रती व्रती वा, स्नातकोऽस्नातको वा,' उत्सन्नाग्निरनग्निको वा, यदहरेव विरजेतदहरेव रेता माथमोमें सुलभ है, प्रतः पाश्रमके सद्भावका विचार किया जाता है। यहां पूर्वपक्षी कहता है कि ऊर्ध्वरेता पाश्रम नहीं है, ऐमा प्राप्त होता है । किससे? इससे कि विधि नहीं है। छान्दोग्यमे 'त्रयो धर्मस्कन्धा' 'यज्ञ, अध्ययन और दान यह प्रथम, तप एव द्वितीय, ब्रह्मचारी और प्राचार्यकुलवामी यह तृतीय' इमसे यहा यज्ञ प्रादिसे उपलक्षित गृहस्थाश्रम, तपः शब्दसे लक्षित वानप्रस्थ, नैष्ठिक ब्रह्मचार्यका परामर्शमात्र ज्ञात होता है, किन्तु उनको विधि उपलब्ध नहीं होती। अपूर्वार्थ होनेसे विधिको भी कल्पना नही की जा सकती है, क्योकि 'वीरहा या एप० (अग्निका उद्वासन [धुझाना] करता है वह देवोका वीरहा-पुत्रघाती होता है ) इस प्रकार अग्नि उद्वासनसे लक्षित गृहस्थाश्रमके परित्यागको निन्दा है। 'चत्वार मात्रमाः' (चार आश्रम हैं ) यह स्मृति गृहस्थधर्ममें अनधिकृत अन्ध, पगु आदि विषयक होगी, क्योंकि अन्धको प्राज्यावेक्षणयुक्त कर्ममें अधिकार नहीं है । पङ्गुको भी विष्णु क्रमसे युक्त पर्म में अधिकार नहीं है। इससे चक्षु आदि मामर्थ्य युक्त के लिए पात्मज्ञानके उपयोगी ऊर्वरेता पाश्रम नहीं है । सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-ऊर्ध्वरेता पाश्रम है, यद्यपि विधिका श्रवण नहीं है तो भी अपूर्वार्थरूपसे विधिको कल्पना की जा सकती है । वोर- घात दोप भी नहीं है, क्योकि वीरघात दोष उत्पन्नाग्नि गृहस्थाश्रम विषय है । स्मृतिको जो भन्ध मादि विषयक कहा गया है, वह ठीक नहीं है, क्योकि अथ पुनरवती १. उत्सनाग्निर्मायर्यामरणेन नष्टाग्निः । माग्नि पूर्वमेवाग्निपरिग्रहरहित।
२३४ भाषानुवादरहिता [म०३ पा० ४ अपि०२] प्रव्रजेत्" इति गार्हस्थ्यानाधिकृतानां पृषसंन्यासविधानात् । न च चक्षुरादि- पाटवक्तामाश्रमान्तरविधिः कल्पनीप: 1 जावालश्रुती प्रत्यक्षविध्युपलम्मात् । 'ब्रह्मचर्य समाप्य गृही भवेत्, गृहाहनी भूत्वा प्रयजेत्" इति तस्मादस्त्यात्र- मान्तरम् । द्वितीयवर्णकमारवपति- लोककाम्याश्रमी ब्रह्मनिष्ठामहति वा न वा। यथावकाशं प्रौष ज्ञातुमहंत्यवारणात् ॥५॥ अनन्यचित्तता ब्रह्मनिष्ठाऽसौ कर्मठे कथम् । कर्मत्यागो ततो ब्रह्मनिष्ठामहति नेतः ॥६॥ 'यो धर्मस्कन्धाः' इत्यत्राप्रमानधिकृत्य 'सर्व एत पुण्यलोका भवन्ति' इत्याश्रमानुष्ठायिनां पुण्यलोकमभिधाय 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' इति मोक्षसाध- स्वेन ब्रह्मनिष्ठा प्रतिपाद्यते । सेयं ब्रह्मनिष्ठा पुण्यलोककामिन पाश्रमिणोऽपि प्रती वा० (ती अथवा मवती, स्नातक वा पस्नातक, उत्सनाग्नि नष्ट हुई मग्निवाला वा मग्निरहित हो' "जिस दिन वैराग्य हो उसी दिन ही संन्यास ग्रहण करें) इस प्रकार एहस्थाश्रममें अनधिकृतोके लिए पृथक संन्यासाश्रमका विधान है। चक्षु मादि सामर्थ्य युक्त व्यक्तियोके लिए गृहस्थाश्रमकी विधि कल्पनीय नहीं है। कारण कि जाबाल श्रुतिमें संन्यामाश्रमको प्रत्यक्ष विधिका उपलम्भ होता है, 'ब्रह्मचर्य समाप्य' (ब्रह्मचर्याश्रम समाप्तकर गृहस्थ हो, गृहस्थसे वानप्रस्थ होकर संन्यासाश्रम ग्रहण करे ) इमसे ऊर्ध्वरेता माश्रम है ॥२॥ द्वितीय वर्णककी रचना करते हैं- सन्देह-पुण्य लोककी अभिलाषा करनेवाला प्राश्रमी ब्रह्मनिष्ठा प्राप्त कर सकता मथवा नही। पूर्वपक्ष-मवकाशके अनुसार यह ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सकता है, क्योकि उसका निदेव नही किया गया है। सिद्धान्त-मनन्यचित्ततारूप ब्रह्मनिष्ठा कर्मठमे कैसे हो सकती है ? प्रतः कर्म त्यागी ही ब्रह्मनिष्ठाको प्राप्त कर सकता है मन्य नहीं। 'त्रयो धर्मस्कन्याः यहाँपर भाश्रमोका अधिकार कर 'सर्व एते.' (ये सब पुण्य लोकको प्राप्त करनेवाले होते हैं ) इस प्रकार माघमोका अनुष्ठान करनेवालोके लिए पुष्पलोकोका अभिधान कर 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' (ब्रह्मसंस्थ अमृतत्वको प्राप्त होता है ) इमसे मोक्षके माधनरूपसे ब्रह्मनिष्ठाका प्रतिपादन किया जाता है। यह ब्रह्मनिष्ठा पुण्यलोकगामी प्राथमियोको भी हो सकती है । क्योकि वे भी माश्रम कर्मका मनुष्ठान कर अमिणो ब्रह्मनिष्ठा । - [म० ३ पा० ४ अधि० ३] यासिकन्यायमाला २३५ संभाव्यते । प्राधमकर्माण्यनुष्ठाय यथावकाश ब्रह्मनिष्ठायाः सुकरत्वात् । नहि 'लोककामी ब्रह्म न जानीयात्' इति निषेधोऽस्ति । तस्मादस्ति सर्वस्याऽऽ- इति प्राप्ते ब्रूमः-ब्रह्मनिष्ठा नाम सर्वव्यापारपरित्यागेनानन्यचित्ततया ब्रह्मरिण समाप्तिः । न चासो कमगरे संभवति । कर्मानुष्ठानत्यागयोः परस्परं विरोधात् । तस्मात्कर्मत्यागिन एव ब्रह्मनिष्ठा। (तृतीये रमतमत्वादीनां ध्येयत्वाधिकरणे सूत्रे) स्तुतिमात्रमुपादानादिति चेन्नापूर्वत्वात् ॥२१॥ भावशब्दाच ॥२२॥ तृतीयाधिकरणमारचयति- स्तोत्रं रसतमत्वादि ध्येयं वा गुणवर्णनात् । जुहूरादित्य इत्यादाविव कर्माद्नसंस्तुतिः ॥ ७॥ भिन्नप्रकरणस्थत्वान्नाङ्गविध्येकवाक्यता उपासीतेतिविध्युक्तेध्येयं रसतमादिकम् ॥८॥ उद्गीथावयवस्योंकारस्य रसतमत्वादयो गुणाः श्रूयन्ते-'स एष रसानां भवकाशके अनुसार सुलभतासे ब्रह्मनिष्ठा प्राप्त कर सकते हैं । और 'लोकका अभि- लापी ब्रह्मको न जाने' ऐसा कहीं निषेध भी नहीं है। इससे सब प्राथमियोके लिए ब्रह्मनिष्ठा है। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-सब व्यापारोके परित्यागसे मनन्यचित्तसे ब्रह्ममें पर्यवसान होना ब्रह्मनिष्ठा है। वह कर्मशूरमे नहीं हो सकती, क्योकि कर्मानुष्ठान और कर्मत्यागका परस्पर विरोध है। इससे कर्मत्यागीके लिए ही ब्रह्मनिष्ठा है ॥ २॥ तृतीय अधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-उद्गीथावयव मोंकारमे कथित रसतमत्व प्रादि गुण स्तुतिके लिए हैं भयवा ध्यानके लिए? पूर्वपक्ष-जैसे 'इयमेव जुहूरादित्यः' (यह पृथ्वी ही जुहू है और प्रादित्य चयनस्थ कूर्म है ) इस प्रकार प्रादित्यरूपसे कर्माङ्ग जुहूकी स्तुति की जाती है, वैसे ही गुणोका वर्णन होनेसे केवल उद्गीथावयव ऊकारकी स्तुति है । सिद्धान्त-अन्य प्रकरणस्य होनेसे मङ्ग विषिके साथ एकवाक्यता नहीं है भोर 'उपामोत' इस प्रकार विधिका कथन होनेसे रसतमत्व आदि गुण ध्यानके लिए हैं। उद्गीथावयव भोकारके 'स एप०' ( यह जो उद्गोच संज्ञक प्रकार है वह सम्पूर्ण २३६ भाषानुवादरहिता [८०३ पा०४मधि०४) - ररातम. परमः' इत्यादिना । सगरमयादिसमोपारस्प स्तुति., न यातः भ्यम् । यया 'इयमेव जुरादिश्यः पूर्मः सोंपादो कर्माप्रभूताना 'जुनादीनामादिरयादिरूपेण स्तुतिः, सपा रगतमत्वादिगुणेरोंगारस्य रतिः । इति प्राने यूम:-पिमो सान्तः । जुहगरियः' इत्यादिक विधि- प्रकरणे पटिनस्वास्तोत्रम। रगतमरवादि भूपनिदि पडितरवेन वामप्रकरणपटिनोदगोपविधियारपेने कवायरवानापान सावपम्। किंतु "पोमि: स्येतददारमुद्गीथमुपागोत" इति मंनिहितन विधिनकायस्वादसतमत्यादि ध्यातव्यम् ॥३॥ (चतुर्प पायानस्य विधास्तुपर्धताधिकरणे गने) पारिप्लयाषां इति पेन विरोपिगत्यात् ।। २३ ॥ तथा पैकवाक्यतोपपन्यात् ।। २४॥ चतुर्याधिकरणमारचपति- पारिप्नवापमास्यानं किया विचास्तुतिस्तुतेः । ज्यापोऽनुछानशेपत्वं तेन पारिप्तवार्यता Hn भूतादि रमोमें उगष्ट रगतम है ) स्यादिंग रमतमाय पारि गुण सुने पाते हैं। ये रगतमन्त्र पादि गुण भोगगरी स्तुति के लिए है, म्यान के लिए नहीं है। से-'रमेर जनरादित्यः' (मह पृथ्वी र है, मादिग्य घयनस्य पूर्म-गरोग है पौर स्वर्गलोक पाहवनीय पग्नि है ) यास्मेिं पके पक्ष भूत पू मादिको मारियापिसे सुति है। वैसे रसमय मादि गुणोंद्वारा मोकारको स्तुति है। सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम पहने हैं-यह विषम दृष्टान्त है, 'T:- रादित्यः' इत्यादि जुह विधि प्रकरणमें पठित होनेरो स्तुति है और रसमल मादितो उपनिषदमें पठिन हानेसे कर्म प्रारण पठित उदगीय विधि पात्र गाप एकवाक्यता न होनेमे सावक नहीं है । किन्तु 'मोमिनदार. ( इस पार उद्गीयको उपासना करे) इस सनिहित विपिरो एकापता होनेसे रगतमत्व मादि गुणोरा प्यान करना पाहिर ॥३॥ धतुर्य प्राधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-माख्यान पारिप्लवके लिए है अथवा विद्यास्तुति के लिए? १. भाथ्याना तु "इयमेव पृथियो जुद्रः, प्रादित्यः कूर्मः, सौक माहवनीयः' इति पठितम् ।
म०३ पा० ४ मधि० ४] वैयासिकन्यायमाला
मनुवैवस्वतो राजेत्येवं तत्र विशेषरणात् ।
पत्र विद्युकवाक्यत्वभावाद्विद्यास्तुतिभवेत् ।।१०।।
"अथ ह याज्ञवल्क्यस्य द्वे भार्ये बभूवतुः" "जनको ह वैदेह प्रासांचके"
इत्यादिकमुपनिषदि धूयमाणमाख्यानं पारिप्लवायं भवितुमर्हति । अश्वमेधयागे
रात्रिषु राजानं सकुटुम्बमुपवेश्य तस्याग्रे वैदिवान्युपाख्यानान्यध्वयुणा वक्त-
व्यानि । तदिदं पारिप्लवाख्यं कर्म "पारिप्लवमाचक्षीत" इति वाक्येन विहि-
तम् । तदर्थत्वे सत्योपनिषदाख्यानान्यनुष्ठानायोपयुज्येरन् । ज्यायोऽनुष्ठानं विद्या.
स्तुतेः । तस्मात्पारिप्लवार्थम् ।
इति प्राप्ते ब्रूमः-प्रथमेऽहनि 'मनुवैवस्वतो राजा' 'द्वितीयेऽहनि 'यमो वैव-
स्वतो राजा' इत्याद्याख्यानाना पारिप्लवार्थाना विशेषितत्वादोपनिषदानामा-
ख्यानानां तच्छेषत्वं न संभवति । संनिहितविद्यास्तावकत्वे तु विद्यावाक्यैरेक-
वाक्यता लक्ष्यते । तस्मात्-विद्यस्तावकमाख्यानम् ॥४॥
(पञ्चम मात्मज्ञानस्य कर्मानपेक्षत्वाधिकरणे सूत्रम् )
अत एव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा ॥ २५ ॥
पूर्वपक्ष-विद्यास्तुतिकी अपेक्षा कर्मानुष्ठानका पङ्ग मानना श्रेष्ठ है, इससे ये
पाख्यान पारिप्लवार्थक हैं।
सिद्धान्त-उस माख्यानमे 'मनुवैवस्वतो राजा' इस प्रकार विशेषण होनेसे मोर
यहा विद्याके साथ एकवाक्यता होनेसे विद्याकी स्तुति है।
'अथ ह याज्ञवल्क्यस्य भायें बभूवतु.' (याज्ञवल्क्यकी दो भायाएं थो) 'जनको ह.'
(जनक वैदेह थे ) इत्यादि उपनिषद्में प्रयमाण पाख्यान पारिप्लवार्थ होने चाहिए,
प्रश्वमेध यागमें राजाको कुटम्ब सहित बैठाकर रातमे उसके सामने प्रध्वयुद्वारा वैदिक
उपास्यान कहने चाहिए। यह पारिप्लव नामक कर्म 'पारिप्लवमाचक्षीत' (पारिप्लवको
कहे ) इस वाक्यसे विहित है। एतदर्थक होनेपर प्रोपनिषद् प्राख्यान अनुष्ठानके लिए
उपयुक्त होंगे। विद्यास्तुविकी अपेक्षा मनुष्ठान श्रेष्ठ भी है, इसमे पाख्यान पारिप्ल-
वार्य हैं।
सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते है-पारिप्लवार्थ जो पाख्यान
है, उनमें प्रथम दिनमें 'मनुवैवस्वतो राजा' (विवस्वानका पुत्र मनु राजा ) दूसरे दिन
'यमोवैवस्वतो.' (विवस्वानका पुत्र राजा यम ) इत्यादि पारिप्लवार्थ पाख्यानोको
विशेषित किया गया है । इससे भोपनिषद् भाख्यान पारिप्लवार्थ नहीं हो सकते । सनि-
हित विधास्तावक होनेपर तो विद्यावाक्यो के साथ एकवाक्यता लक्षित होती है। इससे
पाख्यान विद्यास्तावक हैं ॥४॥
- । . २१८ भाषानुवाददता [५०३ पा० ४ अपि पशमापिारणमारगपति- पारमयोप. पले बक्षिी मो या, हाते। पदिनोप्यपेसायाप्रपाजादिपु स्नात् ॥ ११॥ प्रविधातमगोप्यस्तो हि मानदयो। मेरपेक्ष्यं सोमवार विद्या पनिपेशिणी ॥ १२ ॥ "विमतो ब्रह्मतत्याययोध. स्वपनप्रदाने स्वाभूलकसि., परिवार प्रयाजापदादांपूर्णमागवए । यद्यपि प्रपमाधिको विवापाःस्थापपुरणापक्ष प्रतिरादनेन वर्मादरव' नियारितम्, तपाऽप्यतिर म निवारितम् । प्रतो नामिदो हेतु।। मतः पर्मानापेको योष । इति प्राप्ते यूम-विमतं ग्रहातानं स्यविगेपिनिवर निवर्तनेन्यापे न भवति, प्रकाशमात्, दोपवा, पटगानाच । यत्त्वग्नित्यमुत्तम् । तत्र मर्मणः रोशमनवमभिप्रेतम्-विप्रपाजादिवरतोपवायं त्वम्, उतावपातादिवास्य. रूपोपकार्य प्रत्वम् । नाऽद्यः । मुस्ते वर्मजन्यत्वेनानिस्पत्यप्रसपतेः। द्वितीये पंचम पिकरणको रचनाते है- सन्देह -पारमजान परने पल-मोगकर्मी अपेक्षा राषषा नहीं? पूर्वपदा--कर्मी पपा रना है, पोषिलोको मोंगी पपैगा रहती है। अपार माहिमें ऐमा देखा पाता है। सिद्धान्त-प्रविण पौर उमरे नाम ज्ञान और दीवानरपेक्ष्य-स्वावल्य देता जान है, पर यहाँ भी। मोगली फलमे भी विचा की प्रथा नहीं रखती। 'विमत ब्रह्मतत्त्वज्ञान पपने पस प्रशानमें पपने मनभून पर्मी मपेक्षा करता है, पड़ी होने से, प्रयाग मापेदा द-यूईपास पादिके ममान ।' यद्यपि अपमाधिकरणमें विधाके स्वतत्र पुरुषार्थव प्रतिपादन गर्मागत निवारण किया गया है, तपापि पङ्गित्वका निवारण नहीं रिया गया है । मत ममिद हेतु नहीं है। इससे मारमशान कर्माङ्गकी अपेक्षा रखता है। सिदान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते है--विमत ब्रह्मान अपने विरोधी पदार्थक निवर्तनमें अन्यको अपेक्षा नहीं करता, प्रकाश स्वरूप होनेसे, दीपके समान अथवा घटगानके समान'। जो पङ्गिव कहा गया है उसपर वह प्रष्टव्य है- कर्ममें कैसा मङ्गव मभिप्रेत है। क्या प्रपान मादिक समान फलोपकारी पङ्गत है प्रथवा प्रवधात मादिके समान स्वरूपोपकारी मङ्गल ! प्रथम तो युक्त नहीं, क्योकि मुक्तिको कर्म जन्यत्व होनेसे भनित्यत्वाप्रसक्त होगा। द्वितीय पक्षमें-साध्य पून्य दृधान्त । म०३ पा० ४ अधि०६] वैयासिकन्यायमाला २३६ साध्यविकलो दृष्टान्तः । अवघातादी प्रयाजादीनां स्वरूपोपकार्यत्वाभावात् । तस्मात्-उत्पन्ना विद्य स्वफलदाने कर्माणि नापेक्षते ॥५॥ (पळे जानोसत्तौ यज्ञशमदमाद्यपेक्षाधिकरणे सूत्रे) सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत् ॥ २६॥ शमदमाद्युपेतः स्यात्तथाऽपि तु तद्विधेस्तदङ्गतया तेपामवश्यानुप्ठेयत्वात् ॥२७॥ पष्ठाधिकरणमारचयति- उत्पत्तावनपेक्षेयमुत कर्माण्यपेक्षते । फले यथाऽनपेक्षैवमुत्पत्तावनपेक्षता ।। १३ ।। यज्ञशान्त्यादिसापेक्षं विद्याजन्म श्रुतिद्वयात् । हलेऽनपेक्षितोऽप्यश्वो रथे यद्वदपेक्ष्यते ॥ १४ ॥ ब्रह्मविद्या स्वफले यथा कर्माणि नापेक्षते, तथा स्वोत्पत्तावपि । अन्यथा क्वचिदपेक्षते क्वचिन्नापेक्षत इत्यर्धजरतीयन्याय प्रसज्येत । इति प्राप्ते ब्रूमः-नाधंजरतीयत्वदोषोऽत्रास्ति। योग्यतावशेनैक्स्यैव कार्य- विशेषेष्वपेक्षानपेक्षयोरुपपत्तेः। यथा लागलवहनेऽनपेक्षितोऽप्यश्वो रथवहनेऽ- पेक्ष्यते, तद्वत् । न च विद्यायाः स्वोत्पत्तो कर्मापेक्षायां प्रमाणाभावः । "तमेतं है । भवपात मादिमें प्रयाज मादिका स्वरूपोपाकारी मङ्गत्व नही है। इससे उत्पन्न विद्या-पात्मतत्त्वज्ञान अपने मोक्षरूप फल देने में कर्मकी अपेक्षा नहीं करती है ।। ५ ।। षष्ठ मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह ह-ब्रह्मज्ञान अपनी उत्पत्तिमे कौकी अपेक्षा करता है अथवा अपेक्षा नहीं करता? पूर्वपक्ष-ब्रह्मज्ञान जैसे अपने फलमे कर्मोकी अपेक्षा नहीं करता है वैसे अपनी उत्पत्तिमें भी अपेक्षा नहीं करता है। सिद्धान्त-दो श्रुतियोंके प्रमाणसे यज्ञ शान्ति प्रादिकी अपेक्षासे ही ब्रह्मविद्या उत्पन्न होती है । जैसे हलमे अनपेक्षित भो अश्व रथमें अपेक्षित होता है। ब्रह्मविद्या प्रपने फलमें जैसे कर्मोको अपेक्षा नहीं करती, वैसे अपनी उत्पत्तिमे भी कर्मोकी अपेक्षा नहीं करेगी अन्यथा कहीपर मपेक्षा करती है मोर कीपर नही करती इस प्रकार अर्धजरतीय न्याय प्रसक्त होगा। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं--यहाँ अर्धजरतीय दोष नही है, क्योंकि योग्यतावश एक ही वस्तुको कार्य विशेषोंमे अपेक्षा मोर अनपेक्षा दोनो हो सकती हैं, जैसे हलवहन करनेमे अनपेक्षिव भी भाव रथ वहन करनेमे अपेक्षित है, वैसे २४० भाषानुवादसहिता [म०३ पा०४ अधि०७] वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन" (बृह० ४।४।२२) ति प्रवृत्तिरूपाणां वेदानुवचनादीनां विविदिपोत्पादनद्वारा बहिरङ्गसाधनत्वावगमात् । "शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वाई- स्मन्येवाऽऽमानं पश्यति" ( बृह० ४।४।२३ ) इति निवृत्तिरूपाणां शमदमादीना विद्योत्पत्तिकालेऽप्यनुवर्तमानतयाऽन्तरजसाघनत्वावगमात् । तस्माद्यज्ञादीनि शमादीनि च विद्या स्वोत्पत्तावपेक्षते ॥६॥ (सप्तम भापदि सन्निभोजनानुशाधिकरणे मूत्राणि) सर्वान्नानुमतिश्च प्राणात्यये तदर्शनात् ।। २८ ॥ अषा- धाच्च ॥ २६ ॥ अपि च स्मयते ॥३०॥ शब्दश्चातोs- कामकारे ॥३१॥ सप्तमाधिकरणमारचयति- सर्वाशनविधिः प्राणविदोऽनुज्ञाऽयवाऽपदि । अपूर्वत्वेन सर्वान्नभुक्तिया॑तुर्विधीयते ।। १५ ।। वाद्यन्नभोजनाशक्तेः शास्त्राच्चाभोज्यवारणात् । प्रापदि प्राणरक्षार्थमेवानुज्ञायतेऽखिलम् ॥ १६ ॥ विद्याके फलमें मनपेक्षित भी कर्म उसको उत्पत्तिमे अपेक्षित है। विद्याकी स्वोत्पत्तिमे कर्म की मपेक्षामें प्रमाणाभाव भी नहीं है, क्योकि 'तमेत वेदानुवचनेन०' (ब्राह्मण इस आत्माको स्वाध्याय, यज्ञ, दान, भौर प्रनाशक तपसे जाननेकी इच्छा करें पवृत्तिरूप वेदाध्ययन प्रादि विविदिषाके उत्पादन द्वारा बहिरङ्ग साधन प्रवगत होते हैं। 'शान्तो दान्त.' (अत इस प्रकार जाननेवाला शान्त, दान्त, उपरत, तितिक्षु भोर समाहित होकर आत्मामें कार्यकरण संघादमे ही आत्माको देखता है ) इस प्रकार निवृत्तिरूप शम, दम आदि विद्याके उत्पत्ति कालमें भी मनुवर्तमान होनेसे अन्तरङ्ग साधन पवगत होते हैं। इससे विद्या अपनी उत्पत्तिमे यज्ञ आदि और शम भादिकी अपेक्षा करती है ॥६॥ सप्तम प्रधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-'न ह वा' इत्यादिमे प्राणोपासकके लिए सर्वान भक्षणकी विधि है अथवा आपत्कालमै अनुशामात्र है। पूर्वपक्ष-अपूर्व होनेसे प्राणोपासकके लिए सर्वाग्न भक्षणको विधि है। सिद्धान्त–वान प्रादि, पोर मक्ष्य मनके भोजन भक्षण में प्रशक्ति होनेसे मोर शानसे अमक्ष्य पदार्थका निषेष होनेसे आपत्कालमे प्राणको रक्षा करनेके लिए सर्वान भक्षणको केवल मनुज्ञा है विधि नहीं है। इस प्रकार - [म० ३ पा० ४ मधि०८] वैयासिकन्यायमाला २४१ प्राणविद्यायां श्रूयते-"न ह वा एवंविदि किंच नानानं भवति' (छा० ५।२।१ ) इति । प्राणोपासकेन भोवतुमयोग्यं न किंचिदस्तीत्यर्थः। तत्र सर्वान्न भोजनस्य मानान्तरेणाप्राप्तत्वात्प्राणोपासकस्य तद्विधीयते। इति प्राप्ते ब्रूमः-'यदिदं किंचाऽऽश्वभ्य मा कृमिभ्य आ कीटपत म्या, तत्तेऽग्नम्" इति श्वादिभोज्यमनमुपासकस्य भोज्यतया विधेयम् । न च तद्वि- पातुं शक्यम् । यतो भक्ष्याभक्ष्यविभागशास्त्रं सर्वान्नाशन विधौ बाध्येत । तस्मादापदि यावता प्राणरक्षा भवति तावन्मात्र निषिद्धानमप्यनुज्ञायते । प्रत एव चाक्रायणो मुनिः प्राणात्यये प्राप्त पयु पितान्गजतत्पालकोच्छिष्टान्वुल्मा- पान्मक्षयित्वा शूद्रभाण्डस्थमुदकं न पपौ। तत्रोभयत्र कारणं चावोचत्-'न वा अजोविष्यमिमानखादन्" इति । "कामो म उदपानम्' ( छा० १।१०।४ ) इति च । तस्मादापदि सन्निभक्षणमभ्यनुज्ञातम् ॥७॥ (अष्टमे यज्ञादीनामाश्रमविद्योभयहेतुन्दाधिकरणे मूत्राणि) विहितत्वाच्चाऽऽश्रमकर्मापि ॥३२॥ सहकारित्वेन च ॥ ३३ ॥ सर्वथाऽपि त एवोभयलिगात् ।। ३४ ॥ अनभि- भवं च दर्शयति ॥ ३५॥ अष्टमाधिकरणमारचयति- प्राणविद्यामें 'म ह वा एवं विदि०' (ऐसा जाननेवाले प्राणोपासकके लिए भोजनार्थ कुछ अनन्न मभोज्य नहीं है ) ऐसी श्रुति है । प्राणोपासकके लिए भोजन करनेके भयोग्य कुछ भी नहीं है, ऐसा अर्थ है । इसमे किसी अन्य प्रमाणसे सर्वान्न भोजनकी अप्राप्ति होनेसे प्राणोपासकके लिए सर्वान्न भक्षणका विधान किया जाता है। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-'यदिद किञ्चाऽश्वम्य.' ( श्वान, कृमि, कीट, पतङ्ग, पर्यन्त जो कुछ सब तुम्हारा मन है ) इस प्रकार श्यान मादि भोज्य अन्न उपासकके लिए भोज्यरूपसे विधेय होगा, परन्तु उसका विधान नहीं किया जा सक्ता, क्योकि भक्ष्यामक्ष्य विभाग शास्त्र सर्वात भक्षण विधिमें बाधित होगा। इमसे प्रापत्कालमे जितने अन्नसे प्राणरक्षा हो सकती है उतने मात्र निषिद्ध मनको भी मनुज्ञा है, अतएव चाक्रायण मुनिने प्राणनाश प्राप्त होनेपर गज और हस्ति- पालकके उच्छिष्ट एवं वासी उडदोंका भक्षण दिया, परन्तु शूद्रके भाण्ड-पात्रमे रखा जल नहीं पिया। वहा दोनो स्थलोमे कारण कहा है-'न वा०' (इन उच्छिष्ट उडदोको न खाकर मैं जीवित नहीं रह सकता था और जलपान तो मुझे यथेच्छ मात्रामे मिलता है ) इससे प्रापत्कालमें सर्वान्न भक्षणको अनुज्ञा है । मष्टम प्राधिकरणको रचना करते हैं- २४२ भाषानुवादसहिता [प्र. ३ पा० ४ अघि०८] विद्यार्थमाश्रमाथं च द्विः प्रयोगोऽथग सकृत् । प्रयोजनविभेदेन प्रयोगोऽपि विभिद्यते ॥ १७ ॥ याद्धार्थभुक्त्या तृप्तिः स्याद्विद्यार्थेनाऽश्रमस्तथा । मनित्यनित्यसंयोग उक्तिभ्या सादिरे मतः ॥ १८ ॥ यानि यज्ञादीनि विद्याहेतुत्वेन विविदिपावाक्ये विहितानि, तान्येवाऽऽश्रम- धमत्वेन पूर्वकाण्डे विहितानि तेषा प्रयोजनद्वैविध्यादतिरनुष्ठानम् । इति प्राप्ते म:-यया याद्धार्थ भोजनेन एप्तिान्तरोपकतया सिध्यति, तथा. विद्यार्थमनुष्ठित: कर्मभिराश्रममा सिध्यतु । न च विद्या हेतूनां काम्यत्वादाश्रम धर्माणां च नित्यत्वात्सकृत्प्रयोगे नित्यानित्यसंयोगविरोध इति वाच्यम् । वचन: द्वयबलेनेकस्य कर्मण प्राकारद्वयोपपत्तः । यथा 'खादिरो यूपो भवति । खादिरं वीर्यकामस्य यूपं कुर्वीत' इत्यत्र वचनद्वयबलेनकस्य नित्यत्वं काम्यत्वं च तत् । तस्मादुभयविघाना यज्ञादीना सकृदेव प्रयोगः॥८॥ सन्देह-विद्याके लिए और माश्रमके लिए दो चार कर्माका अनुवान है पथवा एक वार? पूर्वपक्ष-प्रयोजनका भेद होनेसे प्रयोगका भी भेद है मर्थात् कर्मोंका दो पार मनुष्ठान है। सिद्धान्त-एक वार ही प्रयोग होना चाहिए, जैसे श्राद्ध के लिए जो भोजन है उससे तृप्ति मी होगी, वैसे विद्याके लिए अनुष्ठित कम मात्रमके लिए भी होगा। 'खादिरो यूपो भवति' मादिरं वीर्य कामस्य यूपं कुर्वीत, इन उक्तियोंसे जैसे खादिरमें नित्य भनित्य-काम्य संयोग स्वीकृत है, वैसे प्रकृतमें भी नित्यत्वानित्यत्वका विरोध नहीं है। विविदिषा वाक्यमै विद्याके हेतुरूपसे जो यज्ञादि विहित हैं, वे ही पाश्रमके धर्मरूपसे पूर्वकाण्डमें विहित हैं । अतएव उनका प्रयोजन दो प्रकारका होनेसे उनका अनुष्ठान भी दो वार होना चाहिए। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं जैसे श्राद्धके लिए विहित भोजनसे तृप्ति अवश्यंभावी सिद्ध होती है, वैसे विद्याके लिए अनुष्ठित कर्मोंसे प्राधम धर्म सिद्ध होता है। विद्याके हेतु भूत कर्म काम्य हैं और पाश्रम धर्म नित्य हैं, उनके सकृद प्रयोग होनेपर तो नित्यानित्य संयोगका विरोध होगा? तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि दो श्रुतियोके बलसे एक कर्मके भी दो भाकार हो सकते हैं। जैसे 'खादिरो युपो मवति' ( खदिर वृक्षका यूप-यज्ञस्तम्भ होता है ) 'खादिरं (वीर्य- कामनावाला खादिर यूप करे ) यहापर दो वचनोंके बलसे एक कर्म मे नित्यत्व मोर काम्यत्व है अर्थात् जैसे एक खादिरमे भी नित्य संयोगसे क्रत्वर्थत्व और भनित्य मंगोगमे . [भ० ३ पा० ४ अधि० ६ ] वैयासिकन्यायमाला २४३ (नवमेऽनाश्रमिणोऽपि ब्रह्मज्ञानाधिकरणे सूत्राणि ) अन्तरा चापि तु तद्दष्टेः ॥३६॥ अपि च स्मर्यते ॥३७॥ विशेपानुग्रहश्य.॥३८॥ अतस्त्वितरज्ज्यायो लिगाय॥३६॥ दशमाधिकरणमारचयति- नास्त्यनाश्रमिणो ज्ञानमस्ति वा नैव विधते घोशुद्धपाश्रमित्वस्य ज्ञानहेतोरभावतः ॥ १६ ॥ प्रस्त्येव सर्वसंबन्धिजपादेश्चित्तशुद्धितः । श्रुता हि विद्या रैक्वादेराधमे त्वतिशुद्धता ॥२०॥ पूर्वाश्रम परिसमाप्य केनापि कारणेनोत्तरमाश्रममप्रतिपन्नोऽनाश्रमी, स्नातकविघुरादिः । तस्य तत्त्वज्ञानं न संभाव्यते । बुद्धिशुद्धिहेतोराश्रमित्वस्या- भावात्। इति प्राप्ते ब्रूमः-संभवत्यनाश्रमिणोऽपि ज्ञानम्। पाश्रमनिरपेक्षस्य जपादेवुद्धिशुद्धिहेतुत्वात् । 'जप्येनैव तु संसिध्येबाह्मणो नात्र संशयः।' इति स्मृतेः। श्रुतेश्च संवर्गविद्यायामधिकारोऽनाश्रमिणो विवाहार्थिनो रैक्क्वस्य । पुरुषार्थत्व है, वैसे प्रकृतमे भी समझना चाहिए। इसलिए उभयविध यज्ञ प्रादिका एक पार ही प्रयोग प्रमोष्ट है ॥८॥ नवम मधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-अनाश्रमियोके लिए ज्ञान है अथवा नही है अर्थात् ज्ञानमे अधिकार है अपवा नहीं? पूर्वपक्ष-उस पुरषका ज्ञानमें अधिकार नहीं है, क्योकि ऐसे पुरुपमे बुद्धिको शुद्धतावा हेतुभूत मात्रमित्व नही है । सिद्धान्त-मनाश्रमी पुरुषके लिए भी विद्या सुनी जाती है, क्योकि सर्व सम्बन्धी जप आदिमे भी बुद्धिकी शुद्धि हो सकती है और यही कारण कि रक्व मादि मना- अमियोके लिए विद्या है, जप प्रादिसे इस आश्रममे तो अतिशुदता ही है । पूर्वाश्रमको परिसमाप्तकर किसी भी कारणसे उत्तर पाश्रम न प्राप्त करनेवाला अनाश्रमी है । ऐसे स्नातक, विषुरादि हैं। उनके लिए तत्त्वज्ञानकी संभावना नहीं है। क्योंकि चित्त शुद्धिका हेतु पात्रमित्व उनमें नही है । सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-पनाश्रमीको भी ज्ञान हो सकता है, क्योकि प्राश्रम निरपेक्ष जपादि बुद्धि शुद्धिके हेतु हैं। 'जप्येनैव तु०' (ब्राह्मण जपसे ही सिद्धि प्राप्त कर सकता है इसमें कुछ भी संशय नहीं है ) विवाहार्थों प्रना. प्रमी रक्वका संवर्गविद्यामे अधिकार सुना जाता है। एवं प्राश्रम रहित गार्गो 1 धर्मतः। भाषानुवादसहिता [अ०३ पा० ४ अधि० १०] एवमाश्रमरहिता गार्योदय उदाहार्याः । न चैवं सत्याश्रमवैयथ्यम् । शुद्धपति- शयहेतुत्वात् । तस्मादनामिणोऽपि संभवत्येव ज्ञानम् ।।६।। (दशम प्राध्रमाणामवरोहनिराकरणाधिकरणे सत्रम् ) तद्भूतस्य नातद्भावो जैमिनेरपि नियमातद्रूपाभायेभ्यः॥४०॥ दशमाधिकरणमारचयति- अवरोहोऽस्त्याश्रमणां न वा, रागात्स विद्यते। पूर्वधर्मश्रद्धया वा यथाऽरोहस्तथैच्छिकः ॥ २१ ॥ रागस्यातिनिषिद्धत्वाद्विहितस्यैव प्रारोहनियमोक्तयादेविरोहोऽस्त्यशास्त्रतः ॥२२॥ 'ब्रह्मचर्य समाप्य गृहो भवेत्, गृहाद्वनी भूत्वा प्रव्रजेत्' इत्याप्रमाणामारोहो यथेच्छाधीनो भवति, तथा पारिवाज्यानस्थः' इत्याद्यवरोहोऽपि कचिद्रागव- शारक्वचित्पूर्वाश्रमधर्मश्रद्धावशाच्च युक्तः । इति प्राप्ते व्रमः-रागस्तावन्मिथ्याज्ञानमूलत्वादतिनिषिद्धः । न च पूर्वा- श्रमधर्मे श्रद्धा युज्यते । उत्तराश्रमिणं प्रत्यविहितत्वेन धर्मत्वाभावात् । न हि यो येनानुष्टातुं शक्यते श्रद्धीयते च, सतस्य धर्मो भवति । किं सहि यो यं प्रति विहितः, पादि उदाहरणके योग्य हैं, ऐमा होनेपर भी माघम व्यर्थ नहीं है, क्योकि प्राथम चित्त शुद्धिके पतिशयका हेतु है, इससे अनाप्रमोको मी तत्वज्ञान हो सकता है ॥६॥ दशम अधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-माप्रमोका पवरोह-च्युति हो सकता है अथवा नहीं ? पूर्वपक्ष-प्राश्रमोंका अवरोह रागसे वा पूर्वाश्रमें धर्म में श्रद्धासे हो सकता है । जैसे ब्रह्मचर्य मादि प्राप्रमोका पारोह ऐच्छिक है, वैसे भवरोह भी ऐच्छिक है। सिद्धान्त-राग प्रतिनिषिद्ध है और विहित हो धर्म है, इसलिए प्रारोह नियमके कथन मादिसे प्रशास्त्रीय प्रवरोह नहीं होता। 'ब्रह्मचर्य समाप्य' (ब्रह्मचर्य माधमकी समाप्तिकर गृहस्थाश्रमी हो, गृहस्थाश्रमसे वानप्रस्थी होकर मन्यासाश्रम प्रहण करे ) इस प्रकार पाश्रमोका मारोह जैसे इच्छाके अधीन है, वैसे 'मन्यासाश्रमसे पुनः वानप्रस्थ हो' इत्यादि अवरोह भी कहींपर रागसे पौर वहींपर पूर्वाश्रम धर्म में श्रद्धामे होना युक्त है। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्व पस प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-राग तो मिष्याशान मूलक होनेसे प्रतिनिषिद्ध है । पूर्वाप्रमधर्म में श्रद्धाका होना युक्त नहीं है, क्योंकि उत्तर पायमोके प्रति प्रविहिव होनेसे धर्म नहीं है। जो जिसका अनुष्ठान कर सकता है और जिममें श्रद्धा करता है वह उमका धर्म नहीं हो सकता है, किन्तु जो जिमके प्रति विहित . [प्र० ३ पा० ४ अधि० ११ ] वैयासिकन्यायमाला स तस्य धर्मः। किंच "ततो न पुनरेयात्' इत्यवरोहनिषेधेनाऽरोही नियम्यते। न चाऽरोहवदवरोहेऽपि शिष्टाचारो विद्यते । तस्मानास्त्यवरोहः ॥१०॥ (एकादश ऊध्वरेतसः पातित्ये प्रायश्चित्ताधिकरणे सूत्रे) न चाऽऽधिकारिकमपि पतनानुमानात्तदयोगात् ॥ ४१ ॥ उपपूर्वमपि त्वेके भावमशनवत्तदुक्तम् ॥ ४२ ॥ एकादशाधिकरणमारचयति- भ्रष्टोर्ध्वरेतसो नास्ति प्रायश्चित्तमथास्ति वा। प्रदर्शनोक्तेनस्त्येिव वतिनो गर्दभः पशुः ।। २३ ।। उपपातकमेवेतद्वतिनो मधुमांसवत् । प्रायश्चिताच्च संस्काराच्छुद्धियंत्नपरं वचः ॥ २४ ॥ नैष्ठिकब्रह्मचर्यादूर्ध्वरेतस्त्वं प्राप्तस्य पुनः स्त्रीसझेन भ्रष्टस्य प्रायश्चित्तं नास्ति। आरूढो नैष्ठिक धर्म यस्तु प्रच्यवते पुनः । प्रायश्चित्तं न पश्यामि येन शुध्येत्स प्रात्महा। इति प्रायश्चित्तादर्शनवचनात् । “अथ यो ब्रह्मचारी स्त्रीमुपेयात्, स गर्दभं है वही उमका धर्म है। किंच ततो न० ( उससे पुनः हटे नही ) इस प्रकार भवरोहके निषेयसे प्रारोहका निययन होता है । और पाराहके समान अवरोहमे शिष्टाचार भी नही है, इससे उत्तराप्रमसे अवरोह नही है ॥ १० ॥ एकादश प्रधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-ऊर्ध्वरेतामे भ्रष्ट अर्थात् नैष्ठिक ब्रह्मचर्याश्रमसे भ्रष्टके लिए प्रायश्चित्त है मथवा नहीं है? पूर्वपक्ष-प्रायश्चित्त नहीं है, प्रायश्चितके प्रभावका कथन है, जो प्रायश्चित गर्दभ पशुका पालभन है, वह प्रती-उपकुर्वाण ब्रह्मचर्याश्रमीके लिए है। सिद्धान्त-वतीका मद्य, माम भक्षण जैसे उपपातक है, वैसे यह भी उपपातक ही है महापातक नहीं है, इसलिए प्रायश्चितरूप संस्कारसे उसकी शुद्धि हो सकती है और प्रायश्चित्तका प्रभाव बोधक वचन है वह यलपर-स्वल गल साध्य प्रायश्चित्त नही है, किन्तु अधिक यल साध्य है। नैष्ठिक ब्रह्मचर्य से ऊर्ध्वरेतसवको प्राप्त हुए मोर कदाचित् स्त्री प्रसङ्गसे भ्रष्ट हुएके लिए प्रायश्चित्त नहीं है, क्योकि-'मारूढो नैष्ठिक०' (नष्ठिक ब्रह्मचर्य धर्म को प्राप्तकर जो पुनः भ्रष्ट हो तो उसका प्रायश्चित्त नही देखता हूँ जिससे वह प्रात्मघाती शुद्ध हो) इस प्रकार प्रायश्चित्तका प्रदर्शनवचन है । 'प्रथ यो ब्रह्मचारी० (जो ब्रह्मचारी स्त्री 1 येत् । भाषानुवादसहिता [म० ३ पा० ४ अघि० ११] पगुमालभेत" इत्यस्ति प्रायश्चित्तमित्युच्यते । तन्न। तस्य प्रतिविषयत्वात् ! उपकुर्वाणकाख्यो यो वेदाध्ययनानत्वेन ब्रह्मचर्यव्रतमनुतिष्टति, तद्विषयमिदं प्रायश्चित्तवचनम् । तस्मादूर्ध्वरेतस्त्वाभ्रष्टस्य नास्ति प्रायश्चित्तम् । इति प्राप्ते व्रम:-यथोपकुर्वाणकस्य मघुमांसभक्षणमुपपातकमिति प्राय- श्चित्तं पुनः संस्कारो विद्यते, तद्वदूर्ध्वरेतसोऽपि गुरुदारादिभ्योऽन्यत्र प्रवृत्तिरुप- पातवमेव न तु महापातकम् । ततः प्रायश्चित्तात्पुनःसंस्काराच्च मुद्धिर्भवति । यदि' महापातकेष्वपरिगणितत्वेनोपपातकत्वमाश्रित्य प्रायश्चित्तमुच्यते, ता. दर्शनवाक्यस्य का गतिरिति चेत् । 'यत्नपरं तद्वाक्यम् इति धूमः । प्रत एव 'प्रायश्चित्तं न पश्यामि' इत्याह, न तु 'नास्ति' इति । प्रायश्चित्तं तु गर्दभप- शुरेव । ब्रह्मचारित्वस्य समानत्वात्। तथा वनस्थपरिवाजक्योरपि भ्रंशे प्राय: श्चित्तं स्मयते- 'वानप्रस्थो दीक्षाभेदे कृच्छ द्वादशरात्रं चरित्वा महाकक्षं भक्षुर्वनस्थवरसोमवृद्धिवर्जम्' इति । वसवृद्धिर्वनवास: । सोम वृद्धिरपि स एव ॥११॥ प्रसङ्ग करे तो वह गर्दभ पशुका मालभन करे ) इम प्रकार प्रायश्चित्त है, ऐसा यदि कहो तो यह युक्त नहीं है, क्योकि वह व्रती विषयक है। जो वेदाध्ययनके मङ्गरूपसे उपकुर्वाण नामक ब्रह्मचर्यद्रतका अनुष्ठान करता है, वद्विषयक यह प्रायश्चित्तवचन है। इससे प्रर्ध्वरेतस्वसे भ्रष्ट हुएके लिए प्रायश्चित्त नहीं है । सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-जैसे उपकुर्वाणके लिए मद्य मास भक्षण उपपातक है और उसका पुनः प्रायश्चित्तरूप मस्कार है, वैसे ऊर्जरेताकी भी यदि गुरु खोसे मन्यत्र प्रवृत्ति है तो वह उपपातक है महापातक नही है, इसलिए उमकी प्रायश्चितरूप मस्कारसे शुद्धि हो सकती है। यदि महापातकोमें परिगणन न होनेसे उपपातकका प्राश्रयकर प्रायश्चित्त कहते हो, तो प्रदर्शन वाक्यको क्या व्यवस्था होगी ? ऐसा कहो तो हम कहते हैं 'यलपरं तद्वाक्यम्' मदर्शन वाक्य यत्नपरक है। प्रतएव 'प्रायश्चित्त नही देखता हूँ' ऐमा कहा है, नहीं है, ऐसा नही कहा है । प्रायश्चित्त तो गर्दभ पशु ही है । क्योकि दोनोमें समान है। वैसे वानप्रस्थ और परिव्राजकके भ्रष्ट होनेमे 'वानप्रस्थो दीक्षाभेदे०' (वानप्रस्थ दीक्षासे भ्रष्ट होनेपर द्वादश- रात्र कृच्छ व्रतकर बहुत तृण और वृक्षवाले प्रदेशकी जलदान प्रादिसे वृद्धिकरे' भिक्षु भी वानप्रस्थके समान सोमलताको छोड तृण मौर वृक्षबाले प्रदेशको क्लदानसे १. स्नो हिरण्यस्य सुरां पिबंश्च गुरोस्तल्पमावसन्ब्रह्महा च । एते पतन्ति चत्वारः पञ्चम- श्वर स्तरिति' (घा० ५१t ) 'सुवर्ण चोर, सुरापान, गुरु स्त्रीगमन, ब्रह्महत्या, ये चार पतित होते हैं, पञ्चम वह है जो इनका सङ्ग करता है ) [५०३ पा० ४ अघि० १२] वैयासिकन्यायमाला (द्वादशे भ्रष्टस्य कृतप्रायश्चित्तस्याप्यव्यवहार्यताधिकरणे सूत्रम्) पहिस्तूभयथाऽपि स्मृतेराचाराच्च ।। ४३ ॥ द्वादशाधिकरणमारचयति-- शुद्धः शिष्टैरुपादेयस्त्याज्यो वा दोपहानितः। उपादेयोऽन्यथा शुद्धिः प्रायश्चित्तकृता वृथा ॥२५ ।। प्रामुष्मिक्येव शुद्धिः स्यात्ततः शिष्टास्त्यजन्ति तम् । प्रायश्चित्तादृष्टिवाक्यादशुद्धिस्त्वैहिकोष्यते ॥ २६॥ पूर्वोक्तप्रायश्चित्तापादितशुद्धधन्यथानुपपत्त्या कृतप्रायश्चित्तस्य शिष्टैः सह इति प्राप्ते ब्रूमः-प्रामुष्मिकशुद्धिसद्भावेऽपि प्रायश्चित्तादर्शनवचनादैहिक- शुद्धपमावाच्छिष्टैरेप न व्यवहार्यः ॥ १२॥ (त्रयोदश ऋत्विकृताङ्गध्यानस्य स्वामिगामित्वापिकरणे सूत्राणि ) स्वामिनः फलश्रु तेरित्यात्रेयः ॥४४॥ आत्विज्यमित्यौ. डुलोमिस्तस्मै हि परिक्रीयते ॥ ४५ ॥ श्रुतेश्च ।। ४६ ॥ त्रयोदशाधिकरणमारचयति- वृद्धि करे ) इस प्रकार प्रायश्चित्तको स्मृति है। कक्षोकी वृद्धि वनवास है, सोमवृद्धि भी व्यवहारोऽस्ति। वही है ॥११॥ द्वादश मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-प्रायश्चित्तसे शुद्ध हुए ब्रह्मचारी मादि शिष्टो द्वारा उपादेय हैं मथवा स्याज्य हैं ? पूर्वपक्ष-दोषको निवृत्ति होनेसे वे ग्रहण योग्य हैं । अन्यथा प्रायश्चितकृत शुद्धि व्यर्थ होगी। सिद्धान्त-उसको पारलौकिक शुद्धि होती है, इससे शिष्टलोग उसका त्याग करते हैं, उमको ऐहिक शुद्धि नहीं है, क्योकि 'प्रायश्चित्त न पश्यामि' ऐसा वाक्य है । पूर्वोक्त प्रायश्चित्तसे सपादित शुद्धि अन्यथा अनुपपत्तिसे कृत प्रायश्चित्तका शिष्ट- पुरुषोके साथ व्यवहार हो सकता है । सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-उसकी पारलौकिक शुद्धि होनेपर भी प्रायश्चित्तके भदर्शन वाक्यसे ऐहिक शुद्धि न होने के कारण शिष्टपुरुष उसके साथ व्यवहार नहीं करते हैं ॥ १२॥ त्रयोदश मधिकरणकी रचना करते हैं- २४८ भाषानुवादसहिता [म०३ पा० ४ प्रधि० १३] अन्नध्यानं याजमानमात्विजं वा यतः फलम् । ध्यातुरेव श्रुतं तस्माद्याजमानमुपासनम् ॥ २७ ॥ यादेवं विदुद्गातेत्यात्विजत्वं स्फुटं श्रुतम् । कोतवादविजस्तेन मृतं स्वामिकृतं भवेत् ॥२८॥ प्रमावबढेपूपासनेषु यजमान एवानुष्ठाता, नस्विजः । ध्यातुः फलधव वणात् । फलं तु यजमानस्यैवोचितम् । स्वामित्वात् । तस्मात्फलिनो यजमान. स्यैव ध्यातृत्वम् । इति प्राप्त ब्रमः- -"एवं विदुद्गाता यूयात" इति वाक्यरोप उद्गातुरुपा- सकत्वं स्पष्टं धूयते । युक्तं चैतत् । ऋत्विजामशेषकर्मानुष्ठानाय यजमानेनक्रीत. स्वात् । तस्मात्विग्मिः कृतं यजमानेनैव कृतमिति फलित्वोपपत्तेरुपासनमृ• त्विजा कर्म ॥ १३ ॥ (चतुदशे मौनस्य विधेयत्वाधिकरणे मूत्राणि ) सहकार्यन्तरविधिः पक्षण तृतीयं तत्त्वतो विध्यादिवत् ॥४७॥ कृत्स्नभावातु गृहिणोपसंहारः ॥ ४ ॥ मौन- पदितरेपामप्युपदेशात् ॥ ४६॥ सन्देह-मझोपासनाका मनुष्टान कर्ता यजमान है अथवा ऋत्विक् ? पूर्वपक्षा-उम उपासनाका अनुष्ठानका यजमान है, क्योकि सजन्यफल ध्यान करनेवालेके लिए सुना जाता है । सिद्धान्त-'एवंविदुद्गाता ब्रूयात्' इस वाक्यमें स्पष्टरूपसे पलोपामनामोंका पर्ता ऋत्विक कहा गया है, ऋत्विदक्षिणासे खरीदा गया है, अतः उससे किये गये मनु- धानका फल यजमानको होगा। कर्माङ्गोसे सम्बन्धित उपासनामोका अनुधावा यजमान ही है ऋत्विक् नहीं क्योकि । ध्यानाके लिए फलका श्रवण है, फल तो यजमान के लिए हो उचित है, कारण कि वह उनका स्वामी है। इससे फलवाला यजमान ही ध्याता है। सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-'एवंविदुद्गाता ब्रूयाद' ( इस प्रकार जाननेवाला उद्गाता कहे ) इस प्रकारके वाक्यशेषमे उद्गाताका उपासक- रूपसे स्पष्ट श्रवण है । और यह ठोक भी है, क्योकि समूर्ण कर्माका अनुष्ठान करने के लिए यजमानसे ऋत्विक लोगोका परिक्रयण किया गया है। इसने ऋखि कसे किया गया कर्म यजमानसे ही किया गया है, इस प्रकार फलानरूपसे यजमानको उपपत्ति होती है । इमलिए उपासनारूप कर्म ऋत्विजोका है यजमानका नहीं ॥ १३ ॥ चतुर्दश मधिकरणको रचना करते है- [म० ३ पा० ४ मधि० १४ ] वैयासिकन्यायमाला चतुदंशाधिकरणमारचयति- अविधेयं विधेयं वा मौनं तन्न विधीयते। प्राप्त पाण्डित्यतो मौनं ज्ञानवाच्युभयं यतः ॥ २६॥ निरन्तरजाननिष्ठा मौनं पाण्डित्यतः पृथक् । विधेयं तद्भेददृष्टिप्राबल्ये तन्निवृत्तये ॥३०॥ कहोलब्राह्मणे श्रूयते-"तस्मादब्राह्मणः पाण्डित्यं निविद्य बाल्येन तिष्ठा- सेतु, बाल्यं च पाण्डित्यं च निविद्याथ मुनि:' (बृह० ३।५।१ ) इति । अस्याय: मय: यस्माद्ब्रह्म भाव: परमपुरुषार्थस्तस्माद्ब्रह्म बुभूपुरुपनिषत्तारपर्यनिर्णयरूपं पाण्डित्यं निःशेषेण संपाच बालवन्नोरागद्वेपत्वेन युक्तोऽसंभावनानिराकरणाय युक्तिरनुचिन्तयन्नवस्थातुमिच्छेत् । तत: पाण्डित्यबाल्ये निःशेपेण संपाद्याथ मुनिरिति । तत्र 'भवेत्' इति विष्यश्रवणान्मुनित्वं न विधेयम् । न च विधिः कल्पयितुं शक्यः । पाण्डित्यशब्देन प्राप्तस्य मौनस्यापूर्वार्थत्वाभावात् । पण्डितस्य विदुषो भावः पाण्डित्यमिति ज्ञानवाचकोऽयं शब्दः । तथा मुनिशब्दोऽपि । 'मन ज्ञाने' इत्यस्मादातोस्तनिष्पत्तेः । तस्मात्प्राप्तस्य मौनस्य नैव विधिकल्पनम् । सन्देह - मौन विधेय है अथवा प्रविधेय है ? पूर्णपक्ष--मानका विधान नहीं है, क्योंकि वह तो पाण्डित्यसे ही प्राप्त है, कारण कि पाण्डित्य और मौन दोनों ज्ञानवाची हैं। सिद्धान्त-निरन्तर ज्ञाननिष्ठा रूप मौन पाण्डित्यसे पृथक् है। इससे भेददृष्टिके प्रबल होनेपर उसकी निवृत्ति के लिए उसका विधान भावश्यक है। कहोलब्राह्मणमें 'तस्माद्ब्राह्मणः' ( अतः ब्राह्मण पात्मज्ञानका पूर्णतया संपादनकर मात्मज्ञानरूप बलसे स्थित रहनेको इक्छा करे, पुनः बाल्य और पाण्डित्यको पूर्णत्या प्राप्तकर वह मुनि होता है ) ऐमी श्रुति है । इसका यह अर्थ है- चूंकि ब्रह्मभाव परम पुरुषार्थ है, इसलिए ब्रह्मभावको इच्छा करनेवाला उपनिषत् तात्पर्य का निर्णय रूप पाण्डित्य पूर्णरूपसे सम्पादनकर बालकके समान राग द्वेष, रहित रूपसे युक्त होकर असम्भावना निराकरण के लिए युक्तियोका अनुचिन्तन करता हुमा अवस्थित होनेकी इच्छा करे । अनन्तर बाल्य और पाण्डित्यका सम्पादनकर 'प्रथ मुनि' इसमे 'भवेत्' (हो ) इस प्रकार विधिके अश्रवण होनेसे मुनित्व विधेय नहीं है, विधिको कल्पना करने के लिए भी समर्थ नहीं है, क्योकि पाण्डित्य शब्दसे प्राप्त मौनमें अपूर्वार्थत्व नहीं है । विद्वान पण्डितका माव पाण्डित्य है, इससे यह पाण्डित्य शब्द ज्ञानका वाचक है, क्योकि इसी प्रकार मुनि शब्द भी 'मन ज्ञाने' इस धातुसे निष्पन्न हुमा है। इसलिए प्राप्त मौनमें विषिकी कल्पना नहीं करनी चाहिए।
