Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Kharatara Gaccha Pattavali Sangraha
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Kharatara Gachha
PATTAVALI SANGRAHA
Compiled by
SRI JINAVIJAYA
Acharya Shres Jin Dharanandra Suis
SHRI PUJAYAJI MAHARAJ,
BHARUNJIKA -RASTA!
JAIPUR CITY.
Published by
PURAN CHAND XABAR
Calcutta
Ir by a Lla'recha at the Tshsa Vincde Press,
48 Indian M Tor Street, Calcutta,
1932
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कैलकत्ता निवासी बाबू पूरणचन्दजी नाहर, एम्०९० बी० एल्की
वर्मपत्नी श्री इन्द्रामारीजीके ज्ञानपचमी तपके उद्यापनार्थ वितीर्ण
खरतरगच्छ-पट्टावली-संग्रह
सग्राहक
श्री जिनविजयजी
भधिष्ठाता-सिंघी जैन नानपीठ
शान्ति निकेतन
प्रकाशक
बाबू पूरणचन्द नाहर, एम० ए० बी० एल
न०४८, इडियन मिरर स्ट्रीट, कलकत्ता
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. निवेदन आज सरतरगच्छको कई प्राचीन पट्टावलियोंका यह साह पाठकोंक सम्मुख उपस्थित करते हुए हर्प होता है। इस विषयकी सन बातें प्रवीण इतिहासवेत्ता श्री जिनविजयजी महोदयके 'क्रिश्चित् वक्तव्य' से ज्ञात होगी। जैनशासनके इतिहास-सम्बन्धी साधनोंमें पट्टावलीका स्थान उच्च है , अत जैन और जैनेतर इतिहास-प्रेमी सज्जनोंको इन पट्टावलियोंसे विशेष लाभ होगा, इस भावनासे ही इन्हें प्रकाशित किया गया है। यह छोटासा साह पुगतत्त्वज्ञोंके लिए अधिक उपयोगी हो, इसलिए सायमें अकारादि क्रमसे नामोंकी तालिका भोदे दी गई है। आशा है कि भविष्यमें एसे २ जो कुछ साधन मिलेंगे, उन्हें हमारे धमवन्धु प्रकाशित.. फरनेका उद्यम करते रहेंगे। ४८, रतियार स्टाट} -प्रकाशक [ ख ] शाखा-समुदायका अच्छा और प्रामाणिक इतिहास तैयार हो जाय। इस भूतक आवेशानुसार हमने उन सत्र सामग्रियोंका संकलन करना शुरू किया। ऐसा करनेमें हमें कुछ अधिक समय लग गया और अहमदाबादक पुरातत्त्व मंदिरके आचार्यपदके भारने हमारी पूनाकी विशेष स्थितिको अस्थिर बना दिया। इसलिये इस संग्रहके विस्तृत-संकलनका जो विचार हुआ था वह शिथिल होने लगा और चिरकाल तक कुछ कार्य न हो सका। इधर जिस प्रेसमें यह संग्रह छपा उसके मालिकने छपाईके खर्च आदिका तकाज़ा करना शुरू किया। जिस विस्तृतरूपमें इसे प्रकाशित करनेके लिये सोचा था उसमें बहुत कुछ समय और अर्थव्ययकी आवश्यकता थी और शीत्र ही इस कार्यको परिपूर्ण करने जैसे संयोग दिखाई न देनसे हमने अंतमें उस विचारको स्थगित किया और यह संग्रह जो इस रूपमें छप गया था, इसे ही प्रकाशित कर देना उचित समझा। इसी बीचमें वावृवर्य श्री पूरणचंदजी नाहरके अवलोकनमें यह छपा हुआ संग्रह आया और आपने इसे अपने खर्चसे प्रकाशित कर अपनी धर्मपत्नी श्रीमती इंद्रकुमारीजीके ज्ञान पंचमी तपके उद्यापन निमित्त वितोर्ण कर देनेका अभिप्राय प्रकट किया। तदनुसार पूनेसे वह छपा हुआ ग्रंथ-भाग कलकत्ते मंगवा लिया गया और प्रेसका बिल इत्यादि चुकता किया गया। इस संग्रहक्र साथमें हम कुछ दो शब्द लिख दें तो इसे प्रकाशित कर दिया जाय ऐसो बाबूजीको इच्छाको हमने सादर स्वीकार कर हम इस विषयमें कुछ सोचते ही थे कि कुछ ऐसे प्रसंग, एकके बाद एक, उपस्थित होत गये जिससे वर्षों तक हम उनकी उस आनाका पालन नहीं कर सके और २।४ घंटेके कामको २१४ वर्ष तक ठेलते रहना पड़ा। सन् १६२८ के प्रारम्भमें महात्माजीने गुजरात-विद्यापीठको पुनरुघटना की, और विद्यापीठका ध्येच 'विद्या' नहीं 'सेवा' निश्चित किया और साथमें कई प्रतिनाका बन्धन भी लगाया। हमारा उसमें कुछ विशेष मतभेद रहा और हमने अपने विचारोंको स्थिर करनेके लिए कुछ समय तक विद्यापीठके वातावरणसे दूर रहना चाहा। इसीके वाद तुरंत हमाग इगदा युरोप जानेका हुआ। युरोपके सामाजिक और औद्योगिक तंत्रोंका विशेपावलोकन करनेका हमें अधिक मौका मिला और उसमें हमें अत्यधिक रुचि उत्पन्न हुई। हमारा जो आजीवन अभ्यस्त-विपय संशोधनका है, उसमें तो हमें वहां कोई नवीन सीखनेकी बात नहीं दिखाई दो, क्योंकि जिस पद्धति और दृष्टिसे युरोपियन पण्डितगण संशोधन-कार्य करते है, वह हमें यथेष्ट ज्ञात थी और उसी पद्धति तथा दृष्टिसे हम बहुत समयसे अपना संशोधन-कार्य करते भी आते थे, केवल वहांक विद्वानोंका उत्साह और एकाग्रभाव विशेष अनुकरणीय मालुम हुआ। हमें जो खास अध्ययन करनेके विशेष विचार मालुम दिये, वे वहांके समाजवाद-विषयक थे। इन विचारोंका अध्ययन करते हुए हमागे जीवनाभ्यस्त जो संशोधन-रुचि है, वह शिथिल हो चली। समाज-जीवनके साथ सम्बन्ध रखनेवाली बातोंने मस्तिष्कमें अड्डा जमाना शुरू किया। इन बातोंका विशिष्ट अध्ययन करनेके लिये हमारी इच्छा वहांपर कुछ अधिक काल तक ठहरनेकी थी, लेकिन संयोगवश हमको जल्दो ही भारत लौट आना पड़ा। इधर आनेपर वाबूजीने इस संग्रहकी सर्वप्रथम ही याद दिलाई, लेकिन सत्याग्रहके नूतन युद्धमें जुड़ जानेके कारण और फिर जेलखाने जैसे एकान्तवासके अनुभवानन्दमें निमग्न हो जानेसे इन पुरानी वातोंका स्मरण करना भो कत्र अच्छा लगता था। एक तो योंही मस्तिष्कमें समाज-जीवनके विचारोंका आन्दोलन घुड़दौड़ कर रहा था, और उसमे फिर भारतकी इस नूतन राष्ट्रक्रान्तिके आंदोलनने सहचार किया। ऐसी स्थितिमें हमारे जैसे [ ग नित्य परिवर्तनशील प्रकृतिवाले और क्रान्तिमें हो जीवनका विकाश अनुभव करनेवाले मनुष्यके मनमें वर्षों तक पुराने विचाराका साह कर रसना, और फिर जब चाहें तर उन्हें अपने सम्मुस एकदम उपस्थित हो जाने की आदत बनाये रखना दुसाध्य-सा है जेलमुक्ति होनपर विधाता हमें शान्तिनिरुतन ग्गींच लाया। विश्वभारतीके ज्ञानमय वातावरणने हमारे मनको फिर ज्ञानोपासनाकी तरफ सींचना शुरू किया और हमारी जो स्वाभाविक सशोधन-रुचि थी, उसको फिर सतेज बनाया। वाँसे हमने ४ ऐतिहासिक प्रन्योंके सम्पादन और मशोधनका सकल्प फर रसा था और उसका कुछ काम हो भी चुका था, इसलिये म्ह-रहकर यह तो मनमे आया ही करता था कि यदि इस सकल्पके पूरा करनेका कोई मन पूत साधन सम्पन्न हो जाय, तो एक बार इसको पूरा कर लेना अच्छा है। वाचू श्री बहादुरसिंहजी सिंघीके उत्साह, औदार्य, सौजन्य और सौहादने हमारे इस सम्ल्पको एकदम मूर्तिमन्त यना दिया और हम जो सोचते थे, उससे भी कहीं अधिक मन पूत साधनको सप्राप्ति देखकर परिणाममें हमने मिगी जेन ज्ञानपीठ और सिंघी जैन ग्रन्थमाला का भार उठाना स्वीकार किया। जनसे हम यहा आये, तभीसे इम सग्रहके लिये श्री नाहरजीका वरावर स्मरण दिलाना चालू रहा। हम भी आज लिसने हैं, कल लिसने हैं, ऐसा जवान देकर उन्हें आशा दिलाते रहते थ। बहुत समय बीत जानेक कारण इस विषयमें जो कुछ हमारे पुराने विचार थे और जो कुछ हमने लिपना सोचा था, वह स्मृति-पटपर से अस्पष्ट हो गया। जिन प्रतियोपरसे यह सपह मुद्रित हुआ था, वे भो पासमें नहीं रहनेसे, इस विषयमें क्या लिसें, अछ सूझ नहीं पडती थी । विनप्ति त्रिवेणि', 'कृपारस कोष', 'शत्रुजय तीर्थाद्धार प्रयन्ध' इत्यादि पुस्तकोक प्रणयनके बाद हमारा हिन्दी-लेसन प्राय बन्द-सा ही है। पिछले कई वर्षोंसे निरन्तर गुजराती भापा ही में चिन्तन, मनन, लेपन, और बाग्व्यवहार चलने रहनेसे हिन्दी-भाषाका एक सरहसे परिचय ही छूट गया, इस कारणसे कुछ हिन्दी लिप्पनेसा ठोक ठोक चित्तेकाम्य न हो पाता था, लेकिन इन दिनों में हमारा साहित्य-सग्रह हमार पास पहुंच गया और वाँसे सदूकोंमे वद पड़े हुए पुगने कागजों और टिप्पणोंको उथल पुथल करते हुए इस विषयक कुछ साधन भी हाथमें आ गये, जिससे ये पतिया लिखनेका मनमे कुछ विचार हो पाया। बस यही इस मप्रहके बारेमे हमारा किश्चिन वक्तव्य है। श्वेताम्बर जैन सप जिस स्वरूपमें आज विद्यमान है, उस स्वरूपक निर्माणमें सतरतरगच्छ आचाय, यति और श्रापक-समूहका बहुत बड़ा हिस्सा है। एक तपागच्छको छोड़कर दूसरा और कोई गच्छ इसरे गौरवको बगवरी नहीं कर सकता। कई वातोंमें तपागच्छसे भी इस गच्छका प्रभाव विशेष गौरवान्वित है। भारतके प्राचीन गौरवको अक्षुण्ण रखनेवाली राजपूतानेकी वीर भूमिका पिरले एक हजार वपका इतिहास ओमवाल जातिकं शोय, औदार्य, बुद्धि-चातुर्य और वाणिज्य-ज्यवमाय-कौशल आदि महदू गुणोसे प्रदीप्त है और उन गुणोंका जो विकाश इस जानिमें इस प्रकार हुआ है, यह मुर यतया सग्तरगच्छके प्रमावान्वित मूल प्रपोक सदुपदश तया शुभाशीवांडका फल है। इसलिये सरतरगच्छका उज्वल इतिहास यह परल जैन सबके इतिहासका ही एक महत्त्वपूर्ण प्रकरण नहीं है, बल्कि समप्र राजपुताने इनिहामका एक विशिष्ट प्रकरण है। इस इनिहासक सकलनमे सहायभूत होनेवाली रिपुल साधन-सामग्रो इधर-उधर नष्ट हो रही है। जिस वाहको पट्टालियो इस मप्रहमें सगृहोत हुई है, वैसी पई पट्टावलियां और प्रशस्तिया [ घ] संगृहीत की जा सकतों हैं और उनसे विस्तृत और श्रृंखलाबद्ध इतिहास तैयार किया जा सकता है। यदि समय अनुकूल रहा, तो 'सिंघो जैन ग्रंथमाला' में एक-आध ऐसा बड़ा संग्रह जिज्ञासुओंको भविष्यमें देखनेको मिलेगा। बाबू श्री पूरणचंदजी नाहरने बड़ा परिश्रम ओर बहुत द्रव्य व्यय करके जैसलमेरके जैन शिलालेखोंका एक अपूर्व संग्रह प्रकाशित कर इस विषयमें विद्वानों और जिज्ञासुओंके सम्मुख एक सुन्दर आदर्श उपस्थित कर दिया है। इसके अवलोकनसे, राजपुतानेके जूने पुराने स्थानोंमे जैनोंके गौरवके कितने स्मारक-स्तंभ बने हुए हैं तथा उनसे हमारे देशके ज्वलन्त इतिहासकी कितनी विशाल-स्मृद्धि प्राप्त हो सकती है इसको कुछ कल्पना आ सकती है। इस ग्रंथमें प्रायः खरतरगच्छके ही इतिहासकी बहुत सामग्री संगृहीत है जो इस पट्टावलिवाले संग्रहकी वातोंको पुष्टि करती है तथा कई बातोंकी पूर्ति करती है। इन सब बातोंके दिग्दर्शनकी यह जगह नहीं है। ऐसे संग्रहोंके संकलन करनेमें कितना परिश्रम आवश्यक है वह इस विषयका विद्वान ही जान सकता है 'विद्वानेव जानाति विद्वज्जनपरिश्रमः'। जैसलमेरके लेखोंका ऐसा सुन्दर संग्रह प्रकाशित कर तथा इस पट्टावलो संग्रहको भी प्रकट करवाकर श्रीमान् नाहरजीने खरतरगच्छकी अनमोल सेवा की है एतदर्थ आप अनेक धन्यवादके पात्र हैं। आपका इस प्रकार जो स्नेहपूर्ण अनुरोध हमसे न होता तो यह संग्रह योंही नष्ट हो जाता और इसके तैयार करनेमें जो कुछ हमने परिश्रम किया था वह अकारण हो निष्फल जाता अतः हम भी विशेष रूपसे आपके कृतज्ञ हैं। शान्तिनिकेतन सिंघी जैन ज्ञानपीठ जिनविजय पर्युपणा प्रथम दिन, स० १९८७
॥ ॐ अहे ।।
नमोऽस्तु श्रमणाय भगवते महानीराय
॥ खरतरगच्छ-सूरिपरंपरा-प्रशस्तिः ।।
श्रियेऽस्तु वीरखिगलागजातः समागतानेकनुरेन्द्रजातः ।
दुष्टाएकर्मक्षयनकमस्तिरस्कृतापरिपक्षलक्षः ||१॥
यदीयमन्तानमना मुनीवराः कुर्वन्ति धर्म निमल कलावपि ।
अद्यापि कालेन स पश्चमेऽपि, श्रिये सुधर्मा गणभृद्वरोऽयम् ॥ २॥
येनाप्टी ननलिका नवनवस्नेहानुगा पन्धुराः
सौरयों ननकोटयो दशगुणास्त्यक्ता ननाधिश्यकाः ।
येन स्वेन कुटुम्बकेन सहितेनाग्राहि दीक्षा गुरोः
सोऽयं केलिपुङ्गयोऽप्यपभमूर्जम्बूमुनिः पातु वः॥३॥
चारोऽपि प्रथितो निहाय सकलचार्याघवध सुधी-
रात्मीय परिगर्ख कोणिकनृपाध्यक्ष तदागव यः।
चौराणा शतपञ्चकेन कलितः प्राज्य सर्वश्रुत-
जान्यासीत्प्रभवोऽथ सरिमुकुटः सोऽस्तु श्रिये विद्विभुः ॥ ४॥
श्रुत्ला माधुमुसाद्विनिर्गतरचोऽहो कष्टमित्यादिक
नीमूर्तिनिरीक्षणेन तरमा त्यस्त्वाधर सन्धुरम् ।
संसाराद्विरतो ब्रत समधिया चादाय मृरिपद
लेभे सार्थभुतनतास्पदमसी शग्यभनः सोऽनतात् ॥ ५ ॥
यः स्वल्पायु त्या निजमुतमनकस्य चात्तचरणस्य ।
दशवकालिकमकरोत् सल्पदिनानल्पमुसहेतुः ॥ ६॥
त शय्यभवसरि प्रणमत मस्त्या गुणाकामारम् ।
जिनशासनशृङ्गार योगिमन सरसिजे हमम् ॥ ७ ॥
तत्पश्पणमणिर्जयतु यशोभद्रमुरिधारयः।
गुरुमक्तिशालिहृदयः सुसकारः सयमाधारः ॥ ८ ॥
संभूतिविजयसरि. मकलश्रुतफेरली जगद्विदितः ।
निखिलभीसूरिशिरस्तिलाममो जयतु योगीशः॥९॥
प्राचीनगोवतिलको जिनशासनेऽस्मिन् मार्तण्डमण्डलबदद्भुतभास्करोऽयम् ।
दामप्रकामचरमभुतकालीशो जेजीयते य इह मुग्गिणारतसः ॥१०॥
संघोपरोधपशवोऽखिलष्टकाष्टविनापहाग्मुपमर्गहर चकार ।
नियुक्तिकृमिसिलनकदम्पकस्य यः सोऽन्तु दुर्गविहरी गुरुमगाः ॥११॥
- । खरतरगच्छ-सूरिपरंपरा-प्रशस्तिः ।। भूतो न कोऽपि न भविष्यति भृतलेऽस्मिन् श्रीस्थूलिभद्रसदृशो मुनिपुङ्गवेषु । येनैप रागभुवनेऽपि जितो हि कामः पण्याङ्गनावरगृहे वसता निकामम् ।।१२।। ताते स्वर्ग गतेऽपि क्षितिपतिमणिना नन्दभूपेन राज्य- मुद्रामस्याlमाणामपि च विगणयन् मोक्षदुर्गस्य मुद्राम् । भोगान् भोगीशतुल्यान् परिणतिविपमाः पण्यनारीविचार्य त्यक्त्वेवं सर्वमेतद्वरचरणभरं यो दधार स्वदेहे ॥ १३ ॥ धन्यो हि सोऽपि जनकः शगडालमन्त्री लक्ष्मीश्च सा जनिकरी युवतीपु धन्या । वंशोऽपि धन्य इह नागरवाडवीयो यत्राजनिष्ट मुनिरेप मुनीन्द्रवन्धः ॥१४॥ शिव्यौ च स्थूलिभद्रस्य महागिरि-सुहस्तिनौ । दशपूर्वधरावेतौ प्रवीणों पुण्यशालिनी ॥१५॥ जिनकल्पतुलां विभ्रत्तयोरेको महामुनिः। द्वितीयसंग्रतिक्ष्माप-प्रतिबोधकरोऽभवत् ॥१६॥ तस्योपदेशतोऽनेके विहाराः कारिता भुवि । तेन संग्रतिभूपेन यथा भूर्जिनमण्डिता ॥१७॥ वज्रः प्रवचनाधारस्तत्पट्टानुक्रमादभूत् । सुनन्दाकुक्षिसंभूतो जातमात्रो विरागवान् ॥१८॥ पालनके स्वपन्नेकादशाप्यङ्गानि लीलया । योऽपठद्भालभावेऽपि साध्वीनां वसतौ स्थितः॥१९॥ प्रवर्धमानः क्रमशः शशाश्वत ददत्प्रमोद सकलेऽपि सन्छे । मातुर्विवादेऽपि गृहीतवाँल्लघुरजोहति वाचमभूपयत्पितुः ॥ २० ॥ अथो गुरुः सिंहगिरिनिजायुः पर्याप्तिमालोक्य पदं स्वकीयम् । सभिन्नपञ्चद्विक-पूर्वधारिणे मुनीन्द्रवज्राय ददौ समाहितः ॥२१॥ श्रीवजसूरिर्गुणलब्धिभूरिः कुर्वन् विहारं विविधेऽपि देशे । प्रोत्सर्पणां श्रीजिनशासनेऽस्मिन् नानाविधां प्रातनुत प्रभुर्यः ।। २२ ।। स्वयंवरे तां धनरत्नकोटिसमन्धितां श्रेष्ठिसुतां त्यजन्तम् । अपि स्वरूपेण जितसरङ्गनां तं वज्रसूरि प्रणमामि सादरम् ॥ २३ ॥ श्रीष्टिवादपठनाय गतेन मातुर्वाचा सुपूर्वनवकं च पपाठ सार्द्धम् । श्रीआर्यरक्षिवगुरुः स मुदे शमाढ्यः संबोधिताखिलपरीवृतिरेप भूयात् ॥ २४ ॥ श्रीमलि कादिपुष्पसुगुरूः श्रीआर्यनन्दिप्रभुः जीयान्नागकरिप्रभुश्च विजयी श्रीरेवतीसरिराट् । ब्रह्मद्वीपिगुरुः सदार्यसमितेः संप्राप्तदिक्षश्चिरं खण्डिल्लो हिमवान् गुरुर्विजयते नागार्जुनो वाचकः ॥ २५ ॥ गोविन्दाभिधवाचकं गुरुवरं संभूतिदिन्नायं श्रीलौहित्यमुनि सदा प्रणिदधे श्रीपोष्यमुख्यं गाणम् । भाण्यायेषु (१) विधायकं मुनिवरोमास्वातिसदाचर्क वन्दे श्रीजिनभद्रसूरितिलकं नित्यं कृतप्राञ्जलिः ॥ २६ ॥ त्रिखण्डमेदिनीराज्यं पालयन् सर्वतः प्रभुः । अवन्त्यां विक्रमादित्यः प्रबोध्य श्रावकी कृता२७॥ 4. ...-."
खरतरगच्छ-सूरिपरपरा प्रशस्ति । मिध्यात्विसंगृहीतः प्राग महाकालजिनालयः आत्मसाद्विहितो येन जिनशासनभास्वता॥२८ नव्यस्तोत्रप्रभावेण पार्धमातः प्रकाशिता । विनत्रपिण्डिकामध्यात् स्फटाटोपेषिभूषिता ॥२९॥ श्रीवृद्धवादिमरीन्द्र-पट्टपङ्कजभातरम् । सतोष्टुवीमि ने भक्त्या सिद्धसेन दिवाकरम् ॥३०॥ - चतुभि कलापकम् । याकिनीभगवतीवचनात्प्रबुद्धेस्त्यक्त्वाभिमानमाखिल जगृहे चरित्रम् । यःसोगता विधिरलेन वधोपनीतास्ते सागसोऽपि यतिनीवचनाच्च मुक्ता॥३१॥ सद्यापत्ते समीहोद्भवदुरितामदे साब्धिवेदेन्दुसंख्या जैना ग्रन्धाः कृताः स्युर्धनतिमिरभिदो नव्यगाधाप्रबधे । यैरप्यात्मीयशिष्यव्यपगमनभवदुःसतापामृतोप- थके ग्रन्यो रमालो धुरिकृतललितो रिस्तरारयो नवीनः ॥३२॥ ते हरिमद्रमुनीन्द्रा निस्तन्द्राचन्द्रकिरणसंकाशाः । श्री आमदयकलघुगुरुचिवृतिकरा सघनयकाराः ॥३३॥-निमि• बुलकम् । वन्देऽह देवसूरीशं नेमिचन्द्रगुरूत्तमम् । नम सुनिहितायाध श्रीउद्योतनसूरये ॥३४॥ तत्पदेवाचलफल्मक्षा भव्यागिना कल्पितदानदक्षाः । सूरीश्वरास्ते सुमनोभिरामा श्रीवर्धमाना गुरषो विरामाः ॥ ३५ ।। ये अर्बुदाद्रावृपमेश्वरस्य मणीमयीमूर्तिमतिप्रभावाम् । प्रकाशयामासुग्थोरगेन्द्रासंप्राप्तसाम्नायकसूरिमन्त्राः ।। ३६ ॥ तत्पट्टपकेरुहराजहसा जैनेशरा सूरिशिरोवतमाः। जयन्तु ते ये जिनशेवशासनभुतप्रविणा मरनासमाक्षिपन् ॥ ३७॥ श्री पत्तने दुर्लभराजराज्ये निजित्य वादे मठरासिसूरीन् । वर्षेऽब्धिपक्षाम्रशशिप्रमाणे लेमेऽपि यः सरखरो निरुद्दयुग्म (१)॥३८॥ सवेगरङ्गशाला विहिता प्रस्तावकुमुमवरमाला | त जिनचन्द्रमुनीन्द्रं नमत जनानन्दाक्षितिचन्द्रम् ॥ ३९॥ वृत्तिचक्रे नगाड्ग्या ललितपदयुता देवतादेशतो ये- नव्यस्तोनेण येपा प्रफटतनुरमृद् भूमितो दिव्यस्पी । पार्श्वः सूर्जरकणाल. कलिमलमथनः स्तम्भनाधीयरोऽय- मस्य स्नानाजुमेकाद्विगतगदतनी दिव्यम्प यदीयम् ॥ ४०॥ सानिध्यकारा सकलातिहारिणी पमारती यत्पदपक्षले त्रिता । वे पूज्यराजामयदेवमूग्यो यच्छन्तु मधे राफ्लार्थसम्पदम् ॥४१॥ मूदुपक्षीयमूरे. प्राशिप्यः कच्चोलर्पिण.। जिनपल्लमनामाभूद्विरागी कर्मभेदतः ॥४२॥ तस्यामयगुरोः पादुपमपत्तोऽभवत् । जिनरल्लभाशयोध्य सनमितान्तपारगः ।। ४३ ।। क्रमशोऽमयसूरीणा पट्टान्दरकेसरी । जिनवष्टमसूरीन्द्रो लिङ्गगनाईनः ।। ४४ ॥
।। खरतरगच्छ सूरिपरंपरा-प्रशस्तिः ।। दुर्गे चित्रकूटे विकटभृकुटिका चण्डिका प्रत्यवाधि, अहे मानोनतश्रीकरणसदभरः सत्यवान वैभवेनः ! प्रागनिरस्वो वतासादाद् धनपतिरभवत्सोऽपि सहारणो वे चक्रे तेनापि जने जिनगृहकरणायुन्नतिः शासनेऽस्मिन् ॥ ४५ ॥ पिण्डविशुद्धिप्रकरण-फर्मग्रन्धाधनेकशास्त्रकृते । तस्मै श्रीजिनवल्लभगुरवे सततं नमकुर्वे ॥४६ ॥ तत्पद्वे मेरुङ्गे सुरतसदृशो जैनदत्तो मुनीन्द्रो दुर्गे श्रीचित्रकूटे ग्रहरसशशभृञ्चन्द्रसंख्ये हि वर्षे । भूतप्रेताः पिशाचा ग्रहगणनिवहा कुग्रहास्ते गृहीता येनासाध्येप (१) मन्त्रप्रवलबलतया योगिनीचक्रवालम् ॥४७॥ यत्पूर्व चै [व] पट्टे विनिहितमभवद् केनवितेन तस्मात्प्राकाशि मन्त्रस्तदपि हि गुरुणा पुस्तकं मन्त्रगर्भम् । येनाथी विक्रमाख्ये विपुलपुरखरेऽवारि मारिः प्रबोध्य लोका माहेश्वरीयास्तदपि हि गुरुणा स्थापिता जैनधर्म ॥४८॥ तस्मिन्नेव पुरेऽक्षसप्तगुणितं साधुवतिन्योः पृथग् एकस्यामपि दीक्षितं समभुवन्नन्या क्षणात्सो प्यथ । सिन्धोर्मण्डलमाससाद च गुरुः पूर्णेन्दुवत्साधुभिः संसेव्यो जनचक्रवाकनयनानन्दं ददत् शुद्धधीः ॥ ४९ ।। तत्र श्रीसोमराजः सुरपतिसदृशो यत्पदाम्भोजभृङ्ग- स्तुष्टस्तरमै स दत्ते भवरामिति वरं ग्रामदेशे पुरऽपि । श्राद्धः श्रीमास्त्वदीयो नरपतिसदृशः सत्प्रधानो गुरुर्वा भाव्यैकैकः स एप प्रकटतरमिहाद्यापि जागर्ति गच्छे ॥ ५० ॥ यो योगीन्द्रनिपेवितक्रमयुगः प्राचीनपुण्योदया- द्देवोक्तेश्च युगप्रधानपदवी प्राप्तो जगद्विश्रुताम् । यस्योपान्तमुपासते सुरगणा दासा इवाहनिशं कल्पगुर्मरुमण्डले स जयति श्रीजनदत्तो गुरुः ॥५१॥ तेषां नामग्रहणाद्विपत्तितां यान्ति सकलविपदोऽपि । अहिदष्टमृत्य्वभावो विद्युदपातो भवेद् भविनाम् ।। ५२ ॥ विस्फुरति कान्तिरतुला सुकला देहेऽपि मान्दिरे सकला। कमला विस्मयजननी वदने वाणी सुधोगिरणी ॥ ५३ ॥ श्रीअजयमेरुदुर्गे स्वर्गे गमनं च जातामव येपाम् । स्नूप तिलकसुरूप प्राचीदिक्तरुणीभालतले ॥ ५४ ॥ . , - । 1 परवराट-सूरिपरपरा प्रशस्ति ।। क्षत्रव काले वय निर्गतो गणः श्रीरुद्रपल्ल्यां जिनशेखरस्य हि । श्रीरुद्रपल्लीय इति प्रसिद्धो ग्रहर्तचन्द्रेन्दुमिते च वर्षे ॥ ५५ ॥ वर्षे राणवपक्षचन्द्रसुमिते श्रीविक्रमारये पुरे यस्पोदारमहोत्मनः समभनन् पट्टामिपेकसणे । बचचन्द्रनिमाननो नरमणी मालो निशालो गुर्गः मोघ श्रीजिनचन्द्रसूगितिलको जीयान्मनोऽभीष्टदः ।। ५६ ॥ योगिस्तमितपिम्पमोचकतरस्तेा पुनः स्थापक- चैत्ये यः ममभून्मृतेशत्योत्तम्याशु त योगिनम् । तोपात्तेन ममपितामपि लगी विद्या न यः स्वामिनी- मुस्मिटेत्यपनन मा पिता रिनिहिता तेन क्रुध्यत्वानिनी (?)॥६०॥ गुरुणा पापमुक्तेन मुक्तो योगी गतोऽपि मः। मोघ जिनाति. मरिः मुस्मृग्मिमनमः ॥६॥ जीयाञ्चिर चिरायुका पत्रिंशद्गुणरोगाधि.। पत्रिंशद्वादजेता चारिधिमार्गनभोमणिः॥२॥ श्रीजावालपुर महोत्सबहुतो वस्तापिपक्षणमृत्- माने व दलातले समभनन्पट्टाभिपेको महान् । श्रीजनेश्वरमरिराजमुकुटो वागनिर्जितो स्वर्गुरोः श्रीभाटारिकनेमिचन्द्रवनयः म पातु गो वान्छितम् ।। ६३ ।। श्रीमद्राहारकार ने सिलनगरतरे थाग्निपसद्वयेन्दु- मरन्ये च विशालद्रणिनितरण श्रापकर्दीयमाने । पूज्यविनाय योग्य स्वपदमलमचीकारिय शेरपि त श्रीमत्सरिराजं जिनपतिमुगुरुं मस्तुने पूज्यपादम् ॥ ५७ ॥ प्रतिष्ठासमयेऽन्येयुर्योग्यकस्तर चागतः । प्रतिष्टितानि निम्बानि स्तमयामाम विद्यया ॥१८॥ अान्तरे मूरिगुणानभिना महत्तरोगाच म नर्मवाचम् । पालेन चन्द्रेण तु चन्द्रिमा कनि निमो प्राय जुम्मे क्य नहि ॥ ५९ ।। [इति महतरावचनेन गुरमपंता प्राप । ] शिखिशिखिलोचनशशिमित जिनहिरिराजगुरो। लापरतर्गवगगो जातो जानालपुरनगर ।। ६४॥ चन्द्रागिनयनाशिमिता जापालपुरम्हादुर्गे। जनप्रमोघमुगुगेरभरन्पट्टोन्सरी रम्य ॥६५॥ शगिटनयनानिमिता निनचन्द्रमुग्गिजन्य । श्रीमज्जारालगोजनिष्ट पट्टाभिकमहः ॥६६॥ मुनिमुनिनयननाकरमाणे हि वर्षे पिपुलपनसमृद्धे पननाम्य पुरस्मिन् । पदमामहिमोर्षिन्ता यन्य शुन्या मतिनागरमृम्भूिसिामाग्यरारी॥६७|| मिलगिरियोऽम्मा यन्य शनादेशाद् पनागपनरोटा मन्तुली विद्दार । सरतसमंतर्य सुप्रतिष्ठा गेमपतन्तिीप. प्राणिना मर्यकालम् ||६८॥
