A. U. A

Sheyli

Yatendra Kumar · 2006\5

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शेली
(अङ्गारेजी के प्रख्यात रोमानी कवि प्रसस विसी शेली का
जीवन वृत्त, काव्य साधना और काव्य-लोक)
रचयिता
यतेन्द्र कुमार एम० ए०
भामुख
प्रो० रामधारी सिंह 'दिनकर'
भूमिका
बा राम विलास शर्मा एम०ए० पी०एच-डी.
प्रकाशक
भारत प्रकाशन मंदिर
अलीगढ़
प्रथमावृति ]

श्रद्धय
प्रो० मुरारी लाल
को

श्रामुख अलीगढ़ के भावुक, नवयुवका, किन्तु, मेधावी साहित्यकार, श्री यतेन्द्रकुमार ने एक बड़ा ही शावश्यक कार्य पूरा किया है। हिन्दी के छायावादी काव्य पर अँगरेजी के महाकवि शेली का प्राथुर प्रभाव आँका जाता है, किन्तु, शेली की कविताओं का अनुवाद हिन्दी में अभी तक किसी ने किया नहीं था। यतेन्द्र जी ने शेली की 'अनेक प्रतिनिधि-रचनाओं का सफल अनुयाद करके राष्ट्र भाषा के इस अंभाव को दूर कर दिया है। मैंने कई कविता का अनुवाद स्वयं अनुवादक के मुख से सुना और सुनकर प्रायः मंत्रमुग्ध रह गया। शेली की भावुकता, "शेली का आवेश और शेली की कोमल गर्जना, ये सारी चीजें हिन्दी अनुवाद में आ गई हैं और बहुलशः अनुवाद में सच्चा आनन्द प्रकट . 4 हुआ है। जो लोग शेली की रचनाओं का आनन्द मूल में नहीं ले सकते थे, थे अब यतेन्द्र कृत अनुयादों को झूम-झूम कर पढ़ेगे। मैं इस कवि के अनुवादक-कवि को बधाई देता हूँ। अजयः मही किं यतेन्द्र में शेली की आत्मा हिन्दी में अपना उद्धार खोज रही हो।

भूमिका तरुण कृषि रवीन्द्रनाथ ठाकर को लोग बाल का शेली कहा करते थे। इससे शेती के काव्य की सरसता का अनुमान किया जा सकता है। बहरेजी भाषा में उससे बड़ा गायक-कवि नहीं हुमा। उसका विश्वास था कि कविता बिना परिश्रम के अपने आप कवि के हदय से निझर की तरह निकलनी चाहिये। उसकी कविता पढ़ने में ऐसी ही लगती है। श्री यतेन्द्र कुमार ने बड़े परिश्रम से शेली की इन कविताओं का हिन्दी में अनुवाद किया है। शेली भाषी बात मानों द्वारा कहता है तो माधी बात कप और लय द्वारा। इसलिये किसी के लिये भी उसकी रचनाओं का अनुवाद करना दुसाध्य होगा। श्री यतेन्द्रकुमार ने अपने अनुवाद में जिस हद तक शेक्षी के विचारों और, भाषों की रज करती है, इसके लिये बधाई के पात्र हैं। हिन्दी कविता की भाषा अभी परिष्कृत हो रही है। प्रमौक्षिक कवियों की हिन्दी भी पाक को सता देती है कि उसे संवारने की जरूरत है। ऐसी दशा में श्री यतेन्द्रकुमार मे शेती के संगीत और प्रवाह को हिन्दी भाषा और छन्दों में उतारने का जो प्रयत्न किया है, यह स्तुत्य है। ब्रिटेन की औद्योगिक क्रान्ति की छाया में ग्रेली का जन्म हुआ। झाम्स को राज्यक्रान्ति से उसे प्रेरणा मिली। पलेटी के प्रादर्शवाद और ब्रिटेन के भौतिकवाद दोनों से ही यह प्रभावित हुआ। जिस समय धूर्त ब्रिटिश साम्राज्यवादी अपने व्यापार और राज्य का विस्तार करने में लगे हुए थे, इस समय मानी बिटिया जाति की मम्मान रक्षा के लिये मेली ने अपना काव्य रचा। जीवादी संस्कृति की विषमताओं के पंक में कमल खिक्षा तरह उसका काव्य हुमा है। जी की रचनाएँ इस बात का प्रमाण है कि जीवादी समाज में साहवय कषियों को मातनाएं दी थी। इसीलिये शेक्षी की रचनाओं में इतनी पीना है, पीला से त्राण पाने के लिये स्वपनों का निर्माण है। लेकिन शेखी विद्रोही कवि भी है। इसे भायएड, फ्रान्स, इटली, यूनान, मिटेन [] पादि की पीवित जनता से हार्दिक सहानुभूति थी। यद्यपि उसके सामने यह स्पष्ट पा था कि जनता किम साधनों से मुक होगी, फिर भी उसकी मुक्ति में उसे एवं विश्वास था। इस मुक्ति के उसने गीत गाये। अन्याय और अत्याचार के प्रति उसने तीन रोष प्रकट किया। वह नये युग का गायक बन गया-वह मया युग जिसे भान मजदूर धर्ग के नेतृत्व में श्रमिक जामता समन धरती पर जा रही है। इसलिये शेली संसार के सभी देशभकों और जनवादी साहित्यप्रेमियों का प्रिय कवि है। हिन्दी के अनेक कवि शेली से प्रभावित हुए हैं। बहुधा उसका स्वप्नदर्शी रूप ही हिन्दी पाठकों के सामने पाया है। इस अनुवाद से वे उसकी बहुमुखी प्रतिभा से परिचित होंगे। इसलिये भी अनुवादक धन्यवाद के पात्र है। पाया है, उनके इस परिश्रम का यथेष्ट चादर होगा और व शेली तथा दूसरे विदेशी कवियों की रचनाओं का अनुवाद भी हमें बैंगे। -रामविलास शर्मा वक्तव्य माधुनिक हिन्दी काव्य की नूतन गतिविधि से जिसकीयच मात्र भी परिचय होगा, यह इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि हिन्दी कविता के क्षेत्र में एक नवीम और महान परिवर्तन की भूमिका बन रही है। जीवन की प्रगति में अनास्था रखने वाले कुछ साहित्यिक बौखलाये से इस प्रकार के परिवर्तन में कविता के विनाश का रूप देख रहे हैं। पर जिनका इष्टिकोण इतना सीमित नहीं हो गया है, और जो भाग के काव्य के क्षेत्र