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Mahalakshami Vrat Katha
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॥प्रथा
भाषाटीका संहित महालक्ष्मीव्रतकथा-
पारम्भः।
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1
. श्रीगणेशाय नमः ॥ राजा युधिष्ठिर कहते हैं कि हे पुरुषोत्तम ! विचारकर एक ऐसा व्रत बललाइये कि जिसके करने से अपना नष्ट भया हुवा स्थान (राज्यादि जो छूट गये हों) फिर मिलें और सब ऐश्वर्य, पुत्र, आयु आदि फलोंकी प्राप्ति हो॥१॥श्रीकृष्णजी कहते हैं हे युधिष्ठिर! सत्ययुगके श्रीगणेशाय नमः ॥ युधिष्ठिर उवाच ॥स्वस्थानलाभपुत्रायुः सर्वेश्वर्यफलप्रदम् ॥ व्रतमेकं समा. त्व विचार्य पुरुषोत्तम ॥ १॥ कृष्ण उवाच ॥ दुर्वारे चैव दैत्येन्द्रे परिव्याप्तत्रिविष्टपे ॥ एत- देव कृतस्यादौ देवेन्द्रः प्राह नारदम् ॥ २ ॥ तस्य श्रुत्वा ततो वाक्यं स मुनिः प्रत्यभापत ।। नारद उवाच ॥ पुरन्दर पुरं पूर्व परमासीत्सुशोभितम् ॥ ३॥ प्रारम्भमें दुःखसे धारण करने योग्य ऐसे वृत्रासुरने स्वर्ग जब व्याप्त कर लिया (अर्थात् देवताओंको बहुत श्रोस देने लगा)तय यही बात नारदजीसे इन्द्रने भी कही थी॥२॥उस वक्त इन्द्रक वाक्यको सुनकर नारद मुनि बोले-हे पुरन्दर,हे इन्द्र ! पहले एक अत्यंत सुन्दर नगर था ॥३॥ । .
.
कथा
म०ल०
॥२॥
जहांकी जमीन रत्नगर्भा थी, पर्वत रनयुक्त थे, जहां स्त्रियोंके कटाक्षरूपी पाणोंसे ॥ ४ ॥ कामदेव
त्रैलोक्यको अपने वश करता था ॥ ५॥ जहां अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष उत्पन्न होते थे। जो पुर संसार-
रत्नगर्भाऽभवद्भूतमियंत्र स्त्राव्यभूधराः ॥ यत्रांगनाजनापांग,गलोचनसायकैः ॥ ४ ॥ त्रैलोक्यं
स्ववशं चक्रे देवः कुसुमसायकः ॥ ५॥ चतुर्वर्गजनिर्यत्र यच विश्वस्य भूषणम् ॥ विश्वकर्मापि
यदीक्ष्य कंपयत्यनिशं शिरः ॥ ६॥ तनाभवन्महीपालो मंगलो मंगलालयः ॥ चिल्लदेवी प्रिया
तस्य दुर्भगैका वभव ह ॥ अन्या तु चोलदेवी या महीपी सा यशस्विनी ॥ ७ ॥
का आभूषण था,और जिस नगरकी रचना (पनावट)देख,विश्वकर्मा भी हरदम शिर डुलाता था ॥६॥
वहांका राजा मंगलस्वरूप अतएव मंगल नाम से विख्यात था, उसकी दुष्टभाग्यवाली एक चिल्लदेवी
नामकी स्त्री थी और दुसरा महाशयस्विनी चोलदेवी थी, वह पटरानी थी ॥७॥
॥२॥
किसी समय मंगल राजाने चोलदेवीको साथ लेकर राजमहलके ऊपर चढ़ते ही एक जगह देखी ॥८॥ दन्तकान्तिसे प्रकाशित की हैं दिशा जिसने ऐसा राजा उस जमीनको देखकर कामयुक्त किंचित् हंसमुख होकर चोलदेवीके प्रति बोला ॥8॥ हे चंचलाचि ! अपनी शोभासे नन्दनवनको लजाने कदाचिन्मगलो राजो चोलदेवीसहायवान् ।। पासादशिखरारूढः स्थलीमेकामपश्यत ॥८॥ तामा लोक्य महीपालः स्मरस्मेरमुखांबुजः ॥ चोलदेवी पूति पाह दंतद्योतितदिङ्मुखः ॥६॥ चंचलांक्षि तवोद्यानं कातिनिंदितनंदनम् ॥ कारयामि तयोदिष्टतस्त्रोद्यानमकारयत् ॥१०॥ संपन्नं तु तदुद्यानं नानाद्रुमलतान्वितम् । नानाफल समायुक्तं नानापक्षिसमावृतम् ॥ ११ ॥ वाला यहां एक तेरा यगोचा लगावेंगे। यह सन (चोलवी) ने कहा कि बहुत अच्छा, लगवाइये उसके ऐसा कहनेपर राजाने वहांपर बगीचा लगवा दिया ॥ १० ।। जय वह बगीचा अनेक तरह के वृक्षोंकी लताओंसे युक्त हुआ अच्छी तरह फलने फूलने लगा, और अनेक प्रकारके पक्षियोंसे सेवित अर्थात् ( संपूर्ण सामग्रीसे संपन्न हुआ)॥ ११ ॥ PAL म०ल० ॥३॥ कथा तत्रागत्य वहांपर एक सुवर पाया। यह कैसा था कि बड़ा शरीरवाला, ऊँचा मानो आकाश को स्पर्श कर रहा हो और वर्षाकालके मेघोंकी तरह कृष्णवर्ण, चंचल नेत्रवाला ॥१साअपनी डाढोंसे मानो चंद्र- सूर्यको पकड़ रहाहै,प्रलयकालके मेघोंके समान शब्द करनेवाला वह सुवर अनेक प्रकारके वृक्षलतादियों महाक्रोडस्तनुन्यस्तनभस्थलः ॥ पावृटकालघनश्यामश्चक्षुभ्यामतिचंचलः ॥ १२ ॥ दंष्ट्रावकृष्टचंद्रार्कः पूलयांभोधरध्वनिः ॥ उद्यानं भंजयामास नानाद्रुमलता- न्वितम् ॥ १३ ॥ कांश्चिदुत्पाटयामास पादपान्पडुनंदन ॥ कांश्चिदंतपहारेण कांश्चिदं- तपूघर्षणैः ॥ १४ ॥ । - 1 से युक्त उस बगीचेंको तोड़ने लगा ॥ १३ ॥ श्रीकृष्णजी कहते हैं कि हे युधिष्ठिर ! उसने कितने वृक्ष उखाड़ गले, कितने दांतोंके प्रहारमे फाड़ डाले, कितने दांतो घर्षण से तोड़ डाले ॥१५॥ ॥३॥ -- . - काल सदृश उस सूकरने बगीचेके कितने रक्षकोंको भी मारा तब बगीचे के रक्षकों ने भयभीत हो, सब मिलकर उसका हाल राजाके सामने कहते भये । राजाने वह सुनके, क्रोधसे लाल लाल नेत्र कर ॥ १५ ॥ १६ ॥ अपनी सारी फौजको हुक्म दिया कि उसको मारो। ऐसा हुक्म देकर आपभी मत- जघान कांश्चित्पुरुषानूक्षकानंतकोपमः ॥ तद्भुनक्तीति विज्ञाय संहत्योद्यानपालकाः ॥ १५ ॥ सभयास्तस्य वृत्तांतमूचुस्ते नृपतेः पुरः ॥ तदाकर्ण्य ततो राजा क्रोधारुणितलोचनः ॥ १६ ॥ वधाय दंष्टिणस्तस्य संदिदेशाखिलं बलम् ॥ ततश्चचाल भूपालः श्रीगंडगलितर्गजैः ॥ १७ ॥ आप्लावयन्मही सर्वां वाजिवृंदवृताम्बरोम् ।। चालयन्सकलान् शैलान स्यन्दनौघमरुद्भवैः ॥ १८ ॥ वारे हाथियों सहित चला ॥१७॥ घोंडोके समूह का कपड़ा पहनी हुई अर्थात् (घोड़ों से व्यास) पृथ्वी- को खुदाता हुआ और रथोंके प्रवाहके पवनसे पर्वतोंको कपाता हुआ ॥ १८ ॥ , .
