Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Devanshi Ya Taranhar
Front matter
किंकरना भक्तिपुष्पोनु पुष्प वीसमु
कर्ता
भिक्षुक किंकरदास
मिक्षुक पर्णकुटी, फतासानी पोळ
नवि पोळ-अमदावाद.
विजयादशमी-१९९७
प्रत १०००
आभार
पालणपुरनिवासी स्वर्गस्थ डोक्टर
अमुलखभाइ धरलचंद भाइ
कोठारोनां सुपुत्री बाळाबेनना
स्मरणार्थे मारा एक मित्र
आ पुस्तकना
प्रकाशनमा रुपीआ
सवासो भेट मळया
छे. जेओश्रीनो
तरफथी
हुआ स्थले
पुनः पुनः
आभार
मानु छु
भिक्षुक
किंकरदासना
सविनय वंदन
आध्यात्मिक सरिता
( शिखरीणी. )
वहीं गंगा क्यांथी नयन निरखे पंथ ए ना जणायो
विविध पानच भावी स्नान करतां देह पावन बनायो
नगन्यां मटकी पथ भूलेलां पंखीडां गान गावे
ना जांनि छाया रमण करतां भक्तिनी नींद आवे
श्रण प्रा? रवि प्रकाश्यो! दिव्य रोशन झपायां
नीनां जगतभरनां पक्षीओ त्यां भरायां
निजामी अयनव रीते प्यास मननी छीपावे
:: .मा स्नान करतां आत्ममां मुख पावे
उर्मिओ
अर्बुदगिरिराजना गगनचूंची शिखरो अने विकराळ
अरण्योमां, संसारीक व्याधिओने, विरामी, अविचळ मस्तीमा
निजानंद, लूटतां हास्यवेरता मुखाविंद अने. नयनोना.अद्वैत
प्रकाशे आकर्षित करतो एक अवधूत, मुक्तिना पंथे विचरतां
जगतभरने UNIVERSAL LOVE विश्वप्रेमनी अमोली
वानगी पीरसी रह्यो छे
मानवमुसाफरोनां जुय ए अबधूतनी पर्णकुटीमा उलटे,छे.
जीवनक्षुधाने संतुष्ठ; करवानी: विविध. सरणीए हरेक
पोतपोताथी पाचन थइ शके तेवा प्रकारनी वानगीओ प्रति-
पादन करे के.
आत्मभावना के मायावि वांच्छना! एतो पोतपोताना
निश्चयेज,सरजायां छे.
हुँ जेटलं.पाचन करी शक्यो तेनीज आ नोंध. छे.
आ तके मारा आत्मप्रिय शेठ श्री वकील हिंमतलाल
प्रभाशंकर शुकलनो आभार ना भूल.
साहित्यकारनी कक्षाए नहि आलेखता केवळ भक्तिनीज
मस्ती छे, एम-समजी: भुल बदल-वांचको क्षमा अपें एटलीज
अभ्यर्थना साथे, विरमु.
भिक्षुक
किंकरदास
अविरत
आश्रम
राग-खमाज-धूमाळी ( वैष्णव जन तो तेने कहीये)
आश्रम अविरत खोल्युं मनवा अविकारी नर आवो रे
ब्रह्मदशामां विंगल बाजे नाद सुणी हरखावो रे
अजर अमर सुखधाम बगीचो सोहम सोहम वासे रे
घटमंदिर जो साफ बने तो जन्म जरा दुःख नासे रे
मुक्तिपंथे कोक सुकानी वीरला धून धखावे रे
जगवंधनने जडथी तोडी अविनाशी पद पावे रे
भक्तिधा अंतरमां रेली निजनु कोण पीछाणे रे
मोहमिनारा मान भूलावे चाल्या कंइक मशाणे रे
श्रवण करेधी नहि समजातुं क्षणमां भान भूलातुं रे
आतमश्रद्धा अविचळ मंदिर जयजय तान मचातुं रे
लग जाणे ए खेल तमाशा सत्य दशा नहि जागे रे
भान भई ए म्हेल नहि छे तीर हृदयमां वागे रे
विवारी नर वाक जगतमा निशदिन प्रभुगुण गावे रे
विका योग नाथ चरणमे नैयां नित्य झूलावे रे
समर्पण
आत्म समाधि ना अवि र त
क्षेत्र मां जे ओ श्री अमर
मनाया छे अने वर्तमान
काळमां सदेहे विचरता
दिव्यात्माओनेज
आ पुस्तक
समर्पण
भिक्षुक
किंकरदासना
कोटानुकोटी वंदन
विषय-सूचन १ ९ ४५ दुंदुभी मरुधरनी महत्ता दादागुरुनो जीवनदीपक ज्योतिनां किरणो दिव्य ओजसो योधवचनो अहिंसातो पडह सदुपदेश-विश्वप्रेम श्री केशरीयाजी तिर्थ मंगल महोत्सव विहार गुरस्तोत्र ६३ ७१ ८१ १०१ १०९ . ११३ -: भूलसुधार:- "श्री शेजेजय तिर्थ संबंधमां पृष्ठ १०८ उपर आठमी लीटीए "श्रीमान गुलावचंदजी ढट्टा साहेवे" छे. ते बदल अहीं रेल सुधारा मुजद वांचवू. श्रीमान गुलादचंदजी दट्टा साहेव, कलकत्तानिवासी मर्तुम राबहाद्दर बद्रीदासजी शेठवाळा, शेठ रायकुमारसिंहजी, आपरानिवाली मम शेठ लक्ष्मीचंदजी वैद्यना पुत्र मोहनलालजी र अन्य प्रतिष्टित ग्रहस्थोए प्रस्तुत संदेशो पाठवेलो." ८ धर्माचार्य दर्शननिधी स्वामी रामदासः एम. ए. दक्षिण आफ्रिकाथी आपणा देवांशी संतने लखे छे केः- ओ लॉर्ड ! ओ प्रभु! आपने मळवू ते आ जगतना तमाम पवित्र तत्वोने मळवा वरावर छे. आप एक छो! आप अनंत छो! आप शिव छो,! आप कृष्ण छो! आप देव छो! आप निर्गुण छो! आप सगुण छो! आप सत्य छो! आप पवित्र छो! आप उच्च छो! आप सर्वस्व छो! अने ते सर्वथी पर ते पण आप छो. आपने पुन्य नथी लागतुं, तेमज पाप पण नथी लागतुं. आपने ओळखवाने माटे लाखो जन्मनी जरुर छे. जो आपनी कृपा थाय तो स्हेजमां आपने ओळखी शकाय! आपना जे वचनो छे तेमां तमाम शास्त्रोनो समावेश छे. आ जगतना कल्याण माटे अद्रश्यथी आप जगतनी चोतरफ दिव्य संदेश पहोंचाड़ी रह्या छो. You are. Higher.of, The Higher.&, GOD of. The Gods. आप. सत्-चित्-आनंद स्वरूप परमात्मा-परब्रह्म-छो. Swami, Ramdas,M. A. DHARMACHARYA DARSHANANIDHI South Africa..
पाणी तथा सोजलनो मत्कारीक पुरवणी
अल्लाहावाद लीडर पत्रना ता. १५-७-३५ गोमवाना
अंकमांना अंग्रेजी लखाण उपरथी गुजराती भाषांतर.
मारवाडमा आवेल एरणपुरा नजीक विसलपुर गाममा
जैन धर्मने लगती धार्मिक क्रियाओ करवामां आवी हती.
(प्रतिष्ठा उत्सव) जे वखते हजारो जैनो तथा बीजाओए
हाजरी आपी हती.
आ प्रसंगे जैन धर्मना इतिहासमां नोंघवा लायक बनाव
बन्यो हतो.
आ गामडामां उनाळाना समये दरेक साल पाणीनी
तंगी पडती. जेथी आ समये पण आटली वधी मानवमेदनीने
पाणी पुरुं पाडवाना उपाय शोधवा माटे गामना लोको
चिन्तातुर बन्या इता.
आ सर्व क्रियाओ आबू पर्वतनी प्रख्याती वाळा विश्वो-
त्पादक, योगीराज आचार्य सम्राट, जगतगुरु योगीन्द्रचूडा-
मणि गुरुश्री विजयशांतिसूरीश्वरजी-महाराजना शुभ हस्ते
थवानी हती. गाम लोको गुरुदेव भगवाननी पासे गया
योगीराजे खात्री आपी के हमारे चिंता करवी नहि.
योगीराज विसलपुरमां पधार्या बाद पाणी पुरु पाडवानी
चिंता संपूर्ण रीते नाश पामी हती अने संभवे नहि तेवी
जग्याओए पण पाणीनी भरती थई.
सर्व क्रियानी समाप्ति मुधी अखूट पाणी मळया कर्यु. रांधेली रसोईमां गणत्री करतां वधारे मानवीओ आवी जतां छतां खुटवाने बदले खोराक वधी पडतो दरेकने मानवू पडतुं के आ वधुं कोई दैवी हाथोथी ज थाय छे. एकत्र थएल मानवसागरे मुर्शीदावादवाळा-जगतशेठनी आगेवानी हेठळ जैनधर्ममां युगप्रधाननी महान पदवी छे ते योगीराजने एनायत करी. १ युरोपना स्वीटझरलेन्ड देशना योगप्रेमी मी. जोर्ज जुटझेलर कहे छे के:- विश्वना सर्वोपरी योगेश्वर जगतगुरु आचार्य सम्राट श्री विजयशान्तिमूरीश्वरजी भगवानना परम पवित्र चरणकमळमां हुं मारा आत्माने विशुद्ध थवा अर्थे विनयपूर्वक नमस्कार करीने धरु छं. सर्व योगोमां राजयोग के नैसर्गिक योग ए उच्चमां उच्च छे. व्यक्तिगत आत्माने सीधे सीधो परमात्मामां तदा- कार जोडवाथी मोक्ष के मुक्तिने पमाय छे. सद्गुरु भगवाननी सर्व आज्ञाओनु पालन करीने, हृदयना सर्व भावोनु तेमना उपर प्रेमपूर्वक सिंचन करीने अस्खलीत- पणे तेमनी सतत भक्ति करवाथी आपणामां सद्गुरु भगवाननी ११ - प्रसादी उतरती जणाशे अने मुक्तिनो साक्षात्कार ( जीवन्मुक्त दशानो अनुभव.) थतो जशे. हे प्रभु ! एक जीवात्मा करोड भवे पण: तने भाग्येज ओळखी शके छे. परंतु तारी करुणा मात्रथी तो एक क्षणमांज तने ओळखी शकाय. हारां वचनामृतो ए सर्व शास्त्रोना नवनित रुप सत्व छ. विश्वप्रेम एज त्हारो धर्मग्रंथ छे. ज्ञाती संप्रदाय के राष्ट्रियताथी पर रहीने सर्वनो समभावे सत्कार करे छे. पाश्चिमात्य तत्वज्ञानीओ तथा सुसंस्कारीत साक्षरोने विश्वना आ सवोंपरी योगेश्वरना पवित्र चरणकमळमां विनय- पूर्वर झुकवा आवतां में प्रत्यक्ष जोया छे: आथी हुं मारा सर्व प्रेमाळ मित्रो, पर्यटन करवा निकळेला बंधुओ तथा संशोधक विद्वानोनु हर्षपूर्वक ध्यान खेंचु छं रे:-गद्गुरु भगवानना, प्रेम, विनय अने भक्तिपूर्वक दर्शन करीने मना आशिर्वाद मेळववाथी, मात्र आ एकज़ स्थळे नशाना विधपर्यटननो उद्देश सफळ थशे. George Jutzeler. SWITZERLAND EUROPE. * ૧૨
अमेरीकाना न्युयोर्क शहेरना
"ट्रीव्युट हेरोल्ड" पत्रना तंत्री मीस माइकल पीम
कहे छे केः-
में दुनियाना दरेके दरेक देशनी मुसाफरी करी छे अने
घणा महान पुरुषोने हुँ मळी छु, अने छेवटमां पूज्य गुरुदेव
महाराज शांतिविजयजीने पण मळी. अमारा पाश्चिमात्य
लोकोमा एटलं तो ठीक छे के अमो वरावर समजीनेज मानीये
'छीये. अमो अमारा मनने पुछीए छीए के " शंका" दरेक
वस्तुमां शुं छे ? मीस मेयोए मधर इन्डीया" नामनी जे
चुक लखी छे तेमां लखतां एणे मोटी भूल खाधी छे, कारण
के हिंदमां हजीए आवा देवरत्नो छे तो पछी एणे शुं बुद्धिथी
ए पुस्तक लख्यु हशे ? हवे तो हुँ एने वरावर जवाव आपीश
एटले एनी भूल समजाशे अने जगत सत्य वस्तु सारी रीते
समजी शकशे.
Guruji is GOD; no doubt.
(निःशंक गुरुजी परमेश्वरज छे.)
Miss Michael Peem.
EDITOR TRIBUTE HEROLD"
New YORK, U. S. A.
१३
आंग्ल विदुषी एलीझावेथ शार्प कहे छे केः- परमपूज्य गुरुदेव भगवानश्री शांतिविजयजीनां दिव्य चक्षुओ नैसर्गिकपणेज विराट अने भव्य छे. तेओश्रीनां नयनो आपणी सास फरतांज आपणा अंतरनां छुपा संकल्प- विकल्पो झडपी लेता होय तेवोज मास थाय छे. तेओश्रीनी त्वचा श्याम होवा छतां ध्यानस्थ दशामा रमण करतां त्वचाना रंगनी अनेक छायाओ बदलाइने दिव्यरुप देखाय छे. आ दृष्टीविषयक चमत्कार में प्रत्यक्ष अनुभव्यो छे. संस्कृतमा "तारक विन्दु' नामे ओळखातुं तेजनुं एक दिव्य बिन्दु तेयोश्रीना एक चक्षुथी वीजा चक्षुए फरतुं झवकारा मारतु स्पष्ट जोइ शकाय छे. योगनी भाषामां वे पांखडीनुं कमळ के जे "आज्ञाचक्र" कहेवाय छे तेनी छाया तेओश्रीना भाल प्रदेशमां द्रष्टीगोचर थाय छे. Elizabeth Sharpe पोर्चुगीझ तत्ववेत्ता, अने संशोधक डोक्टर जोस रोड्रीग्से "इलस्ट्रेइटेड वीकली' तथा दिल्हीना अठवाडीक "नवयुग" ना ता. १२-७-३५ ना अंकमां आपणा देवांशी संतना फोटा साथे छपावेल अंग्रेजीनुं गुजराति भाषांतर. महान योगीराज श्री विजयशांतिसूरीश्वरजी महाराज प्राचीन योगक्षेत्रना सूर्य समान पथदर्शक छे. योगीओ आत्म- शक्तिथी चमत्कारीक देखाता वनावो वतावी शके छे के जेने सामान्य एकान्तिक जनता जादु इलम के जंत्रमंत्र माने छे. परंतु वस्तुतः तेमा जादु इलम के जंत्रमंत्र नथीज. योगथी प्रगटती आत्मशक्तिथी अशक्य देखातुं वधुं शक्य बनी शके छे. Dr Jose Rodrigues PORTUGUES PHILOSOPHER & EXPLORER लाला लजपतरायना उर्दू वंदेमातरम् पत्रमांथी. टुंक नोंध. दुनियामां महान आदर्शमां आदर्श पुरुष होय तो ते एक शांतिविजयजी ज छे. कुदरती शक्तिओ खरेखर पूज्य गुरुदेव शांतिविजयजीने ज प्राप्त थई छे. जो मनुष्य गुरुजीनो खरेखरो दावो करी शके तो शांति- विजयजीज खरेखरा गुरुजी कही शकाय, । १५
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ॐ
देवांशी संत या तारणहार
ध्यानमूलं गुरुमूर्ति पूजामूलं गुरुपदः ।
मंत्रमूलं गुरुवाक्यं मोक्षमूलं शुरुकृपा।
.
दुंदुभी
दु
दु
ओ! मातृभूमी गुणगान करुं शां शां हारा सन्मान
कंइक वन्या बळवान अविरत अमृतरसना पान
स्वराज्य साचुं क्या सरजायु सत्याग्रह शुभ नाम
आत्मसमाधि अविचळ भासे मुक्ति पुरी नु धा म-करूं.
कर्म धर्मनी न्यारी घटना त्याग मोह ने राग
केम पराजय थाय कर्मनो चिरल विभूति जाग-कलं.
स्वराज्य लीधुं आत्मसमीपे सुरंग सत्य भिसा न
प्राणीमात्रने दुःख ना दीसे दै वि क तानु भा न करूं.
सत्याग्रह
संग्रामे विरला भाग्यां भवनां दुःख
निजानंदमां महासुख मानी वाध्यु आतम सुख-करूं.
दुनियाभरमां नोबत वागी न व खं डे सैनिक
हुकम थतां पडता मयदाने मायानी नहि भीत-करं.
--
--
वाल
कृष्ण कनैयो भक्त सीरांने नरसिंह हाग
वीरप्रभु जगवंदन जीनवर मातृभूमी रखवाल-क.
स्वराज्य खातर ज्योति जगवी जगव्यो भारत देश
सत्याग्रह कोली
साथे सीत नहि लवलेग-कलं.
क्राइष्ट अने जरथोस्त गाया रहेम की रहेगान
कुरान ने वाइवलना पाने अति लख्यां गुणगान-कलं.
आज दीसे नहि झांखी एनी उलटी जगनी रीत
स्वराज्यना वहाने सपडाता जुठी जगनी प्रीत--कलं.
छता अमात भाग्य उदयने पुन्य प्रकाश छवाय
मातृभूमीनो मोघो दीपक योगी नाम गवाय-कलं.
आत्मसमाधि सत्याग्रहले पर्वत केरी टोच
अरण्य ने अर्बुदना
अर्बुदना पहाडे संकटनो
पहाडे संकटनो नहि शोच-कलं.
क्षमा अने शांति हथीयारो ध्यान अनेरी टेक
स्वराज्यनो ए साचो साथी तुंही तुंही मन एक-करुं.
शांतिविजय शुभनाय धरावे विश्व प्रेस संदेश
भक्तिधामां स्नान करावी टाळे जगनो क्लेश-कलं.
वाहयस्वरूप न्यारो भासे अविचळ पंथ मनाय
स्वराज्यना साचा सैनिको नित्ये
पडता पाय-कलं.
भक्तिभावने प्रेम भीरुनो निश्चय ए पयगाम
सत्याग्रहना अविरत पंथे किंक र नो संग्रा म-करुं.
२
भारतवर्षमा
हजु पुन्यनो
प्रकाश छवायो नथी, परंतु
तेना चीरस्मरणिय इतिहासने उज्वळ बनावे तेवा दिव्य पुरुषो
हजु भारतना भाग्यवंत मिनारे यशस्वी छे.
शीतनो झरो अतुल वेगे रेलायो छे. जेना पवित्र पानथी
दुनियाना अनेक असाफरोए, काग्निनी ज्वलंत भट्टीमां
भीतरनी आग बुझावी असीम वेदनाओमां शांतिसुधा रेली छे !
क्यां?
अहो! मरुधर देशनी पवित्र भूमियां आजे एक अलौकीक
तान मची रहयुं छे. एना आंगणे आजे एक दिव्य प्रेमनो
सागर उभरायो छे. विश्वना बारे खूणामां बसता मानवो ए
सागरमा स्नान करवा आनंदपुग्ध वन्या छे. केटलाक स्नान
करी पोनाना आत्माने पवित्र बनावे छे तो केटलाक लांवा
समयनी तृषा छीपावी हृदयने संतुष्ठ करे छै.
अरे! आधी अद्भूतता वतावनार महान विभूती कोण
छे १ एना नामथी भारतवर्षयां आजे कोइ पण अजाण नथी.
तेओश्रीनु शुभ नाम महानयोगी गुरुदेव भगवंत श्रीमद्
विजयातिसूरीश्वरजी महाराज अने तेओना शुरु
तपस्वी महात्माश्री तिर्थविजयजी महाराज अने
तेओनीना गुरु योगेन्द्र महात्मा गुरुदेव भगवंत श्रीमद्
धर्मविजयजी महाराज.
३
-- जैन धर्म ए विश्वनोज धर्म छे. भगवान श्री मनी जगतना कल्याणार्थेज आत्मरोशनी प्रगट की हती. मान श्री महावीरना पधरशिष्य नौतम गणधर पण ज्ञातीना ब्राह्मण हता. भगवान श्री महावीरना समयमा तेमज काळधर्म बाद पण जेनेतर प्रजामांधी जन्मेल पात्माओए जैन धर्मनी विजयपताका बगाडी छे. जेवा के ... हरिबळ मच्छी ज्ञातिना चंडाळ हता, सेतारज मुनि ज्ञातिना ढेड हता, सिद्धसेन दिवाकर, बपभसूरीजी, कळीकाळ सर्व मनाता हेमचन्द्राचार्य आदि अन्य ज्ञातिओमाथीज जन्मेल महात्माओप जैन धर्मने देदीप्यमान बनाव्यो छे. प्रस्तुत कथन मुजब आ विभूतीओनी संस्कृति चाली आवे छे. गुरु, गुरुना गुरु, अने दादागुरु ए आहिर (क्षत्रिय) कोम- नाज अमोलां रलो छे. दादागुरु महान प्रभावशाळी अने समर्थ आत्मज्ञानी हता. धन्य हो ! ए मरुधर देशने अने धन्य हो! ए आहिर कोमने धन्य हो ! ए मांडोली गामने अने धन्य हो ! ए मणादर गामने" धन्य हो ! ए देवांशी वसुदेवी माताने अने धन्य हो! ए पुण्यात्माश्री भीमतोलाजीने" "
मरुधरनी महत्ता
वसंततिलका
झगमगे दवला
मस्थर तणा मिनारे शुभ ज्योत मासे
जीनमंदिरो
प्रकाशे
आहा ! अनुप रचना जीन चैत्य केरी
मरुधर तणी निरखशो कीर्ति अनेरी.
मरुधर एटले मारवाड. चालु युगने निहाळतां त्यांनो
लोकसमुह परदेशमा वेपार करतो होवाथी मारवाडना आंगणे
स्थायी बसतो लोकसमुह ओछा प्रमाणमां निरखी शकाय छे.
परंतु एना पूर्वगामीओनी अजोड कीर्तिना मिनारा मारवाडनी
अटेरीए यशस्वी छे.
मारवाडनी अटेरीओना उंडा स्वरूपनु जेने भान हशे
अगर जेणे मारवाडनी ए अनुपम रचनाओ निहाळी हशे
तेश्रोना मनोमंदिरमा अवश्य ख्याल हशे के एनी मनोरमा
अने सौन्दर्यता जीनप्रासादोनी अनुपम अने विशाळ रचनाओ
साथे अपूर्व भाव उल्टे एवी श्री जीनेश्वर देवनी प्रभावीक
मुर्तिओ साथेनां जीनचैत्योनी झगमगती ज्योतथी भरपुर छे.
लखलूट लक्ष्मीना खर्च बंधावेलां जीनालयो के आजे मानव
५
एनी प्रतिभालु अवलोकन करी शके १ हिंद भरमां एनी कीर्ति अजोड छे. आबु देलवारानी अविचळ कीर्ति. देलवाराना जीनपालादो के जेलु अद्वैत कळामय शील्प काम आजे विश्वभरमां मशहुर छे. हिन्दुस्तानना इतिहासमा पण आजे ए अपूर्व आलेखाय छे. एनी कारीगरीनो तादृश्य चितार वतावे तेवु कोइ जीनमंदिर आजे हिंदुस्तानना आंगणे अस्तीत्वमा नथी. वस्तुपाळ तेजपाळ अने श्री धवळराजाना मंत्री श्री विमळशाए करोडो रुपीयाना भोगे बंधावेल ए आबु देल- वारानां जीनप्रासादो वांधवामां ए श्रेष्ठीओए जळनी वरसती धारा मुजब द्रव्यनी रेली करी छे. धन्य हो ! ए जैन समाजना साचा अने शूरवीर सुभटोने के जेओनां नाम अने उज्वल कीर्तिओ आजे पण तेओना जीवननी अविचळ रुपरेखानु भान करावे छे. अवचळगढना जीनप्रासादो. चौदसो चुमालीस मण सोनानी भरावेली जीन प्रतिमा- ओना अगमगता दिव्य प्रताप साथे अनुपम अंजन करावतां गजीन न्यो आबु पर्वतनी उंचामां उंची टेकरीए आवेलांछे, दे जनी प्रतिभा अने सौन्दर्यता आजे पण मानवना मनो- महिन्द जगमगादी रही छे. ६
राणकपुरनी प्रतिभा
राणकपुरनु चौदसो चुमालीस थांमलानु देरासर के जेने
चंधाववामां लखलूट द्रव्यनो व्यय करवामां आवेलो छे, ते
जीनप्रासादनो पायो पुरवामांज अढळक द्रव्य रेलायुं छे.
नादिया गामना श्रेष्ठी धना पोरवाले आ जीनप्रासाद बंधावी
पोतानी कीर्ति अमर बनावी छे.