में होने वाले मथै प्रयोगों, कविता के प्रति अपनाये भये रुखों, और साहिस्य के नये मान- पण्डों के प्रति अनुदार भाव नहीं रखते, वे अवश्य इस बात को स्वीकार करेंगे कि हिन्दी कविता का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल है, और यह सब परिवर्तन सृजनात्मक ही है। हिन्दी के कवि को जैसे किसी नई बात को कहने की व्याकुलता खाये डाल रही है, वह इसके लिये, मये भामा नये शप नये प्रतीक गह-गढ़ कर अपनी भभिव्यंजना शक्ति को बढ़ा रहा है, इसके लिये न केवल यह अपने अन्दर ही फॉकता है। नवज अपनी सविता पूजी का ही प्रयोग कर रहा है. परन्, उसके प्रयत्न की दिशा अनेकमुखी है। वह उदू साहित्य से पाजल और शेरों को अपना रहा है, अन्य प्रान्तीय भाषाओं के विरत रत्नों से अपने सरस्वती मंदिर को समारता है, जनजीवन में गहराई से पेठकर, चिर-पेक्षित लोक गीतों की सरलता से अपनी कविता- धी को असंकृत कर रहा है। यह सब उसकी बड़ी बात कहने की बड़ी तयारी ही है। हिन्दी का स्वरूप अब बदल गया है। यह राष्ट्रभाषा के पद पर भासीन है। इसका क्षेत्र तीज गति से विस्तृत हो रहा है। उसका कविं भी अय सीमित दायरे में बंधा-वधा न रहकर अपने युग के प्रति ईमानदार होकर काव्य-समस्या के विराट रूप को अपनी कल्पना में बाँधने को सम्मुख है। इसी दृष्टिकोण को सामने रखकर प्रगति की इस धारा में मैंने भी अपने यूपर्यास का जनकण आशना चाहा है। विश्व-काय की अनमोल निषियों से हिन्दी साहित्य को परिचित कराने के प्रयास में 'शेती' को प्रथम घुमने का म-मामा कारण चाहे कुछ रहा हो, पर आना कारण यही है कि शेखी सचमुच उन कवियों में अग्रगण्य है, जिनकी भावभूमि में भारतीयों को सहज अपनापन मिलता है। इस बधु संकलन की अनेक कवितायें इसकी साक्षी देगी, जब पढ़ते-पढ़ते भापको हिन्दी के भनेक मये-पुराने कवियों की काव्य पंक्तियाँ सहज ही स्मरण होती चलेंगी। शेखी स्वयं भारत से प्रभावित था । यद्यपि उसे न यहाँ पाने काही सुयोग मिला और न यहां (५ के बारे में से अधिक जानकारी ही थी, पर फिर भी, उसके अन्दर हमारे देश के प्रति भाव था-जो उसी के भाई बन्द सानाज्य की शिपसा रखने पालों के दृष्टिकोण से सर्वथा विपरीत था। इसकी अनेक कविताओं में इसकी अभिव्यकि हुई है। कहीं वह 'ऐलास्टर' में कवि के रूप में सौन्दर्य शोधी होकर अमरनाथ आता है, कहीं हिमालय के ऊपर भेए चराने की कामना करता है। पर लोभी कवि शेली की भावभूमि कितनी ही अपनी खगे, आपको यह याद कर ही लेना पड़ता है कि उसके काध्यलोक का वातावरण विदेशी । वह समुद्र पर छोटी सी नौका में अकेला धूमता है, प्रभजनों के साथ खेलता है, बोली चोरियों की सैर करता है, भूरे पर्वतों के समान तिरसे भाने वाले मेध उसके संगी है। इसी वातावरण से उसकी त्वरित कल्पना बिम्ब सतारती चलती है । इसलिये पाश्चर्य नहीं कि भापको उसके अनेक सुन्दर स्थान असुन्दर बगे। सम्भव है कि अनेक स्थलों पर भापको उसके कपमान बोधगम्य न हो। कहीं आपको समझने के प्रयास में पंक्ति समूह की को बाँधना पड़े या अटकना पड़े। पर. इससे पूर्व कि ऐसी हर जगह पर आप अनुधावक को दोष दें, विनम्र निवेदन है कि उसे फिर मुख-मुड़ कर देखें, धैर्य के साथ | फिर शायद आपको अपरिचय नहीं रह जायेगा। बड़े काव्यों के खरगों में यह दुरूखा और भी अधिक परिक्षित होगी, तो भी उसमें ऐसे स्थलों की कमी न रहेगी, जिनकी पक कर भापका मन भानन्द से म गमक उठे। पों मैंने अनेक स्थलों परमून कविता के भाव, चंद, जय, बिम्ब, इत्यादि को क्यों का प्यों उतारने का प्रयास किया है, अंशत: सफलता भी मिली है, पर हर जगह यह सम्भव नहीं हो सका, इसलिये प्रायः कविताओं का रूपान्तर सुविधानुसार पदों में ही किया गया है। सबसे पहला ध्यान मूला के भावों पर ही रखा है। भाषों की रक्षा के लिए अनेक स्थलों पर प्रवाह और माधुर्य की भी बलि देनी पड़ी है। लेकिन फिर भी अनेक कविताएँ इसका अपवाद हैं। कहीं-कहीं मूल के शाब्दिक अर्थों पर ही माथापच्ची करने और हिंदी पाठक के सामने नीरस प्रदेखिका प्रस्तुत करने के बजाय उसके भावों का स्वतन्त्र अनुवाद कर दिया गया है। मूल कविता के भावों की रक्षा करने से प्रयत्न में अनेक नये शब्द गदने पड़े हैं, भनेक उपेशित और अमचलित शब्दों को पार कर यथास्थान रखकर काम बनाया है। कोशिश यही रही कि भूल कवि की पारमा ज्यों की प्यों हिन्दी में उतर आये ।

