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Antriksh Ki Duniya Main [ Part - 2 ]

Shri S. C. Dutta · 2011/03

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अन्तरिक्ष की दुनिया में
रोमाचक वैज्ञानिक उपन्यास-माला 2
प्रिय सजीव एवं विदुषी पुत्रियों को--

आज हम विज्ञान के युग में रह रहे है जहा प्रकृति के नित्य नर रहस्य खुल रहे है। मानव के लिए जा पात अनवानी समझी जाती थी आज वे सभी सम्भव होती जा रही है। विकसित एव विकासशील देश अपने वैज्ञानिकों को अन्तरिक्ष में भेजकर प्रकृति की खोज में लगे हुए है। आज का वैज्ञानिक चाँद पर पहुच चुका है तथा अन्य नक्षत्रा की खोज में भी किट आदि छोडे जा चुके है। चाँद की धरती क भूखण्ड़ा का नामकरण भी कुछ राष्ट्रों द्वारा किया जा चुका है। भविष्य में चाँद पर यस्तियाँ बनने की भी सम्भावनाए है। इस दिशा मस्स तथा अमेरिका में होड लगी हुई है। इन देशा ने अन्तरिक्ष में कुत्ते, सरगोश बन्दर तथा कीटाणु और पौध भजकर अन्य नक्षत्रों की खोज का मार्ग प्रशस्त किया है। "अन्तरिक्ष की दुनिया म" अन्तरिक्ष से सम्बधित वैज्ञानिक उपन्यासा की एक एसी श्रृंखला है जिसम वैज्ञानिस की रोमाचकारी गतिविधियों उनकी महत्त्वाकाशाओं उनकी खाजों का वर्णन प्रस्तुत किया गया है।

रोमाचक वैज्ञानिक उपन्यास माला
--
अन्तरिक्ष
दुनिया में
2
एस सी दत्त
सहयोग प्रकाशन, दिल्ली-110091

कॉपीराइट सुरक्षित प्रथम संस्करण 1991 मूल्य तीस रुपय सहयोग प्रकाशन 41 सहयोग अपार्टमेंट मयूर विहार फेज- दिल्ली-110091 कम्प्यूटर कोड्स दिल्ली-110009 द्वारा ताज प्रेस मायापुरी नई दिल्ली में मुद्रित Antriksh Ke Dunian Main - (2) Fanda an adventurous science fiction in Hindi by Shri SC Dutta 1 रामशरण का यात्रा पर प्रस्थान "इन्द्रधनुष के विविध रंग वातावरण को अनोखी छटा प्रदान कर रहे हैं पत्तों पर पड़ी बूंदें रंगीन हीरों की तरह जगमगा रही है, अस्त हो रहे सूर्य की लालिमा आकाश को सुनहरा बना रही है हरियाली को देखकर मन गदगद हो रहा है प्रकृति के इस अनूठे रूप को देखकर पाषाण हृदय भी विह्वल हो उठेगा" घास से मखमली बिछौने पर नादिन नगर से दूर जा रहे यात्री रामशण ने गठरी को कंधे पर संभालते हुए कहा यात्री दिन भर यात्रा करके थककर चूर हा चुका था पर निर्जन जंगल में ठहरता भी कहाँ ? भूख से भी वह व्याकुल हो रहा था भोजन की व्यवस्था भी आस-पास नहीं हो सकती थी पलक मारते ही अंधेरा हो जाएगा रास्ते में भोजन के लिए उसने एकाध जगह हाथ-पैर तो मारे परन्तु भोजन खिलाने की बात तो दूर रही किसी ने उसे बैठने तक को नहीं पूछा पिछली बार जब वह यात्रा पर निकला था तो उसे खान-पान की समस्या का सामना नहीं करना पड़ा था एक सज्जन ने उसका उचित ढंग से अतिथि सत्कार किया था उसी सुविधा को ध्यान में रखकर ही रामशरण ने यह मार्ग पुन अपनाया था अब के वह परले से अधिक अनुभव प्राप्त व्यक्ति था इस बार भी उसे एक

वृद्धा रास्ते में मिली थी जिसके कटु शब्दों ने उसकी भूख को ही
सुखा दिया
भूखा प्यासा यात्री
"पता नहीं आज के सभ्य ससार का मानव इतना शुष्क क्यों
होता जा रहा है अतिथि सत्कार की तो बात ही क्या एक मनुष्य
दूसरे मनुष्य के दर्शन करके भी खुश नहीं"
समाज को कोसता हुआ आगे बढ़ रहा था
"अभी तो अगली वस्ती काफी दूर है, सामने खडे टीले पर
पहुच कर शायद कोई बात बन जाय अधेरा हो ही गया है"
थकावट से परेशाा रामशरण ने कहा उसके पांव आगे बढ़ने के
लिए जवाब दे रहे थे
वह मन को तसल्ली दे रहा था ताकि थकावट कम महसूस
हो, उसकी आंखें जल्दी छा रहे अंधेरे में प्रकाश को ढूंढ रही थीं
ताकि विश्राम के लिए तो कोई जगह मिल जाए
"अहा ! रोशनी तो नजर आई" यात्री ने आखों की पुतलियों
को चौडा करते हुए कहा "इधर कोई न कोई घर होगा ही"
जगल के घोर अंधेरे में प्रकाश ने उसे कुछ आशा बँधा दी
इसी आशा से पग बढाता हुआ वह वहा पहुच भी गया
यात्री रामशरण की उम्र होगी लगभग चालीस वर्ष सुडौल
शरीर, रंग चिट्टा, कद ऊचा छोटी-छोटी मूछे, वस्त्र भी उसने
बढिया पहन रखे थे परन्तु रास्ते की धूल ने उसके सुन्दर चेहरे
को धूमिल कर रखा था रात को उसे पहचानना भी कठिन था
वह एक कुटिया के द्वारा पर खड़ा हो गया कुटिया के भीतर
से एक वृद्ध महाशय आहट सुनकर बाहर निकले और यात्री को
संदेह की दृष्टि से देखने लगे
"नमस्ते श्रीमान् जी", यात्री ने कहा "यहा रात को
विश्राम करने के लिए स्थान मिल जाएगा ? मैं बहुत थका हुआ है
6

और रात हो गई है" "आपको पीछे कोई जगह नहा ।म्ला ? मन त समझाया कि मेरा बेटा हरीश आ गया है, मैं तो उसकी प्रतीक्षा कर रहा है, मुझे खेद है कि मैं आपके लिए कोई व्यवस्था नहीं कर सकता" "एक वृद्धा से भेंट तो हुई थी" रामशरण ने कहा "परन्तु वहां मुझे निराशा ही हाथ लगी" "यहां से थोड़ी दूर एक स्थान है, राई, वहां आपके ठहरने का प्रबन्ध हो सकता है" वृद्ध ने उत्तर दिया "मेरा बेटा हरीश भी वहीं कारखाने में काम करता है आज उसने घर लौटने में देरी कर दी है, मुझे शक है कि उन लोगों ने उसे कुछ कर न दिया हो, वह मेरा इकलौता बेटा ही मेरे बुढापे का एकपात्र सहारा है, और है भी वह बड़े सीधे स्वभाव का" यात्री रामशरण की थकान और भूख तो जाती रही, परन्तु उसे वृद्ध के बेटे की चिन्ता व्याप्त हो गई "राई में वे लोग कौन हैं जहां आपका बेटा काम करता है? "गधर्व विश्व विद्यालय के एक वैज्ञानिक किसी अन्य मित्र के साथ वहां काम करते है" वृद्ध बोला "वहां शायद कोई प्रयोगशाला है जिसमें हरीश को भी उन्होंने साथ लगा रखा है" "उन लोगों के नाम ?" "एक का नाम तो शायद विष्णु है, हरीश को ही उनका अधिक पता है मुझे तो अपने भोले-भाले बेटे की बहुत चिन्ता रहती है वह रोज शाम से पहले वापिस लौट आया करता है पर आज अभी तक न-जाने क्यों नहीं आया" वृद्ध का गला रुंध गया था रामशरण ने अनुमान लगा लिया कि वृद्ध वेटे के कारण कितना परेशान है, उसे उन वैज्ञानिकों की गतिविधियों पर भी सन्देह हो गया "महाशय " यात्री ने आश्वासन दिया "मैंने आपकी बात 7

ध्यान से सुन ली है मैं अवश्य पता करता हूं और आपके बेटे को
शीघ्र वापिस भिजवाने के लिए उनसे आग्रह करता हूँ"
रामशरण को वृद्ध की असह्य अवस्था पर दया आई वह शुद्ध
हृदय का व्यक्ति था तथा परोपकारी जीव था उसने मन में सोचा
"मालूम होता है कि वहा वैज्ञानिक प्रयोगशाला में प्रयोग करते है
और वे हरीश का अनिष्ट करना चाहते है"
सज्जनों का हृदय दुखियों के दुख को दूर करने के लिए सदा
ही द्रवीभूत हो जाता है भद्र पुरुष तो पेड के समान दूसरों को फल
तथा छाया प्रदान करता है और स्वय कडी धूप सहन करता है
वृद्ध ने मन कठोर करके कहा "आप का बहुत-बहुत
धन्यवाद आप जाते ही हरीश को उन लोगों से छुट्टी दिलाकर
भिजवा देवे आपके सामने वह वहां से निकल आए, यह ध्यान
रखें क्योंकि वह उन लोगों से बहुत भयभीत है
"आप तसल्ली रखिए"
रामशरण को वृद्ध की शुष्कता तो भूल गई परन्तु हरीश को
उन लोगों से छुड़वाने की धुन सवार हो गई सज्जनता उसे आगे
हाने को मजबूर कर रही थी पाव भले ही उसके पीछे पड़ रहे थे
वह इतनी आयु में ही काफी भ्रमण कर चुका था वह अनुभवी
युवक था तथा हित के लिए जान की बाजी भी खेल लेता था वह
तो कहा करता था-"वह आदमी क्या जो आदमी के काम न आ
V
सके"
कोई और होता तो वृद्ध के कदु व्यवहार पर चिढ जाता
परन्तु उसने वृद्ध से नम्र भाव से विदा ली और धीरे-धीरे आगे बढ़
गया वह अपनी गठरी को दाएं तया बाएं कंधे पर बदलता हुआ
जा रहा था
वन में एक बटिया पगडण्डी पर वह कछुए की मन्द गति से
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चलता गया यद्यपि उसका मन तेजी से उलझन सेलझाने मी लगा
हुआ था
चलते-चलते उसे अधेरे में ऐक टोला, गदेखाई पड़ा पास है
पहुंचते ही उसे मालूम हुआ कि वह तो पैडो का झुण्ड है जिसके
बीच में एक दरवाजा है जो उस समय बन्दया उसके अन्दर अब
कैसे जाए बाहर ताला भी लग रहा था, उसके दोनों और दीवार
थी जिसके साथ-साथ कटीली झाडियों की ऊची वाड लग रही थी
ऐसी जगह को गठरी के साथ फादना खतरा मोल लेना था
उसे तो हर कीमत पर अन्दर जाना था वह अपने मन में
गुनगुना रहा था
प्रण करके पीछे हटना ही मूर्ख की पहचान
जो प्रण अपना पूरा करता वही सच्चा इन्सान है
दुविधा में तो वह फस हो गया था दीवार फांद तो चोर और
चला जाए तो प्रण भंग होता है तथा वृद्ध के साथ विश्वासघात
करना था विश्वासघात उसके लिए पाप था
"दीवार को ही फादूगा" उसने निर्णय कर लिया "इस समय
ताला तोडना ठीक नहीं जो होगा देखा जाएगा जब ओखली में सिर
दिया है तो चोटों का क्या डर"
यात्री को विश्वास हो गया कि यह निर्जन स्थान उन्हीं
वैज्ञानिकों का हो सकता है और यह उनकी प्रयोगशाला है उसे
अपने पर भी क्रोध आ रहा था उसने व्यर्थ ही दूसरे के लिए
झंझट मोल ले लिया था
ऐसे अन्धेरे में कटीली झाडियों के बीच में से निकलना सरल
काम नहीं था परन्तु वह तो धुन का पक्का था दीवार फांद कर बाड
में से निकलते समय उसका शरीर छलनी हो गया आगे खाली
स्थान पर उस मकान का आगन था जो भवन का पिछवाडा
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था उसने वहा खड़े होकर स्थिति को आंका
उस विशाल बंगले को दो रास्ते जाते थे एक सामने वाले
बरामदे में पहुंचता था दूसरा दूसरी ओर से घूमकर पीछे को जाता
था वहीं शायद उनकी प्रयोगशाला थी वहां पक्की सडक-सी बनी
हुई थी जहां कि जगह-जगह गड्ढे पड़े हुए थे वहां से उनका भारी
सामान दोया जाता होगा यह बड़ा मकान कई जगह से मरम्मत
मांगता था
एक भाग तो विल्कुल काला हो रहा था प्रयोग करते समय
धुए से ऐसा हो गया होगा
"हे प्रभु । मैं कहा आ फंसा" वह अपने को कोसने लगा
"जो होगा सो देखेंगे" वह सामने की ओर जाकर बरामदे की
सीदियों पर चढा सामने घटी लगी हई थी उसने घंटी बजाई कोई
उत्तर न मिला दावारा घटी बजाई तब भी कोई न बोला उसमें
खड़े रहने की तो शक्ति रही नहीं सामने पडे बैच पर वह लेट गया
और प्रतीक्षा करने लगा
ग्रीष्म ऋतु थी पर वर्षा हो जाने से ठड हो गई थी ठडी हवा
भी चल रही थी यात्री चूर-चूर हो रहा था पेट में भूख के मारे चूहे
भी नाच रहे थे
ऐसी अंधेरी और शान्त रात में सिवाए उल्लू और झींगुर के
कुछ भी सुनाई नहीं पड रहा था जिससे वातावरण और भी अधिक
भयावह प्रतीत हो रहा था
"अरे । भीतर से यह कैसा क्रन्दन सुनाई पड़ रहा है" थकान
से ऊघते हुए यात्री ने कान लगाते हुए कहा
"अन्दर खूब
हल्ला-गुल्ला मचा हुआ था जैसे मार-पिटाई हो रही हो"
"मुझ छोड दो मैं अन्दर नहीं जाऊगा, मुझे घर लौटने
दीजिए" कोई जोर-जोर से कह रहा था
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AK- होकर "अन्दर तो सचमुच ही कोई गडबड है. देखता हू इधर घटी को कोई सुन ही नहीं रहा। रामशरण उठा और मकान के पीछे जो पहुँचा जहा शोर हो रहा था स्थिति प्रतिकूल होने पर भी वह वहां जाडेदा उसने देखा कि तीन व्यक्ति परस्पर जूझ रहे थे उनके सामने जान 'वह इतना ही बोला "बस । बंद करो, इस सघर्ष को" वे तीनों अलग हो गए उनमें से एक हट्टे-कट्टे व्यक्ति ने क्रोध में कहा - "तुम गुण्डे । इस समय कैसे आ टपके हो ?" "मै यात्रा पर निकला हूँ" "तो यह यात्रा गृह है ?" "एक असहाय वृद्ध के इकलौते बेटे का पता करने आया हूँ जा तुम्हारे पास बताया जाता है" "तुमने रात के समय यहां घुसपैठ करने की हिम्मत कैसे की?" "मुझे तुम लोगों से इतना ही कहना है कि इस युवक को वापिस घर भेज दो" छोटे कद का जो दूसरा वैज्ञानिक था, और जो रामशरण को पहचानता था वोल उठा "आप मुझे पहचानते हैं ? आपका नाम रामशरण है न?" "बिल्कुल, आप मेरे कॉलेज के साथी धवन ही तो है" "खूब पहचाना आपने आपकी स्मरण शक्ति की मैं दाद देता हूँ" धवन ने हाथ बढाते हुए कहा कॉलेज में पढ़ते समय तो उनकी आपस में कभी बनी नहीं थी धवन कुटिल प्रकृति का छात्र था, वह रामशण की कार्यकुशलता तथा परोपकार की भावना के कारण उससे सदा जला करता था धवन अपने वैज्ञानिक साथी विष्णु की ओर मुडा और बोला,

