Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Grana Fala Darpana

Pandit Mitha Lal · 2012/08

PDF Proofread

Front matter

॥ श्रीः॥
वहदयं मार्तण्ड का चतुर्थ अङ्क।
ग्रहण फल दर्पण।
अर्थात्
सूर्य चन्द्र के ग्रहण द्वारा जगत् में होनेवाले फेरफार का शान।
भाषा तत्व व्याख्या सहित।
जिसको
प्राचीन ज्योतिः शाश्रमी, देवभूषण, ज्योतिष रत्न धादि
पण्डित मीठालाल अटलदास व्यासने
अनेक अलभ्य प्राचीन ग्रन्थो से संग्रह करके
प्रकाशित करा ।मु०व्यापर-राजपूताना.
-
Sa.5C
-
प्रथमावृत्त ]
स १९७० वि
[प्रति १०००
मूल्य 1) आठ आना.
इस के सर्वाधिकार प्रकाशक ने स्वाधीन रखे हैं।
अमदाबाद टफशाल में युनायन प्रीफ्टींग प्रेस कंपनी लीमीटेडमां
C मोतीलाल सामळदासने छापा

भूमिका। सृष्टि विद्या के सिद्धान्तानुसार ब्रह्माण्ड के गोल पदार्थों में केवल एक सूर्य ही स्वय प्रकाशमान् है । चन्द्र, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि और पृथिवी आदि अन्य जितने ग्रहादि हैं वे सब केवल उसी एक सूर्य ही के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं । रात्रि के समय सूर्य पृथिवी ही की एकदम आड में अर्थात् उसी की दूसरी ओर आ जाने से मूर्य का प्रकाश पृथिवी पर नहीं आ सकता है। किन्तु अन्य ग्रहों तथा तारों पर सूर्य का प्रकाश नियमानुसार कुछन कुछ चनाही रहने से घे पदार्थ प्रायः चमकी ले दृष्टि आते हैं । ज्योतिः शास्त्र के मतानुसार ये सब अपनी २ गति से अपनी २ कक्षा में सदैव ही घूमते रहते है । इसी गति द्वारा चन्द्रमा घूमते २ जिस समय सूर्य से ठीक दूसरी ओर सा- मने पृथिवी की छाया के भीतर आ जाता है तब उस पर सूर्य का प्रकाश न पड़ सफने से यह अवस्थानुसार न्युनाधिक प्रकाश हीन हो जाता है और उसका वह अंश अदृश्य हो जाता है उस समय चन्द्रमा को ग्रहण हुआ कहते हैं। इसी प्रकार चन्द्रमा घूमते२ जिस समय बादल के समान सूर्य के न्युनाधिक आड़ा आ जाता है उस समय पृथिवी पर आने वाले सूर्य के उतने प्रकाश को रोक लेता है इसलिये उस समय सूर्य को ग्रहण हुआ कहते हैं । अर्थात् शुक्ल पक्ष की पूर्ण मासी को जब सूर्य और चन्द्रमा के बीच में पृथिवी आ जाती है उस समय यदि रात्रि हो और चन्द्रमा का विम्ब भी पृथिवी की ठीक छाया में आ जावे तो उस समय चन्द्रमा का ग्रहण होता है; परन्तु चन्द्र बिम्बका जितना अंश छाया में अा जावेगा उतना ही चन्द्र ग्रहण हुआ दीखेगा । इसी प्रकार कृष्ण पक्ष की अमावस्या को जय सूर्य और पृथिवी के बीच में चन्द्रमा आ जाता है उस समय यदि दिन हो और चन्द्रमा का विम्म भी सूर्य के ठीक आड़ा आ जावे तो उस समय सूर्य का ग्रहण होता है; परन्तु सूर्य विम्ब का जितना अंश चन्द्रमा से लॅक जावेगा उतना ही सूर्य ग्रहण हुआ दीखेगा । अतः सूर्य चन्द्र को ग्रहण होने का मुख्य कारण तो यही है। परन्तु श्री ब्रह्मा देव तथा शिवजी के पर प्रदान से 'राई' नामक प्रह चन्द्र ग्रहण के समय तो पृथिवी की छाया में और सूर्य ग्रहण के समय चन्द्रमा के यम्य में प्रवेश कर जाता है। इसी लिये पुराण आदि धर्म शास्त्रों में ग्रहण का कारण राहु मानकर उस के निमित्त सान दान जप तप हवनादि करने से अक्षय पुन्य होने का विधान सहाय दृष्टि मे वर्णन करा है। पदार्थ विद्या के सिद्धान्तानुसार ग्रहण के समय मूर्य चन्द्र और पृथियी की जो एक प्रकार की एक दूसरे के साथ आक- पण शक्ति वा विद्युत् शक्ति है उस में कुछ अन्तर पड़ जाता है जिस के कारण जगत् में मी अनेक प्रकार का परिवर्तन हो जाता है परन्तु किस प्रकार के ग्रहण के समय किस प्रकार का परि- घर्तन होगा इसका ज्ञान सर्व साधारण को हो जाने के लिये परो- पकारी महर्षियोंने अनेक शास्त्रो में बहुत विस्तार से वर्णन करा है। परन्तु आज कल के निरुद्यमी मनुष्यों के लिये उन अलभ्य अन्यों का एकत्र करना ही महान दुर्लभ है तो फिर उन महान् विषयों से युक्त अनेक ग्रन्थों में से ग्रहण से सम्बन्ध रखने वाले समग्र विषयों ही को छांटकर एकत्र कर लेना कितना दुर्लभ है? यह यात किसी से भी छिपी हुई नहीं है। इसलिये मैने अनेक प्राचीन ग्रन्थों का माररूप “वृहदर्घ्य मार्तण्ड" नामक एक महान विस्तृत ग्रन्थ सरल आर्य भाषा दीका सहित निर्माण किया है। यह अन्य लोकोपकारार्थ अंक अंक रूपसे प्रकाशित किया जाता है । इन में 'सर्वतो भद्रचक (त्रैलोक्य दीपक)' 'वृष्टि प्रबोध (भारत का वायु शास्त्र), और 'संक्रान्ति प्रकाश' नामक तीन अक* तो प्रथम प्रकाशित किये जा चुके उसी प्रकार यह ग्रहण निबन्ध' नामक चौथा अंक भी प्रकाशित करने के लिये तीन भागों * सर्वतो मदचक तथा वृधि प्रबोध' नामक अक ती प्रकाशित होत ही हाधोदाय विक गये । परन्तु ग्राहकों की माग दिन परदिन यदती हो गई इसरिये वृष्टि प्रबोध को पहिले से भी अधिक पटाकर दूसरी बार छपवाया है जो धोरे ही दिनों में सप प्राइकों की सेश में भेजी जाचुरेगी और 'क्रान्ति प्रकाश को भी इनी गिनी प्रतिये शेष हैं वे भी शीघ्र ही बिक जायेगी।

३ में बनाया है । इन में ग्रहण होने का मुख्य तथा गौण कारण, उस के जानने के गौण तथा मुख्य उपाय और उस के स्पर्श म- ध्य-मोक्ष-स्थिति तथा विश्व आदि का यथावत् शान कुछ भी गणित किये विना सहज ही केवल दो चार अंक मिलाने ही से हो जाने का सरल विधान तो गणित के सिद्धान्त से 'ग्रहण ज्ञान दर्पण' नामक भाग में, ग्रहण के निमित्त से जगत् में होने वाले अनेक प्रकार के शुभाशुभ फलों का विधान फलित के सिद्धान्त से 'ग्रहण फल दर्पण' नामक भाग में और ग्रहण के समय स्रान -दान, जप-तप, हवन, तथा अनिष्टकारक ग्रहण की शान्ति आदि का विधान धर्म शास्त्रों के सिद्धान्त से 'ग्रहण पुण्य दर्पण' नामक भाग में किया गया है। इन में से यह 'ग्रहण फल दर्पण' नामक भाग प्रथम प्रकाशित किया जाता है इस विषय का ऐसा विस्तुत ग्रन्थ आज तक कहीं भी प्रकाशित नहीं हुआ है। इस को देख कर यदि पाठकों की इच्छा उन 'ग्रहण ज्ञान दर्पण' तथा 'ग्रहण पुण्य दर्पण' नामक भागों के देखने की हुई तो वे दोनों भाग भी शीघ्र ही प्रकाशित कर दिये जावेंगे।* १९७० चैत्र सुदि ७ पण्डित मीठालाल व्याम, पाली (मारवाड़) * हमारे यहा की पुस्तके प्रकाशित होते तो दर लगती है। किन्तु विक्री होत कुछ भी देर नहीं लगती अतः जो लोग मगाने में देरी करते हैं उनके हाथ पुस्तक न आने से दूसरी आवृत्ति छपने तक उन्हें पछताना परता है इप्सी से हमारे यहा की पुस्तकों की उपयोगिता पाठक स्वय ही जान सकते हैं।

सूचीपत्र । पृष्ठ. लोक. ... १ १ ... ... ... ५ ... ... ७ ... ... ... " ४ ... २ ... " ... ... " ... ... प्रकरण विषय. १ मङ्गलाचरण २ ग्रहण निर्णय ३ ग्रहण होने का मुख्य कारण ४ ग्रहण स्शमी फल प्रकरण (१) स्वामि निर्णय (२) ग्वामि ज्ञान (३) ब्रह्मा स्वामि फल (४) चन्द्र स्वामि फल (4) इन्द्र स्वामि फल (६) कुयेर स्वामि फल (७) मरुण स्वामि फल (८) आनि स्वामि फल (९) यम स्वामि फल (१०) स्वामि रहित पर्व पल ५ अयन फल प्रकरण (१) उत्तरायण फल... (२) दक्षिणायण फल... ६मास फल प्रकरण (१) कार्तिक मास फल (२) मृगशिर मास फल (३) पोप मास फल... (४) माघ मास फल... (1) फाल्गुन मास फल (६) चैत्र मास फल (७) पेशाग्न मास फल (८) ज्येष्ठ मास फल ૨૨ १३ १४ ... ... ... ... ६ ... ... " " " ... ७ २० २१ २२ ... " ... " ८ ... " २४ २५ २६ ... " पृष्ठः श्लोक. २७ " २ . ... प्रकरण. विषय. (९) आपाढ़ मास फल (१०) श्रावण मास फल (११) भाद्रपद मास फल (१२) आश्विन मास फल (१३) मास विशपे फल (१४) सूर्य ग्रहण विशेष मास फल (१५) चन्द्र ग्रहण विशेप मास फल (१६) अधिक मास फल २९ ३० ... .. ... વેર ३३ " ... " ७घार फल प्रकरण ... ... ११ .... " ... ... ३६ ... " ... ... ૧૨ ... ... ४० ... ... " દર ... १३ (१) रविवार फल (२) चन्द्र धार फल ... (३) मगल पार फल... (४) बुध वार फल ... (६) गुरु धार फल (६) शुक्र चार फल ... (७) शनि घार फल (८) सूर्य ग्रहण विशेष चार फल (९) चन्द्र ग्रहण विशेष वार फल ८ नक्षत्र फल प्रकरण (१) अश्विनी नक्षत्र फल (२) भरणी नक्षत्र फल (३) कृत्तिका नक्षत्र फल (४) रोहिणी नक्षत्र फल (१) मृगशिर नक्षत्र फल (६) आर्द्रा नक्षत्र फल (७) पुनर्वसु नक्षत्र फल (८) पुष्य नक्षत्र फल (९) अश्लपा नक्षत्र फल १४ ... " " ... ... " ... ... ... " હર ... १६ - पृष्ठ. लोक. ... ... १७ ६७ ... ... ... ... ७१ ७२ ७३ ... " " ... ७६ " ... ... प्रकरण. “विषय. (१०) मघा नक्षत्र फल... (१९) पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र (१२) उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र फल (१३) हस्त नक्षत्र फल (१४) चित्रा नक्षत्र फल (१५) स्वाति नक्षत्र फल (१६) विशाखा नक्षत्र फल (१७) अनुराधा नक्षत्र फल (१८) ज्येष्ठा नक्षत्र फल (१९) मूल नक्षत्र फल (२०) पूर्वपाढा नक्षत्र फल (२१) उत्तराषाढा नक्षत्र फल (२२) श्रवण नक्षत्र फल (२३) धनिष्ठा नक्षत्र फल (२४) शतभिषा नक्षत्र फल (२५) पूर्वाभाद्रपदा नक्षत्र फल (२६) उत्तरा भाद्रपदा नक्षत्र फल (२७) रेषती नक्षत्र फल (२८) नक्षत्र घश से धान्यादि की तेजी मन्दी. (२९) सूर्य ग्रहण नक्षत्र फल ९ नक्षत्रानुसार कूर्म चकोक्त देश फल प्रकरण. १० ब्राह्मणादि जाति नक्षत्र प्रकरण ११ नक्षत्रानुसार मण्डल फल प्रकरण (१) मण्डल ज्ञान (२) वायु मण्डल फल (३) भन्नि मण्डल फल (४) घरण मण्डल फल (१) महीन्द्र मण्डल फल ... (६) घायु आदि मण्डलों का फल पाक काल २१ ... ... ८० ... ... " ... ૨૨ ૮૨ ... " ૨૪ " ... ९७ २६ .. ... " १०० १०१ १०३ १०४ ... ... ... " ... " ... ... . २८' १०७ पृष्ठ. श्लोक. " १०८. ... " १०९ ... " " ૧૨૨ ११३ ११४ ... " ... " ३० ११७ " ... .. " प्रकरण. विषय. (७) मण्डलों की शान्ति करने की आवश्यकता १२ योग फल प्रकरण ... (१) विष्कुम्भ योग फल (२) प्रीति योग फल... (३) आयुष्मान् योग फल .(४) सौभाग्य योग फल (4) शोभन योग फल (६) अति गण्ड योग फल (७) सुफर्मा योग फल (८) धृति योग फल... (९) शूल योग फल... (१०) गण्ड योग फल... (११) पृद्धि योग फल (१२) ध्रुव योग फल ... (१३) व्याघात योग फल (१४) हर्षण योग फल (१५) चज्र योग फल .. (१६) सिद्धि योग फल (१७) व्यतिपात योग फल ." (१८) परियाण योग फल (१९) परिघ योग फल (२०) शिव योग फल (२१) सिद्ध योग फल (२२) साध्य योग फल (२३) शुभ योग फल (२४) शुक्ल योग फल (२५) ब्रह्म योग फल (२६) ऐन्द्र योग फल (२७) वैधृति योग फल ११९ १२० ... ... ३१ ... " ... ૬૨૨ " १२३ ... १२४ " ... ... " " १२६ १२७ १२८ १२९ ३३ ... " ... ... ... " .. " पृष्ठ. लोक. ... ... ... ... " ... ... " ३६ ... १३९ ... ... ३४१ કર ... .. ... ... ... " ... ... " विषय. १३ पशि फल प्रकरण (१) मेष राशि फल... (२) वृष राशि फल... (३) मिथुन राशि फल (8) कर्क राशि फल (५) सिंह राशि फल (6) कन्या राशि फल (७) तुला राशि फल (८) वृश्चिक राशि फल (९) धन राशि फल (१०) मकर राशि फल (११) कुम्म राशि फल (१२) मीन राशि फल (१३) राशि वरासे हरएक वस्तु की तेजी मन्दी (१४) नीच राशि स्थित चन्द्र ग्रहण फल १४ खांश (आकाश भाग) फल प्रकरण (१) खांश निर्णय (२) प्रथम खांश फल (३) द्वितीय खांश फल (४) तृतीय खांश फल (६) चतुर्थ खांश फल (६) पञ्चम खांश फल (७) पर खांश फल (८) सप्सम खांश फल (९) प्रन्यान्तर से माघ स्वांश फल मध्य खांश फल अन्त्य खांश फल सन्ध्या काल फल (१३) मोश समय खांश फल ... १४७ १४८ १४९ ... ... ... " " ४० ... " ... ... है। ... १६० ... ... " ... દર ... FE " ... " .. १६६ " पृष्ठ. श्लोक. " ... ... " ४ " ... ... ... १७२ १७२ ... ... ... १७४ " " १७६ ४५ ... ... " विषय. १५ ग्रस्तोदय, ग्रस्तास्त, व मग्नास फल प्रकरण. (१) सूर्य चन्द्र ग्रस्तोदय फल... (२) सूर्य प्रस्तोदय अस्तास्त फल (३) चन्द्र प्रस्तोदय प्रस्तास्त फल (8) खग्रास फल (4) खग्रास पाप हष्टि फल १६ दिशा फल प्रकरण ... (२) ईशान कोण फल (२) पूर्व दिशा फल (३) अग्नि कोण फल (४) दक्षिण दिशा फल (६) नत्य कोण फल (६) पश्चिम दिशा फल (७) वायव्य कोण फल (८) उत्तर दिशा फल १७ पास फल प्रकरण ... (१) दश प्रकार ग्रास निर्णय (२) सव्य ग्रास फल (३) अप सव्य ग्रास पल (७) लंह पास फल (4) ग्रसन ग्रास फल (६) निरोष प्रास फल (७) अवमर्दन ग्रास फल (८) आरोहण ग्रास फल (९) आघात ग्रास फल (१०) मध्यतम ग्रास फल (११) अन्ततम पास फल १८ वर्ण फल प्रकरण (१) धून वर्ण फल ... २७९ १८० ... ... ... " ... ... " 1 ... .. " ... ... ... ... " " १९० " ... " ." ...

पृष्ठ. श्लोक ... " ... ... " १ १ ... ... ... ... २०४ २०५ " २ २०६ " " ... ." प्रकरण. विषय. (२) कृष्ण वर्ण फल... (३) रक्त घर्ण फल (४) कापिल वर्ण फल (4) धर्ण घश से ब्राह्मणादि को अशुभ फ्ल... (६) धर्ण यश विशेष फल १९ ग्रह दृष्टि फल प्रकरण (२) भौम दृष्टि फल (२) बुध दृष्टि फल (३) शुक्र दृष्टि फल... (8) शनि दृष्टि फल... (6) गुर दएि फल :.. २० ग्रह अस्त-फल (१) भीम अस्त फल (२) वुध ग्रस्त फल... " (३) गुरु ग्रस्त फल... (४) शुक्र ग्रस्त फल... (५) शनि ग्रस्त फल... २१ मोक्ष फल प्रकरण (.) दश प्रकार के मोक्ष निर्णय... (२) दक्षिण हनु मोक्ष फल (३) वाम हनु मोक्ष फल (४) दक्षिण कुक्षी मोक्ष फल (६) चाम कुक्षी मोक्ष फल (६) दक्षिण पायु तथा वाम पायु मोक्ष फल... (७) संछईन मोक्ष फल (८) जरण मोक्ष फल (२) मध्य विदारण मोक्ष फल (१०) अन्त्य विदारणा मोक्ष फल... (११) मोक्ष समय का वर्ण फल ... ५३ ... २०९ २१० २११ २१२ २१३ ... " ... : ... १४ ... २१४ ... " ... " ... " २१६ २१७ ... " ... ५५ " " ... " २२० ૨૨૬ રરર ... " ... २२४ ११ पृष्ठ. लोक. ... ... २२५ " ... ... ... २२९ २३० ૨રૂર ... ... " २३३ " १९ २३५ " ... २३७ प्रकरण. विषय. २२ काल फल प्रकरण (१) एक ग्रहण से आगे होने वाले अन्य ग्रहण का मासानु सार फल (२) छः मास से होने का फल ... (३) तेरह महीनों से होने का फल (8) अठारह महीनो से होने का फल (५) चन्द्रमा का ५ । ११ और सूर्य का १७ महिनों से होने का फल . (६) चन्द्रमा का ५ वर्ष और सूर्य का १२ वर्ष पीछे होने का फल (७) एक मास में दो ग्रहण होने का फल... (८) एक पक्ष में दो ग्रहण होने का फल... (९) चन्द्र ग्रहण के एक पक्ष पीछे सूर्य ग्रहण होने का फल (१०) सूर्य ग्रहण के एक पक्ष पीछे चन्द्र ग्रहण होने का फल (११) सूर्य, चन्द्र और फिर सूर्य ग्रहण होनेका फल (१२) अति वेला ग्रहण फल (१३) हीन बेला ग्रहण फल (१४) अति वेला हीन वेला ग्रहण होने में शका (१५) अति वेला हीन बेलाकी शंका का समाधान २३ उत्पात फल प्रकरण... (8) उत्पातों का पृथक२ अशुभ फल ६२ २४ ग्रहण समय बादल वर्षा आदि शान प्रकरण... (१) नवांश वश से वर्षादि निर्णय- (१) निमित्तों द्वारा वर्षा आदि निर्णय २५ मनुष्यादि को जन्म कर्मादि नक्षत्र फल प्रकरण. (१) जन्म कर्मादि नक्षत्र निर्णय... (२) जन्म कर्मादि नक्षत्र फल (३) जन्म नक्षत्र फल .. ... " २३८ " .. ... " २४० २५१ ૨૪૨ २४३ " ... " २४४ . ... ૨૨ २५१ ... . ... ... " ... ...

