Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Navkar Mahamantra Kalp
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श्रामयजैन ग्रन्थालय।
नाहटा कोगुवाड़
कानेर,
णमोकार-मन्त्र-कल्प
(णमोकार मन्त्र सम्बन्धी स्तोन, यन्त्र, मन्त्र आदि)
सम्पादक
भारतगौरव, धमनेता, विद्यालकार
आचार्यरत्न १०८ श्री देशभूपणजी महाराज
अनुवादक
बलभद्र जैन शास्त्री
(भूनपूर्व सपादक दैनिक सदश तथा माप्ताहिक जैन सन्देश)
प्रकाशक
जेन मित्र मण्डल
पर्मपुरा, दिल्ली
प्रवासव- जन मित्र मण्डल धमपुरा, दिल्ली ट्रैक्ट न० १५८ प्रथम सस्करण फाल्गुणी अष्टान्हिका वीर नि० स० २४६० ASIA परागदज पाट प्रम ७२०५ गला टवो वाली पहाडी धीरज दली प्राद्य-वक्तव्य M 'णमोकार मन्त्र कल्प' पाठको के हाथो मे दते हुए मुझे हार्दिक हो रही है। प्रसन्नता इसलिए, क्योकि इसके द्वारा रणमोकार मात्र प्रचार प्रसार करने का स्वरण अवसर उपलब्ध हुअा है। जैन शास्त्रों में वार मन को अनादि निधन मन बताया है। यह मत किनी के द्वारा कि नहीं हुअा, बल्कि यह अनादिकाल से इसी रूप मे चला आ रहा है। से जो तीथकर और अह त होकर सिद्ध भगवान् बने हैं, वे दनी मन्त्र मे और आगामी अन तकात मे जो तीथङ्कर और अहर वनक मि भी इसी महामन की बदौलत । इसीलिये शास्त्रो में इसके चिन्दर माहात्म्य की अनका क्थाय मिलती हैं। इसमें ऐसी शक्ति निहित है कि के समस्त पाप और कम नष्ट हो जाते हैं । वास्तव में यह महामंत्र - वाणो का सार है, ससार के समस्त मत्रो का उत्पत्ति इला म्हन सारा मन गाम्न इमी महामत्र स निष्पन हुआ है। मत्रो की इस महामन मे गर्भित हैं। इस महामन को महिमा गाते हुए शाम्यो मे वाह पार मुक्ति दोनो देता है अथात् इस मत्र के जाप स पुग-वा- कर्मो को निजग भो हाती है। फलत इससे समार की भो पूर्ण होती हैं और अ त मे इमसे ससार का अवागमन बाद श्रद्धापूर्वक इस मत्र के जाप से ससार को मभा सम्पनाये :- का नाश होता है अ मद्वि और नवनिधिया की प्राति - को चिता प्राधि और व्याधि दूर भाग जाता है। इस मन के माहात्म्य के सम्मध मे यहा तक कहा प्रह पूर्वो का सार है मम्पूण विद्याग्मा को प्राद्यविद्या द बारा जम स्थान है। यदि मृत्यु के समय शुद्ध मन से प्रारी तो वह निश्चय ही अच्छी गनि प्राप्त करता है । इस महामन का माहात्म्य प्राचानकालनमा एसो पच णमोयारो मध्य पाव--- मगलाण च मवेमि पढम - and इसका अर्थ यह है-यह पच नमस्सार मनगर पापा TI TIT करन वाला सब मगलो में प्रथम मगल है। णमाकार मातम माहा म्य को जन गमाजमा पच्चा बच्चा जानता है और मूल रामोसार मय पढत ?ए उमका माहाम्य । पाता है। प्राचाय वीरसन ने धवला ग्रथम इम म गमगताचरमपम दवर बडी सु दर घ्यारया की है। णमोकार मन का ध्यान रणमाचार मप्र म वुल पाच प? और पतीस अक्षर है। frतु इमक सक्षेपीकरण से कई अय मन भी बन जात है जिनमा प्रभाव रतीम अक्षरा (मक णमाकार मंत्र के समान ही होता है। ये मत्र इम प्रकार है पनीस अक्षगे वा मन-एमा अरिहताण, णमो सिद्धाण गमा प्राररियारण, गमो उबज्भायाण, गमो लोए स यसाहूए । सोलह अक्षरो का मन-अरिहत सिद्ध पाइरिय उवज्भाय साहू अथवा प्रह- सिद्धाचाय उपाध्याय सव साधुभ्यो नम । छ अक्षरो का मत्र-अरिहत सिद्ध, ॐ नम सिद्धम्प , नमात्सिद्धभ्य । पाच अक्षरा वा मत्र-असि मा उ सा, रणमा सिद्धाण । चार अक्षर का मर-अरिहत प्रसि साहू । दो अक्षर का मत्र-ॐ ह्री, सिद्ध असि । एक अक्षर का मत्र-ॐ ग्रा म् अ,सि। । पार प्रदान यह पुस्तक संग्रह ग ५ है । इसको एक प्राचीन हस्तलिखित प्रनि श्रीमान् ला० मनोहरलात जो - पहाडो धीरज, दित्लो ने पूज्य प्राचाय १ ८ श्री देशभूषण जी म गज । अवलाक्नाथ तो थी। महाराज ने वह प्रति मुझे भो दिवाई मुझे वह 1-7 पगट आई मैंने प्राचाय महाराज से इसका अनुनाद करय प्रकाशन का गाना मांगी। ग्रानाय श्री 1 इम जनोपयोगी समभवर स्त्रीगे। पान मैंने परिथम पूवक इमा अनुवाद समापन प्राटि किया नथा कुछ प्रावग्यक म्तोत्र तथा प्रावश्यय सूचनाय इसम और बढ़ादी जो वतमान रूप में पाठवा के समक्ष है। ला० मनाहालाल जी ने अन्य आवश्यक अथ आदि पर मर वाय म वासी सह्याग प्रदान किया । इसके लिए मैं प्रापका प्रत्य त प्राभारी हूँ। मा अथ के अनुवाद और मशाधन काय म मेरे मित्र प० मदनलाल जी 'सुपाकर शास्त्री ने मुझे पूरा महयोग दिया यह सहयाग मेरे लिए बडा अमूल्य और उपयोगी रहा, अत मै माननीय सुधाकर जी का भी कृतज्ञ हूँ। यह सव काय पूज्य प्राचाय महाराज के आदेश स और उनके निर्देशन मे हुअा है। प्राचाय श्री सरस्वती के अनय उपासक हैं । साहित्य-सृजन म निर तर लगे रह कर पाप जन साहित्य की महान् सेवा कर रह हैं और अपनी प्रतिभा से उसे समृद्ध कर रह हैं। प्रस्तुत ग्र य भी प्रापवे ग्राशीर्वाद और यापक अभिज्ञता का परिणाम है । आपके चरणो म इसे अर्पित करके मेध य हो गया। इम य य के मुद्रण आदि का सारा व्यय श्रीमती कुदप्रभा जी धमपत्नी स्व० लाला बरातो ताल जा यहियागञ्ज लखनऊ और श्री वा० मताशच द्र जी बी० ए० ठेकेदार एस्प्लेनेड रोड दिल्ली ने दिया है । आपकी गुम्भक्ति और धमप्रेम वास्नर मे सराहनीय है । मै आपके अमूल्य सहयोग के लिए दोनो का ग्राभारी हू। मेरी इच्छा थी कि इस ग्रथ को माग सम्पूर्ण बनाया जाय । इसमे रणमाकार मन सम्बधी विभिन्न शास्त्रो के सम्पूण उद्धरणो का सकलन, गमापार मत्र के माहात्म्य को प्रगट करने वाली क्याय आदि दन का मंग विचार था। साथ ही मैं चाहता था कि णमोकार मप्र का अपने जीवन में क्या चमत्कार आपने देखा, ऐमी कुछ अनुभूत घटनायें भी दो जायें। किंतु जिन परिस्थितियो म यह न थ प्रकाशित हो रहा है उनमे यह सम्भव न हा सका। यदि कभी इमका दूसरा सस्करण निकल मका तो यह सब मामग्री दन का मै अवश्य प्रयत्न का गा। मेरी हार्दिक अभिलाषा है कि इस अनादि निधन मन को समार मे उसका उचित स्थान और सम्मान अवश्य प्राप्त होना चाहिए। प्राशा है, यह ग्रथ पाठको को अत्यत उपयोगो प्रतीत होगा। मेरी प्रायना है कि प्रत्यक पाठक इस ग्रथना नियमित प म पाठ और स्वाध्याय करे। दिल्ली वलभद्र जैन विषय-सूची क्रममस्या पृष्ठ मस्या १ २ ३ ४ ५ ७ . ६ १२ -१४ १० १२ १३ विषय अनादि निधन रामासार मन जन रक्षा स्तोत्रम् ॥२. द्वितीय जन रक्षा रतोत्रम् (पत्र पजर कवन) - रक्षा मध सव रक्षा मन ऋषभदेव रक्षा मन सद रक्षा मथ १ ग्राम रक्षा मत्र पच परमेष्ठी स्तोत्र - पच नमस्कृति स्तवन" irr नमस्कार कमरिणवा श्री. पच नमस्कार स्तान (उमाम्मामी प्राचाय) २७ -३१ नमस्कार मत्रस्तवन (मानतु गाचाय)31 ३२--३६ पच परमेष्ठि मय प्रभाव पन (प्रारत) Yo अपराजित मन ४०-४४ वध पार स्तोत्र भरम पजर स्तवन ४६-४७ जिन पजर स्तोत्र जम्मा ४८-१३ तत्वाथसार दीपक मदभ (भट्टारक मलकीति) ५४-८० पच नमस्कृति दीपक मदम गिरते ८१-८६ णमोकार मत्र की स्तुति (हिंदी) पत्र नवकार मनम्नोत्र ६२ मर साधन विधान नवकार मत्र+४५ बम्प मय साधन बी विधि अगुलिया के नाम ६७ ६७ माला जाप समय, प्रासन ६७-१०० १७ १८ १६ २० २१ २२ २३ अगुली जाप २४ क्रममस्या विषय णमोकार मन का व्रत और जाप्य विधान २६ यमत्र भाग रक्षा मत्र पृष्ठ मरया १०१-१०६ १०७-१११ २८ " ३० " ११५ ११५ ३२ रोग निवारण मय मस्तव दद दूर करन मत्र ताप निवारण मत्र बदीवाना निवारण मत्र ११६ ११७ ११६ ४० १२० ४२ १२० १२० बदीखाना मछली वचावन मन अग्नि निवारण मय चोर, बैरी निवारण मन चोर नाशन मय दुश्मन तथा भूत निवारण मन वादजीतन मन बादजीतन विद्या प्राप्ति मम परदश लाभ मत्र शुभाशुभ क्थन मन (वाग्वल मन) मन चिंता मिति काय मय द्रव्य प्राप्ति मत्र लक्ष्मी प्राप्ति, यश करण, रोग निवारण मय सर्व मिद्धि मत्र द्रव्य लाभ, सव सिद्धि मत्र पुत्र सम्पदा प्राप्ति मात्र राजा तथा हाकिम वशीकरण मत्र वशीकरण मत्र सप भय निवारण मत्र दुष्ट निवारण मत्र लक्ष्मी लाभ करावन मत्र रोगापहार मत्र १२१ १२१ १२२ ४८ ५० ५२ १०२ १२३ १२३ १२३ १२४ १२४ ૨૨૪ १२४ ५६ मम सत्या ५७ विपथ व्रणादि नाशन मन प्राकारागमन मय पृष्ठ सर १२५ १२॥ १२५ १२५ " ६० ६२ १२६ १०६ १२६ व्यापार लाभ, जबदायक मन भय नायक मत्र सद रोग नाशक मन विराध वारक मत्र सर्व सिद्धि व जयदायक मन पात्म रक्षा महासबलीररण मप्र ग्रावाशगमा वारक मन मवाय माधक मम रक्षा मात्र चोर भय नागन मत्र वांछिताथ फल सिद्धिदायर मत्र नवग्रह अरिष्ट निवारक जाप जाप्य मत्र१ स७ अनादि निधन मय चतारि मगल पाठ ६८ ६६ १२७ १२७ १२८ १२८ १२६ १२६-१३० १३० ७१ ७२ ७३ १०६ जाप्य १३० १३१ ७७ सूय मत्र का मुलासा शाति मत्र वावा दुलोच दजी कृत गर सव शाति मत्र ७८ १३ १३२ १३२ wayampram- रान - - -- - ISE 812) -- रामो प्ररिह ताण णमो सिद्धारण णमो पाइरियाण णमो उवज्माया णमो लोए सव्वसाहूण eo aldainamadhana मथुरा नग्रहालय में स्थित स्तूप रे द्वार पर विभूषित पा परमेष्ठि मान
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णमोकार-मन्त्र-कल्प
(भाषानुवाद सहित)
अनादिनिधन णमोकार मन्त्र
णमो अरिहन्ताण
णमो सिद्धाण
णमो आइरियाण
णमो उवज्झायाणं
णमो लोए सव्यसाहणं
जैनरक्षा-स्तोत्रम् श्रीजिन भक्तितो नत्वा त्रैलोक्याहादकारकम् । जैनरचामह वक्ष्ये देहिना देहरचकम् ॥१॥ तीनो लोको को आह्लादित करने वाले एव देधारियो के देह की रक्षा करने वाले भगवान् जिनेश्वर को भक्तिपूर्वक नमस्कार करके जैन-रक्षा-स्तोत्र को कहता हूँ। ॐ ही आदीश्वर पातु शिरसि सदा मम । ॐ ह्रीं श्री अजितो देवो भाल रनतु सर्वदा ॥२॥ ॐ ही भगवान् आदिनाथ मेरे मस्तक को सदैव रक्षा करे। ॐ ह्री श्री देवेश्वर अजित मेरे भाल की मदव रक्षा करे। नेत्रयो रक्षको भूयात् ॐ आ को सम्भत्रो जिन । रक्षेद् घाणेन्द्रिये ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ब्लू अभिनन्दन ॥३॥ ॐा को तीर्थकर सम्भवनाथ मरे नेत्रा की रक्षा करें। ॐ ह्री श्री क्ली ब्लू तीर्थंकर अभिनन्दन मेरी प्राणेन्द्रियो की (नासिका की) रक्षा करें। सुजिह्व सुमुखे पातु सुमति प्रणवान्वित । कर्णयो पातु ॐ ह्रीं श्रीं रक्त पद्मप्रभ प्रभु ॥४॥ प्रोकार ध्यान से युक्त तीर्थकर श्रीसुमतिनाथ भगवान मेरी जिह्वा मुस की रक्षा करे। ॐ ह्री श्री रक्तवरण भगवान् पद्मप्रभ प्रभु मेरे पाना की रक्षा करें। २
सुपार्श्व सप्तम पातु ग्रीवाया ह्रीं श्रियाश्रितः ।
पातु चन्द्रप्रभु श्रीं ह्रीं क्रीं (क्रो) पूर्वस्कन्धयोर्मम ॥५॥
श्री से शोभायमान सप्तम तीर्थंकर भगवान् सुपार्श्वनाथ मेरी
ग्रीवा की रक्षा करें। श्री ह्री क्री (क्रो) भगवान् चन्द्रप्रभु मेरे स्कन्धो
की रक्षा करे।
सुविधिः शीतलो नाथो रक्षको करपंकजे।
ॐक्षा क्षीं युनो काम चिदानन्दमयौ शुभौ ॥६॥
ॐ क्षा क्षी झू चिदानन्दमय शुभ भगवान् सुविधि और
शीतलनाथ मेरे करपकजो (हाथो) की रक्षा करे।
श्रेयासो
वासुपूज्यश्च
हृदये सदय सदा।
भूयाद् रक्षाकरो वार वारं श्रीप्रणवान्वितः ॥७॥
श्री और प्रणव से युक्त श्रेयास और वासुपूज्य भगवान् दया
करके मेरे हृदय की निरन्तर रक्षा करें।
विमलोऽनन्तनाथश्च मायावीजसमन्वितो।
उदरे सुन्दरे शश्वद् रक्षाया• कारको मतो ॥८॥
मायाबीजाक्षर से युक्त विमलनाथ और अनन्तनाथ भगवान मेरे
सुन्दर उदर (पेट) की रक्षा करें।
श्रीधमेशान्तिनाथो च नाभिपकेरहे सताम् ।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं हसयुक्तो पुन पातां पुन पुन. ॥६॥
ॐ ह्री श्री क्ली ह से युक्त श्रीधर्मनाथ और शान्तिनाथ वार-
वार नाभिकमल की रक्षा करें।
श्रीकुन्थु-अरनाथो तु सुगुरू सुकटीतटे ।
भवेतामवको भूरि ॐ ह्रीं क्लीं सहितो जिनो ॥१०॥
ॐ ह्री क्ली से सहित भगवान् युनाथ और अग्नाथ मेर पटितट की रक्षा करें। मे पाता चारु जघाया श्रीमल्लिमुनिसुव्रतो। हा ही ह. ततो ह व्लू क्लीं श्रीं युक्तो कृपाकरो ॥११॥ ॐ हा ही ह ह ब्लू फ्ली श्री मे युक्त कृपालु भगवान् मरिल- नाथ और मुनिसुव्रतनाथ मेरी मुन्दर जघायों की रक्षा करे। यत्नतो रक्षको जानू श्रीनमिनेमिनायको । राजराजीमतीमुक्तो प्रणवाक्षरपूर्वको ॥१०॥ राज्य और राजीमती को छोकर जाने वाले श्रावार से युक्त भगवान् नमिनाथ और नेमिनाथ मरे जानुदा (घुटनो) की रक्षा करे । श्रीपाश्र्वेशमहावीरौ पाता मा हो समानदो। अह्रीं श्रीं च तथा भ्र. क्ली हा ह्र श्राश्र युतो जिनो ॥१३॥ ॐ ह्री श्री भ्रू बनी हा हाथ से युक्त सुमान देने वाले भगवान् श्रीपाश्वनाथ और महावीर मेरी रक्षा करें। रक्षाकरा यथास्थाने भवन्तु जिननायका । कर्मक्षयकरा ध्याता भीताना भयवारका ॥१४॥ कम के नाम करने वाले, भयास्ता का भय निवारण परन् वाते भगवान् जिनेद्र ध्यान दिये गये यथास्थान रक्षा करने वाने हो। जैनरक्षा लिखित्वेमा मस्तके यस्तु धारयेत् । रविवद् दीप्यते लोके श्रीमान् विश्वप्रियो भवेत् ॥१५॥ जो व्यक्ति इस जैन-रक्षा-स्तोन पा लिसपर अपने मस्तक पर धारण करता है वह मय वे समान समार मे प्रकाशित होता है और लक्ष्मीवान होता है तथा विश्व का प्रिय होता है। तस्योग्ररोगवेताला शाकिनीभूतरानसोः । एते दोपा न दृश्यन्ते रक्षकाश्च भवन्त्यमी ॥१६॥ उमको भयकर रोग, वैताल, शाकिनी, भूत और राक्षम आदि दोप नहीं दिखाई देते, अपितु उसके रक्षक होते है । अग्निसर्पभयोत्पाता भूपालाश्चोरविग्रहा । एते दोषा प्रणश्यन्ति रक्षकाश्च भवन्त्यमी ॥१७॥ अग्नि, सर्प, सात प्रकार के भय, उत्पात, राजभय, चोरभय और विग्रह (युद्ध-कलह) ये सभी दोप इस स्तोत्र के पाठ करते रहने से नष्ट हो जाते हैं और ये सब रक्षक बन जाते है । जैनरनामिमा भक्त्या प्रातरुत्थाय य पठेत् । इच्छितान् लभते कामान् सम्पदश्च पदे पदे ॥१८॥ जो व्यक्ति प्रात काल उठकर भक्तिपूर्वक इस जैन-रक्षा-स्तोत्र को पढता है, उसकी सम्पूर्ण मनोकामनाए सफल होती है और वह पद पद पर लक्ष्मी को प्राप्त करता है। श्रावणे शुक्लगेऽष्टम्यां प्रारभ्य स्तोत्रमुत्तमम् । अभिषेक जिनेन्द्राणां कुर्याच्च दिवसाष्टकम् ॥१६॥ इस श्रेष्ठ स्तोन को श्रावण शुक्ला अष्टमी को प्रारम्भ करके आठ दिन तक भगवान् जिनेन्द्र का अभिषेक करे । ब्रह्मचर्यं विधातव्यमेकमुक्त तथैव च। शुचिना शुभ्रवस्त्रेण वालकारेण शोभनं ॥ नरो वापि तथा नारी शुद्धभावयुतोऽपि सन् । दिन दिन तथा कुर्यात् जाप्य सर्वार्थसिद्धये ॥२०-२१॥ ५ (स्तोत्र पाठ करने वाला) ब्रह्मचय धारण करे, एक वार भोजन करे, पुरप हो या स्त्री पवित्र सफेद वस्त्र पहन कर और अलङ्कार धारण कर सम्पूण मनोरथो की सिद्धि के लिए भावपूर्वक प्रतिदिन इसका जाप करे। एकाया तु विधातव्यमुद्यापनमहोत्सवम् । पूजाविधिसमायुस्त कर्तव्य सज्जनेर्जने ॥२२॥ सज्जन मनुष्यो को एकम को पूजा-निवि सहित उद्यापन महोत्सव करना चाहिए। इति जनरक्षा-स्ताराम अथ द्वितीय जैनरक्षास्तोत्रम् (बज्रपंजरकवचं) प्रागादीशानपर्यन्त पुष्टि विद्वेपणं तथा। आकृष्टिं मोहन वश्यं उच्चाट स्तम्भमारणे ॥१॥ सर्वातिशयसम्पूर्णान् ध्यात्वा सर्वजिनाधिपान्। पच वर्णान् पत्र रूपविषयद्रुमकुजरान् ॥२॥ चतुर्गात्रान् चतुर्वस्त्रान् चतुर्विशतिसम्मितान् । जैनी मांगेषु रक्षा कु दु खोघघातिनीम् ॥३॥ मैं (माधक) पुष्टि, विद्वेपण, आकर्षण, मोहन, वशीकरण, उचाटन, स्तम्भन, मारण के लिए सम्पूर्ण ३४ अतिगय से युक्त भगवान् ऋपभदेव मे लेकर भगवान महावीर-पर्यन्त सब जिनेश्वरी को, जो कि पचवर्ण (धवल, नील, रक्त, प्रियगुप्रभ और तप्तकाच- नाभ) वाले हैं और पचेन्द्रिय स्पी विषय-वृक्षो के लिए कुञ्जर (गज) के समान हैं तथा चार गान और चार मुस वाले है, (उनको)म्मरण करके दुःखो के समूह का नाग करने वाली सर्वाग-रक्षा को कहता हूँ (करता हूँ। शिरो मे वृपभ पातु भालं श्रीअजितप्रभुः। पाता मे श्रीजिनो नेत्रे सम्भवश्चाभिनन्दन ॥४॥ सुमतिः पद्मप्रभुश्च श्रवणे मम रजताम् । मुपावों रचतु घाणं मुख चन्द्रप्रभः प्रभु ॥५॥ ७ रसना मुरिधि पातु कठ श्रीशीतलो जिन । स्कन्धी श्रेयासश्रीरासुपूज्यश्च निमलो भुजो ॥६॥ अनन्तश्रीधर्मनाथो पाता मे करपल्लवो। शान्तिमें हृदय रचेत् मध्य नाभिं च कु खरो ॥७॥ मल्लि कटि सक्थिनी च रक्षतान्मुनिसुव्रत । नाभिर्जानुद्वय पायान्नेमिजंघाद्वयीं पुन ॥८॥ श्रीपाश्वो वर्द्धमानश्च रनता मे पदद्वयम् । चतुर्विशतिरूपोऽव्यादर्हन् मे सफल वपु ॥६॥ भगवान ऋषभदेव मेरे शिर की, अजितनाथ मस्तक की, सम्भवनाथ और अभिनन्दन जिनेन्द्रदेव दोना नेत्रा की, सुमतिनाथ और पद्मप्रभु मेरे दोनो कानो की, सुपाश्वनाथ प्राण की, भगवान् चन्द्रप्रभु मुस यी, मुविधिनाथ मेरी जिह्वा की, शीतलनाथ कठ की, श्रेयास और वासुपूज्य दानो स्कन्धो की, विमलनाथ दोना भुजाया की, अन तनाथ और धमनाथ मेरे दोना हाथो की, शातिनाथ मेरे हृदय की, चुन्युनाथ पीर अरनाथ मध्य और नाभि की, मरिलनाथ कटिप्रदेश की, मुनि- सुव्रतनाथ जधानो की (साथलो की), नमिनाथ दानो जानुनो की, नेमिनाथ दोनो जघामो की तथा पारसनाथ और महावीर भगवान् मेरे दोनो पैरो की रक्षा करे । चतुर्विंशति तीथकररूप भगवान ग्रहन्त मेरे सम्पूर्ण शरीर की रक्षा कर। एता जिनपलोपेता रक्षा य सुकृती पठेत् । स चिरायु सुसी भूत्वा न व्याधिर्विजयी भवेत् ॥१०॥ भगवान् जिन द्रदेव के आशीवाद से युक्त इस रक्षास्तोर को जो पुण्यात्मा पढेगा वह चिरायु और सुखी होकर विजयी होगा और उसे क्सिी प्रकार की साधि-व्याधि नहीं होगी। ८ पातालभूतलव्योमचारिणश्छमकारिण । न दृष्टुमपि शक्तास्त रचित जिननामभिः ॥११॥ पाताल, पृथ्वी और आकाश मे विचरण करने वाले मायावी जीव भगवान् जिनेन्द्रदेव से रक्षित की ओर देख भी नहीं सकते। जिनेति जिनभद्रेति जिनचन्द्रति वा स्मरन्- नरो न लिप्यते पापैभुक्ति मुक्तिं च विन्दति ॥१२॥ जिन, जिनभद्र और जिनचन्द्र के रूप मे भगवान् का स्मरण करने वाला व्यक्ति पापो से लिप्त नहीं होता तथा उसे भोग और मुक्ति दोनो ही प्राप्त होते है । वनपजरनामेद यो जैन कवच पठेन् । अव्याहताग सर्वत्र लभते जयमगलम् ॥१३॥ इस वज्रपजर नामक कवच को जो जैन पढेगा, वह सभी अगो से सुरक्षित, सर्वत्र जय और मगल को प्राप्त होगा। जगज्जैत्र कमन्त्रेण जिननाम्नेव रचित । लिखित्वा धारयेदृ यस्तु करस्था सर्वसिद्धयः ॥१४॥ जिननामस्पी जगद्विजयी इस मत्र द्वारा रक्षित इस स्तोन को लिखकर जो धारण करेगा, उसके हाथो मे सभी सिद्धिया पा जाती है। ललाटे दचिणस्कन्धे वामस्कन्धे करेऽपि च । वामकक्षावामकट्योर्जानी पादतलेऽपि च ॥१५॥ नाभौ गुह्य दक्षिणाघितले दक्षिणजानुके । कटीफनाहस्ततलस्तनेषु दक्षिणेषु च ॥१६॥ ललाट पर, दक्षिण स्कन्ध पर, वामस्कन्ध, हाथ पर, वायी पक्षा, बटिप्रदा, जानुद्वय (घुटने), पादतन, तथा नाभि, गुह्यस्थान (गुप्ताग) एव दक्षिणजातु, टिप्रदश, हननन तथा दक्षिण स्तन पर (सम का लिरो)। धेमा दृष्टमान स्वप्ने जेनरक्षामिह प्रभु । रिकामा गुरु प्रात प्रबुद्धस्ता तथा लिखेत् ॥१७॥ वनरक्षा स्नान को भगवान् जिने द्र स्वप्न मे जिस प्रकार दिनाल, नायव प्रातकाल उठकर उसे उमी प्रकार लिस ले । वागरतने चेतिमन्त्रार्णान् सप्तदश स्मरन् । ॐ हा ही प्रमुग्मास्तस्य स्युर्मनीषितसिद्वय ॥१८॥ और वामस्तन पर (इस मत्र को लिखे)। इन सत्रह म अवर्णो पा स्मरण करे । इस मन्त्र मे ॐ ह्रा, ही ये वीजाक्षर प्रमुख है। इस प्रकार करने वाले साधक को मनोवाछित सिद्धिया प्राप्त होती हैं। इति जनरक्षा-स्तोत्र समाप्तम् रक्षा-मन्त्र आपदा-नाशन-मन्त्र । ॐ नमो वृषभनाथाय मृत्यु जयाय सवजीवशरणाय परमपवित्र- पुरुपाय चतुर्वेदाननाय अष्टादशदोपरहिताय सर्वज्ञाय सर्वदशिने अष्ट- महाप्रातिहार्याय चतुस्त्रिशदतिशयसहिताय श्रीसमवसरणे द्वादशपरिखा- वेप्टिताय ग्रहनागभूतयक्षराक्षसवश्यकराय मशान्तिकराय मम शिव कुरु कुरु स्वाहा। इति आपदानाशनमन्त्र सर्वरत्नामन्त्र । ॐ क्षा क्षी शू क्षे क्ष क्षो क्षी क्ष क्ष नमोऽहते सर्व रक्ष रक्ष हु फट् स्वाहा । पभदेवरक्षामन्त्र । ॐ ऋपभाय अमृतविन्दवे ठ ठ ठ स्वाहा । रक्षा अभिमन्त्र इस्कीम दिन तक प्रतिदिन १०८ बार पढे। इससे समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं। और शिर की पीडा (शिर मूल) दूर हो जाते है। सर्वरक्षामन्त्र । ॐ हू हूं फट् किरटि घातय घातय परिविघ्नान् स्फोटय स्फोटय सहस्रखण्डान् कुरु कुरु परमुद्रा छिन्द छिन्द परमन्त्रान् भिद भिंद ह्राक्षा क्ष व फट् स्वाहा । विधि-पढ कर सरमो चारो ओर फेके। ब्रह्मचर्यपूर्वक इसका जप करे और गान मे भोजन न करे । आत्मरक्षामन्त्र । ॐ क्षिप ॐ स्वाहा। विवि-इसे प्रतिदिन १०८ वार जपे ।