भाषानुवादसहिता [म०४ पा०३ प्रधि०१५) इति प्राप्ते घूम:-पूर्वोक्तस्य पाण्डित्यस्य पुन मुनिशब्देनाभिधाने प्रयोजना भावाग्निरन्तरज्ञाननिष्ठापूर्वापों मुनिशब्देन विवक्षितः । ततः तिष्ठासेत्' इति पदानुवृत्या विधिलभ्यते । अस्ति च ज्ञाननैरन्तर्येण प्रयोजनम् । प्रबलभेदवासना- वासितस्य तनिवृत्यर्थत्वात् । तस्मानिदिध्यासनात्मक मौनं विधेयम् ॥ १४॥ (पञ्चदो भावसुदेरेव वाल्यशब्दाभिधेयतापिकरणे मूत्रम् ) अनाविष्कुर्वन्नन्वयात् ।। ५०॥ पञ्चदशाधिकरणमारचयति- बाल्यं वय: कामचारो घोशुद्धिर्वा प्रसिद्धितः। वयस्तस्याविधेयत्वे कामचारोऽस्तु नेतरा ॥ ३१ ॥ मननस्योपयुक्तत्वाद्भावशुद्धिविवक्षिता । मत्यन्तानुपयोगित्वाविरुद्धत्वाच न द्वयम् ।। "बाल्येन तिष्ठासेत्" इत्यत्र वालस्यभावो बाल्यमिति प्रसिद्धिधा धयो भवेत् : अथ तस्य विध्यनहत्वम्, तहिं बालस्य कर्मति ध्युत्पत्त्या कामचारादि- कमस्तु । सर्वथा घोशुद्धिनं वाल्यम् । सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते है-पूर्वोक्त पाण्डित्यका मुनि शब्दसे प्रभिधान होनेपर प्रयोजनके न होनेसे निरन्तर ज्ञाननिष्टाप अपूर्वार्ष मुनिशब्दसे विवक्षित है । इसलिए 'विष्ठासेत्' (स्थित होनेकी इज्या करे ) इस पदको पनुवृत्तिसे विधि प्राप्त होती है । ज्ञानके नैरन्ठर्य से प्रयोजन भी है। क्योकि प्रबल भेदभावनासे पासित पुष्पमें उसकी निवृत्ति के लिए है। इमसे निदिध्यासनात्मक मौन विधेय है ॥१४॥ पंचदश अधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-वाल्पशब्दसे घय, कामाचार मथवा अन्तःकरण शुदिका ग्रहण है ? पूर्वपक्ष-बालका भाव बाल्य यह प्रसिद्ध है, मतः बाल्य-शब्दसे भवस्थाका ग्रहण है, यदि उसे प्रविधेय माने तो कामाचार-यथेष्ट प्रवृत्तिका ग्रहण उचित है। किन्तु मन्त:करणको शुद्धिका प्रहण नहीं है । सिद्धान्त--मननमे उपयुक्त होने से भावशुद्ध बुद्धिको शुटि हो विवक्षित है परन्तु मत्यन्त अनुपयोगी और विरुद्ध होनेमे अवस्था भौर कामाचार दोनोका प्रहण नहीं करना चाहिये। 'बाल्येन तिष्ठा सेत्' ( बालभावसे रहे ) यहाँपर 'बालका भाव बाल्य' इस लोक प्रमिक्सेि मवस्था होगो । यदि कहो कि वह विधिक योग्य नहीं है, तो 'बालका कर्म बाल्य' इस व्युत्पत्तिसे कामाचार प्रादि होंगे। सर्वथा बुद्धिकी शुद्धि बाल्य नहीं है ।
। [प्र० ३ पा० ४ अधि० १६ ] घेयासिकन्यायमाला २५१ इति प्राप्ते यमः-पाण्डित्यमौनाख्ययोः श्रवणनिदिध्यासनयोमध्ये मननं विधेयत्वेन श्रुत्या विवक्षितम् । तस्य च भावशुविरुपयुक्ता, रागद्वेषमानापमा- नादिदोषप्रस्तत्वेन बहिःप्रवृत्तिमपरित्यज्य मन्तुमशक्यत्वात्। बालस्य कर्मेति व्युत्पत्तिस्तु यथेच्छाचारे, भावशुद्धौ च समाना । वयःकामचारी तु मननस्यात्य- न्तमनुपयुक्तो। प्रत्युत विरोधिनौ । मूढस्य बहिःप्रवृत्तस्य वा मनसो मनन विनाश- कत्वात् । तस्मात्-भावशुद्धिरेव बाल्यं नेतरदुभयम् ॥ १५ ॥ (पोडश-आत्मज्ञानस्पेहिकामुष्मिकत्वव्यवस्थाधिकरणे मूत्रम् ) ऐहिकमप्यप्रस्तुतप्रतिबन्धे तदर्शनात् ।। ५१॥ पोडशाधिकरणमारचयति- इहेव नियतं ज्ञानं पाक्षिकं वा, नियम्यते। तथाऽभिसंधेर्यज्ञादिः क्षीणो विविदिषाजनी॥ ३३ ॥ असति प्रतिबन्धेऽत्र ज्ञानं जन्मान्तरेऽन्यथा। श्रवणायेत्यादिशास्त्राद्वामदेवोद्भवादपि ॥ ३४ ॥ श्रवणमनननिदिध्यासनेष्वनुष्ठीयमानेष्वस्मिन्नेव जन्मनि ज्ञानं जायत इति सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-पाण्डित्य पोर मौन नामक प्रवण मोर निदिध्यासनके मध्य मे मनन विधेयरूपसे अतिसे विवक्षित है। उसके लिए तो मावशुद्धि उपयुक्त है। क्योकि राग द्वेष, मान-अपमान भादि दोष ग्रस्त बाह्य प्रवृत्तिके परित्यागके विना मनन नही हो सकता है। 'बालका कर्म' यह व्युत्पत्ति यथेच्छाचार और भाव शुद्धिमे समान है, अवस्था और कामाचार तो मननमें प्रत्यन्त भनुपयुक्त हैं, प्रत्युत विरोधी हैं। क्योकि बहिप्रवृत या मूढ-मन मननका विनाशक है। इससे भाव शुद्धि ही बाल्य है पनि बाल्य शब्दमे ग्राह्य है, किन्तु मन्य दो-अवस्था मोर कामाचार नहीं ॥१॥ षोडश मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-श्रवण प्रादिके अनुष्ठान करनेपर नियममे इसी जन्ममे ज्ञान होता है, वा इम जन्ममे मघवा जन्मान्तरमे ज्ञान होता है, इस प्रकार विकल्प है। पूर्वपक्ष-इसी जन्ममे नियमत. ज्ञान होगा, क्योकि 'इसी जन्ममे मुझे ज्ञान हो' इस प्रकार अभिलाषाकर पुरुप प्रवृत्त होता है और यज्ञ मादि विविदषाके उत्पादनमे ही चरितार्थ हैं। सिद्धान्त प्रतिबन्ध न हो तो इमो जन्ममें ज्ञान होगा अन्यथा जन्मान्तरमें, क्योकि 'श्रवणाय' इत्यादि शास्त्र है और वामदेवका उद्भव भी है। अतः विकल्प है। मनुष्ठीयमान अवण मनन और निदिध्यासनके होनेपर इसी जन्ममें ज्ञान उत्पन्न . २५२ मापानुवादसहिता [प्र.३ पा०४ माघ०१६] नियम्यते, न विह वा जन्मान्तरे वेति फालविकल्पः । कुतः। श्रवणादिपु प्रव- तमानस्य पुरुषस्य झानेच्छाया ऐहिकज्ञानोत्पत्तिविषयत्वात् । 'इहैव मे विधा जायताम्' इरपमिसंघाप पुरुषः प्रवर्तते। न चादृष्टफलाना यज्ञादीनां तत्सा- धरवेन स्वर्गदजन्मान्तरे ज्ञानोत्पत्तिः शकुनीया। श्रवणादिप्रवृत्तेः प्रागेव विविदिपामुत्पाद्य यज्ञादीनां चरितार्थत्वात् । तस्माद-ऐहिकत्वेन नानोत्पत्ति- नियम्यते। इति प्राक्षे चूम:-प्रसति प्रतिबन्ये ज्ञानमिदेव संभवति । सति तु प्रतिवन्येऽत्रानुष्ठितः श्रवणादिमिर्जग्मान्तरे ज्ञानमुत्पद्यते । प्रतिबन्धश्च बह- विधः श्रूयते- । 'श्रवणायापि बहुभियों न लभ्या दाण्वन्तोऽपि वहवोयं न विद्यः । पाश्चर्योवक्ता कुरालोऽस्य लब्या माश्चर्यों ज्ञाता कुशलानुशिष्टः" । (कठ० २।७) इति, न च पूर्वजन्मानुष्टितैः भवणादिभिजन्मान्तरे ज्ञानोत्पत्तिनं दृष्टचरी। वाम- देवस्य गर्भ एवावस्थितस्य ज्ञानोत्पत्तिश्रवणात् । "गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव एवमुवाच" इति श्रुतेः । तस्मात्-इह वा जन्मान्तरे वा ज्ञानोत्पत्तिः॥ १६ ॥ होता है, ऐमा नियम है। इस जन्ममें अथवा अन्य जन्ममें ज्ञान होगा। इस प्रकार काल विकल्प नहीं है, क्योंकि श्रवण मादिमे प्रवृत्त पुरुषको शानेच्या ऐहिक 'ज्ञानोत्पत्ति विषयक है 'इमी जन्ममे मुझे विद्या हो' इस प्रकारका मभिमधानकर पुरुष श्रवण पादिमें प्रवृत होता है। प्रदृष्टफलवाले यज्ञ मादिके उत्साधक होनेसे स्वर्गके समान जन्मान्तर में ज्ञानोत्पत्ति होगी । ऐमो शहा नहीं करनी चाहिए, क्योकि श्रवण मादिमें प्रवृत्तिके पूर्व ही विविदिपाको उतनकर यज्ञ प्रादि चरितार्थ हैं । इसलिए इसी जन्ममे ज्ञानोत्पत्ति होगी ऐसा नियम है । सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-प्रतिबन्ध न हो नी इमी जन्ममे ज्ञान हो सकता है। प्रतिबन्ध हो तो इम जन्ममे अनुष्ठित श्रवण प्रादिसे जन्मा- स्तरमें ज्ञान उत्पन होता है । सानोत्पचिमे भनेक-विध प्रतिबन्ध सुने जाते हैं- "श्रवणाय वहुभिर्यो न लम्यः' (जो मारमा बहुतोंके श्रवण के लिए भी प्राप्त होने योग्य नहीं है । बहुवे प्रवण करते हुए भी जिस आत्माको नहीं समझते, उस मात्म- तत्वका निरूपणकर्ता भी माश्चर्य रूप है । उमे प्राप्त करनेवाला भी निपुण पुरुष ही होता है तथा कुशल प्राचार्य द्वारा उपदेश किया जाता भी प्राश्चर्यरूप हो है) पूर्व जन्ममे मनुष्ठित प्रवरा मादिसे मन्य जन्ममे ज्ञानात्पत्ति नहीं देखी जाती । तो यह शङ्का ठोक नहीं है, क्योकि गर्भमे ही स्थित वामदेवको ज्ञानो पत्ति सुनी जाती है। - [म० ३ पा० ४ अधि० १७] वैयासिकन्यायमाला २५३ ( मप्तदशे मुक्तेरेकविधत्वाधिकरणे सूत्रम् ) एवं मुक्तिफलानियमस्तदवस्थाधृतेस्तदवस्थाधृतेः॥५२॥ सप्तदशाधिकरणमारचयति- मुक्तिः सातिशया नो वा फलत्वाद्ब्रह्मलोकवत् । स्वर्गवच्च नृभेदेन मुक्तिः सातिशयैव हि ॥ ३५ ॥ ब्राँव मुक्तिनं ब्रह्म क्वचित्सातिशयं ध्रुतम् । अत एकविधा मुक्तिर्वेधसो मनुजस्य च ॥३६ ।। यथा ब्रह्मलोकाख्यं फलं सालोक्यसारूप्यसामीप्यसाष्टिभेदेन चतुर्विधम् । तय साटिन म चतुमुखेन समानश्वयंत्वम् । यथा वा "वर्मभूयस्त्वात्फलभूय- स्त्वम्" इति न्यायेन स्वर्गो बहुविधः । तथा मुक्तिरपि फलत्वाविशेषात्सातिशया। इति प्राप्ते ग्रूमः-मुक्तिर्नाम निजसिद्धग्रह्मस्वरूपमेव न तु स्वगंवदागन्तुकं किंचद्रूपमिति वक्ष्यते । ब्रह्म चेकविधत्वेन श्रुतं नितिं च । तस्माचतुमुखस्य मनुजस्य वा मुक्तिरेकविधैव । सालोक्यादिविशेषस्तु जन्यरूपत्वादुपासनातार- तम्येन सातिशयो भविष्यति । मुक्तिस्तु न तादृशीति सिद्धम् ॥ १७ ॥ 'गर्भ एवंवच्छयानो' (गर्भमे ही शयन किया हुमा वानदेवने ऐसा कहा ) ऐसी अति है । इससे इस जन्ममें अथवा अन्य जन्ममें ज्ञानोत्पत्ति होती है। ऐसा विकल्प है ॥१६॥ सप्तदश अधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देश-मुक्ति सातिशय है मथवा निरविशय ? पूर्वपक्ष --फल होनेसे ब्रह्मलोक अथवा स्वर्गके समान मनुष्य भेदसे मुक्ति सातिशय । सिद्धान्त-ब्रह्म ही मुक्ति है, सातिशय ब्रह्म कहींपर भी श्रुत नहीं है। अतएव ब्रह्मा पोर मनुष्यको मुक्ति एक प्रकारकी होती है । जैसे ब्रह्मलोक नामक फल मालोक्य, सारूप्य, सामीप्य और साटि भेदसे चार प्रकारका है । उनमे साटि नाम चतुर्मुख ब्रह्माके समान ऐश्वर्यत्व है अथवा जमे 'कर्मा- धिक्यसे फलाधिक्य होता है। इस न्याय से स्वर्ग अनेक विध है। वैसे ही मुक्ति भी फल पविशेष होनेसे सातिशय है। सिद्धान्तो--ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-मुक्ति स्वतःसिद्ध ब्रह्मस्वरूप ही है, वह स्वर्गके समान कुछ भी पागन्तुकरूप नहीं है, ऐसा कहेगे, ब्रह्म तो एक प्रका- रका हो त मोर निर्णीत है, इसमें चतुमस ब्रह्मा और मनुष्यको मुक्ति एक प्रकारकी है । सालोक्य मादि विशेष तो जन्यरूप होनेसे उपासनाके तारतम्यसे सातिशय ही होगा किन्तु मुक्ति तो वैसी नहीं है, यह सिद्ध हुमा ।। १७ ॥
२५४ भाषानुवादसहिता[म० ४पा० १ मधि० १] इति श्रीभारतीतीर्थमुनिप्रणीतायां वैयासिकन्यायमालायां तृतीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥४॥ तृतीयोऽध्याया समाः॥ पत्र पादे मादिता। प्रधिकरणानि सूत्राणि ५२ ४७६ अथ चतुर्थाध्यायस्य प्रथमः पादः (मास्मिन् फलाध्याये प्रथमपादे जीवनमुक्तिनिरूपणम् ) (इस फलाध्यायके प्रथम पादमें जोवनमुक्तिका निरूपण है ) (प्रपमे श्रवणमननादीनामावृत्त्यधिकरणे सुत्रे) श्रावृत्तिरसकृदुपदेशात् ।। १॥ लिगाच ॥ २॥ चतुर्थाध्यायस्य प्रथमपादस्य प्रथमाधिकरणमारचयति- श्रवणाद्याः सकृत्कार्या मावा: वा सकृद्यतः। शालार्थस्तावता सिध्येत्प्रयाजादौ सकृत्कृतेः॥१॥ आवर्या दर्शनान्तास्ते तण्दुलान्तावधातवत् । दृष्टेत्र संभवत्यर्थ नादृष्टं कल्प्यते बुधैः॥२॥ इति श्री भारतीतीर्थमुनि प्रणीत वैयामिकन्यायमालाके तृतीयाध्यायके चतुर्थ पादका 'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती' कृत भाषानुवाद ॥४॥ चतुर्थाप्रध्यायके प्रथम पादके प्रथम अधिकरणकी रचना करते है- सन्देह -श्रवण प्रादि एकबार ही करने चाहिए अथवा भावृत्ति-अनेक वार करने चाहिए? पूर्वपक्ष-श्रवण प्रादि एकवार ही करने चाहिए, क्योकि तावन्मात्र ही शास्त्रका प्रयोजन सिद्ध हो जायगा, प्रयाज आदि एकवार ही किये जाते हैं। सिद्धान्त-प्रारममाक्षात्कारपर्यन्त श्रवण प्रादिकी मावृत्ति करनी चाहिए, जैसे सण्डलोंको निपचि होने तक अवघात-कूटना किया जाता है। यहा साक्षात्काररूप दृष्टफलके संभव होनेपर पण्डित लोग अदृष्ट फलकी कल्पना नहीं करते हैं। .
२५५ [म० ४ पा० १ अधि० २] यासिकन्यायमाला "सकृत्कृते कृतः शास्त्रार्थः इति न्यायेन श्रवणादोना प्रयाजादिवत्सकृदेवा- नुष्ठानम्। इति प्राप्ते ब्रम.-उक्तन्यायस्यादृष्टफलविषयत्वात् । अत्र ब्रह्मसाक्षात्कार- लक्षणस्य दृष्टफलस्य संभवात् । 'दृष्टे संभवत्यदृष्टं न कल्पनीयम्' इति न्यायेना- वघातवत्फलसिद्धिपर्यन्त श्रवणाद्यावर्तनीयम् ॥१॥ (द्वितीय मात्मत्वेन ब्रह्मणो ग्रहणाधिकरणे सूत्रम् ) आत्मेति तूपगच्छन्ति प्रायन्ति च ॥३॥ द्वितीयाधिकरणमारचयति- ज्ञात्रा स्वान्यतया ब्रह्म ग्राह्यमात्मतयाऽथवा । अन्यत्वेन विजानीयादु ख्यदुःखिविरोघतः ॥३॥ औपाधिको विरोधोऽत अात्मत्वेनैव गृह्यताम् । गृह्णन्त्येवं महावाक्ये स्वशिष्यान्ग्राहयन्ति च ॥ ४ ॥ यच्छास्त्रप्रतिपाद्यं ब्रह्म तज्जीवेन ज्ञात्रा स्वव्यतिरिक्ततया ग्रहीतव्यम् । दुख्यदु खिनोर्जीवब्रह्मणोरेकत्वविरोधात् । इति प्राप्ते ब्रूम -'वस्तुतो ब्रह्मस्वरूपस्यैव सतो जीवस्यान्तःकरणोपाधिकृतो "सत्कृते कृतशास्त्राय.' ( एक वार करनेसे शास्त्रका प्रयोजन सिद्ध हो जाता है ) इम न्यायसे प्रयाज आदिके समान एकवार ही श्रवण प्रादिका अनुष्ठान करना चाहिए। सिद्धान्तो-ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-उक्त न्याय प्रदृष्टफल विषयक है मर्याद जहा मदृष्टफल हो उस स्थलके लिए है। परन्तु यहां तो ब्रह्म माक्षात्काररूप दृष्टफलका समव होनेसे 'दृष्टफलके संभव होनेपर प्रदृष्टफलकी कल्पना नही करनी चाहिए' इस न्यायसे अवघातके समान फलसिद्धि पर्यन्त श्रवण प्रादिको प्रावृत्ति करनी चाहिए ॥१॥ द्वितीय भधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-ज्ञातासे स्वभिन्नरूपसे ब्रह्मका ग्रहण करना चाहिए अथवा स्वस्वरूपसे । पूर्वपक्ष-भिन्नरूपसे ही ब्रह्मको जानना चाहिए, क्योकि दुखी और सुखी भत्यन्त विरुद्ध हैं। सिद्धान्त-सुखी और दुखी रूपसे ब्रह्म और जीवका विरोध तो प्रोपाधिक है, इसलिए मात्मरूपसे ही ब्रह्मका ग्रहण करना चाहिए, इससे तत्ववेत्ता महावाक्योंसे मात्मत्वेन ब्रह्मका ग्रहण करते हैं मौर अपने शिष्योको भी ग्रहण कराते हैं। जो शास्त्र प्रतिपाद्य ब्रह्म है, वह ज्ञाता जीव द्वारा स्वभिनरूपसे ग्रहण करना चाहिए, क्योकि दुःखी-सुखी जीव मोर ब्रह्मका एकत्व विरुद्ध है। सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-वस्तुत ब्रह्मस्वरूप ही जीव २५६ भाषानुवादसहिता [भ० ४ पा० १ पषि०३] दुखित्वादिगंगारपर्म.' इति विपत्पादे (म० पू०प०२ पा०३) जीवविचारे प्रपधितम् । प्रतो यास्तव विरोधामायादारमत्वेनेव ब्रह्म गृह्यताम् । पत एवं 'महं ब्रह्मास्मि' भयमारमा 'ग्रह्म' इत्यादिमहावाक्यस्तस्यविद प्रात्मत्वेनैव ब्रह्म गृह्णन्धि। तथा 'तत्त्वमसि' इत्यादिमहावाण्यै स्वशिप्यान्याहपन्स्यपि । तस्मादात्मत्वेनैव ब्रह्म प्रहीतध्यम् ॥२॥ (तृतीये प्रतीकेन्दृष्टिनिसरणापिकरणे मूत्रम्) न प्रतीये न हिमा॥४॥ तृतीयाधिकरणमारवयनि- प्रतीवेऽहंदृष्टिरस्ति न या, ब्रह्माविभेदतः। जीवप्रतीपयोहाराष्टिरिप्यते ॥५॥ प्रतीमत्वोपासक्त्वहानियोग्ययोधारणे प्रवीक्षणे तु मिन्नत्यानास्त्यष्टिपोग्यता ॥६॥ 'मनो ग्रह्मेत्युपासीत' 'मादित्यो ब्रह्म' इत्यादिषु अझदृष्टपा संस्कृतं मन- मादित्यादिप्रतीकमुपास्यम् । तच्च मतीरमुपासन स्वात्मतया प्रहीतव्यम् । प्रतीरस्य ब्रह्मवार्यस्वेन ग्रह्मणा सह भेदाभावात् । जीवस्य च ब्रह्माभिन्नत्वात् । ब्रह्मवारोपास्यप्रतीव स्योपासकजीवस्य च भेदाभावेनैकत्वसंभयात् । है, तो भी मन्त्र करण पाउपाधि सिदिममार धर्मवाला है, इसका वियद- पिकरण के जीवविचारमे विस्तारसे विचार रिया गया है। मतएव वास्तविक विरोध न होनेसे पारमरूपसे ही ब्रह्मका ग्रहण करना चाहिए। इसलिए 'मह ब्रह्मास्मि' "मय- मारमा ब्रह्म' इत्यादि वाक्योसे तत्त्वविद भामरूपसे ब्रह्मका परण करते है एवं 'तत्वमसि' मादि महावाक्योंसे पपने शिष्योको मो मात्मरूपसे ग्रहावा ग्रहण कराते हैं। इससे पात्मरूपसे ही प्रहाका ग्रहण करना चाहिए ॥ २॥ तृतीय पधिकरणकी रचना करते है- सन्देह-प्रतीकमें पहंदृष्टि है अथवा नहीं ? पूर्वपक्ष-ब्रह्मके साथ सबका मभेद होनेसे जीव पौर प्रतीकों ब्रह्मद्वारा भहंदृष्टि करनी चाहिए। सिद्धान्त-प्रविय वोक्षण ज्ञानकालमें प्रतीक त्व मोर उपासकवको हानि है पोर प्रवीक्षण भज्ञानकालमें भिन्न होनेके कारण प्रदृष्टिको योग्यता नहीं है । मनो ब्रह्मेत्युपासीa' (मन ब्रह्म है ऐसी उपासना करे) 'पादियो ब्रह्म' (पादित्य ब्रह्म है ) इत्यादिमें ब्रह्मष्टिसे संस्कृत मन, पादित्य मादिप्रतीक उपास्यरूपसे बुत हैं। वह प्रतीक उपासकद्वारा स्वात्मापसे ग्रहण करना चाहिए। क्योंकि प्रतीक ब्रह्मका [१० ४ पा० १ अधि०४ ) वैयासिकन्यायमाला २५७ इति प्राप्ते घूमः यदि ब्रह्मकार्यस्य ब्रह्मैक्यमवलोक्यते, तदा प्रतीकस्वरूपमेव विलोयेत । घटस्य मृद्रूपेणेतये विलयदर्शनात् । यदि च जीवस्य ब्रह्मक्यमव- लोक्येत, तदा जीवत्वापाये सत्युपासकत्वं हीयेत । अथोपास्योपासकस्वरूपलोभेन कार्यकारणक्यं जीवनीक्यं च न पर्यालोच्येत, तदा गोमहिपवदत्यन्तभिन्नयोः प्रतीकोपासकयो स्त्येव त्वयोग्यता। तस्मात्प्रतीके नास्त्यहंदृष्टिः ॥ ३ ॥ (चतुर्थ उपास्ये ब्रह्माष्टपधिकरणे सूत्रम् ) ब्रह्मदृष्टिरुत्कर्षात् ॥ ५॥ चतुर्थाधिकरणमारचयति- किमन्यधोब्रह्मरिण स्यादन्यस्मिन्ब्रह्मधीरुत। अन्यदृष्टयोपासनीयं ब्रह्मात्र फलदत्वतः॥७॥ उत्कर्षतिपरत्वाभ्यां ब्रह्मदृष्टयाऽन्यचिन्तम् । प्रन्योपास्त्या फलं दत्ते ब्रह्मातिथ्याधुपास्तिवत् ॥८॥ कार्य होनेसे उसका ब्रह्मके साथ भेद नहीं है। और जीव भी ब्रह्मसे अभिन्न है, इससे ब्रह्मद्वारा उपास्य प्रतीकका मौर उपासक जीवका भेद न होनेसे एकत्व हो सकता है। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं--यदि ब्रह्मकार्य-प्रतीकका ब्रह्मके साथ ऐक्य देखा जाय तो प्रतीकका स्वरूप ही विलीन हो जायगा, क्योकि लोकमें घटका मृदूपसे ऐक्य होनेपर विलय देखा जाता है। पोर यादि जीवका ब्रह्मके साप ऐक्य देखा जाय तो जीवत्वका नाश होनेपर उपासकत्वका नाश होगा। यदि उपास्यो- पासकस्वरूपके लोमसे कार्यकारणका ऐक्य प्रौर जीवब्राँक्य पर्यालोचित नही हो, तो गो महिषके समान अत्यन्त भिन्न प्रतीक और उपासकमे एकत्वको योग्यता ही नहीं है। इससे प्रतीक्मे महंतष्टि नहीं है ॥३॥ चतुर्य मधिकरणकी रचना करते हैं-- -क्या ब्रह्ममे अन्य-आदित्य आदि बुद्धि करनी चाहिए मथवा प्रादित्य मादिमें ब्रह्मबुद्धि करनी चाहिए ? पूर्वपक्ष-अन्यदृष्टि से ब्रह्मकी उपासना करनी चाहिए, क्योकि यहां ब्रह्म ही फल- दाता है। सिद्धान्त-उत्कर्ष और 'इति' परत्व होनेसे ब्रह्मदृष्टिसे अन्यका चिन्तन करना पाहिए, मतिथि मादिकी उपासनाके समान पन्यकी उपासना करनेसे भी ब्रह्म ही फल सन्देह- देता है।
। २५८ भाषानुवादसहिता [म० ४ पा० १षि०५ ] 'मनो ब्रह्म' इत्यत्राग्रह्मस्वरूपमनोष्टिं ब्रह्मरिण वृत्वा महोपासनीयम् । ब्रह्मरणः फलमदत्वेनोपास्यताहत्वात् । इति प्राप्से बम:-प्रहारण उत्कृष्टत्वादष्टिनिवृष्टे मनसि पर्तय्या । लोके हि निकृष्टे भृत्ये राजदृष्टि वृत्वा राजवत्तं पूजयन्ति । सिंच 'मनो ब्रह्मेत्युपासीत' इत्यत्र ब्रह्मशब्द इतिशब्दपरत्वेन दृष्टिलक्षाको भविष्यति । मन.दादश्वामिति- परत्वामुख्यार्थवाची। यथा 'स्थाणु चौर इति प्रत्येति' इत्यत्र स्थाणुशन्दो- मुख्यावाचो चौरमाम्दो दृष्टिलक्षवस्तद्वत् । न चाब्रह्मस्वरूपस्य मनस उपास्यत्वे ब्रह्मणः फलप्रदत्वानुपपत्तिः। प्रब्रह्मस्वरूपस्याप्यतिधेरुपासने कर्माध्यक्षवेन यथा फलं प्रयच्छति, तद्वदापि संभवात् । तस्मादग्रहरिण प्रतीके ब्रह्मधीः कर्तव्या ।। ४॥ (पश्चम मङ्गवादित्यत्वादिधीकरणापिकरणे मूत्रम्) आदित्यादिमतयश्चाङ्ग उपपत्तेः ॥ ६॥ पञ्चमाधिकरणमारचर्यात- मादित्यादावनदृष्टिर रव्यादिधीरुत मोत्कर्षों ब्रह्मजत्वेन द्वयोस्तेनैच्छिकी मतिः ॥६॥ 'मनो ब्रह्म' यहाएर ब्रह्मस्वरूप मनोष्टि ब्रह्ममें कर ब्रह्मकी उपासना करनी चाहिए। क्योंकि ब्रह्म फलदाता है, मतः वह उपासनाके योग्य है । सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्षा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-ब्रह्म उत्कृष्ट है, मका प्रह्मा- दृष्ठि निकृष्ट मनमें करनी चाहिए। लोकमें भी ऐसा देखा गया है कि निकृष्ट भृत्यमें राब- रष्टिकर राजाके ममान उमको पूजा-गरकार करते हैं। विंच 'मनो ब्रह्मेत्युपासीत' इस तिमें ब्रह्मशब्द 'इति' शब्द परत्व होनेसे दृष्टिका लक्षक होगा । मन शब्द 'इति' परत्व न होनेसे मुख्यायवाची है । जैसे 'स्थाणु' चोर इति प्रत्येति' (स्थाणुको घोर ऐसा जानता है ) यहाँपर स्थाणु शब्द मुख्यार्थवाचो है पौर चौर शब्द दृष्टिका लक्षक है । वैसे प्रकृतमें समझना चाहिए। यदि प्रब्रह्मस्वरूप मन उपास्य माने तो ब्रह्म फलदाता नहीं हो सकता, तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि भब्रह्मस्वरूप अतिथिको उपासनामें भी कर्माध्यक्ष- रूपसे जैसे ईश्वर फल देता है, वैसे यहां प्रकृतमें भी संभव है। इससे प्रब्रह्म प्रतीकमें ब्रह्मबुद्धि करनी चाहिए ॥ ४॥ पञ्चम मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-मादित्य आदिमे अङ्ग दृष्टि करनी चाहिए अथवा मङ्गोंमें मादित्यादि दृष्टि करनी चाहिए।
