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Hindi Upnayas Parshth Bhumi Aur Parampara

Dr.badari Das · 2010/12

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हिन्दी उपन्यास
पृष्ठभूमि
और
परम्परा
डॉ.बदरीदास

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हिन्दी उपन्यास
पृष्ठभूमि
और
परम्परा
डा.बदरीपास

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हिन्दी-उपन्यास : पृष्ठभूमि
और परम्परा
[भागलपुर विश्वविद्यालय द्वारा पोनधि० डी० को
उपाधि के लिए स्वीकृत गोषप्रबधा
डॉ० बदरीदास
व्यान्थान
शोध अन्यो के प्रकाश
रामबाग,कान

:-
खान्थामा
३.०३.१
प्रकाशक
प्रथम रामबाग वानपुर-१२
मूल्य
२०००
प्रकाशन काल
अक्टूबर १९६६
आवरण-मुद्रक
मनोहर प्रिण्टिग प्रस कानपर
ग्रय मुद्रक
मानक प्रिण्टस आनत्बाग कानपुर-१

आभार-प्रकाशन मेरा शोध काय स्वर्गीय डा० धर्मेद्र ब्रह्मचारी शास्त्री को सम्मति स मआरम्भ होकर लगभग पांच वर्षों बाद १९६२ म भागलपुर विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हि दा विभाग के अध्यक्ष प्रा० श्री वीरेद्र श्रीवास्तव, एम०७० डी. लिट. विद्यावाचस्पति क प्ररणादायक निदेशन म सम्पन्न हुआ । १९६३ क माच म भागलपुर विश्वविद्यालय ने इस पर पी-एच. डा० को उपाधि प्रदान का । मैं अपन विद्वान निदेशक का आजीवन आभारी रहूगा । सवश्री शिवपूजन सहाय, व्रजरत्नदास दुर्गाप्रमाद खत्री और रामचन्द्र वर्मा से कुछ आवश्यक सूचनाए मिलरी । मैं इनका अनुग्रहीत हू । शोज के सिलसिले में सहायता तो अनेक पुस्तकालया से मिली पर सहायता के साथ सुविधा कवल नागरी प्रचारिणी सभा (वाराणसी) और चत्तण्य पुस्तकालय (पटना सिटी ) म प्राप्त हो सकी इसलिए उनक पाधिकारी मेरे विष घयवाद के पात्र हैं। जिन स्वर्गीय और जीवित लखकों के रचनात्मक या आलोचनात्मक माहित्य क आधार पर मैंन प्रस्तुत प्रब घ को रूप प्रदान किया उनक प्रति सम्मान प्रकट किए बिना रहा नहीं जा सकता। गोध-काय म थामती मणिमाला दास का अमूल्य सहयोग प्राप्त हुआ है । उहें फिन शब्न म ध यवाद दू? शोध-प्रयों क सुरुचि-सम्पन प्रकागाय 'प्रथम ने प्रव ध प प्रकाशन का भार रेकर मुझ उपकृत किया है। बदरी दास उपनिदाक, राजमाषा विभाग सचिवालय, पटना।

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क्रम आभार-प्रकाशन प्रस्तावना ९-२६ अध्याय १- पूर्व का कथासाहित्य २७-५२ २- उपन्यास एक नई कला ५३-९७ ३- ऐतिहासिक पीठिका ९८-१३९ ४- पूर्व इतिहास १४०-१७५ 1-प्रारम्भिक दशक १७६-२२० ६-- प्रतिनिधि उप यास-लेखक २२१-२६० ७- उपन्यासकारो के उप यासकार २६१-२९२ जासूसी उपन्यास के पिता २९३-३२४ ९- मूलधारा ३२५-३७४ १०- उपधाराएं ३७५-४२० ११- हिदी और अन्य भाषाओ के उपन्यास ४२१-४६० १२- अन्य साहित्य-विधाओ का योगदान ४६१-४८१ १३- पाठकगण ४८२-५०२ १४- विश्व-उपयास के आलोक मे ५०३-२१९ परिशिष्ट १- परीक्षण, सूची एव सूचना ५२०-५७८ २- पत्र और मुलाकात ५७५-५७८ आनुपगिक सहायक सामग्री २७९-५६३

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प्रस्तावना विवेच्य विषय हिती उप यास का इतिहास एक प्रकार से आधुनिक हिनी साहित्य का इतिहास है। वतमान काल गद्य-काल है और गद्य को विधाआ में उप पास अत्यधिक सम्पन्न एव लाप्रिय होने का दावा कर सकता है । उसन परम्परागत तथा नूतन साहित्य की बनक प्रवत्तियां आत्मसात कर ली है और रखको-पाठनों का विशाल परिवार बसाया है । उससे भापा को व्यजना शक्ति स्वच्छत गति और तरल नमनीयता मिली है । उसमे इतनी गति और सम्भावना है कि उसने नाटककार, कवि आलोचक एव पडित की प्रतिमा को भी आकृष्ट कर लिया है। उसके प्रति समीक्षकों की जसो रुचि और दष्टि रहनी चा िए वसा नहीं रही है बल्कि वे उसकी विपत उसकी पूर्व परम्परा की उपेमा करत रहे हैं। उप यास व्यक्ति को रचना हाते हुए भी जनता का साहित्य है और व्यक्तिगत प्रतिमा के साथ ही सामाजिक जीवन को देन है । उस उचित परि प्रक्ष्य म देखने के लिए यह बावग्यक है कि वह जिस पृष्ठभूमि म लिखा गया उस पर ध्यान रखत हुए उसके विकास की पूरी प्रक्रिया का निरपण किया जाय । प्रस्तुत प्रवप इस नियम एक मौरिस प्रयास है। मुविधा एव सर्गान के लिए इसकी परिधि हिसी उप पास ६ प्रथम चरण ता सीमित रही सीरिन का मापार पृष्ठभूमि और प्रवृत्ति को समानता है। भारतीय राष्टीयद्वारे विकास के समाना तर ही हिदी उप पास का विकास हुआ है। दोनों र विकास की प्रपम स्थिति में एकरूपता है । सामपिर परिवाम परि पान होने से रोकांच में परिवतन होता है और रचि-परिपतन साहित्य व १ हुआ। उसके ५ ग '१०] [[हिर्दी उपन्यास पष्ठभूमि और परम्परा स्वरूप में परिवर्तन उपस्थित करता है। प्रथम महायुद्ध 'तक उप यास लेसन रुचि-विप क अनुसार हुआ पर उसके बाद नई 'राष्टीयतो उन्य के साथ ही लाकरुनि में परिवतन हुआ जिसको प्रतिविम्व साहित्य म रिसाई पठा । उस समय प्राय सभी भारतीय भाषाओं के उप यास मनवयुग का आविर्भाव पूर्व लिखे गये हिदा उप यास विषय की दृष्टि से भिन्न होते हुए भी गिल्प और सर्वदना की दस्टिस एक 'हग कतिपय वरिष्ठ उप यास कार उन्नीसवी सदी स लिखना मारम्भ कर घोसवी सदी तक लिखते रह । में सवासदर्न को प्रकाशन' एक काल के अंत और दूसरे के प्रारम्भ का स्पष्ट संक्त है । अत प्रथम मौलिक उप यास मालती' के प्रकाशन काल स सेवासदन के प्रकानि काल तक यात १८ से १९१७५ तक हिदी उपन्यास को प्रथम चरण माना जा सकता है। सेवासदन' के पूर्व प्रेमच दै का एक उपन्यास 'प्रेमा' (१९३७) हिदी में प्रकाशित हो चुका था' किंतु यह पाठको और आलोचकों का ध्यान आकृष्ट फर ऐतिहासिक महत्व प्राप्त नहीं कर मया । क्याशिल्प की दष्टि में सेवासदन और 'प्रमी में लगभग उतना ही अतर है जितमा सवासदन और उसके पूर्ववर्ती उपायांसो म उसका प्रारम्भ और अदुत पुरान हग का है। । पारम्भ में वातावरण का घणन ईम प्रकार किया गया हैं 'सध्या का समय है । डूबने वाले सूय की सुनहरी किरण रगीन गोशों की आड से एक अगरेगी ढग पर सजे हुए कमरे में झांक रही है अन्तमप्रमच दम विधवायो का विवाह क्या कराया एक बला मलि लीहिदीयदीप मे बाल कृष्ण भटट न प्रमो का स्वागत इन शब्दो म' किया लिखन वाले न तो अपनी समझ म विधया विवाह की प्रथा के अनु मादन म से लिखा है पर सो नहीं विधवा विवाह की जीटा - इसम भले ही उडती है। इंडियन प्रेस ५ मालिक को चाहिए कि ऐसी पुस्तक गन छापा करें। वार कृष्ण भटट जैस स्वतंत्र विचार के लिखकै प्रेमा के विद्रोही स्वर का पहचान नहीं सके । वह प्रमाद की प्रथम कृति है जिसमें सर्वासदन की दिशा का निदा है। प्रमा सुमन को प्रत्यापित करती है। दोनोउप यास को समस्या नारी-परावीनता की समस्या है यद्यपि प्रमा मे वह विधवा विवाह की समस्या का अंग है और सवासदन में वेश्या समस्या का। प्रेमा मे प्रमचदको रचनात्मक प्रतिमा विगेपत्त चरित्र निर्माण वणम चार T र सिद्ध नहीं मे - - प्रमावना]] [११, पक्ति और कहानी-कला म प्रस्फुटित हुई है। फिर भी, यह स्वय, कुछ अपूगता का अनुभव हुआ और उन्होंने उस्का पूण, सशोषित रूप मतिना' नाम से प्रमाणित किया। इस तरह वह युगा तरकारी, उप यास हो सका। जब १९१६ सेवासदन का प्रकाशन हुआ, हिदी-ससार धूम मच गई । हिन्दी-उपन्यास का मानो दूसरा जम हुआ और वह यूरोपीय उपयास के तुल्य माना गया । प्रमच दा का प्रयम मौढ उपयास हिदी को सर्वोत्तम समस्यामूलक उपन्यास बन गया । डा० श्यामसु दर दास के कथना नुसार 'हिंदी उपन्यास क्षेत्र में प्रमय द की रचनाओ ने युगान्तर उपस्थित किया। हिन्दी वालों ने उनके महले मौलिक उप यास सेवासदन' का उतावली के साथ स्वामत क्रिया और प्रमोश्रम निकलते ही वे हिंदी के सर्व श्रेष्ठ उप यासकार कहलाने लगे " युपान्तर उपस्थित करने का श्रेय प्रमा को नहीं समासदन' को है अतर हिन्दी उपन्यास के काल-विभाजन की रेखा उसम निहित है । यदि प्लेमत्र द को मध्यविन्दु मानकर काल-विभाजन किया जाता है तो प्रेमबर्द-काल का आरम्भ 'प्रेमा' से माना जाना चाहिए। सेवासदन के प्रकाशन के साथ गुगातर क्यो बौर बसे हुआ इसे समझने के लिए उसके ऐतिहासिक एव साहित्यिक महत्व का आकलन आव श्यक है । उन्नीसवी वादो के प्रतिम दशक में तिलिस्मी-ऐयारी और जासूसी-उप यासो की जा धाराए फूटो वे बीसवी मातादी के प्रथम दाक म विशाल बन गइ । -सवासदन ने उनका बर और वेग फीका कर दिया। जो उप मास वक्त कावने के लिए पढ़ते थे वे लोकप्रिय उप्रयास के गोकोन ता ही साहित्यिक उप्रत्मास:म भी मनोरजन की सामयी ढूढ़ते थे । कुछ लोग तिमा ग्रहण करने के रिए, उप यास का अध्ययन करते थे और उसम साम यिक । विचार का दान करना चाहते थे ।, सेवासदन ने दोनो की मांग पूरी की। उसम पुराने और नप कया-तत्वा, का समय इस कोल •स किया. यया या बिभिन्न रुचि के पाटक इससे प्रभावित हुए विना नही रह सके ! उसने हिन्दी-उपयास की परम्परा कायापक प्रतिनिधित्व किया। देदकीमदन पत्री ने पाठको को सख्या बढ़ाई थी। प्रमच न सस्या के साथ- साय, श्रेणो बहार लोरर्सच का सस्कार दिया। जहाँ तक अनूदित उपयासा । कम प्रश्न है भारतेहुनाल में उनका स्तर जसा ऊँचा था वसा द्विवेदी-वाल में नहा रहा। सवामन के कुअर साहब न कहा या रिअनुवास १२] [हिदी उप यास पाठभूमि और परम्परा मिलता। हि दी का अपकार हो रहा है । मौलिकता को पनपने का अवसर नही प्रमचद ने अपनी अनुपम मौलिक सप्टि स हि दो-उप यास का बगला की गरदश्रु भावकता एव कृत्रिम समास पदावली से मुक्त कर अपने पात्र की चिता दूर कर दी। उहोंने डार्विन और भाक्स की भांति देश विदेश के कथासाहित्य का रसास्वादन किया था । पराण से लबर तिलिस्म होगवा तक ये चाद गए थे। जो सभी ढग के कयासाहित्य का अध्ययन करता है उससे अच्छे बरे की परख म भूल हो सकती है। पर प्रमचद ने तिलिस्म होगरवा के मादा का अनुसरण नहीं किया । उन्नीसवीं सदी के महान यूरोपीय उप यास कार तथा सरशार रवीन्द्र देवकीनदन खत्री आदि भारतीय उप यासकार उनके प्रिय रेखक थे। पर उ होने उनम से किसी का कुछ अनुकरण या अपहरण नहीं किया। वे उपयास और उसकी बालोचना का अध्ययन मनन करने से उसकी क्ला से परिचित हो चुके थे। उनके गहरे अध्ययन म उनके जीवन पायापक अनुभव मिल गया था । उनम जन्मजात उपसास मार की प्रतिमा थी । फलत हिदी को सेवासदन' की विभूति मिली। वे सजग कलाकार थे। उन्होंने हेनरी जेम्स कोनराड, पलावेय और ज्वायस के समान उपयास को कला के रूप में ग्रहण किया और उस कला का चरम रुप प्रदान किया यद्यपि उनकी कला कला के लिए नही थी। सेवासदन का आरम्भ ही उसकी विशिष्टता का द्योतन करता है। पश्चाताप के फड ए फल कभी न कभी सभी को चखने पड़ते है लेकिन और लोग बुराइयो पर पछताते हैं दारोगा कृष्णचद्र अपनी भलाइयो पर पछता रहे थे ।' यह भारम्भ प्रमा के आरम्भ से सवथा भिन्न है। यहाँ पराने उप यास की भांति न तो प्रकृति की पृष्ठभूमि सजाई गई है और न पात्र को मनाम एव अपरिचित रखा गया है न ही वस्तु और पात्र का वास्तविक परिचय कई पष्ठा के बाद दिया गया है । यहाँ पात्र की शारीरिक रूपरेखा के बदले मानसिक दगा का वणन किया गया है । दारोगा कृष्ण बद्र आरम्भ में ही पछताते दिखाई पड़ते हैं और वह भी बुराई पर नहीं भलाई पर जबकि उनके पूर्वज अत में पछताते थे और बुराई पर पछताते थे। सेवासरन के पान उलटने पर आगे क्या होगा यह जिज्ञासा न होकर • ऐमा क्यों हुआ यह विचार मन म उत्पन्न होता है । पाठक जसे बसे आगे प्रस्तावना] बढता है महसूस करता है कि यह परम्परागत उपयास को पीछे छोड [१३ सेवासदन के युगा तरकारी होने का अब यह नहीं है कि उसके पूर्व उप यास मे जडता थी और प्रमच द के आगमन के साथ ही उसका कायाकल्प हो गया । वस्तुत सेवासदन के पूर्व ही परिवतन की प्रक्रिया आरम्भ हो गई थी। १९१४ १८ के बीच प्रकाशित होने वाले कुछ उपायासो म नवीनता की आभा फूटने लगी थी। १९१३ मे देवकीन दन खत्री का स्वग वास हो चुका था। विशारीलाल गोस्वामी और गोपालराम गहमरी अपने पथ पर अटल थ । उनसे अलग होकर कुछ उप यासकार नई भूमि गोड रहे थे । इह आधुनिकता का अग्रदूत कहना प्रमच द के ऐतिहासिक महत्व का अस्वीकार करना नहीं है । परिवतन वा प्रथम चिह्न मनन द्विवेदी के राम लाल (१९१४) म स्पष्ट है । उसम पहली बार ग्राम्य जीवन का यथाय मोर पूण चित्र अकित किया गया। लाला भगवानदीन को अघट घटना (१९१४) देशी रजवाडो का वास्तविक रूप दिखाने वाला पहला उप यास है । छबीलेलाल गोस्वामी को जावित्री (१९१६) शिल्प की दष्टि स नया प्रयोग है । अवधनारायण ने विमाता (१९१५) म सवप्रथम साहित्यिक एव लोकप्रिय उपयास की विशेषताओ का सफलतापूर्वक सग्निवेश किया। यह अनुमान करना गरत हागा कि प्रमचद के विना हि दो-उपयास का इतिहास दूसरा होता । वे सेवासदन लेकर नहीं आते ता भी परिवतन अवश्य होता हो उसम विलम्ब हो सकता था या उसकी दिशा बदल सकती थी। हिंदी-उप यास का यह सौभाग्य है कि प्रमचर परिवतन के माध्यम एव प्रतीक बने और न केवल हि दी है बल्कि भारत के मूधन्य उपयास पार बने। वे परम्परा से अलग होकर किसी दूसरी दिशा म नहीं मुह ये बल्कि उसे ही नया मोड दने म सफल हुए थे । दूसरे रागे में, सेवासदन पुराने भवन की ही एक नई मजिल पी। नूतन म पुरातन क्सि रूप म विद्यमान है यह सेवासदन मोर देवकीनन्दन खत्री की पाजर को कोठडी' पर तुर नात्मक दृष्टि डालन से स्पष्ट हो जाता है। इस उपपत्ति से प्रमपद की पसा एव व्यक्तित्व की अवमानना नहीं होती है स्वाभाविक विकास कम पा परिचय मिलता है। उनकी अमर कृति हिदी उप यास के इतिहास की एक विशिष्ट अवस्था मूचित करती है उसकी अगति या अनस्तित्व नहीं। इस - ३ 1 । r । १८ १४] हिंदी उपन्यास पठभूमि और परम्परा सरम पर इस तरह परदा डाल दिया गया है कि लगभग अधशतीका उप यास साहित्य अकार में पड़ा हुआ है। उस पर गम्भीरता' और विस्तार स विचार करत का प्रयत्न नहीं किया गया है। उसबै सम्बध में चरते चारित " कह दिया गया है या वही हुई बात का दुहराया गया है। इस प्रकार की, भ्रामक , धारणाओ, मिथ्या आरोपी और निराधार बना कर निराकरण हाना चाहिए । दृष्टिकोण अनेक पुराने उप यास पुस्तकाकार प्रकानित न होवर समसामयिक मथ परिकाओ की ज़िल्दो म दवे पड़ हैं । कुछ उप यामी को मौलिकता घोर रचना काल दिग्ध तथा अनिश्चित है तो कुछ अपूर्ण ही हैं। उपल ध सामग्री के निरीक्षण परीक्षण तथा दुलभ, सामग्री के अवैषण के उपरान्त चौदह अध्यायो,म अध्ययन प्रस्तन किया गया है। प्रत्यक यध्याय का विवरण दिया जाता है। किसी भी माहित्य रूप की उत्पत्ति आकस्मिक घटना नहीं होती है वल्कि उसके लिए पहल स हो भूमि तयार होती है । उपन्यास के 'विकसिात्मक विवेचन के, लिए, उसके पूर्ववर्ती क्यासाहित्य का परिचय अपेक्षित है। सस्कृत, प्राकृत एव, अपभ्र व गद्य-पद्यमय क्या साहित्य की भूमिका देनी अनावश्यक हो नही आपत्तिजनक भी है क्योकि उप यास आधुनिक सभ्यता का साहित्य रूप है जो उसक समान ही पश्चिम से आया है । अत 'प्रथम अध्याय में प्राचीन भारतीय कथा परम्परा का परिचय नहीं दिया गया है । उपन्यास गद्यक्या है । इसके अध्ययन के लिए यह जानना आवश्यक है कि इसके पूर्व गद्य म कसी, कथाए, लिखी गई और यह उनका माध्यम स बना । अंत हिन्दी की पुरानी गद्यकथा के विकास और स्वरूप पर विचार किया गया है । उसक आलोक म उप यास की प्रवृत्तिया को समझने में सहायता मिलेगी और यह ज्ञात हो सकेगा कि यह उससे कहाँ तक भिन्न और कहा तक प्रभावित है। दुसरे अध्याय मे देश विदेग मे उपयर्यास के उदय और उसके करी हमक शिष्ट्य का निरूपण है । आलोचकों न पुराने उप यास की सोद्देश्यता - पर सबसे अधिक और कला पक्ष पर सर्वस कम ध्यान दिया है । इस अध्याय ..म पुरानी कथा-परम्परा से उपयास को तलना करते हुए उसका तात्विक विवेचन किया गया है। इससे उसकी कला का सामाय नान होता है और - प्र । [१५ । यह भ्रात. पारण दूर होती है कि प्रारम्भिक उप यासकार गिल्प के प्रति सजग नहीं थे। इसमे उपयास की परिभाषा और उसके सम्बध में उसके -- रचयिताओ के दृष्टिकोण पर भी प्रकाश डाला गया है । जिन परिस्थितियो म उपन्यास की रचना हुई उनको रूपरेखा तीसरे अध्याय म दी गई है । साहित्यिक इतिहासो और शोध न यो मे ऐतिहासिक पीठिका प्राय निरपेक्ष रूप से दी जाती है जो बहुधा इतिहास की वस्तु वन जाती है । प्रबघ म बाह्य प्रभाव के स्रोत और स्वरूप का विवेचन करते हुए यह दिखाया गया है कि उप यास सामयिक सत्य को कहा तक प्रतिविम्बित कर सका है। । प्रथम, आधुनिक उप यास के दो दा पूर्व अनुवादो और मौलिक प्रयोगो के रूप मे प्रयास की रचना होन लगी थी । इस तथ्य का अवेषण नहीं किया गया है । चौथे अध्याय म कई पूर्ण-अपूण ज्ञात अज्ञात रचनाओ का परिचय दिया गया है, जो हिदी उपन्यास का 'विकास म खासकर प्रारम्भिक उपायास का विकास प्रम जानन के लिए उपयोगी है । हिदी उपन्यास का प्रारम्भिक दशक भारतेंदु-काल के मतगत आता है उसकी अपनी विशपता और अपनी दन है। उसक एतिहासिक महत्व को देखते हुए उसके लिए पांचवा अध्याय सुरक्षित कर दिया गया है । बार सीमा परीमागुरु (१८८१) और चकाता (१८९१) आधार पर निधारित की गई है क्याकि प्रथम स हिंदी उपन्यास की परम्परा आरम्भ होती है और रितीय के प्रकाशन से उसम नव परिवर्तन हाता है । ५० रामचन्द्र शुक्ल द्वारा निर्धारित प्रथम उत्यान का काल (१८८ -९३) भी लगभग यही है। - गिरोराल गोस्वामी दवकीनदन सत्री और गापार राम गहमरी एप पर उनीसवीं सदी म और दूसरा पर बीसवी सदी म रसार संड हैं। ये आलो यकाल में प्ठ और सामा य लेखक हैं । हिला उप यास व इतिहास म इनका स्थान चतुरसेन नास्त्री भगवतीचरण वर्मा और इलाचद्र जोगी जसे लसकों स अधिक चा है। य विगिय काल क ही नहीं प्रमुख धाराओ १ भी प्रतिनिधि है । तीन हिदा उपयास को नया स्तर और आयाम प्रदान दिया है उसी प्रकार जिस प्रकार प्रमच द जनद्र और यापार न किया है। ये अपन-अपन पत्र और अपन युग को अद्वितीय प्रतिभाएं हैं । इनम म प्रत्येकन उपयास की जिस परम्परा का प्रवतन प्रतिनिधित्व और पापणा पिया है वह उन बाद भी जीवित रहा और उसम कई पस्वी रसा हुए।

१६] [हिदी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा व्यक्ति परम्परा का वाहक होता है और परम्परा व्यक्ति म जीवित रहती है। इसलिए विशिष्ट लखक का अध्ययन प्रकारातर स परम्परा का अध्ययन है। गोस्वामी खत्री और गहमरी क कृतित्व और कला की मीमासा के बिना हिदी-उप यास की उपलधि का सही मूल्याक्न सभव नहीं है । छठ, सातवें और आठवें अध्याया म इनका विगए अध्ययन किया गया है। इनके जीवन वृत्त का उपयाग उसी सीमा तक विया गया है जहाँ तक वह इनकी रचनाओ की व्याख्या में सहायक होता है। इनके पारिवारिक सामाजिक और साहित्यिक परिवेश में इनके जीवन और रचनाओ में सम्बध स्थापित किया गया है । जीवनी पर ज्यादा जोर देन स आलोचना रब जाती है। अनक महान रेखको के बावजूद हिदी उप पास के इतिहास में यक्ति की अपेक्षा प्रबत्ति का अधिक महत्व है । यह वात आलाच्यकाल के सम्बध में विगेप स्प से सत्य है । साधारणत यह धारणा प्रचलित रही है कि एस काल में मूल धन के नाम पर केवल तिलस्मी ऐयारी उपयास है अयथा जो कछ है वह बगला और अग्रजी का उधार या जूठन है । प्रब घ में मौलिक और अनूदित रचनाओ पर समान रूप से विचार किया गया है ताकि सत्य पर प्रकाण पर और हिती उप यास + स्वतत्र यक्तित्व का उदघाटन हो । मौलिक उपयास की विविध धाराओ का विकास दिखाने में उनके उटगम तक जाने का प्रयास किया गया है और सामा य विशेषताओ एवं प्रतिनिधि रचनाओ पर विशेष दष्टि रखी गई है । सामाजिक उप यास की धारा की प्रधानता ध्यान में रखकर उसका पृथक विवेचन नवें अध्याय में किया गया है । और उसमें उपयास लेखिकाओ के अशदान का आकलन विशेष रूप से किया गया है। अन्य धाराओं का भी अपना महत्व है और लोकप्रियता की दृष्टि से तो व अतिरिक्त सहानुभूति की अपेक्षा रखती हैं। उनको समीक्षा दसवें अध्याय में की गई है। ग्यारहवां अध्याय हिंदी और अय भाषाओ के उप यास का सम्बध दिखाते हुए समकालीन भारतीय उपयास को एक्ता तथा हि दी और बगला उपयासा को विभिन्नता स्पष्ट करता है। बारहवें अध्याय में यह दिखाया गया है कि उप यास क रूप विधान में लिखित और अलिखित साहित्य का क्या यागदान रहा है । यह अध्याय 1 प्रस्तावना] [१७ प्रबध का प्रमुख साहित्यिक पृष्ठाधार है । उपयास के वास्तविक पाठक साधारण जन हाते हैं। नय रखक रेखकों क रखक हैं पुरान रेखक पाठ' क ख थे। विवच्य कार में लेखकों और पाठका में जा सम्पक था वह आज नहीं है । इम काल व उप यास का काई भी अध्ययन तब तक पूर्ण नहीं कहा जा सकता नब तक जिनक लिए वह रिखा गया उह ध्यान में न रखा जाय । तरा अध्याय में इस तथ्य पर ध्यान दिया गया है। अतिम अध्याय म विवच्य उपयास का मूल्याक्न विश्व उप यास + सदभ म दिया गया है। विषय के प्रतिपादन म पप्ठभूमि और परम्परा पर विशप ध्यान दिया गया है तथापि यह चेष्टा का गई है कि उसका काई पक्ष अछूता न रहे । शास्त्रीय एतिहासिक व्याख्यात्मक एव समान शास्त्रीय आलाचनादों का आश्रय रते हुए प्रवत्ति लखक और रचना पर समान दष्टि रखी गइ है । प्रयास यह रहा है कि अनुशीलन म तथ्य और तत्त्व का समवय हो । इस विवचन-पद्धति स पान क्षितिज का विस्तार कहाँ तक होता है इसका आभास अध्याया क उक्त विवरण स मिलता है । यदि इसस हमार साहित्य और मस्कृति व सजाव अग उपयाम का अध्ययन कुछ भी आग वर समा ता सताप की बान हागा । हि दो म बमा तक उसक सिद्धातो का स्थिरीकरण नहीं हुआ है न ही उसकी समी ता समद्ध हुई है । विवच्य कार पर विशप ध्यान रखकर उपयास मालाचनात्मा साहित्य का सर्वेषण करना अनावश्यर नही हागा । उपयास विषयक आलोचना उपयास साहित्य की नई उपज हात हुए ना काव्य और नाटक का रग पीका कर चुका है पर काय और नाटक की आलाचना म उसकी माला चना का स्तर कचा नहीं है । इसका एक कारण ता यह है कि वह अपक्षया नया है। दूसरे वह बहुत दिनों तक साहित्य जगत म उपमित रहा । फिर उस मनोविनाद की वस्तु मानन का स्वाभाविक परिणाम यह हुआ कि उस गभीर अध्ययन का विषय नहीं बनाया गया । यह भी उल्लखनीय है कि काय और नाटप की भारताय परम्परा हिदी म अभा है कि तु उपयास प िचमकी दन है । मन उसा रिए भारतीय साहित्य शास्त्र उपयागा नहीं हिदी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा हो सका । पाश्चात्य साहित्य की परख के लिए पाश्चात्य आलोचना का मानदड उपयुक्त है यद्यपि उसकी भी २७ सीमाए हैं । उपन्यास का रूप इतना नमनमोल है कि उसे सुनिश्चित और सदढ़ नियमो क बधन म आबद्ध करना कठिन है। पत्र-परिकाओका अशदान যায় বিষ ঋন্তান হ বুখঘার যত্নশক্সিমাম সাদির निवधा से हुआ । हरिश्चन्द्र पद्रिका और माहनचन्द्रिका' (जुलाई १८८१) का नाटक वा उप यास शोप लघु रुष अपयरस पर विचार करने का प्रथम प्रयास है २० बालकृष्ण भटट कर उपायास (हि दो पदीय जनवरी १८८२ ) एक उप यासकार द्वारा उपमास पर लिखित पहला यारोचनात्मक निबध है जिसम विचार को निष्पक्षता और विवेचन की मौलिकता है । भटटजी को मा यता है कि उप पास अग्रजा ही भाषा का एक अग है। उप पास पर सामायत लिखित ऐस निबंधो के बाद वनमान ता दी के आरम्य म बम्बई पलकत्ता और पानी के कुछ प्राता म कुछ विनिष्ट उप यासा का लेकर साहित्यिक विवाद हुमा ना अनजान म समालाचना का रूप धारण करन एगा। बेपटेश्वर समाचार और भारतमित्र न देवकी नदन खत्री की पथावस्तु का समवता और अश्लीलता पर निमम आप किया। समालोचक ने खत्रीजी वो ऐयारी के साथ साथ विगोरीलाल गोस्वामी को सिमता का उपहास रिया र सुदशन सपादक माश्य प्रसाद मिश्र न खत्रीजी के आलावा श्वल प्रतिवाद करते हुए उनक पप म जो रछ लिम्बा उससे उपन्यास के अनक अगों पर प्रकाशन । उनक विचार से उप "यास का मुख्य गुण विचित्र घटना है। उपन्यास के साथ ही उसकी आलोचना का विकास होता गया। महावीर प्रसाद द्विवेदी के सपादन-काल के उपरात सरस्वती म उपयाय विषय उत्कृष्ट निषध बराबर निकलते रह । द्विवेदीजी न स्वय उपवास रहस्य ('सरस्वती १९२२) म उपयासकार के सामाजिक दायित्व पर बल देकर लिखा कि 'उप पास जातीय जीवन का मुकुर होना चाहिये । प्रम चद के दो निवाघ 'उप यास रचना (माधुरी २७अक्टूबर १९२२ ) और उप यास' (साहित्य-समालोचन, १९२५) किसी पुस्तक मे माहीत नहीं प्रस्तावना] [१९ हुए हैं। प्रथम निबघ उपयास का विशद तात्त्विक विवेचन और दूसरे में हिदी उप यास विकास की सक्षिप्त रूप रेखा है । पायो मे पुस्तक परिचय के रूप में भी उपयास की समीक्षा की जाती थी । समाक्षक प्राय सम्पादक होते थे। वे किसी कृति के गुण-दोष का उल्लेख कर देना आवश्यक समझते थे और घटनाओ को अस्वाभाविकता और भाषा की अशुद्धि पर पनी दष्टि रखते थे । उप यास को कला की अपेक्षा उपयोगिता की क्सौटी पर परसना उह प्रिय था। जब साहित्य जगत मे उप यास की महत्ता प्रतिष्ठित हुई, पन पनि काओ म उसकी चर्चा विशेष रूप से होने लगी। साहित्य स देश और 'आलो चना' क उपायास विशेपाक क्रमश १९४० और १९५४ मे निकले । प्रथम विशेषाक में देवकीनदन खत्री, किशोरीलाल गास्वामी और गोपाल राम गहमरी के सक्षिप्त परिचय के अतिरिक्त कुछ उपयास लेखको के पत्र भी हैं । आलोचना' के विशेषाक म न ददुलारे वाजपेयी विजयशकर मल्ल, श्वम्भर मानव बच्चन सिंह और नरोत्तम नागर के निवधा को छाडकर "प जितन निवध हैं उहे दुवारा पढन की जरूरत नहीं। आचाय वाजपेयी ने प्रमच द के पूर्व के उप यास पर एक सूक्ष्म दृष्टि डाली है और प्रो० मल्ल ने उसका साहित्यिक मूल्याकन सामाजिक परिपाश्व मे 'कया है । बच्चनजी ने उप याम और मध्यवग के विकास मे सम्बघ दिसाकर नवीन स्थापना की है । नागरजी के फुटपाथ के उप यास म तिलिस्मी ऐयारी, जासूसी और साहसिक उप यासों की विकास रेखा है। निबंध-सग्रह आगेच्यकाल के अध्ययन की दष्टि से हिली साहित्य सम्मलन की रेखमाला म सालित गोपालराम गहमरी का नाटक और उप यास (प्रथम हि० सा० स० काय विवरण दूसरा भाग ) और लक्ष्मण गोविद आठले का हिदी भाषा में उपयास' (सप्तम हि० सा० स० लेखमाला १९१७ ) उल्लेखनीय है । गहमरीजी ने सैद्धातिक और आठलेजी ने ऐतिहासिक पण पर प्रकाश डाला है । डा. नगेद्र ने अपने छोटे विन्तु सुदर निवध हिंदी विचार और अनुभूति' ) म स्वप्न के माध्यम से प्रतिनिधि उप ‘यासकारो द्वारा अपनी कृतियों पर विचार प्रकट करवाया है । याधुनिक साहित्य के ममम पापाय नन्ददुलारे वाजपेयी ने 'माधुनिक साहित्य (१९५०) सपास २०] [हिती उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा और नया साहित्य नय प्रश्न (१९५५) म आधुनिक उप यास की अनेक समस्याओ का विवेचन कर उसका आलाचना का नया आयाम प्रदान किया। विशिष्ट कृतिया एव कृतिकारा र अनुगीलन म उन स्वतत्र चितन एव मापक दष्टिकोण को छाप है। आचाय नलिनविलोचन गर्मा के हि दो उप यास (हि दी गद्य की प्रवत्तिया ) स उसकी प्रवृत्तिया को समझने म जो सहायता मिलती है वह इस विषय पर लिखित किसी एक पुस्तक से क्दाचित ही मिलेगी। साहित्येतिहास आलोच्यकालान उप यास के मिश्रबच रामचन्द्र शुक्ल, अयोध्यासिंह उपाध्याय रामशर शुक्र वृष्णाकर शुक्ल, रक्ष्मीसागर वाष्र्णेय पीकृष्ण लाल और हजारी प्रसाद द्विवेदी के इतिहास उपादेय हैं । मिथव धु विनोद अमूल्य माकर प्रय है । रचनात्मक समाक्षा के पिता आचाय एक्ल की अभि रुचि या सहानभूति उप यास की मार नहीं थी पर उसके सम्बध म उ हाने जो कछ लिखा है उसका एक एक शद अयपूर्ण है । स्वय उप माम लखक होकर भी हरिओघ जी उसका विस्तत विवचन नही कर सके तथापि उनक प्रतिपादन म मौलिकता है। डा रसाल ने अपने ढग से उपयास लेखको का परिचय दिया है। प० कृष्णाकर गक्ल को मीमासा म सूक्ष्मता साथ स्पष्टता है । डा० वाष्र्णेय न उन्नीसवी तादी उत्तराध के उपयास के विषय और रूप विधान का अध्ययन प्रस्तत किया है । डा. लाल ने १९०० २५ के उपयास के कला म्प क्था गली और कोटि क्रम का विकास विल क्षण रीति से दिखाया है। डा० वार्ष्णेय म वनानिक तटस्थता है डा० लाल म विलेषणात्मक आग्रह मोघ म दाना का समान महत्त्व है। आधनिक उप “यास के सम्बध म जो कुछ कहना आवश्यक था वह डा० द्विवेदी ने अपनी निमल गाली म कह दिया है । डा० रामविलास शर्मा का भारतेन्दु युग भी इतिहास है जिसम न केवल भारतेंदयुगीन उप यास की विशेषता का उदघाटन हुआ है बल्कि उप यास के अध्ययन को नई दिशा मिली है। विशिष्ट आलोचना उप पास पर विगप रूप से लिखे गए आलोचना प्रथों के नाम अग लिया पर गिन जा सकते हैं । रघवीर सिंह का सप्तदीप (१९३८) इस प्रकार का प्रमुख ग्रथ है जा प्रभावाभियजा होने के कारण आलोचनात्मक के साथ प्रस्तावना] [२१ मूल्य नही रखता । तारा करपाठन ने 'हिनी के सामाजिक अयास (१९३९) मे आलोच्य काल के बाद के कुछ प्रतिनिधि उप यासकारा पा परिचय दिया है। शिवनारायण लाल श्रीवास्तव ने हिदी उप यास' (१९४०) लिखकर सवप्रथम ऐतिहासिक और व्याख्यात्मर आलोचना पद्धतिया का समवय किया और एक महान अभाव की पूर्ति को । विनोदार ध्यास की उपयास-कला' (१९४१) विदेगी और भारतीय उप यास का परिचय देती है । गगा प्रसाद पाण्डय का 'हि दी क्या साहित्य' (१९५१) कतिपय कयाकारो के साहित्य को निणयात्मक आलोचना है । पदुमलाल पुग्नालाल बनी क्या साहित्य के प्रथम आधुनिक समालोचक हैं। आधुनिक कथासाहित्य' (१९५४) उनके पुराने-नये निवघो पा सकलन है, जिसम व्यक्तिगत रुचि से गम्भीर समीक्षा मिल गई है । पजरत्न दास ने हिदी उप यास साहित्य (१९५६) में उपन्यास-क्ला और प्राचीन कथा-परम्परा पर विस्तार से विचार करते हुए हिदो उप यास का ऐतिहासिक दष्टि से अध्ययन किया है और प्रारम्भिक उप यासकारो को अपेक्षित पृष्ठ दिए हैं । विभवन सिंह का हिदी उप यास और पपायवाद (१९५५) एक अभिनव प्रयास है। सिद्धात उपयास के सातिक प्रश्न पर पहली पुस्तक प० अम्बिकादत्त पास भी गद्यकाव्य मोमासा (१८९७) है। विद्वान रेसर ने नई दष्टि से पुरानी यस्त का देखा इसलिए उह सस्कृत गद्ययाय मे कपारस नही मिला और पुरानी दष्टि से नई वस्तु को देखा इसलिए उनके अनुसार उप यास ये पुल भद उनचास अबु द छ करोड एषतालीस लारा अठानवे हजार चार सौ हए । १० जगताप प्रसाद भानु को वाय प्रभावर' (१९०९) म गद्य काव्य को कोटि म उपयास को रसना अनुचिन लगा क्योरि उसम 'नीति एय उपजना हितवान नही पी । डा. याममुदर दास ने साहित्यालोचन' (१०२२) २ उप यास का वर्गीकरण और विवेचन हडसन ये ऐन इटोडक्शन द स्टडी आफ लिटरेचर' के अनुसार पिया पर पही-यही मौलिल एप विचारति जक प्यास्पा प्रस्तुत की। उनकी परिभाषा सारगभित है 'उपन्यास मनुप्प के वास्तविक जीवन को पात्पनिय पथा है ।डा. रामवुमार यर्मा की माहित्य समालोचना (१९३८) अपने विषय पर अपने ढग की रचना है । प. विश्वनाय प्रसाद मिश्र का वार मप विम' (१९४२) समीक्षा गास्न म एम नूतन मध्याय जोहता है । उहोंने भारतीय और पाश्चात्य सिमानों का २०] [हिती उपयाम पृष्ठभूमि और परम्परा और नया साहित्य नय प्रश्न (१९५५) म आधुनिन उप यास की अनक समस्याओ का विवेचन कर उसकी भागेचना को नया आयाम प्रदान किया। विशिष्ट कृतिया एव कृतिकारी के अनुशीलन मे उनके स्वतत्र चिन्तन एव यापक दष्टिकोण की छाप है। आचाय नलिनविरोचन गर्मा के हिदा उप यास (हि दी गद्य की प्रवत्तिया ) स उसको प्रवृत्तियों को समयने म जो सहायता मिलती है वह इस विषय पर लिखित किसी एक पुस्तक स पदाचित ही मिलेगी। साहित्येतिहास भारोच्यकालीन उप यास के मिश्रव घ रामचन्द्र गुक्ल अयोध्यासिंह उपाध्याय रामार शुक्ल षष्णशकर शुक्ल लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय नोकृष्ण लाल और हजारी प्रसाद द्विवेदी क इतिहास उपादेय हैं । मिश्रवधु विनोद अमूल्य आकर अथ है। रचनात्मक समाक्षा के पिता आचाय क्लवी अभि रुचि या सहानभूति उप यास की आर नही थी पर उसक सम्बध म उहान जो कुछ लिखा है उसका एक एक दा द अथपूण है । स्वय उप याम रखक होकर भी हरिऔध जी उसका विस्तत विवचन नही कर सके तथापि उनक प्रतिपादन म मौलिकता है । डा० रसाल ने अपने ढग से उप यास रेखका का परिचय दिया है। प० कृष्णाकर गल की मीमासा म मूक्ष्मता के साथ साथ स्पष्टता है । डा० वाष्र्णेय न उनीसवी शतादी उत्तराध के उपन्यास के विषय और रूप विधान का अध्ययन प्रस्तत किया है । डा. लाल ने १९ ० २५ के उप यास के क्लारूप कथा गली और कोटि श्रम का विकास विल क्षण रीति से दिग्वाया है। डा. वार्णय म वनानिक तटस्थता है डा० लाल म विलेपणात्मक आग्रह गोध म दोना का समान महत्त्व है । आधनिक उप ‘यास के सम्बध म जो कुछ कहना आवश्यक था वह डा० द्विवेदी ने अपनी निमल गली में कह दिया है । डा० रामविलास गर्मा का भारतेन्दु भी इतिहास है जिसम न केवल भारतेंदयुगीन उप यास की विशेषतामा का उदघाटन हुआ है वहिक उप यास के अध्ययन को नई दिशा मिली है । विशिष्ट आलोचना उपयास पर विगप रूप से लिखे गए आलोचना ग्रयो के नाम अग लियो पर गिन जा सक्त हैं । रघवीर सिंह का सप्तदीप (१९३०) इस प्रकार का प्रमुख प्रथ है जो प्रभावाभि यजा होने के कारण आरचनात्मक प्रम्नाना] [२ म्र नहीं रखता। ताग गुकसान न गि मामाविक पवान (१००९) में बार'च्य कारक बार 33 प्रतिनिधि पामगरोंग परिचय दिया है। शिवनागपारार मावानुव न हिती नयाड (१०४०) दिनकर मवप्रथम एतिहासिक बौ शयामा आराधना-पद्धतियों का नमन्वय किया और एक महान बनाव की प्रति का। दिनातमकर व्यास गे 'म यास-कटरा (१९८१) दि बोर भारतीय र पान का परिचय दनी है । या प्रमार पाडेय का हिंदी कया-सादिव (५१) कतिपय कयाकारों * नापि मनिपान बालानना है । पटमार पुनाला बझ्यो कया मानित क प्रथम बानित ममाराचक हैं। यानि कयासाहिब' (१९५८) उना पुरान-नय निवघों का मकान है रिममें व्यक्तित रचि मभीर ममता मिल है। द्रजग्न मन हिन्दा र वाम-मादिच' (२०५६) में उपम-करा और प्राचान क्या-परम्परा पर विस्तार म विधा क-न हिन्यवान का एतिहासिक -ष्टि न यम्दन किया है गर प्रारम्भिक यामागे ग अपसिन पृष्ठ मित्र हैं। विनवन सिंह का हिन्न' नाम और पयायवार (१९५१) एक अभिनव प्रधान है। मिद्धान्त वाम र नद्धान्तिक प्रान पर पहला पुस्तक ५० अन्बिन " गन्य मौमामा' (१८७) है। विद्वान रन्न न नद दृष्टिन पुराना दम्ग का रचा इसरिए उन्हें मलन गगन में कयाग्न नहीं मिला त्रार "गना म न दनुका मा तिना नुसार सचान कर म चाम मब 8 कराह एकार्डन राव महानव हजार, बार नौ ए । ५० माय प्रसाद नानुका कान्य प्रनाकर' (११) पद्यान्न भी काटि में काम का रखना जनुचित - कार टनने नाति एव पर उनक दिववादी नहीं पा : टा. "याममुदर नाम न 'गादि पागदन (०२०), पाम का वकर और विवचन डन के रन बटाटन टू" मा बारिटरेचर क अनुशार किया पर कहें कहीं मौलिक एवं विचाराने र प्याला प्रस्तुत का। रनरी परिनाका मार 'टप मास प्य वाम्नदिक वादन को गलनिकपा है। डा. रामटमार दना का हिप-ममायाचना (१९३८) पत्र दिपय पर कान की रचना है । २० दिवसाय प्रसार मिय का दाम मि (१४०) समोगा में छन्न सम्मान बोना है।हान भारतीय दौर पा चार जिदानों का २२] [हिदी उप यास पप्ठभूमि और परम्परा सम वय किया है और बताया है कि हिंदी के प्रारम्भिक उपयासों का ढर्रा भारतीय था। प० गुलाबराय के काय के रूप (१९४७) म सद्धानिक और यावहारिक दोनों दृष्टियो स उप यास का जसा सागापाग विवेचन किया गया है वसा अ यत्र दुलभ है । उनको दष्टि में उपयाम जीवन का चित्र है, प्रतिविम्ब नही प्रमच द ने उप यास के साथ ही उसको आलोचना लिखना आरम्भ दिया और दानों को साहित्यिक गरिमा प्रदान की। कुछ विचार (१९३९) और उसके परिवधित सस्करण साहित्य का उद्देन्य (१९५४) म सकलित एतद्विषयक निबध लोकप्रिय साहित्य पर गभीरतापूरक विचार करने के फल हैं। उप यास सम्बधी आलोचना की उपलघि उसके अभाव स ढक गई है। पत्र पत्रिकाआ की समीक्षा उप यास के कुछ अगो तक सीमित रही है । निब घो में उसकी अनेक महत्वपूण समस्याए अछूनी रह गई हैं । साहित्यति हासो मे उसे समुचित स्थान नहीं मिला है। विद्वान आलोचको ने उसे अपना क्षत्र नहीं बनाया है । सद्धा तक दष्टि से मौलिक उदभावनाए कम हुई हैं परानी और नई सामग्री को एकत्र कर देने की प्रवत्ति प्रबल रही है । अग्रेजी मे लु बोक लिविस और लिडल ने उपयास के मूल्याकन के लिए कमश कथा कहने की पद्धति शटो के प्रयोग और विशिष्ट अवतरणो के उद्धरण को आधार माना है। हिन्दी मे न तो ऐसे प्रतिमानों की स्थापना हुई है और न उमके आधार पर विश्लेषण और निरूपण किया गया है । परिणाम और गुण दोनो को दष्टि से उसकी उपयास विषयक आलोचना में यूनता है । यह अभाव गव का विषय नहीं है तो रज्जा और निराशा का कारण भी नहीं है । अव जिस गति से शोध और समीक्षा की अभिवद्धि हो रही है वह आशा दिलाती है । उपयास को विशिष्ट प्रवत्ति लेखक और शिल्प विधान के सम्बघ मे कुछ प्रवध प्रकाशित हा चुके हैं । इनके जो अश प्रस्तुत प्रबध के प्रतिपाद्य से सम्बद्ध हैं व अपक्षित ज्ञान की वृद्धि में सहायक मही होते । उदाहरण के लिए डा० राजश्वर गरु प्रमच द एक अध्ययन मे प्रमच द की रचनाओ की सही तिथि भी नहीं दे सके । डा. देवराज उपाध्याय ने उपयास की उत्पत्ति क सम्बध मे राल्फ फाक्स के मत को ज्यो का त्यो उद्धृत कर दिया है पर आधार का सकेत या उल्लेख नहीं किया है ।। जब प्रस्तुत प्रब प का टक्न समाप्तप्राय था डा. कलाशप्रकार का 'प्रमच द-पूव हिदी-उप यास प्रकाश मे माया । उसके सम्बध म यहाँ केवल प्रस्तावना [०३ यह कहने का अवकाश है कि उसमें विषय पर गम्भीरता म विचार किया गया है पर सीमित काल के अध्ययन में जा व्यापस्ता हाना चाहिए वह नहीं है। डा. प्रकार ने 'केवर प्रवत्ति विशेष को प्रतिनिधि रचनाओं तक अपने बध्ययन का सीमित रखा है। रोन अनुवादा का जा प्रेमच द-यूब उप पास के अभिन्न अंग हैं जानबूय कर हाड लिया है। परन्तु कुछ अनूदित रचनाओं (मिश्रवधु वीरमणि मापारराम गहमरा खूनी का मद') का मौलिक समय र स्थान दिया है । भावात्मक उप यास का घारा-जा किता मा दृष्टि स हिलीटप यान की कम महत्वपूर्ण धारा नहीं है-जनक दिवचन पादिषय नहीं बनी। घराज घटना' सायोपासक' प्रमा दिमाता और 'भोजपुर का टगो हिन्दी क श्रेय उपयास है । उनर बिना उन युग का काई मी यध्ययन पूरा नहीं कहा जा सकता है । किन्तु डा. प्रकाश न उनका नामालख भा नहीं किया। उन्होंने प्रतिनिधि रचनाओं के नाम पर निवनों (रुद्रदत्त मा स्वग में महासमा' मारतेंदु स्वग में महामना (१) का अधिवगन') और कहानियों (पुरानो टुटनों का चरिय' मौस्तार सन') का मानपयाम में सपा दन की कागि का है। वह अपन विवच्च काल की नारमनीय रचनायों की उपमा कर बाद की अनक रचनाओं (महन द्विवदो कल्याणी दुर्गाप्रसाद खत्री रक्त मरल प्रतिशोर' राल पजा' यादि) को यों हा कई पछ दन का राम मवरण नहीं कर सों। इस प्रकार एक अमित कार प्रति पाय नहीं किया गया ।

२४] [हि दी उपन्यास पृष्ठभूमि और परम्परा टिप्पणिया १- प्रसाद सियारामशरण गुप्त हजाराप्रसाद द्विवदी और राहुल साकृत्या यन उल्लखनीय हैं। २- इतिहासा और आलोचना-ग्रथों म उसके प्रकाशन-काल का बहुधा उल्लख नहीं किया है और यदि किया गया है तो प्रामाणिक स्पस नही । डा० इदनाथ मदान क प्रमचद एक विवेचन म १९१४ डा० राजेश्वर गुरु क प्रमच द एक अध्ययन मे १९१६ और ब्रजरत्न दास के 'हि गे उप यास माहित्य म १९१९ है । ३- शिवनारायणलाल श्रीवास्तव ने हिदी उप यास में प्रमा का प्रकाशन काल १९०५ तथा डा. राजेन्वर गरु ने प्रमचद एक अध्ययन म १९ २ बताया है पर उमको रचना १९०५ म हुई और प्रकाशन १९०७ मे । रचना काल के लिए आजकल (फरवरी १९५२) म रघवीर सिंह का लिखे गय प्रमचद क पत्र का उद्धरण दष्ट य है । ४- जलाई १९०७ पृ०२ ५- मैंने विधवा का विवाह करा के हिदू नारी को आदश से गिरा दिया था। उस वक्त जवानी की उम्र थी और सधार को प्रवत्ति जोरो पर थी। उस रूप म उस पुस्तक का नहीं देखना चाहता था। इसलिए मैंन क्था में उल्ट फर करक लिख डाला। -रघुवीर सिंह को लिखा गया उक्त पत्र ६- सेवासदन के निकलते न निकलते प्रमचद जी एकदम विकार ह्य गो हार्डी और राला आदि की कक्ष म रखे जान लगे । -गिलीमुख प्रेमचद की कला सरस्वती फरवरी १९२९ १० १३८ ७- हि दी साहित्य प० ३२४ ८- दखिय मरी पहला रचना (क्फन) ९- सातवें अध्याय म तुलनात्मक विवचन किया गया है। १०- प्रमचद का काइ परम्परा विरासत में नहीं मिली। -डा० इद्रनाथ मदान प्रमचद एक विवेचन ५० १२१ वस्तुत आधुनिक हिदी-उप यास की परम्परा का सूत्रपात प्रमचद स ही होता है। -गिवदान सिंह चौहान हि दी-गध-साहित्य ५.६४ प्रस्तावना] [२५ ११- प्रेमचद के पूर्व जितने उप यास हैं वे मूक हैं, उनके पात्र शायद ही कही वार्तालाप करते दिखलाये गये हो।' -हा० देवराज उपाध्याय 'आधुनिक कथा साहित्य और मनाविनान प०८९ डा० उपाध्याय को मनोवज्ञानिक उप यास के सम्बघ म जो कहना चाहिए था वह उहोने प्रमच द के पूर्ववर्ती उप यासा के सम्बध म कह दिया है। मनावज्ञानिक उप यास वास्तव म मूक हात है क्याकि उन पात्र या ता आप ही आप वाने करत है या चपचाप साचते हैं । प्रेमचट पूर्व उप यासा में कवल छबीललाल गास्वामी का जाविधी म वातालाप का जितना अा है उतना शायद ही किसा हि टी उपयाम म हा देखिय अध्याय १२ । १२-यात गर्मा न हिदी क उप यासकार (१९५१) म किस तरह गिद नारायणलाल श्रीवास्तव क हिदी उप यास (१९५०) की प्रतिलिपि कर दी है यह एक उदाहरण स स्पष्ट हो जायगा। श्रावास्तव जी न गहमराजी की समीक्षा करते हुए लिखा है पिलिप आपनहम गरलाय हाम्स एडगर वल्स आदि उप यासकारान इन विपया पर बडा मनो रजक रचनायें की। लेक सीरीज, सिक्स पेंस सीरीज फोर पेंस सीराज आदि कई पुस्तक मालाए जासूसी उप यासो क लिए ही निकाली गई। (पृ०७३) । गर्मा जी लिखत हैं फिलिप आपनहम गरला हाम्स एडगर वेलस आदि उप यासकारा ने जासूसी विषया पर जसी मनोरजक रचनाए की या गहमराजी न भी उसी प्रणाली का अपनाया जिस प्रकार अग्रजा मस्क सारीज सिक्स पेंस सीराज फार पेंस भोराज रत्यादि प्रकाशित हुइ उसा प्रकार दिदी म भी रचनाए प्रकाशित का जान रगो (पृ०८) 1गरलार होम्स उप यासकार नही उप यास का नाम है जिसका सर कानन डायल है, इस विश्वविदित बात का रिसन म एक आलाचक स भूर हा ग ता क्या दूसरा आलोचर उस दुरराय बिना नही रह सकता ? - माफ्ट आफ फ्विसन द पिवान एण्ड द राडिंग परिक तथा ए ट्रिटाइन मानद नावेल दप्टव्य है । 14. True its roots go back sery far to Trimalchio s Banquet

