Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Ratnapareekshadi Sapt Granthsangrah
Front matter
राजस्थान पुरातन ग्रन्थ माला
राबखान पम्पहारा प्रकाशित
सामान्यतः मशिह मारतील तमा पितः सम्मान प्रदेशीय पुराणलाठीन
समय प्राय बपथ समापी गुमाती, हिन्दी मावि मापास्विर
शिविर बामपसिनी रिभिर प्रबाही
प्रधान संपादक
पुरातत्त्वाचार्य, पद्मश्री, जिन विजय मुनि
[भऑनररी मेयर ऑफ जर्मन मोरीएम्टम मोसाइटी अर्मनी]
मम्माम्प सरस-मापारकर प्रामविचा संबोधन मनि, प्ला) गुमाव साहिब
सम्म, नाम्हाला विसरामन वैविक भोग पसार होशियारपुर, पजाय
निच सम्माम्ब नियामक (भॉररी परेक्टर)- मारनीष रियामान ।
प्रधान संपायक-गुबरात पुरातत्त्व मन्दिर प्रवासी भारतीय विद्या प्रपाठी
सिपी और प्रधागा व साहितसंशोधन प्रवासही-मादि, इमापि ।
प्रन्याफ४४
ठपुर फेर पिरपित
रत्नपरीक्षादि-सप्त-ग्रन्थसंग्रह
प्रकाशक
पनत्यानपण्यासानुसार
संचालक-राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
Director Rajasthan Onental Rescarch Instituto, Jodhpur
विक्रमाय २ १७
राष्ट्रीय शाप १८८३ / सम्पनियमानुभार सपिना सुरक्षित है पिस्त्यात
मुरफ-समीगो मारापन बोपरी सिमसामर प्रेस १६-१८ प्रेमभार सौर गई
मघाशक-मोपात बारापन बहुरा उपसंचायत राजस्थान प्राथरिया प्रतिमान बोपुर
ठकुर फेरू विरचित
रत्नपरीक्षादि- सप्त-ग्रन्थसंग्रह
समुपलाम-प्राचीनतम पुस्तकानुसार
पुरातत्त्वापार्य मिनविजय मुनि द्वारा
संघोषित एर्ष मुपरिफत
सामग्री-संपादनका
अगरचन्द तथा भवरलाल नाहटा
- प्रकाशमफर्ता
प्रजस्थान पम्याशानुसार
सचालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
(गयरेफ्टर, यसस्थान मोरिएम्टम रीसर्च इस्टीट्यूट)
जोधपुर (राजस्थान)
विक्रमाय २०१७
पष्ट्रीप शाम्प १८०
- प्रथमाति-
पिसाप
ses
विषयानुक्रम
पू०
पू०
-
मपान सपावफीय-किंचित् प्रासंगिक
प्रास्ताविक कथन
भगरपन्द्र, मघरलाल नाइटा
ठफुर फेसकृत रमपरीक्षाफा परिचय
ले ग मोतीचन्द्र पम् ए. पीपश्री
(१) रमपरीक्षा मूल प्रन्थ
(२) द्रव्यपरीक्षा
(३) धातूत्पच्चि
(४) ज्योतिषसार
(५) गणितसार
(4) वास्तुसार
(७) खरतरगल्छयुगप्रघानचतुःपदिका
(८) परिशिष्ट - ज्योतिषविषयक स्फुटपध
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१७-१८
३९-४४
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११-७४
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राजस्पाम पुरातन प्रन्यमाप्ता-लपरोक्षादि सप्त प्रन्य संग्रह मनसायल्यास NigatorsmRRESARIAHARAN ISRAEListeAERICA यांपायर रमाकर intml समयमा परीक्षा प्रबका मध्य सामान मेगाptoपेर्मक m प्रारजन्यमेवममत अत्यामामामाचियपत्रमार्गमा मनापरवामानामावमिमोस्पाय IRCT अनदेस्याभ्यो स्मारपूर 12kuwritream MAN RALAttemapeethun अपपरीक्षा प्रत्या समाप्तिसूचक पृष्ठ Graphol 1. गरमाथHEcmo को मा same dtus (RI ..- . पराम Bune Iowan मान नाPिATYANA MRITY MADARA १५, राप mad सम्म Mit CREAM anram-EEREILLY 1
राजस्थान पुरतम प्रबमाता-लपरीमादि सप्त प्राय संग्रह
भातम्यामासिकमामामीमास्तमनशिप
माम उमाणिमयमापदंगकपिटमी
म्यार
विपासवर्यामीनारसम्ममा
मध्यमसदन
समाजापरता PARAN
TROमामारी
यममा मकस्म
नामानि माया गरम
मेर
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बातार प्रया
प्रादि पृष्ठ
-
बातृत्पत्ति प्रब का
अन्तिम एक
प्रधान सपादकीय किंचित् प्रासगिफ राजस्थान पुरातन प्रन्यमाला के ११ में प्रन्यांक रूप में, ठपुर फेरू रचित ७ प्रन्पों का यह एकत्र संग्रह प्रकट किया जा रहा है। टार फेह के इन मन्पों की मिसी पूर्ण प्राचीन पोपी का पता लगाने का श्रेय श्री बगर चम्दनी और मपर गठनी नाहटा को है। इन साहिस्ससोजी मधुयों की समान में, कलकवे के एक कोने में परे गए चैन मन्यों के पिटारे में से, इस मत्सवान निषि को प्रकाश में लाने का अमिनम्दनीय यश प्राप्त किया है। ठकुर फेक के ये प्रदधात्मक प्रम्य फैसे मिले और इन को प्रकाश में छान का कैसा प्रयत किया- इस विषय में नाहटा मन्पुओं मे, अपने प्रस्तावनात्मक पक्षम्प में यमे लिखा है। इस से पहले भी इन्हों ने, कुछ पत्रों में देख प्रकट करा कर इस विषय पर काफी प्रकास राखने का प्रयह किया है। इस संग्रह की प्राधीम पोपी चव इन के देखने में आई, तो इम की शोमक बुनि मे तत्काल उस का विशिश महत्व पिणन दिया और तुरन्त उस पोपी पर से अपने हाप से नकल उतार कर मेरे पास देखने के लिये भेज दिया। मैं ने भी प्रन्य कम्प परीमा' नामक प्रभम्प में वर्णित सबवा अकात विषय की उपलम्धि देस कर, इस को सुप्रसिर सिंघी बैन प्रन्पमाला हा प्रकट कर देने की अपनी इस नाइटा बन्धुओं को पक्त की और उस बसब प्राचीन मिसित पोपी को मेरे पास मेर देने को लिखा । पर उस समय कसक में सांप्रदायिक मार पीट की तूफान वानी हम पड़ मच रही पी इस सिपे तुरस्त या प्रति मेरे पास न वा सकी । प्रतिका प्रस्मस बबलोकन किये बिना किसी अन्य को अप देन के लिये मेरी रुचि सतह मही राती, इस लिपे में उसकी प्रतीक्षा करता रहा । बाद में, मेरा जब कम्फसा जाना हा तो मैं उस प्रतिको देखने में समर्प हुमा भीर माहटा क्युमों के सौमन्य से यह प्रति कुछ समयके लिये मुझे मिल गई। ई मा कर मैं ने उस पर से अपने निरीक्षण में प्रतिलिपि करवाई और उसे प्रेस में उपमाने की म्पवसा की। बाद में मोर कर मेरा वधिक पना रायसाम में रोने सगा वौर में मेरे तत्वावधान में प्रसापित वीर सपालित रानस्सान पुरातत्व मन्दिर (वब, रामसान प्राप्प विधा प्रतिष्ठान ) के संगठम मौर सपान के कार्य में अधिक व्यस्त रहने मागे इस का प्रकाशम सगित सा हो गया। पर इस मम्प को, इस रूप में, प्रकट करने कान की अमिमापा नाइट बन्धुभों को बात ही उत्कट दी और मुम मी पे बात प्ररणा करत रहे । तब में म इसे राममान - R एमपरीक्षादि प्राय संग्रह-किंचित् समिक पुरातन मम्पमामा सारा प्रकट करने की व्यवस्था की वौर उसी क फल स्वरूप, वान यह मन्थ प्रकाश में भा रहा है। नाहटा पम्भुकों का यो सात भामह न रहता तो मैं इसे प्रकट करने में शायद ही समर्प होना । जत इस के सपादन के प्रयोमागी ये बधु है। इस संग्रह की प्रेस कॉपी से ले कर प्रश्य को पर्वमान रूप देने तक के पगैरह सब मुझे ही देखने परे और मापा एवं अर्पनुसन्धान की पि से इस फे संशोधन में मुझे बहुत अम उठाना पग । इस लिये प्रन्प के प्रकाशित होने में अपेक्षा से भी बहुत अधिक समय म्यतीत हुआ। ठकुर फेस मे अपनी ये सप रचनाएं प्राकृत भाषा में हिसी है। पर इस की यह प्राकृत भाष, शिर और प्याकरण क्र न कर, एक प्रकार की प्राकृत-अपने की चन्ती शेळी वाली मापा है. विसे हम न पुर प्राक्स का सकते हैं, म मुदभपमा ही कर सकते हैं। फेरू के हम प्रन्थों के यो विषय है वे दोकम्पबहार की राशि से पातही उपयोगी और लम्पसनीय है। इस लिये उस ने अपनी रचना के लिये प्रास्त माषा की पास ही सरस शैली का उपयोग करना पसंद किया । उस का सस्य अपने मान को- विषय के मर्प को वमिम्पक करना रहा है, इस रिये म्याकरण के रूस नियों का अनुसरण करने के लिये यह प्रपतवान् मही दिखाई देता । अपनी रचना के लिये प्राप्त का प्रसिर गापा न्द उस ने पसन्द किया है और वह हम्द के नियम का ठीक पामन करने की शि से, कहीं इसको दीर्घ पौर दीर्म को इस रस्ता है, और कहीं कही को एकाक्षर के रूप में तो कही एकाक्षर को द्वित्व के रूप में भी प्रपित कर देता है । छन्द का भग न हो इस विचार से पा शब्दों का विमतिक रूप तक रस देता है। अन्धकार की इस शैली का ठीक मम्पयम करते करत हमें इस का संशोधन करना पग है। इस मिप हम्परा समय भी इस में बात म्पतीत उभा । फेह के इन मन्यों में से और 'रबपरीक्षा' तपा 'धावपति' के कुछ हिस्से के सिवा, और माँ की बम्प कोई प्रति उपपम्प नहीं, मत सळ एकमात्र प्रति के आधार पर ही सब पाठनिर्णय करना पग। साप में प्रति के सक की मनुशियों में भी कुछ परिश्रम मटा दिया। प्रति का मिलने पाळा न संसात बानता है म प्रारत । उस में कहीं कहीं अपनी भाषा में चो वाम्य मिसे। उन पर से उस के माषाहाम का परिचय मिल जाता है। ने इस के संशोधन में केसग उतमा ही प्रयह किया है जिस से बर्पयोन ठीक हो सके, और व्याकरण के नियम के निकट पद का रुप र स्के। दम्पपरीक्षा, रखपरीक्षा और भावपत्ति ये तीन प्रसम्म लौकिक शब्दों के ऊपर बाधारित है और इन में के मनेक शरद ऐसे है बो सर्मपा बपरिभित से भगवे है। इन शब्दों का टीक सहप चानने का कोई बम्प सापन नहीं। बत टम की सिति सी निशित प्रति में हैसी ही रसनी बावश्यक रही। दिख अक्षर B - रत्नपरीक्षादि प्राय संग्रह-किंचित् मासंगिक 'वस्तुसार' एक प्रसिद्ध रचना है। इसका मुद्रण भी पहले हो चुका है और फिर इस की अन्य प्रतियां भी उपरम्प होती हैं। मत उम के आधार पर यह प्रबन्ध तो प्राय ठीक शुर किया जा सका है। इस के तो विशिष्ट पाठ मेद भी दे दिये है। फेस के इन प्रन्यों में सब से अधिक महत्व का प्रन्प 'द्रम्यपरीधा है। इस प्रबन्ध में, उस ने अपने समय में मारत के मिम मिम प्रदेशों और प्रान्तों में प्रचलित, सिकों की नो बानकारी मिली है वह सपा अर्थ है । इस विषय पर प्रकाश गलने वाटी भौर कोई ऐसी प्राचीन साहित्यिक पति अभी तक ज्ञात नहीं है। इस प्रन्य पर तो मारत के मम्पकालीन सिकों के परिमाता ऐसे किसी विशिर विद्वान् को, एक अध्ययन पूर्ण एवं प्रमाणभूत प्रन्प मिस्ना नावश्यक है। इस का संपादन कार्य प्रारम करते समय हमारा उत्साह पा, कि हम इस विषय में पपाशम्प जानकारी एवं साधनसामग्री प्राप्त करके, इस के साप छोटा-पग मी जैसा कोई निवम्भ निगे, पर सम्यामार के कारण हम पैसा निमम्भ लिसन में असमर्प रहे । हम आशा करते है कि अब इस प्रन्य का यह मल खरुप प्रकट हो गाने पर, कोई मुयोग्य निष्कविझ विशन् पैसा प्रयत करने की प्रेरणा प्राप्त करेंगे। फेरू के 'रमपरीक्षा' प्रन्य के विषय में तो प्रसिद्ध विशन् रॉ मोती चन्दजी ने एक बड़ा परिचयात्मक निबन्ध लिस देने की पा की है, नो इसके साप दिया गया है। इसके लिये हम डॉक्टर साहब के प्रति अपना भाभार प्रदर्शित करते है। 'गणितसार' और 'ज्योतिपसार' मेरचनाए प्रावमिक सम्पासियों के अप्पयन की टि से भी उपयोगी है। गणितसार में तो ठगुमर फेक ने अपने समय में दिल्ली के वासपास के प्रदेश में म्पपात अनेक देश्य शो और सानिक पदापों का भी उम्टेस किपा निम पर विशेष प्रकाश गा जा सकता है। फेस के इस प्रत्य संग्रह की मो उक प्राचीन प्रति उपभम्ध है, जैसा कि उसके लिपि कमा ने दो तीन सानों पर निर्देश किया है, बि स ११०३ लौर ११०४ वर्ष के बीच में लिखी गई है। वास्तव में पह पोपी उक संवत् के फाल्गुण और घेत के महिने के पीच में, ए-दो महिने के अन्दर ही निसी गई है। मुर फ्रू ने दम्य परीक्षा' की रबमा सात् १३७५ में दिल्ली में समाउदीन बादशाह के राम्प कान में की पी । अव रचना समय के बाद २५-३० वर्ष के मीन ही या पोपी सिप्सी गई थी जिस से इस की प्राचीनता सत सिद्ध है। इस प्रति की कुल पत्रसस्सा ६० और उन में मिम तालिका के अनुसार पेश की इस मह वास सातों रचनाएं लिखी गई है।
४ " २ ३ है " n 7 रस्नपरीसादि अन्य संग्रह-किवि प्रासंगिक १ पत्रक १ से १८ वष ज्योतिपसार १९ से २७ A दम्पपरीक्षा २८ से ३५ वास्तुसार ३६ से ११ A रतपरीक्षा ११ A से १३ A पासूत्पत्ति १३ B से ११ युगप्रपान चलष्पदी १५ से ६० गणिवसार इम ने इस संग्रह में प्रतिस्पित प्रपक्रम का अनुसरण म करते हुए, प्रपम रमपरीक्षा, दम्पपरीक्षा और घातल्पचि नामक इम ३ रचनाओं को एक साप रसा है, धौर फिर ज्योतिपसार, गणितसार एप वास्तुसार इन ३ रचनाओं को एक साप रस कर, बन्स में 'युग प्रधान चतुष्पदी' रचना को दे दिया है। इस से विपप का विभावन ठीक सात हो गया है। इसके साप मूळ प्राधीन प्रति मो काकते के जैन भंगर में प्राप्त हुई उसके कुछ पोपे म्याक भी पना कर दिये जा रहे हैं निस से पाठकों को प्रति की प्रतिति का दर्शन हो सके। म्पोतिष, गणित, वास्तुशात, रमशाब और मुद्राविषयक विज्ञान पर, इस प्रकार की विशिः मन्परचना करने वासा ठहर पेरू, सचमुच अपने समय का एक बहुत ही पहनुस विद्वान् और अनुभवी शाखा पा। उसकी ये कृतिया हमारे प्राचीन साहिल की यहुमूल्य निधि है और इस प्रकार राजस्थान प्राप्यषिया प्रतिष्ठान पराइन का प्रकाशित होना सर्वथा समशरणीप होगा । दिनांक-21 मार्च १९१ भारतीय विपा मबन ई --- - मुनि जिन विजय ठपुर फेरू और उनके प्रन्यों के विषय में प्रास्ताविक कथन (लेखक-भगरपन्य, भंवरलाल नाहटा) कमाणा निवासी ठकुर फेस का नाम यों तो उन की सुप्रसिद्ध करी 'वास्तुसार प्रकरण' के कारण सर्व विदित था, परन्तु उन के बामुखी प्रतिमासंपम एवं महान् पकार होने का अब तक पता नहीं था। १५ वर्ष पूर्व, फलफचे की धीमणि जीवन जैन छायोरी की सूची में 'सारा कौमुदी गणित ज्योतिप' नाम से उछिचित फेह मेपाली की प्रति देखने पर ठकुर फेक की की नई कृतियाँ भात हुई । इस प्रति की प्राप्ति से फेल हमने ही नहीं, पर जिस किसीने मुना परम भानंद प्राप्त किया । इन मंत्रों की उपलब्धि से ठाकुर फेस की गणना, भारतीय साहिस्म में, एक अनूठा स्थान प्राप्त करने पाले विद्वानों में की जा सकती है। ठार फेस सिझम की चौदहवीं शती के रानमान्य जैन गृहस्सों में प्रमुस म्पक्कि थे। इन्होंने अपनी कृतियों में वो परिचय दिया है उससे विरित घेता है कि ये कमाणा निवासी श्रीमार वंश के पांधिया (धंषकुल) गोत्रीय प्रेष्ठि कालिय या करश के पुत्र ठकुर 'चंद के सुपुत्र थे। इनकी सब प्रपन रचना 'मुगप्रपान चतुष्परिका' है पो संबर १३९७ में पाचनाचार्य रामशेसर के समीप, अपने निवासमान फमाणा में बनी पी। इन्होंने अपनी पतियों के मंत में “परम जैन' और अपने माप को "निणद पय मतो लिख कर नपमा कार चैनम स्थित किया है। इन्होंने 'रस्नपरीक्षा में अपने पुत्र का नाम हेमपाल लिसा है, जिसके लिये इस ग्रंप की रचना की है। इनके माई का माम बहास है परन्तु भाता और पुत्र के लिए 'द्रष्पपरीक्षा मामक विशिष्ट मैप की रचना की पी। दिछीपति पुरत्राण वगउरीन खिलजी के एम्याधिकारी या मत्रिमंडल में होने के कारण, पीछे से इनका निवास स्पान बविकतर दिछी हो गया था। इन्होंने 'द्रव्यपरीक्षा' दिष्ठी की टंकसास के अनुमब से तया 'रत्नपरीक्षा' पंप सम्राट् के रत्नागार के प्रमा बनुमव से एवं 'गणितसार में मी दोई तत्काीन यमनैतिक गणित प्रभावली आदि से, यह फलित होता है कि ये माश्य शाही दरमार में उप पदासीन म्यति थे। संवत् १३८० में दिल्ली से श्रीमाठ सेठ रयपति ने महातीर्थ शत्रुनय का संघ निकाय पा, जिसमें ठकुर फेस मी सम्मिलित हुए थे। 1-4. मगप्रनामसरी नो बस्तुर से 'मस्तुभार" (गुमरावी मनुषार सदिन संस्मरण)* साप "रत्नपा" भौर “वातात्पति' प्रमाणे मग मी प्राप्ति या है। २-२ मा "रा नि मत मार पुत्रः।
प्रास्ताविक कथन ठकर फेल की "युगप्रधान पतुप्पदिका" के अतिरिछ समी कृतियाँ प्रात में है। मापा यही सरन, प्रवाही और भपमेश या तत्कालीन लोकमापा के प्रभाव से प्रमानित है। प्रन्पोक कतिपम चाम्स तत्कालीन मारतीय संसति एवं माषा पर महत्तर्ण प्रकाश राबते हैं । इनकी कृतियों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है- १ युगप्रधान पतुप्पदिक- यह कति सत्कालीन लोकमाषा उपभश में २८ चौपई व एक छप्पय में रखी गई है। इसमें भगवान महावीर से लगा कर परतरगष्छ के पुगप्रधान नाचार्यों की परंपरा की नामावली निमद है। भाचार्य भी पर्समान सरि के पाघर की जिनेवर रिमी से यह गछ सरतर नाम से प्रसिद हुआ। उनके परवी भाचार्यों के संबन्ध में कतिपय संक्षिप्त ऐतिहासिक बचतों का मी निर्देश किया गया है। से- १ श्री चिनेपर मिजी ने श्रमहिम्पुर में दुर्समरान के समा ८१ वाचायों को जीत कर पसरी माग प्रकाशित किया । २ भी जिनचंद्र रिजी ने उपदेश हारा नृपति को रजित किया एवं 'संवेग रंगशाला मामक प्रेप की रचना की। ३ श्री ममयदेव रिजी ने ९ मंगों पर टीकाएँ पनाई एक नमन पार्थनाप की प्रतिमा प्रकट की। १ श्री मिनवछम प्रिजी ने नंदी, न्हवण, रष, प्रतिष्ठा, युवतियों के ताग रास मादि कार्य रात्रि में किये गाने निपिर किये। ५. श्री निमदछ सूरिजी ने उमन में प्यान-मठ से पोगिनी पक को प्रतियोष रिया । शासन देवता ने इ 'युग प्रमान' पद धारक भोपित किया । ६ भी बिनचंद्र सुरिगी पडे रुपबाम थे। इन्होंने पत से श्रावकों को प्रति- योग दिया। ७ भी गिनपति प्रिती ने अजमेर के नृपति (पृप्पीराग) की समा में पपप्रम को पराजित कर अयपत्र प्राप्त किया। ८ श्री निनेभर मरिजी ने अनेक स्थानों में जिनालय एवं तदुपरि पन, दण, कमग, तोरणादि स्थापित किये एव १२३ साघु एक्षित किये। इनके पाधर श्री विनप्रपोष सूरि के पापर भी निमपद रिजी के समय में कमाणा में पाचनाचार्य रानशेसर गणि के समीप, मत् १५१७ के माघ मास में, इस पतपदी की रपना हई । इसकी एक प्रति हमें वैरूपमेर के मंगर का भरोक्न करते हुए प्रासपी जिसकी नकल हमारे पास सिपमाम है और उससे मापत्यक पाठान्तर मी लिये गये हैं। .
४ प्रासाधिक फ्यम २ रत्नपरीक्षा- यह प्रय १३२* प्रास्त गापाओं में है। संबत १३७२ में रिछी में सम्राट् मासाठदीन के शासनमें वपुत्र हेमपाल के लिये प्रस्तुत प्रप की रफ्ना की। पूर्व कवि गगस्म और मुर मर के प्रयों के अतिरिक्त शाही रत्नकोश की अनुभूति बारा अमिमयित विषय का सुन्दर प्रतिपादन किया है। ३ वास्तुसार-शिल्प सापस्म के विषय में प्रस्तुत मंब प्रामाणिक माना जाता है।पं मगवानदासमी ने हिन्दी और गुजराती अनुमाद सह जयपुर से प्रकाशित मी कर दिया है। प्रस्तुत प्रति संवत् ११०१ की लिसित है और मुदित संस्करण से पाठ मेद का प्राधुर्य है। इसकी रचना संवत् १३७२ विजया दशमी को कमाणापुर में। ४ ज्योतिपसार - यह प्रम संवत् १३७२ में २५२ प्राप्त गाषाओं में रचित है, जिसकी लोक संप्या, मंत्र कुरसिका सह १७१ होती है। इसमें ज्योतिप से पैहानिक विपप को नही मुशता के साप निरूपण किया है। ५ गणिवसार कौमुदी-यह पंप कुल ३११ गायाओं में है। गणित जैसे शुफ बोर मुनि प्रघाम विषय का निरूपण करते हुए पापकार ने अपनी योग्यता का मछा परिचय दिया है। इस प्रय के परिशीलन से तत्कालीन वस्तुओं के माष, तौल, नाप इस्मारि सासहतिक, सामानिफ और राजनैतिक परिस्थिति का पम्य पान हो जाता है। बसों के नाम, उनके हिसाब, पस्पर, मकती, सोना, चाँदी, धान्य, पृत, रोजगदि के हिसायों के साप साप क्षेत्रों का माप, पान्योत्पति, रामकीय कर, मुक्ता इस्मादि अनेक महत्वपूर्ण बातों पर प्रकाश गा गया है। इसके कतिपय प्रम देश्य माषा के छप्पयों में भी है, जो मापाकीय अभ्ययम की शि से मी अपना पेचिएप रसते हैं। ६ पावोत्पतिः -प्रारुल की ५७ गायाओं में पीतम, सोया, सीसा प्रगति पातुओं के उत्पत्ति विधानादि के साथ साथ रिंगुर, सिंदुर, दचिणावत सेस, कर, बगर, चंदन, कस्तूरी बादि बखओं का भी स्वररण दिया है, वो कवि के बहुत होने का सूचक है ७ द्रम्पपरीक्षा-प्रस्तुत भैप कवि की समस्त रचनाओं में अद्वितीय है। मारतीय साहिस में पुराने सिकों के संबध में स्वता रचना वाटा यही एक मग उपउम्पो •4 ममरामासीक प्रभावित पासमार (पुरराव मनपाइसदिन) त में मीशा (मा ११ ११.)। रमो दौर की, १९ मापई पाओसति । पाठप भी मन है । रत्त प्रन्यानुसार मा पापा भोता है। पर पावर में उसमें बीर प्रगती पात्राएं स पर।
८ प्रास्तायिक कफम जिसमें मुद्राओं के मून उपादान, घातुओं की चासमी, पातुशोभन प्रमालिका, मिम मिम मुद्राओं (सको रकम की) के नाम, टक्सास्थान, भाकार प्रकार, तौल, माप, धात के मिश्रण, पनागों के नाम अम बादि समी विपयों पर १९९ गाषाओं में, प्राधीन काल से ले कर सत्कालीन समय तक की प्राप्त समी ब्राभों पर विशिष्ठ विवेचन किया गया है। प्रस्तुत प्रति निसके कुन ६० पत्र है, संवत् १९०३-१९०४ में लिखी हई मुन्दर सुयाय और बछी सिसि में है। किसी सा० मावदेव के पुत्र पुरिसर ने अपने लिए लिसी है। प्रति के हांसिये पर “ पचनीय प्र" लिया हमारे जिससे मातम होता है कि यह प्रति मममें पाटण के बानमार फी रही होगी ।। फेरू प्रभारी की प्रसस्त प्रति से “प्रेसकापी" मैवरलाने सर्प अपने शाप से करके पुरातत्वाचार्य मुनि बिनविमफ्नी को भेजी, जिसे देख कर इम्होंने उस समय सिंधी मैन प्रपमाग शारा इसे परन्त प्रकाशित करने की इच्छा व्यक्त की। साप में बापने मूल प्रसि को भी देखना चाहा। पर कम्कचे की सत्कालीन सांप्रदायिक विषम परिस्थिति पश, मह तब उन्हें नी मेषी पा सकी। बादमें बब मुनिमी कलकत्ता पपारे सब प्रस्तुत प्रति को बर्ग ले गये । भद्रेप मुमिमी से विधान के तत्वाधान में यह प्रब शीम प्रकाशित पे ऐसी हमारी उत्कट इच्छा रही, पर सिंघी मैन प्रन्पमाण के बनेकानेक प्रन्यों के संपादन कार्य में मुनिजी नमन्स व्यस्त रहने के कारण इसके प्रकाशन कार्य में विलंब होता रहा। पर अब या प्रम्प, इस रूप में रामस्मान पुरातन मन्य माछा मारा प्रकाशित हो रहा है, जो इस विषय के मिजामुओं को परम वानन्द दायक होगा। प्रस्तुत संग्रह में ठाकुर फेह के रानपरीक्षा' प्रब के परिचय रूप में, सप्रसिद्ध विद्वान में मोती पदजी ने, हमारी प्रार्थना पर, एक विस्तृत निबन्ध किस दिया है, जो इसमें मुद्रित हो रहा है। हम इसके रिम्ये डॉ साहम के प्रति अपना धर्दिक हता मात्र प्रकार करना चाहते है। अन्त में हम बाचार्य भी मिननिमयनी के प्रति अपना विनम्र और सादर वामार मात्र प्रदर्शित करमा चाहते है कि इन्हों ने, पात परिभम के साप, इस प्रप का यह सुन्दर प्रकाशन, पनसान पुरातन प्रप माग के एक सुन्दर रत के रूप में प्रकट कर, हमारे रािभिनषित ममोरप को सफल बनाया। अगरचन्द तथा मंषरलाल नाहटा ठकुर फेहकृत रखपरीक्षाका परिचय लेखक-रॉ मोतीचन्द्र, एम् ए, पीएच् री (क्युरेटर प्रिन्स मॅाफ पेम्स मुभिमम, वर्ष) अमरकोश (२१२२-१) में पृथ्वी के वस्तीस नामों में सुधा, बमुमती और रगर्मा नाम भार है बिमसे इस देश के रनों के म्यापार की ओर प्यान माता है । हिनी ने (नेचुरल हिस्ट्री ३७७६) मी मारत के इस म्यापार की बोर इशारा किया है। इसमें बरा मी संदेह नहीं कि १८ वी सदी पर्यंत मातक कि, प्रानिल की रनों की मानें नहीं सुछी थी, मारत संसार भर के रनों का एक प्रधान पामार पा । रनों की सरद बिक्री के बात रिनों के अनुमा से मारतीप नौहरियोंने रमपरीक्षा शाब का सबन किया। जिसमें रनों के सीद, वेच, नाम, जाति, वाकार, घनत्व, रंग, गुण, दोप, कीमत तपा तस्पचिस्मानों का सांगोपांग विवेचन पित्मा गया। बाद में चम नकसी रस बनने लगे सब उन्हें जसटी रनों से विसग करने के तरीके भी बताए गए । अंत में रनों और मक्षत्रों के सम्बन्ध बौर उनके शुभ और अशुभ प्रभावों की ओर मी पाठकों का प्यान दिया गया। रमपरीक्षा का शायद सबसे पहला नछेस कौटिल्य के वर्षशास (२।१०।२६) में हवा है । इस प्रकरणमें अनेक तह के रस, उनके प्रातिसान तपा गुण भोर पोप की विवेचना है। कामसूत्र की पौसठ कलाओं की तालिका में (कामसूत्र, ११।१६) एप्पर-परीक्षा बोर मणियगाकर शान विशेष काम, मानी गई है। जयमाला टीका के गनुसार रुप्य-क-परीक्षा के अन्तर्गत सिको तपा रस, स, मोती इमादि के गुण दोषों की पहचान म्यापार के लिए होती थी । मणियगाकर धान की कला में गहनों के चरने के लिए स्फटिक रंगने भीर रतों के भाकरों का ज्ञान मा मावा पा । दिम्पायदान (पृ० ३) में भी इस बात का उछेस है कि म्यापारी को पाठ परीक्षायों में, मिनमें रसपरीक्षा मी एक मम्गात होना बावश्यफ था । पर इस रखपरीधा ने किस युग में एक शाम कर रूम मम पिपा इसका ठीक ठीक पता मही पम्वा । कौटिल्य के कोश प्रमेश्य खापरीक्षा प्रकरण से तो ऐसा मारम पर है दि मौर्य युग में भी किसी न किसी रूप में रसपरीक्षा शाब का महानिक रूप सिर से पुका पा । रोम भौर भारत के बीच में ईसा की आरमिक सदियों में जो म्पापार पतता पा उसमें रगों का मी एक विशेष साम था । इसलिए यह मनुमाम करमा शापद गम्त न होगा कि भारतीय व्यापारियों को, रगों का वा धान रहा होगा - उकुर फेर विरक्ति और किसी न किसी रूप में रमपरीक्षा शास्त्र की स्थापना हो चुकी होगी। जो भी हो, इसमें जरा मी संदेह नहीं कि ईसा की पाधी सदी के पहले रमपरीक्षा का समन ऐजुका था। या समप्त सेना भूस होगा कि रत-परीक्षा शाम केवल नौहरियों की शिक्षा के लिए ही बना था। इसमें शक नहीं कि, नैसा रिव्यावदान में कहा गया है, म्यापारियों के पुत्र पूर्ण और सुप्रिय (दिम्यावदान, पृ० २६, २९.) को और बौर विधायों के साथ साप रबपरीक्षा मी पलना पड़ा था। हमें इस बात का पता है कि प्राचीन मारत में एगा वीर यस रनों के पारसी होते थे। यह भावश्यक मी था क्यों कि व्यापारियों के सिवा में ही रह सरीदते ये खौर संग्रह करते थे । जैसा कि हमें साहिम से पता पता , काम्यकारों को भी इस शाब का ज्ञान होता था और वे गमा रमों का उपयोग रूपकों और उपमानों में करते थे, गो कि रम सम्बन्वी उनके पगार कमी कमी अतिरमित ऐर वास्तविकता से बात पूर चा पाचसे थे । बैसा कि हमें मच्छकटिक के चौथे मंक से पता चलता है, कि जब विपक बसंतसेना के महल में पुसा तो उसने छठे परकोट के वांगन के दालानों में कारीगरों को मापस में मैर्य, मोती, मंगा, पुसरान, नीलम, कतन, मानिक और पने के सम्बन्ध में मासचीत करते देखा । मानिक सोने से परे (वप्पम्ते) या ऐ थे, सोने के गहने गा गा रहे थे, शंस काटे जा रहे थे, और काटने के लिए भंगे सान पर बाए जा रहे थे । वपर्युत विवरण से इस बात का पता चल जाता है कि शतक को एमपरीक्षा का बयान पा होगा । कलाविगस के बाट सर्ग में सोनारों के वर्णन से मी इस बात का पता पता है कि क्षेमेन्द्र को उनकी कला और साशास का वा परिचय पा। रखपरीक्षा धार का निवना से मान पा, उतना ही यह शाब कठिन माना माता पा । इसीलिए एक कुशक रस्नपरीक्षक का समान में काफि वादर होता था। एनपरीक्षा के प्रप उसका माम परे बादर से छेते हैं। नगनिम्त' (६७-६८) के अनुसार गुणवान मालिक निस देश में घेता है, वह पम्प है। प्राइफ को बसे मुणकर वासन देकन तपा गंध मानदि से सत्कार करना चाहिए । मुखमा (१४-१५) के अनुसार रस्नपरीक्षकों को शाबा एवं कुमक होना चाहिए । इसी- किये उनें रत्नों के मत्य वीर मात्रा के बामकार कहा गया है। देश कात के अनुसार मृत्य न बोक्ने मासे सपा शाब से बनम्झि पौहरियों की विज्ञान कदर नीं करते। कार फेरू (१६-१०७) का मात्र मी कुल ऐसा है है। उसके मनुसार मलिक 1 1 विए, भोपितर बानयां भी हमें फिमो पारी १०९ । मैंने इस भूमिमरिन में भी पिलो रेब से बापता पिसत्र में भामार मानता है। मैं मिो में मने इस मालपूर्म प में उपसम्म म गाएक बदमाया है। - उपरीक्षा का परिचय को शासन, समला, मनुषी, देश, काल बौर मार का ज्ञाता चौर रस्लों के रुप का जानकार होना आवश्यक या सीनांग, नीच जाति, सम रहित और मदनाम म्यक्ति जानकार और मान्य होने पर मी भस्टी जौहरी कमी नहीं हो सकया । अगस्तिमत (१५) ने भी यही माव प्रकर विर है। जगखिमत (५१-६६) के अनुसार असुर बौहरी को मंडलिन् कहा गया है। यह नाम शामद इसलिए पग कि जौहरी अपना काम करते समय मस्त में बैठता मा। या मी संभव है कि यहाँ मंडल से मरली यानी समुहू का मतमय हो। अगस्ति मत (६१-६६ ) के अनुसार जौहरी रत्नों का मूल्स बोक्ता पा। उसे देश में मिलनेवाले आठ सानों तपा विदेशी और दीपों से आए हुए रनों का ज्ञान होता पा । उसे रनों की नाति, राग रंग, पति, चौल, गुण, वाकर, दोष, वान (उम्पा) नौर मूल्य का पता होता पा । पर आकर (पूर्वी मप्पमारत), पूर्वदेश, कश्मीर, मप्पदेश, सिंहल तया सिंधु नदी की माटी में रन सरीवया पातमा रन बेचने और मरीदने वाले के बीच मध्यस का काम करता पा । भगतिमत (७२) के अनुसार पर रन विक्रेता से हाप मिला- कर अंगुलियों के इशारे से उसे एन के मूल्य का पता दे देता था। उसी के एक क्षेपक (१५-२३) के अनुसार १, २, ३, १ संम्पाओं का क्रमश' सर्बनी से दूसरी अंगु- लिमों को पकाने से वोप होता पा । अंगूठे सहित चारों अंगुचिया पकाने से ५ की संख्या प्रकर होती पी । कनिष्ठा बादि के तरूप से क्रमश ६, ७, ८ र ९ की सम्पावों का पोष होता था, तया तर्मनी से १० का । फिर ननों के छने से क्रमश ११, १२, १३, ११ वीर १५ का बोध होता पा । इसके बाद स्पेकी छने पर कनिष्ठादि से १६ से १९ सक की सम्पाओं का वोष होता पा । तन्नी वादि का दो, तीन, पार और पांच वार छने से २० से ५० तक की संख्याओं का बोम होवा पा । कनिष्ठा आदि के तों को ६ मार सक छने से ६० से ९० तक वों की ओर इशारा हो जात पा सपा मारी तर्ममी पकरने से १००, मापा मम्पमा पकाने से १०००, भाषी बनामिका पकाने से क्युत, मापी कनिष्टिका से १०००००, मंगूठे से प्रयुत, कई से फोक । मुगट काठ में वपा मा मी बंगुलियों की सक्रितिक मापा से गौहरी मपना म्पापार चष्मते। प्रावीम साहिम में मी बहुधा चौधरयों के समाप में उष्वेस मिलते हैं। दिम्या खान (पृ०५) में कहा गया है कि किसी रस की कीमत मोकने के लिए बीहरी बुलाये दावे थे। अगर ये रत की ठीक ठीक कीमत मी आंक सकते पे सो उसका मत्य ये एक करोड कर देते थे। वाकपालोकसमह ( १८,३६६) से पता पख्ता है कि सानुदास ने पाय मयुरा में पहुच कर यहाँ का चौहरी बानार देशा और वहां एकता और किना फो, एक नौहरी से एक रसासफार का मस्प भाग्ने को कहते ठकुर फेस विरचित पना । सानुदास को उस गहने की मारे ताकते पुए देसफर उन्होंने समता कि शायद यह निगाहदार पा। उससे पूछने पर उसने गहने की कीमत एक करोष यता कर कह दिया कि बेचने और खरीदनेवाले की मी से सौदा पट सकता था। वे दोनों एक दूसरे चौहरी के पास पांचे बिस्ने कहा कि गाने की कीमत सारा संसार पा पर मासमा के लिए उसका मोह एक छदाम पा । सानुदास की जानकारी से प्रसप कर राजा ने उसे अपना रसपीसक नियुक्त कर दिया । प्राचीन साहित्य में अनेक ऐसे ठहस बार बिमसे पता पता है कि वों के म्यापार के लिए मारतीय मौहरी देश और विदेश की बराबर यात्रा करते थे। रिम्पा- वदान (१०२२९-२३०) की एक कहानी में बतलाया गया है कि रखों के म्यापारी मोती, मार्म, पास, मंगा, चांदी, सोना, मकीक, जमुनिया, वौर दक्षिणा शस के प्यापार के लिए समुद्र यात्रा करते थे। निर्यामक प्राय उमें सिंहलदीप में बनने वाले मकाली रनों से होशियार कर देता वा तपा उमादेश दे देता था कि ये सूब समझ कर माछ सरीदें। माताधर्म का (१७) और उपराष्पयन सूत्रको टीका (२९७२) से मीनों के इस म्यापार की भोर समेत हासता है। उत्तराष्पयन टीका में एक ईरानी म्यापारी की महानी दी गई है जो ईरान से इस देश में सोना, चांदी, ख और मंगा छिपा कर मामा चाहत्य का। बावश्पक पूर्णि (पृ० ३१२) में रसम्यापार के लिए एक बनिए का पारस माने का उछेस है। महाभारत (२।२०२५-२९) के अनुसार दक्षिण से इस देश में रस और मूंगे नाते । ईसा की प्रारंभिक सदियों में तो मारत से रोम को हीरे, साई, लोहितांक, बीफ, सार्गेनिम्स, बाबागी, कासाप्रेस, गार मुहरा, रमणि, हेलियोटाप, म्योतिरस, कसौटी पत्पर, भामुनिया, एवेंचुरीन, जमुनिया, स्फटिक, विऔर, फोडेर, मोसम, मानिक लाप, अल्बर्द, गार्नेट, मुम्भ, मोती इलादि पांचते पे (मोतीचन्द्र, सागर, १० १२८-१२९) - प्राचीन रखपरीक्षा का स्या रूप रागा या वो ठीक ठीक नमें कहा जा सक्ता, पर उस सम्पप के पोप मिने उनका निवरण नीचे दिपा पाता है। १ मर्मशान-कौटिल्स ने कोश-प्रबेस परीक्षा (वर्षशाख, २-१०-२९) में रमपरीक्षा के समय की कुछ जानकारियां हैं। कोश में अधिकारी म्पधियों के समाह से ऐसा सरीदे जाते थे। पहले प्रकरण में मोती के उपचि स्थान, गुण, दोप वा बाकार इमादि का वर्णन है। इसके बाद मण, सौगंधिक, पर्य, पुपएग, इम्बनीस, नेदक, वाग्मभ्य, सूर्यकारत, लिमयक, ससक, मचनमूम, पित्तक, मममक, मोहितक, नमक, पोसिरसा, पक, परिन्छषक, इर्प, विस, मुगभिर्प, बाए सपरीसा का परिचप क्षीरपक, मनिपूर्णक, सिमाप्रवालक, चूरूफ, शुकमुष्क तपा हीरा और मूगा के नाम है। इनमें से बहुत से रनों की ठीक ठीक पहचान मी नहीं हो सकती क्यों कि वाद के रमशार उनका तलेस तक नहीं करते। २ रनपरीक्षा-मुखमा की रसपरीक्षा का समय निश्चित करने के पहले पर मिहिर की हार संहिता के ८० से ८३ अम्पायों की चानकारी असरी।। इन मप्पायों में हीरा, मोती और मानिक के वर्णन है । पमे का वर्णन तो केड एक मोक में है। पुदमा की रमपरीक्षा और सहसहिता के प्रकरण की अनबीन करके भी फिनो (पहं पृ० ७ से ) इस नतीजे पर पांचवे है कि दोनों की रनों की बालिकाओं तपा हीरे भोर मोती का माम लगाने की विधि इमादि में परी समानता है। इससे यह बनुमान लगाया जा सकता है कि दोनों प्रयों ने समान रूप से किसी प्राचीन स्मशान से अपना मसाग लिया । गल पुराण ने मी मुदमा का नाम हटाकर ६८ से ७० मप्पार्यों में रमपरीक्षा प्राण कर लिया । बहुत सेमव कि शायद पुरमा का समय ७-८नी सही या इसके पहले मी हो सकता है। ३ अगस्त्रिमत-प्रगतिमत और रखपरीक्षा का विषय एक होते हुए भी दोनों में इतना भेद है कि दोनों एक ही अनुभुति की बात दिनोंसे ममगई भासा मान परते है। श्री फिनो (पृ० ११) के अनुसार अगस्त्रिमत का समय मुदमा के पाय पानी छठी सदी के बाद माना मामा चाहिए | शायद उसका प्लेसक रक्षिण का राइनेमाछा मान पस्ता है। समय है कि यातिमत का वापार कोई ऐसा रतशाम या हो जिसकी स्याति दक्षिण में बहुत दिनों तक दी। प्रप के बनेक उल्लेखों से ऐसा पसा पत्ता है, कि रमशान के प्राचीन सियासों को लिवाहते ए भी प्रकार ने अपने भनुमों का उल्लेख किया है।वमायवश प्रेपकार के भ्याकरण और क्षाली में निष्णात न होने से उसके मात्र समाने में बड़ी कठिमाई परती है। ४ नबरमपरीक्षा-नवरतपरीक्षा के दो संस्करम मिठते है। छोटे स्करण में सोम ममूज् का नाम तीन बार मिलता है निस्के भापार पर या मामा गा सकता है कि इसके रचयिवा कल्याणी का पमिमी पाहाय राना सोमेघर ( १९२८-११३८,६) पा । इस कपन की सपाइ इस बात से मी सिद्ध होती है कि मानसोहास के कोसा- प्पायमें (मानसोपस, भा० १, पृ०६४ से) जो रनों का वर्णन है, यह सिपाय कुछ छोटे मोटे पाठमेदों के नबरखापरीक्षा जैसा ही है । मपरसपरिक्षा का सरा संस्करण बीकानेर वीर गोरफी हससिक्षित प्रतियों में मिलता है । इसमें भागद, मुद्राप्रकार और हत्रिम साकार प्रकरण बधिको । समय है कि सतिसारोदार के मेसक मायण पंरित ने इन प्रकरणों को अपनी बोर से बोर दिया हो।
" ठकुर फेस विरचित सुना । सानुदास को उस गहने की बोर वाकते हुए देसकर उन्होंने समाना कि शायद यह निगारदार पा। उससे पूछने पर उसने गाने की कीमत एक करोग पता कर कह दिया कि बेचने और मरीदनेवाले की मर्जी से सौदा पट सकता पा। वे दोनों एक दूसरे पोररी के पास पहुंचे बिसने कहा कि गहने की कीमत सारा संसार पा पर नासमा के लिए उसका मोल एक छदाम पा । सानुदास की जानकारी से प्रसन होकर राजा ने उसे अपना रमपरीक्षक नियुक कर दिया । प्राचीन साहिम में अनेक ऐसे उस भाए हैं जिनसे पता चलता है कि सखों के म्यापार के लिए मारतीप गौहरी देश भौर विदेश की बराबर पात्रा करते थे। विम्पा पदान (पृ० २२९-२३०)की एक कहानी में पतलापा गया है कि रखों के म्यापारी मोती, पैर्य, शंस, मंगा, चांदी, सोना, भीक, पमुनिया, वौर दक्षिणावर्ष यस के म्यापार के लिए समुद्र पात्रा करते थे। निर्यामक प्रायः उमें सिंदीप में पनने पाले मकी रनों से होशियार कर देता वा तपा उनें वादेश दे देवा पा किये सूब समझ कर माल सरीदें। बताधर्म कपा (१७) और उत्तराप्पयन सूत्रको टीका (३६१७५) से मौ रनों के इस म्यापार की जोर संकेत मिलता है। उत्तराप्पयन टीका में एक ईरानी म्यापारी की कहानी दी गईमो ईरान से इस देश में सोना, चोरी, रत और मूंगा छिपा कर मामा चाहत्य पा । पापक पूर्णि (पृ० ३४२ ) में रनम्यापार के लिए एक पमिए का पारस माने का उल्लेस है । महामारत (२२२०२५-२५) के अनुसार दक्षिण समुद्र से इस देश में रम और मूंगे माते थे। ईसा की प्रारंभिक सरियों में तो भारत से रोम को परे, सार्ग, लोहितांक, बीक, सार्गेनिम्स, मावागोरी, कासाप्रेस, पहा मुहरा, रकमणि, हेलियोटाप, म्योतिरस, कसौटी फ्ल्पर, ममुनिया, एवेंडरीन, समुमिया, स्फटिक, रिसोर, कोरेर, मीलम, मानिक छ, छामर्द, गार्मेट, गरमस्त्र, मोती दमादि पापते पे (मोतीचन्द्र, सार्यवाह, पृ० १२८-१२९) -:२:- - प्रापीन रमपरीक्षा का क्या रूप रण ऐगा पर वो ठीक ठीक नहीं करा पा सम्वा, पर उस समय के जो मग मिले हैं उनका विवरण नीचे दिया भाता है। १ अर्पशास-कौटिस्स ने कोश-प्रवेश्य रखपरीक्षा (वर्पचार, २-१०-२९) में रमपरीक्षा के समय की कुछ मानकारियां दी है। कोश में अभिमसी म्पतियों के सलाह से ही रत सरीने जाते थे। पहले प्रकरण में मोती के उत्पति स्साल, गुण, दोष सपा बाकार इस्मादि का वर्णन है । इसके बाद मणि, सौगधिक, मर्य, पुष्पपग, पदमीठ, मैदक, परमप्य, सूपकात, निमक, ससक, मंपनमून, पिचक, मुममक, मोहितक, अपशक, म्योतिरसफ, मैपक, भविष्याप्रक, र्प, पति, गन्धिकूप, " बाद ४ नवरसपरीक्षा-मबरमपरिक्षा के दो संस्करण मिम्वे है। छोटे स्मरण में रमपरीक्षा का परिचय धीरपक, अफिचूर्णक, सिलाप्रपालक, घूछक, अपुष्क तथा मिरा चौर मूगा के माम पाए है। इनमें से बात से खों की ठीक ठीक पापान मी नहीं हो सती क्यों कि के रजशास उनका उछेस तक नहीं करते। २ रमपरीक्षा-मुखमा की रतपरीक्षा का समय निमित करने के पहले वा. मिहिर की वृहत् संहिता के ८० से ८३ वप्पार्यों की जानकारी नही है । इन बप्पायों में , मोती और मानिक के वर्णन है । पमे का वर्णन तो केवल एक के में है । मुदमा की रसपरीक्षा वोर हादसहिता के प्रकरण की छानबीन करके भी फिनो (पही पृ० ७ से ) इस मतीने पर पांचते हैं कि दोनों की रखों की वारिकायों तपा हरे और मोती का भाव लगाने की विधि इलादि में वकी समानता है। इससे यह पनुमान लगाया मा सकता है कि दोनों प्रयों ने समान रूप से किसी प्रापीन खान से नफ्ना मसाग लिया। गल पुराण ने मी बुरमा का नाम स्टाकर ६८ से.. अध्यायों में रखपरीक्षा प्राण कर मिया । पात समष है कि शायद बुरमा का समय ७-८ वी सदी या इसके पहले भी हो सकता है। ३ अगस्त्रिमत-गस्विमत और रखपरीक्षा का विषय एक ऐवे हुए मी दोनों में इतना भेद है कि दोनों एक ही अनुभूति की बहुत दिनोंसे बडग हा शासनाम परते हैं। श्री फिनो (पृ० ११) के अनुसार वगस्विमत का समय दुरमा के बाद यानी छठी सदी के बाद माना जाना चाहिए । शायद उसका सेसक रक्षिण रहनेवाग मान पस्ता है । संमन है कि अगसिमत का भामार कोई ऐसा AHIR रहा छ निस्की म्यासि दक्षिण में बात दिर्मों तक पी। पंप के अनेक रोगों से ऐसा पता भरता है कि रमशास्त्र के प्राचीन सिद्धान्तों को निबाहवे ए भी प्रकार ने अपने अनुमों का उल्लेख किया है ।वमाम्यवश प्रपकार के प्याकरण और मी में निणात न होने से उसके मात्र समाने में बड़ी कठिनाई पड़ती है। सोम भूमून् का नाम तीन नगइ मिलता है जिसके बाभार पर पह माना जा हेपि इसके रचयिता कास्यागी का पश्चिमी घारम्प रागा सोमेश्वर ( ११२८-११३८,६) पा । इस कपन की सचाई इस बात से माँ सिर होती है कि मानसोडास के योग प्पायम (मानसोहास, मा० १, पृ० ६१ से) बो रहों का वर्णन है, वह सिवाय होटे मोटे पाठमेलों क नवरसपरीक्षा जैसा ही है। नवरतपरीक्षा का दूसरा सममा बीकानेर और तंगोरकी स्वपिसित प्रतियों में मिलता है। इसमें पागद, मामा वोर त्रिम रसप्रकार प्रकरण अधिक है। समय रेल सतिसारोबार के माण्पण परित ने इन प्रकरणों को अपनी बोर से जोर दिया हो। ।
हर फेड विरचित ५ मगरतीय रसपरीक्षा-अगस्तीप रमपरीक्षा पासम में बगस्ति मत का सार है। पर विखार में कहीं की नई बातें बा गई है। ममाग्यवश इसका पाठ एत भार और बमुस। उपर्युक प्रों के सिपाय रससंग्रा, अषमा रमसमुचय, अपदा समवरतपीया २२ कोकों का एक छोय सा प्रप है। सुरतपरीक्षा में मी २० मेक है, मिनमें रखों के गुण दोषों का विवरण है। मणिमाहात्म्य में शिव पार्वती संवाद के रूप में कुछ उपरों की महिमा गाई गई है। ६ फेस रचित रमपरीषा-ठमुर फेहर पित रमपरीधा का कई कारणों से विशेष महत्व है। पहली बात तो पहले किया रखपरीक्षा प्राह में है। ठान फेस के पहले भी शायद प्राक्त में रखपरीधा पर कोई प्रेय रहा हो, पर उसका वमी तक पता नहीं। दूसरी बात यह है कि ग्रंथकार भीमाश नाति में उत्पम ठर चंद के पुत्र यार फेरू मा मुल्तान बगठदीन सिब्जी ( १२९६-१३१६)के खनाने वार टक्साल से निकटतर सम्बन्ध था। उसका सर्प कहना है कि उसने हास्पति, वगम और पुरमा की रमपरीक्षाभों का अध्ययन करके और एक बौहरी की निगाह से अठाठरीन के सनाने में रमों को देस कर, अपने प्रप की रचना की (१-५) उसके इस कपन से यह बात साफ माटम पर जाती है पि कम से कम ईसा की १५ भी सदी के में मुखमाह की रमपरीक्षा, वराहमिहिर के रनों पर के अभ्पाप मौर नगस्विमत, जशान पर वधिकसी प माने जाते ये बौर उनका उपयोग उस मुग के पौहरी बराबर करते पते थे । पैसा हम वागे पठ कर देखेंगे, सर फेस ने रमपरीक्षा की प्राचीन परम्परा की रक्षा करते हुए मी तत्वाम्मन मत्य, नाप, तोड तथा रनों के अनेक मए स्रोतों का रस पिया है बिमका पता हमें फारसी इतिहासकारों से भी मी समता । प्राचीन रसायों में सानों से निकले रनों के सिपाय मोती दौर मगा भी शामिकीमो मानब में परपर नहीं कहे या सफठे । साधारणत माहरात के लिए रस और मणि और कमी कमी उपन पद का म्यवहार किया गया है। संसस साहिम में रख पाद का म्पबहार कीमती पस्त भौर कीमती पवाहरात के लिए हुमा है। परममिरि (पृ० सं० ८.१२) के अनुसार स शब्द का म्याहार हाथी, घोड़ा, पी इस्मादि के लिर गुणपरक , रसरीक्षा में इसका व्यवहार केवल कचनादि रमों के लिए भा है। मण शम का म्पबहार कीमती रतों के लिए मा, पर गापा यह शम्य मनिया, गरिया अपना मनके लिए भी मापा ।
रंग जिनमें सफेदवार माछा प्रधान ।। मारत में इस पपर का पानना बाम रमपरीक्षा का परिचय वेदों में रम शम्द का प्रयोग कीमती यस्तु और सनानों के वर्ष में हना है। उग्वेद में तीन चगह (फिनो, पृ० १५) सप्त रनों का उल्लेख है । मणि का वर्ष अग्वेद में ताबीन की तरह पाननेवाले रनों से 1 (मुग्वेद, १।३१८, २०३० २।२९२, २१ इस्मादि) मणि तागे में पिरोकर गले में पहनी नाती पी (पाचस्पी से० ३०७, तेचिरीयस शा२१) इसमें भी संदेह नहीं कि वैदिफ भायों को मोती का मी मान पा । मोती (कशन ) का उपयोग शंगार के लिए घेता पा (ऋग्वेद, २२३५५१, २०१६८११, अपर्यवेद १।१०।१-३) मुम्पयसित रसशाओं के अनुसार नम रहों में पांच महारत और चार उपरत है। र, मुळा, माणिकप, मोड और मरका महारत है। गोमेद, पुष्पराग, वैर्य (इसनिया) और प्रबाल उपरत है। मानिक और नीलम के का मेद गिमाए गए है। वराहमिहिर ( ८२।१ ) तथा युद्धमा (११९) के अनुसार मानिक के भार मेद पमा-पराग, सौगंधि, कुरुर्विद और स्फटिक है। भगतिमत (१७३) के अनुसार मानिक के तीन मेद हैं, यपा-पपराग, सौगंधिफ, कुरुर्विद । नपरमपरीक्षा (१०९-११० ) में इनके सिवाय नीगपि मी भा गया है। अगसीय रसपरीक्षा में (१६ से) मानिक का एक नाम मांसपिर मी है। टसर फेह के अनुमार (५६) मानिक के साधारण नाम माणिस्य और पुनी है, मग मी मानिक के ये ही दो नाम सोसाधारण में प्रचलित है। मानिक के निम्नलिखित मेद गिनाए गए है-पपराप (पपराग ), सौगंधिय (सौगविक), नीगंध, कुरुविन्द बौर मामुणिय । रसपरीक्षायों में नीलम के तीन मेद गिनाए गए हैं-नीस साधारण मीयम के लिए पात हुआ है तथा इन्द्रनील और महानीठ उसकी कीमती किस्में पी। प्पर फेड ने (८१) नीलम की केवछ एक किस्म महिंदनीठ (मोबनीस) बताया है। प्रापीन रमपरीक्षाओं में पमे के मरकत वीर वार्य नाम धाए । पर मर फेह (७२) ने पमे के निहिसित भेद दिए - गोवार, कीरउठी, पासउती, मगठमी, और धूलिमराई। उपर्युक नव रनों की सालिका प्राय सब रमशाओं में जाती है पर वगनिमत ( ३२५-२९) में सरिक और प्रम जोड़कर उनकी संख्या ग्यारा कर दी गई है। पुरम्प ने उस सालिका में पांच निमलिखित रत जोग दिए हैं- करेतन (tryrobenyi ) मीम, पुलक (garnet) रुविराक्ष (carnefial) शेष मार धामी जम रुपान्तर है। यह पायर मारत और यमन से बाता था। इसके बात -पपा शेष (ony:) से ८ ठपुर फेरिचित माना जाता था। मीम कोई सफेद रंग का पत्पर होता था। पुरमा (२१२-७९) के अनुसार कलायक फ्लिाइट किए ए अमंग का पत्पर होता पायो पुफिकल्पतरु के वनुसार स्फटिक का एक मेद मात्र पा। सोमक नीम्मायक सफेद पत्पर पा और फुग कसन के फिल्म का नीला पत्थर पा । पराहमिहिर की रहनों की तालिका में पाईस नाम गिनाए गए हैं पर एक रत की बनेक किस्में देखते हुए उनकी संख्या कम करना सकती है। बसे शाशिकान्त स्फटिक का से एक मेद है, महानील और इम्बनीस मीलम हैं, तपा सौगंभिक और पराग मानिक के मेद है। इस तर खों की संम्पा घट कर उनीस माती है पमा फटिक के सहित दस रत, कतम, पुरस्क, रुभिराक्ष षा लिमक, राममणि, पास, मममणि, म्पोतिरस बौर सस्पक । म्योतिरस और सस्यक का नशेत अर्पशाब (२।११।२९) में भी हमा। शंस से शापद यहाँ दक्षिणार्स शेस का अनुमान किया जा सकता है। ज्योतिरस शापद पेस्पर या हेम्यिोटोप पा । उपर्युक रखों के सिवाय, फिरोगा (पेरोग, पारोब) छानबर्द और समन यानी मानिया या बेर्म के नाम भी भाए है। रतसंग्रह । (१९) में मसारगर्म (रूप- मसरगर्म, मुसलगर्म, मुसारगत, पानि मसरगठ, मुसारगठ) को दूध पानी बग करने वाला, श्यामरंग का, घमकमला तपा दुर दोषों का अपहर्ता कहा गया है। शब्द कस्पडम ने इसे इन्द्रनीममणि का। वो ठीक नहीं । महाभारत (२२४७१) में मगदच हारा युधिष्ठिर को प्रस्मसार का बना पात्र देने का उछे । गिसकी पापान वापर मसरगर्म से की जा सकती है। मसारगर्म की पहचान पीनी रुन-के-मू पानी जमुनियों से की जाती है, पर वरमसार यश्व मी हो सकता है। क्यों कि वासाम का परोसी बर्मा पशय के लिए प्रसिर है। ठर फेरत परीक्षा (११-१५) में मवरण पपा पमाण, मुळा, मिट्ठम, मरकत, पुसाय, पिरा, इम्नमोल, गोमेद और वैर्य गिमाए है। इनके सिवाय इसणिया (९२-९३) फम (स्फटिक, ९५-९६) बहन (९८) मीसम (मीप्म, ९९) नाम पाए हैं। अर फेह ने काम, बीक बार फिरोगा को पारसी रत बताया है (१७३), इस तर झर फेस के अनुसार खों की संख्या सोग बैठती है। पर परखाकर के रचयिता पोतिरीपर मर (बारमिक ११ वी सर्व) के समय में उगता है कि १८ ख चौर २२ उपरन माने पावे मे (मरकर, प० २१, ०१ श्री सनीतिकुमार पेटी शरा संपारित, कनकपा १९९०)।मों की तालिका में गोमेद, गलोवार, मरकर, मुकुवा, मांसर, पायग, य, रेणन, मरासेस, सौग- सपरीक्षा का परिचय धिक चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त, प्रवाल, राबार्त, कपाय वौर इन्द्रनीड के माम वाए हैं। इस तालिका में रमपरीक्षा के मारतों में गोमेद, मरकत, मुक्का, रा, पाराग, इन्द्र नील, प्रनाउ बोर सूर्पकात है। मस्सर, सौगंधिक, (शापद पुनी), तो पपराग पा मानिक के ही मेद । इसी वर चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त और कपाय स्फटिक के मेव है। मापसेस निसका सम्बय शेष (onyx) से हो सकता है, तमा मनपर्द की गणना रनों में किस प्रकार की गई यह कहना सम्भव नही । उपमणियों की तासिका वर्णरमाकर में दो जगह आई [पृ० २१, ११] इनमें [१] धर्म, [२] महान, [३] बहिन, [१] श्याग (स), [५] म्योमराग, [६] कस्टपस, [७] फुरु [ ] विंद, [८] सूर्यमा (ना) छ, [९] हरि (0) वसार, [१०] जीविठ (जीवित), [११] यवयाति (पवजाति), [१२] शिसि (वी) निक, [१३] शपत्र, [१५] ५ () लिमरक्त, [१५] मम्मंग, [१९] नयुकान्त, [१५] स्फटिक, [१८] कतर, [१९] परिपान, [२०] नन्दक, [२१] वर (1) नफ, [२२] मोहितक, [२३] शैम्पक, [२१] शुधिपूर्ण, [२५] पुछक, [२६] तुस्स (प)क, [२७] शुक्मीम [२८] गुरुर (1) पक्ष, [२९] पीतराग, [३०] वर्गरस (सर) [२१] प्रेक, [३२] काच । उपमणयों की उपर्युक्त तालिका में कुछ मणियों पर प्पान विठाना पानश्पक है। इसमें धर्म और महार्म तो ममियों की श्रेणी में नहीं पाते । कपुर की सपरियों का म्यापार मत पुराना है और इसका उसेच पेरिपस में बनेक बार मा । (शाफ, पेरिपस माफ दि एरीमिपन सौ, पृ० १३ इमादि) महिछत्रक का उस हमारा प्यान कौरिम्प (२।१।२९) के माहिलपक रन की बोर के नाता है। पूस्लिमरकत से यहाँ शायद पमे के सा से मान है और इस वरह या ठकुर फेह की प्रतिमाई मी शायद रो। मस्मांग से यहाँ शायद भीष्म से मतलब। चंयुफात से शायद बमुनिया का मतलब है। अंगन, पुरक, मेदक वीर शतिपूर्णक के माम भी मर्पण में आए है। कोतर से यहां कईसन र तपा मोहितक से मोहितांक का मतय है। तत्पक से हमारा प्यान कौरिस के तुरपोत चांदी की धौर सींच नाता है (१२।१२।३२)। काच से काष मणि की और इशारा है। सन् १५२१ लिखित पप्पीचन्द्र परित्र (प्रारीन गुर्जर काम्प संग्रह १० ९५, पोश, १९२०) में रसों और उपरतों की निप्स इलित तालिका की गई पपराग, पुप्पराग (पुसराब ) म्पणिक, सीपलिपा, गरोद्गार, मणि, मरकस, कसम पर, रूप, चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त बसन्त, शिवकान्त चन्द्रप्रम साफर प्रम, प्रमनाय, अशोक, पीतशोक, अपराचित, गंगोदक, मसारगड, हसगर्म, पुतिक, सौगविक, सुमग, ठपुर फेस विरचित - सौमायकर, विपहर, भूतिकर, पुष्टिकर, सहर, चन, म्योतिरस, मुमापि, शूलमणि, घंझुकाति, देवानन्द, रिपरत, कीटपंस, कसाउमा, पूमाइ, गोमूत्र, गोमेद, असणीया, नीग, वणघर, सगरम, पसघार, पटोण, कणी, पापरी, पिरोया, प्रबामा, मौधिक। उपर्युक पालिका के बम्पयन से इस बात का पता चलता है कि प्रेकर ने उसमें रखो और उपरनों के सिमाप उनके मेद, गुण, दोष इमावि की मी गिनती कर की है। जैसे पपराग, माणिक, सीरिया और सागधिक मानक के भेद है। मरकत के भेद में री गरुडोदार, मणि, मरकस, घूमराह और पीटर्पस मा मासे हैं। स्फटिक के मेदों में चन्द्रकांत, मश्कात, शिवकांत, चन्द्रप्रम, साकरप्रम, प्रमानाय, गंगोदक, सगर्म, फसाउळा (कापाय) वा बासे हैं। पुरराम, कसन, पत्र, पैर्य, वशोक, पीतशोक, पुलक, मंचन, भ्योसिरस, मधुकानि, मसारगछ, रिटरत, गोमूत्र, गोमेद, मसनिया, मीना, पिरोचा, मोती, मंगा अम्ग अलग रह या उपरत है। अपराजित, सुभग, सौभाम्पकर, विपार, पतिकर, पुतिकर, शत्रुहर, देवानन्द, खणघर, रनों के गुण से सम्बन्ध रहे है। पापार, पटोम, कर्मी और पापी रखों की बनावट से सम्बन्धित है। यहाँ पौद और मैन शाखों में भाई रखों की सालिकामों की बोर भी ध्यान दिना देना वावश्यक माठ्म होता है । पुष्पग (९।१५) में मुता, मणि, वेदरिय, शस, शिला, पगाल, रजत, बातरूप, मेहितक और मसारगष्ठ के नाम वाए है। मिचिन्द्र प्रम (१० ११८) में (दमील, महानीम, चोतिरस, बेलप्रिय, उम्मापुष्फ, सिरीस पुप्फ, मनोहर, सरियकत, चटकत, पा, कमोपमक, फुस्सरग, छोहितक मौर मसारगल के नाम बाए है। मुसाती म्पूर (५६) में मार्य, स्फटिक, सवर्ण, रूप, कमगर्म, लोहितिका मौर मुसारगन नाम आए हैं। रिम्यावदान में रनों की दो तालिका है। एक में (पृ० ५१) मुळा, वैर्म, स्न, शिन्ग, प्रबागक, रमप्त, जातरूप, वगर्म, मुसारगण, सोहितिका और दक्षिणावर्त के नाम है, वौर दूसरीमें (०६७) पुप्पराग, पमराग, वन, बैर्य, मुसारगष्ठ, लोहिसिका, दक्षिणावर्त बांस, शिला बोर प्रवास के नाम है। चैन प्रापना सूत्र (भगवान दास हर्षचन्द्र द्वारा भक्ति १, प० ७७, ७८ ) में बर, नग (मेवण ), पयाम गोमेन, रुषक, मंक, पलिए, मोहियास मरफ्य, मसRगठ, मुपमोपग, इंदनील, इसगम्म, पुरफ, सौगषिक, पानाम, बैर्य, समति मोर सूर्यकांत के नाम वाए है । मुभाग की साम्रा में शिग से शायद स्फरिक से मतलब है । मिलिंद प्रम की तामिका में सम्मपुष्फ से शायद जमुनिया का शिरीप्पुपक से (अ० शा० २।११।२९) शापद किसी तरह के गर्य का बोष होता है। मोपमा से शायद चिन्तामणि रत की ओर इशारा है जो सब काम पूरा करता पा । वराहमिहिर का (वृ० सं० ८०५५) प्राममणि भी शायद चिन्तामणि की । एयावती म्यूह के वसगर्म से शायद फो का मासम हो (अमरकोश २।९।९२ )। . .