पृष्ठ. लोक. ... " ... " ... ... ... ... ... ... प्रकरण. विषय. (४) जन्म राशि तथा जन्म लग्न फल (4) जन्म राशि मल... (६) जन्मादि द्वादश राशि फल... २५० २६ अनिष्ट ग्रहण शान्ति प्रकरण २६१ (१) साधारण शान्ति. २६३ २७ ग्रहण श्रवण फल... २६४ ॥ इति सम्पूर्णम् ॥ नई शोध । नई शोध ॥ नई शोध ॥ आयुर्वेद में बुद्धि बढाने का उपाय । आजकल विना विद्या के मयुष्यों का जीवन हो ही नहीं स- कता और विद्या के लिये युद्धि की तीव्रता चाहिये इसीलिये प. रोपकारि महर्पियोंने बुद्धि बढ़ाने के अनेक उपाय वैद्यक शास्त्रमें वर्णन करे हैं उनकी अत्यन्त आवश्यकता देखफर 'आयुर्वेद पञ्चा- नन' व्यास पुनमचन्द तनसुख वैद्यने बहुत पोजके साथ उन उपायों को एकत्र करके सरल हिन्दी भाषा टीका सहित निर्णय सागर यन्त्रालय में छपवाकर प्रसिद्ध करी है जिसकी प्रशंसा वैद्यक के सभी समाचार पत्रोंने मुक्त कंठसे की है मूल्य रु.१) वी.पी से १)रु. पुस्तक देखने ही योग्य है। बुद्धि वर्धक वटी। यह वटी कई वर्षों के अनुभव से यनाई है इसके सेवनसे मस्तिक के शान तन्तु पुष्ट हो जाने से स्वभाविक ( Natura ) धुद्धि बहुत तीव्र हो जाति है जिससे स्मरण शक्ति बढ जानेसे फिर विद्यार्थियों को परिक्षामा फेल होने का भय नहीं रहता इसके २१ दिन सेवन करने योग्य एफ डिम्बी का मूल्य रु.१)वी-पी से१)रु. इस विषय में अधिक हाल जानना हो तो हम से पत्र व्य- वहार करें। पण्डित मीगाल व्यास, व्यावर-राजपूताना।

॥ श्रीः॥ ग्रहण फल दर्पण। . ब्रह्मेशविष्णूश्च महर्पिसवान् सन्दर्शिनोऽगम्य निमित्तशास्त्रान् । श्रीमन्महाराममुनामधेया- नन्यान्समयाँश्च गुरुन्नमामि ॥ १ ॥ बह्मा, विष्णु, महादेवनी आदि देवों को; गर्ग, पराशर, नारद आदि महर्पियों को; वराहमीर, नरपति, चण्डूजी आदि ज्योतिष के आचार्यों को और श्रीमान महारामदासजी व्यासजी आदि सम्पूर्ण गुरुओं को मन, वचन, और कायासे प्रणाम-नमस्कार करता है कि जिनके अनुग्रह से मेरा यह कार्य निर्वित्रता से मिद्ध हो । बहुफलं जपदानहुतादिके स्मृतिपुराणविदः प्रबदन्तिहि । सदुपकारिजने च चमत्कृतिः ग्रहणमिन्द्रिनयोः भवदेत्ततः॥२॥ परम पूज्यनीय महर्पियों ने जगत के हितार्थ मूर्य तथा चन्द्रमा के ग्र- हण सम्बन्धी सम्पूर्ण प्रकारका ज्ञान तीन भागों में बहुन विस्तार से वर्णन किया है उनमें ग्रहण होने के समय, स्पर्श, मध्य, मोक्ष, स्थिति, शर, स. न्मीलन, उन्मीलन, और विश्वे आदि के ज्ञान का निर्णय तो सिद्धान्त आदि गणित के ग्रन्थों में; ग्रहण के समय स्नान, दान, जप, तप हवन और सूतक आदि के विधि निषेध का निर्णय पुराण आदि धर्म शास्त्रों में; और ग्रहण के निमित्त से सम्पूर्ण जगत् में होनेवाले अनेक प्रकार के चमत्कारी যুযুশ फलों का निर्णय संहिता आदि फल विधायक ज्योतिप् के ग्रन्थों में किया है।

सारं सारं समुद्धत्य पूर्व शास्त्र कदम्बतः । क्रियते सुखबोधाय ग्रहस्य फलदर्पणम् ॥ ३ ॥ ग्रहण से सम्बन्ध रखने वाले उपरोक्त तीनों विपयों का सर्व साधा- रण को सुख से बोध-जान हो जाने के लिये मैंने अनेक प्रकार के प्राचीन ग्रन्थों में से सारका भी परम सार रूप संग्रह एकत्र करके फिर ग्रहण जानने की गणित तथा धर्म शास्त्रों के विधान तो 'ग्रहण निबन्ध' नामक ग्रन्थमें किया है और फलिन् सम्बन्धी सम्पूर्ण प्रकारका विधान इस 'ग्रहण फल दर्पण' नामक ग्रन्थ में करता हूं। भारद्वाजकुलारविन्दतरणिर्माध्यन्दिनीयो द्विजो नानाशास्त्रविचार मग्नहृदयो व्यासायटङ्काङ्कितः। वास्तव्यो मरुमण्डले मुविदिते पालीपुरे धार्मिको जात्यापीकरणो महीवर मुतः श्रीमिष्टलालाभिधः ॥४॥ मारवाड़ देशस्थ जोधपुर राज्यान्तरगत व्यापार के लिये सुप्रसिद्ध 'पाली' नगर में निवास करनेवाला, पुष्करणा ज्ञातीय, भारद्वाज गोत्री,मा- ध्यन्दिनीय शाखाध्यायी-शुक्ल यजुर्वेदी, टङ्कशालावटंक-व्यामपदाधिकारी. श्रीमान् महीधर शर्मा का पुत्र, ज्योतिः शास्त्र आदि अनेक प्रानीन शास्त्रों के तत्व का अन्त करण से विचार करने में मदा मन रहनेवाला ('प्राचीन ज्योति-शास्त्रश्रमी, दैवज्ञ भूपण, ज्योनिय रत्न आदि) मैं पण्डित मीठा- लाल व्याम इस मन्य को प्रकाशित करता है। ग्रहण निर्णय। चन्द्रस्य यदिवा भानोः राहुणा सह संगमः। उपरागमिति ख्याता तत्रानन्त फलं स्मृतम् ॥ ५॥ राहु वा केतु के साथ चन्द्रमा का योग होने से चन्द्र ग्रहण और सूर्य का योग होने से सूर्य ग्रहण होता है उमे पर्व, उपराग, ग्रह वा ग्रहण कहते हैं। .

. ग्रहण होने का मुख्य कारण। राहुः कुभामण्डलगः शशाङ्कं शशाङ्कग छादयतिन विम्बम्। तमोमयः शम्भुवर पदानातू सर्वागमानाम विरुद्धमेतत् ॥ ६ ॥ चन्द्रमा का बिम्ब पृथिवी की छाया में आ जाने से चन्द्र ग्रहण ओर सूर्य के आडा आ जाने से सूर्य ग्रहण होता है यही ग्रहण होने का मुख्य कारण है । परन्तु श्री महादेवजी के वरदान से नन्द्र ग्रहण के स- मय तो पृथिवी की छाया में और सूर्य ग्रहण के सभय चन्द्रमा के बिम्ब में अन्धकारमय राह प्रवेश होता है इसी लिये पुराण आदि धर्मशास्त्रों तथा जाणित व फलित आदि ज्योति शास्त्रों में ग्रहण होने का कारण राह माना है । इसका विशेष निर्णय मेरे बनाये हुये "वृहदद्य मार्तण्ड” नामक ग्रन्थ के 'ग्रहण निवन्य' नामक अङ्क में किया गया है । ग्रहण स्वामि फल प्रकरण । पर्व स्वामि निर्णय- पण्मासोत्तरद्धया पर्वेशाः सप्तदेवताः क्रमसः । ब्रह्माशशीद्र कौवेरावरुणाग्नियमाश्च विज्ञेयाः ॥ ७ ॥ सृष्टिके प्रारम्भ से ६ । ६ महीनों के क्रम में ब्रह्मा आदि ७ देवता पर्व ( ग्रहण ) के स्वामि होते है जैसे (१) से ब्रह्मा, (२) से चन्द्र, (३) से इन्द्र, (४) से कुबेर, (५) सेवरुण, (६) से अमि और (७) से यम। पर्व स्वामि ज्ञान- शाकरविगुणंमासैतिरादयं विभाजितं ॥ तानशेपेट्टतेचाश्वैः शेषेपर्वेश निर्णयः ॥ ८॥ विक्रम संवत् में से १३५ हीन करने से जो शेप रहे उसे शालीवा- हन का शक कहते हैं उस शक को १२से गुना करके फिर चैत्रादि गणना से ग्रहण के मास तक की संख्या मिला के ४९ का भाग दें फिर जो ४ शेष रहे उसको ७ का भाग देने से जो शेष रहे उसका स्वामि. ब्रह्मादि क्रम से जाने। नझा स्वामि फल- पर्वाधिपेब्रह्मणिसस्यसंपत्वृद्धिद्धिजानांचतथा पशूनाम् । सेमंप्रजानां धनधर्मद्धिनिरोगतास्याद्विजयोमरार्गः ॥९॥ ग्रहण का स्वामि ब्रह्मा हो तो वर्षा श्रेष्ट, खेतियों की स्मृद्धि, या ह्मणों व पशुओं को मुख, नगन् में क्षेम कल्याण आरोग्य आदि शुभनया धन व धर्म की वृद्धि और देवताओं की नय होवे । चन्द्र स्वामि फल- चंद्रेचपर्वाधिपती मजानाक्षेमवविद्वजन पीडनस्यात् ॥ अवर्षणं धान्यमहर्यताचविनाश मायांतितयौपीनाम् ॥ २० ॥ ग्रहण का स्वामि चन्द्र हो तो प्रजा में क्षेम कल्याण, विद्वानों को पीडा, वर्षा की कमी, धान्य तेन और मम्पूर्ण प्रकार की औषधियों का नाश निम से किराना नेन हो । इन्द्र स्वामि फल- इन्द्रोयदापर्वपतिस्तदानीम्परस्परं स्यात्कुकटो नृपाणाम् । धान्यानिनश्यन्तिशरद्भवानिक्षेमम्प्रजानां नभवेत्कदाचित् ॥११॥ ग्रहण का स्वामि इन्द्र हो तो राजाओं के परस्पर वैर, शरद ऋतु में उत्पन्न होने वाले धान्यों का नाश और जगन् में अक्षेम तथा अकल्याण आदि अशुभ फल होवे। कुबेर म्वामि फल- यदाकुरेरोग्रहणाधिपः स्पात्तदार्थनाशोधनिनां जनानाम् । क्षेमं मुभिक्षंचनिरामयत्वं लोकाश्वसर्वेभयवर्जितास्युः ॥ १२ ॥ ग्रहण का स्वामि कुनेर हो तो धनवानों के धन का नाश, जगन में क्षेम कल्याण, आरोग्य, निर्मयता और सुभिक्ष हो । - ५ वरुण स्वामि फल- जलेश्वरोपर्वपतौ मुमिक्षप्रजास्तथोपद्रववर्जिताश्च ।। क्षेमंचसर्वत्रधनमद्धिः पीडांसमायोति च राजपुत्राः ॥ १३ ॥ ग्रहण का स्वामि वरुण हो तो जगत् में क्षेम कल्याण, धन की वृद्धि, उपद्रवों का नाश, और सुभिक्ष होने जिस मे प्रजा को आनन्द किन्तु राज पुत्रों को पीडा हो। अग्नि म्यामि फल- पर्वाधिपोग्निः सतुमित्रनामाधनमद्धित्वभयं क्षितीचः ॥ शुभाचाष्ट्रपतीन्हितस्छान् निरोगतांचापिकरोतिसस्यम् ॥ १४ ॥ ग्रहण का स्वामि अग्नि हो तो वर्षा श्रेष्ठ, खेनियों की वृद्धि, धन की प्राप्ति, भय तथा रोगों का नाश और राजाओं का कार्य सिद्ध होवे । यम स्वामि फल- यमोयदापर्वपतिस्तदास्याद वर्पणभूपभयंमजानाम् । अन्नक्षयंचौरभयं पृथिव्यांदुर्भिक्षमेवं मुनिभिः मदिष्ठम् ॥ १५ ॥ ग्रहण का स्वामि यम हो तो जगत में अनावृष्टि, दर्भिक्ष, धान्य का नाश, चोरों का उपद्रव और राना का भय होवे। स्वामि रहित पर्व फल- पर्चेशहीनंग्रहणं यदास्यानदापजानाम शुभमदहि ॥ अष्टिदक्षुन्मरकमदं च कदापिकालांतरतोभवेत्तत् ॥ १६ ॥ कोई काल में कदाचित् स्वामि के विना ही ग्रहण होवे अर्थात् ६६ महिनों का क्रम छोडकर ५। ७ । ११ । १३ आदि महिनों में चाहे जिस समय ग्रहण हो जावे तो जगत् मे अनावृष्टि, दुर्भिक्ष और महामारी आदि अशुभ फल होवे ।

६
-
अयन फल प्रकरण ।
उत्तरायन फल-
द्विजानो क्षत्रियाणांचगवांच पीडनंभवेत् ॥
धान्यं मयपणमासैः ग्रहणेचोचरायणे ॥ १७ ॥
ग्रहण उत्तरायन में हो तो ६ माम तक ब्राह्मण, क्षत्री तथा गायों
को पीडा और धान्य मँहगा होवे ।
दक्षिणायन फल-
दक्षिणायनगेराहो वैश्यशुद्र ममईनम् ॥
महिपेकुंजरेपीडात्रिभिर्मासैर्महर्घताः ॥ १८ ॥
ग्रहण दक्षिणायन में हो तो ३ मास नक वैश,शूद्र तथा भैमियों और
हाथियों को पीड़ा नथा मँहगे हो जावें ।
मात फल प्रकरण ।
कार्तिक मास फल-
काचि क्यामनलोपजीविमगधान् मान्याधिपान् कोशलान्
कल्मापानथमूरमेनसहितान् काशीश्च संतापयेत् ।
हन्याचाशुकलिंगदेशनृपति सामात्यभृत्यं तमो
दृष्टं क्षत्रियतापदं जनयति क्षेमं मुभिक्षान्वितम् ॥ १९ ॥
ग्रहण कार्तिक में होतो मुनार, लुहार, हलवाई, भाइर्भूने, वा अन-
मेर आदि अग्नि से भीवीका करने वाले; मगध देश, पूर्व देश, कौशल देश,
कल्मष देश, सूरसेन देश, काशि देश, व कलिंग देश के राना तथा प्रजा
को पीड़ा; और धान्यादि का मात्र सस्ता हो जावे ।
मृगशिर मास फल-
काश्मीरकान् कोशलकामपौदान् मृगांश्च हन्यादपरांतकाश्च ।
ये सोमपास्तांश्च निहंति सौम्ये मुटएिकत्सममुभिक्षकच ॥२०॥

ग्रहण मिगशिर में हो तो काश्मीर कोशल पोद अपरान्तक-इन देशों में कष्ट, पशुओं का नाश, सोमपान करने वालों को पीड़ा और ज- गत् में सुवृष्टि सुभिक्ष तथा क्षेम कल्याण होवे । पोष मास फल- पौपे द्विजक्षत्रजनोपगेधः ससैन्धवाख्याः कुकुराविदेहाः ॥ ध्वंसं व्रजंत्यत्र च मंदष्टि भयं च विद्यादभिक्षयुक्तम् ॥ २१ ॥ ग्रहण पोष में हो तो ब्राह्मण तथा क्षत्रियों को पीड़ा, सिन्ध कुकुर विदेह-इन देशों में कट, और जगत् में वर्षा की कमी तया दुर्भिक्ष आदि का भय हो। माघ मास फल, माघे तु मातृपितृभक्त वशिष्टगोत्रान् स्वाध्यायधर्मनिरतान् करिणस्तुरंगान् ॥ वंगांगकाशिमनुजांश्च दुनोति राहु- दृष्टिं च कर्युकुजनानुमतां करोति ॥ २२ ॥ ग्रहण माघ में हो तो मातापिता की भक्ति करने वाले, वसिष्ठ गोत्री, वेद पाठी व विद्यार्थि तथा धर्मात्माओं को फट; हाथी तथा घोड़ो का नाश; वंग, अंग, काशी, इन देशों में क्लेश और जगत में वर्षा खेति करने वालों के मन चाही होवे। फाल्गुन मास फल- पीडाकरं फाल्गुनमासिपर्व बंगास्मकावंतकमेकलानाम् । नृसज्ञ यस्य प्रवरांगनानां धनुष्कर क्षत्रतपस्विनां च ॥२३॥ ग्रहण फाल्गुन में हो तो नाचने तथा गाने वालों, श्रेष्ठ स्त्रियों, धनुष बनाने वालों, क्षत्रियों तथा तपस्या करने वालों को पीडा; और वंग, अम्मक, आवन्त, मेफला-इन देशों में क्लेश होवे।

चैत्र मास फल- चैव्यं तु चित्रकरलेखकगेयशक्तान रूपोपजीवि निगमज्ञाहरण्यपण्यान् पौंद्रान्ध्रकैकयजनानधकाश्मकांश्च- तापस्पृशत्यमरपोत्रविचित्रवर्षी ॥ २४ ॥ ग्रहण चैत्र में हो तो चित्रकार तथा फोटाग्राफर, लेखक, घर बनाने वाले, वेश्या भांड तथा नाटककार आदि रूप से जीविका करने वालों को पीड़ा; पौदूर, आन्ध्रक, कैकेय तथा अस्मक-इन देशों में क्लेश ओर सोना तथा व्यापार की अन्य वस्तुओं का भाव तेज हो जावे । बैशाख मास फल- वैशाखमासे अहणे विनाशमायांति कार्पासतिलासमुद्गाः ।। इक्ष्वाकुयौधेयशकाः कलिंगाः सोपद्रवाः किंतु मुभिक्षमस्मिन्॥२५॥ ग्रहण वैशाख में हो तो इवाकु, योधय, शक, कलिंग-इन देशों में उपद्रव; कर्पास रुई सूत कपडा, तिल तैल, तथा मुंग का भाव तेज और जगत् में सुभिक्ष होवे। ज्येष्ठ मास फल- ज्येष्ठे नरेंद्र द्विजराजपत्न्याः सस्यानिप्टिश्च महागणश्च ॥ प्रध्वंशमायांति नराश्च सोम्याः शालः समेताश्च निपादसंघाः॥२६॥ ग्रहण ज्येट में हो तो ब्राह्मण राना तथा रान स्त्री, महागण, निषाद तथा सोमपान करने वालों को पीडा; और वर्षा की कमी, तथा खेतियोंका नाश जिम मे धान्य तेज हो जावे। आषाढ मास फल- आपादपर्वरपुदपानवम नदीमवाहान् फलमूलवार्तान् ॥ गांधारकाश्मीरपुलिंदचीनान हतावदेव महलबर्पमस्मिन् ॥२७॥ ग्रहण अपाद में हो तो तालाव नदि आदि, फल, मूल, कन्धार, का. इमीर, पुलिंद, चीन आदि का नाश और वर्ष सर्वत्र एकमी नहीं होवे।

८
श्रावण मास फल-
काश्मीरान् सपुलिंदचीनययनान् हन्यात् कुरुक्षेत्रजान्
गांधारानपिमध्यदेशसहितान् दप्टो ग्रहश्रावणे ।
कांबोजैकशफाश्वशारदमपि त्यक्त्वा यथोक्तानिम-
नन्यत्र प्रचुरान्नहष्टमनु नैात्री करोत्यारताम् ॥ २८ ॥
ग्रहण श्रावण में हो तो काश्मीर, पुलिंद, चीन, यवन देश, कुरु
देश, कन्धार, मध्य देश, कांबोज, एकपाद देश-इनका तया शरद ऋतु में
उत्पन्न होने वाले धान्यों का नाश किन्तु उपरोक्त देशों को छोड़ के अन्य
देशों में धान्य की वृद्धि तथा मनुष्यों को आनन्द होवे।
भाद्रपद मास फल-
कुलिंगवंगानं मगधान सुराष्ट्रनम्लेछान् सुवीरान् दरदाश्मकांश्च ॥
स्त्रीणां चगर्भानशुरा निति मुभिक्षकद्भाद्रपदेभ्युपेतः ॥ २९ ॥
ग्रहण भाद्रपद में हो तो कलिंग, बंग, मगध, मुराष्ट्र, म्लेछ देश,
सुवीर, दर्द, अश्मक, इन देशों को पीड़ा; स्त्रियों के गर्भ नाश और जगत्
सुवृष्टि तथा सुभिक्ष होवे।
आश्विन मास फल-
कांबोजचीनयवनान् सहशिल्पिकृद्भि
वाहीकसिंधुतटवासिजनांश्च हन्यात् ।
आनर्तपौद्रभिपजश्च तथा किरातान्
दृष्टोमुरोधयुजि भूरि मुभिक्षकच ॥ ३० ॥
ग्रहण आसोज में हो तो कांबोज, चीन, यवन, बाल्हीक, सिन्ध,अ-
नातं, पोद्र किरात-इन देशों में कष्ट, शिल्पी(बढई आदि) तथा वैद्यों को
पीड़ा और जगत में बहुन श्रेष्ट सुभिक्ष होवे ।
मास विशेष का फल-,
अश्वयुजमाघकात्तिकमाद्रपदेष्वागतः मुभिक्षकरः ।
राहुरवशेषमासेष्वशुभकरो वृष्टिधान्यानाम् ॥ ३१ ॥