शिरोही नगरीनी अपूर्व रूपरेखा
शिरोही नगरीनां जीनप्रासादोने अडधा शेर्बुजय तिर्थ
तरीके मानवामां आवे छे. शेजुजय तिर्थ उपर आवेली नव
टुंकोनी जे अपूर्व रमणियता मानवना मनोमंदिरने आनंदसुग्ध
वनावे छे एज रेखाचित्र आ जीनप्रासादोनां दर्शन करता हरेक
मानवना नयनो समक्ष तरी आवे छे. शिरोही नगरीनी प्रतिमा
आ जीनप्रासादोथीज मशहुर छे.
श्री वामणवाडजी तिर्थ
शिरोही नगरीनी नजीक आ तिर्थ आवेलुं छे. शिरोही
जतां सज्जनरोड स्टेशनथी मोटरमां बेसतां गाम झारोली
मुकीने प्रथम आ तिर्थ आवे छे. स्टेट तरफथी चालती मोटर
सरवीसनी जती अने आवती मोटरो यात्रालुओने दर्शन करवा
माटे त्यां पांच मिनीटना आशरे रोकाय छे. वामणवाडजीथी
आगळ वीरवाडा अने सांदवाडा गाम पछी शिरोही नगरी
आवे छे. शिरोही नगरी अने वामणवाडजी तिर्थ वच्चे आशरे पांचेक गाउनु अंतर हशे. जैन इतिहास आजे श्रवण करावे छ के आ तिर्थ सुमीमां विश्वोद्धारक भगवान श्री महावीरना कानमां गोवाळीयाए खीला ठोकेला अने जे उपसर्ग महान कहायो ते उपसर्ग आ स्थळे उद्भवाय छे. वामणशडजी तिर्थनी आसपासप वे गाउना अंतरेज गाम आवेलां छे. वामणवाडजी ए कोइ गाम नथी अगर त्यां कोई पण मानश्नी वस्ती नथी. जे जग्याए विश्वोद्धारक भगवान श्री महावीरे ध्यान कर्यु हतुं ते जगाए हाल पगलां छे, अने ते शन उपर हाल एक देरी बांधवामां आवेली छे. आजुबाजु सय पर्स ला अने वादन जीनालयतु मनोहर अने रसणिय- नानां दीयन करावन जीनत्रासाद आजे ए तिर्थनी अपूर्व पनिसार नान करावे छे. तेमज विश्वोद्धारक भगवान श्री नी वेदी प्रतिमा ए जीनप्रासादमां विराजमान --1617 गल के प्रतिमानी अद्भुत अलौकीकता हरेक नवनांनी नाथेज अपूर्व भाव उलटावे छे. निदा मावानी अटेरीए अनेक जीनप्रासादो ने निकायी पूर्व समयना जैन समाजनी मनधार हे. --मीमांज आपणा देवांशी संते ती महत्ता बधारी के. T ८ दादा गुरुनो जीवन दीपक (शार्दूलविक्रडीत छंद) जेणे मनथी मोह मान मार्यां तेने सदाये नमु जेणे मनथी काम क्रोध वाळ्यां तेने सदाये नमु जेणे मनथी राग द्वेष काढया तेने सदाये नमु जेणे मनथी सर्व एक जाण्या तेने सदाये नमु मरुधर देशनी परम पवित्र भूमीमां आजथी एक सैका पहेलां जोधपुर इलाकाना जसवंतपुरा परगणामां आवेला गाम मांडोलीमा एक रायकाश्री दरजोजी करीने वसता हता. मांडोली गाममां जैन देरासर अने उपाश्रय विगेरे आवेलां छे. दर- जोजीने प्रजामा एक कोळोजी करीने पुत्र हतो. पोताना कुटुम्बमां आ पुत्रने जीवंत मुकी दरजोजी देहोत्सर्ग पाम्या हता. कोळोजीनो जन्म संवत १८४८ ना अपाड सुद पुनमने रोज थयो हतो. कोळोजीने वाल्यवयथीज ईश्वरसजन अने प्रभुभक्ति उपर महान श्रद्धा हती. ज्ञातीना आहिर होइ जीवन- निर्वाहनु साधन ढोरोना पालन पोषण उपरज हतुं. कोइ कोइ सण्य जंगलमां ढोर चारतां ईश्वरभजन थतुं श्रवण करवामां आवे तो तुरतज तेओ ते तरफ चाल्या जता. भजननी पुर्णा- हुती ना थाय त्यां सुधी त्यांथी पाछा फरता नहि. तेमज or
वे
ढोरोनी जरापण चिन्ता करता नहि, परन्तु प्रभुभक्तिमांज शुद्ध
हृदये तलीन वनता.
एक समय मारवाडमां एवो सख्त दुकाळ पडयो के
अन्नपाणी अने ढोरोने घास आदि मळवू मुश्केल हतुं. तेवा
समये तेओ उचाको करी देशाटन करवा निकळी गया, साथमा
केटलांक ढोर हतां ते खतम थइ गयां, अने प्रजामा एक,
वर्पनो पुत्र जेनु नाम वेलराज हतुं ते जीवन रह्यो. फरतां फरतां
तेओ पुना पासे आवेला चोक गाममां आवी पहोंच्या. ते
गाममां मारवाड प्रदेशमा आवेल शूळ गामना रहीश एक जैन
ग्रहस्थ जयाजी करीने रहेता हता, तेओने त्यां ढोरोनु पालन
पोपण करवा कोळोजी पुत्र साथे नोकर तरिके रह्या. तेओनी
अपूर्व प्रशुभक्ति निहाळी शेठे कोळोजीने नवकार मंत्र शीखव्या
हता. कोळोजी हरेक समय ते ध्यानमांतलीन रहेता. नोकरीना
त्रण वर्ष पुरां थतां दरम्यान एक समय पोताना पुत्र वेलराजने
जंगलमा सर्प करडयो, करडतांनी साथेज पुत्र मरणने शरण
धो. कोळोजी ए पुत्रने खोळायां लइने एक वृक्ष नीचे बेसी
गरा अने अंतरगां एबी प्रतिज्ञा करी के "आ पुत्र सजीवन
धार ताज मारे अन्नपाणी गृहण करवां, नहितर नवकार मंत्रना
पारमा लय धइ मारा-दहनो मारे पण त्याग करवो."
प्रतिनाथी छटवाने माटे घणा घणा लोकोए तेओने
मा. र एम करता त्रण दिवस पुरा थवा आव्या.
' दिदना उपवा पोताना ध्यानना प्रवळ प्रतापे कोइ
१०
देव, महात्मानु रुप धारण करी प्रत्यक्ष आवी उभा. तेओए पण कोळोजीने पोतानी प्रतिज्ञा छोडवा वावत हरेक कसोटी कर्या वाद पुत्रने हाथ फेरवी सजीवन बनान्यो. तुरतज कोळोजीए पोताना पुत्रने महात्माजीना खोळे भूक्यो अने कहयुं के आप एना जीवन पाळक बन्या माटे आप एने साथे लइ जाओ. नवकारमंत्रना ध्यान मात्रथी ज्यारे मारो पुत्र सजीवन वन्यो तो ते मार्ग मने आप बताबो के जेथी साधु- जीवन प्राप्त करी हुं मारा आन्मानु श्रेय करूं. महात्माश्रीए प्रत्युत्तर आप्यो के आ पुत्रने तमो कोई साधु अगर यतिने वोरावी देजो अने तमो पण अमुक समय वाद जैन दीक्षा अंगीकार करशो, अने आ जगतमा एक ईश्वरी अवतार तरिके पूजाशो एवो मारो तमने आशिर्वाद छे. तुरतज महात्माश्री अद्रश्य थइ गया बाद कोळोजीए त्रण उपवासनु पारणु कयु. चारेक मास पछी पुत्र वेलराजने मुंबइमां एक यतिजीने वोरावी दीधो. जेओ वेलजी यतिना नामथी पालणपुर पासे आवेल गाम मंडारमा मशहुर हता. वेलजी यति अजिथी चारेक वर्ष उपर गाम मंडारमा काळ- धर्म पामी गया छे. पुत्र वेलराजने वोराव्या बाद कोळोजी साधुजीवन प्राप्त करवानी धगशमां खंडालाना घाटमा फरता हता. एक समय तेओए एक वृक्ष नीचे आसनस्थिर बनी एवी प्रतिज्ञा करी के ११
"कोइ मने साधु बनावे तोज मारे आ स्थान छोडवू." त्रण
दिवसना उपवास पुर्ण थतां पोतानी प्रतिज्ञाने फळीभूत करवा
एक मणीविजयजी नामना साधु मळी आव्या. तेओनी पासे
कोळोजीए संवत् १८७३ ना महा सुद पांचमने रोज जैन
दीक्षा अंगिकार करी अने त्यारथी तेओनु नाम मुनी महाराज
श्री धर्मविजयजी स्थापीत थयु. महाराज श्री मणीविजयजी
मळ्या मां पण कुदरतनोज संबंध हतो.
खंडालाना घाटमां अनुक समय व्यतित कर्या वाद
सहाराज श्री धर्मविजयजी पोताना जन्मस्थान माम मांडोली-
मां पायी. अताल अवस्था होवा छतां तेओश्रीने कुदरती
का संपादन थयु. तेओश्री एटला बधा शक्तिशाली पुरुष हता
के एक स्थान पर विराजमान होवा छतां एकज समये जुदा
जाधानोमां दर्शन आपी गमता हता. जेठ मासना सखत
तापण पोनी करीए भीखधीखती शीला उपर आसन
बिली पोरता बान्धी चार मुबी ध्यानस्थ दशामा खुल्लां
नको तली पलां किरणो चक्षु द्वारा ग्रहण करता हता.
न टवीन नदी, माठा विगेरे स्थळोमां रात्रीनी
गई। कार ट्यामां पलार जाता हता. एक समय एवो
हिनी के हस्ति गोचरी बोरावे तोज आहार
उदार पुर्ण थया बाद पोताना अद्भूत
पहावा वजारमा नट चडया. एक हलवाइनी
-
.
दुकान पासे गांडो हस्ति सामेथी आवतो हतो, तेणे हलवाइनी
दुकानमां मुंढ नारखी मोदक लीधो के तुरतज गुरुश्रीए सन्सुख
पातरु धयु अने हस्तिए मोदक वहोराव्यो, वाद तेओश्रीए
पारणु कयु.
एक समय रामसीण गामथी विहार करी आगळ विचरता
हता, जेठ मासनो समय हतो, साथै घणाज माणसो हता.
रस्तामा सखत गरमी होवाथी साथे आवेल माणसो तृपातुर
बन्यां. आसपास पहाड अने जंगल होइ पाणी मेळवबानु कंड
पण साधन हतुं नहि जेथी माणसो गभरावा मांडया. जमीनमां
एक वावडो करावी गुरुश्रीए पोतानी पासे तरपणीमां थोड़
पाणी हतुं तेमांथी थोडु पाणी वावडामा नाख्युं अने से उपर
कपडु ढंकावराव्यु, तुरतज जलाशय लब्धीना प्रभावथी वावडा-
मां पाणी भरायुं ने वधा माणसो तृपा छीपावी शांत वन्या.
नवकारमंत्रना ध्यानथीज तेओश्रीए सर्व सिद्धिओ प्राप्त
करी हती.
नवकार केरा मंत्रथी ए सर्व सिद्धि पागीया
नवकार केरा मंत्रथी ए आत्मरसमां जामीया
नवकार केरा मंत्रथी ए वीर थइने म्हालीया
नवकार केरा मंत्रथी ए परम पदने पाभीया
एक समय गुरुश्री रामसीणमां विराजता हता, चैत्र सुदी
पूर्णिमानो दिवस हतो, सवारना दश वाग्या वाद जंगलमा
१३
ध्यानमां पधारी गया हता, अने सांजना चार वागतां गाममां
पाछा फर्या हता. तेज दिवसे रामसीण गासना केटलाक
श्रावको पालीताणा यात्रार्थ गया हता. नेओए इंगर उपर
आदिनाथ भगवाननां दर्शन करी बहार निकळत वृक्ष नीचे
गुरुश्रीने जोइ बदन करी प्रश्न कयों के "वावजी आप कयारे
पधार्या ?" प्रत्युत्तरसां "ॐ शांति" कयु. तेज दिवसे
ते पात्रकोए रामीण पत्र लखी दर्शाब्यु के “आजरोज अत्रे
इंगर उपर गुरुश्रीनां दर्शन थयां छे तो गुर श्री रामहीणमां छे
के विहार करी गया छ ?" तेनो जवाब एवो मळ्यो के
"चैत्र सुद पुर्णिमाना रोज गुरुश्री तबारना दश वाग्या बाद
जंगलमां ध्यानमां पधारी गया हता ते सांजना चार वागे
गायगां पाछा फर्या हता, अने हाल अत्रे विराजमान छे."
आती रीते तेओश्री पोताना आत्मबळ द्वारा अनेक
स्थानोमां जड़ शकता इता. मृत्युना बिछाने सुतेला मानयो
तथा असंख्य सुंगा प्राणीमोने अभयदान आपी बचावता.
मात्र आशिर्वादथी असंख्य मानवोने पावन बनाव्यां छे.
तेश्रोशीना जीवन संबंधमां घणाज अद्भूत अने अलौकीक
नावलाओ छ, के जनो लखवाथी पार आवी शके तेम नथी.
मृत्युनो समय पण एक मास अगाउथी जाहेर कयों हतो,
अने दातुं के "मारा मृतदेहने जे जग्याए अग्निसंस्कार
करो ने जगाए पालम्बीनी आजुबाजु चार, लीमडाना सुका
.
६१
" खुंटा दाटजो, अग्नि प्रगटाववाली जरूर नहि पडे. शरीर उपरनां उपकरणो, ओपो, महुपत्ती कपडां विगेरे तथा पालखीनी धजा अखंड रहेशे. मात्र आ शरीरे जेवी रीते जन्म धारण कर्यो छे ते शरीरज वळीने भस्म थशे. "लीमना जे चार खूटा दाटशो ते पण वळशे नहि, परंतु अखंड रही भविष्यमां चार लीमडाना वृक्ष थशे. म्हारा काळ- धर्म बाद भविष्यमां कोइ महान आत्मा मारी पाछळ थशे त्यारे तेमांनु एक लीमडानु वृक्ष अद्रश्य थइ जशे." प्रस्तुत हकीकत मुजब संवत् १९४९ ना श्रावण वद छठने रोज प्रभातमां तेओश्री काळधर्म पामी गया. सहस्त्रगण्य मानवो जातिना भेदभाव वगर तेओश्रीनी पालखीने अग्नि- संस्कार माहे जंगलमां लइ गया. लीमडाना चार खूटा दाटी वचमां गुरुश्रीना मृतदेहनी पालखी विराजमान करवामां आवी, अने पालखीनी आसपास चंदननां लाकडां गोठववामां आव्यां इन्द्र महाराजाए पण ते समये अतिवृष्टी करी के जळनो पार रह्यो नहि. अग्नि आपोआप जमणा अंगुठामाथी प्रगट थइ, शरीर उपरनां उपकरणो पालखीनी धजा अने जमीनमां दाटेला लीमना चार खूटा विगेरे अखंड रहयु. मात्र शरीरज वळीने खाख थयु. उपकरणो अने धजा लोको प्रसादी रुपे लइ गया. गुरुश्रीना देवलोक पाम्या वाद जे जग्याए अग्निसंस्कार करवामां आव्यो हतो त्यां दाटेला लीमडाना चार खूटाना १५ चार वृक्षो थयां. गुरुश्रीनी देरी मांडोली गासना पाळे कर- वामां आवेली छे, जे देरीमां गुरुथीनां चरण पधरावेल छे. ज्यारे गुस्थीनी देवलोक पाण्यानी तिथी आवे छे त्याने त्यां मोटो मेलो शराय छे, अने ते दिवसे दर्शन करवा आवनार हरेकने मांडोली गाम तरफथी जमण अपाय छे. ते दिवसे प्रभातमां गुरुदेवना चरणमांथी अपुन रामय गंगाजळ बहे छे. मांडोली तथा तेनी आसपासना गामना मानतो गुरुदेव भगवानना चरणने महान देव तरिके पूजे छे, कोडक समय गुरुदेवश्रीए देवलोक पाया बाद श्रद्धापूर्ण भक्तोने दर्शन पण आप्यां छे. उपरनी तमाम वस्तुस्थिती हाल मोजुद छे. मात्र एक लीम हाल अद्रश्य थइ गयो छे. तेओश्रीना अगाध गुणोद्ध वर्णन तथा दिव्यतानो पार पामी शशाय तेम नथी. गुरुदेव भगवान श्रीसद् धर्मविजयजीना शिष्य तरीके महान नपरनी महात्माश्री तिर्थविजयजी थया. तेओश्री पण जाताना आहिर हता, जन्मस्थान गाम मणादर हतुं. तेश्रोश्रीए आए जीवन तपश्चर्यामांन पूर्ण कर्यु हतुं. संयत १९८४ ना फागण मुढ आठमना रोज मारवाडमां आवेल गाम मृडोनगमां तोश्री काळधर्म पामी गया छे, जेओश्री आपणा दवांगी संतना गुरु अने संसारीकपणाना सगा काका एता हता. १६ ज्योतिनां किरणो र - -- आपणा देवांशी संतनो जीवन प्रवाह संततिलका आहा वसंत आजे केवी खीली छे आहा अति अवनवा पुष्पे वरी छे जन्म्या. अहो शुभदिने कुळचन्द्र भानु आहिरना पुरवना पुन्ये थवानु. जन्मस्थान अने समय - 4 जन्मसमय संवत १९४५ ना माघ सुद पांचम स्थान मणादरनगर ईलाको शिरोही. वसंतनी प्रतिभा वसंत ऋतुनी पवित्र उर्मिओ मानवना अंतरपटमा हास्य पुरती हती. जंगलमा पहाडो अने वृक्षो पोतानु सौन्दर्य झग- झगावी रह्या हता. कोयल कोकिल कंठे कर्णप्रिय मधुरा टहुकार करी रही हती. वसंतनां वधामणां आपतां वृक्षो गीचो- गीच पांदडाथी लीली घटा पाथरी रह्यां हता. :१७ ३ उपाली मंदमंद शितल लहेरो अने झरसर अरसर प्रवाह रेलाता हता. मोर अने वपैयां तेना हृदयभेदक यूरोधी गुंजार करी रह्यां हता. मुरघो प्रमातना छेल्ला रणकारथी मानवने जागृत करतो हतो. सन्नारीओ पोतपोतानी सम्बीओ साये जळ भरवा कुवा तरफ सिधावती हती. वसंतनो तहेवार होवाथी मालवसमुहमा हर्पनां स्मित उभरायां हता. चालो ! चालो ! चालो ! आहिरना माढ तरफ जईए. आहिरना वासमां प्रमातनो समय होवाथी सर्व कोई गौमाताने दोही दुध संकेलवाना कार्यमां गुंथायेला हता. सूर्यनारायण पोतानो प्रकाष फेलाववा मधरां मधरां किरणो फेंकी रह्यो हतो. प्हो फाटवाना समयमां रायकाश्री भीम- तोलाजीना आंगणे कोई भेदी गुंजार थई रह्यो हतो. आस- पासना स्त्रीपुरुषो एकत्र थई ते तरफ प्रयाण करी रह्यां हतां. टुंक समयमांज वधामणी फरी के वसुदेवीनी कुक्षीए एक पुत्ररत्ननो प्रसव थयो छे. साधारण रीते विचारवामां आवे तो युगनो एवो प्रभाव छे के हरकोई ज्ञातीमां पुत्रनो जन्म थाय तो आनन्दमा वृद्धि थाय छे. आहिरना वासमा आजे आनंदनी सीमा न हती. ए पुत्रनी अद्भूत क्रांति, चकोर नयनो अने शरातन तेनी साथेन जन्म्यां होय एवी तेनी बालचेटा हती. पुत्रना आवा उत्तम लक्षणो अने सौन्दर्यता निटाळी मातापितानो प्रेग ए पुत्र उपर अवधि हतो. मातापिता
.
-
ए पुत्रने घडीवर विखुटो मुकतां नहि परंतु तेना लाडभावर्मा
हर्षघेलां वनता.
बाल्य अवस्था अपूर्व लाडभावमा सीलवा मांडी. जंगलो
अने वृक्षोनी गीच घटाओमां गौओने चरावतां वृक्षना थडे
पारणामां माताजी पुत्रने झूलावतां.
वालुडो रे हो मारो लाडकडो
मारो लाडकडो मारो लाडकडो
चालुडो रे हो मारो लाडकडो
हेते हुलावती स्नेहे फुलावती
चरणो हुँ चुंबती रे हो मारो लाडकडो
व्हाल करुं व्हालाने हैयुं भराय छ
आश दीप झवके रे हो मारो लाडकडो ,
झाडे झूलावती हर्षाश्रु सारती
वाळ मने व्हालेरो हो मारो लाडकडो
हैयानांहीर मारालाडकडाबाळने
लाडमयों लाडभयो हो मारो लाडकडो
हृदयमा हर्षवेलां बनेला माता वृक्षना थडे पारणु वांधी
बाळकने झुलावी रह्यां छे. आसपासना खेतरोमां गौमाता
आदि चरी रह्यो छे. कोयलो मधुरा नादे गुंजार करी रही छे,
जंगलनां मनोहर द्रश्यो नयनो समक्ष अवनवी ज्योति झघावी
रह्मां छे. आवी अलौकिक कुदरतनी छायामां ए झूलाय छे,
,
ܪܕ
हुलाय छे, फुलाय छे, अने दुनियाना मुबाको पानी
मुखाकृति अने वालचेष्टा निहाळी हवाय के.
ज्यारे सूर्यनारायण प्रकाय फेंके ने त्याने तेनी ज्योति
अजायव भासे छे. चंपाना वृक्षने पुष्प आये के न्यारे नेनी
वास अपूर्व भासे छे. तेवीज रीते आ वाळकनो जीवन दीपक
झळकवा मांडचो.
मातापिताना मोंघेरा लाडभावमां जीवनपुष्प नबीलतां
शुभ दिने ए बाळकनुं नाम सगतोजी पाडवामां आव्यु,
परंतु मानव समुह ए वाळकने संतोकीयाना नामथी संबोधता.
सगतोजीनी अपूर्व मुखाकृति जीवननी अजायब चकोरता, हास्य
वदन अने दिव्य नेत्रांजनो मानवसमुहने हर्पपुग्ध बनावतां,
मातापितानी साथे जंगल अने वृक्षोनी आबोहवामां
जीवनपुष्प खीलतां पांच वर्षनी वय थतां एक युवान वये
पहोंचेला मानव जेटली बुद्धिमता खीलबा लागी. पुत्रनां
लक्षण पारणामांथीज वर्ताय अने हीरो तेना तेजथी कदापि
चलायमान थाय नहि. तेवीज़ रीते सगतोजीनु जीवन
झळकवा मांडयुं.
भावोना भणकारा
आठ वर्पनी वये पवित्र वनवृक्षोनी छायामां घुरतां धुरतां
पहाडो अने गीरीगुफाओनी सामे सगतोजी पोतानां चकोर
P- नयनो तलसावी रह्या हता. बुद्धिमता कोई अनेरो संचार करी रही हती. आध्यात्मिक वळ जीवनने दिव्य सन्देश अपी रहयुं हतुं. सगतोजी भावीना एक देवांशी संत बनशे तेनी कल्पना ते समये केम घडी काय ? सगतोजीना मनोमंदिरमा मायाना बंधनमांथी मुक्त थवा तेमज भावीने माटे तेमां नहि फसावा अद्वैत भान थयु. हुं कोण ? अने क्याथी ? जगत - साथे मारे ? संसार असार छे, माया अपार छे. एनाथी विरक्त वनवू एज मारो निर्धार छे. एटला उद्गारो बाद जीवनना निश्चयो अपूर्व वेगे झझूमवा लाग्या. संसार हारा यज्ञमां कई वीरनर होमई चूकया संसार हारा यज्ञमां बाहोश नर पटकई चूकया संसार हारा यज्ञमां डाह्या दिवाना थइ चूकया संसार हारा यज्ञमां बुद्धिधनो पण ना वच्या येन केन प्रकारे आ फानी दुनिया अने मायांना विषयी नहि अभडातां आध्यात्मिक पंथे जीवननाव हंकारवानी दृढ प्रतिज्ञाएं सगतोजी निडर वन्या. सगतोजीए मातापिताने पोताना निश्चयथी वाकेफ कया सगतोजीना आ उद्गारो श्रवण करी मातापिता बेवाकळां -
बनी गया. पुत्र तरफनी सोहांधताए जीवनने घडीभर नब्ध
बनाव्युं अने नयनोए अशुनी रेली करी.
जेना माटे भावी प्रबल शक्ति अजगावी रहुं होय न्या
मानवनु शुं चाले?
,
अहो ! कीरतार मायाना बंधननी पान्छळ दुनियाना
हरेक मानव मोहांध बन्या छे, के ए मोहनी धारा मानवने
अश्रुपात करावे तेमां शुं नवाई ?
