Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Guru Bhakati Yoga
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Jरुभक्तियोग
(GURU BHAKTI YOGA)
लेखक
श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती
ॐ सम्पादक
श्री स्वामी सच्चिदानन्द
Rs.8-00
आकल्पजन्मकोटीनां यज्ञव्रततपः क्रियाः ।
ताः सर्वाः सफला देवि गुरुसंतोषमात्रतः ॥
'हे देवी! कल्पपर्यन्त के, करोड़ों जन्मों के यज्ञ, व्रत,
तप और शास्त्रोक्त क्रियाएँ... ये सब गुरुदेव के संतोष मात्र
से सफल हो जाते हैं ।
(भगवान शंकर)
अमानमत्सरो
दक्षो निर्ममो दृढ़सौहृदः ।
असत्वरोऽर्थ जिज्ञासुः अनसूयुः अमोघवाक् ॥
'सशिष्य मान और मत्सर से रहित, अपने कार्य में दक्ष,
ममता रहित, गुरु में दृढ़ प्रीतिवाला, निश्चलचित्त, परमार्थ का
जिज्ञासु, ईर्ष्या से रहित और सत्यवादी होता है।'
४ ५ १३ अनुक्रम निवेदन आमुख गुरुभक्तियोग की महत्ता प. पू. संत श्री आसारामजी बापू एक अद्भुत विभूति १. गुरुभक्तियोग २. गुरु और शिष्य ३. गुरुभक्ति का विकास गुरुभक्ति की शिक्षा ५. गुरु की महत्ता गुरुभक्ति का अभ्यास ७. साधक के सच्चे पथप्रदर्शक ८. गुरुभक्ति का विवरण ९. गुरुभक्ति की नींव १०. गुरुभक्ति का संविधान ११. गुरु और दीक्षा १२. मंत्रदीक्षा के नियम १३. जप के नियम ४. ६. १५ २१ ३२ ४३ ५९ ७४ ८३ ९४ १०७ १२० १३८ १५३ १५५ १५८
निवेदन
गुरु की आवश्यकता, गुरु के प्रति शिष्य की भक्ति कैसी
होनी चाहिए एवं गुरु के मार्गदर्शन के द्वारा साधक शिष्य
किस प्रकार आत्म-साक्षात्कार कर सकता है, इस विषय
में पू. श्री स्वामी शिवानन्दजी महाराज ने अपनी कई पुस्तकों
में लिखा है। श्री गुरुदेव के अग्रगण्य शिष्य एवं उनके निजी
रहस्यमंत्री श्री स्वामी सच्चिदानन्दजी ने सोचा कि स्वामीजी
महाराज की पुस्तकों में से गुरु एवं गुरुभक्ति के विषय में
जो जो लिखा गया है वह सब संकलित करके अलग पुस्तक
के रूप में प्रकाशित करना अत्यंत आवश्यक है। अतः उन्होंने
यह 'गुरुभक्तियोग' पुस्तक का सम्पादन किया ।
आध्यात्मिक मार्ग में विचरनेवाले साधकों के लिए
यह पुस्तक बहुत ही उपयोगी है, इतना ही नहीं, एक
आशीर्वाद के समान है ।
सद्गुरुदेव के कृपा-प्रसादरूप यह पुस्तक आपको
अमरत्व, परम सुख और शान्ति प्रदान करे यही अभ्यर्थना...
आमुख स्वामी शिवानन्द कर्म और कर्त्ता, पदार्थ और व्यक्ति के सम्बन्ध से ज्ञान होता है। वह एक प्रक्रिया है, चेतना नहीं है। बाह्य पदार्थ और आन्तरिक स्थिति की प्रतिक्रिया के द्वारा ही सब प्रक्रिया प्रकट होती है । मनुष्य में ज्ञान का उद्भव यह ऐसी ही प्रतिक्रिया के द्वारा घटित एक रहस्यमय प्रक्रिया है । मूलतः ज्ञान सार्वत्रिक है और उसके लिए कोई प्रक्रिया आवश्यक नहीं है । परन्तु ज्ञान का उदय माने भावातीत चेतना नहीं अपितु सम्बन्धित व्यक्ति में ज्ञान का उदय । सर्वोच्च ज्ञान को स्वरूपज्ञान... अपने सत्य अस्तित्व के बोध विषयक ज्ञान कहा जाता है । जीव में इस स्वरूपज्ञान का उदय मन की वृत्तियों के द्वारा अभिव्यक्ति की सापेक्ष प्रक्रिया से होता है। इस प्रकार उदय की प्रक्रिया के दौरान ज्ञान वृत्तिज्ञान के रूप में होता है और वृत्तिज्ञान निश्चित रूप से चेतना की देश एवं काल से बद्ध अवस्था है । मानसशास्त्र जिसे ज्ञान कहता है वही वृत्तिज्ञान है । उसकी प्रबलता, व्यापकता और गहनता अलग अलग हो सकती है। वृत्तिज्ञान बाह्य कर्म और कर्त्ता, पदार्थ और व्यक्ति के सम्बन्ध के सिवाय उत्पन्न नहीं हो सकता । इस विश्व में कोई भी घटना दो घटना या स्थितियों के संयोग से ही घंटित हो सकती है और तभी वृत्तिज्ञान उत्पन्न हो सकता है । आध्यात्मिक ज्ञान के क्रमशः आविष्कार के लिए आध्यात्मिक मार्ग का साधक कर्त्ता या व्यक्ति के रूप में माना ।
w r गुरुभक्तियोग जा सकता है । अब दूसरी वस्तु या व्यक्ति कर्म के रूप में आवश्यक है। जब ऐच्छिक अनुशासन और एकाग्रता के द्वारा अपने मन की निर्मलता बढ़ती है तब भावातीत चेतना के प्रतिबिम्ब के रूप में ज्ञान का आविष्कार होता है। ज्ञान के आविष्कार की मात्रा का फर्क मन की निर्मलता के फर्क के कारण होता है। किसी भी प्रकार के ज्ञान के उद्भव के लिए बाह्य साधन, कर्म या क्रिया आवश्यक है । अतः साधक में ज्ञान का आविर्भाव करने के लिए गुरु की आवश्यकता होती है । परस्पर प्रभावित करने की सार्वत्रिक प्रक्रिया के लिए एक दूसरे के पूरक दो भाग के रूप में गुरु-शिष्य हैं । शिष्य में ज्ञान का उदय शिष्य की पात्रता और गुरु की चेतनाशक्ति पर अवलम्बित है। शिष्य की मानसिक स्थिति अगर गुरु की चेतना के आगमन के अनुरूप पर्याप्त मात्रा में तैयार नहीं होती तो ज्ञान का आदान-प्रदान नहीं हो सकता । इस ब्रह्माण्ड में कोई भी घटना घटित होने के लिए यह पूर्वशर्त है । जब तक सार्वत्रिक प्रक्रिया के एक दूसरे के पूरक ऐसे दो भाग या दो अवस्थाएँ इकट्ठी नहीं होती तब तक कहीं भी, कोई भी घटना घटित नहीं हो सकती । 'आत्म-निरीक्षण के द्वारा ज्ञान का उदय स्वतः हो सकता है और इसलिए बाह्य गुरु की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है...' यह मत सर्वस्वीकृत नहीं बन सकता । इतिहास बताता है कि ज्ञान की हरएक शाखा में शिक्षण की प्रक्रिया के लिए शिक्षक की सघन प्रवृत्ति अत्यंत आवश्यक है। यदि किसी भी व्यक्ति में, किसी भी बाह्य सहायता के सिवाय,
७
गुरुभक्तियोग
सहज रीति से ज्ञान का उदय संभव होता तो स्कूल, कॉलेज
एवं युनिवर्सिटियों की कोई आवश्यकता नहीं रहती। जो
लोग "शिक्षक की सहायता के बिना ही, स्वतंत्र रीति से कोई
व्यक्ति कुशल बन सकता है ...' ऐसे गलत मार्ग पर ले
जानेवाले मत का प्रचार प्रसार करते हैं वे लोग स्वयं तो
किसी शिक्षक के द्वारा ही शिक्षित होते हैं । हाँ, ज्ञान के
उदय के लिए शिष्य या विद्यार्थी के प्रयास का महत्त्व कम
नहीं है । शिक्षक के उपदेश जितना ही उसका भी महत्त्व
है।
इस ब्रह्माण्ड में कर्ता एवं कर्म सत्य के एक ही स्तर
पर स्थित हैं। क्योंकि इसके सिवाय उनके बीच पारस्परिक
आदान-प्रदान संभव नहीं हो सकता। अलग स्तर पर स्थित
चेतनाशक्ति के बीच प्रतिक्रिया नहीं हो सकती । हालांकि
शिष्य जिस स्तर पर होता है उस स्तर को माध्यम बनाकर
गुरु अपनी उच्च चेतना को शिष्य पर केन्द्रित कर सकते
हैं। इससे शिष्य के मन का योग्य रूपांतर हो सकता
है । गुरु की चेतना के इस कार्य को 'शक्ति-संचार' कहा
जाता है। इस प्रक्रिया में गुरु की शक्ति शिष्य में प्रविष्ट होती
है । ऐसे उदाहरण भी मिल जाते हैं कि शिष्य के बदले में
गुरु ने स्वयं ही साधना की हो और उच्च चेतना की प्रत्यक्ष
सहायता के द्वारा शिष्य के मन की शुद्धि करके उसका
ऊर्चीकरण किया हो ।
दोषदृष्टिवाले लोग कहते हैं : ''अन्तरात्मा की सलाह
लेकर सत्य-असत्य, अच्छा-बुरा हम पहचान सकते हैं
अतः बाह्य गुरु की आवश्यकता नहीं है !''
गुरुभक्तियोग किन्तु यह बात ध्यान में रहे कि जब तक साधक शुचि और इच्छा-वासनारहितता के शिखर पर नहीं पहुँच जाता तब तक योग्य निर्णय करने में अन्तरात्मा उसे सहायरूप नहीं बन सकती। पाशवी अन्तरात्मा किसी व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान नहीं दे सकती । मनुष्य के विवेक और बौद्धिक मत पर उसके अव्यक्त और अज्ञात मन का गहरा प्रभाव पड़ता है । प्रायः सभी मनुष्यों की बुद्धि सुषुप्त इच्छाओं तथा वासनाओं का एक साधन बन जाती है । मनुष्य की अन्तरात्मा उसके अभिगम, झुकाव, रुचि, शिक्षा, आदत, वृत्तियाँ और अपने समाज के अनुरूप बात ही कहती है । अफ्रिका के जंगली आदिवासी, सुशिक्षित युरोपियन और सदाचार की नींव पर सुविकसित बने हुए योगी की अन्तरात्मा की आवाजें भिन्न भिन्न होती हैं.। बचपन से अलग अलग ढंग से बड़े हुए दस अलग अलग व्यक्तियों की दस. अलग अलग अन्तरात्मा होती हैं। विरोचन ने स्वयं ही मनन किया; अपनी अन्तरात्मा का मार्गदर्शन लिया एवं 'मैं कौन हूँ ? इस समस्या का आत्मनिरीक्षण किया और निश्चय किया कि यह देह ही मूलभूत तत्त्व है । याद रखना चाहिए कि मनुष्य की अन्तरात्मा पाशवी वृत्तियों, भावनाओं तथा प्राकृत वासनाओं की जाल में फँसी हुई है। मनुष्य के मन की वृत्ति विषय और अहं की ओर ही जायगी, आध्यात्मिक मार्ग में नहीं मुड़ेगी । आत्म- साक्षात्कार की सर्वोच्च भूमिका में स्थित गुरु में शिष्य अगर अपने व्यक्तित्व का सम्पूर्ण समर्पण कर दे तो साधना-मार्ग ।
९ गुरुभक्तियोग के ऐसे भयस्थानों से बच सकता है । ऐसा साधक संसार से परे दिव्य प्रकाश को प्राप्त कर सकता है। मनुष्य की बुद्धि एवं अन्तरात्मा को जिस प्रकार निर्मित किया जाता है, अभ्यस्त किया जाता है उसी प्रकार वे कार्य करते हैं । सामान्यतः वे दृश्यमान मायाजगत तथा विषय-वस्तु की आकांक्षा एवं अहं की आकांक्षा पूर्ण करने के लिये कार्यरत रहते हैं। सजग प्रयत्न के बिना आध्यात्मिक ज्ञान के उच्च सत्य को प्राप्त करने के लिये कार्यरत नहीं होते । 'गुरु की आवश्यकता नहीं है और हरएक को अपनी विवेक-बुद्धि तथा अन्तरात्मा का अनुसरण करना चाहिये... ऐसे मत का प्रचार प्रसार करनेवाले भूल जाते हैं कि ऐसे मत का प्रचार करके वे स्वयं गुरु की तरह प्रस्तुत हो रहे हैं । 'किसी भी शिक्षक की आवश्यकता नहीं है' ऐसा सिखानेवालों को उनके शिष्य मानपान और भक्तिभाव अर्पित करते हैं । भगवान बुद्ध ने अपने शिष्यों को बोध दिया कि 'तुम स्वयं ही तार्किक विश्लेषण करके मेरे सिद्धान्त की योग्यता-अयोग्यता और सत्यता की जाँच करो । बुद्ध कहते हैं इसलिये सिद्धान्त को सत्य मानकर स्वीकार कर लो ऐसा नहीं।' किसी भी भगवान की पूजा नहीं करना, ऐसा उन्होंने सिखाया लेकिन इसका परिणाम यह आया कि महान गुरु एवं भगवान के रूप में उनकी पूजा शुरु हो गई। इस प्रकार 'स्वयं ही चिन्तन करना चाहिए और गुरु की आवश्यकता नहीं है' इस मत की शिक्षा से स्वाभाविक ही सीखनेवाले के लिये गुरु की आवश्यकता का इन्कार नहीं हो सकता । मनुष्य के अनुभव कर्ता-कर्म के परस्पर सम्बन्ध की प्रक्रिया १० गुरुभक्तियोग पर आधारित है। पश्चिम में कुछ लोग मानते हैं कि गुरु पर शिष्य का अवलंबन एक मानसिक बन्धन है । मानस-चिकित्सा के मुताबिक ऐसे बन्धन से मुक्त होना जरूरी है । यहाँ स्पष्टता करना अत्यन्त आवश्यक है कि मानस-चिकित्सावाले मानसिक परावलम्बन से गुरु-शिष्य का सम्बन्ध बिल्कुल भिन्न है। गुरु की उच्च चेतना के आश्रय में शिष्य अपना व्यक्तित्व समर्पित करता है। गुरु की उच्च चेतना शिष्य की चेतना को आवृत्त कर लेती है और उसका ऊर्वीकरण करती है। तदुपरान्त, गुरु-शिष्य के व्यक्तिगत सम्बन्ध एवं शिष्य का गुरु पर अवलम्बन केवल प्रारंभ में ही होता है। बाद में तो वह परब्रह्म की शरणागति बन जाती है । गुरु सनातन शक्ति के प्रतीक बनते हैं। किसी दर्दी के मानस- चिकित्सक प्रति परावलम्बन का सम्बन्ध तोड़ना अनिवार्य है, क्योंकि यह सम्बन्ध दर्दी का मानसिक तनाव कम करने के लिये केवल अस्थायी सम्बन्ध है । जब चिकित्सा पूरी हो जाती है तब यह परावलम्बन तोड़ दिया जाता है और दर्दी पूर्व की भाँति अलग और स्वतंत्र हो जाता है। किन्तु गुरु-शिष्य के सम्बन्ध में, प्रारंभ में या अन्त में, कभी भी अनिच्छनीय परावलम्बन नहीं होता।यह तो केवल पराशक्ति पर ही अवलम्बन होता है । गुरु को देह स्वरूप में या एक व्यक्ति के स्वरूप में नहीं माना जाता अपितु परम सत्य के प्रतिनिधि के रूप में माना जाता है । गुरु पर अवलम्बन शिष्य के पक्ष में देखा जाय तो आत्मशुद्धि की निरन्तर प्रक्रिया है जिसके द्वारा शिष्य ईश्वरीय परम तत्त्व ११ गुरुभक्तियोग का अंतिम लक्ष्य प्राप्त कर सकता है। कुछ लोग उदाहरण देते हैं कि प्राचीन समय में भी याज्ञवल्क्य ने अपने गुरु वैशंपायन से अलग होकर, किसी भी अन्य गुरु की सहाय के बिना ही, स्वतंत्र रीति से आध्यात्मिक विकास किया था । परन्तु याज्ञवल्क्य गुरु से अलग हो गये इसका अर्थ यह नहीं है कि वे गुरु के वफादार नहीं थे। गुरु ने क्रोधित होकर कहा था कि उन्होंने दी हुई विद्या लौटाकर आश्रम छोड़कर चले जाओ । फलतः याज्ञवल्क्य में मानव-गुरु के प्रति अश्रद्धा का प्रादुर्भाव हुआ लेकिन उन्होंने गुरु की खोज करना छोड़ नहीं दिया। उन्होंने गुरु की आवश्यकता का अस्वीकार नहीं किया है और आध्यात्मिक मार्ग में स्वतंत्र रीति से आगे बढ़ा जा सकता है ऐसा भी नहीं माना है। उन्होंने उच्चतर गुरु सूर्यनारायण का आश्रय लिया। जब उन्होंने फिरसे ज्ञान प्राप्त किया तब सूर्य की कृपा प्राप्त करने के लिये याज्ञवल्क्य के दृढ़ संकल्प बल एवं हिम्मत पर प्रसन्न होकर पुराने गुरु ने अपने अन्य शिष्यों को ज्ञान देने के लिए प्रार्थना की तब याज्ञवल्क्य ने अन्य शिष्यों को भी ज्ञान दिया था । प्रकृति के विभिन्न स्वरूपों के द्वारा अभिव्यक्त ईश्वर ही सर्वोच्च गुरु है । हमारे इर्दगिर्द जो विश्व है वह हमारे जीवन में बोध देनेवाला शिक्षक है । हम अगर प्रकृति की लीला के प्रति सजग रहें तो हमारे समक्ष होनेवाली हरएक घटना में गहन रहस्य एवं बोधपाठ मिल जाता है। यह विश्व ईश्वर का साकार स्वरूप है । उसकी लीला गूढ और रहस्यमय है । वह लीला आन्तर एवं बाह्य, व्यक्तिलक्षी एवं । १२ गुरुभक्तियोग वस्तुलक्षी, हर प्रकार के जीवन के अनुभवों को समाविष्ट कर लेती है। उसको जानने से, समझने से हमारे अनुभव, भावना एवं समझ का योग्य विकास होता है । परब्रह्म के प्रति हमारे विकास के लिए परिवर्तन संभव बनता है । अगर हम प्रकृति की उत्क्रान्ति की प्रक्रिया के साथ व्यक्तिगत विकास को नहीं जोड़ेंगे तो केवल यांत्रिक विकास होगा। उसमें व्यक्ति अनिवार्यतः घसीटा जाता है। उस पर किसी व्यक्ति का नियंत्रण नहीं होता । किन्तु विकास जब परम चेतना के अंश स्वरूप होता है और व्यक्ति की अपनी चेतना में घुलमिल जाता है तब योग की प्रक्रिया घटित होती है। व्यक्ति की चेतना अपने अस्तित्व को आत्मा के साथ पहचानकर, अपने आत्मा में वैश्विक उत्क्रान्ति का अनुभव करे यह प्रक्रिया योग है। अन्य दृष्टि से देखें तो, ब्रह्माण्ड की लीला का लघु स्वरूप में अपनी आत्मा में अनुभव करना योग है । जब यह स्थिति प्राप्त होती है तब व्यक्ति ईश्वरेच्छा को सम्पूर्णतः शरण हो जाता है। अथवा पराशक्ति के नियम उसको इतने तादृश बन जाते हैं कि प्रकृति की घटनाओं एवं मनुष्य की इच्छाओं के बीच संघर्षों का पूर्णतः लोप हो जाता है। उस व्यक्ति की अभिलाषाएँ दैवी इच्छा या प्रकृति की घटनाओं से अभिन्न बन जाती हैं । गुरु की यह सर्वोच्च विभावना है और हर साधक को यह प्राप्त करना है । व्यक्तिगत गुरु का स्वीकार करना यानी साधक की परब्रह्म में विलीन होने की तैयारी और उस दिशा में एक सोपान । गुरु की विभावना के विकास के लिये तथा व्यक्ति की गुरु के प्रति शरणागति विभिन्न सोपान हैं। फिर .
गुरुभक्तियोग
१३
भी साधना के किसी भी सोपान पर गुरु की आवश्यकता
का इन्कार नहीं हो सकता, क्योंकि आत्म-साक्षात्कार के
लिए तड़पते हुए साधक को होनेवाली परब्रह्म की अनुभूति
का नाम गुरु है।
गुरुभक्तियोग की महत्ता
ब्रह्मलीन स्वामी शिवानन्दजी
जिस प्रकार शीघ्र ईश्वरदर्शन के लिए कलियुग-साधना
के रूप में कीर्तन-साधना है उसी प्रकार इस संशय,
नास्तिकता, अभिमान और अहंकार के युग में योग की एक
नई पद्धति यहाँ प्रस्तुत है... गुरुभक्तियोग। यह योग अद्भुत
है। इसकी शक्ति असीम है। इसका प्रभाव अमोघ है। इसकी
महत्ता अवर्णनीय है। इस युग के लिए उपयोगी इस विशेष
योग-पद्धति के द्वारा आप इस हाड़-चाम के पार्थिव देह में
रहते हुए ईश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन कर सकते हैं। इसी जीवन
में आप उन्हें आपके साथ विचरण करते हुए निहार सकते
।
।
हैं।
साधना का बड़ा दुश्मन रजोगुणी अहंकार है। अभिमान
को निर्मूल करने के लिए एवं विषमय अहंकार को पिघलाने
के लिए गुरुभक्तियोग उत्तम और सबसे अधिक सचोट
साधनमार्ग है । जिस प्रकार किसी रोग के विषाणु निर्मूल
करने के लिए कोई विशेष प्रकार की जन्तुनाशक दवाई
आवश्यक है उसी प्रकार अविद्या और अहंकार के नाश के
लिए गुरुभक्तियोग सबसे अधिक प्रभावशाली, अमूल्य और
e-matrimore
१४
गुरुभक्तियोग
निश्चित प्रकार का उपचार है । वह सबसे अधिक
प्रभावशाली 'मायानाशक' और 'अहंकार नाशक' है ।
गुरुभक्तियोग की भावना में जो सद्भागी शिष्य निष्ठापूर्वक
सराबोर होते हैं उन पर माया और अहंकार के रोग की
कोई असर नहीं होती। इस योग का आश्रय लेनेवाला व्यक्ति
सचमुच भाग्यशाली है । क्योंकि वह योग के अन्य प्रकारों
में भी सर्वोच्च सफलता हाँसिल करेगा । उसको कर्म,
भक्ति, ध्यान और ज्ञानयोग के फल पूर्णतः प्राप्त होंगे ।
इस योग में संलग्न होने के लिए तीन गुणों की
आवश्यकता है : निष्ठा, श्रद्धा और आज्ञापालन । पूर्णता के
ध्येय में संन्निष्ठ रहो । संशयी और ढीलेढाले मत रहना ।
अपने स्वीकृत गुरु में सम्पूर्ण श्रद्धा. रखो । आपके मन
में संशय की छाया को भी फटकने मत देना । एक बार गुरु
में सम्पूर्ण श्रद्धा दृढ़ कर लेने के बाद आप समझने लगेंगे
कि उनका उपदेश आपकी श्रेष्ठ भलाई के लिए ही होता
है । अतः उनके शब्द का अन्तःकरणपूर्वक पालन करो ।
उनके उपदेश का अक्षरशः अनुसरण करो। आप हृदयपूर्वक
इस प्रकार करेंगे तो मैं विश्वास दिलाता हूँ कि आप पूर्णता
को प्राप्त करेंगे ही । मैं पुनः दृढ़तापूर्वक विश्वास दिलाता
हूँ।
प.पू. संत श्री आसारामजी बापू :
एक अद्भुत विभूति
ध्यान और योग के अनुभव कैसे प्राप्त किये जायँ ?
पूजा-पाठ, जप-तप-ध्यान करने पर भी जीवन में व्याप्त
अतृप्ति का कैसे निवारण करें ? ईश्वर में कैसे मन लगायें?
अपने अंदर ही निहित आत्मानन्द के खजाने को कैसे खोलें?
व्यावहारिक जीवन में परेशान करनेवाले भय, चिन्ता,
निराशा, हताशा, आदि को जीवन से दूर कैसे भगाएँ ?
निश्चिंतता, निर्भयता, निरन्तर प्रसन्नता प्राप्त करके जीवन
को आनन्द से कैसे महकायें ? अपने प्राचीन शास्त्रों में वर्णित
आनन्द-स्वरूप ईश्वर के अस्तित्व की झाँकी हम अपने
हृदय
में कैसे पायें ? क्या आज भी यह सब सम्भव है ?
हाँ, सम्भव है, अवश्यमेव । मानव को चिंतित बनानेवाले
इन प्रश्नों का समाधान साधना के निश्चित परिणामों के द्वारा
कराके पिपासु साधकों के जीवन को ईश्वराभिमुख करके उसे
मधुरता प्रदान करनेवाले ऋषि-महर्षि और संत-महापुरुष
आज भी समाज में वर्तमान हैं। 'बहुरत्ना वसुन्धरा ।' इस
संत महापुरुषों की सुगंधित हारमाला में पूज्यपाद संत श्री
आसारामजी बापू एक पूर्ण विकसित सुमधुर पुष्प हैं ।
अहमदाबाद शहर में, किन्तु शहरी वातावरण से दूर
साबरमती की मनमोहक प्राकृतिक गोद में त्वरित गति से
विकसते हुए उनके पावन आश्रम के अध्यात्मपोषक
वातावरण में आज हजारों साधक जाकर भक्तियोग,
१६ गुरुभक्तियोग नादानुसन्धानयोग, ज्ञानयोग एवं कुण्डलिनी योग की शक्तिपातवर्षा का लाभ उठा-उठाकर अपने व्यक्तिगत पारमार्थिक जीवन को अधिकाधिक उन्नत एवं आनन्दमय बना रहे हैं । चित्त में समता का प्रसाद पाकर वे व्यावहारिक जीवन-नौका को बड़े ही उत्साह से खे-खेकर निहाल होते जा रहे हैं। प्राचीन ऋषि-कुलों का स्मरण करानेवाले इस पावन आश्रम में कुण्डलिनी योग की सच्ची अनुभूति कराके आत्मिक प्रेमसागर में डुबकी लगवाकर, मानव समुदाय को ईश्वरीय आनन्द में सराबोर करके अगमनिगम के औलिया, हजारों तप्त हृदयवाले संसारयात्रियों के आश्रयदाता वट- वृक्षतुल्य, प्रेमपूर्ण हृदयवाले, सहज सान्निध्य और सत्संग मात्र से वेदान्त के अमृत-रस का स्वाद चखा रहे हैं । संतश्री के नाम को सुनकर, उनकी पुस्तकें पढ़कर अनेक सज्जन उनके दर्शन और मुलाकात के लिए कुतू- हलवश एक बार उनके आश्रम में आते हैं, फिर तो वे नियमित आनेवाले साधक बनकर योग और वेदान्त के रसिक बन जाते हैं। वे अपने जीवन-प्रवाह को अमृतमय आनन्द- सिन्धु की तरफ बहते हुए देखकर हृदय में गद्गदित हो जाते हैं, आनन्द में सराबोर हो जाते हैं । एक अजब योगी आश्रम में आकर पूज्यश्री के दर्शन और आध्यात्मिक तेज से उद्दीप्त नयनामृत से सिक्त एक सुप्रसिद्ध लेखक, वक्ता, तंत्री सज्जन ने लिखा है :
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गुरुभक्तियोग
"कोई मुझसे पूछे कि अहमदाबाद के आसपास कौन
सच्चा योगी है ? मैं तुरन्त संत श्री आसारामजी बापू का
नाम दूँगा । साबरतट स्थित एक भव्य एवं विशाल आश्रम
में विराजमान इन दिव्यात्मा महापुरुष का दर्शन करना,
वास्तव में जीवन की एक उपलब्धि है। उनके निकट में
पहुँचना, निश्चित ही अहोभाग्य की सीमा पर पहुँचना है।
योगियों की खोज में मैं काफी भटका हूँ, पर्वत और
गुफाओं के चक्कर काटने में कभी पीछे मुड़कर देखा तक
नहीं । परन्तु प्रभुत्वशाली व्यक्तित्व के महाधनी ऐसे संत श्री
आसारामजी बापू से मिलते ही मेरे अन्तर में प्रतीति-सी
हो गई कि यहाँ तो शुद्धतम सुवर्ण ही सुवर्ण है ।
प्रेम और प्रज्ञा के सागर
संतश्री की आँखों में ऐसा दिव्य तेज जगमगाया करता
है कि उनके अन्दर की गहरी अतल दिव्यता में डूब जाने
की कामना करनेवाला क्षणभर में ही उसमें डूब जाता है ।
मानो, उन आँखों में प्रेम और प्रकाश का असीम सागर हिलौरे
ले रहा हो।
वे सरल भी इतने कि छोटे-छोटे बालकों की तरह
व्यवहार करने लगें। उनमें ज्ञान भी ऐसा अद्भुत कि विकट
पहेली को पलभर में सुलझा कर रख दें। उनकी वाणी की
बुनकार ऐसी कि सजगता के तट पर सोनेवाले को क्षणभर
में जगाकर ज्ञान-सागर की मस्ती में लीन कर दें।
अनेक शक्तियों के स्वामी
अन्यत्र कहीं देखी न गई हो ऐसी योगसिद्धि मैंने
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१८
गुरुभक्तियोग
अनेकबार उनमें देखी है। अनेक दरिद्रियों को उन्होंने सुख
और समृद्धि के सागर में सैर करनेवाले बना दिये हैं। उनके
चुम्बकीय शक्ति-सम्पन्न पावन सान्निध्य में असंख्य साधकों
द्वारा स्वानुभूत चमत्कारों और दिव्य अनुभवों का आलेखन
करने लगूं तो एक विराट भागवत कथा तैयार हो जाय ।
आगत व्यक्ति के मन को जान लेने की शक्ति तो उनमें इतनी
तीव्रता से सक्रिय रहती है मानो समस्त नभमण्डल को वे
अपने हाथों में लेकर देख रहे हों।
ऐसे परम सिद्ध पुरुष के सान्निध्य में, उनकी प्रेरक पावन
अमृतवाणी में से तुम्हारी जीवन-समस्याओं का सांगोपांग
हल तुम्हें अवश्य मिल जाएगा ।
साबरतट पर स्थित चैतन्य-लोक तुल्य संत श्री
आसारामजी आश्रम में प्रविष्ट होते ही एक अद्भुत शान्ति
की अनुभूति होने लगती है । प्रत्येक रविवार और बुधवार
को दोपहर ११ बजे से और हररोज शाम ६ बजे से. एवं
ध्यानयोग शिविरों के दौरान आश्रम में ज्ञानगंगा उमड़ती
रहती है। आध्यात्मिक अनुभूतियों के उपवन लहलहाते
हैं । आश्रम का सम्पूर्ण वातावरण मानो एक चैतन्य विद्युत्तेज
से छलछलाता है। परम चैतन्य मानो स्वयं ही मूर्त स्वरूप
धारण करके प्रेम और प्रकाश का सागर लहराता
विद्यार्थियों के लिए आयोजित योग शिविरों में अनेक
विद्यार्थियों एवं अध्यापकों ने अपने जीवन-विकास का
अनोखा पथ पा लिया है ।
पूज्य बापू का विद्युन्मय व्यक्तित्व, अन्तस्तल की गहराई
में से उमड़ती हुई वाणी की गंगधारा और आश्रम के समग्र
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गुरुभक्तियोग
१९
वातावरण में फैलती हुई दिव्यता का आस्वाद एक बार भी
जिस किसीको मिल जाता है वह कदापि उसे भूल नहीं
सकता | जो अपने उर के आंगन में अमृत ग्रहण करने के
लिए तत्पर हो, उसे अमृत का आस्वाद अवश्य मिल जाता
है।
ब्रह्मनिष्ठ; योगसिद्ध, माधुर्य के महासिन्धु समान संत
श्री आसारामजी बापू का सान्निध्य सेवन करनेवाले का और
अमृतवर्षा को संग्रहित करनेवाले का अल्प पुरुषार्थ भी व्यर्थ
नहीं जायगा ऐसा अनेकों का अनुभव बोल रहा है ।
गुरुतत्व
जिस प्रकार पिता या पितामह की सेवा करने से पुत्र या
पौत्र खुश होता है इसी प्रकार गुरु की सेवा करने से मंत्र प्रसन्न
होता है। गुरु, मंत्र एवं इष्टदेव में कोई भेद नहीं मानना । गुरु
ही ईश्वर हैं। उनको केवल मानव ही नहीं मानना। जिस स्थान
गुरु
निवास कर रहे हैं वह स्थान कैलास है। जिस घर में
वे रहते हैं वह काशी या वाराणसी है। उनके पावन चरणों का
पानी गंगाजी स्वयं हैं । उनको पावन मुख से उच्चारित मंत्र
रक्षणकर्ता ब्रह्मा स्वयं ही हैं ।
गुरु की मूर्ति ध्यान का मूल है | गुरु के चरणकमल
पूजा का मूल है | गुरु का वचन मोक्ष का मूल है।
गुरु तीर्थस्थान हैं । गुरु अग्नि हैं । गुरु सूर्य हैं । गुरु
समस्त जगत हैं | समस्त विश्व के तीर्थधाम गुरु के
२० गुरुभक्तियोग चरणकमलों में बस रहे हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, पार्वती, इन्द्र आदि सब देव और सब पवित्र नदियाँ शाश्वत काल से गुरु की देह में स्थित हैं। केवल शिव ही गुरु हैं । गुरु और इष्टदेव में कोई भेद नहीं है । जो साधना एवं योग के विभिन्न प्रकार सिखाते हैं वे शिक्षागुरु हैं | सबमें सर्वोच्च गुरु वे हैं जिनसे इष्टदेव का मंत्र श्रवण किया जाता है और सीखा जाता है। उनके द्वारा ही सिद्धि प्राप्त की जा सकती है। अगर गुरु. प्रसन्न हों तो भगवान प्रसन्न होते हैं । गुरु नाराज हों तो भगवान नाराज होते हैं । गुरु इष्टदेवता के पितामह हैं। जो मन, वचन, कर्म से पवित्र हैं, इन्द्रियों पर जिनका संयम है, जिनको शास्त्रों का ज्ञान है, जो सत्यव्रती एवं प्रशांत हैं, जिनको ईश्वर-साक्षात्कार हुआ है वे गुरु हैं । बुरे चरित्रवाला व्यक्ति गुरु नहीं हो सकता । शक्तिशाली शिष्यों को कभी शक्तिशाली गुरुओं की कमी नहीं रहती। शिष्य को जितनी जितनी गुरु में श्रद्धा होती है उतने फल की उसे प्राप्ति होती है । किसी आदमी के पास यूनिवर्सिटी की उपाधियाँ हों इससे वह गुरु की कसौटी करने की योग्यतावाला नहीं बन जाता । गुरु के आध्यात्मिक ज्ञान की कसौटी करना यह किसी भी मनुष्य के लिए मूर्खता एवं उद्दण्डता की पराकाष्ठा है । ऐसा व्यक्ति दुन्यावी ज्ञान के मिथ्याभिमान से अन्ध बना हुआ है ।
ॐ
प्रकरण : 9
गुरुभक्तियोग
गुरुभक्तियोग के अंश
१. गुरुभक्तियोग माना सद्गुरु को सम्पूर्ण आत्मसमर्पण
करना ।
२. गुरुभक्तियोग के आठ महत्त्वपूर्ण अंग इस प्रकार हैं :
(अ) गुरुभक्तियोग के अभ्यास के लिये सच्चे हृदय की
स्थिर महेच्छा । (ब) सद्गुरु के विचार, वाणी और कार्यों
में सम्पूर्ण श्रद्धा । (क) गुरु के नाम का उच्चारण और गुरु
को नम्रतापूर्वक साष्टांग प्रणाम । (ड) सम्पूर्ण आज्ञाकारिता
के साथ गुरु के आदेशों का पालन । (प) बिना फलप्राप्ति
की अपेक्षा सद्गुरु की सेवा । (फ) भक्तिभावपूर्वक हररोज
सद्गुरु के चरणकमलों की पूजा । (भ) सद्गुरु के दैवी कार्य
के लिए आत्म-समर्पण... तन, मन, धन समर्पण। (म) गुरु
की कल्याणकारी कृपा प्राप्त करने के लिए एवं उनका पवित्र
उपदेश सुनकर उसका आचरण करने के लिए सद्गुरु के
पवित्र चरणों का ध्यान ।
३. गुरुभक्तियोग योग का एक स्वतंत्र प्रकार है ।
४. मुमुक्षु जब तक गुरुभक्तियोग का अभ्यास नहीं करता
तब तक ईश्वर के साथ एकरूप होने के लिए आध्यात्मिक
मार्ग में प्रवेश करना उसके लिए सम्भव नहीं है ।
५. जो व्यक्ति गुरुभक्तियोग की फिलासफी समझता है
२२
गुरुभक्तियोग
वही गुरु को बिनशरती आत्म-समर्पण कर सकता है ।
६. जीवन के परम ध्येय अर्थात् आत्म-साक्षात्कार की
प्राप्ति गुरुभक्तियोग के अभ्यास द्वारा ही हो सकती है ।
७. गुरुभक्ति का योग सच्चा एवं सुरक्षित योग है, जिसका
अभ्यास करने में किसी भी प्रकार का भय नहीं है।
८. आज्ञाकारी बनकर गुरु के आदेशों का पालन करना,
उनके उपदेशों को जीवन में उतारना, यही गुरुभक्तियोग का
सार है।
गुरुभक्तियोग का हेतु
९. मनुष्य को पदार्थ एवं प्रकृति के बन्धनों से मुक्ति
दिलाना और गुरु को सम्पूर्ण आत्मसमर्पण करके 'स्व' के
अबाध्य स्वतंत्र स्वभाव का भान कराना यह गुरुभक्तियोग
का हेतु है ।
१०. जो व्यक्ति गुरुभक्तियोग का अभ्यास करता है वह
बिना किसी विपत्ति से अहंभाव को निर्मूल कर सकता है,
संसार के मलिन जल को बहुत सरलता से पार कर जाता
है और अमरत्व एवं शाश्वत सुख प्राप्त करता है ।
११. गुरुभक्तियोग मन को शान्त और निश्चल
बनानेवाला है।
१२. गुरुभक्तियोग दिव्य सुख के द्वार खोलने की अमोघ
कुँजी है।
१३. गुरुभक्तियोग के द्वारा सद्गुरु की कल्याणकारी
कृपा प्राप्त करना जीवन का लक्ष्य है ।
.