- रमपरीक्षा का परिचय प्रज्ञापमासूत्र में मुयगमोषक से शायद पहर मुहरे का वर सगम से किसी तरह के स्फटिक का दोष होता है। अपंशाम (२११९२९) में जैस्म हम पहले देस बाए बनेक रत्नों के उछेस हैं। इनमें मोती, हीरा पनराग, सूर्य, पुप्पराग, गोमदक, मीम्म, चन्द्रकान्त और सूर्यकान्त इस्मादि रस्नों की श्रेणीमें भा पाते हैं। कौर, मौसेयक और पारसमुद्रक से भणियों के उत्पत्ति स्वान का बोध होता है। पर्वत का तो पता नहीं पर मौलेपक रन का नाम शायद मचिस्तान में मालावन में बहनेवाली मूसानी से पका हो (मोतीचन्द्र जे० यू० पी० एच० एस० १७ मा० १, पृ० ६३) लगता है कि प्राचीन साहिम में रत्नों की तालिका देने की कुछ रीति सी पठ गई पी। तमिळ के सुप्रसिद्ध काम्य (शिळप्पदिकारम् में मी एक बगह रमों का उस भाग्य है (शिसप्पविकारम् ११११८०-२०० श्री दीक्षितामारा अंग्रेजी अनुपाद, मखास १९३९) मयुरै में घूमता भामता कोवरन औररी बाजार में पांचा । यहाँ उसने घार वर्ग के निर्दोष हीरे, मरकत, पराग, माणिस्प, मीबिंदू, स्कटिक, पुष्पराग, गोमंदक वो मोसी देखे। । प्राम रानशाओं में ( बगखिम्त १, ६३पुरमा ११ का पाठमेव ) रत्नों की परस बाठ तरह से, यपा-(१) उत्पत्ति (२) आकर (३) वर्ण अपना मया (१) पाति (५) गुण-दोष (६) फा (७) मल्म बौर (८) लियाति (नक्छ) के आपार पर, की गई है। इस का विस्तार नीचे दिया जाता है। (१) उत्पधि-यही उत्पचि से रनों की वास्तविक अपना पारलौकिक उत्पति से स्पत्पर्य है। रत्नों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में प्राय सब शामों का मत है कि एक पाहत असर से पैदा हए । पुरमा (२ १२) के अनुसार एक पराक्रमी त्रिलोक सिता दानर राज बलि पा । एक समय उसने एन को जीत म्यिा । सुठी मराई में उससे पार म पा सकने के कारण देवताओं ने उससे या में बलि-पशु स्मने का पर मांगा । उसके एनमस्तु कहने पर सौत्रामणि या में देवतावों ने उसे स्टेम से बांध दिया । उसकी विनर नाति और कर्म से उसके शरीर के सारे अवयव रनों में परिणत हो गए। ऐसा होने पर देव और मागों में यह सिर रत्नों के लिए छीनामपटी होने सगी । इस छीनाझपटी में समुद्र, नदी, पर्वत, बन इमादि में रान गिर कर भाकर रूप में परिवर्तित हो गए । इन एनों से राक्षस, Aप, सर्प बोर म्याधिों से तपा पापलम में मन्म तथा दुनि से रक्षा होती है । वगतिमत (१-९) में मी कहानी का यही रूप है। फेस फरफ इतना है कि पा में वसुर के सिर पर इन्द्र ने पन मारा भौर पाहत सिर से ही रनों की सपिई। उसके मि से प्राधण, मुगामों से क्षत्रिय, मामि से । 1 , हर फेस विरचित वैश्य और पैरों से सुन रत्नों की उत्पत्ति हुई । नवरत्न परीक्षा (८ से) में देम का माम वा दिया गया है। वज्रासुर को हराने के लिए एम्स ने उससे उसके शरीरदान का पर मंगा । माधम पेषधारी इन्द्र की प्रार्थना सीकार कर लेने पर यह मान कर कि उसका शरीर बमेष, इम्म ने उसके मस्तक पर पत्र से प्रहार किया। उसके शरीर से सरह तय के रस्न निकले । देव, नाग, सिद, यक्ष, राक्षस बौर किमाने वो परस्म पास प्राण कर लिया, बाकी रन पृप्वी पर फैल गए। समस्कुर फेर (६--१९) की रनोत्पत्ति सम्बन्धी अनुभुति का रूप मी पुरमा पाली मनमुति वैसा है। एक दिन असुर बलि इम्ब्रोक को बीतने गया । पर्छ देवातवों ने उससे या-पशु बनने की प्रार्थना की बिसे उसने सीकार कर लिया । उसकी हधियों से हीरे, दांतों से मोती, से माणिक, पिच से पमा, भासों से नीलम, पर रस से पर्य, मना से कर्केतन, नसों से मसनिया, मेद से स्फटिक, मांस से मूंगा, बम से पुसरान सपा वीर्य से मीष्म पैदा हुए । बसर क्त के शरीर से निकले रानों में से सूर्य ने पपरग, चन्द्र मे मोती, मंगम ने मूंगा, पुर ने पम्मा, प्रास्पति ने पुचराग, एक ने करा, शनि ने नीलम, रा ने गोमेद और केतुने मूर्य प्राण कर लिए और इसलिए इम रस्नों को धारण करने पाले उपर्युक ग्रहों से पीला मी पाते। चोखे रत्न शरिदायक और सदोष रन दरिद्रता देने वाले होते हैं। पर रस्मों की उत्पति के सम्बन्ध में उपर्पज मत ही प्रचलित नहीं था, इसका निराकरण बराहमिहिर (८०१३) ने कर दिया है। उनके अनुसार एक मत से देमवस से उत्पन्न हुए, इसरों का कामा है कि पौनि से । कुछ इस मत के हैं कि उनकी उत्पत्ति पत्परों के समापविश्य से है। ठक्कुर फेह (१२) के अनुसार मी कुछ बोग ऐसे थे जिनका मत पा कि रन पप्पी के प्रकार है। जैसे सोना, चांदी, वांबा मादि घात से ही रान मौ । एक दूसरे विश्वास के अनुसार मनुष्प, सर्प तपा मेंक के सर में मणि ती पी (वगस्विमत, ६३-६७) परममिहिर, (८५-५)के अनुसार सर्पमणि गहरे नीले रंग की वीर बगी धमकदार ती थी। (२) आकर-रानों की सान को पाकर कहा गया है। पराहमिहिर ( ८०-१७) के बनुसार मदी, सान और छिटफुट मिडने की जगह वाकर । रमा (१०) ने माफरों में समर, मही, पर्वत और बंगम गिनाए है। (३) वर्ष, छाया-प्राचीन प्रयों में रत्नों के रंग को आया कहा गया है। पर बाद के शामों में वर्ग के लिए छापा शप का म्यगार मा । बाधा शासकार रनों को ज्या की उपम्य पानी परचानी परतों से देते हैं।
। रापरीक्षा का परिचय (४) बाति-नशाओं में इस शम्द झा तीन वर्षों में प्रयोग पूजा है। पमा बसली रस्न, रत्न की किस्म भार भाति । मंतिम विमास के अनुसार रस्नों में भी चातिमेद एता पा । यह विपास शायद पहिले पहल परे तक ही सीमित पा । इसके अनुसार मायण को सफेद मिरा, क्षत्रिय को बगळ, पैश्य को पाला और शुद को कारण पर पहनने का विधान पा । माद में यह लियास भोर रनों के सम्बन्ध में भी प्रचलित हो गया। (५) गुण, दोप-रत्नों के सम्बध में इन शम्दों का प्रयोग उनकी सुस्ता पौर चमत्कार कर इषा है । पहिले वर्ष में वे रन के गुण और दोप परक है । इसरे वर्ष में ये रत्न के पुरे और मने प्रभाव के पोतक है। रस्नों के गुण निमलिमित है-महचा (मारीपन) गुरुस्म, गौरव (धनत्र) काठिन्य, खिग्भसा, राग-रंग, बाब (मचिम्, पुति कति, प्रमाव ) और सछता । (६) फल-समी ररमों के फल की विवेचना की गई है। नन्छे ररुन सास्प्प, गजीवन, पन और गौरष देने वाले, सर्प, नंगठी नामपर, पानी, बाग, विनम्ी, बोट, बिमारी इत्यादि से मुक्ति देनेवाले तया मैत्री कायम रसने वाले माने गए हैं। उसी वर राम रान दुस देनेवाले माने गए हैं। यह मान देने योग्य बात है कि रस्मों के बीमारी षष्ठा करने के गुणों का रस शाखों में उल्लेख नहीं है। रहों के फणे की जांच परताय से यह भी पता चलता है वि उनके किसने में दिमागे कसरत को अधिक प्रमय दिया गया है। पर इसमें संदेह नहीं कि शासकारों ने रम-फल के सम्पाप में गोकपिचासों की भी चर्चा कर दी। मिरे का गर्मजावक फल और पमे का सर्पविष को राना इसी कोटि के विपास है। (७) रसों के मस्य-उनके तीन भौर प्रमाण पर बाधित होते थे। प्राचीन ग्रंथों में खों का माप रूपकों और कार्पापों में निर्धारित किया गया है। यह पता नीं घटता कि रनों का मूल्य सोना अपना चोदी के सिक्षों में निर्धारित होता पा पर कार्पापणके उलेस से इनका नाम पारीके सिको में मारम परता है। अगस्विमत के एक क्षेपक (१२) से पता चलता है कि गोमेद और मूंगे का दाग चारी के सिकों में होता था, सपा पूर्य और मामिक का सोने के सिकों में। ठपरफेक (१३७) ने मरे हीरे, मोती, मानिक और पमे का मुत्य ममि बतलाया है। वाघे मासे से चार मासे तक के साल, सामुनिया, इबनील और फिरोमा के दाम मी सर्णमुद्राओं में होते थे (१२१ १२३) एक यक में १० से १०० क पन्ने बारे विहां पहात मानीय किस्म पर प्रमों में परिपत रोगाने प्रयास कि १८r 1 ५५५-५६ ) ईरानियों प्र मी न ऐसा ही AIY का भार एस ११ १२-११) ।
हपुर फेश विरचित मोतियों का दाम रुप्प टंकों में होता था (१२१ १२६)। उसी तर एक खी में १ से २ पान चढ़ने वाले हीरे का मत्प मी चांदी के टको में कहा गया है (१२७,२८)। गोमेद, स्फटिक, माम, कर्केसन, पुसराब, बेर्यनन सबके मूल्प मी इम्म में होते पे (१३०)। मानसोडास (१, ०५७-१६१) में रहा तोम्ने की तुला का सुंदर वर्णन है। उसके छापात्र फासे के बने होते थे। उनमें चार छेद होते थे। बिनसे गेरिया पिणे जाती दी । कांसे की दारी १२ मेगुरु की होती थी। मिसके दोनों मगर मुद्रिकाएँ होती थी। दारी के ठीक बीचोबीच पांच अंगुल का कोटा होता पा। निसका एक बंगुठ छेद में फसा रिया जाता था। कांटे के दोनों मोर तोरण की वाति बनाई जाती पी। पिसके सिर पर कुआली होती थी। उसी में गेरी लगती थी। सराम् साधने के लिए एक कम तौल का माल एक परमे में और पानी दूसरे पम्ने में मरा बाचा पा । पन कोटा तोरण के ठीक बीच में बैठ नाता पा तो तर सघ गई मानी जाती थी। (८) विवाति-नस शब्द से कृत्रिम रनों का तपा कीमती रत्नों की तरह दिखने पाले उपरत्नों से वमिप्राम है। ऐसे नकली रत्न मारत और सिहल में गतायत से बनते पे । नवरत्न परीक्षा (१७१-१८३) के अनुसार सम माग बले शंस और सिंदूर को सप. प्रसूता गाय के दूध में सान कर फिर उसे वन से बांध कर बांस में मर कर, मिट्टी के बरतन में चावट के साप पका कर फिर उसे निकाल कर धीमी आंच पर रख देते थे, फिर उसे देख में बोरते थे। इससे बांस के मातर नकली मंगा बन जाता पा। इन्द्रनील बनाने के लिए एक कुप्पे में एक पल मीम का पूर्ण और दो पछ शस का पूर्ण मिलाकर सूर दिमाते थे। फिर लोक विधि से मकली इम्बनीम ममा लेते थे। मकली मरकत बमाने के लिए मंगोठ, ईगुर और नीट सममाग में लेकर उसे शीशे की कुप्पी में सूब मिलाते थे। फिर ठमके रखे नम करके उमें बाग में पकाया जाता पा । मानिक पास के पूर्ण बौर ईगुर के मेल से उपर्युक लिमि से बनता पा । ४ इस प्रकरण में रस्न-परीक्षाओं के आधार पर उममें माए रनों के उपर्युछ बाठ मिशेषतामों की बाध परताय करके यह बताने का प्रयत्न किया गया है कि ठकुर फेल ने अपनी रस्नपरोया में कहा कि प्राचीनता का उपयोग किया है और कहा उसने एन सम्बन्धी अपने अनुभवों का । हीरा-नीरा रस्मों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। उसकी विशेषता पाए कि यह सप रहनों को काट सकता है उसे कोई रन नहीं काट सकता । प्राय सब शामों के नु- सार हीरे की उत्पति बसरमम की हीयों से गई। उसमय माम वह इसलिए पका कि इम्र से बनाईत होने पर ही मर निकला ।
रमपरीक्षा का परिचय प्रपान रानशास परेकी साने आठ मा वस मानते हैं । पर कौटिस (मनुवाद, पृ० ७८) में हीरे को सानों के कुछ दूसरे ही नाम है । यपा, समाराष्ट्रक (विदर्भ या वरार में ) मम्पम रायक (कोसन यानी दक्षिण कोसळ में ) काश्मक (शायद परमक) [दरावाद की गोइंग की सान ] इम्बानक (कलिंग, बोरीसा) की तो पहचान टीकाकारों ने की है। कास्मक की पहचान टीकाकर ने बनारसी हीरे से की। चिससे बनारस का हीरे तराशीका मा होने की भोर संकेत हो सकता है। श्रीफ्टनक हीरा पेदोत्कट पर्वत में मिलता पा । श्रीक्टनक का ठीक पता नहीं चलता पर शायद इससे, पनकटक (धरणीकोट ) जो प्राधीम बमरावती का माम था, वोध होता है । अगर यह पहचान ठीक है तो यह रुष्णानदी की घाटी में मिलनेवाले पिरों की ओर कित हो सकता है। मणिमन्तक पिरा मणिमत् अपवा मणिमंत पर्वत के पास पाया जाता था। इस मणिमत् पर्वत की पहचान श्रीपानिटर ने (मार्कलेय पुराण, पृ० १७०) में कश्मीर के दक्षिण की पहारियों से की है । यहां बस य मिलनेका पता न ममता । रस्नधानों में दी गई मरे की सानों का पता निम्नलिठित तालिका से घछ जाएगा मुखमा वराहमिहिर गतिमत मानसोखास अगस्त्रीय रत्न-संग्रा मकर फेह रस्नपरीक्षा राष्ट्र हेमंत हिमाछप हिमता माग पंग मगम मातंग पौर पैडर (पौर) कोशल देण्यातट विमातट येणु मेरागर + मारव वेणु सूर सौपर सोपारक यहाँ यह निश्चित कर सेना कटिम है कि उपर्युक्त पत्र में किसने भौगोलिक माम पास्तविकता लिए हए है और कितने काल्पनिक है । पर इसमें संदेह नहीं की मंत्र में सानों और गामारों के नाम मिल गए हैं। यह भी समय कि बहुत सी प्राचीन साने समाप्त हो गई और उनकी साई मत प्रामीण काम में द कर 0 गाए। मुराष्ट्र यानी आधुनिक सौप में हीरे की किसी सान का पता नहीं चलता पर यह समय म पाहा से एन बाहर मेमे जाते हैं। यहाँ एक रोसनीय बात यह है कि प्राचीन साहिम में वैसे माहामिरेस और बमुदवहिणी में राष्ट्र एक बंदर का नाम मी बाया है जो शायद सोमनाप पाम हो । यही बात सूरिक यानी बबई के पास सोपारा बंदरगाह के बारे में मी कही जा सकती है। मार्यरर की मातकमाला में सो इस घर में रनों छाए जाने का उल्लेख मौ है । हिमालय में हीरे का होना तो उस मनुष्ठि का पोतक है जिसके अनुसार मेरू, हिमालय और समुद्र रानों के बाहर माने गए हैं। पर मात मातग + ठपुर फेस विरचित ठीक है कि शिमग के पास कुछ मरे मिले थे पर हिमामय में हीरे की साम होने का पता नही घन्ता । मातंग से यहाँ किस प्रदेश से वात्पर्य है इसका मी ठीक पता नहीं चरुता । मी फिनो (० २६) चालायरान मंगमेश के एक लेख के वाधार पर मातंगों का निवास स्थान गोसफुग का प्रदेश सिर करते हैं। हरिषेण (पहत्कयाकोश ७५/१-३) के अमुसार मातंग पोम्म देश तपा उसके उत्तर में पर्यत की संषि पर राते थे। शायद यहाँ सेलम जिले के चीवर पर्यत मेणी से मतब्य पर यहां से का पता महीं चला है । पौष्ट्र देश से माम्दा, कोसी के पूर्व पुर्निया जिले का कुछ माग सपा दोनारपुर और राजशाही मिले के कुछ माग का बोध होता है। तथा पोसूपर्धन से योगय जिले के महास्थान से मतलब है। शायद कम्गि के परे से पलपा, पेगरी, कर्नूल, कृष्णा, गोदावरी इस्मादि के सपा समसपुर के पास पक्षणी, संक, तमा दक्षिणी कोपर मदियों से मिल्ने बाले हीरे से है। जहांगीर युग की सोसरा की परे की मान भी इस बात की पुधी करती है। यहाँगीर ने सय वपने एज्य के दसवें वर्ष के विवरण (उनक, ममिनी अनुपाद, मा० १, ३१६) में इस बात का सकेस किया है कि बिहार के सूबेदार हासिम पाने सोखरा को फतह करके वह के परे की सान पर फम्मा कर रिम्पा । परे पर की एक नदी से निकराते थे। इसमें संदेह नहीं कि कोसा से यहाँ दक्षिण कोसम से मतप है। जिसकी पहचान बाधुनिक महाकोस से है। वायद वैरागर और गातर या वेणु के हीरे कौसल के जतर्गत वा नाते हैं। पेमा नई पो भाग कर की बेन गंगा है चौदा मिले से होकर जाती है और उसी पर स्थित पेरागढ़ में हीरे मिलते हैं। मानसोल्लास के रामर (सं० बजाकर) की पहचान इसी भैराग से ठीक उतर जाती है। शायद यस स्थान पीनी यात्रियोंका कोस्सठ भौर टाल्मी का कौसष्ठ रहा हो। बगतीय रनपरीक्षा में पाए मगप से मी शायद छोग नागपुर की मानों का गोषोता है। - रखशामों में हरे के वनेक रंग बताए गए हैं। इनके नुसार पुराए का हीरा काय, हिमाम्य का मैसा, माग का पीग, पद का भूरा, फगिका सुनहरा, कोसल का सिरीस के मन के रंगवाण येणा, का चन्द्र की सरह सफेद, सवा पारा का सफेद घेता पा। टमुर फेस (२२) ने परे का रंग तमैग, सफेद मीमा, मटमैला, हरताल की तय पीग, तपा सिस के पैसा बतलाया है। पे रंग सान-परक पे । हीरे के बों की वोर मा ध्यान वारुप लिया गया है। सफेद मामण, पाम त्रिप, पीला रस और काला पर पहनने का अधिकमी पा । पर राया को चारों वर्ण के हीरे पानने पर वधिकार पा । पर बाद के लेसकों ने सफे, काल, पीले और काले हीरे को है अमक्षा बामण अप्रिप, वैश्य वौर घडू नाति में बांट दिया है। स्कुर फेन (२६) मी इसी मतके है। उनकी राप में सफेर चोखा रा मालवी भात मावे का करता था।
रखपरीक्षा परिचय चिनके घरों में निदोष मरे होते हैं उनकी लिन, अकाल मृत्यु धौर शत्रुमय से रखा होती है। और पीले मरे पहनने से रामा को विनयभी हाप बगवी पी पुस्स उपम्पाते हीरे में भूत, प्रेत, एस, मंदिर, इवधनुप इलादि देख सकते थे (३०)। हीरे का भारमिक रूप अठपहा होता पा और हीरे के इसी बाकार को रक- शादों में सबसे अच्छा माना है। प्राचीन रनशानों के अनुसार बन्छे हीरे में, या वर कोण, बारा धाराए, बाठ दर, पार्थ या मंग कहे गए है। मेरे की पोटी को कोरि, तल को विभानित करने वाली रेसा को बम, चोटी की उठान को उद्ग, तमा नुकीली लिमासक रेसाों को तीक्ष्म करते थे। तौर में कम, सपा, शुद्ध वीर निर्मक मौर मास्कर-पे हीरे के गुण माने गए हैं। माकुर फेस (२१) ने परे के माठ गुण कई -सम फरक, उप कोणी, तीक्ष्ण धारा, पानी (पारितक), वा, सम्बस, वदोष मोर म्मुतोउ । पशाचों में परे के वनेक दोप मी उष्ठिसित है। जिनमें ट्टी घोटी या पहले, एक की नगर दो कोण, दम रीनप्ता, मर्तब्ता, दहीनता, चपटापन, बोदरपन, मारीपन, धुम्मुगपना, बोर कतिहीनता मुख्य हैं । समकुर फेस (२५) ने नौ दोष यपा- काकपद, किंतुर (टा) रेखा, मैलापन, निकट, एक अंगता, वर्तुमता, बोका भाकार, तया फन नपा वषिक कोण बताया है। उसके अनुसार (११२२)भमन्स पोली वीसी पारा पुत्रापा सियों के लिए हानिकर पी । पर इसके विपरीत निपटा, मलिन वार तिकोमा मेरा रमणियों को इसलिए पुस कर होता पा कि पुत्ररतों की चननी होनेसे में अपने को प्रपम रस मानती थी, मग फिर उनका सदोष रस स्पा कर सकवा पा। मेरे का मृदप प्राचीन रत्नशामों में सौल के वापार पर निभित किया जाता पा। इस सम्बन्ध में दो मस पे एक मुरमा धीर वराहमिहिर का मोर सरावगतिमत का । पहिली म्यवस्था में तोड नाम और सर्पप (१ हम = ८ सर्पप ) में थी सपा मन्य रूपों में रे की सबसे बधिक तौर पौस तहुल बौर दाम दो मास रूपक निस्ति की गई थी। सौल के इस कामे हर पटाप या पसाब दो कारों के परामर होता था । २० तैम के हरे का दाम दो मास पा वोर एक संप के हीरे का एक इगर । देखने में स्पे पा हिसाब सौपा सापा माराम परवा है, पर श्री फिमोने हिसाब सगा कर बताया है कि २० तास पानी धार फेर के हीरे का राम इस रीति से बात परिक बैठ पाता है। भगतिमत के बनुसार तौल्प बोर सोस्प के वापार पर पिर से हरे का दाम निषित किया जाता । पिरका माप १ पत्र सौत्स चौर १० वौत्स मानम्पिा गया है। इस तर एक सिके हीरे का दाम ५०, दो का ५० गुणा , पार का ३ ठहर फेक विरचित ५० गुणा १२, पांच का ५० गुणा १६ इस तर मवे मते २० पिरका दाम २८०० पहुंच पाता है। पर इस मुत्पांकन में एक पनप के झरे बाते है। उनके के होने पर उनका दाम पर पाता पा सपा मारी होने पर घर माता पा। इस तर एक एक पिंट के पनत्व का होवे एमी १४ हम्के होने पर उसघ दाम वयह गुना होता था, १२ हम्के होने पर तीस गुना वपा ११ इसके होने पर सत्तर गुना हो जाता पा । इसी तरह एक मय एक पिर का पनप होने पर मी मारी हो तो उसका दाम ११४ मारी होने पर बाघा से पाएगा इमादि । भी फिनो की एप में बगखिमत का में मूस्याक्त पास्ततिक माझम परता है। ठहर फेरने परे का मूल्यांकन वाम देकर मोती, मालिक और पमे के साप दिया है। पर हीरे का मृत्य निर्धारण करते सम्म उसे जगनिमत का प्पान मस्प या होगा। उसके अनुसार (२६) समपिर परे का भारी होने पर कम दाम और पार साम्के होने पर पादा दाम होतापा। बगाउद्दीन के समय चौहरियों की तौक का वर्णन गुर फेस ने इस माह से - १ सरसों . ६ सरसों - १ टोक २ राई १ त २४ १बी १५ भुष या गुंगा (रची) १ मासा ९ मासा टाक के उपर्पत तौल में कई बातें उछेसमीप ।। श्री नेम्सन एट (रिकॉपम्स एर भेट्रालोली माफ R मुस्ताम्स् वाफ देशली, पृ० ३९१ से) ने अपनी ओर से यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि मुम्तान युगके टोक में ९५ रचियां ऐती दी। रची का बमम १०८ फेन मान कर उन्होंने टांक की तौह १.२ प्रेन निर्धारित की है। पर ठहर फेस के हिसाब से तो २९ रची १ क पानी १७२८ प्रेन के बराबर गई पानी एक रची का बबन कर ६२५ प्रेन के करीब मामा यहाँ प्रय नठता है कि गुना से या सापारण गुणा का मद्य यह कोई ठोस पी विसका बसम मापुनिक रचीसे करीब करीब पांचगुमा वषिक पा । ठपुर फेस (१११) ने सर्य इस बात को सीकार किया है कि रमों का भूत्प चा रवा न ऐकर मपनी नबर पर वर्गमित होता है, फिर भी बलातरीन के एमप स्नों के यो राम पे उनकी तौके साथ उसने पर्गम किया है वौर पर भी पताण है की चार रन यामी रा, मोती, मानिक और पने का दाम लेने के देने में मापा पपरीक्षा का परिचय पाता पा । इम रनों की बड़ी से बरी सौळ एक टोक और कमेटी तीर एक गुंजा मान गई है। पर एक टोक में १० से १०० तक पानेवाले मोती तपा एक गुंगा में १ से १२ पान कक पानेवाले मेरे का मूल्य धांदी के यफ में होता था। उपर्युक रत्नों के तौर और मत्स दो येत्रों में समझाए गए है- कीमती रान सम्बन्धी मंत्र- १८ गा" RRE. "११५ हीरा ५/१२/२३५५११६२४२४ 14 २८ ५१ ११२ Rk१५/१५ Y१६ । - १२ १४ x ५ - 10 " १५१ २. मोठी माबिर पचा 10/10 उपर्युक पन की जांच से कई बातों का पता भगवा है। सबसे पाय बात तो पर कि मादीन के काल में और मुर्गों की तरह हीरे की कीमत सम रनों से पक्कि पी । परा से पैसे तौर में बढ़ता जाता पा उसी अनुपात में उसकी कीमत पवी नाती पी । बाद रची तक वो उसका दाम क्रमशः बढता पा पर उसके बाद हर तीन रती के वचन पर उसका दाम दुगना हो पाता पा । बगर बादी बौर सोने का अनुपात १० १ म्ान लिपा गाय सो एक टोक के परे का माप १,२०००० चारी के एक के बराबर होता था । इसके विपरीत एक टोक के मोती का मस्य २००० वोर मानिक का २५०० सुवर्ण टंका था । पमे का दाम तो शुत से कम पानी एक टंक के पये का दाम ६० पुवर्ण टका मा । छोटे मोती और हीरों के तौर पर दाम का पत्र- मोवाकचर -- 1-1 R bf 410 - उपर्यत पत्र से यह पता नम्ता है कि मोती और हीरे नितने अधिक एक टोक में घटते थे उतना ही उनका दाम कम होता जाता था वौर इसीलिए उनका दाम सोने के टीकों में न गाया माकर पशि के टांको में उगाया पावापा। रस शाओं के अनुसार नफाटी हीरा लोह पुसराम, गोमे, स्फटिक, बैर्य और पाशे से बनता पा । र फेस (२७) ने मी रही पसाओं को नकार्य हीरा बनाने के काम में गाने का उलेख किया है। नकी हीरे की पहचान बम्स तया दूसरे पत्प के काग्ने की शक्ति से होती थी। ठहर फेस (१८)रे अनुसार नकली हीरा बसम में भाग, पदी विमनेशला, पत्ती पार वा सपा सरन्यतापूर्वक मिस मानेवासा होता पा।
२० भर फेस विरचित मोती-महारों में मोती का मगर दूसरा है। भारतीयों को शायद इस रसका गत प्राचीनकाल से पता पा । मोवी को घिसे पैदिक साहिम में मशन कहा गया है, सबसे पाना उपवेद (११३५५१,१०६८।१ ) में बाता है। वर्ववेद में पाय, पाकाश, विनधी, प्रकाश तपा सुवर्ण, शंख बौर मोदी से रक्षा की प्रार्थना की गई है। पंस और मोती राक्षों, राक्षसियों और बीमारियों से रक्षा करने वाले माने पावे पे । मनकी उत्पत्ति आकाश, समुद्र, सोना सभा सत्र से मानी गई है। रख्नशामों के अनुसार मोतीके माठ स्रोत-यमा सीप, शंस, पादन, मकर धार सर्प का सिर, सूबर की दाल, हापी का कुंमस्सल तथा बांस की पोर माने गए है। या निवास भी पा कि साती की मूंदें सौपियों में परकर मोती हो पाती पी । मरद के दांतों से भी मोती बनने का उठेस पाता है। मोती के उत्पति सम्बन्धी उपर्युफ विभासों की गांप पस्ताम से पता पसा है कि अपवेद पाये गनुश्रुति से उनका सासा सम्बन्ध है। उसके मात्रमात मानने से मुरबल माली बनुश्रुति की बोर प्पान जाता है। इस तरह हम देख सकते है कि मोती सम्बन्धी प्राचीन विभासों की बर मैदिक युग तक पाच जाती है। प्यार फेह ने मी मोती के उत्पधिस्मान, रत्नशाओं की तरह को है। उसके अनुसार सिम्य मोती भेटे, सफेद सपा गम होते हैं और उनमें मंगळ का भावास होता है । मन्छ से उत्पम मोती काग, गोल दवा हम्का होता है और उसके पहनने से धनु और मूत प्रेतों से रक्षा होती है । वास में पैदा मोती गुने के इवने गोवा राब देनेवाले होते हैं । सूबर की दाल से पैदा मोती गोड चिकना और सासू के फल इतना मरा होता है। उसको पहननेवाण अमेय हो पाता है। सांप से निकला मोती मीण तपा हगपची इतना सा होता है। उसके पहनने से सोपवन, विष, तमा निमी से रक्षा होती है। बाद में पैदा मोती तो देवता पृथ्वी पर जाने से नहीं देते, गिरने के पहिले ही उनें रोक मेते है। पितामणि मोती बाबो बरसवे पाणी की एक भूत हवा से सूस कर मोती हो पाय | सौप के मोती छोटे और मम्यान है। एनशाबों में मोती के गाकरों की संख्या मित्र मिश्र । एक अनुमति के अनुसार बाठ वापर है तो दूसरी के अनुसार चार । नशात (२।११।२९) के अनुसार ताम्रपर्णा से निकलनेवाले मोती सानपर्णिक, पम्पिकलाट से पम्पिकवाटक, पाश से पाशिम्प, कुछ से कोम्प, पूर्ण से चौर्ण, महेन्द्र से माहेन्द्र, कार्दम से कामिक, मोतति से प्रतिसीप, बद से हीय भौर हिमवत् से हैमवतीय । उपर्युक तालिका में ताम्रपणिक और पापकबाटक तो निमम मनार की साती के मोती के पोतक हैं। ताम्रपर्ण से यहां ताम्रपर्णी नदी का तात्पर्य माना गया है। पामबाट मपुरै यो मोती का म्यापार सूट चमवा वा । पाश्च से शायद फारस का मतम रापरीक्षा का परिचय २१ है। पूर्ण को टीकाकार ने मेरम में मुचिरिके पास एक गांव माना है। पर गांव शायर तामिळ साहिस का मुचिरि गौर पेरिप्लस (साफ, पहि, पृ.२०५) का मुनिरिस मा निसकी पहचान केंगनोर में मुपिरिको से की जाती है । मुचिरिस ईसा की नारंभिक सदियों में एक या दर पावोर वान संभव है कि यहां मोती माने से किसी मदी के नाम के नापार पर म्मेवी का चौर्णेय नाम पर गया हो । टीका के अनुसार कोप मोती का नाम सिंह की किसी न नदी के नाम पर पड़ा, पर विचार करने से यह मात ठीक नहीं मालम परती । कूल से पेरिप्लस (५९) के प्रेस्चि तपा शिसप्पविकारम् (पृ० २०२) के कारकै से वोध होता है नो मोतियों के लिए प्रसिद पा । परिप्स के समय में यह पाप देश का एक प्रसिद्ध बंदरगाह था। पर ताम्ररिसी नदी द्वारा बंदर के मर जाने पर बदरगाह वहां से पांच मील दूर हटकर कायठ में पांच गया । माहेन्द्रक, कार्दमक, हादीप और प्रीतसीप का ठीक पता नहीं चमता । टीकाकार के मनुसार कार्दम ईरान और स्रोतसी बर्वर देश में नदिया और द वर्वर देश में दह पा । इम सकेतों में बो भी तम्य हो पर यह टीकाकार का फारस की साडी भार पर्नर देश से मोती पाने की ओर किस भमश्य है। हिमालय तो सब रस्नों का घर माना ही जाता था। बराह मिहिर ८१३२ के अनुसार सिंहल, पलोक, मरापू , साम्रपर्मी, पार्थवास, कोकेरवार, पास्पबाट बार हिमालप में मोती होवे मे। सिंहल-मनार की सारी मोती के लिए प्रसिद्ध है। या साठी १५ से १५० मीठ चोरी हिन्द महासागर की एक वाई ।। मोती के सीप सिंह के उच्चर पपिमतिट से सट कर सपा दीकोरिन के भासपास मिलते हैं। मोतियों के इस मोत का उल्लेस प्मिी (९५१-८) पेरिस (२५,३६,५९,५९), मार्कोपोलो (वि मुक बाफ सेर माफोगे, मा०२, पृ०२६७, २६८) प्रापर गानस (मराविलिया रिसक्रिप्टा, हरयेत सोसाइटी, १८५३, पृ०६३) लिनशोटेन ( योयन माफ लिनशोटेन, हस्स्येत सोसाटी, १८८१, मा०२ पृ०१३-१३५) इत्यादि करते है। परलोक-इसी को शायद टार फेह ने रामावोक का है। इस प्रदेहा का ठीक ठीक पता नहीं पता पर यह प्यान देने योग्य बात है कि मायाछ में भरर भौगो- लिक पेगू को अमादेन करते थे। घरमा के समुद्रतट मे कुछ दूर मे ईदीप समूह के समन में अय मी मोती मिरहे हैं। रामा से पेम् पहचान की जा सकती है। पहा संग लोग मोती निकटते है । मुराष्ट्र कट के रनके दखिन में, नवानगर के समुद्र तट के लागे गोधावदर के पास, मगरा से कह की साड़ी में पिरेरा तफ, नामद, चोक, करवार और मारा क ीपों के बामपास मी मोती मिळठे है (सी० एफ० कुल मार सी० एम० स्टिवेसन, दि पुफ भाग पन, पृ० १२२, छान १.०८)।
શર पर फेर विरचित - साम्रपणी-वैसा हम ऊपर का वाए। यहाँ ताम्रपणां से मनार की साये से मतलब है। ताम्रपर्णी मदो के मुहाने पर पहले कोरके दरगाह पर, पाद में उसके मरमाने से उसके दस्सिन पाय मोड पर, कायरा बंदरगाह हो गया । पांम्पपाट-इससे शायद मधुरे का मतलब है वहां मोती का खूब मापार चलता पा । शिसप्पविकारम् (पृ.२०७) के अनुसार यहाँ के चौहरी बाजार में पन्द्रा गुरु, अंगारक और मणिमुतु किस्म के मोती विझते थे। कौवेरपाट-सका ठीक पता तो नहीं पता पर संमब है कि यहाँ पीरों की उपसिद्ध रामपानी कावेरीपटीनम अपवा भार से मतमय हो। शिकपदिकामम् (पृ० ११० १११) के अनुसार यहाँ मोतीसाव पवे पे वोर ये ऐप मोती सिकसे ये । पारधनमास-इससे फारस की सारी से मतम है। यहां मोती वात प्राचीन काल से मिलते हैं। इसका उछेस, मेगासनीय, चेरस के इसिगेर, निपर्कस, सपा टास्मी ने किया है। टास्मी के अनुसार मोती के सीप टाइसोस दीपमें (बाधुनिक बहरैन) मिठे पे। पेरिस (३५) के अनुसार कोई (मरकत के उचर पत्रिम दमानियत पीप समा में कलातो) में मोती के सीप मिम्ते थे। नवीं सदी में मासूरी ने उसका वर्णन किया है। पारी रेनो, 'ममायर घर में + १८५९ । इम्मबवता ( गम्स, इम्मक्वा) ने इसका उस किया है। मामा ने (दि मेस माफ गोदीविको बार्पिमा, पृ. ९५, मम, १८६१)र्मर की यात्रा में फारस की सारी के मोतियों का वर्णन किया है। किशोटन वीर तावनिये ने मी रमुन, बसरा और मारैम के मोची के म्पापार का बाहों देखा पर्णम दिया है। भगतिमत (१०९-१११) और मानसोहास (१, १३१) के अनुसार सिंहल, मारवाटी, बर वौर पारसीक से मोती माते पे । सिंहल और फारस का तो हम वर्णन कर चुके हैं। भारबाटी से पाई भरव के दमिसन-पूजी स्ट और पर से पाल सागर से मिझनेवाले मोती के सोपों से तात्पर्य मालम परता जान से मरकत तक के मेदरों में मोती के गोताडोर मिळते वो अपना म्यापार स्मेकोतरा के दीपों, सी बफीका दौर जीवार तक पाते हैं। गळ सागर में बकरमा की सारी से पाये मदेव तक मोती के सौप मिस्ते । (कुंग, पही, पृ० १०२)। र पेट के अनुसार (१९) मोती रामावलोइ, सम्बर, सिंबल कातार, पारस, कैसिप और समुद्रतट से बात थे। उपर्युक तालिका कुछ मंश मै रन शामों की तालिकामों से मिल है। रामावलोह से नैसा हम पहले कर लाए है, शायद मेरा के द्वीप समझ से अपना पेंगू से मतगण हो । यम्बर से लाए सागर के समीकी सर से मतम्न है। यहां पर मेगों से तात्पर्य नील नी वोर लात सागर के वीच एनेवागे दनाकिज तपा सोम्पस पौर गहों से है। कान्तार से यहाँ रेगिस्तान से वमिप्राय है । महानिदेस (ग पूसा परा । परब में - खपरीक्षा का परिचय RU संपादित, पृ० १५१-५५) में मम करतार किसी प्रदेश का नाम है मो शापद मेरेनिके से सिकंदरिया तक के मार्ग का पोतक पा। यह भी संमव है कि ठकुर फेह का मत्स्य यहां कावार से बरव के दक्सिन एवी समुद्र तट से हो यहां के मोतियों के बारे में हम ऊपर का पाए हैं। अगर हमारा भनुम्पन ठीक है तो यहाँ कतार से अगस्त्रिम्मत के वापाटी और मानसोडास के बावार से मालय। फेसिप से यह निमय इम्नमवता (गिम्स, इम्नपक्षा, पृ० १२१, पृ० ३५३) के वंदर कैस से मतथ्य है जिसे उसने मून से सौराफ के साय में मिम दिया है। (वाखप में यह बंदर सीयफ से ७० मीठ दमिसन में है)। सीएफ (वानुषिक तहरी के पास ) पक्न के बाद, १३ वीं सदी में उनका सारा व्यापार कैस चग बाया । कीव १३०० के केस का म्यापार मुन उठ गापा । कैस के गोताखोरों परा मोती निकालने का मासों देखा वर्णन इम्नबक्षमा ने किया है। पैसे, बाद में पता कर और बाज वफ पसरा के मोती प्रसिदी उसी वय शायद चौदहवीं सदी में कैस के मोती प्रसिद्ध थे। इम्नगदता के शम्दों में-'हम संखुवाठ से कैस हार को गए । मिसे सीराफ भी करते है। सौराफ के गेग भसे घर के और ईरानी नस्ल के हैं। उसमें एक परम कलीमा मोतियों के लिए गोतासोरी का काम करता था। मोती के सीप सौयफ मार महरेन के पीप नरी की तर शांत समय में होते हैं। मप्रेम और मई के महीनों में यहां फार्स, पारेन और कवीफ के म्यापारियों और गोताखोरों से व्य मावे भावी है। दुरमा ने केवल सफेद मोतियों का वर्णम किया है। मगस्विमत के अनुसार मोती माई (मपुर) पीले और सफेद होते हैं। मानसोल्लास में नीले मोती का मी उछेस ६. तपा रनसंग्रह में बाल मोती का । ठकुर फेह मे भी प्राप' मोती के इनी रंगो का वर्णन किया है। एनशाचों के अनुसार गोष, सफेद, निर्मक, सछ, निभ, वौर मारी मोची बछे होते हैं। बच्चे मोती के बारे में ठकुर फेरू (५१) का मी यही मत है। रत्नशाओं के अनुसार मोती के बाकार दोप-वर्षकप, तिकोनापन, पार्थ वीर मिर (तीनगाठ बनावट के दोप-शुचिपा (सीप से पगाल ) मस्याक्ष (माटी के मांस का दाग), निस्फोरपूर्ण (क्टिक), बसाहट (पंकपूर्ण धर्फर), समापन सपा रंग के दोप-पोगपम, गदापन, कांस्पवर्ण, तमाम और चटर माने गए है। मोवी के प्राय की दोप प्यार फेह ने मी गिनाए हैं। इन दोपों से मोती का मूस्य काफी पट पाम पा। हम हीरे के प्रकरण में देस बाए है कि ठार फेल ने मोतियों के सौस और दाम का पा रसाब रखा था। प्राचीन एलशासों में इस सम्बन्ध में दो मत मिलते है-एक सो दुबमा वौर पराहमिहिर का और दूसरा बगस्ति का । पहले सिदान्त में गुंथा .