२६]
[हिदी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा
to Duphris and Chole perhaps to further to Herodotus
-द नोवेर एण्ड द पीपुल पृ०६१
'उसका जड बहुत पुरानी और गहरी है। यूरोपीय साहित्य म
इसकी जडें ट्रिमालचियो के वाट डाफनिस वलाफ तया हिरोडटस
तक खीचकर राई जा सकती हैं।
- आधुनिक क्या-साहित्य और मनोविनान पृ० १६

पूर्व का कथासाहित्य क-शिष्ट कथाएँ क्था कहानी साहित्य का अत्य त यापक और लोकरजक अग है। वीरगाथा मकाय आख्यानक काय सभी प्रारम्भिक क्था के पद्यबद्ध नमून हैं । मध्यकालीन आख्यानक काय और रोमानी-ऐतिहासिक उपयासा के वस्तु वि यास म बहुत समानता है । जायसी का एक ऐसा उप यासकार कहा जा सकता है जा पद्य मे लिखता हो । ममय और सुविधा के अनुसार क्यासाहित्य पद्य या गद्य का वसन धारण करता रहा है । आलोचका के मत स भले ही उसका स्वाभाविक वसन गद्य हो क्थाप्रमिया को तो क्यारस चाहिए वह पद्य से छनकर आए या गद्य से । हिदी साहित्य के मादि मध्य काल म कविता का साम्राज्य था। गद्यकथा के अभाव मे 'मधुमालती', मृगावती आदि पर कर क्या कहानी पढन को पिपासा गात कर ली जाती थी। वस्तुत प्रमाख्यानक कायम का पनत्व की अपक्षा कथा नत्व का प्राधाय था। . प्राचीन गद्य कविता के युग में भी दक्खिनी, ब्रजभापा और राजस्थानी म गद्य की स्वतन सत्ता थी। उसका पवहार उपयोगी साहित्य के अतिरिक्त ललित साहित्य के लिए होता या । दक्खिनी गद्य को परम्परा चौदहवीं सदी से भारम्भ होती है। उसम खही वोली गद्यस्या का प्राचीनतम रूप उपर प है, यद्यपि वह पारमी लिपि म है । अरवी फारसो से अनूदित मूफी-साहित्य म २८] [हिदी उप यास १ष्ठभूमि और परम्परा दानिक और नतिक सिद्धा ता के प्रचार क लिए स्थाओ का उपयोग किया गया है । फारसी के आधार पर लिखा गया वजही का सवरस (१६२५) अपूर्व रूपक क्था है । उसम सक्न के रडा दिल और इश्क की रडकी हुस्न का प्रम वर्णित है । पान सू म होकर भी यक्तिगत नहीं हैं । भाषा की सादगी और मुहावरो की मिठास ने गली म जान डाल दी है। छोटे छोटे तुकान्त वाक्य नायक का तीर की तरह हृदय मे चभ जाते हैं । पहानी और उसकी कला पर मुग्ध होना पड़ता है एक गहर था हर का नाउ सीस्तान । इस सोस्तान के बादशाह का नाउ अक्ल । दीन व दुनिया का तमाम काम उससे चलता उसके हुक्म बाज जर्रा कह नइ हिलता। इसक फरमाये पर जिनो चले हर दो जहान म वे भले । दुनिया म खूब कहवाये चार लोक। म इज्जत पाये ।। खजभाषा कायभाषा है तथापि उसम सोलहवीं शतानी से उन्नीसवी गता ती पूर्वाद्ध तक गद्य का धारावाहिक अस्तित्व दा रूपो म है क्था वार्ता और टीका । वार्ता साहित्य व्रजभाषा गद्यकथा का प्रारम्भिक रूप है। उसम भक्ता और सतो की निजघरी क्याए हैं। श्री गाकुलनाथ कथित 'दो सौ बावन वणवन की वार्ता' (सत्रहवी शता दी) का उद्दश्य श्री विटठलनाथ गोसाइ की महिमा और उनके सेवको चरित्र पर प्रकाश डालना है पर उस म एहिवतापरण कथा क अनेक तत्व है । हर वार्ता चरिचनायक के जीवन का एक खड चित्र है जिसम उसके यक्तित्व का मानवीय रूप झलकता है और वार्ता क अनरूप पात्रो में विविधता है । कुछ समाज के उच्च स्तर स आए हैं कुछ निम्न स्तर से कुछ भले हैं कुछ बुर क्छ सामा य हैं कछ विशिष्ट । वष्णव को बटी और वेश्या की बेटी दो विरक्त और दो ठग जीवनदास ब्राह्मण और माधुरीदास माली सभी सजीव मुखर और विश्वसनीय हैं । कथासाहित्य म सामाजिक जीवन का ऐसा यथाथ चित्रण उनीसवी तादी उत्तराध मे ही मिल सका । जब पतिता को सत्पथ पर लाया जाता है ययाय आदग की ओर थक जाता है । बोलचाल की भाषा में कोमलता स्वाभाविकता और कोल क साथ कहने का तग रुचिकर है । वार्ता सख्या ६३ उदाहरणाथ उद्ध त है मो वे साहुकार के वेटा की बहू सूरत गाम म रहेती हती वाका रूप बहोत सुदर हतो और वे सती हती एक दिन अपन घर म क्वाड लगाय क नहाती हती मो एक म्लेच्छ पादशाह को नौर घोडा पर वठ जातो हता पूर्वापाग] [२९ गोपाली गणराजी पर गई और देश में मामातुर भमो तय गोटा माग मे पारे पर मे भीतर जाग गयो सो मेरागताती हसी गातो सप पर लियो जप माह जी पोती इसमी तसती माहेत. दो मैं तुगारी पार मदो जगेमगी भयो गोर पर पेहेरेरोगे देशो मे गुगने सरा गयो और ही जो तुप माहेर में हमारे ग मतो गे रहे पाहाप छोड दियो नाली में माहेर में और पाhru में गुल में मागो गार में एक समान देसी गई तयRep गरमाग पर गयो मठारहमी सामी सरलतमा मालागार IItem होते है । भाषाय रागमन शुनत गरिसी अगास तम 'गासिम तोपा (पला १७६० में antr) मा हलेस पिया है। हितोपये' भाग र 'रागनि' (१८०२) और परापुराण' भापार पर 'गाभन farme(१.१७)मी मामी । 'गाभा विमानमा भाग 1 पार मणम भाग प EART में भी पपगी ver है । पार भाग भोर रागगारी गुणोपमा प्रेग और बाद from, मोर तरह पीरदासी से भरी है। राजस्थानी गयी प्राणीगता गौर सरता दिग्दी में लिए गोली परत है । परा को भगुल प्रसार यात' और 'पात गात मा Rilm इतिहास के लिए, पारामा लिए होता है। पाते गपगम . पुछ गमय । गगमग पाTA पुराना गा गोरा पारी मात (१५२४) है। उसका पिप तिहास प्रगिय है । गारमाह मे निराणा माती पास की पातों संध्या २८०० यताई जाती है।" पात माहिम शोर पादिप की विशेषताओं से पूर्ण है । गागरतु मी रिटरी राम गार भेष कि मामले ऐतिहासिक, पौराणिन, अंगागागन भोर मस्गित । भाग ( मा पराग रागीमानामाम' (१८४७) उस्त गोय है जो मिका सियरातमा मत ITrti राप्रपार गIRITA ही नहीं, मैं भी ना ती गई। प पु साहिरिण मा एमगाभी के ए गा मोक्षा Tण पोग तो भा ही, गार पाए जी freी गई।' भर नाम ही साहित्य का पर्याय पा, यह सामापित पाIT जो परायर हो पही सादिय में परिगणितमा नाम परिमाता परमारमानामर २८] [हिदी उप यास १प्ठभूमि और परम्परा दानिक और नतिक सिद्धाता क प्रचार के लिए यात्रा का उपयोग किया गया है । फारसी के आधार पर लिखा गया वजही का सबरस (१६२५) अपूर्व रूपक बथा है। उसम अक्ल के 787 दिल और श को लडकी हुस्न का प्रम वर्णित है । पात्र सू म होकर भी व्यक्तिगत नहीं हैं। भाषा वो सादगी और मुहावरा की मिठास ने गती म जान डाल दी है । छोटे छोटे तुका त धाक्य नायक का तार की तरह हृदय म चम जात हैं । वहाना और उसकी कला पर मुग्ध होता पडता है एक गहर था गहर का नाउ सीस्तान । इस सीस्तान के बादशाह का माउ अक्ल । दीन व दुनिया का तमाम वाम उससे चरता उसके हुक्म वाज जर्रा कहनइ हिरता । इसके फरमाय पर जिनो चले हर दो जहान म वे भले । दुनिया म खूब कहवाये, चार लोका म इज्जत पाये ।। यजभाषा कायभाषा है तथापि उसम सारहवीं पता ही से उनीमवी गता ती पूर्वाद्ध तय गद्य का धारावाहिक अस्तित्व दो रूपो म है क्था-वार्ता और टीका । वार्ता साहित्य प्रजभाषा गद्यकथा का प्रारम्भिक रूप है । उसम भक्तो और सतो की निजघरी स्थाए हैं। श्री गोक्लनाथ कथित दो सौ बावन वष्णव को वार्ता' (सत्रहवी शता दी) का उद्दश्य श्री विटठलनाथ गोसाइ की महिमा और उनके सवको के चरित्र पर प्रकाश डालना है पर उसम एहिवतापर कया के अनेक तत्व है। हर वार्ता चरित्रनायक के जीवन का एक खड चित्र है जिमम उसके व्यक्तित्व का मानवीय रूप झलकता है और वार्ताआ4 अनुरूप हो पात्रा में विविधता है । कछ समाज के उच्च स्तर से आए है कुछ निम्न स्तर से कछ भले हैं कछ युरे कुछ सामा य हैं कुछ विशिष्ट । वणव पी बटी और वेश्या की बेटी दो विरक्त और दो ठग, जीवनदास ब्राह्मण और माधुरीदाम माली सभी सजीव मुखर और विश्वसनीय हैं । क्यासाहित्य में सामाजिक जीवन का ऐसा यथाथ चित्रण उनीसवी ताटी उत्तराध म ही मिल सका । जब पतिता को सत्पथ पर लाया जाता है यथाय आटग की मार झुक जाता है । बोलचाल की भाषा म कामरता स्वाभाविक्ता और कौशल के साथ कहने का ग रुचिकर है । वार्ता सख्या ६३ उदाहरणाथ उद्ध त है सो वे साहुकार के बेटा की पहू सूरत गाम म रहेती तो वाका रूप बहोत मुटर हतो और द सती हती एक दिन अपन घर म पवाड लगाय के नहानी हनी मो एक म्लछ पादगाह को नौर घोडा पर वठले जाता हता पूर्व का क्यासाहित्य] [२९ सा वा की नजर वा स्त्री के ऊपर गई और देख वे कामातुर भया तब घोडा काय के वाके घर के भीतर जाय पडयो सो वे स्त्री नग्न नहाती ती वायो हाथ पर लियो जब वह स्त्री वाली इतनी तसतो काहेकु, नेहा मैं तुमारी चाकर हु तुम कहो जस कागी अवी मोकू वस्न पहरे रव देवो ये सुनक वह म्लेच्छ प्रसन्न भया और कही जा तुम क्पडा पेहेर के हमारे मग चा य कहा वा स्नी को हाथ छाड दिया वा स्त्री ने कपडा पेहेर के और वा म्लच्छ के मुख में एक तमाचा मार के एक कोठा म कवाड दके चली गई तब म्हच्छ सरमाय के घर गया अठारहवी ताटी स सस्कृत के क्था आस्यान के अनुवाद उपलर हान हैं । आचाय रामचद्र शुक्ल न किसी अनात रुखक क नासिकेतापाच्यान (सवत १७६० क उपरात) का उल्लख किया है ।। लाल न हितापदा का आगय लेकर राजनीति' (१८०२) और पद्मपुराण के आधार पर माधव विलास (१८१७) को रचना की। माधव विलास का क्या भाग गद्य म और वणन भाग पद्य म है लेकिन गद्य में भी पा की छटा है । राजकुमार माधव और राजकुमारी सुलोचना व प्रेम और विवाह, मिलन, और विरह की कहाना रस से भरी है । राजस्थानी गद्य की प्राचीनता और सपनता हिदी के लिए गौरव की वस्तु है । उसक दो प्रमुम्ब प्रकार हैं ख्यात और वात' । स्यात का प्रयोग इतिहास के लिए बात का क्था के लिए होता है । कुछ बातें गद्यपद्यमय हैं कुछ गद्यमय । गद्यपद्यमय वात का पुराना नमूना गोरा वादल री बात (१६२४) है । उसका विषय इतिहास प्रसिद्ध है । मारवाड के कविराजा वारी दास की बातों को सस्या २८०० बताई जाती है । वात साहित्य रोष साहित्य की विपताओं से पूण है । क्थावस्तु की दृष्टि स उसक चार भद किये जा सकते हैं ऐतिहासिक, पौराणिक प्रमारयानक और कल्पित । अनू शित रचनाओं म फहराम वरागी का 'पचास्यान (१८४७) उल्लेख योग्य है जो विश्व प्रसिद्ध सस्कृत क्या पचता का रूपातर है । इस प्रकार मध्यकाल में पद्य में ही नहीं गद्य म भी क्याए लिखी गई । पद्य प्रमुख साहित्यिक माध्यम था, इसलिए क्याा करिए गद्य अपेक्षा कृत कम प्रयोग तो हुआ ही गद्यबद्ध क्याए भी पद्य में स्पायित की गइ ।' जब मान्य हो साहित्य का पर्याय था, यह स्वाभाविक था कि जो पद्यबद्ध हो वही साहित्य म परिगणित किया जाय । पटियारा दरवार के स्थावाचक हिदी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा रामप्रसार निरजना तडीबोली में प्रथम प्रोड गद्य लेखक माने जाते हैं। अत अठारहवी शताग मे मौविक वया-वार्ता के लिए खड़ी बोली गय माध्यवहार अवश्य होता होगा । क्यावाचकों 7 कथालेखका के लिए जमीन तयार से यद्यपि वह जमीन वुछ समय के लिए सारी रही। नवीन गद्य नई हिदी म कविता गाने से पहरे कहानी सुनान की शक्ति आई। अमीमवी सदी के प्रारम्भ म जिन पार प्रथम पुरुषा न वडी बोली गद्य के माधुनिक रूप का उत्पारन किया उनम तान क्या साहित्य के रचयिता थे। आघाय शुक्र न लिखा है कि आनिक गद्य परम्परा का प्रवत्त न नाटको से हुआ वास्तविकता यह है कि उसका प्रवतन कथासाहित्य से हुआ । की रानी कनवी की कहानी (१८००-१८०८) सदल मिश्र का नासिक्तो पास्यान (१८०३) और लल्लूलाल के प्रमसागर (१८१०) नवीन गद्य मे लिखित पुगन ढग का अमर कथाए हैं। रानो वेतकी की कहानी मौलिक प्रति हान के कारण स्थासाहित्य के विकासात्मक अध्ययन में विशेष उपादेय है । सभ वन यह खडी बाली गद्य की पहली मौलिक कहानी ही नहीं, पहली मौलिक प्रम कहानी भी है। यह भी सभव है कि पहल पहल गद्यसाहित्य मे कहानी T- का प्रयाग इशान किया हा । उनका ऐतिहासिक महत्व इसलिए और बढ़ जाता है कि जहा सरल मिश्र और लल्लूलाल ने सवविद्यानिधान मानवान महाप्रधान गो महाराज जान गि कस्न साहब के आदेशानुसार अनुवाद किया वहाँ होन आत्म प्ररणा म मौलिक प्रयास किया जसा कि उन्हान आरम्भ में ही लिखा है एक दिन वठ-वठ यह बात अपने ध्यान म चढी कि कोई कहानी ऐसी कहिए कि जिसम हिंदवी छट और किसी वोली का पुट न मिरे । अस्तु वे 38 दिदी म सचेतन हाकर मौलि पहानी लिखने वाले प्रथम रखक हैं । कहानी आदि स अत तक लोककथा के रस म डूबी हुई है । एक दिशकुवर उदयभान हरिनी के पीछे घाडा दौडाता हुआ गाम को एक अमराई में पहुंचता है । वहाँ रानी केतकी अपनी सहेरिया के साथ झूले पर सावन गा रही है । रानी पे जी म कुवर की चाह पर कर रती है। कुवर को अमराइयो का आसरा मिल जाता है। रात म मिलन को बला आती है दोना म परिचय हाता है शादी के वादे होते हैं और भगूठियो क हरसर + बाद पिछडन होता है। उदयभान के पिता सूरजभान देतकी के पिता पूर्व का क्यासाहित्य] जगतपरकाश के पास विवाह का प्रस्ताव भेजते है जो मजूर नहीं होता। दोनाम लडाई छिड जाती है । जगतपरकास के गुरू महे दरगिर कलाश पहाड स यावर कुवर और उसके मां-बाप को हरिन-हरिनी बना देते है और जगतपरकास को एक वधम्बर और भभूत दे जात हैं। बधम्बर का करामात ऐसी है कि उसका एक रोगटा आग पर रखा गया और योगी मह दर गिर आ धमके। रहा भभूत सो इसलिए है जो काई इस अजन करे वह सबका दम और उसे कोई न देख जो चाहे सा कर । सा रानी केतकी आँख मिचौवल खेलन के बहाने मां स भभूत मांग रता है और आँखो म लगाकर कुवर की खोज म निकल पडती है। महे दर गिर आकर उनका पता लगात हैं और राजा इदर की सहायता स कुवर और उसक मां-बाप को भी खोज निकालत है और उनका रूप पूर्ववत बना दत हैं । कु वर और केतकी की शादी वड धूमधाम से होती है। यह कहानी पढ़ना क्या है चांदनी रात म फूलो के दाम घूमना है। इशा गुरू म ही कह देते हैं, दखिये किस ढब से बढ चलता हू और अपन पल को पखडी जस होठो से किस किस रूप म फूल उगलता हू । फिर तो उनको वाणी स पूल झडते जाते हैं । विवाह का प्रस्ताव लान वाले ब्राह्मण पर पल को चगर की जाती है। मह दर गिर पर साने रूपे के फूल निछावर क्यि जाते हैं। क वर की चिटठी रानी पास कागज के नील लिफाफ म नही पूर को पखडी म लिपटी आती है । शादी की सुगियाली म मौलो म कुसम और टेसू और हरसिंगार सज जात हैं और नदियो में इतने पर वहा दिये जाते है कि नदिया जस पूर की बहियां हैं यह समझा जाय। नायक-नायिका वेवहा और केतकी हैं तो नायिका की सहेली का नाम मदनबान और मारिन का नाम फूलवती होना ही चाहिए । उदय भान और पतको की यह कोमर कहानी पर की भाषा म रिसी गई तो की कहानी ता नहीं है ? 'नासिरतोपास्यान का मूशधार कठोपनिषद है। इसम राजवमारी घावती को नाम स नासिक्त की उत्पत्ति और यमरोष-यात्रा का राचा वमन है। प्रमसागर चतुमुज मिश्र की ब्रजभाषा पद्यरचना का अनुवाद है। इसम भागवत र दाम रथ की क्या है। इनका विषय घामिल है रानी क्सको की कहानी का शकिक । अलौकिक और अति प्राकृत सत्व तीनों म है । प्रमसागर म शुकदेव जी राजा परीक्षित यो फषा सुनात है ३४] [हिदी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा प्रय और फारसी गुलिस्ता क भावानुवाद हैं । इनकी नीति क्याए प्रसिद्ध हैं । बीबू नवीनचन्द्र राय का लक्ष्मी सरस्वती सम्वाद (१८६९) भी दा बहनो के सम्वाद के रूप में मनोहर नीतिकथाओं का संग्रह है। अगरेजा में प्रचलित कथाएँ भारतीय सांचे में ढाल दी गई है । यादगाह यिर को उज्जन नगर का धनपति बनिया बना दिया गया है । कहन का दग सीधा सादा है । पहली कहाना इस तरह शरू होती है किसी गांव में जयपाल नामक एक खत्री रहता था। उसके घर में एक रडका और दा लड़कियों थी। बाबू नवीनच राय की भांति स्त्रिया के उपयोग के लिए भारत ने मदालसोपाख्यान ( १८७६ ) लिखकर बालिकाओ में मुफ्त बांट दिया । यह प्रसिद्ध पौराणिक आख्यान है । उमको भाषा साफ सुथरा है । मां बाप का बहू बेटे को देखकर ऐसा करजा ठडा हुआ जस क्सिी को काई सम्पत्ति मिले। राजा के सारे राज्य में आनद फल गया और घर घर बधाइयां होने लगी। सितारेहि द ने राजा भोज का सपना' (१८५८) वामा मन रजन (१८५९) वीरसिंह का वत्तात (?) और लडको की बहानी (१८७६) की रचना की । आचाय गवल न उनकी कहानिया मे आलसियो का काडा का भी उल्लेख क्यिा है पर वह कहानी नही है । मौलिक रचना + स्प म प्रसिद्ध राजा भाज का सपना मुखपृष्ठ पर मिस सी० एम० टकर क राजाज डोम का अनुवाद बताया गया है । भारलेंद युग की स्वप्न क्था की परम्परा शायद इसी स आरम्भ होती है । अनदित हाकर भी भाषा की दष्टि से यह बहुत महत्व रखता है । यह ठठ हिदी का सुदर नमूना प्रस्तुत करता है यद्यपि इसके तुका त वाक्य फारसी ढग के हैं और रानी केतकी की कहानी की याद दिलाते हैं जसे सना उसकी समुद्र की तरग का नमूना और खजाना उसका सोने चादी और रत्ना के सान से भी दूना। गप रचनाए मौलिक जान पाती हैं। वामा मनरजन मस्त्रियो के लिए दा विग की आदा महिलाओ को सत्रह कथाए सकल्ति हैं । उसकी भाषा सरल सस्कृतनिष्ठ विदभ नगर के राजा भीमसन को क या भवनमाहिती दमय ती का रूप और गुण सारे भारतवप में प्रख्यात हो रहा था। वोरसिंह का बत्तात गुटका (तीसरा खड १८६६) म सकलित है । इसमे एक कल्पित कथा क माध्यम से पिया दी गयी है । लडको की कहानी छोटी छाटी तेरह रोधक दालोपयोगी कहानियो का संग्रह है । उसका न हा आकार और सुबोध पूर्व वा यामानित्य] भाषा मन मोहने के लिए काफी है । राजा माहब न शिम भापा की वकाल्न 'निहास निमिरनाक' म माग चल कर का उसस उनकी कहानियाँ अछूती है । हिदी गद्य-रालो के विकास म इनका स्थान एतिहासिक महत्व का है । से नई शिक्षा के प्रचार के लिए बार-क्पा सात्यि की रचना हुई, वस ही ईसाई धम क प्रचार के लिए ईसाई क्या साहित्य की। इलाहा बाट स प्रसारित 'पुष्पमालिका' (१९६८) क्यामाला (१८७७ } 'उपमा रत्लावाली (१८७९) दप्टात क्याओ के संग्रह है। पात्र भारतीय मा हैं योर विगो भा । मापा परिनिष्ठित है। इस प्रकार के साहित्य का भार तीय जनता के बीच प्रचार अवश्य हुमा पर इस राप्रियता बटावित हो मिल होगा। ईसाइयो का उद्देश्य स्पष्ट पा, क्या कहानी ता एक वहाना यो । उहोने वही चतुरता से अपन धार्मिक साहित्य का मारतीय रूप प्रदान पर भारतीय पाठ १ मनानुकूल बनाया था। शिप्ट कथायें और उपन्यास रयास में पूर्व क शिष्ट कयासाहित्य में उपयास की आवश्य कताओं को पूनि हुई । उसम कहाना बहन की वला का विकास हुआ । पल्त उपपास का एक सरर पर मौरिक समस्या हल हो गई। वप यास का उह य मनारजन भी है और शिक्षा भी । उसम इस दुहराय की सिदि हुई। इस समिश्र सितारेहिद, नवीनचन्द्र राय आदि की रचनाओं ने सरल সি ফ ম কথাৱৰ কী মনা মগ্ন ।। না কী ? रहानी' का यह स्थल विसा भी थष्ठ पयास में स्पर त म मामिक जब रात सोय-साय माल्ने रगा और साधवारियां सव मा रहीं रानी देठमी न अपनी सहेली मदनमान का जगाकर या कहा-अरो आ तून क्छ सुना है ? मेरा जी उस पर ना गया है और किसी डोर स थम नहीं सातारु सब मरे भेटों को जानती है । अब हाना को हो सा हो सिर रहता रहे, बाठा जाय । मैं उसके पास जाता हू । तू मरे साप चल । वरे पाव पडती हू कोई सुनने न पाए। पनि जोदन की भाषा में कही गई रानी सतकारी बातें उसको मुद्रा भाव स्वर मा को मिलाकर एक पूरा जीवन चित्र उपस्थित कर देती है । 'मासिस्नोपास्यान' यात्मचरित लो मरिषिव पहलाया है ! उधम म्पत्ति ३६] [हिंनी उप पास पठभूमि और परम्परा और वातावरण का यथाय चित्रण है । गमवती का यह रूप किनना माह है पहिर मास मे तो उस क पा को कुछ अधिक सा देहम रूप उपना और दूसरे म गम का लक्षण जानने में आया | तीसरे घिरा मुह हो गया। चौथ में राए अलग अलग होने लगे पांचवें में कच व नितव ऐस भारी हुरा कि जिनक मार से अलसाकर किसी से बछ बातचीत में कर सकती। इसी प्रकार यमर एक और नरक का स्पष्ट बणन किया गया है । पूर्ववर्ती रेखका ने गद्य म अभियक्ति की क्षमता भरकर उप यासपारा का काम आसान कर दिया। चौरासी वणवन की वार्ता की उक्त वार्ता में साहूकार की बहूँ मधुर प्रलोभन से मागभ्रष्ट नहीं हाती है बल्कि अपने सतीत्व की रक्षा चतरता के साय करती है । हरिऔधजी लिसित अघलिखा पूल में देवहूनी और विशारीलाल गोस्वामा की 'चपला में सौदामिनी पर इसी तरह बलात्कार किया जाता है और वे ऐसी ही चतुरता से बचने का उपाय करती हैं । हरिऔध जी और किनारीलाल गोस्वामी गोकर नाय जी से प्रभावित हुए या नही यह प्रश्न निरयक है । ध्यान देने की यह बात है कि दवरती और सौदामिनी साहूकार की बहू का परम्परा में है । ये सकारात्मक (पोजिटिव) चरित्र भारत की एक ही मिटरी से बने हैं । नेवहूती और सौदामिनी के पीछे युगो का सास्कृतिक इतिहास है। वृद्धि फ्लोदय में शिक्षा और अशिक्षा का परिणाम दिखाने के लिए भले धुरै लडका में भिपता दिखाई गई है। गील भिन्नता आरम्भिक उप यासों के चरित्र चित्रण की एक विशिष्टता रही है । बालकृष्ण भटट ने लिखा है कि उप याम बुरे और भले पात्रो के चरित्र फा बराबर से मुकारिला करके अत म भने पात्र को उप यास के किस्से का मुख्य नायक बनाकर शिक्षा देता है।" आधुनिक युग के आरम्भ में ही कयासाहित्य की प्रभावीरता और महत्ता स्वीकृत हुई और उसे गिया नीति और धर्म का मा यम बनाया गया । यदि ऐसा नहीं होता तो उप यास को और रोग स्वभावत बापित नहीं होते और उसके आविर्भाव में विलय होता । शिक्षोपयोगी और धार्मिक कथा प्रयो की माति आदि उपसास स्पा क भार से दवे हुए हैं। बड़ा बागी गद्यक्या की भाषा एक प्रकार से अनुवादों की भाषा है पर उसमें हि दी का याग और गतिशाली रूप छिपा हुआ है । व्रजभाषा और राजस्थानी में नवीन विषय और विचार का यक्त करने की सामथ्य की मनोरजक क्या लोगो म प्रिय और प्रचलित थी। उन्नीसवी पता श्री के आरम्म स उनके हिदी रूपातर प्रकाशित होने रगे थे। सिंहासन बतीसी उपपासा काम करत पाइनस हमारे आदि उपयासकार परिचित था। फारसोपी जा पुस्ता नागरी मनही पाई थी उनकी जानकारी भी उह पो। फारसी-उर्दू उन दिना हिदू लिक्षित समाज मप्रचलित थी। सरिया स हि मुमरमान ९ वीच सांस्कृतिक आदान प्रदान हो रहा था। उहान पूर्व का स्थासाहित्य] नहीं थी। उनके पद पर खड़ी बोली का प्रतिष्ठित होना स्वाभाविक था। अनुवादको और मौलिक लेखको ने उसे कथासाहित्य क उपयुक्त बनाने में योग [३७ दिया। उप यास नवल गयकया है इसलिये जब तक गद्य कथा का माध्यम नही वनता तब तक उसका उदय नहीं होता। क्थासाहित्य में पद्य को निर्वा सित कर गद्य की प्रतिष्ठा करना एक दिन की बात नही थी। रानी क्तकी को कहानी' नासिकेतोपाख्यान और प्रमसागर म पद्य के लिए स्थान सुरक्षित रहा। परवर्ती रचनाओ में भी कही न कही पद्य के दान हो ही जाते हैं । विलक्षणता की बात यह है कि उसका अश अधिक नही है और जो है वह अवसरानुकूल उपदेश और भाव विरोप की अभियक्ति तथा किसी घटना की सूचना के लिए प्रयुक्त हुआ है तथा कभी-कभी जो गद्य मे कहा गया है उसे ही कविता म दुहरा दिया गया है। क्या का अआ गद्य म ही है । दूसरे शब्गे म गद्य का प्रयोग सामा यत और पद्य का विशेषत हुआ है । उन्नीसवी सदी के मध्य तक मात आते कहानी पद्य का सहारा लिय बिना चलने लगी और गद्य उसका वाहन स्वीकार कर लिया गया। सितारेहिंद तक गद्य में काथ्य कामाभास था वितु उसमे सहज सरल ढग से क्या सुनाने की क्षमता मा गई थी और काव्य-तत्व के ह्रास से जो कभी हाने लगी उसकी पूर्ति वणन सला करने लगी। उस समय प्राचीन गद्यक्या का अधिकारी प्रकाश म नही आया था अत उसके प्रभाव का क्षत्र सीमित रहा होगा। जो साहित्य जितना ही लोकप्रसिद्ध होता है वह उतना ही प्रभावशाली होता है। इस दृष्टि से लोकप्रिय कयायें गिष्ट क्थाओ की अपक्षा अधिक मूल्य रखती हैं । ख-लोकप्रिय कथायें उप यास पे उदय के समय और उसके पहले संस्कृत और फारसी बताल पचोसी हातिमताई चहारवरव आरि लोकप्रिय किस्स छाट वह [हिदी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा । एक दूसरे को क्या कहानी का अपना लिया था और दा भिन्न कहानिया से नई कहानी भी गढ़ ली थी। शायद इस कथासाहित्य का ध्यापर प्रचार देख कर फोट विलिएम कारज के अग्रज अधिकारिया ने इसका रूपातर और प्रकाशन करवाना आरम्भ किया और इसक महत्व एव प्रभाव को बता दिया । मध्यकाल म गद्यकथा पद्य मे वाघ दी गई थी। छपाई की सुविधा होने पर पद्यस्था का गद्य स्पा तर हाने रगा। ला परम्परा में जीवित कथायें भी मुद्रित हार धारे धारे पाठको के सामन मान लगी । मुद्रण यात्र न रेखका और पाठा क लिए मनारजन की सामग्री सुलभ कर दी और लाकरुचि म परिवतन उपस्थित किया । उन्नीसवी सदी स फिर क्यासाहित्य का प्रभाव स्थापित हुआ। लाप्रिय क्थाआ को दा काटिया में रखा जा सकता है भारतीय और अभारतीय । यह भद अध्ययन की सुविधा के लिये प्ररणा और प्रवत्ति को ध्यान में रखकर किया गया है। भारतीय क्थायें मुख्यत सस्कृत स नि सत हैं। फारसी कथायें भारत में भी लिखी गइ पर उनका वातावरण अभारतीय है और उनमें भारतीय कथाओ को ढियां नहीं है इसलिए उह अभारतीय कहा गया । दानों का विवरण यहाँ प्रस्तुत किया जाता है । भारतीय कथाये सिंहासन बत्तासी- सस्कृत सिहासनद्वात्रिगिका का पद्यानुवाद सु दर दास ने ब्रजभाषा में किया था। व्रजभाषा से लल्ठूलाल की सहायता स जवा ने १८०१ में हि दस्तानी म अनुवाद किया । उन्नीसवी शता दी पूर्वाद्ध तक इसके चार सस्करण निक्ल चक थ और इसकी शली हिदी के निकट आ चुकी थी। यह बत्तीस कहानियो का संग्रह है जो राजा विक्रम के सिंहासन को बत्तीस पुतलियां राजा भोज को सनाती है। राजा भाज विक्रम के सिंहा सन पर बठना चाहत हैं पर पुतलिया विक्रम को ही सिंहासन पर बठने योग्य सिद्ध करने के लिए उनकी महानता का वणन करती है। आदा राजा के नाम पर गढी गई कल्पित कहानियो का यह उत्कृष्ट निदान है । कथायें अनहोनी और पात्र अपरिचित हैं फिर भी उनमें वास्तविक्ता का आभास है। वताल पचीसा सस्कृत वतालपविगतिका का पद्यानुवाद सूरति मिश्र ने ब्रजभाषा में दिया था ! लल्लूलाल की सहायता स विला ने पूर्व का कथासाहित्य] हिदुस्तान में १८०१ में अनुवाद किया । उन्नीसवी गता दी तक इसके छ सस्करण निकल चुक थे और भापा में परिवतन हो चका था । एक सस्करण विक्रम विलास' के नाम से भी निकला। यह पचीस कहानिया का सग्रह है। एक योगी के कहने पर राजा विक्रम पेड पर एक लटकते हुए वताल का लाने जाता है और लाने के समय राह म बोल देता है इसलिये वताल फिर पेड पर जा लटकता है । पत्रीस बार के विफल प्रयास के बाद राजा वैताल को यागी के निकट लाकर पाता है कि योगा उसका गत्र है। हर बार वताल राह मे राजा को एक कहानी सुनाता है। कहानी म कहानी' सजाने का यह अच्छा उदाहरण है। आरम्भ सवाद और विकास वणन से होता है । कल्पना और बुद्धि दोनो को उत्तेजित करने वाली वस्तु मिलनी है । पुरुष प्रगल्भ प्रणय निवेदन करत हैं स्त्रियां अवध यौन सम्बध स्थापित करती है और उनका विनग्ध निर्माता सूक्तियां सुनाता चलता है। राजा आर राजकुमारी सायु और चार सेठ और साहूकार सभी मानवीय और जीवन क प्रति आस्थावान हैं। गुक बहत्तरी- सस्कृत गुरु सप्तति का अनुवाट फारसी मे कादिरी ने तूतीनामा' (१७०४) नाम से और हेदरी ने उदू म तोता कहानी (१८२८) नाम से किया था। एक अनात लेखक न हि टी म १८६० म एक बहत्तरी नाम स अनुवा- क्यिा वितु मूल संस्कृत से क्यिा या फारसी उदू से यह नहीं कहा जा सकता। इसम विदग्ध चूडामणि नामक ताते द्वारा रही हुई बहत्तर कहानियां हैं । सौदागर मदन परश चल जान पर उसकी रूपवती पत्नी प्रभावती प्रतिदिन परपुरुष क साप रमण करन के लिए जाना चाहती है कि तोता उसे क्या मुनाफर रोक लता है । बहत्तर दिन तक सनाई गई इन कहानियों म यह पालकर बता दिया गया है कि परपुरुप करन के लिए विवाहित स्त्रियां किस तरह छल्छद से काम रती है । स्त्री और सर्पिणी को एक ही श्रणी म रखा गया है। इसकी नायिका प्रभावती जितनी ही सुटर है उतनी ही वेवफा है। नारी के प्रति एसा दष्टिकोण उदू गुजारे दानित म भी मिलता है । जहाँ तक भौतिक जीवन क यथाथ चित्रण का सम्ब ये है गुरु वहत्तरी' वानिया के डकामरन की समक्ष है ।इसकी विशिष्टता यह है कि इसम नीति लोक भी जोड दिय गय हैं । संस्कृत ३ घना प्रधान क्या संग्रह के अतिरिक्त कई भाव प्रधान भास्यान भी लिखे गय । प्रथम कोटि की रचनाओं म मूर कथा गोड हा जाती ४.] [हिदी उप यास पठभूमि और परम्परा है प्रासगिक कथाओं का स्वतत्र अस्तित्व बना रहता है और वे भूक्ष्म सूत्र म सबद्ध रहती हैं तथा घटनामा का प्रवाह अपड गति स आग बढना है। दूसरे प्रकार की रचनाओ म आदि स अत तक एक कथा को प्रधानता रहना है और यौन-बीच म मामिक परिस्थितिया एव मनाहर दश्यो का पणन रहता है । स्थापत्य को दष्टि से ये उप यास निकर हैं । इनम न ता नतिक आप का आरोप है न लोवचातुरो सिखान की चेष्टा हो अपितु मानवीय मना विकारो का सरल स्पष्ट स्वरूप है । पात्र आदा वोर और प्रेमी होते हुए भी दुवक्षतामा के शिकार हैं । उनका रागात्मक सम्बध अतिप्राकृत क्तियों स न होकर प्रातिर रमणीयता से है । भाव-प्रधान आध्यान म लौकिक प्रमाम्यान की विशषताए निहित हैं जसा कि निम्नलिखित पुस्तको क अध्ययन से नात होता है। माधोनल कामबटला (१८०१)-इसकी रचना विरान लल्लूलाल को सहायता स मोतीराम क्वीश्वर के ग्रभभाषा प्रय के आधार पर हिदु स्तानी म की। पूर्व में पद्य प्रमाख्यान के रूप में कई कविया ने इसकी रचना की थी। इसका मूलाधार समवत सिंहासनद्वामिनिका को इक्कीसवी कथा है। इसम सुदरी कामकदला के प्रति माधवानल क प्रगल्भ प्रम का चित्तापक वणन है । माधवानर विगिता सम्पन्न “यक्ति है । वह स्वय सुटर है और सोन्य का उपासक है । उसका गुण उसके लिए अभिशाप बन जाता है । अनेक कष्ट झरने क वाट वह प्रयसी को पत्नी बनाने में सफल होता है । नल प्रसग (१८६०) गोपाचद भरयरी (१८६७) 'गोपीच द (१८६८) स्मिा मृगावती (१८७६) और कहाना कला कामी (१८७९) -पहली पस्तक अनेक पराण और महाभारत का सार लकर रची गई है और दाऊजी अग्निहोत्री कयालय (बनारस) म छपी है। यह नल दमयनी के अमर प्रेम की छोटी-सी कहानी है। दूसरा और तीसरी पस्तका लेखक मा कवर लक्ष्मण सिंह और प० जयदत्त हैं । इनको कथावस्त प्रसिद्ध है और सभवत मौखिर परम्परा से ली गई है। यामिनी भान लिखित विस्सा मृगावती क्तवन की इसी नाम को प्रमगाथा का गद्य रूपा तर प्रनीन होना है। श्यामलाल चक्रवर्ती लिखित अतिम पस्तक का मूलाधार सभवत दक्सिनी कदि तहसोनुहीन की मसनवी है । इसम के वर कामरुप और कलाकाम की प्रमक्या है । आजिमगज और पटन स मा प्रकाशित कहानी क्ला काम (१९०८ वि० स०) और विस्सा कलाकाम (१९०७) पद्यबद्ध हैं।

। पूर्व का कथासाहित्य] [४१ प्रम और साहसिकता से भरी अतिम दो कहानियो के मूल रचयिता मुसलमान हैं और इनम फारसा क्था की सटियां है तथापि इनका स्वरूप भारतीय है। छबीली मठियारी-इसका प्रकाशन १८८६ म आगर में हुआ। यह पहल प्रकाशित हुआ या नही यह कहना कठिन है । रखक का नाम भी नहीं दिया गया है । सभव है इसका श्रात भी मौखिक रास्था हो । दिल्ली का शाहजादा रमनगाह शिकार म जात समय एक ए पर छबीली भठियारी का देखकर प्रमासक्त हो जाता है । वह अपनी स्त्री विचित्र वरि के पास आँख पर पटटी बांध रहता है बाहर निकलने पर पटटी खोल देना है और छबीली म मिलता है। विचित्र कुवरि एक दिन गुजरी के भप म उसकी प्रमलीला पने जाती है तो वह उस पर भी पिना हो जाता है । धीरे धीरे वह सही रात पर आता है और छबीली का मार डालता है । कहानी प्रतीकात्मक है। पटटी वध रहन और खुलने का अथ प्रमुध होना और हो म आना है । नतिकता को प्रतीक म प्रक्ट करने को रीति स्तुत्य है । सालिंगा सदाव्रज का वत्तात -राजकुमारी सालिंगा और कवर सावज की प्रमकथा उत्तर भारत म अमर है। सका आश्रय करके आख्या न का य भी रिस गए हैं । गणेगालाल का एक गद्यपद्यमय पान्तर आगर में १८८९ में प्रगित हुआ । गद्य खडा बालरी म और पद्य व्रजभाषा म है। पद्यमय सवाद सरम और स्पर्शी हैं । पहानी का सारा यह है कि प्रमिका के विवाहित हाने पर भी प्रमी उसे भूल नहीं पाता है और उसस मिलने के लिए कठिनाइयों का सामना करता है। सारमा सदावक्ष नाम स प्रचलित क्या में कछ नवीनता है। प्रमो का मालूम हाता है कि उसकी प्रमिका कर समराल जाएगी। वह प्रमिका व वहन पर एक रात म उसकी राह म पोपडा छार साघु वन वठना है । प्रमिका ससुराल जाते समय साघु का दान कर स्त्री है । इस प्रकार के मधुर प्रसग पुस्तक म भरे हुए हैं । कप्रिय क्याएँ विशुद्ध क्याएँ हैं। इसे पढन स मालूम हो जाता है कि किस्स-रहानियों सक्तिना मजा मिरता है । प्नम कल्पना और सत्य मानव और अमानव इस तरह मिले हुए हैं कि रहें अलग करना कठिन है । य वास्तविक जीवन स बिल्कुल दूर नहीं हैं और इनम घटना-नचिय रहते हुए भी भाव विभूति है यत य रोमाचक होन के साथ साथ मनारज हैं । 4. प्रेम साहस स अभिन्न है । यही कारण है कि वह रुग्ण अनुभूनि न हार ४२] [हि दो उप यास पाटभूमि और परम्परा प्ररक शक्ति है और उसम कुठा न हार प्रगल्भता है। बताल पचीसी की छठी कहानी मे एक घोवी देवी से प्रापना करता है कि सुदरी घोविन से उसका विवाह हो जाय तो वह अपना सिर अर्पित कर देगा। नायक नायिका नाना प्रकार की बाधाओं और व्यवधाता का सामना करते हुए मिरते हैं । उनका परिचय बहुधा प्रथम दान से होता है और विवाह में परिणत होकर पूण होता है । परत कथाए सखात होती हैं । इनम मनुष्य की आदिम और मावभौमिक प्रवत्तियां स्वाभाविक रूप म यक्त हुई हैं अत पात्र मानवीय और सजीव हैं। यहाँ सामाजिक मा यता और नतिक ब धन क विरुद्ध एक प्रतिक्रिया परिलक्षित होती है । परपरुप या परस्त्री से प्रम या अतिप्राकृत तथा मानवीय पात्रो म यौन सम्बाघ सामा य सामाजिक आचरण के उल्लघन का उदाहरण है। इस प्रकार के पात्रो से पाठक अनजान म तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं। उनम वे अपने यक्तित्व के प्रच्छन्न रूप की छाया पाते हैं । इन कथाओ की लोकप्रियता का यह भी एक कारण है। अभारतीय कथाएँ भारतीय कथासाहित्य की परम्परा बहुत पुरानी है । उसका प्रवतन ईसा के पूर्व हा चुका था। भारत म मुमलमानो के आगमन से उसका प्रवाह मद पड गया और अरबी फारसी कथाओ का प्रचार होने लगा। गहरजाद ने विष्ण शर्मा की जगह अपना सिक्का जमा लिया । विदेशी क्थामा प्रचार प्रसार म मध्यकालीन किस्सागो फाट विलियम कालेज और नवलकिशोर प्रस न विरोप सहायता पहुचाई। किस्सागो का काम निकम्म और विलासी बादशाहा, राजाओ और नवावा को किस्से सनाना था । मुगल दरबार मे किस्सागोई खूब चमकी। जहाँ गग कवि को एक छप्पय पर छत्तीस लाख रुपये योछावर किये गये वहाँ कथाकौशल के बिना कोई किस्सागो वाहवाही नही लूट सक्ता था। इसलिए कहानी एक कला बनी। फिर क्ला ने पशे का रूप धारण किया। पेशवर किस्सागो एक साथ ही कथाकार और अभिनता की भूमिका अदा करते थे । हाथ क सचालन से स्वर के चढाव उतार से चेहरे के हाव भाव से वे अपने आश्रयदातामा के हृदय म हप विस्मय भय विश्वास उत्पन्न कर उनका मन बहलाते थे । उनकी कहानिया म नाटकीयता और मनोरजक्ता सहज ही आ गई । प्रस्तुत अध्याय में एक किस्सागो द्वारा लिखित रानी केतकी की कहानी को उपधृत 1 पूर्व का कथासाहित्य] [४३ । पक्तियों म यही गुण है। मुगल दरवार का देखादेखी राजपूत दरबारो म भी किस्सागोई का साहित्य बनता रहा । और जब दिल्ली में पतयड के दिन आये तव किस्सागो नवाबो के दरवारा मे घोसला बनान लगे। फलत सामत्री समाज में अरबी फारसो कथाओ का खूब चलन हुआ । इन कथाओ क के द्रविन्दु राजा रानी थे । नवाबो और नरेगो न इनमे अपने जीवन का प्रतिबिम्ब देखा और इनका हार्दिक स्वागत किया। हिंदू-मुसलमान दानो म इनका प्रचलन देखकर इहे सबोध भाषा में प्रकागित करने का प्रयत्न स्वाभाविक था । फोट विलियम कालेज और नवलकिशोर प्रेस ने सरल उदू म इनका अनुवाद और प्रकाशन करवाया । कलकत्ता और लखनऊ उदू कहानी के जम स्थान हुए। लम्बनऊ की देखादेखी बम्बई मयुरा पटना सिटी और काणी के प्रकाशको न भा फारसी उदू क्स्सि कहानिया के भापा तर प्रकाशित किय । अभारतीय क्याए फारसा स उदू म फारसी उदू स हिदी मे आइ । ऐसा गायद ही काई मनोरजक कथा हो जो उन्नीसवी सदी क अत तक नागरी म नहीं निकली हा । विप लोकप्रिय रचनाओ का परिचय नीच दिया जाता है। बागोवहार या चहारदरवेश'- यह उन किस्सो का सग्रह बताया जाता है जो अमीरसुसरो ने अपन गुरु निजामुद्दीन औलिया की बीमारी म मन-बहराव के लिए सुनाय थे । इसका अनुवाद मीर अम्मन न उदू म क्यिा जो १८०१ म प्रकाशित हुआ । १८८३ म प्रकाशित अपन हिंदी अनुवाद म श्रीधर भटट ने बताया है कि उनके पूर्व भी नागरी म पस्तक निकली थी। नागरी म प्रथम प्रकाशन का काल ज्ञात नहीं हो सका है। इसम चार यागी अपने दगाटन की वार्ता यादगाह आजादवहत का सुनाते हैं। कही कोई पाहजादी किसी गरीव जवान ल्ड पर फिा हो जाती है कही परी गाह जादे को प्यार करने के लिए आसमान से उतर आती है । आपवीती-गली में कहा गई साहसिक्ता और प्रम की कहानियां मनारजन के साथ साथ लौषि रीति की शिक्षा प्रदान करती हैं। हातिमताई मूल पारसी स हैरी न उद् म यारादो महफिल (१८०२) नाम स अनुवाद किया। मीर मुनी रक्ष्मणदास का हातिमताई (१८५१) पारसी का हिंदी अनुवाद है । दानवीर हातिम को आलम्बन बनार लिपी गई यह क्या प्रहरिका-कथा का अठा नमूना है। एक - [हिदी उपयास पप्ठभूमि यौर परम्परा । के समान नाहजादा एक सौदागर को वेटो म गादी वरना चाहता है । वह कहती है कि यदि नाहजादा उस सात प्रश्ना का जवाब दे तो वह शादी कर सकती है। हातिम उस हजार लिए उन प्रश्ना का जवाब ढूढने के सिलमिले म दूर दूर की यात्रा परता है । उसको यात्रामा वणन सान कहानियों में Fप में किया गया है जिनम प्रम तिलस्म और जादू की घटनाए भरी हुई हैं । रीछ की यटी और मत्स्पक या हानिम स प्रम परना चाहती हैं। जिन्न सोप बनकर मासमान स उतरता है और मनुष्य का रूप धारण कर सुगरियो म किसी का अपने लिए धुन लेता है । हरिण और सियार मनुष्य बोलत हैं । स्त्रियो पुरुषो का ? धारण करती हैं और नेवरा भी मनुष्य बन जाना है। हातिम का सौ मन मव गटक जाना पापियों से भरे कुए का दिखलाई पहना कटे हुए सिरा का सिलसिला बर हसना मामूली बाते हैं । हर रिस्सा गया है दिया गया है जसे पहला किस्सा हातम क जाने का और पहली गत बजा लाने का। गुरु सनोवर - यह हातिमताई मे बहुत मिलता जलता है । गाह जादी मेहर अग्रज के पास एक प्रश्न है गुल न सनोवर को क्या दिया । जो इसका उत्तर देगा गाहजादी उससे विवाह करेगी। एक राजकुमार एस भेत का पता लगान के रिए एक दूर नहर में जाता है जहाँ उसे गुल और उसकी वैधफा स्त्री की कहानी मालूम होती है । जीवराम जाट ने इस रहस्य मूलक कथा का हिंदी स्पातर किया जिसका तीसरा सस्करण १८९२ म निकला किस्सा रला मजनू -हैदरो ने उन्नीसवी गाता दी पूर्वाध म सुमरा को मसनवी के आधार पर उदू म यह पुस्तक लिखी । उत्तराध म देवकीनंदन खत्री न हिदी में लिखकर हरिप्रकाश यत्रालय से प्रकाशित कराया। मय राकप्रचलित प्रमाख्यानों की तरह इसम भी दा विरहाकुल हृदया का सुकुमार प्रमाणित है पर इसको अपनी विशेपनाए हैं। प्रमी प्रमिका परस्पर विरोधी परिवारा स माए हैं। उनका प्रमससग से अकुरित हुआ है और विवाह में परिणत हाते होते रह गया है । म म धुलपर प्रेम या पारश रूप निखर उठा है। खत्रीजी की अलकारहीन मापा गली भाव को सहज सवय बनाने म सपल हुई है। मजहबे इक या विस्साए गुलबकावरी- उद् म इस नाम से पूर्व वा क्यासाहित्य] [४५ पारसी 'किस्सए ताजुलमुलुक व गुरुवावरी का अनुवाद १८१३ म निहाल घद लाहोरी ने किया। 'गुरु बकावती नाम से हिंदी अनुवाद १८६१ मे बनारस लाइट प्रम से प्रकाशित हुआ । इसमे ताजुलमुर्क के निर्वासन और गुरुवकावली स उसके प्रेम का वणन है। इस कथा का एक रूप ऐमा है जिस पर भारतीय रंग चढा हुआ है । एक परम रूपवती राजकुमारी थी। एक दिन अपनी सहलिया के साथ उस आते देखकर रानी ने कहा कि बकावली (हसी का झड) आ रही है । उस दिन से उस राजकुमारी का नाम वकावली पड गया। शोणभद्र नामक एक राजा ने यागो के वेग म आकर बकावली की फरवारी म एक अपूर्व फल लगाकर बदर म उसे माग लिया। जद उमका विवाह दूसरे स होने लगा तब योगी न उसे शाप देकर नती बना दिया बोर स्वय नद बन गया। दास्तान अमीर हमजा कहते हैं जो ने अपर के मनोविनोन के लिए फारसी म इस बड पोथे की रचना की थी। इसम लगभग सत्तरह हजार पने और आठ दफ्तर हैं । पहला दपतर नौशेरवा नामा उदू १८०१ म अनूदिन हुआ। पांचवा दफना निलिस्म हो गया है जा सान जिल्गे म है । तिलिस्म होगरुबा को पहली जिल्द उद् म १८८४ में प्रकाशित हुई । हिदी म उसका अनुवाद विचित्र चरित्र नाम स १८ ३ म नवलविणार मस से निकला । एक जिल्द मे ही १८४७ पृष्ठ है । अनुवादक रामरत्न वाजपेयी है। दास्तान अमार हमजा क याठा दफ्तर हिनी म अननित हुए या नही उसका पता नहीं चला है। इसी नाम से कालीचरण शर्मा और महेन्त मां का जो अनुवाद नवलविणार अस में प्रकादिन हुआ वह एक हा पुस्तक के रूप में है। अमीर हमजा को बद्रीय पात्र बनाकर कही गई इस कल्पित क्या म प्रम मासिक्ता तिरिस्म एयारी और जादू क एक म एव वरवर खर है । अमभव घटनामा अनिनाटकीय दृग्यो और अदभुत प रस्थितिया की योजना म रचयिता वी वल्पना का चमबार देखार दग रह जाना परता है । वह न वा मन म विश्वास बढ़ाता है न हृत्य को स्पा करता है क्वल कल्पना यो उपमाता रहता है। उसमो कपा नसके मायक का पाडा दर व रिए भी छिपा नहीं पाती है । अमौर मानव होकर भी आतमानवीय वन म सपन्न है । उसे देखकर इसका अनुमान होता है कि छोटा सा मनुष्य कितना महान हाता है । अमरू ऐपार उसका साथी है पाम्बर उमा सहायक हैं मुरिया ४८] [हि दी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा - का आधार और मानवीय सम्बध का मूल प्रव । परानी कथाओ की भौति कुछ उप यासा में अवध प्रम और निम्न काटि की वासना का वणन है कि तु जहाँ एक म अश्लीलता की गध है वहीं दूसरे म कला का स्पा है । तिलिस्म एयारी और जादू क उप यासो पर फारसी प्रभाव स्पष्ट है। उनकी विशिष्टता यह है कि वे इस प्रकार की लाप्रिय क्याओ के साहित्यिक रूप है । वे कौतूहल तप्त करके नहीं रह जाते विविध भावो का सचार भी करते हैं। देवकीन दन खत्री ने चद्रकाता की कथा का बीज तिलिस्म होगरुवा से लिया था । चहारदा की भांति चन्द्रकाना सतति भ पात्रो की आपबीती स क्या का उदघाटन हुआ। वक्ता श्रोता की प्रणाली मुख्य कथा म उपकथाओ का निबद्ध करन का कौशल और कलात्मक रचनाविधान भारतीय एव अभारतीय कथाओक अदभुत कथा शिल्प के परिचायक है। इस गिल्प का प्रयोग कुछ विशेष रचनाओ- जसे, श्रद्धाराम फिल्लौरी की भाग्यवती लाला श्रीनिवास दास के परीक्षा गुरु, विश्वेश्वरान द की चतुरा की चतराई-म किया गया है परतु समष्टित उसे उप यासों में नही अपनाया गया। फारसी की मसनवी और दास्तान की शली का भी चठन नही हुआ । कथामाला-गली का उपयोग विगपतया क्सिी कृति का करेवर बढान के लिए किया जाता था ताकि अवकागभोगी वग की रुचि का प्रसादन हो सके । नवयुग क पाठक उस राजा क समान नही थे जिसे कभी बात नहीं होने वाली कथा सनन का गौक चर्राया था। उप यासकारो का नई वस्तु के लिए नये गिल्प का प्रयोग करना पड़ा। लोकप्रिय कथासाहित्य का रस कथात्मक अ म है । उसक रचयिता कयक्कड या किस्सागो थे जिनका मुरय उद्दश्य कथ्य को रमणीय और विश्व सनीय बनाकर मनोरजन करना था। प्रारम्भिक उप याम रेखक उनके उत्तराधिकारी होने के कारण कहानी सुनान की करा जानत थे । देवकीनदन खत्री और प्रेमचद जसे प्रतिभाशाली कलाकारों ने उनस कहानी बहना सीखा था । जिसम कहानी कहन की सहज शक्ति होती है । वह भी कहानी सनने या पढने के बाद लिखने में समथ होता है । अत कथाकार किसी न किसी रूप म पूर्व क्थासाहित्य और उसको कला से प्रभावित होता है । अपने पूर्वजो की भाति उपयासकार भी फया को रुचिकर बनाने क लिए घटना को प्रधानता देते थे वास्तविकता का भ्रम उत्पन्न करते थे और उपदेग की छोंक देत थे।