. ग्रहण यदि भाद्रपद, आसोज, कार्तिक वा भाव में हो तो सुभिक्ष तथा धान्य मन्दा और जो मिगशिर, पोप, फाल्गुन, चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ या श्रावण में हो तो वर्षा तथा धान्य का नाश होवे । सूर्य ग्रहण का विशेष मास फल- सूर्य ग्रहण कार्तिक में हो तो सुभिक्ष, मिगशिर में हो तो रस कस तेन, पोप में हो नो धान्य तेन, मात्र में हो तो मध्यम फल, फाल्गुन में हो तो धान्य बहुत तेज, चैत्र में हो तो धान्य संग्रह करने से शीघ्र लाम, वैशाख में हो तो धान्य संग्रह करें, ज्येप्ट में हो तो धान्य अवश्य संग्रह करें, आपाठ में हो तो दुर्भिक्ष राज्यविग्रह, श्रावण में हो तो धान्य बेचने से लाभ, भाद्रवा में हो तो मुभिक्ष ओर आसोन में हो तो घृत तेलतेज होवे।३२॥ चन्द्र ग्रहण का विशेष मास फल- चन्द्र ग्रहण कार्तिक में हो तो समुद्र में विग्रह, मिगशिर में हो तो धान्य संग्रह करने से ७ महिनों से लाभ, पोप में हो तो रस कस तेज, माय म हो तो रस संग्रह करने से शीघ लाभ, फाल्गुन में हो तो आगे रस तेन, चैत्र में हो तो वर्पा काल में दुर्भिक्ष, वैशाख में हो तो सर्व वस्तु तेन, ज्येठ में हो तो मुभिक्ष इसलिये धान्य शीघ्र वेच दें, आपाढ में हो तो रम कस वस्तु तेज, श्रावण में हो तो सर्व वस्तु का नाश, भाद्रपद में हो तो धान्य बेचकर रस संग्रह करें और आसोन में हो तो कपाम रुई मूत आदि तेन होवे । ३३ ।। अधिक मास फल- कदाचिदधिके मासे ग्रहणं चन्द्रसूर्योयोः । सर्वगष्ट्रपयं भंगः क्षयं यान्ति मही भुजः ॥ ३४ ॥ ग्रहण अधिक मास में हो तो मर्व राष्ट्र का भग तथा भय और रा. नाओं को देश होवे।

वार फल प्रकरण । रविवार फल- अल्पं धान्याल्प मेघाश्च स्वल्पक्षीराश्व धनेवः । कलिंगदेश पीडा च ग्रहणे रविवासरे ॥ ३५ ॥ ग्रहण रविवार को हो तो वर्षा की कमी, धान्यकी उत्पत्ति अल्प, संवन् साधारण, गायों के दूध थोडा, रानाओं मे युद्ध, कलिंग देश में पीड़ा और घृत तैल के वेच देने से लाभ होवे । चन्द्रवार फल- कर्पूरं मदिराश्चैव विनश्यन्ति वरांगनाः । यमुनातट पीडा च दुर्भिक्ष तस्कराद्भयम् ॥ ३६ ।। ग्रहण चन्द्रवार को हो तो कपूर तथा मद्य का नाश, किसी श्रेष्ट स्त्री को कष्ट यमुना के किनारे के देशों में पीड़ा और धान्य तथा तेल के संग्रह करने से लाभ होवे । मंगलयार फल- राजकुंजरपीडाच दुर्भिक्षं तस्कराद्भयम् । अवन्ति देशपीडाच मगलग्रहणं यदि ॥ ३७॥ ग्रहण मंगलवार को हो तो राज्यहाथी को कष्ट, दुर्भिक्षका मय, चोरों का तया अग्निका उपद्रव और अवन्ति (मालवा) देशमें पीडा होव। बुधवार फल- पीत धातु महर्घत्वं सार धान्यं विनश्यति । कोशले छत्रभंगश्च ग्रहणे बुधवासरे ॥ ३८॥ ग्रहण बुधवार को हो तो चावल आदि सार धान्यों का नाश, सोना पीतल आदि धातू तेन, कोशल देश में किसी रानाको पीडा और सुपारी तथा लाल वस्त्र के संग्रह करने से लाभ होवे। " . गुरुवार फल- सत्य शौचरतायेव वित्रवस्तु प्रकारकाः। पीडयोत्सन्धु देशच ग्रहणं गुरुवासरे ॥ ३९ ॥ ग्रहण गुरुवारको हो तो सत्य बोलने वाले, पवित्र रहने वाले, चित्र विचित्र वस्तु बनाने वाले तथा मिंध देश के रहने वाले पीडा भोगे और पीली, लाल व सुगन्धी वस्तु तथा नेर आदि सग्रह करने मे राम होरे । शुकवार फल- राज्ञामन्तः पुरं चैव भृगुकच्छं विनाशयेत् । रजतमौक्तिकं वस्त्र ग्रहण भृष्टवासरे ॥ ४० ॥ ग्रहण शुक्रवार को हो तो राज्य के महलों में उपद्रव, भडोच देश मे पीडा किन्तु अन्य देशों में सुख, चादी मोती तथा स्वेन कपडे का भाव तेन और जगत् में मगलीक उत्सव अधिक होवे । शनिवार फल- सिन्धुतीरे च सौराष मइय तस्काराद्भयम् । राजमन्त्रि विनाशार्थ गृहणे मन्दवासरे ॥ ४॥ ग्रहण शनिवार को हो तो सिंध तथा सोरठ देश में धान्य तेन, चोरो का उपद्रव, रानके मन्त्रियो को कष्ट ज्वार तथा अफीम आदि काली वस्तु तेज और पीले व राते वस्त्र तथा ताना आदि सग्रह करनेसे २ मास में लाम होवे। सूर्य ग्रहण विशेप वार फल-- सूर्य ग्रहण रविवार को हो तो गेहू चावल मुंग आदि धान्य तथा गुड का सग्रह करने से दो मास में बहुत लाभ होवे ।४२॥ सोमवार को हो तो घृत तिल तेल मुग उडद तथा अफीम आदि कारी वस्तु का सग्रह करने से लाभ होवे १४३॥ मगलवार को हो तो कपास रुई सूत कपडा चादी मोती सुमारी ना.

लेर मनीठ हींगलु घृत खांड गुड़ तांबा मुंगा गेहुं चावल आदि सर्व वस्तु का संग्रह करने से साढे चार मास से बहुत लाभ होवे ।४४॥ बुधवार को हो तो ज्वार बाजरी मोठ चने आदि धान्य सुपारी कपास कपड़ा लवंग अफीम आदि संग्रह करने से दो मास पीछे लाभ होवे।४५॥ गुरुवार को हो तो तिल तेल एरंड अलशी सरमों खारक काले वस्त्र संग्रह करने से चार मास पीछे लाभ होवे 1८६॥ शुक्रवार को हो तो वायु का जोर वर्षा अधिक धान्य भाव साधा- रण और खेतियों की वृद्धि होवे।४७॥ शनिवार को हो तो तिल तेल तमाखू काली वस्तु तथा शस्त्र का संग्रह करने से बहुत लाभ होये॥४८॥ चन्द्र ग्रहण विशेष वार फल- चन्द्र ग्रहण रविवार को हो तो अफीम और चांदी मन्दी हो वे इसलिये पहिलेही से वेच दें ॥१९॥ सोमवार को हो तो रुई पहिले से संग्रह करने से २ मास में एक संडी पर रु. २५) ३०) का लाभ होवे ॥५०॥ मंगलवार को हो तो रुपा तथा जसद राई के मेथी आदि के संग्रह करनेसे ३ मास पीछे लाभ होवे ।५१॥ बुध वार को हो तो कसुंभा मनीठ तथा सोने के संग्रह से लापहोवे।५२ गुरुवार को हो तो रुई के संग्रह करने से ४ मास में एक खंडीपर रु. २०) २५) का लाभ होवे ।५३॥ शुक्रवार को हो तो, जगत् में आनन्द और रुई मन्दी हो जावेगी उस समय खरीदने से आगे ४ मास पीछे अच्छा लाभ होवे।५४॥ शनिवार को हो तो अलशी सरसों एरंडी तिल आदि का संग्रह क- रने से ६ मास पीछे लाभ होते. ६५॥

३ नक्षत्र फल प्रकरण। अश्विनी नक्षत्र फल- अवाश्च सेनापतिवैद्य सेवकास्तु रंगदक्षा वणिजश्च वारकाः। रूपान्विताश्चाश्वहरा फलानि च प्रयान्तिपीडां ग्रहणे यदाचिने॥५६॥ ग्रहण अश्विनी में हो नो घोड़े, सेनापति, वैद्य, नोकर, घोड़ों का पहिचानने वाले, व्यापारी, रखवाले, स्वरूपवान् घोडों को हरने वाले, और मालेर आदी फल-इनको पीड़ा होवे । भरणी नक्षत्र फल- येबन्ध ताडनवद्या निरता मनुष्याः क्रूरास्तथा रुधिर मांसभुजो पियेस्युः । येचापि नीचकुलजाअपि सत्त्वहीना स्तान् पीडयेत्तुपकणान् ग्रहणं भरण्याः॥ ७ ॥ ग्रहण भरणी में हो तो वध बन्धन तथा ताडन करने वाले, मांस भक्षी, नीच कुलोत्पन्न. सवसे हीन और चने आदि तुप वाले धान्य-इनको पीड़ा होवे। कृत्तिका नक्षत्र फल- येसूत्रभाष्य कुशला अपिमन्त्र दक्षा आकारिका द्विज पुरोहित कुम्भकाराः। येचामिहोत्र निपुणा अपि मेघ दक्षा• स्तान् पीडपेद्ग्रहणकं यदिकृचिकायाम् ॥ ५८॥ ग्रहण कृत्तिका में हो तो सूत्र मानने वाले, भाष्य करने वाले, मन्त्र शास्त्री, खाँनों के दरोगे, ब्राह्मण, राज्यपुरोहि, कुमार, अमिहोत्री और वृष्टि विद्या जानने वाले इनको पीड़ा होवे। रोहिणी नक्षत्र फल- वाणिज्यभूप धनिसु व्रतकर्पुकाश्च तोयान्त शाकाटकगौ हप शैलमान्याः ।

भोगान्विताश्च घृतखंड वराङ्गनाश्च पीडां प्रयान्ति यदिगोहिणिभे ग्रहास्यात् ।। ५९ ॥ ग्रहण रोहिणी में हो तो व्यापारी, राना, धनवान्, श्रेष्ठ व्रत धारण करने वाले, खेती करने वाले, जल धान्य, गाडीवान्, गाय तथा बैल, पर्वत- वासी, नाना प्रकारके भोग भोगने वाले, धृन, खांड और वेश्या-इन को पीडा होवे। मृगशिर नक्षत्र फल- वस्त्राज्य पुप्प फल रत्नवि गमाश्च गान्धर्व कामुकसुगन्धि बनेचराश्च । येसोमपाश्चहरिणा अपिलेखहारा- स्तान्पीडयेन्चनटकान् ग्रहणं मृगः ।। ६० ॥ ग्रहण मृगशिर में हो तो वस्त्र, कमल, फल, पुष्प, मोती आदि रत्न, पक्षी, गाने वाले, कामी, सुगन्धी वस्तु, वन में विचरने वाले, सोमपान करने वाले, हरण और लेखक-इनको पीड़ा होवे । आर्द्रा नक्षत्र फल- येचौर्य शादयववन्धन भेदकारा मन्त्राभिचार कुशला परदार सक्ताः । चैतालिका नृपतराः कटुकीपधानि हन्याद्ग्रहोर्कशाशनो यदि रौदर्भस्यात् ।। ६१ ।। ग्रहण आर्द्रा में हो तो चोर, सट, बन्धव भेद करने वाले, मन्त्रप्रयो- गसे शत्रुओं को दण्ड देने वाले पराई स्त्रियों से स्नेह रखने वाले, वैताल को वश में रखने वाले, नाचने वाले और कडवी औषधी--इनको पीड़ो हो । पुनर्वसु नक्षत्र फल- ये सत्यशौच निरवा कुशला यशोन्विता रूपान्विताश्च धन धान्य युताश्चशिल्पिनः ॥

, सेगयुताश्च वणिजः शुभधान्यमन्त्रिण: पीडाम्प्रायन्त्यपि च ग्रहणं पुनर्वमौ ॥ ॥ २ ॥ ग्रहण पुनर्वसु में हो तो सत्यवादी, पवीत्र रहने वाले, चतु, यशपा- नेवाले स्वरूपवान् , धन धान्यसे युक्त, कारीगर, नोकरी करने वाले, व्या- पारी, चावल आदि धान्य. प.और राज्य मन्त्रि-इनको पीड़ा होवे । पुष्य नक्षत्र फल- पुप्येतुशालीषु वनानि मन्त्रिणो भूपाश्च गोधूम यवाश्च साधकः ।। यज्ञेटिसक्ताः सलिलोपजीविना पीहांप्रयांति ग्रहणे सोमयोः॥६॥ ग्रहण पुष्य में हो तो चावल, गुड़ खांड, स्त्री, राज्य मन्त्रि, राजा, गेहूं, जव, साधु, यज्ञ करने वाले, और जल से जीविका करने वाले इनको पीडा होवे। अश्लेषा नक्षत्र फल- शिल्पानि पन्नग विषाणिच कंदमूल कीटो परस्वहरणाभिरताश्च वैद्याः। धान्यानिचैव सतुपानि च नाग चल्यो नाशं प्रयान्ति यदि पर्व भुजंग स्यात् ॥ ६४ ॥ ग्रहण अलेपा में हो तो कारीगर, सर्प-सर्प का विष अफीम, भैस आदि के शीग, कन्द मूल, कीट-नेसम, चोर, वैद्य, नुप पाले सर्व धान्य और नागरवेल के पान-इनको पीड़ा होवे। मघा नक्षत्र फल- पियर्सगं यदि भवेद ग्रहणं तदानीम् नारी द्विपश्च पितृभक्ति रत्ताश्च शूराः । शैलाश्रयाः फलभुजो वणिजश्वकोष्टाः पीडांमयान्ति धनधान्य युता रसाश्च ॥६५ ।।

ग्रहण मया में हो तो स्त्रियों से द्वेप रखने वाले, पितॄश्वरो के भक्त, शूरवीर, पर्वत पर रहने वाले, फल भक्षण करने वाले, व्यापारी और कोष्ठा- गार-इनको पीड़ा होवे । पुर्ण फाल्गुनी नक्षत्र फल- गर्वाविवालि शिल्पिपण्य कुमारिकाच कार्पासतैल लवणान्यति सुन्दरांश्च । दुर्गाश्रयाश्च फलमाक्षिकयोपिताश्च भाक्फाल्गुनीजनित पर्वणियांन्ति पीडाम् ॥६६॥ ग्रहण पुर्वा फाल्गुनीमें होतो गवाले, शिल्पी, खरीदने वेचनेकी वस्तुएं, कुमारी कन्याएं, कपाप्त रुई सूत कपड़ा, सर्व प्रकारका तेल, सर्व प्रकारका लवण, स्वरूपवान्, किलेमें रहनेवाले, नालेर आदि सम्पूर्ण फल, सहत और स्त्रियो-इनको पीड़ा होवे । उस्तरा फाल्गुनी नक्षत्र फलम्- ये शौर्य माईवयुता विनयान्विताश्च पाखडिदानशुभकर्म रतानराश्च । शास्त्रमवीण शुभधान्य महा धनाढया स्तान् पीडयेद्रहणमुत्तर फाल्गुनीपु ।। ६७ ॥ ग्रहण उतरा फाल्गुनीमें होतो पराक्रमी, दयालु, विनयवान् पाखंडी, दानव, शुभ कर्म करनेवाले, शास्त्री, चावल आदि धान्य और श्रीमन्त व धनाध्य-इनको पीड़ा होवे । हस्त नक्षत्र फल- तेजो युताश्च वणिजो रविकुंजराश्च पण्यानिशिल्पि तुप धान्यगजाधिरोहाः। चौराश्च शास्त्रकुशलाः परिपीडिता:स्यु- ईस्तेयदाग्रहण मिन्द्रिनयोस्तदानी ॥ ६८ ॥ .

१८, ग्रहण हस्तमें होतो तेजस्वी, व्यापारी, स्थीयोधा, हाथी, व्यापारकी वस्तुएं, कारीगर, चावल चने आदि तुपवाले धान्य, हाथीपर चढनेवाले, और पण्डित-इनको पीड़ा होवे । चित्रा नक्षत्र कल- शालाक्य चित्रमणि भूषण रागलेख्यः गंधादियक्तिकुशला आपतन्तुवायाः। तान्पीढयेगाणितकोविदराजधान्यां चित्रारख्यमेयदि भवेद्रहणरवीन्दोः ॥ ६९ ॥ ग्रहण चित्रामें होतो शस्त्र चिकत्सावाले वैध वा सरजन-डाकदर, चित्रकार य फोटोग्राफर, नोहोरी, रंगरेन, लेखक, अतर बनानेवाले, काड़ा बुननेवाले, गणितज्ञ और उत्तम धान्य--इनको पीड़ा होवे । स्वाति नक्षत्र फल- धान्यानि वात वहुलानि खगा मृगाश्च येतापसाचलघुसत्व तुरंगमाश्च । पेचापि पण्यकुशला चल सौहृदाश्च स्वातीग्रहे च वणिजः परिपीडितास्युः ॥ ७० ॥ ग्रहण स्वातिमें होती मटर चने आदि वायुकारक धान्य, गवादि पशु, मयुरादिपक्षि, तपस्वी, सत्वहीन, घोड़, व्यापारमें कुशल. चल नित्त- वाले और व्यापारियों को पीड़ा होवे । विशाखा नक्षत्र फल- आरक्त पुप्प फल गाखि जलानिमुद्गाः कर्पासमाप चणकाः मुरयाग्निसक्ताः। नाशंभयांसपिपुरंदरवद्विपिण्ये चंद्रार्कयोयदिभवेद्रहण समयः ।।. .. महा विशाग्या में होतो लाल रंगके पुष्प, लाल रंगके फल, लाल " शाखावाले वृक्ष, जल, मुंग, रुई, उड़द, चने, देवता और अग्रिसे काम लेनेवाले इनको पीड़ा होवे किन्तु धान्यादि पदार्थ मन्दे हो जावे । अनुराधा नक्षत्र फल- शौर्यान्विताश्च गणनायक साधुगोष्ठी यानप्रसक्त हृदया आपसाधवश्च । मस्यं शरद्भवमपि प्रशमं प्रयान्ति मैत्राख्य जो ग्रहण मिन्द्रिनयोर्यदास्यात् ।। ७२ ॥ ग्रहण अनुराधामें होतो पराक्रमी, बहुनसे मनुष्योंके स्वामि, साधु ओंकी सत्संग करनेवाले, वाहनपर चढ़ने के सौखीन, साधु महात्मा, और सरद ऋतुमें उत्पन्न होनेवाले चावल मकी ज्वार मुंग तिल आदि धान्य- इनको पीड़ा हो । ज्येष्टा नक्षत्र फल- असन्त शौर्य कुलवित्त यशोन्विताश्च सेनाधिपानृपतयो विजिगीपबोये । ताम्रादिकं परधनापहृताश्चयेते पीडांप्रयान्ति यदि पर्व सुरधिपः ॥ ७३ ॥ ग्रहण ज्येष्ठामें होतो अधिक पराक्रमी, कुलीन, धनवान् , यश- स्वी, सेनापति, राजा, शत्रुओंको जीतनेकी इच्छावाले, तांबा आदि धातु और चौर-इनको पीड़ा होवे । . मूल नक्षत्र फल- २ वीजानि चाति धनयुक्त गणाधिपाश्च पुष्पौषधानि भिषजः फलमूलवार्ता । येचापि मूल फलपतिजनाचतेषां पीडाकरं रविशशि ग्रहणं च भूले ॥ ७४॥ ग्रहण मूल में हो तो सर्व प्रकार के वीन, अति धनवान्, बहुत से २० । मनुष्यों में मुख्य, पुष्प, ओषधी, वैद्य, सर्वफल, कन्दमूल, और इन वस्तु- ऑसे अजीविका करनेवाले-इनको पीडा होवे । पूर्वाषाढ नक्षत्र फल- ये ससशाच निरता मृदवो धनाढयाः पानीय मार्गगमना जल जीवकाश्च । तोयाद्भवानि कुमुमानि फलानि चैव नश्यन्ति पर्वणि च सेतुकराजलों ॥ ७५ ॥ ग्रहण पूर्वापाटा में होतो सत्यवादी, शौचयुक्त, मुशील, धनाढन्य, समुद्र आदि जल शिंचन करनेसे उत्पन्न होनेवाले फल पुष्प और पुल बनानेवाले-इनको पीड़ा होवे । उत्तराषाढा नक्षत्र फल- तेजस्विन स्तुरगकुंजर मल्लयोधा ये स्थावराजगतियन्त्रिक देवभक्ताः। भोगान्विताश्च मनुजाः परिपीडिताः स्युः क्षेमंसुभिक्षं मिहवैश्वगतोग्रहश्चेत् ॥ ७६ ॥ ग्रहण उत्तराषाढा में हो तो तेनस्वी, घोड़े, हाथी, मल-कुस्ती कर- नेवाले, योधा-शूरवीर, स्थावर-वृक्षादि, यन्त्र बनानेवाले, देवताओंके भक्त, नाना प्रकारके भोग भोगनेवाले--इनको पीड़ा किन्तु जगत्में क्षेम कल्याण तथा शुभिक्ष होवे। श्रवण नक्षत्र फल- मायाविनिसोयम ससघर्मा उत्साहिनो भाग वतोक्त धर्माः। धान्यं द्विजाकर्ममुयेसमर्था स्तान्पीडये चेद्राणश्रुतौस्यात् ॥७७॥ ग्रहण श्रवणमें हो तो माया फैलानेवाले, नित्य उद्यम करनेवाले, सत्य धर्मि, उत्साही, भागवत पाठी, गोधूमादि धान्य और वैदिक कर्म कर नेवाले ब्राह्मण-इनको पीड़ा होवे ।