बरवा कृष्णल की तौर। माप पांच गुंडों के बराबर होता पापौर शाणाचार माप के दाम रूपक वयषा कार्षापम में उगाया गया है। सबसे मी तौस एक शाप मान की गई है और कीमत ५३०० रूपक । तौल में हर एक माप बढने पर दाम हुगुना हो जाता पा । दूसरे सिरान्त में सौछ गुना, मनही पौर कलम में निर्धारित है। एक कळस चाळीस गुमों के भरवा चौतीस मंमली के परापर माना गया है।गुना की तौल करीब बाधा केरेट तपा कउंब करीब सारे बाईस केरेट के है। मोती की मारी से मारी तौत दो कलेन मानकर उनकी कीमत ११७११७३ () मानी गई है। वीठ पर वाम किस आधार पर पडता पा, इसका विवरण ठीक सरासे समान में मही वाता। स्व रत्नधानों के अनुसार सिंहल में नकली मोवी पारे के मेस से बनते थे। भकली मोती बापने के लिए मोती, पानी के और नमक के पौस में एफ' पत रस दिया जाता पा । दूसरे दिन उसे एक सफेद कपरे में पान की भूसी के साप एगरते ये। ऐसा करने से नकली मोती का रंग स्तर पाता पा पर वसी मोती वार मी बमकने लगता पा।। मानिफ-बनुमति के अनुसार पपराग की उत्पत्ति बपुरका के रस से हुई। मानिक के नामों में पद्मराग, सौगंभिक, कुलविंद, माणिक्य, मीउगधि और मासवर मुल्य है। दमा के कुरुविंदच, सुगंधिकोष, स्फटिक प्रस्त ता वराहमिहिर के अरिंदमय, सौगंधिमव सपा स्फटिक का शाब्दिक वर्ष बसे गंधक से उत्पन, ईगुर से उत्पमा फटिक से उत्पन लिया जाय अपना मी इसमें दिह है। यह नहीं कहा जा सकता कि एलपरीक्षाकार को जिससे दोनों शासकारों ने मसाग लिया है गंधक, गुर पोर स्फटिक से मानिक की उत्पचि के किसी रासम्पनिक प्रक्रिया का शान वा भषमा नी । प्रायः सब शाओं के बनुसार सबसे अच्छा मालिक का में प्रवगा नदी के किमारे मिलवा पा | कुछ हलके दर्चे के मानिफ कसपुर, श्रेय तपा हंबर में मिस्ते से (दुरमा, ११० वराहमिहिर ८२।१; मामसछास, ११४०३-७१) यमुर फेल (५५) के अनुसार मानिक सिंहल में रामागंगा मदी के तट पर, काशपुर और तुबर देश में मिलते थे। रावणगगा-ठबुर फेह की एमागंगा शायद रावणगया है। यहां हम पामों का प्यान इम्नवक्ता फी सिंहम यात्रा की भोर दिलाना चाहते हैं। अपनी पाया में वह कुनमार पर यहाँ मानिक मिलते थे (गिम्स, इनबत्ता, १० २५६-५७) पह मगर एक मरी पर स्थित पा जो दो पदारों के बीच पाती पी। इनमक्षा के बनु- सार (मौसपी मुहम्मदासेन, शेष इम्नवता का सफरनामा । १० १५८-३९ लाहोर १८.८) इस शहर में प्राप्नभ किस्म के मानिक मिसटे थे। उनमें से कुछ सो मी से निकलते थे और कुछ जमीन खोदकर । नवदता के वर्णन से यह भी पता चलता है ।
पपरीक्षा परिचय कि पाव शम्द का ध्याहार माणिक और नीलम सपा सरे रंगीन रनों के लिए मी होता पा। सौ फमम से ऊदी मभिपत के पत्थर एमा सय रस लेता था। मार्कोपोलो (यून, दि मुक माफ सर मार्कोपोमो, २, १५१) ने मी सिंह के मानिक नौर दूसरे कीमती परपरों का उल्लेख किया है। सावनिये (झवेन्स, मा० २, पृ० १०१-१०२) के अनुसार मी मध्यसिंहल के पहारी इछाकेकी एक नदी से मानिक वौर सरे रत्न मिळते थे | बरसात में या नही पात वा खावी पी । पानी कम ऐ जाने पर रोग इसमें मानिक इमादि की सोम करते थे। उपर्युक उदरणों से रावणगगा अपवा रामाग्गा की वास्तविकता सिद्ध हो जाती है। सर ए. टेनेंट के अनुसार इनवता का फुलकार या क्तकार गपोश पा विसका दूसरा नाम गगाभीपुर या गोली पा। पर गिम्स के वनुसार कुनकार की पहचान कोनेंगडे (कुरूनगर) से की जा सकती है मो इनपक्षा के समप सिंहल के रामानों की एचपानी पी । (गिम्स, इम्ममक्षा, पृ० ३६५ नो ६) फ (क) लपुर-कापुर-प्राचीन रस्नशाओं में मानिक का एक, प्राप्तिस्सान कापुर दिया है। यह पाठ ठीक नपवा नहीं यह तो कहना मन नहीं, पर मोठे मानिक का वर्णन करते हुए मुरमा (१२९-१११) ने काशपुर का वास किया है। बगर करपुर (मानसोल्लास-कानपुर ) पाठ ठीक है तो शायद उसका मिलान गमिक काम्प पहिमपहले के कालगम् से क्यिा चा सकता है मिसे श्री मीरकंठशामी कगरम् वपना याधुनिक केदा मानवे है (मीलकंठशाली, हिस्ट्री नाफ श्रीविषय, पृ० २६, मवास १९९६) पर केदा में मानिक कैसे पांघे यह प्रश्न विचारणीय है । समब है कि स्पाम और गर्मा के म्यनिक पहा बिकने के लिए पहुंचते हो और पामार के नाम से, सत्पणिमा का माम पर गया हो। कमपुर की पहचान लिगोर के इसमस पर सित कर्मरंग से भी मेली ने की (वही, पृ०८१)बगर यह पाचाम ठीक मसमपुर में शायद मानिक का म्यापार होता रहा होगा । वंध्र-प्रदेश में मानिक मिसने का गौर इम्प उठेस महीं मिक्ता । हुंघर- पत्रेय पुराण (पनिटर का नुवाद, पृ० २१३) के दब, पैसा भी पामिंटर का अनुमान, शायद विप्पपाद पर एनेवार्य एक संगठी बाति के योग पे पर बर देश की सिति का ठीक पता न चम्ता । विप्प में मानिक मिटने का भी पता नहीं। रस्नशाखों में मानिक के पात से रंग को गए हैं जिनमें चटकीला (पपग) पीतरक (कुरुपिद) और नीठरत (सौगरिक) मुस्प है। प्राचीन स्लशामों के नुसार सब तप के मानिक एक ही सान में मिलते थे। पुदमा के बनुसार सिमस की मी ४ हपुर फर विचित रावणगंगा में चार रंग के मानिक सिते ये पर मानसोझास (१७५-१७५) के अनुसार सिंह का पराग गम, कालपुर का कुरुविद पीमा, बांध का सौगषिक अशोक के पत्र के रंग का, तपा तुंबर का नीगधि मीले रंग का होता पा। पर सानो के अनुसार मानिक का रंगों के अनुसार वर्गीकरण कोरी कल्पमा मान पाती है। जातीय स्नपरीक्षा (१७,५२) अनुसार तो मानिक के वर्ण मी निषित कर दिए गए है। उस प्रेप में पमराग पासण, अरुविंद क्षत्रिय, श्यामगंधि पाप और मांसबर शन माना गया है। प्रायन वर्ण का मानिक सफेद और जाप मिश्रित, पत्रिय गहरा माय, पैश्य पीछा मिश्रित साम वौर घन पाला मिश्रित खास रंग का ऐता पायो यह वाव मानने छापक है कि यह विचास केपम शाखीय ही नहीं पा इसका प्रसR छोगों में भी पा । इम्नवता के मनुसार सिंहन के मानिक को मामण करते मी पे । ठकुर फेस के मनुसार (५७-६१)पपग्रग, सूर्य तपे सोने वीर ममिवर्ण कर सौगंपिक पमास के झड, कोयल, सारस और चकोर की बस के रंग पैसा तमा बनारदाने के रंग का मामघ कमल, वान्ता, मंगा और ईगुर के रंग का कुर्विद पराग गौर सौगपिक के रंग का, और पमुनिपा जामुन नौर कनेर के शम के रंग का होता पा । मानसोझास (१८५) के अनुसार स्निग्ध छाया, गुरूप, निर्ममता और नतिरळता मानिक के गुण माने गए है। अगस्त्रीय रमपरीक्षा के अनुसार (५२, ५०) बलिया, मानिक गहरे माल रंग का, लोहे से न फटनेवायम, चिकमा, मांसर्पित की वामा देने वाटा, पुदिदापक तपा पापनाशक ऐसा पा । मनिक के वाठ दोप पषा-विश्वय, दिपद, मिम, कर्सर, मानपद (दूप से पुकी तर) कोमल, घर (गरम ) वार एम (धुमा) मानिक के दोप है (मानसोडम्स, १७९-१८)। टमुर फेरू के अनुसार (२२) मानिक के ये वाठ गुप्प है यपा-साय, उजिम्प, पिरण्यम, कोमल, रंगीलापन, गुरुता, समता और मनचा । इसके दोप है (६२) गतछाप, पर घूमता, मिम मनन कर्कर धौर कठिम, विपद तथा रुस । प्पर फेह के वनुसार मानिक की तौर और दाम के बारे में हम ऊपर कर पाए है। वराहमिहिर के बनुसार एक पछ (पर्प) के मानिक फा दाम २६.००, ३कार्य का २००००, २ कार्प का १२०००, १ कार्य (१६ मापक) का ६०००, ८ मापक का ३०००, १ मापक का १००० और २ माषक का ५००है। मुरमा (१०) के अनुसार समान तौत के हीरे और मानिफ का एक से मृत्य होता है। पर हीरे की ती तदुर्मों में और मानिक की वीस मापकों में होती है । बगस्विमत के अनुसार मानिक का दाम घटना तीन बातों पर भार्गक्ति पायप-म्पनिक की किस्म, फ्नस्प (पों में) तपाति (सर्पों में) मानिफ की साधारण फाति का मापदंर २. - २० म खपरीक्षा परिचय सर्मपों के उतार पठाप में निहित थी। इसके लिए सम्भवति, पार्मसि, धोवर्ति; अपमा, गुर फेस(१७)के कर्मयोसिस्, पार्मिम्पोखिम और अघोग्योतिस् छन्दम्पबहार में बाए है। बगर कति २० सर्पों से अधिकाई तो उसे कांतिरंग करते थे और उसी अनुपात में उसका नाम मचाता था। घनल की इकाई १ यम मानी गई है, इसमें हर बार इकाई माने पर मानिक का दाम हुगुना हो पाता पा । बधिक से अधिक दाम २३१, ९११,००० तक पचता है। र फेह ने (११) मानिक के किस्मों पर दाम का अनुपात निश्चित किया है। उसके बनुसार पपराग, सौगधिक, नीठगंध, फुरुविंद और पमुनिया के दामों में २०, १५, १०, ६ वौर ३ मिखा मृत्य का मंतर पर नाता का। पर फेक ने (१८) के उपवती, पोवती धौर कियवर्ती मानिकों को उचम, मप्पम और नवम श्रेणी का माना है बाकी को मिकी । सान पर चढाने से पिसनेवाली, तथा छठे ही दाग पग्ने पाली तथा पर में पत्थरबाली सुमी को पिप्पटिका करते थे (७० । पर फेक ने तो मकली मानिक बनाने की किसी विधि का उछेस नहीं किया है पर एनसातों में, बसा हम ऊपर देस बार , नकली मानिक बनाने की विधियां दी मौर यह मी मतगया गया है कि नकली मानिक फैसे पहचाने जा सकते थे। पुरमा (१२९-१३१) ने पांच तर के नकली मानिक बताए जो बमार तो मी पाते ये पर ये साधारण उपस्न पे नो मानिक से मिलते हुवे पे और जिनसे मामिक का पोसा साया जा सकता था। ये परपर करायपुर, वर, सिंहल, मुसामाठीप बोर श्रीपूर्णक से मासे पे । मुजामा का पता मर्स पस्ता पर भीपूर्णक से शापद यहाँ मिस के भीपुर से मतव्यो मीसम-बनुभुति के नुसार नीठम की उत्पचि बसरबत की बालों से हुई। शादों के भनुसर नीम की दो किस्में पी इन्द्रनीठ और महामील, पर इनके रंगों के बारे में शासपरों के समिम मत है । मुखमा के अनुसार इमनीठ का रंग सनुप पैसा होता है और मानीठ का रंग दूध में नीडापन सा देता है। पर दूसरे शानों के नमुसार यह इन्द्रनीर का गुण है। टमुर फेरू (८१) ने इम्बमीठ और महानीको मिगकर नीलम का नामकरण महेन्द्रनील किया है। पुदमह के अनुसार मीरम केवल सिंहल से बाता पा । मनसोझास (१९२)क अनुसार मीलम सिंहल द्वीप के मध्य में रावणगगा नर्स के किनारे पभाकर मे मिता पा। मगस्विमत ने कलपुर और कलिंग क नाम मी जोड दिए है। उसके अनुसार कापुर का मीलम गाय की नस के रंग कर बोर कलिंग का नीमम दान की बात के रंग का होता था। ।
૧૮ - कर फेक विपित हम उपर देस माए है कि इनक्यता सिंह के मीलम वीर उसके प्राप्तिसान का किस तरह बानों देखा हाल वर्गम करता है। मिशोटेन (मा० २, पृ० १९०) के मनुसार पेग का मीलम मी बच्छा होता पा, जो प्रायद मोगाके की मानिक की सानों से निकम्ता पा । (सावनियेर, २, पृ० १०१, १०२)। कमपुर वौर कलिंग के मोम्म से शायद वर्मा और साम के मीठम से मन हो जो कलिंग वौर केदा के बाजारों में जाकर बिकते थे। रत्नशाकों में मीसम्म के दस या ग्यारह रंग कहे गए है। तनीठाम नीष्म मामण, रजनीअम क्षत्रिय, पीनीगम पैश्य, तथा पननीठ शुद्र माना गया है। पर फेस के अनुसार नीलम के मौ रंग होते थे पपा-मीन, मेघवर्ण, मोरकठी, बम्सीकर श, गिरकर्णकर , अमरपंची, हण, श्यामम बौर कोक्तिीवाम । एनशानों के अनुसार नीयम के पाचगुण ६ पषा- गुम्वा, स्निग्धता, रंगायता, पार्यरचनठा और तनाहित्य । र फेस के बनुसार पे गुण है-गुम्वा, पुरंगत्य, मुभागता, कोमता और मर्रचनता । रत्नशारों के बनुसार मीसम के . दोम है यपा-वभक (भूमिक) कर पा सचर्कर ( रेतीग), प्रास (टूटा), मिन (पिटका), मृदा या मृविका गर्म ( मातर मिती होमा) और पापण (पर में पत्थर होना)। ठकुर फेह (८३) के अनुसार मीठम के नौ रोष है, पपा-अभ्रक, मरिस (महा), सर्फरगर्म, सास, पम्प, परीग, समा, सागार (महीमरा) और मिव । नीम का दाम मानिक की तरह भगाया जाता था । र फेरू के समय में नीलम के दाम के बारे में हम उपर का भार है। पभा-(मरकत, तार्म) की उत्पचि वार कर के उस पिच से मानी गई । मिसे गम ने पुप्पी पर गिराया । प्राचीम रमशागों में पमे की सामों का वर्णम बस्पर है। दुबमा (१५०) के अनुसार बन गस ने भमुर का का पिच गिराया तोर राष्प कोरकर, रेगिस्तान के समीप, समुद्र के किनारे के पास एक पर्वत पर गिरकर मरकत बना गया । पर मी कहा गया है (१९१९) की तरफ के पक्ष होते थे। बगस्विमत (२८७) के अनुसार पर सुप्रसिद्ध पर्वत समुद्र के किनारे के पास तरकों के वेशम सित पा । मगचीय रत्नपरीक्षा (७५) के अनुसार पमे की दो सने पी एफ तुरुफ देश में और दूसरी मगध में । म्ह फेल ने (७३) मरकत के उपधि साम बिद, मम्म्याचम, बर्बर देश और उदातीर माने है। मकत के उपर्युक भाकर की पांच पड़ताल से एक बात स्पट ऐ गाती है कि प्रायः सब शावकार पमे की स्थान पर देश के रेगिस्तान में, समुद्र तार के निकट, मानवे है। टाममो युग से लेकर मप्यकाठ तक प्रायः सब लिवरण मित्र में विशेष कर भास रमपरीक्षा का परिचप - । सागर के पास सित 'पर' पर्वत की पने की सान का उल्लेख करते है। इस सान का उस पिनी, कासमास इरिको कायस्टस (करीब ५१५६०) मासूर और नवी सी के दूसरे भरव यात्री करते हैं। बस ईदिसी के अनुसार मप्य नीठ पर बखान से कुल दूर एक पर्वत के पाद पर पमे की साम है। यह खान शहर से बात र एक रेगिस्तान में है। इस पमे की सान की, दुनिया की और कोई दूसरी सान मुका- बला नहीं कर सकती। अपने फायदे और निर्यात के लिए यहां काफी बादमी काम करते है (पी०ए०जोवर्स, नए ईनिसी, १, पृ०३६), पहा यह भी उल्लेखनीय पात है कि वसाम से एक महीने की राह पर मरकता नामक एक शहर पा यहाँ हम्श के बाल सागरपाले किनारे पर सित नस्लेग के म्यापारी यते थे। यह समय हो सकता कि संहत मरकत का नाम शायद इसी शहर से परा हो पर संसस मरकत की म्मुत्पत्ति यूनानी स्मरम्दोस से की जाती है । यह यूनानी शम्द बसीरी पर, रिम् बारिकेत या बारकत, शामी मोर्को का रूपांतर है। परवी जुम्मुरुद शापद यूनानी से निकम हो (णठफर, साइनो इरानिका, पृ० ५१९) पिशोटेम (२, ५, १४०) के अनुसार मी मारत में बात कम पमे मिल थे। यहाँ पो की काफी मांग पी दौर में मिस्र के काहिरा से भावे थे। अरलिंद-इस देश का नाम मौर फर्म नहीं मिठता । पर यहां हम पेरिप्पस (७) के बलिवेस की मोर प्यान दिगमा चाहते है जिसकी पहचान बास मदेव के यस विमानक से ७९ मील दूर सा से की जाती है। सारी के उचर में क्यसित गांव में प्रामीन भकलितेस का रूप बच गया है। बहुत समय है कि भवलिंद मी इसी पासितेस बालित का रूप । यहां पमा तो नहीं मिलता पर संभव है कि बैग के म्यापारी मिली पमा इस देश में खाते हे हों और उसी के भापार पर वासिद-अपित पमे का एक खोत मान लिया गया हो। मलयापल - या दक्षिण भारत का मरयाचा तो हो नहीं सकता । शायद डर फेरु का तरेप पो गेबस और से से यहाँ मुरमा के अनुसार तुरुफ पानी गगुरु होता पा । पर और उदधि तीर का संकेत भी पाठ सागर की बोर इशारा करता है। मगष-अगस्त्रीय रत्नपरीक्षा में मगम में भी पमे की साम मानी गई है। मोर (रेकार्रस् माफ दि बिपालोमिका सर्वे बॉफ इंडिया, मा० ७ १० १३) के अनुसार मार के हजारीबाग मिसे में पमे की एक सान थी। रत्ननाओं में पये की पार से भाठ छाया मानी गई है। जगम्निमत के अनुसार महामरकत में अपने पास की तुओं को रंगीन कर देने की शक्ति होती थी। मरम्स - . धपुर फर रिषित सहन और सालिक रंग के होते थे। सन का रंग सेवार पैसा और दूसरेका शुकपर, शिरीष पुष्प बौर झीया पैसा होता पा। रतशाचों में पमे के पांच गुण यपा-सम्छ, गुरु, सवर्ण बिग्य वौर परजस्क (मिरहित ) है । अकुर फेह के अनुसार (७६) बझी छापा, मुम्क्षणता, बनेक रुपता, उधुता वोर वयता पमे क पांच गुण है रखशाओं के अनुसार शवम्ता, बठरता (कतिगमवा) मलिनता, समता, सपापाणता, करवा गौर विस्कोर पो के दोप है। ये से दोप ठमकुर फेस ने गिनाए हैं। केवम शबरता की जगह सरजस्कता वा गई है। मुखमा के अनुसार नकी पना शीशा, पुत्रिका मोर मचातक से बनता पा । इसके बनाने में मपीठ, नीड मौर गुर भी उपयोग में पाए जावे पे । उपरस रतधामों में उपरों का बरी सरसरी तौर पर उल्लेस जा। पांच महा- वों के विपरीत पर फेह ने विद्यम, मूंगा, सासनिया, मार्य, स्फटिक, पुसरान, फतन और मीम को नष्ठेस किया है। विलुम अपशाब (मियी धनुवाद, पृ० ७६) के अनुसार मंगा बाम्मेद मौर विवर्ण से बाता पा । यहां मारकंद से मिस के सिकदरिया के बंदरगाह से मतलब है। टीका के अनुसार सिवर्ण पषन दीप के पास का समर है। अगर या ठीक है मो या विवर्णसे ममप्प सागर से तात्पर्य होमा चाहिए । मुरमा (२९९-२५२) के अनुसार मुंगा शकपन, सम्हासक, देवक और रामक से भावे थे। यहाँ रामक से शायद रोम का मतम्म हो सकता है। वगतिमत के एक क्षेपक (१०) में कया गया है कि हेमकद पर्वत की एक सारी बीच में मंगा पापा पाता पा । ठाकुर फेरू के नुसार (९०) मंगा कावेर, विन्प्पाचर, पीन, महाचीन, स्मा पौर मैपाठ में पैदा होता था। पेरिप्पस (२८, २९, १९, ५६) के अनुसार मूमप्य सागर का पास मंगा बारबारिकम पेरिगामा (मस्कण) और मुनिरिस के बंदरगाहों में वावा था । छिनी (२२।११) के अनुसार भूगे का मारत में अच्छा दाम पा । भाम की तरा उस समय मी मंगा सिसकी, कोर्सिका और सागनिया, नेपल्स के पास स्मगान और नेता, कागलोनिया, बमेरेक दीप तपा यूनिस भम्जीरिया और मोरक्को के समय तट पर मिता पा । खास सागर और नरव के समनट के मुंगे काले होते थे। वगतिमत के हेमंद पर्वत के पास एक सारी गल में मंगा मिल्ने के उठेर से मी शायद मल सागर भवा फारस की सारी के मूंगों से मतमो सकता है। .
सपरीक्षा का परिचय श्री माठफर के अनुसार (साइनो ईरानिका, पृ० ५२५-२५) धीमी प्रयों में ईरान में मुंगा पैदा होने के उल्लेख है। उन के अनुसार मंगा फारस, सिंह और चीन के दक्षिण समुद्र से वाता था । ताग इतित से पता चलता है कि फारस की प्रवास भिजार तीन फुट से ऊंची नहीं होती थी। इसमें संदेह नहीं कि फरस के मंगे एशिया में सब जगह पहुंचते थे । काश्मीर के मूंगे का वर्णन यो एक चीनी इतिहास कार ने किया पर फारसी मूंगा ही रहा होगा । माकोंपोमो (मा० २, पृ० १२) के अनुसार सिम्मत में मूंगे की परी मांग थी वौर ठसका काफी दाम होता पा । मुंगे लियां गले में पहनती की अपवा मतियों में मरे माते पे । काश्मीर में मंगे इटली से पाचते थे और यहाँ उनकी काफी सपत थी (मार्कोपोलो १, पृ० १५९) । धाव निये (मा० २, पृ० १२३) के अनुसार वासाम वीर भूटानमें मूंगे की काफी मांग थी। फाषेर-पाई दक्षिण के कामेरी पहीनम् के बंदरगाह से मतम्म हो सकता है। शायद यहां मंगा बहार से उतरसा हो । विप्यापम में मंगा मिना कोरी कल्पना माल्म पस्ती है। पीन, महापीन-सगवा है चीन दौर महाधीन से यहाँ क्रमश धीन देश वीर मंटन से मतय हो । समय है कि पीनी व्यापारी इस देश में बाहर से मूंगा हाते। समद्र-ससे भूमप्य सागर, फारस की धारी वौर बाल सागर के भूगों से मतम मालम परता है। नेपाल-बैसा हम उपर देस बार है विपत बौर कातीर की धरा नेपाल में मी मुंगे की नदी मंग पी।ऐ सकता कि नेपाली म्यापारियों द्वारा मंगा लाए जाने पर नेपान ठसका एक उत्पचि सान मान रिम्पा गया हो। लासनिया-मीले, पीले, माठ और सफेद रंग की मसनिया ठकुर फेन (९२-९३) के अनुसार सिंहलदीप से बाती थी । इसे बिगाक्ष वपया मिली के बोच नैसी रंगवाठी मी करा गया है । उसमें सूस परने से उसे कोई को पुलकित मौकरते थे। पैर्य-मत्र श्री गाउँ, सौरीन्द्र मोहन ठाकुर पौर फिनो की राप है कि बैर्य का वर्णन हसनिया से बहुत कुछ मिलता है। पुश्मा (२००) ने मी वैर्य को निशी की बांस के शासक कहा है पाणिनि २२८५ के अनुसार मैर्य (मैर्य) का माम सान पाचक है। पतं- पति के अनुसार मिस्र में प प्रमप लगाकर उसे सान पाचक मानना ठीक नाम क्योंकि ११ एर फेर विरचित बैर्य बिर में मही होता, मह तो बानबाप में होता है और विदूर में कमाया जाता है। पर शायद नाम्पाय शम्द विदूर में परिणत हो गया हो और इसलिए उसमें य प्रमय जग गया ऐ । इसके माने मह हुए कि विदूर शम्द बाध्याय का एक दूसरा रूप है। इस पर एक मत है कि विदूर बालाय महीं हो सकता, इसरा मत है कि मिस तर म्यापारी वाराणसी को निखरी करते थे उसी सरा वैयाकरण वाम्बाय को मिदूर। उपर्युज कपन से यह बात साफ हो जाती है फिर्य पानाय पर्पत में मिसम्ता पा वीर विदूर में कमाया और पेचा पाता पा । यह पर्वत दक्षिण भारत में पा । मुखमा (१९९) के अनुसार विदूर पक्त दो एम्पों की सीमा पर स्थित पा । पहला देश कोंग । बिसकी पहचान बाधुनिक सेलम, कोयबर, तियेसी और दूसन्कोर के कुछ भाग से की जाती है। दूसरे देश का नाम मालिक, चारिफ या तोक्क भयवा ३, निसे भी फिनो चोलक म्पनते हैं जिसकी पहचान चोमरस से की जा सकती सीमापार पर भी फिनो ने थाम्याप की पहचान बीबर पर्वत से की है। यह बात उल्लेखनीय है कि सेटम मिले में स्फटिक बौर फोरेर बहुतायत से मिते है। ठमपुर फेस (९९) का विर्यग फोंग का बिगडरा रूप है । समुद्र का उछेस कोरी कम्पमा है । साकुर फेह ने सनिया दौर नैर्य बग बम्ग रन माने ।। समय है कि देशमेद से एक ही रह के दो माम पर गए हों। स्फटिक प्राचीन राशाओं के अनुसार स्फटिक के दो मेद यानी सूर्यकांत और पाकस्त माने गए है। अफर फेस (९६) ने मी यहि माना है पर गतिमत के क्षेपक में सनिक के मेदों में अकात भौर सगर्म मी माने गए है । पृषवीचन्द्र परिष (पृ० ९५) में भी जलकांत और ईसगर्म का उल्लेस है। सूर्यकांत से भाग, चन्द्रकान्त से अमृतवर्षा, पक्षात से पानी निकाना तथा ईसगर्म से लिप का नाश माना पाता था। पुरमा के अनुसार सटिक कायरी नदी, सिंप्यएर, यान देश, दीन और नेपाल में होता मा । मानसोवास के अनुसार ये सान लेका, साती मदी, विम्यापछ और हिम्यष्य थे । ठक्कुर फेस के अनुसार नेपाल, कसार, पीन, कामेरी नी, पमुना और रिम्पाप से स्फटिक माता पा। पुखराज पुमराम की उत्पत्ति असुर बब के चमरे से मानी गई है। इसका नाम पदसनिया पैसा होता पा । मुरमा के अनुसार पुसपर हिमाइप में, भास्तिमत के अनुसार सिंह और कपास (1) में क्या रणसंग्रह के अनुसार सिंह और कर्क खपरीक्षा का परिचय में होता था। ठाकुर फेह ने हिमालय को ही पुसरान का उद्गम साम माना है पर पर बात प्रसिद्ध है कि सिंहल अपने पीले पुसराग के लिए प्रसिद्ध है। कसन फतन के उत्पत्ति सान का किसी रमशार में उल्लेख नहीं है। पर ठाकुर फेस ने पवणुप्पट्ठान देश में इसकी उत्पति की है। यहां शायद दो जगहों से मसलब पक्षण और उप्पट्ठान । पत्रण से समय । शायद अफगानिस्तान में गरनी के पास पर्यान से मतलय हो और उप्पट्टान से परि-भफगानिस्तान से । भगर हमारी पहचान ठीक है तो यहाँ पनि से शायद म मखम के म्यापार से मत्सब हो। उप्पट्टान से रूस में उग्र पर्वत में एकाटेरिन बर्ग और टाकोबाजा की कतन की सानों से मतल्प हो (जी० एफ०, र्वर्ट स्मिप, पेम टोन्स, पृ० २३६, मरन १९२३)। मह मी संभव है कि उपपट्ठान में पान पाम्द छिपा हो। इम्नस्तूता ने (२६१-६९) पान को चोल मंजस का एक बग बंदर माना है पर इस बंदर की ठीक पहचान नहीं हो सकती । संमय है कि इससे कावेरी पीनम् भपवा नागपानम् का बोध होता हो। मगर यह पहचान ठीक है तो शायद सिंग का कदन यहां वाता हो। मकर फेरू के अनुसार इसका रंग सांचे वय पके हुए महुए की तर अपमा नीमाम होता था। मीष्म-ठाकुर फेस ने मोम का उत्पति स्थान हिमाम्प माना है। या रंगमें सफेद मा बिजली बार बाग से रक्षा करनेवाला मामा गपारे। गोमेद रतशालों में इसका विवरण कम वाया है । वगस्विमत के क्षेपक में (१-५) गोमेद को सा, गुरु, निगम और गोमूत्र के रंग का कहा गया है। नगरतीय परीक्षा (८३-८९) में गोमेद को गाय के मेद भयवा गोम्न के रंग का कहा गया है। उसका रंग पबम धौर पिमर मी होता था। टस्फुर फेस (१००) ने इसका रंग गाय छास, सफेद और पीछा माना है। और किसी रसशास में गोमेद के सपचिस्साम का पता नर्म धम्ता । पर अर फेस ने इसका स्रोत सिरिनापफुझपरेका देस तपा मर्मदा मा मामा है। सिरिनायफुमपरे में कौन सा नाम छिपा हुआ है यह तो टीक मी कहा जा सकता पर गोरकुंग से ममुष्टीपान के राम्ने में पुंगम के आगे मगुपपाद परता पा रिमे तात्र- नये ने नगेसपर कहा है (सावनिये, १, पृ० १७३) समर है कि नापकुलपर यह स्थान हो। बग देस से शापद मंगान का बोध हो सकता है, गहुत संमा है कि ११वी सर्व में सिंहस से गोमेद वहाँ जाता रहा हो।
३५ हपुर फेस विरचित पारसी रस समकर फेस ने (१०३)ला, कीक वीर पिरोना को पारसी रत माना है। इसका परवाना कि ये रत या तो फारस में होते थे वया उनका म्यापार फारस बौर परब के म्पापारी करते थे। लाल-भाग की तरह माल पा रह पदससाण देश यानी पदम्पर्म से वाता पा । मार्कोपोगे (मा० १, पृ० १९९-५०) के अनुसार पदस्था के पक्षास मानिक प्रसिद थे। वे सिमान के एक पहार से सोद कर निकाले जावे पे और उन पर पहो के शासक का पूरा अधिकार होता पा । गल की साने का मद के दाहिने किमारे पर इराकाधम निले में शिगनान के सीमा पर स्थित है (पुर, ए चर्नी टु वासस, भूमिका पृ० ३३) मकीक-ठाकुर फेस ने इसे पीले रंग का कहा है और इसकी उत्पत्ति खमण देव यानी परब में पमन देश माना है। पम्न देश के मकीक का रस इम्नता (११९७-१२१८) ने किया है (फेरी, तेरसद रेखासीफ म एक्सप्रेम भोरिया, १, १०२५६) पौर इसे कई बीमारियों की बौषधि मानी है। बान दिन मी यानी वर्षकई में प्रसिद है। इसका दाम ठाकर फेरु के अनुसR बहुत कम होता था। फिरोजा-उमर फेरू के अनुसार नीमम रंग का फिरोगा नीसाबर और मुपासीर की सानों से बाता था । मिसावर से यहां फारस के निशापुर से मतलब। तावर्मिये (२, पृ० १०३-०१) के अनुसार फिरोचा फारस में दो सालों से पाया पाता था। पुरानी सान मशद से तीन दिन के रास्ते पर निशापुर के भासपास पी बोर नई मशद से पांच दिन के रास्ते पर थी। मुबासीर से यहाँ ईराक के मोसुछ या मम्मोसिस से पोप होता है। मगता है फारसी फिरोचा यह म्यापार के लिये धाता पा । नाम दिन मी मोसम में फिरोने का म्यापार होता। गा, जासनिमा, हमनीक और फिरोने का दाम मकर फेस के वनुसार तौर से सोने के टांकों में होता पा । निमशिक्षित मंत्र से पर बात साफ हो पाती है- माया . १॥ - १ ३ १ ॥ नसपी पा ॥ ११॥ -२० 1 पैरोग्य I उपर्युक पत्र के अप्पयन से पता चल जाता है कि बस इस्मादि की कीमत दूसरे महारों के मुकापिने में काफी कम थी।
परीक्षा का परिचय उपसंहार प्राचीन शाबों के धापार पर हमने ऊपर यह दिखाने का प्रयास किया है कि रमशान प्राचीन भारत में एक विहान माना नाता पा । उस विज्ञान में बात भी पातें सो अनुभूति पर बानित पी पर इसमें संदेह नहीं की समय समय पर रनशानों के लेसक अपने अनुभवों का भी संकलन कर देते थे। ठाकुर फेरू ने भी अपनी 'रसपरीषा' में प्राचीन प्रयों का सहारा लेते हुए मी चौदहवीं सदी के रस म्पक्साप पर काफी प्रकाश रामा है। ठम्कुर फेस के प्रप की मचा इसलिये और मी बढ नाती है कि रम समन्धी इतनी बातें मुस्तान युग के किसी फारसी बया मारतीय अंपकार ने नहीं दी है। कुछ रखों के उत्पचि सान मी, टमर फेल ने ११ वी सदी के रतों के बायात निर्यात देख कर निमित किए है। रनों की तीन वीर दाम मी उसने सम्या नुसार रसे है, प्राचीन शाखों के भापार पर नहीं । पारसी रनों का विवरण तो ठाकुर फेस का अपना ही है, पराग के प्राचीन मेव तो उसने गिनाए ही पर पुमी नाम का मी उसने प्रयोग किया है निसका म्यवहार दान दिम मी जौहरी करते हैं। उसी पर मटिया काले मानिक के लिए देशी शब्द निप्परिया का म्पपहार किया गया है। मेरे के लिए फार शम्द मा भाषा प्रचलित है। छगप्प हैउस समय मासमा परे के म्पसाय के लिए प्रसिद्ध पा, क्योंकि उस्कुर फेरू ने चोसे हीरे के लिए मालवी शम्द म्पाहार किया है। पमे के पारे में तो उसने बहुत सी मई माते की है। कुछ ऐसा भगता है कि उमर फेह के समय में मई और पुरानी सान के पों में मेद हो पुका बा दौर इसीलिए उसने पमों के तत्कालीन प्रचसिन नाम गरुगेद्गार, कीरतठी, पासक्ती, मगउनी बौर निमाई दिए हैं। इन सब बातों के वापार पर यह कहा जा सकता है कि ठाकुर फेक रनों के सबै पारसी थे । उनहोंने देस समान कर ही रतों के वर्णन लिसे केस परंपरागत सिद्धान्तों के वापार पर 0 नौ । ।
अनुक्रम
१ रखपरीक्षा
२ द्रव्यपरीक्षा
३ घाल्पचिः
१७-१८
२१-४४
श्रीमालवशीय ठकुर फेरुविरचिता प्राकृतमापापदा रत्न परीक्षा सयलगुणाण निवास नमिठ सव्यन्न तिहुयणपयास । संखेवि परप्पहिय रयणपरिक्खा भणामि अह ॥१॥ सिरिमालकुलुचसो ठकुर चवो जिणिंदपयमचो । तस्संगरुहो पेरू जपइ रयणाण माहप्प ॥ २ ॥ पुब्धि रयणपरिक्खा सुरमिति अगत्य युद्धमटेहिं । विहिया त दण तह पुरी मंडलीय च ॥३॥ अलावदीणकलिकाल चकवट्टिस्स कोसमझत्य । रयणायरु व्य रयणुश्चय च नियदिट्टिए दहु ॥ ४॥ पचक्ख अणुभूय मडलिय परिक्खिय च सत्यार्य(इ)। नाठ रयणसरूव पसेय भणामि सव्येसि ॥५॥ लोए भणति एव आसी बलदाणवो महायलव । सो पत्तो अन्नविणे सग्गे इदस्स जिणणत्य ॥६॥ तहिं पत्यिओ सुरेहिं जम्ने अम्हाण तु पसू होह । तेण पसने भणिय भविओह कुणमु नियकच ॥ ७॥ सो पसु पहिठ सुरेहिं तस्स सरीरस्स अवयवाओ य। सजाया वर रयणा सिरिनिल्या सुरपिया रम्मा ॥८॥ अस्थिस्स जाय हीरय मुत्तिय दताठ महिर माणिक । मरगयमणि पित्ताओ नयणाओ इन्दनीरो य ॥९॥ घाइजो य रसाओ क्माउ फफेयग समुप्पन । रहमणीओ य नहामो पलिय मेयाठ सजाय ॥१०॥ अभी मावार्य विपरपन पन मगर . चयपुर
५
मारफेरविरचिता
विदुमु आमिस्साओ चम्माओ पुसराठ निप्पन्नो ।
सुकाउ य भीसम्मो रयणाण एस उप्पत्ती ॥ ११ ॥
एव भणति एगे भूमि]विकारं इम च सव्य ध ।
जह रुप्प कणय तच य धाळ रयणा पुणो तह य ॥१२॥
तठ्ठाणाओ गहिया निय निय बन्नेहिं नवहि मुगहेहिं ।
तचो जत्थ य जत्थ य पडिया ते आगरा जाया ॥१३॥
सूरेण पउमराय मुत्तिय चंदेण बिहुम भूमे।
मरगयमणीउ बुरे जीवेण य पुसराय च ॥ १४ ॥
सुकेण गहिय वन सणिंदनील तमेण गोमेय ।
केएण य वेदज्ज मुछा तत्येव सेस तहिं ॥१५॥
इय रयण नव गहाण अंगे जो घरइ सच्चसीलजुओ।
तस्स न पीउति गहा सो जायइ रिदिखतो य ॥ १६ ॥
पुणु जह सत्थे भणिया मदोस अइचुक्खया गुणडा य ।
ते रयण रिरिजणया सदोस घण पुत्त रिरिहरा ॥१७॥
अइ उचिमरयणतरि इको वि सदोस क्रूड समलु हवे ।
ता सयलठतिमाण कतिपहाव हणेइ धुव ॥ १८ ॥
मणिया मूलुप्पची अमो य पुष्छामि आगराईणि ।
यम गुण दोस जाई मुछ सव्याण रयणाण ॥ १९॥
वज्र जहा-
हेमत सूरपारय कलिंग मायग कोसल मुरहे ।
पडर विसएम तहा घेणुनई वजठाणाई ॥२०॥
तंघ सिय नील कफुस हरियाल सिरीसकुसुम पणरचा ।
इय वजयमछाया कमेण भागरविसेसाओ ॥२१॥
सपरीक्षा पर विशेषोऽयम्- कोसल कलिंग पढमे दुइए हेमत तह य मायगे। पहुर मुरट्ठ तईए वेणुज सोपारय कलिंमि ॥ २२ ॥ छ कोण अट्ठ फलहा बारम घारा य हुति वजा य । अट्ठ गुणा नव दोसा चउ छाया चउर वन्न कमा ॥ २३ ॥ समफलह उच्चकोणा मुतिक्खघारा य वारितर अमला । उज्जल अदोस लहु तुल इय वजे हॉति अट्ट गुणा ॥ २४ ॥ कागपग विंदु रेहा समला फुट्टा य एगसिंगा य । घट्टा य जवाफारा हीणाहियकोण नव दोसा ॥ २५ ॥ सिय विप्प अरुण वत्तिय पीय यहस्सा य कसिण मुद्दा य। इय चउ वा दुजाई चुक्ला तह माल्षी नेया ॥ २६ ॥ निहोस सगुण उचिम चचारि वि वन हुति जस्स गिहे। तस्स न हवति विग्ध अकालमरण न सतुमय ॥ २० ॥ चत्वारि वि वन्न तहा पीयारुण नरवराण रिरिफरा । सेसा नियनिय वने सुहकरा वज नायव्या ॥ २८ ॥ लग्छीए आयड़ी थमइ अरिणो परि(र)कम समरे । तेण अरुण पीय नरेसरो घरइ घरवज ॥ २९॥ जह दप्पणेण वयण वीसइ तह उत्तमेण वजेण । नर तिरिय रुक्ख मदिर तहिंदघणुहाइ दीसंति ॥ ३० ॥ अइचुक्ल तिक्वधारा पुत्तत्थीइत्थियाण हाणिकरा । चप्परि मलिण तिकोणा रमणीण बज्न मुहजणया ॥३१॥ मणिय स्थ- महमेव पढमरयण सुपुत्तरयणाण खाणि मुह पुन्छी। कोण वराओ वज्जो इय दोस दाउ घर इत्थी ॥३२ ।।
करफेरविरचिता
समपिर सगुण निम्मल गुरुतुम्हा हीणपिंड लहुमुछा ।
फार लहताल वजा बहुमुल्ला सम समा मुछो ॥ ३३ ॥
वज लहु फलह सिरं वित्थरचरण तिलोवरि काठ ।
जो जड़इ अह जड़ावह तस्स धुव हवइ बहु दोसं ॥ ३४ ॥
जस्स फलहाण मज्झे बुडो खुट्टो हुति भिन्न वनाइ ।
कागपय रस्तविंदू त वज्ज होइ पुषहरं ॥ ३५ ॥
बजेण सव्यि रयणा वेह पावति हीरए हीरा ।
कुरुविंदो पुण बेहद नीलस्स न अन्नरयणस्स ॥ ३ ॥
अयसार कच फलिहा गोमेयग पुसराय वेदुजा ।
एयाउ फूडवजा कुणति जे होंति कलकुसला ॥ ३७॥
कूहाण इय परिक्खा गुरु पिनाया य मुहमघारा य ।
साणाय मुह घसिया दुह घसिया रयण जाइमया ॥ २८ ॥
॥ इति वनपरीक्षा॥
अप मुचाहल-
गयकुम १ संखमझे २ मम्छमुहे ३ वस ४ कोलवाटे य ५।
सप्पसिरे ६ तह मेहे . सिप्पउड़े ८ मुधिया हुति ॥ ३९ ॥
मवय(पोह पीय रचा इय उत्तिम जयुडाय मज्झत्या ।
बट्टामलयपमाणा गयदजा हुति रज्जफरा ॥ ४॥
दाहिणषते संखे महासमुद्दे य कयुजा हुति ।
लहु सेया अरुणपड़ा नरदुल्हा मगलावासा ॥४१॥
मच्छे य साम वा ल्हुतुला विमलादिट्ठिसजणया ।
अरि चोर भूय साइणि भयनामा हुति रिरिकरा ॥४२॥
गुजसमा मदपहा हवति कम्छ वन सव्य भूमीसु ।
रज्जकरा दुक्खहग सुपवित्चा वसउदरणा ॥ ४३ ॥
रमपरीक्षा सूवरदाढे वट्टा घियवन्ना तह य सालफलतुला । चिट्ठति जस्स पासे इदेण न जिप्पए सोवि ॥ ४०॥ सप्पस्स नील निम्मल ककोलीफलसमाण लच्छिकरा। छल छिद्द अहि उवद्दव विसवाही विचु नासयरा ॥१५॥ मेहे रवितेयसमा मुराण कीलत कहव निवडति । गिण्हति भतराले अपत्त घरणीयले देवा ॥ ११ ॥ वाय छिज्जद कोवि हु जलबिंदू जलहमि वरिसते । मुवि मुत्ताहलरच्छी भणति चिंतामणी विठसा ॥१०॥ एए हुति अवेहा अमुछया पूयमाण रिरिकरा । लोए बहुमाहप्पा लहु बहुमुल्ला य सिप्पिभवा ॥४८॥ रामावलोइ बन्चरि सिंघलि कतारि पारसीए य । केसिय देसेस तहा उवहितः सिप्पिजा हुति ॥ १९ ॥ सव्येस मागरेस य सिप्पठडे साइरिक्ख जलजोए । जायति मुचियाइ सव्वालकारजणयाइ ॥५॥ सार वट्ट अमल सुसणि कोमल गुरु छ गुणा । ल्हु कठिण रुक्ख कररा विवक्ष सह बिंदु छह दोसा ॥ ११ ॥ ससिकिरणसम सगुण दीड इफगि कलुसिय हवइ । तस्स य खडस हीण मुल्छ निंबउलिए अर ॥ ५२ ॥ अहरूप पप्रिय असार विष्फोड मम्छनयणसम | करयाम गठिजुय गुरु पि वट्ट पि रहुमुल्छ ॥ ५३ ॥ पीयर अयट्ट तिहा सखुर छहसु खरड जह जुग्ग । सदोसे य दसंर्स इयराण दिट्टए मुल ॥ ५ ॥ ॥ इति मुत्ताहलपरीक्षा ॥
ठहरफेहविरचिता
अथ पनरागमणिर्यथा-
रामा गंगनई तड़ि सिंघलि कलसठरि तुवरे देसे।
माणिक्काणुप्पची विहु विहु पुण दोस गुण यन्ना ॥ ५५ ॥
पढमित्य पउमराय सोगघिय नीलगघ कुरुविंद ।
जामुणिय पच जाई चुन्मिय माणिक नामेहिं ॥५६॥
सूरु व्व किरणपसरा मुसणिड कोमल च अम्गिनिहा ।
ज कणयसम कढिया अक्खीणा पउमराय सा ॥ ५० ॥
किंमय कुसुम कसुमय कोइल सारिस चकोर अक्खिसमं ।
दारिमबीजनिह ज तमित्य सोगधिया नेया ॥५८ ॥
कमलालय विहुम हिंगुलुयसमो य किंचि नीलामो ।
खजोयकतिसरिसो इय वन्ने नीलगयो य ॥ ५९ ॥
पढम तह साव गंघयसमप्पह रंगबहुल कुरविंदा ।
पुण सचासं लाय सजल व इय सहाय गुण ॥६॥
जामुणिया विमेया जवू कणवीररचपुष्पसमा ।
मुहस्संतरमेय वीसं पनरस स क तिग विमुवा ॥११॥
मुछाय मुसणि किरणाम कोमल च रंगिल्छ ।
मुख्य सम महत माणिक हवइ अट्ठगुणं ॥१२॥
गयडाय जड धूम मिन्न हसणं सककर कठिण ।
विपय रुक्ल चतहा अर दोसा भणिय माणिक ॥१३॥
गुणपुवुन्न जहुत्त माणिक दोसपञ्जिय अमल ।
जो घरद तस्स रज पुत्त अत्य हवइ नूण ॥६॥
गुणसहिय पउमराय धरिए नरनाह आवया टल ।
सहोसेण उपजइ न ससय इत्य जाणेह ॥१५॥
भगुण विवन छाय सहसण जुय यस्य च खग च ।
इय माणिक भरिय मुदेसमट्ठ नरं कुणइ ॥५॥
सपरीक्षा
कर चरण वयण नयण सुपउमराय पइस्स जणयती ।
तो वहइ पउमराय पउमिणि सुयपउमजणणत्थ ॥ ६७ ॥
अहवट्टि उड्वट्टी तिरीयवट्टी य जा हवइ चुनी ।
सा अहमुचिम मनिझम कूडा पुण सव्ववट्टी य ॥ ३८ ॥
जो मणि यहिप्पएसे मुचइ किरण जमिग गयधूम ।
सा इदकति नेया चदो व्य मुहावहा सघणा ॥ १९॥
साणाइ फ्ठमराय जो छिनइ अगुली छिविय कसिणा ।
त च पहाउ सगम्भा चिप्पिडिया हवइ सा चुनी ॥ ७॥
॥ इति माणिक्यपरीक्षा समत्ता ॥
अथ मरकसमणिर्यया-
अवलिंद मलयपव्वय वष्वरदेसे य उवहितीरे य ।
गरुडस्स उरे कठे हवति मरगय महामणिणो ॥ १ ॥
गरोदगार पढमा कीडउठी दुईय तईय पासठती।
मूगउनी य चउत्थी घूलिमराई य पण जाई ॥ ७२ ॥
गरहोदगार रम्मा नीलामल कोमला य विसहरणा ।
कीडउठि मुहम णिदा कसिणा हेमामफतिला ॥ ७ ॥
घासवई य समक्खा नील हरिय कीरपुण्डसम णिश।
मगउनी पुण कठिणा कसिणा हरियाल मुसणेहा ॥ ४ ॥
धूलमराई गरुया तह कढिणा नीलकच सारिप्छा ।
मुल धीस विसोवा दसट्ट सह पच दुन्नि फमा ॥७५ ॥
रुक्स विफोडा पाहण मल क्कर जठर सज्वरस तह य ।
इय सत्त दोस मरगयमणीण साण फल वोप्छ ॥ ४ ॥
रुक्खा य वाहिकरणी विष्फोडा सत्पघायसंजणणी ।
मलिण महिरंपयारी पाहाणी यधुनासयरी ॥७॥
सरफेरविरचिता फकर सहिय अठत्वा जठरा जाणेह सन्ध दोसगिह । सज्जरसा मामिछु मरगइदोसाइ ताण फल ॥ ७८ ॥ सुष्छायं मुसणि अणेश्य तह लहु च वड़ । पच गुण विसहरण मरगय मसराल लच्छिकर ॥ ७९ ॥ सूरामिमुछ ठविय कर उयरे मरगयमि चिंतिजा । विप्फुरइ जस्स छाया पुनपविता धुरीणा सा ॥८॥ ॥ इति मरकतमणिपरीक्षा समता ॥ अथ इन्द्रनीलम्- सिंघलदीय समुम्भव महिंदनीला य चउ मुवमा य । छ दोस पच गुणाहि य तहेव नव छाय जाणेह ॥ ८१ ॥ सियनीलाम विप्प नीलारुण वत्तिय वियाणाहि । पीयामनील पइस घणणील हवाइ त सुर ॥ ८२॥ अम्मय मदि सककर गष्मा सचास जठर पाहणिया । समल सगार विवन्ना इय नीले होति नव दोसा ।। ८३ ॥ अम्मय दोस घणवय सककर वाहिठ मदिए कुछ। पाणिए असिघायं मिमविषमे य सिंहमयं ॥ ८४ ।। सवासे बधुयह समल सगारे य जठर मित्चस्वय । नष दोसाणि फलाणि य महिंदनीलस्स भणियाइ ॥ ८५॥ गुरुय तह य सुरंग मुसणिर कोमल मुरजणय । इय पच गुण नील घरंति मणि कोष पसमति ॥४॥ नील घण मोरकठ य अलसी गिरिकमकुसुमसंकासा । मलिपंखफसिण सामल कोइलगीवाम नव छाया ॥२०॥ हीरय धुनिय माणिक मरगय नील च पंच रयणमय । इय घरिए ज पुग्न हबइ न त कोहिदाणेण ॥ ८ ॥ ॥ इति इन्द्रनीलमहापचरयणुच्चयं ।।
सपरीक्षा अह बिहुम इसणियय वइडवो फलिह पुसराओ य। कोयग मीसम्मो भणिय इय सत्त रयणाण ॥ ८९॥ विदुम जहा- कावेर विशपव्वइ चीण महाचीण उवहि नयपाळे । वल्लीरुख जायइ पवाल्य कवनालमय ॥ ९ ॥ [पाठान्सर-वल्लीरूप फच्छ(त्यो वि पयालय होइ उयहिमन्मम्मि । पहुरच कठिण कोमल नह नाल सम्पमुसप्पेह ॥ ५०] बहुरंग मुसणिद्ध सुपसन्न तह य कोमल बिमल । घणवन्न वनरत्त भूमिय पय विदुम परम ॥ ९१ ॥छ॥ लहसणियओ जहा- नीलुज्जल पीयारुण छाया कतीइ फिरइ जस्सगे। त इसणिय पहाण सिंघलदीवाठ सभूय ॥ ९२॥ इकोवि य ल्हसणियओ अदोस अइ चुक्खओ विरालक्खो। नवगहरयण समगुणो भणति त सपुलिय केवि ॥ १३ ॥ वाहज जहा- कुवियगय देसोवहि वइहरनगेस हवइ वइदुज्ज । यसदलाम नील वीरिय सताण पोसयरं ॥ ९४ ॥ [पाठान्सर-रयणापरस्स मन्मे रुपियंगय नाम मणषयो तत्प । बाहरनगे बापा पागज बसपचाम ।। ५१] फलिह जहा- नयवाल कासमीरे चीणे कावेरि जठणनइतीरे । विधगिरि हुति पलिह अइनिम्मलदप्पणु ब्व सिय ॥९५ ।। [पाठान्तर-नपवाले कसमीर पीपे बरि अउणनाफूले । विमनग उप्पला फलिए यानिम्मल सेय ॥ ५४] रविकताओ अग्गी ससिकताओ झरेइ अमिय जल। रविकत चदक्ते दुन्नि वि फलिहाठ जायति ॥ ५५ ॥ २
परफेकमिरचिता
[पाठान्तर-उप्पतीमो अम्गी ससिकतिओ सय बमियजल ।
रविकत-पंदकते दुमि वि फलिहायो जाति ॥ ५५]
पुसराय जहा-
बहुपीय कणयबन्नो समणिो पुसरामो हिमवते ।
जायइ जो घरइ सया तस्स गुरू हक्इ सुपसन्नो ॥ ९७ ॥
[पाठान्तर-पहुपीय सहिरवणो ससिपेहो होइ पुसराको प ।
मीसम विण चंदसमो दुमि वि आयति हिमवते ॥५६]
कवेत्यण जहा-
पषणुप्पट्ठाण देसे जायइ ककेयण सुखाणीओ।
तक्य सुपछ महुक्य नीलाम सदिढ मुसणिर ॥९८॥ छ ।
[पाठान्तर-पवणुस्पठापदेसे बाया फळपगं मुखाथियो ।
वबम सुपकमहुय पय नीलाम मुदिर मुसह ॥५२]
भीसम जहा-
मीसमु दिणचदसमो पहुरओ हेमवतसंमूओ।
जो घरइ तरस न हवाइ पाएण अग्गि विजुमयं ॥ ९९ ॥
॥ इति रयणससक ॥
सिरिनायकुल परेवग देसे तह नव्या नईमझे।
गोमेय इदगोव सुसणिर पडुरं पीय ॥१०॥
[पाठान्तर-सिरिनापालपरेबमदेसे वह मम्मसनईमन्मे ।
गोमेय इंदगोव सुसणेह पंडुरं पीयं ॥ ५३]
गुणसहिया मलरहिया मगलजणया य लच्छिआवासा ।
विग्घहरा देवपिया रयणा सव्वे वि सम्हाया ॥१.१॥
मुधिय बज पयालय तिन्नि वि रयणाणि मिमजाईणि ।
वमवि जाइबिसेसो सेसा पुण मिमजाईओ ॥ १.२ ॥
इय सत्युत्तर(सप्तम) रयणा मणिय मणामित्य पारसीरयणा ।
धन्नागर संजुत्ता लाल अकीया य पेरजा ॥१.३॥
रमपरीक्षा [पाठान्तर-य सत्युपपरमा मणिय ममामिरय पारसी रयणा । पष्मागर समुचा अभेजे पाठसंजाया ॥५७] अइतेय अग्गिया लाल वदखसाण देसमि । जमणदेसे यकीक लहु मुल्ल पिल्लुसमरंग ॥ १० ॥ [पाठान्तर-इतेय अगीवण्ण लाल बहादसाए देसम्मि । पमणदेसे यकीफ ला मळ पिलुसमरंग ॥ ५८] नीलामल पेरुज देसे नीसावरे मुवासीरे । उप्पजइ खाणीमो दिहिस्स गुणावह मणिय ॥१.५॥ [पाठान्तर नीलनिर पेरुण देसे नीसावरे गुवासीर । उप्पमा खापीओ दिद्विस्स गुणावह मणिय ।। ५९] ॥ इति वनादिसर्वरताना स्थानज्ञातिखरूपाणि समास (1)॥ अयेतेषामेव मूल्यानि यक्ष्यते जथागाहा। पुन भावानुसारेण जथा- जे सत्य दिद्विकुसला अणुभूया देस काल भावम् । जाणिय रयणसरूवा भडलिया ते मणिजति ॥ १.६॥ हीणग अतजाई लक्षण सन्तुज्झया फुडफलका । अय जाणमाणया विठु मडलिया ते न कईयावि ॥१.७॥ मडलिय रयण दह परोप्पर मेलिऊण करसन्न । जपति ताम मुछ जाम सहासम्मय होइ ॥ १०८ ॥ पणिमो अमुणियमुखो हीणहिय मुणइ तस्स नहु दोसो। मडलिय भलियमुल्ल कुणति जे ते न नदति ॥ १.९॥ महमस्स अहियमुछ उचमरयणस्स हीणमुल च । जे मयलोयसाओ फुणति ते कुट्टिया होति ॥ ११ ॥ रयणाण दिट्ट मुह निरुड वर न होइ कईयाधि । तहवि समयाणुसारे ज वदृइ त भणामि अह ॥ १११ ।।
१२ ठकुरफेरुविरचिता तिहु राइएहिं सरिसम छहि सरिसम तदुलो य बिठण जवो । सोलस जवेहि छहि गुजि मासओ तेहिं चहु टको ।। ११२ ।। एगाइ जाव [था] रस तिग युट्टी जाम गुज चठपीस । घठ रयणाण मुल्ल तोलीण मुक्नटकेहिं ॥ ११ ॥ पच दुवालस वीसा तीसा पन्नास पचसयरी य । दसहिय घठसहि सय दो चाला ति सय वीसा य ॥११४॥ चार सय तह य छह सय चउदस सय उवरि विठणविठण जा । इकार सहस दुगसय मुलमिण इक हीरस्स ॥ ११५॥ अह इग दु कठ अट्ठय पनरस पणवीस याल सट्ठी य । चुलसीइ चठदमुत्तर सय च क्मसो य सट्ठिसयं ॥ ११५ ॥ तिमि सय सहि समहिय सच सया तहय वारस सया य । दो सहस कणय टका मुचियमुल्ल बियाणेहिं ॥ ११ ॥ दो पच अट्ट बारस अट्टार छवीसा य [याल] सट्ठी य । पचासी वीसा सठ सहि सय दुसय वीसा य ॥ ११८ ॥ चउ सय वीसा अह सय चठदस चठवीस पिहु पिटु सयाणि । गुजाइ [मास !] टक उत्तिम माणिक मुल्लु वरं ॥ ११९ ॥ पायड एग दिवढ दु ति चठ पण छच्च अट्ठ वह तेरें । ठार सगवीस चचा सट्ठि महामरगयमणीण ॥ १२ ॥ अस्यायं एप पत्रपूठिजत्रेणाह ॥छ॥ . २८ ५८ १२ मोती (५१२१९ 11 मरार । . .. बम समय गारपरे गा गाव बामनी ।। .