२५६ [म०४ पा० १ मधि०६] वैयासिकन्यायमाला आदित्यादिधियाऽङ्गानां संस्कारे कर्मणः फले। पुज्यतेऽतिशयस्तस्मादनेष्वकर्कादिदृष्टयः ॥१०॥ 'य एवासी तपति तमुद्गीथमुपासीत' इत्यत्राऽदित्यदेवता प्रतीकं कृत्वा कर्मानभूतोद्रीयदृष्टिः कर्तव्या। विपर्ययेण वा कर्माण प्रादित्यदृष्टिः। प्रादि- त्योद्रोथयोरुभयोब्रह्मकायंत्वेन पूर्वाधिकरणोत्कर्षन्यायानवतारेण नियामका- भावात् । इति प्राप्ते ब्रूमः-प्रादित्यदृष्टया कर्मा संस्कर्तव्यम् । तथा सति दृष्टिभिः संस्कृतस्य कर्मणः फलातिशयसंभवात् । विपर्यये तु कर्मागरादित्यदेवतार्या संस्कृतायां किं तव फलिष्यति । न ह्यक्रियात्मिका देवता फलस्य साधनं भवति । अन्यथा देवतायाः साधारणत्वेन यजमानायजमानयोः फलसाम्य- प्रसङ्गात् । तस्मादनेवादित्यादिदृष्टयः कर्तव्याः॥५॥ (पष्ठ उपासन पासनावश्यकताधिकरणे सूत्राणि ) आसीना संभवात् ॥७॥ ध्यानाच्च ॥८॥अचलत्वं चापेक्ष्य ।। ।। स्मरन्ति च ॥१०॥ पष्ठाधिकरणमारचयति- पूर्वपक्ष-ब्रह्मजन्य होनेसे दोनोंमें कोई उत्कर्ष-अतिशय न होनेसे पपाभिमत दृष्टि की जा सकती है। सिद्धान्त-मादित्य मादि बुद्धिसे मङ्गोका संस्कार होनेसे कर्मके फलमें भतिशय युक्त है । इससे अङ्गोमें ही आदित्य प्रादि दृष्टि करनी चाहिए। 'प एवासी तपति' (जो यह प्रादित्य तपता है ) 'तमुद्गीथमुपासीत' ( उस उद्गीयको उपासना करे ) यहापर मादित्य देवताको प्रतीककर फर्माङ्गभूत उद्गीय दृष्टि करनी चाहिए । अथवा विपयर्य से कर्भाङ्गमे मादित्य दृष्टि करनी चाहिए। क्योकि मादित्य और उद्गीथ दोनोंको ब्रह्मकार्य होनेसे पूर्वाधिकरणमें उक्त उत्कर्ष न्यायके प्रवृत्त न होनेसे कोई नियामक नहीं है। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-आदित्य दृष्टिसे कर्माङ्गका संस्कार करना चाहिए, क्योकि ऐसा होनेपर दृष्टियोसे संस्कृतका फलातिशय होता है, विपर्ययमें तो काङ्गोसे आदित्य देवताका संस्कार होनेपर तुम्हे क्या फल होगा ? प्रक्रियात्मक देवता फलका साधन नहीं होता। अन्यथा देवताके साधारण होनेसे यजमान और प्रयजमानको फल समान होगा। इमसे अनोमें प्रादित्य मादि दृष्टि करनी पाहिए ॥५॥ पष्ठ मधिकरणकी रचना करते हैं- - 1 पासितुं शक्यम्, २६० .] मापानुयादसहिता [म. ४ पा० १ अधि०७ नास्त्यासनस्य नियम उपास्तावुत विद्यते । न देहस्थितिसापेक्षा मनोप्तो नियमो न हि ॥११॥ शयनोत्थानगमविक्षेपस्यानिवारणात् घोसमाधानहेतुत्वात्परिशिष्यत मासनम् ॥ १२॥ 'मासीनेनैवोपासितव्यम्' इति नास्ति नियमः। मानसव्यापार प्रति देहस्थितिविशेपस्यनुपयुक्तत्वात् । इति प्राप्ते ब्रूमः-परिशेपादामन नियम्यते । तथाहि-न तादच्छयानेनो. अकस्मानिद्रयाऽभिभूतेः संभवात् । नाप्युत्यितेन गच्छता दा, देहधारणमार्गनिश्चयादिव्यापारेण चित्तस्य विक्षिप्तत्वात् । पत मासोने- नैवोपासितव्यम् ॥ ६॥ (मप्तम उपासने दिगादिनियमनिराकरणाधिकाणे सूत्रम् ) यामता तनाविशेषात् ॥११॥ सहमाधिकरणमारचपति- दिग्देशकालनियमो विद्यते वा न विद्यते । विद्यते वैदिकत्वेन कर्मस्वेतस्य दर्शनात् ॥ १३ ।। सन्देह-उपसनामे मामनका नियम है अथवा नहीं ? पूर्वपक्ष-मन देदकी स्थितिको अपेक्षा नहीं रखता, मतः मासनका नियम नहीं है। सिद्धान्त-शयन, उत्थान और गमनसे विज्ञपका निवारण न होनेके कारण वृद्धिको स्थिरांके हेतु मासनका परिशेपमे उपासनामें नियम है । 'बैठकर ही उपासना करनी चाहिए ऐसा नियम नहीं है, क्योंकि मानस व्यापारके प्रति देह स्थिति विशेष उपयुक्त नहीं है । सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं--परिशेषसे प्रासनका नियम है, जैसे कि शयन करनेवाला उपासना नहीं कर सकता, क्योकि अकस्मात् निद्रासे उपासनाका अभिभव होना संभव है। खडे होकर वा चलकर भी उपासना नहीं हो सकती, क्योंकि देहधारण, मार्ग निश्चय आदि व्यापारके होनेसे चित्त विक्षिप्त होता है । इससे बैठकर ही उपामना करनी चाहिए ।। ६ ।। सप्तम अधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह--उपासनामों में दिक् , देश और कालका नियम है अथवा नहो ? U 1 [म० ४ पा० १ अधि०७] वैयासिकन्यायमाला ऐकाग्न्यस्याविरोपेरण दिगादिन नियम्यते। मनोनुकूल इत्युक्त दृष्टार्थ देशभाषणम् ॥ १४ ॥ "ब्रह्मयज्ञेन यक्ष्यमाणः प्राच्यां दिशि" इति दिग्नियमः। "प्राचीनप्रवणे वैश्वदेवेन यजेत" इति देशनियमः "अथ यदपराह्न पिण्डपितृयज्ञेन 'चरन्ति" इति कालनियम. तदेतन्नियमप्रयं यया कमणि दृश्यते तथोपासनेऽपि द्रष्टव्यम् । वैदिकत्वस्याविशेषात् । इति प्राप्ते ब्रूमः-ऐकायं हि ध्यानस्य प्रधान साधनम् । न च तस्य दिगादिनियत्या कश्चिदतिशयो विद्यते । अतो नास्ति नियमः । अत एव श्रुतिर्योगाभ्यासाय प्रदेशं निर्दिशन्तो "मनोनुकूले" इत्येवाऽऽह । 'यस्मिन्देशे सौमनस्यं तत्रैव मनो युज्यात्, नतु शास्त्रेण नियमितः कश्चिद्देशोऽस्ति' इत्यर्थः । "समे शुचौ शर्करावह्निवालुकावजिते" ( श्वे ० २०१०) इति योगाभ्या- साय देशविशेषः श्रूयत इति चेत् । सत्यम् । दृष्टसोकथं तु तदिति वाक्यशेषे मनोनुक्लत्वविशेषणान्निश्चीयते । तस्मान्नास्ति दिगादिनियम. ॥७॥ पूर्वपक्ष-दिगादिका नियम वैदिक कामे देखा जाता है, मता वैदिकत्व समान होने से उपासनामोमे भो दिगादिका नियम है। सिद्धान्त-उपासनानोमे सामान्यतः एकाग्रताको अपेक्षा होनेसे दिगादिका नियम नहीं है 'मनोनुक्ले' इस उक्तिसे देशविशेषका कथन केवल दृष्टार्थ है 'ब्रह्मयज्ञेन०' ( यज्ञ करने की इच्छावाला पूर्वदिशामे ब्रह्मयज्ञ करे ) इसप्रकार दिशा- का नियम है, 'प्राचीनप्रवणे.' (पूर्वदिशामें क्रमश: निम्नस्थलमे वैश्वदेव करे ) यह देशका नियम है । 'अय यदपराह्न ' ( अपराह्नमे पिण्डपितृ यज्ञ करे ) इस प्रकार काल- का नियम है । इन श्रुतियोले क्रमशः ब्रह्मयज्ञ, वैश्वदेव और पिण्डपितृयज्ञमे पूर्वदिशा, निम्नदेश और अपराह्न काल यह तीन नियम जैसे कर्ममे देखे जाते हैं, वैसे उपासनाओमे भी समझना चाहिए। क्योकि इनमें भी वैदिकत्व समान है। सिद्धान्ती--ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-एकाग्रता ही ध्यानका प्रधान सापन है । उसमे दिशा प्रादिका नियम करनेसे कोई अतिशय नहीं है । अतः नियम नहीं है । प्रतएव श्रुति योगाम्यासके लिए प्रदेशका निर्देश करती हुई 'मनोनुकूले' ऐसा ही कहती है । जिस देशमे मन मग्या रहे, उसो देशमे मनको स्थिरता करो, परन्तु शास्त्र द्वारा कोई नियमित देश नहीं है' ऐमा अर्थ है । 'समे शुचौ०' (समतल, पवित्र, सूक्ष्म पाषाण, भग्नि मोर वालूसे रहिन तथा शब्द, जल पनवट रहित ) इस प्रकार योगा- म्यासके लिए देश विशेष सुना जाता है ? ऐडा यदि कहो, तो ठोक है, परन्तु यह दृष्ट ११० भाषानुवादसहिता [म. ४ पा० १ मपि०७ } नास्त्यासनस्य नियम उपास्तावुत विद्यते । न देहस्थितिसापेक्ष मनोप्तो नियमो न हि ॥ ११ ॥ मायनोत्थानगमनविक्षेपस्यानिवारणात् घोसमाधानहेतृत्वात्परिशिष्यत प्रासनम् ॥ १२॥ 'मासीनेनैवोपासितव्यम्' इति नास्ति नियमः। मानसव्यापार प्रति देहस्थितिविशेषस्यनुपयुक्तत्त्वात् । इति प्राप्ते ग्रूमः-परिशेषादासन नियम्यते । तथाहि न तादच्छयानेनो- पासितुं शक्यम्, अपस्मानिद्रयाऽमिभूतेः संभवात् । नाप्युत्पितेन गन्छता भा, देहधारणमार्गनिश्चयादिव्यापारेण चित्तस्य विशित्वात् । पत भासीने. नैवोपासितव्यम् ॥ ६ ॥ (सप्तम उपामने दिगादिनियमनिराफरणाधिकरणे मूत्रम्) यकारता समाविशेषात् ॥११॥ सप्तमाधिकरणमारचयति- दिग्देशकालनियमो विद्यते वा न विद्यते। विद्यते वैदिवत्वेन कमस्वेतस्प दर्शनात् ॥ १३ ॥ सन्देह-उपसनामे भासनका नियम है अथवा नहीं। पूर्वपक्ष --मन देहको स्थितिको अपेक्षा नहीं रखता, मतः पासनका नियम नहीं है । सिद्धान्त-शयन, उत्यान मोर गमनसे विशेषका निवारण न होने के कारण बुद्धिको स्पिरतोके हेतु मारनका परिशेषमे उपासनामें नियम है । 'बैठकर ही उपासना करनी चाहिए ऐसा नियम नहीं है, क्योंकि मानस व्यापारके प्रति देहस्थिति विशेष उपयुक्त नहीं है। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-परिशेषसे भासनका नियम है, जैसे कि शयन करनेवाला उपासना नहीं कर सकता, क्योकि मकस्मात निद्रासे उपासनाका अभिभव होना सभव है। पडे होकर वा चलकर भी उपामना नहीं हो सकती, क्योंकि देहधारण, मार्ग निश्चय आदि व्यापारके होनेसे चित्त विशिम होता है। इससे बैठकर ही उपासना करनी चाहिए ॥ ६॥ सप्तम भधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-उपासनामोमें दिक् , देश और कालका नियम है अथवा नही ?
। [अ० ४ पा० १ अधि०६] वैयासिकन्यायमाला २६३ वृत्तिलक्षणो दृष्टोपायः परित्याज्यो भवति । अन्यथा सर्वस्य सुखदुःखादेरपूर्व- जन्यत्वेन भोजनाद्यों दृष्टः प्रयत्नः परित्यज्येत । ततो दृष्टार्थोपायत्वादामरण- मावतंनं कर्तव्यम् । यद्यप्येतान्यष्टावधिकरणानि साधन विचारत्वात्पूर्वाध्याये योग्यानि, तथाऽपि फलप्रत्यासनसाघनत्वात्फलाध्याये विचारितानि ॥ ८॥ (नवमे शानिनः पापलेपनिराकरणाधिकरणे सूत्रम् ) तदधिगम उत्तरपूर्वाधयोरश्लेषविनाशौ तव्यपदेशात् ॥१३॥ नवमाधिकरणमारचयति- ज्ञानिनः पापलेपोऽस्ति नास्ति वाऽनुपभोगतः । अनाश इति शास्त्रेषु घोषाल्लेपोऽस्य विद्यते ॥ १७ ॥ प्रकत्मिधिया वस्तुमहिम्नैव न लिप्यते। अश्लेषनाशावप्युक्तावजे घोपस्तु सार्थकः ॥ १८ ॥ 'नामुक्त क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि' इति पापाविनाशस्य सर्वशास्त्र- प्रसिद्धत्वाद्ब्रह्मज्ञानिनोऽप्यस्ति पापलेपः । इति प्राप्ते घूमः--तत्र तावन्निगुणब्रह्मात्मतत्त्वविदः पापलेपशङ्काऽपि निरन्तर प्रावृत्ति रूप दृष्ट उपाय परित्पाज्य नहीं होता। अन्यथा सब सुखदुःखादि अपूर्व जन्य होनेसे भोजनादि अर्प दृष्ट प्रयल भी परित्याज्य होगा। इससे दृष्टार्थ उपाय होनेसे मरणार्यन्त प्रावृत्ति करनी चाहिए । यद्यपि ये पाठ अधिकरण साधन विचार होनेसे पूर्वा- ध्यापके योग्य थे, तथापि फलके प्रति प्रतिसमीप साधन होनेसे फलाध्यायमें इनका विचार किया गया है ॥८॥ नवम अधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-ज्ञानीको पापका लेप होता है अथवा नही । पूर्वपक्षा-ज्ञानीको भी पापका लेप होता । क्योकि शास्रोमे ऐसी घोषणा है कि भोगके विना पापका नाश नहीं होता। सिद्धान्त-मात्मा प्रकर्ता है, इस प्रकार बुद्धिसे प्रकत्मिक वस्तुको सामर्थ्य से ही लिप्त नहीं होता है, क्योकि 'मश्लेष और विनाश' को शास्त्रमें उक्ति है । शास्त्रका जो उक्त घोष है वह तो मज्ञानी पुरुषके लिए है ज्ञातोके लिए नहीं। 'नामुक्त क्षीयते कर्म' (अभुक्त कर्म सौ कोटिकल्योमे भी क्षय नहीं होता ) इस प्रकार पापका अविनाश सर्व शास्त्र प्रसिद्ध होनेसे ब्रह्मज्ञानीको भी पापका लेप-सम्बन्ध होता है। सिद्धान्तो-ऐमा पूर्वपश प्राप्त होनेार हम कहते हैं-यहा तो निर्गुण ब्रह्मारम- २५२ भाषानुवादसहिता [म०४ पा० १ अपि०८] (भष्टम उपासनानामामरणावत नापिकरणे मूत्रम्) आ प्रायपत्तत्रापि हि दृष्टम् ।।१२।। मष्टमाधिकरणमारचयति- उपास्तीना यावदिच्छमावृत्ति स्यादुताऽमृति । उपास्त्पमिनिष्पत्तेर्यावदिच्छ न तूपरि॥१५॥ अन्त्यप्रत्ययतो जन्म भाव्यतस्तत्प्रसिद्धये। प्रामृत्यावर्तन ल्याम्य सदा तद्भाववाक्यत ॥१६॥ विजातीयप्रत्ययेनानन्तरितसजातीयप्रवाह उपास्तिशब्दाः । कियताऽपि कालेन सपद्यते। मतो यावदिच्छमावृत्ति , न त्वामरणम् । इति प्राप्ते बम -भाविजन्मन प्रयोजनोऽन्त्यप्रत्यय मामरणमावृत्तिम न्तररेण न सुलभ । अत एव स्मृति:-, सदा तद्भावभावित (गोता० ८।६) इत्याह । कथ तहि ज्योतिष्टोमादिकमणा स्वर्ग गच्छतोऽन्त्यप्रत्यय । धर्मजन्या पूर्ववशादिति ब्रूमः। उपासनेऽप्यपर्वमस्तीति चेत् । बाढम् । नैतावता निरन्तरा सौकर्यके लिए है । इस प्रकार वाक्यरोपमें मनोनुकूलत्व भविशेषसे ही निश्चय किया जाता है, इससे उपासनामोंमें दिशा मादिका नियम नहीं है ॥७ ।। पष्टम मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-उपासनामों की मावृत्ति इच्छाके अनुसार होनी चाहिए अथवा मरण पर्यन्त। पूर्वपक्ष-उपासनाके अर्थको अभिनिष्पत्तिसै ज्ञात होता है कि इच्छानुसार प्राधि होनी चाहिए उमके ऊपर-मरणपर्यत नहीं। सिद्धान्त- सदा तद्भावमादित' इस वाक्य प्रमाणसे अन्य प्रत्ययसे ही भावी जम होता है प्रत उसको सिद्धि के लिए मरणपर्यत मावृत्ति न्याय युक्त है। विजातीय प्रययके व्यवधान रहित सजातीय प्रत्यय प्रवाह उपासना शब्दका अर्थ है। वह तो कितने कालमे भी सम्पन्न हो सकता है प्रत जब सक इच्छा हो तबतक उपासनाकी मावृत्ति होनी चाहिए किन्तु मरणपय त नहीं। सिद्धान्तो-ऐसा पूर्व पक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं--भाविज मका प्रयोजक तिम प्रत्यय मरण पर्य त प्रावृत्तिके विना सुलभ नहीं है । प्रतएव स्मृति भी सदा तद्भाव' (मवदा उसके भावसे भाषित ) इस प्रकार कहती है । तो ज्योतिष्टोम प्रादि कर्म द्वारा स्वगमें जानेवालेका अन्त्य प्रयय कैसे होगा कम जय अपूर्व द्वारा ऐसा हम कहते हैं । यदि कहो कि उपामनामें भी पूर्व है ठीक है परन्तु इतने मात्रसे म० ४ पा० १ अधि०६] वैयासिकन्यायमाला २६३ वृत्तिलक्षणो दृष्टोपायः परित्याज्यो भवति । अन्यथा सर्वस्य सुखदुःखादेरपूर्व- जन्यत्वेन भोजनाद्यर्थों दृष्टः प्रयत्नः परित्यज्येत । ततो दृष्टार्थोपायत्वादामरण- मावतनं कर्तव्यम् । यद्यप्येतान्यष्टावधिकरणानि साधनविचारत्वात्पूर्वाध्याये योग्यानि, तथाऽपि फलप्रत्यासनसाधनत्वात्फलाध्याये विचारितानि ॥ ८॥ (नवमे शानिनः पापलेपनिराकरणाधिकरणे मूत्रम् ) तदधिगम उत्तरपूर्वाघयोरश्लेषविनाशौ तव्यपदेशात् ॥१३॥ नवमाधिकरणमारचयति- ज्ञानिनः पापलेपोऽस्ति नास्ति वाऽनुपभोगतः । अनाश इति शास्त्रेषु घोषाल्लेपोऽस्य विद्यते ॥१७॥ प्रकारमधिया वस्तुमहिम्नैव न लिप्यते । अश्लेषनाशावप्युक्तावजे घोषस्तु सार्थकः ॥ १८ ॥ 'नामुक्त क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि' इति पापाविनाशस्य सर्वशाख- प्रसिद्धत्वाद्ब्रह्मज्ञानिनोऽप्यस्ति पापलेप. । इति प्राप्ते ब्रूम.-नत्र तावन्निर्गुणब्रह्मात्मतत्त्वविदः पापलेपशङ्काऽपि निरन्तर पावृत्ति रूप दृष्ट उपाय परित्याज्य नहीं होता। अन्यथा सब सुखदुःखादि भपूर्व जन्य होनेसे भोजनादि अर्थ दृष्ट प्रयल भी परित्याज्य होगा। इससे दृष्टार्य उपाय होनेसे मरणपर्यन्त प्रावृत्ति करनी चाहिए । यद्यपि ये पाठ अधिकरण साधन विचार होने से पूर्वा- व्यायके योग्य थे, तथापि फलके प्रति प्रतिसमीप साधन होनेसे फलाध्यायमें इनका विचार किया गया है॥८॥ नवम अधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-ज्ञानीको पापका लेप होता है अथवा नही ? पूर्वपक्ष-ज्ञानीको भी पापका लेप होता । क्योकि शास्त्रोमे ऐमी घोषणा है कि भोगके विना पापका नाश नहीं होता। सिद्धान्त-मात्मा अकर्ता है, इस प्रकार बुद्धिसे अकात्मक वस्तुको मामर्थ्य से हो लिस नहीं होता है, क्योकि 'प्रश्लेष और विनाश' की शास्त्रमें उक्ति है । शास्त्रका जो उक्त पोप है वह तो अज्ञानी पुरुषके लिए है जानौके लिए नहीं। 'नामुक्त क्षीयते कर्म' (अभुक्त कम सौ कोटिकल्पोमे भी क्षय नही होता ) इस प्रकार पापका अविनाश सर्व शास्त्र प्रसिद्ध होनेसे ब्रह्मज्ञानीको भी पापका लेप-सम्बन्ध होता है। सिद्धान्तो-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेर हम कहते हैं-यहां तो निर्गुण ब्रह्मारम- । २६४ भाषानुवादसहिता [अ०४ पा० १ अधि० १० ] नोदेति । नाव न करोमि न करिष्यामीति कालत्रयेऽप्या ग्रहास्वरूपत्वेन निश्चितत्वात् । न ह्यातुलेपं मन्दा अपि शंकन्ते । नापि सगुणग्रह्मविदो लेपो स्ति । अश्लेषविनाशयो। श्रुतत्वात् । ब्रह्मसाक्षाताराद्ध्वं देहेन्द्रियव्यवहारव- पात्संभावितस्य पापस्याश्लेपः श्रूयते । तद्यथा-'यथा पुष्करपलाश प्रापो न श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न लिप्यते' ( छा०४१४३ ) इति । साक्षा- कारात्पूर्व विह जन्मनि जन्मान्तरेषु च संचितस्य पापसंघातस्य विनाशः धूयते-"तद्यषेपीकातूलमग्नो प्रोतं प्रदूषत, एवं हास्य सर्व पाप्मानः प्रदूयन्ते" (छा० ५।२४।३ ) इति । 'नाभुक्तम्' इत्यादिशास्त्रं तु सगुण निर्गुणग्रह्मज्ञान- रहितविपयम् । तस्मानास्ति ज्ञानिनः पापलेपः ॥६॥ (दशमे शानिनः पुण्यलेपनिराकरणाधिकरणे मूत्रम् ) इतरस्याप्येवमसंश्लेपः पाते तु ॥ १४ ॥ दशमाधिकरणमारचति- पुण्येन लिप्यते नो वा लिप्यतेऽस्य श्रुतत्वतः। न हि श्रौतेन पुण्येन श्रोतं ज्ञान विरुध्यते ॥ १६ ॥ मलेपो वस्तुमामात्समानः पुण्यपापयोः । श्रुतं पुण्यं पापतया तरणं च समं श्रुतम् ॥ २० ॥ तत्त्वविदके लिए पापको शङ्का भी उदय नहीं होती, क्योकि 'न किया, न करता हूँ और न करूंगा' इस प्रकार तीनों कालोमें भी अकर्तृ ब्रह्मस्वरूपमे निश्चित है । पतकि विषयमे पापलेपको शङ्का मन्द भी नही करते । सगुणविद्को भी पापलेप नहीं है, क्यो- कि भश्लेष और विनाश श्रुत हैं । ब्रह्ममाक्षात्कारके मनन्तर देह, इन्द्रिय व्यवहारके बल से संभावित पापका अश्लेप सुना जाता है । जैसेकि 'यया पुष्करपलाश'' (जैसे कमल- का पत्र जलसे गीला-लिप्त नहीं होता, वैसे 'एवं वित्' मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा जाननेवाले विद्वान्को पापका सम्बन्ध नही होता ) ब्रह्म साक्षात्कारके पूर्व इस जन्ममे और जन्मा. न्तरोंमें संचित पापमघातका विनाश 'तद्ययेषीकातूलमग्नो०' (जिस प्रकार सौंकका भप्रभाग अग्निमे प्रक्षिप्त करनेसे तत्काल जल जाता है, इसी प्रकार इस विद्वानके सब पाप दग्ध हो जाते हैं ) इससे सुना जाता है । 'नाभुकम्' इत्यादि शास्त्र तो सगुण मोर निर्गुण ब्रह्म ज्ञान रहित पुरुष विषयक है । इससे ज्ञानीको पापका लेप नही है ॥ ६ ॥ दशम अधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह ब्रह्मज्ञानी पुष्पसे लिप्त होता है मथवा नहीं? पूर्वपक्ष-तत्त्ववित् पुण्यसे लिप्त होता है, क्योकि श्रौतपुण्यका प्रतिज्ञानसे विरोध नहीं होता।