गुरुभाक्तयागा
र
गुरुभक्तियोग के सिध्दांत
१४. नम्रतापूर्वक पूज्यश्री सद्गुरु के पदारविन्द के पास
जाओ । सद्गुरु के जीवनदायी चरणों में साष्टांग प्रणाम
करो । सद्गुरु के चरणकमल की शरण में जाओं । सद्गुरु
के पावन चरणों की पूजा करो । सद्गुरु के पावन चरणों
का ध्यान करो । सद्गुरु के पावन चरणों में मूल्यवान अर्घ्य
अर्पण करो। सद्गुरु के यशःकारी चरणों की सेवा में
जीवन अर्पण करो । सद्गुरु के दैवी चरणों की धूलि बन
जाओ । ऐसा गुरुभक्त हठयोगी, लययोगी और राजयोगियों
से ज्यादा सरलतापूर्वक एवं सलामत रीति से सत्य स्वरूप
का साक्षात्कार करके धन्य हो जाता है।
१५. सद्गुरु के दैवी पावन चरणों में आत्मसमर्पण
करनेवाले को निश्चिन्तता, निर्भयता और आनन्द सहजता
से प्राप्त होता है । वह लाभान्वित हो जाता है।
१६ आपको गुरुभक्तियोग के मार्ग द्वारा सच्चे हृदय से,
तत्परतापूर्वक प्रयास करना चाहिए ।
१७. गुरु के प्रति भक्ति इस योग का सबसे महत्त्वपूर्ण
अंग है ।
१८. पवित्र शास्त्रों के विशेषज्ञ ब्रह्मनिष्ठ गुरु के विचार,
वाणी और कार्यों में सम्पूर्ण श्रद्धा गुरुभक्तियोग का सार है।
गुरुभक्तियोग एक विज्ञान के रूप में
१९. इस युग में आचरण किया जा सके ऐसा, सबसे
ऊँचा और सबसे सरल योग गुरुभक्तियोग है ।
२०. गुरुभक्तियोग की फिलासफी में सबसे बड़ी बात
२४ गुरुभक्तियोग गुरु को परमेश्वर के साथ एकरूप मानना है । २१. गुरुभक्तियोग की फिलासफी का व्यावहारिक स्वरूप यह है कि गुरु को अपने इष्टदेवता से अभिन्न मानें । २२. गुरुभक्तियोग ऐसी फिलासफी नहीं है जो पत्र- व्यवहार या व्याख्यानों के द्वारा सिखाई जा सके । इसमें तो शिष्य को कई वर्ष तक. गुरु के पास रहकर शिस्त एवं संयमपूर्ण पवित्र जीवन बिताना चाहिए, ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए एवं गहरा ध्यान करना चाहिए । २३. गुरुभक्तियोग सर्वोत्तम विज्ञान है । गुरुभक्तियोग का फल २४. गुरुभक्तियोग अमरत्व, परम सुख, मुक्ति, सम्पूर्णता, शाश्वत आनन्द और चिरंतन शान्ति प्रदान करता है। २५. गुरुभक्तियोग का अभ्यास सांसारिक पदार्थों के प्रति निःस्पृहता और वैराग्य प्रेरित करता है तथा तृष्णा का छेदन करता है एवं कैवल्य मोक्ष देता है । २६. गुरुभक्तियोग का अभ्यास भावनाओ एवं तृष्णाओं पर विजय पाने में शिष्य को सहायरूप बनता है, प्रलोभनों के साथ टक्कर लेने में तथा मन को क्षुब्ध करनेवाले तत्त्वों का नाश करने में सहाय करता है। अन्धकार को पार करके प्रकाश की ओर ले जानेवाली गुरुकृपा प्राप्त करने के लिए शिष्य को योग्य बनाता है। २७. गुरुभक्तियोग का अभ्यास आपको भय, अज्ञान, निराशा, संशय, रोग, चिन्ता आदि से मुक्त होने के लिए शक्तिमान बनाता है और मोक्ष, परम शान्ति और शाश्वत आनन्द प्रदान करता है।
२५
गुरुभक्तियोग .
गुरुभक्तियोग की साधना
२८. गुरुभक्तियोग का अर्थ है व्यक्तिगत भावनाओं,
इच्छाओं, समझ-बुद्धि एवं निश्चयात्मक बुद्धि के परिवर्तन द्वारा
अहोभाव को अनंत चेतना स्वरूप में परिणत करना ।
२९. गुरुभक्तियोग गुरुकृपा के द्वारा प्राप्त सचोट, सुन्दर
अनुशासन का मार्ग है।
गुरुभक्तियोग का महत्त्व
३०. कर्मयोग, भक्तियोग, हठयोग, राजयोग आदि सब
योगों की नींव गुरुभक्तियोग है ।
३१. जो मनुष्य गुरुभक्तियोग के मार्ग से विमुख है वह
अज्ञान, अन्धकार एवं मृत्यु की परम्परा को प्राप्त होता
है।
।
३२. गुरुभक्तियोग का अभ्यास जीवन के परम ध्येय
की प्राप्ति का मार्ग दिखाता है ।
३३. गुरुभक्तियोग का अभ्यास सबके लिए खुल्ला है।
सब महात्मा एवं विद्वान पुरुषों ने गुरुभक्तियोग के अभ्यास द्वारा
ही महान कार्य किये हैं। जैसे एकनाथ महाराज, पूरणपोड़ा,
तोटकाचार्य, एकलव्य, शबरी, सहजोबाई आदि ।
३४. गुरुभक्तियोग में सब योग समाविष्ट हो जाते हैं ।
गुरुभक्तियोग के आश्रय के बिना अन्य कई योग, जिनका
आचरण अति कठिन है, उनका सम्पूर्ण अभ्यास किसीसे
नहीं हो सकता।
३५. गुरुभक्तियोग में आचार्य की उपासना के द्वारा
गुरुकृपा की प्राप्ति को खूब महत्त्व दिया जाता है ।
२६ गुरुभक्तियोग ३६. गुरुभक्तियोग वेद एवं उपनिषद् के समय जितना प्राचीन है। ३७. गुरुभक्तियोग जीवन के सब दुःख एवं दर्दो को दूर करने का मार्ग दिखाता है । ३८. गुरुभक्तियोग का मार्ग केवल योग्य शिष्य को ही तत्काल फल देनेवाला है। ३९. गुरुभक्तियोग अहंभाव के नाश एवं शाश्वत सुख की प्राप्ति में परिणत होता है । ४०. गुरुभक्तियोग सर्वोत्तम योग है। इस मार्ग के भयस्थान ४१. गुरु के पावन चरणों में साष्टांग प्रणाम करने में संकोच होना यह गुरुभक्तियोग के अभ्यास में बड़ा अवरोध है। ४२. आत्म-बड़प्पन, आत्म-न्यायीपना, मिथ्या- भिमानं, आत्मवंचना, दर्प, स्वच्छन्दीपना, दीर्घसूत्रता, हठाग्रह, छिद्रान्वेषीपना, कुसंग, बेईमानी, अभिमान, विषय- वासना, क्रोध, लोभ, अहंभाव... ये सब गुरुभक्तियोग के मार्ग में आनेवाले विघ्न हैं । ४३. गुरुभक्तियोग के सतत अभ्यास के द्वारा मन की चंचल प्रकृति का नाश करो । ४४. जब मन की बिखरी हुई शक्ति के किरण एकत्रित होते हैं तब चमत्कारिक कार्य कर सकते हैं । ४५. - गुरुभक्तियोग का शास्त्र समाधि एवं आत्म- साक्षात्कार करने हेतु हृदयशुद्धि प्राप्त करने के लिए गुरुसेवा पर खूब जोर देता है ।
२७
गुरुभक्तियोग
४६. सच्चा शिष्य गुरुभक्तियोग के अभ्यास में लगा
रहता है।
४७. पहले गुरुभक्तियोग की फिलासफी समझो, फिर
उसका आचरण करो। आपको सफलता अवश्य मिलेगी।
४८. तमाम दुर्गुणों को निमूर्ल करने का एकमात्र
असरकारक उपाय है गुरुभक्तियोग का आचरण ।
गुरुभक्तियोग के मूल सिद्दान्त
४९. गुरु में अखण्ड श्रद्धा गुरुभक्तियोग रूपी वृक्ष का
मूल है।
५०. उत्तरोत्तर वर्धमान भक्तिभावना, नम्रता, आज्ञा-
पालन आदि इस वृक्ष की शाखाएँ हैं । सेवा फूल है । गुरु
को आत्मसमर्पण करना अमर फल है ।
५१. अगर आपको गुरु के जीवनदायक चरणों में दृढ़
श्रद्धा एवं भक्तिभाव हो तो आपको गुरुभक्तियोग के अभ्यास
में सफलता अवश्य मिलेगी।
५२. सच्चे हृदयपूर्वक गुरु की शरण में जाना ही
गुरुभक्तियोग का सार है ।
५३. गुरुभक्तियोग का अभ्यास माने गुरु के प्रति शुद्ध
उत्कट प्रेम ।
५४. ईमानदारी के सिवाय गुरुभक्तियोग में बिल्कुल
प्रगति नहीं हो सकती ।
५५: महान योगी गुरु के आश्रय में उच्च आध्यात्मिक
स्पन्दनोंवाले शान्त स्थान में रहो। फिर उनकी निगरानी
में गुरुभक्तियोग का अभ्यास करो। तभी आपको गुरुभक्तियोग
में सफलता मिलेगी।
।
२८
गुरुभक्तियोग
५६. गुरुभक्तियोग का मुख्य सिद्धान्त ब्रह्मनिष्ठ गुरु के
चरणकमल में बिनशरती आत्मसमर्पण करना ही है।
गुरुभक्तियोग के मुख्य सिदान्त
५७. गुरुभक्तियोग की फिलासफी के मुताबिक गुरु एवं
ईश्वर एकरूप हैं । अतः गुरु के प्रति सम्पूर्ण आत्मसमर्पण
करना अत्यंत आवश्यक है।
५८. गुरु के प्रति सम्पूर्ण आत्मसमर्पण करना यह गुरु-
भक्तियोग का सर्वोच्च सोपान है ।
५९. गुरुभक्तियोग के अभ्यास में गुरुसेवा सर्वस्व है।
६०. गुरुकृपा गुरुभक्तियोग का आखिरी ध्येय है।
६१. मोटी बुद्धि का शिष्य गुरुभक्तियोग के अभ्यास में
कोई निश्चित प्रगति नहीं कर सकता ।
६२: जो शिष्य गुरुभक्तियोग का अभ्यास करना चाहता
है उसके लिए कुसंग शत्रु के समान है।
६३. अगर आपको गुरुभक्तियोग का अभ्यास करना हो
तो विषयी जीवन का त्याग करो ।
शाश्वत सुख का मार्ग
६४. जो व्यक्ति दुःख को पार करके जीवन में सुख एवं
आनन्द प्राप्त करना चाहता है उसे अन्तःकरणपूर्वक गुरु-
भक्तियोग का अभ्यास करना जरूरी है।
६५. सच्चा एवं शाश्वत सुख तो गुरुसेवायोग का आश्रय
लेने से ही मिल सकता है, नाशवान बाह्य पदार्थों से नहीं।
६६. जन्म-मृत्यु के लगातार चलनेवाले चक्कर से.छूटने
का कोई उपाय नहीं है क्या ? सुख-दुःख, हर्ष-शोक के द्वन्द्वों
२९
गुरुभक्तियोग
में से मुक्ति नहीं मिल सकती क्या ? सुन, हे शिष्य ! इसका
एक निश्चित उपाय है। नाशवान विषयी पदार्थों में से अपना
मन वापस खींच ले और गुरुसेवायोग का आश्रय ले। इससे
तू सुख-दुःख, हर्ष-शोक, जन्म-मृत्यु के द्वन्द्वों से पार हो
जाएगा।
६७. मनुष्य जब गुरुभक्तियोग का आश्रय लेता है तभी
उसका सच्चा जीवन शुरु होता है । जो व्यक्ति गुरुभक्तियोग
का अभ्यास करता है उसे इस लोक में एवं परलोक में
चिरन्तन सुख प्राप्त होता है ।
६८. गुरुभक्तियोग उसके अभ्यासु को चिरायु एवं
शाश्वत सुख प्रदान करता है ।
६९. मन ही इस संसार एवं उसकी प्रक्रिया का मूल
है । मन ही बन्धन और मोक्ष, सुख और दुःख का मूल है ।
इस मन को केवल गुरुभक्तियोग के द्वारा ही संयम में रखा जा
सकता है।
७०. गुरुभक्तियोग अमरत्व, शाश्वत सुख, मुक्ति,
पूर्णता, अखूट आनन्द और चिरंतन शान्ति देनेवाला है।
गुरुभक्तियोग की महत्ता
७१. परम शान्ति का राजमार्ग गुरुभक्तियोग के अभ्यास
से शुरु होता है।
७२. जो जो सिद्धियाँ संन्यास, त्याग, अन्य योग, दान
एवं शुभ कार्य आदि से प्राप्त की जा सकती हैं वे सब सिद्धियाँ
गुरुभक्तियोग के अभ्यास से शीघ्र प्राप्त हो सकती हैं ।
७३. गुरुभक्तियोग एक शुद्ध विज्ञान है, जो निम्न प्रकृति
को वश में लाकर परम सुख प्राप्त करने की पद्धति हमें
३०
गुरुभक्तियोग
सिखाता है।
७४. कुछ लोग मानते हैं कि गुरुसेवायोग निम्न कोटि
का योग है। आध्यात्मिक रहस्य के बारे में यह उनकी बड़ी
गलतफहमी है।
७५ गुरुभक्तियोग, गुरुसेवायोग, गुरुशरणयोग आदि
समानार्थी शब्द हैं। उनमें कोई अर्थभेद नहीं है ।
७६. गुरुभक्तियोग सब योगों का राजा है ।
७७. गुरुभक्तियोग ईश्वरज्ञान के लिए सबसे सरल,
सबसे निश्चित, सबसे शीघ्रगामी, सबसे सस्ता भयरहित
मार्ग है । आप सब इसी जन्म में गुरुभक्तियोग के द्वारा
ईश्वरज्ञान प्राप्त करो यही शुभ कामना !
शिष्य को सूचनाएँ
७८. गुरुभक्तियोग का आश्रय लेकर आप अपनी खोई
हुई दिव्यता को पुनः प्राप्त करो, सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु
आदि सब द्वन्द्वों से पार हो जाओ।
७९. जंगली बाघ, शेर या हाथी को पालना बहुत सरल
है, पानी या आग के ऊपर चलना बहुत सरल है लेकिन
जब तक मनुष्य को गुरुभक्तियोग के अभ्यास के लिए हृदय
की तमन्ना नहीं जागती तब तक सद्गुरु के चरणकमलों की
शरण में जाना बहुत मुश्किल है ।
८०. गुरुभक्तियोग माने गुरु की सेवा के द्वारा मन और
उसके विकारों पर नियंत्रण एवं पुनःसंस्करण ।
८१: गुरु को सम्पूर्ण बिनशरती शरणागति करना
गुरुभक्ति प्राप्त करने के लिए निश्चित मार्ग है।
८२. गुरुभक्तियोग की नींव गुरु के ऊपर अखण्ड श्रद्धा
३१ गुरुभक्तियोग में निहित है। ८३. अगर आपको सचमुच ईश्वर की आवश्यकता हो तो सांसारिक सुखभोगों से दूर रहो और गुरुभक्तियोग का आश्रय लो। ८४. किसी भी प्रकार की रुकावट के बिना गुरुभक्तियोग का अभ्यास जारी रखो । ८५. गुरुभक्तियोग का अभ्यास ही मनुष्य को जीवन के हर क्षेत्र में निर्भय एवं सदा सुखी बना सकता है । ८६. गुरुभक्तियोग के द्वारा अपने भीतर ही अमर आत्मा की खोज करो । ८७. गुरुभक्तियोग को जीवन का एकमात्र हेतु, उद्देश्य एवं सच्चे रस का विषय बनाओ। इससे आपको परम सुख की प्राप्ति होगी। ८८. गुरुभक्तियोग ज्ञानप्राप्ति में सहायक है । ८९. गुरुभक्तियोग का मुख्य हेतु तूफानी इन्द्रियों पर एवं भटकते हुए मन पर नियंत्रण पाना है । ९०. गुरुभक्तियोग हिन्दू संस्कृति की एक प्राचीन शाखा है जो मनुष्य को शाश्वत सुख के मार्ग में ले जाती है और ईश्वर के साथ सुखद समन्वय करा देती है । ९१. गुरुभक्तियोग आध्यात्मिक और मानसिक आत्म- विकास का शास्त्र है । ९२. गुरुभक्तियोग का हेतु मनुष्य को विषयों के बन्धन से मुक्त करके उसे शाश्वत सुख और दैवी शक्ति की मूल स्थिति की पुनः प्राप्ति कराने का है । ९३. गुरुभक्तियोग मनुष्य को दुःख, जरा और व्याधि
३२
गुरुभक्तियोग
से मुक्त करता है, उसे चिरायु बनाता है, शाश्वत सुख प्रदान
करता है।
९४. गुरुभक्तियोग में शारीरिक, मानसिक, नैतिक और
आध्यात्मिक... हर प्रकार के अनुशासन का समावेश हो
जाता है। इससे मनुष्य आत्मप्रभुत्व एवं आत्म-साक्षात्कार
पा सकता है।
९५. गुरुभक्तियोग मन की शक्तियों पर विजय प्राप्त करने
के लिए विज्ञान एवं कला है ।
प्रकरण : २
गुरु और शिष्य
गुरु की महत्ता
१. जो आँखें गुरु के चरणकमलों का सौन्दर्य नहीं देख
सकती वे आँखें सचमुच अन्ध हैं ।
२. जो कान गुरु की लीला की महिमा नहीं सुनते वे
कान सचमुच बहरे हैं ।
३. गुरु रहित जीवन मृत्यु के समान है ।
४. गुरुकृपा की सम्पत्ति जैसा और कोई खजाना नहीं
है।
५. भवसागर को पार करने के लिए गुरु के सत्संग जैसी
और कोई सुरक्षित नौका नहीं है ।
६. आध्यात्मिक गुरु जैसा और कोई मित्र नहीं है ।
७. गुरु के चरणकमल जैसा और कोई आश्रय नहीं
है।
३३
गुरुभक्तियोग
८. सदैव गुरु की रट लगाओ :
गुरु के प्रति भक्तिभावना
९. श्रद्धा, भक्ति और तत्परता के फूलों से गुरु की पूजा
करो।
१०. आत्म-साक्षात्कार के मन्दिर में गुरु का सत्संग
प्रथम स्तंभ है।
११. ईश्वरकृपां गुरु का स्वरूप धारण करती है ।
१२. गुरु के दर्शन करना ईश्वर के दर्शन करने के
बराबर है।
१३. जिसने सद्गुरु के दर्शन नहीं किये वह मनुष्य
अन्धा ही है ।
१४. धर्म केवल एक ही है और वह है गुरु के प्रति
भक्ति एवं प्रेम का धर्म ।
१५. जब आपको दुन्यावी अपेक्षा नहीं रहती तब गुरु
के प्रति भक्तिभाव जागता है ।
१६. आत्मवेत्ता गुरु के संग के प्रभाव से आपका
जीवनसंग्राम सरल बन जाएगा ।
१७. गुरु का आश्रय लो और सत्य का अनुसरण
करो ।
१८. आपके गुरु की कृपा में श्रद्धा रखो और अपने
कर्तव्य का पालन करो ।
१९. गुरु की आज्ञा का अतिक्रमण माने खुद ही अपनी
कब्र खोदने के बराबर है ।
२०. सद्गुरु शिष्य पर सतत आशीर्वाद बरसाते हैं।
आत्म-साक्षात्कारी गुरु जगद्गुरु हैं, परम गुरु हैं ।
3
३४
गुरुभक्तियोग
२१. जगद्गुरु का हृदय सौन्दर्य का धाम है ।
गुरु की सेवा
२२. जीवन का ध्येय गुरु की सेवा करने का बनाओ।
२३. जीवन का हरएक कटु अनुभव गुरु के प्रति आपकी
श्रद्धा की कसौटी है।
२४. शिष्य कार्य की गिनती करता है जबकि गुरु उसके
पीछे निहित हेतु और इरादे की तुलना करते हैं ।
२५. गुरु के कार्य को सन्देहपूर्वक देखना सबसे बड़ा
पाप है।
२६. गुरु के समक्ष अपना दम्भपूर्ण दिखावा करने की
कभी कोशिश मत करना ।
२७. शिष्य के लिए तो गुरुआज्ञापालन जीवन का
कानून है।
२८. आपके दिव्य गुरु की सेवा करने का कोई भी मौका
चुकना नहीं ।
२९ जब आप अपने दिव्य गुरु की सेवा करो तब
एकनिष्ठ और वफादार रहना ।
३०. गुरु पर प्रेम रखना, आज्ञापालन करना यानी गुरु
की सेवा करना ।
३१. गुरु की आज्ञा का पालन करना उनके सन्मान
करने से भी बढ़कर है।
३२. गुरुआज्ञा का पालन त्याग से भी बढ़कर है ।
३३. हर किसी परिस्थिति में अपने गुरु को तमाम प्रकार
से अनुकूल हो जाओ।
३४. अपने गुरु की उपस्थिति में अधिक बातचीत मत
गुरुभक्तियोग
३५
करो ।
३५. गुरु के प्रति शुद्ध प्रेम यह गुरुआज्ञापालन का सच्चा
स्वरूप है।
३६. अपनी उत्तमोत्तम वस्तु प्रथम अपने गुरु को
समर्पित करो । इससे आसक्ति सहज में मिटेगी ।
३७. शिष्य ईर्ष्या, डाह एवं अभिमान रहित, निःस्पृह
और गुरु के प्रति दृढ़ भक्तिभाववाला होना चाहिए । वह
धैर्यवान और सत्य को जानने के लिए निश्चयवाला होना
चाहिए ।
३८. शिष्य को अपने गुरु के दोष नहीं देखना चाहिए ।
३९. शिष्य को गुरु के समक्ष अनावश्यक एवं अयोग्य
प्रलाप नहीं करना चाहिए ।
४०. गुरु के द्वारा जो सद्ज्ञान प्राप्त होता है वह माया
अथवा अध्यास का नाश करता है ।
४१. एक ही ईश्वर अनेक रूप में माया के कारण दिखता
है ऐसा जिसको गुरुकृपा से ज्ञान होता है वह सत्य को
जानता है और वेदों को समझता है ।
४२. गुरुसेवा और पूजा के द्वारा प्राप्त निरन्तर भक्ति
से तीक्ष्ण धार वाले ज्ञान के कुल्हाड़े से तू धीरे-धीरे पर
दृढ़तापूर्वक इस संसार रूपी वृक्ष को काट दे ।
४३. गुरु जीवननौका का सुकान हैं और ईश्वर उस
नौका को चलानेवाला अनुकूल पवन है ।
४४. जब मनुष्य को संसार के प्रति घृणा उपजती है,
उसे वैराग्य आता है और गुरु के दिये हुए उपदेश का चिन्तन
करने के लिए शक्तिमान होता है तब ध्यान में बार
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गुरुभक्तियोग
३७
के आश्रय में रहना चाहिए... सेवा, साधना एवं शास्त्राभ्यास
करना चाहिए ।
५४. शिष्य को गुरु के द्वार से जो कुछ अच्छा या बुरा,
कम या ज्यादा, सादा या स्वादु खाना मिले वह गुरुभाई
को अनुकूल होकर खाना चाहिए ।
गुरु का ध्यान
५५. गुरु के चरणकमलों का ध्यान करना यह मोक्ष एवं
शाश्वत सुख की प्राप्ति का केवल एक ही मार्ग है ।
५६. जो मनुष्य गुरु के चरणकमलों का ध्यान नहीं करते
वे आत्मा का घात करनेवाले हैं। वे सचमुच जिन्दे शव के
समान कंगले मवाली हैं। वे अति दरिद्र लोग हैं। ऐसे निगुरे
लोग बाहर से धनवान दिखते हुए भी आध्यात्मिक जगत
में अत्यंत दरिद्र हैं।
५७. सयाने सज्जन अपने गुरु के चरणकमल के
निरन्तर ध्यान रूपी रसपान से अपने जीवन को रसमय
बनाते हैं और गुरु के ज्ञान रूपी तलवार को साथ में रखकर
मोहमाया के बन्धनों को काट डालते हैं।
५८. गुरु के चरणकमल का ध्यान करना यह शाश्वत
सुख के द्वार खोलने के लिए अमोघ चाबी है ।
५९. गुरु का ध्यान करना यह आखिरी सत्य की प्राप्ति
का केवल एक ही सच्चा राजमार्ग है ।
६०. गुरु का ध्यान करने से सब दुःख, दर्द एवं शोक
का नाश होता है।
६१. गुरु का ध्यान करने से शोक व दुःख के तमाम
कारण नष्ट हो जाते हैं ।
३६
गुरुभक्तियोग
अभ्यास के कारण उसके मन की अनिष्ट प्रकृति दूर होती
है।
४५. गुरु से भली प्रकार जान लिया जाय तभी मंत्र के
द्वारा शुद्धि पैदा होती है ।
शिष्यवृत्ति के सिदान्त
४६.. मनुष्य अनादि काल से अज्ञान के प्रभाव में होने
के कारण गुरु के बिना उसे आत्म-साक्षात्कार नहीं हो
सकता । जो ब्रह्म को जानता है वही दूसरे को ब्रह्मज्ञान दे
सकता है।
४७. सयाने मनुष्य को चाहिए कि वह अपने गुरु को
आत्मा-परमात्मारूप जानकर अविरत भक्तिभावपूर्वक उनकी
पूजा करे अर्थात् उनके साथ तदाकार बने ।
४८. शिष्य को गुरु एवं ईश्वर के प्रति संनिष्ठ भक्तिभाव
होना चाहिए ।
४९. शिष्य को आज्ञाकारी बनकर, सावधान मन से
एवं निष्ठापूर्वक गुरु की सेवा करना चाहिए और उनसे
भगवद्भक्त के कर्त्तव्य अथवा भगवद्धर्म जानना चाहिए ।
५०. शिष्य को ईश्वर के रूप में गुरु की सेवा करना
चाहिए । विश्व के नाथ को प्रसन्न करने का एवं उनकी कृपा
के योग्य बनने का सुनिश्चित उपाय है ।
५१. शिष्य को वैराग्य का अभ्यास करना चाहिए और
अपने आध्यात्मिक गुरु का सत्संग करना चाहिए ।
५२. शिष्य को प्रथम तो अपने गुरु की कृपा प्राप्त करना
चाहिए और उनके बताये हुए मार्ग में चलना चाहिए ।
५३. शिष्य को अपनी इन्द्रियों को संयम में रखकर गुरु
-
गुरुभक्तियोग
३७
के आश्रय में रहना चाहिए... सेवा, साधना एवं शास्त्राभ्यास
करना चाहिए ।
५४. शिष्य को गुरु के द्वार से जो कुछ अच्छा या बुरा,
कम या ज्यादा, सादा या स्वादु खाना मिले वह गुरुभाई
को अनुकूल होकर खाना चाहिए ।
गुरु का ध्यान
५५. गुरु के चरणकमलों का ध्यान करना यह मोक्ष एवं
शाश्वत सुख की प्राप्ति का केवल एक ही मार्ग है ।
५६. जो मनुष्य गुरु के चरणकमलों का ध्यान नहीं करते
आत्मा का घात करनेवाले हैं। वे सचमुच जिन्दे शव के
समान कंगले मवाली हैं। वे अति दरिद्र लोग हैं। ऐसे निगुरे
लोग बाहर से धनवान दिखते हुए भी आध्यात्मिक जगत
में अत्यंत दरिद्र हैं।
५७. सयाने सज्जन अपने गुरु के चरणकमल के
निरन्तर ध्यान रूपी रसपान से अपने जीवन को रसमय
बनाते हैं और गुरु के ज्ञान रूपी तलवार को साथ में रखकर
मोहमाया के बन्धनों को काट डालते हैं ।
५८. गुरु के चरणकमल का ध्यान करना यह शाश्वत
सुख के द्वार खोलने के लिए अमोघ चाबी है ।
५९. गुरु का ध्यान करना यह आखिरी सत्य की प्राप्ति
का केवल एक ही सच्चा राजमार्ग है ।
६०. गुरु का ध्यान करने से सब दुःख, दर्द एवं शोक
का नाश होता है।
६१. गुरु का ध्यान करने से शोक व दुःख के तमाम
कारण नष्ट हो जाते हैं ।
३८
गुरुभक्तियोग
६२. गुरु का ध्यान आपके इष्ट देवता के दर्शन कराता
है, गुरुत्व में स्थिति कराता है ।
६३. गुरु का ध्यान एक प्रकार का वायुयान है, जिसकी
सहायता से शिष्य शाश्वत सुख, चिरंतन शान्ति एवं अखूट
आनन्द के उच्च लोक में उड़ सकता है ।
६४. गुरु का ध्यान दिव्यता की प्राप्ति के लिए राजमार्ग
है, जो शिष्य को दिव्य जीवन के ध्येय तक सीधा ले. जाता
है।
६५. गुरु का ध्यान एक रहस्यमय सीड़ी है, जो शिष्य
को पृथ्वी पर से स्वर्ग में ले जाती है ।
६६. गुरु के चरणकमल का ध्यान किये बिना शिष्य
के लिए आध्यात्मिक प्रगति संभव नहीं है।
६७. गुरु का नियमित ध्यान करने से आत्मज्ञान के
प्रदेश खुल जाते हैं, मन शांत, स्वस्थ एवं स्थिर बनता है
और अन्तरात्मा जागृत होती है ।
सुख की विजय
६८. शिष्य जब गुरु के चरणकमल का ध्यान करता
है तब सब संशय अपने आप नष्ट हो जाते हैं।
६९. शिष्य जब गुरु की सुरक्षा में होता है तब कोई
भी वस्तु उसके मन को क्षुभित नहीं कर सकती ।
७०. आप अगर अपने मन को बाह्य पदार्थों में से
खींचकर सतत ध्यान के द्वारा गुरु के चरणकमल में लगाओगे
तो आपके तमाम दुःख नष्ट हो जाएँगे ।
७१. गुरु का ध्यान करना यह तमाम मानवीय दुःखों
का नाश करने का एक मात्र उपाय है ।
गुरुभक्तियोग
३९
७२. जो शिल्य अपने गुरु के चरणकमल में अपना चित्त
नहीं लगा सकता उसे आत्मज्ञान नहीं मिल सकता ।
७३. जो शिष्य गुरु का ध्यान बिल्कुल नहीं करता उसे
मन की शान्ति नहीं मिल सकती।
७४. अगर आपको इस संसार के दुःख एवं दर्द दूर
करने हों तो आपको आत्म-साक्षात्कारी गुरु का ध्यान करने
की आदत डालना चाहिए । ठीक ही कहा है :
ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम् ।
मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ।।
गुरुकृपा की आवश्यकता
७५. गुरु की सहाय के बिना कोई आत्मज्ञान पा नहीं
सकता।
७६. गुरुकृपा के बिना दिव्य जीवन में कोई प्रगति नहीं
कर सकता।
७७. गुरुकृपा के बिना आप मानसिक विकारों से मुक्त
नहीं हो सकते एवं मोक्ष नहीं पा सकते ।
७८. अगर आप अपने गुरु की मूर्ति का ध्यान करने
की आदत नहीं डालो तो आत्मा का भव्य वैभव एवं सनातन
ज्योति आपसे सदा के लिए अदृश्य रहेगी ।
७९. गुरु के स्वरूप का नियमित एवं व्यवस्थित ध्यान
करने की आदत डालकर आत्मा को ढांकनेवाले आवरण
को चीर डालो।
८०. गुरु के स्वरूप का ध्यान करना यह तमाम रोगों
के लिए शक्तिशाली औषध है ।
४०
है
गुरुभक्तियोग
८१. गुरु का ध्यान करने से अन्तरात्मा के ज्ञान के
एवं अन्य कई गूढ़ शक्तियाँ प्राप्त करने के लिए मन के द्वार
खुल जाते हैं।
८२. गुरु का ध्यान करने से जीवन के तमाम दुःख
दूर हो जाते हैं।
शान्ति और शक्ति का मार्ग
८३. गुरु के स्वरूप का ध्यान करो, तभी आपको सच्ची
शान्ति और आनन्द की प्राप्ति होगी ।
८४. आध्यात्मिक गुरु का ध्यान करने से बहुत ही
आध्यात्मिक शक्ति, शान्ति, नया जोम और नया बल मिलता
है।
८५. पवित्र गुरु का ध्यान करने से शुद्ध शक्तिशाली
विचारों का विकास होता है ।
८६. गुरु के स्वरूप का नियमित चिन्तन करने से मन
इधर उधर भटकना धीरे-धीरे बन्द कर देता है ।
८७. गुरु के स्वरूप का ध्यान करने से आध्यात्मिक
मार्ग में से तमाम अड़चनें दूर हो जाती हैं ।
८८. गुरु का ध्यान करने से मन की उत्तेजना दूर होती
है और मन की शान्ति में बहुत ही वृद्धि होती है ।
८९. दिव्य गुरु के चरणकमलों का ध्यान करने के लिए
ब्राह्ममुहूर्त सबसे ज्यादा अनुकूल समय है | चालू व्यवहार
में भी कभी-कभी गुरु का ध्यान करके आप शक्ति, स्फूर्ति
और प्रेरणा प्राप्त करते रहो ।
९०. आप ज्यों ही बिस्तर में जागो कि तुरन्त गुरुमंत्र
का जाप करो । यह बात बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।
४१ गुरुभक्तियोग ९१. एकान्त एवं गुरु के स्वरूप का गहरा चिन्तन... ये दो चीजें आत्म-साक्षात्कार के लिए महत्त्वपूर्ण आवश्यकताएँ हैं। ध्यान के लिए प्राथमिक तैयारियाँ ९२. गुरु का ध्यान करने के लिए हरएक वस्तु को सात्त्विक बनाना चाहिए । स्थान, भोजन, वस्त्र, संग, पुस्तकें आदि सब सात्त्विक होना चाहिए । ९३. गुरु का ध्यान करना किसी भी परिस्थिति में छोड़ना नहीं चाहिए । ९४. केवल सदाचारी जीवन जीना ही ईश्वर- साक्षात्कार के लिए पर्याप्त नहीं है, गुरु का निरन्तर एवं गहरा ध्यान करना अनिवार्य है। ९५. अगर आपको संसार के दुःख-दर्द एवं जन्म-मृत्यु की मुसीबतों से सदा के लिए मुक्त होना हो तो आपको गुरु के स्वरूप का गहरा ध्यान करने की आदत डालना चाहिए । ९६. गुरु का ध्यान करना यह अनन्य अनुभव या सीधे आत्मज्ञान के लिए राजमार्ग है । ९७. अन्न, वस्त्र, निवास आदि शारीरिक आवश्यक- ताओं के लिए शिष्य को चिन्ता नहीं करना चाहिए । गुरुकृपा से उसके लिए सब चीजों का इन्तजाम हो जाता है । ९८. गुरु का ध्यान शिष्य के लिए एकमात्र मूल्यवान पूँजी है। ९९. भक्तों के लिए भगवान हमेशा गुरु के रूप में पथप्रदर्शक बनते हैं ।
४२ गुरुभक्तियोग १००. मनुष्य को गुरु की सेवा करना चाहिए और गुरु जो जो आज्ञा करें उन सबका पालन करना चाहिए । इसमें उसे बिल्कुल लापरवाही या बड़बड़ नहीं करना चाहिए । अपनी बुद्धि का भी उपयोग नहीं करना चाहिए । १०१. गुरु जब कोई भी चीज करने की आज्ञा करें तब शिष्य को हृदयपूर्वक उनकी आज्ञा का पालन करना चाहिए । १०२. गुरु के प्रति इस प्रकार की आज्ञाकारिता आवश्यक है। यह निष्काम कर्म की भावना है । इस प्रकार का कर्म किसी भी फल की आशा के लिए नहीं किया जाता अपितु गुरु की पवित्र आज्ञा के लिए ही किया जाता है। तभी मन की अशुद्धियाँ, जैसे कि काम, क्रोध और लोभ नष्ट होते हैं। १०३. जो शिष्य चार प्रकार के साधनों से सज्ज है वही ईश्वर से अभिन्न ब्रह्मनिष्ठ गुरु के समक्ष बैठने के एवं उनसे महावाक्य सुनने के लिए लायक है । चार प्रकार के साधन यानी साधनचतुष्ट्य इस प्रकार हैं : = आत्मा-अनात्मा, नित्य-अनित्य, कर्म- अकर्म आदि का भेद समझने की शक्ति । (२) वैराग्य = इन्द्रियजन्य सुख और सांसारिक विषयों से विरक्ति। (३) षट्संपत्ति = शम (वासनाओं एवं कामनाओं से मुक्त निर्मल मन की शान्ति), दम (इन्द्रियों पर काबू), उपरति (विषय-विकारी जीवन से उपरामता), तितिक्षा (१) विवेक
४३
गुरुभक्तियोग
हरएक स्थिति में स्थिरता एवं धैर्य के साथ सहनशक्ति),
श्रद्धा और समाधान (बाह्य आकर्षणों से अलिप्त मन की
एकाग्र स्थिति).