पापरीक्षा अरमासाय अहिय मासय अड्ड जाम चउ मास । तोरीण हेमटकिहिं मुल्लू कमेण मुरयणाण ॥ १२१ ॥ एग दुसढ छ नवग पनरस चठवीस तहय चउतीस । पन्नास लालमुल पठण एयाउ ल्ड्सणिययं ॥ १२२ ॥ पा अड पठण एग दु पच अद्वैव तहय पन्नरसं । इय इदानील] मुल्ल तहेव पेरोजयस्स पुणो॥ १२३ ॥ अस्यायं जत्रे जथा- मासा ॥ २॥ . ॥ ३ . - . ९ 14 . . सदसणी ॥ बीड 1 . ॥1 २ ५ ५ पेरोमा प १ १ ५ सिरि वर गुण अद्ध पाय अणुसार पाय करड च । टकिष्कि जे तुलती मुत्ताहल त भणामि अह ॥ १२४ ॥ दस वारस पन्नरसा वीस पणवीस तीस चालीसा । फ्नार(स?) सत्तर सय चडति टकिकि तह मुष्ठ ॥ १२५ ॥ पन्नास चालीस तीस पीस च तहय पन्नरस । यारस दस 8 पण तिय इय मुल रुप्पटकेहिं ॥ १२६ ॥ इति मुत्ताहल। अथवज जथा एगाइ जाम वारस तुलति गुजिफि वच ताणमिम । मुछ महरिएहिं ज भणिय त मणिमामि ॥ १२७ ।।
टारपेरुविरचिता पणतीस छब्बीसं वीस सोलस तेरस[य] उसेवा । अट्ठ च एग ऊणा जा तिय कमि रुप्पट्टकाय ॥ १२८ ॥छ॥ अस्यार्थ जत्रेणाह- - मोटी . १५ . " ॥ -- . ३ २ १५ २ . . प गुंगा ५ " . . ५ ५ . १ ५ ३ + मुद्रित प्रतिमें १२॥ यी गाथाका पाठ मित्र रूपमें मिसता मीर उसके नीचे यंत्ररूप कोष्ठक दिया गया है उसी मकगणना भी मिम प्रचारकी है। गाया भीर कोष्ठक निम्न प्रधर- [अब वि छा] दा तेरस सोलस पावीस तीस टक्याई । लालस्स माल एवं पेरुज इदनीठ सम ॥ १२३ अस्या पत्रमाह- मासा । ૨ २॥ ३ ४ हीरा ७ १६ । २०६०१००/१५०/२२०३४. १०१२०/२४|४८.९१० घूनी मोती २ ८.१२.१८.२००/४०५ मरा ४ ६।१.१.२२/३५५. बनीस । २ ។ दसणीया . सास ३ १३ ०२ ३. परामा । २ . - मपरीक्षा मुद्रित प्रतिमें १२४, १२५, १२६ इम : गाथाषि स्थानपर पाठमेदवाछी मिप गाया तथा नरे नीचे यंत्ररूपसे जो कोष्ठक दिये है सनमें भकादिमी मिम गिनती पता है। गाया और कोष्टक मिम्न प्रकार है- पारस पठदस सोलस पीसाई दसहिय च बाप सर्य । रकिफि बे तुलती मुत्ताहल ताण मल्लमिम ॥ १२४ चालीसं पणतीस तीस पठवीस सोलसिकार । अट्ठ छ इगेग हीम बाब दुकमि रुप्प टकाण ॥ १२५ एगाइ बाव पारस पति गुजिक्कि पक्ष ताणमिम । वीसाय सोल सेरस गारस नप इगुण आव दुर्ग ॥ १२६॥ मस्याथै पुनर्यप्रणाह- मोती टेकप्रति १२/१४|१६२.३०/४०५०/१०/७०/८०/९०/१०० प्य तेकन ४०३५/३०२४ १६/११८ ४ ३ २ हीरा गुंजा १ २ ३ ४ ५ ६ ८ १०/११/१२ सप्य टकम ८ ७ ६ ४ ३ २ अइ चुक्ख निम्मला जे नेय सव्याण ताण मुल्छु मिम । नहु इयर रयणगाण कणयर विहुमे मुल्ल ॥ १२९ ॥ गोमेय फलिह भीसम कोयण पुसराय वेहुज्जे। एयाण मुल्लु दम्मिहि जहिच्छ कज्वाणुसारेण ॥ १३०॥छ । [पाठमेद-भइ मुफ्त निम्मला जे नय समाण वाण मुलमिम । सदोसे सपमर्स ममालप मुख दसमस ।। २७ गोमेय फलिह मीसम कोत्यग पुस्मराप मारले । उचित पण छ टंका समयद विदुस मुलं ॥ २८ ॥ इति सर्वेपी मून्यानि समाप्तानि ॥]
फुरफेरनिरमिता सिरि धधकुले आसी कन्नाणपुरम्मि सिढि कालियो । तस्सुप ठकुर चदो फेरू तस्सेव मंगरुहो ॥१३१ ॥ तेणिह रयणपरिक्खा विहिया नियतणय हेमपालकए । कर मुणि गुण सेसि वरिसे (१३०२) अलावदी विजयरजम्मि ॥१३२ ॥ [पाठमेद-वेणय रयणपरिक्सा रहया संसेवि विष्ठिय पुरीए । कर मुगि गुण ससि परिसे अल्लावदीपस्स रमम्मि ॥१२६ ] ॥ इति परमजेन श्रीचद्रागज ठकुर फेरू विरषिता सक्षिप्तरमपरीक्षा समायो॥ १ पाठान्तर-फेरविरचित संक्षेप्यासपरीसा समाप्तः ।
ठकुर फेरू विरचिता प्राकृतमापायदा द्रव्य परीक्षा ॐ नमो कमलवासिणी देवी। कमलासण कमलकरा छणससिवयणा सुकमलदलनयणा । संजुप्तनवनिहाणा नमिवि महालम्छि रिरिकरा ॥१॥ जे नाणा मुद्दाइ सिरि ढिल्छिय टकसाल कजठिए । अणुभूय करिवि पचिउ वन्दि मुहे जह पयाठ घिय ॥२॥ त भणइ कलसनदण पदमुओ फिरऽणुमाय तणयत्थे । तिह मुल्लु तुल्छु दब्बो नाम ठाम मुणति जहा ॥३॥ पढम चिय चासणिय, वीयइ कणगाइ रुप्प सोहणिय । तइए भणामि मुल्ल, चउत्थए सव्य मुदाइ ॥ ॥ वार ॥ , चासणिय जहा- - - मुफ पलासकट्ठ गोमय आरम्नगा अजा अत्यि । कमि तिय इगे गि भाय एगट्ट पहिय त रक्ख ॥५॥ छाणिय सेर सवायं वधि गह वकनालि धमि मद । घम अंगार सवा मणि सोहिय उत्तरइ चासणिय ॥६॥ त पुणरवि सोहिवद पण तोला रक्ख वघिऊण गह। ता हवइ सह कर अइ निम्मर चासणिय रुप्प ॥७॥ ॥इति सर्व चासनिका मूलसोधनविपि ॥ सीसस्स अमल पत्च करेवि रहु खड तुलिवि सोहिज्जा । नीसरह रुप्प सयर सीस गच्छेद स्नरटि महे ॥८॥ १ - सरफेसविरचिता सय तोलामञ्झेण बारह जव सीसए हवइ रुप्प । पम्छा पुण पुण सोहिय तहावि निक्ण न कझ्यावि ॥९॥ ॥ इति नागचासनिका ॥ रुप्पस्स वीस मासा छटक नाग च देइ सोहिज्जा । जं जायइ ते विमुवा एव हुइ रुप्प चासणिय ॥१०॥ ॥ इति रुप्पचासनिका॥ नाणय सहक हरजय रीणी चकलिय टक दस गहिउ । पनरह गुण सीसेण सोहिय नीसरह ज रुप्प ॥ ११ ॥ तस्साओ पाहिजइ रुप्प सीसस्स ज रहद सेस । त चासणिय सरूव अन्न ज खरडि मन्झि हवे ॥१२॥ नीचुछ नाणयाओ कमेण चउ दु जव किंचि हीणहिया । संगहइ खरडि रुप्प अवस्स चासणिय समयमि ॥ १३ ॥ छरजय चासणिय दुग दह वह टकस्स मेलि गहि अड। पठण दु जवतरेस ह दु जवतरि वाहुइछ नूण ॥ १४ ॥ ॥ इति द्रव्यचासनिका ॥ पासणिय जव दहग्गुण जि टफ मासा हवति तस्सुवरे । अग्गिस्स मुसि दीयइ टकप्पइ जे जवा होति ॥ १५॥ त सय माझे रुप्प तहप्छमाणस्स पूरणे अत । तवमहियस्स पुण जुय सल्लाही सा मणिज्जेइ ॥ १६ ॥ ॥ इति सालाहिकाविधिः॥ सामनेण सुपनो वारहि वन्नीय मिचि पणओ य । पच जव हीण चिप्प पिंजरि यनी य पच तुले ॥१०॥ सिय खडिय लूण काठर सम मिस्सिय चुन सा सरोणीयं । मेलगय कणय चिप्पय करेवि तेण सह पदयव्य ॥१८॥ -- 1 प्रम्पपरीक्षा तिहु अग्गिय सलोणी सचि सलूणीहि मुज्झए चिप्प । इकारसीय क्नी इफारस जव भवे सुक्स ॥ १९॥ सय तोल कणय पइए ज घट्टइ सा सलूणिय चिप्पे । चिप्पे दहग्गि पछे जं घट्टइ त च कायरिय ॥२०॥ चिप्सस्स तिन्नि मासा पत्त करिवि मिचि कणय सह पाए । स तिहाठ जओ घट्टइ मितीमो पढम चासणिय ॥२१॥ पम्छा ति अग्गि पके पुणो वि तिय मास मिचि सह पइए। तेरह विमुव जवस्स य इय अंतरु वीय चासणिए ॥ २२ ॥ परपुग्न दहग्गि प[इ.]ए मिति सम हवइ तइय चासणिय । टकाण चफलीय गहिज्वइ य कणय चासणिय ॥ २३ ॥ ॥ इति सुवर्णशोधना चासनिका च ॥ मेलगइ रुप्प विमुवा दह तेरह सोल ठार उणवीसा । पच उण चठण तिउण विठण सम सीसय दिवा ॥ २४ ॥ सयल कुदव्य गग्छ खरहितरि रहइ सेस रुप्पवर । तं पुण विवष्ट सीसइ सोहिय हुइ वीस विसव धुव ॥ २५॥ ॥इति रुप्पसोधना॥ तुलिय सलूणीमामो महाइ गुणीय खरडि एप्परस । वट्टेवि मेलि पिडिय करिज कोम स चुन्न सहा ॥ २६ ॥ ततो करेवि कुट्टिय धमिज्ज घट्टेड तईय असुमल । हवइ दुभामिस्स वल तस्साओ अइय फुवा ॥२७॥ नीसरइ सयल रुप्प सीसं तय च आइ खरहि महे । सा खरडि पुण धमिज्बइ पिहु पिहु नीसरहि दुनेवि ॥२८॥ काइरिय पुणो एव कीरइ तस्साउ तय सह क्णय । नीसरह तस्म चिप्प हुइ सीस स्वरडि मझाओ ॥ २९ ॥ ॥ इति मिथदल शोधना।
२०
परफेसविरचिता
कजलिय मूसि प्रिय तोपाल नियारयस्स सुहम कण ।
सोहग्ग फक सज्जिय वसंस जुय कढिय हवइ दल ॥३०॥
॥ इति कणचूपर्ण शोधना ॥
चठ माय अमल तमय पर पिचल सोल माय सह कठियं ।
इय रीस कायव्व रुप्पस्स विसोव करणत्थे ॥३१॥
वीस विसोवा रुप्प मासा वीसाठ जं जि कड़िजा ।
तित्तिय मासा रीस दिज हवइ ते विसोव कस ॥ ३२ ॥
॥ इति रुप्पवनमालिका ॥
मइ चुक्ख रुप्प तबय कमि पनरह सह सर पर रीसे ।
इय माय पनियत्थे सोलस चठ फणय घडणत्थे ॥ ३३ ॥
जारिस बनी कीरइ तित्तिय दु जवहिय मिति कणओ य ।
सेस दु जवूण रीसं एव तोलिक एपद परं ॥ ३४ ॥
रीस सम रुणय पढम गालिवि पुण थोव फ्णय सह कढिय।
पुण सेस सहा पट्टिय ता हका जहिच्छ बनाम ॥ ३५ ॥
अथवा-
राम कर भाय मुलभ तारं मुणि सच माय सह कढिय ।
एयं सयस रीसं मुवन्न वनस्स हरण वरं ॥ २६ ॥
सेयालीस विभाय धुर कणय करवि एग एगूर्ण ।
तत्छि दिज रीसं क्मेण पाऊण छुइ वन ॥ ३० ॥
॥ इति कनकवनमालिका ॥
जवि सोलसेहि मासउ चहु मासिहि टकु तोलओ तिठणो।
सोलहि जयेहि वन्नी वारहि पन्नी महाकणओ ॥ ३८ ॥
वनी तुल्लेण हय मित्ति सुवनस्स अग्ध सह गुणिय ।
वारस मागे पच जहिच्छमाणस्स तं मुन्छ ॥ ३९ ॥
मम्यपरीक्षा नाणा कमी कणओ नाणा तुम्छेण जाम गालिजा। केरिस पन्नी जायइ अह एरिस वन्नि किं तुलो ॥ ४० ॥ जसु वनी ज तुल्लो सो तस्सरिसो गुणेवि करि पिंड । तुलि विहचे वन इच्छा वन्नी हरे तुल्छ ॥३१॥ ॥ इति स्वर्ण विवहार ॥ उग्घाड मूसि दुग सउ पडिय सो ढक मसि उद्देसो । भावट्ट खए गम्छा हरजद तह रीण बट्टे य ॥ १२ ॥ यणि घटणु जालणि सहस्सि तोलेहि रुप्पु चठमासा । कणओ सवाउ मासठ टकट्ठ सहस्सि दम्मेहिं ॥ १३ ॥ ॥ इति हास्य ॥ पहु सय ठुचरि कणओ चहु सय वत्तीस कणय टको य । तेवन्नि सह रुप्फ्ठ सट्ठि टकठ नाणठ ति बने ॥ ४ ॥ तोलिफरस सलूणी दम्मिहि वतीसि च हु कायरिय । रुप्पस्स खरडि सीसय पमाणि छह टक दम्मिके ॥४५॥ सीसस्स मली सीसस्स अदए तह य उठल खरडि पुणो । लोहदि लोह ककर इय अग्ध तेर वासट्टे ॥ १६ ॥ रुप्पय कणय ति घाठय इय तिय मुद्दाण मुल्छ दम्मेहिं । यनिय तह पमाणे सेस दु धाग्य टंकेण ॥ ७ ॥ नाणा मुदाण कए जारिस टको पमाणिओ छोइ । टकेण तेण मुल्ल गणियन्य सयल मुराण ॥४८॥ भणिसु हव नाणवट्ट दम्मितिहि जाम इचिय मुद्द । इय अग्घ पमाणेण इचिय मुदाण कइ मुल्ल ॥ ४९ ॥ रासिं तिगाइ गुणिय मज्झिम हरिऊण भाउ ज पर । त ताण मुद मुल्ल न ससय भणड फेस ति ॥ ५॥ ॥ इति मोल्यम् ॥
२२ परफेसविरचिता - -- अथ मुद्रा यथा- सवा इगवन्न दम्मिहिं पुत्चलिया खीमलीय पठतीसे। तोला इकु कजानिय वावनि आदनिय इगवन्ने ॥ ५१ ।। रीणी जे मुद्दा लग स तिहा गुणचासि तोलओ तेवि । सहयाल रुवाई खुराजमी सा पचासे ॥५२॥ वालिट्ट पाउ ओवम रुप्प मया तिनि होति तिहु तुल्छे । । सड सठ असी चत्ता तोला इको य वायनो ॥५३॥ सिरि देवगिरिउ वो सिंघणु तुल्लेण मासो, इको । । सतरह घिसुवा सहा रुप्पट ताराय मासो ॥ ५४ ॥ अन्न ज जि फरारिय खट्टा लग नरहवाइ रीणीय । तहं सयल विट्टि मुा अहवा चासणिय अग्गिमुहे ॥ ५५ ॥ ॥ इति रूप्यमुद्रो॥ - १ । . . . . पूतछी तो० ५॥ पीमठी कमानी मावनी ५१ रीणीमुद्रा रुवाई ४ पुराउमी पालिए नि। प्रति १५.पा.१ ८० वा. ५० था मीपणमुद्रा s४ वागमा.15०२ रीणी सठिया रुग मरहराति गरी पतेरपि अयया चामनी समाज मून्य। ५२ द्रव्यपरीक्षा कणय मय सीयराम दुविह सजोय तह विओयं च । वह वन्नी दस मासा अभन्नणीया सपूयवरा ॥ ५६ ॥ घठकडिय तह सिरोहिय अट्ठी वन्नी सवा चठ म्मासा । तुले कुमरु पुणेव भट्ठी वन्नी धुव जाण ॥ ५७ ॥ पउमामिहाण मुद्दा घारह वन्नी य तस्स कणओ य । तुल्लेण टकु इको सच जवा सोर विसुवसा ॥ ५८ ॥ देवगिरी हेमच्छू सवादसी सिंधणी महादेवी । ठाणकर लोहकुडी अट्ठी वाणकर पठण दसी ॥ ५९॥ खम्गघर चुक्खरामा सहनवी केसरी य छह सहा । सच जव दसी वझी कठलादेवी बियाणाहि ॥६॥ जे अनि अच्छु बहुविष्ह थरेहि तह मुड तुम्छु नबेइ । चठमासा दीनारो जहिम्छ बन्नी गुसारि फलो' ॥६१ ॥ ॥ इति स्वर्णमुद्रा ॥ " १ या १० सीताराम मासा १० १संयोगी १ वियोगी पानी परकीया ४॥ पा ८ सिरोहिया ८कुमर सिएपगिरि मासा ॥ या २२ पदमा १अप 50410 ३ मार देवगिरी मुद्रासमय पानी पिठराममाणे १. सिंपण १० महादेवी ८ ठाणापर ८ मोरफडी पापमपाण खापर. चोपीराम केमरी १० सौमोवी पीनार मा ४ २४ सरफेसविरचिता वाणारसीय मुद्दा फ्ठमा नामेण इकि सय मझे। तिमेव घाउ तुम्छे तोला सइतीस जाणेह ।। ६२ ॥ पच जव हीण वारह वन्नी कणो य टक इगयाला । छतीस अमल रुप्प तब चउतीस टकेव ॥१३॥ • पवमा १०० मध्ये पातु पटक ११ है सोनापानी ११ व ११ चीपा है ३५ सपा सोपा मावी विश्वा २० ₹ २४ ताम्बा पोपा अमम प्रपान इति पउमस्स मज्झे रुप्प कणय तय मासओकिको । सस दह पच जव कमि मुन्न चठ पनर विमुपहिया ॥ १४ ॥ इय एगि पउम तुल्लो मुणि ७ जव विमुवस सोल टकु इगो। जाणेह तस्स मुल्लो जइयल उणसहि भह सट्ठी'॥६५॥ • पदमा पसंतीन्मे है। अब ७७Int मासा १७०॥ पा चोक्षा। मासा १.१.sun १ कनक चोखा मासा ५०४ ताबा निमय भगवा तिघाउ समय पठमा समतुष्ठ विविहमुला य । भगवदसणिय नामे कारिय जियसन्त रायस्स ॥६६॥ भगवा मामापिय माम्य मुमा ११ तोस्मे मासा जप ७ भगत माम जितसप नृपारित मुद विलाई कोरं मासा नव तुछि सिनि घाम य । तंय दिवइमार्स सेस कणय रुप्प अहह ॥ १७ ॥ पठण ति टका मुन्ड इमस्स सेसाण कमिण पाठण । जा पाय टकओ हुइ इफारस मुद तुल्लि समा ॥ ६८ ॥ पिसाई कोर मुद्रा ११ वाटपे । मासा ९ मन्ये टंक ऽII 5155२ SPAISnsus SouISS।
द्रव्यपरासा १५ माहोवयस्स मुद्दा तुम्लो इफस्स सह चउमासा । संजोय तिग्नि घाऊ पिहु पिडु नामेहि त मणिमो ॥ ६९ ॥ रुख कणय गुज चठ चठ तवठ गुणवीस वीरवमो य । मुम्लु चठवीस जइथल हीरावमस्स वापीस' ॥७॥ तंच अढाइ मासा रुप्पु सुवन्नो य इकु इको य । तियलोयवम मुछ छचीस' विविह भोजस्स" ॥१॥ २४ पीरवरमु मासा ॥ सोनर ०रूपउ ० रावी४ यती ४ पात जांचा . २२ हीरावरमु मासा 80 भातु सोमर तांबा ०प ३॥ . . ॥ पिसोकपरमु १ मासा ४ मा • मा १ सोलमा एप्पो मा शतांगा • मोम माना वोल्प पिपिप मूम्प ०६पातु संभव। यहह तिय कमि घाऊ रुप्प कणय गुज अट्ठ पण अहुठ्ठ । त्यु भव ॥ सतर "धीसं १ मुल्ले चालीस तीस पीस धुव" ०२॥ पासम्म मासा सोना सपा तांबा ४. प.८ प८ १० ४॥ रा५ रा५ रा १७ २. १ रारारा २० ॥ इति त्रिधातुमिश्रितमुद्रा ॥ ४ परफेरविरचिता अथ विधातुमुद्राः- जे तोला जे मासा जि टक उल्लविय सयल मुद्देहिं । त सयमझे रुप्पठ जाणिजहु सेस तयो य ॥ ७३ ॥ खुरसाण देस संभव चिन्हक्सर पारसीय तुरुकीय । तपय रुप्प दु घाऊ इमेहि नामेहि जाणेह ॥ ४ ॥ भमइ य एगटिप्पी सिकदरी कुरुलुकी पलाहठरी । सम्मोसीय लगामी पेरि जमाली मसूदीया ॥ ४५ ॥ सय मुद्द ममि रुप्पट ति घट ति दुइगेग दुदु इग दु तोला। मुन ति ३ मुन• छ६ तु २ सवापण ५ छ ६ दु२ सढनव ९॥ पठणदुइ १॥ मासा ॥ ७ ॥ चउतीसं तेवीस चउतीसिगयाल असी सहि कमे। इगयाल सत्याल पणपन्न याल टकिके" ॥७॥ ॥ इति खुरसाणीमुद्रा । विवर जत्रेणाह- मा . २ २५ मामा मुद्रा १०. मम्ये पा तो २१ गटीपी १०० माये रूपा हो। मा. २४ सिकम्पी १०० मध्ये रूपा २ मा. ४१ कुम्लुकी १०० मध्ये सपा मा ६ ८० पसादरी १०० मध्ये रूपा १ मा २ ६० समोसी १० मध्ये रूपा १ मा ५ ४१ गामी १०० मध्ये पा २ मा ४७ परी १०० मध्ये पा मा २ ५५ माछी १. मम्मे कपा भाव ४८ मसूदी करारी १०० मध्ये रूपा ૨ अवदुल्ली तह कुतुली तुछि सवापण दुमासिया मुळे । सट्टि असी तह रुप्प दु दु जव घठ सोल विवकम्मे" ||८|| R - . म१० . मध्ये रूपा म.८० भपाती १ मासा ५१ मध्ये रूपा पष २६४ ऋतुठी १माला २ जय ॥ ॥इति अठनारीमुद्रा ॥
२७
मध्यपरीक्षा
विकम नरिंद मणिमो गोजिग्गा अउणतीस तोल रुवा ।
उराहा पणवीस सवा रुमे अहुठ चउ मुझे ॥ ७९ ॥
भीमाहा छव्यीसं तोला मासडु चारि टकिके ।
चोरी मोरी तोरा पणवीसं मुल्लि चारि सवा ॥८॥
करह तह कुम्मस्वी कालाकचरि य छक करि मुन्छे ।
सय मझि अट्ठमासा सतरह तोला य खलु रुप्म" ॥ ८१ ।।
॥ इति विक्रमार्कमुठा ॥
१५
.
.
a
.
.
गोजिगा १०० मम्ये रूपा तोळा २९ मासार प्रति ॥
ग्राहा
१०० मध्ये रूपा तोमा २५ मासा ३ प्रति ४
मीमाहा १०. मम्मे रूपा तोला २६ मासा on प्रति .
• चोरी मोरी १०० मध्ये स्पा वोला २९ मासा. प्रति ॥
१०० मध्ये पावोसा १७ मासा८ मति
कुर्मरूपी १०० मध्ये रूपा तोसा १७ मासा ८ प्रति
• साफपारि १०० मापे सपा पोमा १७ मासा ८ मति.
गुजरवइ रायाण यहुविह मुद्दाइ विविह नामाइ ।
ताण थिय भणिमोह तल्ल मुल निसामेह ॥ ८२ ॥
कुमर अजय मीमपुरी लूणवसा रुप्पु टक पणवाना ।
पथ नव विमुख मुल्लो तुम्हे चउमास तेर जवा ॥ ८ ॥
वीसलपुरीय छह करि कुडे गुग्गुलिय टक पक्षास ।
बुछहर पनर तोला महुट्ठ मासा छ सह करे ॥ ८४ ॥
अजुणपुरीय तोला वारह सहाय मुल्लि अट्ठ करे।
कझारिया चठदस तोला मासा ति सचेव ॥ ८५ ॥
नव करि असपालपुरीगारस सोला अहाइय मासा ।
सारंगदेव नरवइ तस्स इम संपवक्खामि ॥८॥
सोढरपुरी छ तोला मासा अट्टेव मुल्लु पन्नरसा ।
पणमासा वहतोला दस करि लाखापुरी जाणे ॥७॥
परफेरविरचिता १०० मा० १०० मा०४ ४ मा०४ मा० ४ मा०६ मा० ८ १२ १०० मा० ॥ मा०२ मा०२ मा०८ मा०५ ५४ कमरपुरी मध्ये बोला ० मजयपुरी माये तोमा १८ ५० भीमपुरी १०० मम्मे सोळा ५४ सावणसापुरी मध्ये तोडा १८ ८ मईमपुरी मध्ये तोळा पीसगपुरी २०० मध्ये तोखा १५ करेगूगळे - रोमहर मध्ये तोला १५ ७ फयरिपा १.० मध्ये सोळा १४ ९ आसपाठपु मध्ये सोसा १५ सोसपुरी १०० माये तोमा मामापुरी मध्ये होगा गविका य पच तोला रुप्पट सयमझि वीस करि मुझे। पटिया रजपलाहा सोलह करि छ तॉल अहुठ मसा ॥८॥ घेवलय सह सोलस रुप्पु छ तोलाय मासओ पठणो । श्य इतियाण तल्लो मासा पचेव इकिको ॥ ८ ॥ अट्ट करिवि सट्ठ सया तोला सदवार तुलि मासाठा । दस तोल सस्त मासा वराह नव सह टकीण ॥९. वारह सह करेषिणु तोल? या विनाइका चदी। कन्हापुरी छ सहा कणु पनरह तोल अहुठ मसा ॥११॥ वाण इगवीस तोला अघमासठ रुप्पु पच इगि टके । मछवाह छ करि सोलह तोला मासट्ठ रुप्पु सए ॥१२॥ चठतीसा पइतीसा छत्चीसा तह य सचतीसाय । मालधपुरि छारीया चासणिए मुलु एयाण ॥ ९३ ॥ ॥ इति गुमरीमुद्रा ॥ २० पविणा १६ परिया मम्मे तोला १०० मध्ये होता १०० मध्ये होगा १०० मम्पे तोता ६ मा० मा० ॥ मा० मा० वा मा० ३१ मा १५ वसा ८ साठसया ५पह मुंद १२० दिमाया भारपुरी ५ वाणमुद्रा मम्वाहा १२ १० ८ ALA २१ मान मा० मा०८ १०० माये ताखा द्रव्यपरीसा मालविय क्तमडिया तोला अट्ठाय सह वारि करे। दिउपालपुरी पनरह तोला पण मास छह सहा ॥ ९४ ॥ कुडलिया छह तोला पठण छ मासा य मुछि पन्नरसा । मासट्ठ पच तोला बारह जब कठलिया सतरं ।। ९५॥ वावीस टक दव्वो तेरह सट्टा छडुल्लिया होति । सेलकी तुगह पण तोला सियमास चठवीस (उणवीसं1) ॥९॥ इय इचियाण तुल्ल चठमासा दह जवा हवति धुव । जानीया चिचठठी वीसं दवो य पण तोला ॥ ९ ॥ ८ . १ १० उलिपा मुत्र ६ ५ १ al ४ ५ . प्रति माम १०० मरूपातो. मा०वोस्पे १२५ चौघीया था दिग्पालपुरी रलिया २३॥ मुखिया सेकी वोगर २० गामीया चितीशी जकरिया गलहुलिया वावीस तीस मुख तह दव्यो। कमि चारि तिनि तोला छ जव चठम्मास चठमासा ॥९८॥ मासह इषु सोलठ रुप्पो य रवालगा य छप्पना । सिवगणय पचहचरि मुल्लि सवा सोलओ रुप्पो ॥ ९९ ॥ घउदस सवा चउदसी तोला वपरस्य मलित सच करे । सिह चोर मार मलुवा तेरह तोलाय सच सत्र सवा" ॥१..॥ ॥ इति मालधीमुद्रा ॥ . . ४ ८ . प्रति नामानि १०० माये कपातो. मा० तोम्ये १० २२ सकारीया माम १००मध्ये ४ ३० गालिया ५. पागा मुद्रा शरमाये । ७५ सिपगणा शतमम्ये ७ पापरा माम मुद्रामध्ये १७ मल्लीता माम मुद्रा मध्ये १५ १ ७ सीहमार नाम मुद्रा म० ७ चोरमार माम १० म. ० २० ठकुरफेरुविरचिता चाहही तिलि कमसो दुउत्तरी अंककी पुराणीय । तिति दुतोल दहति दह मास वीस वतीस पणतीसं ॥११॥ आसलिय सतरहुत्तरि दु तोल छम्मास दव्यु चालीस। आसल्ली ठेगा महि छ टक कणु मुल्लि पन्नास ॥ १.२॥ आसलिय नविय तुले सतरह तोला सवाय इगि टके। टक अढाई रुप्पउ सय मझे वीस मासाय ॥ १०३ ॥ २ ॥ इति नलपुरमुद्रा ॥ २ १ म० २८ पोहरी मोठरी १०० मम्मे पो० ३ मा० १० प्र. ३२ चांही आंककी १०० मध्ये तो. ३ मा० । प्र० ३५ पहिरी पुराणी १०० माये वो० २ मा० १० प्र०४० मासली सतगोचरी मध्ये तो० २ मा० म. भासही ठेंगा १०० मध्ये वो. २ मा० म०१७ मासली नबी ठेघ १ प्रति तुलित तोला ११ मध्ये रूपा तोटा २० सटरमध्ये रूपा दो ५(1) चदेरियस्स मुद्दा मुझे कोल्हापुरीय छह सहा । पनरह तोला सतिहा तुम्ळे चउ विमुव टकु इगो ॥१.४ ॥ सह सह बारह तोला जीरीय हीरिया सयगे । वारट्ट करिवि स कमे टकइ इके वियाणेछ ॥ १.५॥ पव्यु अढाई तोला अकुडा सय मच्क्षि मुछ चालीसा । जाइत मड मास नव जब दन्यो मुछेण विवढ सय ॥१६॥ सह सउ वीर टका जब तेरह सात मास सय मो । लपवण सवा छ मासा रुप्पु सए मुछ असी सयं ॥१०॥ राम दु जव पउमासा दुनि सया मुल्लि टकए इके । बब्बावरा मसीणा खसरं च सय नकद अहिय ॥१.८॥ ॥ इति पदेरिकापुरसत्कमुद्रा" ॥
द्रम्पपरीमा २१ अब प्रव . प्र० जम 0 ० . ० मा०४ मा०६ मा०६ मा०६ मा०८ मा०७ मा०६ मा०४ मा०५ मा०५ मा०५ अ. ४ . . म ८ ० ८ . म० ८ म. ६ा कोल्हापुरी १०० मध्ये सो० १५ म० १९धीरिया १०० मध्ये तो ८ ८हीरीया १०० मध्ये तो० १२ प्र० ४० मफुला १०० मध्ये तो० २ प्र० १५० बात १०० मध्ये तो प्र० १३० पीरमुंद १०० मध्ये तो प्र० १३ प्र० १८० उमणी १०० माप तो.. म०२००राम १०० मध्ये तो प्र०१९०दम्बावरा १०० मध्ये तो प्र० १९० मसीणा १०० मध्ये वो प्र०१९०पसर १०० मध्ये तो रसि चंदेरिकापुरमुद्रा। जालघरी पडोहिय जइतवाहे य रूपचपाहे । रुप्प चउ तिन्नि मासा दिवढ सय दु सय टकिके ॥१.९॥ तिन्नि सय इकि टके सीसडिया हुइ तिलोयचदाहे । संतिठरीसाहे पुण चारि सया इकि टकेण ॥ ११॥ ॥ इति जालधरीमुद्रा ॥ २२ प्र० १५० जार्यवाहे १०० मध्ये कपा मो०० म०२०० रूपर्यवाहे १०० मध्ये म० २०० मिमोकचंदाहे १०० माये म०४०० सातिउरी साहे मध्ये अथ दिल्लिकासत्कमुद्रा यथा अणग मयणप्पाहे पिघउपलाहे य चाहहपाहे । सय मज्झि टक सोलह रुप्पउ उणवीस करि मुल्लो ॥११॥ ॥ एता मुद्रा राजपुत्र-तोमरस्य । मा०५ " .... सात १ मध्ये । प्रति मामानि मुद्राना अपगपछाहे १९ मदनपठाहे पिशउपमाहे १९ बाहर पसाहे प्य वोमा मासा ५ ४ ५ ४ " सत पत सत१ " ४ "
ठकुरफेसविरचिता
सूजा सहावदीणी तहेव महमूद साहि चठकडिया।
टक चउद्दस रुप्पउ सय मज्झे मुछ इगषीसं ॥ ११२ ॥
कडगा सरवा मखिया सवा छ तोला य रुप्पु सोल करे।
कुन्डलिया पण तोला छ मास अट्ठार इगि टके ॥ ११ ॥
छुरिया जगडपलाहा चठतोल दु मास रुप्पु पणवीस ।
दुकहीटेगा अहिया इगि मासइ रुप्पि तेवीसं ॥ ११ ॥
कुव्याइची जजीरी तह य फरीदीय परसिया मझे।
वस मासा तिय तोला मुळे टकिफि छव्वीसा ॥ ११५॥
चठक कुवाचीय वफा सवा ति सोला य मुल्लि इगतीसा ।
सतिहाय तिमि तोला खकारिया तीस करि जाण ॥ ११६ ॥
उणतीस निवदेवी मुळे तोला ति सा चउमासा ।
धमडाह जकारीया अहुट्ठ तोलाऽडवीस करे ॥ ११ ॥
पढमा अलावदीणी सयमा समसीय पारि टक सवा ।
इगसहि इणि टका सचरि चउ टक मोमिणिया ॥ ११८॥
दुक सेला पच रवा तोला तिय दिवदु मासओ रुप्पो।
बच्चीस करिवि मुळे टकद इके वियाणिजा ॥ ११९ ॥
तितिमीसि फुक्लाणी खलीफती अघचदा सिर्फवरीया ।
नव टक रुप्पु मुळे चठतीस करेवि इय समसी ॥ १२ ॥
समसहीण मुयाण रुकुणी पेरोजसाहि पणतीसं ।
तह वारसुचरी पुण इग मासा हीण तिय तोला ॥ १२१ ॥
समसदि सुया रदीया सस्स रदी दुन्नि विछिय घुदउवा ।
सढ सोल पठण तेरह टकक उणवीस इगतीसा ॥ १२२॥
नवगा पणगा मउजी मासा नव सह तोलओ इको ।
पणपन्न सोलहुतरी दुइ तोला मुल्लि पचास ॥ १२३ ॥
उणचास पनरहुतरी दुइ तोला इफु मासओ रुप्पो ।
छका दु तोर दु मासा सइंसाल मउजिया एव ॥ १२ ॥
प्रम्पपरीसा पेरोजसाहि नदण अलावदीणस्स एय मुद्दाइ । बलवाणीय इकगी भड़ा तिय टक मुल्लि असी ॥ १२५ ॥ बलवाणि वामदेवी तिस्सलिय चठकहीय सगवन्ना । मुळे दिवड तोलर सय मझे दन्यु नायव्यो ॥ १२६ ॥ तेरहसई मरुट्टी नवा करिवि इकु सोलओ रुप्पो । उच्च मूलत्थाणी नवमासा रुप्पु तीस सय ॥ १२७ ॥ मरकुट्टीय सुकारी वारह नव नवइ १२९९ अंकितस्स महे। तोलिक अब मासठ सचासी मुल्लि जाणेह ॥ १२८ ॥ सीराजी दुइ तोला छम्मासा रुप्पु मुलि इगयाला । घउपन्न मुक्खतलफी मासा दस तोलओ इको ॥१२९ ॥ फाल्छणी तह नसीरी दकारी सत्त छ पण १५ टक कणो। सगयालीस पचासं पणपन्ना कमिण टकिके ॥ १३ ॥ सचावीस गयासी दुति हिय सयमज्झि १०२।१०३ टक दस रुप्प । मठजी सइ पण तोला समसी हुय रुप्प टकाय ॥ ११ ॥ जल्लाली तह रुकुणी सहा पण टक रुप्पु सय मझे । मुम्छ सवार दम लहति घट्टति विवहारे ॥ १२ ॥ अमन देससंभव अमुणियनामाइ ज जि मुद्दाइ । ते पनरह गुण सीसइ सोहिवि कणु मुजु नबेई ॥१३॥ २४ नामानि मुद्रानो शतमम्ये सूजानाम मुद्रा सत सहापदीनी मुद्रा सदर माम्बसाही मुद्रा सत! परफडीया मुद्रा सत १ कटका माम मुद्रा सत्तर सरवानाम मुद्रा सव मलिया मुंद १८ रसिया मुंग २५ पुरिपा मुर जगटपटादामाम २॥ करीया रंगा २६ उपाापी पीरी मुद्रा रूप्य तोठा मासा ४ ८ मति २१ 8 ૨૨ २१ 1 ४ ४ " " h " " " " " " M 7 " 1 ठकुरफेषिविता " " । " " 5 " " " " " " . , m , " " " " , " " M . M " प्रति नामानि मुद्राना शत १ मम्मे पप्य तोला मासा फरीरी माम मुदा परसिया मुद्रा " परक माम मुद्रा सव ३ ११ वफा नाम मुद्रा वर्ड ३ सकारिया नाम मुद्रा मीषदेवी माम मुद्रा । २८ अमराहा नाम मुद्रा , २८ जकारीया नाम मुद्रा । १ मसापीवी मुद्रा सतका समसी मुद्रा " मोमिनी अळाई मुना १ ३२ सेमा समसी तितिमीसी माम मुद्रा, इम्पसानी २४ बलीफती ४ मपदा सिकारी नाम मुद्रा यकुमी माम मुद्रा, पेरोज़ साही पाहोचरी री दिक्षिका टकसामर्स मध्ये रदी पुदीषो रेफशा वाक पारनवका मरजी १ पमा मग्गी नाम मुद्रा सोठोत्तरी मुद्रा सत १ मध्ये पनहोत्तरी मुद्रा सत १ मध्ये छका माम मुद्रा सटमध्ये घसवाबी इकांगी सत १ मम्मे बसवामी वामदेवी सत१ मध्ये श्रीफलीया तेएसा मपेटी सव १ मध्ये पां मुखपाणी सत१ मध्ये मगरगामी मुद्रा सत१ मध्ये सुपारी नाम मुद्रा सत१ मध्ये २ सीराजी माम मुद्रा सत १ मप्ये २ मुम्तमफी मुद्रा सत १ मध्ये १० कान्हुणी माम मुम्रा सत १ मध्ये ર मसीरी डिस्पो टकसामाता रकारी माम मुद्रा सत १ मध्ये २७ गयासी दुगाणी माम मुद्रा २. मरजी माम मुद्रा तिगानी सत १ ४८ जगाछी माम मुद्रा पर्तमाना रुकुमी नाम मुद्रा प्रयतमान तिमी रिम्पो राम्ये पचमाममुना। ४ D .............no ce-naar........... " A २ २ " . h ८० . " " . ८७ " । " २ " H भा H
प्रम्पपरीक्षा
संपह पवट्टमाणा मुद्दा अल्लावदीण रायस्स ।
दुविह दुगाणी दब्यो पठणा दस अट्ट टक सए ॥ १३ ॥
छग्गाणी पुण दुषिहा सहा पणवीस पउण पणवीसा ।
टंक सय मझि रुप्पउ सड़ा चउ दु जव नव विमुवा ॥१५॥
इग्गाणी सय मझे तयठ पण नवद टक पण दव्यो ।
रायहरे विवहारे गणिज्ज इग्गाणिया सयल ॥ १३६ ॥
इग पण वह पन्नासं सय तोला तुम्लि हेम टकाइ।
चठ मासा दीनारो रुप्पय टको य तोलीणो ॥ १३ ॥
चठ मास जाव पडिय सहावदीणस्स तुम्छ मुद्दाइ ।
दम्म गाणी टका रुप्प सुवम्नस्स तोलीणा ॥ १३८ ॥
॥इति अश्वपति महानरेन्द्र पातिसाहि अलावदी मुद्रा
॥
१५
बार
०पप्प नरमाई मति गम्यते ।
छगानी सत मध्ये तोट
१० ज्यानी सवमप्ये तो८
३० दुगानी सत मध्ये हो।
१० दुगानी सव मप्ये तो२
६० इमानी सतमग्ये तो
बोपतांचा सतरफ पूरणे सपे मुद्र
मा
मा
मा३
मा८
मा८
प
प्र०
इचो मणामि संपइ कुदुखुदी रायवदिछोठस्स ।
चठरेस वट्ट मुद्दा नाणाविह नुल मुल्लो य ॥ १३९ ॥
यचीस फणयमया रुप्पमया वीस दम्म सत्तविहा ।
पठविह समय साहा मुद्दा सव्येवि तेसट्ठी ॥ १४ ॥ दारं ॥
इग पण यह तोलाइ यस हिय जा सउ दिवट सउ दु सय ।
इय यह हेम टंका घठरेस पुणोवि एमेव ॥ ११ ॥
टारफेमविरचिता तेरह मासा सतिठा सुषन टको य सोनिया तिविहा । इग मासिया दुमासिय चठगुंजा एय बत्तीसं ॥ १४२ ॥ ॥ इति स्वर्णमुम्राः ॥ - - हेमटका मामा वीस्ये तोलिया पंच तोलिया १ ०६स ठोमिया १ ०पंचाश तोलिया ०सय तोलिया न हेमदीना मासा ४ अप्पन सपिफोहिपा। । काफमुद्रा २२ पान २९.रंका मामाविमा पोखो यथा- १५. सपाघर माना वो तो ८. ४० ५० १०७ १.१००१५० २०० १५. पशुकोण तोम्मे कमर पत् मिमित। २ मासा १३ संचार। 1. अपर मामा चम्पुमुद्रा- १माप्ता १ । १मा० २।१.४ रुप्पिग तोली वट्टा चउदस घठरेस हेम सम तुला। फ्य विहा रुप्पझ्या इग दु ति चठमासि अब तुला ॥ १४ ॥ ॥ इति रुप्यमुद्रा सम्पमसर १०मवरणम् । १५ का मुद्रा मानाविषयो। १ संचाधर तो०१ १५ पाया। वोडो पण- ८ १.७० ८०१ १००११० ०० पर्व। पीपा मुना माना तोडो। १मासामासा २१मा। १मासा१मासा संपा २० मम्पपपता दुग्गाणी य छगाणी तुल्ले मुल्ले य रुप्प तथे य । अल्लाई सम जाणह अन्ने अग्ने वि ही मणिमो ॥ १४ ॥ चठगाणी वट्ट सए सोल सवा टक नव जवा रुप्प । घठमासा तुम्छेण न संसय इत्थ नायब ॥ १४५ ॥ चठवीस वारसट्ठ य अडयालीसाण मुद चरंसा । तुल्ले य रुप्प सवय संखा कमि अट्ठगाणीओ ॥ १४६ ॥ तिचीस टक नव जव चउ विमुवा रुप्पु सेस तंबो य । सय अठ्ठगाणिएहिं इगेगि तुलो य घउमासा ॥ १४७ ॥ ॥ इति द्रम मुद्रा ॥ प्रम्मा मुना सप्त नामाषिष वोळो भूगो। चार मुद्रा सोम्ये १ १. दुपाणी १०० मध्ये पातु २ t.८मवाती सप्य । है. ९९ तान १. पनगानी १०० मध्ये पातु २ t.१६मा०१बसप्प १८३ मा०२ सय ७प्रांबा १७गानी १०० मध्ये पातु २ ई.२४ मा०३बदशकप्प ५मा० अब १४ाम्र पतुरसमुद्रा १ अठगानी १..मध्ये t.०मा० अय९४० t. मा०३० प्रा.१० १ पाएगानी १०० ₹१५० मा०१०१५-१२७४६. मा०४०.२.१० १परवीसगानी तो है०३ (३००१) मा०३०१५ २८.३० मा०८०1Rs.15. १ अरठागीसगानी t.१(१०) पाणीसगानीयो रिगुण प्रय। वान मुद्रा साहा से। ०७१मासा • मासा । 05मासा..७५मासा५ te रफेरविरचिता विसुवा सवाय विसुवा अघवा पइका य तंब चउरसा। तुल्लेण कमि चढसा मासाओ जाम पण मासा ॥ १८॥ ॥ इति साहे मुद्रा ॥ एव दव्यपरिक्ख दिसिमिचं चदतणयफेरेण । मणिय सुय बघयत्थे तेरह पणहत्तरे वरिसे ।। १०९ ॥ इति श्रीचन्द्रागज ठकुर फेरू विरचिता' द्रव्यपरीक्षा समाप्ता। - .
ठकुरफेहविरचिता
धातू त्पत्तिः।
भय घातूत्पतिमाह-
रुप्प व मट्टियाओ नइ पव्ययरेणुयाउ कणमो य ।
पाठव्यामो य पुणो हवन्ति दुनिवि महाघाळ ॥१॥
पट्ट व कीडयाओ मियनाहीओ हवेइ कत्यूरी ।
गोरोमयाठ दुव्वा कमल पकाउ जाणेह ॥२॥
मठरं च गोमयाओ गोरोयण होन्ति सुरहिपिचाओ।
चमरं गोपुष्छाओ महिमत्यामो मणी जाण ॥३॥
उमा य पुकामओ दन्त गइदाउ पिम्छ रोमा(मोरा ?)ओ।
चम्म पसुवग्गामो यासण पारखण्डाओ ॥४॥
सेलाठ सिलाइ, मलप्पसाउ हुइ जवाइ घरं ।
इय सगुणेहि पवित्रा उपती जय नीयामो ॥५॥
इत्युत्पत्तिः ।
अप करणीयमाह-
पिचलि जहा-
ये मण अघा(यटिय कुट्टिषि रघिज गुडमणेगेण ।
ज जायह निधीढ तयर तयय सहा कढिय ॥६॥
सा पीस विमुव पित्तल दुभाय तण पनर विमुवा य ।
तल्लेण तबयाओ सपाइया दछ मूसीहिं ॥७॥
तन्मय जहा-
पष्धेश्य स्वाणीओ आणवि कुट्टिज घाहु मट्टी य ।
गोमयसहियं पिरिय फरेवि सुकवि य पइयव्व ॥८॥
व्हरफेरिचिता पच्छा स्वाद खिविय घमिज नीसरई सन्व मलक । ज हिढे रहइ दल त पुण कुट्टेवि घमियव्य ॥९॥ तस्साउ कहा पयर त तबमिट्ठय बियाणेह । घुडाणए पुणेव गुट्ठ गुलिय तमो हवद ॥१०॥ अथ सीसय जहा- ना(नगखाणीओ पाहण कडिवि कुट्टेवि पीसि घोइज्जा। ज होइ त मलदल दुभाय तइयस लोहजुय ॥११॥ सय सय पलस्स मूसी ते चाडिवि तीस मंगए इके। आवट्टिय उल्लेण चउत्यभागूण हुइ सीसं ॥१२॥ लोह सारं प्य पुणो उप्पची पाहुपाहणाभो य । पित्तल कसाईण विणहए होइ भिंगारी ॥ १३ ॥ अय रंगय जहा- रंगस्स घाहु कुट्टिवि करिज कोमंस चुण्ण सह पिंड । धमिय निसरई ज त पुण गालिय कविया होन्ति ॥ १४ ॥ अप कसय जहा- कविय सेरकारस मणेग सम्ध च फ्यर गुट्ट वा । आवट्ट पतिय मुद कसं हुइ वीसयसूण ॥१५॥ भय पारय जहा- पारस्स पाहु ठविय तस्सोवरि गोमयहकुढि कुम्वा ।। मदग्गिघमियमाणो अवि संचरइ सस्स महे ॥१५॥ अहवा रसव भणन्तेगे तरुणत्पी तत्य करवि सिंगारं । तुरियारूद सकिवि अपुठ्ठपयरेहिं नस्सेइ ॥ १७ ॥ क्यामो तस्स फए पारं उछलवि घावए पम्छा । बाहुबह दहमकामो पुणोवि निवडेइ तत्वे व ॥१८॥ .
४१
-
पावत्पत्ति
ज रहइ नियट्ठाणे कत्यव कत्येव खाखडीहिं ।
तत्थाठ गहइ सा तिय उप्पची पारयस्स इम ॥१९॥
अथ हिंगुलय जथा-
एगमण पारह तहा गन्धय चुन्न च सेर दस सिविठ ।
दूरामो आसन्न मदग्गी कीरए मिस्सं ॥२०॥
कुट्टेवि तहिं खिविज्जइ मणसिल हरियाल सेर पा पाय ।
पूरिवि कच कराव दहिजइ खोरचुमेण ॥ २१ ॥
मढि मट्टिय सदलेण सिनि अहोरचि वहि जालिज्वा ।
जाव मुगध सा हुइ सेर छयालीस हिंगुल्य ॥ २२ ॥
अथ सिन्दूरं जहा-
सीसयमणेगमाझे वसयरक्खा वहर सेराइ ।
गालिपि मेलिवि कुट्टिवि छाणवि जलि घोलि घरियव्व ॥२॥
निचारिठण नीरं ज हिढे तस्स पठिय क्य सुक्क ।
धणि कुट्टि हखि छाणिय ठवि मट्ठी अग्गि कायव्य ॥ २४ ॥
जह जह लग्गइ ताव तह तह रंग चढेइ जा ति दिण ।
सेरूण सिन्दूरं तग्गालिय हा पुण सीसं ॥ २५ ॥
एव च मणिय संपइ कुघाउमो सुघाउ भणिमोह ।
कविय रगे फणय सोल्य सय जव चठत्तीस ॥ २६ ॥
सयतोलामम्झेण पारह जव सीसए हवइ रुप्प ।
पच्छा पुण पुण सोहिय सहावि निकण न कइयावि ॥२०॥
अथ धातोकरणी विधि-फप्पूर अगर चदण-मृगनाभीत्यादि ।
दाहिणवत्त संख इगमुह रुदफ्त सालिगार्म च ।
देवाहिट्ठिय तिनि वि अमुल्ल सपहाय भणियन्ति ॥ २८ ॥
४२
-
मारफेविरचिता
खीरोवहिसंभूय विभूसणं सिरिनिहाण रायाण ।
पाहिणवत्त संस बहुमगलनिलयरिदिक ॥ २९ ॥
यदृन्ति रेहकलियं फ्चमुह सम्म सोलसावत्तं ।
इय सखं विरिकर संखिणि हुइ दीहहाणिकरा ॥३०॥
सिरिकणयमेहलजुय घरठाणे ठविय निश्च मुइ काठ ।
दुरि न्हविळण चन्दणि कुसुमागरि मन्ति पूइजा ॥ ३१ ॥
पूजामम
ॐहीं श्रीं श्रीघरकरस्थाय
पयोनिधिजाताय लक्ष्मीसहोदराय चिंतितार्थसप्रदाय
श्रीदक्षिणावर्चसंसाय । ॐ ह्रीं श्रीं जिनपूजायै नमः॥
इति पूजाविधिः।
दाहिणवयो य संखोयं जस्स गेहमि चिट्ठइ ।
मगलाणि पपट्टन्ते तस्स रम्छी सयवरा ॥२५॥
तस्संसि खिषिय चदणि तिल्य जो कुणइ पुहवि सो अजिओ।
तस्स न पवई किंची अहि-साइणि विजु-अग्गि-अरी ॥३४॥
नरनागिहे संख बुद्धिर रज्जि रहि भण्डारे ।
इयराण य रिद्धिकर अंतिमजाईण हाणिकर ॥ ३५॥
दाहिणवचे संखे खीर जो पियइ क्य फुलपछी य ।
सा वा वि पम्वइ गुणलक्खणसजुय पुर्च ॥ ३६॥
पावूस्पत्ति
दुमुहा भगलजणया तिमुहा रिवहरण पर मज्झत्था ।
पचमुछा पुसयरा सेसा सुपविच सामन्ना ॥ ३९ ॥
इति रुद्राक्षा ।
गण्डयनइसभूय सालिम्गाम कुमारफणयजुय ।
चककिय सावत्त वट्ट कसिण प सुपविच ॥४०॥
लोया तईयभत्ता हरि व्व पूयति सालिगामस्स ।
सेयत्थि मुन्चिहेक पावहर करिवि झायति ॥ ३१॥
इति शालिग्रामम् ।
महमूमि दक्षिणोवहि केलिवण तत्य केलिगुदाओ।
कहरव्यो य जायइ कप्यूरं केलिगम्मामओ ॥ ४२ ॥
कप्पूर तिनि किचिम इकडि तह भीमसेणु चीणो य ।
कचाउ मुकमि मुल्लो पीस दस छ विस व विमुवसो ॥४॥
कायासुगन्धकरण तहत्यिमज्याय मेयग सीय ।
वाय-सलेसम-पिच तावरे आमकप्पूर ॥ १४ ॥
इति कर्पूर ।
अगरं खासदुवार किण्ठागर तिल्लिय च सेंपलय ।
थीसं दस तिय एग विसोक्गा सुकमि अन्तरय ॥ १५ ॥
अपकढिण गवलयम्न मझे कसिण सरुक्स गरुय च ।
उपह घसिय सुयघ दाहे सिमिसिमइ अगरवरं ॥ ४ ॥
इत्पगरम् ।
मलयगिरि पव्वयमि सिरिचदणतरुवर च अहिनिल्य ।
अइसीयल सुयष तग्गधे सयल्यणगध ॥ १० ॥
सिरिचवणु तह चदणु नीलवई सूकटिस्स जाइ तिय ।
सह य मलिन्दी कठही घबरु इय चदण छविह ॥१८॥
वीस वारट्ट इग तिहाउ पा बिसय चदण सेरें ।
पण तिय दु पाठ टका जइयल चउ तिनि कमि मुछ॥१९॥
४२
रफेरविरचिता
खीरोवहिसंमूय विभूसण सिरिनिहाण रायाण ।
वाहिणवच सस्ख बहुमंगलनिलयरिद्धिकरं ॥२९॥
वन्ति रेहकलिय पचमुह सुम्म सोलसाक् ।
इय सरव विद्धिकरं सखिणि हुइ दीहहाणिकरा ॥३॥
सिरिकणयमेहलजुय वरठाणे ठविय निच सुइ काउ ।
दुद्धि न्हविऊण चन्दणि कुसुमागरि मन्ति पूजा ॥३१॥
पूजामत्र
ॐ हीं श्रीं श्रीघरकरस्थाय
पयोनिधिजाताय लक्ष्मीसहोदराय चिंतितार्थसप्रदाय
श्रीदक्षिणावर्चसंखाय । ॐ हीं श्रीं जिनपूजायै नमः ॥
इति पूजाविधि ।
दाहिणवतो य संखोय जस्स गेहमि घिद ।
मगलाणि पपट्टन्ते तस्स ल्छी सयवरा ॥ २५॥
तस्सखि खिविय घदणि तिल्य जो कुणइ पुरवि सो अजिओ।
तस्स न पहवइ किंची अहि-साइणि विजु-अग्गि-अरी ॥३४॥
नरनाहगिहे सख युड़िकर रजि रहि भण्डारे ।
इयराण य रिद्धिकरं अंतिमजाईण हाणिकर ॥ ३५॥
दाहिणवत्चे सखे म्बीरं जो पियइ कय फुलपछी य ।
सा वक्षा वि पसूबइ गुणलपखणसजुयं पुत्त ॥ ६ ॥
इति दक्षिणावर्चसञ्ज ।
दीवतरि सिवभूमी सिवरक्स सत्य क्षेन्ति रुहक्खा ।
एगाइ जा [चा ठहस वयण सन्वे वि सुपविक्षा ॥ ३० ॥
पर उत्तमेगवयण सिरिनिल्या विग्धनासणा मुहया ।
क्णपनुय कप्ठ सयणे भुय सीसे संठिया सहला ॥ ३८ ॥
मातृत्पचिः
दुमुहा मगलजणया तिमुहा रिक्हरण घर मज्झत्था ।
पचमुहा पुनयरा सेसा सुपवित्त सामन्ना ॥ ३९॥
इति रुद्राक्षा ।
गण्डयनइसभूय सालिग्गाम कुमारकणयजुय ।
चककिय सावत्त पट्ट कसिण व मुपविच ॥४॥
लोया तईयभन्ना हरि ब्व पूयति सालिगामस्स ।
सेयत्यि मुचिहे. पावहरं करिवि सायति ॥४१॥
इति शालिग्रामम् ।
महभूमि दक्षिणोवहि केलिवण तत्य केलिगुदाओ।
कहरन्यो य जायइ कप्पूरं केलिगम्भाओ ॥ ४२ ॥
फप्पूर तिग्नि किचिम इकहि तह भीमसेणु चीणो य ।
कचाउ सुकमि मुछो घीस दस छ विम व विसर्वसो ॥१३॥
कायासुगन्धकरण तहत्थिमज्वाय मेयग सीय ।
वाय-सलेसम पिच तावहरं आमकप्पूर ॥ १४ ॥
इति कर्पूर ।
अगरं स्वासद्वार किप्हागर तिल्लिय च सेंपलय ।
वीर्स दस तिय एग विसोक्गा सुकमि अन्तरय ॥१५॥
अइकठिण गवलपम्न मझे कसिण समक्स गश्य च ।
उपह घसिय सुयघ दाहे सिमिसिमइ अगरवरं ॥ ११ ॥
इत्यगरम् ।
मलयगिरि पन्वयमि सिरिचदणतरुवर च अहिनिल्य ।
अइसीयल मुयघ गधे सयल्यणगघ ॥ ४० ॥
सिरिचषणु तह चदष्णु नीलबई सूकस्सि जाइ तिय ।
तह य मलिन्दी कउही वव्यरु इय चदण छविह ॥ १८ ॥
वीस बारह इग तिहाठ पा विमुव चदण सेरं ।
पण तिय दु पाठ टका जइथल चउ तिनि कमि मुल्ल ॥९॥
४ 1 सरफेरूपिरचिता सिरिचन्दणस्स चिह, वन्ने पीय च घसिय रचाम । साए कहुय सीय सगठि संताय नासयरं ॥५॥ इति चन्दनम् । नयवाल-कासमीरा कामरुया मिय चरन्ति सुकमेण । मासी मुत्थगठि उन कत्यूरिय अरुण पीयषणा ॥५१॥ नयवाल-कासमीरे मियनाही हवइ षीस विसवा य । पचि उरमाइ पव्वय सभूय दहट्ट जाणेह ॥ ५२ ॥ मियनाहि वीणओ हुइ पण तोला जाम चम्म सह तुम्छो । । तस्स कणु पार विसुवा चम्मो विमुषठ उद्देसो ॥५॥ मियनाहि उल्हमहुरं कहुय तिक्ख कसायमुमाघ । दुग्गन्धि छदि तावं तियदोसहरं च मुसणेह ॥ ५४॥ इति मृगनामीकश्रिका । कसमीरि जववि केसरि देसे हुइ फुकुम सुगन्धवरे । थीम वारह विमुवा पण मावण हुक्मयस्स भव ॥ ५५ ॥ इति कुकुमम् । मुर मास कुट पाल्य नह चन्दण अगर मुत्य छल्लीरं । सिल्हारसवडजुय सम मिस्स दहग वर पूर्व ॥ ५६ ॥ ॥ इति धूप । कापूरसुरष्ठियासिय चन्वणसंभूय परम सिय वासा । मासीवाल्यसंभव कयूरिय वासिया सामा ॥५॥ इति वासः। इति ठकुरफेरूविरविसे पातोत्पत्तिफरणीविधि समाप्त । धीविक्रमादित्ये संपन् १४०३ वर्षे फागुण ३०८ चन्द्रमासरे मृगसिरनपत्रे लिखितम् । सा• मावदेगान पुरिस । मात्मवाचनपटना मुममस्तु । ॥
ठकुर फेक विरचित
ज्योतिष सार
॥ॐ स्वस्ति ॥
॥ आदिस्यादिप्रहा नमः ॥
सयलमुरासुर नमिठ जोइससारं मणामि किं पि अह
संखेवि परप्पहिय निरिक्खिठ पुव्यसत्थाइ ॥१
हरिमद्द-नारचदे पउमप्पहसरि-जठण-वाराहे ।
लल्ल-परासर-गग्गे कयगथाओ इम गहिय ॥२
दिणमुद्धि बयालीसं विषहारे सहि गणिय अहतीसं ।
गाह दुहियसउ रम्गे दुसय पयालीस जुय सव्वे ॥३॥दारं॥
[प्रपमं दिनशुविद्वारम्]
दिणशुद्धि जहा--
रविससि कुजे हे गुरे सिये सणिवारा राई केये सहिय गहा।
ससि चुह गुर सिय सोमा कूर ति बुहो य जेण जुओ ॥४
नका महा य जया रिचा पुन्ना य पडिवयाइ तिही ।
नक्क्त जोय रासी चछ अवकहड मुपसिर ॥५
स जहा-अश्विनी १, मरणि २, कृत्तिफा ५,रोहिणी, मृगशिरः
५,आद्रा ६, पुनर्ग्यसु७, पुष्प, मसेपा९, मघा १०, पूर्यफाल्गुनी ११,
उत्तरफालानी १२, हस्त १३, चित्रा १४, स्वासि २५, विशास्था १६,
अनुराधा १७, ज्येष्ठा १८, मूल १२, पूर्वापाढा २०, उत्तरापारा २१,
अमीधि २२, अषण २३, धनिष्ठा २४, शतमिपा २२, पूर्वमाद्रपद
२६, उत्तरभाद्रपद २७, रेषति २८ ॥ इति नक्षत्रनामानि ।
1 ४२ विणसुति, ६० प्पबहार, ३८ गणित, १०२ सन-२४२ ग्रह।
-टिप्पणी
२ . , ठकुरफेरपिरचित ज्योतिपसार विष्कम १, प्रीति २, आयुष्मान् ३, सौभाग्य ४, सोमन ५, भतिगर ६, सुफर्मा७, घृप्ति ८, शुल ९, गर १०, वृद्धि ११, प्लव १२, व्याघात १३, हर्पण १४, या १५, सिदि १६, व्यतीपात १७, परियानु १८, परिघ १९, शिष २०, सिद्धि २१, साध्य २२, शुभ २३, राल २४, घमा २५, पेंद्र २६, वैषति २७ ॥ इति योगनामानि ॥ मेषु १, धृषु २, मिथुनु ३, कर्क ४, सिंधु ५, कन्या ५, तुला ७, वृश्चिक, धनु ९, मफरु १०, मु११, मीनु १२॥ इति राशिनामानि॥ शुचे चो ला अश्विनी। लि स्लले लो मरणि।मइ उ ए कृतिका । मोघ विघु रोहिणी । वे वो क कि मृगशिरःपम्प भावा । के को इहि पुनर्वसु । हेहोरपुष्प । रिडरेगे बसेपा। म मि मु मे मघा। मोट टिड पूर्णफास्गुनी। टे दो प पि उत्तरफाल्गुनी। पुपण ठ हस्ता। पेपो र रि चित्रा।रु रे रो त स्वाति । ति तु ते तो विशाखा । न नि नु ने अनुरापा। नो य पि यु ज्येष्ठा । ये यो ममि मूल । म प फार पूर्वापारा । मे मोज जि उत्तरापाठा। मुजे जो मा अमि जित् । सि खु स्खे स्लो भवण । ग गि गुगे पनिष्ठा। गो स सिस शतभिषफ । से सो व दि पूर्षमद्रपदा । दु श स प उत्तरभद्रपवा । दे वो पघि रेषती । इति नक्षत्रावकहरयम् ॥ मधिनी भरणी कृत्तिकापादे मेपः १। कृत्तिफाणां त्रयः पादा रोहिणी मृगशिरा वृप २। मृगशिराद भाद्रा पुनर्पसुपावत्रय मिपुनः ३। पुनर्पसुपावमेफ पुष्य भोपा फर्कट। ४ । मघा पूर्ण फाल्गुनी उत्तरा फाल्गुनीपादे सिंहा। उत्तरफाल्गुनीनां पयः पावा हस्त चित्रार्च कन्या ६। चित्रार्द्ध स्वाति विशाखापावय तुला ७ । विशासापायमेफ ममुराधा ज्येष्ठावृमिफा सामूल पूर्यापाड उत्सरापार पावे घनः । उत्तरापाटाणां प्रयः पावा अयण पनिष्ठाद मकरः १० । घनिष्ठार्दै शतमिप पूर्वमद्रपदपादत्रय कुभा १९ । पूर्वमद्रपारमे उत्तरमद्रपद रेषती मीनः १२। इति नक्षन्ने राशयः॥ रवि पहिवऽहमि नवमी कर मूल पुणव्यसू घणिट्ठा य । अस्सिणि पुस्मो य तहा ति-उचरा रेवई सिरा॥६ सोमे नवमी धीया मियसिरि अणुराह पुस्सु रोहिणिया । सषण इय पच रिक्खा मयसरे जया तिहि मुहया ॥७ --
प्रथम विनगुनितार
तिय छट्टऽट्ठमि तेरसि मूलऽस्सणि रेवई य असलेसा ।
मियसिर उत्तरभव प्रय सिद्धा भूमवारंमि ॥८
बीया सचमि यारसि असलेसा पुस्मु सधण अणुराहा ।
किचिय रोहिणि मियसिरि बुद्धविणे इय मुहा भणिया ॥९
पचमि दसमिकारसि पुग्निम अणुराह पुव्यफग्गु करें ।
पुस्स पुणव्वस रेवइ अस्सणि य विसाह गुरि सिद्धा॥१.
