Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner

Navapadaditap Vidhi Sangrah

Acharya,shant Murti · 2011/03

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goodpapgaggpounuw ॥ ग्रह मम ॥ १३८० सध * श्री जिनदत सूरि गुरुभ्यो नम श्री नवपदादि तप विधि संग्रह संभाइक-0 परम पूज्य विद्वद रख शांत मूर्ति आचार्य महाराज मारेप श्री १००८ श्री जिन रन सुरिश्वरजी महाराज साटेप प्रकाशक- Panoonoapanaospasagapp00gangaonmat b០០០០០ប៉០០២ ចិត្ត आचार्य महाराज माहेष के सदोपदेश में थी जैन रन प्राश महले के सस्थापक साहित्य भूषण फूलचन्दजी पौरड़िया जैन "पुष्प" रतराम (मालवा) - निममसयत् मूल्य.-८-० पीर संयत् कार्तिक पूर्णिमा २००१ (1000000000000000000000

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. स्वापिता-पूज्य उपाध्यायजी महाराज श्री लन्धी मुनिनी महाराज याहर "जिन रत्न सूरि सविज्ञजिनदत्त शिष्टि वृपगै ज्ञान क्रिया सतमै । पट् त्रिगद् गुण रन रोहण नगर्यान्व में सेवितः ।। स्थाप्यन्ते मरि जतवो, विधि पथे येराग मोक्त्या वर.। सेमी थीं जिन रम परिगुरुवो मानत्यत्र पूरीश्वरा ॥१॥ श्री जैनारत्न प्रकाश मंडल कोटा . , श्री जिन रत्न सूर्याख्या- सस्था-पिता मुपासके। जयाला दत्र श्री जैन- रत्न प्रकाश मल ॥१॥ - • उपधान प्रशस्ति (अनुष्टुपं) पप यास स्थितः ज्य, रतलाम पुरे घरे । उपधान किया कारि, भी जिन रस्न सुरिमि ॥१॥ पक्षाएलजी दामोम, पत्नीकृत महोत्मये। महप चनसा सयत् ग्व रय म्ब युग्म घरमरे ॥२॥ सासमाप्तिंगतामार्ग, पथर कादशी तिथी। मालारोपण शांत्पादि, कर ति स्नानपूर्वक हुगरसी नायुलालो, मामलय प्रेम सी। निर्मल कुमारसिंओ, मुहारमल हरिसिं ॥ ४॥ पुरचनादप प्राददा, परोपकार कमी। साशप कारिणो वामन , सपि नन्दन्तु भूतरे ll .

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है
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पाठको।
"ना पदादि तप विधि सग्रह" की प्रथम नाति
परम पूज्य शांत मूर्ति प्राचार्य महाराज साहेब श्री १००८
भी जिन ग्ल'परिधाजी महागन माहेब के सदोपदेश से
जिनदच सरि ज्ञान महार मुबई के मेनेजर अवेरी मूलचन्द
हीराचद भगत ने वीर मयत् २४६० में प्रकाशित करवाई
थी प्रथम आवृति की स्टाक में एक मी पुस्तक न रहने
पर व सप वारघकों की पाग होने पर उक्त प्राचार्य महा-
राज साहेब के सदउपदेश से ही इस दूसरी आवृति का
प्रकाशन हुआ है।
पद्यपि वपाली में तपस्याओं की विधि का अन्छ।
सरह है फिर भी नव पदजी के तथा वीम स्थानक जी के
सरही चैत्य बदनादि उसमें नहीं हैं वे सर रत्न सागा में
अवश्य हैं किंतु रत्न सागर जैसी पड़ी पुस्तक प्रत्येक
गृहस्य के यहां मिलना असमर सा है अतएव पूज्य
आचार्य महाराज साहिए इस छोटी पुस्तक में भावश्यक

H [२] नर पद तप वीस स्थानक तर अक्षय निधि तप बादि २ तपों की विधि चैत्य बदनादि का पूरा २ सह कर तप सप आरधनों प्रति महान उपकार किया है । मडल ने इसका भूल्य मी लागत मान सिर्फ ०-८-. रक्खे हैं ताकि आवक से फिर भी कोई उपयोगी जैन साहित्य प्रकाशित करवाया जा सके। याशा है कि विदूद जन इस पुस्तक फा सा उपयोग करते हुगे प्रेसदोष अथवा रटिदोष नही हुई रियों को शुद्धता पूर्वक पढ़ने की कृपा करेंगे। भवरीय- पुष्प प ।

धन्यवाद। निस मजनों ने इस इम पुस्तक के प्रकाशन में सहायता प्रदान कर अपनी लक्ष्मी कामद्' उपयोग घज्ञान का प्रचार किया है अतएर उनको तथा इस पुस्तक के मूफ आदि देखने में सहायक श्रीयुन उम्मेदमलजी साहेप नाहंटी कोटा निवासी को हार्दिक धन्यवाद दिया जाता है। १०) भीमान् मगनीरामजी अभूतसिंह जी मादेय रतलाम २०) स २००० के रतलाम में उपचान प्रवेशक धंधु व पहिनों के ज्ञान ग्वात से। १५१) महेदपुर श्री सघकी तरफ से। मषदीय- पुष्प मुक्ति का मार्ग स्वर्ग के मिलने का दग यह। और कुछ युक्ति नहीं । देव गुरु की सेवा करो। सेवा विना मुक्ति नहीं ॥१॥ पुस्तक प्राप्ति स्थान- मु. मुबई (१) जिनदत्तसूरि ज्ञान भटार, (२) श्री जैन रन प्रकाश मडल, ठि० कोटा वाला सेठ साहिब की दुकान रतलाम (मारवा) 4 बुक पोस्ट से पुस्तक मगवाने वाले सज्जन मूल्य से पैसे के अधिक पोस्टेज टिकिट भेजें।

विषय सूची न० विषय विषय अध मरिहतपद चैत्यवदन १/२. नथ चरित्रपद चैत्य यदन १२ पृष्ट न० स्तवन २ स्तवन " " ७ ५ " " स्तवन " २७ " " " ॥ सिद्धपद घेत्यवदन ३ २५ रापपद चैत्यवदनम् "स्तवन " २४ .७॥ भाचार्यपद चैत्यवदनम् , | २८ अरिहतना १२ गुण १५ २६, सिद्धना ८ गुण युए ६/३६, प्राचार्ययदना ३६गुण १६ १०, उपायपद चैत्यपदनम्, | ३१ , उपाध्यायना५५गुणो १८ ११, उपाध्यायपद स्तवन ३3, साधुपदना २७ गुण १६ १९ स्तुति ३३ , दर्शनपदना ६७ गुण २० १३ , साधुपद चैत्यपदनम् ज्ञानपदना ५१ गुण २४ ३५चरित्रपदना ७2,गुण २६ "तपपदत्ता गुण १६ , दर्शनपद चैत्यवदनम् ३७ ,, चेत्यवदन नवपदनो ३३ स्तघन सिद्धचरस्तवन २४ १ ३६, नयपद्रनी शुद्ध १९ , मानपद चैत्यवचनम् ११ स्तवन धुर . " १ " 2 नवपद चैत्यवदन २०॥ " स्तवन " " " " " , पृष्ठान " . सज्झाय८५ [२] न विषय "विषय ४३ मय नयपदोली पररा ६. अथ वीसस्थानक धुर ३८६.. पीसम्यााकनु स्तयन ७६- शिस्था पण दीयालीपर्यन गुणणो ७८ विधि ६. , भानपघमीपये अधिकार ४५, प्रथम अदितनार२मेदत्र्यवदन ४६ , जीना सिद्ध पद३१,४२ १, थुर (यसतिलश) ४७, भीजापरण २७,४ ७२ यया पांच नमाकार ४८, सौथा आचार्य, ३६,४५७३ अयानानना नमस्कार । ४६, पानमास्य चिर,१०,४७ उभयप्र याचारागनी , छठा उपाध्याय, ५, , मानमा साधु, ७,४२ ७५ बीजी सुगगडागनी , ८५ ५२ गठमाधान ,५१,५.७६.त्रीजी ठाणागनी मधमा दर्शन ६७,५२ ७७, चौधी समयायांगनी." दशमा विनय ,,५२,,५६/७८, (५)मगवतीमत्रनी ५५ ग्यारमाचारित्र,,७०,५९ ७९,, (६)शातासनी ५६ ,, पारमा ब्रह्मचर्य १८, ६३८०, (७)उपरामदशासू, ५७, तेरमा मिया ॥२५,६४८१, (4)भतगडदागी ३ "चउदमामपसीण,.,६५, ८२ १९ अनुत्तरियारभग १४ ५९ ,,पनरमा गौत्तम ,१.,,६६/८३, (१०)प्रश्न व्याकरणाग १५ १०,,सोलमा जियाण,,२० (११. विराकसूत्री, सतरमा पजम, १७,६७, ८. कलश ६२ , अढारमा ज्ञान ,४,८८६७५ मौनएकादशी पर्य ,प्रोगणीसमाशुत २०, ३१ अधिकार ६५, पीसमासीथ ८७ मधमानएकादशीनो५० ६५ , घीसस्थान चैत्यवदन ७४ गुणणा९० से ०९पृष्ट तक " . ५ - " " " " " " " " " " " [३] म० विषय पृष्ठम० विषय ८८ पोषरदि १० तपशु अधि ११० ११० पचफल्यागकनु गुणणो- कअप मेसतेरसनपनी, पृष्ठ १२८ से १३५ ९. रोहिणी तप १११ १११ अपगोतम पात्रतपविधि, सोलिया(पपायनय) १२ गचरगी तप तपनी घि ११२ ११३ नवरंगी तप १३६ ९२ , पत्रासो तपविधि ।।३।११५ भातील पर्द्धमान तप छमामी ११५ मथनदीवरतपविधि १३७ ९४, पापी ११४ ११६दर्शन २८ लाधी १.५ १९७सान् “६ ५४ लम्धिनो गुणणो ११६ | ११८ चारित्र ९७ प्रय१५ तर वैघि ११७ ९ धर्मचक तप गुणणो आदिर१८ | १२० योगशुद्धि .९, तिलक-पविधि १२५यवमध्य यजमध्य २००४रागम, चादायएसप १० ११ भंग गुणपो १२० तीर्थकर पधमान तप १३९ १०२ छुटक सूत्र १२३ १२३ पाम भूषण तप १०.५गणधानप १.४ तीर्थकर दीक्षा तप १०४ गणघता जाप निर्वाण १५ नवशर नपविधि १०६इद्रिय जय तप १२७ चतुर्विध मघ १४२, १.७८वर्म एदन प १२८ तीर्थंकर च्यान १०८ चदन शालानो मट्टम १२६ तपविधि १७।३० सवत्सर १०६अथ पचक्क्याएक १३१ पद्मोत्तरपिनोली तपविधि १३२ समवसरण तप " " " " " " " " " " " " ..

तप१५४ . " " " " सपत्ति तप " १ [] विषय पृष्ठमा विषय १५२ दशरिपयति धमतप १५४ २५६ नप कमल १३४ पनपरमेष्ठी १५७ सूरायण १४ १३५ सादर १४२ १५८९६ जिन २३६ निरूकसिंह १ मतीन घोषीसी जिन १३७ सौभग्य कल्पवृक्ष गुणणो २३८ अगावपापडीतपनो एक २ तमानचोयीसी जिन१५६ ३अनागत १३. अदु खदर्शि मसुम्ब ४वीश विरहमान, ४ ४शाध्यत १४० मम चतुर्थ १५६ १७० जिन सप १४१एमचकपाल १४७ १४२चत्तारि अठदस दोय, १जद्धाप महा विदेह ३.जिन १४३ गोनम कमल २धात भीखद पूर्व महा १४४ सिंहासण १ विदेह ३२ जिन १४५१० दश पञ्चपखाण, १४८ ३ घात की खडेपधिम १५ घडीया ये घडीया , महा घिदेठ ३२ जिन १६ १५७पाच घठ ४५ पुष्फरार्धे पूर्व महा १५८ अक्षय निधि विदेठ ३२ जिन १४९ शाश्वत मेरु पर्वत ५ पुष्कराईं पश्चिम १५०क्यली विदेह ३२ जिन १५१ शाश्वत जिन १६० केवल हा तर १५२ सिद्धि ११अष्टफर्मोत्तरप्रति तप १६ १५३ मोक्ष फरमक १६२ पाच पचनाण १५४ स्वर्ग ॥ १५३ १६३ पचमहामत तप २५५ रक्षरोपण १६० सकल तीर्थ नमस्कार १७ ' " " . " १४१ " " " " 1 । 4 - ॐ ह्री अई नम ॥श्रीजिनदत्तसूरिभ्यो नमः॥ ॥श्रीनवपदादि तपविधिसंग्रह। ॥ अथ अरिहतपद चैत्यवदन ॥ जय जय श्रीअरिहत भानु,भषि कमल विकाशी। लोकालोक अरूपिरूपि समम्न वस्तु प्रकाशी ॥१॥ समुद्घात शुभ केयले , क्षय कृतमल राशी ॥ शुक्लचरम शुचि पादसे , भयो वर आपनाशी ॥२॥ अतरत रिपु गण हणीए, हुए अप्पा अरिहत ॥ तसुपद पफजम रहत , हीर धर्म नित सत ॥३॥ - तप१५८ . 1 " . " " सत्ति तप " " " [] पृष्ठन विषय पृष्ठ १३- दाविषयति धातए १४ १५६ नप कमल १३४ पचपरमेष्ठी १५७ सूरायण १३५ सर्वात सुदर १४ १५८०६ जिन २३६ निम्कसिंह भतीन घोपीसी जिन १३७ सौभाग्य कल्पवृक्ष, गुणणो १३८ अणाद पापडीतपयो १५१ पतमान चोवीमी जिन१६ १३५ भतु सदाशिमसुन ३मनागत ४ यीश विरहमान, ४४शाश्वत १४०पम चतुर्थ १५६ १७० जिन तप १४१मचरपाल १४२चत्तारि अठ दसदोय, १ जयूद्धाप मा यियेह ३२ जित १४३ गौतम फमल २धात दीख पूर्व महा १५० सिंहासण विदेह ३२ जिन ४५१०६० पथक्वाण, १४८ ३ घात की सहे पखिम १४६ घडीया ये घडीया , महा विदछ ३२ मिन १६३ १७पाच पठ ४५ पुष्पगधे पूर्व महा १४८ अक्षय निधि विदेह ३२ जिन १५९ शाश्वत मेरु पर्वत ५ पुष्कराईं पश्चिम १५० चली विदेह ३२ जिन ११शाश्वत जिन । १५२ | १६० केपल सातप १५२ सिद्धि ११अटफर्मोत्तर प्रतितप१६ १५३ मोक्ष फरमक १६२पांच पयस्ताए १५४ स्वर्ग , १५३ १६३ पचमहामत तप २५५ र रोपत १६. सकल तीर्थ नमस्कार १५: " , " " . " " १४१ " " . " 1 " -

7
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ॐ
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ॐ हा आई नः
॥ श्रीजिनदत्तरित
॥श्रीनवपदादि तपविधिमंदा
॥ अथ अरिहत्तपट पंदन:
जय जय श्रीअरिहत भानुमविहिनी
लोकालोक अरूपिपि ममस्त बनुमा
समुद्धात शुम केरले , क्षर ननद रामा
शुक्लचरम शुचि पादसे , भयो या नावानी
अतरत रिपु गण हणीप, हुए अप्पा पनि
तमुपद पकजमें रहत , हीर पर्म।
.

३ - . जग अरिहत पद स्तवन ।। श्रीरभेगुण यसिके फत, कर्मकु भजे श्रीमरिहत्त। मनमानले । अष्ट समय में समय तीन, मर्व आहारथी हावे हीन । मन०॥१॥ पादर कायो मन वप भोग, सनु तनुस पुन दृढ तनुयोग । मन । सुखम कायत मन पच रोष,निजवीर्य ताकुकर फोक मन ॥२॥ सशीमात्र के मन व्यापार,ये इद्रीने वाक्यप्रकार मन । आदिसमय रथ्यो पण कसु जीय, सुरवम लह्यो तिण जोग अतीय । मन० ॥३॥ एसा योगथी.समय एक, हीनासख गुणा करी छेकोमन समया सखे जोग निरोध, कृत्वा जो त्यो जोगी शोध मन ॥४॥ वेदसमे अनाहारतापाय, कुशल,पाहे से श्रीजिनराय' मन तेरमे गुणमे गुण समे देव, आपोसा जगा नितमेव । मन०॥५॥ ॥ अथ अरिहंतपद धुड 'सफल द्रव्य पर्याय प्ररूपक, लोकारोक सरूपोजी। केवलज्ञान की ज्योति प्रकाशक, अनन्त गुणे फरी परोजी ॥ क्षीजें भय थानक आराधी, गोत्र तीर्थंकर भूरोजी । पारे गुणा फरी ण्हया अरिहत, आराघो गुण भूरोजी ॥१॥ 1 - ॥ अथ सिद्धपद चैत्यवदन ॥ श्रिीशैलेशी पूर्वप्रात, तनु होन निमागी। पुब्ध पपयोगप्रसंगमे, अग्धगति जागी॥ १॥ ममय एक में लोक मान्न, गये निगुण नीरागी। चेतन भूपे आतम रूप, सुदिशा रदी सागी ॥२॥ फेषल दसण नाण थीए, रूपातीत स्थमाघ । सिद्ध भए नसुहीर धर्म, घटे परि शुभ भाय ॥ ३॥ ॥जय सिद्धपद स्तवन । (पारे महिलां ऊपर मेह जरोखे बीनली ।। ए चाल) अष्ट परस नग मास हीना कोठी पूर्वम म्हारा लाल ही० । उत्कृष्ट करै वाम सयोगी घाम म्हा०प्त। अजागी के अरा तो मघ भव्यता म्हारा || त०॥ शैलेशी लगट दलै गुणणिता म्हा०॥०॥१॥ हस्ताक्षर पच काल है ते याग में म्हा. २०॥ तेरम प्रकृतिको अन्त, फरीने अन्तमें महा. क.॥ गमन करे नगरजसें । अक्रिय होयने म्हा० प्र० ॥ ०, पुरपयोग अमा स्वभाव अषधों महा० स्व०॥२॥ ईपु गुण नवपरिमाण जोजन रक्षेदीम्हा० जा यनुल विशठ भाश,निरालयन मही म्हा. नि०॥ मध्ये जोजन अष्ट,घना कृति अन्तमें म्हा ०५० ।। - -- मक्षी पसथी हीन भणी सिद्धान्त में म्हा० भ०॥३॥ सनुप मारा नाम शिलासें जोय. म्हा०शि०॥ लघु अगुल पत्तीम प्रमाण प्रयगाना म्हा०प्र०॥ पृद्धिधनु शत पच, गुणसे होनता म्हा. गु०॥ मिलिया एकमें लत, अपाघा नालही म्हा० अ०॥ गष्ट प्राण धरि रय सिरी हिजो सही म्हा०सि०॥ योजो पद श्रीसिद्ध घरी मन गहमें महा. घरो॥ । कुशल भये जग जीव मिलोगा तेहमे म्हा०मि०॥५॥ । - ॥ अर्थ सिद्धपदनो थुइ ॥ For अष्ट करमा दमन कराने, गमन फियो, शिव वाशीजी । अध्यापाघ सादि अनादि, चिदानन्द चिदराशीजी ! परमातम पद पूरण विलाशी, अध पन वाघ-विनाशीजी, अनत-चतुष्टय -शिवपन पायो, केवल ज्ञानी भाषीजी इति ॥२॥1 FM HERE ॥ अथ आचार्य पद चैत्यवदनम् ॥ { जिनपदकुल सुखारस"अनिल । मितरसगुण पारी प्रयलसयल घन मोहकी। जिणने चमु शारी॥१ ज्यादिक शिनराजगीते नियातन विस्तारीमा 10111070- TTPIC - ।

कूपै पापे परत जगजन निस्तारी ॥२॥ पचाचारी जीवके । आचारज पदसार । तिनफ यदे हीर-धर्म, अठोत्तरसोवार ॥३॥इति ॥ ॥ अथ आचार्यपदस्तवन ॥ (नणदल वांदलीले ए वात) खती खड्गधी जेणें । हण्यो क्रोध सुभट मम देणे हो । गणपति गुण पेवी मन महागिरि चयरे। अति सोमन मध्य वयरें होग। दभरूप विप- वेली | पर मज्नय कीले ठेली हो ॥ग०॥ मूर्ग वेलथी भयो । लोह सागर मुत्तेतरियो हो ॥गo!! ॥२॥ मदनानाग मदीनो । जिणदम शम अंने कीनो हो।ग ।। मोहमहामल्ल- तायो T+पुग्ण पैराग मुगरें पाख्यो हो ॥ ग०॥३॥ दोपागयंद पस कीनो । धरी उपमश अकुश लीनो हो । ग०॥ अतरंगरिपु मेधा । सुरवर पिणजिण निपेघ्या हो। ifTORY रसाकृती गुणधी लीनो सूत्र अ भागनपीनो 'हो, ग. "आचारिज पद एहवा । घरीजीप कुशरना सेयो हो। ग॥५॥ इति ।। ३. RETRA TRIPE ॥ अथ आचार्यपदी थुइ ।। पचापारपाले उजगाले, दोपरहित गुणागती। गुण एसीमे आरामधारी,हात अंग पिचारिजी। प्रयल समस धन मोह हरणका अनिल ममी गुण पाणीजी । क्षमा सहित जे सयम पाले आचारज गुण ध्याजी ॥ इति ।। ३ ।। ॥ अथ उपझायपद चेत्यवदनम् ॥ धन धन श्री उवहार राय । शठता घन भवन ।। जिनयर दर्शित द्वादशाग । घरकृमजनरजन ॥१॥ गुणरण भजण मण गयर । सुयशृणि पिगजण ।। फुतप लोय लोपणें । जत्थए सुप मजण ॥३॥ महा प्राणमे जिन रयो । आगममे पद तुर्य । सिन थहिनिश हीर धर्म । धद पाठकवर्य ।। इति ॥४॥ ॥ अथ उपाध्याय पद स्तवन ॥ (सांवरिया लगा रही एघास हुपर्ने ३ दूरी हुपर्ने । चेतन भाप शाठने दूरी होय. तु मुझ पास फ्यु आरे दू. तुझने गुण पतलाचे दू०॥ आकणी ||तो सगै निज पचेद्रीनो। रचना चरम भुलाणो । नाणा परणी राय उपश- 1 मसे । माद्री मंडाणो दुः॥१॥ द्रव्ये ते पर- जाप्ने फीना | जातिनाम व्यपदेश । एप तो गो तुरग गजादिक । किण कमें उपदेश दू० ॥२॥ इत्यादिक यहु मुझकु शका | तेरे संग लागी । नीलपर्ण की शमतासेती । मैं भयो तोसुरागी दु. (३॥ उपकहिये हणीयो भपियानो। अधिया लामत आपयाधीनांमन पीडाना,मायोपेन विलाए दू॥४ आधिक्य स्मरायै घर आगम सूत्रसेंत उवझायतत्से- घा ते हर्णिसठता/चेतन कुशलताथाय दृ.इति।।५।। ॥ अथ उपाध्याय पद स्तुति ॥ अग इग्यारै चउदै पूरव , गुण पचीसना पारीजी। सूत्र अरथधर पाटक कहिये,जोग ममाधि विचारीजी तपगुणसूरा आगम पूरा, नयनिक्षेपे तारीजी । मुनि गुणधारी बुधविस्तारी पाठक पूजो अधिकारीजी इति ॥४॥ ॥ अथ साधुपद चेत्यवदनाम् ॥ दशण नाण परित्त करी। वरशीवपद गामी॥ धर्म शुक्ल शुधि चासें । आदि मखय कामी ॥१॥ गुण पमत्त रापमत्तते । भये अतर जामी. ३ Tr A 4- (८) इदिय दमनभूत । शमदम अभिरामी ॥२॥ पारुति धन गुणगण भयो ए । पचमपद मुनिराज तत्पर एफज नमत है। हीर धर्म के फाज ॥ ३ ॥ ॥ अथ साधुपद स्तवन । (माखन माखन मति को ए-चाल) निकपाया जग जनम है। धारे चउगति घसनसं रोप हो मुनिदजी। रागहीन भय तु करै।माहिया शिव रमणी से हेतरो मुनिंदजी ॥१॥ सर्व प्रमाद सजी रहै मा० छठ पूरव कोड हो ॥ मु. शत सोगम आगम कर मा० लघु फाले गुण आदि हो।। मु० ॥२॥सत्यानदि निंद्राउटे मा. यामें कर्म निफन्द हो मु०प्रचला निद्रामें रही सा० । पारम गुणनो चासहो मु०॥३॥ स्थितिरस घात प्रमुख फरै सा. जो गुण संरयातीत हो मु०) तोपिण तिण जग में लही सा० त्रिक धन गुणनीरुपात हो मु०तो पिण तिण जगमें लही सा०त्रिक घन गुणनीरयात हो मु०॥४॥रयण प्रयसै शिवपधे सा० साधन परवर जीव हो मुसाधु हुवइ तमु धर्म मा कुशल भवतु जगतीय हो मु०॥५॥ इति ॥ अथ साधुपद थुई ॥ सुमति गुपत्ति कर मजम पालै,दोपपपालीश टालजी। पट् काया गोकुल रखवाले, नय विष ब्रह्मव्रतपालजी। पचमहाव्रत सुधापाले,"धर्म शुक्ल उज्यालेंजी ।। क्षपक श्रेणि करि कर्म खपा, दमपद गुण उपजावजी ॥ इति ॥ ५ ॥ ॥ अथ दर्शनपद चैत्यवदनम् ॥ हुए पुग्गल परियट्ट । ड्ड परमित ससार ॥ गठि भेद तव करि लहै । मय गुण आधार ॥१॥ क्षापक वेदक शशि प्रसघ । उपशमपण वार विना जेण चाग्थिनाण नहीं एवं शिवदातार ॥२॥ श्रीदेव गुरूधर्मनीए । रुचि लच्छन अभिरामः । दरशनक गणि हीर धर्म । अरनिश करत प्रणाम ।। शाति ॥ अथ दर्शनपद स्तवन ॥ पारामचन्द्र दाग भावो मोहरधोरी । पपाल। ' देव श्रीजिाराज | गुरुते सोधु मण्योरी । धर्म जिनेश्वर प्रोसारक्षण शेधि तगोरी ॥१॥ बोधि लाम काज | ससम नरक मोरी । तेण पिना सुरलोक । तात अधिक चुरोरी ॥ २॥ मिग- 1 1 सापे सप्त । पोध ही छह रहेरी । उपशम क्षायक वेद । ईश्वर तीन कसोरी ॥ ३ ॥ भवसागर अपार । फुण अस्ताघ कटोरी। जसुलाते होय। + गोसप मात्र खरोरी ।। ४॥ यद-भायें अममाण । नाण चारित्त भलोरी। पोध धर्ममें जीव । साभ कुशल कलोरी ॥५॥ इति ॥ अथ दर्शनपद थुइ ।। जिन पन्नत तत्व सुधा सरधे, समर्पित गुण उजवालजी। भेद छेद करी आतम निरखी, पर दाली सुरपावजी । प्रत्याख्याने समतुल्य माल्यो, गणघर परिहतशराजी । ए दरशनपद नित नित पदो, भवसागरको तीराजी ॥ इति ॥ अथ ज्ञानपद चैत्यवदनम् ॥ क्षिमादिक रस राम विन्ह । मित आदम नाण भाव मिलापसे जिन जनित । सुय वाश प्रमाण १ भवगुण पज्जवओहि दोय । मण लोचन नाण । लोका लोक सरूप जाण । इफ केवल भाण ॥२॥ नाणा-थरणीनासपीए चतन नाण प्रकाश। सप्तम पदमे हीर धर्म । नित पाहत अवकाश ॥३॥इति 1. प्राप्त धन प्रकारता। सप्त मामृतका तेन सु ॥४॥ तद्रोधनरूपी भो । चेतन सयम धाम (सु.) कर घनमिलपद धर्मस् । कुशल भवतु अभिराम (सु०)॥५॥ इति ॥ अथ चरित्रपद थुई ॥ करमअपचय दर खपावै, आतम ध्यान लगायी। पारे भावना सूधी भाषे, मागर पार उतारेजी । पखड राजा दूर सजीने, चक्री मजन घारेजी एयो चारित्रपद नित नित पदो आतम गुण हितकारजी ।। इति ॥ अथ नपपद चैत्यग्दनम् ।। श्री पभादिक तीर्थनाथ । तवगिर जाण । ग विहि तैरपि पाय । मध्य द्वदा परिणाम ॥१॥ वर्म कीमित ग्रामोसही ( आदिक:लब्धि निदान भेदै ममतासुतग्विण । इन्धन फर्म विमान ॥२॥ - नमो श्रीतपपद् भरोए । इच्छा रोध सरूप । नित शिर धर्म । दूर भयतु भवकृप - अति ॥ अथ तपपद स्तवन ।। भेद भण्या जिनराजै । पाथ मध्य न , अग विमारीजी। अपधि मन-पर्यव फेपल बलि प्रत्यक्षरूप अपधारोजी । ए पांच ज्ञानकुघदो पूजा, भविगनने सुग्नकारोजी ।। इति अथ चरित्रपद चैत्यवदनम् ॥ जस्त पसाय माहु पाय | जुग जुग समितंद । नमन करें सुभ भावलाप । फुण नरपति वृन्द ॥१॥ जपे पुरि अरिहतराय । करि कर्म निकन्द । सुमति पप तीन गुप्तियुतादै सुस्प प्रमद ॥२॥षु कृति : मान कपायपीए । रहित देश सूचिवन्त ॥ जीप पारित हीर-धर्म । नमन करत नित मत ३ जति ॥ अथ चारित्रपद स्तरन ॥ निर्विकल्प अजनिर्गुणी चिराभाम निस्मग। (सग्यानी मांभरो)भूतिहीन चनेन करै । रूपी पुद्गल रस (मुग्यानी सा०)॥१॥ म्पर्द्धक कारण घर्गणा कार्ये कारण भाय सुरु गत्या जोग सुधा' मता । लब्धा सग्य स्वभाव । सु० ॥ २॥ पाता लघु जोग में । पृदिल है जुगमान (सु. ) मध्ये वनसमये लहै। अते द्वौते जाण [सु] ॥३॥ सहकारी मानस मुखा। कारण रम्प परेण सु. ।

