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Yogarasayanam

2005/07/25

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स्वामी ब्रह्मानंदजी.
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श्रीरमापतये नमः
योगरसायनम् ।
श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यब्रह्मानंदस्वामिना
विरचितम्
तदिदं
मुंबय्यां
पांडुरंग जावजी इत्यनेन
निर्णयसागरमुद्रणालयाधिपतिना मुद्रयित्वा प्रसिद्धिं नीतम् ।
(पञ्चमावृत्तिः)
शकाब्दाः १८५१, सन १९२९.
मूल्यं १० आना.

-- Publisher-Pandurang Jawaji, Nirnaya Sagar Press, 26-28, Printer-Ramchandra Yesu Shedge, Kolbhat Lane, Bombay.

प्रस्तावना. ॐ सर्वमहाशय सजनोंको विदित होकि योगविद्या जीवात्माकी उन्नतिका एक मुख्य साधन है । वेद, शास्त्र, पुराण, इतिहासादिग्रंथोंमें सर्वत्र योगका प्रतिपादन कियाहै । भारतवर्षके सिवाय चीन, तिबेत, जापान, अमेरिकादिदेशोंमें तथा वेदांत, बौद्ध, जैन, शैव, वैष्ण- वादिसर्वगनोंमें योगका आदर है। महादेव, मत्स्येन्द्र, गोरक्ष, पतंजलि, वसिष्ठ, वामदेवादिक बडेबडे देवता ऋषिमुनियोंने योगका साधन किया इतिहासोंमें प्रसिद्ध है। और जो जो मनुष्यशक्तिसे विलक्षण उत्कृष्ट गुण ऋषिमुनियोंमें सुननेमें आतेहैं सो सर्व योगविद्याके प्रभावसे हि उनको प्राप्त हुयेथे जिनको सुनकर आजक- लके श्रद्धाहीन लोक उनको असंभव बतलाते हैं। सो इस योगविद्याके प्रतिपादक पातंजल, गोरक्षसंहिता, (२) योगियाज्ञवल्क्यसंहिता, शिवसंहिता, योगबीज, हठपदी. पिकादिक अमेक ग्रंथ विद्यमान हैं सो तिममें भिन्न भिन्न प्रक- रणोंमें योगके साधनोंका वर्णन किया है । सो साधक पुरुषोंको सुगम बोधके लिये तिन सर्वयोगके ग्रंथोमेंसे सार निकालकर यह योगरसायन नामक ग्रंथ निर्माण किया गया है। इस ग्रंथों ममसे योगके आठ अंगोंका विधिपूर्वक निरूपण किया है । इसमें विशेषता यह है कि, जगहजगहपर अपने अनुभवके अनुसार सर्व योग- युक्तियोंका वर्णन किया गया है । सो इस मंथके अनु- सार जो पुरुष योगाभ्यास करेगा सो अवश्य सिद्धिको प्राप्त होगा। सो यह अंथ ईश्वरदर्शन, योगकरमालुम, विचारधीमक, मोक्षमता, भजममालादिक ग्रंथोंके रूचते- हारे पुष्करतीर्थ निवासी स्वामिनाहानंदने निर्माण किया है तथा बंबईनिवासी शेठ पांडुरंग जाषजीमे अपसे प्रेसमें छपाकर प्रसिद्ध किया है इति । स्वामिब्रह्मानंदू.

ॐ श्रीरमापतये नमः। योगरसायनम् । मंगलम् । योगनिद्रां समासाद्य यः शेते शेषविष्टरे । तस्य पादांबुजं नित्यं देवस्य प्रणमाम्यहम् ॥१॥ अर्थ-योगरूपी निद्राको ग्रहण करके जो शेष- नागकी शय्यापर शयन करते हैं ऐसे जो दिव्यस्वरूप विष्णुभगवान हैं तिनके चरणकमलोंके प्रति मैं सर्व- दाकाल नमस्कार करताहुं इति ॥१॥ योगिराज शिवं चापि नत्वा गुरुपदांबुजम् । योगाचार्यानशेषेण योगं वक्ष्यामि सिद्धये ॥२॥ अर्थ-सर्व योगियोंके मुख्य अधिपति जो शिवजी हैं तिनको नमस्कार करके और अपने गुरुके चरणक- मलोंको नमस्कार करके तथा योगविद्याके आचार्य जो मत्स्येन्द्रनाथ गोरक्षनाथ पतंजलि याज्ञवल्क्य आदिक हैं तिन सर्वको नमस्कारकरके साधकपुरुषोंको मोक्ष- यो. र. १ (२) पदकी सिद्धिके लिये योगविद्याका निरूपण करताहुँ इति ॥२॥ प्राणापानसमायोगो योगश्चित्तात्मनोस्तथा । यत्र जीवेशयोर्योगस्तं योगं नित्यमभ्यसेत् ॥३॥ अर्थ-जिसकरके प्राण और अपानकी एकता होवेहै चित्त और आत्माकी एकता होवेहै तथा जीव और ईश्वरकी एकता होवेहै ऐसा जो योग है तिसका मुमुक्षुपुरुषोंको सर्वदाकाल अभ्यास करना योग्य है है इति ॥३॥ । क्रियाजालान्यनेकानि प्रभवंति न मुक्तये । योगमेवाभ्यसेन्नित्यं बुधो मोक्षाय केवलम् ॥४॥ अर्थ-अनेकप्रकारकी जप तप तीर्थ दानादिक जो स्थूलक्रियायोंके समूह हैं सो मुक्तिके लिये साक्षात् समर्थ नहि होसके हैं अर्थात् तिनसे शीघ्र मुक्तिकी प्राप्ति नहि होवेहै यातें बुद्धिमान् पुरुषको संसारबंध. नकी मुक्तिके लिये केवल योगकाहि अभ्यास करना चहिये इति ॥४॥ तत्त्वज्ञानेन कैवल्यं ज्ञानं योगमयं तथा । विना योगेन यज्ज्ञानं नैव तन्मोक्षकारणम् ॥५॥ अर्थ-तत्त्वज्ञानसें कैवल्यमोक्ष होवेहै और सो ज्ञान (३) योगरूपहि है और जो योगके विना शुष्कज्ञान है सो मुक्तिका कारण नहि होवे है इति ॥५॥ अणिमादिपदं येन प्राप्य जित्वा तथांतकम् । जीवन्मुक्तश्चरेद्योगी योगमार्ग तमाश्रयेत् ॥६॥ अर्थ-जिसकरके अणिमा महिमा आदिक सिद्धि- योंको प्राप्त होयकर और कालको जीतकरके जीव- न्मुक्त भया योगी स्वतंत्र जगत्में विचरताहै तिस योगमार्गका बुद्धिमान् पुरुषोंको अवश्य आश्रयण करना योग्य है इति ॥६॥ शुष्कशास्त्रविवादेषु नैवायुः क्षपयेदुधः । नहि दीपकवार्तायामंधकारो विनश्यति ॥७॥ अर्थ-शाखोंके शुष्कविवादोंमें बुद्धिमान् पुरु- पको सर्व आयु व्यतीत नहि करनी चाहिये क्योंकी जैसे दीपककी वार्ता करनेसे अंधकारका नाश नहि होवेहै तैसेहि केवल शास्त्रोंकी वार्ता करनेसे संसार- बंधनकी निवृत्ति नहि होवेहै इति ॥७॥ इन्द्रियार्थेषु सक्तानां देहाध्यासवतां नृणाम् । आलस्यहतबुद्धीनां शास्त्रं स्यादवलंबनम् ॥८॥ अर्थ इन्द्रियोंके विषयों में आसक्त और शरी- रमें अध्यासवाले तथा आलस्यकरके क्षीणभई बुद्धिवाले (४) जो पुरुष हैं सो अष्टांगयोगसाधनेका परिश्रम नहि करसकते हैं यातें तिनके लियेहि केवल शास्त्रका आलंबन है इति ॥८॥ तस्माच्छास्त्रं विचार्यादौ पश्चाद्योगं समभ्यसेत् । यथा पूर्वर्षयश्चक्रुर्वसिष्ठाद्याः शुकादयः॥९॥ अर्थ-यातें विवेकी पुरुषको प्रथम शास्त्रोंका विचारकरके पश्चात् योगका अभ्यास करना चहिये जैसे कि वसिष्ठादिक और शुकदेवादिक पहलेके ऋषिमुनि करते भये हैं इति ॥९॥ शैववैष्णवशाक्तेषु मतेषु निखिलेष्वपि । सर्वत्र विहितो योगस्ततस्तं साधयेत्सुधीः १० अर्थ-किंच शैव वैष्णव शाक्त आदिक सर्वमतोंमें सर्वत्र योगका विधान किया है यातें बुद्धिमान् पुरु- षको तिस योगकी अवश्य साधना करनी योग्य है इति ॥१०॥ आलोड्य योगशास्त्राणि स्वस्थानुभवतस्तथा । सारभूतं प्रवक्ष्यामि विधानं योगसाधने ॥११॥ अर्थ-पातंजलदर्शन शिवसंहिता याज्ञवल्क्य- संहिता गोरक्षशतक हठयोगप्रदीपिका आदि अनेक योगशास्त्रोंको मथन करके तथा अपने अनुभवके

(५)
अनुसार योगसाधन करनेकी जो विधि है तिसको
संक्षेपसे सारभूत निरूपण करताहूं इति ॥ ११ ॥
तत्र योगविधौ ज्ञेयं द्वाराणां तु चतुष्टयम् ।
विनेशानुग्रहानंतोर्दुर्लभं यस्य कस्यचित् १२
अर्थ-तहां प्रथम योगसाधनमें चार द्वार जानने
चहिये जो कि ईश्वरकी अनुग्रहके विना हरएक जी-
वको प्राप्त होने अतिकठिन हैं इति ॥ १२ ॥
प्रथमं विषयत्यागो द्वितीयमनुकूलता।
तृतीयं गुरुसंयोगश्चतुर्थ चेशचिंतनम् ॥ १३ ॥
अर्थ-प्रथम तो स्त्रीआदिकविषयोंका परित्याग
होना और दुसरे सर्वप्रकारसे योगसाधनकी साम-
ग्रीकी अनुकूलता होनी तथा तीसरे योगविद्याके
जाननेवाले गुरुका समागम होना और चौथा ईश्व-
रका आराधन करना इति ॥ १३ ॥
द्वाराण्येतानि योगस्य चत्वारि मुनयो विदुः।
नैतैर्विना भवेत्सिर्जिन्मकोटिशतैरपि ॥१४॥
अर्थ-यह चार योगके मुनिलोकोंने मुख्य द्वार
कथन कियेहैं क्योंकि इनकेविना कोटिजन्मोंमें भी
योगकी सिद्धि नहि होसके है इति ॥ १४ ॥

(६)
तथाष्टावेव योगस्य ज्ञेयान्यंगानि साधकैः।
येषां साधनतो जंतुः कैवल्यं पदमश्नुते ॥१५॥
अर्थ-तथा योगके आठ अंग साधकपुरुषोंको
जानने चहिये जिनके साधन करनेसे यह जीव कैव-
ल्यमोक्षपदको प्राप्त होवेहै इति ॥ १५ ॥
यमश्च नियमश्च स्यादासनं प्राणसंयमः।
प्रत्याहारस्तथा पश्चाद्धारणा ध्यानमेव च ॥१६॥
समाधिरिति योगस्य विदुरंगानि योगिनः ।
लक्षणं च क्रमात्तेषामुच्यते मुनिसंमतम् ॥१७॥
अर्थ-यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार
धारणा ध्यान और समाधि यह योगके आठ अंग
योगी लोकोंने कथन किये हैं अब क्रमसे तिन आठोंके
पतंजलि याज्ञवल्क्य आदि मुनिलोकोंके मतके अनुसार
भिन्न भिन्न लक्षण निरूपण करते हैं इति ॥१६॥१७॥
अथ यमः ।
अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यापरिग्रही।
यमः पंचविधःप्रोक्तो मुनिभिर्योगचिन्तकै:१८
अर्थ-अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य और अप-
रिग्रह इस भेदतें योगके जाननेहारे मुनिलोकोंने पांच
प्रकारका यम कथन किया है इति ॥ १८ ॥

(७)
अहिंसा सर्वभूतानां सर्वथा द्रोहवर्जनम् ।
सत्यं स्याज्जीवजातस्य हितं वाक्यं प्रियं च यत् ॥
अर्थ-तिनमें मन वाणी शरीरकरके सर्वप्रकारसे
सर्वभूतप्राणियोंको जो दुःख नहि देनाहै सो अहिंसा
कहियेहै तथा जो सर्वजीवोंका हितकारक और प्रिय
वचन बोलना है सो सत्य कहियेहै इति ॥ १९ ॥
अस्तेयं परद्रव्याणामनादानं विनाज्ञया।
सर्वथा मैथुनत्यागो ब्रह्मचर्यमुदीरितम् ॥२०॥
अर्थ-पराई वस्तुवोंका मालिककी आज्ञाकेविना
जो ग्रहण नहि करनाहै सो अस्तेय कहियेहै तथा सर्व-
प्रकारसे जो मैथुनका परित्याग करनाहै सो ब्रह्मचर्य
ऋषिलोकोंने कथन किया है इति ॥ २० ॥
योगोपकरणादन्यपदार्थानामसंग्रहः ।
अपरिग्रहणं तद्धि कथितं मुनिपुंगवैः ॥ २१ ॥
अर्थ-तथा योगसाधनकी उपयोगी सामग्रीके
सिवाय विशेष पदार्थोंका जो संग्रह नहि करना है सो
अपरिग्रह श्रेष्ठ मुनिलोकोंने कथन किया है इति॥२१॥
अहिंसया भवेन्मैत्री सत्येनामोधवाक्यता।
अस्तेयागनलाभश्च बलं स्याब्रह्मचर्यतः॥२२॥

(८) अपरिग्रहणादात्मविचारो जायते ध्रुवम् । योगिनो यतचित्तस्य यमानां परिपाकतः॥२३॥ अर्थ-अब यमोंके भिन्न भिन्न फल कथन करते हैं अहिंसा पालन करनेसे सर्वभूत प्राणियोंसे मित्रता होवेहै और सत्यभाषण करनेसे अमोघयाणी होवेहै तथा अस्तेयसे नानाप्रकारके मनोवांछित पदार्थों की प्राप्ति होवेहै और ब्रह्मचर्यसे मानसिकशक्तिकी वृद्धि होवेहै तथा अपरिग्रहसे अध्यात्मविचारकी उत्पत्ति होवे है इस प्रकारसे चित्तके जीतनेवाले योगीको यमोंकी परिपकावस्थामें उक्त फलोंकी प्राप्ति होवे है इति ॥२२॥२३॥ अथ नियमः। शौचं तोषस्तपश्चैव जपश्चेश्वरचिंतनम् । पंचधानियमश्चापि विज्ञेयः साधकोत्तमैः॥२४॥ अर्थ-शौच संतोष तप जप और ईश्वरका चिंतन इसभेदसे नियमभी साधकपुरुषोंको पांचप्रकारकाहि जानना चाहिये इति ॥ २४ ॥ शौचं शुद्धिर्हि देहस्य मनसश्च निगद्यते । यथालाभेन तुष्टिस्तु संतोषः परिकीर्तितः २५ अर्थ-तिनमें शरीर और मनकी जो शुद्धि है सो (९) शौच कहिये है तथा प्रारब्धयोगसे जो द्रव्यादिक प्राप्त होवे उसीमें जो तृप्ति माननी है सो ऋषिलोकोंने संतोष कथन किया है इति ॥ २५ ॥ तपश्चान्द्रायणादीनां व्रतानां यद्विधारणम् । प्रणवादिपवित्रस्य मंत्रस्यावर्तनं जपः ॥२६॥ अर्थ-चांद्रायणादिक व्रतोंका जो विधिपूर्वक धारण करना है सो तप कहिये है तथा ओंकार आदिक पवित्रमंत्रका जो वारंवार उच्चारण करना है सो जप कहिये है इति ॥ २६ ॥ मनसा भक्तिभावेन यदीशस्य निरंतरम् । स्मरणं सर्वगत्वेन तदेवेश्वरचिंतनम् ॥ २७ ॥ अर्थ-नम्रता और प्रेमभावसे सर्वदाकाल मनसे जो ईश्वरका सर्वव्यापकरूपसे स्मरण ध्यान करना है सो ईश्वरका चिंतन कहिये है इति ॥ २७ ॥ शौचाहेहे विरागः स्यात्संतोषादुत्तमं सुखम् । तपसा सिद्धिलाभश्च जपादेवसमागमः ॥२८॥ ईश्वराराधनासिद्धिः समाधेर्जायते ध्रुवम् । योगिनो नियमानां च परिपाके न संशयः २९ अर्थ-अब नियमोंके फल निरूपण करते हैं शौच पालन करनेसे अपने तथा पराये शरीरको मलिन

(१०)
समझकर ग्लानिसे वैराग्य होवे है और संतोषसे
शांतिजन्य परमसुखकी प्राप्ति होवे है तथा तप करनेसे
अणिमादिक सिद्धियोंकी प्राप्ति होते है और जप कर-
नेसे इष्टदेवका समागम होवे है तथा ईश्वरके आरा-
धनसे समाधिकी सिद्धि होवे है इस प्रकारसे निय-
मोंकी परिपक्कावस्थामें योगीको उक्त फलोंकी प्राप्ति
होवे है इति ॥ २८ ॥ २९ ॥
यमैश्च नियमैश्चापि योग्यः स्याद्योगसाधने ।
अनादरेण चैतेषां न कचित्सिद्धिभाग्भवेत् ३०
अर्थ-उक्त रीतिसे यम और नियमोंकरके युक्त
भयाहि योगी पुरुष योगसाधन करनेमें योग्य होवे है
और यमनियमोंके अनादर करनेसे कदाचित्भी
सिद्धिको नहि प्राप्त होसके है इति ॥ ३०॥
तस्मादतिप्रयत्नेन सेवनीया निरंतरम् ।
यमाश्च नियमाश्चापि योगेप्सुभिरखंडिताः ३१
अर्थ-यातें योगसिद्धिकी इच्छावाले साधकपुरु-
षोंको अतिप्रयत्नसे यम और नियमोंका सर्वदाकाल
अखंडित सेवन करना योग्य है इति ॥ ३१ ॥
अथासनम्।
आसनानि बहून्याहुर्मुनयो जीवभेदतः।
तेषां चतुष्कमादाय सारभूतमिहोच्यते॥३२॥

(११)
अर्थ-नानाप्रकारके जीवोंकी बैठकके अनुसार
पूर्वके मुनिलोकोंने बहुतप्रकारके आसन कथन किये
हैं सो तिनमेंसे सारभूत चार आसन लेकरके यहां
कथन करते हैं इति ॥ ३२॥
सिद्धासनं भवेदाचं द्वितीयं पद्मसंज्ञितम् ।
तृतीयं स्वस्तिकं प्रोक्तं वीराख्यं च चतुर्थकम् ३३
अर्थ-तिनमें पहला सिद्धासन दूसरा पद्मासन
तीसरा स्वस्तिकासन और चौथा वीरासन कहिये है
इति ॥३३॥
सिद्धं प्राणाधिरोहे स्यात् ध्यानकाले तु पद्मकम्
खस्तिकं जपवेलायां वीरं स्यात्सुखसंस्थितौ३४
अर्थ-तिनमें सिद्धासन तो प्राणके चडानेके का-
लमें करना चाहिये और पद्मासन ध्यानकालमें करना
चहिये तथा स्वस्तिकासन जप करनेके बखत करना
चहिये और वीरासन साधारण सर्वदा सुखसे बैठनेके
कालमें करना चहिये इति ॥ ३४ ॥
गुदावृषणयोर्मध्ये वामपाणि नियोजयेत् ।
दक्षपादाग्रभागं च वामजंघांतरे न्यसेत् ॥३५॥
हस्तयुग्मं न्यसेदंके सिद्धासनमितीरितम् ।
कुंडलीबोधकं शीघ्र समाधेश्वोपकारकम् ॥३६॥

