Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Yog Viyog

Shankar · 2010/12

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বর্তী১৮
शंकर
अनुवादक
हसकुमार तिवारी
हकमल
सालकमल प्रकाशन

© हिदी अनुवाद १६६५
राजकमल प्रकागन प्राइवेट लिमिटेड
दिल्ली
प्रथम सस्करण, १९६५
प्रमाण
राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड
मूल्य: ६००
मुक
नवीन प्रेस दिल्ली

उत्सर्ग
मेरे अग्रज
श्री शिवशकर मुखोपाध्याय के
करकमलो में

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So might we talk of the old familiar faces
How some they have died and some they have left me
And some are taken from me all are departed,
All all are gone the old familiar faces
Charles Lamb

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बमपन म जिहाने मेरा अक्षरारम्भ कराया था उही की बात माद मा रही है । देवी सरस्वती के दफ्तर म अगर पुरानी लखा-वहियो को ठोर ठोस बनाम रसन का इतजाम हो, तो वहाँ के जर म माज भी मेरे नाम सामने यह जरूर लिखा होगा~द्रोडयूस्ड याई योगेदनाय मन्ना। बूढे मादमी थे अपनी तबीयत से हमेशा पान पवाते रहते थे। उन के खिचाप स बदन की धमड़ी में तनाव नहीं रह गया था लकिन उनके शरीर के रग से समता मनाये रखने के लिए हो जस मिररे माल आज भी काले घे। घर बाकी लग रहे मगोजी कहते य मेरे पिताजी (4 वकील ५) रहत ५ बागेन। ये रहते हमारे ही घर थे, मौर लाल कपड़ को जिल्वाली वही म हर दम जाने क्या-क्या लिखते रहते। उनके मानी जसे हरूफ देखकर मैं सोचता रहता था-ऐसे हरूफ में कर लिस सगा? और समको तरह पहल में भी रहें मुशाजा' ही कहा करता पा। बाद में एक दिन मा ने कहा मम से इनको मास्टरजी' कहना, मौर प्रणाम क्यिा करना। मास्टरजी घबराकर उठ खड़े हुए यह हरगिज नहीं हो सकता। ग्राहाण का कहना मेरे पांव क्यो छएगा मौन कहा, "क्यों नहीं हुएगा? माप उसका अक्षरारम्भ करा रह ?

योग दियोग है ! उसके गुरुरेव हुए । पुराना जमाना होता नो इमे आपके घर जाकर मापकी सेवा करके विद्या सीसनी पाती। मसीबत में पडकर मास्टरजी ने कहा था आप क्या कह रही हैं ऐसा कहीं हाता है। इसके बार मां और मास्टरजी न फिर यह प्रसग नहीं उठाया । मुस लकिन यह प्रस्ताव वेजा नहीं लगा। महीन भएम शनिवार को मास्टरजी अपने पर जाया करते थे-बाली उत्तरपाडा य पास रसुनायपुर या जाने कहाँ । सोमवार को जब लौटकर आत ता माप की यरी म भरा होता पा कह का साग भतुआ पपीता मौर लगभग हर बार एक मथा जरूर होता। इस क्या फल मे सरदी-बुगार का तो पया सम्म प है सोईवर ही जानें लकिन घर के लोगा मे पर से मास्टरजी को मेरे लिए कथा छिपाकर लाना पडता। अपने मन का आँखा से मैं प्राय रघुनाथपुर से एर निषिद्ध वृक्ष म लटकते हुए सरणे लुभान फ्ल देखा करता। सो बेमटने खुशी खुशो मैंने गुरुग्रह म रहने का प्रस्ताव पा किया। मास्टरजी बोल यह कसे हो सकता है या एम पार पूम माना मेरे साय बशत पिताजी नाराज न हो। इसके याद ही अ-आ -प शुरू हो गया था और लगभग उसके साथ ही पहारे की पदाई । इस पढ़ाई में साय हो मेरे दुखमम जीवन के पहले परिच्छे की सूचना मुझ मिप्ती। पहाड़े के अको से मेरे जीवन भ्यापी शत्रुत्व की शुरुआत नरा यारयाशित ग से हुई भी। अभी इतना ही बताऊगा हमारे मोसूना लसा जोखा रिए अभी इतने ही की बहरत है। मास्टरजा ने मुझे उंगली पर गिनना सिखाया था । पूरते पार म पार जोहन से कितना होता है ? हो तो? गणित में मेरी दीदी उस समय मुझस बहुत भागे थी । उसने महा 'हाय राम तू अभी जोर ही मोर रहा है ? मेरा तो जान पटाव गुणा योय वियोग भाग चारा सत्म हो चुका। मेरे गिमाए म शायद उसी वन काई गोलमाल शुरू हो गया था। जोहना बन्द गरले मैं चुपचाप वठ गया। मास्टरजी बढे भले मादमी थ मारपीट नहीं करते । बार हिसाब छोडरर खेलने की बात सोचन सगे हो ? नया बात है? मैंने कहा जो नही। में यह जानना चाहता हूँ कि पहल जोड ही क्या हाता है घटाव गुणा या भाग क्यो नही करते? माज सोचता हूँ मास्टरजी साधारण बुद्धि के मादमी नही थे। उन्होंने कहा था गुणा भाग असल म और कुछ नही जोड पटाव का ही एक बडा प्रकार है । मसर मो है वह है जो मोर घटाव । रसोई म जसे सब कुछ मा वा मुना हुगा होता है, या उबला हुआ साग गणित शास्त्र वसे ही सिफ जोड मौर घटान है। में "पाय जरा समय से पहल पका हुआ था। मास्टरजी को भला पाकर बस सवार हो गया कप पर पूछा पहल जाच्या पहरे पटाव ? भास्टरजी बेचार फजीहम म पर गए थ । बोले शरारत छोडकर पहले यह हिसाव बना लो ना बनाने को कहा है। जय उहाने देखा कि मुसम हुक्म मानन का काई लक्षण नहीं दिखाइ द रहा है तो वोल, 'ऐसा करागे तो मैं पिताजी से कह दूगा। पिताजी स कह दन का नतीजा मेरे लिए कुछ अच्छा न होगा यह जानता था। सकिन मास्टरजी मा मोहराने का तरीका मुझे मालूम पा। सोचते हा माज भो थम आती है कि अपने शिक्षा गुरु को मैंने बिलकुल साफ शाम कह दिया था कि आपने नही पिताजी से कहा तो दांव देखकर आपके बहीखाते मे दधात उलट देने स म धाम नहीं आऊँगा। मास्टरजी की लापरयाही स एवार वहाँ पर दवात उलट थी मक चलते पिताजी ने उनकी रया गत बनाई थी मुझे मालूम था। और स्याहीपुत उन धौपाक पुनस्टार के लिए वह कसा अमानुपिक यम सया गम उठाना पड़ा पा यह भी अपनी आँखा देखा था।

१२ योग वियोग इस घमको का नतीजा निकला था। निरुपाय होकर उहाने मुझे समझाने की कोशिश की थी कि जोड और घटाव गुणा और भाग पर ही गणित को दुनिया है । पता नही क्यों पहले जोड सिखाया जाता है पिर घटाव। मैंने महा यह पुरालाने से काम नही घरगा। मोड बड़ा है या घटाव यह यदाना ही पड़ेगा। मास्टरजी खीमकर बोले क्या पता ' हमारे पुरखा ने पहले कोड का याविष्कार किया था या घटाव का नही बता सकता। लकित हाँ काम लोगो ने दोनो ही आते हैं नहीं तो जमा-सच नहीं हाता । इसमे याद मौके-बेमौके मास्टरजी का मितना तग क्यिा नही रह सकता। जब भी सवाल हल करने का मन न हुआ जब भी फांकी दने की इच्छा हुई सभी उस पुराने मसले का उठाकर उह परेशान पर दिया । आज भी यह सोचकर हैरानी होती है कि वे धेचारे घूठे किस असीम धीरज से मुझे शान्त करने की कोशिश पिया करते थे मझ सम शाने के लिए स्तिनी सहज मामूली उपमा दूंढ निकाला परत थे। कहते मो समझो अभी उस दिन तुमको एक भाई हुआ है । मह हुया जाम। मौर अपन जोडन मोदी की मां मर गई यह हुमा घटाय । मगर मैं एक भी सुनने को तयार मही। नतीजा यह हुया कि छ नहमा । मैं बस यही महता रहा कि यह यताइए, इन दोनो म महा कौन है ? सो मास्टरजी के दिल से चाहने के रायपूट में हिसार म मच्चा रह गया। मेरे हमउम्र लड़के पर इत्त बडे बटे गुणा भाग यहाँ तक कि ल स य और म स व एरने लगे में उसी जोद घटाय में ही गोते खाता रहा। गुरु को सताने का मूल्य मुझ बाद में भी काफी घुमाना पड़ा। शुरू की इस भूल को कभी सम्हाल नहीं पाया। मेरे पूरे छात्र-जीवन पर इस हिसाब ने जीती-जागती विभीपिका होकर अपनी अशुभ काली छाया फला रखी थी। आज भी इतने दिनो के बाद छटपन की वे बातें पोप पाती है।

योग वियोग रगता है जाड घटाव का यह हगामा न रहा होता तो यह दुनिया कसी असीम शाति का बसेरा होती । मानव-मम्यता + उस मादि युग में अपने पुरखे इस जोद के झमेले मे क्या पहने गए नहीं जानता । हो, यह जोड़ है, जभी घटान माया है । मास्टरजी ने बताया मा जम है इसरिए मत्यु है । जोडन को माँ पदा नहीं हुई होती, तो उसे मरना नहीं पड़ता। और फिर जोड़न का भी नग वदन नगे पांव गल म उतरी लपेटे यो घूमते फिरना नहीं पहला । अपनी कच्ची चुदि से उस समय मैंने सोचा गोटन की मां यदि पदा नहीं हुई होती तो मेचारे जोहन को इतनी सालीफ नहीं उठानी पड़ती। उस समय क्या पता पा मि इस जोड घटाव म जोडन का अस्तित्व भी निविदास जुठा है । और मी याद आता है जब जरा वहा हुआ तो मास्टरजी कहते बह रहन से काम नहीं पलगा। हिसाम करते ही जाना होगा-या तो जोड या पटाय गुणा या भाग कोई-न-कोई करता ही पड़ेगा। अाज समझता हूँ दुनिया में भी यही है। हिसाव का राम रखने का काई उपाय नही । मा तो जोड़ या घटाव गुणा या भाग-~-करते ही जाना पड़ेगा। ओ भाग्यवान हैं दुनिया म प जोरव हैं अभागे घराते हैं । जो बहन ही सौमाग्यशाली हैं उनके लिए है गुणा और भाग्यहीनो केहिए सिफ भाग। बहुत सी पुरानी बातें याद आती हैं। अपनी लेखा-बही म पिसी विराट मास्टरजी कशार पर भी पेवल जोडा हो जाता है और कभी म्वच घटाव पर पटाय । गुणा भी है और भाग भी। इस ओर पटाय, गुणा भाग २ अन्त म जिन्दगी के हिसाब का फल क्या निकलगा फोन जाने ! चायद हो कि भूय निकले लेरिन नतीजा नानकर तो हिसान करने के लिए रठा नहीं है। या गुरू । इसका कोन सा जोड़ है कौन-सा पटार बहुत यार यह भी नहा समान पाता। मितु यह दोष हिसाव का नहीं हिसाब म । योग वियोग समझने वारी मपनी अक्ल ही इसकी जिम्मेदार है। को ज्याला जोड घटाव गुणा भाग सब गदवस होकर एकाकार हो जाता है । छाना दाको खसयोर ज से ही मन म सर आती है वस ही हिसाब मा जटिल थक और उलझ जाता है-जोडपी जगह भाग और भाग वा जगह गुणा कर बठता हूँ । अतीत मुदूर अतीत और इस यतमान का काल के फ्रम से सजाकर रख भी सगा ऐमा नहीं लगता। लकिन हिसाब में उसझन हाने स तो नहीं चलने ।। छानादा क बारे में मुझे रिखना ही होगा । भानता हूँ इसके बाद से मनुष्य की दुनिया में मुझ सम्मान मा मामन नही मिलगा । र किन भतन स सजोए अपने सुनाम भी आशा म सन्देहजनर व म जो रखा है उसे ता पेल होना ही है । लकिन शुरू से ही पहूं । मास्टरजी व हाथ से छुटकारा पाकर एक दिन हावरा जिला स्कूल में दाखिल हुआ था। यहाँ कई साल बिताकर जिस स्कूल में मुझ अनिवाय कारण से ट्रासफर सना पडा उसफा नाम है विवेकाना इन्स्टीटयूगन । हापा को नमाजी सुमाप सहक पर इस स्कूल की पुराने ढंग की तिमजिली इमारत को यापम से पिसी किसी न देखा होगा। यहाँ हम सबसे कुछ साल में सीनियर थे, लक्ष्मीकान्त मण्डर । उह हम सभी छानो-दा महार पुकारते थे। उनको स्कूल म दूर से देखता भौर सोपा करता-पाश में किसी तरह छाना-दा असा हो पाता। छानो-दा उस समय हीरा हो रह थे। इसलिए नि स्पोट स म कोई सानी न पा उनका । ऊँनी कुदान में भी भइल । चार सौ चालीस गम और दो-सौ बीस गम की दौड म भी उनसे पहला पुरस्कार कोई नहीं ल जा सकता था। चार मील चलन को होड में भी उस बार जिल म अव्वल माए मोर मातीमा चलन्म कप जीता-इतना बडा पप फि अरेल ला नहीं पा रहे प ढोकर । खेर का मिस देवता क मघोन है, मालूम नहीं।

योगवियोग शनोदा पर उनके प्रसन्न होने से ईर्ष्यालु देवी सरस्वती विरूप हो बठी। विषकानद स्मूल क दजा सात ने स्टेशन पर छानो-दा की विद्या मा इजन जो रुका सो फिर नहीं हिला। लगातार तीन साल तक फेल । मन्तिम वार इम्तहान के समय छानो दा कमर मे कागज छिपाकर ले भाए थे। अपने हेडमास्टर साहब को आँस को रहार यत्र ही कह लीजिए। जैसे ही उस कागज से खातोन्दा लिखन गए हेडमास्टर माहव के ही द्वारा रगे हाथो पपड लिये गए। पहले इम्तहान के हॉल से फिर समय पर स्कूल से ही विग होना पहा उन्ह । उसके बाद वही हुआ जो हाता है। छानो-दा परबार हो गए। पाँडारवगान म चाय की एम गन्दी दूकान पर बळ धोरी पोते रहते। वहां भद्दी गारिमा भी चलती। सुना कि उसी उम्र म छानोन्दा ने गांजा भी शुरू कर दिया पा। स्कूस जाते समय कभी-यभी चाय की दुकान पर उनसे मेरी मुलाकात हो जाया करती थी। मुन बुलाया भी ऐ सुन । हम अच्छे लहने थे। बौडी पोने वाल से लड़के से बात करने म शम से सिर झुकता था। छानो-दा वे बडी भलमनसाहत से बात भरते अपने शिक्षक लोग सब मज म हैन? चार मील वाली होस में इस बार फोन अव्वल आया।" छाना-सा जानवे मे कि में अच्छा सहका हूँ। इसीलिए गाली गलौज नहीं करते । फिर भी मुझ पर बना रहता कोई देख न र कही सोचेगा म तुरा हो गया है, या नहनुम जाने की राह पर पदम बढाया है। इसके बाद से छाना दा मुझे ज्यादा नहीं गया करत । शायद उन्हनि मेरे मन की स्थिति मा भांप लिया हा। लक्नि एक दिन अचान उन्होंने मुझे बुला लिया। एक गदा हाझपट पहन वे बाड़ी पी रहे थे । मुझे दखते ही बोल 'ऐ मुन। उस वार स्कूल की पत्रिका म मेरी एक रचना छपी थी। वे कुछ देर तक मेरी तरफ अचरज से साक्ते रह गए। फिर मोले अण्डा तू 1

योग वियोग
7
पहानी सिखता है?
मैंने गम्भीर हाकर गरदन हिसाई। छानोदा के अचरज पी सुमार
सन भी नहीं कटी। पूछा
'कहानी लिखता कसे है।
जरा वापर जवाब दिया 'बनाकर।
छाना दा और भी हैरान हा गए दिमाग में शायद महानी आ
जाती है ? भन्छा रवि बाबू भी तो इसी तरह से लिखा करत ये
छानोन्दा ने जानना चाहा ।
मैंने विश की नार हलका हसकर हामी भरी और ऐसा एक भाव
दिपाया कि छानो-दा को समझने में तकलीफ न हुई कि मैं और रवीन्द्र
नाप दोना ही मसक हैं और हम दोना दिमाग लगाकर लिखते हैं । और
इसीलिए शायद छानोग उसी समय से मेरे बारे में बहुत अच्छी धारणा
कर वठे थे। भेंट होते हा घात करना चाहत । और भी खुद ही
होगियार र देते हम लोगा स मत मिला-जुग पर हम लोगा का
रेमा वराय है। दिन रात लिखा पढा परना और दिमाग मगार
लिखते जाना।
इसी प्रकार और भी बहुत दिन चरते। लकिन छानोना कही
गायब हो गए थे और मैंने भी खास सोज-पृछ नही मी बल्कि उनस
छुटकारा मिल गया इससे धन की सांस सी ली थी। इस बीच पत्रिका
म मेरी और भी रचनाए निकली अग्धे लड़के के नात मेरा नाम बोर
घटा और इसी सौभाग्य के ज्वार म अवाछिन छानोमा और भी दूर
हट गए।
लेकिन बहुत दिना बाद छानो दा की फिर मुझे जरूरत हुई।
पिताजी अचानक पर बसे । मुफस्सिल को अदारत के वकील रोज रोज
को अन-वस्त्र की महा म ही जुटे रहते अनागत भविष्य में लिए जोडने
का अवसर नही पाया। मेरे लिए मडा दुर्तिन आया । पसो की कमी से
पदना छोडपर नौकरी के चक्कर मे घूमने लगा।
मगर यहाँ नौररी ? सुना पा, पसे हा तो मलकसे म माघाइच

योग वियोग । । तर मिल सकता है। इसलिए पिताजी को दी हुई सोने की अंगूठी योर बटन पर कुछ रुपए जुटा रखे थे। मरे एक नजदीकी रिश्तेदार न सौ रुपये सलामी देकर एक सरकारी दफ्तर मलाअर डिवीजन किरानी की जगह हासिल को पो। मेर लिए ध्रुवतारा सरोखे उन सज्जन ने कहा था रुपए मौजूर रखना पा नहीं कब सुयोग आ जाए तो रुपया न रहने से जनम भर अफसोस से मरते रहोगे। रुपए तो मेरे पास यकिन नौरीकहाँ ? अन्त म टाइप सीखना शुरू किया। जितनी जल्दी मीप मक मही भेण । लकिन यहां भी बाधा। टाइप स्कूर का मारिक भवतारण वायू नगे बदन हाघ म ध लिये शिकारी कुत्त-असा मगीन के पहरे म मुस्तदा । सिसान का रत्ती भर भामह नहीं मिप इसी पर नगर कि कोई आध घटे से ज्यादा तो नहीं टाइप कर रहा है। माघ मष्टा भी धीरज परपर नहीं वह सकत । पच्चीस मिनट होते ही चिल्ला उम्ते रमिंगटन तीन नम्बर फाइव मिनिटस मौर। वही कोई ज्यादा सीप ने इसीलिए ऐसी कसी निगाह । कोई-कोई छात्र नाछोरवन्दा था। उसे जब तक जबदस्ती हटा नहीं दीजिए टाइम करता जाता । भवतारण मादू कढे यह लगन मट्रिक के समय दिखाई हाती स्कालरगिप समर आई. सी एस० बी०सी० एस० हो सक्त इस मकस यजाने वाली लाइन ममान को नोवत नही माती । कुछ लोगो को मैंन इसी बीच रह रसा या राइपिस्ट की कोई जगह मही हो तो खयार रखेगे मरा। चालीस को सौर हो गई है। मेरी पोर को सुनकर कोईकाई अपचका उठे, मर भाई अब यह रामराय नहीं रहा । बालास की स्पोर म अब हवका मेमसाहब के सिवा क्सिोमानीपरी नहा मिलती। मेरेरफार की मामा का छाकरा वा हसते हसते पचहत्तर को स्पीड म टाइप करता है। वह छोकरा पार मज के बाद एक घण्टा एक्स्ट्रा टाइप करता है-~-सो की स्पीड उसकी हुई समझ योग वियोग 7 दो चार जने तो मुझ पर नजर पड़ते ही दूसरी तरफ से चल देते। साचते नौकरी में लिए रोना-गाना शुरू कर देगा शायद । रास्ते पर चुप चाप खडा सोच रहा या पतालीस रुपए लगामर एक घनदा क्यष खरीद ? विज्ञापन म सिखा पा कारा की नौकरी निश्चित है । हाँ अगर जल्दी फ्ल चादसे हा ता आणविक शक्ति वाला एनस्ट्रा स्ट्राग क्यध है। दाम लक्नि बहुत है-एक सौ बहत्तर रपए । इतने रुपये वहाँ से आएग' एसम एक दिन छानोमा पर नगर पढी। सादा हाफ शट खाकी हाफ पट काल जूते और हर माजे पहने घसे जा रहे थे। हाथ म चमडे का चौकोर फाला बग । मुझे देखत ही व यम गए । पास आकर बोल न" सौन-सी कहानी लिखी? मैंने कहा कुछ भी नही लिखा । मरे जवाब से छानोन्दा लकिन निराश नहीं हुए । बोल रवि वाबू मी तो कभी-कभी कुछ नहीं लिखते थे। चुपचाप यठ रहत ये । कवि कलाकारों के साप यही ता मुसीवत है। वव देवी सरस्वती की कृपा होगी उसक आसरे मह म अगूठा डाल चुपचाप वठ रहो। हम रोगो के साथ यह बलरा नहीं । सला भूख जन लगगी नो जसे भी हो रुपए फमा पर पेट भरेंगे। कोई जवाब न देकर मह पर लना चाह रहा था कि छानो-दा क काले बग पर नजर पडी । उस पर सफेट रग से लिखा था प्रेट इडियन टाइपराइटर लिमिटेड ! छानो-दा चले जा रहे थे। मैने हठात् मावाज दी छानोन्दा। चौक्कर ये पलटे और मेरे पास आये। उत्तजना से मेरे तो होठ कांपने लगे। अब तक तो फिर भी मल लोगो से नौकरी के लिए कहा है। सय बस्ती वालो का भी पकहना होगा । छानो ता वाले बुलाया कुछ पहना है छानो-दा आप टाइप का काम करते हैं ? हो मेकनिक है। मुझ ?

योग वियोग १६ पम का सिर खाकर में मोना मैने राइप करना सीखा है। छानोगमानो चौक चठ । बोल अरे तू इस लाइन में श्यों रवि मावू क्या टाइप करते ५ 7 मैं जवाब न द मका। सांसों स मोमू रहन लगे। - समम गए। नौकरी न होने स मृत भूपो भरना पड़ेगा यह भी समय गए । पीठ पर एर थप्पड लगाकर वोल घबरा मत मैं घरानोरा टीयर गा। मशीन ठीप रन क लिए कितनी जगह ता जाता हूँ। दूसरे दिन गाम पा फिर हम दोना को भेंट हुई। छाना-दा चाय की दुकान पर पर शाह को पचा पर रह थ । मुझे उपर स जान देखकर गया। बाल चाय पिम्पुट ल। मुगेगम थाइ । पहा यह सब जाहिए । आप मरी नौकरा मी पाशि पर रह है यहा बहुत है। छाना- नान पहा 'साविना सा महानी रिसन करा दिमाग नहीं गुलगा । उसका को दिमाग साफ रखन के लिए कितना क्या साना चाहिए। हो तरी नौपर लिए बहुत जगह पह रखा है। फल पनि तू मर साय भरना पार्टी के पास साय ही ल चटगा। दूसर दिन सवरे मरा नई जिन्दगो शुरू हुई। ६५ नम्बर माहार-चगान मन में एक अघरे यमर में व रहन प । उनक कार पर नजर पst- प्रट इडियन टाइपराइटर सिमिटड पारी एड हेड यॉफिस १५ वाटारवगान एन हावा। सिटी मॉफ्सि १६७ स्वालाएन फोन मरा हा दसपर धानादा हस पह। अपना बग लिखाकर माल माफ्मि का नाम-वाम देखकर घबरा मत जाना । मसल म अपना यह मग हो अपनी फकारी है। यही मरा सिटी बॉफ्सि है और यही है।

२० योग वियोग आफिस है। कारन रहने से पार्टी महा जाती है । सोचती है बोगस है। यस और ट्राम स चलकर जब हम म सत्ता के ऑफ्मिों वाले इलाके में पहुंचे तो लगभग ग्यारह बज रहे थे । लकिन ग्रेट इडियन टाम्पटाइटर कम्पनी कहाँ ? पुराने टाइपराइटर की एक छोटी-सी दूकान जरूर दिखाई दे रही थी लपिन उमका कोई नाम नहीं लिखा था ! दूकान थे आगे रास्ते पर मुटर वेंच विछी थी। उन पर कुछ लोग बड़े थे। उन सबक हाथ में छाना- जसा पमरा एक बग । छानो- को देखत ही सम दोर-सा पर उठ । सभी दुवल-दुबले-से। महता पहनावे म हाफ पट । दो एव जन अधमली धोती और म्यूकर के रग उड़े जूते पहने थे। रेमिंगटन रिवन की डिविया से बीटी निकार कर सुलगात-मुलगाते एक ने कहा आइए आदए माता । छानो-दा लकिन जल-से उठे । बोले देखो तुम लोगा को सावधान लिए देता हूँ तबान से अगर पुरा फुछ निकला तो एक ही धूसे में चेहरे मा भूगोल यदल दूंगा। उन्होंने लागो से मेरा परिचय कराया यह मेरे छोटे भाई जसा है। तुम लोगों की तरह गया बीता नहीं। बहुत ही अच्छा लडका । इमको रिसी पविता पहानी पत्रिका में छपती है। मन की सच ही उन भर मानसा ने अयाक होकर मगे भोर ताका। नाल तो पडे क्यो है ? यठिए । जिस भर मामी ने पहले वात गुरू की थी चे बोल माप दूसरा कुछ न सोचें सर आपने भैया से बाबा का रिता जोडा है। यह बुरी भारत यडी पुरानी है । एकाध बार गएसी हो सकती है। जो मर आदमी दूकान म सहे थे उनके वान पर तेल चिकटी गी। मास की ऐनम पी एम कमानी नदारद-धागे से बधी। कांच की अलमारी म नाना आकार प्रकार के यनादि । छानोदा ने फहा पासू-दा सर म स्या दुम पर सिला रहे हो दोन एक एसकेपमेंट ह्विस । पार्टी हाथ से निपल न पाए। पान चबाते हुए पापू दा ने कहा चौह नगर रेमिगटन न ? कम्पनी योग वियोग का मार तो मगवा देता हूँ। बैंच पर के एक सम्जन ने दवे गले से छोक डाली अरे रहने भी दो अपना मतीपना कम्पनी का माल बचकर हजरत घरवासी का गहना कपडा खरीदेंगे । कम्पनी के माल से हम मशीन की मरम्मत भरनी पडे वो खूब खामा फमा के। अन्दाजे स समन गया यहाँ सफण्ड हैंड माल का स्टाक है। मिटमिट करके हमते हुए पांचूना बोले खर, जहाँ से भी हो, एर दे दूंगा। सकिन पए पूरे दस लगे। 'इसीलिए ता तुम्हारी बीवी भाग गई। घरवालों से भी कावली सवा रुपए का माल और दस रुपए म फटकारना बाले-जसा व्यवहार 7 भाहते हो। उनकी बात चलती रही। मैं वेंच पर चुपचाप बठा रहा । एक ने फहा दुनिया में जितने टाइप मानिक है सबको यहाँ आना पदवा है । हम सम प्राइवेट प्रक्टिस करते हैं-~-रेमिंगटन या अउर पर माहारी तनवाह की नौकरी नहीं। पाच-दास पाट स खरीदार छान वेष पर आ बट । इस राय में छानो दा का प्रताप गजब का।हर मेवनिक उनसे सरता। इस मोन कोई माह मेकनिक बेंच पर आ वठ । छानो दा ने कहा देखो मेरे इस छोटे भाई को एक नौकरी चाहिए। टाइप सीख रहा है। सरा सात दिन का समय देता है। जहां भी हो इस मीच में इसे काम दिलाना होगा। नहीं हुआ तो सिर फोड दूगा, समझ लो। मल पड़े-कुरते पहने उन लोगा मै सफाई नाराज किन नहीं हुआ। एक ने कहा जो कम्बरून हम मोगा से मशीन की मरम्मत कराते हैं ये भादमी हैं ! खटमल है सदमल ! नौकरी भी होगी नो सून धूस लेगा। छानो दा बिगर ठ। कहा 'राजकिसन, पतगड फिर बनाना ! मामी मुरी ही सही एक मौकरी जुरा । मेरा भाई आखिर तुम लोगों को सरह हासपेज तो नहीं है । पेट म समधिग है ।

योग वियोग वस और . आफ्सि है । कास न रहने से पार्टी भहर जाती है। सोचती है बोगस है। ट्राम से चलपर जब हम क्लात्ता के ऑफ्सिो वाले इलार में पहुंचे तो लगभग ग्यारह बज रहे थे। लेकिन ग्रेट इडियन टाइपटाइटर कम्पनी कहाँ ? पुराने टाइपराइटर पी एक छोटी-सी दूकान जरूर दिसाई दे रही थी मकिन उसका कोई नाम नहीं लिया था। दूकान आग रास्ते पर कुटक उप विछी थी। उन पर कुछ लोग वठ थे। उन सबक हाथ म छानोमा जसा घमोमा एक यग । छानो-दा को देखते ही सब शोर-सा पर उठे। सभी दुरल-दुरल-मे। बहता ने पहनावे म हाफ पट । यो एक जने यधमली पाती और यूकट के रग उटे जूते पहने थे। रेमिंगटन रिवन की डिविया से वीड़ी निकार कर मुर गात-मुलगाते एक न कहा आइए आइए वादा । छाना- दाकिन जल-से उठ । वोल देखो तुम लोगा को सावधान किए देता हूँ पवान से यगर बुरा कुछ निकला तो एक ही चूंसे मे चेहरे का भूगाल वदल दूंगा। उहाने लोगों स मेरा परिचय पराया यह मेरे छोटे भाइ जसा है । तुम लोगों की तरह गया-योता नहीं। बहुत ही मच्छा रहा। इसकी लिखी पविता कहानी पत्रिका में छपती है। अब की सघ ही उन भलमानसा ने भवान होकर मरी आर ताका। बोले तो खड़े क्या है? वठिए । जिस भए आदमी न पहल यात शुरू की यो व बोर माप दूसरा बुछ न सोचें सर थापरे भया से वावा मा रिस्ता सोडा है। यह बुरी बादत पडी पुरानी है । एकाध बार गल्ती हो सकती है। जा भर मादमी दूकान म स थ उनके बदन पर तेल चिकटी गनी । मांस की ऐनक को एक कमानी दारद-धागे से बंधी। कोच की अलमारी में नाना आकार प्रकार के पनादि। छानामा ने कहा पांपू-दा मर भी मयो दुम पर खिला रहे हो दोन एम एसपेपमेंट हाय से निकल न जाए। पान चबात ए पाँचदा ने कहा चौदह नबर रेमिंगटन न? कम्पनी हिल । पार्टी योग वियोग २१ मा माल तो भगवा देता है। बन पर के एक मज्जन ने दवे गले से सोरु गाली, 'अरे रहने भी दो अपना सतीपना । कम्पनी का माल बेचकर हजरत घरवाली का गहना कपडा सरोदेंगे । कम्पनी के माल से हम मशीन की मरम्मत करनी पडे ता सून साया फमा के।' अन्दाज से समझ गया यहाँ सेकेण्ड है: माल का स्टार है। मिटमिट पर हसत हुए पाँचदा बोलें खर, जहाँ से भी हो एव दे गा । किन रूपए पूरे दस लगेंगे। इसीलिए तो तुम्हारी बीवी भाग गई। घरवालों से भी कायली वाल-जसा व्यवहार सवा रुपए कामास योर दस एपए म फ्टकारना पाहने हो। उनकी शात चलती रही। मैं मंच पर सुपचाप बठा रहा । एक ने कहा, दुनिया + जितने टाइप मैकनिक हैं सबको यहाँ आना पस्ता है। हम सब प्राइवेट प्रक्टिस करते हैं-रेमिंगटन या मडरउड पर माहवारी तनसाह री नौकरी नहीं। पाच-दा से पाट स सरीरकर छानाम वेंच पर आ बट । इस राय में छानो-दा का प्रताप गजर का। हर मकनिक उनसे पता। इस बीच कोई सत्रह मेकनिक बॅच पर आ ठे५। छानो दा ने कहा 'देवो मेरे इस छोटे भाई को एक नौकरी पाहिए । टाइप सीख रहा है । सला सात दिन का समय देता हूँ। जहाँ भी हा इस बीच में इसे माम दिलना होगा। नही हुमा तो सिर फोड दंगा समझ ला ।' मल कपड़े कुरते पहने उन लोगो म से कोई नाराज लकिन नहीं हुआ। एक ने कहा को कायस्त हम लोगो से मशीन की मरम्मत कराते हैं वे मादमी है। सटमस सटमा ! नौकरी भी होगी, तो भून घुस लेगा।' छानो-दा बिगारठ।पहा 'राजकिसन यगड फिर बनाना। कमी दुरी ही सही एक नोररी जुटा । मेरा भाई माखिर तुम लोगा की तरह शासपेज हो नहीं है । पैट म सममिंग हैन।

२२ योग पियोग मुझे साथ लेकर छातान्दा निकल पड़े। एक दफ्तर में आयरिंग और सफाई का काम था। मुम बग यमार मनो दा ने काम शुरू किया। मैं देखने गा । उसो सिलसिस में उहोने मरी नौपरी की योशिश की। लपिन निसमा नमीद हा पत्थर से दवा हा उसरा माई क्या करे ! काम खत्म करर दो रुपए जव म सलते हुए छानो-दा ने मशीन के मालिक से कहा 'मफोन को एक बार भोवर हॉल परवा लीजिए और दस साल हसते-खेलते चली जाएगी। मालिक ने पूछा झडोगन सी है? बडीशन | भजी यह पीज बुनियादी है। पुराना चावल उबारने में बढता है । जा मॉडल आरक्ल है ये सब ठोक मास की औरतो बस है। देखने म ही बनी-ठनी लग्न मोरी काम की नहीं । कडाउन लगा ही रहता है। माल्भि लेकिन मोठी बातों से भीग नहीं । बोठ अच्छा एक महीना एक बज रहा था । छानो-दा मुझे लेकर सीधे एक मिठाई मो दुकान मे गये। मोई बार आने का खिला दिया मुझ । मैंने आनाकानी को भी, किन्तु उनकी बस यही एक बात अच्छे लड़कों को खाना चाहिए सब सो दिमाग खुरगा ! अभी तो चविता पहानी लिख सकोगे। ! धोरे घोरे टाइपराइटर की अजीब दुनिया से मैं परिचित हो उठा पा । अपहरउह मी हा कास्टिंग स्मिथ कारोना म नही लगेगी लग्नि स्मिथ का टाइपवार कुशन इम्पीरियस मशीन में मजे में फिट हो जाएगा यह मने भी सीख लिया । लग्नि नौकरी का कोई ठिकाना नहीं। मन निराश लौटे। बाल किसी भी तरह से और नही मठता। छानो-दा यह सुनकर बहद नाराम हा जासे। कहते मह प्याजी गुल रहन दो । भौर तीन दिन का समय देता हूँ। मगर इस अरसे में नौकरी इसकी नहीं गी तो हम में से हर किसी को रोम एक आना जुर्माना योग वियोग २३ . भरना पडेगा। जर की रस्म निरलेगी हो तुम सोगा की टमक टूटगी। इतना महार छामा छ भटो गाली वस्न जा रह य पिन्तु मरी सोलूगी का मसाल हाल ही जम्ब कर गए । मैंने उनस कहा मा 'मातिर कर तर भर लिए पसे विषारत रहेंग माप ? मैं कहो विगाह रहा हूँ कमा रहा है। मर साथ-साथ पनरों म जाता है, मेरी मदद करता है. मी म्यागोई कीमत ही नहीं। मदद at में धूव कर रहा हूँ। छाना- पार्टी राना यह मरा असिस्टेंट है। मशीन री जांच करते-मरत रहते टेकडाउन । मैं अट बग से रपर री मुहर लगा पर निकासना और एस्मिट तयार करता-~- एक करज स्ट्रप १ समै एमडग कागि ४. रुपय मविस ५ रूपप । कुल ५३ रुपय। मशान वाला सम्व हिसाम से पोरसा इतन रुपये। महता भी नहीं सर, यह हमारा युजमल बाज है।किन माग मारे रेगुलर स्टमर है आपके लिए दस रुपये की छूट । छानो- कागज पर शम्दी सही मारते-~~-एल० मण्डल पनेजिंग हाइरेक्टर । कहते, सर, चुमि हम लोग बग लिय पूमने फिरते हैं इसी हिए। एक बार कम्पनी में मगीन भन देखिए । मरम्मत री तो दूर सिप देखने को ही पचास रुपय सलामी ।" कस्टमर ने कहा, 'कहाँ कम्पनी का काम और यहां आपना' सम्पना के मिस्त्री क हाम मा मान से मड़े हैं सर मेर हा पैसा कोई ममागा परेगा मरम्मत । लेपिन हस्तार करेगा पाई गोरगर कारा मद साहव । भाखिर उनका सनसान हाये कहाँ से आएंगे मार हामोर्गों की समर से म? कस्टमर कुछ पसीजा, मह देखकर छाना-न ने फिर कहा, 'मानित कम्पनी का भी काम देखा है सर । मरम्मत होकर जिस नि मनीष वापस माई फिर सौनि ठप हो गई। मापको यकान न आए दाई ૨૪ योग पियोग । पता दे सकता हूँ। मम वह कम्पनी का आखिरी सलाम रफ मुझ काम देती है। ऐसी वसी नही सर मेम साहब टाइपिस्ट । खरीदार न कहा अच्छा। छानो-दा न नहा मेरे काम से मेमसाहव वहद खुश हैं । कहती है मिस्टर मण्डल तुम्हारा टप माना फेर टप है। की-बोर के टप की कीमत को व जानती हैं । पतली-पतली उगलियां हयोगी पौटने जसा टाइप करना उनस नहीं बनसा । खरीदार ने कहा माछा छाना दा ने अर्ज की आखिर कोई मगीन को ठीक से मरम्मत क्या पराता है ? चिटठी अण्डी छपेगी इसलिए नहीं। इसलिए कि प्रोडकान वट जाएगा । एक भादमी दश टाइपिस्ट का काम करेगा। अब छानान्दा ने अपना प्रसग उठाया तो एस्टिमेट को देख लेंगे जरा? नहीं । रख जाइए वाद म सबर दूगा। एसे कितने तो एस्टिमट बनते है मगर याहर क्तिने आते हैं दूकान के पांचू बाबू रहते इस राजगार का यही हाल है । मेकनिक तो फिर भी गनीमत है कि आयलिंग पिरनिंग करते हुए डालते हैं । मैं तो पाट स की बिसात बिछाए मक्खियाँ हकाता हूँ। यास्तष म अभीय है यह दुनिया। हसी-मजार गाली-गलौज म दिन ता झटता है लक्नि शाम ता सौरा-पानी क भी पसे नसीब होग या नही कोई नही जानता। मौर रिसी दिन सेरेण्ड हैमगीन की दलाली में बीस रुपप आ गए । दूसर साथिया को फाना कान इसकी खबर भर हो। घेर लेंगे-भरे ऐ रिसी उस युग्दी मगीन को दो सौ मे कसे बेच लिया उसे नवयौवन गोली खिलाई पी? ऋपि बाबू ने सिर हिलाया 'अत्री सनाने की मकस हो तो हर युरखी को छोकरी बनाके पलाया जा सकता है। पिसी तरह से बाहर बाहर पकाचर कर दो। वेवएफ सरीदार उसी से खुग अन्दर के लिए . - योग वियोग २५ व कभी जरा भी दिमाग नहीं सपान । एक न फोहन डाला वुढढी जब ऐंठ वठगी तो समझगा। ऋपि धावून पहा इसम क्या तुम्हारा और क्या मरा ! बुराहट होगी ता मरम्मत कर दूगा। फिर स विल । सब-न सब दुनियादार । पिता का अन्त नहा । एक ने कहा कसा ग्नि-समय आ गया। छानो-दाको गिरस्ती न थी सक्नि अभाव था। फिर भी सभी अवान नहीं सोरते । ऊपर स गरदन पर सवार हो गया हूँ मैं । क्या करू कोई उपाय नहीं। दुनिया म इतन मोगा र हात हुए टानो-दा मुझको नयों प्यार सरत हैं नहीं समझ पाता। मरे स्वभाष ननात नहीं मेरी गरीबी के लिए भी नहीं। मैं लिखता हूँ इसलिए । कव तो स्कूल की पत्रिका में एक रचना सुपी यो। छानो-दा ने उसे पटा भी नहीं, शायर देखा भर था। उसी से अपने का उजाहकर मुझ पर स्नेह परसा दिया। मोर उसी का लाभ उठाकर में लगातार स्वालो सन को पूरान परवठा उनके मत्य खा-पी रहा हूँ। एक दिन वे मुझ पाच बाबू को दूकान पर बिठाकर निकल पडे। उनके चत जाने के बाद पांचू बावू गरदन पुजाते हुए हसने लगे। एन ने कहा छानू बाबू कहाँ गय? पांच बाबू बोले 'समझ ही सक्ते हो आज सात तारीख है। ऋपि पावू बोल तकीर! नहीं तो सला को ऐसी पार्टी कहाँ पुटती? पान बाबू ने कहा तुम लोगा का नसीव साटा है तुम लोग टाइपिस्ट बाबुओं की मशीन पनाते-बनात हो मर जामोग । क्या कहा दादा ! कार्ग-सी सही-सही दाढ़ी और मली रमीज पहने टाइपिस्ट बापू कठ हैं। मगर छानो को नसीब से क्सी मेम साहब मिल गई है। एक ने कहा। पांच मावू को ज्यादा उत्सुकता थी। पूछा देखा है मेम 'साहरको?"