चक्रवर्ति होय के वासुदेव होय, राजा होय के राणो
होय, श्रीमंत होय के निर्धन होय परंतु मातानो प्रेग तो पुत्र
उपर एकज सरखो होय.
सगतोजीनां मातापिता अति अश्रुनी धारा रेली रह्यां छे.
पुत्रनी भारीनी विचार श्रेणी श्रवण करी मोहनीगां बेबाकळां
बनी रडता हृदये प्रभुने प्रार्थना करे छे. ओ प्रभु आ पुत्रनी
वियोगता केम सहन थशे ! ओ प्रभु आ गभरु वाळनी लाड
भावना केन विसराशे ! ओ प्रभु आ लाडका पुत्रनी लालसा
केम भूलागे ! आ पुत्रना अंतरने आप जरापण कुमळु
नहि बनायो?
प्रेये रडे हैयां अमारा नाथ अंतर व्यावजो
मोहन जीवनने मारतो शांतिसुधा रेलावजो
जे आशमां झलतां हतां ए स्वप्न आज दिखाय
ओ पुत्र हारा कथनथी आंसु नयन उसराय
माया हृदयने वींधती तो पण जीवन झकडाय छे ओ पुत्र त्हारा स्नेहथी अंतर विखूटां थाय छे भाव भीना हृदये मातापिता अंतरमां कल्पांत करी रह्या छे. कहेवत छे के बाळहठ योगहठ, राजहठ अने स्त्रीहठ ए चार हठो दुनियामां मशहुर मनाय छे, के एने फेरववी ए असंभवित निवडे छे. ओ माता! हवे तुं मने घडीभर ककळाव नहि. संसार चित्र. भवसमुद्रमा जीवन नावने हंकारतां अनेक मुसाफरो मायाना दुष्ट अने तोफानी पवने संसारना भेदी चक्रमां मोहना वावाझोडे फसाया छे. पुत्रमां, पत्निमां, मित्रमां, स्नेहीमां, कुटुंबमां, वैभवमां, कीर्तिमां अने आप्तजनोना परितापमां झझूमतां भाग्येज कोइ वीरपुरुष आ भवसमुद्रमा जोलां खाता जीवन नावने वाहोश नाविकनी प्रबळता अने आत्मानी अगाध शक्तिने खीलवता भवसमुद्रथी पार पाम्या छे. बाकी तो अनेक मरे छे अने अनेक जन्मे छ, भवसमुद्रनी ए पारावार घटना अने पथक पथक खीणो छे. संसारनी भयरुप भेखडो अने मोहरूपी विकराळ जंग- लोमां मायाना महान विकट पंथे कर्मरूप बळीए अनेकनां बळीदान लीधां छे अने अनेक मोतना पंथे सिधाच्या छे. २३
,
संसारना परिताप, कर्मरुप अग्नि, मायानी गुंथेली विषम
सांकळो, मोहना मनोरम्म मिनारा अने वैभवनी अटेरीए रमण
करतां केटलाए मानवो संसारमा मूलां ममी रहयां छे. अनेक
जीवात्माओ ए माया अने मोहना भयानक पंथे आत्मार्थी
भोमिया वगर चोराशी लाख जीवयोनिमां भटकया छे,
रखडया छे अने अधोगतीना गेवी खाडामां पटकाया छे.
संसारनी पारावार लीलामा रमण करतां विषयाशक्त
मानवपक्षीओ मायाना भिन्न भिन्न तानमां हर्षवेलां बनी नाच
छे. कुटुंब निहाली खुशी थाय छे, वैभव निहाळी फुलाय छे
अने मायाना तानमा हरखाय छे.
आ असार संसारना कारागृहथी छुटवू ए विरलाओनीज
विभूति छे.
अगम पंथ भक्तितणो
वीर नरोनां काम
कायर निरखी भागता
मोघो ए विश्राम
मुक्ति तणा
संग्राममां
कोण झुकावे शीर
मरण थकी जे ना डरे
कहाता वीर
जेणे संसारमा जन्म धारण करवा छतां आत्मानी अजब मस्तीने पिछाणी छे, पुत्र वनिता अने यौवनमा फसावा छतां जेणे भक्तिनी अजोड प्राधान्यता खीलावी छे, वैभवमा विश्राम लेवा छतां दानेश्वरी बनी परमार्थना पंथे, अने अवरनी उन्नति खातर भक्ति अने धर्मना पंथे अनेक शुभमार्ग लक्ष्मीनो सत प्रयोग को छे एवा वीर पुरुषनी कीर्ति मृत्युना पंथे जवा छतां जगतनी द्रष्टिए अमर गवाय छे. एवा केटलाए इतिहासो आजे जगतमां अस्तित्व धरावे छे. मोक्षना महेमानो m- जेणे आ फानी दुनियानो त्याग करी मायानी गुंथेली सांकळो अने संसारनी गेवी शेत्रंजोने तोडी फोडी अने आ संसारनी असारताने जीवनना प्रत्येक रोममा उतारी जेओए आत्मामां साची फकिरता प्राप्त करी छे एवा देवांशी संतो के जेओने आत्मार्थी फकिरो वाही शकाय तेचा आत्मार्थी वीर पुरुषोनां नाम आ स्रष्टिने विषे अविचळ मनाय छे अने आलममां बसता लोकशासनमा पूजाय छे, भजाय छे अने स्मराय छे. एवा साचा आत्मार्थी जीवात्माओनु जीवन एज साची साधुता साधुनो अर्थ एटलोज थइ शके के जेणे आत्माने साध्यो होय तेज साधुत्वना पंथे आलेखाय. एवा शांत अने आत्मज्ञानी संत फकिर आ विषम समयमा जवल्लेज निरख- २५
वामां आवे, ए पण निववाद अने युगना पंथे सत्य अने
माननीय मनाशे.
माता ! हवे हुँ जाऊ छु.
संसारना परितापनी असारतामरी विषम भट्टीमां नहि
होमातां आध्यात्मिक शांतिनी शोधमा मुक्तिना असर पंथे
जीवन नैयां झुलावीश.
ओ दुनिया ! तारा आंगणे ज्ञानेश्वरी पण जन्म्या छे.
ओ ! दुनिया हारा आंगणे देवांशी संतो पण जन्म्या छे.
ओ दुनिया ! तारा आंगणे विश्वना तारक एवा आध्या-
यिक योगेश्वरो पण जन्म्या छे.
आजनो रायकाश्री भीमतोलाजीनो सणादर नगरमां
रम्य करतो पुत्र सगतोजी भविष्यकाळना एक देवांशी संत के
नारणार महान योगेश्वर वनो एनी रुपरेखा केम आलेखाय ?
कारतार ! न्हारी माया अगम्य छे. अनादि कालना
पुन्यना भरपुर खजाने करोडोनी संख्यामां बसतो कोक
मुनापरक न्हारा अविचळ मागनले भोलीयो बने छे.
जगतोजी वनक्षानी गीच घटाओ, पर्वतना शिखरो,
मनोमांस कन्ना भावीनी प्रतिज्ञा फलीभूत करवा
पनि डा श्वाने अनु चिन्न्नन करी रह्या छे, अने
ननमा नोभी बन रही छे. दुनियाथी भान
7 : ममतनी बसाए विचारश्रेणीमा गुंथाया छे.
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पूर्वना प्रबळ संयोगे महात्माश्री तिर्थविजयजीनो संसर्ग ययो. सगतोजीनी आवी उच्च भावनाओ निहाळी तेओश्री पण घडीभरने माटे विचारमा पड्या अने जेना माटे कल्पना- मात्र ना थइ शके एवा एक गभर वाळकनी आध्यात्मिक विचारश्रेणी श्रवण करी चकित बन्या. सगतोजीए पोतानी निश्चयवंत भावनाओ दर्शावी येन केन प्रकारे त्यागना पंथे प्रवेशी आध्यात्मिक शांतिमां जीव- ननो विकास उज्वल वनाववानी उर्मिओ प्रदर्शीत करी अने सगतोजीए तेओश्रीना संसर्गमा प्रयाण कयु. सोळ वर्षनी वय थतां सुधी सत्संगमां जीवन वितावी साधु बनवानी उच्च कक्षाए मेराया. साधुजीवननी तैयारी जोधपुर इलाकामां आनेल गाम रामसीणमां महात्माश्री तिर्थविजयजी विराजता हता. रामसीण गामना पंचो समक्ष संगतोजीना दीक्षा उत्सव संबंधमा केटलोक वार्तालाप थवा बाद संवत १९६.१ ना माघ सुद पांचम (वसंत पंचमी.) ना रोज लगतोजीने दीक्षा आपदानु मुहुर्त नियत कर- वामां आव्यू. रामसीण गाम अने तेनी आसपास वीजां चोवीस गाय आवेलां छे. तेमां रामसीण मशहुर गणाय छे. रामसीण .
गामनी ते समयनी प्रतिमा उज्यक आलेखाती. पांचशे जैन श्वेतांवर वीसा ओग्वालना ग्रहो, जीनालय अने उपाश्रय विगेरे गासनी मनोरस्यता अने कीर्ति उदभवतां हता. बगतोजीना दीक्षा महोत्स्वनो दिव्य संदेश श्रवण करी गमसीण गायनो मानवसबुह हर्पनी उर्मिओ उद्भवतो आनंद- मय ओजरना उच्च शिखरे रस्य करतां भावभीना विचारो संकेलतो तो. विविध प्रकारनी उर्मिओए मानव समुहने हर्षवेलां बनान्यां हता. अपूर्व अजायवता साये मानसीक तमन्नाओ इंच कक्षाए झझूमी हती. जीवनमा कदापि श्रवण नहि करेली अने भावीमां संभवित न मानी शकाय एली आननी देवीक घटना हरेकना मनोमंदिरमा दिव्यता पुन्ती ती. सद्भाग्य मानवां के पुन्यनो महान उदय मानवो ? जिली मानवी के देविक दुर्दुभी मानवी ? रामसीणमां तामाकपाहना भीतरना आ अपूर्व भावभर्या उदगारो हता. टाइ महात्मद, वरघोडी, स्वामीवात्सल्य आदि साधे अधिया दीक्षा महोन्मत्र उजववानी भावभीनी तैयारी- निपत पर. समीर गामना ठाकोरश्री जोरावरसिंहजी नोवन सानना टाकोरोमां नेत्रोनी कीर्ति श्रेष्ठ मनाती हती. स्वभावमा सरळ अने मीलनसार होइ तेओनी प्रतिभा उज्वळ आलेखाती ठाकोरश्री जोरावसिंहजीने पोता माटे वेसवानो एक मुख्य घोडो हतो. ते घोडा उपर स्वार बनी वायणे फरवानी सगतोजीनी खास तमन्ना होवाथी गामना पंचोए ठाकोर साहेब समक्ष प्रस्तुत घटना दर्शाची. ठाकोर साहेब पण एक आहिरना पुत्रनी साधु अवस्था ग्रहण करवानी जीज्ञासा, अने दीक्षा महोत्सवनी भावभीनी तैयारीओ श्रवण करी आनंदमुग्ध बन्या अने पंचो समक्ष पोतानो घोडो आपवा- नी भावना व्यक्त करी. दीक्षाना एकवीश दिन अगाउथी सगतोजीने वायणे नोतरवानो क्रम गोठवायो. वायणु एटले जे ग्रहस्थने त्यां जमवानु आमंत्रण करवामां आव्युं होय तेओने त्यां उत्तम वस्त्रालंकारोथी विभुपीत थइ वाजते गाजते जमवा जवानु. छेवटनी संसारिक भावनाओ पुर्ण करवानी आ अभिलापाओ कहीये तो चाली शके. . दीक्षा महोत्सव रामसीण गामनी अंदर आ भव्य तैयारीओ शानी थइ, रही छे ? बहारथी आवतो हरेक सुसाफर आ भव्यता सामे, नयनो फेंकी रह्यो हतो. एटलं श्रवण करवामां आवतुं के आहिर- २९ ज्ञातीमा जन्मेल एक गमरु युवान त्यागना पंथे सा थुथवाने दीक्षा अंगिकार करवाना छे, तेनी आ अपूर्व तैयारीओ चाली रही छे. दीक्षा महोत्सवनी दिव्यता निरखया रामसीण गामनी पादरे आसपासनां गामोमांथी असंख्य मानवमेदनी उलटी हती. आहिर ज्ञातीनो एक गभरू युवान केटलो बधो पुन्य- शाळी इशे के आजे ए त्यागना पंथे जीवननैयां झूकावशे ! आवा भावभीना उद्गारो चिंतवता असंख्य मानवसमुह राम- सीण गामसां रवेशवा मांडयो. दीक्षा समय १९६१ला माघ सुद पांचम (वसंतपंचमी) अट्टाई महोत्सव, स्वामी वात्सल्य आदि शुभकार्यनी समाप्ती दाद आजरोज दीक्षानो वरघोडो हतो. आजना प्रभातथी ढोल वाजीव शरणाई नोरत बगीओ घोडा पालखी आदिना समा- भनी अपूर्व तयारीओ थई. मूर्यनारायण पण पोतानो भव्य प्रकार फेला लाग्यो. रामसीण नगरमा वसतो मानवसमुह, ही पुरुप दालन आदि सर्व आ दिव्य वरघोडानो अद्वैत गनद टूटदा पोतपोतानाच प्रकारना शुभ वस्त्रालंकारोथी म. ने टुं. ननयमां बाजीत्र ढोल शरणाई आदिना ती नदोर सनी नगरने जाग्रत करी दीधुं. SU सगतोजी पण संसारिक अवस्थाने छेवटनी अंजली अपी आत्ममार्ग प्रवेशवाना होवाथी तेमने उच्च कोटीना शुभ वस्त्रालंकारोथी विशुषीत करवामां आव्या अने कुमारिकाना शुभ हस्ते ललाटमां कुमकुमनु मंगळ तिलक करावी हथेलीमां श्रीफळ अने चांदी नाणु अपी सज्ज करेल पालखीमां विराज- मान करवामां आव्या. पालखीमां द्रव्य तथा बदामोनो ढग करवामां आव्यो. तुरतज जयजयना गगनभेदी नादो साथे दिव्य वरघोडानी शरुआत थई. सगतोजी मानवसमुहना सामे चकोर नयनो तलसावतां द्रव्यादिनी वृष्टि करता हता. आ समये रामसीण नगरमा असंख्य मानवमेदनी उलटी पड़ी हती. नगरनी चोतरफ प्रदक्षिणा फरी वरघोडो उपाश्रय नजीक आवी गयो. सगतोजी पालखीमांथी उतरी जीनालयमां दर्शन करी उपाश्रयमा प्रवेश्या. गुरुश्री तिर्थविजयजीने वंदना करी गुरुना आदेश गुजब दीक्षानी विधीमां जोडाया. शिवीका परथी भूमि पर उतरे मदमाया मोह मने मने विसरे शुभ वस्त्र सज्यां निज देह परे अलंकार तजी सहु दूर करे. १ •hcs कोण अले क्याथी उपन्यो पळेपन याद करें
मुज ज्ञात नथी सुज तात नथी
मुज मात नथी हुँ एक खरे. २
गुरु चर्ण पडी विधी सर्व करी
शीर लोच चूंटी शुम वेश धरे
सहु माफ करो सहु माफ करो
नहि वेर अने नहि खेद अरे. ३
सद जीव क्षमा आपो शुजने
सर्व जीवोने खमाई
अरे
शुम वेश सजी प्रभु चीर तणो
वीरपणुं राखीश
खरे. ४
हु
कदी कष्ट पढे सुज शीर परे
पण शांति कदी न तजीश अरे
निर्जर बनवस्ती प्रडेश मही
मुज आन्यतणु साधीश बरे. ५
हं मंन वनु हुँ संत
हूं संत बनु
संयम
व्रत भार बहीश हवे
वृट निश्व भीम कर मनायी
दावी नदि पीछ करीग हवे ६
शार्दुलविक्रडीत छंद
अंगे वस्त्र सजेल सर्व मुकयां आभुषणो अंगथी
मायाने ममता बधी मन तजी साधुत्वना रंगथी
मानवपुर उभर्यां अती निरखतां अश्रु नयनथी वहे
क्यां ए आहिरपुत्र आज साधु संन्यास पदने वरे
संयम भार उठावयो कठीन छे खांडा तणी धार छे
कायर नरनु काम नहि अरेरे विरला तणी पार छे
आशिष आपे वृद्धजन मुखेथी कल्याणकारी थजो
वीरवळनी हाकल करी जगतना कल्याणकारी हजो
.
निहाळो! निहाळो! निहाळो!
ए आत्मदिक्षा उचरे छे अने विश्वना साधु बने छे.
पंचमुष्टि लोच, स्नान आदि क्रिया पूर्ण थतां सगतोजीने
साधुवेश अंगीकार करावी गुरुश्री तिर्थविजयजीए पोताना
शिष्य तरीकेनी मस्तक उपर वासक्षेप नाखी तेओश्रीनु नाम
मुनि महाराज श्री शांतिविजयजी स्थापित कयु. एकत्र
थयेल मानवमेदनीए घडीमर प्रेमनां अश्रुओ वाव्यां अने
वृद्धोए आशिप अपी.
"हे पुत्र! तमो कल्याणकारी थाओ"
" हे पुत्र! तमो साचा वीर थाओ"
३३
४
आल्स सावना
( हरिगीत छंद)
हुं जाउं हुं हुं जाउं छु
त्यां कोइ पण नहि आवशो
मस्तो तणा ए महेल छे
कायर नहि त्यां फावशो १
ए धून छे विरलातणी
निश्चय विना नहि आवशो
मुक्ति तणो ए पंथ छे
भक्ति सुधा रेलायशो २
संसार नाम असार छे
माया जीवनी मारशो
मृत्यु भीति नहि होय तो
घटमां प्रकाप झपावशो ३
योग ने क्यांधी थ्यो
ए गोधमा
हुँ निसरू
हात नाहि मुन जान नदि
पंथे विचरु ४
ह
स्नेही नहि मित्रो नहि
हुँ एकलो हुँ एकलो
नहि कोइ माझं जग्तमा
हुँ एकलो हुँ एकलो ५
हुं संत विश्व तणो बनु
मुज आत्मनो साधक थवा
वनवास ने पहाडो महि
विचरीश मनने साधवा ६
कर्मों सतावे कारमा
ए ख्याल मनमां नहि करु
सोहम् तणा स्वप्ना महि
भव भय तणां दुःखडां हरु ७
निश्चय कदापि नहि चूकुं
आत्ममस्तीमां
झूकुं
मुक्ति विरुदने पामवा
मारी प्रतिज्ञा नहि चूकुं ८
हुँ
चैतन्यघन! चैतन्यघन!
आनंदघन! आनंदघन!
करशुं नमन! करशुं नमन !
करशुं नमन! करशुं नमन! ९
३५
आत्मभावनानां अविचळ सुत्रोनां संस्मरणो करता आध्यात्मिक शांतिना उपासक वनवानी तमन्नामां प्रेराया. साधु अवस्थानो पुरो बोधपाठ ग्राव्य करवामां आवे तो तेनो अर्थ एटलोज थइ शके के साधुना वेपथी मानवनो आत्मा साधु बनतो नथी. परंतु साधुतत्वना ग्राहक वनी साधुत्वना पंथे जीवननाव हंकारे छे तेवा विरल आत्माओनीज साधुता पूजनीय मानी शकाय. वाकी वर्तमान समयना वितंडावादमां नयनो फेरवीए तो श्रद्धाहिन्य वनवाना बोधपाठ सिवाय साधुत्व भाग्येज निश्ववामां आवे. दिक्षा अंगीकार कर्या बाद आपणा देवांशी संत साधुत्वना अमर पंथे विचरवानी द्रढ प्रतिबाए रामतीणथी श्री मांडोली नगरमां पधार्या. श्री मांडोलीनगर ए दादागुरु श्रीमद् धर्म- विजनीना जन्य अने काळधर्म पाण्यानु स्थान हतुं. दादागुरुनी गडत प्रतिभानु टुंझ अवलोकन हुं आगळ करी गयो छु. के जैपनी आपणा देवांगी ते नीचे मुजब प्रार्थना करी छे. न श्रद्धदेव ही य पक्षपातो नद्वैप मात्राद रुचि परेपुः शारदापन्न परीक्षयातु वागेव वीर प्रभुमाश्रितास्मः
.
श्री हरिभद्रमूरिजी महाराज कहते हैं कि जो साधन साध्य से
जोडता है वह धार्मिक योग कहाता है. और जो धर्मानुष्ठान शुद्ध
आत्मासे संयोग करावे वह योग है. "योगी योग निरोधः
अर्थात् सावधको रोकने से स्वाभाविक ही मन, वचन और कर्म पुण्यकी
ओर बढते है. मन, वचन, और कर्मका पुण्य की ओर जाने से योग
निरुद्ध हो कर शुद्ध आत्माको परमात्मा का दर्शन मिलता है.
पातंजलीने कहा है कि "योगश्चित प्रवृत्ति निरोधः "
अर्थात् चित्तकी वृतियों को रोकना ही योग है. जब चित्तको वृतियोंका
निरोध हो जाता है तो "दृष्टु स्वरुपेऽवष्यानम् " अर्थात् आत्माको
अपना रुप भासने लगता है.
कहा है-
पूजा कोटि समं स्तोत्रं स्तोत्रं कोटि समं जपः ।
जपात् कोटि समं ध्यानं ध्यानात् कोटि समं लयः॥
करोडो पूजा के समान एक स्तोत्र, और करोडो स्तोत्र समा
जप, और करोडो जप के समान ध्यान, और करोडो ध्यान के समान
लय (समाधि) होती है.
पुनः
निर्विकल्प समुत्पन्नं ज्ञानामृत पयोधरं ।
विवेक संजलिं कृत्वा तं पिबन्ति तपस्विनः ॥
निर्विकल्प से पैदा हुए ज्ञान रूपी अमृत के समुद्र को विवेक की
अंजली बना कर तपस्वो लोग पीते है.
समतामृत मनानाम् समाधि धूत पाप्पनाम् ।
रत्न त्रय भयं शुद्धं परज्योति प्रकाशकः ।।
समता रुपी अमृत में मग्न हुए तथा समावि से धो डाला है
अन्तःकर ग के पापोको जी-होने और ज्ञान, उर्शन तथा चारित्र से
शुद्ध हुए महापुरुष ही परम ज्योति को प्रकाश कर सकते है.
यत्क्षणं दृश्यते शुद्धं तत्क्षणं गत विभ्रमः।
युस्य चिन्तं स्थिरीभूतं निर्विकल्पं समाधये ॥
आत्म तत्व विपे जब योगिराजका चित्त स्थिर हो जाता है तब
निर्विकलए सम्माधिको प्राप्त कर स्वस्थ चित्त हो शुद्ध आत्माको पाता है.
श्री मांडोली नगरथी टुंक समय बाद आपणा देवांशी संत
रायसीणमां पधार्या. दिक्षा महोत्सवना शुभ प्रसंगमां द्रव्यनो
व्यय करवामां शेठ नोपाजी डाड्याजीनो अपूर्व काळो हतो.
ओट राससीणमां एक मकान इतुं तेमां कोइ मानव वास
करी शयतुं नहतुं. ते मकानमां आपणा देवांशी संते त्रग दिवस
वास कयों, अने त्यारवाद ते मकानमा तेओ सर्व विना
भीतीए वाम करी शवया.
आध्यात्मिक पक्षे प्रवेमी आपणा देवांशी संते गतकाळनां
सौन्दर्य ने पूर्वसामी महान पुरुषोना सिद्धान्तोने अनुसरी
मला उस इमाए देदिप्यमान बनावयानी अपूर्व तालावेली-
हर दिनमारने स्थापन करी अने गीरीगुफाओमां
१
विचरवानी महत्वाकांक्षाए योगमार्गना अधिकारी बनवा
मौन अने ध्याननी गतिमा प्रवेश्या.
ॐकार विन्दु संयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः
कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमोनमः
कार आ विश्वनो अमोलो मंत्र छे.
ॐकार आ विश्वनो कल्याणकारी मंत्र छे.
ॐकार सर्व मंगलोमां प्रथम मंगळ छे.
*कार ए सर्व मंत्रोनो राजा छे.
ॐकार मां ब्रह्मा विष्णु महेश्वर आदी सर्व देवो छे.
ॐकार मां पंच परमेष्टि देवो के.
ॐकार सर्व सिद्धिनो दायक छ.
ॐकार कर्म समुहने भस्म करनार छे.
ॐकार शान्तिनो साचो मिनारो छे.
ॐकार आत्मानो साचो मार्गदर्शक छे.
आत्म समाधिनाअविचळ पंथे प्रवेशतां आपणा देवांशी संते
गानमां तानमां अने ध्यानमां ॐकार मंत्रने स्थापन कर्यो.
योगमार्गना अभ्यासी वनवानी अपार लगनीमा उच्च कक्षाए
आत्म मस्तीना अवर्णनिय दिव्य सूत्रोने अंगीकार करवा
पर्वतना शिखरो, कोतरो अने गीरीगुफाओमा विचर्या.