पूर्व का क्यासाहित्य] पुराने किस्से-कहानियों को सवस वडी विपता मनोरजकता पी जो उप यासा को अनायास मिल गई। इसमें सदेह नहा कि नय रूपकों और पाठका म उनका प्रचार बहुत दिनों तक रहा और वह पढकर वे कहानी पढन का गौर पूरा करत रहे। जम जस उपयाम का विकास होता गया उनम गिष्ट समाज का मम्पर घटता गया। प्रमद के उदय के बाद उनको प्रभावशीलता जाती रही और व फुटपाय को गामा बनकर रह गई । क्यासाहित्य के अभाव के दिनों में जनता का उनस मनोदिनोद हुआ और उगती हुई पीढा को रुचि आत्रात हुई। वहाना की रोकप्रियता के मूल म यह लाकवि थी जो लाकप्रिय स्याओं स बनी पी लोग जिस ढगदी कथा पढने के अभ्यस्त थ उस ढग के उपयास के लिए उरमुक और अधीर हुए। ग-उद्गम और स्वरूप उपयास के पूवी क्यासाहित्य के उगम और स्वरूप पर सामाय रूप म विचार करना आवश्यक है। उसके चार मात दिखाई पडने हैं सम्पन साहित्य फारमो साहित्य लोकसाहित्य और अंग्रेजी साहित्य | सस्कृत म प्राप्त सामग्री प्राचीन और मध्यकालीन भारत की सामग्री है जो मम पालीन समाज और सति की झोरी प्रस्तुत करती है। पौराणि नीति पर और मनोरजन प्रधान क्याओं का अनुवाद उन्नीसवीं शताली के पूर्व से ही आरम्भ हो गया था। उनमें उद्देश्यगत एकता है यद्यपि उनका विषय धार्मिक भी है और लोकिर भो । पौराणिक कथाओं म भौतिकता का और रिय कथाओं में पामिकता का रग है। जीवन के प्रति सतुलित दष्टि. काग व्यक्त करती हैं धौर उसे जीने योग्य बनान का सच देती हैं। फारसा साहित्य मा सम्पर क्लिनी मा के माध्यम से आरम्भ हुआ। दक्यिनी गया शनिकता प्रधान होन कारण विशिष्टता सम्पन्न है । मुस्लिम जग निरपरा वीर दानी बादशाह प्रमो आदि का बनारस्सिी गह पाएँ स्थितिया, स्थाना रूदियों और गलियों में एक-सा है। रानी पानहानी बाहर प्राय सबका वातावरण विगी है । य मान भोर अमाक सयोग से मन पर जादा घमर हारती हैं | साहित्य सप्रम मोर मारता रो रोमानी वयाएँ गई जो मध्यकालीन भारत का मारततिर पापीन नायर-नायरा पिया उम्पवर्गीय समाज - ३ ५०] [हि दी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा क है पर उनका चित्रण मानवीय यथाय और भारतीय मादा के धरातल पर हुआ है अत वे जन मन को प्रभावित करते रहे हैं । राजा भोज विक्रम नल, भरथरी आदि से सम्बधित कथाएं वास्तव में जनता की वस्तु हैं । शायद इनकी जनप्रियता को देखकर ही मस्लिम रेखका ने इनके अनुरूप अमीर हमजा जसे निजघरा नायक की कल्पना की थी। अनक पारसी कथाए मध्य कालीन भारत म ही रची गइ । भारतीय कथासाहित्य की प्राचीन परम्परा म नतिक और धामिक दष्टिकोण की प्रधानता है, मध्यकालीन परम्परा म ऐहिक और मानवीय दष्टिकोण की पाप पुण्य त्याग विराग के स्थान म प्रम सम्मान, ईर्याप का वणन आदश से यथाय की आर प्रयाण है, जा उप यास के लिए शुभ लक्षण है। सस्कृत फारसी और लोकप्रिय क्याओ का वण्य विषय पराना है । महाकाय पराण इतक्या इतिहास आदि से उनके कथानक लिए गए है । पाठ्य पुस्तका के रूप म लिखित कहानियों मे नवीन वस्तु और विचार की झलक मिलती है । उनक पात्र राजा रानी न होकर साधारण पुरुष-नारी हैं । वे आधुनिक भारत की आवश्यकता और भावना के अनुकूल हैं । वे मुख्यत अग्रजी साहित्य से ली गई है । इनसे हि दो उपन्यास का सीधा सम्बन्ध है । कुल मिलाकर प्रस्तुत अध्याय के कथासाहित्य म अलौकिक्ता से रोमिकता का पक्ष प्रबल है । स्वच्छद प्रम उसका प्राण रस है । यह प्रयत्ति उप यास की मौलिक प्रवत्ति रही है। उन्नीसवी तादी उत्तराध में उपयास की दो प्रमुख धाराए फूटी। एक धारा वास्तविक जीवन की पृष्ठभूमि में मानव चरित्र का अध्ययन करन लगी और दूसरी चरित्रचित्रण की अपेक्षा अदमत घटनामा यो प्रधानताकर मनारम कहानी सुनाने में लग गई । चरित्र प्रधान उप यास न गिष्ट कथा साहित्य का और घटना प्रधान उप यास न लोकप्रिय कथासाहित्य का स्थान ले लिया । पूर्वाध मे उप यास का आगमन नहीं हुआ लेकिन उसका माग बन गया । वह हिदी कथासाहित्य के इतिहास का निणयात्मक काल है । उस समय नवीन गद्य और मुद्रण यत्र का प्रचार हुआ", जिनसे उप यास को जीवनाधार मिला । नियसन ने इस काल को नवजागरण का काल18 ठीक ही कहा है।

पूर्व का क्यासाहित्य] [५१ टिप्पणियां १- तब परम बढ़ रहे नाहिंन हाट-बजार । मधुमारनी, मृगावनी, पोथी दोय उचार -रामचन्द्र गल हिदी माहित्य का इतिहास पृ० ९९ मे उद्धत २- ब्रजभाषा, राजस्थानी अवधी घडी घोलो और मषिली का माहित्य हिदी का साहित्य माना जाता है । अवधी मे गद्यकथा उपल ध नहीं है। मपिली हिदी से भिन्न स्वतत्र भाषा है जिसकी अपनी लिपि और अपना साहित्य है । अत इन पर विचार नहीं दिया गया है। *- डा. बाबूराम सक्सना दक्खिनी हिनी' (१९५२) पृ० ८५ ४- थोराम शर्मा दविवनी का पध और गद्य' (१९५४) पृ० ४०६ ५- हिनी-साहित्य का इतिहास' पृ० ४०५ E- मोतीलाल मेनारिया 'राजस्थानी साहित्य का रूपरेखा' पृ० १८० ५-- उदाहरण के लिए मूरति मिश्र ने ताल्पविगतिका का व्रजभाषा में पद्यानुवाद किया। हिदी साहित्य का इतिहास', पृ० ४५३ ५- देखिए रामलाचन गरण द्वारा सपादित बिहार का साहित्य (१९२६) १०-हिरी साहिय का इतिहास' पृ० ४३६ ११- उप यास हिती प्रदीप जनवरी १८८२, पृ० १९ १२-उपयास लेसका ने अपनी रचनाओ में लोकप्रिय कपा-प्रपों का विक स्पलों पर निर्देश दिया है और अपने पात्रो को उनका अध्ययन करते हुए दिखाया है । इमस यह निष्कप निमलता है कि वे लेखकों और साटा के बीच प्रचलित थे। उदाहरण के लिए राधाचरण गोस्वामी की पास विधवा' म बहारदवेश का उल्लेख (भारतेंदु जनवरी-फरवरी- माघ १८८५ पृ० १५३) है। लाला श्रीनिवासदास का नायक अगि फ्लाका सोते जागते का किस्सा पढ़ता है (परी मागुरू, पृ. ३८) । १५- अन नारंगे के मुसलमानों क साप ससग से अहाँ धावली भीरहसन मेहार वेग हातिमताई से अपों का जन साधारण में आदर या -शिवनादन सहाय हरिपचर पृ० १२०

५२]
[हिदी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा
-
१४- छोटी छोटी कथामा को पद्धति मारत मे बहुत प्राचीन काल से चली जाती
थी। बौद्धो और जनों के घम अपों के निर्माण-माल तक इस पद्धति का
विकास हो चुका था। ६०० ई० से पूर्व बहुत सी कथाएँ बन चुकी
थीं, जिनका महाभारत और पुराणों आदि म समावेश है।
-गौरीकर हीराच द ओया मध्यकालीन भारतीय संस्कृति पृ०६१
१५-हजारी प्रसाद द्विवदी हिंदी साहित्य पृ० ३६७
१६-प्रेमच द साहित्य का उद्देश्य , पृ०६१
१७-आधुनिर गद्य के प्रवतक लल्लूलाल मुद्रणयत्र के भी सस्थापक थे । इस
काय म उह एक ऐसे अग्रेज से सहायता मिली थी जिसे अहोन गगा म
डूबने से बचाया था।
18- It was the period of renaissance of the practical introduct
1on of the priptiog press into Northern India and of the
foundation of the modern school which now shows such
commendable activity
-द माडन वर्नाक्यूलर लिटरेचर आफ हि दुस्थान , ५० १०७

२ उपन्यास : एक नई कला पूंजीवादी युग की देन सभ्यता के विकास के समाना तर ही साहित्य की विधामा का विकास हुआ है । कहानी कहना और मुनना मनुष्य का स्वभाव है, इमरिए उसका जम भापा के जन्म के साथ हुआ होगा । लिपि के आविष्कार के पूर्व आश्मि मानव-समाज म उमका प्रचलन रहा होगा । उसका इतिहास उतना हो पुराना है जितना मानवता का रतिहास । सम्य-अमम्य सभी जानियों म उसकी परम्परा अक्षुण्ण रही है । ससार के प्राचीनतम ग्रयों में उस बीज विद्यमान हैं। पुराण, जातक, पुरान, बाइबिल आदि धमधा मे उसके द्वारा नीति और रोति को क्षिा सरल, मार्मिक ढग से दी गई है। यद्यपि कल्पना प्रसूत साहित्य में क्यासाहित्य सवाधिक प्राचीन ममापनी और सपत्र है स्थापि उसका स्वान अस्तित्व राज्य और नाटर के दा farn है और उसका जो रूप अग्रजो नोवेल' तथा हि दो में उप याम क नाम स अभि हित है, वह तो बापुनिक सभ्यता की उपज है। जये-जसे सभ्यता मौनिकता का आवरण ग्रहण परती गई, या গ্রন ফী রি যতরী সদ। সবম বন্ধিৰি যা শ ৪থম মুনি उपयास र पासाहित्यको विकास की अने अवस्थाएं पार करनी पी। उनमें ये अपस्याएं विशेष महत्व रसती है जब उमने लिखित प धारण किया, जब उसने स्ववत्र सत्ता प्राप्त की और जब समरे पद्य का राजमाग टोपर गधा जनपथ ग्रहण रिया । इस विकास म के बाद free ५४] [हिदी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा कला के रूप में उप यास का जम हुआ । साहित्यिक इतिहासकार इसके मूल की साज सस्कृत, ग्रीक या लटिन के रामास'म कर सकते हैं पर उसस इसका सीधा सम्बध नही दोसता । ग्यारहवी ती म जापानी रेखिका मुरासाको शिकाबू लिखित 'गॅजी मोनोगतरी ससार का सबसे पुराना उप यास माना जाता है। सामती समाज का यथाप चित्रण करने वाला यह उप यास सामती युग की पलाकृति है पर उपयास का वास्तविक विकास पूजीवादी युग म ही सभव हो सका। जसे कलात्मक विनोद का प्राचीनतम साधन महाकाव्य है बस ही उसका नवीनतम साधन उपयास है। उप यास न मानवीय अनुभव को सपूर्णता के साथ प्रस्तुत करने में महाकाव्य का स्थान ले लिया है और इस अर्थ में उम महाकाय का उत्तराधिकारी मानना उचित ही है ।' प्रकृत महाकाव्य मे सभ्यता की उस अवस्था का दिग्दगान है जब जीवन में साम जस्य सरलता और सपन्नता थी। पूजीवादा सभ्यता की विषमता संघप जटिलता और विविधता की अभि यक्ति के लिए उपयास सवथा सक्षम और योग्य था। पूजीवाद ने उस उचित उपादान उपयुक्त माध्यम, और प्रचारात्मक साधन प्रदान पर विश्व साहित्य का अग बना दिया । उत्पादन क साधन मे परिवतन होने से व्यक्ति और समाज की समस्याएँ वढी, सामा जिक विषमता ने व्यक्तिगत विपता को जम दिया मुरण पत्र का प्रचार हुआ और अवकाश की वृद्धि हुई । फलत उप यासकारो को नई कथा सामग्री, विभिन्न प्रकार के पात्र और पाठक मिले । काडवेल के अनुसार उपयास के विकास का आधार श्रम विभाजन है। वास्तव में वह आर्थिक परिवतन से उदभूत नये मनुष्य का नया साहित्य है। यूरोप मे चौदहवी-सोलहवीं गतानिया के बीच नवजागरण के फल स्वरूप समाज और माहित्य म अपूर्व जाति हुई । सामतवाद के ध्वस गेप पर पूगीवाद का आविर्भाव हुआ और उसके साथ साहित्य म मध्ययुग का अत और नवयुग का आरम्भ हुआ। उप यास इस नवयुग की सर्वोत्तम सष्टि है। जिस तरह नवजागरण की लहर इटली से उठकर यूरोप के अय देगों में फली उसी तरह उपन्यास का प्रचार इटली से धीरे धीरे स्पेन प्रास इगल आदि देशो म हुआ। इटली यूरोप का पहला पूजीवादी देश था। वहाँ उप यास को उदभावना स्वाभाविक और साथक थी। उस देश के प्रसिद्ध लेखक वोकगियो का 'कामेरन (१३५३) उप यास का प्रारूप था।

उपयास एक नई परा] [५५ लगमग दो सदियों तक वहाँ वोकनियो का अनुकरण किया गया । इस साहित्यिक परिपाश्व म मास म रबेरै, स्पेन में सरवात और इगल इम पोल्डिग ने अमरा परगा' (१५३२), डान द्विग्जोट' (१९०५) और टोम बोस' (१७४९) लिखकर महान प्रारम्भिक प्रयोग किए। इस प्रकार उप यास का पुराना नमूना पूब म मिलता है कि तु माह मान एप में वह पश्चिम म उत्पन्न हुआ { भारत म उसका आयात अग्रजो के साप हा । भारतवासियों ने अग्रजो कान की तरह अग्रजी उपयास को अपना लिया ! यूराप की भांति भारत म भी उपयास नवजागरण की विशिष्ट देन है । इस प्राचीन देश के लिए क्या कहानी बहुत पुरानी वस्त है परत वयास नवलेखन है यद्यपि कुछ विद्वान उस कथासाहित्य की भारतीय परम्परा म मानते हैं। पुरानी कथा-परम्परा और उपन्यास ५० विशोरीलाल गोस्वामी ने अमर कोपकार की परिभाषा ('उप ‘यासस्त वारमुषम') के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि उप पाम पद का प्रयोग पहले किया गया है इसलिए प्राचीन भारत में उपन्यास का प्रचलन था पर अमरकोष मे 'उपन्यास' घर वा प्रयाग उप “यास ये आधुनिक अय मनहा किया गया है। वहाँ वाइमुखम' का अर्थ है प्रस्तावना । फिर गोस्वामी जी न दाकुमारचरित , 'वासवदत्ता चरित और पादम्बरों को उपयास मानते हुए कहा है कि जिस प्रकार साहित्य के प्रधान अगों म नाटक का प्रचार प्रथम यहाँ हो हा या उसा तरह उप यास की मष्टि मी प्रथम यहीं हुई थी।" वास्तविक्ता तो यह है कि पश्चिमी सम्पक के पूर्व हमारे देश में आधुनिष ढग के उप यास और पहानी नाम स दो भिन्न साहित्याग नहीं थे । दही न क्या प्रारणयिका म जो अतर बताया वह तात्त्विर अन्तर नहीं था। उ हान स्वयं यह कहकर उसका निराकरण कर दिया - 'तत या स्यायिवरपर जानि । अग्निपुराण म गद्यकाव्य के पाच प्रकार माने गय है जिनम अन्तिम तीन क्या में यन्तमुक्त हो जाते हैं । क्या आस्थापिका म शास्त्रीय ६ष्टि से मैद स्पष्ट नहीं किया गया है तथापि वाण ने कल्पित कादम्बरी और ऐतिहासिक हपरित लिखकर और वह जमा पा बोर पापापिका मानकर व्यावहारिक दृष्टि से भेद किया है। यह [हि दी उप यास पप्ठभूमि और परम्परा भेद भी गलीमत न होकर विषयगत है । साहित्य शास्त्र में कथा आस्यायिका की न तो मिस्तत व्याख्या या पलागत विवचना की गई है और न उनक लिए उप पास सारद का प्रयोग हुआ है बल्कि उहे काव्य के अतगत रख दिया गया है। हिदी को उत्तराधिकार मे सस्कृत से तीन प्रकार की कथाएँ मिली उपदेश-प्रधान (पञ्चत) मनोरजन-प्रधान (कथासरित्सागर ), और माय प्रधान (कादम्बरी)। इनमें प्रथम गद्यपद्यमय हैं द्वितीय पद्यमय और ततीय गद्यमय । सस्कृत के प्रति समद्ध कपासाहि य मे दशकुमारचरित कादम्बरी' और वासवदता जसी गिनी बनी बडा गद्यकथाए ही उपयास के निकट लाई जा सकती हैं। इह गद्यकथा ने कहकर गद्यकाय पहना अधिक उचित है क्योंकि ये गद्य में लिखी गई हैं पर इनकी गली में काव्यकला के दान हाते हैं । दही समास को गद्य का जीवन कहा पा वाणन विकटाक्षरबप' को कथा का आवश्यक गुण माना था और मुबघु ने अपना कृति के अमर अक्षर मे लेप की छटा दिखाने का प्रण कर लिया था। सिसातत वाण ने कथा को सरलता और स्वाभाविक्ता को महत्व दिया था और उसकी उपमा पति के पास प्रम से म्वय आन वाली वधू सदी भी पर अपनी कलाकृतियों में वे अपनी उपमा को साथक नही कर सके । विद्वानो द्वारा विद्वानो के लिए रचित सस्कृत गद्यका य का रस चमत्कार में है। उसम कथा का अागो और वणन का वा मुख्य है। जितना ध्यान रस-सचार और अलकरण-सा की ओर दिया गया है उतना शील निरूपण की ओर नही । जिन विशेषतामा क कारण उसे साहित्य के उच्चासन पर प्रतिष्ठिन किया जाता है वे उप यास म दुलभ हैं । उसे उप याम की धूल भरी चौहद्दी पर खींचकर लाना उसका अपमान करना है। एक दशकुमारचरित ही अपने सगठित कथानक सजीव चरित्र चित्रण निराइम्बर शली और यथाथवादी दुखिकोण के कारण आधुनिक उपयास की कुछ बावश्यकताया की पूर्ति करता है लेकिन वह भी अतिप्राकृत और अलौकिक सत्त्वो पूग है । उस अधिक से अधिक पश्चिमी ढग का पिकारेस्क रोमास कहा जा सकता है। शास्त्रीय और यावहारिक दोना दृष्टियो से सस्कृत गद्यका य माधुनिक उपयास की कोटि मे नही आते । कीथ ने अपने इतिहास में इनका विवेचन 'महान रोमास के रूप में किया है। गोस्वामीजी की भाति गहमरीजी भी उपयास को पश्चिम की देन [५७ उपन्यास एक नई कला] नहीं मानते। उन अनुमार 'नाटक और उप माम विदेगी वस्तु नहीं हैं और न हमारे देश म विलायन को नकल से चर है। उन्होने यह स्पष्ट नहीं किया कि उपास विदेश से नहीं आया तो कहाँ म आया ? यदि उनका अभिप्राय यह हो कि हिदी म उपयास सांघ अग्रेजा स न आवर वगला में माध्यम से आया तो उनका क्यन कुछ अशो तक ठोक है और यदि यह हो कि सस्कृन से आया तो निराधार है क्यापि सस्कृत कथासाहित्य और हिंदी उप पास के आदशों म मल नहीं है । गोस्वामीजी और गहमरीजो के उपास भी सस्कृत गरी गद्यकाव्य न हाकर अग्रेजी शलो ये उपयास हैं । वे संस्कृत गाय की भांति भाव प्रधान नहीं है बल्कि अग्रजी उपयास समान घटना प्रधान या चरित्र प्रधान हैं । उ होन ऊपर जा कुछ कहा है वह प्रत्यक वस्त को भारतीय सिद्ध करन की समकालीन प्रवत्ति का द्योतक है। भारत कविता, कहानी और नाटर का जन्मस्थान माना जा सकता है सस्कृत गद्य प्रद धका का उपयाम का प्राचीन प्रतिम्प कहा जा मरना है ति उप पास यत्र युग को उपज है और आधुनिक यूरोप में विष सित हुमा है । मस्कृत हिंदी के प्रयाण्ड विगन और अन प प्रमा पाचाय महावीर प्रसा- द्विवन स्पष्ट कहा है यह सस्कृत भाषा में प्राचीन पथ साहित्य में भी पाया जाता है। पर मकर रूप म हा उस दान हाते हैं। प्रवृर उपयास-माहित्य व जनन उन्नयन और प्रचलन राय पश्चिमी दगो ही क लेपका को है। वासवदत्ता' आदि उपयाम हा या गद्यकाव्य उपन्यास विदा वस्तु हो या भारतीय मूल प्रश्न तो यह है कि हि दो म उपन्यास- लेसन मस्त क्या-आत्यापिका नमून पर प्रारम्भ हुमा या प्रेजी उप याम क नमूने पर इस सम्बन्ध में गास्वामाजी और पह्मरोजी म भी पहर उपन्यास और उसकी मालोचना सिखन वाल ५० बार Try मटट के मन में अधिक ठोस और प्रामाणिक मत क्या हो सकता है। हम रोग जमा और वातों म अग्रजी की नार करत जाने है उपयास कारिखना भी उन्हीं के दृष्टांत पर सीख रहे हैं।" अस्तु हि अयास का जम सहन गाय का पुनजाम नहीं पा हमारे उपासमारों ने अप्रेजी उपायास या उस पर आधारित वगला उप यास ब ग पर उपन्यासा की रचना की। रह पाया (१८७१) में ५८] [हिदो उप यास पष्ठभूमि और परम्परा लकर अपने अपने अजनबी (१९६१) तक की परम्परा पश्चिमी ढग के उपयासा की परम्परा है । हमारे मूध य आलोचक भी एक स्वर स स्वीकार करते ह" कि उप यास की कला पश्चिम से आई है । इसम मरेह नही कि प्रारम्भिक उपयासकार सस्कृत गद्यकाय मे परिचित थे और उन पर उसका सीधा या वगला माध्यम से कुछ प्रभाव पड़ा क्तुि यह प्रभाव उस समय परिलक्षित हुमा जब पश्चिमी आदश पर उपयास की रचना आरम्भ हो चुकी थी। सस्कृत गद्यकाय का अनुवाद भी अग्रजी उप यास क प्रचलन के उपरान्त हुआ था। सामा यतया रूप गुण क अतिरजित वणन और विपतया नारी और प्रकृति के सर परण म उपयासकार वाण और सुबघु के अनुगामी जान पड़ते हैं । उनकी वणन गली जग्रेजी प्रभाव की सूचना नहीं देती क्योकि अग्रजी उपन्यासकाराने गली के प्रति विशप मोह प्रदर्शित नही किया है । क्छ आलोचक हिंदी उप यास की परम्परा का मध्यकाल से मानते है । मिश्रबधु की सम्मति में उप पास विभाग चलता तो पर से था और प्रौढ तथा अलकृत काल वाले कुछ ग्रथ ऐसे ही थे तथापि इसका प्रचार भारतेंदु के समय से ही माना जा सकता है ।18 डा. श्यामसु दरदास के क्थन म भी यह अतविरोध है हिंदी के उपयास आधुनिक समय की उत्पत्ति है । पर त ध्यान से देखने पर इनकी परम्परा प्रमाख्यानक कवियो के पद्या में ही आरम्भ हाती दिखाई देती है।" डा० माताप्रसाद गुप्त ने हिंदी पुस्तक साहित्य में उप यास की सूची देते हुए पद्मावत चित्रावली आदि को प्राचीन उपयास के मतगत रखा है। श्री कृष्णशकर शुक्ल तथा श्री शिवनारायण राल श्रीवास्तव रानी केतकी की कहानी को हिदी का पहला उप यास मानते हैं 10 मिश्रवघ के क्थन स यह स्पष्ट नहीं होता कि प्रौढ माध्यमिक क्ला तथा अकृतकाल के किन ग्रयो को वे उप यास मानते हैं। यदि उनका अभिप्राय उक्त काला के महाकाय कथाका य और वणनात्मक काय से हो ता वे उपयास नहीं कहे जा सकते और यदि गद्य रचनाओं स हो तो अब तक ऐसी कोई रचना नही मिली है जिसे उप यास की कोटि में रखा जा सके । जिस तरह कतिपय यग्नेज आलोचक उप यास और रोमास का सम्बध जोडते हैं उमी तरह डा० श्यामसुदरदास ने प्रमाख्यानक काय को रोमास का य के निकट लाकर उसका सम्ब घ उपयास के साथ जोड दिया है जो उचित प्रतीत नही हाता । उपयास गद्य कथा है जब कि प्रमाख्यानक का य पद्यकथा उपायास एक नई कला] है। पद्य मे नाटक तो कर लिखे गय हैं अब तक उपयास एक भी नहीं लिखा गया है ! पद्यवद्ध उपयास जसी कोई साहित्यिक वस्नु नहीं है । गद्यकथा का गति विस्तार और आधार प्रान करता है इसलिए उप यासकार उसके माध्यम स कहानी मुनान के माथ ही यक्ति और वातावरण का चित्रण कर पाता है। पद्य मे ऐमी सम्भावना नहीं है । क्याका य और उप यास में न क्वल माध्यम का बल्कि उपादान और दप्टिकोण का भी अतर है। गद्य का आवरण ग्रहण करने से भी कोई रचना उपयास नहीं बन जानी। यदि गगनी हाने मे रानी केतकी की कहानी' उप पास हो सकती है ता 'नासिकेतापास्यान भी उप यास बहलान का दावा कर सकता है। रानी क्तका का नानी' का उप मास मानने का एक कारण यह भी हो सकता है कि वह एक बडी कहाना है । कि तु वह आकार में उप याम को भले हो छ ले प्रकार म उसमे दूर है । माध्यम, आकार और गठन उप यास के प्रत्यक्ष परिचायक अवश्य होत हैं पर केवल उनके आधार पर उसका स्वरूप सुनिश्चित करना भ्रामक है। ई बी कहानियां लप उपयास स बड़ी होती है और कई लय उप यास बड़ी बहाना स बडे होते है। उनकी विभिन्नता का मूला धार आकार नहीं है। फास्र मत स ५०००० गम अधिक की कोई वस्पिन गद्य रचना उप पाम है ।" इस परिभाषा के अनुसार बाल कृष्ण भट्ट का नूतन ब्रह्मचारी गभग १०००० को गद्य रचना होने के कारण उप पाम का पति म नहीं आ सकता है। यह एक कामचलाऊ परिभाषा है। धम आधार मानने पर आलाच्यका अनक छाटे उपयाम लम्बी कहानियो R गिने जागे । हि दो उप यास आरम्भिक कार म उप याप्त और कहानी * योर रेवा खोचना भी भा प्रत्यन कठिन हो जाता है। उनका भद स्वरूप म उतना नहीं जितना विषय म है । जस-जस उप यास का विकास होता गया यह भैर स्पष्ट होता गया और कहानी तया उपयास भिन्न साहित्य रूप बन गए। वहानी जीवन का मानचित्र । उप यास म जीवन की विविधता दिरारता और पूर्णता रहती है। उपयास का रूपविधान उपन्यास परिए प्रयुक्त यजी दादर नोवेल उसको विपना का वाया है। इस 17 का अर्थ होता है नदीन । उपपास साहित्य का प्राचीन नहीं नवीन प है। नवीनता उसा मूल आक्षम है। हिन्दी उपशास तीन ६०] [हिदी उप पास पप्ठभूमि और परम्परा पीरियां देख चुका है । हर पीड़ा के लेखको ने अपने पूर्ववर्ती रुखको का पुरानपथी मानन का साहस किया है । प० अविकादत्त यास को सस्कृत क्या माख्यायिका इतनी नीरस प्रतीत हुई कि उन्होने वासवदत्ता क सम्बध म लिखा कि कवि को कहानी बांधना भा न आया । प्रमचाटन सेवासदन मे एक मौजा पात्र से कहवाया था कि अनुवादा को निकाल दिया जाय तो हिदी म चद्रका तासतति क सिवा और कछ रहता ही नहीं। और आज क्छ नय रखको की दृष्टि म प्रमच की रचनाएँ भी पुरानी पड गई है । अपन पूवजो की आलोचना उपहास और निदा करना अपने को श्रष्ठतर पापित करने का प्रयास तो है ही नवानता के प्रति आग्रह व्यक्त करना भी है। वास्तव म उपायास जीवन के समान ही गतिशील और परिवतनगील है। उसम जीवन को परिवर्तित परिस्थितिया के प्रति अपने को अनुकूल बनान की अपूव क्षमता है । उसका रूपविधान सामयिक परिवेश और साहित्यिक प्रयोग से हुआ है । पू जीवादी समाज की अवस्थाओ के अनरूप ही उसक स्वरूप में परिवतन होता गया है । उन्नीसवी सदी मे पूजीवाद प्रारम्भिक अवस्था में था अत उप यास को स्परेखा सुनिश्चित नहीं हुई थी। प्राचीन गास्त्रीय नियमो के ब धन से मुक्त होने के कारण वह स्वय अपने नियमो का निर्माण और उल्लघन करता आया है । उसम स्वतत्रता और नमनशीलता है इसलिए नये नये प्रयोगो के लिए गुजाइश है । उसम कुछ ऐमी शिल्पगत विशेषताए हैं जो उसे सस्कृत गद्यका य मध्यकालीन हि दो क्थाकाव्य और पूर्व की गद्यस्थाओं से अलग करती हैं । इन विशेषता के आधार पर उसके “यक्तित्व की भलीभौति परख की जा सकती है । उसके छ अग हैं क्यावस्तु, पात्र वतालाप, वातावरण उद्दश्य और गली । ये अग परस्पर इतने सम्बद्ध है कि एक दूसरे से अलग नही किए जा सकते । अलग कर देखने से जो अवयव नगण्य और प्रभावहीन प्रतीत होते हैं उनस निमित होने पर एक रचना अपनी मपूणता म साथक सुदर और सजीव हा जाती है जस दूब पर आसकण । हनरी जेम्स की मा यता है कि उप यास एक जीवित वस्तु है और उसके एक अग म दूसरा निहित रहता है। विश्लपणात्मक अध्ययन क लिए भिन भिन्न अगा या तत्त्वा का विवेचन करना आवश्यक हो जाता है । कथानक कयामक उप यास का मेरुदण्ड है । उसको नवीनता उपयास की प्रमुख उपायास एक मई क्ला " विशेषता है और उसे पुरानी क्या परम्परा मे पृथक करती है । सरकत गद्य- काय का कथाना प्रत्यात है । उपपास के पूर्व हिदी म रिखित गद्यस्याओं का विषय परम्परागत है । 'रानो क्तको को बहाना' भी प्रेमाख्यान परम्परा को एक कही है। वह या ता साहित्यिक परिधान मलिपटी हुई रोक्था है या साकया सादश्य पर गढी हईकया है। उप पासपी क्यास्तु जीवन की पुर तब मे ली गई जिसमें नित नए पड जुडत रहते हैं । इसलिए उमम नवीनता का अभाव नहीं हुआ। अयमव, असरय समय सत्य र वह समय और सत्य का रुकर पुरानी क्याओ स अरग हा गया। दोनों म उतना हो भिन्नता है जिननी सत्य और कल्पना म } उपयाम वैवल कया नहीं है जीवन की क्या है । उसम अदभुत और अपरिचित घटनाओं के बदरे माधारण और परिचित घटनामाका वन रहता है। अमरीकी बाराचा एडमड विल्सन के पथनानुसार रसायह है जा अनुभव । अथ प्रदान पर । प यास-क्ला जीवनानुभव का पापी प्रदान करने म है। स्मति और कल्पना अनुभव के ही बग हैं, जिनकी महायता मेला का "मार माया जाता है। आदि उप यासकारों न परम्परागन कथावस्तु का छाहकर यक्तिगत अनुभव के आधार पर क्यावस्तु का निर्माण किया । लाला श्रीनिवास दास मेठी में सम्पन म रह धुन थे इरिए 'परीमागुरू म उहाने यापारी वग का चित्र क्या अस्ति रिया निजी अनुभव का ही यक्त किया । देवकीनदन खत्री न चद्रकाता' में 'अपन गपाजी की जवानी के तजुर्वे दौर का म बाने पर अपनी में देखो हुई जगर की बहार का वर्णन किया है 15 किगारीलाल गोस्वामी 'दूसरों से चाल कर लियाते रहते थे। लिसाते समय उसी तरह माजमय 21 में बोलत ये थोर पहने थे नि यह प्लाट स्वय भैरा देखा है और उसका मैंने अनुभव दिया है । कुछ लेसकों ने आरमानुभव को इतना महत्त्व रिपा दि पयासों के प में मारमचरित्र लिख दिया । ठाकुर जगमाहन सिंह ने "पामास्वप्न के सम्पण में उसे अपने जीवनचरित्र की सरिता ना हस कहा है और प्रजनन सहाय ने अपने सौ योपास' का अपनी जीवनी का एए पृष्ट राधाकृष्णदास ने निहाय हिंदू दे मदनमोहन और बारात भाट ने 'यो बान एक मुजान' में पावर से तादात्म्य स्थापित पिया है । महना हमाराम समान अपने सयासों की भूमिकाओं में सिसा है दि उना समास रिसो पुस्तक वे आपार पर नहीं रिस गए हैं वे पल्पना ६२] [हिदी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा की उपज हैं। कुछ लेखको ने अपनी कच्ची सामग्री जीवन स नही बल्कि तिहाम पुराण और कथासाहित्य स ली। पर यह स्मरणीय है कि आरम्भ में समकालीन सामाजिक जीवन को ही प्रमुखता मिली तथा अतीत का प्रत्यक्षी करण और पननिर्माण भी वतमान की दष्टि स किया गया । इसस ऐति हासिक उप बासा म भी सामयिकता का समावग हो गया और उनका सम्बध सुदर अतीन से न होकर मुख्यत मुगलकाल से रहा । उनम इतिहास म अधिक कल्पना और सत्य स अधिक सम्भावना को स्थान मिला है। वे जातीय गौरव की गाथा या शौर्याधित प्रम का आख्यान हैं । और इसलिए विशुद्ध एतिहासिक न होकर राजनीतिक और रोमाटिक है। तिलस्मी एयारी उप ‘यास म भी नवीनता की ओर इयान है जसा कि चद्रका ना की भूमिका स मालम हाता है। साहित्य में मौलिकता का महत्त्व सवमा य है । उपन्यास की उत्कृ प्टता कथानक को मौलिकता पर निभर करती है। जिस उपन्यासकार के अनुभव का आयाम जितना ही बड़ा होता है उसकी कथावस्तु में उतनी ही विविधता और नवीनता होती है । आलोच्यकाल के उप यासकारों ने जीवन के विभिन्न क्षत्रो से वस्तु ग्रहण की और इसलिए उनकी रचनाओ मे सहज सजीवता है । उनमें अधिकाश ऐस हैं जिनक अनुभव म यापकता तो है गहराई नही है। उहोन मानवीय मनोभावो और गाश्वत समस्याओ की ओर विशेष ध्यान नही दिया है । अनुभव की समृद्धि के साथ कल्पना की शक्ति भी अपेक्षित है। इसके अभाव म अनेक उप यासकार परिचित परि स्थितियों और दम्यो का मार्मिक चित्रण नहीं कर सके अनात परिस्थितियों और दश्यो की बात तो दूर रही । बहुत से गौण लसको ने लोकप्रिय लखको क वस्तुतत्त्व का अनुकरण या अपहरण किया है। इन दोपो बावजूद एक गुण प्राय सभी उप यासकारो म पाया जाता है और वह किसी भी साहित्यकार का प्रथम आवश्यक गुण है। व अपने और अपने पाठको के प्रति ईमानदार हैं। उनकी रचनाओ मे साहि त्यिक सौंदय चाहे न हो अनुभूति की सच्चाई अवश्य है । वे देखी सुनी और जानी हुई बातो को ही प्रस्तुत करते हैं। कहते हैं मेंच प्रकृतवादी पलावेय ने अपन उप मास की पृष्ठभूमि की प्रामाणिकता के लिए मिश्र की यात्रा की थी। रामजीदास वन्य ने फूल में कांटा नामक उपयास म इगरड उप यास एक नई कला "य का वणन करने के लिए इगल ड को यात्रा ता नही की पर एक अमजी पुस्तक पढकर आवश्यक नान प्राप्त कर लिया। यह काई आवश्यक नहीं है कि महान उपन्यासकार के अनुभव का क्षितिज विस्तृत हो । यदि उसम रचनात्मक प्रतिभा है तो अपन सौमित ज्ञान के सहार वह उच्चकोटि क उपयाय को सष्टि कर सकता है । अग्रजी उपयास-लेखिका जेन आस्टेन ने उस दश्य का वणन नहीं किया है जिसम केवल पुरुष हा। सच्चाई के प्रति इतनी निष्ठा नही भी हो तो उप यासकार मानव जीवन की उन घटनाया और प्रियाआ का आधार बनाकर सफ्ल हा सकता है जा लागा का मम स्परा पर सहानुभूति उत्पन्न कर सकें। किसी रचना का स्थायी मूल्य इसम निहित है कि उसम दिस प्रकार के उपादान का उपयोग किया गया है। उप यास को कला वस्तु के चयन और वियास से आरम्भ होता है। उप यासकारा ने पुरान विषय का पल्पना म रगर नवीन बना दिया है । देवकीन दन खत्रो न दास्तान अमीर हमजा' के कुछ द या का नया और मनाखा रूप प्रदान किया है। विशारीलाल गोस्वामी न पई ऐतिहासिक उपन्यास प्रसिद्ध घटनाओं के आधार पर लिस फिर भी उनम मोलिनता और रोचकना है। प्रख्यात या परम्परागत स्थानक में भी रम हाता है लेकिन उसका चार परने के लि. कल्पना योर कसा का विप उपयाग करना पड़ता है। प्रमद का कहना था कि नप क्यानक वह रस, वह आपण नहीं होता जा पुरान कथानका म पाया जाता है । हां उसका परेवर नवीन होना चाहिए। दुलला पर यदि वाई उपयास लिखा जाय ता वह कितना समस्पी होगा, यह बताने की जरूरत नह।" प्राचीन क्या नवीन लेवर धारण पर मोरिक था से अधिक नहा तो उसके समान आमपक हा सक्ती है क्याकि वह सनातन सत्य व पूण हान के कारण अक्षय सोदय और सतत वान ६ को वस्तु होती है। सच ता यह है कि काई क्यानर पूर्णत मोलिए कहा नहीं जा सकता। यहते हैं, विश्व र पार कर सात मूल एमासूत्रों को पावृत्ति बरत रहे हैं । मौलिकता बिन्दुल नई बात बहन म ही नहीं बल्कि एक बात का अनक ढगों स रहन म है । उपयाम का वास्तविक विषय स्वय उसका रेखक है और उसको मौलिकता रया की सपना की मौलिकता है। उसम विषय को अपना रस का महत्व अधिक है। पा वस्तु तो साहित्य-जगत की है जा प्राप दाम्य आख्यान काय पहानी नाटर, उप पाम सबको सामूहिण सम्पत्ति है । उप यासरसा न ६६] [हिदी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा तापला व्यवस्था और नियम का। फिर मध्य या अत स भारम्भ करना किसी हद तक स्वाभाविक भी है। वास्तविक जावन म भी हम पहले किसो व्यक्ति का दूकान म सामान खरीदत हुए या सडक पर जाते हुए दसन हैं पीछे उसका परिचय पात है पहर कोई काय होता है फिर उसका कारण जानन की कोशिश करते है और इस तरह आगे से पीछे की ओर लौटते है। यदि उपयास म पात्र और प्रिया को इस रीति से दिखलाया गया तो वह जीवन का ही प्रतिविम्ब था। उसका मुखद अत मनमाना होकर भी निरथक नही था । पुरान क्याकारा की भांति उप यासकारा का मुख्य उद्दश्य पहानी सनाना नहीं था। वे कहानी के माध्यम से अपना निश्चित दृष्टिकोण यक्त करना चाहते थे । अत क्थानक का लक्ष्य की ओर अग्रसर होना आवश्यक था। उपयासकारा का उद्दश्य कथानक की गति और दिशा का निर्धारण करना रहा है । यह कहना ठोक है कि लक्ष्य का नान ही कथानक है।" उप यास एक बाल कला है। उसकी घटनाए काय-कारण शृङ्खला के साथ साथ काल क्रम म बधी रहती हैं । कथा की अवधि कई वर्षों स लकर कुछ घण्टा तक रह सकती है। उसम पूरे समाज का या एक परिवार का या कुछ पात्रा का विकास एवं परिवतन दिखाया जा सकता है । तिलस्मी ऐयारी उप यासा म बहुघा क्या का विस्तार एक से अधिक पीढियो तक है । कुछ उपन्यास कल्पित जीवनी के समान लगते । नर नारी जाम लेते है बड होते हैं और मर जाते है। उप यास के आदि अत की स्थितियों मे अतर होता है। हनुमत सिंह की मेरी दुख गाथा एक यक्ति के सम्पूण जीवन की झांकी है । क्यानायक जम लेकर शिक्षा प्राप्त करता है विवाह के बाद एक मारवाडिन युवती पर बलात्कार करने के अपराध मे जेल जाता है जेल से छटन पर देश सवा में जीवन की निम घडियां बिताता है । इसी प्रकार किनारी-गल गोस्वामी की लीलावती बालिका से प्रमिका और प्रमिका स माँ बन जाती है। वह जब पचास बरस की हो जाती है उसके जीवन म कोई उल्लेख योग्य घटना मेष नहीं रहती। अवधनारायण की 'विमाता म रघन टन के बचपन से मुखी विवाहित जीवन तक की क्था है। कुछ उप यास जीवन के अल्प कार को लेकर लिखे गये हैं जसे चांदकरण गारदा का कालेज होस्टर नायक के विद्यार्थी जीवन का चित्र उपस्थित करता है । कछ उप यासो का क्थाकाल दिनो और घण्टा तक सीमित है । परीक्षागुरु म केवल पांच दिनो की क्या है गोस्वामीजी लिखित ।

उपयास एक नई कला] {६७ - लाल दर' म वर एक रात की। जहाँ बाल का विस्तार होता है वहाँ छ घानाए दृश्य होती है, कुछ मून्य ! 'मरी दुप गाया' म सात वर्षों की प्रिया का एक वाक्य म धन का प्रयास किया गया है जम 'सात वप क कारादण्ड स मरे सब पापा का प्रायश्चित हो चुका । लीलावती' में चौथे परिच्छेद का महान पर पदह घर्षों के बाद पांचवा परिच्छेद आरम्भ होता है। बीच की घटनाओ को यह कहकर छाड लिया जाता है कि व उल्लखनाय नहा है । जीवन की प्रत्यक वस्तु का वणन साहित्य मन तो सभव है, न वाचनीय हो । वर्षों की बात धाड गम कह दी जा मकती है और एक दिन की बात के लिए अनेक पान रेंग ला सक्त हैं। कलाकार का छोडना और कुछ ग्रहण करना पडना हैं । बा म पसद और चुनाव जरूरी है । उपन्यास म सभिप्त उल्लख व द्वारा द य और मूय घटनाओ म सगति मिलानी पड़ती है । इसके विपरीत नारक म जहाँ केदार दश्य होते घटनामा की ?सरा सहज हा जुडती धरती है। भाभी उपयासकार भकत स जिनना प्रभाष उत्पन्न कर दत हैं उतना वन स सम्भव नहीं होता। विमाता क सोसर अध्याय म सुभता की मृत्यु वणन के बाद चौथ अध्याय का प्रथम वाक्य ( सुभला के परलाक्वामी ह ग्यारह वप हो गए। ) पदबर पाठन विस्मय विमुग्ध हो जाता है । एक छोरा-मा वाक्य बों की रिक्तना भरता है और कथा की गति को माड देता है। इस प्रकार की औप यासिक अभियक्ति ही एक मधुर घटना बन जाता है । साधारणत लम्बी अवधि क छाट उपचास म कमाय रहता है हाटी अवधि बड उपायास मतिथिरता। पुरानी कहानियो मौतूहल बनाकर मनोरजन ररने का माधन थी। उनम पदनामा का अविराम प्रवाह रहता था और पाटर या धोना वसुध हागर वहते जात थे। मह गुण उप पाम म भी अण्ण रहा जिन्तु जर्ग पुगनी कहानियां सरल बाल जिनासा को शांति करती थी वहाँ उप याम उसम आग बड़ार पाठकों की पल्पना और बुद्धि को भी उद्दीप्त करने लगे। बुद्धिनरव क समावेश स राधकता में कमी नहीं हुई वलि हाम्परम लिए विगप अप पिसावविना ये रिए हास्थरम यावश्यक नहीं रेरिन उपयाम पे रिए मा बनिवाप है। हमारे पराने उपयामार हसना साना ड जानते थे। देवकीनादन सत्रा की हारनियता का एक कारण उनकी हास्यापता है। ।