(४) मुमुक्षुत्व = मोक्ष अथवा आत्म-साक्षात्कार के लिए
तीव्र आकांक्षा ।
प्रकरण : ३
गुरुभक्ति का विकास
पवित्रता ही पूर्वतैयारी
१. जिसके मन से तमाम अशुद्धियाँ दूर की गई हों ऐसे
शिष्य को ही गुरु के गूढ़ रहस्यों की दीक्षा दी जाय तो उसका
मन सम्पूर्ण स्थिरता प्राप्त कर सकेगा और वह निर्विकल्प
समाधि की अवस्था में प्रविष्ट हो सकेगा
२. जो सिद्ध आत्मयोगी हों ऐसे गुरु की निगरानी के
नीचे योग सीखो।
३. विषयविकार से रंगे हुए आपके मन को एकाग्रता,
गुरु के उपदेश एवं उपनिषदों के वाक्यों के मनन, ध्यान
एवं जप से पवित्र बनाना होगा ।
४. आपको मार्गदर्शन देने के लिए आत्म-साक्षात्कारी
सद्गुरु होने चाहिए।
५. एक ही स्थान, एक ही आध्यात्मिक गुरु और एक
ही योग-पद्धति में लगे रहो । यही निश्चित सफलता की रीति
है।
४४
गुरुभक्तियोग
योग की साधना
६. गुरु अथवा सिद्ध योगी की निगरानी में ही प्राणायाम
का अभ्यास करना चाहिए ।
७. आप अपने गुरु के अथवा किसी भी संत के चित्र
पर एकाग्रता कर सकते हैं।
८. विषयों से मन को वापस खींच लो और अपने गुरु
के उपदेश के मुताबिक आगे बढ़ो ।
९. कश्मीर में स्थित साधक (शिष्य) भी अगर हिमालय
के उत्तरकाशी में स्थित अपने गुरु का, अपने आध्यात्मिक
मार्गदर्शक का ध्यान करे तो भी गुरु एवं शिष्य के बीच एक
निश्चित सम्बन्ध स्थापित होता है। शिष्य के विचारों के
प्रत्युत्तर में गुरु शक्ति, शान्ति, आनन्द,
सुख
के स्पन्दन
प्रसारित करते हैं । शिष्य लोहचुम्बक के प्रचण्ड प्रवाह में
स्नान करता है। जिस प्रकार एक बर्तन से दूसरे बर्तन
में तैल बहता है उसी प्रकार गुरु और शिष्य के बीच
आध्यात्मिक विद्युत शक्ति का झरना धीरे धीरे निरन्तर बहता
है। शिष्य अपनी श्रद्धा के मुताबिक गुरु से शक्ति प्राप्त करता
। जहाँ जहाँ शिष्य सच्चे हृदय से अपने गुरु का ध्यान
करता है वहाँ गुरु को भी मालूम पड़ता है कि अपने शिष्य
की ओर से प्रार्थना या उन्नत विचारधारा का प्रवाह बहता
है और अपने हृदय को स्पर्श करता है । जिनके पास
आन्तरचक्षु होते हैं वे गुरु-शिष्य के बीच हल्का-सा उज्ज्वल
प्रकाश स्पष्टतः देख सकते हैं। चित्तरूपी सागर में सात्त्विक
विचारों के स्पन्दन से गति पैदा होती है ।
गुरुभक्तियोग
४५
गुरु का स्पर्श
१०. आध्यात्मिक गुरु अपनी आध्यात्मिक शक्ति अपने
शिष्य को प्रदान करते हैं। सद्गुरु के अमूल्य स्पन्दन शिष्य
के मन की ओर भेजे जाते हैं। श्रीरामकृष्ण परमहंस ने अपनी
आध्यात्मिक शक्ति विवेकानन्द को दी थी। यह गुरु का दैवी
स्पर्श कहा जाता है । समर्थ रामदास स्वामी के शिष्य ने
अपनी ऐसी शक्ति नर्तकी की पुत्री को दी थी जो उसके प्रति
अत्यंत कामुक थी। शिष्य ने उसकी ओर दृष्टिपात किया
और उसे समाधि प्राप्त कराई । उसकी कामुकता नष्ट हो
गई। तब से वह बहुत धार्मिक एवं आध्यात्मिक स्वभाववाली
बन गई । मुकुन्दबाई नामक महाराष्ट्र की एक साध्वी ने
बादशाह को समाधि प्रदान की थी।
११. आप जप और ध्यान शुरु करें उससे पहले कुछ
दैवी स्तोत्र या मंत्रों का अथवा गुरुस्तोत्र का उच्चारण
करो। अथवा बारह दफा ॐ का मंत्रोच्चार करो अथवा पाँच
मिनट तक कीर्तन करो ।
१२. मन को एक स्थान में, एक साधना में, एक गुरु
में और एक ही योगमार्ग में लगाकर उसकी चंचल वृत्ति को
वश में करना चाहिए ।
१३. 'योगवाशिष्ठ' में गुरु वशिष्ठजी कहते हैं : ''हे
राम ! पाव भाग का मन प्रारंभिक ध्यान में लगाओ, पाव
भाग का खेलकूद में, पाव भाग का अभ्यास में और पाव
भाग का मन गुरुसेवा में लगाओ ।'
१४. ईश्वर ने आपको तमाम प्रकार की सुविधाएँ,
अच्छा स्वास्थ्य एवं मार्ग दिखाने के लिए गुरु दिये हैं। इससे
४६
गुरुभक्तियोग
अधिक और क्या चाहिए ? अतः विकास करो, उत्क्रान्त
बनो, सत्य का साक्षात्कार करो और सर्वत्र उसका प्रचार
करो ।
१५. गुरु एवं शास्त्र आपको मार्ग दिखा सकते हैं और
आपके संशय दूर कर सकते हैं । अपरोक्ष का अनुभव (सीधा
आन्तरज्ञान) करना आप पर निर्भर रखा गया है। भूखे व्यक्ति
को स्वयं ही खाना चाहिए । जिसको सख्त खुजली आती
हो उसे खुद ही खुजलाना चाहिए ।
मन को संयम में रखने की रीति
१६. मन के साथ कभी मूठभेड़ मत करो । एकाग्रता
के लिए जलद प्रयासों का उपयोग मत करो | सब स्नायु
और नस-नाड़ियों को शिथिल करो । मस्तिष्क को ढीला
छोड़ दो । धीरे धीरे अपने इष्टदेव का चिन्तन करो । भाव
एवं अर्थ के साथ अपने गुरुमंत्र का उच्चारण करो। खदबदाते
हुए मन को स्वस्थ करो | विचारों को शान्त करो
१७. यदि मन में 'अहं' के सब संकल्प हों तो गुरु से
दीक्षा लेने के बाद आत्मा का ध्यान करके एवं वेद का
सच्चा रहस्य जानकर मन को विभिन्न दुःखों से वापस खींच
सकते हैं और सुखदायक आत्मा में पुनः स्थापित कर सकते
हैं।
१८. कुछ वर्ष तक अपने गुरु की प्रत्यक्ष निगरानी में
और उनके सीधे एवं निकट के सम्पर्क में रहो। आप धीरी
और नियमित प्रगति कर सकेंगे ।
१९. चंचल मन एक साधना से दूसरी साधना की ओर,
--A7 गोरा सोदान्त की और
आध्यानिक प्रालि
२२. आ हुइ -केर
खुल्ली कर द. इन लो
अविक तहानुन की हार
प्रलोन्नों के साथ लेते हो
२३. नित्र परन्द बने में न रहें
लांग आपकी अद्ध, नन्त सरल से बालेस
कर देंगे । आपने शुरू की हुई सात में एक साने गुरु में
सम्पूर्ण श्रद्धा रखें ! अपने सन्दता को इलामाले
होने मत दें। आपकी साधना नंग और साह के सा
चालू रखें । आप त्वरित सामालिक पुगति कर :
४८
गुरुभक्तियोग
आध्यात्मिक सीड़ी के सोपान एक के बाद एक चढ़ते जाएँगे
और आखिर आपके ध्येय को हाँसिल कर लेंगे।
२४. पक्षी, मछली और कछुए की तरह स्पर्श, दृष्टि एवं
इच्छा या विचारों के द्वारा गुरु अपनी आध्यात्मिक शक्तियों
का प्रसारण कर सकते हैं । कभी कभी गुरु शिष्य के भौतिक
शरीर में प्रविष्ट होकर अपनी शक्ति से शिष्य के मन को उन्नत
बना सकते हैं।
२५. कभी कभी आध्यात्मिक गुरु को बाह्यतः अपना
क्रोध दिखाना पड़ता है किन्तु वह शिष्य की गलतियाँ दिखाने
के लिए ही होता है । यह बात खराब नहीं है ।
२६. कुछ लोग कुछ वर्ष तक स्वतंत्र रीति से ध्यान
करते हैं किन्तु बाद में उनको गुरु की आवश्यकता महसूस
होती है । उनको साधना के मार्ग में अवरोध आते हैं । इन
अवरोधों और भयस्थानों को कैसे हटाये जायें यह वे नहीं
जानते । तब वे गुरु की खोज करने लगते हैं । छः सात
बार आने-जाने के बाद भी किसी बड़े शहर में किसी अनजान
आदमी को छोटी गली में स्थित अपने निवास स्थान में
वापस आने में दिन के समय में भी तकलीफ महसूस होती
है । सड़कों और मुहल्लों में मार्ग खोजने में भी तकलीफ
होती है तो बन्द आँख से अकेले चलनेवाले को उस्तरे की
धार जैसे आध्यात्मिकता के मार्ग में आनेवाले विघ्नों की
तो बात ही क्या ?
परिवर्तन
२७. मन के प्राकृत स्वभाव का सम्पूर्णतः नवसर्जन
करना ही चाहिए । साधक अपने गुरु से कहता है : ''मुझे
गुरुभक्तियोग
४९
योग का अभ्यास करना है । निर्विकल्प समाधि में प्रविष्ट
होने की मेरी आकांक्षा है। मैं आपके चरणों में बैठना चाहता
हूँ। मैं आपकी शरण में आया हूँ।'' किन्तु वह अपने प्राकृत
स्वभाव को, आदतों को, चारित्र्य को, वर्तन को, चालढाल
को बदलना नहीं चाहता ।
२८. प्राकृत स्वभाव में ऐसा परिवर्तन करना सरल नहीं
है । संस्कारों की शक्ति दृढ़ और बलवान होती है। उनके
परिवर्तन के लिए काफी मनोबल की आवश्यकता होती
है । पुराने संस्कारों की शक्ति के आगे साधक कई बार
निरुपाय हो जाता है। उसे नियमित जप, कीर्तन, ध्यान,
अथक निःस्वार्थ सेवा और सत्संग से अपने सत्त्व और
संकल्प का असीम विकास करना पड़ेगा । उसे अन्तर्मुख
होकर अपनी कमियाँ और दुर्बलताएँ खोज लेनी पड़ेगी। उसे
गुरु के मार्गदर्शन में रहना होगा । गुरु उसकी गलतियाँ खोज
निकालते हैं और उन्हें दूर करने के लिए योग्य रीति बताते
हैं ।
२९. आपको मोक्ष के चार साधनों के लिए तैयारी करके
ब्रह्मनिष्ठ एवं ब्रह्मश्रोत्रिय गुरु के पास जाना चाहिए । आपको
अपने सन्देह दूर करना चाहिए । अपने गुरु से प्राप्त किये
हुए आध्यात्मिक प्रकाश की सहायता से आध्यात्मिक मार्ग
में चलना चाहिए । आपका ठीक प्रकार जीवन-निर्माण हो
जाय तब तक अहं और संसार का आकर्षण छोड़कर आपको
गुरु के द्वार पर रहना चाहिए । ठीक ही कहा है कि :
सम्राट के साथ राज्य करना भी बुरा है... न जाने कब
रुला दे ! गुरु के साथ भीख माँगकर रहना भी अच्छा है...
4
।
५०
गुरुभक्तियोग
न जाने कब मिला दे ! आत्म-साक्षात्कार सिद्ध किये हुए
पुरुष का व्यक्तिगत सम्पर्क बहुत उन्नतिकारक होता है। यदि
आप संनिष्ठ एवं उत्सुक होंगे, यदि आपको मोक्ष के लिए
तीव्र आकांक्षा होगी, यदि आप अपने गुरु की सूचनाओं का
चुस्तता से पालन करेंगे, यदि आप अखण्ड और निरन्तर
योग करेंगे तो आप छः महीने में सर्वोच्च लक्ष्य सिद्ध कर
सकेंगे । ऐसा ही होगा, यह मेरा वचन है ।
३०. जगत प्रलोभनों से भरपूर है । अतः नये साधकों
को ध्यानपूर्वक उनसे बचने की आवश्यकता है । जब तक
उनकी घड़ाई पूर्ण न हो जाय, तब तक उन्हें गुरु के
चरणकमलों में बैठना चाहिए । जो मनमुख साधक प्रारंभ से
ही स्वच्छन्दी बनकर बर्ताव करते हैं, अपने गुरु के वचनों
पर ध्यान नहीं देते वे बिल्कुल निष्फल हो जाते हैं । वे
लक्ष्यहीन जीवन बिताते हैं । और नदी में तैरते हुए लकड़े
की भाँति इधर उधर टकराते हैं ।
गुरु के प्रति आध्यात्मिक अभिगम
३१. ''हे पूज्य गुरु ! हे मेरी अविद्या के विदारक !
आपको मेरे नमस्कार ! आपकी कृपा से मैं ब्रह्म का शाश्वत
सुख भोगता हूँ | अब मैं पूर्णतः निर्भय बन चुका हूँ। मेरे
सब संशय और भ्रम नष्ट हो गये हैं।"
३२. उपरोक्त मंत्र में शिष्य अपने अन्तरात्मा के अनुभव
गुरु के समक्ष व्यक्त करता है। शिष्य अपने गुरु के चरणकमल
में साष्टांग प्रणाम करता है। उन पर श्रेष्ठ फूलों की वर्षा करके
उनकी स्तुति करता है। ''हे पूज्य, पवित्र गुरु ! मुझे सर्वोच्च
सुख प्राप्त हुआ है । मैं ब्रह्मनिष्ठा से जन्म-मृत्यु की परम्परा
---
.
५१ -- गुरुभक्तियोग से मुक्त हुआ हूँ। मैं निर्विकल्प समाधि का शुद्ध सुख भोग रहा हूँ | जगत के किसी भी कोने में मैं मुक्तता से विचरण कर सकता हूँ। सब पर मेरी समदृष्टि है । मैंने प्राकृत मन का त्याग किया है। मैंने सब संकल्प एवं रुचि-अरुचि का त्याग किया है । अब मैं अखण्ड शान्ति का अनुभव करता हूँ। मेरे आनन्द के अतिरेक के कारण मैं पूर्ण अवस्था का वर्णन नहीं कर पाता । हे पूज्य गुरुदेव ! मैं अवाक् बन गया हूँ। इस दुस्तर भवसागर को पार करने में आपने मुझे सहाय की है।'' ३३. "अब तक मुझे केवल मेरे शरीर में ही सम्पूर्ण विश्वास था । मैंने विभिन्न योनियों में असंख्य जन्म लिये । ऐसी सर्वोच्च निर्भय अवस्था मुझे कौन-से पवित्र कर्मों के कारण प्राप्त हुई यह मैं नहीं जानता । सचमुच यह एक दुर्लभ भाग्य है । यह एक महान अदृष्ट लाभ है । अब मैं आनन्द से नाचता हूँ। मेरे सब दुःख नष्ट हो गये हैं । मेरे सब मनोरथ पूर्ण हुए हैं । मेरे कार्य सम्पन्न हुए हैं । मैंने सब वांछित वस्तुएँ प्राप्त की हैं । मेरी इच्छा परिपूर्ण हुई है ।'' ३४. "आप मेरे सच्चे माता-पिता हो । मेरी वर्तमानं स्थिति मैं दूसरों के समक्ष किस प्रकार प्रकट कर सकूँ ? सर्वत्र सुख और आनन्द का अनन्त सागर लहराता हुआ मुझे दिख रहा है । जिससे मेरे अन्तःचक्षु खुल गये वह महावाक्य 'तत्त्वमसि' है । उपनिषदों, वेदान्तसूत्रों एवं वेदान्तशास्त्रों का भी आभार ! जिन्होंने ब्रह्मनिष्ठ गुरु का एवं उपनिषदों के महावाक्यों का रूप धारण किया है ऐसे श्री
५२
गुरुभक्तियोग
व्यासजी को प्रणाम ! श्री शंकराचार्यजी को प्रणाम ! ब्रह्मविद्
गुरुओं को प्रणाम ! भगवान शिव को प्रणाम ! भगवान नारायण
को प्रणाम ! सांसारिक मनुष्य के सिर पर गुरु के चरणामृत
का एक बिन्दू गिरे तो भी उसके सब दुःखों का नाश होता
है । यदि एक ब्रह्मनिष्ठ पुरुष को वस्त्र पहनाये जायें तथा
भोजन कराया जाय तो सारे विश्व को वस्त्र पहनाने एवं
भोजन करवाने के बराबर है। क्योंकि ब्रह्मनिष्ठ पुरुष सचराचर
विश्व में व्याप्त हैं । सबमें वे ही हैं । ॐ...ॐ...ॐ...'
दुराग्रही शिष्य
३५. दुराग्रही शिष्य अपनी पुरानी आदतों को चिपका
रहता है । वह भगवान की या साकार गुरु की शरण में नहीं
जाता।
३६. यदि शिष्य सचमुच अपने आपको सुधारना चाहता
है तो उसे अपने आप के साथ निखालिस और गुरु के प्रति
ईमानदार बनना चाहिए ।
३७. जो आज्ञाकारी नहीं है, जो शिस्त का भंग करता
है, जो गुरु के प्रति ईमानदार नहीं है, जो अपने गुरु
के समक्ष
अपना हृदय खोल नहीं सकता उसे गुरु की सहाय से लाभ
नहीं हो सकता । वह अपने द्वारा ही सर्जित कादव कीचड़
में फँसा ही रहता है। वह अध्यात्म-मार्ग में प्रगति नहीं कर
सकता । कैसी दयाजनक स्थिति ! उसका भाग्य सचमुच
अत्यंत शोचनीय है ।
३८. शिष्य को भगवान अथवा गुरु के प्रति सम्पूर्ण,
अखण्ड और संकोचरहित होकर आत्म-समर्पण करना
चाहिए ।
गुरुभक्तियोग
३९. गुरु तो केवल अपने शिष्य को, सत्य जानने की
अथवा जिस रीति से उसकी आत्मा की शक्तियाँ खिल उठे
वह रीति बता सकते हैं।
गुरु की आवश्यकता
४०. अध्यात्ममार्ग में हरएक साधक को गुरु की
आवश्यकता पड़ती है।
४१. केवल गुरु ही वास्तविक जीवन का अर्थ एवं
उसका रहस्य प्रकट कर सकते हैं तथा प्रभु के साक्षात्कार
का मार्ग दिखा सकते हैं ।
४२. केवल गुरु ही शिष्य को साधना का रहस्य बता
सकते हैं।
४३. जिन्होंने प्रभु का साक्षात्कार किया है वे ही आदर्श
गुरु हैं।
४४. ऐसे गुरु मन, वचन और कर्म से पवित्र हैं ।
४५. ऐसे गुरु अपने मन एवं इन्द्रियों पर प्रभुत्व रखते
हैं, वे सब शास्त्रों का रहस्य समझते हैं, वे सरल, दयालु,
सत्यप्रिय एवं आत्मारामी होते हैं ।
४६. शिष्य के हृदय के अन्तस्तल में सुषुप्त दैवी शक्ति
को गुरु जागृत कर सकते हैं। .
४७. शिष्य ने अगर पूर्वजन्म में शुभ कर्म किये होंगे,
वर्तमान जीवन में भी अगर वह शुभ कर्म करता होगा, अगर
वह संनिष्ठ हृदयवाला तथा ईश्वर-प्राप्ति की तड़पवाला होगा
तो उसे सद्गुरु अवश्य प्राप्त होंगे ।
४८. गुरु से पूरा लाभ उठाने के लिए उनके प्रति रि।
में दृढ़ श्रद्धा एवं सच्ची भक्ति होना चाहिए ।
५४
गुरुभक्तियोग
४९. शिष्य को गुरु के प्रति जितनी मात्रा में भक्तिभाव
होगा उतनी मात्रा में उसे फल की प्राप्ति होगी ।
५०. केवल आध्यात्मिक गुरु ही मार्ग दिखाकर शिष्य
को प्रभु के प्रति ले जाएँगे।
५१. गुरु मनुष्य के रूप में साक्षात् ईश्वर ही हैं ।
शिष्य के कर्तव्य
५२. शिष्य को गुरु की आज्ञा का पालन अन्तः-
करणपूर्वक करना चाहिए ।
५३. गुरु के द्वारा निर्दिष्ट पद्धति कभी कभी शिष्य की
रुचि को तत्काल अनुकूल न भी हो, फिर भी उसे श्रद्धा
रखना चाहिए कि वह उसके हित के लिए ही है, लाभदायक
ही है ।
५४. गुरु मिलने से जो लाभ होते हैं और जो मानसिक
शान्ति का अनुभव होता है वह असीम होता है ।
५५. अपनी सर्वोच्च दिव्य प्रकृति का भान होते हुए
भी भगवान श्रीकृष्ण ने अपने गुरु सांदीपनि की कैसी सेवा
की और उनके पास अभ्यास किया यह तो आप जानते
ही हैं।
५६. जिस शिष्य को अपने गुरु में श्रद्धा होती है वह
ज्ञान प्राप्त करता है ।
५७. पूरे हृदय से, संकोच रहित होकर सम्पूर्णतया
अपने गुरु की शरण में जाओ ।
५८. गुरु पृथ्वी पर साक्षात् ईश्वर हैं अतः उनकी पूजा
करो ।
५९. गुरुभक्ति एवं गुरुसेवा के फलस्वरूप आखिर
५५
गुरुभक्तियोग
आत्म-साक्षात्कार होता है।
६०. शिष्य को गुरु की सेवा करते रहना चाहिए । जब
उसका आत्म-समर्पण पूर्णतः हो जाएगा तब गुरु उसे सत्य
का स्पष्ट दर्शन कराएँगे ।
६१. कुछ भ्रांत शिष्य कुछ समय के लिए अपने गुरु
की सेवा करते हैं । फिर 'मैंने चित्तशुद्धि प्राप्त की है' ऐसी
मूर्ख कल्पना करके गुरु की सेवा छोड़ देते हैं । उनको
सर्वोत्तम ज्ञान प्राप्त नहीं होता । उनको ध्येयसिद्धि नहीं
होती ।
६२. उनको थोड़ा बहुत पुण्य अवश्य मिलता है लेकिन
आत्म-साक्षात्कार नहीं होता । सचमुच, यह एक बड़ा
नुकसान है । उनकी यह गंभीर भूल है ।
गुरुभक्ति और गुरुसेवा
६३. गुरुभक्ति और गुरुसेवा साधना रूपी नौका की दो
पतवारें हैं जो शिष्य को संसारसरिता के उस पार ले जाती
हैं
६४. जो गुरु की शरण में गया है, जो सच्चे मन से
गुरु की सेवा करता है, जिसकी गुरुभक्ति अद्भुत है उसे
शोक, विषाद, भय, पीड़ा, दुःख या अज्ञान की असर नहीं
होती । उसे तत्काल ईश्वर-साक्षात्कार होता है ।
६५. प्रभु और गुरु एक ही हैं अतः गुरु की पूजा करो।
६६. जिन्होंने जानने योग्य जाना है, जिन्होंने प्राप्त करने
योग्य प्राप्त किया है, जो मार्ग दिखाने के लिए समर्थ हैं ऐसे
गुरु के चरणकमलों का आश्रय लेनेवाले शिष्य को यों मानना
चाहिए कि मैं तीन गुना कृतार्थ हुआ हूँ |
५४
गुरुभक्तियोग
४९. शिष्य को गुरु के प्रति जितनी मात्रा में भक्तिभाव
होगा उतनी मात्रा में उसे फल की प्राप्ति होगी।
५०. केवल आध्यात्मिक गुरु ही मार्ग दिखाकर शिष्य
को प्रभु के प्रति ले जाएँगे ।
५१. गुरु मनुष्य के रूप में साक्षात् ईश्वर ही हैं ।
शिष्य के कर्तव्य
५२. शिष्य को गुरु की आज्ञा का पालन अन्तः-
करणपूर्वक करना चाहिए ।
५३. गुरु के द्वारा निर्दिष्ट पद्धति कभी कभी शिष्य की
रुचि को तत्काल अनुकूल न भी हो, फिर भी उसे श्रद्धा
रखना चाहिए कि वह उसके हित के लिए ही है, लाभदायक
ही है ।
५४. गुरु मिलने से जो लाभ होते हैं और जो मानसिक
शान्ति का अनुभव होता है वह असीम होता है ।
५५. अपनी सर्वोच्च दिव्य प्रकृति का भान होते हुए
भी भगवान श्रीकृष्ण ने अपने गुरु सांदीपनि की कैसी सेवा
की और उनके पास अभ्यास किया यह तो आप जानते
ही हैं ।
५६. जिस शिष्य को अपने गुरु में श्रद्धा होती है वह
ज्ञान प्राप्त करता है।
५७. पूरे हृदय से, संकोच रहित होकर सम्पूर्णतया
अपने गुरु की शरण में जाओ ।
५८. गुरु पृथ्वी पर साक्षात् ईश्वर हैं अतः उनकी पूजा
करो ।
५९. गुरुभक्ति एवं गुरुसेवा के फलस्वरूप आखिर
गुरुभक्तियोग
५५
आत्म-साक्षात्कार होता है।
६०. शिष्य को गुरु की सेवा करते रहना चाहिए । जब
उसका आत्म-समर्पण पूर्णतः हो जाएगा तब गुरु उसे सत्य
का स्पष्ट दर्शन कराएँगे ।
६१. कुछ भ्रांत शिष्य कुछ समय के लिए अपने गुरु
की सेवा करते हैं। फिर 'मैंने चित्तशुद्धि प्राप्त की है' ऐसी
मूर्ख कल्पना करके गुरु की सेवा छोड़ देते हैं । उनको
सर्वोत्तम ज्ञान प्राप्त नहीं होता । उनको ध्येयसिद्धि नहीं
होती।
६२. उनको थोड़ा बहुत पुण्य अवश्य मिलता है लेकिन
आत्म-साक्षात्कार नहीं होता । सचमुच, यह एक बड़ा
नुकसान है। उनकी यह गंभीर भूल है ।
गुरुभक्ति और गुरुसेवा
६३. गुरुभक्ति और गुरुसेवा साधना रूपी नौका की दो
पतवारें हैं जो शिष्य को संसारसरिता के उस पार ले जाती
हैं।
६४. जो गुरु की शरण में गया है, जो सच्चे मन से
गुरु की सेवा करता है, जिसकी गुरुभक्ति अद्भुत है उसे
शोक, विषाद, भय, पीड़ा, दुःख या अज्ञान की असर नहीं
होती । उसे तत्काल ईश्वर-साक्षात्कार होता है ।
६५. प्रभु और गुरु एक ही हैं अतः गुरु की पूजा करो।
६६. जिन्होंने जानने योग्य जाना है, जिन्होंने प्राप्त करने
योग्य प्राप्त किया है, जो मार्ग दिखाने के लिए समर्थ हैं ऐसे
गुरु के चरणकमलों का आश्रय लेनेवाले शिष्य को यों मानना
चाहिए कि मैं तीन गुना कृतार्थ हुआ हूँ।
हैं
५६
गुरुभक्तियोग
६७. स्वार्थ का त्याग करना अति कठिन है। यदि शिष्य
स्वयं स्वार्थ को निर्मूल करने का दृढ़ निश्चय करे और सतत
अभ्यास के द्वारा उसे पुष्ट करे तो गुरुकृपा से स्वार्थ विदा
होता है।
६८. शिष्य अगर जितनी संभव हो सके उतनी व्यवहारु
रीति से, तत्परता से एवं निश्चयपूर्वक गुरु के आदेशों का
पालन करने का प्रयास करेगा तो उसे प्रभु का साक्षात्कार
होगा ।
६९. शिष्य में जो गुण होने चाहिए उन सबमें गुरु की
आज्ञा का पालन सर्वश्रेष्ठ गुण है ।
आज्ञापालन का मूल्य
७०. आज्ञापालन अमूल्य गुण है । क्योंकि अगर आप
आज्ञापालन का गुण जीवन में लाने का प्रयास करेंगे तो
आत्म-साक्षात्कार के मार्ग में स्थित सबसे महान शत्रु
मनमुखता और अहंभाव धीरे धीरे निर्मूल हो जाएँगे ।
७१. गुरु की आज्ञा का सम्पूर्णतः पालन करने का कार्य
कठिन है किन्तु अन्तःकरण से प्रयत्न किया जाय तो वह
सरल हो जाता है। गुरु की आज्ञा का पालन विश्व की तमाम
कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने का अमोघ शस्त्र है ।
७२. हरएक सामान्य कार्य में बहुत ही परिश्रम की
आवश्यकता होती है। अतः अध्यात्म के मार्ग में
मनुष्य
को
अपने आप पर किसी भी प्रकार का संयम रखने के लिए
तैयार रहना चाहिए और गुरु के प्रति आज्ञापालन का भाव
जगाना चाहिए ।
७३. आन्तरिक भाव की अभिव्यक्ति के रूप में पूजा,
गुरुभक्तियोग
५७
पुष्पोपहार और भक्ति एवं पूजा के बाह्योपचार की अपेक्षा गुरु
की आज्ञापालन का भाव अधिक महत्त्वपूर्ण है ।
७४. समझो, किसीको ऐसा लगे कि अमुक प्रकार से
आचरण करने से गुरु को अच्छा नहीं लगेगा, तो उसे ऐसा
आचरण नहीं करना चाहिए । यह भी आज्ञापालन ही है ।
७५. यदि किसी भी मनुष्य के पास विश्व में अति
मूल्यवान मानी जाय ऐसी सब चीजें हों लेकिन उसका मन
अगर गुरु के चरणकमल में न लगा हो तो समझो उसके
पास कुछ भी नहीं है।
७६. बेशक, सत्य अद्वैत है किन्तु द्वैत के विशाल
अनुभव के द्वारा ही मनुष्य को आखिर अद्वैत की उच्चतम
चेतना में पहुँचना है। वहाँ पहुँचने की प्रक्रिया में गुरु के
चरणकमलों के प्रति भक्तिभाव सबसे महत्त्वपूर्ण है । वह एक
सर्वश्रेष्ठ साधना है।
७७. अपने आपको बार-बार गुरुभक्ति में स्थापित करने
के लिए शिष्य को विभिन्न पद्धतियाँ काम में लाने का प्रयत्न
करना चाहिए ।
७८. हरएक गुरु जिस प्रकार शिष्य ग्रहण कर सके उसी
प्रकार उपदेश का औषध देते हैं।
७९. गुरु के चरणकमलों से लगे रहो । उसमें साधना
का रहस्य निहित है ।
गुरु को अर्घ्य
८०. प्राचीन काल में शिष्य को हाथ में समिध लेकर
गुरु के पास जाना होता था । समिध गुरु के चरणकमल
को आत्मसमर्पण और शरणागति करने का प्रतीक है ।
५८
गुरुभक्तियोग
८१. ''यह हमारे कर्मों की गठरी है। आप उसे जला
दो ।' शिष्य हाथ में समिध लेकर गुरु के पास जाता है
इसका यह अर्थ होता है । इसका बाह्य अर्थ ऐसा है कि
ऋषि उस समय में अग्निहोत्र करते थे। उनके यज्ञ के लिए
काष्ठ लाने के रूप में गुरु की सेवा का यह प्रतीक है ।
८२. आध्यात्मिक साक्षात्कार गुरु की परम सेवा का
फल है।
८३. मनुस्मृति में कहा गया है कि शिष्यों को सदा
वेदाध्ययन में निमग्न रहना चाहिए । परम श्रद्धा एवं
भक्तिभावपूर्वक आचार्य की सेवा के दौरान शिष्य को मदिरा,
मांस, तेल, इत्र, स्त्री, स्वादु भोजन, चेतन प्राणियों को हानि
पहुँचाना, काम, क्रोध, लोभ, नृत्य, गान, क्रीड़ा, वाजिन्त्र
बजाना, रंग, गपशप लगाना, निन्दा करना, अति निद्रा लेना
आदि से अलिप्त रहना चाहिए । उसे असत्य नहीं बोलना
चाहिए ।
८४. गुण एवं ज्ञान के भण्डार समान गुरु की निगरानी
में शिष्य को अपने चारित्र्य का योग्य निर्माण करना
चाहिए ।
प्रकरण : ४
गुरुभक्ति की शिक्षा
भक्ति के नियम
१. फल की आसक्ति रहित शुद्ध हृदय की गुरुभक्ति से
मुक्ति प्राप्त होती है।
गुरुभक्तियोग
५९
२. शोक एवं भय से मुक्ति हो ऐसे गुरु के चरणकमल
के सान्निध्य में जाओ ।
३. अपने दैवी गुरु के चरणकमलों में अपना हृदय रख
दो ।
४. अपने गुरुद्वार को, गुरुआश्रम को साफ करके सजाने
में अपने हाथ को काम में लगाओ।
५. गुरु शिष्य के बीच का सम्बन्ध बहुत ही पवित्र है।
६. जो गुरु की सेवा करता है वह सब गुणों को प्राप्त
करता है।
७. अपनी आँखों का उपयोग अपने दिव्य गुरु की छवी
(फोटो) को निहारने में करो ।
८. अपने मस्तक का उपयोग सद्गुरु के पावन चरणों
में झुकाने के लिए करो ।
९. हे मनुष्य ! गुरु के चरणकमलों का आश्रय ले।
काम, आसक्ति, अभिमान आदि को त्याग दे, क्योंकि वे
गुरुसेवा में मुख्य विघ्न हैं ।
१०. कोई भी तृष्णा से रहित, भक्तिभावपूर्वक गुरु की
भक्ति करो तो आपको उनकी कृपा प्राप्त होगी ।
११. अपनी सम्पत्ति, अपने शुभ कर्म, अपना तप आदि
अपने पावन गुरु को अर्पण कर दो । तदनन्तर ही उनकी
कृपा प्राप्त करने के लिए आपका हृदय शुद्ध होगा ।
१२. गुरु एवं संतों के चरणों की धूलि से आपके हृदय
को शुद्ध करो । तभी आपका हृदय पवित्र होगा, तभी आप
भक्ति कर सकोगे ।
१३. प्रेम एवं आदर से अपने गुरु एवं संतों की सेवा
६०
गुरुभक्तियोग
करो । उनको साक्षात् प्रभु मानो । तभी आप भक्ति कर
सकोगे।
गुरुसेवा का योग
१४. गुरुसेवायोग' का अर्थ है गुरु की निःस्वार्थ सेवा ।
१५. गुरु की सेवा माने मानव जाति की सेवा ।
१६. गुरुसेवा से मन की अशुद्धि नष्ट होती है। गुरुसेवा
हृदयशुद्धि के लिए एक बलवान चीज है। अतः भावनापूर्वक
गुरु की सेवा करो।
१७. गुरु की सेवा दिव्य प्रकाश, ज्ञान और कृपा को
ग्रहण करने के लिए मन को तैयार करती है।
१८. गुरुसेवा हृदय को विशाल बनाती है, सब विघ्नों
को हटाती है । गुरुसेवा हृदयशुद्धि के लिए एक असरकारक
साधना है।
१९. गुरु की सेवा मन को सदा प्रगतिशील और चपल
रखती है।
२०. गुरु की सेवा के कारण दैवी गुण जैसे कि दया,
नम्रता, आज्ञापालन, प्रेम, श्रद्धा, भक्ति, धैर्य,
आदि का विकास होता है ।
२१. गुरुसेवा से ईर्ष्या, धिक्कार एवं दूसरों से बड़ा होने
का भाव नष्ट होता है ।
२२. जो गुरु की सेवा करता है वह अहंभाव और ममता
को जीत सकता है।
२३. जो शिष्य गुरु की सेवा करता है वह सचमुच
तो
अपने आपकी ही सेवा करता है ।
२४. 'गुरुसेवायोग' के अभ्यास से अवर्णनीय आनन्द
आत्मत्याग
गुरुभक्तियोग
६१
और शान्ति प्राप्त होती है ।
२५. शिष्य जब गुरु के घर रहता हो तर्ब उसे संतोषी
जीवन बिताना चाहिए | उसे पूर्णतः आत्मसंयम करना
चाहिए ।
२६. अपने गुरु के समक्ष शिष्य को धीरे से, मधुरता
से एवं सत्य बोलना चाहिए । उसे कठोर एवं गलीच शब्दों
का उपयोग नहीं करना चाहिए । गुरु के द्वार पर रहकर,
गुरु का अन्न खाकर गुरु के समक्ष जूठ बोलना अथवा
गुरुभाइयों के साथ वैर रखना यह शिष्य के रूप में असुर
होने का चिन्ह है। शिष्य के रूप में निहित ऐसा असुर गुरु-
शिष्य परम्परा को कलंकित करता है । गुरु के हृदय
को
ठेस पहुँचे ऐसा आचरण करनेवाला शिष्य अपना ही सत्या-
नाश करता है। जो गुरु का विरोध करता है वह सचमुच
हतभागी है।
कबीरा निन्दक ना मिलो पापी मिलो हजार |
एक निन्दक के माथे पर लाख पापीन को भार ||
गुरु की एवं गुरु के कार्य की निन्दा करनेवाला निन्दक
हजारों जन्मों तक मेंढ़क होकर पड़ा रहता है ।
तुलसीदासजी ने ठीक ही कहा है :
हरिगुरु निन्दा सुनहिं जे काना ।
होवहिं पाप गौघात समाना ॥
हरि गुरु निन्दक दादुर होवहिं ।
जन्म सहस्र नर पावहिं सो हि ॥
गुरुभक्तों को, शिष्यों को एवं सत्शिष्यों को चाहिए कि
वे ऐसे आसुरी वृत्तिवाले, श्रद्धा डिगानेवाले अथवा अपने
६२
गुरुभक्तियोग
हल्के व्यवहार से गुरु के नाम को, गुरु के धाम को क्षति
पहुँचानेवाले असुरों को सावधान कर दें एवं स्वयं भी उनसे
सावधान रहें।
प्रसिद्ध गुरु के द्वार पर ऐसे आसुरी वृत्ति के लोग शिष्य
के रूप में घुस जाते हैं । शिष्य तो उसे कहा जा सकता
है जो अपना हलका स्वभाव छोड़ने के लिए तत्पर हो,
गुरु के सिद्धान्त के मुताबिक चलने के लिए सतत सजाग
हो । गुरु को या गुरु के द्वार को लांछन लगे ऐसा आचरण
कोई भी शिष्य कर ही नहीं सकता। अगर करता हुआ दिखे
तो वह शिष्य के रूप में असुर है। सशिष्यों को ऐसे कपटी
शिष्य से सावधान रहना चाहिए ।
२७. शिष्य को अपने गुरु की निन्दा नहीं करना
चाहिए ।
२८. जो गुरु की निन्दा करता है वह रौरव नर्क में गिरता
है।
२९. जो खाने के लिए ही जीता है वह पापी है। जो
गुरु की सेवा करने के लिए ही खाता है वह सच्चा शिष्य
है।
३०. जो गुरु का ध्यान करता है उसे बहुत कम भोजन
की आवश्यकता रह जाती है।
गुरु की कृपा
३१. केवल गुरु की कृपा से ही आप अपने मन को
नियंत्रण में रख सकते हैं ।
३२. आप गुरु की कृपा से ही समाधि या अतिचेतना
में स्थित हो सकते हैं ।
---
गुरुभक्तियोग
६३
३३.विराग, अनासक्ति, इन्द्रिय-विषयक भोगविलासों के
प्रति उदासीन हुए बिना किसीको गुरुकृपा नहीं पच सकती।
३४. मन के सहकार के सिवाय इन्द्रियों से कुछ नहीं
हो सकता । मन को गुरुकृपा से वश में किया जा सकता
३५. शिष्य जब गुरु की निगरानी में रहता है तब उसका
मन इन्द्रिय-विषयक भोग-विलासों से विमुख बनने लगता
है।
३६. गुरुओं एवं संतों के समागम से, धार्मिक ग्रंथों के
अभ्यास से, सात्त्विक भोजन से, प्रभु के नाम आदि से
सात्त्विक वृत्ति में वृद्धि होती है ।
३७. राजसी प्रकृति का मनुष्य अपने पूरे हृदय से एवं
अन्तःकरण से गुरु की सेवा नहीं कर सकता ।
३८. प्राणायाम और गुरु के नाम का जप करने से मन
अन्तर्मुख होता है।
३९. ब्रह्मश्रोत्रिय एवं ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास शास्त्रों का
अभ्यास करो, तभी आपको मोक्ष प्राप्त होगा ।
४०. ब्रह्मचारी का मुख्य कर्त्तव्य अपने गुरु की सेवा
करना है।
गुरु का ध्यान करना चाहिए
४१. प्रातःकाल में ४ से ६ के बीच गुरु के स्वरूप का
ध्यान करो तो उनकी कृपा का अनुभव कर सकोगे ।
४२. अपने गुरु की फोटो अपने सामने रखो । ध्यान
के आसन में बैठो | धीरे धीरे फोटो पर मन को एकाग्र
करो । मन को उनके चरणकमल, हाथ, छाती, गले, सिर,
६४ गुरुभक्तियोग मुख, आँखों आदि पर घुमाओ । आँख की पुतली न हिले इस प्रकार सतत पाँच मिनट तक निहारो । फिर आँखें बन्द करके उसी प्रकार भीतर फोटो को निहारने का प्रयास करो । इस क्रिया का पुनरावर्तन करो । फिर अच्छी तरह ध्यान कर सकोगे। ४३. गुरु के स्वरूप का ध्यान करो । ध्यान के दौरान आपको दिव्य आत्मिक आनन्द, रोमांच, शान्ति आदि का अनुभव होगा । कुण्डलिनी शक्ति जागृत होगी, हृदय भाव- विभोर होगा । रोमांच, हास्य, रुदन आदि अष्टसात्त्विक भाव में आपका मन विचरण करने लगेगा । शिष्य की गुरुमुखता की यह निशानी है। फिर आपको साधना करनी नहीं पड़ेगी, साधना अपने आप होने लगेगी । ४४. सांसारिक लोगों का संग, अधिक खाना, अभि- मानी एवं राजसी प्रकृति, निद्रा, काम, क्रोध, लोभ - ये सब गुरुकृपा प्राप्त करने में विघ्न हैं। ४५. गुरु के स्वरूप का चिन्तन करने में निद्रा, मन की चंचलता, सुषुप्त इच्छाएँ जागना, हवाई किल्ले बाँधना, आलस्य, रोग एवं आध्यात्मिक अभिमान विघ्नं हैं । ४६. गुरु सब शुभ गुणों का धाम हैं । ४७. शिष्य के लिए गुरु जीवन का सर्वस्व हैं । ४८. गुरुभक्ति जन्म, मृत्यु एवं जरा को नष्ट करती है। ४९. गुरुभक्ति ईश्वरकृपा प्राप्त करने का एकमात्र साधन है। गुरु : एक महान पथप्रदर्शक ५०. जो आत्मज्ञान का मार्ग दिखाते हैं वे पृथ्वी पर
गुरुभक्तियोग
६५
. के सच्चे देव हैं। गुरु के सिवाय यह मार्ग कौन दिखा सकता
है ?