(१२) अर्थ-गुदा और अंडकोशके मध्यभाग सीवनीमें घामपादकी एडीको लगाय कर दहने पादका अग्र- भाग वामजंघाके अंदर स्थापन करे तथा दोनों हाथ संपुटकरके गोदमें स्थापन करे यह सिद्धासन कुंड- लीके शीघ्र जगानेवाला और समाधि चडानेमें परम उपयोगी पूर्वके योगीलोकोंने कथन किया है इति ॥ ३५ ॥ ३६॥ वामोरूपरि दक्षांत्रिं विन्यसेत्तस्य चोपरि। दक्षोरौ वामपदं च संस्थाप्याञ्जलिसंपुटम् ३७ स्वांके निधाय नासाग्रं पश्येनिश्चलमानसः। पद्मासनं भवेदेतद्योगसिद्धिकरं परम् ॥ ३८॥ अर्थ-वामऊरुके ऊपर दहना पाद रखकर तिसके ऊपर दहने ऊपर वामपादको स्थापन करे और अपने अंकमें दोनों हाथ संपुटकरके धरकर नासाके अग्रभागमें निश्चल मनसे दृष्टि जमावे सो यह शीघ्रही योगकी सिद्धि करनेवाला पद्मासन कहिये है इति ॥ ३७॥ ३८ ॥ दक्षजंघांतरे वामं वामजंघांतरे तथा । विन्यसेचरणं दक्षं स्वस्तिकं चैतदुच्यते॥ ३९ ॥ अर्थ-दहनी जंघाके बीचमें वामपादको और (१३) वामजंघाके बीचमें दहने पादको स्थापन करे इसका नाम स्वस्तिकासन कहिये है इति ॥ ३९ ॥ दक्षिणोरुतले पादं वामं विन्यस्य दक्षिणम् । वामोरूपरि संयोज्यं वीरासनमितीरितम् ४० अर्थ-दहने ऊरुके नीचे वामपादको रखकरके दहना पाद वामऊरुके ऊपर स्थापना करे इसको योगीलोकोंने वीरासन कथन किया है इति ॥ ४०॥ ज्ञेयं सर्वासनेष्वेतन्मुख्यं पीठचतुष्टयम् । साधकैरनिशं सेव्यं योगार्थिभिरतंद्रितैः॥४१॥ अर्थ-सर्व आसनोंमें यह चार आसन मुख्य जानने चाहिये योगसिद्धिके अभिलाषी साधकपुर- पोंको आलससे रहित होकरके निरंतर इनका सेवन करना योग्य है इति ॥४१॥ स्थिरं स्यादासनं यस्य स योगं कर्तुमर्हति । शरीराचलताभावे नहि चित्तं स्थिरं भवेत् ४२ अर्थ-जिस पुरुषका आसन स्थिर होवेहै सोई योगका साधन करसकता है क्योंकि शरीरकी अचल- ताके विना मन कबी स्थिर नहि होसकता है इति ४२ आसनं त्वेकतानेन कृतं दुःखावहं भवेत् । शनैरभ्यासतस्तस्माद्बर्द्धयेदासने स्थितिम् ४३॥

(१४) अर्थ-आसनको एकदम अधिक देरतक करनेसे शरीरमें परिश्रम होता है यातें धीरेधीरे अभ्यास करके आसनको बढाना चहिये इति ॥४३ ॥ यदा प्रहरपर्यंत स्थिरं स्यादेकमासनम् । तदा योग्यं विजानीयादासनं योगसाधने ४४ अर्थ-जिस कालमें एक प्रहरपर्यंत एकहि आसन स्थिर होजावे तब आसनको योगकी साधना करने में योग्य समझना चहिये॥४४॥ आसने स्थिरतां याते मनःस्थैर्य भवेद्रुवम् । प्राणस्यापि गतिनं शिथिला संप्रजायते ॥४५ अर्थ-अब आसनका फल कहतेहैं जब आस- नकी स्थिरता होवेहै तो निश्चय करके मनभी स्थिर होजावेहै और प्राणवायुकी गतिमी निश्चयकरके मंद होजाती है इति ॥४५॥ इन्द्रियाणांच चापल्यं शांतिमायाति निश्चितम् ततो योगस्य सिद्धिः स्यात् तस्मादासनमभ्यसेत् अर्थ-तथा आसनकी स्थिरता होनेसे इंद्रियोंकी जो स्वाभाविक चंचलता है सोमी शांत होजाती है और इसप्रकारसे मन प्राण इंद्रियोंकी स्थिरता होनेसे शीघ्रहि योगकी सिद्धि होवेहै यातें योगसाधनाकी

(१५)
इच्छावाले साधकपुरुषोंको प्रथम आसनका अवश्य
अभ्यास करना योग्य है इति ॥४६॥
भ्रमणं तीर्थयात्रासु नैव कार्य हि योगिना।
स्थित्वा स्थाने सदैकस्मिन् योगारंभ समाचरेत्
अर्थ-योगाभ्यासी पुरुषको तीर्थों की यात्रामें
भ्रमण नहि करना चहिये किंतु योगसिद्धिपर्यंत सर्व-
दाकाल एकस्थानमेंही निवास करके योगाभ्यासका
साधन करना योग्य है ॥४७॥
अथ प्राणायामः।
प्राणायाममथेदानीं कथयामि समासतः ।
यस्य ज्ञानाद्भवेद्योगी योगसिद्धेस्तु भाजनम्
अर्थ-अब प्राणायामकी विधि संक्षेपसे कथन
करते हैं जिसके जाननेसे योगी पुरुष योगसिद्धियोंका
पात्र होवे है इति ॥४८॥
प्राणायामस्य भेदास्तु कथिता मुनिपुंगवैः।
बहवो योगतंत्रेषु साधकानां हिताय वै ॥४९॥
अर्थ-पूर्वके मुनिवरोंने योगके ग्रंथों में प्राणायामके
बहुत प्रकारके भेद साधक लोकोंके हितके लिये कथन
किये हैं इति ॥४९॥
द्वावेव तेषु सर्वेषु प्राणायामौ वरौ मतौ ।
चंद्रभेदनसंज्ञश्च भस्त्रिकासंज्ञकस्तथा ॥५०॥

(१६) अर्थ-तिन प्राणायामके सर्व भेदोंमेंसे चंद्रभेदन और भस्त्रिका यह दो प्राणायामही योगीलोकोंने श्रेष्ठ मुख्य मानेहैं इति ॥५०॥ संध्यादिकर्मवेलायां चंद्रभेदनमिष्यते । भस्त्रिका योगकाले स्यादिति ज्ञेयं विचक्षणैः५१ अर्थ-तिनमें संध्यादिककर्म करनेके कालमें तो चंद्रभेदन करना चहिये और योगाभ्यास करने में भस्त्रिका प्राणायाम करना चहिये ऐसा बुद्धिमान् पुरुषोंको जानना योग्यहै इति ॥५१॥ वामनासिकया प्राणं पूरयेचंद्रमार्गतः । कुंभयित्वोदरे सम्यक सूर्यद्वारेण रेचयेत् ॥५२ अर्थ-अब प्रथम चंद्रभेदनकी रीति कथन करते हैं पहले चंद्रमाके मार्ग वामनासापुटसे प्राणका पूरण करे और तिस पूरक कियेहुये प्राणको पेटमें भलीप्र- कारसे अपनी शक्तिअनुसार रोककरके पीछे सूर्यद्वारा दहने नासापुटसे रेचन करदेवे इति ॥ ५२ ॥ पुनः पिंगलया पीत्वा कुंभयित्वा यथावलम् । शनैर्विरेचयेत्प्राणं वामरंध्रेण युक्तितः॥५३॥ अर्थ-इस प्रकार एक प्राणायाम करके फिर दूसरी वार दहनी नासापुट पिंगलासे प्राणको पूरक करे और (१७) यथाशक्ति पेटमें कुंभक करके पीछे युक्तिसे धीरेधीरे वामनासापुटसे रेचन करदेवे इति ॥ ५३ ॥ प्रणवं वाथ गायत्री मनसा कुंभकावधि । जपेदेकांतगः सोयं चंद्रभेदनमुच्यते ॥५४॥ अर्थ-और प्राणके कुंभकपर्यंत मनसे ओंकारका अथवा गायत्रीमंत्रका एकांतमें बैठकरके जप करे इसको चंद्रभेदन प्राणायाम कहते हैं इति ।। ५४ ।। वामनासापुटात्माणं रेचयेत्तेन वै पिबेत् । पीतं विरेचयेत्तूर्णं दक्षनासापुटेन तम् ॥ ५५ ॥ ततस्तेनैव पीत्वाऽथ वामरंध्रेण रेचयेत् । वामेनैव ततः पीत्वा दक्षरंध्रेण रेचयेत् ॥५६॥ अर्थ-अब भस्त्रिका प्राणायामकी रीति निरूपण करते हैं पहले वामनासापुटसे प्राणको रेचन करके उसीसे शीघ्रही पीजावे और फिर तिसकों शीघ्रही दहने नासापुटसे रेचन करदेवे तथा फिर उसी पुटसे पीकरके वामपुटसे रेचन करदेवे और फिर वामपुटसे पीकरके दहनेपुटसे रेचन करदेवे इति ॥५५॥५६॥ एवं पुनः पुनः कुर्याद्रेचपूरौ द्रुतं द्रुतम् । भस्त्रावल्लोहकारस्य क्षणमात्रं विचक्षणः॥५७॥ अर्थ-इसप्रकार जैसे लुहारकी धोकनी चलतीहै (१८) तैसेही चतुरपुरुष शीघ्र शीघ्र दोनो नासापुटोंसे वारी वारी थोडीदेर रेचक पूरक करे इति ॥ ५३ ॥ ततो विरेचयेद्वायुं निखिलं वामरंध्रतः। किंचित्कालं बही रुष्ट्वा वामेनैव पिबेत्ततः ५८ अर्थ-पीछे संपूर्ण पेटके प्राणवायुको वामना- सापुटसे रेचन करदेवे और किंचित् काल तिसको बाहिर रोककर फिर उसी बामनासापुटसेही पूरक करलेवे इति ॥ ५८॥ कुंभयेदुदरे पीतं प्राणं धृत्या यथावलम् । शनैर्विरेचयेत्पश्चाद् दक्षरंध्रेण बुद्धिमान् ॥५९॥ अर्थ-तिस पूरक कियेहुये प्राणको धीरजसे अप- नी शक्तिअनुसार कुंभक करें और पीछे धीरेधीरे दहने नासापुटसे रेचन करदेवे इति ॥ ५९ ॥ पूर्ववद्भस्त्रिकां कृत्वा दक्षरंध्रेण रेचयेत् । किंचित्कालं बही रुवा ततस्तेनैव पूरयेत् ॥६॥ कुंभयित्वा यथाशक्ति प्राणं वामेन रेचयेत् । वामदक्षक्रमेणैवं प्राणायाम समभ्यसेत् ॥३१॥ अर्थ-इसप्रकार एक प्राणायाम करके फिर दूसरी पार पहलेकी न्याई थोडी देर भस्त्रिका करके नासाके दहने रंध्रसे प्राणको रेचन करे और किंचित्काल ति- (१९) सको बाहिर रोककर फिर दहने रंध्रसेही पूरक करलेवे और यथाशक्ति पेटमें कुंभक करके फिर वामनासापु- टसे शनैः शनैः रेचन करदेवे इसप्रकार उक्तरीतिसे वामे और दहने रंध्रसे क्रमकरके प्राणायामका अभ्या- स करे अर्थात् पहला प्राणायाम वामनासापुटसे करे और दूसरा दहनेसे फिर तीसरा वामेसे और चौथा दहनेसे करे इसप्रकार क्रमसे करे इति ॥६०॥६१॥ भस्त्रिकाकुंभकोयं स्याच्छीघ्रं प्राणजयप्रदः। कुंडलीवक्रभावघ्नस्त्रिदोषशमनः परः॥ १२ ॥ अर्थ-इस प्राणायामको भस्त्रिकाकुंभक कहते हैं इसके अभ्यास करनेसे शीघ्रही प्राणका जय होवेहै और कुंडली शक्तिका चक्र सरल होवेहै तथा कफ पित्त वात तीनों दोषोंकी शांति होवेहै इति ॥६२॥ अस्यैवांतर्भवंत्यन्ये प्राणायामा यतोऽखिलाः। तस्मादस्यैव कर्तव्यः सदाभ्यासःसुसाधकैः ६३ अर्थ-और जो दूसरे शीतकारी शीतली आदिक प्राणायाम हैं सो सर्वही इस भस्त्रिकाके अंतर्भूत हो- जातेहैं यातें श्रेष्ठ साधकपुरुषोंको केवल इसी भस्त्रिका प्राणायामकाही सर्वकाल अभ्यास करना योग्यहै इति ॥ ६३॥ यो. र. २ (२०) कुंभकस्य तु मध्येपि पिबेद्वायु विचक्षणः । एकवारं द्विवारं वा कुंभकस्य विवृद्धये ॥६४॥ अर्थ-बुद्धिमान् पुरुषको चहिये कि कुंभकके बीचमेंभी एकवार अथवा दोवार नासिकाद्वारा बाहि- रसे प्राणवायुको पीजावे तो कुंभककी विशेष वृद्धि होवेहै इति ॥ ६४ ॥ नाभौ संचिंतयेद्योगी सूर्यमंडलमुज्ज्वलम् । तेन प्राणनिरोधः स्याच्चिरकालं न संशयः॥६५॥ अर्थ-तथा योगीको चहिये कि कुंभककालमें अपने नाभिचक्रमें प्रकाशवान् सूर्यमंडलका ध्यान करे तो तिससे मनकी वृत्ति अंतर्मुख होनेसे प्राणका चिरकालपर्यंत निरोध होवे है इति ॥६५॥ सायं प्रातश्च कुर्वीत प्राणयामं तु साधकः । घटिकात्रितयं नित्यं पथ्यपूर्वकमेकधीः॥६६॥ अर्थ-उक्तरीतिसे प्रातः तथा सायंकाल तीन घ- टिकापर्यंत नित्यही पथ्यपूर्वक साधकपुरुषको एकाग्र- चित्त होकर प्राणायामका अभ्यास करना योग्य है इति ॥६६॥ रसमम्लं तथा क्षारं विदाहि कटुकं तथा । त्यक्त्वा भुंजीत गोधूमं मुद् वा तंडुलं तथा ६७ ५५ (२१) अर्थ-खाटा रस लवणादि विशेष क्षार मरिचादि दाहकारक और निंबादि कटु पदार्थोंका परित्यागकरके गेहूं मूंग तथा चावलोंका भोजन करना चहिये इति घृतं नवीनं सेवेत निशायां च पयः पिबेत् । सैंधवं चाल्पमश्नीयात् तथैव मधुरं रसम्॥१८॥ अर्थ-ताजा घृतका सेवन करे और रात्रीको दूधका पान करे तथा सैंधव निमक थोडा खावे और मीठा रसभी थोडा खाना चहिये इति ॥ ६८॥ एतद्धि योगिनां पथ्यं नापथ्यं तु कदाचन । पथ्याभावे भवेद्योगी नानारोगसमन्वितः ६९ अर्थ-येही पदार्थ योगीलोकोंके लिये पथ्य हैं यो- गीको अपथ्य कवी सेवन नहीं करना चहिये क्योंकि पथ्यके नहीं पालन करनेसे योगीके शरीरमें नानाप्र. कारके ज्वरादि रोगोंकी उत्पत्ति होवे है इति॥६९॥ इत्थं मासद्वयं कुर्यात् त्रिमासं वा गतालसः । यावत्पंचशतं मात्राः कुंभकस्य भवंति हि ७० अर्थ-इस प्रकार उक्तरीतिसे दो अथवा तीन मासपर्यंत प्राणायामका अभ्यास करना चहिये जबतक कुंभककी पांचसौ मात्रा अनायाससे होजावें इति॥७॥ एकादिगणनां कुर्यान्न द्रुतं न विलंबितम् । मनसा कुंभकाले तु मात्रास्ताः परिकीर्तिताः७१

(२२)
अर्थ-कुंभककालमें एक दो तीन चार पांच इस
प्रकारसे न तो शीघ्र और न विलंबसे जो मनमें
गिनती करनी है तिसको मात्रा कहते हैं इति ॥७१॥
मात्राणां तु भवेत्संख्या यदा पंचशताधिका।
तदायोग्यं विजानीयात् कुंभकं शक्तिबोधने७२
अर्थ-जिसकालमें मात्रायोंकी पांचसौसे अधिक
संख्या होजावे तो तिसकालमें कुंभकको कुंडलिनीके
जगानेमें योग्य समझना चहिये इति ॥ ७२ ॥
गतिं विज्ञाय नाडीनां कुंडलीस्थानमेव च ।
सम्यग्योगीततो युक्त्या शक्तिबोधनमाचरेत्॥
अर्थ-पहले नाडियोंकी गति तथा कुंडलीका
स्थान भलीप्रकारसे जानकरके पश्चात् युक्तिसे योगी
कुंडलीको जागृत करे इति ॥ ७३ ॥
अस्ति नाभेरधः कंदो देहमध्यगतः सदा ।
कुक्कुटांडसमाकारः सर्वनाडीसमाश्रयः ॥१४॥
अर्थ-नाभिके नीचे शरीरके मध्यभागमें कंदका
स्थान है और कुकुटके अंडेके समान तिसका आ-
कार है तथा शरीरकी सर्व नाडियोंका सो आश्रयभूत
है इति ॥ ७४॥

(२३) तस्मादूर्ध्वमधस्ति निर्गताः सर्वनाडिकाः। देहं व्याप्यावतिष्ठते भूमंडलमिवापगाः ॥७॥ अर्थ-तिस कंदसे ऊपर नीचे और तिरछियां सर्व नाडियां निकली हैं जैसे पृथवीमंडलमें नदियां व्या- पक होय रही हैं तैसेही सो नाडियां नीचे ऊपर तिर- छी सर्व शरीरमें व्यापक होय रही हैं इति ॥ ७५ ॥ तासु सर्वासु वै तिस्रःप्रधाना नाडिका मताः। इडा च पिंगला चैव सुषुम्नेति प्रकीर्तिताः ॥७६॥ अर्थ-तिन सर्वनाडियोंमें इडा पिंगला और सु- पुग्ना यह तीन नाडियां योगीलोकोंने मुख्य मानी हैं इति ॥ ७६॥ इडा वामे स्थिता नित्यं पिंगला दक्षिणे तथा। सुषुम्ना मध्यगा ज्ञेया योगसिद्धिप्रदायिनी७७ अर्थ-तिनमें इडा नामकी नाडी वामभागमें है और पिंगला दक्षिणभागमें है तथा सुषुम्ना दोनोंके मध्यमें जाननी चहिये सो सुषुम्नाही योगकी सिद्धि देनेवाली है इति ॥ ७७॥ कंदमध्याद्विनिर्गत्य मेरुदंडेन संगता। सुषुम्ना पृष्ठमार्गेण ब्रह्मरंध्रमुपागता ॥ ७८॥ अर्थ-सो सुषुम्ना पूर्वोक्त कंदसे निकलकर मेरु-