अंग्रेजी साहित्य से अमिह परिषय रखने वालों के लिये शायद इसमें विशेष रस न पाये । पर तो भी इस संकलन में उनकी कविताएँ संग्रहीत मिलेगी जिनकी अंग्रेजी संकानों में भरसक बोशा की गई है। कवि शेती के एक ही पर पन अधिक और दिया गया है। इस संकलन में भापको कवि की ऐसी रचनाएँ भी मिलेगी, जिन्हें पढ़ कर आप परबस कह उठेंगे काश! इनका अनुवाद पहले हो गया होता। हमारे अध्यापक भी अंग्रेजों की लीक पर ही चलते हुए शेली के दूसरे रूप को प्रस्तुत नहीं कर पाये जो हमारे स्थानिय संघर्ष को भी प्रेरणा देता। पर देर आषद दुरुस्त पायद, हमारा देश आज भी इसी कठिन प्राधिक वैषम्य की स्थिति में गुजर रहा है, जिसके तीखेपन ने भावुक कवि को झकझोर दिया था। प्रस्तुत पुस्तक की रचना में प्रमेक अनेगी ग्रंथों की सहायता ली गई है। विशेष रूप से प्रो. डीडेन की छहसी पृष्ठों की प्रामाणिक बीयनी और डा. रामविलास शर्मा की अंग्रेजी पुस्तिका इस दृष्टि उस्लेखनीय है। अन्त में मैं अपने उन सब मास्पद माहित्यिक मधुओं, और मित्रों को धन्यवाद देता है, जिन्होंने अपने अभिमत, परामर्श और धरण धैर्य से मुझे प्रोत्साहन दिया। प्राशा है कि विश्वकाव्य को हिन्दी में उतारने की मेरी योजना की पहली किश्त प्रापको रुधेगी। इस सम्बंध में सभी उपयोगी सुझावों का हार्दिक स्वागत करूंगा। निराला-जयन्ती १५ १५६, प्रेमनगर, अलीगढ़ .. २ गायन ऋमिका शेलीका जीपन-शुत एक शेली की काव्य-साधना ईस शेली का काव्य-लोक कपिता-शीर्षक मूल कविता का शीर्षक पृष्ठ १. काग्यांश---१२२ २. Liberty B. स्थायीनता (Liberty) ३ ५, गीत (When the lamp is shattered...) १. 'पीला' की साँग (An Evening at Pisa) ६ (Music) ७. कनिस्तान की एफ ग्रीष्म खया (An Evening at Church. yard) अबाबील (The Skylark) ६. शंका-गीत (Ode to Night) १५ १०. 'बादल' के प्रति (The cloud) ११. . 'पश्चिमी प्रभाग के प्रति (Ode to the Western. Wind) १२. नैपक्स के निकट लिखित पद (Stanzas written near Naples) २३ १३. 'मानसिक रूपश्री के प्रति (Ode to the Intellectual Beauty) १४. स्मृति के विधगों से (Halcyons of Memory) २८ १५. एक जण (One moment) २१ १६. भारतीय पमन' के प्रति (Ode to Indian Serenade) १७. श्रौल-१८१४ के पद (Stanzas-April 1814) ३५ ( To the Spirit of Delight) ३. १८. धे, प्रसनने।

२२. [ २ ] १६. ग्रीष्म और शरद (Summer and Winter) ३५ २०. के प्रति (To-) ३५ २१. संगीत (Music. चेतावनी (An Exhortation) ३७ २३. आयशः शशि से (Tothe Vaning Moon) ३८ २७. परिवर्तममयता (Mutability) ११. वधूगीत (Bridal chorus) २६. 'विलियम शेली के प्रति (To Williom Shelley) 89 २७. प्रोजरपाइन का गीत (Song of Progerpine) ४६ २८. ओ, जग ! जीवन ! भो कान ! (O,world O, life ! O,Timel) • [काव्यांग-1] (... frag. 1821) १५ ३०. 'केशरक्षिय के शासन में खिखित (Written during the administration of Casterleigh) ३१. इपड के मनुष्यों से (To the Men of England) ४६ ३२. शशि से (To The Moon) ३३, मृत्यु (Death) ५१ ३६. अपोलो के प्रति (To Apollo) २५. 'काल' के प्रति (To Time) ३६. प्रेमदर्शन (Philosophy of Love) ५६ ३७. मोजीमैल्डियस (Ozymandius) ६१ ६४ ७४ ७३ [३] काव्यांश कविता-शीर्षक मूल काव्य १. काव्या७९१ २. जब गूंजेगा त का नाद क्वीन मैब [१८१३] ३. नरक पीटर बैन र थर्ड (118) सच्चा पयार ऐपिप० (१८२०) १. श्राह्वान मास्क (१८११) ५. शूकर का कोरस स्वेजोफुट० (१८२०) ७, कवि का अवसान ऐलास्टर () म. आतिथ्य रिवीक्ट. (१८१३) 8. पसंतश्री रिवोल्ट (१८१०) १०, शशिका गीत प्रोमे० (18 ". याहमा का गीत १२. ऐशिया का गीत १३. प्रकृति प्राप्मा की स्तुति १५. धरतीमाता ११. ऐथेन्स-ज्योति लिपी (१५२०) १६. ऐखोनेस के कुछ स्फुट पद ऐडोनेस (२१) १७. काव्यांश इलाम (१२) १६. ऐन्द्रजालिका का गीत संकेत.. 'रिवोल्ट माफ इस्लाम' के लिये 'रिवोक्ट' प्रोमेथियस अनवायड 'प्रोमे स्वेलोफुट द टाइरेण्ट स्वेखो' एपिप साहशीडियन 'ऐपिप मास्क माफ ऐनाको 'मास्क' पीटर बैन व थर्ड 'पीटर वैन' ( पंकियाँ जो मूल में नहीं है, या शेती की लिखावट में नहीं पढ़ी मासकी अथवा असने अभूरी जोपदी) १२ नया यूनान " शुद्धि-पत्र पुरत में छूटी भ अशुद्धियों के लिये हमें, मादक खेद है। कृपया शुद्धि एन की सहायता से कुछ प्रमुख अशुद्धियों को शुनर -१० पृ० पं० अशुद्ध जन्म ३ ५ १७ जीवन यंत्र गोविन स्वर्णराशियों लोफोक्ली। गोडपिन स्वर्णराशियों के सोफाक्लोज १२ २४ सम्पृष्टता सम्पुष्टतर ३ बायरन २७ ६ बाइरन सावन्तीय स्वयंभीगी भीगी मौर ३० २३ सामन्तीय भीगी भीगी और तत्कालीन ३१ उकालीन सोनेट सीनेट ३२ अमलही अनकही ३२ मस्त त्रस्त दुष्कल्पना २२ इतकल्पना काव्य लोक पं० खेत सागता लीलगती २१ पकाय कृपाया

पाश्चात्य प्रभंजन !--शेली !
(१७६२-१८२२)
इस भविष्यवाणी का बन जा, अन तू शंखनाद' भरपूर !
श्राया है यदि शरद, रह सकेगा बसंत फिर क्या अथ दूर?

Bun To0I
Rangana ||
फील्डप्लेस-शेली का जन्मस्थान
:
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शेली का जीवन-वृत्त

"हैं अधिकांश दुग्नी जन,
वे दुसराये गये भूल से काव्य-धोख में,
जिसे सीखते पीक्षा में थे,
सिखलाते हैं उसे गीत में !"
