Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Vishva Parichya
Front matter
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হয়-শিম
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विश्वमारता प्रन्या विभाग
२१०, कानवालिस स्ट्रीट, पलकत्ता।
प्रकाशम-श्रीविशारीमोहन सातरा
विश्व-परिचय
प्रथम सस्करण
कातिर, सं० १६६५
मूल्य--एक रुपया
शान्तिनिकेतन प्रेस में प्रभात कुमार मुखोपाध्याय
द्वारा मुद्रित।
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॥ रे औचित्य के सरध में शिान थोडी सी त्रुटि भी क्षमा नहीं करता। इस ओर भी में यथासम्भव सतर्क रहा है। वस्तुत मैं ने पनव्य समझ कर ही लिया है, लेकिन वह कर्तव्य फेल विद्याथियों के प्रति हो सीमित नहीं है, स्वय अपने प्रति भी है। इमे लिखने के कार्य में मुझे अपने जापको भी शिक्षा देते हुए आगे पढ़ना पड़ा है। छान मनोभार की यह साधना शायद विद्यार्थियों की शिक्षा साधना के रिये उपयोगी हो भी सकती है। अपनी कैफियत कुछ निम्तार के साथ ही तुम्हारे सामने देनी पड़ रही है। क्योंकि ऐसा करने से ही इसके लिग्यने में मेग जो मनोभान रहा है यह तुम्हारे निकट स्पष्ट हो सकेगा। विश्व जगत ने अपने अति छोटे पदार्थों को छिपा रया है और अत्यन रडे पदार्थों को छोटा बना कर हमारे सामने उप स्थित क्यिा है अथवा नेपथ्य में हटा रखा है। उसने अपने चेहरे को इस प्रकार सजा कर हमारे सामने रखा है कि मनुष्य उसे अपनी सहज बुद्धि के मम में बैठा सके। किन्तु मनुप्य और चाहे जो कुछ भी हो, सहज मनुष्य नहीं है। वही एक ऐमा जीव है जिसने अपने सहज योध को ही संदेह के साथ देखा है, उसका प्रतिवाद किया है और हार मानने पर ही प्रसन्न हुआ है। मनुष्य ने महज शक्ति पी सीमा पार करने की साधना के द्वारा दूर को निक्ट बनाया है, अदृश्य को प्रत्यक्ष दिया है, और दुर्योध को भाषा दी है। प्रकाशक के अन्त राल में जो अप्रकाश लोग है, उसी गहन में प्रवेश करके मनुष्य
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। दे औचित्य के समय में विज्ञान थोडी-सी त्रुटि भी क्षमा नही करता। इस ओर भी में यथासम्भन सतर्क रहा है। वस्तुत मैं ने पत्तव्य समझ कर ही लिया है, लेकिन वह वर्तव्य फेवर विद्यार्थियों के प्रति ही सीमित नहीं है, स्वय अपोप्रति भी है। इसे लिखने के कार्य में मुझे अपने आपको भी शिक्षा देते हुए आगे पढना पड़ा है। छात्र मनोभार की यह साधना शायद विद्यार्थियों की शिक्षा माधना के लिये उपयोगी हो भी सस्ती है। अपनी कैफियत कुछ विस्तार के साथ हा तुम्हारे सामो देनी पड़ रही है। क्योंकि ऐसा करने से ही इसके लिपने में मेग जो मनोभाव रहा है वह तुम्हारे निकट स्पष्ट हो सकेगा। विश्व-जगत ने अपने अति छोटे पदार्थों को छिपा रखा है और अन्य न घडे पदार्थो को छोटा बना कर हमारे सामने उप स्थित रिया है अथवा नेपथ्य मे हटा गया है। उसने अपने चेहरे को इस प्रकार मजा कर हमारे सामने गया है कि मनुष्य उसे अपनी सहज बुद्धि के प्रेम में बैठा सके। किन्तु मनुष्य और चाहे जो कुछ भी हो, सहज मनुष्य नहा है। वही एक ऐसा जीन है जिसने अपने सहज घार को ही संदेह के साथ देखा है, उसरा प्रतिवाद दिया है और हार मानने पर ही प्रसन्न हुआ है। मनुष्य ने सहज शक्ति की सीमा पार करने की माधना के दाग दूर को निकट बनाया है, अदृश्य को प्रत्यक्ष किया है, और दुनारको मापा दी है। प्रकाशलोक के अन्त रात में जो अप्रकाश लोक है, उसी गहन में प्रवेश करके मनुष्य ने विश्व-व्यपार के मुत रहस्य को निरन्तर उद्घाटित किया है। जिस साधनाके डाग यह सब संभर हुआ है उसके लिये सुयोग और शक्ति पृथ्वी के अधिकाश मनुष्या के पास नहीं है। फिर भी जो रोग इस साधना की शक्ति और दान से एका दम यचित रह गये हैं, वे आधुनिक युग के सीमान्त प्रदेश में जाति वहिपत हो गये हैं। यडे वन में वृक्षों के नीचे सखे पत्ते अपने आप गिर पडते हैं और मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं। जिन देशों में विज्ञान की चर्चा हाती रहती है यहा शान के टुकडे टूट टूट कर निस्तर विस रते रहते हैं। इससे यहा की चित्तभूमि में उर्वरता का जीव धर्म जाग उठा करता है। उसीके अभार में हमलोगों का मन अवैज्ञानिक हो गया है। यह दीनता केवल विद्या विभाग में नहीं, कायक्षेत्र में भी हम लोगों को अस्ताथ कर रही है। मेरे जैसा अनाडी जो इस अमार को थोडा-सा भी दूर करने के प्रयत में लगा है, इस से ये हो लोग सब से अधिक कौतूहल अनुमन करेंगे जो मेरे ही जैसे अनाटियों के दर में हैं। किन्तु मुझे भी कुछ थोदा कहना है । पन्चे के प्रति माता का औत्सुक्य तो रहता है लेकिन डाक्टर की तरह उसे विद्या नहीं आती। विद्या तो वह उधार ले सकती है पर उत्सुकता उधार नही ली जा सकती। यह औत्सुक्य सेवा शुश्रूषा में जिस रस को मिला देता है वह अपहेला की चीज नहा है। यह कहना ही व्यर्थ है कि मैं विज्ञान का साधक नहीं,
है। किन्तु वाल्यकाठ से ही विज्ञान का रस आम्यादन करने
में मेरे लोम का अन्त नहीं था। उस समय मेरी अवस्था
शायद नौ दस वर्ष की होगी, बीच पीच में रविवार के दिन
अचानक मीतानाथ दत्त महाशय आ जाने ये। आज जानता
उनके पास पूजी रहुत अधिक नहीं थी किन्तु विज्ञान की दो
एक साधारण बातें जर वे दृष्टान्त दे कर समझा देते तो मेरा मन
आश्चर्य से भर जाता। याद आता है जब उन्हों ने पहले पहल
काठ का गुरादा देकर दिग्वा दिया कि जाग पर चढाने से नीचे
का गर्म पानी हल्का हो कर ऊपर उटता रहता है और उपर का
ठडा और भारी पानी नीचे उतरता रहता है, इसी लिये पानी
खोलता है, तो अनरच्छिन्न जल में पक ही समय ऊपर और
नीचे निरन्तर इतना भेद घट सकता है यह देख कर मुझे
घटा आश्चर्य हुआ था।
की स्मृति याज
भी मन में विद्यमान है। जिस घटना को स्वत सहज
समझ पर यिना सोचे विचारे मान लिया था, वह सहज नहीं
है, इस रिचार ने शायद पहरे पहल उसी दिन मेरे मन को
चिन्तामन किया था। इसके बाद अपस्था जव शायद बारह
की होगी (यह कह रमना अच्छा है कि कोई कोइ आरमी जैसे
रग अधे होते हैं अथात् २ग नहीं देख सकने वैसे ही मैं
तागम-या-अधा इ-मैं तारीप याद नहीं रख सरना) उस
समय पूज्य पिता जी के साथ टरहोसी पहाड पर गया था।
सारा दिन टोकरियों में रूद कर शाम को डाकरगले
उस आश्चर्य
तक पहुचता। पिताजी कुसी निकाल कर आगन में बैठ
जाते। देखते-देसते, गिरिश गों मे घेष्टित निरिड नोल
अधकार में जान पडता तारिकाये उतर जाई हैं। चे मुझे
नक्षनों की पहिचान करा देते। केवल परिचय ही नहीं, सूर्य से
उनकी कक्षा की दूरी, प्रदक्षिणा में लगने वाला समय और
अन्यान्य विवरण मुझे सुना जाते। वे जो कुछ कह जाते उसे
याद करके उन दिनों अनभ्यस्त लेखनी से मैं ने एक घटा सा
प्राध लिया था। रम मिला था, इसीलिये लिप सका था।
जीवन में यह मेरी पहली धारावाहिक रचना थी, और यह थी
वैज्ञानिक सवादों के आधार पर।
इसके बाद उम्र बढती गई। उन दिनों तक मेरी बुद्धि
इतनी खुल गई थी कि अन्दाज से अग्रेजी भाषा समझ सकू।
सहजयोग्य ज्योतिर्विज्ञान की पुस्तके जहा कहीं जो कुछ मिलीं
उन्हें पढने में कोई कोर कसर नहीं रखी। बीच बीच में गणित
सबंधी दुगमता के कारण मार्ग वन्धुर हो उठा था फिर भी
उसकी कृच्छ्रता के ऊपर से ही मन को ठेल-ठाल कर आगे
चढाता गया। इस से मैं ने यह बात सीखी है कि जीवन की
प्रथम अभिज्ञता के मार्ग में हम जो सब कुछ समझते हों सो
यात नहीं है, और सब कुछ स्पष्ट न समझने के कारण हम आगे
न चढने हों, यह बात भी नहीं कह सकते। जल स्थल विभाग
की भांनि ही हम जितना समझते हैं उस से कहीं अधिक नही
समझते, तौभी काम चल जाता है और हम आनन्द भी पाते
M
-
हैं। कुछ अश में न समझना भी हमें अग्रसर होने के माग में
आगे ठेल देता है। जय में रहकों को पढाया करता था तो यह
चात मेरे मन में रहती थी। मैंने कई बार पडी थाम्था या पाट्य
साहित्य छोटी उम्र के विद्यार्थियों को पढ़ाया है। उन्होंने
स्तिना समझा है, इसका पूरा हिसार नहीं लिया, लेकिन यह
जानता कि हिसाय के राहर भी ये बहुत कुछ समझ लेते हैं,
जो निश्चय ही अपथ्य नहीं है। यह पोध परीश्वक की मार्क
देने वाली पेनिमल के अधिकार का नहीं है रिन्तु इसामन्य
काफी है। अन्तत मेरे जीवन से यदि स प्रार यटोर पर
मग्रह की हुइ राते निकाल दी जाय तो बहुत कुछ जाता रहेगा।
मैं ज्योतिविज्ञान को सरल पुस्तरे पढने रगा। उन दिनों
इस विषय की पुस्तके कम नहीं निकली था। सर राबर्ट घाल
की पडी पुस्ला ने मुझे काफी जानन्द दिया है। इस आनन्द
का अनुसरण करने की आकाक्षा से निउकोम्पस, फामरिय
प्रभृति अनेक लेपकों की अनेक पुस्तके पढी है--बीज और
पेशा समेत निगलना गया है। इसके बाद एक बार साहस
सचय करके हक्सली की लिखी हुई प्राणितत्त्व सयधी एक
नियन्त्रमाला शुरू की। ज्योनिविज्ञान और प्राणिनिशान
फेवर इन दो विषयों को ही मैं उल्ला पुल्टता रहा। इसे
पकी शिक्षा नहीं कह सकते अथात् इसमें पाटित्य की
पडी गधाइ नहीं है। किंतु निरतर पढते पढते मन में एक
वैज्ञानिक वृत्ति स्वाभाविक हो उठी थी, आशा करता है,
1
अधविश्वास की मृढता के प्रति मेरी जो अथ्रद्धा है उसने चुद्धि की उच्छू गलता से बहुत दूर तक मेरी रक्षा की है। फिर भी मुझे ऐसा नहीं लगता कि उक्त कारण से कवित्व के इलाके में कल्पना के महल की कोई विशेष हानि हुई है। आज आयु के अन्तिम पर्व में मन नये प्रास्त तत्व-वैज्ञानिक मायावाद-से अभिभूत है। उन दिनों जो पुछ पढा था, उस का सर समझ नहीं सका था, लेकिन फिर भी पढ़ता ही गया। आज भी जो कुछ पढता है उसमें का मय कुछ समझना मेरे लिये संभव नहीं है और अनेक विशेषज्ञ पडितों के लिये भी ऐसा ही है। जो लोग विज्ञान से चित्त का याद्य संग्रह कर सकते हैं ये नपस्वी हैं।-मिष्टान्नमितरै जना, मैं केवल रस पाता है। इस में गर्व करने की कोई बात नहीं है, किन्तु मन प्रसन्न हो कर कहता है, यथालाभ। यह पुस्तक उस यथालाभ की ही झोली है। मधुकरी वृत्ति का आश्रय करके सात पाच धगें से इसका सग्रह किया गया है। पाण्डित्य तो अधिक है ही नहीं, इस लिये उसे अशात रना ग्सने के लिये विशेष उद्योग नहीं करना पडा। प्रयत्न किया है भापा की ओर। विज्ञान की सम्पूण शिक्षा के लिये पारिभा पिक शब्दों की जरूरत है। लेकिन पारिभाषिक शब्द चर्व्य (चाकर पाये जाने वाले) पदार्थ की जाति के हैं, दाँत जमने के गाद ये पथ्य होते हैं। यह बात याद करके जहाँ तक हो
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सरा है परिभाषाओं से पच पर सहज भाषा की मोरही
ध्यार दिया है।
रस पुस्तर में एक यात को लक्ष्य करना-इसी नार
अथान इसरी भाषा सहज ही चल सके, यह योशिश तो इसमें
परन्तु माल यहुत कम करे हया यनाने फो में ने
अपना कर्तव्य नहीं माना। दया करके सञ्चित करने को दया
करना नहीं रहते। मेरा मत यह है कि जिनका मन अतिर
सित है, ने जितना स्वभारत ले सकेंगे, उतना रे रेंगे वासी को
अपने जाप छोड देंगे। लेकिन इसी कारण से उन के पत्तल
को प्राय भोज्यशून्य पर देने को मद्यपहार नहीं कहा जा
सरता। मन लगाना और गोशिश करके समझने का प्रयत
करना भी शिक्षा का अग है, यह आन्दि का ही महचर है।
बाल्यकाल में अपनी शिक्षा का जो
प्रयत्न मैं ने ग्रहण पिया था
उस पर से यही मेरी अभिनता है। एक विशेष उम्र में जर
दूध जन्छा नहीं गता था उस समय मैं ग्डों को धोपा देने के
लिये दूध को नीचे से ऊपर तक फेनिर पर के कटोरा भग्ने का
पड्यन किया करता था। जो लोग पालकों के पढ़ने की
किनारे लिखा करते हैं, देखता, ये भी काफी मात्रा में पेन की
व्यवस्था क्यिा परते हैं। यह बात ये भूल जाते है कि शान का
जैसा आनन्द है, वैसा ही उसका मृत्य भी है लड़कपन से ही
उस मूल्य के चुराने में फसर यरने से यथार्थ जानद के अधि
कार पाने में भी क्सा रह जाती है। चना कर साने से जहा
एक तरफ दांत मजबूत होते हैं वहीं दूसरी तरफ भोजन का पूरा म्वाद भी मिलता है। यह पुस्तक लिपते समय यथासाध्य इस बात को भूलने नहीं दिया है। श्रीमान प्रमथनाथ मेनगुप्त एम० एस सी तुम्हारे ही पुराने विद्यार्थी हैं। ये शान्तिनिकेतन विद्यालय में विज्ञान के अभ्या पक है। पहले मैं ने इस पुस्तक के लिपने का कार्य उन्ही को सौंपा या। धीरे धीरे हटते हटते सारा भार अन्त में मेरे ऊपर ही आ पटा। वे अगर शुरू न फरते तो मैं समाधान कर सकता। इसके सिना अनभ्यस्त रास्ते पर अव्यवसायी के साहस से काम भी नहीं चलता। उनके पास से मुझे भरोसा भी मिला है और सहायता भी मिली है। अलमोडा आकर, एकान्त में, इसका लिसना पूरा कर सका हु। मेरे स्नेहास्पद मिन वशी सेन को पाने से एक अच्छा अन सर भी मिल गया। उन्हों ने यतपूर्वक यह सारी रचना पढी है। पढ कर प्रसन्न हुए हैं, यही हमारे लिये सर से रडा लाभ है। मेरी अस्वस्थता की हालत में स्नेहास्पद श्रीयुक्त राजशेयर यमु महाशय ने बडे यत्न के साथ प्रूफ सशोधन करके पुस्तक प्रकाशित करने के कार्य में मुझे विशेष महायता दी। इसलिये उनके प्रति कृतज्ञह। शान्तिनिकेनन । • आश्विन, २३४४४ रवीन्द्रनाथ ठाकुर
॥
मा है परिभाषानों में बच पर सहज भाग की ओर ही
ध्यान दिया है।
रस पुस्तक में पक पात को लक्ष्य परना-इसी नार
नयान नसकर मापा सहज ही चल सके, यह फोशिश नो इसमें
है परन्तु मार रहुत कम करये हया ना को मैं ने
अपना धर्तव्य नहीं माना। दया करके वञ्चित परने यो दया
करना नहीं यहते। मेरा मत यह है कि जिनका मन बनिक
सित है, ने जितना स्वभारत ले सकेंगे, उतना तेरेंगे पाकी को
अपने माप छोड देंगे। लेकिन इसी कारण से उनके पत्तल
को प्राय भोज्यशून्य पर देने को मयवहार नहीं कहा जा
सरता। मन लगाना और योशिश परये समझने का प्रयन
करना भी शिक्षा का अग है, यह आनन्द काही सहबर है।
थाल्यकाल में अपनी शिक्षा या जो प्रयन मैं ने ग्रहण किया था
उम पर से यही मेरी अभिपता है। एक विशेष उम्र में जर
दूध अच्छा नहीं लगता था उस समय मैं बटों यो धोपा देने के
रिये दूध को नीचे से ऊपर तक पनिर कर के कटोरा भग्ने का
पयन किया करता था। जो रोग धारकों के पढने की
किताबें लिखा करते हैं, देवता, ये भी काफी मात्रा में फेन की
व्यवस्था क्यिा करते हैं। यह यात वे भूर जाते हैं कि ज्ञान या
जैसा बानद है, जैसा ही उससा मृत्य भी है रडकपन से ही
उस मृत्य के चुकाने में क्सर करने से यथार्थ मानद के अधि
कार पाने में भी क्सर रह जाती है। चवा कर पाने से जहा
एक तरफ दांत मजबूत होते हैं यहां दूसरी तरफ भोजन का पूरा
बाद भी मिलता है। यह पुस्तक लिखते समय यथासाध्य
इन रात को भूलने नहीं दिया है।
श्रीमान् प्रमथनाथ सेनगुप्त एम एस सी० तुम्हारे ही पुराने
निकायों हैं। वे शान्तिनिरेतन विद्यालय में विज्ञान के अध्या
पर हैं। पहले मैं ने इस पुस्तक के लिपने का कार्य उन्ही को सौंपा
था। धीरे धीरे हटते हटते सारा भार अन्त में मेरे ऊपरी
आ पडा। चे अगर शुरू न फरते तो मैं समाधान कर सकता।
इसके सिवा अनभ्यस्त रास्ते पर अव्यवसायीको साहस से काम
भी नहीं चलता। उनके पास से मुझे भरोसा भी मिला और
सहायता भी मिली है।
अल्मोडा आकर, एकान्त में, इसफा दिया पूरा फर सपा
ह। मेरे स्नेहाम्पद मित्र पशी सेन को पाने से एक अशा भय
सर भी मिल गया। उन्हों ने यतपूर्वक यह सारी रचना पनी है।
पढ़ कर प्रसन्न हुए हैं, यही हमारे लिये सर से पटा लाभ है।
मेरी अम्बस्थता की हालत में स्नेहारपद श्रीयुक्त राजशेपर
वसु महाशय ने बडे यत के साथ प्रूफ मशोधा फरफे पुस्तक
प्रकाशित करने के कार्य में मुझे विशेष सहायता दी। इसरिये
उनके प्रति कृतज्ञ
शान्तिनिषेतन ।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर
२ आश्विन,,
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अनुवादक का वक्तव्य
विश्व परिचय कवि की भाषा में लिखी हुई वैज्ञानिक पुस्तक
है। बगला में ८ १० महीनों के भीतर पुस्तक चार बार छप चुकी ।
प्रतिकार रेसक ने इस में सशोधन और परिवर्धन किये हैं। यह
अनुवाद जर आधा छप चुका था तभी मूल पुस्तक चौथी बार
सस्कृत और परिवधित हुई और अनुवाद की छपाई समाप्त होने के
पहले ही छप गई। इसीलिये इस सर से नये सस्करण का
उपयोग अनुवाद में नहीं किया जा सका।
विश्व परिचय पालको लिये लिया गया है, परन्तु प्राप्त
वयस्क विद्वानों को भी इसमें कम जानन्द नही मिलेगा। अनु
वादक को अनुवाद करते समय भाषा की सरलता और उसका
माधुर्य दोनों का सामञ्जस्य करते हुए चलना पडा है। कभी
कभी निरपाय हो कर दोनों में से किसी एक का मोह छोटना
भी पडा है। भाषा के माधुर्य का मोह छोडने में उसे प्राय ही
कठिनाई में पड़ा पड़ा।
पक यान FिEtani को इस में नई जान पड सकती है।
मूर लेग्नक चंगा if I और विस्मयादि बोधक चिह्नों
का प्रयोग यात या | उनका कहना है कि अप्रेजी
से चिों को Fit immeी प्रण करना चाहिये।
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अनुवादक का वक्तव्य
विश्य परिचय कवि फी भाषा में लिमी या पुग्नक
है। घगला में ८ १० महीनों के भीतर पुस्ता चार यार एप चुकी।
प्रतिकार लेखक ने इस में सशोधन और परिपन दिया। यह
अनुनाद जर आधा छप चुका या नमी मृर पुम्ना पोथी यार
संस्कृत और परिधित हुई और अनुगद की समान होने के
पहले ही छप गई। इसीलिये ग्म सय मे नये मगरण का
उपयोग अनुवाद में नही किया जा सका।
विश्व परिचय पालकों लिये रिता गया, पातु ग्राम
वयस्क विद्वानों को भी इसमें यम आनन्न न मिगा। अनु
वादक को अनुवाद करते समय भाषा की मात्रा मोर उसमा
माधुर्य दोनो का मामञ्जस्य करते हुए ग्रा पा | कमी
कमी निरुपाय हो कर दोनों में से किसी पपा मोर छोटा
भी पड़ा है। भाषा के माधुर्य का मार होने में से प्राय ही
कठिनाई में पडना पडा है।
एक पात हिंदी के पाठकों कोइम में ना जान पट मानी है।
मल रेपक वगला में प्रश्नवाचक और शियाटियोतर चिहो
का प्रयोग बहुत कम करते हैं। माना कि अग्रेजी
से इन चिह्नों को हमें सोच समझ काn orm
हमारी भाषानी के कहाँ, क्या नादि शद अग्रेजी के where which आदि जैसे व्यर्थ नहीं हैं। उनमें स्वय प्रश्न का भार है। इसी लिये अग्रेजी में जब इन शब्दों के न्येि प्रश्नवाचक चिह्न दिये जाते हैं तर तो ठाक है, पर हिंदी वगला आदि भाषाओं में प्रश्न का चिह्न देना निरर्थक है। जनुनाद में भी इस. युक्ति को स्वीर पर लिया गया है।
सूची
परमाणुलोक
नक्षनलोक
सौरजगत्
ग्रहलोक
भूलोक
६५
उपसहार
११२
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ऐण्टीमीटा की नीहारिका
विश्व-परिचय
परमाणुलोक
सुन सकते हैं।
हमारा सजीव शरीर कई गोध या समझ की शक्तियो को
रे कर पैदा हुआ है, जैसे देखने का बोध, सुनने का गोर, सूपने
का बोर, चपने का बोध और छूने का रोध। इहीं को हम
अनुभूति रहते हैं। इन के साथ हमारा अच्छा पुरा लगना और
हमारे सुप दुप गुथे हुए हैं।
हमारी इन अनुभूतियों की सीमा राहत अधिक नहा है ।
हम बात थोडी दृर तक ही देख सकते हैं और बहुत कम पातें
अन्यान्य वोध शक्तियो की दौड भी बहुत दूर
तक नहीं है। इसका मतलब यह है कि हम जितनी शक्ति का
मम्बर ले कर आये हैं वह इसी हिसाब से मिली है कि हम इस
पृथ्वी पर अपने प्राण यचा रखे ।
जिस नक्षत्र से पृथ्वी का जन्म हुना है और जिसकी ज्योति
इसके प्राणों का पालन कर रही है वह है सूर्य । इस सर्यन
हमारे चारों ओर प्रकाश का पर्दा टांग दिया है। पृथ्वी मिया
इस विश्यमें और भी कुछ है, यह बात वह देसने नहीं देता।
समाप्त होता है, सग्ज डूबता है, जालोय का पटा
वियपरिचय
-
हट जाता है, और जन्यमार को छाप कर असाय नक्षत्र निकल
पटते हैं। तर हम समझ सकते हैं कि इस विश्व की चौहद्दी
पृथ्वा को छोड कर न दूर नक चली गई है। किन्तु फेवर
नुभूतियों के बल पर हम यह नहीं समझ सकने कि यह दूरी
शितना है।
इल दृरी के साथ हमाग परमात्र योग जासी के देखने से
है। नहा से कोई आगाज नहीं जाती, पयो कि नानाज का
पोध हा में होता है। यह हना चादर की तरह पृथ्वी पर
लिपटी हुई है।
हा प्रथ्वी पर ही शन्द उत्पन्न करती है
और उस के नरगों को घर उपर चलाया करती है। पृथ्वी
के बाहर प्राण (गर) और बाद का कोई अर्थ ही नहीं होता।
हमारे स्पर्श योध में गर्मी और सदी अनुभव करने का पक
रोध है। पृथ्वी के बाहर इस बोध का सवध कम से कम एक
जगह कार्की अधिक है। सूर से धूप आनी है और धूपसे
गमों। धम गर्मी से हमार प्राण बचे हुए हैं। ऐसे भी नक्षत्र
जो सूर्य से लागों गुना अधिक गर्म हैं पर उनकी गर्मी हमारे
योध ना नहा पहुचता।रेरिन सूर्य को तो हम पराया नहीं यह
साते। जिन यसप्य नक्षत्रों मे यह विश्व ग्राण्ड ना है, सूर्य
उनमें हमारा सर स बधिर अपना है। फिर भी यह तो मानना
हा पडेगा कि सर्य पृथ्वी से है बहुत दूर । म दूर नहा, नौकरोड
तीस राप मार दृर। सुन कर चोय उटने से काम नहीं
चरेगा। निम ब्रह्मण्ड में हम रह रहे हैं उम में यह दूरी नक्षत्र
3
गया उनने समन्वय हो
परमाणुलोक
लोक की सब दृग्यिो निचले दर्जे की है। कोई भी दूसरा नवर
इमले अधिक नजदीक नहीं है।
ती दूरी की बात सुनकर हमाग मन चौंक उठता है, क्यों
कि जल और मिट्टी से रना हुआ यह पिंड अर्थात यह पृथ्वी
बहुत ही छोटी है। पृथ्वी की सबसे बडी रेपा नर्थात उसकी
रिपुररेया के कटिवेष्टन का गस्ता सिर्फ २० हजार मीणा
है। विश्व के साथ हमारा परिचय ज्यों ज्यो रदता जायगा
त्यों त्यों हम देखेंगे कि ससारके वृहत्त्व और दृग्त्व की मूवी में
यह पच्चीस हजार की सस्या निहायत मानती है। यह पूरे
ही कहा गया है कि हमारी बोध शक्ति कि सीमा पटुन मर्ड
हे। जिस दूरी को लेकर हमें सर्वदा कारगार करना ,
यह तो और भी थोटी है। किन्तु हमारे प्रा
प्रयोजन उसी में समाप्त हो जाता है और न ही
रहता है। इसी मामूली दूरी के भीतर ही धमा
चलने फिरने का लेखा-जोखा निर्दिष्ट है।
रेकिा जर पर्दा उठा तो हमारी अनुमति
सीमा के भीतर ही बृहत् विभ्वने निनन्द मंzrem
हत्के से इशारे से अपने आप को प्रस्ट Tig
न करता तो हमारा जानना होता हो, यही
को देख सकने रायक आख हम ! अब
इनना सा टेपने को ही मान तिरछा अनुमति की
ति
४
विन्य परिचय
मनुष्यको सतोप नहा। इन्द्रिय पोध ने यस्तु का जग सा
जाभासमान दिया। गिन्तु मनुष्य की बुद्धि की पहुंच उसकी
गोध शक्ति पी पपेक्षा रहुत अधिक है। संसार में जितनी
पहुंच हो सकती है, सर के साथ दौड लगाने की स्पद्धा उस में
है। घर (बुद्धि) इस विराट् जगत् की निगट पैमाइश की
पर रेने निकल पढी, अनुभूति ने बच्चों को पुसलाने वाली जो
जपनाह उठा रखी थी उसे उसने जम्बीरार कर दिया। नौ
क्रोड तीस तास मीलो पो हम पिसी प्रकार अनुभव नहीं पर
सम्ते, रितु फिर भी गुद्धि हार माननेवाली नहीं : यह हिसार
लगाने बैठ गई।
चाहर के विश्व लोक की यात तर तक छोड दी जाय,
पृथ्वी पर हम रहते हैं उस से अधिक रिक्ट तो और कुछ नहीं
है। तीमी इस के समस्त अगों को एक साथ देर सपना हमारे
योध के रिये असम्भर है। पितु एक छोटे से ग्लोव पर यदि
उसका मानचित्र अंकित देखें तो पृथ्वी को समग्र रूप से जाने
की एक मामूली नीच पड जाती है। आयतन की दृष्टि से यह
ग्लोर पृथ्वी के कइ हजार हिस्सो में से एक हिस्सा है। हम
जन्यान्य बोधो को छोड़ कर पेरलमान दृष्टिोध की पगेंच से
गुरचा हुआ परिचय ही इस में पाते हैं। विस्तारित नियरण के
हिसार से देखा जाय तो यह परिचय पर दम पोला है।
जधिर देखने की शक्ति हम में नहीं है, इसी लिये इसे छोटा
करके ही देखना पडा।
जिस
.