(१३) प्राप्त घर प्रकारता ! सप्तमाभृतका तेन सु ॥४॥ तद्रोधनरूपी मलो । चेतन सयम धाम (सु०) कर घनमिलपद धर्मस् । कुशल भयतु अभिराम (१०)॥५॥ इति ॥ अथ चरित्रपद थुई ॥ करमअपचप दूर खपावै, आतम ध्यान गाजीपारे भावना सूधी भाषे, मागर पार उतारेजी । पटूसड राजकं दूर तजीने, चक्री मजा धारेजी एरवो चारिनपढ नित नित पदो आतम गुण हितकारजी ।। इति ॥ अथ नपपद चैत्यदनम् ॥ श्रीपभादिक तीर्यनाथ । तदवशिय जाण। ग विहि अतैरपि पाय । मध्य द्ववश परिणाम ॥१॥ वर्म कंगमित मामोसही (मादिक: सन्धि निदान मेदै ममतासुनाविणे । हुग्धन कर्म घिमान ॥२॥ नयमो श्रीतपपद भलोए । इच्छा रोष सरूप । चढनसें नित शि धर्म । दूर भरतु भवकूप ॥३॥ इति ॥ अथ तपपद स्तवन । पारम भेद भण्या जिनराजै । पाय मध्य T - में जगारे ( शिषपदणी) तिण भष सिद्धितणा वर ग्पाता । जिनवर पिण तपना तारे ॥१॥[शि.] समता सहिते जिनसे भारी।- मली फर्म पमुपिण हारी रे (शि०)जीव कनकस कर्म प.पोरा । दरे तप पायनका जोरारे (शि०)॥२॥ तप सरयरना कुसुम है प्रादि । देव नरनाफल सिद्धीरे (शि०)पाप सफर तमनी राशी । सप. मानूमें जाये नाशीरे (शि.)शा जस्सा'पसाये लदिप यार । सन्धी सगसी जगहित काररे (शि०) प्रति दुक्कर फणू साध्यतोहीना। कामतातें पारू कीनारे (शि०)॥४॥ इच्छारोघनरूपी फाहिये। तपपद से कृपा से । नयपद चेतन पाहिपेरे, पाठक भीर धर्म कुशलक भासेरे (शि.)॥५॥ ॥ अथ तपपद थुई ॥ इच्छारोधन तपते भाख्यो, पागम तेहनो सा- खोजी । द्रव्य भाषसे द्वादशा दाखी, जोग समाधि राखीजी । चेतन निजगुण परणित पखे, तेहीज तप गुण दाखोजी । लब्धि सकरनो कारण देसी, ईश्वरसे मुखभाषीची ॥ इति

॥ अथ अरिहतना १२ गुण ॥
१ अशोक वृक्षप्राप्तिहार्य सयुताय श्रीअरिहताय नमः
२ पुष्पवृष्टि प्रातिहार्य सयुताय श्रीअरिहताय नमः
३ दिव्यध्वनि प्रातिहार्य संयुताय श्रीअरिहताय नमः
४ चामर युग प्रालिहार्य सयुताय श्रीअरिहताय नमः
५स्वर्णसिंहासन प्रातिहार्यसयुताय श्रीअरिहतायनम
६ भामडल प्रातिहार्य सयुताय श्रीअरिहताय नमः
७ दुदुभि प्रातिहार्य सयुताय श्रीअरिहताय नम
८ छनत्रय प्रालिहार्य सयुनाय श्रीअरिहताय नमः
९ज्ञानातिशप सयुताय श्रीअरिहताय नमः
१० पूजातिशय सयुताय श्रीअरिहताय नमः
११ वचनातिशय सयुताय श्रीमरिहताय नम
१२ अपायपगमातिशय सयुताय श्रीअरिहताय नमः
॥ अथ सिद्धना ८ गुण।
१ अनन्त ज्ञान सयुताय श्रीसिद्धाय नमः ।
२ अनन्त दर्शन सयुताय श्रीसिद्धाय नमार
३ अव्यायाध गुण संयुताय श्रीसिद्धाय नमः
४ अनन्तचारित्र गुण सयुताय श्रीसिद्धाय नमः
५ अक्षास्थिति गुण सयुताय श्रीसिद्धाय नमः
M
344
SM

.
६ अरूषीनिरजन गुण मयुताय श्रीसिद्धाय नम
७ अगर लघु गुणो सयुताय श्रीसिद्धाय नमः
. अन्नार्य गुण मयुताय श्रीसिद्वाय नमः
॥ अथ आचार्यपदना ३६ गुण ।।
१ प्रतिरूप गुण सयुताय श्रीआचार्याय नमः
२ भूर्यपत्तेजस्वि गुण सयुताय श्रीप्राचार्याय नम
३ युगप्रधानागम सयुताय श्रीआचार्याय नम
४ मधुरयाक्य गुण सयुताय श्रीप्राचार्याय नम
५ गाभीर्य गुण सयुताय श्रीश्राचार्याय नम'
६ धैर्य गुण मयुताय श्रीआचार्याय नमः
७ उपदेश गुण मयुताय श्रीआचार्याय नमः
८ अपरि श्रावी गुण सयुताय धीमाचार्याय नमः
९ सौम्य प्रकृति गुण सयुनाय श्रीप्राचार्याय नम
१० गीर गुण सयुताय श्रीभाचार्याय नमः
११ प्रविग्रह गुण सयुताय श्रीप्राचार्याय नम
१२ अविक्थक गुण सयुताय शीघ्राचार्याय नम
१३ अचल गुण सयुताय श्रीप्राचार्याय नमः
१४ प्रमन्न वदन गुण सयुताय श्रीमाचार्याय नम
१५ क्षमा गुण संयुताय श्रीप्राचार्याय नमः
१६ ऋजु गुण संयुताय श्रीआचार्याय नम

१७ मृदु गुण सयुताय श्रीआचार्याय नमः
१८ सर्व सगमुक्तिगुणसयुताय श्रीआचायाय नमः
१९ द्वादश विधतप गुण सयुताय श्रीआचार्याय नमः
२० सप्तदशविध सयम गुण सयुताय श्रीआचार्याय नम
२१ सत्यव्रत गुणसयुताय श्रीआचार्याय नमः
२२ शौच गुणसयुताय श्रीआचार्याय नमः
२३ अकिंचन गुणसयुताय श्रीआचार्याय नमः
२४ ब्रह्मचर्य गुणमयुताय श्रीआचार्याय नमः
२५ अनित्यमावनाभावकाय श्रीआचार्याय नमः
२६ अशरणभावनाभाकाय धीआचार्याय नमः
२७ ससारस्वरूपभावनाभावकायश्रीआचार्यायनम
२८ एकत्वस्वरूपभावनाभावकाय श्रीआचार्याय नमः
२९ अन्यत्यभाधनाभावकाय श्रीआचार्याय नमः
३० अशुचिमावनाभावकाय श्रीआचार्याय नमः
३१ आश्रयमावनाभावकाय भीआचार्याय नमः
३२ सवरभाषनाभावकाय धीआचार्याय नम
३३ निर्जराभावनाभावकाय भीआचार्याय नम
३४ लोकस्वरूपभावनामावफाय श्रीआचार्याय नमा
३५ पोधिदुर्लभभावनामावकाय श्रीआचार्याय नमः
३६ धर्मदुर्लभभाषनाभावकाय श्रीआचार्याय नमः

(१८)
॥ अथ उपाध्यायना २५ गुणो ।।
१आचारागसूत्र पाटनगणमयुताय श्रीउपाध्याय नमः
२ सुयगागसूत्र पाठागुगसयुताय श्रीउपाध्याय नम
३ श्रीटाणागसून पाटनगुणमयुताय श्रीउपाध्यायनमः
४ श्रीसमनायगसूत्र पाठागुणमयुताय उपा० नमा
५श्रीमगपतीत्तूत्र पाउनगुगमयुगय श्रीउपा० नम.
६ श्रीज्ञातासून पाठनगुणमयुताय श्रीउपा० नमः
७ श्रीउपाशगदशामसूत्र पाठनगुणमयु. श्रीउपा० नमः
८ श्रीअतगडदशागसूत्र पाठागुणमयु. भीउपानमः
९श्रीअणुशरोवाईसून पाठेनगुणसयुनाय श्रीउ नमः
१० श्रीमन याकरणसूत्रपाठनगुण सयुताय श्रीउनमा
११ श्रीविपाकसूत्र पाठनगुणमयुताय श्रीउपा० नमः ।
१२ श्रीउत्पाटपूर्व पाठनगुण मयुताय श्रीउपा० नम
१३ श्रीआग्रायणीपूर्ण पाठनगुण सयुताय धीउपा०नम'
१४ श्रीवीर्यमयादपूर्ण पाठन गुण मयुताय श्रीउपा० नम
१५ आस्तिप्रवाद पाउनगुण सयुताय श्रीउपा० नमः
१६ ज्ञानप्रवाद पाठनगुण सयुताय श्रीउपा० नमः
१७ सत्यप्रषादपूर्य पाठनगुण सयुताय श्रीउपा० नमः
१८ आत्मप्रवादपूर्ण पाठनगुण सयुताय श्रीउपा० नम
१९ फर्मप्रवादपूर्व पाठनगुण सयुताय श्रीउपा० नमा
४

२० प्रत्योख्यानमवाउपूर्णपाठनगुण मयुताय श्रीउ०नमः
२१ विधामापूर्य पाठनगुण मयुताय श्रीउपा० नमः
२२ अविस्यमयादपूर्व पाठनगुण सयुय श्रीउपा० नमः ।
२३ प्राणायामप्रगटपूर्व पाठनगुणमयुनाय श्रीउनमः
२४ मिशिलपाठनगुण मधुनाय श्रीउपा०नम
२५ लोकारिंदुमारपून पाठनगुण म्युताय श्रीउपानम.
॥ अथ साधुपपना २७ गुण ॥
१प्राणातिपातपिरमणतसपनाय भीसाधरे नमः
२ मृपावादविरमणत मयुनाय श्रीसाधरे नना
३ अढत्तादानविरमगातसयुताय श्रीमाधये नम.
४ मैयुायिरमणनतसपुतार
श्रीपाघरे नमः
५परिग्राचिरमणतमयुताय
श्रीसाधानम
६ रात्रिभोजाविरमणातसयताय श्रीमाय नम
ও নাগাস্কাৰ श्रीमाधो नमः
মেঘগন্ধায়
श्रीसाधये नमः
९तेऊफायरक्षकाय श्रीनाराधे नमः
१. वाकायरक्षकाय
श्रीसाधये नमः
११ वनस्पतिकायरक्षकाय
श्रीसाधये नमः
१२ नसफायरक्षकार
श्रीमाधये नमः
१३ केंद्रियजीवरक्षकाय श्रीसाघवे नमः

(२.)
१४ येइद्रियजीवरक्षकाय
श्रीसाघवे नम
१५ बेइद्रियजीवरक्षकाय श्रीसाधवे नमः
१६ चौरिंद्रियजीवरक्षकाय श्रीसाधये नमः
१७ पचेद्रियजीवरक्षकाय श्रीसाधय नम
२८रोधिग्रहकारकाप श्रीसाधये नम
१९क्षमागुणयुक्ताय श्रीसाधवे नमः
२० शुभभावनाभावकाय श्रीसाधये नमः
२१ प्रतिलेखनादिक्रियाशुद्धकारकाय श्रीसाधवे नमः
२२ सयमयोगसयुक्ताय श्रीसाधवे नमः
२३ मनोगुप्तिसयुक्ताय श्रीसाधवे नमः
२४ चचनगुप्तिसयुक्ताय श्रीसाधवे नमः
२५ कायगुप्तिसयुक्ताय श्रीसाधवे नमः
२६शीतादिद्वाविंशतिपरीशइसणतत्पराय धीसान
२७ मरणांत उपसर्ग सहन तत्पराय श्रीसाघवे नमः
॥ अथ दर्शनपदना ६७ गुण ।।
१परमार्थ सस्तवरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः
२ परमार्थज्ञातृसेवनरूप श्रीसद्ददर्शनाय नमः
३ पापमदर्शन घजनरूप श्रीसदर्शनाय नमः
४कुदर्शन पर्जनरूप श्रीसदर्शनाय नम
५शुपारूप श्रीमदर्शनाय नम

A ६ धर्मरागरूप श्रीमदर्शनाय नमः ७ वैपाकृत्यरूप भीसदर्शनाय नमः ८महद्विनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नम ९सिद्धविनयरूप श्रीसदर्शनाय नमा १० चैत्पविनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ११ श्रुतविनयरूप धीमदर्शनाय नमः १२ धर्मविनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः १३ साधुधविनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः १४ आचार्यविनयरूप श्रीसबर्शनाय नम १५ उपाध्यायविनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः १६ प्रवचनविनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः १७ दर्शनविनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः १८ संसारेजिनसारमिति चिंतनरूप श्रीसदर्शनाय नमः १९संसारेजिनमतसारमितिचिंतनरूप भीसद्दर्शनायनमः २० ससारेजिनमतस्थित माध्वादिसारभित्ति चिंतन- रूप श्रीसद्दर्शनाय नमः २१ शकादूपणरहिताय श्रीसहनाय नमः २२ कांक्षादूषणरहिताय श्रीसद्दर्शनाय नमः २३ विचिकित्सारूपपणरहिताय श्रीसदर्शनाय नमः ५४ कुदृष्टिप्रशसा दूषणरहिताय भीसद्दर्शनाय नमः २५ कुटष्टिपरिचपीषणरहिताय श्रीसहर्शनाय नमा

१
(२२)
२६ शश्चनप्रभातफरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः
२७ धर्मक्षधाप्रमावकरूप धीसहर्शनाय नमः
२८यादिप्रभावकरूप श्रीमदर्शनाय नमः
२९ नैमित्तकप्रभावक्रूप श्रीसद्दर्शनाय नम
३० तपस्निप्रभावकरूप प्रीसद्दर्शनाय नम
३१ प्रज्ञायादिविद्यामृत्मभाषकरूप श्रीसदर्शनाय नमः
३२ चूणांजनादिसिद्धप्रभावकरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः
३३ कविप्रभावकरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः
३४ जिनशासने कौशर भूपणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः
३५ प्रभावनाभ्पणरूप श्रीमदर्शनाय नमः
३६ तीर्थसेवाभूपणरूप श्रीसदशायनमः
३७ धैर्यभूपणरूप श्रीमदर्शनाय नमः
३८ जिनशासने भक्ति भूपणरूप श्रीसद्दर्शनाप नमः
३९ उपशमगुग्गरूप श्रीमदर्शनाय नमः
४० सवेगगुणरूप श्रीसद्दर्शनाय नम.
४१ निर्वेदगुणरूप श्रीमदर्शनाय नमः
४२ अनुकपागुणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः
४३ धास्तिक्यगुणरूप श्रीसद्दर्शनाय नम
४४ परतीर्थकादिवेदनवर्जनरूप श्रीसदर्शनाय नमः ।
४५ परतीधिकादिनमस्कारवजनरूप,श्रीसद्दर्शनाय नमः
श्रीसदर्शनाय नमः

४७ परतीर्धकादिमलापवर्जनरूप श्रीसानाय नमः - ४८ परतार्थकादिअमनादिवानवर्जनरूप श्रीस० नमः ४१ परतीर्थकादिगधपुष्पादिप्रेषणवर्जनरूप श्रीसनमः राजाभियोगाकारयुक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः ५१ गणाभियोगाकारयुक्त पीसदर्शनाय नमः २पहाभियोगाकारयुक्त श्रीमदर्शनाय नमः ५३ सुरामियोगाकारयुक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः ५४ कानारयूरपाकारयुक्त श्रीसदर्शनाय नम ५. गुरुनिग्रहाकारयुक्ताय श्रीमदर्शनाय नम ५६ सम्पपत्व पारित्र धर्मस्यमूलमितिचिंतन श्रीसद्दर्शनाय नमः ५७ सम्पपत्वं चारित्रधर्मपुरस्यद्वारमिति चिंतन- श्रीमदर्शनाप नमः ५८सम्परत पारिन धर्मस्य प्रतिष्ठानमिति चिंतन श्रीमदर्शनाय नम ५९ सम्परचारित्रधर्मस्यापारमितिचिंतनश्रीसनम ६.मध्यपत्यपारिधर्मस्यमाजनमिनिचिनननीसनमा ६१ सम्पपस्यं चारित्र धर्मस्य निधि संनिम मिति चिंतन श्रीमदर्शनाय नमः ६९प्रस्तिजीवतिभदानस्थानयुक्ताय श्रीमदर्शनापनमः ५ सयजीवो निस्पति भदानस्थानयुक्ताय श्रीसनम. ।

1-
६४ सयलीय कम्माणि करोतीति श्रद्धानस्थान
युक्ताय श्रीसदर्शनाय नमा
६५ सचीव कृतफम्माणि घेदयतीति श्रद्वानस्थान
युक्ताय श्रीसद्दर्शनाय नमः
६६ जीपस्यास्ति निर्याणमिति प्रदानस्थान युक्ताय
श्रीसद्दर्शनाय नमः
६७ अस्ति पूनर्मोक्षोपायोति श्रद्धानस्थान युक्ताय
श्रीसदर्शनाय नमः
॥ अथ ज्ञानपदना ५१ गुण ॥
१ स्पर्शनेंद्रिय व्यजनावग्रहाय श्रीमति ज्ञानाय नमः
२ रसनेंद्रिय व्यजनावग्रहाय श्रीमति ज्ञानाय नमः
३ घाणेंद्रिय व्यजनावग्रहाय श्रीमति ज्ञानाय नमः
४ श्रोत्रंद्रिय व्यजनावग्रहाय श्रीमति ज्ञानाय नमः
५स्पर्शेन्द्रिय अर्थावग्रहाय श्रीमति ज्ञानाय नमः
६रसेन्द्रिय अर्थायग्रहाय श्रीमति ज्ञानाय नमः
७ प्राणेद्रिय अर्थावग्रहाय श्रीमति ज्ञानाय नमः
८ चक्षुरिंद्रिय अर्थावग्रहाय श्रीमति ज्ञानाय नम
, ९धोत्रंद्रिय अर्थावग्रहाय श्रीमति ज्ञानाय नमः
१० मनोभावग्रहाय धीमति ज्ञानाय नमः
११ स्पर्शन्द्रिय' ईहा श्रीमति-ज्ञानाय नम
'श्रीमति-ज्ञानाय * नम,
रमेन्द्रिय ' 'ईहा

२२ मननो
१३ प्राणद्रिय ईहा श्रीमति - ज्ञानाय नमः
१४ चक्षुरिंद्रिय , ईहा श्रीमति ज्ञानाय नमः
१५ोद्रिय ईहा श्रीमति ज्ञानाय नम
१६ मन ईहा श्रीमति ज्ञानाय नमः
१७ स्पर्शेन्द्रिय अपाय श्रीमति ज्ञानाय नमः
१८रसेन्द्रिय अपाय श्रीमति ज्ञानाय नमः
१९प्राणेंद्रिय पाय श्रीमति ज्ञानाय नमः
२० चक्षुरिद्रिय अपाय श्रीमति ज्ञानाय नम'
२१ श्रोत्रंद्रिय अपाय श्रीमति ज्ञानाय नमः
ध्यपाय श्रीमति सानाय नमः
२३ स्पर्शद्रियधारणा श्रीमति.. ज्ञानाय नमः
२४ रसेंद्रियधारणा श्रीमति ज्ञानाय नम
२५ घ्राणेंद्रियधारणा श्रीमति ज्ञानाय नमः
२६ चक्षुरिद्रियधारणा.
श्रीमति -ज्ञानाय नमः
२७ पोनेंद्रियधारणा श्रीमति -ज्ञानाय नमः
२८ मनोधारणा
श्रीमति- ज्ञानाय नमः
२९ श्रीप्रक्षर
श्रुतज्ञानाय नमः
३० श्रीअनक्षर शृतज्ञानाय नमः
३१ श्रीसजी
शुतज्ञानाय नमः
३२ श्रीअसज्ञी
श्रुतज्ञानाय नमः
३३ श्रीसम्पर - श्रुतज्ञानाय नमा

३४ भीमिया ध्रुतज्ञानाय नम ३५ श्रीसादि श्रुतज्ञानाय नम ३६ श्रीअनादि श्रुतज्ञानाय नमः ३७ भीसपर्यवसित श्रुतज्ञानाय नमः ३८ श्रीअपर्यवसित श्रुतज्ञामाय नम ९ श्रीगमिक शुनज्ञानाय नम १० श्रीअगमिक श्रुतज्ञानाय मन ४१ अगप्रविष्ट श्रुतज्ञानाय नम ४२ श्रीअनगमाविष्ट श्रतजानाय नम ४३ श्रीयनुगामि अवधिज्ञानाय नमः ४४ भीअननुगामि अवधिज्ञानाय नम ४५ श्रीवर्द्धमान अवधिज्ञानाय नमः ४६ धीहीपमान अवधिज्ञानाय नम ४७ भीमतिपाति अवधिज्ञानाय नमः ४८ श्रीअपत्तिपाती अवधिज्ञानाय नमः ४९श्रीमानुमति मन पर्यवज्ञानाय नम ५. श्रीविपुलमतिमन पर्यवज्ञानाय ५१ लोकालोकप्रकाशक श्रीकेवलजानाय नम ॥ अथ चारित्रपदना ७० गुण ॥ १माणातिपातविरमणरूप श्रीचारित्राय नम २ मृपावादविरमणरूप श्रीचारित्राय नमः (२७) ३ अदत्तादानविरमणरूप उमैथुनविरमणरूप ५परिग्रहविरमणरूप ६क्षमाधर्मरूप ७ आर्जवधर्मरूप ८ मृदुताधर्मरूप ९मुक्तिधर्मरूप १० तपोधर्मरूप ११ सयमधर्मरूप १. सत्यधर्मरूप १३ शौचधर्मदप १४ अम्चिनधम्मरूप १५ ब्रह्मचर्यधर्मरूप १६ पृथ्वीरक्षासयम १७ उत्करक्षासयम १८ तेउरक्षासंयम १९ चाउरक्षासयम २० वनस्पतिरक्षासयम २१ येद्रियरक्षासयम २२ तेइन्द्रियरक्षासयमा २३ परिद्रियरक्षासयम श्रीचारित्राय नम श्रीचारित्राय नम धीचारित्राय नम श्रीचारित्राय नमः श्रीचास्त्रिाय नमः श्रीचारित्राय नमः श्रीचारित्राय नमः श्रीचारित्राय नमः श्रीचारित्राय नमः श्रीचारित्राय नमः श्रीचारित्राय नमः भीचारित्राय नम श्रीचारित्राय नमः श्रीचारित्राय नम श्रीचारित्राय नम श्रीचारित्राय नमः श्रीचारित्राय नमः श्रीचारित्राय नम श्रीचारित्राय नमः श्रीचारित्राय नमः श्रीचारित्राय नमा -

(२८)
२४ पवेद्रियरक्षासयम श्रीचारित्राय नमः
२५ अजीवरक्षासयम श्रीचारित्राय नमः
२६ प्रेक्षासयम
श्रीचरनाय नमः
२७ उपेक्षासयम
श्रीचारित्राय नमः
२८ अतिरिक्त वस्तभक्तादिपरठण त्यागरूप सयम
गुणयुक्ताय श्रीधारियाय
२९ प्रमार्जनरूप श्रीचारित्राय नमः
३० मन सयमरूप श्रीचारित्राय नमः
३१ वाकूसयमरूप चिारित्राय नम
३२ फायसयमरूप श्रीचारित्राय नमः
३३ प्राचार्यवैयावृत्यरूपमयम श्रीचारित्राय नमः
३४ उपाध्याय वैयावृत्परूप सयम श्रीचारित्राय नमः
३५ तपस्विवैयावृत्यरूप श्रीचारप्राय नमः
३६ लघुशिप्यादि वैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नम:
३७ ग्लानसाधु वैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नम
३८ साधुपैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः
३९ श्रमणोपासक धैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः
४० सघयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः ।
४१ फुलवैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नम'
४२ गणवैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः
1

(२९)
४३ पशुपडगादि रहित वसति वसन ब्रह्मगुप्त
श्रीचारित्राय नम
४४ स्त्रीहास्यादिविकधावर्जनब्रह्मगुप्त श्रीचारित्रायामा
४५स्त्रीआसनवर्जन ब्रह्मगुप्त श्रीचारिमाय नम
१४६ स्त्रीगोपाग निरीक्षण धर्जन ब्रामगुप्त श्री.
चारित्राय नमः
४७ कुडयांतर सहित स्त्री हावभाव सुणन वर्जन
उस्मगुप्त श्रीचारित्राय नमः
४८ पूर्वस्त्रोसभोगचिंतनयर्जनब्रह्मगुप्त श्रीचारित्राय नम
४९ प्रतिसरस आहार वर्जनवामगुप्त श्रीचारित्रायनम.
५० प्रतिमाहार पर्जनब्रह्मगुप्त श्रीचारित्राय नमः
५१ अगविभूपावर्जन ब्रह्मगुप्त श्रीचारित्राय नमः
५२ अनशनतपोरूप श्रीचारिनाय नमः
५३ जनोढरीतपोरूप श्रीचारित्राय नमः
५४ वृतिसक्षेपतपोरूप श्रीचारिवाय नमः
५५ रसत्यागतपोरूप श्रीचारित्राय नमः
५६ कायफिलेसतपोरूप श्रीचारिमाय नमः
५७ सलेसणातपोरूप श्रीचारित्राय नम
५८प्रायश्चित्ततपोरूप श्रीचारित्राय नम
५९ विनयतपोरूप श्रीचारित्राय नमः
६० वैयावच्चतपोरूप श्रीचारित्राय नमः