सज्जन रोड स्टेशनथी एक माइल दूर अजारी गाम
आवेलं छे. ज्यां कुमारपाळ राजानु बंधावेल घावन जीना-
लयतु मंदिर छे. अजारी गामथी अडथा माइल उपर मार्कड ऋपिनु आश्रम अने सेंकडो वर्ष पूर्वेनु सरस्वति देवीनु मंदिर आवेलं छे. मार्कड ऋषि छेल्ला त्रण सैकानी आसपास देवलोक थयानु मानवामां आवे छे. वैष्णवसंप्रदाय जेवी रीते गोपीचंद अने भर्तृहरीने अमर माने छे तेवीज रीते मार्केड ऋपिने पण मानवामां आवे छे. मार्कड ऋपिना आश्रमनी लगोलग ए सरस्वति देवीनु रमणीय स्थान आवलं छे. एनी प्रतिमा अने दिव्यता अगभ्य भनाय छे. हिंदुस्तानना इतिहासयां आ मंदिर अत्यंत पुराणु अने पूर्व समयमां थयेल महान पुरुषोने दिशासुचक आज स्थान हतुं, एम कहीए तो चाली शके. श्री अभयदेवनुरि महाराज, कळीकाळ सर्वज्ञ मनाता श्री हेगचन्द्राचार्य, श्री सिद्धसेन दिवाकर, श्री वपभट्टसरि, वसिष्ठ ऋपि, विश्वामित्र ऋषि, राजा भोज, पंडित काळीदास आदि अनेक महान पुरुषोए आ परमपवित्र स्थानमां जीवन- नयाने आत्मलमाधिना अविचळ पंथे मेरी छे. पर्वतोना शिखरो, कोतरो अने पांचसे खजुरीना वृक्षनी पीचोचीच छायानी मध्यमां आ परमपवित्र स्थान अपूर्व रमणीरता अने असीम शान्तिनो भास करावतुं दिव्य ज्योति झगमगार्ग न्युं छे. एनी विशिष्टतानु विशेष अवलोकन कर- रानो माम्प समय नहि होवाथी तेनो टुंक इतिहास काटेख्यो ई.
महात्माओना माटे आ एफ असीम शांतिनु स्थान छे. आ पवित्र स्थानमां आपणा देवांशी संते लांबोकाळ आत्म- समाधिमां रमण करी जीवननैयाने आध्यात्मिक पंथे आगळ धपावी छे. मार्कड ऋषिना आश्रममा लांबोकाळ आत्मसमाधिमा निर्ग- मन करी आध्यात्मिक पंथना प्रेरक बनी आपणा देवांशी संत पवित्र आवु गीरीराजमां पधार्या. पूर्वकाळमां थइ गयेला अने प्रभुतामां पूजाता असंख्य ऋपिमुनिओए आवु पर्वतनां विकराळ जंगलो अने गुफाओमा आत्मसमाधि द्वारा प्रक्षुता प्राप्त करी छे. आयु पर्वतनी अद्वैत घटनाओ दर्शावता चीर स्मरणीय कीर्तीस्थंभो अने दैविक स्थानो आजे पण यशस्वी छे. आवु पर्वतनी अद्वैत प्रतिमाथी भाग्येज कोइ अजाण हशे. आधु पर्वतनां विक्राळ जंगलोमा झगमगतां दैविक स्थानो जेवां के वशिष्ठाश्रम, पाटनारायण, गुरुशिखर ऋषिकेप आदि एवी भयभीत भूमिमां आवेलां छे के ज्यां हिंसक प्राणी सिवाय मानव भाग्येज विचरी शके. आवां स्थानोमां आपणा देवांशी संते आत्मसमाधिमा रमण करता मृत्युने हथेलीमा राखी मौन अने तपश्चर्यामांज जीवननैयांने झूलावी छे. महान घोर अभिग्रहो अने मरणान्त उपसर्गोनो सामनो करी कर्म समुहने खाख करवा केवळ क्षमासूत्रोनी माळा भजतां वर्षोनां वर्षों अध्यात्मिक पंथे विताव्यां छे. रसेन्द्रियनो निग्रह ४१ करवा मीठा वगरना अउदना वाकला पर रही अडोल आसने छ छ मास सुधी ध्यानस्थ दशामां जीवननैयां झुलावी छे. ए समयनी दैविक घटनाओ उद्भवतां आपणा देवांशी संते पोताना पूर्वभूत सिद्धांतोने यशस्वी बनाववा महान पुरुषोना जीवनना बोधपाठने हृदयमंदिरमां कोतरी भगवानश्री महावीर- नो एकज सिद्धान्त क्षमा विरस्य तूपणम् "ने अमर वनाव्यो छे. 66 एक समय आपणा देवांशी संत श्री वामणवाडजी तिर्थमां विराजता हता, धर्मशाळामा दाखल थतां मुख्य द्वारना मेडा उपर तेओश्रीनो निवास हतो. ते मेडो अने जमीनदळनी वचमां पंदर फुटनी उंचाई हो. जमीन उपर मात्र पत्थरोनी शीलाओज हती. ए मेडाली वारी पासे आ देवांशी संत रात्रीना ध्यानस्थ दशागां विराजता हता. ते समये अचानक उपसर्ग थवाथी नीचेनी जमीन दळना पत्थरोमां घटकाया, अने मस्तक- मांथी लोहीनी धारा वही. टुंब समय बाद कारखानाना माणसोने खबर पडता त्यां आबी पहोंच्या, अने तेओश्रीने मेडागां विराजमान कर्या. पूर्व समयना महान पुरुषोला सिद्धांतोने रोमेरोममां कोतरी आपणा देवांशी संते वो मुधी पर्वतमा शिखरो, कोतरो, गीरीपाओ अने भयानक निर्जर बनोमां विचरी ध्यानस्थ दगामा रम्य करनां आध्यात्मिक पंथे आत्मज्योत प्रकापी छे ४२ पी. ए. महेताना मननीय उदगारो. n अरे ! मने ज्यारे हिन्दना छप्पन लाख साधुओ, वावाओ अने फकीरो याद आव्या त्यारे मने विचार थयो के, मांहो- माहे चीसकारी पाडता, घुरका घुरकी करता अने हरामनी रोटी खानाराओ ए क्यां अने आ महान पुरुष क्या ? आत्मानी साक्षीए कहुं हुं के में मारी जींदगीमांखरेखरो आनंद मेळव्यो होय तो आ महान पुरुष शांतिविजयजीनां चर- णोना ज्यारे में दर्शन कर्या त्यारेज. भूतकाळमां जे महान पुरुषो थइ गया छे ते कोटीमां तेओ अत्यारे सहेजमां आवी उभा छे. एमनो जे भोळो देखाव उपरनो देखाय छ के "आतो कोई वाळक जेवा बाबा भोला देखाय छे" पण ए महान पुरुषनां अंदरनां तत्वो घणाज उत्तम छे अने जेनी गति पण गहन छे एवा पुरुषने ओळरखवा माटे, महान शक्ति वाळो जीव होय तोपण घणा लांवा टाईमे कांईक अंशेज समजी शके छे. कोण कहे छे के भारतमां अमृतगंगा नथी ? कोण कहे छे के-दुनियामां कल्पवृक्ष नथी ? में तो एम मान्यु हतुं के ए तो कोई मंत्र वादी देवी उपासक हशे पण एतो कळीका- ळमां अलौकिक राजयोगनो खरेखरो अनुभव मेळवेला महान छे. अरे ! में तो आटला वरस सुधी भुलज खाधी,
कारण के सारी मति अने कल्पनाए मने खरेखरो दगो दीधो.
कारण के भने ओळखतां आटला बरस लागी गया.
हुँ ए महान पुरुषनी तारीफ नथी करतो. पण ए सत्यनो
संदेशो जगतने अंधकारमाथी अजवालामां आववा माटे कई
छु. ए महान पुरुषना गुणोतो घणाज छे पण केटलं लखी
शकाय ? मने तो लाग्युं छे के तेओश्री सर्वना मनना विचारो
बहु सारी रीते जाणी शके छे. अरे! कहेवू न कहेg एतो
एमनी नरजीनी वात छे. एमने माटे मारे शुं शब्दो संबोधवा
ते काइ हुं समजी शकतो नथी.
४४
दिव्य ओजसो
गजल
प्रतिभा विश्वमा झळकी
दीपकनां तेज प्रगटायां
अविचळ भावनी झांखी
सरोवर स्नेह रेलायां
नती ज्यां कल्पना त्यां त्यां
अजव घटना बतावी छे
वन्यु जे ना वने त्यां त्यां
अमर वंसी वजावी के
संसारना परितापनी विषम भट्ठीमां नहि होमातां साधु-
त्वना रंगने प्रत्येक रोममां पुरतां पुरतां आत्म समाधिना
अविचळ शिखरे चडवानी कुच कदममां आगे धपतां आपणा
देवांशी संत पहाडो, वन वृक्षो अने गीरी गुफाओमां रमण
करता आबु गीरीराजनी आसपासनी भूमिमां विचरता हता.
,, माया देवीनी मोह जाळोने एणे वींखी नांखी हती
संसारनी शेत्रंजोने एणे तोडी नांखी हती.
मारा हारानी मीमांसाओ एणे भस्मीभूत वनावी हती. संसारिक विपत्तीओथी विराम पामी केवळ सोहम् सोहम्नीज भट्टी धखावी हती. दुनियाना दगलबाजो अने जगतना जादुगरो सामे नयनो नहि फेकतां आगोचर पंथेज प्रयाण कयु हतुं. हूं कोण ? अने क्यांथी ? आ एकज तमन्नामां जीवन नैयां अमी हती. धावा समये आपणा देवांशी संत लोक शासनना व्यव- रशी चिनुन रही एकांत अने आत्म समाधिमांज जीवनना पाल सामनी ध्यान गव्यामां ममपी निजानंद लुटता हता. गलानी नंत गतिओ छे. आत्मा अरुपी छे अने देह -मानले. दहिगन्मा अंतरात्मा अने परमात्मा ए दरतां महान योगेश्वरो अने अवधूतोज पनी गतिमा प्रवेशी प्रान्म ज्योतिनो दीपक छे. भावा भान्मार्थी पुरुषोनी भावना पर है छतां जेनु कल्याण थवानु -~~ र पाटने ग्राद्य की भक्तिना हर के.
वर्तमान समयना विज्ञानकारोनी शोधोने निहाळतां एवी केटलीए शोधन कलाओ आजे आपणा नयनो समक्ष तरी आवे छे के आ सर्व घटनाओनो उंडा उतरी ख्याल करीएतो आखरे हरेकमां कुदरतनीज दैवीक शक्तिओ प्रवेशेली छे. जेवी रीते रेडीया उपरज आपणे विचारीएतो घणीज सहेलाइथी समजी शकाय तेम छे. रेडीओ एकज स्थान परथी ब्रोडकास्ट थाय छे परंतु हजारो कोसना अंतरे वसतो मानवसमुह ते श्रवण करी शके छे. आ वस्तुस्थिती पण विचार गम्य के कारणके तेमां पण एटलं तो अवश्य छे के जेने त्यां रेडीयानु मशीन होय तेज ए श्रवण करी शके छे वाकी आखं जगत श्रवण करी शकतुं नथी. तेवी रीते महान योगेश्वरो अवधूतो अने देवांशी संतो विश्वभरमां सततपणे दिव्य संदेशनो ब्रोडकाट कर्या करे हे छतां ए संदेशने झीलवा माटे शुद्ध हृदय रुपी रेडीयो धराव- नारा पुन्यवान जीवात्माओ जवल्लेज मळी आवे छे. दुनियातो विविध प्रकारे मायाना परितापमां झझूमेली छे ते मायावी दुनिया कदापि आत्मज्योतिना प्रकाषने ग्रहण करी शकती नथी.
आपणा देवांशी संत आजे आत्मज्योतिनो दीपक विश्व- भरमां प्रगटावी रह्या छे. साधु थर्बु ना स्हेल छे बंधन कदी ना तूटतां मदमोह ने माया खरेखर आत्मधनने लूंटतां व्याधि दिगो वीरला भट्टी जलावे ध्याननी मम्मी की कमों तणी माला भजे भगवाननी गुरु शिप्यना मेकापने लांबो काळ निर्गमन थयो हतो आ लमये आपणा देवांगी संतना गुरु श्री तिर्थविजयजी माराज मांडली नाममा विराजता हता. एक दिवस मध्यान्हे शिप्यन चितवन करतां गुरुश्री तिर्थविजयजीना नयनोमांथी आंच टाकला लाग्यां. शिप्यना जीवननी विचार सरणी मिदिमा प्रवेगन चिंतातुर बन्या हता तेज दिवसे गाणा देवांनी मननी मांडोली गामे गुरुत्री तिर्थविजयजी गण गच्या आप तरफ विचरूं हूं."
फेदाणी गामयां ते समये आशरे जैलोनां पांत्रीशेक घर
हता. गाममां जीनालय आदी कंइ ज हतुं नहि. आपणा देवांशी
संते गाममां निवासस्थान नियत कर्या वाद गामना पंचोने
वोधपाठ करतां प्रभुभक्ति याटे जीनेश्वरदेवनी मूर्ति स्थापन
करवा सूचव्यु. आपणा देवांशी संतना संदेशनो सत्कार करी
गामना पंचोए जीन प्रतिमाजी स्थापन करवानु नक्की कयु.
गामना पंचोनी आर्थीक स्थिती सामान्य होवा छतां ते
शुभ दिने लावशीनु भोजन करवानु नियत कयु अने आपणा
देवांशी संतना उपदेश अनुसार आसपासना गाममाथी जीन
प्रतिमाजी लावी शुम दिने प्रतिष्ठा करी.
जे शुभ दिने प्रतिमाजी विराजमान करवामां आव्यां
तेज दिवसे आपणा देवांशी संतना दर्शनार्थे मांडोली अने
आजुबाजुना गाममाथी लगभग अढीसो मानव सांजना चार
वागता पछी गाममां आवी पहोंच्यु. आजना.शुभ दिने मंगळ
कार्य होवाथी गामना पंचोए पोतानी शक्ति अनुसार पचासेक
मानव जमे तेटली सगवडे रसोइ तैयार करी हती.
विना संकल्पे अने अणधार समये अढीसों मानवना
आववाथी गामना पंचो मानसीक विचारश्रेणीमां गुंथाया.
सांजना चार वागता पछीनो समय होवाथी वधारे रसोई
वनाववा जेटलो अवकाश न हतो अने वहारथी आवेला
मानवोनुं सन्मान करवू ए पण प्रथम दरज्जे फरज हती.
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मानसिक सुंझवणो वितावतां पंचोए आपणा देवांशी संत
समक्ष सधळी हकिकत जणावी. ते समये आपणा देवांशी संते
खात्री आपी के तमो सर्व विना मीतीए सर्वने भोजन करावो
जेमां कोई वस्तुनी उणप नहि रहे एयो मारो आशिर्वाद छे.
आपणा देवांशी संतना आटला कथन वाद पंचो हर्पमुग्ध
वन्या अने हर्षनी छोळो वहावतां बहारथीआवेला महेमानोने
जयण सारु नोतर्या. बहारथी आवेला तमाम महेमानो अने
गामना पंचो सर्व मोजन जम्या अने त्यारवाद गाममा हरेक
घेर प्रसादी तरिके लारशी वहेंचवामां आवी.
फेदाणी गामना पंचो आ दैवी घटना निहाळी चकित
वन्या के जेनी कल्पना सरखी न हती ते शुभ कार्य आनंदनी
अवधि साथे पूर्ण थयुं.
मांडोली गाम अने आजुबाजुना गाममांथी आवेला
पहेमानो आ दैवीक घटना प्रत्यक्ष निहाळी हर्षनां स्वप्न
वितावनां आपणा देवांशी संतनां दर्शन करी पोतपोताना गामे
दिदाय धया.
पेदाणीची विहार करी आपणा देवांशी संत मांडोली
नाम पधारी गया अने गुरु श्री तिर्थविजयजीना मनोमंदि-
मान्तिरक्षा रेली.
वित दया दाह लांबा समये थापणा देवांशी संत
पधारता होवाथी मांडोली गाम अने आजुबाजुना गामना मानवसमुहमा अपूर्व आनंद रेलायो हतो. आत्मसमाधि अने निजानंद ए आपणा देवांशी संतनां जीवनसूत्रो हता. अद्यापि सुधीनो जीवन रथ ते पथे इंकारतां आपणा देवांशी संत सोहमनी ध्यान शैय्यामां झूलतां झूलतां आत्म ज्योतिनो दिव्य प्रकाश झघावी रह्या हता. मांडोली गामनी आसपास चोर अने धाडपाडुओनो भय झझूम्यो हतो. आजुबाजुना गाममां लूटफाट चाली रही हती. आवा समये मांडोली गामनो मानव समुह पण गभराटमां मुकायो हतो. जीवनमा हाम खूटी पडी हती. भयनी भीतीमां अधीरो बन्यो हतो. रात्री अने दिवस आजुबाजुनु वातावरण श्रवण करतां मुंझवणमांज जीवननी घडीओ वितावतो हतो. धन, माल, वैभव, कुटुंब अने परिवारनी मोह दशामां धीरज केम रही शके? आवा समये आपणा देवांशी संते मांडोली गामना मानव- समुहने खात्री आपी हती के विना भीतीए तमो सर्व भक्ति अने आनंदसांज जीवन वितायो, मांडोलीने कंइ पण थवानु नथी. आजुबाजुना गामोसां लूटफाट थइ परंतु आपणा देवांशी संतनी शुभाशिषथी मांडोली गाम आवाद रघु. विश्व प्रेमनां अमूलां वचनामृतो व्रपावतां आपणा देवांशी संत मांडोली अने आजुवाजुना गामोमांथी आवता हरेक
मानवने भक्ति गंगामां स्नान करावी पावन नचायना ने
आवनार सुसारो तेओश्रीनां दर्शन करी लांबा पानी गाय
डीपावता.
आत्म समाधिना अविचळ शिस असतां आपणा
देवांशी संत संवत १९७७ नी सालमां माह मानना अलावा
शिवगंज नगरमां विराजताहता. व्यानस्थ दगामां पण करता
एक दिवसे गोचरी निमित्ते प्रयाण करतां वरुपजी नामना एक
विशा ओशवाळ ग्रहस्थना घरमा प्रवेश्या के ज्यांना बाळा
अपंग दशामां पडेलो हतो, गोचरी वहोर्या (भिक्षा लीगा)
वाद ते बाळकनी दयामय स्थिति निहाळतां आपणा देवांशी
संते प्रश्न कर्यो के " आ वाळकने शुं थयुं छे ? " प्रत्युतर
मळ्यो के " बावजी ! ए घणा समयथी आवी अपंग दशामा
ज छे." ते समये आपणा देवांशी संते शुभाशिप अपी के
शांति थइ जशे" आटला कथन वाद आपणा देवांशी संत
आश्रयस्थान तरफ विदाय थया.
जे वाळक अपंग दशामां पडेलो हतो ते चालतो थयो
अने गत जीवन नविन गतिमा प्रवेश्युं. ते बाळकनु नाम
शुकनराज धनरुपमल छे जे हाल विद्यमान छे अने हालमां
तेओनी उमर सत्तावीश वर्पनी हशे.
आत्ममस्तिनो दीपक प्रगटावता आपणा देवांशी संतनी
शुभाशिपथी शिवगंजनगरमां घणाज लांबा रामयनो कलह हतो
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ते पण विराम पास्यो अने स्नेहमुधा रेलायां. सोहमनी ध्यान- शैयामां जीवननैयांने झूलावतां आपणा देवांशी संत लोक- शासलना वाखभावथी विमुख रहेता अने जगत पण तेओश्रीनी ओळखथी विमुख हतुं. केवळ एकज तमन्नामां मस्तीदीपक चावतां लोकशासनना परिचयमां तेओश्री घणाज ओछा आवता. आयु पर्वतनी आसपास रमणीय भूमिमां विचरतां आपणा देवांशी संत शिवगंजनगरथी विहार करी नजीकमां आवेल गाम पोमावामा प्रवेश्या. एक रात्री पसार करी प्रभा- तमा विहार कर्यो. बीजा दिवसे सवारमा गामना पंचोने जाण थतां, तेओ एकत्र थई आपणा देवांशी संतने गाममा लाववाना अपूर्व उत्साहे, तेओश्रीए जे मार्गे विहार को हतो ते तरफ प्रयाण कयु. बे माईलना अंतरे निहाळतां एक वृक्ष नीचे आसनस्थिर बनी, शांतिना सौन्दर्य वितावता, ध्यानस्थ दशामां आपणा देवांशी संत विराज्या हता. पंचोए विनय सहीत वंदन करी पोमावा गाममां पधारवा विनंति करी. पंचोनी विनंतिनो स्विकार करी अति आनंद अने जय जयना गुंजार साथे आपणा देवांशी संत गामनी पादरे आवी पहोंच्या. हर्षवेला मानवसमुहे अपूर्व भावभीना हृदय संकेलतां दवदवा भयु सामैयु कयु अने आपणा देवांशी संत गाममां प्रवेश्या. કર
पोसावा गाममां रतनचंद मनरुपजी नामना एक श्रेष्ठी
वसता हता. तेमनी प्रतिष्ठा उज्वळ मनाती हती. आर्थीक
स्थिती पण समय अनुसार ख्यातिमय हती. रतनचंद शेठना
हृदयमंदिरयां एक रात्री कोइ दैविक भास थयो, अने आपणा
देवांशी संत समक्ष उज्वळ कार्य करी लक्ष्मीनो सत्प्रयोग
करवानी उत्कंठा जागी. तेमना धर्मपत्नि खुमीवाई तथा तेमना
मातुश्री बनीवाईने वीशस्थानकनी ओळीनु व्रत उजववाना
निमित्ते पांचथी सात हजार रुपीया जेटली रकमनो सत्प्रयोग
करवानी भावना रतनचंद शेठे प्रदर्शीत करी. ते समयना
कथन मुजय रतनचंद शेठ पासे वीसेक हजारनी रोकड
अने चालीसेक हजार रुपीयानु जेवर (घरेणुंगांडं) हतुं. तेमज
परदेगयां चोखानो वेपार चालतो हतो.
रतनचंद टोटे पोतानी उत्कंठा पूर्ण करवा, उजमणु अठाई
मानव आदि शुभ कार्योनी तैयारीओ करी. अने आजुबाजुना
नामगंधी नगाग्नेहीने नोतरवाना संदेशा पाठव्या.
लिनचंद होटना प्रांगणे हजागेनी संख्यामां मानबमेदनी
सदी दडी. जेट मामनो मन ताप होवाथी रस्ताओ उपर
मग निवार व्य. आठ दिवस मुवी प्रभुभक्ति अने
- मंदापना भेदभाव सिवाय सहस्त्रगण्य
का जमत जम्यां. बीनगणनीना हजारो
:क ट प दानुनी उणप रहेती नहि.
5SF Tी एकादीना मंगळ प्रभाते
'-
असंख्य मानवसमुहनी ठठ जामतां आपणा देवांशी संत समक्ष रतनचंद शेठना मातुश्री वनीवाइ तथा तेमनां धर्मपत्नि खुमी- बाईए वीश स्थानकनी ओळीनु व्रत उजव्यु. अने शेठे पोतानी उत्कृष्ठ भावनाओ दिव्य स्वप्न वितावतां पूर्ण करी, पांच-सात हजारना खर्चनी भावनाए प्रवेशता, पोताना खुल्ला हस्ते सर्व रोकड रकम उपरांत जेवर (घरेणुंगाटुं) पण वेची नाखी साठेक हजार रुपीया जेवी मोटी रकम सतपंथे वापरी. पोमावा गामना मानवसमुहे जे कदापि निरख्यु न हतुं अने जेनी कल्पना सरखी पण उदभवी शकाय नहि तेवू दिव्य स्वप्न प्रत्यक्ष निहाळ्युं. ते समये पोमावा गाम एक विराट नगर बन्युं हतुं. एना आंगणे सहस्त्रगण्य मानवमेदनी उल्टी पडी हती, अने विना भीतीए आनंदना ओजसो वहावतां जयजयकार मनायो हतो. आत्मदीपक प्रगटावतां आपणा देवांशी संतना आशि- दिथी पोमावा गाममा दैविक घटना बनी गइ अने जयजय- कार गवायो. रतनचंद शेठे पण जेटली हार्दीक उत्कंठाथी सत्पंथे लक्ष्मी लूटावी हती तेनाथी वमणी लक्ष्मी वीजा वर्षे चोखाना वेपा- रमां प्राप्त करी. हालमा ते रतनचंद शेठना पुत्र हेमराजजी विद्यमान छे अने तेमनी प्रतिभा पण पोमावा गाममां उज्वळ मनाय छे. जीवन्मुक्त दशामां रमण करतां आपणा देवांशी संत मारकन्डेश्वर अने अजारी गाममां विराजता हता. मारवाडमा ५५ नाणा स्टेजननी नजीकमां चामुन्डेरी करीने एक गास आवेलु छे. चामुन्डेरीनी प्रतिभा उज्वळ मनाय छ. उपाश्रय अने जानवयो देना मारणचिन्हो छे. त्यांना मंदिरमां अंजनशलाका अने प्रतिष्ठा महोमर उजवानो हतो. जेनी भावभीनी नयारीमो बोलतां शुभ मुहूर्त नियत थयुं तुं. मुहूर्तनो नमय नजीक भावना गाम अग्निनी तथा चोन्नो भय वनपत्राथी, गुहर्तनो वखत शुभ नथी एवी गामलोसोमां गंगा उभी थई हती. गामना पंचो आ लमये विषम दुलानियां होयानां शान्तिने पाटे शुं करचुं ए विचार- श्रेणीयां गंधाया हना. चायन्डे गार पकीना केटलास ग्रहस्थो आपणा देवांशी रिची ता नेपोए गामना केटलाक प्रतिष्ठित पाटाराट की. अंतमा एq नियत थ' के आपणा नई नेओधीने सर्व घटनाओतुं निवेदन भीनी छायामांग शुभ कार्यों उजवना सी चामुन्डे गाममां पधारवा विनंती करवी. ना पत्र आपगा देवांगी मंत समक्ष अजारी - टरे भावी पहोंच्या. विनयपूर्वक वंदन ---- कार कानां गांनि थवा आशिर्वादनी सन्दा गामनां पधाग्दा मास अत्यंत 2: दिनति प्रदान करी, . - .