" धनिष्ठा नक्षत्र फल- क्लीवाश्च मानरहिताश्चल सौहदाश्चये स्त्रीषिणः शमपरा बहुवित्तयुक्ताः। ये चापिदान निरताः परिपीडितास्युः श्चौराग्निभिश्च वसु ग्रहणं यदिस्यात् ॥ ७८ ॥ ग्रहण घनिठा हो नो नपुंमक, मानरहित, चल चित्तवाले, स्त्रियों से द्वेष रखनेवाले, शमपरायण, बहुत वितवाले और दानी इनको पीड़ा तथा चोरों का व अग्निका उपद्रव होवे। शतभिषा नक्षत्र फल- मत्स्य वंधानरता अपिपाश हस्ता जीवाश्च ये जलचरा जलजायाश्च । येशोडिका रजकसौकरि शाकुनाश्च नाशंपयान्ति वरुणक्षेमतो ग्रहश्चेत् ।। ७९ ॥ ग्रहण शनभिपामें हो तो मन्त्री पकड़नेवाले, पाश डालनेवाले, जल- चर जन्तु, कमल, घोड़े, कलाल आदि मद्य बनानेवाले, धोबी, सोकरीक और पक्षीपाती-इनको पीड़ा होवे । पूर्वा भाद्रपदा नक्षत्र फल- कोनाहिसं पशुपालक तस्कराश्च धर्मव्रतविरहिताः शठनीचचेष्ठाः । ये चापि युद्धकुशला मनुजा विनाशं पूर्वासु पर्वयदि भद्रपदासुयान्ति ॥ ८ ॥ ग्रहण पूर्वा भाद्रपदामें हो तो कीनाश, हिंसा करनेवाले, पशु पालने- वाले, चोर अधर्मि, व्रतरहित, सठ, नीच प्रकत्तिवाले और युद्ध करने में कुशल-इनको पीड़ा होवे ।

" उत्तरा भाद्रपदा नक्षत्र फल- चिमामहा विभव दानरतास्तपोन्विताः पाखंडिनः ऋतुरताश्रमिणो नरेश्वराः। तान् शारधान्य महितान् विनिहन्ति पर्व चन्द्रार्कयोभवति भद्रपदोत्तराम ॥ ८ ॥ ग्रहण उत्तरा भाद्रपदामें हो तो ब्राह्मण, अधिक वैभववाले, महा. दानी, तपस्वी, पाखंडी, यज्ञ करनेवाले, आश्रमी, राना, और शार धान्य • श्रेष्ठ पुरुष-इनको पीड़ा हो । रेवती नक्षत्र फल- तोयोद्भवानि कुसुमानि फलानि गन्धाः शंखांबुनानिलवणं च मुगन्धि पुष्पम् । नौकर्णधार वणिजो मणिमौक्तिकानि नश्यन्ति पौष्णभगते ग्रहणं रवीन्दोः ।। ८२ ॥ ग्रहण रेवतीमें हो तो जलमे उत्पन्न होनेवाले फल पुष्प, सुगन्धी द्रव्य, शख, कमल, लवण, सुगन्धीवाले पुष्प, नवीन करणधार, व्यापारी और मणि तथा मोती-इनको पीड़ा होवे । नक्षत्र घश से धान्यादि की तेजी मन्दी- अश्विन्यां पीडिनायां स्यात् मुद्गादीनां महर्यता । भरण्यां श्वेत वस्त्रेभ्यो लाभं मासत्रये भवेत् ॥ ८३ ॥ कृतिकायां हेमरूपा प्रवालमणि मौक्तिकम् । सग्रहति लाभदायी मासे च नवगे स्मृतम् ॥ ८४ ॥ रोहिण्यां सूत्रकर्पास संग्रहो लाभदायकः । दश मासान्तरे मोक्तः सोमवेघा न चेदिह ॥ ८५ ॥ मृगशीपि मंजिष्ठा लाला क्षारः कुमुम्भकम् । मह दामासान्त लाभदने स्पोरिजम् । ८६ ॥ घृतं महर्घमायां लाभदं मासपञ्चके ।

३३ तैलाल्लामा पुनर्वसौः मास पञ्चकतः परम् ॥ ८७ ॥ पुष्येमासे खिभिर्लाभो भवद्गोधूम संग्रहः । आश्लेषायां तु मुद्देभ्यः मामिः स्यान्मासपञ्चके ॥ ८॥ ग्रहण अश्विनी नक्षत्र में हो तो मुंग आदि तेज, भरणीमें हो तो श्वेत कपडा संग्रह करने से ३ महिनों से लाभ, कृत्तिका में हो तो सोना चांदी प्रवाल मोती तथा मणी आदिके संग्रह करने से ९ महिनों के बाद लाभ, रोहिणी में (सूर्य ग्रहण) हो तो कपास रुई सूत आदि के संग्रह करने में १० महिनों के बाद लाभ किन्तु चन्द्रमा के ग्रहण में यह फल नहीं, मृगशिर में हो तो मनीठ लाख क्षार कसुम्भा आदि के संग्रह करने से १० महिनों के बाद लाभ, आर्द्रा में हो तो घृत के संग्रह कर- नेसे ५ मास में लाभ, पुनर्वसु में हो तो तैल के संग्रह करने से ५ महि- नों के बाद लांभ, पुष्प में हो तो गेहूं के संग्रह करने से ३ महिनों से लाभ, और अश्लेषा में हो तो मुंग संग्रह करने से ६ महिनों से लाभ होवे। मघा चतुष्टये चोलाचणकः खलुतुष्टये । चित्रायां च युगन्धर्या मासोलाभयान्तरे ॥ ८९ ।। त्रिपञ्चनवभिर्मासैः स्वाती लाभ स्तथातया। विशाखायां कुलित्थेभ्यः पण्मासे लाभ सम्भवः ॥ ९॥ राधायां कोद्रवाल्लामो मासैनवभिराप्यते । ज्येष्ठायां गुडखण्डादेः पञ्चमासे धनोदयः ॥ ९१ ॥ ग्रहण मवा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी वा हस्त में हो तो चवले तथा चनों के संग्रह से लाभ, चित्रा वा स्वाति में हो तो जवार वा बाजरी के संग्रह से २ महिनों से लाभ, विशाखा में हो तो कुलथी के संग्रह से ६ महिनों से लाभ, अनुराधा में हो तो कोदो धान्य के संग्रह से ९ म- हिनों से लाम और ज्येष्ठा में हो तो गुड़ तथा खांड के संग्रह से ५ महिनों से लाभ होवे। : .

२४ तन्दुलेभ्यस्तयाभूले पूषायां श्वेतवस्ततः । उपायां श्रीफलात्पुंग्या सर्वत्र मास पञ्चकम् ॥ ९२ ॥ अवणे तुवरीलामा धनिष्ठायां तु माषतः । चणकेभ्योति वारुण्यां तेभ्यः पूभानिपीडने ॥ ९ ॥ लाभरिखमासि निर्दिष्ट उभायां लवणादितः। मास पदकालाभदृष्टो रेवसां मुद्माषतः ॥ ९४ ॥ अहण मूल नक्षत्र में हो तो चावलों के संग्रह से ९ महिनों से लाभ, पूर्वाषाढा में हो तो श्वेत वस्त्रों के संग्रह से ५ महिनों से लाभ, उत्तराषाढा में हो तो नालेर तथा सुपारी के संग्रह से ५ महिनों से लाभ, श्रवण में हो तो तुहर के संग्रह से लाभ, धनिष्ठा में हो तो उड़दों के संग्रह से लाभ, शनमिषा वा पूर्वाभाद्रपदा में हो तो चनों के संग्रह से लाभ, उत्तराभाद्र- पदा में हो तो लवण आदि के संग्रह से ३ महिनों से लाम और रेवती में हो तो मुंग तथा उड़दों के संग्रह करने से ६ महिनों से लाभ होवे । सूर्य ग्रहण नक्षत्र फल- आंदिस ग्रासकाले तु दुर्भिक्षं मायसो भवेत् । तत्तियि विष्णवाच्यानि महर्याणी भवन्ति ही ।।९५ ।। मूर्य का ग्रहण हो तब प्रायः दुर्भिक्ष होता है और उस समय जो नक्षत्र हो उस नक्षत्र के अक्षरों के नामवाली वस्तुएं भी महंगी हो जाति है। . 'नक्षत्रानुसार कूर्म चक्रोक्त देश फल प्रकरण । नक्षत्रत्रय वगैरामेयायैर्व्यवसितः नवधा । भारतवर्षे मध्यात्मागादि विभाजिता देशाः९६ ॥ कृतिका आहे २७ नक्षत्रों के ९ विभाग करे फिर इस भारत देश के मध्य से लेके पूर्वादि क्रम से सम्पूर्ण भूमण्डल के ९ भाग करके कृत्ति. .

कादि नक्षत्रों के ९ भाग वांट दे जैसे-कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिर, ये ३ मध्य देशके; आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्प ये ३ पूर्व के; अश्लेपा, मघा, पूर्वा फा- ल्गुनी ये ३ अग्निकोण के उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्राये ३ दक्षिण के; स्वाति, विशाखा, अनुराधा ये ३ नैर्ऋत्यकोण के ज्येष्ठा, मूल, पूर्वा- पाढा ये ३ पश्चिम के; उत्तरापाढा श्रवण, धनिष्ठा ये ३ वायव्यकोणके शतमिया, पूर्वा भाद्रपदा, उत्तरा भाद्रपदा ये ३ उत्तर के और रेवती, अश्विनी, भरणी ये ३ ईशान कोणके देशोंके है । ग्रहण जिस दिशा के नक्षत्र पर हो उस दिशा के देशोंको दुर्भिक्ष युद्ध महामारी चोर आग्नि आदि उपद्रवों की पीड़ा होवे | , ब्राह्मणादि जाति नक्षत्र प्रकरण । ब्राह्मणादि जाति नक्षत्र निर्णय- पूर्वात्रयं सानलमग्रजानां राज्ञान्तु पुष्येण सहोत्तराणि । सपौष्ण्यमैत्रं पितृ दैवतं च प्रजापतेर्भ च कृषीवलानाम् ॥२७॥ आदिय हस्ताभिजिदाश्विनानि वणिक्जनानां प्रवदन्तिभानि । मूलात्रिनेत्रानिल वारुणानि भान्युग्रजातेः प्रभविष्णुतायाः ॥९॥ सौम्येन्द्र चित्रावमु दैवतानि सेवाजनाधाम्य मुपागतानि । साप विशाखा श्रवणा भरण्याश्चाण्डल जातोरभिनिर्दिशन्ति ॥१९॥ कृत्तिका, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वापाढा, पूर्वाभाद्रपदा ये ४ नक्षत्र ब्राह्मणों के पुप्य, उत्तराफाल्गुनी, उत्तरापाढा, उत्तराभाद्रपदा ये ४ क्षत्रियों के रोहिणी, मवा, अनुराधा, रेवती ये ४ खेती करनेवालों के; अश्विनी, पुन- वसु, हस्त, अभिनित् ये ४ वैश्यों-यापारियो के; आर्द्रा, खानि, मूल, * इसका विस्तारपूर्वक निर्णय मेर प्रकाशित कीये हुये सर्वतो मद. घक (प्रैलोक्य दीपक) प्रन्यके 'कूर्मचक्र प्राण' में काया है। . , , , शतभिषा ये ४ उग्र जातिवालों के; मृगशिर, चित्रा, ज्येष्ठा, धनिष्ठा ४ सेवा-नोकरी करनेवालों के और भरणी, अश्लेषा, विशाखा, श्रवण ४ नक्षत्र चांडाल जाति के हैं। ग्रहण निस जातिके नक्षत्र पर हो उस जाति के मनुष्यो को अनेक प्रकार से कष्ट पीड़ा होवे। नक्षत्रानुसार मण्डल फल प्रकरण । अत्रापि केचिनगविशेष वायव्य हौताशन वारुणेन्द्राः। स्युसप्तरेभवास्तु वर्गाश्चत्वार एषां च पृथक् फलानि ॥१०॥ जगत् का विशेष शुभाशुभ फल जानने के लिये महर्षियोंने अश्वि- न्यादि रेवती पर्यन्त अभिनित् सहित २८ नक्षत्रों के ७ । ७ नक्षत्रों का (१) वायु, (२) अग्रि, (३) वारुण और (४) माहेन्द्र नामक पार मण्डल माने हैं। वायु, अग्नि, वारण, य माहेन्द्र मण्डल नक्षत्र ज्ञान- आर्यणचित्रदिति मैन्दवाधि स्वासोकभं चेतिगणोनिलस्याः । याम्यानपादानि भतिप्यभाग्य मघाविशाखा हुतभुगणोयम्॥१०॥ तोपेशाहिर्बुध्न्यरक्षोम्बुपूपा साशानां वारुणनीति भानि । मैव्यं ब्राह्मचं वैष्णवं वासवेन्द्रो वैश्वं चेन्द्रोयं भवर्गोऽभिजिश्चा१०२ अश्विनी, मृगशिर, पुनर्वसु, पूर्वाफाल्गुनी, हम्न, चित्रा, स्वाति, ये ७ नमन वायु मण्डर के हैं। भरगी, ऋतिका, पुष्प, मया, उत्तराफाल्गुनी, विशाखा, पूर्वाभाद्रपद ये ७ नक्षत्र अग्नि मण्डल के हैं। मण्डलोंश विशेष निर्णय मेर समाये हुये 'वृहदार्थ मार्त' प्रन्थ के सक्रान्ति प्रकाश' नामक अफ में कोश गया है।

आर्द्रा, अश्लेषा, मूल, पूर्वापाढा, शतभिषा, उत्तरा भाद्रपदा, रेवती,
ये ७ नक्षत्र वारुण मण्डल के है।
रोहिणी, अनुराधा, ज्येष्ठा, उत्तरा पाडा, अभिजित, श्रवण, धनिष्ठा,
ये ७ नक्षत्र माहेन्द्र मण्डल के हैं।
वायु मण्डल फल-
वायुर्गणे कोपि यदोपसों भवेत्तदानी पचनोतिचण्डः।
सिक्ताग्रहो वीरहतोरणाना लोके नृपे चापि महानधर्मः ॥१०॥
ग्रहण के समय वायु मण्डल में का नक्षत्र हो तो प्रचंड वायु का
वेग अधिक, युद्ध करने वाले योधाओं को कष्ट पीड़ा, और राना तथा
प्रजा को दुःख केश होवे।
अग्नि मण्डल फल-
वहगणे नेत्ररुजोतिसार यार्थहानिचलनपकोपः ।
गावोऽल्पदुग्धास्तरवोऽफला स्युः गर्भपाताश्च नितंविनीनाम्।१०४॥
ग्रहण के समय अनि मण्डल में का नक्षत्र हो तो अग्नि का कोप,
नेत्र तथा अतिसार रोगों का उपद्रव, वर्षा का नाश, गायों के दूध अल्प,
वृक्षों के फलों की हानी और स्त्रियों के गर्भपात होवे ।
वारुण मण्डल फल-
.
गावोवहुक्षीर धृताफलाट्या वृक्षाः प्रजाक्षेममुभिक्षयुक्ताः ।।
मेघाः प्रभूतांवुमुचो भवंति वर्गे जलेशस्य त सोपिवर्गे ॥१०॥
ग्रहण के समय वारुण मण्डल में का नक्षत्र हो तो वर्षा अधिक, मु.
भिक्ष की वृद्धि वृक्षों के फल फूल अधिक, गायों के दूध तया घी की वृद्धि
प्रना में आनन्द और रानाओं में शान्तिं होवे ।
माहेन्द्र मण्डल फल-
महेन्द्रवर्गे वनितामुसौख्यं प्रजाश्च सर्वे मुदिताभवन्ति ।
निकामवर्षा मघवाधरित्री प्रभूतसस्याधिगतेति विद्यात् ॥१०६॥

ग्रहण के समय माहेन्द्र मण्डल में का नक्षत्र हो तो वर्षासमयानुकूल, खेतियों की वृद्धि, स्त्रियों को सुख, और राजा प्रना को आनन्द होवे । वायु आदि मण्डलों का फल पाक काल- बिमासिकं स्याहाग्नेयं वारुणं पंचमासिकम् । माहेन्द्रं चैववायव्य सप्तरात्रं फलं भवेत् ।। १०७ ॥ वायु मण्डल का ७ दिनसे, अनि मण्डल का ३ मास मे, वारुण मण्डल का ५ माम से और माहेन्द्र मण्डल का ७ दिन से शुभाशुभ फल ऊपर लिखे अनुसार होता है । मण्डलोंकी.शान्ति करणेकी आवश्यकता- आग्नेयी कारयेच्छांति शांति कुर्याच वारुणीम् । वायव्यां शांतिमिप्पेत माहेन्द्री कारयेदपि ॥ १०८॥ वायु, अमि, वारुण और माहेन्द्र-इन मण्डलों में से जिस मण्डल में ग्रहण आदि कोईभी उत्पात हो तो उसकी शान्नि कर देने से फिर अशुम फल का नाश हो जाता है। विष्कुम्भ योग फल- विष्कुंमयोगे ग्रहणं रविवोर्ये मानवाः शोभनबुद्धियुक्ताः। तान् पीडयेबाजिगजान पश्चि दुर्गाणि लोकेच तदा भयस्मात्१०९ ग्रहण विष्कुंभ योग में हो तो श्रेष्ठ बुद्धिवाले, घोड़े, हाथी, चेल इनको पीड़ा और किले में रहनेवाले लोकों को भय होवे । प्रीतीयोग फल- चेत्मीतियोगे ग्रहणं तदानीं परस्परं मित्रविरोधकृतस्मात् । भेदं च राज्ञां सइमंत्रिंभिश्च रांगनाभिवरह करोति ॥११॥ ग्रहण प्रीतीयोग में हो तो मित्रों के परस्पर वैर, राजाओं और मन्त्रियों में फूट और श्रेष्ठ स्त्रियों में भी कलह हो ।

२९
आयुष्यमान योग फल-
योगे तथायुष्मति चेत् ग्रहः स्यात् पीडातदांनी द्विचतुष्पदानाम् ।
योद्धास्तथा ये चिरसंग्रहाश्च तेषां महद्देशभयं च विद्यात् ॥११॥
ग्रहण आयुष्मान योग में हो तो मनुष्य, पशु, पक्षी आदि को पीड़ा;
और योधाओं को, बहुत समय से' संग्रह करनेवालों तथा देश को
भय होवे ।
सौभाग्य योग फल-
सौभाग्ययोगे ग्रहणं यदा तदा निहीत युनः पुरुषांश्च कामिनः ।
सौभाग्ययुक्ता परयोपिताश्च या सुवससौरभ्यगुणानुलेपनम् ॥११२॥
ग्रहण सौभाग्य योग में हो तो कामी पुरुषों को, सौभाग्य युक्त श्रेष्ठ
स्त्रियों को पीड़ा और वस्त्र तथा सुगंधी पदार्थों का नाश होवे ।
शोभन योग फल-
योगे रवींदोग्रहणं च शोभने महाक्षितीशांच शुचीन् मुमंत्रिणः ।
ज्योतिषिदो इंति च वेदपारगान अवन्तिदेशे परिपीडनं भवेत् ॥११३
ग्रहेण शोभन योग में हो तो महाराना, राज्यमन्त्रि, ज्योतिषी, वेद-
पाठी और अवन्ति (मालवा) देश-उनको पीड़ा होवे ।
अतिगण्ड योग फल-
ग्रहो यदि स्यादतिगंडयोगे तदा युवानः पुरुषाश्च वेश्या ।
नृपास्त्वमात्याः शुचयो नराश्च काशी तथोपद्वपीडिता स्युः।११४॥
ग्रहण अतिगण्ड योग में हो तो युवान पुरुप, वेश्या, राना, राज्य-
मन्त्रि, पवित्र रहनेवाले और काशी देश-इनको पीड़ा होवे ।
सुकर्मा योग फल-
मुकर्मयोगे ग्रहणं यदा भवेत् क्षितीशदैवज्ञमुराश्च मागधाः ।
मुवर्णकाराश्च सुकर्मकारिणः किरातदेशा हापयांति पीडन् ॥११५॥