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"यह है मेरे पुराने वैज्ञानिक मित्र रामशरण, जो कि आजकल बुढापे
के कारणों की खोज तथा भाषा-विज्ञान के क्षेत्र में भी छान-बीन
कर रहे हैं
वही जिनका समाचार-पत्रों में भी प्राय नाम आया
करता है इनकी इतिहास तथा दर्शन शास्त्र में भी विशेष रवि है
"पर इस समय यह घुसपैठ कैसी ?" विष्णु ने उपेक्षा की
दृष्टि से पूछा
"जरा शान्त रहो" धवन ने विष्णु को ठड़ा करने की
चेष्टा की और रामशरण को सम्बोधित करते हुए बोला
"प्रिय मित्र । इस युवक हरीश को तो हम छोड देते हैं तुम
आओ और जलपान करके विश्राम करो"
'धन्यवाद । वास्तव में इसका पिता इसके लिए व्याकुल
है"
"यह युवक जरा घबराया हुआ है शान्त होने पर हम इसे
भेज देते हैं" विष्णु ने भी अनुमोदन किया
धवन रामशरण को एक ओर ले जाकर बोला "इसे अभी
दौरा-सा पड गया था नहला-धुला कर इसको भेज देते है तुम
रात को मेरे पास ही ठहरो"
इन बातों से रामशरण को इन लोगों पर और भी सन्देह हो
गया, पर हरीश को इन कसाइयों से छुडाने की समस्या विकट थी
विष्णु तो क्रोध से लाल-पीला हो रहा था धवन ने उसे
समझा-बुझा कर शान्त किया
"चिल्लाना बंद करो और चलो अन्दर" विष्णु हरीश को
डांटने लगा
"नहीं मैं भट्ठी में जलने को तैयार नहीं हूँ, मैं बलि का बकरा
नहीं बनूगा"
धवन ने सफाई पेश करते हुए कहा "वास्तव में हरीश एक
बार प्रयोगशाला में प्रयोग करते समय जल गया था तब से इसके
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मन में डर बैठा हुआ है" इतना कहकर
परीश की और
मुडा और बोला -- "घबराओ मत, एक बार अन्दर चला और हम
तुम्हें शीघ्र ही तैयार करके घर भेज देते है"
विष्णु ने धवन को संकेत से अतिथि
ले जाने के
A
लिए कहा
--
"इधर ही ठीक हूँ" - रामशरण बोला
"अरे यार । आओ बैठे" धवन ने आग्रह किया, "आज युगों
के बाद तो मिले है
"जैसे तुम्हारी इच्छा" बैठक की और बढते हुए थके-मांदे
रामशरण ने कहा और अन्दर जाकर सोफे पर बैठ गया धवन
उसके लिए खाद्य-सामग्री लेने चला गया
-
2 हरीश के बदले बन्दी
यात्री रामशरण बैठे-बैठे ऊब गया उसे अपने विद्यार्थी जीवन की
याद आने लगी धवन कॉलेज में बड़ा घमण्डी छात्र गिना जाता था
दूसरों से और विशेषकर रामशरण से वह डाह करता था पढने में
तो उसने विज्ञान का छात्र होते हुए भी महात्मा गाधी पडित नेहरू,
बाबू राजेन्द्र प्रसाद चर्चिल तथा नैपोलियन इत्यादि विभूतियों की
जीवनियां पढ डाली थीं पर था वह बडा टोंगी और धूर्त
इसी बीच में बार खुला और धवा चाय लेकर आ गया चाय
प्याली में डाल हुए वह बोला 'मित्र ऐसे निर्जन स्थान में इस
समय तुम्हारा आना कैसे हुआ ?"
रामशरण ने उत्तर दिया "तुम्हें पता है शुरु से ही मेरी
यात्रा करने में रुचि रही है इधर से निकलते समय एक वृद्ध से
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भेंट हो जाने पर उसके इकलौते पुत्र के घर न लौटने की समस्या
सामने आई इसी लिए मुझे यहां आना पड़ा" धवन बडे ध्यान से
उसके चेहरे की ओर देखता रहा
"मित्र, तुम्हारा साथी किस खोज-वीन में लगा है ?"
"मेरा सहयोगी विष्णु विश्व-विख्यात वैज्ञानिक है वह
आजकल दूसरे नक्षत्रों पर पाए जाने वाले स्वर्ण भण्डार को पाने
की धुन में लगा हुआ है उसमें सफल होने पर हम मालामाल हो
जाएगे" इतना कह कर उसने प्याले में और चाय डाल
दी और वोला "हरीश को तो नहला-धुलाकर घर भेज
दिया है"
प्याला पीते ही यात्री रामशरण की जीभ लडखडाने लगी, आखे
पथरा गई और अंग-अग दीला हो गया उसके सामने सब कुछ
घूमने लगा उसे नशे का आभास हो रहा था
वे दोनों साथी उससे थोड़ी दूर बैठे कुछ फुसफुसा रहे थे
धवन विष्णु स कह रहा था "इससे तो वह छोकरा हरीश
ही ठीक था वह भी बुद्धू और बेकार उसके शरीर का ककाल यदि
प्रयोगशाला में टाग भी दिया जाता और दूसरे नक्षत्र के निवासियों
को सौपकर यदि हमें स्वर्ण के भडार मिल जाते तो क्या हानि
थी"
--
"यह तुम्हारी मल है" विष्णु ने कहा "उस छोकरे की तो
रात से ही तलाश शुरू हो गई थी उससे तो हमारा भण्डा तुरन्त ही
फूट जाता रामशरण के तो कोई आगे है न कोई पीछे, अकेला दम
है हरीश का तो लौट जाना बेहतर था"
रामशरण को काफी कमजोरी आ गई थी वैसे तो वह अकेला
ही इन दोनों के लिए काफी था परन्तु इन दुष्टों ने उसे नशीली
औषधि पिलाकर विवश कर दिया था
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फिर भी उसने हिम्मत बांधी और द्वार की ओर भागा, वह
चिटकनी खोलने को ही था कि पीछे से एक लाठी उसके सिर पर
पडी, लाठी लगते ही वह गिर पड़ा
3 भूलोक से आगे
दोनों वैज्ञानिकों ने रामशरण को जकड कर बंद कर दिया
"अब" विष्णु ने पूछा
"पक्षी के पर काटकर उसे पिंजरे में बंद कर दिया गया है
अव उसके उड़ने की संभावना कम है" धवन का उत्तर था
जव रामशरण को होश आया तो उसने अपने आपको एक
डिब्बे में बद पाया उसने ऊपर झांका तो तारे टिमटिमा रहे थे
उसने डिब्बे की एक दीवार को छुआ तो वह भट्टी की तरह जल
रही थी जबकि दूसरी ओर की दीवार एकदम ठंडी थी
वह नशे की स्थिति में था उसे विश्वास हो गया था कि इन
लोगों । उसे कुछ नशीली औषधि पिला दी है फिर भी उसने
हिम्मत नहीं हारी उसने उठने की चेष्टा की, परन्तु दीवार के
दूसरी ओर लुढक गया उसे अपना बोझ बिल्कुल नहीं महसूस हो
रहा था वह भारहीन बुत बना बैठा था
शीघ्र ही उसका कमरा गूजने लगा ऐसा प्रतीत हो रहा था
जैसे बम पड़ रहे हो अब उसे पता लगा कि वह आकाशयान में उड
रहा था उस यान पर उल्कापात हो रहा था
उसे चाँद भारी गोले की तरह दिखाई दिया
"इतना बडा चाँद ।" वह हैरान था
तभी द्वार खुला अन्दर अंधेरा था उसे किसी व्यक्ति की
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--
झलक दिखाई दी दार झट बद हो गया वह झलक किसी और
की नहीं थी, विष्णु ही अन्दर आया था
रामशरण अचम्भे में पड़ा सोच रहा था
"हे परमेश्वर ।
मैंने अपनी होश में कभी किसी का बुरा नहीं किया फिर मुझे किस
पाप का दड मिल रहा है ? राजी है हम उसी में जिसमें तेरी रजा
है मनुष्य को तो शुभ सोचना तथा शुभ ही करना चाहिए मुझे तो
कर्म करने का पूरा अधिकार है परन्तु फल का दाता भगवान है"
इस प्रकार वह अपने मन को दाढस बंधा रहा था
तब उसने विष्णु की ओर झाकते हुए कहा
"मित्र । यह
सब क्या माजरा है ?"
"क्या करोगे पूछ कर ?" विष्णु का उत्तर था
"मैंने तुम्हारा कोई अनिष्ट किया है जो तुमने मुझे समाप्त कर
देने की ही ठान रखी है "
"यह तुम्हारी दूसरों के घर घुस-पैठ करने का परिणाम है"
"मेरा इसमें कोई स्वार्थ नहीं था"
"तो तुम दूसरों के ठेकेदार बनना चाहते हो? हमारी योजना
मे तो तुमने रोड़ा अटका दिया है"
"मैने केवल उस वृद्ध बाप के बेटे को वापिस घर भेजने भर
के लिए ही तो आग्रह किया था"
"उसे तो हमने भेज ही दिया है न" -- विष्णु बोला
"फिर मुझे कैदी बनाकर क्यों ले आए हो?"
"चुप रहो और देखते जाओ" विष्णु ने उसे धमकाया और
द्वार बंद करके चला गया
वैज्ञानिक यात्री फिर सोच में पड गया
इन दुष्टो से तो तक करना ही वेकार है कोई बात नहीं मुझे
भी अपने परम पिता परमात्मा के न्याय पर अटूट श्रद्धा है बस
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उसी की कृपा दृष्टि चाहिए पथिक रामशरण मन ही मन विचारने लगा aslil 4 आकाशमोगा की रामशरण का जीवन मृत्यु से भी खराब था परन्त, परमार्थी जीवों को ऐसी कठिनाइयों से जूझना ही पड़ता है उसकी दार की ओर दृष्टि गई द्वार खुला और विष्णु सामने खडा मिला "हम जा कहां रहे है ?" उसने पूछा "धरती से लाखों मील दूर आकाश गगा की ओर" "किस लिए ?" विष्णु ने व्याख्या करते हुए कहा "क्या क्यों तथा किस लिए का उत्तर दूढने के लिए इसी जिज्ञासा को शान्त करने के लिए ही तो बड़े-बड़े आविष्कार होते रहे हैं" "मानव के मन में अनादि काल से ही प्रकृति के रहस्यों को जानने की जिज्ञासा रही है विज्ञान की खोजों ने मानव के मन से अंधविश्वास भगा दिया है अब इन्द्र देव कुपित होकर अतिवृष्टि तथा बाद नहीं पैदा करता अधिक अन्न उपजाने के लिए मानव को बलि नहीं चढ़ानी पडती आधी, तूफान तथा महामारी इत्यादि का इलाज क्या क्यों तथा कैसे के उत्तर से ही विज्ञान ने खोज निकाला है" "अब यह भली-भाति विदित हो गया है कि प्रकृति के कुछ अटल नियम है उनका उल्लघन करने से प्रकृति में उथल-पुथल होता है क्योंकि उसका संतुलन बिगड जाता है हमारा यहां आने 17

का तात्पर्य इसी जिज्ञासा को शान्त करना है"
"तुम्हारे साथी तो चमकीली धातु (स्वर्ण) के भण्डार पान की
वात बता रहे थे" - कैदी ने बताया - "यह सवव तो हुआ पर मुझे
फसा कर लाने से इन बातों का क्या सम्बन्ध है ?" उसने बात को
बदलते हुए कहा
"हम प्रयोग कर रहे है "
"उसके लिए मैं ही बलि का बकरा मिला हूँ ?"
अधिक वाद-विवाद स कोई लाभ नहीं अव तो जिस स्थिति
में हो उसे ही सहर्ष स्वीकार करो तुम्हारा वलिदान व्यर्थ नहीं
जाएगा विना बलिदान के आज तक कुछ भी नहीं मिला बिना
खतरा माल लिए कोई भी बड़ा काम आज तक सम्पन्न नहीं हो
सका"
'अच्छा । तुम्हें नई दुनिया की बाज की धुन पर हो रही
-
विष्णु जा अपने शास्त्रा का भी जानकार था बाला "हमारे
शास्त्रों में भी तो लोक लोकान्तरों की यात्रा का वर्णन मिलता है
योगियों ने योग बल द्वारा अन्य ग्रहों का भ्रमण किया प्राचीन काल
में भारतवर्ष तो आर्यावत कहलाता था विज्ञान के क्षेत्र में भी बहुत
उन्नत था महाभारत में युद्ध के अनेक आयुधों का उल्लेख है
योगीराज श्रीकृष्ण ने तथा पाण्डव महारथियों ने युद्ध में ऐसे-ऐसे
गैस तथा अस्त्र फेंके थे जिसस युद्ध क्षेत्र में अधेरा छा जाता था
आग बरसने लगती थी तथा वादल फट जाते थे वास्तव में जो
प्रगति ऋषि मुनियों ने योग द्वारा की थी वह आज विज्ञान द्वारा
दिखलाने के लिए मानव कृत सकल्प है"
"तुम आकाश गगा पर ऐसे ही घूमने के स्वप्न ले रहे हो जैसे
धरती पर घूमते है " रैदा ने प्रश्न किया
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विष्णु ने उत्तर दिया "सभी विचारक और वैज्ञानिक अपने स्वप्नों को ही तो आविष्कार के रूप में साकार करते हैं, विचार ही तो क्रिया का स्प धारण करते हैं" तभी द्वार में से चौधिया देने वाली रोशनी हुई इस तेज प्रकाश में तो आखें ही अन्धी होने जा रही है" "अभी काले चश्मे का प्रवन्ध किए देता ह जिससे नेत्रों को कोई हानि नहीं होगी" विष्णु थोडी देर बाद चश्मे ले आया "कैदी का शरीर अब एकदम हल्का हो गया उसने साथ रखी आक्सीजन से लम्बी सास खींची और अन्तरिक्षयान के मोटे शीशों में से बाहर का दृश्य देखने लगा वाह । कितना अनुपम दृश्य "यहां तो बस ऐसे ही नजर आएगा हमारे पास व्यर्थ खर्च करने के लिए आक्सीजन नहीं है अब शान्त हो जाओ" विष्णु ने कहा और द्वार बन्द करके चला गया 5 यात्री की आशका रामशरण सकेत पाकर धुप हो गया, परन्तु मन उसका बहुत बिन्न था उसकी नींद भी हराम हो गई थी भूख-प्यास भी चिन्ता से सूख गई थी, ऐसा होना स्वाभाविक ही है क्योंकि ऐसा रोग ही जो जीवित मनुष्य को भी जला देता इसीलिए चिन्ता को चिता से भी बढकर कहा गया है उसका जीना नरक से कम नहीं था वह इस दुविधा में था कि उसे वे लोग कैदी बनाकर क्या करेंगे? वे दानों वैज्ञानिक उससे इधर-उधर की बातें करते थे परन्तु रहस्य नहीं बताते थे उसके 19

वालने पर भी प्रतिबंध लगा हुआ था उस बेचारे की हसा भी हवा
हो गई थी वह मन ही मन पछताता रहा था
अब जी के क्या करेंगे जब दिल ही टूट गया
क्या खुशी मनाएगे जव हर साथी छूट गया
सोचा था जीवन भर ही निश्चित विचरना है
पर क्या खवर थी एस नरका से गुजरना
है
पर हित में जीवन यापन क्या पाप है मर राम ।
सभवत पुण्य की यातिर दने पड़ रहे है दाम
झरना सरिता तरुवर भी करत रहत उपकार
पर नर-पिशाच है करता रहता सबका उपकार
फिर भी रामशरण का उस न्यायकारी प्रभु के त्याग पर अटल
विश्वास था इस उधेड-वुन में वह लग ही रहा था कि द्वार खुला
और धवन ने प्रवेश किया
"मित्र । और कितनी यातनाए दोगे ?" उसने पूछा
सत्र रखो धवन ने हमेशा अपने जीवन में ऊची उडान भरना चाहा
था वह अन्य नक्षत्रों पर पहुँचने के स्वप्न लेता था और प्रकृति के
नए-नए रहस्यो की खोज का श्रेय लेना चाहता था उसकी खाज
से विज्ञान के क्षेत्र में नया अध्याय जुड़ जाएगा उसकी ख्याति सर्वत्र
फैल जाएगी तथा उन नक्षत्रों में पाए जाने वाले स्वर्ण भण्डार के
पाने से वह मालामाल भी हो जाएगा"
कैदा रामशरण के मन में बीते काल
घटनाए घूम रही थीं,
उसने दक्षिण भारत के तटाय प्रान्तो के अनेक बाढ-पीडित लोगों की
सेवा की थी उत्तर भारत में भी तूफान से नए परिवारों के बीच
उसने काम किया था उडीसा प्रान्त में महामारी के फैलने से कई
रोगा परिवारा की उसन सहायता की थी वह तो परोपकार की
साक्षात मूर्ति था वह हर धर्म के व्यक्ति से अपने जैसा ही व्यवहार
20

स
करता था उसे पर दुख हरने में ही आनन्द मिलता था
उसकी समझ में एक बात नही आती थी कि उसे किस कुकर्म
का फल मिल रहा है उस अपने सद्कृत्यों पर पूरा भरोसाज्या
उसने आज तक किसी का अनिष्ट सोचा भी नहीं था इस यातनी ।
का कारण उसके पूर्व जन्म के किसी कुकर्म का फल ही हो सकता:-
है क्योंकि प्रभु का न्याय तो अटल निष्पक्ष तथा दयापूर्ण होता है"
योगा ऋषि मुनि तथा महात्मा लोग भी तो.अनेक कष्ट सहन..
करते आए है सत्यवादी हरिश्चन्द्र मर्यादा पुरुषोत्तम श्री जोर
योगीराज श्रीकृष्ण इत्यादि युग पुरुषों ने भी अपने जीवन में दूसले
के लिए अनेक विपदाओं का सहन किया वह इस बात पर गर्व
करता था कि वह अति वशिष्ठ, उद्दालक दधीचि, विश्वामित्र
तथा नारद जैसे मुनियों की मतान है जिन्होंने अने ब्रह्म तेज
और तपस्या से ससार का कल्याण किया और दूसरों की भलाई
के लिए सर्वस्व न्यौछावर करके अपनी अमिट छाप छोड़ी
अपने कमर में पडा-पडा वह इन विचारों में डूबा हुआ था कि
उसे सूर्य की किरण दिखाई दीं वे अधिक तेज प्रतीत हो रहा ची
उसकी पहली धारणा कि ऊपर विल्कुल अन्धकार तथा खाली वायु
मण्डल मिलेगा अब विल्कुल बदल गई इस परमपिता परमात्मा
की असीम शक्ति का आभास उसे उन शब्दों में हो रहा था
इस असीम का निर्माता तो होगा नहीं कभी ससीम
कैस नहीं ब्रह्माण्ड रचाने वाला होगा स्वय असीम
इस विशाल यान के कई छोटे-छोटे कमरे थे उसे वहा टहलने
का अवकाश मिल गया उसने वहां की खोज-वीन करनी शुरू कर
दी परन्तु उसकी गति-विधियों पर रोक लगा दी गई शायद
इसलिए की उन व्यापारी वैज्ञानिकों ने उन कमरों में सामान छिपा
रखा था

उन लोगों व्यवहार से उसे विश्वास हो गया कि वे उसे
बन्दी बनाकर रखेंगे उसने भी अपने को परिस्थितियों के अनुकूल
दालना शुरू कर दिया सच है समर की गति को पहचानना
ही बुद्धिमत्ता है
इस ईमानदार कैदी ने स्वेच्छा से ही उन लोगों के हर काम में
भाग लेना शुरू कर दिया उन्होंने भी उसकी मदद को स्वीकार कर
लिया इससे वे एक-दूसरे के अधिक समीप हाने लगे पर वे उस
पर निगाह वरावर रखते धे
कुछेक कमरों में तो वह झाक भी नहीं सकता था एक कमरा
तो पायलट का था जहां से वे उस जहाज का नियन्त्रण करते थे
वैज्ञानिक रामशरण बढिया रसोइया बन गया वह प्रेम से
भोजन बनाता और वे सभी मिलकर खाते सोने से पूर्व वह उनसे
बातें करके जी बहला लेता था धवन को अब भी उससे कॉलेज
वाली ईर्ष्या चल रही थी
रामशरण रसोई का काम निपटा कर बिस्तर पर जा लटा
पर नींद उससे आख-मिचौनी खेल रही थी उसे एकदम ध्यान
आया अभी कुछ काम तो रह ही गया है वह झट उठा और दवे
पाव रसोई में गया अंधेरे में ही निपटाना उसने ठीक समझा वह
काम करके लौट ही रहा था कि उसने दोनों को बातें करते हुए
सुना धवन की बात साफ सुनाई पड रही थी परन्तु विष्णु की दूरी
के कारण कम
धवन कह रहा था "यान से उतर कर कैदी का क्या
करेंगे?"
"क्या मतलव ?"
'अगर यह भाग निकला तो धवन ने प्रश्न किया
'क्या बात करते हो। नए प्राणियों को देखते ही इसके प्राण
--
22

