Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Garur Kisane Dekha Hai

Shrikanta Verma · 2011/03

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गरुड किसने देखा है -- राजकमल प्रकारान नयी दिल्ली परना

गरुड़
किसने
देखा है
श्रीकान्त वर्मा

मूल्य रु 3500
वीणा वर्मा
प्रपम सस्करण 1987
प्रकाशक राजकमल प्रकाशन प्राइवट लिमिटेड
1 बी नेताजी सुभाष मार्ग नयी दिल्ली-110002
टाइप-सैटिंग फोटो टाइप डिवीजन
राजकमल प्रकाशन प्रा नि
एफ-5 सैक्टर-नौएडा-201301
मुरक महरा आफ्सैट प्रम
नयी दिल्ली
आवरण चचल

सग्रह के बारे में 'गरुड किसने देखा है श्रीकान्तजी का छठा काव्य-संग्रह है जो उनके स्वर्गीय होन के लगभग एक वर्ष बाद प्रकाशित हो रहा है। इस सग्रह की कुछ कविताएँ हिन्दी की कुछ प्रमुख पत्रिकाओं में पहन्न प्रकाशित हो चुकी है। परन्तु अनेक कविताएँ ऐसी है जा यहॉ पहली बार प्रकाशित हो रही हैं । रचनाकाल की दृष्टि से इस सग्रह की कुछ कविताएँ 'मगध के आसपास की हो सकती हैं परन्तु बहुत-सी ऐसी है जो निश्चित रूप से 'मगध के बाद की है। अपने जीवन के अन्तिम दिनों में श्रीकान्तजी लगातार अपने अगले काव्य-सग्रह के बारे में सोचते रहे थे। परन्तु साथ ही एक दबी हुई आशका भी उन्हें निरन्तर मथ रही थी जिसका हल्का-सा आभास उनकी उस छोटी-सी टिप्पणी में मिल सकता है जो इस सग्रह की अब मगध नहीं होगा शीर्पक कविता के आरम्भ में दी गयी है। इस संग्रह में कुछ कविताएँ एसी भी दी जा रही हैं जो मूलत कवि की डायरी से ली गयी है। बीच-बीच व डायरी लिखते रहते थे और कई बार डायरी के बीच में ही मानों कविताएँ फूट पडती थीं । सृजनात्मक बेचैनी क ऐसे काव्यात्मक अश उनके अन्तिम दिनों की डायरी के पृष्ठों में बिखरे पड़े हैं। इसीलिए यह उचित जान पडा है कि कविताओं के साथ-साथ कवि की डायरी के कुछ हिस्से भी द दिये जायें। यह इसलिए भी आवश्यक लगा कि डायरी में व्यक्त मनोभावों के साथ इस सग्रह की कविताओं का मूल स्वर कहीं-न-कहीं मिलता है। साथ ही डायरी क कुछ पृष्ठों को पढकर कवि की उस पीडा और मानसिक उथल-पुथल का भी अन्दाज लगाया जा सकता है जिसके बीच इस सग्रह की अधिकाश कविताएँ रची गयी थी। -वीणा वर्मा

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क्रम विदेह अश्वघोष 43 12 14 45 कविताएँ बतकही नियति मौत से डरो बहिर्गमन गरुड मृत्यु जिसे आना चाहिए था छीनाझपटी पितामह अरुण इत्यादि माया नींद 15 17 18 48 51 53 55 57 19 21 59 23 24 61 26 63 डायरी का पन्ना-1 पेरिस में स्त्रियाँ लन्दन से क्या वास्ता डायरी का पन्ना-2 सुन्दरता से साक्षात्कार किसे पुकारूँगा डायरी का पन्ना-3 मुझे क्षमा करो काशी के पण्डित गान्धार मगध में सन्नाटा मणिकर्णिका के नीचे मणिकर्णिका मिलेगी अब मगध नहीं होगा शिव जो स्मरण आते है शिव जो स्मरण नहीं आते डायरी का पन्ना-4 इन्द्रजाल e8 30 31 65 66 68 33 34 7D मुक्तिबोध की मृत्यु इस तरह नगर की नींव पड़ी यहीं आनन्द कन्नौज में क्या नहीं अवन्ती है अवन्ती रहगी तृष्णा तक्षशिला गगा स्मृति का पर्याय अश्वत्थामा 72 36 38 39 75 40 77 41 79 42 डायरी के कुछ पन्ने 81

一
-
--

कविताएँ

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बतकही
वैसे तो यह केवल बतकही है
तब भी यह सच है
कि उसने अपनी जिन्दगी गुजार दी सोचते-सोचते
क्या गलत है क्या सही है।
हजार मारा हाथ-पैर, उबर ही नहीं पाया।
उसने अपना जीवन गँवाया-
औरों ने कमाया।
भाइयो, हमारे ही जमाने में यह हुआ,
दुन्दुभि बजाता हुआ
(निकला तो निकल ही गया-
निर्भय,
नि शक, निर्विकार)।
1984
गरुड किसने देखा है। 11

नियति मौत से डरो
(भुनभुनाता हुआ) यह कहता हुआ हत्यारा गया
यह आदमी इस काबिल नहीं था कि मारा जाय
केवल अनिर्णय में मारा गया।
घिधिया सकता था
घिघियाया नहीं-
हथियार उठा सकता था
उठाया नहीं।
कुछ भी बताया नहीं
जिरह भी नहीं की
चुप भी नहीं रहा।
सहमा भी नहीं
ताव भी नहीं खाया।
फकत मारा गया
जाहिल नहीं था
सवाल कर सकता था
नहीं किया
जवाब दे सकता था
12 / गरुड किसने देखा है

नहीं दिया
अपनी जगह से उठ सकता था
नहीं उठा
किसी और की जगह ले सकता था
नहीं लिया
काबिल नहीं था,
इसे मारा ही जाना था।
कोई ऐसे मरता है ?
किसी का इस तरह मरना हत्यारे को
भी अखरता है-
इसलिए भाइयो, जिन-जिनका
नाम रजिस्टर में दर्ज है
उनसे मेरी अर्ज है-
इस तरह मत मरो।
मौत से डरो।
1984
गरुड किसने देखा है। 13

बहिर्गमन
बाहर निकलो, श्रमण बाहर
प्रतिस्पर्धा है,
पुरुष है,
लम्बी कतार है-
-
कतार में
कौन है जो नहीं है?
नन्द है, मुरा है, शकटार है
और चन्द्रगुप्त है
बाहर ससार है
बहरूप है
नगी
कामाख्या है
कामरूप है
पुकार है-
।
अशोक नहीं है, बिम्बिसार है
बाहर निकलो श्रमण बाहर, निकलने का
रास्ता सबको मालूम है
कितना आसान है।
1984
14/ गरुड किसने देखा है

गरुड गरुड के विषय में सिर्फ सुना है गिद्ध को देखा है जो वही है गिद्धराज आओ- गरुड की बाट में आँखें पथरा चुकी । गरुड के विषय में सिर्फ तीन लोग जानते है विष्णु, लक्ष्मी और व्यास चौथा कोई नहीं। (हो तो बतायें) गिद्धराज आओ- गरुड अगर था भी तो वापस नहीं आयेगा। गरुड कभी था ही नहीं गिद्ध था जिन्होंने गिद्ध नहीं देखा गरुड किसने देखा है / 15 उन्हीं के सपनों में गरुड मँडलाता है मँडलाने दो गिद्धराज आओ- गरुड किसने देखा है? 1984 16/ गरुड किसने देखा है

मृत्यु
मृत्यु ने मुझे
मृत्यु के हवाले कर दिया है।
1984
गरुड किसने देखा है /17

जिसे आना चाहिए था
जिसे नहीं आना चाहिए था
आया
पतझड
दोस्तों को देखा
निरीह होते हुए।
जिसे नहीं आना चाहिए था
आया
बैशाख
दोस्तों को देखा
पहाड ठोते हुए।
जिसे आना चाहिए था
नहीं आयी
वर्या
दोस्तों को देखा
रोते हुए।
1984
18/किगन दया!

छीनाझपटी
छीनाझपटी है
किसलिए?
सुनो, भाई, सुनो
तुम्हें कभी नहीं देखा पहले छीनाझपटी में ।
तुम तो सुनो।
क्या चाहते हो?
पाने को सिर्फ कपिलवस्तु ही नहीं है
किसके लिए व्यग्न हो?
विध्याचल पार कभी
दक्षिण गये हो?
लका जल रही है।
उत्तर को लौटो
हस्तिनापुर की विधवाओं का विलाप सुन
छाती फटती है?
श्रावस्ती, उज्जयनी, कौशल
गरुड किसने देखा है 119

या फिर सन्नाटा जिसमें सिर्फ बरगद उगता है,
फैलता है, बूढा होता है-
दाढी पर हाथ फेर,
कपिलवस्तु, कपिलवस्तु जपता है।
मुडकर देखो-
चन्द्रगुप्त गुजर रहा है
बिम्बिसार मृत्यु से डर रहा है
प्रियदर्शी शोक में डूबा हुआ है
स्कन्दगुप्त जय-पराजय
दोनों से ऊबा हुआ है।
सब कुछ
हो
चुका
है
क्या होना चाहते हो?
1984
20/गरुड किमने देखा है

पितामह
पितामह बाणों की शय्या पर पड़े है
कोई नहीं, सिर्फ कुछ
बचे-खुचे खडे है
जो पूछते है,
पितामह क्यों अडे है ?
निर्णय हो चुका, हार चुके युद्ध
अब तो लिखनी भी शुरू कर दी व्यास ने महाभारत
अब किस सोच में पड़े है
व्यास इन्हें समझाओ।
व्यास ने कहीं नहीं कहा
कि हारने के बाद भी पक्ष मत बदलो
हार को स्वीकार करो
कुशासन पर भीष्म की तरह
मृत्यु का इन्तजार करो।
व्यास ने कहीं नहीं कहा
कि युद्ध में सत्य मारा नहीं आता
कहा होगा व्यास ने पर व्यास का
गरुड किसने देखा है 121

कब कहा व्यास ने कि
जो लिखता है महाभारत पक्षधर नहीं होता।
1984
22/ गरुड फिमने देखा है

अरुण इत्यादि
मैं यह समझता था कि कोई नहीं आता
आते है
अरुण इत्यादि
मैं यह समझता था मैं जो करता हूँ
कोई नहीं करता
-करते है
अरुण इत्यादि
मैं यह समझता था मैं ही अभिमन्यु हूँ
और है
अरुण इत्यादि
मैं यह समझता था मैं ही रह गया हूँ
,
अरुण इत्यादि।
1984

माया
माया तू पहले मेरी थी-
उत्तमचन्द अटारीवाला
जिसने सोने के पिंजरे में
मूंगे की चिडिया को पाला
केवल इतना ही कहता है।
वैसे तो वह चुप रहता है
क्या प्रमाण है ? है कोई
जिसने माया को
अमरचन्द के घर देखा है?
घर उत्तमचन्द का है
या माया का घर है?
उत्तमचन्द को इस टण्टे में
घर के बिक जाने का डर है
डर के मारे दुख सहता है
केवल इतना ही कहता है
माया तू पहले मेरी थी।
मान लिया माया उसकी धी
24/गमा हिमने दम

उत्तमचन्द की होने के पहले
किसकी थी?
जिसकी भी हो क्या कहता है
सुनो, उसे देखो
क्या वह भी
उत्तमचन्द-सा दुख सहता है ?
सहता है तो उत्तमचन्द है
अगर नहीं
तो यह उसकी अपनी पसन्द है।
1984
गरुड किमने देखा है 125

नींद
नींद आती है, नींद छा जाती है, नींद खुलती है
नींद के अपने नियम है
नींद को छप्पर की तरह हाथ पर उठाये हुए
रात आती है, रात छा जाती है, रात ढलती है
रात के अपने नियम है।
किसी-किसी को नींद नहीं आती
कोई रात को बुलाता है
एक जागता है
दूसरा सारा दिन भागता है
एक झींकता है
दूसरा चीखता है
एक कहता है नींद हराम है
दूसरा रात का गुलाम है
एक बिस्तर पीट रहा है
दूसरा अपने पैर घसीट रहा है
एक को रात जागने के लिए छोड गयी है
दूसरे को रात टूटने क लिए जोड गयी है
26/गर फिमन दाग है

नींद आती है, नींद छा जाती है, नींद खुलती है
नींद को छप्पर की तरह हाथ पर उगये
रात आती है, रात छा जाती है, रात ढलती है
नींद आँख खुलने पर जवाब माँगती है
रात-भर का दिन-भर का हिसाब माँगती है
नींद को बोला क्या जवाब है
रात को दिन का क्या जवाब है हिसाब है?
नींद आँखों की किरकिरी थी, रात सिरफिरी थी।
नींद को जब नहीं आना चाहिए था आयी, रात परायी
किसी ने नहीं कहा तो हम सही वक्त पर आये
कोई नहीं आया सही वक्त पर
नींद के पलने
रात कितनी जल्दी आती है, रात कितनी देर से
कटती है
नींद कितनी देर से आती है, नींद कितनी जल्दी
जल्दी खुलती है।
1984
गरुड किसने देखा है/27

इन्द्रजाल
मुये मृत्यु ने दबोचा
मुँह दबाये कुछ देर खपरैल-खपरैल चलती रही।
दर्शकों ने सोचा
गवा
मगर तभी
मृत्यु
ने बिना किसी वजह
मुये छोड दिया,
छोडा तो क्या मुँह स गिरा दिया
दर्शकों की करुणा निराशा में बदल गयी
भीड छंटने लगी-
मैन पुकारा
रुको।
मगर फिजून
मैन आवार दी-
अरे भई सुनो।
मगर फिजून।
माफिदी
गुना तो सगा
मानिना

मैंने कहा-
सुनो तो भाइयो मैं अभी
मरा नहीं हूँ
यह वही है कि मृत्यु के मुँह से
बच निकला
पर मरा नहीं है।
मगर फिजूल।
तब मैन कहा,
रुको, अभी खेल खत्म नहीं हुआ है।
दिखाता हूँ-
रुक गये पेर ।
अपने और गैर
दोनों मेरी ओर मुड पड़
मैने कहा
सबको मरना है
यह सुनते ही भीड
मुझ पर झपट पड़ी
समझा, मृत्यु मुझे मरने के लिए
छोड गयी है।
1984
गरुड किसने देखा है /29

मुक्तिबोध की मृत्यु
नहीं भी होती मुक्तिबोध की मृत्यु
तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता
मुक्तिबोध को मरना ही था।
सितम्बर में हुई मुक्तिबोध की मृत्यु
दिसम्बर में होती
ता भी कोई फर्क नहीं पड़ता
मुक्तिबोध का मरना ही था।
वहाँ तक ले आयी थी मृत्यु मुक्तिबोध को
जहाँ तक वह पहुंचे
मुक्तिवाद को मरना ही था।
पृछ रह थे मुक्तिबोध
मृत्यु का पता
मुक्तिवाद को मरना ही था।
मृत्यु मुक्तिवाद के प्रारव्य में थी।
1934
30/frमन

इस तरह नगर की नींव पड़ी
जो कहीं नहीं जा सकते थ वे वहीं रह गये कहो तो
वहीं खप गय
अकेले-दुकेले समूह
में
पर वैसे अकेले-
इस तरह नगर की नींव पड़ी।
नगर में शान्ति है, नगर में सुख है, नगर में
कवल नागरिक है--
जो नगर छोड कहीं नहीं जायेंगे, वहीं खप जायेंगे
अकेले-दुकेले या
समूह
में
पर वेसे अकले
नगर पर किसका कब्जा हा, हमको क्या ?
नगर को लेकर जो भी लड़ रहे हों, हमको क्या?
कुछ भी हो नगर का नाम, हमको क्या ?
नगर तो है
नगर में क्या नहीं?
गम स्मिन रखा है /31

नगर है, नागरिक है, नगरवधू है-
समूह में।
इस तरह नगर की नींव पड़ी।
1984
32 गा रिमन मा
-----

यहीं
यहीं बुद्ध न भिक्षा मांगी
यहीं बुद्ध
भिक्षा माँगेंगे
यहीं
बुद्ध न दुख को देखा
यहीं
बुद्ध
दुख को देखेंगे
यहीं बुद्ध न मन को जीता
यहीं बुद्ध
मन को जीतेंगे।
यहीं बुद्ध न
आँखें मूंदी
यहीं
बुद्ध ऑखें मूंदेंगे
कब आयेंगे बुद्ध
?
1984
गरुड फिमन रखा हे 133

आनन्द
आनन्द
मनुष्य न पैदा होता है
न मरता है
सिर्फ गुजरता है
बेमतलब सँवरना
बेमतलब
सँवरता है।
आनन्द
मनुष्य अपनी छाया से
डरता है
तुमने
देखा है उसे
जो
इच्छा नहीं रखता
सग्रह
नहीं
करता
34/गर किसने देखा है

प्रिय है या नहीं तुम्हें ?
कुएँ में अपनी
छाया नहीं देखता
पानी
भरता है।
1984
गरुड किसने देखा है 135

कन्नौज में क्या नहीं?
कन्नौज में क्या नहीं?
रहने को घर है
आवागमन को सडक है
दोनों ओर
वृक्ष
जो झरते अवश्य है
पर कौन-सा वृक्ष है
जिसके पत्ते
नहीं करते?
स्त्री-पुरुषों की छटा है
कोलाहल है,
हर्ष है,
किलकारी है
कन्नौज की बलिहारी है
शासकों के लिए
आमोद और प्रमोद है
बाह्मणों के लिए भोज है।
जो इधर से गुजरता है
गर्व से करता है
36/ गरिमने दाग है

भैया यह कन्नौज है।
कन्नौज में क्या नहीं?
फिर क्यों कन्नौज खाली हो रहा है
फिर क्यों लोग
एक-एक कर, कभी-कभी सदल
कन्नौज छोड रहे है ?
क्या हुआ
क्या कन्नौज पर अकाल की छाया आ पड़ी?
या पण्डितों ने कन्नौज के
भविष्य को लेकर
?
कुछ कहा
ऐसा कुछ नहीं
अपूरी कविता, 1985
गरुड किसने देखा है /37

अवन्ती है, अवन्ती रहेगी
है तो अवन्ती में
गायक, मूर्तिकार, कवि
क्या कर रहे है वे?
राजन | कहते है वे
अवन्ती रच रहे है
यह कहकर
मृत्यु से बच रहे है
कि प्रक्रिया समाप्त नहीं होती
अवन्ती है, अवन्ती रहेगी।
-
राजन । बात मेरी समझ में
नहीं आयी
मिथिला क्यों नहीं थी?
मिथिला क्यों नहीं है?
1984
38/गर रिमने दा

तृष्णा
तृष्णा थी जिसने तोडा
बसन्तसेना को
तृष्णा है, जो तोडेगी
बसन्तसेना को
छोड नहीं पायी
बसन्तसेना
तृष्णा ऐसी ही होती है।
तृष्णा से बचो
सम्भव हो
तो,
अपने से भी
तुम भी गिडगिडा रहे थे,
बसन्तसेना ।
बसन्तसेना।
1984
गरुड किसने देखा है | 2n