महण सुकर्मा योग में हो तो राना, देवज्ञ, देवता, मघद देशवासी, सुनार, सत्कर्म करनेवाले और किरात देश-इनको पीड़ा होवे । घृती योग फल- योगे धृतौ रविशशिग्रहणं यदा सयद्वादिवगीतकुशलापि च नृत्यकारान् ॥ ये काष्टकमकुशलाः परयाचकाश्च कर्णादि भूपणयुताः परिपीडयेतान् ॥१६॥ ग्रहण धृतीयोग में हो तो गाने बनाने तथा नृत्य करनेवाले, लकड़ी का काम करनेवाले, दूसरों से याचना करनेवाले और कानों में आभूषण पहरनेवाले–इनको पीड़ा होवे । शूल योग फल- योगे च शूले ग्रहणे विनाशमायांति वैद्या जलजंत्रवाहाः । महेन्द्रजालपपरा नाराये कैवर्तकाचा पि स पूर्वदेशाः ॥११७॥ प्रहण शूल योग में हो तो वैद्य, जल मे यन्त्र चलानेवाले, इन्द्रनाल के खेल करनेवाले, केवत देशवाशी-इनको पीड़ा होवे । गण्ड योग फल- दृश्येत राहुर्यदि गंडयोगे पीडां तदा युद्धकराः प्रयांति ॥ ये योगिनो मंत्रविदो गजाश्च देशाश्च येदक्षिणदिस्थितास्ते। ११८ ग्रहण गण्डयोग में हो तो युद्ध करनेवाले, योगी, मन्त्रवादी, हाथी और दक्षिण देशवाशी-इनको पीड़ा होवे । पृद्धि योग फल- ग्रहो रवींद्वीर्यदि वृद्धियोगे तदा कुलीनान्नृपतीन् पीडयेत् । कुटंबिनी ये च तयोत्कटाश्च कांबोजदेशाधिपतिन्निहति ॥११९।। ग्रहण वृद्धि योग में हो नो कुलवानों, राना, कुटुंबवाले, उत्कट पुरुष और कांबोन देशवाशी-इनको पीड़ा होवे । , ३१ - " ध्रुव योग फल- ध्रुवाख्ययोगेपि पुराणवाचकान् व्यासान्निहन्यादपि देवनायकान् । ये हेममार्गोत्तरगामिनश्च तान् जनान् रविंद्वोर्ग्रहणं यदा भवेत्॥१२० ग्रहण ध्रुव योग में हो तो पुराण पाठी, कथा व्यास, देवताओं के पूनारी और हेमालय की ओर से उत्तरदिशिकी यात्रा करनेवाले-इनको पीड़ा होवे । व्याघात योग फल- ये मद्यमांसाभिरताश्च लोलुपा ये तस्करा ये पि च जीवघातकाः । निपीडयेत्तान् गिरिवासिनो जनान् व्माघातयोगे रविशीतयुग्रहः १२१ ग्रहण व्याघात योग में हो तो मध पीनेवाले, मांस खानेवाले, स्त्री- लोलुप, चोर, जीवघाती और पर्वतपर रहनेवाले-इनको पीड़ा होवे । हर्पण योग फल- मिष्टान पानाभिरताश्च कामिनः सौभाग्ययुक्ताः मुखिनश्च ये जना। निपीडयेतान भृगुकछवासिनो योगे यदा हर्पणनामनिग्रहः ॥१२२॥ प्रहण हर्पण योग में हो तो मिष्ठान वानेवाले, मधुर रस पीनेवाले, कामी, सौभाग्य युक्त, सुखी, और भृगुकच्छ-भडोंच देशवाशी-इनको पीड़ा होवे। वज्र योग फल- ये काटकर्मकुशलाश्च धनुर्द्धरा ये गानकर्मकुशलाः परिपीढयेत्तात् । ये कौशले जनपदे निवसंति लोका स्तांश्चापि वजयुजि चे ग्रहण रवींद्वो ॥१२॥ प्रहण पत्र योग में हो तो लकड़ी का काम करनेवाले, घनुप रस- नेवाले, गानेवाले और कौशल देशके मनुष्य-इन को पीड़ा होवे ।

૨૨ सिद्धि योग फल- ये धातुकर्मकुशलाश्च तपस्विन योगिनः कापालिकाश्च तिलका हरमेकलाश्च । चांछन्ति सिद्धिमपि ये परिपीडयेत्तान् योगे यदा ग्रहणमिद्धनयोश्च सिद्धौ ॥ १२ ॥ ग्रहण सिद्धि योग मे हो तो धातु के वरतन बनानेवाले, तपस्वी, योगी, कपाली कनफटेनाथ, मन्त्रादि की सिद्धि चाहानेवाले और निलक हर तथा मेकल देश में रहनेवाले इनको पीड़ा होवे । व्यतिपात योग फल- ये चित्रकारा अपि रंगकार ये पूर्वरत्तांतकथानकाश्च । किरातदेशाः परपीडिताः स्युग्रहो यदा स्याव्यतिपातयोगे१२५॥ ग्रहण व्यतिपात योग में हो तो चित्रकार, रंगकार, प्राचीन इनि- हासवेत्ता, तथा किस्से कहानिये कहनेवाले और कीरात देशवाशी-इनको पीडा होथे। वरियाण योग फल- योगे वरीयसि यदि ग्रहणं रवद्विोः संपीडयेन्नृपयुता वरयोपिताश्च । ये भोगिनो नरवरा अपि यौवनस्वा स्तान् कोकण जनपदं त्वचिरानदानीम् ॥ १२६ ॥ ग्रहण वरियाण योग में हो तो राजा, श्रेष्ट स्त्री, भोगी पुस्प, उत्तम भनुष्य, योवन अवस्थावाले और कोकण देशवाशी-इनको पीड़ा होवे । परिघ योग फल- नंदाश्च गोपा ऋषयश्च भृसास्तुरंगमा ये वनवासिनश्च । ये जीवहिंसानिरताश्च तेषां पीडा हेस्यात् परियाख्ययोग।१२७॥

।
ग्रहण परिघ योग में हो तो नन्द, गोप, ऋषि, नोकर, घोडोंवाले,
वनवासी, और जीव हिंसा करनेवाले-इनको पीड़ा होवे ।
शिव योग फल--
. ये होमपूजानिरताश्च शैया ये चापि पड्दर्शनवादिनश्च ।
संपीडयेत्तानपि मध्यदेशं ग्रहो यदिस्पाच्छिवनानियोगे ॥१२८॥
ग्रहण शिव योग में हो तो होम करनेवाले, देव पूजारी, शिव के
भक्त, पदर्शनवादी और मध्य देश-इनको पीडा होवे ।
सिद्ध योग फल-
धनुर्द्धराश्चैव तपस्विनश्च ये योगिनो भिक्षुकसिद्धसंघाः ।
इन्याचतान् काहरमेकलांश्च सिद्धाख्ययोगे ग्रहणं रवींदोः॥१२९॥
ग्रहण सिद्ध योग में हो तो धनुष्य रखनेवाले-मेने भील आदि,
तपस्वी, योगी भिक्षुक, साधुओ की जमात और कार तथा मेकल देश-
इनको पीड़ा होवे।
साध्य योग फल-
उपवाशपराश्च साधवः शुचयः सत्परतावणिग्जनाः।
स्मृतिवेदविदश्च वाडवा युजि साध्ये ग्रहणं निहति तान् ॥१३०॥
ग्रहण साध्य योग में हो तो उपव स करनेवाले, साधु, पवीत्र रहने-
वाले, सत्यवादि, व्यापारी, स्मृति तथा वेदके जाननेवाले और पण्डित-
पीड़ा होवे ।
शुभ योग फल-
योगे शुभे ग्रहणमिद्विनयोर्यदास्यात्
पीडां मयांति शुभकर्मकरानरा ये ।
श्रेष्ठाः स्वजातिषु च भर्तृपराश्च नापे
रेवातटस्थितजना अपिवोत्तमा ये ॥ १३१॥

. । ग्रहण शुभ योग में हो तो शुभ कर्म करनेवाले, स्वजानिमें में श्रेठ, पतिवृत्ता स्त्रिये, उत्तम पुरुप और नरबदा के किनारे के देश म रहनेवाले मनुप्य-इनको पीड़ा होवे। शुक्ल योग फल- शुक्लाखायोगे ग्रहण यदा स्यात्कर्पूरशुक्लांबरपुप्पकाराः। विनाशमायांति शुभाः स्त्रियश्च धनक्षयश्चाप्यमृतक्षयश्च ॥ १३२॥ ग्रहण शुक्ल योग में हो तो कपूर, श्वेत वस्त्र पुप्पो से जीवौका करनेवाले माली आदि, तथा शुभ स्वी इनको पीड़ा और जगत् में धन तथा अमृत का क्षय होवे । ग्रह्म योग फल- ये देवार्चनहोमंजाप्यानरता ये स्वक्रियापालकाः सद्धर्मानुरताश्च वाडववरा ये वेदपारंगमाः। तान् सर्वान्परिपीढयेदपि तथा ये लोकमान्याजनाः मूर्याचन्द्रमसोर्ग्रहो यदि भवेब्रह्माख्ययोगे तदा ॥१३॥ ग्रहण ब्रह्म योग में हो तो देवपूना में रत, होम करने में आशक्त, जाप्य करनेवाले, स्वक्रिया पालक, सद्धर्म कर्ता, पण्डित, वेदान्ती, और जगत् में माननीय पुरुष-इनको पीड़ा होवे । ऐन्द्र योग फल- महायलिटाश्च महानरेन्द्रा विनाशमायांति धनुर्द्धराश्च । भीतयुद्धानि महांतिचैन्ने योगे यदा स्याद्राण दिो ॥१३४॥ ग्रहण एन्द्र योग में हो तो महाबलवान , महाराना, धनुष्यधारी योधा --इनको पीड़ा और रानाओं में युद्ध होवे। धैधृति योग फल- व्यापारिणश्च धनधान्यचतुप्पशानि सकराश्च सहभांरतुमश्रितश्च । "

नश्यति सागरजलोद्भवभूषणानि .
चंद्रार्कपर्व यदि वैधृतिनामयोगे ।। १३५ ॥
ग्रहण वैधृति योग में हो तो व्यापारी, धन, धान्य, चौपाये पशु
सर्व प्रकारकी खाने, तोलसे विकनेवाली सम्पूर्ण वस्तुए और समुद्र के
जलसे उत्पन्न होनेवाली वस्तुएँ तथा मोतियों के आभूषण इनको पीड़ा होवे।
राशि फल प्रकरण ।
मेष राशि फल-
ये पांचालाः शूरसेनाः कलिंगाः कांबोजांधा शस्त्रवानांकिराता:
येषां वृत्तिहिना मध्यदेशस्ते पीड्यंते मेपराशि ग्रहेण ॥१६॥
ग्रहण मेप राशि में हो तो पजाव, शूरसेन-मथुरा, कलिंग, कायोग,
अन्ध्र, किरात, मध्यदेश और शस्त्र से तथा अम्रिसे आनीविका करनेवाले
इनको पीड़ा होवे।
वृष राशि फल-
गोपा पशवो थेगोमिनो यनुजा ये च महत्वमानिनः ।
त पीडामुपयांति भास्करे ग्रस्ते शीतकरे थवाटपे ॥१३॥
ग्रहण वृष राशि में हो तो गोप, पशु, गोमिन मनुष्य, और बहुत
अमिमान पाले-इनको पीड़ा होवे।
मिथुन राशि फल-
भूपाश्च भूपसदृशाः प्रवरांगनाश्च
सुह्माश्च वाहिकजना वलिन कलाशा !
मत्स्या तथा जनपदा यमुनानटस्था
पीडां प्रयान्ति मिथुने ग्रहणे रविन्दोः ॥१३॥

ग्रहण मिपुन राशि में हो तो राना, राजाओं के सदृश्य, उत्तम स्त्रिये, सुम्न देश, बाहीक, वलवान् , कलाकुशल, मत्स्य देश और यमुना तटके देश-इनको पीड़ा होथे। फर्फ राशि फल- आभीरपल्हवशान् शररांश्च मत्स्यान् पांचालमलविकलांश्च गुरुनिहन्यात् । मांजिटमोतिकतान्न गुडाश्च तैल नश्यति कर्कटगतं ग्रहणं यदि स्यात् ॥३९॥ ग्रहण कर्क राशि में हो तो आभीर, पल्व, शबर, मत्स्य पंनाव, मल, विकल मनुष्य, गुरुमन-इनको पीड़ा और मनीठ, मोनी, घृत, गुड़, नैल-इत्यादि का भान तेज हो जावे । सिंह राशि फल- सिहे पुलिंदगणमेकलसत्वयुक्तों स्तेजोमयानरपतिन्वन गोवरांश्च । काश्मीरकांश्च विनिहति पशुंश्च दुर्ग ये संथिता अपि च तान् ग्रहणं रवीन्दोः ॥१४॥ ग्रहण सिंह राशि में हो तो पुलिंद, काश्मीर, गण, मेरल, देश, किले में रहने वाले, सत्व युक्त, तेजस्वी राजा, वन में विचरने वाले, और, पशु-इनको पीड़ा हो। कन्या राशि फल- कन्यागते रविशशिग्रहणे विनाश । मायांति सस्पकविलेखकगेयमताः। देशास्तथात्रिपुरशालियुताश्मका श्व सिदौपायुवती जनिताश्च गर्भा ॥ १४१ ।।

३७ , ग्रहण कन्या राशि में हो तो खेती वाले, लेखक, मकान में रहने वाले, त्रिपुर तया अश्मक देश कोकाट, स्त्रियों के गर्भो को पीड़ा और . चावल तथा ओषधियों का नाश होवे | तुला राशि फल- तुलाधरेखंसपरांससाघून वणिग्दर्शाणान् रुरुकछपांश्च । हन्यारवीन्द्वौहणंतु राज्ञां करोति युद्धं त्वय दृष्टिनाशं ॥१५२।। ग्रहण तुला राशिमें हो तो परान्त देश, साधूनन, व्यापारी, दशार्ण, कुरु तथा कच्छ देशमें कट; वर्षाका नाश और रानाओ में परस्पर युद्ध होवे। वृश्चिक राशि फल- अलिन्यथोडंयरमद्गचोलान् दुमान् सयोधेयविपांबुधीयान् । हिमांशुसूर्यग्रहणं निहति धनाधिपांश्चापि मुभिक्षकृत्स्मात् ॥१४॥ ग्रहण वृश्चिक राशि में हो तो उदंबर, मद्र, चोल तथा योधैय देश, अफीम आदि विप, जल, और बुद्धिवान् तथा धनवान-इनको पीड़ा और जगत् में सुभिक्ष होवे। धन राशि फल- ग्रहो रवींदोर्यदि चापरासौ इन्यादमासान्वरवाजिमल्लान् । विदेहपांचालवणिग्जनोग्रा युद्धज्ञवैद्यांश्च तथौपचानि ॥ १४४ ॥ ग्रहण धन राशि में हो तो राज्य मन्त्रि, श्रेष्ठ घोड़े, मल विदेह व पंजाब आदि देशो, व्यापारी, योधा, वैद्य और ओषधी-इनको पीडाहोगे। मकर राशि फल- • इन्यान्मृगे तुझपमंत्रिकुलानि नीचान् मंत्रौषधेषु कुशरा स्थविरायुधे यान् । अन्पांस्तथायुधकरान् ग्रहणं रवींदी देशांश्च दक्षिणभवान् प्रवदति संतः ॥१५॥ . .

ग्रहण मकर राशि में हो तो मच्छियों, मन्त्री, नीच कुल के मनु प्य, मन्त्रादि, ओपधियों को पहिचानने वाले, स्थिर-तृक्षादि, आयुष, युद्ध कुशल मनुष्य और दक्षिण देश वासी-इन को पीडा हो । घुम्म राशि फर- कुथे यदा ग्रहणमिद्विनयोस्तदांनी पाश्चासजान गिरिभवान् दरदानजनाश्च । आभीरकानपि पुरानपिचर्वराश्च भारोद्वहार्य गजचौग्नृपाः निहन्ति ॥ १४६ ।। ग्रहण कुभ राशि में हो तो पश्चिम देश वामी, पर्वतों पर रहने वाले, दरद देश निवासी, आमीर व वर देश, भार उठाने वाले उट आदि, हाथी, चोर और राना-इनको ीडा । मीन राशि फल- मीनसिकतं अहमिदुसहश्चभान्बोः पाशान् जनाश्च धनिनो जलजीविनश्च । हन्याच मागरतरं च समुद्रनानि द्रव्याणि नाशमुपयान्ति च मानयुक्ताः ॥ १४७ ॥ ग्रहण मीन राशि में हो तो विद्वान्, धनवान , मेल से जीविका क रनवाले, समुद्र के किनार के देशों में रहने वाले, समुद्र में उत्पन्न होने वाले शीप शख आदि द्रव्य और अभिमान वाले मनुष्य-इन को पीडा होवे। पशि घश से हरएक वस्तु की तेजी मन्दी- यस्मिन् राशी भवेत्सर्व तस्यावाच्य ऋयाणकम् । अत्यपलभतेमूल्यं पीड्यमाने च राहणाः ॥ १४८ ॥ ग्रहण मेषाद चाहे निस राशि में हो उस राशि के नामकी वस्तुए भात महगी हो नारे नेते ग्रहण मेप राशि में हो तो निन वस्तुओं की मेष राशि होगी वे वस्तुए बहुत महगी हो जावे ।

नीच राशि स्थित चन्द्र ग्रहण फल-
नीचावलम्बिसोमस्तु यदा गृह्येत राहुणा ।
सकारास्तदा भर्ता सरूस्थम्पारे पीडयेत् ॥ १४९ ॥
अल्पां चन्द्रश्च दीपाश्च म्लेको पूर्वापराविनाः ।
दीक्षिताः क्षत्रिया भृत्याः शूद्राः पीडामवाप्नुयः ॥१५०॥
चन्द्र ग्रहण के समय चन्द्रमा नीच राशि-वृश्चिक राशि का हो तो
सर्पाकार तथा मत देश में रोगादि का उपद्रव, तथा ग्रह भक्ति में चन्द्रमा
जिन देशों का स्वामि है उन देशों में तथा म्लेछ, बाह्मण, दीक्षित, क्षत्री
भृत्य-नोकर और शूद्र-इन को पीडा होवे ।
खांश (आकाश भाग) फल प्रकरण ।
खांश निर्णय-
रात्रेर्दिनस्य च मितिस्तुरगैविभाज्या
लब्ध नभोशक मितिस्तुगतेष्टनाड्यः ।
खांश प्रमाण विहृताः फल संख्ययावम्
खांशादिने निशि च ते नगसंख्यकास्युः ॥१५१॥
ग्रहण का स्पर्श अर्थात् प्रारम्भ दिन में हो तब तो दिन मानकीघाट
पल ( सूर्योदय से सूर्यास्त पर्यन्त ) के और रात्रि में हो तो रात्रि मानकी
घटि पल। सूर्यास्त से सूर्योदय पर्यन्त) के ७ भाग करे इसे आकाश भाग
माने हैं । फिर ग्रहण के स्पर्श समय की घष्टि पल निस आकाश भागमें
हो उस के अनुसार ग्रहण के स्पर्श समय का आकाश भाग जाने इसे
खाश भी कहते हैं।
प्रथम खांस का फल-
आधे नोशे ग्रहणं रवीन्दोः गुणाधिकान नैकृति काश्चविधान
हुताशत्तिश्च समस्तयज्ञान प्रज्ञांस्तथैवाश्रमिणो निहन्तिः ॥१५॥