अ५ एणमोकारकल्पः प्रारभ्यते । प्रथम पचपरमेष्ठीस्तोत्रम् । पचानानामादाता तप प्रति समुत्सुक । विवक्ता भोजने तोये श्रेष्ठवशसमुद्भव ॥१॥ ससारदेहभोगेभ्य उदासीननदास्थित । अष्टाविंशगुणेर्युक्तो मुनिर्भवति नान्यथा ॥२॥ पाच महावतो का पालन करने वाले, तप के प्रति उत्सुप रहने वाले, आहार के सम्बध मे विवेकशील, श्रेष्ठपश मे उत्पन हुए, ममार, देह और भोगो से विरागी तथा अट्ठाईस मूलगुगा धारण करने वाले मुनि बहनाते है । इन गुणो के विना मुनि नही यहला सकते । एकादशागकठस्थश्चतुर्दशश्च पूर्वक । पठित पाठित येन स उपाध्याय उच्यते ॥३॥ ग्यारह अग और चौदह पूर्व के जो स्वय पाठी है अर्थात् जो स्वय पढते हा और दूमरो को पढाते हा वे उपाध्याय कहनाते है । निर्विकल्प समारुह्य चामृताभ्य गाहक । विवेकमजलिं कृत्वा ज्ञान सदानि साधक ॥१॥ शिविकल्प ममाधि को पागा रन बाल, स्वानुभवस्पी अमृत का अवगाहन करने वान सा +F (प्राचार) विवेक वी अजलि बना कर ज्ञान का प्रास्वाद । १२
घातिकर्मनय कृत्वा अघाति दग्धरज्जुकम् ।
षट्चत्वारिंशद् गुणैयुक्त अर्हन् भवति नान्यथा ॥५॥
घाति कर्मों का नाश करके अघाति कर्मों को जली हुई
रस्मी के ममान कर देने वाले छयालीस गुणो से युक्त अर्हन्त भगवान्
होते है । इन गुणो के विना अर्हल नहीं कहे जाते ।
अर्हत्पदविनाशे स अष्टसम्यस्त्वसयुतः ।
गमनागमनिमुक्त स सिद्ध कथित. पर: ॥६॥
अर्हन्त पद की मज्ञा समाप्त होने पर जो मम्यक्त्वादि आठ गुणो
से युक्त होते हैं तथा मसार के आवागमन से छूट जाते हैं वे महान
सिद्ध परमात्मा कहलाते हैं।
अलोकिकमहावृत्तिानिनों केन वय॑ते ।
अनानी बद्ध यते यत्र जानी तत्रैव मुच्यते ॥७॥
सम्यक्ज्ञानी पुस्पो की अलौकिक वृत्ति का वर्णन कौन कर सकता
है। क्योकि जहा अज्ञानी जीव रागान्ध होकर बन्ध को प्राप्त करता
है, ज्ञानवान उन्ही कार्यों में स्वानुभवपरिगति द्वारा कर्मों की निर्जरा
को प्राप्त करता है।
मिथ्यात्त्रविषमुत्सृज्य सम्यक्त्वममृत पिवेत् ।
येन कर्मामय हत्वा ब्रजेत् पदमव्ययम् ॥८॥
मिथ्यात्व रूपी विप को छोडकर सम्यक्त्वरूपी अमृत को पीना
चाहिए, जिससे कमव्याधियो का नाश होकर अविनाशी मोक्षसुख की
प्राप्ति हो।
सम्यक्त्व हि धन यस्य सुख तस्य भवे भवे ।
धनमेकभवे दत्त सुखाय यच्च दुखदम् ॥६॥
1417 पास सम्यक्त्रस्पी धन है, उम गव-भव मे मुम्ब प्रान 'T !तु मागाग्नि धन कुछ समय के लिए मुस देता हुआ गिता है किन्तु वस्नुत वह दुसो का दाता है। पर दरिद्रोऽपि विचनणो नग्मतत्त्वार्थवान् न श्रुतिशास्त्र, सुलोचनोजीर्णपटोऽपि शोभते न नेत्रहीन कनरलकृत ॥१० दरिद्र किन्तु तत्वाथवान् और विचक्षण मनुप्य श्रेष्ठ है विन्तु जो शास्त्रमान से रहित है वह थेप्ट नहीं है। अच्छे नेरवाना भले ही फटे-पुराने वस्त्र पहने विन्तु अच्छा नगता है पित्तु नेत्रहीन व्यक्ति भले ही सुवरण के आभूषण पहने हुए हो, सुदर प्रतीत नही होता। अद्याभवत् सफलता नयनवयस्य देव त्वदीयचरणाम्बुजवीक्षणेन। अथ त्रिलोफतिलक प्रतिभासते मे ससारवारिधिरय चुलुकप्रमाणम् ॥११॥ आज मेरे दोनों नेत्र सफल हुए, हे देव । जो आपकी चरणाम्बुज- छवि का दशन विया । हे निलोवतिलक ' आज यह ममारगमुद्र मुझे आपकी कृपा से चुल्लूभर मावम पड रहा है। विनयाल्लभते विद्या तपसा च मुगा दानतो भोगभूमिस्तु ज्ञानत पदम विनय से विद्या प्राप्त होती है, ता'। दान से भोगभूमि में जाकर जम हाता ।। नाशी मोक्ष-पद प्राप्त होता है। 1 इति पचपरमष्ठीगुणस्तवा सम्प्रणम् ।
अनुष्टुब्वृत्तवद्धमद्भुताशयसंवलितं श्रीपंचनमस्कृतिस्तवनं . प्रतिष्ठितं तमःपारे पारे वाग्वर्तिवैभवम् । प्रपचवेधस पंचनमस्कारमभिष्टमः॥१॥ जो अज्ञानान्धकार के उस पार प्रतिष्ठित है अर्थात् अज्ञानान्धकार के नाशक है, जिन्हें अज्ञानान्धकार स्पर्श भी नहीं कर सकता तथा जो वाणी की सामर्थ्य से परे है, इस ससार के मायाजाल को छिन्न- भिन्न करने वाले है ऐसे पचनमस्कार स्प मन का मैं स्मरण करता अहो पचनमस्कार कोऽप्युदारो जगत्सु यः । सम्पदोऽष्टौ स्वय धत्ते दत्तेऽनन्ताः स्तुत स ता ॥२॥ तीनो लोको मे अतिशय उदार पचनमस्कारमन्त्र आश्चर्यजनक है। जो स्वय तो अष्टसिद्धियो को ही धारण करता है किन्तु स्मरण किये जाने पर वह अनन्तमिद्धियो को देता है। दत्तेऽनुकूल एवान्यो भुक्तिमात्रमपि प्रभु । एप पचनमस्कार प्रातिलोम्येऽपि मुक्तिदः ॥३॥ मसार मे मामर्थ्यशील अन्य व्यक्ति (राजा, महाराजा) अनुकूल होने पर ही भुक्ति (भोग) मान देते है किंतु यह पच नमस्कार मत्र ही ऐसा है जिसे उल्टा पढने पर भी मुक्ति प्राप्त होती है।
जिमके पाम सम्यक्त्वम्पी धन है, उसे भव-भव मे मुस प्राप्त होता है । कि तु सामारिक धन कुछ समय के लिए सुख देता हुआ लगता है किन्तु वस्तुत वह दुमो का दाता है । घर दरिद्रोऽपि विचक्षणो नरस्तत्त्वार्थवान् न श्रुतिशास्त्रवर्जित । सुलोचनो जीर्णपटोऽपि शोभते न नेत्रहीन कनरलकृत ॥१० दरिद्र किन्तु तत्वाथवान और विचक्षण मनुष्य श्रेष्ठ है किन्तु जो शास्त्रज्ञान से रहित है वह थेप्ठ नही है। अच्छे नेत्रवाला भले ही फट-पुराने वस्त्र पहने किन्तु अन्छा लगता है किन्तु नेत्रहीन व्यक्ति भले ही सुवण ये आभूषण पहने हुए हो, सुदर प्रतीत नहीं होता। अद्याभवत् सफलता नयनद्वयस्य देन त्वदीयचरणाम्बुजवीक्षणेन । अथ त्रिलोकतिलक प्रतिभासते मे ससारवारिधिरय चुलुकप्रमाणम् ॥११॥ आज मेरे दोनो नेत्र सफल हुए, हे देव । जो आपकी चरणाम्बुज- छवि का दशन क्यिा । हे त्रिलोकतिलक ' आज यह मसारगमुद्र मुझे आपकी कृपा से चुल्लूभर मालूम पड़ रहा है । विनयाल्लभते विद्या तपसा च सुल दानतो भोगभूमिस्तु ज्ञानत पढन विनय से विद्या प्राप्त होती हैं 3 '। दान से भोगभूमि मे जाकर जन्म होता है ) . नाती मोक्ष-पद प्राप्त होता है। इति पचपरमप्ठीगुणनचन सम्पाम् । १४ - : अनुष्टुवृत्तबद्धमद्भुताशयसंवलितं श्रीपंचनमस्कृतिस्तवनं प्रतिष्ठित तमःपारे पारे वावर्तिवैभवम् । प्रपचवेधसः पंचनमस्कारमभिष्टुम ॥१॥ जो अज्ञानान्धकार के उस पार प्रतिष्ठित हैं अर्थात् अज्ञानान्धकार के नाशक है, जिन्हें अज्ञानान्धकार स्पर्श भी नहीं कर सकता तथा जो वाणी की मामथ्य से परे है, इस ससार के मायाजाल को छिन्न- भिन्न करने वाले हैं ऐसे पचनमस्कार रूप मन का मैं स्मरण करता । अहो पचनमस्कार कोऽप्युदारो जगत्सु य । सम्पदोऽप्टौ स्वय धत्ते दत्तेऽनन्ता स्तुतः स ता• ॥२॥ तीनो लोको मे अतिशय उदार पचनमस्कारमन्न आश्चर्यजनक है। जो स्वय तो अष्टसिद्धियो को ही धारण करता है किन्तु स्मरण किये जाने पर वह अनन्तसिद्धियो को देता है । दत्तेऽनुकूल एवान्यो भुक्तिमात्रमपि प्रभु । एप पंचनमस्कार प्रातिलोम्येऽपि मुक्तिद ॥३॥ ससार मे सामथ्यशील अन्य व्यक्ति (राजा, महाराजा) अनुकूल होने पर ही भुक्ति (भोग) मात्र देते है किंतु यह पच नमस्कार मत्र ही ऐसा है जिसे उल्टा पढने पर भी मुक्ति प्राप्त होती है।
नमस्काग्नरेन्द्रम्य मिमपि प्राभर स्तुम । यदीयफत्कृतेनापि नियन्ति द्विप चणात् ॥४॥ यह पत्र!मगार माना र नरेन्द्र (गजा) है जिममा प्रभाव अद्भुत है । हम “ग अद्भुतप्रभाव को नमस्कार परत हैं। इस नमस्कार गरे । कार (फूप मान से) शत्रु द्रवित हो जाने है अथवा दूर पगायिन हो जाते है। मिहतोऽप्यणिमायास्ता नमस्कारमधिष्ठिता । अटापट्यत्तरात्मापि यदसो प्रणरे विशत् ।।५।। शिम्बन्धधिया धीर स्वागदेशनिवेशिता । नमस्कृता नवपदी कथितो बजपजर ॥६॥ अणिमा, महिमा आदि मिडिया इस नमस्कार मन में निहित है। यह छयासठ अक्षरात्मा भी प्रणव (प्रोकार) मे प्रविप्ट है। अग याम द्वाग शिर, स्मन्ध आदि सभी अगो मे निवशित नवपदात्मक णमोकार मन को नमस्कार किया गया है, यही वनपजर स्तोत्र यहा गया है। वर्यता श्रीनमस्कारान् कार्मण किमतोऽधिकम् । यरसप्रयोगत पासुरपि सवनयेज्जगत् ॥७॥ श्रीयुक्त नमस्कारमत्रो का इससे बढकर कामण (जादू, प्रभाव) का वणन क्या हो सकता है कि जिस प्रयोग से पति-कण भी ससार का निर्माण कर लेते है। नमस्कार नम सिन यत्पदम्पर्शपापन । पद्माच्छादितसांग शान्निमामादयेत पगम् ॥८॥ ।
चत्तारि मगल-अरिहता मगल
सिद्धा मगल, साहू मगल
केवलिपन्नत्तो धम्मो मगल॥
चत्तारि लोगुत्तमा-
अरिहता लोगुत्तमा
सिद्धा
लोगुत्तमा,
साह
लोगुत्तमा,
केपलिपन्नत्तो
धम्मो लोगुत्तमोज
चत्तारि सरण पवज्जामि-
अरिहते सरण एवज्जामि,
सिद्ध सरण पपज्जामि साह सरण पयन्जामि
केयलिपनत्त धम्म सरण पप्रज्जामि।
मथुरा सग्रहालय मे रखे हुए प्राचीन आयाग पट्ट के मध्य स्थित मगल-पाठ
अन्त गादि पत्र गरप्ठियो का हाथ की अगुलिया पर ध्यान करने या अनेर विघ्नम्प भों के लिए गरुड के समान होता है अर्थात् जिस प्रकार गन्ड सों का नाश करता है उसी प्रकार वर साधर भी गमोहार मन द्वारा अनेक पापा को दूर करता है । गुरुन् पच नमाद ध्यायन् मुद्रया परमेन्टिनाम् । गृढप्ररूढमचिराद् कर्मग्रन्थि विमोचयेत ॥१४॥ परमेष्ठी मुद्रा से पच गुरमो का क्रमश ध्यान करता हुआ अति शीत ही गूढवाढ (अयन्त दृढता से जमी हुई) ममं (निकाचित अथिया का नाश करता है । पोडशाचरगान शुद्धान परमान परमेष्ठिन । प्राणी प्रणिधानोऽपि स्वेरिसत फनमेधते ॥१५॥ परमेष्ठिया के पोडश (मोलह) अक्षर वाले शुद्ध मयो का ध्यान करने वाला प्राणी अपने इच्छित फलो को प्राप्त करता है। । विद्युज्जलाग्निभूपालव्यालचौरारिमारिजम् । भय वचयते पचनमस्कारस्य संस्मरात् ॥१६॥ पचनमस्कार मन का स्मरण करने वाले व्यक्ति विजली, जल, अग्नि, राजा, मर्प, चोर, शत्रु, महामारी आदि भयो मे मुक्त रहते है। श्राराध्य विधिवत् पंचनमस्कारमुदारधी । लक्षजापेन पापेन मुक्तिमार्हन्त्यमश्नुते ॥१७॥ उदार बुद्धिवाला विधिपूर्वक पचास्कार मन्त्री पाराधना परके उसके एक लक्ष जाप से पाप से मुक्त हाकर अहल पद को प्राप्त हो जाता है। १९ areer + ऐहिकं फ्लमीप्सूनामप्टकर्मप्रसाधिनी । , मुस्त्यर्थिना च स्यादेपैवाष्टर्मनिषेधिनी ॥१८॥ इम लोक मे भोगने योग्य फलो की इच्छा करने वालो के लिए । यह अप्ट कर्मों का बन्ध करने वाली है और यही मुक्ति की इच्छा रखने वालो के लिए अप्ट कर्मों का नाश करने वाली भी है। विपदामभिचारस्योपादानस्याखिलश्रियाम् । स्मर्ता नमस्कृते स्वनिवर्गेण वरिवस्यते ॥१६॥ विपत्तियो का नाश करने वाले तथा सम्पूर्ण सम्पत्ति-समृद्धियो के उपादान स्वरूप नमस्कार मन का स्मरण करने वाला देवताओ से पूजा जाता है। चतुर्दशाना पूर्वाणामेवोपनिषत् परा । आद्या सकलविद्याना वीजाना प्रकृति परा ॥२०॥ यह णमोकार मत्र चौदह पूर्वो का पुज है । यह सम्पूर्ण विद्याओ की आद्यविद्या है और वीजाक्षरो का जन्मस्थान है। इयं पोदन पथ्य परलोकाध्वयायिनाम् । परमास्त्रं नृणा मोहराजयुद्वाय सज्जताम् ॥२१॥ यह णमोकार मन परलोक जाने वाले व्यक्तियो के लिए हितकारी पाथेय है (सर्वोत्तम पथ्य है) और मोहराज से युद्ध करने के लिए तत्पर मनुष्यो के लिए सर्वश्रेष्ठ अस्य है । प्राणी प्राणप्रयाणस्य तणे ध्यायन् नमस्क्रियाम् । लभते सुगति चैका पाप्मन. कृतपूर्व्यपि ॥२२॥ मृत्यु के समय जो प्राणी क्षण भर भी नमस्कार मत्र का ध्यान करले तो वह पूर्व मे अनेक पापो का कर्ता होने पर भी सुगति को प्राप्त करता है।
नमस्कृति कृपावितै श्रोत्रयो प्राभृतीकृताम् । स्वीकृत्य पुण्यसध्यचस्तिर्यचोऽपि ययुर्दिवम ॥२३॥ स्पानु गुम्जता के द्वारा बानो में पहुचाये हुए नमस्कार मश्र को स्वीकार करके पुण्यवान् तियंच भी स्वग को जाते है। विदण्डिन नियासियप्टिना श्रेप्टिनन्दन । नमस्कारस्य महसासाधयत स्वर्णपूरुपम् ॥२४॥ मन, वचन, वाय या निग्रह करवे प्ठिनन्दन ने पच नमस्कार के प्रभाव में म्वणपुरप की मिद्धि को। स्मृत्वा पचनमस्कार प्रविष्टायास्तमोगृहम् । घटन्यस्तो महासत्या पन्नग पुष्पमाल्यभृत् ॥२५॥ पच नमस्कार महामत्र का स्मरण करके अन्धेरे घर में प्रवेश करने वाली महासती (मामा) को घडे मे रखा हुआ मर्प भी माला हो गया। , नमस्कारेण सम्बोध्य मातुलिंगवनापरम् । प्राणवाण स्वपरयोwधत्त श्राद्धपु गव ॥२६॥ मातुलिंग वन के अमर को नमस्कार से सम्बोधन करके थादपु गव ने स्व और पर के प्राणो की रक्षा की। यक्षता हुडिकोऽप्रापत् सुकुल चण्डपिगल । इतस्ताहक् गुणस्फीनिं सुदर्शन सुदर्शने ॥२७॥ (नमस्कार मात्र के प्रभाव से) हुडिक यक्ष बन गया और चण्ड- पिंगल को उच्च कुल प्राप्त हुआ। मुदगन ने मुदशन वन मे महा- प्रभावशाली गुणगरिमा को प्राप्त किया। २० एष माता पिता स्वामी गुरुनेत्र भिषक् सखा । प्राणत्राण गतिर्दीप शान्ति पुष्टिमहन्महः ॥२८॥ यह पच नमस्कार मत्र माता है, पिता है, स्वामी है, गुरु है, नेत्र है, वैद्य है और मिन है । यही प्रारणरक्षक है, यही जीवो की गति है और अज्ञान अन्धकार में विचरण करने वालो के लिए दीपक के समान है और शान्ति, पुष्टि और महान यश को देने वाला है। निधयः सन्निधो कामधेनुरप्यनुगामिका । भूभृतो भृतकास्तस्य यस्य नैप हृदो हिरुक् ॥२६॥ णमोकार मन जिसके हृदय से दूर नही होता, निधिया उसके समीप रहती है और कामधेनु उसका अनुगमन करती है तथा राजा उसके सेवक के समान काम करते है। नास्येयत्ता प्रभावाणां क्रमवर्तितया गिराम् । मितायुष्ट्वाच्च सर्वोऽपि न्यक्षेण भणितु नमः ॥३०॥ वाणी के क्रमवर्ती होने से इसके प्रभावो की इयत्ता (सीमा) नही है और मनुष्यायु मीमित है इसलिए इसके सम्पूर्ण प्रभाव को इन्द्रियो के द्वारा कहा नहीं जा सकता। सर्वावस्थोचितं सर्वश्रुतसार सनातनम् । परमेष्ठिमहामन्त्र भक्तितन्त्रमुपास्महे ॥३१॥ मभी अवस्थाओ मे करने योग्य, सम्पूण शास्त्रो के मारभूत, शाश्वत और भक्ति योग्य परमेष्ठी महामन्त्र की हम सब उपासना करते हैं। उच्चैर्याजनलक्षमानविदितो विभ्रत् सुवर्णात्मता भव्यानन्दनभद्रशालमहिमा रोचिष्णुचूलाचित । 5.
अस्तु श्रीजिनगेभाम्बरसचिस्थान लसन्निर्जर लोऽय व परमेष्ठिपचकनमस्कार सुमेरु श्रिये ॥३२॥ जो (मर) एक नाब याजन ऊचा है, जो मुवरणमय है, भव्य गुग्गा को जान ददायक तथा भवशाल वन मे महिमायुक्त है, जो अपन चमको हा चलो से गोभायमान है, जो जिनचत्यालयो से अत्यन्त मुशो भिन है और देवताओं का स्थान है वह यह पच परमेष्ठी नमस्कार मम्प मुमेर पापो लिए कल्याणप्रद हा । साम्नायावयवा जिनप्रभगुरुयों सूत्रयामाप्त या दिव्या पचनमस्कृतिस्तुतिमिमामानन्दनन्दन्मना । यस्यैपाचति कण्ठसीमनि सदा मुक्तालतापिभ्रम त मुचन्त्यचिरेण विघ्ननिचया श्लिप्यन्ति च श्रीभरा ॥३३॥ आनन्द से प्रसन्न मन श्रीजिनप्रभ गुरु ने प्राम्नाय (शास्त्र) के अवयवो सहित जिस दिव्य पचनमस्कार स्तोत्र यो गुम्फिन दिया है वह (यह स्तोत्र) जिनके कण्ठप्रदेश में मोतियो की माला के ममान शोभायमान रहता है, उसे सभी विघ्न शीघ्र ही छोड देते है और लक्ष्मी उसका आलिंगन करती है। २२ अथ नमस्कारक्रमणिका लिख्यते । वन्दे शान्तिजिन प्रबोधतरणि कारुण्यवारानिधि भव्यध्वान्तहर पदत्रयधर काम जिन चक्रिणम् । व्योमाकाशखपण्णवास्तिवधूस्त्यक्त्वापवर्गव्रता- ध्वन्यं कीव-वशमण्डन-मणि श्रीविश्वसेनोदभवम् ॥१॥ में ज्ञान के मूर्य, करुणा के ममुद्र, भव्यजनो के प्रात्मान्धकार के नाशयिता, कामदेव (प्रद्युम्न), जिन और चक्रवर्ती तीन पदो को वारण करने वाले, पण्णवति-महस्र (छियानवे हजार) स्त्रियों को छोडकर मोक्ष अभिलापा मे प्रव्रज्या ग्रहण करने वाले, श्रीविश्वमेन के पुत्र और कुरुवश के रत्न-स्वरुप श्रीशालिजिनेश्वर को नमस्कार करता हूँ। वन्दे कुन्थुजिनं प्रमाणसदन स्यादवादसच्छेखरं आदित्यान्वयवार्चिरत्नममल मुक्तिप्रियावल्लभम् । त्यस्ता क्रिपद रमाश्च सकलान्याहत्य घातीन्यपि मुक्त्यै प्रवजित प्रभु जिनपति कैवल्यभानूदयम् ॥२॥ मैं प्रमाणो के सदन (म्वय प्रमाणभूत), स्यावाद (अनेकान्त) के श्रेष्ठ शिखर, सूर्यवशरूप समुद्र के निर्मल रत्न, मुक्तिप्रिया के वल्लभ (प्रिय), चक्रवर्तीपद, स्त्री-समूह को छोडकर तथा चारो घांति- कर्मों का नाशकर मुक्ति प्राप्ति के लिए प्रत्नज्या स्वीकारने वाले, कैवल्य- ज्ञानम्प भानु के उदय-स्वरूप श्री कुन्युजिनेश्वर को नमस्कार करता हूँ।
वशश्रीसदन सुदर्शनतनु चक्रश्रिया राजित
गीर्माणाधिपतिप्रपूजितपद त्रैलोक्यचूडामणिम् ।
दुवोपद्रुमखण्डनकपरशु मुक्तिश्रियो वल्लभ
वन्देऽर जिनभास्कर समरसेरापूरित चिन्मयम् ॥३॥
मैं स्त्रवश की श्री के निकेतन (वग की प्रतिष्ठा का सवद्धन कपन
वाते) शोभन (दर्शनीय शरीर वाने) प्रवर्ती-पद की श्री से विरार
मान, दवताओ के अधिपति (इन्द्र) मे चरणवदन रिये गये, तीनों
लोक के मुकुट-मणि, अज्ञानम्प वृक्ष को काट गिराने में तीक्षा परशु
(फरमा) के ममान, मुक्ति-रानी के वल्लभ (प्रिय), ममरमो म
आपूण, चैत यस्वरूप, श्रीअरनाथ जिनेन्द्र भगवान् को नमस्कार
करता हूँ।
वन्दे सदा साधुगण गरिठ त्रिहीनकोटीनवक विशुद्धम् ।
रत्नत्रयी-भूपणभूपिताग सद्ध्यानपीयूपप्रपुष्टकायम् ॥४॥
मैं तोन कम नवकोटि-विशुद्ध, रत्नत्रय म्प भूपणो से विभूपिन,
श्रेष्ठ ध्यानम्प अमृतपान से पुष्टकाय श्रेष्ठ माधुगणो को सदा नमस्-
कार करता हूँ।
श्रीशारदा सारपदार्थदात्री कुरोधमिश्यावपिनाशिका वे।
वन्दे जिनस्यास्यभवा त्रिकाल सिद्धान्ततर्कागम-पूर्ण-सिधुम्॥
मैं सार पदार्थों को प्रदान करने वालो, दुर्ज्ञान (कुबोध) और
मिथ्यात्व का नाश करने वाली, श्रीजिनेद्र भगवान के मुख से उत्पन्न,
सिद्धान्त, तक र प्रागमो की तबालब भरी हुई मित्रु नामक नदी
अथवा समुद्र रूपी श्रीभगवती शारदा को नमस्कार करता हूं।
विशालकीर्तिम् प्रथम भजामि गुमत्तम गोतमनामधेयम् ।
सरसूक्तिपीयूपरसेन योऽत्र प्रपोपितो भव्यगण प्रशस्तै ॥६॥
F
मर्वप्रथम मैं जगद्व्यापिनी कीति से युक्त गुरश्रेष्ठ गौतम (गणधर)
को प्रणाम करता हू । जिन पर श्रद्धा रखने वाले भव्यगणो ने अनेक
पीयूपपिणी सूक्तियो द्वारा उनका स्तवन किया है।
। श्रीमूलसघसदनेषु लसत्प्रदीपो
जातोमुनीश्वग्वर किल पद्मनन्दी।
सिद्वान्ततर्फविषयेषु विचन्तणो य.