|| खरतरगह-सूरिपरंपरा प्रशस्तिः ।। रंगतरंगा सदने तुरंगा विशालनेत्रा युवती सरंगा । पाणीतरंगा बदने रसाला यस्य प्रसादारिकल संभवन्ति ।। ६९ ॥ देवराजपुरे यस्य स्वर्गतस्य गुरोरथ । पूज्यमानं जनः स्तूपं ददाति सकलं सुखम् ।। ७० ॥ तद्यथा-निर्धनाय धनं दद्यात् नेत्रहीनाय लोचनम् । विद्याहीनाय सद्विद्यामश्रोतृणां च सुश्रुतिम् ।। ७१ ॥ राज्यार्थिनां च यद्राज्यं सुखं सुखार्थिनामपि । प्रयच्छत्युत्तमं भोग भोगार्थिभ्यो विशेषतः।।७२|| कुष्टिना हरते कुष्ठ रोग रोगवतामपि । कष्टं कटवतां पुंसां दीर्भाग्यं दुर्भगात्मनाम् ।। ७३ ।। -~~-चतुर्भिः कलापकम् । शून्यं ग्रहामींदुमितेऽत्र वत्सरे श्रीदेवराजाख्यपुरे पदोत्सवः । जज्ञे च यस्याविरभूत्सरस्वती श्रिये स वः श्रीजिनपद्मगरिरात् ।। ७४ ॥ खखवेदचन्द्रमाने वर्षे पहाभिपेचनं यस्य । गुणलब्धिरत्नजलधि याजिनलब्धिमूरिगुरुः ॥७५ ॥ पच्छून्यवेदेन्दुपिते हि वर्षे पट्टोत्सवो जेसलमेरुदुर्गे । यस्याभव द्रव्यधनव्ययेन सोऽस्तु श्रिये श्रीजिनचन्द्रदरिः ।। ७६ ।। बाणेन्दुवेदशशिभृत्तमिते च वर्षे श्रीस्तंभतीर्थनगरे समभूद् यदीयः। पट्टाभिपेकमहिमा गरिमालयोऽसौ जेजीयते गुरुजिनोदयसरिराजः ।। ७७॥ श्रीजिनेश्वरसूरीणां तदैव निर्गतो गणः । बैकट इति नानासीद्विश्रुतोऽयं महीतले ॥ ७८ ॥ नेत्राक्षिनीरनिधिचन्द्रमिते च वर्षे श्रीपत्तने पुरवरे पदमाविरासीत् । श्रीमज्जिनोदयगुरोः पदपङ्कजालीभृङ्गायितं नमत तं जिनराजमूरिम् ॥७९॥ तत्पनन्दनवने विभाति जिनमद्रसूरिमुरफलदः । सकलमनोमतदाता शतशाखावर्धितो बाढम् ॥ ८० ॥ अत्रान्तरे देवकुलादिपाटके चन्द्रर्तुवेदेन्दुमिते च वत्सरे । शाखा गुरुश्रीजिनवर्धनानां शुक्राद्यपक्षे दशमीदिनेऽभूत् ।। ८१ ॥ वाणपिवेदेन्दुमिते च वर्षे माघस्य राकादिचसेऽजनिष्ट । पट्टोत्सयो भाणसपल्लिकायां ननौमि तं श्रीजिनभद्रमरिम् ॥ ८२ ॥ गुरोः श्रीजिनभद्रस्य महिमा वर्ण्यते कियान् । यद्भाले भासते भाग्यलक्ष्मीविस्मयकारिणी।।८।। वामेतरे यत्करपङ्कजेऽस्मिन् चेक्रीयते सिद्धिरमामुकेलिम् । विहारनीरोर्मय एव येषां संपत्तिशस्यानि समेधयन्ति ।। ८४ ॥ दारियं क्षीयते येषां सौम्यदृष्टिविलोकनात् । चन्द्रोदयाद्यापैति संकोचः कुमुदाकरे ॥८५॥ तत्पदृशकासनेश्वराजो विराजते श्रीजिनचन्द्रसरिः । श्रीपत्तने यस्य पदोत्तवोऽसूद्वाणेन्दुवाणेन्दुमिते च वर्षे ॥८६ ॥ श्रीमजेसलमेरौ समराकारितविहारमध्येऽस्मिन् । जिनचन्द्रसूरिगुरुणा चक्रे विम्वप्रतिष्ठा सा ॥८७॥ ~ ॥ खरतरगच्छ सूरिपरपरा-प्रशस्ति । तत्पट्टपङ्कजयुगे अमरायमाणं ननम्यते जिनसमुद्रगुरु तमेनम् । नेक्षणेपुराशमृत्यमित च वर्षे पट्टोत्सवो विपुलपुञ्जपुरे यदीयः ८८ ॥ दाने पितार्यमाणे प्रपरा चक्रिरे प्रतिष्ठा ये । वाग्मटमेरुविहारे सारेजस्मिन् भूतले सुतराम् ॥ ८९ ॥ आदेशान्नृपमातलस्य मुदितो जाटाभिधः श्रीरो रत्नाचीपुगशिप्रमाणशगद प्रोद्भुतपुण्योत्सरे । श्रीगण्डुकाराभिधानविपयेऽप्यानीतरान माधवे श्रीमज्जेनलमरुतः पुरवरे योधानके श्रीगुरुन् ॥१०॥ करसरोरुहमिद्धिरमाधरान् सकललब्धिमहोदधिसुन्दरान् । गुरुगुणावलिभूषितविग्रहान् जिनसमुद्रगुरूममतादमून् ॥११॥ --चतुर्भिः : कलापकम् ॥ तेपा पट्टाम्मोजीलामरालाः सूरीगाः श्रीजैनहसा रमालाः । कामघसे नीलकण्ठोपमाना जेजीयता निर्जितागपमानाः ॥ ९२ ॥ श्रीविक्रमारये नगरे विशाले गाणेषुनाणेन्दुमिती समायाम् । ज्येष्ठस्य शुले नवमीदिनेऽय वारे गुरी चारु शुभे पि लग्ने ॥ ९३ ॥ श्रीकमसिंहेन कृतोद्यमेन धनव्ययात्प्रीणितमलोकः । येपा गुरुणा नतनागराणा पट्टोत्सनोऽकारि सुविस्तरोऽयम् ॥ ९ ॥ अत्रान्तरे श्रीजिनदेवरे श्रीआयपक्षीयगणो विभिन्नः। रेयाभिधाने नगरऽननिष्ट वाणर्तुवाणन्दुमिते च वर्षे ॥९५॥ कुर्वन्तः क्रमशो विहारमनप देशवनेकैप्वय भीमेवावरिपकेऽतिनिपुले श्रीआफरारस्ये पुरे । जग्मुस्ता शकन्दरो नरपतिस्तद्राज्यमारंधरी भीमडूंगरपासिंहमाची श्रीमालचूडामणी ।। ९६ ॥ तो सभीफलकारिणी वितरणरत्यद्भुताटम्बर- अक्रात नगरप्रवेगनमह श्रीमद्गुरुणा मुदा । मेरा तनमनागयो गुणस्ता प्राचीनकर्मोदयात् फोऽप्येको प्रतिकमुट दुष्टमनिक' पश्यन् मातुयलन् (१) ॥९७॥ सोऽन्यः क्षगमाप्प पापहृदय' सप्ताटवार उधी. साहनिम्प पुरोग्दामिमापिला (१) चके तदा तामय । नौ मन्यत नृपस्तन किमपि प्रोजाध्य नाराय- मेफातपटो महानतिरपीहास्तीति मसायते || ९८॥
|| खरतरगच्छ-सरिपरंपरा-प्रशस्तिः ।। *- । तस्यैवं कथया तया हयपतिश्चित्ते स विस्मागितः किञ्चित् प्रष्टुमतः स्ववानि पुतुकात् मरीन्निनाव हुनम् । तत्पृष्टैर्गुरभिश्च सत्यवचनेक्तेषु रोपादयो चिक्षेपांतियुगे तदा नयवत्तां जंजीरमेपां हहा ।। ९९ ।। तावत्तस्य हदि भ्रमे सबति नो संचापरं वेत्त्यसा- बुद्रावन्त्वथ पश्यति सा भय किंचिततो चिन्तयन् । ज्ञातं सेप सिताम्बरः कलयतीतीकलां ननिया द्राग्भीतो गुरुमोक्षणाय नृपतिश्चादिक्षारक्षकान् ॥ १० ॥ जीरापल्लिपुरीशपाईकृपया प्राचीनपुण्योदया- दहध्यानवशात्तदा जयजयारावे प्रवृत्ते सति । सार्ध दुःस्थितबन्दिपञ्चकशतैः श्रीसूरयो निर्ययुः श्रीराहोदनात् शशाङ्बदतः साहीनकारोदरात् ।। १०१ ॥ अमन्दानन्दजांकूरा उदगच्छन्मनोयनौ । विवेकिश्राद्धलोकानामुद्दीप्तं जिनशासनम् ॥१०२।। गीतनर्तनवादित्रमङ्गलध्वनिपूर्वकम् । वर्धापनं च सर्वत्र गुरूणां सोचनेऽजनि ॥१०३॥ युग्म ते मेघराजकुलनन्दनकल्पवृक्षाः निःशेषजन्तुहृदभीप्सितदानदक्षाः । श्रीजैनहसगुरवोऽनघसंघलोके यच्छन्त्यमी सकलसिद्धिमुदारवुद्धिम् ॥१०॥ श्रीसूरयोऽप्यथ परंपरया विहारं कुर्वन्त एव नगरं वरपत्तनाख्यम् । प्राप्ताश्चिरण करवस्यियुचन्द्रसंख्ये वर्षे समाहिनधियोऽत्रच ते स्वरापुः॥१०५।। तेषां पट्टसरोजे श्रीजिनमाणिक्यसूरिगुरुहंसाः। विशदोभयपक्षधरा जयन्तु जगतीवराभरणाः ॥१०६ ।। येषां पट्टमहोत्सवो जयजयाराबः प्रवृत्त महान् श्रीबालाहिकगोत्रभूपणमाणिः श्रीदेवरादकारितः। पक्षाब्देपुशशिप्रमाणशरदि श्रीपत्तनाख्ये पुरे माघस्योज्ज्वलपश्चमीवरदिने स्वोपार्जितार्थव्ययात् ॥ १०७ ॥ तेऽमी राजकुलाङ्गजाः सुगुरवः सूरीश्वराः साम्प्रतं रन्नादेव्युदरांबुधौ शशधराः पुण्याजपाथोधराः । सौभाग्यातमालभाग्यतिलकात्पूर्वपिरेखांगताः नन्दन्त्वम्बरसंस्थिताश्चिरतरं याबद्रवीन्दुधुवाः ॥१०८ ॥ श्रीमज्जिनाज्ञाप्रतिपालकाय तीर्थकरैर्वन्यपदाम्बुजाय । संघाय भूयाच्छिवसाधकाय भद्र जगज्जन्तुहिताय नित्यम् ॥ १०९ ।। श्रीचन्द्रगच्छगगने जिनहसमरिराज्ये कराष्ट्रशरचन्द्रमितेऽथ वर्षे । चक्रे प्रशस्तिरिति बोधयशोथिनैषा किञ्चिन्मया स्थविरमूरिपरंपरायाः ॥११० । --- ॥ खरतरगच्छ पट्टावली ॥ ve+ [१] श्रीगीतमस्वामी गारग्रामवासी वसुभूति वजस्वामी दशपूर्ववरः । तच्छिप्यात् नागेंड, ब्राह्मण-पृथ्वीभार्या तयोः पुत्रः। गौतमगोनः। चद्र, निति, विद्याधर, गच्छ ४ स्थापना । तस्य गृहस्थत्वे वर्ष ५०, छमस्थले वर्ष ३०, कालिकाचार्य । आर्यश्यामाऽपरनामा । ततः श्रीवीरनिर्वाणसमये केनलमासाद्य १२ वीरात् ४१३ । वः सिद्धः । एव मर्मायुः ९२॥ गर्दभिल्लोच्छेदको कालिकाचार्यों धीरात् श्रीपीरपट्टे सुधर्मस्वामी। ५०० वपः। अमिवश्यायनगोत्रः । कुलागसभिवेसे शान्तिसूरिः। धम्मिपिता महिला माता । तस्य ५० वर्षान्ते हरिभद्रसूरिः। याकिनीधर्मपुत्रो होमानीत- दीक्षा, ४२ वर्ष छमस्थत्व, ८ वाणि केवल, चौद्धप्रायश्चित्तार्थ १४४४ प्रकरणकर्ता धीरात् सायुः १०० श्रीगीरात् २० वपैः सिद्धः। ५८५ यप । तत्पट्टे श्रीजबूस्वामी। सडिल्लसरिः। काश्यपगोत्रः, श्रीराजगृहीनगरी, ऋषभ- आर्यसमुद्रसूरिः। दसपिता, धारिणी माता, तयोः पुत्रत्वेन आर्यमगु । पंचमस्र्गाद व्युत्ता समुत्पनः । ८ कन्या आर्यधर्मः ९९ कोटिकाचनत्यागी। गृहे वर्ष १६, प्रते आर्यमद् । २०, केरले ४४; एवं वर्ष ८० परमायुः । आर्यस्यरादिः। पीरात् ६४ वर्षः सिद्धः। दुलकापक्षः। ततः प्रभवः कात्यायनगोनः । तता शय्यमयः । धारात् ९८ चपैः स्वर्गतः। लेसनका यलम्या वीरात् ९०० वः । देवढिगणिक्षमाश्रमणाः । सकलमिदान्त- भीयशोभद्रः। आर्यमभूत विजयः। गोविंदयाचकः । मद्रमारस्वामी उपमग्गहरकत्तांपीराद १७० उमास्वातिवायफामरामरतिप्रकरणकृत् । भूतिमद । कोश्यामनिरोधक २१४ यप देविंदनाचकः। १४ पूर्वघर। जिनमद्रगणिक्षमाश्रमणः। मर्पमाप्यकता आर्यमहागिरिः । दसपूर्वघरो जिनकल्पतु- ९८० वर्षः । सनाकन् पीगत् २७० ॥ शीलागाचार्यः। प्रथमद्वितीयागमृत्तिकी । आर्यसुहस्तिः । क्षेत्रातर सिमेनप्रति श्रीदेवमरिः। पिता विक्रमादित्योऽननि । श्रीनेमिचंद्रमूरिः १० । खरतरगच्छ पट्टावली-१ ॥ १. श्रीउद्योतनसूरिः। १२ कुलकपणेन दशसहस्रबागडी प्रति- २.श्रीवर्धमानसूरिः गाजणादि १३ पाति- बोधकः स्वक्रियागुणप्रबोधितचित्र कुटीयचा- साह-च्छत्रोद्दालक चंद्रावती-नगरी-स्थापक मुंडः । नास्य परपक्षीयस्य पदं देयमिति सर्वसं विमल दंडनायक निर्मापित श्रीविमलबसतो घोक्त्या श्रीअभयदेवोक्तमेनं मुक्त्वा नान्यस्य ध्यानवलवाकृतः बालीनाहक्षेत्रपालप्रकटित ददामीति देवभद्राचार्योक्त्या च १२ वर्षाणि वज्रमय आदीश्वरमूर्तिस्थापकः पण्मासाना- पट्टे शून्ये पद मास ममायुरस्तीत्यगृह्णतोपि प्रद- चाम्लः प्रकटीकृतधरणेन्द्रात सूरिमंत्रशुद्धिकारी। तं संवन् ११६७ पदं । संवत् ११६८ चित्र- ३.श्रीजिनेश्वरसूरिः। सरसापत्तनवासीविनः कूटे स्वर्गप्राप्तिः । शिरसि मच्छिकादर्शनात् प्रतिबुद्धो गृहीत ७. श्रीजिनदत्तसूरिः। संवत् ११३२जन्म। दीक्षः पत्तनमागतः । तत्र सोमपुरोहितगेहे वाचकमंत्रीपिता । बाहडदे भाता। संवत् ११४१ स्थितः । वेदऋचासत्यापनेन रंजयित्वा दीक्षा गृहीता, ११६९पाटि वैशापरदि६दिने । तत्साहाय्येनैव संवत् १०८० दुर्लभराजस- श्रीजिनदत्तसूरिः ज्योतिर्वली विक्रमपुरे मारि- भायां ८४ मठपती जित्वा प्राप्तखरतरविरुदः। निवर्तनद्वारा प्रबोधित ५०० शिष्य दीक्षक एक ४. संवेगरंगशालाप्रकरणकारी श्रीजिन- नंद्यां, उञ्जयिन्यां महाकालप्रासादे स्तंभमध्या- 'चंद्रसूरिः । अन्यदा श्रीजिनेश्वरसूरयः मालव- दोपधवलेन प्रथमानुयोगपुस्तकाकर्षकः । ६४ देशे धारापूर्या प्राप्ताः तत्र महाधनश्रेष्ठी-धन- योगिनी, ५२ वीर क्षेत्रपालादिसाधकः । ओसी- देवीपुत्रः अभयकुमाराख्यो देशनां श्रुत्वा प्रवु- यानगरे ओसवंशीय लक्ष श्रावकप्रतिबोधकः । द्धो दीक्षां जग्राह । क्रमेण अभयदेवसूरयो जाताः १५०० साधु, १००० साध्वीदीक्षकः । नाग- गीतार्थाः। देवश्राद्धाराद्धांचिकालिखित 'दासानुदासा इव' ५. अभयदेवाचार्यों वहाचाम्लकरणजात- एतत्काव्यवाचनात् ज्ञातयुगप्रधानपदः । श्री- कुष्ठरोगो धवलकेऽनशनप्रतिपत्तये आहूतासन्न- जिनदत्तसूरीणां सप्तवराः योगिनीभिः प्रदत्ता:- संघो पि निशि शासनसुरी ज्ञापितस्य स्तंभनक- ग्राम २ एकः श्रावको दीप्तिमान् भवति । १। ग्रामे सेढीनदीतटस्थ पंपरापलाशाधः स्थित श्रावकाः प्रायेण निर्धना न भवन्ति ।२। श्रा- स्वयंदुग्धकपिलाधेनुपयःसिच्यमान श्रीपार्श्व- वकत्य कुमरणं न भवति । ३। साध्व्या रितु- स्य 'जयतिहुअण'द्वात्रिंशतावृत्तैः प्रकटीकारको याति । ४ । गुरुनाना शाकिनी न प्रभवति गतकुष्ठो नवांगीवृत्यादि महाकृत्य करणा- ।५। विद्युन्न पराभवति । ६। खरतर श्रा- दानीतगुर्वावलीमध्यनामा च। वको यो शूलताणे याति स पंच टंककान् ६.श्रीजिनवल्लभमूरिः। चैत्यवासि सुवर्णक- लात्वा समायाति । ७। एते सप्तवराः । अर्थ चोलकवर्षि जिनचंद्रसूरिशिष्यो दशबैकालिक- योगिनीभिः सप्तरराः श्रीगुरुपार्थात् मागिता:- पूत्रवाचनाद्वैराग्यवान् स्वयं गुरुं पृष्टा अभयदे- यः आचार्यों भवति स पंचनंदी साधयति । वसूरिमुपसंपन्नः। तदनु पिंडविशुद्धि-सार्ध- ।१ । सूरिमंत्र साधयति । २। सामान्यसाधु वातक-पडशोतरियादिग्रंथकद लेखरूपलिखित- दिसाहली जापं करोति ।३। श्राद्धा उभयकाल ॥ सरवर पहावडी-१॥ सप्प स्मरणगुणनं दुर्वन्ति ।। प्राविका मिश ११. श्रीनिनप्रमोधहरिः। दुर्गपदभयोषध तीप्रभवी: गुणति । ५। मान प्रतिगृहे आचा- व्याख्याता म०१३४१ स्वर्गः। मलद्वयं करोति ।६। यती शस्त्या एकाशनं १२. श्रीजिनचंद्रमूरिः । छाजहरवंश्य: करोति।७। एते सप्त वराः योगिनीनां दत्ताः। शववर्षायुः चतुर्नुपप्रोषका कलिकार फेवलीति दिल्ली १, उनणी,मरुअच्छि ३, अजमेरु ४,ए विरुदः । सं १३३६ जायालपुरे स्वर्गतः । ओठपीठ। तर गडेशन नागंतव्यमिति रक्ता -चदानी राजगन्छ इति रयातिः। च संवत् १२११ आमाठ मुदि६ तिथी अजय १३. श्रीजिनकुशलरिः। छाजहडगोत्र: मेरी स्वर्गगमन । मरुदेशे समीयाणउग्रामः । मत्रीजील्हागर जय- -गवन १२०५ रुद्रपल्या छमना रिपदं मोरीमाता ! स० १३३० जन्म, स. १३४७ गृहीतं जिनसेवरेण ततो गोलियागणो जातः। दीक्षा, सं० १३७७ पाटणनगरे पाटः। गनु- ८.श्रीजिनचद्रनगमणिमडितमालश्रीजि- जये २२ वर्षाणि यावत् प्रतिदिनभोजित श्राद्ध नदत्तगरिभिःस्वहस्तेन पट्टे स्थापितः। पूर्वस्या पंचगत भीमपल्ली जमलमेरुकारित श्रीवारपा- दगपाणि स्थित्वा मुहतीयाण श्राद्ध प्रतियो- र्धनाधप्रामाद सा. तेजपालपुन सा० धरणा, धकामय गार्जरनाय आगच्छत् अंतरा आयात सा० कडूआ कारित सरतर-सहीति नाम भीमाल मदनपाल श्रीचंदादि दिष्टीमधम- प्रसिद्ध श्रीमानतुगप्रतिष्ठाकारकः । उच्चाs- दामदेण तय गच्छन् प्रतोल्या रजोहरणपाताजा- ध्वनि मागितजरदाता स० १३८९ देवराज- दलस्तव सं० १२२३ स्वर्गगामी । पोडी पुरे स्वर्गतः। पाक्षेत्रपाटस्तत्स्तुपे अधिष्ठाता तन्मणिश्च यो १४. श्रीजिनपद्यमूरिः। श्रीतरणप्रभरएम- गिना गृहीतः । मदनपालेन गुरुमृती अनशनं गृ- वर्षेपि दत्तमूरिपदो वाग्मटमेरी गरिष्ट श्री- होतं । तुर्थे २ पट्टे श्रीजिनचंद्र गरिनामस्थापन । वीरचेत्यालोकनानाथर्यपृष्टविवेकसमुद्रोपाध्याय ९. श्रीनिनपतिमूरि । प्राप्त १५ वर्ष पट्टो 'यूहागदा नही वठी अंदरि फिउ माणी' पपेकपनो ३६ यादवा माल्दगोरः । आ- इति यचनेन प्रगटितमूर्सभारः पत्तनममीपर- सानगरे श्रीमालहाजीप्रतिष्ठाया योगिस्तंभित- तिस्वरस्वतीनटीतीरे निशि प्रातर्मया गर- प्रतिमाःमसामोपादुन्यापर तडीयमान- समक्षं फथ च्यारन्याकर्तव्येति चिंताममनतर- विवादपाग्राहकः तापूनास्वादनान । सुरतर- मेप प्रत्यक्षीमतपरम्पतीरधारः अतो गच्छधार । परीक्षमडागेनमिनद्रदत्तार- भगवन शमहिनाः' इति कान्य निर्माय म्या- पुर. मा० १२७७ अन्वादनपुरे दिवं जगाम। ग्यानमागि। मालपानागम्यतीचिरतः १०. श्रीनिनधारि । मटारीनेमिचंद- श्रीनिनपरिप्रमुगमायु १८ मर्मपोपि - पुरः। मदेशमान प्रासमृपिट.। म० भनी माये पतितः। ना मैन्ये पुग श्रादी- १३३१ संगी। मत पुन्यपीरपानिमा फेनविसादेन मालिः -जधानी मीनियमगुग श्रीनिानिहार म्पनीटर मधणे किं. गुगभ, न मपपिता! गुनानगली को। मगेनं विपिन मादाय कपिगदा गतीपंगे- १२ || खरतरगच्छ पट्टावली- १ || - मि, स्व श्रीअजितकायोत्सर्ग घटी ४५ निरंतरं • सा.कोचरश्राद्धकृतप्रवेशोत्सवापत्तने डागा अस्खलितं कुरु अन्यथा आगंतुं न शक्यते । तेन आसाधीर स्तंभतीर्थे सा०कर्मसीगृहस्थितहस्ति- तथा प्रतिपन्ने अष्टापदे गत्वा प्रासादखालके शालः । पत्तने सं०१४३२ स्वः प्राप्त: उपविश्य, तदा प्रस्ताचे देवैः स्नानं प्रारब्धं व १८. तदानी सतीोमानिताप्तपदो पि मं० तते केनचिन्मृन्मयं कलशं स्नात्रकरणाय गृहीतं वेगडभ्राताधर्मवल्लभसहजज्ञानगणी सा० उदय- स तस्य नालको भन्नः मुक्तश्च तेन तद्गृहीत्वा करणवचसा उत्कटतया परित्यक्तः, स्थापितश्च- पुनः खालं प्रविशता कलशमुखं भग्नं तथाविधं लोकहिताचार्यः श्रीजिनोदयः । ततो में- समानीय श्राद्धस्य दत्तं श्राद्धेन हसितं 'जेह- त्रादिशक्तिमान सरस्वतीपत्तनं गत्वा रुदेली. वउ बोपउ छइ, तेहबउ चोपउ आण्यउ' तच्छ- यागणेशपायें प्राप्तमंत्रो जिनेश्वरनामा सं० टया सर्वेपि सज्जा जाताः तन्मध्यकेन गणी- १४२२ जज्ञे । यतो वेगडागच्छः । शेन श्रीजयसागरपाठकानाभिदं सर्व प्रोक्तं १९. श्रीजिनराजमूरिः। मुखाधीत ३६ तच्छटागंधो वार ६७७ वस्त्रधीत पि न गतः। सहस्रन्यायग्रन्थः । स्वर्णप्रभाचार्य१, भुवनरत्ना- ततः तच्चैत्यस्थपुण्यवीरयक्षक्षेत्रपालाभ्यां अन्य- चार्य २, सागरचंद्राचार्य ३ स्थापका, स्त्री भुज्यते चैत्यमध्ये अन्यत्री अन्यपाधैं सं० १४६१ देवलवाटके स्वगंगतः । मुच्यते स्वस्वामीीया तस्य चपेटादिना मुख- -सं० १४६१देवलवाटके सा० नाल्हाकारित पक्रादिकरणं संघविज्ञप्तेन श्रीविनयप्रभपाठकेन नद्यां सागरचंद्राचार्य स्थापितभ्यः कृताच्यादि कीलिकया चैत्ये कीलिती; पुण्यवीरमूर्तिरद्यापि देशविहारेभ्यः संघगणोन्नतिकारिभ्यो जेसलमेरो वर्तते । श्रीजिनपद्मसूरिः सं १४०० स्वः प्राप्तः उत्थापित क्षेत्रपालदर्शित तुर्यव्रतशंकया तैरेव पृथक्कृतेभ्यः श्रोजिनवर्धनमूरिभ्यः पीपलि- १५.श्रीजिनलब्धिसूरिः। नवलखाशाखाशं- यागणो जातः । गारः सैद्धान्तिकोऽवधानपूरको नागपुरे स्वर्ययौ। ततश्च वा०शीलचंद्रगणिपार्थे पठितानेकश्रुता १६. श्रीजिनचंद्रमूरिः । उद्यतविहारी भाणशोलियाग्रामे सा नाल्हाकारितनंद्यां साग- स्तंभतीर्थे सं० १४१४ स्वर्गतः। रचंद्राचार्यरेव स्थापिताः आयूगिरिनारजेसल- १७. श्रीजिनोदयमूरिः। माल्हूसारूदपाल- मेर्वादिषु प्रासादोपदेशकाः भावप्रभ-कीर्ति- धारलदेपुत्रः। समरनामा । प्रल्हादनपुरतो यज्ञ- रत्नाचार्यादि स्थापकाः भांडागारादि लेखकाः यात्रांकृत्वा भीमपल्लयां कीहभगिन्या सह श्रीजिनभद्रसूरयः कुंभलमेरौ सं० १५१४ स्वः गृहीत दीक्षः । सोमप्रभनामा। तरुणप्रभाचार्यतः प्राप्ताः । प्राप्तपदः। पंचतिथिकृतोपवासः । २८ साधुभिः २०. श्रीजिनचंद्रसूरयः। चम्मगोत्रीयाः। कृतसर्वदेशविहारः । क्रमेण शिष्यशिष्यणीसंघ- पत्तने सा० समरसिंह करितनंद्यां श्रीकी- पतिबाहुल्यकृत् कृताऽनेकपदस्थः सलपणपुरे तिरत्नाचाः स्थापिताः । अर्बुदाचले नवफण- १२ ग्रामाऽमारिघोषणाकारि। सुरत्राण सनापत पार्श्वप्रतिष्ठापकाः । श्रीधर्मरत्न-श्रीगुणरत्ना. देसलहरा सारंगस्पर्धया शत्रुजये यात्राकारी मह- चार्यादिमहापदकर्तारः कर्मग्रन्थवेत्तारश्च । ५० पत्तने।
॥ खरतरगच्छ पट्टारली-१ ॥ वर्षसर्वायुषः । स्वयंज्ञातावमाना जैसलमेरौ आचार्यायाः । ततो यहुकालं स्वगर्छ प्रभाव्य समभावस्तूपा अभुवन् सं० १५३७ । घर्ष ५७ सर्वायुपः श्रीपत्तने सं० १५८२ साव- २१. श्रीजिनसमुद्रमूरयः । परीक्षगोत्रे धाना एव स्वर्ययुः। वाग्भटमेरौ टेका देवलदेसुताः । पुंजपुरे मडपतः २३. तत्पट्टे श्रीजिनमाणिक्यसरयः। चोप- समागतः । मउठीया श्रीमालसोनपालकारित- डागोये स. राउलरयणादे तनयाः तरेवे(१) सं० नंद्या श्रीजिनचद्रसूरिस्थापिताः। साधितपच- १५८२ स्वहस्त कमल स्थापिता बलाहीदेवरा- नदिसोमरादियक्षाः। महाचारित्रिणोऽहम्मदा- जेन कृतमविस्तरनंदीमहसः । कृतगुर्जराधने- वादे स० १५५५ स्वर्ग ययुः। कदेशनिहाराः सस्थापितानेकोपाध्यायवाचना- २२, तत्पट्टे श्रीजिनहमसूरयः। सघनी- चार्यराः । सातिगया। ध्यानरलेन जेसल- मेघराज भार्या महिगलदे नदनाः। श्रीजेसल- मेर्वागतमुगलसैन्योपद्रवनिवारकाः । क्रमेण मेरी गृहीतदीक्षाः। तदनुक्रमेण स० १५५६ देवराजपुरस्थ श्रीजिनकुशलसरियानां विधाय ज्येष्ठसुदि ९ रवी श्रीनिक्रमपुरे मनीश्वरकर्म- परावर्तमाना देघराजपुरात् पचविंशति कोरो सिंहप्रेषिताः : कारणवशतः श्रीराजधान्यास्तर- स्वय दर्शितस्वोपद्रवाः कृत्वानशनाः तत्रैव स० प्रभूताः पीरोजीलक्ष १ व्ययनिर्मितमहावि- १६१२ वर्षे आपाढसुदि ५ स्वर्गलोक प्राप्ताः। स्तरनद्या श्रीशातिसागराचार्यदत्तरिमंत्रास्तदा २४. तत्पट्टे श्रीजिनचंद्रसूरयः । रीहडगोने नीमकालजलदयर्षणसतुष्टसर्वलोकेभ्यः प्राप्त- सा. सिरिवन्त सिरियादे सुताः। स० १५९५ श्लाघाः । पूर्व घा० धर्मरंगामिधाः श्री- जन्म । सं० १६०४ दीक्षा। सं० १६१२ वर्षे जिनहससूरयस्ते चाऽन्यदा आगरातो भ्रात- भाद्रपद ९ दिने गुरुवारे श्रीजेसलमेरुनगरे वेगराज पोमदत्तालंकृता स० ट्रगरसीप्रहिता राउल श्रीमालदेकृत महोत्सरे भट्टारक श्री. कारणेन विहरतःप्राप्ता आगरास्थाने।तरचतेन जिनचंद्रसूरिः स्थापितः । स० १६१३ वर्षे संमुसानीताऽनेकसिंधुरसर्वसंघमालक-उपरान- श्रीविक्रमनगरे चैत्रमासे सप्तमीदिने क्रियो- वाद्यमाननिःस्वनाद्यातोद्यादिविस्तारपूर्ण प्रवे- द्धारः कृतः। तेपा त्वेतेऽनदाताः श्रीफलुद्यां ता. शोत्सरे कृते पिशुनकृतविकृत्या पातिसाहि- द्य-चैत्यतालकोटघाटकृत, पुनः स०१६४३वर्षे शकदगऽऽदेशतो घालपुरे ३६ मासान् रोधेन वाद्य-धर्मसागरकृतग्रयच्छेदकृत, श्रीअकबर- रक्षिता अपि सध्यानरलेन समागतक्षेत्रपा- साहिप्रतिनोधकारी, तत् साहिवचसा युगप्रधा- लश्रीजेमलमेनीय सभवनाथाधिष्टायककृतसा- नपदधारी, स. १६५२ वर्षे नानगानीकृत हाय्याः तेनैव स्वय ५०० बदिजनैः सह महोत्सवेन पचनदीना साधकः। सिंधु१, वयप मुक्ताः स्थापितानेकपाठकनाचनाचार्याः प्र. २, पनाह ३, रावी ४, धारउ ५, इति पच तिष्ठानयकर्तारः । तदवसरे स. १५६६ नद्यः, तथा स्तभतीर्थे वर्प यावत् मीनरक्षाकृत , वर्षे नापि हेतुनातीतार्थशिरोमणिभिरपि श्रीज्येष्ठपर्वणि सर्वाष्ट दिनानि यावदमारि श्रीशातिमागराचार्यरेव स्थापिताः स्वशिष्याः प्रवर्तकः, श्रीशत्रुजयादि तीर्थपु चैत्यप्रतिमा श्रीजिनदेवमूरयः । तदच्छः पृथग जज्ञे वडा, प्रतिष्ठाकद, श्रीविक्रमपुरे ऋपमनिनादिप्रभूत- ..