तक्षशिला
किसी ने विरोध नहीं किया
किसी ने शिकायत नहीं की
पत्ता तक नहीं खडका
आम्भी जा मिला।
ठीक ही तो हुआ
युद्ध टल गया
कोई मारा नहीं गया
सुनायी नहीं पडा विलाप
बामणियाँ खुश है कि ब्राह्मणों की
दक्षिणा में कमी नहीं हुई
वैश्य जो सुखी थे सुखी है
क्षत्रियों को साधने की फुर्सत ही कब मिली
अछूता नहीं रहा जब गगाधर
क्या फर्क पड़ता है सलामत है तक्षशिला
ठीक ही तो हुआ
पत्ता नहीं खडका ।
आम्भी जा मिला।
1985
40/गर रिमनपा

गगा स्मृति का पर्याय
भाइयो,
कवियो या न-कवियो
क्या यह सच नहीं
तुम्हारी स्मृति या तो गगा होगी
या
नाली होगी
कविता कविता होगी
नहीं होगी
तो
गाली होगी
जो भी हो
स्मृति का लेकर
बहस मत करो
याद रखो
बहस भी तभी तक
जब तक
स्मृति है।
इसके बाद?
मणिकर्णिका।
9 जनवरी 1986
गरुड फिमन देखा है 141

अश्वत्थामा
युद्ध हुआ तो मुझको ही मारा जाना है
नहीं हुआ तो मुझको ही मारा जाना है
उस युग में मुझको कहते थे अश्वत्थामा
क्या कहते हैं अब जब सबकुछ बदल गया है
अश्वत्थामा ट्रक के नीचे कुचल गया है।
1985
42/ गरुड किमन देखा है।

विदेह
तुमसे क्या कहा विदेह ने?
जानने को आतुर है, प्रजा,
क्या कहा विदेह ने?
कुछ कहा भी या नहीं?
बोलो, बन्धु, बोलते क्यों नहीं ?
विदह स्वस्थ तो है ? सुखी
तो है ? प्रसन्न तो है ?
या खिन्न है, दुखी है
अस्वस्थ है?
प्रजा, जानने को आतुर है
कैसे है, विदेह।
जो है उनके विषय में,
जो नहीं रहे उनके विषय में?
उनका कहना अर्थ रखता है।
बोलो, बोलते क्यों नहीं?
क्या कुछ नहीं कहा विदेह ने?
गरुड किसने देखा है 143

क्या हाल भी नहीं पूछा किसी का
विदेह ने?
क्या यह भी नहीं कहा,
प्रजा सुखी रहे।
तो सुनो,
सच सुनना चाहते हो,
ता सुनो,
विदेह नहीं रहे।
जनवरी 1986
44/गझड किमन दखा है

अश्वघोष
बन्धु अश्वघोष
मैं समझा नहीं मतलब
मैने जिसके चेहरे पर हँसी देखी थी
उसी को
बिलखता देख रहा हूँ,
जिसे सुना था गर्व से
कहीं,
विपुल है, सुख।
देख रहा हूँ वही
शोकाकुल
लौट रहा है।
मैं समझा नहीं मतलब।
सुनो बन्धु,
मै अश्वघोष नहीं,
में वही हूँ
तुमने जिसके चेहरे पर
हँसी देखी थी,
फिर उसी का देखा बिसूरते,
जो गर्व से कहता था,
गरुड स्मिने देखा है 145

सुखी हूँ
फिर कहने लगा,
धोखा था।
मैं वही हूँ और अगर मैं अश्वघोष भी होता
तो क्या होता?
यहाँ के लागों की यही तो खूबी है
ये सीढियों पर चढते हुए
हँसते है,
ठठाते हैं,
सीटियाँ उतरते हुए
ऑसू बहाते है
कभी स्वय को
कभी सीढियों को
गरियाते है।
यहाँ के लोगों का कहना है कि
यहाँ के लोगों की यही तो विशेषता है
वे जन्म लेते है, चहचहाते हैं,
आँखें लडाते है
चौपट बिछाते
जब तक वे लिप्त हों,
कैसी विडम्बना है मित्र,
जब तक वे लिप्त हों
तब तक अवधि समाप्त,
वे चौसर उठाते हैं,
आतकित होते,
46/ गरुड किमने देखा है

घबराते है,
यह पूछने के बदले मैं कौन हूँ?
वे हर आने-जानेवाले से
पूछते है, कौन हो तुम? कौन?
हडबडाते है।
लडखडाते है,
दरवाजे भडभडाते है।
अब तुम्हीं सोचो,
मैं नहीं होता अश्वघोष,
तो क्या तुमसे नहीं पूछता,
कौन हो तुम?
जनवरी 1986
गरुड विसने देखा है । 47

डायरी का पन्ना-1
( 25 सितम्यर 1985 गृहस्पतियार | नयी दिल्ली)
कुछ का व्यवहार बदल गया । कुछ का नहीं
बदला।
जिनसे उम्मीद थी नहीं बदलेगा
उनका बदल गया।
जिनसे आशका थी,
नहीं बदला।
जिन्हें कोयला मानता था
हीरों की तरह
चमक उठे।
जिन्हें हीरा मानता था
कोयलों की तरह
काले निकले।
सिर्फ अभी रुख बदला है आँखें बदली है
रास्ता बदला है।
अभी देखो
क्या होता है
क्या-क्या नहीं होता।
48 /गर स्मिना है

अभी तुम सड़कों पर घसीटे जाओगे,
अभी तुम घसियारे पुकारे जाओगे,
अभी एक-एक कर
सभी खिडकियाँ
बद होंगी
और तब भी तुम अपनी
खिडकी खुली
रखोगे.
इस डर से कि जरा भी अपनी
खिडकी बद की तो
बाहर स एक पत्थर,
एक घृणा का पत्थर,
एक ईर्ष्या का पत्थर,
एक हीनता का पत्थर,
एक प्रतिद्वन्द्रिता का पत्थर,
एक विस्मय का पत्थर,
एक मानवीय पत्थर,
एक पैशाचिक पत्थर,
एक दैवी पत्थर,
तुम्हारी खिडकी के शीशे तोडकर जायेगा
और तुम
पहले से अधिक
विकृत नजर आओगे,
पहल से अधिक
बिलखते-बिसूरते दिखायी पडोगे,
जैसा तुम नहीं दीखना चाहते
दिखायी पड़ोगे।
गरुड किमने देखा है /49

कम- यह कोई पहली बार नहीं है जब तुम्हें मार पड़ी है -से-कम तीन तो आज को मिलाकर हो चुके, मतलब है तीन बार, मार। और ऐसी मार कि तीनों बार बिलबिला गया निराला की कविता याद आती है "जब कडी मारें पड़ीं, दिल हिल गया।" - 50/ गरुड किसने देखा है

पेरिस में स्त्रियाँ
पेरिस में स्त्रियाँ है, चारों आर,
उपभोग्या स्त्रियाँ,
और पुरुष का आहार करनेवाली स्त्रियों,
वे स्त्रियाँ कहीं गयीं नहीं है,
वे यहीं है
पिगॉल में, मोलाराज में
साँ एल्जेि में
पेरिस क प्रत्येक कहवाघर में,
सड़क पर,
बॉर में,
टबक में,
पेरिस में
पेरिस में सिर्फ स्त्रियाँ है,
स्त्रियाँ कविताएँ है,
स्त्रियाँ,
पिकासो की धनाकार,
घूमती,
गरुड किसने देखा है /51

थिरकती,
बैठी हुई स्त्रियाँ है,
स्त्रियाँ है,
इसलिए पेरिस है,
पेरिस है,
इसलिए स्त्रियाँ है,
स्त्रियाँ
स्त्रियाँ है।
3 जुलाई 1985 / परिम
52 गार किमन गवा है
-

लन्दन से क्या वास्ता
जैन ऑस्टन
शार्लेट ब्राण्ट,
थैको
चार्ल्स डिकेंस के उपन्यास
मै इन तमाम उपन्यासकारों और
कवियों की रचनाएँ
पढता,
बडा हुआ।
जरा-सी झलक, और स्मृतियाँ
हरी हो जाती है,
वर्तमान को झेल सकना
दिन-ब-दिन
कठिन होता जा रहा है,
मैं अपने बचपन में
जवानी के दिनों में
अतीत में
वापस लौट जाना
चाहता हूँ।
गरुड किसने देखा है / 53

मैं रग-रूप-गध को अपने
जीवन में पुनर्स्थापित
करना चाहता हूँ,
मैं उन दिनों को लौट जाना चाहता हूँ,
जब
दिन कट जाते थे
धूप में पत्ते-पढते,
रातें,
किस्से गढ़ते-गठते।
अब घर जाना चाहता हूँ।
लन्दन से क्या वास्ता
?
वास्ता है।
-
उन पात्रों, चरित्रों, दृश्यों से
जो मेरे मन में
घूम रहे है
आज लन्दन की बारिश में
उस सबकी,
जो पढा है
याद ताजा हो आयी।
4अक्टूबर 1985/ लन्दन
54/ गरुड किसने देखा है

डायरी का पन्ना 2
(3 नवम्बर 1985 नयी रिली)
राजनीतिज्ञों ने मुझे पूरी तरह भुला
दिया।
अच्छा ही हुआ।
मुझे भी उन्हें भुला देना चाहिए।
-
बहुत-से मित्र है, जिन्होंने आँखें फेर
ली है,
कतराने लगे है-
शायद वे सोचते है
अब मेरे पास
बचा ही क्या है?
मैं उन्हें क्या दे सकता हूँ?
और यह सच है
मैं उन्हें कुछ नहीं दे सकता।
मगर कोई मुझसे
मेरा 'स्वत्व' नहीं छीन सकता,
मेरी कलम नहीं छीन सकता
गरुड किसने देखा है / 55

यह कलम
जिसे मैंने राजनीति के धूल-धक्कड के बीच भी
हिफाजत से रखा,
हर हालत में लिखता रहा
-
पूछो तो इसी के सहार
जीता रहा,
यही मेरी बैसाखी थी,
इसी ने मुझसे बार-बार कहा,
'हारिये न हिम्मत बिसारिये नराम।
हिम्मत तो मैं कई बार हारा
मगर राम को मैने
कभी नहीं बिसारा।
यही, मेरी कलम,
जो इस तरह मेरी है कि किसी और की
नहीं हो सकती
मुझे भवसागर पार करायेगी-
वैतरणी जैसे भी
हो,
पार कर ही लूँगा।
-
156/ गरुड किसने देखा है

सुन्दरता से साक्षात्कार अब तो उतार दो यह चेहरा- मनहूस चेहरा अब तो हो जाओ वह जो इस सबके पहले तुम थे, पेरिस की निर्वसन प्रतिमा की तरह- सीन में मैने सबसे पहले 1960 में अपना चेहरा देखा था, सबसे पहले क्यों, एक बार, पहली बार, क्योंकि उसके बाद कभी नहीं देखा वह चेहरा जो मेरा था। किसी और का नहीं, मेने ही देखा था वह चेहरा गरुड किसने देखा है / 57

जो उन तमाम चेहरों को दख रहा था
जो मलार्मे बॉदलेयर, इम्बो,
अपोलिनायर की कविता से
झॉक रहे थे,
जो बोला और वॉलजक के उपन्यासों में
जडे हुए थे,
में कैद थे
वे चेहरे
जिन्हें भुला नहीं पाया-
जो लूव्र
भुला पाता
तो पेरिस क्यों आता।
बार-बार आता
हूँ
ढूँढता हूँ
शायद नहीं ढूँढता
तब फिर क्यों
आता हूँ
दोहराता हूँ।
मैने ही तो लिखा था,
जो आता है
सिर्फ दोहराता है
मित्रो।
तुम सिर्फ अपने का दोहरा रहे हो
अन्यथा,
कहाँ से आ रहे हो,
कहाँ जा रहे हो?
22 अक्टूबर 1985/ पेरिस
58 / गरुड किमने देखा है

- किसे पुकारूँगा जो भी अपने अन्दर झॉकेगा घबरायेगा, सिर चकरायेगा- अन्दर एक भयानक कुँआ है, बावडी है, रसातल है, अथाह अन्धकार है- जो भी भविष्य की सोचेगा, हाथों-पैरों में लकवा मार जायेगा भविष्य में जरा से फासले पर मृत्यु मृत्यु की, कवियों ने, कितनी कल्पनाएँ की है, मगर सबका सुख रोमाण्टिक- मृत्यु भयानक है, गड किमन दला है 159

जीवन का अन्त है,
माया ही सही,
मगर कितना लुभावना, क्तिना सरस,
निरर्थक होते हुए भी, सार्थक है,
यह ससार।
मगर कैसे न सोचूँ
चाहकर भी तो भुला नहीं पाते
हम भविष्य को,
अपने आप को।
इसलिए
तैयार रहो,
आगे ओर भी चकरायेगा सिर,
आगे
ओर भी निहत्थे, नि सग
निर्बल होते जाओगे-
किसे पुकारूँगा
कोन आयेगा?
18 अक्टूबर 1985/ न्यूयॉर्क
60/ गरुड क्सिने देखा है

डायरी का पन्ना-3
(16 नवम्बर 1985 / शनिगार / नई दिल्ली)
ऑपरेवियो पॉज के लिए हम सब कटा हुए मेरे घर । अज्ञेयजी ने कहा नीन कवि मिलकर एक कविता लिने ।
करिता लिखी गयी । अनय ऑवियो पॉज और मै। शुरुआत पॉज न की थी। फिर अजयजी ने लिखा फिर
मैन । फिर इमी क्रम में
1 "मैत्री नदी है, मैत्री मुद्रिका है।"
(पॉज)
2 "नदी मुद्रिका में से बहती हे
मुद्रिका नदी का द्वीप है ।'
(अज्ञेय)
3 "नदी के पहले नदी होती है, नदी के बाद
सिर्फ नदी।"
(श्रीकान्त वर्मा)
4 "पहले और बाद इसी भेद को
मैत्री मिटाती है।'
(अज्ञेय)
5 "कैसे मिटेगा ? मुद्रिका काल के हाथों
लती है आकाश।"
(पांत)
गरुड किग्न गया है
61

6 मैत्री काल को मिटाती है । मुक्त करती है ।
मैत्री नदी है बहती है कगारें बनाती है।"
(अज्ञेय)
7 "हम स्मृति आर विस्मृति के बीच जीते है,
वर क्षण अविराम समय पर
वाया करता हुआ द्वीप है।
(पॉज)
8 बालू पर ढूँढते अपन पगचिन्ह
चीखत हे लोग, नदी औ नदी,
नदी तुम कहाँ हो ?
(श्रीकान्त वा)
62/ गट क्मिन देखा है

मुझे क्षमा करो
मैं जीवन-भर बेवजह झूठ बोलता रहा,
अपने विवेक के विरुद्ध किया,
स्वय पर भरोसा न कर, ओरों के आगे गिडगिडाता रहा-
में खुद को एक गिरा हुआ आदमी
मानता हूँ,
मगर कुछ लोगों को देखकर मैं हैरत में पड़ जाता हूँ,
उनके गिरने की कोई सीमा ही नहीं
वे हत्यारे ही नहीं,
चोर उचक्के डकेत
होमोसैक्चुअल
मेट्रोसेक्चुअल
रेपिस्ट है,
उनके जीवन में सत्य का,
पश्चाताम् का एक क्षण
नहीं आया
और वे सब-के-सब, राजनीति में है-
जब मैं उन्हें देखता हूँ
तो कहता हूँ,
मैं उनसे बेहतर हूँ
गरुड क्सिने देखा है 163

मगर यह कहना कितना बेमतलब है-
क्या हम गिरे हुओं से अपनी
तुलना कर स्वय को उठा हुआ
करार देंगे,
में बोनों के कन्धों पर चढकर
महान नहीं होना चाहता,
मित्रो,
में महानों के चरणों पर गिरकर कहना चाहता हूँ-
में अधम हूँ,
मुझे क्षमा करो।
19 नवम्बर 1995
64/ गमड क्सिन देखा है

काशी के पण्डित
काशी के पण्डित काशी के पण्डित है, जोड नहीं
अब देखो न,
व्याख्या कर डाली धर्मयुद्ध की ।
पहले की जाती तो क्यों मारा जाता दुर्योधन ?
क्यों कर्ण?
मै पूछता हूँ लिखा ही क्यों जाता महाभारत
जो भी, जैसी भी हो,
साफ कहे देता हूँ नगरवासियो, देशवासियो
मुझे स्वीकार्य नहीं
व्याख्या धर्मयुद्ध की।
अब कैसा धर्मयुद्ध, निहत्थों पर जिसमें
हथियार नहीं उठेगा?
तब किस पर उठेगा हथियार।
निहत्थों पर उठने के लिए ही
बन है हथियार।
1985
गरुड किसने देखा है /65

गान्धार
गान्धारों में से एक हुई थी
गान्धारी
जिसे दीखता था सबकुछ
सिर्फ नहीं दीखता था गान्धार
यद्यपि गान्धार
हस्तिनापुर से इतनी दूर नहीं
कि हस्तिनापुर जहाँ
चर्चा होती है हरेक की
गान्धार की न चर्चा हो, न पूछ, न व्यवहार ।
सच तो यह है कि
सभी की आँखों में जलन थी
एक ने देखा दूसरे को
और दूसरे की ऑख सुलग उठी
दूसरे की नहीं तो पहले की
सभी की आँखों पर
मकड़ी का जाल था
वैसे यह सच है कि कोई
अन्धा न था
66/ गरुड किसने देखा है।

और यह भी कि उन्हें
हस्तिनापुर भी नहीं दीखता था।
और अगर आया भी कभी
प्रसग गान्धार का तो
लोगों ने कन्धा उचकाया
कहाँ है गान्धार?
तब भी क्या वे
रही नहीं करते
जो उन्होंने किया
स्वय ओर
?
दूसरों के
साथ
मित्रो,
हस्तिनापुर के साथियो,
अगर पूछोग
कहाँ है गान्धार?
तो कभी-न-कभी
मिलेगा उत्तर
हस्तिनापुर में।
आज नहीं उस दिन जानोगे
तुम, कहाँ है गान्धार
जब यह अनुभव होगा
हस्तिनापुर के लिए
व्यर्थ है विलाप
कोई नहीं सुनता
पुकार।
1985
गरुड रिसने देखा है 167

मगध में सन्नाटा
महाराज बधाई हो - कोई नहीं रहा
किमी का नहीं बख्शा काल ने
श्रावस्ती की कास उजड
चुकी
कासाम्बी विधवा की तरह
सिर मुंडाय
सडी है
कपिलवस्तु फटी-फटी
ऑग्गों स
मिर्फ दर रहा है
अपन्नी
निमन है
का मेंशयों का रिसाव हो
मगर में सन्नाटा।

क्षमा करें
महाराज
आप नहीं समझेंगे
यह
कैसा सन्नाटा है।
1984
गरुड किसने दखा है ! 69

मणिकर्णिका के नीचे मणिकर्णिका मिलेगी
क्यों कराह रहे हो?
कोई उपचार तुम्हें मणिकर्णिका से
नहीं बचा सकता।
क्यों भूलने की कोशिश कर रहे हो ?
कोई भी विस्मृति
यथार्थ पर पर्दा नहीं डाल सकती।
क्यों फावडा लेकर
खाद रहे हो मणिकर्णिका ? क्यों
चिल्ला रहे हो,
मै रहने नहीं दूंगा
तुझे,
मणिकर्णिका?
व्यर्थ है,
मिनो
व्यर्थ।
मणिकर्णिका के नीचे
मणिकर्णिका
मिलेगी
और उसक भी नीचे
70/गड किमने देखा है

मणिकर्णिका,
हम खोद ही तो रहे है
तबसे हमने सीखा है
फावडा
चलाना
जब से यह जाना
कि
हर बार पाया
मणिकर्णिका।
9जनवरी 1986
गरुड किसने देखा है/71