परमाणुलोक
प्रति दिन गनमें इस विश्व को छोटा करके हमारे सामने
गया जाता है, मानो उसे हमारे सिर के ऊपर आकाश रूपी
गोय में दिगाया जाता है। दृष्टियोर के सिवा गोर कोइ भी
योर इममें स्थान पद पाता। जिमी यात मोचो मे भी मन
अभिभूत हो जाता है उसी इतने विराट् विश्य को दिप-चालाल
ने नारद इस छोटे से आशश में यद् परके हमारे सामो
ग्म दिया गया है।
विता छोटा फरये रगा गया है, इस गान का जरा-सा
जदाजा लगाने के लिये सूर्य या दृष्टात मन में लाना होगा।
ग्वभावत ही हम जितनी बडी चीजों को जाा या अनुभव
पर मरते हैं उन में मरमे पडी है यर पृथ्वी। इसे हम टुण्डा
टुकटा करके ही देख सकते हैं। फिरभी सूर्य इस पृथ्वी से
चौदह लाय गुना पडा है। इतना बडा सर्य आकाश के पक
सितारे सोने की एक गाली-जैमा दिग्पाई देता है। मर्य के
भीतर होने वाले भीषण उथल पुथर की पर जय मालूम होती
है और उसके बाद जब देखता कि प्रात कार हमारे आम के
मागीचे के पीछे पर सोने की पहिया (सूर्य) धीरे धीरे ऊपर
उटनी है, जीव जन्तु और वृक्ष लतायें आनन्दित हो उठती है ,
नत्र सोचा करता है, हमें किस प्रकार भुला ग्गा गया है। हम
में कह दिया गया है कि तुम्हारे जीवन के कारवार मे ग्स
से अधिक जानने की कोई जरूरत नहीं। और अगर हम भुलाये
न गये होते तो जीते भी कैसे। यह सर्य अपने विराट म्यम्प
६ विश्व परिचय में जो कुछ हे ग्ह यदि हमारी अनुभूति के थोडा भी निकट पाता तो हम मुहर्त भर में लुप्त हो जाते। यह तो हुइ सर्य की पात। इस सर्य से और भी अनेक गुना बड़े और भी करोडो नक्षत्र हैं। उन्हें हम प्रकाश के कद छोटे छोटे दुिनों के समान देख रहे हैं। जिस दृग्त्व के भीतर नक्षत्र छितराये हुए हैं, सोच पर उनए कोई कृल रिनारा नहीं पाया जाता। जिन जासमान में विश्व जगत का यह डेग है यह कितना रडा है, इसकी धारणा हम एक और तरह से कर सरते हैं। हमारे ताप योर के पास पृथ्वा के बाहर से एक बहुत बडी पर बडे जोरों के साथ आ रही है, वह है धूप का गर्मी यह सरर नौ क्रोड नीस रास माल दूर की है। लेकिन आकाश के फोने कोने में क्रोट रोड नक्षन फ्ले हुए है , इन में से कद तो सूर्य से भा लासो गुना अधिक गर्म हैं। रिन्तु हमारे सौभाग्य चश उनए सम्मिरित उत्ताप गम्ते में ही इस प्रकार मर जाता हे रि विश्व यापी इस अग्नि काण्ट से हमारा आकाश दुसह नहीं हो जाता। कितनी दूरी का है यह राम्ता, शितना निशाल है यह लामाश ! ताप की अनुभूति को स्पर्श करने वाली नौ परोड मीलों कि दूरी इसके सामने नितात तुच्छ है। पडे बडे यतो में तह्मण भोजन के रिये जो चूल्हे जलाये जाते हैं उनके पास चैटना सहन नहीं है, रेग्नि सोर दस बने के लास पाम शर के रसोइयरी में जो याग जाती है उसकी गर्मी विशाल आकाश में फैर जाती है, इसी रिये हम शहा में वास कर मरने हें। नहा परमाणुलोक तो सजाय यदि इकट्ठा हो जाता तो हमारा वास करना ही मुश्किल हो जाता। नक्षत्र लोक की बात भी कुछ ऐसी ही है। वहाँ की आग की जाच जितनी भी प्रचण्ड क्यों न हो उसके चारो ओर का आकाश और भी बहुत विशार है। इस विगट् दृरी से भी नक्षत्रों के अस्तित्व का समाचार कौन ले आता है। सहज उत्तर है प्रकाश । किन्तु प्रकाश तो चुपचाप बैठ कर सगर नहीं सुना जाता, वह डाफहरकारे की तरह पीठ पर पर लेकर दौडता चलता है। यह विनान का एक जबर्दस्त आविष्कार है। चलना भी मामूली चलना नहीं, ऐसी तेज चाल विश्व ब्रह्माण्ड में किसी दूसरे को नसीर गही। हम लोग इस छोटी पृथ्वी के जादमी हैं इसी लिये अबतक जगन की सन से बडी तेज चाल की बात जानने का सुयोग हमें नहीं मिला। एक दिन यह सरर भी विज्ञानियों के जाश्चर्यजनक कगमात घाले यत्र में पकड गई-यह प्रकाश परु सेकेंड में एक लास छियामी हजार मील के वेग से दौडता है। यह एक ऐसा प्रचड वेग है जो अक में तो लिख दिया जा सस्ता है, लेकिन मन में नहीं लाया जा सकता, जिसकी गुद्धि से तो परीक्षा होती है, ऐकिन अनुभव से नहीं। प्रकाश की इस तेज दौट को अनुभव से समझने योग्य स्थान इस छोटी सी पृथ्वी पर यहाँ है। इस योडीसी सकरी जगह में उसके चलने को हम नहीं चलने के समान ही देखते आ रहे हैं। परीक्षा करने योग्य स्थान महाशय मे ही मिल सकता है। सूर्य उस महाशन्य मे
निम्य परिचय
जिनी दूरी पर पतमान है वह जिनने क्रोट मील भी क्यों न
हो ज्योतिक लोक के पैमाने से रहुत अधिर रहा है।
सलिये इस दूरत्व के भीतर अपेक्षारत छोटे माप मे
मनुष्य ने प्रयाश का दौटा देखा! यार मिली कि इस शून्य
को पार व पृथ्वी तर सर्य के प्रकाश के जाने में साढ़े पाठ
मिनट समय लग जाता है। जमात मर्य जिस समय हमारे
दृष्टि नर उपस्थित हुना, नाम्नर में उस मे मारे जाट
मिनट पहले ही आ गया था। इस आगमन की बार
देने में प्रकाश नामक हरकार को बाट मिनट के करी। समय
लग गया। इतनी देरी से कुछ विशेष नुक्सान नहीं, यह तो
प्रय तानी सपर ही मिली है। पितु मौरजगत् के सर मे
ननीक जो नक्षत्र है, अयात नथन रोक में जिसे हम अपने
मुहल्ले का पडोसी कह सकते हैं, उसने जर मार दी कि 'देयो,
में यहाँ ', नो उमझी यह म्बार यहाँ ना पहुंचा टने में प्रकाश
को पाय चार साल मे मी अधिक समय 7ग गया। अर्यात्
जभी भी जो पर मिली वह चार साल की मासी है।
या कीर खीच दी जाती तो काफी हो जाना किन्तु और भी
अधिक दूर्ग पर नक्षत्र है जहा से प्रकाश के जाने में रायों परस
ग जाने है। आकाश में प्रकाश के इस जारगमन की पर
पर चिनान के सामने एक मत उठा-इसरे चरने या ढग
मा है यह भा पर अमरत की पान है। जगार मिला है
मि उमरा चरना मन्यन सामनाग की तरह है। फिर भी
परमाणुलोक है पहुन मगजपञ्ची करके भी कुछ समझा नहीं जा सका है कि यह नरग है क्सि चीज़ की, केवल प्रकाश के ज्यवहार से इतना निश्चित जारा लिया गया है कि है यह तरग ही। लेकिन मनुष्य के मा को हैगन करने के लिये साथ ही साथ एक और भी जुटनाँ समाचार अपनी तमाम गवाही माखी के साथ हाजिर हुआ, उसने सरर दी कि प्रकाश असग्य ज्योतिरुण लिये हुए है , अनि क्षुद्र झीसी के कणों की तरह उसका घर्षण हो रहा है। इस दो परम्पर विरुद्ध समाचारों का मिलन कहाँ होता हे. यह बात अब भी निश्चित नहीं हो सकी है। इस से अधिक अचरज में डालने वाली एक परम्पर विरुद्ध रान ओर है। यह यह कि, नाहर जो कुछ हो रहा है वह एक ऐसा कुछ है जो तरग और वर्षा है, लेकिन भीतर जो कुछ हम पाते हैं वह न यर है न रह , उसे हम प्रकाश कहते हैं, इसका मतलब क्या हे, सो पात कोइ पंडित अब तक पता नही सका है। जिसे सोचा नहीं जा सकता, जो देखने-सुनने के बाहर है, उसके विषय में इतनी सक्ष्म और इतनी विशाल सपर मिली कैसे, यह सवाल उठ सकता है। फिलहाल यह मातलेने के सिवा उपाय नहीं है कि इसके लिये निश्चित प्रमाण है। जो लोग ये प्रमाण संग्रह कर रहे हैं उसकी ज्ञान की तपस्या असाधारण है, उनके सन्धान का मार्ग अत्यत दुर्गम है। उनकी बात को जांच पडताल कर लेने लायक विद्या हम में से बहुतो के पास नहीं है। थोडी विद्या रेकर अविभ्याल करके हमे स्वय ठग जाना पड़े-
विश्व परिचय
गा। प्रमाण के रास्ते परे ही हुए हैं। उस गम्ते चरने की
सायना यदि करोगे, शक्ति यदि होगी, तो एक दिाग्न सब
यातो पो रेकर इन सर मामलों में सवार जपार सहज ही हो
सकेगा।
1
तर तर प्रकाश की तरंगों की बात हा समझरी जाय ।
ये तरंग पेपर एक हा तरंग धीधारा नहा है। इनके साथ
जनेक तरगो ने दर वाधा है। युछ तो नियाई दे जाती है, और
कुछ रहा। यहा यह कह ग्यना जरूरी है कि जो प्रकाश
दिपाह नहा देता उसे गोरचार की भाषा में प्रकाश नहीं
कहते । रिन्तु दिपाई दे या न दे, पिसी एक शक्ति का इस प्रकार
तरगित रूप में चलना ही जर दोनों का बमार है तो निश्यतस्त्व
की पुम्ना में उनका (न दिग्वने वाली तरंगो का) अरग नाम
देना अनुचित है। बडा भाइ दूर नामी गरामी है और छोटे
भाई को कोई नहा जानता, तौभी वशगत ऐक्य के कारण दोनो
की उपाधि पर ही होती है, यह भी वैसा ही समझा चाहिये।
प्रकाश की तरंगों के अपने दर की एक और भी तरंग है।
इसे हम नापों से नहीं देखने, स्पर्श से समझते हैं। यह है
ताप की तरग। सृष्टि के कार्य में उसका यूर प्रताप ह ।
इसा तरह के प्रकाश की नरग की जात के कई पदार्थ है जिन में
क म्पर्श से जाने जाते हैं, परम्पर्श से समझे जाते है, पिसी
पिसी को हम स्पष्ट प्रराय ये रूप में जानते हैं और साथ ही
ताप के रूप में अनुभव भी करते हैं और किसी को देख भी नहीं
परमाणुलोक सस्ते और स्पश से भी नहीं समझ सरते। हमारे निस्ट प्रकाशित प्रकाशित इन प्रकाश तरगो की भीड को पदिएक ही नाम देगा हो तो उसे तेज कहा जा सका है। विश्वमृष्टि के आदि म य और अत में इसी तेज या कम्पा विभिन्न जनम्यालो में छिपाएमा है। पन्य हो या गहा, नहर से देखने से जा पडना है कि उनके भीतर कोद दिएना-डुलना या नआन्दोलन नहीं है। वे मानी स्थिरता की नादर्श भूमि हैं। किन्तु यह पात सिद्ध हो चुकी है कि डारे अणु परमाणु अथान अन्य तमाम पदार्थ जि हम देख नहीं सकते, लेकिन जिाके मिलित होने से ये बने हैं, सर्वदा भीतर ही भीतर काँप रहे हैं। जन ये उडे होते है तब भी कॉपने है और पपी जर जोर भी तेज हो जाती है तब गर्म हो कर हर से ही हमारी बोध शक्ति के निकट प्रत्यक्ष हो जाती है, हम इमे भर करने लगते हैं। जाग में जलाने मे लोहे के परमाणु कांपते-काँपते इतने अधिक अग्थिर हो उठने हैं कि उनकी उत्तेजना अधिक देर तक छिपी नहीं रहती। उस समय कम्पा की तरग हमारे शरीर की स्पर्श नाटी को धा मार कर उसके भीतर जिस पर को फैला देती है, उसे हम गमा कहते हैं। रस्तुत गर्मी में चोट पहुचाती है । प्रकाश चोट पहुंचाता है नापों में और गर्मी शरीर में। बचपन में एक दिन मास्टार साहब ने दिखाया था कि लोहे का टुरडा अग्नि में तपाने पर पहले गर्म होता हे फिर पूर लाल और अत में उज्जर म्वेत हो जाता है। मुझे ग्यच याद आ रहा
विश्य परिचय
।
है कि उस दिन इम वान ने मुझे यूर सोचने को बाध्य क्यिा
गा। मैं सोच रहा था कि नाग तो कोई एक द्रव्य नहीं है जो
लोहे के पार पाहा से मिट पर तोहे के द्वारा इस प्रकार के
नाना प्रकार के भार नरया दे सके। लेकिन इतने दिन बाद
आज सुनता है कि और भी अधिक ताप देने से यह रोहा गैस
हो जाता है। और यह सब कुछ इसी जादूगर ताप की कार
मानी है, जो सृष्टि के नाम से लेकर नाज तक घर रही है।
मूर्य का प्रकाश सफेद है । इस सफेद रंग में मात मिन भिन
रंग मिले हुए हैं। मानों को सतरगा साज है जो समेट रेने
पर सादा निपता है और फैला देने पर सतरगा। पुराने जमा
मे झाड फानूस का प्रचार या, रिजली पत्ती के प्रचार से इसका
जत्र देश निकाला हो गया है। इस भाड़ में तिकोने काचके
टुम्हे मूला ग्ने थे। इस तरह के निकोने याच के टुण्डी
था गुण यह है कि उनके भीतर से यदि ध्प निफ्ले तो उसने
मान रगों के प्रमश टूट पर छितरा जाते हैं। और एक के
पाट दसरे रंग इस प्रम मे छिजाते है, बैंगनी ( rolet)
tfa oftas (indigo ), f17 (blue) & (groen) fiat
(vellow ) Trift (orange ) Art 777 (rel)i wa
गग जापों मे देपे जाने है पर इनके दोनों किनारों पर और
भा भिन्न भिन प्रकार के प्रकाश की तरंग उठा करती हैं,
जो हमारी महज चेतना की पपद में नहीं जाना। रस जानि
जो नेज येगनी गये उस पार है उसे ultraviolet light
पग्माणुल्य
13
।
पहने हैं।
सहज भाषा में यह सस्ते-चमनी पार या
प्रकारा। और जो प्रकाश लार के इलाके में नहीं आ सका,
उल्कि उसरे उधर ही रह गया है उसे यहते हैं, infia rud
hght इसे गर पार का प्रकाश पट सकते हैं। सर चिलियम
हर्शल एक यन यो ज्योतिषी थे। उन्हों ने तिकोने कान के
टुकडे के भीतर से परीक्षा फररे प्रकाश की मनग्गा छटा देगी श्री।
उन्हों ने ताप-माप की नीलेकर पक गये पास रस कर
देवा। फिरलार रंग पार करके नतीको ग्ग रहित असार
स्थान के पास ले गये। लेकिन यहा भी गौ रकनी नहीं दियाइ
दी। उस समय समझा गया कि इस अधकार में छिपा हुआ और
मी कोइ प्रकाश है। इस के बाद पक जमा रसायनी आये।
एक फोटोग्राफी का लेट लेकर ये परीक्षा में गये। इस
प्लेट पर बैंगनी से रेयर र नामात रगो की सपर मिला।
फिर उहो ने बैंगनी पार करके अधकार स्थान की जांच की।
आखिरवार जो चीज आप की पकड में नहीं आई थी वह प्लेट
की पस्ट में आ गई। फोटोग्राफी के प्लेट में येंगणी पार
के प्रकाश का प्रभाव काफी प्रपर होता है। एक बार ऐसा
जान पटा था कि ये अ-देख प्रकाश रान दल के ही पार्श्वचर हैं
जो अधेरे में जा पडे है। किन्तु ज्यों ज्यों इस गुप्त प्रकाश की
सोज आगे पढती गइ त्यो त्यों सतग्गे दल का जासन छोटा
होता गया। विज्ञान की पैमाइश में प्रकाश को सीमा जाज
सतरंगे गजा के देश से सौगुना अधिक बढ़ गई है। लाल
विश्य परिचय
पार के प्रकाश की ओर नमश जो नरग दीय पडी है वही तरग
आज उस आकाश वाणी को ढोती चलती है, जिसे रडियो.
पाना' कहते हैं। इसी तरह गती पार की ओर सुप्रसिद्ध रेट
गेन प्रकाश प्रस्ट हुना जिसकी सहायता से रेह पे चमडे या
पर्ग भद फर भीतर का हाड दिग्पाई देता है।
प्रकाश से कुछ क्षत्रों के अस्तित्व की ही पर नहा
मिनी पल्कि उस की छाती फाटकर मनुष्यो यह पर भी
स्ट कर ली है कि इन क्षत्रों में कौन कौत से पदार्थ हैं।
यह घसरी पैसे हुई, जरा समझा के रहा जाय---
तिकोने काच के भीतर से जर सूर्य का सफेद प्रकाश
निकलता है तो उसके एक के बाद दूसरे सात ग्गों का परिचय
मिर जाता है। गेहा धगैर फठोर पदार्थ काफी गम हो कर
जाजर उठते हैं और उनका रंग जर प्रमश सफेद हो जाता है
तो इस स्वेत प्रकाश को भाग करने पर सातों रगों की छटा पक
दूसरे से सटी हुइ दिसने रगती है । उनके भीतर कोई फाक नहीं
रहना। किन्तु गेहा को गर्म करते करते जर यह इतना गर्म
हो जाता है कि गैस वा जाय तो फिर तिकोने कांच के
भीतर से उसके प्रकाश को भाग करने से वणन्छा में अनि
त्ति प्रकाश नहीं मिस्ता। अलग अरग फेनर रघर रेपायें
और उनके पीच पीच में प्रकाशहीन पाटी जगहें दिगती है।
इस प्रकार रेसानो का जो चिह्न पट जाता है उसे परिपि
नाम दिया जा सकता है।
परमाणुलोक इस लिपि में देखा गया है कि दीत गैसीय जनम्या में प्रत्येक पढार्य के प्रकाश की वर्णच्छयायें अलग अलग है। नमक में सोडियम नामक एक मौलिक पदार्थ पाया जाता है, नाप दे दे कर उसे गैस कर दिया जाय तो उसकी लिपि में उसके मकाण के भीतर दूध नजदीक ही नजटीफ दो पीली रेपायें दिमाई पड़ती है, और कोई ग नहीं दिपाइ देता। सोडियम के सिवा अन्य किसी पदार्थ की वर्णन्टा में ठीक उसी स्थान पर उसी प्रकार को दो लकीर नहा मिलती। इस लिये उस प्रकार की दो रकीरें जहाँ कही के भी गैस में मिले, समझ लेना होना कि निश्चय ही वहा सोडियम मौजूद है। लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि देखा जाय वर्णच्छटा में सोडियम गैस पी इन दो उज्ज्वल पीत रेपानों की चोरी हो गई है और उन की जगह पर काले धरे दिप रहे हैं। विज्ञानी करते हैं कि किसी उत्तप्त गैसीय पदार्थ का प्रकाश उसी गैस के अपेक्षास्त ठडे स्तर को भेद करके जाता है तो नीचे का ठा म्नर उसे पूरी तौर से सोग्व रेता हैं। लेकिन यह बात नहीं है कि इस प्रकाश के अभाव में ही कुछ काले दागो की सृष्टि हुद हो। वस्तुत जो गैस रस प्रकाश को रोकता है वह भी अपने उत्ताप के मुतारिक प्रकाश विपेर देता है, लेकिन उत्ताप की कमी के कारण इस का प्रकाश कुछ मलिन होता है। यही मरिन प्रकाश वर्णच्छटा में उज्ज्वल प्रकाश के पास रहने के याला मालम होता है।
विश्व परिचय
नितीभा मालिस पदाय है, उनका प्रमोद पर नयेष
यापर्णा या फद तैयार पर रिया गया है। इस गण
भेद की गुरना फग्ने से ही मनु मेद प्राट हो जायगा,
यह जहा यहीं भी रही। , गाीय अपम्पा में उसका
रहा नारी है।
प्रध्या पर जिा मालिय गायों का गयर मिरी ६,
सूर्य में उन गय पा रहा उचित है या कि पृथ्वी नो पर्य
केवर से उत्पन दुइ है। पहली परीक्षा में
पेशी गाय
मिले थे, गर्ग या पारा, इस प्रश्न पो भारतीय विrit
मघनाद माहा ने दिया है। या अनुसधा मार्ग निमार
सर इहों ने सय में और या मोरिय पदाथा फापता स्माया
है। उनये मुझाये गम्त में प्राय सी मौरिक पदार्थों की
सर मिल गई है। आज भी जो सपना डाया संवाद
पृथ्वीया वायु मण्डर पीच गस्ते में ही गेय रेता है।
सत्र रंग मिर पर सूर्य या रंग सदा है फिर पापरण
है कि हम ना पस्तुगों में नाना रग देयते हैं। यास यह है
कि परतुयें सर रंगों को अपने भीतर प्रहण नहा पर सक्ती,
पिसी किसी पो बिग उज याहर पिदा पर देती है। यह
हॉटाया हुआ रंग ही हमारी जागो या गम है। मोटा
नगरिंग पेपर जिस रस को सोप देता है यह फिी या भोग्य
नहीं होता, जिस ग्स यो यह रे नहीं रेता यही यचा हुआ झूठा
रस हमाग प्राप्य है । यह भी ऐसा ही है । चुनी सूर्य के विरणा'
परमाणुरोक के सभी रगों को मान लेती है, फिरा देती है फेल लाल रंग फो । उस के स त्याग के मासे ही चुन्नी की इतनी शुहगत है। जो (ग) उसने आत्मसात् कर लिया है उसकी योई ख्याति नहीं। चुन्नी फेरल रार रंग को ही क्यों नहीं प्रण करता हे और नीलम का नील रंग के ऊपर ही इतना विक्ट पैगम्य या है, इस प्रश्न का जमाव उनके परमाणुगों की दुनिया में छिपा हुआ है। सूर्य के रंगों की तरंगो फो पके केश लौटा देतेरे इसीलिये रे सफेद दिपते हैं और काले केश किसी रग को नहीं रोटाते इसी रिये चे कारे हैं। जगन की सभी चीजें अगर सूर्य के सर रगों को ग्रहण कर जाती, आत्मसात कर लेती, तो कृपणों की यह दुनिया एक दम काली दिपाई देती अर्थात दिखाई ही नहीं देती। मानो पोस्टमाष्टर चिट्टी गॉटने वाले सातो हरकारो को कैद कर लेता। और यदि ये पदार्थ किसी भी प्रकाश को ग्रहण न करते तो सब कुछ सफेद दिसता, और 'उस एकाकार जगत् में सर पदार्थों का भेद ही मिट जाता। मानो सातो हरकारों की सर चिट्ठियाँ रम्सी की तरह चॅट कर एक कर दी जाती और कोई स्वतत्र सर ही न मिलती। सर को एक ही चेहरे में देखने को देखना नहीं कहा जा सकता, हम दृटे प्रकाश के मेल जाल में चीजो को देखते हैं। पके केश सफेद क्यों दिखाई देते हैं, यह सहज बात भी जो 'पूछने की चीज है, यह बात हामरे मन में आती भी नहा । लेक्नि छोटा, वडा, सहज, कठिन, सर यातों का जवाब तलब
रिय परिचय
करने के काम में शिान गाहुना। परे पेश सदा है
इसीलिये सफेद दिया। इसी प्रकार की घोरया गरी युति दे
र हमारी गुद्धिजय तरमा पोशात पर ग्मा था। यिनी
ने पाहा, यह उनर भागमनाक हो सकता है किन्तु मतोष
जनक नहीं है। हे आदी ये मस्तर पर यौन सी घटना
घटती है और य पेश मफेद हाने रगते हैं, इस मागोज
करके रिये उदि यो प्राय माढे नौ करोड मील दौडाना
पडता है। यहाँ अत्यन प्राण्ड और प्रचण्ड आग्नेय गैस
उत्स से जिस नेज की धारा चरी आ रही है यह यूर के पेरा में
कर टकराइ, और प्रतिक्षण उससे दाग परगट मान
रगी, इसा गॅटने प्रकाश में फे। सफेद दिपार दोगे।
पयों यह प्रमाश लौट आता है, मालूम नहीं। पितु यह
अत्यात छोटी पटना विश्व के पितली पड़ी घटना के साथ
नित्य ही योग युन है यह सोच कर अपाय हो रहना पड़ता
है। संसार में ऐसा कुछ भी नहीं है जो मय मे स्वतंत्र हो
कर पो बाप घट रहा हा, जिस का हिसाय सारे माण्ट में
पहा भान मिरता हो।
सूर्य किरणों के साथ लिपटी हुई ऐसी अनेक तरंगे हैं, जो
अति आप परिमाण में जाती हैं और इसी लिये हम उहें अतु
भर नहीं कर सकते। ऐसी भी तरगें है जो आती तो माफी
माना में हैं पर पृथ्वी का वायुमण्डल उ धीचहा में रोक रखता
है। नहीनो हम जर कर मर जामा पहना। सर्य का जितना
परमाणुलोक
दान हम गर्दाश्त कर सकते हैं, पहले से ही उसके साथ हमारे
देहतन्त्र का समझौता हो गया है। उस के याहर हमारी
जीवन यात्रा का काम्यार यद है।
इस विश्वरूपी चित्र में जो चीज सा मे अधिक हमारी
आखों को आरट करती है यह हे नक्षत्रलोक और सूर्य, जो
स्वय एक नक्षत्र है। इतने दिनों तक ये ही मनुष्य के मन में
प्रधानता पाते आये हैं। वर्तमान युग में मनुष्य को सर से
अधिक आश्चर्य में डाल दिया है इस विश्व के भीतर छिपे
हुए विश्व ने, जो अतिशय सूक्ष्म है। यह जापो से नहीं देखा
जाता फिर भी वास्तव में समस्त सृष्टि के मूल में है।
एक मिट्टी के घर को ले कर यदि हम जांच करे कि उस
के मूल में क्या वस्तु है नो कुछ धूरके कण मिलेंगे। इन
कणों को नोटने पर जर और टुकडे नही हो सकेगे तो हम
कहेंगे कि ये कण ही मिट्टी के घर के मौलिक मसाले हैं।
मनुष्य ने एक दिन ऐसा ही सोचा था। विश्व के पदार्थों के
टुकडे करते करते जर इतने सूक्ष्म टुकडे हो जायगे कि उन्हें
और अधिक न तोडा जा सके तो इही को विश्व के आदि
भूत अर्थात मौलिक मामग्री कहेंगे। हमारे शास्त्रों में इसे पर
माणु और यूरोपीय शास्त्र में आटम कहते हैं। ये इतने सूक्ष्म
हैं कि दश करोड परमाणुओं को एक पर एक सजाने से उनका
माप केवल एक इंच होता है।
सहज उपाय से धूल के कणों को हम अधिक भाग नहीं
ঘির বন্তির
फिर भा पनिटिय के प्रति पजिटिय की और नेगेटिन प्रति
नेगेटिन् की आसान नहीं है। इनमा आयर्पण विपरीत पत्र
वी ओर ही होता है।
इन दो जातियों के प्रति सक्ष्म कणी के झुण्ड मिल कर हा
परमाणु हुए हैं। इन दो पक्षों को पर प्रत्येक परमाणु मानो
सय और ग्रहों के मिलित सौरमण्डल के समान है। सूर्य
जिस प्रगर मार-लोक के केंद्र में रह र पायर्पण फेरगाम
से पृथ्वी को गुमा रहा है, पनिटिव् वैद्युत कण भी उसी प्रकार
परमाणु के केन्द्र में नेगेटिन् यणों को मीच रहा है और ये
सांसपे घोटी की तरह गामधारी पजिटिर के चारों ओर
चकर मार रहे हैं।
पृथ्वी सूर्य के चार्ग और नौ करोड मीर दूरी रख यर.