१४ ॥ खरतरगच्छ पहावली-१ ॥ चिंचप्रतिष्ठा कृत:श्रीसाहिसलेमराज्ये ताधकृत श्री कोटिद्रव्यव्ययेन मंत्रिराज श्री कर्मचंद्रेण जिनशासनमालिन्यतः श्रीसाधुविहारो निपि- कृतनंदीमहोत्सवः श्रीलाभपुरे। तन्निर्वाणं तु द्धः साहिना तत्रावसरे श्रीउग्रसेनपुरे गत्वा साहिं श्रीमेदतटे सं० १६७४ वर्षे पोसवदि १३दिने । प्रतिबोध्य च साधूनां विहारः स्थिरीकृतः। २६.तत्पट्टे गुरुश्रीजिनराजसरिः। सं.१६७४ तदा लब्धसवाई युगप्रधान वडागुरुरितिविरुदो वर्षे फागुणसुदि ७ दिने संघपति श्री आसक- येन गुरुणा । एवमवदाता भूयांसः संति सुन- ऐन कृतनंदीमहोत्सवः । तस्मिन्नेव दिने श्री सिद्धाः। तेषां निर्वाणं श्रीबीलाडापुरे सं०१६७० जिनसागरसूरीणामाचार्यपदस्थापनेति । कीयत् वर्षे आसूवदि २ दिने स्तूपस्थापना । तस्य काले निर्वासिताः। श्रीमजिनराजमूरिः। वारके श्रीसागरचंद्रसूरिसंताने अनुक्रमेण भाव २७.तस्य पट्टे श्रीजिनरत्नमूरिः। श्रीजिनर- हर्षतूरयो निर्गता इति । लमूरिवारके श्रीरंगविजयो निर्वासितः । २५. तत्पट्टे श्रीजिनसिंहमूरिः। चोपडागोत्री २८. श्रीजिनचंद्रमूरिश्चिरं जीयात् ।। ।
॥ खरतरगच्छ पहावलो॥ [२] प्रणिपत्य जगन्नाथ र्धमानं जिनोत्तमम् । गुरूणा नामधेयानि लिस्यन्त स्त्रविशुद्धये ॥ १. इह तायद त्रिभुवनजनोपरा, सकलपापसंतापहर्ता, परमशिकरः, चरमतीर्थकरः, पञ्चमगतिगामी श्रीमहावीरस्वामी सजातः । स च इक्ष्याकुकुलममुद्भवः, काश्यपगोत्रीयः, क्षत्रियकुण्डग्रामनगराधीश्वरः, मिद्धार्थस्य रानः त्रिशलाराश्याच पुत्रः, चैत्र शु० दि० त्रयोदश्यां जातजन्मा । तस्य महावीरस्य चतुर्दशसहस्रपामताः साधवः, पत्रिंशत्सहस्रपमिताः साध्व्यः, एकोनपष्टि (५९) सहस्राधिकलक्षप्रमाणाः श्रारकाः, अष्टादशसहस्राधिकलक्षत्रयप्रमाणाः श्राविकाच वमूवुः । तथा पुनर्नव गच्छाः, एकादश गणधरा सजाताः । स भगवान् त्रिंगद् वर्षाणि यारत् गृहनामे स्थित्वा, एकपक्षाधिकानि सार्धद्वादश (१२) वर्षाणि छद्मस्थपर्या- यम्, पक्षाधिकपण्मासन्यूनानि निंशद् वर्षाणि केलिपर्याय च प्रपाल्य-सर्वायुर्द्विमप्तति (७२) वर्षाणि प्रयित्वा चतुर्थारकस्य त्रिषु वर्षेषु सार्धाष्टमासेषु शेपेषु विद्यमानेषु पापाया नगर्यो कार्तिकाऽमावास्याया मुस्तिं प्राप्तः । -सत्पद्दे गौतमस्वामी, स च इन्द्रमतिनामा गौतमगोनीयः, वसुभतिब्राह्मणस्य पृथ्ल्याच प्रामण्याः पुत्रः, पश्चाशद् वर्षाणि गृहवासे स्थित्ला, त्रिंशद् वणि छद्मस्थप- यिम्, द्वादश वर्षाणि केवलिपर्याय च प्रपाल्य-सर्वायुर्द्विनति (९२) वर्षाणि पूरयित्वा वीरनिर्वाणाद् द्वादशार्पव्यतिक्रम मोक्ष प्राप्तः। किञ्च, गौतमस्वामिदीक्षिताः सर्वेऽपि साधक केवलबान संप्राप्य मुक्तिमेर गताः न पश्चादेकोऽपि स्थितः तेन अग्रे गौतमस्वामिपरपरा न ध्यूढाः, अत एवाऽयं पट्टेषु न गम्यते । तथा 'पञ्चमारकमान्ते दुप्पसहमूरि याद मुधर्मणः परपरा स्पास्पति' इति वीरपास्याद् अपि मुधर्मस्वामिवर्जिन रंगणधरैनिन निजशिष्यस- न्तति सुधर्मस्वामिने समर्प्य अनशन कन्वा मुक्तिश्रीवा । इह परिनानीलत्तितश्चतुर्दश वर्षः अमालिनामा प्रथमो निनो जातः, तथा पोडश- चपलिप्यगुमनामा द्वितीयो निनो जातः । २. अथ वीरस्वामिपट्टे सुधर्मस्वामी सनातः, कोटाकामनासी, अग्निवेदपायनगोना, धम्मिनुस्य पितुभदिलायाय मातुः पुत्रः । पञ्चागद् (५०) पपीणि गृहे, द्विचत्वारिंशद (५२) चणि छद्मस्थभाने, अष्ट (८) वर्षाणि केलित्वे च स्थिन्त्रा-सापूर्वपंचतं (१००)प्रपाल्प पीरनिर्माणाद् विंशति (२०) वर्षव्यतिक्रमे शिरश्रियं प्राप। ३. नगरे श्रीजम्यूम्वामी, स च पञ्चमस्वर्गायुस्त्या राजगृहनगयां काश्यपगोत्रीय- समदत्तनामा गोष्ठी, धारणी भार्या, ठयोः पुनन्वेन उत्पन्नः । एकदा समये मुधर्मस्वामिपाई धर्म शुन्या, बैगम्प प्राप्प, पगृह पागन्य रात्री नवपरिणीता अष्टौ कन्याः प्रतिवोधयन्, शालोद्याटिनीविधामपर्म चारपतीपरिवृत बापं गृह प्रविष्टं प्रमवनानानं राबड़मार १६ । खरतरगच्छ पट्टावली-२॥ प्रतिबोधितवान् । ततः प्रभाते अष्टौ (८) कन्याः, अष्टौ (८) तासां मातरः, अष्टौ (८) च पितरः, स्वस्य मातापितरौ (२) च-एवं २६, तथा चौरपञ्चशतीसहितः प्रभवः (५०१)-सर्वे ( ५२७ ), तैः सह जम्बूकुमारो दीक्षां जग्राह । तथा नवनवति (९९) कोटिस्वर्णमुद्राणाम् , अष्टकन्यानां च परित्यागी बभूव । स च पोडश (१६) वर्षाणि गृहे, विंशति (२०) वर्षाणि छद्मस्थभावे, चतुश्चत्वारिंशद् (४४) वर्षाणि केवलिपर्याये च स्थित्वा-अशीतिवर्षाणि (८०) सर्वायुः प्रपाल्य, वीराच्चतुष्पष्टि (६४) वर्पव्यतिक्रमे मोक्षं गतः, चरमकेवली जातः । तथा जम्बूस्वामिनि मुक्ति गते दशवस्तुविच्छेदो जातः । तथाहि-१. मनः पर्यायज्ञानम्, २. परमावधिज्ञानम्, ३. पुलाकलब्धिः, ४. आहारकशरीरम्, ५. क्षपकश्रेणिः, ६. उपशमश्रेणिः, ७. जिनकाल्पमार्गः, ८. परिहारविशुद्धिः, सूक्ष्मसंपरायम्, यथाख्यातचरित्रम् , ९. केवलज्ञानम्, १०. सिद्धिगमनं चेति । ४. तत्पट्टे प्रभवस्वामी, स च जयपुरवासिनो विन्ध्यस्य राज्ञः पुत्रः, कात्यायनगोत्रीयः, त्रिंशद् (३०) वर्षाणि गृहे, चतुश्चत्वारिंशद् (४४) वर्षाणि सामान्यव्रते, एकादश (११) वर्षाणि आचार्यपदे स्थित्वा--सर्वायुः पञ्चाशीति (८५) वर्षाणि प्रपाल्य वीरात् पञ्चसप्तति (७५) वर्षव्यतिक्रमे स्वर्ग जगाम । ५. तत्पट्टे शय्यंभवसूरिः स च राजगृहवास्तव्यो वात्स्यगोत्रीयः, एकदा यज्ञ कुर्वन् श्रीप्रभव- स्वामिप्रेषितसाधुद्वयमुखाद 'अहो ! कष्टं २, तत्त्वं न ज्ञायते परम्' इति वचनं श्रुत्वा संजातसंशयः स्वगुरुं प्रति खड्गमुत्पाव्य तत्त्वं पप्रच्छ । तदानीं तेन गुरुणा प्रोक्तम् 'यज्ञस्तम्भस्य अधो वर्तमान शान्तिनाथविम्बमस्ति, इति तत्त्वम् ' ततस्तदर्शनाद् जैनधर्मे संजातरुचिः शय्यंभवभट्टः सगर्भा स्त्रियं मुक्त्वा प्रभवस्वामिपार्श्वे व्रतं जग्राह । क्रमेण 'योग्योऽयम्' इति ज्ञात्वा गुरुभिराचार्यपदे स्थापितः । अथ प्रश्चात् संजातजन्मनः, कदाचित् स्वपार्थे समागतस्य मनकनानो निजपुत्रस्य पण्मासावधि आयुर्ज्ञात्वा तन्निमित्तं सिद्धान्तादुद्धृत्य दशवैकालिकशास्त्रं कृतवान् , ततः संघान- हेण आगामिकालभाविप्राणिनामनुकम्पया च सूरिभिः स ग्रन्थो न पश्चात् प्रक्षिप्तः। तथा श्रीश- य्यभवसूरिरष्टाविंशति वर्षाणि गृहे, एकादश (११) वर्षाणि सामान्यव्रते, त्रयोविंशति (२३) वर्षाणि सूरिपदे स्थित्वा-सर्वायुर्द्विषष्टि (६२) वर्षाणि प्रपाल्य वीराद् अष्टानवति (९८) वर्षेः स्वर्गभार जातः। ६. तत्पढे श्रीयशोभद्रसूरिः, सच तुझीयायनगोत्रीयो द्वाविंशति (२२) वर्षाणि गृहे, चतु- दश (१४) वर्षाणि सामान्य व्रते, पञ्चाशद् (५०) वर्षाणि आचार्यपदे-सर्वायुः पडशीति (८६) वर्षाणि प्रपाल्य वीराद् अष्टचत्वारिंशदधिकैकशत (१४८) वर्षव्यतिक्रमे स्वर्गभाक् । ७. तत्पट्टे सप्तम श्रीसंभूतिविजयः, स च माठरगोत्रीयो द्विचत्वारिंशद् (४२) वर्षाणि गृहे, चत्वारिंशद् (४०) वर्षाणि सामान्यव्रते, अष्टौ (८) वर्षाणि युगप्रधानत्वे स्थित्वा सर्वायुर्नवति (९०) वर्षाणि प्रपाल्य वीरात् पट्पञ्चाशदधिकैकशन (१५६ ) वर्षातिक्रमे दिवं गतः । ८. तत्पट्टे द्वितीयो लघुगुरुनाता भद्रबाहुस्वामी तु प्राचीनगोत्रीयः, प्रतिष्ठानपुरवासी, तथा है " ॥ सरतरगा पट्टायली-२॥ व्यतरीमृताऽविनीतनिज-बन्धुवराहमिहिरकृतसंयोपद्रमनिवारणार्थमुपसर्गहरस्तोत्रकरणेन प्राच- नस्य महोपफारक, तथा पुनश्चतुर्दशपूर्ववित, कल्पसूत्र-आवश्यकनियुक्त्यादिप्रभूतग्रन्थकार- सजातः। स च पश्चचत्वारिंशद् (४५)वाणि गृहे, राप्तदश (१७) वर्षाणि सामान्यते, चतुर्दश १४ वर्षाणि युगप्रधानले स्थित्या-सर्वायुः पदमप्तति (७६) वर्षाणि प्रपाल्य वीरात् सप्तत्य- किगत (१७०) र्पव्यतिक्रमे स्वर्गमाम् । ९. नन्पट्टे नरमः स्थूलभद्रस्वामी, स च पाटलिपुरनगर ननमनन्दभूपस्य मन्त्री शकडाला; मार्या लालदेवी, तयोः पुत्रः, गीतमगोत्रीयः, कोश्याप्रतिरोधकः, सर्वजनप्रसिद्धः, चतुर्दश- पूर्णविदा चरमः, तत्र दश पूर्वाणि वस्तुद्वयेन न्यूनानि सूरतोऽयतश्च पपाठ, अन्त्यानि चत्वारि पूर्वाणि तु सूत्रतएर अघीवनान् नाऽथतः, इति वृद्धपाटः। स त्रिंशद (३०) वर्षाणि गृहे, विशति (२०) वर्षाणि सामान्यत्रते, एकोनपञ्चाशद् (१९) वर्षाणि मूरिपदे स्थित्वा-नानाति (९९) वर्षाणि मर्वायुः प्रपाल्य बीगद् एकोनविंशत्यधिकद्विशतः (२१९) स्वर्ग प्राप्तः । -अशान्तरे वीरनिर्वाणान् चतुर्दशाधिकद्विशत (२१४) वर्षः आपाटाचार्याद् अव्यक्तनामा तृतीयो निह्नो जातः । नया विंशत्यधिकद्विशत (२२०) वपरश्चमिजाद सामुच्छेदिकनामा चतुर्थो निनः । तथा पुनरष्टाकिंगतिअधिकद्विशत (२२८) वः गणनामा एकस्मिन् समयेऽनेकक्रियोपयोगवादी पञ्चमो निनोऽभूत् । १०. तत्पढे दशम आर्यमहागिरिः, एलापत्यगोत्रीयो जिनकल्पिकतूलनामारूढः, पुनस्त्रिंशद् (३०) वणि गृहे, चत्वारिंशद् (४०) वर्षाणि सामान्यग्रते, निंगद् (३०) वर्षाणि हरिपदे- सर्वायुर्वर्पशत (१००) अपाल्य स्वर्गमार । ११. तत्पट्टे आर्यनुहस्तिदरिः। यामिष्ठगोत्रीयः। तेन किल भरेद्रमशीभूतः सप्रतिजीनः प्रत्राज्य निखण्डाधिपतित्व प्रापितः, येन मप्रतिना श्रीरात् पश्चशिदधिकद्विशतर्फ राजपदं प्राप्य मपादलक्षप्रनिमा-नगीनजिनप्रासादाः काग्निाः, सपाटकोटिपिम्बानि फारयित्वा प्रतिष्ठा- पितानि, प्रयोदशसहनप्रमितजीर्णोद्धाराः कारिताः, पचनातिसहस्रप्रमाणाः पित्तलकाः प्रतिमा: कारिताः, ममातानि मनागाग मण्डिताः, द्विसहमप्रमिता धर्मशालाः कारिताः, पुनर्यः प्रति. दिन नवीनोत्पादितत्यपर्धापनित श्रुत्वा दन्तधावन कृतवान् । किंबहुनोक्तेन, परिसण्डा- मपि मेदिनी जिनगृहप्रतिमादिभिर्मण्डितामकरोत् । तथा माधुरोपधारिनिजरिरजनप्रेपणेन अनादेशेऽपि माधुपिहार फारितवान् । श्रीश्रेणिकस्स गनः सप्तदो पट्टे मजातः । तथा श्रीगु- पभिरन्येऽपि जयन्तीमुहमालाया यहनो मन्याः प्रतियोषिताः। ते च गुप्तः किंग (३०) पाणि गूढे, चतुपाने (२४) मामान्यनते, पट्चत्वारिंशत् (४६) वर्षाणि गरिपदे-गापुरेक पर्पशन (१००) प्रमान्य श्रीरात पत्रात्यधिकशताये (२६५) व्यनिझान्ने वर्गमानो जाता। १२. भीमार्ग हस्तिपढे श्रीन्धित रिस पोटिग्मिन्यवापान् पोटिका, पुनः सामन्यां नगपा बानत्वात् 'पारदिकः' इति पिदमा विशपनाम । तथा यामापत्य- गोत्रीचा म प एगिर (३१) वालिद, समश (१७)गि मामान्मयते, अवसाधिदे " || खरतरगच्छ पट्टावली-२ ॥ (४८) वर्षाणि सूरिपदे-सर्वायुः षण्णवति (९६) वर्षाणि प्रपाल्य वीरात् त्रयोदशाधिकवर्षशतत्रये (३१३) व्यतीते स्वर्गभाग जातः । तत एव अस्माकं संप्रदायः 'कोटिकगच्छः' इति प्रसिद्धः। १३. सुस्थित सूरिपट्टे इन्द्रदिन्नसूरिः १४. तत्पट्टे श्रीदिन्नसूरिः। १५. तत्पट्टे श्रीसिंहगिरिर्जातिस्मरणज्ञानवान् । -अत्रान्तरे पादलिप्ताचार्यों वृद्धवादिसूरिश्च वभुवतुः, तथा सिद्धसेनदिवाकरोऽप्यासीत्, येन उज्जयिन्यां महाकालप्रासादे रुद्रलिङ्ग स्फोटयित्वा कल्याणमन्दिरस्तवेन पार्श्वनाथबिम्ब प्रकटीकृतम् । विक्रमादित्यश्च प्रतिबोधितः । विक्रमराज्यं तु श्रीवीरात् सप्तत्यधिकवर्षशतचतुष्टये (४७०) व्यतीते संजातम् । विक्रमादित्यराजा वीरात (४७०) वर्षे जातः । १६.तत्पट्टे श्रीवास्वामी,यो वाल्यादपि जातिस्मरणभाक्,गौतमगोत्रीयः,तुम्बवनग्रामवासी धनगिरि-सुनन्दयोः पुत्रः, श्रीसिंहगिरिसूरीणां हस्ताद् दीक्षां गृहीत्वा, तत्पार्थे एकादशाङ्गानि अधीत्य, द्वादशस्य दृष्टिवादाङ्गस्य अध्ययनाय दशपुराद् उञ्जयिन्यां श्रीभद्रगुप्ताचार्यसमीपं ययौ। तत्र गुरुभिर्दश पूर्वाणि पाठितानि । पुनर्य आकाशगामिविद्यया संघरक्षाकृत, दक्षिणस्यां दिशि बौद्धराज्ये जिनेन्द्रपूजानिमित्तं पुण्याद्यानयनेन प्रवचनप्रभावनाकृत, देवाऽभिवन्दितः, दशपूर्ववि- दामपश्चिमः, तथा पण्णवत्यधिकचतुश्शत (४९६) वर्षान्ते जातः, अष्टौ वर्षाणि गृहे, चतुश्चत्वा- रिंशद् (४४) वर्षाणि सामान्यत्रते, पट्त्रिंशद् (३६)वर्षाणि सूरिपदे-सर्वायुरष्टाशीति (८८) वर्षाणि प्रपाल्य श्रीवीरात् चतुरशीतिअधिकपञ्चशत (५८४)वर्यान्ते स्वर्गभाक् । इतो घजशाखा संजाता। तथा वज्रस्वामितो दशपूर्व-चतुर्थसंहननादिव्युच्छेदः । अत्र श्रीवीरात् (५४४) वर्षे रोहगुप्तात् त्रैराशिकः पष्ठो निह्नवो जातः । -तथा वीरात् सपादपञ्चशतवतिक्रमे (५२५) शत्रुञ्जयोच्छेदो जातः, ततः सप्तत्य- धिकपञ्चशत (५७०) वर्जावडोद्धारोऽभूत् । १७. तत्पट्टे श्रीवज्रसेनाचार्यः,स च उत्कोशिकगोत्रीयः। एकदा द्वादशदुर्भिक्षान्ते श्रीवज- स्वामिवचनात् सोपारके गत्वा जिनदत्तश्रेष्ठी, तद्भार्या ईश्वरीनाम्नी, तया लक्षमूल्येन धान्यमानीय पाकार्थमग्नौ स्थापितायां हण्डिकायां विपनिक्षेप क्रियमाणं दृष्ट्वा, ‘प्रातः सुकालो भावी' इत्यु- क्त्या विपनिक्षेप निवार्य नागेन्द्र-चन्द्र-निवृति-विद्याधर-नामकांश्चतुरः सकुटुम्बानिभ्यपुत्रान् प्रवाजितवान् । तेभ्यश्च स्वस्वनामाङ्कितानि चत्वारि कुलानि जातानि। स श्रीवज्रसेनसूरिः प्रान्ते चन्द्रमुनि स्वपदे निदेश्य, अनशनं च विधाय स्वर्गभाक् । १८.तत्पट्टे श्रीचन्द्रसूरिस च सप्तत्रिंश (३७)वर्षाणिगृहे,त्रयोविंशति(२३)वर्षाणिसामन्य- व्रते, सत (७)वर्षाणि सरिपदे-सर्वायुः सप्तपष्टिवर्षाणि(६७) प्रपाल्य स्वर्गभाक् । इतश्चान्द्रकुलमिति प्रसिद्धन्, अत एवाऽस्माकं गच्छेऽधुनाऽपि वृहद्दीक्षावसरे "अम्हाणं कोडिओ गणो, वयरी साहा, चं। कुलं, अमुगगगनायगा, अनुगमहोज्झाया संति, महत्तरा नत्थि' इति पाठं नवीनशिष्य प्रति आचार्यपास्थिता वृद्धाः भावन्ति ' इति संप्रदायः । " - । खरतरगच्छ पट्टावल्ली-१ ॥ --अवाऽवसरे श्रीआर्यरक्षितसूरिर्महाप्रभावका संजाता, स च दशपुरनगरे सोमदेवः पुरो- हितः, रुद्रसमा भार्या, तयोः पुत्रः साधिकनवपूर्वाणि वजस्वामितोऽधीत्य निजकुटुम्ब समग्रमपि प्रतिनीध्य जिनशासनप्रभावनाकृतातः । तच्छिप्यः श्रीदुर्वलिकापुप्यमित्रपरिर्वभूव । अत्रान्तरे वारा (५८४) वर्षे गोष्ठामाहिल: सप्तमो निह्नवो जातः । तथा (६०९) पैदिगम्बरोत्पत्तिः । १९. ततः श्रीसमन्तभद्रसूरिर्वनवासी । २०. ततः श्रीदेवसूरिर्वृद्धः । २१. ततः श्रीप्रद्योतनसूरिः। २२. ततः श्रीमानदेवसूरिः शान्तिस्तवकर्ता । २३. ततः श्रीमानतुङ्गसूरिभक्तामर-भयहरणस्तोत्रयोः कर्ता ।२४. ततः श्रीवारसूरिजर्जात: --आन्तरे श्रीदेवद्धिंगणिक्षमाश्रमणो महाप्रभावको जातः, स च वीरात् अशीत्यधिक- नवशतवः (९८०) वल्लभीनगर्या समस्तसाधुमीलनेन समिद्धान्तलेखकारी । देवा याषद् एक पूर्व स्थितमिति वृद्धसंप्रदायः। -पुनस्तदैव श्रीकालिकाचार्यों जातः, स च वीरवाक्याद् भाद्रपदशुक्लपश्चमीतचतुर्थ्या श्रीपर्युषणापर्व जानीतवान्, ततएवाऽद्यापि चतुरशीतिगच्छेषु चतुर्थ्यां सावत्सरिकप्रतिक्रमण क्रियते । अय च वीगत निनवत्यधिकनवशतवः (९९३), तथा विक्रमसंवत्सरात् प्रयोविं- शत्यधिकपञ्चशतवः (५२३) सजातः । -पुनः कालिकाचार्यद्वयं प्राग् जातम्, तत्राऽऽद्यः प्रज्ञापनाकृद् इन्द्रस्याग्रे निगोदविचा- रवक्ता श्यामाचार्यापरनामा, स तु वीराद (३७६)वपेर्जातः । द्वितीयो गर्दभिल्लोच्छेदकः, स तु वीरा (१५३) वर्षेतिः। -पुनस्तदैव श्रीजिनभद्रगणिक्षमाश्रमणो जातः, स च विशपावश्यकादिभाप्यकर्ता । ताच्छिष्यः शीलाझाचार्यः प्रथम-द्वितीयाङ्गवृत्तिकृत् । तदैव पुनः श्रीहरिभद्रसूरिनभूष, स च जात्या ब्रामणः, सर्वशास्त्रपारगः सन् प्रतिज्ञा चक्रे ' यदुक्तस्यार्थमह न वेमि तच्छिप्यो भनामि' इति । तत एकदा साध्वीमुखाद् एका गाथा श्रुत्वा तदर्थमनवध्यमानः प्रतिज्ञावगात् साध्वीदर्शितगुरु- समीपे व्रत जग्राह । जनशास्त्राण्यपि साणि अधीत्य आचार्यत्व प्राप्तः। तस्य हस-परमह- सनामानी वी शिष्यी परशासनरहस्यग्रहणार्थ घौद्धाचार्यसमीप गती, तनाऽध्ययन कृत्या, स्वपुस्तकं गृहीत्वा स्थान प्रत्यगच्छन्ती 'ती जैनौ' इति ज्ञात्वा पश्चादागतसैद्धारिती । अयैतत् स्वरूप विनाय कोपाक्रान्तेन गुरुणा तप्तवैलपूरित कटाह स्थापयित्वा मन्त्रलायतुइ- त्वारिंशदधिकचतुर्दशशत (१४४४) बौद्धा आकर्षिताः, तदानीं याकिनीमहत्तरावचनैःको- पादुपशान्तेन गुरणा बौद्धा मुक्ताः। ततः पापशुद्धयर्थमाकर्पिताद्धप्रमाणानि (१४४४) पूजाप- शाशकादिप्रकरणानि कृतानि । एवविधाः श्रीहरिभद्रसूरयो जाताः । २५ ततः (श्रीवीरसरिपट्टे) श्रीजयदेवमूरिः । २६. ततः श्रीदेवानन्दसूरिः। २७. ततः श्रीनिक्रममूरिः। २८ ततः श्रीनरसिंहमूरिः । २९. ततः श्रीसमुद्रसूरिः। ३०. ततः श्रीमानदेवमूरि। ३१. ततः श्रीवियुधप्रभसूरिः । ३२. ततः श्रीजयानन्दसूरिः। . + || खरतरगचा पट्टापली--- ।। - ३३. ततः श्रीरविप्रभसूरिः। ३४, ततः श्रीयशोभद्रसूरिः । ३५. ततः श्रीविमलचन्द्रसूरिः। ३६, तत्पट्टे श्रीदेवसूरिः । -तस्य च सुविहितमार्गाचरणात् 'सुविहितपक्षगच्छ' इति प्रसिद्धिर्जाता । ३७. तत्पट्टे नेमिचन्द्रसूरिः। ३८. तत्पट्टे उद्द्योतनमूरिः। -अस्माचतुरशीतिगच्छस्थापना जाता। तत्स्वरूपं यथा-एकदा श्रीउद्द्योतनसूरिं महा विद्वांसं शुद्धक्रियापात्रं च विज्ञाय अपरेषांव्यशीति (८३) संख्यानां स्थविराणां व्यशीतिशिष्याः पउनार्थ समागताः, तान् श्रीगुरुः सद्रीत्या पाठयति स्म । तस्मिन्नवसरे अम्भोहरदेशे स्थविरम- पडल्यां वृद्धस्य जिनचन्द्राचार्यस्य चैत्यवासिनः शिष्यो वर्धमाननामा सिद्धान्तमवगाहमानश्चतु- रशीत्या (८४) ऽऽशातनाधिकारे आगते सति गुरुं प्रत्येवमुक्तवान्-'भोः! स्वामिन् ! चैत्ये निवसतामस्माकमाशातना न टलति, ततोऽयं व्यवहारो मे न रोचते' इत्युक्तं श्रुत्वा गुरुणा यथा यथा विप्रतारितोऽपि अयं स्वश्रद्धातो न परिभ्रष्टः । ततः श्रीउद्योतनसूरि शुद्धक्रियावन्तं श्रुत्वा तत्पार्थे समागत्य तस्यैव शिष्यो जातः, तदुपसंपदं च गृहीतवान् । ततः श्रीगुरुभिर्यो- गादिकं वाहयित्वा सर्वे सिद्धान्ताः पाठिताः, क्रमेण - योग्यं ज्ञात्वाऽऽचार्यपदं दत्वा, गच्छवृद्धयादिलाभ विज्ञाय उत्तराखण्डे विहारार्थमाज्ञा दत्ता। ततो वर्धमानाचार्योऽपि गुर्वादेश स्वीकृत्य तत्र गतः। अथ श्रीउद्द्योतनसूरिस्त्र्यशीति (८३) शिष्यपरिवृतो मालवकदेशात् संघेन साधं शत्रुजये गत्वा ऋषभेश्वरमभिवन्ध पश्चाद् वलमानो रात्री सिद्धवड- स्याधोभागे स्थितः, तत्र मध्यरात्रिसमये आकाशे शकटमध्ये बृहस्पतिप्रवेशं विलोक्य एवमुक्त- वान्-' साम्प्रतमीदृशी वेला वर्तते, यतो यस्य मस्तके हस्तः क्रियते स प्रसिद्धिमान् भवति । अथैतत् श्रुत्वा व्यशीत्याऽपि शिष्यैरुक्तम्-' स्वामिन् ! वयं भवतां शिष्याः स्मः, यूयमस्माकं विद्यागुरवः, ततोऽस्मदुपरि कृपां विधाय हस्तः क्रियताम् । । ततो गुरुभिरुक्तम्-'वासचूर्ण- मानीयताम् ' । तदा तैः शिष्यैः काष्ठच्छगणादिचूर्ण कृत्वा गुरुभ्य आनीय दत्तम् , गुरुभिरपि तच्चूर्ण मन्त्रयित्वा त्र्यशीतेः शिष्याणां मस्तके निक्षिप्तम्, ततः प्रभाते श्रीगुरुभिः स्वस्य अल्पायुर्ज्ञात्वा तत्रैव अनशनं कृत्वा स्वर्गतिः प्राप्ता। अथ ते त्र्यशीतिरपि शिष्याः आचार्यपदं प्राप्य पृथग् विहारं चक्रुः । अथैकः स्वशिप्यो वर्धमानसूरिः, त्र्यशीतिश्च इमेऽन्यदीयाः शिष्याः -एवं चतुरशीतिगच्छाः संजाताः । ३९. उड्योतनसूरिपट्टे श्रीवर्धमानसूरिः स च षण्मासान् यावद् आचाम्लतपः कृत्वा,धरणेन्द्र समाराध्य, श्रीसीमन्धरस्वामिपाधै तं प्रेष्य सूरिमन्त्रं शुद्धं कारितवान् । तथा पुनरेकदा विहारं कुर्वन् सरसाख्ये पत्तने समाययौ । तस्मिन्नवसरे सोमब्राह्मणस्य द्वौ पुत्रौ शिवेश्वर-बुद्धिसागर- नामानौ, एका च कल्याणवतीनाम्नी पुत्री, एवं त्रयोऽप्येते सोमेश्वरमहादेवस्य यात्रार्थ गच्छन्तः सरसाभिधाने पत्तने समाजग्मुः, तत्र सरस्वत्यां नद्यां स्नात्वा रात्रौ तत्रैव सुप्ताः, ततोऽर्धरा- त्रिवलायां सोमेश्वरदेवः प्रादुर्भूय तेभ्य इत्युवाच-'भोः ! प्रसन्नोऽहम् , मार्गयत मनोवाञ्छितं वरम् ततस्तै।कुण्ठे याचिते स प्राह-'भो ! ममाऽपि वैकुण्ठं नास्ति, ततो भवद्भयः कुतो ददामि, - .
- - ॥ खरतरगच्च पहावली-१॥ १ पर यदि भवतां वैकुण्ठेच्छास्ति, तर्हि श्रीवर्धमानमूरेश्वरणसेवा कार्या, स एव एको वैकुण्ठदाता- स्ति' इत्युक्त्वा देवोऽदृश्यो वभूर। ततः प्रातःकाले ते त्रयोऽपि जना नद्या स्नात्ता उपाय- मागत्य च गुरुम्यो वैकुण्ठममार्गयन् । ततो गुरुभिरपि एकस्य भ्रातुर्मस्तकशिसाया स्थिवां मत्सी दर्शयिन्या, दयामयं श्रीजिनधर्म द्योतयित्वा सर्वसिद्धान्तपारगा कृताः। शिवेश्वरस्य जिनेश्वर इति नाम कृतम् । एकदा जिनेश्वरेण उस्तम्-'स्वामिन् ! यदि गुर्जरदेशे गम्यते तदा भूयसी धर्मोन्नतिः स्यात् ।। ततो गुरुभिरुक्तम्-'तर हीनाचारिणामसयमिनों चैत्य- वासिना नहुः प्रचारोऽस्ति, ते उपद्रवं कुर्युः, ततस्तर न गम्यते ।' तढा पुनर्जिनेश्वरेण उक्तम्-'स्वामिन् ! यूकामयात् किं वस्त्र परित्यज्यते, ततो मधम्, बुद्धिमागराय च तत्र गमनार्थमात्रा दीयताम् । अथ गुरुभिरपि एतत् श्रुत्वा जिनेश्वर--बुद्धिसागराम्यामाचार्यपद दत्वा गुर्जरदेश प्रति विहाराज्ञा दत्ता । तावपि गुर्वाज्ञया त देश प्रति विहार चक्रतुः । तथा गुरुभिः कल्याणपती साध्वी महत्तरा कृता । तथा पुनः श्रीवर्धमानसूरिमिस्त्रयोदशसुरनाणच्छ- पोद्दालक-चन्द्रावतीनगरीस्थापक-पोवाडज्ञातीय-श्रीविमलमन्त्रिण प्रतिगोध्य श्रीअर्बुदाचले छिन्नजैनतीर्थस्य पुनः प्रवृत्त्यर्थमुपदेशो दत्तः पर तनत्याह्मणैरुक्तम्- ' इदमस्माक तीर्थ- मास्ति, अत्र जिनप्रासादो न भवति' इति । ततो गुरुभिः पुप्पमाला मन्त्रयित्वा, विमलमन्त्रिणे दत्वा च प्रोक्तम्-'भो ! मन्त्रिन् । ब्राह्मणकन्याहस्ते इमां माला प्रदाय ब्राह्मणानामग्रे इति वक्तव्यम्-'अस्मिन् पर्वते य भूमी एपा माला पतति, तर अस्माक तीर्थमस्ति ।' अथ मन्त्रिणा यया गुरुमिरुक्त तथैर कृतम् । ततश्च या माला पतिता तत्र कलश-झलयादिपूजोपकरणसहित प्रतिमानय प्रादुर्भूतम्-तका वज्रमयी श्रीआदिनाथप्रतिमा, देतीया अम्बिकामतिः, तृतीया घालीनाथक्षेत्रपालमूर्तिः-इति । अथैन कृतऽपि ब्राह्मणैः पुनरुक्तम्-'भवता देवोऽस्ति,पर देवगृह नास्ति, ततो देवस्यन पूजा कार्या, देवगृह तु न कारयि- तव्यम् '-इति । तदानिमलमन्त्रिणा द्रव्यमलेन विप्रा वशीकृताः, स्वर्णमुद्रास्तरण निधाय भूमि गृहीत्वा तत्र ऋषभदेवप्रामादः कारितः । अष्टादशकोटि-त्रिपञ्चाशल्लक्षामित द्रव्य व्ययीकृतम् । वत्र अद्यापि 'विमलवसही' इति प्रसिद्धिरस्ति । ततः श्रीवर्धमानसूरिः म० १०८८ प्रतिष्ठा कृत्वा प्रान्तेऽनशन गृहीत्वा स्वगं गतः । ४०. तत्पट्टे श्रीजिनेश्वरसूरिः, स च बुद्धिसागरण माघ मरुदेशाद् निहार कृत्वा अनुक्रमेण गुर्जरदेशे अणहिल्लपुरपत्तने समागतः । तत्र दुर्लभराजस्य पुरोहितः शिवशानामा ब्राह्मणः स्वमातुलोऽस्ति, तद्गृह प्राप्तः । अथ सपियो नट्टन्छानान् तर्क-व्याकरणादि शास्त्राणि पाठयन् एकस्य वेदपदस्य अशुद्धमर्थमुवाच । तदा श्रीजिनेश्वरमूगिमः प्रोक्तम् 'अस्य पदस्य अयमों न भवति, मादिः कथमित्य पाठयते । तदा विप्रेण उक्तम्-'भवता वेदार्थपरिज्ञान कुतः ? चेद् भवेत् तर्हि भाइरेव अस्य अर्थो वाच्य' इति । अथैतद् वचः श्रुत्वा गुरुभिर्ये केपि पुरो- हितस्य सदेहा अभूवन् ते सर्वेऽपि निरस्ताः । ततः पुरोहितेन पृष्टम्-'को भवता निनासः ? कर भरतः पिता?' इति । तदा गुरुमिवाराणमी नगरी, सोमदत्तत्राह्मणव प्रोक्तम् । तदा , . , १२ । खरतरंग पटविली.३ ।। तेन ज्ञातम् एतौ मम भागिनेयौ, ततश्च बहुमानपुरस्सर स्वगृहे राक्षतौ । अथैषा वार्ता चैत्यषा- सिभिः श्रुता, चिन्तितं च स्वचित्ते यतो जिनेश्वरसूरिरत्राऽऽगतोऽस्ति, स तु संवेगरणनि- मनगाना परमशुद्धक्रियापात्रमस्ति, वयं तु शिथिला हीनाचारिणः स्मः, ततोऽयं केनाऽपि प्रकारणे नगराद निष्कासनीयः, अन्यथाऽस्माकं निन्दा भविष्यति, इत्येवं विचिन्त्य कियाद्रि- चैत्यवासिभिः संभूय दुर्लभनृयाय प्रोक्तम्-'महाराज ! अस्मिन् पुरे दिल्लीतो ग्रन्थिच्छोटकाः समागताः सन्ति, ते च भवत्पुरोहितस्य गृहे तिष्ठन्ति' । अथ राज्ञा एतद् वाक्यं श्रुत्वा पुरोहित- माहूय पृष्टम्-'भवद्गृहे चौरा आगताः श्रूयन्ते' । तेनोक्तम्-'राजन् ! मद्गृहे तु शुद्धाचारवन्तः, सन्मार्गसंचारिणो मुनीश्वराः सन्ति, न चौराः। किंतु ये केऽपि तेषु चौरव्यपदेशं कुर्वन्ति त एव चौराः । तदा राज्ञा आचारदर्शनार्थ जिनेश्वरसूरय आहूताः, आगता गुरबो राजसभायाम् , आस्तृतं वस्त्रं दूरीकृत्य, रजोहरणेन भूमि प्रमाय, ईर्यापथिकी प्रतिक्रम्य, स्वकम्बलमास्तीर्य स्थिताः। अथैतत् सद्गुर्वालोकनाद् आनन्दितेन राज्ञा उक्तम्-' सन्मार्गधारका एवंविधा एंव भवन्ति' । तथा पुनर्भूपेन एतेभ्यो विरुद्धं चैत्यवासिनामाचारं दृष्ट्वा गुरुभ्यो मुनीनामाचारः पृष्टः । तदा जिनेश्वरसूरिभिः प्रोक्तम्-'अस्माभिर्मुखात् किं कथ्यते, भवतां देवाधिष्ठितं सरस्वतीभाण्डागारमस्ति, तत्र सर्वमतस्वरूपनिवेदकानि पुस्तकानि सन्ति, ततो निर्म- लजलेन कृतस्नानां कुमारी कन्यकां संप्रेप्य भाण्डागारात् पुस्तकमानायितव्यम् । तदा राज्ञा तथैव कृते सति दशवैकालिकपुस्तकं कन्याया हस्ते आगतम्, तच राजसभायामानीतम्, ततो गुरुभिः प्रोक्तम्-'इदं पुस्तकमेतेषां चैत्यवासिनामेव हस्ते देयम् , एते एव वाचयन्तु ' ततो । वाच- यद्भिस्तैः साध्वाचारपत्राणि मुक्तानि, तदानीं गुरुभिरुक्तम्- 'राजसभायां दिवसे चौर्य जायते। राज्ञा पृष्टम्-'तत् कथम्?' तदा तैरुक्तम्-'एभिः पत्राणि मुक्तानि !' राज्ञोक्तम्-'तर्हि यूयमेव वाच- यत'। गुरुभिरुक्तम्-'नाऽत्र अस्माकं कार्यम् , पक्षपातरहितैाह्मणैर्वाचनीयम् । ततो ब्राह्मणेभ्यः पुस्तके दत्ते सति तैयथार्थ वाचितम् । तदा शास्त्राऽविरुद्धाचारदर्शनेन जिनेश्वरसूरिमुद्दिश्य 'अतिखराः' इति राज्ञा प्रोक्तम् । ततः 'खरतर' विरुदं लब्धम् । तथा चैत्यवासिनो हि पराजय- प्रापणात् 'कुंवला।' इति नामधेयं प्राप्ताः। एवं सुविहितपक्षधारकाः जिनेश्वरसूरयो विक्रमतः१०८० वर्षेः 'खरतर' विरुदधारका जाताः । तथा पुनरेकदा मरुदेवीनाम्नी साध्वी चत्वारिंशद् दिनानि यावदनशनं कृतवती, प्रान्ते निर्जरां कारयद्भिर्जिनेश्वरसूरिभिरुक्तम्-'स्वकीयमुत्पत्तिस्थानं ज्ञाप- नीयम्' ततः सा गुरुवचः स्वीकृत्य, कालं कृत्वा देवपदं प्राप्ता। अथैकदास देवः सीमन्धरस्वा- मिवन्दनार्थ गच्छन् ब्रह्मशान्तियक्षं प्रत्युवाच-'भवता जिनेश्वरसूरीणां पार्वे गत्वा 'मसट सट' इत्येतानि पञ्चाक्षराणिकयनीयानि, एपामर्थ स्वयमेव गुरवो ज्ञास्यन्ति'--इति । तदा यक्षेणाऽऽगत्य तान्यक्षराणि कथितानि, ततो गुरुभिस्तेषामों निगदितः । तद्यथा- मरुदेवी नाम अजा गणिनी जा आसि:तुम गच्छम्मि । सम्गम्मि गया पढमे देवो जाओ महड्डीओ ॥ - - .