आवा संजोगोमां तेमनी विनंतिनो स्वीकार करी आपणा
देवांशी संन चामुन्डेरी तरफ विचर्या. विनंति करवा आवेला
पंचो हर्पनी छोळो उछाळता पोताना गाम तरफ सिधाच्या
अने आपणा देवांशी संतना पधारवाना शुभ संदेशथी गाम
लोकोने बाकेफ कर्या. गामनो मानवसमुह पण भावभीना
हृदये शुभ समाचार श्रवण करी हर्षीत बन्यो. गई कालनी
विषम भीती आजधी विराम थवा मांडी. दुःखना घेरायेला
वादळां विखरातां गाममां अपूर्व स्नेहमयों हर्ष समृद्धिनो सूर्य
प्रकापवा मांडयो अने आनंदना ओजसो छवायां. आपणा
देवांशी संत चामुन्डेरी गाममां प्रवेश्या अने तेओश्रीना पधा-
रखाथी तमाम भय शांत थइ गयो.
हर्पसमृद्धिमां दिवाना बनेला चामुन्डेरी गामना पंचोए
आपणा देवांशी संतना आदेश मुजब जाजम बीछाबी अने जे
कल्पना मात्रथी पण ना निरखी शकाय अने संभवीत न हतुं
तेवू दिव्य स्वप्न वितावतां वोलीनी आवकमां एक लाख ने
एंशी हजारेक जेटली मोटी रकमनी आवक थई.
चामुन्डेरी गामना आसपासना गामवाळाओ एकत्र थई
जमता न हता ते कलह पण विराम पाभ्यो अने अति उछरंगे
संवत १९८४ना
जेठ सुद एकमथी सातम सुधीमां प्रतिष्ठा
महोत्सवनु शुभ कार्य आपणा देवांशी संतनी छत्रछायामां
समाप्त थयु.
आसपासना गामोमांथी असंख्य मानवमेदनी उलटी अने कोईपण वस्तुनी उणप वगर जाति के संप्रदायना भेदभाव वगर नवफारशीना जमण थया के जे आपणा देवांशी संतनी लब्धिनीज घटना वनी गई. पोरवाल संमेलन संवत १९८९ना चैत्र वद-एकम, वीज अने त्रीजना रोज श्री बामणवाडजी तिर्थनी रमणीय भूमीमां अखील भारतना जैन श्वेतांबर वीशा पोरवाल ज्ञातीनुसंमेलन एकत्र थवानु हतुं तेना कार्यवाहको आएणा देवांशी संतने पधारवानी विनंति करवा अवचळगढ मुकासे आवेला. तेओए अत्यंत तमन्ना दर्शाववाथी तेओनी विनंतिनो स्वीकार कयों. बाद अवचळगढथी वामण- वाडजी तिर्थ तरफ विहार शरु को. रस्तामां आवता गामोगाम हजारोनी मानव मेदनीने पावन करता करता संवत १९८९ना चैत्र सुद वारसना रोज आपणा देवांशी संत बामणवाडजी तिर्थमां पधारी गया. पोग्बाल संमेलननी पुर्णाहुतीना समये मारवाडना श्रीसंघ नापी आपणा देवांशी संतने योगलब्धि संपन्न राज राजे- या अन्न जी प्रनिपालनां विरुद्ध अर्पण करवामां आव्या. अनेक समवे मारवाडमां उपगता चुडाने बंध करवानी घणीज नोश्री समक्ष प्रतिताओ लीधी.
श्री बामणवाडजी तिर्थभूमिमां आपणा देवांशी संतना दर्शनार्थ आसपासना गामोमांथी असंख्य मानवमेदनी उल्टी इती के एक मास मुधी श्री वामणवाडजी तिथं एक भव्य शहेर समु दिसतुं हतुं, एटली वीं मानवनीठठ जामेली रहेती. श्री वामणवाडजी तिर्थभूमिमां ते सभये शिरोही इला- काना अट्ठाशी गामना लगभग २५० ना आशरे वृद्ध रायकाओ दर्शनार्थे आवेला ते सर्वने आपणा देवांशी संते प्रतियोधी शुद्धाचार पाळवानी प्रतिज्ञाओ करावी अने हरेक गाममां ते मुजब पालन कराववानी शुभ सुचनाओने सर्व जणाए मान्य करी. सुरिसम्राट पद संवत १९९० ना कारतक मुद पुनमना रोज श्री बामण- वाडजी तिर्थभूमिथी दुजाणा निवासी एक गृहस्थ तरफथी नानी पंचतिर्थीनो छररी पाळतो संघ काढवामां आव्यो हतो. आसपासना गामोमांथी आशरे पांचेक हजारनी मानवमेदनी उल्टी हती. पंचतिथींना गामोमां फरी मागसर सुद वीजना रोज श्रीसंघ वीरवाडा मुकामे पधारी गयो. ज्यां गामनी पादरे एक वृक्ष नीचे आपणा देवांशी संत विराजमान हता. त्यां एकत्र थयेल मानवसमुहे तेओश्रीने जगतगुरु सूरिसम्राट पद अर्पण कर्यां हता. जे समये मुर्शीदावाद निवासि जगतशेठ तथा वीजा घणाज प्रतिष्ठित कुटुंवो हाजर हता. ५९ . वरखा इन्द्र लगी वृष्टि , दिव्य पुरुष पार्ण गणा भयो दिन - हिंदु नरेंदो नया पालनपुरना नवाब जोन, पान नाना मानवंता एजन्ट टु पी गार्नर जना, मान । बीला ओफीसदो तथा जीओए आप जीतने ॥ करवामां आवेल जगतगुलरिल वाटपदने गन पाने. अने गोलवाड प्रांतीय जैन कोनफरनले पण मग करानी अनुमोदन अप्यु छे तरुवर सरोवर संतजन चोथा मेह परमारथ कारणे चारे धरीया देह महान अने देवांशी विभूतिओ हमेगां जगतना कल्याण माटेज जन्म धारण करे छे अने विश्वकल्याण एज तेओश्रीनो ध्येय होय छे. विसलपुरनो प्रतिष्ठा महोत्सव मारवाडमां एरनपुरा नजीक विसलपुर गाममां आवेल जीनालयना प्रतिष्ठा महोत्सवना दिव्य प्रसंगे आपणा देवांशी संतने विसलपुर पधारवा त्यांना मानव समुहनी आदर्श भावना हती अने प्रतिष्ठा महोत्सव आदिनु तमाम कार्य तेओश्रीना शुभ हस्तेज दिपाववानी तेओनी खास उमेद अने आत्म- निश्चय हतां. के - ६० प्रतिष्ठा महोत्सवनो कार्यक्रम जाहेर थतां आसपासना गासमांथी हजारोना प्रमाणमा मानवमेदनी विसलपुर गागमा उतरी पडी हती. आ समये विसलपुर गाम एक विराट नगर वन्युं हतुं. गरमीनी ऋतु होइ आवनार हजारो माणलोने पाणी पुरं पाडवानी महान सुकेली उली थइ हती. आपणा देवांशी संत पण श्री वामणवाडजीथी विचरतां विसलपुर नगरमां पधारी गया. गाम लोकोए तेओश्री समक्ष पाणी सबंधनी मोटी मुश्केली व्यक्त करी. तेगोश्रीए आशि- वीद अप्यों के ज्यांमुधी उत्सवनी पुर्णाहुती नहि थाय त्यांलुधी पाणी अखूट रहेशे. आटला ऋथन वाद गागलोकोमा हिंमत आवी. आठ दिवस सुधी नवकारशीना जमणमां वीन गणतीना हजारो माणसो जमवा छतां लब्धिना अद्भूत प्रभावथी कोइ- पण वस्तुनी उणप रहेती नहिं. संवत १९९१ वैशाक सुद दशमना रोज अंजनशलाका अने प्रतिष्ठा महोत्सवनां शुभ काम आपणा देवांशी संतना शुभ हस्ते जय जयकार साथे सिद्धिने वर्या के जेनी दैविकता आलेखी शकाय तेम नथी. युग प्रधान एकत्र थयेल असंख्य मानवमेदनी अने श्री संघे आपणा देवांशी संतने ते समये युग प्रधान पद अर्पण कयु, जे समये तेओश्रीना मस्तक उपर सोनामहोरो चांदीनाणुं आदीनी दृष्टि करवामां आवी हती. अने स्वीओए साचा मोतीनो स्वस्तिक रच्यो हतो. जगतशेठनो इल्काव वर्षों थयां जेओने अर्पायेलो ६१ छे ते मुर्शिदाबाद निवासी शेठश्री जगतसिंहजी तथा जोधपुर स्टेटना ओफीसरो आदि बीजा घणाज प्रतिष्टित कुटुंबो ते समये त्यां हाजर हतां. आपणा देवांशी संतनी असंख्य दैवीक घटनाओ छे के जेने आलेखबानो आ स्थळे पूर्ण अवकाश नथी. तेओश्री एक स्थान उपर विराजता होवा छतां जुदा जुदा स्थळोमां श्चद्धा- पूर्ण मानवोने दर्शन आपे छे. जीवन्मुक्त दशामां रमण करता आत्ममस्तीना पूजारी आध्यात्मिक योगना अधिकारी महान पुरुषोना पवित्र दर्शनमात्रथी संसारिक व्याधिओ विरारे छे अने असाध्य रोगीओना रोग विराम पाये छे. जे कल्प- नामां न होय ते प्रत्यक्ष निहाळाय छे अने अशक्य घटनाओ शवर बने छे. तेओश्रीना अद्भूत प्रभावधी असंख्य मानवो पुन्ययागे प्रवेश्यां छे. आजे विश्वनी चोतरफ तेओश्रीनो जय- एंट गाजी रह्यो छे. पूज्य बनवानो दाबो नहि करतां पूजक वनवानी साची सिलापा, गुरु बनबानो दाबो नहि करतां शिष्य बनवानी साची मनोदना, आध्यात्मिक शांति अने जगतकल्याणनी नाही भावना तोश्रीना रोमेरोममां गुंजार करी रही छे. न्यां विराजे हे त्यां चोथो आरोज ( सतयुग ) कागल म ने विराटनगर बने छे, अने गाम मटीने की गय है, जांडगीमां निहाळ्यु न होय तेवा अद्वैत निहार है, भने आनंदनोज मागर पाय छे.
आपणा देवांशी संतनां बोधवचनो कंगालमां कंगाल मनुष्यमां पण दिव्यता गुप्तपणे बेठेली छे. हुं अंदरने पूजनारो छ. वस्तुनी पीछान करवानु पुस्तको द्वारा थइ शके. पण पुस्तकोनु ध्येय तेज आत्मज्ञान. ज्ञाननी हद ते परमपद. तत्वने समज्यो नथी त्यां सुधी उपर उपरनी वधी एकटींग छे. जे सत्य छे ते मारो धर्म छे. वहारनी तकलीफ शी वीशादमां ? अंदरनी शांति वगर वधुं नकामुं छे. विवेकानंद ए पंडित हता. अने स्वामी राम ए जवर- जस्त आत्मार्थी हता. प्रवृत्तिमाथी निवृत्ति ल्यो. एटले निवृत्तिमय प्रवृत्ति करो. वनी शके तो तमारा जीवनथी ने छेवटे तमारा विचा- रोथी वीजाने पवित्र करो. ६३
महानुभाव ! गारे जे जोइए के ते नारी पासे नथी अने
तुं कृपा करीने मने आपया मागे लेनी मने पश्चा नथी.
विश्व सारं मित्र छे ने हुं पौनो मित्र छ.
हुं त्यागी छु ए मात्रनानो त्याग तेज साचो त्याग कही
शकाय.
शांतिमय जीवन एज खरं जीवन हे. एकान्तमा आनंद
छे. ॐकार मंत्रना ध्यानमा परम सुख
छे.
मनुष्यनु जीवन एवं होय के जेनी देवताओ पण यात्रा
करवा आवे. एबु जीवन जीवजो.
भांग पीधेला मनुष्यने जेम छाश पीतां नीसो उतरे छे
तेम आ संसारमा संसारनी भावनाथी खरडायेला आत्माने
शुद्ध करवा ॐकार मंत्रना जापनी जरूर छे.
तहु
आत्माने
शुद्ध करवा मथजो.
लघुतासे प्रभुता मले प्रभुतासे प्रभु दूर,
लघुता वीन प्रभुता नहि लघुता घटमां पूर.
६४
इंदोरना सरदार माधवराव विनायकराव किवे, एम. ए. ना हृदयोद्गारो ज्यारे इंदोरथी अमो आबु जवा माटे निकळ्या, त्यारे टाइम्स ओफ इन्डीआ" बांचता तेमां " आबुमां महात्मा श्री शांतिविजय रहे छे अने ते दिव्य शक्ति धरावे छे. तेओ- श्रीने युरोपीयन, पारसी, जैन, मुस्लीम, हिन्दु, दरेके दरेक पूज्य माने छे." आ प्रमाणे वाचता अपारा मनमां पण विचार आव्यो के अमारे पण तेमने मळg जोइए. आथी अमो पण त्यां गया, गुरुदेव शांतिविजयजीने जोया त्यारे अमोने मनमा ययुं के ए कोइ दिव्य पुरुष तो छेज. अमो काइ पुजनीक आदर्श तरीके मानता नहिं. पण हवे तो अमो कोइ अजब देवरत्न समज्या छीए अने जेम जेम अनुभव वधतो गयो तेम तेम अमोने प्रतिती थती गइ के ए तो कोइ अनव दिव्य पुरुष छे. ए महान पुरुषने ज्यारे आपणे जेवी जेवी भावनामा जोइए छीए तेवी तेवी रीते तेओ पोते देखाय छे. प्रथमथीज दुनियाने अंधविश्वासमां बीजा साधुओ मळेल छे एटले आपणे आवा महान देव पुरुषने ओळखी शक्या नहि. कारण के जगत आजे साधुओ माटे अविश्वास करे छे ए वात वरोवर छे; दुनियामां डोळ करनाराओ अने पांडित्य भरेली वाक् चातुर्यता बताव- नारा घणा पुरुषो साधु वेशमां जगतने भरमावे छे. अने एवा ६५ ५
असाधुओने पण माननारा अने पूजनारा अंधश्रद्धालुओ मळी
जायचे.
+
एमनो उपरनो देखाव तद्दन भोको अने सादो छे. ज्यां
दरी आपणने पूर्ण अनुभव नहिं थाय त्यां मुधी एमज लागशे
के ए तो तद्दन मामुली साधारण माणस छे. गुरुश्री शान्ति-
विजयजीनो उपरतो देखाव जुदो अने अंदरना गुरुदेव शांति-
विजयली जुना छे. आजे दुनिया तो उपरनो डोळ डमाक
जाने अंधश्रद्धासां साइ जाय छे, अने ज्यारे पाछळथी
अनुमय धाय के न्यारे श्रद्धाहिन्य वली जाय छे.
बायुद्धं नाम ले पवित्र छ ए नामथी पोते कोइ पवित्र
जमीन बी. पारो के कोड्नुं नाम राम, कृष्ण, रीखब, जरथोस्त,
मामद. अने कोडनुं नाम इशु छे. हवे एवां नाम धारण
पी नेवा महान पुरुप थइ शक्रता नथी. धारो
के माशेना वेपज पुजनीक गणाता होय तो पछी
नहारानी थाय छे तेवीज रीते तेमज बकराना
बाई चादवाथी कांड बकरो सिंह थतो नथी
:::ो जीव वयान होय तोज खरेखरो सिंह
नाटकमा एक श्रीमंत माणस ज्यारे
ली माणम थाय छे; तेथी ते
-वाय दाज गते दुनियाना धमा-
- दी गया होत तो आजे दुनिया
.
-
7
-
६३
मुक्तिपुरी वनी होत अने दुनियाना महान पुरुषोने ओळखाव्या'
होत. ए महान आत्माओने ओळखवा माटे पर्ण महान
विचारक थवानी जरुर छे.
जो ए महान पुरुपना आशिर्वाद मळे तो दुनियाना मोटा
मोटा नामी डोकटरोए पण जेने माटे आशा छोडावी दीधी
हती, तथा ज्योतिषोए पण जेने माटे हाथ खंखेरी नखाव्या
हता, तेवाओ पण एमना आशिर्वाद बडे सारा थइ गया छे.
जेने आपणे साधु कहीये, जेना दर्शन वडे आपणुं पाप नष्ट
थह जाय, ए साधुता कांइ जुदीज वस्तु छे. गुरुदेव शान्ति-
विजयजीने तो वधा ओळखे छे पण आपणी काइ महान
पुन्याइ हशे तोज अंदरना गुरुदेव शान्तिविजयजीने ओळखी
शकीशु. तेज दिवसे आपणे आशिर्वाद खरेखरो मेळव्यो
कहेवाशे. विशेष शुं कहुं ? एमनो आशिर्वाद एटलो वधो
वळवान छे के जे केसने माटे दरेके दरेक माणसोए आशा
छोडी दीधी हती तेनो महान रोग पण मुक्त थयो, ए मारो
पोतानो खुद अनुभव छे.
हुं तो दुनियाना महान योगेश्वर तेमने समजुं छु. अहाहा!
दुनियामां आजे एका देवरल छे जेने कोइ ओळखी शक्या
नथी. कारण के एमनी पासे सिंह अने वाघ जेवा र
जनावरते पण पाळेला जनावरोनी माफक आवी बेसी
जाय छे. एवा महान पुरुषको भेटो थवो एकाइ साधारण
वात नथी. एकवार तो दरेके दरेक मनुष्ये जरुर एमनां दर्शन
६७
करयां जोइए, एबी मारी दरेके दरेकने भलामण छे, एमनो जे मार्ग छे ते सत्य छे. सारं ते सत्य लहिं पण सत्य तेज मा छे एवो गुरुदेवन्नी दरेकने एकसरखो उपदेश छे. गुरुदेव पोते जाते आहिर (क्षत्रिय) कुळमां जन्मेला अने हरेके दरेक प्राणी उपर समभावना राखवी एवो एओश्रीन्दो उपदेश छ अने विश्व कल्याण थाओ एवी शावना छे. ब आचार्य श्री विजयकेलासूरोजीना अमदावादमां अंतिम उगारो वृहत् जीवनप्रभा तथा आत्मोन्नतिकारक वचनामृतो नागना पुन्तरता ३५२ मा पानामांथी टुंक सार. पांचमनी सवार थइ गड, झाडा बंध थइ गया हता. पोते ना नमुहारने जपाव्युं के आवुथी योगीराज श्री विजय- गनिमीदाजी महाराज आधीने मने मळी गया, अने देगा हाई है वे हवे जवानी तैयारी करी ल्यो. प्रथम में : सर कयु हतुं के मारा अंत समये मारी *
तपस्वी मुनिश्री निशरीलालजीना
आन्तरिक उद्गारो
स्थानकवासी जैन (पाक्षिक) अमदावाद ता. ११-१-३७
ना अंकमांथी.
२५६ मा उपवासनी रात्रे मने एक दिव्य प्रकाश
देखायो. तेमां आबुवाळा योगीराज आचार्यश्री विजयशांति-
सूरीश्वरजी महाराजनां दर्शन थयां. तेमणे आदेश आप्यो
के तमारी हठ छोडी दई पारणु करो. आथी पूर्ण श्रद्धा थई के
गुरुदेवनो जे हुकम छे तेनो कुदरत साथे संबंध छे.
प्रथम ज्यारे आबुथी तारद्वारा ते योगीराज गुरुदेवे
पारणु करवानी आज्ञा करी, त्यारे हुं एक विश्वप्रेमी महापुरुष
तरिकेनी श्रद्धाथी पर हतो. ज्यारे हुं तेमनी पासे रह्यो तेमना
समागममां आव्यो त्यारे पण मने संपूर्ण श्रद्धा न हती अने हुँ
एम समजतो के तेमनो अने मारो धर्म जुदो छे. तेमज वीजी
अनेक शंकाओ साथे केटलाक माणसो तेमनी विरुद्ध बोलता
होवाथी ते पुरुपनी यथार्थतानी मने पुरेपुरी श्रद्धा न हती.
परंतु २५६ मा उपवासे मने तेमनो भास अने प्रकाश
थवाथी मारो तेमना प्रत्ये जगतना महात्मा पुरुषो पैकीना
एक होवानो विश्वास स्थापित थयो, अने तेथी तेमनी आज्ञाने
कुदरती प्रेरणा समजी में पारणु कयु छे.
दिल्हीना स्टेटससेन पत्रना ता. ७-१-३६ ना अंकमांना
अंग्रेजी लखाण उपरथी गुजराती भापांतर.
एक अर्वाचीन चमत्कारीक योगी
हीझ होलीनेस योगीराज, जगतगुरु, युगप्रधान, आचार्य
सम्राट श्री विजयशांतिमृरीश्वरजी महाराज मारवाडमां
बरस्वतीना अरण्यमां विराजे छे.
जग्या एक वेरान
जंगलरूप हती. परंतु गुरुदर्शनाभिलापी हरेक कोमना माणसो
पाक्वाथी ए स्थान भरपुर शहेर जेवू लागे छे.
प्रथम
ते
एक धनवान वेपारीए ए स्थानमां जमण कार्यु हतुं जेमां
एक हजार मानवना खोतकनी सगवड करी हती. परंतु गुरु-
देदना दर्गन माठे नांज सुधीमां पांचेक हजार माणस आवी
जारी कार्यबाहको सुंझवणमां पडला. परंतु गुरुदेवना आशि-
बांदी तमाम मानतो भोजन करी शक्या अने पछीथी जोतां
पंकजम जुजन नेटलो बोराक वधी पडयो हतो.
पातिक (वाडीक) अमदावाद ता. ६-१-३६ना
-- .. दाग जैन योगी" शीर्षक हेठळ आ
किन पिट भयुं छे.
ए
अहिंसानो पडह
---
-
वसंत तिलका
जय घोषणा गजावी हिंसा वचावा
संयम वीणा बजावी हिंसा वचावा
साधुत्वता :दिपावी हिंसा वचावा
हाकल करी जगतमां हिंसा बचाया
अहिंसाना अपूर्व सिद्धांतने उज्वळ वनावधानी धगशमां
आपणा देवांशी संते जीवन नैयांने आगळ धपाचतां विश्व
प्रेमना अमोला उपदेशने पावतां जाती अने भेदभाव बगर
जेवा के युरोपियन पारसी चैष्णव आदि हरेक कोमना भानको
तथा राजा महाराजाओ आपणा देवांशी संतनी प्रतिभा श्रवण
करी चरणोमां झूकवा लाग्या. अने दिनप्रतिदिन आत्मकमळ
खीलतां खीलतां चारे दिशामा अहिंसानो ध्वनि गाजी उठयो.
जोधपुर प्रदेशमा जसवंतपुरा करीने गाम आवेलुं छे. ज्यां
सुदा नामनो पहाड छे. संवत १९७३नी सालना चातुर्मासमां
आपणा देवांशी संत ए सुदाना पहाडमां विराजता हता, सुदाना
पहाड उपर एक चामुंडा देवीनु मशहुर मंदिर आवेलं छे.
जोधपुर इलाकामा ए मंदिरनी प्रतिभा अद्वितीय मनाय छे.