ग्रहण का स्पर्श आकाश के प्रथम भाग में हो तो गुणि जन, खेती करने वाले, ब्राह्मण, लुहार, सुनार, हलवाई भाड़ मूंज अनमेर आदि अनी जीवि, यज्ञ करने वाले, बुद्धिवान् और वान प्रस्तादि आश्रमी-इत्यादिको कष्ट होव। दूसरे खांश का फल- खांशे द्वितीये ग्रहणं रवीन्दोः कृषीवलानां वलनायकानाम् । पाखण्डिनां चापि वणिक्जनानां राजन्यकानां च विनाश करस्यात् ग्रहण का स्पर्श आकाश के दूसरे भाग में हो तो खेती करनेवाले, सेनापति, पापड़ी, व्यापारी वा महाजन और राजपूत आदि के पीड़ा होवे । तीसरे खांश का फल- खांशे तृतीये गृहणं रवींदोः म्लेशांश्च शुद्रानपिमंत्रिणश्च । कानिहन्यादपि मध्यदेशं छत्रं च कांस्यत्रपुकं महर्घम् ॥१५४॥ ग्रहण का स्पर्श आकाश के तीसरे भाग में होती म्लेछ, शूद्र, राज्य मन्त्री, कारुक जन आदि को कष्टः मध्य देश के राजा को पीड़ा और कांसी तथा कतीर काभाव तेज होवे। चौथे खांश का फल- खांशे चतुर्थे ग्रहणं रविंद्वोः तदा निहन्यात्वनुमध्यदेशम् । नृपस्तियामंत्रिजनान् पशूश्च धान्यं च सर्वं कुरुते महर्घम् ॥१५५|| ग्रहण का स्पर्श आकाश के चौथे भाग में हो तो मन्य देश का नाश, राजा तथा राज्य मन्त्रियों को कर, पशुओं को दु स और सर्व प्र. कार के धान्यों का मात्र तेन हो जाये। पांचधे खांश का फल- आकाशमागे यदि पंचमे स्यात् हिमांशु सूर्य ग्रहणे तदानीम् । वैस्यानपसांश्च पशूश्चहन्यादतः पुरवापितिलान् शिशृंश्च ॥१५६।।

४१
ग्रहण का स्पर्श-आकाश के पाञ्चवें भाग में हो तो वैस्य, वालक,
पशु तथा रानाओंके अन्तपुर (रनवास) आदि को कष्ट पीड़ा और तिलों
का भाव तेज हो जाये।
छठे खांश का फल-
पष्टेन मोशे ग्रहणेरविन्दोः स्त्रीशूद्ररत्नांश्च निहतिकन्याः ॥
मुवर्ण कपूरक कुंकुमानां महतस्यादपिनागवल्माः ॥१६॥
ग्रहण का स्पर्श-आकाश के छठे भाग में हो तो स्त्रियो, कन्याओं,
तथा शूद्रों का नाश; नागरवेल के पानों की कमी, और सोना, रत्न, क-
पूर, केसर आदि का भाव तेन हो जावे। .
सातवे खांश का फल--
खांशे यदा सप्तमके रविन्दोः ग्रहस्तदा चौर विमर्दकर्ता ॥
प्रसंतहिचापि गजाश्ववैश्यापीडा करो वस्त्र विनाशकृच ॥१६॥
ग्रहण का स्पर्श आकाश के सातवें भाग में हो तो चोरों का उपद्रव,
हाथी तथा घोड़ों को कष्ट, वैश्यों को पीड़ा और कपड़े का भाव तेज
हो जाव।
ग्रन्थान्तर में आद्य सांश फल-
यौवनस्थांश्च पूर्वाह्न हन्ति यज्ञविदाधनान् ।
औदकानि च सत्वानि नागेन्द्र श्चात्र दु:खितः ।।१६२॥
ग्रहण का स्पर्श आकाश के आद्य माग में हो तो योवन अवस्था
वाले, यज्ञ करने वाले, जल से उत्पन्न होने वाले और हाथीयों के
स्वामि-इनको पीड़ा होवे ।
मन्थान्तर से मध्य खांश फल-
अथ मध्यस्थ संभासः शूद्रान् हन्ति सतस्करान् ।
उपरक्तो नृपं हन्ति चन्द्रश्च घरवारणात् ॥१६३॥

-
ग्रहण का पर्श आकाश के मध्य भाग में हो तो अद्र, नोर, और,
सजा को पीड़ा होव।
ग्रन्थान्तर से अन्त्य खांश फल-
मलम्बः प्रमदां हन्ति क्षवं राष्ट्रं च सर्वशः ।
त्रिगर्ताश्चात्र पीड्यन्ते मत्स्याश्च कुरवो जनाः॥१६४॥
ग्रहण का सर्श आकाश के अन्न भाग में हो तो स्त्रियों, क्षत्री.
राज्य, त्रिगत, मत्स्य और कुरु देश--इनको पीड़ा होवे।
ग्रन्थान्तर से सन्ध्याकाल फल-
सन्ध्याकाले तु गर्भस्था गृहीतः पीठयेत् प्रजाः।
गावो गर्भ विमुञ्चन्ति न च वर्पेत् पुरन्दरः ॥१६५॥
ग्रहण का स्पर्श सन्ध्या काल में हो तो गर्भवन्नी स्त्रियों को पीडा,
गायों के गर्मों का नाश और वर्षा का अभाव होवे।
मोक्ष समय का खांश फल-
एवं खांश फलं प्रोक्तं ग्रहणे स्पर्श कालजम् ।
यस्मिन् खांशे विमुक्ति स्पातलोक्तानां शिवं भवेत् ॥१६६||
ग्रहण के स्पर्श समय के आश भाग के अनुसार निन के लिये
निम प्रकार से उपरोक्त अशुभ पल लिया है उन्ही के लिये मोक्ष समय
के आकाश भाग के अनुमार उमी प्रकार से शुभ फल होता है अर्थान
निस भाग में स्पर्श हो उम भाग वालों के लिये अशुभ और जिम भाग में
मोक्ष हो उस भाग वादों के लिये शुभ फल जाने ।
प्रस्तोदय, प्रस्तास्त व खग्रास फल प्रकरण ।
सूर्य चन्द्र प्रस्तोदय फल-
उदितो प्रहणं सूर्य चन्द्रमा यदि वा भवेत् ।
राजा युद्धं पनानाशं मर्व प्रम्तोति दुःबदा ॥१६७॥

५३ प्रत्युत्तमो रविश्चन्द्रो गृह्यते यदि तत्र च । भयं तदा विजातीया ब्राह्मणानामुपस्थितम् ॥१६॥ ग्रहण ग्रस्तोदय हो तो रानाओं में युद्ध, प्रना में क्लेश, ब्राह्मणों में भय और सम्पूर्ण ग्रहण हो तो जगत् में बहुत दुःख होवे। सूर्य प्रस्तोदय अस्तास्त फल- उदया स्तमयेवाऽपि सूर्यस्य प्राणं भवेत् । सदा नृपभयं विद्यात् पर चक्रस्प चागमम् ॥१६९॥ मूर्य या ग्रहण ग्रस्तोदय वा प्रस्तास्त हो तो श्रेष्ठ राजा को भय, देश में सेना का उपद्रव और महाजनों को कष्ट पीड़ा होवे । चन्द्र प्रस्तोदय प्रस्तात फल- यावतोशान गृहीत्वन्दुरुदयसस्तमेति वा । तायनों शान्कृथिव्यास्तु तम एव विनाशयेत् ॥१७०।। नन्द्रमा का ग्रहण ग्रस्तोदय वा ग्रस्नास्त हो परन्तु ऐसा ग्रहण जिस दिशा में तथा मिना ग्रस्त हो उस दिशा के देशों का उतने प्रमाण से नाश होवे। खग्रास फल- सूपेंन्द्रो सर्वथा मासे सर्वस्यापि महर्घता ॥१७॥ ग्रहण खग्रास अर्थात् सम्पूर्ण ग्रहण हो तो व्यापार की सम्पूर्ण व- स्तुएं मंहगी हो जावे अनः पहिले से खरीदने वालोंको लाभ होवे । खग्रास पाप दृष्टि फल- ग्रस्तौ समस्तौ यदि पापदृष्टौ हिमांशुसूर्यो मरक पदोस्त। दुभिषदौ क्षत्रियदुःखदौ च भयं प्रजानां परचक्रजस्यात् ॥१५२॥ ग्रहण खग्रास हो और सूर्य ग्रहण समये सूर्य पर तथा चन्द्र ग्रहण समय चन्द्रमा पर अर ग्रह की दृष्टि भी हो तो जगत् में महामारी का

४२
ग्रहण का सर्श आकाश के मध्य भाग में हो तो शूट, चोर, और,
रामा को पीड़ा होव ।
ग्रन्थान्तर से अन्य खांश फल-
मलम्बः प्रमदां हन्ति क्षत्र राष्ट्रं च सर्वशः।
विगश्चिात्र पीध्यन्ते मत्स्याश्च कुरवो जनाः॥१६४॥
ग्रहण का सशं आकाश के अन्न भाग में हो तो स्त्रियों, क्षत्री.
राज्य, त्रिगर्त, मत्स्य और कुरु देश-इनको पीड़ा हो।
प्रन्थान्तर से सन्ध्याकाल फल-
सन्ध्याकाले तु गर्भस्था गृहीतः पीडयेत् प्रजाः।
गावो गर्भ विमुञ्चन्ति न च वर्षेत् पुरन्दरः ॥१६५॥
ग्रहण का पर्श सन्ध्या काल में हो नो गर्भवती स्त्रियों को पीड़ा,
गायों के गर्मों का नाश और वर्षा का अभाव होवे।
मोक्ष समय का खांश फल-
एवं खांश फलं प्रोक्तं ग्रहणे स्पर्श कालजम् ।
यस्मिन् खांशे विमुक्ति स्यारत्मोक्तानां शिवं भवेत् ॥६६॥
ग्रहण के स्पर्श समय के आकाश भाग के अनुसार निन के लिये
जिम प्रकार मे उपरोक्त अशुभ फल लिखा है उन्ही के लिये मोक्ष समय
के आकाश भाग के अनुसार उसी प्रकार से शुभ फल होता है अर्थात
मिस भाग में स्पर्श हो उस भाग वालों के लिये अशुभ और निस भाग में
मोस हो उस भाग वालों के लिये शुभ फल जाने ।
ग्रस्तोदय, प्रस्तास्त व खग्रास फल प्रकरण ।
सूर्य चन्द्र प्रस्तोदय फल-
उदितो प्रदणं सूर्य चन्द्रमा यदि वा भवेत् ।
राजा युद्धं प्रज्ञानाशं मर्व प्रस्तोनि दुम्वदा ॥१७॥

मत्युत्तमो रविश्चन्द्रो गृह्यते यदि तत्र च । भय तदा विजातीया ब्राह्मणानामुपस्थितम् ॥१६॥ ग्रहण प्रस्तोदय हो तो राजाओं में युद्ध, प्रजा में केश, ब्राह्मणों में भय और सम्पूर्ण ग्रहण हो तो जगत् में बहुत दुस होवे। सूर्य प्रस्तोदय ग्रस्तास्त फल- उदया स्तमयेवाऽपि मर्यस्प ग्राणं भवेत् । तदा नृपभयं विद्यात् पर चक्रस्य चागमम् ॥१६९॥ सूर्य का ग्रहण ग्रस्तोदय वा ग्रस्तास्न हो तो श्रेष्ठ राजा को भय, देश में सेना का उपद्रव और महामनों को कष्ट पीड़ा होवे । चन्द्र प्रस्तोदय ग्रस्तात फल- यावत शान गृहीत्वन्दुरुदयसस्तमेति वा । सायोशान्धृधिव्यास्तु तम एव विनाशयेत् ॥२७॥ चन्द्रमा का ग्रहण ग्रन्तोश्य वा ग्रस्तास्त हो परन्तु ऐसा ग्रहण जिस दिशा में तथा जितना ग्रस्त हो उस दिशा के देशों का उतने प्रमाण से नाश होवे । खग्रास फल- सूयेन्द्रो सर्वथा प्रासे सर्वस्यापि महर्घता ॥१७॥ ग्रहण खग्रास अर्थात् सम्पूर्ण ग्रहण हो तो व्यापार की सम्पूर्ण य- स्तुएं मंहगी हो नावे अनः पहिले में खरीदने वालोंको लाभ शो। खग्रास पाप दृष्टि फल- ग्रस्तौ समस्तौ पदि पापदृष्टौ हिमांशुसूयौं मरक मदोस्तः। दुभिंसदौ क्षत्रियदुःखदौ च भयं प्रजानां परचक्रजस्यात् ॥१५२॥ ग्रहण खग्रास हो और सूर्य ग्रहण समये सूर्य पर तथा चन्द्र ग्रहण समय चन्द्रमा पर कर ग्रह की दृष्टि भी हो तो नगन् में महामारी का उपद्रव, दुर्भिक्ष का भय, रानाओं-क्षत्रियों को पीड़ा और प्रजा को पराई सेना के उपद्रव का भय होवे। दिशा फल प्रकरण। ईशान कोण फल- ईशान्यां दृश्यते राहु सेहिमरुवेर्यदा । महावातं महाशीतं मुभिसं क्लेशिताः मजाः ॥१७३ ।। ग्रहण का स्पर्श ईशान कोण से हो तो वायु का वेग अधिक, अति शीन, सुभिक्ष और प्रानाको क्लेश होवे । पूर्व दिशा फल- पूर्वस्यां दृश्यते राहुस्तोयपूर्णांवघराम् । करोति राजपुत्रांश्च हन्माचैव वरांगनाः ॥१७॥ ग्रहण का स्पर्श पूर्व से हो तो दी अधिक, क्षत्रियों को कष्ट और श्रेष्ठ स्त्रीको पीड़ा होवे। अग्नि कोण फल- अग्नियां हिमगोसे दृश्यते राहुमण्डलम् । अग्निचौरभयं चंच मन्नवस्त्रमहर्षत ॥ १७५ ॥ ग्रहण का स्पर्श अग्नि कोण से हो तो अग्नि का भय, चोरों का उ. पद्रव और धान्य तथा वस्त्र सेन हो जावे । दक्षिण दिशा फल- चन्द्रार्कग्रहणे ग्रासो दक्षिणस्यां यदा भवेत् ॥ हन्याजलचरान् वैश्यान् गांश्च जलदानाप ॥ १७६ ।।

ग्रहण का स्पर्श दक्षिण से हो तो-जलचर प्राणियों का नाश, वैश्यों को पीडा, हाथियों को कष्ट और वर्षा की कमी होवे। नैऋत्य कोण फल- मूर्यविवे यदानासो नैऋसां राहु दर्शनम् । दुर्भिक्षं निष्ठुरालोकाः साधवो यांति पीडनम् ॥ १७७ ॥ ग्रहण का स्पर्श नेत्य कोण से हो तो दुर्भिक्ष का भय, लोगो में निष्ठुरता, और साधु पुरुषों को पीड़ा होवे । पश्चिम दिशा फल- मूर्यग्रासश्च वारुण्यां क्षेमारोग्यसुभिक्षकृत् ॥ हन्यात् कृषिकरान् वीजं शुदान सेवाकरांस्तथा ॥ १७८ ॥ ग्रहण का स्पर्श पश्चिम से हो तो जगत् मे क्षेम, आरोग्य, सुभिक्ष आदि का सुख किन्तु खेती करने वालों, शूद्रों, नोकरी करने वालों और सर्व प्रकार के बीजों का नाश होये । यायव्य कोण फल- भास्करग्रासकाले च वायव्या दृश्यते तमः ॥ महावातमचंडाभिरप्टिभिः खंडमंडलम् ।। १७९ ॥ ग्रहण का पर्श वायव्य कोण से हो तो वायु महान् प्रचड चले और वर्षा विषम अर्थात् कही तो होवे और कहीं विलकुल ही नहीं होवे । उत्तर दिशा फल- उत्तरस्यां दिशि यदा दृश्यते सिहिकामुतः। गवां पीडा च विमाणामश्वानां वनवासिनाम् ॥ १८० ॥ ग्रहण का स्पर्श उत्तर से हो तो गायों को पीड़ा, ब्राह्मणों को कष्ट, घोड़ों की हानी और वनवाशियों को क्लेश होवे ।

ग्रास फल प्रकरण !
दश प्रकार ग्रास निर्णय-
सव्यापसव्य लेह ग्रसन निरोधावमर्दनारोहाः।
आघ्रान्तं मध्यतमस्तमोऽत्य इति ते दश ग्रासाः । १८१ ॥
ग्रहण के (१) सव्य, (२) अपमव्य, (३) लेह, (४) असन, (५)
निरोध, (६) अवमर्दन, (७) आरोहण. (८) आघात, (९) मध्यतम और
(१०) अन्न नम नामक टश प्रकार के ग्राम होते हैं।
सव्य प्रास फल-
राहुयंदा मव्यगतः शदृश्यते पनाविवृद्धिः समुभिक्ष्यनिभर्य ।
वृष्टिः प्रभूतायुदितं जगहवेत् सेव युनाधर्मरताश्च मानवाः ।। १८२ १३
मूर्य ग्रहण का स्पर्श वायव्य कोण मे और चन्द्र ग्रहण का स्पर्श
अग्नि कोण से हो नो वह मव्य भ्रमण नामक ग्रात होता है । ऐमा ग्रास
हो तो सुवृष्टि, सुभिक्ष, प्रजा की वृद्धि, जगन मे प्रमन्नना, परोपकार में प्र
वृत्ति और धर्म में श्रद्वा वाले मनुष्य होवे ।
अपसव्य ग्राम फल-
राहुयंदा यात्यपसव्यगत्या तदा प्रजानां नृपपीडनं स्यात् ।।
दुर्भिक्षचोरामिभयं सरोगमल्पां च वृष्टिं मकरोति मेघः ॥१८३॥
सूर्य ग्रहण का स्पर्श नेऋत्य कोण से और चन्द्र ग्रहण का स्पर्श
ईशान कोण से हो तो वह अप मव्य नामक ग्रास होता है ऐसा पास हो
तो प्रजा को रानाका क्ष्ट, दुर्भिक्ष का भय, चौरों की पीड़ा, अग्नि का उ-
पद्रव, रोगों का भय, और वर्षा की कमी होवे ।
लेह ग्रास फल-
जिह्वोपलेहिपरितस्तिमिरनुदो मंडलं यदि सलेहः ॥
प्रमुदितसमस्तभूताः प्रभूत तोया च तत्र मही ॥ १८४ ॥

ग्रहण के समय सूर्य वा चन्द्रमा का विम्ब बीचमें से जैसे निव्हासे नाटे हुये के सदृश्य दीखे उसे लेह नामक ग्राम कहते हैं । ऐसा पास हो तो सम्पूर्ण प्राणि प्रशन रहे और वर्षा बहुन होवे । आसन ग्रास फल- चरों ओर मे ग्रहण यसनमिति यदा अंशः पादो वा गृहाते तथाप्यर्द्ध । स्फीतनृपवित्तहारीपीडा च स्फीतदेशानाम् ।। १८५ ।। ग्रहण के समय सूर्य वा चन्द्रमा के तृतीयांश, चौथाई वा आधे गि- म्त्र को ग्रहण हो तो उसे ग्रसन, नामक ग्रास कहते हैं । ऐसा ग्रास हो तो स्फीत देश के राजा को कष्ट, प्रना को पीड़ा और धन की हानी होये । निरोध ग्रास फल- पर्यंतेपु गृहीत्वामध्यपिंडिभूतं तमस्तिष्ठेत् सनिरोधो विज्ञेयः प्रमोदकृत्सर्व भूतानाम् ॥ १८६ ॥ ग्रहण के समय सूर्य वा चन्द्रमा का बिम्ब लग कर बीच में पिंडाकार हो तो उसे निरोध नामक ग्रास कहते हैं । ऐमा पाम हो तो मम्पूर्ण जगन् को आनन्दप्रद होवे । अवमर्दन ग्रास फल- अवममितिनिः शेपमेवसंछायामिव तिष्ठेत् ।। हन्यात् प्रधानपुरुपान् प्रधानदेशांश्चतिमिरमयः ॥ १८७॥ ग्रहण के समय सूर्य चन्द्रमा के सम्पूर्ण विम्ब को छादन करके ब- हुत समय तक ग्रहण रहै तो उसे अर्वमर्दन नामक ग्रास कहते है । ऐसा ग्रास हो तो प्रधान पुरुषों को कष्ट और प्रधान देशों के पीड़ा होवे । आरोहण ग्रास फल- वृत्ते ग्रहे यदि तपस्तत्क्षणमावत्यदृश्यते भूयः॥ आरोहणमित्यन्यान्यमईनर्भयकरं राज्ञा ॥ १८८ ।।

ग्रहण होने के उपरान्त फिर तत्काल ग्रह होता हुआ दोखे तो उसे आरोहण नामक ग्रास कहते हैं। ऐमा ग्राम होतो रानाओं को परस्पर एक दूसरे का मय होवे । आत्रात नास फल- दर्पणामिवैकदेशे मबाप्पनि चाप्समारूनापहतम् । दृश्येताघ्रात तत्सुदृष्टिटयावहजगतः ॥ १८९ ॥ ग्रहण के समय सूर्य चन्द्रमा का बिम्ब एक और दर्पन के समान वायु वा धूप से मलीन दीखे तो उसे आघात ग्रास कहते हैं । ऐसा प्रास हो तो वर्षा श्रेष्ठ तथा जगत् की वृद्धि होवे। मध्यतम प्रास फल- मध्य तपः प्रविष्टं वितमस्तं यदि मंडलं परितः ॥ तन्मध्यदेशनाशं करोति कुश्यामयभयं च ॥ १९॥ ग्रहण के समय सूर्य चन्द्रमा का विम्ब बीच में से ग्रस्त तथा अन्त में मण्डल के समान हो तो उसे मप्यतम नामक ग्रास कहते हैं । ऐसा ग्रास हो तो मभ्य देश को पीड़ा और उदर रोग का भय हो। अन्ततम ग्रास फल- पर्यन्तेप्वति वलं स्वयं मन्यतमस्ततोन्याख्ये। सस्यानांमिति भयं भयंमस्मिन्रतस्कराणां च ।। १९१॥ प्रहण के समय सूर्य चन्द्रमा का विम्ब बीन मे से तो स्वच्छ और अन्त में पास हो तो उसे अन्ततम ग्राम कहते हैं। ऐसा ग्रास होतो किमी प्रकार के उपद्रवों से खेतियों का नाश तथा जगत् में चोरो का भय होवे ।