1जनवरी 1985 बुधवार / नयी दिल्ली ।
मगध' की रचना के डढ साल बाद आज
साल के पहले दिन लिखी गयी मरे अगले
कविता-सग्रह की भूमिका
बशर्ते कविताएँ लिखी गयीं।
अब मगध नहीं होगा
जो आगे निकल गये
हॅसते हैं,
मगध पीछे रह गया।
जो पीछे रह गये
हाँफते हैं,
आगे है, मगध, अभी
आगे है।
मगध हो चुका।
मगध को होना है।
मगध था ही नहीं।
मगध कैसे होगा?
72/ गरुड किसने देखा है

तो क्या हुआ
?
यह भी सम्भव है
मगध हो रहा हो,
हमी बेखबर है।
और यह भी
तो सम्भव है
मगध भुला दिया जाय
-
और भी तो है
देखो तो अवन्ती
कैसी सजी हुई है।
और चम्पा ?
चम्पा का क्या कहना।
शान ही निराली है
देखो, देखो, देखो
देखो?
वैशाली है।
मैंने कहा था
सिर्फ आम्बपाली है।
सच नहीं है।
और भी है।
भूल
जाओ
कभी सोचा है तुमने
गरुड क्सिने देखा है / 73

रात आज उतनी ही काली है,
जितनी कल थी।
मगध पर मगध, पर मगध, पर
तह जम चुकी है
अब मगध नहीं होगा
जो होगा
मगध नहीं होगा
स्मरण नहीं?
क्या कहा था चन्द्रगुप्त ने
सब होगा, मेरे बाद,
सिर्फ चन्द्रगुप्त
नहीं होगा।
74/ गड किमन दाया है

शिव जो स्मरण आते हैं और शिव जो स्मरण नहीं आते
मित्रो
मत भूलो,
शिव अकेले है
जिनमें
जहर पीने की क्षमता है
और जो
पिये जा रहे
है
जहर।
तुमने पिया है, जहर?
तो पियो,
तुम पाओगे
तुम्ही हो शिव
सच तो यह है
मित्रो
जहर पीकर भी
सभी शिव नहीं होते
गरुड किसने देखा है /75

और यह कि
जहर पिये बिना
कोई
शिव नहीं होता।
9जनवरी 1986
76/ गरुड किसने देखा है।
सो

डायरी का पृष्ठ - 4
(शुक्रवार 4 जनवरी 1985 / नयी दिल्ली)
अभी तुम पर न जाने कितनी मुसीबतें
आयेंगी।
अभी तुम पर न जाने कितने पहाड
अभी तुम स्वय को न जाने कितना
कोसागे।
अभी तुम न जाने किस-किसको दोषी ठहराओगे।
अभी न जाने कितनी बार प्रतिज्ञाएँ करोगे,
शपथ उठाओगे और उन्हें भग करोगे,
हलफनामें जलाआगे,
अभी न जाने कितनी बार सिसिफसब
की तरह ऊपर जाने की कोशिश
करोगे, लुढकोगे, अपने पख
झुलसाओगे।
अभी न जाने कितनी बार उद्यम
करोगे और नतीजा नहीं
निकलेगा।
गरुड किसने देखा है 177

अभी न जाने कितनी बार पाप के दलदल
में फंसकर छटपटाओगे, उबरोगे
ओर पाओगे कि तुम एक और
दलदल में आ पहुंचे।
अभी न जाने कितनी बार
मरणान्त पीडा से गुजरोगे,
हर बार मृत्यु से बच निकलोगे और
इसके पहले कि राहत की सांस लो या
कहो, धन्यवाद, एक और मरण
हाथ में कॅटीले गुलाब की तरह प्रश्नचिन्ह
लिये आ खडा होगा और कहेगा, लो
मैं
यह रहा
तुम इसी की तो प्रतीक्षा कर रहे हो
यह दिन कभी नहीं आयेगा।
1985
78/ गरुड फिमन देखा है

इन्द्रजाल
श्रावस्ती नगर में देवदत्त ब्राह्मण
मारा गया
यवन नहीं
शूद नहीं
दस्यु नहीं,
देवदत्त ब्राह्मण देवदत्त ब्राह्मण के हाथों
मारा गया
दोनों देवदत थे
दोनों ब्राह्मण थे
दोनों सहोदर थे
दोनों विधुर थे
देवदत्त घर से निकलता था
घर में रहता था
देवदत्त को देवदत
देवदत्त देवदत्त को
देवदत्त
कहता था।
गरुड किसने देखा है/79

एक दिन देवदत्त बोला देवदत्त से
कुँए में पुकारता हूँ
देवदत्त,
देवदत्त । देवदत्त कुँआ
देवदत्त तू एक कुँआ है सिर्फ गूंजता है
देवदत्त
कुँआ है या देवदत्त
निर्णय को
कुँए में उतर गया
कभी देवदत्त, कभी कुँआ पुकारा गया
श्रावस्ती नगर में
देवदत्त
देवदत्त देवदत्त था या कुँआ ?
1984
80/गरुड किसने देखा है

डायरी के कुछ पन्ने
.
-

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वर्ष 1972 11 जनवरी, 1972 मैने डायरी लिखना दूसरी बार शुरू किया है। पहली बार, दस साल पहले 1962 में मैने डायरी लिखने का प्रयत्न किया था। कुछ दिनों तक चलने के बाद क्रम टूट गया। उन दिनों मै एक भयानक मानसिक सकट से गुजर रहा था। जिन्दगी बैमानी लगती थी। चारों तरफ अन्येरा था। आज फिर मेरे चारों ओर अन्येरा है, पहले से कुछ अधिका आज मै जिस सकट से गुजर रहा हूँ, वह सम्पूर्ण सकट है - बौद्धिक और आध्यात्मिक। बहुत हद तक मेरे व्यक्तित्व (आइडन्टिटी) का सकट है। दस साल पहले मैने अपने सकट को सुलझाने के लिए एक के बाद एक कई फैसले लिये थे। मुक्ति का अहसास हुआ था, मगर यह अहसास झूठा था। मैंने जिन्दगी में जो फैसले लिये आज लगता है वे गलत थे। मैं आज पहले से अधिक पराधीन हूँ। पराधीनता अपने आप में कोई चुनौती नहीं । यह अहसास कि मै पराधीन हूँ, वास्तविक चुनौती है। और यह अहसास कि मैं अपनी नियति को बन सरने में असमर्थ हूँ, और भी तकलीफदह है। 1 फरवरी, 1972 मैं पिछले कुछ महीनों से सिगरेट छोडने का प्रयल कर रहा हूँ। मिगरेट के परिणामों के बारे में सोचकर भय होता है। इन दिनों यह भय बराबर बना रहता है। भय कारण कुछ भी कर पाना लिखना, पढना असम्भव हो जाता है। बीच-बीच में कई बार दो-एक दिनों के लिए छोड़ चुका हूँ। किमी-न-किसी बहाने फिर शुरू हो जाती है। गरुड किसने देखा है 183 इस बार एक अजीब बात हुई। दो दिन पहले मैंने सिगरेट छोड़ने का फैसला किया। चौबीस घण्टे नहीं पी। दफ्तर पहुंचते ही सिगरेट पीने की इच्छा हुई। एक सहयोगी से मौंगकर पी। घर लौटा। बाजार से सिगरट नहीं ली। बिना सिगरेट एक दिन और गुजारा। दूसरे दिन बाहर निकला तो घर से डर लगने लगा। लगा घर लौटूंगा तो एक विशाल सूनेपन से सामना करना पड़ेगा। दिन भर अपने से लड़ता रहा। शाम सिगरेट का पैकेट खरीदा। घर लौटा। लगा अब इतना सूना नहीं लगेगा। एक बार फिर अपने प्रयास में हार गया। अब अपनी इच्छा पर काबू करने के लिए मैने एक और उपाय सोचा है। अगले सप्ताह चार-पाँच दिनों की छुट्टी लूँगा। घर में एक भी सिगरेट नहीं होगी। पाँच दिनों में सिगरेट की इच्छा काफी हद तक मर चुकी होगी। इस इच्छा पर फतह कर ही बाहर निकलूँगा। 3फरवरी, 1972 सुबह मुझे दस्त के साथ थोडा सा खून गया। कुछ कमजोरी लगी। पहले भी-छह महीने पहले ऐसा हुआ था। डाक्टर ने कहा था कोई खास बात नहीं पेट की गर्मी से ऐसा हो जाता है। मगर मैं अपने बारे में एक शक्की आदमी हूँ। मुझे स्वय को लेकर खासकर शरीर को लेकर तरह-तरह की शकाएँ हुआ करती है - पिछले दस वर्षों से यही क्रम है। कभी कैसर कभी दिल दौरे कभी कुछ और का सन्देह होता रहता है। आज सारा दिन मुझे लगता रहा मेरे पेट में घाव (अल्सर) है। और दिन, नरक का एक लम्बा दिन रहा। मृत्यु के भय ने मुझे पूरी तरह दबोच लिया। मृत्यु का मुझे शारीरिक भय उतना नहीं होता जितना नैतिक। मुझे लगता है मैने अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं की ,यदि अकस्मात मेरी मृत्यु हो गयी तो वीणा और मण्टू का क्या होगा? फिर यह स्याल कुछ तसल्ली देता है कि मैंने 50000/ का बीमा करा रखा है। मुझे मृत्यु के इस भय से इस नैराश्य से उबरना चाहिए। और मैं इसके लिए कुछ योजनाएँ बना रहा हूँ। 12 अगस्त 1972 सवेरे आँख खुलते ही अखबार में पढा पालम के नजदीक विमान दुर्घटना में मिनी माता नहीं दिल और दिमाग का अपने सम्बन्धियों स्नेहियों की मौत से जरूर काई रिश्ता होता है। रात मुये तीन बार के हुई और घबराहट का अनुभव हुआ। यह सब आधी रात के करीब हुआ 84/ गरुड किसने देखा है ठीक उसी समय मिनी माता की मौत हुई होगी। ऐसा मेरे साथ पहले भी हुआ है। जब भी जीवन में कोई दुर्घटना होने को होती है, मन आशकाओं, डरावने सपनों से घिर जाता है। सुबह से लेकर दोपहर तक हम दुर्घटना स्थल पर मिनी माता के शव की तलाश करते रहे। लगभग दो बजे दिन को उनका शव मिला। शरीर कमर के पास से दो टुकड़ों में बँट गया था। सिर और चेहरे की जगह खोपडी का एक टुकड़ा और कुछ दाँत थे। पहचान उनकी कलाई के गोदने से की जा सकी। शरीर के नाम पर मास का एक लाथडा मिला। विमान के सारे यात्री मारे गये थे। एसा भयानक दृश्य मैने कभी नहीं देखा। चारों ओर, आसमान में, गिद्ध कौए उड रहे थे। रात-भर जगली जानवर इन शवों का खाते रहे थे। विमान परिचारिका की साडी का एक टुकडा एक पेड की शाखा पर झूल रहा था। लगता है दुर्घटना के बाद यात्रियों के शरीर दूर-दूर तक जा उडे। कोई भी शव साबुत नहीं था। जिन्दगी पर मौत की यह अजीब विजय है। 13 अगस्त, 1972 मिनी माता का अन्तिम सस्कार आज दिल्ली में विद्युत् शव-दाहगृह में कर दिया गया। मेरे जीवन का एक अध्याय शायद सबसे कीमती अध्याय समाप्त हुआ। कितनी यादें मिनी माता के साथ जुडी हुई है। 1956 में दिल्ली आया था। मिनी माता ने न केवल रहने को जगह दी, बल्कि एक ऐसी शक्ति दी जिससे कि मै इस कठिन नगर में कठिन समय में भी, बना रह सका। 1958 में भारतीय श्रमिक बन्द हो गया और मैं बेरोजगार हो गया। पाँच साल बेकार रहा। हर तरह की मानसिक आर्थिक बौद्धिक विपत्तियाँ आयी। मिनी माता की मदद के बिना इनमें से एक का भी सामना सम्भव नहीं था। कहना चाहिए कि मिनी माता ने मुझे पुनर्जीवन दिया। मै नष्ट हो चुका था। मुझे जरख से मनुष्य बनाया। मिनी माता की मृत्यु नहीं हुई में ही मर गया हूँ। कितने इसानों से मुलाकात हुई कुछ हैवान साबित हुए कुछ दगाबाजा मिनी माता अकेली थी, जिन्होंने मुझे ठीक-ठीक समझा, मेरी कद्र की मुझे हर बार मौत से बचाया जो मुझे मृत्यु से छुड़ाकर लाया आज मैं उसी का दाह कर लौटा हूँ। 4दिसम्बर, 1972 मोहन राकेश नहीं रहे। कल शाम हृदयगति रूक जाने से उनकी मृत्यु हो गयी। लगता नहीं कि मोहन राकेश नहीं रहे। गुस्से में भरकर सभा से वाक आउट कर जाना उनकी आदत थी। ऐसा लगता है जैसे वह वाक आउट कर गये है। गरुड किसने देखा है /85 31 दिसम्बर, 1972 यह सारा वर्ष मघर्ष और निरागा में गुजरा। कई दोस्त और आत्मीय, गाईन रोडरमल, मोहन राका मिनी माता विद्युड गये। मुझे स्वय बीमारियाँ हुई। दिनमान ने वरावर परेशान किया। रघुवीर सहाय की बराबर यह कोशिश रही कि ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो कि मै छोडकर चला जाऊँा यह अलग बात है कि इसमें उन्हें अब तक कामयाबी नहीं मिली है। नया साल कल शुरू हो रहा है। देखा जाये भविष्य के गर्भ में मरे लिए क्या है। वर्ष 1973 4जनवरी 1973 डाक्टर की सलाह पर मैं सुबह सैर को जाने लगा हूँ। यह एक दूसरी ही दुनिया होती है। रोशनी कुछ और होती है छायाएँ कुछ और होती है। सब कुछ फैटेंसी की तरह नजर आता है। छाया और प्रकाश के लीलामय ससार में इक्का-दुक्का भागते हुए प्राणी स्वप्नलोक के प्राणी लगत है। सारे वातावरण पर प्रकृति हावी हाती है। मनुष्य उस समय निद्रालाक से बाहर आ रहा होता है और प्रकृति उसका स्वागत करती स्वय जैसे विदा ले रही होती है। फिर वही दिनचर्या आरम्भ होगी फिर वही छलावे वही धक्का-मुक्की वही पुकार वही हगामा वही बेमतलब आवाजें। जब पौ फटती है तब लगता है ससार में पहली बार सवेरा हो रहा है। मगर थोड़ी ही देर में यह ससार एक पुरानी बासी दुनिया में बदल जाता है। 26 जनवरी, 1973 गणतन्त्र दिवस। कितना बडा षडयन्त्र है गरीब जनता के विरुद्ध। आजादी को पच्चीस साल हो गये मगर आजादी का दिखावा है वास्तविक आजादी नहीं। जश्न । समारोह । भारत से अधिक समारोही देश कोई नहीं। समारोह में किसी को अकेले होने का वक्त नहीं होता। समारोह की असलियत पर विचार करने की फुर्सत से उसे वचित कर दिया जाता है उसे शामिल कर दिया जाता है। भारतीय व्यवस्था कितनी चतुर रही है। 86/ गरुड किसने देखा है वर्ष 1984 6जनवरी, 1984 आज सवेर केन्द्रीय हिन्दी समिति ने अपनी बैठक में मेरा यह सुझाव मान लिया कि हिन्दी की पाठ्य-पुस्तकों में उर्दू के शायरों और अदीबों की भी रचनाएँ पठायी जाय। उर्दू और हिन्दी के बीच की दीवार चाहे वह लिपि का फर्क हो या फारसी और उर्दू का फासला-नकली है। क्या सिर्फ फारसी की भरमार से एक भाषा उर्दू और सस्कृत की बहुलता से वही हिन्दी वन जाती है? उर्दू और हिन्दी का बहुत-सा साहित्य ऐमा है, जिसमें न फारसी का कठमुल्लापन है न सस्कृत की पण्डागिरी। उसे हम किम भाषा का साहित्य कहेंगे? एक फारसी में लिखी गयी है, दूसरी देवनागरी में। मगर देवनागरी में लिखे को फारसी में लिख दिया जाय और फारसी में लिखे का देवनागरी में, तो काई अन्तर नहीं पड़ेगा। हिन्दीवालों का यह कहना कि उर्दू कोई भाषा नहीं उतना ही भ्रामक है जितना उर्दूवालों का यह कहना कि हिन्दी कोई भाषा नहीं। सच्चाई यह है कि दोनों में स कोई भी उसी हद तक भाषा है जिस हद तक वह एक समान स्रोत से शब्द ग्रहण करती है। इस अर्थ में आधुनिक हिन्दी गद्य और कविता सही अर्थ में भाषा है उन्होंने एक समान क्षेत्र से शब्द ग्रहण किये हैं। शब्द हवा में नहीं पकडे जाता वे एक विशेष अनुभवलोक से आत है। आधुनिक हिन्दी कवि-कथाकार का अनुभवलाक इस अर्थ में पूरी तरह सिक्युलर है। 16 जनवरी, 1984 आज मरे विवाह का 17 पूरे हुए। क्या कहा जायेगा -विवाह की 18 वीं वर्षगाठ है। मगर यह बात मुझ याद नहीं आयी-वीणा ने याद दिलाया। एक अर्मे बाद यानि कुछ ही वर्षों में विवाहित होन का अहसास जाता रहता है। ग्रिल समाप्त हो जाता है - रस्मअदायगी रह जाती है। या यह कहा जाय तो ज्यादा सही होगा कि विवाह एक ऐसी सस्था है जिसमें ग्रिल नहीं होता। शायद यह सस्था बनायी ही गयी है आदमी का डक निकालने के लिए। देअर ऑर मोर प्रिस्म दैन फिक्म। गरुड किमने दया है 187 30 जनवरी, 1984 कविताएँ बहुत वर्षों से रूकी पड़ी थीं या अन्दर कहीं दधी पड़ी थी। अब वे निकल पडी है - अनायास। मै रोज कविताएँ लिख रहा हूँ। एक नये सस्कार को ढूँढ निकाल रहा हूँ, दूसरों के लिए। अवन्ति मालवा उज्जयिनी सिता चम्पा काशी कौशाम्बी, कपिलवस्तु, कोसल कलिग वैशाली आम्रपाली वसवदता वसन्तसेना चन्द्रगुप्त विष्यसार, अशोक अजातशत्रु पात्रों चरित्रनायकों नगरों स्मृतियों का एक रेला है जो चला आ रहा है, एक भीड है, जो उमडी पड़ रही है। यहीं है मेरी कविताएँ। इनका मुख्य सरोकार है मृत्यु, सहार, नैतिक क्षया इन कविताओं का एक सग्रह दो महीनों के भीतर तैयार कर दूंगा -- जिस रफ्तार से लिख रहा हूँ, उससे तो अभी यही लगता है। पुस्तक का नाम होगा 'मगध । मैं जानता हूँ, मगध क्या है? कालातीत काल। । 4 फरवरी, 1984 स्वाधीनता के विषय में मैं चारबार बराबर बरसों से सोचता रहा हूँ। कम-से-कम एक बात तय है। सुबह से शाम तक धूप ढलने तक धूप में, बगीचे में बैठा रहा हूँ, लिखू या पद्, या जो भी करता रहूँ- मगर इस सारे दौरान न कोई मुझे पुकारे, न कोई मरे एकान्त में प्रवेश करे। मेरे लिए इससे बडी स्वाधीनता और कुछ नहीं। रचना महान रचना सिर्फ इसी शर्त पर हो सकती है कि कोई शर्त नहीं। 9 फरवरी, 1984 दो महीनों में मुझे तीसरी बार डायरिया हुआ। यह सब हर रोज ड्रिंक का परिणाम है। जो भी हो अब भविष्य में शराब नहीं पिऊँगा। जैसे सिगरेट छोड दी वैसे शराब भी नहीं छुऊँगा। वैसे भी यह समय का अपव्यय है। शाम का समय बेहतर कामों में लगाया जा सकता है। मुझे अभी जीवन में बहुत कुछ करना है। निखना है। जिसे लिखना है उसे शराब छोडनी होगी। शराब पीकर हम उम्दा बहस कर सकते है शराब पर एक से एक बढिया नायाब शेर प्रस्तुत कर सकते हैं अच्छा लिख नहीं सकते। कम-स-कम अपने लिए मै यह बात सही मानता हूँ। B8/गरुड किमने देखा है 22 फरवरी, 1984 फेलिक्स कुजनेत्सोव सोवियत लेखक संघ के प्रथम सचिव है। सोदोफ कवि, हिमालय पर लिखा है। और मरियम सेल्गेनिक भारतीय लेखकों की पुरानी परिचिता दुभाषिया और अध्येता] कल शाम घर पर उन्हें तथा कुछ भारतीय लेखकों को आमत्रित किया। रूसियों से साहित्य पर चर्चा से एहसास हुआ कि रूसी समाज में एक अनोखा परिवर्तन आया है। अब वे कठमुल्ला साहित्य को स्वीकार करने को कतई तैयार नहीं। मार्क्सवाद पर भी उन्होंने नये सिरे से चिन्तन आरम्भ किया है। कुजनेत्सोव ने मुझसे कहा कि मार्क्सवाद एक व्यापक और उदार विचार-सौरभ है। एक तरह से वह वही है जो भारतीय आध्यात्मिकता। कुजनेत्साव की बात सही भले ही न हो मगर मार्क्सवाद को एक आध्यात्मिक पद्धति के रूप में देखना ही, सोवियत समाज में एक नयी शुरूआत है। 6 जून, 1984/ गुएल्फ, कैनेडा आज अपराह्न 'हिन्दी समिति का समारोह मेरी अध्यक्षता में गुएल्फ विश्वविद्यालय में आरम्भ हुआ। तीन आलेख पढे गये, पहला विद्यानिवास मिश्र का आधुनिक हिन्दी साहित्य के सरोकारों पर दूसरा राजेन्द्रसिंह का हिन्दी भाषा की निर्माण प्रक्रिया पर और तीसरा किसी कैनडेयिन विश्वविद्यालय के किसी द्विवेदी का हिन्दी गजल पर। विद्यानिवास और राजेन्द्रसिंह के आलेखों की स्थापनाएँ महत्वपूर्ण थीं। विद्यानिवास का आग्रह था कि आधुनिक विशेषकर समकालीन हिन्दी-साहित्य को (उन्होंने उदाहरण कविता से दिये) मानवीय चेतना एव मानवीय सरोकारों के साहित्य के रूप में स्वीकार किया जाया वह मानवीय है इसीलिए आधुनिक है। आधुनिक होने का अर्थ ही है, मानवीय होना। राजेन्द्रसिह ने बहुत-से उदाहरणों के जरिए यह समझान की कोशिश की कि हिन्दी भाषा में कहीं से भी शब्द लेकर उसे आत्मसात करने की क्षमता है। दूसर शब्दों में उसमें एक समसामयिक भाषा बने रहने की शक्ति है। उर्दू के विषय में उन्होंन कहा कि वह कोई भाषा नहीं क्योंकि वह किमी एक समुदाय की भाषा नहीं। इन मान्यताओं पर दिलचस्प बहस होनी चाहिए थी मगर नहीं हुई। गरुड किसने देखा है /89 8 जुलाई, 1984/भोपाल - मध्यप्रदेश शासन साहित्य परिषद द्वारा आयोजित 'रामचन्द्र शुक्ल शती समारोह आज शाम समाप्त हो गया। समारोह कहना मजाक बनाना है। हर तरह के प्रगतिशीलों और जनवादियों का मेला था 1 दिखावे के लिए कुछ निर्विकार प्रतिमाएँ और प्रतिभाएँ भी थीं। साबित कर दिया गया कि रामचन्द्र शुक्ल हिंदी के पहले प्रगतिशील थे। किसे प्रगतिशील माना जाये? तुलसीदास को? कवीर को? भारतेन्दु का? प्रेमचन्द को? नहीं नहीं। रामचन्द्र शुक्ल को। अब अगले कुछ वर्षों तक रामचन्द्र शुक्ल का इस्तमाल छडी की तरह किया जायेगा। 13 जुलाई, 1984 (प्रात) / मॉस्को आज मेरे पुनर्जन्म की पहली वर्षगाँठ है। पिछले वर्ष ह्यूस्टन में आज ही के दिन डॉ कुली ने मेरे हृदय का ऑपरेशन किया था। यह एक वर्ष निरर्थक नहीं गया। मैंने कविताएँ लिखी जो बरसो से रुकी हुई थी। निरर्थक कामों से चित्त हटाया ईश्वर पर लगाया। ईश्वर तुमने मुझे दोबारा जन्म दिया है यह व्यर्थ नहीं जायेगा। यह तुम्हारी ही वस्तु है तुम्हें ही समर्पित है। अगल वर्ष और भी सयम से जिऊँगा ताकि और भी रव सकूँ। रचना ईश्वर क निकट पहुँचना है। 13 जुलाई, 1984 (साय) मॉस्को गोकी ने लिखा है शायद अगर मैं भूलता नहीं हूँ तो मैं पहली बार तॉल्स्तॉय से मिला तो लगा मैं ईश्वर के सामने खडा हूँ। आज यास्ना पोल्याना ने मेरा सिर अपनी तुच्छता के अहसास में इतना झुका दिया कि लगता है अच्छा ही हुआ। अब कभी मैं सासारिक दर्प में सिर नहीं उठा सकूँगा। इतने महान कलाकार सत पैगम्बर की इतनी मामूली समाधि--घास में छिपी हुई मिट्टी स इस कदर सटी हुई कि मिट्टी का मिट्टी से अलगाना कठिन है। चाहते तो तॉन्स्तॉप अपनी स्मृति में ताजमहल बनवा सकत थे। मगर वह लीला समझत थे। उन्होंने मिट्टी में शरण ली मिट्टी, जो अन्तिम सत्य है। तोल्स्तॉय क घर को टूरिस्टों ने रौंद डाला है। मगर क्या फर्क पड़ता है। वह सर्दी और गर्मी में दिन और रात मुँह याये स्तव्य खडा है तॉन्स्तॉय की गैरमौजूदगी में। अभी तो ये यहाँ 90/ गड किमने देखा है।