५१. गुरु प्रभुप्राप्ति का मार्ग दिखाते हैं और शिष्य को
सदा के लिए सुखी करते हैं ।
५२. जो पूर्णता का मार्ग दिखाते हैं वे गुरु हैं ।
५३. संस्कृत में 'गु' शब्द का अर्थ अन्धकार या अज्ञान
है और 'रु' का अर्थ 'दूर करनेवाला' है । अन्धकार या
आवरणरूपी अज्ञान का नाश करने के कारण वे 'गुरु'
कहलाते हैं
५४. आध्यात्मिक गुरु निरन्तर उपदेश से साधक को
तालीम देते हैं ।
५५. गुरु सच्चे शिष्य को प्रभु की ओर से प्राप्त भेंट
हैं।
५६. तमाम शास्त्र जोर देकर गुरु की आवश्यकता मानते
हैं।
५७. श्रीराम जैसे दैवी अवतार ने भी श्री वशिष्ठजी को
अपने गुरु माने थे और उनकी आज्ञाओं का पालन किया
हैं
था।
५८. शिष्य दुन्यावी दृष्टि से चाहे कितना भी महान हो,
फिर भी गुरु की सहाय के बिना वह निर्वाणसुख का स्वाद
नहीं चख सकता।
५९. गुरु के चरणकमल की धूलि में स्नान किये बिना
केवल तपश्चर्या करने से या दान से या वेदों के अध्ययन
से ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता ।
६०. शिष्य को सदा अपने गुरु की मूर्ति का पूजन करना
5
६६ गुरुभक्तियोग चाहिए और उनके पवित्र नाम का जप करना चाहिए । ६१. साधक को अपने गुरु का या किसी भी संतों का बुरा बोलना या चाहना नहीं चाहिए । ६२. साधक चाहे कितना भी महान हो फिर भी उसे गुरु के समक्ष फिजुल बातें नहीं करना चाहिए । ६३. गुरु पृथ्वी पर देवदूत हैं, नहीं नहीं, देव ही हैं। ६४. गुरु को शिष्य की सेवा या सहाय की आवश्यकता नहीं है किन्तु सेवा के द्वारा विकास करने के लिए वे शिष्य को एक मौका देते हैं । महापुरुषों का मार्ग ६५. कितने भी महान होने के बजाय भी तमाम संतों, ऋषियों, पयगम्बरों, जगद्गुरुओं, अवतारों एवं महापुरुषों को अपने गुरु थे। ६६. गुरु सब सद्गुण एवं शुभ वस्तुओं की खान हैं । ६७. गुरु के सान्निध्य से सब संशय, भय, चिन्ता और दुःख का नाश होता है । ६८. गुरु में अचल श्रद्धा और गुरु के प्रति दृढ़ भक्तिभाव से शिष्य सब कार्यों में सिद्धि एवं भौतिक आबादी प्राप्त कर सकता है। ६९. भवसागर में डूबते हुए शिष्य के लिए गुरु जीवन- संरक्षक नौका हैं। ७०. अगर आपको कोई भी कला सीखना हो तो उस कला के विशेषज्ञ गुरु के पास जाना चाहिए । ७१. साधारण प्रकार के भौतिक ज्ञान की बाबत में अगर
गुरुभक्तियोग
६७
ऐसा हो तो आध्यात्मिक मार्ग में गुरु की आवश्यकता कितनी
सारी होनी चाहिए ?
७२. गुरु की सहाय के बिना मन को संयम में लाने
की कोशिश जो करते हैं वे ऐसे व्यापारी जैसे हैं जिनको
अपने जहाज के लिए अच्छा संचालक नहीं मिला है ।
७३. अध्यात्ममार्ग काँटोंवाला और सीधी चड़ाईवाला
मार्ग है । प्रलोभन आपके ऊपर हमला करेंगे। उसमें पतन
की संभावना है। अतः ऐसे गुरु के पास जायें जो इस मार्ग
के जानकार हों।
७४. गुरु का चिन्तन करने से सुख, भीतरी शक्ति, मन
की शान्ति एवं आनन्द प्राप्त होता है । गुरुचिन्तन से,
गुरुचर्चा से उनके दैवी स्वभाव का संचार हमारे जीवन में
होता है।
७५. गुरु की प्रशस्ति माने ईश्वर की प्रशस्ति ।
गुरु से हमारा सम्बन्ध
७६. इस कलियुग में आत्म-साक्षात्कारी सद्गुरु की
भक्ति के द्वारा ही ईश्वर-साक्षात्कार करना है। सत्यस्वरूप
ईश्वर का साक्षात्कार किये हुए गुरु कलियुग में तारणहार
हैं ।
७७. गुरु से दीक्षा प्राप्त हो जाय यह बड़े भाग्य की बात
है ।
७८. मंत्रचैतन्य याने मंत्र की गूढ़ शक्ति गुरु की दीक्षा
के द्वारा ही जागृत होती है।
७९. आज से ही सम्पूर्ण भक्तिभावपूर्वक गुरु की सेवा
करने का निश्चय करो ।
६८
गुरुभक्तियोग
८०. आध्यात्मिकता की खान के समान गुरु की सहाय
के बिना आध्यात्मिक प्रगति संभव नहीं है।
८१. गुरु साधकों के आगे से माया का आवरण एवं
अन्य विक्षेप दूर करते हैं और उनके मार्ग में प्रकाश करते
हैं।
८२. माता को देव समान जानो, पिता को देव समान
जानो, गुरु को देव समान जानो, अतिथि को देव समान
जानो ।
८३. गुरु की सेवा के बिना पवित्र शास्त्रों का अध्ययन
करना यह समय का दुर्व्यय है ।
८४. गुरुदक्षिणा दिये बिना गुरु के पास पवित्र शास्त्रों
का अध्ययन करना यह समय का दुर्व्यय है ।
८५. गुरु की इच्छाओं को परिपूर्ण किये बिना वेदान्त के
पुस्तकों का, उपनिषदों का एवं ब्रह्मसूत्रों का अभ्यास किया
जाए तो उससे कल्याण नहीं होता, ज्ञान नहीं मिलता ।
८६. लम्बे समय की गुरुसेवा के बाद आपका शुद्ध एवं
शान्त मन आपका गुरु बनता है । जैसे पारस के संग से
लोह सुवर्ण बनता है वैसे गुरु की चिरकाल पर्यन्त सेवा से
आपमें भी गुरुत्व प्रकट होता है ।
गुरुकृपा की अनिवार्यता
८७. चाहे कितने ही फिलासफी के ग्रंथ पढ़ो, सारे विश्व
का प्रवास करके व्याख्यान करो, हजारों वर्ष तक हिमालय
की गुफा में रहो, वर्षों तक प्राणायाम करो, जीवनपर्यन्त
शीर्षासन करो फिर भी गुरु की कृपा के बिना आपको मोक्ष
mms
गुरुभक्तियोग ६९ की प्राप्ति नहीं हो सकती । रामायण में कहा है : गुरु बिन भवनिधि तरहिं न कोई । चाहे विरंचि शंकर सम होई. ।। ८८. आध्यात्मिक गुरु यह नहीं दिखा सकते कि ब्रह्म ऐसा है या वैसा है । प्रत्यक्ष अनुभव होने से पहले शिष्य समझ नहीं पाता कि ब्रह्म कैसा है। किन्तु गुरुकृपा शिष्य को अपनी हृदय गुहा में ही ब्रह्म का प्रत्यक्ष अनुभव गूढ़ रीति से करा सकेगी। ८९. अपने माता, पिता एवं बुझुर्गों को मान दो । ९०. अगर गुरु इजाजत दें तो उनकी पैरचंपी करो । ९१. हरएक को अपने ज्ञान से, गुरु की सहाय से वेदान्त ग्रंथों का सच्चा रहस्य प्राप्त करके अपने भीतर ब्रह्म का अनुभव करना चाहिए । ९२. साधक को गुरु अथवा आध्यात्मिक पथदर्शक मिले हों फिर भी उसे अपने प्रयासों से ही सब तृष्णाओं, वासनाओं एवं अहंभाव का नाश करना चाहिए और आत्म- साक्षात्कार करना चाहिए । गुरुकृपा से प्राप्त होनेवाली प्रसन्नता ९३. गुरु के चरणचमलों का आश्रय लेने से जो परम आनन्द का अनुभव होता है उसकी तुलना में तीनों लोकों का सुख भी नहीं आ सकता । ९४. अपने गुरु के साथ कभी लड़ो मत । उनको कभी कोर्ट में मत ले जाओ । ९५. गुरु की आज्ञा का उल्लंघन करने से सीधे नरक में पहुँचते हैं । गुरुद्रोही खुद तो डूबता है, अपने कुल को
७०
गुरुभक्तियोग
भी कलंकित करता है ।
संत सताये तीनों जायी तेज बल और वंश ।
एड़ा एड़ा केई गया रावण कौरव केरो कंस ||
पातकी एवं स्वार्थी लोग सद्गुरु के लिए चाहे कैसी भी
अफवाहें फैलायें फिर भी सुज्ञ समाज एवं शिष्यगण सद्गुरु
के पावन सान्निध्य और उनकी मधुर याद से अपना हृदय
पावन रखते हैं।
९६. गुरु एवं ज्ञानी पुरुषों का सान्निध्य मनुष्य जीवन
में कभी कभी ही मिल सके ऐसा दुर्लभ मौका है ।
९७. किसी भी प्रकार के ज्ञान की प्राप्ति, विशेषतः आत्मा
विषयक मूल्यवान ज्ञान की प्राप्ति गुरु से ही हो सकती है।
९८. गुरु की परोपकारी कृपा शिष्य के लिए सर्वस्व
है । आत्मज्ञान के द्वार खोलनेवाली गुरु की कृपा ही है ।
९९. आत्मसमर्पण का अर्थ है अपने आपको सम्पूर्णतः
गुरु के शरण में छोड़ देना ।
१००. तृष्णा एवं अहंभाव आत्मसमर्पण में कदम कदम
पर विघ्नरूप बनते हैं ।
१०१. भगवान श्रीकृष्ण ने अपने गुरु सांदीपनि के
चरणों का सेवन किया था। उन्होंने अपने गुरु की सेवा की
थी। वे अपने गुरु के लिए लकड़ियाँ लाते थे। भगवान श्रीराम
के गुरु वशिष्ठजी थे जिन्होंने उनको उपदेश दिया ।
देवों के गुरु बृहस्पति हैं । दैवी आत्माओं में सबसे महान
सनतकुमार दक्षिणामूर्ति के चरणों में बैठे थे ।
१०२. साधना का रहस्यमय मार्ग गुरु की कृपा के द्वारा
ही जाना जा सकता है ।
७१
गुरुभक्तियोग
१०३. अगर आप सच्चे हृदय से, आतुरतापूर्वक प्रार्थना
करेंगे तो ईश्वर गुरु के स्वरूप में आपके पास आयेंगे ।
पूर्व अभ्यास की आवश्यकता
१०४. अगर आपको 'प्राथमिक चिकित्सा' का ज्ञान पाना
हो तो केवल उसके विषयों की चर्चा करके पा सकते हैं, किन्तु
आप अगर एम.बी.बी.एस. कहलाना चाहते हैं, फिझीशियन
या सर्जन के रूप में काम करना चाहते हैं तो आपको नियमित
रूप में छः वर्ष का अभ्यास करना चाहिए । इसी प्रकार आप
उपासना, प्रार्थना आदि के द्वारा देवताओं को प्रसन्न करके
उनकी कृपा प्राप्त कर सकते हैं । किन्तु प्रत्यक्ष आध्यात्मिक
साक्षात्कार के लिए आपको तीन चीजें चाहिए : गुरुसेवा,
गुरुभक्ति और गुरुकृपा ।
१०५. गुरु को शिष्य का आत्मसमर्पण और गुरु की
कृपा ये दो चीजें आपस में जुड़ी हुई हैं ।
१०६. शरणागति गुरुकृपा को खींच लाती है और
गुरुकृपा से शरणागति सम्पूर्ण बनती है।
१०७. शिष्य संसारसागर को पार कर सके इसके
लिए ब्रह्मवेत्ता गुरु आत्मज्ञान देकर उसका अमूल्य हित
करते हैं। यह काम गुरु के सिवाय और कोई नहीं कर
. सकता ।
१०८. जिसके ऊपर सदैव गुरु की कृपा रहती है ऐसे
शिष्य को धन्यवाद है ।
१०९. हिन्दूओं के पुराणों में एवं अन्य पवित्र ग्रंथों
में गुरुभक्ति की महत्ता गानेवाले सैंकड़ों उदाहरण भरे हुए
हैं।
:
७२
गुरुभक्तियोग
११०. जिसको सच्चे गुरु प्राप्त हुए हैं ऐसे शिष्य के लिए
कोई भी वस्तु अप्राप्य नहीं रहती।
१११. आप अपने इष्ट देवता को गुरुकृपा के द्वारा ही
प्रत्यक्ष मिल सकते हैं ।
११२. गुरु एक प्रकार का माध्यम हैं जिनके द्वारा ईश्वर
की कृपा भक्त के प्रति बहती है ।
११३. सच्चे गुरु की अपेक्षा अधिक प्रेम बरसाने-
वाले, अधिक हितकारी, अधिक कृपालु और अधिक
प्रिय व्यक्ति इस विश्व में मिलना दुर्लभ है ।
११४. शिष्य के लिए तो गुरु से उच्चतर देवता कोई
नहीं है।
११५. सचमुच गुरु के सत्संग जितनी उन्नतिकारक
दूसरी एक भी वस्तु नहीं है। गुरु की आवश्यकता के सम्बन्ध
में प्राचीन काल के तमाम साधु-संन्यासियों का एक समान
ही अभिप्राय था ।
११६. गुरु के बिना साधक अपने लक्ष्य पर पहुँच सकता
है ऐसा कहने का अर्थ होता है कि प्रवासी बाढ़ में उफनती
हुई तूफानी नदी को नौका की सहायता के बिना ही पार
कर सकता है।
११७. सत्संग माने गुरु का सहवास । उस सत्संग के
बिना मन ईश्वर की ओर मुड़ नहीं सकता ।
११८. आत्मवेत्ता गुरु के साथ एक क्षण का सत्संग
भी लाखों वर्षों के तप की अपेक्षा कहीं उच्चतर है ।
११९. हे साधकों ! 'मनमुखी साधना' कभी करना
नहीं । पूर्ण श्रद्धा और भक्तिभाव से 'गुरुमुखी साधना'
गुरुभक्तियोग
७३
करो।
१२०. जिसने गुरु किये हैं वह उपनिषदों में वर्णित ब्रह्म
को जानता है।
१२१. गुरु साधक-जगत के प्रकाशक दीप हैं ।
१२२. निष्ठावान शिष्य के लिए जो गुरु सुख, शान्ति,
आनन्द और अमरत्व का मूल एवं ध्रुवतारक हैं ऐसे गुरु की
जयजयकार हो !
१२३. आपके गुरु अथवा योग सिखानेवाले आचार्य
आपको प्रणाम करें उसके पहले आप उन्हें प्रणाम करो ।
१२४. योग के साधक को अपने गुरु में एवं ईश्वर में
श्रद्धा और भक्तिभाव होना जरूरी है ।
१२५. उसे गुरु के उपदेश में एवं पवित्र शास्त्रों में श्रद्धा
होना जरूरी है।
प्रकरण : .
गुरु की महत्ता
गुरु ही एक मात्र आश्रय
१. रसोई सीखने के लिए आपको सिखानेवाले की
आवश्यकता पड़ती है, विज्ञान सीखने के लिए आपको
प्राध्यापक की आवश्यकता पड़ती है। कोई भी कला सीखने
के लिए आपको गुरु चाहिए । तो क्या आत्मविद्या सीखने
के लिए गुरु की आवश्यकता नहीं है ?
२. संसारसागर से उस पार जाने के लिए सचमुच गुरु
७४
गुरुभक्तियोग
ही एक मात्र शरण है।
३. सत्य के कंटकमय मार्ग में आपको गुरु के सिवाय
और कोई मार्गदर्शन नहीं दे सकता ।
४. गुरुकृपा के परिणाम अद्भुत होते हैं ।
५. आपके दैनिक जीवन के संग्राम में गुरु आपको
मार्गदर्शन देंगे और आपका रक्षण करेंगे।
६. गुरु ज्ञान के पथप्रदर्शक हैं।
७. गुरु, ईश्वर, ब्रह्म, आचार्य, उपदेशक, दैवी गुरु आदि
सब समानार्थी शब्द हैं।
८. ईश्वर को प्रणाम करो उससे पहले गुरु को प्रणाम
करो । क्योंकि वे आपको ईश्वर के पास ले जाते हैं ।
९. आपके गुरु से मंत्र की दीक्षा लो। उससे आपको
प्रेरणा मिलेगी और आप उच्च स्थिति पर पहुँच सकेंगे।
१०. आपके बदले में गुरु साधना नहीं करेंगे, साधना
तो आपको ही करना होगा ।
११. गुरु आपको सच्ची राह दिखाएँगे ।
१२. गुरु शिष्यं के लिए सच्चा योग पसंद कर सकते
हैं।
१३. गुरु की कृपा से शिष्य अपने मार्ग में स्थित विघ्नों
एवं संशयों को पार कर सकता है ।
१४. गुरु शिष्य को भयस्थानों में से एवं बन्धनों में से
उठा लेंगे।
१५. अपने गुरु की सेवा करने के लिए अपने प्राण एवं
शरीर का बलिदान देने की तैयारी रखो, तब वे आपकी
आत्मा की सँभाल लेंगे।
७५
गुरुभक्तियोग
१६. आपको उठाकर समाधि में रख देंगे ऐसा चमत्कार
कर दिखाने की अपेक्षा आपके गुरु से रखना नहीं । आप
स्वयं कठिन साधना करो । भूखे आदमी को खुद ही खाना
चाहिए ।
१७. अगर आपको सद्गुरु प्राप्त नहीं होंगे तो आप
आध्यात्मिक मार्ग में आगे नहीं बढ़ सकेंगे।
१८. अपने गुरु की पसन्दगी सोच-विचार कर एवं धैर्य
से करो । क्योंकि बाद में आप गुरु. से अलग नहीं हो
सकते । अलग होने में बड़े में बड़ा पाप है ।
१९. गुरु-शिष्य का सम्बन्ध पवित्र एवं जीवन-पर्यन्त
का है । यह बात ठीक से समझ लेना ।
साधना का रहस्य
२०. पूरे अन्तःकरण से हृदयपूर्वक गुरु की सेवा
करो । किसी भी प्रकार की अपेक्षा से रहित होकर आपके
गुरु के प्रति प्रेम रखो। अपनी आय का दसवाँ हिस्सा आपके
गुरु को समर्पित करो । गुरु के चरणकमलों का ध्यान
करो। इसी जन्म में आपको आत्म-साक्षात्कार होगा । यह
साधना का रहस्य है ।
२१. गुरु की पूजा करने के लिए शिष्य के लिए गुरुवार
पवित्र दिन है।
२२. जिनको आत्मा विषयक ज्ञान है, शास्त्रों में जो
पारंगत हैं, जो तमाम उत्कृष्ट गुणों से युक्त हैं वे सद्गुरु
.
हैं
२३. जिसको आत्म-साक्षात्कार सिद्ध किये हुए गुरु
मिलते हैं वह सचमुच तीन गुना भाग्यशाली है।
७६
गुरुभक्तियोग
२४. अपने गुरु की क्षतियाँ न देखो। अपनी क्षतियाँ देखो
और उन्हें दूर करने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करो।
२५. गुरु की कसौटी करना मुश्किल है । एक कबीर
ही दूसरे कबीर को पहचान सकता है । अपने गुरु में ईश्वर
के गुणों का आरोपण करो । तभी आपको लाभ होगा।
२६. जिनके सान्निध्य में आपको आध्यात्मिक उन्नति
महसूस हो, जिनके वक्तव्य से आपको प्रेरणा मिले, जो
आपके संशयों को दूर कर सकें, जो काम, क्रोध, लोभ से
मुक्त हों, जो निःस्वार्थ हों, प्रेम बरसानेवाले हों, जो अहंपद
से मुक्त हों, जिनके व्यवहार में गीता, भागवत, उपनिषदों
का ज्ञान छलकता हो, जिन्होंने प्रभुनाम की प्याऊ लगाई
हो उन्हें आप गुरु करना । ऐसे जागृत पुरुष के शरण की
खोज करना ।
गुरुभक्ति के लिए योग्यता
२७. गुरु के पास जाने के लिए आप योग्य अधिकारी
होने चाहिए । आपमें वैराग्य की भावना, विवेक, गांभीर्य,
आत्मसंयम एवं सदाचार जैसे गुण होने चाहिए ।
२८. अगर आप ऐसा कहेंगे कि 'अच्छा गुरु कोई है
ही नहीं ' तो गुरु भी कहेंगे कि 'कोई अच्छा शिष्य है ही
नहीं ।' आप शिष्य की योग्यता प्राप्त करें तो आपको सद्गुरु
की योग्यता, महत्ता दिखेगी और समझ में आयेगी।
२९. गुरु आपके उद्धारक एवं संरक्षक हैं । सदैव उनकी
पूजा करो, उनका आदर करो ।
३०. गुरुपद भयंकर शाप है ।
३१. जो सत्, चित् और परमानन्द स्वरूप हैं ऐसे गुरु
७७
गुरुभक्तियोग
को सदा साष्टांग प्रणाम करो ।
३२. शिष्य को अपने गुरु की मूर्ति सदा स्मरण में रखना
चाहिए, गुरु के पवित्र नाम का सदा जप करना चाहिए, उनकी
आज्ञा का पालन करना चाहिए । इसीमें साधना का रहस्य
निहित है।
३३. शिष्य को गुरु की पूजा करना चाहिए क्योंकि गुरु
से बड़ा और कोई नहीं है।
३४. गुरु के चरणामृत से संसारसागर सूख जाता है
और मनुष्य आवश्यक आत्मसम्पत्ति प्राप्त कर सकता है।
३५. गुरु का चरणामृत शिष्य की तृषा शान्त कर
सकता है।
३६. आप जब ध्यान करने बैठें तब अपने गुरु का एवं
पूर्वकालीन सब संतों का स्मरण करें । आपको उनके
आशीर्वाद प्राप्त होंगे।
३७. महात्माओं के ज्ञान के शब्द सुनें और उनका
अनुसरण करें।
३८. शास्त्र एवं गुरु के द्वारा निर्दिष्ट शुभ कर्म करें ।
३९. शान्ति का मार्ग दिखाने के लिए गुरु अनिवार्य
हैं।
४०. 'वाहे गुरु' यह गुरु नानक के अनुयाइयों का गुरुमंत्र
है। 'ग्रंथ साहब' पढ़ो तो आपको गुरु की महत्ता का परिचय
होगा।
४१. गुरु की पूजा करके सदा उनका स्मरण करो ।
इससे आपको सुख प्राप्त होगा ।
४२. श्रद्धा माने शास्त्रों में, गुरु के शब्दों में, ईश्वर में
७८ गुरुभक्तियोग और अपने आप में विश्वास । ४३. किसी भी प्रकार के फल की अपेक्षा से रहित होकर गुरु की सेवा करना यह सर्वोच्च साधना है । ४४. श्रवण माने गुरु के चरणकमलों में बैठकर वेद का श्रवण करना। ४५. गुरुसेवा महान शुद्धि करनेवाली है। ४६. आत्म-साक्षात्कार के लिए गुरु की कृपा आवश्यक है। ४७. जितनी भक्तिभावना प्रभु के प्रति रखनी चाहिए उतनी ही गुरु के प्रति रखो । तभी सत्य की अनुभूति होगी । ४८. सदैव एक ही गुरु से लगे रहो । ४९. ईश्वर आदि गुरु हैं जिनको स्थान एवं समय (देश- काल) की सीमा नहीं होती । एक शाश्वत युग से दूसरे शाश्वत युग तक वे समग्र मनुष्य जाति के गुरु हैं । ५०. कुण्डलिनी शक्ति को उसकी सुषुप्त अवस्था में से जागृत करने के लिए गुरु की अनिवार्य आवश्यकता रहती है। गुरु के प्रकाश का अनुसरण करो ५१. अज्ञान का नाश करनेवाले तथा ज्ञान देनेवाले सद्गुरु के चरणकमलों में कोटि प्रणाम ! ५२. समदर्शी संत-महात्मा और गुरु के सत्संग का एक भी मौका चूकना नहीं । ५३. आपके स्थूल मन के कहे अनुसार कभी चलना नहीं । आपके गुरु के वचनों का अनुसरण करें ।
७९
गुरुभक्तियोग
५४. उच्च आत्माओं एवं गुरु के स्मरण मात्र से भौतिक
मनुष्यों की नास्तिक वृत्तियों का नाश होता है और अन्तिम
मुक्ति हेतु प्रयास करने के लिए उनको प्रेरणा मिलती है।
तो फिर गुरुसेवा की महिमा का तो पूछना ही क्या ?
५५. जिस प्रकार दो खरगोशों के पीछे दौड़नेवाला
मनुष्य दो में से एक को भी पकड़ नहीं सकता उसी प्रकार
जो शिष्य दो गुरुओं के पीछे दौड़ता है वह अपने आध्यात्मिक
मार्ग में सफलता नहीं प्राप्त कर सकता ।
५६. अहंभाव का नाश करने से शिष्यत्व की शुरुआत
होती है।
५७. शिष्यत्व की कुंजी है ब्रह्मचर्य और गुरुसेवा ।
५८. शिष्यत्व की पहचान माने गुरुभक्ति ।
५९. गुरु के चरणकमलों में आजीवन आत्म-समर्पण
करना यह शिष्यत्व की निशानी है।
६०. गुरुदेव की मूर्ति का नियमित ध्यान करना यह
शिष्यत्व का राजमार्ग है ।
६१. गुरु महाराज के प्रति सम्पूर्णतः आज्ञापालन का
भाव शिष्यत्व की नींव है ।
६२. गुरु से मिलने की उत्कट इच्छा और उनकी सेवा
करने की तीव्र आकांक्षा मुमुक्षुत्व की निशानी है।
६३. देव, द्विज, आध्यात्मिक गुरु एवं ज्ञानी पुरुषों की
पूजा, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा शरीर का
तप है।
६४. ब्राह्मणों, पवित्र आचार्यों एवं ज्ञानी पुरुषों को प्रणाम
करना, ब्रह्मचर्य और अहिंसा ये शारीरिक तपश्चर्याएँ हैं ।
८०
गुरुभक्तियोग
६५. माँ-बाप और आचार्य की सेवा, गरीब और रोगियों
की सेवा भी शारीरिक तपश्चर्या है।
गुरु व्दारा ब्रह्म का ज्ञान
६६. ब्रह्म विषयक ज्ञान अति सूक्ष्म है । शंकाएँ पैदा
होती हैं और उनको दूर करने के लिए एवं मार्ग दिखाने
के लिए ब्रह्मज्ञानी आध्यात्मिक गुरु की आवश्यकता रहती
है।
६७. सत्य के सच्चे खोजी को सहायभूत होने के लिए
गुरु अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
६८. आध्यात्मिक गुरु साधक को अपनी प्रेमपूर्ण एवं
विवेकपूर्ण निगरानी में रखते हैं तथा आध्यात्मिक विकास
के विभिन्न स्तरों में से उसे आगे बढ़ाते हैं ।
६९. सच्चे गुरु सदैव शिष्य के अज्ञान का नाश करने
में तथा उसे उपनिषदों का ज्ञान देने में संलग्न रहते हैं।
७०. वेद भी ज्ञानमार्ग के पथप्रदर्शक गुरु की प्रशस्ति
गाना चूकते नहीं हैं।
७१. साधक कितना भी बुद्धिमान हो फिर भी गुरु अथवा
आध्यात्मिक आचार्य की सहाय के बिना वेदों की गहनता
प्राप्त करना या उनका अभ्यास करना उसके लिए संभव नहीं
है।
७२. गुरु अपने शिष्य की दैवी शक्तियों को जागृत
करते हैं।
७३. प्रथम तो अपने गुरु को, आध्यात्मिक आचार्य को
खोज लो जो आपको अनन्त तत्त्व अथवा शाश्वत चेतनप्रवाह
के साथ एकत्व साधने में सहाय कर सकें ।
८१ अतः गुरुभक्तियोग ७४. अध्यात्ममार्ग में सलामतीपूर्वक तथा मक्कमता से आगे बढ़ने के लिए अपने गुरु के द्वारा ही शिष्य को सूचनाएँ मिल सकती हैं। ७५. अपने गुरु की इच्छा के शरण हो जाओ। उनको आत्मसमर्पण करो । तभी आपका उद्धार होगा । गुरु ही ईश्वर ७६. ईश्वर ही गुरु के रूप में दिखते हैं । ७७. सच्चे गुरु एवं सच्चे साधक बहुत कम होते हैं । ७८. योग्य शिष्यों को यशस्वी गुरु प्राप्त होते हैं । ७९. ईश्वर की कृपा गुरु का रूप लेती है । ८०. गुरु अपने शिष्य को अपने जैसा बनाते हैं, वे पारस से भी महान हैं । ८१. संसारसागर को पार करने के लिए गुरु जैसी कोई नौका नहीं है ! ८२. 'हे राम ! तुम्हारे तन, मन, धन, अपने सद्गुरु के चरणों में समर्पित कर दो, जिन्होंने तुम्हें परम सुख या मोक्ष का मार्ग दिखाया है । ८३. अपने गुरु या आचार्य के समक्ष हररोज अपने दोष कबूल करें, तभी आप इस दुन्यावी निर्बलताओं से ऊपर उठ सकेंगे। ८४. गुरु दृष्टि, स्पर्श, विचार या शब्द के द्वारा शिष्य का परिवर्तन कर सकते हैं । ८५. गुरु और ईश्वर सचमुच एकरूप हैं। ८६. गुरु इस दुनिया में ईश्वर के सच्चे प्रतिनिधि हैं ८७. गुरु आपके लिए 'इलेक्ट्रीक लिफ्ट' हैं। वे आपको 6
८२
गुरुभक्तियोग
पूर्णता के शिखर पर पहुँचाएँगे ।
८८. गुरु के प्रति निःस्वार्थ एवं भक्तिभावपूर्वक सेवा यह
पूजा, भक्ति, प्रार्थना और ध्यान है ।
८९. 'हे राम ! जिससे आत्म-साक्षात्कार को गति
मिलती है, जिससे चेतना की जागति होती है, उसे गुरुदीक्षा
कहते हैं।'
९०. यदि आप गुरु में ईश्वर को नहीं देख सकते तो
फिर और किसमें देख सकेंगे ?