६८] [हिदी उप यास पाठभूमि और परम्परा उप यास को राचक बनाने के लिए क्यानक की योजना की जाती । इस लिए पहले कथा को जटिल और रहस्यमय बनाना आवश्यक समझा जाता था। आरम्भिक अग से घटनामा की गुत्थियां सजाकर उत्तठा जगाई जाती थी और अतिम भाग म उ ह मुरयावर गात की जाती थी। गहमरीजी न रहस्यमयता का उपयास का आवश्यक गुण मान लिया था उपयास म पहिले जानन याम्म बात घटना की जवनिका म छिपा रखना और इधर उधर को जो सिलसिले और वेजोड न हा पहिले कहना और घटना पर घटना का तूमार बांधकर असल भेद जानने क लिय पाठको के हृदय मे कुतूहल बढ़ाना और रहस्य पर रहस्य साजकर ऐसा उपल्यास गढना कि पूरा पढ विना पूरा स्वाद न मिले किन पढन वालो को ऊब न हा बल्कि जितना परता जाय उतना ही उसम उलझता जाय । भोले भाल नये पाठको को उल्याये रखन के लिए निपण उप यासकार क्था के रहस्य को धीरे धीरे खोलते थे उस काई रसिक वर वधू के घू घट को हटाते हटाते हटाता है। वे उप यास म स्वय आकर दशन देते थे और अधीर पाठवा को समझान की कोशिश करते थे एस दोपहर के समय यह क्या घर स निकला और क्या इसका मन मूबा था इसका रहस्य जानने के लिए कौन न उक्ताता होगा कि तृ सहसा क्सिी रहस्य का उद्घाटन उप यास लेखको की रीति के विरुद्ध है इससे इस प्रस्ताव का यही समाप्त करते हैं ।। सहसा रहस्य का उदघाटन उपायास उखका की रीति के विरुद्ध है यह कहकर भटटजी ने बड पते की बात कहा है । एक्वारगी कथा कह देने स कथा रुक जाती है, उसकी रोचकता नष्ट हो जाती है कौतूहल समाप्त हो जाता है और पाठक को अनुमान तथा प्रत्या करने का अवसर नहीं मिलता । उपयासकार का कौशल इसम है कि वह घटनाओ को इस प्रकार सम्बद्ध करे कि जो पहले अप्रत्याशित हो वह बाद म अवश्यभावी प्रतीत हो। आदिकालीन उपयासकार बहुधा अपनी रचनाओ के आरम्भिक भाग म अप्रत्याशित और अतिम भाग म अवश्यमावी को स्थान देते थे। वे पाठको को मुग्ध करने के लिए क्यानक को पेचीदा बनाना उचित समझते थे। लेकिन इससे पाठको के मन म उलझन और कब भी पदा होती है । रहस्य को तुरत प्रक्ट कर देना उतना ही भावाछनीय है जितना रहस्य को अनावश्यक सृषि करना । कथानक की जटिलता रहस्यमय उप यासा की गोभा हो सकती है तो जय प्रकार के उप यासा के लिए घातक भी। रहस्यमयता को आधार सप यास एक नई क्ला] । मानकर चल्न म चरित्रावन की अपक्षा आपस्मिक घटनाओ को अधिक और अनावश्यक महत्व मिल जाता है। सरल क्यानक की पल्पना उतनी हा रचनात्मक प्रतिभा की अपेक्षा रखती है जितनी जटिल प्रधानक की याजना । सरलता क्यानक का बहुत बडा गुण है । यह आवश्यक नहीं कि सररता कघर सरल कथानक म हा मिश्र में नहीं हो । किशोरीलाल गोस्वामी न कई उपयामों में दो समाना तर कथाओं को मिला दिया है अथवा अनेक स्या सूत्रा को गुम्फिन किया है फिर भी क्यानक पेचीदा नहीं होने दया है । उप पास का इतिहाम यही बताता है कि उसम स्थानक का प्रमा हास होता गया है और आज तो वह उपेक्षा की वस्तु बन गया है । उपयास को गति कथानक पर और उसकी सुदरता ढांचे पर निभर है। एक बुद्धि का अपील करता है दूसरा सौदयबोध का चिा भिन्न भिन्न तत्त्वो क सामजस्य से बनता है कि तु क्यानक स उसका अभिन्न मम्ब प हाता है । करिना नाटक और निबध की तरह उप यास ढांचे को मार पाठ का ध्यान अनायास नही जाता क्यावि उमक अध्ययन म व प्रभाव ऐक्य पर विचार नही करत । यदि पढन के समय उसकी पूर्णता की और कुछ ध्यान जाना है तो पाने के बाद उसका आरित स्मरण हो रह जाता है । हेनरी जन्स ने उप यास के सभी अगा वे सतुलन का अत्यधिक महत्व दिया है और उम दष्टि मे रखकर उपयास को देवल दा कोटियाँ निर्धारित की है जीवित और जीवनहीन । जीवित उप याम का पानक मुपर और सुमबद्ध होता है । क्यावियाम को दष्टि से दो प्रकार के उप पास माने जाते हैं, शिविर या मुगठिन क्यान के उप यास । इनम दूसरा प्रकार रेसक को मुचितित परियोजना और निर्माण-कौशल का परिचय देता है। उसम कृत्रिमता का मामास रह मरता है किन्तु उसका स्प-सौष्ठव बौद्धिक बानन्द प्रदान करता है। उपयारा पा सुदर ढांचा गुठिन कथानक या डाया है जिसम अनावश्यक विस्तार या सक्षप नहीं होता माधारण बातें भी सरल लगती हैं यसाधारण परिस्थितिया में भी वास्तविक्ता या बाभाम मिलता है पटनाया का आरम्म, विकास और समाहार सहज स्वामाविक होता है और विषय तथा स्वरूप अभिन्न होते हैं। पद्रवाता विमाता और प्रमाडाचा अरपन्त गुपर है। उप यासकार अपने क्पाल से पाठमाँ के हृदय का कोमल होना दूपर रहे उपसास को मुरता से प्रभावित हान योग्य बनाता है । अन्टा [हि दो उप यास पष्ठभूमि और परम्परा । उप यास अच्छी तरह कही हुई कहानी है । नाटक म कहानी कहने का एक ढग है उपन्यास में उसके एक स अधिक ढग हैं । पुरानो क्या परम्परा में मुख्यत पुराण शली और कथामाला गली का अनुसरण किया गया है । पुराण गली में एक यक्ति दूसरे यक्ति को कथा सुनाता है और क्याकार उस कथा को दुहराता है । 'नासिकेतोपाख्यान में व पायन मुनि राजा जनमे जय को कथा सुनात हैं सदलमिथ तो कवल रिपोटर हैं । इस पद्धति म मुख्यकथा तक पहुचने म पाठक को बहुत प्रतीक्षा करनी पड़ी है । कथाकार उसकी कथा सुनाने लगता है जिसन कथा सुनाई थी। पचतत्र आलिफ लला म प्याज के छिलक क समान एक कहानी स दूसरी कहानी निकलती है। उप यास में इन पद्धतिया का अनुकरण नहीं किया गया है इनका परिवर्तित स्प कही कही अवश्य मिलता है। क्छ रचनाओं म कथा का आरम्भ आरम्भ के पहले हा जाता है जस बालकृष्ण भटट की रहस्यकथा और मनग्वर मिश्र का बलवत भूमिहार । दानो मे बटे पोत की कथा स्वर्गीय बाप-दादे से ही शुरू की गई है। बहुत स उपन्यास एक से अधिक कथानक लेकर चलते हैं । दो या तीन कथाआ का क्रमिक या समाना तर विकास होता है । उनमें एक मुख्य होता है और दूसरा विरोध या सामजस्य विश्राम या विविधता उपस्थित करता है । अत म उनको अविति हो जाती है । उपन्यास म कहानी दर कहानी का सिलसिला नहीं रहता है यदि रहता है तो दूसरे रूप में जसे परीक्षागुरु म छोटी छाटी कहानियों पूण इकाई के रूप में नहीं बल्कि दाटात क रूप म हैं । कभी कभी उप यासकार रोचकता के लिए कोई छोटी पहानी उपन्यास म जाट देते हैं । यह प्रणाली अभी भी परानी नहीं हुई है। उप याम में उप यास का बियास एक विलक्षण क्याशिल्प है । इसका पराना प्रतिरूप पौराणिक कथाआ म पाया जाता है। भाग्यवती और परीक्षागुरु में इसका प्रारम्भिक स्प है। भाग्यवती म एक राजा एक पडितजी का एक ऐसी पस्तक लिखने के लिए कहते हैं जिसे पढकर लोग घोले म नहीं आ सकें । पडितजी कौतुक संग्रह नामक ग्रंथ लिखकर देते जो भाग्यवती के अनुरूप ही है । परीक्षागुरु व अत मे उसका नायक अपन शुभचिंतक मित्र को अपना वत्तात प्रकाशित करा दने का अनुराष करता है। उसका बत्तात तो उपयास ही है । यथाथ का भ्रम उत्पन्न करन का यह अच्छा उदाहरण है। मनाहरलाल लिखित 'कातिमाला और गोपाल लार लिखित अलवला रागिया में इस गिल्प का कलात्मक उलप है। ।

उपमास एक नई क्ला] [ ७१ पुस्तक की 'प्रस्तावना म गणा किनारे उपवन के बीच प्रासाद म पलग पर स्टा हुई एक पोडगी पूणच द्र की शोभा देख रही है कि एक पच्चीस वर्षीय युवक पीछे से उसकी आँखें बन्द कर दना है । युवनी क यह पूछने पर कि युवक इतनी रात तक क्या कर रहा था युवक जवाब देता है कि वह एक उपन्यास लिख रहा था। हास परिहाम दे वार युवा युवती के हाम म एक पुस्तक रख देता है जिस पर अपना नाम देखकर वह मुस्कुरा उठती है और वह चाव स पढन लगती है। प म लेखक लिखता है 'बस उपचास समाप्त हो गया। पूर्वोक्त गगा तटस्थ उपवन के उन्नत आगार को उच्च बटटालिका पर वठकर चद्रमा की शामा को दखन वाला तथा पति से प्रम कलह करने उपरात पति का दिया हुआ उपयास बड म से देखने वाली पोडप वर्षीया बालिका कातिमाला ने जिस समय पुम्ना समाप्त क्यिा रात आधी स अधिक जा चुकी थी। जब उससे पति पूछना है कि उप यास कसा है तो वह कहती है कि वह ता उन दोना का जीवन बत्तान है । फिर यह कहता है कि उनक जीवन की घटना भी एक उपन्यास की घटना से कम नहीं है इसलिए उसन उपयाम लिखा । अरवेला रागिया का बत होने पर उस उपन्यास पा भी मत हो जाता है जा एक स्त्री पान द्वारा अक्सर पढ़ा जाता है। गेनों की घटनाओ म समाना नरता दीख पडती है । जहाँ वहीं इस कौर का उपयोग किया गया है वहाँ लगता है कि पाठर के सामने काई कलाकृति न होरर स्वय जावन है और उप पास की रचना वरना उपायास की एक घटना है। स्था ती से क्यापार और उसकी कृति का सम्बध मूचित होता है । नाटक म नाटस्कार दष्टिगार नहा होनामि तु उपयास म उपयासकार स्थय कहानी कहता है, पात्रो के मुह स कहलाता है तथा कभी कभी प्रबाट होकर अपना मत देना है। उप पास म उमका बटा ईश्वर की भांति व्यक्त होन पर भी अ"य रह सकता है और वेवर पात्रा एव उनके प्रियाकलाप का प्रत्यक्षीकरण हा सकता है। यरुप म मया पहन की विधि सर्वाधिक सर प्राचीन और प्रचलित है । उपासकार इतिहासकार और महाकाव्य यार की भाति प्रत्यार ग स बहता है। वह मवान और त्रिशरों है। यह य जगन के अतिरिक्त अनजगनमा भी हटा माना जाना है । यह वाराए म अम्यक्त रहता है वितु वपन म उसका व्यक्तित्व उमर आता है। पुराने उप पामरे पर वार्ता में भी कभी-कभी प्रकट हो जाते थे।"

७२] [हिंदी-उप यास पष्ठभूमि और परम्परा लेखक के तटस्य रहने पर कया का प्रवाह सहज स्वच्छद होता है। जब वह कथानक के बीच म टपक पडता है पाठको का भ्रम नष्ट हो जाता है और कथा की गति शिथिल हा जाती है । यही इस पद्धति का उल्लेखनीय गुण और दोष है । पुराने उप यासकार पाठको को कछ कहे विना रह नही सकत य शायद इसलिए यह गली उह विशेष प्रिय थी । यति कहानी किसी एक पान के दष्टिकोण स कही जाती है तो इस पद्धति म भी उत्तम पुरुप वाली पद्धति की विशेषता आ जाती है। उत्तम पुरप की गली मे लखक और पात्र का तादाम्य हा जाता है। क्या एक प्रधान पास या गौण पात्र या अनक पात्रो स कही जा सकती है । एक क्ति (खासकर प्रधान पात्र ) द्वारा कही गई क्या आत्मचरित या आपबीती जसी लगती है। उदाहरण के लिए ठाकर हनुम त सिंह की चन्द्रकला और विशारीलाल गास्वामी के माधवीवाधव मे क्रमग नायिका और नायक द्वारा क्या कही गई है । आत्मकथा-शली म स्पष्टता और सत्या भास के गुण अनायास आ जाते हैं । घटना प्रधान उप यासा में जहाँ वास्त विकता का रग रहना आवश्यक है इसकी उपयोगिता देखी जाता है। आश्चयवत्ता त में एक पात्र अपने कल्पित भ्रमण का वर्णन इस तरह करता है कि उसम अविश्वास करना कठिन है। रहम्य का उत्तरोत्तर उदघाटन कराने क लिए एक स अधिक यक्तियो द्वारा क्था कहान का विधि रहस्य मूलक उपयासो के लिए सवथा उपयुक्त होती है। आलोच्य काल के जासूसी उपचासो मे इस विधि का विशेष रूप स प्रयोग किया गया है। भावात्मक और मनोव नानिक उपन्यासकारो को मैं शली स माह हाना स्वाभाविक है। वे अपना ओर स वणन विश्लेपण करने के बदले पात्रो के स्वगत-कथन स उनके व्यक्तित्व का निरूपण करत हैं । वजन इनसहाय के प्राय सभी उप यास इसी शली में हैं । इसमें रचयिता को बीच बीच म दान देने की जरूरत नही होती । उसे जो कछ कहना होता है पात्रो के स्वर म कह देता है। यह परोक्ष ढग उप यास को नाटक के निकट ले आता है । इम पद्धति की अपनी सीमाए हैं । कथा कहने वाला पात्र पृष्ठभूमि म चला जाता है और अभिनय करने वाला पात्र ध्यान आकर्षित कर लेता है । मदि अभिनेता क्थानायक बनता है तो स्वाभाविकता और सगति पर आघात होता है । लेखक कथावाचक पात्र को मार नही सक्ता न ही उसे निजी अनुभव और पयवेक्षण की सीमा से बाहर होने दे सकता है। इस । 1 उपयास एक नई कला]] कठिनाई को दूर करने के लिए अनेक व्यक्तिया से कया कहाई जा सकती है लेकिन एकसूत्रता लाने के लिए असाधारण रचना कौशल की आवश्यकता हाती है। यही कारण है कि एक पात्र की आत्मकथा के रूप म लिखित उपपास के ही अनेक उगहरण मिलते हैं। रामचीज सिंह को 'कुलवनी' दा पात्रों नाय और नायिका ६ मुख स पित आत्म-वत्तात का उत्कृष्ट उदाहरण है। एक जगह एक साधु एक मोदिमाइन और एक लडका आ मिलत हैं। सडक ना साधु कहता है कि वह किस तरह घर छोडकर साघु बन गया और उसकी स्त्री लोकापवाद ये कारण घर से भाग निकली। मोदिआइन कहती है कि वह कुशव तो नाम की लडकी को जानती है जो घर से निकल गई थी। फिर साधु बताता है कि वह भी बलवती का हार जानता है । उसका पति एक रात अपनी ससुराल छिपकर गया, जिससे कुलपती को गम रह गया और उसन वरनामी क डर घर छोड़ दिया। मोदिमादन आगे कहती है कि कुलद नी ने पर छोडन चे या एक भिखारिन के हाथ अपने पुत्र का वेच दिया। इस प्रकार जब कहानी पूरा होती है तब यह भेद खरता है दि मोदिआइन कुरुवन्नी है साघु उसका पति है और वह लड़का उसका पुत्र है । प्रजनन्दनसहाय ने 'राधाकात की मया दो बहो म दो पायो द्वारा पहाई है और परिशिष्ट लिखकर सम्बद्धता स्थापित की है । चन्द्रशेखर पाठक के वारागना रहस्य म कई पात्र बारी-बारी से अपनी अपनी कथा सुनात हैं। ॥ को क्या अपूरी रहती है कि दूमर को शुरू हो जाती है । यह क्रम अन तक घरना है। इसस पानक जटिल और रसहीन हो गया है। सिलसिला मिलान के लिए पुनरुक्ति का आश्रय रना पड़ा है। पात्रों का आत्म विपण अस्वाभाविक और उपग-पयन नीरस लगता है। पाटन का क्या का क्रम और मगमि मिलान में कठिनाई होती है। य दोष जो इस प्रकार उप यास में अक्सर पाये जाते हैं, 'काला संतति' को स्पा नहीं कर सके हैं। "स विधि का सबत पोठिनाई चरित चित्रण में है। प्रधान पात्र अय पात्रा का दिन पण नहीं कर पाता है और अपना विपण कर सपना है तो अत्यन्त प्रगल्भ या अप विनम्र होकर ही जा अस्वाभाविर लगता है जहां गौण पात्र एसा करता है वहां ऐसी कटिनाई नहीं होती है । पर और निजी माध्यमापन भारपाया ही स्पा तर है । इसलिए इनक पृथा प्रयाग की विशप माप याता और उपमागिता ७४] [हि नो उप पास पष्ठभूमि और परम्परा नहीं होती। इनकी दो दिपताए उल्लेखनीय हैं। इनमें आत्मीयता का स्वर रहता है और विस्तृत वणन को गु जाइरा रहती है । रेखक यक्तिगत अनुभूति या गहनतम रूप और दनिक जीवन का सूक्ष्मतम विवरण प्रस्तुत कर सकता है । मारोच्यकार म पत्र या दनिकी के रूप में एक भी पूरा उपयास नहीं लिखा गया, उनका प्रयोग पूरक विधिया के रूप मे हा हुआ है जो स्वाभाविक भी होता है। श्यामास्वप्न इसका मयतम निदान है। किसी घटना क घटने पर उसका वणन तुरत किया जाय तो उसमें स्पष्टता और तात्कालिकता का गुण आ जाता है ना श्यामास्वप्न मै है । सरावारा (साहित्य पत्रिका १९१२ १३) एक पत्रामा उप यास है किंतु उसकी मौलिक्ता सदिग्ध है। अधिकाश प्रारम्भिक उपयासकारो ने इतिहास-लोम पत्रो का बहुधा व्यय हार किया है कि तु उनसे क्या वे विकास में नहीं बल्कि भ्रम र उत्पादन म सहायता मिली है। महाका यात्मक, आत्मकथात्मक और रेख्यात्मक पद्धतिया प्रमा घटना प्रधान चरित्र प्रधान और भाव प्रधान उपयासो के लिए विप उप युक्त हैं । प्रत्येक पद्धति में कुछ गुण कुछ दाप हैं । कुशल उप यासकार एक के अभाव की पूर्ति द्वितीय की सहायता से करता है। प्रथम पद्धति स जीवन का चित्रण वास्तविकता सम्पूणता और वस्तुनिष्ठता के साथ किया जा सकता है। उसम लखक का अपना को दिखाने का अधिक अवसर मिरता है। विश्व के प्रसिद्ध उपयासकारो म फोल्डिंग, स्माट जेन आस्टन हार्डी डिस, थवर टाल्सटाप, दास्तावेस्की गोर्यो, बार जक विक्टर ह्य गा जोला पलबक, देवकीन दन खत्री, प्रमचद, प्रसाद वदावनलाल वर्मा यापाल और रत्चद्र की यह प्रिय ली है। उप पास म यथा का वास वणन और वार्तालाप स होता है और वार्तालाप भा बारमकपा का हा एक ढग है । अन अयपुरुप गला म याप पता और सम्भावना है । उपयामकार वणन विश्रेपण याख्या और वार्ता लाप का उपयोग स्वत बता एव सुविधा के साथ करता है । मनावजानिक चरित्र चित्रण के लिए भी यह ला अधिक उपयुक्त हाती है । सवा लेखक सभी पात्रो के मन का विश्लेपण तटस्थता स कर सकता है। था क.ने की विधियों का विकास कालक्रम से नही हुआ है।" हिदी उपन्यास के उदयकाल म ही सभी विधियो के उदाहरण मिल जान उपल्यास एक नई क्ला] [७५ हैं । एक 'श्यामास्वप्न' म ही आत्मक्या दैनिको और पात्र की गरियो की समष्टि है। प्रेमच दयाल तक अयपम्प म क्या कहने की विधि अत्यधिक प्रचरित रही । जनभद्र ने परम्परा से अलग होकर 'मैं गैली को ग्रहण किया और उसे कलात्मक रूप प्रदान करने की चेष्टा की। स्था प्रस्तत करने की नाटकीय विधि सर्वोत्तम विधि मानी जाती है । वाताराप म उप यासकार अव्यक्त रहता है इसलिए उसमें नाटकीयता है जितु नाटकीयता वार्तालाप तक सामित न होकर वणन के अगम भी है। उपपासकार अपनी ओर से नहीं करता है वगनी को पहन देता है। पाय को उसकी उपस्थिति का मान नहीं होता है । वह किसी वस्तु का इस प्रकार वणन करता है कि पाठक को नाटकीय वतमानता और प्रत्यक्षता की अनुभूति होती है । जिम उप यास म सारास (समरी) कम दश्य अधिक हात हैं उसरा क्याशिल्प नारकीय होता है । दश्य वार्तालाप के रिना भी रह सक्त है। वार्ताराप के उपयोग से अधिक वस्तनिष्ठता आती है । जहाँ उप पासकार नरत क्पा आरम्म कर देता है और व्याख्या को जिसरा सम्बन्ध अतीत में होता है, जान देता है वहां वह नाटकार के निकट आ जाता है। नाटकीय या परोक्ष विधि पुरानी कहानी और उप याम म भेद प्रकट करती है । पुरानी कहानी की भांति उपयास का सम्वध भी बाती हुई घटनाओं में है पर नहाँ एव म घटनाओं का वणन तिहासिक रीति से किया गया है वहीं दूसरे म नाटक समान अतीत की घटनाए वतमान में घटती हुई लिखाई गई। उपयामकार का कोल इसम नहीं है कि वह जो हर चुना है उसकी सूचना दे बल्कि इसम है कि वह नाटककार की तरह आसो के सामने धरनामों को पटित होते हुए दिखा पात्रों के अतगत प्रत्यक्षीकरण म जहाँ नाटककार अममयता का अनुभव करता है वह अपने कौल का विप चमत्कार प्रदगित करता है । लुबीर न क्या गला को अत्यधिक हुए लिखा है कि जब तक वहानो स्वय नही कहता है तब तक कला आरम्म नही होती है। जब उपपासफार उपास ६ बीच बीच में प्रस्ट नहीं होता और क्पाका स्वत उदघाटन हाता चलता है तब वह मफ्ल क्लापार होता है। महत्त्व देते पात्र उपयाम पराना स्पा-बहानी को तरह केवल यह ना बता कि [हिदी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा षया हुमा बल्कि यह भी कहता है कि क्यो हुआ किमे हुआ। क्वल कौतूहल वधक घटनाआका जाल बिछाकर पाठक वा अधिक काल तक उलयाकर नहीं रखा जा सकता । मन रमाने के लिए कया नत्त्व के साथ-साथ मानव तत्त्व चाहिए। उप यास-लखकों ने देवी-देवता भूत प्रत, पशु-पक्षी राजकुमार राजकुमारी के बदले सामान्य नर-नारी को के द्रबिदु बनाकर मनुष्य के प्रति मनुष्य की सहज उत्कठा को तप्त क्यिा घटना और चरित्र में सम्बध स्थापित किया और कथानक का सजीवता एवं साथकता प्रदान की। प्रमचद ने उप यास को मानव चरित्र का चित्र मात्र कहकर उसके मम की आर मकेत किया था तथा उस घटना प्रधान कथा कहानी से अलग कर ऊचाई पर पहुचाया था। रानी क्तकी की कहानी हातिमताई आदि की भांति उपयास म घटना किसी बाह्य और अदश्य शक्ति से उत्पन्न नहीं हुई है। उसम चरित्र से घटना और घटना से चरित्र का विकास होता है । पुरानी कथाआ म मनुष्य अतिप्राकृत शक्तिया क ताल पर नाचते थे इसलिए घटनाए चरित्र निरपेक्ष हुआ करती थी। उप यास म मानवीय नाटक का मूत्राधार मानव का ही बनाया गया था इससे चरित्र ही विधाता है यह उक्ति चरिताथ हा सकी। यदि उसम अतिप्राकृत तत्त्वो को स्थान भी मिला ता वे मानव जीवन का अग बनकर रहे । उहे मानवीय भावो से आदालित हाते हुए दिखाया गया सामाजिक परिवेग म उपस्थित किया गया और का यगत याय का भागी बनाया गया। पहले क्याओ म जो प्रभाव अलोक्कि घटनामा के समावेग स उत्पन्न किया जाता था वह उपयास म छम वेश सयोग देवयोग आदि कृत्रिम साधनो स किया गया । परानी कहानियां बिना मुमाफिर की गाडियां नहीं थी लकिन मुसा फिर अजनवी और अनोख थे। उनम नर-नारी दशन भी देते थे तो उनका यक्तित्व उभरकर सामने नहीं आता या । जिस तरह दनिक जीवन में किसी व्यक्ति का परिचय उमके नाम से मिलता है उसी तरह कथात्मक पात्र को टाइप के बदले यक्ति के रूप में उपस्थित करने वाला उसका नाम होता है । पात्र का नामकरण चरित्र चित्रण की पहली आवश्यकता है। पूर्ववर्ती कथाकार अपने पात्रा को राजा रानी श्रष्ठ साहूकार ठग चोर साधु-मयासी कहकर काम चला लेते थे यति माम देते थे तो पशु पक्षी को भी का यात्मक और परुष-स्त्री को भी प्रतीकात्मक नाम देते थे जसे मरालकेसर और घूसरक नाम सिंह और सियार (पचतत्र) हुस्न और इश्क ( सबरस)।

उपयास एक नई कला] [७७ उप यास में पात्रो क नाम वास्तविक जीवन के अनुरूप रखने का यत्न किया गया, जिसम उनमें वास्तविक्ता का आभास हुआ। जहाँ गुणवाचक नाम का प्रयोग किया गया वहां सपा का विशेषण नही बनान दिया गया। समष्टित नाम या और व्यक्ति के बोध हुए। क्छ उपन्यासकारा ने नवीन और विलक्षण प्रयाग दिए जो कल्पना से पयाथ असाधारण स साधारण की आर आने में प्रयास थे । इशा न मालिन का फूलकली (रानी केतकी को वहानी') और बालकृष्ण भटट न दासी को गुलविया (रहस्यकथा) कहकर पुकारा है। दाना फूल हैं पर एक म कल्पना का रग है, एक मे मिटटी की गध। देवकीन दन खत्री ने वद्रोनाय, चुन्नीलाल, पन्नालाल और रामनारायण के रूप म अपन परिचिता और मित्रो को चन्द्रकाता के पन पर उतार दिया। इन पायो के कारण पाद्रकान्ता मे जसा सत्याभास है पसा उसके प्रतिरूप तिरिस्म होराख्या' म नहीं हो सकता। प्रमच द की प्रमा का नायक धनपतराय का पुत्र, अमृतराय है । इसस बढकर सत्य क्या हो सकता है ? परिचित नामधारी पार पाठकों का ध्यान तत्क्षण आकृष्ट कर लेते हैं । आलोच्यकार के विदेशी भाषा स अनूदित उपयामा म भी पात्रा क नाम भारतीय बना लिए गए हैं । नामकरण चरित्रचित्रण की सरएनम विधि है। उपायास मेजय विधियों का भी प्रयोग किया गया है । उह समानत विरूपणात्मक और नादकीय कहा जाता है। पहली विधि म उपन्यासकार स्वय पात्रों के बहिरग और अन्तरग का वणन विश्लेषण करता है तथा इभा कभी उनके सम्बध म प्यारूपा और निणय भी प्रस्तुत कर देता है। दूसरी विधि म पात्र स्वय अपन क्थन और प्रिया म अपने को प्रकट पर देत हैं तथा कभी-कभी उनके सम्बन्ध म अय पात्र भी अपना मत यक्त करत हैं । पहली विधि गोण पात्रा के लिए विशेष उपयुक्त होता है । मुख्य पात्रा के लिए दोनों का मम्मिश्रण समोचीन हाता है। विश्लेषणात्मक या प्रत्यक्ष प्रणाली से चित्रण म स्पष्टता और सजीवता आती है किन्तु उसक अनावश्यक या अधिक प्रयोग म पाप्रवाह म बाधा होती है नया पाठ को मारम निणय की स्वरना नहीं रहती है ।नाटकाय या परोक्ष प्रणाली से चित्रण यपाप एव रसारमा हाता है कि उप यासकार विगपाधिकार से पचित हो जाता है। दुध मारोचक प्रथम प्रणाली सद्वितोपोधिक महत्त्व देते हैं पर उप पास पी विशिष्टता प्रथम म हो निहित है। बार कृष्ण मटट मेहता लजाराम दार्मा और ममन द्विवेने प्रत्यन गयो तपा देवकीनन सत्री, गोपालराम ७८] [हिदा उपयास पृष्ठभूमि और परम्परा गहमरी और अवधनारायण ने परोक्ष ढग को प्रधानता दी है। किशोरी लाल गोस्वामी और प्रमचद न दोनो का समान रूप से उपयोग किया है। ऐतिहासिक दृष्टि स चरिचित्रण की पद्धति का विकास स्थूलता से मूक्ष्मता और प्रत्यक्षता से परोक्षता की बार हुआ है । पहले उपन्यासकार पात्रो के भावों और विचारो का वणन कर देते थे बाद म उनका विश्लेषण करने लगे। चरित्रचित्रण के विभिन्न तत्त्व परस्पर पूरक हाते हैं और उनके मिश्रण से पात्रो का यक्तित्व सपूणता म उमरता है । बहिरग के विवरण स पाठको के मन मे पात्रो व सजीव चित्र अकित हो जाता है किसी यक्ति की वेशभूपा रूप रग एव आचार यवहार का वगन सामाय रीति से या इस प्रकार किया जाता है कि विलक्षणता का बोध होता है। एक उपयास म बहुधा दो तीन पात्रा का ही सम्यक विश्लेपण किया जाता है। बहिरग के सविस्तार वणन से अतरग का सूक्ष्म विश्लेषण अधिक कौगल की अपक्षा रखता है। कभी-कभी उपयासकार याख्या करने के बदले सकेत से ही स्थायी प्रभाव उत्पन्न करते हैं। वार्तालाप और भाव भगी के सयोग स वक्ता का प्रत्यक्षीकरण होता है । वार्तालाप स क्रियाकलाप का महत्त्व कम नही होता है क्योकि क्थन से क्रिया कम मुखर नहीं होती । चरित्रचित्रण उपन्यास का अत्यत सजीव अग है । उसम सफल होने के लिए अनुभव की यापकता पयवेक्षण की सूक्ष्मता सहानुभूति की गहराई और कल्पना की उबरता वाछनीय है। इनके साथ साथ जब उपयासकार म मानवप्रकृति परखने की क्षमता और वणन करने की शक्ति हाती है तब वह अविस्मरणीय पात्रो की सष्टि कर पाता है । पात्रा म वास्तविक्ता विश्वसनीयता स्वाभा विक्ता मानवीयता और सजीवता हाना चाहिए । वे कठपुतल न होकर अपना यत्तित्व रखत हो। प्राचीन क्थासाहित्य के पात्र प्रकार या प्रतीक हाते थे । विविध परिस्थितियो म उनका उत्यान-पतन दिखाने का प्रयास नहीं किया जाता था। उनम शीलवचित्य नही या। उप यास मे मुख्यत तीन काटि क पात्रो के दान हुए सामाय या प्रतिनिधि विशिष्ट और सावभौमिक । विमाता में एक ही व्यक्ति को घर और बाहर की भिन्न परिस्थितियों म रखा गया है । उसक व्यक्तित्व में उक्त तीन विशेषताए निहित हैं। पास्टर ने पात्रो को दो श्रणियो म रखा है सपाट (पलट) और गोल (राउ ) उपयास एक नई करा] {७९ मपाट पात्रों में एक ही विशेषता होती है जो प्रमुख और सामाजिक होता है । व पहचान जाने योग्य और स्मरणीय हात हैं। माल पात्र इसके विपरीत होते हैं वास्तविकता यह है कि कोई व्यक्ति न ता अत्य त सपाट होता है न अत्य त गोल 1 जा विचार या आग के मूत रूप होते हैं उह ही सच्चे अथ में सपाट कहा जा सकता है । पाय स्थिर या गातगील होते हैं । स्थिर पान परिस्थितिया से प्रभावित नहीं हाते गतिशील पात्र होते हैं । गौण पात्र सपाट और स्थिर होत हैं मुख्य पार गोल और गतिशाल । स्थिर पार लघु उपयाम के उपयुक्त होते हैं गतिशील पात्र विशाल उप यास के । वार्तालाप पात्रा को सजीवता और स्वाभाविकता वानालाप पर निमर है। मसार म पशु पक्षा और मूक निष्प्राण व्यक्ति ही बातचीत करते हुए नहा पाये जाते हैं। पूर्वमाल की क्याए वणनात्मक फयाए पी। उनम वार्तालाप का पाहा अा रहना भी था ता मानुषिक और अमानुषिक पात्रों में बट जाता था। मय दाता में मनुष्य और पशु म विभिन्नना होने पर भी वालन म समानना पो। परम्परा-पालन के लिए पद्य में भी सम्बाद की योजना की जाती थी। उयास म वार्तालाप का अधिकाधिक उपयाग किया गया और वह उपयाम का आक्षक अग बन गया। इसके माध्यम से उपयासकार स्था, पात्र और प्टिकोण पर प्रकाश डालते हैं । इसस कथा म वास्तविकता चरित म स्वाभाविकता और उद्देश्य म यस्तुनिष्ठता का समावेश हुआ तथा उप मरस म नाटकीयता आई। विविधता और विधाम के लिए वार्तारापमा विशप महत्त्व है । वणनामा वार्तालाप क लिए अवसर प्रदान करता है और वार्ताप का नया यणन के लिए विधाम का काम करता है । कुल उप मार दीना मलिन उपमाग से प्रभाव हारत हैं । जही वक्ता के नाम का उल्लस या उसकी या घटाओ का सरत रहना है वहाँ वार्तालाप म मा क्षणित विराम हाता है । बाहा चेप्टाओ का सरत रहन पर पात्रो का प्रत्यसोरण होता है । छ पात्रों को वाणी ऐयक की वाणी प्रतीत होती है पछ पात्रों वाणी म उन व्यक्तिव की छाप हानी है और वे अपनी वाणी मे पधान रिए जाते है । बड उप यास म प्रत्यक पात्र की वाणी म विगिरमा निर्वाह करना कठिन है । कभी कभी रिसी व्यक्ति का सामूहिक चारा पिपप बनाकर उसरा चरित चित्रण किया जाता है।

[हिदी-उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा ८०] यपि वार्तालाप का उपयोग केवल रोचकता की वदि के लिए क्यिा जा सकता है तथापि जब क्या और पात्रो के विकास से उसका सम्बध नहीं रहता तब वह अमगन और अस्वाभाविक हो जाता है। उससे रेखक को विचार व्यक्त करने का अवसर मिला है। कभी कभी उसका दुरुपयोग किया जाता है। लेखक प्रचार या प्रदान के लिए अप्रासगिक बातो को चर्चा छेड देते हैं । उनक पात्र बातचीत करना छोडकर वाद विवाद करन लगते हैं। या भाषण दते हैं । पाठन कानी सुनना चाहते हैं । साहित्य दान राजनीति मादि के विषय म अनावश्यक लम्बा कथोपकथन उह अच्छा नहीं लगता। इस दोष का परिहार वहाँ होता है जहाँ पात्रो के सिद्धान उनके बौद्धिक धरातल के अनुकल हाते हैं । पुराने उप यासकारो म किनारीलाल गोस्वामी और प्रजननसहाय प्रचार के लिए तथा नये उपयासकारो मे इगच - जोगी और देवराज प्रदान के लिए अप्रामगिक विपया पर अनावश्यक वार्तालाप की याजना करत हैं । वार्तालाप साधारण हा या साहित्यिा उसे कथा क विस्तार का नहीं विकास का साधन होना चाहिए। लोग जो क्छ वोलत हैं वह साथक और रुचिकर नहीं हाता । इसलिए कथात्मक वार्तालाप वास्तविक जीवन के अनुरूप न हार कलात्मक होता है। उसे प्रभावोत्पादक बनाने के लिए चुनाव और यवस्था की आव *यकता होती है। उप यासकार की दक्षता इसमे है कि वह वार्तालाप को इतना वास्तविक न रसे कि सरसता नष्ट हो जाय और न इतना क्लात्मक बनाय कि कृत्रिमता आ जाय । सफल वार्तालाप वह है जो वास्तविक न हाते हुए भी वास्तविक प्रतीत हो । उसम अनुकूलता उपयक्तना स्वाभाविकता, सजीवता सायना और रोचकता के गुण होन चाहिए । यथातथ्यवाद क वाग्रह स पाग स्थान और काल के अनुक्ल वार्तालाप की भाषा का प्रयाग किया जाता है । उसको दुरुहता दुर्बोधता और बहुलता क्यारस में बाधक हाती है। फजाबाद को वेगम में अग्रज पात्र अग्रजी में बालत हैं । चुन्नीलाल ज्योतिषी व खावारी रहस्य में स्थानीय वाला (राजस्थानी) का प्रयोग दिया गया है। गिोरीलाल गोस्वामी के ऐतिहासिक उप यासा के पात्र बहुधा उदू एमुअल्ला बघारते हैं। - वातावरण उपयासकारान पात्रो को वाणी ही नही दी उनक रहने लिए उपन्यास एक नई कला] [१ - मसार को भी रचना की। देश काल और पात्र परस्पर इस तरह सम्बद्ध हैं कि एक विना दूसरे की कल्पना करना कठिन है । पूर्वकालोन क्याा म पानी कनियाराप के लिए स्थान और काल निर्धारित नहीं थे। उनका राजा किसी समय विमो ग क किसी नगर म रहता था जादूगरनी और राक्षसो सात समुद्र क पार कहीं रहती थी। उनका ससार जादू और स्वप्न का समार था । उपन्यास क पार दशकाल का सामा म वैध हाते हैं। देश कार को विशिष्टता आधुनिक उप यास का प्रमुख दिशिता है । इसस पात्र और उनक क्रिया व्यापार वास्तविक और विश्वसनीय लगते हैं और पाठ पा ध्यान उनम केन्द्रित होता है। नूनन ब्रह्मचारी म एक ही वाक्य में मानवीय काम का पृष्ठभूमि का सक्न दिया गया है धनास व महान में नासिक स दस पास पर एक जगल मे सामने समय तीन आरमी हथियारव द घाट पर सवार बापस म १७ बातचीत पर या पात्र निश्चित स्थान काल म बातचीत करते हुए दिखाए गए है सरिए उनका चित्र पूण और जीवन्त हो उठा है । आरम्भिा उप यासों म पृष्ठभूमि को विशिष्टता का एसा ही उल्लेख रहता था। गा की रानी पतरी जिम अमराई म अपनी सहलियों के साथ झूल रही थी वही बर उन्यभान का घाडा ही पहुंच सकता था । रात के सन्नाट में उनका चोरी चोरी मिरना मभव होकर भी सत्य प्रतीत नहीं होता है। स्थान क नामकरण स पृष्ठभूमि को विगिता अधिक स्पष्ट हुई। पुरान कथाकार किसी पर नगर गढ़ और गांव मक्था वा इद्रजार पादन ५। कुछ उप यासकारो ने भी पुर का प्रयाग किया है (जैन द्र कर्मास्नी मेहता रजाराम शर्मा आरण दम्पति ) वितु उहाँले भौगोपि पस्य का आभाम दिया है। यह आव यक नहीं है कि उपास म उल्लिखित स्यानों नाम वास्तविक और परिचित हा । कल्पित नामों से भी वास्तविकता का भ्रम उत्पन्न किया जा सकता है । स्थान कल्पित रहे हों या अपरिचित उपन्यास-रखका न न नाम रसार उनवा अस्तित्व मिदरिया । उहोंने या तो वास्तविक स्थानाका कल्पित नाम दिए या कल्पित 'पानों को वास्तविक नाम । यहनों न प्रमिद और सुपरिनि स्थानों को पापा का बनाया । मालोच्यकार १ उपचासा में पानी की चर्चा इतनी हा है कि उनकी ए नायिका को पसना करती है तो पानी की बल्पना ५२) [हिदी उपन्यास पप्ठभूमि और परम्परा करनी चाहिए। परिचित स्थाना की अपेक्षा नवीन वा अपरिचित स्थानाम अधिक आपण हाता है । कुछ उपायाम लेखका ने नवीन प्रदेगी या क्षत्रो को चना और उह अपन उपयामो का घटनास्थल बनाया । इसस प्रादेशिर या आचलिक उप यासो का मूत्रपात हुआ। बालकृष्ण भटट हरिबोध गोपालराम गहमरी और मनन द्विवेदी न मयुक्त प्रात ठावर जगमोहन सिंह ने मध्यप्रदेश भुवनेश्वर मिश्र अवधनारायण और जगनाथप्रसाद चतुर्वेदी ने मिथिला के गावा की पाकियो प्रस्तुत की हैं । उन्होने प्रकृति और मानव समाज का जो स्प अकित किया है उसमे स्थानीय रग है । उप यास म स्थानीय रग का महत्त्व बन गया है । श्यामास्वप्न म ग्रामीण दृश्य का जसा स्वाभाविक कि त सुदर चित्रण है वसा प्राचीन क्थासाहित्य म तो क्या समकालीन उपयासा में भी विरल है पुराने टूट फूट रियाले इस ग्राम के प्राचीनता के साक्षी है ग्राम के सीमात क पाड जहाँ यु ड क ड कौवे और वकुले बसेरा लते हैं गवई को शोभा बढाते है प्यो पटते और गाधूरी के समय गयो क विरक को नोभा जिनके खुरों से उडी धूल एसी गलियो म छा जाती है मानो कुहिरा गिरता हो ये भी ग्राम म अभिसार का एक अच्छा समय होता है । स्थान के अतिरिक्त काल को विशिष्टता पर ध्यान दिया गया। सामाजिक उप यासो म वतमान का ऐतिहासिक उप यासा म अतीत का और तिलस्मी उप यासों में भविष्य का प्रतिबिंब मिलता है । युग विरोप के रीति रिवाज रहन सहन और आचार विचार को पूण और यथाथ रूपरेखा उपन्यास म हो मिलती है । ऐतिहासिक उर यासा का महानता भिन्न भिन्न कालो की सामाजिक राजनीतिक और सास्कृतिक परिस्थितियो के सम्यक अध्ययन में है। पृष्ठभूमि को कवि चित्रकार और नाटककार की दृष्टियो से देखा जाता है । तदनुरूप उसका वणन सातिक यथातथ्य और तटस्थ होता है। प्रो. प्रतिभासपन्न उपयासकार एक साथ ही कवि का हृदय चित्रकार की आँख और मारककार का मस्तिष्क रखते हैं। प्राकृतिक पृष्ठभूमि के लिए प्रकृति का सश्लिष्ट या सक्षिप्त वणन किया जाता है । परान उपन्यासो के अध्याय अक्सर प्रकृति के कोमल या भयर दृश्य स आरम्भ होते हैं ।

उपयास एक नई कला [३ । सामाजिक पृष्ठभूमि के लिए घर कमरे, सडक आदि का विवरण दिया जाता है और उसकी सूमता एव विस्तार पर यथाथवादी उप यास म विशेष ध्यान रखा जाता है। भौतिक वातावरण के अतिरिक्त मानसिक वातावरण भी होता है। दोना में सामजस्य का विराम दिखाकर अमाष्ट प्रमाव उत्पन्न किया जाता है। रोमानी उपन्यास म मनुष्य और प्रकृति का रागात्मक सम्बध दिखाया गया है और विविध भावा का संचार करने के लिए प्रकृति व विविध रूपों का चित्रण किया गया है। सामाजिक उपन्यास म यत्ति और आवन म सक्रिय मजीव सम्बर स्थापनि किया जाता है। एक ही काल मलिखित 'चद्रकाता म बनारस स दूर के पहाड नरियां घाटियाँ और जगल हैं तथा नि सहाय हिंद म बनारस की गदी सहवें अधरी गलियो नग कमरे और मनहूस दूकाने हैं। पहला उपयाम वन और पवत का उप यास है दूसरा गलियो और कोरिया का। वन वि क लिए मित्र है उपन्यासकार के लिए त्रु । सस्कृत के गद्य प्रकार वन उपवन सध्या प्रात नादि का वणन करन लगत प तो क्याचार स कवि बन जाते थे। व पृष्ठभूमि का पणन गति प्रदर्शित रन का साधन मानत थे । उनव सूक्ष्म विवरण से भौमिक वातावरण सजीव हो उठना था दिन उनका वणन कथा का ग न होकर आभूषण बन जाता पा । उपन्यासकार वणन के लिए वणन नही करते । उनम स कुछ तो मुदर मनाहर द यो का मक्षप म उल्लख कर देते हैं कछ साधारण अनारपक्ष और उपेशित वस्तुओं का विवरण देना आवश्य समयते हैं । ब्रजनन सहाय क अदमत प्रापचिन (१९०५) म दोनों के उाहरण मिरते है । पर की शादखिये पर बहुन गदा या वहाँ एक घटाई बिछी हुई थी और एक टूटी चारपाई यो । कोन म एव तो मिटटी के बनन पहे हुए थे। चारों बार मर जारा लगाए हुए थे।" यणन का नितान्त यमाव उतना ही पता है जितना उसका बना वयर आधिक्य । उप यासार या वन-बोल इमम है कि वह छोटी टोटी चानो की चर्चा को भी रोचर बना और गल को मत्य व समान प्रस्तुत पर असा माग्पनी 'या वय वृतान और दिमाता मदिया गया है । उपवास मानवीय पपा है। उसमें धन की उपयोगिता उसी अग 1 ९८] [हि दो उप यास पप्ठभूमि और परम्परा तक है जिस अग तक वह नाटकीय और प्रतीकात्मक है अर्थात उसम मान बोय फाय और भाव की व्याख्या होती है । जहाँ पष्ठभूमि का वणन मुख्य होता है वहाँ घटना और चरित्र गौण हा जाते हैं । प्रकृति से मनुष्य की महिमा बढकर है । हरी भरी प्रकृति आनद मग्न प्रमी प्रमिकामा के प्रम व्यापार में अवश्य योग देती है पर वे स्वय मरुभूमि को भी सरस बना सकते हैं । जिस उप यासकार को मानवजीवन का ही कविता प्रिय है वह प्रकृति की माया से मोहित नहीं होता। प्रमचट ने प्राकृतिक सौंदय को मानवीय दश्य का अग बनाकर वणन को कथा म मिला दिया गया है। प्रमा की ये पत्तियां उदाहरणाथ उद्ध त हैं अमृतराय मन म बहुत सी बातें सोचते सोचते पूर्णा के साथ काठ पर गये । खुली हुई छन थी । कुसियां घरी हुई थी। नौ बजे रात का समय चत्र के दिन चांदनी खूब छिटकी हुई मद मदनीतल वायु चल रही थी। बगीचे के हरे भरे वक्ष धीरे धीरे झूम घूम कर अति गोभायमान हो रहे थे। जान पडता था कि भाका ने ओस की पतली हलकी चादर सब चीजो पर डाल दी है । दूर दूर के घु घले धु धल पेड ऐसे मनोहर मालूम होते हैं मानो देवताओ के रमण करन क स्थान हैं।" पप्ठभूमि के प्रति दो दृष्टिकोण हैं वस्तुनिष्ठ और आत्मनिष्ठ । दाना के लिए यह उचित है कि वणन म विस्तार नही हो कथात्मक अग से उसका सम्बध रहे जहाँ ऐसा न हो वहाँ वह किसी पात्र के दष्टिकोण के अनुकल हो । वणन-कला अनावश्यक विस्तार म न हार यजना में है। देवकीनदन खत्री गोपाल राम गहमरी प्रमचद और अवधनारायण के वणन को साथकता पाठका को वण्य विषय म त मय कर देने म है । बालकृष्ण भटट किशोरीलाल गोस्वामी प्रजन दन सहाय और मन्मन द्विवेदी वणन क आवेग से कया की गति म बाधा गरते हैं। उद्देश्य कथा साहित्य की पुरानी परम्परा और नवविकसित उप यास मे सबसे स्पष्ट कि तु सबसे सूक्ष्म अतर उद्दश्य का अतर है । सस्कृत गद्य कविया का लक्ष्य रस और अलकार की झड़ी लगाकर पाडित्य का प्रदान करना था। हिदी म सस्कृत और फारसी स आने वाली रोकप्रिय कथाए मनवहलाव का मसाला देकर साहित्यित्र सराक जुगती थीं। 'रानी केतकी उपयास एक नई ला] [८५ का पहानी , नासिक्तोपाख्यान और 'प्रमसागर भाषा का आदा उपस्थित परन के लिए लिखे गए । राजा शिवप्रसाद, १० वगीधर, १० बद्रीलाल यादि न पाठयक्रम करिए उपयोगो क्यानया की रचना की। समप म, उप यास पून साहित्यिक और लोकप्रिय क्याओ का उद्देश्य माता सम्मित उपदे।' देना था। मनोरजन और उपदा के तत्त्व कम या अघित, समस्त कल्प नात्मक साहित्य म रहत हैं और वे उपयास म भी बन रह । प्राचीन कथाओं और उप यासा का अतर निरुद्देश्य और साद्देश्य रेखका की रचनाओं का भनर नहीं है । २ र जीवन के प्रति दप्टिकाण और उसको व्यक्त करन को प्रणाम है। उपयामकारों के दृष्टिकाण में जा सजगता वयक्तिक्ता विशिष्टता और व्यापकता है वह पुरान ढग के कयाकारो म नहीं थी। प्रमच द का यह वपन अपूर्ण है प्राचीन श्याओम रेसर बिल्कुल नेपथ्य म छिपा रहता था। हम उसके विषय में उतना ही जानते प जितना वह अपन या अपने पात्रा य मुख से व्यक्त करता था। जीवन पर उसके क्या विचार हैं, भिन भिन्न परि स्थितियों में उसके मनाभावा म क्या परिवतन हाते हैं इसका हम कुछ पता न पलना था, लेकिन माजरल उपचासा म हम अपर कटिवाणा मा स्थल-स्थल पर परिचय मिलता रहता है।" पात्रा के चुनाव और चित्रण में उप यासकारा की जीवनष्टि ध्वनित होती पी साय हा व उपायास के बीच म पाठों से मातचीत करना समर या अन्त में विटारने क समय र कला या मीनि के सम्बध म पुछ महन रा लोन सवरण नहीं कर पाते थे। पुराने पाकार टीका टिप्पणी परने का प्रयास नहीं करते थे। प्राचीन कथाओं के उपकरण के चुनाव और उपयाग म निसी नवीन और गम्भीर जीवनगन को प्रभावशाली ढग स प्रकट रन का प्रयास नहीं मिरा याधुनिक उपयास का म्वरूप निर्धारित परनवारा ऐसा का जोपन के प्रति विशेष दष्टिकोण है । हम कह सकते हैं कि उप याम उप यास पार ये जीवन-दान का ही विस्तार है । वह अपनी वस्तु का विमास और पात्रों का चित्रण अपनी जीवनदष्टि का स्पष्ट या सापतिक परिचय दन में लिए करता है । पुरानो पानहानी की तरह उप यास मन को मुग्ध करन वारा अपमुठ पटनाओं का चक्र नहीं है बलि सर के मतावान और पाठक के भाव विचार उत्तजित रन 7 मापन है ! ओ उप पाय [हिदी उप यास पप्ठभूमि और परम्परा कौतूहल तृप्त करन के साथ साय वादा की ओर आकृष्ट नहीं करता जिसमे जीवन की जटिल समस्या का हल नहीं प्रस्तुत किया जाता और जिसक अध्ययन स गति और प्रममता का अनुभव नहीं होता उसकी शाकप्रियता अयहीन साहित्यिक मूल्य नगण्य और सामाजिक उपयागिता सदिग्ध है । सस्कृत-फारसी कथासाहित्य म सरल सुख दुख हास विलास विस्मय वचिय का वणन है । सामाजिक जीवन के गूढ प्रसगो से उसका सम्ब घनकी है । उसकी रचना मनोविनोद के लिए हुई थी। उपयास लोकप्रिय कित गम्भीर कला रूप है। जिस उपन्यासकार के पास करने के लिए कुछ मूल्यवान नहीं है वह पाठवग के हृदय पर स्थायी प्रभाव नहीं डाल सकता भल ही वह कुछ पाठको को अधिक काल तक और अधिकाग पाठका का कुछ बाल तक प्रभावित कर र । जब तक उसका अपना एक निश्चित मत नहीं होगा तब तक वह समाज की समस्या और उसका समाधान उपस्थित नहीं कर सकेगा। हमारे सभी प्रप्ट उप यासकार थप्ठ विचारक हैं । उनकी रचनाओं का शक्ति का सात उनकी विचारधारा है । उनका विचारधारा म बर है और उस बल म उह विश्वास है । परान उप पासा में कला की ऊँचाई हो या न हो जीवनदशन की गहराई ता है ही। उनमें जन्मदाताआ न उह विचार के प्रचार का साधन बनाकर उह मरण के भय स मक्त कर दिया है। शैली गली की दृष्टि स भी उप यास की अपनी विगपता है। प्राचीन कथाएँ पद्य और पद्याभास गद्य में लिखी गई थीं। उप यास विशुद्ध गद्य म लिखा गया । इसन के दो म पद्य देवताओ की भाषा' (लग्वज माफ द गौडस) है । गद्य दनिक जीवन की भाषा है । पद्य स गद्य यथार के अधिक निकट है और उपयास यथाथ के बिना रह नही सक्ता *सरिए गद्य उसक लिए उपयुक्त होता है । यथार्थता विपय म ही नहीं विषय का प्रतिपादन बरन की रीति में भी है। जीवन स यथार्थ वस्तनिष्ठ और पूण चित्रण गद्य क माध्यम से ही मभव है और कहानी भी उसी के माध्यम स कहने योग्य होती है । उपन्यास के लिए ऐसा गद्य चाहिए जिसम सरलता स्वाभाविक्ता लचक और स्वछदता हो । प्रारम्भिक हिटी-उप यास म ऐसे गद्य का व्यवहार क्यिा गया। सस्कृत और फारसी की रोमानी क्याओं का उदात्त गद्य उसके लिए विशेष उपयोगी नही हो सकता था। प्रथम आधुनिक उपयासकार को यथार्थ तप याप्त एक नई कला [८७ चित्रण के लिए बोलचाल की भाषा का यवहार करना आवश्यक प्रतीत हा।" वाण और सुव घुस लिए गली साधन न होकर माध्य थी । उनी सवी शताब्दी प्रवाघ तक लिखित हितो क्याआ का गद्य पद्य की ढिया में आधन था । कायामास मद्य उदात्त अगैक्षिक और शाश्वत तत्वा को वह्न कर सकता था वितु दनिक जीवन की साधारण वस्तुमा को प्रस्तुत करने म असमर्थ था। अत उपन्यासकारा ने सरल निराडम्बर गद्य गली का प्रयोग किया, जो क्यासाहित्य में नूतन परिवतन का द्योतक था। उप यास के अभाव का एक कारण गोप यासिक गद्य का अभाव था। गा, सितारेहिद प० बद्रीलाल, प० गौरीदत आदि कथा रखका न ठठ भाषा का व्यवहार किया था, जा कथासाहित्य के लिए उपयागी थी। फिर भो उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यकाल तक हिला गद्य की निजी विशिष्टता अछी तरह निखर नही पाई थी। एक नई समस्या उस समय बडी हुई जब राजा शिवप्रसाद सितारेहि द फारसा का आर फ्मिल पर और राजा लक्ष्मण मिह मस्कृत के मोह म पड गये । दानी राजामा वादािण प्रतिक्रियावादी पा। इस विषम स्थिति में भारत दु प्रगतिशील दप्टिकाण रेकर आय और माग प्रदान किया। वे हि दो म सरल और प्रचलित पारसा उद्र तो लान में विराधी नही थ पर कठिन तत्सम सस्कृत के ठू सन व हिमायती भी नहीं थे। उहोंने अतिवाद स दचकर हि दी के व्यक्तित्व की रक्षा को । अनि भाषा का स्वरूप पर कर "ली को आधुनिक प्रान किया। उनके हाया सन १८७३ मे हिदी नई चाल म ढली', हिंदी क नई पाल में दरने का अप है वालचार का भाषा या साहित्यिक रूप मढरना ।" भारवे दु ने सस्त और पारसा म नही बलि वाल्चाल और साहित्य की भाषाआ में समयौता किया ! भारते दु-युग म आकर गद्य वन, विरपण और वालिप का सफल माध्यम बन मुसा उपायास जिस गद्य की प्रतीक्षा म पा से उपस्थित रन म प्रारम्भिर गय निर्माता के नाम स्मरणीय रहेंग।उपयासकारा की गला म सपना सजीवता और स्वाभा विकता र माय या वणन और वार्तालाप प्रस्तुत करने की नसा शक्ति है पसी पुरान मातारानी परी नहीं है । परानी नही म नई अनुभूति और विधारा व्यक्त करने की सामय नही यो। उपायामकारो को भाषा का महत्व इसम है रि यह नई वस्तु नई रविना और नई भाषना का यभि पति कर सकी। उनकी सही एवं प्रकार से उनको जीवन दृष्टि [हिदा उपन्यास पृष्ठभूमि मोर परम्परा बन गई। उप यास का तात्विक विवेचन करने पर दो बातें स्पष्ट हो जाती हैं उपयास क सभी अगों में नवीनता और नमनीयता तथा उनके गठन म उप यासकार जिस विलक्षण क्ला का उपयोग करता है वह वास्तविकता का भ्रम उत्पन्न करने की कला है। इस कला का चमतार विगेपकर कथा दियास मौर चरित्र चित्रण में दिखाई पड़ता है। उप यासकार क्था और चरित्र का इस स्वाभाविक ढग स प्रस्तुत करता है कि व कल्पित हाकर भी मथाथ प्रतीत हात हैं। पाठक क्था को आपवीतो या जगवीती घटना के समान और चारत्र को अपने या अपन परिचित के समान सत्य समझ बठते हैं। कला में सत्य से सत्य की प्रतीति कम विश्वसनीय नहीं होती। यथाथ वादी एक प्रकार स भ्रमवादी होता है। नाटक म दशक द्वारा भ्रम की सप्ट की जाती है, उप यास मलखक द्वारा । दशक भ्रम की अवस्था में अधिक दर तक नहीं रहता क्योकि यह अभिनता को उस यक्ति से भिन्न समझता है जिसका वह अनुकरण करता है । उप यास में कम से कम उस समय तक भ्रम बना रहता है जब तब वह पढ़ा जाता है । जहाँ रगमचीय साधन पीक पड़ जाते हैं वहाँ सजीव पान अपना रग जमा रते हैं । यदि उप यास में भी घटनाए असम्भव और अ-भत हो पात्र अलौकिक और असामा य हो तो अविश्वास को स्वेच्छा से हटाना' कठिन हाता है। साधारणीकरण में घटनाओ की असाधारणता स पात्रो की असाधारणता अधिक वाधक होता है। पानी की अवतारणा घटनामो मे सत्याभास प्रदान करन क लिए की जाती है । कथा को विश्वास योग्य और प्रभावोत्पादक बनान के लिए विभिन्न तत्व का सहज सफल सम वय वाछनीय है । स्वाभाविस्ता उपयास का प्राण है । हेनरी जम्स के विचार स जीवन का भ्रम उत्पन्न करना ' उप यास कार की कला का अथ और इति है।" शब्द, अथ और परिभापा उपयास की विधा नई है पर उपयास - पुराना है । सस्कृत साहित्य शास्त्र म जिस सन्नभ और अर्थ में उसका प्रयाग किया गया उस सदभ और अथ म हिनी मे नहीं किया गया है। साहित्य दपण में वह माणिका का एक भेट माना गया है जो दश्यकाय के अन्तगत है । सस्कृत म गद्यकाव्य के लिए उपयास का प्रयोग नहीं हुआ पर हिदी मे बहुत दिना । ।