कथा
म०ल०
||४||
अच्छे २ पैदल मिपाहियोंसे सर दिशाओंको पूरित करता हुआ वह राजा उस यगीचेको खुप मजबूत
घेरके॥१६॥अत्यन्त गंभीर शब्दसे दसो दिशाओको शब्दायमान करता हुआ थडे जोरसे योला कि जि-
सकी रास्तासे यह सुवर अन्य बनमें चला जायगा।॥२०॥उसका शिर में शत्रुकं समान जरूर काटूंगा।
पदातिभिर्महोदारैः पूरयन्निखिला दिशः ॥ ततो गाई समावृत्य तदुद्यानं नरेश्वरः ।। १६ ।।
उवाचोचैरतिध्यानैर्दिशो मुखस्यन्दश । पथि यस्य वराहोऽयं प्रयात्युपवनातरम् ॥ २० ॥
तस्यावश्यं शिरश्छेदं विदधामि रिपोरिख ।। तस्य भूपस्य तदाक्यं समाकण्य स सूकरः ।। २१॥
जगामास्यैव मार्गेण प्राणिनां चेष्टितं यथा ॥ ततः स सूकरासक्तः कशयाऽश्वं प्रताड्य च ॥२२॥
बीडाकलंकितस्येदोार्ग तस्यैवं सोऽगमत् ।। गत्वाऽथ विपिनं घोरं सिंहशार्दूलसंकुलम् ॥२३॥
वह सूकर राजाका यह वचन सुनकर॥२१॥जैसे प्राणियोंका चेष्टित हो उसी तरह उस राजाहीके मार्गसे
निकल गया । तय सूकरासक्त वह राजाभी लज्जित होकर चायुकसे घोड़ेको मारकर उस मुघरके पीछे
गया । जव महाघोर, सिंहशार्दूलादिकोंसे व्याप्त ॥ २२ ॥ २३ ॥
॥४॥
तमाल, ताल, हिंताल, अर्जुन इन वृक्षोंसे युक्त और झिल्लीझंकारोंसे सब दिशाओं को पूरित करनेवाले
ऐसे एक वनमें जाकर ॥२४॥ वहां स्वस्थचित्त हो उसी सूकरको देखता हुआ उस वनमें घूमने लगा।
बाद में जब वह सुवर समय पाकर, राजाके सामने हुश्रा तव राजाने उसे थाणसे मारा। जैसे इन्द्रजी
तमालतालहिंतालशालार्जुनलतान्वितम् ॥ झिल्लीझकारसंभारवाचाटितदिगंतरम् ॥ २४ ॥
तत्रैकचेताः संपश्यन्वने बभ्राम भपतिः। कोलो वेलामवाप्याऽथ सोऽभवद्राजसंमुखः ॥ भल्लेन
सोऽवधीत्कोलं वज्रेणादि यथा हरिः ।। २५ ।। अथ व्योम्नि विमानस्थः स्मरसुंदरविग्रहः ॥ क्रो-
डरूपं परित्यज्य सोऽब्रवीन्मंगलं नृपम् ।। २६ ॥
वज्रसे पर्वतको मारे ॥ २५ ॥ बादमें वह सूकररूप छोड़, आकाशमें कामतुल्य सुन्दरशरीर हो, विमान
मे बैठ मंगल नाम राजासे बोला ॥ २६ ॥
।
।
कथा
म०ल०
॥५॥
महीपाल ! आपका कल्याण हो । आपने हमको मुक्त किया अर्थात् सूकरयोनिसे छुड़ाया। अब
जिसकारणसे सूकर हुआ वह हाल सुनिये ॥ २७ ॥ मेरा नाम चित्ररथ है मैं एक समय देवताओं
से युक्त ब्रह्मदेवके निकट चंचत्पुट आदि तालोंकरके और षड्ज आदि सातों स्वरों (निषाद, ऋषभ,
गंधर्व उवाच ।। स्वस्ति तेऽस्तु महीपाल त्वया मुक्ति कृता मम ॥ ममाकर्णय वृत्तान्तं येनाऽहं
जात ईदृशः ॥ २७ ॥ एकदा देवतावृंदः संवृताः कमलासनः ॥ चंचत्पुटादिभिस्तालैः षड्जाद्यैः
सप्तभिः स्वरैः ॥२८॥ मंद्रादिभिस्त्रिंभिर्मानैर्गीयमानं मया नृप ॥ नानांस्थानगुणोपेतमश्रौषीद्गी-
तमुत्तमम् ॥ २६ ।। गीयमानश्च्युतः स्थानात्ततोऽहं कर्मणाऽमुना ॥ शप्तश्चित्ररथरतेन ब्रह्मणा सृ-
टिकमणा ।। ३० ॥
गांधार, षड्ज, मध्यम, धैवत, पंचम,) करके ॥ २८॥ और मंद्रादि तीनों मानों करके अनेक स्थानगुणोंसे
युक्त ऐसा उत्तम गीता गाता था ॥ २६ ॥ गाते गाते मैं स्थानसे च्युत हुअा अर्थात् ताल बिगड़ ग-
ई । इसी कर्म से सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीने मुझको शाप दिया ॥ ३० ॥
-
॥५॥
. N . - कि तुम पृथ्वीपर सूकर होकर रहोगे और जब संपूर्ण शत्रुओं को जितनेवाला मंगलनामका राजा तु- झको मारेगा तब तेरी मुक्ति होगी ॥३१॥सो हे महीपते ! आपके प्रसादसे इस समय वह सब घ- टित हुआ । इससे हे राजन् ! देवकोभी दुर्लभ ऐसा मेरा पर ग्रहण करो ॥ ३२ ॥ देखो, महालक्ष्मी- ॥ ब्रह्मोवाच ॥ कोलो भव त्वं मेदिन्यां मुक्तिस्ते तु तदा भवेत् ॥ निर्जिताखिलभूपालो मं- गलस्त्वां हनिष्यति ॥ ३१ ॥ तदद्य घटितं सर्व त्वत्प्रसादान्महीपते ॥ मद्गृहाण वरं भूप देवस्यापि सुदुर्लभम् ॥ ३२ ॥ महालक्ष्मीव्रतं दिव्यं चतुर्वर्गफलप्रदम् । लभस्व सार्वभौम- त्वं गच्छ राज्यं निजं द्रतम् ॥ ३३ ॥ का व्रत बहुत उत्तम है, और चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) फलको देनेवाला है। आप सार्वभौम राजा होवोगे । अय शीघ्र आप अपनी राजधानीको जाइये ॥ ३३ ॥ - . -- 1 . कृया मल Be नारदजी कहते हैं-हे इन्द्र इस प्रकार चित्ररथ गन्धर्व राजाके प्रति कहके प्रसन्न हो, शरत्कालके भेघों के समान अन्तर्धान हो गया।।३।इसके अनन्तर मंगल राजा कांखमें मृगछाला लिये, वाजमें खड़े, आये हुए कोई ब्रानण ब्रह्मचारीको देख ॥ ३५ ॥ मुसकाफे मधुर वाणी बोला कि तुम देव ? या ॥ नारद उवाच ॥ चित्ररथोऽथ गंधर्व उक्त्वेदं भूपतिं प्रति ।। अंतर्धानं गतस्तुष्टः शरत्काल इयां- बुदः ॥ ३४ ॥ अथ मंगलभपालः पार्श्वस्थ दिजमागतम् ॥ विलोक्य बढ़क कञ्चित्कक्षानि- क्षिप्तशंवलम् ।। ३५ ।। उवाच मधुरां वाचं स्मितपूर्वां शुचिस्मिताम् ॥ देवस्त्वं दानवरत्वं वा गंधर्वो वाऽथ राक्षसः ॥ ३६ ।। सत्यं वद वटो कस्माकिमर्थ त्वमिहागतः ॥ श्रुत्वेत्याशिष्य तं विप्रः प्राह लद्देशसंभवः ॥ २७ ॥ दानव ? या गन्धर्व ? या राक्षस हो?॥३६॥ हे बटो (वनचारिन् ) सत्य कहो कहां से और किस वास्ते तुम यहां आये हो ? इस प्रकार राजाका वचन सुन ब्रह्मचारीने आशीर्वाद देकर कहा कि मैं तुमारे ही देशमें उत्पन्न हूं ॥ ३७॥ न स - और मैं आपके साथही आया हूं इससे हमको कुछ यथोचित आज्ञा दीजिये । इसके अनन्तर राजाने कहा कि तेरा नूतन नाम है ॥ ३५ ॥ सो तुम जल्दी जलाशय देख, हमारे वास्तं जल लावो। इसके बाद राजाको वटके नीचे बैठाकर. महाबुद्धिमान वह वटु "ऐसाही करेंगे" यह कर घोड़ेपर चढ़ पति- योंके शब्दस सुन्दर जहां तालाब था, वहां गया ॥ ३९ ॥ ४० ॥ कैसा है तालाब कि मानों मूर्ति- अहं सार्द्ध त्वयाऽध्यातरतदादिश यथोचितम् ।। राजोऽथ तमुवाचेदं त्वं दो नुतनालयः ॥ २८ ॥ अपां स्थानं विलोक्य वं तोयं तूर्णं ममानय ॥ अथ विश्रभ्य भूपाल बटुको वटपादपे ॥२६ ।। तथाकृत्य तुरंगं च समारुह्म महामतिः ।। जगाम पक्षिघोषेण यत्रास्ते सुंदर सरः ॥४०॥कमलै- कनिवासेन रथांगाभरणेन च । वनमालालयत्वेन दधन्नारायणी तनुम् ॥ ४१ ॥ मान् नारायणही है नारायण कमला जो लक्ष्मीजी हैं, तिनका एक निवासस्थान है। और यहां कमलों- मेंहि लक्ष्मी वसती । और वे चक्रधर हैं तो यहांभी चक्रकी जगह चक्रवाक पक्षीही हैं और ये वन- माला पहने हैं तो यह वनोंकीही माला [ पंक्तियों ] से शोभित है ॥४१॥ V , म०ल० ॥७॥ और कैसा है कि समुद्रसे अधिक है। क्योंकि समुद्रमें पंचवका तूफान होता है और इसमें पवनक सैकडों उद्योग विफल जाते हैं, वह खारा है यह मीठा है, वहविषसहित है यह विषरहित है, वह अगस्त्यमुनिकी प्यास न बुझा सका और इसने उनकीभी प्यास बुझा दी है, और वह मलिन भग्नवायुशतोद्योगमक्षारं विपवर्जितम् ॥ नाशितागस्तितृष्णाति प्रसन्नं सागराधिकम् ॥ ४२॥ पके मनोऽथ तत्राश्वः पृष्ठादुत्तोर्य तस्य सः ॥ चतुर्दिशं निरीक्ष्याज्य तस्यैव सरसस्तटे॥४३॥ दिव्यवस्त्रपरीधानं दिव्याभरणभूषितम् ।। कथयन्तं कथा दिव्या स्त्रीणां सार्थ प्रपश्यत ।। ४४ ॥ है यह निर्मल है॥४२॥इस प्रकारकी शोभा देखता हुवा घुम रहा था इतने में उसका घोडा कीचडमें फंस गया, तब उसने उसकी पीठसे उतर चारों दिशाओंको देख उसी तालावके तटमें॥४३॥ दिव्य वस्त्रोंको धारण किये, दिव्य आभरणोंसे भूषित, सुंदर कथाओंको कहता हुआ स्त्रियोंका समूह देखा ॥४४॥ ॥७ र फिर वह घटु स्त्रियों के समूहके पास जा अपना हाल कह, हाथ जोड़, मधुर वाणीसे योला ॥ ४५ ॥ हे सार्थ ( स्त्रियोंके समूह ) ! श्रद्धा भक्तियुक्त तुम लोग यह क्या कर रही हो इसकी क्या विधि है ? क्या फल है ? सो हमसे यथायोग्य कहिये ॥ ४६ ॥ ऐसा उस घटु (ब्रह्मचारी ) का उपसृत्यास्थ तं सार्थं स्ववृत्तान्तं निवेद्य च।। कृतांजलिरिति माह बटुमधुरया गिरा ॥ ४५ ॥ बटु- रुवाच ।। एतत्किं क्रियते सार्थ त्वया भक्तिपरेण वै ॥ को विधिः किं फलं चाऽस्य ब्रूहि तन्म याथतथम् ॥ ४६ ।। श्रुता च तमुवाचेदं सार्थः करुणया गिरा ॥ सार्थ उवाच ॥ शृणु विकचि- तेन श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ॥ ४७ ।। - वचन सुन, स्त्रियोंका समूह द्यायुक्त वाणीसे बोला, हे विप्र ! एकचित्त, श्रद्धा व भक्तियुक्त हो मुनो ।। ४७ ॥ 1
म०ल०
11511
संपूर्ण फलोंको देनेवाला यह ग्रन उन्हीं महालक्ष्मीजीका है। जो तीनों लोकों में माया, प्रकृति, शक्ति
श्रादिनामोमे पुकारी जाती हैं ॥४८॥ हे घटो [मचारिन् ] ! इसकी विधि को नुनो । भाद्रपद महीने की
शुक्लाऽष्टमीले इल व्रतका प्रारंभ किया जाना है ॥४६॥ सयेरे उठ सोलह वार झाप, पांव, मह धोके,
या माया प्रकृतिः शक्तिोलोक्येप्यभिधीयते ॥ व्रतमेतन्महालक्ष्म्यास्तस्मात् सर्व फलमदन
॥ ४८ ॥ अाकर्षय विधि चास्य कथ्यमानं मया कहो ॥ भाडे मासि सिताष्टम्यामारम्भोऽस्य
विधीयते ॥ १६ ॥ प्रातः पोंडशकृत्वस्तु पूक्षाल्यांनी करो मुखम् ॥ तन्तुषोडरासंसिद्धं ग्रन्थि
पोडशसंयुतम् ॥ ५० ॥ मालतीपुष्पकपूरचन्दनागुरुचर्चितम् ।। लक्ष्म्यै नमोऽय मंत्रेण पूति
ग्रन्थ्यभिमंत्रितम् ॥ ५१॥
सोलह तागोंसे धनाया हुआ, सोलह गांठियोंसे युक्त, मालतीफूल, कपर, चन्दन, अगर इनसे पूजित
और "लदम्यनमः" इस मंत्रसे प्रति गांठमें अभिमत्रित, ऐसा डोरा ॥ ५० ॥ ५१ ॥
,
॥३॥
-- हे महालक्ष्मी ! धन धान्य, पृथ्वी, धर्म कीर्ति, आयु, यश शोभा, घोड़ा, हाथी, पुत्र, हमको देश्रो ॥ ५२ ॥ इस मंघसे दाहिने हाथमें बाँधकर, अक्षतासहित देयके सोलह पौधा लेकर ॥ ५३ ॥ धनं धान्यं धरां धर्म कीर्तिमायुर्यशः श्रियम् ॥ तुरंगान्दन्तिनः पुत्रान्महालक्ष्मि प्रयच्छ मे ॥ ५८ ॥ मन्त्रेणानेन बद्धाथ दोरकं दक्षिणे करे ॥ कांडानि षोडशादाय दूर्वाया साक्षतानि च ।। ५३ ।। एकचित्तः कथां श्रुत्वां पूजयेत्तञ्च दोरकन् । ततस्तु पातरारभ्य यावत्स्यद- सिताष्टमी ॥ ५४ ॥ तावत्पूक्षाल्य हस्तौ तु पादादीनि कथां तथा ॥ शृणुयात्यूत्यहं विध तत्संख्यैरक्षतादिभिः ॥ ५५ ॥ ॥ - एकचित्त हो, कथा सुने, उन्हींसें डोरा पूजे फिर प्रातःकालले लेकर कृष्णपक्षकी अष्टमी तक ।। ५४ ॥ रोज हाथ, पांच मुह श्रादि धोकर वैसेहीअक्षतादि लेकर कथा सुने ॥ ५५ ॥ --
म०ल०
॥६॥
क०
तदनन्तर कृष्णपक्षकी अष्टनीको सायंकालमें जितेन्द्रिय हो स्नान कर, श्वेत वस्त्र परिधान करके
व्रत करनेवाला पुरुष हो या स्त्री पूजास्थानको जायें ॥५६॥वहां पर पूर्वाभिमुख होकर, सुन्दर धोये हुए
आसनपर बैठकर उत्तम, सपेद पत्तोंसे युक्त अष्टदल कमल लिखे ॥ ५७ ॥ वाजू में ऐन्द्री आदि
श्रथ कृष्णाष्टमीं प्राप्य नक्तकाले जितेन्द्रिय॥स्नातःशुक्लाम्बरधरो। व्रती पूजागृहं विशेत्।। ५६ ।।
तत्रो पविश्य पूर्वास्यश्चारुधौतासनोपरि ।। श्वेपत्रं लिखेदष्टदलं कमलमुत्तमम्॥ ५७ ॥ ऐन्या-
दिशक्तिप्तंयुक्तं पार्श्वे पत्रं स केसरम ॥ कर्णिकायां ततो लक्ष्मी कपूरक्षोंदपांडुराम ॥ ५८ ॥
शुभ्रवस्त्रपरीधानां मुक्ताभरणभूषिताम् ॥ पंकजासनसंस्थानां स्मेरानन सरोरुहाम् ॥ ६ ॥
शक्तियोंसे युक्त कसर सहित पत्र लिखे फिर कपूर, अगर चन्दन आदिसे फर्णिकामें देवी लक्ष्मीजीको
लिखकर ध्यान करके कपूरकी तरह सफेद, सुन्दर पत्रोंको धारण किये, मुक्ताभरणोंसे भूषित
॥६॥