९१. 'जब तुम मेरे समक्ष निखालिस होकर अपना हृदय
खोलोगे तभी मैं तुम्हें सहाय कर सकूँगा ।'
९२. आपके मित्रों, आदर्शों तथा गुरु या आध्यात्मिक
आचार्य के प्रति वफादार एवं सन्निष्ठ रहें ।
प्रकरण : ६
गुरुभक्ति का अभ्यास
अनुकूल होने का सिदान्त
१. अनुकूल होने का विरल गुण बहुत कम लोगों में होता
है, और वह एक उत्तम गुण है । उसके द्वारा शिष्य अपना
कैसा भी स्वभाव हो फिर भी वह अपने गुरु के प्रति अनुकूल
बनता है।
२. आजकल प्रायः सभी साधक अपने गुरुभाइयों को
अनुकूल होना नहीं जानते ।
३. शिष्य को अपने गुरु के अनुकूल होना और उनसे
हिलमिल जाना चाहिए ।
८३
गुरुभक्तियोग
४. गुरुभक्ति जगाने के लिए नम्रता और आज्ञापालन
के गुण जरूरी हैं।
५. शिष्य जब एक ही गुरु के सान्निध्य में रहते हुए अपने
गुरुभाइयों के साथ अनुकूल होना नहीं जानता तब घर्षण
होता है और वह अपने गुरु को नाराज करता है ।
६. जहाज का कप्तान सदैव सावधान रहता है ।
मच्छीमार भी सदैव सावधान रहता है । ऑपरेशन थीएटर
में सर्जन सदैव सावधान रहता है। इसी प्रकार भूखे-प्यासे
शिष्य को भी गुरुसेवा में सदैव सावधान रहना चाहिए ।
शिष्यत्व के मूल तत्व
७. अति नींद करनेवाला, जड़, स्थूलकाय, निष्क्रिय,
आलसी एवं मूर्ख मन का शिष्य गुरु संतुष्ट हों इस प्रकार
उनकी सेवा नहीं कर सकता ।
८. जिस शिष्य में उपदेश के आचरण का गुण होता
है वह अपने गुरु की सेवा में सफल होता है । आबादी एवं
अमरत्व उसको आ मिलते हैं।
९. गुरु की सेवा करने की उत्कण्ठा एवं लगन शिष्य
में होनी चाहिए ।
१०. गुरु के प्रति भक्तिभाव तमाम योग्य मानवमहेच्छाओं
का एकमात्र ध्येय है।
११. शिष्य जब गुरु के पास रहकर अभ्यास करता हो
तब उसके कान श्रवण के लिए तत्पर होने चाहिए। वह जब
गुरु की सेवा करता हो तब उसकी दृष्टि सावधान होनी
चाहिए ।
१२. शिष्य को अपने गुरु, माँ-बाप, बुझुर्ग, सब.योगी
८२
गुरुभक्तियोग
पूर्णता के शिखर पर पहुँचाएँगे ।
८८. गुरु के प्रति निःस्वार्थ एवं भक्तिभावपूर्वक सेवा यह
पूजा, भक्ति, प्रार्थना और ध्यान है ।
८९. 'हे राम ! जिससे आत्म-साक्षात्कार को गति
मिलती है, जिससे चेतना की जागति होती है, उसे गुरुदीक्षा
कहते हैं ।
९०. यदि आप गुरु में ईश्वर को नहीं देख सकते तो
फिर और किसमें देख सकेंगे ?
९१. 'जब तुम मेरे समक्ष निखालिस होकर अपना हृदय
खोलोगे तभी मैं तुम्हें सहाय कर सकूँगा ।'
९२. आपके मित्रों, आदर्शों तथा गुरु या आध्यात्मिक
आचार्य के प्रति वफादार एवं सन्निष्ठ रहें ।
प्रकरण : ६
गुरुभक्ति का अभ्यास
अनुकूल होने का सिदान्त
१. अनुकूल होने का विरल गुण बहुत कम लोगों में होता
है, और वह एक उत्तम गुण है । उसके द्वारा शिष्य अपना
कैसा भी स्वभाव हो फिर भी वह अपने गुरु के प्रति अनुकूल
बनता है।
२. आजकल प्रायः सभी साधक अपने गुरुभाइयों को
अनुकूल होना नहीं जानते ।
३. शिष्य को अपने गुरु के अनुकूल होना और उनसे
हिलमिल जाना चाहिए ।
।
गुरुभक्तियोग
८३
४. गुरुभक्ति जगाने के लिए नम्रता और आज्ञापालन
के गुण जरूरी हैं।
५. शिष्य जब एक ही गुरु के सान्निध्य में रहते हुए अपने
गुरुभाइयों के साथ अनुकूल होना नहीं जानता तब घर्षण
होता है और वह अपने गुरु को नाराज करता है ।
६. जहाज का कप्तान सदैव सावधान रहता है ।
मच्छीमार भी सदैव सावधान रहता है। ऑपरेशन थीएटर
में सर्जन सदैव सावधान रहता है। इसी प्रकार भूखे-प्यासे
शिष्य को भी गुरुसेवा में सदैव सावधान रहना चाहिए ।
शिष्यत्व के मूल तत्व
७. अति नींद करनेवाला, जड़, स्थूलकाय, निष्क्रिय,
आलसी एवं मूर्ख मन का शिष्य गुरु संतुष्ट हों इस प्रकार
उनकी सेवा नहीं कर सकता ।
८. जिस शिष्य में उपदेश के आचरण का गुण होता
है वह अपने गुरु की सेवा में सफल होता है । आबादी एवं
अमरत्व उसको आ मिलते हैं ।
९. गुरु की सेवा करने की उत्कण्ठा एवं लगन शिष्य
में होनी चाहिए ।
१०. गुरु के प्रति भक्तिभाव तमाम योग्य मानवमहेच्छाओं
का एकमात्र ध्येय है ।
११. शिष्य जब गुरु के पास रहकर अभ्यास करता हो
तब उसके कान श्रवण के लिए तत्पर होने चाहिए। वह जब
गुरु की सेवा करता हो तब उसकी दृष्टि सावधान होनी
चाहिए ।
१२. शिष्य को अपने गुरु, माँ-बाप, बुझुर्ग, सब योगी
८४
गुरुभक्तियोग
एवं संतों के साथ अच्छी तरह बरताव करना चाहिए ।
१३. अच्छी तरह बरताव करना माने अपने गुरु के प्रति
अच्छा आचरण करना ।
१४. गुरु शिष्य के आचरण पर से उसका स्वभाव तथा
उसके मन की पद्धति जान सकते हैं ।
१५. अपने पवित्र गुरु के प्रति अच्छा आचरण परम सुख
के धाम का पासपोर्ट है।
१६. शिष्य जब गुरु की सेवा करता हो तब उसे तरंगी
नहीं बनना चाहिए ।
१७. आचरण अपने गुरु की सेवा करके प्राप्त किये हुए
व्यवहारु ज्ञान की अभिव्यक्ति है।
१८. दैवी एवं उत्तम गुण दुकान से खरीद करने की
चीजें नहीं हैं। वे गुण तो लम्बे समय तक की हुई गुरुसेवा,
श्रद्धा एवं भक्तिभाव द्वारा ही प्राप्त किये जा सकते हैं।
गुरु को आत्मसमर्पण
१९. ज्ञानार्जन के बाद गुरु को राजी-खुशी से, शीघ्र,
बिना झिझक से एवं बहुत राशि में गुरुदक्षिणा दो ।
२०. गुरुदक्षिणा से असंख्य पापों का नाश होता है ।
२१. गुरु को दी हुई दक्षिणा हृदयशुद्धि करनेवाली महान
वस्तु है।
२२. जो दक्षिणा गुरु को दी जाती है वह व्यवहारु प्रेम
का प्रतीक है।
२३. तमाम गुरुभाइयों के कल्याण के लिए उदार भावना
विकसित करो।
२४. दान का प्रारम्भ अपने गुरु से ही होता है ।
८५
गुरुभक्तियोग
२५. गुरु को दक्षिणा देने की आदत डालनी चाहिए ।
२६. शिष्य के पास जो कुछ हो वह गुरु को सप्रेम भेंट
चढ़ा देना चाहिए ।
२७. गुरु के द्वारा चाहे जैसा भोजन, कपड़े एवं निवास
प्राप्त हो उससे शिष्य को सन्तोष मानना चाहिए। अपने सच्चे
मन एवं हृदय से गुरु की सेवा में तत्पर रहना चाहिए ।
२८. गुरु की सेवा के दौरान कैसी भी परिस्थितियों में
साधक को मिलनेवाला संतोष सदा आनन्द और शक्ति देता
है।
२९. जो कुछ घटना घटित हो, उसमें सदा संतोष
रखना चाहिए । सदैव याद रखो : उच्चात्मा गुरु को जो
अच्छा लगता है वह आपकी पसन्दगी की अपेक्षा अधिक
होता है।
३०. संतोष जैसे परम गुण से युक्त शिष्य पर ही गुरु
की कृपा उतरती है।
३१. गुरु की सेवा के दौरान शिष्य को अपनी साधारण
बुद्धि का उपयोग करना चाहिए ।
विवेक के घटक
३२. उच्चात्मा गुरु की कृपा के द्वारा शिष्य के हृदय
में विवेकबुद्धि का उदय होता है ।
३३. जिसको नैसर्गिक विवेकबुद्धि प्राप्त हुई है उसे
अवश्य गुरुकृपा मिलती है ।
३४. किसी भी चीज की स्पृहा के बिना अपने गुरु के
प्रति फर्ज अदा करो ।
३५. शिष्य का कर्तव्य गुरु के आदेशों का वफादारी-
८६ गुरुभक्तियोग पूर्वक एवं अविलम्ब पालन करना है । ३६. गुरु के प्रति अपने छोटे छोटे कर्त्तव्य निभाने में भी सतर्क रहो । आपको बहुत आनन्द एवं शान्ति की प्राप्ति होगी। ३७. गुरु की सेवा में दासत्व जैसी कोई चीज नहीं है। ३८. गुरु की सेवा माने गुरु को आत्म-समर्पण । ३९. सब प्रकार की सेवा पवित्र एवं उत्तम है । ४०. गुरु के प्रति अपना कर्त्तव्य अदा करना माने सत्य धर्म का आचरण करना । ४१. अपने गुरु के प्रति अदा की हुई सेवा नैतिक फर्ज है, आध्यात्मिक टॉनिक है। उससे मन एवं हृदय दैवी गुणों से भरपूर बनते हैं, पुष्ट बनते हैं । सम्पूर्ण शरणागति ४२. तत्पर एवं सन्निष्ठ शिष्य अपने आचार्य की सेवा में अपने सम्पूर्ण मन एवं हृदय को लगा देता है। ४३. तत्पर शिष्य किसी भी परिस्थिति में अपने गुरु की सेवा करने का साधन खोज लेता है । ४४. अपने गुरु की सेवा करते हुए जो साधक सब आपत्तियों को सह लेता है वह अपने प्राकृत स्वभाव को जीत सकता है। ४५. शान्ति का मार्ग दिखानेवाले गुरु के प्रति शिष्य को सदैव कृतज्ञ रहना चाहिए । ४६. कृतघ्न बेवफा शिष्य इस दुनिया में हीनभाग एवं दुःखी है। उसका भाग्य दयनीय, शोचनीय एवं अफसोस- - जनक है।
गुरुभक्तियोग
८७
गुरु की प्रतिष्ठा
४७. पवित्र वेदों के रहस्योद्घाटक, आदि एवं पूर्ण
ब्रह्मरूप महान गुरु को मैं नमस्कार करता हूँ, जो ज्ञानविज्ञान
रूप वेदों के सार को भ्रमर की तरह चूसकर अपने भक्तों
को देते हैं।
४८. सच्चे शिष्य को अपने हृदय के कोने में अपने
सम्माननीय गुरु के चरणकमलों की प्रतिष्ठा करना चाहिए ।
४९. शिष्य जब अपने गुरु से मिले तब उसका सबसे
प्रथम फर्ज है खूब नम्र भाव से अपने गुरु को प्रणाम
करना ।
५०. भागवत में अवधूत की एक कथा आती है जिनको
चौबीस उपगुरु थे, जैसेकि पंचमहाभूत, सूर्य, चन्द्र, समुद्र,
प्राणी आदि । ये नगण्य होते हुए भी अपने अपने ढंग से
उनको सर्वोच्च ज्ञान दिया था ।
५१. अन्य किसीका विचार किये बिना, एकाग्र मन
से केवल अपने गुरु की ही पूजा करता है वह श्रेष्ठ शिष्य
-
म
५२. जब साधक में सत्त्व की वृद्धि होती है तब वह
सदाचारी बनता है और उसमें गुरु के प्रति भक्तिभाव
विकसित होता है।
५३. गुरु समदृष्टि के प्रतीक हैं अतः वे अपने तमाम
शिष्यों के प्रति समभाव रखते हैं ।
५४. श्रीकृष्ण उद्धवजी से कहते हैं : ''मैं पुरोहितों में
वशिष्ठ हूँ, गुरुओं में बृहस्पति हूँ, साधुओं में मैं नारायण हूँ
एवं ब्रह्मचारियों में सनत्कुमार हूँ।"
८८
गुरुभक्तियोग
५५. शिष्य जब अपने गुरु की सेवा करता हो तब उसे
दूसरों की सेवा कभी लेना नहीं चाहिए । आध्यात्मिक विकास
में उसके लिए यह एक महान अवरोध है ।
५६. दूसरों को गुरुभाई बनाकर अपने गुरु का यश
बढ़ाओ । गुरुभक्ति विकसित करने का यह राजमार्ग है ।
विन्दत्ता से नमता बढ़कर है
५७. आप महान विद्वान एवं धनवान हों फिर भी
गुरु एवं महात्माओं के समक्ष आपको बहुत ही नम्र होना
चाहिए ।
५८. शिष्य अधिक विद्वान न हो लेकिन वह मूर्तिमंत
नम्रता का स्वरूप हो तो उसके गुरु को उस पर अत्यन्त
प्रेम होता है।
५९. अगर आपको नल से पानी पीना हो तो आपको
स्वयं नीचे झुकना पड़ेगा । इसी प्रकार अगर आपको गुरु
के पवित्र मुख से बहते हुए अमरत्व के पावन अमृत का पान
करना हो तो आपको विनम्रता के प्रतीक बनना पड़ेगा ।
६०. जो मनुष्य वफादार एवं बिल्कुल नम्र बनते हैं उनके
ऊपर ही गुरु ही कृपा उतरती है ।
६१. गुरु के चरणकमलों की पूजा के लिए नम्रता के
पुष्प के अलावा और कोई श्रेष्ठ पुष्प नहीं है ।
श्रन्दा का अर्थ
६२. श्रद्धा माने गुरु में विश्वास ।
६३. श्रद्धा माने अपने पवित्र आचार्य एवं महात्माओं
के कथन, वाणी, कार्यों, लेखन एवं उपदेशों में विश्वास ।
गुरुभक्तियोग
८९
६४. आचार्य प्रमाण के रूप में जो कहें उसमें अन्य
कोई प्रमाण या साबितियों की परवाह किये बिना दृढ़ विश्वास
रखना उसका नाम है श्रद्धा ।
६५. गुरु में सम्पूर्ण श्रद्धा रखें और अपने आपको पूर्णतः
गुरु के शरण में ले जाएँ। वे आपकी निगरानी करेंगे। इससे
सब भय, अवरोध एवं कष्ट पूर्णतः नष्ट होंगे ।
६६. सद्गुरु में दृढ़ श्रद्धा आत्मा की उन्नति करती है,
हृदय को शुद्ध करती है एवं आत्म-साक्षात्कार की ओर ले
जाती है।
६७. गुरु के उपदेश में सम्पूर्ण श्रद्धा रखना यह शिष्यों
का सिद्धांत होना चाहिए ।
आज्ञापालन का प्रकार
६८. आज्ञापालन माने गुरु एवं बुझुर्गों के आदेशों को
पालने की इच्छा ।
६९. जो शिष्य अपने गुरु की आज्ञा मानता है वही
अपनी स्थूल प्रकृति पर नियंत्रण पा सकता है ।
७०. नम्रता, भक्तिभाव, निरहंकारीपना आदि सब दिव्य
गुण गुरु की आज्ञा का पालन करने से ही प्रकट होते
मान
७१. गुरु के आदेशों में शंका नहीं करना या उनके पालन
आलस्य नहीं करना यही गुरु के प्रति सच्ची आज्ञाकारिता
है।
७२. गुरु की आज्ञा का पालन सब कार्यों में सफलता
की जननी है।
७३. गुरु जो आज्ञा करें वह काम करना और मना
गुरुजिये कारना यही प्रति सच्ची आई शेष्य गुरु के भय के कार- प्रेम के खाने शुद्ध प्रेम से गुरु है। का प्रचन पाठ है गुरु में की एक नदो है जो ईश्वर के चरम और गुरु के आज्ञापालन के मार्ग श्य के हृदय में संतोष न हो तो यह छ- गुरु के प्रति आज्ञापालन का भाव पू. बनें भाव एवं तत्परता होगी तो गुरु सा- - होंगे, भेंट के प्रकारों से नहीं । का को अत्यन्त तत्परतापूर्वक एवं ध्यानप में सेवा करना चाहिए । साध्यात्मिक नीति मने आपको आचार्य की - ना को खूब तत्परता श्रद्धा का सक्रिय स्व. सम्पूर्ण आत्मसमर्पण क सुसेवा के नित्यक्रम अपने आचार्य की दान समेत रहो । .
९१
गुरुभक्तियोग
८४. आचार्य एवं हरएक संत का आदर करना यह नम्रता
का चिह्न है।
८५. आचार्य एवं आदरणीय व्यक्तियों की उपस्थिति में
ऊँची आवाज से बोलो नहीं ।
८६. गुरु के वचनों में विश्वास रखना यह अमरत्व के
द्वार खोलने के लिए गुरुचाबी है ।
८७. जब आप किसी महान गुरु के शिष्य हों तब अन्य
किसीको आप अपने शिष्य बनाओ नहीं एवं खुद गुरु बनने
का प्रयास करो नहीं । उनको अपने गुरुभाई मानो ।
८८. गुरु करना और बाद में उनको धोखा देकर उनका
त्याग कर देना इसकी अपेक्षा गुरु नहीं करना और भवाटवी
में भटकना बेहतर है।
८९. जो मनुष्य विषयवासना का दास है वह गुरु की
सेवा नहीं कर सकता, गुरु को आत्मसमर्पण नहीं कर
सकता । फलतः वह संसार के कीचड़ से अपने आपको
बचा नहीं सकता।
मिलन की शक्ति
९०. गुरु से धोखा करना यह अपनी ही कब्र खोदने
का साधन है।
९१. गुरु और शिष्य के बीच जो शक्ति जोड़ने का काम
करती है वह शुद्ध प्रेम होना चाहिए ।
९२. गुरु का कृपा-प्रसाद और शिष्य की कोशिश
मिलती है तब अमरत्व रूपी बालक का जन्म होता है ।
९३. शिष्य को ज्ञान दिये बिना ही गुरु को उसके पास
से गरुदक्षिणा नहीं लेना चाहिए ।
९० गुरुभक्तियोग करें वह काम न करना यही गुरु के प्रति सच्ची आज्ञाकारिता है। ७४. दंभी शिष्य गुरु की आज्ञा भय के कारण मानता है । सच्चा शिष्य प्रेम के खातिर शुद्ध प्रेम से गुरु की आज्ञा का पालन करता है। ७५. शिष्य का प्रथम पाठ है गुरु के प्रति आज्ञाकारिता । ७६. भलाई की एक नदी है जो ईश्वर के चरणकमलों में से निकलती है और गुरु के आज्ञापालन के मार्ग से बहती है। ७७. यदि शिष्य के हृदय में संतोष न हो तो यह बताता है कि शिष्य में गुरु के प्रति आज्ञापालन का भाव पूरा नहीं है। ७८. आपमें भाव एवं तत्परता होगी तो गुरु आपकी भेंट से प्रसन्न होंगे, भेंट के प्रकारों से नहीं । ७९. शिष्य को अत्यन्त तत्परतापूर्वक एवं ध्यानपूर्वक अपने गुरु की सेवा करना चाहिए । आध्यात्मिक नीति-रीति ८०. अपने आपको आचार्य की सेवा में सौंप दो । तन, मन एवं आत्मा को खूब तत्परता से अर्पण कर दो । ८१. गुरुश्रद्धा का सक्रिय स्वरूप माने गुरु के चरण- कमलों में सम्पूर्ण आत्मसमर्पण करना । ८२. गुरुसेवा के नित्यक्रम में खूब नियमित रहो । ८३. अपने आचार्य की दैनिक निजी सेवा में घड़ी के समान नियमित रहो । .
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गुरुभक्तियोग
९१
८४. आचार्य एवं हरएक संत का आदर करना यह नम्रता
का चिह्न है ।
८५. आचार्य एवं आदरणीय व्यक्तियों की उपस्थिति में
ऊँची आवाज से बोलो नहीं ।
८६. गुरु के वचनों में विश्वास रखना यह अमरत्व के
द्वार खोलने के लिए गुरुचाबी है ।
८७. जब आप किसी महान गुरु के शिष्य हों तब अन्य
किसीको आप अपने शिष्य बनाओ नहीं एवं खुद गुरु बनने
का प्रयास करो नहीं । उनको अपने गुरुभाई मानो ।
८८. गुरु करना और बाद में उनको धोखा देकर उनका
त्याग कर देना इसकी अपेक्षा गुरु नहीं करना और भवाटवी
में भटकना बेहतर है।
८९. जो मनुष्य विषयवासना का दास है वह गुरु की
सेवा नहीं कर सकता, गुरु को आत्मसमर्पण नहीं कर
सकता । फलतः वह संसार के कीचड़ से अपने आपको
बचा नहीं सकता।
मिलन की शक्ति
९०. गुरु से धोखा करना यह अपनी ही कब्र खोदने
का साधन है।
९१. गुरु और शिष्य के बीच जो शक्ति जोड़ने का काम
करती है वह शुद्ध प्रेम होना चाहिए ।
९२. गुरु का कृपा-प्रसाद और शिष्य की कोशिश
मिलती है तब अमरत्व रूपी बालक का जन्म होता है ।
९३. शिष्य को ज्ञान दिये बिना ही गुरु को उसके पास
से गुरुदक्षिणा नहीं लेना चाहिए ।
९० गुरुभक्तियोग करें वह काम न करना यही गुरु के प्रति सच्ची आज्ञाकारिता है का प्रथम पाठ - ७४. दंभी शिष्य गुरु की आज्ञा भय के कारण मानता है। सच्चा शिष्य प्रेम के खातिर शुद्ध प्रेम से गुरु की आज्ञा का पालन करता है। ७५. शिष्य है गुरु के प्रति आज्ञाकारिता । ७६. भलाई की एक नदी है जो ईश्वर के चरणकमलों में से निकलती है और गुरु के आज्ञापालन के मार्ग से बहती है। ७७. यदि शिष्य के हृदय में संतोष न हो तो यह बताता है कि शिष्य में गुरु के प्रति आज्ञापालन का भाव पूरा नहीं है। ७८. आपमें भाव एवं तत्परता होगी तो गुरु आपकी भेंट से प्रसन्न होंगे, भेंट के प्रकारों से नहीं । ७९. शिष्य को अत्यन्त तत्परतापूर्वक एवं ध्यानपूर्वक अपने गुरु की सेवा करना चाहिए । आध्यात्मिक नीति-रीति ८०. अपने आपको आचार्य की सेवा में सौंप दो । तन, मन एवं आत्मा को खूब तत्परता से अर्पण कर दो । ८१. गुरुश्रद्धा का सक्रिय स्वरूप माने गुरु के चरण- कमलों में सम्पूर्ण आत्मसमर्पण करना । ८२. गुरुसेवा के नित्यक्रम में खूब नियमित रहो । ८३. अपने आचार्य की दैनिक निजी सेवा में घड़ी के समान नियमित रहो ।
गुरुभक्तियोग
९१
८४. आचार्य एवं हरएक संत का आदर करना यह नम्रता
का चिह है।
८५. आचार्य एवं आदरणीय व्यक्तियों की उपस्थिति में
ऊँची आवाज से बोलो नहीं ।
८६. गुरु के वचनों में विश्वास रखना यह अमरत्व के
द्वार खोलने के लिए गुरुचावी है ।
८७. जब आप किसी महान गुरु के शिष्य हों तब अन्य
किसीको आप अपने शिष्य बनाओ नहीं एवं खुद गुरु बनने
का प्रयास करो नहीं । उनको अपने गुरुभाई मानो ।
८८. गुरु करना और बाद में उनको धोखा देकर उनका
त्याग कर देना इसकी अपेक्षा गुरु नहीं करना और भवाटवी
में भटकना बेहतर है।
८९. जो मनुष्य विषयवासना का दास है वह गुरु की
सेवा नहीं कर सकता, गुरु को आत्मसमर्पण नहीं कर
सकता । फलतः वह संसार के कीचड़ से अपने आपको
बचा नहीं सकता।
मिलन की शक्ति
९०. गुरु से धोखा करना यह अपनी ही कान खोदने
का साधन है।
९१. गुरु और शिष्य के बीच जो शक्ति जोडने का काम
करती है वह शुद्ध प्रेम होना चाहिए ।
९२. गुरु का कृपा-प्रसाद और शिष्य की कोशिश
मिलती है तब अमरत्व रूपी वालक का जन्म होता है ।
९३. शिष्य को ज्ञान दिये बिना ही गुरु को उसके पास
गुरुदक्षिणा नहीं लेना चाहिए ।
से
९२
गुरुभक्तियोग
९४. शिष्य को अपने समग्र जीवन के दौरान गुरु के
यश की पताका लहराना चाहिए ।
९५. गुरु के चरणकमल में आत्मसमर्पण करना यह
शिष्य का आदर्श होना चाहिए ।
९६. गुरु महान हैं। विपत्तियों से डरना नहीं । हे वीर
शिष्यों ! आगे बढ़ो ।
९७. गुरुकृपा अणुशक्ति से अधिक शक्तिशाली है।
९८. शिष्य के ऊपर जो आपत्तियाँ आती हैं वे छुपे
वेश में गुरु के आशीर्वाद के समान होती हैं ।
९९. गुरु के चरणकमलों में आत्मसमर्पण करना यह
सच्चे शिष्य का जीवनमंत्र होना चाहिए ।
गुरु की सेवा
१००. साक्षात् प्रेम एवं आनन्दस्वरूप अपने गुरु की
सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त हो जाय तो सेवा में असीम
आनन्द एवं परम सुख मिलेगा ।
१०१. नम्रतापूर्वक, स्वेच्छापूर्वक, संशयरहित होकर,
बाह्य आडम्बर के बिना, द्वेष रहित बनकर, असीम प्रेम से
अपने गुरु की सेवा करें ।
१०२. पृथ्वी पर के साक्षात् ईश्वर स्वरूप गुरु के
चरणकमलों में आत्मसमर्पण करेंगे तो वे भयस्थानों से
आपका रक्षण करेंगे, आपकी साधना में आपको प्रेरणा देंगे
तथा अन्तिम ध्येय तक आपके पथप्रदर्शक बनेंगे ।
१०३. गुरु की कृपा अखूट, असीम और अवर्णनीय
है।
१०४. गुरु का उच्छिष्ट प्रसाद लेने से असाध्य रोग
गुरुभक्तियोग
९३
मिटते हैं।
१०५. गुरु पर श्रद्धा एक ऐसी चीज है जो प्राप्त करने
के बाद और कुछ प्राप्त करना शेष नहीं रहता ।
१०६. इस श्रद्धा के द्वारा निमेष मात्र में आप परम पदार्थ
पा लेंगे।
१०७. गुरु के वचन एवं कर्म में श्रद्धा रखो, श्रद्धा रखो,
श्रद्धा रखो । यही गुरुभक्ति विकसित करने का मार्ग है ।
प्रकरण : ७
साधक के सच्चे पथप्रदर्शक
शिष्यत्व के मूल सिदान्त
१. साधक अगर श्रद्धा एवं भक्तिभाव से अपने गुरु की
सेवा नहीं करेगा तो उसके तमाम व्रत, तप कच्चे घड़े में
से पानी की तरह टपककर बह जाएँगे ।
२. मन एवं इन्द्रियों का संयम, गुरुभगवान का ध्यान,
गुरु की सेवा में धैर्य, सहनशक्ति, आचार्य के प्रति भक्तिभाव,
संतोष, दया, स्वच्छता, सत्यवादीता, सरलता, गुरु की
आज्ञा का पालन... ये सब अच्छे शिष्य के लक्षण हैं ।
३. सत्य के साधक को मन एवं इन्द्रियों पर संयम
रखकर अपने आचार्य के घर रहना चाहिए और खूब श्रद्धा
एवं आदरपूर्वक गुरु की निगरानी में शास्त्रों का अभ्यास करना
चाहिए ।
४. उसे चुस्तता से ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए
और आचार्य की पूजा करना चाहिए ।
९४
गुरुभाक्तयाग
५. शिष्य को चाहिए कि वह आचार्य को साक्षात् ईश्वर
के रूप में माने, मनुष्य के रूप में कदापि नहीं ।
६. शिष्य को आचार्य के दोष नहीं देखना चाहिए क्योंकि
वे तमाम देवों के प्रतिनिधि हैं ।
७. शिष्य को गुरु के लिए भिक्षा माँगकर लाना चाहिए
एवं खूब श्रद्धा तथा भक्तिभावपूर्वक उन्हें भोजन कराना
चाहिए ।
८. शिष्य को सब सुखवैभव का विष की तरह त्याग
कर देना चाहिए और अपना शरीर गुरु की सेवा में सौंप
देना चाहिए।
९. शास्त्रों का अभ्यास पूरा करके शिष्य को चाहिए कि
वह गुरु को दक्षिणा दे और उनकी आज्ञा लेकर अपने घर
वापस लौटे।
१०. जो गुरुपद का उपयोग आजीविका के साधन के
रूप में करता है वह धर्म का नाश करनेवाला है।
११. ब्रह्मचारी का मुख्य कर्त्तव्य पूरे हृदय से अपने
आचार्य की सेवा करना है ।
१२. गुरु की कृपा प्राप्त करने के लिए उनकी निजी सेवा
और उनकी आज्ञा का पालन जितना सहायरूप है उतना
सहायरूप तप, यात्रा, भेंट, दान आदि नहीं है।
१३. वेद, प्रत्यक्ष ज्ञान, गुरुवचन और अनुमान ये चार
ज्ञान के प्रमाण हैं।
१४. हरएक कर्म में दुःख के बीज समाविष्ट हैं किन्तु
गुरु की सेवा के विषय में ऐसा नहीं है ।
के आदेशों का पालन करने के लिए शिष्य
१५. गुरु
गुरुभक्तियोग
९५
को कभी भी धन, भोगविलास, सुखवैभव और अपने शरीर
का भी त्याग करने के लिए तैयार रहना चाहिए |
।
गुरु सम्बन्धी धर्म
१६. जो तन, मन और धन को गुरु के चरणों में अर्पण
कर देता है वह गुरुभक्ति का विकास कर लेता है।
१७. जिससे गुरुचरणों के प्रति भक्तिभाव बढ़े वह परम
धर्म है।
१८. नियम माने गुरुमंत्र का जप, गुरुसेवा के दौरान
तपश्चर्या, गुरुवचन में श्रद्धा, आचार्य-सेवन, संतोष,
पवित्रता, शास्त्र का अध्ययन और गुरुभक्ति अथवा गुरु का
शरण ।
१९. तितिक्षा माने गुरु के आदेशों का पालन करते हुए
दुःख सहन करना ।
२०. त्याग माने गुरु का निषेध हो ऐसे कर्मों का त्याग
करना ।
२१. जो अपने गुरु की आज्ञा का पालन नहीं करता
तथा गुरु की सेवा नहीं करता वह मूर्ख है ।
२२. भगवान श्रीकृष्ण उद्धवजी से कहते हैं : ''दुष्प्राप्य
मनुष्यदेह मजबूत नौका जैसी है। गुरु उस नौका के कर्णधार
हैं । वे नौका को संभालते हैं। उस नौका को चलानेवाला
मैं (कृष्ण) अनुकूल पवन हूँ।'' जो मनुष्य ऐसी नौका और
ऐसे साधन से भवसागर पार करने का प्रयत्न नहीं करता
वह सचमुच आत्मघातक है ।
२३. मनुष्य अनादि अज्ञान के प्रभाव में होने के
कारण गुरु की सहाय के बिना आत्म-साक्षात्कार नहीं कर
९६
गुरुभक्तियोग
सकता ।
२४. गुरु जो कहते हैं उसमें कुछ गलत हो सकता
है ? उसके लिए कारण होगा ही। मनुष्यबुद्धि वहाँ पहुँच
नहीं पाती ।
२५. गुरु की निजी सेवा सर्वोच्च प्रकार का योग है।
२६. गुरु की निजी सेवा करने से शिष्य अपने मन को
वश में कर सकता है ।
प्रकृति के तीन गुण
२७. क्रोध, लोभ, असत्य, क्रूरता, याचना, दंभ,
झगड़ा, भ्रम, निराशा, शोक, दुःख, निद्रा, भय, आलस्य...
ये सब तमोगुण हैं । जो अनेक जन्मों के बावजूद भी जीते
नहीं जा सकते । किन्तु श्रद्धा एवं भक्ति से गुरु की की हुई
निजी सेवा इन सब दुर्गुणों का नाश करती है।
२८. गुरु के वचन में और ईश्वर में श्रद्धा रखना सत्त्वगुण
है।
२९. गुरु के भोजन के बाद जो खुराक बचा हो वह
बहुत सात्त्विक होता है ।
कामवासना का बिल्कुल त्याग
३०. साधक को विजातीय व्यक्ति का सहवास नहीं
करना चाहिए। जो लोग ऐसे सहवास के शौकीन हों उनका
संग भी नहीं करना चाहिए। क्योंकि उससे मन क्षुब्ध होता
है तब शिष्य भक्तिभाव और श्रद्धापूर्वक अपने गुरु की सेवा
नहीं कर सकता।
३१. शिष्य अगर अपने आचार्य की आज्ञा का पालन
९७
गुरुभक्तियोग
नहीं करता है तो उसकी साधना व्यर्थ है ।
३२. बुद्धिमान साधक को तमाम प्रकार के खराब संग
से दूर रहना चाहिए । उसे संतों एवं गुरु का संग करना
चाहिए । उनके संग से वैराग्य विकसित होता है, तमाम
वासनाएँ दूर होकर मन शुद्ध बनता है ।
३३. जैसे अग्नि के पास बैठने से ठण्ड, भय,
अन्धकार दूर होता है वैसे ही जो शिष्य गुरु के पास रहता
है उसके अज्ञान, मृत्यु का भय तथा सब अनिष्टों का नाश
होता है।
३४. जो इस संसार-सागर में इधर उधर डूबते उतरते
हैं उनके लिए बुद्धिमान गुरु का आश्रय श्रेष्ठ है ।
३५. सूर्य के पास से केवल एक बाह्य दृष्टि ही प्राप्त होती
है किन्तु गुरु के पास से ज्ञान प्राप्त करने के लिए कई प्रकार
की कई दृष्टियाँ प्राप्त होती हैं ।
गुरु माने साक्षात् देवता
३६. गुरु इस पृथ्वी पर साक्षात् ईश्वर हैं, सच्चे मित्र
एवं विश्वासपात्र बन्धु हैं ।
३७. "हे भगवान ! हे भगवान ! मैं आपके आश्रय में
आया हूँ | मुझ पर दया करो । मुझे जन्म-मृत्यु के सागर
से बचाओ।" ऐसा कहकर शिष्य को अपने गुरु को दण्डवत्
प्रणाम करना चाहिए ।
३८. निरपेक्ष भक्तिभावपूर्वक जो गुरु के चरणों की पूजा
करता है उसे सीधी गुरुकृपा प्राप्त होती है ।
३९. आचार्य से प्राप्त की हुई तथा सेवा से तीक्ष्ण बनी
हुई ज्ञानरूप तलवार एवं ध्यान की सहायता से शिष्य मन,
-
7
९८
गुरुभक्तियोग
वचन, प्राण और देह के अहंकार को काट देता है तथा सब
रागद्वेष से मुक्त होकर इस संसार में स्वेच्छापूर्वक विहार
करता है।
४०. तीव्र गुरुभक्ति के शक्तिशाली शस्त्र से मन को दूषित
करनेवाली आसक्ति को मूल सहित काट दिया जाय तब तक
विषयों का संग त्याग देना चाहिए ।
४१. गुरु का आश्रय लेकर जो योग का अभ्यास करता
है वह विविध अवरोधों से पीछे नहीं हटता ।
४२. सच्चे शिष्य को अपने गुरु के पवित्र चरणों में किसी
भी प्रकार की हिचकिचाहट या शर्म के बिना साष्टांग दंडवत्
प्रणाम करना चाहिए । यह उसके सम्पूर्ण आत्मसमर्पण की
निशानी है।
४३. किसी भी फल की आशा से रहित होकर जो गुरुसेवा
और गुरुपूजा में लगा रहता है वह उल्टे मार्ग में नहीं
जाएगा । उसे सेवा-पूजा का प्रकाश अवश्य प्राप्त होगा।
४४. ज्ञान का प्रकाश फैलानेवाली पवित्र गुरुगीता का
जो हररोज अभ्यास करता है वही सचमुच विशुद्ध है । उसे
ही मोक्ष की प्राप्ति होती है ।
४५. जो अपने गुरु के यश में आनन्दित होता है और
दूसरों के समक्ष अपने गुरु के यश का वर्णन करने में आनन्द
का अनुभव करता है उसे सचमुच गुरुकृपा प्राप्त होती है ।
४६. परमात्मा और परब्रह्मस्वरूप गुरु की अज्ञाननाशक
उपस्थिति में आपके सब संशयों का नाश होगा, जैसे सूर्योदय
होते ही ओस की बूंदें नष्ट होती हैं ।
४७. "हे महान, परम सम्माननीय गुरु ! मैं आदरपूर्वक
गुरुभक्तियोग
९९
आपको नमस्कार करता हूँ। मैं आपके चरणकमलों के प्रति
अचूक भक्तिभाव कैसे प्राप्त कर सकूँ और आपके दयालु
चरणों में मेरा मन हमेशा भक्तिभावपूर्वक कैसे सराबोर रहे
यह कृपा करके मुझे कहें ।'' इस प्रकार कहकर खूब
नम्रतापूर्वक एवं आत्मसमर्पण की भावना से शिष्य को चाहिए
कि वह गुरु को दण्डवत् प्रणाम करे और उनके आगे
गिड़गिड़ाए ।
४८. साक्षात् ईश्वर जैसे सर्वोच्च पद प्राप्त किये हुए
गुरु की जय हो ! गुरु का यश गानेवाले धर्मशास्त्रों की जय
हो ! जिसने केवल ऐसे गुरु का ही आश्रय लिया है ऐसे
सच्चे शिष्य की जय हो !