योग बियोग देखा नहा है मतलब? मासम ठौर जरो पोलसन म मसन को बनी हो । और कार से किसी ने माना पाव भर गुलायमल छिरक दिया है । उस बार जब छाना का पेट की बीमारी हुई थी में हो तो गया था मशीन बनाने । यसम मशीन क्या बनाई भुर भुर मुगध आने सगी गुनान की। महा देखने से जो जुहा जाता है। एम ने कहा इसीलिए तो उस बार तुमने पूरे डा पट तर मगान बनाइ थी। झूठ मत पहा कसम घण्टे भर था पूरा एर घण्टा । लकिन हाँ आये माजी नहीं चाहता था। और मैं जय तक मशीन बनाता रहा ममसाहर बगल को गुर्सी पर वठी देखती रही । अचानक दपता क्या है गरदन हिलाती हुई गुनगुनारर गा रही है । उसके बार काम छापरी न हाप के नासून पाटे ग स आ ना निकासर कधी की हाटो पर सिर कगाया। शादी-बादी पर ली है श्या कौन जान भया ! लकिन मसी-सी एगी। मासे पूछा सम मया पर इज मिस्टर मन्त? साचा मह ई सुम्हार मिस्टर महल या पट गया हो गया है-ही इज रिरिंग । फिर सोचा मो नया जरूरत परी है । छानो गाय नाराम होगा । सानह दिया उसे सुमार माया है। 'वाह सासी अप्सम दो दिखाई ! एक दूसरे ने महा । ऋषि वायू बोल मोह यह सुनकर ममसाहय या जो तकरीप हुई दो-तीन बार सुनी। उसक बाद पहा आ आइ एम वरी सारी। पानू बाबू ने कहा गया नागा तुझे उतनी स्योरी होने की क्या पदा ११ तेरी मशीन साफ़-मूफ का पसे लिय और चला भाया । मानिस पी पूल्हा चरमी की सबर मा तुझे क्या करना ? उन सबकी नजर मब मुझ पर पड़ी। कउ उर-ग गए। पांचू चावू ने पुर घाटमर पहा हम सब जरा आपस म हिसार पितार करते हैं- माए ? -

मोग वियोग
२७
भपने दादा स भाप यह न दौनिएगा। ऐस है व मि खून फमार पर
बनेंगे।
मैंने डरते हुए कहा, नहा कया ।
हिम्मत पाकर भूपि गाबू वाले लगिन नही अन्तिम पा। सम्बन
मानो ने फिर कभी हम लोगा को नहीं भगा । लेग्नि मन अभी भी नसा
सागरकर पर उठना है।
पाधू शबू ने कहा 'मा
प्रपिवाबू ने कहा मैंने एसा भी पापाजल दिया भई विल ने पसे
सुम ले सेना में सिफ माम कर मा। सम उस पर भी तयार नहीं।'
अब कार में एक रुपये का लालच दिखामो उससे अगर काम
बने।
कसम ओ पीन है मुझे उसम भी आपत्ति नहीं है तुम्हारी अप्रेमी
तस्वीरों की स्टार कहाँ लगती है !
और भी शातें होता गाय शक्ति एक ने होसियार पर दिया नि
छानो-दा आ रह है। सुनना था कि सब फिन हो गए। इशारे से पाचू
बाबू ने मुप्त मौन रहन क बचन की याद दिला दी।
छानो- आर पेंच पर 3 गए। दूसरे मानिक मी धोरे
धौर यहाँ इकटठे हए । छानो दा न कहा, 'तो सला तुम लागो न मरे
नाई की नौकरा रिए कुछ नहा रिमा । कई दिन निपल गए। भाज
जुमाना दाक्षिण रानपा हरेक से एक-एन आना वसूलो।
हवम हान की दर नपा न जुमाना वसूसना शुरूर दिमा । और
Pमा सदन विना रिसी ना-नू क नेपा को एक-एम आना देना शुरु र
निय { छानो-दान बार मान गिय। तो कुर रितना हुआ ?
एक रुपया चार भाना।
गुर" हानादा ने कहा।
पर लोरत हुए हावा स्टेशन पर जानादान चे पसे मुझ लिये। मुम
बड़ी गम हो रही थी तनि उहाने नवस्त बना दी।
मेपाने रहा

२८ योग वियोग - टाइप-टोले में मंगभग रोज ही जाना-माना शुरू कर दिया। मुझे पनि बाबू के पास विठाकर छानो दा फिर चले गए। उस दिन तीसरे पहर ज्यादा लोग नहीं थे। पांचू बाबू टाइप झाड़ने वाले प्रश की उलटी पीठ से पीठ सुजला रहे थे। पार्टी के यहां से लौट पर अब ऋपि बाबू दूकान पर हाजिर हुए। कपास पर का पसीना पोछते-पोछते बोल 'पांचू-दा मुछ कश पाहिए। बीवी के पट में जो भाया है लगता है नष्ट हो जाएगा। दा दिन तो होम्योपथी गोली दो कोई लाम नही हुमा । नष्ट होना ही ठीक है । मरकर बो जाएगा। पांचू-दा नोले । वह तो समता लकिन अभी तो मुक्ति मिलनी चाहिए। डाक्टर न मुलाया जाए तो गाय-बछा दोनो पाएगा। कुछ रुपए पान-दा को आंखें अब चचल हो उठी। नोले सवेरे क्या पाठ पढ़ामा था? फैसा कुछ बसी में ? पि वायू उनके विलकुल परीर जाफर फुसफुसाकर बोले बिना पसाए नारा या? मगर वाजिम दाम देना। पापू पावू का चेहरा खिल उठा। दाना म क्या-क्या बातें हुइ । ऋषि बायू ने फागज म मोडी हुई कोई थीम कमीज री व से निकालकर पापू वाबू को दी ! पाच बाबू ने पांच का एक नोट देकर कहा जौहरी। पांचू बाबू ने मब मुप्त पर नजर डाली। बोले 'छानो तो घनघोर गुपा है उससे कुछ कह्न भी हिम्मत नहीं होती। रोज एक माना जुर्माना । जुर्माने के सवा रुपा रोज तुम्हें दिया करेगा अब तक तुम्हारी नौकरी नहीं लग जाती। वे जरा इके। उसके बाद नफरत से मह फेरकर मोल 'तुम मर्द हो कि औरत ? मैं चौंक उठा। वे डांट बठ 'दूसरे से भीख मने मे धर्म नही बातो? इतनी जगह तो जाते हो टाइप का एस्टिमेट देने कुछ हाथ साफ नहीं कर सकते ? मद हो । दो फिट रोलर की कीमत मा होती है जानते हो? पक्का मदा करता मोग-वियोग २६ उस दिन की सोचकर माग भी मुझे स्गता है पांचू वायू का सन्ह और ही पा। उन्होंने ठीक ही मुझे पहयाना पा! आज मी जब कोई मेरी तारीफ करता है, तो पहले तो अच्छी ही छगती है, मीठी लगती है। सरिन उसके बाद ही हर-सा लगने लगता है। यहीं काई पहचान ले मुझे। मगर मरे घोर छाना-दा के अन्तिम यघ्याम को कोई जाहिर कर दे। अपनी निगाह के सामने देखता हूँ मली ममीज पहने रास्ते पर की अप पर सुपचाप वठा हूँ। जरा देर म छानो-दा पौटे । सबसे एक माना जमाना वसूला। उसके बाद सौरते समय माट में ले जाकर पैसे मुझे दिय । मुझे सो मारे धूणा के मिट्टी में मिर जाने का बी होने लगा। छाना- कहा छि तू कहानी लिखता है न! जा घर मा । सवेरे रेटी रहना । बदन नगर चलना है एक मशीन देखने ।' दूसरे दिन हामडा से गाड़ी पर सवार हुआ। छाना-दा हर पहा मरे सामने छोटे-स हुए रहते । इसलिए कि मैं अच्छा सहमा हैन, मेरी जवान से मूलकर भी कभी बुरी बात नहीं निकलता। मैं तो कभी परीक्षा भवन म पोरी करत हुए पाहा नहीं गया। भूलकर भी मैंने कभी किसी की पापा की तरफ द्वामा ता नहीं। चोरी नहीं की चोरी करने में शिमी झी मदद नहीं की। छानो-दा ने कहा 'दुकान म उन मसम्म लोगों व साय मठे रहने म तुझे वक्लीफ होती है, है न ? नहीं।" मने जवान दिया। पदन नगर में हम एक बहुत बड़े मकान के सामने पहुंचे । मकान मालिक नामी मारवारी पा। टाइप राइटर नन्हीं म यहाँ या। सठगी उस समय गजी पहने हनुमानधी की तस्वीर के सामन बार बार जमीन से सिर मुला रह पे। सेठजी की स्त्री न हमें बिठाया। नौकर टाइप राइटर को हमारे सामने मग पर रस गया। सेठजी ने यावर मतामा 'मह ममीन वही सगुनिया है। टूटे साहे की दुकान से माज उन्हाने यह महल गारी पारलाना सब कुछ किया-इन सबका सतो

मोग वियोग
पितामत इसी मशीन रा हुमा ।
सयाने शिरोमो तरह छाना दान भा ममान का जरा इधर उधर
देखकर पहा साक्षात् लछमी है। थोड़ी सी मरम्मत हो जाए ना
बिलकुल नई-जसी काम करेगी। सामी माई और भगवती माई मी
तरह संवा स मशीन मी रातुष्ट होती है।
वग खालपर मौजार निकाल 1 पड जतन से छानादान चारभार
सोलार करेज का मेम पर रखा। मनुभवी मांसा स अप व उस बूटी
मगीन की जमानी का रहस्य कूटन गे। मैं भी ध्यान से देसता रहा ।
धानो दा ने मशान पर मोस दिलाए रमपर ही महा टप डाउन।
पानिपातपरकावन लगामा और लिखने लगा मन परेज स्ट्रप बन
एसपमंट हिर
मारवामी ने कहा बुर्तिया मा बिलमुर छापरा बना देना होगा।
पालिस गहापाका मर साइन में पाछत्त-पोछते छानो दा हिसार
सगान ग ओर मैं एक कागज लगाकर मशीन + टाइप का नमूना लन
लगा। छानो-दा ने कहा सेठजी तीस रुपए लगेंगे।
"तीस रुपए ! सउजी ने अपना जिन्दगी म एमे अचरज की बात
नही मुनी। इसना तो शामद मोटरसे मरम्मत म भी नहीं लगता।
सठजी साधंधे दांत कमया उठ। उनमा विमार था दालान
म्पर देन से गुद रेमिंग्टन कम्पनी ही मनोम को ठीक कर देगी।
गुस्सा घोर अपमान स मरा बहतालु सफ जर उठा ! ना दारा
पहरा भी सुख हा उठा । हम दाना पा रलरिराया ही धीर रुपये
हागा।
छाना-दाने पहा यासिर इतनी दूर से भाया ता प्रॉयस हा पर
दूं। दो रपए दे दीजिएगा।
महम जरा-सा तेल नादो रुपया । सहमी उछल उठ 1 व्यापार
के नाम पर क्या हम कृत बन गए हैं। छानोन्दा फिर भी सेठनी
को समझाने की कोगिर रहे पे रिसे बम म पाई भी भायर

योग वियोग नहीं करेगा। मगर उम सूख नारियल का फोहना आसान न था। मैं तो बत नाराज हो गमा। ठहरो नाहक हो हमसे या काम करा लना मजा चखाता है। व दोना बात पर रहे थ और घर में मन म ठानका गइप राइटर पर शक गया । मर हाय सांप रह 4 ता भी महज दा मिनट लगेप। भर एक मिनट की भी देरन पर मैंने छानासे महा ऐमे पाम भी हम जरूरत नहीं। चलिए लोट पल । छाना दा जसे जिद्दी और विगहल आदमी मरे महते ही मारवाडी मा पिद छोडकर पल भाएंगे यह मैं साप भी नहीं सका था। मौर समय हाता ता प सिर-फुगवर कर वठते । लपिन मान का रखर इम पल आए । मर दोना पर कांप रहे थे । हाम भी जस बामनहा। माना हाथ ही अपने नहीं, किसी और के हा। किसी अदेवी मूड से माना हाथा को हिलाने की भी गस्ति जाती रही। रास्त पर उतरत हा छाना-नाने महापाराससकर बना लिया और फिर मरा नरफ इस तरह से साफा नहीं, नहा उस दृष्टि का पणन रन की पाक्ति मुशम नहीं। उस दृष्टि म मया पा यह मैं सुद नहीं जानता। रविन विना मैं समझ गया कि मैं उह फॉफी नही है समा ।पकमाई पड गया । गाज भी गिरी हासी उन पर तो भी वतन मकित न होते । सिप मिसी प्रकार इतना रहा तून यह क्या किमा' हाथ-पांव हा नहा, मर मरा मारा गरीर हो वा हा आपा । ऐसा भगा राह पर लुदर पर गा मैं । मन कदा "सिफ दो फिर रोगनिस झाना-नाको माना अभी भी विश्वास नही हा रहा था। माल तू पविता रिमता है! है ईश्वर । मह क्या रिया। गुस्स म सहमा का सबब सिम्पान की ऐसी दुमति मुझे क्या हुई? परती मया पटातू ! मेरी छातीशीघरून एकाएर थम क्या नहीं जाता कि सारे सकोस ने छुटकारा मिल जाए। धाना-दा मपन गेजस पज-स पायद थप गाए सरिन नही ता।

३२ योग वियोग मुछ भी तो नहीं निया। उना भी चेहरा बिलकुल सफेद हो उठा। पायद हा कि भावो की तस्वीर एक पल के लिए उनकी आँखा के आईने म उतर आई हो। मेरे कानों मे उहोंने कहा कि वे जान गए हैं। एतना कहार मुझ साचत हुए स्टेशन की तरफ लपक । सब ही वे जान गए थे। दादरबान हम लागा के पीछे दौरे आ रहे थे। मेरी चतना उस सण ये रिए पिउन कर गई । कुछ भी माद मही कर पा रहा हूँ। सिफ इतना ही याद है कि औचक हो छानो दा न जुराए फिट रोलर मुझसे टीन लिए । मैंने मानापानी की थी। सरिन वे वोट 'हम लोग दागी माल हैं । हमारा कुछ नहा होगा। और उन रोतरा को अपनी जेब के हवाल करते हुए कहा था ऐसा न हमा तो तराता रेसह सराव हो आएगा। उसके बाद क्या हुआ मैं किसी भी प्रकार याद नहीं कर पाता। परवानो ने हम दोना का टेंटुमा दा दिया था। मेरी पीठ पर भी दो-एन मुक्के परे पे । नोदा की नाक से लहू सा फम्बारा पूट पड़ा था। इस पर भी रहोंने कहा "उसे छोड़ दीजिए, उसका कोई मसूर नहीं। मैंने चारी की है। सपमुष ही उन लोगा ने मुझे छोर दिया और छानोदा यो पाने भेज दिया। मरे पास घेला मी न था। विना टिस्ट क ही गाडी पर सवार हो गया और घर लौटकर सारी रात रोता रहा। रोते रोते कर नीर मा गइ और सपना देखा कि पुरिस ने मरी कमर मे रस्सी गाई है। स्ल से धूंसे भगा रही है । हजारों बादमिमों की भीड जमा हो गई है। सब पीस रह हैं-घोर पोर! और छाना-पते पल जा रहे हैं- उस छोड दीजिए । उसका फाई कसूर नहीं । पोरी मैंने फी है। मुझे नहीं मालूम पानि मुबह की गिरण धरती में छागों के लिए इतना सोच इतनी लग्ना लेकर आती है। ऐसा लगा कि मैं बिलकुल नगा होकर भीड भरे चौराहे पर सहा हूँ । सब मुझको देख रहे हैं। फिर योग वियोग ३३ चौंका। इस बार भी सपना देख रहा था। किसी को मालूम नही हुमा । मेरे जीवन के वस अधर क्षण की सबर किसी पर जाहिर न हुई । अखबार में छपा 'टाइप गइटर ये हिस्सो की चोरी के जुम में तीन महीने की सजा । हाकिम न अपने फसमे मे ऐसे घिनौने अपराध के खिलाफ जो तीसी राम जाहिर की थी, उसका विवरण भी विस्तार निमला। और कोई होता तो पागल हो जाता सायद । पायद मात्महत्या कर पता लकिन मरे-जसे कापुरुप गधे के लिए कुछ भी करना सम्भव न हुमा। सिर्फ चन्दन नगर का दृश्य कभी-कभी जय मांखों में झूल जाता वो बेवस-सा हो जाता। जाने कितनी राता का छिपकर राया और साचता रहा यह गम मैं छिपागा से ? पसे फिर रोगों को अपना यह मुह दिखाऊँगा! लक्नि देखा, "म मेरी सचमुच ही बक गई है । कोई नहीं पहपान सका मुम। तीन महीने के गाद छानो-दा जल स लौट । मुझे सबर मिली। लगिन उनसे भेंट करने की हिम्मत नहीं पी। मोडारवगान के रास्ते से चलना ही छोर दिया। उनके सामने-सामने खड़े होने का साहस ही नहीं ? लकिन यह कौन जानता था कि मेरे लिए छानो-दा। यह हाल होगा ? उनका सब-कुछ गया। पांच मामू न छानो मण्डल को फिर घ पर बठने नहीं लिया। जेल की सजा पाय हुए राइप राइटर घोर से मन मनीत कौन बनवाए उसके बाद उसने राद शुरू हो गया मघ पतन का इतिहास । मरीमालपापियामपन ऊपर उठाकर उन्होंने अपने सवनाश को बुराया। मुझे पता चला छानो-ग परेिटमार बन गए। मरे स्ले म कमी सा घोट हुई। लेकिन मुहासात करने का साहस नहीं हुमा । उसके बाद य चार हो गए और फिर उकत ।

. मोग वियोग - और मरी अपनी बात ? वह ता धीरे-धीरे सब कुछ निवेदन नगा। मेरे जीवन में हिसार मा जोड घटाय गुणा भाग कुछ भी जानना यारी नहीं रहेगा । बाप सोग ममी भी शायद मुप नही पहचानत लफिन इस पार पूरी तरह पहचान लेंगे। नीच की भी बहुत-बम माते हैं सभी मुछ कहूंगा सोलिए ता भाज लिखन मठा हूँ। एमिन पहल इस महानी को खत्म पर लूं। अनेक मग्नि परीक्षामा के पार समार के देवता एक दिन क्षमा-मुदर यांसा मे मुहल पर कृपा मी धपा की। सफलता वी सीडिया से मैं ऊपर उठने लगा। पाठका की दुनिया म मैं एम नामी मर्मी साहित्यिक के रूप में गिना जान एगा। मरा सः परत्न मावा की तरह निमस था । दुनिया में पही भी यहाँ तम नि चन्दन नगर मी पुरिस मी वही म भी मरे यारे मनुछ भी लिखा नही था। दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से मुझे एर साहित्यिक पुरस्कार देने की घोपणा होने क बाट ही यह घटना घटी। उस राज एप प्रसिद्ध मासिक पप विप प्रतिनिधि ममस मिरन आ रह थ। उन्हाने यह भी वह रखा था कि मेरी कुछ तस्वीरें हेंगे। पोड़ा-सा समय ममी या । सा महल क एक सेलन म हाजिर हुआ। सेलून पे मालिय गणपति बाबू ने सातिर से जल्दी जल्दी मर लिए नुर्सी बढ़ाई। बोले आप इस गए-बीसे मुहल्ट म आज भी रह गए है यही सौभाग्य है । यही रहते हुए भी रात दिन कितनी महत भामें माचत हैं । साजिागी परने लिखने म ही वे रह गए 'मरे सिवाय और पिसी बात माता समाल किया नहीं। इतने म बाहर गएर विमट पोलार सुनाई निया बालो हरि हरि मार ! स्वपए मीमतरी बांस यी एम खाट पर चटाईम रिपटो एर राा जा रही थी। दाने पाल और एक बार पोर से चिल्ला उठ हरि हरि बाल. सावुन-मना ग्रामर गास पर रगहने हार गणपति वायू न पहा तो बाग योग वियोग यह गुहा गुजर गया । एक जमाने स बीमार था । उमर भी क्या हुई थी। सकिन पहावत है न सर जसी करनी वसी भरती भी राह पर रहा हाता तो जान भोर स्तिने दिन जिला रहता। पाँच जन नाम लत दस नने लागये पीछ-पीछे जाते । लपिन छानो मण्डर जसा हान से तो चटार म लिपटकर वेईमान पाक्टमारामा पर बसतल्या घाट ही जाना होगा ! मरा दिमाग घूमना शुरू हो गया। गणपति बाबू न पाया मर इस परिपतन को भांप लिया। वाठ इस सम्वस्त छाना की खबर सही मापका चेहरा नीला पड़ गया। हा हा रफ से । हसकर महा यही हाता है कलाकार का हृदय ' आप लाग हर किसी का प्यार पिए बिना नहीं रह सकत । सुना है रवि बाबू भी एसे ही 4-गरीमा का यष्ट विरगुरु नहीं सह सात थ। किन सर इस पम्वस्त छाना य गुजर जान से मुहल्ल इज्जत बच गई नही ता इसका नाम ही गुण्डा महल्ला हो गया था। बाप-जसे लखक यहाँ रहते हैं इस कोई यकीन ही नहीं करना चाहता। मगर वाइ गुण्डा था सर । एक तरफा पफ पलनी हो गया था तो भी चोरी परता फिरता था। पुलिस से हाथा क्तिना पिटा मगर माई परवाह नहा। यही उस राज रवि मातम जमदिन पर (तारीख मा फ्तई यार नहा रहती ५ वशाख ता ) महा काली विद्यालय की एकको र गल से हार छीन लगा धागा रा दसिए सही कसा अमानुम मा । वचारी एका रवि बाबू का गाना गान जा रही थी उस भी न छाहा। साराग्वगान की बदनामी यी साचकर दाम स गरदन सुप जाती है। पुशल हाथ से उस्तरा पलाता गणपति वाचूने पहा का दाप पाकी न था। सिप चोरी डकतीही १ मगर भाप जसे आदमीसामन मैं यह सब जबान पर नहीं ला सरता। मेरा यदन कसा तो येवस हो पाया | मुछ भी नही पूग मैन । मग्नि पूछने की अपक्षा दिना पिए हो गणपति बाबू बाल अतिम यार

२१
योय वियोग
सा चोरी करपे घोलागगा म जाकर पडा था। उसके पहले दो दिन
सोनागाछी और हाकट्टा गली म भी था। मगर पुलिस को निगाहा म
घुल झोक्ना क्या इतना सहम है | उन लोगा ने उस घर को घेर लिया
और छानो को निकाला। कितना कई मरी दूमान तक पर बनसर घावा-
दाढ़ी बना दा! बाल बना दो। ऊपर से हुकुम सिर दवाओ स्नो लगायो
बाल में साइमजूस लगाओ! एक घण्टा वेगारी करावे तब जाठा । गुण्डा
मुहल्ले में दूकान कर पठा हूँ करू क्या और वही होता सो दिखा दता।
मरे चेहरे पर और एक बार मावुन लगाते हुए गणपति वायू ने कहा
"परम की पल हवा म हिलती है मर । नामारी और पुलिस ने एक
साथ घरदवाया।
बाते करते हुए भी उनका हाय च ही रहा था। डिटॉल लगाते
एगाते रोल आपने सो विवेकानद स्थल से पास किया है हैन ?
मैंने कहा हाँ।
इसी को कहते है कुदरत का कमाल ! छानो भी उसी स्कूल में
पढ़ता था। एम ही पेड में भाम और मामढ़ा फला।
और भी कहा जी मुहल्ल की बदनामी । हर रोज रात में छानो
मी माण-पूछ के लिए पुलिस आती। उसे रात को घर से निकलने का
हुकुम नहीं था। मौर फिर हर हफ्ते पाने में हामिरी दनी पड़ती थी।
मजा देखिए इधर पूछ-ताछ कर पुलिस गई और उपर यह निकल
कर चोरी पर भाया।
उसके बाद हो गई टी० मी । मगर तब भी रस को न पूछिए !
गसपोस्टों को अठमान हुए सिपाही आता । आवाज लगाता
अय छिनुया घर में है?
छानो दम साधे चुपचाप पहा रहता। इस पर सिपाही नाराज
होरर महता अरे साले छिनुमा क्या कर रहा है।
छानो इस पर जवाब देता अजी यही तो हूँ। तुम्हारी वहन
माय सोया है।
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योग वियोग गणपति बाबू ने कहा जरा हिमानत देखिए उसकी पुलिस के साथ मजा ! उसकी बहन से रिश्ता जोड लिया । अवश्य आखिरी दिना रस सूख गया था । इतना-इतना सहू उबलता था। कितने निरीह लोगा का ३७ तेवाह किया। उस समय सिपाही पुरारता भी तो छानो जवाब नहीं सकता। आज सुबह जब कोई जवाय न मिला तो सिपाही ने सोचा हो न हो सम्बत चोरी करने गया है। सिपाही ही मदर घुसा । देखा वह मरा पड़ा था। गणपति बाबू ने एक छोटा सा आईना मेरे सामने रखा। कहा उन नीयो की बात छोडिए । बरा अपना चेहरा ठीक से देख सीजए। उस प्रसिद्ध मासिक पत्र विशेष प्रतिनिधि उस दिन मेरे पास आये थे। मेंट के बाद मेरी कुछ तस्वीरें भी ली थी। जव जाने को हुए सो मेरी दीवार पर टगी चार तसवीरों पर उनकी नजर पड़ गई। ये ये रवीद्रनाथ भारतवद्र टाल्सटाय और डिरेस। विशेष प्रतिनिधि ने कहा 'एक सवार पूछना भूल गया---अपने साहित्यिक जीवन में आप रिसके ऋणी हैं ? सरिन इसके जवाव की जरूरत नहीं इन तसवीरा से ही मुझे जवाव मिल गया है। मैंने शायद उह टोकने की चेष्टा की थी। लग्नि मेरे गल से पावाज ही नहीं निक्ली। दिमाग धायद घषकर खा गया था। जब मैं अपने मे आया तो विशेष प्रतिनिधि जा चुके थे। इसके कुछ ही दिन बाद रवीद्र जमोत्सव के उपलक्ष्य में सभापतित्व करने के सिससिल में मगार से बाहर की एक साहित्यिक सस्था के Yo योग दियोग जो भी काम हो करके मगर हम सौ रुपए जमा कर पाऊ तब गाय फोट पा टाइपिस्ट होना मेर लिए सम्मय हो सरे । उसी समय सलकिपा रामग रोड एक पानवाले ने मेरा परिचय राजपाल से करा दिया। यह पानवाला रात या पोरी चोरी गर कानूनी पराब वेचा परता था और उसी सिलसित म राजपाल स उसरी जान पहचान हुई थी। सादी हाफ कमीज सफे हाफ पट सफेद माजे और सफे धमडे के जूतों मे इस भले आरमी का दखने से सहसा लगेगा माना कोई यहा जहाजी अफ्सर हो । लरिन मुना सुदरलाल राजपाल क्सिी की नौकरी महीं करते अपना ही कारोबार है। प्रोस्ट्रम रोड पर किसी मारवाडी को महल जसी इमारत है । यही राजपालजी रहते हैं । सुना उस मारवारी के कलस्ता गहर म बसे और दसेक मान है उसके सिवाय विराट व्यापार । राजपालगी के साथ मारवाडी महादय क्या सा और कोई नया कारवार शुरू करेंगे । गारवार शुरू करें न करें अपने को एन नौकरी जुट जाए तो जो जाऊँ। भौर राजपाल शायद यह तार गए थे। इसीलिए मोर सभी हर महीने नन्नीस रुपये दूंगा। भागे अगर अपने फाम स खुश कर सको तो यही उनीस यार कहाँ पहुँच जाएगा नहीं कह सकता। हो सस्ता है कुछ ही दिनों म तुम हर महीने चौबीस-पचीस रुपए कमाना शुरू कर दागे। राजपाल साहबपी कम्पनी म टाइपिस्ट हो गया। मारवाडी उसी विशाल मान म माना पष्ठता और वहीं पहले ही दिन उनने एका उटेंट दक्षिणश्वर याबू से परिचय हुआ। मुझे बिठाकर राजपाल ने भावाब दी 'डारिन बाबू मौर आवाज के साप ही एक भल मादमी समरे में दामिल हुए। मुप्त दिखाकर हाय की छोटी-सी छडीको घुमाते हुए राजपाल ने इस नये मादमी मो रस लिया है। मब से तुम्हारा काम घट गया।

योग वियोग ४१ मही पहली बार दक्षिणश्वर यायु रे चेहरे की तरफ ताका साहीक पर असी खरी हफ्ते भर को काला-सफेट दानी। खूब दुदल । लम्बाई म पांच फुर से ज्यादा न होग । राजपाल के सामने ये जिस ग से खड़े थे उसी से समझ मे मा गया कि वे साहब से सूबरते हैं। उनके सामने मुझसे बात करने म भोय रे। मसरी कमीज को बास्तीन कोनी तक मुठी। हाय की नसें फूली फूली। मेरी भोर ताकार मले मादमी ववम-स है। राजपाल ने अपने रोधीले गले की हुकार से जा रहा उधका मवरम पा 'बरेजकिन बाबू औरतों की धरह मह सिए क्यों खड़े हो ? बोली। मगर भादमी पसन्द न माया हो तो यही हो। इसे भगाकर दूसरा मादमी ला देता हूँ। "TET मह मया रहा है। तो चौक उठा । सक्ति इससे पहले कभी नौकरी नहीं की। अपने खानदान भी कोई कभी मौकरी के पास नहीं पटना। मन को समझाया मॉफिस म साहब लोग इसी तरह सात करते हांगे घबराने की कोई बात नहीं । लकिन साम-हा-साथ यह डर हुआ हा शामिन मा मुल Hद न करें हो अगर साफ कह दें “उहूँ यह छोपरा मुझे नही जेंचवा! सो तो जो उन्नीस रुपए हर माह मिलत, मी गए। गरिन भायू ने लकिन कुछ मौन रहा। लोग बलि के मारे को जैस बार रत है उन्होंने उसी तरह मुझे गौर से देखा और उसके बाद सम्मति गरदन हिराई। राजपात छडी लिय काम में निकल गए। आने से पहरे अपनी लाठ और गोल-गोल आँखें धुमाकर भोले हाफिन बाबू तो सारे पोस्टमार साप आज ही लिस हारिए । रापन लाने के लिए आपको नहीं माना हागा नया पावू जाएगा। राशन लाला? हो, वह भी करना होगा। दो रागन कार यमाकर शनिया ने पहा निसावधान ! साहब को कही शुबहा एमा, सो ४२ योग वियोग गुदा - 1 सराजू पर तोलगे। मुनकर में तो मवाक । मेरा चेहरा देखकर डाक्नि बाबू का दायद माया हो थाई। बोले मुझ पर नाराज होने से तो बोई गम नहीं। आप उस आदमी को तो नही पहचानते ? परकर फुसफुमाकर पूछा क्या ? दो दिन रह लीजिए सब समझ पाइएगा। जामिन बावू न घूक पोटा। उसरे बाद और भी धीरे धीरे धीले डेंजरस आदमी है- मासिरी बात बोलने की इच्छा नही यो उनको अनजाने ही घरवस मुंह से निकल पडी इसलिए हर से थर-थर कापने लगे मेरे दोनों हाय हाथों से सर दवाते हुए रोने रोने से होपर बोले दुहाई है कह न दीजिएगा। फिर तो मेरो योटो-घोटी काट डालगा। राशन लकर लौटा । देखा हाकिम बाबू बड़े ध्यान से चिटिठयो लिखते चले जा रहे है । मैंने कहा मैं आ गया डाकिन वाबू होंने मेरी तरफ ताका। नाक की नोक पर से घश्मा उतारकर पहा बाप भी मुझ राग्नि मानू ही कहेंगे ? वह कम्बस्त तो पजायी है ठीक उग्धारण नहीं कर सकता है। मेरा असली नाम है दक्षिणश्वर चटर्जी। मैंने कहा, गलती हो गई अब से भापको दक्षिणश्वर माघ ही कहूगा ! दक्षिणपर बाव अय सुध हो गए। घोले भगवान तुम्हारा मला करें। अब दो बार चिटिठया वो लिख डालो। लिखने बैठ गया । सकिन उन चिटिठयों की याद से बाज भी मुस सर लगता है। उनमें से किसी भी चिट्ठी के लिए मुन जल पे सहना पर सकता था। गनीमत पीकिकोई मेरी रिवायट नही पहचानदा पा । मेरी लिखो उन चिटिठया म से दो पार आज भी बदतरला या मोंटन स्ट्रीट के मारवाड़ियों के यहाँ सुरक्षित हैं या नहीं कौन जाने ? हा तो माज भी मेरे आफत में पर जाने की सम्भावना है। कुछ ही गिनों में भय के साय यह आविष्कार किया कि ये रामपाल योग दियोग जी जा-सा चीज नहीं हैं। एक कोटि के मारवाडी साधारण लोगों को उगकर पसे कमाते हैं और उन-उसों को ठगने के लिए राजपाल जसे धाप हैं। फर्राटे की अग्रजी बोलने वाले। बातो में काइयो कारवारी को भी पानी बना देने म ज्यादा देर नहीं लगती। वहीं मे से एक को पटाकर इस राजमहल में पठ हैं। एक पसा किराया नहीं ! उलटे आते-जाते दरवान सलाम बजाया करता। लक्नि वहा वाजार के गहीवाल लोग ठगाने के लिए नही वठ हैं। मलमाठ में उनका सिर गरने के लिए बड़ी ऊंची अफल की जरूरत है। इसीलिए नाम से वेनामी बहुत चिटिठयां लिखनी पडती। शायद हो कि राजपालजी की नजर र पर पडी। तो पहले ये क के पास नहीं जाएंगे |--काम शुरू करेंगे उपर । बेनामी चिटठी दोश दी आप प से होशियार हो जाए। फिर तरकीब से प से जान-पहचान करक वे धीरे धोरे ग की तरफ बढ़ेगे। उसके बाद जाने रितने प्रकार का महीन जाल मुनकर जो वे क को फसाएंगे यह एक लम्बी रहस्य-स्था की सामग्री है। मगर समय मिला तो भविष्य म यह लिखी जाएगी। लकिन उस कहानी से मेरा या दक्षिणावर मादू का विरोप कोई सम्बध नही। हम लोग निमित्त मात्र हैं। उनके कहे मुताविक हाथ से या टाइपराइटर से मुछेक पिटिठयां लिख देने से ही माहवार मिल जाता। और बहुत तो दो एक बेनामी टेलीफोन । वह भी किया है। लग्नि दक्षिण वर बाबू ? उहें काम बहुत था। दिन भर चुपचाप काम करते चले जाते भोर साहब की पुकार हुई नही फिर से घर पर कोपने लगते। दक्षिणश्वर बाबू रामपाल कम्पनी के एकाउंटेंट पे । मगर सनस्वाह मालूम है ? तीस रुपए | सुनकर पहले मैं भी अवाक हो गया था । मुम सो कहिए अनुभव नहीं था इसलिए उनीस रूपए मे घुस पडा। यह भी कोई सान के लिए नही रहना। टाइप में हाय जरा मजे कि और कही भागूगा । सक्नि दक्षिणश्वर बाबू तो काम जानते हैं । वे क्या चिपके हैं ?

योग यियोग दक्षिणेश्वर बाबू को मैं बिल्कुल नहीं समझ सकता या । उह कभी हमत नहीं देखा । अब देखिये गुमसुम बठ हैं । सारी दुनिया को हर की निगाहा से देखते हैं। न केवल साहब से बल्कि मुझसे यहाँ तक कि दरबान से भी डरते हैं । मानो ये अभी ही परकर पीटेंगे उहे जुल्म करेंगे । और उनके साथ राजपास के व्यवहार की न पूछिए । एक दिन नाराज होकर बोल 'उल्लू कही पा! बकर असी दादी क्या बद गई है ? इतना ही नहीं आगे की बातें मलम की नोक से लिखी भी नहीं जा सकती। दक्षिण वर धावू ने लकिन कोई प्रतिवाद नहीं किया । पल्लि मुत्त की नाइ उनका पांव पकडकर काउचाउँ करने लगे। बोल अय की भर माफ कर दीजिए हुजूर ममी दाढी धनवाकर पाता हूँ। राजपाल साहब का गुस्सा फिर भी न उतरा । दक्षिणश्वर बाबू को एक चोटा लगाया और फोरन तेजी से निकल गए। में यह किस दुनिया मे आ पहुँचा ? मेरा शरीर पर-थर कांप रहा पा । लकिन जिनके लिए मुप्त इतनी फिक्र पड़ी थी देखा उह कुछ भी नही हुआ । सरफ पर जाकर इट पर यठकर दादी बनाई और वापस बाकर अपने गाल पर हाथ फेरने लगे। मुनसे पूछा देखोतो कसो बनी दादी ? छ पसेल लिये । राजपाल साह्य मे को उहें गालियां दी और चांटा लगाया इसे ये भूल हो गए। अपने कुरते की ओर ताकर उ होने कहा 'जब राशन लने जागोगे उपर से मेरे लिए दो पसे का सावुन सो ले आना भया ! फरता दिखा मरमहा, तीन हफ्ते से पीपा नही गया है। पता नही कम साहब की निगाह यह जाएगी तो उस मार को सरह कान पकड़कर उठ-यठ कराएंगे। दक्षिण वर बाबू को सचमुच ही मैं नही समाप्त पाता । जव काम करते ता कितना सदर काम करते । लकिन और समय लगता सूपानगंगा है। घसे पिसी कठिन रोग मे दुटि और व्यक्तिख विलकुल नष्ट हो गया हो। दक्षिणश्वर मानू के परद्वार नही । साहब के ही यहाँ रात बिताते । 1 योग-वियोग ? काम-काज सरम करके में जब पर जाता में सुपचाप बैठ रहते। इतना दुल इतने अभावो में भी मेरी अपनी एक गिरस्ती है। वहाँ मपनी दिपवा मो, अपने नाबालिग बहन भाइयो के साथ सांझ को बातचीत करके भी खुशी होती है । हम सभी मिलकर सपना देखते है अपना यह दुस सदा नही रहेगा । लकिन ये दक्षिणश्वर बापू । उसे सो कुछ भी नहीं है। एक जन सत्तू और एक जून दरवानों को दाम देकर रोटी तरकारी खाते हैं। कहीं जाते-आते नहीं। पूछा है उनसे शाम को तो कोई काम नही रहता, तब क्या करते है आप 'करना नपा है मया तिमजिले की छत पर जारर ठहता हूँ। यहाँ स स्टेशन की गारियाँ दिखाई देती हैं-~-डिभो की तरफ मुह किए उारता रहता हूँ। "एक दिन हमारे घर घसिर ।' मैंने मोता दिया। घेरा हए।महा 'पिसी के यहाँ जाने को मेरी भादत मही ।' पर म बातों के सिलसिले में एस दिन मैंने मां से कहा था, बेचार दक्षिणेसर माबू पा लाना देखकर बड़ी सकलीफ होती है।' यह सुनकर मो र मेरे खाने के साप सिगरेट क एन्नेि म थोडी सी सजी और दो चार रोटियाँ रख दी थी। उस रोज हमारे साहब भी भाहर गये थे। दोपहर को मैंने जबदस्ती दक्षिणेश्वर माव को अपने साप टिफिन पर निगा। हरगिज तयार नहीं हो रहे ये समझिए कि हाप पर पाकर ही रिकाना पड़ा। पूछिए नहीं कि मानन्द से उस दिन उन्होने सम्मा साई ! साते साते वे रो पड़े। बोले सुम मुझे प्यार करते हो अभी तो मरी रेखों में भी आंसू आ गए । आखिर उन्ध थए जस बाल्मीम भी अनुभूति है ! मैंने कहा था, हा दक्षिणश्वर बाबू में सो पम-से-कम आपको प्यार करता हूँ। उसो दुबलता रे क्षण में उस दिन उनकी कुछ बातें मुनी। पता योग वियोग मगा कि वे कसरता यूनिवसिटी के ग्रेजुएट हैं। सुनकर मैं सोचा गया। वे शायद मेरे मन मी मात वार गए । महा पा यकीन नहीं पा रहा है शायद ? मौर शट अपनी कुर्सी से उठे और बिस्तर के नीचे से एक तेल लगा गदा रिफाफा निकाल लाए। उसी शिफाफे मे में अपना पी. ए० का सर्टिफ्वेिट निकालकर मरे ऊपर फेंक दिया। कहा भागते परन और कुछ तो नहीं मगर इस सर्टिफिकेट मा ठीक से भाया था। भागते धात 7 मेरी उत्सुकता मा गई । "कहाँ से भागे थे ? इमझे जवाब में यह पेंचुए जमा आदमी फन उठाकर साप सा फुफ्कार उटमा इसकी कल्पना नहा की थी। घूसा तानकर मेरी तरफ बढकर उन्होंने कहा इससे तुम्हें मतरव? वित्त भर मा अमास पा छोकरा इससे तुम्हे क्या मतलब ? मैं तो ऐसा हकका बक्का हो गया कि बोरतो बन्द ! बात नापद और बढ जाती कही एन यत पर राजपास साहय बाहर से नहीं लौट आए होते । मिजाज साहब का भी बिगहा हुमा था। उह देखत ही दक्षिणश्वर बाबू मन लगाकर अपना काम करने लगे मानो मुछ हुआ ही नहीं। मरा भी यह दिन पुरा बीता। शुक्रवार रागन का दिन है यह पतई भूर गया। इससे राजपाल साहब बेहद नाराब हुए। बोले तुम माट साहब हो गए हो याद करके राशन का रुपया मांगते नही मना ? मैंने चू न को चले लार न माने के लिए पल दिया। सक्नि उसी दिन ऐसी आफत आएगी यह क्या जानता था! दो यहा म चावल मौर गेहूँ को ईसा और पाव भर धोनी का ठोंगा पाएं हाय मे लकर भा रहा था। जाने कहाँ से एक साइकिल वाला आया और ऐसा भपया दिया कि मैं ठोसाक पर जा रहा । धौनी पाठागा छिटककर नाले में मा गिरा। जिन्होंने हावरा के खुले हुए नालों को देखा है, नही जानते हैं कि योग वियोग बहुत-सी नहरें भी उनक माग बच्चे हैं । पाहे तो उनमें नाव पलाई या सकती है । उस नाते से चीनी २ ठागे का उसार हरगिज न हो सका। सौंटन्सी पस लिये नौट आया। मापनी तस्दौर कि रामपालजी फिर गहर चले गए थे। यह सुना वो दक्षिण वर मावू बोले . हाय राम यह नया हुआ 1 साहब तो बान हो मार डालेंगे सुम्हारी। तो उपाय ? चीनी तो घत कार बाजार से ही मिल सकती थी। पाय भर की कामत माठ आने । महीन मासिर मे पल्ले इतने पसे कहाँ ? मैंने सोकांपना शुख कर दिया। मेरी यह हालत दसकर दक्षिणश्वर बाबू ने गट दिया, 'हर काहे का? भारी-धईमानी पोहे हा की है। फिर क्या सोचकर उहोंने अपने बिस्तर के नीचे से सिगरेट का एक टिन निकाला। उममें से एक अठन्ली निकालकर बोले, जाओ इसी वक्त पीनी सरीदकर ले माया ! मैं रो पहा था । वृतमता से उनके हाय जकड़ लिए थे। मपना हाय घटाकर मुह दूसरा इरफ करक कहा था, 'तुम अमा तर निरे बच्चे धौनी लारर में घुप वठा था। मन ही-मन नसीय का विकार रहा पा। सोच रहा था मैं तो मानता हूँ निरुताय हूँ पढ़ा लिपा नही काम नही जानता । सेकिन यह यो० ए० पास आदमी तीस रुपस्तियों पर यहाँ गों पड़ा है और यह भागार पाने की जामात कही, सो कहाँ से? दक्षिणेश्वर या माफर मेरे पास बठे। धीरे धीरे मेरे मधेपर अपना हाय रखकर बोल महा आज बेमारे का दिन बुरा बौता ! मैं जानता था। जम सम मुझे खिसाने लगे तभी समझ गया था कि भाज कुपन मुछ होगा। इसी तरह से पत रही पी जिदणी। कहने जसो कुछ न पो उनमें ।

योग वियोग । फिलहाल दक्षिणेश्वर बाबू म कुछ परिवतन देख रहा था। हर दम गुम सुम । हर दम जसे कुछ सोच रहे हो । साहब ने एक दिन उम्हे फटकारा 'बल्ल सूभर कही का! दक्षिणश्वर बाबू एकाएक बिगह उठे । नोले 'मुझे तुम्हारी नौकरी नही करनी। मैं चला जाऊंगा। राजपास साहब ठठाकर हस पड़े। मटके-जसे उनके गोलमटोल चेहरे पर के गोल-गोल चेचक के दाग चकमका उठे-रुपयामेरा रुपया? दक्षिणेश्वर याबू फिर केंचुआ हो गए । साप पर रिसी ने मानो नाइट्रिक ऐसिर छिड़क दिया। वे चुपचाप कमरे से निकल आए और थपना काम करने एगे। मैं दग होकर उन दोनों का नाटक जरूर देखता रहा लकिन कुछ पूछ न सका । दूसरे दिन जन फाम पर आया तो देखता स्या हूँ कि दक्षिणेश्वर बाबू फूट-फूटकर रो रहे हैं । सामने जाकर मेरे सड़े होते ही वे रोना वद करसे अपनी मांखें पोछने लगे । योस पूछो मत भैया कितनी बड़ी भूल की है। मैं 'बुद्ध-सा उनकी ओर ताकने लगा। वे अपने-आप ही बोले है ये रुपए मैं कभी नहीं चुका सकूगा। मापने साहब से रुपए पज लिय ये क्या? रहोंने इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया। कहा मैंने जो किया है भमा तुम कभी भी अपना वसा सवनाश न करो। दूसरे के पैसे से कभी गाड़ी के पहले दर्जे मे सवार होना । में कुछ भी न समझ सका। उनके मुंह मो ओर ताकता रहा । इसके बाद उनसे जो कुछ सुना सुनकर अवाक हुए बिना उपाय म था। अपनी खडी खड़ी दाढी पर हाथ फेरते हुए दक्षिणेश्वर बाबू बोल मुझे देखकर तुम्हें पगला पगला-सा लगता होगा । है न ? मगर माई में सदा ऐसा न था। मेरी भी गिरस्ती थी दास-बच्चे थे। मैं भी कोट पट टाईगटे ऑफिस जाता था। उस समय पजाब में रहता था। वहां के दगे म सब जाता रहा। मेरी नजरों के सामने हो मेरे बेटे बेटी स्त्री लगता योग वियोग ४६ को कत्ल कर दिया । मैं किसी तरह भागकर स्टेशन पहुँमा । पास म एक घेता नहीं। एक दिन एक दाना नसीर नहीं । वही स्टेशन पर ही तो राजपाल से मुराकात हुई। में भी भागे आ रहे । मरी हालत देखकर हे गाया गया हो माई थी। कहा पिस न रा मैं तुम्हें लिदा पलंगा। गाड़ी में बेहद माह। साहब जाने वहाँ से दा टिक्ट से भाए फस्ट नलास के। फ्स्ट क्लास का टिकट देखकर मुझे हर हुमा । मैंने कहा, 'उतने दाम का टिकट ले लिया मापने मेरे पास सो कुछ भी नहीं है। 'राजपाल न हसकर कहा हम क्या है, बाद में भुका बना।' दक्षिणश्वर नाथू ने कहा "फिर क्या पूछना, सभी स इनके पास पण है। और ये पटना क्सकसा पटक यौर गोहाटी म मारवाडियों के साथ पाल फरेय करते फिर रहे हैं। 'मैंने कहा है मैं नही रहूंगा । लकिन साहब सूद समेत पहले दर्जे का किराया वापस मांगते हैं । महते हैं मेरे रुपए गिन दो और रास्ता सो। जो मिलता है उसम से पेट काटकर पाता है। मगर उतने रुपए कहाँ से लास? पहले दर्जे की बजाय अगर सीसरे दर्ने मे पापा हाता सो पाम तक इनके रुपए गिनकर चल दिया होता।' उनकी आई छलछला उठी थी मैंने समझा। बड़ा अन्याय सा लगा मुझे। मेरे पास रुपया होता सो राजपाल की नाम पर रखवा भौर दक्षिणश्वर बाबू को वहां से पण देने को कहता। मगर अपने पल्ले दो दा रुपए भी मही तो उतने । उनमे मैंने पूछा 'साहब ने ममा वाया लिसा सिया है ?" उन्होंने गरदन हिलाकर कहा नहीं सिखत-पदस में कुछ भी नहीं। मुनते ही मेरा मह रोशन हो गया । कहा 'दक्षिणेश्वर दादा फिर सो कोई खौफ नहीं। उन्होंने उत्सुकमा से कहा 'सुम्हारे दिमाग में कोई सूस भा गई क्यों ? मुझे पता नहीं क्या हो गया है दिमाग काम नही करता।'