उपन्यास एक नई कला [८९ तक वह गवा य म परिगणित हाना रहा। प० अम्बिकादत्त व्यास ने 'गद्य काव्य मीमासा और डा. श्यामसुदरदाम न साहित्यालोचत म उस गद्य काव्य की कोटि म हो रखा है। उपयास गद्यकाव्य मे भिष्ठ एक स्वतन्त्र रचना प्रकार है। 'अमरकाप' म दिया गया अथ उस पर रामू नहीं होता। वह अग्रजी नोवेर' का समानार्थी है। प्राचीन संस्कृत साहित्य में प्रयुक्त प्स - स उसको नाममात्र की समानता है । हिदी म यह 7 मोघ सस्कृत से न आकर बगलास आया। 'उप यास' नाम का प्रयाग भारत दु काल से ही हान लगा था यद्यपि उस लिए अन्य पद भी व्यवहत हात रहे । द्विवेदी-बार म उप यास व लिए उपयास' या प्रयोग होने लगा और कहानी के लिए आस्थायिका का। पहले उपन्यास को आख्यायिका भी कहा जाता था ( चद्रप्रभा और पूर्णप्रका) ) उपर प रचनाओ मे मालती (१८७५) के लिए सवप्रथम उपवास का प्रयोग हुआ है । श्यामास्वप्न को गद्यप्रधान कल्पना प्रणयिनी परिणय' को एक अपूर्व अभिनव प्रकार की अलौकिक कल्पना और सौ अजान एक सुजान को 'प्रबध कल्पना कहा गया है। अमरकाप' म कथा आख्यायिका म भेद दिखात हुए कथा को प्रवध कल्पना कहा गया है - प्रबध कल्पना क्या' । उक्त रचनाओं म कल्पना का यवहार मूचिन करता है कि उपयास कल्पिन क्या माना जाता था। अग्रजी विान' का भी यही अभिप्राय होता है। अम्बिकादत्त ध्यास ने अपन उप पास का नाम आ चय पता न रखा है। वनात स सच्ची घटना का वाय होता है। इस दृष्टि से उप यास सत्य-क्पा का आभास देता था। दातों का व्यवहार भी कमी-कमी दिया जाता था, जो बडी फ्था का मूचक था। परीक्षागुरु को उम याम साथ ही एक सामारित वार्ता कहा गया है। प्रारम्भ म कुछ उप यासकार बोर माला नावेल का ही प्रयोग करत थ रूपनारायण पर अपनी 'यामकुमारी को नावेल की सजा दी है । राधाचरण गास्वामा न अपने उपपास ( पल्पलता सौदामिनी आदि) लिए 'नवयास रा उपयोग किया या ना अप्रजो नोवत्र' ये अधिक निस्ट था। इन सभी शहरों में उपयास' ही अधिक प्रचलित रहा और अव तावह हो गया है। उसे बहुधा पुग्नक के मुखपृष्ठ या भूमिका में निर्दिष्ट कर दिया जाता था। भरारी और गुपराती म 'नवसपा 'नोवेश क आधार पर गदा [हिदी उप याम पृष्ठभूमि और परम्परा सुनीता और हुआ गद है। मराठी म उप यास का कादम्बरी की भी सज्ञा दी गई है। अव भारतीय साहित्य म प्राय उस यास गद का ही व्यवहार किया जाता है । नावेल मे नूतन साहित्य रूप का बोध होता है जा उपायास से नही होता। उप यास का युत्पत्यथ है समीप रखना। वह ऐसा साहित्यिक माध्यम है जिसमे लेखक पाठक के समीप अपने अनुभव की कथा मानव चरित्र का चित्र और अपनी जीवनदष्टि प्रस्तुत करना चाहता है । उसकी कोई सवमाय परिभाषा नही है । जाज ऑरवेल ने उसे सर्वाधिक मरा जकतावादा साहित्य रूप ( द मास्ट एनाकिंकल ऑफ आल फोमस ऑफ लिटरेचर' ) कहा है। वास्तव म वर साहित्य का ऐसा रूप है जिसका काई रूप नहीं है। वह परिभाषा के व धन मे वधन के लिए तयार नहीं होता। जिसके सीमाहान प्रसार म चद्रकाता सतति सेवासदन रोखर-एक जीवनी को स्थान मिल सकता है उसकी एक परिभाषा सुनिश्चित करना कठिन है । हेनरी जेम्स के अनुसार वह अत्यात स्वतत्र अत्यात नमनीय अत्यन्त विराट साहित्य रूप है। उप यासकारो के सिद्धात फिर भी उसके जामकाल स ही उसकी परिभाषा और याख्या दा गई है । उसके सम्ब घ मे उपयासकारो ने जो विचार यक्त किये अथवा सिद्धान निर्धारित किये हैं यहां उनका विवेचन करना आवश्यक है। मालाचको के मत का उल्लेख प्रस्तावना म किया जा चका है। प० बालकृष्ण भटट ने उप यास को मन बहलान वाली गुटिका कहा था । उनकी परिभाषा एकागी होते हुए भी प्रारम्भिक उप यासों के लिए सत्य है । उनका आकार छोटा होता था। उनम अनक ऐस हैं जो आज लघु उप यास की कोटि म भी नही रखे जायेंगे। उनके आकार के सम्बध मे तत्कालीन लेखका की जा धारणा थी उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। आज की धारणा के अनुसार उहें उपायास नही मानना उचित नहीं होगा। वह प्रयोग का काल था उस काल की रचनामा को जरा सहानुभूति से देखना ही पडगा । भरट जी ने उपयास मात्र को गुटिका की सज्ञा दी पी पर तु ५० अम्बिकादत्त व्यास ने उपयासिका नाम से उसका एक स्वतत्र प्रकार निर्धारित किया था। उनके अनुसार जो तीन घण्टे के भीतर पढ़ा जा सके वह उपयासिका है । उहोने अपनी छोटी सी कयारचना स्वगसभा को [ ९१ उप यास एक नई कला] उपयासिका के अतात रखा था । लघु उपयास की यह परिभाषा अभी भी उपयोगी है। उप यास क आकार की अपेक्षा उसक उपादान को अधिक महत्त्व दिया जाता था । मटरजी न लिखा था कि उपन्यास का मुख्य रस शृङ्गार रस है बिना जिसके यह ऐसा भासित हाता जसा सर्वाग सुदर रमणी को किसी न नाक काट लिया हो"। उप याम व उदयकाल से ही उसम प्रमतत्व का प्रधानता रही है। यहां तक कि वह प्रमक्या का पर्याय माना जाता रहा है। किशोरीलाल गोस्वामी की दष्टि म प्रेमभाव उप यास का মমু আধা ই इसम प्रम की प्रबरता, प्रणय की उमतता, चाह की मत्तता, यौवन या पूर्ण विकास, लालसा का प्रवल प्रवाह कामना का वेग रस को तरग प्राति की लहरा सभी कुछ रहना है इसीलिए कवियों में साहित्यप्रणी म उपन्यास को पाठ गद्दी दी है। रामप्रसाद शर्मा ने अपनी चद्रमुखी म इसी आय का विचार प्रकट किया है । कुछ उप यासकार उपन्यास को कल्पित प्रमस्या न मानकर समाज का सचा इतिहास मानते हैं और उनके अनुसार उसकी यष्ठता प्रमानुभूति का पजना में नही बल्कि सामाजिक व्यवहार के वणन म निहित है । उप पास समाज का चित्र है और आज उपयाम की जो क्या पित मानी जाती है वही समय पड़ने पर इतिहास बन जाती है।" जनादनसहाय ने उसे इतिहास स भी ऊचा स्थान दिया है इतिहास उतने दिन नहीं रहता जितने दिन कविता उपपास तथा माटर रहते हैं और जितने लोग इन विषया को पढते हैं उतने लोग इतिहास को कदापि नहीं पढ़ते । इसका परिणाम यह होता है कि भविष्य म उप याम धादिय सहारे लाग समाज दा तपा जाति की रीति नीति एवं आधार विचार से अवगत होत है १३ पर दी गई कोई एक परिभाषा पूर्ण नहीं कही आ सस्ती । उपयाम माम विशाल है । उसमें काव्य की कल्पना भी है और इतिहास का सत्य भी । उसमें सामाजिक यपाथ साथ हो सुधारवादी आदत भी होना चाहिए ताकि वह मनुष्य के भविष्य का निमाण पर सवै । माधव कसोट ने उपयासकार के गहन दावि की और समेत परत हुए शिया या ९२] [हिदी उप यास पष्ठभूमि और परम्परा उपयास लिखना कोई लहका का खेल नहीं है । उपयास म समाज देश व भापा को बड़ी हानि लाभ पहुचाता है। उप यास भी एक सरह पर समाज देश व भाषा का इतिहास बनाने वाला होता है। पुराने उपयासकार इस महत्वपूर्ण वात का महसूस करते थे कि उप यास का काय वतमान की व्याख्या करने के साथ-साथ समाज को अनागत के लिए तयार करना है। महता लग्जाराम शर्मा क विचार से उप यास के विविध प्रयोजन हैं उससे प्रजा के सच्चे चरित्र का वाघ हो और हानहार प्रजा क चरिम' का रूप भी अक्ति हो । उपल्यास एक साथ ही अतीत की प्रतिध्वनि वतमान का प्रतिबिम्ब और भविष्य का सकत है। उसम जीवन जीवनदान और कला के तत्त्व मग्निहित हैं । इनके सम वय से उसका रूप निर्मित होता है। वह केवल जीवन का अग नहीं कलाकृति भी है। पुरान उप यासकारा को भी मा यता थी कि उससे जीवन के सम्बन्ध म उत्कठा ही पूरी नही होती साहित्यिक मानद की भी उपलब्धि होती है । उसे गापालराम गहमरी ने साहित्य का मधुर अग और अमृतलाल चक्रवर्ती ने 'कोमल मधुर साहित्य माना है । यह सही है कि उसे इस रूप म ग्रहण करने का चप्टा कम हुई है । उसकी अपरिमित संख्या देखकर तो ऐसा लगता है कि उसका रचना के लिए असाधारण प्रतिभा नही बल्कि कागज और स्याही का उपयाग करन की पारीरिक गति चाहिए । फिर भी यह अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि उपयास एक गम्भीर कला है। उपन्यासकार का काम केवल कहानी गढना चरित्र निर्माण करना और स देश सुनाना नहीं है । उस सामग्री के साथ साथ सामग्री की सज्जा पर भी ध्यान देना पड़ता है । निम्नलिखित परिभाषा कला पक्ष की दष्टि से वही समीचीन है। क्सिी घटना को ऐसे अगो मे विभक्त करके जिनको अलग अलग वणन करन म आश्चय आनद और साहित्य के छो रसो का ययास्थान रस प्राप्त हो सके और उन भिन्न भिन्न अगो के वणन के अत म समम्न घटना सुशखर बन जावे और सारा वत्तात एक साथ मालूम हो जावे ऐसे गद्य के लेख को उपचास रहते हैं 10

उपयास एक नई क्ला
टिप्पणियां
१- मत म दो का दशकुमारचरित ग्रोव म * का इफनिस ऐंह
वा तया रटिन म पत्रानियम का सट्रिकोन पुराने उप यास के नमून
माने जा सकते हैं ! 'दावमारचरित' एक राजकुमार और नो मनि
भारों के भ्रमण-दत्तात के रूप म प्रेम साहसिक्ता और धूतता की
अनुठा धा है। फनिस ऍड पर ग्राम्य जीवन के निर्दोष प्रमका
मधुर कहानी है। राट्रिकोन म उच्च वा के पासण्ड और रामन समाज
क भ्रष्टाचार पर व्यग्य किया गया है।
2- Encyclopaedia Britannica Voi 16 577
इस उपयास का अनुवाद प. विनाय पाय द्वारा गंजी की
वहाना नाम किया गया है और साहित्य अकामो द्वारा प्रकागिन हुआ है।
३- आ-ि अग्रजी उपयासकार फोडिग न अपन उपयाम जासफ ऍट्यूज
को कोमिक एपिर इन माज' को सना दी यो । राल्फ पोवस के शव
म यह आधुनिक बुजु मा समान का महाकाव्यात्मक कलाप (Epic
are form of our modern bourgrous society) है दनोवेल ऐपद
पापुर पृ०८० । हिन्ना रखा में सवप्रयम समवत १० रामास गौर
न उप यास का 'ग का महाका' कहा था। देखिए रामदास गोड
प्रम द जी का गद्याव्य विशालभारत, जनवरी १९२८, पृ०५६)
4 'The novel was bound to develop therefore under capital
ism whose increase in the productive forces brought by the
division of labour not only increased the differentiation of
society but also by continually revolutionising its own basis
produced an endless flux and change o life
-Illusion and Realty, p 173
It is from Northern Italy ibat ibe doye) of modern Europa
(both the literary type and the name) derives
-Encyclopaedia Britannica Vol 16 p 577
६- देखिए प्रगानी परिभया उन्धान
७- वही
८-नाम्मा ॥२८॥

९४] [हिदी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा . ९- आख्यायिका कथा खण्कथा परिक्षा तथा ममानिकोति मयते गद्यकामन्च पन्चधा ॥१२॥ १०-ओज समास भूयस्त्वमेतद गद्यस्य जीवनम ११-नवोऽर्थे जातिरग्राम्या दलेपो क्लिष्ट स्फटो रस । विकटाक्षरब घश्च कृत्स्नमेकत्र दुलभम -हषचरित ॥९॥ १२-प्रत्यक्षरश्लपमयप्रयाध 'वयास वदग्ध्यनिधिनिबधम -वासवदत्ता श्लोक ९ १३-स्फरकलालापविलासकोमला करोति राग हृदि कौतुकाधिकम रसेन शय्या स्वयमभ्युपागता कथा जनस्याभिनवा वधूरिव -वही 11 १४- नाटक और उप यास प्रथम हिंदी साहित्य सम्मलन काय विवरण- दूसरा भाग पृ० ८८ १५- उप यास रहस्य सरस्वती, अक्टूबर १९२२ पृ० १९७ १६- उपन्यास हिदी प्रदीप जनवरी १८८२ पृ० १८ १७- उपन्यास और छोटी कहानियो के ढाँचे हमने पश्चिम स लिए हैं । -प. रामचद्र शुक्ल हिंदी साहित्य का इतिहास ५० ५३९ उपन्यास लेखन की आधुनिक कला पाश्चात्य देगो स आई है -डा० श्यामसुदर दास साहित्यालोचन पृ० १५७ हिंदी में नये उपयासो का चलन बहुत कुछ अग्रजी और बगला के उपन्यासों की प्रेरणा से हुआ। -40 विश्वनाथप्रसाद मिश्र वाडमय विमा पृ. ५० यह गलत धारणा है कि उप यास और कहानियाँ सस्कृत की कया आख्यायिका की सीधी सतान हैं। -डा० हजारी प्रसाद द्विवेदी साहित्य का मम पृ०६३ १८-मि व धुविनोद (चतुथ भाग) पृ० १५८ १९- साहित्यालोचन पृ० १५४ २० - आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास पृ० १३८ हिदी उपन्यास पृ०६१ 21- Any fictitious prose work over 50 000 words -Aspects of the Novel p 9 ।

तप यास एक नई कला] २२-- गद्यकान्य मीमांसा', नागरी प्रचारिणी पत्रिका प्रथम भाग, १८९७ 23- 'A novel is a living thing all one and continuous like oth r organism and in proportion as it lives will it be found i think, that in each of the parts there is something of cach of the other parts -The House of fiction p 34 24 - Art is that which gives meaning to experience २५-डा. श्यामसुदरदास हिदी के निर्माता पृ० ५८ २६-गोदा देवो 'स्वगीय पण्डित किशोरीलाल गास्वामी 'सरस्वती, जुलाई १९३२, पृ० ६२ २७- साहित्य या उद्देश्य' पृ० ६१ २८-वही, पृ०४ 29- Plot is the knowing of destination -Elizabeth Bowen Collected impressions, p 249 ३०- 'नाटक और उप यास', प्रथम हि दी साहित्य सम्मेलन कायविवरण दूसरा भाग पृ० ९४ ३१-बालकृष्ण भट "सो याजन एक सुजान पृ० ३० 32- the only classification of the povel that I can vaderstand is unto that which has life that which bas it not -~-वही पृ० ३५ ३३-३धिए 'पद्रकाता सतति ' 'लतिका मधुप' (१९१३) ३४-६० श्रीकृष्णलाल ने उपयास को फया गलियो का एतिहाधित दष्टि से विवास दिखाते हुए लिखा है 'उप पास म समापण ला का उपयोग बहुत देर म हुमा, प्रारम्भ में बहुत दिनों तक क्वल दपनारमक गरी पा ही बालवाला था। - 'आधुनिक हिन्दी-साहित्य का विकास पृ० २८६ । 35- "The art of fiction does not begio unul the novelist thinks of his story as a matter to be sbown to be so exbibited that it will tell itself -Craftal fiction p62 36- Aspects of the Novel p65 38- "The setting is oot very important. Happy lovers have in thetas lves tbe poser of beadufying a desert A luxuriant ९६] [हि दी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा ४२- Dature do doubt serves them better - Robert Liddel Some principles of fiction ३९-पृ० २२४-२५ ४०- साहित्य का उद्देश्य पृ० ५० ४१- इस पस्त म दिल्ली के एक कल्पित (फर्जी) रस का चित्र उतारा गया है और उसको जसा का तसा (अर्थात स्वाभाविक) दिखाने के लिए सस्कृत अथवा फारसी अरबी के कठिन-कठिन श दो की बनाई हुई भापा के बदले दिल्ला के रहने वाला की साधारण बोलचाल पर ज्याद दृष्टि रखी गई है। परोक्षागुरु का निवदन हरिश्च द्र ने उस बिगडी हुई हिदी भापा को नव बलकारा स अकृत करक सुसम्पन्न नागरी बनाकर नागरी का नाम साथक किया । हिन्दी भाषा उनक समय में ऐसी सहज मधर एव लावण्यमयी हुई कि लोग देखत हा इस पर विमोहित हाने लगे -शिवन दन सहाय 'हरिश्च द्र पृ० १०९ ४३- इस देग रूपी खेत म जो हमारी भाषा का बीज छिप रहा था उस ठल्ललाल स्पी वर्षाऋतु ने अकुरित किया तो शिवप्रसाद शारद ने उस बलबूटे का आकार दिया और हरिश्चन्द्र वसत ने उसमे फ्लफल दिखलाए।' 44- the begining & the end of the art of the novelist वही पृ० ३३ ४५-हो म यह शर बगरा से आया है और अनुकरणप्रिय रचनाचतर वगाली ग्रयकारो ने आधनिक लक्षणा से अग्रजी के नोविल - का पर्याय बना लिया है। माधवमिश्र निवधमाला पृ० १० डा० सत्य द्रने समीक्षा के सिद्धात (१९५२) में पृ० १५७ में लिखा है कि उह किगारीलाल गोस्वामी ने बताया था कि 'उपन्यास का आरम्भ वगला के बकिम ने किया। वे दिन हुक्का पीत-पीते मनु स्मति पढ रहे थे कि उह उपयास गठन का पता चला और वही नाम उहोंने ग्रहण किया। उप यास T का ग्रहण और प्रचार वक्मि ने भले ही किया हो

उपयास एक नई परा
[९७
उसका प्रथम प्रयोग कदाचिन भूदेव मुखोपाध्याय ने पिया क्योकि होने
वकिम से पहले ऐतिहासिक उप यास (१८५७) नामकी पुस्तक लिखी
थी।
46- "the most independent most elastic, most prodigious of
literary formas
'The Art of the Novel p 326
४७-"उप यास', हि दीप्रदीप' (जनवरी १८८२), पृ० १८
-- गद्यकाव्य मीमासा", ना० १० १० १८९७
४९-वही पृ० १९
५०-- 'मुख सबरी का निदान
५१-महता लग्नाराम शर्मा 'आदश दम्पत्ति को भूमिका
५२- राधाकात' की भूमिका
५३- किरणशी की मालोचना { मनोरजन एप्रिल १९१३)
५५-- गेरुआ बावा' की भूमिका
पादा' की भूमिका
५६-वनवारीलाल तिवारी वीरव्रतपारन ' (१९०५) की 'अवतरणिका

३ ऐतिहासिक पीठिका हि दी उप यास उन्नीसवी सदी की स तान है। साहित्य के इस नय रूप का जन्म नये भारत के जन्म के साथ हुआ और नये भारत की भांति ही यह अग्रजी सम्पक को देन है । अग्रजी सम्पन से उप यास की विधा ही नहीं मिला, उससे राजनीतिक आर्थिक, सामाजिक सास्कृतिक और साहित्यिक क्षत्रा में वे परिस्थितियां उत्पन्न हुइ जिनस उप यास का विकास सम्भव हआ। अग्रेजी राज्य की स्थापना भारत में अग्रजा का नजर धन धरती और धम पर गडी रही परतु भारतीय इतिहास मे उनका प्रवेश एक ऐस सत्राति काल में हुआ वे अनजान में भारतीय समाज और साहित्य म नूतन, महान और दूरगामी परिवतन के भागी बने । आग्ल भारतीय सम्बध को अदभुत कहानी सोलहवी सदी मत स आरम्भ हाती है। उस सटो के अतिम वप म समूयल डनियल ने विदेश म अग्रजी भाषा और साहित्य के प्रचार की रोमानी कल्पना की' और उसी के अतिम दिन ईस्ट इंडिया कम्पनी को पूर्व म यापार करने को गाही सनद मिली । १६१२ मे कम्पनी ने पहलेपहल सूरत म सुरती का कोठी खोली। एक अग्रज विद्वान ने एक बार कहा था कि आधुनिक सभ्यता म दो चीजें बढी आवश्यक हो गई हैं तम्बाकू और उप यास । अग्रजों ने पहले तम्बाकू और बाद म उप यास देकर दो बड़ी भाव'यक्ताए पूरी कर दी । सतरहवी ता 1 के अत तक वे पश्चिम दक्षिण - ऐतिहासिक पोठिा मे पृव-उत्तर को भार बढ गय तीन वड नगरा (मद्रास, बम्बई, कलकत्ता) की नाव डारने में सफल हुए और सौदागर के साथ-साथ जमीदार बनकर भारत में राज्य स्थापित करने का स्वप्न दखन रगे। उनका स्वप्न अतिम महान मुगल सम्राट औरगजेब की मत्यु के बाद ही साकार हो सका। १७०७ में औरगजेद के निधन के बाद प्राय पचास वर्षों म विशाल, उन्नत मुगल साम्राय हिन्न भिन्न हो गया और अक्वर क धगज नाममात्र सम्राट रह गए । दा छोटे-बड़े स्वाधीन और सघपरत राज्यों में वट गया । वीर मराठो को जयध्वजा मध्य में गुजरात से तडीसा तक और उत्तर म पजाव तक फहराने लगी। हिंदू राज्य के पुनरुत्थान की मभावना जाग उठी । भूपण को कल्पना सत्य होने का आई । सी स्थिति म यदि विगी व्यापारी भारतीय राजनीति में हस्तक्षप नहीं करते ता भारतवासियों में जो यग्यतम होना उसका सिक्का चलता और भारत का इतिहास दूसरा होता । अग्रमों न बद्रीय रसन को दुल्ता और आतरिक कलह से भाभ उठाकर अपना प्रभुत्व स्थापित करना तुम दिया । अतत मुगला र उत्तरा घिकारी मराठ नही, जज बन । प्लासी म युद्ध (१७५७) म बंगाल के अतिम बहादुर मवाव सिराजुद्दौला को उसी के अस्त्र से पराजित कर कराय ने भारत म जिस राज्य की नीव कूटनीति पर डालरी 'उस कूटनीति के द्वारा हो वारेन हस्टिग्स (१७७२ १७९५) न मजमूत बनाया बलस्ली (१७९८ १८०५) न उम पर पाय सड दिए और डलहौसी (१८४८ १८५६) न उमे महल बना दिया। १७५७ से १६५७ तर का काल भारतीय राजसत्ता के विघटन और अग्रजी प्रभुता के विस्तार का बाल है । प्यासी युद्ध के बाद कम्पनी को छाया सत्तर भार की और वढने लगी और अवध क विलयन (१८५६) स समूच हिदी ससार पर छा गई। आर्थिक परिवतन कम्पनी प्रसार के मौ वर्षों का इतिहास राजामो नवाबो और वेगों से अधिक व्यापारियो कारीगरों और किसानों द रक्त सपा आमू म लिखा गया है। व्यापारी शासक राय मनामन का अप या व्यापार और व्यापार का अय या एट । भारत स मुफ्त या कम दाम म माल रिया आता पा और यूरोप म ज्या गम वसा जाना पा । रगान बमूल परने र उपायो की जाती मोमानवारिम इस्तमरारा बावस्त' (१७९) १००] [हिला उप यास पष्ठभूमि और परम्परा उत्तराध स अनजी ढग की जमीदारी प्रया की नीव पड़ी और किसानों को मजदूर वनानेवाला एक नया वग बना । पूर्व के पासक आर्थिक नापण करते थे तो सावजनिक हित के कार्यों म “यय करते थे । कम्पनी ने जा लूटा उसस भारत उजाड हो गया कि तु इगलण्ड म औद्यागिक फाति हो गई। औद्योगिक प्राति के बाद मशीन से बने सस्ते विदेशी माल भारत मे घडाघड माने लगे मोर उद्योगपतियों का शोषण चक्र चलने लगा। उनोसवी शतादी पूर्वाध तक भारत कच्चा माल देकर तयार माल लेनेवाला खेतिहर उपनिवेश बन गया । उधर इगलपन म पूजीपतियो के घर म धन का ढर लग गया । पूजीवाद ने साम्राज्यवाद को जम दिया। बाजार बनाए रखने के लिए उपनिवेश बनाए रखने की आवश्यकता थी । १८५७ के विप्लव के पूर्व ही ईस्ट इंडिया कम्पनी र हाथ से शासन मून रन की तयारी शुरू हो गई थी जो १८५८ म पूरी हो गई । अब लूट पर कानून की मुहर लग गई। नतीजा यह हुआ कि उनीसवी तादी के पूर्वाव म सात बार अकाल पड म चौबीस बार। माक्स न १८५३ मे लिखा था कि समस्त गृहयुद्ध विदेगी आक्रमण विद्रोह विजय दुर्भिक्ष भारतीय समाज को ऊपरी सतह का छूकर रह गए पर इगलण्ड न उसका परा ढाँचा ध्वस्त कर दिया ।' कृषि की अवनति, उद्योग व्यवसाय के विना नगरो के ह्रास और यक्तिगत भू-स्वामित्व के सूत्रपात से प्राचीन ग्रामव्यवस्था छिन भिन्न हो गई । भारत की आर्थिक प्रणाली की रीढ ही टूट गई । अठारहवी शता दी मे राजनीतिक प्रभत्त्व से और उन्नीसवी तादी म उत्पादन क उन्नत साधन स आर्थिक विध्वस हुआ। भारतीय समाज की अपरिवतनगीलता का कारण परम्परागत श्रमविभाजन या । अग्रजो क आन से उत्पादन और वितरण के साधना म परिवतन हुआ और भारत म महान सामाजिक वानि हुई । मध्यकालीन सामती यवस्था का स्थान नवीन पूजीवादी यवस्था लेने रगी। इम परिवतन के लिए भारत वो जो मूल्य चुकाना पड़ा यह इतिहास में अपना सानी नही रखता । इगलण्ड म पूजीवादी समाज-व्यवस्था की प्रतिष्ठा इ गलण्ड के ही पूजीपतियों द्वारा हुई, भारत म विदेशी व्यापारी और पूजीपतियो द्वारा । भारत म भी मुगल साम्रा य के अघ पतन के साथ पूजीवादी वर्ग का आविर्भाव हो रहा था। सत्रहवीं शतादी के भारतीय सौदागरो की तुलना लदन पा मामस्टरडम के सौदागरो के साथ को जाती थी सूरत का वीरजी एतिहासिक पोठिक] वारा संसार का सबसे धनी सौदागर माना जाता था। अठारहवीं शतानी के मध्यकार तक भारत एक महान औद्यागिर देश था । अपने उत्पादन और उत्पादन की प्रणाली में वह किसी भी उनतिनील देश की समानता पर सकता था। गांव के साथ साथ नगरा का और नगरो म बुजु भा वग का विकास हो रहा था। परिवतन की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गई थी। विवासो मुख पू भोवाद हासो मुस सामन्तवाद को अपदस्थ कर नई समाज व्यवस्था का स्थापना अवश्य करता । मुगल साम्राज्य के मस्तकाल में राजामा और नवादा की विलासिता, प्रतिद्वदिता, अयोग्यता राज्यलिप्सा स्वच्छाचारिता मध्यकालीन सामती व्यवस्था मे पतन की सूचना थी । इतिहास स्वय उसक लिए रिता सजा रहा था। भारत में अग्रजा का आगमन नहीं होता तो भा उमक बापिक और सामाजिक ढाँच मे परिवतन होना । उन्होन आवर स्वाभाविक विकास में व्यवधान उपस्थित कर दिया। देश का सुरोध समानि काल की कठिन परिस्थितियो से गुजरना पड़ा। भारतीय पू जीवाद और मामतपाद दोनों को पद-लित र विटिग माम्राज्यवाद भारत के भार पर पदवठा मामतवाद का क्षय धायिक परिवतन राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक और साहित्यिक परिवतनो का आधार होता है । अग्रजी राज्य ने भारत पर एक नई माथिम और राजनीतिक व्यवस्था लाद दी। मध्यकालीन सामनवाद का क्षय और आधुनिक पूजीवाद का उदय हुआ । इस प्रक्रिया में उप यास के उ भव एक विकार या बट सम्बध है। १७०७ से १८५७ तक की अध तानी सामत थार का हासबाल है । औरगजेब को मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारिया ये साय ही सामतों का शौद्धिक नतिक, पासपीय आदि दृष्टियों से अघ पतन हुआ मानों सासले पर के गिरने से डालियां टूटकर बिखर गइ । चकार की मसाई (१७६४) म वगाल-अवध के नवादा और मुगल सम्राट की हार सामतवाद को पहली करारी हार यो। १८५६ म अवध के साथ ही मुस्लिम मामती सस्कृति पर आघात पहा । सिपाही विद्रोह म उन सभी शक्तिया सी पराश्य हुई जा सामती व्यवस्था को पोषय पी और सामती व्यवस्था जिनकी पार पी। सत्तादन का स्वाधीनता मग्राम एक प्रकार से सामतवाद तिम अमल स्वाधीनता संग्राम था। उसके बाद उमा सनाया गय १०२] [हिदी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा ही सात सौ देगी रजवाडा म रह गया। सामतवाद के ह्रासकाल मे राजनीति धम, समाज और संस्कृति के क्षेत्रो मे अधकार छाया हुआ था केवल साहित्य की दिशा मे प्रकाश दृष्टि गोचर हो रहा था यद्यपि उसम भी अस्तकालीन आभा ही शेष रह गई थी सुदर कि त जीवन हीन । मुगल दरवार को विलासिता छरक छलक कर राजाआ और नवाबो क दरवारा मे बिखर रही थी। छोटे छोटे दरवार छोटे छोटे स्वग कर रहे थे । कवि और किस्सागो अपन आश्रयदाताओ की रचि के अनुकूल अपनी कला दानों हाथो से लुटा रहे थे। सामती संस्कृति क साथ सामती साहित्य और कला विकास की चरम सीमा पर पहुंच गई थी। अब उनका पतन अवस्यभावी था। सत्तावन की प्राति के बाद साहित्य म अभूतपव काति हुई । सामतवाद का पोपक प्रभाव नष्ट हो गया और अग्रजी प्रभाव का विस्तार हुआ । दरबार और दरबार की शोभा बढाने वाल कवि और किस्सागा फीके पड़ गए । शिक्षा शासन और समाज क नवगठन स मध्यवग का उदय हुआ। मध्यवर्गीय समाज साहित्य कला और मस्कृति का सगम बना । मध्यवग के द्वारा मध्यवग के लिए उपयास की सृष्टि होन लगी। वह मध्यवर्गीय कला म बन गया। मव्यवग का उदय उनीसवी ताटी के मध्य म मध्यवग का उदय एक नई घटना था। डाडवेल का मत है कि इस वग का अस्तित्व कम से कम डढ हजार वर्षों से नहीं था। मुगलकाल म उच्च और निम्न वर्गों के बीच परोहित “यापारी कवि और कलाकार थे पर आधुनिक मध्यवग स उनको सामाजिक स्थिति भिन्न थी। कम्पनी काल छोटे छोटे जमीदारो कवियो और नौकरी-पेगे वालो को मध्यवग की कोटि म रखा जा सकता है यद्यपि इनकी संख्या अधिक नही थी। सत्तावन के विप्लव तक मध्यवग जिसमे कवि और कलाकार भी थे एक प्रकार से राजाओ और रईमो पर अवलम्बित था। नवास्थित मध्यवग प्रत्यक्षत शासक का आवित नही था । वह समस्त दावा प्रतिनिधि धा। उसका गठन ऐसा था कि उसके विभिन्न स्तगे में स्पष्ट विभाजन रेखा नही खोची पा सकती है। एक छार पर व थे जि है पूजीपनि नहा जा सकता था और दूसरे छोर पर वे थे जो सवहारा के निक्ट थ । मोटे तौर पर मध्यवग को दो समूहो में रखा जा सकता है (१) स्वतत्र पावर जसे-वकील - - ऐनिहारि पोठिका] {१०३ माहित्यकार, पत्रकार, सेठ तथा सौदागर, (२) सरकारी और गरमरकारी वेतन भोगी नोकर, जस-किरानी, अधिकारी शिक्षक, पटवारी और मुनीम । उपयास लेखक शिक्षित मध्यवग । इस वग व राग अल्पमस्या होते हुए भी अस्पत शक्तिवान और प्रभावशाली थे । उनको कुछ सामाय विशेषताए पा । वे मुसम्मत, जागत, उदार और गतिशील थे। उनम जाति, भापा और प्रान्त पा भे-भाव नहीं था। वे समान स्वाय से अनुप्राणित थ । उनकी रुधि प्रति जातिगत न हार वगगत थी। ये ए वग घे जाति न"बामाजिक, धार्मिक, राजननिक और साहित्यिा नेतृत्व उनके हाथ मथा। वे विद्रोह और जाति के बदले समाना और मुधार + हिमायती थे। पूर्व-पश्चिम और प्राचीन नवीन म समवय करना चाहत ने। व गामास खान से मर जाना बेहतर समझते थे पर अपन सिर पर गामूत्र हारने को उतावले रहीं थे." मध्यवर्गीय ननिकता की जसी गहरी छाप उपचास पर पडी बसी साहित्य के मय अगा पर दिखाई नहा दो। नागरीकरण अघि मध्यवर्गीय रेखा और पाठक नगरी म रहते थे। अग्रेजी य आगमन-मार साधन जन से सम्पन्न वड-बडे नगर थे, जहाँ उद्योग ध्यवसाय और शासन बाप हात कम्पनी को आर्थिक नीति के कारण पई पुराने नगर उजद गय और मयं धन । सतरहवी शताब्दी म यई और परी मी डाली गई यो । १७७५ म बनारम अवध के नवाब ये हाथ म पम्पनी के हाथ में आया ! अधारहयों सी तर हिगे उपयास + तीन मुप भारम्भिा प्रान स्थान अप्रजा प्रभाव के अनान मा गये थे । १८५६ तब दिक्षत्र र सभी नगर इम्पनी के आधीन हो गये । विदेशी व्यापार नये उद्योग, शिक्षा और पासन के बाद हर में नगरों का अमित विकास हुमा । पुराने नगरों का शयापट हो गया । महा सामनी सभ्यता और सरपति पत्नी पी वहा महाजनी सभ्यता और मस्कृति निवास करने लगी। १८७१ म भारठे दु ने नवावों बार एसनऊ दा का वपन करते हुए हिापा नही पहिले जौहरी बाजार और माना बाजार पा यहाँ गाह परने हैं और मद मामवाडो मरिसीम डारपर बही अस्पतार नहीं टापायाना हा रहा है। ये मुल न होनाम गारे पूतन हैं।

१.४] [हिंदी-उपयास पृष्ठभूमि और परम्परा 13 जहाँ माती लुटते थे वहां धूल उडती है। इन धूल धूसरित नगरो म ही सामाजिक राजनीतिक और साहित्यिक त्रियाशीलता आरम्भ हुई । स तो की कुटिया और राजाओ के दरबार छोड कर साहित्य नगरो की सभाओ समितियो और समाजा म शरण लेने लगा। उनीसवी ताब्दी पूर्वाध म बुरेलखण् बघलखण्ड अवध बनारस राजस्थान क राजदरबारो म वीर और शृङ्गार रस की कविताए ग जती थी। उसक उत्तराध म बनारस, प्रयाग मेरठ अलागढ कानपुर आगरा, पटना रांची आदि शहरो म साहित्यिक सभा समितियो का जाल बिछ गया । इनसे भाषा र प्रचार के साथ साहित्य की सजना म सहायता मिली। पवि-समाजो में पुराने ढग की कविताओ का पाठ होता था समस्यापूर्ति होती थी एव स्फुट शृगारिक कविताओ को प्रथय मिलता था। यह दरबारी वातावरण गद्य साहित्य के विकास के अनुकूल नही था तथापि इसी दरबारी वातावरण म उपन्यास पनपने लगा। जहाँ साहित्यकारो का सम्मेलन साहित्यिम चर्चा और विचार विनिमय होता था वहाँ साहित्य की प्रवत्तियो का निर्माण और अटियो का अनुभव भी हो रहा था। दरवारी साहित्य का मतिम आश्रय स्थान बनारम ही नये साहित्य का धाराओ का उदगम स्थान बना । लक्ष्मण गोबिट आठले न काशी को हि दी उप यास का उत्पत्ति स्थान माना है और कहा है कि भारते दु को सभा ने सभ्य समाज म हि दी गम बढाकर उप यास पटने और रिखने को कचि पदा की और जहाँ उपयासो का नाम न था वहाँ बीस ही वष के भीतर उप यासों का एक दूसरा हिमालय खडा हो गया । उपन्यासो म गोष्ठी जीवन के अनेक पक्ष प्रतिबिम्बित हैं। कथा मायक चाटकारों से घिरे हुए है ( एक कहानी कुछ आपबीती कुछ जगवीती परीक्षागुरु सो अजान एक सुजान ) । सभ्य समाज म कविता इतनी प्रिय है कि कवि ही सच्चा साहित्यकार माना जाता है । युग को रुचि के अनुकूल उपयास म काव्य का रूपरग है जो अध्याया के आरम्भ म पद्यात्मक उद्धरण और दश्यन्योजना नखशिख वणन सरस वार्तालाप और अलकृत भाषा गली म देखा जा सकता है। भाग्यवती और श्यामास्वप्न मे तो कवियित्री और कवि का ही नायिका और नायक बनाया गया है। सहृदय उप यास लेखको के समान उनके पात्र भी मित्र के बिना नहीं रह सकते हैं। किसी नायक को मित्र सामाजिक आदोलन में सहयोग देता है ( नि सहाय हिदू), किसी के ऐतिहासिक पीरिका] लिए स्वय मूलरी पर चर जाना चाहता है (प्रणयिनी परिणय ), पिसी को प्रमिका के बाग म ('पद्रकाना') तो किसी को वश्यारय तब ('धूत रसिक साल') पहुचा देता है । इस प्रकार मित्रता उपयाम की क्या-रढि बन गई है। मध्यवर्गीय सों ने राजभवन के प्राचीर म माहित्य को निकाल कर उसका गठन धन समाज के साथ कर दिया। वहत दिनों तक साहित्य बौर समाज का सम्ब व साहित्य और नागरिक समाज का सम्बध रहा तथापि इस प्रकार दोनों कभी सम्बद्ध नहीं गए थे। उपयास ही एक एसा साहित्य स्प है जिसमे नागरिक सम्यता की विविधता और जटिलता की यपाय और पूर्ण अभिव्यक्ति हुई । नगरों में सवप्रथम मामाजिक एवं आर्थिक परिवतन के चिह्न प्रक्ट हुए। वेतनमागी वग शक्ति और स्वतत्रता का अनुभव करने रगा। धार्मिक दष्टिकोण के बदल भौतिक दप्टिकोण का प्रादुर्भाव हुआ। पुरान मूयों का विघटन हुआ और उनका स्थान नय मूल्य उन रुगा नागरागरण की इन विशपताओं का उपयास पर गहरा प्रभाव पहा । अधिकारी उप यासकारों ने नगर का घटनास्थल और वहाँ के वयक्तिक पारिवारिक एवं मामाजिक जीवन का वण्य विषय बनाया तथा कहीं कही उसे इतना महत्वपूर्ण स्थान लिया कि वह एक पात्र बनकर मानवीय पात्र म अधिक सजीव हो उठा। उहोंने निर्भीक हावर नगरवासियों को नतिक्ता पर प्रकाश हारा। रईसों की कमण्य विलासिना और वेन्याओं के छिल प्रम को कर उ होन अन पृष्ठ रग तपा वचना और साहसिकता को ययायवान क्याए मुनाइ । प्रारम्भिा उपयास नगर जीवन के दस्तावेज है और प्रारम्भिा उपयासकार सच्च अप म नागरिक उप पामार हैं। न्यावसायिक लेखन - मध्यवग के अभ्युत्थान से माहित्य का नागराकरण हो नहीं ध्याव मायीकरण भी हमा। सामत्रो समाज म साहित्य राजाओं का विनार और विनों का यमन था । साधारण पाठकों की गस्या सीमित होन सपदि राजा महाराणामों की कृपा पर निमर ये। आधुनिए युग म साहित्य निशित समाजको सम्पत्ति बना दया पाठ योर प्रशर उसके सरसक हुए। यद्यपि राजदरबार से बाजार में मार माहित्य पुरस्कार की वस्तु नहीं रह परमरोद त्रिी री सामग्री हो गया नयापि उमा अवमूमन नहीं हुआ।

१०६] [हि दो उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा गामा वग के आश्रय म रहने के कारण कवि उसको बीरगाथा और विलास रीला का गान करते थे। नवोदित मध्यवर्गीय लेषक साधारण ग्राहको की गुणग्राहक्ता पर अवलम्बित थे और उसको अवहेलना नही कर सकते थे। फलत साहित्य एक स्वतत्र एवं सामाय वत्ति वना तथा उसम मानव जीवन की साधारण घटनामा सवेदनाओ और आकाक्षाओ को स्थान मिला । सामयिक निवघ, गद्यनाटक और यथाथवादी उपायास पगेवर लेखका क विशिष्ट अगदान हैं। जहा उपयास जनता की वस्तु बना वहाँ उसम साहित्यिक गुणा का ह्रास भी हुआ । राजाश्रित कवियो को अपनी कला के प्रदशन का अवमर मिलता था और लोकरुचि के अनसार लिखन को बाध्य नहीं होना पड़ता था। राजाश्रय स मुक्त लेखक लाक्रुचि को प्रभावित करने के बजाय उसस प्रभा वित होने लगे। उहीने अच्छे बुरे मौलिक अधमौलिक उपयास लिखना और लिखवाना शुरू किया और उनका दर लगा दिया। उनकी दष्टि क्ला की आवश्यकताआ की आर न जाकर बाजार की मांग की ओर चली गई। इस नुटि की पूर्ति दूसरे प्रकार से हुई । जब तक अथ क लिए लिखना ठवक की प्रतिष्ठा के विरुद्ध होता है तब तक वाणी का मदिर आर्थिक और सामाजिक समस्यामा के लिए ब. रहता है । साहित्य के यावसायीकरण से उसका सामाजीकरण हुआ। यावसायिक उप यास लेखक समाज क लिए और समाज क सम्व । म लिखन की भावना से प्ररित हुए । उनको वस्त और शली म निजी विशिष्टता है। उनकी गली उनकी रानी न होकर उनकी दासी है । महान “यावसायिक लेखक गापालराम गहमरी के उप यास इस तथ्य की पुष्टि । करते है। सामती तत्त्वो का विरोध आधुनिक भारत का निर्माता मध्यवग आधुनिक साहित्य का निर्माता है। रीतिकाल का साहित्य सामतवग का साहित्य है । आधुनिक काल का साहित्य मध्यवग का साहित्य है और उप यास उसका अत्यत सजीव अग है । जस सामतवग और रामानी क्थासाहित्य का सम्बध अभिन्न था, वसे ही मध्यवग के साथ यथाथवादी कथासाहित्य-उप यास-का इतिहास जुडा हुआ है । सगीत को भांति कथा-कहानी भी शासक वग के लिए विलास का वस्तु थी । रामानी कथासाहित्य क्षणिक मनारजन के लिए जीवन की कठोर एतिहासिक पीठिका] [१०७ वास्तविकता म दूर यादश प्रेम और साहसिकता के मुत, असाधारण लोक मए नाता पा । रोमांस और मादा साथ-साय चलन है। रोमानी रक्षक अनिवायत बादराबाद और आगवादी सामा यत रोमानी होता है। मध्य वग आयादी होते हुए भी घ्यावहारिक एव वस्तुवादी पा। उसका साहिप अस्त्र आदावाद न हाकर आदर्शो मुख पयापवाद हो सकता था। रोमानी पासाहित्य उस मध्यवण की कचि और भावना के अनुकूल नहीं था जिसम हिती उपयामार उत्पन हुए । अन उपयाम की उत्पत्ति रोमानो कमा माहित्य र प्रतिक्रियास्वरूप हुई । इस प्रतिक्रिया का परिचय र यास रेसका नउपचास में मध्यवर्गीय मधायदाद की निष्ठा और रोमाम विराधी रख म दिया है। आरम्म स हर आज तर उपवास म मध्यवर को वाग मुखरित हाता रही है । मध्यवर्गीय समाज, सभ्यता और संस्कृति स सस विप सम्बप रहा है । रमपास म प्रम और युद्ध की कथा प्रधान रही है, उपयाम म प्रम और सम्मान की। मध्यवर जावन कोयदा मौलिक समस्काए पानियादास स लकर प्रमचन् तर उपपासकारों को प्रिय रही हैं। जब समाज एवं देश का नेतृत्व राजा गना व हाय में या क्यासाहित्य म व नायर-नापिका ५ । अब नतृत्व मध्यवर परत लगा, इसरिए पयास म मध्यवर्गीय पुष्प नारी नायक-नायि की भूमिका म उतरे । अपनी परिस्थिति स जमन वाल निहाय हि + मध्यवर्गीय नायक-नायिका बारम्बार नामाप वरपर उप यासों में जम रत रह हैं। दवकीनन खत्री के निगरमी-एयारी उपयास में मा कुमार वीरद्र सिंह अपनी निप्रियता के शारण पतनील सामठ बगपा और जमिह अपना सक्रियता के कारण बदायमान मध्यवर का प्रतिनिधि व परत ए पिलाई पन्ने हैं । मध्ययन व गुपारवारी पाए और उपारमा प्रति सम्नी माता और यनिय सोदितान उपयास म अभियाना पाई है। बस्नु पात्र और पिको की शामाओं २ बावजूद उप पाम प्रतिनिधि साहित्य म्प रहा है । उपप्या रेशरों सामन मस्त और पारमो और उन पर आपा रित उन्नीसवीं सागको हिरो-पाए पो, बिहे रामाम' का सपा दी जा सरती है। दण्डी मुदय और वाम 4 प्रेम रामाम, आविषय और नरी दानों में असाधारण थे, उन्हें मन्तुष्ट नहीं क्योंकि उनका अनियनि नवीन विचार, धामपित विपर और सरर गैरीम पी। १० वा १०८] [हि दो उप यास पष्ठभूमि और परम्परा भटट ने लिखा था कि दण्डो के दशकुमार चरित से किसी प्रकार की शिक्षा नहीं निकलती और सुब धु की 'वासवदत्ता से कछ मानद नही मिल सकता । ५० अविनादत्त यास ने कादम्बरीक सम्बध म अपना मत इन गदा मे व्यक्त किया था क्या स कही लम्बा चौडा उसका आटाप है । कथा का आन द लन को पटना हा तो एक पृष्ठ बाँचत-बाँचत जी घबडा जाता है ।" देवकीन दन खत्री पर फारसी रोमास का प्रभाव भी पड़ा और उसका प्रतिक्रिया भी हुई। उहोन दास्तान अमीर हमजा के नायक अमार और उसके ऐयार अमूर का प्रतिद्व द्विता म कमार वारे द्र सिंह और तेजसिंह को खडा किया । फजी न अपन जादूगरो को हिंदू काफिर बनाकर धार्मिक असहिष्णुता दिखाई थी। खत्रीजी न इसका कलात्मक प्रतिवाद किया । उहान मुसलमाना का खलनायक का एयार बनाया पर हिदू मुस्लिम पात्रा के चित्रण में दुहरी कूची से काम नहीं लिया। उन्नीसवी राता । पूर्वाध म प्रचलिन कहानियो मे रानी केतकी की कहानी जिस पर फारसी के साथ ही भारतीय छाप है दरबारी कवि और कथाकार द्वारा लिखी गई थी। उसम दरबारी कहानी की प्राय सभी प्रवत्तियाँ हैं । गासन वग के विचार एव विश्वास निराल होते हैं । प्रम और युद्ध की कल्पित घटनाए जादू-टाने की अदभत बातें उसका मन मोह लेती है । अत रामानी फ्थाओ म देशकाल की परिस्थितियो का वास्तविक और स्वाभाविक वणन नहीं रहता । शासक वग अपने वभव विलास और सुख मुविधा को अक्षण्ण रखने क लिए धम नीति दान और अविश्वास के हथकडा स काम लेता है । यही कारण है कि रोमानी कथा साहित्य मे अली किक एव उपदेगात्मक तत्त्व भी रहते हैं। उसका मुख्य उद्दश्य कौतूहल बढ़ाकर आन ? प्रदान करना है अत उसका घटना प्रधान और सुखात होना मावश्यक है । उसम उपदेश को अपक्षा मनोरजन की मात्रा अधिक होती है । वह अदभत रस का साहित्य था जिसस मध्यवग के वुद्धिजीवी लेखक प्रभावित नही हा सके । वे उसके आदर्शों को अपनाकर या उसकी परम्परा को आगे बढाकर अपना प्रयोजन सिद्ध नही कर सकते थे। रानी केतकी लापाजन लगाकर गायब हो गई थी। देवकीनन्दन खत्री न उसे हसकर उडा दिया 'जिस आदमी क पास कोई ऐसी चीज हो जिससे वह गायब हो जाय तो फिर ऐयारी साखने की जररत क्या रही ? गायब हाकर जो चाहा कर डाला। पुरानी कथाओं के स्वरूप या वस्तु स बाधुनिक उप यासकारो 110 एतिहासिक पीठिका] [१०१ की आवश्यकता पूरी नहीं हो सकती थी । प्रमच द ने उन पर यग्य की घौधार की थी हमार यही उप यास काल से पहले एसे विस्स कहानिया का बहुत प्रचार था जिनम प्रम और विरह के वणन प्रधान हात थे। प्रमी एक निगाह म माशूक का 'क्रतए नाज' हो जाता था माशूका अपनी सहेलियों से अपनी विपत्ति कहानी सुनाती यो आगिक साहब आह भरते थे सिर धुनत ये घर पर खबर हाती थी, यार समयाने के लिए जमा हाते थे रोमानी क्या व समान रीतिकाव्य भी अवाभोगी अभिजात वग का साहित्य था। उसमें भी जीवन के गभीर प्रश्नो और प्रसगा का अभाव था तथा कल्पना चमत्कार और आडवर की प्रधानता थी। उसके आदा भी मध्यवग के नए लेखको को माय नही हो सक । उनम स कुछ उसके प्रासक होत हुए भी समथक नही थे । राजाआ रईसा का जीवन उस कमरे 4 समान था जिसे परद मी बाट स ही देखा जा सकता था। उसी तरह रीतिकाल म नर-नारी का यौन सम्बध नायक नायिका भेद क बहाने दिखाया जाता था और नायक-नायिका का वणन राधाकृष्ण के नाम पर किया जाता पारलौकिक आवरण को हटाकर नर-नारी क सहज सामा य रूप का दखने और दिसान की प्रवृत्ति आधुनिक उपयास म प्रक्ट हुई । रीतिकालीन नायक नायिका म नर-नारी के सौदय की चरम कल्पना साकार हुई और उनका चित्रण व भव के मादक वातावरण म किया गया। दरबारी पविया ने साधारण स्त्री-पुरुष को अपन काव्य म स्थान देना उचित नहीं समया। जिनम कटास निशप की क्षमता न हो ऐमी गोवर पायती हुई, सेत निराती हुई गहक्म म उसतो हुई स्त्रियां उनके काव्य का विषय नही हो सकती थी। साधारण परिचित वातावरण म साधारण नर-नाराक क्रियाकलाप का वणन उपन्यास की जो विशेषता है । रीतिमुक्तको म गृह जीवन में भीतर भी नर-नारी के सम्बध की झांकी मिरता है पर उसम जितनी मादकता है उतनी मामिक्ता नही । मिलन विरह क वणन कृत्रिम और परम्परागत है। मण्याम' के रूप म वणित नायक-नायिका क निशिदिन, श्रोत विसास सच्चो गृहस्यो रे मुगद दापत्य जीवन के प्रतिविद न होकर विलासिता मग्न पासा वग के जीवन के परिचाया है। उपयास का प्रयतन परिवार की दनिकी के प म हुमा । पहला लिखित उपयास 'भाग्यवती पुरम्ब पा उपायास है।