गुरुकृपा से ईश्वर-साक्षात्कार
४९. वादविवाद, बुद्धि, गहन अभ्यास, दान या तप से
ईश्वर-साक्षात्कार नहीं होता । वह तो जिसने गुरुकृपा प्राप्त
की हो उसको ही होता है ।
५०. गुरुकृपा का छोटे से छोटा बिन्दू भी इस संसार
के कष्टों से मनुष्य को मुक्त करने में पर्याप्त है ।
५१. केवल गुरुकृपा के द्वारा ही साधक आध्यात्मिक
मार्ग में लगा रह सकता है एवं तमाम प्रकार के बन्धनों एवं
आसक्तियों को तोड़ सकता है ।
५२. जो शिष्य अहंकार से भरा हुआ है,
के
वचनों को सुनता नहीं है उसका आखिर नाश होता है ।
५३. जिन गुरु को आत्म-साक्षात्कार हुआ है ऐसे गुरु
में और ईश्वर में कोई फर्क नहीं है । दोनों समान हैं और
एकरूप हैं।
जो गुरु
।
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गुरुभक्तियोग
वचन, प्राण और देह के अहंकार को काट देता है तथा सब
रागद्वेष से मुक्त होकर इस संसार में स्वेच्छापूर्वक विहार
करता है।
४०. तीव्र गुरुभक्ति के शक्तिशाली शस्त्र से मन को दूषित
करनेवाली आसक्ति को मूल सहित काट दिया जाय तब तक
विषयों का संग त्याग देना चाहिए ।
४१. गुरु का आश्रय लेकर जो योग का अभ्यास करता
है वह विविध अवरोधों से पीछे नहीं हटता ।
४२. सच्चे शिष्य को अपने गुरु के पवित्र चरणों में किसी
भी प्रकार की हिचकिचाहट या शर्म के बिना साष्टांग दंडवत्
प्रणाम करना चाहिए । यह उसके सम्पूर्ण आत्मसमर्पण की
निशानी है।
४३. किसी भी फल की आशा से रहित होकर जो गुरुसेवा
और गुरुपूजा में लगा रहता है वह उल्टे मार्ग में नहीं
जाएगा । उसे सेवा-पूजा का प्रकाश अवश्य प्राप्त होगा ।
४४. ज्ञान का प्रकाश फैलानेवाली पवित्र गुरुगीता का
जो हररोज अभ्यास करता है वही सचमुच विशुद्ध है। उसे
ही मोक्ष की प्राप्ति होती है ।
४५. जो अपने गुरु के यश में आनन्दित होता है और
दूसरों के समक्ष अपने गुरु के यश का वर्णन करने में आनन्द
का अनुभव करता है उसे सचमुच गुरुकृपा प्राप्त होती है ।
४६. परमात्मा और परब्रह्मस्वरूप गुरु की अज्ञाननाशक
उपस्थिति में आपके सब संशयों का नाश होगा, जैसे सूर्योदय
होते ही ओस की बूंदें नष्ट होती हैं ।
४७. ''हे महान, परम सम्माननीय गुरु ! मैं आदरपूर्वक
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*ALA
गुरुभक्तियोग
आपको नमस्कार करता हूँ। मैं आपके चरणकमलों के
अचूक भक्तिभाव कैसे प्राप्त कर सकूँ और आपये दमा
चरणों में मेरा मन हमेशा भक्तिभावपूर्वक कैसे सारा
यह कृपा करके मुझे कहें ।" इस प्रकार का
नम्रतापूर्वक एवं आत्मसमर्पण की भावना से शिल्लक
कि वह गुरु को दण्डवत् प्रणाम करे और उन
गिड़गिड़ाए।
४८. साक्षात् ईश्वर जैसे सर्वोच्च पद प्रा
गुरु की जय हो ! गुरु का यश गानेवाले धर्मः
हो ! जिसने केवल ऐसे गुरु का ही आश्रय
सच्चे शिष्य की जय हो !
गुरुकृपा से ईश्वर-साक्षात्कार
४९. वादविवाद, बुद्धि, गहन अन्यान, दन्:::
ईश्वर-साक्षात्कार नहीं होता । वह तो जिसने
की हो उसको ही होता है।
५०. गुरुकृपा का छोटे से छंट दिन्छ।
के कष्टों से मनुष्य को मुक्त करने में या
५१. केवल गुरुकृपा के द्वारा ही साधा
मार्ग में लगा रह सकता है एवं तनामा
आसक्तियों को तोड़ सकता है।
५२. जो शिष्य अहंकार से न
वचनों को सुनता नहीं है उसका आदि
५३. जिन गुरु को आत्म-साक्षा
में और ईश्वर में कोई फर्क नहीं है । सो
एकरूप हैं।
।
१००
गुरुभक्तियोग
५४. गुरु के सत्संग की सहाय के बिना नये नये साधक
के कुसंस्कारों में मूलतः परिवर्तन करने की बिल्कुल आशा
नहीं है।
५५. गुरु का सहवास साधक के लिए एक सुरक्षित नौका
है जो उसे अन्धकार के उस पार निर्भयता के किनारे पर
पहुँचाती है।
शास्त्रों में गुरु की प्रशंसा
५६. भागवत, रामायण, महाभारत, योगवाशिष्ठ आदि
में गुरुभक्ति की महिमा सुन्दर ढंग से गायी गई है। हररोज
उन ग्रन्थों का अभ्यास करो | आपको उनमें से प्रेरणा
मिलेगी।
५७. आत्म-साक्षात्कारी गुरु के लिखे हुए ग्रंथ परोक्ष
सत्संग जैसे हैं । आप जब संपूर्ण श्रद्धा और भक्ति से उनका
अध्ययन करते हैं तब आपके पावन गुरु के साथ आपका
पूर्ण सायुज्य होता है।
५८. जो अपने साधनापथ में सच्चे हृदय से प्रयत्न
करता है और जो ईश्वर-साक्षात्कार के लिए तड़पता है ऐसे
योग्य शिष्य पर ही गुरु की कृपा उतरती है ।
५९. आजकल शिष्य लोग ऐश-आरामवाला जीवन
जीते हैं और गुरु की आज्ञा का पालन किये बिना ही उनकी
कृपा की आशा रखते हैं।
६०. गुरु एवं महात्माओं के सत्संग की महिमा विषयक
गुरुनानक, तुलसीदास, शंकराचार्य, व्यास और वाल्मीकि
ने ग्रंथ लिखे हैं।
६१. पुरंदरदास, निश्चलदास, सहजोबाई, मीराबाई,
गुरुभक्तियोग
१०१
ज्ञानेश्वर, एकनाथ आदि ने गुरुकृपा की महिमा गाई है ।
६२. जो लोग नियमित सत्संग करते हैं उनमें ईश्वर
और शास्त्रों में श्रद्धा, गुरु एवं ईश्वर के प्रति प्रेम और भक्ति
का धीरे धीरे विकास होता है ।
६३. गुरु का संग 'माँग और पूर्ति' का प्रश्न है। अगर
सच्चे हृदय की माँग हो तो पूर्ति तुरन्त हो जाएगी । कुदरत
का यह अटल नियम है।
६४. आपको अगर सचमुच ईश्वर-साक्षात्कार की तड़प
होगी तो आपके आध्यात्मिक गुरु को आप अपने घर के
द्वार पर खड़े पाएँगे।
६५. आत्म-साक्षात्कारी महान गुरु का संग प्राप्त करना
मुश्किल है, किन्तु वह संग बहुत ही लाभकारी है। आप
अगर भक्तिभावपूर्वक, इमानदारी से प्रार्थना करेंगे तो वे स्वयं
आपके पास आयेंगे ।
६६. इस दुनिया में उत्तम वस्तुएँ अत्यंत अल्प मात्रा
में होती हैं जैसे कि कस्तूरी, केसर, रेडियम, चन्दन, विद्वान,
सदाचारी पुरुष तथा परोपकारी स्वभाव के लोग बहुत कम
होते हैं। अगर ऐसा ही है तो संतों, भक्तों, योगियों, पयगम्बरों,
दृष्टाओं तथा आत्म-साक्षात्कारी गुरु के विषय में तो कहना
की क्या ?
६७. आप अगर आत्म-साक्षात्कारी गुरु की सेवा करेंगे
तो आपके मोक्ष की समस्या हल हो जाएगी ।
६८. अगर पावनकारी आचार्य की सेवा में जीवन
बिताओगे तो जीवन कृतार्थ हो जाएगा ।
६९. महात्माओं का संग ईश्वरकृपा से ही प्राप्त होता
१०२
गुरुभक्तियोग
है।
७०. गुरु की सेवा करके आशीर्वाद प्राप्त करने की
इच्छुक साधकों को कुसंग से अवश्य दूर रहना चाहिए ।
७१. इस माया का रहस्य कौन जान सकता है ? जो
कुसंग का त्याग करते हैं, जो उदार हृदयवाले गुरु की सेवा
करते हैं, जो अहंभाव से मुक्त हैं और जो ममता रहित हैं
वे इस माया का रहस्य जान सकते हैं ।
७२. रागद्वेष से मुक्त ऐसे गुरु का संग करने से मनुष्य
आसक्ति रहित बनता है। उसे वैराग्य प्राप्त होता है।
७३. उसमें गुरु के चरणकमलों के प्रति भक्ति जागती
है।
७४. जो भक्तिभावपूर्वक गुरु की सेवा करता है वह
जीवन के परम तत्त्व को प्राप्त करता है।
७५. साधक का मन किसी भी प्रकार के प्रयत्न बिना
ही, गुरु की सेवा से अपने आप एकाग्र बनता है ।
७६. गुरु ग्रंथसाहब कहते हैं कि गुरु के बिना ईश्वरप्राप्ति
का मार्ग नहीं मिल सकता । गुरु स्वयं ईश्वर स्वरूप होने
के कारण वे साधक को ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग में ले जाते
हैं । उस मार्ग में वे पथप्रदर्शक बनते हैं । गुरु ही शिष्य को
ऐसा अनुभव करा सकते हैं कि वह स्वयं ही ईश्वर है ।
गुरु का महान प्रेम
७७. दैवी गुणों का विकास करनेवाला महान रहस्य
गुरुभक्ति में निहित है।
७८. जो शिष्य अपने गुरु के चरणकमलों में सम्पूर्ण
आत्म-समर्पण करता है उसे गुरु स्वयं ही सब दैवी गुण प्रदान
गुरुभक्तियोग
१०३
करते हैं।
७९. जो अपने मन पर संयम रखकर ध्यान नहीं कर
सकते उनके लिए तो गुरुभक्ति जगाकर गुरुसेवा करना ही
एक उपाय है।
८०. गुरु शिष्य की मुश्किलियों एवं अवरोधों को जानते
हैं, क्योंकि वे त्रिकालज्ञानी हैं। अतः मन में ही उनकी प्रार्थना
करें । वे आपके अवरोध दूर करेंगे ।
८१. गुरु के दर्शन अन्धकार का सर्वथा नाश करते हैं
और असीम आनन्द देते हैं ।
८२. भगवान आपका कल्याण करें और आप सब
गुरुभक्ति जैसे दुर्लभ दैवी गुण का विकास करो ।
८३. भगवान स्वयं ही आचार्य के रूप में दिखते हैं।
प्रत्यक्ष मानव के स्वरूप में दर्शन देते हैं अथवा ब्रह्मनिष्ठ
महान ज्ञानी के रूप में दर्शन देते हैं।
८४. जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त जीवन का एक मात्र
हेतु महान गुरु की सेवा करना है।
गुरु के साथ तादात्म्य
८५. केवल बुद्धिमान व्यक्ति के रूप में एक व्यक्ति की
कोई सत्ता नहीं है | उसमें वास्तविकता का ज्ञान नहीं
है। किन्तु जब व्यक्ति गुरु के सम्पर्क में आता है तब उसमें
सच्चा ज्ञान, सच्ची शक्ति और सच्चा आनन्द प्रकट होता
है । वे गुरु भी ऐसे हों जिन्होंने परमात्मा के साथ तादात्म्य
स्थापित किया हो ।
८६. शिष्य घास के तिनके से भी अधिक नम्र होना
चाहिए । तभी गुरु की कृपा उस पर उतरेगी ।
१०६
गुरुभक्तियोग
से शिष्य योग्य पथ पर आगे बढ़ने में शक्तिमान होगा ।
आत्म-साक्षात्कार का रहस्य
१०१. जीवन के परमतत्त्व रूपी वास्तविकता के सम्पर्क
का रहस्य गुरुभक्ति है।
१०२. सच्चे शिष्य के लिए तो गुरुवचन माने कानून ।
१०३. गुरु का दास बनना माने ईश्वर का सेवक
बनना।
१०४. जिन्होंने प्रभु को निहारा है और जो योग्य शिष्य
को प्रभु के दर्शन करवाते हैं वे ही सच्चे गुरु हैं ।
१०५. बनावटी गुरु से सावधान रहना । ऐसे गुरु पूरे
के पूरे शास्त्र रट लेते हैं और शिष्यों को उनमें से दृष्टान्त
देते हैं लेकिन वे जो उपदेश देते हैं उसका आचरण वे खुद
नहीं कर सकते ।
१०६. आलसी शिष्य को गुरुकृपा नहीं मिल सकती।
१०७. राजसी
स्वभाव के शिष्य को लोकसंग्रह
करनेवाले गुरु के कार्य समझमें नहीं आते ।
१०८. किसी भी कार्य का प्रारंभ करने से पहले शिष्य
को गुरु की सलाह लेना चाहिए ।
प्रकरण : ८
गुरुभक्ति का विवरण
आध्यात्मिक शिक्षा का अर्थ
१. मुक्तात्मा गुरु की सेवा, उन्होंने लिररे ।
१०७
-
गुरुभक्तियोग
का अभ्यास और उनकी पवित्र मूर्ति का ध्यान, यह गुरुभक्ति
विकसित करने का सुनहरा मार्ग है ।
२. जो शिष्य नाम, कीर्ति, सत्ता, धन और विषयवासना
के पीछे दौड़ता है वह सद्गुरु के चरणकमलों के प्रति सच्चा
भक्तिभाव नहीं रख सकता ।
३. शिक्षा का क्षेत्र बहुत ही विशाल है और ज्ञानप्राप्ति
की संभावनाएँ अपार हैं। अतः गुरु की आवश्यकता अनिवार्य
है।
४. तैत्तीरीय उपनिषद कहती है : "अब, ज्ञान के विषय
में बात करते हैं। आचार्य प्रथम स्वरूप हैं। शिष्य आखिरी
स्वरूप है। ज्ञान इन दोनों के बीच की कड़ी है और उपदेश
वह माध्यम है जो यह समन्वय कराता है । यह ज्ञान का
:
क्षेत्र है।"
५. कठोपनिषद कहती है : जिस आत्मा के विषय में
भिन्न-भिन्न प्रकार से उपदेश दिया जाता है उस आत्मा
विषयक जब निम्न स्तर की बुद्धिवाले व्यक्ति के द्वारा उपदेश
दिया जाता है तब सरलता से समझ में नहीं आता । किन्तु
जब वही आत्मा के विषय में ब्रह्मनिष्ठ गुरु उपदेश देते हैं
तब बिल्कुल सन्देह नहीं रहता, अर्थात् भली प्रकार समझ
में आ जाता है । आत्मा तो सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है। केवल
बौद्धिक कुस्ती से उसे प्राप्त नहीं किया जा सकता । केवल
गुरुकृपा से ही ज्ञान प्राप्त हो सकता है ।
गुरु-शिष्य का सम्बन्ध
६. शिष्य को आचार्य के घर रहना चाहिए, बारह वर्ष
तक सम्पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए तथा कठिन
१०८
गुरुभक्तियोग
तप करना चाहिए | उसे गुरु की सेवा करना चाहिए तथा
उनके मार्गदर्शन में पवित्र शास्त्रों का अध्ययन करना
चाहिए ।
७. जो शिष्य को शिक्षा दे सकें और स्वयं जो शिक्षा
दें उसको अपने आचरण में भी ला सकें वे ही गुरु हो सकते
हैं।
८. मनुष्य को जिस किसीको भी गुरु के रूप में स्वीकार
नहीं कर लेना चाहिए । एक बार गुरु के रूप में स्वीकार
कर लेने के बाद किसी भी परिस्थिति में उनका त्याग नहीं
करना चाहिए।
९. आत्म-साक्षात्कारी गुरु इस जमाने में सचमुच बहुत
दुर्लभ हैं।
१०. सचमुच आध्यात्मिक विकास कर लेनेवाले व्यक्ति
जब तक परमात्मा की आज्ञा नहीं होती तब तक गुरु के
रूप में फर्ज अपने सिर पर नहीं लेते ।
११. जब योग्य साधक आध्यात्मिक पथ की दीक्षा लेने
के लिए. गुरु की खोज में जाता है तब उसके समक्ष ईश्वर
गुरु के स्वरूप में दिखते हैं और उसे दीक्षा देते हैं।
१२. जो मुक्तात्मा गुरु हैं वे एक निराली जाग्रत अवस्था
में रहते हैं जिसे 'तुरीयावस्था' कहा जाता है । जो शिष्य
गुरु के साथ एकता स्थापित करना चाहता हो उसे संसार
की क्षणभंगुर चीजों के प्रति सम्पूर्ण वैराग्य का गुण विकसित
करना चाहिए।
उच्चतर ज्ञान का मूल
१३. जो उच्चतर ज्ञान चित् में से निष्पन्न होता है वह
गुरुभक्तियोग
१०९
विचारों के रूप में नहीं अपितु शक्ति के रूप में होता है।
वह ज्ञान गुरु को शिष्य के प्रति सीधेसीधा संक्रमित
करना पड़ता है। ऐसे गुरु चित्शक्ति के साथ एक रूप होते
हैं।
१४. ईश्वर-साक्षात्कार केवल स्वप्रयत्न से ही नहीं हो
सकता । उसके लिए गुरुकृपा अत्यन्त आवश्यक है ।
१५. शिष्य जब उच्चतर दीक्षा के लिए योग्य बनता है
तब गुरु स्वयं ही उसे योग के रहस्यों की दीक्षा देते हैं ।
१६. गुरुश्रद्धा पर्वतों को हिला सकती है । गुरुकृपा
चमत्कार कर सकती है । हे वीर ! निःसंशय बनकर आगे
बढ़ो ।
१७. परमात्मा के साथ एकरूप बने हुए महान आध्या-
त्मिक पुरुष की जो सेवा करता है वह संसार के कीचड़
को पार कर जाता है ।
१८. अगर आप सांसारिक मनोवृत्तिवाले लोगों की सेवा
करेंगे तो आपको सांसारिक लोगों के गुण मिलेंगे। उससे
विपरीत, जो सदैव परम सुख में निमग्न रहते हैं, जो सर्व
गुणों के धाम हैं, जो साक्षात् प्रेमस्वरूप हैं ऐसे गुरु के
चरणकमलों की सेवा करेंगे तो आपको उनके गुण प्राप्त
होंगे । अतः उनकी सेवा करो... बस, सेवा करो ।
आचरण के सिदान्त
१९. अपने गुरु की सेवा करनेवाले शिष्य को दूसरों
के समक्ष लज्जित नहीं होना चाहिए, संकोच महसूस नहीं
करना चाहिए ।
२०. गुरु ने भोजन न किया हो तब तक आप कभी
११०
गुरुभक्तियोग
भोजन मत करें।
२१. गुरु का उच्छिष्ट प्रसाद (गुरु की थाली में बचा
हुआ प्रसाद) जो ग्रहण करता है वह गुरु के साथ एकत्व
का अनुभव करेगा । गुरुकृपा से वह उनके साथ एकरूप हो
जाएगा।
२२. अनिवार्य परिस्थितियों में भी जब गुरु निद्राधीन
हों या आराम करते हों तब उन्हें जगाना नहीं चाहिए, विघ्न
नहीं डालना चाहिए ।
२३. गुरु के साथ हँसी-मजाक कभी मत करें। अगर
ऐसा करेंगे तो धीरे धीरे उनके प्रति आदर कम होता जाएगा
और आपको लगेगा कि मैं उनके बराबर हो गया हूँ।
२४. बनावटी गुरु से सावधान रहना । उन्होंने अपनी
बरबादी तो की है लेकिन वे आपकी भी बरबादी कर
देंगे।
२५. गुरु होना अच्छी बात है लेकिन गुरु का त्याग
करना बहुत खराब बात है।
२६. गुरु होना अच्छी बात है और गहरी श्रद्धा से उनकी
सेवा करना यह उससे भी अच्छी बात है।
२७. गुरु की आज्ञा का पालन करना ईश्वर की आज्ञा
का पालन करने के बराबर है।
२८. अनेक गुरु करना खराब बात है। गुरु से धोखा
करना और उनकी आज्ञा का उल्लंघन करना बहुत खराब
बात है।
२९. गुरु की सेवा करने के लिए सदैव तत्पर रहो।
३०. गुरु की अथक सेवा करके उनकी कृपा प्राप्त
गुरुभक्तियोग
१११
करो।
३१. जिसने गुरुकृपा प्राप्त की है वही साधना का रहस्य
जानता है।
३२. गुरु होना अच्छी बात है। उनकी आज्ञा का पालन
करना उससे भी अधिक अच्छी बात है और उनके आशीर्वाद
प्राप्त करना श्रेष्ठ है ।
३३. जो अपने गुरु की सेवा करता है वही परम सत्य
के सम्पर्क में आने की कला जानता है।
३४. जो मोह से मुक्त बनता है वह कभी भी गुरु का
द्रोह नहीं करेगा।
३५. गुरु महाराज के जीवित होते हुए जो उनकी गद्दी
पर बैठने की इच्छा करता है उसे सीधा नर्क का पासपोर्ट
मिल जाता है । यमराज भी ऐसे आदमी से डरते रहते हैं
कि शायद वह आदमी मेरी गद्दी भी छीन लेगा ।
३६. गुरुपूर्णिमा के दिन जो अपने गुरु की पादपूजा
करता है उसे सारे वर्ष के दौरान सारे कर्मों में सफलता
मिलती है।
३७. गुरुभाई पर प्रेम रखना यह गुरुदेव के प्रति प्रेम
रखने के बराबर है ।
३८. गुरुभाई को सहाय करना यह गुरुदेव की सेवा
करने के बराबर है।
३९. गुरु की सेवा करना माने आत्मोद्धार करना ।
४०. गुरु की सेवा करना माने माँ-बाप की सेवा
करना।
४१. किसी भी चीज में अन्धश्रद्धा होना यह अच्छी
११२
-
गुरुभक्तियोग
बात नहीं है किन्तु ईश्वर के साथ एकत्व स्थापित किये हुए
गुरु के वचनों में अन्धश्रद्धा रखना यह मोक्ष का राजमार्ग
है।
४२. आप कुछ ही समय में एक महान विद्वान बन सकते
हैं किन्तु आसानी से सच्चे शिष्य नहीं बन सकते ।
योग्य गुरु की खोज
४३. आजकल कई बनावटी गुरु तथा शिष्य दिखाई
देते हैं। आपको गुरु की पसन्दगी करना हो तब ध्यान
रखना ।
४४. शिष्य का कर्तव्य है गुरु के पवित्र मुख से जो
आज्ञाएँ निकलें उनका पालन करना ।
४५. गुरु के निवास एवं आश्रम के आसपास के स्थान
स्वच्छ एवं व्यवस्थित रखो।
४६. गुरु और शिष्य के बीच प्रेमी और प्रेमिका जैसा
सम्बन्ध है।
४७. कभी कभी गुरु अपने शिष्य की कसौटी करें या
उसे प्रलोभन में डालें तो शिष्य को गुरु के प्रति अपनी श्रद्धा
के द्वारा उसका सामना करना चाहिए ।
४८. शिष्य को कोई भी चीज गुरु से छिपाना नहीं
चाहिए | उसे स्पष्टवक्ता और प्रामाणिक बनना चाहिए ।
४९. रागद्वेष से मुक्त गुरु के चरणकमलों की धूलि बनना
यह तो महान सौभाग्य है, दुर्लभ अधिकार है ।
५०. परमात्मा के साथ एकत्व स्थापित किये हुए
आचार्य के पवित्र चरणों की धूलि तो शिष्य के लिए अलौकिक
अलंकार है।
११३
गुरुभक्तियोग
५१. गुरुसेवा का एक भी दिन चूकना नहीं । किसी भी
प्रकार के पंगु बहाने बनाना नहीं ।
५२. जो अपने को गुरुचरण की धूलि मानता है ऐसे
मनुष्य को धन्य है।
५३. जो शिष्य नम्र, सादा, आज्ञाकारी तथा गुरु 5 के
चरणकमलों के प्रति भक्तिभाव रखनेवाला है उस पर गुरुकृपा
उतरती है।
५४. गुरु के कार्य का एक साधन बनो ।
५५. गुरु जब आपकी गलतियाँ बतावें तब अपने कार्य
उचित हैं ऐसा बचाव मत करें, केवल उनका कहा मानें ।
५६. जो गुरु विशेषज्ञ हों उनके मार्गदर्शन में आसन,
प्राणायाम, ध्यान सीखो ।
५७. जिसकी निद्रा तथा आहार आवश्यकता से अधिक
है वह गुरु की रुचि के मुताबिक उनकी सेवा नहीं कर
सकता ।
गुरु के पदचिन्हों पर
५८. जो अधिक वाचाल है और शरीर की टीपटाप
करना चाहता है वह गुरु की इच्छा के अनुसार सेवा नहीं
कर सकता ।
५९. हररोज भाव एवं भक्ति से गुरु के चरणकमलों की
पूजा करो।
६०. अगर अलौकिक भाव से अपने गुरु की सेवा करना
चाहते हो तो स्त्रियों से एवं सांसारिक मनोवृत्तिवाले लोगों
से हिलोमिलो नहीं ।
६१. गुरु के आशीर्वाद का खजाना खोलने के लिए
8
११४
गुरुभक्तियोग
गुरुसेवा गुरुचाबी है।
६२. जहाँ गुरु हैं वहाँ ईश्वर हैं, यह बात सदैव याद
रखो।
६३. जो गुरु की खोज करता है वह ईश्वर की खोज
करता है । जो ईश्वर की खोज करता है उसे गुरु मिलते
हैं।
६४. शिष्य को अपने गुरु के कदम कदम का अनुसरण
करना चाहिए ।
६५. गुरु की पत्नी को अपनी माता समझकर उनको
इस प्रकार मान देना चाहिए ।
६६. अपने गुरु से क्षणभंगुर पार्थिव सुखों की याचना
- मत करना । अमरत्व के लिए याचना करो ।
६७. अपने गुरु से सांसारिक आवश्यकताओं की भीख
नहीं माँगना ।
६८. सच्चे शिष्य के लिए आचार्य के चरणकमल ही
एकमात्र आश्रय है।
६९. जो कोई अपने गुरु की भावपूर्वक, अहर्निश अथक
सेवा करता है उसे काम, क्रोध और लोभ कभी सता नहीं
सकते ।
गुरु के चरणों में
७०. जो दैवी गुरु के चरणों में आश्रय लेता है वह गुरु
की कृपा से आध्यात्मिक मार्ग में आनेवाले तमाम विघ्नों
को पार कर जाएगा ।
७१. योग के लिए श्रेष्ठ एकान्त स्थान गुरु का निवास
स्थान है।
गुरुभक्तियोग
११५
७२. शिष्य के साथ गुरु रहते नहीं हों तो ऐसा एकान्त
सच्चा एकान्त नहीं है। ऐसा ऐकान्त काम और तमस का
आश्रयस्थान बन जाता है।
७३. जिस शिष्य को अपने गुरु के प्रति भक्तिभाव है
उसके लिए तो आदि से अन्त तक गुरुसेवा मीठे शहद जैसी
बन जाती है।
७४. गुरु के पवित्र मुख से बहते हुए अमृत का जो पान
करता है वह मनुष्य धन्य है ।
७५. जो सम्पूर्ण भाव से अपने गुरु की अथक सेवा
करता है उसे दुनियादारी के विचार नहीं आते । इस दुनिया
में वह सबसे अधिक भाग्यवान है ।
७६. बस, अपने गुरु की सेवा करो, सेवा करो, सेवा
करो । गुरुभक्ति विकसित करने का यह राजमार्ग है ।
७७. गुरु माने सच्चिदानन्द परमात्मा ।
गुरु की पूजा
७८. पूज्य आचार्य की सेवा जैसी हितकारी और
आत्मोन्नति करनेवाली और कोई सेवा नहीं है ।
७९. सच्चा आराम दैवी गुरु की सेवा में ही निहित
है । ऐसा दूसरा कोई सच्चा आराम नहीं है ।
८०. गुरुकृपा से जीवन का मर्म समझ में आता है।
८१. किसी भी प्रकार के स्वार्थी हेतु के बिना आचार्य
की पवित्र सेवा जीवन को निश्चित आकार देती है ।
८२. वेदान्त के थोड़े बहुत पुस्तक स्वतंत्र रीति से पढ़
लेने के बाद यों कहना कि 'न गुरुः न शिष्यः' यह सत्य
के खोजी के लिए महान भूल है ।
.
११४
गुरुभक्तियोग
गुरुसेवा गुरुचाबी है।
६२. जहाँ गुरु हैं वहाँ ईश्वर हैं, यह बात सदैव याद
रखो।
६३. जो गुरु की खोज करता है वह ईश्वर की खोज
करता है। जो ईश्वर की खोज करता है उसे गुरु मिलते
हैं।
६४. शिष्य को अपने गुरु के कदम कदम का अनुसरण
करना चाहिए।
६५. गुरु की पत्नी को अपनी माता समझकर उनको
इस प्रकार मान देना चाहिए ।
६६. अपने गुरु से क्षणभंगुर पार्थिव सुखों की याचना
मंत करना । अमरत्व के लिए याचना करो ।
६७. अपने गुरु से सांसारिक आवश्यकताओं की भीख
नहीं माँगना ।
६८. सच्चे शिष्य के लिए आचार्य के चरणकमल ही
एकमात्र आश्रय है।
६९. जो कोई अपने गुरु की भावपूर्वक, अहर्निश अथक
सेवा करता है उसे काम, क्रोध और लोभ कभी सता नहीं
सकते ।
गुरु के चरणों में
७०. जो दैवी गुरु के चरणों में आश्रय लेता है वह गुरु
की कृपा से आध्यात्मिक मार्ग में आनेवाले तमाम विघ्नों
को पार कर जाएगा।
७१. योग के लिए श्रेष्ठ एकान्त स्थान गुरु का निवास
स्थान है।
गुरुभक्तियोग
११५
७२. शिष्य के साथ गुरु रहते नहीं हों तो ऐसा एकान्त
सच्चा एकान्त नहीं है। ऐसा ऐकान्त काम और तमस का
आश्रयस्थान बन जाता है ।
७३. जिस शिष्य को अपने गुरु के प्रति भक्तिभाव है
उसके लिए तो आदि से अन्त तक गुरुसेवा मीठे शहद जैसी
बन जाती है।
७४. गुरु के पवित्र मुख से बहते हुए अमृत का जो पान
करता है वह मनुष्य धन्य है।
७५. जो सम्पूर्ण भाव से अपने गुरु की अथक सेवा
करता है उसे दुनियादारी के विचार नहीं आते। इस दुनिया
में वह सबसे अधिक भाग्यवान है ।
७६. बस, अपने गुरु की सेवा करो, सेवा करो, सेवा
करो । गुरुभक्ति विकसित करने का यह राजमार्ग है ।
७७. गुरु माने सच्चिदानन्द परमात्मा ।
गुरु की पूजा
७८. पूज्य आचार्य की सेवा जैसी हितकारी और
आत्मोन्नति करनेवाली और कोई सेवा नहीं है ।
७९. सच्चा आराम दैवी गुरु की सेवा में ही निहित
है । ऐसा दूसरा कोई सच्चा आराम नहीं है ।
८०. गुरुकृपा से जीवन का मर्म समझ में आता है।
८१. किसी भी प्रकार के स्वार्थी हेतु के बिना आचार्य
की पवित्र सेवा जीवन को निश्चित आकार देती है ।
८२. वेदान्त के थोड़े बहुत पुस्तक स्वतंत्र रीति से पढ़
लेने के बाद यों कहना कि 'न गुरुः न शिष्यः' यह सत्य
के खोजी के लिए महान भूल है ।
११६
गुरुभक्तियोगः
८३. कभी कभी शिष्य के पापों को हर लेने से गुरु
को शारीरिक पीड़ा भुगतनी पड़ती है। वास्तव में गुरु कोई
भी शारीरिक रोग या पीड़ा नहीं भोगते, किन्तु बहुत भक्तिभाव
और तत्परता से गुरु की सेवा करके अपने हृदय को पवित्र
बनाने के लिए शिष्य को प्राप्त एक विरल मौका है।
८४. पुण्यशाली आचार्य का उत्तम विचार शिष्य को
पार्थिवता 'और इन्द्रियविषयक जीवन से ऊपर उठने में
सहायरूप है।
८५. 'उप' माने 'पास' । 'नि' माने 'नीचे' । 'षद'
माने "बैठना' । 'उपनिषद' माने आचार्य के पास नीचे
बैठना । शिष्यों का समूह ब्रह्म के सिद्धान्त का रहस्य जानने
के लिए आचार्य के पास बैठता है ।
रहस्य-विद्या का दान
८६. पवित्र शास्त्रों का गूढ़ रहस्य और प्राचीन सिद्धांतों
का अर्थ केवल पुस्तकें पढ़ने से या पाण्डित्यपूर्ण भाषण सुनने
से समझ में नहीं आता । जो भाग्यशाली शिष्य आजीवन
गुरु के साथ रहकर उनकी सेवा करते हैं और गुरु के प्रति
आदर तथा भक्तिभाव रखते हैं उनको 'तत्त्वमसि, अहं
ब्रह्मास्मि, सर्वं खल्विदं ब्रह्म' आदि उपनिषदों के कथन
अच्छी तरह समझ में आते हैं और उनके अर्थ का साक्षात्कार
होता है।
८७. गुरुकृपा आत्मा का आन्तरदर्शन कराती है।
८८. अनेकबार की बिनती और कठिन कसौटी के बाद
ही सद्गुरु अपने विश्वसनीय शिष्य को उपनिषद की रहस्य
विद्या प्रदान करते हैं।
११७ गुरुभक्तियोग ८९. उपनिषद की परम्परा के मुताबिक आचार्य ब्रह्म- विद्या का रहस्य अपने योग्य पुत्र अथवा तो विश्वसनीय शिष्य को ही दे सकते हैं, और किसीको भी नहीं। फिर वह चाहे कोई भी हो और चारों ओर से पानी से आवृत्त, वैभव से समृद्ध सारी पृथ्वी गुरु को देने के लिए तैयार हो । ९०. पावनकारी गुरु को दण्डवत् प्रणाम करने के बाद उनकी ओर पीठ करके शिष्य को जाना नहीं चाहिए । ९१. आचार्य यदि वेदान्त का सच्चा अर्थ जानते हों और जीवन की विभिन्न अवस्थाओं को वह किस प्रकार लागू किया जा सकता है वह समझते हों तो एक बालक को भी वे वेदान्त सिखा सकते हैं । ९२. जो व्यक्ति पैसे के पीछे दौड़ता है वह गुरु की सम्पत्ति चुराने में भी झिझकता नहीं है । ९३. गुरु की सम्पत्ति के प्रति लोलुप मत बनो । ९४. जो मुक्तात्मा पावनकारी गुरु हैं वे शान्ति और आनन्दस्वरूप हैं। वे समदृष्टिवाले और स्थितप्रज्ञ हैं। उनके लिए मान-अपमान, स्तुति-निन्दा, सुख-दुःख समान है । वे काम, क्रोध, लोभ, मद और मत्सर से मुक्त हैं । उनको रुचि-अरुचि नहीं होती । उन्हें कोई आसक्ति नहीं होती। वे बालक जैसे निर्दोष, फिर भी ज्ञान के भण्डार हैं। वे अपनी उपस्थिति मात्र से या कृपादृष्टि से ही शिष्य के संशय दूर करते हैं। ९५. गरीब और बिमार की सुश्रूषा करना, गुरु और माँ- बाप की सेवा करना, दया के उत्तम कार्य करना, गुरुकृपा से आत्मज्ञान पाना... यह सब सचमुच सर्वश्रेष्ठ पुण्य है।
- है के ११६ गुरु ८३. 11211 बनने से तो मरना व को शारीरि । सन वृत्तियों और 3 भी शारीरिव. : ! IIों को दूर करता । और तत्परता से प्रति भक्तिभाव सब बनाने के लिए ८४. पुण्यः स्वरूप पार्थिवता 'और कर-साक्षात्कार सहायरूप है। की लती है। ८५. 'उप' म और माने "बैठना'। बैठना । शिष्यों का स. के लिए आचार्य के प रहस्य. ८६. पवित्र शास्त्रों क. का अर्थ केवल पुस्तकें पढ़न से समझ में नहीं आता । : गुरु के साथ रहकर उनकी आदर तथा भक्तिभाव रर.. ब्रह्मास्मि, सर्वं खल्विदं ब्र अच्छी तरह समझ में आते है। होता है। ८७. गुरुकृपा आत्मा ८८. अनेकबार की बिनती ही सद्गुरु अपने विश्वसनीय शि तिमा प्रदान करते हैं । 3 4.