(गोली)

। कवि शेली का जन्म यो तो कुल तीस ही वर्षों का है, पर उसके इस छोटे से जीवन पथ पर अद्भुत रहस्यों और घटनाओं का इतना अधिक प्राबल्य है कि इन थोड़े से पन्नों पर उसकी रूपरेखा भी भली- भाँति अद्वित नहीं की जा सकती। साहित्य के इतिहास में शायद ही और ऐसा काय हो, जिसके अन्दर प्रतिभा और व्यक्तित्व का ऐसा अनोखा संयोग हुआ हो। उसका अत्यंत अल्पकाल, सचा और रूढ़ियों के प्रति विद्रोह और सत्य की निष्ठा पूर्ण साधना का प्रतीक है । उसके कपि और व्यक्तित्व का अविच्छिन्न सम्बंध है, इसलिये शेली के काव्य का उसके जीवन की प्रमुख घटनाओं के आलोक में ही निहारने से परिचय पाया जा सकता है। विचार और कर्म में इतनी समता शायद ही किसी के जीवन में मिले । जो सोचा या लिखा, लसका अक्षरशः जीवन में पालन किया । जो शेली है, वही शेली का काव्य है, जैसा उसका काव्य है, वैसा ही उसका जीवन है। चार अगस्त मन्त्रहसोबानवे, अगरेजी साहित्य का चिर-स्मरणीय दिवस है। इस दिन इग्लैंड के एक जागीरदार कुल में कविशेली का • जन्म हुआ। पिता टिमोथी शेली समृद्धिशाली, आकर्षक व्यक्तित्व वाले, पर साधारण बुद्धि के जागीरदार थे, जिनकी राजनैतिक चेतना अपने दलनायक का शीख मीच कर समर्थन करने और धार्मिक ज्ञान रविवार को गिरजाघर जाने में ही सीमित था। साहित्यिकता से नितांत शून्य थे। श्रीमती शेती अत्यंत रूपवती, स्वास्थ्य सम्पन्न, और प्रसन्नचित्त महिला थी। यह स्वाभाविक ही था कि इनकी संतान भी सुन्दर होती। कुल सात बच्चे हुए थे । एक की मृत्यु बचपन में ही होंगयीं थी। चार लड़कियों और लड़के जीवित थे। बड़े लड़के का नाम रक्खा गया था, पर्सीयिशी शेली, जिसका वर्ण असाधारण रूप से शुभ्र था। यों, उसके अवयव कुडौल थे, पर मुख सुन्दर था और इस सौन्दर्य का विशेष आधार था, उसका छोटा, पर गोल मटोल चिकना चौड़ा माथा, जिसके ऊपर कच्चे सोने के से वर्ण वाले कोमल रेशमी कुन्तल घन्य शुणावलियों से लहराते; पर इन सबसे सुन्दर थे उसके दो नयन-सरोवर जिनकी विशाल परिधियों में, आकाश की सी अगाध नीलाहट सिमटी हुई थी, जिसमें से उठते भावों के मेघ न जाने किन पार्थिव-बिम्ब- शैलों से टकरा कर बरस बरस पड़ते थे और कवि का सम्पूर्ण आनन आत्मिक छवि-नीर से धुला-धुला सा रहता था, जिसकी निखरी सुघड़ाई पर विचरती दीसि देखने वाले की नजर को टिकने नहीं [वीन शेली ] देती थी। एक प्रसिद्ध चित्रकार ने कवि का पोर्टरेट' बनाने की अपनी असफलता की घोषणा करते हुए कहा, यह अत्यधिक सुन्दर है, और चित्रण की सीमा से बाहर है। आयु में बालक शेली को 'बार्नहम' के स्कूल में बिठा दिया गया। तत्पश्चात् , 'टफोर्ड' के 'सियोन्स-स्कूल में एक स्कॉच अध्यापक की देखरेख में उसने शिक्षा पाई । उसके शैशव में असाधारण गम्भीरता थी। चाँदनी रात में नीहारिकाओं को निहारते हुए घर से निकल कर शून्य पथों पर विचरता रहता। बूढ़ा नौकर चुपके से उसका पीछा करता, पर हमेशा वह खर्बर यही लाता कि विशी, सिर्फ घूमता ही रहा और घर वापस था आया। स्कूल में भी वह अपनी गम्भीरता के कारण 'सनकी' और 'अत्यत असामाजिक जीप' के नाम से विख्यात था। उसकी इस आदत से लड़के उसे और तंग करते, जब शेली के धैर्य का प्याला भर जाता, तब उसके बचपन के सखा और याद के जीवनी लेखक, कप्तान मैडविन के शब्दों में, 'उसकी आँखें, चीते की तरह जल उठतीं। वह एकाएक लपकता, अथवा जो भी कुछ हाथ पड़ता, उससे अाक्रमण कर देता" गणित से वह घबराता, नाच के सबक से दूर ही रहने की कोशिश करता, यदि मजबूरी रह ही जाना पड़ता, तो पैर ऐसे उठते, मानो शहीद कर लिया गया हो ! येन-कूद में उसे प्रायः गैरहाजिर पाया जाता। पर तो भी वह कुछ सीख रहा था। विद्वता ने अनजाने में ही उसका कर थाम लिया । 'ईटन' तक प्रवेश करते-करते मीक, लैटिन पर उसका असाधारण अधिकार हो गया। उसका समय 'प्लिनी के इतिहास के अनुवाद में, लैटिन की धारा प्रवाह तुक जोड़ने में कट रहा था। और तब वह कैशोर्य के किनारे पर से अपने चरण तरुणाई की तरणी में धर चुका था। पाठ्य पुस्तकें बच्चों के खेल के समान थीं। पर एक और चीज में उसकी रुचि बढ़ रही थी, वह थी उसकी भूत-प्रेतो, राक्षसों और तिलिस्मों की कौतूहल-नगरी, जिसके जादुई जगत का, वह अपनी कल्पना की दूरबीन से पर्यवेक्षण करता । सोते, जगते, उठते, बैठते, इन्हीं की रहस्य भरी छायाएँ उसके मानसिक जगत में धूमती रहतीं। और कुछ तो, उसके जीवन के अन्त तक अचेतन शिरात्रों में बसी, रूप बदल-बदल कर उसके काव्य और श्य-परिधि में प्रकट होकर उसे भरमाती रहीं। धार] घर में बच्चों को बड़ा प्यार करता, कंधों पर चढ़ा कर सैर कराता, जादूगरों और राक्षसों की नई-नई कहानियाँ सुनाता, कभी-कभी विचित्र वेपभूषा पहिन कर इनका अभिनय भी किया जाता। उसकी छोटी बहिन हेलेन के अनुसार, जब भाई ऐसे कपड़े पहिन कर घर भर में घूमता, तो इस आशंका में कि एक दिन इसके हाथों धर को अवश्य ही लपटों में राख होना है, किसी को संदेह न रह जाता। 'सियोन्स' से ईटन तक पहुँचने में, विज्ञान के प्रति उसका झुकाव और होचला था। ईटन की विज्ञान शाला का एक नौकर- सामान निकाल कर बेचने में बड़ा कुशल था, और शेली उसके सामान का सबसे बड़ा खरीदार था, क्असर नये-नये रासायनिक घोलों को मिलाकर वह अटपटे प्रयोग करता। अपने कमरे में एक रात को बत्ती जलाकर शेली एक विशेष प्रयोग कर रहा था, इतने में संरक्षय अध्यापक ने महसा प्रवेश किया, देखा कि शेली, कुछ 'गैल्वेनिक वोल्ट' फिट किये कुछ भाग की नीली लौ-सी उठा रहा है. कौतूहल और कुछ रोप से उसने पूछा, क्या हो रहा है ? 