श्रीजैनशासनप्रकाशनभानुरासीत् ॥७॥
जो मूलसघ के भवन को प्रकाशित करने वाले दीपक के ममान
हैं, ऐसे पद्मनन्दी नाम के मुनीश्वर हुए। वे सिद्धान्त-तर्क आदि
विपयो मे अत्यन्त निष्णात विद्वान थे और जैनगामन के प्रकाशन मे सूर्य
के
समान थे
तत्प? जिनचन्द्रनामविदित सिद्धान्ततर्काम्बुधिः
तत्प शुभचन्द्र आगमनिधिर्धर्मप्रवीणोऽभवत् ।
तत्पट्टे मुनिसिहकीर्तिरिति यो वागीश्वरो धर्मगी
तवंशे किल धर्मकीतिरभवत् रयात परीनाग्रणी ॥५॥
उनके पट्ट पर जिनचन्द्र हुए जो कि सिद्धान्त और तर्कशास्त्र के
विद्वान थे, उनके पट्ट पर धमप्रवीण श्रीशुभचन्द्र हुए, उनके पट्ट पर
मुनि सिंहकीति हुए जो धर्म के प्रवक्ता और वागीश्वर थे। उनके वश
मे श्रीचर्मकीर्ति हुए जो परीक्षा (प्राप्तविपयक निर्णय) मे अग्रगामी
।
सुशीलभूषणाभिध सुशीलभूपणाश्रितः ।
तदीयपट्टके स्थित स नानभूपणास्यक ॥६॥
वशश्रीसदन सुदर्शनतनु चक्रश्रिया राजित गीर्वाणाधिपतिप्रपूजितपद त्रैलोक्यचूडामणिम् ! दुबोधद्रुमखण्डनकपरशु मुक्तिश्रियो वल्लभ वन्देऽर जिनभास्कर समरसेरापूरित चिन्मयम् ॥३॥ मैं स्ववश वी श्री के निरतन (वश की प्रतिष्ठा का सवद्धंन करन वाले) शामन (दशनीय शरीर वाले) प्रवर्ती-पद की श्री से विर मान, देवनामो के अधिपति (श्द्र) से चरणवदा किये गये, नीना लोक के मुकुट-मरिण, अज्ञानम्प वृक्ष सो बाट गिराने में तीक्ष्ण पर (फ्रसा) के ममान, मुक्ति-रानो के वरलभ (प्रिय), ममरमो म आपूण, चैत मस्वरूप, श्रीअरनाथ जिनेन्द्र भगवान् को नमस्कार करता हूँ। वन्दे सदा साधुगण गरिष्ठ त्रिहीनकोटीनवक विशुद्धम् । रत्नत्रयी-भूपणभूषिताग सद्ध्यानपीयूपप्रपुष्टकायम् ॥ ४॥ मैं तीन कम नवकोटि-विशुद्ध, रत्नत्रय रूप भूपगो से विभूपिन, श्रेष्ठ ध्यानरूप अमृतपान से पुष्टवाय श्रेष्ठ साधुगणो को सदा नमस्- कार करता हूँ। श्रीशारदा सारपदार्थदात्री कुबोधमिथ्यात्सपिनाशिका वै। वन्दे जिनस्यास्यभरात्रिकाल सिद्वान्ततर्फागम पूर्ण-सिंधुम्॥५ मैं मार पदार्थों को प्रदान करने वानी, दुर्ज्ञान (कुयोध) और मिथ्यात्व का नाश करने वाली, श्रीजिनेद्र भगवान् । मुग से उत्पन्न, सिद्धान्त, तर्क और आगमा की लबालब भरी हुई सिधु नामक नदी अथवा समुद्र रूपी श्रीभगवती शारदा को नमस्कार रता हूँ। विशालकीर्तिम् प्रथम भजामि गुमत्तम गौतमनामधेयम् । सत्सूक्तिपीयूपरसेन योऽत्र प्रपोपितो भव्यगण प्रशस्तै ॥६॥ २४ T । . मर्वप्रथम मैं जगद्व्यापिनी कीर्ति से युक्त गुरुश्रेष्ठ गौतम (गणधर) को प्रणाम करता जिन पर श्रद्धा रखने वाले भव्यगणो ने अनेक पीयूषपिणी सूक्तियो द्वारा उनका स्तवन किया है। श्रीमूलसंघसदनेषु लसत्प्रदीपो जातो मुनीश्वरवर किल पद्मनन्दी । सिद्धान्ततर्कविपयेषु विचक्षणो यः श्रीजैनशासनप्रकाशनभानुरासीत् ॥७॥ जो मूलसघ के भवन को प्रकाशित करने वाले दीपक के समान हैं, ऐसे पद्मनन्दी नाम के मुनीश्वर हुए। वे सिद्धान्त-तक आदि वेपयो मे अत्यन्त निष्णात विद्वान थे और जैनशासन के प्रकाशन मे सूर्य के समान थे। तत्प जिनचन्द्रनामविदित सिद्धान्ततर्काम्बुधि. तत्प शुभचन्द भागमनिधिर्धर्मप्रवीणोऽभवत् । तत्प? मुनिसिहकीर्तिरिति यो वागीश्वरो धर्मगी. तवंशे किल धर्मकीतिरभवत् स्यात परीक्षाग्रणी ॥६॥ उनके पट्ट पर जिनचन्द्र हुए जो कि सिद्धान्त और तर्कशास्त्र के वेद्वान् थे, उनके पट्ट पर धमप्रवीण श्रीशुभचन्द्र हुए, उनके पट्ट पर मुनि सिंहकीर्ति हुए जो धर्म के प्रवक्ता और वागीश्वर थे। उनके वश में श्रीधमकीर्ति हुए जो परीक्षा (आप्तविपयक निर्णय) मे अग्रगामी ये 5 सुशीलभूपणाभिधः सुशीलभूपणाश्रित । तदीयपट्टके स्थित स ज्ञानभूपणारयक ॥६ ou श्रीमजगभूपगनामधेय प्रमाणसाहित्यकनानुराग । वाटीन्द्रपादाम्बुजमेव्यामानो जान पृथिव्या मुनिचक्रवर्ती ॥ उना पट्ट पर शीलवाना म भूपागम्वरुप सुशीलभूपग मुनि हुन श्री उप पट्ट पर जानभूषण नाम पे मुी हुए। उनके पट्ट पर जगभूपण नाम के मुनि हुए जिनका प्रमाण साहित्य और पला पर अयन्त प्रेम था और जिनके चरणो की सेवा वादीद्र (बडे व शास्त्राथमहारथी) क्यिा करते थे और जो पृथ्वी पर मुनि चाव रुपम विरयात थे। तत्पांकितराजिता मुनिरा श्रीविश्वभूपाभिधा जग्मु क्वाप्यमले पुरे जिनप्रभोर्यानार्थसिय तु ये । तस्मिन् सम्भवनाथदेवयजन-प्रारम्भ-भारोद्धरा स्तेपा नाम गुणान् सुमन्त्रममल नित्य भणामो वयम् ॥११॥ उनके पट्ट पर श्रीविश्वभूपण नामा मुनिश्रेष्ठ विराजमान हुए जो तृतीय तीर्थकर भगवान मम्भवनाथ की पूजा-प्रतिष्ठा के लिए किसी पवित्र नगर में गए और वहा उन्होंने भगवान् की प्रतिष्ठा परवाई। उनके नाम और गुणो को तथा पवित्र मन्त्र को हम नित्य ही स्मरण । करते हैं। इति नमस्कारक्रमणिका समाप्ता पंचनमस्कारस्तोत्रम्। । विश्लिप्यन् घनकर्मराशिमशनि संसारभूमिभृत- 'स्वनिर्वाणपुरप्रवेशगमने निष्प्रत्यवाय सताम् । मोहाधावटसंकटे निपतता हस्तावलम्बोऽर्हतां पायाद् व सचराचरस्य जगत संजीवनं मन्त्रराष्ट्र ।। अनादिकाल से साथ लगी हुई कर्मराशि को नष्ट कर ससारस्पी पर्वतो का भेदन करने वाला, सज्जनो के लिए मोक्ष-नगर में प्रवेश करते समय पाने वाले समस्त विनों से वाला, मोहान्धकार रूप गर्त मे (गड्ढे मे) पडे हुए प्रति हस्तावलम्बन स्वरूप और सम्पूर्ण चर-अचर जगत ऐसा यह अर्हन्त प्रादिक पचपरमेष्ठी स्वस्प नमस्कार कर आपकी रक्षा करे। एकत्र पंचगुरुमन्त्रपदानराणि विश्वत्रय पुनरनन्तगुण परत्र । यो धारयेत् किल तुलानुगत तथापि वन्दे महागुरुतर परमेष्ठिमन्त्रम तीना लोको से अधिक भारवाले (गुरणशील) परमेष्ठीमत्र का पर ही गुरु रहेगा । मैं ऐसे परमेष्ठीमन को नमस्कार करता हूँ। ये केचनापि सुपमायरका अनन्ता उत्सर्पिणीप्रभृतय प्रययुर्विवर्ता । तेष्वप्ययं परतर प्रथितप्रभावो लब्ध्वामुमेव हि गता शिवमत्र लोका ॥३॥ जो कोई सुपमा आदि अन त पारे और उत्मपिणी अवसपिएं पादि विवत (कालचक्र) व्यतीत हो गये, उन मभी समयो मे यह मा राज प्रसिद्ध प्रभावनाशील है। इमी को प्राप्त करके तीनो लोक शि (कल्याण) को प्राप्त हो गये । उत्तिष्ठन् निपतन् चलन्नपि वसन् पीठे लुठन् वा स्मरे- ज्जापद् वा प्रहसन् स्वपन्नपि वने विभ्यन्विषीदन्नपि । गच्छन् वर्त्मनि वेश्मनि प्रतिपद कर्म प्रकुर्वन्नमुं य पचप्रभुमन्त्रमेकमनिश किं तस्य नो चाछितम् ॥४॥ उठते हुए, गिरते हुए, चलते हुए, ठहरते हुए, श्रासन पर लेट हुए, जागते हुए, हसते हुए, सोते हुए, वन'मे भ्रमण करते हुए, भयकातर होने पर, दु खग्रस्त होने पर, माग मे चलते हुए, घर में प्रतिपद कर्म करते हुए जो व्यक्ति इम पचप्रभुयो (पचमेष्ठियो) के मन को निरन्तर जपता है, उसको कौन ऐसा वाछित पदाथ है, जो मिल नहीं जाता । अर्थात् वह सभी वाछिता को प्राप्त करता है। सग्राम-सागर करीन्द्र-भुजग सिह- दुर्व्याधि वह्नि रिपु वन्धनसम्भवानि । -- चौर- -ग्रह-भ्रम-निशाचरशाफिनीना नश्यन्ति पंचपरमेष्ठिपदेर्भयानि ॥५॥ पच परमेष्ठी पदो के स्मरण से सग्राम, सागर, हाथी, सर्प, सिंह, दुष्ट व्याधिया, अग्नि, शत्रु और बन्धन से उत्पन्न होने वाले, ग्रहपीडाजन्य, भ्रमसम्भूत, निशाचर और शाकिनियो के द्वारा उत्पन्न भय नष्ट हो जाते है। यो लक्ष जिनबद्धलक्ष्यहृदय सुव्यक्तवर्णक्रम श्रद्धावान् विजितेन्द्रियो भवहर मन्त्र जपेच्छावक । पुष्पै श्वेतसुगन्धिभिः सुविधिना लनप्रमाणैरमु य सम्पूजयते स विश्वमहितस्तीर्थाधिनाथो भनेन । जो जिनेश्वर भगवान् मे हदयवृत्तियो को एकाग्र करने में के प्रति श्रद्धावान होकर वर्णक्रमो का स्पष्टतया उच्चाग्न- जितेन्द्रिय श्रावक भव (ससार) का नाश करने वाले पहा का जाप करता है और विधिपूर्वक एक लाख सुगन्छिन - करता है, वह जगत्पूज्य तीर्थकर हो जाता है। इन्दुर्दिवाकरतया रविरिन्दुरुप पातालमम्बरमिला सुरलोक एव । कि जल्पितेन बहुना भुवनत्रयेऽपि जग्मुर्जिनास्तदपपर्गपद नदेव विश्व वगकमिदमत्र कथ पिनास्मात् । तत् सर्वलोकभुवनोहरणाय धीरे- मन्त्रात्मक जिनवनिहित तवात्र ॥८॥ जितेन्द्रदेव तो तभी मोक्ष मे चले गये तो फिर यह विश्व बेचाग चिना जिनेद्रा के किस प्रकार ठहरा हुया है ? हा, समझ मे आया, पीर व्यक्तियों ने सम्पूर्ण लोको एव भुवनो के उद्धार के लिये यहा पर जिनेद्र भगवान् का मनात्मक शरीर (ही) रख दिया है । हिसावाननृतप्रिय परधनाहर्ता परस्त्रीरत किचान्येप्पपि लोकगहितमति पापेषु गाढोद्यम । मन्त्रेश यदि रास्मरेद्वि सतत प्राणात्यये सर्वदा दुप्फर्माहितदुर्गतिनतचय स्वर्गी भवेन्मानव ॥६॥ हिंसा करने वाला, मिथ्या भाषण में रचि रखने वाला, पराये धन का अपहारक, परस्त्रीगामी तथा अय लोकनिन्दित पापो मे विशेप साह्म रखने वाला ऐसा व्यक्ति भी यदि प्राणत्याग के समय मनराज का जप करे तो समस्त दुष्क्मजय दुगतियो वा क्षय करके दवपद को प्राप्त करे। अय धर्म श्रेयानयमपि च देवो जिनपति बत चेतत् श्रीमानयमपि च य सर्वफ्लद । किमन्यैर्वाग्जालेबहुभिरपि ससार-जलयो नमस्कारात्तत् कि यदिह शुभरूप न भाति ॥१०॥ यह नमस्कार मनराज ही श्रेयस्कर बम है, यही जिनेद्रदेव है, यही पवित्र प्रत है, यही श्री से युक्त है, यही सम्पूण फलदाता है, अन्य ? - वाग्जालो से क्या इम मसार रूप ममुद्र मे वह क्या है जो इस नमस्कार मत्र से शुभस्प नही हा जाता हो। स्वपन् जाग्रतिष्ठन्नपि पथि चलन् वेश्मनि सरन् भ्रमन् क्लिश्यन् मायन् वनगिरिसमुद्रेष्ववतरन् । नमस्कारान् पच स्मृतिखनिनिखातानिव सदा प्रशस्तविज्ञप्तानिव वहति य सोऽत्र सुकृती॥११॥ मोते हुये, जागते हुये, ठहरते हुये, मार्ग मे चलते हुये; घर में चलते हुये, घूमते हुये, क्लेशदशा मे, मद-अवस्था में, वन-गिरि समुद्रो मे अवतरण करते हुये, जो व्यक्ति (सुकृती) प्रशस्तो में- पित किये गये इन नमस्कार मन्यो को अपनी स्मृतिरूप ED रखे हुये के समान धारण करता है वह बडा भाग्यशाली पुण्यवान्) है। इति उमास्वामिकृत पचनमस्कारस्तोत्र श्रीमानतुंगाचार्यविरचितं नमस्कारमन्त्रस्तवनम भत्तिभरअमरपणय पणमिय परमिट्रिपचय सिरसा । नवकारसारथरण भणामि भव्वाणभयहरणम् ॥१॥ भक्ति-पूवर देवताग्रो से प्रणाम दिये गये पचपरमप्ठियो व नमस्कार करके भव्य जीवा के भय को हरने वाले नमस्बारमार स्तव को मैं कहता हूँ। ससिसुविही अरिहता सिद्धा पउमाभ सुपुज्जजिणा । धम्मायरिया सोलस पासो मल्ली उपज्झाया ॥२॥ सुव्वय नेमी साहू दुट्ठारिढुस्स नेमिणो धणिय । मुक्स खेयरपयविं अरिहता दिंतु पणयाण ॥३॥ चद्रप्रभ और सुविधिनाथ तीर्थंकर भगवान का अहत ये रूप में, पद्मप्रभ और वासुपूज्य भगवान का सिद्ध के रूप मे ध्याना चाहिये तथा ऋपभ-अजित-सम्भव-अभिन दन-सुमति-सुपारव-गीतल-श्रेयास- विमल अनत धर्म-गाति-कुथु-अर-नमि-महावीर इन सोलह का प्राचाय के रूप मे तथा मल्ली और पाश्वनाथ का उपाध्याय के रूप म ध्यान करना चाहिय । मुनिसुव्रत और नेमिनाथ तीर्थक्गे का साधुस्थान में ध्यान करना चाहिये । साधु दुष्ट अरिप्ट (आपत्तियों) के नाश करने में चक्रधारा के समान होते हैं । अहन्त प्रणतजनो के लिए मोक्ष एव नेचर पदवी को प्रदान कर।
मोह सिद्धा कुणतु भुवणस्स । पस पवत्थ थभतु आयरिया ॥४॥ ने लोक का वशीकरण करे और ससार का | आदि (जल, ज्वलन, विपधर, चोर, शत्रु, शाकिनी-डाकिनी-राकिनी-लाकिनी-छाकिनी, - । स्तम्भन करे। ज F 1 उवज्झाया हुतु सव्वभयहरणा । निउणा माहू सया सरह ॥५॥ नाम करने वाले उपाध्याय समस्त भयो को 'नो साधु पाप के उच्चाटन, मारण आदिक । * गयण सिद्धाय सूरिणो जलणो । वणो मुणिणो हरन्तु दुहम् ॥६॥ भगवान् का ध्यान करना चाहिये, आकाश- व मे प्राचार्यो का और तैजसतत्व मे उपा- मे मुनियो का व्यान करना चाहिये । इस ये पाचो परमेष्ठी हमारे दुखो का नाश करने १७ - . रत्ता सिद्धा य सूरिणो कणया । सामा साहू सुह । उज्ज्वल वर्ण ध्यान , उपाध्याय मर गवर्ण) मेष्ठी ३
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- तियलोयवसीयरण मोह सिद्धा कुणतु भुवणस्स । जल जलणए सोलस पयत्थ थभतु आयरिया ॥४॥ मिद्ध भगवान् तीनो लोक का वशीकरण करे और मसार का मेहन करें। आचार्य जल आदि (जल, ज्वलन, विषधर, चोर, शत्रु- सिंह, मप, भय, मग्राम, शाकिनी-डाकिनी-राकिनी-लाकिनी-दाकिनी, हाक्निी) इन सोलह का स्तम्भन कर। इहलाइयलाभकरा उबझाया हुतु सव्वभयहरणा। , पावुन्चाडण-ताडणनिउणा माह सया सरह ॥५॥ इह लोक के लिए लाभ करने वाले उपान्याय समस्त भयो को हरने वाले हो । है भव्यजनो । साधु पाप के उच्चाटन, मारणं आदिक - । कर्मो मे सदा सहायक हो। महिमण्डलमरहन्ता गयण सिद्धाय मूरिणो जलगो। वरसंवरमुवझाया पवणो मुणिणो हरन्तु दुहम् ॥६॥ पृथ्वीतत्व में अर्हन्त भगवान का ध्यान करना चाहिी, आकाश- तत्व मे मिद्धो का, जलतत्व मे प्राचार्यों का और तेजमतत्त्र मे उपा- प्यायो का तथा पवनतत्व में मुनियो का ध्यान करना चाहिये। इस प्रकार से व्यान करने पर ये पाचो परमेष्ठी हमारे दुखो का नारा करने वाले हा। . ससिधवला अरहता रत्ता सिद्धा य सूरिणो कणया ।' मरगयभा उवझाया सामा साहू सुह दितु ॥७॥ अर्हन्तो का चन्द्रममान उज्ज्वल वर्ण ध्यान करना चाहिए, सिद्धो का रक्तवर्ण, प्राचार्य कनकवर्ण, उपाध्याय मरकतमरिणमदृश नीलवर्ण और साधुग्री का श्यामवर्ण (कृष्णवर्ण) ध्यान करना चाहिये। इस प्रकार से ध्यान करने पर ये पचपरमेष्ठी मे कल्याणदायक हो। d
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तियलोयवसीयरण मोह सिद्धा कृणतु भुवणस्स । जल-जलणए सोलस पयत्य थभतु आयरिया ॥४॥ मिद्ध भगवान तीनो लोक का वशीकरण करें और ममार का मैहन करे । प्राचार्य जल आदि (जल, ज्ववन, विपधर, चोर, शत्रु, सिंह, सप, भय, सग्राम, शाकिनी-डाकिनी-गक्निी-लाकिनी-छाकिनी, हाक्निी) इन मोलह का स्तम्भन करे । इहलोइयलाभकरा उवज्झाया हुतु सव्वभयहरणा । पावुच्चाडण-ताडणनिउणा माह सया सरह ॥५॥ इह लोक के लिए लाभ करने वाले उपायय समस्त भयो को हरने वाले हो । हे भव्यजनो । माधु पाप के उच्चाटन, मारण आदिक कर्मों मे सदा सहायक हो । महिमण्डलमरहन्ता गयण सिद्धाय मूरिणो जलगो । वरसंवरमुत्रझाया पवणों मुणिणो हरन्तु दुहम् ॥६॥ पृथ्वीतत्व मे अर्हन्त भगवान का ध्यान करना चाहिये, आकाश- तत्व मे सिद्धो का, जलतत्व मे प्राचार्यो का ओर तेजमतत्व मे उपा- ध्यायो का तथा पवनतत्व में मुनियो का ध्यान करना चाहिये । इम प्रकार से व्यान करने पर ये पाचा परमेष्ठी हमारे दुःखो का नाश करने -- वाले हो। . ससिधवला अरहता रत्ता मिहा य सूरिणो कणया। मरगयभा उबझाया सामा साहू सुह दितु ॥७॥ अर्हन्तो का चन्द्रसमान उज्ज्वल वर्ण ध्यान करना चाहिए, सिद्धो का रक्तवर्ण, प्राचाय कनकवर्ण, उपाध्याय मरकतमणिमदृश नीलवर्ण और साधुग्रो का श्यामवर्ण (कृष्णवर्ण) ध्यान करना चाहिये । इस प्रकार से ध्यान करने पर ये पचपरमेष्ठी में कल्याणदायक हो।
सीसत्था अरहता सिद्धा वयणम्मि सूरिणो कठे। हिययम्मि उवज्झाया चरणठिया साहुणो वदे ॥८॥ अर्हन्तो को शिर स्थ ध्यान करना चाहिये, मुख में सिद्धा का कण्ट में सूरियो (प्राचार्यो) का, हृदय में उपाध्यायो का और चरण- प्रदेश में साधुप्रो का ध्यान करना चाहिये । इस प्रकार ध्यान क्यि गये इन पाचो परमेष्ठियो को हमारी वन्दना हो। अरिहता असरीरा आयरिया उवज्झाय तहा मुणिणो । पचक्खरनिप्पन्नो ओंकारो पंचपरमेट्ठी ॥६॥ अन्त, सिद्ध, प्राचार्य, उपाध्याय और मुनि इनके पचाक्षरो से निप्पन भोकार ही पचपरमेष्ठी है। वकला अरिहता तिउणा सिद्धा य लोढकल सूरी। उवझाया सुद्धकला दीहकला साहुणो सुहया ॥१०॥ वतुल (गोल) आकारयुक्त अर्हन्त, त्रिकोणाकार सिद्ध, लोप्टक- प्राचारधारी प्राचाय, द्वितीया के चद्र की फ्ला के समान आकार- धारी उपाध्याय, दीपकला (प्रलम्बकला) के आकारधारी साधु ध्यान करने वालो के लिये सुखकारी हो । पुसिस्थि-नपु सय-रायपुरिस-बहुसद्दवरणणिज्जाण । जिण-सिद्ध-सूरि-वायग-साहूणकमे णमसामि ॥११॥ पुरपाशक अर्हन्त, नारीअशक सिद्ध, नपु सकाशक प्राचाय, राजपुरुषाशक उपाध्याय और थाद्धजनाशक साधुओ को मैं नमस्कार करता हूँ। पढभ-दुसरारिहता चउस्सरा सिद्ध-सूरि-उवझाया । दुग-दुगसरा कोण मदन्तु मुनीसरा दुसरा परशा , ते प्रथम द्विस्वर (अ-आ) रूप ग्रहन्त होते है। इ-ई-उ-ऊ इन चतु स्वर रूप सिद्ध होते है। आचार्य ए-ऐ रूप होते है। प्रो-ौ रुप उपाध्याय होते है । इस प्रकार ये दो दो स्वर वाले अर्हन्त आदिक तथा द्विस्वर अ-अ रूप मुनीश्वर जयशाली हो । पुण अएकचटतपयस त्ति नववग्ग वन्न पणयाला । परमिटिमण्डलकमा पढमतिमतुरियतियवीया ॥१३॥ वे वर्ण अ-ए-क-च-ट-त-प-य-म इस प्रकार नव वर्गों में विभक्त ४५ अक्षर होते हैं। वे परमेष्ठीमडल क्रमानुक्रम से प्रथम, अन्तिम, चतुर्थ, तृतीय और द्वितीय होते है। सतिसुक्के अरिहते रविमगल सिद्ध गुरु-वुहा सूरी। सरह उवज्झाय केऊ कमेण साहू सणी अहन्त भगवान् चन्द्र और शुक्र के, सिद्ध सूर्य और मङ्गल के, प्राचाय गुरु (वृहस्पति) और बुध के, उपाध्याय केतु के और साधु शनि और राहु के रूप मे स्मरण करने योग्य है । वरणनिवहो कगाई जेसि बीओ हकारपज्जतो नियनियसरसजोगा सरेमि चूडामणि तेहि ॥१५॥ जिन अर्हन्त आदिको का ककार से लेकर हकार पर्यन्त वर्णसमूह वीज है, अपने अपने स्वर के सयोग से उनकी चूडामणि को मैं स्मरण राहू ॥१४॥ करता हूँ। सेयारुणपीयपियगुवन्न कसिणाइ विडवित्तपाई। अबिल-महु-तिक्ख-कसाय-कडुय परमिट्ठिणो वदे ॥१६॥ अर्हल आदिको का क्रम से वर्णध्यान इस प्रकार करना चाहिए- प्रहन्त श्वेत, सिद्ध अरुण, प्राचार्य पीत, प्रियगु (नीलवर्ण वृक्ष) के ३५ समान उपाध्याय और वृक्षपयो के समान माधुप्रो का ध्यान कर चाहिए तथा अम्ल, मधुर, तिक्त, कपाय और क्टु इस पच रस परमेष्ठियो को वन्दना करनी चाहिए। पुव्वाणुपुग्विहिट्ठा समयाभेएण कुरु जहाजिट्ठ । उवरिमतुल्ल पुरो निसिज्ज पुव्वक्कमो सेसो ॥१७॥ जम्मिय निक्खित्ते खलु सोचेव हविज अकपिन्नासो सो होई समयभेश्रो वज्जेयन्वो पयत्तेण ॥१६॥ इच्छियपय अकाण नासभासो य भंगपरिमाण । अतकभागलद्ध ठवियका पुण पुणुद्धरिय ॥१६॥ मूलगपतिद्गेण अको जो ठविय दुन्नि जे अका। तेसि दुभगे काउ निसिज कमक्कमेण तु ॥२०॥ नंदा तिहि अरिहंता भद्दा सिद्धा य सूरिणो य जया। तिहि रित्ता उवझाया पुण्णा साहू सुह दितु ॥२१॥ अन्तो का ध्यान नन्दा तिथि में, सिद्धो का भद्रातिथि में, प्राचार्यों का जयातिथि में, उपाध्यायो का रिक्ता तिथि मे तथा साधुओं का पूर्णातिथि में ध्यान करना चाहिए । ये पच परमेष्ठी मुझे सदा सुख दें। १ १-गाया न० १७-१८-१९-२० इन चारो गाथाओ का अथ ठीक तरह समझ में नही पा सका । अत विद्वान् इनका अथ निकालने का प्रयत्न करें। यदि हमें भी अथ भेज सकें तो हम उनके श्राभारी रहेंगे और अगले सस्करण में इन गाथायो का अथ दे देगे-स० . । ससि-मंगल अरिहंता बुहो य सिद्धा य सुरगुरू सूरी। सुक्को उवझाय पुणो साहू मदो सुहं भाणू ॥२२॥ सोम-मगलवारो को अर्हन्तो का, वुधवार को सिद्धो का, बृहस्पतिवार को प्राचार्यों का, शुक्रवार को उपाध्यायो का और रविवार तथा शनिवार को साधुओ का ध्यान करने पर वे सुखप्रद होते हैं । कत्तिय-चित्तो अरिहा वसाहो मग्गमास सिद्धा य । पोसो-जिट्ठो-भव-बातोश्रा सूरिणो सुहया ॥२३॥ माहासाढुज्झाया फग्गुणमासो य सावणो साहू । मह मगलमरिहता अचितचितामणी दिंतु ॥२४॥ अर्हन्तो का ध्यान कार्तिक और चैत्र में, सिद्धो का ध्यान वैशाख और मार्गशीर्ष में, प्राचार्यों का पौप, ज्येष्ठ, भाद्रपद और आश्विन में, उपाध्यायो का माघ और आपाढ मासो मे तथा साधुओ का फाल्गुन एव श्रावण मास में व्यान करना चाहिए। अचिन्त्यचिन्ता- मणि भगवान् अर्हन्त मेरा कल्याण करे । पु सयरा अरहंता घणिट्ठापंचगा य सिद्धा य । दिगुरिक्खा मायरिया णमामि सिरसा य भत्तीए ॥२५॥ आदाई जे रिक्खा उवझाया तेसि दितु गुणनिवह। चित्ता साई साहू सासयसुक्ख महं दितु ॥२६॥ अर्हन्त पुरप नक्षत्र हैं, घनिष्ठापचक सिद्ध हैं, प्राचार्य द्विगु नक्षत्र हैं, उन्हें मैं भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर नमस्कार करता हूँ। आर्द्रा आदि जो नक्षत्र हैं वे उपाध्याय है। वे मुझे अनेक गुणो को प्रदान करे। चित्रा और स्वाति नक्षत्र साधु स्वरूप है। ये मुझे शाश्वत सुख प्रदान करें। ३७ ऊमु कन्ना पिस परिहा मेसोमयरो य अतिणो सिमा। पचागरण अलि सूरी धणु मिहुणोज्झापया वदे ॥२७॥ ककडतुला य साह दोहद रासी य पचपरमिट्ठी । भावेण थुणमाणो पावइ मुक्स च मुकरय च ॥२८॥ कुम्भ, कन्या और धूप राशि म्प अहंन्त, मैप, मकर और मीन स्प सिद्ध भगवान्, सिंह तथा वृश्चिक म्प प्राचाय, धनु और मियुर स्प उपाध्याय हैं, उन्हें नमस्कार हो । यस पोर तुला स्वम्प साधु इस प्रकार द्वादश राशिस्वरूप पचपरमेष्ठी मेरे द्वारा स्तुति किये गा सुस और मुक्ति के दायर्य हो । त नत्थि जन इत्थ निमित्तगहगणियमततताई। ज पत्थिय प्रयच्छ कहेइ ज पुच्छिय सयल ॥२६॥ इसलिए ग्रहगणित और मन्त्रतन्त्रादि इसके निमित्त नहीं है। इस पचपरमेष्ठीस्तवन से जो मागा जाता है, सो देता है और जो पूछा जाता है सो वहता है। तिहुयणसामिणिविज्जा महमन्तो मूलमततत्ततिय । इत्य ठिय पि न नज्जद गुरुवपस विणा सम्म ॥३०॥ मूल-मत्र और तन्त्र इस प्रकार तीन रूप महान त्रिभुवनस्वामिनी विद्या यहा स्थित होते हुए भी गुरउपदेश बिना प्राप्त नहीं की जासक्ती। सुमरियमित्त पि इम'तरा नासेइ सयलदुरियाइ । पारम्परेण नाय त नत्थि सुह न जे कुण्ड ॥३१॥ यह पचपरमेष्ठी स्तोत्र स्मरण मात्र से सम्पूर्ण पापा का नाश कर देता है और ससार में ऐसा कोई सुख नहीं है जिसे परम्परा से प्राप्त न दिया जा सके।
: पचनवकारत लेलेण संसिअ अणुहवेणम् । ३ सिरिमाणतुगमाहिंदमुज्जवल सिवसुहं दितु ॥३२॥ पच नमस्कार मन्त्र का तत्व श्रीमानतुगाचार्य ने अपने अनुभव के अाधार पर सक्षेप में कहा है। वह मन्त्र मुझे विशुद्ध मोक्ष-सुख दे । । सभरह पढह झायह णिच्च घोमेह णवह अरहाई - भद्दपरा जइ इच्छह तस्सेव य अत्तणो णाण ॥३३॥ जो इस नवपदी णमोकार मन्त्र का स्मरण करता है, पढता है, नित्य ध्यान करता है और उच्चारण करता है वह अपना कल्याण करता है और आत्मज्ञान प्राप्त कर लेता है। न हि उवसग्गा पीडा कूरग्गहदसण भयो संका। जह वि न हबति एए तो वि तिसझ भणिज्जासु ॥३४॥ इस नवपदी नमस्कार मन्त्र के पाठ से न तो उपसर्ग किसी प्रकार को पीडा देते है, न क्रूर ग्रहो का दर्शन होता है और न ससार-परि- भ्रमण की बहुशका रहती है । यद्यपि एक बार नमस्कारमन्त्र के जाप से ये बाधाए नही होती, तथापि इसका त्रिकाल पाठ करना चाहिए । एसो परमरहस्सो परमो मतो इमो तिहुअणम्मि । ता किमिह बहुविहेहिं पढिएहिं पुत्थयसएहिं ॥३५॥ तीनो भुवनो मे यह नमस्कारमन्त्र परम रहस्य है, परम मन्त्र है, सो अधिक पढने और पुस्तकभार उठाने से क्या लाभ है। अर्थात् केवल णमोकार मन्त्र से ही सर्व सिद्धि हो जाती हैं ।