- वर्ण फल प्रकरण । धूम्र वर्ण फल- धूने क्षेमं मुभिक्षं च वर्षते अमृतोपमम् । महोत्साही भवेल्लोकः सर्वोपद्रवजितः ॥ १९२ ।। ग्रहण का वर्ण धूम्र हो तो जगत् में क्षेम, कल्याण, सुवृष्टि, सुभिक्ष तथा मंगलीक उत्सव अधिक और सर्व प्रकार के उपद्रवों का नाश होवे । कृष्ण वर्ण फल- महिपा मधकाराश्च कुंजरा वहिनीविनः । शूद्राश्चैव प्रपीड्यंते कृष्णवर्ण विधुन्तुदे ॥ १९३ ॥ ग्रहण का वर्ण कृष्ण हो तो मद्य बनाने वालों, भौतियों, हाथियों, आनि से आजीविका करने वालों और शूद्रों को पीड़ा होवे । ताम्र वर्ण फल- रक्तः कृष्ण विमिश्राभे सस्यानां वजनभयम् । युद्धं परस्परं राज्ञा मजानां पीडनं भवेत् ॥ १९४ ॥ ग्रहण का वर्ग लाल और काला-मिला हुआ ताम्र के समान हो तो बिजली गिरने से खेतियों का नाश होवे । कपिल वर्ण फल- कपिले शीघ्रगाः सत्वा म्लेछानाशं मयांति हि । दुर्भिक्षं नृपपयुद्धं च शेषवर्णा अनिष्टदा ॥ १९५ ॥ ग्रहण का वर्ण काला और पीला मिला हुआ कपिल वर्ण हो तो शीच चलनेवाले हरण तथा ऊंट आदि पशुओं को पीड़ा, म्लेछों को कष्ट, दुर्भिक्ष का भय और रानाओं के युद्ध होवे । वर्णवश ब्राह्मणादि वर्गों को अशुभ फल- रक्तो राहु शशी सूर्यो हन्याक्षेत्रान् सिताद्वजान् । विशः पीतो विवर्णस्तु कृष्णः शूद्राभिघांसति ॥ १९६ ॥ ७ ग्रहण का वर्ण श्वेत हो तो बाह्मणों का, लाल हो नो क्षत्रियों का, पीला हो तो वैश्यों का काला हो तो शुद्रों का और विवर्ण (मिश्र वर्ण) हो तो विनातियों का नाश होवे । वर्णवश विशंप फल-~ श्वेतेक्षेम मुभिक्षं ब्राह्मणपीडां च निर्दिशेद्राही । अग्निभयमनिल.वर्णे पीडा च हुताशवृत्तिनाम् ॥ १९७ ॥ हारतेरोगोल्वणता सस्यानामीतिभिश्च विध्वंसः । कपिले शीघ्रगसत्व म्लेछध्वंसोऽथ दुर्भिक्षम् ॥ १९८ ॥ अरुणकिरणानुरूपे दुर्भिक्षावृष्टयो विहग पीडा । आधूने क्षेममुभिक्षमादिशेन्मन्द वृष्टिं च ।। १९९ ॥ कापोतारण कपिलश्या वामे अद्भय विनिर्देश्यम् । कापोतः शुद्राणां व्याधिकरः कृष्ण वर्णश्च ।। २०० ।। विमलक मणिपीताभो वैश्यध्वंसी भवेत् सुभिक्षाय । साचिप्मत्याग्नभयं गैरिकरूपे तु यद्धानि ॥ २०१॥ दुर्वाकाण्डश्यामे हारने वापि निदिशेन्मरकम् । अशनिभयमदायी पाटलि कुसुमोपमो राहुः ॥ २०२॥ पांचविलोहितरूपः क्षत्रवसाय भवतिवृष्टेश्च । बालरवि कमल मुरचाप रूपभृच्छवकोपाय ॥ २०३ ॥ ग्रहण का वर्ण श्वेत हो तो सुभिक्ष किन्तु बामणों को पीड़ा, अग्नि के समान हो तो अग्नि का भय तथा अग्नि से जीविका करने वाले सुनार लुहार अभनेर आदि को पीडा, हरा हो तो रोगों का उपद्रव तथा अति वृष्टि अनावृष्टि दीडि आदि मे ग्वेनियों का नाश. कपिल होती गीध नालने वाले उट आदि प्राणियों व म्लेओं को कष्ट तथा दुर्भिक्ष का भय, लाल हो तो अनावृष्टि व दुर्भिक्ष का भय तथा पसियों को पीड़ा, धूम्र हो तो क्षेम व मुभिक्ष किन्तु व अधिक नहीं होवे, कपोत, लाल वा कपिल मि- 2017 श्रित श्याम हो तो दुर्भिक्ष का भय, कपोत वा कम्ण हो तो शुद्रों को रोग भय, नील माणके सदृश्य हरा का पीला हो तो वैश्यों को पीड़ा, ज्वाला सदृश्य हो तो अग्नि का भय, गेरुके सदृश्य लाल हो तो युद्ध भया दूरवा वा हरिदा सदृश्य हरा पीला हो तो महा मारी का भय, गुलांत्री हो तो वि- जली गिरने का भय, लाल मिश्रित धूलि सदश्य हो तो क्षत्रियों का नाश तथा अनावृष्टि का भय, और प्रातकाल के सूर्य, कमल वा इन्द्र धनुष्य के मदम्य वर्ण हो तो शस्त्र भय होवे । ग्रह दृष्टि फल प्रकरण। सूर्य ग्रहण के समय सूर्य पर और चन्द्र ग्रहण के समय नन्द्र पर मिस ग्रह की दृष्टि होगी वही हाट ग्रहण पर भी हो जाती है। भौम दृष्टि फल-- ग्रस्तं यदा पश्यति भूमिपुत्रो रक्तानि वस्तून्यखिलानि नाशम् । मयंति चौराग्निनृपाहवैश्च पीडा प्रजानां च भवेत्नदानी ॥२०४।। यहण पर मंगल की दृष्टि हो तो पल रंगकी सम्पूर्ण वस्तुओं का नाश, पोरों का भय, अग्नि का उपद्रय, रानाओं के युद्ध भय और प्रना को कार होवे। बुध दृष्टि फल- अस्तं बुधः पश्यति चेत्तदानीं मध्धाज्यलक्षयकचराझार । पीतानि धान्यानि च पीतधावन स्वर्णादिकान्नाशयति मभूतान्०९ ग्रहण पर बुध की दृष्टि हो तो सहत, तैल, वृन मक्की आदि पीला धान्य, साना तथा पीनल आदि पीली धातु का नाश और समाओं को फष्ठ होवे। 201920 शुक्र दृष्टि फल- शुक्रस्य दृष्टिग्रहणे यदि स्यात्सस्यमणाशो भवति क्षितौ च । क्लेशो महाश्चापि सिताश्चधातु धान्यांवराणि मयंति मूल्यम् ॥२०६ ग्रहण पर शुक्र की दृष्टि हो तो खेतियों का नाश, नावल ज्वार आदि स्वेत धान्य तथा नांदी कतीर आदि स्वत धातु मलमल जगनाथी आदि स्वेत कपड़े का भाव तेन और जगत में महान क्रेश होवे। शनि दृष्टि फल- शनैश्चरश्चग्रहणं निरीक्षे दुर्भिक्षचौरोत्यभयं त्ववृष्टिम् । कृष्णानि धान्यानि च कृष्णधातून कुर्यान्महर्यान्यासिवान् विलेपान् । ग्रहण पर शनि की दृष्टि हो तो वर्षा का नाश, दुर्भिक्ष का कष्ट, चोरों का भय, उडद आदि कृष्ण धान्य लोहो आदि कृष्ण धातु नथा क. णागर कस्तुरी आदि कृष्ण लेपन वस्तुओं का भाव तेन हो जावे। गुरु दृष्टि फल- जीयो यदा पश्यति सूर्यमिन्दं प्रस्तं तदा सर्व खगेक्षणायत् । फलं त्वनिष्टं गदितं निहन्यात्सर्वत्र लोकेप्वपि सौख्यकृत्स्यातू२०८. ग्रहण पर गुरु की दृष्टि हो तो मोमादि ग्रहों की दृष्टि के सम्पूर्ण अशुभ फलों का नाश होकर जगत्में मर्व प्रकार का सुख होवे। ग्रह ग्रस्त फल प्रकरण। सूर्य ग्रहण के समय सूर्य निम राशि का हो उसी राशि पर और चन्द्र ग्रहण के समय चन्द्र निस राशि का हो उसी राशि पर नो ग्रह हो वह ग्रह भी ग्रस्त कहलाता है। भीम ग्रस्त फल- आवंतिका जनपदाः कावेरीनर्मदानदाश्रामिणः । दिसाश्च मनुजयतयः पीडते क्षितिसुते ग्रस्ते ॥ २०९ ॥ ग्रहण के समय मंगल ग्रस्त हो तो उन्नयनी देश के रहनेवालों का.

५३ . बेरी तथा नरबदा के किनारो पर रहने वालों को पीड़ा और अभिमानी रानाओं को कष्ट होवे। बुध प्रस्त फल- अंतर्वेदी मरयु नेपालं पूर्वसागरं शोणम् । स्त्रीनृपयोधकुमारान् यस्तो ज्ञो इंति विदुषश्च ॥ २१ ॥ प्रहण के समय बुध ग्रस्त हो तो अन्तरवेदी देश, सरयू नदी के देश नेपाल, पूर्व दिशा का समुद्र, शोणनद, स्त्री, राजा, बालक और विद्वान्- इन को पीड़ा होवे। वृहस्पति ग्रस्त फल- ग्रहणोपगते जीवे विद्वनृपमंत्रिगनहय ध्वंसः । सिंधुतटवासिनामप्पुदीग्दशं संश्रितानां च ॥ २११ ॥ ग्रहण के समय वृहस्पति ग्रस्त हो तो विद्वान्, राज्य मन्त्रि, हाथी, घोड़ों, मिन्ध देश तथा उत्तर देश के लोग-उनको पीड़ा होवे । शुक्र ग्रस्त फल- भृगुतनये राहगते दशार्ण केकयरोपकाहणाः। आर्यावर्ताः शिषयः स्त्रीसचिवगणाश्च पीडयंते ॥ २१२ ॥ ग्रहण के समय शुक्र ग्रस्त हो तो दशार्ण, केकेय, रोम, हूंण, आया वत्तं और शिवी-इन देशों को पीड़ा; स्त्रियों को कष्ट राज्य मन्त्रियों को रोश और प्रना के गुग्व्य पुरुषों को दुःख होवे। शनि ग्रस्त फल- सौरे मरुभवपुष्करसौराष्ट्रा धातयोचुदासजनाः । गोमंत परियात्राश्रिताश्च अस्ते विनश्यति ॥२१३ ॥ ग्रहण के समय शनि ग्रस्त हो तो मारवाड़, पुष्कर, सौरठ, आबू गोमंत और पर्वत प्रदेश-इन देशों में रहने वालो को पीड़ा और सर्व धातू का भाव तेज हो जावे।

मोक्ष फल प्रकरण । दश प्रकार के मोक्ष निर्णय- हनुकुक्षिपायु भेदा द्विदि संछद्दनं व जरणं च । मध्यंत्मयोश्च विदारणमिति दश शशिमूर्ययोमोक्षाः ॥२१॥ ग्रहण का मोक्ष (१) दक्षिण हनु, (२) वाम हनु, (३) दक्षिण कुक्षी, (४) वाम कुक्षी, (.) दक्षिण पायु, (६) वाम पाय, (७) मदन. (८) जरण, (९) म य विदारण और (१०) अन्त्य विदारण ऐसे दश प्रकार मोक्ष होते हैं। दक्षिण हनु मोक्ष फल- अग्नेयामपगमनं दक्षिणहनुभेदसंज्ञितं शशिनः । सस्याविमों मुखरुक्नृपपीडा स्पारसुवृष्टिश्च ।। २१५ ।। ग्रहण का मोक्ष अग्नि कोण में हो नो वह दक्षिण हनु नामक मोक्ष होता है | ऐसा मोक्ष हो नो ग्वेतियों का नाश, रोगों के मुस मे रोग पीरा, रानाओं को कष्ट और वर्षा श्रेठ होवे। घाम हनु मोक्ष फल- पूर्वोत्तरेण वामो हनुभेदो नृपकुमारभयदायी। मुखरोगः शस्त्रभयं तस्मिन् विद्यात् मुभिक्षं च ॥ २१६ ॥ ग्रहण का मोक्ष ईशान कोण मे हो तो वह वाम हनु नामक मोक्ष होता है । ऐसा मोक्ष हो नो राजकुमारों को भय, मुख का रोग, युद्ध का उपद्रव और सुमित होवे। *दक्षिण कुक्षी मोक्ष फल । दक्षिणकुक्षिविभेदो दक्षिणपार्षे यदि भवेन्मोक्षः। पीडा नृपपुत्राणामपियोज्या दक्षिणारिपवः ॥ २१७ ॥ * प्रहण का दक्षिण कुक्षी और घाम कुक्षी मोक्ष रिम्बा है परन्तु गणित में सिद्धान्त से दक्षिण तथा उत्तर दिशा में मोक्ष होता ही नहीं अत यह पल शामों में उत्पात से मोक्ष होने का पाना होगा ।

ग्रहण का मोक्ष दक्षिण में हो तो वह दक्षिण कुक्षी नामक मोस होता है । ऐसा मोक्ष हो तो राजपूनों को पीड़ा और दक्षिण दिशा के शत्रुओं को कष्ट होवे। *वाम कुक्षी मोक्ष फल- वामस्क्त कुक्षिभेदो यद्युत्तरमार्गमाश्रितो राहुः । खिणां गर्भविपत्तिः संस्यानि च तत्र मध्यानि ॥ २१८ ।। ग्रहण का मोक्ष उत्तर में हो तो वह वाम कुक्षी नामक मोक्ष होता है। ऐसा मोक्ष हो तो स्त्रियों के गर्मों का नाश और खेतियों की उत्पत्ती साधारण होवे। दक्षिण पायु तथा वाम पायु मोक्ष फल- नैतिवायव्यस्थौ दक्षिणवामी तु पायुभेदौ द्वौ । गुह्यरुगल्पावृढ़ियोस्तु राज्ञीक्षयो वामे ॥ २१९॥ । ग्रहण का मोक्ष नैत्य कोण में हो तो वह दक्षिण पायु और वा- यव्य कोण में हो तो वह वाम पाय नामक मोक्ष होता है । ऐमे मोक्ष हो, नो लोगों को गुह्य रोग की पीड़ा. वर्षा अल्प होवे और वाम पाय मोक्ष में महाराणी को कष्ट होवे। मंछर्दन मोक्ष फल- पूर्वे प्रग्रहणं कृत्वा प्रागेवचापसर्पति । मंछईनमितिप्रोक्तं क्षेमं सस्यपदं जने ॥ २२०॥ प्रहण का स्पर्श पूर्व में होकर पीछा मोक्ष भी पूर्व में ही हो तो वह मछर्दन नामक मोक्ष होता है। ऐसा मोक्ष हो नो जगन् में ओम कल्याण नया वेतियों की वृद्धि होते। जरण मोक्ष फल.- प्राक् प्रग्रहणं यस्मिन् पश्चादपमर्पणंतु तन्नरणम् । धुरसभयोदिग्ना न शरणमुपयांति तत्र जनाः ॥ २२ ॥ --

और
ग्रहण का स्पर्श पूर्व में होकर पीडा माक्ष पाश्रम में हो तो वह न.
रण नामक मोक्ष होता है । ऐमा मोक्ष हो तो जगत् में दुर्भिक्ष का कष्ट
युद्ध का भय होन मे लोग दुःखी हो जाते हैं।
मध्य विदारण मोक्ष फल-
मध्ये यदि प्रकाशः प्रथमं तन्मध्यविदरणं नाम ।
अतः कोपकरं स्यात्सुभिक्षदं नातिवृष्टिकरः ॥ २२२ ।।
ग्रहण के बीच में से प्रथम प्रकाश हो तो वह मध्य विदारण मोक्ष
होता है । ऐमा मोक्ष हो तो राजाओं के घर ही में उपद्रव, और वर्षा
साधारण होवे तथापि सुभिक्ष हो जावे ।
अन्त्य विदारण मोक्ष फल-
पर्यंतषु विमलता बहुलं मध्ये तमोऽत्पदरणाख्यम् ।
मध्याख्यदेशनाशः गारदसस्यक्षयश्चापि ॥ २२३ ॥
प्रहण के अन्त में प्रथम प्रकाश हो तो वह अन्त्य विदारण नामक
मोक्ष होता है । ऐसा मोक्ष हो तो मध्य देश को कठ और' शरद ऋतु में
उत्पन्न होने वाले चावल मुंग ज्वार आदि की खेतियों का नाश होवे ।
मोक्ष समय का धर्ण फल-
यथोत्साहं गृहीत्वा तु राहोनिष्क्रमते शशी ।
तदा क्षेमं मुभिक्षं च मदरोमाश्च निर्दिशेत् ।। २२४ ॥
ग्रहण के मोक्ष समय में मृर्य वा चन्द्रमा का विम्म निर्मल कान्ति
का तथा मोभायमान हो तो जगत् में क्षेम कल्याण नथा मुभिक्ष होवे।
.
काल फल प्रकरण।
एक ग्रहण में आगे होनेवाले ग्रहण का मासानुसार फल-
पण्मासात्मकृतिया ग्रहाणां वार्पिकम्भयम् ।
वा त्रयो दशमामानां पुररोषां समादिशेन् ॥ २२५ ॥

प्रचतुर्दशमासानां विन्यादाहन जम्भयम् । अथ पञ्चदशे मासे वालानां भयमादिशेत् ॥ २२६ ॥ षोडशानान्तु मासानां महामन्त्रीभयं वदेत् । सप्तदशानां मासानां महाराज्ञी भयं दिशेत् ॥ २२७ ॥ तथाऽटादश मासानां विन्द्याद्राज्ञस्ततो भयम् । एकोनविंशकं पर्व विशं कृत्वा नृपंवधेत् ॥ २२८ ॥ अतः परन्तु यत्सर्वं तचिनोति कलिं भुवि । सूर्य के ग्रहण से आगे फिर सूर्य का ग्रहण और चन्द्रमा के ग्रह- णसे आगे फिर चन्द्रमा का ग्रहण ६ । ६ महिनों से होने का स्वभावीक क्रम है परन्तु जिस देश में इस क्रम को छोड कर कोई भी ग्रहण हो ते यह प्रण उस देश के राजा के लिये अशुभ फलकारक होता है जैसे-प्र- थम के ग्रहण से आगे का ग्रहण १२ महिनों से हो तो जगत् में भय, १३ महिनों से हो तो किसी देश के राज्य के नग्र को शत्रुओं की सेना से घिर जाने का भय, १४ महिनों से हो तो वाहन से भय, १५ महिनों से हो तो राजकुमारों को भय, १६ महिनों से हो तो महा मन्त्रि को भय, १७ महिनों से हो तो महाराणी को भय, १८ महिनों से हो तो स्वयं राजा को भय और १९ वा २० महिनों से हो तो राजा को मृत्यु समान महान् क्लेश होवे । और इससे आगे चाहे जितने महिनों से ग्रहण होवे तो वे सब ग्रहण जगत् के लिये महान् अशुभ फल कारक होते हैं। छ मास से होने का फल- स्वर्भानुरिन्दुषष्टे तु मासे यापतिष्ठति । तदा क्षेमं मुभिक्षं च योगक्षेमं च निदिशेत् ॥ २२९ ॥ सूर्य का चन्द्रमा का प्रथम ग्रहण हो उस से आगे होने वाला ग्रहण यदि ६ मास से हो तो नगन् में क्षेम कल्याण आरोग्य तथा सुभिक्ष आदि शुभ फल हो होवे।