(२४)
दंडसे मिलीहुई शरीरके पृष्ठभागसे ब्रह्मरंध्रमें गई है
इति ॥ ७८॥
ततश्चैषा परावृत्त्या भ्रूकंठहृदयादिषु ।
क्रमाचक्रेषु गच्छंती नाभिमूलमुपाश्रिता॥७९॥
अर्थ-और सो ब्रह्मरंध्रसे होकर शरीरके अग्रभा-
गसे नीचेको भ्रूमध्य कंठ हृदयादि चक्रोंमें क्रमसे
होती हुई नाभिके नीचे कंदमें फिर जाय मिली है
इति ॥ ७९ ॥
कंदोपरिगता नित्यं शक्ति: कुंडलिनी परा।
सार्द्धत्रिवलयाकारा संसुप्तभुजगोपमा ॥८॥
अर्थ-कंदके ऊपरके भागमें कुंडलिनी शक्तिका
स्थान है और साडेतीन बलनके आकारसे सोये हुये
सर्पके समान कुंडलाकार है इति ॥ ८० ॥
सूक्ष्मा तडित्प्रतीकाशा जीवशक्तिसमाश्रया।
मूलप्रकृतिरूपा सा सर्वप्राणिषु संगता॥ ८१ ॥
अर्थ-सो कुंडलिनी शक्ति अतिसूक्ष्म बिजलीके
समान प्रकाशरूप और जीवात्माका आधारभूत है
तथा मूलप्रकृतिस्वरूप है और सर्व प्राणधारी जी-
वोंके शरीरोंमें रहतीहै इति ॥ ८१ ॥

(२५) तस्याः प्राणस्तथापानो वहत्यूलमधस्तथा । मध्ये सा बीजभूतातु संस्थिता परमेश्वरी॥८२॥ अर्थ-तिस कुंडलिनीसे प्राण ऊपरको वहता है और अपान नीचेको वहता है और मध्यमें सो परमे- श्वरकी शक्तिरूप कुंडलिनी बीजरूपसे स्थित होय रही है इति ॥ ८२॥ येन मार्गेण गच्छंति प्राणा मूर्द्धनि योगिनः । मुखेनाच्छाद्य तवारं सुप्ता सा नागकन्यका ८३ अर्थ-जिस मार्गसे योगीके प्राण ऊपर मस्तकमें जाते हैं तिसके द्वारको अपने मुखसे रोककरके सो कुंडलिनी सोय रही है इति ।। ८३ ॥ यावत्सा निद्रिता देहे तावद्योगोन सिद्धयति । अतस्तद्वोधने युक्तिः सम्यगत्र निरूप्यते॥८॥ अर्थ-जबतक सो कुंडलिनी शरीरमें सोय रही है तबतक योग सिद्ध नहि होसकता है इसलिये उसके जगानेके लिये सम्यक् प्रकारसे यहां युक्ति निरूपण करते हैं इति ॥ ८४॥ प्रथमो मूलबंधः स्यादुडियानो द्वितीयकः। जालंधरस्तृतीयश्च शक्तिबोधनहेतवः ॥ ८५ ॥ अर्थ-प्रथम मूलबंध दूसरा उड्डियानबंध और (२६) तीसरा जालंधरबंध यह तीन प्रकारके बंध कुंडलिनीके जगानेमें हेतुभूत हैं इति ॥ ८५ ॥ सिद्धासने स्थितोऽपानं बलादूर्ध्व विकर्षयेत् । आधाराकुंचनेनायं मूलबंधोऽभिधीयते ॥८६॥ अर्थ-सिद्धासनपर बैठकरके आधारचक्रको आ- कुंचन करके जोरसे अपान वायुको ऊपरकी तरफ खेंचे इसको मूलबंध कहतेहैं इति ॥ ८६ ॥ नाभेः पश्चिमतानं हि बलात्कुर्यात्पुनः पुनः । उडियानो भवेधः प्राणोड्डयनकारकः ॥८७॥ अर्थ-पेटकी नाभिको वारंवार पीठकी तरफको जोरसे ताननेसे उड्डियानबंध होता है इससे प्राणोंका मेरुदंडद्वारा ऊपरको गमन होता है इति ॥ ८७ ॥ चिबुकं कंठकृपस्य न्यसेदुपरि भागतः । बंधो जालंधरःप्रोक्तः शिराजालनिरोधकः ८८ अर्थ-कंठकूपके ऊपरके भागमें मुखकी ठोडीको जमानेसे जालंधरबंध होताहै इस नाडियोंकी ऊर्ध्व- गतिका निरोध होवेहै इति ॥ ८८ ॥ बंधत्रयमिदं योगे योगिनामुपकारकम् । कुंडलीबोधकं शीघ्रं ब्रह्मरंध्रगतिप्रदम् ॥ ८९ ॥ अर्थ-यह तीनप्रकारके बंध योगाभ्यासमें योगि-

(२७)
योंके बहुत उपकारक हैं और कुंडलीको शीघ्रही बो-
धनकरके प्राणोंको ब्रह्मरंध्रमें पहुंचाते हैं इति ॥८९॥
ज्ञात्वा बंधत्रयं योगी कुंडली बोधयेत्ततः।
यस्याःप्रभेदाद्भिद्यते चक्राणि ग्रंथयोपि च ९०
अर्थ-इन बंधोंको भलीप्रकारसे जानकरके पश्चात्
योगी कुंडलिनीको जागृत करे जिसके जगानेसे षट्-
चक्रोंका तथा मेरुदंडकी सर्वग्रंथियोंका भेदन होवे
है इति ॥९॥
पूर्ववद्भस्त्रिकां कृत्वा रेचयेत्पवनं सुधीः ।
बहिरेवाथ तं रुष्ट्वा कुर्यादुज्यानबंधनम् ॥९१॥
बलादपानमाकृष्य ततो वायु प्रपूरयेत् ।
कुंभयित्वा यथाशक्ति शनैरेव विरेचयेत् ९२
अर्थ-पूर्वोक्त रीतिसे थोडा भस्त्रिका करके प्राण-
वायुको रेचन करे और तिस रेचन कियेहुये प्राणको
बाहिरही रोककरके पीछे उड्डियानबंध करे और उडि-
यानकरते वकत जोरसे अपानवायुको ऊपरकी तरफको
आकर्षण करे पीछे शीघ्रही बाहिरवाले प्राणका पूरक
करलेवे और शक्तिअनुसार कुंभक करके फिर रेचन
करदेवे इति ॥ ९१ ॥ ९२ ॥

(२८)
सिद्धासने समासीनः सायं प्रातश्च साधकः ।
वामदक्षक्रमेणैवं मुहर्तद्वयमभ्यसेत् ॥९३ ॥
अर्थ-इसप्रकार सिद्धासनपर बैठकर सायंकाल
तथा प्रातःकाल क्रमसे वामनासापुट और दक्षिणना-
सापुटसे चार घटिकापर्यंत साधक पुरुषको नित्य
अभ्यास करना चहिये इति ॥ ९३ ॥
उड्डियाने कृते बंधे मूलबंधोपि जायते ।
तेनापानो ब्रजेदूर्ध्वं प्राणस्य सदनं प्रति ॥१४॥
अर्थ-उड्डियानबंधके करनेसे मूलबंधभी स्वतःही
होजावे है क्योंकि जैसे मूलबंधसे अपानवायुका ऊप-
रको आकर्षण होवे है तैसेही उड्डियानबंधमें नाभिको
ऊपरकी तरफ ताननेसे अपानका आकर्षण होवे है सो
इससे अपानवायु ऊपरको प्राणके घरमें जाता है
इति ॥ ९४॥
ततः कुंभकयोगेन प्राणोऽपानगृहं ब्रजेत् ।
दूयोः संघर्षणादग्निवर्धते देहमध्यगः॥१५॥
अर्थ-और फिर प्राणका पूरक करके कुंभक कर-
नेसे प्राणवायु नीचेको अपानके घरमें जाता है इस-
प्रकार प्राण और अपान दोनोंके घर्षणसे शरीरके
मध्यभागमें रहनेहारी अग्निकी वृद्धि होवे है इति॥१५॥

(२९)
ततो वहिप्रतापेन प्राणसंघर्षणेन च ।
दंडाहता भुजंगीव कुंडली संप्रबुद्ध्यते ॥९६ ।।
अर्थ-और तिस अग्निके तापसे तथा प्राणोंके
संघर्षणसे जैसे दंड लगानेसे सर्पिणी कुंडल छोडकर
सीधी होजावे है तैसेही कुंडलिनी शक्ति निद्राको
छोडकर सीधी होजावे है इति ॥ ९६ ॥
प्रबुद्धा सा जहात्याशु ब्रह्मरंध्रमुखं ध्रुवम् ।
सुषुम्नायां तदा प्राणो विशेदूवं न संशयः९७
अर्थ-जागृतभई कुंडली ब्रह्मरंध्रके मार्गके द्वारको
छोड देती है और तिसकालमें सुषुम्नामें ऊपरको
प्राणका प्रवेश निश्चयकरके होवे है इति ॥ ९७ ॥
ततस्तु हृदयांभोजे प्राणस्य गमनं भवेत् ।
वायोः संस्पर्शयोगेन ज्ञातव्यं साधकोत्तमैः९८
अर्थ--सुषुम्नामें प्रवेश होनेके पीछे प्राणका प्रथम
हृदयकमलमें गमन होवे है सो तिसकालमें हृदयमें
प्राणवायुके अंदरसे स्पर्श होनेसे साधकपुरुषोंको
जानलेना चहिये कि अब कुंडलिनी जागृत होकर
हृदयतक आयगई है इति ॥ ९८ ॥
हृदयात्कंठमायाति कंठाद्भूमध्यमेव च ।
भ्रूमध्याद्रह्मरंधं च व्रजेत्माणः शनैःशनैः॥१९॥

(३०) अर्थ-तिसके पीछे नित्य प्रति अभ्यास करते रह- नेसे धीरे धीरे हृदयसे कंठ में प्राणोंका आगमन होवे है और फिर कंठसे भ्रूमध्यमें आगमन होवे है और फिर भ्रूमध्यसे ब्रह्मरंध्रमें प्राणोंका प्रवेश होवे है इति ॥ ९९ ॥ यथायथैवापानस्य बलादाकर्षणं भवेत् । तथातथा भवेदूवं शीघ्रं प्राणस्य रोहणम् १०० अर्थ-पूर्वोक्त उड्डियानबंधसे जैसे जैसे अपानका जोरसे ऊपरको आकर्षण किया जावे है तैसे तैसेही शीघ्र प्राणका ऊपरको आरोहण होवे है इति ॥१०॥ यदा चक्राणि भित्त्वासौ प्राणो मूर्धानमाव्रजेत् तदा तत्रैव ध्यानेन स्थिरं कुर्याद्विचक्षणः १०१ अर्थ-जिसकालमें आधारादि षट्र चक्रोंको उल्लं- घनकरके प्राणवायु शिरमें पहुंच जावे तो तिसकालमें चतुरपुरुष तिसको तहां ब्रह्मरंध्रमें चंद्रमंडलका ध्यान करके स्थिर करे इति ॥ १०१॥ पूर्वमार्गमिमं प्राहुः सुषुम्नाया मुनीश्वराः। यन याता विमुच्यते जन्मसंसारबंधनात् १०२ अर्थ-इसप्रकार पट्चक्रोंद्वारा प्राणको ब्रह्मरंध्र लेजानेको योगविद्याके जाननेवाले मुनीश्वर लोक

(३१)
सुषुम्नाका पूर्वमार्ग कहते हैं तथा कोई बंकनालमा-
गंभी इसको कहते हैं इसमार्गसे अंतकालमें प्राणोंको
छोडनेसे योगीलोक जन्ममरणरूप संसारबंधनसे मुक्त
होजाते हैं इति ॥ १०२॥
अथ पश्चिममार्गस्य भेदनं संनिरुच्यते।
मेरुदंडं प्रविश्याशु येन प्राणः प्रलीयते ॥१०३
अर्थ-अब सुषुम्नाका दूसरा जो पश्चिममार्ग है
तिसके खोलनेकी विधि निरूपण करते हैं जिससे
मेरुदंडमें प्राणप्रवेश होकरके ब्रह्मरंध्रमें जायकर लीन
होते हैं इति ॥ १०३॥
पूर्ववद्भस्त्रिकां कृत्वा रेचयेदनिलं शनैः ।
रुवा तं बहिरेवाशु कुर्यादुड्यानबंधनम् ॥१०४
अर्थ- पूर्वोक्तरीतिसे थोडा भस्त्रिका करके प्राण-
वायुको एकनासापुटसे रेचन कर देवे और तिनको
बाहिरही रोककर जलदीसे उड्डियानबंध करे इति १०४
नाभेः पश्चिमतानं तु तथा कुर्यात्प्रयत्नतः।
यथा स्यान्मेरुदंडेन संलग्नं नाभिमंडलम् ॥१०५
अर्थ-उड्डियानबंध करतेवकत नाभिको इसतरे
जोरसे पीछेको तानकर हटाना चहिये कि जिसतरे
नाभिस्थान पीठके मेरुदंडसे लगजावे इति ॥ १०५॥

(३२)
कृत्वाऽथ पूरकं शीघं कुंभकं कारयेदुधः।
मनसा चिंतयेचापि पृष्ठे प्राणस्य रोहणम् ॥१०६
अर्थ-फिर जलदी वाहिरवाले प्राणको पूरककरके
कुंभक करे और तिसकालमें मनसेभी प्राणोंका मेरुदं-
डमें चडना चिंतन करे इति ॥ १०६ ॥
दिनैः कतिपयैरेवमभ्यासं कुर्वतो ध्रुवम् ।
मेरुदंडे विशेत्प्राणो वंशरंध्रे यथानिलः॥१०७॥
अर्थ--कुछ दिन इसप्रकारसे अभ्यास करनेसे
योगीके प्राण मेरुदंडमें प्रवेश करजाते हैं जैसे कि
वांसके छिद्रमें वायु प्रवेश करे है इति ॥ १०७ ॥
दिनानुदिनमभ्यासे क्रियमाणे यथाक्रमम् ।
ऊर्ध्वमय ब्रजेत्प्राणो भित्त्या ग्रंथिसमुच्चयम् ॥
अर्थ-फिर दिनदिन क्रमपूर्वक अभ्यास करनेसे
मेरुदंडमें मार्गकी ग्रंथियोंके समूहको साफ करता हूया
प्राण ऊपरऊपरको गमन करता है इति ॥ १०८ ॥
अंगे पिपीलिकारोहे यथा स्पर्शः प्रतीयते ।
मेरुदंडे तथा वायो स्पर्शः स्यादूर्ध्वरोहणे १०९
अर्थ-जिसप्रकार शरीरपर कीडीके चडनेसे स्पर्श
मालूम पड़ता है तैसेही मेरुदंड में प्राणके ऊपर चड-
नेमें स्पर्श प्रतीत होवे है इति ॥ १०९ ॥

(३३) ब्रह्मरंधं व्रजेत्प्राणो यदा पश्चिममार्गतः। पूरयेत्तत्र तं नित्यं संतताभ्यासयोगतः॥११०॥ अर्थ-जिसकालमें मेरुदंडके मार्गसे प्राण ब्रह्मरं- ध्रमें पहुंच जावे तो फिर निरंतर अभ्यास करके तिसको तहां पूरण करे इति ॥ ११० ॥ तदा भस्त्रां परित्यज्य कुर्यात्कुंभं तु केवलम् । यथा स्यात्प्राणसंचारो विशेषात्पश्चिमे पथि ॥ अर्थ-तिसकालमें भस्त्राका परित्याग करके केवल कुंभकही करना चहिये जिससे विशेषकरके प्राणोंका पश्चिममार्गमें प्रचार होवे इति ॥ १११ ॥ वर्द्धमाने ततोऽभ्यासे प्राणस्त्यक्त्वा गमागमौ। ब्रह्मरंध्रे लयं याति मनश्चानु विलीयते॥११२॥ अर्थ-उक्तरीतिसे अभ्यासके बढनेसे और अत्यंत अल्पाहार करनेसे नासिकाद्वारसे आनाजाना छोडकर प्राण ब्रह्मरंध्रमें जायकर स्थिर होजाते हैं तथा प्राणोंके साथ मनभी लीन होजावे है इति ॥ ११२ ॥ प्राणे मूर्धनि संप्राप्ते नादध्वनिरनुत्तमः । श्रूयते योगिनो वक्रे संस्रवेदमृतं तथा ॥ ११३ अर्थ-जिसकालमें प्राणवायु मस्तकमें पहुंचता है तो तिसकालमें योगीको सुंदर अनाहतनादकी ध्वनि (३४) सुन पडती है और मुखमें तालुसे अमृत टपकता है इति ॥ ११३॥ आनंदानुभवस्तत्र जायते योगिनो महान् । स एव तं विजानाति मया वक्तुं न शक्यते ११४ अर्थ तथा तिसकालमें योगीको परम आनंदका अनुभव होवेहै तिस आनंदको सो योगी आपही जानताहै मैं तिस आनंदका कथन नहि करसकता हूं इति ॥ ११४॥ नैव तं विषयासक्ता विदुनों शास्त्रचिंतकाः। योगजं परमानंदं योगिनोऽनुभवंति यम् ११५ अर्थ-तिस आनंदको विषयासक्त पुरुष जान नहि सकते हैं तथा केवल शास्त्रोंके पठनपाठन करनेवाले पंडित लोकभी नहि जान सकते हैं जिस आनंदका समाधिकालमें योगीलोक अनुभव करते हैं इति ११५ मुहर्ताध मुहूर्त वा स्थित्वा मूर्धनि योगवित् । ततोऽवतारयेत्प्राणं सुषुम्नापूर्वमार्गतः॥११६॥ अर्थ-उत्तरीतिसे प्राणोंको ब्रह्मरंध्रमें चढायकरके तहां एक घटिका अथवा दो घटिका ठहरायकरके फिर योगविद्याके जाननेवाला योगी सुषुम्नाके पूर्व- मार्गसे प्राणोंको धीरेधीरे नीचे उतारलेवे इति॥११६।।