कमल के श्रासनमें बैठी हुई किंचित् हास्ययुक्त है मुखकमल जिसका ऐसी शरत्कालीन चन्द्रक तुल्य कांतिवाली, सुन्दर नेत्रवाली, चार भुजा वाली दोनों हाथमें हैं कमल जिसके ऐसी कमलको फिराती शारदेंदुकलाकान्ति स्निग्धनेत्रां चतुर्भुजाम् ॥ पद्मयुग्मामभयदांविरव्यग्रकराम्बुजाम् ॥ ६० ॥ अभितो गजयुग्मेन सिच्यमानां कराम्बुना ॥ संचिन्त्येवं लिखेद्देवीं कर्पूरागुरुचन्दनैः ॥ ६१ ॥ ततस्त्वावाहनं कुर्यान्मंत्रेणानेन सुव्रती ॥ ६२ ॥ महालक्ष्मि समागच्छ पदनाभपदादिह ॥ पंचोपजारपूजेयं त्वदर्थ देवि कल्पिता ।। ६३ ॥ हुई दोनों तरफ दो हाथियोंके शुडादण्डोंसे सिच्यमान इस तरह लक्ष्मीजीके स्वरूपका ध्यान करके ॥५८॥ ५६॥६०॥३१॥ फिर सुन्दर व्रती इस आगे कहे हुए मंत्रसे आवाहन करे ॥६२॥ हे महालक्ष्मि ! हे देवी! भगवान्के स्थानसे तुम यहां आबो, तुम्हारे वास्ते मैंने यह पञ्चोपचारकल्पिता पूजा रची है ।। ६३ ॥
क०
म०ल०
||१०||
फिर व्रती सोलह दिन पूरे होने पर उद्यापन करे, स्त्रियोंका समूह ब्राह्मणसे कहता है कि हे विप्र! जिस
विधिसे उद्यापन करना चाहिये व भद्धाभक्ति युक्तहोकर सुनो॥३४॥ उद्यापनमें सुवर्णक शृंगादिकोंसे
युक्त ऐली एक गऊ, तथा सुवर्ण, अन्न वस्त्रादि वेदपाठी ब्राह्मणको देना चाहिये ॥ १५॥ यथाशक्ति
पोडशाहे तु संपूर्णे कुर्यादुद्यापनं व्रती ।। विधिना येन विप्रेन्द्र शृणु श्रद्धासमन्वितः ॥ ६४ ॥
दातव्या धेनुरेका वै स्वर्णशृंगादिसंयुता।। श्रोत्रियाय सुवर्णं च तथानवसनादिकम ॥ ६५ ॥
यथाशक्ति सुवर्णं च दत्त्वा पूर्णं भवेद्रतम् ॥ द्विजेभ्यः पोडशेभ्यश्च पूदद्याद्वसनादिकम् ॥६६।।सार्थ
उवाचााएतत्ते कथितं विष व्रतानामुत्तमंवतम्। यद्विधानादनायासाल्लभते वाञ्छितं फलम ।।६७॥
सुवर्ण देकर सोलह ब्राह्मणोंको अन्न, वस्त्रादि देने से व्रत पूर्ण होता है ॥ ६६ ॥ देवियोंक समूहने
कहा कि हे विप्र ! व्रतोमें उत्तम यह व्रत हमने तुमसे कहा, जिसके करनेसे अनायास वाञ्छित फल
प्राप्त होता है ॥ ६७॥
॥१०॥
- हे विप्र ! इस व्रतको करके अपने राजासे भी कराओ, यह उत्तम दूत श्रद्धावान्को देना।।६चानास्तिकों के आगे इस व्रतको कभी प्रकाशित न करना । इसके बाद ब्राह्मणने उस स्त्री समूहको नमस्कार करक कीचड़से घोड़ेको निकाल ॥ ६६ ।। जल पिलाक राजाक निमित्त कमलके पत्तोंमें जल लेकर कृत्वा व्रतं पर विप्र राजानं तच्च कारय । व्रतमेतत्त्वया वित्र देयं श्रद्धावते परम् ।। ६८ ॥ ना. स्तिकानां पुरस्तात्तु न पूकाश्यं कथञ्चन ।। नमस्कृत्य तु तं सार्थं पङ्कादुद्धत्य वाजिनम् ॥ ६६ ॥ सम्पीयाम्भस्तदादाय पमिनीपत्रयन्त्रितम् ॥ आरुह्य तुरगं विप्रो राजान्तिकमुपागतः ।। ७० ॥ निवेद्य तद्भतं विप्र राजानं समकारयत् ।। नानाप्रकारसंभारमाकुले बटुकस्य च ।। ७१ ॥ घोड़ेपर चढ़के राजाक पास पहुंचा ॥ ७० ॥ उस बूतका वृत्तांत कहकर नानाप्रकारकी सामग्रीसे युक्त होकर राजासे बूत कराया ॥
-
म०ल०
क०
उस व्रतक प्रभावसे राजा सय राजाओंमें श्रेष्ठ राजा हुमा। तत्पश्चात् राजा यटक लाये हुए घोड़ेपर
चढ़कर ॥ ७१ ॥ ७२ ॥ उस बूतक प्रभावस शीघ्रही अपने पुरको पाया । और उस पृथ्वीके इन्द्र
राजाको आते देखकर ॥७३॥ बाजे आदिसे सम्पूर्ण पुरवासी उत्सव करते भये । चलायमान पताकोंकी
व्रतप्रभावादभवत्स भूभृद्भूभृतां वरः ॥ अथारुह्य महीपालो वटुपाणितं हयम् ॥ ७२ ॥ तद्वत-
स्य प्रभावेण तूर्णं स्वपुरमागतः ॥ तमायान्तं समालोक्य राजानं भूपुरन्दरम् ॥ ७३ ॥ उत्सवं च-
किरे पौरास्तौर्यादिकपुरस्सरम् ॥ चलत्पताकदोमालं लसत्कलशमोलिकम् ।। ७४ ॥ पुरं नृत्यदि-
वोभाति च्छन्नं घण्टौघघर्घरैः ॥ अथोत्कलिकया काचिद्धावति स्म वराङ्गना ।। ७५ ॥
पाँति और कलशोंके मुकुटसे शोभित ॥ ७४ ॥ घण्टोंके समूहके घर्घरशन्दसे नाचता हुअामा शहर
मालूम होता था, कोई स्त्री उत्कंठासे इधर उधर दड़ती थी ॥ ७५ ॥
॥११॥
.