खुष्क हो जायेंगे और फिर बिन साथियों के भागकर जाएगा कहाँ " वे दोनों देर तक बातें करते रहे उनकी बातों से यही निष्कर्ष निकलता था कि वे उसे बन्दी बनाकर बलि चढाना चाहते हैं थोड़ी देर बाद द्वार खुला और वे अपने कमरे में चले गए उसने सास रोक ली ताकि उन्हें उसके वहा होने की भनक न पड़ जाए वह भी अपने कक्ष में लौटकर शीशों में से व्योम की अद्भुत छटा देखने लगा उसे फिर बलि का ध्यान हो आया धवन उससे अपनी पुरानी शत्रुता निकालना चाहता था ईर्ष्या का बीज तो उसक मन में पनप ही रहा था अब उसे अनुकूल वातावरण मिल गया था इसी कुचेष्टा की पूर्ति के लिए यह चाल चली गई थी और हरीश की बजाए वे उसे फसा लाए थे उनकी जुबानी उसने सुना था कि वे उसे अकाश मगा के असुरों के आगे डाल देंगे वे दैत्य बडे-बडे दातों वाले लम्बी-लम्बी जीभों वाले माथे पर भी सींग रखने वाले तथा खूनी आखों वाले होते हैं उसकी कल्पना के अनुसार वे नरभक्षी हैं वे नग्न रहते हैं तथा मनुष्यों का रक्त पीते हैं धरता के जीवों को काट-काट कर खाना ही उनका काम था यही नारकीय जीवन था वे राक्षस धरती के जीवा को उल्टा लटका कर उनकी चर्वी निकाल कर पीते थे रामशरण इस दृश्य की कल्पना करके व्याकुल-सा हो रहा था क्योंलि अब उसके परोपकारी जीवन की अन्तिम घडियाँ थी पर यह भयकर कल्पना भी उसके मनोबल को न गिरा सकी वह जानता था कि जीवन निरन्तर संघर्ष का हो दूसरा नाम है और कठिनाई मनुष्य का भट्टी से निकले हुए सनि की तरह निसीरवी

है वह पुन सोच में पड़ गया
"मैं इन दोनों से ही जूझ लूगा जब ऐसी घड़ी आएगी मृत्यु
जीवन में एक बार आती है भीरु बनकर मरने से अच्छा है कुछ
कर गुजर कर मरना जीवन सेज नहीं, काटों की शय्या है प्रभु
हमारी सहन शक्ति के अनुसार ही कठिनाइयों का बोझ हमपर
डालता है और उन्हें झेलने की शक्ति भी वही प्रदान करता है"
"जीवन परमात्मा का ही लघुस्प है प्रभु का सामर्थ्य असीम है
और जीव का सीमित अत विपदा आने से पूर्व ही क्यों गम से मर
जाए समय आने पर मैं इन दोनों का पत्ता काट दूंगा इतना सोचते
हुए उसने अपनी आट में छिपाए हुए तेज छुरे को टटोला और कैदी
पक्षी की आरती गुनगुनाने लगा
आता है याद मुझको गुजरा हुआ जमाना
वा झाडिया चमन की वो मेरा आशियाना
जब से चमन छुटा है यह हाल हो गया है
गम दिल को खा रहा है दिल गम को खा रहा है
आजाद मुझको पर दे ओ कैद करने वाले
मैं बेजुवा हू कैदी तू छोडकर दुआ ले
6 स्वप्न तथा सान्त्वना
वारे को यदि पता लग जाए कि अगली घडी में उसको वलि
चदाया जाएगा तो वह कटने से पहले ही दम तोड दे बकरा तो
क्साई का हाथ भी चाटता रहता है
रामशरण का कसाई तो उसे नशीली दवाई पिलाकर बाध
लाया था और उस पता भी था कि उसकी खैर नहीं
24

चिन्ता के कारण उसका शरीर टूट रहा था रात को लेटते ही वह स्वप्न के ससार में विचरने लगा वह असुरों के बीच में घिरा हुआ था वहा भारी मेला लगा हुआ था उसमें विचित्र प्रकार के जीव थे विषैले साप, बिच्छू तेन्दुए भेडिए, शेर लकड़बग्घे, चीते सापों की जीमें लपलपा रही थी वन्य जन्तु गरज रहे थे असुरों ने बड़े-बड़े कडाहे भट्टी पर चढा रखे थे जिनके बीच जिन्दा ननुष्या की चर्बी पिघल रही थी उनमें से झुलसते हुए जीव निकल कर भाग रहे थे कुछ लोग मछलियों की तरह तिलमला रहे थे वड़-बडे सींगों और दातों वाले दैत्य नर-मुडों की मालाए गले में डालकर जलने कडाहाँ के चारों और नाच रहे थे साथ ही एसा बाजा बज रहा था जिसकी भयावनी ध्वनि वातावरण को अधिक भयावह बना रही थी भाग रहे जीवों को राक्षस पुन पकड-पकड कर कडाहों में झोंक रहे थे इस धरती के प्राणियों को उन राक्षमा ने भेडा के रेवड की तरह बाध रखा था उन सबके शरीर पर गर्म लोहे से छापे लगाए जा रहे थे वलि की यही निशानी थी उन राक्षसों से बचने के लिए रामशरण भी दौड रहा था पीछे-पीछे राक्षस थे अन्त में वह एक गुफा में जा छिपा वह गुफा भी एक असु' की ही थी अपने शिकार के लिए दाना असुरों में टक्कर हो गई दोनों ही सींग भिडाने लगे उनकी जीमें लटक रही थीं वे एक-दूसरे के शरीर में दात गाडर खून पीन लगे इस रागटे खडे करने वाले दृश्य को देखकर रामशरण का क्पन शुरू हो गया और इतने में उसका स्वप्न भी टूट गया "ओहो । कितना डरावना स्वप्न था वह चौक पड़ा और नेत्र खुलते ही उसने अपने को काल-काठरी में पड़ा पाया उसका 25

जहाज आकाश गगा की और उडा जा रहा था
उसका वाझ बिल्कुल हल्का हो गया वह अपने स्थान पर ही
उडा जा रहा था उसे दिग्भ्रम हो गया था और पता नहीं लग रहा
था कि कौन सी दिशा किधर है उसकी स्थिति अजीब ही थी
कमरे की सभी चीज तैरने लगी उसे खाना-पीना भी कठिन
हो गया जलपान भी नली के द्वारा कर सकता था जल की बूद
बिखरने पर कान, नाक तथा आन में घुस सकती थी बिस्कुट का
एक टुकडा भी छूटकर साथ ही साथ उड़ने लगा उसे पकड पाना
भी समस्या थी
यान की तेज गति के कारण कैदी की नस-नस वे ठिकग्ने हो
गई छत फर्श में और फर्श छत में बदल गया
वे दोनों वैज्ञानिक भी कम परेशान नहीं थे उनकी हालत भी
उतनी लम्बी यात्रा में दयनीय हो चुकी थी
कैदी को अब वह घडी बार-बार याद आ रही थी जब कि
रात को हरीश के वृद्ध पिता पर दया करके जान-बूझकर उसने
यह आफत मोल ले ली थी उस भलाई का बदला बुराई में मिल
रहा था उसने अपने दिल को सान्त्वना दी
उसने एक नेक
युवक के प्राण बचाए थे वह गुनगुनाने लगा
ऐ मालिक तेरे बन्दे हम ऐसे हो हमारे करम
नेकी पर चलें और वदी से टलें
ताकि हँसते हुए निकलें दम
7 कैदी भाग निकला
आकाशयान को जोर का झटका लगा
"यह क्या। रामशरण ने घबराकर कहा
"
6

"आन्तरिक्ष यान रुका है" विष्णु बोला
अभी अन्धेरा था कैदी ने झाका तो वे परस्पर बातें कर रहे
थे
"सामान को सावधानी से उतारना है" - विष्णु ने कहा
"खिडकी को ध्यान से खोलो" धवन बोला
थोड़ी देर में खिडकी खुली कैदी ने नीचे देखा उसे यह देखकर
कुछ सतोष हुआ कि जैसा उसने सुन रखा था धरती वैसी नहीं थी
घोर नरक वाली बात वहा कोई नहीं थी बल्कि दृश्य मनोरम था
एक ओर हरी-भरी धरती थी और तीन ओर जल भरा हुआ था
जल नीले रंग का था पेड लम्बे-लम्बे थे शायद वह सजी होगी
वहां उसे चट्टानें भी नजर आईं
यात्रा के दौरान में रामशरण ने उनके सामान में से एक
पिस्तौल निकाल रखी थी तेज छुरा तो उसके पास था ही उन
दोनों के पास भी पिस्तौलें थी
'अव धरती पर उतर चलो" -~- विष्णु ने आदेश दिया
"इसी खिडकी में से ही निकलना है " कैदी ने पूछा
"हा"
वह खिडकी में से झिझकता हुआ उतरा परन्तु धरती पर पाव
रखते ही उसे शान्ति मिली उसे भारत भूमि की याद हो आई
"भगवान भली करे" कैदी ने प्रभु को याद किया
इस नए संसार में वह चिडियाघर में आ घुसे अपरिचित प्राणी
की तरह नेत्र फाड-फाड कर देखने लगा उसे विश्वास नहीं हो
रहा था कि वे लोग जल के किनारे पर है अथवा रेत चमक रही
है वहां विभिन्न रग थे थोड़ी देर में ही उसका सन्देह मिट गया वे
लोग वास्तव में एक विशाल झील या नदी के तट पर खड़े थे
"यह लो चाबिया विष्णु ने धवन को चावियां देते हुए कहा

--
-
"सामान भी तो उतारना है धवन वाला
कमरा तो सालो
विष्णु ने कमरा खोला रामशरण ने भी उसमें झाका पर घुटन
के कारण वह एकदम पीछे हट गया उसन अनुमान लगा लिया कि
लोग धरती से आकाश की जमीन पर तस्करी का सामान लाते
ले-जाते होंग
उसन जव एक ओर दृष्टि डाली तो उसे एक विचित्र प्राणी
नजर आया इसी लोक का जीव होगा उसने साधा
तभी उन लोगों ने सामान उतारना शुरू किया कैदी ने भी
उनका हाथ बटाना शुरु किया वह चुपचाप कैसे रह सकता था ?
सामान काफी था, वस्त्र अस्त्र-शस्त्र यादने का सामान खान की
सामग्री और प्रयोगशाला के उपकरण
रामशरण क भाग निकलने की काई सभावना नजर नहीं आ
रही थी उनका अन्तरिक्ष यान एक बड़ा गोला-सा था जिसके नीचे
टागे खोल दी गई थी उन्हीं के ऊपर जहाज धरती पर खडा था
उसे जल तरगे भी आनन्द दे रही थी मन्द-मन्द चलती हुई
पवन भी सुखद थी वहा की हरियाली भी नेत्रों की प्यास को बुझा
रही थी ऊची उठती हुई लहरें उसे हिन्द महासागर में आने वाले
ज्वार-भाटे की याद दिला रही थी पूर्णिमा की रात को कई बार
भारतीय समुद्रों में तूफान ला देने वाली तरगे आज उसे देखने को
मिल रही थीं यूरोप के तटीय प्रदेशा में तो सरकार ने बडे-बड़े ऊचे
वाघ भी तरगां से हाने वाली हानि के बचाव के कारण बना रखे थे
"तुम सामान को उतारते जाओ मैं पकडता जाऊगा" विष्णु
बोला
"रामशरण तुम बीच में खड़े होकर इधर से उधर
सभलवाओ"

गए थे"
"मैं तो तैयार ही हू कैदी ने स्वीकृति दा
बिना अधिक समय नष्ट किए वे तीनों एक सीध में खड़े हो
गए धवन खिडकी से सामान कैदी को सौंपता गया और विष्णु
सभालता रहा उसे जानबूझ कर बीच में रखा गया था ताकि उसे
उस सामान वाले कमरों का भेद न खुल जाय, उसके लिए भी और
कोई चारा नही था
रामशरण मन-ही-मन भाग निकलने के उपाय भी सोच रहा
था
काम करते-करते उन्हें भूख सताने लगी
"अब तो भोजन कर लिया जाय" धवन ने प्रस्ताव रखा
"हा । काम के चक्कर में पेट-पूजा की बात तो हम भूल ही
विष्णु बोला
सामान ढोते-ढोते कमर भी टढी हो गई है" धवन बोला
"परमेश्वर ने कमर को इसीलिए लचकदार बनाया है
विष्णु ने चुटकी ली "लो अव तो सीधा कर लो"
वतीनों पसीने से भीग रहे थे बैठते ही ठडी हवा का झोंका
आया
'वाह है भगवन् । इतनी दूर भेजकर भी तुम्हें हमारे आराम
की क्तिनी चिन्ता है" रामशरण ने हृदय से प्रभु का धन्यवाद
किया
रामशरण के साथ उन्होंने मिलकर जो कुछ भी मिला
भूखे-भेडिए की तरह खा लिया उन दोनों ने तो मदिरा भी पी
परन्तु कैदी ने नहीं खाना खाते समय भी वे दानों उसमे हटकर
बैठे थे वे एक-दूसरे स सावधान रहते हैं
खाने से निपटकर उन्हें झपकी आने लगी ऐसा होना
स्वाभाविक ही था कैदी ने भाग निकलने की सोची भी परन्तु
--
29

विवश था उन लोगों ने अपने-अपने पिस्तौल निकाले और उसे
सकेत किया
पहले तो उसकी समझ में कुछ न आया
"उधर सामने देखो क्या है" -- विष्णु ने कहा
सामने झील के कैदी को पाच-छह जीव नजर आए वे लम्बे
थे पूरे पेड़ के पेड़
ये तो खम्भे होगें ? उसने सोचा
थोडी देर में वे हिलने लगे, उनकी टागे अजीव थीं वे किसी
धातु के बने हुए मालूम हो रहे थे उनकी इन्द्रिया उनके शरीर से
विचित्र दग से जुड़ी हुई थीं
वह चिल्लाकर भागने ही वाला था कि उन दोनों ने उसे थाम
लिया "छोड दो मुझे क्या इन राक्षसा का भक्ष्य मुझे बनाना चाहते
हो"
"भागो तो कहा भागोगे ?" दोनों ने पिस्तौले दिखाते हुए
कहा
तभी जल के दूसरी ओर से जोर की ध्वनि हुई
"वे लाग जल के पार हमें बुला रहे है"
रामशरण पीछे लौटना चाहता था वे उसे आगे पानी की ओर
धकेल रहे थे
जल के पार से एक और आवाज आई वही लंबे-लंबे जीव
इन्हें चेतावनी दे रहे थे उन दोनों के चेहरे भी पीले पड़ गए विष्णु
ने पिस्तौल चला दी धमाका हुआ धुआं उठा उधर वे जीव इनसे
दोगुनी संख्या में ये
वे प्राणी इधर को बढने लगे रामशरण जो अपने शास्त्रों में भी
पारंगत था तुलसीदास की चौपाई दोहरान लगा
धीरज धर्म अस नारि
--
विष्णु बोला
30

आपद काल परखिए चारि इस समय तो धैर्य ही रखना पड़ेगा अडिग हो विश्वास जिनका वे कभी डिगते नहीं किन्तु भीर मौत से पहले है मरते बार-बार अब मैं भाग चलू - पथिक को ठनका वे दोनों वैज्ञानिक अपने प्राणों के लिए छटपटाने लगे कैदी की तो चिन्ता एक और रही उन्हें अपनी पड़ी हुई थी उधर वे वायवाय जीव इन्हें हडप करने के लिए तुले हुए थे वे दोनों सिर पर पाव रखकर दौड़ने लग रामशरण मी जल में कूद पड़ा परन्तु उ. दोनों से उल्टी दिशा में वह जल में गिरता-पडता बढता गया और उसे पार कर गया इस दौड में उसे पानी के गहरे और कम गहरे का भी कोई ध्यान न रहा उसे शरीर की चोटों की भी खवर न रही वह झील के पार धरती पर खड़ा था परन्तु विना पीछे देखे घने जगल में वह भागता गया अब उसे कोई खतरा भी इरा नहीं सकता था रामशरण इस नई दुनिया में पटक दिया गया:मा. वह घने जंगल / निम्देश्य घूमने लगा उसे बीच-बीच में गोलियां चलने की आवाज भी सुनाई पड रही थी लम्बे-लम्वे पेडों में से वह आगे बढ़ता गया तत्काल तो उन दोना शत्रुओं के फदे से वह निकल भागा था, परन्तु आगे उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था वन में चलते समय एकाध जीव कभी-कभी उसका रास्ता काट जाता था वैसे वह जगल वन्य प्राणिया स शून्य-सा था वह अकेला अपनी धरती 31

--
"
से अरबों मील दूर दूसरे नक्षत्र की धरती पर उदास मन से घूम
रहा था
आकाशीय जीवों का जो भय उसके मन में अभी तक छाया
हुआ था वह धीरे-धीरे दूर होने लगा कभी-कभी नारकीय जीवन
से दुखी होकर वह अपने जीवन का अन्त करने की बात जो
सोचता था अब उसके मन से हटने लगी
मै अन्तिम श्वास तक अपने भाग्य स जूझने का प्रयास
कस्गा मैं तो व्यर्थ ही उन प्राणियों से डर रहा था मस्गा तो वीरा
की मौत मरुगा" उसने मन में सकल्प किया तथा अपने चाकू
और पिस्तौल को टटोला 'ये मेरे पक्के साथी है फिर डर
किसका ? यह अनमोल जीवन व्यर्थ गवाने के लिए नहीं मिला है
यह तो प्रभु की अनुपम देन है
वह एक टीले पर चढने लगा वहां उसका किसी भी
आकाशीय जीव से टकराव नहीं होगा मैदानों में घूमते समय वे
शायद मिल सकते थे वे टीले उस अपनी धरती के टीला से भिन्न
ही दिखाई दे रहे थे जैस व टीले लम्बे और नोकदार थे वैसे ही
वहा के वे जीव भी थे जो उसने पहले देखे थे उसके चढते समय
जार से हवा के झांके आ रहे थे
रामशरण विज्ञान के तथ्यों से पूर्णतया जानकारी रखता था
वहा धरती की अपेक्षा बोझ हल्का हो जाता है वहा घाटियों में उसे
नीचे बहती हुई नदिया भी मिली उनका जल गर्म था तथा उनके
ऊपर की हवा भी वन की ठडी हवा से नदी की गर्म हवा में
पहुचकर उसे सदी और गर्मी का आभास साथ-साथ ही होने लगा
रात होने को धी ठडी हवा के झोंके उसे तंग करने लगे
लम्ब-लम्बे पेडॉ के नोक्दार पत्ते हवा में झूमने लगे बीच-बीच में
आकाश की छटा भी दिखाई देती थी और नारे भी टिमटिमाने लगे
32

यहां भी भर था कि कही कोई प्राणी पेडा के झुंडों में से न आ 5 अन्धेरा छाने लगा, पर ठड में भी नदी की गर्म पवन उसे आराम दे रही थी सिवाए नदी की गर्म हवा क उसे कोई ओर सहारा नजर नहीं रहा था, एसी ठडी रात में उसे आग चलते रहने में भी कोई नहीं था ऐमी अन्धेरी रात में ठड के समय वह कहा टक्करें ना रहेगा ? "बेहतर होगा कि मैं नदी के नद पर ही रात को विश्राम करूं मेरे लिए कौन गर्म झापडी तैयार मिलेगी " उसने अपने को झाया कुछ कदम बढाते ही ढलान शुरू हो गई आग छोटी-सी नदी वह रुका जहा सुहावनी पवन वह रही थी "इधर ही रुक जाऊ तो ठीक है "रामशरण ने सोचा और रुक गया तभी उसके कानों में जल के गिरने की ध्वनि सुनाई "पास ही झरना होना चाहिए' ऐसा आभास होते ही ने नजर दौडाई झरना बहता हुआ पाया वह रहे झरने की मधुर ध्वनि उसे बडी सुहावनी लगी प्यास : थकान से वह वैसे ही व्याकुल हो रहा था "जल से प्यास बुझा लू तो कैसा रहे ?" वह बोला जव ने थोडा-सा जल पिया तो विषपान वाली बात हुई एकदम वा उसने थूक दिया शरीर आगे न वदने के लिए बाध्य कर था नेत्र नींद से बरवस बद हो रहे थे थककर वह चूर हो | था झरने के पास एक खोखले स्थान में वह घुटन र सोने की चेष्टा करने लगा वह लेट- आता है याद मुझको गुजरा हुआ