चकर काट रही है। जायतन की तुलना करके देखा जाय तो
जति परमाणुभी के पक्ष पथ या दूरत्व अनुपात में उस से
अधिय ही है, कम नहीं। परमाणु जिस अणुतम आकाश को
अधिकार दिये है, उसके भीतर भी दृरत्य यी यहुन यमी-येशी
है। पहरे ही नक्षत्रलोक में ये बृहत्त्व और अति विशालता
की रात वह चुका है, किन्तु अत्यन्त छोटे को भी 'अत्यन्त
विशाल छोटा' कह सम्ने हैं। जिस प्रकार वृहत् निशालता की
सीमा को सान्या चिह्न से घेरने पर एक के बाद नीस पीस
अक घेठाने होते हैं, शुद्रतम विशारता के विषय में भी यह एक
ही पात ठीक है। उसकी साया की फौज भीरजी तार
परमाणुलोक
चाँध कर पडी होती है। परमाणु के जति सक्ष्म
आकाश में अति परमाणु गण जिस दृर्ग पर चकर मार रहे हैं
उस की उपमा देते हुए एक विरन्यात ज्योतिषी ने कहा है कि
हावडा स्टेशन की और सर चीजे हटा कर केवल ७६ छोद
दिये जाय तो उसी के साथ परमाणु के याकाश में स्थित
अति परमाणुओं की तुलना हो सकती है। किन्तु इस व्यापक
शून्य के भीतर कई दूग्पती चचल पदार्थों को रोक रपने के
लिये परमाणु के केन्द्र वस्तु का समस्त भार सारा कार्य कर
रहा है। यह न होता तो परमाणु जगत् तहस-नहस हो जाता
और परमाणुगो से गठित इस विश्वजगत् की हस्ती ही न रहती।
अब हाईड्रोजन गैस के परमाणुओं की दुनिया में दृष्टि
दी जाय।
इस से अधिक हत्का गैस दुसरा नहीं है। इस के
परमाणु
केन्द्र में केवल एक चैद्युत कण विराज रहा है जिस की जाति
को प्रोटन कहते हैं और इसी के आकर्षण में युद्ध हो कर एक
छोटी सी कणिका उसके चारो ओर चार मार रही है, इस की
जाति को इलेक्ट्रन कहते हैं। प्रोटन पजिटिव धर्मी है, इलेक्ट्रन
नेगेटिव धमो। नेगेटिन इलेक्ट्रन बटुल-चञ्चल हे और पजिटिन
प्रोटन धीर-गमीर। इरेक्द्रन के वजन की तो उछ गिनती ही
नही, परमाणु का समस्त भार उसके केन्द्र वस्तु में जमा
हुला है।
मोटी
सर इलेक्ट्रन ही ना मी है, परन्तु
विश्व परिचय जाति के ऐसे भी इलेक्ट्रन गिरफ्तार दिये जा सके है जो हाँ- धर्मी हैं, फिर भी गया वनन इरेक्ट्रा के सम न ही है। का नाम रखा गया है पाजिट्रेन । पहले ही बना चुका हरि दो विपरीत धमी युती में पर स्पर माठगांठ रहती है परमाणु केन्द्र के प्रोदन जपने कश्य पय के इलेयदों को पीच पर परस्पर मिर जा सरते थे-पर ग्स रिये मिल नहीं पाते कि इरेचद्रन के छोडने का जो प्रचण्ड ग है यही प्रोटन के आर्पण के जोर को एक सीमा में रोक रपना है, मयादा का उर धन नहीं होने देता। इरेयगन के दौडने का वेग प्रति सेरेंट १३० मील है। सय और पृथ्वी में भी यही व्यवहार है। पृथ्वी के दौटने का वेग नगर अत्यन्त अधिा रह जाय तो वह सूर्य के जार्षण से अपने को छिट- का कर छूट भागे और अगर दौडने का वेग अत्यन शिथिल हो जाय तो सर्य ही उसे हडप ले। परमाणुलोक में दौडने के जाक्पण का जो नियम नया है उस से इरेचद्न मदली से पाहर निसठ कर नहा जा सस्ता और फिर प्रोटन भी इलेक्ट्रन रे प्रदक्षिणपत्र की मयादा की रक्षा करता रहता है। कभी कभी देखा गया है कि एक विशिष्ट प्रकार के हाई- ड्रोजन का परमाणु साधारण परमाणुओं से दा भारी है। परीक्षा कर देगा गया कि केन्द्र में प्रोटन के साथ उसका एक और सहयोगी भी है। पहले ही कहा गया है कि प्रोटन हाँ धी होना है। उसके केंद्र का जो साझेदार है उसकी जांच. ।
परमाणुलोक . जन्य जाति करने मे मालूम हुआ कि वह साम्यधमा है, न हाँ धर्मों और न ना धमा। इसी लिये उस में कोड वैद्युत उर्म नहा है। उसका वजन अपने सगी प्रोटन के परावर ही है किन्तु प्रोटन जिस प्रकार इलेक्ट्रन को पीचता है, यह वैसा सींच नही सकता, और फिर प्रोटा को धका मार कर गिर, देने की को शिश भी नहीं करता। इस कण का नाम न्यूट्रन रखा गया है। ऐसा भी हाईड्रोजन पाया गया है जिसका वजन तीन गुना अधिक है। जर्थात उसके परमाणु में एक प्रोटन ओर दो न्यूटन हैं। एक बात लक्ष्य कर के देवी गई है कि एक प्रोटन फेवल एक ही इलेक्ट्रन पर शासन रख सकता है। के कणों की गॉट से परमाणु को जितना भारी भी क्यों न कर दिया जाय, इलेक्ट्रन के ऊपर उसका जोर नहीं चलता। माणु के केन्द्र में प्रोटन की सन्या जिस परिमाण मे अधिक होगी उसी पग्मिाण मे ये इलेक्ट्रन को पश में रख सकते हैं। आक्सिजन गैस के परमाणु के केन्द्र मे जाठ प्रोटन रहते हैं, और साध में आठ न्यूट्रन भी रहते हैं, किसी किसी जगह दस दस, किन्तु तौभी प्रदक्षिणकारी इलेक्ट्रनों की मस्या ठीक आठ ही रहती है। पजिटिव और नेगेटिव जहाँ पर यथा परिमाण मिल कर मधि करने शान्ति पूर्वक रह रहे है वहाँ यदि किसी उपाय से गृह- पिच्छेद घटा दिया जाय, अर्थात कुछ नेगेटियों को निकाल बाहर किया जाय तो यह पम्तु वैद्युन के परिमाण के हिमात्र मे वेमेल पर
विश्व परिचय
हो जायगी और पनिटिन धुन का चाज अतिरिक्त हा उठेगा।
स्त्री पुरष मिर कर जहा गृहस्पी सामजम्य पूर्ण ढग से चला
रहे हैं, वहा मे स्त्री का प्रयाय जिस परिमाण में हटा दिया
जायगा उसा परिमाण में नह गृहस्थी पुरुष प्रधान हो उठेगी,
यह भी वसा हा हे।
लेक्ट्रिसिटी के प्रसंग में यह 'बाज' गट सदा व्यवहार
पिया जाता है। साधारणन जिन चीजों को हम ज्यवहार
में गने है उन में चुत की छटपटाहट नहीं देखी जाती,
चार्ज किये हुए नहा है, अथात दो जाति के वैद्युत जिस
परिमाण में परम्पर मिलजुल कर शाति पूर्वक रहा करते हैं,
वह परिमाण ग्न में है। किन्तु पिसी चीज में कोई एक युत
यदि सधि न मान कर, जपने निर्दिष्ट परिमाण को अतिक्रम
कर और मयादा मानना न चाहे तो उस वैद्युत के द्वारा यह
वस्तु चार्ज की गई है, ऐसा कहा जाता है।
एक टुमदा रेशम रेकर काच पर रगडा गया। नतीजा
यह हुआ कि रगट पाकर पांच में से कुछ इलेक्ट्रन निगर
आये, उनी रफ्तनी हुई रेशम में। याच में नेगेटिव के कम
होते ही पजिदिन की प्रधानता हो गड, उधर रेशम में नेगेटिन
बंधुन का प्रभार बढ गया, अब यह नेगेटिव बेधु त के द्वारा चान
कर दिया गया। काँच में इलेक्ट्रिक की कमी पड़ गयी थी,
उसने अपने पनिटिन चा रे झोर में रेशम को पात्र लेना
चाहा, उधर नेगेटिव की मांट चाले रेशम का विचार
परमाणुलोक २७ - काँच की ओर हुआ। कांच या रेशम का साधारण तर जर अक्षुण्ण था, तर तक वे अपने आप में ही सहज ये, शान्त शान्त अवस्था में इन में वैद्युत का अस्तित्व ज्ञात ही नहीं होता था। ज्यों ही बाहर के वैद्यु तिक गृह निम्न की पर मालम हो गई त्यो ही भाग बंटवारे की असमानता ने लोभ पैदा कर दिया काँच या अन्य किसी पदार्थ से रगड के द्वारा मामूली परि माण में इलेक्ट्रन निकाल लेने की बात मैं ने कही है। यदि विज्ञानी से पूछो कि यह परिमाण स्तिना है तो वे गर्दन हि त्रा कर कहेंगे, रगड की मात्रा के अनुसार चालीस, पचास, साठ करोड तक हो सकता है। विजली बत्ती के पलीते के तार में से जर इलेक्ट्रन की ठसाठस भीड दौडती रहती है तभी वह जलता है। उसके इस प्रान्त से उस प्रान्त तक जितने इलेक्ट्रन एक साथ यात्रा करते हैं उस सस्या का हमारे गणितशास्त्र में क्या नाम है, यह पात में तो नहीं जानता। जो हो, यह देखा गया कि अति परमाणुनी का दुरन्त चाश्चत्य पजिटिव और नेगेटिव की सन्धि से सयत हो रहा है, इसी लिये इस विश्व मे शान्ति है। भाट वाला मदारी टमरू बजाता है और उस के प्रत्येक ताल पर भालू नाचना और नाना रोल दिखाता है। यदि डमरू वाला न हो, और पाल्तु भालू यदि धन तोड़ कर अपने स्वधर्म में आ जाय तो फिर काट कर और नोच कर चारो ओर अनर्थ कर डाले। हमारे सारे शरीर में और देह के बाहर भी इस पाल्तु विभीपिका के द्वारा किसी अदृश्य डमरू के छद (ताल) पर सृष्टि
विश्य परिचय
का नाच और मेर वट रहा है। मष्टि के अपाडे में दो पिलाडी
पेल रहे हैं और पिने भीषण के समय से विश्वचगचर
की रंगभूमि को गम कर रप है।
सुविण्यात अग्रेज शितानी रटरफोड ने परमाणु रहस्य को
मार मण्डली के माय तुम्नाय ने पताय, नि परमाणु को घेरे
कर मिन भिन्न चा पथ (स-मार्ग) में इलेक्ट्रनों के दर चार
काट रहे हैं। एक और पडित ने मारिन दिया कि चार
मरने वाले इलेक्ट्रा कक्ष पर मे द पर दूसरे पक्ष पथ में जा
वर म्या7 रदला ग्ते हैं, और फिर अपने निधि सन्ते पर
लोट जाने हैं। टम उदल के समय ही उसमें से किरण
विकीर्ण होती हैं। सर्य के परमाणु या जरता हा पलीता इस
अटने वाले लेबद्रन की चमक से ही प्रकाश पंरते है। यत
में पक गणित विनानी ने सिद्ध किया कि इन कृदने वाले और
चार मारने वाले इलेस्ट्री की गति में एक प्रकार की नरग
काम करती है। इस प्रकार कृतने, छिटकने और लहगने के
योगातीत यापार को रे कर परमाणु की स्थिति है।
पहले ही पता चुका ह कि एक समय के विज्ञानी लोगों ने
यूर द्वन्द्वता के मार ही घोषित किया था कि १० गादि भून ही
विश्वसृष्टि के मौलिक पदार्थ है, जति परमाणुनों की सायरी
ने इस बात को प्रमाणित कर दिया, तभी उनके सम्मान की
उपारिबाज भी रह ग है, हम माज भी उनको मौरिय पदाथ
ही कहते हैं।
परमाणुलोक
एक ऐमा भी समय था जन कि इन मौलिक पदार्थों के
सरन्ध में यह मशहा था कि उनके गुणो में नित्यता है। उन्हें
जितना भी क्या तोडा जाय उनका स्वभार नहीं बदलता।
विज्ञान के नये अध्याय में देखा गया कि उनका चरम भाग
किया जाय तो दो जाति के चैा तो का युग्म नृत्य निकर
पड़ता है। जिहें मौलिक पदार्य कहा गया हे उनके म्यभार
के निशेषत्व को इन्ही वैद्यु तो ने विशेष सग्या में एकत्र हो कर
रचा गया है। अगर यहीं रका गया होता तोभी परमाणुमो
के रूप नित्यता की शुहरत टिक जाती। किन्तु उनके अपने
दल से ही रिद्ध गवाही मिली है। देखा गया है कि जो
परमाणु हलके हैं उनके भीतर इलेयद्रन और प्रोटन का
चकर मारना नित्य नियमित भाव से ही चला जा रहा है।
किन्तु जो अत्यत भारी है, जिन में न्यूट्रन प्रोटन सघ की टसा
उस भीड बहुत अधिक है, जैसे यूरेनियम या रेडियम, वे अपनी
'पूजी सम्हाल नहीं सकते। सदा सर्वदा ही उनकी मूल पूजी
छिटकती रहती है और हरके हो कर वे एक रूप से दूसरा रूप
धारण करते रहते हैं।
जातक रेडियम नामक एक मौलिक धातु ग्थूल आवरण में
छिपा हुआ था। उसके आविष्कार के साथ ही साथ परमाणु
का गृढ रहस्य मालूम हो गया। विज्ञानियो के साथ उसका
जो पहला मुकाविला हुआ उसका इतिहास याद रसने लायक है।
हाँग चेकरेल पैरिस म्यूनिसिपल स्कूल में विज्ञान के अध्या
विश्य पग्चिय पर थे। पक दिन सयोग वश उन्हों ने अपनी प्रयोगशाला में एक टुण्डा यूरेनियम पातु एक फोटोग्राफी ये प्लेट पर रख दिया था। दो सप्ताह याद रही प्रेट रे कर उन्ही ने अपने मह गारी को उस का चित्र लेने के लिये दिया। देखा गया कि पोट केपीच में काफी बडा एक प्रकाश का चिह्न पडा हुआ है। यूरे नियम के टुक्डे से ही अदृश्य प्रकाश विकीर्ण हो कर प्लेट पर गिरफ्नार दुना है । इस गान को निम्सदेह प्रमाणित किये बिना कोइ मत स्थिर न कर सके। उस समय वे अ य प्रयोगों में उरके हुए थे। इस लिये इस प्रयोग की परीक्षा का भार उहाँ ने अपनी असामाय बुद्धिमती छात्री मैडम दुरी के ऊपर दिया। यह महिला फासीसी रिता विद्यालय में अपने पति मध्यापर पियर पुरी की सह्योगिनी हो पर प्रयोग परीक्षा का काम करती थीं। दोनो पनि पनी मिल कर इस अशात धातु की योज मे ग गये। रफी रपये की जरूरत थी, फिर भी ये कर्ज लेने में कुठिन नहा हुए। अष्ट्रिया से २६ मन का एक धातु पिण्ड सराद लाये, इसे पियद कहते हैं । यूरेनियम पय निमिश्र सरिज पदार्थ है। पती पत्नी इसके शोधन और विश्लेषण के काय में जुट गये। प्रात काल से रे घर आधी गत तर काम करते करते साल गुजर गया। सासारिक बाधायें भी यम नहीं आई। अन्त में परीक्षा की प्रणाली से पनिज वस्तु जर घिसते घिसाने इतना सन्म हो गया कि उर्दयीन पिना देखा न जा सके, तर एक दिन सायकाल अपनी प्रयोगशाला में प्रवेश
परमाणुलोक
3"
यह
करके देगा कि परोया मे रचे हुए उस पदार्थ से दीप्ति निकल
रही है। इस उम्ञ्चल पदार्थ के भीतर से मैटम पुरी ने त्रिशुद्ध
रेडियम के कई दाने चा लिये। और भी पांच वर्ष तक
मचान और आलोचना करने के बाद अन्त में उन्ही ने रीडि
यम के सरध में लिपी हुई अपनी रचना परीक्षा समिति
के हाथ में दिया। शीघ्र ही मारे संसार में यह स्मियकर
समाचार घोपित हुआ। अग्निों सर से अधिक विस्मय
जिस रात से हुआ वह या इस धातु का अदुन म्यभार ।
अपने आप में से ज्योतिफणा विकीर्ण कर अपने को नाना
मौलिक पार्थ में रूपान्तरित करता हुआ आखिरकार सीसा
हो जाता है। इसे मानों एक वैज्ञानिक इद्रजाल कह सकते
हैं। यह बात पहले पहल जानी गई कि एक पातु से दूसरे
पातु का उद्भर हो सकता है।
जो पदार्थ रेडियम की जाति के हैं, अर्थात तेज छिटकाना
ही जिन का म्वभाव है, वे सभी जाति यो देने वाले
परापर ही अपने तेज का मूल धन पर्च करते रहते हैं। इस
अपव्यय की सूची में जो नेज पदार्थ पहले पडता है, उसका
नाम ग्रीक वर्णमाला के प्रथम अक्षर के नाम पर आरफा दिया
गया है। हिंदी वर्णमाला के हिसाय से उमे क कह सकते
है। यह पजिटिव जाति का एक परमाणु है। नवीन उद्भावित
एक यन के आकाश में जर इसे दौटाया गया तो उस यत्र की
भीगी हवा के कणों को प्ररल घेग से जाघात पहुचा कर इसने
.
३
निभ्य परिचय
जला दिया। यह जा गस्ता जर उटा उनी मर्गमे उसके
परिचय या रेपन रंगा अपिन हो गए। छिटया पर फेंगा
हुई तेज का एक और यणा है, इसरा नाम दिया गया है पीटा,
हिंदी में ग यह सरते है। यह नेगेटिन चार्ज किया हुआ
इलेक्ट्रा है। सपा घेग प्राण्ड है। चरने में गम्ने में पर
पतला पागन गप देने से आरफा परमाणु का देवा तर राम
होता है, जथान पर हालियम गैस या जाता है। योटा को
रोकने के गिये दो पागज लगते हैं। रेडियम के तूणीर में
इन दो ये सिया पक और यम्नु है । उसका नाम है गामा। यह
परमाणु या अति परमाणु नहीं है एक विशेष प्रकार की प्राश
रश्मि है। उसमा रिरण ग्थर यम्नु को भेट मरती है, जैसा
किरेगा रश्मि करती है।
परमाणु के पिण्ट में जर तर फोर नुम्सान नहीं होता तय
उसकी विशेषता अव्याहत रहती है। उस सीमान में यदि
दो चार इरेचद्रन छीन लिये जाय तो उमरे के निए
चंद्युतों की सप्या में उछ कमी पड सकती है रितु यह
कमी धातक नहीं होती। यदि उसके फेन्द्रवस्तु के पास ग्यजाने
में लूट पाट सम्भव हो तभी उस परमाणु की जाति यदर सकती
है। दृष्टात दिपाया जाय । एक गैस के आधार में केवलमात्र
नड्रोजन था। उस में जा फा कणिका दौडाइ गयी ; इस
नाइट्रोजन परमाणु के केन्द्र वस्तु में धका माग। उसपी प्रोटन
संस्थिति हिल गड इस प्रकार यह हाइड्रोजन और अक्सिजन
परमाणुलोर
1
गैस में रूपान्तरित हो गया। कैसे हुना यह भी पता दू ।
आल्फा कणिका के प्रचण्ड आघात से नाईट्रोजन के केन्द्र में स्थित
प्रोटन-सम्धिति से एक प्रोटन छिटक कर बाहर निकल गया।
आल्फा कणा ने उसे हटा तो दिया किन्तु स्वय जा फसी
उनके दल में। इससे उनका वजन बढ़ गया और वे दो गैसो का
रूप धारण कर गये।
इसी लिये विज्ञानियों ने पहले आशा की थी कि तेज का वार
करने वाले इस रेटियम गोलदाज को परमाणु केन्द्र की पूजी
लूटने की राहजनी में नियुक्त करेंगे। लेकिन रक्ष्य एत
सक्षम है और निशाना मारना महज नहीं है। तेज के जनेक
ढेले मारने के बाद सयोग वश एक लग गया तो लग गया।
इसी लिये इस प्रकार की अनिश्चित लडाइ के पदले आज कल
विशाल यत्र तैयार करने का आयोजन चल रहा है, ताकि
अति प्रचण्ड शक्तिशाली वैद्युत पैदा हो कर परमाणु के केन्द्र
दुर्ग के दुर्भेद्य पहरे को भेद सके। हा प्रपल प्रचण्ड शक्ति
का पहरा है। आज जिस समय लास लाख मनुष्यों को
मारने के लिये महलानी यत्रो का उद्धावन हो रहा है ठीक
उसी समय विश्व के सक्ष्मतम पदार्थ के अलक्ष्यतम मम को
विदीर्ण करने के लिये विराट् वैद्युत वर्पणी का कारखाना
बनने जा रहा है।
पहले ही कहा है कि आत्फा कणा म्वरूप खो कर के
हीलियम गैस हो जाती है। इसको पृथ्वी की उमर ते करने के
निय पग्निय
काम में लगाया गया है। रिसा पहार ये एक पन्धर में यदि
मामृती मात्रा में भी हरियम गैम पाया जाय मोस गैस का
परिणति में जो निरिए समय रगता है उस या हिसार का ये
उस पहाड का जम कुण्डली तैयार की जा सकती है। इसी
प्रणारा मे पृथ्वी की उमर फा विचार किया गया है।
मजन के भारीपा में हाइड्रोजा गैस पेटीक ऊपर के
पाने में जो गैस है उसका नाम हीरियम गैस गा गया है।
यह गैस विशानियां भी दुनिया में नया ही जागा गया है।
यह पहले पहर गय ग्रहण के ममय मालूम हुआ था। सूर्य
अपने चर की सीमा तिप्रम कर के गायों फीस दर तर
जग्ने मुए वाष्प का अति सुक्ष्म उत्तरीय चादर (चादर)
उहाया करता है, जिस प्रकार भग्ना अपने चारों ओर
जरमण का उहग फैला देता है। इसी लिये प्रहण के
समय दृवीन मे उसके चारों ओर के आग्नेय गैस का
निम्तार दिखाई पड़ता है। इस दूरनिक्षित गैस पी दीप्ति
को यूरोपीय भाषा मे रोना यहा जाता है, हिंदी में इसे
किरीटिका रह सकते हैं।
कुछ दिन पहरे सन् १९३७३० पे सूर्य ग्रहण का मुयोग पा
पर जब इस ग्रीिटिका की परीक्षा की गई तो उस समय वर्ण
लिपि की नीर मीमा की ओर ती अज्ञात सफेद लकीरें
दिनाह दीं। पंडिती ने सोचा फि ग्यूर संभर यह कोई आगे
का जाना हुआ ही पदाथ है जो अधिक जलने के कारण नई
परमाणुलोक
३.