योग-वियोग मैंने उत्साह के साथ कहा 'दक्षिगश्वर पायू माप छाती पुकाकर पल दीजिए । राजपार थापका कुछ भी नहीं कर सकता। सोचा था मेरी बात सुनार दक्षिणश्वर बाबू उछल पड़ेंगे । लक्नि हुआ ठीक उलटा। मारे घर के पे सिहर उठे । दानों कानों म अंगुली डालरर बोल उठ मामी-बासी ! मया देखना मुझे। मेरा कोई कसूर नहीं। मैं नमपहराम नहीं हूँ। यह नादान लहना है बिना समझ बोल गया। उनका हाव भाव देखकर मैं डर गया । आँखें खोलकर उन्होंने गम्भीर होकर कहा जोकहा सो कहा ऐसी बात फिर कभी जवान पर न साना। इस वाद सच ही मैंने रहें कुछ नहीं कहा। मह बद करके राजपाल से जुल्मोसितम थे सहते रहे । रोगों को ठगकर रामपाल ने काफी रुपया बटोरा। रही रुपयों से गराय पीता है मोटर पर चढ़ता है रात का घर में छोकरिया को लाकर ऐश करता है मगर दक्षिणश्वर यावूरे पास जो कुछ रुपए है जहे छोडने को तयार नहीं । इतने पर भी दक्षिण वर यायू उहे गासी-गलौज नही परसे। कहते उही कीदया से तो जान बचाकर भाग सरा। मैं उहें नहीं टग सरसा। मैंने पूछा रुपण तुफाने म आपको औरक्तिने दिन लगेंगे ? दे हस मर बोल ऐमे में तो मकीन नहीं होता कि इस जम म सुफेगा। मूद मी तो बढ़ रहा है। मुझे भी खूब गुस्सा आ गया था। पहा आपकी भी गल्सी है। थापको पहले दर्जे में आना नही चाहिए था। जानते तो हैं भपने लोगों के लिए वह सब मही है । वह है यो सोगों के लिए। जिनके पास फरात रुपये हैं वही पसे गद्दी पर बैंच पर सोते हुए सफर कर सकते हैं। ठीक ही पहले हो भाई ! सकिन इन्सान को जव कुमति होती है सो इसी तरह से होती है। यह तो मुझ उसी समय सोचना चाहिए था कि फ्स्ट मसास में सो काफी रुपए लगते हैं। दक्षिणश्वर बाबू गम्भीर हो गए।

योग वियोग जाता, पर लौटकर भी दक्षिणवर वाद् की बात में मूत नहीं पाताया। मेरी मो जब जतन से मेर लिए पाप-अरूपान लाती मुझ पाद मा दृक रोड के उस मिल मकान के एक अधर कमरे में 4 चुपचाप बैठे है। पद हैं । श्व एक बार पहल दर्जे के दिम् म बठकर सदा के लिए अपने को गिरपो रखे गठे है। और यह किराया सूर से बढ़ना मा रहा है । पल पल बढने-बढसे पाबने के रुपए का यह पहल उनके सार अस्तित्व को ग्रस रहा है। अगर घोडी-सी तकलीफ उठार ये तीसरे दर्जे म आए होते ता मज में भाजा' होर जी चाहे जहाँ घूम सकते थे। मैंने महा भी 'भाप नाहक बों पड़े है ? क्सिफी मवाल है आपको राकर रखने को ? यह पर-कानूनी है । गुलाम वाली प्रथा अपने यहाँ से पर की उठ चुकी है। वे तिर घुमाने लग और तुम्त रहा सिर के ऊपर और भी तो कोई है। ये गया पहेंगे ? आने किस महापाप के ता मह जीवन वर्वाद हुआ ! अब यह भी? फिर मैं किसी का पावना गटफ जा" रात को स्टे-स्टे पिर साचता रहा दक्षिणेवर माबू में लिए बरबस ही मरी आंखो म पानी भर आया और फिर एकाएक मन म एक नई युक्ति पाई। दूसरे गिन दफ्तर गया। देखा साहव बाहर चले गए है । जो थोपा बहत शाम पा निबटारर दक्षिणेश्वर माबू की साज म गमा । देला घे अपनी कुर्सी पर नहीं है। उनके कमरे म गया। देखा परीकपरी पर बठकर ये सिगरेट रे पुराने डिम्ब से रुपए गिन रहे हैं। मुझ पर नभर पडत ही कहा अभी रहत पए घट रह है भाई! उसके बाद मयानर सेठ । सुबह गाय साहब को फटकार सुनी पौ । बोले, भई मुम्हें तो बड़ी सूझ-यूष है। किसी उपाय में मुझे हमारा दिला सकते हो? वसेजता से मेरी छाठी उस धमम जोर से घर रही पी रहा, - योग वियोग रात एक बड़ा सीधा-सा उपाय मरे दिमाग में आया है। यही रहार माप किराये कये रुपए कभी नहीं चुका सकगे। आप बी० ए. पास है। अगर किसी स्कूल म मास्टरी भी मिल जाए तो इससे कहीं ज्यादा रुपए कमा सकते हैं। और तर यही आसानी से राजपारजी के रुपए लोटा सकते हैं। दक्षिणश्वर बाबू की आँखें चमक उठी। यह इतनी सीधी-सी बात मी उहें नहीं मूनी पी भी। मैंने महा आखिर आप रुपए पचाना तो चाहते नही । एकिन यहां रहने से पज लिये लिये ही मापको मरना होगा। दूसरे जम मे यह कज और वा जाएगा। दक्षिणश्वर बाबू ज्यादा देर सोच नहीं सकते। जरा भी उत्तजना हुई कि उनका सिर घूमने लगता है। अपना सिर थामकर बोले तुम इस यक्त जाभो । मरे माथे के अन्दर कसा तो कर रहा है ! मैं पला आया। चला तो पाया लकिन यह मया जानता था कि उसर बाद ही ऐसा होगा। दूसरे दिन दफ्तर जो गया तो गजव हो चुका था। हाप के मन को घुमाते हुए रामपाल घोर खाए हुए माप की तरह पहर कदमो पर रहे थे। मुझे देखते ही मानो मेरी गरदन मरोडने के लिए उछल उठ । कहा ओ, तो तम आ गए लिफ्नि दूसरा शतान , कौन? र से पांपते हुए मैंने पूछा । अन्छा ! युटू बन रहे हैं ! हाफिन बाबू कहाँ है कम्यरत रात से ही गायव है। यह नहीं समा सका था कि ऐया होगा। और यहो कसे जानता कि यह ऐसा खूखार हो उठेगा। कही मुझे भी गाली-गलौज न करे । एक तो उम्र कम फिर घर की गरीबी। यह स्कूल करने मे मुझे पार्म नहीं कि उस क्षण मेरी स्वाभाषिक मनुष्यता जाती रही। बया पता नौररी चली जाए। इस महीने की तनस्वाह न दे? तो फिर खाना कसे घरेगा ? मैंने गिडगिड़ाकर मालिक से कहा यकीन मानिए मुझे नही योग वियोग मालूम कि कहां गये। उहाने मेरी तरफ रही निगाहो से देखा। कहा अभी साढ नौ बजे है। फौरन चल दो। अगर एक पजे तक डाकिन बाबू को लार नही रौटे तो तुम्हारे नसीब म बुरा लिखा है। निकला । पलते चलते हावहा के बस-स्टण्ड पर आया । क्तिने लोग निश्चिन्त से अपने अपने काम पर जा रहे थे। मौर मैं ? उन सबका सौभाग्य देखकर मुझ ईर्या होने लगी। दूसरे ही क्षण लगा बदन ठडा होता जा रहा है। आखिर मैं किस सप्पर मजा पड़ा। इससे तो खाए विना मरना माछा था। मेरी मां जानती है मैं अपने दफ्तर म काम करता हूँ। अभी तनस्वाह कम है नाम सीखने पर बढ़ जाएगी। मगर मैं क्या कर रहा हूँ ? सोचा यहीं से भाग जाऊ । लेकिन राजपाल ? उहे मेरे घर का पता मालूम है । जिन्दा न छोड़ेंगे। लेकिन इतने मरे कलकत्ता पहर में मैं दक्षिणश्वर बाबू को यहाँ खोजता फिरू ? अता-पता न हो तो भला इस बाहर म किसी को लूट निमाला जा सकता है ? हावड़ा पुल के किनारे सडा-सहा भासू बहाने कई घंटे नाहक ही परकर काटकर आसिर राजपाल के यहां सेट गया। अन्दर जाने मे पर लग रहा था। उसे मुझ पर विश्वास न होगा पायद मारे-पीटे। किसी प्रकार हिम्मत बटोरकर भीतर गया । कहा नहीं मिला। नासु होकर राजपाल ने को कहा उसका मतलब यह हुआ कि मैं भादमी नही भेड़ा है। इसान को अगर अकल हो तो इस कलकत्ता शहर से सव-कुछ दूटकर निकाला जा सकता है । लक्नि भेडा और मकरा छडी की ठोकर साए बिना कुछ नहीं कर सकता। इसके बाद उहोंने सिर पर हैट रखा जूते पर ब्रश किया और कहा घसो मेर साथ । मैं देखता हूँ वह मम्मत से नहीं मिलता है।

योग वियोग पहले हम हावडा स्टगान गये । राजपास मे हर प्लटफाम येटिंग रूम मुसाफिरखाना पत्ता पत्ता देख लिया। उसके बाद गगा के पाट पर । वहाँ भी छी घुमाते हुए कुछ देर सरे रहे। फिर पुल पार करके हम स्ट्रेण्ड रोड पहुंचे। नदी के किनारे किनारे घाटा को देखते हुए आधा घटे में हम जहाँ पहुँचे वहाँ अयड हरिनाम चल रहा था। पिछले कई वर्षों से धमभोर मारवाहियों ने इस अखं हरिनाम की व्यवस्था कर रखी थी। शिफ्ट उयूटी पर कुछ लोग खोल शाल यजाते हुए घूम घूमर नाच-गा रहे थे। दफ्तर भी बना पा उसका। आखिर इवन इतने सोगा की खोम-खबर रखना भी तो कम बात नहीं। विराट हरे में विचडी पक रही थी। हरिनाम गानेवाला का एक दल पत्तल पिछार साने यठ गया था। ऊपर चील-कौवे गाल होकर महरा रहे थे। यहाँ दक्षिणश्वर धावू मिल जाएंगे फस जान सक्ता था, मानेयालो मी मोर देखकर छडी से इशारा करते हुए राजपाल ने कहा वह रहा। सच तो मैंने भात होकर देखा दक्षिणश्वर बाबू भुकमुक् घठे खिचडी खा रहे थे। रुपककर राजपाल ने उनकी गरदन पर दवाई। दूसरे साग हा-हो फर उठे। क्या हुआ ? मात क्या है ? पोर से वहाँ वे मनेजर बूढे-स राजस्पानी मज्जन दौरे आए। राजपास सब भी कमीज नाकॉलर परत कर दक्षिणश्वर बाबू को खीधार उठाने की कोशिश कर रहे थे। मनेजर ने आकर छड़ा दिया छि बाबूजी साते-खाते किसी को मट देना महापाप है। अप्रतिम होकर राजपाल ने कहा यह कम्बख्त भाग आया है। मनेजर ने पौरे से पहा 'खर सा लेने दीजिए। माप तब तक मरे दफ्तर में मैठिए पलिए। दक्षिणपर बाबू में कहा बेटा भोजन हो पके तो मरे पास माना।

योग वियोग कल दक्षिणश्वर बाबू से खाया नहीं गया। तुरन्त उठार हाय धोए और घस पाए । गुस्से से बोले माप यहाँ क्यों आय ? म मापकी नौकरी नहीं करूगा। राजपास ने उनकी बातों पर कान नहीं दिया। मनेजर से पूछा यह यादमी यहाँ फव याया है ? टूटे चश्मे को मांख पर चढ़ाते हुए बूटे राजस्थानी ने कहा रात । गरीव यादमी। देखकर बड़ी दया माई। टेम्पररी नौकरी दे दी हरिनाम की । एक रुपया रोज दो जून खाना। राजपाल ने कहा यह पोर है । फल मेरे यहां से चोरी करके भाग आया है। भनेजर अवाक हो गए, ऐं। देसफर यह धार्मिक-सा लगा मुझ । दक्षिण वर बाबू कातर होकर चिल्ला उठे बिलकुल फिजूल की मात । मैं चोर नहीं हूँ। इनके यहाँ काम नहीं करना है इसीलिए चला आया हूँ। मनेजर ने दक्षिण पर बावू ना हो विश्वास किया। कहा मैं इन वाता म नही परता। उसने कहा वह आपकी नौकरी छोडकर घरा आया है। राजपाल की शतानी भरी आंखें चक चककर उठी। मोल पस्तिजी मेरा विश्वास न हो तो इससे पूछ देखिए। उन्होंने मेरी मोर दिखा दिया। सबकी नजर पचाकर क्नसियों से मेरी ओर इस ग स ताका कि अगर वह नजर का मता तो मेरे पजरे की हड्डियां तक गल जाती। यह कौन है' मनेजर बाबू ने पूछा। यह भी मेरा नौकर है। राजपाल ने जवाब दिया। मैं क्या करू ? मनेजर भावू ने मेरी तरफ दखा। पूछा वटे यह मादमी या पोरी करके भाग माया है? दक्षिणश्वर वायू को भी जसे सहारा मिल गया । बोल वही कहे, में क्या पोरी करके माया हूँ? ।

योग-वियोग हे 'बर क्या करू मैं ? राजपाल को उन खूखार आँखा का मैने फिर एक बार देखा। छाती में अन्दर माना होडी पीटी जाने एगी। दक्षिणेचर बाडू भी दुकुरकुर मरो मोर तार रहे हैं । लकिन मरे नावालिंग भाई-बहन मेरी विधवा मां भी मरी भोर ताक रहे है। इस महीने की तनख्वाह भी अभी नहीं मिली। क्या करू मैं कोकिन मैंने मी यो लग्नि नहीं बना । यह विसी भी प्रकार नहीं कह सका रिदक्षिणश्वर मावू चोर नहीं हैं। मरी पुप्पो को उहाने राजपाल का समयन हो समझा । विश्वास कर लिया कि दक्षिणश्वर यायू पोर हैं। लमहे में रामपाल की मूरत बदर गई। खुशी से विलकर मनेजर से बोल यो आप लोगो को भी पुलिस की चपेट में आना पडेगा । रुपए पसे इसने वहाँ छिपा रखे हैं तलागी होगी । लक्नि में वह नहीं चाहता। अपने नौकर की खता क लिए आप लोगो को झझट म नही डालना चाहता । इसी को से जाकर मो हो वरूंगा।' शझटो स दूर भल-से वैधारे मनेजर डर गए-पारमेला है । भाप बल्कि इस ल ही जाइए। दक्षिणश्वर बाबू इतन में टूट गए । दो एक बार बिहविड करक बोले में पोर हूँ चोर। उसका गट्टा थामकर राजपाल ने घरना शुरू कर दिया । लज्जा और पृणा स म दक्षिणावर बाबू की तरफ़ ताक नहो सका। दक्षिण वर यावू को ल जाकर राजपाल ने एक कमरे में डाल दिया और शहर से बन कर दिया। कहा तुम्हारी जो दवा है यह मैं सौटते ही दूगा । सारा दिन यदि पर पिया मेरा। मुमसे महा मैं बाहर जा रहा हूँ। लौटने म देर होगी काई काम । महा रागान काना है। मुझ पर कुछ सश हुए थे । बोल बांगाल मायू पी पोल के नीधे से रागन लकर तुम्ह थान अब यहां नहीं माना है । कल साप ले थाना । राजपाल चले गए । मैं यहाँ पुपचाप बठा रहा । भीतर के उस योग वियोग । भमरे को देखकर मेगे जो दशा हा रही पी उसमा वणन करने को सामध्य मुझम नहीं है। कुछ ही देर बाद सुना दक्षिणेश्वर बाबू मेरा नाम लकर पुकार रहे हैं.~- 'कर बापू हैंभाई मरे जरा खिडकी की तरफ आइ भाने की बड़ी इच्छा हो रही पी, लकिन नहीं मा सका । परा देर में फिर उनका भातर स्वर सुनाइप- 'दया करके एक बार दरवाया खोल दीजिए न । में भागगा नही । मिफ दाय रूम जाऊगा। हदिन मेरे लिए काई पाम नहीं था। मेरे पास की नहीं थी और होती भी तो शायद हिम्मत नहीं होती। मुझसे सहा नहीं जा रहा था। राणन सान के लिए उ। दक्षिणश्वर बाबू के गले का स्वर धम भी वैरता था रहा पा घरा सोम घोजिए न दरवाजापाखाना जागा। मौन जवार ? इस सूने विशाल प्रासाद से शहर उनका स्वर कहाँ पहुंचेगा। दूसरे दिन साढे नौ बजे पहुंचा। माहर वाला दरवान मुझे नुनाने ठगा। कर गत म पगले बाबू ने गले से धोती कसकर खुदकशी कर ली। राव ही पुलिस माकर राशल गई। राजपाल साहब को कोई और नही बाद। पुलिस से उन्होन कहा पा दलिए तो इसके लिए इतना रिया मगर तो भी नहीं रख सका। हंगे के बाद जब उसे बचाकर शया पा सभी से उसका रिमाग ठौर नही पा। इतन दिनाक बाद माम भी जर उन रामने दिनों की पारमा माती है तो मैं चारों ओर सने मग जाता है दक्षिणेश्वर गवू भासपास कही सट तो नहीं हैं । रिसी से पायो उपए कर गारी के पहले र का सपर मर लिए भी सम्मर नहीं।

५५ योग वियोग इसके बाद ही विवेकानद स्कूल । राजपाल ने राज्य म जिन्गी जन पर्दात से बाहर होती जा रही थी ठीक ऐसे ही समय हावडा विवेका नद इस्टीट्यूशन के हेल्मास्टर श्रद्धय श्री सुधांशु शेखर भटटाचाय ने मुलवा भेगा। कभी उनसे पदा या राज प्रायना करता रहा कि रामपुरम विवेकानद के पावन जीवन के आदश पर भपने जीवन का निर्माण कर सक। यह पेष्टा, यह स्वप्न मरा सफल नही हुआ लकिन फिर भी यह कहूंगा कि हम लोगा का सारा छात्र जीवन एक असीम मानद म ही बीता। ससार के भनेक छात्रो से हम विवकानद सल के छात्र भाग्यवान है। हमने किसी पहाही स्थान के पब्लिक स्कूल म शिक्षा प्ररूर नहीं पाई ऐंठ कर अप्रेजो उच्चारण में रहस्य को भी नही हासिल किया लग्नि सुपाशु भट्टाचाय उर्फ हाहास पता। हांदा मुझको प्यार करते थे। अर्यामाप से पटना छोड़ देने के बाद के अभ्याय को व टीक से जानत न थे। सोचा था मैं बेकार ही पठाई नौकरी की फोगिर रहा है। मुझको बुलवारर रहा साम मास्टर मी जगह है। तनखाह आ है उससे तुम्हारा अभाव तो शायद न मिटे सकिन आनद पाग। इस मामूरी-सौ नौकरीने किस प्रकार मुम नर-पगु राजपात ५ पगुस स बचाया यह हाडा ने कभी नही जाना। मैंने भी पहले की हिम्मत नहा नी। हर लगा कही सारा कुछ जानकर उन्हें मेरा नाम मने में भी लग्जा का अनुभव हो। समझेंगे कि रामकृष्ण विमानद पी भाषवारा पर हम मनुष्य बनाने की उनकी सार जीवन की प्रचटा बिल कुल विफस हुई। लेकिन उम समय नौररी मेरे लिए बहुत जारी भी योग-वियोग १ "सलिए नितांत मनिछा के वाबजूद मुझे बीते गिनों के बारे म चुप रहना पापा। जहाँ से पढ़े रिहा उसी स्लम frसन हाने का एक विशेष भानन्द होता है । मैंने उस आनन्द का पूर्णतया उपभोग किया था। पर प्रधान कारण उसका यह था कि उन्हाईसा उस समय भी मास्टर थे। मोर सनक सानिध्य में निरानद भरा कोन रह सकता है खासकर कन्हाई-ग की बात आज याद मा रही है। महान्दिा कायाप लागा म से कोई नहीं पहचानते । नामी नहीं है--स्व या छदम नाम से भी 4 पर नहीं। फिर भी उनका सान्निध्य मिला इस लिए अपने का धन्य मानता हूँ। और मवाफ हारर सोचा करता हूँ मनुष्य के इतिहास म एते 'सामाय' होगा को क्या नही जगह मिलती। यतीत भी सारी घटनाओं को कारानुनम से समाकर नहा रम पा रहा है। उस डरावन युग को छान यही कुछ दिन पहले की ओर आ जाने को जो पाहता है । सो वही करु । विवकानद स्कूल र अतीत युग मी पहानी को स्थगित रखवर पास के समप म चला याता हूँ। वाम-कान चुनारर उस दिन गाम का घर लौट रहा था। रास्त म मुना, पहाई-दा नहीं रहे। उसी दिन भोर म जब अपने इस प्रख्यात शहर के सभी सा रह प विवरान हर को सुदै को माप्रम को मार हम मद को शौकी देकर पानी का दौरा चुपचाप फिर पानी म सोट गया। यस स उतर पर सीधे स्कूल चला गया। जो भी नहीं देखा था बार यही देसन को मिला । स को सिहको दरवाजा सर पद । और दिन इस समय बड़े रास्त पर क मॉपिम घर म रोगनी जरती होती थी। दुमजिले भी कुछ कमर म यह दखने में आता था कि लपत को लिक्ट्रिर सप्लाई कम्पनी को कुछ बिजली खर हो रही है। अभी लक्नि सब मरा पास बरा देर र रिए मेन स्विप फ्यूड हाने ने मारा मकान पिपल अधेर मे भरे एर गम म दूब गया है। फिर भी माग नहीं बदसरा रा दर कनिएकाई-गको मनक योग वियोग - नने का हाय मौर खीच ल मात पोखर वे मिनार । वर्षे हुए घाट को सीदी पर घप से वह पडते और फिर शुरू हो जाती गपाप । मगर माज सांस को गप "प कौन करेगा हम छाइपर उनकी पाने की नाव जानें मिस मनाने बरगाह की बोर पल पटी? प्राधम म रहा नहीं गया । वठ खड़ा हुया । देवा मरे सायो पेटरमन दा ने कोई बात नहीं को मुत बठने तक का अनुराध नहीं किया। मौर नि होता तो सब हा-हाँ पर उठते- यह नहीं होगा। भस अभी ही उठने की सयारी" माज सब पीराम निमग्न थे। सीधे घर लौर आया और तब से यही साचता रहा कि क्या सो दिया। कम से कम एक दिन शनिवार को यह सध्या मर लिए हाई दाको सम्म्या हो रहे । आज न ता मन म साहित्य या न राजनीति न मपनौति । मान ये सिफ कन्हाईवाबू सर कन्हाई-दा र हाईलाल वाग। मेरे सापने मेज पर कागज पग था। हमारे मापूरी से स्सूल को मामूली-सी पत्रिका में रहाई दा के तिरोपान का समाचार हो सकता है। हादा मुम या शारदाको मियने कह, या फिर अन्त म वे खुद ही लिखने में। उनकी स्वाभाविक साधु भापा म वे मया लिखेंगे यह मैं ममी से बता दे सकता है। लिसँगै~ परलोक सिधारे फहाईलास वाग। हमारे इस विद्यालय और रामकृष्ण विवेकानन्द आश्रम के साथ बहुत बचपन स मृत्यु मे अतिम क्षण तक सवा के सम्बन्ध से जुड़े पे। उनसे इन दोना प्रतिष्ठाना का सम्ब घ इसना निस्ट का और भगागी था कि हमारे लिए यह अपन भी अघातर है कि उनकी सतिपूर्ति हो सकती है या नहीं। कहाईलाल की मृत्यु के शोक की कोई सात्वना नहीं यह हमे अस हाय हार सहना पड़ेगा। मात्र ८८पपीयवस्था म उहाँने शरीररयाणा ने हमारे ही विद्यालय के प्रवेशिका परीक्षा पास की थी मोर सन् १९३२ में मही गिसक रूपम आए प। प्रवेशिका परीक्षा पास करने के योग वियोग माद व मोटरजीनियरिंग मा साखने गए थे, पास भी किया था लेक्नि जोवन-वृत्ति क चुनाव के समय उहानि पहा मागिर होना ही पसन्द विपा । सम्मपन इस चुनाव के अतिरिक्त उपाय नहीं था क्यानि झामुनिया मचल के जिन रामपम विवेकान र भाषानु प्राणित युवका के दाग रामकृष्ण विवेकानन्द माश्रम और विवेरा नन इस्टीटयून को नोय पगे यो शिशु-सदस्य के नावे रहाईलाल सनस स्यामाविरुदया मिल गए थे। स्वामी विरजान से मात्र शिष्य महालास यतिम दिन तक का ऋण मौर देव ऋण चुकार पर हाईलास सीधे और सहन मादमी थे। मावेग म भाना उह पसन्द नहीं था। लगन से काम करने का अभ्यास या और निरामिमान, याम्बरहीन व्यक्ति सदा अपने प्रतिष्ठान का सम्मान सभाकर चला । साक्ष्ण और सरल वाकपटुता के अधिकारी हाई लाए पा सग साथ उन मित्र मोर ग्यष्ठा के लिए बड़ा मानन्द दायर या यात्रगण अवश्य मधुरता र साप उनके चरित्र की दृढता पा भी परिषय पाते थे। उनको मारमा को सदा माति मिले थौरामकृष्ण के चरणो में यही प्रायना है। सपिन हम लोगो के पास उनसरा और भी परिषय है । पिसी दाश निक ने कहा है, 'दुनिया म हम मम मम दावार रामा होसावे एक ता विवाह र रिन दुहा बनकर और जीवन के अल में, जिस दिन मोया रामा मृत्यु के समुद्र की भोर मफर रखा है। राजा बनने का पहला जो सुयोग पा उसे सामाजीवन सारे रहन का व्रत रफर रहाई दाने अपनी इन्धा से छोड़ दिया था। मात्रय राजा मने । किन एक हिरका मुमतान--माज को धन्तनत, सिफ माज लिए भार-बार अपनी धुरी पर चार माते-बात यह पुरानो धरती जब अगले साल फर याज को जगह आ जाएगी सब उन्हें याद ही कोन सघगा?

६४ योग वियोग दुनिया की परतो यही म ओ अपना नाम लिसाना पाहते हैं उन्हें नदी कठिन परीक्षा पास करनी परती है। हिसावी दुनिया एक बूढे सूद मोरकी नाइ सार क्महे स यघी जमा खरच की वहा लिए पठी है। मपने सुख अपने दुख अपने पाप अपने पुण्य अपने ग्रहण अपने रमाग अपने सुक्म अपने कुकम को पाई-पाई का हिसाब दश । यह यूदा जोदेगा पटाएगा गुणा करेगा फिर भाग करेगा। इस रथा-जोसा के बाद अगर जमा के साने मकाई वहा सा अक रहमा समा उस महो म नाम दज होगा। लेक्नि र हाई दान क्या यह हिसाब दिया है या देना पाहा है ? माम यदि मैं उनकी भोर से वकालत करन जाऊ तो यह मूदखोर ससार बुडदा हसनर लाट-पोट हो जाएगा । और सच मई उम हसी को उपेपा में उमा देने की हिम्मत मुझ भी नहीं । लकिन जिस दिन उनस मेरी पहली भेंट गई थी उस दिन मैं क्या नहा मर सकता था। सूब याद आ रही हैं वे यातें। अभी-ममी स्कूल म दासिल हआ था। रोज पांच पग्ना हाय का रिखा न दियाने से जो जरूर ही सजा देत 4 एसे एक शिक्षर का क्लास था।हम मुछ छाप उदास पठे थे। टिफिन की छुट्टी में सका छिपी खेल र मोह को छोड़कर बड़े बड़े अक्षरा का घम्यई मेल दौडाकर भी दो पने स ज्यादा नही भर सका । जरूरत की घड़ी में भाविकार की सूझ आती है। उस बुरी साइत म जी म माया माश ऐसी काई क्ल निकाली जा सकती जिसस माप ही-आप लिसा चला पाता । फिर लिसाक्ट के लिए चौप किसे रहमा स्मृल के बिगाल मास्टर सब से सब काबू हो जाएंगे। अपो उपजाऊ दिमाग की जब आप ही आप सारीप ररने जा रहा था कि दगल में एक रास्त ने हाड विषाकर महा ऐसी कला साइयों ने बहुत पहले ही निवासी है। यह भी कहा 'उस फल को देखने के लिए साहयों के पास भी जाने की जरुरत नहीं। पुरा धीरज १ योग नियोग परके सूल क कायालय म जाने से ही उसके दशन मिल जाएंगे।' पहल तो दास्त की बात पर पसीन नहीं मामा । हमित दूसरे ही दिन देखा कार्यालय म एक अजीबोगरीव पक्ष म कागज हासमर सपन इन के एम सम्जन रोड पर बिना नजर डाले ही वेसटा रिखते चले जा रहे हैं। अपनी ही यासों का विश्वास न हुआ।मन से निमना और यह मी बिना ऐसे । कौन है य? - मानव-मन्तान हैं या किमाई शाप भ्रष्ट स्वदूत ? दोस्त ने कहा पहचानत नहीं ? छाट घर म कभी नही देखा? कसे पहचा' छाट पर में पढ़ने का सुअवसर तो मिग नही । मैं जयनारायण राव एन ये प्राइमरी सम्मान का घोडा उठसार एक्वारगी मुस्ट रार क हाल की पास म मह लगा बैठा। दोस्त ने रानों में वहा कहाई बाबू सर हैं। मुनत हा पौरु उठा । सामान परिषप नहीं था । लेपिन पहगाई के उम यागार में मा विना रिमो महनत र पन्हाईबाबू क गाटे पस म याठ मिलत है, यह बहुन मार बहनों से मुन मृका या । उनको चिकोटी भी सस्तो पो-पस की तीन । मन म मैंने एक मारे-जगह मन्दाईवावू सर की तम्पीर भी मौक रवी पी। सुरक्षित जगह स एक सौपना राध रोपने नौ भुगी हासिल कर रहा था। अचानक सुनाई पड़ा ऐ पहा मुन जा। मुनत ही समम गया आया पा माघ देखते और वनसीया से उस पिचड़े में हा पर राल Pिया। दोस्त रोग तो अपत हो गए। रोनी-सी मूरत बनाकर मार बाते जाते कहा में देखना नहीं माना या सर उन्हीं लोगों ने सो मुम देखने का कहा। गम्भीर नाय समगीन पर समाज उतारते हुए पन्हामवादू सर ने पहा " नूशा पवना बागा देयता पाहता है तरा सर । होन पास परी पाप की पारी में सुपरी ली। उसर याद सल म फिर एक काब लगाया और में उस समय उन सबरा मन ही मन युपमा रह रहा था मिन गिन का महनौर से रर सवरे देवा पार योग वियोग । क्या नाम है तेरा? रिसी तरह से अपना नाम बताकर मैं फिर यह साबित करने जा रहा था कि मैं बेकसूर है। पटाचट चटाचट की आवाज हुई। डर से मने आँसें बद कररी हो न हो सर सपना गट्टा पना रहे हैं । लेकिन मम अपने मस्ये गटटे को कोई यनुभूति न हुई तो मैंने यखि सोसी। मांस सोलते ही अवाक रह गया । दुनिया म मुझे जो सबसे ज्यादा प्रिय था मेरा यही नाम हो मशीन पर मे पागज म जगमगा रहा था। माखों से मघरज पी समार मिटे इसके पहल हो देवा नाम के चारों तरफ फूलदार मारवठ गया। उस बेशकीमत दौलत को सकर किस गप के साथ दोस्तों में पास तौट गया था यह माम भी याद है । यह भी याद है कि उसी क्षण से दूसरे-दूसरे लौफनाक सर मुन कोडे पसगे-से लगने लगे। मरे मन के पास मान में उस समय एक ही नक्षत्र मी शोमा यो वह नक्षत्र पे कहा बाबू। युगलवायू पर हिमांशुबाबू सर यहाँ पर मि हेडमास्टर साहय तक कोई मरा लिख सकते हैं फल से एसा ? बना सकते हैं एसा फूल ? उसी दिन से फिर उहें पकडन को प्रतीक्षा करता रहा। एप दिन सामुदे के मोह पर उनसे भेंट हो गई । हाथ जोड़कर प्रणाम करके मैंने सर पसा ही फूलदार नाम एम योर लिख दगे ? हापको लिमा गट वाली यही पर लगाऊगा। मरे प्रणाम की नन्दाने परवाह हो न की मकिन बोले यह कौन-सा कठिन माम है ? ऐं! फठिन काम नहीं है ? बासुराड़ के मा" पर अवार सा रह गया। मेरी मांखो के सामने से ही सावुन से फिपी हाफ मोर और घाती पहने कन्हाईवाबू अपनी स्वाभाविर तेज चाल से भोपल हो गए। उस रोज यानी मई महीने की उस मास को मगर मैं लिखना जानता होता और कोई यदि मुझ से कन्हाईबावू के बारे म लिम्पने भो कहता तो मैं बलपूर्वक यह रह सकता हूँ कि मेर हापा ऐसे एक परिण को सप्टि होती जिसक मागे युद्ध रामानुज शकराचाय मिसनर अकबर नेपो योग पियोग। लियन समी तुच्छ मोर रकार से लगत । इनमें से काई क्या इस तरह बिना दक्ष कल चला सकते थे। और पता भी सकते हो तो पया ऐस निश्चित ग से एक बालक के अप्रतिम प्रणाम की उपेक्षा करके यह सस्ते पे-महान सा कठिन काम है हाय उस समय क्या यह मालूम पा कि इसके बाद भी राह-बाट म स्कूल म दाम इस म उनसे किवनी ही बार मुलाकात होगी जीवन के प्रभात मी स्वप्न माया मेरे ही जीवन के मध्याह्न म हिसानी ससार की धाप स धोचीर हो जाएगी। ए भी एक दिन भाएगा, जब मैं खुद ही पल चलाना सीखूगा । यह जानूंगा कि टाइपिस्ट नाम से जो जान जाते हैं, व दुनिया में सापनामा सफल कहलानेवालों म नही आते । जिससे और कुछ भी नहीं हो सकता, वहा मन में टाइप सोषकर बमा यजामा शुरु परता है । सकिन उस समय सोच भी नहीं सका पामि एक दिन विवेका नन्द ल म मार होकर मैं कहाई-दा के स्तर पर पहेच जाऊगा। स्कूल में उसी कायालय पाल झमरे म रटार कहाई-दा कहा कि 'हम हयोगमार साइपिस्ट है ठीक-ठीक बनसा नही । शमर, तुम टाइप करो, पहत जल्दी हापा और बहुत अच्छा होगा।' लग्नि बाग रात उन बातो को सोचकर साम या जो जीवन भर हम हसाते रहे एक साप हा-हल्ला रते रहे उनके लिए हाम-हाम करन स उनका परलोकगत यात्म निश्चय सुखी नही होगी। बात-बात म रोने वाले आमाको कन्हाईदा विलकुल नही पसन्द करत महत 'मह रोना भोना मेरी समझ में नही माता। हो हल्ला करोगे गोरगुर ममाओगे, यह वह तोड़ोगेफोड़ोगे बडे या मास्टर पोर्ट तो सिर साए पिटकर दूसरे ही क्षण बाल-कूद सरने लगोगे मौका लगे तो फिर तोडोगे----इसे कहते हैं साम! जो रिरिचाते हैं मिनामनात हैं मई मैं ता उनका नहीं समा सरता।' मौका मिलने पर मन पूछा मी 'अच्छा थापा पट्टा पपा साइम्ता साने जमाने पावल-सा सस्ता है।

६८ योग वियोग अर यही गट्टा खाया है जमा तो तेरा दन ऐसा सुसा-यह पया नही गमझता? वे ज्यादा यासाचना या सोष विचार की ओर ही न जाते । इसलिए कहा तुझसे वस्या करने से मेरा पेट भरेगा? जरा हो र म देखना क्या है चोये दर्जे वे एका साथ वे मान म इटा के विरेट के सामने फिोट सेल रहे हैं। उनके हम उन थायम के मायक्त्ता सह पुकार रहे हैं वहाई आ पा ठाकुरपर म माम है। मगर कहाई॥ काहे को सुनने लगा तब तक वॉल पो पाउडरी म मारपर छाडया से कह रहे हैं अरे इन फ्लाइया की सारत ही और है। सारे नि पाए करते यक जामागे आउट नहीं कर सकते। नीचे दर्जे से कार जाने पर जब जरा पालाक हुआ तो सबके साथ हो जाना कि महावाबू सर दरअमल फ हाईलाल याग है। प्राइमरी सेमगन म पाते है और ऊपर से लास ने एडवा पी शुल्क जमा करते है । हर महीने शुल्क जमा करने के लिही उनसे हमारा साक्षात् सरोकार हो।हमारेल में मार्यालय मकाउटर नहीं था। हाइएक सिष्ठको 4 मदर वठा करत और हम बाहर से खिसी की राह शुल्प-बही उनक माग डाल देते । ऐनक मे ऐने स थे उस पर एष नजर हालत हाल पेंसिल ना निगान गाते और उमके या रबर की मुहर मारकर घिस या पोटा मा हिस्सा फाडपर लोग देते। किमी रिसोरा दिल हाथ मलते ही विगा उठते यह नम्बस्त यासिर यादमी नही ही यन समा । दर्जा चार म जसा पदर पा आज भा ठाय वसा ही रह गया। परीक्षा गुल्म के माने म पत्रिका पुस्क पत्रिका तुल्क फ सान मे पखा गुल वटा दिया है । दसता हूँ गाजियन सा सिखना पगा। जिसे यह बात पहा उस बेचारे या तो चहा फक। वित-यहाँ पर वह पापम चला तो कहा-गने हसत-हसत कहा देखना मन ही-मन गारी मत दना नहीं तो पाय पीते वक्त गस म अटक जाएगी। मरे में गालियन से शिकायत मरन नही जाता।

योग वियोग ६६ पात म खडे-खहे यह सब सुनसर मैं फिक्र फरके हस पडा । उनको निगाह नहीं बचा सका । बोल 'एँ। दांत निपाटकर हस क्या रहे हो। हुपूर की लिखावट तो वही कौआ-बगुला मी टांग । बहुत दिना के बाद यह सुनार र हाई-दा के बचपन क एक दास्त ने कहा या कन्हाई का स्वभाव ही ऐसा है । मह से बिगडता है सक्नि वह गुस्सा फलजे म नही पठना। यही नहीं, हर कुछ कुछ मशा दिए विना उसका दाना नही हजम होता। हिमाच न बना सक्न पर छोटे वचनों पर जो लाल-पीला होता है वह भी मजा ही है । तुरत उससे मन की बात करो कुछ न रहेगा यमि तुम ही होगा। जिसमा भी झोल झापड हो जितनी भी बनाइ हुई घटना या किस्सा हो देखटो हाई के नाम पर पग दो। इस स्कूल के छात्र व नाते उस नाम पर मच की स्तिनी ही घटनाएं घरराट गइ । पहाई दा के दास्त ने महा एक वार का जिक्र है, हमारी क्लास में ट्रासलशन पूछा गया-महत् साग साधारणतया महत् परिवार स आते है । जाने रिसने पल भर भी सोच विना पोच स मह रिया---प्रट मेन कम फोम रिपाएमस सोस । सभी हा हा हा हस पड़े-सकिन पता नहीं पला कि महा आखिर किसने । मास्टर साहब ने पूण चेंबर साहब क भतीज ये रिलाएक्त साहय हैं यौन ? साहब दूर नहीं मिल रहे थे। एसे में अगति को गति कहाई तो था ही। सपने हसत-हसत उसी सा नाम रण दिया रिलाए बर सोस। दोस्त जरा रुके फिर महा मगर पहा बिगडता जरा भी न था। खेल- नकी बात सा क्या फुटवोर क्या हॉपी और क्या निट उर छोटकर कोई भी टीम नही बनती लरिन गाल सान या सारा मूर हार जाने की सारी जिम्मदारी सवसम्मति से उसा पर योगी आती। पालीवॉल की एक भूल मार का नाम याज भी यापम में कनियन स्ट्रार है।

६८ योग वियोग भरे यही गट्टा साया है मभी तो तेरा बन ऐमा मुसा यह ग्या नहीं सगमता ? वे ज्यादा थालोपना या साच विचार की ओर ही न जाते । इसलिए कहा तुमने वकथक करने से मेरा पेट भरेगा? ज़रा ही देर म देखता पया हूँ चौये दर्जे के हमारे साथ वे मदान म इटों के विरेट के सामने क्रिोट सट रहे है । उनने हम उन आश्रम क कायकता उन्हें पुकार रहे हैं कहाई माजा ठाकुरपर म काम है। मगर महाई काहे का सुनने लगा तब तक एप योरूमो बाउरी म मारपर खडका से कर रहे हैं अरे हा साड्या की ताफ्त हो और है। सारे गिन याल करते थक जामागे आउट नहीं कर सकते। नीधे दर्ज स कार जाने पर जब जरा पालाप हुआ सो सबके साय ही जाना कि फहा वायू सर दरअमल पाईलाल याग है। प्राइमरी सेवान म पाते है और ऊपर से पारा का पी गुल जमा करते हैं । हर महीन शुल्म जमा करने के लिहो उनसे हमारा साक्षात् सरोकार होता।हमारेल के मार्यालय मकाउटर नहीं था। पन्हाइश एर खिसकी प मारवठा करते और हम वाहर म विमो मी गह गुल्फ यही उनके आग ल देने । एनर थे ऐने सदै उस पर एक मबर हासते लाल पेंसिक मा निशान लगा और उसके या रबर की मुहर मारपर बिल का योग मा हिस्सा फाडकर लोग देते। किसी किसी का बिल हाय मरते हो विगड उदते यह मम्यस्त माखिर भादमी नही ही वन समाादा चार म जसा पदर पा आम भी ठाम बसा ही रह गया । परीक्षा शुल्क के खाने में पत्रिका शुल्क पधिमा गुस्क कसान म पया गुल बठा दिया है । देखना है गाजियन सो लिम्बना पोगा। जिस यह यात कही उस बेचारे पा सा पहरा फक। विल-बही पर यह वापस पला ताप हाई-गने हसते-हसते कहा देखना मन ही-मन गाली मत देना नही तो चाय पीत वक्त गल म अटक जाएगी। भरे मैं गाजियन से निकायत करने नहीं जाता।