मुके तेरसि नदा अणुराहा सषण पुज्वफग्गु तिय ।
उत्तरसाढ पुणवम रेवइ अस्सिणिय रिडिकरा ॥११
सणि नवमि पठयि अट्ठमि चउद्दसी सषण साइ रोहिणिया ।
मह सयमिस पुव्यफग्गु तिहि-वार-मि सिद्धिजोय मुहा ॥ १२
॥इति धार-तिपि-नक्षत्र-सिदियोगा'।
छट्टिकारसि घउदसि रवि यारसि तेरसी य सोमदिणे ।
भूमे परिध इगारसि तेरऽमि चठदसी युद्धे ॥१३
गुरि दु चउ सत्त घारसि नम्वि बीय चठत्थि चउद्दसी मुके।
पण सत्त पुन दह सणि तिहि वार विरुर जाणेह ॥ १४
॥ इति तिपि-चार-विरुद्धयोग'॥
सूराइ पारसीओ इग्णजा छट्टि ककजोगोऽय ।
रवि ससि सस हिगे तिये सवश्य छ गुरि सृष्टि तिया ॥ १५
॥फर्कट-सपयोगी ॥
मर चित्तुत्तरसाढा घण-उत्तरफागु-जिट्ठ-रेवइया ।
सूराइ जम्मरिक्खा मुणेह तद यज्जमुसल पुणो ॥ १६
॥ इति जन्मनक्षत्र पप्रमुशलं च ॥
1 या प्रमम श्रेष्ठम्म् । रश्यवां रिवीय कोष्टम्म ।
तृतीय कोष्टकम् । श्या पतुर्य कामम।
३श्यों
४
करफेहपिरधित ज्योतिपसार
रवि मह ति विसाहाई चदि विसाहा ति-पुन्वसाढाई।
कुजि अद्द घणिट्ठतिय पुह मूल ति रेवयाईया ॥ १७
गुरि क्रिश्चिय रोहिणि तिय भिगुरोहिणि पुस्स तिय सणे हत्य।
उत्तरफग्गु तिय तह जमघटुप्पाय-मिचुकमो ॥ १८
॥ इति जमघटः । उत्पातादिनययोगः।।
विक्खम मूल गंडे अगदे घजु तह य वाघाए ।
वइषिद सूराइ कमे अइदुट्ठा सूलजोगा ए ॥१९
॥ इति शूलयोगः॥
रवि सत्त पण ति घठ वर्स चदे रस वेर्ये नयेण मुणि रामौ ।
पण तिय इग दु छ मूमे चठे फेर मुणि पर्चे ऐग हे ॥ २०
राम इग छ वर्स चठ गुरि मिगु दु मुँणि सेरऽग्नि मणि सणि रसा।
घर छ दु कुलि-उपकुलिया कटय पहरऽह कालकमे ॥ २१
॥इति कुलिफ उपकुलिकादित्रयम् ॥
इग दुन्नि छ ब रविणो चदे पढमऽठ पचमी मुठया ।
चउ-सचऽट्ठा मूमे तिमि खडऽठा युहम्मि मुहा ॥ २२
दो पप्प सत्त जीवे मुके चठ पढम छ छ अट्ठ वरा ।
सणि सच ठुम पचम पहरदपमाण सुहवेला ॥ २३
॥शुभषेला इपम् ॥
दुपहर घहिए उणे दुपहर घहि एगि अहिय मज्झम्हे ।
विजय नाम मुहुत पसाहर्ग सयलकज सया ॥ २४
॥ विजयाहूयमुहर्तम् ॥
जइ पुण तुरिय कञ्च इविज्ज लग्ग न लम्मए मुख ।
सा छायाघुयलग्ग गहियव्य सयरकज्येसु ॥ २५
5 पता पधम कोठम्म ।
इयतो पष्ठ कोष्ठम्म् । यता सामं
कोष्ठम्।
।
मथम दिनशुविवार
रवि वीस चदि सोलह कुजि पनरह सह बुद्धि चउदसग।
गुरि तेर मुकि सणिणो वारह वारंगुले सको ।। २६
अथवा
सणि मुकि सोमवारे सद्दष्ट पया चुहिऽट नव भूमे ।
गुरि सन्त रविफारस नियतणु छाया उ मुझकज्जे ॥ २७
॥णयालपम् ॥
मह य घणिट्ठा उदए उहो किचियऽणुराह घू तिरिओ ।
उहे घयाइ कीरइ तिरिए दिक्खा-पयहाई ॥ २८
॥ सुषलग्नम् ॥
मुणि घडिय सूलगडे विक्खमे पच तिमि याघाए ।
बज्ज अइगड नव नव परिह वल वजि सेस मुहा ॥ २९
॥ योगः॥
जाणेह काल होरा पढमा वाराहिवस्स तचो य ।
छठे छठे ठाणे घटिया महाइया जाय ॥३.
॥ फासहोरा॥
घण-मीणे विस-कुमे अज-कके मिहुण-कम्न अलि-सीहे ।
मिय-तुल रवि वडकमे दुचठ छ अह इसनि बारसिया ॥ ३१
इति सूर्यवग्पतिथयः ॥
कुम-घणे अज-मिहुणे तुल-सीहे मयर-मीण विस-फके ।
विच्छिय-झमे सुकमे पुन्युचतिही य ससिदट्टा ॥ ३२
॥ इति पद्रदम्पतियया ॥
मेसाइ कमि चउके पहिवाई पचमिस्स पा पाय ।
एव तप्परए पुण जा पुनिम फूरदहतिही ॥ ३३
॥ इति रवग्यास्तिषया"।
8 मयतां मम फोम्पम् । १९ पो नबम कोष्ठम्म् । 10 श्यतो दशम
ठम्म् । 11 एश्या एकादशं ग्रेष्ठम्म् । 12 श्यतां परम पोष्टकम् ।
सरफेषिचित ज्योतिपसार
चठ छटे नव दसमे तेरसमे वीसमे य नक्स्चे ।
रपिरिक्खाउ गणिजइ रविजोय' सयलकमकरं ॥ ३४
रवि-कुज-बुह-सियवारा दुगतरे भरणिमाइ रिक्खाइ ।
पुनिम तिय मदा तिहि निवजोया तरुणजोगा य ॥ ३५
नवा पचमि नवमी अस्सणिमाई दुगतरे रिक्सा ।
मुह-मूम-सोम-सुका कुमारयोगा मुणेयव्वा ॥ ३६
रविजोय-रायजोए कुमारजोए मुमुरदियहे वि ।
ज मुहकज कीरइ त सव्व बहुफल हवइ ॥ ३७
॥ इति रविजोग" राजजोग कुमारयोगप्रयम् ॥
गुर कुज सणि तिहि भद्दा मिय वित्त घमिट्ट जमलजोगोऽय ।
तिप्पाए नक्खत्ते इय सहिय तिपुत्वरं जाण ॥ ३८
जमल-तिपुक्स्परजोए मुहकज्ज पुचजम्म-वीवाहं ।
न-विणठ्ठ सव्य हवेइ त विठण-तिठण कमे ॥ ३९
॥ इति जमल त्रिपुष्करयोगी"।
वे यार सणि विहप्पइ दुदु मंसरि किधिगाइ नक्वचा ।
तिहि रत्ता तेरऽहमि नायव्या पविरजोगा य ॥ ४०
जुद्ध जणावणीय जलासए मुव अणसणाईण '।
ज पुण वि अकरणीय त कीरइ यविरजोगेण ॥ ४१
॥इति स्पबिरयोग।
सणि ससि बुह अमिसेय बुह-गुर-मुकेस वत्थपहिरणय ।
सूरे कलारंम पुर नंगल मगले कुजा ॥ ४२
इति मीचंद्रांगजठपुरफेस्पविरचिते न्योतिषसारे
दिनदिर्नाम मपम द्वारं समाप्तम् ॥ गाथा ४२।।
१ सूर्यनपत्रात् पामक्षत्र बाम गपनीपम् । ४।६।९।१०।१।२०। रनियोग
'इक्स्स मप पपाप्मणस्स मनति गयपरसास्सा ।
तर रवियोगपणछा गममम्मि गहा न पीसति ॥
18 रश्या प्रयोपत्र कोणम् । 14 रश्या पर्वष कोष्ठम्म । 15 श्या पावस
कोटकम् । 16 एयतां पोय कोष्टकम् । 17 श्यवों सप्तपर्ण कोष्टकम् ।
चिमः ।
प्रथम दिम गुरिद्वार एतैर्यप्रेणाह- प्रयम कोष्टकम् | पार| तिपिसिदियोग मसमसिरियोग रविवार । पुरपामा पुस ३रे। चंद्र १२ मतोया | मृग । मनु । पुप्प । रो।म। मंगलमा म् । मश्चि । रे। मले। म् । उम । पुष २०१२ मसे। पुप्य ।भ । अनु । कारो।। गुर ५१०१११४१५ भनु । ५० फा । ह । पुन । पु । वि।रे । मथि। अनु।मापू० फा।रु०फा।उ०पा। पुनारे अभिात म। स्वा । रो। ममा । शत । पूर्वाफाल्गुनी शनि ४ावर शिवीर्य कोटकम् पार तिमिविलय कर संवर्त वनमुशरू यमर्पट | उत्पात मस्पुयोगकापयोग रवि १११४१२ ७ भरणी मघा विशा ज्येष्ठा सोम રા ११ ७ चित्रा विशा | प.पा | उ०पा| ममि मंगल १० उ०पा मार्दा | पनि बाव बुध | १३शकार ९ २३ भनि० रेवती मश्मि ममीर गुरु| RNIअ१२ उ०फा रुति | रोहि मृग मा शुफURI४ ३ ज्येष्ठा रोहि पुष्प मसे मपा शमि ५१०१५ रेपत्ती चिमा ०भा ७ ६ . दवीयं कोएकम् पार कुलिक उपकृतिक स्टक भयंप्रहर कासवेला | गुमबेगमहपर ८ ३ २ ४ ६ मंग बुष ५ रारा १८५ WUK ४८ १७ घाट दा५ ४ शुक२ श मानि। ૨ परफेरविरचिता ज्योतिपसार पतु कोष्टकम् पचम कोष्टकम् होरा २४ मपन्ति । छायाल(प्रम्) प्रपमपाराधिपस्य यावत् परी पार शंकुर्मगुण | वनुयापार करबहोरा महोराऽपि होरा २० पार घरी 41 २॥ १४ १२ ८. चंद्र शनि गुरु मंग २॥ २॥ पष्ठे कोठम् सूर्यदग्पास्तिथा सप्तम कोष्टकम् चंद्रवपातिपय पशया तिमि रासपा तिथि: २ मापन मेप । मिथुम ૨ ४ ६ पन । मीन अपम मेप। मिपुम । कम्पा प्रमिक । सिंह मकर । तुम तुसा । सिंह मकर । मीन ८ ૨૨ पमिकापा ०२ अएम कोष्टकम् पते घरवरप(पा)सिपया मेपसंकास्पादिर मिप | म | मी मे २ ११ १२ | १३ | १४ ५ ५ ०० ०. 이 ०॥ 아 . ०॥
पार मपम विमशुधि मार मवमै कोष्टकम् पशम कोष्टकम् पत्रपोगा, तरुणयोगा-शे कुमारपोगा तिमि पार तिमि मसम १५ मा सुग।पुष्य रवि भनिरो ३० फा।चिमा।मनु २.पापा .रापमा १२ पू० मा सो पुनाम हा विशा मूलाम पकम्पो कोटकम् पममयोगः बाद ग्रेप्टकम् त्रिपुष्करपोगः तिथि मात्र धार मक्षा पार २ मंग शनि २ रुचि। पुन उ० फा। विमंग १२ |उ०पाापूमा पनि प भयोव कोएम् स्पविरपोगा सिपि मक्षा १४ १५ कृषिमा शन मासेपा उत्त० फास्गुनी साती। स्पेष्ठा उदरापारा ६ PARAN ८ .
१० हरफेरविरचित ज्योतिपसार पतुर्वर्श कोठकम् सूर्यादिमा रविचंद्र मंग| पुष गुरु | शुक | शमि पशिस्थिति मास दिन मासु मामु मास मास | मास उपयदिन सं०. ६६०५२/ २५१४२ मस्तादिम सं० १२० ११ १२ ર मास . . 0 . पमि. पूर्व० o o ० पकदिन . . ६५ २१ पचय कोष्ठकम् पोरी कोष्टकम् मंगस ३।६।१०।११ १२३१७१।।११ ११ सित० २१५ Amateउत्तिम ५२।१०।१२ मध्यमा ३।६।१०।११ R अपमा पानि गोचररसिका पुष सुमा प्रहा | Prat९१ गुक 11R1३1४1५1/21५1१।११ ८1१1१२ पिपाहेमम्य प्रहप्परा फर्स इति सप्तदर्श कोटकम् | शुम मगुम गुम मशुभ शुम मशुम शुम भगुमशुम मशुम शुम मशुम गुम मशुम . २ २ २ ५ . १ २ ३ १ ६ ५ १२ " ६ १. ४ ०९।०६ १ ८ ८ १ ५ ०४ -:.: ૧૨ १. ४ ०३ १२ १२ रपिपादानियामधे भूमम्य शनि यिना पारपिपिना पामयेगा पंद्रसेपः पुप पेय पदस्पति गम्य पुप यिना | चंद्र पिना पाममा पा
दताय म्यवहारदार
[वित्तीय व्यवहारद्वारम्]
सणि तीस गुरू तेरह अट्ठारस राहु दिवदु मानु कुजो ।
घुह-सियरवेगु मासो सिवा दु दिण चदु रासिठिई ॥१
खटु सैयं सट्ठ छतीसौं तिन्नि यहचर दु-एग-धनासी ।
तिलि यौल गारय(ह) आइ कमे उदयदिणसंखा ॥२
मुभरवि सोले दसणी न वयालीसै पच्छिमत्थ दिणा ।
मूमाई तह पुल्वे युह सिय वच्चीसे सगैसयरी ।। ३
पणसटि एगैवीस वारेसअहिय सय च यावेना ।
धरतीस सयं दियहा वषगया मगलाइ कमे ॥१
॥ इति प्रहाणां राशि-स्पिति-उदया ऽस्व-पदिनसक्षालया)
रवि तिय छठो दसमो चंदो तिय सच छ ड्रग इसमो य ।
सियपक्रिन दु पण नवमो गुरु पचम दु नव सत्तमओ ॥ ५
घुहु दु घठ खड पहट्ठो कुजु सणि ति छ मिगु छ सच बसरहिओ।
राहू तिय वस छट्ठो गोयरि सवि गारहा सुहया ॥ ६
रवि मगल पविसंता चदु सणी निस्सरंत गुरु असे ।
मझगया घुह मुका मुह-अमुह फल पयप्छति ॥ .
घुह विजा-गमणि सिमो सणि दिक्खा गुरु विवाहि जुद्धि कुजो ।
निवदसणमि सूरो सव्वसुकचे यली पदो ॥८
नव सत्त पच बीओ दिवायरोऽ मुरगुरू यति छ दहमो ।
एए जहुचपूइय हवति सुपसन्न वीवाहे ॥ ९
॥ इति जन्मराशितो ग्रहाणां गोषः॥
गहणे रासीओ जानिय रासी ति चउ अट्ट गार मुहा ।
पण नव वह ऽत मज्झिम, छ सच इग दुन्नि भइमहमा ॥
॥ इति प्रणराशिफलम् ॥
-
हरफेसविरचित ज्योतिपसार
प्पदबल सियपक्खे कसिणे तारावलं सुरिक्सामओ ।
घर छ नेषुचिम ? गई मजिसमा ति' पणे सर्चऽहमा ॥ ११
॥इति तारापलं जन्मनक्षत्रात् ॥
जो गहु गोयरि भयलो तस्सममुहमकि जब गहो कोई ।
हुइ घामवेहि म गहो अमूहो वि मुइस्स फल देह ॥ १२
रवि सणि विणु सणि रवि विणु पद विणा मुड मुह विणा चंदो।
ममुहक सममुहके सेसस्स गहाण वेहमूहा ॥ १३
गारह तिय वह छ महो पण नव पठरतिमो रषी भमुहो।
सणि कुज ति गार छ मुहा अमदंतिम पंचमा नवमा ॥ १४
सचेग छ इकारस दह तिय चदो मुहकरो भणिओ ।
दु पणतिमऽट्ठ षठ नव असुवरो वामवेहमि ॥ १५
दुचत छ मर वह गारस ठाणे घुद्धो महाबली होइ ।
पण ति नवेगऽढ़ते अमुझो विय होइ नायव्वो ॥ १५
बीमो इकारसमो नव पचम सचमो य विदिकरो ।
वारऽट्ट दह चटत्यो तइमो य अमृदरो जीओ ॥ १७
मुको इगाइ आ पण अट्ठ नविकार अतिमो मुहओ।
अह सचिग वह नव पण इकारस छ तिय विड महो ॥ १८
॥ इति सूर्यादिग्राहाणां जन्मराशितो पामवेपा, फलाफलम् ।।
पुज्यऽगी जमे नेरई पप्लिम वायव्य उसरीर्माण ।
इय अठ्ठदिसा मुकम पायालाऽऽयाससहिय वसं ॥ १९
॥इति दिसाक्रमम् ॥
सिरि' मुहि कंधे यमुर्यो फेरि हियए नाहि गुर्म जाणु पै।
ति ति दुदु दु पण इगेग दु छ रवि रिक्सा उ गण सुकमे ॥ २०
.
द्वितीय म्यपहार मार
एयस्स फल कमसो सिरिवइ मियहार सुईट परेएस ।
चोरी सरै लॅहुतुट्ठो तियरत विदेस अप्पोळ ॥ २१
॥ इति रविनक्षत्राद् रविचकम् ।।
मुहि वाहिणेकर पाए पामरे हिये सिरे नयणे गुझे ।
इगे चर्दै छ च पणे ति ? सणि नक्खचाउ सुकमेणं ॥ २२
रोय' लाई विदेस'घघणे लाहं च पूर्व मुखै मिर्छ ।
भणिया एइ गुणागुण गणिज्ज ता जाव नियरिक्त ॥ २३
॥इति शनिचक्रम् ॥
चठ सिरि'च वाहिणकरि कठिगे पण हिये छ पायै वामकरें।
चट, ति नयणि गुररिक्खा पय वामकरं वजि सेस सदा ।। २४
॥ इति गुरचय ॥
सम रिक्स्तु मेहि ति फुलिय पठ फलिये ति महले ति अडिये गुडिक
तिय रायेस तिय तामस चठ मुहे तिय अर्मुह तमच ॥ २५
फुल्लिय फलिए लाह अपा(खा)णि लग्छी मुह च मुहि रिक्ले ।
मुह महल झडिय रायस तामस अमुहे य अमुहतम ॥ २५
॥ राहुनक्षत्राद् गणनीयम् ॥
राहतनुचफ-पुवा वायव्वौ विय दाहिणे ईसाणे पच्छिमेऽमगी' य।
उत्तर-नेरैइ सुकमे उघडिय राहु दिणमाण ॥ २०
॥ इति राह दिनचक्रम् ॥
पुन्युचराम्गिनेरइ दाहिण पच्छिम्म वायवीसाणे ।
सियपडिवयाइ जोइणि कमि संमुह दाहिणे वजा ॥ २८
॥इति योगिनीचक्रम् ॥
फसिणे सत्चमि पठदसि दिण महा दसमि तीय रयणीए ।
सिय पुचिमट्ठदियहे पठत्यि इफारसी य निसे ॥ २९
सरफेसविरचिव ज्योतिषसार पण पटिय घणहराऽऽइम भयकरी यह दुवालसंतकरी । विट्ठी तियघटियतिम घण-कणयमुहकरी जाण ॥ ३० मणु वर्स मुंणि तिहि वेर्यो वई रहै ति' पुव्ययाइ अठ्ठ दिसे । पढमपहाइ महा पिट्ठि मुहा संमुहा असहा ॥ ३१ ॥ इति भद्रापक्रम् ॥ गिठभूमि सत्चमाय पण दह तिहि तीस तिहि पहिए कमे। घ्य दिण संख च[२]हिसि सिर पुछ समकि यच्छठिई ॥ ३२ विचक कोष्टकम् शनिचक कोष्ठम्म् मस्त श्रीपति मुख ऐग मुते मिएमोजन कपे कंपपत्ति पादपो। मुजी परदेसी वामहस्ते पंधन इस्तयोग पये ईश्वर शी पूजा नामि मेषपोर सीमा गुणे स्त्रीख गुः मृत्यु पाना विदेस पाययोग अम्पायु शनिनसमाव गणनीयम् । रविनक्षत्रात् विधम् । गाय सम्मरिमम् । शनिचरम् । १ ठाम ३ २ २ २ तसर ५ काम मरपए - २ २ २ ६ पाषफ कोष्टकम् मशुम शुम २ गुरुचा कोप्ठम् मस्तक ४ पन्य पा०हस्से ४ लक्ष्मी यिभूति ५ पग्यमी पाइयो पारने मृत्यु मत्रयो। एसमाप्ति पदस्पसिनसमात् गणनीयम् । गाव जम्मासम् । मुखमक्षत्र पुष्फित मसन पसितमसम भपतित मसत्र शहित ममम गुडि मसम राजस मसा तामस मसा सुम अशुम मशुभ गुम मसुम भगुम शुम मशुम ४ ३. ४ शुम मस भशुम रिस रापुनसान् । रेखा गुमाशुमा।
दिवीय व्यवहार कार पहपीपक कोप्टकम् तिथियोगिनीषा कोष्ठकम् । ईशा माप्ति मानय | पूर्व ४ दक्षिण ममस्य ४१२ राापरी दमिण तिथियो। पक्रम् १२ ૨૦ गिनी पर्क वायु पमिम मैमास्य षायु पमिम ८ २० ૨૨ १५ ४ मदायक कोष्ठकम्। पूर्ण भाने पधिम नमस्य | पमिम पापम्प उत्तर रुणे हणे । शुरु दिषा | विषा | दिवा ) दिपा रात्रि पत्रि १४ ४ प्रहरमा मह३ | प्रह। प्रह६ मह७ ॥इति भद्राय सम्मुर्व वर्ग महरमाने। बसपा कोष्टकम् । धान रणे शुरू ८ पत्रि ३ मह८ मह५ ६ पृसिक १० सिंह धनु २० १५ दक्षिण | २० ५० इति परस तिर मकर मिथुम ५ १० ★ मिगु सणि तमु सत्तु रवे, तमु चदे, युहु कुजे, ससी युद्धे । पुह मिगु जीवे, मुफे रवि ससी, मदे रविंदु फुजा ॥ ३४ चं में गु मित्त सूरे, घु र चदि, र च गु भूमि म र पुढे । प म र गुरि स बु सिए, बु म मदे, मिच सेस समा ॥ ३५ ॥इति शमिश्रीदासीना ॥
ठपरफेपिरचित ज्योतिषसार एडमिन उदासीम प्रहकोष्टकम् । वि मैग, पुष शुक्र शनि पुपा पाशपापा .. मित्रप.म.गु.बुर..गु.शु.. च.मैन्यश.दु पुपाम-स.स. शु शप्पथ शराम पप गुप मेस विस मयर को कके मीणे तुले य मिहुणे य । सूराइ कमेणुचा नीचा उच्चा उ सचमगा ॥ २६ ॥ इति उबनीपौ॥ सवण पुस्म रोहिणि ति-उच्चरा सय पणि? उसमुहा । रायामिसेय मंदिर छचालयाय कायन्या ॥ ३० मरणिऽसलेस ति-पुव्वा म वि किची अहोमुहा रिक्खा । नीम्ब सर व यावी फकीरए भूमिखणणाई ।। ३८ चिच अणु जिट्ट रेवद मिय कर पुण साइ अस्स तिरियमुहा । गय तरय फरह दमण जस सगड अरहट कुजा ॥ ३९ ॥ इति अमुस्व-मधोमुख पार्श्वमुम्बा नक्षत्रा॥ मुस स्सा ह सि-पुज्या मिय पण सवणऽद चिच असलेसा । पुस्स पुणऽस्सिणि गुर घुह ससि रवि मिगु इय महा विवा ॥ . ॥ विपारमे श्रेष्ठाः॥ पण पुण रोहिणि रेषइ ति-उचरा पुस्सु पच हत्याई । अस्सिणि पुह-गुरु-मुछा वत्यालकारि पुरिसमुहा ॥ ४१ इत्पाइ पच रेवइ घणि? अस्सिणि गुरऽष भिगुवारे । गइकणयरयण वत्य पहिरेड नारिवरा ॥ ३२ ॥ इति पुरुपस्रिपो पनार्टकारे प्रधानाः ॥ पाणिगहणाउ गमण पढमे तइए य पचमे परिसे । गुर मुफ च सयले विवाहग्गो व मेलगो ॥१३ रोहिणि मूल ति-उत्तर मह मिय फर चिच पुस्नु पण साई । सुहवारे नयवहुया मुगिहिपविठ्ठा ६वह मुहया ॥ १३ ॥ भूतनपदग्रहमसे शुभविननक्षया
द्वितीय प्यषहार मार
कित्तिय भरणि सलेसा पुणन्वसू चिर सवण मूल महा ।
अहा पुस्सो य तहा न कुणइ न्हाण पसू य तिया ॥ ४५
॥ मस्तास्त्रीलाने पते नक्षत्रा निषेपाः ॥
पचग घणिट्ठगाई जा रेवद पचरिम्ख ताव घुव ।
दक्षिणदिसे न गम्मइ न कह तिणगहण गिहछाया ॥ ४६
हत्य सषणाइ तिय तिय अणुहार(राहास्सिणि अमीइ मिय मूल ।
पुस्मु पुणवस रेवइ मुहया गुर चद मेसिज्जे ॥ ४०
॥इति भैरजे(पज्ये)॥
जे इष्ठति मुसहल नववहुय सवाल गुग्विणी ते वि ।
न हु गछति पएग दाहिण तह समुहे मुके ॥ ४८
दुफाल देसमगे रायमए इफि नयरि वीवाहे ।
जे तिय तिवार आगय ताण मुको न हम्नेह ॥ ४९
पोढतिय मुक्ति दाहिण आगन्छइ समुह च वजेइ ।
कलम चेय तवस्सिणी दाहिण समुहो न दूसेइ ॥ ५.
॥ इति शुक्रफटम् ॥
सिंघट्ठिय जह
जीवे महमुच होइ अहव रवि मेसे ।
ता कुणहु निव्यिसंक पाणिग्गहणाइ फन्माण ॥ ५१
॥ इति मते गुरसिंघस्यफलम् ॥
जो जेण रिक्खे मणिओ सो तस्स मुहुति कायव्यो ।
दिण निसि पनरसम सो ज हुइ त मुहुतपरिमाणो ॥ ५२
अई भेहि मि(
चित मह घणे पुवुचरें साढ ऽभीई रोहिणियो।
मिट्ट विसंह मूल सैय पुन्युचर फ] दिणमुहुता ॥ ५३
रयणिमुहुच मरो पुवामझाइ अढे नक्खचा।
पुणव, पुस्तु सपणे केरै चिचों सोई य पन्नरसा ॥ ५४
॥ इति दिन-राभिमुहरीनाम ॥
१८ - ठपुरफेकषिरचित स्पोतिपसार मूल मिय सपण हत्ये पुस्सु पुणवसु कुज 5 गुरुवारे । घणपक्खि मुरदियहे सीमत्यउन्नय कुजा ॥ ५५ ॥ सीमतोमयनम् ॥ सवणाइ तिन्नि हत्य रेयइ अणुराह साइ अस्सिणिया । पुस्सु पुणव्यसऽमीई ति उत्तरा मुहदिणे चंदे ॥ ५६ नामक[र]ण ऽमपासण नयणजण जायफम्म वयषध । सिप्पाइ चूडकरण तणुभूसणमाइ कायव्य ॥ ५७ ॥ इति नामफरण भन्नमासम पूराफरणं प॥ कर सवण चिच रेवा रोहिणि अणुराह पुस्तु जिठा य । मस्सिणि पुणव्वसे वि य करिज सिमुफसवेह मुहा ॥ ५८ पुस्सु पुणव्वल रोहिणि ति उत्सरेहि कुसुभवत्याई । जच्चेण परिहरिवहु जइ बहु सुपइसोहग्ग ॥ ५९ ॥इति कसुभषले निपेपः॥ रोहिणि पमुहाईण अघय काण च धिप्पडं अमलं । सयलस्सुदिसुन्न गयवत्य कमेण उवएसं ॥ ६० ॥ इति श्री चन्द्राज ठपुरफेरू विरचिते ज्योतिपसारे व्यवहारद्वार द्वितीयं समाप्तम् ॥ २॥ [सृतीय गणितपदद्वारम् । . उज्जेणि वाहिणुचर जत्य ठिए मुहमु कीरए लग्गो । तत्यतरस्स जोयण पच उण रसेहिं ज पच ॥१ पि-सय उ उत्तर पिटे हीणजुय दाहिणुत्तरे कमसो । ससि वेय भाइ हर अगुर पडिअगुर ज च ॥ २ दतीय गणिवपद द्वार रवि अगुल सकस्स य विसघ छायाइ त च मेस तुले। भयण सूणदिणेहिं जहिछठ्ठाणस्स नायव ॥ ३ ॥इति विपवज्छाया ॥ एगण सैह्रसय पैणसहि वैसेहि विसवम्छायहय । सोलेह कम रोम फल सदेसचरखडियपलाइ ॥४ ॥ परवरिकानपनम् ॥ वन रिक्स नद नै कर ति देसण तिय-देते नद गुणेतीस । वैसे रिक्ख चरखडिय कमुकमे रिणघण कुजा ॥५ मेसाइ कमि उवकमि इच्छियठाणस्स लागपलसखा । मणिय घ ममो युष्छ तकालिय ज फुड लग्ग॥ ६ ॥ लमानयनम् ॥ स्थापना खिम्पते- टोली जोजन | मासी पोरन ८१ सप्तममा पर्सम्या। Rue पिपपप्ठाप भंगुम पिपम प्रमयाम्गुण मंगु. म. પરી संयोदयसपमान डीसी सं० मेषु २१४ भासी सं. २१२ मीन १२३ चरसारित पु२४७ ६४ मिपु ३०१ २१मकर ४ ૨૨ १४५ धनु | મk ૨૨ सिंप १५१ काम्या ४२ २५५ वृमि परमदिन प.४ तु परमदिन घ.३४ प.४४ घण मिहुणगए सूरे जिचिय भोयसि फिरइ सकपहा । तिचिय अयणस घुष अनि पवाहिय इम जाण ॥७ पण स्व भणे साग सट्ठिफर सहिय अयणसा। से सूरे दायव्वा लम्गे कती चराणयणे ॥८ ॥ इस्ययनांशः॥
२५
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उसरपेरुविरचित ज्योतिषसार
संकतीमुत्सा संकमणं सोहि सट्टि घडियाओ।
सेसकल वियलज त मेसाइउ देस फुटसूर ॥९
॥ स्फुटसूर्यः॥
फुटसूरऽयणसजुय तीसाओ सेस ज च असाई।
तेण छय उदयलग्ग त रविरासीउ नायव्व ॥ १.
हिट्ठाओ सहिफल उहहे जुय ख म फलजत ।
हीण हिट्ठपलाओ सेसाओ लम्ग साहिजा ॥ ११
सेस तीसरणं स्खलु अमुघलग्गे फलसगाईणि ।
मेसाइमुससहिय अयणसविहीण फुदु लग्ग ॥ १२
॥ इति इष्टकालजन्मादि स्फुटलपम् ॥'
एव व फुडियलग्ग भणिय, मणामित्य सत्त्वग्गविहिं ।
गिहे होरो देकाण नैव वारह सत्त तीसंसा ॥- वारं ॥ १३
रवि सीहो ससि कको कुज अलि मेसो य ह मिठुण कक्षा ।
गुर घण मीणो सिय विस तुलो य सणि कुम मयर गिहा ॥ १४
॥ इति गृहस्वामी ॥
लम्गर पढम होरा विसमे सूरस्स तह य चवसमे । -होरा ।
दिवाणो य तिमागो सपच नव अहिवई कमसो ॥-देवाण । १५
अज सीह घणु अजाई सि मयर त्थी नवंस मयराई ।
तुल मिहुण घड तुलाई फको अलि मीण कई ॥ नाशकः। १५
नियमहिक्याइ सुकमे वारस असा मुणेठ इक्षिके।
एव च सचमंसो गणिजए जम्मलम्गमि ॥ १०
॥ इति द्वादशांशाः स्वराशौ ॥
सेर योण वसु मुणिदिये मगल सणि जीव सुकरस ।
विसमे लमगे सुकमे उपक्रमे स मिण तसंसा ॥ १८
॥इति प्रिंशांशः॥
.
-
२१ पदीय गणितपदभार फुडलम्गस्ससाई फलपिंठ नै छ दुसेय दिवढसऐ। सहि फल चउठाण इय खदुधग्गस्स खदुवग्ग ॥ १९ ॥ इति सप्तपवर्गशुदिः ॥ भप पायमुपाया- इगवीस पुज्य सतरह अह अठरह अट्ट जिण रवी सतरं । घउदछ छवीस अट्ठय मेसाई सुकमि गुणयारा ॥ २० - सनानि | मे || मि फ सिं|| तु पूमि मम म गुणाका २१ ८ ।२४] १२ ८ जो लम्गो ठाधिजइ तीसंसो तस्स गुणह गुणयारे । ज हुइ त पल उवार हवइ छ पण घग्गसुदरी य ॥ २१ अह ज लग्ग मुहगह नवसगेगूण त गुणेयन्त्र । नई फल उवरि सुद विणावि खवग्ग भणहि इगे ॥ २२ ॥ति पर्गस्योपापः॥ इय छ पण घग्गमुरी सोमगहाण च सयलकञ्चकरा । कूरग्गहाण ममूहा मुहया उदयत्यमुरि पुणो ॥ २३ वचनवसगसामी जा पिक्खइ लग्ग उदयमृद्धि इम । दिक्खा पयट्ठमाई मुहावड़ा सव्वकजेम् ॥ २४ ॥ इति उपपशुदिः॥ जोइ नवसगु रग्गे तस्स कलत्तस्स सामि पिछे । लग्गस्स य जा मित्र षिच ता अब(त्य १ मुरी य ॥ २५ अस्तशुदि स्त्रीणा शुभफरी । दसम सिए नव पणगे घठ अट्ठ गहा कलसठाणाओ। पिक्वति पायपुट्टी लग्ग दिट्ठीणुसारि फल ॥ २६ । .
૨૨
परफेसविरचित ज्योतिषसार
मुत्वेगोरसठाणे संठिय पिक्खति पुनदिट्ठि गहा ।
लम्गं गहाण विठ्ठी गणिज वाम विणा राइ ॥ २७
अन पुनः केचिदेवमाहु:-
वो वारहघा य छहट्ट पाओ, दिट्ठी य मह तिय गारसामो।
पचो नव ठाण गहाण पठण, पठकिंद दिट्ठी पर(रि)पुन नूण ॥ २८
अपवा-
तिय दसमगो य मदो तिकोणगो ५१९ जीओं मह-चठ भूमो।
सुहवी मुह यदा पुलं पिक्सति जायाओ ॥ २९
॥ इति ग्रहाणां हष्ठिः॥
जा तिय ता न विकप्प सियहिय किंद वडाठ हीलिजा ।
सहु सदहियाठ हीणा नवहिय काठ सोहि मुज ॥ ३.
॥ इति भुजम् ॥
घरसपिडविठण स है लड तीस जुस परमविण ।
कल्यण सूणदिणे निसिड दिणमाणु मिस्सु भवे ॥ ३१
॥ इति परमदिन मिनी॥
अयणसजुपसूरै मुजकम करिवि सेस जं रासी ।
तं चरस्वठियमुच मुज्बेहि गुणिज अंस कला ॥ ३२
हरिठण तीसि माय लपल जुत्त मुत्त खडिचरं ।
त पनरहिजुय हीण अज तुल कमि विठण दिणरयणि ॥ ३३
॥ इति दिन राश्रिमानम् ॥
परमविणाओ हीण इच्छिपय दिणमाणु सेस सचिहय ।
पंचे फल पारसंगुले संकस्स विणदछाय भुव ॥ ३४
॥ इति मध्याहम्णया ॥
चतुर्थ उमदार
जा जहि काले छाया दिणरछाया वि हीण सकैजुया ।
दिणमाण छ चे गुणसेण फल दिवसगयसेसं ॥ ३५
॥ गतशेपविनम् ॥
वियस सकेजुय गयघटियफलेण मज्झछायजुय ।
संपूणे सेस गुल जहिष्छकालस्स छायघर ॥ ३६
॥ इति इष्टपणया ॥
संकपहावग्गजुय तस्स पए कनु कन्नवग्गाओ ।
सोहेवि संकवरगं सेसस्स पए हवइ छाया ॥ ३७
॥ कर्णणया॥
वासरमुत्त घडी पल संपइ तिहि वार रिक्ख जोयजुय ।
त तबालियवारं तिहिरिमख जोय जाणेह ॥ ३८
॥ तिथ्यादितप्कालिक योग ।
॥ इति परमजैन मी चन्द्राङ्गज ठपुरफेम् विरचिते ज्योतिपसारे
गणितपय वृतीपं द्वार समाप्तम् ॥
[चतुर्थे तमद्वारम्]
गुरखिचगए सूरे रविखिचे जीउ गुर-विपि गिहे।
मुळे य सुरगुरे वा याले पुढे य अत्यमिए ॥१
तिनि वह दियह पाले पक्ख पण दियह मिगु मुए बुड़े।
पुष्यावरमुकमेण तिदिण गुरू घाल पण पुरे ॥२
इरिसयण महियमासे रवि ससिगहणाउ जाव सत्त दिणा ।
संकति पढम अम्गिम इय ति दिण दिणचयाईए ॥ ३
जिहस्स जिह्रमासे वइघिद वितिपाय विट्टि ससि नहे।
न हु लग्ग दायव्य जम्मदिणे जम्ममे मासे ॥ ४
॥ इति वर्ष मामादिनिपेपः॥
२४
उपरफेसविरचित ज्योतिपसार
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लचो पाय वेह' जुई जोमिच गलग्गेहु प्पगॅह ।
इक्कमगर्ल दिणदोसा चय दिक्ख पइट्ट वीवाहे ॥ ५
॥ चक्रम् ॥
पचुहरेहा पण तिरिय रेहा, पचेय घठणिहि विन्नि रेहा ।
वामस्स कूणग्गहि बीयरेहा, किचीयमाइ मुणि लचवेहा ॥
॥ पंचशप्लाफापक्रम् ॥
रवि कुज गुर सणिकमसो बारह ति छ अट्ठ पुरउ लच ति ।
पुमिम ससि मुह मिगु सम पम्छा घावीस सच पच नष ॥ ७
विचढेर भयजणण मरण कह च पधुनासयरं ।
कवविसं गमण मरण सूराइलसफल ॥ ८
॥ इति लातः॥
मह चित्ता मसलेसा रेवइ अणुराह सपण इय पाओ ।
रविरिक्खामो ठविजइ अस्सिणिमाईणि जोइज्जा ॥९
॥ इति पातम् । वज्रपातकरम् ॥
ससिहरनक्सचाओ जइ हुइ गहु इकि रेह बीयविसे ।
सा जाणिजहु वेह परिहरियब जो भणिय ॥ १.
रवि कुजवेहे विहया बुहि वझा मिगु अठर सणि दासी ।
गुरवेहेण तवस्सिणी विलासिणी राहवेहेणं ॥ ११
उस्सरसाढतपए सयणाइमपरिय चारि मम्मीई ।
तत्यट्ठिए गहेण उप्पज्जइ रोहिणीमेय ॥ १२
परिहरिवि विस्पाय करिज कज असकिय नूण ।
सप्पस्स वट्ठ अंगुलिछेए ता हवइ कस्य विसं ॥ १३
॥ इति पेषः॥
२५
चतुर्ष म्यवहार झार
सणि सुक्क राह फेल रवि कुज रासिकि चदसहिय जुई।
बुद्ध विहप्पइसहिय न इवइ कत्येव जुझ्दोसं ॥ १४
॥ इति युतिः॥
लग्गससि जो नवसगु जामिचनवसगो य जेण गहो ।
चठवन्न जाय मुझ उवरे जामिच जुइदोसं ॥ १५
ससि लग्ग सचमो जइ गहो त च चयहु जामिच ।
जत्युमयदिसे ना चदे अह लग्गि गलगहय ॥ १६
॥इति यामित्र-गलग्रहो हो ।
रविरिक्खाउ उपग्गह वजह पचाट चठ दसऽट्ठारं ।
उणवीसं वाधीसं तेवीसइम च चठवीसं ॥ १७
विजुमुह सूल असणी केको वजे करें निग्धार्य ।
इय नाम फल कमसो अढेव उवग्गहाण च ॥ १८
॥ इति उपमहः॥
एगा तिरिय तेरस रेहाचकमि विसमजोगिक ।
सम जए अडवीस सयड तुम्छ च सिररिक्ख ॥ १९
सिररिक्साउ कमेण अठ्ठावीस ठविज नक्सचा ।
जइ इकि रेह रवि ससि इकग्गल त वियाणाहि ॥ २०
॥ इति इफग्गल । इति रत्तपादिवोसाः ॥
सणि पष्णु असु पाय धुह गुर कलह कुजऽग्गि रवि रच ।
मुकेण य सतावं अहिचके किचियाइ ससिनाहिं ॥ २१
॥इति अहिषमादोपा॥
उदयामो गय लग्ग सकतीमुचदियह जुयसेय ।
त पचहा ठवेउ तिहि रवि"वह ऽई मुणि सहिय ॥ २२
नवसेस जत्य पर्ण तत्य फल कल्हे अमिग रायमय'
चोरमय मिचु कमे पझ्ठ विवाहे य ताऽरिट्ट ॥ २३
॥ इति बुधपंचकदोपा॥
४
२६
सरफेमविरचित ज्योतिपत्तार
मुचि कलचे रवि सणि खडाट इग ससि छ सच अड मुके।
इग सत्ताड कुजि अह गुरि सचाड बुहि किंदि राहु न विषाह ॥ २४
उदय ऽहमगे मम्म नव पचम फर कंटय मणिय ।
दसम चठत्थे साल कूरा उदय ऽत्थितं छिह ॥ २५
मम्मणवोसे मरण कटयदोसे कुलपलयं हवइ ।
सल्लेण
रायसत्तू
छिदे पुत्च विणासेइ ॥ २६
॥इति लग्ने मंगफराः
अरिगय नीए वो अत्यमिए लग्गरासि निसिनाहे ।
अपले रवि गुरु घदे अदिट्ठसामी सया वजे ॥ २७
इति समयोपाः॥
चरलम्गेण य जता दुश्चियमावे विवाह मुरठषणा ।
पिरलग्गि गिहपवेसं मेसाई घर थिर दु मावं ॥ २८
तणु घणु सहयै सुमित्र मुथै सर्नु फलंच मिर्च धम्मै च ।
कम्म लौह च वैये लगाई मुफमि इय भाव ॥ २९
ससि पीठ कुसुम्ब लग्गो नक्सगो मुफलु तह य माठरसो ।
लग्गो मग्गणहारो भावाहिकई य पायारो ॥ ३.
जु जु माठ सामि मिचे मुहम्गहे दिल जुत्तु सो सङ्लो ।
पावगहे हामिकरो असेसकञ्जेहि नायव्वो ॥ ३१
मावाहिकई भाव लम्गवई लम्ग लग्गवइमाव ।
भावाहियो य लगे पियम्बइ ससिदिठ्ठ सयलमुह ॥ १२
लग्गाहिवई जहिं जहिं भावे संघरइ त तहा कुणइ ।
मिचगिहुचविसेसे इय तच सव्वफज्जेस ॥ ३३
मावतगओ य गहो परमावफल च देइ पिच्छाम् ।
जावंतिम इक घडी जम्म विवाहाइ तत्प फल ॥ ३४
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२७ चतुर्ष म्पपहार मार पण ससि महुह सूरो सिन्नि गुरे दु दु वुहे य मुझे य । सह सणि भूमि राहे इय लग्गे वीस विमुवा य ॥ ३५ ॥ इति लापमापः॥ अप रूम यथा- इग दु ति चउ पण नव दस मुहया सोमा ति गारहा सव्वे । फूर वडा ससि बीमो मुणि मझिम अहम अट्ठता ॥ ३६ अमुहठ्ठाणठिमओ वि हु लग्गो फो न दोसकरणस्लमो । किंदु-तिकोणठिएहिं जइ दिठ्ठो मुरगुरु मिग्रहिं ॥ ३७ इय जम्म जत्त दिक्खा रायभिसेयाइ सरिपयठवणे । बिंबपट्ट-विवाहे मुहलग्गो सयलकज्जेहिं ॥ ३८ ॥ इति जन्म-यात्रा-राज्याभिषेक सरिपवादिसर्वसामान्यलमम् ॥ अप विशेषकार्यमाह- रिक्ख तिहि लग्ग सुकमे नव पच चउत्थय ति पुरिम धुरे । दुन्नेग अद घडिया वजह गहत अइदुठ्ठा ॥ ३९ ॥ इति गंर्गतः। मूल सणे छलि सार्हो पर्ने कुर्मुम्व फल सिह च इय रुक्ख । चठे सत्र मढे वई नवे पणे रस मवै घडिय मुकमि फल ॥ ४. मूले मूल सणि घेणु सहोव(य) छल्लि साह माक्व । फ्चेऽपचक्खय कृमि मती रजच चिरजीवी ॥ ४१ ॥ इति मूलनक्षप्रजातफलम् ॥ छ पणऽऽत विणा युटु दु ति किंदि तिकोण मुफ गुरु चदा । इय जम्मलग्गि सहया ति गारहा सव्यि कर वहा ॥ ४२ मुगिहुच-मिचगिहजुय सणि कुज सूरो य मुत्ति वसमें सुहा । अरिगय अणुच रिउजुय विन्नेया अत्यहाणिकरा ॥ १३ ॥इति जन्मे ।। २ mour
२८
-
ठकुरफेपिरचित ज्योसिपसार
सवण घणि विसाहा दक्खिण अवरेण मूल पुस्सो य ।
कर पुन्वफग्गु उत्तर पुन्वे पुन्युचरासाठा ॥ ४४
सोम सणी पुन्वदिसे गुरु वाहिण पछिमेण मुछ रवी ।
उत्तर मुह भूमो विय गमणे वजेह दिगसूल ॥ ४५
॥ इति नक्षत्रपार विपशूलम् ॥
किचीठ सच सच य पुज्याइ घउहिसेहिं परिघठिई ।।
अग्गी पायव कोणे रेहा उल्लषि न चलिखा ॥ ४३
॥ इति परिषचक्रम् ॥
पुव्याइवसविसेहिं कमेण सियपडिवयाइ हुइ पासो ।
तस्सम्मुहो य कालो गमणे दुन्नि वि समुहमजा ॥ ४०
विणवारं पुल्याई कमेण संघारि जत्थ ठाणि सणी ।
काल तत्य वियाणम् तस्संमुहु पाम भणहि इगे ॥ ४८
॥कास पाशौ सन्मुखी पस्यौं ।
जिट्ठा य पुव्यमदय रोहिणिया सह य उचराफग्गू।
पुव्याइ मुकमि कीला संमुह गमणे विवजिजा ॥ ४९
॥ इति कीला॥
घण सीह मेस पुये, विस कमा मयर दाहिणे धदो।
तुल कुम मिहुण अवरे, उत्तर अलि मीण क य ॥ ५.
वामो चदो सहो निच, दाहिणोऽहाणिकारगो।
पिट्टि व अनुहो चदो, संमुहो आइसुंदरो ॥ ५१
॥ इति चंद्रपार ॥
निसि अतिमदुघडीमो पहरु पहरु पुव्ययाइ छुइ सूरो ।
गमणे दाहिण पिट्ठी पवेसगे वामु पिडि मूहो ॥ ५२
॥ इति रविचार ॥
-
पतुर्थप्पषहार द्वार
जा नाडी वहइ धुव त चरणऽग्गे करेवि चलियन्य ।
सिझति सयलकज इय लग्ग सयललमगाण ॥ ५३
॥इति इसघार ॥
पटियऽट पुन्निमाऽवम रचा तिहि फर वार भरणिऽद्दा ।
मह किचि विसाहत्तर ति सलेसा जव इय असहा ॥ ५४
सय साइ चित्त रोहिणि धण सवण ति पुव्य मझिमा जचा ।
पुण पुस्स मूल रेवइ मिय कर जिट्ठऽस्सिणीऽणुराह सहा ॥ ५५
॥इति अघम मध्यमोत्तममस्थानाः॥
रवि कुज ति छह वह लाहे युह -गुर-मुका खडत रहिय मुहा ।
इगे छ अरऽते विणा ससि जस्ता लम्गे ति छायु सणी ॥ ५६
॥ यानालमम् ॥
इय मडलीय नरवइ पत्थाणे पच सत्र वह दियहा ।
पचसयघणुछमझे वह उवरि ठविज सत्य वत्थाई ॥ ५०
ति उत्तर सय साइऽणुराह पुव्यमद्दक्या ।
पुस्मु पुणव्यसु रोहिणि सवणऽस्सिणि इत्यु दिक्तसहा ॥ ५८
॥ तिपिवारनमनप्रधानाः ।।
दु पण छ रवि दुति छ ससी फुज ति छ वह युद्ध ति दु छ पण दहमो।
किंद तिकोणे य गुरू मुको तिय छ नव यारसमो ॥ ५९
मदो दु पण छ अरमो सुफ विणा सव्वि गारहा सुया ।
चदाउ कूर सत्तम भइ अनुहा दिक्खसमयमि ॥६.
रवि ति ससि सच वहमो बुहेग चठ सच नव गुरू ति छ दो।
मुको दु पच सणि तिय मनिझम सेसा अमुह सेसा ॥ ६१
॥इति दीक्षालनरलिफा उत्तममप्यमापमा ।
सियपश्खि पडिष वीया पचमि दह तेर पुन्निमा मुहमा ।
कसिणे पडिव दु पचमि विवपट्ठाइ मुहबारा ॥ ६२
रेवइ मूल
ठारफेरविरचितम्योतिपसार
सवण घणिट्ट विसाहा दक्षिण अवरेण मूल पुरसो य ।
कर पुन्वफागु उत्तर पुन्ये पुव्युत्तरासादा ॥ ४४
सोम सणी पुन्यदिसे गुरु वाहिण पछिमेण मुक रखी।
उत्तर खुद्द भूमो विय गमणे वबेह दिगसूल ॥ ४५
॥ इति नक्षत्रवार दिक्शुरुम् ॥
किचीच सत्त सत्त य पुव्याइ पउदिसेहिं परिषठिई । । ।
अम्गी वायव कोणे रेहा उल्लधि न चलिजा ॥ ४१
॥ इति परिघषकम् ॥
पुव्वाइदसविसेहिं कमेण सियपहिवयाइ हुइ पासो ।
तस्सम्मुहो य कालो गमणे दुन्नि वि समुहक्जा ॥ ४०
विणवारं पुवाई कमेण संघारि जत्य ठाणि सणी ।
काल तत्य बियाणम् तस्समुह पालु भणहि इगे ॥ ४८
॥ काल पाशौ सन्मुखी पज्यो ।।
जिट्ठा य पुव्यमदव रोहिणिया तह य उत्तराफग्गू।
पुख्वाइ मुकमि कीला समुह गमणे विवजिजा ॥ ४९
॥ इति कीलाः॥
धण सीह मेस पुग्वे, विस कन्ना मयर दाहिणे पदो।।
तुल कुम मिहुण अवरे, उम्पर अलि मीण कके य ॥ ५.
वामो चदो ऽसहो निश्च, वाहिणोऽहाणिकारगो ।
पिट्टि च ममूहो चदो, समुहो अइसदरो ॥ ५१
॥ इति चद्रपार ॥
निसि अंतिमदुघडीओ पहरु पहरु पुव्ययाइ हुइ सूरो।
गमणे दाहिण पिट्ठी पधेसगे वामु पिट्टि मुहो ।। ५२
॥इति रविचार ॥
,
1
--
चतुर्पम्पमहार द्वार
दुन्ह बग्गक ठविउ वर्मु भाए सेस अम्गिमो लहइ ।
बहु काइणि मग्गतो पुरिसो तियपासि सो सहलो ॥ ७२
॥ रिणलभ्यषर्गः॥
गरुड मजोर सीहे साणे अहि उदरे' य मिय मिढे ।
इय अठ्ठवग्गजोणी पचमठाणे हवइ वयर ॥ ७३
॥ इति पचमे धैरम् ॥
तुरीय गये मेस अहि अहि साणे यिरालं च मेर्स मजार' ।
भूसुदरै पैसे मैहिसं घ महिसी" य वैग्ध च ॥ ७४
मिय हरिण साणे वन निठेलढुंग धौनरो य हरि" रेय ।
सीहै पैस इत्य एव अस्सिणिमाईण जोणिकम ॥ ७५
। नक्षत्राणां जो (यो) नयः॥
सीह-गये महिस-रय मूसर्य-मजार वनरं-मेस ।
अहि निठेल पस-बैग्ध मिय-साण विरुद्ध अन्नोन्न ॥ ७६
॥इति योनिपहर ॥
वर कमरासि सामि य सत्तू अमुहा य सेस मुह वरणे ।
इय सत्चमेय पीई मणिय, भणामित्य वीवाह ॥ ७७
॥ इति परणे सप्तघा प्रीतिः ॥
अहि वरिसेहि गठरी, नवि रोहिणि, वसहि कन्न, उपरित्थी ।
एव जाव गणिजइ, बारहवरिमुवरि न गणिज्जा ॥ ७८
गुर रवि ससि लग्गयले गउरी सेसा इगेगि रहियकमे ।
इय भणिय मुह विवाह न विवाह सचवरिसतले ॥ ०९
पच घडी तिहि मंते छह रिक्वते य ति दिण मासते ।
दुहिय अउच्च विहव कमि हवेइ तिय पाणिगहणकए ॥ ८०
रेवद मह मिय रोहिणि मूल ति उचरऽणुराह कर माई ।
घुह गुर सिय ससि वारा पाणिग्गहणे मुहा मणिया ॥ ८१
२०
परफेविरचित स्पोसिपसार
सवण घणिठ्ठ पुणव्यम् पुस्मु महा मूल साइ रोहिणिया।
हत्यु अणुराह रेवइ ति उत्तरा हरिणि सुपइट्ठा ॥ ६३
॥ इति प्रतिष्ठायां तिपिनक्षत्रवारशुमाः ॥
भप खमम्-
ति छ ससी ति छ झा दु छ किंद तिकोण गुरु पट्टमहा ।
मुहू वह इगाइ जा पण इग घठ नव वह सिमो सविचारी ॥५४
॥इति सत्तिमा ॥
मनिमम रवि कुज पचम दु पण छ मुगि सूफ छ नव सप्त युहो ।
किंद तिकोणे चदो वह? पण सणि गुरु तईओ ॥ ६५
॥ मप्यमा।
सोमगहऽट्ठम ति सिओ मगलु सूरो दु अट्ठ नव किंदे ।
सणिग दु घर नव सत्तम पट्ट सवि वारछा अनुहा ॥ १६
॥अपया इति प्रतिष्ठादिनशुदिः॥
गणे नाडि रेसि वेम्ग पदम वेइरं च जोणिवहरं च ।
रासिवईणं भाव कला वर सचहा पीई ॥ दारं ॥ ६.
पुस्सु पुणस्सिणि रेवइ कर साइऽणुराह मिय सवण देवा ।
भरणि ति पुन्च ति उत्तर रोहिणि अदा य मणुयगणा ॥ ५८
घण विच जिट्ठ मह सय मूल विसा कित्ति रफ्वससलेसा ।
मुकुलुचिम नर रक्वस मरण मझिम्म सेसगणा ॥६९
॥ इति देव-मनुस (प्य ) राक्षसगणाः ॥
अहिचकि मस्सिणाई वरकन म एगनाहि त ह ।
कन्ना वरणे अमुह सुझय गिहसामि मिचाई ॥ ७.