दशा को प्राप्त हो गया है, और यह उसी का चिह्न हे
या पहत
सभव, कोई नया पदाथ ही जाना गया। अब भी उसका कुछ
पता नहीं चला।
सन् १८६८ ई. के ग्रहण के समय भी पिज्ञानियों को एक
ऐसा ही आश्चर्य हुमा या। सूर्य के गैस के घेरे मे से एक
ऐसे पदार्थ की लिपि प्राप्त हुई जिसे तब तक कोई जानता
नहीं था। इस नये जाने हुए पदार्थ का नाम दिया गया
हीलियम अर्थात् सौरक ग्यो कि उस समय सोचा गया था
कि यह गैस केले सौरमण्डल में ही है। याद को १० वर्ष
गीत जाने पर विख्यात विज्ञानी रैमजे ने इस गैस के अस्तित्व
का पता अति सामान्य मात्रा में पृथ्वी के वायुमण्डल में पाया ।
उन समय स्थिर हुमा कि यह गैस पृथ्वी पर दुर्लभ है। इस के
नगद देखा गया कि दक्षिण अमेरिका के किसी मिट्टी के तेल के
पदान में जो गैस पाया जाता है उस में हीलियम काफी मात्रा
में मिलता है। फिर तो इसे काम में लगाने में सुविधा हुई।
अत्यत हल्का होने के कारण बहुत हाल तक हाईड्रोजन गैस ही
हवाई जहाज उडाने के काम में राया जाता था। लेकिन
हाइड्रोजन गैस उडाने के लिये जिस प्रकार आसानी से काम
देता है, जला देने में भी उस से कम नहीं है। इस गैस ने
अनेक बडे बडे हवाई जहाजों को जला कर राव कर दिया है।
हीलियम गैस में उस छिपी हुइ प्रचण्ड ज्वल्न चण्टी का निवास
नहीं है। हाईड्रोजन को छोड कर अन्य सभी
थ्वि परिचय यह गघिस हका है। रसा लिये जहान उहाने के काम को निरापद बनाने के लिये अब इसी का व्यवहार होने लगा है। चिकित्सा के लिये मी पिसी स्सिी गेग में इम का प्रयोग शुम पहले हा बताया गया है कि पजिदिन चार्ज वाले और नेगेटिव वार्न थाले पदार्थ परम्पर एक दूसरे को अपनी ओर सींचते हैं। रेरिन एक ही जाति के चार्ज याले पदार्थ पर दूसरे को ठेल कर फेर देना चाहते हैं। उन्हें जितना ही नज दीर किया जाता है उनके ठेल्ने का पैग उतना ही उग्र हो उटता है। इसी प्रकार विपरीत चार्ज वाले परम्पर जितने ही नजदीय आते जाते है उतना ही उनके आरर्पण का जोर पढता जाता है। इसी लिये जो बद्रन केन्द्र वस्तु के पास रहने हैं ये आर्पण के वेग मे बचने के लिये और तेजी से दीटा करते हैं। सौर मण्ट में भी जो ग्रह सूर्य के जितने ही निक्ट है वे उतने हा तेन दौडते हैं। दूर के ग्रहो को विपत्ति का डर कम रहता है, वे बहुत कुछ धार भार मे, मीनान के सार, चलते हैं। दो प्रोटनो की पारम्परिक निमुपता का जोर समझाने के रिये रसायनिक पडित फेडरिक माडी ने हिसाव लगा कर ताया है कि यदि पृथ्वा के एक मेर पर पर ग्राम प्रोटन रसा जाय और दूसरे मेह पर और एक ग्राम तो इस चार हजार माल की दूरी को अतिक्रम करके उनरे धका मारने का जोर प्राय ६ सीमन के दबाव के गवर होगा। अगर यहीं विधान हो तो यह
परमाणुगेक
39
समझना मुश्किल है कि परमाणु केन्द्र की अनि मकीर्ण सीमा
में पक से अधिक प्रोदन किस प्रकार मिलजुल पर रह सकने
हैं। 'स नियम के अनुसार हाईड्रोजन (जिस के फेन्द्र में केवल
एक प्रोटन का एकछत्र राज्य है) को छोड कर विश्व का और
कोई पदार्थ तो टिक ही नहीं माना ,
और फिर विश्व जगत्
नो हाइड्रोजनमय ही हो उठना ।
पर हम देखते हैं कि यूगेनियम धातु में २ प्रोटन और
५.न्यूदा है। यह ठीक है कि इतनी बडी भीट रह सँभाल
नहीं सकता, प्रतिषण अपने फेन्द्र भाण्डार मे प्रोटन और न्यू
ट्रन का योझा हत्या करता रहता है। भार जर कुछ कम हो
जाता है तो वह रेडियम का रूप ग्रहण करता है, और भी कम
होने पर पलेनियम और सबसे गत मे सीसा रा रूप धारण
करके स्थिति पाता है।
जन में इतना फाट जुट करके भी वह किस प्रकार स्थित
रहता है, यह मन्देह तो दर नही हुआ। निकिरण पा कर्तव्य
करके भी मय घुछ कट ऊँट जाने के याद सीसे के हक में ८२
मोटा पच रहते हैं। पजिटिव वैद्युत फा धधामार म्यभाव
पा पर भी ये प्रोटन किस प्रकार परमाणु लोर की शाति रक्षा
करते हैं, इस सवाल का अच्छा जवाय याहुत दिनों तक की
जांच के बाद भी नहीं मिला। केन्द्र के याहर तो इनका झगडा
मिटता नहीं, ऐकिन केन्द्र के भीतर इन की मित्रना अटूट है,
यह पर विषम समस्या है।
बिम्ब-परिनय ग्स रम्य या भेग्नये निययंत्र शनि यायर पदया गया। परमाणु केन्द्रगत प्राटा रुपान्य द्धि परीक्ष यो ने प्रोटा या पल्टन गा 11 जिम सप्या में पंद्युत शाी रन्हें समादे पर चगानी, उम से प्रोटनों में प्रति सेकेन्ड '७२० मार पागनि मिर्ग। नोभी केन्द्रग्गिन प्रोटन गण अपने प्रोटन धम की रक्षा करते रहे, जाममणपारी प्रोटनी का धया मार कर फेंक दिया। नाइना शक्तिका घेग सीर यढा दिया गया। पिनियों ने गति का घेग यदा यर ७७०० मार प्रति मेमेन्ट कर दिया, शिकार फिर भा हार मानीको राजा नहीं हुमा। अत में ८.०० मील वेग यावा मारने पर विरुद्ध शक्ति में कुछ नम पदन पे लक्षण दिया क्यिाने पाली शक्ति की मेट लांघ पर नाममणकारी शक्ति केन्द्र दुग के भीतर पहुंची। देखा गया कि एक प्रोटन के भय प्रोटा ये जितना निफ्ट पहुचने पर उनकी परम्पर को धमा देने धारी प्रवृत्ति जाती रहती है, वह निकटता है पर इच 2०,००,००, ००,००,००० हिस्से पर सटकर रहना। नो दम से यह मान ऐना पड़ेगा कि उतने सामीप्य पर प्रोटनों में परम्पर पो ठेल फाने की जो शक्ति है उस मे कहा अधिर शचि है परम्पर को आरर्पित पर गपने की। महापर्य (भारपण) शक्ति की अपेक्षा इसका जोर कह गुना अधिर है। यह शक्ति परमाणुर्भा की दुनिया में प्रोटन को जिस प्रकार आरट करती है उसी प्रकार न्यूद्रन को भी, अर्थात जिस के ऊपर वैद्युत का नाज है और
रश्मि या फम्मिक रश्मि नाम ।
के राष्ट्रतन्त्र में यह बडी शक्ति मयtutensifa
जो स्वभारत नही मिलते वे भी मिHE Attrn
कर रहे हैं। इस से मालूम होताrtifier
पदाथ भलमनसी की शान्ति नहीं ?
उन्हें मिला लिया गया है तब यहFALorter
समय उनके हिसार में गोलमार mitr.
का अस्तित्व मालूम हुआ। इetizama
परमाणुगर
जिन के ऊपर नहीं है, इन दोनो ही पर उममा
परमाणु
केन्द्रनासी यह अति प्राट आय. array
विध को गाँरे हुए है। जिस शासन ने पाrantiy
झगडे को मिटा रखा है उसी के प्रताप
विराजमान है।
जाधुनिक इतिहास से इसी एक Terierritory
चीन रिपब्रिक की शान्ति नष्ट कर ये Raran
जेनग्ल आपस में लड़ाई करके देश की fursery
राष्ट्र के केन्द्र स्थल में इस निम्न्द 77 kurrey fr
अगर होती तो शासन के कार्य में इन 7 trarware
शक्ति को बलिष्ठ और निरापद ग्यन x rrang
हुआ है। जो स्वतन्त्र भाव से मन fre
धंद्युत सन्धानी गण जा रहा
पर सृष्टि के वाहन बने हुए है।
मियपरिचय
मि यह मरते हैं। कहा से यह शनि ना रही है, उसमझ
में नहीं आया पर रमे टेया गया सवय! ऐसी कोई वस्तु नहीं.
पमा कोर जीव हा जिसरे ऊपर सिमा हस्तक्षेप नही चना।
यतां नर पि गानु द्रव्य वे
परमाणुना का भी यह चोट मार पर
उत्तनित कर देती है। ये रिण शायद जीन की प्राणशक्ति
या महायता कर रही है, या शायद रिनाम कर रही है, क्या
करना हैं मालूम नहीं, रतना हा निमशय कहा जा सकता है गि
गवान कर रही है।
सम्मिर रमियों का दम प्रकार जो निरन्तर चर्पण चर
रहा है, उसकी उत्पत्ति का रहस्य भगात ही रह गया। रिन्तु
जाना गरा हि नया उद्यम पिपुर है, सारं नासमान को छा
माग्नका सञ्चार हो रहा है , जर मे, स्थल में, आगश में, सर्वत्र
ही ग्ना प्रवेश है। रम महा आगन्तुर के पाठे विधान या
गुनचर गर लगा हुआ है, किसी न किसी गि सरा गुप्त
टिमाना भी मालूम हो कर ही रहेगा।
यदुन से रोग कहते हैं कि पम्मिर प्रकाश प्रमाणही
रैटगन रमि से नहीं धिर जोगर। इसी रिये ये रश्मियाँ
सहज ही मोटा मोसा या मोटा सोना पार र निपल
जाता हैं। दिशानियों की परीक्षा मे इतना ही जाना गया है
कि इस प्रकाश के साथ वैद्युत कणिकाय है। पृथ्वी के जिस.
मेन में चुभ्सीय शनि अधिक है, उसी में आर्षण से ये
अपने रम्ते मे हट र मेर प्रदेश में जमा होनी है, रमी लिये
परमाणुलाक
५
पृथ्वी के विभिन्न स्थानों में कस्मिक रश्मि के समावेश की अधि
कना या अल्पता दिखाई देती है।
कस्मिक रश्मि के सम्बन्ध में आज भी नाना मतों का आना
गमन चल ही रहा है। परमाणु के नूतन तत्त के सूत्रपात होने
के बाद से ही विज्ञान की दुनिया में मतों और मन्तव्यों का
हडकम्प मच गया है, विश्व के मूल कारयाने की व्यस्था में
धु रत्व का पवा सक्न पोज निकारना असाव्य हा गया है
यदि कोई वस्तु नित्यन्त की प्याति पा सकती है तो वह केवल
एक आदि ज्योति है, जो मर-युछ की भूमिका में है, जिस के
प्रकाश के नाना जरस्थान्तर्ग के भीतर मे विश्व का यह वैचित्य
गठित हो उठा है।
-
नक्षत्रलोक
यह ना धियापा नाप नगर देखा गया। हा
यता ये सम्मिरन से ग्रह नक्षत्रों में या पगेर प्रमागित
हा रहा है।
शुरू में हा कह रपना, यह जानीया कार उपाय नही
वि स चि ब्रह्माण्ट या मा चेहरा पैसा है। विश्व
पदार्थ या पद्न पाडा हा हमें दिगार देता है। इस ये सिया
हमार्ग आग्य, कान और म्पर्शन्द्रिय यी अपनी विशेषता है।
रसा रिये निव के पदार्थ विशेष भार से, विशेष रूप में, हमें
दिपाइ देते हैं। लोगों में तरग टरराती है, हम प्रकाश रेसने
हैं, और भी सूक्ष्म या और भी रघर तरंगों को देखने की शक्ति
हम में नहीं है। जाउ देखते हैं यह यहुत धोडा है, जो युछ
नहा देवते यह बहुत अधिक है। हमारे बाप और फान इसी
तरह ये हैं कि हम पृथ्वी या व्यवहार चला सके प्रति ने
यह खयाल नहा क्यिा रि
हम
विगानी बनेंगे। मनुष्य की
जाच अणुपीक्षण और दूरपीन इन दोनों का काम समान भार
से कर रही है। प्राति ने यदि हमें आज भी आप से कर
गुना अधिक अणुवीक्षण शचि सम्पन्न आय दी होती तो हम
पृथ्वी के समस्त पदार्थों में अणु परमाणुओ का भारत नृत्य
नक्षत्रलोर
१३
देखते। यदि गोर की सीमा बढ़ जाता या गोध की प्रकृति
अन्य प्रकार की होती तो हमारी यह दुनिया भी दूसरी ही तरह
की होती।
सच पूछा जाय नो विज्ञानी के लिये वह दूसरी ही तरह की
हो गई है --वह इतनी बदल गई है कि जिस भाषा में हम काम
चलाया करते हैं, उसका अधिकाश इस दुनिया में किसी काम
नहीं आता। प्रति दिइस प्रकार के चिह्नों की भाषा तैयार
करनी पट रही है कि साधारण मनुष्य उसका सिर पैर कुछ
भी नहीं समझ सकता।
मनुष्य ने एक दिन स्थिर किया कि विश्वमण्डल के केन्द्र
मे पृथ्वी का आसन अविचल है और सूर्य-नक्षत्र उसकी प्रद
क्षिणा कर रहा है। यह बात मानने के लिये उसे दोप नहीं
दिया जा सकता,उसने पृथ्वी देखने की सहज जाप से ही
देखा था।
आज उसी वक्षु शक्ति बढ गई है--उले उसने
विश्व-देखने की आय बना ली है। अब यह भेद सुल गया है
कि पृथ्वी को ही, दग्वेशी नाच की तरह चकर मारते मारते सर्य
ये चारों ओर भागना पट रहा है। रास्ता लवा है, प्राय 3६..
दिन घूमने में ही लग जाते हैं। इस से भी पडे रास्ते बारे
ग्रह है, उनके एक बार घूम जाने में इतना अधिर समय लगता
है कि उतने दिनों तक रचे रहने के लिये मनुष्य को लोमश
मुनि की आयु दरकार होगी।
रात में आकाश के नीच वीच नक्षन पुज
के साथ पुनः
विश्व परिचय
दृग प्रगाश निमाइ देता है। ग्ना नाम नीहारिका दिया
गया है। दूग्गीन और फैमरे के योग मे जाना गया है कि
गम नीहारिका में नक्षत्रों की जो भीर रगी हुई है उनकी
सग्या वर गेट है। हारिया मण्डर में नक्षत्री की जो
भीड जन्यात प्राण्ट वेग में दौड रही है वह परम्पर धपापा
कर चूर्णपिचूर्ण क्यों नहीं हो जाती ? उत्तर देते समय चैनय
हुना कि इस नक्षत्र पुज गे भीद यांना गती है। इन
गरे से गला मिला कर या सटकर रहने या मार पक्दम नहीं
है। एक दूसरे मे अत्यन अधिर दूरी पर ये चलते फिरते
है। परमाणु के अतर्गत इलेक्द्रनों के गति पथ की दूरी
माध में सर जेम्स जीन्स ने जो उपमा दी है इस नक्षन मण्डली
के सार में भी उसी प्रकार की उपमा दी है। वे कहते हैं कि
लण्डन में बाट नामक एक स्टेशन है। जहां तर मुझे जान
पटता है, यह स्टेशन हापडा स्टेशन से बडा ही है। मर
जेम्म जीस कहते हैं कि उस स्टेशन से और सर पूछ ग्यालरी
करके केवल छ धूलि कण यिग्वरा दिये जाय तर भामाश के
नक्षत्री का एक दूसरे में जो दूरत्व है वह सय धूलि कणा के
विच्छेद के माथ तुटनीय हो सस्ती है। वे और भी रहते
हैं कि नक्षनों की साया जितनी भी पी न हो, जाफाश
की अचितनीय शयता के साथ उसकी तुरना हो ही नहीं
मरनी।
नक्षत्रलोक
अभिनय आरभ होने के बहुत पहले केवल एक परिव्याप्त चलन्त
चाप ही वतमान या। सभी उष्ण पदार्थों का यह धर्म है कि
वे धीरे धीरे ताप त्याग करते रहते हैं। पौरता हुआ पानी
पहले भाप न कर निकल आता है। ठडा होते होते उस
याप के भीतर एक एक कण पानी इकट्ठा होता है। अत्यन्त
गर्मी पहुचाने से कठिन पदार्थ भा गैस हो जाता है , उसी
परिमाण में जर गर्मी थी उस समय विश्व के हल्के या मारी
सभी पदार्थ गैस के रूप में थे। करोड करोड वर्प से वह ठडा
हो रहा है। गर्मी कम होते होते ऐसी अवस्था आई जव उस
गैस मे छोटे छोटे टुकडे धन हो कर टूट पडे। यही निपुल
सस्यक कण तारों के आकार में दर वाध कर नीहारिका गठित
किये हैं। यूरोपीय भाषा में इसे नेचुग (बहुवचन
नेव्यूल ) कहते हैं हमारा सूर्य एक ऐसी ही नीहारिका के
अन्तर्गत है।
अमेरिका के पक पर्वत के शिखर पर एक विशाल दरवीन
म्यापित किया गया है, उस की सहायता से एक बहुत बडी
नीहारिका दिसाइ पड़ी है। माण्ड्रोमीडा नामक नक्षनमटली
के भीतर यह नीहारिका वर्तमान है। इसका आकार बहुत कुछ
गाडी की पहिए के समान है। यह पहिया घूम रही है । एक
एक चक्कर लगाने में उसे प्राय दो करोड वर्ष लग जाते हैं
इस के पास से पृथ्वी तक प्रकाश आने में साढ़े आठ लाय वर्ष
--
लग जाते हैं।
विश्व पारचय
नक्षत्रों की दूग के माध में मय से पहले महारिमानी
न्यूटन एक अदाजा लगाया था। उनकी परती युक्ति यह
था कि नक्षत्र गण ग्रहो की भाति सूर्य के चारो ओर नहा घम
रहे हैं। वे इतो दूर हैं कि मूर्य या आमर्पण उन ना नहीं
पहुच पाता। दृमरी रात यह कि म्यनाम धन्य पुरुषों की नाई
रे अपने ही प्रकाश से प्रकाशित है। नीसग सिद्धान्त यह था
कि कार पुरुष के नक्षत्र जितने उचल दिग्प रहे हैं, उतना
उन्न्य दिपने के न्येि सय को, अपनी दूरी से लापों गुना
अधिर दूर्ग पर जाना पडेगा। न्यूटन का हिसार वित्पुर
ठीक रहा हो, मी गात नहीं है, किनु उस समय के लिये यह
पूर पडे ढग की दूरी का निर्देश दिया गया !
हमार सर मे निक्ट का जो
नक्षन है, जिसे हम
अपने
नारा-मुहल्ले का पटोसी कह सकते हैं, उसकी दूरी को सग्या
में सजा पर समझाने की कोशिश करना बेकार है। सप्या
मे पधी हुई जिस दूरी को मोटे तौर पर समझाना हमारे
लिये सहज है, वह हमारी पृथ्वी के इस गोलर में ही सीमित
है, जिसे हम रे से, मोटर से या स्टीमर से चरने चलते माप
जाने है। पृथ्वी को छोड कर नक्षत्र वस्ती पी सीमा धागते
ही अकों की भाषा पागलपन जान पड़ती है। गणित शास्त्र
नाक्षनिए हिसार से सण्या के जो अण्डे देता है यह मानो
पृथ्वी के यहुप्रसू (यहुत यया देने वाले)ीडों की ही नकर
चरना है।
।
नथलोक
29
साधारणत हम कोस या मील के हिसार से ही दूरी की
गिनती करते हैं, नक्षत्रों के साथ में इसी रीति से काम ले
तो अकों का योझा ढोना मुश्किल हो जायगा। अव्वल तो
सूर्य ही हमारे यहा से बहुत दूर है। नक्षत्रों का दल उस मे
भी लामों गुना अधिक दूर है। इनकी दूरी का हिसार अर्को
से करना वैसा ही है जैसे कोई काँटी से हजार हजार मोहगें
की गिनती करे। सन्या का सकेत बना कर मनुष्य ने लिपने
का गोझा हल्का किया है। हजार लिपने लिये उसे हजार
लकीरे नहीं खानी पड़तीं। किन्तु इस मकेत से ज्योतिष्क
लोक के माप का काम नहीं चलता। इसी लिये एक सरेन
खोज निकाला गया है। इसे प्रकाश का माप कह सकते हैं ।
पक वर्ष में प्रकाश ८८००० करोट मील चलता है। मर्य के
चारों ओर पृथ्वी के घूम आने में जो सौर वर्ष होता है यह जिस
प्रकार ३६५ दिनों के माप से मापा जाता है, उसी प्रकार
नक्षत्रों की गति विधि, उनकी सीमा और सरहद्दी का माप,
प्रकाश की सालाना गति की मात्रा से गिना जाता है। हमारे
इस नक्षन जगत् का व्यास अन्दाजन् एक लाख प्रकाश पप
के बराबर है। और लाखों नक्षत्र जगत् इस के बाहर हैं।
डा दूसरे गांव के नक्षत्रों में से एक का परिचय फोटोग्राफी
मे मालूम हुआ है, यह प्राय पचास लास प्रकाश वर्ष की दूरी
पर है। हमारे सबसे नजदीकी पडोसी नक्षत्र की दूरी चार
प्रकाश-वर्ष की है। उसके जिस क्षण का प्रकाश अभी अभी
-
शिव पापचय
नक्षत्रों की दूरा के सम्र में मय से पहले महाविनानी
यूटन ने एफ अदाना लगाया था। उसकी पहली युति यह
गकि नमन गण ग्रहो की भाति सूर्य के चागें ओर नहीं घुम
रहे हैं। वे इतने दर है कि सूर्य या आर्पण उन तक नहीं
पहन पाना। दृसग यान यह कि म्यनाम धन्य पुरुषों की नाई
ने अपने ही प्रकाश में प्रकाशित है। नीसग सिद्धाल यह था
गि काल पुरुष के नक्षत्र जितने उञ्चल दिन रहे हैं, उतना
उज्ज्चर दिखने के रिये सय को, अपनी दृरी मेरापी गुना
अधिक दूरा पर जाना पडेगा। न्यूटन का हिसार पिल
ठाक रहा हो, सो पात नहीं है, पितु उस समय के लिये यह
न पडे हग की दूरी का निर्देश दिया गया था।
हमारे सर से निस्ट का जो नक्षत्र है, जिसे हम अपने
नारा-मुहल्ले का पडोसी कह मकते हैं, उसकी दूरी को सग्न्या
से सजा कर समझाने की कोशिश करना बेकार है। सण्या
मे वधी हुई जिस दूरी का मोटे तौर पर समझाना हमारे
लिये सहज है, वह हमारी पृथ्वी के इस गोल्य में ही सीमित
है, जिसे हम रेल से, मोटर मे या म्टीमर से चरते चलते माप
जाते हैं। पृथ्वी को छोड़ कर नक्षत वस्ती की सीमा धांगने
हा नकों की भाषा पागलपन जान पड़ती है। गणित शास्त्र
नाक्षनिक हिसार से सम्या के जो अण्डे देता है वह मानो
पृथ्या फे रहासू (यहुत यच्चा देने वाले) कीडों की ही नकर
करता है।
नक्षलोक
अव्वल तो
साधारणत हम कोस या मील के हिसाब से ही दृरी की
गिनती करते हैं, नक्षत्रों के समय में इसी रीति से काम ले
तो अकों का पोझा ढोना मुश्किल हो जायगा।
मूर्य ही हमारे यहां से बहुत दूर है। नक्षत्रों का दल उस से
भी लाखों गुना अधिक दूर है। इनकी दरी का हिसार अको
से करना वैसा ही है जैसे कोई कौडी मे हजार हजार मोहरो
की गिनती करे। साया का सक्त बना कर मनुष्य ने लिखने
का रोझा हल्का किया है। हजार लिखने के लिये उसे हजार
लकीरे नही खींचनी पटती। किन्तु इस सकेत से ज्योतिष्क
लोक के माप का काम नहीं चलता। इसी लिये एक सकेत
पोज निकाला गया है। इसे प्रकाश का माप कह सकते हैं।
एक वर्ष में प्रकाश ४८००० करोड मील चलता है। सूर्य के
चारों ओर पृथ्वी के घूम आने में जो सौर वर्ष होता हे वह जिस
प्रकार ३६५ दिनों के माप से मापा जाता है, उसी प्रकार
नक्षत्रों की गति निधि, उनकी सीमा और सरहद्दी का माप,
प्रकाश की सालाना गति की माना से गिना जाता है। हमारे
इस नक्षत्र जगत् का व्यास जन्दाजन् एक लाख प्रकाश पप
के रार है। और लासों नत्र जगत् इस के बाहर
उस दूसरे गांव के नक्षनो मे से एक का परिचय फोटोग्राफी
से मालूम हुआ है, वह प्राय पचास लास प्रकाश वर्ष की दूरी
पर है। हमारे सब से नजदीकी पडोसी नक्षत्र की दूरी चार
प्रमाण-वर्ष की है। उसके जिस क्षण का प्रकाश अभी भी
पिय परिचय नक्षत्रों की दुरा के समय में मर से पहले महाविती न्यूटन ने एक जदाजा लगाया था। डाकी पहली युक्ति यह या चि नक्षन गण ग्रहो की भाति सूर्य के चारों ओर नहीं घूम रहे हैं। वे ग्नने दर हैं कि सूर्य का लार्पण उन तक नहीं पहुच पाता। दूसरी बात यह रि म्बनाम धन्य पुरुषों की नाई ने अपने ही प्रकाश से प्रकाशित हैं। तीसग सिद्धान्त यह था कि गाल पुरुप के नक्षत्र जितने उज्या दिग रहे हैं, उतना उज्वल दिखने के लिये सूर्य को, अपनी दूरी से लापों गुना अधिक दूरी पर जाना पड़ेगा ! न्यूटन का हिसार पिकुल ठीक रहा हो, सो पात नहीं है, किन्तु उस समय के लिये यह यूर नडे ढग की दूरी का निर्देश दिया गया था। हमारे सर से निकट का जो नक्षत्र है, जिसे हम नारा-मुहल्ले का पटोसी यह सकते हैं, उसकी दूरी को माया से मजा घर समझाने की कोशिश करना बेकार है। सण्या मे गधी दुई जिम दूरी को मोटे तौर पर समझाना हमारे लिये सहज है, यह हमारी पृथ्वी के इस गोलर में हा मीमिन है, जिसे हम रेट से, मोटर से या म्टीमर से चलते चलने माप जाते हैं। पृथ्वी को छोट कर नक्षन यस्ती की सीमा धांगते ही अको की भापा पागलपन जान पटती है। गणित शास्त्र नाक्षनिस हिसार से सम्या के जो अण्डे देता है यह मानो पृथ्वी के यहासू (यहुन यचा देने वाले) कीडो की ही नकर करता है। अपो
क्षनलोक
साधारणत हम कोस या मील के हिसाब से ही दूरी की
गिाती करने हैं, नक्षत्रों के समय में इसी रीति से काम ले
तो अको का पोझा दोना मुश्किल हो जायगा। अव्वल तो
सूर्य ही हमारे यहा से रहुत दूर है। नक्षत्रों का दल उस से
भी लाखो गुना अधिक दूर है। इनकी दुर्ग का हिसार अर्को
से करना वैसा ही है जैसे कोई कौडी मे हजार हजार मोहरी
की गिनती करे। सरया का सक्त बना कर मनुष्य ने रिपने
का गोझा हल्का किया है। हजार लिपने के लिये उसे हजार
लकीरें नहीं सींचनी पडती। किन्तु इस समेत से ज्योतिक
लोक के माप का काम नही चलना। इसी लिये एक सकेन
खोज निकाला गया है। इसे प्रकाश का माप कह सकते है ।
एक वर्ष में प्रकाश ५८८००० करोड मील चलता है। सूर्य के
चारो ओर पृथ्वी के घूम आने में जो सौर वर्ष होता हे वह जिस