११०] [हिदी उप याच पृष्ठभूमि और परम्परा रीतिकाल म वणित नायिका दूती अलकार मादकता और शृगा रिक्ता राजमहल की सदरी कटनी आभूषण, विलासिता और वासना का साहित्यिक प्रतिरूप थी। आश्रयदाताआ की अभिलापा की तरह कवियों की कल्पना कामिनी के देहलता म लिपटी सिमटी थी। नारी म केवल शरीर रह गया था, शरीर मे केवल सुदरता और मुदरता म क्वल सजावट रह गई थी। शृगारी कविया न मानवी को नकली कागज को फुलबारी बनाकर उसके फूल से जगा के साथ खिलवाड किया । प किशोरीलाल गोस्वामी ने लालावती म उनका उपहास क्यिा यदि उन उपमाप्रिय कवियो के गर्ने हुए उपमानो स एसी नायिका मूति बनाई जाय कि जिमके मुख की जगह आईना भोवो का जगह दो तलवारें आँखो के बदले दा मछली नाक के स्थान म सरो के पड हमी की जगह मिश्री की डली गल के स्थान म शख छाती की जगह हाथी के मस्तक चोटी के बन्ले मोटी सी सौपिन हाथ के बरले कमल लिवकर कमर की जगह एक्दम खाली छाडनी जाय और फिर उस नीच जांघ की जगह दो केले के खम्भ खड करके एडी की जगह अनार की डार रख दी जाय तो वह नायिका कसी भपावनी राक्षसी मूर्ति सी बनकर तयार होगी? इसलिए हम अनगर वक्न वारे कवि नहीं है 121 नारी वा गरीर मात्र मानना नर नारी के रागात्मक सम्बध को अस्वीकार करना था। नर नारा की जीवनकथा के रूप में उपन्यास की रचना तभी सम्भव हो सकती था जव उनम रागात्मक सम्बध हो। रीतिकाय प्रमहीन का य था। दव और बिहारी को छाडकर प्राय सभी कवियों का सो दयबोध सूक्ष्म न होकर स्थूल श्र गारिक्ता पर आधारित था । रीतिकालीन प्रम वासना की कुजगली म खो गया था। उस वीर गाथाकालीन साहसिक प्रम ( माक्स की गवली म सिवल रस लव ) या भक्तिकालीन उदात्त प्रम को कोटि म नहीं रखा जा सकता। रामानी कथा और रीतिका य के विरुद्ध प्रतिक्रिया सामन्तवाद और पूजीवाद के सघिकाल की स्वाभाविक देन थी। साम ती अभिरचियो और आकाक्षामो की अभि पक्ति करने वाले साहित्य के प्रति अस तोप सामत बग २ प्रति अस तोप का आवश्यक अग था। भारत में युग-युग से यह धारणा चली आती थी कि राजा और महाराजा देश के भाग्य विधाता हैं। यह बाबा ।

ऐतिहासिक पौटिका धारणा गलत नहीं थी क्योंकि यहाँ अनेकानेक विद्वान धीर, दानी, पायी और प्रजापालक राजाओं का माविर्भाव हुआ था । अठारहवी उन्नीसवी शतान्या के भारतीय इतिहास न यह निणय कर दिया कि उच्च वग से देशहित की आया करना भूल है । एक चिरकालीन राष्ट्रीय विश्वास को धक्का लगा। नवावा और नरेगा के युद्ध नई व्यवस्था कायम करने के बदले पुराना व्यव स्था का बनाय रखन क लिए थे। उनम स बहुता ने सन सत्तावन के विद्रोह म देशवातिया के विरुद्ध विदेशियों का साथ दिया । यदि वे अवरोधक नही हाते तर विद्रोह को बाढ़ म कम्पनी बहादुर के साथ ग्रिटिश ताज भी वह जाता। भारतीय नासक वर्ग के पतनवाल म भी जनता म राजमक्ति की भावना जीवित थी। १८५६ ५७ म कम्पनी के हाथ म अवध के जाने पर जनता म बस तोप को ज्वाला भडक उठी था और विद्रोह हान पर सवन मिस्पर वहादुरशाह को मम्राट पापिन किया था। राजभक्ति की आरती की यह अन्तिम लो यो। प्रतापनारायण मिश्र न अडला स्वागत'म देशी राजसमाज के प्रति जनता की भावना को वाणी प्रदान की थी दुष्ट सुमक्ष अपने भाइन मह साय न दी हो। भाजन दिन विद्रोहिन दल बह निवर की हो। ठोर-और निज पर टवाए अरु फुक्वाय। मान सोप वह ब्रिटिश वग में प्रान बचाय ॥ भारतेन्दु के समय राजा और रईसा को वोरता दिन हो चुकी थी विलासिता गेप रह गई थी। वे घ्यक्तिगत स्वाय के सामने सावजनिक स्याय को भूल गये । वनम उच्च आदा हि मर मिटने की होस नहीं रही। निष्टता और मुरुषि का स्थान असम्पना और रूढिवाद न ले लिया था।' ये आधुनिक मनोवानिक उप यास क नाय की भानि नपुसर असामा जिए और परवा हो गय थे। उनके लिए माम की नाक दूप की सक्सी सातरज के राधा यादि उपमाए उपयुक्त हो ।' उनका दृष्टिकोण सामनी पा। ये रेत म पास गाडकर वन की सास रन वाले गुनुमु ग की तरह महलों म बद रहते ५। समय का गति देखने और पहचानने म के असमय थे। आरमविकास और सामाजिक दायित्व से अनुप्राणित मध्यवग वतमानमा यसारिश पा, सहिए भविष्य भी उसके साथ पा।१० बालकृष्ण भटन पक्षण में पहा पा कि मध्यम धनी ही महत्व या बड़प्पन की नसरीमा उत्पत्ति स्थान है जो दवा को लात मार सुविधा का पूरा वैभव ११२] [हि दी उपन्यास पृष्ठभूमि और परम्परा प्राप्त कर सब कामा म पहिले अग्रसर होती रहेगी। जिस प्रकार सामन्ती समाज के साथ सामती साहित्य का ह्रास हुआ उसी प्रकार नई शक्ति के रूप में मध्यवग के उन्य के समाना तर नई कला के रूप मे उप यास का उदय हुआ । राजसमाज के प्रति असतोप उसम यग्य विद्रोह आक्षप क रूप में उभर कर माया । तिलिस्मी एयारी और ऐतिहासिक उप यासकारो ने सुदर स्त्री के लिए युद्ध हत्या पणय त्र और प्रपच करने वाले सामता को कुत्सित मनोवत्ति का परिचय देकर पतनगील सामती सभ्यता का यांची प्रस्तुत की । जजर हरण सामती सभ्यना को ढरने वाले ज्योतिषी पुराहित और पुजारी भी श्रद्धा एव विश्वास का भाजन नहा रहे । पूर्व म राजाओ की तरह उनका भी समाज में सम्मान था क्योकि वे विद्या धम दान राजनीति आदि म निपुण होते थे। धीरे धीरे वे भा रूढिवादी और अपरिवतनगील बन गये । उहें प्राचीन भारत के अध पतन का सहायक और नवीन भारत के उत्थान का अवरोधक मानकर उप याम लखका न उन पर सरकर या छिपकर आक्रमण किया। 5 इस प्रकार उपायास की रचना सामती यवस्था क त्रिदेवा राजाओ राजापित ककारी और पण्डितो की आलाचना के रूप म हुई। मानवतावाद और जनवाद सामत और सामती मुस्कृति के रक्षक समाज और देश की रक्षा करने म असमथ थे । अत उनम राष्टीय अविश्वास हाना स्वाभाविक था। प्रसाद जी क मतानुसार भारतीय नरेशो की उपस्थिति भारत के साम्राज्य को बचा नहीं सकी। फलत उनकी वास्तविक सत्ता में अविश्वास हाना सकारण था । धार्मिक प्रवचनों ने पतन म और विवेक्दभपूण आडम्बरों म कोई रुकावट नहीं डाली। तव राजसत्ता कृत्रिम और धार्मिक महत्त्व यथ हो गया और साधारण मनुष्य जिस पहले लोग अचिन समयत थे वही क्षद्रता में महान दिखलाई पड़ने लगा। 28 साधारण मनुष्य की महिमा म आस्था उसकी भक्ति में विश्वास उसकी लपता के प्रति सहानुभूति उस मानवतावादी दष्टि की परिचायिका है जिसे भारतीय विद्वान पश्चिम की देन मानते हैं । मानवतावादी दृष्टि उपयास को प्रमुख प्ररकणक्ति बनी। उपन्यास के लिए वह समय सबस यधिक उपजाऊ होता है जब मनुष्य के प्रति मनुष्य का आक्षण होता है । जब मनुष्य को मनुष्य के सम्बन्ध में ऐतिहासिक पीठिका] [११३ जानने और साबने की इच्छा हुई और मनुष्य मनुष्य के अध्ययन का महान विषय बना तव साधारण नर-नारी उप यास म अवतरित हुए । इतिहास क पान पर रा रानी और सेना-सेनापति उडते हैं महाrय म देवता दानव राजा महाराजा और जीवनी मे महापुरुष ही स्थान पाते हैं वितु उस जन समूह का प्रवेश निषिद्ध रहना है जिसे अमरीकी कवि वाल्ट हिटमैन ने डिवाइन एवरेज को मजा दी है। उप यास मानव रोक के मुष-देख आग अभिलापा स्वप्न-सकल्प जय-पराजय की गाया है। उपेक्षित पीडित दलित और निम्न वा का सहानभूतिपूण चित्रण ता उसकी करात्मक विशिष्टता 1 पभग एक हजार वर्षों का (८००-१८००) प्राचीन हिदी-माहित्य सामत युग म पला । दरबारी काम्प और भक्तिकाव्य की समाना तर धाराए चलती रही और वनम राजा रानी तथा देवी देवता विहार करते रहे। कौकिक प्रमाव्यानक काव्य म भी राजा राजकुमार मत्रीपुत्र रानी राजरमारी, मत्रीपुत्री को नायक नायिका का पद मिला। दो सौ बावन बष्णवन की वाई ही एक ऐमो मानवीय कया है जिसम नाना प्रकार के पुरुया और स्त्रिया का मेला देखने याग्य है । उन्नीसवीं सदी म गद्यकार व आरम्भ , साथ मनुष्य के वास्तविक रूप का विशद चित्रण आरम्भ होता है । पाठय पुस्तका कप मे रिसित पामा पत्र-पत्रिकाओ में प्रकागित रेसा चिों मिया और नाटका म मनुष्य जमा है उसी प म उस उपस्थित परन का प्रयास किया गया। जीवनी और आत्मापा लियन की प्रति भारतेंदु-युग २ ही उत्पन्न हुई। रेखाचित्रा मप्ररूप (टाइप) का दान हुआ ता जीवनी और बारमकपा म व्यक्ति के बाह्य और आन्तरिक पयों पर प्रकाश पहा ! इन मानव जीवन में बनी हुई रुचि का बोध होता है। उपचास जनवानी भावना को मोरप दन है । रामानी क्षासाहित्य सपन उपादान और दृषिकोण म मामिमात्य रिए या । सामन युग में बन काल में यह भावना विकमित हुई विसाधारण लोगों के जीवन मे भी रोवर और मार्मिक प्रमग होने हैं और उन्हें साहित्य का प्रतिपाय बनाया जा सकता है। उपयाय यह रचना प्रकार है जिसमें सवप्रथम माधारण रोगा का जीवन चित्रण के योग्य समसा गया और साधारण भाषा में पूषता हाथ मिश्रित हमा पपाय म रोमांस, सामपि म पायद तपा परिचिड में नवीन की उपस्थिरे लिए मिस प्यार दपि की आवश्यकता होती है वह उपमाछ ११४ [हि दो उप यास पष्ठभूमि और परम्परा लम्बकों म है । उहान सामाजिक और पारिवारिक उप यासा म यह अच्छी तरह दिखा दिया कि प्रतिदिन की घटनाआ और क्रियाओम भी हसान एलान की क्षमता है तथा वास्तविक जीवन के रोमास से बढकर कोई रामास नही हाता । उहोन अपन आस पड़ोस घर आंगन की छोटी छोटी बातो की चर्चा इतन सीध सादे ढग से की है कि सत्य गल्प से अधिक अदभुत लगता है । दवकीन दन खत्री और उनक अनुगामियो तक ने राजाओ की अपक्षा उनक नौकरो (ऐयारों) को अधिक महत्त्व दिया और उहें अधिक आपक बनाकर उपस्थित क्यिा क्याकि नौकरो के जादन से विशेष मनोरजक शिक्षा मिल सकती थी। उच्च वग के बदले मध्यम और निम्न मध्य वर्गों म मनारजन और शिक्षा के तत्वा का भावपण परिवर्तित लाक्रुचि का घातक था । लोगा को उन नर नारिया को क्या मे विरोप हाच हा सक्ती थी जिनके साथ वे एकात्म बाघ कर सकें । उहे सामत युग के उगत्त नायक नायिका क सुख दख भी उतन प्रभावित नहीं कर सकते थ जितने अपन युग के नर-नारी क सुख दख । उचित वण्य विषय के प्रति आस्था और आत्मीयता के बिना कला का मृष्टि नही होतो । जव लेखको पाठका को अपन समाज और समय के यक्तियो क प्रति उत्कठा और सहानुभूति हुई तब यक्ति के यक्तिगत और सामाजिक जीवन की कथा उपन्यास म लिखी गई । इस रूप में उप यास लेखन उस पू जीवादी समाज म ही सम्भव हुआ जहाँ यक्ति की महत्ता स्वीकृत हुई व्यक्तिवाद भारतीय सामाजिक संगठन आत्मनिभर ग्राम यवस्था जाति प्रथा और सयुक्त कुटम्ब प्रथा पर आधारित था । उसम यष्टि की अपेक्षा समष्टि का महत्व विरोप था। धम निरपेक्ष अग्रजी शासन प्रणाली नई पू जीवानी अथ व्यवस्था पाश्चात्य यक्तिवादी सम्यता आधुनिक शिक्षापद्धति ओर सुधार-आ दोलन के फलस्वरूप 'यक्ति का महत्त्व बढने लगा। यक्तिगत स्वाधीनता और उपन्यास म घनिष्ठ सम्व ध है। परीक्षागुरु का मदनमोहन हिही उप यास का पहला यक्तिवादी नायक है । वह आर्थिक व्यक्तिवाद का ज्वलत प्रतीक है । अवस्था के सग उसकी स्वतत्रता बढी है । युवक होने पर वह खलकर खेलता है । माक्स ने पूजीपति वग के जो लक्षण बताए हैं वे मदनमाहन म वतमान हैं । वह परम्परागत सामाजिक सम्ब धो से मुक्त एतिहासिक पीठिका [११५ हावर नूतन व्यक्तिगत मवध को स्वीकार करता है । वह वैश्याओ के आगे अपनी मुशीला परली और दरवारियो के आगे अपने मच्चे मित्र को टुकरा दता है। वह परिवार में भावारमा वपन का इस तरह छिन भिन्न कर डालना है कि अपन गुलाब जस कामल और गगाजल जमे मिमल वालको की उसे सुधि नहीं रहती। नाच गान और विलास-वासना म मग्न होकर वह धर्म, नाति, समाज और राष्ट्र का भूल जाता है। द्रश्य और अधिकार के नो मे ऐमा चार हुआ कि लोक-परलार को कुछ सवर न रही। वह अपन अधिकार और स्वतन्त्रता में हस्तक्षप सहन नहीं कर सकता है। वह पिंजड वा पछी बनकर रहना नहीं चाहता । वह अपन हितों को समयता है । अपन का अपना निययिक मानकर वह परामणदाता मित्र का स्पष्ट कहता है में अपना नमानुक्सान समझता है । व्यक्तिवार और अवाद अभिन्न होते हैं । माक्स को मानि श्रीनिवासदास ने उस महाजनी सभ्यता का नवाब उतारकर रस लिया है जन मानव सम्बधों का आधार रुपया है जहाँ प्रोति स्वायपरता का दूसरा नाम है, जहाँ परम्परा आदर नहीं है। इसी प्रकार सौ अजान एक मुजान में सेठकुमार घटता अगारोनता और बेहपाई का जामा पहन मब भाति निरा और स्वछ बन गए थे । इनरे समान धूत रसिकार का सद नायक भी परिवार और समाज से दूर अपना छोटा ससार बमाना है और पानी प्रणय- माताहर देया के जाल ममता है। उन्नीसवी नमानी मध्य मे आपिक परिवतन क परस्वरय व्यक्ति और समाज के बीच स तलन नहीं रहा । सेठ और साहकार उद्योग-व्यवसाय कृपि वाणिज्य म पूजी लगार धन सचय करने लगे। वे व्यक्तिगत वभव के मद मे उच्छ खल और स्वच्छाचारी होकर सरापरवाही भरी विलासिता की और मुवे । पूजी वापवस्था सामाजिक उसोनता को बढ़ावा दनी है। ध्यापारो ग की भाति अग्रेजी गिभित वग की प्रति व्यक्तिवादी यो । यात्री nि सबसे पहरा और मबसे पान प्रमाद यह हुआ कि भारत का विरत समार जो कुछ प्राचीन और भारतीय पा उस ह्य और जोएछ नयान तथा पाचारय पा उमे श्रष्ट समाने लगा। इस देश में मर पारी नौररी स्वग का दरवाजा रही है यार अपजी गिमा उसकी मुनाती दुजो मादपोत गुणमों घोर निसित देशरों को पदा परन चार पायों में परिसर मरठी भर रोग सपन्न बन गए तथा विगार उन ममूद महिपाटी प्रतिगित और दिन बन रहा पित वर्ग नगरों में ११६] [हिदी उप यास पप्ठभूमि और परम्परा पाश्चात्य सभ्यता म पल रहा था अनिक्षित वग गावो म भारतीय सम्यता को पाल रहा था। दानो के यक्तिगत और सामाजिक आटगों मे मल नही रहा । नव शिक्षित वग यक्तिवादी बन गया । वह जनता मे दूर अपने वग स्वाथ मे लीन रहता था। उसे इसका भान नहीं रहा कि समाज का अस्तित्व है और वह समाज का अग है । अग्रजो की तरह रिजव रहन की लालसा सुरक्षा और स्थायित्व की भावना श्रष्ठता का बोध आदि ने यक्तिवादो भाव को दृढ किया। और सामाजिक दायित्व का दुवल बना दिया । यक्ति और समाज म सामजस्य नही रहा । समाज स विभिन्न नवशिक्षित वग के यक्ति स्वात "य का दिग्दान लज्जाराम मेहता और किशोरीलाल गोस्वामी के उप यासो में कराया गया है। राल्फ फाक्स की मायता है कि 'उपयास का सम्बध व्यक्ति से है वह समाज और प्रकृति के साथ “यक्ति के सघप का महाका य है उसका विकास उस समाज में ही सम्भव हो सकता था जिसमे समाज और यक्ति क बीच स तुलन नहीं है और मनुष्य एव मनुष्य या प्रकृति के बीच सपप है । ऐसा समाज पू जीवादी समाज है। ' यक्ति और समाज के सघप की झलक हिदी उप यास की प्रथम नायका भाग्यवती (श्रद्धाराम फिल्लौरी भाग्यवती) और प्रथम नायक तिलकधारी (बालकृष्ण भटट रहस्यकथा) के जीवन म ही मिल जाती है। दोनो सामती सस्कार से मुक्त हाकर समाज स सघप करते है और अपन भाग्य का निर्माण करन म सफल होते हैं। भाग्यवता एक वष म तीन आने पसे से पाच सौ रुपये जमा कर ती । यह भले ही विस्वास योग्य नहीं हो इससे साधारण स्त्री की असीम क्षमता का परिचय मिलता है। तिलकधारी सम्पन्न होकर स्वतत्र जीवन व्यतीत करने के उद्देश्य से चीन तक की यात्रा करता है। हमारे उपयास लेखक स्वस्थ सामाजिक चेतना म सम्पन थे । वे यक्तिवाद का समथन नही कर सक। उनके पात्र समाज और परिवार से अलग होकर फिर मिल जाते हैं। उहें उत्तरदायित्वहीन यक्तिगत स्वाधीनता से सहानुभूति न होकर भी मानवता मे आस्था है, इसलिए उहाने यक्ति का हृदय परिवतन करा दिया है । उहाने समाज से यक्ति के विच्छिन होने की चर्चा की है पर यक्ति का यपने कतप और दापित्व का पय दिखाकर समाज से भिन्न नहीं होने दिया है । उनक मत से समष्टि यष्टि के लिए नहीं बल्कि व्यष्टि समष्टि न लिए है । वे समाज से विमुख यक्ति को खलनायक बनाकर বরিয়াম বাকি} [११७ मनुष्ट होत पे भले ही उनके अधुनातन वाज उह नायक नायिका का पद २. बहुधा उनका नायक होते हैं एक व्यक्तिवारी होता है और दूसरा ध्यक्तिवादी हात ?ए भी सामाजिर हाता है। दूसरे को सहायता से पहल का सुपप पर लाकर उसके माध्यम से वे अपना सुधारवादी आदा व्यक्त करत हैं । व्यक्ति का पक्ति परिवार समाज और देश का उद्धारक बनाकर रहाने उसका महत्व बडी विलक्षणना से प्रतिपादित किया है। आग्ल शामन-व्यवस्था अयशी दासन ने विभिन्न भारतीय भाषाओ म आधुनिक साहित्य के उत्थान के लिए बातावरण तयार किया ! हि ती साहित्य उन्नीसवी सदी क भारम्भ से ही अपनी सम्पर की छाया में आने लगा था कि तु वास्तव म अनजी सम्पक और उससे प्रभावित हान का अवसर उसे उसके उत्तराध म मिरा । 'स्ट इण्डिया कम्पनी न हिन्दी साहित्य का प्रथय नही दिया । फोट विलियम कोरज की नीति उद और वगला व लिए लाभप्रद हुई । गिल क्राइस्ट और परेको उन मापामो पर इतनी कृपा थी कि वे उनो पिता ही कहे जात है। हिदी को ब्रिटिश सामाग्य का भी आयय नहीं मिला। पिछली एक सदी में वह अपने पर पर खड़ी होकर आग बड़ी है । सामत युग के साथ ही राजकीय सहारा चला गया । अग्रजो सम्पर का महत्व राजाध्य प्रदान करन म नहीं वरन उससे वाचन करन म है। जसा कि बताया जा चुका है सन सत्तावन सामती यवस्था के प्रसादमय प्रभाव के अत और अंग्रेजी शासन क ध्यापक प्रमाव के आरम्भ का सूचक है। ब्रिटिश साम्राय की स्थापना व बाद अग्रेजी प्रभाव भारतीय जीवन और साहित्य पर प्रवल और स्पष्ट स्प से पहने लगा। मारताय जीवन और साहित्य म अठारहवी शतानी उत्तराध म जितनी ही जहता पी उन्नीसवा शताब्दी उत्तराध म पाचात्य सिपा सस्कृति साहित्य और विचार उत्तजय सम्पद से उननी ही चेतना माई । पुरान उप यासो म साहस, प्रम, वीरता देशमक्ति और समाजसुधार की पना के मूल म नवारयान को माना है। ८ सौदों को राजरता और अशालि दे बाद व्यवस्था और धान्ति पापम पर सजी राज्य में साहित्य को क्षतिपूर्ति एव नवनिर्माण र लिए मनुष्य अवसर प्रदान किया। भारत शाम इतिहास विदेशी आक्रमण और गहरहा इनिहाय बना हुआ पा । अपजी शासनास म शालि ११८]] [हि दी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा और सुरक्षा समूचे देश में वास करने लगा और विदेशी आनमण बद हो गया। इस स्थिति में भारतवासियो का अपने भत वतमान और भविष्य पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने का अवसर मिला । हि दो-लेखको को गुण दोष परखन की सूक्ष्म दृष्टि मिली थी। उहोंने मुसलमाना और अग्रजी राज्यो की विशेषताओ और दुबलताआ को अच्छी तरह समझने का प्रयास किया। राज नीतिक एकता सामाजिक समानता धार्मिक सहिष्णुता राष्ट्रीय सुरक्षा, यातायात को सुविधा और नवीन शिक्षा प्रणाली अग्रजी राज्य की विगिष्ट उपलधियाँ थी । अत लेखको न अग्रजी राज्य का हार्दिक स्वागत किया और कविता नाटक उपयास आदि में उसकी सराहना की। इसे उनका राजभक्ति नहीं अपितु गुण ग्राहकना मानना चाहिए । सरक्षा और स्थायित्व का वाता वरण गाहस्थ उप यासो मे याप्त है । आगल नामन प्रणाली स जासूसी उपयास प्रत्यक्षत प्रभावित है। खफिया विभाग स उपयास लखका का कच्चा माल मिला । पुलिस वाले कहने के लिए तो जनसेवक रहे हैं पर अपने वचन और यवहार से अपराधी की अपेक्षा निरपराध को अधिक आतकित्त करते रहे हैं और इसलिए अपराध की छानबीन में उह जनता का सहयोग नहीं मिला है । वास्तविक जीवन के अनुरूप ही उपयास म जासूस और उसकी जासूमी मे लोग सहानुभूति प्रदर्शित नहीं कर सके । फलत पुलिस की भांति पुलिस-उप यास बदनाम रहा और उसके प्रचार प्रसार म बाधा हुई। राष्ट्रीयता अग्रजा को शासन व्यवस्था प्रसनीय थी कि तु उनकी गासन नीति अत्यन हानिकर थी। उहोंने भारत में जिस गाति की स्थापना की वह मरघट की लत थी। उसम जीवन का स देश नहीं था मौत की आहट थी। आर्थिक समृद्धि से रहित पराधीन देश की राजनीतिक गति स स्वतत्र देश की अराजकता ज्यादा प्यारी होती है। जब कम्पनी ने विक्टोरिया क हाथ भारत का वैच दिया और १८५८ म महारानी का उदारतापूर्ण घोषणा पत्र सुनाया गया तो लोगों ने सतोष का अनुभव किया जो स्वाभाविक था। किन माशा और विश्वास का वातावरण अधिक दिनो तक टिक नही सका। लोगों ने जिस परिवतन का स्वागत किया था वह गासन का परिवतन नही बल्कि गासका का परिवतन सिद्ध हुआ । अग्रजी शासन के विरुद्ध एक ऐसी भावना अगडाई रेकर खही हो गई जिसे राष्ट्रीयता को सजा दी जानी है।

एनिहासिल पीठिका] [११९ अग्रजों के पहले भी भारत म विदेशिया ने आकर राज्य किया था पर उनम और अग्रजा म बहुत अतर था । पूर्ववर्ती शासकों ने भारत को अपना पर बना लिया था। देश के अग बन गये थे। देश उत्पान पतन म उनका उत्पान-पतन पाभारत में उनका पासन भारतवासिया कागामन था । यग्रेजी औपनिवेशिक सन इसम सवथा भिन्न या । अग्रेज एसे विदेशी Tसक थे जो भारत को अपना दा मानने के लिए तयार नहीं थे। उनका शामन रात से होता था रेरिन उसकी बागडोर लादन में रहती थी। उनका उत्थान-पतन इंगलैंड के उत्थान-पतन पर अवलम्बित था। भारत में पहली बार ऐस शासकों का आगमन हुआ जा अपने को दिगो समान थे। भारतवासियो ने पहली बार वास्तविक पराधीनता का अनुभव किया । अग्रजों के प्रति उनका दृष्टिकोण स्वामी के प्रति दास का दष्टिकाण रहा । अग्रज यहाँ व्यापार करने के लिए आम लक्नि गासन करन लगे। दासिक धनन के बाद भी वे दनिया बने रहे । कम्पनी राज्य के समान वित रिया का राय मा व्यापार के लिए पा । पूजावादी माम्राज्यवार को सम्य यवरता धीरे धीरे प्रकट होन लगी । पूजीवादी सभ्यता परम पू पट लटकाय रही परदेशम थावर नगी हो गई। भारत के उद्याग घघे नष्ट हो चुत थे, अब विदेशी पूजी स नए-नए उद्याग स्थापित किये गये। किमानो का लूटन म देगी जमोरया साप विदेगी जमीदार देने लगे। पिसान महाजना क घगुल में फस गये और स्वय भूखे रहकर दूसरे की घोंद भरते रहे। पलोरेस नाइटिंगर ने १८७८ में कहा था, 'दुनिया का सबस करुण दय दखना हाता मारतीय विसाना को देखो।" गया और अमीषा स्वाधान दशों ६ माय युद्ध दिये गये और उनकी रपटो म भारत के जन जन को मार दिया गया। हिमालय के आंगन में रवस, अराल, महगी, येवारी धौर महामारी के प्रन्य नस्य हान लग । भारत भिसारी बन गया और उसका लक्ष्मी सात समुद्र पार दूानदारों ने देश म दिनी बन गई । ५. नहरून लिखा है, मोने कोनो इगर की ओर बहती रही।" उनके समान हो देति से तडपते हुए हृदय की भाषा में भारते दु ने रिया पा अगरेज राज सुख साज स यो अति भारी पंधन विहि जात यह अति स्वारी। भारत को वापिस प्रवस्या पर मुमरमानों की पुट विमय की अपक्षा [हिदी उप यास पृष्टभूमि और परम्परा के अस्त्र अग्रजा की युद्ध विजय का अधिक गभीर और घातक प्रभाव पड़ा। भारतेंदु कार में कहा था । जाता कि मुसलमानी राज्य हैजे का रोग है अग्रेजी राज्य सय का 133 पूर्व आक्रमणकारिया और विजेताओं के पास सहार थ उत्पादन के उनत साधन नहीं थे। यहां बसने वाले विजयी शासक धन का सचय या अप यय करते थे तो वह यही रह जाता था। अत राष्टीय सम्पत्ति एव उद्योग यवसाय वा ह्रास नही होता था। अग्रेजी काल मे आर्थिक विनाश का क्रम जारी रहा और पुनर्निमाण का अवसर नहीं आया। फिर शाषण का यत्र ऐसा था कि पकड मनही आता था। स्वाधीनता और जनता के दावेदारो ने जिस आथिक नीति को अपनाया था उस हमार मूक्ष्मदर्शी साहित्यकार समझते थे । उहान यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय जनता के गोषण में इगलण्ड की साधारण जनता का हाथ नहीं है। अग्रजी राज्य के अन्यायों और अत्याचारो का भडाफाडकर उमक विरुद्ध जनमत तयार करने में उनका प्रयत्न स्तुत्य है। अग्रजो और उनसे पहले आने वाले विदगियो म एक अतर और था । मुसलमानो और हिंदुओ की संस्कृति में समवय हा गया था। बत से हिन्दू मुसलमान बन गए इसलिए हिंदू संस्कृति के प्रति उनक हृदय में सहानुभूति बनी रही । अग्रज ऐसे विदेशी थे जा भारतवासियों म घलमिल नही सके । दोनो के बीच खाई बनती गई और सत्तावन के विवाह के बाद तो इतनी चौडा हो गई कि देश दो जातीय सेमों म बट गया । जब भारतवासियो न देखा कि अग्रजो की भाषा साहित्य धम और सस्कृति उनको इन वस्तुमओ से भिन्न है और उन पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लादी जा रही हैं तब उनके मन मे घार प्रतिक्रिया हुई। भारतीय सभ्यता इतनी प्राचीन समृद्ध और साक्त थी कि अग्रजा ६ पूर्व आने वाली सभी सभ्य असभ्य विटेगी जातिया को उसने आत्मसात कर लिया । अब उसका पतन हो रहा था अत पाश्चात्य सभ्यता की श्रष्ठना स्वीकृत और प्रमाणित हुई। अग्रजा को भापा रहन महन घम विचार और रीतिरिवाज को जिस विभिनता से वण विद्व की उत्पत्ति हुई उसी से स्वदेगानुराग का पोषण हुआ 130 अग्र जो की शासन प्रणाली आर्थिक नीति और सास्कृतिक साम्राज्य बाद न भारतवासियो के हृदय म देशप्रम की चिनगारी सुलगा दी। स्वामी ऐतिहासिक पीठिका] [१२१ दयान द ने पहले पहर पापणा की कि भारत भारतवासियो का है और स्वराज्य का मात्र दिया जो स्वदेशी राज्य होता है वह मर्वोपरि उत्तम होता है । अथवा मतमतातर के आग्रह रहित अपने और पराये का पक्षपात गूय प्रजा पर माता पिता के समान कृपा, याय और दया के साथ विटेगिया का राय भी पूर्ण समदायक नहा है।" भारतेंदु ने अपनी वाणी में अपनी सपूण शक्ति और विवशता भरकर देशमाता को दुदगा पर आंसू बहान के लिए लागा का पहली बार पुकाग। मिश्र-वधु के मत से 'इतना अधिक स्वदेगाभिमान गायद ही किसी म उस समय हो । आधुनिक भारत उक्त दो नेताओं निर्माताओ और प्रतिनिधिया ने नागरण का TR उस ससय फूका जब उस इडियन नेशनल काग्रेस का जा अग्रजी भाषा म जमोदारो और पूजीपतियों की मांग पर करने वाली अग्रेजी गिभित वग की सस्था पी", नाम भी नही था । एक भारतेंदु ने जो किया वह एक सस्था से शायद ही सभव हो। हिदीसाहित्य पर आग्ल प्रभाव दिखान व जो म कुछ रोचक इन बातो को भूल जाते हैं और राष्टायता के बीजारोपण काश्रय अग्रेजी शिक्षा और अग्रेजी शिक्षा पान वाल वग का देत हैं। राष्टीय भावना राजनीतिक माथिक और सामाजिक परिस्पितियों की उपज थी। उसके विकाराम पाश्चात्य विचारो का प्रभाव पहा भी तो वह अत्यत गौण और सीमित है। जब तक किसी यक्ति या राय म बीज रूप में कोई भाव नही रहता तब तक उसके लिए वाह्य प्रभाव पर दायक नहीं होता । राष्टीयता की परम्परा पूर्वकाल म आ रही या ।' पद्यपि उसम पुनरुथान का भाव पा। मुगरवाल की राष्ट्रीयता म धार्मिकता को छाप यी कम्पनी काल वो राष्ट्रीयता में सामती रग था अग्रेजी राज्यपाल की राष्ट्रायता में पासक के प्रति शासित की भावना का उभार या । उसम मीणता और एकागिता नहीं थी इसलिए वह पा चम को उम राष्ट्रीयता मे नितात भिन्न थी जिगरा दूमरा नाम उपनिवेशवाद है। उसम प्राय वे सभी तत्व ये जो गांधी-युग में काग्रेस के मूलभूत सिद्धान बने । वह सांस्कृतिक राष्ट्रीयता पो । उमम अतीत के बालोक में अपनी यतमान हीनता का देसार विश्व मे प्रगतिशील देशा का पक्ति म सम्मिलित होने की अदम्य अभिलाषा पी १२२] [हि दी उप यास पृष्ठभूमि और परम्पग घम जाति सप्रदाय वग के भेदभाव को भूल कर यापक मानवीय सहानुभूति के आधार पर संगठित होने का आदा था और था आलस्य अघविश्वास आइबर धय महनगीलता आदि का ठुकराकर त्याग और बलिदान द्वारा स्वत्व ग्रहण करन का सकल्प । यह समय की गति को पहचान कर देश के समस्त अभावो को मिटाने और सर्वांगीन विकास करने का महाकाव्यात्मक प्रयास था। उसम राजनीतिक आर्थिक प्रश्नों के अतिरिक्त सामाजिक साम्क तिक प्रनो का भी समावेश था । अत उसमे विदाह और प्राति की अपक्षा समझौता और सुधार की ओर अधिक झकाव था। राष्ट्रीय भावना की “यजना उपन्यास में मुख्यत वतमान के प्रति सजगता और अतीत के अनुराग म हुई है । सामाजिक और ऐतिहासिक उपन्यास इस तथ्य का स्पष्ट द्योतन करते हैं। अग्रजी राज्य म के द्रीय शासन रेल डाक तार और सिक्के ने मिल कर भारत को एक राष्ट्र बना दिया । अगोफ और अक्बर जस महान ९ि दू मुस्लिम सम्राटो के शासन काल मे भी दा एक राजनीतिक इकाई नहीं बना था । राजनीतिक एकता अग्रजी शासन की एक अपूर्व देन थी । यातायात क वनानिक साधनों का उपयाग राजनीतिक आर्थिक स्वाय के लिए किया गया था और उनम उनकी पूर्ति भी हुई तथापि वे अग्रेजी राज्य के वरदान सिद्ध हुए। साम्राज्यवादी डलहौसी न रेल तार डाक और सडर की यवस्था करने के समय शायद ही मोचा होगा कि वह समाज सुधारक बेंटिक स बढ कर रचनात्मक भूमिका अदा करने जा रहा है । यातायात के नए साधन नवयुग ने वाहक हुए और रेल तो नवीन भारत का प्रतीक बन गयो । आवा गमन की असुविधा से मनुष्य के साथ उसक विचार भी भौगोलिक सीमा म वध थे । बलगाडी क यग क बाद रेलगाडी का युग अदभुत परिवतन लकर आया। लोग दूर दूर की यात्रा करन लगे । जान पहचान बढी । एक प्रा त दूसरे मात के निकट आया तथा एक दूसरे के साहित्य से परिचित और प्रभावित होने लगा। भौगालिक दूरी के साथ मानसिक दूरी मिटी । मध्ययग की दीवार गिरन लगी। सकीणता का स्थान उदारता न लिया । लागो म समान भाव विचार का सचार हुआ और जातीय एकता का आदा सामन आया । १८८३ म इलवर बिल आदालत के विरुद्ध आदोलन कर भारतीय तिक्षित समुदाय ने इस एक्ता का प्रदशन क्यिा । भारते के कालचक्र के अनुसार मार्यों म ऐक्य का बाज इसी समय वाया गया।

ऐतिहासिक पीटिका {१२३ साहित्य में आधुनिकता 'रोवह सब मिलि आवहु भारत भाइ म सह अस्तित्व वधुत्व और ममवदना का एर नया स्वर था जो भारत के विराट जनसमुदाय की भावात्मक एक्ता का प्रतीक था। वाबू स्यामसुदरदास" ह्रासकारिणी गारी कविता के प्रतिकुल आ दोलन ३ साथ साथ साहित्य में एक नवीन चनना का भारम्भ उस दिन से मानत है जिस दिन स्वयं सरस्वती ने राष्ट्र भाषा का प्रतिनिधि कवि प ट म वठर एक राष्ट्रीय भावना उध्वसित को यो । उनका यह कथन सवथा मत्य है मध्यकालीन भक्तिकाल मूर म जस गासक और पडोसी विदेगिया क अधिकाधिक सपा से उत्पन्न परिस्थिति तथा अपनी पूर सस्कृति के स्मरण द्वारा अपन उद्धार की वचनी दिखाई पड़ती है ठीक उसी प्रकारचीसवी ती व आम म ही हिद साहित्य के आधनिक कार का उदय भा सत्यापन स्वाभाविक कारणो से और अयत म्वाभाविक परिस्थिति म हुआ। पूर्व मध्यकाल म सास्कृतिक चतना साहित्यिर चेतना वनवर भमर हुई आधुनिक काल म राष्ट्राय उतना माहित्यिक चेतना वनवर । पूर्व मध्य पाल म साहित्यिक चतना कविता के माध्यम म और आधुनिक काल म मुस्यत गय माध्यम से प्रस्ट हुई । सामनवाद के साथ साथ माम्राज्यवाद प्रति बढ़ते हुए दिराध भाव न साहित्य जगत म मध्ययुग का अत और नवयुग का बारम्भ किया। इस दष्टि में आधुनिक नि दो गाहिप (जा पर चीन भारत म दिवसित हुआ है) राजभक्ति के प्रति दाभक्ति का विद्रोह है। नई राष्ट्रीय चतना एव पाश्चात्य विचार के गधान मनवजागरण को रहर सरगित हुई। उस स्पा से हि टी मालित्य का मम आकार से धरती की ओर हो गया। मध्यकाल में काव्य की, और कायम भक्ति एवं दान की प्रधानना पी। तुलसी मूर वीर पहले भत्त ५ तव कवि । प्रमाश्यानव काष्य पिता का बाधा पर अलौकिय स्पक कारण सोषित बचाओ और पात्रों को स्थर वास्तविक्ता विलीन हा वाती थी। गारो कवियों का वक्तव्य न वो पुणत ऐहिा था न पूगत आममिद । प्रियमन ने कहा पा fr१६वीं पनागके मध्य से रेपर वतमान कार तक भारतीय साहित्य म जोए उसम और महान है उमासम्म राम और कृष्ण को स्थाओं में है।" गोस्वामीजी की भारणा पनि प्रान जन का गुणगान करने मे शारदा १२४] [हि दी उपयास पृष्ठभूमि और परम्परा का पश्चाताप हाता है। आधनिक युग म कला या साहित्य धार्मिक अभि यक्ति बनकर नहीं रह सका। मत्य का हो स्वग बनाने की कामना तीव्र हो उठी और मानवता का पूजा हाने लगी। इस नये विश्वास को पश्चिम की भौनिकता प्रधान मन्यना से बल मिला । भोगवाद वतमान युग और साहित्य की आत्मा बन गया । उप यास लौकिक रस का साहित्य है । उसके अस्तित्व के लिए एहिक्तापरक भाव अत्यंत आवश्यक था। उसन धम और माक्ष का छोल्कर अथ और काम से नाता जोड लिया। वह नया माध्यम था इसलिए उसम नये प्रसगो का समावेश हा सका जब कविता में भक्ति शृगार की परम्परा जीवित रही । मध्ययुगीन भक्ति विरक्ति के स्थान के मानवीय राग टप का वणन वरना उसका प्रधान लक्ष्य रहा है । विवेच्यकाल म अयतम सासारिक उपन्यासकार किशोरीलाल गोस्वामी हैं जिनकी ष्टि आरमा की अपेक्षा देह पर विरोप है। विश्व की कई भापाआ की भांति हिदी में भी कविता के ह्रास के साय उप यास का विकास हुआ। ह्रासकाल म नूतन विषय और विधा की ओर माक्पण हाता है । उप यास उस बौद्धिक यग की कलात्मक अभियक्ति है जिसका आरम्भ कला काल के मत म हुआ । नवयुग की चेतना नई अग्रजी पिता और पा चात्य सभ्यता स्वरूप शिक्षित समाज मधपानिक, आलोचनात्मक एव उपयागितावाटी दष्टिकोण का उ मेष हुबा जिसके लिए कविता विरुप अनुक्ल नहीं थी । अत गद्य साहित्य के प्रणयन और अध्ययन की ओर प्रवत्ति हुई । मराठी मथिली जसी कुछ आधुनिक भारतीय भापायों की भांति हिंदी म गद्यसाहित्य का अस्तित्व था किन्तु उसमे विविधता का अभाव था । अग्रजी प्रभाव सबसे अधिक गद्य साहित्य पर पड़ा । गद्य के माना रूप निबध नाटक उप यास आदि पल्लवित हुए । कवि का सम्बध अतजगत से होता है उप यासकार का मम्बध वाह्य जगत से । एक मुख्यत उदात्त गाश्वत और दिय जावन सत्य को यक्त करता है दूसरा मुस्यत पायिय सामयिक और मानवीय ययाथ को । उप यासकार कवि ही नहीं किसी भी कलाकार की अपक्षा मानव जीवन के अधिक निकट रहता है। अविश्वास को स्वच्छा से हटाना का यगत विश्वास हो सकता है । जो अविश्वसनीय और अस्वाभाविक है वह उपन्यास के लिए उपयुक्त नहीं होता। यह आधनिक वानिक दृष्टिकोण का परिणाम था कि उप यास म असम्भव के बरले सम्भव का स्थान मिला और वह प्राचीन क्या कहानी स भिन्न एक [१२५ एतिहासिक पीठिका] रोकप्रिय करारूप बना। वज्ञानिक और बुद्धिवादी दष्टिकोण आधुनिकता का मूलाधार है । वना निक दृष्टि का सर्वोत्तम साहित्यिक रूप तिलिस्मी और जासूसी उप यास है । दवकीन दन खत्री ने तिलिस्म को वनानिक स्तर पर लाकर यह तक उपस्थित किया कि दुनिया म भूत प्रेत कोई चीज नहीं, जादू मत्र सब खेल कहानी है।" जादू-टोने के बदले वेहोगी की बुक्नी और लखलखा का प्रयाग पुरानी मूमता के बदले नई वितु यून मूखता का प्रयाग था और यह वनानिक दृष्टि काण का परिचायक या। चद्रकाता की घटनाआ की सभवता असभवता को पर हाने वाला विवाद उसका द्यातक था कि जो मन बहलान के लिए पढ़ते ५ उनक भी वौद्धिक जिज्ञासा या । युद्धिवादी युग के पाठक हर वस्तु का तक की कसौटी पर क्सकर हा ग्रहण करन के लिए तयार थे। लेखका को पाठकों का मनारजन करने के साथ साथ उनम विश्वास उत्पन्न करना था। वे वही कुशलता से क्या का वि यास करत ५ तापि पाठन समझें कि वे जो पढ़ रहे हैं वह सत्य है । कभी-कभी वे भूमिका म या उपयास के बीच में स्वय क्या की प्रमाणिक्ता सिद्ध करन लगत थे । वे कल्पना म अधिक विचार-बुद्धि को महत्त्व देते ५ इसलिए हास्य-व्यग्य से कया को मनोरजक बनाते थे। हास्यरस क बोध के लिए लेखक और पाठक दाना का बौद्धिक होना आवश्यक है । विनान के आविष्काराम अदभुत आपण था । उपयास में उनको चर्चा होती थी। घटनाओं ममाड देन के लिए उनका उपयोग किया जाना पा| यामास्वप्न का नायब अपनी प्रमिका को भी पारदशक पत्र से देखने एगा पा । ऐम उप यास बहुत कम होग जिनम पत्र-व्यवहार न किया गया हो। रेल ये रोमास के घटनास्थल बन गए। यह यातायात र नये माधन से ही सम्भव हा सका । जेन आम्टेन ने अपनी रचनाओं म रेल की चर्चा नहीं की।हिती उपयासकार समकानता मे इतन विमुख नही थे। - मुद्रण-यम माहित्य परिए विज्ञान को बरमूल्य दन मण-यत्र है । उप याम गद-युग की उपर है और गद्य-युग + निमाण म मुद्रण पत्र का यागदान विशेष महत्व का है । मुद्रप-यत्र के अभाव म माहित्य के विकास और स्वम्परा निर्धारण प्रातामों द्वारा होता था। धम प्रचारसरों ने अठारहवीं १२६] [हिदी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा ताब्दी म नागरी के टाइप तयार किए उनसीवी गता दी पूर्वाध मे देश के विभिन स्थानो म मुद्रण यत्र की स्थापना की और धार्मिक रक्षक प्रथ छपवाए । उह धार्मिक प्रचार करना था हिटी का हित साधन नही करना था फिर भी उहोंने जा कुछ किया उससे हिन्दी साहित्य के उन्नयन में परोक्ष रूप स सहायता मिली । नागरी मे मुद्रित पहला ग्रथ मिसकीन का मरसिया (१८०२) माना जाता है । मुद्रण यत्र के प्रचार से साहित्य म नवीनता का सूत्रपात हुआ । वाणी पद्य के वधन में रह नहीं सकी । गद्य की विधाओ का विकास तथा आधुनिक युग का प्रवतन हुआ। विस्सागा तथा क्थावाचको को आवश्यकता और उपयोगिता नहीं रही। साहित्य का ये द्र दरबारों स उठकर जनता के बीच आ गया । पुस्तके छपकर लोगा को घर बठ मिलन लगी। नए पाठक बने और लखकों पाठको म निकट सम्ब घ हुआ । उप यास लोकप्रिय बने उपयासकार रोकाचि के अनुसार लिखने गे और प्राचीन तथा नवीन भारतीय साहित्य स परिचित हए । मद्रण कला सभी कलामा की सरक्षिका है । लिखित उप यास में मंद्रित उपन्यास की प्रभावगीलता अधिक होती है । मनित सामग्री वेदवाक्य के समान सत्य और प्रामाणित मान ली जाती है । मुद्रित उप यास के क्थानक और चरित्र यथाथ और जीवित प्रतीत होते हैं । मुद्रण क्ला उप यास कला से मिलकर वास्तविकता का भ्रम उत्पन करने में पण सफल हुई। उप यास मद्रित गटो से निर्मित ससार बन गया। पाठक उस ससार को असु दर कह सकते थे परतु उसके अस्तित्व म अविश्वास नही कर सकते थे। प्रम न एक ओर उपयास को पाकेट थियटर बनाकर उसकी सम्भा वना बनाई और दूसरी ओर उसे यावसायिक रूप देकर उमके विषय जोर दष्टिकोण की सीमा निर्धारित कर दी। पत्र-पत्रिका पद्रण यत्र स पत्र पत्रिका का और पत्र पत्रिका से गद्य साहित्य का सवधन हुआ। हरिश्चन्द्र मगजीन (१८७३) पहला पत्र था जिसके मुखपृष्ठ पर अकित विविध विषयो मे उपयास भी सम्मिरित था। उपायास विषयक पत्र से उपयास का अभाव पूरा करने लिए बाबू राधाकृष्ण दास ने नाटकोप यास पाक्षिक पुस्तिका निकालने का प्रस्ताव 'श्रीहरिश्च द्र चन्द्रिका (नवम्बर १८७८) म छपवाया जो काय म परिणत नही हुआ सुदर या 1 इस ढग विचित्र मस्ट उपस्थित हो गया। नवान विचारा के पाए म घामिर और ऐतिहासिक पीठिका] [१२७ का पहला पत्र निकाल्ने का श्रेय वावू देवकीनदन खत्री को है। उनकी उपयासलहरी' का प्रकाशन उप यास क इतिहास में एक स्मरणीय घटना है । रहरी' के बाद कई औपयामिक पत्र-पत्रिकाए प्रकाशित हुइ जिनमें गारीलाल गोस्वामी का उप यास (१८९८) गोपालराम गहमरी का जामूस (१९००) जयरामदास गुप्त का उप यास बहार' (१९०७) और राम लाल वर्मा का दारोगा दफ्तर (१९१०) अपेक्षया दोघजीवी और प्रसिद्ध हुए। या उप यास दनिक और पाक्षिक पत्रा में भी प्रकाशित हुए पर मासिक पम्नक के रूप म उनका प्रकाशन विशप महत्त्व रखता है । स्वतत्र पुस्तक को अपक्षा मासिक पुस्तक क रूप म प्रकाशित उप यास खासकर जामूसी उप यास अधिक लोकप्रिय हुए। पत्र-पत्रिकाए लखक और पाठक म सम्पर स्थापित करने का प्रभाव नारी माध्यम घों । उन्होने उप यास पढन का शौक पदा और पूरा किया और इस तरह उसक पाठकों की संख्या बढाइ । उनम उपायासा क अतिरिक्त आराचना और विज्ञापन का प्रकाशन हुआ। उनसे उपयास के उपयुक्त गद्य गली के निर्माण म भी सहायता मिली। कभी-कभी उनक द्वारा उपहार स्वरूप उप यास वाट दिए जाते थे। इस प्रकार पत्र पत्रिकाओं ने उप याम को और उपयास ने पत्र-पत्रिकाया का लोकप्रिय बनाया । प्रारम्भिक पत्रकारिता का इतिहास एक प्रकार स प्रारम्भिक उप यास का इतिहास है । उप यास के रूपविधान पर उसके धारावाहिक प्रकाशन का प्रभाव स्पष्ट है । पर की आवश्यक्ता के अनुसार किसी उपयास का अनावश्यक विस्तार या सोधन दिया जाता था। इससे उसम अवातर प्रसग आ जाते ५ उसका आकार वहा और स्थापत्य शिथिल हाता था। हर विश्त कमत म उत्सुना जाग्रत कर पाठ को प्रतीक्षा करन क लिए छोड़ दिया जाता पा नई किश्त के भारम्भ म पूव क्या का स्मरण दिलान या घटनाओं का कम मिराने के लिए पुनरावृत्ति की जाती थी और उप यास मुखात बनाया जाता था । पत्र-पत्रिकाओं से घटना प्रधान उप यासोका सवधन हुआ गम्भीर और उधम्तरीय रचनाओं को प्रोत्साहन नहीं मिला। मुधार-आदोलन पश्चिम और पूर्व के सपप से भारत सास्कृतिक जीवन में एक १२८] [हि दी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा सामाजिक रूढियो का उ मूलन तथा नवयुग के अनुकूल नय नतिक और सामाजिक मूल्यो को प्रतिष्ठा आवश्यक हो गई । देश म अनक सुधार आदा रनो का जम हुआ । ब्राह्म समाज (१८२८) के महान सस्थापक राजा राममाहन राय न हिदू धम क घरे म रह कर समाज सुधार के लिए प्रयास किया पर उनके अनुयायी ईसाई धम को ओर फिसल गये । ब्राह्म समाज का प्रभाव बगाल क अल्पसख्यक नवशिक्षित वग तक सीमित रहा। ईसाई मत नव मिक्षित समुदाय को परोक्षत और दलित वग का प्रत्यक्षत प्रभावित कर रहा था । उनीसवी सदी के श्रष्ठतम महापुरुप स्वामी दयान द न एक साथ ही ईसाइया मसलमानो और सनातनियो क धार्मिक पाखण्ट पर आश्मण कर दिया और वदिक धम का जयघोप क्यिा । स्वामीजी कराचाय के बाद दूसर दिग्गज धम प्रचारक होते हुए भी मूलत मानवतावादी थे और अग्रजी शिक्षा के बिना भी प्रखर बुद्धिवादी। मनुष्यो नति के लिए सत्य पर प्रका डालना वे उचित समयत थे । दे पीडित मानवता के पुजारी थे । बाल विवाह जातिप्रथा आदि का विराध और विधवा विवाह स्त्री शिक्षा विदश यात्रा आदि का समथन उनके धम का अगथा। उहान १८७५ मे आय समाज की स्थापना की और आयभापा हिदी का अपने विचारो क प्रचार का साधन बनाकर गौरवावित किया। उनकी दि य वाणी सम्पूण उत्तर भारत म गजकर जन मन में बस गई । हमारे दो यास्वी साहित्यकार श्रद्धाराम फिल्ोरी और भारते दु हरिश्चन्द्र स्वय धम और समाज के बहुत बड सपारक थे। फि-लोरीजी ने अनेक धमसभाओ और धर्मोपदेशको का निमाण क्यिा वहुतो को ईसाई होने से बचाया और अधविश्वासियों का विरोध किया। आयसमाज की स्थापना में दो वर्ष पूर्व १८७३ म भारत दु ने तदीय समाज नाम की वष्णव धम सस्था की स्थापना की थी। उसके माध्यम से उन्होंने स्वदशो वस्तु मद्य निषध गो रक्षा-इन तीन प्रमुख सामाजिक राष्टीय आदोलना का सूत्रपात किया। समाज के सदस्य दशमाय सज्जन थे। परान उप यासकार स्वतत्र निर्भीक और उतार विचार व मनुष्य थ। यह कहना कठिन है कि कहाँ तक उनके विचार मौलिक हैं और कहीं तक सुधार आदोलना से प्रभावित हैं । वसे ही यह निणय करना कठिन है कि उनम कौन उच्चकोटि का विचारक है कौन साधारण काटि का । उह किसी समाज व कटटर धार्मिक सिद्धात मा य नहीं हुए कितु उसक एतिहासिक पीठिका] - सामाजिक, राष्ट्रीय और मानवतावादी विचारा से व अवश्य अनुप्राणित हुए । स्थामा दयान द को मार्टिन ल्यर और भगवान बुद्ध के तुल्प मानते हुए राधाचरण गोस्वामी ने भारतेंदु ( जून १८८६) म आय समाज' शोषक जो रख लिखा या उससे सूचित होता है कि तत्कालीन लेखक । साथ ही आय समाज के आलोचक और प्रासक थे 'स्वामा दयान द सरस्वती कृत वेद भाष्य और मूर्तिपूजन के विषय म हम लागों का मत कसा ही क्यों न हो परतु स्वामी जी म श्रद्धा और आपसमाज म हमारी सहानुभूति है । स्वामीजी के दशोपकारी हान म जो कोई सदेह बरे वह मरकी है और आपसमाज में देशोतति करने में किसी को भ्रम हा तो वह साक्षात पशु है।" स्वामीजी अहिद का हिदू बनाते थे उपन्यास लखक विगड को सुधारत थे। उनके सुधारवादी जाग राष्ट्रीय भावना और नतिक आदा पर माम समाज को छाप स्पष्ट है। नई राष्ट्रीयता के उत्थान काल तर आय समाज हि दी-उप यास पर पापक प्रभाव डालता रहा। उस सामाजिक पा से तो उसका अविच्छेद सम्बध रहा है। उसन विविध विषय मानाय दष्टि बौद्धिर यथाय और सजग प्रेरणा प्रदान की है। उपासकारो का उपदारमा प्रवत्ति और भोजन्याय स गभित गली पर उसका पराम प्रभाव दप्टिगोचर होता है। प्रेमवद को प्रमा आय समाज के प्रभाव का उत्कृष्ट निदान है। आचाय न ददुगरे वाजपेयी के मन मे स्वामी दयान द * विचारों योर मादौ सव सोपी तरह प्रभावित थे। नारी-स्वाधीनता सामाजिक सुधार का ए शनिवारी पहल नारी-स्वाधीनता का आरन पा जो उपयास के लिए विप प्ररणादायर सिद्ध आचीन भारतीय समाज में नारीमा स्थान बर वा था। मुमर माना के आगमन 4 परात वह पर दी रानी बना दी गई और बाल विवाह तथा सना प्रथा की वेदी पर उसका बलिदान दिया गया । उन्नामवीं सो म राजा राममोहन राय ईपरबद और वार मरट न स्त्रीजानि को होना मुधारन पर बल दिया। भारत न वाटाबोधिनी (१८७४) पत्रिका निराल पर उसके मुषाय पर स्त्री पुरुष को समानता का मिशा निरूपित frया। उनकी दृष्टि में नारी पुरुष की दासी नहीं, स्वामिनी पी। पारण मट पवन रे ग से चोवानि का उद्धारमा तरमी यो पहली सीडी 51 १३०] [हिगे उप यास पृठभूमि और परम्परा - । मानते थे 153 नारी सम्ब घी यह ष्टि पश्चिम की देन थी पर उसम भारतीय भावना भरी हुई थी। चारण कविया ने नारी को विजय का उपहार और शृगारी पवियो न विलास की सामग्री बनाकर उसके प्रति सामती दप्टिकोण व्यक्त किया था । मध्यवर्गीय लेखका ने उस सामती व धन और वजना स मुक्त कर पुरुष के समकक्ष ही नही बल्कि उससे श्रष्ठ माना कि तु उसक अधिकारो के साथ साथ कर्तयो पर ध्यान रखा । यदि नारी को हय दष्टि से देखा जाता ता उपयास म उस यक्तित्व की प्रतिष्ठा नही होती । नारी की महिमा के क साथ ही नर नारी के स्वाभाविक आक्पण की महिमा स्वीकृत हुई। उप यास मानव चरित्र का अध्ययन है और मानव चरित्र का प्ररक प्रम है इसलिए उपयास प्रेम का कथानक रहा है। उप यासकार नारी की स्वतनता और समानता के हिमायती थे पर तु वह समाज म न तो स्वतत्र थी और न आर्थिक एव बौद्धिक दप्टिया स पुस्प के समान ही । फलत उप यास मे स्वछद प्रम की अपेक्षा ववाहिक प्रम का प्रधानता मिली । विवाह के पूर्व प्रणय क्रीडा होती थी कि तु प्रमिका को पलो बनाया जाता था पत्नी को प्रमिका नही । वयक्तिक अनुभूति स उत्पन अबाध प्रम को विशेष प्रोत्साहन नहीं दिया जाता था बल्कि उसके लिए रोग या मृत्यु का दण्ड निश्चित रहता था। जव पुरुष-नारी क उ मुक्त मिलन का समर्थन करन वाली पीढी बनी और स्वच्छा स विवाह करन की प्रथा चली तब प्रम और प्रमविवाह का वणन मुख्य हो गया । सास्कृतिक पुनरुत्थान देगप्रेम की मस्ती और समाजसुधार की उमग में साहित्यकारा ने अतीत की उपेक्षा नहीं बल्कि उसका आक्पण उसक देशप्रम का एक अग था । अठारहवी उनीसवी सदिया म पाश्चात्य पण्टिना ने गासन सम्बधी आवश्यकता और जितासा की भावना स परित हाकर भारत की रीति नीति विधि-व्यवहार धम-दान इतिहास कला और भाषा साहित्य वा अनुगोलन क्यिा । मक्समूलर तो इस देश का धरती का स्वग मानने लगा । इधर स्वामी दयानद ने प्राचीन भारतीय सभ्यता की धष्ठना प्रमाणित और घोपित की तथा भारत दु न पुराण इतिहास और पुरातत्त्व का गम्भीर विवेचन क्यिा । अतीत के आविष्कार स भारतवामियों का अपमी अमूल्य सास्कृतिक घरोहर का मान और गौरव हुआ । इसस पुनरुत्थान की प्रवत्ति जाग उठी ऐतिहासिक पोठिवा] [१३१ और ऐतिहासिक, पौराणिक रोमानी तथा तिलिस्मी उप याम लिखने पटने की रुचि उत्पन्न हुई । सास्कृतिक पुनस्यान म सुदूर अतीत के प्रति मोह और निक्ट अतीत के प्रति विरोध भाव था। दाना की पजना पौराणिक उपासो म और उन ऐतिहासिक उप पासो म हुई जिनवा सम्बध मगर बाल स है। एक आर टाड की राजस्थान की गाथा से बलवती प्रेरणा ऐकर ऐतिहासिक उपयास के नाम पर रामानी उपयास लिस गए और उनम रोमानी राष्ट्रीयता का प्रतिष्ठापन दिया गया दूसरी भार नूतन अनु स पान आरोक म ऐस ऐतिहासिक उपन्यास तयार किए गये जो उपन्यास न होकर उसके उपादान हैं। पुरातत्व का प्रेम यहां तक बढा पि निलिस्मी उपन्यासों में भी खण्हरो और पुरान स्थानो व मूल नाम का उल्लेख किया गया और आश्चय पतात में एक पुरातत्ववेत्ता अपने को कद्राय पाय बनाया गया । अनिय और मनावयक प्राचीनता प्रमस अनात की अधभक्ति विदभूत हुई। कुछ लोग वतमान दुरवस्था को भूलकर बीत गौरव का गीत गाने लगे और प्रत्यक वस्तु को भारतीय सिद्ध करन का पत्ल करन लगे । देवकीनन स्त्री ने कालापका का मुह वार करने के लिए तिरिस्म और एपारी का भारतीय वस्तु प्रमापित करने के प्रयास में कहा था कि माया भी नाम ऐपारी का है ।। इस प्रकार पाश्चात्य प्रभाव के विभिन्न योता न हि ती माहित्य के परम्परागत रूपों का मस्कार एवं नवोन स्पो र निमाण दिया जिनमें उपास युग सत्य को स्पतिया प्रतिविम्बित करने म मपर हुआ १३२] [हि दी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा टिप्पणिया 1- And who in time koows whither wo may vent The treasure of our tongue? To what strange shore This gain of our best glory shall be sent २- सरस्वती जून १९२० पृ० ३४२ There is nothing before the eyes of the natives but an endless, hopeless prospect of new fights of birds of prey and passages with appetites contioually renewing for a good that is continually wasting -बर के प्रसिद्ध भापण का जश ४- डिग्यी ने अपनी पुस्तक प्रौसपरस ब्रिटिश इण्डिया म यह मत व्यक्त किया है। 5- Great fortunes sprang up like musbroom 10 a day -माक्स देपिटल ६- रजनी पाम दत्त इण्डिया टूड , पृ० १०६ 7 All the civil wars invasions revolutions, conquests famı nes strangely complex rapid and destructive as the succes sive action in Hindostan may appear did not go deeper than its surface England has broken down entire framwork of Indian society -आन ब्रिटेन पृ० ३७९ ८- मोरलह एगाट हिस्ट्री ऑफ इण्डिया, पृ०२८८ ९- एच० एच० डाडवल इण्डिया पाट टू (१९३६) पृ० १८९ १०-परीक्षागुरु के पात्रों म लाला व्रजकिशोर वकील है मास्टर गिभूदयाल शिक्षक है अहमद हुसेन हकीम है बाबू वजनाथ रेलवे का नौकर है हरिक्शिार साधारण यापारी है हरकिशन दलाल है मिस्टर प्राइट अग्रज सौगर है और फिर पण्डित पत्रकार जज गिक्षित बेकार आदि हैं । मध्यवग के इन प्रतिनिधियों का केद्र सेठ लाला मदनमोहन है । 11- They formed a class not a caste -एच० एच० डाडवेल वही .