॥इति नाडिवेपः॥
समरासीओ अट्ठम वरं विसमाओ अट्ठमे पीई ।
सत्तु खडऽट्ठय अमुह दु धारर्स त य अम्नमुह ॥ ७१
॥ इति पगष्ठक-(
दिवशको ।।
।
अनुपथ्यपदारमार
दुन्ह घग्गक ठविठ वर्स भाए सेस अग्गिमो लहइ ।
वाहु काइणि मग्गतो पुरिसो तियपासि सो सहलो ॥ ०२
॥ रिणसभ्यमर्गः॥
गरेठ मजोर सीहे साणे अहि उदरे य मिय मिट्टे ।
इय अट्ठवग्गजोणी पचमठाणे हवइ मयर ॥ ७३
॥ इति पचमे घेरम् ॥
तुरेय गये मेस अहि अहि साणे विरालं च मेर्स मजारें ।
भूसुदुर पनु मैहिस ग्घ महिसी" य वैग्ध च ॥ ७४
मिय हरिण साणे वनरै निठेलढुंग यौनरो य इरि" रेय ।
सीई पैसु हत्यि एव अस्सिणिमाईण जोणिकम ॥ ७५
॥ नक्षत्राणां जो (यो) नयः ॥
सीह गये महिस-रय मूसर्य-मजार वनरं-मेस ।
अहि निठेल पमुग्ध मिय-साण विरुद्ध अन्नोम ॥ ७६
॥ इति योनिषार ।।
वर कमरासि सामि य स अनुहा य सेस सह
वरणे
इय सचमेय पीई मणिय, मणामित्य वीवाह ॥ ७७
॥ इति परणे सप्तमा प्रीतिः ।।
अद्वि वरिसेहि गठरी, नवि रोहिणि, दसहि कम, उपरित्थी ।
एव जाय गणिजइ, घारहवरिसुवरि न गणिज्जा ॥ ७८
गुर रवि ससि लग्गबले गठरी सेसा इगेगि रहियकमे ।
इय भणिय सुइ विवाह न विवाह सचवरिसतले ॥ ७९
पच घरी तिहि मंते छह रिक्वते य ति विण मासंते
दुहिय अठत्त विव कमि हवेइ तिय पाणिगहणकए ॥ ८.
रेवद मह मिय रोहिणि मूल ति उत्तरऽणुराह कर साई ।
मुह गुर सिय ससि धारा पाणिग्गहणे सुहा मणिया ।। ८१
हरफेसविरचित ज्योतिषसार
अपलमम्-
मिगु ससि विणु सहि (१णि) छट्ठा इगदु चठ नवऽति पच वह सोमा ।
वीवाहे ससि बीओ सव्वे सिय गारहा मुहया ॥ ८२
बुह - गुर छठ्ठा सणि सूरु अट्ठमा सुहय भूम रवि नवमा ।
मुह गुर मुक्का अंते करगहणे सयणमुक्खकरा ॥ ८३
मिगु सस्सू रवि सुसरो सुह दुह लग्ग पसह सुयठाण ।
जामिचवई मचा तियस्स जाणेहु वलमाणो ॥ ८४
॥इति विषाहे लमम् ॥
भप सौरफर्मे-
छहऽहमि नम्वि घठदसि अमावस चउथि विट्टि गइते ।
संझा निसि मजझन्हे एए वज्जेद्द खुस्कम्मे ॥ ८५
पुस्मु पुणव्यम्मु रेवइ सवण घणिष्ट्ठा मियऽस्सिणी हत्या ।
विच मुह सोमवारा खउरं मुहलग्गि कायव्या ॥ ८१
दु पण नवते सोमा मुहपाया अमुह तिय छ गार सहा ।
बुछ गुर सिय किंदि मुहा ससि कुरा अमुह सेस खउरि समा
॥ इति क्षटरफर्मफलाफलम् ॥
रोहिणि महा विसाहा ति उत्तरा भरणि किचियऽणुराहा ।
श्य मुडण लोयकए इदो वि न जीवए परिसं ॥ ८८
॥ इति नक्षत्राः मुंग्न लोचे पर्जनीया।
मछलग्गे चवपले खणिज नीमा अहोमुहे रिक्खे ।
उडमुहे नक्खत्ते विणिज मुहलग्गि घदवले ॥ ८९
चिचऽणुराह ति उचर रेषा मिय रोहिणी य सय पुस्तो ।
साइ पणिट्ट सुइकर गिहप्पवेसे य ठिइसमए ॥ ९.
का ति छ गारसगा सोमा किदे तिकोणगे मुहया ।
कूरऽहम अइमसुहा सोमा मझिम गिहारभे ॥ ९१
किंदऽम ति का असहा तिय गारहा महा सके ।
का पीया अमुहा सेस समा गिहपवेसे य ॥ ९२
८७
चतुर्ष म्यवहार झार
सूरु गिहित्यो गिहिणी पदु घण मुख सुरुगुरू मुक्खं ।
जो सपलु तस्स भाव सबल हुइ नत्यि संदेहो ॥ ९१
॥ इति गहनीम्ब निषेस प्रवेसे च ॥
चदयलहीणदियहे चरलग्गि तिकोण किंदि पावगह ।
तिहि रिच फर वारे रोयविमुक्कस्स हाण वरं ॥ ९२
॥ इति रोगीरोगषिमुक्के लानदिनम् । इति कंगलिकालमानि ॥
फुरु गोधूलियलग्ग विणति दिटे दुमाय रविविधे ।
अम्मछमे जाणम दुदलतरूपत्तमिलमाणे ॥ ९३
फुल्लति य यल्लीओ सठणा निलयस्थि उच्छगा होति ।
राइसिणि सिरिस किकिरि पवाडपचा मिलति गोधूले ॥ ९४
जमि गोधूलियालग्गे चदो मुची खडऽट्ठमो ।
कुलिओ कतिसम्मो य, त च बजेह जस्तओ ॥ ९५
रविम्चवमुचरासी पिंटे
हुइ जत्य छ च वारस वा।
तत्य कमि कतिसमो सणिप्छरते इवइ कुलिओ ॥ ९५
जइ सव्वदोसरहिय गुणबलसहिय घ लम्भए लग्ग ।
ता गोधूलिय सुहमवि युहि एकि सया वि पजिया ॥ ९४
अजापाल [य] गोवाला लुडा सीवर कोलिया ।
ले घरति पुणो तेर्सि, लग्ग गोधूलिय वरं ॥ ९८
॥ इति गोलिफलमम् ॥
आसी सष्टकुलेस सिट्ठिकलसो ठाणे मुकनाणए,
तस्सगस्स रहो मुठपुरवरो घदुध चदो इह ।
फेरू तवणओ य तेण रइय जोइस्ससारं इम,
दोसचाग्गिग (१३०२) वम्छरे दुगसय गाहा दु चचाहिय २४२
॥ इति श्री पांगम ठफुरफेरू विरचिते म्योतिष्कसारे लमसमुबप
द्वार पतुर्य समाप्तम् ॥
म्योतिपसार गाथा २४२ । प्रेया साफ ४१४।
यति सहितम् ।
हरफेविरचित म्योतिपसार न्योतिपसार प्रन्यनिरिटानां यत्र पक परिमादीनां सापना यथा- २४ मे पधारे सचित पाका- २५वमे पनाहे पधिप । पमिदम्-- 'ग' यऋमिवम् । २ करो म मा पु पु म -४ -- घश पू . मम २८ २७ २६. २५ २४. २३ २२- २१. २०. म - हचिसा घि VA " में ह २४ - . - तिसाम्यचक्रम्। परिमाकमिपम् करो मृ मा पुपुमा ७ १२ 1. परिष चक्रम् ...ADA दक्षिण मामि साबि परिम nant H २५ पत्राहे सचिवसम-भगकरफुसियन्त्रमिदम् । ८ १५ 64 प्रद र D जम्म रसिध ११/४/११/३/४/४११११ . ७ ८ १ १ मंगद 4 20 A ८ ८ . ७ . . ० ८ . पत्र पक कुण्डलिनदि VI8 G म V C W मममम० 4 4 - भाव C ~ याबाकाकरखिकार्यप्रमियम् । ૧૨૨૨૨૧૨]]]૧૨ OPla S C र में गुप द V C ८ C - ०. म सर्वसामान्यसमालिकार्यत्रमिदम् ।
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॥*नम' सर्वज्ञाय ।।
ठकुर फेरू-विरचित
गणित सार
[प्रथमोऽध्याय ।
नमिठण सिजयनाह लष्ठीस गिरीस-सयल देवज्ज ।
लेहाण गणणपाही पुन्वायरिएहि जह युवा ॥ १
तचो व (वि) किंचि गहिय किंचि वि अणुभूय किंचि मुणिऊणं।
त सयललोयहेज फेरू पमणेइ चदसुओ ॥ २
पडिकाइणि तह काइणि पडिविस्संसा तहेव विस्ससा ।
जावय होति विसोवा वीस उण कमेण नायव्वा ॥ ३
घीसि विसोइहि दम्मो दम्मिहि पचासि टकओ इको ।
वीस कम दीह वित्यरि अह कवी सहि वीगहओ ॥४
पब्वंगुलि चउवीसिहि यत्तीस करगुली य विश्लेया ।
अहि जवि तिरियगेह पन्वगुल इकु जाणेह ॥ ५
चठवीसंगुर छत्यो पहिय चहु हत्यि हवइ उह इगो ।
बिहुसहसिदडि कोसो चहुँकोसिहि जोयणो इको ॥ ६
इय भणिय सरहत्य विक्खभायाम गुणिय पठहत्य ।
वित्यारहु उदय गुण त घण अत्य वियाणाहि ॥ ७
चहुं फरपुडेहि पाई पहुँ पाई एगु माणओ भणिओ ।
चहुँ माणेहि वि सेई सोल्म सेई भये पत्यो ॥ ८
उहि गुजि मासओ हुइ तेहि चि चहु टकु टकि दसहि पलो।
छहि पलिहि इषु सेरो सेरिहि चालीसि इफु मणो ॥ ९
४२ पर फेक विरचित जवि सोलसेहि मासर तेहिवि चहु टकु तोलओ तिठणो । सोलहि जवेहि वन्नी पारहि वनी महाकणमो ॥ १० सहि पलि एग घडिया घडिया सट्ठीहि एगु दिणु रयणी । दिणि रयणि तीसि मासो वारहि मासंमि वरिस इगो ॥ ११ एग वह सय सहसं दसहस लक्ख तहेव वसलक्स । कोहिं तह दसकोडी अन्य वसअव्व जाणेह ॥ १२ खप तह दसखव्व संख दससंख पउम दसफ्ठम । नील तह दसनील नील्सय नीलसहसं च ॥ १३ इससहस नील तह पुण नील लक्खो वि नील दसलक्ख । तह कोडिनील इन्चाइ संख अकाइ नामाइ ॥ १४ ॥इति २५ गणिताङ्ग॥ परिकम्म पणवीसं तहऽट जाई य अट्ट विवहारा । अहिगारा चारेय पणयालीसाइ दाराइ ॥ १५ । इच्छाएगि जुयदे इच्छा गुणियं हवेइ संकलिय ॥ १५ १ भय संकलितमाह- सम दिण दल मग्ग गुण विसम अग्गिमदलेण सगुणिय । ज हुइ त सकलिय न ससय इत्य नायव्य ॥ १७ इच्छा पहऽक्वरिहिं गुणिज्जइ, पन्हु मेलि पुणु इग्छ हणिज्जइ । निठणिहिं पण्हिहिं भाउ हरिजइ दकिहि संकलिठ कहिजइ ।। १८ एम्गाई जाव दस संकलिय पिहगु वस गुणाण च । एगुत्तर पुहिकमे भणेह एयाण मूल पुणो ॥ १९ सकलियट्ट गुणिगि जुय तस्स पय एगि हीण अहेण । अह विउण वग्गमूले सेस सम संकलियमूल ॥ २० गणिवसार-प्रथमाध्याय २. भाइ(प) ग्यषफलितमाह- जह सकलियपएण इकिक एगयाइ वल्लेइ । तह धिमकलिए छिज्जइ इकिक मूलरासीमओ ॥ २१ सेग विमकलियफ्य संकलियपय च कीरए सहिय । दुन्द पयतरि गुणिय दलीय विमकल्यिसेस ॥ २२ संकलिय सहस्साओ दसाइ दस-दसऽहियस्स सफलिय । साहेवि भणम पडिय ज हुइ विमकलियसेसंक ॥ २३ विमकलियसेस सोहि वि संकलियषणाठ सेस्स बिठणजुय । तस्स पय सेससम त हुइ विमकलियमूलपय ॥ २४ सकलियपय पिठण सेग विमकलियपयविहीणदल । विमकलियजुय ज हुइ त उवराओ य विमकलिय ॥ २५ सयसंकलियषणाओ उवराओ तीइ जाम विमकलिय । ता किं जायइ त मणि, जइ विमकलिय वियाणाहि ॥ २६ , ३ सय गुणाकारमाह- ठवि गुमरासि हिढे कवाडसैघि च उवरि गुणरासी । अनुलोम-विलोमगई गुणिज्ज सुक्रमेण गुणरासी ॥ २७ पीसा सठ यचीसिहि नव सइ सचवीसेहिं। अहहिय सठ सटिगुण किं किं पचेय होति फल ॥ २८ मह गुणरासी खडिवि इगेग अकेण गुणवि करि पिंड । परकमि चहति पती छेय करवि मुकाम गुणिय पुणो ॥ २९ दुतीक गुणाकार सस्यालीफ परिज्ञान- गुणरासि गुम्नरासी पिहु पिहु पिंड नवस्स सेसगुण । तह गुणियरासिपिंड नबसेससम हवइ सुद ॥ ३. सेवसमखजोए रासि अविगयस्व जोडणे हीणे । सुन गुणाणइ मुन्न सुन्नगणे सुम्न सुन्नेण ॥ ३१ ठकुर पेड़ विरचित सुन्नस्स य गुणयारं मुन्नस्स य भागहरं तहा वर्ग । मुनस्स वम्गमूल घणाइ भणि जइ वियाणासि ॥ ३२ ४ भय मागाहरमार- जस्साओ पाहिज्जइ सहरणीमो जु हरइ मुजि हरे । उवरि लिहि हारणीय हिहि हरसं भवे भाय ॥ ३३ ५. भय वर्ग:- पढमक वग्गु ठविय अवरकमे विठणआइ केहिं । गुणि पुन्वसहिय पुण तह घग्गजुय ठाणहियवग्ग ॥ ३४ जो अंकु सिणय अंके गुणिज सो वग्गु अहव इग्छ दुहा । दळूण जुय गुणेविणु तहिट्ठवग्गहिय इय वग्ग ॥ ३५ एगाद नवताण सोलस चठवीस अट्ठवीसाण । पचेय वग्गरासी ज जायइ त भणह सिग्ध ॥ ३५ ६. अप वर्गमूलमाह- ज हवइ क्गरासी तस्सताओ गणिज्ज जाव धुर । विसम सम विसमठ्ठाणे वग्ग साहेवि मूलक ॥ ३० विठणु करि चालि माय फलपती तस्स वग्गि सोहि पुणो । पुव्यविहि जाव परिम विठण तमडिय मूल ॥ ३८ ७ अप घनमाह- धुरिमकघण ठाविय तस्सेव धुरंक वग्गु तिहु गुणिय । वीयके गणिळण ठाणाहिय मुकमि जोडिज्जा ॥ ३९ पुणु वीय अफवम्ग धुरिमकिहि गुणिवि तिठण करि जुत्त । पुणु तस्स य अंसस्स य घण करिवि सहिय घणमेय ॥ ४. इच्छिय अंकु सिहा ठवि उवरुप्परि गुणिय ज हवइ स घणो । अग्गिमु पुष्वकि हय तिउण पुव्ययणजुयसेर्स ॥ ११ गणितसार-प्रथमाध्याय एगाई जाव नव तह सोलस दुसय पचवीसाण । तिमि सय नवऽहियाण पचेय किं हवेइ घण ॥ ४२ ८ भय घनमूलमाह- घणपय दोअ षणपए घणपयमाय घणेण पाडिल । त लहक मूल चालिवि तईयकतलि दिजा ॥ १३ तवग्गु सिउणु सस्सेव पन्छए घरिवि भाउ पाडिज्वा । ल्ड पति ठविजइ हरकविगमो य कायन्वो ॥ ४४ पतिस्स अंकवग्ग तिठण पुव्यकि गुणियि सोहिज्जा । अंति पयस्स घण पुण सोहिय त लख पुण एव ॥ १५ २. अप अमितपरिफर्माष्ठफमाह- मिनकु इम ठविजइ रूउ)वरि असस्स मज्झि छेयतले । हीणंसे बिंदुचय अच्छेय जत्थ तत्येग ॥ १६ छेय हय रूपरासी अंसा जुय गय सवनण हवइ । अनोन्नछेयगुणिया इवति काम सदिसछेयसा ॥ ४७ सदिसच्छेय करेविणु ता कीरइ जोड हीण अंसाण । न हवइ छेयाण जुई कयावि इय मणिय सत्येहिं ॥ १८ छेयके विठण कए उवरिमरासी हवेइ अदीय । सन्वेवि पायरेहि मिन्नठिई एस नायव्वा ॥ ४९ १० अप भिमसफलितमाह- सदिसच्छेयसजुई छेएण विहत्त मिन्नसंकलिय । ति छ पण नवस पिंड तह पठण ति दिउढ सतिहाय ॥ ५. आदायरस वयस्स य सवनण करवि सदिसछेय पुणो । पिहु पिहु अंसाण जुई तयतरे मिन्न विमकलिय ॥ ५१ अर तिहाय खरसा नवस अट्ठाठ सोहि दि सेस । सह तिय पच सतिहा नवम बहमाउ सोहिज्जा ॥ ५२ टपुर फेक विरचित ११ अप भिन्नगुणाकारमाह- मसेण असगुणिय छेएण वि छेय गुणिवि हरियव्य । ज हक्इ ल्वमक त जाणह मिन्नगुणयारं ॥ ५३ पाऊण पच दम्मा गुणिज्ज सतिहाय अट्ठ दम्मेहिं । अह खडसि गुणिय पिहु पिहु किं हवा तस्स फल ॥ ५४ १२. अप भिन्नमागाइरमाइ- करिऊण छेय असा हरस्स विवरीय न हारणीयस्स । पुव्यविहि गुणि विमाय एस विही मिन्नमायस्स ॥ ५५ अट्टाइएहि माय हरिज्जए पठणसचदम्मेहिं । बहु सतिहाइ विहात सवा छ कि ताण लए फल ॥ ५६ १३ अप भिमवर्गमाइ- अंसाण वम्गरासी हिट्ठिम छेयाण वग्गमाएण । पारेवि ज जि लर त जाण [हु] मिन्नवग्गफल ।। ५० अहाइयस्स घम्ग सतिहा पचस्स पठणसचस्स । मणि अछ तिहाय पुणो जइ वम्गविही वियाणासि ।। ५८ १४ अप मिमवर्गम्समाइ- अंसस्स वम्गमूले छेयणमूलेण भाउ पाहिज्जा । विसम-सम-विसमकरणे हुइ मूल मिनवग्गस्स ॥ ५९ १५. मप मिमघनमाह- अंसस्स घण कुज्जा छेयस्स घणाण माउ हरिऊणं । ज किंपि तत्थ र भिन्नघणं त वियाणाहि ॥. साय-सत्चस्स पण सवाय पनरस पा तिहायस्स । ज जायइ घणरासी पचेय त भणिज्जाम्स ॥ ६१ १६ भप मिन्नषणम्समार- असषणमूलरासे छेयणघण मूलभाउ पाहिजा । घणपय दोअ घणपए इय करणे हवइ घणमूल ॥ १२ गमिक्सार-प्रयमाप्पाय १७ अथ घेरासिकमाह- आइ अंतेकजाई ठविचए अन्नजाइमाण । अंतेण मज्झि गुणिय आइमभाग तिरासियग ॥ ६३ जा इकारस दमिहि दोसिय कर सत्त कप्पडो होड़। . ता चवीसिहि दम्मिहि कइ हत्थ हवति ते काहस ॥ १४ मणिम् इव नाणवट्ट नव मुद लहति दम्म पणयीस । इय भग्घपमाणेण सोलस मुदाण कइ मुल्छ ॥ ६५ चदण पल सवाय सतिहा नव दम्म मुल्छु पावेइ । ता छ पल स्वहसूणा किचिय दम्माइ पावति ॥ ६६ दम्मि सवा सचेहिं पिप्पलि दुइ सेर छट्ठमसऽहिया । लष्मइ ता नव दम्मिहि तिहाय ऊणेहिं कि हवइ ॥ ६७ पाठणवीसा सएहिं दम्मिहि सतिहाय पच पत्था य । ता तदुलाइ अम्न कइ लष्मइ इकि उम्मेण ॥ ६८ चारहवन्नी कणमो सतिहा सय दम्मि तोलओ इच्छो । जह हुइ त इकि मासय वसंसहीणस्स का मुखो ॥ ६९ जइ जोयणछट्ठसं फ्गुलओ घलइ सच दिवसेहिं । ता सहि जोयणाइ वित्तिय कालेण गम्छेइ ॥ ७. अंगुलसचसो जइ दिणस्स छट्ठसि कीडमो चलइ । गण्डिहइ अट्ठजोयण नियमई केण कालेण ॥ ७१ अप पंधरासिकमाह-, सप्तनकायसरासिको य (?) हिहिम फलक विवरिय पिहु पिहु कमि दो वि पक्स गुणिकण योवकासिमाय पण सत्त नवाइ रासीण ॥ ७२ १८ भय पंधराशिफमाह- मासेण पचगसए वरिसे सहिस्स किं फर हवइ । अह नो नज्जर कार फल मूल तह पमाणघण ॥ ७३ ४॥ ठकुर फेस विरचित ११ अप भिमगुणाकारमाह- अंसेण असगुणिय छण्ण वि छेय गुणिवि हरियव्य । ज हवइ लद्धमक त जाणह मिसगुणयारं ॥ ५३ पाळण पच दम्मा गुणिज्ज सतिहाय अठ्ठ दम्मेहिं । अह वहसि गुणिय पिहु पिहु किं छक्इ तस्स फल ॥ ५४ १२. अप भिममागाहरमाह- करिऊण छेय असा हरस्स विवरीय न हारणीयस्स । पुव्यविहि गुणि विमाय एस विही मिममायस्स ॥ ५५ अहाइएहि भाय हरिजए पठणसत्तदम्मेहिं । चहु सतिहाइ विहत्व सवा छ कि ताण लग फल ॥ ५९ १३ अप मिन्नवर्गमाह- अंसाण वम्गरासी हिट्ठिम छेयाण वम्गमाएण । पादेवि ज जि लई त जाण [हु] मिन्नवम्गफल || ५० अट्ठाइयस्स धम्ग सतिहा पंचस्स पठणसत्तस्स । मणि अड तिहाय पुणो जइ वग्गविही वियाणासि ।। ५८ १४ अप भिन्नवर्गमूलमाह- असस्स वग्गमूले छेयणमूलेण भाउ पाहिज्जा । विसम-सम-विसमरणे हुइ मूल मिन्नवग्गस्स ॥ ५९ १५. अप मिनघनमाह- अंसस्स घण कुवा छेयस्स घणाण माउ हरिमण । ज किंपि तत्थ पर मिन्नघण त वियाणादि ॥६. सहय-सचस्स घण सवाय पनरस पा तिहायस्स । ज जायइ घणरासी पचेय त भणिज्वामु ॥ ६१ १६ अप भिन्नघणमूरमाए- असघणमूलरासे छेयणघण मूलमाठ पाहिज्जा । घणपय दोम घणपए इय करणे हवइ घणमूल ॥६२ 8 गमिठसार-प्रथमाध्याय १७ भय त्रैरासिकमाइ- आइ अतेकजाई ठविजए अम्मजाइमझेण । मतेण ममि गुणिय आइमभाग तिरासियग ॥ ६३ जा इफारस दमिहि दोसिय कर सत्त कप्पडो होइ । ता चवीसिहि दृम्मिहि कइ हत्य हवति ते कहनु ।। ६३ मणिम इव नाणवट्ट नव मुद लहति दम्म पणवीस । इय अग्घपमाणेण सोलस मुदाण कइ मुल्ल ॥ ६५ चदण पल सवाय सतिहा नव दम्म मुल्लु पावेइ। ता छ पल खडसूणा कित्तिय दम्माइ पावति ॥ ६६ वम्मि सवा सचेहिं पिप्पलि दुइ सेर छट्ठमसऽहिया । लम्मइ ता नव दम्मिहि तिहाय कणेहि किं हवह ॥ ६७ पाउणवीसा सएहि दम्मिहि सतिहाय पच पत्या य । सा तदुलाइ अन्न का लक्ष्मइ इकि दम्मेण ॥ ६८ धारयन्नी कणओ सतिहा सय दम्मि तोलओ इको । जइ हुइ त इछि मासय दससहीणस्स कइ मुल्लो ॥ ६९ जइ जोयणछट्ठमं पशुलओ चल्इ सच दिवसेहिं । ता सट्टि जोयणाइ कित्तिय कालेण गम्छेइ ॥ ७. संगुलसतसो जइ दिणस्स छट्ठसि कीडओ चलइ । गच्छिहा अट्ठजोयण नियचई केण कालेण ॥ १ अप पंपरासिफमाह-, सप्तनफावसरासिको य (१) हिटिम फरक विवरिय पिहु पितृ कमि दो वि पक्ख गुणिऊण थोषक-रासिभाय पण सच नवाइ रासीण ॥ ०२ १८. अय पंचराशिफमाद- मासेण पचगसए वरिसे सट्ठिस्म किं फर हवइ । अह नो नज्वइ काल फल मूल तह पमाणघण ॥ ०३ व्हर फेस विरवत मासे तिहाय उणे सहसए दिवदु दम्मु ववहारो। ता सतरहि पाणिहिं सवायनयमास किं हवइ ॥ ७४ सट्ठ मणह भाडइ जोयण सतिहाइ दम्म पठणदुए। ता नव सवा मणाण किं हुइ दस जोयणे पउणे ॥ ०५ जइ वारस कम्मयरा चहु दिवसिहि तीस दम्म पावति । पणयालीस दिणेहिं ता किं पावति अट्ठ जणा ॥ ५ जइ किरि मिचि सुवन्नो गुजूण तिमास पठणवीस घणे । ता सहदसी पन्नी गुजहिय दुमास कइ मुछ ॥ ७७ १९. अप सप्तराशिफमाह- छ दीह तिकर वित्थर दुइ कवर नवइ दम्म पावति । नव दीह पच वित्यरि ता क्वल सप्त कइ मुल्ल ॥ ७८ २० अथ नवराशिफमाह- चीर वारए पच बन्नेहि, ते दीहण सत्त कर, तिन्नि हत्य वित्यारु अग्छइ । तह सव्यह मुल्लु किउ छ सय दम्म दोसियहि निम्छा। जइ चहु वन्निहि अट्ट कर दीहि पच वित्यारि । ता नव चीरह मुल्लु इ, कहि दोसिय विचारि ॥ ७९ २१ अथ एकादश राशयोशीन) आइ- दु छ ति दु इग पत्थाई जा कर पुड मुग सहि दम्मेहिं । ता नव ति दुग तिकमे पत्याई मुग क्इ मुल्ल ॥ ८० २२. अय न्यस्तत्रैराशिकोरफोमाइ- मझ च आइगुणिय अतेण विहत्व वित्थ तियरासी । अताइ एग जाई ठवि मझे मत जाईय ॥ ८१ वर सेइयमि पत्ये मविया मचहिय वीस पत्याइ । सोलसि सेई पत्थे कह पत्य हवति ते कहसु ॥ ८२ छासहि टकतुल्ल तुलिया मण धीस वक्खरं तइया । जद वाहचरि तुन्छ तुलिय ति हवति कितिय मणा ॥ ८३ पमितसार प्रयमाभ्याय सहिकारस वन्नी तोला चालीस सह कणो य । ता दस सवाय वन्नी पवट्टणे हवद केवइमो ॥ ८४ नव आयाम तिपित्यर दुइ सइ वीसहिय कबला सव्वे । पचायाम दु वित्यर का कबल होति ते कहम् ॥ ८५ २३ भप क्रयविक्रयमाह- मझत गणिय मूल अंताई गुणिय सव्व उप्पत्ती । विक्त्य फयसरि मायं नाइजइ मूललाहघणे ॥4 सतरह मण टकेण लिजहि पन्नरस विकिणिज्जति । जह दस टका लाहे ता कहु टकाण ते मूले ॥ ८० तिहु दम्मि पच वत्यू लिजहि नवि दम्मि सत्त विकिया। दम दुवालस लाहे किचिय दम्माण सा मूले ॥ ८८ उपरि दम्म तलि वत्सु ठविजहि धंका विमि वि रासि गुणिजइ । भाइम रासि लाहि तादिजइ विडू रासि अंतरि पाडिजइ ॥ ८९ २४ मप मारमतिमारफमाइ- भड पटिमकरणे विवरिय मुल फल च विवरीय । कमि गुणवि दोवि रासी हरिज लहु रासिणा मायं ॥ ९० सइ दम्मि दुमण पिप्पलि तिहु सय दम्मेहि पच मण मुठी । ता पिप्पलि सच मणे पाविज्जइ सोंठि फितिय मणा ॥ ९१ २५. अप जीपविक्रयकरणमाह- जीवस्स विक्षरण य वरिस विवरीय फलक विवरीय । सेसं च पुन्यविहिणा जाणिज्जहु जीववरमुल ॥ ९२ दस वरिसा तिय करहा टका सठ अट्ठ महिय पावति । सा नव परिसा फरहा कर मुम्ल हवह पचाण ॥ ९३ ॥इति परमजेन मीचन्द्राज ठरफेरुविरचिताया गणितसार कौमुदीपाट्यां पचविंशतिपरिफर्मसूत्र (प्राणि) समासानि ॥ ॥इति अपमोभ्याय ॥ .
- [द्वितीयोऽध्यायः । १ अथ भागजाप्ती फलासवर्णनमाह- समछेय करवि पग्छा अस्जुई हवइ भागजाई य । अखस्स अधु(इ) तस्स य पणस-छट्ठम किं हवइ ॥' २. अप प्रभागजातिमाह- छेएण छेय गुणिय असे अंसा पभागजाई य । अस्स अधु (इ) तस्स य पणस छट्ठम किं हवा ॥२ ३ अप भागमागजातिमाह- छएण स्वगुणिए छेयगमे हवद भागभागविही । अंसाण जुई भाय धणेण पिहगस गुणवि फल ॥ ३ एगि तिमाय दुभाय एगि मु नव माय सत्तमाय च । एगि छमाय तिमायं किं सयदम्माण पिछगु फल ॥ ४ यावि छ कर चठ नाल्य भरंति कमि दिणिगि वल ति घरंसो। जइ समकालि ति मुघहि ता पूरहि केण कालेण ॥ ५ ४ भप मागानुपपमाह- अहहरि उपरिमु हरु गणि स मंसि हिट्ठिमहरेण गुणि रूव । जा हवइ परिम छेय एसा भागाणुषविही ॥ ६ सह तिय तस्स पाय सहिय ज तस्स छट्ठमसजुय । तस्सद जुत्व किं हुइ सहर सतिहाय तस्स पायजुयं ॥ . ५. अप माग(गा)पषाइमाह- हिट्ठिम हरि उवरिमहरु गुणिज हिट्ठिम हरे गयसेण । उपरिम स्व गुणिजहि एव भागापवाई च ॥८ तिय अड्ण पठणं तस्स वसूण तय अब च । तस क्ठरसरहियं किं किं पचेय हों(हो )ति फलं ॥९ गणितसार-शिवीयाध्याय ६ अप भागमातृजाती माह- मागाई पच जाई समासण त च भागमचीय । पिहु पिहु जहुत्तकरण करेवि समछेय असजुई ॥ १० भर पयस्स माय तिमायभाय तहर अडहिय । तइयस अदहीण एगट्ठ किं इवेइ घण ॥ ११ ७. भप मल्लीसवर्णने भाइ- वालीसवमणविही हिट्ठिम छेएण गुणवि छेयसा । उवरिममैसे रिणु घणु पकीरए हिट्ठिमसाण ॥ १२ दुइ सोला तिय मासा तहेव चठ गुज पच विमुवा य । से सत्तमसहीणा सवन्नणे किं हवइ वल्ली ॥ १३ ८.अप स्वंमसस्तमाश)फजाती आह- समछेय मंस पिंड रुवाओ सोहि ज हवइ सेस । तेण पञ्चक्खभाय लडके थमपरिमाण ॥ १४ अर खडस दुवालस असा जल पक यालुयत्यकमे । पचक्ख तिन्नि कविय भणि पडिय ! थमपरिमाण ॥ १५ माऊ पचमु गयउ पुषदि, दक्षिण अट्ठमठ सोलसमु पच्छिम पणठ्ठल, चाउडु गठ उत्तरह सीहमइण इम छ? नट्ठठ । तलइ रहिउ पडिय ! निमुणि गोरू सठ पणयाल, ते इकठ्ठा जइ करहि कइ रोडइ थणवाल ॥ १५ अघु सतिहाठ विझे खडस सत्चस अहिउ जलतीरे । अट्ठम नवसहिउ थलिगय घठसेस किं जूहे ॥ १० ॥ इति परमजैन श्रीचन्द्राज ठपरफेरविरचिसे गणितसारे फौमुदीपाट्यां अष्टौ भागजातयः॥ ॥ इति द्वितीपोभ्याय ॥
- [ तृतीयोऽध्यायः ।] १ भय व्यवहारगणनायां मिमफल्यवहारे आह- नियकालि पमाणघण फलेण परकालु वि तमोय । मिस्सि गुणिऊण दोन्नवि जोयाबिह तम्मि फलमूलं ॥१ मासेण पचगसए पहु मासिहि दम्म पचसइ वीसा । तस्स फल किं मूलं जइ मुणसि त भणम सिग्घेण ॥२ २. अथ भाग्यके आई- नियकालि पमाणघण गुणिज फलकालि कमिफलाईणि । अंसाण जुईमाय मिस्सि गुणवि लद मूलाई ॥३ मासे सयस्स पण फलु एग विप्पस्स अबु वित्तीय । लेहगपायं वरिसे नवसयफ्यहियमिस्सघण ॥ ४ ३ अप एफपत्रीकरणे भाइ- गयकाल फलसमासे मासफलोण माइ कालो य । मासफलु पिंटु सयगुणि घणपिंटे हरि सयस्स फलं ॥५ दुगि तिगि चठ पंचग सइ मासे घणु विनु एग दु ति छ सयं । चहु छहि सट्ठ मासिहि एग पच कह हवह ॥ ४ भय पश्यो)पके माह- समछेयसजुई छर मिस्सं पचेयमंसि गुणिठण। पक्खेक्करणमेय मिस्साउ फल मुणिज्जेइ ॥ ७ दुनि तिय पथ पठ मण वीय पक्वविय तं च निप्पमं । विसय दहोचर हल हरि दिलाण वि किमह मिन्नफल ॥ ८ टंकह छहि वुणिजहि मुले यस टक पधि वम्मेहिं । टक छयासी पट्टे किं पुणिय किं वुणाववियं ॥ ९ फचोल सच उदए सस्तोवरि एगु हिट्टि विक्समा । दसि इम्मि भरिउ घणि मंगुलि इकिकि कइ मुल्लो ॥ १.
गमितसार-दीयाप्याय पिओ। ५. भय समविपमक्रययोः माह- मुळे वत्यु वि हत्थो पिहगस गुणेय अंस जुवमाव । दव्वेण अंसगुणिओ समविसमक्य तिरासि विहि पुत्र ॥ ११ दम्मिति सेरु हरडइ तिनि यहेडा छ सेर आमलया। भो विज्ज ! देहि फकिय सममचा इक दम्मस्स ॥ १२ तिहुँ अङ सेरु पिप्पलि सतिहा नवि दम्मि मिरिय सेरु इगो। चहुँ पठणु सेरु मुठी इगस्स सिउडू सम देहि ॥ १३ पमि नव सेर तदुल इकारस मुग सेक ति दुइग अंस वणिय ! कमि सवाय दम्मस्स मे देहि ॥ १४ ६ भप सुषर्णव्यषहारे वाह- ज सुषमा ज तुष्ठ त तेण गुणेवि कीरए पिंड । तुल्लि विहस्ते वन्नी वनी माए हवइ तुल्ल ॥ १५ नव दस अहिष्कारस कनी तोलाय तिय छ पण जुयल । एगत्य गालिय त केरिस पनी हवइ कणय ॥ १५ ७ अप सुपणे भिन्नोदाहरणमाइ- अट्ठ सपा नव पठण छ क्मी तुम्लेति पच दुइ मासा । तिय छ पण अंस सहिया आवट्टे किं हवइ कणय ॥ १७ ८. मप पकमुषर्णस्य भाइ- धन्न मुयन्न गुणिक विपक्ष कणए विहत्तवन्नाय । इप्छा बनीमाए पक्कसुक्नस्स तुष्ठक ॥ १८ छ पण? सच तोलय नव सत्त दसट्ठ वनपकाय । संजायवीसतोला केरिस वन्नी हवइ कणय ॥ १९ दुतीक - सचट्ठ नव छ बन्ना चउ पच ति सच तोल्या कमसो । इफारसीय वन्नी तुळे किं हवइ पचविओ ॥ २० उमर फेक विरचित १. अप नष्ठसुवर्णपर्णमाह- उपनवन्नएण मुवनापिंड गुणेवि सोहिजा । वन्नसक्नवहिक गयवन्न सुवाए माय ॥ २१ तिय पच सच मासा नवट्ठ दसवन्न अट्टमासन्ने । उपन्ना दस वन्ना का वन्नी अट्ठमासाण ॥ २२ उपनवन्नताठिय कणयजुई वन्नकणयवहर्पिट । सोदिवि भाय गयकणयवन्नि उप्पन्नवन्नूणे ॥ २३ अहियस्स हीणछेय हीणस्स य अहिय इप्छ बनीओ। छेयक तुल भागा इय इच्छाकरणवनविही ॥ २४ पण सच नव इगारस वन्नीमओ पिहगु पिहगु किं लिज्जा । जेण हुइ दसी वन्नी तछे तोलिछु त भणम् ॥ २५ ॥ इति मिभकम्यवहारम् (रा)॥ १अप सेटीव्यवहारो यः (१यपा-) गच्छेगणुत्तर हय सहाइ अतघणु पुणवि आइ जुयें । धुविहत्त मझिम धण गप्छ गुण हवइ सव्य धणे ॥ २६ घीसाइ पय उत्तर सत्चविणे तुरिय हरडईमाण । त मणि तह नट्ठाई उत्तर गच्छ पुणो मणम् ॥ २० २. अप नष्ठापानयने कर माए- नहाइजाणणत्ये सव्वषण गष्छ भचलाओ । एगण गच्छिउ सरू गुणेवि दलि सोहि सेसाई ॥ २८ ३ अप नष्टोत्तरानपने फरणसूत्रमार- उचरनट्ठाणयणे गच्छेण विहत्तसव्वघणरासी । आइविहीण काठ निररेगष्छ दल लद चयं ॥ २९ १ अथ मष्ठगणनयने माह- अस्उत्तर हयगुणिय दुगुणाई पुद्धि हीणवमासुर्य । मूल घण वि उणूण सचय चयविठण हरि गप्छ ॥३. -- पनिवसार-पस्याभ्याय ५. भय संफलिस्यैफ्यानपने भाइ- इग चय संकलियक वि जुएण पएण गुणिवि तिहु भाय । लह संकलिय जुई न ससय इत्य नायव ॥ ३१ संकलिय धम्म तह पण पिहु पिहु पचाण किं हवइ छ । गणिऊण भणसु सिग्ष जय गणियविहिं पियाणासि ॥ ३२ १. अप षर्गकपनक्यानयनमाह- इच्छपय बिउणसेग ति हरिय संकलिय गुणिय वम्गजुई । संकलियवग्गु ज हुइ त घणपिंड वियाणेहि ॥ ३३ ७ भप संकलितवर्गघनैक्यानयने भाइ- सेग विठण पय पय गुण सेग पयखूण गुणिय हुइ ज त । संकलियबम्ग तह घण तिन्हाण जुई मुणेयच ॥ २४ ॥इति सेतीग्यषहारे सूत्रगापा सम्मत्ता ॥ थप क्षेत्रव्यवहारमाह- परंस वीह चउरस विस्वमायाम गुणिय त खेत । चउरसे छ कर मुया ति पच कर दीह चउरंसे ॥ ३५ भुव पिंडर चठहा कमेण भुवहीण सेस गुण मुकमे । सस्स पए त खित्त सिमुए अ घठम्मुए जाण ॥ ३६ मुहमुव कर पणवीसं भूमिभुव सहि वाम पावन्न । दाहिण उणयालीस कि जायइ तस्स खिचफल ॥ २७ भूमिमुव छत्य चठदस तेरस एग च धीय पन्नरस । एय विसम तिकोण खितफल अस्स किं हवइ ॥ ३८ सयलाण चउरसाण भूमुह जोयह ल्प गुणखिच । ससाण भूमुवह ल्यगुण हवद सित्तफल ॥ ३९ मुवजुव तेरस पनरस भूभुव इगवीस पच हत्य मुहे । मझे लघु दुवाल्स एरिसखिचस्स किं माण ॥ ४.
हर फेविरचित तिकोणफल विठल भूमच मजा लपओ हवा । मुवलय वग्ग अंतरि सेसस्स पए हवइ मध्या ॥ ४१ मुवलय क्गपिंड तस्स पए इवह निप्छ्य कर्म । सव्वस्थ खिचगणणे एस विहि हवइ नायमा ॥॥ ४२ विस्वंम बम्ग वह गुण तम्मूले वट्टनिच परिहि धुव । क्सिम पाय गुणिया परिही ता हवर खिचफल ॥ ४३ यस विक्खमे खिचे समपट्टे किंपि जायए परिही । गुणिठण भणहि पटिय ! तमु खित्तफलस्स किं हवद ॥ ४॥ वट्टस्स य विक्वमं तिठण तह छठ्ठमसजुय परिही । विक्खमहे गुणिया परिहि दल तस्स खित्तफल ॥ ४५ जीवा सर पिंटर सर गुणिय वम्ग दहगुणं काठ । नव माए ज लरं तस्स पए हवइ घणुह फल ॥ ४५ घणुपिंडे इगवीसं जीवा पनरस छक छक जस्स सरं । मणि पडिय | गणियफल किं जायइ तस्स घणु विस्व ॥ ४७ सरवग्ग छगुणकियं जीवा वग्गहिय मूल धणु पिंडं । घणुवग्गाओ जीवा वग्गूण छमाय मूल सरं ॥ १८ घणु सर जुयरहीणं घणुहाओ धम्ग चठण पय जीया । पत्तेय गणियमाण एयाण फल हवइ नूण ॥ ४९ याल्देि तिमुव दुग मुरुजे दो घणुह चरस मजो । वो घणुह जवाकारे कुलिसे चठमुव दु कप्पिजा ॥ ५. तिभुव गयदतोवम चठम्मुव सगडचकवट्टसम । पदस्स सरिस घणुह वट्ट परिपुन्नचदसम ॥ ५१ यालिंदोवम खिचं वित्यारे पचपीस कर दीहे । दल लय तिन्नि घरा गयदते कि हवेइ फल ॥ ५२ निम्मागारे खिचे उभयमुहे तिकर पचकर लये । घरामुहे पण हत्य ति मम्झि दह लय कुलिसवमो ॥ ५३ ॥ इति क्षेत्रव्यवहारसूत्रं समाप्त ॥
गणितसार-हवीयाध्याय १ अप खातव्यषहारमाह- तलमुह मज्झे विसमं यत्त अहव दीह-विसम वा । त एगट्ठ काठ विसमट्ठाणेहिं हरिय सम ॥ ५४ सम पित्थर -दीहगुण उजचे गणिय छवइ खिचफल । खास सममुववेहे घणोवम जायए गणिय ॥ ५५ दुसि चट कर उडचे पुक्खरणी पच हत्य वित्यारे । सोलस हत्यायामे किं जायइ तस्स खचफल ॥ ५६ दीह कर सट्ट सोलस वित्थारे दस सवाय अडुदए । अह वित्यरु दीहुदए सम नवकर किमिह पिहगु फल ॥ ५७ २. भप छपस्य फलानयनमाह- कुववित्थारं वग्ग तिउण खडसहिय वेहि गुणियन्त्र । चहु भाए ज ल्छ त करसंखा हवइ सव्य ॥ ५८ कुवस्स य विक्खम छ हत्य कर वीस जस्स गुत्त । वस्स तस्स पडिय ! स्वत्तफल कि हवेइ धुव ॥ ५९ तिकोणयाइ सिचा पुन्बुत्ता खिचफलसमा जाण । ते वि गुणिय तिवेहे हवति घणहत्य खत्फले ॥५. ५ भय पापाणफलानयनकरणसूत्रम्- दीहगुलाणि वित्थर पिंडगुल ताडियाणि विमएहिं । जिणे अट्ट तैरसोहिं इवति पाहाणघणहत्या ॥ ६१ सहतिय इत्य वित्थरि करटु पिंडे सिरासहे जस्स । ससिहाय पच दीहे कमित्य हुइ तस्स गणियफल ।। ६२ ज हवइ विविहरूव घट्ट तिकोणाइ सयल्पाहाण । खितफल व्य गुणेविणु पिंडगुण हवह तस्स फल ॥ ६३ दस हत्ये विक्खमे घरपट्ट व्य वट्टपाहाणे । । दिवढारमाणपिंडे कि होइ इमस्स गणियफल ॥ ६४ गोलस्मृदयघणड सनवसे अहिय त हवइ सेल ।
हर फेक विति परिहि उत्य भायं छ्य परिहि नवसहिय खिच ॥ ६५ छ कर दीहुदय वित्थर समवट्ट गोलयस्स पाहाण । कि गणिय किं खिस ज हुइ तं मणहि पत्तेय ॥ ६५ ४ भए पापाणस्य तौल्यमाह- घणकविय इकेण ढिल्लियसंभूय पाइण सव्व ।। पचास मण जायइ लिओ फ्ठपीस तुम्छो [य] ॥ ५७ घसी अठयालीसं मम्माणी सहि कसिणु पासठ्ठी । जजावय कमाणय उणवभकुडकडो सट्ठी ॥ ६८ ॥ इति सातव्यपहारसूत्रगाथा १५ सम्मत्ता ॥ अप चितिव्यबहारमाह- गोमट्टै पायसेव चठरसे वेट्ट मुभॊरय ताक ।। सोाण ऍल कुँव वोवी इय नवविहा मिची ॥ ५९ पढममवि सुद्धभित्ती वित्यरवीहुदय गुणिय ज हवह । तस्साउ धार वारी आलय कट्ठाठ सोहिजा ॥ ७.। सेसामो दसमंसं दिवडूय मट्टियस्स घट्टेइ । सेसा पाहणसंखा इवति षणहत्यमाणेण ॥ ०१ ।। पच कर मिति उदये वस दीह दुवित्थरे य तम्मम्झे । पारूति उदह दु वित्परि का सखा हवइ पाहाणे ॥ ७२ अपना गणना- दीहे वित्थरिपिंडे अदु तिहा अट्ठमस इट्ट कमे । चठ रुदइ दिवटु वित्थरि दह दीहे मित्ति के इट्टा ।। ७२ १ अप गोमटमाह- गोंममूलपरिही अद्ध पा परिहि गुणिय सनवर्स । मिचि( तिम्माओ धयण वाहिर मज्झाउ त खिच ॥ ७४ मिचि (तिभाओ परिही उणवीस छ वित्यरस्स किं चयण । याहिर परिही पहिय ! चउवीस किं हवइ खेच ॥ ७५ गपिठसार-वतीयाध्याय परिहीविक्खमद्धे गुणिय नवसहिय खल्लु गुमट्टे । अणुमवसहिय मणियं न संसय इत्थ नायव्य ॥ ७६ २. अप पायसेवमाह- चठरंस पायसेव बाहिर मिची य मझिम थम । वित्यक वीहुदय गुण ज हुइ त कविया जाण ॥ ७७ मिचि तह थम अंतरि कमुछ मग्ग फिरंत त दीह । तल उवर जुयहुदय वित्थर गुणिय हवइ पूरं ॥ ७८ ३ अप वर- तह वट्टपायसेवे यम मित्ती य गणहु कूवु व्य । पूरंतर छचिदल त चठरंसु व्य जाणेह ॥ ७९ ४ अप मुनारया- वट्टपासेवसरिसा मुनारया होंति सयल मझाओ । पुणु इचिय विसेस तिकोणदल वट्टदलमिची ॥ ८. ५.अप ताफ- वारिसुवरिम ताक दीहुदए गुणिय मिचिपिंडगुण । सत्चस दिवट्टण सिहाजुय जायए खल्ल ॥ ८१ सत्त कर ताक दीह सिहासहिय छत्य चारि जस्मुदय । इत्येग मिचिपिंह किं जायइ तस्स खल्लफल ॥ ८२ १. भय सोपानम्- सोवाणहिरवरिम जोयड उदयवित्यरे गुणिय । नव हिहि उवरि एग दु पिहुल छह उदह किमिह फल ॥ ८३ ७ अप पुख्पषमाह- वित्थर दीह उदए गुणिय, ताकविहीण मुक्जुवसहिय । निग्गम अहिय तह खालूण, जलपुल्यध त हुइ नूण ॥ ८४ ८.अप कूप- फुवमिचिमझि परिही वित्यर उदएण गुणिय हवइ फल । दस उदइ दु कर वित्थरि अट्ठारस परिहि किं चयणं ॥ ८५ टफार फेस विरचित अप पापी पट मेदि- चठरंस दीह वट्टा खडस अट्ठस संखवचाई । बहुछदि होति वाकी(वी) ते दिट्ठपमाणि गुणियति ॥ ८६ ॥ इति चितिव्यपारसूत्र गा० १८ सम्मप्ता ॥ अप ऋफचव्यवहारसूत्रकरणमाद- दार जहच्छियमाणे तस्साठ जहिष्छ फलिह कीरति । दुष्ठ वलु दीहु वित्थरु गुणिज्ज फलहेहिं भागु चि ॥ ८७ अट्ट कर वीहु दारो करडु वित्थारि दलि सिहाउ करे। दीहेगु पाउ पित्यार नवमु बलि किमिह फल्हेण ॥ ८८ भप करपते वारुच्छेदितगणना- करवत लीह जे हुइ ते दीहिण गुणिय होति हत्थाइ । वित्थरबसाउ कोडी चिरावणी अग्घमाणेण ॥ ८९ इग दिवढ विमुव सइ गजि दुति वित्थरि गजि असीहिं कोडी य। चहु विसयहि सहि गजे पचाइ नवति पालीसे ॥ ९. दस्साइ जाव तेरस विसुवा पित्यारि ताव तीसेहिं । उक्रते जा सोल्स ता पीसि गजेहि कोडी य ॥ ९१ उवरि जा वीस विमुवा ता कोही दसि गजेहि जाणेह । त्वरि करवत्तु न चल्द इय मणिय सुचहारीहिं ॥ ९२ दारु गज सच दीहे विसोवगा अट्ट सत्त वित्यारे । दस लीह फलह गारस चीरिय कद कोडिया होति ॥ ९३ अट्ठ जय कवियगुलि जवेगु करवत लीह फलहि इगे। वट्टस्स सहकरणे पिंड त वीहु जाणेह ॥ ९४ महुव वह साल सीसम निव सिरीसाइ सम घिरावणिय । खयरजण कीर सवा सेंपल मुरवार गुणि फ्ठण ॥ ९५ ॥इति कपष्यषहारो समतो ॥ गाहा ॥
गणितसार-वतीयाध्याय अप राशिन्यषहारमाह- सममुवि कयऽन्नरासी तप्परिहि खडस वग्गु उदयगुणे । ज हुइ ते घणहत्था षणहत्ये इकि पत्तो य ॥ ९६ तिल कुदव धनाण नवस उदओ य रासि परिहीओ। दसमस मुग्ग गोहुम वोर कुलत्या इगारसमो ॥ ९७ सिहरु व्य वट्टरासी चठरुदय तस्स परिहि छत्तीस । मिचिसंलग्गअद्य कूणतरि पाय परिही य ॥ ९८ याहिरकूणे फ्ठण परिही उदओ सएह जाणेह । किं जायइ करसस्वा पिहु पिहु रासीण त भणम् ॥ ९९ दल पाय पठण परिही गुणिवि कमे दु चउ सचिहाएण । पुज्यु ब्व फल पन्छा नियनियगुणयारए भाय ॥ १.. ॥इति राशिव्यवहारसूत्र सम्मत ॥ गाहा ५॥ अप रणयाम्यवहारसूत्रफरणमाह- थभाइ मिचि छाया दहि मिणवि गुणहु दडमाणेण । तस्सेव पडछाया हरिज माय फलेणुदय ॥ १०१ चठवीसगुल दंडे च्छाया थभस्स तिन्नि दंड सवा । दह सवा अट्ठारस अगुल किं थमु उच्चच ॥ १.२ अप साधनानयनकरणम्- समभूमि दु कर पित्यरि दुरेह वट्टस्स मज्झि रविसक । पढमत छाय गम्मे जमुचरा अद्धि उदयत्य ॥ १.३ चउ पठ इग मयराई पण तिय इग कडाइ धुव रासी । सत्गुल पह मुँणिजुव फर रूपयजुच दिवस गय सेसं ॥ १.४ ॥इति पायाभ्यवहारसूत्र सम्मत्त ॥ गाया ४॥ एकत्र गाया १०४॥ ।। इति परमर्जन श्रीपाज ठफरफेविरचिताया गणितफौमुदीपायऱ्या अटी व्यवहाराणिारा) समाप्त (सा)॥ ॥ इति वतीयोऽध्यायः॥
[चतुर्थोऽध्यायः।] अप देसाशा)धिकारमाह- ढिल्लिय रायट्ठाणे फन भूय करण मज्झमि । जं देसलेहपयडी त फेरू भणइ चदमुमो॥१ जम जम्मु वटिषि दिवइ तस तम जीवलइ ज मवे दव्यो । सो गुणिवि ला दम्मिहि सव्वाण य जीवला माय ॥२ सेव रायह, [सेव रायह ] पच जण गए य, तह सव्वह जीवलइ तीस सहस्स एगस्थ रासिण, सिय तेरस पच दुइ सच सहस इय मिन्न रुविण, घय फारणि जा नक्सास ते सव्विपि पावति । निय निय जियला कहतह किं किं कम मावति ॥ उपक्वइ ज दव्वं छुइ त पंडिय ! करिव सयगुणिय । चट्टीहरे वि भाय ज लष्मइ त सई होइ ॥ ४ गामि नयरि देसे जइ नवि लखि पचास सहसि चट्टी य । सचरि सहस उपक्खइ ता तस्स किसा सई होइ ॥ ५ जिसा सई भेइजइ जितिय घण कन्द्र तहि स वट्टिवा । जुयर तक फुसिवि तह पणभागे होति विमुवा य ॥६ सहसेति असिमका फुसवि कमे लिहम दु चतरह गुणा । ते विमुवाई जाणह एवं दस सहसि लफ्खे वा ॥ . जइ चट्टी मूल्षण दु लक्ख नव सहस पच [ग] तीसा । चठक सई मेइजइ ताम घण किचिय हवइ ॥ ८ (१) अप देशाके- घणरासि अंतिमको फुसिज त विठण विमुव घसमसो। दो मंतिमक पुसिए पणसि तह विसुव सयमसो ॥ ९ रासिस्स असिमके विसुया विमुषसगाइ सेस फ्मा । आइम अंकाणडे दम्मा जाणेह पीससे ॥ १.
गणितसार-चतुर्याप्याय (२) अप मुफालयमाह- मुकातइ ज वरिसे त गय दिण गुणवि वरिस दिणिभाय । पचि सहस्सि मुकातइ नवि दिणि घठमासि किं हवइ ॥ ११ जिचा दम्म मसेलिय दिजहि मासिकि ते तिभागूणा । सेस हवंति विसोया दिवसे दिवसे मुणेयब्वा ॥ १२ (३) बम पावनगती- लहुगइदिणसंखगुण लहु दीहगइस्स अंतरे भाय । लदविणेहि मिलती अप्पगई लहुगई दो वि ॥ १३ चठ जोयणीय पप्छा नवम दिणे सस जोयणी चलिओ। तस्स यहोढण हेऊ मिलेइ सो कइय दिवसेहिं ॥ १४ पचाइ दु यहता जोयण दिवसेण चालए करहो । ओयण चठदस करही किचिय दिवसेहि सो मिलइ ॥ १५ माइ मज्झत रासी मताओ आइ हीण मझेण । भाए लड पिठण एगजुय करह दिणमाण ॥ १६ (४)भप सवत्सरानयनमाह- विछमाइ जे वरिस मास चिचाइ करिवि दिण, छ मुंणि नदे लहिय मास ते वम्छर जुय पुण, नेव निहोण रेस वरिस मास दुइ दुइ दिण कणय, साजिय पच्छरु हवइ मास मुहम माईणय, ताजिा पुणेय करिवि पर अहिय मास सोहेवि पुणि । नेव मुँणि के परिस दुइ दिण अहिय पडिय! विकमसमठ भणि ॥१० ॥ इति देशाधिकारफरणसूत्रं सम्मतं ॥ (५) अय घसाधिकारमाह- जुज पट्टोलय अतल्स साराई पट्ट वत्य एमाई । कर वासक ताणाई इय मुहमा थूल साई ॥ १८ र फेक विरचित " ~ - - सय इत्थि सयल कप्पडि सीवाणि कर दिग्दु एगु काचरणे । इग दु तिय कोर घुवणे घट्टइ पट्टयाइ कमे ॥ १९ सयल खीमेहिं कप्पर समसंख नवार किंचि हीणहिया । दहली जविणा सव्वे थमाठ सवाझ्या उदए ॥ २० उदयस्स वार विम्मुवा कमरतले अट्ठ उपरि स्व्येहि । इग थमि दु यमे या इचो सिय कप्पड मणिमो ॥ २१ सव्वाण पडतलोवर जुयद उदए गुणिज्ज जा कमरं । पिट्ठी वित्थर दीह हय अट्ठस हिय जुय वत्थ ॥ २२ मझिम डहस्साओ चठण खीमस्स कहयलपवेसो । तस्स दिवसा परिही वारसमसूण फ्ठरसे ॥ २३ चठ कर मझिम थम सोलस क्मरं च परिही वावीसं । तस्स स्वीमस्स पहिय ! किं जायइ वत्थपरिमाण ॥ २४ अट्ठस तह य वट्टे तिठण कमर तय जुय दठरं । इय घर हय सीमाणय थमाठ तनाव चउगुणिय ॥ २५ तगोटी इग थमा हिटुवर जुयद उदय गुण वत्य । थमा परिहि पणगुण दुगयमा मम पड अहिया ॥ २५ खरिगह मडव उवर उभयदिसे जि कर तस्स अद्भुदय । तचो पण्गुण परिही परिहिदल उदय गुण वत्य ॥ २७ मिचिवलय पह दोन्निवि दुवार पढ घेवि उदयदीगुणा। इय वत्य अदद मउव सह वार तह मिति ॥ २८ वारिगह खडट्ठसा छत्तागारा य महवागारा। एयाण च तरका हिटुवर जुयह उदयगुणा ॥ २९ इग थम छगुण परिही दुथम परिही य मजा पह महिय । अट्ठस जुच उदए थमाठ तनाव पचगुणा ॥ ३. मीराण वारिग हुइ चिलग चउरस दु एग थमा य । सम उदय घउण कमर विउण परिहि अट्ठमस हिय ॥ ३१ C .