'राक्षस को उठा रहा हूँ' शेली ने बिना झिझक के उत्तर दिया । अध्यापक ने उस पत्र को छुआ ही था कि उसे बड़ी जोर का धका लगा और गिर पड़ा। छुट्टियां में घर आता, तो हाथ तेजान में जले होते, कपड़ों में छेप होतं, जो उसके विज्ञान प्रेम की कहानी को पुकार-पुकार कर कहते। पर शेली को विज्ञान के रोमानी पक्ष में ही रुचि थी, उसके ज्ञान पक्ष को वह कभी भी व्यवस्थित होकर अध्ययन नहीं कर सका। विज्ञान उसके सामने जादू की पिटारी की तरह था, और वैज्ञानिक हरशैल प्रीस्टले, डेवी, जादूगर थे। जीवन भर उसे इस पक्ष से मोह बना रहा । अपनी कविताओं में अनेक स्थान पर इसका वर्णन किया है। 'ईटन' में एक और शौक उसे था। प्रायः खाली समय में वह 'स्टोक पार्क के कब्रिस्तान में घूमा करता। सुनते हैं कि वहीं बैठकर 'प्रे ने अपनी प्रसिद्ध 'ऐलिजी' लिखी थी। यदि साथ में दोस्त होते, तो भूत प्रेनों की अनेक कहाँनियाँ बड़ी रुचि से सुनाता । अपनी प्रसिद्ध कविता 'गानसिक रूपश्री' के प्रति' में मानसिक स्थिति की झलक मिलती है- [ पाँच शेली] उठता, मुख पर जब था शिशु मैं फिरतातों की तलाश में, गुजित कक्षों, गुफा, ध्वंसों, मखत ज्योतिर्मय थन प्रान्तर में, मृत मानव के विषयगा, अतिशय बानों के मैं पीछे-पीछे, अपने भय कम्पित चरणों से घूमा करता I. मैं विषमय वचनावलियों को सुनता जिनको, सुनते-सुनते ऊब गया है तरुण भाग का, मैंने उनको सुभा, न, देग्या! [ 'मानसिक रूपश्री' के प्रति !] वह आरम्भ से ही हर प्रकार की सत्ता और निरंकुशता का विरोध करता। मैडविन के अनुसार, जब यह अन्याय था जुल्म की कोई बात पढ़ता या सुनता, तो उसका खून खौल और क्रोध झलकने लगता । एक दिन विद्यालय में शारीरिक श्रम-नियम का, जिसे वह 'संगठित क्रूरता' समझता था, खुले आम उल्लंघन कर उसने अधिकारियों से पर्याप्त दण्ड पाया। पर तबसे इस विस्मय- जनक अमामाजिक जीव से सभी परिचित हो गये और वह 'पागल शेली' या 'नास्तिक शेली' के नाम से प्रसिद्ध हो गया। 'ईटन' काल में ही उसे लेखक होने की धुन सवार थी। मैडविन और अपनी छोटी बहिन ऐलिजा के सहयोग से कुछ कवितायें और कहानियाँ भी उसने छपाई थीं। 'जस्ट्रोजी' नामक एक उपन्यास भी लिखा था, जिसे किसी प्रकाशक ने छापा भी था। इन्हीं दिनों ग्रीक दार्शनिकों की कृतियों के साथ-साथ प्रसिद्ध विचारक विलियम गोडविन की प्रसिद्ध कृति 'पॉलिटिकल जस्टिस' उसकी प्रिय मंगिनी बन गई, जिसने उसे इतनी गहराई से प्रभावित किया कि शेनी का सम्पूर्ण जीवन ही जैसे उसकी अनुगूंज बन गया। १८१० में उसने 'श्राफ्सफोर्ड विश्वविद्यालय में प्रवेश किया। इस काल का वर्णन 'टामस जैफरसन होग' ने अपनी शैली की जीवनी में बड़ा विशद और रोचक किया है । होग की प्रवृत्ति शेली से विपरीत थी, पर बौद्धिकता के सूत्र से दोनों घनिष्ठ हो गये थे। होग, शेली का बड़ा सम्मान करता था। उससे पहली भेंट हुई एक मध्याह्न भोज के समय । न जाने कैसे दोनों बहस में THE गये। विषय था जर्मनी का कविता स्कूल मौलिक है, अथवा इटली का । 2] [शेली हुए होग जर्मन स्कूल को अमौलिक और इटैलियन को मौलिक बताता था। शेली विरोध कर रहा था। बहस में कितनी देर हुई, इसका पता तब लगा, जब सब जा चुके थे, नोकर मेन साफ कर रहे थे। थोड़ी देर पश्चात् शेली होग के कमरे में पाया ओर शान्ति पूर्वक बोला, भई बहस मैंने फिजूल की थी, मुझे न इटैलियन आती है, न जर्मन, जो कुछ कहा था, वह अगरेजी अनुवादों के आधार पर है । तब होग ने भी स्वीकार किया, मैं भी दोनों में बिलकुल कोरा हूँ । सिर्फ दूसरों की कही बातें दुहरा रहा रहा था। "बात चीत का रस निबट चुकने के पश्चातू" हौग लिखता है, "मुझे इस असाधारण अतिथि को देखने का मौका मिला" "वह बहुत-सी असंगतियों का समूह था। उसकी आकृति पतली दुबली थी, पर तो भी उसके हड्डी के जोड़ चौड़े और मजबूत थे। लम्बा था, पर इतना मुका हुआ था कि कद छोटा लगता था। कपड़े कीमती थे और आधुनिकतम फैशन स सिले थे, पर सिकुड़े, गुडमुड़ी से और बिना अश किये थे। उसकी निगाहें उत्तेजना पूर्ण थीं, कभी-कभी भही भी लग उठती थीं, पर तो भी विनीत और शालीन थीं। उसका त्वचावण लगभग लड़कियों जैसा कोमल, विशुद्धतम लाल और श्वेत वर्ण का था। तीमी सूरज की धूपसं रूखासूखा सा लगता था, जैसा कि उसने बताया कि वह जाड़े भर 'शूटिंग' करता रहा है। उसके अवयव, उसका सम्पूर्ण आनन विशेष रूप से उसका सिर सब असाधारण रूप से छोटे थे। पर याद का, लम्बे और घने केशों के कारण भारी मालूम देता था। खोई-सी-स्थिति में, अथवा विचारों की उत्तेजना में, या गुस्से में, वह हाथों से उन्हें जोर-जोर से मलने लगता था अथवा उँगलियों को वह केश गुच्छों में वह इतनी तेजी से चलाने लगता था कि वे भद्दे और वन्य प्रतीत होते थे।" आवाज असहनीय रूप से पैनी और कर्णकटु और फटी-फटी सी थी। इसके पश्चात् शेलो और हौग परम मित्र होगये होग ने अपने संस्मरणों में शेली के तत्कालीन जीयन के अनक रोचक तथ्यों को सुरक्षित रक्खा है। शेली इन दिनों प्लेटो, 'तिनी', 'सोफोल्कीज', 'कोल्ड्रन' और 'गॉडविन' की कृतियों के साथ, इग्लैंड के प्रसिद्ध विचारक लॉक और 'ह्यम' तथा फ्रांसिसी निबंधकारों का अध्ययन करता था। उसके पढ़ने के बारे में होग लिखता है, [ বার . रोली ] "इतना अधिक कोई विद्यार्थी नहीं पढ़ता था, हर समय उसके हाथ में पुस्तक रहती थी। मौसम, बेमौसम, मेज पर, खाट पर, टहलले समय शान्तिमय गाँवों में या सूनी पगडण्डियों पर ही नहीं, वरन् लंदन के