(३०)
-
६१ मिज्जायतपोरूप श्रीचारित्राय नमः
६२ ध्यानतपोरूप श्रीचारित्राय नमः
६. उपसर्गतपोरुप श्रीचारित्राय नमः
६४ अनतज्ञानसयुक्त श्रीचारित्राय नमः
६५ अनतदर्शनसयुक्त श्रीचारित्राय नमः
६६ अनतचारिरासयुक्त श्रीचारित्राय नमः
६७ क्रोधनिग्रहकरणरूप श्रीचारित्राय नमः
६८ माननिग्रहकरणरूप श्रीचारित्राय नम
६. मायानिग्राफरणरूप श्रीचारित्राय नम
७० रोमनिग्रहकरणरूप श्रीचारित्राय नमः
॥ अथ तपपदना ५० गुण ॥
१ यावत्कथक
तपसे नम
• इत्वरतपभेद तपसे
नम"
३ याह्यमनोदरी तपोमेद तपसे नम
४ अभ्यतरनादरी तपोभेद तपसे नम
५द्रन्यतपोवित्ति सक्षेपतभेद तपसे नमः
६क्षेत्रतपोवित्ति सक्षेपतपोभेद तपसे नमः
७ काटतपोवित्ति सक्षपतपोभेद तपसे' नम
८मावतपोरित्ति "सक्षेपतपोमेद तपमे नम'
फापधिलेस
तपोभेद
१०रसत्याग तपसे
तपमे नम
नम

(१) २८तप ११ इद्रियकपाययोग विषयिक सलीणता तपसे नम. १२ स्त्रीपशुपडकादि वर्जितरधान अवस्थित सलोणता तपसे नम १३ आलोयण प्रायश्चित्त तपसे नमः १४ पडिक्कमण प्रायश्चित्त तपसे ५मिश्र 'प्रायश्चित्त तपसे १६विवेक प्रायश्चित तपने १७ उपसर्ग मायाश्चत तपसे नम प्रायश्चित तपसे १९ भेद मायधित तपसे नम २० मूलप्रायश्चित तपसे २१अणवस्थित मायाश्चत तपसे २२ पारचिय मायश्चित तपसे विनयरूप तपसे नम. २४ दर्शन विनयरूप सपसे नमः २५ चारित्र विनयरूप तपसे २६ पुर्वादिकप्रति मनोविनयरूप तपसे २७ गुर्वादिकप्रतिवचन विनयरूप सपसे नमः २८ गुर्वादिकप्रतिकाय विनयरूप तपसे २९ उपचारिक विनयरूप तपसे ३. आपार्य धेयावच तपसे २३ त्याग ३ ३२ साधु नम नमः नम (३२) ३१ उपाध्याय वेयायच नम तपसे चेयावध तपसे ३३ तपस्वि वेयावच्च तपस ३४ लघुशिप्यादि वेयावध तपसे ३० गिराणसाधु घेपावच्च तपमे नम ३६ श्रमणोपासक यावध तपसे ३७ सघ येयावश्च तपसे घेयावध तपसे ३९गण यावच तपसे ४० घायणा तपसे नम. ४१पृच्छना तपसे नमः ४२ परायतना तपसे नम' ४३ अनुप्रेक्षा तपसे नम ४४ घर्मकथा तपसे ४५ आर्तध्यान निवृत्त तपसे ४६ रौद्रध्यान निवृत्त तपसे। ४७ धर्मध्यान चिंतन तपसे नम ४८ शुक्रपान चितन तपसे उपसर्ग सहनरुप तपसे नमः उपसर्ग सहनरुप तपसे नम- नम नमः . नम (४९पाह्य ५० अभ्यतर . (३३) ॥ अथ चैत्यवदन नवपदनो ॥ उप्पन्न सनाण महोमयाण । सप्पाडिहरासण सठिआण ॥ सदसणाणदियसनणाण । नमो नमो होउ सया जिणाण ॥१॥ सिद्धाण माणदरमा- लयाण । नमो नमोणत चउक्कयाण । समग्ग- कम्मरखयकारयाणा जम्मजरादुक्खनिवारयाण||२|| सुरीणदूरीकयकुग्गहाण । नमोनमो सूरसमप्पहाण।। सद्देशणादाण समायराण। अखडछत्तीस गुणाय- राण ॥ ३ ॥ सुत्तथ्यविथ्धरणतप्पराण । नमो । नमो वायगकुजराण ॥ गणस्ससधारणसायराणं । सम्पप्पणावज्जिय मच्छराण ॥४॥ साहूण ससाहिय सजमाण । नमो नमो सुददयादमाण || तिशत्ति- गुत्ताण समाहियाण । मुणीण माणदपयठियाण||५|| जिणुत्ततत्तइलक्षणस्स । नमो नमो निम्मलदस- रस ॥ मिच्छत्तनासाइ समुगम्मस्स । मूलस्स सद्धम्ममहादुमस्स ॥६॥ अन्नाण समोह तमो हरस्स, नमो नमो नाण दिवायरस्सापंचपयारस्सुवगारगस्स सत्ताण सम्वत्थपपासगस्स॥७॥भाराडियाखटिय सकियस्स । नमो नमो सयम पीरियस्स ।। सझावणा सग विवट्टियस्स । निव्वाण दाणाइ (३४) - T समुज्जयस्स ॥ ८ ॥ कम्मदुमुम्मूलण कुजरस्स । नमो नयो तिव्वतयोभरस्स ।। अणेगरद्वीणनिव. घणत । पुस्सज अत्याण यसाहणरस ॥ ९॥ पनवपपमिद्धं लदिविजासमिद्ध । पपडियसरवरग ६ झीलिरहा समांग ।। दिसिवद सुरसार खोणिपीटा पार। तिजपाविजपयक सिद्धचक नमामि॥१॥इति ॥ अथ सिद्धचक्रस्तवन । नवपदध्यान सदा जयकारी ॥ नवपदध्यान सदा मुखकारी।। ए आकणी || अरिहतसिद्ध आचारज पाठ । साधु देखो गुणरूप उदारी || नषपद ॥२॥ दरशनज्ञान चारित्र हे उत्तम । तप दोय भेदे हृदय पिधारी । नषपद० ॥२॥ मयजडीऔर तत्र घणेरा उन सपा हम दूर विसारी ॥ नवपद० ॥ ३ ॥ पौतजीय भव जलसे तारे।गुणं गावतहे पाहु नरनारी ॥ नवपदः ॥ ४॥ श्रीजिनभक्त मोहन मुनि वदता दिनदिन घटते हरख अपारी नवपद ॥५॥ इति ॥ अथ नवपदनी थुई ॥ नितमति है प्रणम्/ मिद्धचक्र शुभ भाव । हणेः कारज सिद्धिनो लाघो एह उपाय | तुझ नाम पसाय:भारति च्याघि पुसाया गतुझ मनु

महथी मुखसपति मुश थाय ॥ १ ॥ श्री. अरि-
इत नमिये सिद्ध सूरी उपशाय । मुनिवर निषा-
करणे,दसण नाण सुहाय । दुगविधि पारित्रे, धुध '
विध तपमन भाय । ये नवपदध्यातां निरुपम
शिवसुखथाय ॥ विद्यापरयादै जाणो ए अघि
कार । श्रीगुरु उपदेश, सिद्ध चक्र उद्धारा प्रवचन
अनुसारें,माख्यो ण्ह विचार । मवि जन नित
घ्यावो,सरतरु गुण भडार ॥ ३ ॥ जिनधरम अनु-
रागी चक्कमरि सुखकार । सेवकनें आप सुख
संपति परिवार । हिव निधि उदयफरि, चारित्र
नद्री मन भाय । जिनचदसरीसर, खरतर-पति
मुपसाय ॥४॥ इति
॥ अथ नवपर्दचैत्य वदन ॥
श्रीअरिहत उदार. कांति । अतिसुन्दररूप ।
सेवो सिद्ध ग्रनन्तशांत । आतम गुण भूप॥१॥
आचारज उवझाय साधु । शमतारसधाम। जिन
भापित सिद्धान्त शुद्ध,अनुमघ आभिराम ॥२॥
पोधिधीजगुण सपदाए । नाण घरणतव शुद्ध ।
घ्यायो परमानन्दपद । ए नवपद अविरुद्ध ॥३॥
ईद परमय आनन्दकद । जगमांहि मसिघौ ।
चितामणि समजासजोग । यहुपुण्यै लदो ॥४॥

तिहुअणसार अपार एह महिमा मन धारो । परि घर परजजालजाल । नित एह समारो॥५॥ सिद्धचापद सेयतां । सहजानन्द स्वरूप । अमृ. तमय कल्याणनिधि । प्रगटे घेतन भूप ॥६॥ इति ॥ अथ नवपदे स्तवन । रागमारु । तीरथनायक जिनवरूजी अतिशयजास अनूप सिनतमहागुणीजी परमानद सरूप । भविकमन धारजोरे ॥१॥धार जो नवपदध्यान । । भ०। श्रीपाजारजगण घरूरे। गुणपतीश निवास पाठक पदधर मुनिवरूजी श्रुतदायक सुविलासाम. ॥२॥ सुमति गुपतिधर सोभताजी। साधुसमता पत। सम्यग्दर्शन सुदरूजी ।शानप्रकाशक अनन्त म.॥३॥ संवरसाधना धरण छरे,। तप उत्तमविधि होयाए नवपदना ध्यानधीरे । निरूपाधिक सुख होया म०॥४॥ अमृतसमजिन धर्मनोरे । मूल ए नवपदजाण । आविचल अनुभव कारणेजी निप्तप्रति नमत फल्याण ॥५॥इति ॥ अथ नवपदनी थुई ॥ जगनायक दायक सिद्धचा मुखकद जेहना जप तपथी भाजे भव मय फदाश्रीपालने मयणा विधिथी एतिपकीध,नवपदयीपा अष्टसिद्धनवनिघाजिन .

(३७) । सिद्ध आचारिज पाठक श्रीमुनिराज, दर्शनशान चारित्र,नवमो तप कहेपाय । एक एक पद ध्यांतनिधि ससिसार / चोवीसी प्रणम् कीयो भवि उपगार ॥२॥ आसूवलि चैत्र सुदि सातमधी जाण, ओली कीजैसुम मन आविलकरपचखाण । पदपद नौगुणनो कीजै भावसुजगीस आगममाही पोल्पा, ध्यावो तुम निसदीस ॥३॥ धिमलादिक- । देवदेवी चक्रेसरी जान, सिद्धचक्रना सेषक आषणितदान । खरतरगच्छदिनकर श्रीजिन- अखयमारद तस घरणपसाये, भावे श्रीजिनपद क" ॥४॥इति B अथ नवपदओली करणविधि खमासणा प्रदक्षीणा (३८) G CWWW दिन फाउस्सग पदनां नामो वर्ण भोजन फर लोगस्स थाली १ ॐ ही नमो अरिहताण १२ श्वेत चोखा २० १२ १२ नमो सिद्धाण ८ ८ ८[हाल नमो आयरियाण २० ३६/३६, ३६ पीरोचणा ॥ नमो उवझायाण २. २५/२५, २५ | नीलो मग "" नमो लोएसव्वसाढूण २० ५ २७ २७ २७ कालो पद नमो दस्सणस्स २० ६७/६७, ६७म्वेत चोखा नमो नाणस्स २० ८ नमो चारित्तस्स नमो तवस्त , " - ।

- . शुभमास शुभदिवसमा गुरुमहाराजनी पासे विधि पूर्वक पीलालीनी तपस्या ग्रहण करे, पछे मा तप भासो सुदि अने चैत्र मुदि ७ कदाच तीधि घटी होय तो ६ बने षधी होयतो ८धी पूनम सुधी नव आंपील करे, एम वरसमा थे यार करता साहाचार बरसे नव ओली पूरी करथी, नव दिन मुधी देवसिराइपडिकमणो साज सवारे प पखत पहिलेहण, गुरूपासे पचखाण करे त्रिकाल देवपूजा करे, मध्याने आधुइयी देव वांदे, हमेसानवपदना नय चत्पवंदन करे जैटला गुण होय तेटला सापीया प्रदक्षिणा फाउस्सग करे स्वमासमणा अने गुणणो हमेशा एकएक पवनो फरे एकएक प्रदक्षीणा अने एकएक स्वमासणो दइने एकएक गुण कहे, पच; खाणपारवानो चैत्यवदन करे बाद अपील करी त्य पदन करे सतिषखत संधारापोरिसीमणाधीने भूमि सहाराउपर सोवे शीतव्रतपाले इत्यादि नष दिवस सुधी फरयो भने काउरसग कर होय त्यारे इर्या घडीपडिकमीने स्त्रमासमणो वहने इच्छाकारण- सदिस्सह भावन अमुकपद आराधवानिमित करेमिकाउस्साग, दणषत्तियाए, भन्नस्थ० पले

(४०)
फाउस्मग करीने प्रगट लोगस्सकहे आतप पूर्ण पया
पाद शक्तिअनुसार उजमणु करे ते गुरुमुखधी जाणवं
॥ अथ विशस्थानक तपकरण विधि ॥
सारा दिघसे गुरुने पासे विधि पूर्वकवीशस्थान
रूपउच्चरे भातप दशवरपमाहे पूरी करवो आतपनी
भोली २. होय छे एकेएक ओली छछ मासें पूरी
करषी, उपरात मग थाय, एकएक ओली वीस अठम
छठ अथवा उपवास थी थाय छे दशवर्षे भठमधी करे
तो ४०० अठम,छठथी करे तो ४००छठ, उपवासथी
फरे तो ४०० उपचास थाय छे अने आंधील नीवीके
एफासणाची पण थायले, जे दियसे उपवास होय ते
दिवसे पदिकमणो शक्ति होयतो पोषो अथवा देशा
घगाशिक फरवु, देववदन फरवु, जेटला जे पदना
गुण होय तेटला खमासणा साधीया मदक्षीणायने
लोगस्सना फाउस्सग करवा, जे पद होय ते पदनी
धीशमाला दर उपवासे गणवी आतप सपूर्णधयावाद
शक्ति अनुसार उजमणों करे ते गुरुमुखथीजाणवुइति
काउ खमा सा मद- माला
"लोग समाधीया क्षीणा
१ नमो अरिहताण १२ १२ १२ १२ २०
अक०

७ . ८ २, सिद्धाणं पवयणरस २७ २७ २७ २७ २० पायरियाणं ३६ ३६ ३६ ३६ २० ५, राण १० १० १० १० २० ६, उषज्झायाण २५ २५ २५ २५ २० लोएसव्वसावण२७ २७ २७ २७ २० नाणस्स ९ दसणस्स ६७ ६७ ६७ ६७ ६७ २० १०॥ पिनयसंपन्नाण ५२ ५२ ५२ ५२ २० परितस्स १२॥ भवयधारीण१८ १८ १८ १८ १३ किरियाण २५ २५ २५ २५ २० तपस्सीण १२ १२ १२ १२ २५ गोयमस्स १२ १२ १२ १२ २० जिणाण २०२० १७॥ चरणस्स १७ १७ १७ १८ नाणस्स ५० ५२ ५२ ५२ २० १९॥ सुयनाणस्स २० २० तित्यस्त ३८ ३८ ३८ ३८ २० ॥ अथ प्रथम अरिहंतना १२ भेद ॥ १ अशोकवृक्ष मातिहार्यसयुताय श्रीमरिहताय ३ -

"
17
(४२)
२ पुष्पदृष्टि प्रातिहार्यसयुताय श्रीअरिहताय नम
३ दिव्ययनि
४ चामरयुग
५ स्वर्णसिंहासन
६भामडल
७ दुवुभि
८छत्रत्रय
९ज्ञानातिशय
१० पुजातिशय
११ वचनातिशय
१० अपायायगमातिशय ,
॥ अथ वीजा सिद्धपदना ३१ भेद ।।
१ मतिज्ञानावरणि फर्मरहिताय श्रीमिद्धाय नमः
२ अतज्ञानायरणि
३ अवधिज्ञानावरणि
४ मनपर्यवज्ञानावरणि ,
केवल ज्ञानावरणि
६निद्रादर्शनाघरणि
७ निद्रानिद्रादर्शनावरणि
८ प्रचलादर्शनावरणि
प्रचलामचलादर्शनावरणि
१
-
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-

"
(४३)
१० धीणद्धिदर्शनावराण कर्महिनाय श्रीसिद्धायनम
११ चक्षुदर्शनावरणि
१२ अचक्षुदर्शनावरणि
१३ अवधिदर्शनावराण
१४ केवलदर्शनावरणि
१५ शाताबेढनीय
१६ अशाताचेदनीय
१७ दर्शनमोहनीय
१८ चारित्रमोहनीय
१९ नरकायु:
२० तिर्यगायुः
२१ मनुप्यायु
२२ देवायु:
२३ शुमनाम
२४ अशुभनाम
२५ उच्चगोत्र
२६ नीचगोत्र
२७दानातराय
२८ लामातराय
२९ भोगातराप"
"
-
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(५४)
३० उपभोगांतराय पामरहिताय श्रीसिद्धाय नम
३१ पीयांतराय
॥ अथ त्रीजापवयण पदना २७ भेद ॥
१ सर्वतो प्राणातिपातविरताय भीमवचनाय नमः
• सर्वतो मृपावादविरताय
२ सर्वतो भदत्तादानाविरताय
४ सर्वतो मैथुनविरताप
६सर्वतो परिग्रहविरताय
५देशतो प्रणातिपात विरताय
७ देशतो मृषायाद विरताय
८ देशतो अदत्तादान विरताय
९ देशतो मैथुन विरताय
१० देशतो परिग्रह विरताय
११ दिसिपरिमाणवत सयुताय
१२ भोगोपभोगपरिमाणवत सयुताय -
१३ अनर्थदड विरताय
१४ सामायिकवत सयुताय
१५ देसावकासिकात सयुताय
१६ पापपोपवासव्रत सयुताय
१७ प्रतिधीसविभागवत सयुताय
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L

१८ विधिसूत्रागमाप भीमवचनाय नमः
१९ पर्णिकसूत्रागमाय
२० मयसूत्रागमाय
२१ उत्सांगमाय
२२ अपवादागमाय
२३ उभयसूत्रागमाय
२४ उपमसूत्रागमाय
२५ सर्वनपसमूहात्मकाय
२६ मतमंगीरचनात्मकाय
२७ द्वादशांगीगाणिपिटकाय
॥ अथ चोथा आचार्यपदना ३६ गुण ॥
१ मतिरूपगुणसपुताय श्रीमाचार्याय नमा
२ तेजस्वीगुणमयुताय
३ युगप्रधानागमसयुताय
४ मघुरवाफ्पगुणसयुताय
५ गभीरगुण संयुताप
पर्पगुण सयुताय
७ उपदेसगुण सयुताय
८अपरिभापीगुण संयुताप
९सौम्यप्रकृतिगुण सयुताप
"

:
१. अधिग्रहगुण मयुताय
श्रीनागार्याय नमः
११ अधिकधकगुण सयुताय
१२ शीलगुण मयुताय
१३ प्रचल्गुण मयुताय
१४ प्रसन्नवदनगुण सयुताय
१५ क्षमागुण मयुताय
१६ मजुगुण सयुताय
१७ मृदुगुण सयुताप
१८ सर्वमगमुक्तिगुण मयुताय
१९ द्वादशविध तपगुण मयुताय
२० मतदशविध मजम सयुताय
२१ सत्यवतगुण सयुताय
२२ शौचगुण सयुताय
२३ अकिंचनपुण सयुताय
१४ ब्रह्मचर्पगुण सयुताय
२५ अनित्यभायना भावकाय
२६ अशरणभावना भाचकाय
२७रसारस्यरूप भावना भाषंकाय
२८ एकत्वस्वरूप भावना भावकाय ,
२९ अन्यत्व भावना भावकाय
३० अशुचि भावना भाचकाय
"
"
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--
१
.

(४७)
:
-
३१ आश्रय भावना भावसाय श्रीआचार्याय नमः
३२ सवर भावना भावकाय
३३ निर्जरा भावना भाचकाय
३४ लोकस्वरूप भावना भावकाय
। ३५ पोधिदुर्लभ भावना भावकाय
३६ धर्मदुर्लभ भावना भावकाप
॥ अथ पाचमा स्थविरपदना १० भदः ।।
१लोकिकस्थविर देमकाय श्रीलोकोत्तरस्थविराय नम
२ देसस्थविर देसकाय
३ ग्रामस्थविर देसकाय
४ फुलस्थविर देसकाप
५लौकिकस्थविर देसकाय
६ लौकिक गुरुस्थविर देसकाय
७ लोकोत्तर श्रीसघस्थविराय नमः
८ लोकोसर श्रीपर्यायस्थचिराय नमः
९ रोकोत्तर श्रीथतस्थाधराय नमः
१० लोकोत्तर श्रीवय स्थचिराय नमः
॥ अथ छठी उपाध्याय पंदना २५ भेद ॥
१ भाचारागसूत्र पाठकाय श्रीउपाध्यायाय नमः
२ सुयगडागसूत्र पावकाय
"
"
4

-
(५८)
३ ठाणागसून पाठकाय श्रीउपाध्यायाय नम
४ सयापागसूत्र पाठकाय
५ मगयतीसूत्र पाठकाय
६शातागमन पाठकाय
७ उपासफदसांगसून पाठकाय
८ मतगढदसागसूत्र पाठकाय
९ अनुत्तरोववादसूत्र पाठकाप
१० प्रश्रव्याकरणसूत्र पाठकाय
११ विपाकसूत्र पाठकाय
१२ उत्पादपूर्व पाठकाय
१३ धाप्रायणी पूर्वपाठकाय
१४ पीपप्रवाद पूर्वपाठकाप
१५ मस्तिप्रयाद पूर्वपाठकाय
१६ ज्ञानप्रवाद पूर्वपाठफाय
१७ सत्यप्रवाद पूर्वपाठकाय
१८ आत्मप्रवाद पूर्वपाठकाय
१९ कर्मप्रवाद पूर्वपाठकाय
२० प्रत्याख्यानमवाद पूर्वपाठकाय
२१ विधानवाद र्वपाठकाय
२२ अविध्यप्रवाद पूर्वपाठकाय
२३ प्राणायामप्रसाद पूर्वपाठकाय'
"
"
"
"
"

(४६)
२४ क्रियाविसाल पूर्वपाठकाय श्रीउपाध्यायाय नमः
२५ लोकपिंदुसार पूर्वपाठकाय
॥ अथ सातमा साधुपदना २७ भेद ।।
१माणातिपातधिरमणव्रतसयुताय श्रीसाधषे नमः
२ मृपावादधिरमणवतसयुताय श्रीसाधये नमः
३ अदत्तादानविरमणमयुताय श्रीसाधये नमः
४ मैथुनविरमणवतसयुताय श्रीसाधवे नम
५ परिग्रहविरमणनतसयुताय श्रीसाधधे नम
६ रात्रिभोजनविरमणवतसयुताय श्रोसाधये नमः
७ पृथ्वीकायरक्षकाय धीसाधये नम
८ अप्काय रक्षकाय श्रीमाधचे नम
९ तेउकायरक्षकाय श्रीसाधये नम.
१० घाउकायरक्षकाय
११ वनस्पतिकायरक्षकाय -
१२ असकापरक्षकाय
१३ एफेंद्रियजीवरक्षकाय,
१४ पेंद्रियजीवरक्षकाय , ;
१५ तद्रियजीवरक्षकाय;ar
१६ चउरिद्रियजीवरक्षकायत
१७ पचेंद्रियजधिरक्षकाय
१८ लोभनिग्रहकारकाय
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(५०)
१९ अमारणमयुनाय श्रीसाधये नम'
२. भावनाभाकाय
२२ तर नादिक्रियाशुद्धकारकाय श्रीसाधवे नम
२० सजमोगमयुताप
२२ मनोगुतिसयुताय
१४ यचनगुप्तिसयुताय
२५ कायगुप्तिसयुताय
२६ शीतादिद्वाविंशतिपरीसहसहनतत्पराय,
२७ मरणातउपसर्गसहनतत्पराय
॥ अथ आठमा ज्ञानपदना ५१ भेद ॥
१ स्पर्शनेंद्रियव्यजनावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नम
२ रसनेंद्रियव्यजनावग्रहाय
३ घणेंद्रियव्यजनावग्रहाय
४ श्रोतेंद्रियव्यजनावग्रहाय
५ स्पर्शनेंद्रियर्थावग्रहाय
६ रसनेंद्रियअर्धापग्रहाय
७ प्राणेंद्रियगावग्रहाय
८ चक्षुरिंद्रियमर्यायग्रहाय
९ श्रोतेंद्रियमांवग्रहाय -in.!
१० मनोअर्थावग्रहाय
११ स्पर्शद्रियईहाः
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१२ रसनेंद्रियाइहा भीमतिज्ञानाय नमा
१३ घाणेंद्रियईहा
१४ चक्षुरिद्रियाहा
१५ ओद्रियईहा
१६ मनईहा
१७ स्पर्शद्रियअपाय
१८ रमनेंद्रिपअपाय
१९ घाणेंद्रियमपाय
२० चक्षुनिद्रियपाय
"
२१ श्रोत्रंद्रियभपाय
२२ मनोअपाय
२३ स्पर्शद्रियधारणाय
२४ रसनेंद्रियधारणाय
२. घाणेंद्रियधारणाय
२६ चक्षुरिंद्रियधारणाय
२७ अोत्रंद्रियधारणाय
२८ मनोधारणाय
२९ श्रीअक्षरश्रमज्ञानाय नमः
३० श्रीयनक्षरधुतज्ञानाय नम
३१ श्रीसज्ञिश्रुतज्ञानाय नमः
३२ श्रीअसज्ञितज्ञानाय नमः
"

३३ श्रीसम्यग्श्रुतशानाय नमः
३४ श्रीमिथ्याश्रुतज्ञानाय नमः
३५ श्रीसादिश्रुवज्ञानाय नमः
३६ श्रीअनादिश्रुतज्ञानाय नमः
३७ श्रीमपर्यवसितश्रुतज्ञानाय नमः
३८ श्रीअपर्यवमिततज्ञानाय नमः
३९ श्रीगमिकश्रुतशानाय नम
४० श्रीप्रगमिकश्रुतज्ञानाय नमः
४१ श्रीअगप्रविष्टश्रुतज्ञानाय नम'
४२ धीअनगप्रविध्यतज्ञानाय नमः
४३ थीअनुगामिक अवधिज्ञानाय नमः
४४ श्रीननुगामिक अवधिज्ञानाय नम
४५ श्रीवर्दमान अवधिज्ञानाय नमः
४६ श्रीहीयमान अवधिज्ञानाय नमः
४७ श्रीमतिपाति अयधिज्ञानाय नमः
४८ श्रीअप्रतिपाति प्रचधिज्ञानाय नमः
४९ श्रीरऋजुमतिमनापर्यवज्ञानाय नमः
५० श्रीषिपुलमतिमनापर्यवज्ञानाय नम.
५१ भीलोकालोकप्रकाशफ केवलज्ञानाय नमः
॥ अथ नवमा दर्शनपदना ६७ भेद ।।
१ परमार्थसस्तवरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः

"
(५३)
२ पामार्थज्ञातृसेवनरूप भीमदर्शनाय नमः
३ व्यापनदर्शनवर्जनरूप
रवर्शनवर्जनरूप
५ शुश्रूषारूप
६ धर्मरागरूप
७ वैयावृत्य
८ अईद्विनयरूप
९ सिविनयरूप
१० चैत्य विनयरूप
११ सूत विनयरूप
- १२ धर्म विनयरूप
१३ साधुवर्ग विनयरूप
१४ आचार्य विनयरूप
१५ उपाध्याय विनयरूप
१६ प्रवचन विनयरूप
१७ दर्शन विनयम्प
१८ ससारे जिनसारामिति चितवनरूपी
१९ समारेजिनमतमारमिति चितवनरूप,
२. समारेजिनमत स्थित साध्या
दिसारमिति चिंतयनरूप
२१ का इपण रहिताय
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m.
२२ पाक्षादपणरहिताय भीमदर्शनाय नमः
२३ वियिक्त्सिारूप दूषणरहिताय
२४ कुदृष्टिप्रशसारूप दपणरहिताय
२० फुदृष्टिपरिचयदूषणररिताप
२६ प्रवचन प्रमावकरूप
२७ धर्मकथा प्रभाषकरूप
२८पादिममायफरूप
२९ नैमितिकममाथकरूप
३. तपस्विप्रमापकरूप
३१ प्रज्ञाया दिषिद्यामृत्
२२ चूणांजनादिसिद्ध प्रभावकरूप
२३ कवि प्रभावकरूप
३४ जिनशासने कौशलभूषणरूप
३५ प्रमावना भूषणरूप
३६ तीर्थ सेवा भूपणरूप
३७ धैर्य भूषणरूप
३८ जिनशासने भक्ति भूषणरूप
३९ उपशम गुणरूप
४० संवेग गुणरूप
४. निवेद गुणरूप
४२ मनुकंपा गुणरूप
"