रणमो " -- . ॐ ह्रा णमो अरहताण । ह्रीं णमो सिद्वाणं । ह. प्राइरियाणा। हो णमो उपज्झायाण। ह णमो सव्यसाहूण। इति पचवीजानि। अथ श्रीपचपरमेष्ठिमन्त्रप्रभावफलं लिग्यते । पण तीस सोज छप्पण'चदु दुगमेक च जवहझाएह । परमेट्ठिवाचयाण अण्ण च गुरुवदेसेण ॥१॥ णमो अरहताण। णमो सिद्धाण । णमो आइरियाण। णमो उवझायाण ।, णमो लोए सव्वसाहूण।। । अपराजितमन्त्रोऽयम्। दर्शनज्ञानचारित्रतपासि परिचिन्तयन् । श्रियमात्यन्तिकी प्राप्ता योगिनो येऽत्र केचन ॥१॥ अमुमेव महामन्त्र ते समाराध्य केवलम् । प्रभावमस्य निश्शेप योगिनामप्यगोचर ॥२॥ इस अपराजितमत्र के द्वारा दर्शन, ज्ञान और चारिन का पालन करते हुए इस ससार मे जो कोई योगिजन प्रात्यनिक श्री को प्राप्त हुए है, वे सभी दमी मत्र के समागधन और प्रभाव से हुए है । 'इसे अपराजितमत्र का सम्पूण' स्प से प्रभाव वर्णन करना योगियों के लिए भी असम्भव ही है। अनभिज्ञो जनो ब्रूते य स मन्येऽनिलार्दित अनेनेव विशुयन्ति जन्तव पापपकिला ॥३॥ - म . - ३ इस अपराजित मन्त्र के विपय मे जो अनभिज (अजान) व्यक्ति कुछ बोलने (माहात्म्यख्यापन करने) का साहस करता है, मानो वह वातरोग से पीडिन है। संसार मे पाप के पक मे लिप्त मनुष्य इसी से विशुद्धि को प्राप्त करते हैं। अनेनव विमुच्यन्ते भवक्लेशान्मनीषिण । असावेव जगत्यस्मिन् भवविध्वसवान्धवः ॥४॥ प्रशस्त मन वाले विद्वान् इमी मन्त्र से मसार के वन्ध से मुक्ति का प्राप्त करते हैं। यही इम समार मे मुक्तिमाग का सखा है । अमु विहाय सत्वाना नान्य कश्चित् कृपाकर । पतद् व्यसन पाताले भ्रमत्ससार-सागरे ॥५॥ अनेनेव जगत् सर्वमुद्धत्य विधृत शिवे । शतमष्टोत्तरं चास्य त्रिशुझ्या चिन्तयेन्मुनि ॥६॥ इसको छोडके प्राणियों के लिये अन्य कोई कृपाकर नहीं है। मार-मागर मे डूबते हुये हो या व्यसन के पाताल-विवर में प्रवेश रते हुए हो, इसी मन्त्रराज के द्वारा मभी का उद्धार हो जाता है पौर वे कल्याण-मार्ग पर इसी से स्थित होते हैं। मुनि को इसकी १०८ जाप्य त्रिशुद्धि (मन, वचन, काय) मे करनी चाहिए । भु जानोऽपि चतुर्थस्य प्राप्नोति विकल फलम् । स्मरन्मन्त्रपदोद्भूता महाविद्या जगोन्नताम् (१) ॥७॥ गुरुपचकनामोच्छपोडशानरराजिताम् । अहम् सिद्धोपाध्यायसर्वसाधुभ्यो नम ॥८॥ समार भर मे उन्नत, मन्त्र पद से उत्पन्न इम श्रेष्ठ महाविद्या गे स्मरण करने वाला भोजन करता हुग्रा भी इस मन्त्र के जाप्य से प्राशिय फन का प्राप्त कर रोता है । इसी म पाचौ गुरु (पचपरमेश समाये हुए है, यह मोलह अभगे से युक्त है। भगवान अहत, मिद्ध उपा' याय पार मभी सायुप्रो को नमस्कार है। अस्या शतद्वय ध्यानी जपेदेकायमानस । अनिन्छन्नप्यवाप्नोति चेकपोषणज फ्ल ॥६ ध्यान करने वाले को इसवा दो सौ बार जाप्य गे ध्यान करना चाहिए। ऐसा विधिपूर्वक जाप्य करने वाला विना पुन्ठा रसते हुए भी (मन्त्र की अमोघवीयता के कारण) एर उपवाग का फन ता प्राप्त करता ही है। विद्या पडूवर्गसम्भूतामजेया पुण्यशालिनी । जपन् प्रायुक्तमभ्येति फल ध्यानी शतत्रयम् ॥१०॥ पड्वग से उत्पन्न हुई, अजेय और पुण्यशालिनी इस विद्या य तीन सौ जाप्य करने से ध्यान करने वाला पूर्वोक्त (एवोपवास) फर को प्राप्त करता है। अर्हन्मत्र चतुर्वर्णं चतुर्वर्गफलप्रदम् । चतु शती जपन् योगी चतुर्थस्य फल लभेत् ॥११॥ भगवान् अहत, सिद्ध, उपाध्याय और साधु रूप चतुवरण यह मत्र चतुवग (धम, अथ, काम, माक्ष) या फर प्रदान करन वाला है। इसका चार सा सग्याप्रमाण जाप्य करने से योगी (भव्यजन) मोक्ष- फल को प्राप्त करता है। । अर्हन्त अवर्णस्य सहस्रार्द्धम् जपन्नानन्दसवृत । प्राप्नोत्येकोपवासस्य निर्जरा निर्जराशय ॥१२॥ ४२ -- अन्त भगवान् के प्र-वग्ग क सहलवे भाग का अावा भी आन दयुक्त मन से जो जाप्य करता है, वह एकोपवास की निजरा को पाता है। पचवर्णमयी विद्या पंचतत्वोपलनिता । मुनिवीरे श्रुतस्कन्धाद वीजवुझ्या समुद्धृता ॥१३॥ इस पचवर्णमयी और पचतत्वो मे उपलक्षित विद्या का वीर मुनियों ने श्रुत के स्कन्धो से चीज के समान मानकर उद्धार किया है। असिग्राउसा नम । एतद्धि कथित शास्त्रे रुचिमात्रप्रसाधकम् । किंचामीपा फलं सम्यक् स्वर्गमोनकलक्षणम् ॥१४॥ असिग्राउमा नम । गास्त मे इसे सभी इच्छानो का पूरण करने वाला कहा है । और इसके फल के रूप मे स्वग और मोक्ष की प्राप्ति का वखान किया है। सिद्धम् । एकाचर पचपरमेष्टिनामपरम् । उक्तं च । मिद्ध, यह एकाक्षर पाचो परमेष्ठियो के नाम का वाचक है अर भी है- अरहंता असरीरा आयरिया तह उवज्झाया मुगि। पणमक्खरनिप्पएणो अकारो पचपरमेट्ठि ॥१५ अर्हन्त, सिद्ध, प्राचार्य, उपाध्याय और मुनियो । निप्पन्न ॐकार यह पचपरमेष्ठी है।
इहलोकपरलोकेप्टफलप्रदाना) ज्ञात्वा वचनोच्चारण जाप्य कुरुत । तथैव शुभोपयोग-त्रिगुप्त्यवस्थायां मानेन, ध्यायत ॥१॥ इस पच परमेष्ठी मन्त्र को इहलोक और परलोय मे इप्टर का प्रदाता जानकर वचन के उच्चारण से जाप्य करते रहना चाहिए। और शुभोपयोग और मन-वचन-काय-गुप्ति को अवस्था में मौनपूर इसका ध्यान करना चाहिये ।
अथ वज्रपंजरस्तोत्रम्
परमेष्ठिनमस्कार सार नवपदात्मकम् ।
आत्मरक्षाफर वज्रपजरास्यं स्मराम्यहम् ॥१॥
परमेष्ठी नमस्कार मन्त्र नवपदात्मक है और सभी मन्त्रो का सार-
भूत है। यह आत्मा की रक्षा करने वाला है। इस बज्रपजर स्तोत्र
का मैं स्मरण करता है।
ॐ णमो अरहताण शिरस्कन्धरसस्थितम् ।
ॐ णमो सिद्धाणं मुखे मुखपटावरम् ॥२॥
ॐ णमो आयरियाण अग रतति साधिनाम् ।
ॐ णमो उवज्झायाणं आयुधे हस्तयोर्द्धयोः ॥३॥
ॐ णमो लोए सव्वसाहूण मोचके पादयो. शुभे।
एसो पच णमोकारो शालिवजमयस्तले ॥४॥
सव्वपापप्पणासणो बनो वज्रमयो बहिः ।
मगलाणं च सव्वेसि खदिरागारखातिकाम् ॥५॥
स्वाहान्त च पदं ज्ञेय पढम हवड मगलम् ।
वोपरि वनमय पिधान देहिरक्षणम् ॥६॥
महाप्रभावरक्षेयं तुद्रोपद्रवनाशिनी।
परमेष्ठिपदोद्भूता कथिता पूर्वसूरिभिः ॥७॥
- + यश्चैना कुस्ने रना परमेष्ठिपढे मदा। नस्य न म्याद भय व्याधिराधिश्चापि कदाचन ॥८॥ ॐ णमो अरहन्तारण यह शिर और कधी को रक्षा कर । ॐ गामी सिदारण यह मुम और मुसपटाम्बर की रक्षा करे। ॐ गमा आयरियाण यह साधको की अग-रक्षा करता है। ॐ रामो उवमा याण यह दोनो हाया की रक्षा करे, आयुधो की रक्षा कर । ॐ रामा लोए स साहूण चग्गो की रक्षा करें। यह पच नवकार दोनो परा में भालियन के ममान है । सव्वपापप्पणामणो यह वाह बञमय है और मगलाण च मन्येसि पदिर की अग्नि के लिए साई के समान है। पढम हवइ मगलम यह स्वाहान्त पद जानना चाहिए। यह बचपजर देहधारियो के शरीर पर बत्रमय पिधान (आवरण) है। यह महा प्रभावमयी रक्षा है । क्षुद्र उपद्रवो का नाशक है। परमेष्ठियो के पद से उत्पन्न ह और पूर्वाचार्यों द्वारा कहा गया है । जो परमेष्ठी पदो स इसकी रक्षा करता है, उसे कोई भय, व्याधि और पाधि नहीं होती। अथ भस्मपजरस्तपराजो लिस्यते । परमेष्ठिनमस्कार सार नरपदात्मकम् । आत्मरत्ताकरं वज्रपजराम स्मराम्यहम् ॐणमो अरहताण शिरस्कन्धरसस्थितम् । ॐ णमो सिद्वाण मुसे मुखपटाम्बरम् ॥२॥ ॐ णमो पाइरियाण अगरनातिशायिनी। ॐ णमो उपज्झायाण आयुध हस्तयो ढम् ॥३॥ ॐ णमो लोए सव्यसाहूण मोचके पादयो शुभे। एसो पच णमोकारो शिला वञमयी तलेला । PE । - । सव्वपापप्पणासणो वप्रो वञमयो वहि । मगलाण च सव्वेसि खदिरागारखातिका ॥५॥ स्वाहान्त च पद ज्ञेय पढम हवइ मगलम् । वनोपरि वज्रमयं पिवान देहरक्षणे ॥६॥ महाप्रभावरलेय क्षुद्रोपद्रवनाशिनी । परमेष्ठिपदोद्भूता कथितो पूर्वसूरिभि ॥७॥ यश्चेव कुस्ते रतां परमेष्ठिपदै सदा । तस्य न स्याद् भयं व्याधिराधिश्चापि कदाचन ॥८॥ (यह वज्रपजर के समान ही है। इसलिए इसका अर्थ वज्रपजर- स्तोत्र के समान ही जानना चाहिए।) इति श्रीभस्मपजरस्तोत्र सवाधिव्याधिहर समासम् ।
अथ जिनपंजरस्तीत्र लिख्यते ।
ॐ ह्रीं श्रीं अर्ह अहंदुभ्यो नमो नम ।
ॐ ह्रीं श्री अर्ह सिद्धेभ्यो नमो नम ।
ॐ ह्रीं श्रीं अहं आचार्येभ्यो नमो नम ।
ॐ ह्रीं श्रीं अर्ह उपाध्यायेभ्यो नमो नम ।
ॐ ह्रीं श्रीं अहं श्रीगोतमस्लामिप्रमुससर्वसाधुभ्यो
नमो नम
एप पचनमस्कार सर्वपापचयकर ।
मगलाना च सर्वेषा प्रथम भवति मगलम् ॥१॥
ॐ ह्री श्री अह, प्रहन्त भगवान् को नमस्कार हो ।
ॐ ह्री श्री अहं, सिद्ध भगवान् को नमस्कार हो ।
ॐ ह्री श्री अह, आचार्यों को नमस्कार हो ।
ॐ ह्री श्री अह, उपाध्यायो को नमस्कार हो ।
ॐ ह्री श्री प्रह, श्रीगौतमस्वामी प्रमुख सभी साधुनो को
नमस्कार हो।
यह पचनमस्कार मात्र सभी पापा का क्षय करने वाला है । मभी
मगलो मे यह प्रथम (पाद्य) मगल
ॐ ह्रीं श्रीं जय विजये, अर्ह परमात्मने नम ।
कमलप्रभसूरीन्द्रभावित जिनपजरम् ॥२॥
ॐ ह्री श्री जये विजये, अर्हन्त भगवान् को नमस्कार है । कमल- भ सूरीन्द्र न इस जिनपजर स्तोत्र को कहा है । एकभुक्तोपवालेन त्रिकाल य पठेदिदम् । मनोऽभिलापित सर्व फल स लभते ध्रुवम् ॥३॥ प्रतिदिन एक समय भोजन करके जो इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह निश्चय ही मन की अभिलापापा के अनुकूल इच्छित फल पाता है। । भूशायी ब्रह्मचर्येण क्रोधलोभविवर्जित । देवताग्रे पवित्रात्मा पण्मासैर्लभते फलम् ॥४॥ साधक पृथ्वी पर शयन करे, ब्रह्मचयव्रत धारण करे, क्रोध और लोभ का परित्याग करें। देवता के पागे पवित्र मन, वचन, काय से रह तो छ मासो मे फल को प्राप्त करता है। अर्हन् स्थापयेन्मूनि सिह चक्षुर्ललाटके । आचार्य श्रोत्रयोर्मध्ये उपाध्यायन्तु नासिके ॥५॥ साधुन्द मुखस्याग्रे मनःशुद्धि विधाय च । सूर्यचन्द्रनिरोधेन सुधीः सर्वार्थ-सिद्धये ॥६॥ अर्हन्त भगवान् को मस्तक पर स्थापित क्रे, सिद्ध भगवान को चक्षु और ललाट मे, प्राचार्य को दोनो कानो के मध्य भाग मे, उपा- व्याय को नासिका मे, साधुग्रो को मुख के अग्रभाग मे भावनापूर्वक धारण करे । मन की शुद्धि रखे। सूय और चन्द्र का निरोध करे अर्थात् अपने श्वासोच्छ्वासो मे जो दो दक्षिण और वाम स्वर है, उनमे एक सूर्य और दूसरा चन्द्र कहा जाता है, मन का योगीजन सदैव नियमन करते है और वाछित सिद्धि को प्राप्त करते है। साधक को चाहिए कि वह भी साधना के समय इन दोनो स्वरो की साधना भी रखे। . - दक्षिणे मदनद्वेषी वामपाश्वें स्थितो जिन । अगसन्धिषु सर्वन परमेष्ठी शिवकर ॥७॥ दक्षिण अग मे कामदेव मे द्वेष अर्थात् वीतरागता रखने वा भगवान् के स्वरूप का ध्यान करे । वामपार्श्व मे जिनेन्द्र भगवान् : ध्यान करे । सभी अगसन्धियो मे कल्याण करने वाले भगवान् परमर की स्थिति का चिन्तन करे। पूर्वस्या जिनो रोद् आग्नेय्या विजितेन्द्रिय । दक्षिणस्या परब्रह्म नैा त्या च त्रिकालवित् ॥८॥ पूर्वदिशा मे जिन भगवान्, आग्नेय दिक्कोण मे विजितदिई दक्षिण मे परब्रह्म और नैऋत्य मे त्रिकालवित् भगवान् रक्षा करें। पश्चिमाया जगन्नाथो वायव्ये परमेश्वर । उत्तरा तीर्थकृत् सर्व ईशाने च निरजन ॥६॥ पश्चिम में जगनाथ रक्षा करें, वायव्य मे परमेश्वर रक्षा कर उत्तर दिशा मे तीर्थंकृत् (तीर्थकर) रक्षा करें। और ईशान मे निरज रक्षा करें। पाताले भगवानहन्नाकाशे पुरुषोत्तम । रोहिणीप्रमुसा देव्यो रक्षन्तु सकल कुलम् ॥१०॥ पाताल में भगवान् ग्रह त रक्षा करे। पावाश में पुरुषोत्तम रक्षा फरें। रोहिणी प्रमुस देविया सक्ल कुल की रक्षा करें। पभो मस्तक रक्षेद् अजितोऽपि विलोचने । सम्भर कर्णयुगले नासिका चाभिनन्दन ॥११॥ भगवान ऋपभ मस्तर की रक्षा कर । अजितनाथ भगवान्
नोचना की रक्षा करे । सम्भवनाथ दोनो कानो की रक्षा करे तथा
अभिनन्दन नामिका की रक्षा करे ।
ओष्ठौ श्रीसुमती रनेत् दन्तान् पद्मप्रभो विभु ।
जिह्वा सुपार्श्वदेवोऽयं तालु चन्द्रप्रभाभिधः ॥१२॥
मेरे अोठो की श्रीसुमतिनाथ रक्षा करे, दन्तो को पद्मप्रभ विभु
(क्षा करे, जिह्वा की सुपाश्वदेव रक्षा करे । तालु की चन्द्रप्रभ नामक
र्यकर रक्षा करे।
कठ श्रीसुविधि रचेद हृदय श्रीसुशीतल ।
श्रेयासो वाहुयुगल वासुपूज्य करद्वयम् ॥१३॥
मेरे कण्ठ की श्रीसुविधि रक्षा करे, हृदय की श्रीसुशीतल रक्षा करें,
यास दोनो वाहुओं की रक्षा करे ओर वासुपूज्य मेरे दोनो हाथो की
क्षा करें।
अगुलि विमलो र द अनन्तो सोनखानपि ।
श्रीधर्मोऽप्युदरास्थीनि श्रीशान्ति भिमण्डलम् ॥१४॥
विमलनाथ भगवान् अगुलियो की रक्षा करें, अनन्तनाथ नखो की
क्षा करे, श्रीधर्मनाथ भगवान् उदर की अस्थियो की तथा शान्ति-
थिजी नाभिमण्डल की रक्षा करे ।
श्रीकुन्थो गुह्यकं रक्षेद् अरो रोमकटीतटे।
मल्लिहरू पृष्ठिवशं पिडिका मुनिसुव्रत ॥१५॥
श्रीकुन्युनाथ गुह्य की रक्षा करे, भगवान् अरनाथ रोम और कटी-
तट की रक्षा करे, मल्लिनाथ भगवान् उरू की तथा पीठ की रक्षा
करें। मुनिसुव्रत पिण्डलियो की रक्षा करे ।
पादागुलीनमी रक्षेद् श्रीनेमिश्चरणद्वयम् ।
श्रीपार्श्वनाथः सर्वांग वर्द्धमानश्चिदात्मकम् ॥१६॥
- -- मिनाय पैरा यो गुलिया की रक्षा करें, श्रीनेमिनाथ दाई- चरणा की रक्षा परे । श्रीपार्श्वनाथ मार अग की रक्षा करे, वदना श्रीमहावीर भगवान् चतम स्वम्प ग्रामा पो रक्षा करें। पृथिवीजलतेजस्कवारवाफागमय जगत् । रच दशेपपापेभ्यो वीतरागो निरजन ॥१७॥ पृथ्वी, जल, तज, वायु, आपारा प जगत् की गभी प्रकार पापो से वीतराग निरजन भगवान् रक्षा करें। राजद्वारे श्मशाने च मग्रामे शत्रुमकटे । व्याघचौरादिसदिभूतप्रेतभयायिते ॥१८॥ अकाले मरणे प्राप्ने दारिद्र्यापत्समायिते । अपुत्रत्वे महादु से मूर्यत्वे रोगपीडिते ॥१६॥ डाकिनीशाकिनीग्रस्ते महाग्रहगणार्दिते । नद्युत्तारेऽध्वपम्ये व्यसने चापढि स्मरेत् ॥२०॥ राजा के द्वार पर, श्मशान में सग्राम में गश्रु से माट होने पर, शेर, चोर, सप, भूत, प्रेत अादि से भय होने पर प्रकार में मृत्यु का प्राप्त करते समय, दरिद्रता में, आपत्ति मे, पुत्र न हान पर, घार दुःख के ममय, भूखता और गेगवाधा के समय डाक्निी शाकिनी से ग्रस्त होने पर, ग्रहपीडा मे, नदी मे उतरते समय, विषममाग में, व्यसन और पापत्ति में इसका स्मरण करना चाहिए। प्रातरेख समुत्थाय य पठेजिनपजरम् । तस्य किचित् भयं नास्ति लभते सुखप्तम्पद ॥२१॥ प्रात काल उठवर जो जिनपजरस्तोत्र का पठन करता है, उसे किसी प्रकार वा भय नहीं होता और वह सुगसम्पत्तियो को प्रात करता है। .
जिनपजरनामेट य स्मरत्यनुवामरम् । कमलप्रमराजेन्द्रप्रिय स लभते नर ॥२०॥ जिनपजर नाम के इम स्तोत्र को जो प्रतिदिन म्मरण करता है, वह राजेन्द्रो की लक्ष्मी के ममान लक्ष्मी को प्राप्त करता है। प्रात समुत्थाय पठेत्कृतनो य स्तोत्रमेतत् जिनपजरस्य । आसादयेत्स कमलप्रभास्या लक्ष्मी मनोवाछित- पूरणाय ॥२३॥ प्रात कान उठकर जो इम जिनपजर स्तोत्र का पठन करता है, वह कमलप्रभा नाम की लक्ष्मी को इच्छा-पूर्ति के निमित्त प्राप्त करता है। श्रीरुद्रपल्लीयवरेण्यगच्छ देवप्रभाचार्यपदाजहंस । वादीन्द्रचूडामणिरेव जैनो जीयादसौश्रीकमलप्रभारय ॥२४॥ श्रीरुद्रपल्ली के वरेण्यगन्छ मे देवप्रभ आचार्य के चरणकमलो के हसस्प वादीन्द्रचूडामरिण जिनका नाम कमलप्रभ है वह जीवित रहे इति स्तोत्रम् । विधि--शुद्ध शरीर कर शरीर को रुप दे, एकभुक्त उपवास करे ब्रह्मचर्य का पालन करे, भूमि पर सोवे, क्रोध, लोभ रहित प्रात मध्यान्ह सायकाल त्रिकाल पढे, सदा निरन्तर छ मास जाप करे। पीछे घृत, अगर, गुग्गुल, खोपरा का होम करे, पीछे माला अष्टोत्तर शत जपे। चित्त मे निगुरु शूद्र और काणे को न देखे, न अन्य देव को - ध्यावे।
भट्टारक सकलकीर्ति विरचित तत्वार्थसारदीपक-सन्दर्भः तत्वार्थसारदीपके पदस्थ-भावनाप्रकरणम् । अथ पिण्डस्थमारयाय वक्ष्ये पदाक्षरोद्भवम् । ध्यान पदस्थमत्यन्तस्वाधीन मुक्तये सताम् ॥१॥ पिण्डस्थ ध्यान का वणन करने के पश्चात् अव मै अक्षरो और पदो से उत्पन्न पदस्थध्यान का, जो कि स्वाधीन है, मत्पुरुपो की मुक्ति के लिए वणन करता हूँ। पदान्यादाय साराणि योगिभिर्यद विधीयते । सिद्धान्तवीजभूतानि ध्यान पदस्थमेव तत् ॥३४॥ सिद्धात के वीजभूत सार-पदो के अवलम्बन से योगी जो ध्यान करते हैं, वह पदस्थ ध्यान कहलाता है । ध्यायेदनादिसिद्धान्तविरयाता वर्णमातृकाम् । आदिनाथमुसोत्पन्ना विश्वागमविधायिनीम् ॥३५॥ आदिनाथ भगवान् के मुख से उत्पन सकल प्रागमो की रचना करने वाली और अनादि सिद्धान्त मे विख्यात वरणमातृका (सिद्ध- मातृका) का ध्यान करना चाहिए ।
पत्रपोडशसयुक्ते अमले नाभिमण्डले ।
प्रतिपत्र भ्रमन्तीं स स्मरेद् व्यष्टस्वरावलीम् ॥३६॥
नाभिमण्डल मे सोलह पर वाले कमल के प्रत्येक पन के ऊपर
घूमती हुई सोलह स्वरो की श्रेणी का स्मरण करना चाहिए ।
(अ प्रा-इ-ई-उ-ऊ-ऋ-ऋ-~-~-ए-ऐ-प्रो-प्रौ-अ-प्र-ये सोलह स्वर है)
चतुर्विंशतिपत्राढ्ये कजे सत्कर्णिके हृदि ।
पचविंशान् ककारादिमान्तान् ध्यायेत् सव्यजनान् ॥३७॥
हृदय मे सुन्दर कणिकाओ सहित चौबीम पन वाले कमल में क
से लेकर म पर्यन्त पच्चीस व्यजनो का व्यान करे ।
ततो वदनराजीवे हेमे पत्राष्टभूषिते ।
चिन्तयेच्छेपवर्णाष्टो यकारादीन् प्रदक्षिणम् ॥३८॥
इसके पश्चात् मुख में स्वर्ण कमल के आठ पनो की प्रदक्षिरणारूप
शेष बचे हुए य आदि (य-र-ल-व-श-ध-स-ह) आठ वर्णो का चिन्तन
करे।
इमा प्रसिद्धसिद्धान्तप्रसिद्धा वर्णमातृकाम् ।
ध्यायेत् य स श्रुताम्भोधे पार गच्छेच्च तत्फलात् ॥३६॥
उपर्युक्त रीति से प्रसिद्ध सिद्धान्त मे विख्यात इन वर्णमातृकाओ
का जो पुरुष ध्यान करता है वह श्रुत-सागर के पार हो जाता है।
अथ मन्त्रा गणाधीश विश्वतत्वैकनायकम् ।
आदिमध्यान्तसभेदै स्वरव्यजनसम्भवम् ॥४०॥
ऊर्ध्वाधोरेफसयुक्त सकल विन्दुभूषितम् ।
एकाग्रमनसा ज्ञानिन् , मन्त्रराजमिम स्मर ॥१॥
यह गणाधीश मन्त्र जो सभी तत्वो का मुख्य नायक है, जो आदि (अ) मध्य (र) और अन्त (ह) |---इस प्रकार स्वर और व्यजनो से जो उत्पन हुअा है, जो क्लानो मे युक्त है, जो विन्दु से सुशोभित है, हे ज्ञानी ! तू इम मन्त्रराज (ग्रहन्) को एकाग्रमन से स्मरण वर। देवासुरनत मिथ्यादुर्योधध्वान्तभास्करम् । शुक्ल मूर्धस्थचन्द्राशुफजापच्याप्तदिङ्मुसम् ॥१२॥ हेमाजकर्णिकालीन निर्मल दिक्षु खागणे । सचरन्त च चन्द्राभ जिनेन्द्र तुल्यमूर्जितम् ॥४३॥ देव और असुर जिमयो नमस्कार करते है, मिथ्याज्ञानरूपी अघ- कार को नाश करने के लिए जो सूय के समान है, ऊपर रहने वाला है और च द्रमा की उदित होती हुई विरणा के समूह से जिसने दिशामो को विभासित कर रखा है, स्वरण कमल की कणिका में विराजमान, निमल, दिशाप्रो और पायागरपी प्रागन मे विचरण करते हुए चद्र के समान परम मामय्यशाली और जिनेद्र भगवान् के ममान यह मात्र है। ब्रह्मा कैश्चिद् हरि कश्चिद् बुद्ध केश्चिन्महेश्वर । शिव सर्वस्तयेशानो वर्णोऽय कीर्तितो महान् ॥४॥ इस महान् वर्ण (ह) को कोई ब्रह्मा, कोई विष्णु, कोई बुद्ध, कोई मवर और कोई शिव तथा ईशान कहते है। मत्वेतीद महत्तत्वमह नामोदभव वुधा । विश्सकल्याणतीर्थेश श्रीद घ्यायन्तु मुक्तये ॥५१॥ इस प्रकार अहँ नाम से उत्पत्त्न यह महातत्व है, इस प्रकार जान पर विम्ब से वन्याग करने वाले तीरकगे और मुक्ति को देने वाले, श्री देने वाले म मन्य का मुक्ति के लिए यात करना चाहिए। मन्त्रमूनि क्लिाढाय देवदेवो जिन म्वयम् । सर्वनः सर्वगः शान्त सानाटेप व्यवस्थित ॥१५॥ एम मन्य पी प्रारतिको धारण करके म्यय देवाधिदर जिनन्द्र- भगवान जो मबन, गवंध्यापी और शान्त है, साक्षात् स्प में इम मन्य में बिगजमान है। (यह मय है-~-प्रह) जाननीज जगढवन्य जन्ममृत्युजरापहम् । अकागदिहकारान्त रेफविन्दुक्नाकिनम् ॥१६॥ भुक्तिमुस्त्यादिवानार प्रवन्तममृताम्बुभि । मन्त्रराजमिम ध्यायद धीमान् विश्वमुम्बारहम् ॥१७॥ बुद्धिमान पुरप या प्रगण मे लेकर पारपयन वगमातृका- माप नया ग्प ला मार विन्दु मे युक अहं या-जो जानबीज है, गन्धर, जम, मृत्यु मा जग का नाग फरा वाला है और मारिक मुग प्रौर मुत्ति मदन वाना है-जिनमें में निरन्तर अमृत प्रवाहित हा हा हार जो विनय भी मुगावा प्रदाता है, मेम मगज प्रहमा ज्यान करना चाहिए। नासा निश्चल वा भ्रलतान्तरे महोज्ज्वलम् । नालुरन्त्रंग वापान विशन्न वा मुग्वाम्बुजे ॥2॥ पर मन्त्र गज नाता अग्रभाग पर लिया है अथवा मोहों में मर में प्रारत प्रामा अथवा तातुरन्त माना है पर मा में प्रमाना, 7 पर IT Tना चाहिये।
सकृदुचारितो येन मन्त्रोऽय वा स्थिरीकृत । हृदि, तेनापपर्गाय पाथेय स्वीकृत परम् ॥४॥ जिम मनुष्य ने एक बार इम मन्त्र का उच्चारण कर लिया अथवा हृदय मे स्थिर कर लिया, उसने माक्ष के लिए श्रेष्ठ पाथेय मग्रह कर लिया। यदेवैप महामन्त्रश्चित्ते धत्त स्थिति मुने । तदेव कर्मसन्तानप्रारोह प्रविशीर्यते ॥५०॥ जव मुनि के मन में यह महामन स्थिर हो जाता है तव कम- परम्परा के अकुर नष्ट हो जाते है । सर्वावस्थासु सर्वत्र जपन्तु वा निरन्तरम् । विशुद्धे मानसे मन्त्र निश्चल स्थापयन्तु वा ॥५२॥ अथवा सव अवस्थामा मे सवन इस महामन्त्र का जाप करना चाहिए अथवा मन मे इस महामन्त्र को निश्च नता से स्थापित करना चाहिए। ततो हकारमान च रेफविन्दुकलोज्झितम् । सूक्ष्म प्रभास्वर चन्द्ररेखाभ शान्तिकारणम् ॥५३॥ अणिमादिमहीना जनक चिन्तयेत् मुधी । अनुचार्य हृदा नित्य भवभ्रमणहानय ॥५४॥ तत्पश्चात् बुद्धिमान् मनुष्य समार परिभ्रमण के नाश के लिए बिना उच्चारण क्येि हुए अपने मन मे केवल हवार को रेफ, क्ला और विदु से रहित, सूक्ष्म, प्रकाशमान और चद्ररेखा के समान चिंतन परे । यह हकार शान्ति का कारण हे और अणिमा अादि महाऋद्धियो का पैदा करने वाला है।
ॐकार विस्फुरचन्द्रकलाविन्दुमहोज्ज्वलम् । नामायानरनिम्पन्न पंचाना परमेष्टिनाम् ॥५५॥ धर्मार्थकाममोक्षाणा दातार विश्वपूजितम् । हृत्कजमणिकासीन ध्यागेद ध्यानी शिवाप्तये ॥५६॥ नानी पुरुप को विस्फुरायमान चन्द्रकला और विन्दु मे अत्यन्त शोभित पार हृदयकमल की कणिका में विराजमान इस ॐकार का मोक्ष के लिए ध्यान करना चाहिए। यह ॐकार पाच परमेष्ठियो के नाम के प्रथम अक्षरो में निप्पन्न है (अ-अ-प्रा-उ-म्-ॐ) यह वम अथ काम और मोक्ष का प्रदाता है और विश्व मे पृजित है । अर्हन्तो ह्यशीराश्चाचार्या विश्वनतकमा । उपाध्याया गता पार भुताब्धेमुनय परे १५७॥ एया पचनमस्कारपदानां प्रथमातरः। निष्पादितोऽयमोकारो वुधै मर्वार्थसिद्विद ॥५॥ विश्व जिनके चरणो मे नमस्कार करता है, ऐसे अर्हन्त, सिद्ध, प्राचाय और श्र नमागर के पागामी उपायय और श्रेष्ठ मुनि- इन पचनमस्कार के पदो के प्रथम अक्षरो से बुद्धिमान पुस्पो ने समस्त प्रयोजनो के सिद्ध करने वाले इस कार का निष्पादन किया है। एप मन्त्रो जगरयात कामद कामधेनुवत् । ध्यानिनां कल्पशाग्वीव समीहितफलप्रट ॥५६॥ यह मन्न समार मे विरयात, कामधेनु के ममान कामनायो की पूर्ति करने वाला, व्यानी पुरुपो के लिए कल्पवृक्ष के समान इच्छित फल प्रदान करने वाला है।
चिन्तामणिरिसाभीष्टसिद्धिान्मृनमन्त्रज । ध्यातव्योऽनिशमत्यर्थं सर्वकार्यार्थसिहये ॥६॥ मूल मय मे से उत्प। यह ॐार चिनामणि रत्न वे समान अभीप्ट सिद्धियो का देन वाला है, प्रत राबाय और प्रयोजना वी मिद्धि के लिए इसे प्रतिदिन ध्याना चाहिए । स्तम्भनेऽय मुवर्णाभो विद्वपे कज्जलप्रभ । वश्यादिकरणे रक्तो ध्येय शुभ्रोऽघहानये ॥६॥ स्तम्भन म यह मुवरण में समान कान्ति वाना, विद्वेप में काजल वे समान प्रभा वाला और वस्यादि वरण म रक्तवमा और पापा के नास लिए शुभ्र इस कार का ध्यान करना चाहिए । अर्थपोऽनिश ध्येय सर्वत्रच शशिप्रभ । कर्मारिहानये कृत्ये किमसत्करपन सताम् ॥६॥ अथवा इस चद्रमा के समाा प्रभावाले ॐा को मस्पी शत्रुनो के नाश के लिए ध्याना चाहिए। मत्पुरपा का मरी अमत् कल्पना करने से क्या लाभ महापचगुरोर्नाम, नमस्कारसुसम्भवम् । महामन्त्र जगज्ज्येष्ठमनादिसिहमादिमम् ॥६३॥ ध्यायन्तु वा जपन्तुच्चेर्दना सर्वार्थसाधकम् । युक्त्या कमलजाप्योन वशीकृत्य चत्न मन ॥६॥ नमस्कार मात्र मे रहन वान पाच महागुन्या व नाम मे निप्पन यह महामन्त्र जगत् म श्रेष्ठ है अनादिमिद है, आदिम है और सब प्रयोजना का सिद्ध करन वाला ह अत बुद्धिमान पुरपो को बड़ी युक्ति मे कमलनय से चल मा को वा म कसे इमवा ध्यान करना चाहिए और उचे स्वर मे जाप्य करनी चाहिए । 7 मस्तकस्थे स्फुरच्चन्द्राभेऽब्जे पत्राप्टभूषिते। स्थापयेत कणिकामध्योऽर्हन्त पूर्वाटिदिक्षु च ॥६५॥ चतुर्यु पद्मपत्रेषु सिद्ध क्रिमनुकमात् । उपाध्याय पर साधु रिदिक्पत्रेषु दर्शनम् ॥६६॥ जान वृत्त तपो ध्यानी स्थापगड ध्यानसिहो। कर्णिकाया जपेद ध्यायेद वादी मन्त्र च्युतोपमम् ॥६७॥ महापचगुरूणा पचत्रिशुदतरप्रमम् । उच्छ्वासस्त्रिभिरेकात्रवेतसा भवहानये ॥६॥ मस्तक में रहने वाले विस्फुरायमान चन्द्रमा के ममान आठ पनो से भूपित कमल की करिणका के बीच में अहन्त भगवान को स्थापना करनी चाहिए और पूर्व आदि दिशाम्रो म कमल के चार पत्रों में अनु- क्रम से सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु की स्थापना करनी चाहिए और विदिशाम्रो की पावुडियो मे अनुक्रम से सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चाग्नि और तप की स्थापना न्यान को मिद्वि के लिए ध्यानी पुरुषो को करनी चाहिए। उन्हें पहले कणिका मे अनुपम और पचमहागुरो के पैतीम-' अक्षर-प्रमाण मन्त्र को तीन श्वासोच्छ्वासो मे मसार-भ्रमण के नाश करने के लिए जपना चाहिए अथवा ध्यान करना चाहिए। ततश्चतुर्दिकपत्रेषु मन्त्राश्चतुर स्मरेत् । क्रमाद विदितु पत्रेषु नमस्काराश्चतु प्रमान् ॥६६॥ इसके पश्चात् चार दिशानो के पनो में चार मन्त्रो का स्मरण करे । और उसके पश्चात् क्रम से विदिशामा के चार पनो मे चार प्रकार के नमस्कारो का चिन्तन करे । , .