॥ सरतरगच्छ पट्टावली-२॥ टकलयम्मि निमाणे दो सागरआउसो समुप्पण्णो । समणेसस्म जिणेसरसरिस्स इम कहिज्जासु ॥ टकउरे जिणान्दणनिमित्तामहागएण देवेण । चरणम्मि उञ्जमो भो कायव्यो किं च सेसेहिं ।। एवंविधाः श्रीजिनेश्वरसूरयः प्रान्तेऽनशन कृत्वा स्वर्ग गताः। ४१.तत्पट्टे एकचत्वारिंशत्तमः श्रीजिनचन्द्रसूरिः, स च सगरगशालाप्रकरणकर्ता। तथा पुनरेकदा दिल्लीनगरे समागतः, तर 'स्व दिल्लीपतिर्भविष्यसि' इति प्रागुक्त-गुरुवचनस्मरणात सप्राप्तनिवेकेन मौजदीनसुरत्राणेन प्रवेशोत्सवः कृतः, तथा धनपालश्रीमालगृहे निवासः कारितः। तदानी धनपालः श्रावको बभून, तत्सम्बधिनोऽन्येऽपि बहवः श्रीमालगोत्रीयाः श्राद्धाः प्रतिगो- धिताः,केचिदन्यज्ञातीयराज्याधिकारिणोऽपि भाद्वाः जाताः,तेभ्यः पातिसाहिना बहु महत्त्व दत्तम् , ततस्तेषां 'महतीयाण' इति गोत्रस्थापना कृता । तद्गोत्रीयाः श्रावकाः 'जिन नमामि, वा जिन- चन्द्रगुरुं नमामि, नान्यम्' इति प्रतिज्ञापन्तो बभूवुः । एवंविधाः श्रीजिनचन्द्ररयो महाप्रभवका जाताः। तदैव च पद्मावत्या प्रत्यक्षीभूय प्रोक्तम्-'चतुर्थपट्टे सातिशयं 'जिनचन्द्र' इति नाम दातव्यमिति' । तत एवेयं व्यवस्था जाता । ४२. तत्पट्टे द्विचत्वारिंशत्तमः श्रीअभयदेवमूरिः, स च जिनचन्द्रसूरीणा लघुगुरुभ्राता, परमसंवेगी च संजातः। तत्संबन्धो यथा-धारापुर्या धननामा श्रेष्ठी,तद्भार्या धनदेवी, ततोऽमय- कुमारनामा पुत्रो जातः । स चैकदा जिनेश्वरसूरीणा पार्श्वे धर्म श्रुत्वा प्रतिबुद्धः दीक्षा च जग्राह । क्रमेण सकलशास्त्राऽध्ययनेन गीतार्थो जातः, आ चार्यपद च प्राप्तः। तत एकदा व्याख्याने शृङ्गारादिनवरसान पोपितवान् तदा समा सर्वाऽपि आनन्दातिशयसपन्ना जाता। परं गुरुभिरेकान्ते उपालम्मो दत्तः । ततोऽभयदेवसूरिणाऽऽत्मशुद्धयर्थं प्रायश्चित्ते याचिते गुरुभिरुक्तम्-'तक्रोपर्या- ऽऽगतजलेन ठुमरकेण च षण्मासी यावद् आचाम्लतपः कार्यम् । तदा पापभीरुणा अभयदेवसूरिणा गुरुवचसा तथैव कृतम्-पडपि विकृतयः परित्यक्ताः। परमत्यन्तनीरसाहारकरणात प्राक्तनकोद- याच शरीरे गलत्कुष्ठरोगः समुत्पन्नः। तथापि औपधं न करोति। ततः प्रवृद्धो रोगः, तदा अनश नचिकीर्षया गुरवः सघाग्रहेण धरलकाऽभिधाने नगरे प्राप्ताः। अथ त्रयोदश्या अर्धरात्रे शासनदे- वतया प्रकटीभूय प्रोक्तम्-'स्वामिन् । नवैता सूत्रकुस्फुटिका उन्मोहयो भगवानाह-'कराङ्गुलि- गलनाद उन्मोहयितुं न शक्नोमि। तदा देवी प्राह-'अद्याऽपि त्वं चिरकाल वीरतीर्थ प्रभावयि- प्यसि, नाङ्गीत्तिं च विधास्यमि । ततो रोगगमनोपायं शृणु-स्तम्भनकपुरसमीपे सेढिकानदी- तीरे सखरपलाशतले श्रीपार्श्वनाथप्रतिमाऽस्ति, तत्र प्रत्यहमेका गौः समागत्य प्रतिमामूर्भि क्षीर क्षरति । तत्र सधेन सार्घ गत्वा स्तुतिः कर्तव्या । प्रतिमा प्रादुर्भविष्यति, तत्स्नात्रजलेन नीर शरीर भविष्यति' इत्युक्त्वा देवी अदृश्या बभूव । ततः प्रातः काले प्रत्यासन्ननगर- ग्रामेम्पः समागतेन तद्ग्रामवासिना च श्रारफमधेन साधं तत्र गत्वा 'जय तिहुयण ' इत्यादि नमस्कारद्वात्रिंशिका कृता । तर यावता 'फणफणकार' इत्यादि पोडशकाव्येन स्तुतिः ६४ । खरतरगच्छ पट्टावली-२ ॥ प्रारब्धा, तावता पार्श्वप्रतिमा प्रकटीवभूव । ततः श्रावकः स्नानपूजां कृत्वा स्नपनजलेन गुरुणां शरीरं सिक्तम् , तदा रोगनिर्मुक्ताः काञ्चनवर्णशरीराः सृरयो बभूवुः । ततः श्रावकैस्तत्र उत्तुङ्गतोरणं देवगृहं कारितम् । तदा श्रीअभयदेवसूरिभिः तत्र पार्थप्रतिमा स्थापिता । तच्च स्तम्भनकनाम्ना महातीर्थ प्रसिद्धम् । तथा जय तिहुगण' स्तोत्रस्य अन्तिमे गाथाद्वये धर- णन्द्र-पद्मावत्याऽऽकर्षणमन्त्रो गोपित आसीत् । तद् गाथाद्वयमपवित्रभूताः स्त्रीवालकादयो यत् किंचित् कार्येऽपि गुणयन्ति स्म, तदा उनः पुनरागमनेन खिन्नयाऽधिष्ठायकदेव्या गुरखे उक्तम्-'स्वामिन् ! एतदूगाथाद्वयं भाण्डागारे स्थापनीयम् , महति कार्य गुणनीयम् । तथा इयं नमस्कारविंशिका संध्यायां प्रतिक्रमणस्यादौ सदैव गुणनीया' इत्युक्त्वा देवी गता। ततो गुरुभिस्तथैव कृतम् । तथा नवाङ्गानां वृत्तयो विहिताः। एवंविधाः शासनप्रभावकाः श्रीअ- भयदेवसूरयः प्रान्ते गुर्जरदेशे कप्पडवणिजग्रामेऽनशनं कृत्वा चतुर्थं स्वर्ग प्राप्ताः । ४३.तत्पट्टे त्रिचत्वारिंशत्तमो जिनवल्लभसूरिः, स च प्रथमं कूर्चपुरगच्छीय-चत्यवासिजि- नेश्वरसूरेः शिष्योऽभूत् । ततश्चैकदा दशवैकालिकं पठन् सावद्यौपधादिकं कुर्वाणम्-अतिप्रमादिनं. स्वगुरुं विलोक्य उद्विग्नचित्तः संजातः । तदनन्तरं स्वगुरुमापृच्छ्च शुद्धक्रियानिधीनामभय- देवसूरीणां पार्वेऽगात् । तदुपसंपदं गृहीत्वा तेपासेव शिष्यश्च संजातः । क्रमेण शास्त्राण्यऽधत्यि महाविद्वान् बभूव । तथा पिण्डविशुद्धिप्रकरण-गणधरसार्धशतक-पडशीति-प्रमुखाऽनेकशास्त्राणि कृतवान् । तथा दशसहस्रप्रमितवागडिकश्राद्धान् प्रतियोधितवान् । तथा पुनश्चित्रकूटनगरे श्री- गुरुभिः चण्डिका प्रतिवोधिता । सूरिमन्त्रबलसधनीभूत साधारणश्राद्धेन कारितस्य द्विसप्तति (७२) जिनालयमण्डित श्रीवारस्वामिचैत्यस्य प्रतिष्ठा कृता । तथा तत्रैव पुरे संवत् सागर- रस-रुद्र-( ११६७ ) मिते श्रीअभयदेवरिवचनाद् देवभद्राचार्येण तेषां पदस्थापना कृता । ततस्ते षण्मासान् यावद् आचार्यपदं भुक्त्वा अनशनेन कालं कृत्वा स्वर्ग प्राप्ताः । तद्वारके च मधुकरखरतर' शाखा निर्गता । अयं प्रथमो गच्छभेदः। तथा शासनदेवतावचनात् तत एव आचार्यस्य नाम्न आदौ सप्रभावस्य जिनपदस्य स्थापना प्रवृत्ता । ४४. तत्पट्टे चतुश्चत्वारिंशत्तमः श्रीजिनदत्तसूरिः, स च वाछिगमन्त्रि-वाहडदेव्योः पुत्रः, धंधूकाभिधनगरवासी, हुंवडगोत्रीयः, सं० ११३२ वर्षे लब्धजन्मा, सोमचन्द्रमूलनामा, सं० ११४१ वाचक धर्मदेवपार्थे गृहीतदीक्षाकः, तथा सं० ११६९ वैशाख ३० दि० पष्ठी- दिने चित्रकूटनगरे श्रीदेवभद्राचार्येण सूरिमन्नं दत्त्वाऽचार्यपदे. स्थापितः-'जिनदत्तसूरि इति नामस्थापना कृता । परंतु प्रागेकदा सारंगपुरे कुंवरपालोपाध्यायस्य निर्जरा कारिता आसीत्। स हि कालं कृत्वा देवपदं प्राप्य तदानीमेव प्रादुर्भूय बभाषे 'भोः सोमचन्द्र ! त्वमाचार्यपदं प्राप्स्यसि, परं मुहूर्तप्रायं वर्तते । तत्राये मुहूर्ते मृत्युः, द्वितीये गच्छभेदः, तृतीय शुभम् । ततस्तृतीये मुहूर्ते पदं ग्राह्यम्, इत्युक्त्वा देवोऽदृश्यो जातः परं कथंचित् दैववसात् द्वितीये मुहूर्ते पदं जातं, तेन संवत् १२०४ जिनशेखराचार्यतो रुद्रपल्ल्यां रुद्रपल्लीय-खरतर- शाखा भिना । अयं द्वितीयो गच्छभेदः। पुनरेकदा श्री जिनदत्तसूरिश्चित्रकूट देवगृहे -4 ॥सरतरगच्छ पट्टावली-२॥ वजस्यमस्थितं नानामनाम्नायमय पुस्तक मत्रमलेन प्रकटीकृत्य गृहीतवान् । तथोजयिन्या महाकालपामादस्तभस्थ, द्वितीय सिद्धसेनदिवाकरस्य पुस्तकं प्रथमागतविद्ययाऽऽकृप्य जग्राह । तथा एकदा उज्जयिन्या व्याख्यानमध्ये श्रानिकारूप विधाय छलनार्धमागताश्चतुःपष्टियोगिन्यः पट्टकेषु निवेश्य मानलेन कीलिताः, ततो व्याख्यानाते पट्टकेम्य उत्थातुमगस्ताः सत्यो गुरु प्रत्यूचुः-स्वामिन् ! भनता वय प्रत्युत च्छलिताः, जथ कृपा निघाय निमोच्यास्तदा गुरुमित्रचन गृहीत्वा योगिन्यो मुक्ताः । अथ ताभिर्नरं सप्तकं दत्तं तद्यथा- १ प्रतिग्राम सरतर श्राद्धो दीप्तिमान् भविष्यति । २ प्रायेण सरतर भागको निर्धनो न भागी। ३ संघे कुमरणं न भविष्यति । ४ अखड शीलपालका साध्वी ऋतुमती न भनिप्यति । ५ सरतर श्राद्धः मिंधुदेशं गतः मन् धनवान् भागी। ६ सरतर सघ शाक्न्यिादयो न छलिप्यति । ७ जिनदत्तनाम्नि गृहीते विद्युत्पातादिरुपद्रयो न मानी । इति । पुनर्योगिनीभिरुक्तं-एतद्वचनसप्तक पालनीय, येन प्रागुक्तमस्मद्दत्तवरसप्तकं सफलं स्यात् । तद्यथा- १ सिंधुदेश गर्तेर्गच्छनायकः पंचनदी साधनं कार्यम् । २ तथा मृरिभिः प्रतिदिन द्विशत् (२००) यार सरिमनजापः कार्यः । ४ सरतर श्राद्धरुमयकाल गृहे वा उपाश्रये या सप्त स्मरणानि गुणनीयानि । ५ साधुमिनित्य द्विमहस्र नमस्कार गुणनीयाः। तत्रकस्मिन्मणिके एको नम- स्कार एकं च उपमर्गहरस्तोत्र एन यद्गुणन तद सिच्चडिका इत्युच्यते । ६ तथा सरतर श्राद्धर्माममध्ये आचाम्लद्वय कार्यम् । ७ सरतर माधुमिः सति सामर्थे सदा एकाशनक कार्यम् । इति । पुनस्ताभिरुक्तं-१ दिल्ली, २ अजमेरु, ३ भरुअच्छ, ४ उज्जैन, ५ मुलतान, ६ उच्च- नगर, ७ लाहोर-एतन्नगरसप्तके परिपूर्णशक्तिरहितः सरतर गच्छनायर्फ रानी न स्थातब्ध- मित्युक्त्वा स्वस्थान जग्मुः । तथा पुनरजमेरुनगरे पाक्षिक प्रतिक्रमण पुद्धिः श्री गुरुभिः पुनः पुनर्सनत्कारं कुर्वाणा नियुइ मनरलेन जलपानस्याधोमागे रक्षिता, ततः प्रति- क्रमणानतर पागधौभागाद निष्कात्त्य 'जिनदत्तनाम्नि गृहिते मति नाह पनिप्यामीनि' तद्वर गृहीत्सा मुक्ता संस्थान गता। तया पुनरेकदा गुरनो विहार पुर्वाणा वृद्धनगर प्राप्ताः, तर निनमतोन्नतिमसहमाना ब्राह्मणा जिनचेत्ये नियमाणा गा प्रक्षिपतिस्म । ततो मृता गौः । ता च रिलोक्य, नासणाः प्रोचुः अहो जनाना देवो गौघातक इति । ततो पिलभीभूत. श्रावको सो विमाः, तदा गुरुभिमनरलेन व्यतरप्रयोगेण मृता गा. ममीना; ततः सा गाः स्वय- मेव जिनगृहादुत्याय शिवदेवगृहे शिवमर्चेसरि आगत्य निपतिता । वो नगरे मासगानामची ' । - २६ । खरतरगच्छ पट्टावली-२ ॥ वोपहासो जातः। तदा लज्जिता ब्राह्मणा गुरूणां चरणयोनिपतिताः, इत्थं कथयामासुश्च -भो स्वामिनो यूयं महन्तः । इतः परमस्मिन् नगरे ये केपि भवत्परंपरायां यूरयः समप्यन्ति तेषां प्रवेशोत्सवं वयं करिष्यामहे इति । तदानीं भूयसी जिनमतप्रभावना जाता। तथा पुनरन्यदा उच्चन- गरे गुरवः समागतास्तत्र प्रवेशोत्सवे जायमाने जनानामतिबाहुल्यात् तद्ग्रामाधीशस्य मुगलस्य पुत्रो वाहनान्निपत्य मृतः, तदा श्राद्धाः सर्वेपि विमनस्का जाताः, अथ तेषां मुखात् श्री गुरु भिरेतत् स्वरूपं विज्ञाय जिनमतप्रभावनार्थ मद्यमांसमक्षणमस्मै न कारयितव्यमित्युक्त्वा व्यंतर- प्रयोगेण पण्मासान् यावत् स मृतो मुगलपुत्रः सजीवः कृतः । तथा पुनर्नागदेवनामा श्राद्धः अंबड इत्यपर नामा एकदा गिरनार पर्वते उपवास त्रयं कृत्वा अविकांसमाराध्य च 'हे ! मातर- स्मिन् समये भरतक्षेत्रे युगप्रधानपदधारकः कः सरिरस्ति, यमहमात्मनो गुरुत्येन स्थापयामीति' पृष्टवान् । तदा अंबिकादेव्या तस्य हस्ते सुवर्णाक्षरैः-दासानुदासा इव सर्वदेवाः, यदीय पादा- जतले लुठति । मरुस्थले कल्पतरुः स जीयात्, युगप्रधानो जिनदत्तसरिः ॥ १ ॥ इत्येत- काव्यं लिखित्वा प्रोनं ' य एतानि तव हस्ताक्षराणि प्रकटयिष्यति स मृरिर्युगप्रधानो ज्ञेयः । ततः स श्राद्धः स्थाने २ बहुभ्यः सूरिभ्यो हस्तमदर्शयत् परं कोपि अक्षराणि वाचयितुं न समर्थों बभूव । अथैकदा स पाटणनगरे त्रांबावाडाभिधपाटके श्री जिनदत्तसूरीणां पार्थे समागत्य हस्तं दर्शितवान्, गुरुभिस्तद्हस्तलिखितस्वर्णाक्षराणामुपरि वासचूर्णप्रक्षेप कुत्वा शिष्याय आज्ञा दत्ता । ततो वाचितानि शिष्येण तान्यक्षराणि । तदा स नागदेवः परम- भक्तिमान् श्रावको बभूव । एवं विधाः कलिकाले युगप्रधान-पदधारकाः श्री गुरखो जाताः। तथा पुनरेकदा व्याख्यानं कुर्वद्भिः श्री गुरुभिर्दीघोपयोगेन समुद्रमध्ये निमज्जतं श्रावकस्य पोतं विज्ञाय स्वस्मरणं कुर्वतां जनानामुपकारार्थ व्याख्यानपृष्टकं मध्ये मुक्त्वा पक्षि- रूपेण समुद्रे गत्वा पोतस्तारितः। एवं श्राद्धस्य कष्टं दूरी कृत्य पश्चादागत्य व्याख्यानं कर्तु समुपविष्टा ज्ञातश्चैष वृत्तांतः सर्वैरपि लोकः, ततः श्री गुरूणां महामहिमा प्रससार । तथा पुनरन्यदा श्री गुरवः प्रवल प्रवेशोत्सवेन मुलताननगरे समागताः, तदा चतुःपथे स्थितेन पत्तनवास्तव्य परपक्षीय-अंबडनाम्ना श्रावकेण खरतर गच्छोन्नतिमसहमानेन प्रोक्तं-- । अस्मिन्नगरे इत्थमाडवरेण भवद्भिरागम्यते परं अणहिल्लपत्तने यद्येचं भवदागमनं स्यात्तदा ज्ञायते' इति । अथैतत् श्रुत्वा गुरुभिरुक्तं 'भो ! वयमनेनैव प्रकारेण तत्रायास्यामः, परं त्वं तैललवणादिकं स्कंधे वहन् सन्सुखं मिलिष्यसीति । अथ शुरवः कियद्भिर्वासरैरणहिल्लपत्तने समाजग्मुः। तदानीं स अंबडश्राद्धो दैववसान्निर्धनो जातः। ततो ग्राहकभयात् मुलतान नगरात् पलाय्य पत्तने समागत्य तैललवणादि व्यापारणाजीविकां कुर्वन् प्रवेशोत्सवे जायमाने गुरूणां सन्मुखं मिलितः, गुरुभिरुपलक्ष्य शब्दितस्ततो गुरूपरि अति द्वेपं वहन् कपटेन खरतर श्राद्धो बभूव । एकदा श्री गुरुभ्यो विपमिश्रितं शर्कराजलं पायितवान् । ततो गुरुभिर्विपप्रयोगं ज्ञात्वा तत्रत्य रायभणशालिक गोत्रीय आभूनामकं मुख्यश्राद्धं प्रति तत्स्वरूपं निवेद्य घटिका- योजनगामिना क्रमेलकेन पाल्हणपुरात् विपापहारिणीमुद्रामानाय्य निविपैर्जाताः । अथ स , .
१७ . ॥ सरताज पहारी-१॥ पडोसोका निधनानगतो मृत्वा ध्यंतगे भूत्वा च्लनार्थ गुरछिद्राणि पश्यसिस्म । एकदा पहात् रनोहरणप्रपतनन छलिता गृग्यस्तैन । ततः श्री गुल्न बगान् पिलोक्य जामूनामक आपकेग तव्यतरवचमा बमुटुर गुन्मामुपरि ढोकयित्वा सज्जीकना गुरसस्ततो गुलमिस्तदवड- यो सात्या रजोहण गृहीन्या तत्प्रयोगेण जीवित सर्वमपि तन् पुदयम् । ततो नहो चंवरः स्वस्थानं पपा । तथा पुनरंकदा निक्रमपुर मरयोपद्रवः प्रादुर्भुतः, ततो गुरभिड़नेम्पः म उपद्रगो पारितः, नदा दुःपिताहवर रक्त-स्वामिन् ! अस्मदुपर्यपि एपा पा विधेया' सनो गुरमिचनं गृहीत्वा पामपि मरकोपयो निरस्तम्तदा पहयो माहेश्वराः प्रारकाः कृताः, नया फेपि भगा श्राद्धा न जाताः । नन्मध्ये यस्य चत्वारः पुत्रास्तस्य एकः पुत्रो गृहीती, यस्प बतमः पुत्र्यम्तम्यका पुरी गृहीता, एस च पचशत (५००) शिप्या, मात (७००) मान्यव दीक्षिता. । इत्य श्रीजिनदत्तरिभिर्नहुषु नगरेषु नाहटा, राखेचा, मगशाली, नरलपा, टागा, रणीया त्यादि गांवार हताः मार्किक (१) लक्ष आहाः प्रतियोधिताः। तथा श्रीगुमिर्मुलनाननगरे लूपीपा गोत्रीय हाथी साहस्योपरि कृपा विधाय प्रतिक्रमणे तस्मै "अजिपंजियमयमय" इनि स्तोत्रं दत्तम । तथा अणहिल्लपत्तने चोहित्यरा गोत्रीय भारफे- भ्यो " जपनि पण वर पण सत्य" इति स्तोत्र दत्तम् । तथा गुनभिमटतान्य नगरे गणधर पोपडा गोत्रीय श्रादम्प "ज्यमग्गहरं पाम" इनि नयनं प्रात्तम्। अविधाः बीय- प्रासादि-गुलीन-साधिस्तक्षश्रादप्रतियोधकाः, जलश्रमोपरि पलास्तरणादि प्रकारेग पंचनीमाया, सदेहदोलायल्पायनेस्चन्यविधायसः परफायप्रवेशिन्यादि-विविधरिया- संपन्याः, परोपकारिण', परमयःमामा पचारिणः, श्री राम्खर गच्छनायकाः महा. प्रभासाः श्रीजिनदरानग्य. म.१०११ नापाट शुदि एकादस्वामजमेर नगरे अनमनं शन्या प्रथम वर्ग गना ॥१४॥ ॥श्री जिन्दगगगगा गुम्पा गुणवर्णनम् । मया दामादिरल्याणमुनिना लेगा एनम् ।। गरिनरेग नपर्नु मृगचार्योपि नमः। ४५ तत्व पंचात्याशिनम श्री निनरहरिः। म प ० ११९७ माद्रपट घरर अदम्या रव्यजना, पिना माह गगला' माना देन्हदेवी नयो पुरः। 4० १००३ शान्गुनमानसम्म गरे ममामी । म० १२११ यमाय मुष्टि पत्रिम- पूरे गामिन बीजिनामगिमः पनामा पापिन । “ग्माण महिमान:, न-पान मसा: । अयान्पा श्री गुरवो गुटेर प्रति गरम श्रीगमनान भीनयदि मपान नि ममागताः, नापना गुरमित पाri ननभातार न- अम्मा मनोनिगर, मा पानिमामागम स्पन भाग ग्रहया, तया मागमध्य सिमामा महिला न मिला, IT. मान पनि प्रारम:23 मार मारला. म.! म HATT ममार गितामा निमा माराम 11 खरतरगम पावली ॥ माणिक्यचतुष्के समागताः, तावता तैः कार्याकुलत्वेन प्रामुक्तगुरुवचनविस्मरणात् विश्राम मार्थ सेडिकाऽधो विमुक्ता, मणिग्रहणाय दुग्धपात्रमपि न रक्षितं, परं तत्रैको विद्यावान् योगी मणिजिघृक्षया दुग्धपान मृत्वा एकांत स्थितः । अथ सा सेडिका बहुप्रयत्नेन उत्पाव्य मानापि नोत्तिष्ठतिरुम । ततः सर्वस्मिन्नपि नगरे एपा वार्ता प्रवृत्ता, क्रमेण पतिसाहिनापि श्रुता । ततः स्वयं तत्र आगत्य वहन उत्पाटनोपाया अपि कृताः, परं सटिका पदमानमपि ततो न चलिता, ततः पतिसाहिना प्रोक्तं-'सत्यो यं देवः, एतस्य स्थानमत्रैव भवतु' ततः श्रावक- स्तत्रैवाग्निसंस्कारः कृतः। तस्मिन्नवसरे मणिर्गुरुमस्तकात फडाकशब्दं कृत्वा योगिरक्षितदुग्ध- पाने आगत्य निपतिता, योगी च तां गृहीत्वा स्वस्थानं ययौ । तदा मदनपालेनोक्तं गुरुभि- मह्यं प्रागुक्तमासीत् , परमहं त्वरावसात् विस्मृतः । ततः सर्वैः साधुश्रावकैः तस्मै उपालंभो दत्तः। अथ तत्रैव जिनचंद्रसूरीणां स्तूपस्थापना कृता, पतिसाहिप्रमुखैः सर्वैरपि लोकैर्वहुमानो चिहितः, तत् स्थानमद्यापि पूज्यमानं प्रवर्तते । एवं विधाः समभावाः श्री गुरवो जाताः। इतश्च- तुर्थपट्टे सातिशयजिनचंद्रेति नाम स्थाप्यमिति पद्मावती वचनात् व्यवस्था जाता ॥ ४५ ॥ ४६. तत्पट्टे पट्चत्वारिंशत्तमः श्री जिनपतिरिः। तस्य च सं० १२१० चैत्र वदि अष्टस्यां मूलनक्षत्रे जन्म । तथा माल्हूगोत्रीय साह यशोवर्द्धनः पिता, सहवदेवी माता । सं० १२१८ फाल्गुण बदि अष्टम्यां दिल्लीनगरे दीक्षा । सं० १२२३ कार्तिक सुदि त्रयोदश्यां श्रीजयदेवाचार्येण पदस्थापना कृता । अथ श्रीजिनपतिसूरय एकदा वबेरनानि पत्तने समाजग्मुः; स्त्र पत्रिंशद्वादेषु जयो लब्धः। वही जिनशासन-प्रभावना कृता । तथा पुनरेकदा आसापुरे श्रीमालज्ञातीय हाजीसाह कारित प्रतिष्ठावसरे मणिग्राहिणा योगिना जिनप्रतिमा स्तंभिता । तदा सचिन्तैर्गुरुभिः स्वगुरवः समाराधिताः । ततः श्रीजिनचंद्र सूरिभिः प्रादुर्भूय चूर्ण दत्तम् । अथ प्रभाते गुरुभिः प्रतिमोपरि तच्चूर्ण प्रक्षिप्तं तेन सद्य उत्थि- ता प्रतिमा, ततो रंजितेन योगिना मणिः पश्चात् प्रदत्ता, श्री गुरूणां भूयान्महिमा प्रससार । तथा पुनरेकदा श्री गुरवोऽजमेरु नगरे चतुर्मास्यां स्थिता आसीत्, तदा तत्रत्य रामदेवादि श्रावकाणां पुरः सदैव खेड वास्तव्य छाजेडगोत्रीय मंत्रि ऊधरण साहस्य प्रशंसाम- कुर्वन् । एकदा रामदेव श्राद्धो मंत्रि ऊपरणं प्रति मिलितः, तदा तेन मंत्रिणा रामदेव बहादरेण स्वगृह समानीय विधिना भोजनादिभिस्तद्भक्तिः कृता, तस्मिन्नवसरे मंत्रिपत्नी देवगृहे देववंदनाथ चलिता शाटक-कंचुकायनेक वस्त्रभृता छन्वडिका साथै गृहीतवती । तदा राम- देवेन पृष्ट-किमर्थमेताः, ततः सेवकैः उक्त-साधर्मिक स्त्रीभ्यः प्रदानार्थ सदैव गृह्यते। तदा रामदेव उवाच श्री जिनपतिसूरयो यद् भवत्प्रशंसां कुर्वन्ति तद् योग्यमेव, यद् गृहे इत्थं धर्मकार्याणि जायते इति । अथैकदा ऊधरणमंत्रिणा नागपुरे देवगृहं कारितं तदा विवप्रतिष्ठानिमित्त मंत्रिणा स्वकीयाः कुलगुरवः समाहूताः, परं केनापि कारणेन मुहूर्तोपरि नागताः। अपरं च ऊधरणस्य भार्या खरतर गच्छीय श्राद्धस्य पुत्री आसीत् , तया मंत्रिकुलगुरून् हीनाचारिणो मत्वा शुद्धसंवेगरंगधारिणः , ॥ खरतरगच्छ पट्टायली-३ ॥ भोजिनपतिसूरयः समाहूताः, ते च मुहूनोंपरि वनागताः । तदा तेपी पार्श्वे प्रतिष्ठा कारिता । कवरणमंनि सटुंमः सरतर गच्छीय भारकश्च वभूवः तस्य च कुलधरनामा पुनो जातो येन पाहडमेरनगरे उत्तुंगतोरणप्रासादः कारितः। तथा पुनर्मरोटवास्तव्य नेमिचंद्र भाडा- गारिकेण परीक्षा कृत्वा शुद्धमवेगमत श्रीगुरुन जात्या चारित्रच्छां कुर्वाणो अंगडनामा स्व- पुनो गुरुभ्यो दत्तः। एवविधा श्रीजिनपतिसूरय सर्वायुः सप्तपष्टि वर्षाणि प्रपाल्य, सं० १२७७ पाल्हणपुरे स्वर्ग गताः। तदा स० १२१३ आचलिक मत जावं । तथा स० १२८५ चित्रवाल गच्छीय जगचंद्र- सूरितः तपागणो जातः॥ ४७. श्री जिनपतिमूरिपट्टे सप्तचत्वारिंशत्तमः श्री जिनेश्वरमूरिः। तस्य च स० १२४५ मार्गशीर्ष सुदि एकदइयां भरणीनक्षत्रे जन्म । तथा मरोटवास्तव्यभांडागारिक नेमिचंद्रः पिता, लक्ष्मी माता, तयोः पुत्रो अवड इति मूलनामा । स० १२५५ सेडनगरे दीक्षा दत्त्या गुरुभिरिप्रभ इति नाम दत्तं । ततः स० १२७८ माघसुदि पष्ठयां जालोर नगरे माल्ह- गोनीय साह सीमसीकारित द्वादश सहस रूप्यमुद्राव्ययम्प नदिमहोत्सवेन सर्वदेवा- चार्यप्रदत्त सरिमप्रेण पदस्थापना जाता । अर्थकटा अणहिलपत्तने कुमारपालेन राक्षा हेमाचार्याय प्रोक्त-स्वामिन् ! यदि मद्य स्वर्णसिद्धरुपाय दद्यास्तहिं निक्रमादित्यवद् अह- मपि नवीन सवत्सर प्रवर्तयामि'। तदा गुरुणोक्त-'श्रीहरिभद्रसूरिशिप्यानीतवाद्धपुस्तके स्वर्णसिद्धरुपायोस्ति, पर तत् पुस्तकं सरतर गच्छे विद्यते। ततो राजा नानादेश- निवासिनो व्यापारार्थ पत्तने स्थितान् श्रायकान् निरुध्य कथयामास 'यदि पुस्तकं आना- ययत तदा मुच्य' । ततः श्राऊर्जिनेश्वरसूरिम्यस्तत्स्वरूप कथापितं, तदा गुरुभिधिकटे गत्वा चिंतामणिपार्श्वनाथ-चत्यस्तभात् पुस्तक निष्कास्य पत्तने आनीय राजे दत्त, परतु "इद पुस्तकं न छोटनीय न वाचनीय, किंतु भाटागारे पूजनीयमिति" पुस्तको- परि लिसितानि वर्णानि पिलोक्य राजा उवाच-'अह तु नैतत् पुस्तक छोटयामि'। हेमा चार्येणाप्युक्त-'महापुरुषाणा पचन न लोपनीय । तदा हेमाचार्यभगिनी हेमश्रीनीम महत्तरा उवाच-'अह छोटयामि जिनदत्तमूरिसंचनाद नाह निभमि नतो राता तस्यै पुस्तक दत्त, तया छोटित पर तत्कालमेन तस्या द्वे अपि चपी निःमृत्य पतिते, ततो अधत्व प्राप्ता वा दृष्ट्या राणा पुस्तक स्वमडागारे मुक्त राती अमेर्लमात् तझाडागार सर्वमपि ज्वलित, तदा तत् पुस्तक आकाश उदीय स्वस्थान प्राप्तम् । एपरिधाः श्री जिनेश्वरसूरयः स० १३३१ आश्विन यदि पष्टयां अनशनेन स्वगं गताः ॥४७॥ तद्वारके १३३१ जिनसिंहमूरिता लघु परतर गासा मिन्ना । अय तृतीयो गच्छभेदः ।। ४८. श्री जिनवरतरि पट्टेष्टचत्वारिंशत्तमः श्रीजिनप्रयोधमूरिः। म च दुर्गप्रनोध- प्यारन्याता ! माह श्रीचद-माया मिरीयादेनी तयोः पुत्र । म० १२८५ लब्धजन्मा पर्वत ति मूलनामा । म० १२९६ फाल्गुण पटि पचम्या हलाः विगपद्रनगर गृहीवीवः, ।। परतरगच्छ पहावी-६ ।। प्रबोधसूतिरिति दत्तनामा कमेण वाचकपदं प्राप्तः, तता सं० १३३१ आश्विन यदि पंचम्यां संक्षेपेण कृतपट्टाभिषेकः । पञ्चात् सं० १३३१ फाल्गुणवदि अष्टम्यां स्वातिनक्षत्रे जालोरवास्तव्य माल्हूगोत्रीय साह खीमसीकेन पंचविंशति सहस्त्र (२५०००) रूप्यक व्ययेन सविस्तरं विहितपदमहोत्सवः । एवंविधः श्री जिनप्रबोधसूरिनिर्मलचारित्रमाराध्य सं० १३४१ स्वर्ग गतः ॥४८॥ ४९. तत्पढे एकोनपंचाशत्तमः श्रीजिनचंद्रसूरिः। तस्य च समियाणाभिधग्रामवा- स्तव्य छाजहडगोत्रीय मंत्रिदेवराजः पिता, कमलादेवी माता, खंभराय इति मूल नाम । सं० १३२६ मार्गशीर्ष सुदि चतुया जन्म । सं० १३३२ जालोरनगरे दीक्षा । सं० १३४१ वैशाखसुदि तृतीयायां सोमबारे जालोरवास्तव्य माल्हूगोत्रीय साहखीमसीकेन द्वादशसहस्त्र (१२०००)रूप्यकव्ययेन पदमहोत्सवः कृतः । एवंविधाश्चतुर्नुपप्रतिवोधकाः, कलिकाल केवलीति विरुदविख्याताः, जितानेकवादिनः, जिनशासनोन्नतिकारिणः, श्रीजिनचंद्रसूयः सं० १३७६ कुसुमाणाख्ये ग्रामे स्वर्गं गताः ॥ ४९ ॥ तद्वारके खरतर गच्छस्य राजगच्छ इति प्रसिद्धिर्जाता । ५०. तत्पढे पंचाशत्तमः श्रीजिनकुशलसूरिः। तस्य च समियाणाभिधग्रामवास्तव्य छाजहड गोत्रीय मंत्रि जील्हागरः पिता, जयंतश्रीः माता, सं० १३३० जन्म। सं० १३४७ दीक्षा । सं० १३७७ जेष्ट वदि एकादश्यां राजेंद्राचार्येण सूरिमंत्री दत्तः। तदा पाटणवास्तव्य साह तेजपालेन नंदिमहोत्सवः कृतः । चतुर्विशतिशत (२४००) साधु-साध्वीभ्यः, तथा सप्त- शत (७००) घेपधारि दर्शनि प्रमुखेभ्यो वस्त्राणि दत्तानि; तथा तस्मिन्नवसरे दिल्लीवास्तव्य मह- तीयाणगोत्रीय विजयसिंह श्राद्धः तत्रागतस्तेनापि बहुधनव्ययेन नदिमहोत्सवः कृतः । तथा सं० १३८० साह तेजपाल कृत संपेन सार्धं शत्रुजयतीर्थ समागतैः गुरुभिर्मानतुंग नाम्नि खरतर वसतिप्रासादे सप्तविंशत्यंगुलप्रमाण श्रीआदिनाथविंव-प्रतिष्ठा कृता । तथा भीमपल्लीनगरे भुवनपालकारित द्वासप्तति (७२) देवकुलिकामंडित श्रीवीरचैत्यं प्रतिष्ठितम् । तथा जेसलमेरुनगरे सधवलकारितचिंतामणिपार्श्वनाथप्रतिष्ठा कृता। तथा पुनः जालोरनगरे श्रीपार्श्वनाथप्रतिष्ठा विहिता। तथा आगराभिधनगरनिवासी-श्रीसंघस्य आग्रहेण तत्सार्थे भूत्वा शत्रुजय यात्रां कृत्वा भाद्रपदवदि सप्तम्यां पाटणनगरे आजग्मे । तथा श्रीगुरूणां द्वादशशत (१२००) साधु संप्रदायो जातः, पंचाधिकैकशत (१०५) साध्वी संप्रदायोऽभूत् । तथा श्रीगुरुभिविनयप्रभादि- शिष्येभ्य उपाध्यायपदं दत्त,येन विनयप्रभोपाध्यायेन निर्धनीभूतस्य निज भ्रातः संपत्तिसिद्धयर्थ मंत्र गर्मितगौतमरासो विहितस्तद्गुणनेन स्वभ्राता पुनर्धनवान् जातः। एवंविधा बहु श्रावकप्रतिवोधकाः, परम जिनधर्मप्रभावकाः, श्रीजिनकुशल सूरयः, सं० १३८९ फाल्गुणवदि अमावस्यां देराउर नगरे अष्टौ दिनानि यावत् अनशनं कृत्वा स्वर्ग प्राप्ताः। ते च अधुनापि " दादौजी" इति नाम्ना सर्वत्र जगति प्रसिद्धाः संति, प्रति नगरं गुरूणां चरणन्यासौ पूज्यते, सोमवत्यां पौर्ण- मास्यां प्रथमं दर्शनं दत्तं, तेन तदिने विशेपेण पूजा प्रवर्तते इति ॥ ५० ॥ - " ॥सरतरगच्छ पट्टावली-२ ॥ ३१ ५१. तत्पट्टे एकपंचाशत्तमः श्रीजिनपद्मसूरिः । तस्य च छाजहडमानिभूपणस्य स० १३८९ जेष्ट सुदि पटथा श्री देगउरपुरे माह हरपालेन नदिमहोत्सनः कृतः। तदा अष्टमे वर्षे तरुणप्रभाचार्येण सूरिमतो दत्तः । अथकदा श्रीगुरु हडमेरुनगरे श्री वीर- प्रासादे देवनदनार्थं आजग्मे, तदा देवगृहत्य लघु द्वारं महती च प्रतिमा पिलोक्य, पजाब- देशोत्पन्नत्वात्तद्देशमापया प्रोक्त-'मूहा नढा मही बड्डी अदर क्यु माणीति' अथे- दृग् वचनः प्रकटितगालमान, श्रीगुरु प्रति पार्थस्थितेन विकसमुद्रोपाध्यायेन मौन कुरु, इति प्रोक्त, ततो व्यान्यानादि स्थिति प्रवर्तयता तेनोपाध्यायेन मार्द्ध श्री गुरसो गुर्जरदेशे आगताः, तत्र पाटणपाधै सरस्वतीनटीतटे रानी स्थिताः, पर तदानीं गुरुचेतमि इयं चिंता ममुत्पन्ना -'प्रभाते सघाग्रेऽनया भापया कथ व्यारयान करिष्ये' अथैवं चिंतयता गुरुणा भाग्येन अर्ध- रानसमये सरस्वतीनद्या आधिष्ठायिका सरस्वती देवी प्रादुर्भूय इत्य वर दत्तनती-'भो स्वामिन् ! प्रभाते व सघाने यत् किमपि नक्ष्यसि तद्वचः सकलजनमनोहारि भविष्यति । ततः प्रभाते ममस्तसंघाने श्री गुरुभिः स्वयमेन " अहंतो भगनत इद्रमहिता" इत्यादि नानोत्पादितकाव्येन उपदेशो दत्तः, तदा समस्तोपि मघो श्री गुरुनाग्निलासश्रमणेन रंजितमना सजातः । तत्र गुरुभिः पालधनलकूर्चाल सरस्वती" निरुद प्राप्तम् । एवविधाः श्री जिनपासूरयः स० १४०० पैशास सुदि चतुर्दश्या पाटण नगरे स्वगं गताः ।।५१ ॥ ५२. तत्पट्टे द्विपचाशत्तमः श्रीजिनलन्धिमरिः। तस्य च पाटणनास्तव्य नालसा- गोत्रीय साह ईश्वरकृतनदिमहोत्सवेन पदस्थापना जाता । तरुणप्रभाचार्येण सरिमंगो दत्तः। ततः क्रमेण श्री गुरुः समिद्धातिकशिरोमणिरष्टविधानपूरकथ सजातः । स च स० १४०६ नागपुरे स्वर्ग मार ॥ ५२ ।। ५३. तत्पट्टे निपंचाशत्तमः श्री जिनचद्रसूरिः । तस्य च स० १४०६ माघ सुदि दशम्या नागपुरनास्तव्य श्रीमाल साह हाधीकृत नंदिमहोत्मवेन पदस्थापना जाता । तरुणप्रभाचा- येण सरिमनो दत्ताश्री गुरुः स०१४१५ आषाढ वदि त्रयोदश्या स्तभतीर्थे स्वर्गभार ॥५३॥ ५४. तत्पट्टे चतुपचाशत्तमः जिनोदयसूरिः। तस्य च पाल्हणपुरसास्तव्य माल्द- गोपीय साह रुंदपाल पिता, घारलदेवी माता, स० १३७५ जन्म, समरौ इति मूलनाम । सं० १४१५ आपाटमुदि द्वितीयाया स्तभतीधे लूणीयागोत्रीय साह जेमलकृत नदिमहो- त्सनेन श्रीतरणनभाचार्येण पदस्थापना कृता । ततः श्रीगुरुभिः तत्र श्रीस्तभती अजितजिनचैत्यप्रतिष्ठित, तथा श्रीशनुजययात्रा कृत्वा तर पच प्रतिष्ठाः कृता । एव विधाः पचपदिनोपनासकारकाः, द्वादश ग्रामेषु अमारियोपणा प्रवर्तकाः, अष्टारिंशति (२८) साधुपरितारेणानेकदेशविहारकारिणः, श्रीजिनोदयसूरयः स. १४३२ भाद्रपद वदि एकादश्या पाटणनगरे स्वर्ग गताः। तहारके स० १४२२ गड सरतर शासा भिन्ना, तदेव- प्रथम धर्मपल्लमनावकाय आचार्यपदनदानविचारः कृत आगीत , पक्षात् त सदोष ज्ञात्वा द्वितीयशिष्याय आचार्यपद दर्त्त । पदा स्टेन धर्मबल्लभगणिना जेसलमेलास्तव्य वेगद .. -
न
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।। खरतरगच्छ पट्टावली-२ ॥
छाजहडगोत्रीय स्वसंसारिणामग्रे सर्वोपि स्ववृत्तांतः प्रोक्तः। ततः तेषां मध्ये कैश्चित् तद्
भ्रातादिभिरुक्तं 'अस्माकं त्वमेवाचार्यः, वयमन्यं न मन्यामहे' इति । तदा तदायं चतुर्यों
गच्छभेदो जातः। परं तत्संसारिण एव द्वादश भावका जाताः, नान्ये; तथा गुरुशापात्
तद्गच्छे प्राय एकोनविंशति (१९) यतिभ्योऽधिका यतयो न भवति, यदि स्यात् तदा म्रियत-
भ्रष्टो वा स्यात् इति ॥५४॥
५५. श्रीजिनोदयसूरिपट्टे पंच पंचाशत्तमः श्रीजिनराजसरिः । तस्य च सं०
१४३२ फाल्गुनवदि पष्ठयां पाटणनगरे साह धरणकृतनंदिमहोत्सवेन मूरिपदं जातं । ततो
मुखाधीतसपादलक्षप्रमाण न्यायग्रन्थाः, श्री स्वर्णप्रभाचार्य, भुवनरत्नाचार्य, सागरचंद्राचार्य
स्थापकाः, श्री गुरवः सं० १४६१ देवलवाडाख्ये नगरे स्वर्ग गताः ॥ ५५ ॥
५६. तत्पट्टे पदपंचाशत्तमः श्री जिनभद्रसूरिः। तत् प्रबंधो यथा-सागरचंद्राचायेंण
श्री जिनराजसूरिपट्टे श्री जिनवर्द्धनसूरिः स्थापित आसीत् । स चैकदा जेसलमेरुदुर्गे
श्री चिंतामणिपार्श्वदेवगृहे मूलनायकपास्थितां क्षेत्रपालमूर्ति विलोक्य, स्वामिसेवकयो-
स्तुल्यस्थाने अवस्थानमयुक्तमिति विचित्य च क्षेत्रपालमूर्ति उत्पाट्य द्वारे स्थापितवान् , ततः
कुपितः क्षेत्रपालो यत्र तत्र गुरूणां चतुर्थव्रतभंगं दर्शयामास । अनया रीत्या एकदा चित्रकूटे
समागताः, तत्रापि देवेन तथैव कृतं, ततः सर्वेपि श्रावकाः चतुर्थवतभंगं ज्ञात्वाऽयं पूज्य-
पदयोग्यो नास्ति, इति कथयामासुः, अथ जिनवर्द्धनसूरयो व्यंतरप्रयोगेण ग्रथिलीभूताः
संतः पिप्पलकग्रामे गत्वा स्थिताः, कियंतः शिष्याः पार्थे स्थितवंतः। अथ पश्चात् सागर-
चंद्राचार्यप्रमुखसमस्तसाधुवर्गेण एकनीभूय ' गच्छस्थितिरक्षणार्थ नवीन आचार्यः
स्थाप्य ' इति विचारं कृत्वा एक नवीन क्षेत्रपालमाराध्य तं च सर्वेषु देशेषु संप्रेष्य-
यद्यूयं करिष्यध्ये तदस्माकं प्रमाणमिति' समस्त खरतरगच्छ-संघस्य हस्ताक्षराणि
आनाय्य सर्वसाधुमंडली संमील्य भाणसोलग्रामे आजग्मे । तत्र श्रीजिनराजमूरिभि-
रेका स्वशिष्यो वाचकशीलचंद्रगणिपाइँऽध्यापनाय रक्षितोऽभूत् । स च अधीतसकल-
सिद्धान्तार्थः, भणसालिक गोत्रीयः, भादौ इति मूल नामा । सं० १४६१ गृहीतदीक्षः ।
क्रमेण पंचविशति वायो जातः। तं च योग्यं ज्ञात्वा श्री सागरचंद्राचार्यः सप्त भकाराक्षराणि
समील्य सं० १४७५ माघ सुदी पौर्णमास्यां भणसालिक नाल्हा साहकारित सपादलक्ष-
रूपकव्ययरूपनंदिमहोत्सवेन सूरिः स्थापितवान् । सप्त भकारास्तु अमी-१ भाणसोल
नगरं, २ भणशालिक गोत्रं, ३ भादौ नाम, ४ भरणी नक्षत्रं, ५ भद्रा करणं, ६ भट्टारकपदं,
७ जिनभद्रसूरीति स्थापित नाम, इति । अथैवंविधा अर्बुदाचल, गिरिनार, जेसलमेरु प्रमुख-
स्थानेषु विवप्रासादप्रतिष्ठाकारकाः, श्री भावप्रभाचार्य, कीर्तिरत्नाचार्य,-स्थापकाः । स्थाने
२ पुस्तक भांडागारस्थापकाः, श्री जिनभद्रसूरयः, सं० १५१४ मार्गशीर्ष बदि नवम्यां
कुंभल मेरुनगरे स्वर्ग प्राप्ताः । तद्वारके सं० १४७४ श्री जिनवर्द्धनसूरितः पिप्पलक खरतर
शाखा भिन्ना । अयं पंचमो गच्छभेदः ॥५६॥
|| खरतरगच्छ पट्टापली-२॥ ५७. तत्पट्टे सप्तपचाशत्तमः श्री जिनचद्रमूरिः। तस्य च जेसलमेरुवास्तव्य चम्मगोत्रीय साह बच्छराजः पिता, वाल्हादेवी माता। स० १४८७ जन्म, सं० १४९२ दीक्षा, स० १५१४ चै०५०२ कुंभलमेरु वास्तव्य कूकडचोपडागोत्रीय साह समरसिंह- कृतनदिमहोत्सवेन श्री कीर्तिरत्नाचार्येण पदस्थापना कृता । ततो अर्युटाचलोपरि नफणपार्श्व नावप्रतिष्टाविधायकाः, श्रीधर्मरत्न, गुणरत्नमूरि, प्रमुखानेकपदस्थापकाः श्री जिनचद्रसूरयः सं० १५३० जेमलमेरुनगरे स्वर्ग प्राप्ताः ॥५७|| -तद्वारके मै० १५०८ अहमदाबादे लीकारुपेन लेखकेन प्रतिमा उत्यापिता, ततः स०१५२४ वर्षे लौकामिय मत जात ॥ ५८. तत्पट्टे अष्टपचाशनमः श्री जिनसमुद्रसरिः। तस्य च पाहडमेनासी पारस गोत्रीय देकासाह पिता, माता देवलदेवी। स० १५०६ जन्म, स० १५२१ दीक्षा, स० १५३० मा० मु० १३ जेमलमेरुपास्तन्य सवपति सोनपालकृतनदिमहोत्सवेन श्री जिनचद्रसूरिभिः स्वहस्तेन पदस्थापना कृता । ततः पचनही मोमयक्षादिगाधकाः, परमचारित्रवतः, श्री जिनसमुद्रसूरयः स० १५५५ अहमदाबाद नगरे सर्ग गताः ॥५८॥ ५९ तत्पट्टे एकोनपष्टितमः श्री जिनहसरिः। तस्य च सेनावाभिध नगरवास्तव्य चोपडागोत्रीय साह मेघराजः पिता, कमलादेवी माता। स० १५२४ जन्म, स० १५३५ दीक्षा, म०१५५५ अहमदापाटे पदस्थापनाजाता। तथा स०१५५६ वैशासमुदि तृतीयाया रोहिणी- नक्षरे श्रीपीकानेरनगरे फरममीमत्रिणा पीरोजी-लक्षव्ययेन पुनः पदस्थापना-महोत्सयो विहितः । अर्धकदा आगरामिधनगरसास्तव्य म० डुगरसी, मेघराज, पोमदत्त प्रमुस सधेन अत्याग्रहेण आहृताः श्री जिनहससूरयः तत्र गताः । तदा पतिसाहिहितहस्त्यच- मिरिकावान्विटरचामराद्याडवरेण गुरुणा प्रदेशोत्मको निहितः। तर गुरुभक्तिसप. भक्ति-आदी द्विलक्षद्रव्य व्ययीकृतं, तदसहमान-पिशुनकृतीतकारण पतिमाहिना गुरव आहूताः, धवलपुरे रक्षिताः । ततो देवकृतसानिध्यात् श्री गुरवः पविनाहिचित्त रजायित्ता, पचशत (५००) बदिजनान् मोचयित्वा, अमारपोपणा कारयित्वा, उपाश्रये आगताः। हर्षितः समस्तोपि मषः। ततोऽतिमाभाग्यधारकाः, त्रिपु नगरे प्रतिष्ठात्रयकारकाः, अनेकमधपति- प्रमुखपदस्थापकाः, श्री गुरवः पाटणनगरे त्रीणि दिनानि अनशन हत्वा स० १५८२ स्वर्ग प्राप्ताः ॥ ५९॥ -तद्वारके स०१५६४ मरदेश उपाध्याय (मायन्तरे आचार्य) शान्तिमागरत. आचार्य खरतर भासा मिमा अय पटो गच्छमेटः॥ ६०. वत्सद्दे पष्टिनम श्रीजिनमाणिक्यसूरिः। तस्य च एकडचोपडागोग्रीय साह जीवराटः पिता, पादेवी माता । स०१५४९ जन्म, सं० १५६० दीक्षा, स० १५८२ वर्षे भाद्रपदयदि नरम्पा साद देवगजत नदिमहोत्सन प्रीजिनमगरिभिः स्वहस्तेन पद- स्थापना कुता। वो गुर्जर देश, पूर्व देश, सिंधु देशादि विहारकारकाः, पंचनदीसाधकार, || खरतरगच्छ पट्टावली-२ ॥ सं० १५९३ मिते वीकानेवास्तव्य वच्छासुत मंत्रि कर्मसिंहकारित नमिनाथ चैत्यविव- प्रतिष्ठाकारकाः श्री जिनमाणिक्यसूरयः कियंति वर्षाणि जेसलमेरुदुर्गेऽवसन् । तदा मुनयः सर्वेपि शिथिलाचारा जाताः, प्रतिमोत्थापकमतं च बहु विस्तृतं । ततो बीकानेरवास्तव्य वच्छावत मंत्रि संग्रामसिंहेन गच्छस्थितिरक्षणार्थ श्री गुरव आहूताः, तदा भावतो विहित- क्रियोद्धारैः श्रीगुरुभिः 'प्रथमं देराउरनगरे श्रीजिनकुशलसूरियात्रां कृत्वा पश्चात् परिग्रह त्यक्त्वा इतो विहार करिष्ये' इति विचिंत्य गुरुयात्रार्थ देराउरे जग्मे । तत्र गुरुदर्शनं कृत्वा, जेसलमेरु प्रति पश्चादागच्छतां गुरूणां मार्गे जलाभावात्पिपासापरीपहः समुत्पन्नः। ततो रात्री जलं मिलितं तदा गुरुभिचिंतितं 'मया इयंति वर्षाणि रात्रौ चतुर्विधाहारप्रत्याख्यानं कृतं, तदद्य एकस्मिन् दिने कथं विनाश्यते' इति । ततः तत्रैव सं० १६१२ आषाढसुदि पंचम्या- मनशनेन कालं कृत्वा स्वर्गतिं प्राप्ताः ॥ ६॥ ६१. तत्पट्टे एकपष्टितमः श्रीजिनचंद्रसूरिः। तस्य च तिमरीनगरपार्श्वस्थवडलीग्राम वास्तव्य रीहडगोत्रीय साह श्रीवंतः पिता, सिरीयादेवी माता । सं० १५९५ जन्म, सं० १६०४ दीक्षा, सं० १६१२ भाद्रपदसुदि नवम्यां जेसलमेरुनगरे राउत मालदेवकारित- नंदिमहोत्सवेन सूरिपदं जातं । तदा एव रात्रौ श्रीजिनमाणिक्यसूरिभिः प्रादुर्भूय समवसरणपुस्तकस्थमाम्नायसहितं सूरिमंत्रपत्रं जिनचंद्रसरिभ्यो दर्शितं । ततः श्रीजिन- चंद्रसूरयः संवेगवासनया वासितचित्ताः संतः, गच्छे शिथिलत्वं दृष्ट्वा सर्व परिग्रहं परित्यज्य मंत्रि- संग्रामसिंहपुत्रकर्मचंद्राग्रहेण बीकानेर नगरे समागताः, तत्र प्राचीनोपाश्रयं शिथिलाचारै- यतिभिर्निरुद्धं विलोक्य मंत्रिणा स्वकीयाऽवशाला गुरुभ्यो दत्ता, अपरापि यही गुरुभक्तिः कृता । गुरवस्तत्र विशेषतः क्रियोद्धारं विधाय सुविहितसाधुमार्गमादृत्य, स्वसमानाचारैः साधुभिः सार्दू ततो विहारं कृत्वा स्थाने स्थाने प्रतिमोत्थापकमतोच्छेदं कुर्वतः स्वसमाचारी द्रढयंतः क्रमेण गुर्जरदेशे आगताः । तत्राऽहमदाबादनगरे चिर्भटीव्यापारणाजीविका कुर्वाणौ मिथ्यात्विकुलोत्पन्नौ प्राग्वाटज्ञातीयौ सिवा-सोमजी-नामानौ द्वौ भ्रातरौ प्रतिबोध्य सकुटुंबौ महाधनवती श्रावको कृतवंतः। तथा पाटण नगरे एकदा केनापि परपक्षीयेण जनानां पुरो 'अभयदेवमूरिः खरतरगच्छे न जातः, इत्युक्तं तदा गुरुभिः शास्त्रसंमतं वादं कृत्वा चतु शीतिगच्छीय सुनिसमक्षं परपक्षीयाः पराजयं नीताः। ततः सर्वैरपि नवांगीवृत्ति- विधायकोऽभयदेवसरिखरतरगच्छे जातः इत्यंगीकृतं । पुनः तत्कृतकुमतिकुद्दालग्रन्थोऽ शुद्ध नावं प्रापितः । तथा पुनः फलवकिपार्श्वनाथदेवगृहद्वारे तपागच्छीदत्तानि तालकानि उद्घाटितानि, तथा पुनरेकदा मंत्रि कर्मचंद्रमुखाद् गुरूणामति महत्वं श्रुत्वा पतिशाहिना दर्शनार्थ समाहूता गुरखो लाहोरनगरे गत्वा अकबरं प्रतिबोध्य सकलदेशेषु फुरमाणकान् मांचयित्वाऽष्टाहिकासु अमारिपालनं कारितवंतः, तथा वर्ष यावत् स्तंभनगरपार्श्वस्थसमुद्र- मत्स्यान् मोचितवंतः, तथा पुनर्थेपामतिशयं दृष्ट्वा पतिसाहिना युगप्रधानपदं दत्तं । तस्मि- अवसरे एव श्रीमदकब्बराग्रहात् गुरुभिर्जिनसिंहसूरिः स्वहस्तेनाचार्यपदे स्थापितः । तदाऽति ॥ खरतरगच्छ पहावली-१॥ " " प्रमुदिवेन कर्मचंद्रमत्रिणा महोत्सवो विहितः । तत्र नव प्रामाः ९, नव हस्तिनः ९, पंचाशत् (५००) घोटकाः याचकेम्यो दत्ता एवकारसपादकोटि द्रव्य दत्त । पुनमंत्रिणाऽनेकदा श्री खरतरगच्छोद्दीपनं निहितं । तथा पुनः सं० १६५२ श्री गुरुभिः पचनद्यः साधिताः, तत्र पीरपचक, मानभद्र यक्ष, राजक्षेत्रपालादयो देवाः साधिताः। तथा पुनरेकदा सं० १६६९ श्री सलेमपतिसाहिना गानादिकलानिपुणत्वेन स्वपार्थे रक्षितस्य तपागच्छीययतेनिज- स्त्रिया सह एकातस्नेहवा करणाद्यनाचारं विलोक्य कुपितेन सता स्वसेवकेभ्य इत्थमाज्ञा दना-" मम सर्वदेशेषु ये केपि दर्शनिनः सति ते सर्वेपि स्त्रीधारकाः कर्तव्याः, नौचेत् देशेभ्यो पहिः कार्या" इति । ततो भीता यतयः केचित् समुद्रमुल्लघ्य द्वीपातरं गताः, केचित् भूमिगृहेषु प्रविष्टाः, केचित् कोलिककाष्ठकादीना स्थानेपु स्थिताः। तस्मिनवमरे श्रीजिनचद्रसूरिभिः पाटणतो विहृत्य उपद्रववारणार्थ आगराख्ये नगरे आजग्मे । तर गुल्दर्श- नादेव रेजितेन पतिसाहिना बहादरेण गुरव आहृताः, तदा गुरुभिर्बहुचमत्कारान् दर्शयित्वा प्राग्दत्ताज्ञा दूरीकारिता, सनत्र फुरमाणकान्मोचयित्वा सर्वे यतयः स्त्र स्व स्थान प्रापिताच । इत्य बहुधा जिनशासनोन्नतिः कृता, पुनर्गुरूणा-१ समयराज, २ महिमाराज, ३ धर्म- निधान, ४ रत्ननिधान, ५ ज्ञानविमल-एतत्पाडवपंचकप्रमुसाः, पंच नवति (९५) शिष्याः सजाताः । एवविधाः श्रीजिनचंद्रसूरयः सर्वायुः पचसप्तति (७५) चर्पाणि पालायित्वा, सं० १६७० आश्विन यदिद्वितीयाया नातटे स्वर्ग प्राप्ताः ॥ ६१॥ -तद्वारके स० १६२१ मावहोपाध्यायात् भावहीय खरतरशाखाभिन्ना । अयं सप्तमो गच्छभेदः॥ 5६२. तत्पट्टे द्वापष्टितमः श्रीजिनसिंहमूरिः । तस्य च गणधरचोपडागोत्रीय साह, चापसी पिता, चतुरगदेवी माता । स० १६१५ मार्गशीर्षसुदि पर्णिमास्या सेतासरनामे जन्म, मानसिंहेति मूलनाम । स० १६२३ मार्गशीर्षवदि पचम्या वाकानेरे दीक्षा। सर्व १६४० माघसुदि पचम्यां जेमलमेरो वाचकपद। स० १६४९ फाल्गुनसुदि द्वितीयायो लाहोरनगरे पीकानेर वास्तव्य मति कर्मचंद्रकृत महोत्सवेन आचार्य पदं । सं० १६७० वेनातटे मूरिपद । स० १६७४ पापपटि प्रयोदश्या मेडतारप नगरे स्वर्गप्राप्तिर्जाता ।। ६२ ।) ६३. तत्पट्टे श्रीजिनराजसरिः । तस्य च बोहित्यरा गोत्रीय साह धर्मसी पिता, धार- लदेनी माता। स०१६४७ चै० मु०७ जन्म, स० १६५६ मि० सु०३ बीकानेरे दीक्षा, राज- समुद्र इति नाम दनं । सं० १६६८ आमाउलिपुरे श्रीजिनचद्रमरिभिः वाचकपद प्रदत् । ततः म० १६७४ फा० मु०७ मेडताख्ये नगरे चोपडा गोत्रीय साह आसकरणकृत महोत्स- पेन रिपद जात श्रीजिनराजरिरिति नामविहित; त्या द्वितीय शिष्य पोहित्यरा गोत्रीय सिद्धगेनगणिः, तस्मै आचार्यपद दत्त, जिनमागरसूरिरिति नाम विहित । ततो द्वादशवाणि यापदाचार्यः श्रीपूज्याना आपां प्रत , पद्यात्ममयमुन्दरोपाध्याय-शिष्य हर्षनदनक, कदाप्रहेण म० १६८६ आचार्य जिनसागरसूग्तिो लघु-आचार्यांय-सरतर शाखा " - ॥ खरतरगच्छ पट्टापली-२ ॥ भिन्ना। अयमष्टमो गच्छभेदो जातः । ततः श्री जिनराजसूरिभिः लोद्रवपत्तने श्री जेसलमेरु वास्तव्य भणशालिक साह थाहरू कारितोद्धार विहारशृंगार श्रीचिंतामणि- पार्थप्रतिष्ठा कृता । तथा सं० १६७५ वै० सु० १३ शुक्रे श्रीराजनगर वास्तव्य प्राग्वाटज्ञा० संघपति सोमजीपुत्र रूपजीकारित श्रीशत्रुजयोपरि चतुर्दार विहारहारायमाण श्रीऋषभादि जि- नैकाधिक पंचशत (५०१) प्रतिमानां प्रतिष्ठा विहिता । तथा पुनर्भानुवडग्रामे साह चांप- सीकारितदेवगृहमंडन श्रीअमृतश्राविपार्श्वनाथ प्रमुखाशीति (८०) विवानां प्रतिष्ठा वि- धायि । तथा पुनर्मेडताख्ये नगरे गणधरचोपडागोत्रीय संघपति श्रीआसकरणसाहकारित चैत्याधिष्ठायक श्रीशांतिनाथप्रतिटा निर्मिता । एवमन्यत्रापि-राजनगराधनेकनगरेषु श्रीजिन- प्रतिष्ठा चक्रे । एवंविधाः श्रीजिनमतोन्नतिकारकाः, अंबकाप्रदत्तवरधारकास्तवलप्रकटित धंधाणीपुरस्थितचिरंतनप्रतिमाप्रशस्तिवांतराः समस्ततर्कव्याकरणच्छन्दोलंकारकोशकाव्यादि- विविधशास्त्रपारिणो नैषधीयकाव्यसंबंधी जैनराजी-वृत्त्यायनेकनवीन ग्रन्थ विधायकाः श्रीबृहत्खरतरगच्छनायकाः श्रीजिनराजसूरयः सं० १६९९ आषाढ सु० ९ पत्तने स्वर्गभाजः। तदैव, सं० १७०० मिते उ० श्रीरंगविजयगणितो रंगविजय खरतर शाखा भिन्ना। अयं नवमो गच्छभेदः । ततस्तन्मध्यात् श्रीसारोपाध्यायतः श्रीसारीय खरतर शाखा भिन्ना । अयं दशमो गच्छभेदः । एकादशस्तु वृहत्खरतर नामा मूलगच्छः। एवमेकादशभेदः खरतर गच्छः। ६४. तत्पट्टे श्रीजिनरत्नसूरिः। तस्य च सेरूणाभिध ग्रामवास्तव्य लूणीयागोत्रीय साह तिलोकसी पिता, तारा देवी माता, रूपचंद्रेति मूल नाम । तथा निर्मलवैराग्येण मातृ- सहितेन दीक्षा गृहीता। ततः सं० १६९९ आपाढ सुदि सप्तम्यां श्रीजिनराजसूरिभिः सूरि- मंत्रो दत्तः । ततश्च शुद्धक्रियाभ्यासिनोऽनेकपुरविहारकारिणः श्रीजिनरत्नसूरयः सं० १७११ श्रा०व० ७ अकबरावादे स्वर्ग गताः । ६५. तत्पट्टे श्रीजिनचंद्रसूरिः। तस्य च गणधरचोपडागोत्रीय साह सहसकरणः पिता, सुपियारदेवी माता, हेमराजेति मूलनाम, हर्षलाभेति दीक्षानाम । सं० १७११ भा० व० १० श्रीराजनगरे नाहटागोत्रीय साह जयमल्ल तेजसी मातृकस्तूरवाईकृत महोत्सवेन पद- स्थापना जाता। ततः श्रीगुरुभिर्योधपुरवास्तव्य साह मनोहरदासकारित श्रीसंधेन सार्ध श्रीशत्रुजययात्रा कृता, तथा मंडोवरनगरे संघपति मनोहरदासकारित चैत्यश्रृंगार श्रीऋ- पभादि चतुर्विशतिजिनप्रतिष्ठा विहिता। एवंविधा नानादेशविहारिणः सर्वसिद्धान्तपारगाः श्रीजिनचंद्रसूरयः सं० १७६३ श्रीसूरतविंदरे स्वर्ग प्राप्ताः । ६६. तत्पट्टे श्रीजिनसौख्यसूरिः। तस्य च फोगपत्तन वास्तव्य साहलेचा वुहरागोत्रीय साह रूपसी पिता, सुरूपा माता, सं० १७३९ मार्गशीर्ष सुदि १५ जन्म, सं० १७५१ माघ चदि ५ पुण्यपालरग्रामे दीक्षा, सुखकीर्तिरिति दीक्षानाम | सं० १७६३ आषाढ सु ११ सूरतविंदरवास्तव्य चोपडागोत्रीय पारिष सामीदासेन एकादश सहस्र रूपकव्ययेन पद महोत्सवः कृतः। तत एकदा घोषाविंदरे नवखंडपार्श्वनाथयात्रां कृत्वा श्रीगुरुवः संघेन ॥खरतरगच्छ पट्टापली-२॥ सार्ध स्तंमतीर्थगमनार्थ प्रवहणमारूदास्तासमुद्रमध्यभागे पोतस्याधस्तनफलक भग्न, ततो जलेन पूर्यमाण पोत विलोक्य गुरुभिः स्वेष्टदेवाराधन चक्रे । ततः श्रीजिनकुशलमूरिसाहायेन अक- स्मानीनपोतप्रादुर्भागाजलधेः पार लब्ध ततः स पोतोऽदृश्यो बभूव । एवविधाः श्रीरानुजया दियानाविधायकाः सकलशास्त्रपारगा विजेतानेकवादिनः श्रीगुरवस्त्रीणि दिनान्यनशन कृत्वा स. १७८० ज्ये० २०१० श्रीरिणीनगरे सर्ग प्राप्तास्तत्र तहिने देरदृष्टयादिनाणि वादितानि वत्युराधीगादिसर्वलोकास्तद्वाद्यघोप श्रुत्वाऽऽश्वर्यवन्तो जाताः ॥६५॥ ६७. तत्पट्टे श्रीजिनभक्तिसूरिः। तस्य च इदपालमर ग्रामवास्तव्य सेठ- गोत्रीय साह हरिचंद्रः पिता, हरिसुखदेवी माता। सं० १७७० ज्ये० मु०३ जन्म भीमराजेति मूलनाम । सं० १७७९ माघसुदि ९ दीक्षा भक्तिक्षेमेति दीक्षानाम । स० १७८० ज्येष्ठयदि ३ रिणीपुरे श्रीसपकृतमहोत्सवेन गुरुभिः स्वहस्तेनाचार्यपद दत्त। ततो नानादेशविहारिणः साद- डीप्रभृतिनगरेषु हस्तिचालनादिप्रकारेण प्रतिपक्षान् पराजय नीत्या विजयलक्ष्मीधारिणः मर्म सिद्धान्तपाठप्रचारिणः श्री सिद्धाचलादि सकलमहातीर्थयात्राकारिणः श्री गूढारये नगरे अजितजिनचैत्यप्रतिष्ठाविधायिनो महातेजस्विनः सकलविद्वजनशिरोमणि श्रीराजसोमोपा- घ्याय, श्रीरामविजयोपाध्यायादि-सत्परिकरसमेवितचरणाः श्रीजिनभक्तिसूरयः कच्छदेशमडन- श्रीमाडवीविंदरे स० १८०४ ज्ये. मु० ४ स्वर्ग प्राप्ताः । तत्र मायं आमिसंस्कारभमी देवैर्दीप- माला पिहिता । ईदृक् प्रभावका जाताः ॥६६॥ ६८. तत्पट्टे श्रीजिनलाभसूरयः। वेपा च बीकानेरवास्तव्य वोहित्थरागोत्रीय माह पचायण- दासः पिता, पमादेवी माता। स० १७८४ श्रा० मु० चापेउग्रामे जन्म, लालचद्रेति मूलनाम, स० १७९६ ज्येष्टमुदि ६ जेसलमेरुनगरे दीक्षा, लक्ष्मीलाम इति दीक्षानाम । स० १८०४ ज्ये० • गु० ५ श्रीमाडवीविंदरे छाजहडगोत्रीय साह भोजराजकृत नदिमहोत्सवेन पदस्थापना जाता। तत. श्रीगुसो जेसलमेरुजीकानेराद्यनेकपुरेषु विहारं कृत्वा स०१८१९ ज्ये० ३०५, पंच- सप्तति (७५)साधुभिःमार्ध श्रीगौडीपार्धेशयानाकृतवन्तः। ततःम०१८२१फा०म०प्रतिपत्तिथा पचाशीति (८५) मुनिभिः सह श्रीअर्बुदाचलयाना कुर्वति स्म । ततश्च घाणेराव-शादडीनामके नगरद्वये चोपडा वपतसाहादिकृतमहोत्सवेन समागत्य उपद्रवरणाय स० पक्षीयान् स्वमलेन पराजय नीत्या विजयवादिनाणि वादितवतः। ततस्तदेशराणपुरादि-पचतीर्थी वदित्या नावट- मेदिनीतट-रूपनगर-जयपुगेढयपुरादि-नगरेपु रिहत्य सं० १८२५ वै० मु० १५ अष्टा- शीति (८८) मुनिभिःसाई श्रीब्लेवगहाधिष्ठायकम्पभदेवयाना ति स्म। ततः पल्लिकासत्य- पुर-राधनपुरादिपु विहत्य श्रीमसेघर पार्थयाना कृत्वा सेठ गुलालचंद सेठ भाईदास श्रीम- पाग्रहात्परतविंदरे समागताः । वन स० १८२७ वै० म० १२ आदिगोत्रीय साहनेमीदामां- गज भाईदास कारित निम्मप्रासादमडन श्रीशीतलनाय महसफणपार्श्व गाटीपार्थापेका- शीत्यधिक शत (१८१) पिंच प्रतिष्ठा कृतपतः। तया स० १८२८ पै० सु०१२ तय देवगृहे श्री महावीरादि इचशीति (८२) विप्रतिष्ठा पुति स्म । तदा देवगृहनिय निर्मापण .