४३ आस्तिक्य गुणरूप
श्रीमदर्शनाय नमः
१४ परतीथिकादिवदनवर्जनरूप
४५ परतीधिकादि नमकारवर्जनरूप
४६ परतीथिकादि आलापर्वजनरूप
१७ परतीर्धिकादि सलापवर्जनरूप
४८परतीधिकादि अशनादि दानधजनरूप,
४९ परतीथिकादि गंधपुष्पादि प्रेषण वर्जनरूप,
५. राजाभियोगमागारयुक्त
५१ गणाभियोगआगारयुक्त
५२ पलाभियोगआगारयुक्त
५३ सुराभियोगआगारयुक्त
५४ कातारवृत्यागारयुक्त
८५ गुरु निग्रहागारयुक्त
२३ सम्यक्त्व चारित्रधर्मस्य मूलामिति चितवन
श्रीसदर्शनाय नमः
५७ सम्यक्त्व पारित्र धर्मपुरस्य द्वारामिति
चितवनरूप
श्रीसदर्शनाय नमः
५८ सम्यक्त्व चारित्र धर्मस्य प्रतिष्ठान
मिति चितवनरूप
५९ सम्पफ्त्व चारित्र धर्मल्यापार
मिति चिंतयनहप
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(५६)
६० सम्यक्प पारिन धर्मस्य भाजन
मिति चितवनरूप
श्रीसदर्शनाय नम
६१ सम्यक्त्व चारिन धर्मस्य निधि
सनिममिति चिसयनरूप
६२ प्रस्ति जाति प्रदान स्थानयुक्त
३३ सपजीवो नित्यति श्रद्धान स्थानयुक्त ।
६४ मयजीव कर्माणि फरीतीति
श्रद्वान स्थानयुक्त
६५ सचजीयः कृम फर्माणि घेदयतीति
प्रदान स्थानयुक्त
६६ जीयस्यास्तिनिर्वाणमिति'.
अदान स्थानयुक्त
६७ अस्ति पुनर्मोक्षोपायति श्रद्वान स्थानयुक्त
श्रीसद्दर्शनाय नमः
॥ अथ दशमाविनयपदना ५२ भेद ।।
१भीतीर्थकरस्याना गातनाकरणरूप विनयघराप नम
२ श्रीतीर्थकरस्यभक्ति करणरूप
३ श्रीतीर्थकरस्य पहुमान करणरूप
प्रतिीर्थकरस्प स्तुति करणरूप
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५ श्रीसिद्धस्यनाशातनारूप
६ श्रीसिद्धस्यभक्तिकरणरूप17"
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न
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७ श्रीसिद्धस्यपंहुमानकरणरूप विनपंधराय नमः
८ श्रीसिद्धस्य स्तुतिकरणरूप
९श्रीसुविहितचद्रादि फुलानाशातना करणरूप,
१० श्रीसुविहितचद्रादिकलभक्तिकरणरूप
विनयधराय नमः
११ श्रीसुविहितचद्रादिकुलपहुमानकरणरूप"
१२ श्रीसुविहितचद्रादिकुलस्तुति करणरूप
१३ श्रीकोटिकादि गणोत्पन्नसुविहि
तानाशातनाकरणरूप
१४ श्रीकोटिकादि गणोत्पन्न सुविहित
भक्तिकरारूप
१५ श्रीकोटिकादि गणोत्पन्न सुविहित
पहुमानकरणरूप
१६ श्रीकोटिकादि गणोत्पन्न सुविहित
स्तुतिकरणरूप
१७ श्रीचतुर्विधसघानाशातना करणरूप
१८ श्रीचतुर्विधसघभक्तिकरणरूप
१९ श्रीचतुर्विधसघयहुमानकरणरूप
२० श्रीचतुर्षिधसघस्तुतिकरणरूप ।
२१ श्रीशुदागमोक्तमित्याकारकस्याना :,
शातनाकरणरूप
"
"
M

६० सम्यस्त्व चारित्र धर्मस्य भाजन
मिति चितवनरूप
श्रीसद्दर्शनाय नम
६१ सम्यक्त्व चारित्र धर्मस्य निधि
सनिभमिति चितवनरूप
६२ अस्ति जीधेति श्रद्धान स्थानयुक्त
६३ सयजीवो नित्येति श्रद्धान स्थानयुक्त "
६४ सघजीव कर्माणि करोतीति
श्रदान स्थानयुक्त
६५ सचजीय कून कर्माणि वेदयतीति,
श्रदान शनयुक्त
६६ जीवस्यास्तिनिर्वाणमिति
अदान स्थानयुक्त
६७ अस्ति पुनर्मोक्षोपायति श्रद्धान स्थानयुक्त
श्रीसद्दर्शनाय नमः
॥ अथ दशमाधिनयपदना ५२ भेद ।।
१भीतीर्थंकरस्याना शातनाकरणरूप विनयधराय नम
२.श्रीतीर्थकरस्यभक्ति करणरूप
श्रीतीकरस्य बहुमान करणरूप
४ प्रीतीर्थकरस्थ स्तुति करणरूप
५ श्रीसिद्धस्यनाशातनारूप
६ श्रीसिद्धस्पमक्तिकरणरूप
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७ श्रीसिद्धस्यवहुमानकरणरूप विनयधराय नमः
श्रीसिद्धस्य स्तुतिकरणरूप
९श्रीसुविहितचद्रादि कुलानाशातना करणरूप
१० श्रीसुविहितचन्द्रादिकुलमक्तिकरणरूप
विनयधराय नमः
११ श्रीसुविहितचद्रादिकुलपहुमानकरणरूप,
१० श्रीसुविहितचद्रादिकुलस्तुति करणरूप
१३ श्रीकोटिकादि गणोत्पन्नसुविहि
तानाशातनाकरणरूप
१४ श्रीकोटिकादि गणोत्पन्न सुविहित
भक्तिकरणरूपः
१५ श्रीकोटिकादि गणोत्पप्न सुविहित
पहुमानकरणरूप
१६ श्रीकोटिकादि गणोत्पन्न सुविहित !
स्तुतिकरणरूप
१७ श्रीचतुर्विधसघानाशातना करणरूप
"
१८ श्रीचतुर्विधसघभक्तिकरणरूप ।
१९ श्रीचतुर्विघसघयहुमानकरणरूप
२० श्रीचतुर्विधसघस्तुतिकरणरूप
२१ श्रीशुदागमोक्तप्रियाकारकस्याना.'
शातनाकारणरूप
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(५८)
२२ भीशुदागमोक्तक्रियाफारफस्पमक्ति करयरूप'
विनयधराय नमः
२३ श्रीशुदागमोमिया कारकस्यवहमान
कारणरूप
२५ श्रीशुदागमोक्त किया कारकस्य
स्तुति करण रूप
२५ श्रीजिनोक्तधर्मस्पानाशातनाकरयरूप
२९ श्रीजिनोक्तधर्मस्यमक्तिकरणरूप
२७ श्रीजिनोक्तधर्मस्यपटुमानकरणरूप
२८ श्रीजिनोक्तधर्मस्यस्तुतिकरणरूप
२९ भीज्ञानगुणमाप्तस्पानाशातनाफरणरूप
३. श्रीज्ञानगुणमासस्यमक्तिकरणरूप
२१ पीज्ञानणुणप्राप्तस्यपहुमानकरणकप
३९ श्रीज्ञानगुणमासस्पस्तुतिकरणरूप
३३ श्रीज्ञानानाशातनाकरणरूप
३४ श्रीज्ञानभक्तिकरणरूप
३५ भीज्ञानपछुमानकरणरूप
३६ भीज्ञानस्तुतिकरणरूप
२७ भीआचार्यस्यानाशातनाफरणरूप
३८ भीमाधार्यस्पभक्तिकरणरूप
२९ भीमाधार्यस्यबहमानकरणरूप
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"
४. श्रीआचार्यस्पस्तुतिकरणरूप विनयधराय नमः
४१, श्रीस्थविरस्यानाशातनाकरणरूप
५२ श्रीस्थविरस्य भक्ति करणरूप
१५ श्रीस्थविरस्य बहुमान करणरूप
४४ श्रीस्थपिरस्पस्तुति करणरूप
५५ श्रीउपाध्यायस्यानाशातना करणरूप
५६ धीउपाध्यायस्य भक्ति काणरूप
५७ श्रीउपाध्यायस्य बहुमान करणरूप
१८ श्रीउपाध्यायस्य स्तुति करणरूप
४९ श्रीगणावच्छेदकस्यानाशातना करणरूप
५. श्रीगणापच्छेदकस्प भक्ति करणरूप
५१ श्रीगणावच्छेदकस्य बहुमान करणरूप
५२ श्रीगणावच्छेदकस्य स्तुति करणरूप
॥ अथ इग्यारमा चारित्रपदना ७० भेद ।।
१प्रणातिपातविरमणरूप भीचारित्राय नमः
२ मृपावाद विरमणरूप
३ प्रदत्तादान विरमण रूप
४ मैयुनाविरमणरूप
५ परिग्रह विरमण रूप
६समा धर्म रूप
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७मार्जवरूप

m । २ ++ A ८ मृदुता धर्म रूप चारित्राय नमः ९मुक्ति धर्म रूप १. तपो धर्म रूप ११ सयम धर्म रूप १२ सत्य धर्म रूप १३ शौच धर्म रूप १४ अकिंचन धर्म रूप १८ पभ धर्म रूप १६ पृषी रक्षा सयम १७ उदक रक्षा सपम १८ तेऊ रक्षा सयम १९चाऊ रक्षा सयम २० वनस्पति सयम ०१ पंद्रिय रक्षा सयम २२ तेंद्रिय रक्षा,सयम २३ चारिद्रिय रक्षा सयम २४ पचेंद्रिय रक्षा सयम २५ अजीव रक्षा सयम २६ प्रेक्षा सयम २७ उपेक्षा सयम २८ अतिरिक्त वस्नभक्तादि परठण त्यागरूप, 17 - 7 " " " (३१) M 76 .. २९ प्रमार्जन रूप सयमः चारित्रायानमा ३.मनः सयम ३१ वाग् सयम ३२ काय सयम ३३ प्राचार्य वैयावृत्यरूप ३४ उपाध्याय यावृत्यरूप ३५ तपस्वि धयावृत्यरूप ३६ लघुशिष्यादि वैपावृत्यरूप ३७ ग्लानसाधुवयाकृत्यम्प ३८ साधुवैयावृत्यरूप ३९ श्रमणोपासकवैयास्यरूप १० संघवयावृत्यरूप ४१ कुल वैयावृत्य रूप ४२ गणपैयावृत्यरूप ४३ पशुपडकादिरहितवसतियसनब्राह्मगुप्त ४४ स्त्रीहास्यादिविकथावर्जननमगुप्त ४५ स्त्रीभासनवर्जनवमगुप्त ४६ स्त्रीअंगोपांगनिरीक्षणवर्जनब्रह्मगुप्त । ४७ कुटयनरसहितनीहशवमायअवगतमगुप्त ' ४८ पूर्वखीसभोगचितवनवर्जनब्रह्मगुप्त " " Fr " " " 4 - 4 " 1 M " ५० प्रतिमाहारकरणपर्जनप्रभास पारित्राय नमा ५१ अगदिभूषापर्जनघ्रगुप्त ५२ अनशनतपोआप ५. उनोदरितपोरूप ५४ पृत्तिसक्षेपतपोरूप ५५ रसत्यागतपोरूप ५६ फापालेशतपोरूप ५७ सलीनतातपारूप ५८प्रायश्चित्तसपोरूप ५९ विनयतपोरूप ६.पैयावतपोरूप १ सज्जायतपोरूप ६२ ध्यानतपोरूप ६३ उपसर्गतपोरूप ६४ अनतज्ञानसयुक्त ६५ अनतदर्शनसयुत ६६ अनसचारित्रसयुत ६७ क्रोधनिग्रहकरणरूप ६८ माननिग्रहकरणरूप ६९ मायानिग्रहकरणरूप ७. लोभनिग्रहकरणरूप. " " " " " जीप प " " " " ॥ अथ पारमा ब्रह्मचर्य पदना १८ भेद ॥ १ मनसामोदारिकविषयअसेषनरूप भीनामचारिणे नमः २ मनसाभोवारिकविषयमसेवाघनरूप ३ मनसाओदारिफविषयअननुमोदनरूप ४ षषसाओदारिकविषयअसेवनरूप ५षचसाओदारिकविषयमसेवावनरूप पघसाओदारिफविषयअननुमोदनरूप ७कायेनओदारिकविषयअसेवनल्स ८फापेनओदारिफविषयअसेवावनरूप ९कायेनओदारिकविषयअननुमोदनरूप १. मनसावैफियाविषयअसेषनरूप ११ मनसावैक्रियविषपअसेषाषनरूप १२ मनसावैफ्रियविषयअननुमोदनरूप १३ षचसावक्रियाविषयमसेवनरूप १४ वचसापेक्रियविषयअसेवापनरूप १५ पचसविक्रियविषयमननुमोदनम्प १६ कायेनक्रियअसेवनरूप १७कानवैकियाविषयमसेवायनरूप- १८ कापेनक्रियषिषपभननुमोदनरूप " " "

}
৫ ই নানা দিয়ান ,
। গাছিমান গন গন
সালী-কামান
ধনিয়াম
২ মাসালাম
. লমিলগানাথ
• গruানিয়া
ও মান্নানিলন
৫ মিথিংশিমিখান
* পিপল,
• চিনিধন
৫ ?িগিনিধন
মাষণিনিরা
মীনসগিগাবিন
২৪ লাখিখিনিন
(৭ শাসন
( গন্ধবিধান
৫৩ বিলিয়ন
২৫ নামাগমণিপিপানি
২২ রাঙ্গামাগিৰিলে
* কাবাঘমশাবাবিযানিয়ন

. - २१ सपोगकी क्रियानिवर्तनरूप - श्रीक्रियायते नमः २२ समुदायिकी क्रियानिवर्तनरूप २३ मेमकी क्रियानिवर्तनरूप २४ वेषकी किपानिपतनरूप २५ हरियापथिकी क्रियानिवर्तनरूप ॥ अथ चउदा तपसीणपदना १२ भेद ॥ १अणसणसपोरूप श्रीवायतपसे नमः २ उणोदरीतपोरूप ३ वृत्तिसक्षेपतपोरूप ४ रसत्यागतपोरूप ५ कायक्लेशतपोरूप ६ सलीनतातपोरूप ७प्रायाचिततपोरूप श्रीभन्यतरतपसे नमः विनयतपोरूप ९ वैयाकृत्यतपोरूप १० संत्रायनपोरूप' ११ प्रात्मध्यानतपोरूप १२ काउस्सग्गतपोरूप- P Art m f का . - raruri -- 7 4 ॥ अथ पनरमा गौत्तमपदना १२ भद। १ भोगौत्तमस्वामि गणराय नमः २ क्षोशग्निभूतिस्वामि', ३ श्रीवायुभूप्तिस्वामि | ४ीयतस्वामि ५ धीसुधर्मास्यामि ६ भीमद्वितस्वामि ७ धीमौर्यपुत्रस्यामि ८ भीमकपितस्यामि ९ थीप्रचलम्रातास्वामि १. भीमेतार्यस्वामि ११ श्रीप्रभासस्वामि १९ श्रीचतुर्विशतितीर्थकराणाचतुर्दशशत- द्विपचाशत् "गणधरेभ्यो नम 'अथ सोलमा जिणाणपदना २, भेद. १ श्रीसीमधरस्वामि जिनेश्वराय नम २ श्रीयुगमधरस्वामि ३ श्रीषाहुस्वामि ४ श्रीसुपाहुस्वामि भीसुजातस्यामि ". " " For

"
६ भीस्वपममस्यामि जिनेश्वराय नमः
७ प्रारुपमाननस्वामि
८ श्रीमनतवीर्यस्वामि
।
९ श्रीसूरमभस्वामि
१० श्रीविशालस्वामि
११ श्रीवजंघरस्वामि, ... "
१२ श्रीचंद्राननेस्वामि, tnt."
१३ श्रीचन्द्रपाहुस्यामि
१४ श्रीमुजग स्वामि
१५ भीहश्वरस्यामि
१६ श्रीनमिमभस्वामि
१७ श्रीवरिसेस्रामि
१८ श्रीमहाभद्रस्वामि
१९ श्रीदेवपसास्वामि-
२० श्रीप्रजितवार्यस्वामि
अथ सतरमा सजम पदना, ७ भेद
१ प्राणातिपातविरताय
श्रीमयमधराय नमः
२ मृषावाठविरताय
३ प्रदत्तादानपिरताय
४ मैथुनविरताय
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३
६ परिग्रहविरसाप श्रीमयमधराय नमः
६रात्रिभोजनपिरताय
७इरियासमितिसयुताय
८ भाषासमितिसंयुताप
९एपणासमितिसयुताप
१. पादानमडमत्तनिपनेवणासमितिसंपता।
११ पारिठावणियासमितिसंयुताय ।
१२ मनोगुप्तिसयुताय
१३ घनगुतिसयुताय
१४ कापगुमिसयुताय
१५ मनोदडविरताप
१६ पवनदायिरताय
१७ कायदधिरताय
'अथ अढारमा ज्ञानपदना ५१ भेद
१ श्रीआचाराग
श्रुतज्ञानापना
२ श्रीसूपगढांग
३ थीठाणांग
५ भीसमवायाग
५भीमगवतीअग
६ श्रीज्ञाताधर्मकांग
---

4: श्रुतज्ञानाय नमा
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मीउपाशकदशांग
গাজনান্তৰাল
९श्रीअनुत्तरोववाइअग ETimi
• श्रीप्रश्नव्याकरणाग
१भीकर्मविपाकवतांग
२ श्रीउपवाउपांग
-३ भीरायपसेणीउपाग
श्रीजीवाभीगमउपांग
१५ श्रीपत्रवणाउपांग
१६ श्रीजवृद्धीपपततिउपाग
१७ श्रीपदपततिउपाग
१८ श्रीमपन्नतिउपाग
१९ भीनिरयावलीउपांग
२० श्रीपुफियाउपांग
२१ श्रीपुष्फलिपाउपांग
२२ श्रीकप्पिपाउपांग
२३ श्रीवहिदसाउपांग
४२ श्रीचउसरणपयतो
५२ श्रीआउरपचरसाणपपशी
२६ श्रीमतपरितापपन्नो
२७ भीमहापञ्चदखाणपयनो,
.
+
+
.
-4

श्रुतज्ञानाय नमः . " 4 Wav 1 " L 14 " " (७) २८ श्रीसलपैयारियपयानो २९ भीचन्दाविजयपयन्नो ३. श्रीगाणिविद्यापयन्नो ३१ श्रीमरणसकापियानो ३२ श्रीसयारापयनो ३३ श्रीदेवेंद्रस्तवपयनो ३४ श्रीवशवैकालिकमूल ३५ श्रीथापश्यफमूल ३६ श्रीपिइनियुक्तिमूल ३७ श्रीउत्तराध्यपनमूल । ३८ श्रीनिसीयद ३९ श्रीवृहत्कल्पछेद ४० श्रीव्यवहारछेद ४१ श्रीपचकल्पद ४२ श्रीजीतकल्पछेद ४६ श्रीमशानिर्मापछेद ४४ श्रीनन्दीसूत्र ४५ श्रीअनुयोगद्वार ४६ श्रीस्याटस्तिमगारूकायापाद्वाद ४७ श्रीस्यानास्तिभगप्ररूपकार्यस्यावाद “४८ पौरपादस्तिस्पानास्तिमगारूप " " ना T - है ९ 10 (१) कायस्याद्वाद श्रुतज्ञानाय नमः श्रीस्यादवक्तव्यभगमरूपकायस्याद्वाद • भीस्पादस्तिमवक्तव्यभगप्ररूप-। कापस्याद्वाद, । श्रीस्यान्नास्तियक्तव्यभगप्ररूप- कापस्याद्वाद २ श्रीस्पादस्तिस्थानास्तिवक्तव्य- 'भगप्ररूपकायस्याद्वाद अथ ओगणीसमा श्रुतपदना २० भद १पर्याय थतज्ञानाय नमा २ श्रीपर्यायसमास ३ श्रीअक्षर ४ श्रीडाक्षरसमास ५ भीपद ६ श्रीपदसमास ७ श्रीसघात ८ श्रीसघातसमास ९ भीमतिपत्ति १. भीमतिपत्तिसमास ११ श्रीअनुयोग $ " " رو

-
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-
(७२)
१२ श्रीअनुयोगसमास श्रुतज्ञानाय नमः
१३ श्रीपाडपासा
१४ भीपाहुडपाहुडाममास
१५ श्रीपाहुडा
१६ भीपाहुटासमास
- 1,
२७ श्रीवस्तु
१८ भीषस्तुसमास
१९ यीपूर्व
२० पूर्वसमास
अथ वीसमा तीर्थपदना ३८. भेद
१ प्राणातिपातविरतिवत श्रीसाधुनीय नमः
२ मृपावाद विरतियत
३ अदत्तादानविरतियत
४ मैथुनविरतिवरा
५ परिग्रहविरतिवत
६ पृथवीकापजीयरक्षाकाय
७ अपकायजीवरक्षाकाय
८ तेउकापजीवरक्षकाय
९ बाउकायजीवरक्षकाप . HTTE -
१. वनस्पतिकायजीवरक्षकाय . HT
1,
.

"
"
(७३)
११ असकायजीवरक्षकाय भीसाधुतीय नमः
१२ कोघदोषरहिताप
१३ मानदोपरहिताय
१४ मापादोषरहिताय
२५ लोमदोपरहिताय
२६ रागांशदोपरहिताय
१७ द्वेषाशदोषरहिताय
१८ लखागुणयुताय
भीदेशविरतितीर्थाय नमः
१९व्यागुणयुताय
२० मध्यस्थगुणयुताय
१२ सौम्यगुणयुताय
२२ गुणरागरूप
२३ अक्षुद्रतागुणगुंताय २
२४ धर्मप्रभाषकगुणयुताय
२५ सौम्पमकृतिगुणयुताय
२५ जनप्रियगुणयुप्ताय
७ मनोज्ञरूपगुणयुताय
२८ पापभीरगुणयुताय
२९ असदगुणयुताय
३० दाक्षिन्यतागुणयुताय
१ अफरताना
"
"
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-
३२ सत्कयषागुणयुताय भोदेशपिरतितार्थाय नमा
३३ सुपक्षगुणयुताप
३४ दीर्घदर्शिगुणयुताय
३५ पिदोपशगुणयुताय
३६ थ्रदानुगामिगुणयुताय
३७ पिनयगुणयुप्ताप
२८ कृतज्ञतागुणयुताय
-
-
॥ अथ वासस्थान चैत्यपंदन ॥
प्रतिशपवत महांत रूप, अनुपम गुणधारी ।
मारा जिनकुमाल, तीर्थकर शिवगामी ॥१॥
मरिहत सिद्ध प्रयपन गणी, स्पिर यह पुत जान ।
सपसी शुम दर्शम विनय, मावश्यकवळी ग्रानाशा
शील क्रिया तप पारिए, वैयाघच समाधि । शान
ग्रहण भूत भक्तितीर्थ, सेपिल स्पाग उपाधि ॥३॥
ए विज्ञप्ति स्थानक अमल, सेषो सरमायुक्त।
परमातम सपद प्रगेट, कारक यधन मुस-11४॥
मनपगित सए सिद्धि कर, शापिक सुख भर कद।
जिनको पदे भायपर, श्रीकृशलेंदु गणी ॥५॥

-
॥ अथ वीसस्थानक धुइ ॥
निरमल मातम मान प्रकाशक, कारक क्षायिक
भारोजी । जिन पद वर्धक कर्म निफाक, पीस
स्थानक भयो सेवोजी | जिनवर मह जे स्पानक
सेपे, एक भनेक भव तीजेसी माराधन ने साधन
मात्र, मन जित मप सीजेजी ॥१॥ अरिहत मिद्ध
भवचन आचारज, स्थपिर बह शुत पसीजी ।
श्रादर्शन विनयी प्रावश्यक, शील क्रिया प
वामीजी । गणधर यावश सुसमाधि, ज्ञान प्रहण
भुत भगतीजी । प्रवचन एवींशति पद भापक,
जिन नमिप सह गुगतीजी ॥ २ ॥ प्रठम पठ्
उपवास भावील तप, एकाशन निता संगतेजी।
कम्पि ओलीपट्मास भीतर,भाराधन बहभालेजो
भार म टाली पोषधधारी, दोय सहम जप गणि
जी ! काउस्सग्ग निज पद परिमाणे, देवपूजन श्रुन
मणिपजी ॥ ३॥ शामन रक्षक समकिसघारिज
सासर सुरि दाजी । सानिध करज्यो त तप
करता, घपत भाव अवाजी । भोजिनरामसूरीश्वर
शाखा, श्रीकृशलेंदु गणींदाजी । तस पद, सेवक
महलमतिगणी, जपे श्रीपाल्चदाजी ॥४॥ इति
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ब , ।
धादि लारे ॥ पोस० ॥ १९॥ फलोधी मगरनी
भाषिक्षा विविध चित्तलाय लालरे । जनम मफल
फरथा भाणी,एवीज मोक्ष उपाय सारे वीस."
कलश
या धीर जिनपर तणी, माज्ञा धारे चित्तमझार ए।
वसु निधिसिद्धिससी वरम,उजल चैत्रमास मुह करू
मुनि फेरीचन्द गच्छपरतर,भणी स्तवना मनहा२१॥
॥ अथ दीवालीपर्वनु गुणणो ॥
१श्रीमहावीर स्थामि मर्यज्ञाय नमाराने पोजा पहरे
२थीमहावीरस्वामिपारगताय नमःरात्रीजा मारे
३श्रीगौसमरवामिसर्वज्ञाय नम रान चौधा पहरे,
आ गुणणानी दीवाली रान यीम वीस नयकारपाली
गरायो अठम करे तोरमधी उठ करे तो पउदस
थी उपवास करे ना दीवालीने गेज तप करे, रात्रि
जोगो करे, अने प्रभु निर्वाण ममये देरामरमा जाने
लाडु प्रादि अष्ट द्रव्य चलाये, आरती करे,, परप
बदन करे, दीवालीनो स्तवन कहे, निर्वाण कल्याण
फनो अधिकार सुणे, अने भीगीतमस्वामिनो मोटो
रास सोमले पछे पारणो करे, इति

M "मथ ज्ञानपचमी पर्व अधिकार । कार्तिक सुधि पचमी ज्ञान पंचमी नामधी पर्ष काई- पाप या पर्ष भाराधन करपाची गुणमजरी अने 'परदत्तनी माफ मानापरणी फर्म नाश थाप , कोहादि द्रभ्य रोग नाश थाप छ सर्प उपद्रव नाश पापणे, सपूर्ण मनोरथ पूर्ण धाय से शानपधमीर्नु उपयास सुदिमा फरपो कदाच रोगा- दिके कारण अमे भूली जायनी वढिमा फरघो,ज्ञान- 'पार्नु तपजघन्यथी पापमासमपमधी पाँच वर्ष भने पांच माम ने उत्कृष्टयी जाय जीव सुपीयाय जे, उपधाम घोपिर परयो घोपिहार पनी शके तो तिविहार करे, जघन्य मध्यमउत्कृष्ट शामघमीन 'तप म पनी शकतो अवश्य कार्तिक शुदि पचानो तो उपवार्म फरयो तेदियमेशणगारेली झान कोहीने आगल पाच अथवा एकायन साधाया परीने सेना उपर फल फुलबहाथवा, पांच पत्तीनो दीवो करयो भूब उसवयो ज्ञान पूजानी दाल फहीने थामक्षेप करे पुस्तक पर रोकर नाणो पदावे, अने, कागल बलम सलेट पेन शीसान दवात आदि पदावे पपूजा करीने भाषपूजा परवी ते प्रथमहरिपाषाई पद्धिषक- . .