तॉल्स्तॉय, पढ रहे थे, लिख रहे थे सेक्रटरी को चिट्ठियाँ लिखा रहे थे, पत्नी से झगड रह थे, गोर्की का आतिथ्य कर रहे ये सगीत चारों ओर फैली हुई प्रकृति का सगीत, सुन रह था कहाँ गये? कहाँ गये तॉन्स्तॉया यास्ना पोल्याना स्तब्य है हतप्रभ है, उदास है मौन है, पर्यटकों के आने से नहीं किसी के चले जाने सा होटल लौटकर और रास्ते-भर मेरा मन भारी रहा। स्वामिनाथन ने अकारण नहीं कहा था यास्ना पोल्याना जाना तो मेरी ओर से वहाँ की मिट्टी के मत्थे टिक आना। यही तो कहा रूसी कवि सीद्रोध ने जो सारा समय मेरे साथ रहे- 'हम एक तीर्थस्थान में हैं। शनिवार / 14 जुलाई, 1984/लेनिनग्राद लेनिनग्राद के साथ कितनी स्मृतियों जुड़ी हुई है कितने उपन्यास, कितनी कविताएँ कितनी दन्तकथाएँ। पुश्किन दोस्तोएस्की, तॉल्स्तॉय के पात्र जॉर और लेनिना और युद्ध? दूसरा और अन्तिम युद्ध कितना सहार, कितना निर्माणा मेरी युवावस्था के मित्र रामकृष्ण श्रीवास्तव की पक्तियाँ याद आती है बार-बार गिर-गिरकर वक्त फिर सम्हनता है / एक दीप बुझता है एक दीप जलता है। मगर यूरोप में कौन बुझा कौन जला? यूरोप में चिराग दोबारा नहीं रौशन हुआ। यह बाँदलेयर जोला बॉल्जक, मोपासा तॉल्स्तॉय दोस्तोएस्की तुर्गनेव चेखव का यूरोप नहीं। यह गेटे और पुश्किन का यूरोप नहीं। वह बुझ गया। अव तो केवल स्मृतियाँ है सग्रहालय और पुस्तकालय है। आज सवेर मोर्हका नदी के किनारे 12 नम्बर कमान के आगे पैर ठिठक गय-यहीं तो पुश्किन ने अन्तिम दिन बिताय थे। इसे सावियत रूस की परम्परा ही कहना चाहिए कि एक ऐसी शताब्दी में जबकि लेखक और कलाकार को जीत-जी भुला दिया जाता है यहाँ लेखक-कवि मरकर भी याद किये जाते हैं-रोज-रोज सुबह-शामा जीवित लेखक भी यहाँ पर्यटक आकर्षण है, मृत लेखक भी। मगर जैसा मैने कहा यह वह यूरोप नहीं-यह कुछ और है। जिस युग में तॉन्स्तॉय दोस्तोएस्की और गेटे न हो उसमें अगर लेखक भौचक्का नजर आता है अपने को अधिकाधिक अकेला, हीन और असहाय पाता है तो क्या आश्चर्य? क्या आज हम गाँधी की अनुपस्थिति में गिरे हुए विवेकानन्द की गैरमौजूदगी में निर्वीर्य और बुद्ध के बिना अमानुपिकता की हद तक क्रूर नहीं हो चुके है? है ईश्वर यह कितना भयानक यथार्थ है। गरुड किमने दखा है/91 रविवार / 15जुलाई, 1984/लेनिनगोद दिन-भर बारिश होती रही। एक मोन बारिश। जैसे कोई चुपचाप आँसू बहा रहा हो। कोन है, वह? किसकी है यह बारिश? क्यों यहाँ लोग गुमसुम रहते है? चुपचाप क्यों? कोई यहाँ किसी से वार्तालाप करता दिखाई नहीं पड़ता। हरक अपने में सोया हुआ है सिवाय फिनलैण्ड के उन सैलानियों के बो शराब पीने लेनिनग्राद आते हैं। किमी को लेनिनगॉद में हँसते नहीं देखा आलिगनबद्ध होते नहीं देखा प्रत्येक को अकेले देखा। शायद वे युद्ध को अब तक मूल नहीं पाये। कौन था जो मारा नहीं गया। जो मारे नहीं गये व छाइकर चले गये। लेनिनग्राद अब तक युद्ध के सकते में है। सारे शहर में एक ऐसा सन्नाटा है, जिसस मय होता है। दोस्तोएन्की के मकान में जाकर यह सन्नाटा और भी बढ़ गया , भयावह सन्नाटा जिसे तोडकर दॉस्तोएस्की ने रचना की स्वय को नष्ट कर डाला और उस सबको भी जो अब तक अपरिभाषय था। जो बीसवीं शताब्दी को समझना चाहते है उन्हें उसकी शुरुआत दोस्तोएल्की स माननी चाहिए। दोस्तोएक्की के बगैर उस भयानक अपकार को मानव-मन के अधकार का पहचान सकना कठिन है जिसमें पाप, शाप, अपराध हिंसा घृणा क्षय, नैराश्य और अवसाद पल रहे है। यह एक ऐसा नरक है जिसे सिर्फ बीसवीं शताब्दी के लोग पहचानते हैं। यह अकारण नहीं है कि इस शताब्दी के साहित्य की पहचान इतनी पृषक है कि पहले के सभी मानदण्ड इस पत्थर से टकराकर चकनाचूर हो जाते हैं। आज दॉस्ताएक्की की एक प्रतिमा देखी एक छोटी-सी प्रतिमा पत्थर की प्रतिमा, जिसे छू-छूकर काल ज्वार की तरह लौट-लौट जा रहा है। 24 जुलाई, 1984/मॉस्को लियोनिद लियोनेफ रूस के वयोवृद्ध लेपका 86 87 साला गोर्की के समकालीन और मित्र रहे है। वनस्पतियों का उनक जैसा शौक मैन नहीं देखा न ही ऐसी जानकारी और सग्रहा अद्भुत! उन्हें पेडों पोपों पशु-पक्षियों सृष्टि से प्यार है। आज शाम जब मैं पैराडेल्किनों में उनके डाचा गया तब छुटते ही उन्होंने मुझसे प्रश्न किया तुम्हारा ईश्वर में विश्वास है? मेर हाँ कहने पर उन्होंने पूछा 'किस तरह के ईश्वर में?' 92/ गरुड किसने देखा है - मैन उत्तर दिया 'एक निराकार, निर्विकार ईश्वर में जो स्वय ब्रह्माण्ड है-सृष्टि से अलग नहीं, सृष्टि है अन्तिम है, नेति है। लियोनेफ ने मुझे लगभग बीच में काटते हुए कहा, "मगर मुझ, इस तरह के ईश्वर की आवश्यकता नहीं। मुये तो एक ऐसे ईश्वर की जरूरत है जो हर क्षण मेरे जीवन में हस्तक्षेप कर मुझे पाप से बचाये मुझे धर्म पर आमादा करे, मुझे प्रेरित करे मुझे ढाँठस द शक्ति दे आँखें दिखाये गुर्राये पीठ थपथपाये, पुरस्कृत करे, मृत्यु और सहार से विमुख करे। तुम्हारे निर्विकार, तटस्थ उदासीन ईश्वर का मैं क्या करूँगा?" मैने कहा 'मेरी पारणाएँ न केवल मरे अपने बल्कि औपनिषदिक चितन पर आधारित लियानक ने कहा 'मै जानता हूँ। मैं भारतीय दर्शन से अच्छी तरह परिचित हूँ। मै तो यहाँ एक सीमित प्रत्यक्ष और दैनन्दिन प्रश्न कर रहा हूँ न कि किताबी। अब देखो आज ही सवेरे मेरे बगीचे में एक मधुमक्खी पानी पर जा गिरी और भीगती हुई, डूबती हुई अब डूबी-तब डूबी होने लगी। मैंने उसे पानी से निकाला उडाने की कोशिश की मगर वह बार-बार उडकर धरती पर आ गिरी। मैं उसे पूप दिखाता रहा। क्रमश उसके पर सूखने लगे। तब वह अचानक ऊपर उठी, पर अपकाये और लम्बी उडान भरती हुई मेरी हथेली से, सीघे आसमान की ओर छू-मन्तर हो गयी। अब बताओ। मै उसके लिए क्या हुआ? क्या रिश्ता बना, मेरे और उसके बीच? क्या मैं उसका ईश्वर नहीं? लियोनेफ की धारणाएँ ईसाई अनुभव और धर्म से प्रेरित है। उनमें तर्क नहीं है मगर गहरी मानवता है। उनमें तुक नहीं है किन्तु एक अपरिभाषित पीडा है। जब तक वे हमसे बातचीत करते रहे दो बूढी स्त्रिया चाय इत्यादि लाती रहीं। कुजनेत्सोव ने बताया कि वे दिन में लियोनिद की पत्नी के देहान्त के बाद से, घर का सारा काम कर जाती है, मदद के बगैर। वे लियोनिद की पडौसिनें है। कुजनेत्सोव ने यह भी बताया कि लियोनिद स्तोलिन के प्रिय पात्र कभी नहीं रहे। इसके बावजूद गोर्की उनके अनन्य मित्र थे। गोर्की हर रोज कहीं से उपलब्य कर उनके लिए एक-न-एक नया पौधा लात थे। गोकी नहीं रहे उनके अन्य समकालीन भी नहीं रहे। मगर वे पेड-पौये और वनस्पतियों मौजूद है जो उन्होंने साथ लगाये थे। लियोनिद लियोनेफ उनके बीच रहते है उनके सग रहते हैं। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि लियोनिद लियोनेफ अकेले रहते हैं। - गरुड किसने देखा है / 93 26 जुलाई, 1984/नयी दिल्ली रूसियों ने कल मुझे और वीणा को आत्मीय विदा दी। कुजनेत्सोव के घर पर कॉकटेल और रात्रि-माजना उसके बाद मरि सैन्गेनिक और दुभाषिया नताशा एपरपोर्ट तक आये और आधी रात तक अब तक विमान भारत के लिए रवाना नहीं हुआ वहीं रहे। मॉस्को-दिल्ली सिर्फ छह घण्टे की दूरी है। रूस मुन्न एक अलग किस्म का देश लगा, अपनी सास्कृतिक परम्पराओं पर अभिमान से भरा हुआ। वैसे वह मूर्ति पूजा के विरुद्ध है मगर रूस के किसी भी नगर का कोई चौराहा नहीं जिस पर मूर्ति न हो मुख्य रूप से साहित्यकार की। साहित्यकार का इतना महत्व देना उचित नहीं। इतना महत्त्व देने का ही यह परिणाम है कि उनमें से कुछ को दण्डित होना पड़ता है। । 31 अक्टूबर, 1984 युययार नयी दिल्ली आज मेरा मन दुख से परा हुआ है। सुबह सवेरे साढे नौ बजे किमी ने बताया, इन्दिराजी को गोली मार दी गयी। गोली शायद सवा नौ बजे के करीब मारी गयी थी। मेरा मकान इन्दिराजी के बँगल के पीछे ही है इसीलिए खबर पहुँचते देर नहीं लगी मै सीधे मेडिकल इन्स्टीट्यूट पहुँचा। छोटी-सी भीड इकट्ठी थी। मगर किसी को कुछ पता नहीं था। वह किस अवस्था में है। आपरेशन थियेटर में उन्हें रक्त दिया जा रहा था। लगभग ग्यारह बजे विद्याचरण शुक्ल ने बताया कि यवन का कहना है कि उनकी मृत्यु तत्काल घटनास्थल पर ही हो गयी। मगर कुछ यकीन नहीं हुआ। मैं रुका रहा। थोड़ी देर बाद मैने नत्थू से पूछा। उसने भी ऐसा ही इशारा किया। इन्दिराजी को वैसे तो मै बीस वर्षों से जानता था। 1/9/1964 में जब वह सूचना मन्त्री नियुक्त हुई थी तब मैं उनसे पहली बार मिला था। मगर मै निकट आपा उनके 1969 में काग्रेस विभाजन के दौरान जब उन्होंने पार्टी की तथा अपनी लिखा-पढी का काम सौपा। कई वर्ष मैने यह काम किया और 1976 में राज्य सभा के लिए चुने जाने के बाद भी यह क्रम जारी रहा। अब भी उनकी मृत्यु के पहले तक मैं यही काम कर रहा था। कई बार में 15 अगस्त के सालाना जलसे के अवसर पर या काग्रेस अधिवेशन के समय मुझे उनकी स्पीच लिखने के लिए बुलाया जाता कभी-कभी अनुवाद के लिए। कालान्तर में उनके करीब आ गया था। सहायक-जैसी स्थिति हो गयी थी मेरी। और इस नाते उनके व्यक्तित्व को मैने बहुत कोणों से देखा और पाखा! आज वक्त नहीं है, इस पर बातचीत करने का। कभी लियूँगा 1977 में जब वह चुनाव हार गयी थी तब मै उन पर लिखना चाहता था। मगर अपनी उथल-पुथन के कारण लिख नहीं सका। और तब लिखता तो चापलूसी मानी जाती। अब जिसे लिखने के लिए मेरा लिखा चापलूसी माना जाता, वह नहीं रहा अब वे क्या कहेंगे। 94/गरु किसने देखा है + यह जरूर कहूँगा कि हत्या इन्दिरा गाँधी की आज हुई मगर इस हत्या की रिहर्सल 1966 में उसी दिन आरम्भ हो गयी थी जिस दिन वह प्रयानमन्त्री बनीं। समाचार पत्र, बुद्धिजीवी, भाषाकार राजनैतिक विरोधी, सब इन्दिरा गाँधी के विरुद्ध जहर उगल एक ऐसा माहौल बना रहे थे, जिसमें नाटक का अन्त यही हो सकता था। वे फिर यही करेंगे। पहले भी उन्होंने इतिहास से कोई सबक नहीं लिया, अबकी भी नहीं लेंगे। इस देश के बुद्धिजीवी पेशेवर हत्यारे है। 1नवम्बर, 1984 रक्पात आरम्भ हो गया है। हिन्दू युवक सिखों पर टूट पडे है। इन्दिरा गाँधी की हत्या जिन्होंने करायी, शायद वे चाहते भी यही थे। साम्प्रदायिक आधारों पर हिन्दू-सिख विभाजना उनकी मनोकामना पूरी हुई। मन पर दुख की कई परतें पड़ी हुई है। उन्हें हटा नहीं पा रहा नयम्बर, 1984 राजीव जी को पार्टी का नेता चुन लिया गया। यह बहुत सही काम हुआ। राजीव सही आदमी है और मैं जानता हूँ, वह सही लोगों की सलाह से चलेंगे। अभी वक्त ही कहाँ मिला, सारी स्थिति पर विचार का। बुजुर्गों के प्रति उनके मन में आदर है। 1980 में उन्होंने मुझसे कहा था 'जो चीज पार्टी में कोई नजर आती है, वह है परम्परा और अनुभव का आदर। राजीव का व्यक्तित्व उनके नाना जवाहरलाल नेहरू से बहुत मिलता-जुलता है। उनमें प्रतिमा की वैमी ही चमक है वैसा ही खरापन वैसी ही ईमानदारी वैसी ही उदारता और करूणा भारत का एक आदर्श प्रधानमन्त्री मिला है। 3नवम्बर 1984 आज शाम चार बजे शान्तिवन में इन्दिराजी का दाह-सस्कार कर दिया गया। एक युग समाप्त हुआ। दूसरा युग दस्तक दे रहा है। द्वार खालो -- मगर द्वार कौन खोले ? एक-एक को लकवा मार गया है। न सोचने की शक्ति रह गयी है, न समझने की। गरुड किसने देखा है 195