कोई चलायमान मोतिक लताजालोंसे चार भाग करती थी और कोई स्त्री, वालोंको छोरे, कोई एक-
ही श्रांखमें अंजन दिये थी ॥ ७६ ॥ कोई नितम्बक भारसे दुःखी और कोई मोटे स्तनकी थी ।
तदनन्तर बटुसहित राजा अपने गृहमें प्रवेश करने लगा ॥ ७७ ॥ तय पुरकी स्त्रियोंकरके फेंके हुए
चलन्मुक्तालताजालैश्चतुष्कमिव कुर्वती ।। काचिदिमुक्तकेशेव कृतैकनयनाञ्जना ॥ ७६ ॥ का-
चिन्नितम्बन्भारार्ता काचित्पीनपयोधरा ॥ अथाऽविशन्महीपालो वुटुना सहितो गुहाम् ॥ ७७ ।।
पौरनारीजनाक्षिप्तलाजैः पूरित विग्रहः ॥ अथोत्तीर्य हयात्तस्मादटुवावलम्वितः ॥ ७८ ।। जगाम
मङ्गलो राजा चोलदेवी तु यत्र वै ॥ दृष्टा तु चोलदेवी सा दोरकं राजवाहुके । ७६ ।।
लाजासे ढकी है देह जिसकी ऐसा राजा बटुका हाथ पकडक घड़ेसे उतरा ॥ ७८ जहां चोलदेवी
नाम रानी रहती थी, वहां मंगलनास राजा गया और चोलदेवीने राजाको बाडमें डोरेको देखा॥७॥
विमृश्य
मनसा
कुद्धा
शङ्काचके
तृपे
विमाम्
॥
आखेटकस्य
व्याजन
गतोऽन्यां
वल्लभा
प्रति
क०
म०ल०
॥१२॥
मनमें यह विचारके क्रोधित हो राजा यह शङ्का करती भधी कि, राजा शिकारके बहानेसे किसी
और स्त्रीक पास गये हैं ॥८० ॥ उसने अपने सौभाग्यके लिये राजाकी वाहमें डोरा बांध दिया है।
और इसी तरह मेरे देखने के लिये इस बटुक्तो भेजा है।८१॥ तत्पश्चात् कुपित है दैव जिसपर ऐसी उस
॥ ८० ॥ सौगाग्याय तया बद्धो दोरको भूभुजो भुजे । तथैव बटुनश्चायं द्रष्टुं मां प्रेषितो ध्रुवम्
॥ ८१॥ ततो दुर्दैवदुष्टात्मा कोपादाच्छिच दोरकम् ॥ चिक्षेप च महीपृष्ठे स्वसौभाग्यसुखैस्सह
॥शान बुबोध च ता राजा त्रोटयंतीच दोरकम् ।। सामन्तमंत्रिभृत्यायैः कुर्वन्याता वनोद्भवाम्८३
दुष्टात्माने कोपसे डोरेको तोड अपने सौभाग्यमुखके साथ पृथ्वीयेफेक दिया॥८२॥ सामन्त, मंत्री, भृत्या
दिको सरिरा वनकी वार्ता करता हुआ राजारानी डोरे को तोड़ रही है इस बात को नहीं जान सका॥३॥
॥१२॥
॥
उसी समय चिल्लदेवी रानीकी कोई दासी देखनेको पाई और उस टूटे हुए डोरेको लेकर उसका व्रत
घटुकसे पूछकर ॥ ८४ ॥ उम दासीने अपनी रानीसे उसव्रत को करने के लिये कहा। तत्पश्चात् चिल्ल-
टवी नूतन नाम बटको बुलाकर उस व्रतको करती भयो !! ८५ ॥ तत्पश्चात् वर्षके बीतनेपर ल-
चिल्लदेव्यास्तदा काचिदासी द्रष्टुं समागता । तया दोरकमादाय वटुमामृच्छय तदनम् ।।८५||
तद्रतस्य विधानार्थ स्वस्वामिन्यै निवेदितम् ॥ ततो नूतनमाहूय चिल्लदेव्यकरोगतम् ।। ८६ ॥
अथ रुवत्सरेऽतीते लक्ष्मीपूजादिने नृपः ॥ तौर्यत्रिकस्य निःस्वानं चित्तदेव्या गृहेऽशृणोत् ८६||
तकर्य महोपालो नूतनम्बटुमत्रवीत् ।। अहहाद्य दिनं लक्ष्म्यास्स व्रतस्य क दोरकः ।। ८७ ॥
दमीपूजाके दिन चिल्लदेवी रानीके गृहमें बाजा,नाच, गाना आदिके शब्दोंको राजाने सुना ॥ ८ ॥
उस शब्दको सुनकर राजाने नूतन नाम बटुसे कहा, अहह ? आज लक्ष्मीके पूजनका दिन है । वह मेरा
वतका डोरा कहां है । ॥८७ ॥
। म०ल. ॥१३॥ क० + इसप्रकार राजाके पूछने पर वटुने डोरेके तोड़नेकी बात कही।उसको सुनके मंगलनाम राजा चोलदेवीपर नाराज हो ।। ८८ ॥ कहने लगा कि आज हम चिल्लदेवी रानीके घरमे पूजा करेंगे तत्पश्चात् नूतनके हायको पकडके मंगल नाम राजा ॥ ८ ॥ लक्ष्मीजीके पूजनके लिये चिल्लदेवीके गृहको गये । लक्ष्मीजी इति पृष्टो नृपं प्राह दोकत्रोटनक्रमम् ॥ तत्व मंगलो राजा चोलदेव्यै प्रकुष्य च ।। ८८ ॥ मयाऽद्य पूजनं कार्य चिल्लदेवीगृहं पति ॥ अथ मंगलाभूपालो बटुवाह्नवलम्बितः ॥