दशेरा अंने नवरात्रीना तहेवारमा ए देवीना मंदिरे धर्मना
७१
वहाने मुंगा प्राणीओनो भोग अपातो हतो. अने घणाज अबोल प्राणीयोनी हिंसा थती हती. ते हिंसा आपणा देवांशी संनना अद्वैत प्रभावथी पूजारी विगेरेए बंध करी हती. मार्कड ऋपिना आश्रमनी आसपासना अरण्योमां एवो जंगली यानयलमुह बसे छे के जेओने भील अने मेणा तरिके ओबाम्बवामां आवे छे. ते जात एटली वधी अज्ञान अने जंगली के नात्र कपडांनी खातर पण मानवनो संहार करी नाखे. पली कर जानिमां पण आपणा देवांशी संने पोताना दिव्य प्रयायनी झाली आपी असंख्य जीवात्माओने मद्यपानथी विमुख बना शेला वाळकोने सन्मार्गे मेरवा मार्कड ऋपिना मनी मोला पारेला श्री सरस्वतिना स्थान विद्या- मां आव्युं छे. ज्यां ए भील अने मेणा नाना नालयोने विद्यादान आपवामां आवे छे. - मना वीचार्यो भने तेओना सिद्धान्तो स्पष्टपणे : एकनो मुख्य धर्म छे. जेवी रीते मीन आग्वंये जीवन अहिंसाना पंथे झुकाव्यु अगा देवांनी मंते पण अहिंसानी विजय- ("-: -- जावा अपूर्व जमत उठावी छे. अने ...--: " प्रतिताए धधावी रह्या छे. ---- : 4८ माल आपणा देवांगी मंत आयु नी रमणीय निर्थभूमिमां विराजता ।
इता, चातुर्मासनो काळ निर्गमन करतां आसो मास अने दशे-
रानो तहेवार नजीक आवतां अद्वैत भावनाए प्रेराया. दशेराना
तहेवारमा धर्मना व्हाने देवीना मंदिरोमां अज्ञान लोको मुंगा
प्राणीओनी हिंसा करे छे, तेने वनती त्वराए अटकावी
अहिंसाना अवर्णनिय सिद्धांतनो वधु प्रकाश झळझावचा दिव्य
संकल्प जीवन निश्चय प्रदर्शित कयों.
जोधपुर इलाकामां आवां देवी मंदिरो अने मावडीओ ना
नामथी ओळखातां घणाज स्थानो छे के ज्यां वधु प्रमाणमा
मुंगा प्राणीओनां बळीदान अर्पाय छे.
दशेरा तहेवार निमित्ते थती हिंसाने बंध कराववा आपणा
देवांशी संत हिंदयन्ता देशी रजवाडाओमां तार द्वारा पोताना
दिव्य संदेश पहोंचाइयो. आ दिव्य संदेशनो स्वीकार करी
केटलाक राजवीओए कायमने माटे अने केटलाके अमुक
समयने माटे हिंसा बंध करवा पोतपोताना स्टेटमां व्यवस्था
करी, अने ते शुभ समाचारना तार तथा पत्रोथी प्रत्युत्तर
पाठव्या. के जेनु स्पष्ट आलेखन आ नीचे कयु छे.
ता. ४-१०-३२
भावनगर (काठीयावाड) महाराजा साहेबनो तार
"आपनी आज्ञा प्रमाणे हिंसा बंध करी छे."
जोधपुरना नरपतसिंहजी साहेवना तार " हुकम माटे
महाराजा साहेव पासे तार मुकुं छु.
७३
रोहीत ठाकोर-साहेव दलपतसिंहजी चीफ कमान्डींग
ओफीसर जोधपुरनो तार "हिंसा बंध."
मालीया सेट ठाकोर साहेबनो तार " हिंसा बंध."
घोल स्टेट दरबार साहेबनो तार " हिंसा बंध."
पाटरी स्टेट दरवार साहेबनो तार " हिंसा बंध."
इंदोर स्टेट महाराजा साहेबनो तार "हिंसा बंध.
जारनेर (जपुर ) ठाकोर साहेब नरेन्द्रसिंहजी अने स्टेट
पानिपत, कार्यानेटनो तार " हिंसा बंध करी."
चागांद ठाकोर साहेबनो पत्र. "करवा गाममां किरवा
रना धान उपर हजारो पशुओनु वळीदान अपातुं हतुं ते
. अने कोरा तथा नवरात्रीए थती हिंसा पण बंध
."
निः मला साडेवाजीनो पत्र तमाम प्राणी मात्रकी हिंसा
प्राचीन लिा कर उनके रु. ५१) दंड और
जा.
पद विवर नगफनो पत्र "हिंसा बंध."
मजा नावनो पत्र 'हिंमा बंध.'
वोत्र
हिंसा बंध."
.
“
--
“
रामदेवता तार हिंसा बंध."
- मटेनी ना "हिंया बंध.
वडीया स्टेट, दरवार साहेवनो तार "हिंसा बंध."
थाणा देवळी स्टेट, दरवार साहेबनो, तार" हिंसा बंध."
वांकानेर स्टेट महाराजा साहेवनो तार "हिंसा बंध,
ध्रांगध्रा स्टेट महाराजा साहेबनो तार "हिंसा बंध."
धोलपुर स्टेट महाराजा साहेबनो तार "हिंसा बंध."
सायला स्टेट ठाकोर साहेवनो तार " हिंसा बंध."
पेथापुर स्टेट ठाकोर साहेबनो तार " हिंसा बंध."
लुणावाडा स्टेट महाराजा साहेवनो तार "हिंसा बंध."
छोटा उदेपुर महाराजा साहेवनो तार " हिंसा बंध."
कालन्द्री ठाकोर साहेबनो तार " दशेरा अने नवरात्रीए
थती हिंसा बंध."
खुडाला ठाकोर साहेवनो पत्र " हिंसा बंध किया."
सितामउ स्टेट महाराजा साहेबनो पत्र " हिंसा बंध."
ग्वालीयर स्टेट महाराजा साहेबनो संदेशो " हिंसा बंध."
राजपीपला स्टेट महाराजा साहेवनो पत्र "हिंसा बंध."
ता. ६-१०-३२
नाना स्टेट ठाकोर साहेबनो पत्र " हिंसा बंध किया."
वांसदा स्टेट महाराणा साहेबनो पत्र " हिंसा बंध."
ता. ७-१०-३२
जुजावार नहारसिंह साहेवनो तार "हिंसा बंध."
ता. ८-१०-३२
रीवा स्टेट महाराजा साहेबनो तार "हिंसा बंध."
७५
जाम्बुआ स्टेट (पालका) दरवार साहेवनो तार " आ कमां हिया बंध अने भविष्य माटे पण विचारीश." आप स्टेट महाराणा साहेबनो तार "हिंसा बंध." शामोर ठिकाणा (मालया) ठाकोर साहेबनो पत्र “हिंसा मंच किया. पाथर्ण ठाकोर साहेब राय बहादुर चेनसिंहजीनो पत्र बिया वंय." का '.-०-३२ मन्दर टेट महाराजा साहेबनो पत्र " हिंसा बंध." मदीनागा ठाकोर सादेवनो पत्र "हिला बंध." ....., मानना नावनो तार "हिंसा बंध. ... ग ग ग्यार नाहयनो तार " दशेराए थती बगर नावनो पन "हिंसा बंध." -- - टवार मावनी पत्र "कुछ बंद और स 7 FE- :--- नगद माहेने दोराने दिवसे ३ हे.
शिरोही स्टेट महाराजा साहेवे दशेरा, नवरात्री तथा
वीजा केटलाक दिवशो माटे हिंसा बंध करी छे.
चासोर पुडाणा जिल्ला जोधपुरना लगभग पांचसो गामोना
जागीरदारोए ठराव कयों छे के " नवरात्री तथा दशेराला
तहेवारोमां के कोइपण दिवसोयां तेओ जीवहिंसा करशे नहिं
तेमज प्रतिबंध करशे. ते उपरांत दारु मांस तथा गांजानो पण
सर्वदा त्याग करशे. अफ्रीण खावाबाळाओने ओछु करवा
समजावशे तेमज नवा कोइ खातांन शीखे एवी व्यवस्था करशे.
दीगोर देवडा (जसवंतपुरा) परगणाना वाचन गागना
लोकोए संदेशो मोकल्यो छे के " ते गामोमा दारु तथा
जीवहिंसानो प्रबंध कयों छे.
रोल प्रगणाना सरदारे दारुनो त्याग कयों छे तेमज डेढ
जेवी ज्ञातीना सर्व लोकोए दारु तथा जीवहिंसानो त्याग कयों छे.
वेटरनरी होस्पीटल
माउन्ट आबुमा प्रवेशतां प्रथमज मोखरे आ होस्पीटल
आवेली छे. के जे, गुरुदेव भगवंत श्री विजयशांतिसूरीश्वरजी
एनीमल होस्पीटल तरीके विख्यात छे. आपणा देवांशी
संतनुज ए स्मरणचिन्ह छे. वेटरनरी होस्पीटलमां अशक्त
जानवरोनी सेवा करवामां आवे छे. जेनी देखरेख युरोपियन
लेडी मीसीस राइवर्स राइट Mrs. Rivers Wright तरफथी
ग
+
---
राखवामां आवे छे. अने दर साल एना अंग्रेजी अने हिन्दी
अहेवाल प्रकापित करवामां आवे छे. आ होस्पीटलनी जग्या
ते समयना राजपुतानाना मानवंता एजन्ट टु धी गवर्नर जनरल
सर ओगील्वे साहेब Sir Ogilvie K. C. I. E., C S. I.,
जेओ आपणा देवांशी संतना परम सक्त हता तेओए कायमना
पढे होस्पीटलने अर्पण करेली छे अने आयु प्रदेशने माटे
तेओ साहेब तरफथी एg फरमान प्रसिद्ध करवामां आवेलं छे
के “कोई पण जानबरने मारवु के गोळीश्री ठार कर नहिः
तेमज झेरनी पीचकारी पण नहि आपतां वेटरनरी होस्पीटलमां
मोकली आपq."
'वीर सन्देश' एत्र १६ मी डिसेम्बर १९३८ ना अंकमांथी
श्री योगिराजका अपूर्व चमत्कार
जीवदयाका महान कार्य कीया.
जोधपुर राज्यके वाली परगने में तखतगढसे एक कोस
पर पीटीश लायक गाय है. वहां एक वीरके स्थान पर प्रति-
वर्ष ५०० बकरोंशा वध होता था. इस हिंसाको रोकने के
लीने गवाशलोतराली जीवदया मंडली तथा तखतगढ के
जीवदया प्रेनी बहुत कुछ प्रयत्न कर रहे थे, परंतु उन्हें
सफलता प्राप्त नहीं हुइथी.
-
भावी योग्यसे जगतगुरु परम योगीश्वर' श्री १००८
श्रीमद विजयशान्तिरिश्वरजी महाराज ता. ६ डिसम्बर'
१९३८ को तखतगढ से विहार करते हुए लगभग '४ वजे'
बीटीया गांव पधारे. भोपेने यह बात सुन ली थी कि गुरुदेव
इस रास्ते से पधारने वाले हैं. और वे जब आवेंगे तब मुझको
जीववध रोकनेका उपदेश देंगे. इस भयसे वह भोपा पहिले
ही वहां से भाग कर दो कोस दूर दूसरे ग्राममें चला गया.
गुरुदेवको मालूम हुआ कि भोपा यहां नहीं है. तव उन्होंने
दों मिनिट. ठहर कर वीर के स्थान पर द्रष्टी डाली और
विहार कर वीकली पधार गये.
रातको उक्त वीरने भोपांको स्वप्न, देकर कहा कि
"गुरुदेवने पधार कर अपने ग्रामको पवित्र किया है और मैं
अब उनका शिष्य हो चुका हूं, इस लिये आजसे जीववध
नहीं चाहता हूं. तू श्री गुरुदेव के पास जा और मेरी आंज्ञा-
नुसार जीववध नहीं करनेका गुरुदेवसे नियम ले कर आ."
उसी रात स्वप्नमें भोपाको गुरुदेवने भी दर्शन दिये जीससे
उसको द्रढ विश्वास हो गया.
ता.. ११-१२-३८ तदनुसार मिती पौष कृष्णा ५
रविवार की दो पहरके ३ बजे सैंकडों विदेशी यात्रीओ तथा
वोंकली संघ के समक्ष भोपा आया और विनयपूर्वक नमस्कार
करके सव सत्य (स्वप्न आदि का होना) हाल कह सुनाया.
-
७९
गुरुदेवने भी उसको लत्यानुसार उपदेश दिया । मन कर भोपाने यह नियम लिया कि "आज नरेन पर या कहीं भी जीवधन रंगा." इसके ना जाने जन- देवसे तथा श्रीसंघले अर्ज दिया कि उन वीर केन तर कबूतरोंको दाना उलगाने के लिये उन्ना माना गालि उस पर गुरुदेव के उपदेशानुसार तयगढ न नेली रांगने इनकी व्यवस्था करनेका भार अपने उपर ले लिया. जैन समाज का सदभाग्य समझना चाहीये कि से प्रभाविक आचार्य विद्यमान हैं और अपनी इच्छा नात्र में वरे वढे धार्मिक कार्य कर रहे हैं. प्रतिवर्ष होने वाले ५०० बकरों का वध आपके प्रतापसे रूकनेका समाचार सुन कर किन दया प्रेमी का हृदय हर्षसे प्रफुल्लित न हो जायगा ? अधिष्ठायक देव से प्रार्थना है कि योगिराज दीर्घजीवी हों और अधिक से अधिक अहिंसा धर्मका प्रचार करते हुए जैन धर्मका डंका बजावें. डंको बजाव्यो विश्वमा हिंसा बचावा हें प्रभो जगव्या खरेखर राजवी हिंसा वचावा त्हें प्रभो हाकल करी आ विश्वमा हिंसा बचावा त्हें प्रभो मेणा अने भील जातीनां मानव वुझायां हें प्रभो ८०
" अनिर्वचनीयम् प्रेम्नः स्वरूपम् मूकास्वादनवत्"
प्रेमका वर्णन करना अशक्य है. सर्व जीवोंपर प्रेम रखो.
आपणा देवांशी संते बोधेलो
सदुपदेश-विश्वाशेम
श्री दशवकालिक सूत्रके पहिले अध्ययनमें लिखा है
"धम्मो मंगलं मुकिट अहिंसा ॥" जीस धर्म में अहिंसा
आदि प्रधान है वह धर्म सर्व धर्मोमें मंगल और शिरोमणि है.
"दुर्गतौ पतताम् प्राणिनाम् धारयति इति धर्मः॥"
दुर्गति में गिरते हुए प्राणीओंकी रक्षा करता है वही धर्म है.
भगवान बुद्ध कहते हैं-आलस्य त्यागो, धर्मका आश्रय
करो. धर्मका आचरण करनेसे इसलोक तथा परलोक में सुखी
होते हैं. जीसको मेरी सेवा करना हो वह रोगीयोंकी सेवा करें.
"सेवा धर्मो परम गहनो योगीनामप्यगम्यः॥"
रघुवंश में अधिकार आता है कि राजा दिलीपने अपने
प्राणों की भी परवा न करते हुए गायों की सेवा की थी.
श्री कृष्णजीने भी गायों की सेवा की थी.
८१
ब्राहपुराण में लीखा है कि "नंदननैव गोपः॥"
भारतका अभय खजाना पशु है जिनके पर सारा संसार
निर्भर है. पशुओं की सेवा करना मनुष्यका परम कर्तव्य है.
दान में कहा है:-
ब्रह्मचर्य तपः सत्य मनुक्रोश क्षमा घृतिः ।
सनातनस्य धर्मस्य मूलमेतद दुरासदम्
ऋचर्य, तप, सत्य, दया, क्षमा और धैर्य यही सनातन
कवाय मल.
जो मनुष्य सर्व प्राणीओंको अपने आत्मा के समान
जानता हैं अर्थात् जिसने आश्रवका द्वार बंध कर दिया है
और संवर भावमें रहता है उसको पापकर्मका बंध नहीं होता.
"सव्वे जीवाणि ईच्छति जीविओ न मरीजिओ॥"
(दशवकालिकमूत्र अध्याय ४था गाथा ९मी)
सर्व जीवोंको अपना जीवन मिय लगता है. परंतु मरण
की कोई चाहना नहीं करता है इस लिये हिंसाका त्याग
करना चाहिए.
पहिले हिंसा किसे कहते है उसे संपूर्णतया समजना
चाहिए. “हन् हिंसायाम्" हन धातुसे हिंसा शब्द बना.
उसका अर्थ हनन करना अर्थात् मारना होता है वह हिंसा
तीन प्रकारसे होती है. "मनसकेण, वायसकेण, कायसकेण,"
मनसे वचनसे और कायासे. किसीका मन दुःखाना, बुरा
चितवन करना, कठोर वचन बोलना, अपने निमित्तसे दूसरों
को कलेश कराना यह सव “भावहिंसा" है. शरीरसे किसीको
तकलीफ देना, शस्त्रादिसे घात करना तथा प्रमाद के योगसे
जीवका घात होना यह सब “द्रव्यहिंसा" है. जो क्रोध करता
हैं वह वडा भारी हिंसक है. क्रोधसे कपाय वढता है. कषायका
अर्थ संसारको आगसन देना. संसारचक्रमें परिभ्रमण कराने
वाला ही कषाय है.
८३
उपदेश तरंगिणि में कहा है।
नगाम्वरत्वेन सितारवरत्वे न तर्कशास्त्रे न च तत्ववादे ।
न पक्षलेवा श्रमणेन मुक्तिः कपाय मुक्तो किल मुक्तिरेव ।।
न दिगम्बर अवस्थामें मोक्ष है और न श्वेताम्बर अवस्थामें;
न नगदमें या तत्वशासमें मोक्ष है; किन्तु कषायसे मुक्त
होना ही मोल है.
श्री शांतिनाय प्रसने अपने दशमें भव मेघरथ राजाके
भवमें कतरको बचाया था. उसकी रक्षाके लिये अपने
प्राणों की श्री दयार न की. इसी जीवरक्षाके प्रतापसे यह
पही मन में तीर्थक और चक्रवर्ति हुए,
भावनी अधिकार आया है "जयणा धम्मस्सजननी"
". मी लाता है. “अहिंमा लक्खणो धम्मो" अहिंसा
मा.
गाजियममि मेद" हे आत्मा तूं दूसरोंको
11 में माना है. (आकारांगमुत्र के शीतोष्ण
army
महन करना, और जीवहिंसा न
कायाका माम्न मार हैं."
किंमा के पीछे सब तरहका पाप
विदन्नुः
ghet
महाकवि तुलसीदासजी कहते हैं:-
दया
धर्मका
मूल पापमूल
अभिमान
तुलसी दया न छांडीए, जबलग घटमें पान.
जब पहिले स्वदया होगी तब परदया होगी. जीसको धर्म
प्रति प्रेम है वह आत्मा ऐसा होना चाहिए.
"सर्व प्राणिपुः बन्धुभूतःस्यात् । क्रुद्धानामनुनेता । भीता
नामाश्वासयिता । दीनानामभ्युपपत्ता । सत्य सन्धः परपुरुष
वचन सहिष्णुः। अमर्प नः परसगुणदर्शी । रणद्वेष हेतूनां
हन्ता ||"
सर्व प्राणिओंसे भ्रातृभाव रखनेवाला, क्रोधियोंको
शान्त करनेवाला, भयभीतोंको धीरज देनेवाला, दीनोंकी
रक्षा करनेवाला, सत्य प्रतिज्ञावाला, औरोंके कटुवचनोंको
सहन करनेवाला, क्रोधको जीतनेवाला, शांतिके गुणोंको
प्रगट करनेवाला, रागद्वेष जिनसे उत्पन्न हो उन कारणोंको
जीतनेवाला होना चाहिए.
औरभी कहा है:-
"हिंसास्तेयान्यथा काम पैशुन्यं परुषानृते संभिन्नालाप
व्यापाद मभिध्या दग्विपर्ययम् पापं कर्मेति दशधा कायवाङ्
मनासस्त्यजेत् ॥" गजीना
हिंसा चौरी और अन्याय ये तीनो देहके पाप है. चुगली
कठोरवोलना, असत्य बोलना और अनर्थ बोलना ये चार वाणी
के पाप है, प्राणीओंको मारनेका चितवन करना, परगुगको
न सहना और नास्तिक्ता यह तीन मानसिक पाप है. कायिक,
वाचिक और मानसिक ये दश प्रकारके पापोंको त्याग देवें,
अपकार परेऽपिस्यादुपकारः परः पुमान् ।
आत्मसत्सकलान्पश्येद् वेरिणो दूरतो वसेत् ॥"
जो अपने साथ बुराई करे परंतु आप उनके साथ भलाई
करे और सर्व प्राणीओं को अपने आत्मा समान देखे.
गीतामें श्री कृष्ण अर्जुनसे कहते हैं:-
आत्मौपम्येन सर्वत्र समपश्यति योऽर्जुन ॥
हे अर्जुन, जो सब प्राणीओंको अपनी आत्माके समान
दखता वही परमात्माका भक्त है.
महर्षि व्यासजी कहते है।
अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचन द्वयम् ।
परोपकार पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥
अटराह पुराणोंका यही सार है कि परोपकार करना
जपचे होई
पुण्य
नहीं है. और इसरोंको दुःख देना
जन मनोई पाप नहीं है.
हरेक धर्मशास्त्रोमें अहिंसा
वेद सय " माहिती पुरुपं जगन" किनी भी प्राणीकी
+
मान
r
म.
भगवान बुद्धदेव का फरमान:-
Do to others which ye would have them do
to you. Kill not. Cause no death.
जो व्यवहार आप दूसरोंसे अपने प्रति चाहते है, वैसा
ही व्यवहार आप उनके साथ करो. किसीको मत मारो.
किसीकी हत्या मत करो.
जरथोस्ती धर्ममें अहिंसाः-
जरथोस्ती धर्ममें पैगंबर साहिवका फरमान है कि "खास
करके प्राणीओंकी रक्षा करना" 'पशुओंकी कतल करना
यह " अहुर मझद" 'बुरा वतलाता है.
और भी कहा है:-
जो सबसे अच्छे प्रकारकी जींदगी गुजारनेसे लोगोंको
अटकाते है और जो पशुओंको मारनेकी खुशखुशाल सिफा-
रीश करते हैं उनको 'अहुर मझद' बुरा समजाता है.
(गाथा ३२-३३).
सज्जनो विचारों कि एक मेनाने किसी शेठके वहां रोटी
खाई थी और समय आया तब उस शेठकी रक्षाके लिये उसने
अपना प्राण दे दिया, तो गाय आदि पशु जो अपनेको घी
दूध आदि देते हैं तो उनका तो अपने पर कितना उपकार
है ? इसका ख्याल अवश्य करना चाहिए. प्राणिमात्रकी रक्षा
करना मनुष्यका परम धर्म है.
८७
मुललमालोके शास्त्र क्या कहते हैं:-
खुदाने तो पहलेसे ही फरमान किया है कि तमाम जीवों
पर रहीस करो. कुरान शरीफ की शुरुवातम अल्लाताला
खुदा के विशेषण " रहीम
रहीम" दिया गया है.
"मीस्मल्लाह रहीमान्तुर रहीम" इस प्रकार गंगला
चरण के बाद कहा गया है कि सर्व जीवात्माओं पर रहीम
करो. "कुराने शरीफमें सुराने आममे" लिखा है कि "जो
पशु पृथ्वी पर चलते हैं और जो पक्षी हवामें उडते हैं व कोई
दूसरे नहीं है. वे भी अपनी तरह जीवात्मा है." अर्थात् उनको
भी अपना जीवन प्रिय लगता है.
"लातो आजे बोखलकुला" हे मोहमद दुनियाको
विश्वास दे दे कि अल्लाकी दुनियाको कोई नहीं सतावे. अब
देखनेका यह है अल्लाके संतान कोन है ? क्या हिन्द अल्लाके
संतान नहीं ? अगर मुसलमान ही अल्लाके संतान है तो फिर
अल्ला पक्षपाती कहलाएगा. जब कि वह सबका मालिक है तो
फिर हिन्द छुसलिम पशुपक्षी सर्व उनके संतान हैं.
जहां हृदय दयासे भर जाता है वहां दूसरों के प्रति-
हिंसाका भाव हृदयमें रहता ही नहीं.
महर्षि शाण्डिल्यने अपने सूत्रो मे कहा है।
"अनिर्वचनीयम् मेम्नः स्वरुपम् मूकास्वादनवत्" प्रेमका
वर्णन करना अशक्य है. सर्व जीवोंपर प्रेम रखो.
stro
८८
- खिस्ती धर्ममें भी अहिंसा का उल्लेखः- लोर्ड इसामसिंहने अपनी छठी आज्ञा में कहा है कि किसी भी जीवकी हिंसा मत करो, किसी भी जीवका थोडासा बुरा करना पाप है. औरभी कहा है:- Thou shalt not Kill; Blessed are the merciful for they shall obtain mercy. (Jesus Christ) तुं कभी हिंसा मत कर. दयाळु पुरुष सुखी होते हैं उन पर इश्वरका आशिर्वाद उतरता है. (महात्मा क्राइस्ट.) मांसाहार निषेध जो लोग मांसाहार करते हैं उनके प्रति महंमद पैगं- घर साहेवका फरमान. By no means will their meat reach their God nor their blood; but the Diety from you alone will reach Him. प्राणीओंका मांस और, खून खुदाको नहीं पहोंचता है परंतु तुम्हारी भक्तिही केवल उसे पहोंचती है. कंइ मांसाहारी जन कहा करते हैं कि मांस खानेसे शरीर बढता है और बलवान होते हैं यह वात भी विलकुल जूठी और अप्रमानिक सिद्ध हुई है. क्योंकि मांसाहारी जान- वरोमें इतनी ताकात नहीं होती जितनी शाकाहारी हाथीमें,
मांसाहारी जानवर इतने चपल नहीं होने जितने जाना
हरिन, घोडे आदि.