[१३३ ऐतिहासिक पीठिका] - १२-एच० एच० डाडवेल वही १३-देखिए 'लखनऊ १४-समस्यापूर्ति-सम्बधी मासिक 'साहित्य सुधानिधि (१८९३-९४) म ही देवकीन दन खत्री की 'कुसुमकुमारी प्रकाशित हुई थी। १५-हिदी भाषा म उप यास' सप्तम हि० सा० स० लेखमाला, १९१७ पृ० ११९ १६- उप यास हिदी प्रदीप' (जनवरी १८५२) पृ० १७ १७- गद्यकाव्य मीमासा' ना०प्र० पत्रिका (१८९७) १८-चद्रकाता दूसरा हिस्सा छ वीसवा बयान १९-'साहित्य समालाचक, १९२५ भाग १, अक १ पृ० १९ २०-हजारीप्रसाद द्विवेदी हिदी साहित्य , पृ० ३३९ २१-पृ०४९ २२- यहाँ से हिंदू रईस पनिक लोग असभ्य हैं और पुरानी बातें उनके सिर म मरी हैं । मुसस जो मिला उसने मेरी आमदनी गांव पहिले पूछा और नाम पीछे। -मारते दु रखनऊ २३-भारते दुको रचनाओं में प्रयुक्त । २४- हिदी प्रतीप जुलाई १८५८ २५- ब्राह्मणों ही के करम कलम था मनमाना जो माया घिस दिया राजामा पर ऐसा बल रम्पते थे कि इनके मोम की नाक थे या काष्ठ पुत्तलिका जिसकी डोर उनके हाथ म थी- श्यामास्वप्न, पृ०९ हिदुओं के परम पूय विश्वासपात्र ब्राह्मणा ने स्वाय परायण होकर चौपट कर दिया। -अम्बिकादत्त व्यास 'स्वगसभा भारत का दुरवस्थानों के कारण ब्राह्मण और मुसरमान लाग हैं -नि सहाय हिदू पृ० १८ योतिषी और पुजारियों के सम्बधम परीक्षागुरु' और हनुमन्न सिंह को चपला द्रष्टव्य है। २६-बाय और ला दया माय निवघ पृ० ८६-८७ २७- माज तर हिगे के पहत उपायास हुए हैं जिनम कई तरह की बात - १३४] [हिदो उप यास पष्ठभूमि और परम्परा हुआ करते थे Tior यो राजनीति भी लिखी गई हैं, राज दर के तरीके वो सामान भी जाहिर किये गये हैं मगर राजदरों मे ऐयार (चालाक) भी नौकर इन ऐयारो का बयान हिदी किताबो म अभी तक मेर नजरा से नहीं गुजरा अगर हि दी पढने वाले भी इस मजे को देख लें तो कई बातो का फायदा हो - चन्द्रका ना भूमिका 28- The bourgeoisie has put an end to all feudal patriarc hal idyllic relatiops It has pitilessly torn 3sunder the motely feudal ties that bound man to his natural supe and bos left no other bond between man and man than naked self interest than callous cash payments It has drowned the m st heavenly ecstastes of religious ferv our of chivalrous enthusiasm of philistine sentimentalism in the icy water of egotistical calculation The bomgeoise has torn away from the family its sentimental veil and has rcduced the family relation to a money relation -लिटरेचर ऐण्ड आट पृ० ३४ 29- The Novel deals with the individual it is the epic cf the struggle of the individual against society against nature it could develop in a society where the balance b tween man and society was lost where man was at war with his fellows or nature Such a society is capitalist society -द नोवेल ऐण्ड द पिपुल पृ० ८२ 30- The profound hyp crisy and inherent barbarism of bour geois civilization lies unvelied before our eyes turning from its home where it assumes respectable forms to the colonies where it goes naked -मावस आन ब्रिटेन पृ० ३९१ 31- The saddest sight to be seen in the East-nay probably in the world is the peasant of our Eastern Empire -जवाहरलाल नेहरू रिम्पसज ऑफ वल्ड हिस्टी पृ० ४२८ म उद्ध त 32- River of gold flowed ccasele sly to England -वही, पृ० ४०० एतिहासिक पीठिका] ३३-भारत दु वादशाह दपण की भूमिका ३४- तमूर, नादिर चगज महमूद गजनवी आदि हमला करने वालो ने समय समय देश पर आक्रमण कर इस कदर नहीं लूटा था जसा विलायत की बनी चीजा से हमारा धन लूटा जाता है । ये नादिर आदि लुटेरे आए एक बार लूट पाट चले गए दो चार वप उनके लूट का असर रहा याड ही दिन बाद देश फिर अपनी पहिली की सी सम्पन दशा में आ गया।' -~वाल कृष्ण भटट हिदी प्रदीप' ५-भारते दु ने एक पहली को पहेलो स ही समयाया था भीतर भीतर सब रस चूसे बाहर स तन मन धन मूम। जाहिर वातन म अति तेज क्या सखि साजन? नहि अग्रज । इसी प्रकार बालकृष्ण भटट ने (हि दो प्रदाप जून १८८६) म सक्त पिया 'जहाँ तक चाहे पर बढ़ात नाय काई हाथ पकडन वाला नही है। ३६- भूखा के हाथ का रोटी छान दुखिया + तन के वस्त्र उतार, लोगा के प्राण का रुधिर चूस सरकार रुपया उगाहगा और उस रुपय स इगड को प्रवल जठरागिन को आहुति देगी। उस रुपये से अग्रेज सिविलियना और सिपाहियों का शगव पिलायो जायगी। उसी रपये स विलायत क स्वाय परायण लाभी कारीगरा का और सोनगरा का राजगार बढावगा और साथ ही हम लागो को बडे कामल मीठ और कृत्रिम उदार वचना म पुसावगो कि तुम हमको प्राणा से अधिक प्यारे हा । तुम्हारे उपकार के लिए तुम्हार ही सुख रिए हम अपन सुखमय शीतल देश का छोडवर य.! को भयानक लू सतत हैं । तुम्हार सुख के चिन्तन म हम रात रात नौद नही आती। बालकृष्ण भट हिदी प्रदीप ३७- हजारों साहब लोग हिस्तान म एम हैं कि उहें वीसा वप यहाँ रहत बीत गया पर य का पानी नहीं अब तक पिया चाह जा सच हा बोतराम भर भर दिलायन का पानी माता है वही य पोत हैं । इसरा नाम बमभूमि वात्सल्य है । नटिवॉ पवाद वी चीजाको पुरासरी अपने काम म साना इसस घडार उनके वास्ते और क्या वाग्मती हो सकता है। उनरेतीपत्रिक अर्यान् नरय गीत याच [हिदी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा - को लिया जाय तो उस पर स्याल कर जो कुढता है । इतनी अपूर्णता पर भी ये बुद्धिमान और सभ्यता को नाक है । सब तरह के गुणो म पूणता होने पर भी हम गवार असभ्य और भूख बने हैं समय पडे की बात है। भटट निव धमाला प्रथम भाग पृ० ५२ 38- It was Daynand Saraswati who first proclaimed India for the Indians -Annie Besant Renascept India ३९- सत्याथ प्रकाश (सवत २०१६ सस्करण) अष्टम समल्लास पृ० २२७ ४०-दे० 'हिदी नवरत्न 41- It represented the richer bourgeoisie even the poorer middle classes were not in it XX It was the organ of the English educated classes chiefly and it carried on its acti vities in our step mother tong je-the English language Its demands were demands of the land lords and Indian capi talists and educated unemployed seeking for jobs Little attention was paid to the grinding poverty of the masses or their needs -प० जवाहरलाल नेहरू ग्लिम्पसज आफ वल्ड हिस्ट्री पृ० ४९३ ४२-अठारहवी शतानी में भी हैदरअली टीपू सुलान मीरकासिम महादजी सिंधिया नाना फडनवीस जसे कटटर अग्रज विरोधी और जमजात देशभक्त थे। भारत पर विजय प्राप्त करने म अग्रजों को सौ वप लग गये और सौ स भी अधिक युद्ध करने पड । भारतीय प्रतिरोध का एक रूप लूट खसाट और चोरी डक्ती था। जस जम कम्पनी का राज्य बढ़ता गया वसे वसे अपराध भी बढते गये। सन्यासियो पिडा रियो और ठगों के उपद्रव अकारण नहीं थे। देश के विभिन्न भागो मे अनेक राजनीतिक और धार्मिक या दोउन होते रहे । १८५७ की नि कोई आकस्मिक घटना नही थी। उसके पीछे कम्पनी के सौ वर्षों का शासन-जान ब्राइट के शब्गे में सौ वर्षों का अपराध (हण्ड्रड इयस आफ प्राइम) या और था उस शासन के प्रति यापक असतोप । ४३-एक हिंदी प्रमो अग्रज कलकर की अध्यक्षता मे मारते दु द्वारा १८७७ ऐतिहासिक पीठिका] म बलिया म "भारतवप की उन्नति कसे हो सकती है गीपम याख्यान भारतीय स्वाधीनता का प्रथम घोषणा पत्र कहा जा सकता है 'यह समय एमा है कि उन्नति को मानो घुडदौड हो रही है। अमरिकन, अग्रेज फरासीम आदि तुरकी ताजी सब सरपट दौड जाते उस समय हिदू काठियावादी खाली सह बड़े टाप से मिट्टी खोरत हैं। इनको, मोरो को जाने दाजिये जापाना टटटुओ को हॉफत हर दौडते देखकर भी लाज नहीं आती । मनुष्य दिन दिन यहाँ वढत जाते हैं और रपया दिन दिन वमती होता जाता है। धम की आड म काई देश को चाल की आड में काई सुख की आड म कि हैं। उन चोरो को यहाँ वही से परड-पकड कर लाओ । उनको बाप बोध कर वद करो। इस समय जो जो बातें तुम्हारे उन्नति पय म काटा हो उनकी जड खादकर फेंक दा । कुछ मत डरो। अब तक सोलो सो मनुष्य बदनाम न होंग जात स बाहर निकाले जायेंगे परिद न हा जायेंगे कद न होंगे वरच जान म न मारे जायेंगे तय तक कोई ६ भी न सुधरेगा। वगाली, मरठठा पजावी, मरासी वदित जन, बाहा, मुसलमान सब एक का हाथ एक पडा । परदेशी वस्तु और परदेशी भाषा का भरासा मत रखो । अपन देश म अपनी भाषा मउमति करो। ४४-हिन्दी साहित्य, पृ. २७८ 45- From the mddle of the sixteenth century to the present day all that was great and good in industanı literature was bouud by a chain of custom or of inpulse or of both to the eser recorting themes of Rama and Krishna Tbc Mod rn Vernacular Literature of Hindustan Chapter III 46- Willing suspension of disbelief for the moment which coostitutes poetic faith कारिज वापाप्रापिया लिटररिया अध्याय १२ (२) ru-मान्ता' दूसरा हिस्सा, तेरहवां बयान ४-ऐस ने भूत जादू आदि के विश्वास का आमि-भूपता ( Privative nonsens ) मानर लिया है १३८] [हिदी उपयास पष्ठभूमि और परम्परा The history of science is the history of the gradual clearing away of this nonsense or of its replacement by fresh but already less absurd poosense -रिटरेचर ऐंड आट पृ०६ ४९-नाटकाप यास पाक्षिक पुस्तिका हि दी भापा म नाटक और उप यास का सम्पूर्ण रूप से अभाव है विगेप करके अग्रेजी और बगभापा के अनसार उत्तम नाटक आज तक वहुत ही कम प्रकाशित हुए हैं और उपयासों के तो अभी तादा स्वान से भा हमारे देश वाधवगण वचित हैं इस हेत ऐसा विचार किया है कि एक पाक्षिक पस्तिका २० पृष्ठ को हिदी भाषा को पूर्वोक्त नाम की प्रचलित हो और उसमें केवल मनोहर उपयास और नाटक रहे अनक कृतविद्यो न बगला और अग्रजी स बच्छे अच्छे नाटको और उप यासो (नावेल्स) का अनवाद करना भी स्वीकार किया है इसका मूल्य ५) साल होगा और १०० ग्राहक नियत विना प्रकाश न होगी। -राधाकृष्ण दास बाबू गोपालच द की कोठी चौखम्मा ५०- उपयास लहरी का प्रकाशन मई १८९४ मे हुआ। उसका विमापन चद्रकाता (१८९५ वि० स०) म इस प्रकार दिया गया है- भारतवप म ऐसा कोइ भी हिदी का पत्र नहीं है जिसम केवल नवीन उपायास ही लिखे जाते हा भविष्य म चाहे एसा कोई पत्र निकले मगर उपन्यास लहरी इस ढग का पहिला पत्र गिना जायेगा। ५१-'नया साहित्य मये प्रश्न , पृ० २५६ ५२--जो नारी सोई परुप या म कछु न विभक्ति । नारी मर मरघग को साचेहि स्वामिनी होय ।। ५३-हि दो प्रतीप जुलाई १८५१ ५४-दसिय नीलदेवी (१८८१) को भूमिका ५५-इस अध्याय के अवलोक्न स आलाचका की निम्न धारणा गलत सिद्ध होती है।

[१३९
ऐतिहासिक पीठिका]
'देश के सामाजिक और राजनतिक जीवन म जो परिवतन हो
रहे थे उनका स्पष्ट चित्र उन कृतियो (आलोच्य उप यास) म नहीं है।
-पटमलाल पुन्नालाल बस्ती आधुनिक क्थासाहित्य पृ० ४७
'इस युग क लेखक को जीवन स कोई घनिष्ठ सम्बध नहीं था।
व रहस्य और जादू प्रेम और रोमास की दुनियाँ बनाते थे ।
-डा० इद्रनाथ मदान प्रमच द एक विवचन पृ० १५४

४ पूर्व इतिहास हिदी उपन्यास के इतिहास का वास्तविक आरम्भ १८८१ के उत्तराध से होता है जब लाला श्रीनिवासदास का परीक्षागुरु प्रकाशित हुआ और राधाकृष्णदास का नि सहाय हि दू लिखा गया ।' इनसे पूर्व प्रकाशित कोई ऐसी मौलिक रचना नही मिलती है जो पूरी हो और आधुनिक उपयास की सभी आवश्यकताओ की पूर्ति करती हो । फिर भी अनुवाद अनुकरण और रूपातर के रूप में कई ऐसी रचनाए निकली जो उपयास है अथवा उसके अत्यत निक्ट हैं । इनके अतिरिक्त क्छ मौलिक अधूरे उप यास और उप यास के ढग की वढी वहानियो का प्रकाशन हुआ । कछ मौलिक अप प्रणीत होकर वर्षों तक अप्रकाशित रहे जो उप यास-सम्बधी तत्कालीन और वतमान धारणा के अनुकूल हैं । अधिकारी रचनाओ को इतिहास कहानी कथा वत्तात आदि की सजा दी गई है शायद इसलिए उनक वास्तविक रूप को पहचानने म भूल की गई है या उन पर ध्यान नहीं दिया गया है । उनमें सण्डफाड और भरटन की कहानी (१९५५) को कालम का दष्टि से प्रथम स्थान प्राप्त है । सण्डफोड और मरटन की कहानी और परीक्षागुरु' के बीच का काल हिदी उप यास का पूर्व इतिहास है और उस काल के कथा कार हिंदी-उप यासकारो के अग्रणी हैं। उपदेशप्रद अग्रेजी उपन्यास यह एक मनोरजक बात है कि पूर्व इतिहास का आरम्भ अनुवाद स नही बलि अनुवाद के अनुवाद से होता है । अठारहवी शतादी मे अग्रज - पूर्व इतिहाम] [१४१ उपन्यासकार थामस डे ने 'सण्डफोड ण्ड मरटन' नाम शिक्षाप्रद उपयास लिखा था। पश्चिमात्तर प्रदेश के विद्यालय निरीक्षक १० दगीधर ने उसका अनुवाद उदू मे संण्डफोड और मरटन की कहानी (१९५५) के नाम से किया। राजा शिवप्रसाद सितारेहिडन पहल उद् और फिर हिंदी अनुवाद दिया था। सम्मद है १० वशीघर का अनुवाद सितारेहिद के ही उदू अनुवाद पर आधारित हो। सितारेनिद का हि दी अनुवाद इसी नाम से १८७७ म मडिक्ल हाल प्रेस, बनारस से निकला । उपयास मे र गरीव और अमीर के लड़के को चारिमिक विभिन्नता दिसावर क्षिा दी गई है। मरफार का रडका हारी परिश्रमी निष्ट और उपकारी है । इसके विपरीत मरटन का लडका तामी लाड-प्यार में विगटकर बारलो पादरीको संगति म मुधरता है । मूलपा के साथ छोटी छोटी नीतिकथा सम्बद्ध हैं। अग्रजी में दूसरे लोकप्रिय उपयास-रेखक डिफी वा विश्व प्रसिद्ध भ्रमण-उप माम गोस्य पाटणा के मुख्य हिंदी पण्डित बद्रीलाल द्वारा बगला स अनूदित होकर रादि सन सो का इतिहास नाम मे १८६० में प्रकाशित हुआ। अनुवाद केवल प्रथम भाग का और स्वतन्त्रता के साथ किया गया है लकिन टाइप मोटा और आकार वहा है। दोनों अनूदित उपयासा की भाषा मुखोप है। इनसे पाठय पुस्तक को आवश्यक्ता पूरी हुई । ये हिदी म उपन्यास का अभाव पूरा परन नही आए थे। इस दष्टि से डा० जानसन के दानिय उप पाट रासलास के दो अनुवाद हुए जो सारसुधानिधि मई १८७९) और हरि चन्द्र पत्रिका योर मोहन पदका (एप्रिल १८८०) म निकले। पहा अनुवाद सम्मवत ५० वेगवराम भटट का है और दूसरा बाबू दीपनारायण सिंह वर्मा का, जा शायद पुस्तकावार प्राति नहीं हुआ। उपयास हम नील नदी के किनारे अवसोनिया में ले जाता है । उसरा नायक एर राजमार है जो इस मसार म दुस ही दुस देखता है और सुप की पोर में अपनी बहन के साय मरकता है । कहाना रामानी होते हुए भी दानिश पवारण नीरस है। मुगी शिवनारायण द्वारा माजी स अनूदिन विद्याक्ति रस्ति (१९६१) अध्यायों में विभाजित ९२ पृष्ठा को रोचर परस्या है। यह विसी उपायास सअनुवाद हो या न हो, रूप रण म उसके समान प्राय है । इसमें अनित्य नगर रे पनाकापी प्रमिला और युद्धिवान नाम चार भाइयों की कहानी १४२] [हिदी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा सुनाई गई है । अत म रूपा की याख्या की गई है जसे अनित्यनगर क्या है यह ससार है । वातावरण और पात्र भारतीय हैं। शली सरल और वण नात्मक है । पात्र प्रतीकात्मक होते हुए भी यक्तित्व सम्पन्न है । धार्मिक उपयास उप यास के पूर्व और उत्यकाल में ईसाई मत के प्रचार के लिए छोटी बडी कथाए लिखी गई । इनक लेखक साहित्यिक रुचि क नहीं थे अत इनमे साहित्यिक गुण का अभाव था। कहानी उद्देश्य के सामने दब जाती थी परिस्थितियो की योजना धार्मिक सिद्धान के प्रतिपादन के लिए की जाती थी और पान वाद विवाद करने के लिए बनाए जात थे पर कहानी कहने का ढग सीधा सादा हाता था प्रमग घरेल और घटनाहीन हाते थे और पात्र बहुधा भारत के निम्नवग स लिए जाते थे। धार्मिक विषय का लौकिक और साहित्यिक स्तर पर लाकर हृदयग्राह्य बनाने का यह सूक्ष्म प्रयास था ! मसीही पादरियो ने भारतीय जनता का अच्छी तरह समझने और उसकी रुचि के अनुकूल सामग्री दन म बडी सावधानी से काम लिया। फलमणि और करुणा का वत्तात (१८६५) विश्वासविजय (१८८२) 'जयसिंह की कथा (१८८४) जसी लम्बी कथाओ का धार्मिक उपन्यास की कोटि म रखा जा सकता है। क्सिी अनात रखा द्वारा उदू से अनूदित 'फूलमणि और करुणा का वत्तात बगला का पहला उप यास माना जाता है। उसकी लेखिका हन्ना को राइन मूले स नाम की एक अग्रज महिला थी और उसका प्रकाशन १८५२ मे हुआ था। उसकी कहानी आत्मचरित गली मे कही गई है और चरित्राक्न ऐसा किया गया है मानो क्सिी कलाकार ने पूची के हलके स्पश से मोहक चित्र उतार दिया हो । एक मजिस्ट ट की पत्नी साधारण लागो के जीवन की साधारण बातो का वणन करती है । फूल मणि का पति एक भला चपरासी है करुणा का पति शराबी और दुराचारी । दानो स्त्रियां अपन अपने पति के अनुरूप ही हैं । एक गिष्ट और सुशील है दूसरी पति को गाली देने वाली क्ला। पति को सुधारन के लिए करुणा को ईसाई बनने का उपदेश दिया गया है । भापा विशुद्ध खडीबोली होकर भी ब्रजभाषा और बगला से अछूती नही है । अग्रजी स अनुवादित १६२ पृष्ठों का विश्वासविजय' अवल इसलिये उल्लेखनीय है कि इसके दो स्त्री पात्र सौगामिनी और कामिनी विशारीराल पूर्व इतिहास] [१४३ गोस्वामी की चपला' म भी है। मनोहर कथाए उपदेशामक क्यासाहित्य के समानातर ही मनोहर स्या का विकास हुआ। इनका उद्देश्य नीति और घम को शिक्षा देना नहीं बल्कि विशुद्ध मनोरजन करना था । इन्होंने उन पाठको की भाग पूरी की औरय ढाइ जो शिक्षित हार बडी-बड़ी क्पामा पुस्त। पान के आदी हो रहे थे। इनम प्रम और साहसिकता को प्रधानता रहती पी कथानर जटिल और सुखात होता था दौर दैनिक जीवन को पटनाओ के बदले प्रमी प्रेमिकाओं + मुख-दुग्व वणित थे। पात्र उच्च वाक होते थे। उनम वीर राजकुमार और मुटर राजकुमारी आरपण-वेद्र थे। उद् क्पाकार रज्जब अला सहर न उन्नीसवीं शता दी व प्रारम्भ मपिमान इ अजाएब का रचना की थी। उनके तीन मनुवाद हुए शभूराल का फसाने मजायव यानी किस्सा जान मालम का (१९६६), प्राणधिन माफिसाना अजायब अर्थात माहनी चरित्र, (१८६९) तथा श्री भटट का विस्मा फिमान अजायव अर्थात् आश्चय इतिहास । प्रथम अनुवाद की माया पारसा मिश्रित दूसरे को बाधगम्य तथा तीसरे की नागरी लिपि में फारसी है। प्राणपिन वा अनुवाद सर्वोत्तम है । कहानी और उसकी गरी पुरानी रीति की है लेरिन उसम नवीनता को परक है। विनोदार व्यास मन से यह उद्र का प्रथम मोनिक उप पास है। सजीव और माहक वन उसको मवसे वही विशेषता है । समनऊ र वातावरण का चित्र मचा उतरा है। जादू निरस्म और प्रम के उपासन धुरे मिले हैं। शहनादा जान मारम एक ताते ये मुह से अजुमनारा के रूप को प्रसा मुनकर उसकी योज में निकलता है और उसे जादूगर १ फटे से छहा Pाता है । मूरत अरवी में रिसित और ससार म प्रसिद्ध अरिपरता ये गला अनुवाद का अनुवार प. बदौलाल द्वारा रिया गया और १८९१ में महारजनो मतप के नाम प्रकाशित हुमा । पूरा अनुवा 'सहर रजनी परित नाम से नवस विशार म प प्रभागि हुआ। इसम परमले में परने की मरह एक कहानी म दूसरी रहानी किया है । बागाह पहरयारका पाहरजा एक हजार रातों तब कहानियाँ मुनाती है। हर रात बहाना अपूरी रह जाती है जो दूमरी राज पूरी की जाती है। प्रम और जार ३ १४४] [हिंदी-उपयास पृष्ठभूमि और परम्परा ताने-बान से चुनी हुई घटनाए मन को बरबस उलझा देती हैं । अलिफलला' को पडिन वालकृष्ण भटट ने उप यास को कोटि म रखते हुए उसकी बदिश की सराहना की थी। और इंडियन प्रस से १९०९ म प्रकाशित उसका अनु वाट 'बाल आख्योपयास कहा गया था । आधनिक अथ में यह उपयास नहीं कहा जा सकता है पर क्यागिल्प और यथाय पणन में यह किसी भी उप यास से टक्कर ले सकता है। फिसाना अजाएब और 'अलिफलला की मूल विशेपता मनारजक्ता है, जिसकी खोज उप यास में सवप्रथम की जाती है । य हम मानन्दित भले ही कर दें सतुष्ट नहीं कर सकते उत्तेजना भले ही दें, प्ररणा नही दत हसा भले ही दें रुला नहीं सकते । फारसी उदू की घटनामूलक कथाओ के अतिरिक्त सस्कृत स भाव मूलक कथाए आइ। गाल ग्राम मिश्र रिखित मालती माधव की क्या (१८७५) भवभूति के इसी नाम के नाटक का क्यात्मक रूपातर है । एक पत्र न इसे उपयास कहना पसद नहीं किया पर दूसरे ने इसका स्वागत उपयास का नमूना मानकर किया। यदि इस उप यास माना जाए तो रघुवा और रामायण के गद्य रूपा तर को भी उपयास मानना चाहिए। इसम अध्याय नी हैं विराम चिह्न भी विरल हैं जस पूरी कथा दो चार वाक्यो को कथा हो । मारती और माधव + मिलन और विरह से भरी सुकुमार प्रमकहानी हृदय को छू लेती है । प्राकृतिक दश्या और मानवीय भावो का वणन बहुत सुदर है । विषय-वस्तु उपयास के योग्य है । शली म कहीं सादगी है शीतल कमल के पत्तो की बनी जल स सीची हुई सेज पर भी बेपरक लगाए कई रानि विता दती है देवयाग से कही आँख लगी तो एकाएक चौक पडती है सब देह थरथरान लगती मुख से लम्बी सांस भरती छाती म धडका होन स अधिक कांपते कुचों को हाथ से छिपा लेती है। कही अत्यत कृत्रिमता है जो कथा म याघात उत्पन्न करती है मालती तो चित्र को लिखी सी प्रम रस पगी सी चित्र मे ठगी सी काम रग रगी सी भोति म लगी सो मोहजाल में फ्सी सी अनान कुड घसी सी प्रम डोर म बधी सी शोक सागर में पडी सी चिता गडी सी काठ की पुतली सो बेचन हुई बठी थी। बावू गदाधरसिंह ने वाणभटट की कादम्बरी को उपयास मानकर पद निरास 1 7 उसका अनुवाद वगला से दिया। यह हरियाद मगन में १८७३ में मापकर हरिश्चदिका में १८७९ में पूरा हुआ और नमो वप पुस्तक रूप में प्रकाशित हुआ । यनुवाक ने उस प्राचीन संस्कृत पायाम कहा है। अनुवाद येवल क्या 7 अग है वणन वा अधिस घrह गिया गया है। मापा सस्तनिष्ठ और गली सरल है । अनुवाद मरिन नहीं होता लो भा उप उप पास नहीं माना जाता। जब मूल कादम्बरा का आधुनिक पायाम की कोरि म नहीं रखा जाता है तद उसका मनुवार का रमा जागा नकालीन रेसा "स उपन्यास मानन ५ इसलिए यह उस धाग्य है। महिलोपयोगी कथासाहित्य नारद निवध आदि खासकर पुरुषों के पदन लिए ५। नई निभा र प्रचन्न म स्त्री शिक्षा का प्रचार होन सा और एना पुस्तकों का श्राव यस्ता हुई जिनम स्त्रिया का सरस टग सपि दा जाय । ५ or विशिष्ट प्रकार के पासाहित्य की रचना हान गा ! "म गाहम्प उपमान पापूद रुप कहा पा मwar है । मम उपचास अन उपकरण है सोधा सादा थाना मानव प्रकृति की परख मयाय चित्रण और साज सरत गद्य गरी। "मम नारी का नया प और उस प्रति परिवर्तित या मिता। उसकी निपट मूखला को निर्दोष भालापन मानकर उमा पुरा गान नहा लिया गया है। उसे गिक्षित और सम्य बनान पर जार दिया गया है। यही वहाना परिया Tम टोस धरती पर उतर बाई है। महिरपयागी साहित्य में इस हाप्रिय अग म बाधुनिकता । आमा है। मर और तमाम मी नागरी पी जसपनामा दडान दापति गौरीदत्त ने 'देवराना रेटानी की कहानी (१८३०) रिपार पासाहय म नूसन दितिज या उपाटन किया। उहान पहा वार घरेश नापा म परे जीवन में समदुम को बहानी किती धनिया क दो सारे विवाह दे दा भिन्न हा जान है इस घटनाहौन प्रमग या एपर होन नगर मध्यवर्गीय परिवार का पाय चित्र अस्ति दिया है। प्रतिनि को परिस्पि नियों परिचित वस्तुमा और साधारण व्यक्तियों में ना नहाने अदभुत श्राप भर दिया। उनका का पलानी और गोहर पाती हुई वगएँ अपना सहा म महानता और शिया में मुलाया उपस्थित है। होताना आप देवराना से ममता ना नह और [हि दी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा पति पत्नी का प्रम स्पष्ट और अकृत्रिम रूप म यक्त किया है जिसस पारि वारिक जगत के मानवीय सम्बधा के साथ हा मानवीय भावा पर प्रकाश पड़ता है । ससराल स ननद का भावज स देश भजना कि मां स कहना कि मुप दा चार महीन का तुला ले किसी कविता स कम मधुर है ? जा बगला के गाहस्थ उप यासो की प्रासा करने म थकावट महसूस नहीं करते उ है मुखद गह जीवन का यह दश्य रखना चाहिए जिसम एक साथ ही दाम्पत्य वात्सल्य और गगव की पलक है । रात का दानो स्त्री पुरप उस खिलात और वड मगन हाते जय छाटलाल कहता आओ हमारे पास आआ वह चट चला आता और जब उसकी मां कहती आआ हमारे पास आओ हम चोजी देंगे न आता तब दाना हम पडते कभी मां की खाट प से वाप को खाटप चला जाता और कभी राके फिर चला आता । पडितजी का पुरुप स स्त्री के स्वभाव की पहचान यादा है । उनक परुप सपाट और स्त्रियां सजीव हैं । जेठानी का चित्रण स्वाभाविक और विश्वसनीय है । यह चर्खा कातती जाती है और देवरानी को सुना-सुना कर कहती जाती है पौस कोई और खावे कोई । वह ठाकर खाती है घर क चौखट स और कोसती है अपनी देवरानी का । वह कशा और मूख स्त्री का टाइप है । देवरानी नवयुग की शिक्षित और चतन स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है । दोनो की चारित्रिक विभिन्नता अच्छी तरह उभरी है । जेठानी पति का कान भरती रहती है देवरानी पति का नागरी का अखबार पढकर सनाती है। देवरानी पढ़ी लिसी होने के कारण स्वय सुख में पलनी है और • पति का सुख पह चाती है। दिल तो वहाँ नहीं मिलता जहाँ मन पढा हा और स्त्री वेपढी हो। पडितजी का दृष्टिकोण सीमित नहीं है। उलाने स्त्रियों को गि पालन गृह प्रवघ, पति-सवा आदि का शिक्षा देन के लिए ही पस्ता नहीं लिखी है । उहान स्त्री शिक्षा नागरी प्रचार, बवाहिक जीवन के सम्बध म अपने विचार कहानी के माध्यम से यक्त किये हैं। उनके विचार नवीन और सघरे हुए हैं। वे मारी जाति के प्रति सहावुभूति दिखाते हुए उसे समाज म ऊचा स्थान दना चाहते हैं । वे परम्परा से विमुख हाकर प्रगति का स्वागत करत हैं । उन्होने उन्नीसवी सदी के टूटत हुए संयुक्त परिवार का जो स्प - पूर्व इतिहास] [१४७ उपस्थिन किया है उसम कल्पना या वादा का रस नहीं है। व पारिवारिक ययाय के जन्मदाता हैं। उनके सामन यथायवाली कथासाहित्य की काई परम्परा नहीं थी। उहान यह कहानी लिखकर अपनी मौरिक प्रतिमा का परिचय लिया है और गाहस्थ उप यासो को प्रत्यापित {ter है। प्रतिमा इमी तरह प्रत्यापित करती है । पुस्तकम उप पास के मभी अणु हैं केवल कहानी कहने को प्रणाली परानी है। विभाजन अध्यायो पा परिग्ला में नहीं किया गया है, घोच कायम मुध कायमूचक गायक बाठा म दे दिये गप है। उन दिनों इस प्रकार का गापा दना भी एक नया प्रयाग था। क्या वि यास म पाडा परिवनन पर दन से यह कहानी हिदी का पहला मोर उप पास बन जायगी। इसम असम्भव और अदभुत घटनाओ का जार फाडकर फेंक दिया गया है और दानव जावन का साधारण घटनामो को मनोरम पानक मे गूया गया है जा उप पास का न्य होता है। लिवित गब्दों म बालचाल की अनुरूपता वाले विता का भ्रम उपन्न करने में सहायर हुई है। बामचीत क्या का आग बढ़ाता है और पात्रो म जीवन डालनी है। मुनी ई वरीप्रसाद मुदरिस और मग कल्याण राय का frer पूशिसित पपासाहित्य म उप याम , सर्वाधिक समाप है । इसकी रचना १८७२ म हुई प्रान १८९३ म । वराना जठानी को पटानो' को अब इसका चित्रपट यहा है। इमम मध्यवर्गीय परिवार एव समकालीन समाज को समस्यामा पर प्रकाश डाला गया है। दवरानी जठानी मा रह और पिता की मृत्यु के बाद माइया का आपसी व वारा सम्मिलित परिवार प्रपा विघटन का सूचक है। बार विवाह के दुष्परिणाम और विधवाओ का दुदा दिवार कुरीतियों को बार ध्यान आप किया गया है । सामा शिक रोगों मन E लिए स्वावलम्बन और स्त्री का आय यस्ता पर जोर दिया गया लेघों से प्राधा मोव प्रतिमा ४ घरका वैगैगया है। वह उदू पदार हि स प्रम रपनी है और शिक्षित हार महमाय परती है । एसो नवयुवती से विवाह कर आधुनिर आलावर मी नहीं पायेंगे। बाल विधवा नानो रोरार जावन नहीं बनातो वा पर परपियो को पाकर अपनी जीविका गनिवार करता है । न नारा कामह रस्पना असाधारण होपर भी प्रAR नही है | ear पा उद्दश्य महलपराना है महिए उनि अपन पात्रों को याता बामा १४८] [हि दो उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा उल ग म रग दिया है या बिल्कल कालं रग म । गगा की चचेरी बहन उसस पूणत भित है राज उसम नाम को भी नहीं था भी घू घट काढ लिया कभी मुह उघाड दिया । गगा में मध्यवर्गीय पिष्टता और शालानता है उसक पति म मध्यवर्गीय मिथ्या प्रतिष्ठा की भावना । जब गगा उस कहती है क्या दूकान करन म कुछ डर है वह झट भाले गि की तरह जवाब देता है लो डर नहीं है लोग कहेगे कि पढ़ लिखकर दूकान करत हैं। लेखक पात्रा के मन म प्रवण करन का प्रयास करता है । पश्चिम के सम्पक स प्राचीन और नवीन विचाराम जा सघप हुआ उसकी छाप इस पुस्तक म स्पष्ट है । एक ओर लेखक कहते हैं स्त्री मद क पर का जूती है एक टूट गई दूसरी ना जायगी' दूसरी आर उनकी इच्छा है कि अग्रज स्त्रिया को तरह हिदू लडकियो को पढ़ लिखकर पति के घर बाहर के काम म सहायता करनी चाहिए । लेखक का जो कुछ कहना है वह स्वय कहते हैं और पात्रों से भी कह्वात है । कथाकार द्वारा मत प्रकट करने की य प्रत्यक्ष और परोक्ष विधियों पूर्व की स्थाओं म नहीं मिलती। स्त्री शिक्षा के पक्ष और विपक्ष में दा पात्रो के विचार यक्त कराय गय हैं। नथकार का यकाय नय विचार की ओर है। जमनादास समपते हैं कि लडकिया पढ़ेंगी तो निडर और निरज्ज होकर जिसको चाहगी चारी छिपे चिटठी पत्री लिख भेजेंगी । उत्तर में मथुरादास कहते है क्या पढ स्त्रिया का दुरा चाल चलन नहा हाता है । पचता और हितोपदा की तरह उपदेश पद्य म न होकर कहानी के बीच बीच म गद्य में हैं । दष्टात और पत्र द्वारा शिक्षा दने के अतिरिक्त लोक्क्या की भांति अत में लडक-लडकियो का कहानी से शिक्षा ग्रहण करन के लिए कहा गया है । मुहावरा और कहावतो से भरी प्रतिदिन को बोल चाल की भाषा न कहानी म रोचक्ता वार्तालाप म सरसता और उपदा म मधुरता प्रदान की है। नौकरी पेगह तो दर्जी की सूई है कभी गजी म कभी मखमल म घाटा बटा खाटा पसा समय पर काम पता है ये वाक्य तुरत मम का छू लत हैं। प्रम प्रसग के बिना भी सरस सुपर कहानी कस लिखी ना मक्ता है यह बामा शिक्षक स आजक्लक कथाकार सीख सकते हैं । इसम दा भाइया और चार वहनो का कहानियों वारा-बारी से सुनाई गई है । अध्याय में बदल गगा का हाल राधा का हाल आदि उपनापको पूर्व इतिहास] [१४९ से काम चलाया गया है। यदि विभाजन अध्यायों में हाता, क्यानक म वक्ता और अग्विति होती, तो वामा शिक्षक पुराने उप यास का वढिया नमूना होता । इसके विपक्ष में सबसे बड़ी बात यह है कि यह पूणत मौलिक नहीं है। इसकी रचना प० गौरीदत्त की दवरानी जेठानी की कहानी और उर्दू उप यासकार नजोर बहमद क मिरातुल मरूस के आधार पर हुई है। रेवरानी जेठानी की कहानी की भांति इसम कथा मरठ है देवरानी जेठानी के कलह और उससे सम्मिलित परिवार म हान वाली फूट के प्रसग हैं तया शानो नामक एक एक स्त्री-पात्र है । कथानक और चरित्र चित्रण में मिरातुल अरूस' का प्रभाव स्पष्ट है । जिस तरह मिरातुल अरूस में पहले अकवरी और तब असगरी का हाल सुनाया गया है उसी तरह बामा शिक्षक म स्वतत्र कथाएँ क्रम स रखी गई हैं यद्यपि प्रयम कथामा म एकसूत्रता है। गगा-सीताराम मिरातुल अरूस के असगरी मुहम्मद कामिल से मिलते-जुलत हैं । मुरिस की रचना मजा विचार को प्रगतिशीलता और कहानी की कला है वह नजीर अहमद की रचना म नहीं है। जिनका हृत्य प्रम का खिलौना है उनके ही हाथो म प्रमाथा की पुस्तक देना उचित नहीं समझा गया इसलिए देवरानी जेठानी की कहानी और वामा शिक्षक म रम का अभाव है । उदू से अनूदित मनसुखी और सुदर सिह का वत्तात (१८७५) पृष्ठों की एक एमो रचना है जिसम चामल प्रम की करुण कहानी सामाजिक व्यवहार को भूमि पर लिखी गई। गांव के अहोर की लहको मनमुवा अपने चाचा के माश्रय म पल्ती है। उसका पति घरजमाई घनकर रहना चाहता है इसलिए चाचा द्वारा निकाल दिया जाता है । उसका दुख दूना हो जाता है। एक बार मेल में अपने विद्यु हुए पति स मिरने का अदमर आता है लेकिन वह इस मसार से विदा हा जाती है। उसकी याद म उसका पनि भी मर जाता है । विषय म रोक क्या को मापुरो पली मध्यजना गक्ति और वाताराप म स्वाभाविकता है पा पात्रोको प्राणमय बनानी है। पावती ने कहा जीजा ! तेरे प्याह का ता पाच वरस हॉग तू में प"ह धरसोई गौना कब होगा उसन उत्तर रिपा अवर साख म बताये हैं फिर पायती न पहा जीजी तेरा बनडा तो वहा सुदर है यह बात सुनकर मनमुसी मुसकराई और कहने लगा हा बीजो मैंन गो का यर पि नुन र दसा पा मप भी उसको मूरत भी लगी पी। ८.