[८०४ पा०.१ अघि० ११] वैयासिकन्यायमाला २६५ मा भूत्तापलेप: पुण्यलेपस्तु विद्यते । पुण्यस्य श्रौतत्वेन श्रोतब्रह्मज्ञानेन समं विरोधाभावात्। इति प्राप्ते ब्रूमा-अकात्मवस्तुसामर्थ्यात्पापवत्पुण्येनापि न लिप्यते । सगुणज्ञानिनस्तूपासनव्यतिरिक काम्यं पुण्यं पापवदधम जन्महेतुत्वात्पापसम- मेवेति मत्वा पापत्वेनैव दहरविद्यावाक्यशेषे श्रुतिः परामृशति-सर्वे पाप्मा- नोऽतो निवर्तन्ते" इति । अस्यायमर्थ - सुकृतं दुष्कृतं च पूर्ववाक्ये यद्यदनुकान्तं से सर्व पाप्मानोऽस्मादुपासकान्निवर्तन्ते' इति । किंच "उभे उ हैवैष एते तरत" (बृह० ४।४।२२ ) इति श्रुतिः पुण्यपापयोरुभयोर्ज्ञानिना तरणं सममेव ब्रूते । तस्मात्पापवत्पुण्येनापि न लिप्यते ॥ १०॥ (एकाददे ज्ञानादनारब्धपुण्यपापयोरेव निवृत्याधिकरणे सूत्रम् ) अनारब्धकार्ये एव तु पूर्वे तदवधेः ॥ १५ ॥ एकादशाधिकरणमारचयति- प्रारब्धे नश्यतो नो वा संचिते इव नश्यतः। उभयात्राप्यक त्वतद्धोधो सदृशो खलु ॥२१॥ सिद्धान्त--प्रकस्मिक वस्तु सामर्थ्य से पापके समान पुण्यका लेप नहीं होता और अति पुण्यको पापरूपसे कहती है । इस प्रकार श्रुति पुण्य और पापका तरण भी गमान . रूपसे कहती है। ब्रह्मज्ञानीको पापका लेप मत हो, परन्तु पुष्पका लेप तो है हो। क्योंकि श्रोत पुण्यका श्रोत ब्रह्मज्ञानके साथ विरोध नहीं है। सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं--प्रका मक वस्तु सामथ्यं से पापके ममान पुण्यसे भी लिप्त नहीं होता। सगुण ज्ञानी तो उपासनामे अतिरिक्त काम्य पुण्य पापके ममान प्रघम जन्मका हेतु होने से पापके समान ही है। ऐमा मानकर पापरूपसे दहरविद्या वाक्यशेषमे श्रुनि 'सर्वे पाप्मानो०' (सब पाप उस उपासकके निवृत्त हो जाते हैं ) इस प्रकार परामर्श करती है। इसका यह अर्थ है-'सुकृत, दुष्कृत और उनका फल जो पूर्व वाक्यमे उक्त हैं, वे सब पाप इस उपामरके निवृत्त हो जाते हैं।' किंध 'उभे उ हैवप' (वह आपक इन दोनो-पुण्य पापसे तर जाता है ) यह अति पुष्प पाप दोनोसे ज्ञानी लोगोंका तरण समान ही कहती है । इससे पापके समान पुण्यसे भी ब्रह्मज्ञानी लिप्त नही होता ॥१०॥ एकादश अधिकरणकी रचना करते हैं- 1-प्रारब्य पुण्य भोर पाप नष्ट होते हैं वा नहीं ? सन्देह- २६६ भापानुवादसहिता [म. ४ पा० १ प्रधि०११) प्रादेहपातरांसारयतेरनुभवादपि इपचवादिष्टान्तान्नेवारब्धे विनश्यतः ।। २२ ।। झानात्पूर्व संचिते पुण्यपापे विविधे-पारव्ये, पनारख्थे च । तयोद्विवि. धयोरप्यक्तत्वमात्मनः समानम् । तद्वोधश्च समः। ततोऽनारन्यवदास्पयोरपि ज्ञानोदयसमय एवं विनाशः। इति प्राप्त यूमा-श्रुत्पनुभवयुक्तिभ्य मारन्थयोरविनाशो गम्यते । 'तस्य तावदेव चिरं यावन विमोक्ष्येऽथ संपत्स्य (छा० ६१४२ ) इति युतिः। अस्या भयम:-'तस्य तत्वविदो मुकिविलम्बमानाऽपि नात्यन्तं विलम्बते । किंतु गर्भाधानकाले यतृप्तस्याऽयुष: दयाभावेन यावदेहः प्राणेनं विमोक्ष्यते तावदेव विलम्बते । भय देहप्राणवियोगे सति ब्रह्म संपद्यते' इति । यथाऽनया श्रुत्या तत्वविदोऽप्यादेहपातं संसारोऽग्नीकृतस्तथा विद्वदनुभवोऽप्यस्मिन्न स्फुटः । युक्तिश्चोच्यते- -यया लोके तूनिष्ठेषु वाणेष धानुष्कस्य स्वीकारपरि- पूर्वपक्ष-संचित पुण्य पोर पाप समान उन दोनोंका भी नाश होता है, क्योंकि दोनों स्थलोमे प्रवर्तृत्व और उसका बोप समान है। सिद्धान्त-देह पात पर्यन्त संसारके मस्तित्वको श्रुति होनेसे पौर अनुभवसे पौर घु, चक्र भादि दृष्टान्तोंसे भी मारण्य कर्म नष्ट नहीं होते हैं। जानके पूर्व भारब्ध मौर अनारब्ध भेदरो संचित पुण्य और पाप दो प्रकारके हैं । उन दोनों प्रकारके रहते भी मास्माका भकर्तृत्व समान है और उसका बोध भी समान है । इससे प्रनारय पुण्य-पापके समान प्रारब्ध पुष्य पापका भी ज्ञानोदय समयमें ही विनाश होता है। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-श्रुति अनुभव और युक्तिसे ज्ञात होता है कि मारण्य पुण्य पापका नाश नहीं होता है । 'तस्य तावदेव चिरं० (उस विद्वान्के मोक्षमें उतना ही विलम्ब है जवतक कि वह देह बन्धनसे मुक्त नहीं होता। उसके मनन्तर तो वह मत्सम्पन्न हो जाता है ) यह अति है। इसका मह मर्थ है- 'उस तत्ववित्को मुक्तिमे विलम्ब होते भी अत्यन्त विलम्ब नहीं है, किन्तु गर्भाधानके समय निश्चित मायुष्यका क्षय न होने के कारण जब तक शरीर प्राणोसे मुक्त नहीं होता तबसक ही विलम्ब होता है । अनन्तर देहका प्राणोसे वियोग होते ही ब्रह्मके साथ सम्पन्न-एक होता है' जैसे इस ऋतिसे तत्त्ववित्का भी देह पात पर्यन्त संसार मङ्गी- वृत है, वैसे विद्वानोका अनुभव भी इसी अर्थमें स्पष्ट है। युक्ति भी कही जाती है- जैसे लोकमें तुणोरनिष्ठ वाणोके स्वीकार वा परित्यागमे धनुषारी स्वतन्त्र है, तो भी [५०४ पा० १ अधि० १२ ] यासिकन्यायमाला त्यागयोः स्वातन्त्र्येऽपि मुक्त बाणे स्वातन्त्र्यं न दृष्यते । स तु बाणो वेगे क्षीणे स्वयं पतति । एवं कुलालनकमणमुदाहर्तव्यम् । तथा दान्तिकब्रह्मशान- स्याप्यनारब्धकर्मनाशकत्वे स्वातल्यमस्तु न त्वारब्धे कर्मणि । पारपस्य प्रवृतफलस्वात् । यद्यतेः श्रुत्यादिभिरारब्धस्थितिमाभ्युपगाम्यते, तदोपदेष्टुर- भावाद्विद्यासंप्रदाय उच्छियेत । न तावदविद्वानुपदेष्टेति वक्त शवयम् । विद्वांस्तु वेदनसमय एव मुच्यत इति को नामोपदेष्टा संभवति । तस्मानाशरल्य- पोनशि: ॥११॥ (द्वादश प्रग्निहोत्रादिनित्यकर्मणो नाशनिराकरणाधिकरणे सूत्रे ) अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव तदर्शनात् ।। १६ ।। अतोऽ- न्याऽपि होकेपामुभयोः ॥ १७ ॥ द्वादशाधिकरणमारवयति-- नश्येतीवाऽग्निहोत्रादि नित्य कर्म, विनश्यति । पतोऽयं वस्तुमहिमा न कवितप्रतिहन्यते ।। २३ ।। प्रतुपरूफलांशस्य नाशेऽप्यन्यो न नश्यति । विद्यायामुपयुक्तत्वाद्धाव्यश्लेषस्तु काम्यवद ॥ २४ ॥ मुक्त बाण में वह सतन्त्र नहीं देखा जाता है। परन्तु वह वाण वेगवे क्षीण होनेपर म्वयं ही गिर जाता है। इसी प्रकार कुलाल चक्रके भ्रमणका भी उदाहरण देना चाहिए । वैसे दाष्टनिक ब्रह्मज्ञान भी मनारब्ध कर्म के नाश करनेगे यद्यपि स्वतन्त्र है। परन्नु भारब्ध कर्म के विनाशमें नहीं, क्योकि पारब्धकर्म प्रवृत्त फलवाला है। यदि इन अति भादिसे भी प्रारब्धकर्म की स्थिति स्वीकार न की जाय तो उपदेष्टाके भभावसे विधा-संप्रदाय ही उच्छिन्न हो जायगा । पविद्वान् उपदेष्टा हो, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता । विद्वान तो ज्ञानकालमे ही मुक्त हो जायगा तो उपदेष्टा कौन हो सकता है। इससे मारष पुण्यपापका नाश नहीं होता । ११ । द्वादश मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह --भग्निहोत्र आदि नित्यकर्मोका शानस नाश होता है अथवा नहीं ? पूर्वपन-उक्त कर्म नष्ट होते हैं, क्योकि अकास्मक वस्तुको यह महिमा कहीपर भी प्रतिहत नहीं होती। सिद्धान्त-नित्य कर्मोके अनुषक्त फलाशका नाश होनेपर भी अन्य-चित्त शुद्धिप्रद मश नष्ट नहीं होता, क्योकि यह विद्यामें उपयोगी है उसका भावी मसम्बन्ध तो काम्य कर्मके समान ही है।
२६८ भाषानुवादसहिता [प्र० ४ पा० १ मधि० १३] ज्ञानात्पूर्वमिह जन्मानि. जन्मान्तरे वाऽनुष्ठितं यदग्निहोत्रादि नित्यं कर्म, तस्यापि काम्यकर्मवदकात्मवस्तुबोघमहिम्ना नाशोऽभ्युपेयः । इति प्राप्ते घूमः-दावंशो नित्यकर्मणः एकोऽश: प्राधान्येन चित्तशुद्धिप्रद. 1 अपरोंऽशोऽनुपरेण स्वर्गादिफलप्रदा । तस्य नाशोऽस्तु नाम । चित्तशुद्धिप्रदस्य तु विद्यायामुपयुक्तत्वान्न नाशो वर्णयितुं शक्यः । नहि लोके भोगेनोपशीरणं द्रोह्यादिकं नटं मन्यन्ते। यत्तु ज्ञानादूध नित्यं कर्म तस्य काम्यवदश्लेपः॥१२॥ (प्रयोदो नित्यकर्मणोविद्यासापनतापिकरणे सूत्रम् ) यदेव विद्ययेति हि ॥१८॥ त्रयोदशाधिकरणमारचयति- किमनोपास्तिसंयुतमेव विद्योपयोग्युत। केवलं वा, प्रशस्तत्वासपात्स्येवोपयुज्यते ॥ २५ ॥ केवल वीर्यद्विधासंयुक्त वीर्यवत्तरम् । इति श्रुतेस्तारतम्यादुमयं ज्ञानसाधनम् ॥ २६ ॥ विद्यासाधनं नित्यकर्म द्विविधं संभाव्यते-प्रडगाववठोपास्तिसहितं तद्र- जानके पूर्व इस जन्ममें पपवा मन्य जन्ममें मनुष्ठित का भग्निहोत्र प्रादि नित्य कर्म हैं, उनका भी काम्यकर्भके समान प्रकत्मिक वस्तुवे ज्ञानको महिमासे नाश स्वीकार करना चाहिए। सिद्धान्तो ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-नित्य कर्म के दो भंगा होते हैं । एक अंश तो प्रधानरूपमै चित्तशुद्धि प्रद है और दूसरा अंश मनुषङ्गमे स्वर्ग मादि फलप्रद । उसका नाथ भले हो, परन्तु चित्तशुद्धिप्रद दो विद्यामे उपयुक्त है. पता उसका नाश वर्णन नही किया जा सकता । लोकमे भोगसे उपक्षीण द्रोहि प्रादि अन्नका नाश नहीं माना जाता । जो तत्त्वज्ञानके पनन्तर नित्य कर्म हैं उसका काम्यकर्मके समान मसम्बन्ध होता है ।।१२॥ त्रयोदश अधिकरणको रचना करते है- सन्देह-क्या उपासना विशिष्ट नित्यकर्म विद्याका उपयोगी है अथवा उपापना रहित केवल नित्य कम ? पूर्वपक्ष-उपासना विशिष्ट नित्यकर्म हो विद्याका उपयोगी है, क्योकि वही विद्याके साधनमे प्रशस्त होनेसे उपयुक्त है। सिद्धान्ती-केवल कर्म वीर्यवत् है और उपासना विशिष्ट वीर्यवत्तर है, इस अर्थको बोधिका श्रुतिसे तारतम्यसे दोनो कर्म ज्ञानके साधन हैं। विद्याका साधन नित्यकर्म प्रजाश्रित उपामनाविशिष्ट मौर उमसे रहित केवल इस [प्र० ४ पा० १ मधि० १४ ] वैयासिकन्यायमाला २६६ हितं च । तन सोपासनस्य कर्मणः प्रशस्तत्वात्तदेव विद्यासाधनं न तूपास्तिर- न मुक्॥२८॥ इति प्राप्ते यूम:--'यदेव विश्वया करोति तदेव वीर्यवत्तरं भवति' ( छा० १०१।१०) इति श्रुतिः "सोपासनस्य कर्मणोऽतिशयेन वीर्यमस्ति" इति वदन्ती निष्पासनस्यापि वीर्यमात्रमभ्यतुजानाति । अन्यथा तर प्रत्ययानुपपत्तेः । तस्मा- सोपासननिरुपासनयोस्तारतम्येन विद्यासाधनत्वम् ।। १३ ।। (चतुर्दशा अधिकारिणामपि मुक्तिसंभवाधिकरणे सूत्रम् ) मोगेन वितरे क्षपयित्वा संपद्यते ॥१६॥ चतुर्दशाधिकरणमारयति- बहुजन्मप्रदारब्धयुक्ताना नास्त्युतास्ति मुक् । विद्यालोपे कृतं कर्म फलदं तेन नास्ति मुक् ॥ २७॥ मारब्धं भोजयेदेव न तु विद्या विलोश्येत् । सुप्तबुद्धवदरलेपत्तादयस्थ्यात्कुतो अधिकारिपुरुषाणा मुक्ति स्ति । प्रारब्धभोगाय बहुषु जन्मसु स्वीकृतेषु भेदमे दो प्रकारसे विमाजित किया जाता है । उसमेसे उपासना सहित कर्म प्रशस्त होनेके कारण वही विद्याका साधन है, परन्तु उपासना रहित केवल कर्म नही । सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते है-'यदेव विद्यया करोवि०' (जो कर्म विद्यासे-श्रद्धासे योग युक्त होकर करता है वह वीर्यवतर होता है ) यह ऋति उपासना सहित कर्ममें अतिशयसे वीर्य-शक्ति है ऐसा कहती हुई उपासना हित कर्मको भी वीर्य मात्र पभिज्ञात करती है । अन्यथा 'तर' प्रत्यय अनुपपन्न होगा। इससे सोपासन और निरुपासन कर्म तारतम्यमे विद्या साधन हैं ऐसा ज्ञात होता है ।। १३॥ चतुर्दश मधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-मनेक जन्मप्रद प्रारम्प कोमे युक्त अधिकारी पुरुषोको मुक्ति होती है अथवा नहीं। पूर्वपक्ष-कृतकर्म फलप्रद होता है, अतः इससे विद्याका लोप होनेपर उनकी मुक्ति नहीं होती। सिद्धान्त-पारस्य कर्म भोग कराता है न कि विद्याका लोप करता है । मुमो- स्थितके समान कोका असम्बन्ध तदवस्थ होनेसे मुक्ति कैसे न होगी ? अवश्य होगी। अधिकारी पुरुषोकी मुक्ति नहीं है, क्योंकि प्रारब्ध कौके भोगके लिए अनेक जन्म २७० भाषानुवादसहिता [म. ४ पा० १ अधि० १४ ] तत्र पूर्वाजितविद्यायां यत्कर्म क्रियते तस्य फलप्रदत्वे सत्युत्तरोत्तरजन्मपरम्पराया अवश्यंभावित्वात् । इति प्राप्ते घूम:-प्रारब्धं कम स्वफले सुखदुःखे भोजयेत् । तदर्थमेव प्रवृत्तत्वात् । न हि विद्यालोपार्थ किंचित्कर्म पूर्वमनुष्ठितं येन कर्मवशाद्विधा- लोप पाशवपत । न च मरणव्यवधानमात्रेण विद्यालोप: सुषुप्तिम्यवधानेन तल्लोपादर्शनात् । अतो विद्यायामवस्थितायां बहुभिरपि नियमाणेः कर्मभिरले पादस्त्यधिकारिणां मुक्तिः । यद्यप्येतद्गुणोपसंहारपादे निर्णीत तथाऽपि तस्यै- वाऽक्षेपसमाघाने इत्यनदधम् ॥ १४ ॥ इति श्रीमारतीतीर्थमुनिप्रणीतायां वैयासपिन्यायमालायां चतुर्थाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥१॥ भादिता अधिकरणानि १६८ सूत्राणि प्रत्र पादे १६ ४६७ स्वीकार करनेपर उसमें पूजित विद्यामे जो कर्म किया जाय उसके फलप्रद होनेसे उत्तरोत्तर जन्मपरम्परा अवश्यंभावी है। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होने पर हम कहते हैं--प्रारब्ध कर्म अपने फल सुख दुखका भोग कराता है, क्योंकि वह उसके लिए ही प्रवृत्त हुआ है । विद्यालोपके लिए पूर्वमे कोई कर्म मनुष्ठित नहीं है जिससे कि कर्मवश विद्यालोपकी माशङ्का हो । मरणके व्यवधानमात्रसे भी विद्याका लोप नहीं है, क्योकि सुषुप्तिके व्यवधानसे विद्याका लोप नहीं देखा जाता । अतः विद्याके प्रदस्थित होनेपर बहुव क्रियमाण कर्मोसे असम्बन्ध होनेके कारण अधिकारी पुरुषोकी मुक्ति है । यद्यपि इसका गुणोपसंहार पादमें निर्णय किया गया तो भी यहाँ उसीके माक्षेप मौर समाधान किये गये हैं, इमसे निर्दोष है अर्थात् पुनरुक्ति दोष नही है ॥ १४ ॥ इति श्रीभारतीतीर्थमुनि प्रणीत-यासिकन्यायमालाके चतुर्याध्यायके प्रथम पादका 'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत भाषानुवाद ।।१।।
[म० ४ ११० २ अधि० १] वैयासिकन्यायमाला २७१ अथ चतुर्थाध्यायस्य द्वितीयः पादः (पत्र पादे उत्सान्निविनिरूपणम् ) [इस पादमें उतान्ति और गतिका निरूपण है ] ( प्रथमे वागादीनां मनमि दृत्तिलयाधिकरणे सूत्रे) वाइमनसि दर्शनाच्छब्दाच ।।१।। अत एव च सर्वाण्यनु ।।२।। चतुर्याध्यायस्य द्वितीयादे प्रथमाधिकरणमारचति- वागदीनां स्वरूपेण वृत्त्या वा मानसे लयः। श्रुति हननसीत्याह स्वरूपविलयस्ततः ॥१॥ न लीयतेऽनुपादाने कार्य वृत्तिस्तु लीयते । पह्निवृत्तेजले शान्तेर्वावशब्दो वृत्तिलक्षका ॥२॥ उकान्तिकमश्वान्दोग्ये भूपते-'प्रस्य सोम्य पुरुषस्य भयतो वाड्मनसि संपधचे मनः प्राणे प्राणास्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम" (छा०६६) इति । तर नियमाणस्य पुरुषस्य वागादीनि दशेन्द्रियाणि मनसि लोयन्ते । स च लयः किं स्वरूपेण वृत्त्या वेति संशये सति "वाड्मनसि" इति श्रुती वृत्तिशब्दाश्रवणास्वरूपलयः । इति प्रामे धूम:-मनसो वागादिकं प्रत्यनुपादानत्वाद 'उपादाम एव चतुर्ष अध्याय के द्वितीय पादमे प्रथम अधिकरणको रवता करते हैं- मादि इन्द्रियोका मनमे लय स्वरूपसे है प्रथदा वृत्तिसे? पूर्वपक्ष-वरूपने ही लय होता है, क्योकि श्रुति वाइमनसि' ऐसा कहती है । सिद्धान्त-अनुपादानमे कार्यका लय नहीं होता किन्तु कार्यवृत्ति लय होती है पर्थात् वागादिको वृति लय होती है। जैसे वहितिका जलमे शमन होता है. वैसे, और वाक् शब्द वृशिका लक्षक है । मतः वाक् शब्दसै वाग्वृतिका ग्रहण करना चाहिए। छान्दोग्यमे बरक्रान्ति क्रमकी 'अस्प सोम्य पुस्पस्य० ( है सोम्य | इस नियमाए पुरुषको वाक् मनमें लीन हो जाती है, तथा मन प्राण में, प्राण वैजमें, वेज परदेवतामें लीन हो जाता है। ऐसी श्रुति है। यहां निश्माण पुरुषको धार प्रादि दश-इन्द्रियाँ मनमें मौन होता है । वह पाग आदि इन्द्रियोका लय क्या स्वरूपसे है अथवा दृषिसे ? ऐसा संशय होनेपर कामनामि' इस पुतिमें पुचि शब्दका श्रवण न होनेसे स्वरूप लप ही है। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्रास होनेपर हम कहते हैं. मन वाणी मादिके प्रति सन्देहवाग २७२ मापानुवादसहिता [ म०४ पा० २ मधि० २] कार्यस्य स्वरूपलयः' इति मृद्घटादौ व्याप्तिदर्शनान वागादीनो स्वरूपेण लपः। वृत्तिस्त्वनुपादानेऽपि लयमहति । असारेषु जलमध्ये प्रक्षिप्तेषु वह्निवृत्तेहप्रका- शात्मिकाया अनुपादाने जले लयदर्शनात् । श्रुतौ तु वाक्शब्देन वृत्तिलक्ष्यते । वृत्तिवृत्तिमतोरमेदोपचारात् । वागादीना मनसि वृत्तिलयः॥१॥ (द्वितीये मनमः प्राणे लयाधिकरणे मूत्रम् ) तन्मनः प्राण उत्तरात् ।। ३ ।। द्वितीयाधिकरणमारचयति- मनः प्राणे स्वयं वृत्त्या वा लीयेत, स्वयं यतः । कारणानोदवद्वारा प्राणो हेतुमनः प्रति ॥ ३॥ साक्षात्स्वहेती लोयेत कार्य प्राणालिके न तु । गौणः प्राणालिको हेतुस्ततो वृत्तिलयो धियः ॥ ४ ॥ वागादिपु मनसि वृत्या प्रलीनेषु तन्मनः प्रारणे स्वरूपेण लयमर्हति । मनः प्रति प्राणस्पोपादानत्वसंमवात् । तथा हि-"अनमयं हि सोम्य मनः" इति श्रुते- मनसोऽन्नं कारणम् । "मापोमयः प्राण." इति श्रुतेश्च प्राणस्याऽऽपः कारणम् । उपादान कारण नहीं है, 'उपादानमें ही कार्यका स्वरूपसे लय होता है' म प्रकारको व्याप्ति मृत्तिकापटमें देखी जाती है, इससे वाग् भादिका मनमें स्वरूपसे लय नहीं है। वृत्तितो अनुपादनमें भी लय हो सकती है। जल के मध्यमे अनारोंके प्रक्षिप्त होनेपर दाह और प्रकाशात्मक अग्निको वृत्तिका अनुपादान जलमे लय देखा जाता है। तिमे तो चाक शब्दसे वाक्वृत्ति लक्षित होती है, क्योकि वृत्ति और वृत्तिमानका पभेद उपचार है । इमसे मनमे वाग् आदिका वृत्तिलय होता है स्वरूपलय नहीं ॥१॥ द्वितीय प्रधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-प्राणमें मनका लय स्वरूपसे होता है अथवा वृत्तिसे ? पूर्वपक्ष-स्वरूपसे लय होता है, क्योंकि भन्न मोर जल द्वारा प्राण मनका उपादान है। सिद्धान्त-कार्य अपने उपादानमें ही साक्षात् लीन होता है, परम्परासे भमुख्य उपादानमे लीन नहीं होता। प्रवृतमें प्राण भी अन्न और जल द्वारा मनका मुख्य उपा- दान है । इमसे प्राणमें मनका वृत्तिलय होता है । मनमै वृत्ति द्वारा वाग् मादिका लय होनेपर वह मन प्राणमें स्वरूपसे लप हो सकता है, क्योंकि प्राण मनके प्रति उपादान हो सकता है। जैसेकि 'अन्नमय हि सोम्य मनः' (हे सोम्य । मन मन्त्रमय है। ) इस तिस अन्न मनका कारण कहा गया है। 'पापोमयः प्राण' (प्राण जलमय है ) इस घंतिसे जल प्राणका कारण कहा गया ।
[अ० ४ पा० २ अधि० ३] वैयासिकन्यायमाला २७३ तया सति मनःप्राणशब्दाभ्यां तत्कारणे अनोदके उपलक्ष्य 'मनः प्राणे लीयते' इति वाक्यस्य 'अन्नमप्सु लोयते' इत्यों व्याख्यातव्यः। तथा च कार्यस्य स्वोपादाने लयो भविष्यति । तस्मान्मनसः स्वरूपेण लयः । इति प्राप्ते ब्रूमः-द्विविधमुपादानम् मुख्यं प्राणालिकं च । तत्र प्राणमन- सोमघटयोरिव न मुख्य उपादानोपादेयभावोऽस्ति । कि तहि त्वदुक्तप्रकारेण संबन्धपरम्परया प्रणाल्या । न हि प्राणालिक उपादाने कार्यस्य लयं क्वचित्त- श्यामः । तस्मान्मनस: प्राणे साक्षादनुपादाने वृत्त्या प्रविलयो द्रष्टव्यः ॥२॥ (तृतीये प्राणाना जोवे लयाधिकरणे सूत्राणि ) सोऽध्यक्षे तदुपगमादिभ्यः ॥ ४॥ भूतेष्वतः श्रुतेः ॥५॥ नैकस्मिन्दर्शयतो हि ॥ ६ ॥ तृतीयाधिकरणमारचयति- असोभूतेषु जीवे वा लयो भूतेषु तच्छ्रुतेः । स प्राणस्तेजसोत्याह न तु जीव इति कचित् ।। ५ ।। एवमेवेममात्मानं प्राणा यन्तीति च श्रुतेः। जीवे लोत्वा सहैतेन पुनभूतेषु लीयते ॥ ६॥ । ऐमा होनेपर मन और प्राण शब्दमें उसके कारण भन्न मौर उदकको उपलक्षितकर ‘मनः प्राणे लीयते' ( मन प्राणमे लय होता है ) इस वाक्यका 'अन्न जलमे लीन होता है, इस प्रकारके अर्थको व्याख्या करनी चाहिए। इस प्रकार कार्यका अपने उपादानमे लय होगा, इस प्राणमे मनका स्वरूपसे लय है। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्व पक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते है-उपादान कारण दो प्रकारका है। एक मुख्य और दूसरा प्राणालिक-गौण । यहाँपर प्राण मोर मनका मृघटके समान मुख्य उपादानोपादेयभाव नहीं है। किन्तु तुम्हारी उक्तिके अनुसार सम्बन्ध परम्परा प्रणालीमे, प्राणालिक उपादानमे कार्यका लय कहींपर भी हम नहीं देखते हैं । इमसे मनका वृत्ति द्वारा साक्षाव अनुपादान प्राणमें विलय समझना चाहिए।। तृतीय अधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह- -प्राणका भूतोमें लय होता है अथवा जीवमें । पूर्वपक्ष-भूतोमे लय होता है, क्योंकि 'प्राणस्तेजसि' (प्राण तेजमें लीन होता है ) ऐसा ति कहती है, परन्तु जीवमे प्राणका लय कहीपर भी नहीं कहा गया है । सिद्धान्त-एवमेवेममात्मानम्' इत्यादि ध्रुतिसे जीवात्मामे प्राणोंका लय कहा गया है इसलिए प्रथम प्राण जीवमें लीन होकर उसके साथ पुनः भूतोमें लीन होते हैं।