अब पता चलता है, एक देश को बाँधे रखना कितना कठिन है। इन्दिराजी भारत को अपने कपों
पर उठाए हुए थीं। आज उनके बाद वह एक घडे की तरह, सडक पर टूटा पड़ा है। एक इन्दिरा
गाँधी के न रहने से कितना फर्क पड़ गया है।
4 नवम्बर, 1984
एक विराट सन्नाटा डाल पर आकर बैठ गया है अपशगुन की तरह उल्लू की तरह। कभी-कभी
कोई अपरिचित दूर से तिरती आती चीख इस सन्नाट को तोड जाती है।
पता नहीं किसकी है यह चीस? कहाँ से आयी है? कहाँ ले जायेगी?
5 नवम्बर, 1984
दगे रूक गये है। अफवाहें पहले से अधिक जोर पर है।
जब दगे नहीं होते अफवाहें होती है। जब अफवाहें नहीं होती तब दरों होते है।
कभी-कभी दगे और अफवाह दोनों साथ-साथ होते हैं। सोने और सुहागे का साथ।
मारा जाता है गरीब
मारा जाता है बेगुनाहा
मारी जाती है स्त्रियों
मारे जात है शिशु
कुछ बचा नहीं रह जाता।
6वम्बर 1984
शर्म से सिर झुका हुआ है।
मयप्पर, 1984
आज इन्दिरा गाँधी पर रेडियो के लिए सस्मरण रेकार्ड कराया
बोलते हुए चेहरे पर पसीना छलछलाया इस सर्दी में और सीने में हल्का-सा दर्द हो
आया।
इमरेशनल स्टेट्स की वजह से हुआ है रक्तचाप बढ गया होगा। एजाइना तो हो नहीं
सकता इतने शीया
अभी पिउने ही वर्ष तो हृदय की शल्य-चिकित्सा करायी थी मैने।
इम तरह की सिचुएशन से बचना चाहिए मुझे।
मगर कैसे बन
96/गड किमने देग है

31दिसम्बर, 1984/नई दिल्ली दिसम्बर को लोकसभा का चुनाव-अभियान राजीवजी ने मुझे सौंपा था। उसके पहले पार्टी का चुनाव-अभियान कुछ दफ्तरों के हाथ था, जो करोड़ों रुपये अपनी जेबों में भर रहे थे और अभियान को एक ऐसी पटरी पर चला दिया कि गाडी अन्त में पराजय-जक्शन तक पहुँचती। मरा तो खयाल है, पार्टी के भीतर के कुछ शक्तिशाली लोगों ने कुछ विदेशियों के साथ मिलकर पार्टी को हराने की योजना बनायी थी। मगर एक बार फिर मैने पार्टी को विजयी बनाने में भूमिका अदी की। 1980 में भी मैने यही किया था। तब मेरा नारा था-'इन्दिरा लाओ देश बचाओ। इस बार मैने नारा दिया-' इन्दिराजी की अन्तिम इच्छा, बूंद-बूंद से देश की रक्षा। अपने प्रचार अभियान में मैने एक ही मुद्दा रखा। देश की अखण्डता। भारतीयता का अर्थ ही है अखण्डता। प्रत्येक भारतवासी देश की अखण्डता पर स्वय को न्यौछावर करने को तैयार है यह मै जानता था। राजीव जी के कुछ अन्य मित्र इससे सहमत नहीं थे। वे कीमतों का गरीबी का सवाल उठाना चाहते थे। गहन होते हुए भी यह सवाल इन्दिरा गाँधी की मृत्यु की वजह से पृष्ठभूमि में चले गये थे। एकता और अखण्डता का नारा कारगर हुआ। देश ने राजीवजी को इतनी सुदृढ सरकार बनाने की छूट दी कि अगर अब भी नहीं हुआ तो कभी नहीं होगा कोई नहीं करेगा। काग्रेस को 400 सीटें मिली। मगर तुम्हें क्या मिला? 1980 में भी तुम्हें कहा गया था तुम्हें मन्त्रिपरिषद में शामिल किया जायेगा। मगर क्या तुमने मन्त्री की इच्छा से प्रधान प्रचार की जिम्मेदारी ली थी? या राजीवजी प्रति 'अपने स्नेहवश? और देश के ख्याल से? छले जाने की अनुभूति तो होती ही है। इसलिए नहीं कि मुझे काम का पुरस्कार नहीं मिला। बल्कि इसलिए कि निकम्मों को निकम्मेपन का पुरस्कार मिला। मगर ऐसे ससार और ऐसी अव्यवस्था में क्या पछताना जो न्याय पर आधारित न हो। हम ससार को बदल सकते है अपनी नियति को नहीं। हम अन्याय की एक व्यवस्था को बदल कर उसकी जगह अन्याय की दूसरी व्यवस्था कायम करते है। हम इसी भ्रम में चले जाते है। स्वप्न हकीकत में बदलेगा। मगर ऐसा होता कभी नहीं। मरा अनुभव सिर्फ इतना है स्वन देखा स्वप्रसग भी देखा। भरी कविताएँ भी तो स्वप्न और स्वप्रसग का एक अजीबोगरीब एक नारकीय, एक जादुई मिलन है। एक ऐसा होता नहीं, पर है। क्या कहूँ? यह पार्टी की जीत का वर्ष है और मेरी पराजय का। गरुड किसने देखा है। 97

वर्ष 1985
मगलवार 11जनवरी, 1985/नयी दिल्ली
आज नया दिन है और मन बुझा-बुझा है। आखिरकार यह कोई दिया तो नहीं जिसे दियासलाई
से सुलगा लिया जाय और रौशनी फैल जाये।
वैसे तो हम कवि कलाकार साहित्यिक असन्त होते है। मगर तृष्णाएँ कुछ हद तक
बनी रहती है एक पैर सप्तार में रहता है न रहे तो रचना भी सम्भव न हो।
जिस हद तक हम ससार में है इच्छा है। जितनी इछा है उतना दुख है। बौद्ध दर्शन के
अनुसार भी, इच्छा ही दुख की जड है।
मगर इसे छोड सकना कितना कठिन है। असम्भवा तब फिर भोगना ही शेष रह जाता है।
और भोगना ही शप रह गया है। भोगना और रचना।
युधवार 12 जनवरी, 1985/नयी दिल्ली
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1
आज भी मन में गहरा अवसाद है। एक अजान कवि की बहुत पुरानी, मन में दबी एक पक्नि
याद आती है
पूछती है सैयदा
इस जिन्दगी का
क्या किया?
आज यह सवाल मन में बार-बार घुमड़ रहा है. क्या क्यिा इस जिन्दगी का क्या
किया।
पृहस्पतिवार 13 जनवरी, 1985/नयी दिल्ली
आज से मैने फिर लिखने-पढने का क्रम शुरू किया।
पुस्तकों पर धूल जम गयी यी साफ की। पुरानी फाइलों अधूरी रचनाओं पर नजर
दौडायी।
मन को तैयार करना चाहता हूँ। मगर मन दूसरी तरफ भागता है। फिर भी नकेल मरे हाय
जाओगे भी तो कितनी दूर मुझमे जाओगे।
98/गड किसने दखा है