गुरुभक्तियोग
१२१
नहीं अपितु गुरुशरणयोग का आश्रय लेने से मिल सकता
है।
१७. गुरुसेवायोग, गुरुशरणयोग आदि गुरुभक्तियोग के
समानार्थी शब्द हैं । वे सब एक ही हैं ।
१८. गुरुभक्तियोग का अभ्यास माने गुरु के प्रति गहरा
पवित्र प्रेम ।
१९. आचार्य के पावनकारी चरणकमलों के प्रति पवित्र
प्रेम धीरे धीरे विकसित करना चाहिए । उसके लिए कोई
ढूंका मार्ग नहीं है।
२०. गुरुभक्तियोग सब विज्ञानों में श्रेष्ठ विज्ञान है ।
२१. सच्चे शिष्य के लिए पावनकारी आचार्य के
चरणकमल ध्यान का मुख्य विषय हैं ।
२२. गुरुभक्तियोग सब योगों का राजा है ।
२३. गुरुभक्ति के अभ्यास से जब मन की बिखरी हुई
शक्ति की किरणें एकत्रित होती हैं तब यह योग चमत्कार कर
देता है।
२४. सब महात्माओं तथा आचार्यों ने गुरुभक्तियोग के
अभ्यास द्वारा महान कार्य किये हैं। जनार्दन स्वामी के शिष्य
एकनाथजी गुरुभक्ति से महान हो गये और उनका शिष्य
पूरणपोड़ा अविद्वान होते हुए गुरु का अपूर्ण ग्रंथ पूर्ण कर
सका । शंकराचार्य के शिष्य तोटकाचार्य ने गुरुभक्ति से
चमत्कार कर दिखाया । एकलव्य और सहजोबाई गुरु-
भक्तियोग के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। और भी असंख्य गुरुभक्तों
ने गुरु के दैवी चिन्तन से, मधुर स्मृति से अथवा गुरु
के
दैवी कार्य में सेवा करके हृदय की ऐसी शीतलता, मन की
१२०
गुरुभक्तियोग
७. गुरु को विघ्नरूप बनने से तो मरना बेहतर है।
८. गुरु पर भक्तिभाव सब हीन वृत्तियों और आवेगों को
दबा देता है तथा सब अवरोधों को दूर करता है ।
९. गुरुभक्तियोग में गुरु के प्रति भक्तिभाव सबसे महान
चीज है।
भक्ति के स्वरूप
१०. गुरु की अचल भक्ति ईश्वर-साक्षात्कार करने के
लिए बहुत असरकारक पद्धति मानी जाती है ।
११. गुरु की महिमा का सतत स्मरण और उनके दिव्य
सन्देश को सर्वत्र फैलाना यह गुरु के प्रति सच्चा भक्तिभाव
है।
१२. आचार्य के पवित्र चरणों की भक्ति फूल है और
उनके आशीर्वाद अमर फल है ।
१३. जीवन का ध्येय है परिणाम में दुःख देनेवाली
कुसंगति का त्याग करना और अमरत्व देनेवाले पवित्र
आचार्य के चरणकमलों की सेवा करना ।
१४. साधक जब इहलोक और परलोक में चिरंतन सुख
देनेवाले गुरुभक्तियोग का आश्रय लेता है तभी उसका सच्चा
जीवन शुरु होता है।
१५. "जन्म-मृत्यु, सुख-दुःख, हर्ष-शोक के अविरत
चक्र से मुक्ति नहीं होगी क्या ? हे शिष्य ! सावधान होकर
सुन । उसके लिए एक निश्चित उपाय है । नाशवंत
इन्द्रियविषयक पदार्थों में से अपना मन हटा ले और इन
द्वन्द्वों से पार ले जानेवाले गुरुभक्तियोग का आश्रय ले।"
१६. सच्चा स्थायी सुख बाहर के नाशवंत पदार्थों से
.
A
गुरुभक्तियोग
१२१
नहीं अपितु गुरुशरणयोग का आश्रय लेने से मिल सकता
है।
१७. गुरुसेवायोग, गुरुशरणयोग आदि गुरुभक्तियोग के
समानार्थी शब्द हैं। वे सब एक ही हैं ।
१८. गुरुभक्तियोग का अभ्यास माने गुरु के प्रति गहरा
पवित्र प्रेम ।
१९. आचार्य के पावनकारी चरणकमलों के प्रति पवित्र
प्रेम धीरे धीरे विकसित करना चाहिए | उसके लिए कोई
ढूंका मार्ग नहीं है।
२०. गुरुभक्तियोग सब विज्ञानों में श्रेष्ठ विज्ञान है ।
२१. सच्चे शिष्य के लिए पावनकारी आचार्य के
चरणकमल ध्यान का मुख्य विषय हैं ।
२२. गुरुभक्तियोग सब योगों का राजा है ।
२३. गुरुभक्ति के अभ्यास से जब मन की बिखरी हुई
शक्ति की किरणें एकत्रित होती हैं तब यह योग चमत्कार कर
देता है।
२४. सब महात्माओं तथा आचार्यों ने गुरुभक्तियोग के
अभ्यास द्वारा महान कार्य किये हैं। जनार्दन स्वामी के शिष्य
एकनाथजी गुरुभक्ति से महान हो गये और उनका शिष्य
पूरणपोड़ा अविद्वान होते हुए गुरु का अपूर्ण ग्रंथ पूर्ण कर
सका । शंकराचार्य के शिष्य तोटकाचार्य ने गुरुभक्ति से
चमत्कार कर दिखाया । एकलव्य और सहजोबाई गुरु-
भक्तियोग के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं । और भी असंख्य गुरुभक्तों
ने
गुरु के दैवी चिन्तन से, मधुर स्मृति से अथवा गुरु के
दैवी कार्य में सेवा करके हृदय की ऐसी शीतलता, मन की
।
१२४
गुरुभक्तियोग
जाओ।
४४. आचार्य की सेवा में डूब जाओ ।
४५. गुरु पर श्रद्धा और उनके ज्ञान के वचनों से सज्ज
बनो ।
आध्यात्मिक मार्ग और जीवन
४६. आध्यात्मिक मार्ग तीक्ष्ण धारवाली तलवार का
मार्ग है। जिनको इस मार्ग का अनुभव है ऐसे गुरु की अनिवार्य
आवश्यकता है।
४७. आपके सब अहंभाव का त्याग करो और गुरु के
चरणकमलों में अपने आपको सौंप दो ।
४८. गुरु आपको मार्ग दिखाएंगे और प्रेरणा देंगे। मार्ग
में आपको स्वयं ही चलना होगा।
४९. जीवन अल्प है। समय जल्दी से सरक रहा
है । ऊठो, जागो, आचार्य के पावन चरणों में पहुँच
जाओ।
५०. जीवन थोड़ा है । मृत्यु कब आयेगी, निश्चित नहीं
है । अतः गंभीरता से गुरुसेवा में लग जाओ ।
५१. हररोज आध्यात्मिक दैनिकी लिखो। उसमें अपनी
प्रगति और निष्फलता की सच्ची नोट लिखो और हर महीने
अपने गुरु के पास भेजो ।
५२. अपने गुरु से ऐसी शिकायत नहीं करना कि
आपके अधिक काम के कारण साधना के लिए समय नहीं
बचता । नींद के तथा गपशप लगाने के समय में कटौती
करो और कम खाओ। तो आपको साधना के लिए काफी
१२५
गुरुभक्तियोग
समय मिलेगा । आचार्य की सेवा ही सर्वोच्च साधना है ।
५३. गुरु की सेवा और गुरु के ही विचारों से दुनिया
विषयक विचारों को दूर रखो ।
५४. अपने आध्यात्मिक आचार्य के आगे अपनी शक्ति
की बड़ाई नहीं करना या प्रमाण नहीं देना । नम्र और सादे
बनो। इससे आध्यात्मिक मार्ग में शीघ्र प्रगति कर सकोगे ।
५५. आचार्य के कार्यों की निन्दा, आलोचना एवं
दोषदर्शन छोड़ देना । उनके प्रत्याघातों से सावधान रहना।
५६. आचार्य की सेवा करते समय चाहे कितने भी दुःख
आ जाएँ, उन्हें सह लेने की तैयारी रखना ।
५७. प्रेम एवं अनुकंपा की साक्षात् मूर्ति रूप अपने गुरु
के समक्ष अपने दोषों को प्रकट करके एकरार करो ।
५८. आपके गुरु आपसे अपेक्षा रखें उससे भी अधिक
सेवा करो ।
५९. गुरु के सिवाय और किसीसे गाढ़ सम्बन्ध मत
रखो । और लोगों से कम हिलोमिलो ।
६०. गुरु का प्रेम, उनकी दयादृष्टि शिष्य की स्थूल
प्रकृति का परिवर्तन करके शुद्धीकरण कर सकती है ।
शिष्य की भावना
६१. गुरु की महिमा को पहचानकर उसका अनुभव करो
और उनका प्रेम-सन्देश मनुष्य जाति में फैलाओ। ऐसा करने
से गुरु की कृपा आप पर उतरेगी ।
६२. आचार्य के प्रति कर्त्तव्यों में से कभी भी विचलित
मत बनो ।
६३. श्रद्धा, विनय एवं भक्तिभावपूर्वक गुरु को खूब
१२६
गुरुभक्तियोग
मूल्यवान भेट देनी चाहिए ।
६४. गुरु को श्रेष्ठ दान दो । गुरु को लापरवाही में दी
हुई भेंट भी शिष्य को वापस नहीं लेना चाहिए ।
६५. गुरु की सेवा करते समय अपने भीतर के हेतुओं
पर निगरानी रखो। किसी भी प्रकार के फल, नाम, कीर्ति,
सत्ता, धन आदि की आशा के बिना ही गुरु की सेवा करनी
चाहिए ।
६६. आप अपने गुरु के साथ व्यवहार करें तब सच्चाई
एवं निष्ठा रखना ।
६७. गुरुभक्तियोग में ईमानदारी के बिना आध्यात्मिक
प्रगति संभव नहीं है।
६८. जिस प्रकार चातक पक्षी केवल वर्षा के पानी की
आशा में ही जीता है उसी प्रकार केवल गुरुकृपा की आशा
से ही शिष्य आध्यात्मिक मार्ग में आगे बढ़ सकता है।
६९. गुरु के प्रति आतिथ्यभावना दिखाना यह सर्वोच्च
यज्ञ है । गुरुसेवा रूपी यज्ञ के पास अश्वमेध और अन्य
महान यज्ञों की भी कोई कीमत नहीं है।
ईश्वर-साक्षात्कार का सबसे सरल मार्ग
७०. गुरुचरण में आश्रय लेकर प्रेरणा पाओ ।
७१. प्रेम यह गुरु के चरणकमलों के साथ शिष्य के
हृदय को बाँधनेवाली सुवर्ण की कड़ी है।
७२. ईश्वर का अनुभव करने के लिए गुरुभक्तियोग
सबसे सरल, सचोट, त्वरित और सलामत मार्ग है। आप
सब गुरुभक्तियोग के अभ्यास से इसी जन्म में ईश्वर-अनुभव
प्राप्त करें।
गुरुभक्तियोग
१२७
७३. गुरु के नाम का शरण लो । सदैव गुरु के नाम
का रटन करो । कलियुग में गुरु की महिमा गाओ और उनका
ध्यान करो । ईश्वर-साक्षात्कार के लिए यह श्रेष्ठ और सरल
मार्ग है।
७४. मोक्ष अथवा सनातन सुख के द्वार खोलने की
गुरुचाबी गुरुभक्ति है।
७५. जीवन मधुर फूल है, जिसमें गुरुभक्ति मीठा शहद
है।
७६. गुरु के चरणों की भक्ति सच्चे शिष्य के लिए
श्वासोच्छ्वास के बराबर है ।
७७. गुरुभक्तियोग के अभ्यास से अमरत्व, सर्वोत्तम
शान्ति और शाश्वत आनन्द प्राप्त होता है ।
७८. गुरु प्रेम और करुणा की मूर्ति हैं। आपको अगर
उनके आशीर्वाद प्राप्त करने हों तो आपको भी प्रेम और
करुणा की मूर्ति बनना चाहिए ।
७९. गुरु के प्रति भक्ति में शिष्य के हृदय में स्वार्थ की
एक बूंद भी नहीं होना चाहिए ।
८०. गुरु के प्रति भक्ति अखूट और स्थायी होनी
चाहिए ।
८१. गुरुसेवा के लिए पूरे हृदय की इच्छा ही गुरुभक्ति
का सार है।
८२. शरीर या चमड़ी का प्रेम वासना कहलाती है,
जबकि गुरु के प्रति प्रेम भक्ति कहलाता है । ऐसा प्रेम प्रेम
के खातिर होता है ।
८३. गुरु के प्रति भक्तिभाव ईश्वर के प्रति भक्तिभाव
१२८
गुरुभक्तियोग
का माध्यम है।
८४. जप, कीर्तन, प्रार्थना, ध्यान, साधुसेवा, अध्ययन
और साधुसमागम के द्वारा अपने हृदयकुंज में शुद्ध गुरुभक्ति
का फूल विकसित करो ।
८५. गुरु की सेवा आपके जीवन का एकमात्र लक्ष्य
और ध्येय होना चाहिए ।
८६. अपने आपकी अपेक्षा गुरु पर अधिक प्रेम रखो ।
विश्वप्रेम का विकास
८७. अपने शत्रुओं पर प्रेम रखो। अपने से निम्न कोटि
के लोगों पर प्रेम रखो । प्राणियों के प्रति प्रेम रखो । अपने
गुरु पर प्रेम रखो । सब साधु-संतों पर प्रेम रखो ।
८८. गुरु की निःस्वार्थ सेवा, महात्माओं का सत्संग,
प्रार्थना और गुरुमंत्र के जप द्वारा धीरे धीरे विश्वप्रेम का
विकास करो।
८९. अन्य लोगों ने जो चीज महाप्रयत्न से सिद्ध की
हो वह चीज आप गुरुकृपा से प्राप्त कर सकते हैं ।
९०. धन्य है विनम्र लोगों को, क्योंकि उन्हें तुरन्त
गुरुकृपा मिल जाती है। जिन्होंने गुरु की शरण ली है ऐसे
पवित्र आत्माओं को धन्यवाद है, क्योंकि उनको परम सुख,
अवश्य प्राप्त होता है ।
९१. गुरुकृपा की प्राप्ति के लिए नम्रता एकमात्र राजमार्ग
है।
९२. आध्यात्मिक आचार्य अथवा सच्चे महापुरुष की
प्रथम कसौटी उनकी नम्रता है । यह उनका मूल सद्गुण
है
--
१२९
गुरुभक्तियोग
गुरु के साथ तादात्म्य
९३. सूई के छेद से ऊँट गुजर सके इससे भी अत्यन्त
अधिक मुश्किल बात है गुरुकृपा के बिना ईश्वरकृपा प्राप्त
करना ।
९४. जैसे पानी को दूध में डाला जाए तो वह दूध में
मिल जाता है और अपना व्यक्तित्व गँवा देता है वैसे सच्चे
शिष्य को चाहिए कि वह अपने आपको सम्पूर्णतः गुरु को
सौंप दे, उनके साथ एकरूप हो जाए ।
९५. जैसे छोटे छोटे झरने एवं नदियाँ महान पवित्र नदी
गंगा से मिल जाने के कारण खुद भी पवित्र होकर पूजे जाते
हैं और अन्तिम लक्ष्य समुद्र को प्राप्त होते हैं | इसी प्रकार
सच्चा शिष्य गुरु के पवित्र चरणों का आश्रय लेकर तथा
गुरु के साथ एकरूप बनकर शाश्वत सुख को प्राप्त होता
है।
९६. बालक बोलना-चलना क्या एक ही दिन में सीखता
है ? बोलना-चलना सीखने के लिए बालक को आवश्यक ऐसे
माँ-बाप के लम्बे सहवास एवं योग्य निगरानी तथा रस की
आवश्यकता नहीं पड़ती क्या ? पड़ती ही है। इसी प्रकार सच्चे
और ईमानदार शिष्य को गुरु के साथ लम्बे समय तक रहना
चाहिए और तन-मन से सब सेवा करना चाहिए। इस पूरे समय
के दौरान सर्वोच्च विद्या सीखने के लिए हृदयपूर्वक ध्यान
देना चाहिए और उसमें रस लेना चाहिए। इस प्रकार उसे
परम ज्ञान प्राप्त होगा, और किसी प्रकार से नहीं ।
9
।
१३०
गुरुभक्तियोग
सब वरदान देनेवाले
९७. कल्पवृक्ष, कामधेनु और चिन्तामणि माँगनेवाले को
उसका मनोवांछित वरदान अवश्य देते ही हैं। इसी प्रकार
गुरु भी माँगनेवाले को इष्ट वस्तु अवश्य देते हैं । अतः सच्चा
शिष्य तो केवल मोक्ष प्राप्त करने के लिए उपनिषद् की
महाविद्या ही माँगता है ।
९८. जिस प्रकार बालक जब धीरे धीरे कदम रखता
है और स्वतंत्र रीति से चलने की कोशिश करता है तब कभी
कभी गिर पड़ता है और खड़ा होता है । माँ की सहायता
की आवश्यकता पड़ने पर उसकी सहायता माँगता है। इसी
प्रकार साधना के प्रारंभ के स्तरों में शिष्य को करुणामय
गुरु की सहायता एवं मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ती
है । अतः उसे वह माँगना चाहिए ।
९९. एक बालक की तरह सच्चे शिष्य को मोक्ष के लिए
तीव्र आकांक्षा होनी चाहिए तथा संभव हो उतनी तमाम
रीतियों से वह आकांक्षा प्रकट करनी चाहिए । तभी उसकी
इच्छा की पूर्ति करने में गुरु उसे सहायभूत हो सकते
हैं । इस आकांक्षा को प्रयत्न कह सकते हैं और गुरु की
करुणामय सहाय को माता की वात्सल्यमय कृपा कह सकते
हैं।
१००. सुन्दर ढंग से निर्मित मूर्ति के लिए दो चीजें
आवश्यक हैं : एक है अखण्ड, कमीरहित अच्छा संगमरमर
का टुकड़ा और दूसरी चीज, कुशल शिल्पी । संगमरमर का
टुकड़ा शिल्पी के हाथ में रहना अनिवार्य है जिससे छीनी
के द्वारा उसे कुरेदकर सुन्दर मूर्ति बनाया जाय । इसी प्रकार
हैं
.
गुरुभक्तियोग
१३१
शिष्य को भी चाहिए कि वह अपने आपको स्वच्छ और शुद्ध
करके बिल्कुल क्षतिरहित संगमरमर के टुकड़े जैसा बनाए
और अपने गुरु के कुशल मार्गदर्शन में रख दे, जिससे गुरु
छीनी से उसे कुरेदकर प्रभु की दिव्य मूर्ति में परिवर्तित कर
सकें।
१०१. जैसे सूर्योदय होते ही तमाम अन्धकार का तुरन्त
नाश होता है वैसे ही गुरुकृपा उतरते ही शिष्य के मन में
आवरण और अविद्या का तुरन्त नाश होता है ।
१०२. जिस प्रकार सूर्य की प्रखर किरणों से जला हुआ
मनुष्य वृक्ष की शीतल छाया में और दिनभर की गर्मी के
बाद शीतल चाँदनी में असीम आनन्द की अनुभूति करता
है उसी प्रकार संसार की प्रखर किरणों से जला हुआ और
शान्ति के लिए व्याकुल बना हुआ मनुष्य ब्रह्मनिष्ठ गुरु के
चरणों में इच्छित शान्ति और आनन्द की अनुभूति करता
है ।
१०३. जिस प्रकार चातक पक्षी लम्बे समय तक
इन्तजार करने के बाद वर्षा के केवल एक ही जलबिन्दू से
अपनी प्यास बुझाता है उसी प्रकार सच्चे शिष्य को अपने
गुरु की सेवा करनी चाहिए और उपदेश-वचन का इन्तजार
करना चाहिए। इससे उसकी तमाम व्यथाएँ शान्त होगी और
वह सदा के लिए मुक्त हो जाएगा ।
१०४. जैसे अग्नि का स्वभाव ही ऐसा है कि उसके
निकट आनेवाली प्रत्येक वस्तु को जलाकर भस्म कर देती
है, वैसे ही जो मनुष्य कृपालु गुरु की प्राप्ति कर लेता है उसके
किसी भी गुण-दोषों को देखे बिना ब्रह्मनिष्ठ गुरु की कृपा
१३२ गुरुभक्तियोग उसके तमाम पापों को जलाकर भस्म कर देती है । आध्यात्मिक प्रवृत्ति की आवश्यकता १०५. जो कोई मनुष्य दुःखों से पार होकर सुख एवं आनन्द प्राप्त करना चाहता हो उसे सच्चे अन्तःकरण से गुरुभक्तियोग का अभ्यास करना चाहिए । १०६. गुरु के पवित्र चरणों के प्रति भक्तिभाव सर्वोत्तम गुण है । इस गुण को तत्परता एवं परिश्रमपूर्वक विकसित किया जाए तो इस संसार के दुःख और अज्ञान के कीचड़ से मुक्त होकर शिष्य अखूट आनन्द और परम सुख के स्वर्ग को प्राप्त करता है। १०७. प्रारंभ में तरंग के रूप में दिखनेवाली विषय- वृत्तियाँ कुसंग के कारण महासागर का रूप धारण कर लेती हैं । अतः कुसंग का त्याग करके आचार्य के जीवनरक्षक चरणों का आश्रय लो । १०८. अगर आप गुरुसेवा में रममाण रहते हैं तो आप चिन्ताओं को जीत सकते हैं। सब चिन्ताओं का यह अचूक मारण है। १०९. उत्तम शिष्य को अपने गुरु पर किसी भी परिस्थिति में सन्देह नहीं लाना चाहिए या उनकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए । ११०. आदरणीय गुरु के पवित्र चरणों में साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करने में लज्जित होना यह गुरुभक्तियोग के अभ्यास में बड़ा अवरोध है । १११. स्वावलम्बन, आत्मन्यायीपन की भावना, मिथ्याभिमान, आत्माभिमान, अपनी बात ही सत्य है ऐसा
गुरुभक्तियोग
१३३
मानना, आलस्य, हठाग्रह, कूथली, कुसंग, बेईमानी,
उद्दण्डता, काम, क्रोध, लोभ और 'मैं' पना... ये चीजें
गुरुभक्तियोग के मार्ग में महान भयस्थान हैं ।
११२. कर्मयोग, भक्तियोग, राजयोग, हठयोग, ज्ञानयोग
आदि सब योगों की नींव गुरुभक्तियोग है । जो शिष्य मानता
है कि मैं सब कुछ जानता हूँ वह 'मैं' पने की भावना के कारण
अपने गुरु से कुछ भी नहीं सीख सकेगा ।
११३. वह खुद सच्चा है ऐसा गुरु के समक्ष दिखाना
यह शिष्य के लिए बहुत ही खतरनाक आदत है ।
११४. आप जब गुरु की सेवा करते हों तब नम्र,
मधुरभाषी, मृदु और विवेकी बनो । इससे गुरु का हृदय जीत
सकोगे । गुरु के समक्ष वाणी या वर्तन में कभी उद्दण्डता
मत दिखाओ।
११५. मोटी बुद्धि का विद्यार्थी गुरुभक्तियोग के अभ्यास
में किसी भी प्रकार की ठोस प्रगति नहीं कर सकता ।
११६. शिष्य को आदरणीय आचार्य के जीवन की
उज्ज्वल बातें ही देखनी चाहिए ।
११७. मन में अगर गुरु के विषय में कुविचार आये तो
स्वयं ही अपने आपको दण्ड दो ।
११८. आपके लिए केवल इतना ही आवश्यक है कि
गुरुभक्तियोग के मार्ग में अन्तःकरणपूर्वक प्रामाणिक प्रयत्न
करना है।
११९. अपना गुरुमंत्र अथवा गुरु का पवित्र नाम हररोज
एक घण्टे तक स्वच्छ नोटबुक में लिखो ।
१२०. चलते हुए, खाते हुए, कार्यालय में काम करते
१३४
गुरुभक्तियोग
हुए भी सदैव अपने गुरुमंत्र का जप करते रहो ।
गुरु का उन्नतिकारक सान्निध्य
१२१. महान गुरु में स्थित चमत्कारिक आध्यात्मिक
शक्ति के द्वारा शिष्य में जो अद्भुत परिवर्तन किया जाता
है उस उपकार के महान ऋण का पूरा वर्णन करने की शक्ति
वाणी में नहीं है।
१२२. 'सद्गुरु साक्षात् ईश्वर हैं' ऐसा जो कहा गया
है वह सत्य ही है। उनकी महानता शब्दातीत है।
१२३. गुरु का सान्निध्य प्रबल आध्यात्मिक स्पन्दनों
के द्वारा शिष्य को ऊँची भूमिका पर ले जाता है और उसे
प्रेरणा देता है । गुरु की महिमा शिष्य की स्थूल प्रकृति का
परिवर्तन करने में निहित है ।
१२४. सद्गुरु के पूज्य चरणों में आश्रय लेना ही सच्चा
जीवन है, जीवन जीने की सही रीति है ।
१२५. गुरु की शरणागति का स्वीकार करना यही
आत्म-साक्षात्कार का मार्ग है ।
१२६. गुरु में अविचल श्रद्धा न हो.तब तक किसीको
भी परम सुख भोगने को नहीं मिलता ।
१२७. हमें अयोग्य लगता हो फिर भी गुरु जो करते
हैं वह योग्य ही है।
१२८. गुरु के उपदेश में अविचल और अविरत श्रद्धा
सच्ची गुरुभक्ति का मूल है ।
१२९. गुरु सदैव अपने शिष्य के हृदय में बसते हैं ।
१३०. कबीरजी कहते हैं : ''गुरु और गोविन्द दोनों
मेरे समक्ष खड़े हैं, तो मैं किसको प्रणाम करूँ ? धन्य हैं
१३५
गुरुभक्तियोग
वे गुरुदेव कि जिन्होंने मुझे गोविन्द के दर्शन करवाये !''
१३१. केवल गुरु ही अपने योग्य शिष्य को दिव्य प्रकाश
दिखा सकते हैं।
१३२. गुरु अपने शिष्य को 'असत्' में से 'सत्' में,
'मृत्यु' में से 'अमरत्व' में , 'अन्धकार' में से 'प्रकाश' में
और 'भौतिक' में से 'आध्यात्मिक' में ले जाते हैं ।
जगहितकारी गुरु
१३३. सच्चे गुरु शिष्य का प्रारब्ध बदल सकते हैं।
१३४. सद्गुरु पयगंबर और देवदूत हैं, विश्व के मित्र
और जगत के लिए कल्याणमय हैं, पीड़ित मानवजाति के
ध्रुवतारक हैं।
१३५. सच्चे गुरु की सेवा करने से काल का शस्त्र बुट्ठा
बन जाता है। गुरु के ज्ञान के पवित्र शब्द शिष्य के हृदय
में प्रवेश करते हैं । गुरुकृपा के बिना बन्धनमुक्ति नहीं है ।
१३६. जो गुरुभक्तिमार्ग से विमुख बना है वह मृत्यु,
अन्धकार और अज्ञान के भँवर में घूमता रहता है ।
१३७. स्त्री एवं पुरुष अपनी आनुवंशिक शक्ति के
मुताबिक मानवता के पथ का अनुसरण करने की कोशिश
कर सकते हैं उनको महान गुरु का उपदेश सूर्य की प्रखर
किरण की तरह जगत के भ्रांति रूपी अन्धकार को विदीर्ण
करके प्रकाशित करता है ।
१३८. गुरुकृपा से ही मनुष्य को जीवन का सच्चा
उद्देश्य समझ में आता है और आत्म-साक्षात्कार करने की
प्रबल आकांक्षा उत्पन्न होती है।
१३९. शिष्य के हृदय के तमाम दुर्गुण रूपी रोग पर
१३६
गुरुभक्तियोग
गुरुकृपा सबसे अधिक असरकारक प्रतिरोधक एवं सार्वत्रिक
औषध है।
१४०. यदि कोई मनुष्य गुरु के साथ अखण्ड और
अविच्छिन्न सम्बन्ध बाँध ले तो जितनी सरलता से एक घट
में से दूसरे घट में पानी बहता है उतनी ही सरलता से
गुरुकृपा बहने लगती है।
१४१. केवल यंत्रवत् दण्डवत् प्रणाम करने से गुरुकृपा
प्राप्त नहीं की जा सकती। वह तो गुरु के उपदेश को जीवन
में उतारने से ही प्राप्त हो सकती है।
१४२. रात्रि को निद्राधीन होने से पहले अन्तर्मुख होकर
शिष्य को निरीक्षण करना चाहिए कि गुरु की आज्ञा का पालन
कितनी मात्रा में किया है।
१४३. हररोज गुरु की सेवा का प्रारंभ करने से पहले
शिष्य को मन में निश्चय करना चाहिए कि पूर्व की अपेक्षा
अब अधिक भक्तिभाव से एवं अधिक आज्ञाकारिता से गुरु
की सेवा करूँगा।
१४४. गुरु में तथा शास्त्रों में थोड़ी बहुत श्रद्धा होती
है वह भी कुसंग से शीघ्र नष्ट हो जाती है ।
नैतिक पूर्णता की आवश्यकता
१४५. जो गुरु के पवित्र चरणों के प्रति सच्चा भक्तिभाव
विकसित करना चाहते हों उन्हें सब प्रकार की खराब आदतों
का त्याग कर देना चाहिए । जैसेकि धूम्रपान करना,
खाना, नास सूंघना, मद्यपान करना, जुआ खेलना, सिनेमा
देखना, अखबार-नोवेल पढ़ना, फेशन करना, मांस खाना,
चोरी करना, दिन में सोना, गाली बोलना, निन्दा-आलोचना
पान
.
गुरुभक्तियोग
१३७
करना आदि ।
१४६ जो गुरुभक्तियोग का अभ्यास करना चाहते हों
उन्हें सब दिव्य गुणों का विकास करना चाहिए ।
जैसेकि सत्य बोलना, न्यायपरायणता, अहिंसा, इच्छाशक्ति,
सहिष्णुता, सहानुभूति, स्वाश्रय, आत्मश्रद्धा, आत्मसंयम,
त्याग, आत्मनिरीक्षण, तत्परता, सहनशक्ति, समता,
निश्चय, विवेक, वैराग्य, संन्यास, हिम्मत, आनन्दी स्वभाव,
हरएक वस्तु में मर्यादा रखना आदि ।
१४७. आनन्द के लिए बाहर क्यों व्यर्थ खोज करते
हो ? सद्गुरु के चरणों के समीप जाओ और शाश्वत सुख
का उपभोग करो।
१४८. सद्गुरु के चरणों में श्रद्धा और भक्तिभाव ये दो
पंख हैं जिनकी सहायता से शिष्य पूर्णता के शिखर पर पहुँचने
में शक्तिमान बनता है ।
प्रकरण : 90
गुरुभक्ति का संविधान
योग्य व्यवहार के नियम
१. गुरु के कार्य की अविचारी आलोचना नहीं करना
चाहिए ।
२. गुरु को अविचारी सलाह नहीं देना चाहिए। हमेशा
चूप रहो ।
३. जाने अनजाने गुरु की भावना को ठेस मत
पहुँचाओ ।
१३८
गुरुभक्तियोग
४. सद्गुरु के चरणकमल की धूलि अमरत्व प्रदान
करनेवाली है।
५. गुरु के पावनकारी चरणों की पवित्र धूलि शिष्य के
लिए सचमुच वरदान स्वरूप है ।
६. आचार्य के पवित्र चरणों की धूलि ललाट पर लगाना
सबसे महान भाग्य की बात है।
७. जीवन का सबसे महान और दुर्लभ सौभाग्य गुरु
के चरणकमल का स्पर्श है।
८. गुरुकृपा और स्त्री का मुख (काम) वे दोनों परस्पर
विरुद्ध चीजें हैं। अगर आपको एक की आवश्यकता हो तो
दूसरी का त्याग करो ।
९. गुरु के पावन चरणों की पवित्र धूलि शिष्य को रिद्धि-
सिद्धि दिलाती है।
१०. सद्गुरु के जीवनदायी चरणों की धूलि पूजने योग्य
है।
११. शिष्य की सबसे महान संपत्ति अपने सद्गुरु के
चरणकमल की पवित्र धूलि है ।
१२. जो व्यक्ति अपने गुरु के चरणकमल की पवित्र धूलि
को अपने ललाट पर लगाता है उसका हृदय शीघ्र पवित्र
बनता है।
१३. गुरु के चरणकमल की धूलि की महिमा अवर्णनीय
है।
१४. इस पृथ्वी पर हमारा जीवन अन्तःकरणपूर्वक
सद्गुरु के प्रति दिनोदिन वर्धमान भक्तिभाव से, अधिक से
अधिक उनकी सेवा करने के लिए उनकी आज्ञा में रहने
है
ET
गुरुभक्तियोग
१३९
के लिए एक उत्तम मौका है ।
१५. गुरुभक्तियोग की नींव गुरु के प्रति अखण्ड श्रद्धा
में निहित है।
१६. शिष्य को समझ में आता है कि हिमालय की
एकान्त गुफा में समाधि लगाने की अपेक्षा गुरु की निजी
सेवा करने से वह उनके ज्यादा संयोग में आ सकता है,
गुरु के साथ अधिक एकता स्थापित कर सकता है ।
१७. गुरु को सम्पूर्ण, बिनशरती आत्म-समर्पण करने
से अचूक गुरुभक्ति प्राप्त होती है।
जीवनजंजाल से परे
१८. जब आप मुश्किलियों एवं मुसीबतों में आ जायें
तब गुरु की कृपा के लिए प्रार्थना करें। अपने सच्चे हृदय
से बार-बार प्रार्थना करें । सब सरल बन जाएगा ।
१९. प्रातःकाल में जगने के तुरन्त बाद और रात्रि के
समय सोने से पहले गुरु का चिन्तन करो । पूर्णतः उनकी
शरण में जाओ ।
२०. सोने से पहले, दिन के दौरान अगर गुरु की सेवा
के बारे में आज्ञापालन में निष्ठा का अभाव या ऐसी कोई
भूल हुई हो तो उसका विचार करो ।
२१. अपनी आवश्यकताएँ कम करो । पैसे बचाओ और
गुरु के चरणकमलों में अर्पण करो। इसमें आपकी गुरुभक्ति
की कसौटी है।
२२. ब्रह्मनिष्ठ गुरु के चरणकमलों के सान्निध्य में जाने
के लिए कला, विज्ञान या विद्वत्ता कुछ भी आवश्यक नहीं
। आवश्यक है केवल उनके प्रति प्रेम और भक्ति से पूर्ण
mi
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गुरुभक्तियोग
अन्तरात्मा को जाग्रत करने में गुरु को बहुत तकलीफ उठानी
पड़ती है।
३२. चौथी कक्षा का शिष्य केले के तने जैसा है। उसके
लिए किये गये कोई भी प्रयास काम नहीं लगते । गुरु कितना
भी करे फिर भी वह ठण्डा और निष्क्रिय रहता है।
३३. ''हे शिष्य ! सुन । तू केले के तने जैसा मत
होना ! तू पैट्रोल जैसा शिष्य बनने का प्रयास करना अथवा
तो कम-से-कम कपूर जैसा तो अवश्य बनना ।
३४. आप जब अपने गुरु के पवित्र चरणों की शरण
में जाएँ तब उनसे दुन्यावी आवश्यकताएँ या और कोई
चीजें माँगना नहीं किन्तु उनकी कृपा ही माँगना जिसके
कारण आपमें उनके प्रति सच्चा भक्तिभाव और स्थायी श्रद्धा
जगे।
३५. गुरु ही मार्ग हैं, जीवन हैं और आखिरी ध्येय
हैं । गुरुकृपा के बिना किसीको भी सर्वोत्तम सुख प्राप्त नहीं
हो सकता ।
३६. गुरु ही मोक्षद्वार हैं । गुरु ही मूर्तिमन्त कृपा हैं ।
३७. जीने के लिए मरो । अपने गुरु के चरणकमलों
में मरो । अहंभाव का त्याग करके मरो जिससे पुनः सच्चा
दिव्य जीवन जी सको । जिस जीवन में गुरुकृपा के प्राणों
की धड़कन नहीं है, जो जीवन गुरुकृपा से दिव्य स्वरूप
को प्राप्त नहीं हुआ है वह सच्चा जीवन नहीं है ।
३८. गुरु और शिष्य के बीच जो वास्तविक सम्बन्ध
उसका वर्णन नहीं हो सकता, वह लिखा नहीं जा सकता,
वह समझाया नहीं जा सकता । सत्य के सच्चे खोजी को
है
१४०
गुरुभक्तियोग
हृदय, जो फल की अपेक्षा से रहित, केवल उनमें ही निरत
रहने के संकल्पवाला होना चाहिए । केवल उनके ही कार्य
में लगा हुआ केवल उनके ही प्रेम में मग्न रहनेवाला होना
चाहिए ।
२३. मानसिक शान्ति और आनन्द गुरु को किये हुए
आत्मसमर्पण का फल है ।
२४. गुरु के प्रति सच्चे भक्तिभाव की कसौटी आन्तरिक
शान्ति और उनके आदेशों का पालन करने की तत्परता में
निहित है।
२५. गुरुसेवा के द्वारा ज्ञान में वृद्धि करो और मुक्ति
पाओ ।
२६. गुरुकृपा से जिनको विवेक और वैराग्य प्राप्त हुए
हैं उनको धन्यवाद है ! वे सर्वोत्तम शान्ति और सनातन
सुख का भोग करेंगे।
२७. शिष्य गुरु को जब तक योग्य गुरुदक्षिणा नहीं देगा
तब तक गुरु के दिये हुए ज्ञान का फल मिलेगा नहीं ।
२८. गुरुभक्तियोग मन का संयम और गुरु की सेवा द्वारा
उसमें होनेवाला परिवर्तन है।
शिष्यों के प्रकार
२९. उत्तम शिष्य पैट्रोल जैसा है। काफी दूर होते हुए
भी गुरु-उपदेश की चिंगारी को तुरन्त पकड़ लेता है ।
३०. दूसरी कक्षा का शिष्य कपूर जैसा है। गुरु के स्पर्श
से उसकी अन्तरात्मा जाग्रत होती है और वह उसमें
आध्यात्मिकता की अग्नि को प्रज्ज्वलित करता है।
३१. तीसरी कक्षा का शिष्य कोयले जैसा है। उसकी
।
-न
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*
गुरुभक्तियोग
अन्तरात्मा को जाग्रत करने में गुरु को बहुत तकलीफ उठानी
पड़ती है।
३२. चौथी कक्षा का शिष्य केले के तने जैसा है। उसके
लिए किये गये कोई भी प्रयास काम नहीं लगते । गुरु कितना
भी करे फिर भी वह ठण्डा और निष्क्रिय रहता है ।
३३. 'हे शिष्य ! सुन । तू केले के तने जैसा मत
होना । तू पैट्रोल जैसा शिष्य बनने का प्रयास करना अथवा
तो कम-से-कम कपूर जैसा तो अवश्य बनना ।
३४. आप जब अपने गुरु के पवित्र चरणों की शरण
में जाएँ तब उनसे दुन्यावी आवश्यकताएँ या और कोई
चीजें माँगना नहीं किन्तु उनकी कृपा ही माँगना जिसके
कारण आपमें उनके प्रति सच्चा भक्तिभाव और स्थायी श्रद्धा
जगे।
३५. गुरु ही मार्ग हैं, जीवन हैं और आखिरी ध्येय
हैं । गुरुकृपा के बिना किसीको भी सर्वोत्तम सुख प्राप्त नहीं
।
हो सकता।
३६. गुरु ही मोक्षद्वार हैं । गुरु ही मूर्तिमन्त कृपा हैं ।
३७. जीने के लिए मरो । अपने गुरु के चरणकमलों
में मरो। अहंभाव का त्याग करके मरो जिससे पुनः सच्चा
दिव्य जीवन जी सको । जिस जीवन में गुरुकृपा के प्राणों
की धड़कन नहीं है, जो जीवन गुरुकृपा से दिव्य स्वरूप
को प्राप्त नहीं हुआ है वह सच्चा जीवन नहीं है ।
३८. गुरु और शिष्य के बीच जो वास्तविक सम्बन्ध
उसका वर्णन नहीं हो सकता, वह लिखा नहीं जा सकता,
वह समझाया नहीं जा सकता । सत्य के सच्चे खोजी को
१४४
गुरुभक्तियोग
५९. संसार या सांसारिक प्रक्रिया के मूल में मन
| बन्धन और मुक्ति, सुख और दुःख का कारण मन
है । इस मन को गुरुभक्तियोग के अभ्यास से ही नियंत्रित
किया जा सकता है ।
६०. सद्गुरु के दिव्य कार्य के वास्ते आत्मसमर्पण
करना अथवा तन, मन, धन अर्पण करना चाहिए । सद्गुरु
की कल्याणकारी कृपा प्राप्त करने के लिए उनके पवित्र चरणों
का ध्यान करना चाहिए । गुरु के पवित्र उपदेश को सुनकर
निष्ठापूर्वक उसके मुताबिक चलना चाहिए ।
६१. उल्लू सूर्यप्रकाश के अस्तित्व में माने या न माने
फिर भी सूर्य तो सदा प्रकाशित रहता है। उसी प्रकार अज्ञानी
और चंचल मनवाला शिष्य माने या न माने फिर भी गुरु
की कल्याणकारी कृपा तो चमत्कारिक परिणाम देती है ।
६२. अपने गुरु को ईश्वर मानकर उनमें विश्वास रखो,
उनका आश्रय लो, ज्ञान की दीक्षा लो ।
६३. केवल शुद्ध भक्ति से ही गुरु प्रसन्न होते हैं ।
गुरुभक्तियोग के अभ्यास से मन की शान्ति और स्थिरता
प्राप्त होती है।
६४. जिसने सद्गुरु के पवित्र चरणों में आश्रय लिया
है ऐसे शिष्य के पास से मृत्यु पलायन हो जाती है ।
६५. गुरुभक्तियोग का अभ्यास सांसारिक पदार्थों के
प्रति वैराग्य और अनासक्ति पैदा करता है और अमरता प्रदान
करता है।
६६. सद्गुरु के जीवनप्रदायक चरणों की भक्ति महापापी
का भी उद्धार कर देती है।
..