अनेन विधिना भाले मुखे कण्ठे हृदि स्फुटम् । नाभी पद्मे च सस्थाप्य मन्त्र नवनवोत्तमम् ॥७॥ इस विधि से भालपद्म, मुखपद्म, कण्ठपद्म, और हदयामत तथा नाभिकमल में नवीन और उत्तम इस मात्र को स्थापित कर । नमस्काराजपेद दक्षोऽवरोहारोहणेन च । द्विपट्पन्मेषु सर्वेऽमी नमस्काराश्च पिण्डिता ॥७॥ कुशल मनुष्य को आगेह-गवराह-पूवक नमस्कारमान का जाप्य करना चाहिए । बारह कमला मे नमस्कार का ममावेश है। विश्वकल्याणदा सन्ति ह्यष्टोत्तरशतप्रमा । कृरस्नकर्मारिसन्तान नन्तो विश्वमुखावहा ॥७२ । एक सौ आठ सस्या प्रमाण नमस्कार का जाप विश्व कल्याण करने वाला तथा समस्त कमापी यो की परम्पग यो नाग करने वाला और सम्पूण मुख को लाने वाला है । जाप्येन कमलाग्येनानेन योगी लभेत भो । भु जानोऽप्युपवासस्य कर्मणा निर्जग पराम् ॥७३॥ इस प्रकार कमल जाप्य से इम मन का जाप करने वाला योगी पुरप उपवास न करने पर भी उपवास का फन प्राप्त करता है और कर्मों की उत्तम निजग करता है। अपराजितमन्त्रोऽय विश्वमन्त्राग्रिमो महान् । निरोपम्यो जगत्ग्यातो जगद्वन्द्यो जगद्धित ॥७॥ यह अपराजित मन्त्र समस्त मात्रा में मुख्य है, महान है, अनुपम है, जगत् मे प्रसिद्ध है, जगन् द्वारा पदनीय ह और जगत् का हित करने वाला है।
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- परे ॥८॥ मन्त्रजाप्याम्बुभि सिक्ता शाम्यन्ति वहयोऽखिला । जलस्थलभया सरें विलीयन्तेऽस्य शक्तित ॥८॥ सव प्रकार की अग्नि म मात्र के जाप्य म्प जल से मीचन में शान्त हो जाती है और इम मन्त्र की शक्ति मे जल-स्थल के सम्पूर्ण भय नष्ट हो जाने है। अनेन मन्त्रयोगेन महापापकलकिना । शुयन्ति जन्तर क्र रास्त्यजन्ति करता महापाप मे क्लक्ति प्राणी इम मात्र के भोग मे शुद्र और पवित्र बा जाते है और क्रूर जीव भी अपनी क्रूरता का छाड दन है । सतव्यसनससक्ता अजनाधारच तस्करा । प्राप्य मिनमिम मृत्यों तत्पुण्येन दिव गता ॥२॥ सप्तव्यसनो म लीन अजन आदिा चार मृत्यु न समय इस मत्र. रूपी मित्र को पाकर उसके पुण्यप्रभाव से स्नग का प्राप्त हुए। जिनशासनमध्येऽय सारो मन्त्राधिपो महान। उद्धार सर्वपूर्वाणां तत्वाना तत्वमुत्तमम् ॥१३॥ जिन शासन मे यह मत्र सारभूत महान् मगज है और यह समस्त पूर्वो का उद्धार स्वरूप है तथा त वो में उत्तम तत्व है। किमत्र बहुभि प्रोस्तैर्मत्रराजप्रसादन । ध्यानिना जायते मुक्ति का वार्ता परवस्तुपु ॥४॥ बहुत अधिक कहने से क्या लाभ? इस मसराज के प्रमाद से ध्यानियो को मुक्ति प्राप्त हो जाती है फिर दुमरी वस्तुओं के मिलने में पाश्चय ही क्या है १ " - । विनायेति सुखे दुखे पथि दुर्गे रणे स्थिनो। आसने शयने स्थाने रागक्लेशादिके सति ॥८॥ सर्वावस्थातु सर्वत्र महामन्त्र शिवार्थिभि । जपनीयोऽधवा योयो न मोक्तव्यः क्वचिहृदः ॥८६॥ इस प्रकार जानकर सुख मे, दुख मे, मार्ग मे, दुर्ग मे, युद्धस्थान मे, बैठने मे, सोने मे, शयनस्थान मे और रोग-कलह आदिक में सभी अवस्थाओं में और सब जगह मोक्ष चाहने वालो को इसका ध्यान करना चाहिए तथा कभी इमे अपने हृदय मे दूर नहीं करना चाहिए। वाचो वा विश्वकार्याणा सिद्धयेऽत्र परत्र च । तथा संरया विधेयास्य सहन-लक्ष-कोटिभि ॥७॥ इस लोक और परलोक मे ममस्त कार्य और वाणी की सिद्धि के लिए इस मन्त्र के हजार, लाख और करोड सस्य प्रमाण जाप करने चाहिए। णमो अरहताण, णमो मिद्धारण, गमो पाइरियाण, रामो उवज्भायाण, गमो लोए मव्वसाहरण-इस मन्त्र का जाप करना चाहिए। पचसद्गुरुनामोत्यां पोडशाक्षरभूषिताम् । महाविद्या जगदविद्या स्मर सर्वार्थसिद्धिदाम् ॥ पाच मद्गुरुनो अर्थात् पचपरमेष्ठियो के नाम से निप्पन्न हुई मोलह अक्षगे से मुशोभित महाविद्या है, वह समस्त प्रयोजनो की मिद्धि के लिए जगदविद्या है । तू उसका स्मरण कर। अस्याः शतद्वय ध्यानी जपेत् तल्लीनमानस । अनिच्छन्नप्यवाप्नोत्युपवासपर फलम् ॥८६ इम विद्या से मनुप्यो के कर्मों के साथ जम मृत्यु और वृद्धावस्था शीघ्र ही नष्ट हो जाती है और वे शिवसम्पत्ति को प्राप्त करते हैं। वह विद्या इस प्रयार है-ॐ ह्रा ह्री ह ह्रौ ह्र अ-सि-आ-उ-सा नम । अर्हत्सिद्धविधासाधु पर्मान् केवलिभापितान् । विश्वमागल्यकर्तृ श्च विश्वलोकोत्तमान परान् ॥६६॥ विश्वशरण्यभूताश्च ध्यायन्तु तत्पढार्थिन । चतुरोऽत्र चतुर्मद्गलाये पर्दे पर सदा ॥१०॥ विश्व का मगल करने वाले जगन् म मर्वोत्तम और जगत् के शरण्यभूत ये अहत, सिद्ध, तीन प्रकार के (पाचाय, उपाध्याय और साधु) साधु और केवनीप्रमपित यम ये नाग (चत्तारिमङ्गल) आदि उत्तम पदो से मनुष्या को मदा यान करना चाहिए । लोकोत्तमपदा पूज्या शरण्याश्चादादिका । एतद्ध्यानवता ध्यानान मगलानि पदे पदे ॥१०१॥ सम्पद्यन्तेऽत्र वामुत्र सम्पदस्त्रिजगदभवा । धर्मार्थकाममोचार्था प्रणश्यन्त्यापटोऽरिवला ॥१०॥ ये उपयुक्त ग्रहन्त प्रादि लाक मे उत्तमपद हैं, पूज्य है, शरण्य हैं- इस प्रकार ध्यान करने वालो को उनके यान के प्रभाव से पग पग पर मङ्गल का उदय होता है। तीनो जगत् मे रहने वाली सम्पत्ति और धम, अथ, काम और मोक्षस्प पुरपाथ इस लोक मे नथा परलोक मे प्राप्त होते हैं तथा सभी पापदाया का नाश हो जाता है। वह मत्र इस प्रकार ह. चत्तारि मगल । अरिहता मगल । मिद्धा मगल । साहू मगल । केवलिपण्णत्तो धम्मो मगल । - - । चत्तारि लोगुत्तमा । अरिहता लोगुत्तमा। मिद्धा लोगुत्तमा । साहू लोगुत्तमा । केलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमो । चत्तारि मरण पवज्जामि । अरिहने सरण पवज्जामि । सिद्धे सरण पवज्जामि । माहू मरण पवज्जामि । केवलिपण्णत्त धम्म सरण पवज्जामि। मुक्ते सोध द्रुतारोदुमिमा सोपानमालिकाम् । अर्हस्सिहमयोगिश्रीकेवल्यक्षरसम्भवाम् ॥१०३॥ आद्योकारमयी सारा विद्या ध्यायन्तु योगिनः । पचदशमुवर्णाढ्या गुणस्थानगुणातये ॥१०४॥ अहन्त, मिद्ध, और मयोगी केवलियो के अक्षर से उत्पन्न, मुक्ति के महल मे शीघ्र चढने के लिए मीढियो के समान, पन्द्रह सुन्दर वर्णो से सुशोभित और जिमके आदि मे कार है, उस सारभूत विद्या को योगीजन गुणस्थान की प्राप्ति के लिए ध्यान करे। वह विद्या इस प्रकार हे~~ॐ अरहन्त-सिद्ध-सयोगिकेवली स्वाहा । ॐकारभूपित मन्त्र ह्रींकाराकितमुत्तमम् । अर्हन्नामोद्भवं दक्षाश्चिन्तयन्तु शिवाप्तये ॥१०५॥ ॐकार से विभूषित और ह्रीकार से अकित तथा अर्हन इस नाम मे उत्पन्न उत्तम मन्त्र को मोक्ष-प्राप्ति के लिए चिन्तन करें। सकलज्ञानसाम्राज्यदानदक्ष च्युतोपमम्।। समस्तमन्त्ररत्नानां चूडारन सुखावहम् ॥१०६॥ यह मन्न सम्पूर्ण ज्ञान का साम्राज्य देने मे कुशल है और निरुपम है, मुखो का दाता और समस्त मन्त्रो मे चूडामरिण है। वह मन्न इस प्रकार है---ॐ ह्री ग्रह नम ।
कृत्स्नकर्मक्लकौघतमोविध्वसभास्करम् । पर सिद्धनमसारजात सानान्लिवप्रदम् ॥१०७॥ पचवर्णमय मत्र विश्वविनोधनाशनम् । दक्षा स्मरन्तु मोनार, जपन्तु वा निरतरम् ॥१०॥ सम्पूर्ण क्म-क्लब ममूह ग्प अधिकार ने नाश करने के लिय सूर्य के समान, श्रेष्ठ, सिद्ध नमस्कार मे उपन्न, साक्षात् मोक्ष देन वाले और सब विघ्ना के ममूह का नाश करने वाले पचवरण वाले इस मन्त्र का बुद्धिमान् मोक्ष के लिए स्मरण करे या निरन्तर जाप कर। मत-गमा सिद्धारण । निर्दोपस्याहतो घातिघातिन परमेठिन । प्राप्तानन्तगुणस्य श्रीमत परमयोगिन ॥१०॥ विदो जपन्तु मत्रेश, विश्वस्लेशाग्निवामुचम् । भुक्तिमुक्तिसुदातार, त्रातार भव्यदेहिना ॥११०॥ घाति कर्मों को नाश करने वाले, निर्दोप, अनन्त गुणो को प्राप्त करने वाले, लक्ष्मी से सुशोभित और परमयोगी अंरहन्त प मेष्ठी के मनराज को विद्वान् पुरुष जपे । यह मत्रराज मम्पूण क्लेश रूप अग्नि के लिए मेघ के ममान है । भोग और मुक्ति प्रदान करने वाला है और भव्य प्राणियो की रक्षा करने वाला है। अनेन मत्रपुण्येन, त्रिजगन्नाथसपद । विश्वशर्माणि लभ्यन्ते, क्रमाच्छीजिनभूतय ॥१११॥ इस पवित्र मात्र के द्वारा निलाकीनाथ तीर्थकर भगवान् की सम्पत्तिया और समस्त सुप क्रमश प्राप्त हो जाते है । ७० पागमप ममुद्र तथा मसार के व्यापी नद के बीच मे जाकर स्थिर हो गया है अपना उत्तम पुरुप इम मन्यरूपी जहर मुम्परररर यह मत्र इस प्रकार है- ॐ नमोर्हते केवलिने परमयोगिने अनन् विस्फुरच्छालध्यानाग्निनिर्दग्धकर्मबीजाय प्राप्तानन्तका * शान्ताय मङ्गलवरदाय अष्टादशदोपरहिताय स्वाहा। पूर्णेन्दुमण्डलाकार, पुण्डरीक मुखे स्मरन् । क्रमातदष्टपत्रेषु, वर्णाश्चाष्टौ पृथक् पृथका ॐकारार्हन्नमस्कारजातास्तत्कर्णिकोपरि । ज्योतिर्मयमिवात्यन्तदीप्त ह्रीकारमूर्जित ITE बजन्त तालुरन्ध्रेण, तिष्ठन्त भ्र लतान्। स्फुरन्त चिन्तयत्यर्थ, स्त्रवन्तममृता पूर्ण चन्द्र-मण्डल के आकार वाले कमन्न - फिर क्रम से उसके पाठ पत्रो पर 'ॐ नमोर पृथक्-पृथक् ध्यान करे । उस कमल की अत्यन्त देदीप्यमान और प्रभावशाली ही मचान दद 'ह्री' मुखकमल से तालुरन्ध्र के द्वारा जारी है, इस प्रकार ध्यान करे। अनेन मत्रपोतेन, सर्वविद्यागमा ! भवव्यसनपापाब्धे प्राप्यते ॥११५॥ जाते है।
इमा विद्या महादेवी, ललाटे सस्थिता स्मृताम् । कल्याणकारिणी पूता भनींकारजा शिवप्रदाम् ॥११६॥ इम स्वीकार विद्यारप महादेवी या ललाट में स्मरण करो । यह वीवार मे उपा विद्या कन्यागवाग्गिी, पवित्र और मोक्ष दन वाली है। वह विद्या दम प्रकार है वी' यदि सानाचमुद्विग्नो, भवद ग्याग्नितापत । तदा सप्तानर मन, अर्हन्नामोद्भव स्मर ॥११७॥ यदि तू ममार के दुगरपी अग्नि के ताप से उद्विग्न हो गया ह तो अहन्न के नाम से निप्पन पान अभगे वाले मत्र या स्मरण कर। अनेनानादिमन्त्रेण, लभन्ते दृग्विभूषिता । सर्वसौभव विश्व विजय तद्गुणान् शिवम् ॥११८॥ इस अनादि मत्र के द्वारा सम्यग्दृष्टि जीव मवज्ञ की विभूतियो, विश्व-विजय, सवन के गुगो और माक्ष को प्राप्त करते है। वह मन इम प्रवार है-'णमा अरहताण' प्रणपानाहतोद्भूत, वर्णत्रयमय परम् । नासाग्रे ध्यानिनो मन्त्र, ध्यायन्तु शिवशर्मणे ॥११॥ प्रणव (वार) और अनाहत मे उत्पन तीन वरण वाले श्रेष्ठ मन का मान-सुख के लिए ध्यानी जन नामान पर (दृष्टि रख कर) ध्यान कर। एतेनाद्भुतमन्त्रेण, ध्यानशुद्धि परा भवेत् । आत्यन्तिकमुस सात्मज च सिद्धगुणाष्टकम् ॥१२०॥ इस अद्भुत मत्र से उत्कृष्ट ध्यान शुद्धि हो जाती है और आत्मा ७२ मे प्रात्यन्तिक सुख तथा सिद्धो के आठ गुण प्राप्त हो जाते है। वह मन इस प्रकार है--ॐ ग्रह' तती ध्यायेन्महावीज, श्रींकार स्वमुखोटरे । विस्फुरन्त जिनेन्द्रोक्त , परं मन्त्रमय शुभम् ॥१२१॥ तत्पश्चात् अपने मुख के अन्दर भगवान् जिनेन्द्रदेव द्वारा कहे हुए विशेष प्रकार मे स्फुरायमान श्रेष्ठ मामय और शुभ और महावीज श्रीकार का ध्यान करे । विद्या स्वेप्टार्थसदानकरी कल्पलतोपमाम् । श्रीवीरवदनोदभृतां, ध्यायन्त्वचिन्त्यविक्रमाम् ॥१२२॥ इमा विद्या जपेद् योऽत्र, ध्यानलीनो निरन्तरम् । अणिमादि-गुणॉल्लब्ध्वा, तरेच्छास्त्रार्णव च स ॥१२३॥ अस्याः निरन्तराभ्यासाद् ध्यानी लभेत निश्चितम् । त्रिकालविषयं ज्ञान विश्वतत्वप्रदीपकम् ॥१२॥ इच्छित पदाथ के दान करने में कल्पलता के समान, श्रीमहावीर भगवान के मुख मे उत्पन्न और अचिन्त्य सामर्थ्य वाली इस विद्या का ध्यान करो। जो व्यक्ति ध्यान में लीन होकर इस विद्या का निरन्तर जाप देता है, वह अणिमा आदि ऋद्धियो को प्राप्त करके शास्त्र-समुद्र को तर जाता है। इसके निरन्तर अभ्याम से व्यानी निश्चित रूप में विश्व के पदार्थो को प्रकाशित करने के लिए दीपक के समान तीनो कालो का विषय करने वाले ज्ञान को प्राप्त हो जाता है। वह विद्या इस प्रकार है-'ॐ जोगे मग्गे तत्वे भूये भवे भविस्मे अखे जिनपार्वे स्वाहा । ॐ ह्री अह णमो अरहताण ही नम ।
दिक्पत्राटकसपूर्णे, कमने मध्यसस्थितम् । ध्यायदात्मानमत्यन्त, स्फुरदनीमार्फभास्करम् ॥१२५॥ ॐकारार्हन्नमस्काराचा'टो वर्णान् विचिन्तयेत् । क्रमा-पर्यादिपनेषु वर्णक प्रदक्षिणम् ॥१२॥ गाउगाया पार पा 7 परिपूगा वमल ये मध्यभाग में पतु , गयम १५ । ममान पारनी ग्राना का ध्या २१ मा ५ व वे पमा म बार पूवव ग्रह 1 पाठ वगों में से प्रत्येक वरण व 1 , मम्मा - 7गमा अरना। मग पटा गााम पानसर। स्वीकृत्य पर्वदिक्पत्र पूर्वदिक्सम्मुसस्थित । जपदष्टानर मत्र, एकादशशनप्रमम् ॥१२७॥ पत्र निया की ओर मुख करव पूर्व दिशा के पत्र मे पाठ अक्ष चात मत्र का ग्यारह मो बार जप । प्रत्यह प्रतिपत्रेषु, पूर्वादिदिक्ष्वनुक्रमात् । अष्टगत्र स्मरेट ध्यानी, त मन्त्र निर्मलाशयम् ॥१२॥ ध्यानी पुरष पूर्व प्रादि दिशामा के प्रत्येव पत्र मे फ्रम से प्रतिदि अाठ रात तक उस निमन बागाय वाने मन्त्र का स्मरण करता रहे अस्याचिन्त्यप्रभागेन, शाम्यन्ति क्रूरजन्तर । सिंहसदिय समें, हरित्रस्ता गजा इव ॥१२॥ इस मन के अचित्य प्र नाव न सिंह मे डरे हुए हाथिया की त मिह, मप ग्रादि भयकर जानवर शात हो जात हैं। वह मत्र इस तरह है---ॐ णमो ग्ररहताण' इत्यनः ध्यानमा राय, पूर्व विनोपशान्तये । पश्चात् सताक्षर मत्र, जपेदोकारवजितम् ॥१३०॥ विघ्नों से मम्ह बी मानिने लिए पहले दग मन्त्र मा म तरह ध्यान क । पश्चात् अंबार में रहित मान अक्षर पाले मन्त्र का जाप मंत्र ॐकार पूर्वाऽय, विश्वाभीष्टार्थसिद्धिद । एका घनेकार्थ, मुस्तयर्थं प्रणवोज्झिनम् ॥१३१॥ मार पूवक यह मन्त्र सम्पूण न्द्रित प्रयोजना की सिद्धि कराने वाला है। यह प्रोना ही मय अनक कार्यों के लिए होता है और मुक्ति निगार मे रहिन इन मत्र या ध्यान करना चाहिए । यह माम भाति है गामा अरहताग चतुर्विशति तीर्थेशनमस्कारोदभव परं । म्मर मत्र जिनेन्द्रादिपदद जन्मघातकम् ॥१३॥ नापीम नीसग नमस्या में उत्पन्न हुअा यह मन जिीन्द्र प्रादि पदो रा दन वाला है जन्म-मग या नागने वाला है। मा नुम म् । यह मन नि है-'श्रीमदापनादिवर्धमानानन्यो नम' मुनि रम्प मन कृत्वा, पापारानिनिन्दिनीम् । जिनेन्द्रमुग्गजा विद्या, महती पापभक्षिणीम् ॥१३३॥ विश्वविद्यानु सिद्धान्तहानदना जगन्नुनाम । घायन्तु प्रयह धीग महन्मुग्वाम्नवासिनीम् ॥१३॥ TET मा गली मानि पिरोपी रानी TTTTTA चिोट भगवान् मन मे । है धीर पुमा
जाता है।
प्रकार से उद्धार किया है। वह गा विघ्न प्रादि का नाश करन वाला.
महान्, पाप का भन्नग ग्न वानी, विश्व की सम्पूर्ण विद्यामा
तत्व बताने मे ममथ, जगत्वा और अहत भगवान् के मुष वमन :
निवाम करा पानी पिया का राज पान वगे।
मुनेरस्या प्रभागेन, पापपद प्रनीयते।
चेत प्रशान्तिमायानि, विगान जायते परम् ॥१३॥
इस विद्या के प्रभाव से मुनिजन IT पाप पर नष्ट हो जाता है
नित्त में विशेष गानि भी मिल जाता है और श्रेष्ठ विज्ञान मि
वह विद्या उम प्रकार -
गहन्मुगम मलवामिनि । पापा
अतज्जानामहस्रप्रज्वनित । सरस्वति । मत्पाप हन ।
दह दह क्षा, श्री, शू, क्षा, क्ष क्षीरवर धवले । अमृत सभव
भक्षिरिग | व, र, हूँ, हूँ स्वाहा ।"
सजयन्तादियोगीन्द्र सिद्धचकमनेकधा ।
भुक्तिमुक्तेनिधान यद, विद्यापाठात् समुद्धतम् ॥१३६
तद् ध्यायन्तु बुधा मुक्त्ये, सर्वविघ्नादिनाशनम् ।
तस्य प्रयोजक शास्त्र, जात्वा गुरुपदेशत ॥१३७॥
सजय त अादि योगीदवग न विद्याप्रवाद (पूव अथवा विद्यानुवाद
शास्त्र) म भुक्ति और मुक्ति के निधान स्वरूप मिद्धचक्र का अन
क्षयर।
ह । उमके प्रयोजकशास्य का गुर उपदश से जानकर बुद्धिमान पुरपो'
मुक्ति के निये उसका ध्यान करा !