वह झाडियाँ चमन की वह मेरा आशियाना
आजादिया कहा वो वो सब का मिलके गाना
आधी के साथ उडना और तालिया बजाना
मित्रों की सगति में बीता था जो जमाना
भगवान् फिर से ला दे स्वपन का वह जमाना
उसे अकेले पड़े-पड़े अपने बचपन के मस्त जीवन की याद
सता रही थी वह अपनी धरती के लोगों के जीवन की शकी भी
देखने लगा लोग इस समय विस्तरों में पडे नींद ले रहे होगे छात्र
हॉस्टलों में अध्ययन में लीन होंगे रगीले व्यक्ति क्लवों में
रगरलिया मना रहे होंगे नशे मे मस्त लोग कल्पना के ससार में
घिर रहे होंगे युवक हराश भी अपने वृद्ध पिता के हृदय को शान्ति
प्रदान कर रहा होगा
रामशरण अपने हृदय को ढाढस दे रहा था कि दु ख-सुय तो
केवल महसूस करने के लिए होते हैं
दिल की बदौलत रज भी है दिल की बदौलत राह भी
यह दुनिया जिसको कहते हैं दोजख भी है जन्नत भा
जैसे दिन के बाद रात गर्मी के बाद सर्दी वैसे ही सुख
के
साथ दु ख जुड़ा हुआ है जब हम अच्छे दिनों का आनन्द उठाते है
तो बुरे दिनां के कप्ट को भी सहन करने के लिए तैयार रहना
चाहिए सुख-दुख हानि-लाभ तथा जीवन-मरण भाई है मनुष्य
को इनके वीव अपने जीवन की नैया को वलाते रहना चाहिए
9 इपि स भेट
अन्तरिक्ष यात्री रामशरण अपने भूले दिनों की याद करत-करते
गहरी नींद सो गया था प्रात आय युलते ही उसे जोर की प्यास
34

--
लगी थोडा आगे बदा तो उसे एक और झरना नजर आया उसके
जल से उसने होंठ गीले किए यह जल कडवा नहीं था
अब खाने की भी समस्या थी उसका क्या प्रबन्ध हो ? वह तो
अब भूख से व्याकुल होने लगा न उसे किसी जीव-जन्तु का गम
था न ही किसी शत्रु का डर इस नए ससार में वह अपना साथी
आप ही था वह बावले व्यक्ति की तरह अपना रोना-धोना अपने
से ही रो लेता था
उसके पास तेज चाकू था उससे उसने पेड़ों की छाल काटकर
चखी
वाह । इसमें तो भोजन का स्वाद है" उसने उसे चवाते
हुए कहा न होने से तो अच्छा है वह उसी छाल को दर तक मुह
मे डालकर जुगाली करता रहा
पेडों के झुड में एक खाली जगह पर उसने कुछ विचित्र
प्राणियों को विचरते देखा वे लम्बे तथा दुबले पतले थे गर्दन भी
बहुत लम्बी और पिछली टागें छोटी थीं पिछली टागों पर वे खडे
होते थे वह ओट में छिपकर उन्हीं को देखता रहा
उन जीवों ने उसके देखते-देखते उन लम्बे पेड़ों के सभी पत्ते
खा डाले और पेडों को रुड-मुड कर दिया जहा से पत्ते खाए ये
वहा से एकदम सूर्य तेज चमकने लगा अब वे दोनों ही एक दूसरे
को नजर आने लगे उन प्राणियों की आखों से तथा हाव-भाव से
सहानुभूमि टपक रही थी
सूर्य के प्रकाश में रामशरण ने लम्बे-लम्बे पदार्थ देखे वे
एकदम सीधे और नुकीले थे उनके बीच में से पानी बह
"ओहो । ये तो पर्वत है यद्यपि हमारी पर क्या
भिन्न है ये तो आकाश को छूते हुए नुकीलेच दार मीनार से
कुछ पदार्थ तो यहा देखने को मिले" खुवह वाली
हा-

--
पवता की सुन्दरता पर प्रसन्नता प्रकट कर रहा था अचानक
वह चौक पडा
अरे । य दैत्य स क्या दिखाई दे रहे है ?" उसने अनोखे
जावों की आर दयते हुए कहा जो उन पर्वता की ओर से बाहर
निकल आये थे वे लम्वं माटे तथा विचित्र आकार के ये सिर उनके
छाटे-छाट थे और हाथ गद्ददार उनमें से एक रामशरण को
टिकटिकी लगाकर देखने लगा
ऐस लगता है जस मुझे अभी या जाएगा" उसने सोवा
यहा ठहरना ठीक नहीं वह एकदम वहा से दुम दबाकर भागन
लगा और दूर घन जगल में जाकर छिप गया वह भयभीत हुआ
काप भी रहा था
हे सबके रक्षक प्रभो । मुझ इन दैत्यों से बचा । इस नई
दुनिया में भरा सिवाए तुम्हार और लौन है पर हा मेरे पास भी
आत्मरक्षा का सामान है जव तक दन में दम है मैं इन राक्षसों से
जूझूगा उसने मन को तसल्ली दी
कुछ क्षण रुक्कर वह फिर चल पडा चलते-चलते वह एक
चटटान पर पहुचा जिन्सक आग दलान थी बिना पीछे देखे वह नीवे
उतरता गया गिरता-पड़ता वह नाचे पहुच ही गया उसके सामाने
उस भयानक जीव का चहरा नजर आ रहा था थोडी देर में वह
एक नदी के तट पर जा पहुंचा
अभी उसका सास धमा ही था कि एक और भयानक जीव उसे
जल में दिखाई दिया वह दैत्य जल में से ऊपर को उठा वह
एकदम काला तथा चमक्ते हुए शरीर वाला था शरीर पर
लम्ब-लम्बे वाल थे पिछली टार्ग छोटी थी और उसके शरीर से
भाप निकल रही थी उसका शरार न मनुष्य का था न भालू का
और न हा क्गार का वह ता सभी का एक मिला-जुला स्प था
36

उसके मध्य में थैली थी 'विभो । अब तो मेरे सम्मुत्र साक्षात राक्षस खड़ा है म जीवन की डोरी तेरे हाथ है" प्रार्थना करते ही रामशरण जगल में बड़ी लम्बी-लावी घास में जाकर छिप जाने का यत् किया "आकश से गिरा, खजूर पर अटका एक दैत्य से बचा था । दूसरे असुर से सामना हो गया" उसने कहा निरापराध यात्री के सच्चे हृदय की प्रार्थना को भक्त वत्स प्रभु ने स्वीकार कर लिया वह जीव यडा हो गया पिछली टार पर खड़ा होकर वह जोर-जोर से गरजने लगा सारा जगल गू उठा यह भी अच्छी बात थी कि उस जीव का ध्यान दूसरी यह तो मनुष्यों की तरह शोर मचा रहा है इन जीवा की में अपनी कोई भाषा होगी उसने सोचा इनसे सम्पर्क से शायद इन भाषा का भेद खुल जाय वह कुछ ही क्षण पहले अपने प्राण बचाने की फ्रिक मे था औ- अब वह उनसे परिचय प्राप्त करने की सोचने लगा एसा होन स्वाभाविक ही है ज्ञानवृद्धि की जिज्ञासा किस प्राणी में नहीं होती- यात्री का भय भाग गया उसने नए प्राणी की आर गौर से देख उस आकाशीय जीव ने अब शोर बद कर दिया लहरें भी शान पड़ गई वह जीव शायद अपने साथियों को बुला रहा था इन दान की आखे चार हुई रामशरण जमकर बडा हो गया दैत्य ने इसे देखा और पीई हट गया कुछ देर बाद वह फिर आगे वढा पथिक पहले तो कुछ सहम गया परन्तु तुरन्त अपने को सभाल कर वह भी उसकी ओर बदा और अपना हाथ बढाया जिससे वह भी झिझका यह भ

स्वाभाविक ही था दो भिन्न-भिन्न सभ्यताओं के जीवों का मेल
होने जा रहा था
पहले तो उस जीव ने सिकुड कर भाग जाने की चेष्टा की
परन्तु वह तुरन्त ही सभला अब वे दोनों चुप-चाप खडे रहे दोनों
चाह रहे थे कि दूसरा पहल करे भय लज्जा और आश्चर्य तीनों
का सम्मिश्रण उनमें दिखाई दे रहा था
रामशरण को इतना हौसला हो गया था कि वह दैत्य न तो
कोई भयानक जीव है और न ही उसका शत्रु है बल्कि उसमें
सहानुभूति तथा जिज्ञासा के भाव विद्यमान थे वह दैत्य वापिस
लौटने लगा
अब रामशरण उसे मिलने के लिए व्याकुल हो उठा और
उसके पीछे-पीछे हो लिया
"सुनिए आप किघर जा रहे है ?" वह दैत्य से बोला
दैत्य कुछ गुनगुनाया यद्यपि यात्री की समझ में कुछ नहीं
आया दैत्य न मुडकर उसकी ओर देखा और एक प्याला नीचे से
उठाया उसने लौटकर प्याले को नदी के जल में डुबाया और अपनी
कमर से कुछ निकाल कर प्याले में डाल दिया फिर उसने मुह
लगाकर प्याले स जल पिया तब उसने दावारा प्याले को भरकर
पथिक की और वढाया और फुसफुसाया
स्पष्ट था कि पथिक से वह मित्रता गांठना चाहता था अत
संकोच छोडकर पधिक ने भी प्याला पकडकर जल पी लिया
"वाह शरीर में जान आ गई खाली प्याले को वापिस
लौटाते हुए पथिक वोला "बहुत-बहुत धन्यावाद"
दैत्य ने अपने पेट पर हाथ मारा पथिक सोचने लगा
शायद यह कुछ कहना चाहता है वह गुनगुनाया
"हृपि । हृषि" - दैत्य ने पुन पेट को पीटते हुए कहा
38

THAN A . "हृषि । हृपि" - पथिक ने भी उसकी तरह अपने पेट पर हाथ मारते हुए कहा वह अब समझ गया कि उसका नाम इषि है और ऐसे सभी जीवों को हृपि कहते हैं "मनुष्य ' मनुष्य” रामशरणे, ने फिर अपना पेट पीटते। कहा 'मनुष्य । मनुष्य" दैत्य ने भी नकल करने की चेष्टा परत हुए अपना पेट पीटा दैत्य भी समझ गया कि यात्री के धरती पर ऐसे जीवा को मनुष्य कहते हैं "हृपि तो सस्कृत भाषा के ऋपि शब्द का ही विकृत रूप हो सकता है" अनेक भाषाओं के विशेषज्ञ यात्री ने सोचा हृषि (दैत्य) ने थोड़ी देर में धरती से सूखी मिट्टी उठाई और "धरा , धरा" कहकर पेट को पीटने लगा "धरा धरा" - यात्री ने भी दोहराया "भूमि - भूमि धरा-धग, पृथ्वी-पृथ्वी" सस्कृत भाषा के पडित रामशरण ने पेट को पीटते हुए एक साथ ही इन शब्दों का उच्चारण किया हृपि ने भी इन शब्दों को दोहराया "हन्न, हन्न -मुह की और सक्त करते हुए हृपि ने पेट को पीटा "हन्न, हन्न" उसन भी वैसे ही नकल की रामशरण ने अब उसे समझाने की चेष्टा की "अन्न-अन्न" इसने मुह की ओर सकेत करके पेट को पीटा "अन्न-अन्न' हृपि ने भी वैसे ही कहा थोडी देर में हृपि ने प्याले में जल भरकर घूट भरते हुए कहा "जोलो-जालो" रामशरण ने भी वैसे ही किया यह समझ गया कि - ११

जल को जोलो कह रहा है
"जल-जल" - इसने उसी प्याले से जल पीते हुए कहा
हृषि ने भी वैसे ही किया
राम शरण खुशी क मारे उछल पडा
"अब मैं इनके खाने-पीने के शब्दों को समझ गया हूं" उसने
कहा "ये शब्द तो हमारी सस्कृत भाषा के ही बिगडे हुए रूप प्रतीत
होते है अब तो मैं शीघ्र हा आकाश गगा की भाषा को समझ
सकूगा
उसे अब भूख सताने लगी हन्न-हन्न उसने दृषि का सक्त
किया दूसरे ही क्षण हृषि ने पेड़ की और सकेत करके एक ऐसा
अस्त्र फका जो पेड से रसभरे फल का गुच्छा काटकर वापिस
लौट आया पथिक को उन्हें याकर अगूरों का-सा आनन्द आया
10 न्यारी दुनिया
रामशरण ने दात दिखाकर प्रसन्नता व्यक्त की हृपि उसी समय
थोडी दूर तैर रहे एक लम्बे तख्त को उठा लाया उसके साथ
लम्बा-सा डडा था जो दोनों सिरों से कटा हुआ था उसने अपने
पेट पर हाथ मारकर उस तख्त की ओर सकेत किया
"गच्छो-गच्छो" वह बडबडाया
यात्री समझ गया कि वह उस तख्त पर बैठने का कह रहा
गच्छो शब्द सस्कृत के गच्छ का ही स्प है जिसका अर्थ जाना होता
है
"अव न-जाने वह मुझे कहां ले जाएगा, धरती के शत्रुआ से
मुश्किल से पीछा छूटा है तो यह पीछे पड़ गरा है"
है
40

वह सोच में पड़ गया उसकी साप के मुह में छिपकली' वाली
स्थिति हो गई पर हृपि के अतिथि सत्कार से प्रभावित होकर
उसके सग चल पड़ने का निर्णय उसने ले ही लिया
"जब यमराज से भी जूझ कर देख लिया तो इसके साथ
चलने में क्या बात है" वह हृपि के पीछे-पीछे हो लिया उसने उसे
नाव में विठा लिया नाव तथा हृपि दोनों बराबर लम्बे थे अत वह
तो आराम से उसमें लेट गया और डडा हाथ में ले लिया अब वह
लेट-लेटे बड़े आराम से आकाशीय नाव को खेने लगा
नदी का जल गर्म था कुछ देर बाद नाव एक झील में पहुच गई
गर्म छीटे यात्री को तग कर रहे थे दूर किनारे पर उसी प्रकार के
जीव फुदक रहे थे जिनसे डरकर वह नदी की ओर भागा था
"ऐसा न हो कि यह मुझे उन नर-पिशाच धवन और विष्णु के
हवाले फिर कर दे" उसे सदेह हुआ परन्तु हुरे और पिस्तौल को
टटोलकर पुन उसे सब हो गया
नाव में बैठे-बैठे उसे अपनी धरती पर अफ्रीका तथा अरव
देशों में प्रचलित दास प्रथा का स्मरण हो आया उसने कई बार
वहा होन वाली अमानुपिक घटनाओं का वर्णन पढा था
वहा हज पर जाने वाले हजारों यात्री उन देशों के गुडे
व्यापारियों के हाथ लग जाते है सैकड़ों मीलों तक जहा रेगिस्तान
होता है जहा उन गुडा ने भूमिगत अड्डे बनाए होते हैं वे लोग
नवयुवकों तथा युवतियों को बन्दा बनाकर उन्हें रेवडों में जजीरा के
साथ बाघ देते है
तब वे उन बन्दियों को दासों की मडिया में बेचने के लिए ले
जाते हैं वहा उनकी भेड-बकरियों की भाति नीलामी होती है जो
युवक व युवती सरस अधिक कोडे अपने नगे शरार पर
हंसते-हसते सहन कर लेता है उसके दाम ज्यादा मिलते है
.
41