योग यियोग पात म खडे-सहे यह सब सुनकर मैं फिक्र करके हस पड़ा । उनकी निगाह नहीं बचा सका । बोल हैं। दांत निपोहकर हस क्या रहे हो। हुबर की लिखावट तो वही कौआ-बगुला की टांग। बहुत दिना के बाद यह सुनार कहाई-दा के बचपन के एस दास्त ने कहा था कहाई का स्वभाव ही एसा है । मुह से बिगडता है लकिन वह गुस्सा करजे म नहीं पता। यही नही हर छ म कुछ ममा लिए विना उसका दाना नही हजम होता। हिसाब न बना सक्न पर छोटे बन्नों पर जो लाल-पीला होता है वह भी मजा ही है । तुरत उससे मज़ मी यात करो कुछ न कहेगा बल्कि सुरा ही होगा । जिसका भी झोल शापर हो जितनी भी बनाई हुई घटना या मिस्सा हो वेखटरे महा के नाम पर पग दो। इस स्कूल के छात्र ने नात उसप नाम पर मड भी क्तिनी ही घटनाए घलाई गइ । कहाई दा के दोस्त ने कहा एक बार का जिक्र है हमारी क्लास मे ट्रासलगान पूछा गया-महत् लोग साधारणतया महद परिवार स आते हैं। जाने निसने पर मर भी सोचे बिना पीछे स कह दिया--प्रट मेन कम मोम रिसाएमल सोस । सभी हा हा हा हस पडे-लकिन पता नही पला नि कहा नासिर पिसने । मास्टर साहब ने पूछा चेंबर साहब के भतीज रिलाएबर साह्य हैं मौन ? साहब दूट नहीं मिर रहे थे । एसे म अगति की गति कहाई तो था ही। सपने हसते-हसत उसी का नाम रत लिया रिए बर सोस। दोस्त जरा रुके फिर कहा मगर र हा विगहता जरा मीनपा। खेल-यूद की बात लो। क्या पुटवाए क्या होगी और क्या विषट न छोरफर कोई भी टीम नही बनती लग्नि गाल सान का सारा सार हार जाने की सारी जिम्मदारी सवसम्मति स उसा पर पानता। वारीवॉल गरी एप भूल मार का नाम माज मा मायनरन योग वियोग । विद्यापी-जीवन म कहाई-दा क्सि बच पर २ठते पे नहीं मालूम । लकिन मम जीवन म यह सभी पहली पक्ति में नहीं आते थे गोयाकि स्कूल और माधम फार्मों म जा सबसे अमले का होता जिसम सबस पादा मेहनत होती उसी को अपने लिए सुनसर ये खस होत थे। दुनिया म एक इस तरह के लोग होते हैं जो ठौर नमक जस हैं। कुछ भी हो घे सामने नही रहत गोयाकि उनमें न रहने स हर फुछ यस्वाद हो जाता है । फोस्ट म ये सम भाटा गूंघते हैं पूरियां निकारते है लेकिन खाने बैठन है सघने पीछ । य खट-खटकर मरते हैं मगर पयवाद नही घटोरते । समा-समिति उत्सव में ये वर्षे बात है कुसियो लगात है 'योते मी चिट्ठी बोटत हैं किन्तु घुला कुरता पहनकर मेहमानों की अगवानी नफरते । नाटक में पत्ती में नीच बोट म बैठकर प्रामप्ट फरते हैं दाल-सलवार एकर राजा नही बनते । न ता कोई इह महल देता है न ही अखवारा में उपता है इनका नाम । लकिन इनरे धिना न तो फोस्ट हो सकती है न समा हो सकती है न नाटक हा सकता है। इनके बिना असल म जीवन ही नही पल सकता। सकिन दुनिया में इससे कुछ याता-माता नहीं । जो मनुष्या के मन मदिर में प्रवेश पाना चाहत हैं उह निश्चित सामी तो देनी हो पढ़ेगी। मौर इसीलिए तो सर है मुझे । यूटा ससार निर्जीव परपर सा पूछेगा 'बजी जिनके लिए इतना लम्बा लपचर शाह रह हो ये है कौन' ये हैं मौन ? मुभ रहना पड़ेगा 4 पम० ए नहा पी एच. दी. नहा है-- महा मटिक पास । टाइप जानते थे मार पलाना जानत पे मगर मास्टरी परते थे प्राइमरी सेक्शन म । दुनिया जानना चाहेगी कि मासिर दुनिया का क्या दिया उन्होंने ? मुझे सिर झुका कर चुपचाप सग रहना हाणा। फिर दया करने हा साता है पूछा जाए कि कम-स मम एपाय सुमाप रवीद या परतवदको पढाया है उहोंने बचपन म मुसो इस पर सिर झुकाए हो रहना पड़गा। ममिन यह शम कहाई-दामी रही। यह शम उनी है जो उनसे योग-वियोग पढ़ते थे। यह शम उनकी है जो उहे जानते थे करीब से देखत थे। जो जानते हैं कि आज उहाने सवरे क्या खा दिया । क्योकि इस खोना सूत्र सो एक ही दिन में खत्म नहा होगा । जब भी स्कूल में सरस्वती पूजा हागी मास्टर लोग दौड धूप करेंगे लडके हलचल मचाएंगे-तभी याद आएगा कि उन्होंने किसी का बोया है। कहाई-दा का एक मौर रूप देसा है दुर्गा-पूजा में । आश्रम की दुर्गा-पूजा का हमारे जावन म नया स्थान है, इस यह नहीं समझगा जिसने देसा नहीं है । माधम की दुर्गा पूजा का रूप हो और है। आनन्द का रोमी एक दल चार दिना तक सारा कुछ भुलाकर यही पहा रहता है। चीन्है अनमी हो की लम्बी दोस्ती माती-जाती रहती। उन्होंने मूर्ति का दशन किया या नही दान किया तो प्रसाद उन्हे मिश्रा या नहीं अधों पर उनके बठने की जगह है या नहीं या इन शरीर एका ने सरक रसखा है- यह सब दसने के लिए ही तो कहाईनाथ। हमारे माधम को एक मोर मास बात है। पूजा के लिए कभी चदा नहीं मांगा जाता । मफिन बहतेरे लोग सुद ही कुछ माना चाहते है । उनके लिए और खर मा हिसाब किताव रखने के लिए सामने बरस रख भर भिहें हंसत हुए बता देखना पा-वे पर हाईदा । ग्यारह बजे रात सक भी उन्हें उसी तरह बठे देखा है नया पता कोइ मा जाए ! इसके अलाव भी बहुत-बहस । सपेरे बादल बाबू सर ने नारास होकर कहा रहाई रे घण्टे से रहा हूँ हम चाय नहीं मिली मभी धरु । यही तुम लोगों का इन्तजाम है ? पाय बनाने या पारने का भार उनका नहीं इसके लिए दूमर लाग ई लक्नि सो भी दोप मपन कपर सफर लग्नि गुस्स से बयगते हुए ये चाय की खोज में पल दिए। पवार के बीचों-बीर किसो सोना बरसती सुबह में जम ठाक की बाग मनी ध्वनि से नरपाय सैन गुजरठणी प्रसाद सिंए हाप में पून लिए कामुदे के भोग जर माश्रम के सास रास्ते को पार कर टाली की ७२ योग वियोग छौनी वार परामदे में आफर बठेगे जब पेटरसन-ग लर और पाय यौटने जाएंगे तभी जो में भाएगा क्सिमा तो यही होना उपित था कसी तो कमी तो है नौन जस यहां नहीं है। ४ सय गडबर कर वठा । कोन सा जोड है और कौन सा घटाप यही नहीं ठोक रह रहा है। छानो-दा हाक्नि बाबू ये सब मेरे जीवन क कौन-स मक है जोड ? या मैं निरा अभागा हूं इसलिए मयका घटाव ही पर बठा हूँ ! हिसाव को इसी कमजोरी से मैं विद्यार्थी जीवन म कुछ नहीं कर सपा । लग्नि विवेकानन्द स्टल छोटपर विभूति दा का हाथ थाम यम्बा स्टीमर से गगा पार करके जिस दिन हाईकोट म साह्य से मिलने गपा पा उस दिन मरे हिसाब की यही म सिफ गुणा ही गुणा किया गया था इसम स देह नही। उसी क्षण जमा पुरुप म सानिम्म स मैंने जिस विभिन जोदन को प्रत्यक्षा किया था उसी का पोगमा मैंने अपनी पहली किताब क्तिने मन जान रे में लिखा है । उस कहानी का जो हिस्सा अलि खा रह गया है उसफ प्रकाश म थाने का समय अभी भी नहीं पाया । जिस दिन वह समय आएगा मैं जिदा भी रहूंगा या नहीं नहीं जानता । लग्नि सव शक्तिमान ईश्वर से मरी प्रायना है कि तब तक वे मुझे जिदा रपक्ष । नहीं तो मेरी यात्मा मरकर भी गाति नरी पाएगी। मैं उन मान पाल दिन की प्रतीक्षा में हूं। इस बीच मित्तन अनजान रे को परकर कुछ शिकायत की तरह बहुतों न पूछा है क्या जनाव अपनी स्तिान म अपने बरिस्टर साहब के बारे मे ता तना लिखा मकिन उनकी स्त्री के बार में कुछ भी नही रिहा, यो क्यो ?

योग वियोग ७३ कोई-कोई यही रुक गए। दो एक नने ने इससे भी वागे वर कहा आपकी किताब पर वो मह लगता है कि अहोने गादी ही नहीं प्रतिवाद करते हुए मैंने कहा जरा ध्यान से दस मेरा कितार में उनको स्त्री रामसर कई बार आया है। पूछने वाले ने सिर खुजाने सुजाने कहा 'जी हो जी हाँ या तो आ रहा है । लकिन इसी से आप समभिए एक लखक ये नाते यह आपकी कितना वग नाकामयाबी है। उस आप कुछ इस तरह रमा है कि किसी की भी नजर नहीं पड़ी। कोई-कोई और भी कुछ भाग महकर बोला, हा सकता है आपन जानकर हा एसा विमा हो । साहब-सूबा का मामला ठहा न । उनको प्राइवेट साइफ सदा हमारा जमी क्या नाम है कि पीसफुल नहीं होती। सुनकर मानों पर मगुली रसी। जो लिया है उसके समयन म जार पर से पहा भी। लकिन सब पहूँ ? वास्तविक रहस्य का अब तर मैंने किसी में सामने जाहिर नहीं किया । एरअसल श्रीमती यारवेल को मैं पहचानता नही था। जब सक ओल्ड पोस्ट ऑफिम स्ट्रीट के अदालती बाजार में मैंने बाबूगिरी नी मही वस म दवाए सुबह-मास माहब के यहाँ जाता याता रहा तब तक धीमती वारवेल से मरा साक्षात् परिभम नहीं हुआ। सुनकर हो सकता है, रहतो को आमनय हो कि उनसे मेरी पहली मुलाकात साहब व मरन र वाद हुई। स्वामी की मृत्यु के बाद कुमायू के अलावास सपोमती वारवेल लाता मार । सबर मिली कि पाक स्ट्रीट में अपना एक मित्र यहाँ ठहरी हैं और यही अग मी एक वर्षायुखर सम्मा म उनस मरी पहली में हुई। लपिनास भेट में बहुत पहल सहा थोमती वारवल को एप कारम निज तसवीर मैंने मन में उतार को पी।कहने म मुझम नहीं कि यह यसदोर या परी और उसक पारो मार या पुमरे मेपों का समारोह ।

७४ योग वियोग . भोर की घूप जसे साहब र हास्यो वर मुख से किसी भी तरह उसका मेन नही मिला पा रही पी। तो खोलकर ही कहूँ । साहब काम से कलकत्ता मौर मेम साहय पड़ी रानीखेत म। लिहाजा उनके निवास पर-रक्ता पलय के एक नम्बर सूट मे-हम लोगो का रामराज्य । उनकी कसरता की गृहस्थी का मैं भोर बरा दीवानसिंह-गेनों राजाधिराज पे । मूठे माहम मानो हमारी मुटटी में। हमार काम काज और योग्यता पर भी खबरदारी के लिए कोई रह सकता है इसे नौकरी में घुसने के महीने भर बाद ही बिलकुल भूर गया था। नौकरी म जब आया था तब मैं निरा बाला सा था। साहब हागा तो मेम भी होगी और फिर उन्ह साथ रहना चाहिए यह सव स्वत सिद मेरे दिमाग में नहीं आता था। सा नौकरी म भाकर मपना काम करता जाता था। साहन के मेम है या नही या है सो कहाँ है-ऐसा स्थामाविर गौतूहल भी मेरे मन म नही जगता था। कुछ दिनो से पाम कर रहा था । मूब याद है एक दिन शाम को साहब ने मुझे बुलाया। बिस्तर पर लटे-लटे दे कहानी की कितान पर रहे थे । खाठी बन्न । पहनावे में एक मनसिली लगी। बोल अपनी शॉटहैंड की कॉपी न आओ। अपने बेटे और पीवी को एक चिट्ठी लिखाका ससार की बहुतेरी गोपनतम और महत्त्व को चिट्टियां स्टेनो द्वारा रिखी जाती है । मगर स्त्री को रिटेशन से रिखाना । उनकी यात सुन कर राज से (यह थीम उस समय पायद कुछ ज्यादा ही मात्रा मे पी) मर दानों कान टमाटर-जसे लाल हो उठ । कलमत्ता के एक-से-एक जी मान स्टेनो की प्राइवट और कानपिनियल गप सुनने का सौभाग्य मुझे इसी बीच हो चुका था। विलायत से लौटे हुए किसी पौधरी साहब ने अपने पिता को पिन से चिट्ठी लिसवाई थी इसी स्नो-समाज में हलचल मच गई थी। और मुझ स्या तो स्त्री के लिए पिट्ठी स हिस्टेशन 1 पाकर योग वियोग ७५ लना होगा। सोचा पायद मेरे समझने म गलती हुई । जहर उहाने मझसे पर मांगा है स लिखेंगे । चिट्ठी का पट और कलम उनकी ओर घटाते ही दे मिटमिटाकर हसते-हसते सहसा चौक उठ । बोल माई डियर घॉय अपनी नीयो को मैं बहुत प्यार करता हूँ। इस बुटापे म अगर यह मेरे हाप स निकल जाए नो मरी क्या दशा होगी सोचा है जवाब सुनकर मेरे तो नीला पड जान की नौवन । मुख कसूर बन पडा क्या क्या जाने । साहब ने अब बहुत धीरे पीर कहा तुम्हे एक गुप्त बात बता दूं। सवरलार किसी से कहना मत । अपने खतरनाक दुश्मन के सिवाय मै किसी को भी अपने हाथ स चिट्ठी नही रिसता । मेरे हाय का लिखा दो पला पन में दुश्मन या ता अधा हो जाएगा या उसके दिमाग की नस पट जाएगी। अव हसत-हसने लोट-पोट होने की बारी आ गई । सयार हा नहीं रहा कि उनके सहन व्यक्तित्व से सारा भेद मुला वठा हूँ। पूछा तो क्या मापन उहे कभी अपने हाथ से चिट्ठी नही लिखी ? यह न पूगे। धीमतीजी पहल-पहल जव परिचय हुआ तो एन के एक पलिक टाइपिस्ट से चिट्ठी टाइप राता था। एक पन्ना टाइन पराने म एम गिलिंग लगता था। जो हालत थी अपनी। कालज का विद्यार्थी रोज रोज इतना पसा कहाँ से आए लाचारी दूसरा उपाय निकाला। चिट्ठी रिखना और उसे लेकर मैं खुद ही जाता ताकि पढने में कठिनाई हो तो हर कर दूं। सिफ एक वार स्वय न जा सका और उसा बार तो उहोंने यह धमनी दी पि हाय से चिट्ठी लिखोग तो तुमसे कोई सरोकार ही नही रखूगी। हमी-माने वा मचमुच ही उहाने उस राज रिक्टैगन दिया पा। उस हिकान से मैंने ओ चिट्ठी टाइप की उसम यहुत-सी गलतियां हुई थी लेकिन उतनी भद्दी टाइप की हुई चिट्ठी देसकर भी साहब जरा न बिगड़े वसि पी० एस० निशान लगाकर उसके नीचे अपने स जो लिस 7 योग पियोग दिया मन्तसर म वह हया-- टाप म पह वीस गलतियां जरूर की हैं लकिन एसा लहरा भारत भर म मिलना मुरिर है। साथ ही यह भी रहे देता है कि जल्द ही यह लम्का सुमसे भी अच्छा टाइप करेगा। साल के वरावानसिंह ने मझ सायघान पर दिया । यह बास कुमायू माया । अग्रजी मिजाज का सारा रहस्य उसे मालूम था। इसके सिवाय मेमसाहब को उसने बहुत बार देखा है उनरे पास राम भी किया है। उसने कहा और सम चिट्ठियां चाह ज से भी टाइप रो स्नि मेम साहब की यिट्ठी खराब हुई तो भविष्य न करमर समा। ममसाहब किसी तरह की गन्दगी काट रट पसन्द नही मरती। ये साहब जसा बमगोला नहीं हैं-ठीक इनकी उरटी। साक्षात काली मया । पूजा में चूक होने से सर नही । सुनकर मेरा सा डर बढ़ गया । मन में सोपा बासिर रोग रोज रानीखेत चिट्ठी रिखने की या जरूरत है। किसी दिन वह मद मिजाज औरत लिख देगी कि सुम एक याहियात टापिस्ट मो पास रहे हो। दीवानसिह न पहा मेमसाहर यहा गुस्सा खूप टसी फरमारती हैं पाय? मैन पूछा। सुना बकसक नहीं बरती। सिफ माम पसद नही थाना तो पास दुसार मीठ मोठ महती हैं कल से मत आना। एक दिन दीवानसिंह से पता चला मेमसाहब क्या तो रलकतामा रही हैं । उम रात कोई दो घटे आँस पद पर एकाग्रचित्त से मी भगवान से प्रापना की 'हे सर्वपक्तिमान सवा रुपमा ४ रुपया जो भी कहोग पदाऊगा लकिन इस सास विरामती ममसाहब का लगता माना जिसम ब हो जाय । हम जिस प्रकार से यहाँ रामराग्य पला रह हैं उसे अपनी आँखा देस लगी तो लिपस्टिक लगे उसके होठ स्याह सोम्ना पसे सफेद पड़ जाएंगे। उनके सर्वांग या एहू वेग से दिमाग पर मट जाएगा । उसी हालत म डाइग-रूम में बठी फनखियो से मेरा टाइप करना दसेगी । और यह भी देखेंगी कि पचास बार वेग योरपान कह कर में साहब पी चिन्ता की वर्ग को किस कदर तोह दिया करता है।

योग वियोग ७७ फिर साहव स कोई मशविरा किए बिना ही मोठा हसकर मतमनसाहत से पहेंगी कल से मन थाना । मा-हो मन दुस क्यिा नि दुनिया म ऐसा ही होता है। भगवान सध-कृए मन मुताबिक नही दते । बुद्धि देते हैं तो रूप नहीं देत और रूप देते हैं तो सुम सुविधा नहीं। नसीव से मुझ साहब मिला तो मेम- साहर मिली देवी मनसा को अबतार । ईश्वर पर बड़ा गुस्सा भी आया। इस साहब को नहाने ऐसा मेम क्यों नहीं दी जो विगढती नही और मिाहती भी तो मोठा हसपर कम-से कम यह नहा कहती कि कल से काम पर मत आना। ऊपरवाल ने उस कार सवमुष ही मुम पर वही कृपा की। मेरी प्राथना मजूर हुई। रानीखेत से चिट्ठी आई मिश्रोमती वारवेल नहीं आ रही हैं। उनसे न जाने की जो वजह मालूम हुई उसमे मेरी इतो दिना को धारणा को ठस लगी। पहाड़ से उतर बान की सारी मारियो हो चुकी। ऐमे म उनका पुराना नौकर वामार पड़ा । ये हमरत स्वस्य रहने पर जस सरले प्रमुओं की सेवा करते रहत है वते ही बीमार पड़ने पर क्या तो उनम सिवाम दूसरे किसी को सेवा नही स्वीकार करते । नौकर की बीमारी के चलते हजार मील दूर रहने वाल पति से मुलाकात कर हो गई यह सोचकर मैं साम अचरम में पड़ गया। लेकिन जिहे आश्चय होना चाहिए था उनमें मैंने कोई भी परिवतन नही देखा। वे सनकी भांति निशिन्त हाकर मुग्ने हिकोगन देते रहे । उघर से भी जस्टीजरी जवाव आने लगा। उनसे उम भरसे की चिट्टियों में सफड़े नम्वे तो प्यारे नौकर की बीमारी सम्मा वणन और आलोचना हुआ करती। स्टेना लोगों का टिमन साहब के सिर को वसम है मालिका की चिट्ठियो ना एक असर भी अपनी बीवी तक से महीं रह सकते । अपने और अपनी रेमिंगटन मगीन के सिवाय कॉनफ्रेिंस में सौर विमीसो नहीं योग विपोग स समये । अब धक पिटमम साहब का मानून मानता मा रहा था। लफिन इस मामल ने मुझ इस दर सोच ५ पार दिया वि साव के मरे सपन मोक्र गारियन और एडवादार दीवानसिंह म मैन सब कुछ अज किया। दीवा सिंह ने यपने पुराने सिमा त म पाडा-सा सगोचन फरम कहा बीमार थामी वो मेमसाहब कुछ नहीं कहती। यह भी गुना कि 'एक बार अपने बगीच + माली को उहाने जवाय द दिया था। माली जापर साह के सागे न लगा । पाप व रिण्टर उभय स ग पर गए । एक घोर पोधी क अधिकार म दखल दना और दूसरी ओर एष गरीव का मागू। आखिर कानूनी अक्ल सर गइ निमाग म । निकट बुलाकर फुसफुमानर यहा जाकर मम साहब से पहो कि मैं बीमार हूँ । सीम मुहर फीस एने वाल यरिम्टर की ग्ट बुद्धि का मन्तर जसा असर हुआ । नौकरी तो बरकरार रही ही कार से रात मेमसाहब का सवा जतन । दीवानसिंह से मुने इप्त रिस्म पी सत्यता को साहब से जाच देखने की मुन कभी हिम्मत नही पडी।किन उसपी कहानी म इतना भरोसा हुआ कि कभी अगर वसी मसीयत आए तो अपन मदा भक्लोन दाले दारीर मे बचाव होगा। रानीखस से साहब को जो चिट्ठी आइ थी वर वन्त हो थपछी तरह से टाइप की हुई थी। पाग तरफ समान हागिया बसा ही माफ्-सुपरा टाइप । वहा भी पाटट या रबर का दाग नही। चिट्ठी ९ पुस म हा लिखा था भरी पति-परायण पत्नी न इतने मामा के होते हुए भी अगर टाप करने का मार ही रिया हाता तो मैं तुम्हें यह चिट्टी ही नही लिख पाता। चिट्ठी के त म साहब पा रद का लिखा हुमा नोट देवर तो मरी मांसा की पुतरी ग गई। साह्य हिसा था तुम्हारा अभाव बेतरह महसूस कर रहा है। दूसरे क्मिी रानिटेगा देकर यह सन्तोष नहीं आता।

योग-वियोग UE मालिक को प्रशसा सा होना तो दूर रहा मेरा सर ही बढ़ गया। उतना सुटर टाइप करन रे बाद भी साहब को यह राप । अगर मम साहब ने किसी तरह देख लिया हो सो मरे नसीब में माविरी दुस लिप्सा है। किन आसमान के हनमत्रो की मुन्न पर ऐसी कृपा रही कि वे मुझ सा बचात गए उनका नेपथ्य सावधानता में एसा हुमा कि मुझे श्रीमती बारवेल के आमने सामने खड़ा नहीं होना पष्ठा भी । किसी-न किसा कारण से उनका कलमत्ता आना हर बार रुक गया। भगवान के बारे म साहब को किसी भी प्रकार का आग्रह नही था। भादमी और धरती में ही इस कदर मागूल रहा भारत मि इसके बाहर की किसी भी अभिशता का रहें जरा भी आग्रह नही था। और मेम साहब इसके ठीक विपरीत भी। उहें भारतष में धम और धान में मानन्द मिला था। इसी को मार साहब प्राय मजा पिया करते। कहते, जब मझको वा मे में कर सके तो तुम्हार दवी-नवता मरी मम साहब पर सवार हो गए हैं। अपनी सोचकर मम दुस होता है । लगता है अतिम दिनों मुश भी सतार छोडकर कपड़े का एक टुकदा कमर म लपेटे मा बाद किए रिवर गजेस के कितार रहना होगा। यम साहब के कलकत्ता आने के बारे में साहब रहते उनका रानी धेस छोडमर एकाएक यहाँ माना वडा कठिन है ।' क्यापि रानीखेत कुछ ऐसी-चसी जगह योगे हो है गारस और गारम सोग अपने डेरे जाने की राह में वही क जी कहते हैं । इसर सिवाय एक पिसी बहुत महे साघु को सौ साल पे वार वही अतिम बार खा गया था। कभी भी फिर प्रकट हो सकते हैं। ऐस में उस या अगर ममसाहन वहां मौजूद न रह तो क्या हाल होगा समान सस्ते हो। मैंने इन वासो पर जरा भी दिमाग नहीं खपाया हो इतना ही साचकर सुध हुमा कि अभी उनसे क्रयता मान की कोई सम्भावना मोग वियोग नहो । मकिन यह भी नहीं कि घर के मम्ब प म साहब को अवमा म खूब अच्छो साती थी। आदमी का जमा प्यार करत थे धम की वैसी ही उपेक्षा करत ५। एक एम समय ऐमा स्याल पाता कि पूर जाम में कभी कमत्ता में हेनरी विवियन हिरोजियो होकर जम लार इन्होंने ही बगाल के प्रतिभावान युवको को एक जमात या मोड़ पदस गिया था । अतिम जिस वार व रानीसत धूमने गए थे उस पार उह यहाँ बहुत दिनों तक रहना पड़ा था। कर कमा म उतना कुछ जरूरी काम नही था फिर तिहसर साल के पुराने गरीर ने इम उस यहाने गोर पाल करना शुमार लिया । लकिन इस मह स हाथ-पाय समटे घुप वठ रहना उनकी जमपत्री मे लिसा नही था। छोटी-माटी रान पर भी हो हल्ला मचाने म मगन रहस । और उही पाकेट-साइज पपरामा कौतुक भरा विवरण विस्तार म मा रानौखम से लिख भेजा करते थे। कलाता म उस समय लगभग कोई काम ही नहा था मुझ । पक पार मिफ घम्बर म हागिरी देना और कोई चिट्ठी-पत्तर हो तारि साइरेक्ट करके गुमायं पहाड मेज देना । उस अवह अबसर म उनकी चिट्ठियां पढने म जो मानद आता । दूर-दृष्टि नाम की चौड मरी अरल की मोली मे शायर कभी नहीं थी। होती तो उन चिट्टिया को जरूर हिफा जत स रख दना । आज या और भी बहुत हिना के बाद जब वे राव अतीत के पेट में अस्पष्ट मोमरत्ती जमी टिमटिमाती तो इन पुरानी चिट्ठिया का पाकर व मान" आता। लक्षिन यह अपनी ही वाफी थी। पवमान में ही इस तरह मस्त रहा कि भविष्य के लिए सिर सपाने की बात नहीं ममनी । साहब की आखिरी तरफ की चिट्ठी म कुछ नई खबर मिली। लिया पानि जर ही करमत्ता लोट रहे हैं। मैंन यह अचरज स यह गौर किया गि उस चिट्ठी में यिडिया का गीत सुनने पे लिए पाहन रे जगल म दो घटे पपमाप बर रहना या तितलियारे पीछ-पोछ पुलवगिया म दौरना धादि ऐश्वधर का का जिक्र नहा था। लिघा पा कुछ भी वा विचार योग वियोग न करके लोभी नाम जमा जितनी मितान पर म पी इन दो महीनों में ही पार गया । कि और कुछ बचा नहीं, इसलिए पत्नी ने सुयोग समश कर अरविद की 'लाइफ स्विाइन खोस दी है। इन कुछ पक्तियों का महत्त्व मैंने उस समय नहीं समझा। समझा कई दिन के बाद अब कि साहब मलकता लौटे। कोई से लौटते ही अपने तकिए पे नाचे से उहोंने जो किताब निकाली उसका नाम है लाइफ डिवाइन', उस दृश्य को मैं बाज भी थांसो के सामने देख रहा हूँ। किसी सरह से एक नौली नगी एपेपर पाँवो म बाप रूम चप्पल डाल दे सोफ पर उठ गए । पाछ जो रोगनी सही भी, मैंने उसे जरा दी । इशारे से उ होने और सब बत्तिमो को गुल करने को कहा । ऐनक लगाकर माफे के एक ओर योगा गए मोर जसे समाधि मग्न हा गए। पास सहा मैं अपार देखता रहा, शरीर मोई म्मान नहीं। केवल नजर जल्दी-जल्लीगाएं से दाए मा-जा रहा थी। मालरदार आदम-कद जया लाइट-काण्ड-घर म जोत और अघरे का एक अलोमि परिवेश रच रहा था । और ये पढ़ने में लीन । मझे पर जाने को पहना भी भूल गए । एकाएक टेलीफोन बना जाने निमग्नताविस प्रशान्त महासागर के नीचे से वे निरल आए। उस असोक्ति परिवेगको मादकता से मैं भी न जाने कर स्लो-मा गया था। टेलीफोन में वात करके मुझे देखकर व पीक उरे-- 'तुम्हें क्या मैंने घर जाने को नही महा ? आइ ऐम सॉरी माई डियर बॉय। विमाय को बल करते हुए कहा माइमस्ट राइटर माई वाइफ । उन्ह माज ही लिख दना उचित है। मैं पर लकर सामन गया। उपर दसते हुए बड़ी देर तक नया सो सोयत रहे पहा 'नहीं रिक्टेन स नहीं होगा। अपने हा हाय में लिया। उस रात अपने हाथ से रहा दर तक उहनि जो चिटठी लिपी मुझे .

योग वियोग मो बुफ गुड मही दिखाई । लकिन मैंने उसे कुछ ही दिन के बाद देखा था। घिटठी लिसन घाल तब इस दुनिया म नहीं रह गए थे। इसके कुछ ही दिन पहले रेलये रेटस दियुनल से एक मामा म मद्रास गए थे और वहीं व समुद्र-तट के एम नसिंग होम म उहोन आखिरी सांस ली। दक्षिण भारत की एक सदी वी पुरानी क्वगाह म मालिक को सात के लिए सुलाकर दीवानसिंह जब कलकत्ता लौटा तो उसकी आँखो म यांसू थे । हम भी अपने को नही जव्य रम सके थे। पोसी जिल्ट की एक किताब मेरे हाय मत हुए दीवानसिह ने कहा 'मामूजी जय साहब कोट स योमार होकर नसिंग होम में चले आए तो मुझ स यही किताव ग स निकास देने को कहा । मैंने मना किया मास्टर फॉर यू । टेक रेस्ट। लकिन उन्हाने एक न सुनी । वरे की टी-फूटी अग्रेजी पर मजाक म कहा 'माई डियर याय ऐट लीस्ट एट युक इज गुड फार मी। अपनी बीमारी के उन पई दिनो में बहोने पल भर के लिए भी इस किताब का नहीं छाडा । वही कीमती स्मृति दीवान बड़े जतन से मेरे लिए कलकत्तल आया था। यह पी-लाइफ हिवाइन । उस किताब को मैंने हडप नही लिया। सुना श्रीमती वारवेल कुमायूँ शस-सिर से उभरकर सत्ता आ हैं । लरिन थव हम पर क्या था। उस ब मिनार और रोबीलो विलायती ममसाहब से हाथा नौकरी गंयाने फा सतरा नहीं रह गया था । नौकरी सत्म हो जाने से नौकरी घर जाने केर सहम छटकारा पा गए थे। फिर भी पहली मुलाकात क उग से अपने को किसी भी प्रकार से मुक्त नहीं पर पा रहा था। पया पूर्छ क्या बोलें कौन जान । और उन मन को दगा सोचकर तक्लीप भी हो रही थी। इस सुदूर विदेश म स्वामी स मिलन के लिए एक दिन य अकेली ही इग्लर से क्लात्ता आई थी यह बात साहब से मुनी थी। वह विवाह स्वाभाविर तौर पर सुपा होत हुए भी सजान न होने स सफर नहीं हुआ। लिहाजा अब योग वियोग पे कहाँ ? गली के मुहाने पर या बम्बई या कोचीन की बदरगाह भार कौन सा जहाज इम पति गोकातुरा यग्रेज नन्दिनी को फिर से स्वदेश लोगल जान के लिए इन्तजार कर रहा है कौन जाने आखिर भेंट हुई। शायद वह अगस्त महीने का अन्तिम दिन था। मौका पार वहगटेद 7 क्लबत्ता की राह पर मुझ-जसे असहाय और कार वगाली मन्तान को भी अपने प्रबल प्रताप का योडा-सा नमूना बोटने म दुविधा न को। नतीजा यह हुआ कि जब मैं पाक-स्ट्रीट म धोमती वारवर के मौजूदा दरे पर पहुंचा तो कपडे सत भोग दरवाज* सामने खड़े होकर कॉलिंग बेर बजाने म ठिठक गया। ऐसी हालत म किसी मेमसाहन से मिलना ऐटीरेट पे खिलाफ न होगा पिन दो दिन पहल से तप लिए हुए समय पर न मिलना भी अपेजी मम्पता के व्याररग के मुताबिर क्षमा के अयोग्य अपराध है। सब ही मुझ रोने को जी चाह रहा था। इतनी दूर भाकर शौट जागा ? जब सोट जाने पा लगभग स्थिर पर लिया तो अचानक दरवाजा भुल गया । स्वय योमती यारवेल बाहर निरल माई। उनका शान्त स्थिर मुमहा देखरर पौन कहेगा कि महा कई दिन पहल उहोने अपने पति को सोया है। पास में ऐनर को ठीक फरक कहा बरे कर | तुम्हारी हो पात साच रही थी तुम्हारे हो लिए तो दरवामा खोरकर आसमान सी हालत देसने र लिए बाहर निकल रही थी। मेरा र हाम पर श्रीमती वारवेल गमग खांधकर ही मुझ आर लिया गइ । अपना तौलिया बढ़ाती हुई रोला जिसफ लिए हर थो वही हुमा । सार कपड़-लत्ते तो भिगा लिए हैं तुमने । में सवार हो गया था। यह न स नान गई कि में ही शार हूँ ? - मन पूछा स्निग्य हमी हसर पाली सुम्हारा वणन मैंने इतना सुना है कि हाया स्टेशन की भीड़ म भी तुम्हें पहचान सती। श्रीमती वारवेल जरा रुकी। उसकमाद धीरे धीरे दोली 'माईगियर योग वियोग चाय थे तुमसे बहुत ही प्यार करते थे। में निर्वाक होकर उनके मुह को ओर तारता रहा। यह कहने में मुम दाम नहीं कि मैं अपने आंस रोक नहीं पा रहा पा। बड़े मामूली से ही कारण से अनुभूति के बाद द्वार खोलकर मासूमो मेरी आँखों क कोने म आ मिमटती हैं । उस दिन भी यही हुमा । लाख किए भी मामू मो में रोम नही सका। तौलिपा दिखाती हु मेमसाहब ने पहा नदी से बदन पोंछ लो तुम्हारी सेहत के लिए उनको फित्र की हद नही रहती थी। कहते थे तुम्ह जरा ठह लगी नहीं कि सर्दी हो जाती है। मन ही-मन मैंने उम दिन दीवानसिंह से खूप लानत मलामत को। ऐसी मेमसाहब से मैं इतने दिनो तक दरता रहा ? मन में भगवान् से प्रायना करता रहा कि जिसमें ये कलमत्ता न आए । हे भगवान बहुत-सी बातें हुई थी उस दिन । भीगी वमाज को हैंगर से लटका कर बनिमान पहने मेमसाहब के सामन वठा-यानी इसी तरह लाधार घठना पग। उसर बाद उनमें हाथ की पाय पीकर कब जो भेद भूल गया पता नहीं। एगा जानें क्व से इह जानता हूँ जान पितन धर्षों से इनसे सी तरह से बात परता हूँ। उन्होने पति के प्रतिदिन की छोटी से छोटी बान का भी म्योरा मांगा। मैंने बताया जय जगते थे चाय पीकर व काम करने बैठते पे दो एनका म से विसे हर समय पहनते थे। फिलहाल चाय ज्यादा पीने लगे थे। जितना मुझ से बना मैंने सब दिन का एक खाका उनक सामने बोच दिया। उसी समय मुझे किताव वाली बात याद आ गई। अपने शान्निनिम्तनी शाल से निकालकर किताव उह दी। यारिता के छोटा से जरा भीगी-सी उस पिताव से साहब की जिनगी के आखिरी पुछ दिनो के सम्बप की कहानी सुनकर उनका मुसहा उद्भासित हो उग। धीरे धीर बोली में कभी यह विश्वास नहीं पर सजी कि नोएल दिर टेक दट मुक मोरियससी' ।

योग वियोग ८५ पब तर काठ का मारा-सा वठा था पता नही। श्रीमती बारवल ने व निटी मग से साहब की लिखी हुई एक चिटठी निकाली। उस चिटठी का पहचानने म मुझ जरा भी दर न लगी। उस दिन लाइफ डिवाइन' पदते समय अपने ही हाथा लिखी थी स्टेनो की गरण मही ली थी। लिखा था हारिंग अपनी उम्र के तिहत्तर साल के बहुतेरे दिन बहुतेरी रातें मैंने निकम्मी रिता पढनर वर्वाद मी। लकिन तुम तो मुझ बहुत दिनो से जानती थी। तुम्हें यह किवाद मुझ वहुत पहल देनी चाहिए थी चिटठी के अन्त मे पुनश्च-पदत पढते क्य जो सवेरा हो गया पता ही न चला। सारी रात में तीस पन्न पढे । और जहां सर मैं समझता हूँ इन तीस पनो का अय मैंने समझा है। मैंने कहा इसे पढ़कर सत्म करने लिए साप मद्रास ल गए थे। सारम र सके या नहीं नहीं जानता । पुस्तक के पने पलटते ही श्रीमती बारवेल को अन्त की तरफ एक बुफ माक मिला । वह निगान दिवाकर बोली अतिम अध्याय के नरीव पहुँच गए थे। मैंने नाई उत्तर नहीं दिया। मेरी आँखा की ओर देखकर रहाने क्या समझा वही जानें। गहरा निश्वास छोडकर उन्होने नहा राट पी रिसेपोइटेड माई बाय-हताश मत हो ओ मेरे बच्च ! यही तो हमारा अन्त नही । हम सभी फिर इस पृथ्वी पर आएंगे। ये भी आएंगे। उनके लिए दूसरा काई चारा नही रहें इसी भारतवप म ही जमना होगा। जरा चमकर फिर मारी हम सभी उस दिन का इलजार करेंगे जिस दिन हम फिर से यहां आएंगे। पुनज म म विश्वास नहीं करता। मरने के बाद मारमा नए रूप म फिर से पृथ्वी पर आती है या नहीं, इस बात पर नाहक दिमाग सब करक मैंने समय नष्ट नहीं दिया भी। मगर फिर भी उस दिन मैं इसमा प्रतिवाद नही परसरा। मरे मन की गहराई से पिसी न मानो पीम स कहा हर भी क्या है ? मिले E याग पियोग १ न मिल उम्मीद रसन म क्या नुकमान है प्रसग वारकर मैने पूछा थापक्या अपन दालोट जाएगी? बोली नहा-नहीं हगिज नही । उममपिता का पता याद या रही है जिसका मतलव है यहीं पदा हुआ है जिसम यही मर पाऊ। मेरा जमान प्स दाम मही हुमा है भिन्तु जीवन । य अन्तिम कुछ दिन यही बिता कर यहीं मरन म क्या हज है उसर वाद बहुत दिन बीन। पोक की तो अनुभूति स अपना गो सकल्प उहान मरे सामन प्रकट क्यिा था उम बरसकर जीधन क सम्या पार म अगर अपने मीट जाती तो स निरनि सग नारी को कोई दाप नही दला। मिन सत्तर की उमर हो आई यह र प्रेज महिला आज भा भारत को मिट्टी का परः पए है। उग दिन पातजार कर रही है जिस दिन उस पार की पुकार पर सान का नाव का पाल सोल देना होगा। थौर कारन हा पाहे में इमसे उपकन हुआ । उना सान्निध्य से मैंन एर मनाथ एन्वयमय भुवन का आविष्कार दिया । अवाम अचरज क साथ मपने इस सौमाग्य पर आप ही ईर्ष्या की। मार यह तो मोर यात है। पारत मी एक साल का हम दोनों पुमायूँ की पहाटी पर आमने सामन पळ थ। मैंन महा यापकी किसी ने नही पहचाना पिसी ने नहीं जाना । मरी पिताव पामर बहता को यह स्याल हुमा विकराता हाई फोटरे मतिम अग्रज बरिस्टर ने मारी नहीं की। मरे कम पर अपना सत्तर साल का पुराना हाप रखकर बोली इराम तुम्हारा क्या दाप ' व सब तर जिन्दा में तब तक ता तुम मुप्त जानन नो नहीं थे। पश्चिम म ट्वत हुए सूरज की यार तारत हा उ हाने धीमधीमे पहा 'येम माई बाप तुम अब मुम जानत हा और मौन कह सकता है मिजव में भी तुम्ह छोरगर जीयन-सागर न उस पार पली जागी योग वियोग ८७ तो तुम फिर कुमायू की पहाड़ी पर पूमने नही आओगे और इस चोटी पर खड़े होकर सूर्यास्त देखते-देखते मेरी याद नही करोगे? हो सकता है रानीखेत के डाक बंगले में लोटार रात को तुम हम लोगा की यान ही फिर लिखने बह जाओ। * Jx एक और भी विदेशी महिला की बात बार बार याद आती है। दुनिया म कुछ ऐसे लोग होते है जो जीवन भर देते ही रहते हैं प्रतिदिन की प्रत्यागा नही परते। क्या जरूरत पर और क्या बिना जरूरत के अपने को नि स्व करके सटा देने म ही वह मानद मिलता है। दूसरों को पिता से उनकी नीर में खलल पहती है दूसरों के दुख से उनको बाणो मे आंसू भर आता है । ससार म ये विरल हैं लक्नि भाग्य हो तो इस टीजने वाली गोष्ठीमा दुलभ नमूना कभी-कभी देखन को मिल जाता है। श्रीमती बोनर से हम लोगों ने रिया ही लिया है, लकिन इस विदशी भद्र महिला के हम मामूरी-से काम भी नहीं आए। अपने हृदय का असा भरा प्रणाम निवेदन करते हुए कुछ साल पहल मैंने इन पर एक लख लिखा था। ( ससार-रयागी कृष्णप्राण की नेपथ्य महानी उस समय सक मुझ मालूम नही पो।।) मैंने लिखा या भारत से धमजीवन को विदेशी महिलामा को दन क बारे म काई प्रामाणिक * TOT India Without Seatiment Marion Barnell p सने है। मरणप्राण से उत्तर भारत के प्रायः इसी नाम मे सुपरिचित सर्वजन मदेय पिशी सापक का कोड सम्पनीह।

योग बिपोग
पुस्तक नहीं हिली गई है। वह अगर कभी रिसी बाएगी ता मिसज वानर
का नाम उसम नि"षय ही सान र मक्षरा से लिम्ा जाएगा। बहन
निदेशिता मां प्रिस माला के नाम के साथ एसही निस्मास म मिसन
बानर का नाम लिया जाएगा। भारत की प्राचीन घम-साधना के प्रति
ऐसा ज्वमन दिवास एसी एपनिष्ठ यदा मैंने किसा में नहीं देसी नही
सुनी एसा नि पनी भा नहीं।
इस बार ही रॉवट माहय की अविश्वसनीय घटना पो सपन
प्रत्यक्ष अनुभव से लिखा था मोर मिसब बानर का अपना प्रणाम जताकर
एस समाप्त दिया था।
फिक
मात्र यह स्वीकार कर लन म शम नहा लिमिवेष नोनर से अपने प्रपन
परिचय म जरा स्वाप की दूषो।
बात बहुत पहल की है । मरे मित्र परद पोप और मरे दिमाग में
विलायत जाने की सनर सदार हुई थी। विगयत में पहाँ जाना है श्या
जाना है कसे जाया जाएगा कुछ भी मालूम नहीं। जाना है बस इतना
हो जानता था । क्या दिन क्या रात हम दोनो को बस एक
निसी भी तरह हावरामी माया काटकर लानसागर उस पार यग्रजों
की मातृभूमि म कदम रखन स ही हमारी इस उस कार की समस्या का
समाधान हो जाएगा यह विश्वास मेरे माथे पर रख ने ही भर लिया
था।
पारत् मुझसे नही चतुर पाशार पा। उसने कहा
चलान हम
सलासी होकर पल पले लिपटन साहब तोखलामी होकर ही अमरीका
गए थे।
मर भया मम नया 4 दिन रह गए हैं। अब उन हार्मो
में घुस सक्ना बा कठिन है।
गरम् लग्नि घबराया नहीं । गोरा कुछ-न-मुछ उपाय करूर
सूशगा। दाइ ट्राइ दाइ मगेन ।
मैंने पहा