(३५) स्थापयेच यथास्थानं वदेहे तं विचक्षणः। शनैरेव समुत्थाय विश्रांतोऽथ सुखं चरेत् ११७ अर्थ-और फिर चतुरपुरुष अपने शरीरमें क्रमसे सर्व अंगोंमें मनसे प्राणोंको स्थापन करे पीछे धीरेसे आसनसे उठकर थोडी देर आरामकरके पश्चात् मरजीमुजब चले फिरे इति ॥ ११७ ॥ कुंभकाभ्यासतो नित्यं ध्यानयोगाच मूर्धनि । स्थिति संवर्धयेद्योगी समाधिः स्याद्यथा चिरम् अर्थ-केवल कुंभकके विशेष अभ्याससे और ब्रह्म रंध्रमें ध्यानके बलसे योगी पुरुष मस्तकमें प्राणोंकी स्थितिको बढावे जिससे चिरकालपर्यंत समाधि होसके इति ॥ ११८॥ प्राणस्य त्वखिलं कर्म मनोयुक्तं समभ्यसेत्। मनसोविकलीभावे प्राणो न स्थिरतां व्रजेत्११९ अर्थ-पूर्वोक्त प्राणके चडाने उतारनेकी सर्व क्रिया मनकी एकाग्रताके साथ करनी चहिये क्योंकि मनके चंचल होनेसे प्राणकी स्थिरता नहि होसके है इति ॥ ११९ ॥ अथ प्रत्याहारः। प्रत्याहारमथो वक्ष्ये यथोक्तं मुनिपुंगवैः। साधनाद्यस्य योगीन्द्रो निर्विघ्नं सिद्धिमृच्छति॥

(३६)
अर्थ-अब योगका पांचवा अंग जो प्रत्याहार है
तिसको पूर्वके मुनिलोकोंके कथनके अनुसार वर्णन
करते हैं जिस प्रत्याहारके साधन करनेसे योगीपुरुष
निर्विघ्न योगसिद्धिको प्राप्त होवे है इति ॥ १२० ॥
इन्द्रियाणि चरंतीह विषयेषु स्वभावतः।
यत्नादाहरणं तेषां प्रत्याहारो निगद्यते ॥१२१॥
अर्थ--श्रोत्रादिक इन्द्रियां शब्दादिक विषयों में
स्वभावसेही विचरती हैं तिनको यत्नसे जो विषयोंकी
तरफसे निवृत्त करना है सो प्रत्याहार कहिये है
इति ॥ १२१ ॥
इन्द्रियाण्यवशीकृत्य यस्तु योगं समभ्यसेत् ।
भिन्नभांडांबुवत्तस्य योगःक्षरति संततम्१२२
अर्थ-इन्द्रियोंको नहि जीतकरके जो पुरुष
योगका अभ्यास करताहै तिसका फूटेहुये घडेसे जलकी
न्यांई योग निरंतर क्षरता जावे है इति ॥ १२२ ॥
विषयेषु समासक्तो न योगं कर्तुमर्हति ।
तस्माद्विषयसंत्यागो योगिनां परमो हितः १२३
अर्थ-विषयों में फसाहुया पुरुष योगाभ्यासको
ठीक नहि करसकता है यातें योगी लोकोंको विष-
योंका परित्याग करना परम हितकारक है ॥ १२३ ॥

(३९)
तस्मात्सर्वमनात्य योगोपकरणं विना।
निःसंगो निर्जनस्थाने योगमेव सदाऽभ्यसेत् ॥
अर्थ-यातें योगीको चहिये कि योगाभ्यासकी
उपयोगी वस्तुवोंके सिवाय और सर्व पदार्थोंका परि-
त्याग करके सर्वसे असंग होकर एकांतस्थानमें सर्वदा-
काल केवल योगकाही अभ्यास करे इति ॥ १३१ ॥
शब्दादिविषया लोके सुलभाः सर्वयोनिषु ।
दुर्लभं मानुषं देहं मत्वाऽऽसक्तिं न कारयेत्१३२
अर्थ-क्योंकी शब्दस्पर्शादिक जो विषय हैं सो
तो पशु, पक्षिआदिक सर्व योनियोंमें सुलभ हैं परंतु
यह मनुष्यका शरीर मिलना जीवको बडा दुर्लभ है
यातें ऐसा समझकरके विषयोंमें आसकि नहि करनी
चहिये इति ॥ १३२॥
घृतासेकायथा वहाला भूयोभिवर्धते ।
विषयासेवनाजंतोस्तथा तृष्णाभिवर्धते ॥१३३
अर्थ-जैसे घृतकी आहुती डालनेसे अग्निकी
ज्वाला पुनः पुनः बढती जावे है तैसेही विषयोंके
सेवन करनेसे जीवकी नित्यंप्रति तृष्णा अधिक
अधिक बढती है इति ॥ १३३ ॥

(४०) जितं तेन जगत्सर्व येनेन्द्रियगणो जितः। इन्द्रियाणां वशे यस्मादेतद्विश्वमशेषतः॥१३४ अर्थ-अब प्रत्याहारका फल कहते हैं कि जिस पुरुषने अपनी इन्द्रियां जीती हैं तिसने मानो सारा जगतही जीत लिया है क्यों कि संपूर्ण जगत् इन इन्द्रियोंकेही वशीभूत होय रहा है इति ॥ १३४ ॥ जितेन्द्रियस्य चेतस्तु खतः शांतं प्रजायते । तेन सिद्धिर्हि योगस्य शीघ्रं भवति निश्चितम् ।। अर्थ-तथा जितेन्द्रियपुरुषका चित्तमी स्वतः हि शांत होय जावे है और चित्तके शांत होनेसे शीघ्रही योगकी सिद्धि होवे है इति ॥ १३५ ॥ तस्मादिन्द्रियवर्गस्य प्रत्याहारं प्रयत्नतः । कृत्वा धीरमना योगी भवेदभ्यासतत्परः १३६ अर्थ-यातें धैर्ययुक्तमनवाले योगीको प्रयत्नसे सर्व इन्द्रियोंको विषयोंसे निवृत्त करके निरंतरही योगा- भ्यासमें तत्पर होना योग्य है इति ॥ १३६ ॥ अथ धारणा धारणायाः स्वरूपं तु सम्यगत्र निरूप्यते । यस्यास्त्वभ्यासतो योगी सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् अर्थ-अब योगका छटा अंग जो धारणा है ति-

(४१)
:
सका भलीप्रकारसे स्वरूप निरूपण करते हैं जिस
धारणाके अभ्याससे योगी अणिमादिक सर्वसिद्धि-
योंका अधिपति होवे है इति ॥ १३७ ॥
सर्वतो विनियम्यैकदेशे चित्तस्य बंधनम् ।
पुनः पुनःप्रयत्नेन धारणा सा निगद्यते ॥१३८
अर्थ संसारके सर्व बाह्यपदार्थोंसे रोककरके चि-
त्तको किसी एकस्थानमें वारंवार प्रयत्नसे जो निरोध
करना है सो धारणा कहिये इति ॥ १३८ ॥
देशा बहुविधाः प्रोक्ता धारणाया मुनीश्वरैः।
खशरीरे तथा बाह्यपदार्थेषु यथारुचि ॥१३९॥
अर्थ-तिस धारणा करनेके स्थान पूर्वके मुनि-
लोकोंने बहुत प्रकारके कथन किये हैं सो अपने
शरीरमें तथा बाहिरके पदार्थों में जहां चित्तकी रुचि
होवे तहांही धारणा करे इति ॥ १३९ ॥
भ्रुवोर्मध्ये च नासाग्रे नाभौ वा हृदयांबुजे ।
शरीरे धारणां कुर्यादेकांते सुसमाहितः॥१४०
अर्थ-दोनों ध्रुवोंका मध्यभाग नासिकाका अग्र-
भाग नाभिचक्र और हृदयकमल इन स्थानोंमेंसे
किसी एक स्थानमें एकांत बैठकर स्थिरचित्तसे अपने
शरीरमें धारणा करनी चहिये इति ॥ १४०॥

(४२) चंद्रे ध्रुवादितारासु गिरिशृंगेऽथवा तरौ । देवताप्रतिमायां वा बहिश्चित्तं विधारयेत्॥१४१ अर्थ-चंद्रमंडलमें ध्रुवादिक किसी ताराओंमें अथ- वा पर्वतके शिखरपर वा वृक्षकी शाखापर वा देवताकी प्रतिमामें इन स्थानों में किसी एक स्थानमें दृष्टि जमा. कर शरीरके बाहिर चित्तको धारणा करे इति॥१४१॥ धारणां कुर्वतश्चित्तं चलं गच्छेद्यतो यतः। ततस्ततो नियम्याशुधारणादेशमानयेत्१४२॥ अर्थ-धारणा करने कालमें स्वभावसे चंचल जो चित्त है सो जहां जहां पदार्थोंमें जावे तहांतहांसे निरोध करके तिसको धारणाके स्थानमें लाना चहिये इति ॥ १४२॥ यततो योगिनश्चैवं यदा स्याद्धारणा हढा । कर्मबंधाद्विनिर्मुक्तो भवेत्सिद्धस्तदा ध्रुवम्१४३ अर्थ-इसप्रकार यत्न करतेहूये योगीकी जिसका- लमें धारणा दृढ हो जावे है तो तिसकालमें सो सर्व- कर्मोके बंधनोंसे रहित भया निश्चयकरके सिद्धभा- वको प्राप्त होते है इति ॥ १४३ ॥ नासाग्रे हृदयाम्भोज भ्रूमध्ये च विशेषतः। कुर्वाणोधारणांयोगी ज्योतिःपश्यति चिन्मयम् (४३) अर्थ-नासाके अग्रभागमें और हृदयकमलमें तथा विशेषकरके भ्रूमध्यमें धारणा करनेसे योगीको चि- न्मय ब्रह्म ज्योतिका दर्शन होवे है इति ॥ १४४ ॥ नाभिचक्रे यदा कुर्याद्धारणां योगविद्यदि । शरीराभ्यन्तरेसर्व संस्थानं तु विलोकयेत् १४५ अर्थ तथा जिसकालमें योगीपुरुष नाभिचक्रमें धारणा करता है तो तिसकालमें अपने शरीरके अंद- रकी सर्व रचनाको प्रत्यक्ष देख लेवे है इति ॥१४५॥ यदा तु धारयेद्योगी चित्तमादित्यमंडले । तस्य सर्व भवेन्नूनं त्रैलोक्यं दृष्टिगोचरम् १४६ अर्थ-तथा जब सूर्यमंडलमें योगी चित्तकी धा- रणा करता है तो तिसको तीनों लोकोंके सर्व पदार्थ देखनेमें आते हैं इति ॥ १४६ ॥ धारणां कुर्वतश्चंद्रमंडले योगिनोऽखिलम्। नक्षत्राणामवस्थानं क्षिप्रं प्रत्यक्षतामियात् १४७ अर्थ-और जब चंद्रमंडलमें योगी धारणा करे है तो तिसको सर्व नक्षत्रोंकी भिन्नभिन्न स्थितिका शीघ्रही प्रत्यक्ष ज्ञान होवे है इति ॥ १४७ ॥ तारकाणां गतिं सर्वां ध्रुवे कुवस्तु धारणाम् । सम्यग्योगी विजानीयादचिरं स्थिरमानस:४८ (४४) अर्थ-तथा जव ध्रुवतारामें योगी धारणा करता है तो सर्वतारागणोंकी भिन्नभिन्न गतिको शीघ्रही भली- प्रकारसे जान लेवे है इति ॥१४८ ॥ वृक्षाग्रे पर्वताग्रे वा धारणां कुर्वतः सदा । भवेदाकाशगामित्वं सूक्ष्मदेहेन योगिनः॥१४९ अर्थ-तथा जब वृक्षकी शाखामें या पर्वतके शि- खिरमें योगी धारणा करता है तो स्थूलशरीरसे बा- हिर निकल कर सूक्ष्म शरीरकरके आकाशमें गमन कर जावेहै इति ॥ १४९ ॥ पृथिव्यां धारणां कृत्वा योगी तन्मयतां गतः। निधिं पश्यति दूरस्थं पातालं खेच्छया व्रजेत् ५० अर्थ-तथा जब पृथिवीमें अचल धारणा करके योगी तन्मयभावको प्राप्त होजावे है तो जमीनमें दूर गडेहूये धनको देखता है तथा अपनी इच्छासे पाता- लमें भी चला जावे है अर्थात् उसको पृथिवी मार्ग दे देती है इति ॥ १५०॥ जले जलमयीं कुर्याद्धारणां योगविद्यादि । जलस्तंभो भवेत्तस्य मीनवत्सलिले चरेत् १५१ अर्थ-तथा जब जलमें जलमयरूपसे योगी धा- रणा करताहै तो उसको जलके स्तंभन करनेकी शक्ति (४५) होजावे है सो जैसे मीन कच्छपादिक जलके जंतु जलमें रहते हैं तैसेही सो योगीभी जलमें विचरने लगता है इति ॥ १५१॥ वहिधारणया योगी नाग्निना दयते कचित् । खदेहमथवा दग्ध्वा सूक्ष्मदेहेन वै चरेत्॥१५२॥ अर्थ-तथा जब योगी अग्निकी तन्मय धारणा करता है तो उसके शरीरको कबी अग्नि जलाय नहि सकता है अथवा उसकी इच्छा होवे तो अपने स्थूल शरीरको भसकरके सूक्ष्म शरीरसे विचरता है इति ॥ १५२॥ वायुधारणया योगी वायुवयोमगो भवेत् । सूक्ष्मरंधेषु सर्वत्र प्रविशेदविरोधतः ॥१५३॥ अर्थ-और जब योगी वायुकी तन्मय धारणा करता है तो वायुके समान आकाशमें चला जावे है तथा सर्वजगा सूक्ष्म छिद्रोंमें रोकटोकके विनाही प्रवेश करजावे है इति ॥ १५३॥ व्योमधारणया तद्योमवह्यापको भवेत् । सर्वमात्मन्यवेक्षेत जगदेतचराचरम् ॥ १५४ ॥ अर्थ-तथा तैसेही आकाशकी तन्मयरूपसे धारणा करनेसे योगी आकाशकीन्याई सर्वजगा व्यापक होजा- (४६) है तथा सर्व चराचर जगत्को अपने आपमें देखता है इति ॥ १५४ ॥ विषया धारणायास्तु सत्यन्येपि सहस्रशः। स्वयंबुद्ध्या विजानीयाद्यथाकार्य यथाक्रमम् ५५ अर्थ-इसीप्रकारसे औरभी धारणा करनेके हजारों स्थान हैं परंतु जहां जैसा कार्य होवे और जिसक- मसे धारणा करनी होवे सो योगी पुरुषको तिस का- लमें स्वयं अपनी बुद्धिसे विचारके धारणा करलेनी चहिये इति ॥ १५५ ॥ योगिनां क्षीणपापानां नित्यमेकांतवासिनाम् युक्ताहारविहाराणां सिद्धा भवति धारणा१५६ अर्थ-जिन योगीपुरुषोंके सर्व पाप क्षीण होजा- ते हैं और जो सर्वदाकाल एकांतस्थानमें निवास कर- ते हैं तथा जिनका खानपानादिक व्यवहार योगा- भ्यासके सर्वथा अनुकूल युक्तिपूर्वक होता है तिनको ही उक्त धारणाकी सिद्धि होवे है इति ॥ १५६ ॥ अथ ध्यानम् अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि मुक्तिसाधनमुत्तमम् । यत्कृत्वा न पुनर्जतुर्जातु मातुःस्तनं पिबेत्१५७ अर्थ-अब योगका सप्तम अंग जो ध्यान है ति.

(४७) सका निरूपण करतेहैं सो ध्यानही जीवकी मुक्तिका परम श्रेष्ठ साधन है जिस ध्यानके करनेसे यह जीव फिर कबी माताके स्तनको पान नहिं करता अर्थात् जन्ममरणसे छूट जाताहै इति ॥ १५७ ॥ सगुणं निर्गुणं चैव द्विधा ध्यानं प्रकीर्तितम् । सगुणं व्यक्तियुक्तं स्यादव्यक्तं निर्गुणं भवत् । अर्थ-सो ध्यान सगुण और निर्गुणभेदसे दोप्रका- रका योगीलोकोंने कथन किया है तिनमें व्यक्तियु- क्तध्यानको सगुण कहते हैं और अव्यक्तध्यानको नि- गुण कहते हैं इति ॥ १५८ ।। खकीयहृदयांभोजे दलैादशभिर्युते । चिंतयेत्सुस्थिरो भूत्वा संपूर्ण चंद्रमंडलम्।१५९ अर्थ-अब प्रथम सगुणध्यान निरूपण करते हैं प्रथम अपने हृदयमें द्वादशदल कमलका ध्यान करके तिसके बीचमें स्थिर चित्त होकर संपूर्ण चंद्रमंडलका चिंतन करे इति ॥ १५९ ॥ तन्मध्ये संस्मरेद्योगी वर्णसिंहासनं महत् । रस्त्रैर्नानाविधैर्युक्तं कोमलास्तरणान्वितम् ॥१६० अर्थ-फिर तिस चंद्रमंडलके बीचमें नानाप्रका- (४८) रके रत्नोंसें जडित और कोमल बिछोनेयुक्त सुवर्णके सिंहासनका चिंतन करे इति ॥ १६०॥ तस्योपरि समासीनं सूर्यकोटिसमप्रभम् । नारायणं चतुर्याहुं शंखचक्रगदाधरम् ॥१६१॥ शरदाकाशसंकाशं पीतवाससमच्युतम् । धनमालालसत्कंठं मकराकारकुंडलम् ॥१६२॥ मणिमेखलया युक्तं किरीटोज्वलमस्तकम् । प्रसन्नवदनं देवं सर्वकामवरप्रदम् ॥ १६३ ।। सार्वयादिगुणोपेतं विष्णुमव्ययमीश्वरम् । ध्यायेदनन्यधीरेवमापादतलमस्तकम् ॥१६४॥ अर्थ-तिस सिंहासनके ऊपर श्रीविष्णु भगवान् विराजमान हैं कोटिसूर्यके समान जिनके शरीरकी प्रभा है चार भुजोंमें शंख चक्र गदा पद्म धारण कियेहूये हैं शरदऋतुके आकाशके समान जिनके शरीरका स्वच्छ नीलरंग है पीतांबर पहरे हूये वनमाला और कौस्तुभ- मणि कंठमें शोभायमान है मकरके आकारवाले कुंडल कानोंमें धारण कियेहैं कमरमें मणियोंकी तडागी और मस्तकपर रत्नजडित मुकुट प्रकाशवान् है मंदमंद हसता हूया प्रसन्न मुख है और सर्व मनोवांछित कामना तथा वरोंके देनेहारे हैं सर्व जगत्के ईश्वर अविनाशी (४९) खरूप और सर्वज्ञत्व सर्वशक्तिमत्त्वादि गुणोंकरके युक्त हैं इस प्रकारके एकाग्र चित्त होकर चरणोंसे ले- कर मस्तकपर्यंत विष्णुपरमात्माका अभेदभावनासे ध्यान करे इति ॥ ६१॥ ६२॥६३ ॥६४ ॥ अथवा चिंतयेद्योगी शिवं तत्र समाहितः। कोटिचंद्रप्रतीकाशं कर्पूरोज्वलकांतिकम् १६५ भस्मभूषितसर्वांगं नागालंकृतविग्रहम् । व्याघ्रचर्मपरीतांगं जटामंडितमस्तकम् ॥१६६॥ चतुर्भुजं प्रसन्नास्यं चंद्रभालं त्रिलोचनम् । मृगशूलवराभीतिकरं सर्वज्ञमीश्वरम् ॥ १६७ ॥ गंगावारिलसत्केशं कुंडलोज्वलकर्णकम् । ध्यायेद्देवं स्थिरोभूत्वा सर्वांगं सर्वकामदम्१६८ अर्थ-अथवा जो योगीको शिवजीकी भक्ति इष्ट होवे तो हृदयकमलमें पूर्वोक्त सिंहासनके ऊपर स्थिर चित्त होकर शिवजीका ध्यान करे जैसे कि तिस सिं- हासनके ऊपर श्रीशंकर विराजमान हैं कोटिचंद्रमाके समान जिनका तेज है कर्पूरके समान निर्मल श्वेत जिनके शरीरका वर्ण है सर्वअंगोंमें भस धारण करी है कमर भुजा तथा गलेमे नागोंकें भूषणोंसे शरीर शो- भायमान होय रहा है व्याघ्रचर्मका वस्त्र पहरे हूये हैं