स्मर मन्त्रपदाधीशमहन्नामाक्षराभिधम् ।
'अ'वर्ण नाभिपद्म च, मोनमार्गप्रदीपकम् ॥१३८॥
मन्न पदो के अधीश और मोक्ष-मार्ग के लिये दीपक के समान अहं नाम के अक्षरो के वाचक 'अ' वर्ण को तुम नाभिकमल मे स्मरण करो। 'सि'वर्ण मस्तकाम्भोजे, 'सा'कार च मुखाम्बुजे । । 'आ'कार कण्ठकंजे हि, 'चो'कार हृत्सरोरुहे ॥१३६॥ इस प्रकार मस्तक कमल मे 'मि' वरण का, मुख कमल मे 'सा' वर्ण का, कण्ठ कमल मे 'या' वर्ण का पार हृदय कमल में 'उ' वर्ण का तुम व्यान करो। एप मन्त्रमहाराजोऽहंदायनरोदभव । पञ्चवर्णमयोऽनेकाभीष्टदोऽनिष्टशातिकृत् ॥१४॥ अर्हन्त आदि नामो के आदि अक्षर से उत्पन्न यह मन्न मन्त्रो मे श्रेष्ठ है । यह पचवरणमय है, अनेक अभीष्टो को देने वाला है और अनिप्टो की शान्ति करने वाला है। वह मन्त्र इम भाति है.---'अ-मि-या-उ-मा ।' साक्षात् सिद्विपद दातु , चम मत्र स्मरान्वहम् । विश्वविघ्नहर ज्येष्ठ, सर्वसिद्धिनम प्रजम् ॥१४१॥ साक्षात् सिद्धिपद के दने मे समर्थ इस मन्त्र को तुम प्रतिदिन स्मरण करो। वह सब विघ्नो का हरने वाला है मुरय हे पोर 'मत्र सिद्ध नम' इन शब्दो से उत्पन्न है । वह मन्त्र इस भाति हे'नम सबसिद्धेभ्य ।' इत्यादीन्यपराण्यत्र, सारमन्त्रपदानि च । उद्धृतानि श्रुतस्कन्धाजगद्धिताय योगिभि ॥१४२॥ १-चो-च-उ। ७७
।
महान्, पाप का भाग वरन गाला, विश्व की सम्पूर्ण विद्यायाम
तत्व बतान मे ममथ जगदग यार ग्रहत भगवार के मुग कमल में
निवास करन पानी प्रिया का रान पाा पग।
मुनेरम्या प्रभारेन. पापपद प्रनीयते ।
चेत प्रशान्तिमायाति, विज्ञान जायते परम् ॥१३५॥
इस विद्या के प्रभाव मे मुनिनन 7 पाप-पक नष्ट हो जाता है।
वित्त म निरोप शाति भी मिन जना, और श्रेष्ठ विज्ञान मिर
जाना है।
वह विद्या इम प्रसार है-
अ-मुसबमलवासिनि । पापाम
क्षयररि
थाज्यालासहस्रप्रज्वनित सरस्वति
मत्पाप हन हन
दर दह क्षा, भी, भू, क्षा, क्ष क्षार यवले । अमृत सभवे । पाप
भक्षिगि । व, र, हूँ, है स्वाहा।'
सजयन्तादियोगीन्दे सिद्धचक्रमनेकधा ।
भुक्तिमुक्तेर्निधान यद, विद्यावादात् समुद्धृतम् ॥१३६॥
नद् व्यायन्तु बुधा मुक्त्ये, सर्वपिनादिनाशनम् ।
तस्य प्रयोजक शास्त्र, ज्ञात्वा गुरूपदेशत ॥१३७॥
मजयन्त आदि योगीश्वरा ने विद्याप्रवाद (पूर्व अथवा विद्यानुवार
शास्न) से मुक्ति और मुक्ति के निधान स्वम्प मिद्धचक्र का अना
प्रकार म उद्धार रिया है । वह मा विघ्न प्रादि का नाश करन वाल
है । उसके प्रयोजक्शास्त्र का गुर उपदा रो जानवर बुद्धिमान पुरषा
मुक्ति के निय उसका ध्यान कग।
स्मर मन्त्रपदाधीशमहन्नामाक्षराभिधम् ।
'अ'वर्ण नाभिपद्मे स, मोनमार्गप्रदीपकम् ॥१३॥
। . मात्मा की मिद्धि के लिये सर्वन उन मन्त्रो का जप करना चाहिए, अपने मन में उनका निश्चय करना चाहिए और उनका श्रद्धान करना चाहिए । निरर्थक हुत कहने से क्या लाभ है एतत् पदस्थसध्यान, स्वाधीन जपनादिभि । सर्वत्र सुखदु खादिजातावस्थासु कोटिषु ॥१४॥ कुर्वन्तु ध्यानिनो धीरा , स्वप्नेऽपि मा त्यजन्तु भो । शयनासनसदवार्तात्रजनादौ शिवाप्तये ॥१४॥ है ध्यानी धीरजनो । मुख दुग आदि अनेक अवस्थानो मे सर्वत्र जप प्रादि के द्वारा इस पदस्थ सद्ध्यान को अपने प्राधीन को। इसे स्वप्न में भी मत त्यागो । मोक्ष की प्राप्ति के व्यय से सोते, वैठते, वात करते, चलते फिरते भी इसे मत छोडो। सन्मन्त्रजपनेनाहो, पापारि क्षीयतेतगम् । मोहाचस्मरचोराये , कपाये सह दुर्धरै ॥१५॥ येप्ठ मन्त्र के जाप स मोह, इन्द्रिय विषय, काम, चोर और दुधर पायो महित पाप ग नष्ट हो जाते है। मन परीपहादीना, जय कर्मनिरोधनम् । निर्जरा कर्मणा मोच , स्यात्सुख स्वात्मज सताम् ॥१५१॥ मन्त्र के जाप से मत्पुरुपो को मनो-जय, परीपह-जय, कर्मों का भवर, निजग, मोक्ष और आत्मिक मुष होता है । वीतरागमुनीन्द्राणा ध्यानसिद्धिश्च केवलम् । त्यतरागादिदोषाणा, जिन प्रोक्ता न संशय ॥१५२।। - मन ताजा दगर पारम्प मन पद है, उनवा जगत में हित के लिये योगियो न श्रुतस र म उद्धार गया है। यानि निदनीजानि, मन शातिफराणि च । ध्येयानि तानि सर्वाणि, उप पदस्थसिद्धये ॥१४३॥ जो निवेदजनक है तथा मन तो शान्ति के करने वाले बीज है, उन मव वीणा TT पदस्थ ध्यान की सिद्धि के लिये उद्विमानो को ध्यान परना चाहिये। . रागद्वेपानमोहाधरयो यान्ति नय सताम् । साम्य सगरोधादिगुणा प्रादुर्भवन्ति च ॥१४४॥ (मत्रा के ध्यान से) मत्पुम्पाक राग, द्वेप, इन्द्रिया और माहादि गग्रा का नाश हा जाता है और समभाव, सवेग और वोय आदि गुग प्रगट हो जाता है। सारो निर्जरा मोक्षो, मनोजयश्च जायते । येसैन्त्रौरे पदे वर्ण सारोपापहे परे ॥१४५॥ ते सर्ने मुनिभिध्येयाश्चिन्तनीया मुहुर्मुहु । कथनीया परेपा च, भाग्नीया निरन्तरम् ॥१४६॥ जिन श्रेष्ठ, दापा को हरने वाले, सारभूत पदा और वर्षों के मन्त्रसमूह में मवर, निजरा, मोक्ष और मन पर विजय मिलती है, उहे मुनियो को व्याना पार बार-बार चितन करना चाहिए । दूसरा के लिए कहना चाहिए पार निरन्तर उनको भावना करनी चाहिये। जपनीयाश्च पर्वत्र, निश्चेतव्या समानसे । श्रद्धेया स्वात्मसिद्ध्यर्थ, किं वृथा बहुजल्पने ॥१४७॥ ७८ श्री सिहनन्दि भट्टारक विरचित पंचनमस्कृतिदीपक-सन्दर्भः नमाम्यह त देवश लक्ष्मीरात्यन्तिकी स्वयम् । यस्य निधूतिकर्मेन्धधूमस्यापि विराजते ॥१॥ मैं उस देवाधिदेव को नमस्कार करता हूँ, जिसने कर्मस्पी ईधन के घु ए को भी नष्ट कर दिया है और जिसके मम्पूर्ण लक्ष्मी स्वय मुशोभित होती है। यस्य प्रभावो देवेशरपि वक्तु न शम्यते । तत्र मानुषव्यापार केवल हास्यतास्पदम् ॥२॥ जिसके प्रभाव का वर्णन इन्द्र भी नही कर सकते, उसमे मनुष्य का व्यापार केवल हास्यास्पद है । विघ्नचौरारिमार्याद्या शाकिन्यादिगणा अपि । यस्य स्मरणमात्रेण प्रलय यान्ति तेऽखिला ॥३॥ जिसके स्मरण मात्र से विघ्न, चोर, शत्रु, महामारी आदि रोग, और शाकिनी आदि सम्पूर्ण गण नष्ट हो जाते है । यस्य प्रभावतो बुद्धिर्जायते जीवसनिभा। त नमस्कृत्य पञ्चाङ्गमन्त्रं तत्कल्पमुच्यते ॥४॥ ८१ , मवेति रागदुवेंपायरीन हत्वा जिताशया । कपायाचभट सार्म, क्षमा तोपादिकायुधा ॥१५३॥ नानाभेद प्रकुर्वन्तु पढस्थध्यानमूर्जितम् । सर्वयत्नेन सिद्धयर्थ, सर्वत्रालम्व्य साम्यताम् ॥१५॥ जिनद्र देवा ने कहा है सि गगादि दोपो से हित वीतराग मुनियो को केवा ध्यान की मिद्धि हो जाती है, इसमे कोई सराय को वात नहीं है । यह मानकर क्षमा-सन्ताप आदि शम्मधारी हे जितेन्द्रिय पुरपो । तुम पाय, विपयादि वीरा महित राग-द्वेष आदि शत्रुओ को जीतकर और मवन साम्यभाव धारण करके प्रात्म-सिद्धि के लिए प्रयत्नपूर्वक अनक प्रकार में श्रेष्ठ पदस्थ ध्यान करो।
, सर्वरनाकर वृद्धमृत्युञ्जयमुनामकम् । लघुमृत्युञ्जयं नाम, मोक्षद वाछितप्रदम् ॥११॥ फलद वालिनीचक्र , शुभ चैवाम्बिका चकम् (१) वर चक्रेश्वरीचक्र, बृहच्छान्तिकचक्रकम् ॥१२॥ यागमण्डलसच्चक्र , यज्ञचक्र मनोहरम् । भैरव चक्रमिन्द्रारयमित्यादि सकलं बहु ॥१३॥ यन्त्रराजागमोक्त यत्, तदेतेन विना न च । सिद्धेन सिद्धयत्येव, नियमोऽस्ति जिनागमे ॥१॥ पावचक्र, वीरचक्र, मिद्धचक्र, निलोकचक्र, कमचक्र, योगचक्र, विच्छेदा व्यानचक्र,भूतचक्र,तीयचक्र, जिनचक्र, वशीकरणचक्र,ध्यानचक्र, मोक्षचक्र, गान्ति करने वाला श्रेयश्चक्र, सबको रक्षा करने वाला वृद्ध- मृत्युजयचक्र, मोक्ष प्रदान करने वाला तथा कामना पूर्ति करने वाला लयुमृत्युजयचक, फल देने वाला ज्वालिनीचक्र, शुभ अम्बिवावक्र, श्रेष्ठ चक्रेश्वरीचक्र, वृहत् गान्तिचक्र, यागमण्डल चक्र, मुन्दर यज्ञचक्र, भरवचक्र इत्यादि बहुत तरह के चक्र यमराज आगम मे कह है । वे सब इस नमस्कार मन को सिद्ध किये बिना सिद्ध नहीं होते, उसके सिद्ध होने पर ही ये सिद्ध होते है, यह जिनागम का नियम है। यस्य स्मरणमात्रेण, वराङ्गस्य भय गतम् । दीपिनोऽथ तथा श्रेष्ठी, सुदर्शनोऽपि च स्वयम् ॥१५॥ भयमुक्तो वभूवास्य, प्रभावेन महाजनाः । द्वात्रिंशदभिधानास्ते, गता द्वीपान्तर मुदा ॥१६॥ इसके स्मरणमात्र से वराग के हाथी का भय दूर होगया और - - ।
जिनके प्रभाव से बुद्धि सम्यग्दृष्टि जोय के समान हो जाती ह उम पचाङ्ग मन्य (गमापार मात्र) का उमबार करके रणमाकार मर वरप का रहता है। तत्राधिकारा पचन साधन ध्यानकर्मणी। स्तयन फनभित्येतद् यदुक्त पूर्वसूरिभि ॥५॥ तदेव सनिप्यारभ्य प्रक्रियाद्वारत बलु । करोमि देय नान्यस्य दुष्टमिन्याटश सलु ॥६॥ इस कप वे पाच अधिकार ह-१ माधन, २ ध्यान, ३ कम, ४ स्तवन पार ५ फन । इस विषय म पूर्वाचार्या ने जो कहा है, उम सक्षिप्त करो प्रप्रिया द्वार मे मैं प्रारम्भ करता हूँ। इमे दुष्ट और मिथ्यादृष्टि लोगो को नहीं दना चाहिए । तदेव गायत्रीमन्त्र, तदेवाष्टकमुन्यते । तदेव पचक प्रोक्त , पदार्शनिकसम्मतम् ॥७॥ यही गायत्रीमत्र है, यही अप्टक कहलाता है और पट् दशनो द्वारा माय पचक भी यही है। यत्र चिन्तामणिर्नाम, कन्निकुण्डाख्ययन्त्रकम् । पञ्चाराध्यपद यन्त्र, गणवलयाभिधम् ॥८॥ मयो मे चिन्तामणि मन, कलिकुण्ट मत्र, पचाराध्य पद मत्र और गणधर-बलय मत्र है। पार्श्वचक वीरचक्र, सिद्धचक्र बिनोकयुक् । कर्मचक योगचक , ध्यानचक्र विच्छेदकम् ।। भूतचक्र तीर्थचक्र, जिनचक वशीकरम् । ध्यानचक्र मोक्षचक्र , श्रेयश्चक्र सुशान्तिकृत् ॥१०॥ . ८२ - पूर्व दिशा, श्वेत पुष्प की माला, श्रेष्ठ पद्मासन, ज्ञान-मुद्रा, मोक्ष- मुद्रा और प्रभात का समय होना चाहिए । क्षेत्र शुद्ध तटामादितीर द्रव्यं मनोहरम् । भावो मन्त्रलयो ज्ञेयः स्वेष्टपल्लवयोजनम् ॥२२॥ शुद्ध क्षेन, तालाब आदि का किनारा, शुद्ध द्रव्य, मन मे निमग्नमाव और अपना मनोनुकूल पल्लव होना चाहिए। कर्म मोनप्रधान स्याद् गुण श्वेतस्य चिन्तनम् । सामान्य मूलमन्त्र स्थाद्र विशेषस्तत्परो मत ॥२३॥ कम मोक्ष प्रधान हो, श्वेत वरण का ध्यान वह गुण है, मूलमन्त्र सामान्य है और तत्परता से वह विशेप कहलाता है । पूजाद्रव्य कु कुमं च सदकं चरुसचयम् । रत्नदीपक वामे च, धूपकुण्ड च दक्षिणे ॥२४॥ पूजा का द्रव्य, कु कुम, फन, नैवेद्य और रत्नदीप यह बाये हाथ में रक्खे और धूप के पात्र को दाये हाथ मे रक्खे । फल देय जिनेशस्य पुरतो वीजपूरकम् । चूत चोचाम्र-कदलीमुख पटकतुषु क्रमात् ॥२५॥ कोलैला-लवगादि-सवौषध्यभिषेचनम् । दधि-दुग्धेच-सर्पिभिरभिपेको जिनस्य च ॥२६॥ जिनेन्द्र भगवान की प्रतिमा के आगे विजौरा, आम, नारियल, वरी, केला आदि फल और सुपाडी, इलायची, लोग आदि छह ऋतुओ म होने वाले फल क्रमश चढावे । मर्व औपधियो से अभिषेक करे। पश्चात् दही, दूध, गन्ने के रस, घी से (पचामृत) भगवान का । - अभिषेक करे। ८५ मेठ मुदान म्दय भगमुक्त हो गया। इस मन के प्रभाव मे बत्तीस श्रेष्ठ पुरप प्रसन्नतापूर्वक दसर द्वीप चले गये । किमस्य वार्य माहात्म्य, जिह्वया चैकया खलु । कोटिजितादिभित्र्याइ गणेशोऽत्र किमुच्यते ॥१७॥ एक जीभ म हा भागभ्य का क्या वर्णन किया जाय । यदि गणधर वरोडी जिहाना में पह तो क्या कह मकते है । अपवित्रे पवित्रेऽपि, सस्थिते दु स्थितेऽपि वा। यत्सर्वकृत्पर मन्त्र, न त्याज्य विबुधैरिह ॥१८॥ अपवित्र या पवित्र, मस्थित हा या दुम्थित ऐसे काय मे मा इच्छापूरय जो श्रष्ट मन्त्र है, म द्विमानो को कभी छोडना नहीं चाहिए। डद चित्र महत्स्याच मोजद यदवशीकृति- प्रमुग्वानि च कर्माणि, चेप्सितानि ददाति नु ॥१६॥ यह महान् प्रापचय की बात है कि यह मोक्ष दने वाला मत्र वशीकरण आदि कर्मों और टच्छित पदार्थों को पूरा करता है । यमो मुनिमहामूसों, मन्त्रपाटेकजल्पनात् । भूयो भूय पदध्यानात्, साती प्राप्तवान् किमु ॥२०॥ यम नामक मुनि ने, जो विशेप ज्ञानवान नहीं थे, इस मन्त्र के एक पद को जाप से और उस पद के बार-मार ध्यान करने से साता और सद्धि प्रास की। अथ माधनमाह-- पूर्वा ककुप् पुप्पमाला शुक्ला पद्मासन वरम् । वोधमुद्रा मोक्षमुद्रा, काल प्रभात इष्यते ॥२१॥ ८४ तद्विधाने पूर्वदिने गत्वा तु जिनमन्दिरे । प्रतिमा श्रु तमभ्यर्च्य कृत्वाऽनु गुरुपूजनम् ॥३२॥ गुरोराजा समादाय गुरुहस्त समुद्धरेत् । मस्तके न्यस्य सदभाग्य मत्वा गत्वान्तरे गृहे ॥३३॥ तत्र मन्त्र जपेद्यावत् कार्यसिद्धिर्न संभवेत् । तावत् तत्र नियन्ता वा याथातथ्येन योजयेत् ॥३४॥ फिर विधान के पहने दिन जिन मन्दिर में जाकर देव, गुरु और शास्त्र की पूजन करे । फिर गुरु को पाना लेकर उनका हाथ ऊपर उठाकर अपन मस्तक पर रक्वे । और अपना शुभ भाग्य समझकर घर में एकान्त मे जाकर जब तक काय की सिद्धि न हो जाय, तबतक मन्त्र का जाप करे और वहा तवतक एक ऐसे नियामक की नियुक्ति करे जा माशास्त्र के अच्छा वेना हो। मन्त्रस्याग्या तु पञ्चाग, नमस्कारस्तु पञ्चकम् । अनादिसिद्वमन्त्रोऽय न हि केनापि तत् कृतम् ॥३५॥ यह पचाग मत्र है। इसमे पाच नमस्कार है। यह मत अनादि सिद्ध है और इसकी रचना किसी ने नहीं की है। पूर्व येऽपि जिना यातास्ते वे यास्यन्ति यान्ति च । इत्यनेनेव हि मुक्तयज्ञ मूलमन्त्रमनादित ॥३६॥ पूर्वकाल मे जितने जिनेन्द्र भगवान् मुक्ति मे गए, जो वर्तमान म जा रहे हैं और आगे जायेगे, वे इसी रणमोकार मन्त्र के कारण हो । यही कारण है कि यह मूलमत्र अनादिकान से मुक्ति का अङ्ग है । जानुदध्ने जले वापि पर्वते वातपस्थिती। केनापि योगकार्येण कार्य साध्य सुधीमता ॥३७॥ ८७ पश्चादुद्धत्य तत्पीठान्मातृकायन्त्रपूजनम् । कृत्वा पीठे प्रतिष्ठाप्य स्थिरा ता चिन्तयेदनु ॥२७॥ तदन ार उन पीठ मे उठाकर मातृका यन्त्र की पूजन करे, फिर पीठ पर प्रतिष्ठा (विराजमान) करके यह प्रतिष्ठा स्थिर है यह चितन करे। चूर्णादिवासना पश्चाद वार्यधोवासना तथा। धान्यादिवासना चव, फनपनिकवासना ॥२८॥ पश्चात् चरा, वानक्षप की वासना द, फिर जल की अधावासना द। फिर धा य नादि की वासना द और फिर फल और दीपक यी वासाद। पश्चाद् दिनत्रय वस्त्रपरिधान तथा तत । मुसोद्घाटनमेतस्यानन्तर स्यान्निराजना ॥२६॥ इसवे बाद मातृका यय का तीन दिन तक वस्त्र से ढका रक्ये । इसके पश्चात् उमयो ग्वोलदे और उसकी आरती उतारे । पश्चादाफरशुद्धिं च कृत्वा मन्त्र जपेदनु । मूलमन्त्रमुपन्यस्तप्रतिज्ञो व्रतसयुत ॥३०॥ फिर कुण्ड की शुद्धि करके मात्र का जाप करे और व्रत करके मूलमत्र की जाप करन की प्रतिज्ञा कर । स पोषधी निराहारी, नियतो विजितेन्द्रिय । मनोवारकायसशुद्ध पचमन्त्र जपेदनु ॥३१॥ फिर वह पौषधयान, उपवास सहित, सयमी, जितेन्द्रिय और मन वचन-काय की शुद्धि करने वाला माधव पचनमस्कारमन्त्र का जाप दे। ८६
तद्विधाने पूर्व दिने गत्वा तु जिनमन्दिरे ।
प्रतिमा श्रु तमभ्यर्च्य कृत्वाऽनु गुरुपूजनम् ॥३२॥
गुरोराजा समादाय गुरुहस्त समुद्धरेत् ।
मस्तके न्यस्य सद्भाग्य मत्वा गत्वान्तरे गृहे ॥३३॥
तत्र मन्त्र जपेद्यावत् कार्यसिद्धिर्न सभवेत् ।
तावत् तत्र नियन्ता वा याथातथ्येन योजयेत् ॥३४॥
फिर विधान के पहले दिन जिन मन्दिर मे जाकर देव, गुरु और
शास्त्र की पूजन करे । फिर गुर की आज्ञा लेकर उनका हाथ ऊपर
उठाकर अपने मस्तक पर क्वे । और अपना शुभ भाग्य समझकर
घर मे एकान्त मे जाकर जब तक कार्य की सिद्धि न हो जाय, तबतक
मन्त्र का जाप करे और वहाँ तबतक एक मे नियामक की नियुक्ति
करे जो मनशास्त्र के अच्छा वेत्ता हो।
मन्त्रस्याश्या तु पञ्चाग, नमस्कारस्तु पञ्चकम् ।
अनादिसिद्धमन्त्रोऽय न हि केनापि तत् कृतम् ॥३५॥
यह पचाग मत्र है। इसमे पाच नमस्कार है। यह मन अनादि
मिद्ध है और इसकी रचना किसी ने नहीं की है।
पूर्व येऽपि जिना यातास्ते वे यास्यन्ति यान्ति च ।
इत्यनेनेव हि मुक्त्यग मूलमन्त्रमनादित ॥३६॥
पूर्वकाल मे जितने जिनेन्द्र भगवान् मुक्ति मे गए, जो वतमान में
जा रहे है और आगे जायेगे, वे इसी रणमाकार मन्त्र के कारण हो ।
यही कारण है कि यह मूलमन अनादिकाल से मुक्ति का अङ्ग है।
जानुदध्ने जले वापि पर्वते वातपस्थिती।
केनापि योगकार्येण कार्य साध्य सुधीमता ॥३७॥
दुछिपाना चाहिए कि इन मन को चाहे तालाब मे, परत पर, गर्मी म या हिदी भी गमाय पामन ग्रादि म मिद्ध करें। एतन न यो नान्डमादिकचक्रत । स्पनून या शुद्ध शांगनेन किमु स्फुटम् ॥३८॥ “ म चन द्वारा नही करना चाहिए ज्योकि य र भूा 17 म गुद्ध है ही। इसलिए शोधन का यमा - दिनीश पनय शान्ति शाफिनीभूतपन्नगा । तिलिपिना पानि चायमाने सुपचके ॥३६॥ पउ पनीर ध्यान करने स विघ्नो के समूह नष्ट हो जात हैं, शाविनी, भूत, सप नादि का उपसग नहीं रहता और विष निर्विष हो जाता है। ॐ नम सिद्धमित्याग्या यथा कार्यस्य साधिका । तथा सादृश्यतो ज्ञेय मन्त्र पारमगोरुकम् ॥४०॥ 'ॐ नम मिद्धम्' यह मन जिस प्रकार काय की सिद्धि करने वाला है, उसी प्रकार यह पचपरमेष्ठी मत्र भी काय की सिद्धि करता है। ॐ नमोऽभ्य इत्यारया प्रथमा जायते पदी। ॐ नम सिद्धेभ्य इति जायते द्वितीया पदी ॥४१॥ ॐ नम आचार्येभ्यश्च जायते तृतीया पदी । ॐ नम उपाध्यायेभ्यो जायते तुर्या सत्पदी ॥४२॥ ॐनम सर्वसाधुभ्यो जायते पचमी पदी। इति सस्कृतमन्त्रेण सर्वसिद्धिर्भविष्यति ॥४३॥ SS
'ॐ नम अभ्य' यह इस मन्त्र का प्रथम पद है।
'ॐ नम मिद्धेभ्य' यह इस मन्त्र का द्वितीय पद है ।
'ॐ नम आचार्यभ्य' यह इम मन्त्र का तृतीय पद है।
'ॐ नम उपाध्यायेभ्य ' यह इम मन्त्र का चतुर्थ पद है ।
'ॐ नम मर्वसाधुभ्य' यह इस मन्त्र का पचम पद है।
इस सस्कृत मन से सम्पूर्ण कार्यों की मिद्धि अवश्य होगी।
णमोकारमन्त्र की स्तुति श्रीनवकार जपा मनग्गे श्रीजिनमासन मार रे प्राणी । टेक । सवमग म पहनो भगत जपता जै जैकार रे प्राणी। श्रीनरवार जपो मनरग श्रीजिनागन मार रे प्रागी ११ पहते पद विभगा जिनप्जिन मुमिर श्रीअाहत रे प्राणी । "पष्टयम वजित पीजे पद ध्यागा निद्व अनन्त र प्रारणी । श्रीनववार जपा मनरगे श्रीनिनशामन मार रे प्राणी ।२। श्रीमाचारज तीज पद मुमिर गुण छत्तीमनिधान रे प्राणी । चौरे पद उपाध्याय जपाजे मूत्रमिद्धान्तन जान रे प्राणी । श्रीनवकार जपा मारगे श्रीजिनगामन मार रे प्राणी ।। सर्वसाधु पचम पद प्रगामू पच महावत धार रे प्राणी । नवपद अउसव इह छै सपद अउसउ वरण मभार रे प्रारगी। श्रीनवकार जपो मनग्ग श्रीजिनशासन मार रे प्राणी ।।। सात यहा गुर अक्षर रहना एक अभर उच्चार रे प्राणी । सात सागरना पातक जाये पद पचास विचार रे प्राणी। श्रीनववार जपो मनरगे श्रीजिनशामन मार रे प्राणी ॥५॥ सम्पूरण पण से सागरणा पाप पलाये दूर रे प्राणी ये भव खेमकुगल मनवाछित परभव सुस भरपूर रे प्राणी । श्रीनवकार जपो मनरगे श्रीजिनशासन सार रे प्राग्गी ।। इमरत शोभनपुर सौ सिद्धो शिवकुमारन ध्यान रे प्राणी । सरप फिर हुई फूलमाला श्रीमतिने द्रशध्यान रे प्राणी। श्रीनववार जपो मनरगे श्रीजिनशासन सार रे प्राणी ७
यक्ष उपद्रव करत निवारा परचो ऐमा निरधार प्राणी।
चोर चण्ड पिंगलने हुण्डक पाव नग्मुर-रिद्ध रे प्राणो ।
श्रीनवकार जपो मनरगे श्रीजि नशामन सार रे प्राणी ।।
ये परमेष्ठिमन्त्रा जग उत्तम चादहपूरव सार रे प्राणी ।
गुण बोले श्रीपद्मराजगुरु महिमा जाम अपार रे प्राणी ।
श्रीनवकार जपो मनरगे श्रीजिनशामन सार रे प्राणी 181
इति नवकारमन्य सम्पूर्ण
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7 मुी भी ग्व कही पिसी स्थान मे जाकर ठहरते है तो उसके रक्षक, का पहत ९ कि इता दिन तक तेरे स्थान में ठहरेगे तू क्षमा रखियो । उस वास्ते गृहरिशमो वो अवश्य ही उपरोक्तानुमार रक्षक साना ननी चाहिए। (२) जब म साधन करने के वास्ते जावो तब जहा तक एमे म्याा म मन्त्र सिद्ध गे जहा मनुष्यो का गमनागमन न । जसे अपने जैनतीथ मागीतुगीजी, सिद्धवर कूट, रेवानदी के तट या मोनागिरिजी या पार जा अपने जनतीय एकान्त स्थान में हैं। वगीचो के मकाना मे पहाना मे तथा नदी के किनारे पर यानि स्थान म, एमे स्थाना मे म । मिद्ध करने को जाना चाहिए । जब स्थान मे प्रवेश कगे, वहा ठहरो तो मन, वचन, काय से उस स्थान जो रक्षक देव या यक्ष आदि है उमका योग्य विनय करके मुख से उच्चारण करे कि हे इस स्थान के रक्षक, मैं अपने इस काय सिद्धि के वास्त तेरे स्थान म प्राया है। तेरी रक्षा का आश्रय ि है। इतने दिना तक मैं तेरे स्थान मे रहने के लिए आया हूँ, रक्षा का आश्रय लिया है । इतने दिना तक निवास के लिए म प्रदान कीजिए। अगर मेरे ऊपर किसी तरह का सकट, उपद्रव या आवे तो उसे निवारण कीजिए। (३) जब मत्र सावन करने जानो तो एक नौकर सार जानो। जो रसोई की वस्तु लाकर रसोई बनाकर तुमको में परा दिया करे । तुम्हारा धोती दुपट्टा धो दिया करे, जब तुम साधन करने बैठा तव तुम्हारे सामान की चौक्सी रक्खे । (४) जो मग माधन करना हा पहले विधिपूर्वक जितना जि हर दिन जप सके उतना उतना हर दिन जप कर सवा लाख पूर मात्र माधन करे, फिर जहाँ काम पडे उसका जाप जितना कर ६४ १०८ बार या २१ बार या जमा मन्त्र मे लिखा हो, उतनी बार जपने से कार्य सिद्ध होवे । मन्त्र शुद्ध अवस्था मे जपे । शुद्ध भोजन खाये । और मन्त्र मे जिम शब्द के आगे दो-दो का अङ्क हो उस शब्द का दो वार उच्चारण करे। । (५) जब मन्त्र जपने बैठे, पहले रक्षा-मन्त्र जपकर अपनी रक्षा कर लिया करे । ताकि कोई उपद्रव अपने जाप्य मे विघ्न न डाल सके। अगर रक्षा-मन्त्र जप कर मन्त्र जपने बैठे तो माप, बिच्छू, भेडिया, रोछ, शेर, बकरा उसके बदन को न छू मके-दूर ही रुकें। मन्न पूर्ण होने पर जो देव देवी साँप वगैरह बनकर उमको डराने आवे तो जो रक्षा-मन्त्र जप कर जाप करने बैठे उसके अग को वह छू नही सके-सामने से ही डरा सके । जव मन्न पूर्ण होने को आवे तब देव दवी विक्रिया से साप वगैरह हा डराने आवे तो डरे नही, चाहे प्राण जाव तो डरे नही तो मन्त्र सिद्ध होय। मनोकामना पूर्ण होय । यदि विना मत्र रक्षा के (रक्षा-मन्त्र के) जपने बैठे तो पागल हो जावे। म वास्ते पहले रक्षा-मन्त्र जप कर पश्चात् दूसरा मन्त्र जपना चाहिए। (६) मन्त्र जहा तक हो मके ग्रीष्म ऋतु मे सिद्ध करना चाहिए, ताकि धाती-दुपट्टा मे सर्दी न लगे । मन्त्र सिद्ध करने मे धोती-दुपट्टा गही कपडे रखे। वे कपडे शुद्ध हो, उनको पहने हुए पाखाने नहीं नावे, खाना नही खावे, पेशाब नहीं जावे, सोवे नहीं । जब जाप कर पुत्र तो उन्हें अलग उतार कर रख देवे, दूसरे वस्त्र पहन लिया करे, यह वस्त्र नित्य हर दिन स्नान कर बदन पौछ कर पहना करे--यह स्त्र मूत के पवित्र वस्तु के हो । ऊन, रेगम वगैरह अपवित्र वस्तु के नहा, इतने स्त्री सेवन न करे । गृहकाय छोडकर एकान्त में मन्त्र- मिद्ध करे।
(७) मन्ा मे जिम रन की माना लिखी हो उसी रङ्गका
ग्रामन यानी पिस्तग ग्रादि । योती-दुपट्टा भी उसी रग का हो तो और
भी श्रेष्ठ है, यदि माता उस ग्न वी न हाच तो सूत की माला या
जियापाते वी माला उप रज की रंग लेवे। जव मन्त्र जपने बेटे तो
इतकी बाता का ध्यान रये।
(८) पहो गव पाम ठीक करने म जप ।
(६) आसन सबसे अच्छा लाभ का लिखा है, या सफेद या पीला