योग वियोग
६६
इसके बाद एक दिन यह आरबोला 'चर, तुझे मिसज बोनरक
पास तथा
किसक पास? मन पूछ
मित बानर । बहुत पनी ममसाहब है और उनकाई नहीं है।
पला नही गर न उन कसे जान पहचान को पी। यह भी नहीं
मालूम कि यह जान-पहचान पोदितने दिन का सनि मिसज वानर
२ लाarन स्ट्रीट वाले मकान में दाखिल हाल सम्म दरवान असा
लम्बा मलाम पिया मैंने मी सरसरीधारका मन्ना कर लिया।
भष्टी वनात ही पारासो नभाकर दरवाजा खोल दिया । बहा
ममसाहब पूजा पर क्ठी है । आप लोगों को मठने के लिए कहा है।'
सोफे पर बन हर मन कहा किसको पूना रे शरत् ? मेरी माता
को
शरत ने फही पतरेको । मर ठाकुर पूजा । असी पूजा तरी दारी
करती है।
मैं वा वठा तसवार दमन रमादायार पर टगी एक-से-एक मुहर
तसवीर । रगों की बहार सो पूष्टिए मव । ज्यावर वितायत के प्राय
तिक हत्य। कमर के ठीक बीच ममम मधा एक पिशोरी का तर
चित्र। काल के व्यवधान से थोडा अस्पष्ट हो उठा था। ना ही सरल
और निष्पाप मुसा । अनार लावण्य से भरा । लग्नि विभुत पुरान
शहाप त दुरत सदा धातो र पाय पूनन ।
मरी माता की तस्वीर है ? मैंन पूछा।
घरी बापो पर परत् निगद उठा । बोला 'हानडा म रहते रहत
विलनुल जगसी पन गया है। मरो मावा की रबर हाने गी? यह मेम
सार को तमोर है। कम उम्र की। उस समय ममसाहद पर भारत
की धुन नहीं मबार हुई थी।
सानों?
যাৰী আর ক ধন ধিদপছু । সব রাম র

योग पियोग दिन यही कहती है दिनो भी है भारत है। भारत ही दुनिया को राह दिखाएगा । पकी मोर बबस दुनिया एक दिन सिर झुकाकर इसी प्राचीन सम्पता से दया को भीस मोगगी। लोक्न तू तो इन बातो पर विश्वास नहीं करता? मैंने पूछा। शरद ने कहा अरे भई मुष इन बातो में दिमाग लगाने का वक्त फही है ? मुम विलायत जागर नट-बोल्ट बनाना सीखना है। फिर तो काफी तनख्वाह पाली नौकरी मिरगी। तब यह सब सोडूंगा । इतने म मेमसाह यर माइ हलो पारत् बिना किसी भूमिमा ने मुझे दिसाते हुए शरद ने कहा इसी के बारे में कहा था। आपकी बात सुनने १ माद से ही याने के लिए पटा रहा पा । रोज तग करता पप उतरे पास ले चलोगे। भागम जरा हसो। महाकर पदन का टीका लगाया था कपाल पर । कितना फब रहा था । बोली यपना भी कसा नसीब है यूकसल का ही कोयला भेजना पडता है । अमृत मी सन्तानो पो ही इस रात की याद दिलानी पाती है कि सुम अमृत को सतान हो। इसी बीच बरा पाय ल आया । साप ही खाने मी बहुत सी चीजें- सहविध पटिस के । उस सामान नो हमारी तरफ बहाती हुई मिसज योनर बोली स्तिने खुशनसीय हा तुम लोग-प धार यान इन दो पेय यॉनरीक्ष। एक ही साप दो सहविच मुंह म हालते हुए गारद ने कहा में पहले यह सब नहीं मानता था लेकिन अब मेमसाहब ने उस भाव स रहा 'नहीं-नही मरे घने तुम विश्वास करते थे। यह सुगरे हम है--हो सकता है विन्यास अवचेतन मन म सोया उनकी यातचीत म मैं मौन धोना बना पा । ध्याा से मेमसाहब की तरफ ताक रहा था ! कितना अच्छा तारमा गाउन ! दीवार पर टंगे उस मुर मुखदे पर ही लिपी ने माना अनुभव के रंग को दो-एक पक्षी पोग पियोग - फेरनी थी। इसमें पाप का छाया न ह्या कार को घी वो शायः पछ गई पो सक्नि प्रजा को प्रभा से मुखाम दमक उठा था। चेहरे की प्रत्येक रेखा पर आरमविश्वास को पटल छाप । उमर भी कितनी । उन-जसी मेमसाहब तो सिलदा महीन हाफ्पट पहने मदान म टेनिस सेरा परसी हैं । पदम गुली रक्ट पहने माटर चलाती हुई रेस में माती हैं। मेममारवन कहा गीता सारी मनुन्य जाति की असूय सम्पत्ति है। मैं र पती हू और मुझ रोज ही नई रगती है । पदा से मेमसाहब की तरफ नारन का साहस नहीं हुआ। पाँवों पर नजर पड़ी। धी रग के खूप महान मोने-इतने महीन कि लगता, कुछ पहना ही नहीं है । स्तिने भाग भारी पाच ! उहाने लक ए साइट के सिरे से मिगरट निकाली। मुछ खयाल मत करना यह दुरीस निरायन से ल आई ई। किसी भी प्रकार से छोड नहीं पा रही हूँ। धांदो के लाइटर म मममा ने आग जलाई। उसके बाद कितनी हो पाते है । भारतीय दान के बारे म मैंने शरण में ऐना आग्रह कमी नहा दावा। बातें करते रव सोस हो भाई थी। मादाम न पी को भोर देवा । प्रोली मरे रे, यही दर कर दी तुम्हें । हम मरोग चलन लगे कि उन्होंने फिर रोश। कहा, ' जरा सा रुका मामा में हाइवर को बुलवाती हूँ । कुछ दूर तर घास माणा गारी से। गारी पर ठार मैंने पार की भोर साका डाइवर था, पा रह पा । लगिन हादडाम गाय स उतरत हो उने पकदा । यह बोला, भई माफ मात । मुझ विसत ना है। उसे भी हो। मन पहा 'या जो महो । महिला महापसी हैं। ऐसार चरणों की पूस सने से भी अक्षय पुष हाता है।' बोल नहीं 1 मिसेड योनर मुन्न येह नली लगा। राम नही सम्हाल समा। सरद र साथ उनक सावन स्ट्रो यार मसान म फिर गया । उहान भार से - योग वियोग यह सब मैं बिठाया। कितनी बातें की। बोलते-बोलते हक गइ और कहा आविर सुना किरा रही हूँ ! ये सब तो तुम्हागे ही बातें हैं । और मैं जानसी भी किसना ई लक्नि जानो का कागिग कर रही हूँ। माइ रियर वॉय ! यह जो विराट देश है भारत इमके हर तौरय मे कितने चितन युगो की साधना सचित है। मैं अघरज से एकटक देखता रह गया है। विदेशी होते हुए भी इतना जानती हैं । झलक एण्ड ह्वाइट 4 टिन से सिगरेट निकालार मुलगाते हुए मिगेज वार ने रहा जीवन को जानना नागा जग्ने को पहचानना होगा। दु खा र दारुण अनुभवो म ही जीवन क ईश्वर का आलिंगन करना होगा। वे कहती गइ । तीनफ सहविच मुह म भरकर शरद ने फहा तापमुब है नवीन भारतवष इसी सत्य को मुला रहा है। मिसेज बोनर ने हसकर यहा किसने कहा कि भुगाया है ? भारत मया आज भी बुद्ध के चरणों में श्रद्धाजलि नहीं चलाता? कपिलवस्तु में राजकुमार एक दिन अपने सुल-स्वग को लात मारपर दुख भरी दुनिया को यह म उतर आए पे इसीलिए न आज भी उनसी पूजा होती है । एकाएक मेमसाहन पूछ वठी बोधगया देखा है ? हम रोग वोधगया नही गये हैं यह जानकर मेमसाहब ने पीतातप नियत्रित दर्जे का टिक्ट मंगवाया। मैंने कहा पहल दर्जे का टिकट भगवाना ही बहुत या। मेमसाहब चोर उठी गार फारविड | एस मौसम मे पहला दर्मा | और कही तबीयत खराब हो जाए तुम्हारी ! मिसज बानर न भारतवप के लिए दोनों हापा रुपया लुटाया । पैसे की जरा भी परवाह नहीं । शरत् ने कहा परवाह हो यो ? रपए बहुत है मगर सान वाला कोई नही । न पति है म बाल-बच्चे । पिसी तरह मेरा हौल पठाए, तो ठीक है । इशारा दे रखा है। पोहा रुकार शरद बोला ऐसा मुहचोर होने से तू जीवन में कुछ योग वियोग मो न कर सकेगा। सर पूछा तो ममसाहब तुझे मुझस भी ज्यादा पसद करती हैं। सारसरह अपना अभाव बता रुपए मिल जाएंगे। लाज योर पणा से मैंने सिर झुका रिया। एक दिन मार शरत् ने कहा अग्रणी भल ही पाशी न जानता हो मगर दस और बिठा लिया। मेरा वात सुनकर मेममाहब ने पहले तो महा विसरायत ? यहाँ क्या सीखोगे । एक दिन वही साग तुम्हारे भरपों म बार सीखेंगे और वह दिन ज्यादा दूर नहीं है। मगर मैं मा कुछ कम होशियार नहीं । स्वामी विवेकानन को वाणी रटकर गया था। कहा नवीन भारत यूरोप का अपनी वाणो सुनाएगा। फिर मिसज वानर न दुविधान को । बोली ' अपने जान की समारी करो। रपए मैं दूंगो रस मास्यूटी Vvm आइ विल । परत दरिस्ट ग्लान म जाएगा यह सुनकर मेमसाहब दुसी हो गई थी। काई चालीस-एक पौण्ड मेरे वचार तुम्ह क्या राम होगा ? और फान पर टामस डर से कहकर उहोन ही पी० एण्ड ओ० कम्पनी में जहाज में रुबिन रिवरिया। - - पारत के पल जान नै बार उनम मिरना जुरना मैंने वरपर पिया था। जीमा तो हो गया । पाहता, तो मैं मा विलायत जा सरता था। अपनी बुद्धिक परत यह यक्सर हाय से गया । रक्ति धीरे धीर अपने फो सम्हाल रिया और एक दिन तीसरे पहर उनके यहाँ हाजिर हुआ। कमर पता था कि उस दिन राबर साहब स परिचय होगा। मेसमाहर साफ पर बठी गौना पा रही थी। मुझेोलत ही महान पटना र किया। मात क्या है ? इतने हिना से तुम्हारी कार साम-कार नहीं। मैं तो पिता स मरी जा रही थी कि आखिर तुम्ह हुया पा? मैंने उनकम्वासारवार में पूछा-साधा। मेममाह न रहा यार या गए मो यष्टा ही किया। इवन गिना सक रोबर स भारी मममी भरते पाहते होफ उस हूँ।

३४ योग वियोग रावट पौन है मुझ मालूम न या मेमसाहब से ही पता चला एक महीना हुआ फलपत्ता माय हैं । बगाल नम्बर ५ नौजवान अफसर । एडिनबरा स पास परव सीधे भारत पर आए है। अच्छी नौकरी है भविष्य म और भी सती होगी । यो साहब होपर रिटायर करेंगे। मेमसाहब न कहा बहुत नछारका है । मनसुंघे फूल-सा निष्पाप । पिन उमर बहन सराव है। पर स आन बाद एक बरस तो पडा ही खतरनार । अगर होगियार न रहा तो उन टाइप ररने पाली लकियो ये पल्ले पड़ जाएगा। रोज गाम को वेलस्ली स्ट्रीट म गाडी लकर सहा रहा करेगा उसके बाद किसी लड़की साप सकर होटल सरी बार म जावरबठगा। लम्का भला है । अक्ल भी है लकिन है लडाई की रेन । इस लड़ाई म इलर का ऐसा पतन हुमा है कि सोचते ही रागटे खड़े हो जात हैं। इनके विगहने मस्तिनी देर लगती है ? इसीलिए इसम भारत के प्रति पटा जगाने की कोशिश कर रही है। भारत मी सम्पना और संस्कृति को इसे जानना चाहिए । मकिन भारत के बारे में कसा तो एक पूधामह लार याया है। ये वा हरगिज नही सुनना चाहता। परा को वुसार ममसाहब न पाय लाने को कहा। घर ने पूछा तीन भादमिया के लिए? मेमसाहब ने कहा नहीं पा के लिए। मुमसे बाली आज मगता है रोक्ट नहीं आयेगा फर जो भगी हूँ उसस । कित्तु इधर मेक का ति उहोंने मेरी तरफ बढाया और उधर बाहर माटर की मायार हुई। कुछ ही देर म रायट साहय मदर भाये। मुह भर हसपर मेमसाहब न रहा बहुत दिन जिमोगे अभी अभी सम्हारी चर्चा हो रही थी। पर्चा हाने स ज्यान जीने का कौन-सा सम्बग्य है ? सोफे पर बटते हुए राबर ने पूछा। भारत के ऋषि मुनि जरूर हो इस योग वियोग १५ सम्पप में कोई वाणी दे गए है। मेमसाहब विगडकर गरज उठी इसमें ऋषि-मुनि को क्यों खीष रहे हो। भारत के आम लो अनादि काल से जो विश्वास करते पाए है मैं तो वही रह रही है। रॉस्ट साहब कुछ कहने जा रहे ये सकिन मुम देखकर जन्त कर गए। मैंने कोट पट मे लिपटे उनके छ फुर तीन च क शरीर को देख लिया। पीछे की ओर फेरे हुए सुनहले वास । स्टार-सी नाक । सिंघो सा ओखें । क्रिकार के खिलाडी-मा दुहरा नकिन सघन चेहरा । पोरी फ्लाइस ही अनुमान किया जा सकता था कि क्लाईवाला निहायन सक्षन का पुतला नहीं है । सज का दामी कोट । बटन की काज म एक गुलाब का फूल । बलाइव स्ट्रीट पहुत-से साहको को तो देखा । लकिन ऐसा बदन विरला ही दमा नकर पाने पर देखते रहने को जी चाहता है। मेमसाहब ने कहा बरे, तुम लोगों में परिचय नही करामा ! पाय का प्याला मदाती हुई मेम साहम मोली 'यह सरका किन तुम्हारे-लसा गवार नहीं है। मेरी बात मानना कितना पसन्द करता है !' पीछे की ओर फेरे हुए अपने बालों में उगली घगते हुए राबट साहब ने कहा इस सहके मा भविष्य क्यो विगाह रही है इण्डिया को अभी इनोनिमर डाकार कारीगर की जरूरत है। नागा सयासी अब न भी पढ़ें तो देश का कोई नुकसान न होगा। मेमसाहब सासी दुखी हो गई। कहा 'राबट ये आलोमनाए तो कम हो परम हो गई थी। सच पूछा तो आज मैं तुम्हारी यही उम्मीद ही नहीं कर रही थी। रॉबर साहप हप्त परे। सार मे चोले मुश लकिन कुछ उम्मीद है। घर से उन्हाने सिनेमा के दो टिकट निकार किन समय ज्यादा नहीं है । सिनेमा हॉल पहेपने म ही पह मिनट लग जाएंगे।' मेमसाहर से जारत सर मैं उठा। मुझ गेट तम पहुँचाने माद । तुम सो जानते हो, मैं सिनेमा मही जाती। फिर भी मात्र योग वियोग जाऊगी क्याकि उस अपने दर म सोचना है। भारत का दान भारत का धर्म आदाला जा सभी धर्मों की यतिम बात है यह बात उसे समझानी ही पड़ेगी। मिसेज योनर क ही यहाँ राक्ट साहब से फिर भेट हुई। वन दानो में खूब आलोचना चल रही थी ऐसे वक्त में पहुंचा। मिसेज़ योनर रह रही थी 'यूरोप की सबसे बड़ी भूल तो यही है । प्रचलित चिन्तन के विरुद्ध कोई बात सुनी नहीं कि विगट उठ। कोई समझाने जाए तो समझता है हमला मरन आया। हिन्दू धम लक्नि मायामन नही । टोल पीटर भीट बटोरकर अपनी पठता का प्रचार नहीं करना । गोकि सब लिए हिन्दुआ का दार सुरा है। हिन्दू धम फी दारण लेने से सारी समस्याए हरू हो सकती हैं। युद्ध से पके हुए यूरोप को बचाने का यही एक रास्ता है। मेरी मौजूदगी से रॉबट कुछ शामिन्दा हुए-एक भारतीय फ सामने भारत को निन्दा । यह अनुमान पर मैंने वहा मिस्टर रायट आलो चना परते समय एलकर बोलना ही ठीक है। भारत के बारे म अपनी राय जताने मे माप कोइ हिघर न रखें। हिम्मत पाषर रायट वोले इण्डिया के लिए ऐसी अकारण यदा मुझे नही सुहाती। हजार-हजार साल रा उस सत्य की अपी पूमा पर इसकी जो दगा हुई है वह तो प्रयक्ष ही है। ममाहा दुखी हो उठी तुम्हारी यह दरियानूसी है रॉबर्ट । रावट हमे यूरोप दकियानूस है ? विलियम जास विल्सन उहरफ निवदिता-ग क्या बक्त्ता म पहुए थे? मेर टयूशन पर जान का समय हो रहा था । इजाजत लकर मैं अब पला तब भी आलोचना पूर जार पर चल रही थी। पई दिन के बाद फिर मेमसाहब यहाँ गया। गेट से अदर जाने लगा किदरवान न पहा अदर न जाइए रॉण्ट साहरको पा पोग वियोग ६७ T हा है । भगीय छूत की बीमारी है। हपने भर बार फिर गया। मेमसाहव अटर लिया गइ । रावट कट-कट दिताव पद रहे थे । हमार परों को माहट पाते हो रिताय बत पर दी। तमाम बहरे पर पालेमाल धाग। लग्नि चेहरे का वह निरनुप सौन्य नष्ट नही हुमा पा । मेममाहब ने रॉबर के बालो म अंगुला चलाते हुए कहा मत एसा जिगे है। उस रोज तुम्हारे जाने के पार झगडकर यह पल दिया। गमा सो गया-~~पता हो नहीं । हार मारकर में हो गई पाक स्ट्रीट-मादाम वरिल के गेस्ट हाउस म । जाकर देखती है इसकी यह हालत है । गनीमत रही कि में जा पहुँची। उन लोगो ने तो एदुस लिए फोन कर लिया था। उप उस हालत में कपर्वल अस्पताल भेजने सं या हाता भगवान् बाम । ऋषि मुनियो का भागीर्वा' कहा । रॉपट अप को अरा हो । अपनी चादर को बदन पर उरा खीचकर बोर 'फिर ऋषि मुनि ? मममार ने कहा 'तुम्हारी बीमारी म जान-बूझकर ही ये वास नही उठाइ । मगर सदा के लिए तो मुह नहीं सो रिया है। वरा फल का रस दे गया। रॉबट का सिर सभासकर ममसाहब ने धोरे धीरे पिला दिया । बड़े जतन से तौलिया से मुह पाछ दिया । संबट ने पाव हिलाते हुए कहा टूरिस्टो के लिए इहिया म देखन को बहुत से है । मदिर वास्तुकला, पूर्तिकला, वाराणसी अवतर, एलोरा सारा दक्षिण भारत ।' सिफ मरि मेमसाहब ने पूछा। कहा वह तो नारियर काहिरका है । भीलर समस्य का स्वाद नहीं रिया तो कुछ भी नहीं बीमारी में कही उप्तनना म बढ़ जाए इस पर से मैं और मिसेज माना उन कमरे । निकल आए। मममाहब ने रहा हिन्दू धम, इसे माना जाती-कोष है। मगर मैं भी छोडन वाली नही। वह मेरे लिए भानो एक चुनौठी है। मैं भारत के चरणों म उसका सिर भुमा करफ हो

है.
योग विमोग
रहूंगी। इस बीमारी में ही घर पकड़ कर मैंने उसे योरी सस्कृत पोड़ी
बगला सिसाई है।
इसके बाद सेहत सुधारने के लिए रॉबट का लकर मिसज मोतर
पहाट पर चली गइ । मैं उन लोगा को हावदा स्टेशन पर पजाब मेल में
एयर फडोगन काच म सवार रखे सोटा।
हिम्बे से बाहर निकलकर मेमसाहब मुझसे बोली जाने का कोई
इछा नही थी मेरी । सकिन रॉवट का स्वास्थ्य ठीक न रहेगा तो धम
मे उसकी मति नही होगी।
पहाड से लौटने पर मेमसाहब ने चिटटी लिसार मुझ मिलने को
बुलाया। गया देया रॉबट साहब भी पर हैं। मेमसाहब ने मुझे कुछ
रितायें दी। रिसी आ प्रम मे गई थी घूमने । वही से मेरे लिए खरीदी
पी। हम दोनों मालोचना करने लगे। राबट ने उसमे कोई दिलचस्पी
नहीं दिखाई। सिगरेट का घुमा उदात हुए हवाई मेल से आया हमा
लदन टाइम्स परने लगे।
कुछ देर म रोबट ने पड़ी की तरफ वाका । पूछा
तो तुम स्वीमिग
बलव नही जाओगी?
मेमसाहर हसी। गोली तुम्ह तो मालूम है राबट अपनी यह
तबीयन नही । क्लय जाकर तरन मे मुझे कोई आनन्द नहीं आता। फिर
मुप्त पूना भी करनी है।
रोक्ट ने उम दिन मुझे लिपट देना चाहा। कहा स्वीमिंग पलव
जाते हुए मैं आपको एम्प्लनड मे उतार दूगा ।
मेमसाहब ने कहा हाँ यह बडा धच्छा रहेगा।
रॉबर्ट माप ही गाडी चलात । मैं उनकी बगल में बठा । मेमसाहब
ने मुमसे कहा 'फिर आना। और राबर से गोली 'मेक्नि नाराज न
होना।
गट से गाठी बाहर रास्ते पर पहुँचौ मिरॉक्ट न मेरी जोर जरा
तीसी निगाह से ताका । लकिन भरता के साथ महा अगर मुख्याल

योग दियोग .. ? - न करें तो एवं बात पूर्छ ? 'वेशक!' मैंने कहा। स्टीयरिंग पर हाप रष हुए रॉबट ने गम्भीर होकर पूछा, पिसने दिनो से ला रहे हैं यहाँ कराय एक साल से। किस लिए मात है। मेमसाहब से घमी बालोचना करने के लिए। राबद ने मरी हपती दवा हा 'लीज़ डोर टक इट मारवाच । बुरा न मान, मैंन सुना है आप महायानाक्षी है। नौमती चाकरी की कोशिश कर रहे है । कपिल पाप ही कह, अपना स्थाय साधने क लिए रिसी भद्र महिला मे धम का पुसस्कार भरना मया उचित है ? 'मच्छा तो यह इरादा था ! 'कोई जवाब नहीं दिया । क्रोप और अपमान से मैं घोरगी राह पर उतर पहा और वही अतिम हुआ। फिर किलो नि सानन स्टोर नहीं गया। जहो मरी पाह नहीं वहाँ जाना मरे स्वभाव के बाहर है। मेमसाहन से भेंट मुलाकारा नहीं हुई। दुनियादारीक मेले में उलन गया ! हाईफोट परिस्टर में यहां नौकरी मिल गई और एक मनाने विशाल जगह म खो गया । बहुत दिनों बाद हाइकोट के ही काम से एक दिन 'गाल थेम्बर गमा पा । एकाएक रोबट साहब की याद भा गई। उनके मारस्ट्रेिशन विभाग क बड़े वायू से पूछा रोवट साहब यहाँ सि मोहदे पर है?' महे गावू ने मेरी ओर ताका पाप पसातहजानते थे? जी कभी पा पाडा महत परिचय । उन्होंने तो ससार त्याग लिया। घो उठा। राव. सादम ने ससार त्याग दिया ! बह जवस्त सपर मुहम विश्वासी रारट साहम नौकरी सोदार संमार को मापा योग वियोग । वोह ईयर की साज म चल दिए ! बडे बाबू न कहा साहय या नही जा सकता क्सिका मन कहाँ जाकर रमेगा! यरना रोबट साहव बसा साहब क्या बताऊ हमारे पानू दा ने कमरे म राधाकृष्ण की तस्वीर टांग रखी पी। एसे कडे ये कि वह पांच रुपये जुर्माना कर दिया। और वही चोवीस पचीस साल का माला पहाड नौजवान आखिर हिंदू हो गया । यह कसे सम्भव होता है वहीं जानत है ! मेरी आस्वा में एक ही साथ मिमेज बोनर और रोबट साहा की उसमीर सस गइ । रोबट हिद घम म विग्यास करन वाल नहा और ममसार विना विश्वास कराए मानने यारी नहीं। रॉवट न रहा था और कोई होता तो मे या कान में सुनता ता नही-चूमि सुम मह रही हो इसीलिए। पदा से मेरा हृदय भर गया । घर लौटते ही मिसेज बोनर को लम्बा चिट्ठी लिखीजाप ही था कि यह असम्भव सम्भव हुआ। आपने रावट साहब-जसे आदमी को हिद घम का पुजारी बना छोटा । आप मेरा प्रणाम स्वीकार करें। मारतथए और चाहे जो भी हो अश्वश नही है । आधुनिक भारत के नतिर पुनरत्यान के इतिहास म सिस्टर निवेदिता मदर और मिस मवलोह में साथ पापका भी नाम साने में असरा मे लिखा जाएगा। मेमसाहय स इसका दाई पवार नहीं मिला। जवाब की उम्मीद भी नहीं की थी। मैंने स्वय प्ररित होकर भारतीय मस्कृति समिति के वार्षिप या म उन पर एक लम्या स लिखा। उनकबरणो म प्रणाम निवेदन रिमा । उनस अपने सम्प परिचय पा इतिशस दत इए मैन रिसा मेरे मन्तिम पत्र पर उन्हाने जबाव नहीं दिया लगिन उसका मुकाई खद नहीं। सेदको यात असल में उस दिन उनना सोच विचारपर नही लिखी थी। उस समय क्या पता था कि उमस भेट नही ही हुई होती तो मेर

योग पियोग
१०१
लिए अच्छा था । नाहक ही दुख नहीं उठाना पडता ।
जानता है मनुप क इस मसार म सब कुछ गम्भ है। जीवा
मरण पाव-उतार, जीव-हार, हसामान के बीच हो ससार रप का
पहिया पूमता है। फिर भी जिस दिन दिल्ली मल म मिस बोनर स मह
हो गई में उस नि अपने मोसू राक न सका।
यह रास बहुत दिना फवाद की है। सोसरे श टिकट तार
में दिल्ली मल म वठ गया। गाडी जब वन्वानम की ता मैं उतरकर
प्लफाम पर पाग गया। मिटा पार पर नजर पडी। पर चार
पहिये की लागाडा मे गरम पूरियां तर रहा था । और एक ममसाहन
सामने पस दोने म पूरियो सा रही पो । दूरानगर ने पूछा मिवाई
मेमसाहब?
पत्त मे स पाछकर तरकारी क्षाते हुए मेमसाहब ने रहा नहीं।
मैं चौंक उठा । आमाज पहचानी-सी । मिस पोनर ?
इधर गाडी मे सौटी दे दी। दौडकर अपने कमरे में घुस जाना पड़ा।
आसनसोल पहुंचने पहचत बहुत रात हो गइ । गामी म भीड भी दर गई।
मेमसाहब को खोज नही र सफा रकिन उनकी पूरियो साने वाली
तसवीर मन म उपर-पुषस माती रही। दूसरे दिन सदरे मुगलसराय
उतरा। ममसाहका ४ निकाला । सासर दर्ज म एक बेंच फ कोने में
उदाग वठी थी। पता नही ११ स वाला कोई जतन नही हमा।
और पे बात में कारापन । इन्ही कुछ मयों म उन मानो पह मार
बढ़ गई थी। पहलते पर भी नजर परा। हर का माउन गायव
ररको सासी यह भी फट धना यो।
भीर क मारे बार पहुँचना कठिन था। इसलिए विडमी में ही
कहा गुमानिग मादाम !
ममधाहच मरी मार टुकुरस्टार ताकती रहीं। मैंन रहा पहचाना
नही मार हूँ। रोबट साहब ये ससार छोड जान का समाचार
सुनकर मैंने पापा आखिरी रिही दो यो।'

योग वियोग । । मेमसाहब ने अब पहचाना । लकिन जरा भी एप न हुइ । पेपरे पर सोच-सा लाकर वाला-मम मानी चाहिए थीम-ने-बन सुमका मैन कमी तुम्हार मिन य लिए और गुहार लिए रहत-कुछ किया था। चिट्ठी लिगकर अपमान र रन का क्या अधिकार पा तुम्हें । गारी फ लोगों ने मुझ पर गौर किया । मैं कुछ समय न सना इच लिए उनको बार ताक्ना रह गया। शेषमा हा आरा था। मैंन कहा मापसे एम व्यवहार का उम्मील न पी। वहुत दुध तो कह रही हैं तग्नि मिन्गी का गौन-सा काम किया मैन? मम्साहव गुन्म त तुन वा गन' गम है भी तुम लोगो को निसग भादमी सीक्मजोरी फाभ उगवर तुम रूग उमरा सस्या माश पर मरत हो। रही मुक्लि समान को पस्त पिया या उस दिन । भारत ने उनसे भनेक उपसर पाए हैं। एहनान की दुहाई देकर मैन मन का गान्त दिया। फिर भी जाते नाते कहा मैन यानमा बहुत देख है बहुत देर पूमा है मगर यापकी मिला नहीं। में अपने बच्चे मबार पडने सगा विनर का मेमसाहद बुला रही हैं । लोग-बाग मरी यार दयर मुस्करा रह हैं। पता नहीं दिख बुरा साइन म उनमें मुलाकात हद । सोटा । जार पृष्ठा क्या कहना है ममसाहब शोष पर इस बीच क्मिी न मानो पानी डाल लिया। घोसी नाराज हो गए ? माइ एम सारी। भाजाल माग ठीक नहीं रहता । फिर तीमरे दर्जेरी यह तकलीफ। उपचार रह गाना हो टोर ममझा । व दोसी तुम तो बहुत जगह घूमे हा पन नमार यो वा है? गाण? भौर पूई गमक पहल ही गारी ने सीटी दे दी। साहाबाट म सूटनेम नकर उतर पड़ीं। वहीं तर जाना या । देखा मित बानर भी पना छोटा-सा यग रिये उतर पी। महा 'सोरा पा, योग वियोग पहरु कानपुर में देख लंगी खोजकर । मगर जब तुम हो तो पलो पहल इलाहाबाद ही हो या पता रहा त्रिवेणी सगम म नहा रहा हो । कुछ देर वेटिंग रूम म सुस्ता लिया। विश्व से जब सगम पर पहुंचा तीसरा पहर हो गया था। गनीमत कि मेरा कोई निश्चित कायक्रम नहीं पा । धूमने की नीयत से ही निकल पड़ा था। ममसाहब ने मेरा हाथ दवा रिया 'समझ रही हूँ मुझसे बहुत माराज हो गए हो। लेकिन मग भिाग ठीक नही रहता है। नदी किनारे एर पेड़ के नीचे हम यठ गए। कहा अक्षयवट म पूजा नहीं करेंगी। ममसाहब हमी-पूजा झूठ है सब । म मा पूजा करू ? मरा तो सम जाता रहा। मैं चौम उठा । रॉबट साहब ससारत्यागी रॉबट साहब यह सुनत तो क्या सोचते ! पफ बवार हो जाते। मैंने कहा मापको अब अवश्य पूना की जरूरत नहीं रही समाइय स्ट्रीट वा एक मामूरो सरोज जिसक स्पा में सोना हो सकता है उस पूजा उपचार पीया आवश्यक्ता" सामने से कुछ स यासा जा रह थे । मेमसाहम एकाएक दौड पही। जाफर उन सोगा की शक्ल देखने लगी। सपासी तो अवाक । मेमसाहब बोली 'मेरा अपराध क्षमा पर! माप लोगा में से किसी ने कृष्णप्राण को देखा है क्या ? पहले उसका नाम पा रॉक्ट। छ फुट सीन इष लम्बा । सिर पर सुनहले घुघरार बार । बदन पर गया मूला हाप म इकतारा कब पर भोखी शोली। स वासियो म मे एक न कहा 'नही माईजी विही साहब महाराग को सो यहाँ नही देखा है। पकी-सी ममसाहन पिर मेर पास आकर वट ग६ । रॉवट को नों दूट रही है में पूण पिस मिशन में संन्यासी बने है ? जिनके लिए भाप इतनी परेशान हैं या'साय मजे म आपको चिट्ठी लिख सकते हैं। स यासिया माता चिट्ठी लिमने भी मुमानिषद नहीं।'

योग यियोग । मेमसाहब मेरे बहर की ओर ताकने लगी। ऐसी तीखी थी यह नजर freगा मुझ मम्मोहित पर रेंगी। उसक बार लाई स फूट पड़ी। मेरे ही कधे पर सिर रखवर गेने लगी। उह मैन गेते कभी नहीं देखा था। अपने साठदन स्टोर या मकान म ही उदोने मुझसे और बिट साहब सकहा था जो दिव्यतानी होते हैं वे कभी आंसू नही वहाते । सुख हो दुम हो कुछ हा वे अभिमत नहीं होते। आंसू बहारर अपन कापीतल करने जब वे उठी तो साकायका मोटा मूरज पश्चिमी आराम व पहा था। पिवेणी पे तीथ जल म पिसी न जस सिदूर घोल दिया। उसी घुघलक म उस दिन इलाहाबाद के किल के पास बटकर मैने मिसेज बोनर से रावट साहब को पूरी माहानी मुनी। रोबट साहा के बारे म मुझ काई भाग्रह नहीं था। करमप्ता के साहब लोग अजीय होते हैं। अपनी जमात फ सिवाय और क्सिी स मिलने की बात य सपने म मा नहा साच सक्त । दस स पाच मजे तक पोस मूकर किसी प्रकार इस देश के लोगा के साथ काम कर लते हैं। बस उसके बाद गारो लकर पल देते हैं लिट्स लग्न 1 इसे पाक स्ट्रीट के दक्षिण का अभिजात्य कहते हैं। इसी छोटी सी दुनिया म पाये की तरह अपन सापिया म जीत हैं ये । दिन गिनत रहते हैं क्व पर जाने मोटी का दिन बाएगा। दिन धाया कि बोरिया-बसना समटे दा चल दिएछ एक महीन बड़ा विताकर फिर वापस आना परमा। दिल लकिन वही रह जाता सागर पार । वस हामकी ही पचा होम की ही समस्यामा की आलोचना। और तो और घूप घुल पर वत्ता म वठार मुहामा मरेल दन के लिए रोना। भारतीयो से य जो मिरत-जुगत भो है वह निहायत पतम्य-बाय के नाते । रॉबट साहब से काई सरोकार ही नही था मुझे। उमिन मरे मन जानत ही मिसज वानर के नाले रॉक्ट भी मरे जीवन पुट गए थे।

योग दियोग १०५ मेरा मिनाज विगड़ गया था। करवत्ता में कितने तो लोग हैं। मविश्वासी अग्रेजों की सस्या भी कम नहीं है। फिर सबके होते मेम साहब ने तत्वमान सिखाने के लिए रावट से ही नयों चुना ? मैं उनस सीधे यह प्रश्न पूछ सरता था। लग्नि एक नि सग विदेगी महिला का दिल दुपाने से क्या पाया? मेमसाहब ने कहा 'तुम्हें तो मालूम है, रायट भगवान् में विश्वास नहीं करता था। सूय मालूम है । उन्होंने मुल भी एक दिन सरी-खोटी सुनाई थी। अभी तो मैंने आपने यहां जाना-आना बना कर दिया था। मैंने कहा । ममसाहय हो। योली मुझ पता है । मुद राबट ने ही बताया था। रावट ने कहा पा फुसस्कारो क फेर म अपना समय क्यों पद पर रही हो। उसी समय म दुनिया को देखो तो बहुत लाम हो मेमसाहय हर-सा गई थी। वहा हिदुओं ने भगवान् में न सही ईसाइयों से ही भगवान् म विश्वास परो नहीं तो अच्छी राह पर रहोगे कसे ? ग्लहौजी की उन दुरी औरता के साथ जानें कहां वह जाओग ? रावट साहब हंसे थे उठती उमर के जवाना को औरतो र पगुल से बचाने के लिए ही श्या ऋषि मुनिया ने शास्त्रों की रचना की थी। मेमसाह्य ने कहा था हरगिज नही । लक्नि जीवन के पाल को शे में बांधने के लिए रिसी भाव रा तो सहारा पाहिए न ? रावट साहब माल 'इन फिल की बातों में मैं क्तई समय नष्ट नहीं करता लकिन चूमि तुम कह रही हो इसीलिए । रायट की एक महीने की सुट्टी जमा हो गई थी। मेमसाहब ने उसने साप मारताना प्रस्ताव दिया। पहरे तो रानट राजी नहुमा । इस पर मेमसाहब ने कमरे से तसवीरें सोचने का लोभ दिखाया। रावट ने महा यो ट इज इंटरेस्टिग। विग्यास करू पाहे नगर मरि नदी पहार सापुस यासिया की तसवीर इटरस्टिग है । इल स्ट्रटेर मदन पूज सुशी-शी छापेगा। ।

योग वियोग
सिफ तसवीरो का ही माकपण नहा। मेमसाहब वासी और नाई
भी होता तो उस नही र जा सकता। सिप मरे ही लिए राजी हुआ।
दाना दक्षिण भारत म घूम । अरणाचल म रमण महर्षि और भी
दक्षिण में साइ बाबा के दशन मिल । मेमसाहब ने प्रणाम किया। राषट
ने उनकी तसवीर खीची।
उसके बाद सेतुम घ रामश्वर । रयाकुमारी थी जिस चन्टान पर
बठकर मभी विवेकानन्द ने भारत व सम्बयम चितन किया पा उसे
भी दखा । भारतवप के उस र्भातम गिराक्षण्ड पर दोना बड़ी देर तक
सो रहे । सवरे के सूरज ने भारत माता की पानाय को जगमगा लिया
था । पचल लहरे उन दोनों के परोसल पछाड खा रही थी माना
उह दिसनी शिकायत हो । सम्मिलित स्वर स पीस कर कह रही हो
माना-सुनो-सुनो हमारी बात सुना।
समुद्र की रहरी का नया विश्वास ! पापा से मेमसाहब राबट के
करीब आ गह खिसकार। राबट न नहा मनोखा है यह प्राकृतिक
हल्या
मेमसाहब ने पूछा सिफ प्राकृतिक र य और कुछ ?
रावट ने कहा कहाँ ? और छ ता नही पा रहा हूँ।
उसके बाद उत्तर भारत । रागी गया पदावन हरिद्वार । रावट
नाफ दवाए तीप-दधन परते रह और कमरे का बटन दबात रहे । मह
बनाकर कहा है यही भारतवप दुनिया को राह दिखाएगा
हाउ
.
सिली।
लौटते समय इलाहाबाद । रावट ममसाहब मा नाम पर पुकारा
करते । महा एरिजवप बहुत हो गया। अब क्लबत्ता लौट चलें ।
छुट्टी बिल्गुए मिट्टी में मिल गई।
मिसेज बोनर रिम्न हो उठी। अपना मुन र मुखमा उठाकर पूछा,
बिलकुल मिटटी हो?
रामर सरपराने एग । बोल 'दुनिया म इतनी सुन्दर चौजा के होते

मोग वियोग एक ऑम्यस्योर रिलीजन ने तुम्ह पसान विमा ! हजारों-हजार सार के पुराने इन इट-पत्थरा रा देखने में समय पर्वा न करक अगर पामीर रय हात हम तो माँखें भी जुरासी सेहत भी सुधरती।' मेमसाहब ने रावट को गिरायन का कोई उत्तर नहीं दिया। जर से हिन्दुत्त्व रा उहनि हाय से स्वीकार किया सभी । यह सब सुनने कानयार भो । लकिन साता एक नगा-सा सवार हो गया था ! राबर को सममाना ही पडगा उस मपनी तरफ हाना ही होगा। मित्र वानर को जगाना राव की कहानी सुनकर मैंने मन-हो मन उह फिर नमस्सार निया को निष्ठा इस विती महिला म है इसकी बाधी भी हम म होती तो हम कहां से हो रह गए हात निष्ठा मोर आत्मविश्वास शीरभी स हो हमारा यह देश निर्वीय तथा मृतप्राय हो रहा है । में प्यान में रावट साहन रोनहानी मुनता रहा । मेमसाहब रहने स्गो 'बद एक आश्चममय घटना है। मुझे किसी प्रारम विकास ही नहीं होता। सगम में आने के लिए हमने ना की। गगा पर तीसरे पहर की धूप पड़ी पी। राव ने मुछ तसयोरेंरीजर रिनार की भार हम लौट रहे म सा एर मुक्का छाती भर पानी म बटी प्रायना कर रही थी। माझे पार पमरा समारने लगा। मैंने राक लिया। मौरत की तसवीर तीन म समरा न हो पाए । युवती ने प्रणाम लिया और मान साली। हम पर नजर पहले ही उममा पेहग झाल हो गया। हम नार उदर नदी स्निारे एकान्त म जापर मठ । पार फलावर राबर कमरे में नई फिल्म भरने सगा। इनने म पाना म भावान बाई, दिखता। घोरकर राम ने रमरा जमीन पर रख लिया । गोले दपदा म वही पुषतो सामन मसी पास भभी मनी नहार गम से निकला या बिल पुर गया उमर-इससीस-बाईस स ज्यादा नहीं। नौ हाप Tom पड़े में भला पह लम्बो परनार और बहाम"ह पारे रहना मुमहिन १०५ योग वियोग । 7 या । गीला कपडा घुटने तक उठाया था। पौव दूष-स सफेद । दो चार कार रोएँ गील होकर देह से चिपट गए थे। जवानी के गप से उद्दण्ड, अपने शरीर को किसी तरह से लपेटे वह युवती टुकुर-कुर रावट को ताकती रही । यहा ही सरल मुखमा । सीझकर रायद ने मुझसे कहा एलिजावप सोचा कि परा अकेले मे बठकर तुमसे बातें करूगा । लगिन यहाँ भी अमन । अजीम है देश । यही प्राइवेसी नाम की कोई चीज हो नहीं। 'अव तक कहीं ये मेरे देवता ? मुवती ने गील कपडा में दूर से रायट को प्रणाम किया। मुझे तो भारत की जानकारी थी तो भी उस युवती के इस आपरण से मैं धषित हो गई। पूछा कौन हो तुम क्या चाहती हा युवती खीझी । मुह बनाकर बोली तुम रहने दो । कुछ पूछना हो तो मेरा देवता पूछे । मैं उह सब बता दूगी । यह राबट की मार मह किए ताकने लगी। मुझ एगा वह अपनी दो भूखी यानों स रावट को निगल रही है। उसे उस एक ही कपड़े का अपलम्य धा अदर से कुछ भी नहा पहले थी। उसी हारत मे वह रावट स सटकर बठ गई- देवता मरे कृष्ण हैया अब तक यहां थे? रावट मकवा कर मरे पास सरक माया । टूटी फूटी बगला में उसने पूछा तुम कौन हो? अवतो छलना मत करो मेर देवता ! मैं तुम्हारी मीरा है। वीर भूम के टूटे झोपडे म सपना दिखाकर वो तम गायब हुए सो गायर ही हए । मरी मौसा में तब से नीद नही। अन नही रुचता। रात मही बीतती। जाने वितन तीयो म तम्हे द्धती फिरी हूँ ! कितन मदिरा म तुम्हार लिए माषा नवाया । सब इतने गिना म तुम्ह अवकाश मिला है यह भी साहब बनकर छत रह हो ? कोष अपमान और सजा स राषट मा चेहरा साल हो उठा ।

पोग-वियोग
HIT उसने अगजी म पटा 'स्या चाह रही है यह ? भीम ?
मन कहा यह वणवी है। परगर होकर कृष्ण को ईढतो पिरती
है । उन्हा मा भगन गाती है, उही गौ पूरा करती है उही में लिए
जोती है । तुम्हें तो पुनझम पर विश्वास नहीं है। रेफिन गया पता है
पहले जम म सुमने सचमच हो उसरे टूटे झापरे म दरस दिसामा
पा
रावट न मनीबग से एक मानी निकारगर उसकी आर फेंक दो
और मुझसे रहा है यह जम रहने दो अगले जन्म में फिर दरम
दिखाऊगा।
जमीन पर सबठन्नी उठावर वष्णकी ने कहा, महसपा देवता !
माधे से पाई ही होगा। यह मैं नहीं रुती।
मैंने घाचा यह पार पूरा पपा मांग रही है । रापट से मैंने घसा
ही पहा । पिन वष्णको गुस्से से मुझे धूरती रही । बोली 'मरे देवता
को सुम या गलत-सस्त समझा रही हो? उसने राबट में पोर पर
हिए और रोन लगी- मेरे सपने से दिलकुल मिल पाता है। ठीक
सी ही मोने यसो हो नाक वसा हो उसे सोने-सा रग।
राक्ट ने पाँव हा लना पाहा! पणनी और लिपट गई । रोली
अपने चरणाम प्रापया देवता।
सोशकर गट ने मुझसे कहा 'इसी मारतवप को तमने सिर-मोखा
उछापा है ! पागलो की आदत ।
रावर उठ जान सगा। वणवी ने हाथ जोडकर रहा, भौर चाहे
कुछ ने दो मेरे देयता अपने बरणों की पल दो जरा-सी । दासी ससे अपने
माप पर रखेगी। भारा इन्तजार न करके वह यवट के जूते का
पीता सोमने ममी।
रामट न महस पूछा इम दा की और भी निमाछोर देती हैं ?
मैंने कहा हो। मैंने मोरा को हानी नहीं सुनाई तुम्हें
मीरा राण सममिसार!
7
राजा

मोग पियोग वो क्या हुआ इस पच्ची उमर म या भाली घूमती पिरगी। दूसरो को तग करती फिरेयी इनके सपन मगरहे पछ कहते नहीं गवट ने पूछा। जिसे कृष्ण ने पुकारा है, उसे बांधकर घर म कसे रख सकते हा रहकोई नही पुकार सरता मिवाय मरर हास्पिटल मे।' मला पर राट ने अपना जूता हटा रिया। वष्णवी बड़े जतन से उसका चूना उनार रही थी। पॉकर अपनी मड़ी-बड़ी आँसों स रावट को मोर तापने रगी मालो से मामू बहन लगे। मुझस और न सहा गया । कहा रावट इस प्राचीन सभ्यता का मम जानते कितना हो । यहाँ साने स जीवन सामान नही तोला जाता । राग्य एश्वय और स्त्री-पुत्र की माया को तुच्छ परफे यहाँ के राजकुमार मारमा की मोर म निकल पर है। गरीन गाह्मण के परों पर अपना ताज रखकर यहाँ के रामामा ने अपने को फुताय समझा है। हमारी पारणा से शायद इनरा मेल न बठे । सक्नि मदन इसीलिए ये गलत हैं एसी बात नहीं। तम्हारे नाइट लोग महिलामा का मामूली-सा उपकार पर सकने से ही गर्वित होते थे। उसी प्रकार अगर किसी को तुम्हारे पैराकी पुल लेने से गति मिलती हो तो तुम उरो बाधा यो दोगे। बष्णवो लग्नि तुनक गई। मासी मेरे देवता मुझ सजा रहे हैं इसम तुम्हारा क्या ? रावट कुछ भी नहीं समझ पा रहा था। मैं भी नहीं। पगली तो नहीं है यह ? लविन मुश बड़ी मुची हुई जब मपना पाप बढ़ाकर राबर्ट ने कहा तुम्हारे पल्ल पसर मुझ भपन मोजे भी उतारने परे। कुछ तो पदरा आखिर कसकप्तामा वह राघर तो ऐसी हालन में कप का उठार चला गया होना! या कि पुलिस को खबर देता । इमानत पा बिना इन्तजार किए ही घणवी राम के मोज उतारने लगी। इसी मौरे से रावट ने कमरे का बटन दबाया । वष्णवी ने ममि उठारर पूण यह

योग विभाग ।
समा किया देवता
राबर ने हसकर कहा तुम्हारा फोटभीषा।
भपने मखरे से राबट के पांच पाछनी हुई वह बोली 'छामा कर
पमा करोगे देवता?
मा बन्नी जमीन पर पडीया उस उठाकर वणवी ने राम की
आर की जब महाल दिया।
उसके चेहरे की तरफ देखर रावट ने जाने क्या सोचा। उसके
बादमा कान में महा बरा अन्डा फीचर हो जाएगा एक । माफ
अपया इस्ट्रट लान दोहर ला रगा। नाम रसुंगा-~~-एक रुप
प्रमिका गाजावन।
रामर के कहे अनुसार मैंने वणवी से कहा साहम तुम्हारी १७
तसवीरें सना पाहते है।
मझे वह बिलकुल देखना नही पानी था। दुमी हाकर मोली, मेरे
देवता चाह मेरी तसवीर चाहे पोटें, चाहे मुने पानी में पैर तुम्हारा
गया २
में भी इस परीरावर भो । कुछ मोचरर उसने कहा 'तुम रहोगी
सो अमुविधा होगी। एरिसावेथ तुम हाटल सोट मामा छ ही देर में
मैं वहां आ जाता है।
गम साहुमा । मैं होटल सोट आई।
मममाहम की । मैं मर सक अवार देख रहा था उनकी मारपूस
"उमtar
मेमसाहब फूट फूटकर रो पारात रात महा "हाम मैं उसे हाय
पर होटल क्यों और आई ! साय रही हाती दो मान मुझे इस तरह
राना नही पाता।
में मुछ मा समान नहीं रहा था। ममसाहब अपने-माप मोती
समम्मद है ममम्भव । सी पटना सुनी है फिमो नमी?'