(५०)
शिरपर जटाजूट शोभा देरहा है चार भुजा प्रसनव-
दन मस्तकमें चंद्रमा और तीन नेत्र हैं चारि हाथोंमें
मृग त्रिशूल वरदान और अभयदान धारण किये हैं
तथा शिरकी जटामें गंगाजलकी धारा चल रही है
कानोंमें कुंडल शोभायमान होय रहे हैं सर्वज्ञ सर्वज-
गत्के ईश्वर और सर्वकामनायोंके देनेहारे हैं इसप्र-
कारसे स्थिर चित्त होयकर चरणसे लेकर मस्तक-
पर्यंत सर्वांग संपूर्ण शिवजीका ध्यान करना चहिये
इति ॥६५॥६६॥ ६७ ॥ ६८॥
सगुणं ध्यानमित्येतद्विष्णोश्चैव शिवस्य वा।
कृत्वायोगीभवेद्विष्णोःशिवस्यापि समःस्वयम्
अर्थ-यह जो विष्णुभगवान् और शिवजीका
सगुण ध्यान कथन कियाहै इसके करनेसे योगी आप
मी विष्णु अथवा शिवके समान हो जाते है इति॥१६९
पुष्पसंयोगतस्तैले यथा गंधः प्रवर्तते ।
योगिदेहे तथा ध्यानाजायते गुणसंक्रमः॥१७०
अर्थ-फूलोंके संयोगसे जैसे तेलमें सुगंध प्रवेश
कर जावे है तैसेही विष्णु अथवा शिवका ध्यान
करनेसे उनके सर्वज्ञादि गुणोंका योगीके शरीरमेंमी
प्रवेश होवे है इति ॥ १७० ॥

(५१)
सर्वज्ञः सत्यसंकल्पः सर्वशक्तिसमन्वितः।
जीवन्मुक्तश्चरेद्योगी सायुज्यं चांततो व्रजेत् ७१
अर्थ-सो ध्यानकी परिपकतासे सर्वज्ञ सत्यसंकल्प
सर्वशक्तिमान् और जीवन्मुक्त भया योगी विचरता है
तथा शरीरके अंतकालके अनंतर विष्णुलोक अथवा
शिवलोकमें सायुज्य मुक्तिको प्राप्त होते है इति॥१७१॥
अथ निर्गुणध्यानम्
पद्मासने स्थितो योगी स्थिरकायः समाहितः ।
निमील्यनयने पश्येभ्रुवोर्मध्यं सदाधिया१७२
अर्थ-पद्मासनमें बैठकर शरीरको स्थिर रखकरके
और चित्तको एकाग्रकरके दोनों नेत्रोंको बंद करके
अंदरसे मनकी वृत्तिरूप दृष्टिसे दोनों भ्रुवोंके मध्यभा-
गमें निरंतर देखना चहिये इति ।। १७२ ॥
दृश्यते प्रथमाभ्यासे नभः कृष्णं तु केवलम् ।
ततस्तारानिभं तेजो दृश्यते तु कदाकदा ।१७३।
अर्थ-प्रथम अभ्यासकालमें केवल काले रंगका
आकाश देखनेमें आता है और पीछे कुछदिनोंके बाद
ताराके समान कबीकबी तेज नजरमें आता
इति ॥ १७३॥
नानावर्णयुतं पश्चादस्थिरं दृष्टिगं भवेत् ।
ततोऽर्धचंद्रसंकाशं शून्यचक्रसमं ततः॥१७४॥

(५२) अर्थ-तिसके पीछे नानाप्रकारके रंगोंसे युक्त चं- चल तेज दृष्टिमें आवे है अर्थात् तिस कालमें जो तत्व शरीरमें चलता होवे उसी तत्त्वका रंग तेजमें दीखता है और तिसके बाद अर्धचंद्राकार ज्योति नजरमें आवे तिसके अनंतर चारों तरफ तेज और बीचसे खाली चक्रके समान देखनेमें आवे है इति ॥ १७४ ॥ पूर्णचक्रसमं पश्चात् सूर्यमंडलसंनिभम् । श्यते परमं ज्योतिर्ब्रह्मभूतं निरामयम् १७५॥ अर्थ-तिसके पीछे कुछ दिन अभ्यास बढनेसे पूर्णचक्रके आकार तेज नजर आवे है और तिसके पीछे साक्षात् सूर्यमंडलके समान ब्रह्मरूप परमानंद- मय ज्योति देखने में आवे है इति ॥ १७५ ॥ परमानंदसंदोहमज्ञानध्वांतनाशनम् । योगिनो मनसस्तुष्टिकरं क्लेशहरं परम् ॥१७६।। अर्थ-सो ब्रह्ममय ज्योति परमानंदके देनेवाला अज्ञानरूप अंधेरेको नाश करनेवाला और सर्वक्ले- शोंके दूर करनेवाला योगीके मनको परम संतोष करता है इति ॥ १७६ ॥ क्षणं दृष्टिगतं भूत्वा पुनस्तत्प्रविलीयते । ततोऽभ्यासे दृढीभूते स्थिरं भवति कालत:१७७ (५३) अर्थ-और सो तेज क्षणमात्र दृष्टिगोचर होकर- के फिर शीघ्रही लीन हो जावेहै और फिर अभ्यासके दृढ होजानेसे सो तेज दृष्टिके आगे स्थिर होजाता है इति ॥ १७७॥ दिनानुदिनमित्येवं निर्विनाभ्यासतो दृढम् । क्रमाद्विस्तारमायाति तज्योतिः परमं महत् ॥ अर्थ-उक्तप्रकारके दिनदिन निर्विघ्न अभ्यासके बढनेसे सो परम महान ज्योति क्रमसे विस्तारको प्राप्त होता जाता है इति ॥ १७८ ॥ आदौ गृहगतं सर्व वस्तु ध्याने निरीक्ष्यते। ततोबाह्यं ततो दूरं ततो दूरतरं पुनः ॥१७९॥ अर्थ-जब दीर्घकालसे ध्यानसे सो तेज विस्ता- रको प्राप्त होने लगता है तो पहले अपने घरके अंद- रकी पडीहुई वस्तु सब देखनेमें आतीहैं और फिर बाहिरकी वस्तु नजर आती हैं और पीछे दूरकी वस्तु देखने में आतीहैं तथा तिसके पीछे बहुत योजन दूरके पदार्थ देखनेमें आते हैं इति ॥ १७९ ॥ नानावनानि रम्याणि निर्मलानि सरांसि च । समीपस्थानि दृश्यते गिरीणां शिखराणि च ॥ अर्थ-तथा नानाप्रकारके दूरके रमणीय वन और (५४) निर्मल सरोवर तथा हिमालयादि पर्वतोंके शिखर अपने समीपस्थितकी न्याई देखनेमें आते हैं इति १८० सिद्धा महर्षयश्चैव दृश्यंतेंऽबरचारिणः । तारकामंडलं सर्व देवतायतनानि च ॥ १८१ ॥ अर्थ तथा आकाशमें विचरनेवाले सिद्धलोक और महर्षिलोक तथा सर्व ताराओंका मंडल और देवतायोंके स्थान समीप देखनेमें आतेहैं इति॥१८१॥ एवं क्रमेण कालेन योगिनोऽभ्यासयोगतः। दिव्या दृष्टिर्भवत्येव त्रैलोक्यालोकने क्षमा १८२ अर्थ-इसप्रकारसे शनैः शनैः क्रमसे दीर्घकालके अभ्यासयोगसे योगीको तीनों लोकोंके देखनेवाली दिव्यदृष्टि होजाती है इति ॥ १८२ ।। खयं ज्योतिर्मयो भूत्वा योगी तद्गतमानसः। ब्रह्मण्येव लयं याति परे ज्योतिःवरूपिणि १८३ अर्थ तथा सो योगी तिस ज्योतिके ध्यानकी त- त्परायणतासे आपभी ज्योतिःस्वरूप हुया परम ज्यो- तिःवरूप ब्रह्ममें लयको प्राप्त होते है इति ॥ १८३ ॥ भथ समाधिः समाधिमधुना वक्ष्ये भवपाशनिकृतनम् । समाधानं हि चित्तस्यसमाधि मुनयोविदुः१८४ (५५) अर्थ-अब योगका आठवां अंग जो समाधि है तिसको कथन करते हैं चित्तका जो समाधान अर्थात् स्थिर शांत अवस्था है तिसको मुनिलोक समाधि कहते हैं इति ॥ १८४॥ समाधिर्हठयोगेन राजयोगेन वा भवेत् । द्विविधोपि विधिस्तस्य सम्यगत्र निरूप्यते१८५ अर्थ-सो समाधि हठयोगद्वारा तथा राजयोगद्वारा दोप्रकारसे होवे है सो उसकी दोनों प्रकारकी विधिको यहां भली प्रकारसे निरूपण करते हैं इति ॥ १८५ ॥ गुदमेदांतरे वामपादपाणि नियोजयेत् । सीवनीमध्यभागेतु संस्थितः कोमलासने १८६ अर्थ-तिन दोनोंमें प्रथम हठयोग समाधिकी विधि कथन करते हैं गुदा और लिंगके बीचमें सीवनीके मध्यभागमें अर्थात् दोअंगुल गुदाकी तरफ और दो- अंगुल लिंगकी तरफ छोडकरके बराबर मध्यभागमें बायें पैरकी एडीको भलीप्रकारसे जमायकर पूर्वोक्त- सिद्धासनकी विधिसे रुईकी गद्दी आदिक कोमला- सनपर बैठे इति ॥ १८६ ॥ सीवनीपाणिसंबंधं दृढं कुर्यात्तथाऽचलम् । तस्सिँस्तु शिथिलेऽपानः सम्यगूर्व नगच्छति॥ ४ यो. र.

(५६) अर्थ-सीवनी और एडीके संबंधको दृढ और अचल करके बैठना चहिये क्योंकि एडीके शिथिल होनेसे अथवा चलायमान होनेसे अपानकी गति ऊप- रकी तरफ ठीकठीक नहि होती है इति ॥ १८७ ।। सरलं मेरुदंडं च जिह्वाग्रं दंतमध्यगम् । कृत्वा ध्यानं ततःकुर्यात् भ्रूमध्ये स्थिरमानसः। अर्थ-और पृष्ठके मेरुदंडको सीधा रखकर तथा जिव्हाके अग्रभागको अगले दांतोंमें थोडासा दबाकर दोनों भ्रुवोंके मध्यमें स्थिर चित्तसे ध्यान करे इति ॥ १८८॥ अनेनापानवायुस्तु व्रजेदृर्ध्व न संशयः। निबद्धोमूलबंधेन नीचैर्गतिनिरोधतः॥१८९॥ अर्थ-इसप्रकार मूलबंधसे रुकाहुया नीचेकी गतिके निरोध होनेसे अपान वायु धीरेधीरे उलटकर ऊपरकी तरफको चढने लगता है इति ॥१८९ ॥ मूलाधारात्समुत्थाय खाधिष्ठानालयं व्रजेत् । शनैरभ्यासयोगेन तस्मादुपरि गच्छति॥१९०।। अर्थ-सो अपानवायु प्रथम मूलाधारचक्रसे ऊठ- करके स्वाधिष्ठानचक्रमें आता है और तहांसे धीरेधीरे

(५७)
अभ्यासके बलसे स्वाधिष्ठानचक्रको भेदन करके ऊप-
रको चडता है इति ॥ १९ ॥
नाभिचक्रसमीपे तु संभूय परितः शनैः।
कुंडली बोधयित्वाथ क्रमादूर्ध्व प्रधावति १९१॥
अर्थ-और फिर नाभिचक्रके नीचे सर्वतरफसे
एकठा होवे है तथा पीछे कुंडलिनी शक्तिको जगाय
करके शनैः शनैः क्रमसे ऊपरको चडता है इति ॥१९१॥
ततः कतिपयैरेवं दिनैनाभिं विलंध्य वै।
हृदयं कंठदेशं च समायाति समीरणः॥१९२॥
अर्थ-तिसके अनंतर कितनेक दिनोंमें अभ्यास
करनेसे सो अपानवायु नाभिचक्रको उल्लंघन करके
ऊपर हृदयचक्रमें आवे है और तिसके पीछे कुछदि-
नोंमें कंठचक्रमें आवे है इति ॥ १९२ ॥
ततो बुद्ध्या नयेदूवं भ्रूमध्यं योगवित्तमः ।
ब्रह्मरंधं ततो नीत्वा तत्रैव स्थिरतांनयेत् १९३
अर्थ-इसप्रकार मूलबंधके अभ्याससे जब सो
अपानवायु प्राणको साध लेता हूया कंठमें आय जावे
तो फिर वहांसे योगविद्याके जाननेवाला योगी ध्यानसे
तिसको भ्रूमध्यमें लेजावे तथा फिर भ्रूमध्यसे ध्यानसे
ऊपर ब्रह्मरंध्रमें लेजायकर तहां ब्रह्मरंध्रमें धारणकरके
प्राणको स्थिर करदेवे इति ॥ १९३॥

(५८) स्थित्वा तत्र यथाशक्ति भ्रूमध्यं पुनरानयेत् । प्राणं प्रवेशयेद्देहे क्रमादवतरन सुधीः॥१९४॥ अर्थ-और यथाशक्ति ब्रह्मरंध्रमें प्राणोंको स्थिरक- रके फिर भ्रूमध्यमें ध्यानकरके धीरेधीरे प्राणोंको नीचे उतारलेवे और फिर भ्रूमध्यसे कंठमें कंठसे हृदयमें हृदयसे नाभिमें और नाभिसे आधार चक्रमें क्रमसे उतारकरके सर्वशरीरमें जहांका तहां प्राणोंको प्रवेश करके स्थापन करदेवे इति ॥ १९४ ॥ एवं कुर्यात्सदाभ्यासं प्रतिदिनमतंद्रितः। यथा मूर्धनि प्राणस्य सर्वस्यारोहणं भवेत्॥१९५ अर्थ-इसप्रकार उक्तरीतिसे मूलबंधद्वारा निरा- लस होकर नित्यही प्राणोंके चडानेका अभ्यास करना चहिये कि जिससे सर्वशरीरका प्राण खिंचकर ऊपर मस्तकमें चडजावे इति ॥ १९५ ॥ अन्नाहारं परित्यज्य केवलं दुग्धभुग्भवेत् । शरीरलघुताभावे प्राणाकृष्टिन जायते ॥१९६॥ अर्थ-इस प्राण चडानेके अभ्यास कालमें अन्न- व्यंजनादि भोजनका परित्याग करके योगीपुरुषको केवल दूधकाही पान करना चहिये क्योंकि अन्नका भोजन करनेसे शरीरके हलके नहि होनेसे सर्वशरीरसे

(५९)
प्राणोंका आकर्षण भलीप्रकारसे नहि होय सके है
इति ॥ १९६॥
प्राणस्यारोहणे तत्र चतस्रो गतयः क्रमात् ।
भवंति योगिनो देहे नित्यमभ्यासयोगतः १९७
अर्थ-उक्तरीतिसें नित्य अभ्यास करनेसे प्राणके
ऊपर चडनेकालमें योगीके शरीरमें चारप्रकारकी प्रा-
णकी क्रमसे गति अर्थात् चाल होवे है इति ॥१९७॥
पिपीलिकासमा पूर्वं ततो दर्दुरसंनिभा ।
गतिःसर्पोपमा पश्चाद्धंसस्य तदनंतरम् ॥१९८॥'
अर्थ-प्रथम अभ्यासमें कीडीकी चाल जैसी प्रा-
णोंकी ऊपरको गति होवे है और फिर कुछदिनोंमें
मेडक जैसी गति होवे है अर्थात् जैसे मेडक कूद कूद
कर चलता है तैसेही प्राण एकचक्रसे दूसरेमें और
दूसरेसे तीसरे चक्रमें चडता है तिसके पीछे सर्पकी
चालके समान प्राणकी गति होवे है जैसे सर्प लंबा
होकर चलता है तैसेही प्राण पादांगुष्ठसे लेकर सर्व-
चक्रोंसे एकाकार होकर ऊपरको चडता है और ति-
सके अनंतर हंसकी चालके समान प्राणकी गति होवे
है अर्थात् जैसे हंसपक्षी पैर उठाकर चलता है तैसेही
प्राण शरीरके नीचेके भागसे उठकर शीघ्रही ऊपर
मस्तकमें चढ जाता है ॥ १९८ ॥

(६०) यदा हंसगतिः सम्यक् क्रमात्प्राणस्य जायते। तदा शरीरात्प्राणस्य सम्यगाकर्षणं भवेत् १९९ अर्थ-जिस कालमें अभ्यासकरके क्रमसे प्राणकी हंसके समान गति होवे है तो तिसकालमें शरीरसे प्राणोंका भलीप्रकारसे ठीक आकर्षण होवे है इति १९९ सर्वांगेभ्यः समाकृष्टो यदा प्राणानिलो व्रजेत् । ब्रह्मरंध्रमशेषेण समाधिर्जायते तदा ॥२०॥ अर्थ-जिसकालमें शरीरके सब अंगोंसे खिंचा हूया प्राणवायु संपूर्ण मस्तकमें चडजावे है तो तिस- कालमें समाधि हो जावे है इति ॥ २००॥ देहः शून्यो भवेत्सर्वो जगद्विस्मरणं भवेत् । स्वप्रकाशे परानंदे मनोवृत्तिर्विलीयते॥२०१॥ अर्थ-तिसकालमें सर्वशरीर प्राणोंसे रहित शून्य होजावे है और सर्व बाह्यप्रपंचका विसरण होजावे है तथा योगीकी मनोवृत्ति स्वयंप्रकाशस्वरूप परमानंद- रूप ब्रह्ममें लीन होजावे है इति ॥२०१॥ निमग्नस्तन्मयो भूत्वा तस्मिन्नानंदसागरे । दीर्घकाले गते योगीक्षणमात्रं हि मन्यते॥२०२ अर्थ-तिस आनंदस्वरूप समुद्रमें तन्मय होकर निमग्न भया सो योगी बहुतकाल बीत जानेपरमी एक क्षणमात्र मानता है इति ।। २०२॥