ग्यारह-ग्यारह वर्ष के बच्चों को भी वहां बेचा जाता है विक जाने पर अधिक से अधिक मूल्य मिलेगा, 6 दर्जन खाली बोतलें इन दामों की एक अलग जाति है जो अपने को मगरमच्छ के वशज मानते हैं उनमें यह रिवाज है कि वे क्न्या को व्यस्क होते ही व्यापारियों को सौप देते है वे उन्हें मड़ियों में बेचते समय उनके दात गिनते है जैसे कि गौ-भैसों के व्यापारी करते हैं जो व्यापारी उन्हें खरीदते उनके वे जन्म भर दास बन जाते है यदि वे भागने पर पकड़े जाए तो कसाई या तो उनका गला काट देते हैं या कोई अग ऐसी वर्वरता पूर्ण प्रथा का रामशरण को ध्यान आ रहा था "जो होगा सो देखा जाएगा उसने सोचा और नाव में बैठा-बैठा गर्म पानी के थपेड़े सहता रहा उस हल्की-सी किश्ती का चलाना सरल काम ही था नाव हल्की लकडी की होगी पानी भी कम गहरा था जल के दोनों और उसने नजर डाली वहां भी पर्वत और धाटिया थी पर्वत ऊचे और नोकीले थे हृपि के अन्य कई साथी भी वहा नौका विहार कर रहे थे सूर्य उनके ऊपर था वे भूमध्य रेखा के ऊपर से गुजर रहे थे रामशरण गर्मी से घबरा गया उसने अपने वस्त्र उतारे हृषि समझ गया की उसे गर्मी परेशान कर रही है उसने चप्पू जल्दी-जल्दी चलाना शुरू कर दिया नाव शीघ्र ही किनारे जा लगी हृषि अगले पंजा पर फुदक कर पार हो गया यात्री भी कम गहरे जल में से निकल गया हृपि ने नाव को खिलौने की तरह उठा कर तट पर रख दिया सारी दोपहर वै नाव चलाते रहे थे यहां पहुंचते ही शाम हो गई यात्री को अभी भी डर लग रहा था कि उन दासों की तरह 42 वाले उसका सौदा भी न कहीं हो जाए वहा पहुचते ही असुरों ने उनकी प्रेहिल लिया आव हुपि से जो शायद जल का प्राणी था भिन्न-थै वह उनसे दूर रहा था क्योंकि धरती जैसा जीव तो वही उसे मिल ही सहीं सकता था अब वह इतना उदास था कि उसे कैदी चना उसके दोनों शत्रु भी यदि उसे मिल जाते. तो वही उनका स्वागत करता वहा कई प्रकार के और जीव भी उसे मिल उसके लिए वे सभी अपरिचित ही थे उन जीवों से मित्रता तो वह गाठना चाहता था परन्तु विवश था क्योंकि न-जाने वे कैसा व्यवहार करें अत वह शान्त होकर अगली घटनाओं की प्रतीक्षा करने लगा रात हो गई उन लोगों ने आग जलाकर उसके चारों आर चक्कर काटने शुरू कर दिए थोडी देर में उसे अपनी नाक दबानी पडी शायद मास भूनने की तेज गन्ध थी हे भगवान् । हमने तो सुन रखा था कि अन्य नक्षत्रों के प्राणी बडे सुसभ्य सज्जन तथा पवित्र जीवन व्यतीत करने वाले होते हैं परन्तु ये तो राक्षसी दृति के प्रतीत होते हैं" थोड़ी देर में सभी ने खाना खाया और फिर शोमरस पिया जो सोमरस का ही दूसरा स्प होगा यात्री को फल खाने को मिले तब वे साने के लिए पास ही कन्दरा में चले गए 11 विस्तृत जानकारी आन्तरिक्ष यात्री रामशरण का जीवन उन लोगों में रहकर मशीन की नरह हो गया था धीरे-धीरे वह उन जीवों के जीवन पद्धति की गहराइयों में जाने के लिए उत्सुक होने लगा इसके लिए उन जीवों से गहरा सम्बन्ध जाडना शुरु किया उसने उनके रीति-रिवाजों का तथा भाषा का विस्तृत अध्ययन करना शुरू कर दिया उसन देखा कि उनमें एक वर्ग ऐसा था जो ऊचे दिमाग का गिना जाता था वहा उसके जिम्मे दूसरा को शिक्षा देने का काम था वहा के युवक उसके मनाविनोद की सामग्री भी जुटाते थे व लोग यात्री के मीठे स्वभाव के कारण उससे बहुत प्रसन्न थे उनमे दूसरा वर्ग था जो अनेक प्रकार के यन्त्र बनाता था और अस्त्र-शस्त्र प्रयोग करता था उन लोगों की पुस्तके पेड़ की कडा छाल पर छद करके लिखी गई थी जिन्हे कि उंगलिया रखकर पढा जा सकता था जैसे धरती पर नेत्रहीनों की कितावें होती है उनकी भाषा भारतवर्ष की प्राचीनतम भाषा सस्कृत से बहुत मिलती- जुलती थी ऐसा प्रतीत होता था कि किसी युग में उन लोगों का विश्व की प्राचीनतम भारताय सभ्यता से सम्पर्क रहा होगा उनकी कविताए मधुर तथा उत्साहवर्धक होती थी यद्यपि उनका उच्चारण तनिक अजीब-सा था सगीत मा उनका बहुत मीठा होता था वे एक प्रकार के वाद्ययन को उंगलियों से बजाते थे जिसे सुनकर वह मुग्ध हो जाता था सहगान के समय वे एक शब्द "ओमी हो ओमी हो" का वार- वार उच्चारण करते थे जो ओउम् शब्द का ही स्प था "इनका भी ईश्वर में विश्वास है - उसने सोचा और अपनी जिज्ञासा को शान्त करने के लिए उसने पूछा - रामशरण उन जीवों के साथ काफी घुल-मिल गया था उनकी माया समझ नेता था तथा उन्हें अपने भाव समझा भी लेता था उसक साधी अच्छे विद्वान प्रतीत होते ये जहां पहले उसे अपने कैदी होने का दुख था वहा अव नई दुनिया की जानकारी प्राप्त करके प्रसन्नता भी थी 44 14- . 11 V "ओमा सब से महान् और शक्तिशाली को कह हृषि ने उत्तर दिया "उसका निवास स्थान " रामशरण हे पूछा पियाड "वह यहा भा है और वहा भी" "उसका आकार-प्रकार कैसा है ?" "वह सुन्दरतम भी है और उसकी कोइ मूर्ति भी नहीं "ओमी करता क्या है ?" "अपनी मौज से हृपियों को, देवा को तथा स्तन-धारियों को वह पैदा करता है, पालता है तथा उन्हें समाप्त कर देता है "इन जीवों में क्या अन्तर है ? "देव तो औमी की सर्वश्रेष्ठ सृष्टि है दृषि साधारण कोटि का जान रखने वाले प्राणी तथा स्तनधारी निम्नकोटि के जीव "देव करते क्या है ?" "उनम आमी के अधिक से अधिक गुण पाए जाते हैं" दया नान शक्ति सच्चाई अहिंसा तथा परोपकार इत्यादि वे इन्ही गुणों का प्रसार करते हैं" "और स्तनधारी "वे सबसे घटिया दर्जे के जीव हाते हैं जिनसे ओमी कोटे-मोटे काम लेता है "हृपि का क्या काम है " 'तुम देख ही रहे हो ये जीव व्यापार भी करते हैं विद्वान भी तथा अन्य जो काम भी इनके जिम्मे लग जाए उसे पूरा करत हृषि ने सभी वर्गों के विषय में विस्तार से उत्तर दिया रामशरण की जिज्ञासा शान्त हुई अव हृपि भी रामशरण से अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए उत्सुक हुआ "तुम कहा से आए हो हृपि ने पूछा -

आकाश से"
"वहा तो सास लेन को वायु भी नहीं है वहा रहेगा कौन ?"
"चला था मैं पृथ्वी से जो सौर मडल का एक ग्रह है फिर
आकाश से होता हुआ यहा पहुचा है"
"अकेले ही आए हो?"
"दो साथी और थे।
"वहा से आने का तुम लोगों का क्या उद्देश्य था ?"
'मैं तो वैज्ञानिक आविष्कार के चक्कर में यात्रा पर निकला
था परन्तु फस गया उनके फदे में "
तुम्हारे साथी कहा है ?
"वे भी इसी लोक में कहीं इधर-उधर री तलाश में घूम
रहे
होंगे वे मुझे बलि चढाने के लिए जाल में फसा लाये थे"
'वह किसलिए ?" हृषि ने पूछा
मुझ से ईष्या करते थे" रामशरण ने कहा
"ईया किसे कहते हो?"
"वे लोग मेरी प्रसिद्धि स चिढते ये"
"इस लोक में तो इस प्रकार की काई बात नही होती"
इस लोक में जब प्राणी सास लेना और हरकत करना बद
कर देता है तो क्या करते हो?"
हृपि ने बताया - "इस लोक में जो भी जिसको जब चाहता है
वापिस बुला लाता है और वह जीव इस धरती से शरीर सहित
मायब हो जाता है"
"वह कहां पहुचता है ?"
"ओमी के पास वहां उसका अग-अंग अलग हो जाता है
उसके शरीर को चलाने वाली वायु एक डिब्बे में वद कर दी जाती
है अलग-अलग डिब्बों में हरेक की वायु का लेवल लगा होता है ।
46

श्रेष्ठ, मध्यम तथा निकृष्ट ये तीनों श्रेणिया जीव के कर्मों के
अनुसार होती है।
"ये लेबल डिब्बों पर कब तक लगे रहते है ?"
"यह केवल ओमी को ही पता होता है" हृपि ने उत्तर दिया
"और कोई नही जान सकता"
"कोई विरला ही जिसमें ओमी के से गुण हों" - हृषि का
उत्तर था अब उसे रामशरण मे कुछ और जानकारी प्राप्त करने
की जिज्ञासा उत्पन्न हुई
"तुम्हारे लोक में जीवा को कौन बचाता है ?"
"ओउम्, जो सवका पिता है उसे इश्वर प्रभु परमात्मा,
भगवान परमेश्वर, अल्लाह युदा गॉड कई नामां से पुकारा जाता
यात्री ने कहा
"तहा भी जीवों के प्राण डिब्बा में बद किए जाते हैं ?"
"महा हवा जिसे प्राण कहते है वह शरीर में से निकलकर शुभ
व अशम कर्म तथा मन के साथ प्राणी की प्रबल वासना से मिलकर
एक नया शरीर ले लेता है
"सभी प्राणियों को दोबारा एक-सा शरीर मिलता है ?"
'नहीं श्रेष्ठ कर्म वाले देव योनि अर्थात् स्वर्ग व श्रेष्ठ घराने में
शरीर धारण करते हैं जहा ज्ञाा प्रभु-भक्ति सुख-सच्चाई
शान्ति तथा आनन्द हो आनन्द होता है शुभ व अशुभ दोनों तरह
के कमा वालों को साधारण मनुष्यों का शरीर मिलता है जिसमें
सुख-दुख बराबर मिलता रहता है दुष्कर्म करने वालों को
जानवरों कीट-पतगों तथा पड-पौधों की योनि मिलती है"
रामशरण ने पुर्नजन्म के सिद्धान्त को कर्मों के द्वारा सिद्ध करने का
प्रयास करते हुए व्यारया की
हृपि ने ज्ञानवृद्धि के लिए आग प्रश्न किया "पेड-पौधों
17

जीवों और ओमी का परस्पर क्या सबध है ?"
"भारतीय धर्म ग्रन्या के अनुसार ओमी तथा जीव दो पक्षियों के
समान है व दोना पक्षी पड की डाली पर बैठे है उनमें से एक
पक्षी जीव ता शुभ-अशुभ कर्मों क फल वयता है, दूसरा पक्षी ओमी
फल 7 साता हुआ केवल देखता रहता है जिस पेड़ पर वे बैठे है
वह प्रकृति है"
"वे फिर तीना ही सदा बन रहत है ?"
विल्कुल आमी ता परमात्मा है दूसरा पक्षी आत्मा है और
पेड प्रकृति है वे तीनों ही अमर है परन्तु प्रकृति जड है"
रामशरण ने भारतीय दर्शन की थाडी-सी झलक दिखाई
हृपि ने युद्ध नीति की बात छेड दी
सुनत है कि एक लाक ऐसा भी है जहा एक प्रकार के लोग
दूसरे विचारों वाले लोगों को अस्त्र-शस्त्र से भून डालते हैं ताकि
उनके विचारों का प्रसार हो क्या वह तुम्हारी घरती ही है ?" हृपि
ने पूछा
रामशरण ने उत्तर दिया "हमारी दुनिया में हिन्दू
मुसलमान सिख, ईसाई यहूदी तथा पारसी लोग अलग-अलग
धमा के मानने वाले रहते हैं वे अपने-अपने धर्म के प्रचार के लिए
दूसरे धर्मों को नीचा दिखात है और युद्ध छेड देते है जिसम
कमजार पक्ष क माल तथा जान की बहुत हानि होती है"
हृपि को यह सुनकर बडा आश्चर्य हुआ उसने पूछा
"क्या
आप लोगों के धर्म में दूसरों को नष्ट कर देने की शिक्षा दी
जाती है?"
"नहीं किसी धर्म में भी दूसरों का अनिष्ट करने की शिक्षा
नही दी गई है सभी धर्मों के चलाने वालों ने परस्पर प्रेम दया
परोपकार सत्य तथा अहिंसा का ही उपदेश दिया है भारतवर्ष के
8

- -- ऋषि-मुनियों ने तो तपस्या, योगाभ्यास, सयम तथा सवाई द्वारा मनुष्य को ओमी (परमेश्वर) तक पहुचने का मार्ग दिखाया है धर्म शब्द ही पवित्र शुद्ध, तपस्वी, सच्चा तथा निःस्वार्थ जीवन व्यतीत करने का भाव दिखाने वाला है वहा तो दूसरे का अनिष्ट सोचना भी पाप है" "फिर भी देष घृणा और युद्ध क्यों होते हैं ?" हृषि ने पूछा "धर्म के स्वरूप को भली-भाति न समझने के कारण स्वार्थी नेता अपने नाम के लिए अशान्ति लोगों को मूर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं" हर विषय में सुलझे हुए यात्री ने उत्तर दिया हृपि ने फिर प्रश्न किया -- "हमने पढा है कि निचले नक्षत्रों के लोग काले-गोरे का भेद-भाव रखते है कुछ लोग उच्च वर्ग के कहलाते हैं कुछ नीव वर्ग के वे लोग एक-दूसरे के काम को बुरी दृष्टि से देखते है" रामशरण ने कहा "ओमी ने सभी जीवों को वरावर बनाया है वे सभी एक ही मार्ग से जन्म लेते हैं और फिर ओमी में टी सभा जाते है। "ससार में रहते समय अज्ञान के पर्दे के कारण वे अपने सच्चे धर्म को भूलकर स्वार्थ सिद्ध करने के लिए बुराई करते हैं ऊंच-नीच के भेद-भाव प्रभु की ओर से पैदा नहीं होते जीवों को कर्म करने और सोचने के लिए ऐन्द्रिया, ज्ञानेन्द्रियां, मन तथा बुद्धि ओमी की ओर से मिली होती है जीव को सोचकर हर काम करने की पूरी छूट होती है परन्तु अज्ञान व माया का पर्दा उसे कर्तव्य से हटा देता है तो वह उल्टे सीधे विचारों से वैसे ही काम करने लग जाता है" हृपि को उत्तर पाकर सन्तोप मिला परन्तु उसकी जिज्ञासा 49 बनी रही उसने आगे प्रश्न किया "उसी लोक के प्राचीन देश भारतवप के विषय में मैंने पढा है कि वाकि सारे विश्व में ज्ञान का प्रकाश वहीं से फैला है तो फिर वहीं परस्पर झगडे और ऊच-नीच की बातें क्यों होती है ?" प्रश्न बदिया था रामशरण ने कहा "तुमने भारतवर्ष के विषय में ठीक ही पढ़ा है मैने जैसे बताया कि ससार के सभी बड़े-बड़े धर्मों का स्रोत वही देश है वहा जीवन को भी चार भागों में ब्रह्मचर्य गृहस्थ वानप्रस्थ तथा सन्यास आश्रम में बाटा हुआ था इन सबका तात्पर्य जीव को जन्म से मृत्यु तक तपस्वी तथा त्यागपूर्ण जीवन द्वारा बलवान ज्ञानवान चरित्रवान तेजस्वी तथा सत्यवादी और परोपकारी बनाना ही है" "इन चारों आश्रमों के साथ चार वर्ग भी थे ब्राहमण, क्षत्रिय वैश्य तथा शूद, ये वर्ग केवल काम के बँटवारे के लिए थे जो व्यक्ति जिस योग्य हो उसे वैसा ही काम मिले, पुसमान ब्राहमण विद्या दे बलवान बल द्वारा क्षत्रिय के स्प में रक्षा करे वैश्य व्यापार व खेती द्वारा भोजन तथा दूसरी सामग्री पैदा करे जो और कुछ न कर सकता हो वह समाज की सेवा सेवक बनकर करे हृषि की आंखें खुल गई, जब उसने धरती के दर्शन शास्त्र की बातें सुनी उसके हृदय में इन लोगों के प्रति श्रद्धा और वढ गई तब रामशरण ने उससे प्रश्न किया जीवन-मरण जवानी-वुढापा तथा अलग-अलग उद्योग-धन्धों का क्या स्वस्प है?" हृषि सोच में पड़ गया उसने सिर बुजलाया और बोला "तुमने तो एक साथ ही कई बातें पूछ ली है और सभी बडी गम्भीर स "तुम्हारे लोक में -- हमारे लोक में ओमी का ही यह सारा खेल है वही जीवों को 50 अलग-अलग खानों मे बद करता तथा खोलता है हरेक के गुण-कर्म और स्वभाव के अनुसार उसमें हवा भर देता है यहा वुदापा तथा मृत्यु कुछ नहीं सभी जीव सारा जीवन एक ही रहते हैं यहां देप, ईर्ष्या पाप युद्ध इत्यादि नाम की कोई चीज नहीं है हां काम सभी अपनी-अपनी शक्ति और बुद्धि के अनुसार करते " रामशरण ने फिर पूछा "माता-पिता तथा सन्तान का परस्पर क्या सम्बन्ध होता है ? विवाह शादी की क्या व्यवस्था है " हृषि बोला "मैंने अभी बताया आमी अपनी इच्छा से पैदा करता और फिर खानों में बद कर देता है जिस व्यक्ति के जिम्मे जो दूसरा जीव लगाया जाता है उनका परस्पर बहुत स्नेह होता है यहा सभी एक-दूसरे के आजाकारी तथा शुभ चिन्तक होते हैं हरेक की जरूरत पूरी हो जाती है अत न दुख और न ही दप झगडा और युद्ध होता है रामशरण ने सारी बातें सुनी वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि उसकी धरती पर तथा इस नक्षत्र पर बहुत सी बातें लगभग समान ही है ईश्वर जीवन व प्रकृति का स्वस्प वैसा है जन्म-मरण का स्वरूप भिन्न होते हुए भी मूलाधार एक-सा ही है उस लोक में इसकी धरती के लोगों की तरह जीव अपनी-अपनी सामर्थ्य व शिक्षा के अनुसार काम करते हैं केवल नाम के लेवल अलग-अलग लगे हुए हैं विवाह-शादी का नाम 1 रखकर वे लोग वैसे ही गुण कर्म स्वभाव के अनुसार जोड बना लेते है राजनीति धर्म दर्शन शास्त्र इत्यादि विषयों की गम्भीर चर्चा करके वे बहुत प्रसन्न हाते हैं इसस उनके जान में बड़ी वृद्धि हुई सूखी चर्चा से पेट तो नहीं भरता था अब इन लोगों को भूख 51

सताने लगी हृषि ने भोजन की व्यवस्था की भोजन करने के बाद
वे विश्राम करने के लिए कन्दरा चले गए थोड़ी देर में वे स्वप्न के
ससार में विचरने लगे
12 रक से राजा
दूसरे दिन प्रात स्नान इत्यादि से निपटकर पुन बात-चीत में जुट
गए हृषि ने बात शुरू की तुम्हारी धरती पर प्राय योद्धा लोग ही
रहते हैं वे आलसी और निकम्म ता नहीं होते होंगे ? क्या वे जन्म
से ही योदा होते हैं
यात्री ने उत्तर दिया वहा योद्धा नेता समाज सेवक,
वैज्ञानिक सुधारक लयक तथा कवि जन्म से भी होते है तथा
धीरे-धीरे ऐसे गुणों को अर्जित करके भी बनते है"
हृपि ने पूछा
"साधारण कोटि के मनुष्य को वडा बनने के
लिए बराबर प्रयास तथा तपस्या करनी पड़ती होगी?"
"हा उसे तो जीवन भर सघर्ष करना पड़ता है"
"ऐसे व्यक्ति विरले ही होते होगे?"
"हा थोडे ही होते है एकाध का ता मुझे अभी भी याद है मैं
भी उसके विपर में सुन सकता हू ?" हृषि ने कहा
"हाँ सुनिए"
"क्हो"
रामशरण ने
शुरु
क्यिा "एक गराव घराने में एक गाव में
लड़का पैदा हुआ उसका नाम था दीक्षित थोडे दिनों के बाद उसके
पिता-माता मर गए वह अनाथ हो गया उसके पास एक बिल्ली
था उससे वह बहुत प्यार करता था"
52