या लाल-जैमा जिम मा में चाहिए यमा पिछावे ।
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(१०) आढने को याती दुपट्टा सफेद उम्दा हो या जिम रन का
जिम मन्न मे चाहिए वमा ता ।
(११) शरीर की गुद्धि करके परिणाम टीन करते धीरे धीर
तसल्ली के साथ जाप्य करे, अक्षर शुद्ध पढे ।
(१२) मत्र पद्मासन से बैठकर जप। जिस प्रकार हमारी बैठी
हुई प्रतिमानो का आसन होता है, वाया हाथ गोद मे रख कर दाहिने
हाथ से जपे । जो मात्र बायें हाथ से जपना लिसा हो तो वहाँ दाहिना
हाथ गोद मे रखकर वायें हाथ में जप ।
(१३) जहा स्वाहा लिखा हो, वहाँ धूप के माथ जपे यानी धूप
आगे रखे।
(१४) जहा दीपक लिसा हो, वहा घी का दीपक आग वालना
चाहिए।
(५५) जिस जिस अगुली से जाप्य लिखा हो उसी अगुली और
अगूठे से जप । अगुलिया के नाम आगे लिये है।
अगुलिया के नाम- अग्ठे को अगुप्ठ कहते हैं। अग्ठे के साथ की अगुली को तजनी कहत है। तीसरी वीच की अगुती को मध्यमा कहत ह । चाथी यानी मध्यमा के पास की अगुली को (अगुष्ठ म चाथी को) अनामिका कहते हैं। पाचवी सबसे छोटी अगुली को कनिप्ठा कहते हैं । अगुष्ठेन तु मोनार्थ धर्मार्थ तर्जनी भवेत् । मध्यमा शान्तिकं ज्ञेया सिडिलाभाय नामिका ॥१॥ जाप्यनिवि मे मोक्ष के वास्ते अगूठे से तथा धम के वास्ते अगुप्ठ माथ तर्जनी से, शान्ति के लिए मव्यमा तथा सिद्धि के लिए अना- नका अगुली से जाप्य करे। कनिष्ठा सर्वसिद्वार्थ एतत् स्याज्जाप्यलक्षणम् । प्रसरयात च यज्जप्त तत् सर्व निष्फल भवेत् ॥२॥ कनिष्ठा सर्वसिद्धि के वास्ते श्रेष्ठ है । ये जाप के लक्षण जानने । ना मर्यादा किया हुअा मब जाप्य निष्फल होता है। अर्थात् किसी न का २१ बार जाप्य लिखा है तो वहा २१ मे कम या अधिक प्य नही करना, ऐसा करन स वह निष्फल होता है। मन्त्रसिद्धि हो होती। अगुल्न्यग्रेण यज्जप्त यजप्त मेरुतघने । व्यग्रचित्तेन यजप्त तत् सर्व निष्फल भवेत् ॥३॥ अगुली के अग्रभाग से जो जपा जाए तथा माला के उपर जो न दाने मेर के है उनको उल्लघन करके जो जाप्य किया जाए तथा व्यातुन चित न जा जाप्य किया जाए वह मर निष्फल होता है। माना सुप ववर्णाना सुमाना सर्वकार्यदा। स्तम्भने इष्टनाले जपेत प्रस्तरकर्कशान् ॥४॥ राम " Tों का की माला श्रेष्ठ है । परन्तु दुष्टी यो दान म प न न न न म कठोर (मस्न) वस्तु के गांभया को मा-८ य कर। धर्मार्थी काममोनार्थी जपे पुत्रजीनिझाम् । (प्रजम्) शान्तये पुत्रलाभान जपानममालिकाम् ॥५॥ मत्र माधन करन वाला धम T लिए तथा काम और मोक्ष के लिए पापाजीया की माला स जाप्य र। शाति के लिए पार पुत्र प्रामिन पास माती प्रादि वी उत्तम माना स जाप्य करे। शाति से यह तात्पय है fr जमे रोगी आदि के लिए गेग की शाति करना य देवी वगरह रिमी का उपद्रव हा उममी गति करना । शान्ति अर्द्धरात्रि वारुणी दिक् ज्ञानमुद्रा पकजासन । मौक्तिकमालिका स्त्रये स्वते पू० च० का० ॥६॥ शान्ति के प्रयाग मे मात्र जाप्य करने वाला आधी रात के समय पश्चिम दिशा की ओर मुख करके ज्ञान मुद्रा महित कमलामन युक्त मोतियो की माना से स्वयं स्वन पू० च० प्रा० का उच्चारण करता हुअा जाप्य करे। स्तम्भन पूर्वाह्न बज्रासने पूर्वदिक् शभुमुना। स्वर्णमणिमालिका पीताम्वर वर्ण ठ ठ ॥७॥ स्तम्भन (रोपना तथा कोलना) के प्रयोग में पूर्वाह्न प्रथा दुपहर मे पहले कान म, वज्रासनयुक्त पूर्व दिशा यो तरफ मुख करखें - - वण के मणियो की माला मे पीने रङ्ग के वस्त्र पहने हुए ठ ठ इन्चारण करता हुअा जाप्य करे। शन्चाटने च रुद्राना विद्वेषारिष्टज जजा। स्फाटिकी सूत्रजा माला मोक्षार्थाना (र्थिनां) तु निर्मला ॥८॥ टुमन का उच्चाटन करने के लिए रुद्राक्ष की माला, वैर मे जिवापात को माला, मोक्षाभिलापिया को म्फटिकग्गि को तथा सूत्र आ माना अप्ठ है। ' उच्चाटन वायव्यदिक् अपराह्नकाल कुक्कुटासन । प्रवानमालिकावूम्र च फटित् तर्जन्यगुप्ठयोगेन ॥६॥ उच्चाटन इनके प्रयोग में वायव्य काग (पश्चिम और उत्न के बीच मे) की तरफ मुय करके अपराह्न (दुपहर के बाद) मे कुत्यु- दामनयुक्त मू गे की माला से आगे दूप रखकर व फडिति पल्लव लगा र अगूठा और तजनी से जाप कर । वशीकरणे पूर्वाह्न स्वस्तिकासन उत्तरदिक् कमलमुद्रा। विद्रुम मालिका जपाकुसुमवर्ण वपट् ॥१०॥ वशीकरण अर्थात् वश मे करना (अपन अवीन करना) उसके माग मे पूर्वाल, दापहर के पल काल म स्वस्तिकामन युक्त उत्तर दिगा की तरफ मुख करके कननमुद्रा सहित मू गे की माला म जपे । उनुमवरण वपट् उच्चारण करता हुमा जाप्य करे । प्रासन डाभ रक्तवर्ण यन्त्रोद्वार । रक्तपुष्प वामहस्तेन डाभ के आसन पर बैठ कर लाल कपडे सहित यन्त्रोद्धार लान फूल रखता हुआ वाये हाय मे जाप्य करे । आकृष्टिपूर्वाह्नदण्डासन अंकुश मुद्रा दक्षिणदिक् । प्रवालमाला उदयार्कवर्ण वोपट स्फूट अगुप्ठमध्यमाभ्य तु।
+ १ उपनाम, क्वार मुदी सप्तमी का १ उपनाम, वातिर बदी पचमी का १ उपवाम, जानिए मनी पचमी या । उपवाम, मगमिर बदी पचमी का । उपचारा, मगमिर मुदी पचमी का १ उपवाम, पोप बटी पत्रमी का । उपवार, पाप मुदी चतुदगी का ? उपवाम, माघ वदी चतुदगी का १ उपनास, माघ मुटी चतुदगी का १ उपनाम, फाल्गुन वदी चतुरशी ना १ उपवास, पात्गुन मुदी चतुदगो का १ उपवाम, चैन वदी चनुदगो वा ) पवाम चत्र मुदी चतुदगी वा १ उपवाम तत्पश्चात् वगाय वदी चतुदशी ता । उपनाम, वगास मुदी चतुदगी का र उपनाम, ज्यप्ठ पी चतुगी का ? उपवास, ज्येष्ठ मुदी चतुदगी वा १ उपवास, आपाढ बदी चतुगी ा १ उपवास, पापाढ मुदी चतुदशी का १ उपवास, थावगग उनी चतुदगी का १ उपवास, श्रावण मुदी नौमी का १ उपवाम, भादा वदी नौमी का ? उपवाम, भादा सुदी नौमी ना १ उपवास, क्वार पदी नामी का १ उपवाम, क्वार मुदी नामी का १ उपपाम, कातिय वटी नीमी ना १ उपवास, कानिक मुदी नीमी का . उपवाम, मगमिर वदी नामी का १ उपवास, भगमिर सुदी नौमी का १ उपवास । य व्रत १८ महीने में होते है । जाप्य करने की विधि मप्तमी वा जाप्य-गामा अग्हितागा पचमी का जाप्य-रणमा मिद्धाण चतुदशी का जाप्य-गमो पाइरियाण चतुदशी का जाप्य-गामा उवज्झायारण नौमी का जाप्य-गमो लाए सव्वमाहूण इन मनो की जाप्य भगवान की वदी के सामने करनी चाहिए ! अथवा दव स्थान म जाप्य करनी चाहिए अथवा घर मे एकात स्थान १०२ म जाप्य करे। किन्तु घर मे होम और पूण्याहवाचन करके गणमोकार मन्त्र का चिन और जिनेन्द्र भगवान् का चिन, दीप और उपदानी समक्ष रख कर, आमन पर बैठकर और शुद्ध वस्त्र पहनकर जाप्य करे । ज स्थान पर बच्चो आदि का उपद्रव या शोर नहीं होना चाहिए। मन की जाप्य अत्यन्त शुद्ध, भक्ति के माथ करनी चाहिए । मन्त्र में किसी प्रकार की प्राकुलता, चिन्ता, दुग्य, शोक प्रादि भावनाय नही रहनी चाहिए । जाप्य करते समय मन का स्थिर रखना चाहिए। पद या उत्तर दिशा की ओर मुग्व करके जाप्य दनी चाहिए । जाप्य म बठने मे पहले समय की मर्यादा कर लेनी चाहिए, पद्मासन से बठना चाहिए । मौन रखना चाहिए । जितने दिन जाप्य करे, उतने दिन एकाशन, किसी रस का त्याग, वस्त्र आदि का परिमाण करे । जमीन, चटाई या तस्त पर सोवे, जाप्य ममाप्त होने तक ब्रह्मचय व्रत रक्खे । मन्त्र की जाप्य पुष्य या रोहिणी आदि शुभ नक्षत्रो मे प्रारम्भ करनी चाहिए। मुबह, दोपहर और शाम को जाप्य करे । मुबह ५ बजे उठकर स्नानादि मे निवृत होकर शुद्व वस्त्र पहनकर जाप्य दे। म्वेत वस्त्र पहने । यदि घर मे जाप्य करनी हो तो भगवान का दान पूजन करने के पश्चात् करनी चाहिए। दोपहर को शुद्ध वस्त्र पहनकर नथा मन्ध्या को मन्दिर मे दर्शन करने के पश्चात् शुद्ध वस्त्र पहनकर जाप्य करे। जाप्य तीन प्रकार का होता है-मानसिक, वाचनिक (उपाशुक) पार कायिक। मानसिक जप मन मे मन्त्र का जप करना । यह कार्य सिद्धि के लिए होता है। वाचनिक जप-उच्च स्वर से मन्त्र का पढना, यह पुन-प्राप्ति के लिए होता है। कायिक जप-विना वोले मन्त्र पढना, जिसमे हाठ हिलते रहे।
१ उपवाम, क्वार मुदी मममी का १ उपवाम, कार्तिक वदी पचमी का १ उपवाम, कानिक सुदी पचमी का १ उपवाम, मगसिर वदी पचमी का १ उपवारा, मगमिर मुदी पनमी का १ उपवास, पोप बदी पचमी का १ उपवास, पाप मुदी चनुदगी का १ उपवास, माघ बद्री लनुदगी का ' उपनाम, माघ मुदी चतुदगी का १ उपवाम फाल्गुन बदी चतुदगी का ? उपवाम, फाल्गुन मुदी चतुदशी का १ उपवाम, चैत्र नदी चतुदशी गा । उपनाम, चैत्र मुदी चतुदशी वा १ उपवाम, तत्पश्चात् स वदी चतुदशी ना १ उपवास, वगास मुदी चतुदशी का १ सपनाम, ज्यप्ठ परी चतुर्दशी का ? उपवास, ज्यप्ठ मुदी चतुदशी का १ उपवास, पापाढ वदी चतुगी का १ उपवास, पापाढ सुदी चतुदशी का । उपवास, श्रावण बना चनुदगी का १ उपवास, थावण सुदी नीमी वा १ उपवास, भादा बदी नौमी का १ उपवास, भादो सुदी नामी का १ उपवाम, क्वार पदी नामी का १ उपवाम, क्वार मुदी नौमी का १ उपवास, वार्तिक वदी नौमी का १ उपवास, कार्तिक मुदी नीमो का १ उपवास, मगमिर वदी नामी का १ उपवाम, मगसिर मुदी नीमी का १ उपवाम । ये रत १८ महोन मे होते है । जाप्य करने की विधि सप्तमी का जाप्य-रागमो अरिहतागा पचमी का जाप्य-रणमा मिद्धाण चतुदशी का जाप्य-गमो पाइरियारण चतुदशी का जाप्य-गमा उवज्झायाण नौमी का जाप्य-गमा नोए मध्यसाहूण इन मत्रो की जाप्य भगवान की वदी के सामने करनी चाहिए । अथवा दव स्थान में जाप्य करनी चाहिए अथवा घर मे एका त स्थान पहनकर जप करने से बहुत दुम हो जाता है। हरे रङ्ग के वस्त्र पहनकर जाप करने से मान भग होता है। श्वेत वस्त्र पहनकर जाप करन स यश की वृद्धि होती है। पीले रङ्ग के वस्त्र पहनकर जाप करने से हर्प बढता है। व्यान मे लाल रंग के वस्त्र ओठ ह। मव वम काय सिद्ध करने के लिए दर्भामन (डाभ का आसन) उत्तम है। गृह जपफल प्रोक्त बने गतगुग्ग भवेत् । पुण्यारामे नयारण्ये महस्रगुगित मतम् ।। पवत दशमहस्र च नद्या लक्षमुदाहृतम् । काटि देवालये प्राहुरनन्त जिनन्नि मा ।। अथात् घर मे जो जाप का फल होता है, उसमे सौगुना फल बन जाप करने से होता है। पुण्य क्षेत्र तथा जगल मे जाप करने से जार गुना फल होता है । पर्वत पर जाप करने से दस हजार गुना, दी के किनारे जाप करने से एक लाख गुना, देवालय (मन्दिर) मे प करने से करोड गुना और भगवान के समीप जाप करने मे अनन्त मा फन मिलता है। अगुनी-विधान अगष्टजापो मोक्षाय, उपचारे तु नजनी, मध्यमा धन-मौग्याय, शान्त्यर्थ तु अनामिका । कनिष्ठा मर्वमिद्विदा, तजनी गनाशाय इत्यपि पाठान्नरोऽस्ति हि ।। माक्ष के लिए अगूठे से जाप करे, उपचार (व्यवहार) के लिए ली से, वन और मुस के लिए मध्यमा अगुली से, शान्ति के लिए मिका से और सब कार्यों की मिद्धि के लिए कनिष्ठा मे जाप । कही-कही यह भी पाठान्तर है कि गनु-नाश के लिए तर्जनी 'ली से जाप करे। १०५ यह धन-प्राप्ति के लिए किया जाता है । इन तीना जाग्या म मानमिक जाप्य श्रेष्ठ है। जप उगलिया पर या माना द्वारा करना चाहिए, माला चाह म्त की हो या स्फटिय, माना, चाटी या मोती प्रादि की हो गक्ती - ។ -- वि-गाति वे नि पाठ गे पाठ लाग पाठ हजार पाठ मा आठ जप करे। कम स कम मान लाम जप करे। यह जाप नियमवद्ध होर निरन्तर पर मता-पानक म भी छोडे नही। विश्व शानि जप के लिए दिनो का प्रमागा कर लेना चाहिए। पुन-प्राप्ति, नवग्रह-गानि रोग निवारण अादि कार्यों के लिए एक लाय जप करे अात्मिक गालि ने लिए मदा जप दे, दिना वा कोई नियम नही है। स्त्रिया का रजम्वना होने पर भी जप वरते रहना चाहिए, स्नान करने के पश्चात् मात्र का जाप्य मन मे करे, जोर से नही बाले पार माना भी काम में न ल । जप पूर्ण होने पर भगवान का अभिषेक करने यथाशक्ति दान- पुण्य कर। - आसन विधान वाम वी चटाई पर बैठकर जाप करने से दरिद्र हो जाता है। पापाण पर बैठार जाप करने से व्याधि पीडित हो जाता है। भूमि पर जाप करने से दुम प्राप्त होता है पट्टे पर बैठवर जाप करने से दुर्भाग्य प्राप्त होता है, घास की चटाई पर बैठार जाप करन स अयश प्राप्त होता है, पत्ता के आसन पर बैठकर जाप करने से भम हो जाता है, क्थरी पर बठका जाप करने से मन चचल होता है । चमडे पर बैठकर जाप करने में ज्ञान नष्ट हो जाता है, कबल पर बैठकर जाप करा से मान भङ्ग हो जाता है। नील रङ्ग के वस्त्र १०४
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7
पहनकर जप करने से बहुत दुप हो जाना है। हरे रङ्ग के वस्त्र
एदनकर जाप करने से मान भग होता है। श्वेत वस्त्र पहनकर जाप
बग्न स यश की वृद्धि होती है। पोले रग के वस्त्र पहनकर जाप
करने सहप बढ़ता है। व्यान मे लाल ग्ग के वस्त्र श्रेष्ठ ह। मर्व
धर्म काय मिद्ध करने के लिए दर्भासन (टाभ का आमन) उत्तम है।
गृह जपफल प्रोक्त उन गलगुग भवेत् ।
पुण्यागमे नयारण्ये महम्रगुग्गित मतम् ।।
पवते दशसहस्र व नद्या नक्षमुदाहृतम् ।
कोटि देवालये प्राहुग्नन्त जिनमन्निया ।।
अर्थात् घर मे जो जाप का फल होता है, उससे सौगुना फन बन
म जाप करने से होता है। पुण्यशेत्र तथा जगल मे जाप करने से
हजार गुना फल होता है। पवन पर जाप करने से दस हजार गुना,
। नदी के किनारे जाप करने से एक नाव गुना, देवालय (मन्दिर) मे
जाप करने मे करोड गुना और भगवान के समीप जाप करने से अनन्न
गुना फल मिलता ह।
अगुनी-विधान
अगप्ठजापो मोक्षाय, उपचारे तु तजनी,
मध्यमा पन-मोग्याय, शान्यर्थ तु अनामिका ।
कनिष्ठा मवसिद्विदा,
नजनी शत्रुनाशाय इत्यपि पाठान्तरोऽस्ति हि
मोक्ष के लिए अगूठे से जाप करे, उपचार (व्यवहार) के लिए
तजनी से, धन और मुख के लिए मध्यमा अगुती ने, गानि के लिए
अनामिका मे और सब कार्यों की मिद्धि के लिए निष्ठा ने अप
करे। कही-कही यह भी पाठान्तर है कि गा-नाग के लिए न्र्जनो
अगुली मे जाप करे।
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माना विधान दुप्ट या व्य तर देवा के उपद्रव दूर करन, स्तम्भन विधि क लिए, रोग-शान्ति या पुत्र प्राप्ति क लिए माती की माला या फमल वीज माला से जाप दनी चाहिए। शत्रु उच्चाटन के लिए न्द्राक्ष की माला, सव काय मिद्धि के लिए पचवरण के पुष्पा पर जाप देनी चाहिए। हाथ की अगुनिया पर जाप कम म दम गुना फल मिलता है । पावले की माला पर जप कग्न म महम गुना फल मिलना है। लोग की माता पर पाच हजार गुना, स्फटिक की माला पर इस हजार गुना, मोतियो की माला पर लाय गुना, कमल वीज पर दस लाख गुना, सोने की माला पर जाप करने से क्रोड गुना फल मिलता है। माला के साथ भावा की शुद्धता चाहिए ।
यन्त्र-मन्त्र-भाग ॐ ह्रीं अ-सि-श्रा-उ-सा नम । पचपरमेष्ठिना कतिपयमम्प्रदायास्तन मवेदनाच्चाम्नाया लिग्यन्ते- पचानामादिपदाना पचपरमेष्ठिसमुद्भूताना जाप्ये कृते समस्तक्षुद्रोप- बनाा कर्मक्षयश्च । तत्र कणिकायामाद्यपद पाणि चत्वारि गुल्या गवावतविपिना मकलम्य अप्टानग्यतम्मरगो गाकिन्यादयो न प्रभवन्ति । नवकारे कर्चन यन्त्र-इस पद की जाप की विधि । पवडियो पर चित्त राये डिग नहीं। इसके ममान और जप नहीं है। एकाग्रचित्त मे कर। मर्वक्त्याग का कर्ता है, स्वग मुक्ति प्राप्त कंगव । वाछित फन देने वाना यह मत है। विकान जाप-मन्ध्या पान मध्यान्ह मे अष्टोत्तरगत करना । मुम माभाग्य प्राप्त करे । सन्तान र, चित्त को टिगाने नही । मन बचन नन का निश्चल रबरो, पवित्र हा कर । शिलोक में यह बेष्ठ है । मवकायमिद्विभवत् । मो A ॐ र ल म.
- माला विधान दुष्ट या व्य तर देवा के उपद्रव दूर करने, स्तम्भन विधि के लिए, रोग गाति या पुत्र-प्राप्ति के लिए माती की माला या कमल बीज माला स जाप दनी चाहिए। शत्रु-उच्चाटन के लिए रद्राक्ष की माला, सव काय-सिद्धि के लिए पचवण के पुप्पा पर जाप देनी चाहिए । हाथ को अगुलिया पर जाप कसे स दस गुना फल मिलता है । प्रावल पी माला पर जप करने म सहस्र गुना फल मिलता है । लाग की माला पर पाच हजार गुना, स्फटिक की माला पर दस हजार गुना, मोतिया की माला पर लाख गुना, कमल बीज पर दस लाख गुना, सोो की माला पर जाप करने से करोड गुना फल मिलता है। माला के साथ भावो की शुद्धता चाहिए।
अष्टपन के कमल के मध्य की करिणका मे कार अक्षर को
ध्याना। फिर केवल हकार हीन ध्याना। उसको अर्धाद रेफ बिन्दु
युक्न ध्याना । उसका उद्धार ऐमा है, है इसे त्याना । वहुरि ताके
वलय देयकरि ताकी रेखा विपै पचणमोकार जा णमो अरहतारण आदि
न्याप करि अप्टपत्र विप क्रम सू अप्टवग करि मण्डित चिन्तवन
करना । यहा त्रिकोण शब्द को वलयाथ लेना।
ER
.
.
पफब
SOHA
उकामा
तघदघन
सिहाल
Cho
ਚ ਰਲਾ
चरजनन
हतारण
क्षत्रज्ञ
कखगवड
-0
NEET
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चार पाखडी के कमल के मध्य कणिका विप तो अकार । बहुरि
जा के बाह्य पूर्वपन विपै सिकार ! बहुरि दक्षिण पर विर्ष प्राकार ।
बहरि पश्चिम की पाखडी मे उकार । उत्तर की पाखडी मे साकार
अम से स्थापित करे, फिर उसका व्यान करे। फिर उन पूर्वोक्त
१०६
सीमन हतार
समो
मिलाएकटा
स
प्राथनतकारमा जाप--
कमल की पापियो पर चिन
रसिए । सव काय मिद्ध हो,
अनुनम से स्वग मुक्ति का
दाता है। गाग्र चित्त वरना
प्रभात,
मयाह T"या
समय।
(ॐ
ATRO उसामा
L2tou I
अथ दूसरी विधि जाप्य यी-वमल मे चित्त रखिए । ॐ ही
श्री अ-मि प्रा-उ-मा माधुभ्यो नम । यह मत्र सववाय मनवाछिन
कारय सौग्यदाता है। प्रात मध्याह सध्या र । एकाग्र चितम
जपना मन वचन काय से। सर काय पुश पौत्रादि म्वग मुक्ति प्राण
करे।
25
ॐ
ॐ
HI
१०८
(एही परसमोला। सामो
(अरहतारा
समोसिस
Kलमोमाइरियाण
PUPDeutice)
सामोधोएसबस
पठमबइमगत)
समोउवापाए)
(मो सिकारा
कोरस)
रामो
(अरहतारा
लिमे मी
उवभागात
tra
परमप्टिया र क्षगका अप्टदा वगन म परिगया गरिन ए
पर म स्थापित गरे।
पू
पूवाक्त पच गजर महित नपाति नार प्रथम प्रक्षगे को
अष्टदल-अमल के मध्य स्थापित कर घ्याा परना, उगका उदाहरण
यानद्वारा लिया जाता है। राम अष्टदलमा का याना। मो
मिर, मुस, कण्ठ, हृदय, नाभि में प्रदा
म पचकमल स्थापित कर च्या
अथवा प्रथम कमल अपो भाल प्रदा
में स्थापित कर और बाकी के चार
कमला को दक्षिण में निमल प्रदा म
स्थापित पर ध्याना।
(स
११०
प्रथम रत्तामन्त्र
ॐ गगमा प्ररहतागा शिपायाग ।
यह पपर पागे चाटो । उपर दाता र फरे-
ॐ गामा गिद्धाग--मुगावगा।
यह पढकर मार मुर पर हार पर।
ॐ गगमा मारियागग ---अमरक्षा।
यह पढ़कर पार ग्रह पर हाय पर।
ॐ गामा उवज्मायाग-ग्राम।
यह पढकर मामन हार म जस रिमी का तलवार दिवार
एसे दिवाव ।
ॐ रगमा लोग मब्वमाहूरग-~मा।
यह पढकर जम कार किमी ना पनुप ना कर पातो ताररमान
तानकर दिसाव एम दाना हाथा म रिगाव ।
एमो पच णमोयाग-पत्तन पशिला ।
यह पढकर अपन नीचे जमोन पर हाय नगार और जग हिन
कर जा ग्रामन विछा हुप्रा है उसा दधर उधर यह पयान पर नि
मैं बचशिला पर बठा हूँ, नीच म वाचा नहीं हा मकती ।
मन्वपावप्पणामग्गो-चत्रमयप्राराराश्चतुर्दिक्षु ।
यह पढ कर अपने चारों तरफ अगुती म कुण्डल-सा सीचे यह
खयाल करक कि यह मेरे चारो तरफ वज्रमय पाट है ।
मगलाण च समि-गिखादि सवत प्रसातिया।
यह पढार यह सयान कर दि वाट वे पर साई है।
११२
- पढ़म हबइ मगल-ग्राकारोपरि बज्रमयटकरिणकम् । ति महारक्षा-सर्वापद्रवविद्राविगी । यह पढकर वह जो चारो तरफ कुण्डली गीचकर वज्रमय कोट रचा है उसके ऊपर चारो तरफ चुटकी बजावे । इसका मतलब है कि ना उपद्रव करने वाल है वे सब चले जावे। में बज्रमयी कोट के अन्दर व वजू गिला पर बैठा हूँ । इम रक्षामन्त्र के जपने से जाप करते हुए क व्यान मे माप, शेर, विच्छ, व्यन्तर, देव, दवी प्रादि कोई भी विघ्न नहीं कर सकते। मन्त्र सिद्ध करने के ममय जो देव-देवी डगवना म्प धारण कर भावगा तो भी उस वज़मयो कोट के अन्दर नहीं पा सकेगा। अगर पर वगैरह पाम से गुजरेगा तो भी आप तो उम देख सकेंग किन्तु वह जप करने वाले को मायामय वजकोट की प्राट होने से नही देख सकेगा । जपन वाले को अगर कोई तीर-तलवार वगैरह से घात रेगा तो उस स्थान का रक्षक देव उमको वही कील देगा। वह इस (क्षामन्त्र को जपने वाले का घात नही कर सकेगा। अनेक मुनि- सावकी के घातक इस रक्षामन्त्र के स्मरण मे कोले गय है, और उनकी नोट-~~-जो बगैर रक्षामन्त्र क मन्त्र सिद्ध करने बठन है वे या तो पन्नरा आदि की विक्रिया में इर कर मन्न जपना छोड देते है या गिल हो जाते है । इमलिए मन माधन करने से पहले रक्षा का मन प लेना चाहिए । इम मन्त्र मे हाथ फेरने की क्रिया मिर्फ गृहस्य के म्न है । मुनि के तो मन से ही मकल्प होता है । द्वितीय रजामन्त्र ॐ रामो प्रम्हताण ह्रा हृदय रक्ष रक्ष हु फट् स्वाहा ॐ गमो सिद्धाण ही शिरो रक्ष रक्ष हु फट् स्वाहा
प्रथम रत्तामन्त्र
ॐ रगमो अरहताग पियायाम् ।
यह पढार सागे चाटी 7 ऊपर गहना हार फेरे-
ॐ गामा मिद्वाग–मुगायगा ।
यह पढकर सार मुख पर गप पर ।
ॐ रणमा प्रायग्यिाग-प्रदरता ।
यह पढकर भार ग्रन पर हार पर ।
ॐगमा उवज्भायागा-गायत्र।
यह पढार मामने हाथ स जम काड किमी का तलवार दिखाव
ऐसे दिया।
ॐ गामो लोग मधमाहग्ग--माी ।
यह पढकर जमे काई किमी या पनुप मावकर यानी तारकमान
तानकर दिखावे ऐम दाना हाया म रियाव ।
एमो पच गमोयारो पन्तल वचशिता।
यह पढकर अपन नीचे जमोन पर हाथ लगाकर पार जरा हिल
कर जो आसन पिछा हुप्रा है उनके इपर उधर यह बयान करे कि
में वशिला पर वठा हूँ, नीचे म बाधा नही हो मकती।
सव्वपावप्पणामगो-वज्रमयप्राकाराश्चतुर्दिक्षु ।
यह पढ कर अपने चारा तरफ अगुनो से कुण्डल-सा सीचे यह
खयाल करके कि यह मेरे चारा तरफ वज्रमय काट है ।
मगलाण च मयमि-शिखादि सवत प्रखातिका ।
यह पढकर यह पयाल कर कि कोट के परे खाई है।
११२
- पटम बइ मगल-प्राकारोपरि उज्रमपटकरिणकम् । इति महारक्षा-मपिद्रवविद्राचिगी। यह, पटकर वह जो चारा नरफ कुण्ड नी खीचकर वज्रमय कोट ग्चा ह उमके ऊपर चारो तरफ चुटकी बजाव । दमका मतलब है कि जा उपद्रव करन वाले है वे मा चन जाव । में बज्रमयी कोट के अन्दर व वशिला पर बैठा है । टम र बामन्त्र के जपने से जाप करते हुए के ध्यान में माप, शेर, पिन्छ व्यन्तर, दव, देवी आदि कोई भी विघ्न नहीं कर सकते। मन्त्र सिद्ध करने के नमन जा दव-दवी दगवना रूप धारण कर आवगा तो भी उस वज़मया काट के अन्दर नहीं आ सकेगा। अगर पर वगैरह पाम से गुजरेगा ना भी आप तो उम देख मकेंगे किन्तु वह जप करने वाले को मायामय वज़ काट की पोट होने से नहीं देस सगा । जपने वाले का अगर कोई तीर-तलवार वगैरह से घात करेगा तो उस स्थान का रक्षक दव उमको वही कील देगा। वह इस रक्षामन्त्र को जपने वाले का घात नहीं कर सकेगा। अनेक मुनि- नावका के घातक दम रक्षामन्त्र के स्मरण से कीले गये हैं, और उनकी रक्षा हुई है। नोट-जो बगैर रक्षामन्त्र के मन्त्र सिद्ध करने बैठने हैं वे या तो त्र्यन्तरो ग्रादि की विक्रिया मे डर कर मन्त्र जपना छोड़ देते है या मागत हो जाते है । इसलिए मन माधन करने से पहले रक्षा का मन जप नेना चाहिए। इस मन्त्र मे हाथ फेरने की क्रिया मिर्फ गृहस्थ के पास्त है । मुनि के तो मन मे ही सकल्प होता है। द्वितीय रनामन्त्र ॐ रणमो अरहतारण ह्रा हृदय रक्ष रक्ष हु फट् स्वाहा ॐ णमो सिद्धाण ह्री शिरो रक्ष रक्ष हु फट् स्वाहा