आम रास्तों, और भीड़ भरी सड़को परदिन और रात का तीन चौथाई समय यह अध्ययन में लगाता था। पढ़ना उसके उन्माद को सीमा तक था। " उसके पढ़ने के विषय में उसके मित्र 'पीकोक' ने भी लिखा है कि किताबों में प्रायः वह ऐसा खो जाता था कि खाना घरा-घरा घण्टों -सूखा करता । ट्रिलोनी ने भी अपने संस्मरणों में उसके एक हाथ से नाव का चप्पू और दूसरे में किताब पढ़ते रहने और फलस्वरूप डूबने से बचाये जाने का रोचक वृत्तांत दिया है। शेली का सोना भी बड़ा विचित्र था, इतना गहरा सोता था कि उसकी नींद बेहोशी मालूम देती थी। बहस करते-करते वह अचानक सो जाता और खर्राटे लेने लगता, सोते-सोते बड़बड़ाना। बाहर निकल कर चल देना, दिवास्वप्न देखना, उसकी साधारण भारत थी। सोने के बाद उठते ही, बहस की छूटी--हुई-फड़ी को फिर तुरन्त उठा लेता! शेली का नैतिक स्तर बड़ा ऊँचा था। प्रेम उसकी रग-रग में समाया था। हृदय इया और उदारता से लबालब भरा था। होग लिखता है, "किसी भी व्यक्ति में शायद ही नैतिक भावना कभी इतनी पूर्णरूप से रही थी, जितनी शेली में थी, ''अच्छे और बुरे के ऊपर शायद ही किसी की दृष्टि इतनी तीन हो' 'जितनी उसकी बौद्धिक प्रवृत्तियाँ तीन थीं, जितनी प्रबल उसकी प्रतिभा का वेग था, उतनी ही पवित्रता और उश्चता उसके जीवन में थी।" लिखने के साथ-साथ उसके साहित्यिक प्रयत्न भी चल रहे थे। एक दिन पिता टिमोथी शेली ने प्रकाशक 'स्टोकडेल' से कहा, । 'देखो मेरे इस बेटे को साहित्य से शौक है, यह लेखक पहले से भी है। यदि इसे छपाने की कोई सनक आये, तो प्रोत्साहन देते रहना" कुछ मास पश्चात् पुत्र को जो पहली छपाने की सनक उठी, उसने न केवल 'आक्सफोर्ड के ही, वरन अपने पिता के भी घर के दरवाजों को भी सदा के लिये बन्द कर दिया। पाठ] [शेली गया, नास्तिकवाद की आवश्यकता पर उसने एक पर्चा छपवाया, जिसमें शायद हौग का भी हाथ था। सभी प्रमुख स्थानों पर भेजा। इसका प्रकाशन शेली के जीवन की एक बड़ी घटना थी। तब विश्व- विद्यालयों पर पादरियों का पूरा शासन था। अधिकारियों के पर्चे हाथ पड़ते ही शेली और होग विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिये गये। एक ही झटके में कृशकाय तरुणाई की तरणी का लंगर टूट और यह जर्जर पाल के सहारे, आवेश की आँधी में जीवन सागर की अपरिसीमा को अपनी गति में बाँधने चल पड़ी! दूसरे दिन मार्च २६, १८११ को वे आक्सफोर्ड छोड़कर लंदन चल दिये और पौलेएड स्ट्रीट के एक मकान में रहने लगे। जन पिता ने सुना तो उसकी कड़ी भर्तस्ना करते हुए उसे लिखा 'अधिकारियों से तुरन्त क्षमा माँगो' । पर सिद्धान्त-शिला से तराशी मूर्ति ने तुरन्त ही यह अस्वीकार कर दिया! खर्च बन्द कर दिया गया । पिता ने कपूत को अपना गुंह दिखाने की भी सख्न मनाही करदी। दूसरे झकोर ने तरणी के पाल भी उखाड़ दिये। पर अभी स्नेहदीप की पतिका उसके अगम अँधेरे जलपंथ को जगमगा रही थी। 'ईदन' के दिनों में उसका स्नेह सम्बंध 'कैरियत ग्रोव' से हो चुका था, जिसके परिणय की स्वीकृति दोनों परिवारों की ओर से मिल चुकी थी। हैरियट अत्यंत सुन्दरी थी, उसका बौद्धिक स्तर भी साधारण लड़कियों की अपेक्षा उच्च था। शेली के हाथ संघर्ष के थपेड़े खाकर, अवंश भाव से उसी को खोज रहे थे। तरणी के खेवन हार को असीम श्राकाश और सिन्धु की अंधेरी में प्यार के उसी दीपक का सहारा था। हैरियट का भी उत्तर मिल गया, यह नास्तिक शेली से घृणा करती है ! हाथ बे आसरे छटपटाते रह गये। तुब्ध सिन्धु की हिल्लोलों के शीश पर पालहीन, पतवार हीन, आश्रयहीन तरणी मचलती रही। हैरियट का विवाह कुछ काल पश्चात् 'भूमि के जीव' से होगया, होग भी अपने वकालत के अध्ययन के लिये उसे छोड़ कर चला गया । - शेली ] [ नौ शेली के दिन अत्यंत कठिनाई से कटने लगे। तभी परिचय हुआ उसका दूसरी 'हरियट' से, मिस हैरियट वैस्टबुक से । लंदन में पढ़ने घाली शेली की बहिनें अपने जेबखर्च को, इकट्ठा कर अपनी सहेली हैरियट कैस्टक के हाथ भिजवाने लगी। मिस वैस्टबुक जो एक धनी होटल वाले की स्वस्थ और सुन्दर कन्या थी, शेली की ओर आकर्षित हुई। उसके घर वालों ने भी, विशेषकर उसकी बड़ी बहिन, मिस ऐलिजाबेथ वैस्टवक ने उसके एक बड़ी जागीरदार के उत्तराधिकारी होने की लालसा को प्रोत्साहन दिया, और एक दिन शेली को उसके घर वालों के क्रूरतापूर्ण 'अन्याय' से उसकी 'रक्षा' करने के लिए विवश होना पड़ा, और अगस्त २८, १८११ को 'एडिनबरा' जाकर शेली और हैरियट' का परिणय-सम्बंध हो गया। यहाँ यह स्मरणीय है कि शेली हैरियट को चाहता अवश्य था, शायद इसलिये कि उस पर 'अन्याय' किया गया था, पर 'प्रेम' जैसी भावना उसके प्रति नहीं थी। पर उसने यह सोच कर कि उसकी इस स्थिति के लिये वह स्वयं ही 'उत्तरदायी है, उसे विवाह कर बचाना अपना नैतिक कर्तव्य समझा। यहाँ वे अत्यंत फठिन आर्थिक परिस्थिति में गुजर रहे थे, पर तो भी प्रसन्न चित्त थे। यही उनके साथ, रहने को उनका मित्र होग भी था गया। तदनंतर हैरियद की बड़ी बहिन मिस ऐलिजाबेथ वैस्टबुक भी आगई, और शेली की अनिच्छा, पर हैरियट की इच्छा से उसने सारे घर की बागडोर भी अपने हाथ में लेनी। इन दिनों शेली का अधिकांश समय पढ़ने लिखने में ही कट रहा था। हैरियट के अन्दर भी अध्ययन के प्रति रुचि जागृत हो रही थी। शेली का आर्थिक मामलों पर पिता से झगड़ा चल रहा था, इसलिये उसे 'फील्डप्लेस' जाना पड़ता था। यहीं उसकी भेंट अध्यापिका मिस एलिजाबेथ हिचनर से हुई, जिसके उन्नत विचारों से शेली बड़ा प्रभावित हुआ। दोनों में काफी समय तक पत्र-व्यवहार हुआ। वह अपने स्थान को छोड़कर शेली परिवार के साथ भी रही, पर निकटता ने दूर फेंक दिया। वह तो साधारण विचारों की सी निकली ! उसका 'स्पैटोनिक-इश्क' टूट गया, और वह भी 'नास्तिक शेली' के कारण अपनी 'खोई' प्रतिष्ठा के लिये हरजाने के तौर पर कुछ वार्षिक धन का पचन लेकर पृथक् हो गई । 