हृषि ने विल्ली का नाम सुनकर पूछा "क्या तुम लोग
बिल्लियों से भी मित्रता करते हो?"
'क्यों नहीं ?" रामशरण बोला 'वहा सभी जीव-जन्तुओं से
प्यार किया जाता है जीव भी बड़े स्वामी भक्त होते हैं"
"ऐसे जीव अपना प्रेम कैसे प्रकट करते हैं ?"
"उसी बिल्ली की बात बताता हू एक दिन दीक्षित ने लोगों
को यह कहते सुना कि दक्षिण भारत के कोनार नामी स्थान पर
सोने की खाने है उस नगर की गलिया भी सोने की बनी हुई हैं"
"तुम्हारी धरती पर भी सोन को बहुमूल्य धातु गिनते हैं ,
हा'
"तब दीक्षित ने क्या किया ?"
यात्रा कहता गया दीक्षित ने अपनी बिल्ली को साथ
लेकर कानार के लिए चलने का सकल्प किया"
"तब 2
"दीक्षित ने विल्ली को उठा लिया दूसरे कन्धे पर उसने
गठरी रख ली और दोनों गाव स चल पड़े रास्ता लम्बा था बीच
में जब वह थक जाता था तो किसा गाडी वाले से बैठाने को कहकर
सफर तय कर लेता था"
"उसे चलत-चलते एक सप्ताह बात गया रास्त में तृचुरा
नामक स्थान पर पहुच गया जब उसे भूख लगती थी तो
इधर-उधर से मागकर खा लेता था परन्तु बिल्ली को पहल
खिलाता था"
"विल्ली का उसे विशेष ध्यान रहता था ?"
बहुत आप स्वय भूखा रह लेता परन्तु विल्ली को पहले
खिलाता-पिलाता"
"वाह । जीवों से भी इतना प्यार ", हृपि हैरान था
-

.
"आगे सुनिए तृवुर में पहुचकर उसने एक सेठ को देया
तृचुर एक बन्दरगाह थी जहा स विदों को भारताय माल भेजा
जाता था तथा मगवाया जाता था मठ का भारा व्यापार था तब
दीक्षित ने जो अभी अठारह वर्ष का ही युवक होगा सेठ से किसी
काम पर लगाने की प्रार्थना की"
"सेठ ने क्या उत्तर दिया ?" हृपि ने पूछा
"सेठ ने उस युवक के मैले कुवैले बस्त्र देयकर, उस गवार
समझकर पहले तो उस ना कर दी"
"फिर "
"दीक्षित ने जब अपनी स्थिति उसके सामने रखी तो उसे उस
साहसी युवक पर दया आ गई और उसने उसे काम पर लगा
दिया वह रात को सड़क की पटरी पर बिल्ली को माथ लेकर सो
जाता था
"दाक्षित ने तव क्या किया"
उसने मजदूरी करके कानार तक पहुचने के लिए राशि जमा
कर ला और सेठ का धन्यवाद करके विल्ली के साथ कोनार की
ओर चल पडा
वडो हिम्मत बाधी उस युवक ने और विल्ली का साथ मा
नहा धोडा" हृपि ने आश्चर्य व्यक्त किया
"दीक्षित दृढ सकल्प वाला था चलते-चलते एक और स्थान
पर थक कर बैठ गया वह एक कम्बा था वहा एक व्यापारी का
बदिया बगला था जिसकी सीदिनां पर बिल्ली को लेकर विश्राम
करने लगा थकावट के कारण वहा सो गया"
"सेठ ने उसे कुछ नहीं कहा "
"जब वह व्यापारी प्रात जागा तो सीदियों पर एक अपरिचित
युवक को पड़े देखकर फटकारने लगा, परन्तु जब उसने युवक की
FA

राम-कहानी सुनी तो सेठ ने नौकर को बुलाया और उसे युवक में
खान-पान तथा आराम की सामग्री जुटाने को कहीं-
"उस व्यापारी की एकमात्र लडकी उस युवक से बहुत प्यार
करन लगी परन्तु उसका रससोइया, उससे ईयां करने लगा
बुवक उसके व्यवहार से तग आ गया डर के मारे वह सोको
अपनी परेशानी भी नहीं बताता था"
हृषि ने प्रश्न किया
"वह युवक सब कुछ चुप-चाप सहता
रहा?"
"नहीं, एक दिन उसने गठरी उठाई, विल्ली का साथ लिया
और चुप-चाप घर से निकल गया चलते-चलते वह एक गाव में
से गुजरा वहा उसे घंटिया बजती हुई सुनाई पड़ीं उसे ऐसे सुनाई
पडा जैसे वे कह रही हा
पाओगे सोने की खान
बन जाओगे शीघ्र महान
"तब उसने क्या निर्णय लिया ?" हृषि ने पूछा
"उसन उसी दयालु सेठ के घर लौट जाने की ठान ली उसे
उसकी लडकी के स्नेह की भी याद आ रही थी रसोइए की
फटकार का विना ध्यान किए वह वापिस लौट गया"
"क्या व्यापारी उसे दोबारा पाकर प्रसन्न हुआ ?" दृषि बोला
"व्यापारी प्रसन्न ही नहीं हुआ बल्कि उसे उसने विदेश जाने
वाले अपने जहाज के साथ भेजो को कह दिया क्योंकि दोक्षित एक
सच्या ईमानदार तथा परिश्रमी युवक था"
"तब "
"सठ ने उसे आशीर्वाद दिया और उसे जहाज के कप्तान का
सौप दिया कप्तान का नाम था, शैलेन्द्र और सहायक का सुरेश
जहाज का दशेन्द्र द्वीप पर पहुचना या यात्रा उनकी सुखद रही
65

क्योंकि सुरेश उन्हें रोचक तथा साहसपूर्ण घटनाएं सुनाया करता था युवक की बिल्ली उसके साथ ही थी दीप तक पहुंचने में उन्हें कुछ दिन लगे" "जहाज ने दीप के तट को छुआ जगली लोगों ने उनका भव्य स्वागत किया वे दीप निवासी उनके लिए फूलों और फलों की डालियां उपहार के रूप में लाए शैलेन्द्र ने भी दीप के नरेश को उपहार भेजे दीप के राजा और रानी ने प्रसन्न होकर इन लोगों को भोजन के लिए निमत्रण दिया दीक्षित भी उनके साथ गजभवन में निमन्त्रण पर पहुचा वहा अनेक प्रकार के व्यजन इनके सामने परोसे गए" "दीक्षित के लिए तो यह स्वर्गवास था सोने और चादी की तश्तरिया उनके सामने सजी हुई थीं वे सभी लोग बडे प्रेम से पार्टी का आनन्द लेने लगे तभी वहा अचानक हल्ला-गुल्ला हो गया" हल्ला-गुल्ला कैसा ?" हृषि ने पूछा "उन लोगों के देखते-देखते मोटे-मोटे चूहों की सेना ने उनके भोजन पर आक्रमण कर दिया पलों में ही वे सब कुछ घट कर गर" "नरेश के अगरक्षक कुछ न कर सके ?" रामशरण ने कहा "उन अंगरक्षकों ने उन्हें भगाने के सभी उपाय कर लिए परन्तु सफल न हुए कप्तान भी हैगन रह गया" "तब " "कप्तान शैलेन्द्र ने दीक्षित को सकेत किया कि वह बिल्ली को चूहों पर छोड दे युवक के लिए यही उचित अवसर था उसो बिल्ली को इशारा किया और जो काम राजा के अंगरक्षक न कर सके विल्ली ने क्षणों में कर दिया" "बिल्ली के दर्शन मात्र से ही कई चूहे तो देहाश हो गए. वाकि -- 56 हृपि ने पूछा सभी भागकर बिलों में जा घुसे द्वीप नरेश बडा खुश हुआ वह बिल्ली को हर कीमत पर खरीदने को तैयार हो गया उसने दीक्षित से कहा तो वह बिल्ली को केवल एक वर्ष के लिए राजा को देने के लिए राजी हो गया "राजा ने उस उधारी बिल्ली के बदले में दीक्षित को सोने चादी और हीरो के स्क्स उपहार में दिए राजा तथा रानी ने इन व्यापारियों को भावभीनी विदाई दी और सभी उपहार जहाज पर रखवा दिए उन्होंने दीक्षित के प्रति विशेष कृतज्ञता प्रकट की "अपना प्यारी बिल्ली से अलग होकर दीक्षित को दुख तो हुआ होगा? पथिक ने उत्तर दिया "क्यों नहीं पर उसे सन्तोष भी था एक वर्ष के बाद विल्ली उसे वापिस मिल ही जाएगी फिर क्या हुआ ?" हृषि ने पूछा रामशरण ने कथा जारी रखी "जहाज वापिस सेठ के पास पहुच गया सेठ को जब सारा व्यौरा मिला तो उसकी युशी का पारावर न रहा सभी ने दीक्षित की बड़ी सराहना की सेठ ने दीक्षित से प्रसन्न होकर अपनी कन्या का विवाह कर दिया युवक ने सभी उपहार वधू के लिए भेंट कर दिए" "दीक्षित को एक वर्ष बाद वह बिल्ली वापिस मिल गई वास्तव में कोनार के स्वर्ण भण्डार तो उसकी बिल्ली न ही उसके लिए खोल दिए इतना धनी होने पर भी दीक्षित में तनिक भी घमड नहीं था उसने पाठशालाए कल्याण केन्द्र हस्पताल तथा अनाथालय और अनेक सुख-सुविधाओं का प्रबध जनता के लिए कर दिया वह इतना लोकप्रिय हो गया था कि वह प्रान्त का मुख्यमत्री बन गया" हृषि ने प्रभावित होकर कहा "तुम्हारे भूलोक में सचमुच 57

ही एक साधारण व्यक्ति सबसे ऊचे पद को भी प्राप्त कर सकता
शाम होने जा रही थी उन्होने भोजन किया और विश्राम के
लिए गुफा में चले गए
13 उत्तरायण्ड की ओर
वे दोना अभी लेटे ही थे कि हृषि सहसा चौक पडा
"कोई आदेश दे रहा
"कैसा ?" रामशरण ने पूछा
"प्रात निशानेबाजी का प्रोग्राम होगा जिसमें कई प्राणी भाग
लेंगे शिकारी जानवर भी साथ ले जाने हाँग"
"किसका शिकार करना है ?"
"एक भारी दैत्य का" हृपि ने उत्तर दिया और वे दोनों
शिकार का स्वप्न लेते हुए पुन सो गए
प्रात होते ही नावा का एक वेडा झील के किनारे आकर लग
गया उसमें अनेक शिकारी बैठ ये वे सभी शिकारी वाली चुस्त
वेश-भूषा में अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित बैठे थे
एक नाव में हृपि और रामशरण भी बैठ गए. बाकी सभी लोग
अलग-अलग नावों में बैठे थे सभी की आवे गहरे पानी की और
ही लगा हुई थीं बेडा आगे बढा
"सुनिए-सुनिए" हृपि एकदम बौल उठा
"कौन है ?" यात्री ने हडबडाते हुए पूछा
"तुमने नहीं सुना ?" हृषि बोला
अतिथि की सुरक्षा की जिम्मेदारी हमार ऊपर है क्योंकि इसके पीछे
"आवाज आई है कि
58

7-
.
भूलोक के दो अन्य व्यक्ति लगे हुए है अतिथि को खण्ड में तुरन्त
पहुँचाना है"
"आदेश कौन दे रहा "
"वह तुम्हे दिखाई नहीं देगा"
"पर मैं भी तो इस आखेट में भाग लूगा" रामशरण ने
निडर होकर कहा
उनकी नाव दूसरी नावों के बीच गहरे पानी में आगे बढती
गई अभी वे लोग थोड़ी दूर ही गए थे कि बड़े जोर का शोर हुआ
और झील का जल ऊपर उछलने लगा सभी लोग सहम गए
तूफान-सा उठने लगा तभी उनके देखते ही देखते दो नावों को
उझालता हुए एक भारी भरकम काला दैत्य पानी से ऊपर उठा,
वह पूरे जहाज के आकार का था
बेड में एकदम भगदड मच गई शिकार की बात तो वे भूल
गए हरेक को अपनी-अपनी जान के लाले पड़ गए
गमशरण भी एक निडर और अनुभवी शिकारी था उसने भी
विष के बुझे हुए तीर अपनी धनुष पर चढाए और भीड के देखते ही
देखते तीरों की बौछार उस राक्षस पर बरसानी शुरू कर दी दैत्य
जोर से गरजा पथिक के तीरों ने उसका जबडा बींध दिया
दैत्य तेजी से आगे बढ़ता आ रहा था यात्री एक बार तो सोच
में पड़ गया वह दैत्य दूसरे ही क्षण इनकी नाव को उलटाने में
सफल हो गया परन्तु जहरीले तीरों ने उसको छलनी कर दिया
आगे वह हिम्मत न कर सका और नाव के साथ वह भी पानी में
घडाम से गिर पड़ा
सारी भीड दग रह गई सभी की साम में सास आयी वे
पथिक की भूरि-भूरि प्रशसा करने लगे
"वाह । कमाल की तीरदाजी है सभी सराहने लगे
59

रामशरण भी फूला नहीं समा रहा था अभी सब लोग उसके
धैर्य की दाद दे ही रहे थे कि एक धमाका हुआ
"हमारे एक साथी को गोली लगी है" हृपि ने खेद प्रकट
करते हुए कहा
"क्या वह मर गया ?" यात्री ने पूछा
"इस लोक में जीव का कोई नहीं मार सकता सिवाय ओमी
यह किनका काम है "
भूलोक से आए हुए तुम्हार दुष्ट साथियों का ?"
"वे तो मेर भी शत्रु है वही तो मुझे वदी बनाकर यहां लाए
'अब तो तुम्हे अविलम्ब उत्तराखण्ड में पहुचना है जहा कि वे
लोग तुम्हें हानि न पहुचा सके
"फिर वे तुम लोगों को तग करेंगे"
हमारा वे कुछ नहीं विगाड सकते अव तो तुम मेरी बात को
ध्यान से सुन लो और जैस बताऊ वैस ही करना है"
"ठीक है कहते जाआ" रामशरण बाला
हृपि ने कहा "तुम्हें दस दिन तक यात्रा करनी होगा बीच
में एक और स्थान आएगा वहा एक पर्वत की चदाई चटनी है उस
पर्वत पर उग्रसेा का दुर्ग मिलेगा तुम उसे उत्तरायण्ड की यात्रा के
विषय में बताना वह स्वय व्यवस्था कर देगा"
रामशरण ने कहा "मैं समझ गया हू मैं तो स्वय भी नहीं
चाहता कि मेरे कारण आप पर कोई विपत्ति आए ठीक है मेरा
भी इसी में कल्याण है"
वास्तव में पथिक स्वय भी अपने शनुआ स दूर भागना चाहता
था अत उसने अपने सच्चे हितैया मित्र हृपि स हाथ मिलाया और
60

उसके अतिथि सत्कार के लिए उसका बहुत-बहुत धन्यवाद
किया तब वह दृषि के बताए हुए मार्ग पर चल पड़ा और
इन शब्दों को गुनगुनाने लगा
लीला है उस प्रभु की जिसने हमे बनाया
सघर्षमय जगत में भी आनन्द छाया
उस सर्वशक्तिशाली की है अपार माया
उदधि कही उछलता पवत कही उठाया
सूखा यदि यहा है तो बाद भी वहा है
काटे जहा है विखरे ऋतुराज भी वहीं है
उसकी अपार लीला का पार कौन पाए
जिसके उदर में धरती आकाश सब समाए
उसके अटल नियम पर सृष्टि सभी है ठहरी
मुनिगण भी जान पाए ना उसकी नीति गहरी
प्रभु आ गिरा शरण में अपना मुझे बनालो
जो आपदा है सम्मुख उसस मुझे बचाओ
14 मार्ग में
रामशरण हृषि के कहने के अनुसार घने वन में से उत्तराखण्ड की
ओर चल पड़ा उसके मन में धवन और विष्णु दोनों शत्रुओं का भूत
समाया हुआ था जा कि उसका पीछा बराबर करते आ रहे थे उसे
हरदम यही आशका थी कि वे लोग कहीं से फिर न आ
धमके
वह बहुत विद्वान तथा साहसा व्यक्ति था वह जानता था कि
आपत्ति की आशका मात्र से ही मनुष्य को भयभीत नहीं हो जाना
61

चाहिए परन्तु जब वह सिर पर छा जाए तो उसपर विजय पाने में
कोई कसर नहीं छोडनी चाहिए
फिर भी उसे धुक-धुकी तो लगी हुई थी हर एक हिल रहा
पत्ता उसे शत्रु के आने की सूचना दे रहा था वह भी सतर्क था
हृषि द्वारा बताए हुए मार्ग पर वह बढता ही गया
दोपहर हो चली वन में उयडे टीलों को वह पार करता गया
पेडों की धूप-छाया में स निकल कर वह समतल भूमि पर जा
पहुँचा
थोडा आगे बढ़ते ही एक घाटी आ गई एक ओर जगल तथा
दूसरी और पहाड था पहाड़ की ऊची चोटी नीचे से बहुत
पतली-सी दिखाई पड़ रही थी पास ही नदी थी जिसके तट पर
फलदार पेड थे
उसने फल चखे जो कि स्वादिष्ट थे उसे तृप्ति हुई वहा
थोडी देर उसने विश्राम किया और फिर चल पड़ा उसे चोटी पर
चढना था अब वह ताजा होकर ऊपर चढता गया
चढाई तो थी परन्तु थकाने वाली नहीं थी उस धरती पर
उसका बोझ इतना हल्का लग रहा था कि वह कूदता-फादता हुआ
ऊपर चढ गया दोपहर की चदाई में भी उसे पसीना नहीं आ रहा
था उसे तो ऊपर चढते समय गर्मी की वजाए ठंड लग रही थी
"ऐसे कब तक घूमता रहूंगा और कहां पहुचूगा ?" रामशरण
यात्रा से ऊब कर अपने को कह रहा था उसे आकाश गगा के
जीवों की याद आ रही थी "क्या कभी फिर मैं मानव समाज में
मिल सकूगा ?"
यहां उसे धुंध-सी दिखाई देने लगी आकाश में कुछ कालापन
था और तारे भी धीमे-धीम टिमटिमाते हुए नजर आने लगे
अब वह ऐसी दुनिया में पहुच रहा था कि वायु नाम मात्र थी
62