प्रकार ३६. दिनों के माप से मापा जाता है, उसी प्रकार
नवनों की गति विधि, उनकी सीमा और सरहद्दी का माप,
प्रकाश की सालाना गति की मात्रा से गिना जाता है। हमारे
इस नक्षन जगत् का व्यास अन्दाजन् एक लास प्रकाश चप
फे राबर है। और लाखों नक्षत्र जगत् इस के बाहर हैं ।
डा दूसरे गाँव के नक्षों में से एक का परिचय फोटोग्राफी
में मालूम हुआ है, यह प्राय पचास लाख प्रकाश वर्ष की दूरी
पर है। हमारे सबसे नजदीकी पटोसी नक्षन की दूरी चार
प्रकाश-वर्ष की है। उसके जिस क्षण का प्रकाश;
अभी
चिन्य परिचय
हमार्ग आखों को मिला है, अर तर उसे पीते चार वर्ष हो गये,
वह नक्षन भी तर से २० करोट मील दूर जागे निकल गया है।
ऐसा कोई उपाय नहीं कि किसी यदर समय के इस व्यनयान
को पार कर नक्षत्र की वर्तमान खबर पाइजा सके।
जार्या में देखने के युग
के याद दरपीन का युग जाया।
ज्यो यो दरवीन का शक्ति बढती गइ त्यो त्यों घरोक में
हमारी दृष्टि की परिधि भी बढती गइ। पहले जहां पाली
स्थान दिखता था यहाँ पर नक्षत्रों के झुंड दियाइ निये । तोभी
बहुत कुछ वाकी रह गया । परी तो रहता ही चाहिये। रमार
नक्षत्र जगत के बाहर ऐसे जगत भी हैं जिन की रोशनी दूर
पान दृष्टि के भी परे है। एक माम्ररी पत्ती की शिवा ८७
माल की दूरी पर जितना रोशनी देती है, ऐसी आभा को भी
दरवीन के याग से पाडने की चेष्टा में मनुष्य की आप हार
मान गई। दूगीन अपनी शनि के मुतारिक कापों को सरर
पहुचा देता है, लेकिन आपों के पास अगर इतनी शक्ति न हो
कि उस अत्यन्त क्षीण समाचार को गोध के कोठे तर पहुंचा
सके तो उपाय क्या है। किन्तु फोटोग्रफ ये परय (प्लेट)
की प्रकाश प्राहिणी शक्ति आपो से कहा अधिक है। इस
शक्ति का उद्धोधन विमान ने किया है, फोटोग्राफ को उसने
दृरतम आकाश में जार पाने के रिये नियुक्त किया। ऐसी
फोटोग्राफा बनाइ जो अधकार में चुप चाप दुर हुए प्रकाश पर
भी समन जारी पर सरे। दृरीन के साथ फोटोग्राफी और
घने नील रंग की तरगों का परिमाप पक इच के डेढ
जो तरग लहराती है, उसकी एक तरग की चूडा से परवर्ती
तरंग की चूडा तक का माप इतना है। लाल रंग के प्रकाश
का ज्वलन्त लाल रंग जर धीरे धीरे युझता जाता है, और
नक्षतलाक
भाजक्त
फोटोग्राफा के साथ चणेलिपि यंत्र को जोड दिया।
रसी शक्ति और भो पिचित्र कर दी गई है। सूर्य में अनेका
नेक पदार्थ गैस हो कर जल रहे हैं। ये सय जर पक साथ
मिल कर दियाई देते हैं तो उन्हें टोय वजा घर देगा मभर
नहा होना। इसी लिये एक अमेरियन विज्ञानी ने सर्य देगने
याला दरपीन बनाया है। इस से सूर्य में जलते हुए गैमो ये
सब प्रकार के रंगों से पक पक प्रकार का रग अलग निकाल कर
उसकी सहायता से यह विशेष गैसीय रूप देखना मभन हुना
है। इच्छानुसार केवल मात्र ज्वलन्त फैलसियम के अँगनी रंग
या अलत हाईड्रोजन के राल रंग में स्य को देख सकने मे
उसके गैसीय अग्निकाण्ड की अनेक सपरें मिल जाती हैं जो
और किसी तरह नहा पाइ जा सकता।
उजले प्रकाश को विभक्त करने से उसके वर्णसप्तक की एक
ओर दिखाई पडता है वैगनी रंग, और दृमरी ओर लाल-इन
दो सीमाधों के बाहर जो प्रकाश है, यह हमार्ग आखों को
नहीं दिपता।
करोड हिस्से का एक हिस्सा है। अथात् इस प्रकाश के रग में
का तरग ठीक इस मे दूनी होती है।
एक तपाये हुए लोहे
विश्व-परिचय दिपाई नहीं देता उस समय और भी पडे माप फी अन्य प्रकाश की तरंग उससे किरती गाती है। यह तरग यदि हमार्ग दृष्टि को जगा सस्ती तो उसलगल उजानी रंग के प्रकाश में हम थुझ गते हुए लोहे को देव सम्ने, फिर प्रीष्म पाल की सांस को यूप जर अंधेरे में मिल भी जाती तो भी इस लाल-उजानी प्रराश से पृथ्वी भाभामिाहो पर हमें दिगाइ देती। पियुर अधमार जैसी कोई चीज दुीिया में नहीं है। हम जिन्हें देग नहा सक्ने उनसे भी प्रयास है। नपरोक पर निविड फाले आकाश में भी निरंतर नाना प्रकार की विणे छिटा रही हैं। परिपि युन दुग्गीन फोटोग्राफ की सहायता मे इन अदृश्य दतों को भी दृश्य पट पर माच पर अनेर गुम यातों का पता लगा लिया जाता है। यंगनी पार का प्रमाणात उनानी के प्रकाश की तरह ज्योतिषियों ये इतने कामना नहीं होता। इसका पारण यह है कि इस छोटी नरग का यात घुछ पृथ्वी की हवा पार धरने में ही नष्ट हो जाता है। और यह दूर फे रोक फी पर देने लायक नहीं रह जाता। यह तरंग परमाणुगेफ की परर देती हैं। एक विशेष मात्रा की उत्तेजना मे परमाणु स्वेत प्रकाश से म्पन्दित होते हैं। तेज और भी यहने पर चंगनी पारवा प्रकाश दिपाई देता है। दौर भी बढ़ने पर जो रश्मि निकलती है वहीं एक्स रशिम (ण्यम रे) है। अन्त में परमाणु का पेन्द्र- वस्तु जब विचरित होता रहता है तो यह और भी छोटी रश्मि नक्षत्रलोक ले कर गामा रश्मि में जा पहुचता है। मनुष्य ने यत्र शक्ति को इतना बढा लिया है कि वह एक्स रश्मि और गामा रश्मि जैसी रश्मियों को भी देख और अनुभव कर सकता है। जो बात कहने जा रहा था वह यह है कि वर्णलिपि युक्त दूरगीन फोटोग्राफ की सहायता से मनुष्य नक्षत्र विश्व के अति दूरवर्ती अदृश्य लोक को भी दृष्टि मार्ग में ले आया है। हमारे अपने नक्षत्र लोक से दूर बाहर के अनेक नक्षत्र लोकों का पता रगा है। केवल यही नहीं, इस यत्र की दृष्टि में यह बात भी पडी है कि वे सर मिल कर हमारे नक्षत्र आकाश में और दूर- तर जाकाश में चक्कर काट रहे हैं। दूर आकाश में कोई ज्योतिर्मय गैस का पिण्ड, जिले नक्षन पहते हैं, जन हमारी ओर बढता जाता है या दूर हटता जाता है तर हमारी दृष्टि में एक विशेषता आ जाती है। वह पिण्ड स्थिर रह कर जितनी लम्बी प्रकाश की तरग हमारे पास पहुचा सकता, नजदीक आते रहने पर उस से अधिक और दूर हटते रहने पर उस से कम पहुचाता है। जिन सर प्रकाशों की तरंग मग्या में ज्यादा और लगाई में कम होती हैं उनका रग वर्ण- सप्तक में बैंगनी की ओर दिखाई देता है। इसी लिये नक्षत्रों के नजदीक आने और दूर जाने का सकेत भिन्न भिन्न रंगों के सिगनल से वर्णलिपि बता दिया करती है। दूर हटने की पर देता है लाल रंग और नजदीक आने की सबर चैगनी रंग। ""सीटी जाती हुई रेल्गाटी अब पास से विश्व परिचय उसकी आरान कानों को अधिक मादम होती है। क्यों कि सीटी हवा में तरंग उठा कर जो शद हमारे कानों तक पहुचाती रहती है वही गाडी के नजदीक आने पर तरंगों के पुजीभूत होने के कारण जोर की अनुभूति उत्पन्न करती है। प्रकाश में अधिक रग का सप्तक गनी का है। नीहारिका में जो उज्यस्ता है वह उसके अपने प्रकाश के कारण नहा है। जो नक्षत्र उस में भीड रिये हुए हैं वे ही उसे आलोकित कर रहे हैं। ठीक उस तरह से नहीं जिस तरह चांद को सूर्य आलोस्ति करता है। अथांत नक्षत्र का प्रकाश नीहारिका से टक्कर हा आ रहा है। नीहारिका के पर माणु नक्षत्र के आलोक को सोप देते है और फिर भिन्न प्रकार की रचाई के प्रकाश के रूप में उनकी रपतनी कर देते हैं। पीहारिका में और एक प्रकार की विशेषता दिखाई देती है। उस के भीतर बीच बीच में मेत्र की तरह काला काला पुता हुआ सा दिपता है, निरिडतम तारिकाओं की भीड में स्थान स्थान पर काले काले साली स्थान हैं। ज्योतिषी पर्न के पर्यवेक्षण से आकाश में इस प्रकार के प्राय दो सौ काले धचे दिपाई पडे हैं। वनई का अनुमान है कि ये धवे अस्वच्छ गैस के मेन है जो अपने पीछे के नक्षत्रो को ढके हुए हैं। इन में कुछ ननदीक है, कुछ दूर, कोई कोई छोटे हैं और कोई विशाल नक्षत्र रोक के पश्चाती आकाश में जो कम्नुपुक्ष हितगये कोई बहुत ।
नक्षनलोक हुए हैं उनकी निरिडता का हिसार करने से जाना जाता है कि यह बहुत ही कम है, प्रत्येक धनश्च में सिर्फ आधे दर्जन परमाणु । यह कितना कम है यह यात इसी से समझी जा सकती है कि विज्ञान के परीक्षागार में सब से अधिक शक्तिशाली पम्प के द्वारा जो शून्यता निर्माण की जाती है उसके भीतर भी पक धन इच में कई करोड परमाणु रह ही जाते हैं । हमारा अपना नक्षत्र लोक पक चिपटा चकर खाया हुआ जगत् है जिस में लाखों नक्षत्र भरे पडे है। उनके बीच बीच में जो भासमान है उस में अति सूक्ष्म गैस कही तो अत्यन्त रिल और कही अपेक्षाकृत घन है, कही उज्ज्वल और कही जम्वच्छ है। हमारा सूर्य इस नक्षत्र लोक के केन्द्र से दूर एक प्रान्त में स्थित एक नक्षत्र मेघ के भीतर है। नक्षत्रों की अधिक भीड नीहारिका के केन्द्र के पास होती है। सेंटानेस नक्षत्र का व्यास उन्तालीस करोड मील है और सूर्य का जाठ लास चौसठ हजार मील । सूर्य मझोले जाकार का ही तारा माना जाता है। जिस नाक्षन जगत् का एक मध्यविन तारा यह सूर्य है उसके समान और भी लाप-लास जगत् विद्यमान हैं। मब मिला कर जो यह ब्रह्माण्ड है उसकी सीमा कहाँ है, यह हम नहा जानते। हमारा सूर्य अपने सय ग्रहो को लेकर चधार मार रहा है और उसके साथ ही साथ इस नाक्षत्र चायतों के सर तारे चकर -एक ही केन्द्र के चारों ओर। चक्र प्रवाह मार रहे है,
रिश्च परिचय
का।
आकर्षण से सूर्य का गति वेग एक सेगेड में दो सौ मीट है।
गुमती हुइ पहिया से छिटपे हुए पफ की तरह यह (सर्य) मी
नयनचर में से छिटक पद्धता, किन्तु इस वा के हजार करोड
नक्षत्र उसे पाच पर पकडे हुए हैं और मयादा के बाहर नहीं
जाने देते।
इस जाकर्षण शक्ति की पर निश्चय ही पाटको की जाना
हुई है, नॉभी उसे रस विश्वपणना में से निकालने में पाम
नहा
चरने
मच हो या भूठ, पर नहानी मशहर है वि विशानी श्रेष्ट
न्यूटन ने एक दिन देपा वि पर मेरका फल दररत से गिग।
उसी समय उनके मन मे लगा कि फर नीचे ही क्यों आया,
ऊपर क्या नहीं उड गया। सोच कर उन्हों ने देगा कि पृथ्वी
सब युट को अपना और साच रही है, उस में साचने की एक
शक्ति है। इस शक्ति का नाम रखा गया Porrer of Grart
tatton जिसे हिदी में भगकर्ष' कह सरते हैं। जिस में वस्तु
परिमाण जितना ही अधिक है उस पर पृथ्वी का आकर्षण
उतना ही ज्यादा रग रहा है। केवल पृथ्वी ही क्यों, ऐसा
कोई पदार्थ ही नहीं है जो खीचता नहीं। यह जहर
कि
यीचने कि शनि पिसी में अधिर है किसी में कम। इस
के सिवा दूरच की कमी ज्याननी से
इस खिंचाव की भी कमी
ज्यादती होती है । जिस का यस्तु परिमाण दुगुना है, यह दुगुनी
वक्त से साचता है पर अगर दृर्ग भी गुनी हो जाय तो विचाय
,
नक्षत्रोक
चौगुना कम हो जाता है। दूगे और बांगुनी हो नो पिंचाय
१६.गुना कम हो जाता है। ऐसा अगर न होता तो सूर्य के
भाकर्षण से स्व कर पृथ्वी पर पुछ यत्र रहना कठिन होता।
इस पींचतान की पहलवानी में नजदीक की चीजों पर पृथ्वी
की ही जीन रह गई है।
दो विपरीत परमाणुओं के मिलन से जिस जगन् को रचना
हुई है उस में दो सर्वव्यापी निन्द शक्तियों की प्रिया चल रही
है, चलना और पोचना, मुक्ति और यन्धन । एक तरफ नो ब्रह्माण्ड
व्यापी महा दौड और दूसरी तरफ ब्रह्माण्ड यापी महा विचार ।
सभी चल रहे हैं और सभी खाच रहे हैं। चरना क्या है और
यहा से आता है, यह भी मालूम नहीं और पीचना क्या है और
यहा से आता है, यह भी मालूम नहीं। आज विज्ञान में
वस्तु का स्तुत्व अत्यन्त क्षीण हो आया है, यह चलना और
पीचना ही सब से अधिक प्रबल हो कर दिखाई पड़ता है.
अगर अमेला चरना हा होता तो वह सीधे रास्ते में ही
चलता रहता जिसका कोई ओर होता न छोर। आकर्पण उसे
घुमा कर फिरा कर सान्त सीमा में रे जाता है, और चक्र पथ में
घुमाया करता है। सूर्य एव ग्रहों के बीच गसो मील का
व्यवधान है, उस दूरत्व की शन्यता पार करके निरन्तर अशरीरी
आकर्षण की शक्ति चल रही है। इधर सर्य भी चहु कोटि
भ्रास्यमान नक्षनों से से हुए एष महा ज्योतिष्क के पार्षण से
चकर मार रहा है। विश्व की अणीयसी गति शक्ति की ओर
शिव-परिचय
1
गा, वहां मा विराद चालन-और निगद आफ्षण पीपय ही
इन्ोगा चल रही है। मर्य तथा न्य प्रहों यार में जारी
है, तुग्ना परफे देखा गया है पि अनि परमाणु जगन् पे मोटन
र इलेबद्रों की दूरी प्राय उसी अनुपान में है। आर्यण या
जोर उप राय को पार का इलेयदनी के दर योनित्य पार
के अन्यम्त भाग पर घुमा रहा है। यहा एक यार फिर से पार
गाना जरी है रि इलेक्ट्रा और मोटा में जो पगपर या
बारपण है वह मदार संगी नहा है, पद धुत थानाकर्षण
है। परमाणुगों के अत्तमा आफ्षण चैन का भार है,
गौर बाहर का भाषण महापर्ण का, जैसे मनुष्य पे घर या
विचार यात्मीयता या विचार और बाहर पासमाज नयधी।
हमारा यह गायत्र जगत् मानों बिग शून्य के भीतर पर
म्धित एक द्वीप है। यहा से दूर दूर और अनेश नाक्षत्र होप
दिपाइने हैं। हाद्वीपों में जो हमारे सबसे निकट है यह
आण्ड्रोमीडा यज पे पास दिगाई देता है। देखने में यह
एक धुधले तारे जैसा लगता है, बदा मे जो प्रकाश देनाइला
है रह गया पहले यात्रा यो निर चुया था। कुण्डली
भृत नीहारिकायें और भी है, और भी अधिय दृर्ग पर। उसमें
जो सब में दूरपनी है उस विषय में हिसाय लगा कर देगा
गया है कि यह ३००००००००० प्रकाश वर्ष घी दरी पर है।
सरनाक्षत्र जगतों का साया जिसमें गोरियोटि क्षत्र
जमा हुए हैं, मी फरोट में कम होगी।
नक्षनरोक
५७
.
जाज पल एक आश्चर्य की यान चल रही है। वह यह कि
नजदीक के दो तीन को छोड़ कर चाकीनाक्षय जगत हमारे पास
से प्रमश दर हटते ही जा रहे हैं। ये जितनी ही अधिक दृर्ग
पर हैं, उनफे दौडने का वेग भी उतना ही अधिक है। इन सर
नाक्षन जगतों से बने हुए जिस विश्व को हम जानते हैं घर, रिसी
किसी पडित के मन से, निरन्तर फूलता जा रहा है ।
यह जितना ही फूलना है उतना ही नक्षत्र पुज के परस्पर का
दृग्त्व रहता जा रहा है। जिस तेजी से वे हट रहे हैं उसके
हिसाब से और भी .३० करोड वर्ष चीतने पर उनकी पार.
म्परिक दृरी जाज की अपेक्षा दुगुनी यह जायगी।
अर्थात् इस पृथ्वी के भृगटन में जो समय लगा है उतनी
टेर में नक्षत्र निश्च आगे की अपेक्षा दुगुना फूट गया है ।
केवल यही नहीं, एक दल विज्ञाीयो के मत से इस वस्तु-
पुज संघटिन विश्व के साथ ही साथ गोरक रूपी आकाश मी
विस्फारित होता जा रहा है। उनके मत मे शून्य आकाश के
पिसी एक बिंदु से अगर एक सीधी लकीर पीची जाय
तो यह जमीम में न चली जा कर फिर उसी बिंदु पर आ
मिलती है। इसका मतलब यह हुआ कि जाफाश गोल्क मे
नक्षत्रों के जगत् उसी प्रकार घेरे हुए हैं जिस प्रकार पृथ्वी
गोलक को जीव जन्तु और वृक्ष लतायें। इसी लिये इस विश्व
जगन का फूल उटना उस जाकाश मण्डल के पिम्फारण के माप
पर ही है। किन्तु यह याद रखना चाहिये कि इस मत का
विश्व परिचय
म्यापन अभा पूर्ण रूप से नहीं हुआ है। आकाश असीम है,
फाल भी निरवधि है, यह मत ही प्रपल होता जा रहा है।
आकाश युयुद की तरह है या नहीं, इस विषय पर अनेक मत
उद्बुद की तरह ही उठे और पिलीन हो गये। इस प्रमग में
हमारे शास्त्री का मत यह है कि सृष्टि प्रलय की ओर जा रही
है। उसी प्ररय मे फिर नृतन मृष्टि उदभासित हो रही है,
उसी प्रकार जैसे नीट और जागरण यारी बारी से आते रहते
है। जनादि काल से सष्टि और भव्य का पयाय दिन और
गत की तरह पारी पारी मे आ रहा है, इस करपना को मन
में लाना ही सहज है।
पसियुस राशि में ऐगर नामर एक उन्चल नक्षन है।
उसकी उमलता ६० घटे तक स्थिर रहती है। उसके पाच
घटे याद उसका प्रभा एर तिहाइ कम हो जाती है। इसमें
बाद फिर उज्ज्वल होने लगता है। पाच घटे बाद पूर्ण उज्यस्ता
आ जाता है, यह पूर्ण ऐ वर्ष साउ घटे तक रहता है। इस
उज्यस्ता का कारण उसका जोडीदार नक्षत्र है। प्रदक्षिण
के ममय क्षण क्षण पर ग्रहण लगता और छूटता रहता है।
और पर प्रकारके नक्षत्र हैं जिन की दीप्ति किसी बाहरी
कारण से नही बलि भीतर के ही रिमी ज्वार भाटे से घटती
पढती रहता है। कुछ दिन तक समम्त तारा विम्फाग्नि
और फिर सरचित हो जाना है। उसरा प्रकाश मानो गाडी
यी पदकन है।
नक्षत्रलोक . और एक प्रकार के नक्षत्रो की रात कहनी है। इन्हों ने नाम पाया है, नये तारे। इनका प्रकाश एक अत्यन्त तेजी के साथ उज्ज्वल हो जाता है, हजार गुने से लेकर लास गुने नक। इस के बाद धीरे धीरे अत्यन्त मान हो जाता है, एक समय इन एकाएक जल उठने वाले तारों के आनिर्भार को नया आविर्भाव समझ कर इन्हें नाम दिया गया था, नये तारे । कुछ दिन पहले, गत वर्ष, लासेटा अर्यात गोधिका नामधारी नक्षत्र राशि के पास एक ऐसा ही नक्षत्र, जिसे नया तारा कहते हैं एकापक अत्यन्त उन्नत हो उठा। पक एक करके चार छिलके उसने उतार फेके। देखा गया कि इसके उतरे हुए छिलके एक सेकेन्ड में २२०० मील के येग से दौड पडे। यह नक्षन प्राय २६०० प्रकाश-वर्ष की दूरी पर है। अर्थात इस के गैस ज्वलन का यह उत्पतन जो नाज हमारी जापों को दिखाई दिया है, ईसामसीह के जन्म के ६॥ सौ वर्ष पहले पटित हुआ था। उसके इन उतार फेंके हुए छिलको का क्या हुआ, इस विषय का अनुमान लगाया जा रहा है। वह क्या उसका न्यन काट महाशन्य मे चिरागी होते जा रहे हैं, या उसी के आकर्षण मे बँध कर उसके जनुगत होते जा रहे हैं। यह जो तारों का जल उठना है, इस घटना पर विचार करते हुए किसी किसी पदिन ने कहा है कि सम्भपत नक्षत्र के इसी प्रकार के विम्फो रण से ग्रहों का उत्पत्ति होता है। सूत्र सभर, सूर्य ने भी एक दिन इसी प्रकार नये तारो की रोति अनुसरण करके अपने
विश्व परिचय
उत्साग्नि चिमिशा में ही प्रहरूपी मनानों का जम दिया
सर यह मन नगर ठीक हो तो मम्मपन प्रत्येक प्राचीन
नक्षत्र ापक ग्नि निम्फोग्ण की पाया प्रास होती है और
ग्स प्रकार ग्रह यश पीष्टि हाता है। शायद काश में पम
हा क्षत्र नि सतान हैं।
मग मन यह है कि यार या परचय आता हुआ तारा
परम्पर ये जारपण ये साये में आ पर इस प्रग्य फाण्ड से
घटाने में सहायक हुआ। इस मनो अनुसार पृथ्वी पी
उत्पत्ति की जायेचना याद में की जायगी।
हमार जान जगन् के मन ना जाति के हैं। कोई कोई
मर्य से श हजार गुना अधिक प्रकाश देता है, और पोर
कोइ साँचें हिम्मे फा हिम्सा। पिसी किसी का
पदाथपुञ्ज रहुत धन है भार किसी का नत्यत पतग। पिसी
फे ऊपरी सतह की नाप मात्रा ३० हजार सेन्टोग्नेड है, पिसी
क्सिी का तीन हजार मैटीमेट से अधिर नहीं, कोर कोई
चार यार प्रसारित और युञ्चित होते होते आरोक और उत्ताप
या ज्वार भाटा उठा रहे हैं, कुछ भले चर रहे हैं और कुछ
झुट बांध कर । ग्नकी सग्न्या नक्षत्र दल यी पप तिहाई है।
जाडे नक्षत्र महापं ये जाल में फंस कर प्रदक्षिण का अभिनय
कर रहे हैं। जोडे में जिस के आरर्पण की नारत पम है उसी
फे सिर पर प्रदक्षिण का जवानही पड़ती है। विचारी अचला
पृथ्वा कुछ पाच ही न रही हो सो गात नहीं है किन्तु मय फो
नक्षनलगेर
यहुत अधिक विचलित नहीं कर मस्ती। प्रदक्षिण का साग
अनुष्ठान अकेली पृथ्वी को दी यग्ना पड़ता है। जहा दा
ज्योतिकों के आकर्षण की शक्ति प्राय यराया यहाँ धीच में
लक्ष्य स्थिर रप कर दोनों ही उसी लक्ष्य की प्रदक्षिणा करते हैं।
किसी किमी जोडे को प्रदक्षिण का पर चार लगाने में
कई हजार वर्ष लग जाते है, कभी देया जाता है, चकार देते
देने पफ ने दूसरे को हमारी दृष्टि ये पथ से जार में कर दिया,
इस प्रकार उज्वलना में बाधा देता है। किन्तु मोट में करने
घाला नक्षत्र अपेक्षास्त अनुज्चर न होता तो उन्मत्ता में
चाधा न पडती। नक्षत्रों में एक दूसरे की उन्माता में काफी
भेद है। मिसी नक्षत्र ने, ऐसा भी होता है कि, अपनी सत्र दीप्ति
यो दी। प्रकाण्ड आयतन और प्रचण्ड उत्ताप ले कर जो
नक्षम अपनी पाल्य दशा शुरू करते हैं, वे पहले उजले होते हैं,
बाद में कुछ पीलापन लिये हुए और तीन पन बीत जाने पर
लाल हो जाते हैं। इसके बाद और भी ठडा हो जाने पर परच
करने लायक जो कुछ प्रकाश की पूजी रहती है उसे भी फूक
यैठते हैं। अन्तिम अवस्था में ये दिवालिये नक्षन अण्यात अन्य
कार में वास करते हैं।
चेटेलजियुस नामर एक महाकाय नक्षत्र है, उसकी लाल
गेशनी देखने से जान पडता है कि उसकी उमर काफी बडी
हो चुकी है, फिर भी यह झिलमिला रहा है। हाल ही में
खबर मिली है कि यह तारा वृद्ध नहीं, बालक
। हमारा सूर्य
६
.
विश्व परिचय
अधिक फूल
इससी अपेक्षा प्रौढ है। फिर यह है बहुत दूर, पृथ्वी ना
उसका प्रकाश जाने में । १० वर्ष लगते हैं। असल बात यह
गि रसका आयनन अनि विशाल है, अपने शरीर में करोड़ों
मयों को म्यान दे सस्ता है। उधर वृश्चिक राशि में पेन्टारेस्
नामर एक नथर है, उसका नायतन येटेजियुम से भी प्राय
दुगुना है। फिर ऐसे भी नक्षत्र हैं जो हैं तो गैसमय परन्तु
जन में लोहे से भी भारी हैं।
महाकाय नक्षत्र इस रिये पडे नहा हैं कि उनका यन्तु परि-
माण रहत
अधिक है, ने सिर्फ
यात
उठे हैं। फिर
ऐसे अनेक छोटे नक्षर है जिन की छुटाई के कारण उनरे
गैस का सम्मा टूस टूम कर बाधे हुए गहर की तरह है। सूर्य
का धनत्व इनके बीच का है, अर्गत् पानी से कुछ ज्यादा।
कैपेग नक्षन या जीसन घनत्व हमारी हना के समान है
रेक्नि यहाँ अगर हम हया पदरने की बात सोचे नो याद
रखना होगा कि परिवर्तन अत्यन्त अपित होगा। उसके ताप
की मात्रा ३० लाख मेटीग्रेड के आसपास है। इन सब को मात
घर गया है कारपुरुष मंडली का दाना नक्षन वेटेलजियुस
और धिर राशि वारा पल्टारेस। दारा घनत्य इतना अधिक
कम है कि पृथ्वी के किसी पदार्थ के साथ उनकी सुदर
तुरना भी नहीं हो सकती , गितान की प्रयोगशाला में सूर
पीच कर पम्प पिए हुए पात्र में जितनी पुछ गैस बची रह
है उसा के समान!