'यूफ-ऑफ- नौरफौक' के बीच में पड़ने से मि० टिमोथी रोजी ने शेती को दो सौ पाउण्ड वार्षिक बाँध दिया । इस प्रकार गृहस्थ इस] [शेती की गाड़ी बन निकली जो ऐडिनबरा से होती हुई, 'कैस्विक' पर आकर रुक गई । यहाँ पर शेली की भेंट महाकवि 'सदे' से हुई। सदे ने विचारों की भिन्नता के वावजूद शेली के साथ बड़ी नम्रता और स्नेह का व्यवहार किया । पर शीघ्र ही शेली की सदे.के प्रतिक्रियावादी विचारों से उसकी महानता के प्रति धारणा बदल गई। उसने इन दिनों के अपने एक पत्र में लिखा, "सदे के बारे में अब मेरे पहले जैसे ऊँचे विचार नहीं हैं, उसका मस्तिष्क अत्यंत संकीर्ण है, मेरे हृदय को चोट पहुँचती है, वह सोचकर कि वह क्या हो सकता है, पर क्या है..." कैस्विक' की अन्य महत्वपूर्ण घटना थी, मि० विलियम गौडविन से पत्र-व्यवहार । शेली ने गौडविन को अपना संरक्षक और मार्ग प्रदर्शक चुनी। गौरविन ने भी इस दुर्द्धर्ष शक्ति को संयत कर इसको उचित उपयोग की दिशा में प्रवर्तित करने का कार्य हाथ में ले लिया। आगे चलकर इस सम्बंध का बड़ा व्यापक प्रभाव पड़ा। इसके कुछ दिन पश्चात् ही शेली और हैरियट आयरलैण्ड के कैथोलिक मुक्ति संग्राम में भाग लेने के लिये चल पड़े, जहाँ उन्होंने 'आइरिश जनता के नाम' शीर्षक एक पर्चा निकाला। कुछ हलचल करने के पश्चात् वे वापस चले आये । तत्पश्चात् , 'उत्तरी वेल्स' में रहकर उन्होंने अपना राजनैतिक प्रचार जारी रखा। कुछ पर्चे भी निकाले, जिनमें 'अधिकारों की घोषणा' और 'लार्ड लिमबरा को एक पत्र' प्रमुख हैं। १८१२ के बसंत काल में कवि पर्सीविशी शेली ने अपनी प्रथम गम्भीर रचना 'कीन मैब' नाम से प्रस्तुतकी, जिसमें उसने विवाह धर्म, राजनीति, समाज, वणिज, इत्यादि पर विचार प्रकट किये। शेली की विचार धारा को समझने के लिये यह पुस्तक अत्यंत बहुमूल्य है, यद्यपि कविता की दृष्टि से अपेक्षाकृत उत्कृष्ट नहीं है। इसका प्रचलन उसने सीमित ही रखा । इसकी समाज में बड़ी निन्दात्मक प्रतिक्रिया हुई । इन्हीं दिनों शेली पर दो बार सांघातिक प्रहार भी हुश्रा। कुछ लोग इसे शेली का दिवास्वप्न जिनकी 'असे आदत थी, बताते हैं, पर अधिकांश की धारणा यही है कि वे वास्तविक घटनाएँ थी। यहाँ उन्हें घोर आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ा। शेली अपने सिद्धान्तों की रक्षा और शहादत के जोश में सब सह रहा था, पर हैरियट का धैर्य चुक गया था । अपने ऋणदाताओं से आँख मिचौनी करते एक घर से दूसरा घर बदलते फिरते थे। १८१३ में हैरियट के एक पुत्री उत्पन्न हुई, जिसका नाम 'इयान्थे' रखा, शेली इसे बड़ा शेली ] - [ ग्यारह प्यार करता था, पर हैरियट का मास्नेह, पितृस्नेह के बराबर न था, अधर आर्थिक संकटों के साथ-साथ मिस ऐलिजाबेथ वैस्ट के घर में निरंतर कलहा का कारण बन रही थी। निदान शेली के पीछे एक दिन हैरियट अपनी बहिन के साथ अपने घर चली गई। शेली इन दिनों गोडविन-परिवार में आता जाता था, जहाँ उसकी भेंट गोडविन पुत्रियों' से हुई हैरियट की उपेक्षा ने शेली को दूर ठेल दिया, और अब वह अधिकाधिक मेरी गोडविन की ओर आकर्षित होने लगा। लन्दन में अपने पिता के घर हैरियट ने दूसरे पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम चार्ल्स बिसी शेली रक्खा गया। कुछ लोगशेली की इस बात का कि यह यालक उसके सम्बंध से नहीं था, समर्थन करते हैं। पर इस सब के बावजूद भी, शेती का हैरियट के साथ व्यवहार सदा ही बड़ा उदार रहा । वह दूर रहते हुए भी संरक्षक की भाँति उसकी कठिनाइयों की देख रेख करता था और आर्थिक सहायता भेजता था। थोड़े दिन उपरांत, शेली और मेरी परस्पर स्नेह-सूत्र में गुंथ गये। मेरी अत्यंत सुगरी और स्वतंत्र विचारों वाली तरुणी थी, और ऐसा होना स्वाभाविक था। उसका पिता गोडविन इग्लैंड की महान वैचारिक क्रान्ति का प्रणेता था, और माँ, चूल्टोनक्राफ्ट सर्व प्रथम क्रान्तिकारिणी महिलाओं में से थी, जिन्होंने नारी की स्वस्वरक्षा की बावाज उठाई थी। शेली के सौन्दर्य से भी अधिक उसकी मान- यीयता और शिशुसुलभ स्वभाव ने मेरी को मोह लिया। कवि का भी उसके प्रति बड़ा आकर्षण था। वस्तुत: 'प्रेम' जैसी वस्तु से परिचय उसका अभी ही हुआ। दोनों लैंड छोड़ कर चले गये। साथ में 'क्लेरा' भी गई । गोडविन और श्रीमती गोडविन दोनों शेली से बड़े नाराज हो गये। यह तरुण दल फ्रांस धूमता हुधा, वहाँ के नष्ट भ्रट अकाल- ग्रसित गाँवों और नगरों में घूमता हुआ स्विटजरलैण्ड पहुँचा। उसके 'रिवोल्ट आफ इस्लाम' में अनेक स्थलों पर इस विभीषिका की स्मृति का घना स्पर्श है, 'आतिथ्य' शीर्षक हमारे काव्यांश, का आधार, जिसमें युद्ध के तूफान में टूटी हुई सधः पुत्रहीना मा के दैन्य और 'मिस मेरी बूलस्टोनक्राफ्ट गोडविन-पहिली स्त्री से, मिस जैनी बलेरामेपट था क्लेरासरी पत्नी के पहले पति से--मिस पैनी 'गोविन- (दूसरी स्त्री से) बारह ] [रोक्षी शोक की परम मानसिक स्थिति का, उजड़े घरों, और लाशों की पट- भूमि पर चित्रण किया है, कोरी कल्पना नहीं है, वरन ऐसी एक यथार्थ स्मृति है जिसकी कटुता कवि के उर में गहराई से प्रवेश कर चुकी थी, और अनेक कविताओं में, उसकी युद्ध-विरोधी-पुकारों