(६१)
शिष्यो विज्ञातसंकेतो योगिनं बोधयेत्ततः।
कर्णनादैः शिरस्तालैरुष्णवारिनिषेचनैः।२०३।
अर्थ-फिर जब समाधि उतारनी होवे तो प्राणोंके
उतारनेकी युक्तिके जाननेवाला जो शिष्य पास होवे
सो कानोंमें ऊंचे शब्द बोलनेसे किंवा शिरमें हाथकी
हथेलीसे थवथवानेसे अथवा शिरमें थोडा गरमजल
डालनेसे योगीको समाधिसे जगावे इति ॥ २०३॥
शिष्यं विनापि शक्नोति योगीप्राणावरोहणम्।
स्वयं कर्तुं न संदेहः कालेनाभ्यासपाटवात् २०४
अर्थ-यह समाधिसे प्राणोंका नीचे उतारना दी-
र्धकालके अभ्यासकी होशियारीसे शिष्यके बिना
योगी अपने आपभी करसकता है इति ॥ २०४॥
अवतार्य ततो योगी प्राणं संकल्पयोगतः।
स्थापयित्वा यथास्थानं स्वस्थदेहः सुखं चरेत् ॥
अर्थ-उक्तरीतिसे शिष्यके द्वारा अथवा अपने
आप ब्रह्मरंध्रसे संकल्पके बलसे नीचे भ्रूमध्यादि च-
कोंमें ध्यानक्रमसे प्राणोंको नीचे उतारकर तिनको
सर्वशरीरमें अपने अपने स्थानमें यथायोग्य स्थित
करे जब सर्वशरीर स्वस्थ होजावे तो फिर मरजीसे
उठे बैठे आराम करे इति ॥ २०५॥

(६२)
अथवोत्कर्षयेत्प्राणं पूर्वोक्तविधिना सुधीः ।
पश्चिमेनैव मार्गेण नित्यं केवलकुंभकात् ॥२०६
अर्थ-अब दूसरे प्रकारसे हठयोगसमाधिकी
विधि कथन करते हैं अथवा पूर्व प्राणायामके प्रकरण-
में जो सुषुम्नाके पश्चिममार्ग खोलनेकी विधि कथन
करी है उस विधिसे केवल कुंभकका नित्यं प्रति
अभ्यास करके पश्चिममार्ग मेरुदंडसे प्राणोंको ऊपर
चडावे इति ॥ २०६॥
आपूर्य कुंभितो वायुः पृष्ठमार्गेण मस्तकम् ।
अल्पमल्पं ब्रजेदादौ पश्चात्पूर्ण प्ररोहति ॥२०७
अर्थ-पश्चिममार्गके अभ्यासमें बाहिरसे पूरक
करके कुंभक किया हया प्राणवायु पहले थोडा थोडा
मस्तकमें चडता है और पीछे कुंभकका अभ्यास ठीक
हो जानेसे संपूर्ण प्राण ऊपर ब्रह्मरंध्रमें चडजाता है
इति ॥ २०७॥
यदा तु कुंभिते प्राणे रेचनं नैव जायते ।
तदा पश्चिममार्गेण समाधिर्जायते ध्रुवम्।।२०८
अर्थ-जिसकालमें प्राणके कुंभक करनेसे फिर
रेचन नहि होवे है अर्थात् प्राण अंदरका अंदर ही
लीन होकर पृष्ठमार्गसे ऊपरको चढजावे है तो तिस-
कालमें पश्चिममार्गसे समाधि होजावे है इति ॥२०८॥

(६३) समाध्यभ्यासतम्माणो योगिनोवशितामियात् स यथा प्रेरयत्येनं तत्रैवायाति सत्वरम् ॥२०९॥ अर्थ-इसप्रकार समाधिके दीर्घकाल अभ्यास करनेसे सर्वशरीरका प्राण योगीके वशमें होजाता है और सो योगी जिसकालमें जहां प्राणको लेजाना चाहता है उसी स्थानमें सर्व शरीरका प्राण खिंचकर शीघ्रही चला आता है इति ॥ २०९॥ संकल्पानुविधायित्वं यदा प्राणस्य जायते। तदा विचित्रसामर्थ्य योगिनो भवति ध्रुवम् ॥ अर्थ-उक्तरीतिसे जिसकालमें सर्व शरीरका प्राण संकल्पका अनुसारी होजावे है तो तिसकालमें निश्चय करके योगीके शरीरमें नानाप्रकारकी विलक्षण सा- मर्थ्य उत्पन्न होवे है इति ॥ २१० ॥ बहिर्देशे यदा योगी धारणां कुरुते चिरम् । त्यक्त्वा देहं व्रजेत्प्राणोबहिरेव न संशयः२११॥ अर्थ-जब अपने शरीरसे बाहिर दीपक तारा मणि वृक्ष शाखादि देशमें योगी चिरकालपर्यंत धार- णा करता है तो उसकालमें शरीरको छोडकरके प्राण बाहिरही निकल जाता है इति ॥ २११ ।।

(६४) कायः शवत्वमायाति योगी वायुसमो भवेत्। देहबंधाद्विनिर्मुक्तःस्वातंत्र्यं परमं व्रजेत्।।२१।। अर्थ-प्राणके बाहिर निकलजानेसे योगीका शरीर मुरदे जैसा होजाता है और सो योगी वायुके समान सूक्ष्म होजावे है तथा देहरूपी बंधनसे मुक्त भया परम स्वतंत्र भावको प्राप्त होते है इति ॥ २१२ ॥ अणुवत्सूक्ष्मरूपोसौ विचरे वनत्रये। इयमेवाणिमा नाम सिद्धिःसिद्धैरुदीरिता२१३ अर्थ और अणुके समान सूक्ष्मरूप होकर सो योगी तीनों भुवनोंमें विचरता है इसी सूक्ष्म शरीरकी गतिको सिद्धलोक अणिमा सिद्धि कहते हैं इति ॥ २१३ ॥ खदेहे परदेहे वा जीविते वा मृतेऽथवा । यत्रांतर्गतुमीहेत प्रविशत्यचिरं ध्रुवम् ॥२१४॥ अर्थ-इसप्रकार शरीरसे बाहिर निकलकर योगी फिर अपने शरीरमें अथवा किसी दूसरे शरीरमें जीते हुये शरीरमें अथवा किसी मृतक शरीरमें जहां अंदर प्रवेश करना चाहे उसीमें शीघ्रही निश्चयकरके प्रवेश कर जावे है इति ॥ २१४ ॥ प्रविश्य धनिनां देहे नृपादीनामवारितः । भुक्त्वा भोगानशेषेण स्वदेहं पुनराविशेत् २१५ (६५) अर्थ-अथवा राजाआदिक धनी लोकोंके शरी- रमें बिनारोकठोकके प्रवेश करके और तिनके सर्व भोगोंको भोग करके फिर अपनी देहमें प्रवेश कर जावे है इति ॥ २१५॥ आकाशे दीर्घमध्वानं गत्वा दृष्ट्वा च तद्गतान् । पदार्थानखिलाँस्तूर्ण खदेहं पुनराविशेत् २१६ अर्थ-अथवा आकाशमें ऊपर बहुत दूर मार्गतक जायकरके और वहां आकाशमें रहनेहारे सर्व पदा- ौँको शीघ्रही देखकरके फिर अपनी देहमें प्रवेश करजावे इति परंतु जातेवकत अपने शरीरका यथा- योग्य बंदोबस्त करके जाना चहिये इति ॥ २१६ ॥ खदेहे वृद्धतां याते क्षीणे वा व्याधिसंयुते । हित्वा देहं विशेदन्यं कायंवा नवयौवनम् २१७ अर्थ-अथवा जो अपना शरीर बहुत वृद्ध हो गया होय वा अति क्षीण होगया होय अथवा कोई असाध्य रोगकरके पीडित होगया होय तो उस अपने शरीरको छोडकरके दूसरे किसीके नवीन यौवनसं- पन मृतकशरीरमें प्रवेश करजावे इति ॥ २१७ ॥ जीवन्मुक्तिरियं प्रोक्ता जीवतां बंधहारिणी। शास्त्रावलोकनेनैव जीवन्मुक्तो न जायते २१८

(६६)
अर्थ-इसप्रकार जीतेजीही जो स्थूलशरीरके
बंधनसे छूट जाना है तिसीको पूर्वके ऋषिलोकोंने
जीवन्मुक्ति कथन करी है क्योंकि वेदांतादि शास्त्रोंके
पठनमात्रसे यह पुरुष जीवन्मुक्त नहि होसकता है
इति ॥ २१८॥
सिद्धयोन्याश्च कालेन जायंते खयमेव हि ।
योगिनो नित्ययुक्तस्य मुक्तस्य देहबंधनात् २१९
अर्थ-उक्तप्रकारसे अणिमासिद्धि प्राप्त होनेके
अनंतर योगाभ्यासमें तत्पर और स्थूल शरीररूपी
बंधनसे मुक्त भया जो योगी है तिसको काल पाय-
करके महिमा लघिमा आदिक दूसरी सिद्धियांभी
स्वतः ही प्राप्त होजाती हैं इति ॥ २१९ ॥
अथ राजयोगसमाधिः
राजयोगसमाधेस्तु भेदा बहुविधा मताः।
तेषु मार्गद्वयं वक्ष्ये सत्वरं योगसिद्धिदम् ॥२२०
अर्थ-इसप्रकार पूर्वोत्तरीतिसे हठयोग विषयक
समाधिका निरूपण करके अब राजयोग समाधिका
वर्णन करते हैं सो राजयोग समाधिके योगी लोकोंने
बहुत प्रकारके भेद कथन किये हैं तिन सर्व भेदों-
मेंसे शीघ्रही योगसिद्धिके देनेहारे मुख्य दो प्रकारके
मार्ग यहां निरूपण करते हैं इति ॥ २२० ॥

(६७) खेचरीमुद्रया वापि नादश्रवणतस्तथा । निर्विकल्पसमाधिःस्यात् कालेनाभ्यासयोगतः अर्थ-खेचरी मुद्राकरके अथवा नाद श्रवण कर- नेसे दीर्घकालके अभ्याससे निर्विकल्प समाधि होवे है इति ॥ २२१॥ खेचरीसाधनं तत्र प्रथमं परिकीयते । मुख्या सासर्वमुद्रासु सेविता योगिपुंगवैः२२२ अर्थ-तिनमें प्रथम खेचरीसाधनका प्रकार कथन करते हैं क्योंकि सर्व मुद्रायोंमें खेचरी मुद्रा मुख्य है और श्रेष्ठ योगी पुरुषोंने आदरसे इस मुद्राका सेवन किया है इति ॥ २२२॥ जिह्वाधो नाडिका सूक्ष्मा जिह्वांतर्गतिरोधिका। छेदयेत्तांक्रमाद्धीर सूक्ष्मशस्त्रेण युक्तितः २२३ अर्थ-जिव्हाके नीचे जो सूक्ष्म नाडी है सो तालु- रंध्रमें जिह्वाके प्रवेश होनेमें प्रतिबंधरूप है इस लिये धैर्यवान् पुरुष प्रथम उस नाडीको सूक्ष्म शस्त्र करके क्रमसे युक्तिपूर्वक छेदन करे इति ॥ २२३ ॥ यावजिह्वा परावृत्य संस्पृशेन्नैव घंटिकाम् । शिरांसंछेदयेत्तावदल्पमल्पं न वैसकृत् २२४ अर्थ-जबतक जिव्हा उलटी लोटकर कंठकी (६८) घंटिकाको स्पर्श न करे तबतक तिस नाडीका छेदन करना चहिये और सो छेदन एकबारही नहि करना किंतु थोडा थोडा करना चहिये इति ॥ २२४ ॥ छेदस्थाने शिवाचूर्ण सैंधवेन समन्वितम् । दद्यादल्पं प्रतिच्छेदं व्रणस्तेन प्रपूर्यते ॥२२५ ॥ अर्थ-छेदन करीहुई नाडीकी जगापर थोडा सेंधा निमकमें हरडका चूर्ण मिलाकर हरएक छेदनके वकत लगाना चहिये इस चूर्णके नित्य दो तीन पार लगानेसे नाडीका चार पांच दिनमें जखम भरजाता है इति ॥ २२५॥ व्रणे पूर्णे पुनश्छेदो रोपणं छेदनं पुनः । एवंक्रमेण षण्मासात शिरायंघोविनश्यति२२६ अर्थ-पहलेका व्रण भरजावे तब दूसरा छेदन करना चहिये इसप्रकार क्रमसे छेदन करनेसे छे महीनेके अंदर जिव्हाकी नाडीका बंधन ठीक कटजाता है इति ॥ २२६ ॥ छेदनानंतरं कुर्याचालनं दोहनं तथा । जिह्वाग्रं करयुग्मेन गृहीत्वा घृतयोगतः॥२२७॥ अर्थ-पांच छे महीनेमें जब नाडीछेदनका काम पूर्ण होजावे तो पीछे दोनों हाथोंसे जिव्हाके अग्र- (६९) भागको अंगुलियोंसे पकड करके थोडा घृत लगाकर चालन और दोहन करना चहिये अर्थात् बाहिर खेंच खेंचकर जिव्हाको लंबी करनी चहिये इति ॥२२७॥ क्रमेण वृद्धिमायातां निष्पीज्यांगलितः शनैः। जिह्वांप्रवेशयेद्योगी कपालकुहरे ततः ॥२२८॥ अर्थ-जब कुछ दिनोंमें क्रमसे जिव्हा लंबी हो जावे तो तिसको योगी अंगुलियोंसें दबाकरके धीरे धीरे उलटा करके गलेके अंदर ऊपरकी तरफ कपा- लके छिद्रमें प्रवेश करे इति ॥ २२८ ॥ तर्जन्या घंटिकां पूर्व गृहीत्वाकर्षयेद्वहिः । ततःप्रवेशयेजिह्वां शीघ्रं विशति नान्यथा २२९ अर्थ-प्रथम तर्जनी अंगुलीसे तालुकी घंटिकाको पकडकर बाहिरकी तरफ खेचना चहिये और फिर जिव्हाको अंदरकी तरफ प्रवेश करना चहिये क्योंकि घंटिकाको पहले खेंचे विना जिव्हा कपालछिद्रमें जलदी प्रवेश नहि करती है इति ॥ २२९ ॥ कपालकुहरे जिह्वा प्रविष्टा विपरीतगा। ध्यानं भ्रमध्यदेशे च मुद्रा भवति खेचरी २३० अर्थ-जिस कालमें उलटकरके जिव्हा कपालके छिद्रमें प्रवेश करजावे और भ्रूमध्यमें ध्यान लगाया

(७०)
जावे तो खेचरी मुद्रा पूर्ण होजाती है अर्थात् खेचरी
लगाकर भ्रूमध्यमें ध्यान करना चहिये इति ॥२३०॥
यथायथा भवेदीर्घा जिह्वा यत्नेन योगिनः।
तथातथा गुणाधिक्यं विज्ञेयं योगसाधने ॥२३१
अर्थ-जैसेजैसे यत्नकरके योगीकी जिव्हा ज्यादा
लंबी होवेहै तैसे तैसेही योगसाधनेमें अधिक गुण
जानना चहिये इति ॥ २३१ ॥
खेचरीमुद्रिकाभ्यास नित्यमेव समाचरेत् ।
संध्ययोरुभयोर्योगी जितप्राणो मिताशनः२३२
अर्थ-उक्तरीतिसे जब खेचरी मुद्रा पूर्ण होजावे
तो प्राणको जय किया हूया और मिताहार करने-
वाला योगी प्रातःकाल तथा सायंकाल दोनों वकत
तीन चार घटिकापर्यंत तिसका नित्यही अभ्यास करे
इति ॥ २३२॥
दिनैः कतिपयैरेवमभ्यासं कुर्वतः सदा ।
योगिनो योगनिद्रा वै समुदेति सुखप्रदा २३३
अर्थ-इस प्रकारसे कितनेक दिन अभ्यास कर-
नेसे योगीको आनंदके देनेहारी योगनिद्रा शुरू होवेहै
अर्थात् निद्राकी न्याई जागृतावस्थामें चित्तका लय
होने लगता है इति ॥ २३३ ॥

(७१) gho तथा सर्व योगनिद्राचिराभ्यासान्निर्विकल्पः प्रजायते । विस्मृत्य सकलं बाह्यं समाधिस्थो भवेन्नरः २४३ अर्थ-और तिस योगनिद्राके दीर्घकालपर्यंत अभ्यास करनेसे योगी निर्विकल्पावस्थाको प्राप्त होवे बाह्यपप्रंचको भूल करके राजयोगसमा- धिमें स्थित होजावे है इति ॥ २३४ ॥ अथवा खेचरीकाले कुर्यात्केवलकुंभकम् । प्राणस्यारोहणं तेन मेरुदंडे प्रजायते ॥ २३५ ॥ अर्थ-अथवा खेचरी मुद्राद्वारा हठयोग समा- धिभी होसकती है सो जब हठसमाधि करनेकी यो- गीकी इच्छा होवे तो खेचरीके अभ्यासकालमें खेचरी लगाकर केवल कुंभक प्राणायामका अभ्यास करे तो तिसकरके पश्चिममार्ग मेरुदंडसे प्राणोंका ऊपरको आरोहण होवे है इति ॥ २३५ ॥ क्रमेणाभ्यासतो नित्यं प्राणो हित्वा गमागमौ। ब्रह्मरंध्रे लयं याति समाधिस्थो भवेन्नरः॥२३६ अर्थ-और फिर नित्यं प्रति क्रमसे केवल कुंभ- कका अभ्यास करनेसे नासिकाद्वारसे आना जाना छोडकर प्राण ब्रह्मरंध्रमें जायकर लीन हो जाते हैं तो योगी हठयोग समाधिमें स्थित होजाता है इति २३६ (७२) खेचरीमुद्रिकाभ्यासादानंदःस्थाहिनेदिने । सर्वसंकल्पसंत्यागाजगद्विस्मरणं भवेत्॥२३७॥ अर्थ-उत्तरीतिसे खेचरी मुद्राके दीर्घकालपर्यंत अभ्यास करनेसे योगीको दिनदिनमें अधिक आनं- दकी प्राप्ति होवे है तथा सर्व प्रकारके संकल्पोंके परि- त्याग होनेसे बाह्य जगत्का विसरण होजावे है इति ॥ २३७॥ निर्विकल्पसमाधाने मनसो विलयो भवेत् । बायविस्मरणादंतर्दृष्टिः समुपजायते ॥२३८॥ अर्थ--अब निर्विकल्प समाधि होवे है तो मनका विलय होजावे है और बाह्यप्रपंचके विसरण होनेसे योगीको अंतरहृदयमें प्रकाशरूप दृष्टि उत्पन्न होवे है इति ॥ २३८॥ अंतष्टिप्रकाशे तु त्रैलोक्यं सचराचरम् । हश्यते खसमीपस्थं करामलकवत्स्वयम् ॥२३९॥ अर्थ-और जब उस अंतरदृष्टिका प्रकाश दीर्घ- कालके अभ्याससे फैल जावे है तो योगीको तीनों लोकोंके चराचरात्मक सर्व पदार्थ करामलककी न्याई अपने समीप स्थित स्वयमेव देखने में आते हैं इति ॥

(७३) बाह्य विस्मृत्य निद्रायां खमं पश्येन्नरो यथा। समाधिसमये तद्वद्योगी विश्वं प्रपश्यति॥२४० अर्थ-जिस प्रकार निद्राकालमें बाह्य प्रपंचको भूलकर मनुष्य स्खमको देखता है तैसेही समाधिका- लमें योगी बाह्यप्रपंचको भूलकर अंतरदृष्टिसे जगत्को देखता है इति ॥ २४ ॥ खमदृष्टपदार्थांघो मृषा भवति निश्चितम् । समाधौ त्वमृषा सर्व वस्तु कार्यकरं तथा २४१ अर्थ-परंतु स्वम और समाधिमें इतना भेद है कि स्वममें देखे हूये पदार्थसमूह प्रायः करके मिथ्या होते हैं और समाधिकालमें देखीहुई सर्ववस्तु सत्य और काम करनेवाली होती हैं इति ॥ २४१॥ खेचरीयोगतो योगी शिरश्चंद्रादुपागतम् । रसंदिव्यं पिवेन्नित्यं सर्वव्याधिविनाशनम् २४२ अर्थ-किंच खेचरी मुद्राके अभ्याससे योगी मस्तकमें रहनेहारे चंद्रमासे झरता हूया जो सर्वरोगोंके दर करनेवाला दिव्य रस है तिसका नित्य पान करता है इति ॥ २४२॥ प्रथमं लवणं पश्चात् क्षारंक्षीरोपमंततः। द्राक्षारससमं पश्चात् सुधासारमयं ततः २४३॥ ५ यो. र.