८६॥ चचाल कमलार्चाय चिल्लदेवीगृहं प्रति ।। अत्रान्तरे महालक्ष्मीर्वद्धरूपं विधाय च ।।।६० ॥ जिज्ञासाथ गृहं तस्याश्चोलदेव्यास्ततो गता ।। गच्छ गच्छादिदुष्टे त्वं किं गृहागमनेन च ।। ६१ ।। श्रद्धा स्त्रीका रूप धारणकर ॥ १० ॥ परीक्षा लेने के लिये चोलदेवीके गृह में पाई । उनको देखकर रा- नीने तू यहांसे चली जा; मेरे यहां आनेसे क्या है ? ।। ६१ ।। कहा कि हे दुष्टे ! तू ॥१३॥ - 7 इस प्रकार उस दुष्टा रानी से अत्यंत अपमानित होकर लक्ष्मीजी क्रोध करके चोलदेवीसे योलीं ॥२॥ कि जो तैंने मेरा अनादर किया है,उससे तू शूकरमुखी हो, इस प्रकार रानीको शाप दिया तभीसे पृथ्वी में वह मंगलपुरकोल्हापुर नामसे प्रसिद्ध हुश्रा ॥९॥६४॥ तत्पश्चात् रानीके स्तुति करनेपर महालक्ष्मीजी तया दुराशयात्यर्थ लक्ष्मीः साऽप्यवमानिता ॥ ततः ऋद्धा महालक्ष्मीश्योलदेवीमभापत ।। ६२ ।। शशापाऽथो महालक्ष्मीश्चोलदेवीं पुनः पुनः।। ६३॥ लक्ष्मीरुवाच ॥कोलास्या भव दुष्टे वं यत्त्व- या ह्यवमानिता ॥ कोलापुरमिति ख्यातं क्षितौ तन्मंगलं पुरम्।। ६४ ॥अथाऽऽयाता महालक्ष्मी- श्चिल्लदेवीनिकेतनम् ।। बहुधा चिल्लदेव्या सा लक्ष्मीस्सम्मानितार्चिता ।। ६५ ।। उसी रूपसे चिल्लदेवीके गृहमे अई, तय चिल्लदेवीने यहुत प्रकारसे मानपूर्वक महालक्ष्मीजीकी पू. जा की ॥६५॥ .
क० म०ल० ||१४|| - तव लक्ष्मीजी वृद्धरूपको छोडकर प्रत्यन हुई और रानी ने पञ्चोपचारपूजासे लक्ष्मीजीकी पूजा की ॥६६॥ तत्पश्चात् लक्ष्मीजी प्रसन्न होकर चिल्लदेवीमे योली ॥१७॥ कि हे चिल्लदेवी ! तुम्हारे पूजनसे हम प्रसन्न हैं। वर मांगो । तद्नंतर शुभ है चित्त जिसका ॥ 8 ॥ ऐसी चिल्लदेधिने महालक्ष्मीसे यह वृद्धरूपं परित्यज्य प्रत्यक्षा साऽभवत्तदा ॥ पञ्चोपचार पूजाभिः श्रियं राज्ञी ततोर्चयत् ॥ ६ ॥ अतितुष्टा ततोलक्ष्मीचिल्लदेवीमुवाच ह ॥ ६७ ॥श्रीरुवाच ॥ अर्चनात्ते प्रसन्नाऽस्ति चिल्लदेवी वरं वृणु ॥ बने वरं ततो राज्ञी चिल्लदेवी शुभाशया ॥ ६८ ॥ चिल्लदेव्युवाच ॥ ये करिष्यति ते देवि व्रतमेतत्सुरेश्वरि ॥ तद्रेश्म न त्वया त्याज्यं यावचन्द्रदिवाकरौ ॥ ६३ ॥ अद्याऽऽरभ्य क- था झेपा भूपसंबंधिनी तु सा ॥ ख्यातिं याति क्षितो देवि भक्तिर्भवतु मे त्वयि ॥ १०० ।। वर मांगा कि हे देवि ! जो कोई इस व्रतको कर, हे सुरेश्वरि ! उसके घरको जबतक सूर्य चंद्रमा रहें तयतक न छोड़ो ॥ ६६ ॥ और आजसे यह राजसंयन्धी कथा संसारमें विख्यात हो और तुम्हारे विषयमें हमारी भक्ति हो ।। १०० ।। ||१४ - और जो कोई सद्भावसे इस कथाको पढ़ेंगे या सुनेंगे, उनको वांछित फल तुम दो ॥१०१॥ महालक्ष्मी- जी तथास्तु कहकर वहीं अन्तर्धान हो गई, तत्पश्चात् मंगलनाम राजा वहां आकर लक्ष्मीजीका पूजन सद्भावेन कथामेतां ये शृण्वंति पठति च ।। तेषां हि वांछितं सर्व त्वया देयं सदैव हि ॥ १०१ ॥ तथेत्युक्त्वा महालक्ष्मीस्तत्रैवांतरधीयत ।। अथ मगलभूपालस्तत्रागत्य श्रियोर्चनम् ॥ १०२ ।। चके पर या भत्त्या चिल्ल देव्या समन्वितः ।। अथेया दुराचारा चिल्लदेवीगृहम्प्रति ॥ १०३ ।। चोलदेवी समायाता द्वारस्थैारिता जनैः ।। ततो जगाम विपिनं गत्राऽऽसीदङ्गिरा मुनिः ।।१०४|| ॥ १०२॥ परमभक्तिसे चिल्लदेवी रानीसहित करते भये, तदनंतर ईर्षासे दुष्ट आचार करनेवाली चोलदेवीको चिल्लदेवीके गृहमें आती हुई देखि द्वारपालोंने रोका तब वह जहां अंगिराऋष रहते थे उस वनको गई ॥ १०३ ॥ १०४ ।। . . 1
क०
म०ल.