युरोपियन विधान क्या कहते है ?
इ. स. १९०८ में " लंडन वेजीटेरियन एयोगिएनके
सेक्रेटरी मी. एफ. आइ. निकालयनने " १००० लड़कों को
छ मास तक बनस्पतिके आहार के खुनाक पर मनाया था
दुसरे और उतनेही लडकोंको " लंडन काउन्टी कोसील" में
मांसाहार पर रक्खा था. छ मास पश्चात उन दोनो विभागके
लडकोंकी वहांके डोक्टरोने परीक्षा की. जीससे यह मालूम
हुआ कि वनस्पतिके आहार पर रहने वाले वालको अधिक
प्रमाणमें बह गया इतना हि नहीं लेकिन वे विलकुल तंदुरस्त
और अच्छी चामडी वाले वने.
प्रखर डा. हेग कहता है किः-
जब कुदरतने मांस खानेवाले मनुष्य के लिये, मांसाहारी
विकराल जानवरों के जैसा दांत बनाया नहीं तो फिर होझरी
उस मांसको हजम करने के लिये कहांसे बनाई होगी ? तात्पर्य
यह है कि मांसाहार कुदरतसे विरुद्ध है.
जिन जीवोंका आहार कुदरती रीतिसे मांसाहार पर ही
है वे जानवरों मुहके बदले जीभसे पानी पीते हैं यह भी एक
प्रत्यक्ष प्रमाण है कि मांसाहार मनुष्योंका आहार नहीं है.
शाकाहारी और मांसाहारी प्राणीओंके शारिरीक बना-
वटमें, स्वभावमें और रहनसहनमें भी प्रत्यक्ष भिन्नता मालूम
होती है. अपने घोडे और कुत्तेको भी हरिन के पीछे दौडनेके
वाद देखा होगा तो मालूम हुआ होगा कि घोडा जो शाका-
हारी है पसीनेसे तर होगा और कुत्ता जो मांसाहारी है उसके
पसीना बिलकुल नहीं निकलेगा...जीतने मांसाहारी प्राणी
विल्ली भेडिया आदि है उनके कभी पसीना नहीं निकलता
है, परंतु मनुष्यको पसीना निकलता है इस लिये यह अवश्य
शाकाहारी है.
मांसाहारी प्राणी कुत्ते आदि दौडना प्रारंभ करते ही
हांफने लगते हैं और गर्मी आदिमें बडे परेशान होते हैं. उसके
विपरीत हरिन आदि शाकाहारी प्राणी दौडना शुरु करते ही
नही हांफते. मनुष्य भी तेज या धीमी चालसे चलता है तो
हांफता नहीं है. इससे सिद्ध होता है कि हम शाकाहारी हैं.
मांसाहारी चित्ते वाघ आदि दिवसमें सोते हैं और रातको
जागते है. इसके विपरीत बंदर आदि दिनको जागते हैं और
रातको सोते हैं. डोक्टर और वैद्य कहते हैं "जो मनुष्य दिनमें
सोता है यह आलसी और कम उम्रवाला होता है." हम रातको
सोते हैं इससे मालूम होता कि हम शाकाहारी हैं.
परम दयालु महा ऋपिश्री वाल्मिकिजी रामायणमें
कहते हैं:-
दु
मानिपाद प्रतिष्ठान मगमः शाश्वती समाः ।
यत्क्रौंचं मिथुनादेकमवधीः कास मोहितम् ।।
हे व्याध तुमने इस क्रौच पक्षीकी जोड भांगी इसके
कारन तुम अनेक वर्षों तक प्रतिष्ठा नहीं पाओगे
इससे भी यही सारांश निकलता है कि निरपराधी पशु
पक्षीओंका प्राण लेना धर्मसे विपरीत है.
हिन्दु
हिन्दुओंके महान प्राचीन ग्रंथ "रुतत्रके तेइसवें
पटल" में लिखा है:-
हिन्दुधर्म प्रलोप्तारो भविष्यत्येक पत्रिणः ।
हीनंच दुषयत्येवं हिन्दरित्युच्यते प्रिये ॥
शिवजी कहते है, हे प्रिय पार्वति, हीन्-हिंसा; जो हिंसा
आदि दुराचार को दूर करे वे हिन्दु कहा जाते हैं. ख्याल
करो कि हजारों वरस पहिलेसे भारतवासी हिन्दु कहे जाते थे
तबसे अपनी मातृभाषा हिंदी कह जाने लगी.
हिन्दुः हिन्दवः हिन्दीः इति मेदिनी कोशः।
हिन्दु शब्दका अर्थ है कि जो हिंसासे रहित हो. हि-न-दु
इन नीन वर्गासे हिन्दु शब्द बनता है. संस्कृत वाणीमें दु-का
अर्थ
दूर करना है. अर्थात् हिन्-हिंसा को जो दूर करे उसको
हिन्द कहना चाहिए.
यह दान यवनोंके देशवृत्त (तवारीख) में लिखे श्री
व्यासजीके चरित्रसे भी स्पष्ट है. जैसे पारसियों के मुख्य
धर्मपुस्तक मस्तीरनाम जरथुस्न की पैसठवी आयत में
लिखा है:-
अकन् विरह भने व्यासनाम अब हिंदु आमद बसदाना
कि अकिल चुनः लस्त" एक व्यास नाम ब्राह्मण हिंदसे
आया, जीसके तुल्य कोइ पंडित नहीं है. इसके आगे १६३
वें आयत में लिखा है " चूं व्यास हिन्दी वलख आमद गस्ता-
स्य जातुस्कल बख्वाद" जब हिन्दका रहनेवाला चांस बलसमें
आया तब इरानके राजा गस्तास्यने जातुश्कको बुलवाया.
"मन मर्देअम हिन्दी निजाद" मैं एक हिन्दमं पैदा हुआ पुरुष
हूं. फीर आगे लिखा है "वव हिन्द वाज तस्त" फिर वह
हिन्दको लोट गया. इत्यादि बहु विस्तृत विदेशी ग्रंथ
प्रमाणोंसे भी स्पष्ट हिन्द हिन्दु हिन्दी शब्दोंका प्रचार श्री
व्यासजीले पूर्व इस भारत में था और अब भी है. इसका
कारण यह है जब हमारे विद्यावीर धीरपुरुषोंने हिंसा, हास्य,
हास, हुंवद, हतोत्साह, हडचल, हड फुट, हिचक, हीराहित्य
(निर्लज्जता), हीनता, हेला (अपमान ), हठता आदि हेय
अवगुणोंका नाश कर; हर्ष, हित, हितू, हेज, ही (लज्जा),
हल, व्यापार, हीनजन पालन, हिम्मत, हवन आदि
हितकर पदार्थांका चमकीला चन्द्रमा चमकायाथा तभीसे
दीर्घदी, गुणग्राही विदेशी लोग इस देशको हिन्द, निवासिओं
को हिन्दु और वोलीको हिन्दी कहने लगे.
९३
यहां पर कहने का तात्पर्य यही है कि किती गीते कि, हिन्दु शब्दके बूरे अर्थ पर ध्यान देकर वहके हुये लडके इस शब्दको घृणा दृष्टिसे न देखकर अपनी गन्यपूज्य मात- भाषाको हिन्दी नामसे ही पुकारते. सातवत् सदा हित के लिये आराधन करे ब्राह्मण ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः" जो ब्रह्म (आत्मा) को जाने वह ब्राह्मण है. क्षत्रिय और गोरक्षा क्षतात् भायते इति क्षत्रियः" प्रहारसे जो रक्षा करे वह क्षत्रिय है. "गोब्राह्मण प्रतिपाल' शब्दसे भत्रियों को संबोधन कीया- जाता है, क्यों कि गो ब्राह्मणकी रक्षा करना उनका कर्तव्य है. इस विषय मनुजीने कहा है कि " रक्तवस्त्रं शिरसि, हरते यष्टिका धारयति भत्रियः सर पर लाल रंगका वस्त्र और हाथमे लाठी क्षत्रिय लोग धारण किया करते हैं. उसी कथनानुसार रायका कौम आज भी सर पर लाल वस्त्र और हाथमे लाठी धारण करती है. वराहपुराण में लिखा है "नन्द भत्रियः गोपालनात् गोपः" नन्द क्षत्रिय थे गो पालने के कारण गोप कहलाये. यदुनन्दन भगवान श्रीकृष्णने भी ग्वालों सदृश्य गोरक्षा कर देशको गो पालनेका सन्देश दिया है. वशिष्ठलुनिने भी गो रक्षाके लीये कहा था पर राजा दिलीपने उत्तर दिया था कि “प्राणोत्सर्जनं कृत्वा गोरक्षा करोम्यहम्." अर्थान् गोकी रक्षा, में प्राणोकी भेट दे कर भी करूंगा. राजा सगरने भी गो रक्षा की प्रधानता दी है. इन्द्रराजाने कहा है कि गो का दूध अमृत के समान है. पाराशर आदि ऋषिोंने गायको श्रेष्ठ माना है. भीष्म पितामहने कहा है कि देव और मनुष्य गोमाता के पुत्र है. विराट नगरमें स्वयं सहदेव जोपीने गोकी रक्षा की थी. अर्जुनने भी छिपे वेशमें रहते हुए भी गोकी रक्षा की थी. इन प्रमाणोंसे सिद्ध होता है कि उस समय के क्षत्रिय गो के भक्त थे. , इस कलिकालके कठिन समयमेभी गायोंकी रक्षा करके भारतकी जनताको कृषि के लिये बैल तथा दूध, दही, घृत दे कर पालन पोपण कीया है. बहुत वर्षोंकी वात है जब भारत- वर्ष नहीं, हिंदुस्तान नहीं बल्कि दस्युओंका देश कहलाता था. तव सात सात समुद्रोंको पार कर गोपालकों ने हिन्दमें निवास किया था. वे वीर शब्द कहते हुये प्रदेशके संशोधन के लिये निकल पडे. उस समय उनके उपास्य देव अग्नि तथा सूर्य थे. जैसा कि- ९५
-
--
ऋछेदसे प्रगट होन-:--
" अमिन यर का -7 -:--- - -
कंतु चित्रः ॥
अर्थात-हे उमेरे यारा .
शान्ति हो, ले वा यात्रा मार्ग
इस उपर के सत्रको परने का मामी के नगान गार
मार करते हुये अपना अपना गो इन
कर भागे और
जब जंगलसे रास्ता भूल जाते पशु गम हो जाने को लेकी
जाज्वल्यमान चा सा उचाण करणारे नन गरेकी
गुंजायमान कर देते थे.
17
.
अग्यव्यूति क्षेत्र मागन्म देवा उवा मति भूमिाम द्वरणामृत ।
बृहस्पते प्रचिकित्सा गर्विष्ठा मित्ता सत्तेजाम्नि इन्द्र पन्थानम् ।।
अर्थात्-हे देव ! हम यात्रा करते हुये अपना मार्ग
गये हैं और वह प्रदेश, जीसमें पशुओंके लिये चारा आगे
नहिं हे. और इस विशाल प्रदेशमें केवल दस्युही रहते हैं. हे
वृहस्पति ! पशुओंकी खोजका मुझे रास्ता बता. हे इन्द्र ! मेरे
सेवक जो रास्ता भूले हैं उनको मार्ग बता.
वे जिस समय इस प्रकार वनमे घूमते फिरते उस समय
उनको झोंपडीयोंमे रहनेवाले वृद्ध और स्त्रियां निम्न लिखित
प्रार्थना करती थीं.
९६
" उदानं व्ययनं उदानट् परायीण आवर्ननं निवर्तनं मीय गोपान् वर्तनाम्"। गोपाल गायोंकी खोजमें गये हैं. वह सभी दिशाओमें घूम कर सहीसलामत घर वापिस आवें. पुनः पार्थना करते थे कि:- " संधि पूर्विणं विसर्गिक स सिही पारधुरं पूपमिद कृतं विद." अर्थात्-हे मूर्य मेरी रक्षा करके हमें पुण्यका भागी बना. हमको दृढ बनाओ तथा हमारे उदर पूर्ण और रक्षा के लिये कुछ मुक्ति करो. इस प्रकार भ्रमण करते हुये विजयशील गोपाल आस- पासके देशोंको जीतते थे. यही गोपाल कृष्ण भगवान् के साथी वन कर कंस जैसे राजाको नष्ट किया था. श्री कृष्ण भगवानने गीताके १८ वें अध्याय के ४३ व श्लोक में कहा है कि:- शौर्य तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् । दानमवीर भावश्च क्षात्र कर्म स्वभावजः॥ अर्थात्-शौर्य, तेज, धैर्य, बुद्धिमता, युद्धसे न भागना, दान, और स्वामी भाव यह क्षत्रियोंका स्वाभाविक कर्म हैं. उपरके गुण रायका कोममें पाये जाते हैं. इस कौमका प्राचीन इतिहास देखनेसे ज्ञात होता है कि यह कितनी प्राचीन . .९७ है. इस कौमका रायका. वारी तथा देसाई कहते हैं. राय और राजा ये क्षत्रियवाचक शब्द है. रायका यानी राज्य करना. मूल शब्द दरवारी है. जीसका "द" निकल जानेसे रखारी रह गया. देशाई याने देशमें प्रथम आये हुये जिसको देशीय, या ऊपर से गुजरातिमें देशाई कहते हैं. उनका गोत्र वही है जो भत्रियोंका होता है. दुष्काल के समय में भी अन्य देशोमें जा कर भारत के धन, की जिस पर जगतका जीवन निर्भर था उन गायों की रक्षा की थी. अकयर बादशाह के समय में भी दूध दही आदि वस्तुएँ प्रचुर मात्रामें मिलती थी. जिसका कारन यह था कि उस समय गो-बध नहीं होता था. गोरक्षा के लिये प्रोपर्ड नामक पुस्तकमें महाशय आहुरयझदाने कहा है कि:- • Where cattle go on thriving, holiness is Llr, jooder is thriving and every reless- Sof life is thriving, यहां पर की वृद्धि होती हैं वहां पवित्रता, खाद्य पदार्थ पानी नदी प्रत्येक वस्तुकी उन्नति होती हैं. S:.) अमेरिकाके संयुक्त प्रदेश के ( Minister । कृषि विभागके प्रधान मी. राल्फ. ए. शि:- . " It is criming for any man who owns a cow, to sell a pint of milk or a pound of butter, before his children have milk to drink every day & butter to eat at each meal." "किसी भी मनुष्य के लिये जो गाय रखता हो, यह वडे पाप की बात है कि अपने बच्चों के खाने के पूर्व, घी दूध या दहीको वेचे." अमेरिका इंग्लेन्ड आदि मांसाहारी देशों में भी दूधकी आवश्यक्ता समझते हैं. फिर भारत को जो निरामिपी देश है गरीव लोग रहते हैं, लेकिन उन देशोंकी अपेक्षा यहां चौगुना घी, दूध महंगा है. Indian Industrial Committee भारतीय ओद्यो- गिक समितिकी रीपोर्ट का सारांश यह है किः- " Truely the cow is the Mother of all prosperities. "गो सब प्रकार के उन्नति की जननी है. अर्थात् गोरक्षा से सब प्रकारकी उन्नति हो शकती है." महाभारत के शान्तिपर्व में महाराज युद्धिष्ठिरने धृत- राष्ट्रसे कहा कि:--" नहि गोप समः के चित्सन्ति लोके." लोकमें गोके समान कोई नहिं है. नीति का वाक्य है। -राजन् दधुक्षिस धेनु क्षिति सेतां । तेनाद्य वत्समिव लोक ममुं पुषाण ॥ -
“
हे राजन यदि इस गो रूपी पृथ्वीको दुहना चाहता
है तो बछडे रूपी प्रजा की रक्षा कर. भावार्थ यह है कि गो
तथा पृथ्वीकी रक्षा समभाव से करने की अनुमति दी गई है.
इस संसारमें ऐसा कोई भी नहीं है कि जिसको किसी न
किसी प्रकार दूध बाले पशुओंसे काम न पडता हो. दूध, दही,
घृत, कृषि, सवारी, बोझा ढोना, ऊन और बाल आदिके
लिये संसारले उनको मान दिया है.
पाश्चिमात्य लोग कितने सभ्य होते हैं कि छोटेसे छोटे
काम के लिये कृतज्ञता प्रगट करनेके लिये “ THANKS"
आभार" कहते हैं. फिर दूधवाले पशु तो हमारा, कहीं
अधिक उपकार करते हैं-फिर उनकी रक्षा हम क्यों न करें ?
उनकी रक्षा करना हम लोगोंका परम कर्तव्य है.
अतः आशा है कि Legislative Assembly & Council
of States धारासभा और नरेन्द्र मंडळ ईस बात पर
विशेष ध्यान देंगे और दूध देनेवाले पशुओंकी रक्षा का कानून
पास कर, देशकी गिरी हूई आर्थिक दशाको सुधारेंगे.
कितने ही राजामहाराजाओंने दूध देनेवाले पशुओंकी
हिंमा बंद की है और राज्य शासन कर्ताओंने विश्वास
दिया है कि यद्यपि यह कार्य वडा भारी है तो भी
उसकेलिये वे धीरे धीरे बंद करानेकी कोशिश करेंगे. उसका
मैं अनुमोदन करता हूं.
१००
श्री केसरीयाजी तिर्थ
प्रतिज्ञा आत्ममां लीधी विचरीया सत्यना पंथे
अविरत प्रेम रेलावा लीधीती टेक उत्कंठे
जगतने मित्र सम जोता दिसेना वेरनी झांसी
भले हो जैन के विष्नु सरिता स्नेहनी राखी.
मेवाड प्रदेशमा उदेपुर नजीक श्री केसरीयाजी करीने
जैनोनु यात्रानु महान स्थळ आवेलु छे. हिंदभरना जैन
समाजमां ए तिर्थनी प्रतिभा अद्वैत मनाय छे. भव्य जीनालय
अने धर्मशालाओ साथे एनी विराट मनोरम्यता हिंदभरमां
मशहुर
श्री केसरीयाजी तिर्थमा जीनालयना पुजारी तरिके
पंडा लोकोनी जजमानवृत्ति घणा वर्पोथी चालती आवे छे.
जीनालयमां पूजन अने प्रक्षाल आदिनी बोली बोलाय छे.
जेनी आवकनु प्रमाण दिनप्रतिदिन वधतां वार्षिक रुपीया दश
हजार उपरांतनु थवाथी पंडा लोकोए ए आवक पोते मेळववा
हकदार छे ते संबंधमां स्टेट समक्ष तकरार उठावेली. श्री के-
सरीयाजी तिर्थनो वहीस्ट अने देखरेख छेल्ला केटलाक वर्षोंथी
उदेपुर स्टेट करे छे. पंडाओनी जोहुकमीने लइ जीनालयमां
केटलीक वैष्णव रीतीनी शरुआत थएली. वर्षो थयां जीनालय
.
उपर चढावेल ध्वजदंड पंडाओए उतारी नाखी जीनालयमां हवन आदि करी वैष्णव रीती मुजब त्रिकोणी धजा चडाववामां आवी हती. जैन समाज आवा समये निंद्रावश वन्यो हतो. आटला वधा घोर अन्यायो थवा वाद तेनां आंतरचक्षुओ खुल्यां नहता. पूर्व समयनी कीर्तिने उज्वळ राखवानी जहेमत धरावता समाजना सुभटो शांतिमां पोढ्या हता. साधुसंमेलनना सूत्रधारो अने पोतानाज स्वमुखे पोतानी प्रभुता मनावनारा साशन- सम्राटो अजाण्या वनी जुदा पथे ज रमण करी रह्या हता. जनो अने पंडाओ वच्चे आ एक उग्र क्लेशाग्नि सळग्यो हतो. परिणामनी आशातो भावीना हाथ हती. परंतु पंडाओ पोताथी बनतुं करवानी घडीओ वितावता हता. जैन समाजना कोइपण किल्लेदारे आ वाबत विचारी होय तेवू जणातुं नहतुं. प्रकाग अले अंधारनी स्थितीनो ख्याल करतां केवळ अंधकारज दीयो हतो. वाक्यबाण फेकनाराओ पोताना वाणी प्रवाहमांज वित्राळना दर्शाची दुंदुभी नाद वजावी रह्या हता. आवा समय आपणा देवांशी संतनी आंतरगति ते तरफ पवनी अने पोताथी बनतुं करवानी प्रेरणाए आत्मनिश्चय छनक्यों. विधप्रेमना पानने जपावतां जगत कल्याणनी नानाए प्राध्यात्मिदा पथे रमण करतां कोई जीवात्मा साथे करनी हानी नहि राम्यतां सत्य कक्षाए पोतानी प्रतिज्ञा - २०० " जगत समक्ष जाहेर करी अने ते संदेशनी मेवाडना महाराणाने प्रथम हाकल करी. आ समये आपणा देवांशी संत श्री वामण- वाडजीनी तिर्थभूमिमां विराजता हता. जाहेर पेपरोमां नीचेनो संदेश प्रसिद्ध कयों, के "श्री के- सरीयाजी तिर्थ अने पंडा वच्चे सळगेल क्लेशाग्निनो, मेवाड स्टेट तरफथी शान्तिभावे निकाल नहि आवे तो संवत १९९० ना फागण सुद तेरसना रोज मेवाडनी हदमा प्रवेश करी हुं उपवास शरु करीश." जाहेर पेपरोमां एवं पण प्रसिद्ध करवामां आव्यु हतुं के "मेवाडना दिवान सर सुखदेवप्रसादजीतुं मृत्यु, थोडा काळमां छे. मेवाडना महाराणाश्री उपर रजवाडाओ तरफथी तारो करवामां आवेला के योगीराज उपवास आदरे ते पहेला प्रथम तके शांति स्थापन करो. दुनियाभरनी चारे दिशामां आ संदेश फरी वळयो के फागण. सुद तेरस सुधीमां श्री केसरीयाजी तिर्थमां शांति स्थापन नहि थाय तो योगीराज उपवास आदरशे. आपणा देवांशी संतने मेवाडनी भूमीमां प्रवेश करता अटकाववा माटे मेवाडना दिवान सर सुखदेवप्रसादजीए अगाउथी मेवाडनी चोतरफनी सरहद घेरीने चोबीशे कलाक माटे चोकी पहेरा गोठव्या हता. संवत १९९० ना फागण सुद १० ना रोज श्री वामण- वाडजी तिर्थथी विहार करी अजारी पासे आवेल सरस्वतिना १०३
मंदिरसां एक दिवस वितादि आपणा दगीर बोलाना
आत्मवळना अद्भूत प्रमावे फागण खुद्र तेग्यना को उतर
नजीक आवेल गाय सदामां पयारी गया. पोलीस कोकीगगे
आ दिव्य घटना निरखी दीगमूह बनी गया अने नागुनेगे
मेवाडनी चोतरफ आ समाचार फरी वळया.
मेवाडनी हदमा दाखल थतां फागण मुद्र तेगना अगाउ
वे जैन साधुने रोकवामां आवेला. परंतु तेश्रोतु नाम गांति-
विजयजी नथी, एवी चोकस खात्री थवा बाद तेओने आगळ
विचरवा देवामां आवेला.
आपणा देवांशी संते संवत १९९० ना पागण मुद
चौदशथी उपवासनी शरुआत करी. उपवासना दिवस
पसार थतां दिवान सुखदेवप्रसादजी अने अन्य ओफीसरो
सदार सुकामे तेओश्रीना दर्शनार्थे पधार्या. ते समये दिवानने
तेश्रोश्रीए हाकल करी के "मारा माटे आपे त्रण दिवस
सुधी पोलीस विगेरेने महान तकलीफ आपी, अने आपे पण
अति कष्ट सहन कर्यु. अत्यारे हुं आप समक्ष वेठो छु. आप
मने पकडी जेलगां पुरी शक्षो छो. दिवानजी ! बाळ सफेद
थई गया छे. मृत्यु आसपास भगी रहयुं छे. टुंक समयनाज
आ जगतना महेमान छो माटे सत्यने ओळखतां शीखो."
दिवानजीनु मृत्यु टुंक समयमा छे आ हकीकत प्रथम जाहेर
पेपरोमां प्रसिद्ध थई चूकी हती.
१०४
दिवानजी आ हकीकत श्रवण करी स्तब्ध वन्या अने
केटलोक टाइम विताव्या वाद आ बावतमां शांति स्थापन
करवानी पोतानी ईच्छा व्यक्त करी अने त्यां सुधीने माटे
तेओश्रीने छाश उपर रहेवा सारु प्रार्थना करी.