१५०] [हिदी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा उन्नीसवी ताटी के विरक्षण विद्वान, विचारक वक्ता और उत्तर भारत के महान सास्कृतिक नेता प० श्रद्धाराम फिल्लौरी ने धमग्नथा और जीवन चरित के अतिरिक्त कल्पनाप्रसूत साहित्य की रचना की। उहोंने इम नये माध्यम का उपयोग भारतखण्ड की स्त्रियो को गहस्थ धम को शिक्षा देने के लिए किया । इस लिए इसस अधिक उपयुक्त कथा क्या हो सकती थी कि एक गिक्षित स्त्री का चरित्र घर और बाहर म दिखाया जाय? १८७७ म भाग्यवती लिखकर उन्होन एसा ही किया। भाग्यवती समगल आपर अपनी वोठी स्वभाव और क्रिया से अपने सर्वा धयों और पड़ोसियो का मन मोह रती है । उसे एक दिन बिना किसी अपराध क नगी भूखी निधन और निराश्रय कर घर से निकाल दिया जाता है । पति भी निमम होकर कहता है जहां उसकी इच्छा हो अकेली रहा करे । जब उसके खेलने खान के दिन हैं तब उसे अपने पति और परिवार से अलग अपने दुख-सख के साथ रहना पडता है। वह न तो मरे सदेश भेजती है न ससराल की शिकायत करती है घरेल उद्योग धध और खेतीबारी से अपना निर्वाह करती है । जब उसका ससुर उसे बुलान का विचार करता है तब वह आती है तुरत तीथयाना के लिए निकरती है और राह में एक बार फिर अपने सवधियो म बिछड जाती है। उसे जीवन में पहली बार एक ही दिन में भूख-प्यास सहन पदल चलने और लडके का बोझ उठाने का क्डवा अनुभव हाता है । उसको दुदगा देखकर विक्टर ह्य गा की ये दा पक्तियां याद आ जाती हैं जिसन पुरुष का दुख दखा उसने कुछ नहीं दसा उस स्त्री का दुख देखना चाहिए । ' उस पर विपत्तियां आती है लकिन वह धय नहीं खाती पराजय स्वीकार नहीं करती घल मिलकर मरना नही जानता। अपनी बुद्धि के बल पर वह परिस्थितिया का सामना करती है खतरो स खेलती है और उन पर विजय पाती है । पतिगह छाडने के बाद वह प्रमचद की सुमन ( सेवासदन') की तरह वेश्यालय की ओर पर नही वढानी न ही प्रतापनारायण श्रीवास्तव को कुमुद (विदा ) को तरह पितागह की ओर मुह करती है । उन्नीसवी सदी की यह नई नारी अपनी हथली म अपना भाग्य लिए नये दौर की देहली पर खडी है । वह पुराने सस्कारा के जजर व धन को एक झटके म तोड डालती है और स्वयं अपन इतिहास का निर्माण करती है। उसके व्यक्तिख के चार स्प है व्यक्तिगत पारिवारिक, सामाजिक और सावभौमिक । वह व्यक्ति हाकर भी समाज व घर में रहती है । वह .

- पूर्व इतिहास] [१५१ यवहार-युगल गहस्वामिनी और मादा समाजसेविका है । वह व्यक्ति परि वार और समाज का सुधार और कल्याण करती है । मनुष्य के लिए उनके पास स्नेह-सत मावना के सिवा और कुछ नही है । उसम गभीरता है तो चतु रता भी, स्वाभिमान बमठता सहनशीलता और क्षमा है तो लज्जा, ममता भावुकता और कामलता भी । वह जितनी दूर गई है उतनी दूर जाने की कल्पना कोई स्त्री कर सकती है। किसी भी देश और युग की स्त्रियां उसके साथ एकात्म बाघ कर सकती है। यही कारण है कि एकात म, परिवार म समाज म परदेश म जहाँ कही वह दिखाई पड़ती है हम आकृष्ट कर लेती है। हमारे हृदय पर उसका यक्तित्व उसी तरह पक्ति हो जाता है जिस तरह उस रुमाल पर उसकी कविता जक्ति है। भाग्यवती के चरित्र चित्रण म रखक को रचनात्मक प्रतिभा का ही नहीं नारी के प्रति उनक उस स्वस्थ सामाजिक दष्टिकाण का भी परिचय मिलता है जो क्वल प्रमचद म मिरगा। नारी की पराधीनता और परवता उनकी मूल प्ररणा है । उसके लिए उनक हृदय म अयाह करुणा और असीम समवेदना है । उनको भाग्यवती युग युग की पटलिन उपेक्षित लाछिन और अपमानित स्त्रीजाति की प्रतिनिधि है । वह अपने मसुर को जाने के समय पत्र लिखती है ' मेरा क्या है मैं ता पड की मछरी हूँ खसागे रहू गो निकाल दाग धरी जाऊगी पर एक स्मृति रखना जहाँ जाऊँगो आप ही के यहां का बहू मह राऊगी। उसका ससुर अपन अत्याचार का भूल जाता है किन वह अपने अपमान को भा नहीं भूलती और ससुराल सैटन पर कहती है, में तालाज ला यही माने हुई वठी हूँ कि पराई बेटी का किसी के घर म क्या मान हाता है जब चाहा गाय भस को नाइ कान पकड के बाहर कर दी। फिल्लौरीजी पशु और दासी २ प म देसना चाहते । उसके प्रति लिए गए अ याय का वे बहुत यहा सामाजिक अयाय मानते हैं । उनकी दृष्टि म नारी को परप के समान जीने का अधिकार है। तभी तो उनी भाग्यवती सम्मान के माप घर में जाती है अलग होकर रहती है और लौटती है । यह कभी अपना मिर नहीं झुकाती है । वे नारी का अबला नहीं मानते । उना सो दय और प्रम से उसरे स्याग और साहस की और वे अधिर मारप्ट हैं। घर में भाग्यवती क स्याग पा और बाहर म साहस का पता चलता है। पर ये दो गुण स्त्री पात्रों को पर मोर बाहर म रसर दिसाये जाते तो उननी प्रभावोत्पान्यता नहीं पाता। नाराको १५२] [हि दी उपयास पृष्ठभूमि और परम्परा श्रद्धारामजी न दो अमर स्त्री पात्र दिए हैं भाग्यवती और लडाको । भाग्यवती हिदी-उप यास की पहली सकारात्मक नायिका है । लडाको एक टाइप है जिस देखकर क्या पडोमिन को याद या जाती है । भाग्यवती उस प्रणाम करती है तो मजाक समय वठती है । भाग्यवती सफाई देती है कि वह उसकी सास और मां के समान है तो वह गाली मान रेती है और आशीर्वादो की पडी लगा देती है क्या रीतू मय चतुराई म अपने वाप और ससुरे की लुगाई बनानी है ? हत्तेरे ससुरे की दादी जलाऊ वह भड आ कौन है जो मुझ अपनी जुगा' बनाने ? उसकी लुगाई वन तू अथवा उसकी बेटी देवकी। आन दे मेरे बर वटे का मैं कसा तरा चूडा और तेरे ससरे को कजर दाढी पु क्वाती है । यो वकती और फूट फूटकर रोती हुई अपने घर के द्वार पर आ खडी हु। जो कोई भला बुरा स्त्री पुरुप उस गली में से होकर जाता उसी को पकड के खडी हो जाती और रो रो के कहती दसो जी चडल भाग्यवती मुय अपन ससरे की लुगाई बनाती है। यहाँ रडाकी के स्वर का आराह अवरोह सनाई पडता है उस हाथ और चहरे की भगिमा दीख पडती है उसके रोन की आवाज गू जता मालूम पडती है और इन सबसे उसके स्वभाव की सरलता शाक्ती है। उसकी जीभ म उपयुक्त 7 भर दिए गए इसलिए यह नाटकीय प्रत्यक्षता सम्भव हुई । आश्चर्य है स्त्रियो के स्वभाव बोलचाल और व्यवहार को जानने समझने और प्रकट करने म लेखक क्स समथ हुए । कहाँ य पण्डितजी और कहा यह लडाकी । भाग्यवती की एक पडोसिन तो अविस्मरणीय है । वह पहल भाग्य वता की ननद से रुपये उधार कर और समय पर रोटा वर विश्वास प्राप्त वर लती है फिर एक दिन वहाने से गहना मांग कर र जाती है और मांगन पर मुकर जारी है सरीतू कौन है ? और गहना क्सा ? क्या तूने कुछ भाग खाई है बता तो सही तरा घर किस गलो म है ? मैं तो कभी घर से बाहर भी नहीं निकली कि तुय पहचान सकती चल कोई म घर म आ निकलगा तो तुझे नाहक गरमि दी होना पडगा। भाग्यवती जसी स्त्रियो की सस्या कम हाती है । उसकी पडोसिना जेठानियो ननद और सास जसी स्त्रियों को ता गणना ही नहीं की जा सकती ?

पूर्व इतिहास] [१५३ है। इनम अपूर्णता और दुवलता है उनके साथ अधिकाग पाठिकाएं समानता का अनुभव कर सकती हैं । भाग्यवती गहस्य धम की प्रतिमा है तो ये समाज क चलचित्र हैं। पुरष पात्रो में उमादत्त और वासुदेव अपन स्रष्टा के समान ही मडी गली सदियों को ढोने के घरले समय के साथ चलते हैं । इन प्रगतिशील बनारसी पण्डितो स वनारसी ठग अधिक विश्वसनीय लगत हैं । पात्रो की बातचीत न रहें इतना सजीव और परिचित बना दिया है कि उन विलपण का अभाव खटक्ता नही है। भाग्यवती को सास की वातचीत सबम अधिक स्वाभाविक है । उसको बातो म उस हृदय की सर लता और भावुकता लिपटी आती है । ठगों को वातचीत वडी लुभावनी है । वार्तालाप को भापा पात्र और प्रात प अनुसार है इसस पात्रों में वास्तविकता का आभास मिलता है। प्रातीय बोलिया का प्रयोग आरम्भ म न हाकर सवन हाता तो पाठको के लिए एक समस्या खडी हा जानी और गुण भी दाप बन जाता। विभिन्न वर्गों जातियो और प्रकारो के पाया की बातचीत वा हूबहू नकल करने म लेखक को पूरी सफलता मिली है। उहोंने पाणीराज स पर न दा कहार तक को अपनी रचना म स्थान देकर हिटी उपयास म मानवीय यथाथ की उदभावना की। उन्होन कागी के अच्छे साते-पोते पग्तिो के परिवारो का जो पथक्ति किया है वह भारत के मध्यवर्तीय परिवार का सच्चा रूप है । उहाने एलिक्षित स्त्री को मुख्यपान बनाकर स्त्री-समाज की मौकी प्रस्तुत की है । स्त्रियों के दिलचस्प गप्प अपविग्वास क्षणिक रह स्वच्छ- प्रेम सरल सुम-नस मारि का वणन उहोंने तत्स्थता किन्तु रोचकता के साथ किया है। कोई कहती, माईजी। मेरे बेटे की बहू मर गई दूसरा विवाह पद होगा? कोई बोलती माई ! मैं तो तन मन स तुम्हारी दासी हो जाऊ जो मरा भाई विदेश से घर म आ जाय। कोई वहती माईजा मैं दस पप स घर वसती हूँ भगवान ने जगत म कुछ इन्साफ नहीं बनाई जा एक भी छोरा हो जाय तो तुम्हारो टहए करू । सामतवाद ये प्यस-बार में देश की जो सामाजिक और धामिक अवस्था थी उसकी सप्ट रूपरेसा भी उहोंने प्रस्तुत की है । बोस से अजन निशाल देने वाले टग पहया सेठ और साघुरे वेग में पिलाई पड़ते हैं अनि मठ मोर सापटग होने है और प्रम सपा विश्वास उत्पन्न कर दिन दहार - १५४] [हि दी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा लूटते हैं । पडितजी की विलक्षणता यह है कि उन्होन समाज की बुराइयो और करीतियो को न तो बढ़ा चढ़ा कर दिखाया है और न उन पर परदा डाला है । उहोने उनका वास्तविक स्वरूप दिखाने और उनका उचित वि यास करन म एक महान ययाथवादी क सयम कितु निर्भीकता स काम लिया है । जसा कि उन्होने स्वय बताया है उनकी भावना वसी ही है जसी सोये बच्चे को जगान वाल पिता की होती है । उन्होने विधवा के अवध प्रम और पुनिर्विवाह की चर्चा करन का साहस किया । जिस समय ऐसी बात सुनकर धरती कांपती थी उस समय भी सत्य, अप्रिय सत्य वहन म उह भय नहीं हुआ। प्रमच द का कहना था कि यथायवाद यदि हमारा आँख खोल देता है ता आदावार हमे उठाकर किसी मनारम स्थान म पहुचा देता है । फिल्लौरीजी ने अपन सतुलित दृष्टिकोण के कारण यथाथ और आदश लौकिकता और अलौकिकता, नीति और पम म एक सामजस्य उपस्थित क्यिा है । राजभक्त पडितो घूसखोर पुलिस वालो राभी ठगो चालाक चोरों, ढोगी साधुआ और झगडालू स्त्रियो के बीच भाग्यवती का दान होता है । घणा-द्वप विरोध वमनस्य के वातावरण म पारिवारिक जीवन के का आभास मिलता है। पडितजी आगावादी है निष्ठावान हैं । उ ह मनुष्य की गति और ईश्वर का भक्ति म विश्वास है । व धरती का स्वग बनाने के पक्ष में हैं। इससे ययाय की ओर उनका याव मालूम पडता है । अग्रजी राय की शाति में भी जो सामाजिक और नतिक सकट उपस्थित हुआ उसम व पथ प्रदशन करते हैं । वे जजर पुरातन पर हलका व्यग्य और स्वस्थ नूतन का हार्दिक स्वागत करते हैं । सोध उपदेश देन बदले दष्टांता द्वारा बनाई गई गभीर बातें भी ग्रहण करने योग्य हो गई हैं । जीवन मरण मुक्ति आदि पर प्रक्ट किए गए विचार नवीन होकर भी नास्त्रीय आधार लिए हुए हैं। भाग्यवती वं व्यस्त जीवन के माध्यम से कम का सदेग मिलता है । उनके उपदेश देन की कला अनुठी है। हम उह सुनते हैं लेकिन देखते नही हैं । उनके नूतन सामाजिक दान और नतिक सिद्धात सरल होने के साथ-साथ मामिक है। विवाह उस समय करना चाहिए जब वारक आप ही स्त्री का भूखा हो सिंह और शूरवीर वही है जो किसी दूसरे को मार से अपना पेट न भरे य चुमते वाक्य क्सिी सूक्ति स कम हैं ? सुख सताप दगान भी पूर्व इतिहास] [१५५ उनक उप यास मै हम उनक कथावाचक का पाते हैं । वे लिखते हैं इस प्रथम मैंन एक कल्पित कहानी एसो सरस रीति स लिखी है कि जिसके पढ़नेहारे का मन समाप्ति पर पह चाए बिना तृप्त न हाव । आदि स यत तक कहानी की रोचाता का पहला कारण है कहानी कहन का सरल स्वाभाविक ढग । आरम्भ क्तिना मीधा सादा है। कागी मगर म पडित उमादत्त जी के घर में एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम लालमणि' और एक पुत्री उत्पन्न हुई जिसका नाम भाग्यवती रक्खा। कहीं भी कलारमक योजना का प्रयाम नही है। नारी प्रकृति के सौंत्य का वणन तो दूर रहा उसका दुलभ है। वणन विश्लेषण और व्यास्या स वचकर कहानी अबाध गनि म आग बदनी जाती है । फलत पढनहार का ध्यान घटनाआ के प्रवाह पर दित रहता है। उस सम्बोधित कर उस ध्यान को कभी भग नही किया गया है । हास्य और करुणा धूप छोह की तरह अपना प्रभाव डालती चलती है । दा दृश्य अतिनाटकीय लगते है जब भाग्यवती की जठानी रात म शहर स बार ठगो जाती है और निराकरण हाकर घर लौटनी है तथा जब भाग्यवती मै म बडो चतुरता स चारो का पकडनी है । हि दो-उपन्यास म पहली बार एक नारा का निराकरण किया गया है। रखक का उद्द इय पाठरो का उत्त जित करना नहीं बल्कि पात्र का लालच का दड देना था। नायिका का नगी बनाकर वासना भडकान का काम उहोने जनद्र और पापाल के लिए छोड़ दिया । उनका गद्य बातचीत का साहित्यिक स्प है जो क्या कहानी के लिए उपयुक्त होता है । भारतेंदु की भाति । मुहावरो और वाक्यो पर उनका अधिकार है और उसी तरह उनकी गली पर उनक व्यक्तित्व की छाप है। पार क लखक महावरो का प्रयाग करते हैं उहोंने उनकी सष्टि की है। मरल (लखना भरयन्त कठिन होता है। उमम वही सफल होता है जो भाषा को कलम की नो पर नधाता है । बरूम क जादूगर प० अक्षाराम फिल्लौरी न जिस अपनी सरस रोनि रहा है वह उनकी आडम्बरहीन कला है । भाग्यवती' में म बना हुआ एक निराला मसार है जिसम जो पुछ है वह देखने और सुनन याम्य है । सवा २ सम्म यह अनहुई और पपित कहानी और अनुत्पन्न पुरुषा मुस १ उपग है परन्तु पटनहार को सब ऐसे प्रतीत होंगे जिम प्रत्यन त होने और मामन व शिक्षा परते पपानक पात्र और बातासाप ही मजीवना और मम्भवता जो १५६] [हिंदी उपन्यास पृष्ठभूमि और परम्परा उपन्यास की रीढ़ होती है भाग्यवती' की सर्वोत्तम कलात्मक उपाय है। यह एक अद्वितीय रेखक की मौलिक कल्पना की अमूल्य देन है । रामगर गुक्ल, 'रसाल के मन से यह प्रथम प्रौढ उप यास' है । इसम उप यास के कुछ प्रमख तत्त्वो को पाकर आलोचको ने इसे उपन्यास की श्रणी में रख दिया कि तु स्वय लखक ने इसकी रचना उप यास के रूप म नही की। उनकी कलम पर अनजान म एक ऐसी कृति उतर आई जा उप यास बन गई। आगे जिन रचनाओ का विवेचन किया जायेगा वे निश्चित रूप से पश्चिम से प्रभावित आधुनिक उपयास हैं। मौलिक प्रयास उपन्यास क अभाव का अनुभव सबसे पहले और सबम अधिक हि दो गद्य साहित्य के पिता भारतेंदु का हुआ और उन्होंने उस दूर करने की चेष्टा की। उनके लिए हिन्दी का कोई अभाव राष्ट्रीय अभाव था। उन्होंने हि दी भापा और साहित्य के लिए जन्म लिया था । यदि वे ३५ वप के अल्प वयस मे इस संसार से विदा नही होते तो हि ती उप यास अधिक समद्ध और सम्पन्न होता । उनको प्ररणा सम्मति और प्रोत्साहन पाकर कई लेखक उप यास लिखने मे प्रवृत्त हुए। उपन्यास की ओर इनका ध्यान पीछ गया था इसी से इसकी बहुतायत नहीं है । परतु हि दो म उप यास लिखने के लिए लोगों के हृदय म अकुर जमाने वाले यही हुए। उहान पत्र द्वारा पण्डित सन्तोषसिंह का ध्यान इस आर आकृप्ट किया था। यह पत्र लिखे जाने के बार ही लोगों की रुचि इधर हुई और कई एक उप यास वगभाषा से अनु वादित हुए और नये भी लिखे गये। एक ता भारत दु ने उप यास लेखक तयार किय दूसरे उहोन उस गली और उस विचार का ज म दिया जिनक अनुसार उपयाम लिख गये और जो उप यासकारा का प्ररक बने फिर उहोंने स्वय उप यास लिम्बने और अनुवाद करने का प्रयास किया । अत जय गद्य रूपो की भांति उप पास का उदघाटन भी उ हान हो किया। इस दिशा में उनक कृतित्व से उनका व्यक्तित्व अधिक प्रभावशाली सिद्ध हुआ। उनकी पत्रिका हरिश्च द्रद्रिका म पहले पहल उपवास का प्रकाशन आरम्भ हुआ। १८७५ के फरवरी माच के अकों में प्रकाशित 'मारती प्रथम प्रकाशित मौलिक उप यास है । इस अधूरी रचना को उप यास की सना दी गई है परन्त यह नहीं बताया गया है कि उसका लेखक कौन है और यह .

पूर्व इतिहास] [१५७ मौलिक है या अनूदित । अपनी वस्तुगत और गलीगत विशेषताओं म यह हिन्दी-उप यास के समान है। इसलिए उसे मोलिक मानना ही समीचीन प्रतीत होता है । एक मित्र के कारण दो माइया म होने वाली फूट को लेकर कहानी गढ़ी गई है । पहले पहाडी प्रदेश की सध्या दिखलाई पड़ती है फिर दो सुन्दर युवको का आगमन होता है । एक युवक दूसरे को मदिरा पिलाता है भाई के विरुद्ध महकाकर उसकी सहानुभूति प्राप्त करता है और एक दिन उसे ना मे छोडर और उसके पास एक पत्र रखकर चला जाता है । कया एक सिलसिले म वघी नहीं है न पात्रो का परिचय पहले दिया गया है । इसम उप यास में कौतूहल और रहस्यमयता को सप्टि हुई है । इस प्रकार की नाटकोयता प्रारम्भिक उपन्यासों की विशिष्टता है । आरम्भ म प्राकृतिक सुपमा का काव्यात्मक वणन भी पुराने उपन्यासा का स्मरण दिलाता है अमत्यात मरना का (निसरों के चारा आर स प्रवाह ऐसा सूचन करता है मानो मम गिरि को अपने बराबर क चा देस ईपा कर बह श्राप स चारा ओर मण्डल पर अति प्रवल अखण्ड जलधारा छोडकर उसको नाग किया चाहत या स्वत रग देख मेघों का हिमालय का भ्रम हा गया है और मूय के प्रचण्ड तज स पिघल कर बहता देख अपन विधाम का स्थान जान पवन का आच्छादित कर बचाना चाहते हैं यदि मालती मौरिक कृति नहीं है तो कविवचनमुघा' (१८७६) मे प्रकाशित एक कहानी कुछ आपबीती कुछ जगवीतो भारत का पहला मोरिक उप याम ही नहीं, हिदी का भी पहला अधूरा मौलिक उपन्यास है। इसके नाम स एसा प्रतीत होता है कि यह कहानी या आत्माया या सस्मरण है। किंतु इस प्राप्त मा तथा अय प्रमाणों स यह सिद्ध होता है कि यह अप मारमयात्मक उपायास के सिवा बोर कष्ट नहीं है। आश्चर्य है डा० कसरीनारायण शुक्ल ने अपने भारत के निद घ में इसे कसे सारित पर दिया । इसका ढाँचा निवपका सा तो नहीं है । बाबू राधाकृष्णदास ने भारत पासाहित्य का परिचय देते हुए लिखा है 'स्वय एक उप याम लिम्बना प्रारम्भ पिया था जिसका कुछ परा पविवचनमुधा म छपा भी था। नाम उसफा पा एक कहानी पछ आपयोती क्छ बगवीती ।" इसकी पुष्टि बाबू गिवन दनसहाय और बाबू बजरनदास" कपन से होती है । एकहानी का रेवल 'प्रयम से उपर प है । मारम्म परम्परागत १५८] [हि नी उपयास पृष्ठभूमि और परम्परा उप यासों की तरह हुआ है प्रपम खेल जमीन चमन गुल खिलाती है क्या क्या ? बदलता है रग आसमौ कस कस ? हम कौन हैं और किस कुल में उत्पन्न हैं आप लोग पीछे जानेंगे । आप लोगो को क्या किसी का रोना है। पढ चलिये, जी बहलाने स काम उपयास की भाति यहाँ प्रथम अध्याय के बदर प्रथम खेल है आरम्भ मे शेर है पाठका के प्रति सम्बोधन है नायक का परिचय पीछे देने का वादा है और मन बहलान की साध है। भारत दु का जीवन किसी उप यास के नायक के जीवन से क्या कम सरस और सत्रिय था? उहान यक्ति की कहानी के बहाने समाज की कहानी मुनाई है। उन्होन दरवारियो का सूक्ष्म सजीव और वास्तविक चित्रण करन म अपूव कौशल का परिचय दिया है कोई वोला हाय आपका फलाना कवित्त पटकर रात भर रोते रहे दूसरे ने कहा आपको फलानो गजल लाला रामदास को सर में जिस वक्त प्यारी ने गाई सारी मजलिस लोटपोट हो गई तोसरा ठढी साँस भरकर बोला धय हैं आप भी गनीमत हैं बस क्या कह कोई जी से पूछे चौथा बोला आपकी अगूठी का पन्ना क्या है कोच का टकडा है या कोई ताजी तोडी हुई पत्ती है निम्नाकित पक्तियो मे सेवक स्वामी की एक ही रेशमी कोड स खबर ली गई है और अभिजात वग को सफ्दपोगी उधेडकर रख दी गई है 'कोई रडी के भह ए स लड़ता है रुपये में दो आने न दोगे तो सरकार से ऐसी बुराई करेंगे कि फिर बीबी का इस दरबार में दरगान भी दुलभ हो जायगा कोई वजाज से कहता है कि वह काली बनात हमें न ओढाआगे तो बरसो पडै झूलोगे रुपये के नाम खाक भी न मिलेगी कोई इस बात पर चूर है कि मालिक का हमसे बकर कोई भेदी नही जो स्पमा कज आता है हमारी मारफ्न आता है मानव-स्वभाव को परख पात्रो के गद चित्रण वणन शक्ति और सरल साहित्यिक गली म भारत प्रमचद को प्रत्यागित करते हैं । उहोंने पूर्व इतिहास] एक वाक्य म वातावरण का जसा निर्माण किया है वसा नयी पीढी के उप यासकार एक पृष्ठ रंगकर शायद ही कर सकें। सांझ फूली हुई आकाश म एक मार चद्रमा दूसरी ओर सूय पर दाना लाल लाल अजब समा बघा हुमा कसेरू गहरी और फल वचन वाले सडक पर पुकार रह थे । पूर्व कया साहित्य मे क्यानक चरित्र और वार्तालाप का अस्तित्व था पर घणन विश्ले पण का अभाव था । उप यास वे इस आवश्यक तत्व का दान 'एक कहानी' म मिला । मनावमानिक ययाय की पहली झलक भी मिलती है । लगभग छह सौ बारत शदा की यह अधूरी कलासृष्टि ऐतिहासिक और साहित्यिक महत्त्व रखती है। डा. रामविलास शर्मा म उनकी प्रतिभा जिस युर दी पर यहाँ दिखाई देती है उस बुलदा पर नाटका और निद घों में भी नहीं दिखाई देती।" भारते ६ के दूसरे मौलिक उप यास हमारी हठ का उल्लेख प० राम गवर व्यास द्वारा अग्रजी म दिए गये भारते रचनावली के विवरण म है। वायू राधाकृष्णदास लिखते हैं नवीन उप यास हमीर हठ बड धूम स भारम्भ किया था परतु प्रथम परिच्छे ही लिखकर चल बसे । इसस अनुमान किया जा सकता है कि हमोर हठ भारते- क जीवन क अतिम षों म लिखा गया ऐतिहासिक उप यास है। इसका प्रथम परिच्छेद भा अप्राप्य है इसलिए इसक' रचनाकाल और स्वरूप प सम्बप म कुछ अधिक नहीं कहा जा सकता। भारतेंदु व वा उप यास उसका म दूसरा अमर नाम ५० बालकृष्ण भटट का है । व वस्तुत द्वितीय भारतेंदु । उनका रहस्यापा उपायाम (हिंदी प्रदीप , नवम्बर १५७९) एक बहाना की भांति ही कुछ अधूरी दिन तगरी रचना है और यदि वह पूरी हाती ता उनीसवीं सदी के उप यासा म एकहानी के बाद स्थान रखती। इसका नायक तिरपारी अयप य एष जागीरदार का लडका है। वह एक गनर सिपाही व यहां परने वाली मनाय दारिता गुणवती को मेले म पो से बचाता है । बारपण और तमसा क सयोग से प्रम जाम देता है । दाना विवाह करने का निश्चय रत है । तिरपारी घीन पा जाता है और यह समान लिया जाता है कि उसको मृत्यु हो गई। इयर उसके पचास वर्षीय पापा स गुपवती की शारी पर दी जाती है। वह लोटने पर पाबा द्वारा घर में निकाल दिया जाता है। एए दिन उसर मरे ए बाचा पटेज सो टार निराल जाता है उस [हि दो उप यास पष्ठभूमि और परम्परा 17 पर उसका नाम पाया जाता है । यदि यहां पर भी उपयास व समाप्त होन की सूचना दी जाती तो क्लात्मक दष्टि से विशेष क्षति नहीं होती। यो उपयास पूरा होने पर सुखात अवश्य होता। क्थानक और उसके गठन मे भटट जी की कारयित्री कल्पना का स्पश है । उहोंने गांव और शहर की घटनाओ को दक्षता स गुम्फ्ति किया है और पात्रों में मानवाय सम्बध के साथ साथ कलात्मक सम्बघ स्थापित किया है । विवाह के पूर्व प्रम और उसम बाधा उप यासकारो का प्रिय विषय है । तिलकधारी और गुणवती के प्रेम का उत्पत्ति आकस्मिक रूप से हुई है पर उसका विकास दनिक परिस्थितियो के बीच स्वाभाविक ढग स हुआ कभी दोनो मिल एक ही किताव पढन लगत थे और पुष्प रस समान उसक स्वास प्रस्वास म उत्पन भाफ रूपी मधुपान कर मधुकर सा उन्मत्त हो जाता था कभी अपनी प्रेमपत्री को सुईकारी का काम करते देख गुलाब की पखुरी सा सुकुमार अधर और कोमल गोल कपोल को शोभा खडा निरखा करता मानो बहुत दिनों का प्यासा मरुभूमि के पथिक समान उसके अधर रूपी मूगे के कटोरे म रक्खा हुआ सुधारस उठाकर पीना चाहता है प्रमी प्रेमिका का एक साथ मिलकर किताब पढ़ना प्रेमिका को सिलाई फरते देखना कितना साधारण प्रतीत होता है लेकिन कितना सुदर होता है । जो आक्पण सुकुमार अधर और गोल कपोल की कल्पना मे नही है वह जीवन की वास्तविक्ता म है । यथाथ के रोमानी पक्ष की मार सभी ध्यान नही देते । यहाँ मनोव मानिक उपायास की तरह भावावग का प्रभाव मन पर नहीं बल्कि गरीर पर दिखाया गया है। प्रेमी प्रमिका भतीजा चाची बनकर बड अतद्वद मे पड़ जाते हैं कि वे एक दूसरे को किस भाव से देखें । भटटजी न नाटकीय स्थिति उत्पन्न कर फ्था की रमणीयता बढाने की चेष्टा की विन्त तिलकधारी को घर से निकाल कर और उसके चाचा की हत्या कर उन्होने उसका निर्वाह नहीं किया । यदि व प्रम से उत्पन्न होने वाले आतरिक और वाह्य सघर्षों का विस्तार स वणन करते तो बलात्मक सम्भावना पूरी तरह प्रकट होती । शायद उनका उद्देश्य त्रिकोणात्मक प्रम का रूप अक्ति करना नही था। वे समाज की समस्या-बद्ध विवाह की समस्या-प्रस्तुत करना चाहते थे। इस समस्या का जहाँ उहोंने यथाथ चित्रण किया है वहाँ चन्द्रप्रभा और पूर्णप्रका म उसका आदावादी पूर्व इतिहास] [१६१ हुए हर उपस्थित किया गया है। ये मानव हृदय का तलस्पनी अध्ययन नही करते हैं प और अवस्या का वर्णन कर रह जाते हैं। उनकी दुनियाँ म रूप नारी को ही नहीं पुरुष को भी मिला है । धनुषधारी और तिलकधारी मानों 'स्प लवप्य के मनोहर फूरों स मुगामित वस ऋतु के चत्र और वार के दो महीने हों। एक घेहरे स दुटिरता और दूसरे के चेहरे से सरलना टपरती है । पाए सोदय में समानता होत हुए भी पन्त सौदय मजा विभिन्नता है वह वाह्य सोय म प्रक्ट हो जाती है। प्रमदा के नखगिस के पणन में पुरानी रीति की पाल पारिश्ता है। दुका मौदय-यणन नवीनता लिए हुए है टटक चमली के पर समान उसके अग गमरमर सा गौर वण म एथे स भूरे वार, ह पहले सा गोल पोल !" भटटजी फे -चिन बड समस्पी होत हैं। चित्रकार जो प्रभाव रगों से उत्पन्न करता है यह पे घटा से करत है। चरित्रावन में मनौवनानिक यथाय का अभाव रहते भी सामाजिद ययाय है । उन्होंने प्रतिनिधि पात्रामा चित्रण ही नगै क्यिा } उनका निर्माण भी किया है । धनुपधारी हासा मुख बभिजात वग का प्रतिनिधित्व परता है निधारी उगत हुए मध्यवग का। एक आवारा विगामी रावी नपा नाच-गान घटेरदात्री और पतगवाजी म दिन बाटने वाला है। दूसरा उद्यमी कमठ साहसी और स्वाभिमानी है। यह वापदादे मचित धन पर परने के बदले यात्मनिभर रहन में गौरव का अनुभव करता है और जीविका रिए दिन-यात्रा करने को तैयार हो जाना है। जागीरदार होते हुए भी यह सामती रनियों का विरोधी है । ममहाय गुणवती का पालन पोषण करने पारासरीसिंह भी नवीन विचारों में प्रभावित है और स्त्री FTET का हादिक समपर है । स्त्री-पानों में गुणवती पाठओं की महानुभूति प्राप्त करती है। वह तिरपारी को वरण करने के बार दूसरे को देखना भी नहीं चाहती पिन्त कसरीसिंह के कहने पर यूट जगीरदार सादी करना मजूर कर लेती है। यह उस भारतीय नारी की प्रतिनिधि है जा प्रेमपार में बार मी सामाजिर मर्यादा रात्रिमण नहीं बरती। उसकी शिवा मूग दिगो बनकर रह बाती है । उमरे टोर पिपरीत इन्दु है जा एनसरी तितरी बनी हुई है। नवनिलिना पोवन मतवारी सोगपिना पी पहनती है टीमगार दासी का पुराना है और एक पोलिस मेटा १६२] [हिदी उप यास पृष्ठभूमि और परम्परा प्यार करती है। ऐसी आधुनिका के दान नये ३प यासो मे ही होते हैं। अपनी उदारता एव प्रगतिशीलता के कारण भटटजी ने उसका जसा सहानु भूतिपूर्ण चित्रण किया है घसा नये उप यासकार नहीं कर पाते हैं । उप यास विभिन्न वर्गों के पात्रो की चित्रपाला है। उप यासकार केवल नायक के व्यक्तित्व का विकास न दिखाकर सभी पात्रा का रेखाचित्र अकित करता है । बौने कुबडे नौकर पाली कलूटी दासी का भी उसने आकर्षक रूप में प्रस्तुत किया है। इसमें उसकी मानवतावादी दृष्टि और जनतात्रिक भावना निहित है । वह और आगे बढता है तथा मानव लोक म पशु को भी स्थान देता है । कुत्ता मानिक मालिक के शव पर रो रोकर जान देता हुआ दिखाया गया है। - लेखक के ध्यापक एप्टिकोण के कारण रहस्यकथा एक साथ ही पारिवारिक, जासूसी और सामाजिक उप यास है । इसम उस परिवतन का प्रतिबिंब है जव सामती सस्कृति का पतन और आधुनिक सभ्यता का उदय हो रहा था । गाँव म जागीरदारो का पडयत्र और नगर में बढ़ती हुई विलास वासना दिखाने के लिये अवध की एक जागीर और लखनऊ को घटनास्थल बनाया गया है । लखनऊ ऐसा नगर है जहाँ क्लई की भी कलई की जाती है । लेखक कलई को हटाकर सच्च रूप का उदघाटन करता है । पनड बा लेकर चलने वाली बूढ़ी विधवा किरायादारिन नजाकत और नखरे में एक ही है । 'जहाँ खूबसूरती की विक्री वड चाह और कार के साथ होती है वहाँ नघड प्रमदाओ को पूछ नहीं है। समाज की आलोचना करन म भटटजी का ध्यग्य तीखा हो जाता है शली आवेगमयी बन जाती है । कहावता और मुहावरो से उ हैं शक्ति मिलती है। विगड हुए रईस पर चोट करते हुए वे कहते हैं 'एक ता चढनी उमर दूसरे बड मामी गरामी रईस के लडके सिफारिसती घोडी बादशाह को भी लात मारती है । फिर भी उनके वणन म लालित्य और वार्तालाप म स्वाभाविकता है । पात्रानुकूल वार्तालाप क प्रयोग म भाषा को ज्यो का त्यो प्रस्तुत करने की क्षमता है । बौने और कुबड की बातचीत वडी मजदार है। कुचहा अपन कूबड को सौभाग्य लक्ष्मी के खेलने का गेंद कहता है । वणन और वार्तालाप म रोचक्ता होत हुए भी कहानी म रवानी नहीं है। बगला के अध ऐतिहासिक और सामाजिक उपन्यास जव हिदी मे मोरिन पपास का नाम भी नहीं था, बगला म पूर्व इतिहास वक्मिचद्र और उनके बनुगामी रमश्चन्द्र साट तया लिटन के उप यासों को भारतीय वश में सजाकर भारतीय कथासाहित्य में मौलिक परिदतन उपस्थित करन का येय लूट रहे थे । वक्मि की रचनाएं वगदान म घडाघड निस्ल रही थी और उनकी ख्याति वगाल स वाहर फल रही थी। हिन्दी लखन अपन पडोस की नई साहि िपर गतिविधि स परिचित और प्रभावित हो रहे ध। निज भाषा उन्नति बहै सब उन्नति का मूल भारदेदु को यह अमर वाणा उहें अपन भाषा भण्डार का नए साहित्य से सुसज्जित करने की प्ररणा दे रही थी । आवमापा के लिए सवस्त्र समर्पित परने वार बाबू गदाधर सिंह न वकिम को ' दगनग्निी और रमेशचन्द्र दत्त के वगविजेता का अनुवाद कर हिन्दी में वगला उप यासा के लिए प्रवद्वार बना दिया। प्रथम उप याम कविवचनमुधा (अनमानत १८७७-७८) म निकलकर पुस्तकाकार दो नागा में मा १८८२ और १८८४ में प्रकाशित हुआ । वविजेता सारसुधानिधि में २६ मई १८७९ स छपने । दानों एतिहासिक रोमास हैं। दोनों म अकदर के पासन काल को पृष्ठभूमि बनाकर स्वच्छ प्रेम का' पीडा दिलास दिखाया गया है । इतिहास प्रसिद्ध पात्रों को कल्पनाप्रसून पात्रों ने अपना आट म टिपा लिया है । ऐतिहासिक घटनाएँ गौग और मुकुमार मावो का पान प्रतिपात प्रयल हो उग है। वकिम बघीर पाठको का उपवास का ऐतिहामिय अछाहकर आग बढ़न को सलाह देत हैं। इसी प्रकार इतिहास-रेसफ हार भी रमाबद्र ऐतिहासिक व्यक्ति को जानन के लिए इतिहास पटन की मिफा रित करत हैं । दोनों पात्र व्यक्ति न होकर भावुवता क पुतुले हैं । परुपी म स्त्रिया म अधिक आक्पण है । यश्मि को आया अपन पिता के हिंदू पत्र का सेवा अपन हरम म करत-करत उस अपना प्रमी बना लेना है। रमेाचट का कुनी अपन आश्रयदाता की लडकी पर गैस जाता है। ये परिस्थितियो नाटकाय सोदय की मृष्टि करती हैं सामाजिक सत्य की अमि व्यक्ति नहीं करती। इन उप यासों की रमणीयता प-यौवन की घग, रोमानो वातावरण, प्रगल्म , माव-य्य जना पर निभर है । अनुवाद की भापा परिमार्जित है। वविजेता' म उटू श- उद्धरण चिह्नो मे बद है, मानो व अघत हों। वगविजेता से एक महीना पहले सारसुधानिधि म (२८ एप्रिल १८७९) तपस्विनी नामक एक उप याम निरपर पद हो गया । रपिता पा नामोल्सेस नहीं है । पढे सध्या का विस्तृत अप वपन है पिर गगा - हि दो उप यास पृठभूमि और परम्परा किनारे सुकोमल करतल पर कपाल घरकर वही हुई एक चनुनम वयष्का बालिका के सघामय सुधांशु विनिदित मुखमण्डल नवजलघर सदृशा बालुला यित सदोघ केगजाल की शोभा है । भाव और भाषा की दृष्टि से उपल्यास वगला का अनुवाद प्रतीत होता है । कही ब्रजनाथ भटटाचाय को तरुण तापसी ही तपस्विनी नहीं बन गई हो। भारते दु द्वारा लिखित कहा जाने वाला चद्रप्रभा और पूर्णप्रकार तथा 'राजसिंह भी बंगला के अनुवाद हैं । कुछ विद्वान चद्रप्रभा और पूर्णप्रकाश को भारते दु की मौलिक रचना और हि दी का पहला उपयास मानते हैं । डा० हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार भारते दु हरिश्च द्रन पूणप्रकाश और चद्रप्रभा नाम का सब प्रथम सामाजिक उपयास लिखा था ।"डा० रामविलास गर्मा न उसे हिदी के यथाथवादी कथा साहित्य की पहली कडी मानकर उसका विशद विव चन किया है। हरिप्रकाश यत्रालय से कुलीन क या अथवा चद्रप्रभा और पूर्णप्रका नामक उपायास प्रकाशित हुआ था । मुखपृष्ठ पर यह लिखा है कि वह कुलीन या विवाह सम्व घो एक छाटी सी आख्यायिका है जो वगभापा का माशय लकर प्रका' की गई है । अनुवाद और प्रकाशनकाल का उल्लेख नहीं है । इस पुस्तक को खडगविलास प्रस ने पहली बार १८८९ म और दूसरी बार १९२७ मे पूर्णप्रकार और चद्रप्रभा नाम से प्रकाशित किया । दानों सस्करणो म लेखक का नाम भारते दु हरिश्चन्द्र ह । उसके मूल लखक भारते दु नही हैं और न वह हिदी का पहला मौलिक उपयास हो ह । हरिप्रकाश यत्रालय के संस्करण स यह स्पष्ट ह कि वह बगला उपयास का रूपातर है । वाबू राधाकृष्णदास और बाबू गिवन दनसहाय" का कहना है कि भारतेन्दु ने उसका अनुवाद कराकर शुद्ध किया था। उनके क्थन की पुष्टि 'पद्रप्रभा और पूर्णप्रकाश तथा स्वरूपचद जन द्वारा मराठी से अनूदित रमा और माघद (१९०३) की तुलना स होती है। दोना की कथा एक ही ह पात्रो के नाम योर वणन-गली में थोडा अतर है । चद्रप्रभा और पूर्णप्रकाश मे बूढ़ वर दुर्दिराज का चित्र इस प्रकार सोचा गया ह देखने म दीर्घकार कृष्णवर्ण और कृतथा अवस्था अनुमान चौतीस ।

पूर्व इतिहास] [१६५ वरस की सिर के वार दो एक पकने लगे हैं और साम्हने के दा दौत गिर 'रमा और माधव' म यूटे वर अन्नासाहब का यह चित्र ह उनकी आयु ६४ वप से अधिक नहीं था, गरीर किंचित ऊचा होने से और वृद्धावस्या की आक्ति के कारण पीठ किंचित टेढ़ी दीखती थी मस्तक पर बहुत से बाल कमी के नौ नग ग्यारह हा चुके थे मुख म एक दांत न था। चद्रप्रभा और पूर्णप्रयाग मूलन पहले वगरा म लिखा गया हो या मराठी म यह निश्चित ह कि वह अनुवाद ह । वायू बजरत्नदास ने उस श्रीमती मल्लिका देवी द्वारा अनूदित कहा ह । भारत दु को प्रेरणा से देवीजी ने अनुवाद किया होगा और फिर भारतेंदु ने उसका सशोधन किया होगा। उसका प्रकाशनार अगात है इसलिए अनूदित उप यासा म भी कालक्रम की दृष्टि से उसरा स्थान निर्धारित करना कठिन ह । सहगविलास प्रसस १८८४ म प्रगित भापासार म वह सकलित ह अत वह १८८४ क वाद की रचना नहीं ह । उसकी प्राचीनता असदिग्ध है। राजसिंह के सम्बध में वायू राधाकृष्णनास का कहना है कि भारतद ने उसका अनुदार कराकर प्रथम परिच्छत स्वय नवीन लिखा बागे कुछ गुद्ध किया' " बाबू प्रजरनदास और बाबू गिवनग्न सहाय के अनुसार अनु वाद अधूरा रह गया था, वायू राधाकृष्णदास द्वारा पूरा किया गया तथा पाया गया।" मभव ह अनुवाद मल्लिका देवी द्वारा कराया गया हो भारतेंदु ने समोधन किया हो और राधाकृष्णलाम ने कुछ परिवतन-परिवपन फर उमे छपवाया हो। किन्तु सहगविलास प्रेम म राजमिह' १८९४ म भारतेंदु के नाम म निकला। परिच्छेदों के प्रारम्न मनसा दास, नदनाम रहीम मादि की कविताओं के अवतरण है । मापा गरी म मारते की कम का पो मिलता है लगना है जमे मूलनसक वश्मि नहीं है । अनुपा का स्वरूप जितना ही मुदर है मूल रचनाओं के भाव और विपार उतने ही मनारम है। चप्रमा योर पूाप्रकार अनूषित होकर भी मौलिर उप पास के रूप में समादत हुमा है । पदममा का पिता उसे यूट हाय बेचना चाहता है । उसकी माता और मामा यही पतुराई से उसरा विवाह उसके प्रमी पूर्ण साय परा देते हैं। पुरानी परम्परा दर [हिदा उपन्यास पृष्ठभूमि आर परम्परा नई पौध से पराजित होती है । नवगिपिता नायिका से उसकी माता गुणमजरी अधिक प्रगतिशील और आपक है । उसके रूप मे युगा स पददलित नारी स्वाधीनता और सम्मान की रक्षा के लिए सहसा जाग उठी है । मूलकथा म व्यग्य और विद्रोह की ध्वनि है, प्रासगिक क्या में गूढ मावो को मदु यकार है जिससे उपयास और सुदर हो सका है । पूणप्रकाश अपनी बहन से बाने करता है और उसका अधा बहनोई उस पराया समझकर मन ही मन जलता रहता है । अत में उसकी का निमूल सिद्ध होती है । राजसिंह की भूमिका मे बकिम ने स्वय उसे अपना एकमात्र वास्त विक ऐतिहासिक उपन्यास माना है पर वह भी अध एतिहासिक है । इसम समकालीन सांस्कृतिक और सामाजिक अवस्था का चित्रण तो नहीं है औरगजव के महल को रहस्यमय प्रणय लीला का वणन अवश्य है । चघर कुमारी औरगजेब की वासना पक्लि दष्टि से बचने के लिए राणा राजसिंह को पति मानकर पत्र लिखती है। राजसिंह उसकी रक्षा करने के लिए औरगजेब के साथ युद्ध करता है और विजयी होता है । किम की रोमानी राष्ट्रीयता और आदशवादी भावना उप यास'म उभर कर आई है । उनकी आवेगगील प्रकृति उनके पात्रो म परिलक्षित होती है। दुर्गेगा दना का भौति यहां भी घर घर म मुरी है । राजकुमारी मे उसको सहली अधिक मोहिनी है । राजपूत बालाओ की वीरता और दढता हिन्दू हृदय का स्पर कर लती है। विद्य तप्रभा औरगजेब की तसवीर को ठुकराकर कहती है जैस सिलोना सेलकर सासारिक सुखो की साघ मिटाते है हमने वसे ही मोगल बादशाह के मुह म लात मार कर अपनी साध मिटाया है। - ! १८८१ म वगभाषा से बिंदा चतुरा तथा रामेश्वर का अदष्ट राधाचरण गोस्वामी और राधाकृष्ण दास द्वारा अनुवादित हाकर हरिश्चन्द्र चर्चा द्रका और मोहनद्रिका म मश सितम्बर और दिसम्बर के अको मे प्रकाशित हुए। उसी वप सितम्बर म रमागकर व्यास न मधुमती का अनुवाद किया लेकिन उसका प्रकाशन १८८६ म हुआ। इन रचनाआ को उपयास कहा गया है पर थाकार वो दष्टि स गल्प की श्रणी म रखा जाय तो अनुचित नही होगा। विदो चतुरा तो केवल ग्यारह पृष्ठो म समाप्त हो गई है । उसके मूल लखक सम्भवत सतागचद्र वस हैं । उहोन एक अहीरिन कुटनी का चरित्र चित्रित किया है। रामावर या बदष्ट वकिमचन्द्र क माई सजीवचद्र द्वारा रिसित है । इसम रामेश्वर का अपनी पत्नी से, जा पदमा 1 पूर्व इतिहास] [१६७ म कूद गई थी पर मरी नहीं थी, मार्मिक पुनर्मिलन होता है । मधुमती' की कथावस्तु भी ऐसी ही है । उसके रचयिता का उल्लेख नहीं किया गया है पर वह पूर्णचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित है। यह नारी हृदय के भाव-सधप को करुण कहानी है । मधुमती अपने पति से बिछडकर दूसरे पुरुष से विवाह कर लेती है और जब पहला पति आता है तब दूसरे को छोडकर उसके साथ नदी में डूब मरती है । वगला उप यास मे अक्सर पात्रो का अलग कर मिलाया और मारकर जिलाया जाता है । फालतू भावुकता, अनहोनी घटना और रोमानी कल्पना उसकी विभूति है । मूल्याकन अव तक जिन अनूदित-मौलिक, अपूर्ण पूण रचनामो का अध्ययन किया गया है उनम हि दी-उपन्यास की परम्परा का प्रारम्भ विदु क्सि माना जाय, यह विचारणीय है। अनुवाद और स्पातर इस ऐतिहासिक महत्त्व क अधिकारी नहीं हो सकते यद्यपि कार प्रम और परिमाण की दष्टि से वे अग्रगण्य हैं । मौलिक तिया में 'देवरानी जेठाना को कहानी' से लेकर 'रहस्यकथा तक सभी नये ढग को कृतियां हैं किन्त सभा नये ढग के उपायास को विपतामा से पूण नहीं हैं। देवरानी जेठानी को कहानी का विषय और उसका प्रस्तुतीकरण नया है किन्तु क्या गली पुरानी है उस बडी कहानी कहकर आसानी से छोट दिया जा सकता है। 'वामा शिक्षण म अनेक आवश्यक गुण होते हुए भी फपानव जसी कोई वस्तु नही है साथ ही वह अघ मौरिक है, अत उसका मूल्य अधिक नहीं है। 'माग्यवती पुरानो कपा परम्परा स पूणत विधिन नहीं है । उसके स्वरूप, उपादान और प्रयोजन म नवीनता रहत हुए भी प्राचीनता है । ५० अक्षाराम पुरानी पयाओं ये घिर-परिचित पात्र-राजा साधु ठग और पहिन-यो भूल नहीं सक है । मूलक्या ही भूमिका राजा और पण्डित व सवाद फरुप में वर्णित ठगों को रोमाचकारी लीलामा से बनती ह जो पुराण ती को याद दिलाती है । उसका यारम्भ पूर्वापर कम से घोर विकाम अखड गति से हाता है । घटनाओं के विपास में लिपिस्ता है । दो बार पहानी का अंत होते होते रह गया है भाग्यवती के ससुराल लौटने और यात्रा से आने पर । पुस्तक अध्यायों में विभाजित नहीं है । जसे महापाम्प - १६८] [हिदी उपन्यास पृष्ठभूमि और परम्परा में सर्गों का इतना महत्त्व ह कि उनके आधार पर उसकी परिभाषा निर्मित हुई ह वसे ही उप यास मे यध्यायो की उपयोगिता है । प्रत्येक अध्याय पिछले अन्याय से कुछ ग्रहण करता ह और अगले अध्याय को छ प्रदान करता है। कथात्मक वना और कलात्मा विश्राम (रिलीफ) अध्याया पर ही अव लम्बित हैं। पात्रो का प्रवा और प्रस्थान के लिए उनकी आवश्यकता होती ह । पुराने ढरें की। तुकबहत्तरी मनसखी और सदरसिंह का पत्तात और भाग्यवती म बहुत समानता है। शुक्बहत्तरी की तरह भाग्यवती म स्त्रियो की बनावटी हसी और मौसू झूठी कसम प्रपच भरी बातचीत वहानावाजी और धूतता का रूप दिखाकर स्त्री चरित्र की झांकी प्रस्तुत की गई ह । दोना की नायिकाआ के गाम भी मिलते जुलते हैं यद्यपि भाग्यवत। और प्रभावती दो भिन्न युगा की सप्टि हैं । मनसुखी की भांति भाग्यवती भी चतर और साहसी ह और सपरिवार गगा नहाने जाती ह । मनमुखी का चाचा धूत पवीर से उसी तरह ठगा जाता जिस तरह भाग्यवती का ससर । पकीर तम्बाकू की चाँदी बनाकर दिखाता है और मनसखी क चाचा में यह कहकर गहना लेता है कि वह उसका पचास गुना बना देगा लेकिन हाँडी म पकड भरकर चम्पत हो जाता है उसी प्रकार भाग्यवती के ससुर का एक साघु सम्बिया और पारे से चांदी बनाकर दिखा देता ह और एक दिन उसका सारा गहना रेकर होडी म कक्ह छोड जाता ह । दोनो पस्तको मे गगा किनारे के साधुओं का पाखण्ड वर्णित ह और घों की बातचीत म कृत्रिम स्वाभाविक्ता का पट ह । चरित्र कथाभाग वार्तालाप आदि का साम्य यह सूचित करता है कि यदि भाग्यवती पजाब स प्रकाशित मनसुखी और सु दरसिंह का वत्ता त स प्रत्यक्षत प्रभावित नहीं भी हो ता उसका डाचा परानी क्या कहानी से भिन्न नहीं है। श्रद्धारामजी ने निश्चय ही अपनी कहानी का नमूना पश्चिम से नहीं लिया है। सम्भव ह उहोने मनसुखी योर स दरसिंह के जिन नष्टा तो और प्रसमा का उपयोग क्यिा है वे लोक परम्परा से लिए गये हो अथवा वे उनके जीवन अनुभव और आत्म निरीक्षण के अग हो । वे स्वय क्थावाचर थे और कथावाचक क्सिी गम्भीर विषय को समझाने के लिए रोचक कथा वार्ता और दष्टान्त का आधय रेते हैं । उह सामग्री जीवन स मिला हो या पुस्तक स उसे उन्होंन मौलिक स्वतत्र और सरस रीति से समाने म यपनी कल्पना

Hindi Upnayas Parshth Bhumi Aur Parampara

Author
Dr.badari Das
Title
Hindi Upnayas Parshth Bhumi Aur Parampara
File name
Hindi Upnayas Parshth Bhumi Aur Parampara
Text
OCR done
Citation
1966
Published
2010/12
Publisher
Kanpur,grantham Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
169
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Literature
DLI number
514972
Barcode
4990010022636.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
yXY9WHoTQSz
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