- २७४ भाषानुवादसहिता [ ० ४ पा०२ अपि० ४ ] अन्तर्लीनकादशेन्द्रिययुक्तस्य प्राणस्य तेजोबन्नेषु भूतेषु वृत्त्या प्रविलयः, न तु जीवे । "प्राणस्तेजसि" इति श्रुतेः । इति प्राप्ते यूम:-"एवमेवेममात्मानमन्तकाले सर्व प्राणा अभिसमायन्ति" इति श्रुति वे प्राणलयमाह । 'यथा राजानं प्रयियासन्तं सर्वे भृत्याः समायन्ति, तद्वत्' इति श्रुतेरर्थः । न च "प्राणस्तेजसि'' इति श्रुत्या विरोधः । जीवेन सहित. प्राणः पश्चात्तेज प्रादिभूतेषु लीयत इति व्यात्यातुं शक्यत्वात् । तस्मा- प्राणो जोये प्रथमतो लयं प्राप्य पश्चात्तद्वारा भूतेषु लीयते ।।३।। (चतुर्षे ज्ञान्यज्ञानिनोरुन्क्रान्तिमामान्याधिपरणे मूत्रम् ) समाना चाऽऽमृत्युपक्रमादमृतत्वं चानुपोप्य ॥ ७ ॥ चतुर्थाधिकरणमारचयति- ज्ञान्यज्ञोतकान्तिरसमा समा वा, नहि सा समा। मोक्षसंसाररूपस्य फलस्य विषमत्वतः॥७॥ पामृत्युपक्रम' जन्म वर्तमानमतः समा। पश्चात्तु फल वैषम्यादसमोत्क्रान्तिरेतयोः॥८॥ 'निगुणब्रह्मज्ञानिनस्तावदुत्क्रान्तिरेव नास्ति' इति वक्ष्यति । या तु सगुण- मन्तर्लीन हुई ग्यारह इन्द्रियोंसे युक्त प्राणका वृत्तिद्वारा तेज जल और मन्न रूप भूतोमें विलय होता है, न कि जोदमे, क्योकि 'प्राणस्तेम' ऐसौ श्रुति है । सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त होने पर हम कहते हैं-'एवमेवेममात्मानमन्तकाले.' (इसी प्रकार प्रन्तकालमें जब वह ऊर्वोच्छवासी होता है तब सब वाक् पादि प्राण इम प्रात्माके अभिमुख जाते हैं) यह श्रुति जीवमे प्रारणका लय कहती है । 'जैसे प्रस्थान करते राजाको सब सेवक सम्मुख प्राप्त होते हैं, हमके समान' ऐसा घतिका भर्य है। 'प्राणस्तेजसि' इस श्रुतिके साथ विरोध नहीं है, क्योकि जीवके साथ प्राण पश्चात् तेज मादि भूतोंमें लीन होता है' ऐमा व्याख्यान किया जा सकता है । इसमै प्राण जीवमें पहले लीन हो कर पश्चात् जीव द्वारा भूतोमें लीन होता है ।। ३ ॥ चतुर्थ प्रधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-ज्ञानी और अज्ञानीको उत्क्रान्ति समान है अथवा असमान ? पूर्वपक्ष-वह समान नहीं है, क्योकि दोनोके मोक्ष और संसाररूप फल पृथक सिद्धान्त-मार्ग के उपक्रम तक अर्थात् अचिकी प्राप्ति तक वर्तमान जन्म है, मतः उत्क्रान्ति समान है । पश्चात् फलके भेदसे उनकी उत्क्रान्ति विषम भले ही हो। निर्गुण ब्रह्मज्ञानीको टो उत्क्रान्ति ही नहीं है, ऐसा कहेंगे। जो तो सगुण ब्रह्मज्ञानीकी [प्र० ४ पा० २ मधि० ५ ] वैयासिकन्यायमाला २७५ ब्रह्मज्ञानिन उत्क्रान्ति सावज्ञान्युत्कान्त्या समाना। ब्रह्मलोकरूपस्य मोक्षस्य तद्विपरीतसंसारस्वरूपस्य च फनस्य विषमस्वेन तत्प्राप्तिद्वारभूताया उत्तान्ते. वैषम्यस्योचितत्वात् । इति प्राप्ते ब्रूमः-सगुणज्ञानिनो मूर्धन्यनाडोप्रवेश उत्तरमार्गोपक्रमः । ज्ञानरहितस्य नाड्यन्तरप्रवेशो मार्गान्तरोपक्रमः । मार्गपर्यन्तमिदमेव वर्तमान जन्म। प्रत ऐहिकसुखदुःखवदुत्त्रान्तिरपि समाना | उपक्रान्ते तु मार्गे त्वदुक्त- फलभेदापम्पमस्तु ॥४॥ (पञ्चम उपासकस्य ब्रह्मणि स्वरूपेण लयनिराकरणाधिकरणे सूत्राणि ) तदाऽपीतेः संसारव्यपदेशात् ॥८॥ सूक्ष्मं प्रमाणतश्च तथोपलब्धेः ॥६॥ नोपमर्दैनातः ॥१०॥ अस्यैव चोपपत्तेरेष ऊष्मा ॥११॥ पश्चमाधिकरणमारचयति- स्वरूपेणाथ वृत्त्या वा भूताना विलयः परे। स्वरूपेण लयो युक्तः स्वोपादाने परात्मनि ॥ ६ ॥ पात्मज्ञस्य तथात्वेऽपि वृत्त्येवान्यस्य तल्लयः । न चेत्कस्यापि जीवस्य न स्याजन्मान्तरं क्वचित् ॥१०॥ उत्क्रान्ति है वह अज्ञानीकी उत्क्रान्तिके समान नहीं है, क्योकि ब्रह्मलोकरूप मोक्ष मौर उससे विपरीत संसाररूप फलके प्रतिविषम होने से उसकी प्राप्तिके द्वारभूत उन्क्रान्तिमे वैषम्य उचित ही है। सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-मगुणज्ञानीका मूर्धन्य नाडी प्रदेश उत्तरमार्गसे उपक्रम है और ज्ञानरहितका अन्य नाडीमे प्रवेश-प्रन्यमार्गसे उपक्रम है। मार्गप्रर्यन्त यही वर्तमान जन्म है । अतः ऐहिक सुख, दुःखके समान उत्क्रान्ति भी ममान है । मार्गके उपक्रमण होनेपर तो तुम्हारे कथनके अनुसार फन भेद होनेसे वैषम्य भले हो॥४॥ पंचम अधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-भूतोका विलय परमात्मामें स्वरूपसे होता है अथवा वृत्तिसे ? पूर्वपक्ष-अपने उपादान परमात्मामे भूतोका स्वरूपसे लय युक्त है । सिद्धान्त-पात्मज्ञानीके भूतोका विलय मले स्वरूपसे ही हो, परन्तु मन्य अज्ञनियो के भूतोका तो वृत्ति द्वारा ही लप होगा। यदि ऐमा न माना जाय तो किसी भी जीवका कहीं भी जन्म नही होगा।
२७६ भाषानुवादसहिता [म०४ पा० २ मधि० ५ ] "तेजः परस्यां देवतायाम्" इत्या तेज:प्रभृतीनां भूतानां परमात्मनि स्वरूपेण लयो युज्यते । परमात्मनो भूतोपादानत्वात् । इति प्राप्ते यूमः-प्रात्मतत्त्वज्ञानिनस्त्वदुतप्रकारेण भूतानां स्वरूपेण लयोऽस्तु । तस्य निर्णयमाणत्वात् । उपासवस्य पमिणश्च जन्मान्तरसिद्धये वृत्तिलय एवाभ्युपगन्तव्य.॥५।। (पष्ठे ज्ञानिन प्राणानां देहादनुसान्यधिकरणे गूपाणि) प्रतिपेधादिति चेन्न शारीरात् ॥१२॥ स्पष्टो ोफेपाम॥१३|| स्मर्यते ॥ १४ ॥ पष्ठाधिकरणमारचति- किं जीवादथवा देहप्राणोत्क्रान्तिनिवार्यते। जीवानिवारणं युक्त जीवेहोऽन्यथा सदा ॥ ११ ॥ तप्ताश्मजलवदेहे प्राणानां विलयः स्मृतः। उच्छ्वयत्येव देहोऽन्ते देहारसा विनिवार्यते ॥ १२ ॥ 'न तस्य प्राणा उरकामन्ति' (बृह० ४१६) इति तत्वविदः प्राणाना• मुत्क्रान्तिनिषिध्यते । तस्य निषेघस्यापादानं जीवः, न तु देहः । अन्यथा देहाद- नुत्क्रान्तो मरणाभाव प्रसज्येत। 'वेजः परस्पा देवतायाम्' (वेजका पर देवता-परमात्मामे लय होता है ) यहाँ- इस श्रुतिसे वेज प्रभृति भूतोंका परमात्मा स्वरूपसे सय युक्त है, क्योंकि परमात्मा भूतोंका उपादान है। सिदान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं—प्रात्मतत्त्व ज्ञानीके मूठोंका लय तुम्हारे कथनानुमार स्वरूपसे हो हो, क्योंकि उसका ऐसा ही निर्णय होगा। परन्तु उपासक और कर्मको जन्मान्तर सिद्धिके लिए भूतोका वृत्तिलय ही मानना चाहिए। पष्ठ अधिकरणकी रचना करते हैं- मन्देह -क्या प्राणोत्रान्तिका निषेध जीवसे किया जाता है अथवा देहसे ? पूर्वपक्ष-जीवमे प्राणोत्क्रान्तिका निषेध युक्त है, अन्यथा सर्वदा शरीर जीवित रहेगा। सिद्धान्त–तप्त पाषाणके ऊपर जैसे प्रक्षिप्त जलबिन्दु विलीन हो जाता है, ठीक वैसे ही प्राणोका देहमे विलय कहा गया है। मरनेपर देह फूल जाता है। मता प्राणोत्क्रान्तिका देहसे ही निवारण किया जाता है, जीवसे नहीं। 'त तस्य प्राणा उत्क्रान्ति' ( तत्वविक्के प्राण उत्क्रमण नहीं करते ) इस प्रकार तत्ववितके प्राणोंको उत्क्रान्तिका निषेध किया जाता है, उस निषेधका अपादान जीव है, [प्र० ४ पा० २ अधि०७] वैयासिकन्यायमाला হওও इति प्राप्ते ब्रमः--तप्ताश्मनि प्रक्षिप्तं जलं न यथाऽन्यत्र गच्छति, नापि तत्र दृश्यते, किंतु स्वरूपेण लीयते। तद्वत्तत्त्वविदः प्राण देहादनुत्क्रान्ता अपि न देहेऽवतिष्ठन्त, किंतु विलीयन्ते। अतो जीवनासंभवात् 'मृतो देह.' इति व्यवहारः। अनुत्क्रान्ताना प्राणाना देहावस्थानाभावे देहस्योच्छ्नत्वमेव लिङ्गम् । नन्वियत: प्रयासाद्वरं देहादुत्क्रान्तिरस्तु । प्रतिषेधस्तु जीवापादानको भविष्यति । मैवम् । देहादुनान्तस्य जीवेन सहावस्थितेषु प्राणेषु देहान्तर- ग्रहणस्याऽऽवश्यकत्वान्मुक्तिरेव न स्यात्। तस्मादुत्क्रान्तिप्रतिषेधस्य देह एवापादानं न जीवः ॥ ६॥ ( सप्तमे तत्त्ववित्प्राणानां परमात्मन्येव लयाधिकरणे सूत्रम् ) तानि परे तथा ह्याह ॥१५॥ सप्तमाधिकरणमारचयति- ज्ञस्य वागादयः स्वस्वहेतौ लीना' परेऽथवा। गता: कला इति श्रुत्या स्वस्वहेतुषु तल्लयः ॥ १३ ॥ नद्यब्धिलयसाम्योक्तेविद्वदृष्टया लयः परे। अन्यदृष्टिपरं शास्त्रं गता इत्याधुदाहृतम् ॥ १४ ॥ [अर्यात जीवसे प्राण उत्क्रमण नही करते] न कि देह । अन्यथा देहसे प्राणोको उत्क्रान्ति न होनेसे मरणाभाव प्रसक्त होगा। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हप कहते हैं---तप्त पत्थर पर प्रक्षिप्त जल जैसे न अन्यत्र जाता है और न उसमे ही दिखाई देता है, किन्तु स्वरूपमे ही लीन हो जाता है, वैसे ही तत्त्वविके प्राण देहसे अनुन्क्रान्त होते भी न देहमे ही प्रवस्थित हैं, किन्तु विलीन ही हो जाते । इमसे जीवनका संभव न होनेसे 'देह मर गया' ऐमा व्यवहार होता है। अनुत्क्रान्त प्राणको देहमें अवस्थिति है, इसमे देहका उच्छूनत्व हो लिन है । परन्तु इतने प्रयामसे तो देहसे उत्क्रान्ति मानना श्रेष्ठ है, प्रतिपेव तो जीवा- पादानक हो जायगा ? ऐसा युक्त नहीं है क्योकि देहसे उत्क्रान्त जोवके साथ प्राणोके अवस्थित होनेपर अन्य देहका ग्रहण प्रावश्यक है, इससे मुक्ति हो नहीं होगी। इससे प्राणोको उत्क्रान्तिके प्रतिवेवका देह ही अपादान है जीव नहीं ॥ ६ ॥ सप्तम अधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-तत्त्वज्ञानीको वाक् मादि इन्द्रियाँ अपने अपने कारणमे लोन होती हैं पयवा परब्रह्ममे? पूर्वपक्ष-'गताः कलाः पञ्चदश' इस श्रुतिसे ज्ञात होता है कि तत्त्वज्ञानीको इन्द्रियोका अपने माने कारणमें लय होता है, परब्रह्ममें नही । सिद्धान्त-जैसे नदियोका समुद्रमे लय होता है, वैसे कलामोका परमात्मामे . २७५ भापानुवादसहिता [म०४ पा० २ मषि०७] तत्त्वज्ञानिनो वागादय प्राणा विलीयमानाः प्रातिस्विष्वन्यायधिकरणेषु विलोयन्ते, न तु परमात्मनि । 'गता मला पनदा प्रतिष्ठा (मुण्ड० शर) इति क्लाराब्दवाच्याना प्राणादीनां प्रतिष्ठाशब्दवाच्यवस्वकारणप्रातिप्रति पादपत्वात् । 'यत्रास्य पुरपस्याग्नि वागप्येति, वात प्राण, चपुरादिरयम्' इत्यादिश्रुते । इति प्राप्ते यूम-तत्त्वविदो दृष्टया परमात्मन्येव लय इति श्रुत्यन्तरानि श्रीयते। 'यथा नद्य स्पन्दमानाः समुद्रस्त गच्चति नामरूपे विहाम । तथा विद्वानामरूपाद्विमुक्त परात्पर पुरुषमुपैति दिव्यम् (मुण्ड० ३।८ ) इति घृती नद्य ब्धिलयदृष्टान्त उपन्यस्यते। अथ दान्तिवे परमात्मनि लय इत्ययमों न विशद , तहिं श्रुत्यन्तरे विशदो गम्यते-'य'मा नद्य स्यदमाना समुदायमा समुद्र प्राप्यास्त गच्छन्ति । भिद्यते तासा नामरूपे 'समुद्र' इत्येव प्रोच्यते । एवमेवास्य परिद्रप्टुरिमा पोडशवला पुरुषायणा पुरुष प्राप्यास्त गच्छन्ति । लय होता है उसी प्रकारकी माम्योक्तिस विद्वानोंकी दृष्टिसे इन्द्रियोंका सय परमा भामें ही होता है। गता कला।' इत्यादि शास्त्र सो प्रविद्वानोको दृष्टिगे उगहत है। तत्त्वज्ञानीको विलीन होती हुई वाग भादि इन्द्रियां अपने अपने भग्नि पादि मधिकरणोमे विलीन होती हैं परमात्मामे नही । क्योकि गता कला पञ्चश प्रतिष्ठा।' (मोक्षकालमें देहारम्भक प्राण मादि पदह कलाएं अपने अपने भाषपोंमें स्थित हो जाती हैं ) इसमें कलाशन वाच्य प्राण प्रादिके प्रतिष्ठा शब्द वाच्य भपने अपने कारणको प्राप्तिका प्रतिपादक है। यत्रास्य० (जिम समय इस पुरुपको वाक अग्निको प्राप्त होती है प्राण वायुको पौर चक्षु मादि यको प्राप्त होती है ) इत्यादि श्रुति है। सिद्धान्ती-ऐमा पूवपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-तत्त्वविदको दृष्टिस वाग प्रादि इद्रियोका परमा मामे ही लय होता है यह भय श्रुति निश्चय होता है। (जसे बहती हुई नदियां अपने नाम मौर रूपो छोडकर ममुद्रमे विलीन हो जाती हैं वसे ही विद्वान् नाम रूपसे मुक्त होकर परापर दिव्य पुस्पको प्राप्त होता है ) इम श्रुतिमे नदी समुद्रका दृष्यात कहा गया है। यदि दाह्रतिक परमा भामे लय इम प्रकार यह प्रथ स्पष्ट नहीं है तो प्रय श्रुति मे स्पष्ट ज्ञात होता है- यथेमा नद्य'० (जसे वेगसे बहती हुई समुद्रायण ये नदियां समुद्रको प्राप्तकर लय हा जाती है उनके नाम मौर रूपका लय हो जाता है, समुद्र है ऐसा कहा जाता है इस प्रकार इस तत्त्ववित्को पुरुपात्रय पोडश-कलाए पुरुषको प्राप्तवर लय हो जाती है उनके नाम यथा नद्य० २७४ मि०४ पा०२ अधि०८] वैयासिकन्यायमाला भिद्येते तासां नामरूपे 'पुरुषः' इत्येवं प्रोच्यते (प्र० ६५ ) इति । भिद्यते विलियेते । सेयं श्रुतिस्तत्त्वविदृष्टिविषया। 'गताः कलाः' इति शास्त्रं तु तटस्थ- पुरुषप्रतीतिविषयम् । म्रियमाणे तत्त्वविदि समीपवतिनः पुरुषाः स्वस्वदृष्टान्तेन तदीयवागादोनामप्यग्न्यादिषु लयं मन्यन्ते । अतः श्रुत्योनं विरोधः। तस्मात्पर- मात्मनि तत्वविदः प्राणानां लयः ॥७॥ (अष्टमे तत्त्वविद्वागादिलस्य निःशेषत्वाधिकरणे सूत्रम् ) अविभागो लोकवत् ॥ १६॥ अष्टमधिकरणमारचति- तल्लयः शक्तिशेपेण निःशेषेणायवाऽऽत्मनि । शक्तिशेपेण युक्तोऽसावज्ञानिष्वेतदीक्षारणात् ॥ १५ ॥ नामरूपविभेदोक्तनिःशेषेणैव तल्लया। अज्ञे जन्मान्तराचं तु शक्तिशेषत्वमिष्यते ॥ १६ ॥ पूर्वाधिकरण उक्तो लयो न निःशेषः, किंतु सावशेषो भवितुमर्हति । वागा- दिलयत्वात्, प्रज्ञानिवागादिलयवत् । इति प्राप्ते ब्रूमः -'भिद्येते तासां नामरूपे' इत्यत्र जीवस्य याः षोडशकलाः संसारहेतवः, तासा कलानां नामरूपविभेदः श्रूयते । कलाश्च वाक्योपक्रमेऽनु- रूपका विलय हो जाता है 'पुरुष' ऐसा ही कहा जाता है ) भिद्यते-विलय जाते हैं। यह श्रुति तत्त्वविद् दृष्टि विषयक है। 'गता: कला' यह शास्त्र तो तटस्थ पुरुष प्रतोति विषयक है। म्रियमाण तत्त्वविद्के समीपवर्ती पुरुष अपने अपने दृष्टान्तसे उनके वाग मादि इन्द्रियोका भी पग्नि आदिमे लय मानते हैं । अत: दोनो श्रुतियोका विरोध नही है। इससे तत्त्ववित्की इन्द्रियोका परमात्मामे ही लय होता है ।। ७ ॥ मष्टम मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-मात्मामे वागादि इन्द्रियोका लय शक्ति विशेषसे होता है अथवा निरवशेष । पूर्वपक्ष-शक्ति विशेष युक्त हो लय है अर्थात् उनका शेष रहता है, क्योकि प्रज्ञा- नियो मे ऐसा देखनेमे प्राता सिद्धान्त-निमे नाम रूपका विलय कहा गया है, इसलिए निःशेप ही प्राणोका लय होता है । परन्तु अज्ञानी पुरुषोंके जन्मान्तरके लिए शक्ति शेष व अभीष्ट है। पूर्व अधिकरणमे उक्त लय निःशेष नहीं हैं, किन्तु सविशेष होना चाहिए, वागादिका लय होने से, अज्ञानीके वाग् प्रादि लयके समान । सिद्धान्ती-ऐमा पूर्व पक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-'भिद्येते तासा नामरूपे इस श्रुतिमे जीवको जो मंमार हेतुभून कलाएं हैं उन कलाग्राके नाम और रूपका विभेद- २८० मापानुयादसहिता [प०४ पा० २ पि०६] बान्ताः-स प्राणमस्जत। प्राणादा गं यायुग्योतिरापः पपिवीन्द्रिय मनोऽनम् । प्रानाशेयं तपो मन्त्राः पर्म सोयाः, सोवेषु च नाम च' (प्र० ६५४) इति । यदि प्राणादीनां नामान्तानां नामरूपे वाक्यवदोषण सीयेते, तदा नामम्पविभेदश्रुतिकारध्येन। पत्यारमना नामरुपयोः गृहमपोरयस्थानाद ! मजानिनस्तु जन्मान्न रसिद्धये गवरपयशेषत्वमिप्यते । तस्मात्तायदो यागादीनां नि.रोपेण परमात्मनि लयः ॥ ८॥ (नदम उमन्त्रिाविशेषापिररणे मूत्रम्) सदोोग्रज्वलनं तत्प्रकाशिनद्वारा विद्यासामध्यांतच्छेप. गत्यनुस्मृनियोगान्च हातानुगृहीतः शताधिकया ॥ १७ ॥ नवमाधिकरणमारचति- पविशेषो विदोषो या स्यादुत्लान्तेषामितुः । हत्प्रद्योतनसाम्योक्नेरविशेषोऽन्यनिगमात् ।। १७॥ मूर्धन्ययैव नाध्यापो प्रजेन्नाठोविचिन्तनात् । विद्यासामध्यंतश्चापि विशेपोऽस्स्यन्यनिर्गमात् ।। १८ ॥ मय मुना पाता है। कलापोंका याश्योपत्रममे 'स प्राणमसजत' ( उस अन्तर्यामी गुरुपने प्राणु-हिरण्यगर्भो उसन निग। उम प्राण प्रदा, प्राकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी, इन्द्रिप-पांच गानेन्द्रिय मोर पांच कर्मेन्द्रिय मन, योहि, यव मादि मन, मानमे वीर्य-मामर्थ्य तप, कर्मके सापन भून ऋक्, यजु भादि मात्र, अग्निहोत्र पादि कर्म, कर्मों के फलरूप लाक, उन सोकोंमें रहनेवाले के यज्ञस्त, मादि नाम, उनकी रचना को ) ऐमा पनुक्रम है। यदि नाम पर्यन्त प्राण मादि नाम पर कप कि पवापसे लोन हों, तो नाम धौर रूपको प्रलय प्रतिरादक श्रुति वायित होगी, क्योकि शक्तिरूपसे मूधम नाम, रूप प्रवस्थित हैं । जन्मान्तर सिद्धि के लिए प्रशानको तो शक्ति भवशेषता मभित्रत है। हमने तत्ववितके वाग मादिका नि.पोप रूपते ही परमात्मामें सप होता नवम अधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-उपासकको उत्क्रान्ति भन्य जनाकी उत्क्रान्तिके समान है प्रपदा विशेष है? पूर्णपक्ष हृदय प्रद्योतन-नाडी मुखज्वलनरूप साम्य उक्तिसे मन्योको उक्रान्तिस उपासककी उत्क्रान्ति विशेष नही है। सिद्धान्त-उपासक मूर्धन्य नाडीमे हो उत्क्रमण करता है, क्याकि उसने मूर्धन्य नाडोका चिन्तन किया है, इससे पौर मगुण ब्रह्मविद्याके सामर्थ्यसे भो भन्योके उत्क- मणके देवनेसे उपामकको उत्क्रान्तिमै विशेषता है ।
२८१ [अ०४ पा० २ अधि०६] यासिकन्योयमाला - । उपासकस्य येयमुत्क्रान्तिः सेयमितरोत्क्रान्त्या मार्गोपक्रमपर्यन्तं समेत्युक्तम् । मथ मार्गोपक्रमेऽपि समैव भवितुमर्हति । हृत्प्रद्योतनादेः समत्वश्रवणात् । तथा हि-"तस्य हैतस्य हृदयस्यानं प्रद्योतते, तेन प्रद्योतेनेष प्रात्मा निष्कामति चक्षुष्टो वा मूनों वाऽन्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यः' (बृह० ४।४।२ ) इति श्रूयते । अस्याममर्थ:-'वाइमनसि संपद्यते' इति क्रमेण सजीवं तिसरीरं शक्त्यवशेष परमात्मनि यदा लीयते, तदा पूर्वजन्म समाप्तं भवति । अथ जन्मान्तराय तल्लिङ्गं पुनह'दये प्रादुर्भवति। तस्मिन्नवसरे हृदयाग्रेऽवस्थितस्य लिङ्गस्य गन्तव्यभा- विजन्मालोचकात्मकोऽन्त्यप्रत्ययत्वेन लोके प्रसिद्धः कश्चित्प्रद्योतो भवति । तेन युक्तः सन्नाडीभ्यो निगच्छतीति। एतच्च सर्वेषां समानम् । तस्मान्नोपासक- स्येतरेभ्यो विशेषः। इति प्राप्ते ब्रूम-मूर्धन्यैव नाड्योपासको निगच्छति । इतराभ्य एव नाडोभ्य इतरे। कुतः। उपासकेन मूर्धन्यनाट्याश्चिन्तितत्वात् । सगुणब्रह्मविद्यासा- मर्थ्याच । श्रुत्यन्तरे चायमर्थ स्पष्टमेव गम्यते- शतं चैका च हृदयस्य नाध्यस्तासा मूर्धानमभिनिःसृतेका। तयोर्वमायनमृतत्वमेति विष्वड्डन्या उत्क्रमणे भवन्ति ।। (छा०८।६।६) उपासकको जो यह उत्क्रान्ति है वह मार्गके उपक्रमतक तो अन्य लोगोको उत्क्रान्ति के ममान है, ऐसा रहले कहा गया है । मार्गके उपक्रममे भी समान ही होनी चाहिए, योकि हृदय प्रद्योतन प्रादिका समान श्रवण है। जैसेकि 'तस्य हैतस्य' ( उम इम हृदयका अग्रभाग प्रकाशित होता है। उसी प्रकाशसे यह पारमा नेत्रसे, मूर्धसे अथवा गरीरके किमी अन्य भागसे बाहर निकलता है ) ऐमी श्रुति है। इसका यह अर्थ है- 'वाणी मनमे लीन होती है। इस क्रमसे शक्ति प्रवशेप जीव सहित लिङ्ग शरीर जब परमात्मामें लीन होता है तब पूर्व जन्म समाप्त होता है । अनन्तर जन्मान्तरके लिए वह लिङ्ग शरीर पुनः हृदयमें प्रादुर्भूत होता है। उस अवसरपर हृदयके अग्रभागमे अवस्थित लिङ्ग शरीरको गन्तव्य भाविजन्मका पालोचनात्मक जो अन्त्य प्रत्ययरूपसे लोकमे प्रसिद्ध है कोई प्रकाशित होता है, उमसे युक्त हुप्रा यह प्रात्मा नाडियोंसे निकल जाता है । यह तो सब लोगोका समान है। इमसे उपामककी उस्क्रान्तिमे अन्यकी उतान्तिसे विशेषता नहीं है। सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-उपासक मूर्धन्य माडीरो ही निर्गमन करता है और अन्य, अन्य नाडियोसे ही, क्योकि उपासकमे मूर्धन्य नाडीका चिन्तन किया गया है और सगुण ब्रह्मविद्याकी सामर्थ्य है। 'शतं चैका० ( हृदयकी सौ एक मुख्य नाड़ियाँ हैं। उनमें एक मूर्धाको मोर निकल गई है, उसके द्वारा ऊपरकी भोर - २५२ भाषानुवादसहिता [म० ४ पा० २ मषि०१०] इति । 'मन्या नाट्य उस्क्रमणायोपयुज्यन्ते, नत्वमृतस्वप्राप्तये' इत्यर्थः । तस्मादस्त्युपासवस्य विशेषः॥६॥ (दामे रातिमतस्यापि राम्यनुमारिवाधिकरणे गरे) रसम्पनुमारी ॥ १८॥ निशि नेति पेन संवन्धस्य यावहभावित्वाइर्शयति च ॥१६॥ दशमाधिकरणमारचति- महन्येव मृतो रश्मोन्याति निश्यपि वा निशि। सूर्यरएमेरमावेन मृतोम्हन्येव याति तम् ॥ १६ ॥ यावद्देहं रश्मिनात्योयोगो ग्रीष्मक्षपास्वपि। देहदाहाच्छु तत्वाच्च रश्मोनिश्यपि यात्यसो ॥ २० ॥ 