शुक्रवार / 22 मार्च, 1985/मॉस्को यह मेरी रूस की दूसरी यात्रा है। पिछले साल मै वीणा के साथ सोवियत लेखक संघ के आमन्त्रण पर मॉस्को आया था। कल सवेरे विश्व शान्ति परिषद् के न्यौते पर मॉस्को पहुँचा। विश्व शान्ति परिषद् के अध्यक्ष मण्डल की बैठक है। विश्व शान्ति परिषद् वैसे तो सोवियत रूस का प्रचार मच है। मगर इस बार इसका स्वरूप । कुछ बदला नजर आ रहा है। आज सवेरे जब उद्घाटन-अधिवेशन आरम्भ हुआ तो सभी किस्म के जीव-जन्तु नजर आये-पश्चिमी यूरोप के सोशल डेमॉक्रेट्स, ब्रिटेन की लेबर पार्टी के सदस्य अमरीका के युद्ध-विरोधी विचारक और प्रचारक बेल्जियम के पादरी, और भारत की काग्रेस पार्टी का महामन्त्री मै-तमाम काले और गोरे। सूत्र सचालन सोवियत संघ के हाथ में है-मगर भाषणों का स्वा कुछ भिन्न है। चिन्ता का मुख्य विषय है स्टार वार्सी सबके मन में भय है आशका है चिन्ता है, सर्वनाश की छाया है। और इसीलिए लोग इतनी बडी तादाद में इकट्ठा है। वे अपनी बात कहना चाहत है, अपनी चिन्ता व्यक्त करना चाहते है ससार में अपनी चीख [जाना चाहते है। भारत की ओर से मैने अपना और भारत का दृष्टिकोण स्पष्ट किया। हम शान्ति चाहते हैं। मगर युद्ध की भाषा में शान्ति सम्भव नहीं। शान्ति के लिए आवश्यक है सह-अस्तित्व को बुनियादी शर्त के रूप में स्वीकार किया जाये और परस्पर सन्देह और अविश्वास को दूर किया जाये। एक भारतीय और किस भाषा में बात कर सकता है। सोमवार /25 मार्च 1985/मॉस्को युद्ध-विराधी और स्टार वार्स घाषणा के साथ आज विश्व शान्ति परिषद का अध्यक्षीय सम्मेलन समाप्त हो गया। आज सावियत लखक सघ की मरियम सैल्गेनिक और मिस्टर सीदोष से मुनाकात हुई। उनका आग्रह है कि बुल्गारिया स लौटते हुए एक दिन के लिए मैं मॉस्को स्कूँ। आग्रह क्या उनकी जिद है। व बहुत मी बातें करना चाहते है-सोवियन साहित्य के भारत में और भारतीय साहित्यक रूम में अनुवाद के विषय में सास्कृतिक आदान-प्रदान के विषय में और मरे साहित्य के विषय गड किमन सा है / 99 उन्होंने बताया कि वे शीघ्र ही एक सकलन मरी कविताओं का और दूसरा सकलन मरी कहानियों सहित मरे लघु उपन्याम दूसरी बार' का प्रकाशित करने जा रहे है। काफी अनुवाद मार मैन्गनिक चेलीशव अनक्जेण्डर सेक्पैविच और राब्दवस्तम्की न कर डाला है। मरि सैन्गेनिक का कहना है कि वे इन अनुवादो स सन्तुष्ट है। प्रम ट्रस्ट आफ इण्डिया के मॉस्को-सवाददाता गुप्ता ने भी बताया मेरी रचनाएँ रूम में बहुत रूचि और गौर स पडी जाली है। मगलयार /26 मार्च, 1985/सोफिया शाम सोफिया पहुँचा। जुल्गारिया में पहली बार 1968 में आया था। अन्तर्राष्ट्रीय युवा सम्मलन में। सपागवश वह मरी पहनी विदेश यात्रा थी। बृहस्पतिवार /28 मार्च, 1985 /सोफिया सोफिया में मेरा अद्भुत अतिथि-सत्कार हुआ। बुल्गारिया के राष्ट्रपति त्वोदोर निकोव न मुये अपने कार्यानय में बुलाकर आप घण्टे तक बातचीत की , इनकी ससट क अध्यन कम्युनिस्ट पार्टी और एग्ररियन पार्टी के मर्वोच्च नेताओं फादरलैण्ड फ्रण्ट क अध्यभ बुल्गारिया लेखक सघ के अध्यभ लगभग मयका मै महमान बना हरक स अलग-अलग विचार-विमर्श हुआ। पिछले तीन दिनों सहर रोज टेलीविजन पर मुझे दियाया जा रहा है और मुझसे सम्बन्धित समाचार प्रसारित किया जा रहा है। समाचार-पत्रों के मुखपृष्ठों पर मरी तस्वीरें छप रही है। जाहिर है व भारत को काँग्रेस पार्टी को और राजीव गाँधी को महत्व दरह है। वरना मरी अपनी क्या हैसियत है। व भारत के साथ अपने सम्बन्ध प्रगाढ करना चाहते है। त्वोदोर विकाव के साथ मरी दिलचस्प बातचीत हुई। उन्होंने मुझसे पूछा तुम कविता और राजनीति दो घोड़ों की सवारी एक माथ कैसे कर लते हो। ऐसे उदाहरण इतिहास में कन मिलत है। मैंने उत्तर दिया मैं असल में अपने भीतर चौबीसों घण्टे एक लडाई लडता हूँ और इसमें कोई जरमी नहीं होता कोई मेरे हाथों मारा नहीं जाता सिर्फ मै लहूलुहान होता हूँ। कभी राजनीति कविता पर हमला करती है कभी कविता राजनीति पररा में दोनों का द्वन्द्व युद्ध रोकने के प्रयत्न में स्थायी तौर पर जख्मी होकर रह गया हूँ-जख्मी, मगर अपग नहीं। त्यादार चिकोर न हँसकर सम्भवत अपनी सहमति व्यस्त की फिर बताया इन्दिरा गाँधी स मरी दास्ती थी। मर और उनके बीच कोई प्रोटाकोल नहीं था। मै खुलकर उनस बाते करता था और वह भी। इन्दिरा गाँधी का प्रसग आने पर त्वोदार निकोव की आँखों में शाक की छाया तैर गयी। 100/गरुड विमन दया है 29 मार्च 1985 /शुक्रवार /प्लाब्दीय कहने को प्लाब्दीव बुल्गारिया का वाणिज्य कन्द्र है। असलियत यह है कि यहाँ के लागों का सरोकार वाणिज्य से अधिक सस्कृति है। वे उम्दा शराब पीत है बढिया खाना खाते है और उनकी स्त्रियाँ लुभावनी है - लुभाती है भी। उन्होंन अपने खण्डहरों को मयखानों में परिणत कर दिया है और गुफाओं को नृत्यशालाओं (डिस्काथिक) में। प्लाव्दीव एक बहुत पुराना नगर है। उस पर तुर्को और रोमनों की छाप साफ दिखायी पड़ती है । लगभग तीन-चार तो एम्फी थियेटर है जो खुदाई में मिल है। जगह-जगह रोमन स्तम्भ है और हम्माम है। मगर प्लाब्दीव के निवासी प्राचीन अवशों को सिर्फ दखन की चीज नहीं मानते । रोपन स्तम्भों पर पत्थरों क ठोंक डालकर उन्होंने रेस्तराँ बना डाले है - प्राचीन को समकालीन सन्दर्भ दे दिया है । वे संस्कृति को संग्रह की नहीं उपयोग की वस्तु मानते है । इसी में सस्कृति का विकास है। जिस जगह मै ठहरा हूँ, वह कभी राजनिवास था बुल्गारिया के सम्राट का ग्रीष्मनिवास । उन्होंने इसे एक संग्रहालय नहीं होने दिया । वे इसका उपयोग करते है। अब यहाँ बुल्गारिया के राष्ट्रपति के निजि अतिथि ठहरते है । इस थिरचिम निवास में कदम रखते ही लगता है कि यह कभी राजनिवास था। हर चीज मैं रौनक है -- कालीनों बिछौनों रौशनदानों, मेजों कुर्सियों और स्नानगृहों में ,मध्ययुगीनता का आलस्य यहाँ अँगड़ाइयाँ ले रहा है। मगर उन्होंने इस राजनिवास में जिसके चारों ओर हरिणारण्य है कुछ नयी चीजे जाड दी है। कमरों में टेलीविजन सेट रख दिये है और टेलीफोन और हाई-फाई सिस्टम । मगर दिवारों पर लगी या कोनों में रखी घड़ियाँ और घडियाल पुराने है । वे काल का और कालातीत का स्मारक है अतीत की एक श्रद्धाजलि है। 30 मार्च, 1985/शनियार /प्लाब्दीय आज सवरे मै श्री दल्वाकाव के साथ थिरचिम निवास के अरण्य में सैर को गया । दल्वाकोव बुल्गारिया क फादरलैण्ड फण्ट के उपाध्यक्ष है और साफिया से बतौर मर मेजबान मेरे साथ आये बाते वे बहुत करत है सच्चाई ता यह है कि वह चुप रह ही नहीं सकत । मगर दिल के साफ है और खुशमिजाज है । बुल्गारिया के लोगों की यह विशेषता मैन देखी-व सुशमिजाज होत है और अपने फूलों की तरह प्रस्फुटित । बुन्गारिया है भी अपन गुलाबों के लिए प्रसिद्ध । गरुड किसने दखा है | 101 दल्बाकाव के साथ लगभग एक घण्टा अरण्य में घूमता रहा सँको रास्तों, गलियों पगडण्डियों पर । जाडा था और हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। क्सिी माड पर हिरणों और बारहसियों की झलक दिखी तो जरा दूर पर सरगोश रास्ता काट गया । लोमड़ियों और भेडियों के भी दर्शन हुए। मगर बहुत बड़ी तादाद में है यहाँ, वनमुर्गे हाँलाकि बाँस के जगल मुझे दिखायी नहीं दिये और भारत में वनमुर्गे अक्सर बाँस की झाड़ियों में मिलते हैं । यहाँ ३ मैदान पर दौड लगाते नजर आये हैं । तब वे वनमुर्गे न होकर उनसे मिलती-जुलती किसी नस्ल के पक्षी होंगे। दिन-भर पक्षी बोलते रहते है। उनकी मुखरता थिरचिम निवास को और सूना यना जाती इस सूनेपन का पिरविम निवास के सन्नाटे और परम्परा का एकमात्र गवाह है यहाँ का खानसामा। इन तीन दिनों में मैने लजीज स्वादिष्ट पकवान खाये। उनका स्वाद मेरी जीभ पर देर तक टिका रहेगा। खानसाम को जो सारा समय ब्रिटिश शैली के कोट और 'बो में होता है वनस्पतियों की अद्भुत जानकारी है। थिरचिम अरण्य में है भी सैकड़ों किस्म के पेड, फूल पत्तियाँ। तभी तो यहाँ इतने खरगोश है और हिरण और पक्षी । 31 मार्च, 1985/रविवार /मॉस्को मोफिया से मॉस्को वापिस । 27 अप्रैल 1985 / शनियार / बिलासपुर बिलासपुर मेरा अपना नगर है। मेरा जन्मस्थल । पूर्वजों की क्रीडाभूमि ! 29 साल पहले मैं बिलासपुर छोड दिल्ली आ गया था भविष्य की तलाश में अपेरे में रास्ता टटोलता हुआ। मगर इन तमाम वर्षों में न तो मै बिलासपुर को मूल पाया, न बिलासपुर ने मुझे मुलाया। यह क्या करिश्मा है कि इतना सब हो गया, मगर न मै बिलासपुर के लिए अजनबी हूँ न बिलासपुर मेरे लिए। आज शाम श्रीकान्त वर्मा प्रसग के अन्तर्गत नगरवासियों ने मेरा सम्मान किया (कम्पनी बाग में नगर-का-नगर उमड पडा। मुख्यमन्त्री बोरा ने कुछ कहा कुछ अशोक वाजपेयी ने कुछ औरों ने । मगर सबसे पते की बात यह है कि जिन्होंने कभी मुझे पढा नहीं सुना नहीं परे बिलासपुर छोड़ने के बाद पैदा 102/गरुड किमने देखा है हुए वे यहाँ बहुत बड़ी तादाद में मौजूद थे। नयी पीढी । मै उसके लिए एक श्रुति बन चुका हूँ। सच्चाई तो यह है कि नयी पीढी मेरे विरुद्ध नहीं है । वह चाव से मुझे पढती है मेरी रचनाओं में रस लेती है, सराहती है। यह तो मेरे ही कुछ समकालीन हैं जो मेरे विरुद्ध जहर उगलते रहते है पड्यन्त्र रचते रहते है। किसका नाम लूँ, किसका न लें। वे 'बायें भी है दायें भी। सामने पड़ जाने पर मुँहदेखी करते हैं, पीठ फेरते ही गोली दागते हैं ! वे मुझसे नहीं सत्ता से डरते है , वे सिर्फ सत्ता की पूजा करते हैं । जैसे ही कोई सत्ता से हटता है वे उसे रौदत है। 1977 से 1980 के बीच मेरे साथ यही हुई। बिलासपुर का यह आयोजन इस दृष्टि से मेरे लिए महत्त्वपूर्ण था कि मेरा इससे हौसला . - बढ़ा। । आयोजन के पीछे दृष्टि और सृष्टि रामबाबू की है मेरे एक शिष्य की। 11 मई 1985/ शनिवार | पूना आज सवेरे मैंने मराठी के दलित लेखक-सम्मेलन का उद्घाटन किया । दलित लेखक सैकड़ों की सर में आये थे। इसके कर्ताधर्ता गगाधर पावणे और नामदेव घसाल है। दरित साहित्य की खुशबू और रग अलग ही है। उसमें दिखावा नहीं । वह अपनी बनावट में आधुनिक है। उसकी अन्तरात्मा भारतीय है। उसमें हजारों वर्षों से कुचली गयी आत्मा का आर्तनाद है दर्प है प्रतिकार है हिंसा है समर्पण है पहचान है पश्चात्ताप है अस्मिता है। शायद इसीलिए इस लोगों ने अपनी पत्रिका का नाम रखा है अस्मितादर्श । 13 मई 1985/ सोमयार | बम्बई डेण्टिस्ट ने मेरे दाँतों की परीक्षा की । अगले हफ्ते वह मेरे छह-सात दाँतों की कैपिंग करेंगे। 30 जून 1985/ रविवार | कोपेन हैगेन और इसके लिए उन्होंने शहर के बीचोबीच टिवोली बसायी जो उजडती है रात को उजड़ने पर भी बनी रहती है अपने खेल-तमाशों जादूगरों बौनों खिलौनों-रेलगाडियों आधुनिक विज्ञान के चमत्कारी के साथ। हस क्रिश्चियन एण्डर्सन को जन्म दिया जिन्होंने अपने अकेलेपन को बाल-स्वप्नों से मूंगे-मोतियों से जड़ दिया भर दिया। आज भी हस क्रिश्चियन एण्डर्सन की कहानियाँ मुझे मेरे बचपन में ले जाती है जिसमें स्वन है तिलिस्म की तलाश है ऊब नहीं है जिज्ञासा है कौतूहल गरुड किसने देखा है ! 103 है, प्रम है सुगर तृष्णा है, मणि है, स्वर्ग है, पी सी राय का जादू है। हम क्रिश्चियन ए उर्मन की कहानियों में हर व्यक्ति को उमझा बयपन दायारा सौपन की सामर्थ है। डनमार्क में एक अनोग्गी सरलता है जाअनगाव से म्यनगीनास, यचपन के प्रति प्रेम स पैदा होती है। सयाग नहीं कि इनमार्फ का प्रतीक है परी - समुद्र के किनारे बैठी हुई सर से निकलकर धूप में अग सेंकनी हुई स्वप्न देखती हुई. उनपरी । 12 अगस्त 1985/ सोमवार | नयी दिनी चीन और उत्तरी कोरिया की यात्रा से आज मरी पत्नी और मै वापिम आय। चीन की या मेरी तीसरी यात्रा थी। चीन एकदम बला हुआ है। समाजशद की यात्रा सम्पूहुई। अब दोबारा एक सम्पन्न समृद्ध समाज की तलाश शुरू हुई है । चारो ओर समृद्धि की तनक है। भूख है पेट की नहीं अन्तरात्मा की अभियक्ति की प्रेम की। पहली बार मैंने चीनी युवकों को युवतियों की और घूरते देखा। पहली बार सबकी आँखों चमक देखी। पहली बार उनमें आत्मविश्वास देखा। चीन की यह नयी यात्रा कहाँ जाकर समाप्त होगी कहना कठिन है। यह क्रान्ति नहीं प्रति कान्ति है । और यह प्रतिक्रान्ति चीन के लिए जरूरी थी। कानफ्यूसियस के लिए । कालजयी कानफ्यूसिपस के लिए। सितम्बर 1985/ रपियार नयी दिल्ली मैं अपने ही घर में चन्दी होकर रह गया हूँ। सरकार ने सुरक्षा के लिए पचीस हथियारबन्द सन्तरी और अगरक्षक दे रखे है । वे घर आँगन सबकुछ धेरै हुए है। आतकवादियों से अधिक असुरक्षा पुलिस की मौजूदगी से होती है। मृत्यु का भय नहीं । यह दमघोंट किलेबन्दी काफ्का के कैसल की तरह है गुमनाम अनुपस्थिति का स्थानापन्न भय । 18 सितम्यर 1985/ युपवार | नयी दिल्ली आज मेरा जन्मदिन है। मन आत्मग्लानि से भरा हुआ है। इन तमाम वर्षों में मैने क्या किया? मिथ्या चाटुकारिता अह दर्प छल आत्मछल आकाक्षा लोभ 104/गरुड किसने देखा है - वैभव, प्रदर्शन, आत्म-प्रदर्शन, प्रतिद्वन्द्रिता, शत्रुता, आत्मरति। नाटकीय जीवन जिया। मै अपने अन्दर बैठा हुआ एक पिशाच हूँ, अन्यायी अत्याचारी, रोगग्रस्त, भोगग्रस्त । ईश्वर मुझे शक्ति दो इस छद्म और छल से उबरने की। फिलहाल स्वय को धिक्कार ही सकता हूँ आगे की सोचा 'काये, किस मुँह से जाओगे, गालिब ? 10 अक्तूबर 1985/ वृहस्पतिवार | आयोवा पॉल एगल बूढ़े हो चुके है ,शरीर से अन्तरात्मा वही अदम्य वही उदात्त वही करुणाई। पॉल एगल से मैं पहल-पहल 1963 में मिला था दिल्ली के जनपथ स्थित काटेज इण्डस्ट्रीज इम्पोरियम के कॉफी घर में । फिर मैं उन्हें भूल गया। 1969 में उनसे खतो-किताबत शुरू हुई। 1970 में मैं पहनी वार आयोवा आया । दूसरी बार 1978 में, परिवार के साथ । तीसरी बार इस चार । इन तमाम वर्षों में पॉल एगल और हुआ लिग के साथ मेरे सम्बन्ध आत्मीय हो गये है। औपचारिकता कहीं नहीं है। मरे आयोवा पहुँचते ही पॉल एगल न फोन किया वेलकम टू एगल कण्ट्री । तडके यहाँ के हिसाब से 10 बजे तडके ही हुआ / वह दौडे-दौडे आयोवा हाउस आये -- मुझे और मण्टू को घर ले जाने । उनके मुँह से शराब की गन्ध आ रही थी। उन्होंने सँध लिया कि मैं उन्हें सूंघ रहा हूँ। उन्होंने कहा कि पहले बन्द कर रखी थी अब दोबारा पीने लगा हूँ। वह ताबडताड पीने लगे है दूसरों स और स्वय स छिपकर पीन लग है । गरुड क्मिने दसा है | 105 पिछले वर्ष उनके मस्तिष्क का ऑपरेशन हुआ था, मगर इस ऑपरशन से कहीं अधिक उनकी कर्मठता ने उन्हें जीवन्त बना रखा है बल्कि अब वह पहले से अधिक जीवन और आक्रामक नजर आते है। वह जब भी कुछ कहत-बोलते हैं लगता है आयु पर आक्रमण कर रहे हैं, उन पर जरा पर, मृत्यु पर और इस बात का अहमास भी उन्हें पहले से अधिक है कि अगर कुछ निश्चित है तो सिर्फ मृत्यु। को है। क्या सयोग है कि मैं उनके जन्म-दिन के आसपास आयावा पहुँचा। कन इण्टरनेशनल रायटिंग प्रोगैम उनका जन्मदिन मनाने जा रहा है मतलव प्रोग्रेम के सदस्य हालाँकि जन्मग्नि उनका 12 अक्टूबर हुआ लिग एगल के चेहर पर भी उम्र की मार दिखाई पड़ती है। साठ की हो चली । पॉल एगल कई साल हुए प्रोग्रेम से रिटायर हा चुके है। हुआ लिग प्रोग्रॅम चलाती है भागती है दौडती है तमाम दुनिया में साल-पर-साल हर साल लेखक मण्डली जुटाती है । लकिन अब उम्र के साथ-साथ उनमें झुंझलाहट आने लगी है। उन्होंने कहा मरा अपना लिखना-पढना नहीं हो रहा है। पॉल एगल से मैने पूछा-इस उम्र में वह इतने तन्दुरुस्त कैसे नजर आ रहे है ? उन्होंने कहा मै सुबह से देर रात तक सक्रिय रहता हूँ, लिखता हूँ, पढता हूँ, अपनी गाडी खुद चलाता हूँ, अपनी चिट्ठियाँ स्वय टाइप करता हूँ, चलता हूँ, फिरता हूँ, खाँसता भी हूँ, बीमार भी पड़ता हूँ मगर यह बगैर भूले कि मुये जीना है । तब तक जब तक कि जिन्दगी बेमानी न लगने लगे। दोपहर का खाना बाहर रेस्तरां में पॉन एगल और हुआ लिग के साथ खाया। शाम को उन्हीं के घर भोजन पर एक लात्वीनियन दम्पत्ति से मुलाकात हुई-नाम ठीक-ठीक स्मरण नहीं कर पा रहा हूँ। मिस्टर इवार या इमी जैसा कुछ और उनकी पत्नी । इस जैसा भारी-भरकम अहवाला व्यक्ति मैंने माहित्य में कम देखा, राजनीति में तो रोजमर्रा मुलाकात होती है ऐसे लोगों की । वह ओकला हामा से वई लिटरेचर नामक मासिक क्या छापता है स्वय को विश्व-साहित्य का प्रणेता समझता है। दम्भी तो है ही भौडा भी है । सारा समय हुआ लिक पर छींटाकशी करता रहा। मसल सब सावित करता हुआ जिस पत्तल में खा रहा था उसी में छेद कर रहा था। 11अक्टूबर 1985/शुक्रवार | आयोया दोपहर मराठी नरक अरुण सायु से मुलाकात हुई। इस वर्ष भारत से वह इस प्रोग्रेम मे आये है । 106) गरुड सिने देखा है उनसे एक बार पहले बम्बई में भेंट हुई थी एक प्रेस-सम्मेलन में। वह बम्बई में 'स्टेट्समैन के प्रतिनिधि है। शाम को अनन्तमूर्ति से । अनन्तमूर्ति मेरे पुराने मित्र है । उनका सस्कार मेरे प्रिय उपन्यासों में से है बेजोड कलाकृति । मरे कविता संग्रह 'मगध की उन्होंने बडी प्रशसा की। मन बुझा हुआ न होता तो उनकी सराहना से न जाने कितनी शक्ति मिलती। मगर अब पता नहीं क्यों कुछ भी कारगर नहीं हो अनन्तमूर्ति ने बताया कि अपर्णा और विनय धारवाडकर ने जो शिकागो में हैं मेरी अनेक कविताओं के अग्रेजी में अनुवाद किये हैं। कुछ अनुवाद उन्होंने इग्लैण्ड और अमेरिका की पत्रिकाओं में प्रकाशित कराये है । मैन देख है। वे मरी कविताओं के सर्वोत्तम अनुवाद हैं। 12 अक्टूबर 1985/शनियार / वाशिंगटन सबेरे आयोवा से विदा देते हुए पॉल एगल ने एक कहानी सुनायी। उन्होंने कहा, वर्षों पहले, भारत में खजुराहा हवाई अड्ड पर मैंने एक भारतीय सैनिक अधिकारी को अपने सैनिक बेटे को विदा देते हुए देखा । पहले तो पिता सैनिक अधिकारी की तरह बर्ताव करता रहा जब जहाज छूटने लगा, तब पिता ने बेटे को गले लगाते हुए कहा डियर ब्बाय । । पॉल एगल ने मुझसे कहा, वैसे तो तुमसे मेरा कोई रिश्ता नहीं उम्र की दूरी भी इतनी नहीं, फिर भी कहना चाहता हूँ, डियर ब्वाय। पॉल एगल की आँखों में आँसू थे। और शायद हुआ लिग की भी आँखों में। वैस हमारा उनसे क्या रिश्ता है ? 18 अक्टूबर 1985/ शुक्रवार / न्यूयार्क कल शाम पवन वर्मा के घर भोजन के निमित्त गया। मन का दुख उन पर उँडेल आया । गलत किया। हम यहाँ इस नक्षत्र पर दूसरों को सुख देने को है, दुख नहीं अगर हम सुख नहीं दे सकते गरुड किमने देखा है 1107

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24 अक्टूबर, 1985 / बृहस्पतिवार / पेरिस और वही हुआ। मेरी आशका सही निकली। कल शाम कविता-समारोह बुरी तरह विफल हुआ। पहले तो यह कि कविता के नगर पेरिस में कविता के इस समारोह में कोई मशहूर कवि उपस्थित नहीं था - वरना बानफुआ स लेकर कौन- यहाँ नहीं है। जाहिर है कि उन्हें आमन्त्रित नहीं किया गया था। न तो फ्रेंच समिति ने कोई दिलचस्पी ली, न भारतीय दूतावास ने। कुछ भारतीय थे जिनकी समझ और रुचि सतही था कुछ फ्रेच थे, जिनकी रुचि दिखाव की है समझ की मैं नहीं जानता। जहाँ तक मेरा प्रश्न है मरी तो तकदीर ही खराब है। न जाने ईश्वर मुझसे क्यों नाराज है। कई महीने परिश्रम कर भारतीय कविता पर लेख लिखा था। वह भी सबके सिर से गुजर गया। कविताएँ पढी। कुछ तालियाँ पिटी| फिर सारा मामला बुझ गया। मुझ अपना दुख नहीं। मुर पर तो ग्रहदशा है। जो भी काँगा, उल्टे मुझ पर पड़ेगा। दुख इस बात का है कि उपस्थित समुदाय ने अन्य सहयोगियों की रचनाओं के प्रति भी वैजुअल व्यु लिया। असल बात यह है कि हम भारत का जितना भी प्रोजक्ट करना चाहें नतीजा कुछ नहीं निकनगा। दुनिया यह मानने को तैयार ही नहीं कि भारत कालिदास, ताजमहल और बन्दर भानू तथा साँप-बिच्छू से आगे निकल चुका है। हम जब अपन बारे में दावा करते है, और अक्मर सही दावा करते है तो पश्चिम निवासियों को नींद आने लगती है। जब तक हम अपना वाक्य पूरा करते है तब तक पश्चिम अपनी जगह स उठकर हैम्बर्गर खाकर लौट चुका होता है। दोप हमारे वाक्य का नहीं हैम्बर्गर है जो सुना है, बहुत जल्द भारत आने वाला है। ममग्र विफलता के बीच एक आशा की किरण भी थी रजा। चित्रकार रजा को गा ज्म होते ही वह मेरी तरफ लपका उनके पास मगध की कविताओं की न मुझसे पूछा 'आपने 'मगध की अन्य कविताएँ क्यों नहीं कि मैं तो सुनाने को तैयार था तत्पर था मिस्टर गोयिए ही १९ कविता की लड़ाई लड़ रह हैं, कुछ महीन हुए मगध +४। लिखी थी। 'मगध उन्हें बहुत पसन है। गरुड किमन दखा है | 109

अपना दुख
ता कम-से-कम
तो
दूसरों पर नहीं थापना चाहिए।
ध्यान रगूंगा।
19 अक्टूबर 1985 / शनियार / न्यूयार्क
कहीं भी चैन नहीं
कहीं भी
शान्ति नहीं।
कल सुबह
मटू के साथ टहलता हुआ फिफ्थ एवेन्यू
गया।
थाडी ही देर में वैसी ही घबराहट शुरू
हो गयी जैसी दिल्ली में
हुआ करती थी
हाथों-पैरों को माना लकवा मार गया
हो
तालू सूखते हुए
सिर चकराता हुआ
थककर
एक दुकान की दिवार पर टिककर
बैठ गया
फिर होटल आया
कमर में कुछ राहत मिली
एक भारतीय रस्तरॉ में
भोजन किया
पी।
चैतन्य हुआ।
108/गमंड रिमन देखा है