।
घनत्न जर के पचास हजार गुना पय हिम डिविया मे इसका गसमग यहाउनुमान से भी अधिक होगा। प्रारशियाना माप तो साधारण ग्रहों के समान मोटापन्न उमः बन्नु ड्योढे से कुछ कम हा पर मारियमयीका: नयालोक फिर दूसरे किनारे पर उजरे रंग के टिंगने नार। उन घनत्व के निकट लोहा या प्लेटिनम पुर मी नहीं पहुंच गपने फिर भी जम कर कटिन नही हो गये है, ये सय जय मय के ही मात्र हैं। नागे की मीनरी दुनिया में जी की जो प्रचण्ड आव है उसमें इलेक्दन गण प्रोटन के पान - विच्छिन हो जाते हैं, और तारोदारी की जवाबदेही से ही पा जाने हैं, दोनों दोनों का मान बचा कर चलने नोज अन्तर रह जाना नह कम हो जाता है, इस प्रकार उप- परमाणुनों में निग्लर सिर फुडीवल चरती रहना पर माणु की सी आयतन की छुटाई के अनुसार नक्षत्र का नायर मी छोटा हो जाता है। इधर इस तोड फोड र प्रा शान्ति-भग से गर्मी बढ़ जाती है, जो सहज मात्रा का आती है, और फिर घन गैस प्लेटिनम मे भी तीन तार गुफा भारी हो जाता है। इसी लिये ठिंगो नारे माप में सीट हैं, पर ताप मे नही, और वजन की मयादा में मा श्रद्धा या माठ देते हैं। सोरियस नक्षत्र में पर बम्पष्ट गणी नाग है। उपरा पुज का परिमाण सर्य के ही भमान है। सूर्यका अनन्य 4- ६ २ विश्व परिचय का उसी मात्रा का पदार्थ वजन में करीब दस हजार मन से भी अधिक होता। हमारे नाक्षत जगत् के नक्षत्रों के दल, कोर पूर्व में कोई दक्षिण में, नाना तरह के मागा से चल रहे हैं। में चारह मील के वेग से दौड़ रहा है, एक दाना ताग है जिसके दौडने का वेग प्रति सेकेण्ड सात सौ मील है। किन्तु अचरज का बात यह है कि ग्न मे का कोई भी नाक्षत्र जगत के शासन की जमना करके बाहर जा कर गाया नहीं हो जाता। एक महारष पे महाजार में करोडो नक्षत्रों को गंध पर यह जगत् हट्ट की भाति चक्कर मार रहा है। हमारे नाक्षत्र जगत् के बाहर के दूरवतों जगत् में भी यह आवर्तनृत्य जारी है। इधर पर माणु जगत् के अणुतम आकाश में प्रोटन और इलेचद्रन का चकर *मारना चल रहा है। इसी लिये हमारी भाषा में इस विश्व को जगत् कहते है। अथात यह चल रहा है, यही इसी सना है-- चरोसे ही इसकी उत्पत्ति है, वरना हा इसमा म्यभार । नाक्षत्र जगत् के देश काल का परिमाप, परिमाण, दूरत्व और उसके अगि आवर्त की चिन्तनातीत प्रचण्डता को देख कर जितना भी विम्मय क्यों न मालूम हो, यह रात माननी ही पडे गी कि इस विश्व में सरसे बड़े आश्चर्य का विषय यह है कि मनुष्य उसे जान रहा है, और अपनी आशु जीविका के प्रयोजन को अतिकम करके उन्हें जानने जा या है। शुद्र से भी शुद्ध क्षणभंगुर उसरा देह है, चिराट् निश्य-सस्थिति के अणुमान नक्षत्रलोक स्थान में उसका वास है, फिर भी असीम के कटर प्राप्त विश्य ब्रह्माण्ड के दुग्परिमेय वृहत और दुरधिगम्य सूमत्व का हिसार यह जानता है -इस से अधिक आश्चर्य की महिमा इस विश्व में कुछ भी नहीं , या पिपुल सृष्टि के निरपति काल में क्या पता कि और किसी लोक में और किसी चित्त को अधिकार करके और कोई भार प्रकाशित हो रहा है या नहा । किन्तु इस यात को मनुष्य ने सिद्ध कर दिया है कि भूमा शहर के आय ता में भी नहीं है, परिमाण में भी नहीं है, कही है तो वह अन्तर की परिपूर्णता में है।
सोरजगत् नवगण र दूसरे से करोड़ों मील दूर रह कर घूम रहे हैं इस रिये यह प्राय निश्चित है कि उन में परम्पर धका लगना सभर नहीं। पिसी किमी का अनुमान है कि प्राय दो सौ करोड वर्ष पहले ऐसी ही एक दुसम्भर घटना हो गई थी। उस युग के सूर्य के निकट एक विशाल नक्षत्र आ पहुचा था। इस नक्षत्र के आक्पण से सूय के भीतर प्रवद वेग से अग्निवाप्प ज्वार का तरगे लग उठी थी। अन्त में जार्पण के घेग से कोइ पोइ तरग इतनी बढी वि अन्त में टूट कर बाहर निकल आइ । पूर सभर, उस पडे नक्षन ने इन में से करयों को जात्म- सात कर लिया होगा, वामी टुक्डे सूर्य के प्रबल आकर्पण मे बिच कर उसी के चागे और चान काटने लगे। उन्हीं छोटे यडे ज्वलन्त वाप्प के टुण्डों से ग्रहों की उत्पत्ति हुइ , पृथ्वी उनमें से एक है। ये टुण्डे प्रमश तेजोहीन और सर्द हो कर ग्रह का आकार धारण कर गये। आकाश के नक्षत्रों की दूरी सन्या और गति का हिसार करके देखा गया है कि प्राय .. ६ हजार करोड वर्ष में पक र ऐसा उत्पात हो मी सक्ता है। ग्रह सृष्टि के इस मत को मान लिया जाय तो कहना होगा कि ग्रह परिचय चारी पक्षन सष्टि इस विश्व में प्राय अपटनीय ।
सौरजगत १७ घटना ही है। किन्तु, ब्रह्माण्ड की गण्ड गोल्फ सीमा के निरन्तर फूल उठने से नक्षत्र गण क्रमश एक दूसरे के पास से दूर हटते जा रहे हैं, यह मत यदि मान लिया जाय तो मानना पडेगा कि पूर्व युग में जय आकाश-गोल्फ सकीर्ण या उस समय नाराजो का परस्पर टकरा जाना प्राय सम्भव होता रहता होगा। उस नक्षमो के मेले की भीट के समय अनेक नक्षनों के छिन्न अश से ग्रहों की उत्पत्ति की सम्भावना थी, यह वात युक्ति मगत है। फिर ऐसा मान लेना होगा कि जिस अवस्था में हमाग सूर्य किसी अन्य सूर्य से टकराया होगा वह अपस्था उस सरचित विश्व के काल में जाजके समान दु सम्भव नहीं थी। जिन लोगों ने यह मत नही मान लिया, उनमें से अनेकों का कहना है कि प्रत्येक नक्षत्र के विकास की विशेष अवस्था में क्रमश एक ऐसा समय आता है, जिस समय वह पके सेमर के फल कीभाति फट कर प्रचण्ट वेग से अपने चारो ओर ढेर का-ढेर अग्नि वाप्प बिसेर देते हैं। किसी क्सिी नक्षत्र से आचानक इस प्रकार का ज्वलन्त गैस निकलते हुए देखा गया है। एक छोटा सा नक्षन था, कई वष पहले तक उसे दूरवीन की सहायता के बिना नहीं देखा जा सका था। एक बार अचानक वह दीप्ति में आकाश के उज्ज्वल क्षत्रों के प्राय समान हो उठा। फिर कुछ महीने याठ उसका प्रताप इतना क्षीण हो गया कि पहले के समान ही उसे दृग्गीन विना देसा ही न जा सका। उज्ज्वल अवस्था मे थोडे समय में इस नक्षन ने चारो ओर पुज पुञ्ज ६ विश्व परिचय ज्वलत याप रिवेर दिये, और वे ही पीरे धीरे घडे हो कर जम गये। इस प्रकार इसके द्वारा ग्रह उपग्रहो की सष्टि हुइ, यह अनुमान करना असगत नहीं है। यह मत आर मान लिया जाय तो कहना होगा कि करोड कराड नक्षत्र इस अरस्था के भीतर से गुजर चुरे है , अतए सौर मण्टल की भाति ही जपने अपने ग्रहों के दल रे कर कोटि कोटि क्ष-जगत् इस विश्न को पूर्ण दिये हुए है। पृथ्वी के सर से निकर जो TAR है, अगर उसके भी ग्रह मण्टली हो तो उसे देखने के लिये जितने रडे दृग्गीन की जरूरत है वह अब तक तैयार नहीं हुआ है। कुछ ही दिन हुए केम्ब्रिज के एक तरण पण्डित ने सौर जगत की सृष्टि के सरध में एक मत का प्रचार किया है। पहले ही कहा है कि आकाश में अनेक युग्म नक्षत्र है, जो एक दूसरे की प्रदक्षिणा कर रहे हैं। एनसे मत से हमारे सूर्य का भी एक जोडा था। पर घुमाड पारे ज्योतिप्य पिण्ड ने सूर्य ने उस अनुचर को एक धका मारा और उसे अनेक दृर छिटका कर चरता बना। उसके जात जाते भी परम्पर केआरपण से ज्वलन्त वाप्प का एक रहुन पडा मार सर निकल आया था , उससे भीतर इन दोनो की उपादान सामग्री मिली हुई थी। पाप सूत्र या जो यश सूय के प्रबल आकर्षण से रुक गया था, रसी गिरफ्तार गैस से हमारी ग्रहमण्टली पैदा हुई है। आयतन में छोटे होने के कारण इनके ठडे हाने में भी देर नहीं लगी, ताप कम होते होते गैस के टुकडे पहले तरर हुए, फिर और थी। इस सीरजगत ठडे होने पर उनका बाहरी भाग जम कर कड़ा हो गया। लेकिन भीतरी भाग अब भी उपण तरल गैसीय पदार्थों से भरा है। कहना आवश्यक है कि सर्य का सर कुछ गैस है। पृथ्वी के जो सर उपादान मिट्टी, धातु, पत्थर आदि के म्प में हैं उनमें का सर कुछ सूय में प्रचण्ट उत्ताप के कारण गैस की अनम्या में हैं। किरीटिका के जति सृटम गैम-आवरण की रात पहले ही कही गई है। उस स्तर को भेद करके जितना ही जाया जायगा उतनी ही धनतर गैस और उप्तर ताप दिखाई देगा। अन्त में ऐसे स्तर पर पहुचना पडेगा जहाँ ठसा ठस भरे हुए गैस में स्वच्छता रही रह जाती। इस स्थान पर दस हजार फारेनहाइट डिग्री का ताप है। इस जालोडित स्तर को जितना ही भेद करते जायेगे उतना ही घनल और ताप पढता जायगा। अन्त में केन्द्र में करोड ७० लास डिग्री का नाप मिलेगा। इस स्थान पर सूर्य का देह वस्तु लोहे और पत्थर से कहीं अधिक घसा है फिर भी वह गैस धर्मी है। इतने उत्ताप में सूर्य का साग गैस एक्स रश्मि में बदल जाता है। यहाँ एक्स रश्मि प्रकाश की चाल मे दौडती है ओर छिन्न कन्चन इलेक्ट्रन गण पक सेकेण्ट में दस हजार मील की तेजी से भागते हैं। परमाणु रों में प्राय सभी हाइड्रोजन के हैं जिन के इलेक्ट्रन सो गये हैं, अर्थात् सभी प्रोटन हैं-- एक सेकेण्ड में ३ सौ मील के वेग से दौडते हैं। और इनके बीच पीच में लोहे आदि के भारी परमाणु मन्दगति में
किन्च परिचय
हुए एक सेकेण्ड में सिर्फ चालीस मील के बैग से दौडते
सूय की दूरी की यात भर से कहने की कोशिश न करके
पक भापतिक व्याख्या से पता दू । हमारे शरार में जो अनु
भृतियाँ घटित हो रही हैं, उनकी बयर फैलाने की व्यवस्था
हमार्ग जसग्न्य स्पर्श नाडियां कर रही हैं। ये नाडियां
हमारे शरीर में व्याप्त हो कर मम्तिार में जा मिली हैं।
टेलिग्राफ के तार की तरह उनके योग से मस्तिष्क को
सपर पहुंचती है। हम समझ सस्ते हैं कि चीटी ने कहा
काटा है, जीभ में जो साद्य पदार्थ लगा यह मीठा है, दूधका
जो कटोरा हाथ में उठाया है यह गर्म है। हमारा शरीर हारटा
से लेकर पदधान नर फैला हुमा विशाल नहीं है, इसी लिये
पर लगने में देरी नहीं होती, ती मा रहुन थोडा सा समय
लग ही जाता है यह दनना कम है कि उसका मापना कठिन है।
वितु पटिती ने उसे भी मापा है। उहों ने परीक्षा करके
स्थिर रिया है कि मनुष्य के शरीर के भीतर से दैहिक घटना
प्रति सेकेन्ड चार सौ फीट के ग से अनुभूति ता पहुंचती है।
अछा, पर करपना करे कि एक ऐसा दैत्य है जो पृथ्वी पर से
हाथ बढाये तो उसका हाथ सूर्य तक पहुच सके। उस दुसा
हसी दैत्य का हाथ जितना भी मजबूत क्यों न हो सर्य का शरीर
स्पर्श करने ही जल कर मम्म हो जायगा। किन्तु जलने की
जो पीडा और क्षति है उमी खर नाडियों की सहायता से
मीरजगत्
७
उसके दिमाग तक आते आते प्राय ४० वर्ष लग जायगे। इसमें
पहले ही अगर यह मर जाय तो उसे पता ही नहा लगेगा।
सूर्य का व्यास ८ लाख ६ हजार मीलों का है
पृथ्वी पक ही सीधी रेसा में मटा सटा कर रखें तो सूर्य के
एक प्रान्त मे दृमरे प्रान्त तक पहुंच सकती हैं। सर्य का वजन
पृथ्वी से ३ लाय ३० हजार गुना है। इसी लिये उसी
माना के वजन की ताकत से रह अपनी ओर गीच सकता है।
इस जाकर्षण के ग्ल पर सर्य पृथ्वी को अपनी अधीनता मे तो रग
सकता है पर बहुत अधिक दूर होने के कारण आत्मसात् नही
कर सकता।
एक आलू के ठीक बीच में ऊपर से नीचे तक, एक मलाई
घुसेड दी जाय और आल को उसी मलाई के चारो ओर
घुमाया जाय तो यह घूमना जैसा होगा वैसा ही २५ घर्ट में
पृथ्वी का एक बार घूमना होता है। हम कहते हैं पृथ्वी अपने
मेग्दण्ड के चारो ओर घूम रही है। हमारे सलाई वाले आलू
के साथ पृथ्वी का अन्तर इतना ही है कि उस प्रकार की कोई
सलाइ पृथ्वी में नहीं है। मेरुदण्ड जैसा कोई दण्ट ही उसमें
नहीं है। जिम स्थान पर सलाई रह सकती, काल्पनिक सीधी
लकीर की उसी जगह को हम मेरुदण्ड कहते हैं। जैसे लट्ट ।
यह अपने भीतर की एक ऐसी ही सडी रेसा के चागे जोर
घूमता है, जिसे हमने मान लिया है।
मेरुदण्ट के चारो ओर पृथ्वी के एक गार घुमने में चौरीस
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सौग्जगत् ७३ के एक किनारे मे दुसरे किनारे नम का माप पचास हजार मील है और डेढ लापमील है उसके पेनाम्ना का माप ! सूर्य के इन धनों के घटने बढी का प्रभान पृथ्वी पर नाना भाति से पटता है। जैसे हमारी जारवा पर। प्राय ग्यारह वर्ष की यारी वार्ग से सूर्य के धनों का जाविर्भाव देखा जाता है। परीक्षा करके देखा गया है कि वनरपति के तने में इन घरे वाले चों की गवाही क्ति होती रहती है। पदे वृक्षो के नने में काटने पर उस प्रति वर्ष का एक गोल चारतार चिह्न दिसाइ देता है। ये चित्र फही यही तो नटे हुए हैं और कहीं कहीं दूर दर। प्रत्येक चारदार चिद से जान पड़ता है कि वृक्ष प्रति वर्ष कितना रहा है। अमेरिका के परिजाना के मम्मय प्रदेश में डाक्टर डगलस ने देखा है कि जिस साल सूर्य के काले धये अधिक होते हैं उस माल नने के चिह्न जधिर चौडे होते हैं। एग्जिोनाने पाइन वृक्षों के पान सौ वर्षों के चिह्न गिनते गिनते देखा गया कि १०० मे १७२ तक सय के घो के लक्षण नहीं मिन्ते। अन्त में ग्रीनिच मान यत्र विभाग से सर लेकर उन्हो ने जाना कि उन वर्षों में सर्य के धरे प्राय नहीं थे। जाजकल सूर्य के परे बढ़ते जा रहे है। सन् १९३८ रा १६३६ मेग्नके पूग पूग बढ जाने की बात है।
विश्व परिचय
पटे लगते हैं। सर्य भी अपने मेरुदण्ड को चारों ओर घूमता
है। इसके धूमने में जितना समय लगता है, वह जिस उपाय
जाना गया है, वह ग्ना दू। गृप समेरे जर प्रकाश से आयें
चौंधिया नहीं जाता, उस समय सूर्य की जोर देखा जाय तो
शायद मालम होगा कि उसमें काले काले परे हैं। एक एक
कारेघवे कभी कभी इनो डे हो पर प्रकाशित होते
गि मारे ग्रह उपग्रह मिट पर भी उनके बगर नहीं होते।
छोटे छोटे धगी के रोप होते ज्यादा समय नहीं लगता पर
पडे बडे प्रवे दो-दो तीन नान ममाह तक रहते हैं। दूरीन ले
पर देखने में नान पटा है कि ये ममा दाहिनी ओर धूम रहे
है, पितु असल में टन सत्र यो अपने शर्गर में लिये हुए सूर्य ही
म रहा है। उन्हीं काले धनों का अनुसरण करके इस घूमने
के समय का हिसाव जाना जा सका है। प्रमाणित हुआ है
गि पृथ्वी २४ पटे में चूमना है और सर्य २५ दिन में ।
सूर्य के धरे सूर्य के बाहरी आवरण में विशाल गहर है।
वहा से उत्तप्त प्रेम कुण्टरी के साकार में चार काटती हुई
याएर निकल रही है। रमा एक एक केन्द्र प्रदेश हे जो घोर
काग है, उसरा नाम है मात्रा उसके चारों और उस से कम
काली चेष्टनी है, जिसका नाम है पेनाया। चारों ओर की
नीति की तुलना में इन्हें काला देखा जा रहा है, यह दीमि
अगर बद कर दी जाती तो दनकी ज्योति भी अत्यन्त तीत
दिपाइ देती। मुर्य जो घना दुत बडा है उसके आम्त्रा
मौरजगत
७३
एक किनारे से दूसरे रिनारे नफ का माप पचास हजार मील
है और डेढ ठाप मीर उम के पेशाम्बा का माप ।
सूये केन धयों के घटने रहने का प्रमार पृथ्वी पर जाना
भाति से पदता है। जैसे हमारी जावया पर। प्राय ग्यारह
वर्ष की बारी बारी से सूर्य के धयो का निभावनेसा जाता है।
परीक्षा करके नेपा गया कि गारपति के तने में इन धध्ये नाले
पों की गवाही अक्ति होती रहती है। वडे वृक्षों के नने में
काटने पर उस प्रति थप पा एक गोल चधारदार चित्र दिखाइ
देता है। ये निह्न कहीं यही तो नटे हुपरी और काही कही दूर
दृर। प्रत्येक चकरार चिह्न से जान पड़ता है कि वृक्ष प्रति
वर्ष मितना पड़ा है। अमेरिका के परिजोना के मम्मय
प्रदेश में डाक्टर डगलस नटेया है कि जिस साल सर्य के काले
धवे अधिक होते हैं उस साल नने के चिह्न अधिक चौडे होते
हैं। परिजोनारे पाग्न वृक्षी के पान मौ वर्षों के चिह्न गिनते
गिनते देगा गया कि १६.०० मे १७0 तक सय के धनों
के लक्षण नही मिन्ते। अन्त में ग्रीनिच मान यत्र विभाग से
पर लेकर उन्होंने जाना कि उन पर्यों में सूर्य के धने प्राय
नहीं थे।
माजकल सूर्य के धन्ये बढ़ते जा रहे हैं। सन १६३८ पा
१६३६ मे इनके पूग पृग बढ जाने की बात है।
ग्रहलोक यह पहले ही बनाया गया है कि ग्रह स्मेि कहते हैं। सर्य नभत्र है, पृथ्वी ग्रह, अर्गत सर्य में टूट कर निकल जाया हुआ टुकडा, जिस का प्रकाश ठडा हो कर उझ गया है। रिसी किसी ग्रह में गर्मी नत्र भा हो सकती है, पर रोशनी नहीं है। सूर्य के चारों ओर इन ग्रहों के धूमने का राम्ना वा रेखा के ममान गोलाकार है। किसी का रास्ता सूर्य के निकट है और किमी रिसी का सूर्य मे रहुन दूर है। किसी को मूर्य के चारो ओर घूम आने में साल भर से भी कम समय लगता है और पिसी को सौ साल मे भी ऊपर। जिस ग्रह को धूमने में जितना भी समय क्यो न लो इस धूमने का पक निश्चित नियम है, इसका व्यनिनम कभी नहीं होता। सूर्य परिवार के ममी ग्रहों को, चाहे ये दूर के हो या निकट के, छोटे हों या बडे पश्चिम में पूर्व की भोर प्रदक्षिणा करनी पड़ती है। इस मे यह जाना जाता है कि सभी ग्रह एक ही समय पासा कर सूर्य में में छिटक पडे होंगे, इसी लिये उनका चलने का मुमगार एक ही ओर दुवा है। बनी हुई गाड़ी से उतरते समय जिम और गाडी जाता रही है, उसी और शरीर में एक मोरागता है। शाही से आर पाच नादमी उत्तरे नोरन पावों की रही और में प्रहगेक , झोका लगेगा। उसी प्रकार घूमते हुए सर्य से निकल आते समय सभी ग्रहो का झकार एक ही ओर हुआ है। उनके इस चने की प्रवृत्ति से सिद्ध होता है, घे सभी एक ही जाति के हैं, सर का झुकार एक हरी ओर है। सर्य के सर मे निकट है बुध ग्रा, अंग्रेजी में इमे मार्ग रहते हैं। यह मर्य से माढे तीन करोड मील दर है अथात पृथ्वी जितनी दृर्ग पर घूम रही है उसके प्राय तीन भाग का एक भाग। उध के शरीर में कुछ ध्रुधले धने दियाइ देते हैं उमकोय करके जाना गया है कि उसकी एक ही पीठ सूर्य की ओर है। मर्य के चागे मोर घूम जाने में उसे ८८ दिन लगते हैं। अपने मेन्दण्ड के चारों ओर घूम आने में भी उसे उतना हा समय लगता है। अर्थात उसका दिन जितना पडा होता है, साल भी उतना ही यदा होता है। सूर्य की प्रदक्षिणा करते समय पृथ्वी के दौटने का वेग प्रति सेकेण्ड उन्नीस मील है। युध ग्रह का वेग इसे मात दे गया है, उस का वेग प्रति सेकेंड तीस मील है। एक तो उसका रास्ता छोटा है दूसरे उसमें हडपडी बहुत अधिक है, इसी लिये पृथ्वी के चौथाइ समय में ही उस का प्रदक्षिण समाप्त हो जाता है। बुध ग्रह के प्रदक्षिण का जो रास्ता हैं, सूर्य ठीक उसके केंद्र में नहीं है, जरा एक किनारे है। इसी लिये घूमते समय उध कभी तो सूर्य के अपेक्षा रुत निस्ट आता है और कभी दृर चारा जाता है । पृथ्वी का व्यास आठ हजार मील का है, और बुधका उसके विश्व परिचय आधे से भी कम । यह ग्रह सूर्य के इतने निकट रहो का कारण महत अधिर ताप पाना है। जिनगी गर्मों से पानी पौरने लगता है, युन ग्रह के ताप की मात्रा उसके तीनगुने से भी अधिक है। पतनी गमों से पाना भाप पावर गेप हो जाना है। सिर्फ यही नहीं, स्तने ताप में हवा घे परमाणु पननी तेजी से चञ्चर हो उटते है कि सुध ग्रह उहे पपड कर ग्यही मरना, ये देश छोट र शून्य में दौड लगाने हैं। या फे पर माणु भगाडे म्यमान हैं। पृया पर ये सेकेंड में महज दो मील के ग समागा करते हैं, इसी लिये आकारण ये पल पर पृश्या र मम्हाल पाती है। पिन्तु यदि किसी कारण से नाप रह जाता तो प्रति सेकेन्ड मात मील ये वेग से भाग पडते फिर तो पृथ्वी भी अपना हक की अधिक समय तक कान में रम सानी। जो निशानी रोग विश्व जगत के अगयजनीश हैं उनका एक प्रधान काय है, ग्रह नक्षत्रों का माप ठीक करना। इस काम में मामूरी तगज और बांट से काम नहीं चलता, इसी लिये पोराट- पूर्वर उनमे पपर गमूल पी जाती है। यही गात समझा पर पना क्गे कि ण्य लुढक्ता हुना गोला आकर जवान पय पथिर को धा मार गया, पविक दस राथ दूर जा गिरा। क्तिने बडे वजन का गोग धमा मागे तो बादी रतना दर नर पिचन्ति हो सकता है, यह नियम नगर मालूम हो नो इस दस हारमाप पर मे हिसार करपे गोरे का वजन
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ग्रहलोक
७७
निकाल लिया जा सकता है। एक बार अचानक इसी प्रकार का
हिसार करने का सुयोग मिल्ने से बुध ग्रह का वजन निकालना
आसान हो गया। यह सुयोग एक धूमकेतु के कारण मिला।
यह गत बताने के पहले यह बता रखना जरूरी है कि धूमकेतु
गण किस जाति के ज्योति'क हैं। ग्रहगण सूर्य के अपो हैं,
किन्तु धूमकेतुगण एक दम गिराने। वे शुत हर घाटर से
अचानक सूर्य के इलाके में आ पडते है। किसी प्रकार एक
बार सूय के चारो जोर घूम कर के तत्काल चिरागो हो कर
निकल पडते हैं।
धूमकेतु शब्द का अथ हे, धुए की पताका। उसको चेहरे
को देख कर ही यह नाम दिया गया है। उसका मुण्ट गोल
है और उसके पोछे एक उज्वल लपी पताका फहरा रही है।
साधारणत यही उसका आकार है। यह पताका अत्यन्त सूक्ष्म
पाप्प की बनी होती है। यह इतना सूक्ष्म है कि पृथ्वी कभी कभी
इसे मदन करती हुई निकल गई है फिर भी हम जनुभन न कर
सके। उसका मुण्ड उरका पिण्ड से बना है। बीच बीच में
कोई कोई धूमकेतु मूय के राज्य में घुस जाते हैं और फिर बाहर
नहीं निकल पाते, सूय के शासन में पद्ध हो कर अनुचगे के दल
में भरतो हो जाते हैं । तर उन्हें भी यथा नियम सूर्य की प्रदक्षिणा