गुरुभक्तियोग
१४५
६७. जिसने सद्गुरु के पवित्र चरणों में आश्रय लिया
है ऐसे पवित्र हृदयवाले शिष्य के लिए कोई भी वस्तु अप्राप्य
नहीं है।
६८. साधुत्व और संन्यास से, अन्य योगों से एवं दान
से, मंगल कार्य करने आदि से जो कुछ भी प्राप्त होता है
वह सब गुरुभक्तियोग के अभ्यास से शीघ्र प्राप्त होता है ।
६९. गुरुभक्तियोग शुद्ध विनान है । वह निम्न प्रकृति
को वश में लाने की एवं परम आनन्द प्राप्त करने की रीति
सिखाता है।
७०. गुरुदेव की कल्याणकारी कृपा प्राप्त करने के लिए
आपके अन्तःकरण की गहराई से उनको प्रार्थना करो । ऐसी
प्रार्थना चमत्कार कर सकती है ।
७१. जिस शिष्य को गुरुभक्तियोग का अभ्यास करना
है उसके लिए कुसंग एक महान शत्रु है ।
७२. जो नैतिक पूर्णता, गुरु की भक्ति आदि के बिना
ही गुरुभक्तियोग का अभ्यास करता है उसे गुरुकृपा नहीं मिल
सकती।
से
गुरुभक्ति के लाभ
७३. गुरु में अविचल श्रद्धा शिष्य को कैसी भी मुसीबत
पार होने की गूढ़ शक्ति देती है ।
७४. गुरु में दृढ़ श्रद्धा साधक को अनन्त ईश्वर के साथ
एकरूप बनाती है।
७५. जिस शिष्य को गुरु में श्रद्धा है वह दलील नहीं
करता, विचार नहीं करता, तर्क नहीं करता । वह तो केवल
आज्ञा ही मानता है।
10
१४६
गुरुभक्तियोग
७६. शिष्य जब गुरु में श्रद्धा खो देता है तब उसका
जीवन उजाड़ मरुभूमि जैसा बन जाता है । साधक जब
गुरु में श्रद्धा खो बैठता है तब उसके जीवन का वैभव
नष्ट हो जाता है।
७७. जीवन का पानी गुरु में दृढ़ श्रद्धा है ।
७८. सदैव याद रखो : मनुष्य जब पवित्र गुरु के शब्दों
में श्रद्धा खो देता है तब वह सब कुछ खो बैठता है । अतः
गुरु में पूर्ण श्रद्धा रखो ।
७९. गुरु के चरणकमलों की प्रार्थना शिष्य के हृदय को
प्रफुल्ल बनाती है। उसके मन को शक्ति, शान्ति एवं शुद्धि
से भर देती है।
८०. गुरुदेव के पावन चरणों का भावपूर्वक प्रक्षालन
करके उस चरणोदक को अपने सिर पर छिड़को। यह महान
शुद्धि करनेवाला है।
८१. दिव्य गुरु के पवित्र चरणों की धूलि बनना यह
जीवन का अमूल्य लाभ है ।
८२. आध्यात्मिक गुरु के पवित्र चरणों की प्रार्थना सुबह
की चाबी और शाम का ताला है । अर्थात् सुबह होने से
पहले एवं शाम होने के बाद प्रार्थना करना चाहिए ।
८३. सद्गुरु के चरणों के प्रति श्रद्धा एवं भक्तिभाव रहित
जीवन मरुभूमि में खड़े हुए रसहीन वृक्ष जैसा है !
८४. गुरु के पवित्र चरणों की प्रार्थना शिष्य के हृदय
की गहराई में से निकलनी चाहिए ।
८५. शिष्य के शुद्ध, निखालिस हृदय से निकली हुई
आर्जवपूर्ण प्रार्थना ब्रह्मनिष्ठ गुरु तुरन्त सुनते हैं ।
१४७
गुरुभक्तियोग
८६. दुःख से मुक्ति पाने के लिए नहीं अपितु दुःख
सहन करने की शक्ति एवं तितिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रार्थना
करो ।
८७. सब दोषों से पार होने की शक्ति के लिए सद्गुरु
के चरणकमलों की प्रार्थना करो ।
८८. हर एक अपने ढंग से गुरु की सेवा करना चाहता
है लेकिन गुरु चाहें उस प्रकार गुरु की सेवा करना कोई
नहीं चाहता।
.
८९. शिष्य अपने गुरु की सेवा करना तो चाहता है
पर किसी प्रकार का कष्ट सहना नहीं चाहता ।
सच्चे सुख का मूल
९०. सच्चा सुख सद्गुरु की सेवा में निहित है।
९१. शिष्य गुरुसेवा के द्वारा ही देहाध्यास से छूटकर
ऊँची कक्षा प्राप्त कर सकता है ।
९२. अपने गुरु में, गुरु की महिमा में और गुरु के
नामजप के प्रभाव में सच्ची, पूर्ण, जीवन्त और अविचल
श्रद्धा रखो ।
९३. गुरु की सम्पूर्णतः शरणागति लेना गुरुभक्ति की
अनिवार्य शर्त है।
९४. जब तक आपको गुरु में अखण्ड श्रद्धा न जगे
तब तक गुरु की कृपा आप पर उतरेगी ऐसी आशा मत
करना ।
९५. जो गुरु मुक्तात्मा हैं उनके कार्य को अश्रद्धा से
या सन्देह से नहीं देखना चाहिए ।
९६. ईश्वर, मनुष्य एवं ब्रह्माण्ड के विषय में सच्चा ज्ञान
१४८
गुरुभक्तियोग
गुरु से लिया जाता है।
९७. गुरु साधना रूपी नाव का सुकान हैं लेकिन पतवार
तो साधक को ही चलानी होगी ।
९८. गुरुभक्ति तमाम आध्यात्मिक प्रवृत्तियों का मूल
है।
९९. गुरु के प्रति भक्तिभाव ईश्वरप्राप्ति का सरल एवं
आनन्ददायक मार्ग है।
१००. गुरुभक्ति धर्म का सार है ।
१०१. गुरु के चरणकमलों के प्रति भक्तिभाव जीवन को
सचमुच सार्थक बनाता है।
१०२. गुरुभक्ति का आदि, मध्य और अन्त मधुर एवं
सुखदायक है।
१०३. गुरुप्रेम एवं संसारप्रेम दोनों एक साथ नहीं रह
सकते ।
१०४. गुरु की एवं लक्ष्मी की एक साथ सेवा नहीं हो
सकती।
१०५. गुरुद्रोह ईश्वरद्रोह के बराबर है।
भक्ति का अर्थ
१०६. गुरु पर भक्तिभाव होना आध्यात्मिक निर्माण कार्य
की नींव है।
१०७. भावना की उफान या उत्तेजना गुरुभक्ति नहीं
कहलाती ।
१०८. शरीरप्रेम यानी गुरुप्रेम का इन्कार । शिष्य अगर
अपने शरीर की अधिक देखभाल करता है तो वह गुरु की
सेवा नहीं कर पाता ।
गुरुभक्तियोग १४९ १०९. साधक के दुष्ट स्वभाव का एकमात्र उपाय गुरुसेवा है। ११०. गुरु बिल्कुल हिचकिचाहट से रहित, निःशेष एवं सम्पूर्ण आत्मसमर्पण के सिवाय और कुछ नहीं चाहते । जैसे प्रायः आजकल के शिष्य करते हैं वैसे आत्मसमर्पण केवल शब्दों की बात ही नहीं होना चाहिए । १११. गुरु को जितनी अधिक मात्रा में आत्मसमर्पण करोगे उतनी अधिक गुरुकृपा प्राप्त करोगे । ११२. कितनी मात्रा में गुरुकृपा उतरेगी इसका आधार कितनी मात्रा में आत्मसमर्पण हुआ है इस पर है। ११३. शिष्य का कर्तव्य गुरु के प्रति प्रेम रखने का एवं गुरु की सेवा करने का है। ११४. गुरु की कृपा गुरुभक्तियोग का आखिरी लक्ष्य है। ११५. गुरुभक्तियोग का अभ्यास जीवन के परम लक्ष्य के साक्षात्कार का स्पष्ट एवं सचोट मार्ग प्रस्तुत करता है। ११६. जहाँ गुरुकृपा है वहाँ योग्य व्यवहार है और जहाँ योग्य व्यवहार है वहाँ रिद्धि-सिद्धि और अमरता है। ११७. माया रूपी नागिन के द्वारा डसे हुए लोगों के लिए गुरु का नाम एक शक्तिशाली रामबाण औषधि है । ११८. पवित्रता, भक्तिभाव, प्रकाश एवं ज्ञान के लिए गुरु की प्रार्थना करो। ११९. गुरुसेवा की भावना आपकी रग-रग में, नस- नस में, प्रत्येक हड्डी में एवं शरीर के तमाम कोषों में --
१५०
गुरुभक्तियोग
गहरी उतर जानी चाहिए । गुरुसेवा की भावना को उग्र
बनाओ | उसका बदला अमूल्य है ।
१२०. गुरुभक्तियोग ही सर्वोत्तम योग है।
१२१. कुछ शिष्य गुरु के महान शिष्य होने का
आडम्बर करते हैं लेकिन उनको गुरु वचन में या कार्य में
विश्वास और श्रद्धा नहीं होती ।
१२२. जो अद्वितीय हैं ऐसे सर्वशक्तिमान गुरु की सम्पूर्ण
शरण में जाओ।
१२३. गुरुभक्तियोग आपको इसी जन्म में धीरे-धीरे
दृढ़तापूर्वक, निश्चिततापूर्वक एवं अविचलतापूर्वक ईश्वर के
प्रति ले जाता है।
१२४. अहंभाव के विनाश से गुरुभक्तियोग का प्रारंभ
होता है और शाश्वत सुख की प्राप्ति में परिणत होता है।
१२५. गुरुभक्तियोग जीवन के तमाम दुःख-दर्दो को
निर्मूल करने का मार्ग बताता है ।
१२६. गुरुभक्तियोग का अभ्यास आपको भय, अज्ञान,
निराशावादी स्वभाव, मानसिक अशान्ति, रोग, निराशा,
चिन्ता आदि से मुक्त होने में सहायभूत होता है ।
१२७. गुरुभक्तियोग जीवन के अनिष्टों का एकमात्र उपाय
है।
१२८. गुरुभक्तियोग के अभ्यास से सर्वसुखमय, अवि-
नाशी आत्मा को भीतर ही खोजो ।
१२९. एक अन्धा दूसरे अन्धे का मार्गदर्शन नहीं कर
सकता । एक कैदी दूसरे कैदी को नहीं छुड़ा सकता । इसी
प्रकार जो खुद दुनियादारी के कीचड़ में फँसा हुआ हो वह
गुरुभक्तियोग
१५१
दूसरों की मुक्ति नहीं करा सकता । इसीलिए गुरुभक्तियोग
के अभ्यास के लिए गुरु की अनिवार्य आवश्यकता है ।
१३०. गुरुभक्तियोग को जीवन का एकमात्र हेतु, ध्येय
एवं वास्तविक रस का विषय बनाओ। आप सर्वोच्च सुख
प्राप्त करोगे।
१३१. गुरु के प्रति भक्तिभाव के बिना आध्यात्मिकता
नहीं आ सकती।
१३२. यदि आपको गुरुभक्तियोग का अभ्यास करना
हो तो कामवासनावाला जीवन जीना छोड़ दो ।
१३३. अगर आपको सचमुच ईश्वरप्राप्ति की कामना हो
तो दुन्यावी भोगविलासों से विमुख बनो और गुरुभक्तियोग
का आश्रय लो।
१३४. गुरुकृपा से शिष्य के हृदय में विवेक वैराग्य का
उदय होता है।
१३५. ध्यान के समय शिष्य को सद्गुरु से प्रार्थना
करना चाहिए कि उनके चरणकमलों की भक्ति उत्तरोत्तर
बढ़ती जाय और वह अविचल श्रद्धा प्रदान करे ।
१३६. जो गुरु के नाम का जप करता है उसको केवल
मोक्ष ही नहीं लेकिन सांसारिक समृद्धि, आरोग्यता, दीर्घायु
एवं दिव्य ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है ।
१३७. शिष्य को अपने गुरुदेव का जन्मदिन बड़ी
भव्यता से मनाना चाहिए ।
१५२
गुरुभक्तियोग
गुरु और दीक्षा
योग का अभ्यास गुरु के सान्निध्य में करना चाहिए ।
विशेषतः तंत्रयोग के बारे में यह बात अत्यंत आवश्यक है।
साधक कौन-सी कक्षा का है यह निश्चित करना एवं उसके
लिए योग्य साधना पसन्द करना गुरु का कार्य है।
आजकल साधकों में एक ऐसा खतरनाक एवं गलत
ख्याल प्रवर्तमान है कि वे साधना के प्रारंभ में ही उच्च प्रकार
का योग साधने के लिए काफी योग्यता रखते हैं । प्रायः सब
साधकों का जल्दी पतन होता है इसका यही कारण है ।
इसीसे सिद्ध होता है कि अभी वह योगसाधना के लिए तैयार
नहीं है | सचमुच में योग्यतावाला शिष्य नम्रतापूर्वक गुरु के
पास आता है, गुरु को आत्म-समर्पण करता है,
सेवा करता है और गुरु के सान्निध्य में योग सीखता है ।
गुरु और कोई नहीं हैं अपितु साधक की उन्नति के लिए
विश्व में अवतरित परात्पर जगज्जननी दिव्य माता स्वयं
ही हैं । गुरु को देव मानो, तभी आपको वास्तविक लाभ
होगा । गुरु की अथक सेवा करो । वे स्वयं ही आप पर
दीक्षा के सर्वश्रेष्ठ आशीर्वाद बरसाएँगे ।
गुरु मंत्र प्रदान करते हैं यह दीक्षा कहलाती है। दीक्षा
के द्वारा आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है, पापों का विनाश
होता है । जिस प्रकार एक ज्योति से दूसरी ज्योति
प्रज्ज्वलित होती है उसी प्रकार गुरु मंत्र के रूप में अपनी
दिव्य शक्ति शिष्य में संक्रमित करते हैं। शिष्य उपवास करता
है, ब्रह्मचर्य का पालन करता है और गुरु से मंत्र ग्रहण करता
गुरु की
RA
१५३
--
गुरुभक्तियोग
दीक्षा से रहस्य का पर्दा हट जाता है और शिष्य
वेदशास्त्रों के गूढ रहस्य समझने में शक्तिमान बन जाता
है । सामान्यतः ये रहस्य गूढ़ भाषा में छुपे हुए होते हैं ।
खुद ही अभ्यास करने से वे रहस्य प्रकट नहीं होते । खुद
ही अभ्यास करने से तो मनुष्य अधिक अज्ञान में गर्क होता
है । केवल गुरु ही आपको शास्त्राभ्यास के लिए योग्य दृष्टि
दीक्षा के द्वारा प्रदान करते हैं। गुरु अपनी आत्म-साक्षात्कार
की ज्योति का प्रकाश उन शास्त्रों के सत्य पर डालेंगे और
वे सत्य आपको शीघ्र ही समझ में आ जाएँगे ।
जप के लिए मंत्र
ॐ श्री गुरुभ्यो नमः ।
ॐ श्री सद्गुरु परमात्मने नमः ।
ॐ श्री गुरवे नमः ।
ॐ श्री सच्चिदानन्द गुरवे नमः ।
ॐ श्री गुरु शरणं मम ।
१५४
गुरुभक्तियोग
मंत्रदीक्षा के नियम
गुरु में सम्पूर्ण श्रद्धा तथा विश्वास रखना चाहिए
तथा शिष्य को पूर्णरूपेण उनके प्रति आत्मसमर्पण करना
चाहिए।
दीक्षाकाल में गुरु के द्वारा दिये गये तमाम निर्देशों का
पूर्ण रूप से पालन करना चाहिए। यदि गुरु ने विशेष नियमों
की चर्चा न की हो तो निम्नलिखित सर्व सामान्य नियमों
का पालन करना चाहिए :
१. मंत्रजप से कलियुग में ईश्वर-साक्षात्कार सिद्ध होता
है, इस बात पर विश्वास रखना चाहिए ।
२. मंत्रदीक्षा की क्रिया एक अत्यन्त पवित्र क्रिया है,
उसे मनोरंजन का साधन नहीं मानना चाहिए । अन्य की
देखादेखी दीक्षा ग्रहण करना उचित नहीं | अपने मन को
स्थिर और सुदृढ़ करने के पश्चात् गुरु की शरण में जाना
चाहिए ।
३. मंत्र को ही भगवान समझना चाहिए तथा गुरु में
ईश्वर का प्रत्यक्ष दर्शन करना चाहिए ।
४. मंत्रदीक्षा को सांसारिक सुख-प्राप्ति का माध्यम नहीं
बनाना चाहिए, भगवत्प्राप्ति का माध्यम बनाना चाहिए ।
५. मंत्रदीक्षा के अनन्तर मंत्रजप को छोड़ देना घोर
अपराध है, इससे मंत्र का घोर अपमान होता है तथा साधक
को हानि होने की संभावना भी रहती है ।
६. साधक को आसुरी प्रवृत्तियाँ - काम, क्रोध, लोभ,
मोह, ईर्ष्या, द्वेष आदि का त्याग करके दैवी सम्पत्ति सेवा,
गुरुभक्तियोग
१५५
त्याग, दान, प्रेम, क्षमा, विनम्रता आदि गुणों को धारण करने
का प्रयत्न करते रहना चाहिए ।
७. गृहस्थ को व्यवहार की दृष्टि से अपना कर्त्तव्य
आवश्यक मानकर पूरा करना चाहिए, परन्तु उसे गौण कार्य
समझना चाहिए । समग्र परिवार के जीवन को आध्यात्मिक
बनाने का प्रयत्न करना चाहिए । मन, वचन तथा कर्म से
सत्य, अहिंसा तथा ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए ।
८. प्रति सप्ताह मंत्रदीक्षा ग्रहण किये गये दिन एक वक्त
फलाहार पर रहना चाहिए और वर्ष के अंत में उस दिन
उपवास रखना चाहिए ।
९. भगवान को निराकार-निर्गुण और साकार-सगुण
दोनों स्वरूपों में देखना चाहिए । ईश्वर को अनेक रूपों में
जानकर श्रीराम, श्रीकृष्ण, शंकरजी, गणेशजी, विष्णु
भगवान, दुर्गा, लक्ष्मी इत्यादि किसी भी देवी-देवता में विभेद
नहीं करना चाहिए । सभी के इष्टदेव सर्वव्यापक, सर्वज्ञ सभी
के आत्मा में स्थित तथा सर्वान्तर्यामी हैं, अतः दूसरों के
देवता के प्रति विरोधभाव प्रकट नहीं करना चाहिए । हाँ,
आप अपने इष्टदेव पर अधिक विश्वास रख सकते हो, उसे
अधिक प्रेम कर सकते हो परन्तु उसका प्रभाव दूसरे के इष्ट
पर नहीं पड़ना चाहिए । भगवद्गीता में कहा भी है :
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥
'जो पुरुष सम्पूर्ण भूतों में सबके आत्मरूप मुझ वासुदेव
को ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतों को मुझ वासुदेव
के अन्तर्गत देखता है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता और
१५६
गुरुभक्तियोग
वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता ।' (६. ३०)
इस प्रकार गोस्वामीजी ने भी लिखा है कि :
सिया राम मय सब जग जानी।
करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानी ॥
१०. अपना इष्ट मंत्र गुप्त रखना चाहिए ।
११. पति-पत्नी यदि एक ही गुरु की दीक्षा लें तो यह
अति उत्तम है, परन्तु अनिवार्य नहीं है ।
१२. लिखित मंत्रजप करना चाहिए तथा उसे किसी
पवित्र स्थान में सुरक्षित रखना चाहिए । इससे वातावरण
शुद्ध रहता है।
१३. मंत्रजप के लिए पूजा का एक कमरा अथवा कोई
स्थान अलग रखना संभव हो तो उत्तम है। उस स्थान को
अपवित्र नहीं होने देना चाहिए ।
१४. प्रत्येक समय अपने गुरु तथा इष्टदेव की उपस्थिति
का अनुभव करते रहना चाहिए ।
१५. प्रत्येक दीक्षित दम्पति को एक पत्नीव्रत तथा
पतिव्रता धर्म का पालन करना चाहिए ।
१६. अपने घर के मालिक के रूप में गुरु तथा इष्टदेव
को मानकर स्वयं अपने को उनके प्रतिनिधि के रूप में कार्य
करना चाहिए ।
१७. मंत्र की शक्ति पर विश्वास रखना चाहिए। उससे
सारे विघ्नों का निवारण हो जाता है ।
१८. प्रतिदिन कम से कम ११ माला का जप करना
चाहिए । प्रातः और सन्ध्याकाल को नियमानुसार जप करना
चाहिए ।
गुरुभक्तियोग
१५७
१९. माला फिराते समय तर्जनी, अंगूठे के पास की तथा
कनिष्ठिका (छोटी) उँगली का उपयोग नहीं करना चाहिए ।
माला नाभि के नीचे जाकर लटकती हुई नहीं रखनी
चाहिए। यदि सम्भव हो तो किसी वस्त्र (गौमुखी) में रखकर
माला फिराना चाहिए । सुमेरु के मनके को (मुख्य मनके
को) पार करके माला नहीं फेरना चाहिए । माला फेरते समय
सुमेरू तक पहुँचकर पुनः माला घुमाकर ही दूसरी माला का
प्रारम्भ करना चाहिए ।
२०. अन्त में तो ऐसी स्थिति आ जानी चाहिए कि
निरन्तर उठते-बैठते, खाते-पीते, चलते, काम करते तथा
सोते समय भी जप चलते रहना चाहिए ।
आप सभी को गुरुदेव का अनुग्रह प्राप्त हो, यह हार्दिक
कामना है। आप सभी मंत्रजप के द्वारा अपना ऐच्छिक लक्ष्य
प्राप्त करने में सम्पूर्णतः सफल हों, ईश्वर आपको शान्ति,
आनन्द, समृद्धि तथा आध्यात्मिक प्रगति प्रदान करें ! आप
सदा उन्नति करते रहें और इसी जीवन में भगवत्साक्षात्कार
करें । हरिः ॐ तत्सत् ।
जप के नियम
स्वामी शिवानन्द सरस्वती
१. जहाँ तक सम्भव हो वहाँ तक गुरु द्वारा प्राप्त मंत्र
की अथवा किसी भी मंत्र की अथवा परमात्मा के किसी भी
एक नाम की १ से २०० माला जप करो ।
२. रुद्राक्ष अथवा तुलसी की माला का उपयोग करो ।
३. माला फिराने के लिए दाएँ हाथ के अंगूठे और बिचली
१५६
गुरुभक्तियोग
वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता ।' (६. ३०)
इस प्रकार गोस्वामीजी ने भी लिखा है कि :
सिया राम मय सब जग जानी ।
करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानी ॥
१०. अपना इष्ट मंत्र गुप्त रखना चाहिए ।
११. पति-पत्नी यदि एक ही गुरु की दीक्षा लें तो यह
अति उत्तम है, परन्तु अनिवार्य नहीं है।
१२. लिखित मंत्रजप करना चाहिए तथा उसे किसी
पवित्र स्थान में सुरक्षित रखना चाहिए । इससे वातावरण
शुद्ध रहता है।
१३. मंत्रजप के लिए पूजा का एक कमरा अथवा कोई
स्थान अलग रखना संभव हो तो उत्तम है। उस स्थान को
अपवित्र नहीं होने देना चाहिए ।
१४. प्रत्येक समय अपने गुरु तथा इष्टदेव की उपस्थिति
का अनुभव करते रहना चाहिए ।
१५. प्रत्येक दीक्षित दम्पति को एक पत्नीव्रत तथा
पतिव्रता धर्म का पालन करना चाहिए ।
१६. अपने घर के मालिक के रूप में गुरु तथा इष्टदेव
को मानकर स्वयं अपने को उनके प्रतिनिधि के रूप में कार्य
करना चाहिए ।
१७. मंत्र की शक्ति पर विश्वास रखना चाहिए । उससे
सारे विघ्नों का निवारण हो जाता है।
१८. प्रतिदिन कम से कम ११ माला का जप करना
चाहिए। प्रातः और सन्ध्याकाल को नियमानुसार जप करना
चाहिए ।
१५७
गुरुभक्तियोग
१९. माला फिराते समय तर्जनी, अंगूठे के पास की तथा
कनिष्ठिका (छोटी) उँगली का उपयोग नहीं करना चाहिए ।
माला नाभि के नीचे जाकर लटकती हुई नहीं रखनी
चाहिए । यदि सम्भव हो तो किसी वस्त्र (गौमुखी) में रखकर
माला फिराना चाहिए । सुमेरु के मनके को (मुख्य मनके
को) पार करके माला नहीं फेरना चाहिए । माला फेरते समय
सुमेरू तक पहुँचकर पुनः माला धुमाकर ही दूसरी माला का
प्रारम्भ करना चाहिए ।
२०. अन्त में तो ऐसी स्थिति आ जानी चाहिए कि
निरन्तर उठते-बैठते, खाते-पीते, चलते, काम करते तथा
सोते समय भी जप चलते रहना चाहिए ।
आप सभी को गुरुदेव का अनुग्रह प्राप्त हो, यह हार्दिक
कामना है। आप सभी मंत्रजप के द्वारा अपना ऐच्छिक लक्ष्य
प्राप्त करने में सम्पूर्णतः सफल हों, ईश्वर आपको शान्ति,
आनन्द, समृद्धि तथा आध्यात्मिक प्रगति प्रदान करें ! आप
सदा उन्नति करते रहें और इसी जीवन में भगवत्साक्षात्कार
करें । हरिः ॐ तत्सत् ।
जप के नियम
स्वामी शिवानन्द सरस्वती
१. जहाँ तक सम्भव हो वहाँ तक गुरु द्वारा प्राप्त मंत्र
की अथवा किसी भी मंत्र की अथवा परमात्मा के किसी भी
एक नाम की १ से २०० माला जप करो ।
२. रुद्राक्ष अथवा तुलसी की माला का उपयोग करो।
३. माला फिराने के लिए दाएँ हाथ के अंगूठे और बिचली
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गुरुभक्तियोग
(मध्यमा) या अनामिका उँगली का ही उपयोग करो ।
४. माला नाभि के नीचे नहीं लटकनी चाहिए। मालायुक्त
दायाँ हाथ हृदय के पास अथवा नाक के पास रखो ।
५. माला ढंके रखो, जिससे वह तुम्हें या अन्य के
देखने में न आये । गौमुखी अथवा स्वच्छ वस्त्र का उपयोग
करो ।
६. एक माला का जप पूरा हो, फिर माला को घुम
दो । सुमेरु के मनके को लांघना नहीं चाहिए ।
७. जहाँ तक सम्भव हो वहाँ तक मानसिक जप
करो । यदि मन चंचल हो जाय तो जप जितने जल्दी हे
सके, प्रारम्भ कर दो ।
८. प्रातःकाल जप के लिए बैठने के पूर्व या तो स्नान
कर लो अथवा हाथ-पैर-मुँह धो डालो । मध्यान्ह अथवा
सन्ध्या काल में यह कार्य जरूरी नहीं, परन्तु संभव हो तो
हाथ-पैर अवश्य धो लेना चाहिए | जब कभी समय मिले
जप करते रहो । मुख्यतः प्रातःकाल, मध्याह्न तथा सन्ध्या-
काल और रात्रि में सोने के पहले जप अवश्य करना
चाहिए।
९. जप के साथ या तो अपने आराध्य देव का ध्यान
करो अथवा तो प्राणायाम करो। अपने आराध्य देव का चित्र
अथवा प्रतिमा अपने सम्मुख रखो ।
१०. जब तुम जप कर रहे हो, उस समय मंत्र के अर्थ
पर विचार करते रहो ।
११. मंत्र के प्रत्येक अक्षर का बराबर सच्चे रूप
उच्चारण करो।
गुरुभक्तियोग
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१२. मंत्रजप न तो बहुत जल्दी और न तो बहुत धीरे
करो । जब तुम्हारा मन चंचल बन जाय तब अपने जप की
गति बढ़ा दो।
१३. जप के समय मौन धारण करो और उस समय
अपने सांसारिक कार्यों के साथ सम्बन्ध न रखो ।
१४. पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुँह रखो । जब
तक हो सके तब तक प्रतिदिन एक ही स्थान पर एक ही
समय जप के लिए आसनस्थ होकर बैठो । मन्दिर, नदी
का किनारा अथवा बरगद, पीपल के वृक्ष के नीचे की जगह
जप करने के लिए योग्य स्थान हैं ।
१५. भगवान के पास किसी सांसारिक वस्तु की याचना
न करो ।
१६. जब तुम जप कर रहे हो उस समय ऐसा अनुभव
करो कि भगवान की करुणा से तुम्हारा हृदय निर्मल होता
जा रहा है और चित्त सुदृढ़ बन रहा है ।
१७. अपने गुरुमंत्र को सबके सामने प्रकट न करो ।
१८. जप के समय एक ही आसन पर हिले-डुले बिना
ही स्थिर बैठने का अभ्यास करो ।
१९. जप का नियमित हिसाब रखो । उसकी संख्या
को क्रमशः धीरे धीरे बढ़ाने का प्रयत्न करो ।
२०. मानसिक जप को सदा जारी रखने का प्रयत्न
करो । जब तुम अपना कार्य कर रहे हो, उस समय भी मन
से जप करते रहो ।
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१६० गुरुभक्तियोग मनुष्य के चार विभाग साधारण संसारी मनुष्य दूध जैसा है। वह जब दुष्ट जनों के सम्प में आता है तब उल्टे मार्ग में चला जाता है और फिर कभी वापस नह लौटता । उसी दूध में अगर थोड़ी-सी छाछ डाली जाती है तो वह दूध दहीं बन जाता है । संसारी मनुष्य को गुरु दीक्षा देते हैं । अतः जो स्वर सिद्ध हैं ऐसे गुरु दही जैसे हैं । छाछ डालने के बाद दूध को कुछ समय तक रख दिया जाता है । इस प्रकार दीक्षित शिष्य को एकान्त का आश्रय लेकर दीक्षा का मर्म समझना चाहिए । तभी दूध का दही बनेगा, अर्थात् शिष्य का परिवर्तन होगा और वह ज्ञानी बनेगा। अब दही सरलता से पानी के साथ मिलजुल नहीं जाएगा । अगर दही में पानी डाला जाएगा तो वह तले में बैठ जाएगा। अगर दही को जोर से बिलोया जाएगा तो ही वह पानी के साथ मिश्रित होगा। इसी प्रकार विवेकवाला मनुष्य जब बूरी संगत में आता है तब दुराचारी लोगों के साथ सरलता से मिलता जुलता नहीं है । लेकिन संगत अत्यंत प्रगाढ़ होगी तो वह भी उल्टे मार्ग में जाएगा । जब दही को सूर्योदय से पहले ब्राह्ममुहूर्त में अच्छी तरह बिलोया जाएगा तब उसमें से मक्खन मिलेगा। इसी प्रकार विवेकी साधक ब्राह्ममुहूर्त में ईश्वर का गहन चिन्तन करता है तो उसे आत्मज्ञान रूपी नवनीत प्राप्त होता है । फिर वह आत्म-साक्षात्कारी साधुरूप बन जाता है । इस मक्खन (नवनीत) को अब पानी में डाल सकते हैं । वह पानी में मिश्रित नहीं होगा, पानी में डूबेगा नहीं अपितु तैरता रहेगा। आत्म- साक्षात्कार सिद्ध किये हुए साधु अगर दुर्जनों के सम्पर्क में आयेंगे तो भी उल्टे मार्ग में नहीं जाएंगे। दुन्यावी बातों से अलिप्त रहकर आनन्द से संसार में तैरते रहेंगे। अगर इस नवनीत को पिघलाकर घी बनाया जाय और बाद में उसे पानी में डाला जाय तो वह सारे पानी को अपनी सुवास से सुवासित कर देगा। इस प्रकार साधु को निःस्वार्थ प्रेम की आग से पिघलाया जाय तो वह दैवी चैतना रूप घी बनकर अपने संग से सबको पावन करेगा, सबकी उन्नति करेगा । उसके सम्पर्क में आनेवालों के जीवन में अपने ज्ञान, महिमा एवं दिव्यता का निंचन करेगा । --
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