24 अक्टूबर 1985 / बृहस्पतिवार / परिस और वहीं हुआ। मेरी आशका सही निकनी। कन शाम कविता-समारोह बुरी तरह विफल हुआ। पहल ता यह कि कविता के नगर परिस में कविता के इस समारोह में कोई मशहूर कवि उपस्थित नहीं था - वरना वानफुआ से लेकर कौन - यहाँ नहीं है। जाहिर है कि उन्हें आमन्त्रित नहीं किया गया था। न तो फ्रेंच समिति न कोई दिलचस्पी ली ने भारतीय दुतावास ने। कुछ भारतीय थे, जिनकी समझ और रुचि सतही थे। कुछ फ्रेंच थे जिनकी रुचि दिखावे की है समझ की मैं नहीं जानता। जहाँ तक मरा प्रश्न है मरी तो तकदीर ही खराब है। न जाने ईश्वर मुझसे क्यों नाराज है। कई महीने परिश्रम कर भारतीय कविता पर लेख लिखा था। वह भी सबके सिर से गुजर गया। कविताएँ पढी। कुछ तालियाँ पिटी। फिर सारा मामला बुझ गया। मुझे अपना दुख नहीं। मुद्य पर ता ग्रहदशा है। जो भी काँगा उल्टे मुझ पर पडेगा। दुख इस बात का है कि उपस्थित समुदाय ने अन्य सहयोगियों की रचनाओं के प्रति भी वैजुअल व्यु लिया। असल बात यह है कि हम भारत को जितना भी प्रोजक्ट करना चाहे नतीजा कुछ नहीं निकलेगा। दुनिया यह मानने को तैयार ही नहीं कि भारत कालिदास ताजमहल और बन्दर भालू तथा साँप-बिच्छू से आगे निकल चुका है। हम जब अपने बारे में दावा करते है और अक्सर सही दावा करते है ता पश्चिम निवासियों का नींद आने लगती है। जब तक हम अपना वाक्य पूरा करते है तब तक पश्चिम अपनी जगह से उठकर हैम्बर्गर खाकर लौट चुका होता है। दोष हमार वाक्य का नहीं हैम्बर्गर का है जो सुना है बहुत जल्द भारत आने वाला है। इस समन विफलता के बीच एक आशा की किरण भी थी रजा। चित्रकार रजा को श्राताओं में बैठे देखा। कविता-पाठ खत्म हाते ही वह मेरी तरफ लपके। उनक पाम मगध की कविताओं की एक लम्बी फेहरिस्त थी। उन्होंने मुझसे पूछा आपने 'मगध की अन्य कविताएँ क्यों नहीं पढीं? अब मैं उनस क्या बताता कि मैं तो सुनाने को तैयार था तत्पर या मिस्टर गोटिया ही सुनने को तैयार नहीं थे। रजा परिस में भारतीय कला और कविता की लड़ाई लड़ रह है कुछ महीन हुए मगध पढकर उन्होंन अशोक वाजपयी को चिट्ठी लिखी थी। मगय उन्हें बहुत पसन है। गरुड किमने दस्रा है। 109

25 अक्टूबर, 1985 /शुक्रयार / पेरिस
पेरिस में इन दिनों ठण्ड पड रही है। सर्दी पेरिस निवासियों के हिसाब से, इस वर्ष जल्दी आ गयी।
सुबह उठा तो धूप खिली हुई थी। होटल से दस कदम पर ही ईफिल टॉवर के नीचे पडे एक
बैच पर बैठ गया। धूप खाने लगा। करीब दो घण्टे वहीं बैठा रहा बाहर की बातचीत के बीच
अपने भीतर के मौन में डूबा हुआ , नहीं , डूबता-उतरता हुआ बत्तख की तरह ,भीतर कितना
स्वच्छ है देखो ता - नहीं तो मैल है मैल-ही-मैल है।
एक अनन्त स्वप्न है जिसे देखते रहना सुख है। सुख का यही क्षण मुझे चाहिए, बरसों से
इसी का इन्तिजार है।
लेकिन क्या सुख की तलाश में बार-बार पेरिस आना होगा?
मुझे तो अपनी ही दुनिया में डूबकर (यत्तख की तरह डूबते-उतराते) सुख का यह क्षण
उबारना है। यही स्वय का उबरना भी है।
26 अक्टूबर, 1985 /शनिवार /पेरिस
पेरिस के पियरे कार्दा की एक दुकान के तमाम कपडे खरीद डाले। कोट ही कोट/ओवरकोट।
यह भी एक किस्म की सनक है। मगर यह हमेशा मेरी जिन्दगी में रहा। जब भी कोई सनक
दिमाग पर सवार हुई उसे पूरा किया ।
28 अक्टूबर 1985 /सोमवार /नयी दिली
लगभग तीन सप्ताह बाद आधी दुनिया का चक्कर काट घर लौटा तो क्वाधी की पक्ति याद
आयी हेयरेवर यू गो द सिटी विल फॉलो यू।
तुम कहीं सुखी नहीं रह सकते।
29 अक्टूबर, 1985/मगलवार /नयी दिल्ली
दिल्ली लौटा तो फ्लू ने धर दबोचा। ठण्ड पेरिस में ही लग गयी थी लगातार चार रात
कविता-पाठ के बाद देर से होटल लौटने की वजह
बुरा हाल है। बीमारियों ने मुझे घेर लिया है। शारीरिक से अधिक लगता है मानसिक
व्याधियों ने। इस बार इनसे उबर गया तो उबर जाऊँगा।
110/गरुड किसन देखा है