हठवादने नहि पकडतां दिवानना बचनने मान्य करी
आपणा देवांशी संते छास लेवा नियत कयु परंतु वे दिवस
पुरा थतां दिवानना वचन उपरनो विश्वास अयोग्य भासवाथी
फरी उपवासनी शरुआत करी.
मदार गाममां सोएक घरनी वस्ती भाग्येज हशे ते मदार
गाम ते समये एक विराट नगर वनी गयुं हतुं, के ज्यां
मेवाडनो मानवसमुह आपणा देवांशी संतना दर्शनार्थे हजारोनी
संख्यामां उलटयो हतो. त्या असंख्य मानवोने आपणा देवांशी
संत मद्यपान आदिनो त्याग करावी पावन वनावता हता
उपवास चालु होवा छतां सवारथी सांज सुधी हरेक मानवने
तेओश्री दर्शन आपता अने जनताने पुन्य पंथे दोरता.
सदार गायमा वरधीचंदजी तलेसरा नामना एक जैन
गृहस्थनी नानी झुपडीना मेडा उपर आपणा देवांशी संत
विराजता हता, के ज्यां नीचेना भागमां ढोरो बांधवामां
आवतां हतां. ए जैन गृहस्थनां पण पूर्ण सद्भाग्य कहेवाय
के आपणा देवांशी संतनां पुनीत पगलां तेनी झुपडीमां थयां.
१०५
संवत १९९० ना चैत्र शुद्र नेग्मनागेनमा माया आपणा देवांशी संत आत्मबलना अदयन मा उमाली नजीक आवेल गाम देवालीना पादरे पगरी गया सेवाडना महाराणाश्री गोपाळाजीने पार किन्न सकेन थयो के ते दिवसे राजमहलमां वीर कगनी पोने या ली आपणा देवांशी संतना दर्शनार्थ देवाली मुकामे पनाया. देवाली गापमां महाराणाश्रीनो मोति मोल आयलो के, नने अगाउथी साफ कराववामां आव्यो हतो. त्यां पण हजागना प्रमाणमां मानवमेदनी उलटी पडी. अति धामधूम अने जय जयना भेदी गुंजार थतां आपणा देवांशी संत मोति महेलमां पधार्या! श्री भोपालसिंहजी महाराणाए चरणमां शीप झुकाव्यु अने पारणु करवानी पोतानी आंत्रिक विनंति प्रदशीत करी. आपणा देवांशी संते पण एटलीज हाकल करी के " हे नर्य- वंशी महाराणा आप सत्यना पंथे चालो एटलुन मारु कथन छे. जैनोनो हं पक्ष करतो नथी तेमज वेप्णयो प्रत्ये मारे विरोध नथी." संतनी भावनाओ तो सदाने माटे विश्वना कल्याण- मयज होय छे. केवळ शांति स्थापन करवी एज तेओनो मुख्य उपदेश होय छे. मेवाडना महाराणाश्री भोपालसिंहजीए पण मूर्यवंशी महाराणा तरीके गांति स्थापवा वचन आप्यु. अने पोताना
थाय.
स्वहस्ते मोती महेलमां आपणा देवांशी संतने पारणु कराव्यु.
आ समयनी दैविकता केटली वधी अपूर्व हशे के जेनु वर्णन
आ स्थळे करी शकाय तेम नथी. देवालीथी अति धामधूम
साथे आपणा देवांशी संत उदेपुरमां पधार्या.
दिव्य भास अंतर थयो, भोपालसिंह महाराय.
गुरुवरना चरणे पडी, अंतरमा
हरखाय.
वचन दीधुं गुरुदेवने,
सूर्य वंशी महाराय.
मोती महेलमां पारणु, महाराणाथी
त्रीस उपवास पुरा कर्या, आनंद त्यां वर्ताय.
शांति सूरी गुरु देवना, सकळ लोक गुण गाय.
जैनोना इतिहासमां छेल्ला केटलाक सैकाओमा आ
प्रथमज प्रसंग छे के एक जैन साधुने सूर्यवंशी महाराणा
पोताना स्वहस्ते पारणु करावे.
मेवाडना महाराणा तरफथी पण एवं जाहेरनामु प्रसिद्ध
करवामां आव्यु के श्री केसरीयाजी तिर्थमां जैनो सिवाय
वीजा कोइनो स्वतंत्र हक नथी.
उदेपुर मुकामे नेपाळना महाराणा आपणा देवांशी संतना
दर्शनार्थे पधार्या हता अने. तेमणे नेपाळ राज्य धर्मगुरुनु
विरुद अर्पण कयु हतुं.
श्री श@जय तिर्थक्षेत्रना संबंधमां पण ज्यारे पालीताणा
स्टेट अने आणंदजी कल्याणजीनी पेढी वच्चे मुडकावरा विषे
१०७
उग्र कलहान्नि उपस्थित थयो हतो ते साये । यता
देवांशी संते शांतिसुधा रेलायवा जमत उठानी.
मारा श्रवण गुजब एक वचन आयुगीनगजनी पनि
तिर्थभूमीमां पालीताणा, मोरवी तथा लीगडीना नरेन्दो
आपणा देवांशी संतना दर्शनार्थ पधार्या हता. वणे गानो
समक्ष प्रस्तुत घटनानु निराकरण शांतिपावे मन हर्नु भने
पालीताणाना ठाकोर साहेब आपणा देवांगी संतनी आनानु-
सार वर्तवा तैयार हता. आणं जी कल्याणजीनी पेढीने श्रीमान
गुलाबचंदजी ढढ्ढा साहेवे प्रस्तुत संदेशो पाठवेलो परंतु ते
समयना समाजना सुभटो अने कीर्तिपालक किल्लेदारोनी
कीर्तिमा लेशमात्र उणप ना आवे ते लाल सर्व हकीकत पडदा
पाछळ ढंकाइ गइ हती. वीजा केटलाकासंगोए पण आपणा
देवांशी संते पोताथी वनतुं सर्व करेलुं छे.
समाज आ घटनाथी अजाण न रहे माटेज आटला टुंक
उद्गारो आ स्थळे आलेखु छु.
उदेपुरना आंगणे केटलोक समय निर्गमन करी असंख्य
मानबोने सत्य अने विश्वप्रेमनी सरितामां पावन करता करता
श्री केसरीयाजी तिथभूमिमां विचरी गामोगाम फरतां फरतां
आपणा देवांशी संत श्रीवामणवाडजीना रमणीय तिर्थक्षेत्रमा
पधारी गया.
१०८
मंगल महोत्सव
धन्य मांडोली गामना अति पुन्य कहेवाय
सो घर केरा म्हाडगा उत्सव मारे थाय
लक्ष रूपैयो वापयों भक्ति तणो नहि पार
अनुपम रचना आदरी शोमा दिव्य अपार
दिव्य दीपक झळक्यो अहींमणीमयरुपदेखाय
नगर मांडोली गाममां अमृत जळ वरसाय
किंकर कहे आशुं वन्युं मुखे न वर्णन थाय
कृपा पुरण गुरुदेवनी पार कदी न पमाय
श्री मांडोली नगर ए दादागुरुश्री धर्मविजयजी महाराज के
जेओश्रीनो अदभुत उजवळ जीवन इतिहास हुं आगळ आलेखी
गयो छु तेओश्रीनु जन्म अने काळधर्म पाम्यानु स्थान छे.
मांडोली गाममां दादागुरुनी प्रतिमा स्थापन करवाने
गामनो मानवसमुह वर्षो थयां स्वप्न वितावतो हतो. संवत
१९९४ना फागण मासमां दादागुरुनी प्रतिमा स्थापन करवा
माटे अंजनशलाका तथा प्रतिष्ठा महोत्सवनो कार्यक्रम नियत
करवा पंचो आपणा देवांशी संत समक्ष आबु गीरीराजमां
देलवारानी पवित्र तिर्थभूमिमां आव्या अने अपूर्व भावना
१०९
साथे पोतानी विनंति रजु की. मांडोली गयाने जाने
समय विताव्या वाद आ प्राथमिक प्रसंग होताची पनीर
येन केन प्रकारे पधारवानो आग्रह प्रगत को. गने
अंजनशलाका प्रतिष्ठा आदिना गुभ मुहुनों दर्गावचा नुनयं.
मांडोलीना पंचोनी विनंतिनो स्विकार कर्मा पिना पगा
प्रसंगे चाले तेम न हा. संयोगोने वधावी ला आपणा देवांगी
संते अंजनशलाका अने प्रतिष्ठा आदिना मुहुतों दर्गागां अने
मांडोली मुकामे विचस्वानो आदेश जाहेर कया.
आ शुभ प्रसंगोने उज्वळ वनावना मांडोली गामना
पंचोए अविरत जहमत उठावी हती. गाममां वे तडो हतां ते
पण आ शुभ अवसरे एकत्र थइ सर्व कार्यपरायणतामां गुंथाया
हता. पंच पहाडोनी रचना, अट्ठाइ महोत्सव, शांति स्नात्र,
दादागुरुनी प्रतिमानी तथा श्री सुमतिनाथ प्रभुनी प्रतिमाजीनी
अंजनशलाका अने प्रतिष्ठा आदि शुभ कार्यों उजववानी
तमन्नामां रात्री अने दिवस मांडोली गामना पंचो झझूम्या हता.
पाल, रावटी, हस्ति, दिपकरोशनी, वाजींत्रो आदिनी
अजायब गोठवणो करता एक लाख रुपीया जेवी मोटी रकमनो
व्यय करवानी उर्मिओ वितावतो मांडोलीनो मानवसमुह
भावपूर्ण हर्षवेलो बन्यो हतो.
संवत १९९४ ना फागण सुद बीजथी महोत्सवना प्रारंभनी
शरुआत थइ. आसपासना गामोमांथी स्वयंसेवकोना दळो अने
११०
हजारोना प्रमाणमा मानवमेदनी उभरावा लागी. उंट, गाडां आदिनी एटली वधी लांबी हार थती के माइल मुधी तेनो घेरावो दीसतो. मांडोली गामनी चारे दिशाए नोवतोना गुंजारो अने बाजींत्रोना गगनभेदी नादो मानवना हृदय मंदिरमां हर्षना तान पुरता दैविक्तानो भास अर्पता हता. मांडोली गाममां आपणा देवांशी संत वर्षों बाद पधारता होइ आजुबाजुना गामो तथा रजवाडाओमां उत्साहनो पार न हतो. मांडोली गाम आ समये एक विराट नगर बन्यु हतुं. असंख्य मानवमेदनीनां जुथ एना आंगणे उतरी पड्यां हतां. आपणो देवांशी संत फागण सुद सातमना प्रभाते असंख्य मानवमेदनीना सामैयामां हस्ति, वाजींत्रो साथे सुसजीत अद्वैत वरघोडानी मनोरम्यता निरखतां श्री मांडोली नगरमा प्रवेश्या. मानवमेदनी एटली वधी उल्टी हती के सूर्यनारायणनो प्रकाश पण निरखी शकातो न हतो. फागण मुदी नोमना रोज विविध प्रकारनी पुजाओ साथे अंजनशलाकानी विधी पूर्ण थतां दशमनो शुभ दिवस आवी पहोंच्यो. आजरोज श्री दादागुरु तथा श्री सुमतिनाथ भगवान- नी प्रतिमाजीनी प्रतिष्ठा करवानी हती. आजना प्रभाते एक लाख उपरनी मानवमेदनी उभरातां अद्वैत मतिभा अने दैविक सुरो गाजतां फागण सुद दशमना चढता पहोरे आपणा देवांशी 1- संतना शुभ हस्ते बन्न प्रतिष्ठायी मामा , ...--:- द्रश्य एटलं अन्यौलीक तु ने बानी - ... उमराणी हती. माडोली गानन जनको जळधारानी माफक लक्ष्मी केली या संगो साथे विताव्या हता. सुशोभीततानो गनोग्य नितार गनो गाना आव्यो हतो के जनी दैवि लीलाभोनु निशिमा नाम- वानो आ स्थळे. शुमय नथी. महान पुरुषोनी गति अकक होव के के हो न बन पान होय ते बनी जाय अने कल्पनामां पण निहाळा नानी दिव्यता निरखी शकाय. श्री मांडोली नगरनो औन प्रमंग प अकळ गतिनु मान करावतो हतो. आपणा देशांगी गंतनी शुभाशिषनुज आ एक दिव्य स्वम विनी गयुं गस आलेख जराए अतिशयोक्ति अरेलु नहि मनाय. आ प्रसंगने लगती विशिष्ठता दशावतां, ते प्रसंगे "श्रीमद् गुरुमंदीर महोत्सव प्रसंगे" तथा " श्री मांडोली नगर अने मंगल महोत्सव " नामनां वे पुप्प प्रसिद्ध करेला हता. मांडोली नगरमां आठ मासनो काळ आनंद अने हर्ष समृद्धिमां निर्गमन करी, उमेदपुर प्रतिष्ठा महोत्सव प्रसंगे अडतालीस गामना पंचोनी विनंतिनो स्विकार करी सं. १९९५ ना मागसर सुद त्रीजना मध्यान्हे जनसमुहनी भावभीनी विदाय लइ आपणा देवांशी संते शियाणा गाम तरफ विहार कर्यो. ११२
विहार
शांति शांति का झंडा जगतमें फीरे
सारी दुनियामे रोशन उनीका जले
भक्ति करनेसे भवभयके संकट टळे
कोइ क्रिष्ना भजे कोइ रामा मजे
भेदभावो भीतरसे वीराओ तजे
भक्ति श्रद्धा विना नाथ कैसे रीझे
शियाणा गाममा एक दिवस वितावि जन्मभूमि मणादर
तरफ विहार करवानु नियत थयु. आठ वर्षनी वये गाम
मणादर छोड्या वाद मणादरनी भूमिमां प्रवेश करवानो आ
प्रथम प्रसंग हतो. माता तथा मणादरना मानवसमुहने
पोतानी भावना पूर्ण करवानी आ अणधारी तक मळवाथी
तेओ सर्वना हर्षनो पार न हतो. मागसर सुद छट्ठना रोज
मणादरना मानवसमुहना अति धामधूम भर्या सामैयानो स्वीकार
करी आपणा देवांशी संत मणादर नगरमा प्रवेश्या.
मणादरना ठाकोर साहेव मानसिंहजीना कुंवर पण ते
समये दर्शनार्थे पधार्या, अने शीष झूकाव्यु. माताना अति
उत्साहनो स्वीकार करी जन्मस्थळमां प्रवेशी मातानी हार्दीक
भावनाने शांतवन करी. मणादरनगरमा फळेसुनगीनो मोटो जमणवार करवामां आव्यो हतो. फळेसुनगी एटले गामनी पादरे एक चुंदडी फरकाववामां आवे अने ते फरकती रहे त्यां सुधीयां मनुष्य मात्र त्यां आवीने जमे. मणादरनगरमां वे दिवस पसार करी मागसर मुद सात- सना रोज हरजी गाम पधार्या. त्यां आचार्य श्री विजयललित- मरिजी आपणा देवांशी संतने उमेदपुरना प्रतिष्ठा महोत्सवना प्रसंगे पधारवा विनंति करवा सारु आव्या हता. हरजीमां एक दिवस वितावि मागसर मुद नोमना रोज उमेदपुर तरफ विहार कयों. सागसर मुद नोमना रोज वपोरना त्रण वागे असंख्य मानवदनी तथा आचार्य श्री विजयललितमरीजी अने अन्य माधुओ साथेनु वाजींत्रो अने जयजयना गगनभेदी गुंजारो परतुं भव्य सामैयुं उमेदपुरनी पादरे आबी पहोंच्यु. सा- मयानो स्वीकार करी आपणा देवांशी संत गाममां प्रवेश्या. उमेदपुरण अमीझरा पार्श्वनाथनी जे प्रतिमाजीनी प्रतिष्ठा करवानी हती देनी अंजनगलाका वामणवाडजी मुकामे संवत ६८.९. ना महामुद्र पांचमना रोज आपणा देवांशी संतना सन इन्ने वामां आवी हती. ने समये श्याम प्रतिमाजी उपर ड डाय हता ने माटे आगिर्वाद आप्यो हतो के ए साफ महादे. ते नमाम घटना दिव्यपणे यशस्वी बनी हती.
संवत १९९५ ना मागसर सुदी दशमना रोज श्री उमेद- पुरण अमीझरा पार्श्वनाथनी प्रतिमाजीनी प्रतिष्ठा आपणा देवांशी संतना शुम हस्ते थता जयजयकार वर्तायो. अने असंख्य मानवमेदनी आनंदधारा जपावतां विखरावा मांडी. मागसर सुद तेरसना रोज उमेदपुरथी विहार करी पाद- रली गाम आव्या अने त्यां एक दिवस वितावी तखतगढ पधार्या. त्यांत्रण दिवस रही कन्याविक्रयनो कुरीवाज बंध करावी मागसर वद त्रीजना रोज विहार को. रस्तामां भील लोकोनु वीठीआ गाम आवे छे त्यां वीरनु एक मंदिर छे. ते मंदिरनो भूवो भोपाना नामथी ओळ- खाय छे. प्रस्तुत मंदिरमा घणाज पशुओनीहिंसा थती हती ते आपणा देवांशी संतना दिव्य प्रभावथी बंध थइ. आ सबंधमां विशेष आलेखन पाना नं. ७८ उपर आवी गयुं छे. आपणा देवांशी संत श्रीजनी सांजे वांकली गाममां पधार्या त्यां त्रण दिवस रही छट्टना रोज खीवाणदी गाममां पधार्या. ते गाममां सीत्तेर वर्षथी कलह चाल्यो आवतो हतो ते शान्त्वन कर्यो अने आठ दिवस सुधी भक्तिनां पान जपावी तेरसना रोज पोमावा तरफ विहार कर्यो. पोमावा गाममां आपणा देवांशी संत अढार वर्षे पधार्या अने त्यांना जीनालयमां पोप सुद छहना रोज श्री कुंथुनाथ ११५ . *
प्रभुनी प्रतिमाजीनी स्थापना तथा शांतिस्तात्र आदि शुभकार्य
करावी आनंद वर्तावी नोयना रोज विहार करवानु नियत थयुं.
सुमेरपुर अने शिवगंज बन्ने नजीक आवतां होइ बन्ने
गामवाळाओनी एक सरखीज भावना हती परंतु एवं नक्की
कयु के जे दिशामां शुकन आवे ते तरफ विहार करवो.
पोमावा गामनी भावभीनी विदाय लइ पोप सुद नोमना रोज
शिवगंज तरफना सुकन थवाथी आपणा देवांशी संते ते तरफ
विहार कर्यो. रस्तामां आवता गामोना मानवसमुहने भक्ति
अने विश्वमेयना पानथी पावन बनावता सांजे शिवगंज
आवी पहोंच्या.
सूर्य अस्त थवानी तैयारी होवाथी हंसाजी चुनीलाल
नायना एक सुंगानी दुकानमां रातवासो रह्या. प्रभातमां अपूर्व
धामधूम अने उत्साहना झरण पावतां दबदबा भर्या सामैयानो
स्वीकार करी नगरमा प्रवेश्या. आखा ए नगरने ध्वजापताका
अने सुशोभित रंग बेरंगी दरवाजाओथी शणगारवामां आव्यु
हतुं. जनसमुहना उत्साहनी सीमा अपूर्व हती. शिरोही प्रदेशमा
शिवगंजनी प्रतिभा कीर्तिवंत मनाय छे.
शिवगंज नगरमां दोह मासनो काळ भक्ति अने प्रेमनां
गरण पावतां दरम्यानमां पडोशमां आवेल गाम बडगाममां
पधारी आठ दिवसनो काळ निर्गमन करतां लांवा वर्षांनो
भिपण कलह शान्त्वन करी आपस आपसमां सुलेहशांति
स्थापी स्नेहनो सिंधु रेलाव्यो. एक दिवस सुमेरपुरमां पधारी त्यां पण आनंद अने स्नेहसमृद्धिनां झरण व्रषाव्यां. फागण सुद तेरशना रोज शिवगंज नगरथी विहार करी कळापरा, नीलकंठ आदि गामोमां विहार करता गाम चुलीमां पधार्या. चुली पासे राडबढ गाम आवेलुं छे; ज्यां भगवान श्री महावीर स्वामीनु पुराणु अने अलौकिक जीवत स्वामी मंदिर आवेलं छे. त्यां हरेक साल चैत्र सुदी पुर्णिमाए मेळो भरातो हतो; परंतु छेल्ला केटलाक वर्षो थयां बंध हतो ते मेळो फरीथी भरवानो शरु करावी दोढ मासनो समय चुलीमां भक्तिमुधा रेलावतां निर्गमन करी विहार करतां अठवारा पधार्या. अठवारामां आठ दिवस आनंदमंगळमां वितावि साठ वर्पना जुना कलहने शान्त्वन करी स्नेहनां झरणा जपाव्यां. अठवाराथी पोषाळीया, भेव, पालडी. वागण शिरोही गोहीली पाडिव खांभल इत्यादी गामोमां विच- रता विचरता संवत १९९५ ना. वैशाख सुद छट्टनी मंगळ प्रभाते अणादरा पधार्या. त्यां संप्रतिराजाए बंधावेला प्राचीन जीनालयमां वैशाख सुद सातमना रोज प्रतिष्ठा महोत्सव आदि शुभ कार्यने आनंद मंगळ साथे वितावी स्थिरवास रह्या. आ चोमासामां दुष्काळ प्रवर्ततो होवा छतां पण अणादरा अने तेनी आसपासनी भूमिमा सारो वरसाद थयेलो.
~~~ सुवर्ण महोत्सव संवत १९९६ ना महासुद पांचमना रोज आपणा देवांशी संतने पचाश वर्ष पुरां थतां होइ, अपूर्व उत्साह रेलावतां अणादरा गामे सुवर्ण महोत्सव उजववामां आव्यो हतो. ते समये पण अणादरा गामडु मटीने विराट नगर समु दिसतु हतुं. संवत १९९६ ना अपाड सुदी तेरसना रोज अनादराना ठाकोर साहेब तथा मानवसमुहनी भावभीनी विदाय लइ आपणा देवांशी संत विहार करी पवित्र तिर्थाधिराज आधुगिरि उपर पधारी गया. आपणा देवांशी संत विहार करतां जे जे गाममां विचर्या हता त्यां ते ते समयनी दैविकता निहाळतां जाणे परमात्मा पोतेज सदेहे पधारता होय तेवीज भावनाओ लूटतां नमणवारो साथे अपूर्व भक्तिसुधा रेलाती. आजे पण आपणा देवांशी संत अर्बुदगीरीराजना गगन- चुंबी शिखरो अने अरण्योमा निजानंद लूटतां आत्मज्योतिनो दिव्य प्रकाश विश्वभरमां फेलावी रह्या छे. अन्य मानवोना वक्तृत्वमां नहि भरमातां, मानवसमुह मारा आटला जुज निवेदननो स्वीकार करी केवळ सत्यनो प्रभारी बने एटलीज अभ्यर्थना साथे मारी उर्मिओने विरामु छ.
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गुरुस्तोत्र
(हरीगोत)
जीवननैयां तारनारा एकश्री गुरुदेव छे
सिंधुमाथी काढनारा एकश्री गुरुदेव छे
रोग शोग निवारनारा एकश्री गुरुदेव छे
विषम हैयां ठारनारा एकश्री गुरुदेव छे
कर्मज्वालामा हिमालय एकश्री गुरुदेव छे
शांतिनुसाचु शिवालय एकश्री गुरुदेव छ
कल्पवृक्ष
अने
कृपामय एकश्री गुरुदेव छे
जाप जपवानुजीनालय एकश्री गुरुदेव छे
जंझटोने
टाळनारा एकश्री गुरुदेव छे
पतितने पण पाळनारा एकश्री गुरुदेव छे
दिव्यज्योत जलावनारा एकश्री गुरुदेव छे
अभयसुखने आपनारा एकश्री गुरुदेव छे
भाग्यनो तपतो सितारो एकश्री गुरुदेव छे
मुक्तिनो मोंघो मिनारो एकश्री गुरुदेव छे
ज्ञानगंगानो किनारो एकश्री गुरुदेव छे
विश्वप्रेम तणो फुवारो एकश्री गुरुदेव छे
समाजळ रेलावनारा एकश्री गुरुदेव छे
सत्यपाठ शिखावनारा एकश्री गुरुदेव छे
किंकर कहे सुजमंदिरे पण एकश्री गुरुदेव छे
अमर पंथे लइ जनारा एकश्री गुरुदेव छे
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
horon
NAAMKina
Paur
किंकरना भक्ति पुष्पोनु भक्तिरसना झरणां पावतुं
एकवीसमु पुष्प
हृदयनी छोळो"
टुक समयमां वहार पडशे.
: मुद्रक :
दलाल नकळचंद
ही पदिय प्रिं. प्रेम
सोयोट-न्दाबाद
: प्रकारक:
शा पुरुपोत्तमदास पोपटलाल
पतासानी पोळ, नवि पोळ
अमदावाद.
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