गमिससार-पतुपाध्याय वल्लहलि पचवल्ली भुयुकाकलिय मझ सहरिया । एयाण य कप्पडमो तह तइय पुडस्स पुण अहिओ ॥ ३२ छायापड घदोवय सराइ चाजमणियाइ मित्तिपहा । वित्थर वीहे गुणिया मुझति विणोयचिच विणा ॥ ३३ वहली जरूइ ताका छजय कुव्याय चरख पडिरूवा । छत्चालव निसाणा ते टिप्पपमाणि नायव्वा ॥ ३३ उद्देस सियावणिय सइ गजि नावार दम्म सोलसग । चिन्न गजिकि पप्छा दहली जसराइ चेति दुग ॥ ३५ किमिस गजिकि चित्ते सहमे चठवीस यूलि वीसा य । पचारि टक डोरी इग मुत्त अरुण नील वा ॥ ३१ नावार सरज चम्म नीलारुण कसिण वत्थ त पयड । सुस्त नवार सइ गजि निव पठण इयर सेरह ॥ ३७ ॥ इति यस्माधिकारे गाहा २१ सम्मत्ता ॥ भय जनाधिकारफरणसूत्रमाह- वियरग्नि रसे तेरे उद]सिदिये जुर्गे ईसरे । इय कुट्ठिहि ख(-) इगाइ इगिगि समहिय लिहि मणहर । केर निहि सोलसै तह य उवैहि वसु तिहि दिसि ससिहरे । इम्छादलिरू हरिवि कमिण ठवि जतु मुणहि पर । जा सुन्नु वारि ताणुकमिहि जतरि तन्विवरीउ धुय । जा सल्वि गेहि विसम हव सम, सम विसमाइ समक जुय ॥३८ ॥पट गहे जन ।। दाहिण क्नेगाई सचहि य खडाइ पचहि य वामे । दत चउँतीस सैरे सरे मुँणि ठणेयीस ठोर पणेयीस ॥ ३९ पणतीस तिचठे ? यी तेरहे जिणे तीम रिलै मगधीस । मणु ससाई दमें नवं नव तेविस पुल्वाइ जन छगिह ॥ ४० ५ टार फेस विरचित लिहि धुराउ पाओलि अद्ध अह मेलि पुणुवरिम । पायमोलि इय कमिहिं जाव पा जतु हवइ इम । मझिमड उवकमिहि चरिम पा जतु पुणु वि कमि । घठ गिहाइ घट युडि जत इय हुइ ग चय कमि ॥ ४१ तिष्ठि निहि रस जुर्ये यर्स कर तेर" गौर । ससि मुणि रवि" मणु दिसि कले गुणे सरे । अधु पठ चहु चहुठे घउसठि गिहि । केति' च कमिऽणुकमेगाइ लिहि ॥ ४२ भप विपमजमानयने- ख इगाइ जहिच्छोलिं गिछ संखिग जुय सपुव्य पढमोलि । ततो मजिसम मझिम गिहाठ गिह जुत्त मुकमेहिं ॥ ४३ धुरि पति चरिम अकाउ जत्य अहियफ हवा तित्य गिहे । सव्वगिहसख सोहिवि लिहिज्ज इय विसमगिहजत ॥ ४४ जुगै गहे लोयणे इरनयर्ण इदिये मुँणि अँटेहिं । ससि रस जतु इगाइ लिहि, इकासी कुठेहि ॥ ४५ ॥इति जत्राधिकारो सम्मन्चो॥ गाहा ८॥ भप प्रफीर्णकाधिकारमाह- (१) कुसुमानयनमाह- दुगुणा दुगुण जि उव्यरहि, वार वार तिहु जुत्त । मह जइ को कुसूमु न उपरइ, ता धुरि तिन्नि निरुच ॥ १ इषु मुरगिहु चहु दुवारेहि, पचेय तहि जस्खु इगु वार तुल तमु मम्झि मुरवइ । घम्मिठ कुसुमाण वि यहल सयल प्रिंय अदृद्ध मुठवइ । ज तायत इगेगु दे सविहि वारि जक्खस्स । सेस वीस जहि उन्यरहि सव्वे कइ हुइ तम्स ॥ २ 40 गणितसार-चतुर्याम्पाय (२)भप भाम्रानपनमाह- जे पचा ते असि गुणिज्वहि, माइ हीण करि बुद्धि हरिचहि । ला विठण रूवसंजुत्ता, पडिय ! ते जण गया निरुवा । सेढिय सकलिये फलसंखा, लड विहत्ते हुइ फल्सखा ॥ ३ अंम महमु कटक मज्झाउ, गठ मव तोडण वणिहि भक्खणत्थ आएसि राणय । घठरादि वहत छह एण परिहि सव्येहि आणिय । ज कटकु घिउ लह तिहि, वीस वीस सन्वेहि । कय जण गय किचर कटकु, कइ अवाणिय तेहि ॥ (३) अप जमात्रिक परिसोला नयनमाइ- गुणक थप्पिवि कमिण एगाइ, उवरप्परि गुणिवि गुणि वार धार इफिकु दीजइ । वरिसोला जे हवइ सब्धि तेइ पढमह भणिज्वहि । तेवि संक ख्वाह विणु, पुन्च परिहि गुणियति । ति ति मक्सहि सव्यि जण, पडिय इठ पमणति ॥ ५ गय जमाइय पच सामरह, यरिसोलाऽणुकमिहि दियइ सासु तट्ठिय भरेविणु। तह मुजिय रहहि जि ते विठण ति चठ पण गुण करेविणु। अतिम सहि भक्तहि अवरि, मणहि एण बहु खड। सविहि एगु सा मक्खिया, कह थाकइ कइ खर ॥६ (१) अप वसफलानयनमाह- जे जण गहति हत्यं ते चउण गुणिज पर पत्थरे । त यत्यु दीहु वित्थर कर जण गुण चठण सब्धि जणा ॥ वर वधु इगु चउदिसि इगेगु करु ठाहिउ तिहु तिहु जणेहिं ।। नव नव करि जणि पचा का जण परवत्यु पर हत्या ।। ८ , ३८ टपर फेक विरचित (५) अप करमगत्यामार- आइ-मज्झतरासी अंताओ आइ हीण मजोण । भाए पर बिठण एगजुय करह दिणमाण ॥ ९ चट जोयणाइ तिय तिय वहतो निश्च चल्लए करहो । सोलस जोयण करही किचिय दिवसेहि सा मिल ॥१. (६) अय विपरीतोदेशफमाइ- सेसूण जुत्त वग्ग गय अहिय तस्स मूलभाय गुण । गुणयारेण विहत्त सो अमुणिय रासि नायव्वो ॥ ११ पचगुण नवविहत्व तवम्ग नवहियस्स मूल च । दो हीण तिनि सेस विविरिय उद्देसगो रासी ॥ १२ (७) अप पत्रचिन्ताज्ञानमाह- सत्चरि गुण तिठनेहिं पचहि इगवीस पनर सन्चेहिं । पिंडेण सठ पणुत्तर देवि हरिवि मुणह परधि ॥ १३ चिंतिय सुयकरसहिय बिउणिगि जुय पचगुण सुयासहिय । दह गुण ख पणक रूव सेस कमे मुणह सुन्न विणा ॥ १४ (८) अथ मर्दितांफज्ञानमाह- सयलकपिंटु सोहिवि रासिस्सताउ सेसपिंटाओ। ज हीणु नवम् पाडइ पूरइ मलियकु सुन्नु नव ॥ १५ (९) अप सहशांकानयनमाह- एगाई य नवता अट्ठ विणा इच्छियकु नवि गुणिमओ । पुवकरासि गुणिया हवति एगाइ सरिसका ॥ १६ (१०) अथ गोसंख्यानयनमाद- उवराओ जा हिट्टि हुइ, ताणुकमिहि ठविद्ध । उवरुप्परि सव्वेवि गुणि, गावि एम जाणिव ॥ १७ चहु दुवारिहिं गावि नीसरिय, गय पाणी पंच सरि सच रुक्म्व तलि ते घइट्टिय । आवति यारिहि नविहि पइसि उच्च वाहिहि निविट्ठिय । ।
गणितसार-चतुर्याध्याय रक्वहि अट्ठ गुवाल तह, सारिच्छिय सहि तेवि । पडिय ! किचिय गावि हुइ, तम्मि नयरि सव्वे वि ॥ १८ १११) अप गोदुगुषषटनमाह- गो जण सममागेण जणसख इगाइ ठवि कमु छमसो । जा अंतिम गोमक समपण्हे दुहु अंकसम ॥ १९ इति भीपन्द्रायजठारफेरविरचिते गणितसारे देशा धिकारापा' चस्पारिर:) अधिकारानि(रा.) सम्मत्चा ॥ गाहा ६४॥ भय उदेशपचग सूत्रमार- पणमेविणु सिद्धिकरं मणामि निप्पचिपचगुद्देस । घन्निक्खुचुप्पडाण देसकरग्घाणमाणाण ॥ १ सव्वत्य अन्न निप्पइ भूमिविसेसेण अंतरं बहुय । ढिल्लिय आसिय नरहड वरुण पएसा इम जाण ॥२ खिचस्स दीह वित्थर विम्गहया गुणिय हवइ भूसखा । वीस कमि दीह-वित्थरि अह कविय सहि वीगहमओ ॥ ३ अन्नस्स फल जायइ निप्पन्ने पीस विमुव थीगहो । सहि मण घन्न कुदव चठवीस मउट्ट जाणेह ॥ ४ चठला मण बाधीस तिल सोलस मुग्ग मास अट्ठार । वीस फगुणिय चीणय पनरह कूरी सवाईया ॥ ५ सोलस मण क्प्पासा चालीस जुवारि दस सणो तह य । इक्खु सवाणिय साहा इचो आसाढिय जाण ॥ ६ गोहुव पणयालीसे कराव मस्सूर चणय वत्तीस । जव उप्पन मणाइ सरिसम अलसीइ फरढ दस ॥ ७ वटुला सोरि कुलत्या चठदस मण होति सव्व कण तुलिया । जीरा धणिया दस मण पर सिझन्य मन्झि गणियति ॥ ८
.0
हार फेह पिरचित
सव्ये वि वेसवारा हालिम मेत्थी य सग्गवत्ती य ।
कोर धन्नाइ सेकय सठ दम्म करस्स विम्गहए ॥ ९
॥ इति धान्योत्पत्तिफलम् ॥
नव खारि पचास मणी इक्खुरसो तस्स पचमस गुलो ।
सकर छट्ठसे हुइ सोलसमसे य खरा य ॥ १०
तस्स दिवडा रव्वा हीणाहिय पुण हवेइ नीरक्सा ।
पुणु इचिय नवि चलइ जा मणियं विट्ठ पत्चेण ॥ ११
खटाउ तिमागूणा निवात वरिसोलगा मवे पठणा ।
अइचुक्ख सेस सीरो इग वारा होइ खडसमा ॥ १२
॥इति इक्षुरसफलम् ॥
तिल-सरिसम करर मणे तिल्ल नव सच पंच विसुव कमे ।
दुदि अडम नक्सो लूणिठ तचो य पठण घिमो ॥ १३
॥ इति स्नेहफलम् ॥
पसि छालीएहि गावी महिसी तव्यिठण बहु वयल्लि छलो ।
चुल्हि पवाणे कुठिया नाविय वरहार महर विणा ॥ १४
देवइ कन्नचला तह नीली फपिलीय गो अवतीय ।
विप्प सवासणि य पुणो करें घरं नत्यि एयाण ॥ १५
टका वचीस हलो तिविह कुनी एग दीवट दु टकीय ।
महिसिफु गावि अहो बुष्ट्रिय वसहस्स टको य ॥ १५
इय मणिय उदेसं हीणाहिय होति चट्टियणुसारे ।
अब तिहा पा अन तिण घर पा हीण मा सफरं ॥ १०
॥ इति देशकरफलम् ॥
जे पाई दम्मफिहि भवति ते तिठण निप्छए सेई ।
अन्नेवि विठण पाई टकइ इकेवि जाणिज्जा ॥ १८
जि किवि सेर भणियहि दम्मिकिहि, ते वि सवाया मण टकिधिहि ।
मणद्द माउ पचमु पाहिजहु, सेस सेर दम्मिफि मुणिजहु ॥ १९
गणितसार-चतुर्पाप्याय जिचिहि किचिहि दम्मिहि पडिय ! मणु एगु वक्खरो होइ । तस्सद्देहिं विसोइहि सेरो इको वियाणाहि ॥ २. गणिमवत्थ्ण जिसिहि दम्मेहिं होइ कोडिया इका । सावय विसोवेहि लम्मइ एगा गणिम वत्थ् ॥ २१ ॥ इति अर्घस्य फलम् ॥ भय मानानि- वट्टस्स य विक्खम तिउण तह छट्ठमस जुय परिही । सा पाय वित्यरे गुणि ज जायइ त जि खिचफल ॥ २२ -दर्शन (६) परिभि १९ क्षेत्र फल २८ इति वृत्तं ॥ वट्टाओ चठरंस बारस विमुवा हवेइ सविसेस । चठरंसामो वट्ट तह वह पचमसूण ॥ २३ तिकोणयाओ वट्ट सहदुवालस विसोव हुइ खिच । वट्टामो य तिकोण विसोवगा सच अरहिया ॥ २४ । ० ||२७ र ०॥ |॥२॥ २०॥ ॥इति क्षेत्रमानम् ॥ विशेप पपा वर्शनमाह- गोलस्स य उदयघण पठण पठण व हवह पाहाण । परिहिचठत्य माय हयपरिहि नवसजुयखिच ॥ २५ न्यास लम्प गोलफफल १२० क्षेत्रफल १००55, घनि २१६ पठण १६२ पुणु पठणं १२० फ्ल ॥ परिहि ॥ गुणित १० जात ९० । अस्य नवांस १० एव १०० क्षेत्रफल ।। घण कविय इकेण ढिल्लिय समय पाहण सव्व । पन्नासमण जायद तुलिओ चउनीससय तुल्छे ॥ २६ ६
ठपुर फा स्वरात
वसी अडयालीसं सहि ममाणीय कसिणु वासट्ठी।
जज्जावर कन्माणय उणवन्न कुहुकुडो सट्ठी ॥ २७
मट्टी मण पणवीसं तुसंन्न मण अठ्ठारस पणन ।
दह मण तिल्ल घयं तह सोलस मण लवण उद्देस ॥ २८
राजु इगु तिजणसहिओ वारस गज मिति पाहणे चिणइ ।
चउससयाइ इट्टा उदेस जल गग्गरी तीसा ॥ २९
सगवीस मणा हक नव चुन्न पिठणु खोरु इकि गजे।
पाहाण मिति चिजइ नव मणइ इमेव जाणेह ॥ ३०
लेवे केवण चुन्न फउण मण पायसेर सण सहिय ।
तइयस खोर जुत्त तलबट्टे अडु जलठाणे ॥ ३१॥।
छाणय मण चालीसं तह ककर सहि पक हुइ चुन्न ।
रक्ख पवाहिय सट्ठी अरक्ख चालीस कलिया य ॥ ३२
उद्देस पचगमिम चदासुय फेरुणा अओ भणिय ।
जह देसकरुप्पची चट्टिय समए मुणिजेह ॥ ३३
॥ इति उसपचगं सम्म ।
॥ इति परमजैन ग्रीचन्द्राङ्गाज ठारफेरूपिरचित गणितसार
कौमुदीपाट्यां सूत्रं समाप्तः (प्तम्) ॥
॥ सप वस्तुपंध तथा गापा मिश्रित ३११ ॥
लिसित क्षेत्र मुदि ५ सयत् १५०४ ।
गमितसार-बीजक - p ४ सूत्र सं० गापा तथा पस्तुपघ गणित ३११ । गा० १५ मूमप्रपम्प स्थापना । गा० २ मिप पम्गस्य गणमा मा० ७८ परिफर्मामि पाटी २५ १ मिस पर्गमूळ गणमा १४ गा० ५संकलित उत्पति मिषि १ २मिप धनस्य गणना पाद विमठ कलित गणना ૨ १ मिन धन मूल गणना २५ गुणाकार मेद २ गप्पना : ९पशिफ गणना मागाहर गममस्त्पत्ति पंच राशिक गणमा बर्गर्स० उत्पति गमता ५ १सप्त पशिक गणमा २वर्गमूबसस्पतिगणना ४मन उत्पति गणना १ मब यशिक गणमा २० १पममूगत्पचि पणना ८ १ एकादपशिक गणना २१ ४ममित्र परिफम गणना ९ ५प्यस्त राशिफ गणना २२ ३ मिम संकसित गणना २० ४ऋय बिश्य मेद गणना २३ २ मिम गुणाकार गणमा ११ २मार प्रतिमारगणना २४ २ मिम मागाहर गणना १२ २ जीप मिष्य गणना ૨૬ ॥ इति गापा ७८ परिफर्माणि २५ सूत्रस्य पीजक यथा शुभमस्तु । M " " U " " " " " २ अपरमाग जाति ८भष्ट नामानि सूत्र गापा०१७ १पासपर्मनु गाया २प्रमागजाति गाया माग मागजातिगा. ४मागानुपाना. ५मागप्रवाहगमना माग मादजाति गा० ही सवर्णनु गापा ८ स्पमोरेस जाति गाथा २ पुस्तीफ सेठी स्पषहार गापा १ गा• २सेरी प्यवहार गणित १नयपानयन १मरोचपनपन मएगप्पनपन २संकसितैश्यानयम १मार्गकपनामपन १संकलित वर्ग पमेका " ४ " " " ७ २ भपर स्पषहार ८ गणना। सूत्र गा०१०४ १ प्रपम मिमफ ध्यपहार गा०२५ मा. २मिप्रकगणमा प्रय. २ माम्पक गणना दुती २ २पगपत्रीकरण सूम ३ ५मसेपक “सम पिसम २पण्णी म्पप. vमुषर्ष मियो ५मर सुपर्ण पण भएम ८ क्षेत्र प्यपहार सून गापा १९ १समपठरस २वीर्य उरस पादि साप “त्रिकोण से ५५पकोण सेघ त्रिकोण विष्ट समरस ८पणुसकर ९गताकार १.पनायर ११ मृदंगाकार १२ मानापिषि M ४ ५ ७ कार फेरिरचित गनिम्बार-बीजक ४सात व्यवहार गाथा १५ ६षम्यवहार गापा ९ गा. भावनानाविधि मणम षष्ठीवि २रूपस्य फमानयन २ करपसी पापाम फयानयन नाना २ पापाण वोस्प पणन पता गाथा १ . " -- ७ रासि व्यबहार गापा ५ भापति दीपदय " ५चिति म्यवहार गापा १९ पा. मुम्माय गा० १ ५ मिचि रिपापाम २ गोमबधिपण २पापसेवमिति २मुनारा गणित संख्या २साफ गणना एशि १सोपान गणना १ पुग्यपमग इस संगममा पापीसंगणमा - " गविन्सान . । ८छाया व्यवहार पापा ४ ०धापासामया दिएसाप्ता . ॥इति भष्ट ग्यपहार सूप गापा १०४॥ - - - .
ठकुर-फेरू-विरचित
वास्तु सार।
[प्रथम गृहलक्षणप्रकरणम् ।]
नमो जिनाय।
सयलमुरासुरविद इसण-वन्नाणुगाइ नमिठण ।
पयरण ति वत्युसारं जहुत सखेवि मणिमो है॥१
गेहे पनरहिय सर्य, वियपरिक्खस्स गाह सीसाइ ।
पासाइ सहि भणिय, पणहिय सय दुन्नि सव्वेय' ॥२॥ दारं ॥
यचीसगुल भूमी सणेवि परिज पुणवि सा गया ।
तेणेव मैटिएण हीणाहिय सम फल' नेय ॥ ३
अहव त भरिय नीरें चरणसय गच्छमाण जा मुसइ ।
ति-दु-दग संगुल कमि धरै महे मझिम उसमा जाण ॥
सिय विप्प, अरुण खचिय, पीयल पइसाण, कसिण मुद्दाण ।
मट्टियवमपमाणे सुया विवरीय असुहयरों ॥ ५
॥इति भूमिपरीक्षा ॥
समभूमि दुकर वित्यरि दुहेचकस्स मशिन रवि १२ संक।
पढमत छाय गम्मे जमुत्तरा अदि उदयत्यं ॥ ६
पाठान्तरे-रचण्णापुर्ण पप्पमिम् । २गेहार पत्पुसार सोपेम मनिस्सामि।
गषमसर्य च गिर विवपरिषहस्स गाहमा ।
सह सत्तरि पासार पुगसप पचरा सम्वे ।२।
"चपीसंगुरु। ५मस्याए । फसा मेपा।
७मासा मरियजलेप प । भूमी। ९माम ।
१.सिप बिपिमरण क्षचिणि पाय पासी मसिप सुरीम।
महियपापमाणा भूमी निपनियमपण सफ्नपरी।
११।
- ठहर फेर चिरचिव ॥ दिगुसापमापक्र॥ समभूमी तिट्ठीए वदृति छ अट्ठ कोण ककडए । कण दु दिसि सतरगुल मझि तिरिय इत्यु चठरंसे ॥७ चउरसिकिकि दिसे पारस भागाठ पर्व मा मझे। पूणेहि सह तिय तिय ऍव हुइ मुड अट्ठसं ॥ ८ ॥इति भूमिसापना ॥ चठरंस अदिसिमोहा अवम्मियाऽफुट्ट तिदिणवीयरहो । अकसर भूमिमुहा पुज्वेसाणुत्तरखुवहाँ ॥ ९ वम्मपणी वाहिकरा रोरुसर फुटभूमि मधुयरी । ससल्ला बहुदुक्खा त पुन्छ सम्झनाणमिम ॥१० व क च च ए ई स प य इय नव वनी कमेण लिहिण । नय कुट्ठा भूमिकया पुधाइ मुणह पन्हेणे ॥११ व प्पन्हे नरसल्ल सहकरे मिचुकारग पुव्ये । क प्पन्हे खरसल्ल अग्गि दुहत्येहि निवदण्डं ॥ १२॥ पाहिणे च प्पण्हेण नरसल करितलमि मिचकर । त पन्हिसाण नेरइ हिंमाण य मिचु सड़करे" ॥ १३ ए पन्हे मवरदिसे सिमुसल्ल सदाहत्यि परेदेसं । वायवि ह पन्हि चउकरि अंगारा मित्चनासयरा ॥ १४ २ तरंगुछ। माग पण। ५दिण तिग बीपप्पसवा परसाध्याम्मिपी माप। महमा । ७°हा। ८पम्माणी पाहिकरी ऊसर भूमीर हया रोरफरी। आफा मिपुत्री पुषणकारी तह प ससका। ९सपमा। १० पन्ना। ११ मिदियाया। १२ पुस्पाइ दिसास दहा भूमि कारूण मवमाए॥१९॥ महिमतिमण शरिप पिडिपुर्व कपाया करे दामो। माणापिसा पई पहाहम भयरे सः । १२॥ १२ भागीए पुपरी। १७ भामे। १५ तापहे निपंप साकरे सामु सह मिष्ठकाणी । १५ १५ पम्मिदिति ए पण्डे सिससकर दुगम्मि परपस । . ४प पाया।
पास्तुसार-प्रयमप्रकरण ७ स प्पन्हि उस्तरेण ये दयं वरसड केडीइ रोरफरं । प प्पण्हे गोसई सहरीसाणि घणनासं ॥ १५ य प्पन्हि मज्झकुठे केस छार कवाल अइसल्ला । वछत्यलप्पमाणा मिचुकरा होति नायन्यो । १६ इय एवमाइ अभिवि जे पुव्वगयाइ होति सल्लाइ । से सव्ये वि य सोहिवि वछयले कीरए गेह ॥ १७ जहा । परापर्क- कमाइ तिग्नि पुढे घणाइ तिय दाहिणे भवे वम्छो । पच्छिम मीणाइ तिय उत्तर मिहुणाइ तिय णेय ॥१८ गिहभूमि सचमाय पण ५ वह १. तिहि १५ तीस ३. तिहि १५ स १.२५ कमे। इय दिणसंखे चउदिसि सिरि पुछ समकि यच्छठिई ॥ १९ अग्गिममो आयुहरो घणक्षय कुणइ पच्छिमो पम्छो । यामो य वाहिणो वि य मुहावहो होई नायवो ॥ २. घण मीण मिहुण कन्ने रवि ठिय गेह न कीरए फेहवि । तुल विच्छिय मेस विसे पुय्वायर सेस सेस दिसे ॥ २१ ॥ इति षस्स ॥ सोय १ घण २ मिचु ३ हाणी ४ अत्य ५ सुन्न च ६ कलह ७ उव्यसिय ८॥ पूया ९ संपई १० भग्गी ११ मूह च १२ चिचाइ मासफल ।। २२ ॥ इति गहारमे मासफलाफलम् ॥ १ उत्तरदिसि सप्पाहे । २ दिप। ३ फरिम्मि। करेघणयिणासमीसाये। ५सप्पन्हे ममगिहे मार पपास ऐस सप्ता। पाच उमप्पमापा पारण पति मिमुख्य । १७॥ १५प्राइविगे पुग्वे पम् तदा दाहिये पप्पार तिगे। पछिमदिसि मीण तिगे मिप तिगे रचरे पाः १९ ७माए। साफ्णम्मा । ९संवा परसिसि । १.भाउहरो। १९इपर । १२ पण मीण मिहुप कण्या संमीप मफीरए गई। १५ संपा।
४८ ठार फेरविरचित मि मा १०/१५/१०/१५१०५ सिंह मिपुन कर्फ || १०१५९०१५१० १०२५३ २५९.5 धम मकरम न इसाप पूर्ण श्राव प भामाश मृत्यू सूपदम दक्षिण स दरिद मुस्युकर |पापम्प पमिम मान ह मित्तनास परपेश हिम्ममृत्यू । hोको कर कार वइसाहे मम्गसिरे सावणि फम्गुणि मयतरे पोसे। सियफक्खे मुहदीहे' कए गिहे हवइ मुह रिद्धी ॥ २३ मुहलग्गे पदयले खणिज नीमा अहोमुहे रिक्खे । उडमुहे नक्खत्ते चिणिज मुहलग्गि चदबले ॥ २४ सवणऽद पुस्सु रोहिणि ति उचरा सय पणि? उहमुटा । मरणिऽसलेस ति पुन्वा मू-म वि किती अहोवयणा ॥ २५ पुन्युचर नींवतले घिय अक्सय रयण पचगं ठषिर्य ।। सिलानिधेस कीरइ सिप्पीण समाणणापुव्य ॥ २६ । छन पपा- मिगुलग्गे पुहदसमे विणयरु लाहे ११ विहेप्पई फिंदे शाम जइ गिरानीवार, ता वरिससयाउँ तम्मि गिह ॥ २७ वसम चठत्थे गुरु-ससि-सणि फुज-लाहे ११ 8 वरिस साम असी । इग ति च छ मुणि राश कमसो गुरु-सणि-सियेरवि-घुमि सयं ॥ २८ १ दिपसे । २ नीमीउ । मीम । ४ ठवि। ५ पिए। मीमारमे। ७ सपाठय हपा। ८ मरिण परिस भती। मिगु ।
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पास्तुसार-प्रयममकरण
मुखदए रवितइए मगलि छट्टे पचमे जीवे ।
इय लग्गकए गेहे घेण-कणजुय दुसय वरिसाऊ ॥ २९
मुगिहत्यो ससिलग्गे गुरुकिंदे यल एस विद्धिकरौं ।
ठुम मइभमुहा सोमा मझिम गिहारंभे ॥ ३.
इकेवि गिहे निष्छपरगेहि परंसि सत्त वारसमे ।
गिइसामि वष्णनाहे अवले परहस्थि हुई गेइ ॥ ३१
घमण मुक विहफइ रवि कुज खचिय मॅयकु वइसो य ।
छुहु मुटु मिन्छ सणि तमु गिहसामिय वन जाणेह ॥ ३२
करा ति-छ-गारसगा सोमा किंवे तिकोणगे मुहया । ११४०५५
जब भट्ठमो य को अवस्स गिहसामि मारेइ ॥ ३३
॥इति ग्रहमीपनिवेशलनम् ॥
पित्ताणुराह ति उत्तर रेवद मिय-रोहिणी य विद्धिकरा ।
मूलऽदा असलेसा जिट्ठा पुत्त विणासेइ ॥ ३४
मेरैणी महा ति पुज्वा गिइसामिहया विसाह तियनासं ।
किचिय अम्गिमयकर गिहप्पवेसे य ठिइ समए ॥ ३५
तिहि रिच ४।९।१४ वार कुज-रवि चरलग्ग विरुर जोय दिणघद ।
वजिज गिहपवेसे सेसा तिहि-वार-लग्ग सुहा ॥ ३६
किंदेऽहमति फरा १४७१.८१२ अमुहा ति छगारहा श६।११
सहा मणिया।
सव्ये अट्ठम अमुहा इय लग्ग गिहपवेसस्स ॥ ३०
-
मा २दोपरिससपाउप रिवी। ३ पठाओ। ४करो। ५गहे।
वीरपि। मयंम पासोभ। ८पम मार रमे। ९सपल मदगोपसम्गे
मीमारमेय मिरपरसेम । १. पुप्पतिर्ग मा भरपी गिहसामिपद यिसारपी
बास । ९समचे। १२ किमत १३ तिमतिराहे सुरपा
सोमा समासेसे।
हर फेस विरचित सौ गिहत्यो गिहिणी चं? घण मुकु मुरगुरू मुक्ख । जो सबलु तस्स भाव सबल हुइ नत्यि संदेहो ॥ १८ ॥ इति गहमवेशल॥ राया १ सेणाहिबई २ अमञ्च ३ जुवराय । अणुज ५ रण्णीण । नैमिचिय ७ विजाण य ८ उवरोहिये ९ पच पच गिहा ॥ ३९ एगसय अठ्ठहिय पठसठ्ठी सहि असीम चालीस । तीस चालीस तिगे कमेण करसंख वित्यारो ॥४. घठ छच्च अट्ठ तिय तिय अट्ठ छ तियगेस असजुयदीहे । सेसगिहाण य माण वित्याराओ मुणेर्यच ॥ ४१ अह छच चर छ छठ छह घउ तिय गेहीण हीण मुकमेण । वित्यारामओ सेसा सेसगिहा हुति ऐयाण ॥ ४२ अस्पार्य पनेणा- हस्त संक्या पता सेनाधिप भमास्य युषपरममजणीनां नैमिति प विस्तर ०८ दी २३५vis पिस्तर १०० । ११२५ १05 बिस्तर ९२ री २१५/ १०७ मिरर री १०५/ ५॥5 बिसार दीप वन पठफर्स गिह पचीस कराइ वित्येर भणिय । पउ पर हीण मुंकमे जा खोडस अंतजाईण ॥ १३ ॥ उपत ६४ १ |२ ५२ ८० ४० ५० ४० 4.115405 Nus masurus ५३ २४ SCLS ve ४२ ४२ R ૧૨ १८ १२ ९०15URAS 24 RULS UiS ६२ २८ १२ ૨૮ ૨૮ ८२15/05/१२॥ १२IS Rus ५ २४ MS] ३२ २८ २८ २८ २८ का ४० ५ २यो। मापो सपल मरे। ५ पुरोदिपाण इह पंचगिरा। ५७०७ माग छत पिरपरमो। सेमगिहाप प कमसो माण दीदने भने। ७मा पहपा पर ह घर पर घर दीपया कमेणेष। मुनगिहरियमो सेमाण गिहाण पिण्यापार ८ गिदेम। पिरपये मणिभा । १.हीणो कमसा। सोसस ।
बास्तुसार-प्रपममकरण दसमस-अट्ठमस खडस चउरंस वित्थरस्सहिय । दीह सव्यगिहस्से य दिय-खचिय-वइस-मुदाण ॥ ४४ हस्त थिम सत्रिय पश्य शन्न मत्तम अस्या पुन: यप्रेणाह- बस्तर) २२२८ २४ दीर्भ २५७४ २१० २८ २५ अंगुल सचहिय सय उदए गम्मे य होइ पणसीई। गणियाणुसार दीहे मुगिहालिंदरस इय माण ॥ १५ पव्यगुलि वठवीसिहिं वैचीसि करंगुलेहि कवीया । मट्टि जवि तिरिय गेह पव्यगुलु इकु जाणेह ॥ ४६ पासाय-रायमदिर-तहाग-पायार-वत्थभूमाह । इय कबीहि गणिजैहि गिहसामिकरहिं गिहवत्य् ॥ ३० गिहसामिमहत्येण नीम्य विणा मिणस वित्थर-दीह । गुणि मटेहि विहच सेस घयाई मवे आया ॥ ४८ घय १घूम २ सीह ३ सोणे ४ विस ५ खर६ गयधखि एइअट्ठाया। पुव्याइ घयाइ ठिई फल च नामाणुसारेण ॥ ४९ विप्पे घयाउ विजा खत्तिय सीहाउ वइसि वसहाओ। मुदाणे कुजराया घखायु मुणीण दायव्वा ॥ ५. घय गय सीह दिवा सते ठाणे घओ य सव्वत्थ । गय पचाइणे वसहा खेप्टय तह कबडाईल ॥ ५१ १गिहाण प । २कि गरम परिमाण । रिसदेबाद मुद्रित में निमोक गापाएं -दीवित्पपई ममियं सपसम्मणिहमाण । सेसमसिन जामह महरिपर्य पहीपमा मोवरप सास फफ्नो पर्याय मूमगिहमि सम्म। महमूखसासमम्म यह मूगगिई। २च्चीसि । करिमा । ५भर्हि सप मरहि । भूमीप। ७ गमिमा। गिदसामिप्यो परे मिति पिणा। ९साणा। .मह भाप इमे। १५ सिचे। १२ सुरेम फुजरामो वाउ मुगीन मायये । एपंचापण ।
ठहर फेर विरचित -- - - यावी व तहागे सयणे म गमओ अ आसणे सीहो । वसहो भोयणपचे उत्तालये घओ सिट्ठो ॥ ५२ विस-फुजर-सीहाया नयरे पासाय-सव्वगेहेन । साण मिष्छाईण' घख कारयगिहाईस ॥ ५३ धूम रसोइठाणे तहेव गेहेसु वहिजीवाण । रासहु वेसाण गिहे धय गय-सीहाउ रायहरे ॥ ५४ दीह वित्थरिगुणियं ज हुइ त मूलरासि नायव्य । वसु ८ हय रिक्व २७ विहव, गिहनक्खच भैये सेस ॥ ५५ गिहेरिक्स वेयमय नवभाए लड मुत्तरासि घुव । ' गिहरासि सामिरासी छप? दुवार(ल)सं अमुह ॥ ५॥ रिक्स पर ८ सेस वय त च तिहा जक्स-क्खस पिसाय । आय काठ कमेण हीणाहिय सम मुणेयव्व ।। ५७ जक्ख वमो विरिकरो घणनासं कुणइ रक्खस यो य'। मझिम यओ पिसाओ तहय जमसं च वजिजा ॥ ५८ मूलरासिस्स (मूलस्स रासि) अंक गिहनामक्खर षयकसंजुस । तिये ३ सेस मुणहु असा इद-जमा तहय रायाणो ॥ ५९ गिह रिक्स सामिरिक्ख पिंड नव सेस छ चउ नव सुहया । मझिम दो पढमट्ठा ति पच सचाऽहमा तारा ॥. मह कना-यरपीई गणिजए तह य सामिय गिहाय । जोणि-गणेनासि-सव्व त जाणह जोय(हासामओ य ॥१ १ मिजास। २ । गुण गुमत। ४पा। ५गिद रिफ्तं परगुणिम मयमतमा भुत्तरासीमो। ६सगा। ७पसुमच रिफ्लसेस पर्य। ८ भाउ मंचर कमसो। सिवितु सेस मंसा एस-समसयांसा। १.हममामिमपिट मवमर्च सस ७ घर नय सहया। मन्तिम दुगइप मा ति पंच सत्तहमा तारा १०० ११ गिहाण । १२ जोणि-गण-पसि पमुहा माठी दो प गणिपायो।
४२ पास्तुसार प्रथमप्रकरण + मुद्रिसपुस्तके एतदन्सर निम्नलिसिता गाथा लम्यम्ते- ओवरय नाम साला अपेग दुसाल मग्णए गेह। गा नाम प अलिंदो इग । विलिंदोर फरसालो ॥ ६५ पटसाउ पार दुइ दिसि आलिय मिचीहि मंडवो इवा । पिही दारिम पामे मलिंद नामेहिं गुंमारी ॥ ६६ आलिय नाम मूसा पंमप नाम च हा खरदारं । मार पो य सिरिओ पीड कडी घरम एगा ॥ ६७ ओवरप-पहसाला-पम मूलगेह नायम्वं । एसस्स पेव गणिर्य रंधण गेहार गिहमूसा ॥ ६८ ओररप-अलिंद-गई गुजारि-मिचीण पर्षमाण । बालिप मंडवाण य मेएण गिहा उगमति ॥ ६९ पठदस गुरु पत्यारे लाहुगुरुमहिं सालमाईणि । बायंति सष्व गेहा सोल सहस्स ति सप चुलसीआ ।। ७० ततो य विकिपि संपर वहति धुवाइ संतपाईणि । वाण पिय नामाई उपसणचिण्डाइ पुच्छामि ॥ ७१ घुव १षा २ जय ३ नद खर ५ कत ६ मणोरम ७ समुह ८ दुमुह ९॥ कूर १. सुपक्ख ११ घणद १२ खय १३ अकद १४ विउल १५ विजय १६ गिही ॥ ६२ -- पोरश गहम् ssssधुप IS55पम्प SISऽप ||155 मैद SSISTर I SI$40 SISमनोरम् 11 समुह SSSIमुह |155 ठवि चठ गुराइ मुकमे 5151सुपक्ष लहुओ गुरु हिट्टि सेस उवर समा । 151भणद SI फ्लाय उणेहिं गुरु एव । भर्मद पुणो पुणो जोम सन्दरहू ॥ ६३ S॥ पिरष्ठ पिजप १पचारि गुरुठपिई। २माव।
C8 उमर फेल विरचित त धुव-धन्नाईण पुव्वाइ लहहिं साल नायज्वा । गुरुठाणि मुणह मुन्न नामसम भावे जाणेह ॥ १४ ॥ ॥इति पोख्शग्रहम् ॥ पोरशराहकोष्ठफानन्तर मुद्रितपुस्तके एता निमगतागायालम्पन्ते। संतम १ संविद २ पमाण ३ कुरा ४ सस्थियं ५प इस ६ ।। पद्म ७ कम्मर ८ संवा ९ हरिसम १० बिठला ११कराल १२१ ॥७५ विसं १३ पिच १४ धर्म १५ कालरंट १६ तोप पद १७ । पुचद १८ सध्वगा १९ सह वीसइम फालपर्क २० [च]॥७६ तिपुरै २१ सुदर २२ नीला २३फुटिल २४ सासय २५ य सत्पदा२६ सीसें २७। सर २८ सोम २९ सुमा ३० तह मरमाण ३१ च क्रई ३२ ॥ ७७ सीहिर ३३ य सम्बनमय ३४ पुष्टिद ३५ तह फिपिनासणा ३६ नामा । सिणगार ३७ सिरीवासा ३८ सिरीसोम ३९ वा किचिसोरणया ४०॥७८ हुगसीहर ४१ साहा ४२ सन्छिनिकास ४३ च कविय ५४ सोपा १५ ॥ एतेयं ४६ च मुख्य ४७ कलमाया ४८ ह पिलासा ४९ य ॥ ७९ पाहू निवास ५० पुदि ५१ कोहसमिा ५२ मईव ५३ महिता प ५४ । इक्वं ५५ पालन्छेप ५६ पयाफ्वन ५७ य दिया ५८ य ॥ ८० पादुक्ख ५९ ठप्लेयण ६० गम ६१ तह सीहनाय ६२ हवी ६३ । कंटक ६४ नामाई साखणमेय बयो पुच्छं ॥८१ फेवस वोक्रय दुर्ग संतष नार्म मुह गई। सस्सेष मसि पई सहेगलिद प सस्मियम् ॥ ८२ सत्विय गेहस्सम्गे अलिंदु पीयो म मरे पर्व । वि गुजारि दाहिम पंम सहिप इस विच ॥ ८२ विचगिहे नामविसे पा हा गुमारि तार गई । गुमारि पिडि दाहिण पुरगो दुवर्सिद व तिपुरं ॥ ८४ पिही दाहिण पामे गेग गुंबारि पुरठ मलिंदा । हे सासप मागास समाण वयाण संसिफर ॥ ८५ १मिति। २मा फस मेसि ।
पासासार-प्रपमप्रकरण दारिण पाम इगेग वलिंद शुभलस्स मरर्ष पुरयो । मोवरप ममि थमो वस्स प नाम हा सोमं ॥ ८६ पुरो अलिंद तिपग विविसि इफिक हवा [मारी । यमय पर समेयं सीपर नामं च सं गे॥ ८७ गुजारि शुअल तिहुं दिसि दलिंद महे य यंम परिकलियं । मंघ नालिय सहिया सिरिसिंगार सय विति ॥ ८८ विमि अलिंदा पुरओ तस्सम्गे महु सेस पुम्भु च । व नाम जुमासीपर बहुमगल रिदि-आचार्स ।। ८९ दु अलिंद-मरय तह बालिय पिढेग दाहिणे दु गई। मिचिंतरि यम शुआ उसोय नाम धमनिलयं ॥९० उलोबगेर पन्छा दाहिणए दुगा मिचि अंतरए । बा इति दो ममठी विलासनाम हल गेह ॥ ९१ ति अलिंद मुहस्सगे मरपयं सेसं विठासु म । सं गेई घ मातं कुणा महडिं पसंताण ॥ ९२ महि ति अलिंद समस्व बालिय तिरिसेहिए य गुंजारी । ममि पलय गय मिची बालिय य पपापवणयं ॥ ९३ पयावरदणए छ यमय वा हा बंगम सुनर्स । इम सोलस गेहा सम्बाई उचरमराए ॥ ९४ एयार घिय पुख्वा दादिप पच्छिम मदेम बारेण । नामवरेण यभार तिमि मिलियागि पठसहि ॥ ९५ संवणमुचरणारं तं पिय पुस्यमुह संसद मणिप | सम्ममर बहमाण अपरमई सज बामेसु ।। ९६ अमो मलिंद वियग इकिफ पाम दाहिणोपरम । यमपं च दुसाल तस्स य नाम पर रं ॥ ९७ वयये य पउ अलिंदश उभयदिसे इकु इस ओपरयो । नामेण वासरत जुगत माप बसा पूर्व ॥ ९८ सहि ति अलिंद दु पन्छ। दाहिण पामे बहन कि । व गिह नाम बीर्य हियच्छियं चउमु पमाणे ॥ ९९ दो पच्छा दो पुरओ अरिंद वह दाहिये हवा इको । काठस हगह अनलि दंई हमर भूर्ण ।। १००॥
हर फेस विरचित
-
मलिंद तिभि पय मुसल जुलं च वामदाहिए।
एग पिहिदिसाए पुदी संमृद्धि बहुमय ॥ १०१
दु अलिंद पठदिसेहि सुष्वय नाम च सवसिदिक ।
पुरमो विमि अलिदा तिदिसि दुर्ग तं च पासायं ॥१०२
पठरि बलिंदा पुरो पिहि विगं तं गिई दुवेहरखं ।
इ पराई गेहा महषि निपनामसरिसफला ॥ १०३
विमला मुदराई इसाइ भतंकियाइ पमपाई ।
पम्मोय सिरिमवाई घूठामणि कलसमाई य ॥ १०४
एमाएवासु सम्बे सोलस सोलस हवंति गिह सचो ।
इकिकालो चट पर दिसिमेष-अलिंदमेएहिं ॥ १०५
तिमलोयमुदराई उसहि गिहार हुति रायाणो।
वे पुन मबह संपद मिच्छाण प रममावेम ॥१०६
*
पुवैदिसे अत्थाण अग्गीय रसोइ दाहिणे सयण ।
नेराइ नीहारठिई भोयणठिह पच्छिमे मणिय ॥ ६५
वायव्ये सव्यायुह फोमुत्तर घम्मठाणु ईसाणे ।
पुव्वाइविनिदेसो मूलगिहदारविक्साओ ॥ १६
फुव्येणे विजययार जमघार दाहिणणे नायव्य ।
अवरेण मयरवार कुवेरवाचरे पासे ॥ ६७
नामसम फलमेर्य धारं न क्यावि वाहिणे कुजा।
कारणेवसाठ जइ हुइ चठदिसि भागट्ठ कायव्वा ॥ ६८
सुहवास असमझे घठहिं दिसेहिं पि अट्ठभागाओ ।
पठ तिय १ दुन्नि क २ पण तिय ३ तिय पण ४ पुवाइ मुकम्मेण ॥६९
वाराठ गिहपधेसं सोवाण करिव सिट्ठिमग्गेण ।
फ्यठाण सूरमुह जलकुम रसोइ आसन्न ॥ ..
१ पुग्ने सीपार । २ मग्गीद। ३ सम्बाउह । विपक्षाए। ५ पुप्यार।
पाहिणा। बार ईवीए । ८ मेसि । ९माहोर कारण वार चरविति
महमाग प्रयम्या। १. परम पि दिसासु अमागासु ।
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पारसुसार-प्रथममकरण
सईमुहाइ गेहो कायव्या सिप्पि-हट्ट बग्घमुहा ।
गिहयाराउ कमुम्बा हट्टया पुरमो मजमसमा ॥ ७१
पुखुनये अत्यहरं जमुन्नय मदिरं घणसमिद्ध।
अवरुनये विडिकर उत्तरन्नये होइ उव्यसिय ॥ ७२
मूलामो औरम कीरइ पच्छा कमे कमे कुज्जा ।
मूलागणियविसुर वेह सव्वत्थ वजिजा ॥ ७३
सलवेह १ कोणवेह २ तालुयवेह ३ कवालवेह ४ च ।
तह थम ५ तुलावेह ६ दुवारवेह च ७ सत्तमय ॥ ७४
समविसम भूमिकुभिय जलपूरे परगिहस्स तैलवेह ।
कूणसम अइ ण न होइ ता कूणवेह" तु ॥ ७५
इकखणे नीचुच पीढ त मुणह तालुयावेह ।
वारस्मुवरिमपट्टे गम्भे पीढ च सिरवेह ॥
गेहस्स मन्झि माए थमेग त मुणेह उरसल्छ ।
अह अनलो विनलाइ इविज जा थमवेहत ॥ws
हिछम उवर्रमि खणे" हीणाहिय पीढ त तुलावेह ।
पीढ" पीढस्स सम हवेह जइ तत्य नहु दोस ॥ ७८
कुब-यमु डुमै कोणय कीले विहे दुधारवेहो य ।
गेहुम्वविठण भूमी त न विरुद्ध युहा विति ॥ ७१
तल्वेहि कुट्ठरोया हवति उब्वेय कोणवेहमि ।
सालुयवेहे भय कुलक्खयं यभवेहेण ॥ ८.
२सगमुहा परगेड़ा। २ सहय। ३ पुप्यु। ४पाक्षिण एपषत
५मयर उम्पसिर्प उतारच। ७ मारमा। ८सये। दो। १.दो।
११ मा १२१दो सा। ॥ दिटिम उपरि तपाण। "पनि समसंलामो
इति जताय महु पासा। १५ माप पैन। १५ बहेण ।
उपुर फेर रिचित
कावाल तुलावेहे घणनासो होई रोरभावो य ।
श्य वेहफल नाउ सुर गेहं मुकायव्वे ॥ ८१
वेहेगेण य कैलह कमेण हाणिं च जत्य ' हुति ।
सि? भूयाण निवासो चहु क्वय पचि सव्वरिय ॥ ८२
॥ इति वेपः॥
अलैचर सठ भाया पडिमास्यु व्य करिवि मूमि तो।
सिरि हियइ नाहि सिईणे यमं वजेह जपेण ॥ ८५
वारं वारस्स समं अह वारं वारमझि कायम्य ।
अह वजिळण वारं कीरइ पारं तहाल च ॥ ८४
कूण फणस्स सम आला आल घ कीलए कील ।
थमे थम कुवा मह वेह वजि कायथ्या ॥ ८५
मालयसिरमि कीलों यमो पारुवरि वार यमुवरे ।
वादि वारु समखणि विसमा थमा महा अमुहा ॥
थमहीण न कायन्च पासाय मढे-मदिरं ।
फूण-मक्खतरेऽवस्स देय थम पयचमओ ॥
कुमीसिरमि सिहर घट्ट अट्ठस भइगायोरे ।
रूवगपछयसैहिय थमेरिसगिहि" न कायचं ॥ ८८
खणमझे कायव्य कीलाल्य गैठखमुक्ख समसमुह ।
अंतर सी मच करिव सण तह य पीढसम ॥ ८९
गिहमझि अंगणे या तिकोणय पचकोणय जत्य ।
तत्य घसंतस्स पुणो न होइ मुह रिडि कईयावि ॥ ९०
२कोमध्ये। ३ इगवेहेण य फरहो। ४पो। ५ति भूआण
निपासो चाहिं लमो पहि मारी। सिविणो। ७फीछा। ८दि। ९बम।
१. मठ। २१ पश। १२ मांगापाय। १२ सदिमा। १४ गेहेपमा म कापम्या ।
१५ गमोन। १५ मुई। १७७त्ता।
कृण ।
पारसुसार-प्रपमप्रकरण
मूलगिहे पच्छिमदिसि' जो कारइ तिन्नि वार मओवरए ।
सो त गिह न भुजइ अह मुजइ दुस्लिमो हवइ ॥ ९१
कमलेगि ज दुयारो महवा कमलेहिं वजिओ होई।
हिट्ठाउ उवरि पिहलो न ठोइ थिरु लम्छि तम्मि गिहे ॥ ९२
वलयाकार कृणेहिं सकुल अहय एग दु
ति
वाहिण-वामय दीह न वासियन्वेरिसं गेह ॥ ९३
सयमेव जे किवाडा पिहियति य उग्घहति ते अमृहा ।
चित्त-कलसाइ-सोहा-सविसेसा मूलवारि सहा ॥ ९४
छतितरि मिचिसरि मग्गतरि दोस जे न ते दोसा ।
साल-ओवरय-कुखी-पिछि-दुवारेहिं बहु दोसा ॥ ९५
जोइणि नट्टारम भारहनामायण च निवजुद्ध ।
रिसिचरिय-देवपरिय इम चित्त गेहि नहु जुत्त ॥ ९५
फलिहतर कुसुमवल्ली सरस्सई नवनिहाणजुअलष्ठी ।
फलसं परावणय मुमिणावलियाइ सुइचित्त ॥ ९७
पुरिम व्य गिहस्संग हीण अहिय न पावए सोह ।
तम्हा सुर कीरइ जेण गिह हवइ रिदिकरं ॥ १८
यजिजइ जिर्णपुट्ठी रवि ईसर दिष्टि बिहु घामो य ।
सम्वत्य अमुह घरी वम्ही पुण सव्वहा घयह ॥ ९९
अरिहतविट्टि दाहिण हर पुट्ठी वामए मुकल्लाण ।
विवरीए बहु दुक्ल परं न मग्गतरे दोस" ॥ १..
पठमत जाम पजिय घयाइ दु-तिपहरसमया छाया ।
दुहवायो नायच्या तओ य जैतेण वबिजा ॥ १.१
१मुदि। २ पाप हुधि पाप मोबरए। पहपा।
पारि। गे। ८ पिडी। विण पाममुमा। १.माम पउदिसि
अपह। १९ोसो। १२ ।
४५ थामा।
१५ पयरेण।
- हपुर फेक दिन सम कट्ठा विसम खणा सव्वपयारेसु इयं विही कुजा। पुव्युचरेण पल्लव जमावरा मूल कायव्वा ॥ १.२* हल घाणय-सगढ-मई-अरहजताणि फटई तह य ।। पचुंपरि स्त्रीरतरू एयाण य कटु वजिजा ॥ १.३ बिज्वउरि केलि दाडिम जमीरी दो हलिद अबिलिया । चव्यूलि बोरि माई कणयमया तहवि नो कुखा ॥ १.० एयाण जईये जढा पाडवसामओ, पविस्सई महवा । छाया वा जमि गिहे कुलनासो हवइ तत्येव ॥ १.५ संसद भग्ग दहा मसाण खग निलय खीर विरदीहा । निय पहेढय रुक्खा नहु कट्टिजति गिहहेळ ॥१॥ पाहाणमय यम पीढ पट्ट च धारउर्चाइ । एए गेहिविरुद्ध मुद्दावहा धम्मठाणेसु ॥ १.. पाहाणमए कट्ठ कट्ठमए पाहणस्स थमाई। पासाए य गिहे, या यजियव्या पयत्तेण ॥ १०८ पासाय-व-यावी-मसाण मठ-रायमदिराण च । पाहाण-इट्ट-कट्ठा सरिसममचा वि वजिज्जा ॥ १.९, मुगिहजलो उवरिमओ लिविज नियमज्झि नग्नगेहस्स । पम्छा कहवि न सिप्पइ इय मणिय पुव्यसत्यमि ॥ ११ ईसाणाई कोणे नयरे गामे न कीरए गेह । संतलोयाण अमुह मंतिमजाईण रिद्धिकरं ॥ १११ देव-गुरु-बहि-गोघण-समुहे चरणे न कीरए सयण । उचर सिर न कुन्चा न नग्गदेहा न मल्लपया ॥ ११२ "म पु पाठभेदो पथा-'समेपि मारय मूगदे एगिसुधि कीरति । पौर पुष एगमुते उबरयांगारि-मनिस' । १५ ॥ १गापि । २ पारिपसा, पाडोसा। समापारचाण। विरिकर। समुर। - . .
वास्तुसार-प्रफ्मामकरण
धुचामश्चासम्मे परवत्युवले चउप्पहे न गिह ।
गिह-देवलपुव्यिच्छ मूलदुवारं न चालिज्जा ॥ ११३
गो-वसह-सगडठाण वाहिणए वामए तुरंगाण ।
गेहस्से वारभूमी संलग्गा साल ऐयाणं ॥ ११४
गेहाल वाम दाहिण अग्गिम भूमी गहिज जइ कजं ।
पच्छा कहव न लिज्जइ इय मणिय परमैनाणीहिं ॥ ११५
॥ इति मीचन्द्राज ठकुर-फेरू-विरचिते वास्तुसारे
पाइलक्षणमकरण प्रयम समाप्तम् ॥
१ गिगाहरभूमिए। २सासए ठा। पुप्पनापीहि ।
4
-
[द्वितीय विम्बपरीक्षाप्रकरणम् ।।
इय गिहलक्षणभाव भणिय मणामित्य विचपरिमाण
गुण-दोसलक्खणाइ मुहासह जेण नई ॥१
छत्चचयठतारं माल कवोलाउ सवण-नासामो।।
मुहय जिणधरणग्गे नवग्गहा जक्स-जक्खिणिया ॥
वियपरिवारमझे सेलस्स य वण्णसकर न सुह।
समर्मगुलप्पमाण न मुघर हवइ कझ्यावि ॥३
अक्षुमजाणु-कधे तिरिए केसत अंचलते य ।
मुख्ग घठरंसं पजकासण मुह विष ।। 8
नव ताल हवइ रूप स्वस्स य वारसंगुलो तालो ।
मंगुल अहहियसय उड़ चासीण छप्पन्नं ॥ ५
माल १ नासा २ भयण श्गीय हियय ५ नाहि गुम जघाइ८।
जाणु ९ य पिडि १० य चरणा ११ इकारस ठाण नायव्वा ॥
चठ १ पच ५ वेय ४ रामा ३
रवि १२ दिणयर १२ सूर १२ तह य जिण २० वेया ४ ।
जिण २४ वेय ४ मायसंखा कमेण इय उहरूपेण ॥ .
भाल १ नासा २ वयण ३ गीव ४ हियय ५ नाहि गुझ जाणू या
आसीणपिंधमाण पुज्वविही अंक सखाई॥
१प्राणिमा। २पासीण।
मुनिपुस्तके पावन्तररूपेण उपका पाठा-
माठ मासावपर्ण पणमुच मादि गुग्म उम्प ।
प्राणमा परपाइप पायमामि गामिना ।
परपंच प रस पदस दिणमाहवाय निमपा।
मिण या मापसजा कमेण इप जण ॥
पास्तुसार दिवीपमकरण
मुहकमलु चठदसंगुल कनंतरि वित्थरे दह ग्गीवा ।
छचीस उरपएसो सोलह कडि सोल तणुपिंड ॥ ९
कन्नु वह सोल वित्यरि चठ उवरे सिन्नि हिटि लठलि खण ।
नकु ति वित्यरि दुदए सिरिवच्छो दु दह तिय पिठुलो ॥३.