३८
।। खरतरगच्छ पट्टावली-२ ॥
प्रतिष्ठाद्वयविधानसंघभक्तिकरणादौ पत्रिंशत्सहस्र (३६०००) रूपकानि व्ययी
भूतानि । ततश्च मुनिसुव्रतस्वाभियात्रार्थ भृगुकच्छे समागताः। तत्र रात्री वातटे योगिनीकृत
महाधनवृष्टयुपद्रवेण व्याकुलीभूतं सर्वसाथ स्वेष्टदेवस्मरणेन निराकुलं कृतवंतः। ततो
राजनगरभावनगरादौ विहत्य घोघावंदरे नवखंडपार्श्वयात्रां विधाय पादलिप्तपुरे समागताः।
तत्र सं० १८३० माघवदि ५, पंचसप्ततिमुनिभिः सार्धं श्रीशत्रुजययात्रां कुर्वति स्म । ततो
जीर्णगढमागत्य सं० १८३० फा० सु०९ पंचाधिकैकशत (१०५) साधुभिः सह श्री गिरनारमं-
डननेमिजिनयात्रामकुर्वन् । ततो वेलाकूलपत्तन-नव्यनगरादिषु विहृत्य कच्छदेशे मांडवीविं-
दरे श्रीगुरुपदकमलस्थापनां वंदित्वा क्रमेण तद्देशाद्विहृत्य राउपुरनगरे श्री चिन्तामणि-
पार्श्वेशमभिवंद्य सं० १८३३ मिति चैत्र वदि द्वितीयायां श्री गौडीपार्श्वयात्रां चकुः । एवंविधाः
परमसौभाग्यादिसद्गुणश्रेणिधारिणो महोपकारिणः श्रीजिनलाभसूरयः सं० १८३४ मिति
आश्विन वदि १० श्री गूढानगरे स्वर्ग गताः ॥६७॥
६९. तत्पट्टे श्रीजिनचंद्रसूरयः । तेषां च वीकानेरवास्तव्य वच्छावतमुंहता.रूपचंद्र पिता,
केसरदेवी माता, सं० १८०९ कल्याणसरग्रामे जन्म, अनूपचंद्रेति मूलनाम। सं० १८२२
मंडोवरे पुरे दीक्षा, दयासार इति दीक्षानाम । सं० १८३४ आश्विन वदित्रयोदश्यां सोमे शुभलग्ने
गूढानगरे कूकडचोपडागोत्रीय दोसी लक्खासाहकृतोत्सवेन सूरिपदं जातं । ततस्तेगणाधीश्वरा
महेवादिपुरेषु चैत्यान्यभिवंद्य श्रीगौडीपार्श्वेशं नत्वा क्रमेण जेसलमेरुवीकानेरादिषु चिन्तामाण
पार्श्वनाथादि देवयानां कृतवंतः। तत्र जेसलमेरौ आवश्यकादि-योगक्रियां च विहितवंतः। ततोऽ
योध्या कासी चंद्रावती पाटलीपुत्र चंपा मकसूदाबाद संमेतसिखर पावापुरी राजगृह
मिथिला दुतारापार्श्वनाथ क्षत्रिकुंडग्राम काकंदी हस्तिनागपुरादियात्रां व्यधुः। तदानीं पूर्व
देशे श्रीलक्ष्याउनगरे नाहटागोत्रीयः सुश्रावको राजा, बच्छराजाख्यश्चतुर्मासकत्रयं
महोत्सवेन कारितवान् । तत्र बहुविस्तृतः प्रतिमोत्थापक-निन्हवमार्गः श्रीपूज्यैः स्वज्ञान-
बलेन निराकृतः, बहवः श्राद्धाः सन्मार्ग नीताः। श्रीपूज्यानां सुतरां महिमा प्रससार। तन्नगरास-
नोद्याने राज्ञा श्रीजिनकुशलसूरीणां स्तूपः कारितस्ततोविहत्य श्रीगिरनारशत्रुजयतीर्थयोर्यात्रा
व्यधुः । तत्र पादलिप्तपुरे परपक्षीयैः सार्द्ध महान् विवादः समजनि; परं श्रीदेवगुरुप्रसादाजय-
प्राप्तिर्जाता, परपक्षीयाः पराजयं प्राप्य पलायितास्तदा तत्रत्य नृपादिभिर्वहुमानकरणात्पू-
ज्यानां महिमा सर्वत्र सुतरां विस्तृतवान् । ततो वर्षानंतरं मोखाडाभिधग्रामे श्रीगौडी पार्श्वेश
यात्रार्थमागते साधिक लक्ष मनुष्यात्मक श्रीसंघ तत्रत्यामात्यादि प्रधानपुरुषवचनाद् द्वयो-
भट्टारकयोः परस्परमेलः संजातः। ततो दक्षिणदेशेऽन्तरिक्षपार्श्वेशयात्रां कृत्वा श्रीसूरत
विंदरे सं० १८५६ ज्ये० सु०३ स्वर्गं गताः । एवंविधाः परमसौभाग्यधारिणः सकलजन्मनो-
हारिणः सर्वसिद्धान्ताध्ययनकारिणः सर्वत्र विख्यातकीर्तिभरा जंगमयुगप्रवराः श्रीबृहत्खरतर
गच्छेश्वराः वाग्जितमुरेंद्रसूरयः श्रीजिनचंद्रसूरयः संजाताः ॥ ६८॥
॥ खरतरगच्छ पट्टावली-१॥ गांमीर्यादिगुणग्रामवेश्मना शुद्धचेतसा । श्रीजिनलाभसूरीणामाज्ञामादाय शोभना ॥१॥ श्रीजिनमक्तिसूरीन्द्रशिष्या बुद्धिवार्द्धयः । प्रीतिसागरनामानस्तच्छिष्या वाचकोत्तमाः ॥२॥ श्रीमतोऽमृतधर्माख्यास्तेपा शिष्येण धीमता । क्षमाकल्याणमुनिना शुद्धिसंपत्तिसिद्धये ॥३॥ संवत्सरे व्योमकृशानुसिद्वि क्षोणी (१८३०) मिते फाल्गुन मासि रम्ये । विशुद्धपक्षे लिखिता नवम्या गुरुस्तुतिर्जीर्णगढे नमासी ।। इति श्रेयः ।। [ अनुपूर्तिः] ७०. तत्पद्दे श्रीजिनहर्षसूरयः।तेपा वालेनाग्रामे जन्म, हीरचंद्रेति मूलनाम, मीठडियाहि- रागोत्रीय.साह तिलोकचद्रः पिता, तारादेवी माता । सं० १८४१ आऊग्रामे दीक्षा, हितरग इति दीक्षानाम, स० १८५६ ज्ये० सु० १५ श्रीसूरतनिंदरे श्रीसघतोत्सवेन सरिपद जात । श्रीजिनहर्पसूरिरितिनाम निहित । तदा तस्मिन्नगरे श्रीसपेन चैत्यनिनप्रतिष्ठा करापिता । तथा सं० १८६० अक्षयतृतीयाया तिथी देवीकोटवास्तव्य श्रीसघकारित देवगृहे सार्द्ध शनिबाना प्रतिष्ठा व्यधायि । तथा पुनर्जालोरनगरे मनि अपयराजकारित देवगृहे प्रतिष्ठा निर्मिता । तथा स० १८६६ चै० सुदि १५ गिडीयासधपति राजाराम लुणीया गोत्रीय साह तिलोकचढ कृत संघे सपाद लक्ष श्राद्धैः एकादश शतसाधुभिः सह श्रीगिरनार-पुडरीकादी यात्रामकुर्वन् । ततो गुरस अनेक देशेषु विहत्य स. १८७० शिसरगिरिराज तीर्थस्य यात्रा चक्रुः । पुनरपि स० १८७६ श्नीसधेन सह शिखरागरियाना चक्रुः। ततः पथाद् दक्षिणदेशे अंतरीक पार्श्वनाथ, मगसी पार्श्वनाथ, धुलेवगढ इत्यादि तीर्थयात्रा कुर्वता स० १८८७ आपाढ सुदि १० तिथौ श्रीनीकानेरे श्रीसीमधरस्वामिमंदिरे पचविंशति निंगाना प्रतिष्ठा निर्मिता । सं० १८८९ मा० सु०१.तिथी श्रीवीकानेरे सेठियागोत्र साह अमीचद कारित सम्मेतशिखर गिरिमावविराजितमंदिरस्य प्रतिष्टा विहिता। तस्मिन्नसरे जेसलमेरवास्तव्य वाफणा साह- वाहदरमल्ल जोरावरमल्लकस्य हदये सिद्धाचलगिरियानाविचारो बभून । मनसीति विचारः स मृत्पन्नः यः सिद्धाचलगिरि स्मृगति तस्य जीनित सफल भवति' इति विचार्य सर्व परिवारेण सह विक्रमपुरे आगताः, महामहोत्सनेन बहुद्रव्यव्ययेन गुरवः बदिताः, सप्तस्थानेषु बहु द्रव्य दत्त, तदा सर्व साधून् प्रति बहु वस्त्राण्यपितानि | तदा गुरवः श्रीसधेन सह मिद्वाचलगिरियानां प्रतिचेलः। अतराले वर्षाकालस्समागतः। तदा गुरख मडोवरे चतुर्मास्या स्थिताः। एव विधाः जितानेकवादिनः जिनशामनोद्योतकरा' गुरवस्तर मटोरे स० १८९२ का० २०९ चतु: प्रहराणि यापदनशन प्रपाल्य सर्गगताः ।। ७१. तत्पट्टे एक सप्ततितमाः श्रीजिनसौभाग्यसूरयः । तेपाच मारवाडवास्तव्य साई सेर- डापामे स० १८६२ जन्म, मुरतरामेति मूलनाम, गणघर चोपडाकोठारी गोत्रीय साह करमचदः पिता, करुगा देवीमाता, स० १८७७ सिंघिया दोलतरावकस्य लस्करे दीक्षा शौभाग्यविशा- लेति दीक्षानाम, सं० १८९२ मार्गशीर्ष शुक्ल मतम्या गुरुवारे शुभलमे श्रीमद्विक्रमनगरे सजा- ननी साह लालचद सालमार्मिह कतनदी महोत्सवेन रिपदं नात ॥
परिशिष्टम्. ved [प्रत्यन्तरे ६२ तम पट्टपश्चात्-थावत् ७१ पतम पट्टपर्यन्तं निम्नलिखिता भिन्न पट्टपरंपरा समुपलभ्यते.] ६३. तत्पट्टे त्रिपटितमः जिनसागरसूरिः। तस्य च वोहित्थरागोत्रीयः श्रीवीकानेर- वास्तव्य साह बच्छराजः पिता, मिरगादे माता। सं० १६५२ वर्षे कार्तिकसुदि १४ रखो अश्चिन्यां जन्म, चोला मूलनाम । सं० १६६१ वर्षे माहसुदि ७ दिने अमरसरसि श्री जिनसिंह- सूरिणा दीक्षितः। श्रीमालचुहरा अचूका श्रावकैनदीमहोत्सवः कृतः। वादी श्री हर्ष- नंदनगाणिना वाल्यत आरभ्य सर्वशास्त्राणि पाठितानि। सं० १६७४ वर्षे फाल्गुनसुदि सतम्यां मेडताख्ये नगरे चोपडागोत्रीय साह आसकरणकृतमहोत्सवेन सृरिपदं जातं, श्री जिनसागरसूरिरिति नाम विहितं । तथा द्वितीय शिष्य बोहित्थरागोत्रीय राजसमुद्र- गणिः, तस्मै आचार्यपदं दत्तं, जिनराजसूरिरिति नाम विहितं । ततो द्वादशवर्षाणि यावदा- चार्यः श्री पूज्यानां आज्ञायां प्रवृत्तः, पश्चात् आचार्य जिनराजसूरितः त्रिभिर्गच्छो विभिन्नः । तस्य व्यवस्था इयं-सं० १६९९ मिते बृहत् भट्टारक श्रीरंगविजयगणितो रंगविजय खरतर शाखा भिन्ना, अयं नवमो गच्छभेदः । ततः तन्मध्यात् श्रीसारोपाध्यायतः श्रीसारीय खरतर शाखा भिन्ना, अयं दशमो गच्छभेदः। ततः सं० १७१२ आचार्य जिनराजसूरीणां द्वितीय शिष्य रूपचंद्रेण लघु भट्टारक खरतर शाखा भिन्ना, अयं एकादशमो गच्छभेदो जातः । ततः भट्टारक श्री जिनसागरसूरिभिः सं० १६७४ वैशाख सुदि त्रयोदश्यां शुक्रे श्रीराज- नगरवास्तव्य प्राग्वाटज्ञातीय संघपति सोमजीपुत्र रूपजीकारित श्री शत्रुजयोपरि चतुर्दार विहारहारायमाण श्रीऋपभादिजिनकाधिक पंचशत (५०१) प्रतिमानां प्रतिष्ठा विहिता । एवंविधाः श्रीजिनमतोन्नतिकारकाः, अंबिकाप्रदत्तवरधारकाः, समस्ततर्कव्याकरण- च्छंदोलंकारकोपकाव्यादि विविधशास्त्रपारिणः, स्थाने स्थाने सर्वत्र श्रावकर्मानिताः, परम- संवेगवंतः, भाग्यसौभाग्यवंतः, भट्टारक श्रीजिनसागरसूरयः श्री अहमदाबादनगरे सं० १७२० वर्षे ज्येष्ठवदि तृतीयायां एकादशवासराऽनशनं विधाय, स्वपट्टे श्री जिन- धर्मसूरद्रान् संस्थाप्य, सर्वशिष्याणां शिक्षां दत्वा स्वर्ग जग्मुः । अयमष्टमस्तु वृहत्खरतरनामा मूलगच्छः । एवमेकादशभेदः खरतर गच्छः ॥६३ ॥ ६४. तत्पट्टे चतुपष्टितमः श्रीजिनधर्मसूरिः। स च भणशालीगोत्रीय श्रीवीकानेर- वास्यव्य सा० रिणमलभार्या रतनादेपुत्रः, सं० १६९८ वर्षे पौपसुदि २ अभिजित् नक्षत्रे जन्म, खरहथ मूलनाम । सं० १७........वर्षे वैशाखसुदि ३ दिने श्रीजिनसागरसूरिणा दीक्षितः। वादि श्री हर्षनंदनगणिना वाल्ये वयसि सर्वशास्त्राणि पाठितानि। सं० १७११ वर्षे माघ- सुदि १२ आचार्यपदमहोत्सवः चर्द्ध (१) भार्या विमलादे कृतः । सं० १७२० वर्षे श्री विक्र- ॥ सरतरगच्छ पट्टावली-२ ॥ मपुरे मट्टारक पदमहोत्सवः गोलपच्छा अचलदासजीकेन कृतः। ततो भट्टारक श्रीजिन- धर्मसूरिभिः साह उग्रसेन रतनकृत श्री शखेश्वरपार्श्वनाथ सघयात्रा कृता, पुनः शत्रुजये पष्ठाष्टमादितपः कृत, सर्वदेशेषु सर्पक्षत्रे विहारः कृतः । स० १७४६ वर्षे मृगसिरवदि ८ श्रीजिनचद्रसूरीणा गच्छभार स्वकीयपट्ट समर्प्य श्री लूणकरणमरसि नगरे स्वर्ग गताः॥६॥ ६५. तत्पट्टे पचपष्ठितमः श्रीजिनचद्रमरिः। वानडीयनामनामी बुहरागोत्रीय साह सामलदास साहितयोः पुत्रः, सं० १७२९ वर्षे जन्म, सुसमल्ल नाम । स० १७३८ वर्षे श्रीजिनधर्मसूरिपार्थे दीक्षा गृहीता। स० १७४६ वर्षे मृगसिरसुदि १२ लूणकरणसरसि भट्टारक पद प्राप्त, तदुत्सवय छाजहड रतनमी जोधाणीकेन कृतः। ततः सर्वदेशेषु निहत्य स० १७८५ वर्षे श्रीकानेरमध्ये श्रीजिनविजयसूरीणा आचार्यपद दत्त । ततः स. १७९४ वर्षे ज्येष्ठसुदि १५ दिने श्रीनीकानेरनगरे सर्मायुः ६५ वर्षाणि प्रपाल्य स्वर्ग गताः ॥६५॥ ६६. तत्पट्टे पष्ठपष्टितमाः श्रीजिनविजयसूरयः। कीदृशाः-नाहटागोत्रीय साह इगरसी दाडिमदेपुन, स० १७४७ वर्षे जन्म, नाम रतनसी । स० १७५३ वर्षे श्रीजिनचंद्रसरि- पाः दीक्षा । स० १७८५ वर्षे श्रीपीकानेरमध्ये आचार्यपद प्राप्त, तदुत्सरः श्री हाजी- सानडेरा वास्तव्य डेहरा थाहरुमल्लकेन कृतः। स० १७९४ वर्षे श्री बीकानेरमध्ये भट्टा- रुपदं प्राप्त, तत्समय डागा पुजाणी कृतः, प्रभागना बाई फला कृता । सं० १७९७ वर्षे आसो बदि ६ दिने जैसलमेरुदुर्गे दिन गताः ।। ६६ ।। ६७. तत्पट्टे सप्तपष्टितमाः श्रीजिनकीर्तिमूरयः । तेपा च मारवाडवास्तव्य खीवसरा गोत्रीय साह उग्रमेन पिता, उच्छरगदेनी माता, म० १७७२ वर्षे पैशास मुदि मप्तम्या फल वर्तीनगरे जन्म, फिमनचंद्रेति मूलनाम । म० १७९७ जेसलमेरु मध्ये भट्टारक पद प्राप्त । अनेक देशेषु विहार कृत्या पूर्वदेश समेतशिखरादि तीर्थ यात्रा कृत्वा मुकसुदामाद मध्ये चतुर्मामकरय कृत, पथात् ततो विहार कृत्वा अनुक्रमेण श्री विक्रमपुरे प्राप्तः । पयाद सं० १८१९ विक्रमपुरे दिवं गताः ॥ ६७॥ ६८ तत्पट्टे अष्टपष्ठितमाः श्री जिनयुक्तमूरयः। तेपा च मारपाडवास्तव्य पुरा गोत्रीयः साह हमराज पिता, लालदेवी माता, स० १८०३ शासमुदि पचम्या जन्म, मूलनाम जीमणेति । स० १८१५ भट्टारक जिनकीर्तिमरिणा स्वहस्तेन दीक्षिताः । अनेक- शानपारगा एतादृशाः, स० १८१९ मट्टारकपद श्री विक्रमपुरे प्राप्त, तत्समय गोलेच्छा कृन । ततो विहार कृना भी जेसलमेरुगें स० १८२४ आमो पहिं द्वारश्या स्वर्ग गताः ॥६८॥ ६९. तपट्टे एकोनसप्ततितमाः श्रीजिनचद्रायः । तेषा च ग्राम मवास्तव्य रेहटगोत्रीय माह मागद पिता, माता च मक्तादेवी । म० १८०३ चनसुदि चतु- स्या जन्म। स. १८२० युगप्रधान श्री निनयुक्तमरिणा स्वयमेर दाता दत्ता, दतो व्याकरणादि समग्रसिद्धान्तपारगाः, परमतराइन प्रवीणाः, एसरिघा बभूवुः। स०१८२४ ४२ ।। खरतरगच्छ पट्टावली-२ ॥ श्री जेसलमेरदुर्गे आचार्यपदं प्राप्त, तदुच्छवश्च लक्षव्ययेन भूपाल मूलसिंघेन नंदि- महोत्सवो कृतः। अथान्यदा रतलामपुरे चतुर्मासी कृता, तत्र जिनविवस्य प्रतिष्ठामकरोत् । ततः श्री शचुंजयादि यानां कृत्वानुक्रमेण विक्रमपुरं अगमत् । अथान्यदा श्री आचार्यस्य मुखात् धर्म श्रुत्वा विक्रमपुरस्य राजा परमश्रावको जातः। एवंविधा जिनचंद्रमूरयः जेसल- मेरदुर्गे सं० १८७५ कार्तिक सुदि पूर्णिमायां स्वर्ग गताः ॥६९ ।। ७०. तत्पट्टे सप्ततितमः श्री जिनउदयसूरिः । स च सौवमपालग्रामवास्तव्य वोत्थरागोत्रीय साह जयराजपिता, जयदेवी माता तयोः पुत्रः। सं० १८३२ माघ सु० सप्तम्यां जन्म । सं० १८४७ मृगसिरसुदि तृतीयायां भट्टारक श्री जिनचंद्रसूरिणा दीक्षा दत्ता । सं० १८७५ मृगसिरसुदि पंचम्यां जेसलमेरदुर्गे आचार्यपदं प्राप्त, तत्र तत्पट्टमहो- सवः संघवी तिलोकचंद्रेण सहस्र द्रव्यव्ययेन नंदिमहोत्सवः कृतः । अथान्यदा मंदसोर पुरेऽगमत् , तत्र सं० १८९३ वैशाखसुदि तृतीयायां ऋषभजिनस्य बिंब प्रतिष्ठितं । पुनः विक्रमपुरे सं० १८९७ वैशाखमुदि षष्टयां श्री शान्तिनाथविवं प्रतिष्ठित । सं० १८९७ वैशाखसुदि त्रयोदश्यां दिने विक्रमाख्ये पुरे स्वर्गमगमत् ।। ७० ॥ ७१. तत्पट्टे एकसप्ततितमः श्रीजिनहेमसूरिः ।। गो....त्रीयः साणियाला ग्राम वास्त- व्यः साह पृथ्वीराज भा० प्रभादेवी तयोः पुत्रः, सं० १८६६ वर्षे आसाढशुक्ल प्रतिपदायां पुष्यनक्षत्रे जन्म, हुकमचंद मूलनाम । सं० १८८३ वर्षे वैशाखसिते तृतीयायां श्रीजिन- उदयसूरिणा दीक्षीतः। दीर्घदर्शी कस्तुरचंद्रजीगणिना बाल्यावस्थायां शास्त्राणि पाठितानि । सं० १८९७ वर्षे ज्येष्ठशुभ्रदले पंचम्यां तिथौ श्री विक्रमपुरे भट्टारकपदमहोत्सवः डागा सुरतरामजीकेन कृतः। ततो भट्टारक श्री जिनहेमसूरिभिः इंदोराख्यपुरे ऋषभेश्वरबिंब- प्रतिष्ठा कृता, तत्र श्री संवस्य द्विधाभावं निवार्यानंतर मनोदग्रामे श्री पार्श्वप्रभोविवप्रतिष्टा विहिता । पश्चात् श्री शधुंजयादि तीर्थयात्रां कृत्वा सर्वदेशेषु विहृत्य विक्रमपुरे प्राप्तः । तस्मिन् चिरं पदं भुक्तवान् ।
॥खरतरगच्छ पट्टावली॥ [३] अथ पट्टावली लिस्पते। प्रथमं श्रीउद्योतनसूरिः। सुविहितचक्रडूडामणिरुक- क्रियाकर्ता जिनशासनसाधुमार्गप्रकाशको बभूव | एकदा मालवदेशात् बहुश्रीसद्धसहितः श्रीशगुञ्जयतीर्थयात्रार्थ गच्छदिमध्यरात्री आकाशे रोहिणीशकटमध्ये बृहस्पतिः प्रविष्टो दृष्टः । श्रीहरिभिरुक्त 'यदि साम्प्रत सूरिपद यस्य दीयते स गच्छाधिपतिर्महान् भावी, गच्छस्य वृद्धि प्रामोति, गवेपिता. साधवः पर पार्श्वे नोपलभ्यते । तदा गणेशेनोक्त भवच्छिप्यो वृद्धास्योऽ स्ति तस्य दीयता यदि वेलामाहात्म्यमस्ति अयमपि भाग्याधिको भविष्यति । वासो नास्ति । गोरगणकचूर्णेन लुकटीयावडवृक्षाधः स्थापितो वर्धमानसूरिः श्रीउद्योतनसूरिभिः । क्रमेणाथ श्रीवर्धमानसूरयो यहुपरिवारा जाताः । तस्मिन्नरसरे विमलदण्डनायकैन गुर्जरराजा सम्मानि- नाचुदाचलधरित्र्या आरासननगरे अन्यायाः कुलदेव्याः प्रासादः कारितस्तनागम्य स्वमे देव्या दर्शन दत्त । सग गृहाणेत्युक्त्वा रुप्यत्रम्बकपानी दर्शते च तया । ततस्तेन महत सैन्य कृत्या देवीमाहात्म्येन चतुर्विशति देशा गृहीताः । छत्राणि अग्रे वादयन्ते पणिक्कुलत्वात् शीर्ष न स्याप्यन्ते तस्येति । सौराष्ट्रादिमहादेशेषु प्रोढाता प्रतिपालयन् बहुकाल निनाय । सः अन्यदायुंदायलेगाव श्रीमार्यासुप्रभातपुत्राग्या सार्घ । शुमस्थानमालोक्य श्रीः प्रोचे विमल स्वामिन्नत्र स्थले पेत् जिनप्रामादः कार्यः ते तदा महान् लामो भवति । द्विजाः पृष्टाः योचुरिटमस्मदीय तीर्थ न कदाचिज्जैनतीर्थमनासीत् । इत्युक्त्वा विप्रेमहान् कलिः प्रारब्धः, मरणाय बहवो ब्राह्मणा उद्यता जाताः । तस्मिन्नपसरे श्रीवर्धमानसूरयः समेताः विमलेन पन्दिताः पृष्टाच, मगमन् अत्र जन चैत्य नास्ति अह तत् चैत्य कारयामि । परं विनरेतारशं फर्म प्रारम्घ किं क्रियते । अप्रचेत् जिनप्रतिमा निर्गच्छति तदा एते यान्ति । वनः श्रीसूरिभिः सपाटकोटि सरिमन्त्रजापेन धरणेन्द्र समाय वस्याग्रे वार्वा उपवा, तेन त्वरितमेव श्रीआदि- नापप्रतिमा धनुःपञ्चायादध धार्शिता । अन तीर्थंकरप्रतिमासीत् इत्युक्त्वा ततो विमलेन म. दिना मेलिताः। यत्रेयं मालापतति ततोऽयो जिनप्रतिमा । क्रमेण नि'मृता जिनप्रतिमा । दिना. प्रोपदीय नार्थ पुरामी परमधुनास्माभिः गृहीत । मही मौल्येन दास्याम इति । सपाटना विमलेन मधुकरीभिर्धरा पूरिता अतरालधरा निष्ठति मापि परिता, पशकं तर जात विमलेन हटान् विनित मोऽप्यय गिरिमया स्वर्णमठ्या गृहीप्यते । जिरचिन्ति तीर्थमस्म- दीप सपं पास्पतीति शिचिन्य साय ग दत्ता। तन म्हान् श्रीआदिनाथप्रासाठः पारितः । अयादा श्रीगण्य. मरस्वतीपराने जा । शालाया स्थिताः स्वशिप्यान वर्क पाठयन्ति। वटा जिनपग्बुद्धिमागरी चित्रा श्रुत्या वर्षशाराया सरना । याद रतः गुरुमि- दयापों प्याग्या. ताम्पाम्मे दयारन्तो विमा य । मुगिमिरवत न विप्रेषु दया प्राप्यते ।
४४ ।। खरतरगच्छ पट्टावली-३॥ " ताभ्यामुक्तं कथं नेति । गुरुभिः सातिशयैर्वभाषे युवयोः शिरसि मृतमत्स्योऽस्ति । ताभ्यां तथैव दृष्टः । प्रतिवुद्धौ द्वाभ्यामपि दीक्षा गृहीता । पठितानि सम्यग् शास्त्राणि । गुरुभिः पट्टे स्थापितः जातः श्रीजिनेश्वरसूरिः॥ अपरो भ्राता. आचार्यों बुद्धिसागरः। अन्यदा शुर्जरधरित्र्यां श्रीअनहिल्लपाटके श्रीसूरयः समेताः । तत्र दुर्लभो राजा अतीव-विज्ञः षदर्शन पूजकः । तत्र चैत्यवासिनोऽतीवप्रमत्ताः साधुजनद्वेपिणः सन्ति । श्रीजिनेश्वरसूरिः, भ्राता घुद्धि- सागराचार्यः स्वमातुलगृहमागतः । चैत्यवासिनो निर्णीतिर्जाता । प्रभाते राज्ञः सभायां चैत्य- वासिनः समेताः। श्रीगुरवोऽपि राज्ञा पृष्टा युष्माकं मध्ये के सदाचाराः। गुरुभिरुक्तं ये सिद्धान्त- प्रोक्तमार्गानुयायिनस्ते सत्याः। राज्ञा निजकन्या भाण्डागारे मुक्ता, हे कन्ये त्वं पुस्तकं यथा- रुचि गृहीत्वा समानय । सा गता प्रथमत एव दशवैकालिकसूत्रं समानीतं सभा समक्षं, चैत्यवा- सिनः पुस्तकं गृहीत्वा वाचयन्ति स्म । गुरुभिरर्थोऽभिहितः । साध्वाचारे गोचर्याधिकारे पत्र चतुष्कमाच्छादितं । गुरुभिरुक्तं-राज्यपर्षदि स्तन्य जायते । पत्राणि निर्वासितानि । एतेऽस- त्यवादिनस्तस्कराः। यूयं खरतराः, इति सत्यवादिनः । गुरुभिरुक्तमेते कोमलाः इति । ततः श्रीगुरुभिः खरतरविरुदं प्राप्त । दससय चिहु वासेहि नयरपाटण अणहिलपुरि । हुओ वाद सुविहित चहवासीसु बहुपरि । दुलभनरवइ सभासुमुपि जिणि हेलइ वजित्तउ । चित्तवास उत्थपिअ देस गूरजरहिव दित्तउ । सुविहितगच्छखरतर बिरुद दुलभनरवइ तिहां दियउ । श्रीवर्धमान पइ तिलउ सूरि जिणेसर गहगह्यउ ।। गच्छस्थापना जाता। बहवः श्रावका बभूवुः। २. तेयां पट्टे श्रीजिनचन्द्रसूरयः। मोजदीन पातिसाहस्य पिंजारकगृहस्थितस्य उक्तम- सूत्, यथायं ढिल्यां मालवोपि पातिसाहो भविष्यति । ततः क्रमेण कस्यापि म्लेच्छस्य धवासो जातः । एकदा पातिसाहेनोक्तं म्लेच्छस्य एष सेवको सवालोऽस्माकं देहि । तेन दत्तः। शतवयो मृतावस्थाप्राप्तः पातिसाहः क्षणं यावत् सचेतः क्षणं अचेतो भवति । तदा पाति- साहपुत्रो मोजदीनः पिंजारकपुत्रो पि षवासो नाम्ना मोजदीनः। पवासः तिष्ठन् पार्श्वे परिचर्या करोति, तावत् प्रधानपुरुषैरुक्तं स्वामिन् पुत्रस्य राज्यं देहि। तेनोक्तमवसरे दास्यामि । अन्यदा मध्यरात्रौ श्वासश्चटितः, ज्ञातं म्रियते, आकारितः पुत्रो मोजदीनः । पुत्रस्य निद्रा समेता । खावासेन ज्ञानं परिचर्यार्थ मामाकारयति । आगतः पवासः पुत्रभ्रान्त्या शिरः टोपी तस्य शिरसि न्यस्त, पङ्गः करे दत्तः । स्वयं प्रणामः कृतः। भिलिताः प्रधानाः प्रोचुः-स्वामिन् किंकृतं ? नामांत्या पवासस्य राज्यं दत्तं । पातिसाहेनोक्तं-मया यत् दत्तं तत दत्तमेवेति । सत्पुरुषवाक्यं नान्यथा स्यात् । पुत्रः प्रगष्टः खवासस्य राज्यं जातं मोजदीनपातिसाहिरिति । अथ श्री जिनचन्द्रसूरिभितिं स एव पिंजारकपुत्रोऽस्मत्कथितः पातिसाहिर्जातः । ढिली पण्डले साधूनां विहारो नास्ति । अनेक सुल्ला-सेख-काजी-प्रमुखैद्वेषिभिर्निवारितो। वयं यामो येन साधूनां विहारो भवेदिति विमृश्य तत्रागता गुरवः । श्रीमालधनपालगृहस्थिताः ।
। || खरतरगच्छ पट्टावली-३।। तेनोक्तम्-'श्रीपूज्यानामत्रागमनं दुःखाय भविष्यति । सो आगतोऽस्ति । धनपालो जगाम तथैवोवाच च । प्रभाते महोत्सपेन समानीताः गुरवः । पतितः पादयोः । सर्वन देशे साधूना विहारो जातः । यहनः श्रापका जाताः । धनपालकटाकजाता महुतीयाण गोत्रीया इति । मुहुतीयाण डादुइ जिण नमइ कई जिण कड जिणचद । वस्य पद्मावती प्रत्यक्षासीव गुरुमित-अस्माकं गच्छो यथा वर्धते तथा कुरु। देव्योक्तं गच्छो वर्धिष्णते, चतुर्थपट्टे भरदीय नामदेयमिति। तेन दीयते स तु प्रायो भन्यो भवति । तच्छिष्यः श्रीअभयदेचसृरिः। पोडशवर्षे आचार्यपद । प्रथमे दिनेऽतिगाररसो व्या- रख्यातो, लोका हर्पिताः । पर गुरुभिस्पत-शिष्य, शुशाररसोऽतीव साधुभिर्न वर्ण्यते । यतो पिनाशो भवति धर्मस्य । व नीरागी, परं लोकाः सरागाः सन्तीति । तदोत्थाय साधुममक्षं पम्रिकृतित्याग विदधाति स्म । ठूबर छासि जलं एतत् द्रव्यत्रय गृहीप्यामीत्यभिग्रह लली । क्रमेण गलितकुष्ठी जातः । गलिताः नासिकाद्याः शरीरावयवाः मुखपत्रिकामपि गृहीतु न शन्नोति । तदा त्रम्बावतीपुरश्रावकाणा पुरतः प्रोचे गुरुभिः, चेत् सघः कथयति तदाह- मनसन गृहामि । सद्देनोक्त प्रातः । ततो रानी शामनदेवता आगता कथितं नरैताः सूत्रकोकव्यः संति ता उद्धर। तेनोक्त अगुलीभिर्विना कथाद्धगमि। तयोक्तं-सेटिका- नदीतीरे पापरापलाशतरुतले धेनुर्दुग्धं सपति तत्र श्रीस्तम्भनकपार्श्वनाथप्रतिमास्ति नागार्जुनेन क्षिप्तास्ति । तर गत्वा निजयुद्धया स्तवन कृत्वा तिष्ठ, तत्स्नानोदकेन स्वर्णसमशरीर ते भविष्यति । ततः प्रभाते श्रीसद्धपुरतो वार्ता कथिता । सहो जहर्ष । श्रीसद्धेन सम श्रीगु- ग्यस्तन गताः । गोपालेन दर्शित. पलाशः । ननीनस्तोत्रं कृत जयतिहुयणवरकप्परतस इत्यादि स्तनननमापेन प्रकटिता श्रीस्तम्भनकपार्थेश प्रतिमा। श्रीसद्धन पूजा कृता । स्नानो- देकेन गतो रोगः सालोऽपि । श्रीजिनशासनमहिमा जातः। सकलदेशे वरः श्राफा जाताः । ततोऽन्यदा शासनदेवी समायाता । तयोक्त त्वयोक्तममद हस्ते सज्जीकृते कोक्डी- रुद्धरिप्यामि, तदधुनाद्धर । नवागाना वृत्ति हरु । ततो नागाना वृत्तिः कृता, प्रतिमा पंभायतनगरे स्थापिता । जयतिहुयणद्वातिशिका सर्न श्रावक-श्राविकाभिः पठिता। तत्र प्रान्तगाधाया धरणेन्द्रपद्मावत्योराकर्पणमन्त्र समानीत नायोऽपित्रापठन्ति (१)। ततः कुप्यत- स्तीकेनापि धेनुदुग्याग्रहणासगे गुणित स्तवन सेहलान सो बभूव (१)। ततः सूरिभिट्टै गाथे भण्डारित, पिना कष्ट न जप्यते इति । श्रीअभयदेवसरिराचार्यों जातः न भट्टारकस्तेन नामाटी जिनपद न दमिति । अथ श्रीगुरुणा श्रावक एक. प्रतियोधितः परमजैनधर्मया- मितः, म मृत्वा देवलोकं गतः । देवलोकात् तीर्थंकरवन्दनाथं महाधिदेहे गतो देशना- नन्तरं श्रीसीमन्धराः पृटा:-मम गुग्योऽभवदेवमूग्य कतमे मो मुक्ति गमिप्यन्ति । उक्त प्रभुणा नृनीये भने । पृष्टो चोपोति येदित श्रीअमयदेवगूरीणा यतः- भगिय वित्यपरेहिं महानिदेहे भवामि तव्यमि। तुम्हाण व गुरुणो मिग्य मुनि गमिस्सति । कर्णटवाणिज्ये नगरे श्रीअभयदेवा दिव गताः चतुर्थदेवलोके विजयिनः सन्ति । " ४६ । खरतरगच्छ पट्टावली-३ ॥ - अन्यदा चित्रकूटे कचोलाक्षा आचार्याः सन्ति, तेषां शिष्यो वल्लभाभिधः। स तु अत्यन्तसंवेगी परं सर्वशास्त्राणि अधीतानि । यः कोऽपि नवीनः पण्डित आगच्छति तस्य वा- देन जित्वा स्वर्णकचोलकं गृह्णाति, तेन भोजनं करोति, तेन नाम्ना कचोलवृक्षाभिधः । अन्यदा पडीगणार्थ आचार्या ग्रामं गताः। वल्लभस्योक्तं सर्वपुस्तकं तवायत्तमस्ति परमेषा अपवरिका नोदघाल्या । ततस्तेन सैवैकान्ते दृष्टा । एकादशाङ्गानि वाचितानि । ज्ञातः साधुमार्गः। गुरुणा पृष्टं, सिद्धान्तकारणकथितं, यतिरहं भवामि भवदाज्ञया। ततो दत्तादेशः खरतरगच्छे श्रीअभ- यदेवसूरिपाचँ दीक्षा गृहीता । अत्यन्तवैराग्यवान् जातः। श्रीअभयदेवसूरिभिः अन्त्यसमये प्रोक्तं-वल्लभस्य पदं देयं । नतो गच्छयासिनः पदं न प्रयच्छन्ति, कोमल्योयं न विश्वासोऽस्य । एकदा त्रिस्थानको गुरुः चित्रकूटे गतः। चामुण्डाप्रसादे स्थितः। शिप्यमेकं मुक्त्वा स्वयमाहारार्थ गतः। पश्चात् शिष्येण चामुण्डाअक्षिणी उत्पाटिते क्रीडया, शिष्य अंधो जातः । आगतो गुरु, शिप्येण प्रवृत्तिरुक्ता । तत्रैव स्थित्वा एकविंशतिकाव्यैश्चामुण्डा प्रतियोधिता। शिप्यः सजी- कृतः । देव्या हिंसा त्यक्ता, गुरोर्महान् लामो जात इति । तथा वागडदेशे श्रावका बहवो प्रति- बोधिताः-दशसहस्र प्रमाणाः । संघयट्टनामा ग्रन्थो विहितः लघुद्धोऽपि। पिण्डविशुद्धिनाम शास्त्रं कृतं । शुद्धमार्गः प्ररूपितः। वर्ष १२ यावत् आचार्गच्छो निर्वाहितः, तदा मधुकरखर- तरगच्छो निर्गतः। सौराष्ट्रदेशे प्रसिद्धः । चिन्तामणिपार्श्वनाथप्रासादे प्रशस्ति-काव्याष्टकं लिखितमस्ति । तथा 'भावारिवारण' स्तवनं निजनामरहितं कृतं । चित्रवालगच्छनायकेन गृहीतं । चैत्रकूटे चैत्यानर्णये जाते चरणे पतितः ततो निजनामस्तोत्रे समानीतं । षण्मासायुषि पट्टो दत्तः। संवत् ११६७ वर्षे आसाढवदि ६ दिने पट्टे स्थापना श्रीदेवभद्रसूरिणा कृता श्रीचित्रकूटे। ततो मृत्युअवसरे गच्छेपु गवेपितो वाचनाचार्य जयदेवशिष्यः जिनदत्ताभिधः हुंवडज्ञातीयः पट्टार्थे । श्रीजिनवल्लभः स्वर्गतः । ततः श्रीसंघेन समाकारितः श्रीजिनदत्तः सर्व शास्त्रवेत्ता मार्गे आगच्छन् सारंगपुरे एकः कोमल्यौपाध्यायस्तस्य शिष्याः सन्ति परमतीव मन्दमतयः, पाठकस्य तदा मरणावस्था समेता, कोऽपि नाराधनाकारकस्तादृग् विद्वान्, तदा तं तथाविधं समालोक्य ज्ञातमरणो जिनदत्तः करुणापरो धर्ममनशनलक्षणं तस्मै ददौ । सोऽपि दिनत्रयमनशनं प्रतिपाल्य महधिको देवोऽभूत् । तेन जिनदत्तोपकारं स्मरता रात्रौ प्रत्यक्ष समेत्योचे तव सान्निध्यं सर्वदा करिष्यामि। परं तब पट्टाभिषेको मुहूर्तत्रयं गवेपितमस्ति, प्रथमे पण्मासे मृत्युः; द्वितीये गच्छस्फोटो भवि- प्यति, तब गच्छानिष्कासनं; तृतीये सुंदरं भागीति । परमियं प्रवृत्तिर्मम न कस्याप्यग्रे वाच्या। ततः समागतो जिनदत्तः प्रथममुहर्ते कायोत्सर्गे स्थितः । वेला व्यतीता। द्वितीयेऽपि कायो- त्सर्गः समारब्धः साधुश्रावकैनिषिद्धः । ततो द्वितीये मुहूर्ते स्थापितः। संवत् ११६९ वर्षे वैशाख सुदि १० दिने सन्ध्यालग्ने श्रीदेवभद्रसूरिणा, चित्रकूटे श्रीमहावीरभवने, नाम श्री जिनदत्तसूरिरिति जातं । सर्वेऽपि साधवः स्वीयस्थाने गताः। इतश्चैको महात्मा श्रीजिनवल्लभेन गच्छान्निष्कासितोऽभूत, असह्यप्रतिक्रमणापराधेन । स तदा समागतः ममोपरि कृपां कुरुत । T ॥ सरतरगच्छ पट्टावली-३ ॥ गुरुभिः क्षिप्तः। आगताः साधव । अहारार्थ मुसमखिका प्रति लेखयतो गुरोधोलपट्टः एकाटितो, ज्ञात गच्छो द्विधा भविष्यति । तदा वारिकरणानसरे प्रयोदशाचायरक्त एप नाथः कृतोऽस्ति, अस्य दृष्टया आहारो न कर्तव्यो भवह्निः । गुरुभिरुक्त-अय क्षिप्तो मया गच्छे । कुपिता आचार्या:-अद्यैव स्वय कर्ता जातः । अयोग्योऽयमस्माक न पृच्छति । सवैमिलित्वा निष्कासितो गुर्गच्छात् । ततः पट्टाभिपेककारकस्य श्राद्धस्योक्त मूरिणा वर्षय यावत् गम मार्गोऽनलोक्यो भयता, यदि मम माहात्म्य भवति तदाहमेव भवतो गुरुः, नान्यथेति । विस्थानकेन निर्गता गुरु क्रमेण निक्रमपुरे समागतः ! तर मरकोपयो महान् । जनः पृष्टा गुरवो, गुरुरूचे-यस्य चत्वारः पुत्रा सन्ति स एक मह्य ददातु, यस्य च तिस्रः पुत्र्यः स एका चेति । तैर्भणित गते उपद्रवे दास्याम इति । ततोगुरुणा 'तंजयउ' इति नाम स्तवन कृत। तन्माहात्म्येन शान्तितिा । तर पुरे पश्चगतप्रमाणाः शिष्या बाताः । साध्वीना त्रिशतं जातम् । सर्वेऽपि श्रापका जाता इति । ततो पिहृत्य गुरवो नारनउलपुरे गताः । तनेश श्रीमालभापकस्य जामाता निगाहसमये एस मरणधर्म प्राप्तः । तेन साध कन्याया अपि काट- भक्षण कारयन्ति जनाः । सा भीता गुरुणा पार्श्वे समेता । तदा गुरुभिरुक्त पिनो 'अयुक्त- मेतत् क्रियते । पितृभ्यामुक्तमावयोनित्यशल्य भविप्यति । गुरुभिहीता कोमल्यसाध्वीना दत्ता 'लया एपा पाख्या ।' तस्याः पार्श्वे द्वादश वर्षाणि स्थिता । ततो गुरुभिर्दीक्षिता । तस्या वस्ने नयः पटपद्यः पतन्ति । साधीभिरुक्त गुरुणा एपा अतीनाहण्डा एतस्या यस्खे पतन्ति यूकाः । गुरुभिरुक्त एपा सप्तशतसाधीना मुख्या भविष्यति । तदैव तस्याः साच्याः सर्गः शिक्षिणीत्वेन दत्ताः, महत्तरापद च दत्त | कौमल्यसाच्या सा महत्तरा पृष्टा लयास्माक किमपि कथन करणीय, अस्माभिस्त्व पाठिता। तयोक्त्त-दत किंकरोमि । तामिरूचे-धर्म ध्वजे दशाकाः प्रलम्बाः कार्या इति । प्रतिपन्न तद्वचः, अद्यापि तथैव जायते इति । तदा गुरूणामतीर माहात्म्य वर्धते स्म | आचाथः पुनर्गच्छे समानीता गुरवः। सर्वेऽपि माधनो गुर्माज्ञाया प्रवर्तते स्म । ततस्तेभ्य एक आचार्यों निर्गतो रुद्रपल्लीयगच्छो जातः । अन्यदा जिनदत्तसूरय सिन्धुदेश प्राप्ताः । तत्र मूलपाणे चतुर्मास स्थिताः। तत्र कोमल्यगच्छीयाः श्रावकाः महर्द्धिकाः, खरतराः सामान्याः। तक्त्त खरतराणा महत्वपातक करोमि (कुर्मः)। तदा हाथी इति नामा लूणियागोत्रीय' श्रावका सामान्योऽस्ति । अथ यदा धर्मदेगनावसरे हाथी श्रावकः समागच्छति तदा श्रीजिनदत्तसूरिः प्रभूत सत्कारं ददाति । अन्ये श्रापकाः कथयन्ति-किमर्थमस्य बहु सत्कार दत्य । गुरुभिरुक्त्त-एप हस्ती राजद्वारे शोभने । महति कार्ये समप्यत्यसो । अन्यदा कोमल्यावहु धन दत्वा पातिमाहिर्चशीकृतः, कथित च तैः खरतराणा शिरच्छेद कुरु । साहिनोक्त कय ज्ञास्यन्ति सरतराः, कथ च भवन्तः । तैरुक्त ये कामल्यास्ते तिलक विधाय मस्तके समप्यन्ति, ये तु तिलकवर्जितास्ते सरतरा इति । ता वार्ता श्रुत्वा हस्ती रात्री गुरुसमीपे समेतो वार्ता चोक्ता । गुरुणोक्त-त्व याहि वीपीपावे सुन्दर भविष्यति । सोऽपि वीवीपार्थे गत्वोवाच झगिति । ममाद्य मरणं, तेनाह मिलनाय समेतः। . " ४८ ॥ खरतरगच्छ पट्टावली-~-३ ।। तस्या अग्रे वाती प्रोक्ता । सापि गता साहिपाई एप हस्ती मम भ्राता। अनेन सार्वमहमपि मरिष्यामि । साहिनोक्तं-प्रभाते वैपरीत्यं विधास्यामि, मा कुरु चिन्तां । प्रगे कौमाल्यश्रावकाः सतिलकाः सर्वेऽपि समेताः खरतरा अतिलकाः। पतिसाहिना मापे कपाटं दत्वा ये सतिलका- स्ते सर्वेऽपि वध्याः, ये तु अतिलकाः ते न वध्याः। ततः सर्वेऽपि मरणभयेन तिलकमपनीया- पनीय हस्तिपृष्टौ लग्नाः। सर्वेऽपि खरतराः सिन्धुमण्डले । तदा गुरुभिहस्तीकस्य अजितशान्ति- स्तवो दत्तः । अन्यदा गुरूणां प्रोक्तं मिलित्वा सिन्धुदेशस्थैः श्रावकः 'अमास्क गृहे यथा बहुधनं भवति तथा कर्तव्यं । गुरुभिरुक्तं-नागपुरात् परतो गत्वा मकडाणा ग्रामे द्वात्रिंशद- गुलप्रमाणं प्रतिमां कारयित्वाऽमुकनक्षत्रेऽसुकवेलायां च, ततस्तांरुतमध्ये प्रक्षिप्यात्रानयत यूयं परं मार्गेन कस्यापि गृहे भोक्तव्यम् । ततस्तां शुभवेलायां स्थापयिष्यामि । यत्रतत्र लक्ष्मीः स्थास्यति स्वयमिति । ततस्ते तत्र गताः, प्रतिमा कारिता, तेऽन्तरा नागपुरे समेताः। तत्र पुरे शान्तिमूरि- नामाचार्यस्तिष्ठति। तेन रात्रौ लक्ष्मी ऊधमाना कैश्चित् दृष्टा । उत्थितो ध्यानेन कञ्चन देवं समाहयति स्म । सोऽप्यागतः, प्रोचे प्रतिमया साध लक्ष्मीर्याति, जिनदत्तलरिराकर्षति । प्रतिमा अप्रतिष्ठिता स्तीति । प्रभाते तेन श्रावकाणामग्रे प्रोक्तं-एते सिन्धुदेशीया वणिज आयाताः सन्ति तान् सर्वानपि मन्न्य भोजयत, यथा लक्ष्मी गपुरान्न याति । श्रावकत्वा ते सर्वेऽपि निमन्त्रिताः भोजिताश्चेति । ततस्तेनाचार्येण रुतमध्यस्थिता प्रतिमा प्रतिष्ठिता अञ्जनशिलाकया तत्रैव रक्षिता, तैः श्रावकैन ज्ञाता तामेव प्रतिमा लात्वा गुरुसमीपे समेताः। गुरुभिरुक्तं-रछो- हरीया यथा याताः, किं कृतं, प्रतिमा प्रतिष्ठिता सूरिणा लक्ष्मीस्तत्रैव स्थितेति । तैरुक्तं- पुनरन्यमुपायं कथयत, सावधानतया तं करिष्याम इति । गुरुभिः कृपापरैर्भूय उक्तं-भट- नेर नगरे श्रीमहावीरप्रासादे श्रीमाणिभद्रयक्षप्रतिमास्ति तामानयत । ततश्चत्वारः श्रावकाः व्यापारमिषेण तत्र गताः, नित्यं जिनाचा कुर्वन्ति । अन्यदा लब्धावसराः प्रतिमां गृहीत्वा निर्गताः। पृष्टतो वाहरिका अपि चलिता ज्ञातव्यतिकराः। क्रमेण सिन्धुदेशे उच्चनगरे रिपडी- नद्याः पार्श्वे पश्चनद्यो वहन्ति, पञ्चनद्यार्ण जलं । तत्र ते समेताः, वाहरका अपि समाजग्मुः । ते प्रतिमां गृहीत्वा नद्यां प्रविष्टाः। ते अपि प्रविष्टाः। तद्भयेन प्रतिमा तैर्नयां मुक्ता । चाहरकाः संशोध्यालभमानाः प्रतिमां गताः परभूमिभिया । तैः समाचारा जिनदत्तसूरीणां निवेदिताः। गुरचोऽपि नद्यां समेताः । आराधितो माणिभद्रः। प्रत्यक्षी भुत्वोवाच-अहम- त्रैव स्थास्यामि बहिर्नागच्छामि । अत्रैव स्थितः, सान्निध्यं करिष्यामि । ततः श्रीजिनदत्त- सूरि पार्श्वे माणिभद्रयक्षेण सप्त वरा मागिताः। तद्यथा-भट्टारको यः पञ्चनदीः साधयति स सिन्धुमण्डले समेति १ । सूरिः सदा सुरिमन्त्रसहस्रप्रमाणं जपेत् २ । सामान्यसाधुः शतत्रयप्रमाणं जपेत् ३ । खरतर श्रावक उभयोः सन्ध्ययोः सप्त स्मरणानि पठति ४ । श्राद्धः प्रतिगृहं द्विशतप्रमाणां क्षिप्रचटीं पठति ५। श्राद्धः प्रतिगृहं आचाम्लद्वयं मासमध्ये करोति ६ । पदस्थो यो भवति स एकाशनेन भुञ्जते ॥ तथा श्रीजिनदत्तसूरीणां सप्त वराः प्रदत्ताः माणिक्यभद्रेण । तद्यथा-प्रतिग्रामं श्राद्ध एको मुख्यः सधनश्च भविष्यति १ । श्राद्धः . - . ॥ सरतरगच्छ पट्टावली-३॥ ४९ सर्वथा निर्धनो न भविष्यति २। सरतरः श्राद्धः कुमरणेन न मरिष्यति ३ | साधीना रतिन ममेप्यति ४ । भवन्नाम गृहीते विद्युन्न पतिप्यति ५। निर्धनः श्राद्धो यः सिन्धुदेश समेष्यति स सपनो भविष्यति ६ । भवन्नाम्ना शाकिन्यो न लगिप्यन्ति ७। श्रीगुरूणा पार्थे सर्वदा समेति । परस्पर प्रीतिर्जाता । एकदा पीरैः पार्थात् रूप्यमुद्रागत दर्शित, गुरुभिः सुवर्णमुद्रासहस्रक दर्शित आमनाधः । एकटा पीरे स्थिते साधकः आहारार्थ गताः म्लेच्रुत-अस्माकं भोजन देय । तरुस्तमयुक्तमेतत् । गुरुभिस्ते म्लेच्छाः समाहृताः, उक्त चात्र तिष्ठत, भोजन दापयिष्यामः । श्रापकानाय तेपा मिष्टभोजन कारित । एवं वारद्विक, तेन ते सन्तुष्टाः । एकदानसरे संत्रामे मृताः । सजाता देनाः । रात्री श्रीगुरूगा समान्तरे प्रत्यक्षी नभूव । कुस्माकं स्थान ? श्रीपूज्यरक्त-पश्चनद्या, या माणिभद्रो यक्षोऽस्ति ता यूयमपि मत । भोजन याचित तथैर गुरुभिर्दापित, सन्नुशाऽतीर । एकदा देराउरस्वामीहिंदुको राजपुत्र स क्रमेणातीर निर्धनो भूव । गुरूणा पार्थे ममेतः साना भारवाहको जातः, सुखेनाजीविका करोति । गुरसस्तुष्टा. । तेन देराउर- दुर्गः कारित । सामाख्यस्तस्य सेनकोऽभूत् । सोऽन्यदा सग्रामे प्रहार्बरीकृतः गुरुभिरनशन दत्त । मृत्वा व्यन्तरो जातः सोमाः। सेोऽपि समेतो गुरुः पार्थे स्थान देहीति वदन् । गुरुमिः पञ्चनद्या स्थापितः । अथ तर देशे सिलेमा पर्वते तत्र पोडीयो क्षेत्रपालः, स देशाधि- छायकः। माणिभद्रप्रमुसा देवास्तमूचुः-प्रथमतः ये तर पूजा करिष्यति पश्चाद्वय पूजा तस्य ग्रहिष्यामः नान्यथा। तेन प्रथमतः स पूज्यते, ततो माणिभद्रः सपीरः । एकटा श्रीगुरुभिस्त- 'प्रतिवर्ष न कोऽपि माता पूजा करिष्यति, येऽस्माक पट्टस्थायी भविष्यति म एकगो विस्तारणा- गत्यात्र पूजा करिष्यति' इति पद्धतिः निहिता । सरतरगच्छाधिष्टायकाः पञ्चनदीवास्तव्यदेवा मुप्रसन्ना भविष्यन्ति । इति पञ्चनदीपूजास्थापना निचारः॥ एकदा श्रीजिनदत्तसूरयो दिल्या गताः। तर चतु पष्टियोगिनी-पीठानि सन्ति । न पन्दन्ते स्म । कुपिता योगिन्याश्चिन्तित 'छलयाम एन' । अर्थकेन व्यन्तरेणागत्य गुरूणा प्रोक्तं- अन योगिन्यः सन्ति, भरतः छलिप्यन्ति, सापधानतया स्थेय । श्रीपूज्यः रानी महणसी नामा श्रावकस्त समाहृय प्रोक्त चतुःपष्टिः नना पट्टलिकाः कारयित्वा समानय। महत्कार्यमस्ति । वेन राजावेन आनीता. श्रीपूज्यः मन्विताः। प्राताख्यानावसरे एकस्य श्रानफस्योस्त चतु:- पटिः भाविकाः एकेन टोलकनाथ समेप्यति । दक्षिणदिशि स्थास्यन्ति श्वेतवस्त्रा । तामा पट्ट- लिका एताः प्रदेया' । व्याख्यानानसरे समेता., श्राद्वेन दत्ताः, सर्वस्थिताः । श्रीगुरुमिमन्त्र- प्रभारेण स्थमिताः । व्याख्यानानन्तर गुरुभिरक्त यात, प्रभाते पुनरागन्तव्य । ता लजिताः। अय महाविद्यापार स्वापराध क्षामयतिस्म । वय यामः । गुरुमिरुस्त-किञ्चिदस्माक प्रयच्छत । ताभिः सप्त परा दत्तास्तद्यथा-खरतरसाधु प्रायो मूर्यो न भविष्यति । साध्वी स्त्रीधर्म न यास्यति २ । सरतरसाधुसाध्वीना न सर्पान्मृत्युः ३१ खरतराणा पचनसिद्धिः४। विद्युतो नभय ५। शाकिन्यो न च्छलिप्यन्ति ६। श्रीखरतर श्रावका: दिल्याः परतः सर्नेऽपि धनरन्तः + खरतरगञ्छ समरतपयलीशान मन्दिर, जयपुर पण्डिताश्च भविष्यन्ति ७। इति सप्त चराः प्रदत्ताः । योगिनीभिरुक्तं--एकमस्माकमपि वचनं कुरु । यथा भवदीयः पट्टे यः कोऽपि गच्छनायको भाविष्यति ढिल्यां अजयमेरी भरुकच्छे उज्ज- यिन्यां यद्यायाति तदा भोजनं कृत्वा याति रात्रौ न तिष्ठति। यदि रात्रौ तिष्ठति तदा भोजन न करोति इति वाक्यं दत्वा गता निजस्थानं । अन्यदा श्रीजिनदत्तमूरयो वडनगरे गताः। तत्र द्विजा बहवोऽतीव द्विपः साधूनाम् । एकदा एका गौः नियमाणा जिनचैत्ये प्रवेशिता, सा रात्री मृता, द्विजा हास्यं कुर्वन्ति-एपां देवा गौघातकाः। तत्र नगरे रीतिः-चाण्डालाः पुरमध्ये नागच्छन्ति, प्रतोली यावत् स्वामिनो निकासयन्ति । ततस्ते गृह्णन्ति । मिलिताः सर्वे श्रावकाः परं चैत्यद्वार लघु, तां निर्वासितुं न कुर्वन्ति । श्रीपूज्यानामुक्तं श्रावक:- एतत् विगैः कृतं भवदीर्ण्यया । श्रीपूज्याः सुप्ताः, शिप्यानां प्रोक्तं-'मम वस्त्रं नोद्घाटनीयं चतुर्दिक्षु सप्तस्मरणानि पठनीयानि । परकायप्रवेशिनीविद्याबलेन मृता गौरुत्थिता, जिनगृहाद ईश्वरप्रासादे पिण्डिकाया उपरि पतिता, जन समक्षं महाच जातम् । सर्वे द्विजाचरणे पतिताः। स्वामिन् देव गृहाद गाम- पनयत । श्रीपूज्या न मन्यन्ते ततः सर्वैविप्रेभिलित्वा इति वचनं कृतं यदा खरतरगच्छाधि- पतिर्वडनगरे रामप्यति तदा प्रवेशोत्सवं विप्रा एव विधास्यन्तीति । रात्रौं धेनुरुत्थाय पुरादहिः पतिता। इति परकायप्रवेशिनीविद्या । अन्यदा गूर्जरधरित्र्यां नागदेवः श्रावकः चित्ते चिन्तयति 'श्रीवीतरागैरुक्तमस्ति सर्वदा एको युगप्रधानो भवति । तं वन्देऽहं, परं न ज्ञायते । तत्रार्थे सोऽम्बकाटुंके श्रीगिर- नारगिरी गतः। उपवासत्रयं कृतं प्रत्यक्षा जाताऽम्बिका। तेनोक्तं-कथयास्मिन् काले को युगप्रधानो ? । अम्बिकयोक्तं-हस्ते तवाक्षराणि लिखित्वा ददामि । य एतानि प्रकटयिष्यति स त्वया युगप्रधानो ज्ञेय इति । तेनोक्तं-हस्तेन कथं भोक्ष्ये ? आशातना भविष्यति देव्योक्तं-न काप्याशातना, याहि त्वं । ततः स पत्तने समेतः । प्रतिशालमाचार्याणां दर्शितो हस्तो। न कोऽपि वाचयति । प्राप्तखेदोऽतीवागतो जिनदत्तसूरिसमीपे नागदेवः । पूज्यानां हस्तो दर्शितः। वासक्षेपः कृतः, प्रकटितान्यक्षराणि। यतः दासानुदासा इय सर्वदेवा यदीयपादाञ्जतले लुठन्ति । मरुस्थलीकल्पतरुः स जीयात् युगप्रधानो जिनदत्तसूरिः। इत्यक्षाणि प्रकटितानि। हर्पितोऽभून्नागदेवः। प्रणति स्म गुरून् । सर्वत्रापि प्रसिद्धिर्युगप्रधानोऽयं । नागदेव वरसावएणं उजतिवडेविण, पुच्छिय जुगगुरु कहउ तिष्णि उववास करेविण । अविक हु परताक्खि हस्थितिण अक्सर लिक्खिय, सोवणमय करि प्रकट सोय आचारिज लक्खिय करि बासखेव अणहिल्लपुरि जुगपहाण संजमतिलउ, जिनदत्तमूरि सुविहितगुरु श्रीखरतरगच्छ गुणनिलउ । अन्यदा श्रीउच्चनगरे जिनदत्तमूरीणां प्रवेशमहोत्सवो जातः, मिलिताः स्वदेश-पर- देशीया जनाः । तत्र एको मुलाणापुत्रः सप्तवापिकः पतितः चरणमहारैर्मृतो। मिलिता म्लेच्छ. जनाः साधूनामुपाश्रये घोरं विधास्यामः। नगरे महानुपद्रवो जातः । साधवो गंतुं समेतुं च न ॥ खरतरगच्छ पावली-३॥ शक्नुवन्ति । श्रीपूज्यैरुक्त-जीवन्नमौ कय भूमौ प्रक्षिप्यते । ततो रात्रौ परकायप्रवेशिनीविद्या प्रारब्धा । एको व्यंतरश्चाकर्षित | बालकशरीरे प्रक्षिप्तः। व्यंतरेणोक्त-कदाह छुटिप्यामि ? गुरुभिरुक्त-म्लेच्छानामग्रे 'एप पालो यदा महिपीमास अत्स्यति तदा मरिष्यति' इति कथयित्वा जीवितो वालः । मासत्रिके मास भुक्त्वा पतितः। एकदापसरे अजमेरी प्रतिक्रमणानसरे विद्युद् अतीव प्रकाशते उजेहीभवति । ततः श्रीगुरुभिः प्रासुकजलेनाभिमन्य स्तभिता । कृते प्रति- क्रमणे मुक्तेति । श्रीअणहिलपत्तने भाडशालिक आभू सुश्रावकोऽभूत् । तस्मिन्नवसरे श्रीपूज्या मुलगाणे नगरे गताः। श्रावकैर्महान् प्रदेशोत्सवो निहितः। तर पत्तने वास्तव्यान्यपक्षीय अंबड- नामा श्रावकोऽभूत् । तेनोक्तमवविध महामनेशोत्सवः क्रियते । अस्मत्पत्तने एवविधः क्रिय- ते तदा त्रायते भववा शक्तिः। ततः श्रीगुरुभिरुक्त-अस्माक तनाप्रविधः प्रवेशोत्सवो भविष्यति पर त्व तर प्रदेशोत्सवे जायमाने निर्धनो मस्तके पोलिका कूटिका हस्ते च विनत् मिलिष्यसि। तत्तथैव जात । गुरवः पत्तने समेताः। स गुरूणामुपरि द्वेष वहति । कपटश्रावको जातः । ततः पारणकदिने अतिथिसविभाग कृत्वा शर्करापानीयमध्ये विपप्रयोग चकार । तथा गुरुर्विपा- दितो जातः । ततः आभूसुश्रावकेण योजनगामिनीमुष्टिका प्रेपयित्वा देवतादत्तो रसकूपका प्रल्हादनपुरादानीतः। तेनामृतरसेन निर्मिपा बभूवु गुरवः । ततः सोऽम्बडः कर्मनशान्मृत्वा दुष्टव्यंतरो जातः । गुरुणा पावतो भ्रमति छलनाय । अन्यदा रात्रौ पट्टिकोपरि सुप्ताना रजो- हरण पपात । तत्पातेन गुरवः ससनमा जाताः। छलिता व्यतरेण । ततः प्रभातसमये आभूभावकप्रमुसः श्रीसघो मिलित । नानाप्रकारो उपचारो निहितः पर तथापि स दुष्ट- व्यतरो न मुचति गुरु । ततः श्रावकआभूपुनी व्यतरं प्रोचे अस्मत्कुटुंगे अष्टादश मनुष्याः सति मदीयाः, तान् सर्वान् गृहाण, परमेन गुरु मुच । व्यतरेणाचिति किमेष सत्यं ददाति नवेति व्याकुलोऽभूत् । गुरवः सावधाना जाताः । शिसातो गृहितो व्यतरः । मोचितोऽत्याग्र- हेणाभूसुश्रावकेणेति । ततः श्रीजिनदत्तसूरयो वर्ष ८४ आयुः प्रतिपाल्य अजयमेरी स्वर्ग गताः । तत्र स्तूप संघेन कारित । संवत १२०५ वैशाखसुदि ६ दिने श्रीविक्रमपुरे श्रीजिनदत्तसूरीणा स्वहस्तेन पदे स्थापितः नवम वर्षे गृहतिदीक्षः श्रीजिनचद्रसूरिः। तस्य शिरसि मणिरभूव । स तु एकदा वीरनाथयोगांद्रण दृष्टः । तेन जातं एतस्य पचवर्षायुरस्ति । ततो गुरखो ढिल्या गताः। तर योगिनीभिरक्त-अनेनास्मदाज्ञालोपिता अथैन छलयामः। ततो योगिन्यो रानी समागताः धर्मध्वनमाहात्म्येन छल तासा न लगति । तदा भूपकरूपेणापहृतो धर्मध्वजः । श्रीगुरवो ज- जागरुः । मार्जारीरूपेण धाविता । छलिता गुरवस्ताभिः । प्रभातेऽनशन कृत्वा कोचरभाव- स्याने चोक्त गुरुभिः-मम मस्तके मणिरस्ति स दागममये स्मशाने पार्थे दुग्धपान स्थापनीय तस्य मध्ये पतिप्यति । स गृहे पूजनीयोऽक्षय धन भविष्यति । ततः श्रीपूज्ये परलोके प्राप्ते कोचरस्य सा वार्ता विस्मृता। परं योगिना दुग्धपानं मडित दापकाले । मणि लात्वा गतो योगी । दृष्टो वणिजा कोचरेण कलहः कृतः । पर न ददाति । " ५२ । खरतर्गच्छ पट्टावली-३ ॥ , ततः श्रीजिनचंद्रपट्टे संवत् १२२३ वर्षे कार्तिक सुदि १३ वव्वेरक ग्रामे श्रीजयदेवा- चार्येण १४ वर्ष प्रमाणानां पदं दत्तं । श्रीमालतांवी गोत्राभ्यां सा. रामदेव सा. मानदेवाभ्यां महोत्सवश्चक्राते । श्रीजिनपत्तिसूरिलिभावे चारित्रं गृहीत्वा प्राप्तपदः पंचशतसाधुपरिवारेण हिंसारसमीपे हांसी नगरे समेतः। श्रीपार्श्वनाथप्रतिमा श्रावकैः कारिता । श्रीजिनप्रासादो नवीनः कारितः। प्रतिष्ठावसरे नरमणिग्राही योग्यपि तत्रागतः। योगिना ज्ञातं अस्य गुरोः पार्थे विद्याऽभूत् , अस्य पार्वेस्ति न वेति परीक्षार्थ चैत्ये प्रतिमा स्तंभिता । स्थानान्न चलति । जनानामग्रे योगी वक्ति मयैषा स्थंभितास्ति युष्माकं गुरुरुत्थापयतु ।' तत आचार्या उपाध्या- याश्च सविपादा जाताः। विद्या कस्यापि पार्थे नास्ति। ततः प्रतिष्ठांतरायो जातः। तदा साध्व्या शिक्षिता नार्यों गायंति 'बालचंद्रः चंद्रिकां न करोति, अयं वालो गुरुः किं जानाति । गुरुभिश्चिताकृता 'धिग् मे जीवितं । एकदा श्रीपूज्येन सरिमंत्रगोलको वीक्षितो मध्ये सार्धतृतीयाक्षरो मंत्राधिपो स्थितः । निर्वास्य गुरवो जपंति स्म। पद्मावती समेता । प्रभाते आचार्याः पाठका व्याख्यानं कुर्वति, तावत् वालकैः परिवृतो गुरुः क्रीडां कुर्वन् चैत्ये गतः । प्रतिमा स्तंभिताऽस्ति योगी वक्ति । शिरसि वासक्षेपं कृतं, स्तंभितश्च सः । श्रीसंघः सर्वोपि मिलितः । जाता प्रतिष्ठा अहो गुरूणां लघुनामपि माहात्म्यं । योगी वक्ति मां मोचय, कृपां वि- धाय । गुरुभिरुक्तं ढिल्यां मम गुरुशिरोमणिस्त्वया गृहीतोऽस्ति तमर्पय । योगिना दत्तो मणिः । उक्तं चाहो महाभाग्य ! इमां विद्यां गृहाण परमस्य विधिरेवंरूपो वर्तते तांबुलप्रयोगे सिद्धचति । गुरुभिरुक्तं अस्माकं तांबूलभक्षणं न युक्तं, विद्या सिद्धयतु मा वा । ततो योगिना मुखात्तांबूलं निर्वास्योक्तं हे विद्ये ! याहि पातालं, तवास्मिन् लोके ग्राहकोऽन्यो नास्ति । ततः पातालं गता। ततः श्रीगुरुभिः पत्रिंशत् भट्टमिश्राणां वादे जेता गच्छपूत्रानां सूत्रधारः गच्छसमाचारी प्रवर्तकः परमसंवेगी। तस्य वारके नेमचंद्रो भंडारीगोत्रीयस्तस्य पुत्रो देव- दत्तः, तेनोक्तमहं चारित्रं गृहीण्यामि । नेमचंद्रेणोचे प्रथमतोहं परीक्षां करोमि । यदि कोपि शुद्धचारित्रप्रतिपालको मिलति तदा ततसमीपे गृण्हीयाश्चारित्रं। चतुरशीति गच्छवासिनो गवेपितास्तेन परं 'जे जे दीसंति गुरू समय परिकवायति न पुजंति' इत्यादि भग्नपरिणाम आगतः सरस्वतीपत्तने जिनपत्तिसूरीणामुपाश्रये । रात्रौ समुत्थितः अलसेलकूपिका दृष्टा, ज्ञात घृतमस्ति । कूणके वर्षाकालार्थ रक्षापि दृष्टा ज्ञातं चूर्णमस्ति । प्रातर्दृष्ट, ज्ञातं एते संवेगिनः । ततः स्वकीयगृहे गत्वाऽष्टवार्पिको निजपुत्रो दत्तस्तेन, दीक्षितश्च गुरुभिः । स्वर्ग गते गुरौ संवत् १२७८ माघ सुदि ६ दिने । श्रीसर्वदेवसूरिणां दत्तपदो जावालपुरे पट्टाभिषेकः श्रीजिनेश्वरसूरिः स्थापितः । परं अभिणितो मूर्खः । पूज्यैर्मरणकाले श्रीलब्धिचंद्रोपाध्यायानां भलामणिदत्तः। स तु न पाठयति भट्टारकं, किंतु स्वयमेव व्याख्यानादिकं करोति, गर्व वहति, यथा मूर्खः श्रीपूज्यः अहं विद्वान् । अन्यदा वाग्भटमेरुमध्ये आगताः। तत्र महावीरवसतिं दृष्ट्वा द्वारं संकीर्ण चैत्यं बृहत् । प्रधान चावादीत् गुरुः 'चूहा नंटा वसही वड्डी अंदार कित उत्त मइ माणी' इति वचनात् प्रकटितो ॥ स्वरतरगच्छ पट्टावली-३ ।। मूर्खमावः । ततो गता अणहिल्लपुरपत्तन, । मरस्वती नदीतीरे । उत्तीर्णा नदी। पूज्यैश्चितितं- प्रातः संघो मिलिष्यति, नाहं व्याख्यान कर्तुं समर्थः, तस्मान्मरणमेन मम सुंदर, इति विमृश्य स्वयमुत्थितः सूरिः। सरिमन परित्यज्य अनिष्टो नद्या मरणाय । ततो भाग्योदयात् सरस्वती- तुष्टा, परमिति ददौ-त्वं महान विद्यावान् भनेः। पश्चादागत्य सुप्तः । प्रभाते मिलिताः सर्वे लोकाः पूज्याः स्थिताः । लब्धिचद्रश्चितयति-ममादेशः कय न दीयते भट्टारकाः। तावदेव गुरुभिर्नवीनकाव्येनोपदेशोदत्तः। तद् यथा- अहंतो भगत इद्रमहिताः सिद्धाश्च सिद्धिस्थिताः आचार्या जिनशासनोन्नतिकराः पूज्या उपाध्यायकाः। श्रीसिद्धान्तसुपाठका मुनिराः रत्नत्रयाराधकाः पचैते परमेष्ठिनः प्रतिदिनं कुतु वो मगलम् ॥१॥ इत्यादिना चमत्कृत उपाध्यायः अनेक श्रापकाः प्रतितोधिताः। श्रीजिनपत्तिमूरिपट्टे जिनेश्वर सूरिः [तद् ] वारके श्रीपत्तने कुमारपालराजा प्रतिरोधकः, श्रीहेमाचार्यः, निकोटीग्रथकर्ता, अष्टादशदेशेऽमारिघोपणाकारक., अष्टी सहस्राः तुरगा गलितजलपान कुर्नति । तेन राना हेमाचार्याने प्रोक्त यदि सुवर्णविद्या भवति तदाह विक्रमा- दित्यसवत्सर दूरीकृत्य कुमारसवत्सर करोमि । हेमाचार्येणोक्त-परतरगच्छे श्री हरिभद्र- सरिगियरानीन बौद्धपुस्तकमस्ति, तस्य मध्ये सुवर्णसिद्धिविद्यास्ति । ततः सर्वे खरतर श्रानकाः गौर्जगतीयाः मौराष्ट्रीयाः कच्छपाचालाः समुद्रोपकठीयाः कारागारे क्षिताः । तेपा भूपः शरीरेऽतिव्यथा करोति स्म । तः श्राकर्मिलित्वा गुरुणा पत्र मुक्त-वय युप्माकं श्रावकाः, एप कुमारपालः कदर्थयति । नो येपा रुचि पुस्तक मोच्यमेन । ततः श्री जिनेश्वरमूरिभिश्चि- नटे चिंतामणिपार्श्वनाथप्रासादे भाडागारे पुस्तक निर्मास्य प्रदत्त । क्रमेणागत पत्तने । महोत्सरेनानीत । श्री कुमारपालाद्याः मप्तशतमनुन्याः मश्रीकाः अन्ये पि बहवो जनाः शालाया स्थिताः सति । दृष्ट पुस्तक हेमाचार्येण । उपरि लिखितमस्ति 'इद पुस्तक न छोटनीयं, न वाचनीय,-किंतु भाडागारे पूजनीय ।' ततः शकितो मनमि हेमाचार्यों न छोटयति । तदा हेमाचार्यभगिनी हेमश्री महत्तराऽस्ति, तयोक्त-छोटयतु । तरुक्त-इद लिसितमस्ति- 'य' छोटयिप्यति तस्य श्री जिनदत्तमरीणामानास्ति' तेन येमेमि । महत्चरयोस्त को जिनदत्तः, न कोपि भवदीयममो गच्छाधिपः । अह छोटयामि । कुमारपालेन दत्त । तया छोटितमाने दवरके तत्काल नेत्रद्वय पतित । अन्धा जाता । पुस्तक भाडा- गारे मुक्त । राती वहिर्लनः मय पुस्तक प्रचलित । तत्पुस्तकमाकाशमार्गेण नौद्धाना समीपे गत । श्री जिनेश्वरमूरिपट्टे सरत् १३३१ आमाजादि ५ दिने जापालपुरे पट्टामिपेकः श्री जिनप्रतिनधिमूरिः। तद्वारके लघुतर सर गच्छो निर्गतः । श्री जिनसिंहमूरिः । श्रीमालजातीयः । साधिता तेन पद्मावती । तयोक्त पण्मासारधि- रायुरस्ति, नाह ददामि किंचित् । तेनोक्त मम मोघ देवदर्शन । तयोस्त झूझणू नगरे वाली ।। खरतरगच्छ पट्टावली-३ ॥ श्रीमालगोत्रे वणिगस्ति । तस्थ पंच पुत्राः । तेपां गध्यात् तृतीय पुत्रः तं शिप्यं कुरु । तस्याहं वरं दास्यामि । तेन तथा कृतं । तस्य नाम श्री जिनप्रभसूरिः । तस्थावदाता बहवः । यथा- गयणथकी जिनि कुलह नापि ओघड उत्तारी, किद्ध महिप सुपवाद नयर पिक्वइ नव वारी। ढिलीपति सुरताण पूठि तसु वृक्ष चलाविय, रयणि सेत्तुंजि सिहरि दुद्ध जलहर वरसाविय । दोरडइ मुद्र कीधी प्रकट जिन प्रतिमा बुल्ली वयणि, जिनप्रभमूरि सम कवण भरतखंड मंडिण रयणि ॥ १ ॥ इत्यादि प्रभावकः तपागच्छस्य धर्मध्वजदंडीदानं सप्तशतमंत्रप्रदान काचलीयामंत्र- प्रदानं कृतं । तपगच्छविस्तारो यतो जातः । श्रीअल्लावदीन पातिसाहि प्रतिवोधकः अमावस्याः पूर्णिमासी कृता; येन द्वादशयोजनं यावत् चंद्रोद्योतो जातः। पद्मावत्या कर्णकुंडलोऽर्पितो यस्य । इत्यादि बहवोऽवदाता इति । ततः श्रीजिनायोधारिपट्टे संवत् १३४१ वैशाखसुदि ३ दिने जावालपुरे पट्टाभिपेकः श्रीजिनचंद्रसूरिः। छाजहडगोत्रीयः। १३७७ ज्येष्ठनदि ११ दिने अणहिल्लपत्तने पट्टा- भिषेकः । श्रीशत्रुजये खरतरवसतिप्रतिष्ठाकारकः । श्रीजेसलमेरौ श्रीपार्श्वनाथविवं प्रति- ष्ठितं । येन श्रीजावालपुरे श्रीपार्श्वनाथप्रतिमा प्रतिष्ठिता। यस्य परिकरे द्वादश शतानि साधुसाध्वीनां जातानि। श्रीमंगलवरनगरे समुद्रवासिनो देवा बहवो मंत्रवलेन वशीकृताः । देश- उरे स्तूपनिवेसो जातो तस्य। तथाद्यापि प्रत्यक्षं स्मरणेन मे समानयति, जलपानं कारयति तृषातुराणां । अचिंत्यमहिमा श्रीखरतरगच्छशातिनां साधुसाध्वीश्रावकश्राविकाणां, तथाऽ- न्येपामपि नामग्राहिणां सांनिध्यं करोति, वांछितं पूरयति यो गुरुः । ततः श्रीजिनमुशरसूरिपट्टे संवत् १३९०, ज्येष्ठसुदि ३ दिने सिंधुपुरे देराउरपुरे पट्टा- भिपेकः । श्रीजिनपद्मवरिः। तस्य वारले वेगडनिर्गतः। पट्टत्रिकं छाजहङगोत्राणांजातं परमस्मा- कमेवगोत्रीयाणां दास्यामः पट्ट, नान्येपा; तेन सीगडेन भ्राता वेगडः स्थापितः । श्रीसत्यपुरे वाराही साधिता। ऊधरणकेटके खरतरश्रावका जाताः। तत्पट्टे श्रीजिनलब्धिसूरिः । संवत् १४०० आसाढ सुदि १ पहाभिषेकः । कूर्चालसरस्वती । तस्य धारके अजयमेरौ 'हिन्दुक राजा' बीसलदेराजा । खरतराणां चतुरसीति शिप्याः व्याकरणपाठकाः । सप्तशत पौषधाः। घंटाशब्देन आलोचनं क्षामणं कुर्वति ते । तदानवदीन पातिसाहमयेन पद्मावती प्रहिता । गुरु- भिरुक्तं च शुद्धिं कृत्वा एहि । म्लेच्छैद्धा देवी । अकस्मादागतो बहुसैन्यः । सर्वे प्रणष्टाः। देव्योक्तं अहं बद्धा म्लेच्छदेवैः। अथाहं न स्मरतव्या नागच्छामि । म्लेच्छबाहुल्यं जातं । गुरुभिः पंचशिष्याः, महधिकाश्च पंचनाद्दा निर्वासिताः निखातद्वारे । रांवत् १४०६ महासुदि १० दिने पट्टाभिषेकः श्रीजेसलमेरुदुर्गे तत्पट्टे श्रीजिनचंद्र- यूरिः। उद्यतबिहारी परमसंवेगी। संवत् १४१५ आसाढसुदि १३ श्रीस्तंभतीर्थे पट्टाभिषेकः, तत्पट्टे श्रीजिनोदयसूरिः । तस्येदं माहात्म्यं जातं । येषां शिरसि बालत्वे वासक्षेपः कृतस्ते सर्वे संघपतयो जाताः। शिष्याणां ॥ परतरगच्छ पट्टावली-३॥ शिरसि वासक्षेपे सरें पट्टस्था जाताः। प्रतिमाः प्रतिष्ठिताः ताःसर्वा मूलनायका जाताः। श्री- मालपदेशे माडबनगरमध्ये भावका बहनो धनाढया जाता । प्रासादाः प्रतिष्ठिताः । सवत् १४३३फाल्गुनादि ६दिने श्रीअणहिल्लपत्तने पट्टाभिपेकः तत्पट्टे श्रीजिनराजमूरिः। तस्य वारके वाचनाचार्य श्रीक्षेमकीर्तयो जाताः । साधितधरणेंद्रा । दीक्षितानेकशिष्या । पद्भिशत्याचका , द्वादशपाठका , क्षेमधारि (डि ?) निक्षुता । पुनस्तस्य वारके आचार्याः श्रीजिनपर्धनसूरयः । ते श्रीजेसलमेरी पार्श्वनाथचैत्यमध्ये गमारकात् क्षेत्रपालो निर्वासितः। तेन कुपितेन प्रतिज्ञा कृता अह त्वा गच्छान्निसियाभि । रात्री स्त्रीरूपेण समागच्छति । ततश्चितकृटेगता तापि क्षेत्रपालो नारीरूपेण पश्चिमराठी उपाश्रये प्रति- शति, निर्गच्छति। तथा पूर्व सा० सहना केल्हणाऽऽचार्यस्य पदस्थापन कारितमभूत् । तदा आचाय रक्षाविधानमर्दलकं दत्तमभूत् । राजनत्यकारक । तस्मिन्नवरारे क्षेत्रपाले निर्वासितः आचार्य तर सर्वसघो मिलितः । नाल्हाख्यो निधनासुतः। स तु नाहूतः आचार्येदिलशे गृहीतः सहणापा- र्थात् नाल्हाफस्य दत्तः । तत् प्रभावेन पा(ग्या १)रादीनसुरााण पार्चे गतः सम्मानितः। सहणाख्यो दिगृहे क्षिप्तः । तदा पीपिलिया सरतरगच्छो निर्गतः। ततः सप्तभिर्भकारैर्मुहुर्त मीलयित्वा भाणसोल ग्रामे १, भणीसालीगोत्र २, भीम- वारे ३, मद्राफरणे ४, भरणीनक्षत्रे ५, भारकृतगृहनामा । सवत् १४७५ माघमुदि १५ दिने भट्टारक श्रीजिनभद्रसूरि स्थापितः । श्रीसागरचद्रसूरिभिमंत्री दत्तः। रानौ सूरिमन ममवस- रण गृहीत्वा प्रणष्टाः। श्रीजेसलमेरी आगताः। नत्र महोत्सवाः सजाताः। सं० पाचाकेनप्रासादः कारितः श्रीसभवनाथस्य । तर पुस्तकभडागार स्थापित । क्रमेण मप्त प्रासादाः प्रतिष्ठिताः । संखवालगोत्रीयः श्रीकीर्तिरत्नसूरीणामाचार्यपद दत्त । तस्य वारके ग्रामे २ पुरे २ श्रारका धनाढया जाताः । तस्य शतवर्षप्रमाण जातमायुः । तस्याष्टादश गिन्याः जाताः श्रीसिद्धान्तररुचिमहो- पाध्यायश्रीकमलसयमोपाध्यायादयः । सवत् १५१५ वर्षे वैशासवदि २ युधवारे अणहिल्लपत्तने पट्टाभिषेकः श्रीजिन चद्रसूरिः। तत् स्थापितः श्रीजिनसमुद्रसूरिः। सवत् १५३३ वर्षे महामुदि १३ दिनेश्रीपुजपुरेपट्टाभिपेकः । तत्पट्टे चोपडागोने म० १५५५ वर्षे श्रीयीकानेरवास्तव्यम० कर्ममीकृतनढीमहोत्सवः श्रीजिनहंससूरिः। दिल्या सिकदरसातिसाहिना कारागारे क्षिप्तः। मालनापास्तव्यमोहागदेश्रानि- कया 'चतुर्दससाधुसमान कनक ददामीति प्रोक्त' तथापि न मुचति। सिकदरस्य प्रतिज्ञा येन मया पद्धो मुखेन तेन कथ पच्मि मुचथेति पचशत दिन एकस्थाने स्थिताः सति । तदा क्षेत्रपाल: शग्यायाः अधः पातयति, साहि तथापि न मुचति। तदाजेसलमेरुत क्षेत्रपाल:समेतो गुरु प्रत्यू- चे यूय वदथ एन मारयामि । पुज्यैरुक्त-नायमस्माकमाचारः। क्षेत्रपालेनोक्त-भरतो नयामि जेसलमेरु । पूज्यैरुक्त-अन्येपा साधूना का गतिः १ तेनोक्तमन्यानपि क्रमेणानयिष्यामि । पूज्य- रुस्त-नाह प्रच्छन्नवृत्त्या यामि, तस्करवत् । ततः मरिणा सूग्मिनो ध्यातः। आगता शासनदेनी । तयोस्त-पश्यतु मातो मम माहात्म्य । तया साहिशरीरे महावेदना कृता । यधाययोपायान् कुर्वति ५६ ।। खरतरगच्छ पट्टावली-३ ॥ - तथातथाऽधिकतरा जाता। तदा वेदनापीडितो गुरुचरणयोः पतितः। भवंतः पूज्याः गच्छंतु निजे स्थान । पूज्यैरुक्तं यदि सर्वेषां बंदिमोचनं करिष्यसि तदा यामि, नान्यथा । सर्वेपि मोचिताः। अती- व माहात्म्यं जातं । श्रीजिनहंससूरिवारके श्रीशांतिसागरसूरिभिः प्रतिष्ठा कृता । शिष्यदीक्षायां वि- रोधो जातः। तत्राचार्यायो गच्छो निर्गतः। तत्रधाडीवाहागोत्रे टाटीयाशाखे सा० ठकुराकेन लक्षत्र- यद्रव्यदानेन मंडोवरे राजा वशीकृतः । दोसीसाखे श्रीजिनदेवसूरीणां स्थापना कृता । श्रीजिनहससूरिपट्टे चोपडागोत्रे अणहिल्लपत्तने बलाही देवराजकृतमहोत्सवः संवत् १५८२ वर्षे भाद्रवावदि १३ पट्टाभिपेकः श्रीजिनमाणिक्यमूरिः । अनेकशास्त्रवेत्ता। तेन द्वादश पाठ काः स्थापिताः। एकनंद्यां चतुःषष्टि शिष्या दीक्षिताः। सिंधुदेशे सा० धनपतिकृतमहोच्छवेन पंचनद्यः साधिताः । तस्य वारके श्रीकनकतिलकोपाध्यायादिभिः क्रियोद्धारः कृतः। श्रीदेराउरे यात्रार्थ गच्छद्भिरेव स्वर्गप्राप्तः। संवत् १५९५ जन्म, संवत् १६०४ दीक्षा, तत्पट्टे रीहडगोत्रे संवत् १६१२वर्षे भाद्रपद ९ दिने गुरुवारे श्रीजेसलमेरुनगरे राउलश्रीमालदेवकृतमहोच्छवो भट्टारकः श्रीजिनचंद्रसूरिः स्थापितः संवत१६१३वर्षे श्रीविक्रमनगरे चैत्रमासे सप्तमीदिने क्रियाद्वारः कृतः। तेषां चेतेऽवदाताः श्रीफलवर्धीताद्यचैत्यतालकोद्घाटकृत् । पुनः संवत् १३४३ वर्षे ताद्यधर्मसागरकृतग्रंथछेदकृत् । श्रीअकबरसाहिप्रतिबोधकारी । तत्साहिवचसा युगप्रधानपदधारी । संवत् १६५२वर्षे नानगा- नीकृतमहोत्सवेन पंचनदीनां साधकः । सिंधु १, वहव २, वनाह ३, रावी ४, धारउ ५ इति- पंचनद्यः, तथा स्तंमतीर्थे वर्ष यावत् मीनरक्षाकृत् । श्रीज्येष्ठ पर्वणि सर्वत्राष्टदिनानि यावदमारी प्रवर्तकः। श्रीश@जयादि तीर्थेषु चैत्यप्रतिमा प्रतिष्ठाकृत् । श्रीविक्रमपुरे ऋपभविवादि- प्रभूतविवप्रतिष्ठाकृत् । श्री साहि सलेमराज्ये ताद्यकृत श्रीजिनशासनमालिन्यतः श्रीसाधु विहारो निषिद्धः साहिना । तत्रावसरे श्री उग्रसेनपुरे गत्वा साहिं प्रतिबोध्य च साधूनां विहारः स्थिरीकृतः। तदा लब्धः साई युगप्रधान वडागुरुरितिविरुदो येन गुरुणा । एव- मवदाता भूयांसः संति सुप्रसिद्धाः । तेषां निर्वाणं श्री बीलाडापुरे १६७० वर्षे आसूवदि २ दिने। स्थूपस्थापना। तस्य वारके श्रीसागरचंद्रसूरिसंतानेऽनुक्रमेण भावहर्षसूरयो निर्गता इति । तत्पट्टे श्री जिनसिंहसरिः चोपडागोत्री कोटिद्रव्यव्ययेन मंत्रिराज श्रीकर्मचंद्रेण कृत- नंदीमहोत्सवः श्रीलाभपुरे । ननिर्वाणं तु मेदनीतटे संवत् १६७४ वर्षे पोसवदि १३ दिने । तत्पट्टे गुरु श्रीजिनराजसूरिः। संवत् १६७४ वर्षे फागुण सुद ७ दिने संघपति श्री आसकर्णेन कृतनंदीमहोत्सवः। तस्मिन्नेव दिने श्रीजिनसागरसूरीणामाचार्यपदस्थापनेति । कियत् काले निर्वासिताः। श्रीमजिनराजसूरिः तस्य पट्टे विद्यमानगुरुः । Acharya Shree Jin Dharazandra Suri Sill PUJAJI MAHARAJ, BHARUNJIKA - RASTA. JALPUR CITY.