14 मीने समा० दहन मुहपात पहिलाहोने के बादणा पाच समासमणा दइने चैत्यषदन करे। ॥ अथ चैत्यवदन ॥ सकल पस्तुप्रतिभास भानु, निरमल सुख कारण। सम्पग्दर्शन पुष्ट हेतु, भव जलनिधि तारण ॥ सनम तप माणद कद, अलाण निधारण मार विकार प्रचार ताप, तापित जन ठारण || स्याद्राद परि- पाम धर्म, परिणति पडिपोहण । साहु माहुणी संघ सर्व, आराधन सोहण । मोहतिमिर विश्वम, सूर मिथ्यात्व पणामण मातम शक्ति अनत शुद्ध, प्रसुता परगासण ॥२॥ मृति श्रुति अघि विसुद्ध- नाण, मपपज्जद केवल । भेट पचास क्षयोपशामिष एक क्षायक निरमलादीय परोक्ष प्रथम तिहां, दुग परतक्ष दसिता सकल परतक्ष प्रकाश मास, धुच केवल अपरिमित ॥२॥ धर्म सकलनो मूल शुद्ध श्रीपदी जिन माखे । माहिर अग प्रधान खघ, गण घर सुप्रकाशे । शाखा श्रीनियुक्ति माध्य, पति शाम्बा दीपे । घरणी टीका पत्र पुष्प, सशय मा जीपे ॥॥ पचागी सार बोध गयो, जिन पधा भगे । नदी अनुयोगहार, शाखा मानो मनरंगे - है

(८१)
वीर परपर जीत, अनु भव उपगारी । अभ्यासो
आगम अगम 'निरूपम सुखकारी ॥५॥ मोह पकहर
नरिसम, सिद्धान्त अपाधे। देवचन्द्र आणा सहित
नय भग अगाधे ज्ञान, एश्रुतज्ञान मोहामणो सफल
मोक्ष सुख कद । भगते सेवो भविकजन, पामो
परमानद ॥॥ जेकिंचि० नमुत्थुण जावति चेहयाई
जावतकेचि० नमोहत् प्रणमु श्रीगुरूपाय ज्ञान
पचमिनु स्तवन जयवीय अरिहत चेइयाण पदण.
अनत्थ. एक नवकारनु काउस्सग्ग करीने धुइ कहे,
॥ अथ थुइ ( वसततिलका )॥ .
देविंदरदियपएहिपम्वियाणि,नाणाणि केवलमणो
हिमई सुपाणि । पचावि पचम गई सियपचमीए,
पूधात्तो गुणरयाण जियाण दिंतु ॥१॥पछे खमा०
दइने इच्छा० स० भ० पचज्ञान आराधवा निमित्त
काउस्तांग का इच्छ पचज्ञान आराधया निमित्त
फरेमिकाउस्मग्ग वदण अन्नत्थ०कहीने पाच अथवा
०१ लोगस्मनो काउस्सग करीने प्रगट लोगस्स कहे
... पछे समारढावागी योधागाढनामनी श्रीजी धुइ
को प्रदक्षिणा होय तो प्रदक्षिणासमा समणा पांच
more.. जान मधि नमस्कार करे,

३
(८२)
-
यथा पाच नमस्कार
१ श्रीमति
जानाय नमः
२ भीशुत
३ भीमाधि
४ भीमनपर्यव
५ श्रीकालोकप्रकाशककेवल
अथवा ५१ ज्ञानना नमस्कार
१ स्पर्शनेन्द्रियव्यंजनावग्रह श्रीमतिज्ञानाय नम
२ रमनेद्रिाव्यजना रग्रह
३ घाणेंद्रिगव्यजनावग्रह
४ श्रोत्रंद्रियव्यमायग्रह
५ स्पर्शनद्रिग्रअर्थावग्रह
६ रसनेंद्रियअर्थावग्रह
७ घाणेंद्रियर्थावग्रह
८ चक्षुरिंद्रियर्गवग्रह
९ मानेंद्रियअर्यावग्रह
१० मनोअर्थावग्रह
११ स्पर्शनेंद्रियाहा
१२ रसनेद्रिपदहा
१३ धणेंद्रियइहा
१४ चक्षुरिंद्रियाहा
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१५ श्रोत्रंद्रियइहा ।
श्रीमतिज्ञानाय नम
१६ मनाहा
.
"
१७ स्पर्शनेंद्रियअपाय
१८ रसनेंद्रियअपाय
१९ प्राणेंद्रियअपाय
२० पक्षुरिद्रियअपाय
२१ पोटेंद्रिपअपाय
२२ मनअपाय
२३ स्पर्शनेद्रियधारणा
२४ रमनद्रियधारणा
२५ घाणेंद्रियधारणा
२६ चक्षुरिद्रियधारणा
२७ श्रोत्रंद्रियधारणा
२८ मनोधारणा
२९ अक्षर
३० प्रनक्षर
३१ मही
३२ असज्ञी
-
श्रीश्रुतज्ञानाय नम
६३ सम्यम्
३४ मिथ्या
३५ सादि
।
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श्रीभुतज्ञानाय नम " - r न ३६ अनादि ३७ सपर्यवमित ३८ अपर्यवमित ३९ गामिक ४० जगमिक ४१ अगप्रविष्ट ४२ जनगप्रविष्ट श्रीवतज्ञानाय नमः ४३ अनुगामि श्रीअवधिज्ञानाय नम ४४ अननुगामि श्रीअवधिजानाय नमः ४५ पर्द्धमान श्रीअवधिज्ञानाय नम ४६ हायमान श्रीअवधिज्ञानाय नम ४७ प्रतिपानि श्रीअवधिज्ञानाय नमः ४८ अप्रतिपाति थीअवधिज्ञानाय नमः ४९ माजुमति श्रीमनापर्यवज्ञानापन ८० विपुलमति श्रीमन पर्यवज्ञानाय नम ५१ लोकालोकप्रकाशक श्रीफेवरज्ञानाय नम पछे (ॐ ह्रीं नमोनाणस्स) आ पदनी २० मा फेरची, आठ थुधी देव दया, अने स्थिरता हो तो१अगनी सज्झाय सामले पीपघलीधेलोहोय- पीजे दिवसे पौषध पालीने द्रव्यपूजा करे शील पेटक पडिपमणु आदिश्रावकनीकरणी करे उजम M - आदिनी पीजीविधि ज्ञानपचमीना मोटा स्तवनधी जाणवी - अथ प्रथम आचारागनी सज्झाय Ear दाल हठीलानी) पहेरो अग सोहामणोरे लाल, अनुपम भाचारांगरे सुगुणनणनर । पीर जिर्णदेभाखियोरे लाल, उपचाइ जास उपागे सुगु०॥॥ परिशरिग अगनीरे लाल 'हुजाउ वारपाररे सु० विनये गोचरी प्रादरेर लाल, जिहासाधु तणो आचररे ॥सु०॥ सुयग्वध ढोय छे जहनारे लाल, प्रवर अध्ययन पचपीसरे सु०॥ उद्दे "शादिक जाणीयरे लाल, पिच्याशी सुजगीशरे सु०। १०॥३॥ हेतु जुगति करी शोभतारे साल,पद अढारे हजाररे सु०॥ अक्षर पदने रोहडेरे लाल, सस्पाता पीकाररे सुमार|ागमा अनता जेहमारे लाल, वलि अनत पर्यायरे मुकासपरित्ततो छेहरे लाल 'थायर सनत कहायरे सु०॥१०॥५॥ निपद निका- चित शावतारे लाल, जिन प्रणीत ए भावरे सु०। मुणता मातम उल्लामेरे लाल, प्रगटेसाज सामावरे सु० य० ॥६॥ सुगुण श्रावक भाविकोलार, अंगेध- रीय उल्लासर सुविधिपूर्वक तुमेसाभलोरे लाल, गीतारय गुरूपासरे सु०प०७|| सिद्धात महिमा - ।

। लिलोरे लाल, उत्तरे भरपाररे सु० । विनयचन्द्र कहे माहरेरे लाल, एडीज अग आधारे सु०प०८॥इति ॥ अथ पीजी सुयगडागनी सज्झाय ॥ (दाल रमीयानी) पीजोरे अग तुमे सांभलो, मनोहर श्रीसुगडाग (मोरा साजन) अणसे त्रेसठ पासडी सणो,मत खडयो धरि रग मो० ॥१॥ मीठीरे लागे वाणी जिन तणी, जागे जेधीरे जान मो.। एघाणी मनभायी माररे,मानु सुधारे समान मो०। मीठी० ॥२॥ राय पसेणी उपाग जेहनो,ए तो सूत्र गभीर मो० । पहुश्रुत प्ररथ जाणे सह, क्षीरनीर धनुर तीर मो० । मी० ॥३॥ एहनारे सुयखध दोयछे, घलि अध्ययन प्रेरीश मो उद्देशा ममुर्दशा तिहा मला, सम्पाये त्रेवीश मो०मी०॥४॥ नयनिक्षेप प्रमाण भर्या, पद छत्तीस हजार मो० । सरयाता • अक्षर पढमाहे, कुणलहे सेहनोरे पार मो० मी०॥५॥ गमा अनता पर्याय वली, भेद अनत जिणमारे मो० गुण अनत उस परित्त कयां,यावर अनत जेमाहिमो० मी० ॥३|| निपद्धनिकाचित जेमा सयकडा, जिनपन्न -तारे माय मो० । भाग्वीरे मुन्दर एक प्ररूपणा,चरण फरणनोरे जोपमो ||७|| करीये भगत जुगति ए ।

R सूचनी, निश्चय रहायेरे मुक्ति मो० । विनयचन्द्र कहे मगर मगरे पहथी, आतम गुणनीर शक्तिमो०मी०॥८॥ ॥ अथ त्रीजी ठाणागनी सम्झाय ॥ ( दाल-आठ टके ककणो लीयोरी-ए चाल ) पीजो अग भलो कयो रे जिनजी, नामे श्री ठाणाग मोरो, मन मगन थयो, हार देखी देखी भाय, हारे जीयाजीव रामाव,मोरोसपर जगत करी जनारे जिनजी, जीवाभिगम उपाग मो०१॥ पर अग मुझ मन यम्योर जि सिम कोकिल दल अंथ मी० गुहिरभाकर जागतोरे जि० पाजतो एह पारप मो० ॥२॥ कृट शैल शिखरी शिलारे जि. कान नमै पलिट मोगहर मागर द्रह नवीरे . जि. जेहम अमेरे उदर मो० ॥शा दशठाणा अनि दीपनारे जि० गुण पर्याय प्रयोग मो० । परित्त जोदिनी याचना जि० मन्याता अनुयोगमोotil ए शिलोक निजत्तसुरे जि० संगरणी पदिचित्त मोम मायाता जिहारे जि० सुणतां उससे पितमा 100 सुगमध एक राजतोरे जि० दश अध्यपन उडारमा० उशादिक बीशरे जि. पद बहत्तर हजारमा० ॥३॥ रागी जिनशासन मोरे

Ave
A
(८८)
जि० सुणे सिद्धात घसाण मो. विनयचन्द कहे
त हुवरे जि० परमारथना जाण मो० ॥७॥ इति
॥ अथ चौथी समवायागनी सज्झाय ॥
द्वार-भारा महिला उपर मेह क्षमोके वीजली-ए चाल)
गोधी समवायाग सुणो श्रोता गुणी हो लाल,
सुगा । पनरणा उपाग करी शोहावणी हो लाल,
फरी ॥ अरथ मागधी भाषा शाखा सुरतणी, हो
लाल, शाखा० । ममकिन भाय कुसुम परिमल
व्यापी घणो रो लाल, परि० ॥१जीव अजीवने
जीवा जीच ममासथी हो लाल, जीव० । लहीये
एकधी भाव विरोध काइ नथी हो लाल, विरोध
भागा तीन स्व ममयादिकना जाणीये, हो लाल,
यादि रोक अलोकन लोकालोक वग्वाणीये हो
लाल,रोक ॥२॥एक थकी छे सात समवाय प्ररूपणा
हो लाल,मम कोडा कोड प्रमाणक जीव निरूपणा
हो लाल जी०बारमयिह गणिपिटक तणी सगया
कही हो लाल, तः । शाश्वता प्ररथ अनतक छे.
एहना मरी हो लाल, छे ॥३॥ सुयखध अध्ययन
उद्देशादिके भला हो लाल, उ० । सख्याए एक एक
गुणानिलामो लाल, प्र० । पद एक लाख
.
३

-- (८१) चोमालीस सहस उत्तरा हो लाल, स. पदने अग्रउन मरयाता अक्षरा हो-लान, स.॥४॥ भाप्यचूरणि नियुक्ति करी सोहे मदा होलाल,hol : संणना भेट गभीर, निपत न होप फदा हो हाल नि० । जेहनमाये अगझी अतरगति हमी हो लाल अ० जलवते जोर कुणन हुरे खुसी हो साल, ऋ०॥५॥जार घरम सनेह जिणदसुमाहरो होलाल जिका तजिपा-गास्न मिध्यात सूत्र जाण्यो खरो हो लाल, पू०१ जिम मालती लही भृगरकरीरे नवि रहे, हो लाल, कइश्वर शिरसुरगगतजी परिनवि चहे. हो राल, त||३|| प्रवचन निमथ तणो.जुगते वही हो लाल, जु शाकर सेलडी द्राग्व यकी पण मीठडो हो लाल,यकी० स्यु कहिये पहु वात पिनय- घद इम कदे हो लाल वि०एना सुणीने भाव पोता अति गहगहे होराला धो० ॥७॥ इति । ॥ अथ (५) भगवतीसूत्रनी सज्झाय ॥' ('ढाल-पथीटानी) TI पचम अगे भगवती जाणीयेरो जिहां जिनवरना घचन प्रधाघरे । हिमवत परयत सेती नीकल्यारे; मानु पर नक्ष गगा प्रवाह पच० ॥१॥ सूरपन्नती (१०) - 1 । नामे परगटी रे, जेहनी छे उद्दाम उपांगरे। सूत्र सगी रचना दरीयाजिसीरे,माहिला भरथने सजल सागरे । ५० ॥२॥ इहां तो सुबसथ एक अति भोरे । एकमो एक अध्ययन उदाररे । दश हजार उद्देशा । जेहनारे, जिहांकिण प्रश्न छत्रीस हजाररे। पं०॥३॥ पदनो द्वाप लाग्य अरथे भारे, उपरि महस अठयामी जाणरे, रोकालोक स्वरूपनी वर्णनारे, विवाह पनत्ती अधिक प्रमाणरे । ५०॥४॥फरीये पूजा अने परंभावनारे, धग्येि सद्गुरु उपर रागरे सुणीपे सूत्र भगती रागमुरे,तो होय भवसागरनो । त्यागरे । प०५गोतमनामे द्रव्य चहायरे, सम्यम् शान उदय होय जेमरे । कीज माधु तथा साह्मी सणीरे भगति जुगति मनाणो प्रेमरे ५० ॥६॥ इण विधि सुण्य सूत्र आराधनारे, इणभवमीझे वछिप्त फाजरे। परभर विनयचन्द कहे ते लहरे, मोहन मुगमिपुरीनो राजरे । ५० ॥७॥ इनि ॥ अथ (६) ज्ञातासूत्रनी सज्झाय ॥ (दाल-कितलख रागा रामाजीरे पालिो-ए देशी) छहा मग ते ज्ञातासूत्र ववाणीग्रेजो, जहना अधिक उपहहो, मारा सुणजो धरिनेह

-
मिदातनी वातडीजी। अधणे सुगता.गाढो रस
उपजंजी, मयुरना नार्जिन जिम मधुग्वड हो, हमारा
॥१॥ जद्दीवपन्नत्ती उपांगजेदनोजी, इणमाह जिन
पूजानी विधिजो रहो । मां । अर्चिक सुणि परम
शामिरम अनुभवेजी, चर्चिक सुणिकरे मममोर हो।
मां नगर उधान चैत्यवन वडाहमणोजी
समवसरण राजाना मातने तातही. मा। धर्मा.
थारज धर्म कथा निहा दाखवाजी, ई रोकपरलाक
रूद्धि विशेष मुहानहो, at० ॥३॥ भार्ग परित्याग
प्रवज्या पर्यवाजी, सूत्रपरिग्रह पारु तपउपधान हो ।
म. । सोहण पञ्चखाण पादपोपगमनताजी,
स्वर्गगमन शुभकल उनपत्ति हो। मा० १४॥ योधि
लाभ लिनन ते अतक्रिया कशजी, धर्म कथानों
दोग सुधि हो । मा । पहिलाना उगणीश
अध्ययन ते प्राज ले जी, पीजाना दशवर्ग महा
अनुषय हा मां || उठकोही निहां मपल कथानक
मापियाजी,भाण्यायलि उगणीश उद्देश हो मां
मरूपा हजार मा पद पदनाजी, एहकी जाये
कुमति कलेश हो मा | विनय करें जे गुरुनो
पहुँ परजी, तेहन चन सुणलां पहुं फ्ल होय हो ।
मा० ते रमिया मनवसि 'या विनयचरनेजी,
4

- मोग मिले जोया एकके दोयहोरांगाणा इति अथ (७) उपासकटगासूत्रनी सज्झाय (ढाल-विछियानी) हये मातमो अग ते माभरी उपासकदशा नामे घगरे । श्रमणोपाशकनो वर्णना,जसुचदपन्नती उपांगरे ॥१॥ मनलागोमोरोसूत्रधी, एतो-भववेराग तरगरे । रमराता ज्ञाता, गुण,लहे, परमारप सुधि- हित सगरे । मन० ॥२॥ण अगे सुयखध एक ऐ, अध्ययन उद्देश विचाररे । दशदश सम्पाये दाख व्या पदापिण मख्यात हजाररे।म०॥३॥ आणदा- दिक प्रावण तणो, सुणतां यधिकार रसासरे। रस लागे जागे मोहनी, श्रोता जनत:ततकाररे । मः- ॥४॥ श्रोता आगलतो ,वांचना, गीतारथ पा --रीझरे । जे अर्द्धदग्ध समझे, नही तेहसं तो करर्य पीजरे, म० ॥५॥ दश लायक तो इहां.भाखिया, ,पण सूत्र मण्यो नही कोयरे. ते माटे शुद्ध भाषक भणी, एक अरथनी धारणा होयरे,म० ॥६॥ साचो होय ते प्ररूपीये, निस्मक पण,सुजगीशरे कपिविनयचर-कहे स्यु थयो, जो कुमति करस्ये रीशरे म०॥७॥ इति J ..., (a) ५।। अथा(८) अतगडदशांगनी सज्झाय ।। (ढाल वीरवाणी राणी पेलणाजी ए देशी) ३ 7 * आठमोअसगडदशांगी, सुणी-करो कान पवित्र अतगड केवली जे पयाजी तेहनारे जहां आठ चरित्र ॥१॥ फर्म कठिन दल चूरताजी पूरता 7 जगतनी आस !-जिनवर देव-इहा, भामताजी, माम्बवता अरथा सुविलाश, आठ॥२॥ सफल । निक्षेप नय भगीजी, अगना,माव अभग। सहज • सुग्दरगनी सल्पिकाजीकल्पिका जासु उपांग ।। आठ ॥३,एक सुपरवधा-इण-अगनोजी, वर्ग, आठ अभिराम । आट उद्देशा छे पलिजी सख्याता सास पदठामा आठ॥ ४॥ आठमा अगना पादोजी पहवो अच्छरे मीठामीमरस अनुमव रस ० उपजेजी सपजे पुन्यतीरास आउला५॥ विषय लपट नर जे हुवेजी, निरविषयी सुष्मात्याय । जिम महाविप विषधर तणोजी नागमो सुपमा जाय ।। -, आठ० ॥६॥ अमृत वचन मुख बरसतीजी, सर- ! स्वनी करोरे पमायजिम विनपचन्द्र इण सुननाजी । तुरता रहे अभिप्राय-1 आठ॥७॥ इति P- ।

- (९४) अथ (९) अनुत्तरोषवाइ अग सज्झाय ॥ (दाल-नगदल दिली ले-ए देशी॥ नयमा अग अनुत्तरीयथाई, पहनी रूचि मुर आई हो। (प्रा सून सुणो) सूत्र सुणोत आणी, एतो यौनरागनी याणीहो ॥श्रा० ॥१ जसु कल्पावतामका नामे, मोर उपाग प्रकामे हो श्रा०॥ एतो आगेमन अनुल्ग, मार्नु मे शिग्द नी पाहो ॥श्रा6॥२॥ एतो सूत्रनो नाम सुण जे, तिमतिम अतर गति भी जेहो॥श्रा०॥ नवर मनेश, पाथी उलमे मारी देहा हो ॥re ॥३॥ अनुतर सुरपद पाया, सेएना गुण इगमें गा हा ॥श्रा नगगदिक माय वॉण्या, ते छठे अगे आण्याश्रिा०४ा इरा एक सुप ख पार, प्रेण धर्ग बलि मनीरा होश्रा०॥ उद्देर- प्रण सनरा, सरयाता सरम पद पूरा ॥श्रा० ॥ सुत्र सुणावु अमें तहनें, साची श्रद्धा हुये जेहने t०॥ श्रोताधी प्रीत रंगावं, निंदकने मुह स्गायुद्धो ॥ श्रा०॥६॥जे सुणतां करे पकौर तेत माणम नहीं पण ढोर होनापाना कवि विनयच कहे साचो श्रुत रंगे सहु काई राचाहो ||भा०15 - अय (१०) प्रश्न व्याकरणाग सज्झाय ॥ (दाल-आया आम पधारो पूज्य-ए देशी) दशमो अग-सुरग सुरावे, प्रदन व्याकरण ने। सून कल्पता से ते तो,चिदानद फल पामे। वो आयो गुणना जाण, तुमने सूत्र सुगायु ॥१॥ - कला ज्यु, परिमल महके गुरु परागने राग। म उपाग पुष्फिका पहनो, जोर जुगति करी गे। आयो०॥७॥ अगुष्टादिक जिहा, प्रकास्या, नादिफ प्रति सहा ते छे अष्टोतर सत ऐ तो, .. व मध्य मणि चूहा।। आ० ॥३॥ आश्रवद्वार चहा आण्या, पाये सबर द्वारा । मशमन्त्र णीमा रहीये, सब्धि भेद सुग्वकारा ||आ०॥४ पग्मघ एफ छ दशमें अगे, पण पालीम अझयणा पारीम उद्देश चली पद, महस मख्यात नीर- या आ०||५|| जे नर सूत्र मुग नहीं काने, केवल पे काया। माया माहिरहे स्पटाणा, ते नर मीज आया |आ०॥र्द। सूत्रमारे सो मारग दीय ऐ निश्चय नय व्यवहारा । विनयचद कहेने आदरिये तजि मन मदन पिंशारा॥आामाइति

(१६)
अथ (१५), विपाकसूत्रनी 'सज्झायो
(ढाल-कडसानी)
मुणारे विपाक श्रुत अंग यारमो, तजो
विकथा वृथा जे अनेरी । लरित उपाग जसु प्रवर
पुष्पचूलिका, मूलिका पाप'आतक करी । सुणो..
॥ १॥ अशुभ किपाक मम दुष्कृत फल भोगवी
नरकमा गैरफ था जेह प्राणी । सुकृत फल भोगवी
स्वर्गमा जे गया; ताम वक्तव्यता रहा आणी
सु० ॥२॥ दोय श्रुत पधने घीश अध्यपना पली;
वीश उद्देश हा जिन प्रयुजे। सहस सख्यात पद
कुद मच फुद जिम, पहुल परिमला भ्रमर चित्त
गुजे ॥सु०॥३॥ मरस चपकलना सुरभि सहुने रुचे
अन्य डपारनी बुद्धिमाटे। सूत्र उपगार तेहथी
सयल जाणीये, जेहेयी पुरुर्षे सुख प्रखर खाटे ॥सु.
॥४॥ रन्धने मोक्षनापेिड कारण अछे, दुष्कृतने
सुकृत जोवों विचारी दुष्कृतने परिहरी सुकतने
आदरी, 'जिन पंचने धारिये गुण समारी ||सु
॥6॥ मंकररें मकर निंदा निगुण पारकी, नारकी
तणी गति कोइ याये । नारकी प्रकृति तजिासहज
मतोप मज लाग श्रुत सामलीघरम घन्धे।।सु०॥1

मुखने दुख विपाक फलदासपा, बंग इग्यारमें
वीतरागे पिर जोर शासन जिहां सुत्रधी,
पनि विमपचंद गुण ज्योति जागे ||Toll७॥
If कलश
(दीस-पदारनी
अगदग्यारह में धुएषा, साहेलीए । भाजपा
रगरोलकि,सानी सत्रमाहि ऐहनो साना भारंपो
सर्व निघोला सा॥॥नहेलीए भाजपपामणी,
पसरी भंग पारनी सा० मुहमन माप वसकि,
सा०॥सीशहर करी,सााचनुमवरसनीठ
की सा॥२॥हेज परी जे सामले, साकिबरा
कण बालकिसान तोते फल लो कटरा, सा
स्वाइप्रतिहि रसासकि,सा० ॥३हरख अपारपरी
पे, सा॥ महम्मदापदि मझारकि सागाभास
करीए अगनी,सापरत्या जपजपकारकिसाशा
सबत सतर पपावने, मागावीसागातु मम भासषि
सांगादशमी दिन शुदि पक्षमा सारिणीमन
माशाकि, सी० ॥५॥ श्रीजिनधर्मनि पारी,सा॥
श्रीजिनपर हरीशकि, सा॥ खरतर गाना

x
(९८)
घरस निधानजी, सा० ॥ ज्ञान तिलक सुपसापकि,
स.॥विषपचन्द कहे में करीसा. ॥ अगइग्यार
सम्झापकि, साहे. १७॥
॥इति ज्ञानपचमी भारापन विधि सपूर्णम् ।।
॥ अथ मौनएकादशी पर्व आधिकार ।
भगशिर सुदि ११ इग्यारम मौन एकादशी नामपी,
पर्ष मंसिद छ, आ विषसे१५०दोहसो जिन कल्या-
थपा , पथा श्रीमाल्लिनाथना जन्म १दीक्षार
নানা কামানােখা ছায়া
कल्याणक भने श्रीनमिनाशनो केवल ज्ञानरकल्पा
जक पयोथे, तशी आपतमान घोषीशीमा पांग
कपाणफ पपा एवीरीते बीजाचार भरत प्रने
पांच ऐरपतने विषे पांच पांच कल्याणक वापी
या क्षेत्र सम्बंधि१० पर्तमान जिन चोवीसीमार.
• पचास करपाणपया परी मतीत वर्तमान प्रने
जनागत ३० जिन चोविशीमा १५० दोडमो कल्या.
ण पाय ऐसे कारणधी आ दिवस पर्व तमोटी
गण पहे, पसी आ घिस मान सहित उपवास
को शक्ति हापत्तीपोषन करवो तेनी पण शक्ति
होय तो देशाधणाशिक के सामायिक अवश्य