करनी होती है, प्रदक्षिणा का वह माग और समय पकी तोर पर
निश्चित हो जाता है।
सौर परिवार के इसी प्रकारके एक नये सवधा धूमकेतु के
विश्व परिचय
प्राक्षिण मार्ग में एर घार व्याघात उपग्थिन हुआ। जय यह
उध की रक्षा के पास से गुजर रहा ग, उसा ममय बुध
साथ मींचतान के यारण उसका राम्ता गडयडा गया। गेट
गाडी जर पटरी से हट जाती है तो फिर से टेट कर उसे पटरी
पर चढ़ा दिया जाता है पर उस मे टाइम टेबुर फा निदिए
ममय यीत जाता है। यहा भी पेमा हा हुआ। धूमफेनु जर
जपने राम्ने पर रोटा तो तबतक उमका ममय उत्तीर्ण हो
चुका था। धूमकेतु यो निस पग्मिाण में दिल देने में घुध
ग्रह के जितने भाषण का जोर लगा , उस पर से हिसार
गाया जाने लगा। जिसका वजन जितना होता है उतनी ही
शनि से वह पींचा करना है, यह ज्ञानी हुइ यात है, एसी नियम
पर मे बुध ग्रह का वजन निकाला गया। देखा गया कि युध
ग्रह के समान शीस वटपर चढ़ाये जाय तर यही वनन वाफे
यगयर होगा।
सुध ग्रहके रास्ते पर ही शुन ग्रह पे प्रदक्षिण की पारी आती
है। सूर्य को एक बार घूम जाने में उसे दिन गते हैं,
अथोत् हमारे साढे सात महीने का उसका साल है। उसके
मेरुदण्ड पर चर काटने का वेग क्या है, इस विषय पे सके
की अय भी समाधा नहा हुई। यह ग्रह साल में एक यार सूर्यास्त
फे याद पश्चिम क्षितिज पर दिखाई देता है, उस समय इमे
सध्यातारा कहते हैं, फिर यही ग्रह एक समय मूर्यादय फे
पहरे पूर्व और उदय होता है, उस समय उसे शुम नारा कहते
ग्रहलाक हैं। किन्तु असल में यह तारा है ही नही , खूब चमकने-दमक- ने के कारण जनता के पास से इसने तारा का सितार पाया है। रसका आयतन पृथ्वी से जरा सा कम है। इस ग्रह का मार्ग पृथ्वी के मार्ग की अपेक्षा और भी तीन करोड मोल सूर्य के निकट है। यह भी कम नही है। यथोचित दूरी पचा कर चलता है, फिर भी इसके भीतर की पर अच्छी तरह मालूम नहीं। इस रिये नहीं कि यह सूर्य के प्रसर प्रकाश के शाररण से ढका है। बुध सूर्य के प्रकाश से ढका हुआ है, किन्तु शुक्र अपने ही घने मेघ से ढका है । विज्ञानियों ने हिसार करके देखा है कि इस ग्रह का उत्ताप पृथ्वी से प्राय ६० डिग्री अधिक होना चाहिये। इतने उत्ताप से जल का कोई रूपान्तर नहीं होता, इसी लिये यह जाशा की जा सस्ती है कि वहाँ जलाशय और मेघ दोनों का अस्तित्व है। जब तक शुभ ग्रह में आक्सिजन या जलीय वाष्प का कोई लक्षण नहीं पाया गया। उसके ऊपर के घने मेघागरण से भीतर की अपस्था ढकी हुई है। मेव के ऊपरी सतह से जितना कुछ जदाज किया जाता है उससे प्रमाणित होता है कि उसके आक्सिजन की पूजी रहत ही कम है। वहा जिस गैस का स्पष्ट प्रमाण पाया जाता है, वह है आगारिक गैस । मेघ के ऊपरी सतह पर उसकी मात्रा पृथ्वी की उस गैस से हजारों गुना अधिक है। पृथ्वी पर इस गैस का प्रधान उपयोग पेट पौषों के प्राण धारण में होता है अन्यान्य जीव जन्तुओं के प्राण धारण -
निश्च परिचय
यह आश्चर्य
के लिये जाक्सिजन का यहार होता है। प्राण धारण के इन
दो जमरी पढायों में से केवल एक ही शुध
पर है।
की बात है कि शुक्र पर जीप चाप का पता नहीं चलना ।
तो फिर मोचना पटना है कि शुन का धना मेघ किस चीज का
है। सम्भर यह है कि मेरे ऊचे स्तर पर जल टदा होकर
इतना जम गया है कि उस से वाम्प नहीं निकलता।
पृथ्वा की अपेक्षा मर्य के निरट है, जतपर मान लिया जा
सकता है कि ग्रह के ऊपरी सतह के उत्ताप से समुद्र से अत्य
पिक परिमाण में भाप उठा करता होगा और उसी से ऐसा धन
मेव जम गया होगा।
सौर मडरी में शुक्र ग्रह के राद ही पृथ्वी का बामन है।
पहले और प्रहों की बात यतम करके बाद में पृी पी चर्चा की
जायगी।
पृथ्वी के बाद की पगत में मंगल ग्रह का स्थान है। यह
लाल रंग का ग्रह और सर ग्रहों की अपेक्षा पृथ्वा के सर से
निक्ट है। इसका आयतन पृथ्या के आठवें हिम्से के रार
है। सूर्य के चारों ओर घूम आने में इस ५८७ दिन लगते हैं
जिस रास्ते में यह सूर्य की प्रदक्षिणा कर रहा है यह बहुत-बुछ
अडे की तरह का है , इसी पिये घूमते समय एक बार वह सूर्य
के पास आता है और फिर दूर चला जाता है। अपने मेरुदण्ड
के चारों ओर घूमने में इसे पृथ्वी से सिर्फ आध घटा अधिक
समय लगता है इसी लिये वहा के दिन रात हमारी पृथ्वी की
प्रहलोक
चजन के
दिन रात से युछ यडे है। जिम पग्मिाण में इस ग्रह के ऊपर
वस्तु है वह पृथ्वी की यन्तु मात्रा का एक दशमाश है, इसा
लिये आकर्षण की शक्ति भी उमी परिमाण में कम है।
सय के आकर्षण से मगल ग्रह को जिस गस्ते चलना
चाहिये था, उसकी पेक्षा उसकी चाल में थोडा सा फर्क है।
पृथ्वी के आकर्षण के कारण ही इसकी यह दशा है।
अनुसार आकर्षण के जोर से पृथ्वी मगल ग्रह को जितना विच
लित कर सकी है, उसी पर से हिसार करके पृथ्वी का वजन
ठीक किया गया है। इसी सिलसिले में सूर्य की दूरी भी जान
ली गई है। क्यों कि मगर को सय भी गीच रहा है। सर्य
कितनी दूर रहेगा तो दोनो आकर्षणों का काटछाट हो कर
मगल का इतनी दृर विचलित होना समय है, यह यात गणित
करने निकाली जा सकती है। मंगल रहुत बडा ग्रह नहीं है,
उसका वजन भी अपेक्षास्त कम है, इसी लिये उसी मुताविक
आकर्षण का जोर न होने से आशा थी कि वह हमा को यो
देगा। किन्तु सूर्य से दूर होने के कारण वह इतना उत्ताप नहीं
पाता जिस से परमाणु गर्म हो कर गायब हो जाय । किन्तु
यह रात अब भी स्थिर नहीं हो सकी है कि उसकी हना में
किस किस चाप की मिलावट है।
सूर्य से मगल की दूरी पृथ्वी की दूरी से अधिक है, इस लिये
इस में कोई सन्देह नहीं कि यह ग्रह ठडा है। दिन के समय
चिषुव प्रदेश में शायद कुछ गर्मी रहती हो किन्तु रातको
शिव परिचय । निसन्देह धर्फ जमने से भी अधिक टड पडती है। यफ की टोपी पहने हुए उसके मेग प्रदेश की तो बात ही क्या है। परितों में मगर ग्रह के सर में गुत दिनों तर न्य तर्फ चरता रहा है। पक र हरी पासी निशानी मगल में लपी रेपी एकारें देगी और निश्चय किया कि ग्रह के वासिन्दों ने निश्चय ही मेरा प्रदेश से यफ विगलित पानी पाने के रिये ये सपी रवी नहरें निकारी हैं। फिर किसी किसी निशानी ने रहा रि यह आगों की गनी है। आज 47 ज्योतिष्क रोक का गोर मनुष्य ने फैमेरा चलाया है। थैमरे मे पींची पुई तस्वीर में भी काली कारें दिगी हैं। पिन्तु ये रत्रिम नहरें ही हैं और बुद्धिमान जीयो यी ही रतियां हैं, यह यात बिल्कुल मन्दाने पर यही गर है। आश्य ही इस ग्रह पर प्राणी या रहना असभव नहीं है, कों कि यहा हा और जल है। दो उपग्रह मगर ग्रह के चारों ओर घूमा करते हैं, एक फो एक चार स्गाने में ३० पटे लगते हैं और दूसरे को ा घटे, जथात् मगल ग्रह के एक दिन रात में वह उमे प्राय नी यार घूम आता है। हमारे चांट की अपेक्षा ये प्रदक्षिण का कार्य पात जनी रातम कर देते हैं। मंगर और वृहस्पति ग्रह के गीच में अनेक पारी जगह देख कर पंडित रोगो को संदेह हुआ और ये पोज में लग गये। पहले बहुत छोटे छोटे चार ग्रह दिखाई दिये। फिर देखा गया कि यहाँ बहुत हजार ग्रह-पडों की भोट है। ये मुड बांध फर
ग्रहलोक
८३
सूर्य के चारों ओर धूम रहे हैं। उनका नाम ग्रहिका रख लिया
जाय। अग्रेजी में कहते है astcrords | जिसका दर्शन
पहले मिला उसका नाम सीरिस (cells) रखा गया। इसका
व्यास चार सौ पचीस मील है। ईरोस ( uros ) नामक एक
प्रहिका है, सूर्य प्रदक्षिण के समय वह पृथ्वी के जितना
निकट आती है, उतना और कोई ग्रह नहीं आता। ये
ग्रहिकाये इतनी छोटी छोटी हैं कि इनके भीतर की कोई भी
ग्वार हमे नही मिलती। इन सब का मिल कर जितना वजन
है वह पृथ्वी के वजन का एक चतुर्थाश भा नहीं हैं। मगल से
भी कम है, नही तो मगल के चलने के रास्ते में आकर्षण कर कुछ
गडरटी पैदा कर सकती।
ग्रहिकाओ को क्रिसी समूचे ग्रह के खट ही मान लिया जा
सकता है। अपने भीतरी गोलमाल से या किसी पडोसी ग्रह
के आघात से एक दिन इन के घर में विर का समय गुजरा है।
रही इतिहास विस्मृत दुयोग अपने अस्यात कुटा-कर्कटों को
सर्य के चारो ओर घुमा कर किसी प्रकार मर्यादा की रक्षा कर
ग्न ग्रहिकाओ के प्रसग मै और एक दल की बात पताना
चाहिये। ये भी बहुत छोटे छोटे हैं और मुड नाध कर एक
निदिष्ट रास्ते में सूर्य के चारो ओर घूमते हैं। ये उल्का पिंड
हैं। पृथ्वी पर निरन्तर इनकी वर्षा जारी है, यूरो कणों के
साथ इनका जो
जाता है, वह नितान्त कम
८२
बिभ्य परिचय
पृथ्वी के उपर यदि हा या चंदोगा टंगा होता तो इन शुद्र
शत्रुओं के नाप्रमण से हमारी रक्षा न हो सपनी!
दिन हो या गत, उल्कापात युद्ध-न-युछ होता ही रहता है।
लेपित विशेष विशेष महीने की विशेष विशेष तिथियों को
उकानों की ग्रोछार जधिर होती है। वाजप्रेर,,, और
१. ची आगम्न १२, १३, १४ और ०७वी नगन्यर धी रातो
इस उल्कापात की जातिशयानी देने की चीज है। तिथि क्षण
का इस प्रकार का धा सा नियम देग कर विधानी लोग
इसका कारण योजने लगे।
पात यह है कि उनमा एक विशेष मार्ग है। किन्नु
ग्रहों की तरह ये अरे नहीं चलने। ये दुपयेक के दल
पद्ध टिडियो की जात के हैं। लाम लाप की सख्या में भीड
किये हुए पर ही राम्ते चरते हैं। पर्प ये विशेष विशेष दिन
को पृथ्वी का रास्ता ठीक उन्ही जगहों पर पहुंच जाता है जहा
उनकी जमात रहती है। पृथ्वी का आचर्पण घे सम्हाल नहीं
साते। निरतर इनकी झडी होती रहती है जो पृथ्वी की धृत
मे मिल जाती है। कभी कमी 3 बडे टुरडे मी आ गिरते हैं
और फट फटा पर चारो जोर तहस नहस कर देते हैं। सूर्य के
इलाके में अनधिकार प्रवेश करने वारे धूमकेतुओं के दुर्भाग्य रे
ये निदर्शक हैं। ऐसा भी सुना जाता है कि युवावस्था में जर
पृथ्वी रे मतर में ताप अधिक था, उस समय अग्नि के उत्पात
से पृथ्वी के भीतर का सामग्री स्तने ऊपर छिटक गई थी कि
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विश्व परिचय होता है तभी सर्य का प्रकाशन मिग्ने के कारण उपग्रह पर ग्रहण लग जाता है। पितु मध्यपतों ग्रह के पास यदि अपना प्राश हाना नो वह उपग्रह को आरोपित कर सस्ता और प्रहण हो ही नहीं सस्ता। हमारे चाद के ग्रहण के विषय में भी यहा त लागू है। ज्योतिहीन पृथ्वी जय चन्द्रमा के सामने में मय को आट में छिपा लेती है तो उस समय यह चन्द्रमा को छाया ही दे सस्ती है, प्रकाश नहीं। वृहस्पति के बाद को पंक्ति में शनि ग्रह है। यह ग्रह सर्य से ८८ क्गेट ५० लाप मील दूर है। सूर्य की एक प्रदक्षिणा करने में इसे ॥ यप गते हैं। शनि का वेग हस्पति से भी कम है.पर सेकेन्ड में फेल ६ मील । वृह- म्पति को छोड कर सारजगत् के अन्य ग्रहों की अपेक्षा आकाश में यह बहुत पडा है इसका व्यास पृथ्वी के व्यास से प्राय • गुरा है। पृथ्वा से नौ गुना बडा हो कर भी अपनी धुरा पर पफ चकर लगाने में उसे पृथ्वी के आधे से भी कम समय गता है। इतने जोर मे घूमने के कारण उस पेग के दनार से रसा आकार कुछ चपटा सा हो गया है। इनना वडा इसका आकार है फिर भी इसका वजन पृथ्वी से सिर्फ १५ गुना अधिक है। इतना हल्या होने के कारण ही विशाल साय हो कर भी पृनी की अपेक्षा इसरा आकर्षण अधिक नहीं हो सस। एक मेघ का नाररण इसे घेरे हुए है जिसका आकार पीच पीच में नदरता दिसाइ देता है।
शनि और पृथ्वी के आयतन की तुलना - पार मेलाप लगपटुकड़ा का हो जाना नसभा नहीं है। नपर मरने के कारण उपग्रह टूट कर दो पद हो जाता। गृहलोक शनि के दस उपग्रह हैं। उन में जो सर से रहा है यह आयतन में बुध ग्रह से भी रहा है। यह प्राय ८ लास मील दूर रहता है और इसकी प्रदक्षिणा १६ दिन में समाप्त होती है। शनि ग्रह की वेटनी की वर्णच्छटा की परीक्षा करके देखा गया है कि इसका जो अश ग्रह के निकट रहना है उसका चल्न वेग ग्रह के दरवर्षी अशों की अपेक्षा बहुत अधिक है। यह वेष्टनी अगर असण्ड चक की भांति होनी तो घूमनेवाला पाहये के नियमानुसार वेग चाहर की ओर ही अधिक होता। किन्तु शनि ग्रह की बेष्टनी अगर सण्ट खण्ट वरतुनी का बनी हो तो इन वस्तुओं के जो दल ग्रह के पास होंगे वे ही जारपण के जोर से अधिक तेजी से घूमेंगे। इन लाख लाग्य टुकडे उपग्रहों के अतिरिक्त दस बडे बडे उपग्रह अलग अलग रारने में शनिग्रह का प्रदक्षिणा कर रहे हैं। किस प्रकार इस ग्रह के चारो ओर मुड के झुड छोटे टुकटी का पृष्टि हुई, इस मय में शिक्षानियों का जो मत है उनी का कुछ अंश यहा लिया जा रहा है। ग्रह के प्रपल आकषण में पड कर कोई कोई उपग्रह अपना गोल आकार नहीं रवा रन सक्ने, उनका चेहरा आमिरकार बहुत कुछ अडे के समान हो नाना है। जन्त में एक ऐसा समय जाता है जब अधिक पर्दाश्त ग दोनों छोटे टुकडे और भी हटते रहते हैं, इस प्रकार एक ही
विश्व परिचय
चांद घी मा पर दिन यह दशा होने का है। पिनानी लोग
पहने हैं कि प्रत्येक ग्रह यो पर अदृश्य मंडी का बेडा घेरे
हुए है, इसे पतरे का घेग कहते है। इसके भीतर आ पडते
ही उपग्रहों का शरीर पूर उठना है, पहले यह अडे की तरह
ल्या सा आकार धारण करता है फिर टूटने गता है। आमिर
कार ये टुकडे मुट नराध यर गृह
के चारो ओर चार गाने
लगते हैं। निशानियों के मन से वृहम्पनि का प्रथम उपगृह इम
सतरे के घेरे के पास आ गया है, और
कुछ दिन बाट इस घेरे में
घुसते ही उसके टुकडे हो जायगे। उस समय शनिग्रह फी नरह
हम्पति को भी चारी जोर से पक उज्वर येष्टी घेर लेगा।
शनि ये चारो मोर जो वेटनी है उसी सृष्टि के सरध में
पडितों का अनुमान है कि शनि एक उपग्रह घूमने धूमने इस
पतरे घेरे में आ घुसा था। नतीजा यह हुआ कि उपग्रह हर
कर पट पट हो गया और आज भी इस गृह की परिममा फर
रहा है।
चाँद पृथ्वी के मनरे के धेरै से अनेक दर है, इसी लिये उसमें
जो परिवर्तन हुए हैं ये बहुत अधिक नहीं है। पृथ्वी के आकर्षण
के घेग से वह धीरे धीरे जागे पढता आ रहा है, इसके बाद जय
इस घेरे के दारे में प्रवेश करेगा तो टुक्डे-गुफ्टे हो जायगा
और ये टुकडे पृथ्वी-गुह को घेर कर शनि ग्रह की नकल करते
रहेंगे। उस समय चांद पर भी शनि की दशा' होगी।
शनि सय से वृहस्पति की अपेक्षा कहा जधिक दूर है-इसी
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६
२
विश्व परिचय
गृह
१०० मि० में यह ग्रह एक बार अपनी धुरी पर घूम
रहा है, चार उपगह अपने अपने राम्ने में निरन्तर इसकी परि-
प्रमा कर रहे हैं।
यूरेनस ये आरिमार के कुछ ही दिन बाद पडितों ने इस गृह
का येहिसाची चार चल्न टेप कर निश्चय क्यिा कि इस
क्सिी और के आक्षण में पड र पय का नियम तोड़ा है।
मोजते मोजते वह गह भी निरा। उसका नामकरण हुआ
नेपचून ।
सूय से इसकी दूरी ०७० करोड ३० लाप मील है और प्राय
१४ वष में यह सूर्य की एक प्रदक्षिणा करता है। इसका व्यास
प्राय ३३००० मील का अथात यूरेनस से कुछ बडा है।
दूरबीन से एक छोटी सी हग थाली की तरह दिपाई देता है।
इसका एक उपग्रह २ ख २२ हजार मील दूर रह कर
२० पटे में इस ये चारो ओर एक बार घूम आता है। उपग्रह
की दूरी और इसके आयतन पर से हिसाय लगा कर निश्चय
किया गया है कि इसका वस्तु पदार्थ पानी से कुछ भारा है और
वजन में प्राय यूरेनस के परापर है। यह गान अब भी एकदम
निश्चित नहीं हुइ कि इस गह के अपनी धुरी पर एक बार घूमने
में कितना समय लगता है।
नेपचून के आकर्षण से यूरेनस को जिस नये रास्ते पर
चरना चाहिये गा, हिसाय करके देखा गया कि यूरेनस टीक
उमराम्ले पर नहीं चर रहा है। इस से यह समझा गया
गहलोक
६३
।
कि नेपचून के सिवा भी इस गृह के गतिपथ के बाहर कोई और
एक ज्योतिषक वर्तमान है। सन् १९३० में एक नया गह और
निकल आया। इसका नाम प्लूटो रखा गया है। यह ग्रह
इतना छोटा और इतनी दूर है कि दूरबीन की सहायता से भी
यह पदी कठिनता से दिखाई देता है। कैमेरा से चिन सोच
कर इसका अस्तित्व नि सन्देह सिद्ध कर दिया गया है। यह
गृह ही सूर्य से सर से अधिक दूरी पर है, इसी लिये यह प्रकाश
और गर्मी इनती थोडी मात्रा में पा रहा है कि हम उसकी
अवस्था की कल्पना भी नही कर सकते।
लगभग ३६० करोड मील की दूरी से ढाई सौ वर्षों में यह
गृह सूर्य की एक प्रदक्षिणा समाप्त करता है।
प्लूटो गृह बहुत छोटा है, इस लिये उसके आकर्षण का
वेग भी बहुत कम है। नतीजा यह हुआ है कि वह अपनी
हमा को भी नहीं सम्हाल सकता। वह इसके हाथ से जाती रही
है। इसकी ताप मात्रा २३० डिग्री सेटीग्रेड से भी नीचे होगी।
इतनी सर्दीमें अत्यन्त दुरन्त गैस भी तरल, यहाँ तक कि ठोस
हो जाती है। वहा अगारिक गैस, जामोनिया, नाईट्रोजन,
प्रभृति वायव्य पदार्थ भी जम कर वर्फ बन गये हैं और उन
से निश्चय ही गृह ढक गया है। किसी किसी का मत है कि
सौर लोक की अन्तिम सीमा पर कई छोटे छोटे ग्रह विसरे हुए
हैं, प्लूटो उन्ही में से एक है। लेकिन इस मत के लिये कोई
निश्चित प्रमाण नहीं मिला है, कभी मिलेगा भी कि नही, कौन
६४
विश्वपरिचय
जाने। आज की अपेक्षा रहा अधिक शक्तिशाली दरवीन यदि
उस दृरत्व की यानिका (पा) उठा सके नमी सशय का
समाधान होगा।
भूलोक
अन्य ग्रहो के आकार प्रकार और चलने फिरने के सम्बन्ध
में बहुत ही कम खपर इकट्ठी की जा सकी हैं, अकेली पृथ्वी ही
एक ऐसा ग्रह है जिसके शरीर की गठन रीति ठीक तौर पर रहुत
कुछ जानी जा सकी है। गैसीय अवस्था पार करके जब से
उसका शरीर कठोर हुआ है नभी से उसके शरीर में इतिहास के
नाना चिह्न अफित होते चले आये हैं।
पृथ्वी के ऊपर का स्तर किसी चीज से ढका न होने के
कारण शीघ्र ही ठडा हो कर कडा हो गया, और भीतर का
स्तर गर्म होने का कारण यहाँ तरल और गैसीय पदार्थ ही रह
गये। दृध की मलाइ ठडा होते होते जिस प्रकार सिउड जाती
है उसी प्रकार पृथ्वी का ऊपरी सतह भी ठडा होते होते सिड
ने लगा। सिडने पर दूध की मलाइ जिस मात्रा में ऊरड
खावड हो जाती है उसकी तरफ हमारा व्यान ही नहीं जाता,
किन्तु सिकुडी हुई पृथ्वी की असमारता ऐसी मामूली नहीं है
कि उसे हँस कर उटा दिया जाय। चूफी नीचे का स्तर इस
ढोने योग्य पमा नहीं हुआ था इस
के कारण ऊपर का कडा स्तर
वियपरिचय ऊचा नीचा होता रहा, इससे पहाड पचत दिग्पाई दिये। युढे आदमी के माथे का चमटा सिड कर जिस प्रकार पलि पड जाती है उसी प्रकार माना ये पृची के ऊपरी चमडे की गलियां हैं। सारी पृथ्या की ग्रहत गभीरता की नुग्ना में ये पहाड परत मनुष्य के चेहरे के लिचिह्न से कम ही है, अधिक नहीं। प्राचीन युग री पृथ्वी के सिकुडे हुए ऊरड पावड स्तर में कहा गड्ढे हो गये और यही पहाड निकल जाये। गड्डे तर भी पानी से भरे नहीं थे। ययों कि उस समय पृथ्वा की गमों कारण पानी भी भाप के रूप में ही था। गीरे धीर मिट्टी टंटी हुइ, वाप्प पानी हो गया। उसी पानी से भर पर गई ममुद्र हो गये। पृथ्वी के बहुत से पानी के माप तो तरल हो गये, रिन्तु ह्या की प्रधान गैसे वैसे ही रह गइ। उन्हें तरल परना सहज नहा। क्यों कि जितनी सरी में वे तरल होते उतनी सदी में पानी जम पर गर्म हो जाता और पृथ्वी पर्फ के कमच से आच्छादित हो रहती। इस औसत परिमाण की गमी सर्दी से आक्सिजन, नाइट्रोजन प्रभृति हा ये गैस वाले पदार्थ सहज ही चल फिर रहे हैं और हम मांस रेकर जी रहे हैं। पृथ्वी के भीतर की जोर का सकुचन अय भी एक दम चन्द नहीं हो गया है। उसी हिरने के कारण अचानक कहीं नीचे की जगह कुछ हट जाती है तो ऊपर का कडा आवरण टूट पर उसे दगा देता है, इस प्रकार पृथ्वी के ऊपरी सतह को हिला
भृलोक
देता है और भूकम्प हो जाता है। फिर किसी किसी स्थान पर
स्टे हुए दवार से नीचे का तप्त तरल पदाथ ऊपर उछल
आता है।
पृथ्वी की भीतरी अवस्था जानने के लिये जितना सोदना
जरूरी है, उतने नीचे तक खुदाइ अब भी नही हुई। कोयले की
खान सोजने के लिये मनुष्य पृथ्वी के जितना नीचे उतरा है वह
एक मील से बहुत अधिक नहीं है। इससे केवल इतनी ही खवर
मिली है कि जितना ही पृथ्वी के नीचे की ओर जाया जाता हे
उतना ही, एक निर्दिष्ट मात्रा मे, ताप चढता जाता है। और भी
नीचे कितनी गर्मी है, यह बात ज्वालामुखी पहाडी का ताण्डव
देस कर समझा जा सकता है। किन्तु इन तप्त उत्सों की गह
राई भी पृथ्वी की मोटाई की तुलना में बहुत ही कम है।
भूकम्प से पृथ्वी के भीतर की रहुत सी सवरे मनुष्य को मालूम
।
मिट्टी के नीचे कही उथल पुथल हो तो वहा से तरगों के
चा, एक के बाद दूसरे, आगे पढते रहते हैं। सीस्मोग्राफ
(Sulsmograph) अर्थात भूकम्प लिपि नामक एक यत्र निकला
है। उसके पट पर इन ऊची नीची तरगों के चिह्न अंकित होते हैं,
उसमे उनके कापने का वेग जान पडता है।
भिन्न भिन्न देश की प्रयोगशालाओं में यह यत्र रखा गया है।
जिस सीस्मोग्राफ में भूकम्प की रेखा अकित हुइ है,
बार करके देखा जाता है कि पृथ्वी
जिस
-