।
ॐ णमो प्राररिपाण ह्र शिक्षा रक्ष रक्ष हु पट् स्वाहा
ॐ रामा उवज्भायारग ह एहि पहि भगति वजयवच वजिशि
रक्ष राहु पट म्वाहा।
ॐ गणमा लाग विमाहरण है भित्र मापय माधय वजहस्त
शूलिनि, दुष्टान् रस रभ हु पर न्या।।
जब कभी अचारव अपन पर उपद्रव या नाए, सात-पात,
सफर म जाते, मोते वठा ता माग्न "म मन ग स्मग्गा कर, रह
मन्न बार वार पढना गुरु र । मय उपदर नष्ट हो जाव, उपनग
दूर हो, यतरे से जान मात पत्र ।
तृतीय रत्नामन्त्र
ॐ गमा अग्हतागा गमो मिद्वारण, रणमो पायरियारण, गमो
उवज्नायाग, एमा नाग मध्यसाहूण । एसो पच मायारो सन्ध
पावप्पणामगा । मगलाग च स पनि पटम हवइ मगलम् ।
ॐ ह्रीं ह्र फट म्वाहा।
चतुर्थ रनामन्त्र
ॐ रणमो अरहताण नाभी-यह पद नाभि म धारिए
ॐ मा सिद्धाण दि --यह पद हृदय में धारिए
ॐ णमो पायरियारण कण्ठे-यह पद कण्ठ म धागिा
ॐ णमो उवज्भायाण मुसे-~~यह पद मुख म धारिए
ॐ णमो लोए सव्वसाहूण मस्तक-यह पद मस्तक में धारिए
सर्वांगे मा रक्ष रक्ष हिल हिल मातगिनि स्वाहा
यह भी रक्षामत्र ह । जो अङ्ग जिमके सम्मुस लिया है, वह
मन का चरण पटकर उस अङ्ग का मन मे चिन्तवन करे जैसे वह
न सङ्गम रखा हो ऐमा समझे। यह मन्त्र इस प्रकार १०८ बार
पट, रक्षा होगी।
रोगनिवारण मन्त्र
ॐ गमो अरहताण, गमो मिद्धारण, गगमो पायरियाण, रामो
बग्भायाग, णमो लोए मव्वमाहूरग ।
ॐ रणमो भगवदी मुहदे वयाणवारसग एव यण । जगणीये
सरस्मह ए सव्ववाइणि मवरगवगे।
ॐ अवतर अवतर देवी मम शरीर प्रविश पुछ तस्स पविस सत्व
जगमय हरीये।
अग्हत सिरि सिरिए स्वाहा ।
यह मन्त्र १०८ वार लिखकर रोगी के हाथ मे रखे, सर्व रोग
जाए।
मस्तक का दर्द
दूर
करने का मन्त्र
ॐ रणमो अरहताण, ॐ गणमो मिद्धारण, ॐ गणमो पायरियाण
ॐामो उवज्झायाण, ॐ णमो लोए सव्वमाहूण ।
ॐ रामो णाणाय ॐ णमो दसरणाय ॐ णमो चरिताय ॐ ह्री
लोग्यवश्यकरी ह्री स्वाहा ।
विधिक कटोरी में जल कर यह मन्त्र उम जल पर पढकर
उस जल को जिसके मस्तक मे पीडा हो, मावागीशी हो उसे पिलाने
ना उमके मस्तक के मवरोग जाये।
ताप निवारण मन्त्र
ॐ ह्री णमो लोए सव्वताहूण ।
ॐ ह्री णमो उवज्भायारण ।
। ॐ ह्री गगमा पायरियारण- ही गमा मिद्वाग। ॐ ही मामा अरहतारग । जब । मन्त्र पढे पाचवे चरग के अन्त मे "ऐ ह्री" पढता जाव एर सफेद गुद्र चहर नेकर उसके घर कान पर यह मन्त्र पढता जाव पार गाठ दन का नम्ह कोग का माढता जावे, १०८ बार उस कार पर मात्र पढकर उसम गाठ देव वह चद्दर रागी को उढा दर। गाट शिरतो तरफ रह गिी ना पार उतर जिसका दूमर या चाथे दिन वुमार शाता है । इनसे हर प्रना का बुखार जाता है । जब तक बुखार न हटे, रोगी इस चद्दर का प्रार बन्दावाना निवारण मन्त्र ॐ गामो अरहतारग जम्रा नम । ॐ गामो मिद्वारण इम्टा नम । ॐ गमा पायरियागा स्म्ल्या" नम । ॐ णमो उवज्झायाग म्यानम । ॐ गगमो नोए मव्यमाहूग्ग म्ल्या नम । (यहा नाम लकर) अमुकस्य वदिमाक्ष कुरु कुरु स्वाहा । यह प्रयोग है-जिस क्मिी का काई कुटुम्बी या रिश्तदार या मित्र हवालात म हा जाव उमके वास्त उमका कुटुम्बो यह प्रयोग करे, एक पाठा कागज पर पी पाश्वनाथ जी की प्रतिमा माडकर (लिखकर) पाच सो फूल लकर यह मत्र पढता जाव । पोर एक फूल उसके ऊपर चढाता जाव। और उस पर जहा फूल चाया उस पार्ट पर ही अगुली ठोकता जान, ऐमे १०० बार मन्त्र पढ । अमुक की जगह मन्त्र मे उसका नाम लिया पर जिसे बन्दीवान मे रखा हुमा है है। इधर ता यह कार्यवाही करे, उधर उनकी अपील वगैरह जैसी कायवाही कानून की हो मो करे । बन्दीखान मे मे कैद से फौरन छुटे। यह मन्त्र उस पाठे पर चिनाम की प्रतिमा के मम्मुख खडे होकर पढे और खडा होकर ही फूल चढावे, मर काम खडा होकर ही करे, इससे बन्दी मुक्त होय, स्वप्न मे शुभाशुभ हि । नोट-यह क्रिया ग्रहस्थ के वास्न ह मुनि के वास्ते इसके स्मरण मान से ही वन्दीखाना दर हो, अपन प्राप ही बन्दीखाने के किवाड धुलें पार जजीर टूटे। वन्दीखाना निवारण द्वितीय मन्त्र एहसाबसएलो मोरण। गयाज्झावउ मोण। रण्यारिइया मोरण। गद्धासि मोण । एताहरन मोग। विधि-चौथ, चौदश या शनिश्चर को एल की चुटको लेकर मन्त्र पढता हुअा तीन बार फ क कर जिस पर डाले मो वश मे हाय । यह मन्त्र नवकारमन्त्र क ३५ अक्षर उल्टे लिसने मे बनता है, जब ममय मिले और जितनी देर कर सके, इस मन्त्र का जाप करे। नित्य सात दिन तथा ग्यारह दिन तथा २१ दिन तक जपे, अगर हो सके तो इम- का सवालक्ष जप करे । इससे अधिक जितने हो सके करे, तो तुरन्त ही दी छूट जावे, कैद मे हा वह तो यह मन्त्र जपे और उसके हित- पग्विारी अदालत म मुकदमा की अपील वगैरह करे तो तुरन्त इट। , 4 4T ॐ ह्री रामा यायरियाण- ॐ ह्री गामा मिद्वारग। ॐही गामो अग्हतागण । जव यह मन्त्र पढे पाचवे चरण के अंत मे ५ ला एक सफेद शुद्र चद्दर कर उमके IT कान पर यह म पार गाठ देन कातर कारण का माटता नाव, १०८ पर मन्त्र पढवर उमम गाठ दर्व वह चद्दर रागी को उट शिर की तरफ रहे गा मा पार गरे जिसको दूसरे या बुसार प्राता है। उस हर प्रया का पार जाता है । जब न हट, रोगी इस चद्दर का मान बन्दाग्बा निवारण मन्त्र ॐ णमो प्ररहताण मय नम । ॐ रणमा मिद्धाग इम्ल्यानम । ॐ मा प्रायरियाग स्म्ल्य नम । ॐ णमो उवज्भायाण म् न नम । ॐ गामो लोग मन्त्रमाण मल्ट नम । (यहा नाम लकर) अमुक्स्य वन्दिमाक्ष कुरु कुरु स्वाहा । यह प्रयोग है-जिस किमी का कार्द कुटुम्बी या रिश्तदार या मित्र हवालात मे हा आवे उसके वास्त उसका कुटुम्बी यह प्रयाग करे, एक पाठा कागज पर थी पाश्वनाथ जी की प्रतिमा माडकर (लिखकर) पाच सो कून लकर यह मन्त्र पढता जाव । और एक फूल उसके ऊपर चढाता जाव। और उस पर जहा फूल चाया उस पाटे पर ही अगुली ठाक्ता जार, एम ५०० बार मन्त्र पढे । अमुक की जगह मन्न मे उसका नाम लिया पर जिसे वन्दीसान म रमा हुना 'मानन में मुकदमा की अपील वगैरह करे है। इार तो यह कार्यवाही करे, उबर उमको अपील वगैरह जैसी गावाहा कानून की हो सो करे । वन्दीसाने में से कैद से फारन छूटे। पद मन्त्र उस पाठे पर चित्राम की प्रतिमा के सम्मुख खडे होकर पढे व बडा होकर ही फूल चढावे, सब काम खडा होकर ही करे, इससे ग्दा मुक्त होय, स्वप्न मे शुभाशुभ कहे। नाद-~~-यह क्रिया ग्रहस्थ के वास्त है, मुनि के वास्ते इसके स्मरण सत्र में ही बन्दीखाना दूर हो, अपने आप ही वन्दीखाने के किवाड से और जजीर टूटे। वन्दीखाना निवारण द्वितीय मन्त्र हसावमएलो मोग। स्याभावउ मोग। अयारिदया मोग। ससानि मोग। माहरण मोग। विधि-चाथ, चोदश या शनिश्चर को वूल की चुटको लेकर मन्त्र अ अ नान वार फ क कर जिम पर टाले मो वश मे होय । यह कारमन्त्र के ३५ अक्षर उल्टे लिखने मे बनता है, जब समय पर जितनी देर कर सके, इस मन्त्र का जाप करे। नित्य सात पारह दिन तथा २१ दिन तक जपे, अगर हो सके तो इस- सा जप कर । इमसे अधिक जितने हो सके करे, तो तुरन्त ही 1 गाव, कैद म हो वह तो यह मन्त्र जपे और उसमे हित- तो
।
सतावे तो यह मन । २८ वार मुठी वाध पढार उम माडे ।
सुबह शाम दाना समय मादा कर ना भूतादिक जार, पाना
ती अच्छे हो जावें।
नोट--इस मन्य क नीच क च ण म ही दुष्टान ठ ठ ठ में
दुष्टान् त स्थान पर दुम्मन का नाम जाना हा जाने या भूतादिक
कहे।
पादनीतन मन्त्र
ॐ ह स ॐ ग्रह मा अमि प्रा-3 मा नम ।
पहने यह मन्त्र पढकर लभ या मवा लभ जप मिद्ध कर र,
फिर जहा वादविवाद म जाना हा वहा यह मन्ध २१ पार पढ़कर
जाव तो वादविवाद म पार जीन जय पान ।
विद्याप्राप्ति पादजीतन मन्त्र
ॐ ह्री असि-प्रा मा नमा ग्रह वादिनि सत्यवादिनि वाग्वा-
दिनि वद वद मम वस्ने व्यक्तवाच या मत्य-यहि सत्य – हि मत्य वद
सत्य वद अस्पतितप्रचार गदैव मनुजा सुरमदनि ह्री अम ह असि
पा-उमा नम।
विधि----यह मा एक लक्ष बार जपिए ता सव विद्या यावे और
जहा वादविवाद करना पड़ जाए तो वहा वाद के झगडे में पोल ऊपर
हाय, जीत पाये।
परदेश लाभ मन्त्र
ॐ णमो अरहताण ॐ रणमो भगवइए चदायई एस तछाए गिर
मोर मोर हुलु हुलु तुलु चुलु मयूग्वाहिनिए म्वाहा ।
जब किसी परदेश में रोजगार के वास्ते धन प्राप्ति के लिए जावे
तो पहले श्रीपार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा के मामने यह मन्य दस
१२०
। नाट- हजार जप । फिर श्रेष्ठ मुहत मे गमन करे। जिस दिन जिस समय गमन करन लगे इम मन्न को १०८ बार जपे। जव उस नगर मे पहुँच तो यह मन्त्र १०८ पार जपे। जिस नगर मे जावे गेजगार करे, लाभ हो। महान् धन मिले । -जिम नगर मे जाव राजगार के लिए, वहा मगलवार के दिन प्रवेश न करे। मगल के दिन प्रवेश करे तो हानि हो। घर की पूजी सोकर कजदार हो दिवाला निकाले, काम वन्द हो । शुभाशुभ कहन मन्त्र, वाग्बल मन्त्र ॐ ह्री अहँ ह्री क्ष्वी नम स्वाहा । किसी मुकदमे मे या फिर किमी फिकर मे या अन्देशे मे या वीमारी मे, रात में सार मस्तक पर चन्दन लगाकर चन्दन के सूख जाने के बाद १०८ वार यह मन्त्र पढकर सो जावे। जैसा कुछ होनहार होगा स्वप्न द्वारा मालूम होगा। वृहस्पति स ११००० जाप करे। मन-चिन्ता-कार्य-सिद्धि मन्त्र ॐ ह्रा ह्री ह. ह्रौ ह्र अ-सि-पा-उ-मा नम स्वाहा । विधि-इस मन्त्र से मन-चिन्ता काय सिद्ध होय । अर्थात् जब यह मन्त्र जपे ग्रागे धूप जलाकर रख ले । जिस काय की सिद्धि के वास्ते - जप, मन में उसे रखे कि फलाने काय की सिद्धि के वास्ते यह जपता हूँ। यदि काट उम मन्त्र का सवा लाख जप कर तो मनचिन्ते कार्य होय, मर काय की सिद्धि होवे। - दव्यप्राप्ति मन्त्र अरहन मिद्ध पाइरिय उवज्झाय सव्व माहूरण ।
. विधि--इस मय का सवा लाख जप विधिपूर्वक करे तो द्रव्य- प्राप्ति हो। लक्ष्मी प्राप्ति यशकरण, रोग निवारण मन्त्र ॐ गमो अरहताग, ॐ णमा सिद्धाण, ॐ रणमा प्रायरियाण, ॐ गामो उवज्भायाग्ग, ॐ रगमो लोए सत्वमाहूण । ॐ ह्रा ह्री ह. ह्रो ह्र नम म्वाहा। विवि-दम मात्र का जप करन म लक्ष्मी वये (वृद्धि का प्राप्त हा) लोक मे या हो, म प्रकार के रोग जाए । नोट-~~-मवालक्ष जप विधिपूवर जपने से कार्य पूण सिद्ध होता है। फिर जिम मयादा से जपगा उतनी मदद देगा। सर्व सिद्वि मन्त्र ॐ असिना उ-मा नम । विधि-~-इस महामन्त्र का मवालक्ष जप करने से सबकाय मिद्धि होती है। द्रव्य लाभ, सर्वसिद्धिदायक मन्त्र ॐ अरहताण सिद्धाण प्रायग्यिारण उवज्झायारण साहूण मम रिद्धि वृद्धि समीहित कुर कुर स्वाहा । विधि ---स्नान करन के पश्चात् पवित्र हाकर प्रभात मध्यान्ह अपराल तीना समय इस मन का जाप करे । द्रव्यलाभ हो, सव सिद्वि हो । नोट-२१ दिन तक तीना ममय के सामायिक के वक्त निभय होकर दा-दो घडी जाप्य कर । १२२ पुत्र-सम्पदा प्राप्ति मन्त्र ॐ ह्री श्री ही (ह) क्ली अ-सि-पा-उ-सा चुलु चुलु हुलु हुलु मुलु मुलु (घुलु घुल कुलु कुलु सुलु मुलु) इच्छिय (अक्षत) मे कुरु कुरु स्वाहा । निभुवनस्वामिनी विद्या। विधि---जव यह मन्त्र जपने वैठे तो अागे उप जलाकर रख लेवे, और ये मन्त्र २४ हजार फूलो पर एक फूल पर एक मन्त्र जपता जावे। इस प्रकार पूरा जपे। घर मे पुत्र की प्राप्ति हो और चश चले। नोट-वन, दौनत, स्त्री, पुन, मकान, सर्वसम्पदा की प्राप्ति इस मन्न के जाप से होवे। राजा तथा हाकिम वशीकरण मन्त्र ॐ ह्री रामो अग्हन्ताण | ॐ ह्री ग्गमा सिद्धाग । ही गमो पायरियारण। ॐ ही गमो उवज्झायाए । ॐ ह्री गमो नाए मध्य- साहूए । अमुक मम वश्य कुरु कुरु म्वाहा । विधि-जव किमी राजा या हाकिम या बड़े आदमी को अपन वश में करना हो तो याने अमुक मेरे पर किमी तरह मेहरबान हो तो शिर पर पगडी वा दुपट्टा जो वापता हो यह मन्न २१ बार पढकर उसके पल्ने में गाठ देवे । जव मन्द पटना गुरु कर, तर पला हाथ में वे २१ बार यह मन्त्र पढ़कर गाठ दे। मिर पर उम वल्ल को पाप कर उसके पाम जावे ना वह मेहमानो कर, मित्र हो । जव मन अमुक को जगह उसका नाम नेवे । राजा प्रजा विश्यम् । वशीकरण मन्त्र ॐही रामो अरहतारण । अर(प्रा}ि ग्रर (रि मोमा
अमुक मोह्य मोह्य म्वाहा।
विधि-
प-इस मन्त्र स चावल तथा फूल पर मन्त्र पढकर जिसके
शिर पर रये यह वश मे हा ।
१०८ वार स्मरण करन से लाभ
होता है।
सर्पभय निवारण मन्त्र
ॐ ग्रह प्रसि-या-उ मा अनाहतजयि मह नम ।
विवि--यह मन नित्य प्रति टक ३ गुणीजे । वार १०८ दिवाली
दिन गुणीजे । जीवनपयन्त मपभय न हो ।
दुष्ट निवारण मन्त्र
ॐ अह अमुक दुष्ट माधय माधय असि-या-उ-मा नम ।
विधि-इस मन को २१ दिन तक जप १०८ वार शत्रु ऊपर
पढे, क्षय होय।
लक्ष्मी लाभारावन मन्त्र
ॐ ह्री हू, रामो अरहतास ह. नम ।
विधि--१०८ बार पढे लक्ष्मी लाभ हो ।
रोगापहार मन्त्र
ॐ णमो मवा सहि पत्तागण ।
ॐ रामो खेतो महि पत्ताण ।
ॐ रणमा सल्ला महि पत्तारण ।
ॐ णमो मव्वो महि पत्तारण स्वाहा ।
ॐ ऐं ह्री श्री क्ली क्ला ग्रह नम ।
विधि--१०८ बार पढ, मवराग जाय ।
१२४
विधि--२५० दिन अलूरगा भोजन काजी मता कन। २४९
वार मन्त्र पढ़ वक्त के ऊपर याद करे । प्राकारागमन होग।
ॐ णमो उवज्झायारण ॐ गमो लोए म बनाता
ॐ णमो भगवीय मु प्रदेवयानरमा पन जननीयन जननी
यस्य स्सइ येसववाईनेसवनेप्रवत्तर प्रवत्तर नसर्गर पवित्तग्न
विधि--ये मन्न वार १०८ पडा मनाहाराविजे ।
व्यापारे लाभ व जमात मन्त्र
ॐ ह्री श्री अह अ-सि-या-उन्मा अदय
त्रणादिकनाशन मन्त्र
ॐ णमो जिणारण जावियाण ! यूसोणि अ (अ) एस (ए)
ण (गण) वरण (मक्ववाराणवण) मा पच्चत्त मा फुट (यउघउमाफुट)
ॐठ ठ ठ स्वाहा।
विधि--रास पढकर व्रणादिक पर लगाव, नमाप्ति हो ।
आकाशगमन मन्त्र
ॐ गमो अागासगमरिणज्जो स्वाहा ।
आकाशगमन द्वितीय मन्त्र
ॐ रणमो अरहतारण ॐ णमो मिहाल
जनम पहरये अर्हन्तशरीर स्वाहा ।
देखिजे ।
येको
मह नम
विवि-यह मन्त्र दिन मे ३ वार
व्यापार मे लाभ हा, सवन जय पाये।
Tमा ग्रायरियागा
१०६ वार
1
चौर दिग्वाई न देने अर्थात् चोरभयनाशने का मन्त्र
ॐ रगमा अरहताण ग्राभिणी माहणी मोहय माह्य म्वाहा ।
विधि-२१ वार म्मरण कर गाय म प्रग करत हुए । अभिमन्न
क्षारवृक्षा हयन लाभा रास्त म जात हा। इस मन्त्र का स्मरण
करन स चार का दशन भी नहीं होता।
वाहितार्थ पन मिद्विकारक मन्त्र
ॐ ह्री असि-या-उ-मा सम । (महामन्त्र)
अ-सिया उ-सा नम ।
(मूलमन्त्र)
ॐ ह्री ग्रहत उत्पत उत्पत स्वाहा । (त्रिभुवनस्वामिनि)
विवि--स्मरण करने से वाछिताय मिद्ध होता है।
GOV
देव दत्त
khel
है
ह
(वन्दीमाक्षार्थ वश्याथ च य अम्)
१२८
विधि-निकाल १०८ बार जपने में विश्व काना है। नवग्रह अरिष्ट निवारक जाप सूर्य मगल ही गमो मिद्धारण । चन्द्रमा-शुक्र- ~ॐ ह्री णमो अरहताण। दुव-वृहस्पति-~ॐ ह्री णमो उवज्मायाए । गनि-राहु-केतु-ॐ ह्री णमो लोए मव्वसाहूण । प्रत्येक ग्रह की शान्ति के लिए उपरोक्त मन्त्र के दस बार बार करन चाहिए । और सवग्रहो की शान्ति के लिए के हो वीजाला पहले लगाकर पच नमस्कार मन्त्र के दम हजार जप करन चाहिए। एते पचपरमेष्ठिमहामन्त्रप्रयोगा ॐ नमो अन्हित नगवत वाद- बलिस्स पण्हसवणस्स मलेणिम्मल नाणपयामेणि ॐ गर्ग न भासइ अग्हिा मव्व भासइ केवली एण्ण सव्ववयगेण नवनवनामें स्वाहा । प्रात्मान शुचि कृत्य वाहुयुग्म सम्पूज्य कायोत्सर्ग वक्ति। इति ॐ गमो अरहताण हा स्वाहा । ॐ गणमो सिद्धाण ही स्वाहा । ॐ णमो पाइरियारण ह्र स्वाहा । ॐ णमो उवज्झायाण हा म्वाहा । ॐ गमो लोए सव्वमाहूण ह्र स्वाहा । विधि-~-सुगन्धित फूलो से १०८ बार जप कर IT कपड़े में फोडा-फुन्सी पर घेरा देने से तथा गले में पहनन म काटा न पक कर बैठ जाता है। ॐवार सुवरे अ-सि-ग्रा-उ-सा नम । - जाप्य मन्त्र यावश्यक नोट-माला, रजा दान दाने होत
पतिम जो इन तोना म स है उससे जप आरम्भ करो। जपत हुए
अलर चन जायो । जव मार १०८ जप चुको तव उन प्रासिर के तीन
दाना का माला क अन्त म भी जपते हुए उमी आखिर के दान पर
प्रायो। जिसमें माला जपनी शुरू की थी। यह एक माला हुई।
उन तीना दाना क बार में किसी प्राचार्य का मत एसा भी
है यि तीन दान रत्नत्रय के सूचक है। इसलिए इन तीना दाना
पर सम्यग्दशन नानचारिलाय नम एसा मन्त्र पढकर माला समाप्त
(ग) करनी चाहिए।
प्रथम म --ॐ गगमो अरहताण, णमो सिद्धाण, गमो
ग्राइरियाण, गमो उवज्झायाग, णमो लोए मव्वसाहूण ।
दसरा मन-सरहत सिद्ध आइरिया उवज्झाया साहू ।
तीसरा मन्त्र-अरन्त मिद्ध ।
चौथा मन्त्र--ॐ ह्री अमि ग्रा-उ-सा ।
पाचवा मन-ॐ नम मिद्वेभ्य ।
छठा मन्त्र---ॐ ह्री।
सातवा मन्त्र--ॐ।
अनादिनिधन मन्त्र--ॐ रगमो अरहताण, णमो मिद्धाण, णमो
पाइरियाण, रामो उवज्झायाण, णमो लोए सव्वसाहूए ।
चत्तारि मगल-अरहता मगन, सिद्धा मगल, साहू मगन,
केवलिपण्णत्तो धम्मो मगल ।
चत्तारि लोगुत्तमा-अरहता लागुत्तमा, सिद्धा लागुत्तमा, साहू
लोगुत्तमा, पेवलि पण्णत्तो धम्मो लागुत्तमो।
चत्तारि मरण पव्वज्जामि--अरहत सरण पव्वज्जामि, सिद्धे
सरण पव्वज्जामि, माहू मरण पव्वज्जामि, केवलिपण्णत्त धम्म सरण
पव्वज्जामि । ह्रौ सवशान्ति कुरु कुरु स्वाहा ।
१०८ जाप्यम्
भू ॐ सत्य ॐ स्व ॐ मह ॐ जन ॐ तप ॐ सत्य ।
ॐ भूर्भुव स्व अ-सि-पा-उ सा नम मम ऋद्धि वृद्धि कुरु-कुरु स्वाहा ।
ॐ नमो अभ्य स्वाहा, ॐ सिद्धेभ्य स्वाहा, ॐ सूर्येभ्य स्वाहा ।
ॐ पाठकेभ्य स्वाहा । ॐ सवसाधुभ्य स्वाहा । ॐ ह्रा ह्री ह्र
ह्रो ह्र अ-सि-पा-उ-सा नम स्वाहा । मम मवशान्ति कुरु कुरु स्वाहा ।
अरह्त प्रमाण सम करोमि स्वाहा ।
ॐ गमो अरहताण, रणमो सिद्धाण, णमो पाइरियाग, णमो
उवमायाण, एमो लोए सव्वसाहूण ह्रौ शाति कुरु कुरु स्वाहा (नम)
ॐ ह्री श्री अ-सि-या-उ-सा अनाहतविद्यायै णमो अरहताण ह्री नम !
ॐ ह्रा ही है. ह्रो ह्र स्वाहा ।
ॐ ह्री अरहत सिद्ध आचार्य उपाध्याय साधुभ्य नम ।
ॐ ह्रा ह्रीस्वाहा।
विधि-१०८ वार पढकर छाती को छीट दवे ।
ॐ ह्री ग्रह नम । या ॐ ह्री श्री ग्रह नम ।
सूर्य मन्त्र का खुलासा
किसी काम के लिए ८००० जाप करने से फारन काम होता है।
खास कर कैद वगैरा के मामले में आजमाया हुआ है।
ॐ ह्री अह णमो सम्बोसहिपत्तारण ।
ॐ ह्री अहँ गमो खिप्पोसहिपत्ताण ।
विधि-दोनो मे से कोई एक ऋद्धि रोज जपे। मवकार्य सिद्ध हो ।
ॐ ह्री क्ली श्री ऐ को ह्री गामो अरहताण नम
ॐ ह्री अर्ह मो अरहताण णमो जिणाण ह्रां ह्रीं ह्र हा ह
अ-सि-पा-उ-सा अप्रतिचक्ने
विपट विचक्राय झा झी स्वाहा ।
ॐ ह्री अहं णमो चरणाण । ॐ था श्री श्रू थ ठ ठ स्वाहा ।
विधि -इस मन्त्र की नित्य १ माला जपे तो दलाली घनी होय ।
धन घना होवे । राजद्वार जो. दुश्मन भूठा पडे, पुत्र की प्राप्ति
होवे । वदन मे ताकत यावे, परिवार बढे, वुद्धि वढे,
,
बटे, जहा जाव तहा प्रादर सम्मान पाव । म् ठ कर तो भी नजोक न
श्राव, जाप करे जितने वार धूप सेवे, पनामन होकर करना । नामात्र
दृष्टि गाकर जाप करना चाहिए।
शान्ति मन्त्र
ॐ रणमा अरहताण केवलिपण्णत्तो धम्मो मरण पध्वजामि ही
शान्ति कुरु कुरु स्वाहा । श्री अहं नम ।
(१) विजीरा अथवा नारियल १०८ बार इस मन स म कर
वहत्तर दिना तक वघ्या का पिनाव तो पुय हो ।
(२) नय कपडे मन्त्र से मय वर रोगी को उढाय ता दापज्वर
जाय।
ॐ सिद्धेभ्यो बुद्धभ्यो सिद्धिदायकेभ्यो नम ।
विधि -~-जाप १०८ अष्टमी चतुदशी को पढकर तप देना ।
वापा दुलीचन्दजी कृत मन्त्र
ॐ ह्री णमो सिद्धाण, णमो अहन्ताण, णमा प्राचार्याण ।
णमो उवज्झायाण । णमो साहूण, णमो धर्मभ्या नम । ॐ ही
णमो ग्रहन्ताण आरे अभिनि मोहिनी मोहय मोह्य स्वाहा ।
विधि-नित्य १०८ जपे । ग्रामप्रवरो कवर ७ मन्न २१ क्षीरवृक्ष
हन्यते लाभा भवति । प्रथम मन्य जप दीप धूप में सिद्ध करना । पीछ
अपने काम म लावना ।
सवशान्ति मन्त्र
ॐ ह्रा ही हू, ह्रां ह्र अमि-प्रा-उ-सा सवशाति तुष्टि पुष्टि
कुरु कुरु स्वाहा । ॐ ह्री ग्रह नम । क्ली सर्वारोग्य कुरु कुरु स्वाहा ।
विधि-१०८ बार जाप गुरुवार से प्रारम्भ कर । पूर्वदिशा को
मुख करके बैठे। वप से प्रारम्भ कर ११००० जाप कर ।
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समाप्त
M 'Hospital Bill. ent HP docs flay vi the discussions with GNLF Pres them the details of the HEU Counai ruld let him know the details ta Minister Mr Basu would explait in Siligun on the request of nded in its talks with the Centre dhum of the areas the GNLFhad had postponed the band call y elephoned him yesterday and in gun to the Hit Counal The Basus said that Mr Buta Singh tion to the inclusion of arcas was winter go on for everMQU s raped puseys r Serin-cppose badhibers tiram atening the Speaker in bus chamber their yesterday was passed by the Assem bly overlooking the Opposition profest Ht Today was the last day of the mon Soon session and as the question hour Com commenced the Opposition leader Krel Karunakaran and others from the Opposition front stood up wanting to rarsc an issue of utmost importance But the Speaker took the firm stand T that nothing could be permitted to be raised during the question bour The wou Opposition attempt was to refer to a reported statement of the Speaker that cd some Opposition members threatened kun n his chamber yesterday after he ber referred to the Privilege Commuteca issue of prinlcges against Mr KM Man leader of the Kerala Congres& M group in the Assembly As the Speaker stuck to his stand the for Opposition members began thumping theu desks and raised slogans deman ding that the Speaker do justice Before the Speaker announced the adjournment of the House sinc dic Chief Minister EK Nayanar on being called moved a ceasure motion condemning the threatening" of the Speaker by Opposition members led by Ms KM Mani and Mr P Seethu Hajce (Muslim League) The House adopted the mouon amidst the din Teacheddiw Ordere cest increase in electraty tanill add og the Sarkana Commission report did not come off because of the abrupt in 1} adjournmeot Mr K Kan nakaran Mr Mani and.. 2 1 member of the Planning Com available the requirements and the raw material to the Planning Commis- hil areas of the State keeping in View wl scrutinise it before its be formulated for the cast west and Meister and the industnes de Hence three sub sectoral plaas would od of three months Lates the plan for the State did not suffice will submut its report within been observed that a homogenous members of the Government view the vast size of the State it has Mr Hussain said that keeping in expen industrialists sts