पायो, अन पोषध आदि ब्रनमा: मौनपणे १५०
मालानो गुणगो को, आतप जघन्यधी ११ मास
मम्पमयी ११ वर्ष भने ११मास उत्कृष्टयी जाप
जीव मुधी उपवास भाविधी मी एकादशी
भाराधे, कदाप रोगादि कारणे पदमा-करे तो प्रत
भग न थाय,आपण न पनी शकेतो मागशिरसद्धि
मौन एकादशीने दिवस उपवासादिकधीआ पर्वनी
भाराधना तथा १९खमाममणा १९ साथीया
११लागापो काउमा(भीमल्लिनाथ सहारनमा)
भा पदना २० मारा आधीना दरक शुदि ११ ने
दिवसे करपाबीजी प्रतिक्रमण आदिक्रिया नित्य
कृपयनी माफर समजधी, आ द्रमा पूर्ण.धो छते
जानप वमनी माफक उत्तमणी ममजा, पण एटल
विशेष छ के पाच पांच घस्तुन ठेकाणे इग्गरम्यार
वस्तु सरजनी
अथ मौनएकादशीनो १५० गुणा.
. [१] मयूद्वीप भरतक्षेत्र अनागजिन
धोनीशी पायाकल्याणक नाम
भी मायश
• सर्वज्ञाय नमः
“६ श्रीमर्यानुभूति
हने नमः
६ भीसर्वानुभूति
षा तमा
lament

(९८) हरय निपानजी, सा०॥ज्ञान तिलक सुपसायकि, स॥ विषयचन्द कदे में करीसा.॥ अगइग्यार सम्झापकि, साहे. 1७॥, ॥इति ज्ञानपचमी भारापन विधि सपूर्णम् ॥ , ॥ अथ मौनएकादशी पर्व आधिकार । भगशिर मुधि ११ इग्यारम मौन एकादशी नामपी पर्ष मंसिदा विषसे१५०दोसो जिन कल्पा रथया छे, पथा श्रीमाल्लिनाथना जन्म दीक्षार থানা কথাখানাখী ভাষা -कल्याणक भने श्रीनमिनाथनो केवल जानरकल्पा- णक पयो, ती आवर्तमान घोषीशीमा पांच कल्याणफ पपा एवीरीते'वीजा पार भरत भने पांच ऐपमने विषेपांच पांचकल्याणक होपाधी पश क्षेत्र सम्बंधि१०पर्तमान जिन चोवीसीमा५० पचास कस्पाणकथया पली तोत वर्तमान प्रने अनागत ३. जिन चोविशीमा १५० दोहमो कल्या. ण पाय छेते कारणधी आ दिवस पर्व तीक माटो गण पडे, परी मा दिवस 'मान सहित उपवास कपा, शक्ति हापत्तोपोपात करवो तनी पण शक्ति होपाती देशापगाशिक के सामायिक अवश्य T-

बायो, अ पोषध आदि प्रामा.मानपणे १५०
मालाना गुणणो को, आतप जघन्यधी ११ मास
मध्यमपी ११ वर्ष भने १५ मास उत्कृष्टयी जाप
जीच मुधी उपवास भाविधी, मुरि एमावशी
भाराधे, कदाप रोगादि कारणे पक्षमा करे तो बत
भगन थाप,आपण न पनी शकेनोमागशिरसहि
मौन एकादर्शाने दिवस उपवासादिकधी आ पर्षनी
भारापना की, तथा ११ समाममणा ११-साधीया
एलागतो काउमा(मो मल्लिनाथ साक्षाय नमा)
मा पदना २० माला आ बीना रेक शदि ११ मे
दिवसे करवा.पीजी प्रतिक्रमण आदिक्रिया नित्य
कृपयनी माफक समजयी, आवम, पूर्ण धणे उते
शानपत्रमनी माफ उनमणी ममजो, पण एटल
विशेष छके पांच पांच वस्तुन ठेकाणे इगर प्यार
वस्तु समजली
अथ मौनएकादशीनो १५० मुगणा,
जीप भरनक्षेत्र अनमिन ]
पानीशी,पांच कल्याणक नाम
भी महायज्ञ
“६ श्रीमर्यानुभूति
६ श्रीसर्वानुमति
पाधि तमा
- सर्वज्ञाय नम

- भीसांनुमति सज्ञाय नमः গাষ “नाथाय नमः शिप्राधीप भरवक्षेत्रे वर्तमान जिन घोषीसी पांच कल्याणक } १८ श्रीधर वार्थाय नमः १९ भीमहि "चाहते नमः १९श्रीमति साधाय नमः १९ श्रीमल्लि सर्वज्ञाय नम सर्वज्ञाय नमा शि जमूद्वीप भरतक्षेने भनागत जिन पापीसी पांचकल्पाणक', ५ श्रीस्वयम सर्वज्ञाय नम ६ भविषभुत आहेते नम श्रीदेषभुत - लामा नमः श्रीदेवभुत सर्वज्ञाय नम ७ श्रीउप नाधाय नम [ धातकी खड पूर्व भरते प्रतीत जिन । चौवीसी पांच-कल्याणक भीकडक सर्वज्ञाय नमः .६ मीशुभकर असे नमः १६ श्रीशुभकर नाथाय नमः

4
६ श्रीशुभकर
प्रज्ञा नमः
७सप्त
नाभाय नमा
(७) पातकीख पूर्वमात मान जिन
पोपीमी पांच कल्याणक
१८ भीगांगीलनाधाय नमः
१९ अगुिणनायबईते नमः
१९ श्रीगुणानापनाथाय नमः
१९ श्रीगणनायसर्वज्ञात नमः
२१ श्रीजचंद्रमर्वज्ञाप
. (३) भातकी खड़े वभरते अनागत जिन
ओपीसी पाच कल्पाणक
४ मीसंप्रतिसर्पज्ञाय नमः
६ श्रीमुनिनावग्रहंते नमः
भीमुनिनापनापाय नम
६ श्रीमुनिनाघसर्वज्ञाय नम
७ श्रीविशिष्टनाथाय नमः
(७) धातकीख मखिमभरते अतीत जिन
योगीसी प्रांत्र कल्याणक
१ श्रीसधिसर्वज्ञाप नमः
६ श्रीहरिभद्राईते
भीहरिभद्रनाथाय नमः
-
,

N । . ६षीहीमसज्ञाय नमः ७ शोमाधिनाथाय नमः (८) शातकीय पश्चिममा पर्तमान जिन घोपोमी पांप फल्याणक, १८ मल्लिमिहनाधाय नमः १९ भोगाममहिने १९ श्रीअक्षोमनाथाय नम १९ श्रीशोममर्यशाय नम २१ पीप्रयामशाप नमः (५) धातकीख पश्चिममरमे अनागतं जिन पौवीमी पाच कल्याणक ४ाआदिकरसर्वज्ञाय नम T ६ भीधनदाईते ६ धीधनदनाथाय ६ धीधनदर्वज्ञाय ७भीपापनाथाय (१०) पुरका पूर्व माने अनीम जिन चोरीसी पाच त्याणक ४ भीमृदुनाथार ५ नम ६ श्रीव्यकहते ६ श्रीव्यक्तनाथाय नम नम नमः। 1 नमः। नम

1
1
श्रीव्यससर्वज्ञाय
राशतसर्वज्ञाय
(११) पुष्कराद पूर्वमाते वर्तमान जिन
चोवीसी पाच कल्याण
१८भीभयोगनाधाय नमः
१९पीयागनाथमाईते नम
१९ श्रीयोगनाथाय नमः
१९ श्रीयोगनायतर्वज्ञाय नमः
२१ भीअरण्यवाममज्ञायनमः
(१२) पुकारार्द्ध पूर्वभरते अनागत जिन
घावीसी पाचे कल्याणक
४ श्रीपरमर्वज्ञाय
६ श्रीशुदातिहते
नमः
१ श्रीशुदातिनाथाय नमः
म शुद्धातिसर्वज्ञाय नमः
७ श्रीनिकेशनाथाप' नमा
(१३) पुकार्द पश्चिममा मात जिनीं।
चौधीमी पाचक याणक
४ श्रीमत्पसज्ञाप
नम ।
भीधारियनिधिमईत नमा
६ श्रीधारित्रनिधिनाथाय नमः,
सा
"
t
-

(1)
६ श्रीधारित्रनिधिसर्वहाय नमा
७श्रीमशमजितनापाप नमः
(२५) पुकारा पबिमभरत वर्तमान जिन
चौबीसी पांच कल्याण
१८ श्रीप्रसादनाथाय नमः
१९ श्रीपिपरितआईत
१९ भीविपरितनाथाय नमः,
१९ भीविपरितप्तशाय नमः
२१ भीरपामिसर्वज्ञाय नमः
(१५) पुष्करा पश्चिममरते अनार्गत जिन
पोपीसी पांच करयाणा
५ भीमघटितसर्वज्ञाय नम
५ भीनमणेद्रअईते
६ भीनमणेंद्रनाथाय
भीप्रमणेद्रमर्षशाय नमा
७ भीरुपमपन्दनाथाय नम
(१६) जगदीप ऐरक्तक्षेत्र अतीत जिन
चोवीशी पांच कल्याणक
५ भादांतसज्ञाप
श्रीअभिनन्दनभईत नमः
.
मम
L
"
..

नमः
नमः
६ भीमभिनवननाथाय नमः
६ श्रीमभिनंदनसर्वज्ञाय नमः
७ श्रीरत्नेमानाथाय
(१७) जन द्वीपे ऐश्वतक्षेत्रे वर्तमान जिन
चोवीसी पांच कल्याणक
१८ श्रीप्रतिपार्चनाधाय नमः
१९ श्रीमदेवाहते
१९ श्रीमरदेवनाधाय
१९ भीमरुदेवसर्वज्ञाय नमः
२१ श्रीशामकोप्टसर्पज्ञाय नमः
। (१८) जपूद्वीपे ऐरक्तक्षेत्रे अनागत जिन
चोवीसी:पांध कल्याणक
४ श्रीनदिषणमर्वज्ञाय नमा
६ श्रीवतघरमाईते
६ श्रीवतघरनाथाय
निम.
६ श्रीव्रतधरसर्वशाय
७ श्रीनिर्वाणनाथाय नमः
(१२) धातकीखडे पूर्घऐरवते अतीत जिन
चोवीसी पांय कल्याणक
४ श्रीसौदयसर्वज्ञाय
६ श्रीत्रिविक्रमअर्रते
.
-
नमा
नमः

नमा धीत्रिधिकमनापाय नमः ६ श्रीप्रिषिक्रममर्यशाय नमा ७ श्रीनरासिंघनापाय (२०) पालकीह पूर्वपरतिक्षेत्र पर्तमान जिन पापीमी पाग कस्पाणक १८ श्रीकामनापाय १९ श्रीमतोपितहते नमा १९ भीमतोषितनाधाय नमा १९ भीमगोपितमयज्ञाय नमा २१ श्रीनेमनमशाय (२१) पातकीरा पूर्वपरयनक्षेने अनागत जिन पोयीसी पाप फल्याणक ४ थीमुनिनाथसर्यशाय नम ६ श्रीपद्रवाईते ६ श्रीचंद्रदाहनाधाप ६. श्रीचद्रवाहमर्षमाय नम ७ श्रीदिलादिस्पनाथाय नम (२२) पातकीरोठे पाश्चमऐरवतक्षेने अतीत जिन घोषीसी पांच कल्याणक ४ श्रीपुरखसर्वशाय ६ भीअपपोषणाईते नमा . नम १ A- नमः H

(१०७)
R
३
7
4
नमः
६ श्रीअवयोधनाधाय
६ श्रीअवयोपसर्वज्ञाय नम,
७ श्रीविक्रमंद्रनाथाय नमः
(२३) घातकी पाविम परबतक्षेत्रे वर्तमान जिन
योयीमी पांच कल्याणक
१८ श्रीनदिकेशनाथाय नमः
१९ मीटरअर्हते नमः
१९ श्रीहरनाथाय
१९ श्रीहरमर्वताय
२१ वीसुशांतसर्थताय नमः
(२४) घातकी पाश्चिम रक्तक्षेत्रे अनागत जिन
'चोधीमी पांच करगणक ।
४ भीमहामृगेंद्रमशाय नमः
६ भीअसोधितमाहत नमः
६ श्रीअसौचित्तनाथाय नमः
६ भीअसोचितसर्वज्ञाय नमः ।
७ श्रीधर्मेंद्रनाथाय
(२५) पुष्करा रक्तक्षेत्रे यतीत जितः
चोवीसी पाच कल्याणक..
४ श्रीअष्टाहिकसर्वहाय नमः
M
.
.

4-
.
A
६ श्रीषणिकणहते
६ श्रीयणिफनाथाय नमा
६ भीषणिकसर्वज्ञाय नम
७ यीउदयशासनाधाय नमः
(२५) पुष्कराई पूर्व ऐरक्तक्षेत्रे वर्तमान जिन
चोवीसी पांच कल्याणक
१८ भीखेमतनाथाय नमः
१९ श्रीसायफाक्षाहते नमः
१९ भीसायफाक्षनाथाय नमः
१९ श्रीसायफाक्षसर्वज्ञाय नम'
२१ भीतमोकवनसर्वज्ञाय नमः
(२७) पुष्कराद्ध पूर्वएरेवतक्षधे अनागत जिन
चोपीसी पांच फल्याणक
४ श्रीनिर्वाणसर्वज्ञाय नमः
६ श्रीरविराजहिते
मम.
६ श्रीविराजनाथाय
६ भीरषिराजसर्वज्ञाय नम
७ श्रीमथमनाथाय * नमा
(२८) पुटकरा पश्चिम ऐरवातक्षेत्रे अतीत जि
घोषीसी पाच कल्याणक
-
-
+
"

. . - -- 1 I -1 चोवीसी पांच पयाणका ४ मीप्रवदसर्वज्ञाय नमः ६ श्रीकृटिल ग्रहते श्रीकुटिलनाथाय ६ श्रीकुटिलमर्वज्ञाय नम' -७ भीवदमाननाथाय (२९) पुष्कराई पश्चिमे ऐरवतक्षेत्रे वर्तमान जिन चोवीसी-पांच फरयाणक, १८ श्रीविषफनाथाय नमः १९-श्रीधर्मचद्रअर्हते नमः १९ श्रीधर्मचद्रनाथाय नमः १९ श्रीपर्मचद्रसर्वज्ञाय नमा- २१-श्रीनदिकेशस्यज्ञाय नमः । (३०) पुष्करार्द्ध पश्चिम ऐरषतक्षेत्रे अनागत जिन ४ भीकलापसर्वज्ञाय नमः ६ श्रीविमोमअईते ६ श्रीविमोमनाथाय, नमः ।। ६ श्रीविसोमसर्वज्ञाय, . नमः ७ श्रीआरन्पनाथाय , इति मौनपकादशी १५० गुणणो।" नमः ।। - नमा MAM पोषवदि १० दशमी तपनु अधिकार मा तप पोषयदि ण्टले गुजराती मागशरवदि १० दिवसे थाय छ, केमके ते विषसे भीपार्श्वनाथन जन्मफल्पाणफ छ, तेमा प्रथम नवीने दिवसे साफरना पाणीनु ठाम चोधिहार एकासशु करयु दशमने दिवसे ठाम घोविहार क्षीरनो एकामणु करयु इग्यारसने दिवसे दिवसे एकासणु करयु, ते दिवसे परिक्कमणो देवपूजा करवी, ब्रह्मचर्य पालघु शक्ति होय तो पोषो करयो, आतप १० वरष दश मास सुधी हरेक दशमने दिवसे एकासणु कर आतप करनार सूरवत्सनी माफक मा लोक परलोक विपे सुखी थाय छे, अनुक्रमे मोक्षना सुख पामे, दशमीने दिवसे (श्रीपार्श्वनाथ महंते नम' ) आप- वनी १०वीश माला फेरवी अरिहतना पार गुण होषाथी १२ साथीया१२ खमासणा १२ प्रदक्षिणा १२ लोगस्सनो काउस्सग फरवो, उजमणामों जान- दर्शने चारित्रनी दश दश वस्तु समजवी अथ मेरु तेरसतपनो आधिकार आ सपनो माधयदि गुजराती पोषवादि १३ तेरसने दिवसे आरम थाय छे, ते दिवसे श्रीरुष- 4

ग
अथवा प्रागट पाउर रोहिणी नक्षत्र माचे स्पारे
भदेवनु निर्वाण कल्याणक थयुं थी ए दिवस
नु महात्म्य घणु मोटु छे, ते दिवसे चउविहार
उपवास करयो, शक्ति न होय तो तिविहार करतो
रत्नना सोनाना चांदीना अथवा घीना पाच मेरु
करवा, ते मेरु पारे दिशामा चार अने तेना बीचमा
एक मोटो मेरु फरवो, जो गाममां बाजा गाजा
सहित फेरायु होयतो, ते मेरुने पालमा राखीने
फेरवीने देरासरमा जइने धारे दिशामां तथा एक
पीपमा नदावर्त साधीया (गुहली) पांच करीने
तेना उपर मुकीने दीप प प्रमुखथी पूजा करवी,
मा तप तेर मास प्रथया तेर यरस सुपी करवं,
दियसे [ श्रीरुपमदेव पारगताप नमः या पदनी
२० पीसमालागणवी साथीया खमासणा प्रदक्षिणा
काउँस्सग्ग यार पार करवा
अथ रोहिणी तप आधिकार
आ तप रोहिणी नक्षत्रमा थाप थे, तेथी ते
रोहिणी तप कहेपाय छे, ते तप अक्षय तृतीया
सरू धाय छे, ते सप मायामुपश्यत्वामीनीजापूर्वक
सात घरस सात मास सुधी थाप छमासा

। पारे रोहिणी आओ,त्यारे उपयास आँधील अथवा एकाशणाथी ते तर करवी, कदाच भूल थइ जाय तो पायो फरथी करयो, देवपूजा प्रतिक्रमण देव- बदन शीलात प्रादि क्रिया करवी, उजमणामां रूप्य सुवर्णमय अशोकवृक्ष आदि करवो, मा नपथी अक्षयसुग्व मीले छे [ श्रीवासुपूज्यसर्वज्ञाय नम ] मा पढनी वीशमाला फेरवची साथीया खमासणा काउस्सग प्रदक्षिणा पार पार जाणवा, ॥ अथ सोलीया (कपाय जय) तपनी विधि मोधी मानरमाया लोभ आचार कपायना सोल भेद पाय छ पधा अनंतानुषधी,४ अप्रत्याश्यांनी४ प्रत्याख्यानी४ सज्वल आ फायने जीताने चार ओली करवी, यथा पहेले दिवसे एकासणु, धीजे दियसे नीवी, प्रोजे दिवसे आपील, चौथे दिवसे उपवास करवाची एक ओली पुरी धाय छे एवी रोते ज्यार ओली करवाथी १६ दिवसे आतप परो थाय , आतपपूर्ण धया पाद ज्ञानपूजा पूर्वक १६ मोदक फलफुल आदि अष्टद्रव्यथी जिनेश्वरनी पूजा करवी, [ सर्वकपायजप तपसे नमः] एनी दररोज २० धीशमाला गणरी अने साथीया विसर्व सोल सोल करवा, प्रतिक्रमणु देववदन आदि मिया हमे- सानी माफक समजवी, ॥ अथ पखवासो तपविधि ॥ आभार्दने गुरू पासे तप ग्रहण करे, पछे सुदि एकमपी लगाची पूनम सुधी १५ उपवास भेगा फरे पनर उपवासनी शक्ति न होय तो प्रथम मुदि पक्षनी एकमें उपवास करवो, पछे यीज मासे सुदि बीज, धीजे मासे सुदि श्रीज, एम अनुक्रमे पनरमे मासे पूनमनो उपवास करयो, त्यारे मा तप पूरो धाप छ, जे दिवमे उपवास होय ते दिवसे (श्रीमुनि मुक्तस्वामि सर्वज्ञाय नमः) मा पदनी २० माला गणवी, साधीया आदि पार पार समजवा, प्रति- क्रमण देववदनादि क्रिया सर्वे करवी ॥ अथ छमासी तपविधि ।। श्रीमहावीरस्वामीना शामनमा उत्कृष्ट उमासी (उपवास १८० नो) तप थाय छै तेथीतेने प्राधीन कसोपसी उपवास पातरीया पारणावाला कर- घा उजमणामां १८० साह फल विगो प्रभुने भागल रावया, तपस्यांने दिवाने (श्रीमहावीरनाथाय नमा) आ पदनी धीश माला साथीया विगरे,

पार करया, अपना शतरीया उपवास छमास सुधी
करना, तेमा उदगे खराय नहीं चोमामीनो एट्ठ
फाया, शर बरता छ तेजम पारणु पण छठे धाय
है, आ छमासी तपमा १० उपगम याप छ, देय
घदनादि क्रिया करवी, रीमे आठमामी तप
फरमोहोयतो आठमाम करापारमामीनप करयो
होपतो चारमास करग, पपीरातेप्रणमाम, मास
दोद प्राम पण समयो,
॥ अथ वरपीतप निधि ॥
श्रीम्पभदेवस्थामीन (गुजराती फागण')
यदि ८ मे दीक्षा रइने पीजा घरपनी अम्बातीजे
(चारमो उपवासे) पारणो का तेथी माने यरपी
तप कहे छ, पातप चैपदी आठमथी मरु करता
ग्रीजे वर्षे असानीजनो पूर्ण थाप छे, प्रारापमा एका.
तरीयया उपनाम फरमा, तप करतां पचली सखा-
नीजमा पारणो आवे तो ते दिवसे उपवास करयो
पण पारणो न फरयो, ले दिवे मे देवगुम्नी पूजा
पूर्वक सामीपत्सल फरीने पारणो करयो, तपस्याने
दिवमे (श्रीम्पमदेवनाथाय नम ) या पदनीधीश
माला परवी, माधीया विगेरे यार पार समजधा

m
.
है
.
(पीजीरीत) श्री स्पभदेव स्वामीना शास.
नमा उत्कृष्ट तपस्या पार मासनी होयाथी पावा-
श्रीजे एकातरीया उपवास मरु करीने वीजे वरपे
श्राखात्रीजनो पारणो करे बाकी विधि उपर
प्रमाणे-
हालमा मा तप करमानी प्रचार प्राप्रमाणे छ
चैत्रपद ८ ने दिवसे उपयासथी सम की एकातरे
पारणे यासणु करी तेर मान मने अगीयार दिवमे
एटले अखात्रीजे पारण फरे छे, पारणे १०८ घडा
सेलहीनो रस अथवा माकरनो पाणी पीछे,
[घटो रूपानो घणो नानो बनाये छ ]
आ तपमा चउदशनो पारणी न करता जोहरा
तेम त्रण चोमासी (१४-१५) ना उठे कम्पा जोइण,
अने छवटे छठयो ओछे तपे पारणु न कर जोइए,
मेलहीनो रम पे पोर परे अभक्ष्य थाय छ तेथी
ताजो वापरचो, उपरामने दियमे देववढनादि
क्रिया काची
अथ ०८लब्धी तपविधि
आ तप एक एक रब्धिनो एक एक एकांतरीया
उपवास करपाची अट्ठाधीस उपवासे परो थाय ,

"
अने जे लन्धिनो उपवास चारतो होय, ते लधिनी
२० माला फेरयी, अने देयवदनादि फिया फरवी
आ तपस्या फरवायी आणद थाय छे अथवारागट
२८ आपोज २८ निधी अथवा २८ एकास णाधी
पण आतप थायये
॥ २८ लब्धिनो गुणणो ॥
१ श्रीआमासही
लम्धये नमः
२ पीवीपोसही
३ श्रीखेरीसही
४ श्रीजलोसही
७ श्रीसम्वोसही
६ श्रीसभिन्नसोयोसही
७ श्रीअवधि
लब्धये नमः
८ श्रीम्जुमद
९ भीविपुलमा
१. श्रीचारण
११ श्रीआसीरिस
१० श्रीकेवल
१३ श्रीगणधर
१४ श्रीपूर्वधर
"

.
विगरे कोष्टमां देखवा देवपदनादि सर्व ।
12
सभी हित
२ श्रीस्वनि
२७ श्रीवरदेव
१८ श्रीपासुदेव
१९ श्रीमनाप्रव
श्रीवाद
२१ श्रीपदानुसार
१२ श्रीर्यायवृद्धि
श्रीनशॉटेल्या
९.श्रीमाहारक
१५ मीमीतलेल्या
२१.श्रीत्रिय
२७ श्रीमीणमानमी
२८ श्रीपुलाक
॥ अय १४ पूर्व तनिधि
आ धउद पूर्वनी तपस्या एकातरीश घउद १४
उपस पूरा करवायी थाप हे, जे दिन पूर्व
उपवास होय, ते दिवसे ते पूर्वनी माला
आ तप सुदि १४ थी मर करवा, असा
1
रचये नमः इति
H
गणे,
रखी तप पूर्ण थया उजमगो शान पचमी
A

- ५ श्री ज्ञानप्रवाद " (११८) जाणवो अथवा लागट १४ आंबील १४ निधी १४ एकासणाधी पण आतप थाय छ अथ १४ पूर्वनो गुणणो आदि सा ख लो माला १ भाउत्पाद पूर्वाय नमः (१४-१४-१४-२० २ श्रीअग्रायणी २६-२६-२६-२८ ३ श्रीवीर्यप्रवाद १६-१६-१६ २८ ४ अस्तिप्रवाद २८-२८-२८-२ १२-१२-१२-२० ६ श्री सत्यप्रवाद २-२-२--२८ ७ श्रीजात्मप्रवाद १६-१६-१६-२० ८ श्रीकर्मप्रसाद ३०-३०-३०-२ ९ श्री प्रत्याख्यानप्रवाद, २०-२०२०-२० १. श्रीविद्यापवाद १५-१५-१५-२० ११ श्रीअघिध्यप्रवाद १२-१२-१२-२= १२ श्रीमाणावाय पूर्व य नम १३-१३-१३-२० १३ श्रीक्रियाविशाल ३०-३०-३०-२८ १४ श्रीलेफयिंदुसार २५-२५-२००८ अथ तिलक तपविधि आ तप घीश उपवासे पुरोथाय छेतमा श्रीरंप- भदेवस्वामी सपन्धी ६ छ उपचास करे, पछे शप- " " तनाय आदि पानीस तीर्थकरों मयन्धी एक एक उपवास करे अने महावीरस्वामी सम्बन्धी वे उप- वास करे गुणणो जे तीर्थङ्कर सम्पन्धी उपवास होय तनो गुणणो करे, साधिया गिरे धारपार, देवयं- दनादि सर्व प्रिया करे, गुणणो २ श्रीरुपमदेव सर्वशाय नमः २ श्रीअजितनाथ ३ श्रीसभरनाथ ४ श्रीअभिनंदन ॥ श्रीसुमतिनाथ १ श्रीपद्मप्रभु ७ श्रीसुपार्श्वनाथ १८ श्रीचंद्रप्रभु । ९ श्रीसुविधिनाथ, १. श्रीशीतजनाथ ११ श्रीश्रेयासनाथ १२ श्रीगसुपूज्यस्वामी १३ श्रीविमलनाथ १४ श्रीअंनतनाथ श्रीधर्मनाथ " " " -- " -

"
"
.
(५२०)
१६ श्रीशातिनाथ
१७ योपुयुनाय
१८ शीअरनाथ
१९ श्री मल्लिनाथ
२० भी मुनिसुबत
२१ श्री नमिनाथ
२२ श्री नेमिनाथ
२३ श्री पार्श्वनाथ
२८श्री महावीर
।। अथ ४५ आगम तपविधि ।
आ तप ४५ उपयास करवाची पूरो थाय छे,
ध्या सपना उपवास एकांतरीया अथवा ज्ञानादि
विधीमा छटा छुटा पण पाय छे, ४५होय ते सूचनी
प्रथवा ४५ ऑपीलनियी प्रथया ४५ जे सूत्रचालतो
४५ एकासणा लोगट करवाथी पण आतप धायचे,
धीश माला गणवी साधीया विगेरे कोष्टक प्रमाणे
जाणधा
प्रथम ११ अग गुणणो
सा खलो माला
7