विश्य परिचय के भीतर से कितने वेग से कम्पन चला रहा है। पृथ्वी का समूचा भीतरी हिस्सा यदि एक ही पदार्थ से बना होता तो म कम्पन वेग के मापने में अन्तर न पडता। रेरिन फर्क पडते देखा गया है। पृथ्वी की गहराई में कम्पन की तरंग ऊपरी सतह की अपेक्षा अधिक जोर से चरती है। असल में पृथ्वी के मिन भिन स्तरों में भूकम्प का मान मिन मिन होता है। तरल या गैसीय पदार्थ के भीतर से कम्पन की तरगे जिस प्रकार फैलती हैं, कठिन पदार्थ से हो कर उस प्रकार नहीं फैट पाती। समची पृथ्वी अगर जलमय होती तो उसका जन जो युछ होता उस से पाचगुना भागे जल थल-मयी इस पृथ्वी का वजन है। उस के ऊपरी सतह का पत्थर जल से तिगुना घा है। फेवल ऊपरी दगार से उनका भार बढ गया हो सो यात नहीं है, वहा के यस्तु पुञ्ज का भार स्वभावत ही अधिक है। भूकम्प की गवाही से जाना जाता है कि पृथ्वी के केन्द्रम्पल में दो हजार मील तक उत्तप्त तरल पदार्थ है-जिस का अधिकाश ही गला हुआ लोहा है, ऐसा अन्दाज किया गया है। इस तरल. पदार्थ को घेरे हुए पत्थर का जो स्तर है वह पानी से चारगुना भारी है। जो हमा पृथ्वी को घेरे हुए है उसका ७८ फी सदी नाइट्रो- जन और २१ फीसदी आक्सिजन है। हाईड्रोजन तथा और कर गैसें अत्यत मामूली मात्रा में हैं। याक्सिजन वडा मिलन- सार गैस है, लोहे के साथ मिस्र मोचा लगा देता है, अगार
भृलोक
पदार्थ के साथ मिल कर आग जला देता है-इस प्रकार निरन्तर
वायु मण्डल में उसका बहुत हिस्सा पर्च होता रहता है। इधर
पेड पौधे ह्मा के अंगाराम्ल गैस से अपने मतलर का अगार
वसूल करके उसका आक्सिजन वाला हिम्सा हवा को लौटा
देते हैं। ऐसा न होता तो अगाराम्ल गैस से ही पृथ्वी भर
जाती और जादमी साँस लेने की भी हवा न पा सकता।
आसमान में बहुत ऊचाई तक हना में विशेष परिवर्तन
नहीं होता। और भी अधिक ऊचे जाने पर जो गैसें मिल कर
हवा बनती हैं उनका बहुत कुछ वहाँ नहीं पहुच पाता। सूब
सम्भव, सव से हल्की दो गैसें, अर्थात् हीलियम और हाईड्रोजन
से ही वहा की हवा यनी है।
रायर घनत्व कम होते जाने के कारण हवा बहुत ऊपर
तक उठ गई है। चाहर मे पृथ्वी पर जो उत्का पिण्ड गिरा
करते हैं, वे पृथ्वी की हना से रगड सा कर जल उटते हैं,
उन में से अधिकाश का यह जलना १२० मील ऊपर दिखाई
देता है। इसलिये यह मान लेना होगा कि उसके और भी
ऊपर बहुत दूर तक हना है जिसके भीतर से आते आते अन्त
में ये इस जलन की अवस्था को प्राप्त होते हैं।
सूर्य का प्रकाश नौ करोड मील पार करके पृथ्वी तक आता
है। ग्रह वेष्टन-कारी आकाश की शून्यता को पार करके आते
समय तेज का बहुत अधिक क्षय नहीं होता। अर्थात
गर्मी ले कर वह वायुमण्डल के सं
4
100
विश्व परिचय
में पहुचता है। इतने प्रचण्ड धमे मे वहा की हमा के परमाणु
निश्चय ही चूण विचूर्ण हो जाते हैं, पफ भी परमाणु पूरा नहीं
रहता। हवा के मनाच अग में टूटे हुए परमाणुओं का जो
स्तर पनि हुआ है उसे एप् २ ( 12 ) नाम दिया गया है।
पहा पर्च होने से रची हुइ मृय की रिणे नीचे के घनतर
वायुमण्डर पर माममण करती हैं, वहा भी टूटे परमाणुओं के
स्तर का उद्भन होता है, ग्मे फ। (1,1) स्तर नाम दिया
गया है।
और भा नीचे और मा मना हवा में ये किरणों के आधात
मे पगु बने हुए परमाणुओ का एक म्नर है जिसे इ(1)स्तर
बहले हैं।
सूर्य किरणो की गना पार की रश्मि का या हत पुछ
पर्व हो जाता है, यह नि म्य हो कर नीचे की हवा तक बात
थोडी मात्रा में पहुच पाती है। यही हमारे रिये गतीमत है।
अगर वह अधिर जाता तो साहारना मुश्किल हो जाता।
सय किरणों के सिवा और भी क्याले पहाड' दूर से
हना को अदृश्य गदापात परने के न्येि आया करते हैं।
उल्का, इनकी बात पहले ही रताइ गग्री है। इनकी रगड से
तीन हजार से पर मात हजार फारेनहाइट डिग्री तक का
ताप जाग पडना है, इससे बैंगनी पार के प्रकाश के तीक्ष्ण
बाण तरकस से निकर पडते हैं और हमा के परमाणुओं के देह
पर रिस कर उन्हें जला कर छारपार कर देते हैं। इसके
भृलोक । सिवा एक और रश्मि के परसने की बात पहले ही बताई गई है। यह कस्मिक रश्मि है। संसार में यही सन से प्रपल शक्ति का नाहन हे। पृथ्वी की हवा में आक्सिज, नाईट्रोजन आदि गैसो के कोटि कोटि परमाणु भरे पडे हैं। वे अत्यन्त तेजी के साथ निरन्तर चक्कर मारते रहते है, आपस में धकामुक्की और ठेलाठेली तो चल ही रही है। जो कण हल्के हैं उनके दौडने का वेग अधिक होता है। सारे दल का जो वेग होता है उसकी अपेक्षा स्वतन छिटके हुए परमाणु का वेग बहुत अधिक होना है। इसीलिए पृथ्वी के गहरी आगन की सीमा से हाईड्रोजन के बुचरे अणु प्राय ही पृथ्वी का आकर्षण कार कर बाहर को भाग जाते हैं। लेकिन जाक्सिजन और नाइट्रोजन के अणु कणो की गति के बाहर कभी भी अधीर भगोडो की तेजी नही पाती। इसी लिये पृथ्वी के वायुमडल में इनकी कमी नही पडती। केवल हाईड्रोजन ही, जो पृथ्वी की तरणास्था में उसकी सब से बडी गैसीय सम्पत्ति या, धीरे धीरे अपना बहुत कुछ खो चुका है । बडे यडे पपनाले पक्षी पंखो को यों ही सुला रस कर देर तक आसमान में यहते-से रहते हैं, इस से जान पड़ता है कि हवा में इतना धनत्व जरूर है कि वह इन पक्षियो का आधार बन सकता है। असल में, कदिन और तरल पदार्थों की भांति हवा का भी वजन पाया जाता है। मिट्टी के ऊपर कई मील तक रहा का दराय एक फीट लये और इतने हवा
श्चि परिचय
।
पदार्थ पर प्राय २७ मन से भी अधिक पड़ता है। एक साधारण
आदमी के शरीर पर इममा दरार प्राय ४०० मन से अधिक
पडता है। फिर भी हम उसका अनुभव नहीं कर पाते। जैसे
ऊपर मे वैसे ही नीचे मे, जैसे दायें से वैसे ही याये से,समार
भाव से हता का दद्यार और धमा लग रहा है, इसी लिये हया
का भार हमें क्ट नही देता।
पृथ्वी का वायुमंटर अपन आचरण से दिन के समय सूय
की गर्मी को बहुत कुछ गेर रपता है, और रात के समय महा
शून्य की प्रमठ मदों को भी बाधा पहुंचाता है। बाद के शरीर
पर हवा की ओढनी नहीं है, इसीलिये वह सूर्य की गर्मों से सोलते
हुए पाना के समागर्म हो जाता है। और ग्रहण के समय
पृथ्वी ज्यों ही उस पर अपनी छाया विस्तार करती है त्यो ही
देखते देखते यह ठदा हो जाता है। हवा होती तो वह गमी
को रोक रखती। चाद को फेवल यही अमान नहीं है, हवा न
होने के कारण वह एक दम गूगा है, पहीं भी जग सा शब्द
होने का उपाय नहीं। विशेष भार से हिलने पर हवा में
नाना आयतन की सूक्ष्म तरंगे उठती हैं, वे ही हमारे कानके
भीतरी पर्दे पर नाना भांति के कम्पन का आघात करती हैं,
और यही तरगें नाना भाँति की आराज बन कर हमारे कों
के गोचर होती रहती हैं। हसा का एक और भी काम है। वह
फराश की तरह सूय की उग्र किरणों को बिछा कर फैला देती
है, नहीं तो जहा धूप पटती सिर्फ वहीं पर प्रकाश हो सकता,
भूलोक
छाया नाम की कोई चीज ही न होती। तीव्र प्रकाश के गल
में ही घोर अन्धकार होता। वृक्ष की चोटी की धूप से आ
चौंधिया उठतों और नीचे के तलदेश में निविड काला अन्ध
कार हुगा रहता।
घर की छत पर दोपहरी की धूप दमकती
रहती और घरके भीतर होती अमावस्या की घोर अर्धरानि ।
दिया जलाने की बात सोचना भी गलत होता क्यो कि पृथ्वी
की हवा में जो आक्सिजन गैस है उसी से सर चीजें जला
करती हैं। (जब ना ही नहीं होती तो आक्सिजन भी न
होता और आक्सिज न होता तो दिया तो क्या कोई भी चीज
नही जल मफती ।)
हम लोग प्रभ्यास से हवा का आक्सिजन खीचते हैं। उसके
अणु हमारे प्राणवस्तु के अणु के साथ मिलकर धीरे धीरे
उसे अदृश्य ज्वाला से जलाते रहते हैं। इसी लिये हम जब तक
जीते रहते हैं तय तक हमारा सून गर्म रहता है।
हवा को यौगिक पदार्थ नहीं कह सकते, असल में यह
मिलावटी पदार्थ है। उस में नाना गैसें जमा हुई हैं, पर ये
मिल कर एक नहीं हो गई। हवा में जिस मात्रा में नाक्सि
जन है उस से तिगुना नाईट्रोजन है। यदि केवल आक्सिजन
ही होता नो हमारा प्राणवस्तु जल जल कर फर का समाप्त हो
गया होता। यह प्राणवस्तु कुछ अंश में जरता है और कुछ
अंश में जाल नहीं पाता। इसीलिये हम दो आतिशय्य के बीच
में रह कर जी सकते हैं।
१००
विश्व परिचय
पदार्थ पर प्राय २७ मन से भी अधिक पड़ता है। एक साधारण
आदमी के शरीर पर इममा दान प्राय ४०० मन से अधिक
पटता है। फिर भी हम उसका अनुभव नहीं कर पाते। जैसे
ऊपर से वैसे ही नीचे से, जैसे दायें से वैसे ही गाये से, समान
मान से हमा का दवार और धका लग रहा है, इसी लिये हवा
का भार हमें कष्ट नहा देता।
पृथ्वी का वायुमटल अपने आचरण से दिन के समय सूर्य
की गर्मी को बहुत-कुछ रोक रखता है, और रात के समय महा
शून्य की प्रबल सदी को भी वाधा पहुचाता है। चाद के शरीर
पर हवा की ओढनी नहीं है, इसीलिये पह सूर्य की गर्मों से पोलते
पानी के समान गर्म हो जाता है। जोर ग्रहण के समय
पृथ्वी ज्यों ही उस पर अपनी छाया विस्तार करती है त्यों ही
देखते देखते यह उटा हो जाता है। हवा होती तो वह गर्मी
को रोक रगती। चाद को केवल यही अभाव नहीं है, हया न
होने के कारण वह एक दम गूगा है, कहीं भी जरा सा शब्द
होने का उपाय नहीं। विशेष मार से हिलने पर हमा में
नाना आयतन को सक्ष्म तरंगे उठती है, वे ही हमारे कानो
भीतरी पर्दे पर नाना भाँति के कम्पन का आघात करती हैं,
और यही तरंगें नाना भांति की आवाज यन कर हमारे करें
के गोचर होती रहती हैं। हया का एक और भी काम है। यह
फराश की तरह सूर्य
की उन किरणों को मिला कर फैला देती
है, नहीं तो जहा धूप पडती सिर्फ वहीं पर प्रकाश हो सकता,
भूलोक
१०५
आदि सूर्य से जिस प्रकार पृथ्वी निकल आई है उसी प्रकार
पाप्प-देही आदिम पृथ्वी से चाँद निकल जाया है, रियम दोनों
जगह एक ही है। इसके बाद करोडो वर्ष गीत गये,
पृथ्वी उडी हो कर कटी हो गई, चाँद भी ऐसा ही हो गया है।
२ लाख ३६ हजार मील दूर रह कर २७ दिन और ८ घटे में
चद्रमा पृथ्वी की एक परिक्रमा कर रहा है। इस परिक्रमा के समय
वह एक ही पीठ पृथ्वी की और फिरा रखता है। इस का व्यास
प्राय २१६० मील लया है और इसका उपादान जल से प्राय
॥ गुना भारी है। अन्यान्य ग्रह पक्षों की तुलना में पृथ्वी से
इसकी दुरी सूर ही कम है, इसलिये हम इसे इतना उज्ज्वल और
घडा देखते हैं। अस्सी चांदों को अगर एक साथ तौला जाय
तो उनका वजन पृथ्वी के बराबर होगा। दूरीन से बाद को
देखने से स्पष्ट ही दियता है कि वह पृथ्वी के पदार्थों के समान
ही पदार्थों से बना है। उसके ऊपर बडे बडे गहर और पडे
बडे पर्वत हैं।
पृथ्वी के आकर्षण मे ही चद्रमा पृथ्वी के चारी जोर धूम
रहा है। एक चक्कर लगाने में उसे एक महीने से कुछ कम
समय लगता है। औसतन उसकी चाल एक सेकेड मे आध
मील से ज्यादा नहीं है। पृथ्वी इतनी देर मे २० मील दोड
जाती है। अपने मेरुदण्ड के चारों ओर घूमने में उसे एक
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विश्व परिचय
सारा वायुमडल पानी मे मीजा हुआ-सा है। मेत्र में
जितना जल रहता है उस से कहीं अधिक रहता है दवा में।
हमारा सारा शरीर थोडा थोडा याये इस पानी को मोप रहा
है। अत्यन्त सूपा हवा में चमटा मृग कर जय फटता रहता
तर इसका प्रमाण मिलता है।
ऊपर ये वायुमडर ये टूटे हुए परमाणुओं के घेधुन स्तर की
यात पहरे ही कह चुका है। इसके सिवा सहज हमा के भी दो
म्तर है। इसका जो पहला स्तर पृथ्वी केसर से अधिक नजदीर
है उनका वैज्ञानिक नाम है टोपोस्फियर ( troposphere),
हिंदी में इसे शुध स्तर यह सकते हैं। इसकी चौडाई पाँच
से लेकर दस मील से अधिक नहीं है। सारे घायुमडर में
माप की तुलना में स क्षुब्ध स्तर की ऊचाइ बहुत ही कम है,
लेकिन हवा के समस्त पदार्थों का प्राय नव्ये प्रतिशत इसी में
है। इसी लिये अन्य स्तरों को अपेक्षा यह स्तर यात धना है।
पृथ्वी से एक दम सटा हुआ होने के कारण उसकी गर्मों की
उसे गी ही रहती है। उस उत्ताप के पढने घटने से हवा
यहा निरन्तर दौढ धूप फरती रहती हैं। इसी लिये फेरल इमी.
स्तर में आधी और वर्षा होती रहती है। इसके और ऊपर जो
स्तर है उसमें पृथ्वी की गर्मी आधी-तूफान की रफ्तनी नहीं
कर पाती। इसोरिये चहा की हवा शाल है। पंडितों ने
इसरा नाम दिया है स्टोस्फीयर (stratosphere.), हिंदी
में स्तर स्तर कहा जा सकता है।
भूलोक आदि सूर्य से जिस प्रकार पृथ्वी निकल आई है उसी प्रकार पाप-देही आदिम पृथ्वी से चाँद निकल जाया है, जियम दोनों जगह एक ही है। इसके याद करोडों वर्ष गीत गये, पृथ्वी ठडी हो कर कडी हो गई, चाँद भी ऐसा ही हो गया है। २ लाख ३६ हजार मील दूर रह कर २७ दिन और ८ घटे में चद्रमा पृथ्वी की एक परिक्रमा कर रहा है। इस परिक्रमा के समय यह एक ही पीठ पृथ्वी की ओर फिरा रखता है । इस का व्याल प्राय २१६० मील लया है और इसका उपादान जल से प्राय ३॥ गुना भारी है। अन्यान्य ग्रह नक्षत्रो की तुलना मे पृथ्वी से इसकी दूरी यूर ही कम है, इसलिये हम इसे इतना उज्ज्वल और यहा देखते हैं। अस्सी चाँदों को जगर एक साथ तौला जाय तो उनका वजन पृथ्वी के बराबर होगा। दूरीन से चाद को देखने से स्पष्ट ही दिखता है कि वह पृथ्वी के पदार्थो के समान ही पदार्थों से बना है। उसके ऊपर पड़े बडे गहर और बडे चहे पर्वत हैं। पृथ्वी के आकर्षण से ही चद्रमा पृथ्वी के चारो ओर घूम रहा है। एक चक्कर लगाने में उसे एक महोने से कुछ कम समय लगता है। औसतन उसकी चाल एक सेकेंड में आध मील मे ज्यादा नहीं है। पृथ्वी इतनी देर मे २० मील दोड जाती है। अपने मेरुदण्ड के चारो ओर घूमने में उसे एक १०६ विश्य परिचय महीने के गवर ही समय लगता है। उसके दिन और वप एक ही समान धीर मथर वेग से चलते हैं। चाँद के वजन पर से हिसार लगा पर देखा गया है कि यदि किसी चीज का वेग प्रति सेकेण्ड डेढ मील हो तो वह चाँद के नार्पण से निकलकर बाहर निकल जा सकता है । चाँद जिस परिमाण में धूप तापता है उससे उसकी तपी हुइ पीठ पर हना तना गर्म हो उठी होगी कि वह अपनी हवा के परमाणु ओं को रोक नहीं सका होगा, इसी लिये ये सब निकल पड़े होगे। जहा हना का दवार नहीं है यहा पानी पूर शीघ्र ही भाप न जाता है। भाप होने के साथ ही साथ पानी के पर- माणु गमी से चंचल हो कर चद्रमा का बधन छिन्न करके बाहर चले गये होंगे। जहाँ जल भी नहीं, वायु भी नहीं, यहा किसी का जीवन रह सकता है, यह बात हम लोगों की जानी हुई नहीं है। चाँद को एक पिण्डीभूत मम्भूमि यह सस्ते हैं। गत को जिन्हें हम तारानों का टूटना कहते हैं वे तारा नहीं है, यह यात आज किसी को समझाना नहीं पड़ेगा। पृथ्वी के आरर्पण से ये उल्का पिंड लाख-लाय की सप्या में दिन रात गिर रहे हैं। उन में के अधिकाश हवा मे रगड पाकर जलकर राय हो कर गिर जाते हैं। जो कुछ बड़े आकार के हैं, वे जरते जलने मिट्टी पर आ गिरते हैं, म की तरह फट जाते हैं, और चारों ओर जो पाते हैं उसे ही जला कर भस्म कर देते हैं। चांद पर भा यह उला घृष्टि हो रही है। उन्हें रोक और भूलोक जला कर राख कर सके, ऐसी या वहाँ थोडी सी भी नहीं है। इसी लिये चे अबाध भाव से चाँद के सारे शरीर पर ढेला मार रहे हैं। वेग भी कम नहीं है, सेकेंड में प्राय ३० मील , इसी लिये चोट भी ग्बूब करारी कर रहे हैं। चाँद के बडे बडे गहरी की उत्पत्ति अग्नि-उत्स से ही है। जो गला हुना पदार्थ और रास उससे निकल आया था, हा न होने के कारण इननी युग बीत जाने पर भी उनमें कोई परि- पर्नन नहीं हुआ। रास से ढका होने के कारण सूर्य का प्रकाश आवरण को भेद कर रहुत नीचे नही जा पाता, और नाचे की गर्मी मी ऊपर नही जा पाती। चाँद के जिस ओर सूर्य का प्रकाश पडता हे उस तरफ की गर्मी प्राय सोल्ने हुए पानी के समान है और जिधर नहीं पडता उस ओर की सर्दी बर्फ की ठडक से भी प्राय २५० डिग्री नीचे की होती है। चद्रग्रहण के समय जब पृथ्वी की छाया चाँद पर पड़ती है तो उसका उत्ताप कुछ ही मिनटों में प्राय ३४६ डिग्री कम हो जाता है। हवा न होने के कारण और राख के आवरण को भेद कर के सूर्य की गर्मी भीतर प्रवेश न कर सकने के कारण चाँद के पास किसी प्रकार का सचित उत्ताप है ही नहीं, इसी लिये इतना शीघ्र उसकी गर्मी कम हो जाती है। इन सब प्रमाणों से कहा जा सकता है कि चाद का प्राय सय स्थान ज्यालामसो पहाड की राख से ढका हुआ है।
मिश्य पारचय पंक जम-जम कर पृथ्वी पर थान स्थान पर पडिया मिट्टी के पहाड बन गये हैं। विश्व ग्चना के मूल्तम उपकरण परमाणु है, ये ही परमाणु अचिन्तीय विश्व नियमो के वशवती हो अत्तन्त सूक्ष्म जीव कोष के रूप में महत हुए। प्रत्येक कोप सम्पूर्ण और म्यतन है, उन में से प्रत्येर के भीतर पर अपनी ही आश्चर्यजनक शक्ति है जिसके द्वारा याहर से स्वाद लेकर अपने को पुष्ट करते हैं, अनावश्यक को त्याग देते हैं और अपने आप को यहु-गुणित कर सकते हैं। यह जो रह-गुणित करने की शक्ति है उसके भीतर से-मृत्यु से होती हुई प्राण की धारा प्रवाहित हो रही है। प्राणलोक में यह जीवाणु कोष अकेला हो पर दिपाई दिया। इसके बाद ये जितना ही सघयद्ध होते गये उतना ही जीर जगत् में उत्कर्ष और वैचित्र्य समन होने लगा। जिस प्रकार क्रोटों नक्षरों के समपाय से एक एक नीहारिका यनी है उसी प्रकार करोडों जीप कोपों के समावेश से एक एक देह है। घशावली के भीतरसे यह देह-जगत् एक प्रवाह सृष्टि करके नये नये रूपों में अग्रसर हो रहा है। हम लोग अब तक नक्षत्रलोक और सूर्यटोक की चर्चा कर आये हैं, उनकी अपेक्षा कई गुना अधिक आम्धयजनक है यह प्राणलोक। उद्दाम तेज को शान्त करके यह शुद्रायतन ग्रह रूप पृथ्वी जिस अनतिक्षुध परिणति को प्राप्त हुई है, केवल इसी अवस्था में प्राण और उसके सहचर मन का
भूगेक
जावि र ममा हुआ है। रह रात मान लोकार
करना ही पड़ता है कि ममार का यह परिमातही परिमल
है। यद्यपि प्रमाण नहीं है और प्रमान नागर
भी है, तोर्मा मन यह रात नहीं मानना बदा
ब्रह्माण्ड में जार धारण योय चैतन्यPER
पृथ्वी पर ही घटी है और इस हिसार से पृथ्वी कटाद
धारा का परमात्र यतिमाह।
उपसहार
एर पार जगत के सर से धडे आश्चर्य का मवाद ले कर
करोडो थप पहरे तरण नी पर एक छोटी सी जीरकोप
की कणा दिसाइ दा जो हमारी भागों के लिये अदृश्य थी। वह
रितनी पडी महिमा का इतिहास लेकर भाइ थी और फिर भी
फिस गोपन मात्र के साथ। उममा अनुपम कलामय गृष्टिगार्य
देर देह में नई नइ परीक्षामो से गुजरता दुना निरन्तर चरता
आ रहा है। योजना करने की, सशोधन करने की, अन्यन्त
जटिर रमतत्र के उद्धापन और सवालन करने की युद्धि
प्रच्छन भार से इस फोप में कहाँ छिपी हुइ है, और रिस प्रकार
दनके भीतर मे अपने जाप को सनिय बना रही है, और उत्तरी
त्तर अभिज्ञता का सचय कर रही है -सोचने पर इसका कुछ
रिनारा नहा मिलना। अति मृदुर घेदनाशील जीवकोषों का
समूह यशानुनम से जीव देह के नाना जग प्रत्यन में यथोचित
ढग से समष्टि गराध रहे है, और पता नहा, पिस प्रकार अपने ही
भीतर के उद्यम से देह निया या ऐसा आश्चर्यजनक कर्तव्य
विभाग कर रहे हैं। पास्यत्रों के जो कोप हैं, उनके घाम एक
हैं और मस्तिष्क के जो कोप है उनके साम एक दम
सकते हैं। बहुत दिनों के बाद विज्ञान ने यात्रियार
पृथ्वी की सृष्टि के इतिहास में इनका मानिर्भान अचिन्त
एकान्त आकस्मिक अभ्युत्थान को हमारी धुद्धि
पसंहार
दूसरी तरह के है। धीर फिर भी जोगाणु फोय सभी मृत
एक ही जाति के हैं। किसरी आमा से इनके टुझड़ पायाँ
का बँटवारा हुओं और पिसने इनके विचित्रे कार्यों का मिल्ने
सभर रोस्यास्थ्य नामक एक सामयस्य फर निगान मिया।
जीवाणु कोप की दो प्रधागे प्रियाये हैं, याहर से दंगके
संग्रह करके जीवित रहना और यढते रहना, तथा भैपने ही
समान जीयों को उत्पन्न परफे यश धारा को चलाते जाना।
यहाँ से शुरू से ही इस आत्मरक्षा और चशरक्षा जटिल
प्रयास ने ग्न पर निर्भर किया।
अग्राण विश्व में जो सर घटनाये घटी हैं उसके पीछे सारे
जड जगत की भूमिका है। मन इन घटनाओं को जानता है,
इस जानने के पीछे मन फी कोइ विश्व भूमिका कहाँ है। पत्थर
लोहा, और गैसों का आपस में जानने का तो कोई सम्पर्क नहीं
है। इस दु साध्य प्रश्न को रेकर य विशेष युग में प्राण और
मन इस पृथ्वी पर आये--अति शुद्र जीवकोष को यह
बना कर।
माना
नीय है। लेग्नि जो कुछ है उन सब के साथ कोई साधीन
चाहती। हम इस जड विश्व के साथ मनोविश्व के मर गत
की कल्पना सर्वव्यापी तेज या ज्योति पदाथ के रूप
नही
विश्व-परिचय - कि ऊपर ऊपर से देखने मे जो स्थूल पदार्थ ज्योतिहीन दिखाई देते हैं , उनमें भी प्रजन रूप में नित्य ही ज्योति की किया चल रही है। उमी महाज्योति का सूक्ष्म विकास प्राण में है और और भी सूक्ष्मतर प्रकाश है चैतन्य में और मन में। विश्व सृष्टि के आदि में जव महाज्योति के सिरा और कुछ नही पाया जाता तो कहा जा सकता है कि चैतन्य में उसीमा प्रकाश है । जड से रेवर जीर तक में, एक एक करके पर्दा उठने उठने मनुष्य में भा कर इस महा चैतन्य का आवरण मोचन करने की चल रही है। न पडता है चैतन्य की इम मुकि की अभिव्यक्ति हो सृष्टि का अन्तिम परिणाम है। साधा
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