[पलवसन्तरं मुद्रिवपुसके निमलिमस्तिता गामा भपिन उपतम्मन्ते-
नकसिहागम्माओ एगतरि पसु पउरदीहये ।
दिपाइकुडोप दुमाइ माछीहे ॥१
नहुति पित्थरि दुदए पिरे नासम्गि इकु बहु सिहा ।
पण माप मार दी वित्यरि एगगुरु बाण ॥२
पण उदा पठ वित्परि सिविच्छे बमसुचमछमि ।
दिग्गुल पणवह वित्परं ठरचि नाहेग ॥३]
सिरिवछ सिहिण फक्खतरमि तह मुसल पण सरह ५५८ केमे ।
मुणि ७ चठ ४ रवि १२ है ८ वेया केहुणी मणियधु जघ जाणुपय ॥११
[भत्र पुन मु० पु० एतद्द्वापानन्तरं मपोगवा अभिन्न गामा विपन्ते-
पममुच बहोमाए सय पारस अंस उपरि छहिष ।
नाहीउ किए बह पामो केस मवायो॥१
कर-उपर संवरेगं घट वित्परि नद दीहि उच्छग ।
मलमा दुदय वि वित्परि हुमी कच्छिवरे विभि॥२
ममुचाओ पिंडिय छ नीव दह फमुदु सिहप दु मास ।
दुनियुक सच मजोरि भूपसंपी भट्ठ पयसारा ॥ ३
माशुभ समुचामओ पउदस सोलस बार पसार ।
सममुच बाम नाही पपकम माम छम्माप ।। १
परसार गम्मा पनरसमाएटिं परण बंगुट ।
दीगुलीप सोएस पठदसि माए कणिहिया ।। ५
मुद्रितपुस्तके पाठमेदो मया-
फचदा तिमि वित्परि बहाई दिहिफु आधारे ।
फेसंत पा समसिरु सोप पुण नयपरा समं ॥ १०
२मुसस एपण मा कम । २ पसुषेपा। हिमी।
- . [द्वितीय विम्बपरीक्षाप्रकरणम् । ] । इय गिहलक्खणभाव भणिय मणामित्य विपरिमाण । गुण-दोसलक्खणाइ मुहामुइ जेण नजेई ॥१॥ छसचयउचारं माल-कवोलाउ सवण-नासाओ।। मुख्य जिणचरणग्गे नवम्गहा जक्ल-जक्सिणिया ॥ २ विपरिवारमझे सेलस्स य वण्णसंकरं न मुह । समभंगुलप्पमाण न मुदर हवा कश्यावि ॥ ३ अशुभजाणु-कधे तिरिए केसत अंचलसे य । सुवेग घठरंसं पजकासण सुद विष ॥ ४ नव ताल हवह रूप स्वस्स य वारसंगुलो तालो। मंगुल अहियसय उड चासीण छप्पन्न ॥ ५ भाल १ नासा २ वयण ३गीव ४ हियय ५ नाहि गुम जघाइट। आणु ९ य पिडि १. य घरणा ११ इशारस ठाण नायव्या ॥ चट पंच ५ वेय ४ रामा ३ रवि १२ दिणयर १२ सूर १२ तह य जिण २४ वेया । जिण २४ वेय ४ मायसंखा फमेण इय उडस्वेण ॥ . भालं १ नासा २ वयण ३ गीव ४ हियय ५ नाहि गुज्झ जाणू यथा भासीणर्षियमाण पुव्वविही अंक सखाई ॥ ८ १माणिखा। २बासीण। मुद्रियपुस्तके पाठाम्वरकपेण प्यता पाठा- मामासापपर्ण पणमुर्त माहि गुसप। माणममा चरणा इय पर ममापि पाणिना।। पर पंचम तेरस बगस दिपनारायजिप मा। मिपया मायसवाकमेण श्य गोम.७॥
पातुखार शिवीयप्रकरण
मुहकमलु घटदसंगुल कमतरि वित्थरे दह गीवा ।
छत्तीस उरपएसो सोलह कहि सोल तणुपिंड ॥९
का पद सोल वित्थरि प्यउ उवरे सिन्नि हिटि लठलि खण।
नाति वित्यरि दुदए सिरियम्छो दु वइ तिय पिहुलो ॥१०
[पत्यन्म मुद्रितपुरके निमसिसित गाया भपिन उपसम्पन्ते-
नबसिहागम्मानो एगंतरि वासु पउरीहये ।
दिनदवा गेला दुमाइ मच्छु छरीहे ॥१
नाति वित्वरि दुइए पिंडे नासम्गि फु अदु सिहा ।
पण माय बार दोहे वित्वरि एगंगुल बाग ॥२
पण उदइ पठ पित्यरि सिरिपच्छ पमसुचमन्ममि ।
विरंगुछ पगवई विस्परं उरचि नाहेर्ग ॥३]
सिरिवम्छ सिहिण फक्खतमि सह मुसल पण सरह ५।५८ केमे ।
मुणि ७ घउ ४ रवि १२ ? ८ वेया केहुणी मणियां जघ जाणुपय॥११
[ पत्र पुन मु० पु० पतद्वामानन्द भमोगवा मपित्र वा विपन्ते-
पणमच महोमाए सुप पारस अंस उपरि छहिकप ।
नाहीठ फिरवई पाओ फेस वाओ ॥१
फर-उपर बतरेगं घठ वित्परि नद पीहि उप्छंग।
बलपहु दुदय वि पित्यरि कुणी इच्छितरे विभि॥२
मसुचामो पिरिय छ जीप दर फर सिहम दु मास ।
दुपिक सच सयोपरि मुपसंगी मा पपसारा ॥ ३
बाराम महसुचाओ पठदस सोलस अगर पासारं ।
समठप साप नाही वर्षकम बाप मा ।।४
पइसार गम्मरगा पनरसमाएहि परम अंगुई।
दीगुलीय सोलस पठदसि माए कणिहिया ॥५
मुद्रितपुस्तके पाठमेयो यथा-
कछु दह तिमि पित्यरि अहाई हिहि मु आपारे ।
फेसंत पा समसिक सोय पुण नपणरेर समं ॥१०
१ सुसम छ पण मा कमे। २ बसुदेया। पुहिपी।
- कर फेफ विरचित करयल गम्माउ फमे दीहंगुलि नदे पक्खिमिया । छब कणिट्ठिय मणिया गीषुदए तिमि नापमा॥६ मन्त्रि मास्यगुलिया पण दीहे पपिखमित्र घउ चठरो। छह अंगुलि माय तिय नह इकि ति बंगुर ॥७] मेगुठ्ठसहियकरयल वट्ट सगुलस्स वित्थारे । चरण सोलस दोहे त्यदि वित्थिन घर कदए ॥ १२ ॥ ! [एक्शापामन्तरं मुविसपुस्तके निमगतका गाया भक्ति सम्पते- गीष तह कम यतरि सय वित्यारि दिया उदा तिग। अंचलिय अ वित्परि गरिय मह बाद दीहेण ॥१ छम्माय अहदीहे चक्खूपण वीह अपिलचे । सिभि सिहिण चउ नाही नासा उर नाहि मुझेगा ॥ १३ केसंत सिहा गहिय पचट्ठ कमेण अंगुल जाण । फ्ठमुरेहचक करचरण विइसियं निध ॥ १४ [ मनिवपुतके पतवामानन्तरं निमोदवा गामा ममिका सम्बन्धे- नक सिरिषच्छ नाही समगम्मे पंम्मत जाह। तचो व सयलमार्ग परिगरविपस्स नायर्म ॥१ सिंहासणु बिंबामो दिकामो पीहि विरपरे बदो । पिडेण पाठ परियो स्मग नव बहन सस छुयो ॥२ उमपदिसि बक्स-चस्सिपि फेसरि गप पमर मसि पापरी । पउदस पारस दस विय छ भाय कमि इस मषे री ॥३ परूपरी गला तस्साहे धम्मचक उमपदिसं । हरिण रमणीर्य गदियमममि जिणधिमं ॥४ पर फणा दुमि छत्ता पारस हस्पिर्हि दुमि मा कमए । बड अम्वरपट्टीए एय सीहासपस्सुदये ॥ ५ गरिय-सम-सुभाया वचो इगतीस घमरधारी य । घोरणसिर दुमालस इष उदर्य पासवापाण ॥ ६ सोउस माए रून पुरलिपसमये छरि पराठीप । इस रिपरि पापीस स्रोलस पिंटेण पखवाय ॥ ७ १पित्याये। मु पु मासीय गापा।
पास्तुसार नितीपप्रकरण
छचदं समायं पंरुपनालेग तेर मालधरा ।
दो माए पंसलिए वह वसभर-वीणघरा ॥ ८
तिरूपमन्ममि पा दुमाय यसलिय छपि मगरमहा ।
इम उमपदिसे चुलसी दीह उलस्स बाणेह ॥ ९
घठवीसि माइ छचो पारस वस्सुदा महि ससघरो ।
छहियेणुपचवली एव पठस्दए पभास ॥१०
मालपर सोलसंसे गईद अद्वारसमि वाणुवरे ।
हरिणिरा उमयविसं तो अहिअ संखी य ।। ११
छपचय वित्यारं पीसंगुल निम्गमेण दह मायं ।
मामाल वित्पारं पापीस मष्ट पइसारं ॥ १२
सिंबदि एउठपिर छचसम गेहपइ नायव ।
पणसुचसमा विहि पामरमारीण कायया ॥ १३
नाति पच तित्या इमेहि माएहि वेवि पुम इमा।
उस्सग्गियस्स नुअलं विमुग मूल किंवेग ।। १४]
परिससयामो उड़ ज विष उत्तमेहिं संठविय ।
विलय(यल)गु वि पूइजइ त थिय निकल न जमओ ॥ १५
मुह-नक नयण-नोहिं कठिमगे मूलनायग चयह ।
आहरण-यत्य-परिगर-चिन्हायुहमगि पूइज्वा ॥ १६
पाउलेवाइ थिय विलय(यलग पुणवि कीरए सज्ज ।
कढनयण-सीमय न पुणो सच च कईयावि ॥ १७
पाहाणलेयकट्ठा दतमया चिचलिहिय जा पडिमा ।
अप्परिगर-माणाहिय न मुदरा पूयमाण गिहे ॥ १८
एकगुलाइ पडिमा इफारस जाम गेहि पूइज्जा ।
उह पासाइ पुणो इय भणिय पुन्यसूरीहिं ॥ १९
नह-अंगुलीय-वाहा नासा-पयमगिणुक्रमेण फल ।
समय-देसभग यघण-कुल्नास-दन्वखय ॥ २०
१निफस। २माही! सेस।
- ठमुर फेर निरचित फ्यपीढ-चिन्ह-परिगरमगे जण-जाण-मिचहाणि कमे । छत्त-सिरिवम्छ-सवणे लष्ली-मुह-बघवाण वय ॥ २१ पडिमा रठद जा सा कारावय इति सिप्पि अहियगा । दुव्यणे वव्यविणासा किसोयरा कुणइ दुम्भिक्ख ॥ २२ बहुदुक्ख वकनासा इस्सग खयंफरी य नायथा । नयणनासा कुनयणा अप्पमुहा मोगहाणिकरा ॥ २३ कबिहीणायरियया सुय-बघव हणइ हीणजघा य । हीणासण रिरिहया घणक्खया हीणकर-चरणा ॥ २४ उचाणा अत्यहरा वकम्गीवा सदेसमगकरा । अहोमुहा य सचिंता विदेसगा इवइ नीचा ॥ २५ विसमासण वाहिकरा रोरकरऽमायदव्यनिप्पमा । हीणाहीयगपडिमा सपफ्न-परफ्पसकट्टकरा ॥ २॥ उडमुही घणनासा अप्पया तिरियविधि विभेया । आपदिष्टि असहा हवइ अहोदिहि विग्धकरा ॥ २७ चठमुव मुराण आयुह हवत केसंत उप्परे जब ता । करण-करावण-थप्पणहाराणप्पाण देसहया ॥ २८ कठपीस जिण नवग्गह जोइणि 'घउसहि वीर पावमा । चठवीस जपव-जस्विणि वह दिहवह सोले विज्जमुरी ॥ २९ नव नाइ सिर चुलसी हरि-हर-धार्मिद-दाणवाईण । वनक-नाम-आयुह वित्यरगयाउ जाणिजा ॥३. ॥ इति परमबम-भीचन्द्राामपुर-फेरविरचिते पास्तुसारे पिम्मपरीक्षामफरण द्वितीय समाप्तम् ॥ - J J २परममा परमेम। सोमस ।
[तृतीय प्रासादविधिप्रकरणम् ।। मणिय गिहलपवणाइ पिपरिक्खाइ सयलगुणदोसं । संपइ पासायविही संस्खवेण निसामेहे ॥१ पढम गडावरय जलते अह ककरते मरियव्व । कुमनिवेसं अट्ठ खुरस्सिला तयणु मुत्तविही ॥ २ पासायाओ अड तिहायपाय च पीढ-उदओ य । तस्सडि निग्गमो हुई उववीदु जहिछ माण तु ॥ ३ अइयर १ फुल्लियओ २ जाडमुहो ३ कणउ ४ तह य कयवाली ५। गय १ अस्स २ सीह ३ नर ४ हस ५ पच थर इय भवे पीठ ॥४ सिरिविजठ १ महापउमो २ नदायत्तो य ३ लच्छितिलओ ४ य । नरवेय ५ कमलहसो ५ फुजर ७ पासाय सच जिणो॥ ५ [स्तोऽप्रे मुदितपुस्तके निमोठा मपिका गाया सम्पम्ते- बहुमेया पासाया अस्संखा विस्सफम्ममा मणिया । वचो य केसराई पणवीस भगामि मुलिला ॥१॥ केसरिम सामदो सुनदगो नंदिसास नंदीसो । सह मंदिर सिरिवच्छो अमिसम्म हेमवतो अ॥२॥ हिमा ईठासो पुषिजयो इदनीछ मानीठो । भूमा म रयणको पहलो पउमरागो म ॥ ३ ॥ पखंगो मुठलात मारावयो रायसु गोक। पसहो अदाय मेरू एए पणधीस पासापा ॥४॥ पण बंग्याइ सिहरे कमेण पठहि चा हवा मेरू । मेस्मासाप बस्यसंखा इगहिय सर्य वाण ॥५॥ एएहि उपजती पासाया विविह सिहरमाणात्रो। नप सहस्स छ सय सचर विस्थरगयामो ते नेया ॥६॥ पठरेसमि त तिचे महप दुपहिबार पानीसा । मापविरार एष सप्रेस वि दवमवणेसु ॥७॥ १गिता. २ गावियर। त। कस्त। ५पुमा। पप।
- गुर फेर विरचित चरणा चउमहा सखे पासाय हाँति नियमेण । कूणस्सुमयदिसेहिं दलाइ जा होंति भद्दाइ ॥ ६ पडिरह १ वोल्जिरया २ नदी ३ सुकमेण ति पण सत्त दला। पल्लविय करणिक अवस्स महस्स दुष्ह दिसे ॥ ७ दो भाय फूणो हुइ कमेण पाऊण जा भवे नदी । पाय., एग १, दुसह २॥, पल्लविय करणिय मह ॥ ८ महई दस भाय तस्साओ मूल नासिय एग । पठणाति तिय सवातिय २) ३) ३) लेहिं सुकमेण नायव्यं ॥९ कूण पटिरह य रह मद मुहमद मूलमंगाइ । नदी करणिक पन्छव तिलय तवंगाइ भूसणय ॥ १. ॥ इति विस्वर ॥ खुर१ कुमर कलसर कावलिष्ट मच्ची५ जघा या छमि उरजपा ८॥ भरणि ९ सिरवट्टि १० वय ११ वइराड १२ पहाय १३ सेर थरा ॥११ इग तिय दिवङ्क तिहुंढे पण सहा इग दु दिवतु दिवढो य । दो दिवतु विघटु माया पणवीसं तेर घरमाण ॥ १२ पासायस्स पमाण गणिज्ज समित्ति कुमगथराभो । तस्स य दस भागामो यो दो मिचीहि रस ६ गम्मे ॥ १३ इग दुति घठ पण हत्ये पासाइ खुराउ जा पहायरो । नव सच पण ति एग मंगुलजुत्त कमेणुदय ॥ १४ इचाइ स-धाणते ५० परिहत्ये चठक्सगुल विहीणा । इय उदयमाण मणिय अओ य उड़ भवे सिहर ।। १५ १॥ १ ૨ २ - 1 परिहोंति १ दुमि। र दो माप पर क्यो। एपंपि परिपाई। ५तिसुधमि। ६ पहारू । करगिई।
बास्सुसार-पवीय प्रकरण
पाळणे दूण भूमजु नागर सतिहाउ दिषद् सप्पाओ ।
देवह सिहरो दिवो सिरिवम्छो पठणे दूणो य ॥ १६
छजउठ उपरि तिहु दिसि रहिया जुयबिंब उवरि उरसिहरा ।
कूणेहिं चारि फूडा दाहिण वामग्गि दो तिलया ॥ १७
उरसिहर फूहमाझे सुमूलरेहाय उवरि चारि ल्या।
अरि फूणेहि रिसी आवलसारो य तस्सुवरे ॥ १८
पिडिरह विकन्नमझे आमलसारस्स वित्थरङदए।
गीवडयचदिकामलसारिय पठणु सेवा इगिगो॥१९
आमलसारय मझे चदणखट्टास सेयपट्टया ।
तस्सुवरि कणयपुरिसो घयपूर तो य वरकलसो ॥ २०
पाहणकटिट्टमओ जारिस पासाठ तारिसो फलसो।
जइसन्धि पइठ पच्छा कणयमओ रयणजटिओ वा ॥ २१
[पतवापानम्तरं मुद्रितपुस्तके मिन्नग गायायमपिक पिपत्रे
छजाओ पाव कप [माप] इगलीस करिवि वचोथ।
नब बार बाप तेरस दीदये इसइ सउपासो ॥१
उदयदि विहियपिंटो पासायनिलार तिफ प तिल प ।
सस्सुपरि हर सीहो मंरपफलसोदयस्स समा ॥२]
मुहय इगदारुमय पासाय फलस-दड-मकडिय ।
मुहकट्ठ मुदि कीरं सीसम खयरंजण महुव ॥ २२
नीरतरदल विमती भइ विणा चउरसं च पासाय ।
पसायारं सिहरं करति जे ते न नदति ॥ २३
६पकप
१पण पाऊणु। २दापिर। ३ पऊण । ४मंतर। ५चीमा।
सपाहियो। ७भ। ८मविद्ध।
+ परिप पिक्रयमरमे मामससारस्त पित्परो हो।
पस्सरेण प रपमो मम्झे ठाण पत्चार।
गीपश्य हिन भामसारीय कमेण तम्मागा।
पासम सपाउगेगो भामसारस्स एम पिही।
-ति पाठान्तर मुद्रियपुस्तके।
१०. ठार फेल बिगत अगुलाइ कमसो पायगुल पुहि कणयपुरिसो य । कीरइ घुव पासाए इग हत्याई ख-याण ते (५०) ॥ २४ इगहत्ये पासाए दड पठणगुल भवे पिंड । अडगुल बुद्धि कमे जा कर पन्नास कभुदए ॥ २५ निप्पो घरसिहरे घयहीणसुरालयमि असुरठिई। तेण घय धुव कीरइ दडसमा मुक्क्सक्खकरा ॥ २६ पासायामो दुवारं हेत्थप्पड सोलसंगुल उदए । नेव पचम वित्थारे अहवा पिहुलाउ दूणुदए ॥ २७ [मत्र मुद्रितपुस्तके पपा गाया अघिका पिचते- उदयदि पिस्परे पारे भायदोस विमुदए । गुलं समई या हापि पुहि न दूसए ॥ १] निहारि वारउत्ते पिंय साहेहि हिडि पटिहारा । कूणेहि अट्ठ दिसिवइ जघा-पडिरहइ पिक्खणय ॥ २८ पासायतरिय ४ मागप्पमाणर्षिय सठचम मणियं । राउट्टे रयण विरुम घाउमय जहिम्छमाण घरं ॥ २९ दस माय कयदुवार उएवर उच्चरंग मझेण । पढमसे सिवविठ्ठी वीए सिवसत्ति जाणेह ॥ ३. सयणासण सुर सइए लछीनारायणं पठत्ये य । वाराह पचमए छ8से लेवचिचस्स ॥ ३१ सासण सुर सचमए सत्तम संचमि वीयरागस्स । चठिय भइरव अरमे नवमिदा छत्त चमरघरा ॥ ३२ दसमे माए सुन्न जक्खा गषव्यमक्खसा लेण । हिट्ठाठ कमि ठविण्इ सयलमुराण च विठ्ठी य ॥ ३३ १पासायस्स। पचास। “पबा। २ हपंपा। मा हत्य परयति विगग पुहिम्मार ५सत्तसि। मिति ।
पास्तुसार दवीय प्रकरण भागढ़ मणतेगे सत्तम सत्चमि दिछि अरईसा । गिहदेवाले पुणेव कीरइ जह होइ पुहिकर ॥ ३४ गम्भगिहरे पणसा जक्खा पढमसि देवया पीए । जिण-किन्ह-वी तइए यमु चउत्थे सिष पणगे ॥ ३५ नहु गम्भे ठाविजइ लिंग गमे घाइज नो कहति । सिलअर सिलमत्त ईसाणे किं पि आसरिउ ॥ ३६ मिचिसलग्गविंध उचिमपुरिस च सव्वहा अमुह । चित्तमय नागाइ हवति एए संहावेण ॥ २७ ॥ जगई पासायतरि रस ६ गुण पच्छा नवग्गुणा पुरओ। दाहिण-घामे तिउणा इय भणिय खिचमचाय ॥ ३८ पासायकमलियम्गे गूढक्खयमडव तठ छछ । पुणु रंगमहव तह तोरण सुषलाणमडवय ॥ ३९ दाहिण-यामदिसेहिं सोहामहव गउक्खजुय साला । गीय नट्टविणोय गपव्वा जत्थ पकुणति ॥ ४. पासायसम विठण दिवट्टये पठण दूण वित्थारे" सोवाण तिन्नि" उदए चउकीमो मडवा होति ॥ ४१ कुभी यम मरण सिरपट्ट इग पंच पठण सप्पाय । इंग इय नव भाग कमे मडव पिडुलाउँ अड्दए ॥ ४२ पासायअट्ठमसे पिंड माडिय-कलस-यभस्स । दसमसि थारसाहा सपडिग्घहु कलेसे दूणुदए ॥ १३ पट्टस्स आयहिट उज्चयहिट्ट च सव्यसुचेग । उदुवरसम कुमिय थमसमा थम जाणेह ॥ ४४ । १ ससि । २भरिहता। ३ देवालु। ४ गिहा। ५ वसमित। मातरियो । समासेण । ८ गुणा! ९ मम्बाप। १.म्मर भागे । ११ पुष । १२ सपठाप्य । २५ दिगर्य। १४ पिरपारो। १५ ति उपप प्रग्यप पण । १५पार भरणा १७ पलम दिपादए।
ठकुर फेस विरचित
जलनालयाउ फरिसं करतरे चठ जवा कमेणुध ।
जगईय मिति उदए छजये सम चउदिसेहिं पि ॥ ४५
अग्गे वाहिण-वामे अट्ठह जिणिद-गेह पठवीसं ।
मूल
सेलागाठ इम पकीरए जगइ मज्ममि ॥ ४१
रिसहाई जिणपती पासायामओ य वामियदिसाओ ।
ठाविज पिट्ठिमग्गे सव्वेहि जिणालए एवं ॥ ४०
चउपीसतित्थमझे ज एग मूलनायग हवइ ।
पतीद सस्स ठाणे सरस्सई ठवमु निम्मत ॥ ४८
चठतीस वाम-माहिण नव पिट्ठी" अट्ठ पुरठ देहुरियं ।
पासाय मूल एग वावन्नजिणालयं एव ॥ ४९
पणवीसं पणवीस वाहिण-यामेन पिट्टि इकार ।
दछ अग्गे नायव्य इय वाहचरि जिणिदाल ॥ ५.
अंगविभूसणसहिय पासाय सिहरबर-कट्ठमय ।
नहु गेहे पूइजा न परिजइ किंतु जर वरं ॥ ५१
जच कए पुणु पष्छा ठविज रइसाल अहव सुरभवणे ।
जेण पुणो तस्सरिसो करेइ जिणजत घर संघो ॥ ५२
गिहदेवाल कीरइ दारुमय विमाण पुप्फय नाम ।
उपवीढ पीढफरिसं जहुत्त चठरंस तस्सुवरें ॥ ५३
घउ थम चठ दुवारं च तोरण ठ दिसेहि उजउर।
पच कणवीर सिहरं इंग ति दुवारेग सिहरं वा ॥ ५४
मह मित्ति छज्ज ओवम मुरालय आयुमुर कायव्य ।
सम चरसं गम्भे तस्साठ सवायओ उपए ॥ ५५
१मामिपाट । २ मा। सिमागाउ। ४ सीखुपारस्स पारिपविसामो ।
पुर। ६वहर। ७ मूग पासाप । ८ मतु। ९तस्परि। १० पग पुति
पारेग। ११ ततो भ सपायमो ग्यपा।
१०३
वास्तुसार-पतीय प्रकरण
गष्भाउ छनमो हुइ सवाउ सतिहाउ दिवटु वित्यारे ।
वित्थाराठ सवाओ उदएण य निग्गमे अहो ॥ ५६
छज्ज-उद-यम-तोरणजय उवरे मडओवम सिहरं ।
आलयमझे पडिमा छज्जयमममि जलवट्ट ॥ ५०
गिहदेवालयसिहरे धयवह नो करिज कइयाधि ।
मामलसारये कलस कीरइ इय मणिय सत्येहिं ॥ ५८
सिरिघषकल्स-कुल्समवेण चदाहरण फेरेण ।
कमाणपुरठिएण य निरक्खिठ पुन्वसत्याइ ॥ ५९
सिपरोक्गारहेऊ नयण-मुणि-राम-चद (१३७२) परिसम्मि ।
विजयदसमीइ रश्य गिहपहिमाल्क्सणाईण ॥ ६०
इति परमजनभीचन्द्राङ्गजठारफेरूविरचिते षास्तुसारे
प्रसावषिधिप्रफरण इतीय समाप्त ॥
॥ एष मास्तु प्रयरणं प्रय गाथा २०५ ।।
१वा चु। २परिभाकपापि। मामस्सार ।
+ मुदितपुस्तक ५ गाथा पूपं लिपिता पधाद् उपरिवनगाथा पिपते ।
- , , , , ठपुर फेरू रचिता खरतरगच्छयुगप्रधानपतु पदिका। नमो मिनाय। सयल सुरासुर वदिय पाय, वीरनाह पणमवि जगताय । सुमरेषिणु सिरि सरसइ देवि, जुगवरचरिउ भणिम संखेवि ॥१ मुहमसामि गणहर पमुह, सिरि जुगपवर नाम वर मत, मुमरहु अणुदिणु भचिजुय । लीला तरिवि भवोवहि जेम, कमि कमि पावहु सिरिसह ॥धूषक वरमाणजिणपट्टि पसिस, केवलनाणीगुणिहि समिडु। पचमु गणहरु जुगवरु पढमु, नमहु मुहमसामि गुरु ममम ॥२ मज्जा अट्ठ पच सय तेण, इकि रयणि परिवोहिय जेण । मुगुरपासि लिठ संजमभार, सरहु सरहु सो जयुकुमार ॥ ३ पमक्सरि सिजमठ मुगुरु, जसोमहु सूरीसर परु । सिरि संभूयविजठ मुणितिलठ, पणमहु महयाहु गुणनिलल ॥ महवाह सूरीसरपासि, चठदस पुव्य पढिय गुणरासि । मजिठ जेण मयणमडवाउ, जयउ मु लिमडु मुणिराउ ॥ ५ दूसमकालि तुलिउ जिणकप्पु, अज्ज महागिरि गुरु माहप्पु । अज मुहत्यि थुणहु धरि माउ, जिणि पडियोहिउ संपइ राउ॥ संसिसरि कय संघह संति, चउदिसि पसरिय जसु वरकिति । तामु पट्टि हरिमठु मुर्णिदु, मोहतिमिरमर हरण दिणिंदु ॥ . संडिलसरि तह अज समुहू, अज्ज मगु जणकइरवचंदु । अज घम्मु घर पयरिय धम्मु, भद्दगुप्तु वसिय सिषसम्मु ॥८ घयरसामि पठ्माविय तित्यु, अज रक्खिठ योहिय जणसत्यु । अज्ज नदि गुरु बदहु नरहु, अज नागहत्थीसह सरहु ॥९ रेवयसामि सरि वरिष्ठ, जिणि उम्मूलिय भवदुइसल्छ । हेमवतु झायहु बहु मचि, तरहु जेम भवसायरु झचि ॥ १.
न
.
युगप्रपाम चतुम्पदिन
नागजोयसरि गोविंव, भूइदिन्न लोहिच मुर्णिद ।
दुसमसरि उम्मासय सामि, तह जिणमइसरि पणमामि ॥ ११
सिरि इरिमइसरि मुणिनाहु, देवभइसरि वर जुगवाहु ।
नेमिचद् 'चदुजलकिचि, उज्जोयणसुरि कचणदिति ॥ १२
पयडिय सरिमतमाहप्पु, रूविज्झाणि निज्जियकदप्पु ।
फुदुज्वल जस भूसिय मवणु, सलहहु वइमाणसरि रयणु ॥ १३
अणहिलपुरि दुलह अत्याणि, जिणसरसूरि सिहतु घखाणि ।
चउरासी आइरिय जिणेषि, लठ जसु वसहिमग्गु पयडेवि ॥१४
जिणि विरईय कहा संवेग रंगसाल तह सत्य अणेग ।
निमदेसण रंजिय नरराय, तमु जिणचवसरि सेवाहु पाय ॥ १५
वर नव अंग वित्ति उररण, थमणि पास पयठ फुडकरण ।
अभयदेवमुरि मुणिवरराउ, दिसि दिसि पसरिय जमु जसवाठ ॥ १५
बलि
रहु सुपइड,
तालाराम जुवह मुणि सिह।
निसि जिणहरि जिणि वारिय अविहि,
युणुहु म जिणवल्लहसरि मुविहि ॥ १७
जोइणिचकु उजेणिय जेण, वोहिउ जिणि नियमाणवलेण ।
सासणदेवि कहिउ जुगपवरु, सो जिणदत्तु जयठ गुरपवरु ॥ १८
सहजरूवि निज्जिय अमरिंद, जिणि पहियोहिय सावयविद ।
पच महन्मय दुदर घरणु, नट जिणचद मुरिमुणिरयणु ॥ १९
अजयमेरि नरवइपश्चक्खि, करि विवाठ पुहियणजणसक्खि ।
जिणि पठमप्पहु लठ जयपतु, जिणवइसरि जयउ सुचरितु ॥ २.
नयरि नयरि जिणमदिर ठविय, तोरण दड फरस घज सहिय ।
देवीसा सठ दिस्सिय साहु, जिणसरसरि जमउ गणनाहु ॥ २१
नदि न्हवणु
हर फेस विरचित तमु पय पठमजोयणु भाणु, जस निम्मलु गुणगणह निहाणु । जुगपवरागम संसयहरणु, जिणपवोह मुरिमुइगुरु सरणु ॥ २२ ॥ तम पटुटरु गुरु मुमिरयणु, मयणविणासणु सिवमुहकरणु । मषियलोयजण मणआणदु, संपइ जुगपहाणु जिणघदु ॥ २५ इय इत्तिय मुहगुरु आमनइ, जिणघदमुरि जुगवर जो मनछ । मुजि रमइ सासय सिवनारि, वलवि न पडइ इत्य ससारि ॥ २४ जक्खिणि जक्ख विठण पठवीस, विजादेवि चणी वीस । इय चउ(स)ठि मिलि देहि असीस, जिणचदमुरि जिउ कोटि वरीस ॥२५ संघसहित फेरू इम भणइ, इत्तिय जुगपहाण जो थुणइ । पढइ गुणइ नियमणि मुमरेइ, सो सिवपुरि वर रजुकरेइ ॥ २१ सेरह सइताला महमासि, रायसिहर वाणारिय पासि । चद तणुम्मवि इय चउपईय, कमाणइ गुरुभचिहि कहिय ॥ २७ सुरगिरि पच दीव सम्वेवि, चद सूर गह रिक्स जि केवि । रयणायर घर अविचल जाम, संघु पठविठु नदठ साम ॥ २८ ॥ इति जुगमधान चतुपदिका समाप्ता ॥३॥ जिणपयोह गुरराय चलणपकय वर अलिवलु । नवविह जिय दयफरणु मयण गय सिंह महाक्लु । चदुजलु गुणविमल कित्ति दस दिसिहि पसिर । दवणु पणदिय चठ फसाय गुणगणिहि समिडउ । मुरिंदु पणय पण जण सहिउ, पछिठ मुहियण निरु नरहु । रिठ मंतरंग मय अवहरणु पय पढमक्खरि गुरु सरहु॥१॥ ॥स०१४०३ फा०शु०८ लि०॥
परिशिष्टम् ।
मूमप्रवौ भ्योतिषसारमन्बाम्ते निम्रलिक्षितानि ज्योतिपलिपपसम्पदानि कानिषित्
स्फुटपपानि प्रासानि, तानि परिशिएसपेणात्र मुद्रिवानि ।
लाभ विक्रम मै शपु स्थितः शोमनो निगदितो दिवाकरलेपरैः।
सुते तपो जायेगार्किमियदि न विभ्यते तवा ॥१
पून जन्म रिए-लाभ सं निगचन्द्रमाः शुभफलदस्तदा ।
स्वास्मोन्स्य मंतिमी धर्मगैर्षियते न विपुधैर्यदि महे॥२
विक्रमाय रिपुः शुमा कुजा स्यात्तदान्स्यै सुते धर्मगैः खगैः।
घेन विद इनसनुरप्पसौ किंतु मर्म घृणिना न विध्यते ॥३
स्नायु शमृति खो ऽयंगः शुमो शस्तवा न खल विध्यते यवा ।
आत्मजे त्रि नष आप नपर्न प्रास्यैगर्षिधुभिर्नममेरे॥४
खाय पर्म तनय नस्पितो नाकिनायकपुरोहितः शुभः ।
रिफ र जगिर्यवा विप्यते गगनपारिमिर्न हि॥५
आसुप्ताष्टमसूतो पयायगो विद भारफुजियशोभनः स्मृतः।
नेपनीस्त तर्नु फर्म पर्मघी छामै रि'-सहस्पलेचरैः॥ ६
एपमत्र खपरा ग्यघान्यिता सत्फल नहि दिशान्ति गोचरे।
पामयपविधिना स्वशोमना भप्यमी शुमफलं दिशन्स्यलम् ॥७
॥इति प्रहाणा वामवेध दक्षिणवेधयो फलम् ॥
सर्वेपामैव दोषाणां धर्जपेद् घटिफामूयम् ।
उत्पातमुस्युफाणानां सप्त पद पच नाटिफा ॥१
पहषोऽप्येष जगदुः सिंहास्दोऽपि प्रशगुरुम् ।
समतिकान्तमपी न विरुदः सर्वकार्येषु ॥ २
भास्मोपेक्षफ पोपफ पपफानिह अन्मराशि पन्द्राम्याम् ।
घटिफास्तिपिरसरुद्राईसाइयशफलचरमान्ता ॥३
.
पोगिनीचा प्रवक्ष्यामि दिम्य परममुत्तमम् ।
जयं च विजयं पेष पेन जापन्ति मूतछे ॥१
इन्द्राणी पूर्वमागेपु योगिनी नाम नामता।
प्रतिपदानवम्यां प उपयं फरसे सदा ॥२
१०८ परफेसविरचित म्पोतिपसार प्रत्यावे लिखितानि विचित पपानि
उत्तरायां महिपीनाम योगिनी योगनामिमी।
वशम्पाप द्वितीयायां उवय फुरते सवा ॥३
एकापश्यां तृतीयायां मेपरूराहु योगिनी ।
कुमारी नामविशेया मानेपी दृश्यते यथा ॥
श्वानपष्ठिगता देवी पतुर्षी मावशी तथा ।
नख्यां दिशमासत्य सिंहनारायणी सवा ॥५
वाराही योगिनी नाम सिंहारूवा सर्परा ।
पपम्यां प्रयोदश्यां व दक्षिणे उपयं सदा ॥ ६
पारुण्यां दिशमासूख्य ब्रामणी पगामिनी ।
पतुर्दश्यां तु पाठपां च उवयं ककसे सवा ॥७
घटित्वा तु मरठिं चामुंग पररूपिणी ।
सप्तयां पूर्णिमाया पवायम्ये उवयं सदा ॥८
महालक्ष्मी महादेवी ईशान्यां धूपसंस्थिता।
काके स्वा सदा देषी भमापास्याष्ठमीदिने ॥ ९
एष तु योगिनीपक ज्ञायते यस्तु मानषः।
विजय लमेत् संग्रामे युटेपु रणसफटे॥
पूते वा विवहारे पा विवादे जायते शुभम् ॥
धानकर्कटनालानां मेपेण महिमादिषु ।
विजय जायते तस्य यस्य पछे हु योगिनी ।।
अप सन्मुस्खयोगिन्यां संग्रामेषु रणेषु च ।
गम्यते युपते पुंसां न सिद्धिर्जायते कपित् ॥
॥ योगिनी पत्रम् ॥
GOVERNMENT OF RAJASTHAN
RAJASTHAN ORIENTAL
RESEARCH INSTITUTE
JODHPUR
(INOLA)
Hon. Director Adrohre Mun! Jimran, Purabattracharya
E11
: 1651-1:
TTT
PUBLICATIONS
RAJASTHAN PURATANA GRANTHAMALA
Gem Eintor
PADMASHRIZ MUN JINYAYA, PURATATTYACHARYA
DECEMBER 1961
No text on this page.
PUBLICATIONS Up to July 1861 RAJASTHAN PURATAN GRANTHAMALA (Geel Editor - MUN JOVVIAYA Perottidern) Rajasthan Orimal Research Institute, Jodhpur November 1961 A SANSKRIT 1 Praman manjari- by Sarvedeva with commentaria by Adrayaranya Balbhada and Vaman Bhatt, ed. by Pattabhưım Shastri, Ex Ponapel, Mabarajas Sanskat Collegs, Jupur nou Pro£ of Danban Universty of Calcutta. —R. 6 00 2 Yantraraja rachana-An atrological work written onder arders of Maharaja Samu Ja Stagh of Japar ed. by Late Pc Kedar Nath Jyourvid, Editor Karsumala Series -Rs, 1750P 3. Maharshikul-vaibhavam Pt I-by Late Vidyanacharpad Madburadan Ojha, ed. by Mahamabopadhyaya Pt Giridhar Shara Chaturvedi. -Re 10 75 AP 4 Maharshikul-yaibhavam Pt. II Text--by Late Vidyavachaspao Madhusudan Ojhe, ed by Pt. Pradamna Ojla -Rs. 3 sonP 5 Turksamgrah--by Annam Bhatt with commentary of Kshmakalyan Gani ed. by Dr Jitendra Jetli, MA, Pb D Prof. Ramananda Arts College, Ahemdabad -R 3.00 6 Karakaambandhodyota-by Rabhas Nandı, cd by HP Shatn, M A., Ph D Vice Prinapal B. J Institute Vidya Bhavan Abemdabad. - Rs. 1 75 OP 7 Vattidipika—by Mount Kitshina Bhatt, ed by Proshottam Sharma Cbarorrede formerly Prof Mayo College Ajmer LR 2.00 & Shabdaratoapradipa-by an unknom ochot ed. by HP Shaxari, M.A, Ph D, Vice Principal B. J losatute Vidya Bha wan, Ahemdabad -Rs. 2.00 9 [ 2 ] Krishnagiti--by Somanathu ed by Di. Priyabala Shab M.A Ph. D D Litt. Prof Ramınınds Arts Collegs, Abcmdıbıd. -R. 1 75 nP 10. од Nritt sam grab- tradise Indian Dance-by an m koown author ed. by Dr Priyabala Shab M., PLD D Litt. Prof Ramunanda Art College, Ahendabad. -Rs. 1 75 DP 11 Shriogarhara vali—by Shn Hantha Kavi cd. by De Priyabala Sbah MA., Ph. D., D Litt, Prof Rimunanda Art College Abemdabad -R: 2.75 DP 12 Rajvinod Mahakavyam-by Udaraj medieval Sanıkde poem on the hfe and achievemena of Mahmud Begre, Sultan of Abemdabad, ed by G N Bahur M. A Dy Director Rojas than Oriental Research Institute, Jodbpar --R. 1 as nP 13 14 -RS 375 15 Chakrapanivijaya Mahakavyam-by Lakshmi Dhar Bhurt a romantic Sanskrit poem based on the love Hory of Ushe and Aniruddha ed. by K.K. Shastri Curator and Prof BJ Institute, Gujrat Vidya Sabha Abemdabad --R3 SonP Nrityaratna-Kosha Pt 1-by Maharana Kambhakarna Deva of Chittote; a long awaited authentic creuse on Indun Dance, ed. by R C Parkb Director B J Institute Gujrat Vidya Sabha Ahemdabed Uktiratnakar-by Sadlia Sander Gooi ed. by Puratattwacharya Mmoi Jin vijayap Hon Director Rapatban Onenol Roxearch Institute, Jodhpur LR 4 75 nP Durgapushpanjall-by Late Mabamahopadhyaye Pt. Darge Prand Dwivedy, ed by G.D Dwivedi Lecturar Maharajas Sansknt College, Jaipur -R 435 nP Karnakutuhal and Shri Krishpallamntam by Mahakari Bholenath • protege of Sawai Pratap Singh of Jaipur ed. by CN Babora M.A., Dy Director Rajasthan Oriental Research Institute Jodhpur - Rs. I jo nP 16 17 18 19 20 21 [ 3 ] Ishwarvilasa Mabaka vyam-by Kavikalanidhi Shri Krisboa Bhatt work based on the History of Jarpur written under orders and to the time of Maharaja Sawu lihwan Singh won of Maharaja Sawai Ju Singh of Jaipur The work bean an cyc witness descdption of the Ashwamedha yapa performed by Sawal Jai Siogli od. by Mathurinath Bhatt, Sabrtyacharya with · foreword by late Dr P.K. Gode MAD Litt Curator B OR Institute, Poona. -R II SO OP Ratadearghika-by Vidyarım Kav 1 fare and abndged work on Sanskat rbetona, ed. by G.N Babora, M A Dy Director Rajasthan Onical Research Insitute Jodirpur. -Rs 2.00 Padya-muktawali- A compiladot of Literary and Historical poems of Krabna Bhatt a contemporary of Sawai Jai Singh of Jaipor ed by Mathuranath Bhatt, Sahityacharya. -Rs. 400 Kavyaprakash—of Mammats with Samketa by Someshwar Bhatt, found in Jatualme Grootha Dhandar Edited by RC Pukb Director B J Institute Gajrat Vidya Sabba Ahendabad Pt. 1 R 1100 PL. II Rs. 8.25 DP Vasturatnakosha-by an unknown author Edited by Di Pnyabala Shab M A PL D., D Litt. Prof Ramanand Arg Colkge, Abemdabad -Rs. 4 SO OP Dashkantha Vadham-by late Mahamabopadhyaya Durga Pasdy Dmoedi, a poetical work on Red-Cherits Edited by Shn Gangadhar Dwivedi, Prof Maharap Sansknt College Jaipur -R 4 00 Bhuvaneshwar Mahastotram-by Prithwidbaracharya with commentry of Padmanabha edited by Shri GN Bahara MA Dy Director Raasthan Onental Research Iosatute Jodhpur. -R 375 nP R. RAJASTHANI AND HINDI hasadhado Prabaodhs-by Mabalan Padmanabba a famous 22 12 23 24 25 Rajasthani Historic Poem dealing with the civalry of Kopadhade Chooban at the time of the attack of Ahuddin Khilji on the fort of Jalore ed by Prof. K.B Vyas, MA Elphinstone College, Bombay -R 12.25 DP 2. Kyarkhan Rasa-by Alf Khoa Nuwab of Fatehpur (Shekhawad) Poeucal Hotory of Kayamkbann, the Muslim Rajpoot of Rajasthan ed. by Dr Dashrath Sharma, MA D Litt Professor Hindu Collegs, Delhi and Shri Agar Chand Nalata Bikaner -Re 475 nP 3 Lava Rasa— by Gopaldan Kanya contemporary description of the battle of Madhorajpura berween the Chief of Lan and Agreerkhan of Tonk ed by Mehrab Chand Khared Jaipur R375 DP 4 Vankidas-r-Khyat-History of Rajasthan writen in Rajasthuani prose by Vankdas, the famous Historan of Jodhpur ed by Prof Narottamdas Swami, MA Vice Predpal Mahamant Bhupal College Udaipur - Rs. S so nP 5 Rajasthani Sahitya Sangrah Pt. I-A collecuon of old Rajas thani literary prose ed by Prof Narottamdas Strami M.A. Vice Proapal, Maharana Bhupal College Udaipur -Rt. 2.15 6 Rrjasthani Sabitra Sangrah Pt II – Three old Rajauhani stories lc Bagdaratan Ri Val Pratap Singh Mahokam Singh Ri Vat und Veeremde Soncegara Ri Vat edited by P.L. Mezna MA., Sahitya Raina Offig Senior Research Asse. Rajasthan Onnual Rescarch lastltate Jodhpur Rs 2.73 DP 7 havindra halpalata -- by Ravindracharya Saraswada conicniporary of Emperor Shahalahan, cd by Reni Sbrumuri Lakshmi Komari Chundawat Jipur -Rs. 2 00 & Jugal Vilam- a poem by Maharaja Pruby Smsh of hushalgarh ed, by Rani Shrimao Laksbmi kuman Chundawas, Jaipur RA175 nP 9 Bhagat Mala s poctial work in Rajasthani by Charan [ 5 ] -R 15 Brahma Desy Dadapanthi, ed. by Uduraj Ujjwal Jodhpur -R i 75 AP 10 A Classified List of Manuscripts PL I lot of 4000 manuscript collected in The Rajasthan Oriental Research Institute opto the yar 1955 -R 7 so nP 11 A Classified List of Manuscripts PL 11- List of 3855 MSL collected in the Rapasthan Oriental Research Inutute from Apr 1956 to March 1958 Edited by Shn G N Babura De Director Rajasthan Onental Rexarch Lostitute Jodhpur Rs 1200 12 A List of Rajasthani Mapustipts Pt. I-Collected in the Rajasthan Oriental Research Insurute, Jodhpur upto March 1938 Edited by Padmashin Muni Sbri Jinvijai -RL 4.50 DP 13 A List of Rajasthani Manuscripts-PC II–Mo collected drring the year 1958 58. Edited by Purushottamlal Menan, MA Sahitya Ratha 14 Monbata Nanshi Khyat Pt 14by Manbad Nena of Jodbpur History of Rajasthan in Rapsthani proxe edited by Shn Baddi Prasad Sakaru. -- R. & SODP 15 Raghuwar Jus Prakast-by Chaan Kythnaji Adha A work on Rajasthani rhetories, edited by Sbn Siparam Lalas 16 Veer Veo-by Dhadhi Badar Rajasthanı pocm relating a few heroic ev no of Vectam Rachod of Judbpar Edited by Smu Rani Laxmi Kuman Chuodamit of Rawatar -R 4 SOAP 17 A Catalogue of Late Purohit Harinarayol B A Vidyabhooshan Maquascripts Collection--edited by Shn G. N Bahuri Ds Director Raprhan Onental Rearch Institute Jodhpur and Shn L N Goswami, Senior Research Asst. Rapschaa Oriental Roscarch Insacure, Jodhpm -R: 625 AP 18 Sooraj Prakash Pt 1-by Chanın Karnıdan Kariya Hutory of the Rathods of Jodhpur in Repastbami Poem edited by Shri Stuu Rim Lalas --R., 800 19 Netaurang-by Raong Budha Smgbjı Hada of Bandı Tork on rhetorios, edited by Shri Rampagd Dadheach AS A Lecturer Hoodi Dept. Jasprint College Jodhpur. -Rx 8.25 -R 4.00 RAJASTHAN ORIENTAL RESEARCH INSTITUTE, JODHPUR B WORIS IN THE PRESS H ח Editor 1. Tripun Bhand Laghuxın Mund Sbri Jlavijıyafi by Luthu Pandit 2 Balshiksh. Vyakunta by Sungnam Singh 3. Padarth Ratna Manjusha by Kohna Mubre 4. Katamritaprapa by Someshwar 5. Praletanund by Rachanath Kari 6. Shakun pandeep 7 Hameer Mahubavys of Naya Chandra Soon 8 Ratna paretekybadi of Thekte Pberd 9 Vrant Vilan Phafa ShH MC Modi 10. Chandra Vyakaran by Chandra Shri BD Dorbi Gomi 11 Sorayambhoochbanda Shn H.D Val alar 12 Natya Ratne Kosh Pt. II Prof. R.C. Parikh & by Maberina Kumbhalana Dr Prigubal Shah 13. Nandopakhyan Shri BJ Sendenti 14 Voittajatinmuchchay Shi HD Velankar by Ka 1 Virbanku 15. Kavi Dorpen 16. K. 1 Kaustubha ShMN Gort by Kavi Raghunath Manobar 17 Go. Badal Padmloi Chaupai Shri Udai Sinth Bhatnagar by Kavi Hemrutan 18 Indr Pradha Prubaodh Dr. Dushntha Sharma 19 Voerdatte of Sabandhu Dr Juider Moban 1 Sbolla 20 Ghatkharpendi Panche lachu Pt. Amit Lal Mohan Lal Kavyani 21. Bboven deepak of Yarpacberg Pt. Pursboetum Bhatt 22 R fastbun Med Sandrt Sabutsa Troldon in Hindi Ki Khol by Dr Bhandarkaar by Shri Babmy Dutt Trivedi 23 Monbeta Nena ni Rhyet Pt. II Shd Badet Paud Sitat 24. Rebore Vinhd Vltat Mani Shri Jlanlara 2. Puntata Samuhodban Ki Idban
[ 7 ]
Sha Sitarum Lalu
Muai Shri Jinphanji
Mund Shri Jinyljayajı
Padmuhri Muni Jinrijıyajı
26. Sooraj Pralush Pt. II
2 Ratbodan Ri Veoshaveli
28. Rajaxbani Bhuba Subirya
Grantbe Suchi
29 Min Bribat Padawalı, complited
by Late Pt Hen Nara yunji Purohit
Vidya Bhooshan
30 Rajuthani Sahitya Sutinh Pt. III
31 Sthulibudna Kikidi
32 Matage Predah Ki Hindi Ko Den,
SbH LN Goswami
Dr A.R. Jajodua
Du Mod Lal Gupta,
MA PhD
PL Manriya M.A
Bbatt Shn Mathumpathji
33. Rukmini Handa by Seyanji Jboole
34 Vattamuktavali
by Shri
Bhatt
35 Aantahan
SE G D Dwivedi
SOME COMMENTS 1-Kanadhade Prabandha - by Mahakari Padmanabha ed. by Prof. K B. Vyu M A. Elphiostone College, Bombay We are indeed grateful to the Rapsthan Puratattya Mandir for grying to the interested world thus beouful edition of a very fine word which should be known all over India. SUNTTI KUMAR CHATTERJI NA. D La Charter Govt. tlodi Sedeka Commoa. t 2-Rajavinoda Mabalayyım-by Udalra; ed by Shri Gopal narayan Bahuc M A. Dy Director Ranschen Orenal Research Institute, Jodhpur The series of important fare Sanitat od Prakrit text aucd the Rapsthan Puratan Granttumalo started by Mug under his Gaeil-Editorship doing valuable Krvice to Indology With hus chancerotic vision and historical Ionight Mooiji hu selected for this xries some rure texts of great historiaal, Leenry and cultural value These term Sapukat will facilitate the Kearch for omilr tests The manuxaipt of the Rajavinoda Karya in praise of Mahamod Begde was ecured by Dr Bubler in 1857 for the Govt. of Bombay Mon Jinvijayap wu the first to realise the importance of the poem and make arrangeuknt for los editing and pubhaton o the series of the Rawuthun O R Institute Accordmgly he entrusted the work of editing thu poem to Shri Gopaloareyan and I am happy to find that thus lared oditor has spared no pains to givmg w an editon worthy of the senior in which it ippan. I have to convey my hearty congrutalıdons to Muni Jinnjayafi upon the wise planomg of his scheme of Repuxtban Paran Gnathimala uand its succenfal crecation by entrusting different works in it to competent Kholars like Shri Gopal Dityan, who alo deserves the best thinks of all lovers of Indian [ 9 ] Hutory and Sanskrit by making iyulable to them a new text, hitheno unknowo and mpublshed. Anotab of the Bbendector Odaal Roerd Lutitut Pool VLXXVIL, 1907 PK. GODE HALL 3—Ishwarvilasa Mahakavyam-by Karikalandhu Krosbou Bhatt ed. by Shri Mathuranathi Bhatt, Sabiryacharya, Japur The publication of an 18th century poem of Kinha Bhatt Jupur-court bard, brings out interesting fact that the Ashvamedha Yajna was organked by rulers to assert thar supre macy over deghboanng princa us late as 200 yars ago Bhatt m hus book 'Isbmrvilas Karya describes the Ashamedba Yagna performed by his faend and master Raja Ishwar Singh some ame after he ascended the Amber gaddi in 1743 on the death of his father Sawu Ju Singh Il who founded Jaipur Bhatt himself attended the Yajos. Besides describing the Yajua mdetul, be name the persons who mtoooed the Cermony 7th Monober, 1902 TITES OF INDIA 4-Classified List of Manuscripts Pt II-ed by Son GN Babara M.A Dy Director Rajasthan Onental Research Inst. Jodhpor A All stadens in Indology will be glad to consult this excellent atalogue containing many are ind predloos Sanskrit work Director Indian Institute, Perla 16th Feb, 1960 LOULS RENOU B Itendent from the list that the Institate possesses a nch collection of Sanskat Manuscripts on almost all subjects uod bounches of leaming cultivated in pacat lodu, spd ako. large bomber of Patm, Rajasban, Old Gujarat and Hlodi maons cripts, and these lists l undoubtedly prove to be important tools of research to scholso domg textual work in Sanskrit and derived languages LL LANDESARA Jovana ot TOdetildtuts Baroda Deceba, 1960 [ 10 ] C. The caulogue adds to our knowledge of the manuscript material still causang in the Indian librarias IMEO 414 Morgan 20 Ron Gianppe Twcd Last und Wart. Jap. September, 1961 D Dic Rajasthan Pantna Greathinala welche im Aoftrig der Regierung von Rajasthan Wake in Sanskrit, Prabnt Alt Rajas than Gujarat und Hindi herausgibt ix in Europe blber wenig bekannat. Sie hat jedoch berat eine grobc Rabc schone Veroffentlichungen beromgebradt, darunter manche bisher vobekannte Wake. Der vorliegende Band enthalt ein Hand schaftenverzeichnis Der tatc Tal dieses Verzeichnisses bchendie 1956 erworbenen Handschnften. Der vorliegende zwelte Teil verreschiniet die Neuerverbungen von April 1936 bus Mark 1958 zusammen mehr als 4000 Nummit Angegeben and in hergebrachter Wasse Tital Vefast Datum und Bet terzahl der Handechinft und, wenn node dad korre Bemer kungen beigefugt. Im ersten Anhang and Anfang und Sculub einer Annhl wichtigerer Handschnften ledergeben. Der zweite Anhang enthalt in alphabetische Verzeichnis der Verfasserar Em dotter Anhang bemgt ein Verrechou dar chemaligen Palastbiblichek von ladra-gardh, dhe nummer unter die Obhut da Oriental Research Institute in Jodhpor gestellt ist. Dract und Austattung des Banda dod sehr gut Von einigen besonderi wertvolen Handschriften and conloc Blatter abgebildet. men. E FRAUWALLNER Journal I the Jotitute of Lodolog Upimty of Vienne I appreciate them very much for ther being at roe carichment to any library specialped in the Onetutuludic field. Praded LMEO (Oraal Incitata) ProL TUCCI Roc. (Italy) H I am very glad to know that the Institute a to actively fugeged in coding the wo published manumit of Repsthed in Sanent and other langtages Thu u a valoable contbation to Saptrit studies Indian Leatab Uatty f Oxford 2 July 1961 Prof T BURROW [ ll ] 5-Daukanthradbam by M M Pandic Durgaprasad Dwivedi, edited by Sha Gangadhar Dwivedi "The author of the work onder review bas depicted the life of Rama from the spiritual pount of view in bu work alled Duotanthradbam on the loss of Yogavaostha well-known cxtenuve pbilosophical treatise on Advaita Vedanta The author a gifted poct of a very high order The treatment of the theme ospecially in the first chapter is highly elaborate and tbc descriptions aboumd mnch poctical imagery of high souhetic value. HC MISTHA Joomal of the Odental Instituta Baroda VIX No 3, March 1981 ६-भीभुवनावरीमहास्तोत्रम्-पृथ्वीपराचार्यविरचित मनाभाट माध्यसहित सम्पावक भीगोपालमारायण बहुरा एम ए., उपसम्पासक रागस्पान प्राप्यरिया प्रतिष्ठान जोपपुर । क "मूम स्तोम की प्रबोधिनी टीका पोर पाय-टिप्पणियों में जो भमेकानेक पाठान्तर दिये गये है उनसे इम प्रकाशन की उपयोगिता तपा महस्व बा मया है। २९पून १९९१ महाराषकुमार श षीरमित एम ए एप एम पी री विद् एम पी सीताम 'इस स्तोत्र में भुवनेश्वरी के स्वरूप भ्यान पोर मंत्रों का सम्यक स्म से विवेपम है। साथ ही अन्य १२ स्तोत्रों के द्वारा भुवनेश्वरी के माहात्म्य की पर्याप्त सामग्री एका को गई है। यपासमय उपासमासम्म पी पी मातम्य विषय दिए गए है। प्रारंभ में प्रास्ताविक परिचय' नाम से भीगोपासमारामण बहुरा ने वित्तापूर्ण भूमिका मिली है। उससे इस स्तोत्र तपा इस विषय को समझने में परी महामता मिलती है। ता २ प्रापा १९९१ मिक रिमुस्तान नई शिmat -रामस्थानो साहित्य सपह- माग १ सम्पादक यीनरोत्तमदास स्वामी एम ए भाग २ सम्पादक पीपुष्पोत्तमपाल मेनारिया एम ए माहिग्य-रल। साहित्य पौर मापा की दृषि से ही महीं इतिहास-समम्मी भी बहुत [ 12 ] पपिक सामग्री उक्त बाा-साहित्य में प्राप्य है। तत्कालीम प्रापारविचार, रहन-सहम पार्मिक भावनामों और प्रध विश्वासों प्रादि की ठीक-ठीपपानकारी प्राप्त करमे के लिये इस प्रकार के गव साहित्य का गहरा प्रम्पयन सर्वपा पनिमार्य हो पाता है। पाद-टिप्पणियों में दिये गये पाठाम्तरों और साथ ही मावश्यक शम्यापों से इस संस्करण का विशेष महत्व हो गया है। इन दोनों भार्गों में दी गई भूमिकायें भी उपयोगी पौर विपार-प्रेरक है। ठा २१ जून १९५१ 1-सम्पादक ८-स्व. पुरोहित हरिनारायणगी विद्याभूषण-प्रबसमाह-सूची- भीगोपासमारायण बहुरा एम ए प्रौर श्रीमष्मीनारायण गोस्वामी दीक्षित । स्वर्गीय पुरोहित हरिनारायणगी स्वप ही एक समीप संस्था थे। उन्हेनि एकाकी मो काम किया वह अनेकानेक सस्पामों के मिम कर काम करमे पर भी उसनी पूगता मौर तत्परता से किया पाना कठिन ही होता। प्रत उनके मिनी पुस्तकालय के रागस्थान प्राध्यपिया प्रतिष्ठान को सौपे जाने से बस्तुत एक बड़ी सासतिक निधि की सुरक्षा हो गई है जिसके लिये राजम्पान ही नहीं भारत का समूचा शिक्षित समाम पुरोहितजी के सुपुत्र श्रीगमगोपामग्री का सर मनुगृहीस रहेगा । मत ऐसे महत्व के पुस्तक संग्रह की यह पुस्तक सूपी अवस्य हो विनामों सयोपों पारि सम ही के लिये बहुत हो उपयोगी होने बामी है । प्रतिष्ठान का यह प्रकाशन सग्रहणीय है। तापूम १९५१ १- मरमप्रकास भाग १-पिया परमीवामजीकृत सम्पादक भीसीताराम सासस । साहित्य प्रेमियों के साप ही इतिहासकारों के मिये कविया करणीदानात 'सूरजप्रकास' का विशप महत्त्व है । मारवाड़ के इतिहास के प्रमुख पापार प्रप के रूप में इस पंथ का अध्ययन फिमा गाता है। प्रत उसको प्रकाशिस करमे का मायोमन कर प्रतिमन मे एक बड़ी कमी को पूरा किया है। ता २१ १९९१ म्दाराचमार में पारविह एम ए. एन एन बी.,री मिट् एम पी
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