॥१५॥
उन्होंने उसको शूकरमुरची देखकर ज्ञानदृष्टिसे विचार, अंगिरा मुनिने उस चोलदेवीसे लक्ष्मीजीका
व्रत कराया ॥ १०५ ॥ व्रतके करनेसे चोलदेवी महायशस्विनी हुई और चतुरता, केली, लीला और
अथाऽऽलोक्याताकारां ज्ञानदृष्टया विचिन्त्य ताम् ।। समनिः श्रीव्रतं दिव्यं चोलदेवीमकारयत्
॥१०५|| व्रते कृतेथ संजाता चोलदेवी महायशाः ।। दाक्षिण्यकेलिलीलाभिलावण्यैकनिकेतना
॥ १०६ ॥ ततः कदाचिदागत्य वनमाखेटके नृपः ।। मुनर्वेश्मनि राजा तां ददर्श वामलोचनाम्
।। १०७ ।। अथ राजा मुनिम्प्राह केयं धन्येति कथ्यताम् ॥ तद्वृत्तान्तं समाख्याय राज्ञे तां
पददौ मुनिः ॥ १०८॥
शोभाका गृह हुई ॥ १०६ ॥ तत्पश्चात् किसी समयमें मंगलनाम राजा शिकार खेलनेको धनमें आया
और उस स्त्रीको ऋषिके गृहमें देखा, तय राजाने मुनिसे पूछा कि यह स्त्री कौन है ? उसका सम्पूर्ण
वृत्तांत कहकर उस रानीको मुनिने राजाको दिया,॥ १०७ ॥ १०८ ॥
॥१५॥
इसके अनन्तर राजा अपने राज्यमें आकर चोलदेवी और चिल्लदेवीसहित मंगल राजा राज्य करने लगा ॥ १०६ ॥ फिर चिल्लदेवीने चोलदेवीसे मिलनेके हेतु वर मांगा, जिस प्रकार समुद्रमें गंगा यमुना हमेशः मिली रहती हैं॥११०॥उसीप्रकार मंगलराजाकी वे स्त्रियां होती भइ और परस्पर एक से एक भ- अथागत्य निज राज्य चोलदेवीसमन्वितः ॥ चिल्लदेव्या च सहितो बुभजे मंगलो नृपः॥१०६।। चिल्लदेवी वरं वत्रे चोलदेवीसमागमम् ।। समुद्रस्य यथा गङ्गायमुने सङ्गते सदा।। ११० ॥ तथा मङ्गलभूपस्य जाते ते वामलोचने ॥ परस्पराधिके ते तु प्रिये राज्ञो बभूवतुः ॥१११|| चिल्लदेव्या समं सोऽथ चोलदेव्या सहाखिलाम् ।। सप्तदीपवती पृथ्वीं बुभुजे मंगलो नृपः ॥ ११३ ॥ धिक प्रेम करनेवाली राजाको प्रिय होती भई॥१११शाअनंतर मंगलनाम राजा चिल्लदेवी तथा चोलदेवी सहित सम्पूर्ण सप्तदीपवती पृथ्वीका उपभोग करता भया ॥ ११२ ॥ + १ - -- म०ल. ॥१६॥ क० नारदजी इन्द्र से कहते हैं, कि जैसे आपके गुरु मंत्री हैं उसी तरह इस व्रतके प्रभावसे वह नूतन बटु मंगलराजाका मंत्री हुआ, ॥ ११३ ॥ सब राजा में श्रेष्ठ मंगलनाम राजा सम्पूर्ण भोगोंको भोग करके स्वर्ग में प्राप्त हो श्रवणनक्षत्र हुआ ॥ ११४ ॥ नारदजीने कहा कि हे इंद्र । यह व्रत सव व्रतोमें उत्तम व्रतस्याऽस्य च सामर्थ्याटुकस्सोऽपि नूतन ॥ अभून्मंगलभूपस्य मंत्री तव यथा गुरुः ॥११३|| भुक्तास्थ सकलान्भोगान्मङ्गलो भूभुजां वरः ।।स पुनः स्वर्गमेत्याभून्नक्षत्रं विष्णदेवतम् ॥११॥ ॥ नारद उवाच ।। एतत्ते कथितं शक्र व्रतानामुत्तमं व्रतम् ॥ यकथाश्रवणेंनाऽपि लभते वांछितं फलम् ॥ ११५ ॥ प्रयाग इव तीर्थेषु देवेषु भगवानिव ।। नदीषु च यथा गङ्गा व्रतेष्वेतत्तथा व्रतम् ॥ ११६ ॥ है, जिसकी कथामात्रके श्रवणसे वांछित फल मिलता है ॥ ११५ ॥ जिस प्रकार तीर्थों में प्रयाग और देवताओंमें भगवान् और नदियों में गंगा है उसीप्रकार सब व्रतोमें यह व्रत श्रेष्ठ है ॥ ११६ -- आपको धर्म,अर्थ,काम,मोक्षकी इच्छा होतो हे शक्र ! श्रद्धापूर्वक इस व्रतको करो ॥११७॥ इम बूत- के करने से महालक्ष्मीजी धन,धान्य,पृथ्वी,धर्म,कीर्ति, आयु,यश, शोभा,घोडे,हाथि,पुत्र ये सब देती हैं ॥ ११८ ॥ श्रीकृष्णजी राजा युधिष्ठिरसे कहते हैं, कि इसके बाद नारदजीके उपदेशसे इंद्रजीने इस धर्म चार्थं च कामं च मोक्षं च यदि वांछसि ।। तहीदं च व्रतं शक कुरु श्रद्धासमन्वितः॥११७॥ धनं धान्यं धरां धर्म कीर्तिमायुर्यशः श्रियम् ।। तुरंगान्दन्तिनः पुत्रान्महालक्ष्मीः प्रयच्छति ॥ ११६ ॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ व्रतमिदमथ च के नारदेनोपदिष्टं सुरपतिरपि यस्माद्वांछितार्थं स लेभे ।। त्वमपि कुरु तथेतद्धर्मसूनो यथा स्यादभिमतफलसिद्धिः पुत्रपौत्रादिवृद्धिः ॥ ११६ ।। इति श्रीभविष्योत्तरपुराणे महालक्ष्मीव्रतकथा समाप्ता ।। व्रतको किया, और जिसके करने से इंद्रने वांछित फलको पाया । धर्मपुत्र! तुमभी इस व्रतको करो जि- ससे अभीष्ट फलकी सिद्धि और पुत्रपौत्रादिकोंकी वृद्धि हो ॥ ११६ ॥ इति श्रीभविष्योत्तरपुराणे महालक्ष्मीव्रतकथाटीका समाप्ता ॥ .
मुद्रक- है गोकुल प्रसाद द्वारा। गोकुल प्रेस, नं० ४६ बुलानाला बनारस सिटी। म - .
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॥ समाप्ता ॥
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CLICE REMPP - 2空空空空22222222 GaurrarrrrurrrrocarrouprrrrinaraumarATHDRAJEERUT TIOCLE TO इति महालक्ष्मी व्रतकथा भा.टी. । 14 * समाप्तम् SHOVA TORROTESTHATIOITCTORSTIOTECTESTOTTOYLIS BOXONLOALOT OTHOREORNOTTOMSOTECTLSPOTTOREOTIO rorrrrrrrrrrrners 17 Tujrsitण murrrrrrrrrrrrry 14. AFTECREDIRECENTEERINE 353