'अर्थतेरेव रश्मिभिरूध्वंमाक्रमते' (छा० ८६५) इति मन्यनाच्या निर्गतस्य रश्मिसंबन्धः श्रूयते। स चाहन्येव मृतस्य संभवति, न तु रात्री, रश्म्मभावात्। इति प्राप्ते घूमः-रश्मिनाड्योः मंबन्धो यावदेहमावी । प्रत एव ग्रीष्म- षानेवाला जीव ममरत्यको प्राप्त होता है, शेष नाडियां नानागतिको देनेवासी केवल उत्क्रमणका कारण होती है ) इस अन्य घुविमे यह पर्थ स्पष्ट ही ज्ञात होता है । "मन्य नाडियो उत्क्रमणके लिए उपयोगी होती हैं परन्तु वे मोक्ष प्राप्तिके लिए नहीं है। ऐसा अपं है। उससे उपासकको उत्क्रान्निो मन्यको अपेक्षा विशेप है ।।। दशम प्रधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-दिनमें ही मृत पुरुष रश्मियोको प्राप्त होता है प्रथवा रात्रिमे मृत भी ? पूर्वपक्ष--रात्रिमे सूर्यको रश्मियोके प्रभाव होनेसे दिन में ही मृतक रश्मियोको प्राप्त होता है। द्विान्त-रश्मि और नाडीका सम्बन्ध यावद् देह भावो है. ग्रीष्म ऋतुको रात्रियोमें भो देह संतापका मनुभव होता है, ऋति भी रश्मिी भोर नाड़ीका भवियोग दिखलाती है । इमसे मृतक व्यक्ति रात्रिमें भी रश्मियोका प्राप्त होता है। 'अर्थतरेव.' ( उपासक इन्ही रश्मियोसे ऊपरको उत्क्रमण करता है ) इमसे मूर्धन्य नाड़ीसे निकले हुएका रश्मि सम्बन्ध मुना जाता है। वह तो दिनमें ही मृतका संभव है, रात्रिमें नही, क्योंकि रात्रिमे रश्मियों नहीं हैं। सिद्धान्तो-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-रश्मि और नाडोका सम्बन्ध [प०४ पा० २ प्रधि० ११ ] वैयासिवन्यायमाला २३ निशासु देहदाह उपलभ्यते। ऋत्वन्तरेषु तु प्रतिषिद्धत्वादनुपलम्भः। श्रुतिश्च रश्मिनाड्योरवियोग दर्शयति-'अमुष्मादादित्यात्प्रतायन्ते वा प्रासु नाडोपु सूता पाभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्ते तेऽमुष्मिन्नादित्ये सप्ता.' (छा०८२) इति । तस्मान्निश्यपि मृतो रश्मोन्याति ॥१०॥ ( एकादश मयनाधिकरणे तत्त्वविदो दक्षिणायनेऽपि विद्याफलाधिकरणे मूत्र) अतश्चायनेऽपि दक्षिणे ॥ २०॥ योगिनः प्रति च मर्यते स्माते चैते ॥२१॥ एकादशाधिकरणमारचयति- अयने दक्षिणे मृत्वा घीफलं नेत्यथैति वा। नेत्युत्तगयणाद्युक्त भीष्मस्यापि प्रतीक्षणात् ॥ २१ ॥ आतिवाहिकदेवोक्त वरख्यात्ये प्रतीक्षणात्। फलेकान्त्याच्च विद्यायाः फलं प्राप्नोत्युपासक, ॥ २२ ॥ दक्षिणायने मृतस्योपामकस्य न विद्याफलं ब्रह्मलोकप्राप्तिः संभवति । तो यावद् देह भावो है, प्रतएव ग्रीष्म रात्रियोमे भी देहमे गर्मी उपलब्ध होती है । अन्य ऋतुप्रोमे भी शोत मादिसे प्रतिहत होनेसे प्रतीत नहीं होती। श्रुति भी रश्मि और नाड़ीका प्रवियोग दिखलाती है-'ममुष्मादादित्यात्' (वे रश्मियाँ निरन्तर उस मादित्यमण्डलसे फैलती हैं और इन नाडियोमैं प्रवेश करती हैं और इन नाडियोसे फैलती है ये उम मादित्य मण्डलमे प्रवेश करती हैं ) इसस निश्चित हुमा कि रात्रिम भी मृत रश्मियोको प्राप्त होता है ॥ १०॥ एकादश मधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-दक्षिणायनमे मृतक उपामक उपासनाफल-ब्रह्म प्राप्ति कर सकता है मथवा नहीं? पूर्वपक्ष-ति और स्मृतिमे उत्तरायण मादिके कथनसे और भीष्म पितामह द्वारा उत्तरायणको प्रतीक्षा होनेसे दक्षिणायनमे मरकर ब्रह्म प्रालि नही कर सकता है। सिद्धान्त-उत्तरायण शब्दसे प्रातिवाहिक देवता कहे गये है । पिताको प्रसनतास प्राप्त स्वेच्छा मरणरूप वरदानको स्वातिके लिए भीष्म पितामहने उत्तरायणको प्रतीक्षा की मोर विद्याफल ब्रह्म प्राप्ति अवश्यंभावी-भव्यभिचरित होनेसे उपासक विद्याके फल ब्रह्मको प्राप्त होता है। दक्षिणायनमे मृत आमकको विद्याका फल ब्रह्मलोक प्राप्ति नहीं हो सकती है, क्योकि २८६ मापानुवाद सहिता [म०४ पा० ३ घि०२) वायोपे पञ्चाग्निविद्याविदो विद्यान्तरोपासनाचोद्दिश्याचिरादिमार्गस्येव पठिनत्वात्-"य इत्यं विदुः, ये चेमेऽरण्ये श्रद्धां तप त्युपासते, तेऽचिषभि- संभवन्ति (बृह० ६।२।१५ ) इति । श्रुत्यन्तरोताना वाय्वादीना गुणोपसंहार: न्यायेनाचिरादिमागंप्रवेशे सति तत्पर्वस्वसभवात् । तस्मादचिरादिमार्ग एक एवं ॥१॥ (द्वितीये वायो भनिवेशाधिकरणे गूत्रम् ) वायुमन्दादविशेषविशेषाभ्याम् ॥ २॥ द्वितीयाधिकरणमारचयति- संनिवेशयितुं वापुरत्राशयोऽथ शक्यते । न पायो वायुलोकस्य श्रुतक्रमविवर्जनात् ॥ ३॥ वायुच्छिद्राद्विनिष्क्रम्य स प्रादित्यं व्रजेदिति । श्रुनरेवनिवेर्वायुर्देवलोक्स्तनोऽप्यधः "तेविषमभिसंभवन्ति, प्रचिषोऽहः अह्न प्रापूर्यमाणपक्षम्, पापूर्यमाणप- क्षाद्यान्पडुदड्डेति मासांस्तान्मासेभ्यः, संवत्सरम्, संवत्सरादादिन्यमादित्या- चन्द्रमस, चन्द्रमसो विद्युतं, तत्पुरुषोऽमानवः, य एतान्ब्रह्म गमयति" ( छा० पचिरादि एक ही मार्ग है। क्योकि पंचाग्निविद्याके वाक्यरोपमे पंचाग्निविद्यावेतामो पौर भन्य विद्याके उपामकों को उद्देश्यकर मचियदि मार्ग ही पठित है। 'य इत्यं विदुः' (जो ऐमा जानते हैं ) जो ये भरण्यमे श्रद्धायुक्त होकर तपकी उपासना करते हैं, वे भचिको प्राप्त होते हैं ) अन्य श्रुतिमे उक्त वायु मादि मागोका गुणोपमहारन्यायसे अचिरादि मार्गमे प्रवेश होनेपर तत्पूर्वत्व हो सकता है । इसलिए मचिरादि मार्ग एक ही है ॥ १॥ द्वितीय प्रधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-अचिरादि मार्गमें वायुका संनिवेश हो सकता है अथवा नहीं हो सकता। पूर्वपक्ष-नहीं हो सकता, क्योकि वायु लोकमें श्रौत प्रमका प्रभाव है । सिद्धान्त-अचिरादि मार्ग में संनिवेश करना चाहिए, क्योकि 'वायुके छिद्रसे निकलकर वह मादित्यलोकमें माता है, इस भर्थको बोधिका धृति है, इससे मादित्य लोकके नीचे वायुका मोर वायु लोकके नीचे देवलोकका भी समावेश है । वेऽचिपमभिसंभवन्ति.' (वे अधिको प्रास करते है, चिसे महको, प्रहसे मापूर्य- माणपक्ष-शुक्लपक्षको, मापूर्यमाणपक्षसे जिन छ: मासोमें सूर्य उत्तरमें जाता है उन छ। मासोको, मासोंसे संवत्सरको, संवत्सरसे प्रादित्यको, मादित्यसे चन्द्रमाको चन्द्रमाक्षे विद्युत्को, वहाँ ममानव पुरुष है, वह प्रमानव पुरुष इन उपासकोको ब्रह्मलोकमें
२८७
[अ० ४ पा० ३ अधि० २] यासिरन्यायमाला
५॥१०॥१.२) इति धूयमारणेऽचिरादिमार्गे शाखान्तरे श्रुतो वायुः केनापि सनि-
धेशेनान्तर्भावयितुमशक्यः । अस्योपरि वायुः' इति क्रमस्याश्रुतत्वात् । कल्प-
काभावाचा
इति प्राप्ते बम-श्रुत्यन्तरं तत्कल्पवम् । तथा हि-"स वायुमागच्छति
तस्मै स विजिहीते यथा रथचक्रस्य खम् । तेन स ऊवं प्राक्रमते स आदित्य-
मागच्छति" (वृह० ५।१०।१ ) इति। 'इतो निर्गत्योपासको यदा वायुमा-
गच्छति, तदा तद्वायुमण्डलं छिद्रितं भवति । तेन रथचक्रच्छिद्रप्रमाणेन वायु-
च्छिद्रेण वायुमण्डलमुल्लड्ध्याऽऽदित्यमण्डलं प्राप्नोति' इत्यर्थः । एवं च वायो-
रादित्यात्पूर्वत्वप्रतीते. क्रमविशेषोऽवगन्तुं शक्यते । “मासेम्य: संवत्सरम,
संवत्सराद्वायुम्, वायोरादित्यम्" इत्येवं संनिवेशः वर्तव्यः । बृहदारण्यके तु-
मासानन्तरं संवत्सरं परित्यज्य तस्य स्थाने देवलोकः पठित । स च संवत्सरा.
नन्तरं वायोरििनवेशयितव्यः । माससंवत्सरयोः संवन्धित्वेन प्रसिद्धयोरान-
न्तर्यस्यानिवारणीयत्वात् । तदेवं संवत्सरादित्ययोर्मध्ये देवलोकवायुलोको
संनिवेशायितव्यो ।॥२॥
पहुंचाता है ) इस प्रकार श्रूयमाण अचिरादिमागमे अन्य शाखामें श्रुतवायुका किसी भी
संनिवेशसे अन्तर्भाव नही किया जा सकता, क्योकि इसके अनन्तर वायु है, ऐमा क्रम
युत नहीं है और कल्पक हेतुका भी प्रभाव है।
सिद्धान्ती-ऐसा पूर्व पक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-अन्य श्रुति ही इस मर्थका
कल्पक है । जैसे कि 'स वायुमागच्चति०' (वह वायुको प्राप्त होता है, वहा वह वायु
उसके लिए छिद्र युक्त हो पाता है- मार्ग दे देता है, जैसा कि रथके पहिएका छिद्र
होता है, उसके द्वारा वह ऊर्व होकर चढता है वह मूर्पलोकमे पहुंच जाता है ) 'इससे
निकलकर उपासक नव वायुमे पाता है, तब वायु मण्डल सच्छिद्र हो जाता है, वह
रय चक्र छिद्रके समान वायु छिद्रसे वायुका उल्लङ्घनकर प्रादित्यमण्डलको प्राप्त होता
है' यह श्रुत्यर्थ है। इस प्रकार घायुको प्रादित्यसे पूर्व प्रतीति होनेसे क्रम विशेष
जाना जा सकता है-'मासोसे संवत्सरको, संवत्मरसे वायुको, वायुमे प्रादित्यको प्राप्त
होता है। इस प्रकार संनिवेश करना चाहिए। बृहदारण्यकमे तो मासके अनन्तर
संवत्सरका परित्यागकर उसके स्थानमें देवलोक पठित है। उसका संवत्मरके मनन्तर
और वायुके पूर्व में मंनिवेश करना चाहिए, क्योंकि सम्बन्धिरूपसे प्रसिद्ध मास मौर
संवत्मरका मानन्तर्य अनिवारणीय है। इससे संवत्सर और मादित्य के मध्यमें देवलोक
पौर वायुलोकका मंनिवेश करना चाहिए ॥२॥
२८८
भाषानुवादसहिता [अ० ४ पा० ३ अधि० ३]
(तृतीये वरुणादिलोवानां व्यवस्थाधिकरणे सूत्रम् )
तडितोऽपि वरुणः संबन्धात् ॥३॥
तृतीयाधिकरणमारचयति-
वरुणादेः संनिवेशो नास्ति तत्रोत विद्यते ।
नास्ति वायोरिवैतस्य व्यावस्थाश्रुत्य भावतः ॥५॥
विद्यत्संवन्धिवृष्टिस्थनीरस्याधिपतित्वतः
वरुणो विद्युतोऽस्त्यूचं तत इन्द्रप्रजापती ॥६॥
कौषीतकिन:-पठन्ति--"स वरुणलोकम, स इन्द्रलोकम्, स प्रजापति-
लोकम्' इति । ते वरुणादयत्रयो लोका अचिरादिमागे निवेशयितुमशक्या: ।
वायोरिव व्यवस्थापकाभावात् ।
इति प्राप्ते ब्रूम:-विद्युल्लोकस्योपरि वरुणलोकः संबन्धवशाद्वयवस्थाप्यते ।
'विद्युत्पूर्वकवृष्टिगतनीरस्य वरुणोऽधिपतिः' इति विद्युदरुणयोः' संवन्धः इन्द्र-
प्रजापत्योस्तु स्थानान्तरासंभवेऽपि 'मागन्तुकानामन्तै संनिवेश.' इति न्यायेन
वरुणलोकस्योपरि संनिवेशःवरुणादीना संनिवेशादीरादिमार्गोव्यवस्थितः ॥३॥
तृतीय अधिकरणकी रचना करते हैं-
सन्देह-अचिरादि मार्गमे वरुणादिका मंनिदेश है मथवा नही है।
पर्वपक्ष-
-वरुण मादिका संनिवेश नहीं है, क्योंकि वायुके समान इसको व्यवस्था-
पिका अति नहीं है।
सिद्धान्त-वरुणका चिरादिमागमे सनिवेश है, क्योंकि वरुण विद्युत्सम्बन्धी
वृष्टिके जलका अधिपति है, अतः विद्युत्के ऊपर वरुण है उसके ऊपर इन्द्र और प्रजापति
हैं। ऐसा क्रम है।
कोषीतकी शाखावाले पढते हैं-'स वरुणलोकम् ' (वह वरुणलोक वह इन्द्रलोक
और वह प्रजापति लोकको जाता है ) वे वरुण आदि तीनो लोक अचिरादि मार्ग में
संनिविष्ट नहीं किये जा सकते, क्योकि वायुके समान यहां कोई व्यवस्थापक नहीं है ।
सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं--विद्युत्लोकके पर
वरुण लोककी सम्बन्घसे व्यवस्था की जाती है। विद्युत्पूर्वक दृष्टिगत जलका वरुण
अधिपति है, इस प्रकार विद्युत् पौर वरुणका सम्बन्ध है। इन्द्र और प्रजापतिका
अन्य स्थान नहीं है, तो भी 'पागन्तुकानामन्ते सन्निवेशः' (आगन्तुकोका अन्त मे
समावेश होना चाहिए ) इम न्यायसे वरुणलोकके ऊपर इन्द्र और प्रजापति लोकोंका
सन्निवेश है । इस प्रकार वरुण प्रादिके मंनिवेश होनेसे अचिरादि मार्ग सुव्य-
वस्थित है ॥३॥
भ० ४ पा० ३ मधि० ४ ] वैयासिकन्यायमाला २८६ (चतुर्थ अचिरादीनामातिवाहिकत्वाधिकरणे सूत्राणि ) श्रातिवाहिकारतल्लिङ्गात् ॥ ४॥ उभयव्यामोहात्तसिद्धः ॥५॥ वैद्युतनैव ततस्तच्छ्रुतेः॥६॥ चतुर्थाधिकरणमारवयति- मार्गचिह्न भोगभूर्वा नेतारो वाचिरादयः । प्राद्यो स्यातां मार्गचिह्नसारूप्याल्लोकशब्दतः ॥७॥ अन्ते गमयतीत्युक्त नेतारस्तेषु चेदशः निर्दशोऽस्त्यत्र लोकाख्या तग्निवासिजनान्प्रति ।। ८ ।। य एतेऽचिरादयः श्रुतास्ते मार्गचिह्नानि भवितुमर्हन्ति । लौकिकमार्गचि- ह्रसारूप्येण निर्दिश्यमानत्वात् । लोका हि मागंज्ञाननायेवं निर्दिशन्ति-ग्रामा- नित्य नदी व्रज, ततः पर्वतम्, ततो घोपमिति तद्वदनापि "अर्चिपोहः । महापूर्यमाणपक्षम्" इति निर्दिश्यते । तस्मान्मार्गचिह्नानि । यद्वा ब्रह्मलोक जिगमिपोविश्रामस्थानभोगभूमयोऽचिरादयः। कुतः। वायुलोकं वरुणलो मिति प्रत्युतस्य लोकशब्दस्य भोगभूमो प्रसिद्धत्वात् । इति प्राप्ते बम:--'तत्पुष्पोऽमानवः । स एतान्ब्रह्म गमयति' (छा० ५३१०१२) चतुर्थ भधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-क्या चिरादि मार्गके चिह्न है, या भोग-भूमि हैं, अथवा नेता हैं ? पूर्वपक्ष-पचिरादि मार्गके चिह्न विशेष हैं अपवा भोग भूमि हैं, क्योंकि मार्गके चिह्नका सादृश्य है और लोक शब्दका प्रयोग है। सिद्धान्त-ऋतिके मन्तमें 'गमपनि' (ले जाता है) इस प्रकारके कथनसे चियदि नेता है, उनमें इस प्रकारका निर्देश भी हो सकता है, एवं लोक शब्दका प्रयोग वनि- वासी जनोके माधारपर किया गया है। अतिमें प्रतिपादित जो ये अचिरोदि हैं, वे मार्गके चिह्न होने चाहिए, क्योकि लौकिक मार्ग चिह्नके साहश्यसे निर्दिश्यमान हैं, लोग मार्ग शानके लिए ही निर्देश करते है-'प्रामसे निकलकर नदीको जामो, नदीसे पर्वतको और पर्वतसे पर्णकुटिको जामो' ठीक इसी प्रकार यहाँ भी 'चिसे ग्रहको, अहमे शुक्लपक्षको ऐसा निर्देश किया जाता है । इससे पचिरादि मार्ग-चिह्न हैं। प्रथया ब्रह्मलोक जानेवालोके लिए अधिरादि विश्राम स्थान भोगभूमि हैं। क्योकि 'वायुलोक, वरुणलोक' इस प्रकार प्रयुक्त लोक शब्द भोग भूमिमें प्रसिद्ध है। सिद्धान्ती-एमा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-'तत्पुरुषोऽमानका (वह T २६० भाषानुवादसहिता [अ०४ पा० ३ अधि०५] इत्यन्ते थूयमारणस्यामानवस्य विद्युत्पुरुषस्य नेतृत्वावगमात्, तत्साहचर्यरणा- चिरादयोऽप्यातिवाहिकदेवता इत्यवगम्यते । यत्तु निर्देशसाम्यमुक्तं तदाति- वाहिकदेवतास्वपि समानम् । 'गच्छ त्वमितो बलवर्माणम्, ततो जयगुप्तम्, ततो देवदत्तम्' इत्यादिनिर्देशदर्शनात् । लोकशब्दस्तूपासकानां तत्र भोगाभावेऽ- प्यातिवाहिकदेवानां भोगमपेक्ष्योपपद्यते । तस्मादातिवाहिका प्रचिरादयः ॥४॥ (पञ्चमै कार्यब्रह्मण एवोत्तरमार्गगम्यत्वाधिकरणे सूत्राणि ) कार्य बादरिरस्य गत्युपपत्तेः ॥ ७॥ विशेषितत्त्वाच्च ॥८॥ सामीप्यात्तु तद्वचपदेशः ॥६कार्यात्यये तथ्यक्षेण सहातः परमभिधानात् ॥ १०॥ स्मृतेश्च ॥ ११॥ परं जैमिनिमुख्यत्वात् ॥ १२॥ दर्शनाच्च ॥ १३ ।। न च कार्ये प्रतिपत्त्यभिसंधिः ॥ १४ ॥ पश्चमाधिकरणमारचयति- परं ब्रह्माय वा कार्य मुदङमार्गण गम्यते । मुख्यत्वादमृतत्वोक्तेगंम्यते परमेव तत् ॥६॥ कार्य स्याद्गतियोग्यत्वात्परस्मिस्तदसंभवात्। सामीप्याग्रह्मशब्दोक्तिरमृतत्वं क्रमाद्भवेत् ॥ १० ॥ विद्युत्पुरुष अमानव है उपासकोंको ब्रह्मलोकमे पहुंचाता है ) इस अतिके भन्तमें धूयमाण प्रमानव विद्युत्पुरष नेता अवगत होता है। उसके साहचर्य से मचिरादि भी माविवाहिक देवता हैं, ऐसा प्रवगत होता है। पौर जो निर्देशसाम्य कहा गया है, वह पातिवाहिफ देवताओंमें भी समान है। 'यहाँसे तुम बलवर्माके पास जानो, उससे जयगुमके पास, उससे देवदत्तके पास जानो' इत्यादि निर्देश देखा जाता है। लोक शब्द मो उपासकोंमें वहाँपर भोगके प्रभावमें भी पातिवाहिक देवोंके भोगकी मपेक्षा कर उपपन्न होता है। इससे पचिरादि मातिवाहिक हैं ॥४॥ पंचम मधिकरणकी रचना करते है- सन्देह-उत्तरमार्गस क्या परब्रह्मकी प्राप्ति होती है अथवा कार्यग्रह्म की ? पूर्वपदा--परब्रह्मकी ही प्राप्ति होती है, क्योकि ब्रह्म शन्दका मुख्या परब्रह्म है । और 'अमृतत्वमेति' इस श्रुति पथनगे भी परब्रह्म ही प्राप्त होता है। सिद्धान्त-कार्य ब्रह्मको प्राप्ति होती है, क्योंकि यह गतिके योग्य है और परब्रह्ममें गतिरा मन नहीं है। ब्रह्म पदवी उक्ति तो सानिध्यसे वही गई है और प्रमा अमृतत्व प्राप्त होगा।
[अ० ४ पा० ३ अधि० ६ ] वैयासिकन्यायमाला "स एतान्ब्रह्म गमयति" इति श्रूयमाणं यदुत्तरमागंप्राप्य वस्तु, तत्परं ब्रह्म भवितुमर्हति । ब्रह्मशब्दस्य तत्र मुख्यत्वात् । 'तयोध्यमायनमृतत्वमेति' (कठ० ६.१६ ) इत्यमृतत्वकथानाच । इति प्राप्ते ब्रम:--सत्यलोकाख्यं कार्य ब्रह्म, उपासकाव्यतिरिकत्वात्परि- च्छिमत्वाच्च गतिपूर्कप्राप्तियोग्यम् । न तु तथा परं ब्रह्म, तस्य सर्वगतत्वात् । उपासक स्वरूपत्वाच । ब्रह्मशब्दस्तु मुख्यार्थासंभवेन सामीप्यसंबन्धात्सत्यतोक- माचष्टे । समीपो हि सत्यलोक: परब्रह्मणः । तल्लोकवामिनां तत्वज्ञानेऽवश्य- भाविनि सति पुनर्जन्मव्यवधानमन्तरेण मोक्ष्यमाणत्वात् । अत एव स्मृतिगह- ब्रह्मरणा सह ते सर्व प्राप्ते च प्रतिसंचरे। परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम् ।। इति ।। एवं च सत्पमृतत्वश्रुतिः क्रममुक्त्यभिप्राया। तस्मादुत्तरमार्गेण प्राप्यं कार्य 1 (पप्ठे प्रतीकोपासकाना ब्रह्मलोकगतिनिराकरणाधिकरणे सूत्रे ) अप्रतीकालम्बनानयतीति बादरायण उभयथाऽदोपात्त- स्क्रतुश्च ।। १५ । विशेषं च दर्शयति ।।१६।। षष्ठाधिकरणमारचयति- 'त एतान्ब्रह्म गमयति' इस अति वाक्यसे श्रूयमाण उत्तरमार्गसे प्राप्प जो वस्तु है, वह परब्रह्म ही हो सकता है, क्योंकि ब्रह्मशब्द उसमे मुख्य है। 'तयोलमायन- मृतत्वमेति' ० ( उम मूर्धन्य नाडीसे ऊर्वको जाकर अमृतत्वको प्राप्त होता है ) इम अतिसे अमृतत्वका कथन है। सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-पत्यलोक मंशा कार्य ब्रह्म वह उपासकसे भिन्न और परिच्छन्न होनेसे गति पूर्वक प्रामिके योग्य है, परन्तु परब्रह्म वैसा नहीं है, क्योकि यह सर्वगत है और उपासकका स्वरूप है। ब्रह्म शब्द तो मुख्या- यंक न होनेसे मामीप्य मम्बन्ध-संनिधि प्रमाणसे सत्यलोकको कहता है, सत्यलोक पर- ब्रह्मके समीप है । तत्लोक वामियोको तत्त्वज्ञान मवश्यंभावी होनेपर पुनर्जन्मकै व्यव- पानसे रहित वे मोक्ष प्रास करनेवाले होते हैं। प्रतएव 'ब्रह्मणा गह' (महाप्रलय होनेपर हिरण्यगर्भके अन्तमें प्रति समष्टि लिङ्ग शरीरका अवसान होनेपर ब्रह्मलोक शुद्ध-बुद्धिवाले सभी मुख्यान ब्रह्मके माय परपदको-परब्रह्म स्वरूपको प्राप्त होते हैं ऐसा स्मृति कहती है। ऐसा होनेपर अमृतत्त्व प्रतिपादिका ऋति क्रममुक्तिके अभिप्रायसे है । इमसे उत्तर मागसे प्राप्य कार्यबा ही है.॥५॥ षष्ठ मधिकरणको रचना करते है- २६२ भाषानुवादसहिता [म० ४पा० ३ अधि० ६] प्रतीकोपासकान्ब्रह्मलोकं नयति वा न वा। अविशेषश्रुतेरेतान्ब्रह्मोपासकवन्नयेत् ॥ ११ ॥ ब्रह्म तोरभावन प्रतीकाहफलश्रवात् । न तान्नयति पञ्चाग्निविदो नयति तच्छ्र तेः ॥ १२ ।। "स एतान् ब्रह्म गमयति" इति ध्यमाणोऽमानव: पुरुषो ब्रह्मोपासकवत्प्र- तीकोपासकानपि सत्यलोकं प्रापयति । प्रविशेषश्रवरणात् । इति प्राप्ते प्रम-"तं यथा यथोपासते तदेव भवति" इति श्रुतौ ब्रह्म भावनारूपः ऋतुब्रह्मप्राप्तिहेतुरित्यवगम्यते। न हि प्रतीकोपासकानां ब्रह्मन्तु- रस्ति, येन ते सत्यलोकं गच्छेयुः। किंच यथामतक्मिर्वाचीनानि फलानि तेषु श्रूयन्ते- "यावनाम्नो मतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति"। नामब्रह्मोपासितुः शब्दशास्त्रदिलक्षणे नामविशेषे स्वातन्त्र्यं भवति' इत्यर्थः । कथं तहि पश्चाग्नि- विदा प्रतीकोपासफानां सत्यलोकप्राप्तिः । वचनबलादिति ब्रूमः । तस्मात्प्रायतो न प्रतीकोपासकान्सत्यलोकं प्रापयति ॥६॥ सन्देह-प्रमानव पुरुष प्रतीकके उपासकोको ब्रह्मलोकमें ले जाता है अथवा नही ? पूर्वपक्ष-तिमें विशेषका कथन न होनेसे ब्रह्मोपासकके समान प्रतोकोपासकको भी ममानव पुरुष ब्रह्मलोकमें ले जाता है । सिद्धान्त-बहाऋतुका प्रभाव होनेसे मौर प्रतीक योग्य फलकी श्रुति होने से प्रती- कोपासकोंको पमानय पुरष ब्रहालोकर्म नही ले जाता, परन्तु पंचाग्निके उपासकोको तो ले जाता है, क्योंकि उसकी श्रुति है। 'स एवान्ब्रह्म गमयति०' इसमे प्रयमाण अमानव पुरुप ब्रह्मोपासकोंके समान प्रती- कोपासकोंको भी सस्मलोकको प्राप्त कराता है, क्योंकि विशेष अति नहीं है । सिद्धान्तो—ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होसेपर हम कहते हैं-'तं ययाः' ( उस परमा- स्माको जिस-जिस प्रकारसे उपासना करता है वही होता है ) इस श्रुतिमें ब्रह्मभावना- आप प्रतु ब्रह्मप्राप्तिका हेतु है, ऐसा भवगत होता है। प्रतीकोपासकोंमें ब्रह्मऋतु नहीं है जिससे वे मत्यलोक्को प्राप्त करें ) किञ्च प्रतीकके अनुसार प्राचीन फल उनमें सुने जाते हैं-'पावन्नाम्नो०' (जहाँतक नामको गति होती है वहा तक नाम ब्रह्म उपासक की यथेच्छगति हो जाती है ) 'नाम ब्रह्म उपासक शब्दशास्त्र मादिरूप नाम विशेषमें स्वतन्त्र होता है' यह अर्थ है । तो फिर पञ्चाग्निविद प्रतीकोपासकोको सत्यलोककी प्राप्ति कैसे होती है ? वचन-बल-श्रुतिबलसे, ऐमा हम कहते हैं। इससे प्रमानवपुरुप प्रतीकोपामकोंको मत्यलोकको प्राप्त नहीं कराता है ।। ६ ॥