. (१२१) २ श्रीसुगडांगसूत्राय नमः २३-२३-२३-२० ३ श्रीठाणागसूत्राय नमः १०-१०-१०-२० ४ श्रीसमवायांगसूत्राय नमः१०४-१०४-१०४-२० ५ श्रीभगवतीसूत्राय नमा.. ४२-४२-४२-२० ६ श्रीज्ञातागंसूत्राय नमः १९-१९-१९-२० ७ प्रीउपाशकदशांगसूत्रायं नमा १०-१०-१०-२० ८श्रीअंतगडदशांगसूत्राय नम १९-१९-१९-२० ९श्रीअनुत्तरोधवाइसूत्राय नमः २३-२३-२३-२० १० श्रीपन्नावागरणसूत्राय नमः १०-१०-१०-२० ११ श्रीविपाकसुत्राय नमः २०-२०-२०-२० बार उपाग १२ श्रीउववाइसूत्राय नमः २३-२३-२३-२० १३ श्रीरायपसेणीसूत्राय नम ४२-४२-४२-२० १४ श्रीजीवाभिगमसूत्राय नम १०-१०-१०-२० १५ श्रीपन्नवणासूत्राय नमः ३६-३६-३६-२० १६ श्रीजनूदिवपन्नत्तीसूत्रायनमा५०-५०-५०-२० १७ श्रीचदपन्नत्तीसूत्राय नमः ५०-५०-५०-२० १८ श्रीसूरपन्नत्ती १५७-५७-०७-२० १९ श्रीकप्पिया १०-१०-१०-२० २० श्रीकापवाडिसिया १०-१०-१०-२० २१ श्रीपुफिया १०-१०-१०-२० v . " "

(१२२)
२२ श्रीपुप्फचूलिया
२३ वहिदशा-
१०-१०-१०-२०
'१०-१०-१०-२०
६ छ छेद सूत्र
२४ श्रीव्यवहार सूत्राय नमः २०-२०-२०-२०
२५ श्रीरकल्प
२१ श्रीदशाश्रुतस्कंध, १९-१९-१९-२०
२७ श्रीनिशीथ
१६-१६-१६-२०
२८ श्रीमहानिशीथ ४२-४२-४२-२०
२९ श्रीजीतकल्प
३५-३५-३५-२०
१०पयन्ना
३० श्रीचउसरणपयन्नासूत्रायनमा१०-१०-१०-२०
३१ श्रीसधारापयन्ना 1 १०-१०-१०-२०
३२ श्रीतदुलपयन्ना १०-१०-१०-२०
३३ श्रीचदाविज्झा
१.-१०-१०-२०
३४ श्रीगणिविज्जा २१०-१०-१०-२०
३५ भीदेविंदधुओ
१०-१०-१०-२०
३० श्रीगीरथुओसुत्राय नमः १०-१०-१०-२०
३७ श्रीगच्छाचार
१०-१०-१०-२०
३८ श्रीजोतिसकरडक १०-१०-१०-२०
३०. श्रीमहापचक्याण , १०-१०-१०-२०
"
"

(१२३)
N
m
४ मूलसूत्र
४० श्रीमावश्यकसूत्राय नमः ३२-३२-३२-२०
४१ श्रीउत्तराध्ययन
३६-३६-३६-२
४२ श्रीओपनियुक्ति १०-१०-१०-२०
५३ श्रीदशवैकालिक १४-१४-१४ २०
॥वे छुटक सून॥
४४ श्रीअनुयोगद्वारसूत्राय नम,, ६२-६२-६२-२०
४५ श्रीनदी
"५१-५१-५१-२०
११ गणधर तप
या तप दरेक एक एक गणधरनी एक एक
उपवास अथवा लागट आयील निवी अथवा एका
सणो करवाधीपूरो-थाय छे तेमा जे गणधर नो
उपवास होय ते दिवसे ते गणधरनो जाप २० माला
नो करवो, अने साधीया विगेरे इग्यार इग्यार सम
जवा बीजी किया विधि सरखी करवी,
गणधरनो जाप'
१.श्रीइन्द्रभूति
'गणधराय नमः
२ श्रीअग्निभूति
३ श्रीवायुभूति
Tim
४ श्रीव्याभूति
५श्रीसुधर्मा
"
1

करना । पीछे एकातरीया ६० उपवास करके ऊपर
एक अट्टम करना | सप मिलाके ६६ उपवास होते
हैं। ६३ पारणे होत है।
दूसरी रीति से पहिले दिन उपवास दूसरे
दिन एकासणा, तीसरे दिन 'ठाम घोविहार एक
दाणा का आपील करना । चौथे दिन एकला ठाणु
(चोविहार एकासणु) कम्वु । पाचौ दिवसें ठाम
घोविहार एक दत्ती (एक यखते,माणामा पडलुज
खाते) नु एकसणो करयो । छटे दिवसे लुखी
नीवी, सातम दिन आषील, आठमें दिन अठ कवलनु
एकसणो करयो । इस प्रकार आठ दिनमें यर तप
पुरा होता है। साथिआ वगेरा जितने जिस कर्म
की प्रकृतिए हैं उतना ही करना ।माला २० गिनना।
उजमणा मे मूल आठ कर्म उत्तर प्रकृति १५८
होने से रूपा का एक वृक्ष कराता वह भी आठ
शाखा प १५८ पानड़ा सहित कराना | उसके मूल
में कर्मरूय वृक्ष को छेदन हेतु सोना का कुहाडा
तैयार कराना जिस दिन जो कर्म का तप चल उस
दिन घोही गुणना आदि करना।
गुणणो-
खिलो साभाला
१ श्रीअनत ज्ञान गुणधारफायनमा५-५-५-२०
-

। - (१२७) २ श्रीअनत दर्शन r७-७-७-०२० ३ श्रीअव्या षाघ २२-२-२-२० ४ श्रीक्षायिक सम्यत्तच ६२८-२८-२८-२० ५श्रीअक्षय स्थिति: ६ श्रीअमूर्ति १०३ १०३-१०३-२० २-२-२-२० ८ श्रीअनत वीर्य, ७ श्रीगुरु लघु .. चदन वालानो अट्ठम तप विधि कोई भी दिवस यह पट्टम तप किया जाता, है पारणे के दिन उड़द के पाकले मुनिराज को बहरा कर उसी का स्वय भी पारणा करे। पारणे आयपील का पक्षक्खाण करे । ठाम चौविहार करे । इस तप के पारणे पर रूपा की सुपडी में ने खुणे उडद के पाफहे भरके वोहरावे रूपानाणा से गुरु की पूजा करे । बहराते वखत पगमें तथा हाथमे सुतर की अथवा रेशम की आटी डालना । इस तप में (श्री माहवीरनाथाय नम ) इस पद की २० माल्। व, साथिया बगेरा १२-यारा। ॥ अथ पचकल्याणक तपविधि - नर्पमा परो-धाय छ, अनेर 5 -- Fr आतप (१२८) आपील नीची अथवा एकासणा थी आतप कराय छे, एक एक फरयाणकनो एक एक उपवास करवो जे तिथिये पक, पे, प्रण, चारफे पांच कल्याणक होगतो, ते तिथिये प्रतिवर्ष एक एक उपवास करीने नप पुरो करपो जे कल्याणकनो उपवास चालतो होय तेनो गुणणो २० माला साथीया काउस्सग विगेरे पार पार जाणवा, बीजी क्रिया नित्यक्रिया माफक पचकल्याणकनु गुणणो तिथि कार्तिक (गुजराती भासो) वदि कल्याणक ५ श्रीसभवनाथ सर्वज्ञाय नम केवल १२ श्रीपद्मप्रभ अर्हते नम. जनम १२ श्रीनेमिनाथपरमेष्ठिने नम १३ श्रीपद्मप्रमनाथाय नमः .) श्रीमहावीर पारगताय नमः ' मोक्ष कार्तिक सुदि ३श्रीसुविधिनाथ सवज्ञाय नमः केवल १२ श्रीमरनाथ सर्वज्ञाय नमः मागशीर (गु० फार्तिक) यदि ५ श्रीसुविधिमहत नमा '६ श्रीसुविधिनाथाय नमः . . दीक्षा चवन । दीक्षा । केवल - . - दीक्षा मोक्ष जन्म मोक्ष दीक्षा दीक्षा केवल ११ श्रीमहावीर नाथाय नम. ११ श्रीपमप्रभ पारगताय नमः मागशीर सुदि १० श्रीभरनाय अर्हते नमः १. श्रीअरनाथ पारगताय नमः २१ श्रीअरनाथनाथाय नमः ११ श्रीमल्लिनाथ भाईते नमः ११ श्रीमल्लिनाथ नाथाय नमः ११ श्रीमल्लिनाथ सर्वज्ञाय नम: ११ श्रीनमिनाथ सर्वज्ञाय नम १४ श्रीमभयनाथ अहंते नमः १५ श्रीमभवनाथ नाथाय नम: पोष (गुरु मगशीर ) यदि १. श्रीपार्श्वनाथभाईते नम ११ श्रीपार्श्वनाथनाथाय नम १२ श्रीचद्रम अर्हते नम १३ श्रीचद्रमभनाथाय नमः १४ श्रीशीतलनाथ सर्वज्ञापनम पोष सुदि ६ श्रीविमरनाय सर्वज्ञाय नमः १श्रीशातिनाथ केवर जन्म दीक्षा जन्म दीक्षा जन्म दीक्षा । । केघर " (१३०) ११ श्रीअजितनाथ १४ श्रागिरदन च्यवन जन्म -दीक्षा मोक्ष केवल केवल माघ (गु० पोप) यदि ६ श्री रमप्र म परमेष्ठिने नमः • श्रीपालनाय अर्हते नमः १२ आशीतलनाथ नाथाय नमा १३ श्रीमपभदेव पारगताय नमः .)) श्रीश्रयासनाथ मज्ञाय नम माघ सुदि २ श्रीअभिनन्दन अर्हने नम २ श्रीवासुपूज्य सर्वज्ञाय नम श्रीविमरनाथ अरते नम ३ श्रीधर्मनाथ महेने नमः ४ श्रीविमरनाथ नाथाय नम ८ श्रीमजितनाथ महते नम ९ श्रीअजितनाथ नाथाय नम १० श्रीअभिनदन नाथाय नम १३ श्रीधर्मनाथ नाथाय नमः फागण (माघ) वदि ६ श्रीसपार्श्वनाप सर्वज्ञाय नमः । दीक्षा जन्म दीक्षा दीक्षा તીક્ષા 7 । केवल TO मोक्ष घर च्यवन केवल जन्म केवल दीक्षा दीक्षा ७ श्रीसुपार्श्वनाथ पारगताय नमः '६ श्रीचप्रम मनाय नम श्रीसुधिधिनाथ परमेष्टिने नम ११ श्रीरषदेव सर्यज्ञाय नमः १२ श्रीश्रेयांसनाथ अर्हते नमः १२ श्रीमुनिसुन सर्वज्ञाय नम १३ श्रीप्रेयांसनाथ नाथाय नम १४ श्रीवासुपूज्य अति नम ०)) श्रीयासुपूज्य नाथाय नमः फाल्गुन सुदि २ श्रीनाथ परमेष्टिी नमः ४ श्रीमशिनाथ परमठिने नमः ८ श्रीसमरनाथ परमेष्ठिने नमः १२ श्रीमदिनाथ पारगप्ताय नम १२ पोमुनिसुव्रत नाथाय नमः चन (गुरु पागण) पदी ४ श्रीपाना पामेदिने नमः ४ श्रीपाश्चना सर्पशाय नम ८ धीनाम परमेष्ठिानमा ८ श्रीपभदेव आम नमा ८धीपभदेय नाथाय नमा व्यवन मोक्ष दीक्षा हएयन केयल ध्ययन

-
१९३२)
मोक्ष
मोक्ष
चैत्र सुदि
३-श्रीकुथुनाथ सर्वज्ञाय नम
५ थीमजितनाथ पारणताय नमा
५ श्रीसभवनाथ पारगताय नम
८ श्रीमनतनाय पारगताय नम
• श्रीसुमतिनाय पारगताय नमः
११ श्रीसुमतिनाय सर्वज्ञाय नम
१३ श्रीमहावीर अहंते नम
१५ श्रीपद्मप्रभ सर्वज्ञाय नम
धैशाख (गु०चत्र) यदि
१ श्रीकृथुनाथ पारगताय नमः
श्रीशीतलनाथ पारगताय नमः
५ श्रीकुथुनाथ नाथाय नमः
६ श्रीशीतलनाथ परमेष्ठिने नमः
२. श्रीनमिनाथ पारगताप नम
१३ श्रीभनतनाथ नाथाय नमः
२४ श्रीभनतनाथ अहते नम
१४ श्रीअनतनाथ सर्वज्ञाय नमः
१४ श्रीकृथुनाथ अहते नम
वैशाम्ब सुदि
४ श्रीअभिनदन परमेष्टिने नमः
मोक्ष
मीक्ष
मोक्ष
दीक्षा
जन्म

मोक्ष जन्म दीक्षा व्यवन (१३३)- ७ भीधर्मनाथ परमेष्टिने नमः ८ श्रीअभिनदन पारगताय नमः ८ श्रीसुमतिनाथ अर्हते नमः ९ श्रीसुमतिनाथ नाथाय नम १. श्रीमहावीर मर्वज्ञाय नमः १२-श्रीविमलनाथ परमेष्ठिने नमः १३ श्रीभजितनाथ परमेछिने नमः जेठ (गु० वैशाख) बदि ६ श्रीअयांसनाथ परमेष्ठिने नमः ८ श्रीमुनिसुव्रत अहंते नमः ९ श्रीमुनिसुव्रत पारगताय नमः १३ श्रीशांतिनाथ अर्हते नमः २३ भीशातिनाथ पारगताय नमः १४ श्रीशांतिनाथ नाथाय नम जेठ मुदि ५ श्रीधर्मनाथ पारगताय नमः ९ श्रीवासुपूज्य परमेष्टिने नमः १२ श्रीसुपाश्वनाथ अाहते नमः १३ श्रीसुपार्श्व नाथाय नमः आपाढ (गु० जेठ) यदि ४ श्रीपभदेव परमेष्ठिने नमा मोक्ष जन्म 'मोक्ष मोक्ष पवन दीक्षा पवन मोक्ष दीक्षा । च्यरन मोक्ष मोक्ष V मोक्ष च्यवन जन्म ७ बीविमरनाथ पारगताय नमः • श्रीनमिाथ नाथाय नम अपाह सुदि ६ श्रीमहावीर परमेष्ठिने नम ८ श्रीनेमिनाथ पारगताय नम १४ श्रीवासुपूज्य पारगताय नम श्रारण (गु० अण) यदि ३ श्रीश्रेयासनाथ पारगताय नम ७ श्रीजनतनाथ परमेष्ठिने नम ८ श्रीनमिनाथ आईते नमः ९ श्रीकुथुनाथ परमेष्ठिने सम श्रावण सुदि २ श्रीसुमतिनाथ परमेष्ठिने नमः ७ श्रीनेमिनाथ महने नमः ६ श्रीनेमिनाथ नाथाय नम ८ श्रीपार्श्वनाथ पारगताय नमः १५ श्रीमुनिसुखत परमेष्ठिन नम:' मादरया (गु० श्राण) यदि ७ श्रीशानिनाथ परमेष्ठिो नम ७ श्रीचद्रप्रम पारगताय नन ८ श्रीसुपार्श्वनाथ परममिने नमः च्यवन च्यवन तीक्षा जन्म मोक्ष च्यवन ५ वययन मोक्ष च्यवन

माथीया आदि सतावीस मनावीम मो
-
जाता है। श्री गोननस्वामी की पूना कानी।इम
मकार १५ पूर्णिमा तक यार करना नाहियातप
झोली सहित गोतम स्वामी त महावीर मामी
के सन्मुग्व पात्र रखे आर माघु मुनिराज के पात्र
में खीर घोहराये। पीछे पार का पारस्य भी
करें । स्नानादि पूजन कराय 1 उपचार दिन
(श्री गोतमस्वामी नमा) हम पर की २० मारा
भादरवा सुदि
९ श्रीसुविधिनाथ पारगताय नम मोक्ष
आमो (गु भावा ) यदि
१३ श्रीमहावीर परमारने नम
गर्भापहार
.)) श्रीनेमिनाथ समजाय नम
केवल
आसो सुदि
१५ श्रीनमिनाथ परमेष्ठिने नमः
॥ अथ गोनम पात्र तप विधि ॥
इस तप में हरेक पूर्णिमा को उपयाम दिया
पूर्ण होने पर रूपा का पात्र यनवा उममें पीर मर
4
.
पचरगी नए
पाचजणा पाचपाच उपवासमाला,

पारधार उपवासमाला, पांच जणाणत्रण उपवास माता, पांच जणा पपे उपचासवाला, पांच जणा एक एक उपवासवाला, पधा सीसीने २५ जणा होवा जोहण, पधारे होय तो हरकत नहीं, अने छेले दिवसे सधा जणानो पारणो आववो जोहये। नवग्गी तप मा तपस्पामा ८१ जणा होया जोइये फेमके नव जणा नव नव उपवासवाला उतरता उतरता अनुमामे ला नव एक एके उपचासवाला ममजवा, पारणो एक दिवसे पधानो आयवो जोइये । आगील वर्द्धमान तप भासपमा एक आंबील करी उपवास पछी वे अपील करी उपवास पछी त्रण आपील करी उप- पास पावत् अनुक्रमे १०० सो आपील फरी उपवास करयो मा तपागट करे तो ४ वर्ष त्रण मास २० दिषसे पुरो थाय छे, मा तपशा करता प्रथम पांच ओली लागद करवी,मा तपमा हमेशां तपन दिवसे (नमो अरिहताण) आ पदनी २० माला अने साथिया विगेरे पार पार समजवा ।

+
म
(२३७)
अथ नदीश्वर तप विधि.
1 आसपात्रीनदीश्वरद्वीपमा ५२ शाश्वमा चत्य
आश्री ५२ उपवास करवायी पुरोधाय छ, ते पावन
उपवासो अमावास्याने दियमे करवामा छ,
श्रा तप दीवानी अमावास्याये शरु करवानो छ,
जे दिवस उपवास होय ते दिवमे (श्रीनदीश्वर
शाश्वत जिन चैत्याय नम ) मा पदेनी २० माला
गणवी, साधीया विगेरे पार पार समजया ।।
दर्शन तप विधि
मा तए एक अठम तप करवाथी अथवा एका
तरीया ३ उपवास करवायी धाय छ।
:
मा म एक अठम अषया एकातरीया प्रण
उपवासधी पुरो पाय छ ।
चारित्रं तपविधि,
, प्रामप एक अठम अथवा एकातीय प्रणा
उपवासपी पुरो थाय छ ।
. : मानणे सपनो गुणणो
प्रमाणे करो।
1
4
ज्ञान तपविधि:
m
-
, fa

1
धर्मचक्र तप...
प्रधम छठ करीने पारणा करयोपशामरीया
३० उपवास करवा, मरिहत पदनु गुणणु आदि
कर।
41
.
योगशुद्धि तप
मनोयोग आधी प्रथम दिवसे-नीधि पीजे
दिवस जातीर श्रीज दिवसे, उपवास करयो एवी
रीते वचन योगनी अने काययगनी ओलि करवी
पातपणे ओगए पुरोशाय छ, गुणणो २० मारा
साधीया समा० काउस्मग्ग३ प्रणवण करपा प्रथम
ओलीमा मनोयोगतपमेनम पाजी ओगमापची-
पागतपसनम श्रीजी ओलीमाकापपोगतपसे नमः
यामध्य वञ्जमध्य चाद्रायण तप
मा तपना पे भेद छ, सुदि एकमे एक कवल,
पीजे पे कवल, एक एक एक घलनी वृद्धि करवायी
पुनमने दिवसे १५पचर सेवा, यदि एकमें १५ कपल,
पछे एक एक कपल ओछो करवाची अमावास्याये
एक केरल रेयो, एक मासमा मा तप पूरी धाय ,
मा तपने यवमध्य चन्द्रायण कहेछ, पदिएकमें एक
M
an
-
+

ha
कंवल, पीजे पे कवल, एक एक एकनी वृद्धि करपाधी
अमावस्याय १५ फवल या सुदि कमै १५ कपल
मछ,एक. एक कवर ओछो करयाची पूनमन दिवसे
एक कपल ऐयो मा ता पण एक मासमा पुरा थाय
या तपने यजमध्य चादापण कहे थे।
- तीर्थकर वर्धमान तप
यहाप'एकांसणों नीवी आयपील अथवा
उपनाम से होता है इसमें प्रथम श्रीपभदेनस्वामी
का एकारण दूसरे अजितनाथ के २ एकामणे । एक
एक पासणी की वृद्धि परते चोयीसमें महावीर
स्वामी के २४कारणा वरना पीछे मशवीरस्वामी
का एक एकामा पार्श्वनाथजी फा दो एषामणा।
इस प्रकार एक एक कोसणा की वृद्धि करसे श्री
भाषभदेवस्यामी के २४ एकामेणा करें। इस प्रकार
एकताकर के २५ कामणे होते हैं। उपवास
आदि से यह तप करना हो तो ऊपर बताई विधि
के माफक २५ २५ उपयोग करें। बानरीया अथवा
छुटे उपयाम भी किये जा मस्त । जो तीर्थकर
का सप चलता ही उनका ही जाए करना याकी
मरिहत पेंद्र की तरह समझें।

(१४०)
परम भूपण तप
इस तपमें ३२ लागट आंधील करें। अपवा
एकातरीया एकासणावाला ३२ आयपीट करना।
गुणना आदि मरिहत पद की तरह ।
नीर्थकर दीक्षा तप
यह तप जिन जिन तीर्थकरों ने दीक्षा लेते
समय जो तप किया था पर सप एक ही साय अथवा
एकातरीया उपधाम में पूरा करने का है। धीमुमति
नाथ ने एकामणा करके दीक्षालीधी वास्ते पासणा
करना । श्रीवासुपूज्य स्वामी ने उपवास करके दीक्षा
ली थी इसलिये उपवाम और श्रीमल्लिनाथ और
श्रीपार्श्वनाथ ने अट्ठम पारके दीक्षा ली श्री वास्ते
अट्टम अथरा एकातरीया तीन उपवास वाफी २०
तीर्थरों ने छठ करके दीक्षा टीथी.इसरिये छह
अथवा दो उपवास करें । गुणने में जो तीर्थकर की
सपस्पा, घरती हो उन तीर्थकर के नाम के आगे
नाथाय नम जैसे श्रीपभदेव जाथाय-नम. पाकी
मरिहत पद की तरह समझें ।
तीर्थकर ज्ञान तप
यह तप जिन जिन तीर्थकरी के जिस जिस

करके मोक्ष गपे और बाकी २२- तीन एक ही साय अथवा एकांतीया छुटा उपवास से मोक्ष गये है। श्री महावीर स्वामी {१४१) तपस्या से केवलज्ञान प्राप्त हुवा है वह तप एक साथ अथवा एकांतरीया उपवास करने से पूरा होता है। श्री भाषभदेव, मल्लिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनामको केवलज्ञान अट्ठम तप से प्राप्त हुवा है इमसे अर्शन अथवा एकांतरीया उपवास करें- वासुपूज्य स्वामी को केवलज्ञान एक उपवाम से प्राप्त हुआ था इसस एक उपवास करें। पाकी १९ तीर्थकरों को केवल ज्ञान छ तपसे हुवा है इससे १९७४ अथवा एकांत- शया उपास करें। जिन २ तीर्थरों सप चलता हो उन तीर्थंकरों का गुणना करना जैस श्रीऋषभदेव सर्वज्ञाय नमा इत्यादि साथिया आदि मरिहत पद तीर्थकर निर्माण तप. इस तपमें जो २ तीयंकर जिस र तपश्चर्या से मोक्ष गये हैं घोर तप एक साप अथवा एकातरीया उपयाम करने से पूरा होता है श्रीपभदेव की तरह समझे। F- महीना अर्थात् में

.
--
T
Aur
M
*
मे यह तप पूरा होता है। साथीया आदि अरिहंत
पद की तरह जो तीर्थकर का गुणना चलता हो उन
तीयकर के नाम के आगे पारगताय नम. जोडे जैसे
श्री ऋषभदेय पारगताय नमः इत्यादि।
। चतुर्विध संघ तप
इस सपमें पहिले एक छट्ट करके पाद में एका-
तरीया ६. उपवास करना । गुणनो नमो तित्यस्त
२० माला साथिया विगेरा.६२ पासट समझें ।
"तीर्थकर च्यवन तप
पह तप एक एक तीयकर के च्यवन कल्याणक
आधी एक एक उपवास कान पूरा होता है।
पोखीम उपवाम एनरिया अथवा छुटा कराय छे
गुणने में जिस तीर्थकर का तप चलता हो उन तीर्थकर
के आगे परमेष्ठिने नम पर जोड़ना जसे ऋषभदेय
परमोधने नमः वामी मरिहत पद की तरह,
तीर्थंकर जन्म नप
पहसपाभीच्यवन कल्याणक की तरह समझें।
परतु गुणना अर्हत नया करना स किाश्री
भापमदेव अहस नमः।
-
,
4
2
7

A
-
(गुरु श्रावण) चदि यो सरूपरीने मादरया सुदी
५सुधी कराय छे तमां पहले दिघसे एकामगोबी
दिवसे नीची, चीजे दिवस आपिल, चौथे विमान
(४३)
संवत्सर तपः
एक वर्ष में चोयीस पावी सबंधी आलोपणा
* उपवाम श्रण चौमामी सपधी आरोषणा
के ६ उपयाम, संवर्ग मषधी आलोपणना पूर्ण
उपवास, मयं मीली ३३उपवास एकांतरीया प्रथया
हग करवाती मा तप ऐरोधाय छे गुणणो सवच्छर
पसनमः याकी अरिहत पद जेम |
पद्मासर तपओली
मा सपमा ओली एकांतरिया आट
माठ उपवामनी थाय छ एवी नव ओली करवायी
मा तपंपरों यायछे पधा मिली ७२ उपयाम याय
गुणणो आदि अरिहन पदनी जेम समजयो, मा
पसुदिनसमीधी सरु करयो।
समवसरण तप
मा तप ६ दिवसे पुरी थाय ऐ, मावरषा
,
उपवास
पीते पार ओली
.
.
1
।
चार
-

ग
८
२०
(१४४)
सापिया माला दिवसे
१ श्रीभावजिनाय नमः
२०
२ श्रीश्रुतसमयसरण जिनायनम ९ २०
श्रीमनापर्यवजिनाय नम,
४थीकेवलिजिनाय नमः
॥ दशविध यति धर्म तप
मा तप दश एकांतरिया उपवास करपापी
पुरो पाय छ अने सुदिमा शख्थाय के सपने दिवसे
गुणणु विगेरे १० माला मा प्रमाणे-
१क्षमागुणाधराय नम. २ मार्दवगुणवराय नमः
३ आर्जवगृणधराय नमः ४ मुक्तिगुणधराय नमः
५तपोगुणधराय नम ६ सयमगुणधराय नमा
७सत्यगुणधराय नम ८ शौचगुणधराय नमा
९ अकिंचनगुणधराय नमः१० प्रत्मचर्यगुणधराय नमा
पचपरमेष्ठी तप
पहेल दियसे उपवासपीजे दिवसे एकलठाण,
धीजे दिवसे आपील, चाप दिवसे एकासणु, पांचमे
दियो बीवी, छटे दिवसे परिमट्ट, अने सातम दिवसे
पेपासणु, एप्रमाणे सात दिवसानी,एक ओली वाप

एकांतरिया २५ वा वापर
समाप्त थार्य छे गुणणो आदि मानिमारका
पटलु विशेष छ वदि एकमालशे श्रमाचा
पूवीरीत पोच ओटी काया प्रीत
मोमा परी वाय ।
गुणों नमोमरिहताय मानिदान
नमोमायरियाण : नेमीउक्साशन
सन्यसाहूण]
। एफ एक ओलीमा गुपणो सादियापित
एक नवपदओलीमा फडेट प्रेमामे भयो भागमा
दिवस सुधी करवो।
साह
सुदरत
भातप ओठ एकांतरियावास का पार
मापील करवायी आठ उपवाम भान मात्र काहीन
मिलीने १५ दिवसे परो याप छ
स्या पुरो थाय छे.
भातप सुदिएकमयो शाम कार से पुनर्भ
'निरूकमिहत
उनु तप सर्वात सुंदर ती क्षेत्र समजबो पण
1.
सौभाग्य पद नप
-
-
स