तेहेरे महिनों से होने का फल- मासि त्रयोदशे दृश्यो चन्द्राकों ग्रहणं गतौ । छत्राण्यनेकानि तदा भज्यन्ते नृपतिक्षय ॥ २३०॥ कालः शोकावह पुंसां देशाऽनेकविनाशनः । स्वचक्र परचक्रैश्च विनश्यति बहुमनाः ॥ २११ ॥ सूर्य वा चन्द्रमा का प्रहण प्रथम के ग्रहण से आगे १३ वें महीने में हो तो कई देशों में उपद्रव, अपने राज्य की वा शत्रु की सेना से प्रजा को कष्ट, और राजाओं की मृत्यु अधिक होवे । अठारह महिनों से होने का फल पदा त्वष्टादशे मासि राहुः सोममुपक्रमेत् । रसक्षयो व्याधिभयं विनाशः फलपुष्पपोः ।। २३२ ॥ सूर्य वा चन्द्र मा का ग्रहण १८ वें महीने में हो तो घृत तेल गुड़ खोड सहन आदि रमों का नाश, फल तथा पुष्पों की हानी और रोगों का उपद्रव होवे। चन्द्रमा का ५। ११ घ मूर्य का १७ महिनों से होने का फल- चन्दे पञ्चममासे तु मासे त्वेकादशे थवा । सप्तदशे वा सूर्यस्य ग्रहणं शुद्भपायतत् ।। २३३ ।। चन्द्रमा के प्रथम प्रहण मे आगे होनेवाला ग्रहण ५ वें वा ११ वें महीने में हो ऐसही सूर्य का ग्रहण १७ वें महीने में हो तो जगन् में नि. श्चय दुर्भिक्ष -अकाल का भय होवे। चन्द्रमा का ५ चर्को भीर मर्प का १२ वर्षों पीछे होने का फल- पंञ्चसंवत्सरं घोरं चन्द्रस्य ग्रहणं परम् । विग्रहं च पर विन्द्यात्सूर्यद्वादश वार्षिकम ! २३४॥ चन्द्रमा के प्रथम ग्रहण से आगे का महण यदि ५ वर्षों ( ६० म. हिनों) पीछे होते ऐसे ही सूर्य का प्रहण १२ वर्षों (१४४ महिनों)

पीछे होवे तो जगन में युद्ध महामारि आदि अनेक प्रकार के महान् घोर
उपद्रव हो।
एक मास में दो ग्रहण होने का फल-
यद्यैकमासे ग्रहणं भवेच शशि मूर्ययो ।
राजयुद्धं तदा ज्ञेयं क्षयं याति वसुंधरा ॥ २३५ ॥
एक ही महीने मे चन्द्रमा और सूर्य का-दोनों ग्रहण हो जावे तो
गनाओं के युद्ध, चोरों का उपद्रव, पाप कर्मों की वृद्धि. माधूओं को पीड़ा
और जगन् में अनेक प्रकार का वेश हो ।
एक पक्ष में दो ग्रहण होने का फल-
एक पक्ष मैं भडली दोय ग्रहण हुवन्त ।
माहि डोले छत्र पडे आई शाख गमन्त ॥ २३६॥
कदानित् उत्पान वशसे एक ही पक्ष में दो प्रण हो जाये तो जगत्
में भय, राजाओं को कष्ट और सेतियों का नाश हो।
चन्द्र ग्रहण के एक पक्ष पीछे सूर्य ग्रहण होने का फल-
सोम ग्रहे निवृत्ते पक्षान्ते यदि भवेद्ग्रहोर्कस्य ।
तत्रानयः प्रजाना दम्पत्योःरमन्योन्यम् ॥ २३७ ॥
चन्द्रमा के ग्रहण के एक पक्ष पीछे सूर्य का ग्रहण हो तो जगत में
अनेक प्रकार के रोगों का उपद्रव तथा स्त्री पुरुषों के परस्पर में वैर होवे ।
सूर्य ग्रहण के एक पक्ष पीछ चन्द्र ग्रहण होने का फल-
रविग्रहाच पक्षान्ते यदि चन्द्रग्रहो भवेत् ।
तदा दनिनो पूजा धर्म वृद्धिर्महोदयः ॥ २८ ॥
सूर्य के ग्रहण के एक पक्ष पीछे चन्द्रमा का ग्रहण हो तो यज्ञों की
वृद्धि माननीय पुरुषों का सत्कार धर्म का प्रचार और जगत् में आनन्द होवे ।
सूर्य चन्द्र और फिर सूर्य ग्रहण होने का फल-
रवि ग्रहणं प्रथमं कुर्यात् चन्द्र ग्रहण रविपुनः ।,
तदा च पटका योग रुण्ड मुण्डा च मेदिनि ॥ २३९ ॥

प्रयम तो सूर्य महण, फिर चन्द्रमा का ग्रहण और उस के पीछे फिर सूर्य का ग्रह्मा-ऐसे ३ प्रण कभी भी हो तो अनेक प्रकार के उपद्रवों से जगत् का नाश होवे। अतिवेला ग्रहण फल- अतिवेला गतं पर्व फलं सस्य विनाशनम् । मध्यछत्रं विनश्येत मध्यदेश उपनवः ॥ २४० ॥ प्रण होने का जो समय गणिन से निश्चय किया है उस समय पर न होकर उस से पीछे हो तो वह अति वेला प्रहण कहलाता है । ऐमा प्रण कभी होवे तो फलों का तथा खेतियों का नाश, मध्य देश के राना को क्लेश तथा मध्य देश के लोगों को उपद्रवों से कष्ट.होवे । हीन घेला ग्रहण फल- चेलाहीनं यदा पर्व शस्त्रकोप भयंकरः । स्त्रीणां च स्रवते गर्भो महाराज्ञां नुधिग्रहः ॥ २४१ ।। इसी प्रकार गणित से निश्चय किये हुवे समय से पहिले ही ग्रहण हो जावे तो वह होन वेला प्रहण कहलाता है । ऐसा ग्रहण कभी हो तो शस्त्रों का भय, महाराना को विग्रह और स्त्रियों के गर्भपात होवे। अति घेला हीन बेला ग्रहण होने में शंका- हीनातिरिक्तकाले फलं मया उक्तं पूर्वशास्त्र दृष्टत्वात् । स्फुट गणितविदां काल कदाचिदपि नान्यथा भवति ॥२४२॥ ग्रहण के अति वेला और हीन वेला का फल प्राचीन प्रन्थों में लिखा है किन्तु वराहमिराचार्य इस पर शका करते हैं कि जिसकी गणित सच्ची होगी उस के निश्चय कीये हुवे समय से आगे वा पीछे महण कदापी नहीं हो सकता। .

६१ अति घेला हीन चेला की शंका का समाधान- पूर्वाह्न वा पराह्ने वा वेलाहीनं तदुच्यतेः । मध्याने अति वेलास्यात् त्रयोवेला गुणाः फलम् ।। २४५ ॥ किसी ग्रन्थकारने मध्यान से वा मध्य रात्रि से पहिले होने वाले ग्र- हा को तो हीन वेला और मव्यान वा मध्य रात्रि में होनेवाले ग्रहण को अति वेला मानकर वराह मिहिराचार्य की उपरोक्तशंका का समाधान कराहै । उत्पात फल प्रकरण । मुक्त सप्ताहान्तः पशिनिपातोऽन्नसङ्ख्यं कुरुते । नीहारो रोगभयं भूकम्प प्रवरनृपमृत्युम् ॥ २४४ ॥ उल्का मन्त्रिविनाशं नानावर्णा धनाश्च भयमतुलम् । स्तनितं गर्भविनाशं विद्युन्नृपदष्ट्रि परिपीडाम् ॥ २४५ ॥ परिवेपो रुपीडां दिग्दाहो नृपभयं च साग्निभयम् । रुक्षो वायुः प्रवलश्चौरसमुत्थं भयं धत्ते ॥ २४६ ॥ निर्यात मुरचापं दण्डश्च शुद्भयं सपरचक्रम् । ग्रहयुद्धे नृपयुद्धं केतुश्च तदेव सन्धः ॥ २४७ ॥ ग्रहण का मोक्ष होने के बाद ७ दिन के भीतर२ आगे लिखे हुये नि- मित्तों के होने से प्रत्येक का पृथक् २ अशुभ फल होता है जैसे आंधी आवे तो अन्न का क्षय, धूहर पड़े तो रोगों का उपद्रव, भूकम्प हो तो श्रेष्ठ राना को लेश, उल्का गिरे ( नानावर्ण के तारा टूटे) तो राज्य म- त्रि का नाश, अनेक वर्ण के बादल हो तो बहुत भय, मेव गाने तो मेय के गों का नाश, विजलि चमके तो राना का नया सर्प शूकर आदि दोनों वाले जन्तुओं का भय, परिवेष ( सूर्य नन्द्र के कुण्डल) हो तो रोगों की पीड़ा, दिग्दाह हो ( चारों और बहुत तेलम्बी सन्ध्या फ्ले ) तो राना का तथा अनि का भय, रूक्ष वायु जोर में चले तो प्रबल चोरों का उपद्रव, निर्यात (विना बादल गाने ) तथा इन्द्र धनुष्य अथवा दंड का चिन्ह हो तो दुर्भिक्ष का भय नथा पराये रामा की मेना आने का उपद्रव और ग्रह युद्ध हो ( भोमादि शनि पर्यन्त ग्रहों में में कोई २ ग्रह आकाश में बहुत ननीक आवे ) अथवा केतुका उदय हो (धमकेतु वा चोटी वाला नाग दोन ) नो राजाओं के परम्पर गुह हो। अधिकृतसलिलनिपातः सप्ताहान्तः मुभिक्षमादेश्यम् । यञ्चाशुभ ग्रहणनं तत्सर्वं नागमुपयाति ॥ २४८ ॥ परन्नु ७ सात दिन के भीतर २ यदि पानी वर्प जाय तो उपरोक्त निमित्तों का नथा ग्रहण सम्बन्धी अन्य भी सम्पूर्ण अशुभ फले का नाम हो कर जगत में सुभिभ हो जावे । ग्रहण समय बादल वर्षादि ज्ञान प्रकरण । नवांश वा से धादि निर्णय- विभौमनवांशेत निरभ्रं ग्रासमादिशेत् । बुध सौरिनवांश तु मलिनं क्षुद्रवर्पणम् ॥ २४९॥ गुरोरंशकमासाद्य दृश्यते सवलाहका। शशिशुक्रनवांशे तु पावद् काले महांजलम् ॥ २५० ।। अन्यत्राव्यक्तभूतौ तौ श्यते छादिताम्बरौ । प्रहण सूर्य वा मंगल के नवाश में हो तो ग्रहण के समय बादल नहीं, बुध वा शनि के नवांश में हो तो बादल तथा थोडी वर्षा, गुरु के नवांश में हो तो बहुत बादल, और केन्द्र वा शुक्र के नवांश में हो और उस समय वर्ण काल हो तब तो कही वां और अन्य काल हो तो आ- काम बादलों मे ढक भावे इतने बादल होवे।

निमित्तों द्वारा वर्षा आदि निर्णय- यस्मिन्यक्षे तपनराशिनोः सहिके यावमर्द- स्तत्राप्टम्यां ग्रहण समयेन्वेपणीय पुरैवः । दृश्या दृश्यो यदि जलधरैर्यधदृश्याविनेन्दू छायाछन्नौभवत इहलो पर्वकालेपि तद्वत् ॥ २५१ ॥ जिस पक्ष में जिस समय ग्रहण होनेवाला हो उस पक्ष की अष्टमी को उसी समय अर्थात् सूर्य ग्रहण में तो कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन में और चन्द्र ग्रहण में शुक्ल पक्ष की अष्टमी की रात्रि में ठीक ग्रहण होने के समय पर जो बादल, वर्षा, वा निर्मल आदि जैसे निमित्त होंगे ठीक वैसेही निमित्त आगे प्रहण होने के समय भी होगे ऐसा जाने । मनुष्यादि को जन्म कर्मादि नक्षत्र फल प्रकरण । जन्म कर्मादि नक्षत्र निर्णय- जन्म:माद्यं दशमं च कर्म संघातिक पोडशमृक्षमावाद । अष्टादशं वै समुदायसंज्ञ भवेत्त्रयोविंशतिक बिनायाम् ।।२५२॥ यत्पञ्चविंशं खलुमान च पडर्स एवं मनुजस्नु सर्वः। विश्वभरेशो नवमः स्वजाति देशामिपेकोद्भवः प्रदिप्टम्॥२५॥ प्रथम तो जन्म नक्षत्र, जन्म नक्षत्र से १० वा कर्म, १६ या संघा- निक, १८ वा समुदायक, २३ वां विनाश, और २५ वा मानस-ये छनत्र मनुष्य मात्र है और राजाओं के जानि, देश और राज्याभिषेके ये तीन नक्षत्र अधिक होने में ना नक्षत्र मान है। जन्म कर्मादि नक्षत्र पर ग्रहण होने का फल- जन्मभे प्रतिहते तनुपीडा कर्मणा फलहतिर्दशमः । पोडो भवनि बान्धवपीहाष्टादशे तनुभृतां धनहानि ॥ २५४ ।।

माणिनाममुद्दतिश्च विनाशे मानमे विकलतामनसः स्मात् । जातिभे भवतिगोत्रविनाशो देशभे सकलदेशविनाश ।। २५५ ।। प्रपीडिते ससभिषेकधिष्ण्य भवेन्नृपाणां तनु देशपीडा । घोरापि पीडा प्रशमं प्रयाति स्नानैर्य तस्तानिततोभिधास्ये ॥२५६ प्रहण निम मनु के जन्म नक्षत्र पर हो उस मनुष्य के शरीर को पीडा, कर्म नक्षत्र पर हो तो कर्म में हानी, समुदाय नक्षत्र पर हो तो कु- टम्बियों को पीड़ा, विनाश नक्षत्र पर हो तो मित्रों का नाश और मानम नक्षत्र पर हो तो मन में विकल्पना होवे । और राजाओं के जाति के नक्षत्र पर हो तो गोत्र वालों को पीडा, देश के नक्षत्र पर हो तो देश का नाश और राज्याभिप के नक्षत्र पर हो तो राजा के शरीर को तथा देश को महान् पीड़ा होवे । परन्तु इन नक्षत्रों की शान्ति कर देने से इन सम्पूर्ण अशुभ फलों का नाश हो जाता है। जन्म नक्षत्र फल- यस्यप जन्मनक्षत्रे गृह्यते शशि भास्करौ । तस्य पुंसः प्रजायन्ते दुःखशोकाप मृत्पवः ।। २५७ ।। प्रहण निम के जन्म नक्षत्र पर हो उमको दुःख, शोक, नया अप मृत्यु का भय होवे। जन्म तारी तथा जन्म लग्न फल- यस्मिनराशौ विलग्ने वा ग्रहणं चन्द्र मूर्पयोः तज्जातानां भवेतीडा नराः शान्ति विवर्जिताः ॥ २६८।। पहाण जन्मराशि पर वा जन्म लय की राशि पर हो तो उम मनुष्य को रिमी प्रकार की पीडा होने परन्तु उम की शान्ति कर देने में फिर पीटा नहीं होरे ।

जन्मादि द्वादश राशि फल-- घातहानिमश्रियं जतनभाध्वस्ति च चिन्ताक्रमात सौख्यंदारवियोजनं प्रकुरुते व्याधि च मानक्षयम् । सिद्धि लाभपपायमर्कशशिनोः पण्मासमध्यग्रहो राशिनां समुदीरतेन विधिना ज्ञेयं हि सम्यक्फलम् ॥२५९॥ ग्रहण जन्म राशि पर हो नो घात, दूसरी पर हो तो हानी, तीसरी पर हो तो धन प्राप्ति, चौथी पर हो तो विश्वम, पांचवी पर हो तो चिन्ता, छठि पर हो तो सौख्य, , सातवीं पर हो तो स्त्री का वियोग, आठवीं पर हो नो रोग, नववी पर हो तो मान का क्षय, दशवी पर हो तो सिद्धि, ग्यारवीं पर हो तो लाभ और वारहवीं पर हो तो हानी ये फल ६ महिनों में होवे। अनिष्ट ग्रहण शान्ति प्रकरण । साधारण शान्ति- सिद्धार्थकुष्ट रजनीद्वयलोध्रमुस्ता लाजानकैः सफलिनीमुरामांसि युक्ताः । नानं हितं ग्रहणदोष विनाशनाय सर्वे ग्रहा रवि मुस्खा शुभदा भवन्ति ॥ २६० ॥ अनिष्ट ग्रहण की शान्ति के लिये सरसों, कूट, हलदी, अरु हलदी, लोद, लाजा, मफली, और मुरामांसी-इन ओपधियों को जल में डालकर उस जल से स्नान करने मे ग्रहण के अनिष्ट कारक अशुभ फल का नाश होकर सूर्यादि सम्पूर्ण ग्रह शुभ फल दायक हो जाते है । शान्ति की वि. शेष विधि ग्रहण पुण्य फल दर्पण नामक भाग में लिवेग । " ग्रहण श्रवण फल- शृण्वन्तिये पटगवं ग्रहणं रवीन्दो- भेदैरनेकवियुलै रुपपन्नमत्र । ते प्राप्नुवन्तिहरमस्तक सापूत गगावगाहन फलं विपुलं च लक्ष्मी ॥ २६१ ॥ पश्चाङ्ग में लिखे हुवे ग्रहण सम्बन्धी नाना प्रकार के भेदों सहित लों का विधान शृवण करने से गहा में स्नान करने के समान फल प्राप्त ना है और ग्रहण के निमित्त मे जगत् में होने वाली सुवृष्टि, अनावृष्टि, 'भिक्ष, दुर्मिन, तथा हरएक वस्तु की तेनी मन्दी आदि फेरफार को प हले से जानकर व्यापार द्वारा बहुत से धन की प्राप्ति भी सकती है। इति श्री मारवाड देशस्थ जोधपुर राज्यान्तर गन पाली नगर नि शिी पुष्करणा ज्ञातीय व्यासपदवी समलन श्रीमन्महीपर तनय नाना- स्त्र विचारणे मदा मम हृदय, ज्योतिर्विद वरिष्ठ 'प्राचीन ज्योनिः शास्त्र मी', 'देवज्ञ भूषग', 'ज्योतिप रत्न', आदि पण्डिन मीठालाल व्यास स- हीत "वृहदयॆ मार्तण्ड " नाम्नो महतो ग्रन्थादुघृत 'ग्रहण निबन्ध' मक चतुर्थ अंकस्य ग्रहण फल दर्पण 'नामक (१) माग आर्य भाषा टीका हिन सम्पूर्णम् ॥ 209 ॥ ईति॥

हमारे यहा की पुस्तकें ।
42000
वृष्टि प्रबोध(भारत का वायु शास्त्र)।
प्राचीन वृष्टि विद्या का भण्डार और सुभिक्ष दुर्भिक्ष को
पहिले से जान लेने का सहज उपाय । प्रथमवार की छपी सय
पुस्तकें बिक गई । अब दुसरी चार पहिलेसेभी विशेष उपयोगी
उपदेशों सहित छापी है। मूल्य वही रु. १) वी पी. से १३)
संक्रान्ति प्रकाश।
-
इस में सूर्य की १२ संक्रान्तियों का फलादेश बहुत विस्तार
मे लिखा है जिससे जगत्का शुभाशुभ फल तथा धान्य घृत
गुड़ वस्त्र धातु आदि हरएक वस्तु की तेजी मंदी ज्ञात हो जाती
है। ऐसी उपयोगी पुस्तक हरएक ज्योतिषी तथा व्यापारी को
पास रखनी चाहिये । भाषा टीका सहित मूल्य रु. १) पोटेज पी.
पी.माफ।
सिद्धान्त सार (पद्यपश्चाशिका)
जन्म पत्रिका का फल देखने में परम उपयोगी होने से प.
हिली धार की छपी सब यिक गई । तय दूसरी पार अधिक
उपयोगी धनाफर छापी गई थी पर इस फी भी अप थोड़ी पुस्तकें
रह गई है मूल्य भ) पोटेज ). पी. पी. से।)

उपश्रुति (सोई के शकुन)।
इस में पुरुष, स्त्री, बालक आदि के शब्द के शकुन पर से
सुभिक्ष दुर्मिक्ष तथा हरएक वस्तु को तेजी मन्दी एव लीलाम
के आंक फरक आदि का ज्ञान होने की विधि भाषा टीका सहित
है मत्य ) पोटेज ) बी पी. मे ।)
भवानी वाक्य (२०० वर्ष की मैकी)।
इसमें प्रत्येक वर्ष में होनेवाली वृष्टि अनावृष्टि, सुभिक्ष दुर्भिक्ष
आदि तथा धान्य, घृत तेल गुड, परियाना, कपास,
कपडा आदि की तेजी मन्दी लिखि है मूल्य ।) पोटेज माफ ।
पं० मीठालाल च्याम
यावर-राजपूताना ।

BHAVAN'S LIBRARY
This book is valuable and
NOT to be ISSUED
out of the Library
without Special Permission

Grana Fala Darpana

Author
Pandit Mitha Lal
Title
Grana Fala Darpana
File name
Grana Fala Darpana
Text
OCR done
Citation
1920
Published
2012/08
Publisher
Bombay,.shree Venkatesware Press.
Language
Sanskrit
Pages
84
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Classification
Devotional
DLI number
405752
Barcode
99999990292792.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
yXMerW4B2dp
Download PDF

Grana Fala Darpana