(७४)
अर्थ-तिस रसका खाद प्रथम लवण जैसा होता है
और पीछे क्षार जैसा होता है तिसके पीछे दूधके समान
होवे है और पीछे दाखके रसके बराबर होवे है तथा
अंतमें अमृत जैसा मधुर प्रतीत होवे है इति ॥२४३॥
अमृताखादनाहेहो योगिनो दिव्यतामियात्।
जरारोगविनिर्मुक्तश्चिरं जीवति भूतले ॥२४४
अर्थ-तिस अमृतरसके खेचरीद्वारा नित्य पान
करनेसे योगीका शरीर दिव्य भावको प्राप्त होते है
और वृद्धपणा तथा सर्व रोगोंसे रहित भया योगी
पृथिवीमें चिरकालपर्यंत जीवता है इति ॥ २४४ ॥
अथ नादसमाधिः।
अथ नादानुसंधानं प्रवक्ष्यामि यथाक्रमम् ।
यस्यानुष्ठानतो योगी परं ब्रह्माधिगच्छति २४५
अर्थ-अब योगसंप्रदायके क्रमके अनुसार नादा-
नुसंधानका निरूपण करते हैं जिस नादानुसंधान
करनेसे योगी परब्रह्मभावको प्राप्त होते है इति।।२४५॥
पद्मासनं समास्थाय खस्तिकं वा यथासुखम् ।
कर्णरंध्रयुगं पश्चादंगुलिभ्यां निरोधयेत्॥२४६॥
अर्थ-पद्मासन अथवा स्वस्तिकासनसे सुखपूर्वक
बैठ करके पीछे दोनों अंगुष्ठ अथवा तर्जनीअंगुलि-
योंसे दोनों कानोंके छिद्रोंको बंद करे इति ॥२४६ ॥

(७५)
निमील्य नयने चित्तं कृत्वैकाग्रमनन्यधीः।
शृणुयादक्षिणे कर्णे नादमंतर्गतं शुभम् ॥२४७॥
अर्थ-और दोनों नेत्रोंको निमीलन करके तथा
चित्तको एकाग्र करके दहने कानकी तरफ चित्तवृ.
त्तिको लगायकरके शरीरके अंदरसे उठती जो ना.
दकी शुभध्वनि है तिसको श्रवण करे इति ॥२४७॥
कर्णयोस्त्वेकतानेन रोधनं नैव कारयेत् ।
त्यक्त्वात्यक्त्वांगुलिंमध्येनादाभ्याससमाचरेत्
अर्थ-नादके श्रवणकालमें कानोंको निरंतर बंद
नहि रखना चहिये किंतु बीच बीच में थोडी थोडी
देरके बाद अंगुलियोंको छोडकर नादका अभ्यास
करना चाहिये क्योंकि कानोंके एकदम बंदकर रख-
नेसे कानोंमें दरद हो जाताहै यातें धीरेधीरे ज्यादा
ज्यादा बंद करनेका अभ्यास करना चाहिये इति॥२४८॥
अधस्ताद्धजयोर्दद्यादाधारं काष्ठनिर्मितम् ।
श्रवणे तेन नादस्य नैव बाहुश्रमो भवेत् २४९
अर्थ-नाद श्रवणकालमें दोनों भुजोंके नीचे
लकडीका बनाया आधार रखना चहिये जिसको
वैरागन या आसा कहते हैं तो तिसकरके नादके
सुननेसें बाहु थकती नहि हैं इति ॥ २४९ ॥

(७६) श्रूयते प्रथमाभ्यासे ध्वनिर्नादस्य मिश्रितः। ततोभ्यासे स्थिरीभूते श्रूयते तु पृथक् पृथक् ॥ अर्थ-प्रथम अभ्यासकालमें तो नादकी ध्वनि- मिलीहुई सुन पडती है और जब बहुत दिनोंमें अ- भ्यासकी स्थिरता हो जावे है तो फिर सर्व नाद जुदा जुदा सुननेमें आते हैं इति ॥२५० ॥ घंटानादसमः पूर्वं ततः शंखसमो ध्वनिः। वीणारवसमः पश्चात् तालनादोपमस्ततः २५१ अर्थ-पहले घंटाके शब्दके समान नादकी ध्वनि होवे है फिर शंखकी आवाजकी न्याई होवे है पीछे वीणाके बजने जैसी ध्वनि होवे है और फिर तालके शब्दके समान प्रतीत होवे है इति ॥ २५१ ॥ वंशीशब्दनिभश्चाथो मृदंगसदृशो ध्वनिः। भेरीरवसमः पश्चान्मेघगर्जनसंनिभः॥२५२॥ अर्थ-तिसके अनंतर बंसीकी आवाजके बराबर ध्वनि सुननेमें आवे है और पीछे मृदंगके शब्दके समान होवे है तिसके पीछे नगारेकी आवाज जैसी होवे है तथा सबके पीछे मेघकी गर्जन जैसी ध्वनि प्रतीत होवे है इति ॥ २५२ ॥ क्रमेणाभ्यासतश्चैवं श्रूयतेऽनाहतो ध्वनिः । पृथग्विमिश्रितश्चापि मनस्तत्र नियोजयेत्२५३

(७७)
अर्थ-इस प्रकार क्रमसे जुदा जुदा अथवा मिली-
हूई नादकी ध्वनि अभ्यास करनेसे सुननेमें आती हैं
उसमें मनको लगाकर श्रवण करना चहिये इति २५३
नादारंभे भवेत्सर्वगात्राणां भंजनं ततः।
शिरसः कंपनं पश्चात् सर्वदेहस्य कंपनम् २५४
अर्थ-नादके आरंभकालमें प्रथम शरीरके सर्व
अंगोंमें टूटन जैसी प्रतीत होवेहै और तिसके पीछे ज्यादा
अभ्यासके बढनेसे शिर कांपने लगता है और फिर कुछ
दिनोंमें सारा शरीरही कांपने लगता है इति ॥२५४ ॥
अमृताखादनं पश्चाजिह्वाग्रे संप्रवर्तते ।
रोमांचश्च तथानंदः प्रकर्षणोपजायते ॥ २५५ ॥
अर्थ-तिसके अनंतर कुछ दिनोंमें जिव्हाके
अग्रभागमें अमृतका स्वाद प्रतीत होते हैं और
शरीरमें रोमांच तथा विशेषकरके आनंदका अनुभव
होवे हैं इति ॥ २५५ ॥
नादश्रवणतो योऽसावानंदो योगिनो भवेत् ।
शक्यते स गिरा वक्तुं मया नात्र कथंचन २५६
अर्थ-नादके श्रवणकालमें योगीको जो आनंद
प्राप्त होते हैं तिस आनंदको मैं यहां अपनी बाणीसे
किसी प्रकारसे कथन नहि करसकता हुं इति ॥२५६॥

(७८)
आरंभो योगनिद्रायास्ततः समुपजायते ।
सर्व देहादि विस्मृत्य समाधिस्थो भवेन्नरः २५७
अर्थ-तिसके अनंतर योगनिद्राका प्रारंभ होवे है
अर्थात् नादकी ध्वनिमें चित्त लीन होवे हैं और
तिस योगनिद्राके दीर्घकालपर्यंत अभ्यास करनेसे
देहादिक सर्व बाह्य प्रपंचको भूल करके योगी राज-
योगसमाधिमें स्थित होय जावे है इति ॥ २५७ ॥
अथवा नादयोगेन शरीरे कृशतां गते ।
सर्वागेभ्यो भवेत्तूर्ण प्राणस्याकर्षणं ध्रुवम् २५८
तं ध्यानेनोव॑मानीय ब्रह्मरंधे प्रवेशयेत् ।
तत्रैव स्थिरतांनीत्वा समाधिस्थो भवेन्नरः२५९
अर्थ-अथवा नाद श्रवणके अभ्याससे हठयोग
समाधिभी हो सकती हैं सो जैसे नाद श्रवणके अ-
धिक अभ्यास करनेसे जब शरीर अत्यंत कृश होजावे
तो मूलबंध लगाय कर बैठनेसे शरीरके नीचेके सर्व
अंगोंसे प्राणका निश्चयकर आकर्षण होवे हैं और
फिर तिस खिंचे हूये प्राणको नाभि हृदय कंठादि
चक्रोंमें पूर्वोक्त रीतिसे ध्यानसे ऊपरको लायकरके
ब्रह्मरंध्र में प्रवेश करे और तिसको तहांही ब्रह्मरंध्रमें
स्थिर करदेवे तो योगी हठयोग समाधिमें स्थित
होजावे है इति ॥२५८ ॥२५९ ॥

(७९) नादश्रवणतो नित्यमंतीनं भवेन्मनः। नच बाह्य विजानाति कूपे मग्न इव द्विपः २६० अर्थ-उक्त प्रकारसे नादके नित्यं प्रति श्रवण करनेसे मनकी वृत्ति अंतर्मुख होकर लीन होजावे है और मनके अंतर्लीन होनेसे योगीको बाह्य प्रपंचकी कुछ खबर नहि रहती जैसे गहरे कूयेमें पडे हूये हाथीको बाहिरकी कुछ खवर नहि रहती है इति ॥ २६०॥ अंतर्लीनमना योगी जगत्सर्व प्रपश्यति । सर्वगुप्तपदार्थानां प्रत्यक्षत्वं च जायते ॥२६॥ अर्थ-चिरकालपर्यंत मनके अंतर्लीन होनेसे यो- गीको अंतर्दृष्टिके प्रकाशमें सर्व जगत् देखनेमें आता है तथा गडीहुई निधि आदिक सर्व गुप्त पदार्थोंका प्रत्यक्ष अनुभव होवे है इति ॥ २६१ ॥ अंतर्धानस्य शक्तिश्च योगिनो भवति ध्रुवम् । सङ्कल्पानुविधायित्वं शरीस्योपजायते ॥२६२॥ अर्थ-और योगीको दूसरोंके सामने अदृश्य होनेकी शक्ति होवे है तथा शरीरकी स्थिति अपने संकल्पके अनुसार होजावे है इति ॥ २६२ ॥ यथा संकल्पयेद्देहं यथारूपं यथागुणम् । तथैव जायते सद्यः शरीरं योगिनो ध्रुवम् २६३ (८०) अर्थ-शरीरके संकल्पानुसारी होनेसे जिस का- लमें योगी जैसे स्वरूप वा जैसे गुणवाले शरीरका संकल्प करता है उसी प्रकारका उसी कालमें यो- गीका शरीर बन जावे है इति ॥ २६३ ॥ एकस्मिन्नेव काले च शरीराणि बहून्यपि । निर्माय विहरेल्लोके पुनको भवेत्क्षणात् २६४ अर्थ-तथा एककालमेंही योगी संकल्पके बलसें अपने अनेक शरीरोंको निर्माण करके जगत्में विहार करता है और फिर क्षणमात्रमें तिन सर्व शरीरोंका उपसंहार करके एकलाही रह जाता है इति ॥२६४॥ भूतं भव्यं भविष्यं च वेत्ति सर्वं सकारणम् । ध्यानमात्रेण सर्वेषां भूतानां च मनोगतम् २६५ अर्थ-किंच भूत भविष्यत् और वर्तमान तीनों कालकी चातको हेतुके सहित जान लेता है तथा क्षणभरके ध्यानसे सर्व जीवजंतुवोंके मनकी बातको जान लेवे है इति ॥ २६५ ॥ खर्गेऽतरिक्षे पाताले तथा भूमंडलेऽखिले । अव्याहतगतियोगी खेच्छया विचरेचिरम्२६६ अर्थ-तथा स्वर्गलोक अंतरिक्षलोक पाताललोक और सर्व पृथिवीमंडलमें अखंडित गतिवाला हूया

(८१)
योगी अपनी इच्छानुसार दीर्घकालपर्यंत विचरता है
इति ॥ २६६ ॥ इसप्रकार नादश्रवणका फल वर्णन
करके अब प्रसंगसे त्राटक मुद्राका निरूपण करते हैं।
त्राटकाभ्यासतश्चापि कालेन क्रमयोगतः।
राजयोगसमाधिः स्यात् तत्पकारोऽधुनोच्यते॥
अर्थ-खेचरी और नादके समान त्राटकके अभ्यास
करनेसेभी धीरेधीरे क्रमसे राजयोगसमाधिकी सिद्धि
होवे है सो अब त्राटकका प्रकारभी यहां निरूपण
करते है इति ॥ २६७ ॥
श्वेतमृत्ला प्रलिप्तायां भित्तौ कृत्वा मसीमयम्।
वर्तुलाकारकं बिंदुं दूरस्थस्तं विलोकयेत् ॥२६८॥
अर्थ-प्रथम सुपेद मृत्तिका अर्थात् कलीचूनासे
लिपीहूई भीतपर पैसेके बराबर स्याहीसे गोलाकार
एक बिंदु बनावे और फिर चार पांच हाथ दूर बैठ-
कर उसको देखनेका अभ्यास करे इति ॥ २६८ ॥
सुखासने समासीनो निर्जनस्थानगः सदा ।
निमेषवर्जितं नेत्रं शनैस्तत्र नियोजयेत् ॥२६९
अर्थ-अभ्यासकरने कालमें पद्मासन या स्वस्ति-
कासनसे सुखपूर्वक एकांत स्थानमें बैठना चहिये
और निमेषकेविना एकटक नेत्रोंको उस बिंदुमें
लगाना चहिये इति ॥ २६९ ॥

(८२) दृष्ट्या समं मनश्चापि लक्ष्यस्थाने प्रवेशयेत् । लक्ष्यं विहाय नैवान्यचिंतयेन्नावलोकयेत् २७० अर्थ तथा दृष्टिकेसाथ मनकोभी बिंदुस्थानमें लगाना चहिये बिंदुको छोडकर और किसी तरफ देखना नहि चहिये तथा मनसेभी कुछ चिंतन नहि करना चहिये इति ॥ २७० ॥ दिवा निरीक्षयेहिंदुं रात्री नक्षत्रमुज्ज्वलम् । दीपं वा दूरतोधृत्वा क्रमान्नित्यं समभ्यसेत् ७१ अर्थ-दिनको तो स्याहीके बिंदुकी तरफ देखना चहिये और रात्रीको जो विंदुकी तरफ देखना अनुकूल नहि पडे तो आकाशमें किसी प्रकाशवान् तारेकी तरफ या कुछ दूरपर अचल दीपकको रखकर उसकी ज्योतकी तरफ देखनेका अभ्यास करना चहिये इति ॥२७१॥ यथा धन्वी वकं लक्ष्यं वेधयत्यचलेक्षणः । तथैव त्राटकाभ्यासं कुर्यादेकाग्रमानसः॥२७२ अर्थ-जैसे धनुषधारी पुरुष अचल दृष्टिसे अपने लक्ष्यको वेधन करता है तैसेही एकाग्र मनसे योगीको त्राटकका अभ्यास करना चहिये इति ॥ २७२ ॥ यदा मुहूर्तपर्यंतं निमेषोन्मेषवर्जिता। स्थिरा दृष्टिर्भवेत्तत्र सिद्धः स्यात्राटकस्तदा २७३ (८३) अर्थ-जिस कालमें दो घटिकापर्यंत निमेष उन्मे- पसेबिना तिस बिंदुमें दृष्टि स्थिर होजावे तो तब त्राटककी सिद्धि जाननी चहिये इति ॥ २७३ ।। दृश्यते प्रथमाभ्यासे तेजो बिंदुसमीपगम् । चक्षुषो रश्मिजालानि प्रसरंति समंततः २७४॥ अर्थ-त्राटकके अभ्यास करनेमें प्रथम बिंदुके आसपास तेजकी प्रतीति होवे है और फिर थोडे दिन पीछे नेत्रोंकी रश्मिया बिंदुके चारों तरफ फैल जाती हैं इति ॥ २७४॥ तेजसा संवृतं लक्ष्यं क्षणं लुप्तं भवेत्ततः। क्षणं दृष्टिगतं भूत्वा पुनर्लुप्तं भवेत्क्षणात् २७५ अर्थ-और फिर तेजकरके ढकाहूया सो बिंदु बीचमें कबी क्षणभर दीखना बंद होजाता है फिर क्षणभर दीखने लगता है और फिर क्षणभरमें लोप हो जाता है इति ॥ २७५ ॥ वर्धमाने ततोऽभ्यासे लक्ष्यं हित्वा शनैःशनैः। दृष्टिरंतर्मुखत्वेन लीयते मनसा समम् ॥२७६॥ अर्थ-और जब बहुत कालतक करनेसे त्राटकका अभ्यास बढजाता है तो फिर अपने लक्ष्यरूप विं- (८४) दुको छोडकरके धीरेधीरे योगीकी दृष्टि अंतर्मुख भई मनके सहित लीन हो जाती है इति ॥ २७६ ॥ यथैवावस्थितं तत्र शरीरं योगिनो भवेत् । तथैव प्रतिमाकारं निश्चलं जायते ध्रुवम्॥२७७।। अर्थ-तिस कालमें योगीका शरीर जिस प्रकारसे बैठा होता है उसी प्रकारसे चित्रमें लिखी हुई मूर्तिके समान बाह्य ज्ञानसे रहित निश्चल हो जाता है इति।।२७७ क्षणमंतर्मुखो भूत्वा पुनरुत्थानकं व्रजेत् । ततो निरीक्षयेल्लक्ष्यं पुनरंतर्मुखो भवेत् ॥२७८॥ अर्थ-इसप्रकार पहले क्षणमात्र अंतर्मुख होय करके योगी फिर उत्थानको प्राप्त होते है और फिर उस बिंदुकी तरफ अचल देखते रहनेसे फिर अंतर्मुख होजावे है इति ॥ २७८ ॥ एवं कुर्वन्सदाभ्यासं त्राटकस्य विधानतः। चिराभ्यासवशाद्योगीसमाधिस्थो भवेद्धवम् ।। अर्थ-इस रीतिसे निरंतर विधिपूर्वक चिरकाल- पर्यंत त्राटकके अभ्यास करनेसे योगी निश्चय करके राजयोग समाधिमें स्थित होजावे है इति ॥ २७९ ॥ समाध्यभ्यासतो नित्यं जायतेंऽतर्मनोलयः। अंतर्दृष्टिप्रकाशश्च तस्य संजायते क्रमात्२८०॥