5
वहा वातावरण वाली कोई बात नहीं थी ज्यों-ज्यों वह ऊपर
चदता गया उसे घुटन सी प्रतीत होने लगी
"और ऊपर जाने पर सभव है मेरा दम हा घुट जाए और मैं
सास भी न ले सकू इन जीवों ने शायद इसीलिए मुझे यहां भेजा
वह घबराने लगा
फिर भी वह ऊपर चढता गया अब उसे चक्कर भी आने
लगे अब उसे ऐसा लगा कि वह चोटी से दलान की और उतर
रहा हो
दिन ढल रहा था अधेरा होने की था वह तो दोपहर के
समय ही ठिठुर रहा था तो रात कैसे कटेगी उसे तो उत्तरा खण्ड
में पहुचना था उसे चिन्ता सताने लगी
"उत्तराखण्ड वास्तव में कोई खण्ड है भी कि नहीं कौन जाने
हो सकता है मुझे टालने के लिए ही हृषि ने यहा भेज दिया हो"
इस प्रकार वह मन में सकल्प-विकल्प करने लगा
चलते-चलते उसे आशा की रेखा नजर आई
"अहा । सामने प्रकाश की झलक पड़ रही है" वह उछल पड़ा
"यही होगा वह स्थान" यह सोचकर उसने पुन हिम्मत बाधी
और गिरता-पड़ता उस स्थान पर जा पहुचा जहा रोशनी जल रही
थी
15 उग्रसेन से भेंट
एक सुन्दर भवन था जहां से प्रकाश आ रहा था
"इस समय तुम कैसे यहा आए हो ?' एक आवाज सुनाई दी
"मैं थका हुआ यात्री हू
63

--
किस लोक से आए हो?"
भूलोक से" रामशरण ने उत्तर दिया
इतनी लम्बी यात्रा तुमने कैसे तय की और यहां किस उद्देश्य
से आए हो?" उसी आवाज ने पूछा
"यह एक लम्बी कहानी है" रामशरण वोला, यहा भेजने
वाला है आकाश गगा का दृपि ठण्ड तथा थकावट के कारण मुझमें
खड़े रहने का दम नहीं है"
आगे चले आओ एक विशालकाय सुर ने कहा और वह
अन्दर से प्याले में जल भर कर ले आया
'लो इसे पी लो
थके हुए यात्री ने जल को गटागट पी लिया इस समय तो उसे
यदि विष भी मिल जाता तो वह सहर्ष पी लेता
वाह । इसने तो मुझम प्राण फूक दिए है
"यहा से गुजरने वाले सभी राही इसका सेवन करते हैं
"आप का परिचय ?" यात्री ने पूछा
"मुझे उग्रसेन कहते हैं"
सुर ने उत्तर दिया और पूछने
लगा - "तुम्हारा परिचय ?"
हमारे भू-मण्डल में हम लोग मनुष्य कहलाते है वैसे मेरा
नाम है -- रामशरण"
उस सुर के शरीर की बनावट विचित्र-सी थी न तो मनुष्यों
की भाति था और न ही पशुओं जैसा वह दोनों का मिला-जुला
रूप था उसके शरीर पर पखों की तरह वाल थे ऐसे
जीव का वर्णन यात्री ने आज तक कहीं भी नहीं पढ़ा था
"तुम्हे शायद भूख लग रही है ?" सुर ने पूछा
उस सुर के उच्चारण से मनुष्यों की बोली स्पष्ट रूप से समझ
में आ रही थी
64

करते हुए कहा
"हाँ मुझे जोर की भूख लग रही है"
उग्रसेन अन्दर से खाने-पीने की सामग्रोल आया यात्री ने
भूबी निगाहों से भोजन को देखा और उसके मुंह से लार टपकने
लगा
"यह ठोस पदार्थ क्या है ?" उसने भोजन की जान मन
"यह पदार्थ पशुओं के शरीर से रस निकाल कर उससे नैयार
किया जाता है
"और यह तरल पदार्थ ?" एक प्याले की ओर इशारा करते
हुए यात्री ने कहा
"यह वही रस तो है जिसे दाग्धा कहते है
"अच्छा । अब मैं समझा यह पनीर है जो दूध से तैयार
किया गया है यह सस्कृत के दुग्ध शब्द से ही तो बना
भूख के मारे पथिक के पेट में चूहे नाच रहे थे भोजन को भूखे
भेडिए की तरह वह निगल गया
"इतना स्वादिष्ट खाना मैने जीवन में पहली बार खाया है"
यात्री न सतोष व्यक्त करते हुए कहा "उस रस देने वाले जानवर
को आप किस नाम से पुकारते हैं ?"
"उसे हम धायन कहते हैं उसे छोटे सुर वन में घास चराकर
ले आते हैं - उग्रसेन ने बताया उन्हीं का रस और पनीर हम खाते
हमारी धरती पर रस पशु को धेनु व गाय कहते हैं" यात्री
ने स्पष्ट किया - "और जहां वे पशु चरते है उसे गोचर भूमि कहते
"इन पशुओं को घास चराने वालों को तुम लोग किस नाम से
65

- मुकारते हो ?" उग्रसेन ने प्रश्न किया "उन्हें हम ग्वाला कहते है। 'हमारे यहा उन्हें गोवाला कह देते हैं" तब तो हमारी और तुम्हारी भाषाओं का मूलरूप काफी मिलता-जुलता है" सुर उग्रसेन को रामशरण ने कहा भोजन से निपटते ही उग्रसेन अन्दर जाकर एक प्याला भरकर ले आया 'अब जरा इसका आनन्द भी देखो" प्याला आगे करते हुए उग्रसेन ने कहा यात्री ने उसे पी लिया और वह बोला - "मेरे तो अग- अग में इससे नई स्फूर्ति आ गई है आप वैद्य तो नहीं हैं?" यह रस यहा पाई जाने वाली जडी-बूटियों से हैयार किया जाता है यह हर सुर को जन्म से ही घुट्टी के रूप में पिलाया जाता है इसी के कारण इस लोक ३ निवासी सदैव जवान और स्फूर्ति वाले होते हैं" अच्छा । तभी तो मैने यहां कोई बूढा नहीं देखा" "इस लोक में बुढापे का रोग है ही नहीं" इस पदार्थ का नाम क्या है ?" रामशरण ने पूछा "सुरा" "वाह । हमारे शास्त्र में यह पदार्थ तो देवताओं का अमृत कहलाता है" भोजन के बाद उग्रसन उसे घुमाने ले गया उसकी थकान तो भोजन करते ही भाग गई थी वे लोग नीचे उतर रहे थे तो उन्हें खट-घट की आवाज सुनाई दी वहीं कुछ यन्त्र भी लगे हुए थे "यह आवाज कैसी है ?" उसने पूछा 66 "यहा तेजगति से उड़ने वाली मशीने बनती है जो दूसरे नक्षत्रों में जाती है "आप लोग व्यापार करते है ?" "अनुसधान भी तथा व्यापार भी" - उग्रसेन ने बताया और बोला - "तुम्हारे नक्षत्र से और जीव भी यहा आए हुए है" तब उसने एक यन्त्र में से झाकने के लिए यात्री को कहा - यात्री को अपना धरनी समुद्र तथा पर्वत भी नजर आए उस दूरबीन को देखकर वह वोला - "इस लोक में भी विज्ञान काफी उन्नत है" तब वे लौकर भवन में पहुंच जहा कि सुखद विछौनों पर वै लैट गए और दूसरे हा क्षण गहरी निद्रा का आनन्द लेने लगे 16 पडाव रामशरण रात तो गहरी नीद साया प्रात वह बहुत प्रसन्न चित्त दिखाई दे रहा था उग्रसेन से मिलकर वह बहुत खुश था उसे उन जीवा से जो डर लग रहा था वह दूर हा गया प्रात दोनों ने बडे प्रेम से नाश्ता किया "अब मुझे ओमी के पास पहुचना है" - वह बोला "चिन्ता मत करा, हम दोनों साथ-साथ चलेंगे" - उग्रसेन ने आश्वासन दिया थोड़ी देर में उग्रसेन ने रामशरण को अपने कन्धों पर बिठा लिया और आकाश की और ले उड़ा अब पथिक को रामवरित मानस में लिखी हुई वानरों के सेनापति हनुमान की कया याद आ गई वह भी श्रीराम और लक्ष्मण को कन्धों पर उठाकर ले आया 67

वास्तव में उग्रसेन एक यन्त्र लिए हुए था उसमें ऐसी कलाए थीं
जिन्हें घुमाते ही उनकी उडान धीमी व तेज जैसे भी वे चाहते थे हो
जाती थी वह यन्त्र सूर्य से एकत्रित ऊर्जा के कोणों से चलता था
तथा कुसीं की तरह था पथिक बड़ा हैरान हो रहा था
"ये लोग विज्ञान के क्षेत्र में हम लोगों से भी कही आगे है "वह
मन ही मन सोच रहा था
वास्तव में वे दोनों उस कुर्सी के आकार के यन्त्र पर बड़े
आराम से उडते हुए जा रहे थे तभी उग्रसेन एक गोला निकाल
कर बोला--
लो इसे कधों पर लटका लो दम घुटने पर इसकी नालियों
को नाक में लगा लना"
"यह तो आक्सीजन है" - पथिक बोला
उग्रसेन ने कुर्सी की क्ला घुमाई और उसकी गति तेज हा
गइ वे लोग घने जगला में ऊपर स दृश्य का आनन्द लेते हुए आग
बढते गए पेड़ा के बीच में स कही-कही भवन नजर आ रहे थे
"यहा कौन लाग रहते है ?" यात्री ने पूछा
"वे व्यापारी लोग हैं जो अन्न तथा फल पैदा करते है तथा
उन्हें दूसरे स्थानों पर भेजते है" - सुर ने बताया
वे पेड़-पौधे भूलोक की धरती पर पाए जाने वाले पेड-पौधों
की तरह ही थे उन पेडों के बीच में से कई प्रकार की मोटी ध्वनि
उन्हें आकर्षित कर रही थी
"कितना मधुर स्वर है ?" यात्री बोला
"यह कविता पाठ हो रहा है"
"य कैस कवि है ?* यात्री ने पूछा
"ये पंखो और लम्बी चाच वाल कवि हैं जो खिल रहे फूला
पर मस्त होकर मधुर भाषा में कविता पाठ कर रहे है"
68

पथिक समझ गया कि ये कवि तो वन के पक्षी है जो कि पेडों
पर बैठे कलोल कर रहे है
उड़ते हुए उन्हें आकाश का रंग काला लग रहा था एक और
सूर्य का प्रकाश था और साथ ही तारों की धीमी-धीमी रोशनी भी
दिखाई दे रही थी
घरों में रहने वाले लोग बाहर खडे होकर इनका स्वागत करते
हुए दिखाई पड रहे थे उनके हाव-भाव से उनके आदर-भाव की
झलक-झलक रही थी रामशरण को बहुत आनन्द आ रहा था
यद्यपि ठण्ड से वह ठिठुर भी रहा था
उन्हें उडते-उडते दिन निकल गया शाम होने को थी अब वे
एक स्थान पर पहुचे जहा उनका परिचय एक अन्य सुर से हुआ
वह एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक था उसके हाथ में एक पुस्तक थी जो
वहा पाए जाने वाले पेड़ की छाल पर लिखी हुई थी उसे देखकर
पथिक को भारतवर्ष में ताड पत्रों पर लिखे हुए प्राचीन ग्रन्थों का
ध्यान आ गया
"यह पुस्तक किस भाषा में लिखी हुई है ?" उसने पूछा
"औरस भाषा में यह बाई आर से दाई ओर को लिखी जाती
"यह तो भारतीय भाषाओं की भाति ही है" यात्री ने आश्चर्य
से कहा
.
उस वैज्ञानिक से पथिक की अनेक विषयों पर चर्चा हुई
राजनीति, धर्म दर्शन-शास्त्र भूगोल तथा इतिहास इत्यादि उसकी
वातचीत का अनुवाद उग्रसेन करता जा रहा था क्योंकि रामशरण
को तो वैज्ञानिक के केवल होंठ ही हिलते हुए नजर आ रहे थे
शाम हो गई थी उन्होंने अतिथि का ही आतिथ्य स्वीकार
करके रात वहीं विश्राम किया
69

17 मालद्वार प्रात होते ही उग्रसेन ने रामशरण को अगली यात्रा के लिए तैयार किया उसने अपनी मशीन का निरीक्षण किया वह बिल्कुल ठीक काम कर रही थी वह मशीन वास्तव में एक कुसी थी जिसके सभी कल-पुर्जे उग्रसेन ने ही तैयार किए थे वे दोनों ही उस कुर्सी पर सवार हो गए और अपने मेजवान सुर का धन्यवाद करते हुए उस धरती पे ऊपर उडने लगे रास्ते में कहीं वीरान जगह थी कहीं हरियाली "यह नीचे हरा-हरा क्या दिखाई दे रहा है ?" यात्री ने पूछा "सूखे स्थानों में जहा जल के श्रोत मिलते हैं वहा धरती ही-हरी हो जाती है इसे उर्वरों के नाम से पुकारते हैं रामशरण ने कहा "हमारी पृथ्वी पर भी रेगिस्तान में ऐसी हरियाली होती है जिसे नखलिस्तान कहते है उर्वरो शब्द तो संस्कृत के उर्वरा शब्द से मिलता है जिसका अर्थ उपजाऊ होता उस उडन खटोले (कुर्सी) में वे दोनों आगे बढते गए, रास्ते में एक सुन्दर झील थी जिसे वे पार कर गए तब उग्रसेन ने कला घुमाई, यात्री को झटका लगा और दूसरे ही क्षण वे एक द्वीप पर जा उतरे "कितना मनोरम स्थान है ?" रामशरण गदगद हो गया "यह फलों फूलों सुगन्धि और मधु से भरपूर दीप है इसका नाम है मालदार" उग्रसेन ने दीप का परिचय देते हुए कहा "यहां तो सुगन्धि और फल-फूल है यह तो सुगन्ध द्वार है मालदार कैसे हुआ ?" यात्री ने मजाक किया इतनी शान्त सुगन्धित फलों से भरी हुई धरती विविध रंगों 70

1
के पेड़-पौधे तो रामशरण ने अपनी धरती पर
घास भी इतनी मुलायम तथा चमुकीली थी कि उसका गम वहीं
रम गया
"ऐसे शान्त और रमणीक स्थान पर जीडीव असते तसत
कितन सौभाग्यशाली होंगे? यह तो स्वर्गभूमि है "अहाको
राग-देप बुराई तना गदगी का नाम भी नहीं है यहा वे लोग रहते
होंगे जिन्होंने पिछले जन्मों में बड़े शुभ कर्म किए होंगे हे प्रभु
तुमने फुरसत में बैठकर इस प्रदेश का नक्शा बनाया होगा यात्री
ने उस अनुपम द्वीप पर टिप्पणी करते हुए कहा
"इसमें काई सन्देह नहीं कि यह एक अनुपम दीप है' सुर
ने स्वीकार किया पथिक ने फिर कहा "जी चाहता है कि यही पर
शेष जीवन बिता दू"
इतना कहकर वह मन ही मन गुनगुनाने लगा
अनाचार का जहा न लेश
कितना सुन्दर है यह देश
चारों और लटकती बेल
प्रकृति का दर्शाती खेल
कभी न मुरझाए ये फूल
द्वीप का अनुपम है यह फूल
पखधारियों की यह तान
मधुमक्खी का मीठा गान
मन्द-मन्द है बहते श्रोत
अमृत रस से ओत-प्रोत
अनाचार का नाम नहीं है
सच्चे स्वर्ग का धाम यही है

शान्ति को है देने वाला
दुखों को हर लेने वाला
मन है सदा यही बस जा
जन्म-मरण से मुक्ति पाऊ
उग्रसेन बोला - "आप तो कवि है"
"तम्हारी इस जगह की अनुपम छटा सबको कवि बना देती
"अब तुम्ह कला की झाकी दिखाता हूँ"-सुर ने प्रस्ताव रखा
तब वह यात्री को एक टीले पर ले गया वहां पाषाण की एक
विचित्र प्रतिमा पर श्लोक लिखे हुए थे
"वाह । यह प्रतिमा तो ओमी ने अपने हाथों से बनाई प्रतीत
होती है" रामशरण ने चकित होकर कहा
"यह प्रतिमा ओमी के दास ने बनाई है जो कि आपके सामने
खडा है" - मुस्कराते हुए उग्रसेन बोला
यात्री के आश्चर्य का ठिकाना न रहा
"विश्वास नहीं होता आप तो विश्वकर्मा है जो कि भूलोक में
श्रेष्ठ इंजीनियर कहे जाते हैं।
"साधुवाद के लिए धन्यवाद हो आप भी यदि थोड़ी देर
प्रतिमा के सहारे खड़े हो जाएं तो मैं कुछ और भी दिखाऊंगा"
उग्रसेन कागज तथा पेन्सिल लेकर चित्र बनाने लगा थोडी देर में
ही एक सुन्दर चित्र तैयार हो गया
"लीजिए। एक अन्य रामशरण का चित्र"
"वाह । यह मेरा ही चित्र है कहीं भूल तो नहीं रहा ?"
तभी पथिक की दृष्टि एक जहाज पर पड़ी वह तट की और
आ रहा था
72

"इधर व्यापारी जहाज आते-जाते होंगे ?" यात्री ने पूछा
इतनी देर में उस जहाज में से एक व्यक्ति इनकी ओर आया-
"श्रीमान जी, वन्दे। मुझे ओमी ने यहा भेजा है मैं भू-लोक के
विशेष अतिथि को ले जाने आया हू इन्हें मुझे ओमी के पास ले
जाना है
उग्रसेन ने पथिक से जहाज पर चढने का आग्रह किया
"आप नहीं चलेंगे?"
"नहीं अब आप निश्चित होकर जाइर"
ओमी भला
करेगा
यात्री ने उग्रसेन से स्नेहपूर्ण विदाई ली उसका हाथ चूमा और
जहाज में बैठ गया
"आपका नाम 2" रामशरण न नाविक से पूछा
"मरा नाम दासू है।
"ये लोग दस्यू व दास की तरह के होंगे"
लगाया
अब कहा चलना है ," उसने पूछा
"जहां मैं ले चलूगा' दासू ने चप्पू चलाते हुए कहा
उसका छोटा-सा जहाज गहरी झील के साथ-साथ बढ़ता
गया रास्ते में उन्हें भवन देयने को मिले जहा श्रमिक काम कर
रहे थे शाम होते ही एक गाव में वे ठहर गए लोगों ने उनकी खूब
सेवा की रात को उन्होंने वही विश्राम किया
पथिक ने अनुमान
18 शत्रु पुन प्रकट हुए
प्रात सूर्योदय से पूर्व ही किसी ने यात्री को जगा दिया "आपको
73