L श्रीम दियममा पुरो थाय के क्षेत्र सुदी एकमनो आ पर वाय छे गुणणो अरिहत पदनी जेम अष्टापद पावडी तप ओली आतप ८एकासणा८नीवी८ आंधील अपवा८ उपवासथी पाय प्रसोचत्र सुविथी लाने पुनम सुधी ८ आठ एकासणादि करवाथी एक मोली पाय छे ण्वीरीते आठ ओली करवाथी ४ वर्षे मा तप पूरी याय छे गुणणो श्री प्रष्ठापदतीर्थाय नमः माला २० साथिया आदि ८ आठ अदुखदार्श सर्वसुम्ब सपत्ति तप आ तप मां पहले मासे मुदि १ बीजे मासे सुदि २ श्रीजे मुदि ३ एम बघता पनरमे मासे सदि १५ नु उपवास कराय छ एम १५ उपवास करवाधी १५ सुदि पखवाडे आतप पूरो धाप मरिहत. पदनु गुणणुआदि। कर्मचतुर्थ तपः आसप प्रथम अठम पछे एकातरिया ६० उप- पास पछे अतमा उपर एक अठम करवाची पूरो याप , आ तप आंतरा रहित करवो पधा ६६ उपवास पाय छे गुणणो भादिपरिहत पदनी जेम -- - (१४) कर्म चचाल तप आसप प्रथम मठम पगृहांतरिया ३४ उप पास उपर अठम तप कर वायी पुरोधाय पषा ७०उपवास पाय ये गुणणुआदि अरिहन पनी जम चत्तारि अठ दस दोय तप प्रथम चार पछे आठ पछे दशप से उपवास परवापी आतप पूर्ण पाप भी अपडताप नम, सापिया विगरे २४ एकातरिया युटापण उप- * पास पाय, गौतम कमल तप " +- आ तपमा नव उपवास एशंतरिया करवा पुणणो भीगीतमस्वामिने नम माधिया विगो संतापीस। सिंहासण तप आतप मा उपवाम ग्या, पांच पांच उपवासे पारणु होपरे, आ पावग सुदि. १२ भी सक याप के, भाववा सुदिनु पार पाप गुणाणु विगो ममव मरण तपनी पेठे ममजा + १९ उपवास - - मां चार चार होयछे, 1 1

((४८)
(गु० श्रावण ) बदि थी सग भादवा सुदि ५
पारण होय छ,
१० दश पञ्चाक्खाण तप
पहले दिवसे उपशम झीज दिवसे एकामण,
पीजे दिवसे एक दाणों जमलो, चोथे दिवसे नीवी,
पांच दिवसे एक कवल, छटे दिवसे सकल ठाणु,
सात में दिघसे एक दुत्ति, आठमे दिवसे आंबील
नयम दिषसे एक धारा दशमे दिवसे लखी नीषी,
गुणणु नमो सिद्धार्ण साधया विगैरे आठ आठ
घडीया घे घडीया तृप
आ तप मा लागट ६९ ठास चनु विहार परि
मह वाला प्रकासणा होप छ, पा घाडीया उपचार
(६ मीनीट मा आहार पाणी करी रेवते) अध
घडीया तप आठ (.१२ मीनीट मा आहार पाणी
फरी लेचुते ) एक घडीया तप १६ (२६ मीनीट मा,
आ०)प घडीया तप ३२(६८ मीनीट मा आहा)
पाच छठ तप
आ तप एका तरिया पाच छठ अने, पारणे
एकासणो करायी १५ दिवस मां परो याप छ,
तेमा प्रथम छह पारण पी.शाकर सहित,घउना.
.
,
-
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।
मादा नुं थाय छे, बीजा बहनु पारणु दुध शाकर
सहित चोखानु थायछ, त्रीजा छठनु पारणु झाली.
पादिक ब्रहोरावी ने भरे भापो प्यायछे, चोथा
पहनु पारण श्वानुनी पेठे जमवानु होय छे, पाचमा
मनु पारणुं पाणीनु लोदो, भरीने पीजाना वेत्रपा
घो जवु, त्यां, कोई जमवानु कहे तो जमीलघु, न
कहे तो उपवास करवा
अक्षय निधि तप
पर तप १६ दिन में पूरी होता है । भाद्या
गुज० श्रावण) यदी ४ में यह तप आरभ करें।
भादवा सूदी ४ (मवत्मरी समाप्त करें इसमें १५
"कासंणा और आग्विरी, दिन उपवास किया
| जाता है । इस तप के आरम, के दिन घर
देरासर में अषया उपासरे में जिन प्रतिमा स्थापित
की जावे, उनके मामने ककू अथवा केसर के चारों
तरफ सापये करके उनके ऊपर अक्षत (चावल)के
मधिये करें। चांदी अथवा ताये का कलसा केसर
का सापपा.काफे पांवल के साथिये पर रम्य । उस
फलको १३.दिन तक उठाना हिलाना नहीं ।
येसे ही सुद का.एक कलश अलग रसना हर एक

(१५०)
ध्यपने २ करश में हर रोज रूपानाणो, सोपारी
चांठी के फूल और चावल की एक मुठी डालें।
श्रीफल कलश के मुख पर रख के लाल अथवा पीले
बलमेलच्छ द्वारा पांध कर रग्व शक्ति होतो पहिले
और अतिम दिन रूपानाणा दोनों कलश में डालना
कम से कम एक पैसा हर रोज कलश में डालना
ही पाहिये।
भगवान की स्थापना में ११) अथवा ५|| रुपया
रखना । भगवान की जीमनी तरफ १६ दिन तक
अखड दीपक चायल के साधीये पर रखना। भगवान
के सामने पाजोट पर श्री कल्पसूत्रजी रख कर हर
रोज बास क्षेप और रोकह नाणा से पूजा करना।
पहिले और अतिम दिन गुरू पास ज्ञान पूजा करें
खुद का व मूल फलश अगर अधुरा (खाली) होतो
आखिरी दिन चांवल से पूरा भर देना चाहिये।
खमा समा देकर अत देवता का एक नय
कार काउस्सग करके भूत देवता की स्तुनि कहें। .
पाच के दिन सुहागन स्त्रिये मस्तक पर कलश
रख के वाजा गाजा सहित नगर में फिर के देहरा
सर में भगवान के आगे कलशों को रखें।

सापीया खमाममणा, प्रदक्षिणा, काउस्मग माला हर रोज ज्ञान पद की तरह सप क्रिया करना पाहिये १६ दिन तक.शियल प्रत पालन करना, भूमि संपारे सोना देववदन दोनों राइम, पहिले हण चैत्य पदन करके पथकवाण पालना जीमने के पाद पेत्य वंदन करके पानी पाचं प्रतिकमण करें। सपारा पोरसी भणा के सोना । या तप४ ओली करवा पी ४ धरम में पूरा होता है। शाश्वत मेरु पर्वत तप आतपमा एक एक उली पांच पांच उपवास नी होय छे, पारणे पीपामणू फरयु, पाच उली कर- पाधी २५ उपधाम साधीया ग्वमासमणा काउस्सग । पांच पांच नवकार घाली यीम पीस गुणणो । १. जवुद्वीप सुमेरु शाश्वत जिनाय नम २ पात की खह पूर्व मेरु० ३ घात की गर पश्चिम मेर० । ४ पुष्कराध पूर्व मेरु०। ५. पुष्करा पश्चिम मेरु०॥ . . . केवली तप ६ आ तपमा २० आंपीट छलो एक उपचास

।
"
४
११५६)
हीय छ गुणणणो आदि अरिहत पद नीयैठे।
शाश्वत जिन तप
आ तर्प मा १४ अनपुन में छठ करवो, यदि
९ भने १४ सुदि ९ मन १४ उपवास करयो, साथी ।
या आदि अरिहंत पदनी पेठे पार वार, गुणणो आ
१ श्री चंद्रनिन सर्वज्ञाय नम
२ श्री योरिपेण
३ श्री प्रापभानन सर्वज्ञाय नमः
श्री वर्द्धमान
सिद्धि तप
आ आँ सपमा आठ उपवास सुधी एक एक
उपवास वधारता जर्नु, पंधी मीलों ने ३६ उपवास
होय छ, पारणं यापासणु करघु, सिद, पंदनी 4.
खैमासमणी साधीयो का संग्ग आठ आठ जा-
णवा, अने जेजे सिद्धनों गुण चाल तो हपि सेते
गुणनी माली २० गुणांधी।
मोक्ष करमेक तप ।
पहले दियमे उपवास, पाजे दिवस औपील, श्रीजे
दियमे नीवी, चौथे दियसे एकासणो, पांचमे दिवसे
पुरीमद, एक एक उली, ऐवी पांच उली करवा थी

-
"
आ तप २५ दिवसे पूरोधाय छे गुणणो आदि सिद्ध
पदनी पेठे जाणवु।
स्वर्ग करभक तप
आ तप मा लागट १२ एफासणा, नय नीवी,
पाच आषील, १ उपवास होय छ, आ तप २७
दिवस मां पूरो होय छे, गुणणो आदि सिद्ध पदनी
-
,
पेठे,!
17
रत्न' गेहण तप
आ तप मां उली पाच होय छे, प्रथम दिवसे
एकासणी, पीजे दिवसे नीधी, बीजे दिवसे आंपील
-चौथे दिवेमे उपवास, आ प्रथम उली यीज़ा मा
अनुक्रम में नीवी १ आयील २ उपवाम ३ एका
सणो ४.त्रीजी मा ऑपील १ उपचास २ कासणो ३
नीवी ४, चोथी मा उपवास, एकासगो २, नीवी
३ आवील ४, पाचमी मां एकसणो नायीरज
पील ३ उपवास ४, आतप २० दिवमे पूरी होय
छे, आसो सुदि ५ थी आरमवु, अर्ने ऋण परसे
पूरो होय छ, गुणणो आदि पर परमेष्टि पद भी
पेठे समझ

नव कमल तप
आ तप मां एकांतरिया आठ उपवास करवा
धी एक उरी होय छे ऐवी नव उली एक वरस मां
फरवी, उपवास ८१ होय छे, उजमणा मां जिनना
नष अगे नव कमल चडाववा, गुणणो विगेरे भरि
हत पदनी पठे,
सूरायण तप
मा तप निरतर यदि १ थी अमावश्या मुधी १५
आपील करवायी पूरो होय छे गुणणो विगेरे अरिहत
पद पेठे,।
९६ जिन तप.
आ तप मां एक एक तीर्थकर आश्री एक एक
उपवास करवाधी ९६ उपवास थाय छ ज तीर्थकरनो
उपचास घालतो होय तेनो गुणणो साथिया विगेरे
पार पार नही आवतो होय तो नमो भरिअताणनी
माला फेरवयी।
अतीत चोवीसी जिन गुणणो
१. श्री केवल ज्ञानि नाथाय नम'
२. श्री निर्वाणि
r
M
श्री सागर
"

७ " , " " ४. श्री महावश नाथाय नमः ५ श्री विमल , ६. श्री सर्वानुभूति " श्री श्रीधर ८ श्रीदत्त ९ श्री दामोदर श्री सुतेज श्री स्वामि श्री मुनी सुनत १३. श्री सुमति श्री शिवगति १५ श्री प्रस्ताग १६. श्री नमीश्वर १७ श्री अनिल २८. श्री यशोधर १९ श्री कृतार्थ २० श्री जिनेश्वर श्री शुद्धमति श्री शिवकर २३ श्री स्वदन २४. श्री समति " " 7 " " " . " " 4 " (१५६) वर्तमान चोवीसी जिन २५ श्री ऋषभ देव नाथाय नमः"! श्री अजित M २७. श्री सभव २८ श्री अभिनदन २० श्री सुमति श्री पद्ममम श्री सुपार्व श्री चद्रप्रम ३३ श्री सुविधि ३४ श्री शीतल श्री भेयांस ३६ श्री वासु पूज्य श्री विमल ३८ श्री अनत ३९ श्री धर्म श्री शांति " . " " भी कुथु श्री अर . भी मधि ४४ भी मुनी सुग्रत -- । ४५. श्री नमी नाथाय नमः ४६ श्री नेमी ४७ श्री पाच ४८. श्री महावीर अनागत चोवीसी जिन । ४९ श्री पद्मनाम नाथाय नमः। ५०. श्री सुरदेव ५१. भी सुपार्श्व ५२ श्री स्वय प्रम ५३ श्री सर्वानुभूति श्री देवश्रुत ५५, श्री उदय ५६ श्री पेढाल ८७ थी पोहिल " " " . " ५८ थी शत कीर्ति श्री सुव्रत " ६० श्री अमम श्री निष्कसाय भी निप्पुलाक ३ M " " ६३ श्री निर्मम " श्री चित्रगुप्त ग " , " " " ६५ श्री समाधि नाथाय नमः ६६ श्री सवर ६८ श्री यशोघर ६८ श्री विजय श्री मात्रि भी देय ७१ श्री प्रनत ७२ श्री भडकर वीश विहरमान जिन ७३ श्री सीधमर स्वामिने नमः ७४ भी युग मघर श्री बाऊ ७६ थी सुपाऊ श्री सुजात ७८. श्री स्वय,प्रम ७९ श्री अपमानन ८० श्री सूरमम श्री विशाल ८३, श्री यमघर ८४ श्री चद्रानन " " , । भी अनत वीर्य . " " १ "

.
-
cs IM
८८ श्री
+
पोनर बाटो खोप माना अपपा ममो
मालो गुमोमाधियादि अरिद artml
१ जाप महा विदेह २२ ॥
"+
१ श्री जयदेव
२ श्री कर्ण भद्र
7
" र
सहाय!

"
(१६०)
३ श्री लक्ष्मी पति सर्वज्ञाय नम
४ श्री अनन हर्ष
५ श्री गगाधर
६ श्री विशालचद्र
७ श्री प्रियकर
८ थी अमरदत्त
२ श्री कृष्णनाथ।
१० धी गुणगुप्त
११ थी पद्मनाभ
१२ थी जलघर
१३ श्री युगादीश
१४ भी वरदत
१५ श्री चन्द्रफेनु
१६ श्री महाकाय
१७ श्री अमरकेतु
१८ श्री अरण्य वास
१९ श्री हरिहर
"
"
२१ श्री शांति देव
२२ श्री मनत कृत् ।
२३ श्री गजेन्द्र
है
1

•४ श्री सागरचद्र' सर्पज्ञाय नम
१५ श्री लक्ष्मीचद्र
२६ श्री महेश्वर
२७ श्री ऋषभदेव
२८ श्री सौम्पकाति
२९ श्री नमि मद्र
३. श्री अजित मग ॥
३१ श्री महीधर
३२ श्री राजेश्वर
धात की ख़ड पूर्व महा विदेह-३२ जिन
३३ श्री वीर भद्र मयज्ञाय नम
३४ श्री घनसेन
३५ श्री नीलकट (नसीन कीर्ति)मर्वज्ञाय नम
३६ श्री वनकश (मुजफशि)
३७ श्री रुकमिक सर्वज्ञाय नमः
३८ श्री क्षेमकर
३९ श्री मृगांक
४० श्री मुनि.मुर्ति
४१ श्री विमल चद्र
४२ श्री आगमिक
४३ श्री पुष्पोत्तर (सुकृतनाप) सर्वज्ञापनमा
।

. - " ४४ भी घसुधानाय सर्वज्ञाय नमः ४५ श्री मल्लिर (महिला) नाथ, ४६ श्री पलमृत् ४७ श्री वनदेव ४८ श्री रेषाकित ४९ श्री आमृत पाहन " ५० भी पूर्ण मद्र (चद्र), ५१ श्री कल्पशाक ५२ श्री नरीन (नील) दत्त ५३ श्री विद्यापति ५४ श्री सुपार्श्वनाथ ५५ थी भानुनाथ ,५६ थी प्रभजन ५७ श्री वशिष्ठ ५८ भी जलप्रम ५९ षी महाभीम ६. श्री ऋषिपाल ६१ श्री कुडगदत्त ६२ श्री भूतानन्द ६३ श्री महावीर ६४ श्री तीयेश्वर " " न . " " " " "

"
"
"
घात की खडे पश्चिम महा विटहर
६५ श्री धर्म दत्त सर्वज्ञापन
६६ श्री भूमि पति
६७ श्री मेरुदत्त
६८ श्री सुमति मित्र
६९ श्री श्री पेण
७. श्री ममानद
७१ श्री पद्माकर
७२ श्री महो घोष
७३ श्री चन्द्र प्रम
७४ श्री भूमिपाल
७५ श्री सुमति पेण
७६. श्री अच्युत
७७ श्री तीर्थ भूति
७८ श्री ललिताग,
७९ श्री अमरचद्र
८० भी ममाधिनाय
८१ श्री मुनिद्र
८२ श्री मरेंद्र
८३ श्री शशांक
८४ श्री जगदीवा
.
है
२

"
८५। श्री देवेन्द्र
मज्ञाय नम
८६ श्री गुणना
८७ श्री उद्योत
1८ श्री नारायण
८९ श्री कपिल
९. श्री प्रकर
९१ श्री जिन दीक्षित,
९२ श्री मकलनाप
९३ श्री शिसारनाथ
९४ श्री प्रेघर
९५ भी सहस्त्रार (भे)
९६ श्री अशोकदत्त
५ पुष्कराधे पूर्व महा विदेह ३२ जिन
९७ श्री मेघ वाहन सर्वज्ञाय नमः
९८ श्री जीव रक्षक
९९ श्री महापुरुष
१०० श्री पापहर
१०१ श्री मृगांक
१०२ श्री नरसिंह
१०३ श्री जगत्पूज्य
१०४ श्री सुमतिनाथ
"

१
"
१०६ को मा महेंद्र मशार कर
१०६ को अमर भूति
१. श्री विशाल (कुमार)द्र
१०८ कापारि (धीर)
१०९ भी रमणनाथ
११. श्री स्वयम्
१११ श्री अचल
११२ श्री मकर फेतु
११३ श्री सिद्धार्य
१५ श्री मारनाथ
१५ श्री विजयदेव
११६ श्री नरमिट
११७ श्री सीतान
"
"
"
"
११८. श्री वृद्धारक
११९ श्री चद्रातप
१२० श्री चित्र (पद) गुप्त
(२१ श्री स्वरय
१२२ श्री महा या
१५६ श्री उमांक
"
१२५ श्री

"
१२६ श्री पुष्पकेतु सर्वज्ञाय नम
१२७ श्री कामदेव
१२८ भी समरकेतु
पुष्करार्धे पश्चिम विदेह ३२ जिन
१२९ श्री प्रसन्नचन्द्र सर्वज्ञाय नमः
१३. श्री महासेन
१३१ थी उघ्रनाम
१३२ श्री सुवर्ण
१३३ श्री फुरु हद
१४४ भी वनवीर्य
१३५ श्री थिमलपा
१३६ भी यशाघर
१३७ भी महापल
१३८ श्रीषनसेन
१३९ श्री भीमनाथ
१४. श्री विमल बोष
१४१ श्री मेरु प्रम
१४२ श्री भद्रगुप्त
१४३ श्री सुरक्ष
१४४ श्री सुव्रत
१४५ श्री हरिचद्र
।

" " - " १४६ श्री प्रीतीधर सर्वज्ञाय नमः १४७ श्री अतिश्रेय १०८ श्री कनक केतु १४. श्री आजित धीर १५० श्री फल्गु मित्र १५१ श्री ब्रह्म भूति १५२ श्री हितकर १५३ श्री वरुणदत्त १५४ श्री यशः कीर्ति १५५ श्री नागेन्द्र १५६ श्री महीधर १५७ श्री कृतवर्म १५८ श्री महेंद्र १५९ श्री वर्धमान १६. श्री सुरेंद्रदत्त जबूद्वीप भरतक्षेत्र १ जिन १६१ श्री अजित नाथ सर्वज्ञाय नमः जबूद्वीप एरवत क्षेत्रे १ जिन १५२ श्री चद्रनाय सर्वज्ञाय नमः धात, की खड पूर्व भरते १ जिन १६३ श्री सिद्धांतनाथ सर्वज्ञाय नम., " " " " " .

धात की खड पश्चिम भरते है जिन
१६४ श्री कर्पट नाय सर्वज्ञाय नमः
घात की खड पूर्व एरवत १ जिन
१६५ श्री जयनाथ सर्पज्ञाय नमः
घात की खड पश्चिम एरवते १ जिन
१६६ श्री पुष्पदत नाय सर्वज्ञाय नम
पुष्कराधे पूर्व भरते है जिन
१६७ श्री प्रभास सर्वज्ञाय नम
पुष्करा) पश्चिम भरते १ जिन
१६८ श्री प्रभाकर सर्वज्ञाय नम
पुष्कराधे पूर्व एरवते १ जन
१६० श्री आदिनाथ सर्व ज्ञाय नमः
पुष्कराधे पश्चिम परवते
१७० श्री पलमन्द सर्वज्ञाय नमः
देवल इंडा तपः
आ सपमा पेसणापांच, एकसमानावी नव
ओपोल पांच, एक उपयास शेप छे'२७ दिषसमों
श्रा तपपूरो थाप छे गुणणो नमो आरिहताण सा.
थियादि पार वार ।

"मोजे दिवसे एकासणो चोये दिवस नीची पांच
दिवसे आपाल आ एक ओली पाय ऐवी पांच
मा तपमा एकांतारिया व उपबाम
नमो शेण्सवसाहुणनो गुमको मौधिया
4
४
A
अष्टकमोत्तर प्रकृति तपEE
4. आठर्मनी उत्तर प्रनिटाहोपायी आ
सप १५८ उपवास करवायी पूरी पाय छ नेमा ज्ञान
धरणी कर्मना पांच, दर्शनावणी कर्मना न बदनी
कर्मना पे मोहनी कर्मना २८ प्रायुकिमना नाम
कर्मना १०३ गोत्र कर्मनार' अंतराप कर्मनापांच
उपवास करवा, पण ते एकांतरिया कावा, निमो-
सिद्धाणनो गुणणो करवो:माधिया विगो सिद्ध
पदनी जेम.
ym
पाच प्रचलखाण Mainine
प्रथमे दिवसे उपयाम पीजे दिवसे पासपो
.
*
मोरी करवाधी पचीस दिवसोमा आतप पुरोधाय
नोमिद्धाण गुणणो माया विणी पाठ आठ,
पचमहावत
Indian
"
मताधीम तपस्या पर
उजमणो करवा

(१७०) आगोष्टादशदीप शन्य जिनपश्चान्सुदेवो मम । त्यक्तारभ परिग्रह सुधिहितो घायमा मद्गुरु ।। धम. केयलिभापितो घरदयः कल्याणदेतु पुनरई- त्मिसु सुसाधुधर्मशरण भूयात्रिशुध्या भव ॥१॥ अर्थ-यथार्थ धक्ता प्रहार १८ दोपरहित जिनेश्वर एवा अरिहत मारा सुय छे, आरभ परि- ग्रह राहिस सूत्रने अनुसार क्रिया करनारावा माधु मारा सुगुरु छे, अष्टदयावालो कल्याणनो करनारों एयो केथलि भापित मारे सुधर्म छे, ज्या सुधी आ ममारमारहु, त्यां सुधीमारे शुद्ध मन पचन काया पी अरिस्त मिद्ध माघु अने केयी भापित धर्मनु शरणु थाओ॥१॥ भूतानागतवर्तमानसमये यददुप्रयुक्तर्मनी- चाफा ये कृतकारितानुमतिभिर्देवादितत्वत्रये ।। संघ प्राणिपुचाप्तवाच्यनुचित हिमादि पापास्पद । मोहाधेन मया कृत तदधुनागामि निंदाम्यहम्।।२।। अर्थ-अतीत भविष्य अने वर्तमान कालमा अशुद्ध मन पचन अने कायाधी पोते करवो पीजा पामधी करावधो करता होयतेनी अनुमोदना कर तत्व ने विषे चतुर्षिध सघने विषे अर्थ:-अरिहतोना अरिहतपणानी, सिदाना मिद्धपणाना, आचार्योना आचायपशाना पालार, 'श्रावृकपणाना, अधिरति मायकाना समरिया दनाकरछु अने, प्रशसा कम ससारेऽनमपास्वकमेवगाविस प्राणियोने पिप आप्त वचनने विषे मोथी अब - में में अनुचित फर्यु होइ, हिंसादि १८पापस्थान 'कीधा सव्या-] हाय तेने हु हमणा गुगलगाव ग E, आत्मशाग्वे निदु छु, ॥२॥ t भईसिद्ध गर्णाद्रपाठकमुनी पादोऽयति मात्र गर्दत्वादिकभावतद्गतगुणान् मार्गानुमारीन गुणान। - श्री मईद्वचनानुसारि सुकृतानुटान सइर्शन- ज्ञानादीननुमोदयामि मुहितयोगी प्रशसाम्यामा पपणाना साधुओना माधुपणाना आना पाना, भावोने तथा उपरोक पाईनादिना गुणोने, तथा मार्गानुमारी गुणाने का र इतना वचन अनुमार मुक्त धन प्रदान किया) ने, सम्पगदर्शन ज्ञान चारिमा T 4- ५ धारिवाति के अनुमो- . म- ४ क्षाम्यते क्षमिता वर नास्तिच यदुवितित १ 1-

(१७२)
अपी-
-आपसारने विष पोतपोताना कर्मने
विपे घश (आधीन) घण्टा ४गतिमा भमता मर्ष
जीवोने
हखमा छु मे, पण ग्यम्या छतां मारा
उपर क्षमा करी, काइनी माघमारावेर भाव नधी,
सर्व जीयोने विषे सुम्वन देवा पालीमारी मित्रता
जे मन पी दुष्ट चितयेलु, पचन थी भालु,
अने कायापी करेलु, में दुष्कृत (पाप) मिध्या
याओ (४)
सचायास्यनि मे का दिनमह यत्पा-पिप्येऽमलं ।
चारित्र जिन शासन गतमुनर्मागें चरिष्याम्प |
मुत्तो जन्मजरादिदुख:निवहात्सपेगनिघेदतातोक्ता-
स्तिक्पदयालुमाप्रशमता घर्ता भविष्याम्यहम् ।।
अर्थ-ते दिवस मारो क्यारे आवशे के जे
दियसे निमल चारित्र अने जिन आज्ञा ने पालीम,
पूर्वमुनिओना मार्गमा चारीश, जन्म जरा मृत्यु
आदि दुःखनाममुदायधीमुक्त थहम, सवेग (ममा.
रिक सुग्वने दु खरूप मानयुने) निवंदना (समार
ने फेदरूप मानवु ते) आप्त [ जिनेश्वर ] कोल
घचन उपर श्रद्धारूप ते प्रस्तिकता दयालुना मश.
मता आदि गुणोने शारण करनारी पाश (५)
7
".

सकल तीर्थ नमस्कार मामिषु ये कपि , भूतानागत मामत । अहंतो भगवतस्तान , सर्वान्न जिनेश्वरान् ॥१॥ पर महाविदेषु , विचरतो जिनश्वरा । मीमपरादय सति , ये तान्यदे निरतरम् ।। २ ।। मिद्धा मिद्विस्थिता येच ये धमिध्यति माप्रत । मत्सपति चतान सर्वान् , सिद्धान्यदे निरतरम् ॥३॥ माईद्वीप द्वयात स्था, ये माधयति माधव । ज्ञानादिमिः शिवाध्यान, वदेहतान्मुदाऽपिरान् ।४] म्वर्ग म च पातारे , यानि चैत्यानि चाता। तानि मणि धदेऽह, शाश्वताऽशाश्वतानि च ॥०॥ श्रीशपुजय मम्मेन, तारगाष्ठापदादान् । उज्जगतारि तिर्थानि , यदे मणि भारत: जिन कल्याण करथाने, पानि तिर्यानि मामत सत्यान्यपि तीर्थानि ,तानि घद निरनम् ॥ ७ ॥ -

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Navapadaditap Vidhi Sangrah

Author
Acharya,shant Murti
Title
Navapadaditap Vidhi Sangrah
File name
Navapadaditap Vidhi Sangrah
Text
OCR done
Citation
1943
Published
2011/03
Publisher
Ratalam,shri Jain Prakash Mandal
Language
Sanskrit
Pages
189
Library
Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Classification
Devotional
DLI number
551971
Barcode
4990010032660.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
yIUHpSwdscv
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