Scharya blures Jin Iharapandra Sa Sinu PUJA YAJI MAHARAJ, BHARUNJIKA - RASIA JAIPUR CITY अनुक्रमणिका ७ २ नाम पृट नाम ३६ अकया (साहि) १३, ४,५६ याउप्राम थकबराबाद ३६ माकरपुर भसयरान (मंत्री) भागरा (नगर) १३,३०,३३३५ अग्निवग्यायन (गोय) भाचाय स्वाहर पाखा (भाचाीय गन्छ) ४१ भादि (गोत्र) भचुका ४० याद्यपक्षीयगण अजमेर (मजमेर, अजयमेरु, दुग,-नगर) थायू (मदादि, मधुंदाचप) ३,१२,२१,३२,३३,३७,४३ ४,१९,२५,२७,२८,५०,५१,५४ भामू २१,२७,५१ অনিয়নি यायधम है भयाहियपतन (-पाटण, पुरपत्तन, पाटक, पुरपाटण) मायनन्दि १,२६,२७,२९,४,५०,१,५३०१६ यायभद्र मनायदेप २७ भापमहागिरि ६,१७ भन्पवंद २. भायमेगु है भमयमार १०,२३ भायाशित सूरि समयदेव मूरि (भायाय) ३,१०,२३,२४,३४,४५,४१ भार्यवयरदि अमरपर यायध्यामा अमृतधम ३६ भायप्तमुदस्त्रि अम्बाक माय ममूति विजय है थपिका (अम्बा) १०,२१,२६,३६,८०,४३,१० मार्य राइस्ति पूर्ति ११,२६,२७,२६१ मारामन नगर अम्मोहर देश भावापक नियुक्ति पोध्या भावापक सपुति भनमन करिता ५० थापााचार्य १० पसारदीन (पातिपाहि) भामरसाद) भासी (नमो) १४,३१,३,४, यामाठलिपुर अध्यन (पनिय) भासाघीर ममित्र मामानगर (पुर) १९२० भएमापार ( राजनगर १३,३३,३४३८४० मारपिकमत २१ ह ܕܐ,€ भारती एमास ( २ ) उ ए इनाकु कुल इन्द्रदिश सूरि इन्द्रभूति (गौतम) इंदपालप्सरग्राम इंदोर ( पुर) ईयर ( साह) इधरी १५ पदाचा पानरनिकम टपाध्याय १६ कापयनित) १८ पन्मलमपमोपाध्याय फमादेवी ३.०३ कमांच कर्मचर। यह क्रममी-मंत्री) ४,१२-१४,३३-२५,३६,५४,५, १८ परायो १७ ४१ फल्मायमंदिर १८ १४. कल्यागपतों २४,२६ पल्यागार कस्तुरचंद्र गरि ४२ २,१०,११,१५,०५,४० उपसेन उग्रसेनपुर उचनगर उदरंग देवो उज्जन (भयन्ती) उज्जती (गिरनार देशो) उत्कोशिक गोत्र उत्तराखंड पन्चाई उदयकरा उदयपुर उद्योतन सुरि फामन्दी नगरी १७,२८ १८ काननीया मंत्र कात्यायन गोत्र १२ कालिकावार्य (१) [-स्यामाचार्य। ३. (()[गह निहोच्छेदक] १,१६ ३,१०,२०,४३ ६,१७,२५ कामी २,६ फाग्यप (गोत्र २८,२६ क्सिनद ४१ ५४ कोत्तिरव [सुरि, प्राचार्य) १२,३२,३३,५४ कोल्हू १० उपसग्गहर ल्तोत्र उमाल्वाति (चाचा) ऊधरण (मंत्री) अधरण पेटक ऋषभदत्त-श्रेष्ठी अषभेश्वर १,६,१५ उमतिकुटालग्रंथ १० एलापत्य श्रोसवंग है भोसीया नगर कुमारपाल (राजा) १७ कुलक कुलघर १० कुलागसजिवेग सुमाणा ग्राम १० कुंभलमेरु (-नगर) ४६ कुंवरपाल (उपाध्याय) २७,३८,५३ कुंवला १२,३०,३३ ६ कचोलाक्षा कच्देश (पांचाल) ૨૨ ( ४ ) जयराज जावड नाम पृष्ट जिनपति सरि ५,११,२८,२६,५२,५३ जगचन्द्रसूरि जिनपा सूर ६,११,१२,३१,६४ जमालि (१ ला निव) १५ जिनप्रतिबोध सरि जम्बु (कुमार, -मुनि, -स्वामी) १,६,१५,१६ जिनप्रबोध सूरि जयतिहुयण स्तोत्र १०,४५ जिनप्रभ सूरि जयदेव (-वाचनाचार्य, -सूरि, याचार्य ) १६,२८,४६,५२ जिनभक्ति सुरि जयदेवी ४२ जिनमदगणि ज्ञमाभ्रमण ६,१६ जयपुर १६,३७ जिनभद्र सूरि २,३,१०,३२,५५ जयमल्ल ३६ जिनमाणिक्य सूरि ८,१३,३३,३४,५६ ४२ जिनयुक्त सूरि ४१ जयसागर पाठक १२ जिनात सूरि १४,३६ जयसीरी ११ जिनराज सूरि ६,१२,१४,३०,३५,३६,४०,५५,५६ जयतनी ३० जिनलब्धि सूरि ३,१२,३१,५४ जयानन्द सूरि १६ जिनलाम सूरि ३७-36 जादा ७ जिनवद्धन (सूरि, गुरु) ६,१२,३२,५५ जालोर (जावाल, -पुर, -नगर, महादुर्ग) ५,११,२६- जिनवल्लम सूरि (गुरु) ३,४,१०,२४,४६ ३०,३६,५२-५४ जिनविजय सूरि ४२ रय जिनशेखर सूरि(-प्राचार्य) ५,११,२४ जिनकीर्ति सूरि जिनसमुद्र सूरि (गुरु) ७,२३,३३,५५ जिनकुशल सूरि ५,११,१३,३०,३४,३७,३५,५४ जिनसागर सूरि जिनचद्रसूरि (१) ३,१०,२३,४४ जिनसिंहसूरि (१) ५,११,२९,४०,५३ (२) ५,२२,२७,२८,५१,५२ (२) १४,३४,३५,५३ (३) ५,११,३०,५४ जिनप्तौल्य सूरि ६,१२,३१,५४ जिनप्सौभाग्य सुरि ६,१२,१३,३३,५५ जिनहप सरि १३,३४,३५,३६ जिनहस (-गुरु, सूरि) ७,८,१३,३३,५५,५६ १४,३६ जिनहेम सूरि जिनचंद्रसूरि (क) ४१ जिनेश्वर १२,२१,४३ ३८ जिनेश्वर सूरि (१) ३,१०,२१-२३,४४ (क) ४१,४२ (२) ५,६,११,२६,५२,५३ जिनचंद्राचार्य (चैत्यवासी) (चैत्यवासी) २४ जिनदत्त (-गुरु, -मुनि, सूरि) ४,१०,११,२४-२७,२६,- जिनोदय सूरि ६,१२,३१,३२,४२,५४ ४६-५१,५३ जीमण ४१ जिनदत्त श्रेष्ठी १८ जीरापल्ली पुरी जिनदेव सूरि ७,१३,५६ जील्हागर (-मनी) जिनधर्म सूरि ४०,४१ जीवराज (साह) ३३ ४२ १४,३५,४०,५६ (४) " ४२ २० पृष्ठ पृष्ठ जुनागढ (जीणगढ) ३५,३६ चिरापद्रनगर जेसलमेर (-दुग, नगर) ६,७,११ १३,३० ३६,४१,४२, यूलिभद्र है जेसल साह जैनराजी (वृत्ति) जोधाणो जोरावर मल दरावैज्ञालिक सूत्र अरूण नगर टाटिया शाखा ठाकुरा दत्त दयासार ३६ दयपुर १०,१६,२२,२०१४४ दक्षिणदेय १८,३८,३६ २३ दादिमदे ४१ दादोजी दिगम्बर दिन सूरि दिला (दिल्ली) ५,२७,२८,३०,४४, १२,२७,४१,४२ ४६.५२,५५ दिलोपति ४१ दिलामण्डल दुगप्रबोध २६,३४,३५,५४ दुवलिका पुष्यमित्र सूरि (दुयलिका पज्ञ) २,६,२६ ११,१२,३१ दुलम ( नरपति, नृप, राज,-राजा ) ३,२०,२१,२२,४४ ३६.३६ दुप्पसह नि १८ १३,३३ डागा (गोत्र) दूगरसी ४४ २७ तपा (-गया, माच्छ) तस्याम ( -सूरि-पाचाय) वारादेवो ताबी श्रीमाल (गोत्र) विमरो नगर विशोकचंद विलासो (दाह) सिम्यगुप्त (२रा निव) नुनीयायन गोत्र तुम्वन ग्राम तेजपाल तेजसो प्रम्यावतीपुर ग्रापावादानिध पाटक निपती দ্বিয়। নাযিক্ষ याहरूमल ६ ५३ दृष्टिवाद ३४ देका (साह) ३६,४२ देराउर ( दुग, नगर, पुर) ३०,३१,३४,४६,४,५६ देसवादा (नगर) १५ देवहण देवी १५ देवकुलपाटक १८ देवदिगणि क्षमाप्रमण १३० देवदत्त ३६ देयमद्र सूरि १५ देवराज (मंत्री) २६ देवराजपुर । देवसदे (देवी) १.१५ देवल वाटक ३६,१६,२० ४१ देवानन्द सहि ३६ देविद वाचक १०,२४,४६ १५ दंपति ६ जेसल साह जोरावर मह झुम' नगर ५६ दिगम्बर डागा (गोत्र) ४१ दिलोमण्डल २६ नाम पृष्ठ नाम २६ जुनागढ (जीयांगढ) ३५,३६ चिरापद्रनगर नेमलमेर (-दुर्ग, नगर) ६,७,११ १३,३० ३६,४१,४२, थूलिभद्र ५४-५६ दत्त ३०,३२,५५ ३१ जैनराजी (वृत्ति) दयासार जोधाणो दशपुर १६ दावकालिक सूत्र १०,१६,२२,२४,४४ 38 दक्षिणदेश १८,३८,३८ ४३ दाडिमदे दादोजी टाटिया शाखा दिन सूरि १८ ठाकुरा ५६ दिला (टिलो) १५,२२,२३,२५,२७,२८,३०,४४, १२,२७,४१,४२ ४६५२,५५ टूगरसी ७,१३,३३,४१ दिलोपति ४४ देहरा दुर्गप्रदोष तपा (मास, गच्छ) २६,३४,३५,५४ दुपलिका पुष्यमिन सूरि (दुवलिका पक्ष ) २,६,१६ तस्यप्रभ (रि, प्राचार्य) ११,१२,३१ दुलम ( नरपति, नृप, राज,राजा) ३,१०,२१,२२,४४ तारादेवी ३६,३६ सावी भोमाल (गोत्र) तिमरी मगर सिलोकचंद ३६,४२ देराउर (-दुर्ग, -नगर, पुर) ३०,३१,३४,४६,५४,५६ तिक्षामो (साह) ३६ देसवादा (नगर) सिम्यगुप्त (२रानिहर) १५ देल्हण देवी तुङ्गीयायन गोत्र १६ देवालपारक तुम्जवन ग्राम १८ देदिगणि समाधमण तेजपाल तेजसो १७,२४,४६ प्रयापतीपुर देवा(-मंत्रो) ६.९,३३,३०,३३,५६ मायावादाभिघ पारक नियतो २१ देवलदे (देवी) नियना राधिक ३६,१६,२० याइस्मत पाहत्या ३६ देविद पापक दुष्प्रसह सरि ५३ दृष्टिवाद ३४ देका (-साह) ६ १३० देवदच ३६ देयमद्र सूरि ६ देवरापुर १,१५ देवल चाटक १८ देवरि ४१ देवानन्द सूरि नाम पृष्ठ नाम पृष्ठ १२,२५,३१,४८ देवीकोट दोलतराव दोसी २ ३६ नागपुर ३६ नागर वाढवीय ३८,५६ नागर्जुन नागेन्द्र २ १८ १८ नागेन्द्र (-गच्छ, कुल) धनगिरि धनदेवी धनपति घनपाल धनश्रेष्ठी (महा-) धर्मदेव वाचक थर्मध्वज धर्मनिधान धर्मरत्न (-सूरि, -प्राचार्य) धर्मरंग (वाचनाचार्य) धर्मवल्लभ (वाचक) धर्मसागर (उपाध्याय) धर्मप्ती (साह) धम्मिल धरण धरणेन्द्र धवलक (-पुर) घंधुका ( -नगर) धाडीवाहा (गोत्र) धारणी धारलदे धारापुरी धुलेवा (-गढ़) ६,१८ १०,२३ नानगानी ४,५६ नारनठलपुर ४७ २३,४४,४५ नाल्ह ( साह) १२,३२,५५ १०,२३ नाहटा (गोत्र) २७,३६,३८,४१ २४ निवृत्ति ६,१८ ५१,५४ निर्वृत्ति (गच्छ, कुल ) ६,२८ ३५ नेमिचन्द्र ( भांडागारिक ) ५,११,२६,५२ १२,३३ नेमिचन्द्र सूरि ६,२० १३ नेमीदास ३७ १२,३१ नैषधीय काव्य ३६ १३,५६ पञ्चनदी १०,१३,२५,३३,४८ पटना (पाटलीपुत्र नगर) १७,३८ ६.१५ पद्मसिंह ११,३२ पद्मादेवी १०,२०,२४,४३,४५,५५ पद्मावती ३,२३,२४,२८,४५, ५२-५४ १०,१३,२३,३३ परमहल पर्वत २६ पल्लिका ३७ ६,१५ पंचायणदास ३७ १२.३१,३५ पंजाब ३१ १०,२३ पाटण (पत्तन, -नगर, -पुर) ५,६,८,१०-१३,२६, ३७,३६ २६-३६,५०,५१,५३ २,१७ पादलिताचार्य ५२ पालिप्तपुर (पालीताणा) ३५ १६ पारख (परीक्ष) गोत्र ११,१३,३३ ५४ पालनपुर (पाल्हणपर, प्रल्हादनपुर) ११,१२,२६,२६, १२,२७,३१ ३१,५१ ३. पावापुरी ३८ २ पासदीन (मुरबाण) १०,२६,५० पांचा ५५ २४ ) नन्द (भूप, नवम) नरमणि नरसिंह सूरि नवदीन नवलखा (गोत्र, शाखा) नव्यनगर नागकरि प्रभु नागदेव ( अंबड़) पापेष्ठ ग्राम ५८ ४२ पुहरा (गोग्र) पृष्ठ नाम पिपदविशुदिपरणे ४,१०,२४,४६ वागह देश पिपलक (पोपिलिया) खरतरगच्छ पासा (५) ३२,५५ ३३ पोर घाल्दा ३५४६ पौरोजी २६,३१,३३ पाहटमेर ३३ ३५,३६ पॉपलिया गय (गच्छ) घाहदरमह पुननव (गच्छ) बाहरिका पुण्यपालर ग्राम ३६ बाद्वारक नगर पुगयघोर यन ११,१२ बिनासर मोशानेर (विक्रमपुर, नगर) ४,५,७,१०,१३,२७, पुनार पुजाणी ३३-३५,३०-४२,४७,५१,५५,५६ पुररीक बोवी पूजापञ्चायक प्रकरण बीलाढा (-पुर) परदेश बुद्धिसागर २०,२१,४३ पृथ्वी बुद्धिसागर (-पाचाय) पृथ्वीरान पोमदत १३,३३ पोत्यरा (पोहित्यरा) गोत्र २७,३५,४०,४२ पोरवाड (प्रावाट) ज्ञाति २१,३४,३३,४० धौद पोष्यमुख्य गणि यौद्धराज्य २ प्रतिष्ठानपुर प्रझयाति यज्ञ २१ प्रयासस (नगर) माग २३ प्रयासन सूरि १६ भकादयो प्रबाघ मूचि ३० मकामर स्तोत्र प्रमय (स्वामी) मतिम प्रभाग भगू माम भटनेर नगर प्रशापना मधारक पद प्राचीन गोत्र प्रोटिपागर पायक भणसाली (मणपालिक, भाउपालिक) २५,३३,३६, ३. फलोपो (पालद्वी ना, पनुको) १३,३४,१६ दिला फवागाई १ भद्रगुप्त (माचार्य) फोगासन ३६ मद्रयाहु (-स्वामी) भयारपस्सोग बनारस (पारायमी मगरी) भरतोत्र पाक ( प्राम, पत्तन) ११८५२ भईव (मरु साधा का भूगुर) ११,३५,१८,५० बझा (बालारिक गोत्र ८,२१,५६ मंदारी (औदारिक, मादागारिक) गोत्र ११,२६,५९ प्रपमरति प्रभा ३३ thr.NA (९) १६ नाम पृष्ठ भाईदास ३७ महाविदेह ४५ भागचंद्र ४१ महिगलदे १३ भाणलोल (-ग्राम, नगर, भाणसपली) १,१२,३२,५५ महिमाराज भानुवड ॐ महेवा भावनगर ३८ मंगलवर नगर ५४ भावप्रभ (-प्राचार्य) १२,३२ मंडप १३ भावकृत ५५ मंडोवर (-पुर, -नगर ) ॐ,३८,६,५६ भावहर्ष (सूरि, उपाध्याय) १४,३५,५६ माठर गोत्र भावहपीय खरतर शाखा (७) ३५ माणिभद्र यन ३५,४८, भावारिवारण स्तवन ४६ माधव भीमपल्ली (-नगर) ११,१२,३० मानतुन (सूरि) ५,११,१६,३० भीमराज ३७ मानदेव सूरि भुवनपाल ३० मानदेव साह ५२ भुवनरत (प्राचार्य) १२,३२ मानसिष्ठ भोजराज ३७ मालदेव ( राउत) २४,५६ मठठीया मालवा १०,२०,४३,४८,५५ १६,१२,२८.३१ मकडाणा ४८ माहेश्वरी ४,२७ मकसूदावाद ३८,४१ मांडन नगर मगती ३६ मांडवी (विदर) ३७,३८ मण्डूक मिरगादे मणिग्राहि २९ मिथिला मदनपाल ११,२७,२८ मीठडिया वुहरा (गोत्र) मधुकर खरतर शाखा (१) २४,४६ मुगल (मुद्गल) १३,२६ १,१६ १०,२५-२७,४७,५१ मनोद ग्राम मुलतान (-त्राय) ४२ मूलतिघ मनोहरदास मन्दसौर (दशपुर ) १८,१६,४२ मेघराज (-साह) ८,१३,३३ मरुदेश (मारवाड़, मंडल, -स्थल ) ४,११,२१,२६,३३, मेडता (-नगर, -पुर, मेदनीतट ) १४,२७,१५-३७,४०,५६ ३६,४१,५० मेरु मरोट २६ मेवाड़ (मेवात) महणसी महतीयाण (महुमुहु) गोत्र मोरवाड़ा ११,२३,३०,४५ मौजदीन (-पोतिसाह, -मुरबार) २३,४४ महाकाल (-प्रासाद) १०,१८,२५ महागिरि २ यशोभद्र (सूरि ) (१) १,६,१६ महाधन श्रेष्ठी १० माल्ह (गोत्र) ४० मनक ४२ मूलाणा (ज्ञाति) ४ ३८ पृष १३,३४,४१,५६ ५,२१,२४ २४,७ यशोवद्धन याकिनी धर्मपुर योधपुर ( योधानक) रघोहरीया रजोहरया रतन रतनप्ती रहनादे रतलाम रतनिधान रयणादे रप्रिमति रसकूपक रंगविजय गणि रंगविजय खरतरणापा (6) राधपुर नाम २८ पिढी (नदी) ८ रोहड (रेहड) गोत्र ७,३६ स्वपल्ली रद्रपलीय खरतरशाखा (२) स्मसोमा रुंदपाल (साह) ४२ रदेलिया गण (गणेश) रूपचन्द्र रूपनी १२,३१ ११,१२ ३६,३५,४० ३६,४० ३७ ४० ३५ रूपमी १३ ७ ३० रेया नगर रेवती सूरि रेखा छट २ २७ रासेचा (गोत्र) राजगड रामगृह राजनगर ('अहमदाराद' देसो) राज समुदगणि रानपामोपाध्याय २४,३६,४० रोहगुप्त ३६,४० ३८ लस्खा (साह) १३ लक्ष्मी लक्ष्मीलाम २१,३० लखनऊ (लच्याउ नगर) ३८ १,१५,१६,३८ सघुमाचाीय खरतरशाखा (E) ३५ लघु खरतागन्य (-गण-पाखा) (३) ५,११,२६,५३ ३५,४० लघुभद्दारक खरसर पाखा (१२) ३७ लघुपट ३६ लब्धिचंद्र उपाध्याय ५२,५३ लालदेवी १७,४१ ३७,३६ ३७ लाहारसामपुर) २४,२५,३४,३५,५६ 1८,५२ लुटक ३७ लूणकरण सर २६ सूणिया (गोत्र) २७,३१,३१,३६,४७ १३६ लोया (लोर पराम) २७ सौहित्य २ ३७ लालचंद राजाराम राजेंद्राचाय रामपुर राधनपुर रामदेव रामरिनय उपाध्याप रापमपयालो (पान) रावी (नदी) सासन लोका (-मत) ८ ३३ रियमल ४० रियो (मगर, पुर) वन्दराज (राजा)- " (सा) [ १० ] ४० वनाह नदो वर्धमान सूरि वल्लभ ...१६ नाम पृष्ठ नाम पृष्ठ वच्छावत ३४,३८ विन्ध्य राजा १६ पच्छाउत ३४ विपुलपुजपुर वन ( -सूरि,-स्वामी,-मुनीन्द्र) २,६,१८,१६ वित्रुघप्रभ सूरि १६ वज्रसेन ( -सूरि, प्राचार्य) १५ पिमल (-दडनायक, मत्री) १०,०१,४३ वज्रशाखा (वयरालाहा) १८ विमल गिरि ५ वड नगर (वृद्धनगर) २० २५,५० विमल चंद्रसरि वडली ३४ विमलवप्तति ( वसही) १०,२१ वढा श्राचार्यांया गच्छ १३ विमलादे वनवासी १६ विकसमुद्र उपाध्याय ११,३२ १३,५६ विशेषावश्यक भाष्य वयष (वहव) नदी १३,५६ वीर क्षेत्रपाल घयरी १८ वीरनाथ योगीन्द्र वराहमिहिर वीरप्रभ १७ वर्धमान २० वीरसूरि ३,१०,२०,२१,४३,४४ वीसलदे राजा ४६ वृद्धदेव सूरि वल्लभी नगरी वृद्धनगर वपत साह ३७ वृद्धवादी सूरि ३,१८ वसुभूति (ब्राह्मण) ६,१५ वृहत्खरतरगच्छ ३६,४० वागडिक ( वागडी) १०,२४ वृहत्संघपह ४६ वाग्भट मेरु ७,११,१३,५२ वृहस्पति वाचक (वाछिग ) मंत्री १०,२४ वेगढ (मत्री) १२,५४ वात्स्य गोत्र १६ वेगड खरतरशाखा (वेगडागच्छ, वाफगा ३६ वालीनाथ क्षेत्रपाल वैकटगण) (४) १०,२१ वेगराज १३ ३६ वेनातट वाल्हा देवी वेलाकुल पत्तन ३७ ४१ व्याघ्रपत्य गोत्र १७ वासिष्ठ गोत्र १७ पाहडदे शकडाल (शगडाल ) मंत्री २,१७ १०,२४ विक्रमपुर ( 'बीकानेर' देखो) शकन्दर (सिकन्दर, नरपति-पातिसाहि) ७,१३,५५ विक्रमसूरि १६ शबंजय (सिद्धाचल, तीर्थ विक्रमादित्य १२-१३, १८,२०,३०, ३६-४३,५४,५६ २,६,१८,२६,५३ शय्यंभव सूरि( -भट्ट) विजयसिह १,६,१६ ३० शान्तिप्तागर (-उपाध्याय, प्राचार्य) १३,३३,५६ विद्याधर (माच्छ, कुल) ६,१८ शान्तिसूरि (१) विनयप्रभ (-उपाध्याय, पाठक ) १२,३० ४८ ३ वालेवा ग्राम चावडीय ग्राम पृष्ठ ૧૨ १४,३५,५६ ११,२५,५२ ५५ ४ सपेश्वर ११,२७,२६ सग्रामसिंह मत्री ३४ २३,४२ है पृष्ठ नाम नाम शान्ति स्तव सलखगपुर पिवयमा (विरेचर) २०,२१ सलेम (पातिप्ताहि) घोलरदगण (वाचनाचाय) १२,३३ सवदेव सरि(थाचाय) धोलाङ्गाचाय ६,१६ सहपशानगणि धौभाग्यविद्याल ग्पामाचाय । 'कानिराचाय (१) देखो) सहसकारण श्री सतपाल श्रीकरया श्रीचंद धीपाल २७ सघपह (ग्रय) श्रीमाल २३ सघवी (गोत्र) धीमाल (पाति,गोत्र) ०,११,१३,२३ मंडिल सूरि २८,३१,४०,४४,१७,५२४ सदेहदोलावलि प्रोमालदेव राठल श्रीपत समूतिविजय सूरि श्रीमार उपाध्याय ३६,४० संगरङ्गशाला प्रकरण श्रीपारीयखरतर शाखा (१०) सागरचंद्र (-सूरि-पाचाय) भोर्ति प,४३,४४ साणियाला ग्राम भ्रमिक सातल (नर) पतपट ७ सादडी पदयोति प्रकरण सामीदाप्त सत्यपुर २७,५४ सामुच्दैदिक (४ निव) पमन्त्र भद्रसरि सादयतक प्रकरण समयराज सारंगपुर समयपुदर उपाध्याय २७ १३५६ सप्रति ०१७ ३,१०,२३ १२,२४,३२,५५,५६ ४२ ७ ४१ १०,२४ सामनदाम १७ १० २४,४६ समवह सार ३५ सालमसिंह ६,१२,३१ साहि १२,३३ साहिब ११.३० साहसेवा (गोत्र) १६ सिकंदर ५३ सिवड ४१ समियाणा ग्राम ममुदहि ममुदारगेया ममपियर (शिखर गिरिज) सरमारमन साम्पती (देवी) नदी ३,६,१८,२५,३५ .८,३६,४१ दिसेन (गणि, दिवाकर) २०२० सिवाचन ('रक्य देवो) सिद्धार्थ ११,००,३१,३ मिरियाद सिरपंत " १४ १३ भाषागार मा un 2144 FAY { नयी for:-मा 1 . - . Enabalu STIC rITTEगी। TH UNE ( मामी मूग -शि मानराम : -fram , Raftar विनर एगि पागल रास्वियमूरि पशि . दिगांग feet (ग) FER Ent ३१ १३,१४५ -गोग, मान । सेटमटिमा) गोदा यानी मेगावा नगर । मेगा प्राम मनपान पोपार मोमन सोमजी मोमदत्त । माझगा) सोमदेव । पुरोहित पोमप्रभ सोमाख्य सोमेश्वर महादेव सोमयत सोमराज मधोमामा 3","माधा क्षारपड गाम, नगर) १० मागरमालक मुनि মীনাবা २० शेमधारी ज्ञान रिमल १५
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