म० ४ पा० ४ अधि० १ ] वैयासिकन्यायमाला २६३ इति श्रीभारतीतीर्थमुनिप्रणीतायां वैयासकिन्यायमालायां चतुर्थाध्यायस्य तृतीय पाद॥३॥ आदिता अधिकरणानि ६ १८५ सूत्राणि १६ ५३४ मन्त्र पादे अथ चतुर्थाध्यायस्य चतुर्थः पादः (प्रत्र पादे ब्रह्मप्राप्ति-ब्रह्मलोकम्पितिनिरूपणम् ) { इस पादमे ब्रह्मप्राप्ति और बहालोकको स्थितिका निरूपण है ] (प्रथमे मुकर्नबीनन्वनिराकरणाधिकरणे सूत्राणि) संपधाऽऽविर्भावः स्वेनशब्दात् ॥ १॥ मुक्तः प्रतिज्ञानात् ॥२॥मात्मा प्रकरणात् ॥३॥ चतुर्याध्यायस्य चतुर्थपादे प्रथमाधिकरणमारचति- नाकावन्नूतनं मुक्तिरूपं यद्वा पुरातनम् । प्राभिनिष्पत्तिवरनात्फलत्वादपि नूतनम् ॥ १॥ स्वेन रूपेणेति वाक्ये स्वशब्दात्तत्पुरातनम् । प्राविर्भावोऽभिनिष्पत्ति: फलं चाज्ञानहानितः ॥२॥ इति श्री भारतीतीर्थमुनि प्रणोत बयामिकन्यायमालाके चतुर्याध्यायके तृतीय पारका 'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती' कृत भाषानुवाद ॥ ३ ॥ चतुरन्यायके चतुर्थपादके प्रथम प्राधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-~मुक्तिका स्वरूप स्वर्गके समान नूतन है पथवा पुरातन ? पूर्वपक्ष-मुक्तिका स्वरूप नूतन है, क्योकि 'अभिनिष्पत्ति' वचन है पौर मुक्तिमें फलत्व भी है। सिद्धान्ती-खेत रूपाण' इस श्रुति वाक्यमे 'स्व' शब्दके होनेसे मुक्तिस्वरूप पुरातन ही ज्ञात होता है। अभिनिष्पत्तिका प्राविर्भाव अर्थ है । और अज्ञानके नारासे फल व्यवहार भी मक्तिमे है ।
२६४ भापानुवादसहिता [अ० ४ पा० ४ अधि०१] "एष संप्रसादोऽस्माच्छरोरात्समुत्याय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपे. पाभिनिष्पद्यते" (छा० ८।१०।३ ) इति श्रूयते । अस्पायमर्थ.-'सम्यक्प्रसीद: त्युपाध्युपशान्तो' इति संप्रसादो जीवः । स च शरीरत्रयाभिमानं परित्यज्य परं ब्रह्म प्राप्य मुक्तिरूपेरणावतिष्ठत इति । ततन्मुक्तिरूपं न जीवस्य पूर्वसिद्धम्, किंतु स्वर्गवदागन्तुकम् । कुतः। 'अभिनिष्पद्य' इत्युत्पाद्यत्वश्रवणाद। पूर्व सिद्धत्वे संसारदशायामपि सद्भावेन फलत्वं न स्यात् । तस्मात्स्वर्गवदिदं नूतनं मुक्तिरूपम्। इति प्राप्त ब्रूम:-'स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते' इति स्वशब्देन विशेषित- त्वात्पूर्वमपि विद्यत एवेदं मुक्तिरूपम् । न चात्र स्वशब्द: स्वकीयमभिधते विशेषणवैयर्थ्यप्रमगात् । यद्यद्रूपं मुक्तावुपादत्ते तत्तत्स्वकीयमेवेति कस्य व्याव- तये विशेष्येत । आत्मवाचित्वे तु स्वशब्दस्य स्वकीयत्वव्यावृत्ति: प्रयोजनम् । न चामिनिष्पत्तिरुत्पत्तिः, पूर्वसिद्धस्योत्पत्तेरसभवात् । कि तहि, तत्वज्ञानेन ब्रह्मत्वाविर्भावोऽभिनिष्पत्तिः। न चैवं सति 'उपसंपद्य, अभिनिष्पद्यते' इत्यनयोः पुनरुक्तिरिति शङ्कनीयम् । उपसंपत्तिशब्देन तत्पदार्थशोधनस्य विवक्षितत्वात् । 'एप मंप्रमादो०' (यह मंप्रसाद-जीव इस शरीरसे समुत्यानकर-देहात्मभाव त्यागकर ज्योति स्वरूप परब्रह्मका साक्षात्कार कर स्व-प्रात्मरूपसे माविर्भूत होता है ) ऐमी श्रुति है । इसका यह अर्थ है-'उपाधिके शान्त होने पर जो भली-भान्ति प्रसन्न होता है.' वह मप्रसाद जीव है। यह तीनो शरीरोके मभिमानका परित्यागकर मुक्तिरूपसे अवस्थित रहता है। यहाँ मुक्तिरूप जीवका पूर्व मिद नही है किन्तु स्वर्गके समान मागन्तुक है । क्योकि 'अभिनिष्पद्यते' इस प्रकार उत्पाद्य श्रवण होता है। यदि पूर्वसिद्ध हो तो संसारदशामें भी उसकी सत्ता होनेसे फलत्व नहीं होगा, इसम स्वर्गक समान मुक्तिस्वरूप नूतन है। सिद्धान्ती-'स्वेन रूपेणामिनिषद्यने' (भपने रूपसे मभिनिष्पन्न होता है) इसमे स्वशब्दसे विरोपित होनेसे पूर्व भी यह मुत्तिरूप ही है यहां स्वशन्द स्वकीय वस्तुका मभिधान नहीं करता, क्योकि ऐमा माना जाय तो विशेषण-व्यर्थ प्रसङ्ग होगा। जिम जिम रूपमा मुत्तिमे ग्रहण किया जाता है, वह यह स्वकीय ही है तो दिमको व्यावृत्तिके लिए यह विरोपिन है । स्वशब्द प्रात्मवाचो हो हो सकोपन्वी व्यावृत्ति प्रयोजन है। पौर अभिनिष्पत्ति शब्दो उत्पत्ति विवक्षित नहीं है, क्योकि पूर्व मिदकी उत्पत्ति नहीं हो सकती, सिन्तु सलमानसे ब्रह्मचा माविर्भाव ही अभिनिष्पत्ति है। परन्तु ऐमा होनेपर 'उपमं पद्म' 'अभिनिष्प' इन दोनो शन्दोको पुननिकी गहा भी नही करनी चाहिए। क्योंकि 'उपर्म पत्ति' गन्दमे 'सर' पदावा भोपन विवक्षित है और [म० ४ पा० ४ मधि० २] वैयासिकन्यायमाला अभिनिष्पत्तिस्तु वाक्यार्थावबोधः । न च पूर्वसिद्धत्वे मुक्तिरूपस्य फलत्ववि. रोषः। निवृत्ताज्ञानत्वाकारेण पूर्वसिद्धत्वाभावात् । तस्मात्पुरातनं वस्त्वेव मुक्तिरूपम् ॥१॥ (द्वितीये मुक्तेर्ब्रह्मभिन्नतानिराकरणाधिकरणे सूत्रम् ) अविभागेन दृष्टत्वात्॥४॥ द्वितीयाधिकरणमारचयति- मुकल्पाद्ब्रह्म भिन्नमभिन्न वा, विभिद्यते। संपद्य ज्योतिरित्येवं कर्मक भिदोक्तिः॥३॥ अभिनिष्पन्नरूपस्य स उत्तमपुमानिति । ब्रह्मत्वोक्तेरभिन्नं तद्भेदोक्तिरुपचारत. ॥४॥ पूर्वाधिकरणे नितिं यदेतन्मुक्तस्वरूपं, तत्परस्माद्ब्रह्मणो भिन्नं भवितुम- हति। कुतः। कर्मक भेदव्यपदेशात् । 'एष संप्रसादः परं ज्योतिरुपसंपद्य इत्यत्र संप्रसादशब्दोदितो जीव उपसंपत्तो कतृत्वेन व्यपदिश्यते । ज्योति। शब्दवाच्यं च ब्रह्म कर्मत्वेन । तस्मान्मुक्तस्य जीवस्य स्वरूपं ब्रह्मणो भिन्नम् । इति प्राप्ते ब्रूमः-'ज्योतिरुपसंपद्य' इति वाक्यं तत्पदार्थशुद्धिविषयमुक्तम् । मभिनिष्पत्ति तो वाक्यार्थका अवबोध है। मुक्तिरूपके पूर्व सिद्ध होनेपर भी फलत्वका विरोध नहीं है, क्योकि निवृत्त प्रज्ञानत्व रूप प्राकारके होनेसे पूर्व सिद्धत्व नही है मर्थात् मज्ञानसे पूर्वसिद्ध प्रतीत नहीं होता, इससे मुक्तिरूप पुरातन वस्तु ही है ॥ १॥ द्वितीय अधिकरणकी रचना करते हैं- सन्देह-ब्रह्म मुक्तके स्वरूपसे भिन्न है,प्रथदा अभिन्न ? पूर्वपक्ष-ब्रह्म मुक्तके स्वरूपमे भिन्न है, क्योकि 'सम्पद्य ज्योतिः' इस प्रकार कर्म-कर्तृके भेदसे कथन है। सिद्धान्त-अभिनिष्पन्न रूपवालका 'स उत्तमः पुरुषः' इस वाक्यसे ब्रह्मभाव कहा गया है, इसलिए मुक्तके स्वरूपसे ब्रह्म अभिन्न है और वह भेदोक्ति तो उपचारसे है । पूर्व प्रधिकरणमे जो यह मुक्ति स्वरुप निर्णीत किया गया है, वह परब्रह्मसे भिन्न होना चाहिए, किससे? इसमे कि धर्म-कर्तृ भेदका व्यपदेश है ! जैसेकि 'एष संप्रसादा पर ज्योतिरुपसंद्य' (यह मंप्रसाद-जीव परं ज्योतिः स्वरूपको प्राप्तकर ) यहाँपर संप्रसाद शब्दसे उक्त जोव ब्रह्म प्राप्तिमे कर्तृरूपसे व्यपदिष्ट है और ज्योतिः शब्द वाच्य ब्रह्म कर्म- रूपसे व्यपदिष्ट है, इससे मुक्त जीवका स्वरूप ब्रह्मसे भिन्न है। सिद्धान्तो-ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-'ज्योनिरुपमंद्य' यह .
२६६ भाषानुवादसहिता [अ०४ पा० ४ अधि०३] अतस्तदानी भेदोऽस्तु नाम । तत उपरि "स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते" इति वाक्यं वाक्यार्थदशापन्न मुक्तिस्वरूपं प्रतिपादयति । न च तस्य ब्रह्मणा भेदोऽस्ति । 'स उत्तमः पुरुष.' इति वाक्ये तच्छब्देनाभिनिष्पन्नमुक्तस्वरूप परामृश्य तस्यो- त्तमपुरुषशब्दवाच्यब्रह्मस्वरूपत्वाभियानाद । तस्मान्मुक्तस्वरूपं ब्रह्माभिन्नम् ॥२॥ ( तृतीये सविशेषत्वादिव्यवस्थानिराकरणाधिकरणे सूत्राणि ) ब्राह्मण जैमिनिरुपन्यासादिभ्य ॥५॥चितितन्मात्रेण तदात्मकत्वदित्यौडुलोमिः ॥ ६ ॥ एवमप्युपन्यास्यात्पूर्व- भावादविरोधं बादरायणः ॥ ७॥ तृतीयाधिकरणमारचयति- क्रमेण युगपद्वाऽस्य सविशेषाविशेषते । विरुद्धत्वालालभेदादयवस्था श्रुतयोस्तयोः॥ ५ ॥ मुक्तामुक्तदृशोभैदाधवस्थासंभव सति । अविरुद्ध योगपद्यमश्रुतं क्रमकल्पनम् ।।६॥ मुक्तस्य स्वरूपभूतं ब्रह्म श्रुतिषु द्विघा प्रतिपाद्यते-क्वचित्सविशेषम् । क्यचिनिविशेषम् । तथा हि-"य प्रात्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युविशोको पाक्य तत्पदायके शुद्धि-विषयक कहा गया है, अतः उम अवस्थामे भेद भले ही हो । परन्तु उसके ऊपर 'स्वेन होणामिनिष्पद्यते' यह वाक्य वाक्यार्थ दशापन मुक्ति स्वरूपका प्रतिपादन करता है । उमका ब्रह्मम भेद नहीं है, क्योकि 'म उत्तम पुरूष' इस वाक्यमे "तत्' शन्दमे ममिनिष्पन्नरूप मुनस्वरूपका परामर्श कर उसका उत्तम शब्द वाच्य ब्रह्म स्वरूपत्वसे मभिधान दिया गया है। इससे मुक्तका स्वरूप ब्रह्मम भभिन है ॥२॥ तृतीय मधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-सविशेष-सगुण भोर निविशेष-निर्गुण ब्रह्म दोनो एक कालमे ही मुक्क पुरुषको प्राप्त होते हैं भयवा क्रम स ? पूर्वपक्ष-सविशेष व पौर निविशेषत्वका विरोध होनेसे अत्युक्त उन-विशेषच और निविशेषत्वकी कालभेदमे व्यवस्था होनी चाहिए अर्थात् क्रममे प्राप्त होते हैं । सिद्धान्त-एक काल में ही ब्रह्ममें मगुण पोर निर्गुणरूप रहते हैं । मतः मुक्त और प्रमुनको दृष्टिके भेदसे व्यवस्था हो सकती है, इमलिए योगपद्य प्रविरुद्ध है व्रम कचना मी श्रुति सम्मत है। मुनका स्वा भूम ब्रह्म युनियोंमें दो प्रकारले प्रतिपादित है-हीर मविशेष- सगुण पौर पहीं निविशेष निर्गुण । जो कि 'य मारमाशहापामा'. (जामामा
F
[प०४ पा० ४ अघि० ३ ] वैयासिकन्यायमाला
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विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामा सत्यसंकल्पः" (छा०८७१) इति सविशेषेत्व-
श्रुतिः । “स यथा सैन्धवपनोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नो रसधन एव । एवं वा
अरेश्यमात्माऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव" (बृह० ४।।१३) इति
निविशेषत्वश्रुतिः। ते एते सविशेषत्वनिविशेषत्वे मुक्तिदशायो ग्रह्मणो न
युगपत्संभवतः । परस्परविरुद्धत्वात् । मत: कालमेदेनोमे व्यवस्थापनीये ।
इति प्राप्ते बमः-प्रतिपत्तभेदायुगपदेव सविशेषत्वनिविशेषत्वे उपपयेते।
मुक्तप्रतिपत्त्या निविशेषत्वमेव । चदप्रतिपत्त्या तु सविशेष मुक्तस्वरूपं ब्रह्म
सर्वज्ञत्वादिगुणविशिष्टं सज्जगत्कारणत्वेनावमासते। न हि मुक्ताः पुरुषाः
कदाचिदपि 'सर्वज्ञत्वसत्यसंकल्पत्वादिगुणयुक्ता वयम्' इति प्रतिपद्यन्ते ।
सत्प्रतिपत्तिहेतुभूताया मविद्याया विनाशितत्वात् । बद्धस्वरूपास्वविधायुकाः
सन्तो निविशेषमेव ब्रह्म 'सर्वज्ञस्वादिविशिष्टम्' इति कल्पयन्ति । अता प्रति-
पत्तभेदाद्वपवस्थामिद्धो किमनेन कालभेदकल्पनेन । तस्मात्-युगपदेव सवि-
शेषत्वनिविशेषत्वे ।। ३ ।।
(चतुर्थे परलोकगोपामकस्य भोग्य वस्नुसृष्टी संकल्पहेतुताधिकरणे सूत्रे)
संकल्पादेव तु तच्छ्र ते । अत एव चानन्याधिपतिः ॥६
पापरहित, जरारहित, मरणरहित, शोकरहित, बुभुक्षा शून्य, पिपासारहित, सत्यकाम
मौर सत्यसंकल्प है)। यह सविशेष अति है 'स यथा'• ( सत्यवचन-नमक्का डला
मन्तर रहित, बाहर रहित सम्पूर्ण रमघन ही है । एवं 'मरेऽयमात्मा० ( हे मैत्रेयी !
यह प्रात्मा अन्तर बाह्य रहित सम्पूर्ण प्रज्ञानघन ही है ) यह निविशेषत्व प्रतिपादक
शुति है । ये सविशेषत्व और निर्विशेषत्व मुक्तिदशामें युगपद् ब्रह्ममे नही हो सकते
हैं, क्योंकि परस्पर विरुद्ध हैं। मनः कासभेदसे क्रमसे उन दोनोंकी व्यवस्था करनी
चाहिए।
सिद्धान्ती-ऐसा पूर्व पक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-प्रतिपत्ता-माता-शाताके
भेदसे युगपद ही सविशेष मौर निविशेषत्व उपपन्न होते हैं। मुक्तको प्रतिपत्तिसे
निर्विशेषत्व और बद्धको प्रतिपत्तिसे सविशेष मुक्त-स्वरूप ब्रह्म सर्वज्ञल गुण विशिष्ट
जगत्कारणरूपसे प्रतीत होता है । मुक्त पुरुष किसी मवस्थामें भी 'सर्वज्ञत्व, सत्यसंकल्प-
लादि गुणयुक्त हम हैं, ऐसा नहीं जानते। क्योकि उस प्रविपत्तिके हेतुभूत भविद्याका
विनाश हो गया है। बद्ध-स्वरूप तो मविद्यासे युक्त होते हुए निविशेष ब्रह्म ही
'पर्वल प्रादि गुण विशिष्ट है। ऐमी कल्पना करते हैं । अतः प्रतिपत्ताके भेदसे व्यवस्था
सिस होनेपर इस काल भेदको कल्पनासे क्या प्रयोजन है । इसलिए युगपद ही सविशे-
पस्व और निर्देशेषत्वको उपपरि है ॥ ३ ॥
भाषानुवादसहिता [म. ४ पा० ४ मषि०४ ] चतुर्थाधिकरणमारचयति- भोग्यसृष्टावस्ति बाह्यो हेतु: संकल्प एव का। आशामोदकवैषम्यादतुर्बाह्योऽस्ति लोकवद ॥७॥ संकल्पादेव पितर इति श्रुत्याऽवधारणात् । संकल्प एव ' हेतुः स्याद्वैषम्यं चानुचिन्तनात् ।। ८ ।। पूर्वाधिकरणत्रयेण विदेहमुक्ती विचारितायां ब्रह्मलोकलक्षणायां मुक्ते रवशिष्टत्वात्तद्विचार आ पादसमाप्तेः प्रवर्तते । तत्राचिरादिमार्गण ब्रह्मलोक प्राप्तस्योपासकस्य भोग्यवस्तूनां सृष्टो बाह्यहेतुरपेक्षितः । न तु मानससंकल्पमात्र तद्धतुः। तथात्वे सत्याशामोदकसमत्वेन पुष्कलभोगाभावप्रसन्नात् । इति प्राप्ते चूम:-'स यदि पितृलोककामो भवति, संकल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति' (छा० ८।२।१ ) इत्यादिना पितृमातृभ्रातृगन्धमाल्यादिभोग्यसृष्टो संकल्पस्य साधनस्वमभिधायेवक बाह्यहेतुं निराचष्टे । न च संकल्पकार्या- रणामाशामोदकसमानत्वं शङ्कनीयम् । उपार्जितमोदकसमानत्वस्यापि संकल्प- चतुर्य प्रधिकरणको रचना करते हैं- सन्देह-ब्रह्मलोकको भोग्य सृष्टिमें बाह्य वस्तु हेतु है अथवा केवल संकल्प ही पूर्वपक्ष-उक्त सृष्टिमे बाद्य वस्तु हेतु है, क्योकि लोकमे भोग्य पदार्थको उत्पत्तिमें बाह्य वस्तु हेतु देखनेमे भाती है । यदि केवल संकल्प ही कारण माना जाय तो भाशा- मोदकका साम्य प्राप्त होगा। सिद्धान्त–'संकल्पादेव पितरः' इत्यादि श्रुतिसे अवधारण होनेसे प्रतीत होता है कि केवल मंकल्प ही हेतु है, माशामोदकको विषमता तो अनुचिन्तनसे ही हो सकती है। पूर्व तीन मधिकरणोंसे विदेहमुक्तिका विचार किया गया है, भव ब्रह्मलोकरूप मुक्ति मविशिष्ट होने से पादसमाप्ति पर्यन्त उमका विचार किया जाता है । यहाँपर मधिरादि मार्ग द्वारा ब्रह्मलोक प्राप्त उपासकको भोग्य वस्तुनोकी सष्टिमे वाह्य वस्तु अपेक्षित है, मानस संकल्पमात्र उमका हेतु नहीं है। यदि मानस संकल्पमात्र हेतु माना पाय तो माशामोदक साम्यसे पुष्कल भोगका प्रभाव प्रसङ्ग होगा । सिद्धान्ती-ऐमा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-'स यदि पितृलोककामो०' (वह उपासक पदि पितृलोकको इच्छाबाला होता है तो उसके संकल्पमात्रमे ही पितर उपस्थित होते हैं ) इत्यादि श्रुतिले पिता, माता, भ्राता गन्धमाल्यादि भोग्य सृष्टिमें संकल्पको साधन कहकर एवकारस हो बाघ हैतुका निराकरण किया जाता है। संरल्प [म०४ पा० ४ अधि० ५ ] यासिकन्यायमाला २९६ यितुं शक्यत्वात् । संकल्पशक्तरुपासनाप्रसादेन निरंकुशत्वात् । तस्मात्संकल्प एव भोग्यसृष्टी हेतुः॥४॥ (पञ्चमे देहभावाभावयोरच्छिकताधिकरणे सूत्राणि ) अभावं पादरिराह ह्येवम् ॥ १०॥ भावं जैमिनिर्वि कल्पामननात् ॥११॥ द्वादशाहवदुभयविधं बादराय- योऽतः ॥ १२ ॥ तन्वभाव संध्यवदुपपद्यते ॥ १३ ॥ भावे जाग्रद्वत् ॥ १४ ॥ पश्चमाधिकरणमारचति- व्यवस्थितावैच्छिको वा भावाभावी तनोर्यतः। विरुद्धी तेन पुंभेदादुभो स्यातां व्यवस्थितौ ॥ ६ ॥ एकस्मिन्नपि पुंस्येतावैच्छिको कालभेदतः । अविरोधात्स्वप्नजाग्रद्भोगवद्युज्यते द्विधा ॥१०॥ 'मनसैतान्कामान्पश्यन्रमते' 'य एते ब्रह्मलोके' (छा०८।१२।५,६) इति मानसं भोगमुपपादयन्ती श्रुतिर्बाह्यदेहस्य सेन्द्रियस्याभावमाह। 'स एकधा भवति कायोमे आशामोदक्के साम्यकी शङ्का नही करनी चाहिए, क्योंकि उपाजित मोदकोकी समानताकी भी कलाना की जा सकती है, कारण कि उपासनाके प्रसादसे संकल्प शक्ति निरकुश होती है । इससे केवल संकल्प ही भोग्यवस्तुको सृष्टिमे हेतु है ॥ ४॥ पंचम अधिकरणकी रचना करते है- सन्दह-ब्रह्मलोकमें शरीरके भाव मौर मभाव युति प्रतिपादित है, उमकी भेदसे व्यवस्था है अथवा ऐच्छिक है अर्थात् पुरुषको इच्छासे शरीरका सत्त्व मोर अमत्व हैं। पूर्वपक्षा-एक पुरुषमे शरीरका सद्भाव और असद्भाव विरुद्ध हैं, अतः पुरुष भेदसे दोनोको व्यवस्था होनी चाहिए। सिद्धान्त-एक पुरुषमे भी समय भेदसे दोनों ऐच्छिक हो सकते हैं। स्वप्न और जापतके भोगके समान विरोध न होनेसे दोनो प्रकारको व्यवस्था युक्त है। मनसताकामान्पश्यन्रमते.' (यह पुरुप ब्रह्मलोकमें मनसे ही भोगोको देखता हुआ रमण करता है ) 'य एते ब्रह्मलोके' ( ये जो ब्रह्मलोकमे संकल्पलमय भोग है ) इम प्रकार मानस भोगका उपपादन करती हुई श्रुति इन्द्रिय सहित बाह्य देहका प्रभाव कहती है। स एकघा भवति०' (वह सृष्टिके पूर्व एक रूप होता है पौर सृष्टिकालमे अनेक 1 पुरुप ३०२ भाषानुवादसहिता [म० ४ पा०४ अधि०७] सृष्टावप्रकृतत्वेन स्रष्टता नास्ति योगिनाम् । स्वाराज्यमीको भोगाय ददौ मुक्ति च विद्यया ॥ १४ ॥ ब्रह्मलोकं प्राप्तानामुपासकानां यथा भोगयोग्यदेहेन्द्रियस्रष्टत्वमस्ति, तथा वियदादिजगत्स्रष्टत्वमस्ति । 'प्राप्नोति स्वाराज्यम्' इति श्रुत्या निरवग्रहे- श्वर्यावगमात् । इति प्राप्ते ब्रूम:-वियदादिजगत्सृष्टिप्रतिपादकेषु प्रकरणेषु सर्वत्र परमात्मैव स्रष्ट्रत्वेनावगम्यते । न क्वापि योगिनस्तथाऽवगम्यन्ते । अतो न तेषां जगत्स्रष्ट्र- त्वम् । अन्यथाऽनेकेश्वरत्वे सति कश्चित्सिमृक्षति, कश्चित्संजिहीपंतीति जगद्वध- वस्था न सिंध्येत् । कथं तहि स्वाराज्यश्रुतिः । ईश्वराधीनस्वाराज्याभिप्रायेण' इति मः। ईश्वरो ा पासनया तोपितस्तेषां भोगमात्रसिद्धये स्वाराज्यं ददौ । मुक्ति च तत्त्वविद्योत्पादनेन दत्तवान् । तस्माज्जगत्सृष्टौ स्वातन्त्र्याभावेऽपि मोगमोक्षयोस्तेषां स्वातन्त्र्यमस्ति ॥७॥ पूर्वपक्ष-वे जगवके स्रष्टा हैं, क्योकि 'स्वागज्यमाप्नोति' इस श्रुतिसे योगियोमे निरवधिक प्रवधि रहित ऐश्वर्य प्रतीत होता है । सिद्धान्त-सृष्टिके प्रकरणमें अपठित होनेसे योगी जगत्के स्रष्टा नहीं है। परमा- रमाने योगियोको भोगके लिए स्वाराज्य और विद्यामे मुक्ति दी है, अतः योगी जगदके स्रष्टा नहीं है। ब्रह्मलोक प्राप्त उपासक जैसे भोगके योग्य देहेन्द्रियके स्रष्टा है, वैसे माकाश मादि जगत्के स्रष्टा भी हैं, क्योंकि 'प्राप्नोति स्वाराज्यम्' इस श्रुतिसे उनका निरङ्कुश ऐश्वर्य अवगत होता है। सिद्धान्ती-ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर हम कहते हैं-पाकाश पादि जगदको सष्टि प्रतिपादक प्रकरणों में सर्वत्र परमात्मा ही सष्टारूपसे अवगत होता है, वैसे कहीं- पर भी योगी स्रष्टारूपसे अवगत नहीं होते। मतः वे जगत्के स्रष्टा नहीं है, अन्यथा अनेक ईशवर होने से कोई एष्टि रचनाको इच्छा करेगा तो कोई उसके महारको इच्छा करेगा, इमसे जगदको व्यवस्था सिद्ध नहीं होगी। तो पुनः स्वाराज्य प्रतिपादिका तिकी क्या गति होगी ? ईश्वरापरीन स्वाराज्य के अभिप्रायसे पह अति है, ऐमा हम कहते हैं । ईश्वरने उपासनासे प्रमन्न होकर भोगमात्र सिद्धिके लिए उनको स्वाराज्य दिया मौर तत्त्वविद्याके उत्पादनसे मुक्ति दी। इससे योगिर्योका यद्यपि जगदको सष्टिमें स्वतन्य नहीं है बो भी सोश और मोक्षामें उरको स्वादस्य है ही , ३०३ [प०४ पा० ४ अधि०७] वैपामिकन्यायमाला इति श्रीमारतीतीर्थमुनिप्रणीतायां वैयसिकन्यायमालायां चतुध्यिायस्य चतुर्थः पादः ॥४॥ समाप्तश्चायमध्यायो ग्रन्थश्च ।। आदिता मधिकरणानि १६२ ধূমায়ি २२ अत्र पादे जिज्ञासुजनतोपाय तथा विद्यावतां मुहै। भारतीतीर्थरचनां सत्यानन्दः सरस्वती ॥ १॥ वैयासिकन्यायमाला व्याकरोद्राष्ट्रभाषया। अनया व्याख्यया भगवान्विश्वनाथा प्रसीदतु ॥२॥ प्रातिशून्यनेत्राब्दे वैक्रमे मासि फाल्गुने । शिवरात्रिदिने भव्ये सम्पूर्णषाऽविमुक्तके ॥३॥ श्री भारतीतीर्थमुनि-प्रणीत वैयासिकन्यायमालाके चतुर्याध्यायके चतुर्थ- पादका 'स्वामी सत्यानन्द सरस्वती' कृत भाषानुवाद समाप्त ॥४॥ चतुर्थोध्यायः समाप्तः । ( समाप्तवायं नायः )