योग बियोग किसी प्रकार से अपने को सम्हासपर ममसाहब ने पहा होटस में मैं रात भर रायट पी प्रतीक्षा परती रही। यारह वग गए मगर रावट का पता नही । यती जलाए बिस्तर पर छटपटाती रही। मुबह मा राबट नही थाया। मैं पुलिस म खवर देने जाने लगा। एसे समय कमरा लिए एक आदमी मुझसे भेंट परने माया । यह त्रिवेणी घाट का पग या । बोला एक साहब ने मुझे बाठ माने पसे दिये और पहा यह पग होटल के इस ठिकाने पर पहुंचा देना। कमरा में केस को खोलकर में घोर उठी अदर एव पुर्जा पा था। अपने पनिटी बग से वह पुर्जा निरालकर मेमसाहब ने मुन्न दिया । उस पुर्जे को मेमसाहब ने शायद हजार भार पदा होगा। बार-बार के व्यवहार मे गत हो आई या उसकी। उसम लिखा था--सपमुच मजीम है यह मारतवप । मैं चला । बस । अष्ण प्राण (राबट)। मन पुर्जा मेमसाहन का लोटा दिया। उहाने जतन से उसे बग में रपा आश्चय ही है ! ससार म ऐसा अपटन भी घटता है। भगवान् मे जरा भी विश्वास न रखने वाला एक नाटकीय क्षण म सर्वरितमान् के भरणा में मारम निछावर परफे उही मी पताका कन्धे पर उठार विश्व विजय को निरस पठा। रावट के इस नये जनम म अगर किसी की देन है तो यह है मिसेज बोनर की। लेकिन यह बेहाल हो उठी। मोली, बस यही तब स ढूढ़ती फिर रही है उसको । नाई तीरथ कोई मेला कोई आश्रम नहीं छोड़ा। मितनों कोपए लिये निकृष्णप्राण पर नजर परत ही मुझे सार कर दे। लकिन कहाँ बहता ने महा म साहब वरागी को दसा तो है। पहनाये में गेरुमा हाय में सारा माप पर घुषराले-सुनहले वाताव पर भीख की झोली। साय मे एक घणवी । भहा क्सा सरल और निप्पाप मखड़ा । सामात् मीरा हो जैसे । । १ योग वियोग दूंट थपी में तो रारर को। हिमालय से समायुमारी तर । जहाँ भी पता चला यही दौडी गइ।' प्रयागतीय म बठकर मेमसाहन मी या सुनते सुनते मरी अक्षा मे कृष्णाण का तसबार तर आई। हैट-कोट पैट म एक अविश्वासा मज तरुण । सघारमा सारा माह छोहार कृष्णप्राण बनकर भारत के लोगों को खान छानते फिर रहे हैं। मैं जब बठकर उनकी महानी मुन रहा है हो सकता है और उसी क्षण वे किमी मूनी जपली राह म दूबते सूरज सी पृष्ठभूमि मे माग रा भमन सुन रहे हैं. ऑसों से बह रही है मासू की धारा । और हम धरती क लोग, कामिनी-चन के मोह मे पो भर की भांति दुनिया के काचा में कर रहे है। मनुष्य का मन सदा हमारे लिए एष दुर्शय रहस्य बना रहेगा । रावर के इस नये जम म अगर किसी का कोई दान है तो वह है मिमेड वोनर मा। समिन वह क्या बहाल हो उटी? हाने जो पाहा था यही तो हुआ। रत्नाकर राममा गीत गान लगा। पिन मिसेज वानर रो रही हैं। सा कमा वह इतने दिनों तर अभिनय कर रही पो. मेमसाहब ने मेरे दोनो हाथों को दवा लिया~रावट का निरालना हो होगा । उसने लिए अगर मुझे अपना सबम्ब भी दना पड़ता में तमार मेमसाहब मा यह निहारा मुश अध्छा न रगा। दिलासा देत हुए कहा "जोरावट सस्य का स्वाद पाकर ससार धनों को तोडफोहर कृष्णप्राण बन गए, उहें थरने वीर मही हो पाया तो क्या पिमरे का पछी अर पिमरा सोसकर तर भागा तो फिर उसे रोटा लाने सनमा ममसाहब व ता सगभग उमत्त हो उठी थी। मेरी बाबा पर वान पान नहीं रिया । बाली 'उने पोगर निकारना ही पड़ेगा।

योग वियोग
।
कम से कम एक बार तो उससे भेंट करनी ही पड़गी।
शायद हो कि मेरा मोई प्रश्न करना पोमन नहा हुआ मगर मुझसे
और सुप न रहा गया । पूछा जाम्बिर क्यों ? क्या उसकी खोज म ऐसी
पागल बनी घूमती फिर रही हैं ?
मेमसाहब सकपका गइ उसस एक सवाल पूछना है।
कौन-सा सवाल?
शम स मिसेज बोनर का चेहरा सुख हा गया । आप-ही-आप बाली
सवाल मुझ पूछना ही होगा वरना में कभी भी उसे क्षमा नही पर
सर्केगी।
मगर मपनी सहत की तरफ भी कभी देखा है मापने ?
अवनी अहाने सचमच ही मुभ अवार पर दिया । बोली में हार
गई । मेरा शरीर बहुत दिन पहल हो एक पप्णयी से हार गया। रास्ट
को में रोककर दुनिया मे नही रख सकी। इसीलिए उसस सवाल करूगी।
भर ममसाहय यागा-पीछा करने लगी।
मैंने कहा कोई असुविधा तो जरूरत नहीं रहने की।
यह भपने-माप बुवुन लगी मेरा क्या ? कोई असुविधा होगी
तो वह उसकी होगी।
परा नी । उसके बाद बोली हो सकता है मन पर जो घटा है
तुम्हारी वह जाती रहे । लकिन तो भी कहूँगी । तुमसे कहने म धम क्या
है मन ? राबट तो भारतवप पो जरा भी नहीं पसन्द करता पालकिन
फिर भी वह रोज रान मेरे पास क्यो मावा या' और लगातार पाँ
कागि करने में जा नहा कर सकी उसे प्रयाग की उस युवती ने मात्र
कछ सणाम कर दिया । मेरो गर मौजूदगी में उमफ पास ऐसा क्या
मिला उस?
मेमसाहन में होठ कोपन लगे। धारा तरफ तार पर उन्होंने मेरे
पान मे पहा इसे सिप तुमने ही जाना है और काई नहीं जानता । मुन्न
सूप या है प्रयाग म उस दिन राबट मे मुपे होटल लौर जाने को महा

पोग वियोग उसस क्षण भर पहर वह वणवी की भौगी कपड़ो स उसस्ती देह भी तरफ खास निगाह से ताल रहा था। घौकर मैंने मिसेज वानर की आर सामा। उनरे ,ठ तत्र भा साँप रहे थे । होफता हुई ओली तुम लोग मुझे माफ करना । हा मकना है यह मेरी भूल हो । मगर वो भी मैं उसस एक बार पूछणी राबर तुम्हारी जम निगाहम या पा?" उस बार इलाहाबाद कृष्णप्राण का कोई पता न पता। हम दोनो ही निराश होर कसा लौट भाए । पिन उम्मीद नहीं छोड़ी। वष्णया में सबके देखे रावट साहम ने क्या पाया था यह गाय मदार लिए रहस्य ही बना रहे । मुसे यह जानने का कोहल नही या कि किस शक्ति के प्रसाद म उहाने संसार के सारे व भन तोड दिए । सपिन मैंने राबट से मिस वानरक मिलन प्रयोजनको सूम समझा। उनको दही यार देरत हा मुझे डर हा आता । गत नि बस सोचती हैं मोर सोचती है। मुगे भी महत राम पा । दुनिमा की हाई लभले ही थक जाता, दूसरा के ममले हल करने कोठा भी हो तो सामन्य नही रह जाती। लपिन मिसेज प्रोनर का बहाण्हसानमाद था मैं। विलामत से गर घोप ? मी लिमा मा~मेममाहब यो मेरो तितर रहना । उही नी दया से मैं यहां आ पापा कम-स-मम मरे नात ही उनकी खोम-खपर लत रहना । मोटर मैन बहुतो में प्राण को सोन पूछ की। और हार पार परमन म एक पत्रिका शारदीप विरोपार म मैंने प्यार बार मरिया। पाठमा से अनुरोध किया कि किसी से मगर उनकी मही भेट हा जाए तो कर मुझे वार कर। मा की कोई तसवीर मेरे पास नहीं है।मकिन उसकी मूरत साल का ए पाका माभूटा तोर समनापुर सोनस सम्म हैं। सिर पर मुनहर धुप बाल।

योग वियोग बदन पर लम्बा गेरुमा झूरा। नग पाव। हाय महातारा स्टिार-सी नाम गौर खिची मिची-सी आंखें । साक्षात् श्रीकृष्ण से ! पर इतना ही कि इनका रग कच्चे साने-सा है। यह भी लिख दिया था कि कृष्णप्राण पो माप देयने हा पहचान गे। हजारो को भीड म भी घ छिपन प नहीं। देखिए कही मि मुन्न अनेंट टेलिग्राम कर दीजिए। निहायत मद्रजमोचित न होने पर भी मैंने महा तर लिग्य दिया था कि मैं पहुँचत ही टेलिग्राम का पप द दूंगा। मिसज वानर की कहानी यही खत्म हो जावी अगर एक टेक्षिप्राम भा नहा जाता । जिस उभारता पाठक ने मुझ तार भेजा था न तो उह तार का खच दिया गया न ध याद हो । उहोने कृष्णप्राण का पता ता भेजा न अपना परिचय नहीं दिया। मेरी यही इच्छा भी कि उनसे मिलकर पस्तिगत और पर उन्हें परमाद दू और कृतज्ञता स्वस्प अपनी इस किताव को एक प्रति भेंट कर्स । यह क्विाय अगर पिसी उनके हाथ लगे तो कृपा पर यमी भी वे अपना परिचय ८ । मुझे विशेप भानग्द होगा। पूजा की छुट्टी में य गायद पवायु परिवतन के लिए पहार पर गय में या किसी सरकारी काम से मदनपुर जाना पड़ा था। वहीं से उहोन खघर भेजी थी। सार पाने व बाद मैंने जरा भी दर न पौ।एक टक्सीलकर भोपार रगान स लाउन स्ट्रीट घग गया । ममसाहब ने कहा यक्लास में पलूगी। जब रावट इतना कष्ट उठा रहा है तो मैं भी झर सकूँगी। बडा मुश्किल से उहें ऊंचे दर्जे का टिकट लन को राजी कर पाया । जिसरी मादी नहीं हैं मही धुन म वही परक शोमार न हो जाएं। पूर्वी रेलवे के एक प्रभावशाली मचारी की मदद से किस मुसीबत से उत्त नि टिरटमा जुगा- मिया यही यह कहानी पहन का जहरत योग षियोग ११७ नहीं। मिसेज बोनर के मन की जो दशा थी उस समय ] टिकट न मिरता तो शायद पदल ही मदनपुर के लिए चल पड़ती मिसेज़ मोनर के चरित्र म कुछ ऐसी विरोपताए देखी जा आमतौर से हम लोगो म नहीं पाई जाती। ग्लश मे पदा होकर भाग्य के परि हास से ये कलकत्ता आ पहुंची थी। रिन्दी म पिसी भी अन्याय के मागे उन्होंने सिर नहीं पाया यहाँ तक कि अपने पति का भी माफ नही किमा। ल में ही साइबोस कोट से हरकारा पा लिया था। उनके उस अध्याय की पूरी जानकारी मुझे न थी। इतना ही समझा था मिचोटा स पलनी पलना हाने का वाद उन्होंने जीवन म कमी हार नही स्वीकार की। मनप्य के अन्तरतम के अमृन पर उन्ह भाज भी गहरी आस्था था। पास घण्टे के सफर के बाद जब हम गतथ्य स्टेशन पर पहुंचे मोर हो धुकी थी। मनपुर कहा है यह पता नही था। लोगर से पूछताछ करने पर का पत्ता पला उससे सिर पाम हने की नौबत भाई वत से तीसेक माल पाना या । यहाँ से फिर दूसरा उपाय परना पा। कहा जा रहा है यही ठीक-ठीक नहा मालम पा। इस राजाने परदेस म कहाँ रात मिता दूगा इसका भा ठिकाना नहीं। ऐसे ऐहदेर के लिए दिल ये तयार होर नही मामा पाकहाँ का तो कौन साहब तिस पर उसने एक बार मेरा अपमान तक रिया पा उसी लिए इतनी तसा उठाने का मेरे लिए काई मतलब नहीं पा । पनि पहाडी हवा में कोई जादू होता है शायद । सामने से बड़े खरे पहाट का देसकर गरीर जसे पुरा गरम हो माया ! मरी नसामी रस्त विदुएँ मानो नोट से जगार क्लरद परने सगी मुझसे बार-बार रहने लगी हम प्रफुल्लित है। माम मुबह का जगना अगर किसी का सफल हुआ है तो हम लोगो का जी में माया बीवन जानने का एसा मौकारिताको मिलना योग वियोग है ? मैं भाग्यवान हूँ। वस पर मिसेज बोनर और मैं पास पास बठ थे। लपिन हम दोनों म काई बात नहीं हुई। विराट विशाल पवत पे सामने होर को भी मालोचना जसे वेमानी लगती है। बस से उतर कर आवश्यक जानकारी लने म कुछ पर हो गई । उसरे पाद हम मदनपुर की ओर रवाना हुए। एक टटट्टू पर हमारा सरो-सामान । साम म घोडेवाला और हमारा पथ प्रदशन पानसिंह । नाटकदमा छोटा मा आदमी लाल सब-जसा रग । ये पहाची लोग मुम बहुत अच्छे लगत है । इनर मन में कोई प नहीं हाठा शुदसा नहीं होती। पानसिंह ने कहा आप लोगा का मदनपुर जाने में कोई नष्ट न होगा बाबूजी । आप लोगा के लिए मैंने शिव भगवान् को पूजा चढाई है। शिवजी अगर प्रसन्न हो तो कितनी भी पदाई क्या न हो चदाई नही मारम होगी। और शिवजी कही नाराज हा तो दुस्सा श अम्त नही यह राह ही घसे भादमी मी सत्म नहीं होगी कभी-जितना ही पलसा जाएगा रास्ता उतना ही बनता जाएगा। वह मननपुर पभी नही पहुंचेगा। मिसेज बोनर से पूछा चल तो सकेंगी न पहाड में सामने यह भी जसे उत्फुल्ल हो उठी थी। बोसी में सुम्हारी तरह माटी की बेटी नही हूँ मैं पावती , स्कॉटलैट की जिस जगह मेरी पदाइा हुई वहाँ पहार-ही पहाड है। पानसिंह के उपदेश क अनुसार शिव भगवान् मो प्रणाम करते चल पड़ा । मन ही मन कहा हे क्णधार ससार म मभी बहुत कुछ देखने की इच्छा है । लिहाजा आफ्त मुसीवन म आवश्यक प्रोटरगान देन म जूसी न मोमिएगा। पानसिंह ने वहा बाबूजी काम तो मैंने यहां बहुत दिन रिया लकिन मुसाफिर लरर मदनपुर की भार कभी नही गया है। यहाँ मो दानीय पृष्ठ भी नहीं है। ?

योग वियोग मैने कोई जवाब नहीं दिया क्यापि शायद हो कि हम जिन्ह देखने जा रह हैं शायद वे न मिले। हमारी यह मारी मेहनत ही बकार हो। दिन भर चलत चल्त शाम को एन क-बाले म का । मदनपुर अभी बहुत दूर पा। लिहाजा वही रानिवास । पानसिंह हमार लिए साना बनाने को रसाइ म गया। और हम लोगों ने सामने के बगीचे मे दो आरामसिया पर अपने शरीर को रिछा दिया। ऐसा नही प्रवीत हुआ कि थास-पास रही मनुष्य का कोई विह है। बस पर मोर पहाड । पहाड और पेठ । सब विशाल । भुक्ता को कही कोई निशानी ही नहीं। कहीं एक छोटा पौवा तक तो नजर नहीं भाया। पश्चिमी आकार का सूरज भी कमा अजाना-सा सगा । मन ही मन सूरज स महा तुम्ह तो जितना हो बार दखा है। घोपाल-मगान की बस्ती से लाउडन स्ट्रीट वाल मकान ने एग्जे से त्रिवेगी-तोष के नदी किनारे पठार भी देखा है । लकिन हर बार तुम नम लगसे हो। नगाधिराज की परिपारिफा निको अन्तिम किरणों को भी पोंछ गई। सिप अस्पष्ट मन्यार मे दूर मी मरण्य-श्रेणी में मुस्लिप्टस की भीनी महक तहकर मान लगी। पाड़े को पीठ पर सामान लादर दुमरे दिन फिर हमारी मात्रा शुरू हुई । रूपवती युवती को मोति मदनपुर की राह ने माना सतरग नाइलन की साडी पहन रक्षा हा माज | उस रूप से परा भी विचलित न होकर हमारा घोड़ा दाशनिक को गम्भीरता लिये धीर साल से पला जा रहा पा। भोर हम, हम तो जसे स्तिने दिन इस राह पर घमत रह हा हमारो साल से हमारे पुरस इस राह स जा आत रह है। आप भी में मानामश्वरी पोठ पर माल भादर व्यापार का जा रहा हूँ। ममताह मा at साग रही थी। भामद ससार त्यागी रणप्राण सजा प्रन पुगी उसके लिए तयार हो रही हा । मदनपुर का परती १२२ योग वियोग तो थापको मोखों से आंसू बहने लगेंगे। अटा सा आथम बनाया है। वही रात दिन रहत है। किसी से बोलते नहीं। कुछ दीजिए तो लते नहीं । हफ्त में एक दिन यायम से बाहर निकलते हैं । इफतारे पर गुन गुनाते हुए गांव पाला प पास आत हैं। हमारा मितना सौभाग्य है बाबूजी वे हम छागा के वीप हैं । उह पोहा-सा चावल दाल देकर हम घय हो जाते हैं। और अन्त म हम सच ही मदनपुर पहुँच गए। दूर हो से पानसिंह ने दिखा दिया वह रहा हमारा गांव । कुछ घरा की छोटी-सी वस्ती। पर भी इतनी इतनी दूर पर मि एक घर से दूसरे में जाने में हाफ उठन मीनौवत। ऐसे बजाने अचीन्हे स्थान में पानसिंह जसा बघु मिल जाना बडे भाग्य को पात है। अपने पटनायहरू जीवन म मैं बहुत देर म घूमा बहुत-बहुत सोगा स मिला किन्तु इन पहाडिया जस अतिथियत्सल और अच्छे तथा परापकारी लोग मैंने नहीं देख । पानसिंह ने अपना मकान ही हम लोगों के लिए छोड दिया । घर पहन का एक ही तो कमरा पा एक टुकड़ा बरामदा । वही हम लोगो का सरो समान सहमगर पानसिंह मपने एक सम्बायी के यहाँ चला गया। यूरोप में प्राण की जो प्ररता है उससे वास्तव म हम लोगा की काई तुलना नही । मिसज बोनर और कृष्णप्राण में नाटक का मैं महज दार पा। उस नाटक का नतीजा कुछ भी हो उससे मेरी किस्मत कामो रद्दोबदल नही होगा । लक्नि ता भी मिसज बोनर की चिन्ता से मरे उग का यन्त नही पा । इतनी दूरी तय करके आने के बाद कही जतन स पाला हुमा उनका सपना सपना ही रह जाए तो या होगा ? लरिन मिसज योनर का अन 1 भारमविश्वास था। गुनगुनाकर 'घामान को ठोर करने लगी। पूछा सिफ दो दिन के लिए इवना या सामान समाइ ?

योग वियोग एक अम कोरीवकर जाने में रखती हुई व वासी "एर बसतो सिफ रावट को भी मार पंट और डूवा समग है। और इसम मरे कपड-लस है। फरपा मारक है बिस्तर है टाफी है। रावट का का बहुत पसद है। रावट को बंधी हुई तसवीर निरालर ममसाहब ने बक्स पर रखी। बा-टाई भोर कीमतो सूट में माम बदन की तसवार । बाट की जेबस रुमाल का गाना हक रहा मा । बान ऐंड सेप४ को बोपो हुन तसवीर पर मएमा हस्ताक्षर करफ रावट न मेमसाहब का मेंट दी थी। कमरे ने कियाह के पल्से सटाकर ममसाहब सिंगार करने वठी। बाहर के बरामद पर सहा-सहा में पहार देखन रगा। अपनी भाषा आपापा कामना-वासना भी अनिश्चित परितृप्ति 7 लिए हम सदा हा बचर और बचन बन रहत 1 लक्नि गिरिराजमाती भनिन्चितता की कोई समस्या नहीं। इसीरिए व चान्त है पिर। कमर र मन्दर में ममसाहब ना निकला तो उन्ह पहचानना मुश्किल । मैंने उह पश्चिम की ऐसी उग्र पार म कभी नहीं दवा पा। उनकी उम्र जसे दस सास कम हो गई हा नारगी रग का पम लम्बा स्कट माना उनकगरीर मे स गया हा हाय दाना विस्कुल मुले । १3 की हड्डियां दा अमट रेखामा जमी दीख रही पी। साटन म पतले कमरवत से कमर घो। सनसघरे पाला म भी पसाता एक अगली सद। उस पर मेमसाहब ने रेशमी रुमाल रपट लिया। भोली स भाईना निकालकर रहनि सपना पेहरा देख लिया और निकल पर। में भी साप पला । मरे हाथ म रगीन कागज मनिपटारावर साहब का प्यारा पा! सौम होगा पी। हम आम के पास पहुंचे। दूर से ही मजीर की आवार मुनाई द रहो पो। ष्णप्राण अपन मदनमोहन मा भमन मुन' रहे। भगवान को रात का माग का सुरा था। अब व सोएंगे। पारो तरफ अधरा । ए दीया जा रहा था फेवल । उसी सपन योग वियोग सी रोगनी में कृष्णप्राण को दवा। दरागी का गेरुआ धीर । घुटा हुआ सिर । लम्बा पड़कर प्रणाम म मुझे उस शरीर मे रावट साहब को कौन निकाल ? मन्दिर के अदर जाने का हम साहस न हुआ। बाहर सड़े रहे । मेमसाहब का घरीर उत्त जना से कांप रहा था। अब कृष्णप्राण नगे बदन हाप में फतारा लिये बाहर निकले । दोनो की नजर जय मिली, तो मानो इसके लिए दोनो में से कोई तयार म था। कब तक 4 निर्वाक खो रहे मालूम नहीं। मेमसाहर अस्फुट स्वर में बोल उठी कृष्णप्राण ! और पागस-सी उनके हाथ पकडने को एपकी। कृष्णप्राण मय से पीछे हट गए। मेमसाहव रायट कहकर फिर बढ़ने लगी लेकिन ठिठक गम । यही था वह परम आकाक्षा का मिलन जिसके लिए मिसेज़ पोनर भारत के एक से दूसरे प्रदेश को धूल छानती फिरी। मैंने सोचा था कि मेमसाहय रे ध आंसुआ का बांध आज टूट जाएगा। लक्नि कहाँ ? सो तो नही हुआ। कृष्णप्राण मुह फेरकर मासमान की ओर साफ्ते रहे। रावट यह सा मेरी कल्पना से भी परे था मेमसाहब ने महा। प्णिप्राण ने को जवाब मही दिया । अब शायद इस प्रश्न की बारी थी जिस प्रन के लिए मगाम से हम दौरे दोहे मदनपुर आये थे। मेमसाहब ने कहा रावट तुमसे एक गोपनीय बात है । चलो हम यहाँ उस युग्लिप्टस क नीचे चलें । रायट ने गरदन हिलाई 'मुझ माफ मरता। लिसो स्त्री से अकेल मे मिस्ना मेरे लिए सम्मव नही। तुम यह कह क्या रहे हो रॉक्ट? राबट धुपचाप खड़े रह । मेमसाहब हॉफने लगी। बोली देसो राबट तुम्हारे लिए क्या स माई हूँ ! फरपो का कक । तुम्हारे पले माने के बाद से मैंने मी देर नहीं खाया। माम सब मिलकर साएंगे। राबट ने सिर हिलाया क म माग रहता है । माइ एम सारी। ममसाहब विफल मनोरष ही मोट आई। प्रन पूछा नही जा सका।

योग दियोग रात भर व सोइ नही । मुझे भी नहीं सोने दिया। बोली में पूछ सस्ती थी तुम्हारे सामने ही पूरा मस्ती यो । लेकिन मैं तो उसे फिर से पाना चाहता हूँ। इसीलिए कुछ भी न पूगी। १ दूसरे दिन सदेरे मेमसाहब फिर गई थी। में जानकर ही नही गया। पटा-पज सोचता रहा ऐसा क्यों होता है ? राबट साहब ने तो भव मुछ पाया था-प्रेम, स्वासम्म सौंदय दौरत कीर्ति । स्वदतातो उनकी मुरठी में थी। सकिन कौन-सा विपन्न विस्मय उनके भीतर ने मैं एकाएक घेरने ममसाहव उदास सोट माइ। पूछ भी न कर सकी। ममसाहब ने कहा पा रावट तुमने अपनी मां को सोची है क्या ? उनके कोई नहीं है। जो साहब पहरू बोलते ही रहते थे, मब वे मानो बोलना ही भूल गापे । उनको पात का जवाब दिए बिना ही कृष्णप्राण मन्दिर म चले जा रहे थे। मां के नाम से रुक गए नारद । मोले, 'अपना जो कुछ भी था सन तो मैंने उनके नाम लिख दिया है । मैंने तो बहुत पहले ही उन्हें हिस दिया है कि रुपयो की मुझे जरूरत नहीं।' पको-सी मेमसाहब कमरे में बठ गर । उसजना के मारे इस ठण्डी जगह म भी पसीना भाने लगा रहे । प्रवना सुन्दर माक भीग गया था। समसाहब पायद इस न्पपता के लिए तयार न पी। हरके ही, ठीक से प्रा भी नही हुमा पा, वे निकल पी पी। माधम से गाने की बावाज मा रही थी। मजीरा बजाकर कोई गा रहा था, हे लीरामम मुबह हा गई । उदयाल का मूरज तुम्हारी आगा को प्रतीक्षा कर रहा है । उठो जगो मातों पर कृपा करो। उस गौस में आधा की कोई चिनगारी नहीं थी। माशाविहीन पका पट का एक सुर मानो सारी पृथ्वी को उदास करना चाह रहा था। ममसार को मांखों से आंसू ला रहे थे । रारट के ऐसे मम पतन की बात कोई भी नहीं सोच सफा पा । भारत को मिट्टी पर परे १२६ योग वियोग होकर जिसने पौरुप और कम का विजय-गीत गाया जिसने बिना अपनी बुद्धि और विचार की कसौटी पर कस कुछ को भी नहीं माना नही माग पत्थर के एक टुक्डे को नीद से जगा रहा है । कह रहा है-प्रभो सुम्ही मरे सहारे हो। पौरुष को ऐसी अपमृत्यु तो व कभी नहीं चाहते थे । ममसाहब को वही देर तक सडा रहना पड़ा था। गनीमत कि यहाँ भीद भार नही थी नही तो लोग ममसाहब का दखकर हसना शुरू कर देते । कानाफूसी घलती आपस म । भगवान् को जगाने के बाद कृष्णप्राण को दम मारने की फुरसत नही। भोग लगाना था। भोग के बाद प्रमु के नहाने का समय होगा। नहाने के बाद फिर भोग। वियोगिन मिस बानर तय तफ भी बाहर खड़ी थी। पसीने से नहा गई थी । सूरज मानो बीच आसमान से श्वेतागिनी पर कुछ विशेष नगर डाठ रहे हों। मन्दिर से फिर गीत की फटी सुनाई पठी- प्रभो तुम्हारे सिवा मरा कौन है? गीत गा-गाकर जब प्रभु का सुलाकर कृष्णप्राण निक्ल तब तक ममसाहब पककर चूर हा गई थी। उसी समय दामातें हुइ । व फिर मन्दिर में चले गए। . ममसाहब इस पर मी हार मानने वाली नही । बक्स खासकर भौर भी मौखें चौघियाने वासे परे निकाल । किवाड बन्द करके बही दर तर बनी उनी । हैंगर म झूलत हुए तीन माप दिसावर मनस पूछा बतायो तो कौन-सा फबगा मुझे मैं खुद ही शर्मिन्दा हा गया । लकिन मुसीबत को ऐमी कठिन घडी म आगमी का वह बोध नही रहता । औरा ने क्या सोचा इस चिन्ता से हार की बागका ही बढी हो जाती है। इसीलिए ममसाहब की पागा को स्वल्पता देखकर दुःख ता हुआ पर शिकायत न कर सका। लक्नि क्सिी बात का कोई नतीजा न हुभा। ममसाहब की सारी योग वियोग काशिश बेकार गइ । उहाने अपने पैसे प्यारे प्राका को फश पर छितरा frया और बिस्तर पर पडकर रोने रमी । राबट फो ये हरा न सकी। ममसाहब ने कहा रावट को वष्णवी स ही जीवन जिमासा का उत्तर मिस गया था। पता चल गया था भाभे से काम नही चलता । पूरा देना पडता है । सारे बमन ताडकर अपने को पूर्णतया समर्पित कर देने पर ही जीवनेश्वर का परिचय मिल सकता है । वष्णपी ने कहा था देवता, नदी किनारे खडे हाकर जल छिड़कने से नया होगा दूद पड़ो। सम्मा के सूने अवरे म प्रयाग म कोट-पटभारी रायट साहब स पप्णवी ने कहा था 'म मुम्ह आठ आना नहीं दूंगी रेवता पूर सालह माने गी। मेरी यह देह मेरा यह मन-~~-सब तुम्हारा है। राभट साहब ने पूटा था 'हाहै हर नहा है ? "म नहीं? वष्णयो ने इसकाजवाब देन म जरा भी टेरन एगाई। वोली गम ? सुम्हार आगे मुझे कसी आम ? धौरहरण के समय कोरव-समा में दोपदी बय सर लाज लिये तुम्हें पुकारती रही तुमने कुछ भी नही किया । सकिन जब उसने लाज को तिलाजलि देकर पुरारा प्रभो तुम्हारे सिवा मरा और कोई नही~-वि तुमने उसको लान बचाई।' भर ! क्या कह गई ! रह क्या गई यह औरत । पित्रसी को नाइ रावट के सारे शरीर म सिहरन दौड गई और कृष्णप्राण के रूप म रावट का नया जम हुआ। मदनपुर में उस निस्तम्घ निरन म अपनी देह विद्याए ममसाहब ने राबट से कहा था, और मैन रमा तुम्हें कुछ भी नहीं पिया? क्या तुमने मुमसे बिना पूछे ससार, सम्पति मौर यौन शक्ति पाई ? पलो कोट चलो। 'उसमें पाद मैंने पूछा। मांस पाजी हुई ममसाहय बाली उसरे तोटने मामाई उपाय नहीं। जिस पुल ग उसने मदी पारसी थी उस पुल का उसने सुद ही जता योग वियोग पूछा। दिया । ही हैज बन ट दी विज बिहाइड हिम । तो फिर फल सवेरे ही होट चलें ? मैंने मेमसाहब तयार हा गई थी । मुमरिन हो ता रात को ही चलने को सपार पी। वियाह की कुण्डी लगाकर वे सो गइ और बाहर बरामटे को खाट पर सम्बल आटे में निद्रावी की आराधना परने लगा । लक्नि नीर पयो मान लगी ? इतने दिनो मे याद परिपूर्ण जीवन यी खोज मिली। विसावों म ऐसे व्यक्ति को जीवन कहानी पढी पी-लपिन पढना मोर यांसा से देखना तो एक यात नही। सोपा इस जीवन पर मैं कहानी लिस्रंगा-परिपूर्ण विश्वास को कहानी। सानते सोचते कब सो गया था मासूम नही । अयानक नीद टूट गई। रात के अधरे मे मिसेज बोनर क दरवास पर जसे कोई बडी साय पानी से खट-खट कर रहा था । फुसफुसाकर पुनार रहा पा- ऐलिजावेय एलिजावेथ मैं चौंक उठा । अरे कृष्णप्राण ? नहीं-नही असम्भव है। यह कसे हो सकता है ? आधी रात को सबकी नजर बचाकर ससारत्यागी कृष्णप्राण भला किसी स्त्री से मिलने क लिए क्या मान लगे? गले की आवाज से ही ममसाहब शायद समझ गई थी। ये दृसिंग गाउन पहने ही दरवाजा खोलकर बाहर निकस बाइ । अपरे में मैं उनकी पागल नहीं देख पाया। सक्नि अवरजभरी दवो आगाज पानों मे भाई दी। राबट? इसर बाद को पटना के लिए मैं तयार नही पा । मेमसाहब मेरी माट के पास आए। गौर क्यिा कि मैं सोया हूँ या पगा। (मरा दोप माफ करें में उस समय नींद का यहाना बनाए पड़ा था।) वे पांवो बही सावधानी से दानों बाहर निकल गए। यह या गति ' मेरी। इतने दिनो को सोशियो से जिहें मैंने यसा क मासन पर मिठाया, ये भी मुझे निराध परेंगे? मैंने तय प्पो कर लिया है कि सारी शक्ति मगारर परिपूण विश्वास मी एक कहानी । . 1 योग वियोग १२६ लिगा । भपने पाठकों को बुलाकर कहूगा देखो मैं सिनिक' नहीं हूँ। भाग से मैं भी उठ सहा हा ! इस नाटक को परिगति मुझे देखनी ही होगी। चांन्ना म मदनपुर मानो सर रहा था। पहार को चोटी पर मम । मय पर मेष । सफेद मेष से माल पहार की ऐसी आधी रात को मिठाई मैंने कभी नहीं देखी। मुससे भूख ही मागे मागे कृष्णप्राण और ममसाहब चल रहे थे। सेि लक्ष्म करके नही नह साठा सनि मने कातर होकर आवेदन किया मेरे पिन्वाध की कहानी को चौपट न करो। युग-युग से विनिसार मोर माफ का धुंधरी दुनिया से कर असीरिया, बेबिलोनिमा मिस पीस रोम गिल्ली और लकत्ता में पधार की जोत होती माई है। मनुपम रूप की रानी उपजीक घरमा म जाने कितने साधरो ने अपनी समस्या का फल पढाया है। मानेवाली दुनिया में भी न जाने स्तिनी शार इसी को पुनरावृत्ति होगी। मदनपुर को इस बांदनी धुली रात म खस मादिम रिपु से मेरा परिपय नहीं ही हो तो क्या ? कृष्णप्राण भौर मिसज गेनर एर चट्टान की ओट म सड़े हो गए। उस समय भी उनके बदन पर गेदमा सोह रहा था। वनित मिसन बानर ने पूछा, "क्यों ' पर्या आये कृष्णप्राण न उदास होकर कहा, 'सुम्हें एक भेद की बात बताऊ । भाए बिना मुझसे रहा नहीं गया । मिसेज योनर और भी उत्तमित हो उठा--- कोन सी वास' बतामो मुझे रसा। 'प्रयाग म जब मैंने मीरा की मार देखा पा मेरी निगाह म पाप या पाप हो मुड बीच में गया था। लेकिन उपक बाद मैंने पवित्र होने पीािनी। बरासर अप्पप्राण ने मुरामाए पर म कहा, मीरा ने चाहा या मैंद पर. सरिन मोरारा तुमो [--सका मैंने भूह का है। मैं, २ योग वियोग दूद नही सका आज भी मैं अपने को पूर्णतया उरसग नहीं कर सका है। याद है तुम्हें मरे जम दिन पर सुमने मुषे एर कमीज और एक पट उपहार दिया था ? मैं वही पहनकर सगम पर गया था। मैंने सब-कुछ जोडा सदेह नही लगिन उस कमीग और पट को आज तक झाली म छिपारर रखा है। मीरा स भी नहीं कहा। कही कही पिर जरूरत हो क्सिी गिन। और कुछ न नहार लगा से मिर झुकाकर कृष्णप्राण तेजी से पहाडियो म ओझल हो गए। ममसाहब और मैं उसी दिन सवेरे मन्नपुर से चल पाए । कृष्णप्राण की आखिरी मुलाकात की यात मेमसाहय ने मुझस लकिन नहीं कही। पानसिंह के पत्र से मालूम हुआ कि कृष्णप्राण भाश्रम छोटकर मही चल दिए। वे ममी कहाँ हैं नहीं जानता । लग्नि परागी की झोली म एक ममोज और पट आज भी जरूर इन्तजार की परियां गिन रहे हैं। कौन जान शायद कभी उनकी जरूरत हो जाए। मिसज योनर और कृष्णप्राण मा जीवन रहस्य मेरे सामने हाईकोट की नौकरी परते-करते हो उद्घाटित हुआ था। हाईकोट स वास्ता चुकाकर जहाँ गया उसका नाम है पौरंगी। नागरिव मभ्यता का बो रूप रोज रात के अंधरे म पश्ता को छाती पर सटे होरर हम बाहर से देखा करत हैं और देखकर चकित हात है सकिन जिसके अन्तर के अन्त स्तल में प्रवेश करना हमारे लिए कभी सम्भव नहीं होता और इसलिए जो हमारे लिए सदा बनाना हो योग वियोग रह जाता है घटनाकम से कभी मुझे उसने आमने-सामन खड़ा होने का दुनम सौभाग्य मिला था। इस दुनिया में में से आ निपला पा 'चोरगी' म पहल ही यह निवदन कर चुका हूँ। माज में एक स्वनामघय लखान अपनी विमी एक रचना म रिया है अगर किसी जाति और उसकी सभ्यता का जानना चाहत हा तो जाकर इस बात का पता लगाओ कि 'हाउ दे लिए एड हाउ दे नवस रहते है और किस तरह से प्रम करते है। इसी में क्या ता उनकी सभ्यता का एक विश्वसनीय तथा सहज हो समझ म मानेपाली मकी मिलती है। यह बात न मयर देश बल्कि विशेष अथ म किसी खास महर पर भी लागू होती है यह विश्वास बहतों का है। मै भी सभी इस पर विश्वास करता था। उसके बाद एक दिन भेरी परित मौसा के माग धानक नगरीको पायगाला के ग्रीन रमका दरवाजा खुल गया । मुग्ध म नियन और नाइन से मलमलाती धोरगी पाहजहाँ होटल म एक मामूला कमचारी की भूमिका म पाद प्रदीप के सामने मा सम हुआ। और विश्वविमोहिनी चौग्गी की उस अभिजाततम पाम गाला म ही पहल-पहल सुना 'सम्यता का पहचानना चाहते हो तो शहर में जामा । और आर नगर को पहचानना चाहते हो सो यह खोज रादि वहाँ र रोग क्स रहते है किम तरह से प्रम करते हैं और किस सरह म उत्सव अन्त म एक दिन मौन मृत्यु के देश का चुप चल देव है। सक्नि यह सब देखन जानने के लिए नाहक ही समय मोर धारज के अपव्यय की सास नही । इसका सबसे आसान उपाय यह है कि दिन इस साजरे धूपर की आह म अपन प्यार हर को पायाला म हाजिर हा जामा। मगर और नागरिर का सन्चा रप खान को या रावन वाले दर्शन की इन आँखा व आग टलीविजन की ससार जसा साफ मक उठेगा। यूरोपीय ग स चला वास पाहजहाँ होटल ना मैं एर मामूली रिम- पानिस्ट पा । मपरिमित हाटल जोवन र भाष्यकार राधाम जिहाने मरे- योग षियोग लिए किया जिहाने इस दुरूह जगद के अतर की याणी को हृदयगम करान मे मेरी सहायता मी यो उनका नाम था सत्यसदर बोस उफ सटा बोस । उनको छोडकर होटल पाहजहाँ पे जीवन का पल्पना करना भी मरे लिए सम्भव नहीं। मरी पोरगी दरअसल इही सत्यसर-दामा स्मति चित्र है। सटाग ने एक दिन उस माहूर क्पन- एवरी नदी गेटस दी गयनमेंट प्ट डिजय ज-की नकल पर महा था एपरी सिटी गेटस दी हाटेल इट रिजव ज । जसा गहर वसा ही होटल होता है । मिस्टर हान्म नाम के हमार एक विदेशी शुमगी ने (नकी चर्चा पोरगी म विस्तार से कर धुका हूँ मेरी इस रचना के पीछे उनकी दन बहुत पो।) हसपर कहा या पाडा और मकर यो रह सकते हा एपरी हाटेल गेटस दी कस्टमर इट जिव । जसा होटल यस ही लाग आप्त है। यह बात चौरगी लिखते समय याद नही माई थी ऐसी बात नहीं। सक्ति मपने स्वाप से ही इसे मन निर गहर प्रदेश में प्रवेश नहीं परन दिया क्योंकि दिमाग में ऐसी यात क रहन से अपना क्तव्य करने में वाधा पहन की विशेष सम्भावना पी।मैं उस वक्त प्रासादोपम पायगाला मेमर-पमरे में नाना रगो से रगीन जीवन को खिलाने के नशे में पूर हो रहा था। मरी भनुभवहीन थाखा के बाग उन जुलूसों ने मिनकी सोच भी नहीं सकता मुष पक्ति और एगमग वार गरितहीन कर दिया था। उस समय सो गाहजहाँ होटल मा यह नया रिसेप्पानिस्ट भनुमवी यौर जीवनमर्मी सरमसुदर बोस की स्तह-छापा में केवल आदमी ही देस रहा था और देखते दसते सोच रहा था कि दुनिया के विभिन्न प्राशों के विभिन्न समस्याबा से पिर ये लोग पाहजहाँ के परिवेश में पचत है या नही । उसी प्रकार स उस होटल मे जीवन उसमें आन-जाने वाल मोगा और उसक ममारियो सुख-दुख की बात मैंने यडे जतन रो मागको सरह पी। दूसरी तरफ से पानी जसा होटल है यस हो लोग माते हैं ।