--
-
हमारे मुखिया ने याद किया है।
- उसने कहा
यात्री घबराकर बोला -- "मुझे। वह किसलिए?"
"वही बताएँगे" उसी व्यक्ति ने कहा
पथिक झट तैयार हो गया वह मुखिया के आदेश को कैसे
टाल सकता था वहा उसे बड़ी भीड-भाड देखने को मिली उसे दो
पक्तियों के बीच में स ले जाकर मच पर बिठा दिया गया सभी
लोग बडी उत्सुकता से उसकी ओर देख रहे थे वातावरण बिल्कुल
शान्त था
मुझे ये लोग शायद दड दना चाहते हैं" रामशरण मन ही
मन घबरा रहा था
थोड़ी देर बाद उनका मुखिया भी वहा पहुच गया सभी लोगों
ने खडे होकर सिर झुकाते हुए उसका अभिवादन क्यिा वह यात्री
से कुछ दूर एक ऊचे आसन पर बैठ गया
आप भयभीत क्यों है ?" मुखिया ने उसे सबोधित करते हुए
कहा
"अब तो आप मेरे द्वीप पर अतिथि है आप लोगों ने दूसरे
नक्षत्रा से यहा आकर इस द्वीप पर काबू पाने की अनाधिकार चेष्टा
की है मैने आपको पहले भी बुला भेजा था
पथिक ने स्पष्ट किया - "मुझे तो मेरे साथी बन्दी बनाकर
यहाँ भगा लाए है वे तो मेरी बलि चढ़ाने की योजना बना रहे है"
मुखिया ने कहा - "तुम्हारे भूलोक से तस्करी करने वाले कुछ
वैज्ञानिक व्यापारी यहां आकर स्वर्ण के भण्डार लूटकर ले जाना
वाहते है मेरी प्रजा इसे सहन नहीं करती"
अभी वे बाते कर ही रहे थे कि दूर से एक भीड उनकी ओर
उमडती हुई दिखाई पड़ी दो व्यक्तियों को वे बन्दी बनाकर ला रहे
५ बन्दी और कोई नहीं थे बल्कि धवन और विष्णु ही थे जिनकी
74

तस्करी करने की चर्चा चल रही थी
उन दोनों को मुखिया के सम्मुख खड़ा कर दिया गया विष्णु के
हाथ वधे हुए थे धवन दोनों हाथ जेब में डाले रडा था
वैसे दोनों के चेहरों से निर्भीकता टपक रही थी सरक्षको ने
उन्हें घेर रखा था भीड में वे रामशरण को नहीं देय पाए पर उसने
उन्हें देख लिया
तब एक सरक्षक ने झुक कर कहा "महाराज इन दोनों
जीवों ने सारे द्वीप पर उत्पात मचा रखा है मेरे भाई को इन्होंने
आकरण ही गोलियों से छेद दिया है"
"तुमने ऐसा क्यों किया ?" मुखिया ने दोनों अपराधियों से
पूछा
दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा- "ऐसे काम नही चलेगा ये
तो हमें खा जायेंगे" विष्णु ने धवन को धीरे से कहा - "इन्हें कुछ
लालव दिया जाए" इतना कहते ही विष्णु ने अपनी जेब से सोने
की कुछ मुदाए उनके आगे बिखेर दी इन सिक्कों की
चमक-दमक से वे सभी लोग मोहित हो गए
"हम पर धौस जमाने की जरूरत नहीं" - विष्णु गरजा
"ये लोग तो मजाक कर रहे है" - मुखिया एकदम शान्त
होकर बोला
विष्णु की चाल चल गई थी धवन ने भी अपनी जेब से
चमकीले मणको की माला को निकालकर मुखिया के गले में डाल
दिया
मुखिया ने आदेश दिया - "इन लोगों की खोपड़ियों को छ
वार जल में डुबोकर जडी-बुटियों से साफ करो"
तव वह फिर बोला - "तुम लोग कितने नीव हो जो अपने ही
भाई की बलि चढाने के लिए उसे यहां ले आए हो?"
75

भूलोक के जीव आपसे नहीं डरते हमें मार भी दोगे तो और
लोग यहा आ धमकी" - विष्णु ने निर्भीक होकर कहा
धवन ने वात को एकदम बदलते हुए कहा - "और कुछ वात
नहीं हम लोग तो स्वर्ण भण्डार को लेना चाहते है हमें यदि वह
हाथ लग जाए तो हम इस लोक को तुरन्त छोड जायेंगे हमारा
उत्पात मचाने का कोई उद्देश्य नहीं है"
"देखेंगे इस बारे में हम क्या कर सकते है"
मुखिया ने
कहा
19 मातृभूमि की ओर
यात्री से पूछा
दीप का मुखिया केवल रामशरण से वात-चीत कर रहा था उसने
"आप यहा रहना चाहंगे कि भूलोक में वापिस
लौटना ?"
पथिक के लिए इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन था वास्तव में
उसको इन जीवों से बड़ी धनिष्टता हो चुकी थी उनकी भापा उनके
रीति-रिवाज उनके धर्म दर्शन-शास्त्र तथा व्यापार सबके बारे में
उसकी काफी जानकारी हो चुकी थी उस मनोरम धरती को वह
स्वर्ग से कम नही समझता था ऐस स्वर्ग को कौन छोड़ना चाहेगा?
उसने सोचा एक दम निर्णय लेना बड़ा कठिन था परन्तु वह यह
भी भली-भांति समझता था कि माता तथा मातृभूमि स्वर्ग से भी
बढकर है उसमें वापिस लौटने की इच्छा प्रबल हो उठी
"मैं उन्हीं दोनों मनुष्यों के साथ भूलोक में वापिस लौटना
चाहूंगा जो मुझे बदी बनाकर लाए थे" पथिक ने निर्णय दे दिया
"ठीक है तुम्ह उन्ही के साथ वापिस भेज दूंगा और साथ ही
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ऐसा अस्त्र भी तुम्ह दूगा जिसके होते हुए वे दोनों तुम्हें काई भी हानि न पहुँचा सकें हमारे अगरक्षक तुम्हारी सीमा तक तुम्हें सुरक्षित छोड आयेंगे" - मुखिया न आश्वासन दिया पथिक को तसल्ली हो गई और वह बडा प्रसन्न हुआ जब विदाई का समय आया तो मुखिया ने बुलाकर कहा "लो तुम्हारे साथ अपना सशस्त्र अगरक्षक भेजता हूँ तुम्हें भी रक्षा के लिए एक शस्त्र देता हूँ मेरा आशीवाद तुम्हारे साथ है तुम्हारे साथी तुम्हारा अनिष्ट नहीं कर सकेंगे" "वैसे मैं उन दोनों को दण्ड दे सकता था परन्तु तुम लोग दूसरे नक्षत्र के अतिथि हा अत मैं क्षमा करता हूँ मैं चाहता हूँ कि हमारी दोनों सभ्यताओं का सवध भविष्य में और घनिष्ट होता जाए" पशिक ने कहा "मैं आपका बहुत कृतज हू आपने मुझे बवाया ही नहीं बल्कि मरे लिए आराम के सारे साधन जुटाए हैं मैने यह रहकर हर क्षेत्र में ज्ञान वृद्धि की है हमारा आना-जाना भविष्य में बराबर बना रहेगा मैं आश्वासन दिलाता हूँ दो सर्वथा भिन्न सभ्यताओं के प्राणिया का विदाई समारोह हृदय विदारक था विदाई लेकर रामशरण धवन तथा विष्णु अंगरक्षक के साथ तीव्र गति से उड़ने वाली मशीन में बैठकर उडने लगे विष्णु तथा धवन का मन अभी यिन्न ही था क्योंकि उनका कुछ समय पूर्व ही तो जुलूस निकाला गया था उडते समय उन्होने वहां के पर्वतों, वनों झीलों तथा विखर हुए गावों के मनोरम दृश्य दये बहुत ऊचाई पर उडते समय उन्हें आक्सीजन की कमी महसूस हो रही थी उग्रसेन रामशरण को इसी मार्ग से लाया था वही दृश्य उसने 77

पुन देखे नीचे इंजीनियर काम कर रहे थे तथा बड़ी-बड़ी
दुग्धशालाए थीं वहां का जर्रा-जर्रा उन्हें विदाई दे रहा था
रामशरण घिडकी में से मनोरन दृश्यों का आनन्द ल रहा था
"वह अपनी धरती से अरवों मील दूर यात्रा करक कई अनुभव प्राप्त
करके वापिस लौट रहा था वह विज्ञान की खोज में एक नया
अध्याय जोडने जा रहा था
उसे पड़े-पडे घुटन प्रतीत हो रही थी आक्सीजन उन लोगों
के पास नपी-तुली ही थी ज्या-ज्यों धरती के समीप आ रहे थे
त्या-त्यों गर्मी से व्याकुल होते जा रहे थे उसे अपने साथी शत्रुओं
से इतना भय नहीं था जितना दम घुटकर मर जाने का
मानव लोक की सीमा तक तो इनका चालक इन्हें ले आया
तब उसने विदाई ली रामशरण ने उसे कृतज्ञता प्रकट करते हुए
एक कीमती घडी उपहार में दी उसने धन्यवाद दिया और वापिस
लौट गया
उसके पास एक अन्य यन्त्र था उसे उसने खोला, उसकी
कला घुमाई और दसूरे ही क्षण वह घर्र-धर्र करता हुआ ऊपर को
उड गया वह एक छोटा पोत ही था
अब इनका यान वेग गति से नीचे की ओर गिरने लगा तव
धवन ने उसका कंट्रोल संभाला रामश्रण ने दूरबीन से देखा तो
उसे एक गोला नजर आया
"हमारा यान तो टकराने जा रहा है। वह चिल्ला उठा
वे तीनों घबरा गए धवन ने एकदम ब्रेक लगाई वास्तव में
चांद के आर्कषण के कारण यान से चाद से टकरा गया होता,
यदि ब्रेक न लगाई जाती
कुछ ही क्षण में एक धमाका हुआ और थान पक्षी की तरह
घूमती हुई चन्द्रमा की धरती पर बैठ गया यान की टागे धरती पर
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'शारा - टिक गई वे लोग धरती पर उतरे धरती की तरह थी THE उनके नाकों में टोटिया लग रही या बालने समय उन्हें. चिल्लाना पड़ता था क्योंकि वहां हवा थी ही उन अब घूमन की हुई चाद की धरती पर घूमने निकले तो उन्हें दाडत हुए चलना पड़ा रास्ते में यदि ऊचा टीला भी पड़ जाता था तो उसे एक छलाग में ही पार कर जाते थे बीच-बीच में बडे-बडे गढ़ उन्हें देखने को मिले जो कि उल्कापात के कारण पड़ गए थे चन्द्रमा की धरती पर उल्कापात के निशान ऐसे पड़े हुए थे जैसे किसी के चेहरे पर चेचक के दाग हो उन्हें धरती में दबी हुई बोतल भी मिली "अहा । यह तो आक्सीजन की बोतलें है" रामशरण उछल पडा "यहा पहले आन वाले चन्द्रयात्री छोड़ गए होंगे' उसने कहा उन लोगों ने ऊपर झाका तो आकाश काले रंग का दिखाई दे रहा था और तारे ऐसे टिमटिमा रहे थे जैसे बल्ब जल रहे हो धवन तथा विष्णु आकाश गगा की यात्रा के बाद अपनी पुरानी शत्रुता को भूल चुके थे उस लोक के मुखिया ने तो रामशरण को पूरा-पूरा आश्वासन देकर भेजा था उसे एक खुफिया यन्त्र भी दिया था तथा उसका आशीर्वाद भी उसे प्राप्त था उन दोनों का व्यवहार उसके प्रति सौहार्दपूर्ण था वातावरण ने उन्हें बिल्कुल बदल दिया था उनके व्यवहार से ऐसे लगता था कि उन्हें अपने किए पर पश्चाताप हो रहा हो धवन ने तो हृदय के उद्गार इस प्रकार व्यक्त किए - "मित्र 71 रामशरण । हमने आज तक तुमसे जा भी दुर्व्यवहार किया है उसके लिए हमें खद है हम क्षमा प्रार्थी है हमसे भारी भूल हुई तुम्हे हमने एक सज्जन व्यक्ति पाया है तुम्हारे कारण हमने अन्य नक्षत्रों की झाकी भी प्राप्त की है तुम यदि हमार बाच में न आते तो हम न-जाने कितने व्यक्तियों की बलि अब तक चढ़ा देते" रामशरण ने भी अपने निष्कपट हृदय की झाकी देते हुए कहा - "प्रिय दोस्तो । मेरे मन में तो आपके प्रति दुर्भावना न कभी रहा है और न ही कभी होगी मैं ता एक निरापराध युवक को उसके वृद्ध पिता को सौंपने की दृष्टि से तुम्हारे बीच में कूद पडा था मेरा स्वार्थ तो था नहीं" वैज्ञानिक क्षेत्र में आप लोगों की देन भी कम नही परन्तु वैज्ञानिक मस्तिष्क के साथ हृदय को भी न भुलाए सहृदय वैज्ञानिक बनकर आप लोग मानव जाति का कल्याण अधिक कर सक्ते हैं वैज्ञानिक ब्रह्माण्ड का रहस्य भले ही जान लें परन्तु जब तक मानव को नहीं पहचानोगे उनका प्रयास अधूरा ही रहेगा" अव हम अधिक शर्मिदा मत करो" लगाते हुए कहा वे लोग अव घूमते-घूमते ऐसी चट्टानों पर से गुजर जा गीली प्रतीत हो रही थी और जहां काई सी जमी हुई थी "वाह । यहां काई भी है और छाटे-छोटे कीटाणु भी उड़ रह धवन ने आश्चर्यपूर्ण हसी हसते हुए कहा "यह भी एक नई खोज का विषय मिल गया" टिप्पणी करते हुए कहा "यहा सभव है जल के श्रोत हों, तब तो यहा बस्तिया बनाई जा सकती हैं इस सबके बावजूद भी उन वैज्ञानिकों को अपनी धरती पर पहुँचने की धुन सवार हो रही थी अत उन्होंने यान पर वापिस लौटकर उसकी मशीन का निरीक्षण किया विष्णु ने उसे गले - -- विष्णु ने 80

वे तीनों यान में सवार हो गए और अपनी सुरक्षा पेटियां वाघ
लो तव इजन को चाल किया गया जोर की ध्वनि हुई और यान
ऊपर का उड गया
उनका यान चन्द्रमा के दूसरी ओर मुडा जो कि सदा धरती से
अंधेरे में ही छिपा रहता है वहां स गुजरते समय भी उन्होंने भारत
भूमि से सम्पर्क बनाए रखने में सफलता प्राप्त की चन्द्रमा की
पिछली और स धरती के साथ सवध स्थापित रखने वाले वे पहल
चन्द्रयात्री थे
चन्द्रमा की आरूषण शक्ति से मुक्त होने के लिए उन्हें धमाका
करना पड़ा उनका जहाज अब धरती की ओर तेज गति स उडने
लगा ऊपर से उन्ह भूलोक के सभी महाद्वीप समुद्र तया पहाड
दूरवीन द्वारा दिखाई दे रह थे समुद्रों का जल धरती के गोले के
साथ-साथ चक्कर काट रहा था
धरती ऊपर से एक भारी चमकता हुआ गोला दिखाई पड
रहा था ऊपर से सूर्य का दृश्य भी अद्भुत ही नजर आ रहा था
हर नन्वे मिनट में सूर्य चमकता और विलीन हो जाता
धरती के समीप आते हा जहाज की गति धीमी कर दी गई
उनक पास स्वचालित कैमर थे जो स्वयं धरती के चित्र बराबर ले
जहाज में तभी एकदम लाल सकत हुआ आगे खतरा था
वैज्ञानिकों ने प्रभु का स्मरण किया और खतरे का सामना करने के
लिए तैयार हो गए
अव जहाज का पायलट रामशरण था उसने दिशा घुमाई
दूसरे ही क्षण उल्कापात हुआ
सब कुछ साफ हो गया था
"तुमने तो हमें बचा लिया, तनिक भी असावधानी हो जाती तो
घवन ने कृतज्ञता प्रकट
--
81

करते हुए कहा उन्हें राई नाम के स्थान पर बनी प्रयोगशाला का ध्यान आने लगा उन्होंने यान को राई में ही उतारने का निश्चय किया वहां कि वैद्यशाला तथा हवाई अड्डे से उन्होंने सम्पर्क स्थापित करके उतरने की व्यवस्था कर ली उनकी प्रतीक्षा विश्व के सभी विज्ञान केन्द्र वहां उत्सुकता से करने लगे शाम के समय उनका जहाज धरती के ऊपर मडराने लगा "नीचे सब ठीक है ?" रामशरण ने राई के कन्ट्रोल रूम से पूछा "बिल्कुल । आप निश्चिन्त होकर उतर आइए" नीचे से उत्तर मिला उनके यान के मातृ भूमि को छूते ही दर्शकों की अपार भीड हवाई अड्डे पर जमा हो गई 'भारत माता की जय । भारतीय वैज्ञानिक अमर रहे के घोषों से आकाश गूंज उठा अन्तरिक्ष यात्रियों को सबसे पहले मिलने वाला था हरीश वह अब उन दोनों वैज्ञानिकों की प्रयोगशाला का अध्यक्ष था और एक साधारण व्यक्ति से विख्यात वैज्ञानिक बन गया था हरीश के वृद्ध पिता ने भी उनका गले मिलकर स्वागत किया दूसरे दिन प्रात भारत की राजधानी दिल्ली में एक भारी समारोह का आयोजन किया गया वहा देश-विदेश के वैज्ञानिक उपस्थित थे भारत के राष्ट्रपति ने उनका अभूतपूर्व देग से अभिनन्दन क्यिा टी वी और दूरदर्शन के द्वारा उसकी फिल्म तैयार की गई और उन्हें अद्वितीय सेवाओं के लिए पदक भी प्रदान किए गए 82

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भीचन्द्र दत
एस सी दत
121024 को धीर मदता तहसील शकरगढ
पाकिस्तान में सुप्रतिष्ठित दस मोहयाल ब्राह्मण परिवार
में जन्म लिया।
एम ए हिन्दी एव अग्रेजी बी एड साहित्यरत्न
हिमाक्ल प्रदेश पजाब तथा दिल्ली शिक्षा विभाग में 35
वर्ष पर्यन्त मुख्याध्याक हाई स्कूल तथा स्नोतकोत्तर
(अग्रेजी) के स्प में क्रमश कार्य करके जनवरी 1984
में सेवा निवृत्त।
अनेक अग्रेजी व हिन्दी पुस्तकों के लेखक जिनमें
निम्नलिखित कतिपय पुस्तकें उल्लेखनीय है -
1 हिन्दी - धीर का धैर्य, अपना खून, प्रगतिपय बापू
की जीवन गाया, हित साधना कवितावली इत्यादि।
Inspiring Stories A Book of
Conversation Eng Graded Translation
Bapus' Forth Play way Eng Readers
Dictionary
उप सम्पादक बी प्रिपेयर्ड (मासिक पत्रिका स्काउट्स
तथा गाइडस्-दिल्ली)
हिन्दी तथा अग्रेजी की पत्रिकाओं में लेख कवितार तथा
कहानिया प्रकाशित होती रहती है।
2 अग्रेजी

Antriksh Ki Duniya Main [ Part - 2 ]

Author
Shri S. C. Dutta
Title
Antriksh Ki Duniya Main [ Part - 2 ]
File name
Antriksh Ki Duniya Main [ Part - 2 ]
Text
OCR done
Citation
1953
Published
2011/03
Publisher
Sayog Prakashan Dehli
Language
Sanskrit
Pages
86
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Science
DLI number
551006
Barcode
4990010031790.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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yYKGZL7rmOW
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Antriksh Ki Duniya Main [ Part - 2 ]