31अक्टूबर, 1985 / बृहस्पतिवार /नयी दिल्ली आज इन्दिरा गाँधी की पहली बरसी है। मेरे जीवन पर इन्दिरा गाँधी का सबस अधिक असर रहा है। इन्दिरा गाँधी के जबर्दस्त और आक्रामक व्यक्तित्व ने मुझ पर गहरी छाप छाडी है। मैं सोचता हूँ, इस रिश्ते पर इन्दिरा गाँधी पर मुझे एक पुस्तक लिखनी चाहिए। केन्द्र हो इन्दिरा गाँधी परिदृश्य हो यह क्रूर और बर्बर शताब्दी। इस द्वन्द्व से कई दिलचस्प नतीजे निकलेंगे। लकिन पहले भी कई बार सोचा और लिख नहीं पाया। ता क्या हुआ? एक बार फिर। एक बार फिर प्रयत्ल करो। तुम नहीं लिखोगे तो दूसरे बहुत-से फालतू लोग लिखेंगे प्रशसा या निन्दा कर इन्दिरा गाँधी की हत्या करेंगे। वर्ष 1986 3 जनवरी 1986 /शुक्रवार /कलकत्ता कल देर रात कलकत्ते आया। यहाँ से कल सबरे पोर्ट ब्लेयर जाना है, अण्डमाना अण्डमान देखने की इच्छा बरसों से थी उन सींखचों को देखने की जिनमें हमारे पूर्वजो का दम घुटता रहा। मर भी गय सिर्फ एक स्वप्न के लिए स्वाधीनता। मरे लिए यह तीर्थ यात्रा है। जहाँ तक कलकत्ते का प्रश्न है कभी यह पूर्व की सास्कृतिक राजधानी था। टैगोर ने उसे एक ऐसी गरिमा और विलक्षणता दे दी जिस पढ-सुन लोग कहते थ कलकत्ता कभी नष्ट नही होगा। मगर असत्य साबित हुई यह भविष्यवाणी। कलकत्ता नष्ट हो चुका है। कुछ महीने पहले राजीव गाँधी की इस टिप्पणी पर कितना बावेला मचा कि 'कलकता इज ए डाइग सिटी। मगर मैं कहता हूँ, 'कैलकटा इज ए डेड सिटी। राजनेताओं लुटरे व्यापारियों और वक्त ने उसे नष्ट कर दिया। हर शहर की एक उम्र होती है। सौ साल ढाई सौ साल हजार साल तक्षशिला नालन्दा पाटलिपुत्र इन्द्रप्रस्थ सभी नष्ट हो चुका काल ने सबको निगल लिया। कहने का तो एथेस अभी भी है। और रोम? और वेनिसा मगर क्या ये वही एथेंस रोम और वेनिम है? तमाम दुनिया में एक ही नगर अपवाद है जिस पर शताब्दियों की घून जम गयी काल न उस जगह-जगह खरोंच डाला है मगर वह अब भी गूंज रहा है जीवित है जीवन का गवाह मणिकर्णिका के बावजूदा काशी। मगर वह भी इसलिए कि गगा है। जब तक गगा रहेगी काशी रहगी अपन पण्डों सौंडों, रॉडों सीढियो के साथ और रहना चाहिए उसे। एक अपवाद तो हो। कलकते में गगा नहीं है। हुगली है। हुगली के तट पर व्यापार होता है। हुगली क्यों न नष्ट करती कलक्ते को। गरुड किसने दसा है / 111 4 जनवरी 1986/शनियार /पोर्ट ब्लेयर हर हँसी के पीछे आँसू होते है। कुछ आँसू यहाँ भी बहाये गये पोर्ट ब्लयर में, जो कभी 'काला पानी के नाम से जाना जाता था। काली पानी हमारी भाषा का एक मुहावरा बन गया-सुदूर निष्कासित जिसक लौटने की कोई उम्मीद नहीं। मगर काला ता नहीं यह पानी? सुन्दर है हरा है, नीना है, चारों ओर द्वीप है, मूगिया, पहाडी द्वीप। जैसे समुद्र पर कछुए आसन मारकर बैठ गय हों और बैठे ही हो शताब्दियों से। तीन सौ से अधिक द्वीपा सुरम्य मनोरमा फिर क्या काला था? काले थे हिन्दुस्तानी हमारे पूर्वज, क्रान्तिकारी देशभक्त जिन्हें गोरे शासक इसलिए यहाँ भेजत थे कि उन्हें देशप्रेम का मजा चखाया जाय। उन्हें पता चल कि यन्त्रणा असह्य यन्त्रणा अमानवीय यन्त्रणा क्या होती है। अपरान्ह जब मैं सेल्युलर जेल गया तो मैंने देखा, अपनी सभ्यता पर नाज करनेवाले अग्रेज कितने कुरुप बदशक्न मनहूस, अमानुषिक कारागृह खडे कर सकते हैं। मानवीय स्वतन्त्रता की पक्षधरता का दावा करनेवाली गोरी जाति किस तरह इन्सान को उन सीखचों में एक नहीं दो-दो दशक दस-दस बीस-बीस वर्ष कैद कर रख सकती है। इन सींखचों में जहाँ से कोई निकल नहीं सकता और कोई प्रवेश नहीं कर सकता। एक पतली-सी सूरज की किरण को छाड जो ससार को सुखभरी नींद से जगाती है लोग-बाग अँगडाइयाँ लेते ओंठों पर मुस्कान लिये उठते है किरण जो औरों क लिए आशा का सन्देश लिये आती है। इन अभागों के लिए जो यहाँ अण्डमान में काला पानी भोग रहे थे सुबह कभी कोई आशा का सन्देश नहीं लायी और शाम आयी तो वह भी डरती-डरती उनकी कोटरियों के दहलीज पर एक स्वप्न मात्र रस गयी-आजादी का स्वप्न जिसे उन्होंने बरसों देखा सैंजोकर रखा । आखिर इस स्वप्न के लिए ही तो उन्होंने सजाएँ भोगी थीं। उनका जुर्म अपराध क्या था? उन्होंने स्वप्न देखा था। और वे उसे असलियत में परिणत करना चाहते थे। कितनों ने दम तोड दिया भूख और बीमारी से। क्या देते थे उन्हें वे भोजन के नाम पर । मुझे बताया गया कि रात को टट्टी-पेशाब के लिए बाहर जाने की माँग करनेवालों पर कोडे बरसाये जाते थ या गालियाँ दूसरे सबेरे जब अग्रेज जेलर के सामने उनकी पशी होती थी। मगर किसी ने आत्मसमर्पण नहीं किया1 (हथियार डालने का मुहावरा गलत होगा। हथियार थे ही कहाँ उनके पास) नीचे की चार कोठरियाँ काल कोठरियाँ है जहाँ उन्हें फाँसी से पहले रखा जाता था। इन काल कोठरियों के ठीक सामने कुछ ही कदम की दूरी पर फाँसीघर है। बाहर एक चबूतरा । फाँसी के पहले तडके कैदी को इस चबूतरे पर लाया जाता था। अग्रेज बडे 'उदार थे। मौत के पहले कुछ क्षण वे आदमी को खुली हवा में साँस लेने की छूट देते थे। वे बडे धर्मभीरू थे । 112/गरुड किसने देखा है - है, न ? तभी तो कैदी को स्नान-ध्यान कराया जाता था गीता-बाईबल-कुरान के पाठ की सुविधा दी जाती थी और उनके 'स्वतन्त्रता प्रेम की तो अन्यत्र कोई मिसाल ही नहीं । फाँसी पर घटाने के पहले पूछते थे, 'अन्तिम इच्छा कितनों ने उत्तर दिया होगा-'आजादी क्या उन्होंने उनकी अन्तिम इच्छा पूरी की ? शेक्सपियर के नाटकों में ट्रेजेडी ट्रेजेडी रहती है, कॉमेडी कॉमेडी। मगर वे शेक्सपियर को घर मून आये थे। यहाँ आकर उन्होंने सीखा था ट्रेजेडी को कॉमेडी में और कॉमेडी को ट्रेजेडी में बदलना। तभी तो वे फाँसी की सुबह तमाम कोठरियों के द्वार खोल देते थे ताकि बाहरी सीखचों से कैदी देख सके अपना भविष्य-फॉमी आजादी की माँग करनेवालों का भविष्य-फाँसी विदेशी शासकों को बाहर खदडने का मंसूबा रखनवानों का भविष्य-फाँसी फाँसी पर चढने का हौसला रखनेवालों का भविष्य-फाँसी और फाँसी की रस्सियों की परवा न करनेवालो का भविष्य-फाँसी । देखो, तुम्हें इसी तरह फाँसी पर चढाया जायेगा। देखो, फाँसी पर लटककर तुम्हारी जीभ आजादी का नारा लगानेवाली जीम इसी तरह बाहर निकल जाएगी। देखा अपना हश्र देखा। देखो अपनी लडाई का हश्र देखो। दखो अपने देश का हश्र दखा। देखो हम तुम्हें किस तरह नहला-धुलाकर पवित्र करते है (गगाजल नहीं हुआ तो क्या हुआ, काला पानी तो है) और अब तुम्हें उस लोक में भेजते हैं जहाँ फाँसी नहीं होती कम-से-कम 'आजादी चीख पड़ने पर फाँसी नहीं हाती, जहाँ कोडे नहीं लगाये जाते (नरक में जरूर लगाये जाते है, मगर अण्डमान आने के बाद नरक जाने की जरूरत ही क्या?) जहाँ वह शरीर ही नहीं जिसे लटकाया जा सके। और रोज ही या अक्सर यह दृश्य दोहराया जाता । फाँसीघर में एक साथ तीन व्यक्तियों को फाँसी देने की व्यवस्था है। इसका अर्थ यह हुआ कि कई बार तीन-तीन व्यक्तियों को एक साथ फाँसी दी जाती थी। फाँसी के पहले कितनी चीखों से आसमान भर गया होगा कुछ रोये होंगे, कुछ चिल्लाये होंगे, कुछ न नारा लगाया होगा- इनकिलाब जिन्दाबाद 'क्रान्ति अमर रहे ।' जिन्होंने ये नारे लगाये वे पागल थे। कोई विक्षिप्त व्यक्ति ही स्वय को खतरे में डालता है। समझदार कोई जोखिम नहीं उठाते, कोई खतरा मोल नहीं लेना चाय भी फूंक-फूंककर पीते है। फाँसीधर के सामने की कारा की दूसरी मजिल की सबसे अन्तिम कोठरी सावरकर की थी, जिन्हें सबसे खतरनाक कैदी माना जाता था। 1910 में उन्हें यहाँ लाया गया। 1929 में 'रिहाई हुई। उनकी कोठरी को एक लोहे की दीवार खडी कर शेष काराघर से अलग कर दिया गया था। कोई भी कोशिश कामयाब न हो भाग निकलने की । गरुड किसने देखा है। 113 बरसों यहाँ रहने के बावजूद सावरकर को यह न मालूम हा मका कि उनके भाई भी इसी काराघर में कैद है। मेरे मन में सावरकर के प्रति पूर्वग्रह था क्योंकि उनका सम्बन्ध हिन्दू महासभा' से रहा। मैने यह नहीं सोचा कि एक हिन्दू के रूप में अपनी अस्मिता की तलाश साम्प्रदायिकता नहीं । कम-स-कम ऐसा व्यक्ति साम्प्रदायिक नहीं हो सकता जिसन दशभक्ति की इतनी बड़ी सजा भोगी हो। जेल के बाहर सावरकर की प्रतिमा स्थापित की गयी है मरा सिर झुक गया श्रद्धा में। और कुछ शर्म में । हम कितने शीघ्र दूसरों के विषय में फतवा दे देत है। और अगर तर्क के जरिए तुम लोग यह प्रमाणित कर भी लो कि सावरकर साम्प्रदायिक थे तो मुझे तुम्हारा तर्क मजूर नहीं। मैं कवि हूँ। मै तर्क नहीं जीता । मरे लिए सावरकर वह व्यक्ति है जो हाथों-पैरों में हथकडी-बेडी पहने बरसों इस भयानक कोठरी में अँधेरे में कैद रहा मगर न वाणी अवरुद्ध हुई न आत्मा। शाम हो चली है। समुद्र पर चिड़ियाँ मँडला रही है। हजारों की तादाद में। कौन जानता है ये हमारे पूर्वजों की मृतात्माएँ हो । कुछ मेरी खिडकी के शीशों से आकर टकरा जाती है । या वे मुझे जगा रही है गहरी नींद से। जागो तुम नींद में हो । नींद में चल रहे हो नीद में लिख रहे हो, नींद में जीवन जी रहे हो। जीवन वह है जो इन सीखचों में रहनेवालों ने जिया । मैन अपने कमरे की बत्तियाँ नहीं जलायीं । रहने दो यह अन्धकार । होने दो पूर्वजों से पृतात्माओं मे यह सवाद। नीचे पहाडी के नीचे समुद्र है। पानी दूर तक फैला पानी। अरे यह तो सचमुच काला हो चला । यह पानी। 5 जनवरी 1986/ रविवार / पोर्ट ब्लेयर सेल्युलर जेल से लौटने के बाद मैने सोचा था मुझे रात नींद नहीं आयेगी। मार थोडी देर खुद से झगडने के बाद आँखें झपक गयीं और थोड़ी ही देर में मै खर्राटे भरने लगा। सुबह उठा तो समुद्री चिड़ियाँ पख मारती समुद्र पर झपट्टा मारती दिखायी पड़ीं। दोपहर मोटर बोट में समुद्र की सैर की । यहाँ के द्वीपों के नाम अग्रेजी है-अग्रेज अपनी बीवियों और सालों के नाम अमर करना चाहते थे। रॉस ऑइलैण्ड वाइपर ऑइलैण्ड (अवश्य ही यहाँ जहरीले नाग रहते होंगे)। वाइपर ऑइलैण्ड में एक टेकडी पर पुराना फाँसीधर पी देखा। 1857 के भारतीय सैनिकों को, जिन्होंने देशप्रेम किया था यहाँ लाकर फाँसी दी गयी थी 114/गरुड किसने देखा है एक द्वीप में किसी पेशेवर अपराधी ने तत्कालीन वायसराय लार्ड मेयो की हत्या की थी, उनकी सैर के दौरान । ब्लड एवेन्ड बाई ब्लड । चार या शायद तीन हजार वर्षों के रक्तपात के बावजूद मनुष्य को अकल नहीं आयी कि रक्त का बदला रक्त होता है । बुद्ध, ईसा, गाँयी रक्तपात समाप्त करना चाहते थे। मगर वे अब पुस्तकालयों, सग्रहालयों और पूजाघरों की वस्तु होकर रह गये हैं। रिनासाँ कलाकारों ने कला और धर्म को एकाकार कर ईसा को सिर्फ एक कृति या मसीहा होने से बचाना चाहा । उन्होंने ईसा में मनुष्य का उत्कृष्ट रूप देखा और दिखाया। भारतीय और दक्षिणशियाइ कलाकारों ने भी बुद्ध का नरातम के रूप में दरसाया । मगर बुद्ध और ईसा दोनों की पूजा होती है अपने-अपने ढग से । वे चैत्यो मठों गिरिजाघरों या फिर भद्रलोक के ड्राइगघरों की वस्तुएँ और सजावट होकर रह गये । गाँधीजी फिल्म का विषय बन गये। जिन्दगी में व्यवहार में किसी का गवाह न गाँधी रहे, न बुद्ध न ईसा । कोई नहीं कहता मैं तुम्हारी शरण हूँ। कोई नहीं दोहराता प्रेम करो। कोई नहीं कहता क्षमा करो। चारों ओर रक्त और प्रतिहिंसा की गुहार है चीख-पुकार है । हत्या सिर पर सवार है समग्र मानवजाति की हत्या । लाच में बैठकर सौन्दर्य-विहार करते सौन्दर्य को निगलते, मापते हुए भी मेरा मन अशान्त है इस समुद्र की तरह । फर्क इतना है कि समुद गहरा है मै उथला हूँ, ओछा हूँ। जीवन-भर प्रयत्ल कर भी अपने मन और व्यक्तित्व में गहराई नहीं पैदा कर सका । 6 जनवरी 1986/ सोमवार | पोर्ट ब्लेयर आज भी दिन-भर नाव पर द्वीप समूह की समुद्र की सैर करता रहा । समुद्र विराट है। वह मनुष्य का उसकी तुच्छता का बोध कराता और शक्ति का भी यह कि तुम विजेता हो तुमने जय यात्राएँ की है समुद्र में और अन्तरिक्ष में । समुद्र भिन्न है भूमितत्व से बिलकुल भिन्न , जल जिसे सिर्फ वायु मथ सकता है। क्या माया है | कैसी है ईश्वर की सृष्टि । यह समुद्र चन्द्रमा को देखकर लपकता है न हाने पर तटो पर सिर धुनता है। वैज्ञानिक व्याख्याओं ने हमारे अन्तर्जगत को कितना छोटा कितना जिज्ञासा-रहित कितना कोरा बना दिया है, अन्यथा कितना जादू है इस सृष्टि में। कम-से-कम मेरे जीवन-काल में वे यह सारा माया-लोक यह समग्र जादू नहीं तोड पायेंग- 1-ब्रह्माण्ड का तिलिस्म। गरुड किसने देखा है | 115 7 जनवरी 1986/ मगलयार / कलकत्ता घूम रहे है। -- कलकत्ता के लिए फिर मन उदास हो गया। चारों ओर लोग है। मगर सब, एक मूलभुलैयों में किसी की आँखों में चमक नहीं। चेहरे पर रौनक नहीं। हरेक जानता है, भविष्य नहीं। यही वह नगर है जहाँ मैं पहली बार 1965 में आया था। आज से इक्कीस साल पहले इन्हीं दिनों । मैने कलकत्ते के मन में घुमडते स्वप्न देखे थे। स्त्रियों को सगीत में सराबोर देखा था। नौजवानों की बहसें सुनी थीं जिनमें जान थी और वे नौजवान देखे थे जो अपनी आस्था-विश्वास के लिए जान देने पर आमादा थे। सुसस्कृत वेश्याएँ देखी थीं, सभ्य शराबी देखे थे बात-बात पर लड़ पड़नेवाले कवि देखे थे,चाकू के बल पर क्रान्ति का हौसला रखनेवाले करोडपति बापों के नक्सलपन्थी बेटे देखे थे। मगर अब। अब गँवार और फूहड रण्डियाँ है । (सुना है बिहार और बगाल के राजनेता उनके मेजबान और मेहमानों दोनों ही है ) उजड्ड असभ्य, उचक्के पियक्कड है कवियों को मेमना बनाने की कोशिश है और चाकू गुण्डों की भाषा बन गया है। जॉब चानाक का कलकत्ता तो बहुत पहले खत्म हो चुका था और टैगोर का भी। हमने अपने जीवन-काल में जो कलकत्ता देखा था, वह भी नहीं रहा। याद दिलाने को हावडा का पुल है । 9 जनवरी 1986/ वृहस्पतिवार | बनारस बनारस जो मेरी कविताओं में काशी बनकर, बार-बार आता है मरा प्रिय शहर है। शिव का भी प्रिय शहर है बगाल की विधवाओं का भी यूरोप और अमेरिका के गॅजेडी और अफीमची युवको का भी मूर्तियों की तस्करी करनेवालों का भी और जीवन-भर बगैर कुछ किये सिर्फ मरनेवालों का भी। क्यों? पता नहीं। शायद इसलिए कि बनारस शिव का नगर है । शायद इसलिए कि बनारस ससार का सबसे स्वाधीन स्वायत्त नगर है। क्या नहीं है यहाँ जिसे आजादी नहीं । मरने के बाद अपने-अपने स्वर्ग में पहुँचने की इच्छा रख मरनेवालों की आजादी। घाट पर सीढी पर गली में सारा जीवन गुजार देने की आजादी । कोढ का कर्मफल मानने की आजादी। 116/गरुड किसने देखा है इस लीक की आजादी तो हर जगह है। बनारस अकेला शहर है जहाँ परलोक की आजादी शिव प्रत्येक की मान्यता, विश्वास, मनोवाछित मरणशैली और जीवनशैली की रक्षा करते है शिव जो दिखाई पड़ते हैं-कभी काढी की शक्ल में कभी भिखारी की, कभी विधवा की कमी साँड की कभी तस्कर की कभी मूर्ति की, कभी-कभी परिचित-अपरिचित की। शिव, जो स्मरण आत है और शिव जो स्मरण नहीं आते। मगर काशी (बनारस ) में सिर्फ शिव नहीं शव भी है । असख्य शव । बहत हुए शव दहकते हुए अगारों की तृष्णा शान्त करते हुए शव भीड को चीरकर गुजरते हुए शव, न जाने कहाँ से लाठी टेकते, हाँफते रुक-रुककर चलते हुए शव शव के नाम पर छलते हुए शव, मणिकर्णिका का पता पूछते शव मणिकर्णिका से डरकर छटपटाते हुए शव। - मैन शव का न जाने कितने रूपों में देखा है कल्पनाएँ की है। बनारस में मरे बचपन का वह हिस्सा गुजरा है जहाँ गगा हमारी स्मृति का पर्याय बन जाती है। सम्भव है किसी जन्म में मैं रोहिताश्व था। या डोम ? जो भी हो मैं बार-बार आया काशी। झाशी में मेरी बुआ ब्याही गयी थीं । मरे पिता स छोटी थी । उन्हें बहुत प्यारी थी और उनसे भी अधिक मेरी दादी को। और मै अपनी दादी का लाडला था। उनक साथ बार-बार हर साल बनारस आता। फिर अकेले बनारस आने लगा। वैसे पास ही प्रयागराज है और दूर ही सही दिल्ली भी है। मगर मैं कहीं नहीं गया । सिर्फ बनारस आया । क्यों? मैन कहा न मैं नहीं जानता। या तो मैं ~ डोम था या राहिताधा मैं बनारस में नहीं बसा । मगर बनारस मुझमें बस गया। मैं कैम राक सस्ता था बनारम का बसन स ? उसन मुयमें जहाँ भी जगह खाली देखी घर बना लिया। मेरी बुआ बूढी हा चुकी है। मुझ दख रान लगी। शायद स्मृतियाँ जाग उठी गगा कगार नाइ बह निकली। गरुडेस्मिन नामा मुद्य याद आया मैने इन्हें कभी युवा दया था। तब वह फिननी सुन्दर थीं। सुन्दर अब भी है। बुराप का अपना सौन्दर्य होता है मृत्यु की अपनी शान्ति हानी है। मगर चहर पर झुर्रियाँ है क्या य दरारे है शरीर कहन-भर का शरीर है। यहाँ से बनारस स कुछ ही दूर मारनाथ में बुद्ध न सपस पहल अपन पाँप शिष्यों म यही कहा था- जरा। राग। सुद्धायु। मृत्यु। इस चक्र से निकला । और इस चक्र म निकलने का राम्ना है। मगर आसान नहीं। अन्यथा हम बार-बार बनारस क्यों आत। हम आत ही है बनारस क्योंकि हमें अभी रास्ता नहीं मिल पाया है। रास्ता है। और रास्ता यहीं है रॉड साँड और शव जिस पर से गुजर रहे है वहीं कहीं। कौन जाने । 10 जनवरी 1986/ शुक्रवार / बनारस आज वड सबरे नाव पर गगा-विहार करते हुए सूर्योदय देखा । गगा का काशी का सूर्योदय । लाल एकदम लाल सूर्य । गगा से निकलता हुआ उगता हुआ । तुलसीदास ने इसी सूर्य को इस लाल गोले को देखकर अजनी-पुत्र हनुमान की कल्पना की होगी। घाट-ही-घाट है । दशाश्वमेध और मणिकर्णिका तो दो मशहूर घाट है। हर दस काम पर एक घाट है किसी राजा, रानी या व्यापारी के नाम पर । और कर भी क्या सकत थ व अपना नाम चिरस्थायी करने को ? मगर जरा और चलो । नुम्हें मिलेगी मणिकर्णिका जहाँ मुर्दे फूके जा रहे होंगे । और दो नहीं शायद तीन हजार साल से यही फूके जा रहे है । क्या याद दिलायगी वह तुम्हें ? यही कि कुछ भी स्थायी नहीं। भाइयों कुछ भी टिकाऊ नहीं अमर नहीं अजर नहीं । सरक लो सीयो सिर झुकाओ महाकाल के आगे । 118/ गरुड किसने देखा है हम कहत है कालजयी । कालजयी सिर्फ एक मुहावरा है। कुछ नहीं कातजयी । भारतन्दु ने कहा, 'राजा हरिचन्द की कहानी रह जायगी।' बम कहानी रह जायगी, क्योंकि कहानी शब्द है नाद है विस्फोट है सृष्टि का ब्रह्माण्ड का विस्फोट कल जब मै अपनी बुआ क घर गया था, अर्दली बाजार तो अपने फूफा का देखा 85 सान की उम्र बिस्तर पर पड़े न बाल मकन है, न हाथ-पैर हिला सकते है। उन्हें काई बीमारी नहीं । सिर्फ बुडापा है। लगा एक शव है जो सिर्फ प्रतीक्षा कर रहा है । न काई भय रह गया है, न तृष्णा न लोभ । मगर मैने कितना गलन मोया था। मिर्फ मृत्यु ही हमें लाभ और तृष्णा से छुटकारा दती है। कारण कि मैन जैस ही मिठाई का रिव्या साला, शव हिलने-डुलने लगा। परिवार के लोगों ने समय लिया । सहारा दकर उठाया। उन्होंन अँगुली से मिठाद की ओर इशारा किया। मरी बुआ ने उनक मुँह में एक मिठाई का दुकडा डाला और शव क चहर पर तृप्ति का भाव आया । उन्हें निटा दिया गया। थाडी देर में शव खराट भरने लगा। न जान क्तिनी तृष्णाएँ स्वप्न में मँडरा रही होंगी। एक एसी ही घटना की याद आ गयी। कुछ साल पहले अपनी मृत्यु के कुछ दिन पहल मर पिता न खाट पर पड़-पड़े अस्फुट स्वर में कहा 'बडे दिनों बाद आय हो । आज मछ नी खिलवा दा। मछली खाने के बाद उस दिन मैने उनक चेहरे पर ऐसी ही तृप्ति देखी थी। यह कैसी तृप्ति है ? कैसी लालसा मेने कबीरदास की पक्ति दाहराई 'माया महाठगिनि हम जानी। 7 । 10 मार्च 1936/ सोमबार / न्यूयार्क इस बीच में कितना कुछ घट गया । जिन्दगी ही बदल गयी। मै मौत के कगार पर खड़ा हूँ। पिछले छह महीनों से मै पट और पीठ के दर्द से परशान था। तीन-चार हफ्ते हुए वरियम मिल्क कराया ता पता चला कि पट में अल्सर है। दवाएँ की ! तुरत कोई राहत नहीं मिली वितिगन्न अस्पताल में जाँच और इलाज के लिए भरती हुआ। और जाँच करने पर पता चला कि भोजन की नली क निचले हिस्म में कैमर है । तुरन्त राजीवजी को फोन किया। उन्होंने अपने मविवालय को आदेश दिया कि न्यूयार्क के स्लान कटरिंग अस्पताल में मेरे इलाज की व्यवस्था करायी जाय । इलाज के लिए खर्च चाहिए। उन्होंने पार्टी का आदेश दिया। एयर इण्डिया से मुझे तीन निस्टि दिलाये । मेरी पत्नी, लडका और मैं। इस तरह सभी व्यवस्था हुई । ईश्वर उन्हें लम्बी उम्र द । गरुड किसने दखा है / 119 1983 में भी उन्हीं की मदद स मेरे हृदय शल्यचिकित्मा हुई थी न्यूयार्क में । उनसा सहृदय दुर्लभ है । वह मित्रों के मित्र है । पिछल सोमवार, 3 मार्च का मै न्यूयार्क पहुँचा मपरिवार । वीणा मन्टू और मै । तुरन्त मरी जाँच शुरू हुई। स्नोम कटरिंग केसर का सबम मशहूर अस्पताल है । सर्जरी विभाग के अध्यक्ष डॉ मर वेना ने मरी आरम्भिक जाँच की। दृसर दिन डॉ लाहरडल ने एण्डोस्कोपी की और बायप्सी के लिए मास का एक टुकडा काटकर निकाला है। बायप्मी की रिपार्ट अभी नहीं आयी । मगर डॉ लाहरडेल का ख्याल है कि एक छाटी-मी झिल्ली है जिसमें ग्रोथ है। अब कल मुय रडिएशन के लिए अस्पताल जाना होगा। परसों वे मुये भरती करेंग और बृहस्पतिवार को मरा ऑपरेशन होगा। ऑपरशन गॅ मनजीतसिह बन्म करेंगे। दस रोज मुय अस्पताल में रखेंग। मौत का यह मुय पर दूसरा हमला है। पहली बार 1983 में ता वर निकला। इस बार दखें क्या हाता जीवन मरण नियति कुछ समझ में नहीं आत । मनुष्य की अपनी इच्छा ज्ञान दृष्टि कल्पना क पर बहुत कुछ है हम जिसके विषय में कुछ नहीं जानते और कभी नहीं जान पायेंग । है - 11 मार्च 1986/ मगनवार | न्यूयार्क - आज सपरे स्लान कटरिंग अस्पताल में मुझे रेडिएशन लिया गया । भोजन की नली में पाइप डालकर करीब 15 मिनिट डॉक्टरों न रडिएशन चिकित्सा की। वे कहत है इसमे ऑपरशन में सुविधा होगी । उनकी मान्यता है कि इससे कैसर-ग्रस्त सल सिकुडकर रह जायेंगे और ऑपरेशन के जरिए कैसर-प्रभावित हिम्मे को निशानकर फेंक दिया जायगा । रेडिएशन सिर्फ 15 मिनट हुआ पगर सारा शरीर दिन-भर शिथिल रहा जैसे शक्ति ही नही रह गयी हो। जब से बीमारी का पता चला है भूख ही बुझ गयी है। डॉक्टर कहते है कैमर में एसा अक्सर होता है। क्या कहूँ कितना अभागा हूँ मैं। बचपन स रागग्रस्त रहा। अभी जवान भी नहीं हुआ था कि पिता निकम्मे हो गये । कोई काम नहीं काई आय नहीं। जिस उम्र में लोग सपने देखते है मैने स्कूल मास्टरी की , माँ-बाप भाई-बहिनों को पाला और अपनी शिक्षा पूरी की । दिल्ली आया तो एक क बाद एक मुसीबतों का सिलसिला चल निकला। कोई अन्त नहीं। पराजय विफलता पीडा अपमान रोग घाखा सर मुझसे चिपकते गये। 120/ गरुड किमने देखा है कभी निराला की परिन याद आती है ‘क्या कहूँ, आजा नहीं कही, दुख ही जीवन की स्था रही तो कभी मुक्तिबोध की पिस गया वह भीतरी और बाहरी दो कठिन पाटों बीच एमी जिनगी है नीच। नहीं जानता यह डायरी जारी रहेगी या यह इसका अन्तिम पन्ना होगा। मगर इतना अवश्य कहूँगा मैं जीना चाहता हूँ। हमारा हिन्दू दर्शन हमारे ग्रन्थ कितने सही है। बार-बार में जिस एक जगह पर लौटकर आते है जिस एक शब्द को बार-बार दोहरात है वही सच है वही अन्तिम मत्य है भाग्य का अभिलख लिखा जा चुका है। न हम उसे पढ सक्न है, न बदल सकते हैं। क्या मैं जानता था कि तीन वर्ष में मृत्यु मुझे दो बार आ दबाचगी और क्या मैं जानता हूँ, आग मर साथ क्या होगा और क्या नहीं होगा? सब कुछ सपना लगता है । पिछली सारी जिन्दगी सब कुछ जो मरे साथ घटा जो मै- दया भोगा झला ग्चा बमा बमाया सब कुछ सपना ही तो था । और अब भी । मैं सपना ही तो दख रहा हूँ । सपने में जी रहा सपने में मर रहा हूँ। ममग्र सृष्टि मेरा नहीं हमारा नहीं, परमपिता का महास्वप्न है समूचा ब्रह्माण्ड । हम को रवप्नपटन पर गुजरती परछाइयाँ है । मरा मन शान्त है। मैंने एक उदग्नि जीवन जिया।मगर आज शान्त हूँ। क्योंकि देर से ही सही मैन यह समझ लिया है कि सूत्र मेरे हाथ नहीं । मै तो सिर्फ एक कठपुतली हूँ। जैसे राखे राम तैसे रहिए। इसम अधिक हम क्या कह सकते है क्या कर सकते है।

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Garur Kisane Dekha Hai

Author
Shrikanta Verma
Title
Garur Kisane Dekha Hai
File name
Garur Kisane Dekha Hai
Text
OCR done
Citation
1980
Published
2011/03
Publisher
Rajkamal Prakashan Private Limitad New Dehli
Language
Sanskrit
Pages
126
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Poetry
DLI number
551498
Barcode
4990010032232.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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