योग वियोग इस महकथित और बहुविज्ञापित अक्ति की सचाई झुठाई को सौटी पर क्सने की कोशिश नहीं की। अब माज शाहमहो होटल मुझे माधय नहीं देता। कुछ दिन पहल गत के अंधेरे म उसने न केवल मुस वकार पस्कि देपनाह भी कर दिया था। उसक विपन क पिनयन न मुझे लाल-पीला होकर बता दिया था कि मन में उनका कोई नही होता हूँ । अव मेरी जगह दूसरे लाखालात रोग की तरह सारो घे जगमगाते आसमान के नीमे हैं । चौरगोना पवन पाक जहाँ से मैं पाहजहाँ म पहुँचा था फिर वही तोटा । बेकार मैं अपने मध्यवित्त आक्रोश की आग में शाहजहाँ के जीवन को (कम स-कम साहित्य फ भोगन मे) छार छार कर दंगा-एसी एक सनक सुरू शुरू मुझ पर सवार हो गई थी। लकिन अपन दो मैंन जस्त कर लिया। सय कर लिया कि पापशाला के अनगिन मेहमानो तथा मि पारिया के जीवन चित्र प्रीति और श्रद्धा के रग से रंगकर अपने पाठकों यो भेंट क्रूगा। उसके बाद की घटना उनके लिए मजानी नहीं जिहाने 'चोरगी पढ़ी है । उसक मत म होटल से अपनी अचानक विराई को जो कहानी लिमी है यह कुछ आज मी पटना नही । पाहजहाँ होटल र मनजर मार्कोपोलो का नम जीवन की साज म स्वण उपकूल की ओर जाना सुजाता मिन के दिमाग में कातर मेरे दुस-दुन्नि क साथी सत्यसुदर- उप सटामोस का भी शान्ति की तलागम गाड कास्ट चल दना--- इससे बाद भी तो क्तिन दिन गुजर गए। जो एक बार जाता है वह वायद सटा के लिए हो जाता है। इस घसार म घरते हुए एक बार जो करीब से दूर हट जाता है उसे फिर पास यात सो महो देखा। चोरणी ने उस सपने मरे बोक्न से मुझे अफर छोड़कर जो लोग गायब हो गए यह उम्माद स्वप्न म भी न की यो कि भी उनसी भी सरर मिलगी। नस्नि आज अगर मुशस कोई पूछे रि 'धोरगा लिसन का सबसे याग वियोग वा पुरस्कार तुमने क्या पाया पा जवाब देन म मुझ जरा भी देर न रूगगी। मैं वह चिट्ठी पूछने वाले की ओर तुरत बढा दूगा पो अभी कुछ दिन पहल हवाई डाक से आई है। कहूंगा इसे पद देखिए । पूछने गाले सज्जन जरा अवाक से होकर मरी मोर तारते हुए मप्रतिभ से कहगे- बेशक किसी प्रवासी पाठिका को भेजी हुई प्रासा को चिट्ठी है । मैं काई जवाब न देकर सिप लिफाफा ही गम्भीर होकर उनकी तरफ बना दूंगा। लिफाफे पर नाम-पता मरा नहीं पर ये सम्पादक का है । अग्रेजी में पता लिखा हुआ वह लिफाफा जिस दिन रीडाइरेक्ट होकर हाकिए की माफत मरे हाय म आया मैं उसे बिना खोल ही चौक उठा। मुम यह समझने म पल भर भी न लगा कि ये गोल-गोल टाइप से पुष्ट हरूफ सत्यसुर-दार हैं। सुरन्त खोलकर पढ़ने लगा- प्रिय शकर पता नहीं यह चिट्ठी तुम्हार पास तक पहुँचगी भी या नहीं। फिर भी तुम्हें लिख विना रहा नहीं गया। मैंने यह उम्मीद ही बिलकुल छोड दी थी कि कभी तुम्ह तुटकर निकाल सकूँगा। जिस होटल म मार्कोपोलो खुद काम कर रहे हैं और मुन्न नौकरी दी है वह माफी बहा हा गया है। इस इलाके म इसका या नाम है । यो समझो काम म दबा रहता हूँ। भारत छोरकर मान के बाद स नहीं जानता क्या तुम्हारी याद बरावर बाया ररती। जी मे हाता नि किसी तरह से तुम्हारा हाल पाल मालम हो। सकिन तुरन यह सोचने में बनी तकलीफ होती कि दुनिया क इस पने पनारम्य मे शकर नाम का मेरा एक परम स्नेहमाजन सहामी सदा के लिए खो गया, क्योकि नाहजहाँ हाटल के पते पर मैंने तुम्ह तीन-तीन घिट्टियो भेजी। एक का भी बवाय नही बाया। हाटल के मालिक के नाम भी चिट्ठी भेजी थी। उहनि सिफ इतना ही लिखा कि हमारे यहाँ इस नाम का कोई समचारी नहीं है ।

योग विमांग आखिरकार यहाँक एक सउन सरकारी लिगेशन के अन्यतम सदस्य होकर भारत गा रहे थे। मैंने उनसे अनुरोध किया कि कसरता पाएँ वा जरा शाहजहाँ होटल के रिसेप्दान-फाउण्टर में तुम्हारी सोज । लोट कर बन सज्जन ने बताया, तुमने वहाँ की नौकरी छोड़ दी है और होटल म किसी को तुम्हारा पता नहीं मालम है । सापा, यहा अन्त हो जाएगा। लेकिन जिसमा अन्त नहीं होना है जिसका एक मक अभी अभिनय को बन रहा है वहाँ मरे सोचने से क्या पाता-जाता है। हम जहां नौकरी कर रहे हैं उस शहर म सभी बगाल र रिमा पून की शक्ल देख पाऊगा यह था ही नही की थी। साल म रिसो एक भारतीय मा मह देखकर ही तसदी कर लेता हूँ। लकिन बहरहाल एक गाली डाक्टर यहाँ सरकारी नौकरी पर आए हैं। एक भाज म उनसे भेंट हो गई। गालो को उपाभि देखते ही मैं वेताब हा ठा भोर को वीरता हुआ उनके पास जा पहुंचा। ये एक्स रे के बिपग है। विश्वविद्यालय को बहन-सी घिप्रिया और हिप्लोभावाल ये भल आरमो कुछ साल यहाँ के अस्पताल म नौकरी करके फिर स्वदेश लौर जागि। उनके यहाँ मैं माता-जाता है। वही एक दिन देश साप्ताहिक कुछ मक देखने का सौमाग्य हुआ । अमाने से बगला छूट गई। मपनी मातृभाषा को भूल तो नही रठा यह जानने के लिए कुछ म वहाँ से उठा लाया । बिस्तर पर लेटे-कटे उसने पन्ने पमटन लगा कि एएक तुम्हारा रचना पर नजर परी। उसके बाद बड़े चाव से सहपता तम सुम्हार गाहाहो हाटस के जीवन की कहानी पढी। दम राक अगले मका राह दखी यह भी कहूँ सो गसत म होगा। रसकि जिन हागोर वणन तुमने करना चाहा है और कोई न आने माहे मेरे लिए में लेखक से भी ज्या परिचित हैं। नटा हरिबाबू जिहें अपनी रहानी मे सुमने माफी जाह दी है इसे सुनते तो शाम पहसे फि मां सामने ननिहाल योग वियोग कोनहानी। देखा अपनी कहानी में तमने सुजाता-दी को भी नहीं छोड़ा है। कम-से-कम कुछ लोगों में तो उसका परिषय जाहिर हुआ है। यह भी परोक से जरूर तुम्हारे प्रति स्नेह और प्रीति प्रकट कर रही होगी। एयर होस्टेस सुजाता मित्र किम प्रभार एव दिन शाहजहाँ के रिसप्पानिस्ट सत्यसुदर से परिचित हुइ किस प्रकार से एफ अविश्वसनीय परिवा में हमने एक दूसरे को पहचाना करो सुजाता ने शाहजहाँ की पापाणपुरी से शापभ्रष्ट सरयसुन्दर मा उद्धार किया और हवाई कम्पनी म पछी जगह दिसाई थोर उसके बाद जीवन का प्याला बद गाढ़े सुधारस से लबालब हुमा तो रिस प्रकार अपने यनजानते ही सुजाता अभागे सत्यसुदर को आँसू बहाने के लिए छोटार दुनिया से विदा हो गई यह शायद किसी को मालूम ही नहीं हो पाता । उसकी यादगार को मनाए रखने के लिए जो काम मुझ करना चाहिए था वह समने किया। तमने योग्य सहोदर फा-सा कत्तम्प दिया है। इसके लिए तुम पर ईश्वर की मसीम अरुणा बरसे। सम्हे सुजाता कितना स्नह करती थी यह कोई जाने या न जाने मुझसे छिपा नहीं। परलोक म आत्मा नाम की चोम यदि रहती है और वह अभी तक मगर पुनमम की पुडिया में फिर से दुनिया में नहीं मा गई है तो वह जसर ही तृप्त हुई है। कौन जानता था कि इतने इवने लोगा क होत चाइजहाँ होटल का भूतपूर्व एक मामूली रिसागनिस्ट सुजाता को इस प्रकार से याद रखेगा। महीं कह सकता किया इस समय शाहजहाँ के छार माए जीवन की छवि आँखों में साफ झलक पाई है और मेरा सगदिल भी आँखों की माकस्मिा याद को रोक नहीं पा रहा है। अधेरे अफीका महाग के एक छोर पर बठा मेरा समीपविहीन प्रवासी हृदय फिर मानो हुगली नदी के मुहाने को लौट जाना पाहता है। लकिन यह होने का नहीं। तुम्हारा स यसुटर दा अब रिसी भी ।

योग वियोग : प्रकार से पाहजहाँ को जिदगी को नही अपना सकता। वहाँ जाने पर पो चिन्ताए मेरे सिर पर सवार हो जाएगी हो सकता है ये मुझे पागल बना दें। बहुत दिना के बाद जब मौत मेरे दरवाजे के करे खटखटाएगी अब में समा सना कि सुजाता से मरे मिलने का समय अब आ पहुँचा, तो एक बार भारत वापस जाऊणा-~-सटिमेण्टल जर्नी एराउण्ड इडिया। उस समय मौका छो तो होटर की परिक्रमा में तुम भी मेरा साथ देना। उस दिन समसे मिलने को मुझे जरूरत पड़ेगी। चाहे जहाँ भी रहो मौका निरकर उन्हें मुझसे मिलना ही होगा। में अपना यह हाय तुम्हारे मापे पर रखूगा और अपनी तथा सुजाता को भोर से तुम्हे माशीर्वाद दूगा। मेरी सपूरी इन्छाए जिनमें से कई तो कमी पूरी होन होगी 1-4म से-कम यह एक उस समय पूरी होगी। सुनो पाकर मैं बगला में कितने दिनों के बाद पिठी लिख रहा है पानत हो ? पपई छोरने के बाद अब से माकों के इस होटल में माया हूँ तब से किसी को बगता में चिटठी मही लिखी और उसके पहल हो शिवनी मिली थी? तुम्हारी मुजावानी के डर से कई बार माममापा म चिटठी लिखने को नाकामयाब कोशिश की पी जिहैं उसने पम को एक सोस म मस रसापा। शायद मौका मिलने पर उधानम उन विटिय्याको पढ़ा करती थी क्योकि उन विडियों पर बहुत भार पाने की निशानी है। दुपटना में सुजाता के मर जाने के बाद उसकी दूसरी भनेक पापिस सम्पत्तियों के साथ फिर से उन चिटिठयों का भी मैं मालिक मना । मुद की रिमा उन रिटिटयों को मैं बाज भी गहरी रात में विमनी की रोशनी में पढ़ा करता है। मपने-आपका मानो फिर से आविष्कार करता में सोचते हुए सप हो हैरानी होती है कि निसने मे चिटिठया सिसी यह पभी इसा हृदय में रहता था। मैंने ऐसा इन्तजाम कर रमा है कि मेरे मरन के राद ये विटिज्या तुम्हारे पास पहुंच जाए। मेरे विस को समरगीरी रसने वाल अपर मरे इस मनुरोध गे रखें और मगर उस यस्त योग वियोग सक भी तुम्हें सस्यसुन्दर-दा सगा सुजाता दी के यारे म आग्रह हो तो हो सकता है इन चिटिव्या से तुम सबमा एक नये सत्यसुदर दा का आविष्कार करागे। जव में दुनिया म रह नही पाऊगा तो मुझ सज्जित तग या विचलित नहीं होना पड़ेगा। बन पड़े तो नये सिरे से चौरपी का सगोपन कर लना। सन्दुरुस्ती अभी भी मेरी बुरी तरह अच्छी है । ऐसा सयाल था कि इस भग्धफार महादेश की कोई विचित्र यीमारी इस नवागन्तम पी देह में भाग्य लकर अपनी बस्ती बढ़ाएगी। वे और असन्तुष्ट दार को नाइ में भी इस जीवन-नाटक के मन्तिम अब वे इन्तजार म देह वेसम हो उठा हूँ। फिर भी जिस ढंग से सय चल रहा है उससे लगता है कि मेरी ये चिट्ठियो जब तुम्हार हाय लगेंगी तब तुम्हारी भी उम्र पुण् मम नहीं होगी। उस दिन तुम्हारे अन्दर का नौजवान जिदा नहीं भी रह सकता है जिसका मैंने शाहहाँ होटल के पाउटर में स्वागत किया या जिसे मैंने भाम-काज सिखाया था। ऐसी हालत म चौरगी के सत्य गुन्दर मध्याय का पुनर्वियास न मरना ही ठोस होगा। पर छोटो इन बातों को। तुम्हारी पोरगी' पढ़ते-पढ़त कितनों की यार माती है। देख रहा हूँ उनमें स मुछ को तो तुमने ठीक कमरे मो सरह पर लिया है । कुछ को छोर भी दिया है देख रहा हूँ । नया बात है? तुम्हारी रिताब पढ़ते-पठते पाहजहाँ होटल के उन बीते दिनों को मन-ही-मन एक बार फिर देख आया। नटादारी राबूशे तुमने रहर सही उतारा है । शाहजहाँ के सरिया-याबू इस समय यहाँ हैं जानते हो क्या ये तुम्हारी स्तिाव पर्नु हो खुश हों शायद । या फि कहा नहीं जा सकता तुमने चूंकि उनके इत्य मी पोरा को याहर प्रकाशित निया है इसलिए मुतला भी सकते है। उद्योगपति मिस्टर अगरवासा + गेस्ट सूट भी स्थायी होस्टेस परवी गुहाको एदि ने मेरे मन को फिर उदास कर दिया। उसकी पाठ मोग वियोग । न भी लिस सस्ते थे। दुनिया म दुख तो सदा ही रहेगा जिधर देखो उपर हो दुख है तो साहित्य के बोगन म उसक गले म माला डाल पर स्वागत करने की क्या पडी है । हम शायद यह कहो किस कोटा निकलना है दुस की कहानी से दुमा कर सान्वना मिलती है। सत्य का स्वरूप देकर सम्हारी शिल्पी सत्ता mयद सन्तुष्ट होती है। लग्नि मुझे यब महा नही मगठा। मेरी का मानसिक स्थिति है उसरे हिसाब से अब सिफ वही कहानियां अच्छी लगती हैं जिनम माखिर म राजकुमार राजकुमारी र विवाह करके बटे-मोता तक सुख से राज करता है। इस बात पर पुम्हारीगल कसी भन गई होगी यह मैं बिना ही रह सकता हूँ। स्तिने दिनों तक दखता रहा हूँ मुम्हें 'सुम मुसकराकर पोखा का फाकस मुझ पर अलपर कह रहे हा ईसा मिल्नातक जीवन भला हाटल म कहाँ मिलंगा? लकिन भया सुम्ही बतायो घसी छोटी-मोटी पटनाएँ माहमहाँ म म पटी नहीं थी क्या ? मुझे तो वसी एक घटना याद आ रही है जिसम तुम्हारे प्रिय बरा गुडहिया की नौकरी जाने-बाने को थी। यह घटना गर हुई म होटल में नही माये थे । मप्रमों । उस समय बहिसाब रोनन्दाद । हमारे होटल म याने पाती म स साद पौदह माना किस्म काग मिटि पामिट क बाटदाता होते । रिस्म-स्म के लोगा म बहुतेरे छोटे छोरे साहित्य की भाषा म तुम निह युवक-युवती कहते हा-भो आते थे। सुनकर तुम्हें हैरत होगी नि बढ़तेरी मगरेपिने अपने हनीमून भ्रमण की स्मान-मूषी म मतरता नाम शामिल करना पसरती थी। एस बहने मतिपि पाहनही म रहत ५ । रहना हो महंगा इस क्योंकि राई-कोई नहीं जा माते सो फिर जाने का नाम नहीं एते । पूमना-फिरता दशनीय स्थानों को देखना मुखी हवा का मानन्द मना सब साफ पर रह जाता। ।

योग वियोग किवाड खिडकी बन्द किए होटल मे ही पड़े रहते । इनम से किसी किसी के रहने से होटल का हलिपा ही बदल जाता। ऐसा छोटी जगह म ही नहीं बडी जगहों म भी कसे होता है नहीं समझ पाता। पता नही कसे सबको पता चल जाता कि ये नवविवाहित हैं । रवल उबले (हाइ बॉयरूड या रूपान्तर ) साहबा का मिजाज एकाएर जसे बदल जाता। ये कयूतरमतरी को प्राइवेसी देने को उत्सुक हो उठते । प्राय नगर माता ब्रेकफास्ट के समय शाइनिंग टेबल पर जिघर नवविवाहित पति पत्नी वठ हैं उधर लगभग खाली पहा है। अपनी धुन म लापरवाह कोई अगर उघर जा पठता तो शुभपीगण उसे इस तरह से ताकते माना वह वेचारा किसी महिला की लीलता हरण कर रहा हो । यह समझकर यह भला आदमी सिर प्रकाए दूसरी तरफ जाने की राह नहीं पाता। हनीमून कपल को सब बातों में वो आई० पी० पसा सम्मान देने के लिए सब हम पर असबार पी भाषा मे जिसे कहते हैं मतिम दवाव देते । लिहाजा फाउंटर पर भीड भी होती तो वह छोटकर हम मधु यामिनी दम्पति को पहल अटेंट करते। मतलब यही कि आप लोगों को हम पहल वितार देना चाहते हैं-इनकी अपेक्षा मापने समय की कीमत नहीं ज्यादा है। सय यातो मे उनकी बरा खास खातिरदारी होती । मसलम दक्षिण के एक सौ सत्ताईस मम्बर के कमरे का नाम ही था हनीमून-सूट । मार्कोपोलो से पहले हमारा एक पगला मनेजर था। वे जेनुइन नये दम्पति से उस कमरे का किराया कुछरम लिया परते थे। लग्नि मागे घसकर कम्पनी वे एकाउट में घूमते फिरत सेल्समन और अफसरोकी कृपा से व्यवसाय की तरक्की हुई और ये बातें गायब हो गई। हनीमून वाल बहुतेरे जोड़े इस बी आई० पी० मादर को सहज ही स्वीकार करते । मुस्किल पडतो उनको सफर जो जरा लजील होते । मई मादी गोया कोई अयाय मपराध हो । लिहाजा हनामून को पे प्रया योग दियोग : की परड-लाइट को भोट में मनाना चाहते । तुम शायद यह सोच रहे हो कि हम दजना जोडा म यह कसे समझते थे कि यह जाटा नवविवाहिती का है। तुम्हारा यह सवाल रही नटाहारी बाबू सुनते ता तुरन्त जवाब देठे किसने कर शादी की है यह मैं कमरे म मदम रखते ही समझ आता हूँ। मापके हनीमून सूट पपा बह गया-धीदा एक सौ एक नम्बर का कमरा जिस माप लोग सबसे पहले गाने की कोशिश करते हैं वहाँ भी अगर नया-नया व्याह किया हुआ बहू-दूल्हा रहे वो मैं कह दे सकता है। नटाहारो पावू होटल के ही कार के चद्दर-तकिये की देखभाल करते-करते काइयों मन गए पे! सुमन अपनी किताय ही में तो लिखा है कि उहोंने शाट साहब तक का बिस्तर विछाया था। नटाहारी बाबू न कहा पा अनी अपन मध्यवित्त गृहस्य घर की पाकियो की मांग में सिन्दूर भरने का दम देम्बार ही समान या आता है कि इनकी अभी अभी शादी हुई है। इन प्रारवाली औरतों म तो यह भला ही नहीं। फिर भी उनकी बाठों से मैं समझ जाता है। बेचारे दूल्हे भूमते-से रहते हैं असे अफीम के नशे में हाछ में न पांध में । लकिन नई न्याहता बीवी ! दांत से जसे सुने मटर चबा रही हो बातो की वोठार । आपको तग पर मारेंगे। धन से हरगिज नहीं रहने देंगे। सलाम भेजगी। कहेगी पादर बदलवा दीजिए। मजी जनाब खुद लाट साहन क यहाँ खुद सर साहब की योवो जिस पर सोती है वहाँ भी रोज नाम को ही पादर माती जाती है पानी है। देरमन सिर्फ चादर को उत्तट देता है । और माप तो जनाब हरिदासपाल होटल में हैं। यहां पटरी पटरी फोन चादर मार पहिए तो! यही बात है । लरिन साफ-साफ मह ता कौन ? आपके पास्त्र में मौन सिस गमा हैन सरोदार मी गत हर हान्त में ठीक हाती है। रिहाना सिर नवापर सुनो और बदलो धादर। देयोजी उस वाव रग पर सिर सपा रही हैं और चारा छोरा य योग वियोग होस्टेस की नीररी नहीं रहेगी। तो हमारी बाडी यहा पाहजहाँ में मा नाएगी। इसे म थीमान् पाकर जिससे हम दूसरे किसी ममरे म न ठल दें। - हनीमून सूट म गुरवेष्टिया की नो गत हुई उसे रिखते हुए तुम्हारी सुजाता दी की व बातें याद आ रही है । सोचता हूँ इसी सूट में कितनी घटनाए घटत देखी। केवल इसी सूट पर तुम एक बहुत बड़ी किताब लिम सकते थे। इसी सूट म इण्डोनेशिया के एक बोट सयासी मा पतन हुआ पा। सयासी घे अघ पतन की कहानी से सिनिका को आनन्द आ सकता है मगर मुझे यह जरा भी अच्छी न लगी। मैं तुम्हें नहाँ तक जानता हूँ तम्ह भी अच्छी नहीं लगेगी। सो मिंग प्रतीपबुद्ध की कहानी का अभी रहने दो। उसी कमरे में एक दिन जान दिनमणि विश्वास अपना रंग और कमरा लकर आकर ठहरे थे। आदमी अवेल लकिन फमरा लिया का ग्वल बेर का । उस समय हम लोग समझ नही सक । उस कमरे में जाने मे पहल भले आदमी ने पहा थोडी ही देर मे मेरी स्त्री आ जाएगी। वे अपने घर से बार बार काउंटर पर फोन करते रहे मरी स्त्री था गह? हमने बताया भी नहीं तो। अभी ता तो श्रीमती विश्वास नहीं आई है। वहांने कहा अजीब मुसीबत है ! उनमे साथ-साथ हम लोग भी मुसीबत में पर गए थे। होटल के रिसेप्शनिस्ट का काम करने में बडे धीरज की मरूरत होती है । लकिन अपने घोरज ना तार भी टूटने एगा पा समझिए । हर दस मिनट पर टेलीफोन की घंटी बज उठती पी- 'हलो, मेरी वाइफ बूला विश्वास मा गइ क्या ? देखने में ही सून सूरत है। माखो पर रीमलस ऐना । दाएं गाल पर तिल है एक छोटा सा ।

योग विमोग . की पलड-लाइट की मोट में मनाना चाहते । तुम शायद यह सोच रहे हो कि हम दजना नाडा में यह कैसे समझते थे कि यह जोडा नवविवाहितों का है तुम्हारा यह सवाल कही नटाहारी बाबू सुनते तो तुरन्त जबाव देवे फिसने पर दादी की है, यह मैं कमरे में कदम रखते हो ममझ जाना हूँ। मापके हनीमून सूट क्या वह गया-बीता एक मो एक नम्बर का कमरा जिस आप लोग सबसे पहले गाने की कोशिश करते हैं, वहाँ भी अगर नया-नया स्याह किया हुआ बहू दूल्हा रहे तो मैं कह दे सकता है। नटाहारी वायू होटल के ही कमरे में चद्दर-तकिय की देखभाल करते-करते काइयां बन गए थे। सुमने अपनी स्तिार ही मे तो लिखा है कि उन्होंने लाट साहब तक का विस्तर विद्याया मा । मैटाहारी रावू न कहा था बजा अपन मध्मवित्त गृहस्य घर की लहरिया की मांग में सिंदूर भरने मा ढग देखकर ही समझ में आ जाता है कि इनको सभी अभी शादी हुई है। इन पारपाली औरता म तो बह रला ही नहीं। फिर भी उनकी माता से मैं समझ जाता है। चारे दूल्हे झूमते-से रहते हैं जो अफीम क नशे में होनछ में न पांच में । लकिन नई स्याहता धीमी ! दांत में बसे भुने मटर बना रही हो-बातो की धौछार। ये आपको सग कर मारेंगे। पन से हरगिज नहीं रहने देंगे। सलाम भेगी। कहेगी धार मदनवा दीजिए। मजी जनाब खुद लाट साइन यहाँ पदाट साहब को बीवी जिस पर सोती है वहां भी रोज नाम को ही चादर माली जाती है यानी है देशमन मिफ पादर को उलट देता है। और माप मो पनाद हरिदासपाल होटल म हैं। वहाँ पो पो कौन पादर बदल, कहिए हो! यही बात है । लकिन साफ-साफ कह वो कौन ? आपके शास्त्र म दोन लिस गया है न खरीदार भी पाठ हर हारत म ठीक होती है। लिहाजा सिर नपारर मुनो और बदसो पार। देवोरी उस वपत रग पर सिर सपा रही है और वेचारा छोरा १४२ योग-वियोग मांस पिर किए सोच रहा है ईश्वर की दया से एक शादी तो कर ली। मेरी इस बीवी की रुचि बंधाकर रखने लायक । मगर अनान में खूब जानता हूँ यह महज नयपन का दिखौमा है। काम दिखाकर पति को ऐंचाताना पर देने की चेप्टा। मवनय कि देखो तो सही कसी रुचि है मरी तुम्हारे लिए कितनी फि है मुझे रितनी साफ-सुपरी हूँ मैं । और महज मारिनरी बीवी ही नहीं है सेक्रटरी की सेक्रेटरी गागन मी भाजन और नौकरानी को नौररानी। सा जब भी कोई इस लिनन के लिए सुत-सुत करती है तो मैं कमरे में गौर से देखता हूँ और नया होलोक नय पडे-झत्त देखकर ही समाप्त जाता हूँ कि नई शादी हुई है। अभी तो चादर के लिए होटल के बाबू को खूब परेशान किया जा रहा है आगे कुछ भी नहीं रहेगा। उस समय तोगे रवाकर बेचारे पति का ही चादर पलटने के लिए रहना होगा। मपनी कमाई कौडी की खुद ही भीख मांगकर दपतर जाना पड़ेगा। नटाहारी-दा की बातें मुझे बड़ी बन्छी लगती थी । हम हसते देख कर भल मादमी और भी निगड उठते थे। कहते हनीमून नहीं अनार । गह तो साहब का दाना म्वाता हू साचारी है नहीं ता सप बात कह देता घानी मून-चांद-से मुसड़े से फिक्र परके हसकर मर्दो से पानी ठेलवाती है। नटाहारी के सिवाय दूसरे ओ लोग नय म्याह का सुराग लिया परते वे ये बरे । उनके इस कुतूहल के पीछे पसा समान के सिवाय मौर कोई मतमन नहीं रहता। मदर की खबरें पहल बरे हो जान पाते। वे दूसरे वरा से कहते और वे बरे पोटरों को बता दते और इस तरह पता नहीं कसे खबर सारे होटल म फल जाती। यरा का मतलब और कुछ नहीं होता ने मौके फसाफर साहब से पुछ मदा करना। नई बीवी में सामने इनाम की मांग करन से साहब को मुटठी सस्त करन मी गुजाइश नहीं रहती। मौर ।

योग-वियाग नही यम दिया तो कुछ इस जोर से ना-ना करते मि इज्जत-मान मधाने के लिए साब को और भी बुछ विदेशी मुद्रा भारतवर्ष में रख जाना पड़ता। बरा गुडमेडिया के बारे में तुमने लिखा है। झमेला उमी ने सहा पिमा । उसकी म्यूटी उस समय हनीमून सूट के सामने मी। एक जोडी मार पहा टिकी। उनके हाय भाय उनके मूटफेस तया याना का मोर और सरो-सामान देखर गुरवरिया ने ताह लिया कि ये ना विवाहित हैं। गुडवेरिया की उम्र उस समय कम थी। हाल के सभी मामलों म वसा पक्का वह नहीं हो पाया था। लेकिन मक्स यो उस्तरे-जसी। उसी से हमें पता चला कि ये लोग शादी के राद देश भ्रमण को पति ने भांप लिया था कि गुहनेरिया की निगाहों ने उहें तार लिया है । सो उन्होंने चांदी की चपन से गुडरिया मा जी गाने की कोशिध को पी। यह मात भी हमें गुइरेडिया से ही मालूम हुई थी। उस दिन उसके होंठ पर सुबह से ही हमी लगी हुई थी। मुमसे उसने कहा था कि कल मरा एक मनिमार रिस दीजिएगा । मैं उसी वक्त समझ गया कि हपरत को मचानक मुध पसे मिर गए हैं। उस पर चरा दराव गलत ही मामला समझ में या गया। उसने रस किया कि साहब ने उसे बुलाकर हाथ म पार सपए का एक नोट सोंस दिया। कोई और मारण स नही माहब का पता पा कि धरा के गरिए हरी भात फलती है। ये पाहते पेपिहोटर म यह बात किसी प्रकार से माहिर महा कि वे नवविवाहित हैं। गुरुवेरिया ने तुरन्त उk निरामा दी कि होटल स्टाफ सपा होटर की छत पर जो कोमा मना मनी है उनसे भी हमपी भनक सर न मालूम होगी। हाँ इसमें मदन साहब से उसे भविष्य में मोर मुछ इनाम की माता रहेगी। माममा ऐसा ही पसता रहताना मात्र मुझे उसकी माद नहीं रहती, योग वियोग । न ही लिखने की बावश्यकता होती। लकिन याद है दूसरे ही दिन उलटा नतीजा निकला। साहब और उनकी स्त्री सबके ध्यान में केन्द्र रन गए। उन्हें देखते ही दूसरे लोग निखियों से तारने लगते । होटल के कमचारियो म भो एक मौन हलचल मच जाती। दोएर महमानों ने तो शम और प्रचरित शोल का सिरसाकर काउटर में फुस मुसाफर मुझसे पूभ भोइफ यू मोट माइ हू इज द बटिसमन ? कम से पहा माय हैं ? पर धक ठहरेंगे मता सरते है। पाहजहाँ के काउटर पर खडे हाकर मैं पूराप और अमरीका के लोगो को पालकर पो गया हूँ। दूसरी के लिए यहाँ ऐसा दवा नौवहन बगाने में काफी कुछ धिन जलाने की जरूरत होती है। लिहाजा में जो पोग मपाक नहीं हया सा नहीं। मगा होटल में आने वाली अपर महिलाएं भी इस जोड़ी के पीछे पर गई है। इन्हें देखते ही वे लोग भी मापस म रोलने-बतिमाने लगते कभी-कभी उनका घात का पाग-बहुत लाउज से छिटार फाउटर ar परपा है। मैंने पहते सुना है अरे बाबा, होटल भासिर होटल ही है। उसकी प्रस्टिन ममा पिसाबात में उनका भगर नाम रह सकता है तो पह सिलाने में दूसरी बातो मे तनरा सतीश इदना बेकार है पर ही होगा। मही तो है तुम्हारा शाहजहाँ । मुना यहाँ को-की नहीं पर सरसी। लकिन अब अपना ही आता देख । उस रोज शाम को मामला परा टेडा-सा हो गया। हनीमून सूट की भद्रमहिला सासी सीजी-मी मेरे पास माउटर मे भाइ । भ टढा करक बोली मरा सयाछ पानियह भसे भादमियो का होटम है। मैंने कहा, सयास था क्यो ममी मी मापा रही सयाल रहे इसको कोगिरगा। बात क्या है कहिए? उनकी उम्र ज्यादा न थी। सिर वे माल तमसोमनीय सोय था। लिहाजा मब तक मार ही पुष्पों को प्रशसा मरी वियर दृष्टि को हजम करने की मादी हो गई होगी। सकिन उहानि पहा 'हम साग योग वियोग दुनिया के बहुत-से होटल देख चुके हैं। मगर कही भी लोग ऐसे असम्य की भांति मेरी तरफ सास्ते नही रहन थे। पहल बर्दाश्त रिया। सोपा मामूली ऐप्रीसिएटिव सर है। लफिन लोग तो रोग सुम्हार होटल के बरे तक सिफ ताकवे ही नहीं रहते मेरे मुडवे ही एक दूसरे को कुहनी का धक्का देता है फुमफुसाकर चर्चा करता है । ऐस सो नहीं चल सकता। समथिग मस्ट सीरन । मैं क्या जवाव दू सोच नहीं पा रहा पा । लकिन देखा उनकी बाय वास्तव म गीली हो पाई है। नावे-जाते बाली 'छि यह कसी गन्दी बात है ? हमने सोचा मा 'पाहजहाँ एक रेस्पेरटेबुल होटल है। मैं वास्तव म चिन्तित हो उठा। सोच रहा था कि इसे मनेजर तक पहुंचाऊ या नहीं। हमारे जो कमचारी उनकी ओर इस तरह से ताकत हैं वे और पाहे जो हो होटल म नौकरी करने याग्य नहीं हैं । को अपने को सयत नही रख सकते, रहे नौकरी पर रखने से भविष्य म कोई बात हो जाए तो वा जुव नहीं। मैंने उसी वक्त भ' महिला से फोन पर बुराया। कहा हम अगर अभी ही एक आइडन्टिफिकेशन परेड करें तो आप पहचानकर बता सो देंगी कि हमारे स्टाफ में से किस किसने भापकी भोर वसी अभद्रता से साका है? ये इस पर तुपा होंगी कि उनकी शिक्षापत्त का नतीजा निक्ला । लग्नि फल उलटा हुआ। वे और भी दुखी हो गइ । बोली माई ऐम एम इससे ठग निकालने में गांव उजाड हा जाएगा। मैं दो यह सारती है कि यहाँ कौन मेरी बोर वसे नही साफ रहा है। टेफान रखकर सोचने लगा। फुमत के समय सोचते-साधते इस फसल पर पहुंचा कि मामला जिस ढग से बढ़ रहा है बात मनेजर तक पहुँची जानिए । फिर एसा न हो कि वे यह समझ में काम में दिलाई करता है। माप में पर भी क्या सकता है। अपने स्टाफ पर तो यपिरार है, होटल म आनेवाला को हम से रोक सकते हैं ? सोचा सोचा था,

योग-वियोग
.
, मैंने पूछा।
दो चार को भार फहूँ कि यो इस तरह से सागर उन चारों
पा भोवन दूभर कर रहे हैं
लफिन मुम सोपना नहीं पड़ा । एकरा दौड़ा-दौडग माया बोला
गजब हो गया हुजूर आप फौरन हनीमून मूट मे जाए।
'नयों, मया बात
यह राता-सा बोला गायद सब तर यहाँ गुडवेलिया को हार फरा
पर सस्प रही होगी।
मरर । खून! मैं मारेर में मौस उठा।
आप जल्ग जाइए, हुनर देर नगर, मापके पगें पड़ता है।
उसने किसी तरह से कहा।
में काउटर मा सम-पूछ बसे ही छोडनर दौस असगरमी भाषा
म जिसे की जगह रहते हैं, यहां जाकर देखा। मामला सप ही बड़ा
कठिन था । साहब गुरवैडिया की तरफ पिस्तौल ताने सोप भौर चारा
गुहदेहिया मुदभूमि म थारम-समपण परनेवार सनिक की मांति दोनों
हाय कपर उठरए दीवार से सटा अपनी मन्तिम पटो का इन्तजार
कर रहा था। देखने म नौजवान साहब मुन्न शान्त मिनामा माया।
मारिन अभी उनकी आँखें देखकर लगा उनम टाटा सम्पनी पी भट्ठी
गल रही है। साहब ने भून में पून का नया पट उठा था। मोठा हमने
वाली मेमसाहन मी परराकर साहराहाय यामने पीरोशिश करती
हुई रह रही थी चिकि, नासमत न बनो। पिस्तौल समट RTI बल्कि
पलो बाज हम इस हाटम से ही पसे जाएँ।
प्रपसी क विनीत अनुरोध से भी रिवि नाम रे साहस का दिल जरा
मो मुलायम नहुया । वे बोल जाना तो है ही मगर उस पहरे मैं इस
ला का सा सिसाकर जाना पाहता हूँ।
गुहनडिया उस समय करण स्वर म मपनी मातृभाषा में जो विनती
पर रहा था उसरा मम हमाऐ सपद पमरे को मया मैरी, सुम्हारे
परों म दण्डवत् । तुम इस संहार साहब से मुझे रवा लो। म मा

योग वियोग नोरी करना नहीं चाहता । मुझ मेरे गांव में अपने मां-बाप के पास लौट जाने का अन्तिम अवसर दा। मुझ दूर से हो देखकर गुरदेहिया हाय-हाव भरपे रो उटा मुझे बधाइए। कम्यभूमि मे में माना गुरु बहिया के लिए देवदूत-सा प्रस्ट हुमा होऊ । मीठी बातो स साहब फिरहाल पिस्तौल छोरने से रुक गए । कमोज से बन्न लगाते-लगाते रहा 'इस कम्बस्त के लिए मुझे ज़रा भी सिम्पपी नहीं। इसने मुझसे मुहमांगा टिप्स लिया और तिस पर भी मुझ हुवाया। मरे भोर जिनि के बारे म इसने ऐसा कबल फलाया कि जबान पर लाने हुए भी धिन होती है । मैंने माज सवर समझा कि होटल में तमाम लोग क्या इस तरह से हमारा भोर ताकते रहते हैं । मेरी वाइफ ने सोते समय स्तिनी ही मार शिकायत की लेकिन मैंने ध्यान नहीं दिया । यहा तुम भाकपक हो इसीलिए लोग तुम्हे देवे विना नहीं रह सकते । मब बात साफ समझ म मा गई। साहब ने जर। दम सिया और सुन्न माखों से मरी ओर देखा । कही मुझ पर हो म गोली पला दें। 'यूना हम लोगो के बारे में यह क्या कहता फिरा है । इन फ्पट, जप यह आदमी छोटर का फ्मचारी है तो होटल पर क्षतिपूर्ति का दावा क्मिा मा सस्ता है। गुरुवाच्या कमा रहा है तुमने? मैंने पूछा । गुडहिमा की यांलो भासू मूछ नहीं थे। भामुमओ को फिर एस यार की मग गई। यह वोसा हुकूर मरा या दोप! साहम ने मुझ पस्नील दी और कहा सिी को मालम न हो कि हमारी भभी-यमा शादी हुई है। मेमसाहब तो हैं । भला के पति ने बदन पर हाप रसपर कह तो सही कि साहय न एसा नही रहा। साहम ने रदिए कहा 'तो कौन कहता है रि यह नही रहा । मगर तुम इवये यदल सोगा स क्या कहते पिरे ? जवाप म गुस्वरिया ने सो पताया उसी से सारा रहस्य सुरु गया।

मोग वियोग उसने कहा, 'पही लोग जान न जाएँ इसलिए मैंने सबसे यह कहा, अजी मभी हनीमून कहाँ । ममा छ महीने तक तो उनकी शादी हो नहीं होती। 'जस्ट यिर ऑफ इट ! मेरे पिता गिरजा रे पादरी हैं में यूनिसिटी में प्राध्यापक है और हम सुलमाम इस होटल म स्वस येक ममर म रह रहे हैं ---म्याह से 1 महीने पहल । साहर माले। उनको नयविवाहिता पत्नी सिहर उठी। मोली दिरि मेरा मिर धूम रहा है । मैं मूच्छिा हो जाऊंगी मूटित होने की बात को मैंने ढाल बना लिया। कहा इस समय आपको परेशान करना ठीक नहीं। मैं गुडिया का लिये जा रहा हूँ। यह कहकर वहाँ से चला आया । साहर अगर अपनी दोषी की हिफाजत म जुट नही जाते तो रात जरूर मनेजर के माना जा पहर आती और गुडनेहिया की नौकरी पाना मुमरिन नही हो सकता। गुष्वेहिया ने बेशक महसानमा द होकर मेरे परो की धूल ली थी। पहा या में मापका बदाम का गुलाम बन गया। मैंने कहा, बनना मनावा कुछ न होगा सिफ अपने नाम में योमा सुधार पर देने की इमारत दो । मब से मैं तुम्हें गहररिया रहा रूगा-दुनिण भर का गावर मपाने म तुम मेमोड हो। भई पाकर आज मुझे लिखने का नारा सवार गया है। पित और मन के सिवाय और किसी प्रकार के साहित्य से नाता नहीं रखा। सकिन माज अपने मन की उन माता को जो जमाने से मन में जमती रही है कहन की इजा हो रही है । इसकी वमह मापद मुम हो। अपनी 'चोरण' प तुमने मुझ इस ढग से चित्रित पिया है कि अपने बारे में मार ही मेरी श्रद्धा बढ़ रही है। दुस यह सोपकर होता है तुम्हें और भी बहुत-सी बावें वसा रखनी चाहिए थी। रात रात दिन दिन बरसो कलासा के अभिजात शाहजहाँ होटर के पावटर पर सो खरे मनुष्य में जीवन का जो विचित्र रूप देवा है, उससे मैं खुद ही अवाक योग वियोग १४६ हो जाता है। एक ही जगह खड़े होकर मैंने मनुष्यता को एवरेस्ट जसी ऊँचाई देखी है और फिर अथाह नीयता का अघेरा देखकर दंग रह । सोचता हूँ कलकत्ता में जव ता साप बठकर तुमसे बातें की, तो ये सर बातें क्यों न याद याई ? सुम्हारी उम्न कम है जीवन के अभी बहुत व इम्तहान तुम्हें पास करते हैं। तुम जानते होते वो ये यात तुम्हारे काम माती। मैं अब कहा हूँ ' तुम लोगो से कितनी दूर अकला में अफ्रीका में एक कोने में पड़ा हूँ। क्यो पड़ा है यह मुझको नही मालूम । हो मरता है विधाता सर म मेरे नाम ऐसी ही पोस्टिंग सिसी पी। मगर रहने दो अभी ये बातें । मेरी चिटठो पढ़कर तुम सोचोगे कि शाहनही होटर के रिसेप्शनिस्ट बैटा बोस का दिमाग सराव हा गया है। कहाँ से तो तेईस वसन्त बिताने वाली एक एयर होस्टेम आंधी सी सन्य सुनर चोस के भाग्यााश मे माई और उसके जीवन के एर छोर से दूसरे छोर तप की काली भटाए भर दी । मोधी का प्रलय नृत्य शुरू हो गया । और जब बदली फट गई शान्त यासमान को फिर से उसका नीरा रग मिला, तो पता चला कुछ नहीं है । जो पा रह गया है वह सय मुकर बोस नही, एक सण्डहर है। बात बिलकूल झूठ है यह नहीं कहूँगा । पानि मेरे-जैसा मादभी होटल के काउंटर का काम-काब छोरार बिस्तर पर बठ-यठे इस प्रकार पन्नेना-पन्ने लिसता चलाया रहा है यह देखकर तुम्हारी सुजाता-दी भी हँस पड़ती। कहा नहीं जा समता अपने माने से कमरा नियामकर मेरी इस हालत को ससवीर भी सीष सकती थी। "काहरहो के हनीमून मुटवाली कहानी तुम्हारी सुजाता-गकोहोटल की एन पर मुनाई यो गापः । उनकी क्या राया मालूम है ? उहोंने काहा पा सम्हारे मास शिष्य पर स कह रखेंगी। सम तो यहां की मोड़कर दूसरी arरी करोगे। शादी के माद मरी भी एपर योग वियोग हास्टेस की नौकरी नहीं रहमी । तो हमारी बोडी यही पाहजहाँ म मा जाएगा। यस मधीमान् शार निमसे हम दूसर पिसी कमरे मन हनीमून सूट म गुरुयरिया की जो गत हुई उसे लिखते हुए तम्हारी मुजाता दी की ये बात पार आ रहा है । सामता इसी सूट घटनाए पटते पाणी केवल इसी मूर पर तुम एक बहुत बडो किताब लिम समन थे। इसी सूट म इण्डोनेशिया के एक बोर सयासी का पतन हुआ था। सयासी ने मध पतन की कहानी से सिनिमाको आनन्द मा साता है मगर मुझे यह जरा भी मच्छी न लगी। मैं तम्हें नहीं तर जानना है तम्ह मी अच्छी नहीं लगेगी। सो मिंग प्रतीपट की कहानी को अभी रहने दो। उसी कमरे में एक दिन ऑन दिनमणि विश्वास अपना वग और कमरा लार आकर ठहरे थे। आदमी मकेल सकिन कमरा लिया था स्वल ये का। उस समय हम लोग समझ नहीं सक । उस कमरे मे जान में पहल भल बादमी ने कहा पारी ही दरम भरी स्त्री मा जाएगी। थे अपने घर से बार बार काउटर पर फान परते रहे मेरी स्त्री मागह? हमने मताया 'बी नहीं तो। अभी तर तो श्रीमती विश्वास नही माई है।" रहोंने कहा अबीम मुसीवत है। उनके साथ-साप हम लोग भी मुसीवत म गए थे। होटल के रिसेप्शनिस्ट रा काम परन में बड़े पारन की नरूरत होती है । लरिन अपने धीरज तार भी हटने एमा पा समझिए । हर दम मिनट पर टेरोफान की पटी बज उठती थी- हलो मेरी वाइफ बूला विश्वास मा गई रया ? देखने मे बसी यूर मुरत है । माखों पर रीमला ऐनर । दाएं गाल पर तिल है एक