(८५) अर्थ-और समाधिके नित्यं प्रति अभ्यास करनेसे योगीका मन अंतरलीन होवे है तथा मनके अंतरलीन होनेसे क्रमसे योगीको अंतर्दृष्टिका प्रकाश उत्पन्न होवे है इति ॥ २८॥ करामलकवद्विश्वं तेन योगी प्रपश्यति । दूरतो दर्शनं दूरश्रवणं चापि जायते ॥ २८१ ॥ अर्थ-तिस अंतर्दृष्टिके प्रकाशसे करामलककी न्यांई योगी सर्व जगत्को देखता है और अपने आपही दूरके पदार्थ समीप दीखने लगते हैं और दुरकी वार्ता समीप सुन पडती हैं इति ॥ २८१ ॥ यदुक्तं खेचरीयोगे यच्चोक्तं नादचिंतने । तत्सर्व त्राटकाभ्यासाद् योगिनो भवति ध्रुवम् अर्थ-औरभी जो खेचरी मुद्रा तथा नादश्रव- णमें फल वर्णन किये हैं सोभी सबी त्राटकके अभ्या- ससे योगीको प्राप्त होजाते हैं इति ॥ २८२ ॥ अणिमादिगुणैर्युक्तो विचरेद्भुवनत्रये । खेच्छया देहमुत्सृज्य कैवल्यं पदमश्नुते॥२८॥ अर्थ-इस रीतिसे अणिमामहिमादिक सिद्धियों- करके युक्त भया सो योगी तीनों भुवनोंमें खतंत्र विचरता है और जिस कालमें उसकी विदेहमुक्त (८६) होनेकी इच्छा होवे है तो तिस कालमें अपनी इच्छासे शरीरको परित्याग करके कैवल्य मोक्षपदको प्राप्त होजावे है इति ॥ २८३ ॥ एतत्संक्षेपतः प्रोक्तं योगस्यांगाष्टकं क्रमात् । सर्वेषां योगतंत्राणांसारभूतमसंशयम् ॥२८४॥ अर्थ-यह पूर्वोक्त रीतिसे संक्षेपसे योगके यम- नियमादिक आठ अंगोंका क्रमसे निरूपण किया है सो यह योगके सर्व ग्रंथोंका सारभूत है इसमें कुछ संशय नहि है इति ॥ २८४ ॥ नात्र किंचिदयुक्तं वा नाधिकं किंचिदीरितम् । यथानुभूतं दृष्टं च तदेवात्र निरूपितम् ॥२८५॥ अर्थ-इस ग्रंथमें किंचित्मात्रभी अयुक्त तथा अधिक नहि कथन किया है जिस प्रकारका स्वयं अनुभव किया तथा शास्त्रोंमें देखा है सोई यहां नि- रूपण किया है इति ॥ २८५ ॥ तस्मादास्तिकभावेन कुर्याद्योगस्य साधनम् । अवश्यं सिद्धिमामोति निर्वेदान्न जहाति चेत्॥ अर्थ-यातें साधकपुरुषको आस्तिकमावसे इस ग्रंथके अनुसार योगका अभ्यास करना चहिये और सो अवश्य करके सिद्धिको प्राप्त होवेगा जो कदा.

(८७)
चित् अभ्यासके परिश्रमसे उपराम होकर बीचमें नहि
छोडेगा तो इति ॥ २८६ ॥
प्रायशो योगयुक्तीनां संनिवेशोऽत्र विद्यते ।
तथापि गुरुवफ्रेण विज्ञेयास्ता विचक्षणैः॥२८॥
अर्थ-यद्यपि प्रायः करके योगकी सर्व युक्तियां
इस ग्रंथमें लिखी हुई हैं तथापि बुद्धिमान् साधक
पुरुषोंको तिन युक्तियोंको योगाभ्यासी गुरुके मुख-
सेही सीखनी चहिये इति ॥ २८७ ॥
हठयोगस्य सम्प्रोक्तो राजयोगस्य वै तथा ।
विधिरत्र समासेन क्रमादभ्यासमाचरेत् २८८॥
अर्थ-प्राणोंका चडानारूप जो हठयोग है और
मनका विलयरूप जो राजयोग है तिन दोनोंकी विधि
संक्षेपसे इस ग्रंथमें कथन करी है सो तिन दोनोंका
क्रमसे अभ्यास करना योग्य है इति ॥ २८८ ॥
सततं तु हठाभ्यासं नैव कुर्याद्विचक्षणः ।
साधयित्वा हठं पूर्वराजयोगं ततोऽभ्यसेत् २८९
अर्थ-बुद्धिमान् योगी पुरुषको चहिये कि सर्वदा
काल हठयोगकाही अभ्यास न करता रहे किंतु हठ-
योगको प्रथम सिद्ध करके पीछे विशेषकरके राज-
योगकाही अभ्यास करे इति ॥ २८९ ॥

(८८) सर्वेषु योगमार्गेषु शरीरं कृशतां व्रजेत् । भयं तत्र न कुर्वीत युक्त्या रक्षेत्कलेवरम् २९० अर्थ-हठयोग हो अथवा राजयोग हो योगके सर्व मार्गों में अच्छीतरे अभ्यास करनेसे शरीर अवश्य कृश होजाता है सो तिसमें साधक पुरुषको भय नही करना चहिये किंतु युक्तिसे शरीरकी रक्षा कर- नी चहिये इति ॥ २९०॥ वर्जयेदशनं रूक्षं लानं शीतांबुना तथा । पद्भ्यां पर्यटनं चैव स्त्रियं चापि विशेषतः २९१॥ अर्ध-योगीको अभ्यास करने कालमें रूखा भोजन नहि खाना चहिये और शीतकालमें ठंडे पानीसे स्नानभी नहि करना चहिये तथा पैरोंसे चलकर देशाटनभी नहि करना चाहिये और स्त्रीका संग तो अवश्य नहि करना चहिये इति ॥ २९१ ॥ नातिशीते न चात्युष्णे नातिवर्षति तोयदे । अभ्यासं वर्द्धयेद्योगीनो चेद्रोगभयं ध्रुवम् २९२ अर्थ-पौष माघके अतिशीतकालमें और ज्येष्ठ आषाढके अतिउष्ण कालमें तथा अत्यंत वर्षा पड़ने कालमें योगीको अभ्यासको अधिक नहि बढाना च. हिये किंतु साधारण रीतिसे करते रहना चहिये क्योंकि (८९) अतिशीतादि कालमें ज्यादा अभ्यास बढानेसे शरी- रसे अवश्य रोग होनेका डर रहता है इति ॥ २९२ ॥ देशेऽनुकूले काले च समे स्थाने च निर्मले। वर्धयन्नित्यमभ्यासं ध्रुवं सिद्धिमवामुयात्२९३॥ अर्य-अपनी प्रकृतिके अनुकूल पवित्रदेशमें और शीतोष्ण समकालमें तथा सर्व दोषोंसे रहित निर्मल शुद्ध स्थानमें योगी नित्यं प्रति अभ्यासको बढावे तो निश्चयकरके सिद्धिको प्राप्त होते है इति ॥ २९३ ।। प्राणस्यारोहणे वापि परकायप्रवेशने । शरीरमोक्षणे चादौ भोजनं परिवर्जयेत् २९४॥ अर्थ-समाधिमें प्राणके मस्तकपर चडाने कालमें और परशरीर प्रवेश करने कालमें तथा देहत्याग करने कालमें योगीको थोडे दिन पहले भोजनका परित्याग कर देना चहिये इति ॥ २९४ ॥ निरशनादग्निस्तूर्ण जाठरो दाहकृद्भवेत् । काले तदुपशांत्यर्थं क्षीरं नीरान्वितं पिबेत् २९५ अर्थ-भोजनके नहि करनेसे जठराग्निसें पेटमें विशेष दाह उत्पन्न होवे है तो तिसके शांत करनेके लिये अनुकूल समयानुसार दूधमें पानी मिलाकर पीना चहिये या मनका दाख गुलकंदादिक ठंडी वस्तु खानी चहिये इति ॥ २९५ ॥ ६ यो. र.

(९०) खतो वा परतो वापि प्रबंधं सर्वमादितः। स्थानशिष्याशनादीनांकृत्वा योगं समभ्यसेत् अर्थ-द्रव्यकी अनुकूलता होय तो अपने आपसे नहि तो किसी धनवान् मित्र या सेवककी सहाय- तासे अपने अभ्यासलायक स्थानका और ऊपरकी सेवा करनेवाले शिष्य या नौकरका तथा भोजनादि खर्चका सर्वप्रकारसे अनुकूल पहलेसे बंदोबस्त करके पीछे योगाभ्यासका प्रारंभ करना चहिये क्योंकि बिना ठीक बंदोबस्तसे दीर्घकालपर्यंत अखंडित अभ्यास नहि चल सकता है इति ॥ २९६ ॥ योगाभ्यासे प्रवृत्तस्तु शीघ्र सिद्धिं न कामयेत्। कालेन दुरिते क्षीणे स्वतःसिद्धिःप्रजायते॥१७॥ अर्थ-योगाभ्यासमें प्रवृत्त भये योगीको शीघ्रही सिद्धिकी वांछा नहि करनी चहिये किंतु धीरे धीरे अभ्यास करते रहनेसे काल पायकर सर्व संचित पापोंका नाश होजानेसे अपने आपही सिद्धिकी प्राप्ति होवे है इति ॥ २९७ ॥ शास्त्रवाक्येषु विश्वासो गुरुपादाब्जसेवनम् । भक्तिर्विष्णी शिवे वापि योगस्य सिद्धिहेतवः॥

(९१)
अर्थ-योगशाखोंके वचनों में पूर्ण विश्वास होना
और योगवेत्ता गुरुके चरणकमलोंकी निष्कपटतासे
सेवा करनी तथा विष्णु अथवा शिवमें पूर्ण भक्ति होनी
इतनी वार्ता योगकी सिद्धिमें कारणभूत हैं इति २९८
पथ्याशिनो विरक्तस्य शांतस्यैकांतवासिनः ।
दृढचित्तस्य धीरस्य योगः सिद्धयति सत्वरम् ॥
अर्थ-जो योगी पुरुष निरंतर योगाभ्यासके अनु-
कूल पथ्यभोजन करता है और सांसारिक विषयोंसें
और व्यवहारोंसे विरक्त रहता है तथा रागद्वेषसे
रहित शांत चित्तवाला होता है और सर्वदा काल
एकांतस्थानमें निवास करता है और दृढचित्तवाला
तथा धीरजवान है तिसको योगकी सिद्धि शीघ्र
होवे है इति ॥ २९९ ॥
विना बहुविधा योगे भवंतीति विनिश्चितम् ।
तथापि साधयेद्योगी योगं धृतिपरायणः ॥३००
अर्थ-योगाभ्यासमें प्रवृत्त भये योगीको बहुत
प्रकारके शरीररोगादिक विघ्न आयकर अभ्याससे
चलायमान करते हैं यह बात निश्चित है तोभी धी-
रजपरायण होकर योगीको अवश्य योगका साधन
करना चहिये इति ॥३०॥

(९२)
प्रणवस्य जपं कुर्याद्योगारंभे सदा बुधः।
तदर्थमीश्वरं चापि चिंतयेचेतसा मुहुः ॥३०॥
सर्वज्ञं सर्वगं शुद्धं दयालं सर्वकारणम् ।
विनास्तेन विनश्यंति तमांस्यर्कोदये यथा ॥३०२
अर्थ-बुद्धिमान् योगी पुरुषको विनोंकी निवृत्तिके
लिये योगाभ्यासके आरंभकालमें नित्यं प्रति ओंका-
रका जप करना चहिये तथा तिस ओंकारका वा-
च्यार्थ जो ईश्वर है तिसका मनसे चिंतन करना
चहिये सो ईश्वर सर्व जीवोंके कर्मोंके जाननेहारा है
और पृथिवी आकाश पाताल सर्व जगामें व्यापक है
तथा सर्वत्र व्यापक हूयाभी सर्व दोषोंसे रहित शुद्ध
निर्मल है और जीवोंके सर्व अपराधोंको क्षमा करने-
वाला दयालु है तथा इस चराचर जगत्के रचनेहारा
परम कारण है इस प्रकारसे जप करतेवकत वारंवार
मनसे चिंतन करना चहिये तो तिसकरके सर्व
विनोंका नाश होवे है जैसे सूर्यके उदय होनेसे सर्व
अंधेरेका नाश होवे है इति ॥ ३०१॥३०२॥
अभ्यासानंतरं कुर्याद्गच्छंस्तिष्ठन्खपन्नपि ।
चिंतनं हंसमंत्रस्य योगसिद्धिकर परम् ॥३०३॥

(९३) अर्थ-तथा योगाभ्यास करने कालसे पीछे चलते बैठते सोते सर्वदा काल योगीको हंसमंत्रका चिंतन करना चहिये तिससेभी सर्व विघ्नोंकी निवृत्तिपूर्वक शीघ्र योगकी सिद्धि होवे है इति ॥ ३०३ ॥ हकारेण बहिर्याति सकारेण पुनर्विशेत् । प्राणःसर्वशरीरेषु श्वासोच्छासक्रमेण वै३०४॥ अर्थ-सर्व पशु पक्षी मनुष्यादि शरीरोंमें जो श्वास और प्रश्वासकी गतिसे प्राण चलता है सो हंशब्दसे तो बाहिरको आता है और साशब्दसे अंदरको प्रवेश करता है इति ॥ ३०४ ॥ हसोहंसोहमित्येवं पुनरावर्तनक्रमात् । सोहं सोहं भवेन्नूनमिति योगविदो विदुः३०५॥ अर्थ-इस प्रकारसे हंसोहंसो शब्दको बारबार फि- रानेसे उलटकर सोहं सोहं हो जाता है जैसे बहुतवार मरा मरा कहनेसे राम राम हो जाता है ऐसे योगवि- धाके जाननेहारे योगी लोक जानते हैं इति ॥३०५॥ अजपानाम गायत्री निरंतरजपात्मिका । गिरिजायै पुरा प्रोक्ता शिवेनेयं सुसिद्धिदा ॥ अर्थ-यह अजपानामकी गायत्री है अर्थात् इसको अजपा गायत्री कहते हैं सो इसका बिना जप (९४) किये अपने आपही निरंतर जप होता है और यह प्रथम महादेवने पार्वतीके प्रति सर्व सिद्धियोंके देनेवाली उपदेश करी है इति ॥ ३०६॥ अस्थाश्चिंतनतो नित्यं सर्वदुष्कृतराशयः । योगिनां नाशमायांति तृणभारा यथाग्निना ॥ अर्थ-इस अजपा गायत्रीके नित्यं प्रति चिंतन करनेसे योगी पुरुषोंके सर्व जन्मजन्मांतरोंके पापस- मूह नष्ट होजाते हैं जैसे अग्निके लगनेसे घासके भारे जलकर नष्ट होजाते हैं इति ॥३०७॥ क्रमेणाभ्यासयोगेन जायतेऽतर्मनोलयः। प्राणश्च क्षीणतां याति योगनिद्रा प्रजायते ३०८ अर्थ दीर्घकालपर्यंत विधिपूर्वक इसके अभ्यास करनेसे मन अंदर लीन होजाताहै और मनके लीन होनेसे प्राणकी गतिभी क्षीण होजाती है तथा योग- निद्रा उत्पन्न होती है इति ॥ ३०८ ॥ नित्यमंतर्मुखत्वेन परमानंदमात्मनः। अनुभूय चिरं योगी कैवल्यपदमश्नुते ॥ ३०९॥ अर्थ-और इसके अभ्यास करनेसे सर्वदा काल अंतर्मुख वृत्ति होनेसे योगी आत्माके परम आनंदका (९५) चिरकालपर्यंत अनुभव करके पीछे देहांतकालमें परमपद कैवल्य मोक्षको प्राप्त होते है इति ॥३०९॥ यस्त्वेवमुक्तमार्गेण योगाभ्यासं समाचरेत् । नरो वाप्यथवा नारी स याति परमां गतिम् ॥ अर्थ-जो पुरुष पूर्वोक्त रीतिसे अष्टांग योगका नित्यं प्रति अभ्यास करता है सो पुरुष हो अथवा स्त्री हो दोनोंही परमगति मोक्षपदको प्राप्त होते हैं इति ॥३१०॥ योगाभ्यासे प्रवृत्तस्य योगिनः श्रद्धयान्विता । परिचयाँ प्रकुर्वति शिष्या वा धनिनश्च ये ३११ ते तस्य पुण्ययोगेन क्षीणपापकदंबकाः। अनायासेन गच्छति ब्रह्मणः सदनं परम् ३१२।। अर्थ--तथा योगाभ्यासमें प्रवृत्त भये योगी पुरु- षकी जो शिष्यवर्ग अथवा धनवान् सेवक लोक अनु- कूल अन पान स्थान वस्त्रादिकोंसे श्रद्धापूर्वक सेवा करते हैं सोभी तिस योगीके पुण्यके भागी होनेसे सर्वपापोंसे रहित भये देहांतमें अनायाससेही ब्रह्मलो- कको प्राप्त होते हैं इति ॥३११ ॥३१२॥ शृणुयादपि यो नित्यं पठेद्वा योगपुस्तकम् । श्रद्धया संयुतः सोपि सर्वपापैर्विमुच्यते ३१३ ॥

(९६) अर्थ तथा जो पुरुष श्रद्धापूर्वक योगके पुस्त- कका श्रवण अथवा पठन करता है सोभी सर्वपापोंसे मुक्त होजावे है इति ॥ ३१३॥ इतीदं पुष्करक्षेत्रे ब्रह्मानंदेन योगिना । साधकानां हितार्थाय कृतं योगरसायनम् ३१४ अर्थ-इतिशब्द ग्रंथकी समाप्तिका वाचक है सो यह योगरसायन नामक ग्रंथ योगसाधना करनेहारे जिज्ञासु जनोंके हितार्थ स्वामी ब्रह्मानंद योगीने पुष्करतीर्थमें निर्माण किया है इति ॥ ३१४ ॥ योगात्मा योगकृद्योगी योगिध्येयपदाम्बुजः। योगसिद्धिप्रदोऽनेन प्रीयतामीश्वरो हरिः३१५॥ अर्थ-योगस्वरूप और योगविद्याके निर्माणकर्ता तथा स्वयं महायोगी और सर्वयोगियों करके ध्यान करने योग्य चरणारविंद तथा सर्वदा काल योगसाध- कोंको योगकी सिद्धि देनेहारे और सर्व जगत्के ईश्वर जो विष्णु परमात्मा हैं सो इस योगरसायनके अर्पणसे प्रसन्न होवो इति ॥ ३१५ ॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीपुष्करतीर्थ- निवासिब्रह्मानंदस्वामिविरचितं योगरसायनं संपूर्णम् ॥

Yogarasayanam

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Yogarasayanam
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Yogarasayanam
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OCR done
Published
2005/07/25
Publisher
Gurukul Kangri Vishwavidyalay
Language
Sanskrit
Pages
99
Library
University Library,gurukul Kangri Vishwavidyalaya
DLI number
476980
Barcode
99999990169226.00
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