योगविपोग
मैंने कहा
7
हम कहते रहे जी नहीं पाई हैं। बाते हो सबर दंगा।
उहोंने न्हा 'नही-नहीं, में सुर हा फान कर लगा । वारा यह
हामीली हैं।
इसमे राम की कौन सी बात है । होटल म मपने पति
के पास आ रही हैं।
वह आप लोग नहीं समझ सकेंगे । वही समझ लें तो मापसे जान
दिनमणि विश्वास का फा ही क्या इतने लोगों के होते धूला ने मुत्र
से ही आखिर शादी क्या को ?
हमारे पास उस समय हमारा सहयोगी विलियम धाप खडा था।
उसने कहा 'बुढ़ापे पी नजारत देखकर तो मर गया मैं ।
मैंने कहा परदेस म बीवी आ न पहुंचे तो फिक्र तो होती है ।
लकिन ता भी माजरा समझ नहीं सका था। अब स-स मिनट पर
रेलीफोन की घटी या उठने लगी- 'हलोरिसेप्शनिस्ट, यूला माग
मैंने कहा 'भाप साविर जमा र उनके आते ही में आपको सबर
दूगा।
जात दिनमणि विश्वास ने यह नहीं सुना । पोन पर फोन करते चल
गए। हम सबका और-भौर काम बन्द होने की नौबत आ गई। फोन
उतारकर रसत न रखते फिर फोन । आबिन माकर कहा आप अगर
इठने देना है वो नीचे लाउज म माकर बठिए ।
'त्री हो। मोर माप झोग यार मेरे किराये से कमरे में मो
पाइए । आखिर आप लोग यहाँ हैं किसलिए? आपको तनख्वाह निय
लिए मिलती है ? वे दुखी होकर बोले ।
बनाम म में भी दो बार सूना सस्ता पालकिन कसी वो माया
बाई ! स्त्रीको चिन्ता समले भादमीगदिमाग ठिकाने नही है। मेरी
मी एक पार सामगज से कलमत्ता मा रही थी। देर हो गई। पिताजी
उस समम मिरमा रमर कॉोनी म रहते थे। वे भी दो मिनट के लिए
पिर नहीं 2ठ पा रहे थे।

योग वियोग जॉन निमणि विश्वास ने पिर फोन पिया, 'बात क्या है कहिए तो? पूरे पदह साल का विवाहित जीवन है अपना । उसके पहन पांच साल फोटलिप-बूला हाजरा के पाछे-पोथे छाया-सा डालता फिरा। यह भी मेरे लिए होटल में रस्तराम मदान म चिडियाखाने में हजार करती यो । देरी हो उसने कभी नहीं की। 'वे माएगी कहाँ से? मिस्टर विश्वास टेलीफोन पर अमला उठे। मेरी इवनी खोज पूछ उहैं पसन्द नहीं पाई। बोले उससे मापको पमा मतलब ऐसा निम्यिजिटिवनेस मुझ अच्छा नहीं मगता । होटल म काम करते हैं, मेहमान जो पूछे उसी का चमार दोजिए । ज्यादा बातों से मत व या आपका? साचार मुझे पहना परा मिस्टर विश्वास होटल में नये मेहमान कहाँ से पा रहे हैं यह हम नियमत जानना चाह सस्ते हैं । हमें अपने रजिस्टर म अकरना पड़ता है। पहले उसे पाने दें फिर सारा इतिहास रजिस्टर में सिल लीजिएगा। जॉन दिनमणि विश्वास कुछ नरम पाकर मोस । आप सो नाहक होकर हो गए। मैंने तो आपकी मदद के लिए या पूछा पा किस गाशे या हमाई महाप से भा रही है अगर मह मालूम होता वा हम स्टैपान या हवाई मार से पूछताछ करते। उहाने जवाब दिया में अभी भी कहता हूँ कि टेलीफोन करने को जरूरत होगी सो में खुद हो पर लंगा । भाप सिफ रा नजर रखिए।' भने कौन सा बड़ा काम पहा था। लकिन कुछ मिनट बोसते न बीतते फिर फोन बज उठा। मैं खो जसे पागल हो जाऊगा। हला माहाहाँ रिसप्पन । मेरी स्त्रीला या मा गई ?' मैंने ठा मिजाज से ही कहा ओ नी तो।' सुनिए । उनमा हलिमा तो मारुम है म ? पांच फुट पांच इप। एक घौ बीस पावर। देखते ही पहमान लग रहदाएं गाल पर एक तिक मैने कहा

योग वियोग
है एकाएक पापमो सगेगा नेरल विल नही है खुबसूरती बचाने के
लिए मेक अपने स्मय बना दिया गया है। पहल पहल मुझे भी ऐसा ही
एगा था।
मिलियम पाष बोसा, 'माम किसका मह देखकर उठे ये भया !
अजीर मुसीवत भाई।
पैरों से कह दिया 'तुम लोग शरा खयाल तो रसना । कोई महिला
माए तो उहे मेरे या विलियम के पास लिवा माना।'
दिगियम से बोला भया तुम हातक काउटर सम्हालो मनेजर
के पास से कुछ काम करके सोट आजी
मनेजर से स्पेशल कटरिंग का सारा इन्तजाम करके कारटर पर
कोट पापा। देक्षा विलियम फोन पर बात कर रहा है । समझने में
सिकत न हुई कि हनीमून सूट व बही बावू मान कर रहे हैं।
फोन रखकर विलियम बोला, ऐसी बहुमुखी प्रतिभा बहुत कम दोषने
मो मिलती है।
मतरव ? ' मैंने पूणा
"मतवकिपीवी की शरत के सिवाय मले मादमी को मुख भी साद
नहीं पा रहा है।
मैंने मत भादमारे समपन म कहा हाँ । मड़े होटल में कुछ दिनो
के लिए आने पर वीवी की शाल भूसार दूसरे मुबह को बात सोचना
हो मा सौर है।
पिरियम बोला 'नी लगता है भैया को उनके प्रति बड़ी मनोरी
मा गई है।
मैंने कहा जानते हो सो हो मॉस दो बार लस दो हर | सारी
दुनिया प्रमिक को प्यार करती है पदपाह ग्याह पहले हो मा पाह
कबाद।
मलिहारी प्रमिक' रिलियम ने उत्तर दिमा 'यह क्या रहा
है मुना मापन ? रहता है, उसकी वाइफ या तो मेरुन रग को सिल्क

मोग वियोग की को निशानी नहीं थी कही। मल मादमी शोसीन सूर है इसका प्रमाण उनके पांव के जूते से सिर का पाक तक था। उन्होंने पूछा था, मरी स्या को थाने में अगर देर हो ? बाप होटल कब तक खुला रखते हैं ? विलियम ने कहा माप इसकी गवई चिन्ता न करें। इन होटला का दरवाजा भी बन्द नही हाता । राप भर लोग मात जाते ही रहते हैं। 'भल आदमी? उन्होने पूणा । जो हो । रात म हवाई जहाज के मुसाफिर पाते हैं । मुछ जाते भी मिस्टर विश्वास ने पूछा ओ पोरने की कोई बात नहीं ! मा खयाल है आपका उसर म विलियम ने कहा "जो बिल्कुल नहीं । जरूर मिसेज़ विश्वास कोकही देर हो गई है। उनके आते ही हम भापको सबर करेंगे सो रात चाहे जितनी भी क्यो न हो। रात कुछ कम नहीं हुई थी। मिस्टर विश्वास ने फिर फोन विमापा । विलियम न रहा आप नाहर गयो परेशान हो रह है ६मसे सो कंबरे में जाकर बठ जाए कुछ देर । नाच-गान मे जी बहला रहेगा। वहाँ जान से मापको कमीदान मिलता है क्या? जो यह क्या हरदे हैं आप? "तो फिर मुझे मुमताज रस्सरी म नाच देखने जान की क्यों रह रहे है ? दिन भर भी थरी-हारी माकर चूला मगर यह सुन कि मगमग नगी देशी गसरो का नाच देस रहा है तो वह गया सोचगी कहिए सो जे. डी. विश्वास ने फिर यह भी कहा 'बात क्या है ? माप पा हम पति-पली बीच म दरार शलना चाहते हैं ? विलियम पमिदा हो गया था किसी प्रकार से उसन कहा पसारा है मुश रहताकी वारियो करे ना तुरा नही मानती। पति के साथ वे मोग वियोग - भी माती हैं नाच देखती हैं सातो पोतो हैं और उसके बाद घर लौट जाती है। फिर तो आप लोगों ने बुला को खूब पहपाना है। अपने माइन समाज में उस एक अपवाद समझ सकते हैं । बेहद गर्मीली है। मेरो भोर ताक करके बात करने में मो उसे गम जाती है। अगर वह कही सुन ल कि मैंने माप लोगो को इस कदर परेशान किया है, तो वह मारे राम के गई जाएगी। कमरे में कल देम ले सो अन्दर ही नहीं जाना चाहेगी । बसे में भाप योगी से एक सिंगल क्म के लिए कहना पड़ेगा। उस दिन रात में भी मेरी स्यूटो यो। डिनर म वा एक अपनी सपर जन विरियम से घाज लने मे लिए काउटर पर माया सोकपरा टूटने का समय हो गया था। मिसेज विश्वास सभी तक भी राम पर मही माई हैं यह सुनकर मेरा मिजाज खराब हो गया। समझ गया कि माज राव मरी दुगति का यत नहीं रहेगा। हनीमून मूट ने ये सज्जन नार मदम कर देंगे। पवरे हटने के बा हो विश्वास साहब ने फोन किमा ‘हलो मेरी स्त्रीको देक्षा मा? मैंन महा, जी नहीं। किसी को मन्दर मात सो नही देखा । अमी मभी फेवरे टूटा । लोग बाहर निकल रहे हैं। भव मानो उन्होंने जरा मागा-पोछा पिया। कहा मापको याद है २ मेरुमण को मारी। गाल पर तित कहा भी इन बातों म हमसे भूत नहीं हुआ करती। पह मिनट भी मही बात होंगे मिविश्वास साहब ने फिर फोन उठाया। मर को सासी झुंझलाहट थी भावान म- मिसेन विश्वास माती तो भापको सदर मिर जाती। मैंने कहा। इस बार घर पर मादमी गुस्से । 'मजी मनाक छोदिए । रह जरूर या गई है मौर मापको मारर रुपये दिप है। कहा है कि मुम न बताए कुछ। पया पवार में कुछ सोच नहीं पा रहा था जे०सी० विश्वास ने गिड़गिडाफर पहा "पारके और मट न दें मुर। जाते ही हैं म्याह मी पडी रात के एक बजार पीस मिनट पर थी। हो सकता है वह ठीक उसी घाट से कमरे के मन्दर याकर मुल परित कर गी। उसे न्याह की रात म बेहद शरारत सूमती है । और-और दिन तो गर्माई-सा रहती है, म्याह वाले दिन बिलकुल दस्त जाती है। मैंने पूछा आप गोगा का म्याह माया हिन्दू धम क मनुसार हुआ था? २ और नही ता किस धम र यनुमार हागा 'जी नहीं इस बॉन माम से मैं आपका खयाल है कि मैं ईसाई हूँ ' हमारी जातीच में हुई थी। आपकी बुद्धि को बलिहारी । ऐमा न होता तो होटल के रिसन्यनिस्ट होपर रास्त गयों रहते। मेरी तरह एरिया से बाहर जाकर सक ट्राई परमपब के कुछ कमाकर साए होते । मजी जनाब जॉन नाम टोप्यार से मेरे नानाजी ने रष दिया था। वे जॉन पटरमन म नौकरी करते ये। उनके दामार यानी मेरे पिताजो भी वही राम करते थे। में जब पदा हुआ उस समय वहाँ के जो बठे गावू पे वह भरे रसिक थे। उन्होंने यह सबर मिलते ही नानासा को बुलवाया । वोर उन धेरी हैप्पी न्यूज । यह तो बॉल जॉन पटरसन एफपर है । साय ने उसी समय नानाजी और पिताजी को सीन दिन की छुटटी र दो। एक महीने मी सनस्वाह भी। सो मेरे एहसानमद नानाजी ने नाम रखते समय यह पान पार जोर दिया। मेरी दादी ने एतराज दिया था। नानाजी ने कहा इससे माग पतकर नोपरी मिलने में सुविधा होगी। यह जद ना होगा तो जान पटरसन यात-नो-बान में से अपो यहाँ रम लेगा।

पोग वियोग ज्या ज्या गत वदने कमी, जॉन st० विश्वास मानोपलने लगे। तीसरे पहर एकाध बात पूछने पर जिहोंने एप न बासी रमाया वही टेलीफोन पर रिसेप्शनिस्ट को अपनी जम-कहानी बहने लगे। 'हला रिसेपनिस्ट ! यापका नाम क्या है? जी सरयसुन्दर वास । लोग मुझे मैटा मौत के नाम पे ही जानने 'तो सुनिए, मिस्टर बास । पूरा मा सवार रह गई थी। आपकी तयह यह भी मेरा नाम सुनार र ग पी। उसके वा कोहबर में नि मेरे गर म लिपटकर बोली, हो न हो तुम्ह मेम स्याहमे री इच्छा यो। समी सो नाम के साथ जान जाड़कर रखाया। विश्वास साहब फोन पर हो हंस पड़े- जरा मना देखिए माप ! मग गाउनवालो मेम से शादी करन के लिए लोग नाम पालते हैं। बिलकुल माली | बुधिवितर पाक पहनन वासी बारह बरस की लकी विश्वास साहब फान रस हा जान म-आन आए । बाम-नाज महर नहीं था, सबिन मौसा मिस सोभूी पर वठ-या ही एक अपकी ल सू । लपिन विकास साहब नाछोह का वीवा के धार म मुझे मुनाए बिना नहीं रहो । योरे, गनीमत कहिए नि बार यच्चा नहीं हमा नहीं तो यह पामती को यहो नहीं समझ पाता। मग्छा ही हमा साहर पन्च का मुंह दसना जर नसीव नहीं हुआ, लकिन रहे पालने हगामे से साफ बच गया। माग रात में एक भी फिस पटी है पसे मदोनी चिन्ता होता। कहता भीरपा मैं ? कदा बजा फरमामा मापने । पिर जो दाा है देशमी आबादी जितमी मम बड़े वही अन्या।' उन मने मह भी कहा माप पर सा रहिए। रहोंने जरा मोठे-मोठे मेरी लिहामी ली, माह-मादी मापन नहीं को है शारदा योग बियोग मापने कसे समता? "विवाह की वर्षगांठ को रात भला कोई विवाहिश पुरुष अपनी स्त्री का इन्तजार करते-करते सो सकता है ? आपको लोग पागल कहेंगे। मैंने कहा सवेरे से ही तावेचन पठे हैं माप । मापकी व दुरुस्ती की मी मासिर कोई कीमत है न ? पतरे की। जाम रो० विश्वास नोसे आज ही तो मजा है। परा शोर-गुल गप सप खाना पीना खाना-पीना ? इसनी रात को तो होटल में आपको भी नहीं मिलेगा। मैंने कहा। मला यह मैं नहीं जानता है ? ऐसे होटला में इतनी रात का एक चीज के सिवाय पूछ भी नहीं मिलता। और फिर उसका आदर भी नहीं दना पाता । बरे सुद आकर पूछ गाते हैं। मैंने इसीलिए पहले ही दो दिनर मगवाकर रस लिये हैं। रात एक बजकर पीस मिनट पर पाह का सान था । आप देस लीजिएगा वह ठीक उसके पहल था पहुँधेगी। अब आपको बताने में क्या मुजायका ब्याह को राठ में जरा सो गया था । सके लिए जब भी मौका मिला है मूसा ने मरा मजाक उडाया है। सो सब से ब्याह की वषगांठ की रात में कभी नहीं सोया । मैंने यहा ओ ! खर । मैं यही हूँ। वे पाएगी वो भेज दूगा। ठहरिए । माप पडे होशियार आदमी हैं जनाव यही महार टेलीफोन काट देना चाहते हैं । उन्हें गप परने का मानो न चट गया था। बोल मैंने आपके स्टुमार को लकिन जनरल मैनू का भाडर नहा दिया। यह सब गरम न रहने से साया नहीं जाता। उससे अच्छा कोल्ड सूप पोल्ड चिकेन कोल्ड फिनाम्याह की वषगांठ म सब पुर ठहा गरम सिप दिल । उन्होंने फ़ोन रसकर मुझ परा पन लेने दिया । मान दिन को भी ग्यूटी यो । अपर स रात को काम। पना शरीर मन पर रंज छापा हुना पा। और रात में शाहजहां होटल । तो सुमने देखा है। किसी नटसट ।

मोग वियोग : महके को सान्त होकर सो जाते देख मेरा मन खराब हो जाता है। रात के खुले मौर-मजे के पार पाहनहाँ का या ऊँप जाना मुझे बसा नहीं मगता। बरेने जग रहने से मन का हाल कसा तो हो जाता है। मुझमें साहित्यिक प्रतिमा होती, वो मन के इस भाव को ठीक ठोर म्यस्म कर पाता । मैं मगर हादस का किराना ठहरा मुमत साहित्य को माशा फिर भी यह रहत दाम नहीं कि फाउटर में धनेले सह-मह बहुत रातो को मैं अपने-वापसे बात करता रहा हूँ, देर तक अपनी समीक्षा करता रहा है। उस रात भी की थी। सोपा माज इस समय मेरे सिवाय मोर एक मादमी पाहजहाँ रे हनीमून सूट म अपनी प्रेयसी के माने की राह देखत हुए जागर रात बिता रहा है। उस यादमी का रामाटिक कहना होगा। मापस रा यह आकया हो तो ससार पहिया म मिटिंग का काम करता है--पिसाई कम हो जाती है, ससार पक का परर मरर पम जाता है। इस प्रिया प्रीति को समासोचना का मा अधिकार है मुझ 7 एक और हनीमून सूट म जान दिनमणि विश्वास और बूरा क माह की सात राउ चलो। यहोरा वहा कोटा पचीस पर पहुँच पला । मिस्टर विकास के धौरव का बाप हा जा रहा है, यह टेलीफोन पर उनकी भाधार से हा समझ गया। हगे। 'हनो मिस्टर विश्वास में सटा दोम बोल रहा हूँ। बाप सटा बीस हा या नाटा रोस हाटस टु मी ' मेरा क्या । में महज यह जानना चाहता है कि माप इस होटल के रिसेप्शनिस है मा नहीं? में सवार हो गया। मभी-अभी पारी ही देर पहले यमन मन कोरितनी चा पता रहा। परल बरत है क्या ?

योग वियोग
मिस्टर विश्वास बोल आप भगर झूठ बोलें तो मपनी जिम्मेदारी
पर बोलेंगे।रहिए चूला माई या नहीं?
मैंने हा माते ही सबर मिलगी भापको।
दिनमणि विश्वास दुसी हो उठे। बोल 'आप जानते मही पाप
आग स खेल रहे है। कपहरी की हवा खानी पड़ेगी हाजत म भी पन
होना पर मरता है। चूला को या छिपाकर साचते हैं बाप सय पच
जाएंगे ? वह नहीं होगा में समा फसा दूगा।
मुझसे मोर चुप न रहा गया । सोफ भी हमा। न जाने इस रात
में भारत-सरपी किस भामर्स म फरा गया। महा नया बकारी
बातें पर रह हैंथाप?
'दपा ने काम किया लगता है। अब सोधे-सीधे बता दीभिएर
मूला को किसी ने कुछ किया है क्या? चारी अकेली आ रही थी।
मैंने कहा, ईश्वर 1 करे कोई एक्सिडेंट हो सकता है। आप
मस्पताल में खोज कीजिए।
माखिर जे० विश्वास नमरे म फोन को गोद म किये खिलमाह
पोड़े ही कर रहा है। किसी अस्पताल को नहीं छोग। तमाम योग की
मही नहीं है।
मा पहाँ से रही थी? मलकप्ता से बाहर किसी यस्पताल में दो
रही?
वेवार बकवास नरें मिस्टर पोसबाप शायदोनिमरें मैं
हरगिज नही बताने का कि बूला हो स था रही थी। हाँ इतना जान
जिए मगर दुघटना हुई होती तो मैंने बिन मस्पतालों म पूछताछ
की पूला उनम से किसी B पर होती।
मैंने अब जरा भागा-मीठा किया और माराममह हो पिया माग
कुछ सयाम न करें लरिन भापको अब लाल बाजार म सदर देनी
पाहिए । इतनी रात हो गई ६ मक्सी आ रही थी।
इस पर दिवाय साहब ने जो जवाब दिया उससे मैं पास्ता में

योग वियोग
चिन्तित हो गया। बोल, बूला देखने में इतनी मुमान है कि पुलिस कुछ
नहीं कर सकती। कार बाजार के बूते की बात नहीं फोट विलियम की
मिलिटरी कर सके तो कर सके। मगर पहों का डिफेन्स डिपाटमट भी
क्या है साहब ? उनकी मदद मांगी तो पुलिस को फोन करिए कहार
पोन रख दिया । माप ही पहिए, दो वा-दुरल सिपाही लाठी स क्या
7
मैंने कहा 'साठी मा राइफल रिवाल्वर--यह सब भी है।
विश्वास साहब का कुछ भरोसा हुमा 'माम पुलिस रही रहती
है साहब
बरकपुर म।
'ता उहा का पान कर देस क्या सयाल है यापका?
मने कहा, उह फोन करने स काई साभ नही । मापसाल बार
ही फोन करें। जरूरत होगी तो वही वही फान करणे।'
माज जी०डी० विश्वास ने जरूर पी रहा है नही तो या को
उसा बात करत शेने मितिटरी नहीं सुलाई जा सकता ? पुलिस
सिपाहियों म ताकत है वो?
मैं कह रहा चाहे तो पुलिस लाट साह्य स मिलिटरी मगवा
मरती है यदि घसी जरूरत हो तो।'
'खर आप जब कह रहे है तो लाल बाजार ही फोन करू ।
माखिरी बोगियर देखें । दूला के लिए मुरे सब मरना होगा।
रहाने शल बाबार फान दिया था इसका प्रमाण मिल गया।
माई पदह मिनट के अतर ही पुलिस को गारी पा धमकी ।
इन्सटर ने पूण मान दिनमणि विश्वारा यहाँ ठहरे है ?"
मैंने महा सीहो। उनकोसी ग्रूला विश्वास गायनरी मिल रही है।
इन्स्पेक्टर साहब इस पहे..-'माइ सो। मिल जाती है। मर जर
दूना निवास का नाम मालूम हो गया तो चिन्ता नही । बहू भाग्य से
फोन मिता, नहीं तो मान रात भर परेशान र मारतो।

योग वियोग में उनकी योर वाकने लगा- आप लोगों ने बूला विश्वास को सोज लिया क्या? हम लोग यूगविश्वास की खोज में नहीं थाय हैं । हम आये हैं जॉन डी० विश्वास की खोज म । हमे उनके कमरे में ले लिए। कमरे की दूसरी मुभी भी है न ? हा सकता है हमारे याने की खबर पाकर वे कमराही न खालें। मुश खौफ हुमा । आप लोग मिसर विश्वास को खोज रहे है ? 'जी हो। हमारी मौकरी में क्तिने झमे हैं पाप नही जानते। जॉन ती० मिन्यास के लिए दिन भर क्लाता की गरी-गली छान मारी । उस समय गाहजहा' होटल में आ गया होता तो पायद एक रिकार्ड मिल जाता। दूसरी कुजी की जरूरत नहीं पडी। दरवाजा मिस्टर विश्वास ने खुद ही खोल दिया। पोल आप लोग या गए । वूला को ले आए हैं ? हम मापनो ले जाने के लिए भाये हैं यूला को नहीं।' इस्पेटर ने रहा। ? यह मसा पासन है ! यूला का खोग देने का दम नहीं और मुम मने मा गए उन लोगा के साथ ही जे० डी० विश्वास उतर आए । फास्टर फे पास सटे होकर बाते माप लोग बाम् : पुलिस से आ रहे हैं ? बन्दूक रहा है मापकी। इन्स्पेक्टर ने सामटे से नहा गारी से मिस्टर विश्वास की मां का मुग लाभो-पहषानें। उसके बाद विश्वास से पहा हम भाम्र पुलिस नहीं है-हम हैं मिसिंग पमन्म स्वाद । सो पाने वालों का मोजना हमारा काम है। एक बूढ़ी विधवा पगली-सी काउंटर की ओर दौडी आइ- मरे र दोन तु दिन भर कहो रहा ?

योग वियोग बेटे को छाती से सगापर मो रोने रुगो । इन्स्पेक्टर ने कहा, 'चलिए, वर घलें । सामान होटल से कल ल जाया जाएगा। याधी रात क इस नाटक में मैं बेवकूफ बन गया हूँ, यह वाव पुलिस के उस भले मादमी ने समझ ली। विश्वास और उसकी मां गाडीको सरफ बढे तो राल पूछिए मत साहब ! मेंटल केस ! सोग इस भन्द रखते हैं। मसे तो भाग माया ! लहाद के ममम वचार की स्त्री पति से मिलने के लिए पोरगी रोड से या रही थी। विश्वास अपनी स्त्री के लिए ऑफिस स निकलगर मजन पाक में खड़े थे। यहां से होटल पाने की बात थी। सायद हो कि माप ही में यहाँ मात। रास्ते से नीग्रो सोल्जर मिसेज विश्वास को उठा गए। उसके बाद मोई पता ही न पला । उन लोगो को ले जाने माद मैं माफी देर तक परयर बना सग रहा । मकान मानो उस रात मैंने पलक नहीं झपकाया । पसिल कर फाउंटर के एक पर पर अल्लम गल्लम कपीर साधता रहा। बेचारे दिनमणि विश्वास की विवाह रमनी मोर हनीमून सूट काम हरगिल मलग करक नही दख सरता । भूला विश्वास इस समय कहा है, कौन जाने ! शायद उनमा नाम-निशान हा नहीं होता तो मिस्टर पिन्यास पाहे पुरिस से, पाहे फौज थे, उसका बरूर खोज निकलवाते । हाटल मपने लम्ब वीवन में कितने लोगों के नितने मजीबोगरीब समान से, freने मसाय उपराध से तग आया हूँ लनिन भान दिनमणि विश्वास जसे मादभी का अत्याचार माज भी बार-बार सहने को तयार हूँ। जो मनुष्य को शारीरिक विकसता की भाशेचना करके धानन्द पाते है ये मेरे लिए क्षमा के योग्य नहीं। मानसिक विरति या व्यपता को लेकर जो साहित्य रचते हैं मैं उह भी नहीं पस करवा रिन नॉन दिनमणि विकास कम्यवहार म दिमाग सराब होने का कोई लक्षण नहीं या । मने खोब-यूध से जाना था कि जिस दिन हमसे उनकी भेंट हईपी सर हो वह उनम पाह को वषगांठ या दिन था। पाकर सोने की इस पाहा से तुम्हारे अफोका प्रवासी ममा पूर्व परिचित योग वियोग है। जान दिनमणि विश्वास के जीवन म फिर भी पूरा विश्वास को स्मरण करने योग्य एप सुन ला नि है। लकिन तुम्हारे सत्मसुदर-दा के लिए तुम्हारी सुजाता दी यह भी नहीं रस गह-न्याह की पषगांठ को यादगार भी हाती तो जिदगी कुर सहने याग्य होती । मेरे जीवन में सिफ एक सूना निरानरण दिन है । हर साल सायन का पृष्टि-मुसर वह न धीरे धीरे मेरे पास सुजाता की आकस्मिक दुपटना से मृत्यु का समाचार लेकर माना है । मरे सुगी म सपोषन म जा टेलिग्राम व्याघ की सरह पहुंचाया था उसी को मैंने बडे जतन से रखा है। उस रोज उसे निकालकर देखता हूँ । सोचता हूँ शायद यह और किसी का सार है साकघर पालों ने गलती से मुझे भेज दिया है। अपने मन के आवेग सही मैं जे० सी० विश्यास मी यात लिस गया । चाहो तो उसकी पीटा का भस्म बनारसमाम धरती पर बिखेर दना-उसकी वास लिखना। स्नेह लो। शुभधी तुम्हारा सरपसुन्दर-दा भाईसर तुम्हारी भेजी हुई पिसाब मौर चिट्ठी मिली। बड़ी खुशी हुई। पोरगी में शाहजहाँ होटल र रिसेप्शनिम्ट सटा रोस को सुम इस रूप में याद रसोग इसकी सभी परपना भा नहीं की थी मैंने । जीवित पमान के लिए जिस यादमी ने अपने जीवन मुख्य मश एर विलास पुरी सीडी छत पर नगमग कती सा बिताया था उस मादमी पी जीवन महानी मिलन को धुन तुम्ह समार होगी यह सेि पता था?

योगर्नययोग . माज तुम्हारी सुजाता-दी होती, तर वडी मुस्सिल होती मुझ । हर दम परेशान कर मारता कहता थोर का गवाह बटमार । इस मकरुण दुनिया में पोरगी के शाहजहाँ होटल मे एक नये रामकृष्ण परमहस का मआविर्भाव हुआ था और उहीमा कमामव प्रीराम के नये संस्करण में श्रीरने तिसा। इसके सिदाय भी मत-सी बात कहको बिह सुन-सुनपर तुम भीतर से ता पा होते ऊपर से नाराज । मुझे दु सी हो जाना पड़ता। उनकी भास्मिक मृत्यु से यज्छा ही हुआ वह प्राणमय छलकती तरण अब हमारे सट को बाधात नहा फ्रेगाहम उस तरम गीताल-ताल पर भान दनत्य नही करना पड़ेगा। भाई परर हम दोना सूप पच गए। हम गुरु-शिप्य का मजाक करने लिए वे हमार घोष जीवित न रही। रात पाफी हा पुकी है। मपीका के एपबारगी पन्चिमी छोर एक कमरे म यठा-वठा तुम्हे घिटठी लिख रहा हूँ। पर म बदर से साला यर है। सामने एक टेबुली चल रही है. वही टेवुलपटी लिसे तुम्हारी मुजाताको मरी मेन मी दराज में सुपचाप रसपर अपनी उडान में चली गई थी। मैं कुछ भी नहीं जानता या सुमाता सिफ तुम्हे ही सम यता गई पामजीदराज में घरी देखरर मैं तो यवान हा गया । यह कहाँ से आई ? ऐसी पड़ी मौन स गया? तुमने पहा या जो इस रम गई हैं मैं उन्हें पहचानता है मगर नाम यतान को मुमानियत है। उन्होंने कहा है कि तुम्हारे भया को एक एकाम मी को सस्त मारत है। समय पर जगने म उह दिसत होती है। सभी-कभी तो हावड़ी से बहुत पहले ही पा जात है। तुम्हें माराम है कि यह पो कितने दिनों तक मुझे नगने म मदद देतो रहो । विदेशम भी वह अभी ता मरे कमरे मवाती चली जा रही है। लक्नि मर मुझ मगान की जात नही होती। मुछ दिन स ना : पोग वियोग की देवी मुझसे रूठ गई हैं। मेरी उनीदी रावों को गवाह बने रहने के लिए ही मानी यह पी तमाम रात मेरे साप जाना करती है। फक इतना ही है कि वह अपने-मार में ही मशगूल रहती है आप अपने लिए ही बोलती रहती है। मेरी हालत इसी नही । मैं अपने समरे मे अकेले ही घबराता रहता हूँ छटपटाता रहता है। श्यता है रिसी कटिन अपराम के कारण मुझ पेल के सूने सेल म बन्द कर दिया गया है। राव ही नहीं दिन को भी मन सेल म ही पा रहता है। वाह, जाने कर से बगला में पात नहीं की है! कई रोज से एर पात सोर रहा हूँ मैं । कलकत्ता में तुम्हारी नपा हालत है ? तुम्हारे दिन कसे पट रहे हैं ? तुम पर जबरस्तो परता? कोई नई भूम भी नहीं दे रहा है। इतना ही याद रखोकि भारत यप से बहुत दूर सात समुद्र पार एन अजाने महासागर के पिनारे तुम्हारे एक भया है। व तम्हारे हित हैं। मपनो से खासी इस संसार म एरमात्र तुम्ही इसके मपने हो। सम्हारा कभी भी मन हो जाए कभी भो तम्हें जरूरत मा परे तुम तुरन्त मेरे पास पले मा सकते हो। मैं अपने एक छोटे मा को पाऊगा और होटल अफीका एक ऐसा समधारी पाएगा जो बहुतरी शिफायतो के बावजूद होटल के जीवन को प्यार करता है। भाई पाकर यहाँ काम करने में तुम्हे कोई मसुविधा नहीं होगी। होटल अफ्रीका में एक नये मनेनर को महाली हो रही है। उनका नाम है सटा सौ• योग । मार्कोपोनो को एक मन्तर्राष्ट्रीय पेन डोटस म नौकरी मिल गई है। उनलाह बहन म्यादा है । मुा मासूम नही पा कि इसक मैनेजर के लिए उहाने मेरे नाम की सिफारिश की है। कल परकी सपर मा गई होटल के मधिपारो रानी हैं। मानों ने तुद ही मुझ यह सवर दी। हाटम मफोरा भावी मनेगर या भामरण रहा-साच दखना। नौकरी-वोकरी को छाहो । यपने भया को निगाहो के सामने रखना योग विशेष १६६ चाहते हो तो चले भाभा अब तुम्हारी बान पर माज ! तुम्हारी पिठी का एक हिस्सा पदार बा मला आपा सुमन स्सिा है बहुत-से पाठक पाटिकाए जानना पाहत है कि दुनिया म वास्तव में क्या सत्ययुदर बास नाम के कोई सनसन थे? मा समने पहाना करि बल्पना स स बहा कर लिया ? एसी बिटी से तुम्हें परेशानी हुई हो पाया । शायर मन ही मन दुखी भी हुए हो कि लहू-मास क बने तुम्हारे सत्यभुन्दर-दा के मस्निल पर लोग अविश्वास कर रहे हैं । लकिन मुझ तो भाई अच्छा ही लगा। तुमने पूछा है ना मेरा अमोका मा पता मांगते है उन्ह पता लोगे या नही । तुम्हे तो यह भली भांति मालूम है कि तुम्हारे सिमा मोर पिसी को मैं अपना पता नहीं बताना चाहता। जब मैं जी-जान से देश की माटी की मागा बाटने की कोशिश कर रहा है, तो चिटठी-पतर का नाता भी मुश कमजार बना सकता है। सो जो कह रहा था तुम्हार नाराज हान मा दुस करने की पाई वजह नहीं । मुस खु. ही यह सरह होता है कि मैं कभी कलकता म पा भी या नही वहाँ के बिलास बहल नाहजहां होटल के रिसेप्शन रावंटर में काम करत करसे एक मधे होटल-जीवन से अनजान छोकरे पर भो मैंने देता था। उसपे बाद और उससे पहल भी शहरी सम्मता २ ए नित नगे रूप को रात मौर दिन तरह-तरह से दक्षता रहा। पृणित ही क्या कहै ? माछा भी ना देखा है बहुत । कवर की नवमी कोनी क साथ-साथ समय की दुसी छोटी बहन रोनोमो भी सो देखा, होस्टेस करमा गुहा के माथ एक चदास पुजारिन फरयो को भी तो दमा! पुत याद है सुमन एक बार मपने हाईकोट में साहस, जिनगीनहानी तुमने तिने अनमान महिमी है कमरे म एक बात बाई थी। उ होने तुमस महापा माई रियराम इट टेक्स मॉस टॉफ पिपुस टु मेक ए पर बहुत प्रकार मागों से एक दुनिया बनती है। बात बहुत टीक है। मपने शाहजहाँ होटस की ही बात को न ! मला १७० योग वियोग - और बुरा सु और कु कैसे साथ-साथ रहता है। नहीं ता एक ही शाहमहाँ होटल की छत के नीष पोरा पटर्जी जिमि प्रभातचन्द्र गोमम और नटाहारी बाबू जसे मिन प्रकृति के लोग मस पास-पास रहते हैं याज रात एगता है मुषे नौद नहीं आएगी। तुम्ह खत लिखना छोपर उरापायचारी की। इस अधिकारमय देश क गहनतम अधेरे म भी अपने लिए इत्ती-सी नीद की खोज मझे न मिली। सोचता हूँ अब से पूरी-पूरी नाइट इयूटी हो रगा। और जा भी हो इससे रात के खौफ से बच जाळगा। यह नीद भी क्सी आश्चयजनक चीज है। जिहोंने इन्सान को नीद मा थागीर्वाद लिया था वह प्रणाम है। मनुष्य की सारी सत्ता को मोई मानो नीद की पतली चादर से ढक देता है । बनोवा मागीदि है यह नींद भूम का भोजन है पाने का पानी है गरमी के लिए वफ और सर्दी का गरम पानी है। स्लिप द ग्रेट सेवेलरह सकते हो-इन कृपा-कटाक्ष से यवकूफ और घालान एक हो जाते हैं, और तो और होटल फा नौरर परवसिया भोर मनेजर मार्को म भो मुछ देर के लिए कोई पफ नही रह जाता। नीद के रिए अभी क्या पोशिश नहीं की और नार यजाते हुए रेखवर सोने के नाते तुम्हारी सुजाता-दी ने कितना मान दिया है । मैंने कहा था कहाँ भी वो बात है पति की नाक बनती पो इसलिए पति को पत्नी न तलाक दे दिया था। तुम्हारी सुजाता-दी ने कहा पा पेठ पर यस और मूछ म तेल पहल पारी सो हो से सब तो तलाक की मात । तुम्हें सा जाने कितनी बात मालूम हैं । पिस देश म तो युरी रसोई में वहाने पति पत्नी को तलाक देते ५ पास में महा-यहाँ सो पति को उवली भुनी मछली सॉम के बिना परोमन में परनी पर तलाक का मामला पलाया जा सकता है, यह सारा तो तुम्ह कष्टस्य है। जी पाहे, ठीक मौकों पर इन नजीरो का उपयोग करना। में हस पाया। शादी का दिन तय करने का रोम हो रहा था। मैंने मुजाता से कहा था मैंने पुष्ट बहा नहीं रि जब गटकर माममा योग वियोग १०१ ? खारिज कर दी। कहेंगे सुम्हें भी बनने की जगह नहीं मिली दूंटे जो हवाई होस्टेस एफ-से एक जवदस्त साहब को खिलार सेवा जतन करर सुश करती आई है, वह तुम्हारे जसे हरिदास पाल को सन्तुष्ट नही कर सकती। मामला सो खारिज ही होगा उलटे डिक्री का खच सिर पर । मेरे पास तो पस नही हैं सो हाजत से बचाने के लिए फिर तुम्ह ही रुपए देने हागे। यह सब ता क्तिने पहली बात है। लकिन बाज की रात सव याद आ रही है। और नही जानता नया तम्हे सब लिखता चला जा रहा हूँ। तुम पास होते तो जवानी हो सुनाता-कुछ देर के लिए उन खोए हुए दिनो म लौट पाया जाता । जसे महाभारत म कुरुक्षत्र की लमाई बाद जीवितो और मरे हुओ म एक बार पुनर्मिलन हुआ था। आज रात नीद नहीं ही आएगी। लग्नि तुम्हे चिटठी लिखना भाग रहा है। लगता है तम मानो मरे सामने ही वठ हो। मैं अपनी धुन मे बोरता चला जा रहा हूँ और सम जसा कि तुम्हारा स्वभाव है, कुछ पूछे बिना सुपचाप अपने सस्यसुदर-दा की बात सुनत जा रहे हो। तुम्हारी किताब पढते पडते कितनी ही बातें याद मा रही थी। सोच रहा था और क्या लिखा जा सरता था पाठमा को और रया-क्या बताया जा सकता था। एक बार कलकसा के किसी अखबार के सवाददाता मुससे एप मजा प्रश्न पूछा था । उहोंने पूछा था बता सकते है लोग सि सि पारण से होटल म माते हैं मैंने कहा था ज्यादातर लोग तो होटल में ठहरनेवाल वही होते हैं जो दफ्तर या ध्यापार के काम स परदे आत हैं इसके बाद सख्या हाती है पपटको की। धूमि फॉरेन एक्सचेंज मिरता है इसलिए भारत वप म जि हम दामा' की खातिरदारी से रसते हैं जिनमे सवन परसेंट महर पा जिनके पागत-स्वागत मी सबरगीरी में इस इस घड़े अफसर हलआ हैरान होते हैं। सरकारी मापा म इमरा हर सच ?

१७२ योग वियोग हमाग अदेखा निर्यात है-इनविजिबुल एक्सपोट । यह कहानी तो जरूर जानते होंगे जो हम लोग शाहजहाँ म अफ्सर कहा परते पे । लार, नाम का एक पपिटमार हमार होटल के सामन एव अमगेकी माहय मा पॉरेट मारते या पक्ग गया। पुरिस ने उसे पालान कर दिया । पितु लालू का यकील धुर पर था। उसने कहा 'धर्मावतार सव सही है। लकिन आप यह न भूलें कि मेरा मलाइट देश के लिए विदेशी मुद्रा कमान फी कोगिता कर रहा था। परिव प्रासोक्यूटर भी तो अवल गुम हो गई । शमियां को सम्मान के साथ रिहा कर दिया गया। पमटवों के बाद नम्बर पाता है लिंगटा का। ये सब बाते हैं कप्रिंग मास्कृतिक मादान प्रदान शुमकामना की अदला बदली के लिए। इनके मनीयग की सदुरुस्ती बडी इलिमेट होती है। लक्नि भाते है मे ममात में इसरिए होटल का पम्ता पर जाता है। यहां तक कि एक विस्तर वाले कमरे म दो-दो तीन-तीन को भी ठूस दन से ये खास नाराज नहीं होते। बरव-से लोग सेहन के लिए भी होटल में बात है। हमारे साधारण परिवार के लोग होटल मान पुरी या वाराणसी के होटल का सपनाकर लते हैं। बड़े शहर के वदे-बरे होटला म स्वास्थ्य सुधारन बार विरपूल नहा माते । और ऐसे भी आते हैं उनमें से फिल्मी दुनिया की मशहूर सितारा नसादेवा के मचानक होटल म आ पहुँचने का हाल तो तुमने 'चौरगी' में लिखा है । या पिकर प्रेम-मिरन रिए पर छोडरर जो को या पुरुष राठ का आते हैं उनका भी जिक्र सुमने किया है। मेरिन तुम्हें साधुचरण पार - यार म रिपना पाहिए था ।रिन नही मैं गरती कर रहा हूँ शायद य सज्जन मन स्त्रीसहित हमारे होटर में पधारे थे तप यहाँ की नौकरी म आए नहीं थे। साघुपरण के होटल म यान की बात सोचकर मुत माज भी हसी माती है। सायुषरण का हुरिया वा । गुपचुप गोरगप्पा-जसी एक मात हमारे यही कही जाती है । इसम उच्चारण मात्र से जो एक सवीर

Yog Viyog

Author
Shankar
Title
Yog Viyog
File name
Yog Viyog
Text
OCR done
Citation
1965
Published
2010/12
Publisher
Delhi,rajkamal Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
169
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Literature
DLI number
514945
Barcode
4990010022612.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
yRQA0SUamrb
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