में यही नरहिंसा विरोधी-प्रतिक्रिया गूंजती रही। इस यात्रा का प्रमुख ठहराव स्विटजरलैण्ड का 'न नों' स्थान रहा, पर आर्थिक संकट के कारण दल को पुनः लौटना पड़ा। यद्यपि गोडविन शेली से अत्यंत अग्रसन्न था, बड़े-कड़े पत्र लिखता था, पर अपने कर्जदारों से निष्कृति पाने के लिये अपने इस अवैध जामात्रा को ही विवश करता था। शेली के ऊपर लदे ऋण के इतने बड़े बोझे के प्रमुव कारण यही गोडविन महाशय थे। तभी शेली के सौभाग्य से, उसके बाया मर बिसी शेली की अत्यंत परिपक्व आयु में मृत्यु हो गई। लगके पिता, टिमोथी शेली अब सर टिमोथी शेली हो गये, और कानून के अनुसार सम्पत्ति का उत्तराधिकारी, अब शेली हो गया। उसे और उसके अवैध श्वसुर गोडविन, तत्काल ही एक बड़ी सीमा तक ऋणग्रस्ति से मुक्त हो गये। लगभग एक सहल पा० की वार्षिक आय में ने, बोसौ पा० वार्षिक हैरियट को बाँध दिये। शेली का इन दिनों स्वास्थ्य बहुत गिर गया था। मेरी के प्रथम, शिशु-जो एक लड़की थी की मृत्यु हो जाने के कारण उसे और शोक पहुँचा । टेम्स नदी से ले चलैण्डतक को यात्रा से, जिसमें मेरी, क्लेरा, और शेली के अतिरिक्त, क्लेरा का भाई चार्ल्स भी था, शेली के स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ा। जौटने पर उसने 'ऐलास्टर' (१८१५ ई०) नाम की एक लम्बी कविता लिखी, जिसमें प्राकृतिक सौंदर्य के अपूर्व चित्रण के साथ-साथ प्लेटो के सौन्दर्य के सिद्धान्त की एक कवि की यात्रा में अच्छी व्यंजना हुई है। इसमें कथा-प्रवाह अल्प है, सौन्दर्य की खोज में कयि के चरण जहाँ-जहाँ पड़ते हैं शेली ने उसकी पृष्ठभूमि में चल-नैसर्गिक दृश्यों का बड़ा सुन्दर चित्रण किया है। प्रस्तुत संग्रह में 'कवि का अवसान' शीर्षक से 'ऐलास्टर के काव्यांश में सौन्दर्य- शोध में असफल कवि की कारुणिक मृत्यु का मर्मस्पर्शी चित्र खींचा है, जिसकी पटभूमि में, प्रकृति के स्पंदित बिम्ब को अक्षित कर, शेली और [ रद शेती] भी मार्मिक बना देता है। इसमें शेली का कला-पक्ष सचमुच निखर उठा है। - २४ जनवरी १८१६ को मेरी के दूसरा शिशु, अब के लड़का विलियम शेली-पैदा हुआ । गत यात्रा में, शेली का जिनोत्रा में नार्ड बायरन से मिलन हुआ था, जहाँ क्लेरा और बायरन का परस्पर प्रेम सम्बंध हो गया, इसके परिणाम स्वरूप क्लेरा के एक पुत्री ऐलेगोरा- हुई। इसी बीच नदी में डूब कर हैरियट की आत्महत्या का दुखद समाचर मिला' शेली ने अपने दोनों बच्चों 'इयान्थे,' और 'चार्ल्स को लेने की कोशिश की, या हैरियट के पिता, मि० वैस्टक ने 'चांसरी कोर्ट में बच्चे शेली को न दिये जाने का प्रार्थना-पत्र दिया। लार्ड चांसलर 'ऐल्डन' ने अपना निर्णय देते हुए कहा "चूकि शेली ने 'कीनमैय' लिखा है, जिसमें उसने 'नास्तिकवाद' का प्रचार किया है, और चूंकि वह ईसाई विवाह पद्धति पर आस्था नहीं रखता, इसलिये बच्चों के भावी हित को ध्यान में रखते हुए उसे इन बच्चों के पिता होने के अधिकार से वंचित किया जाता है। "और बच्चों के इन हितैषियों ने 'कास्तिक पिता' को बच्चे न लौटाये। शेली इस आघात को कभी न भूला । शोषकों के विरुद्ध उसकी घृणा और तीखी हो गई। अपनी अनेक कविताओं में इस घटना की अभिव्यक्ति की है। लार्ड चांसलर को सम्बोधित करते हुए, उसने एक कविता लिखी जिसकी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं। हरे देश का शाप तुम पर है, न्याय बेच दिया, सस्य कुचल दिया, प्रकृति के पवित्र चिह्नों को मिटा दिया, और कपट से पटोरी गई स्वर्ण राशियों, के, ध्वंस के सिंहासन पर गर्जना के स्वर में करती है वकालत !" 'मास्क माफ ऐना' शीर्षक अपनी १८१६ की रचना में लार्ड ऐल्डन को इन शब्दों में याद किया है। 'इसके एक समाह पश्चात्, शेली और मेरी की प्रेमभाजन, भावुक फेनी ने भी अपने शरीर का पास्महत्या द्वारा अंत कर लिया बोग इसका कारण शेली से असफल प्रेम करने, अन्य श्रीमती गोविम के व्यवहार को उत्तरदायी बताते हैं। चौदह ] [ शेती "इसके बाद कपट' माया, जो रोने में या पदा कुशल, 'बाई ऐक्खन के समान फर चोगा, पहिने हुए धवल, एक-एक मास् चक्की का पाट बना गिरता भूपर । छोटे-छोटे बच्चे जो उसके समीप थे खेल रहे। भाते उन्हें उठाने, हीरों की प्रतीति में मेल रहे। माथे पर वे चोट, कपट के अनुविन्दु से टकरा कर" इसी संग्रह में संकलित 'विलियम शेली के प्रति' शीर्षक कविता में भी इसका अत्यंत स्पष्ट संकेत दिया है। लंदन में रहते हुए शेली का परिचय तत्कालीन निबंधकार और कवि ले हन्ट' से हो गया जो आगे चल मृत्युपर्यंत की प्रगाढ़ मैत्री में परिणत हुआ । 'ले हन्ट' के ही यहाँ, शेली की भेंट ५ फर्वरी १८१७, को, जॉन कीटस से हुई, दोनों में घनिष्ठ मित्रता नहीं थी, पर स्नेह सम्बंध अवश्य था। यह काल और भी दृष्टियों से महत्वपूर्ण है, इन्हीं दिनों शेली का विवाह भी धार्मिक रीति से 'सम्पन्न हुआ, क्योंकि यह डर हो चला था कि कहीं शोषक, 'विलियम' को भी न चीन लें। इस विवाह से शेली गोडविन का 'वैध' जामात्रा हो गया । और दोनों के सम्बंध भी पुनः अच्छे होगये। इस काल में शेली ने अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों का प्रणयन किया। 'प्रिंस ऐथानीज' 'रोजालिण्ड एण्ड हैलेन' 'लाभो एएड सिन्थिया' जो बाद में 'रिवोल्ट आफ इसलाम के नाम से प्रकाशित हुआ, इसी काल की रचनायें हैं। इनमें अन्तिम बहुत महत्वपूर्ण है। इसमें सुधारक शेली और कवि शेली ने मिल कर क्रान्ति की एक तस्वीर पेश की है जिसका कथा प्रवाह रोचक है, पर काव्य की दृष्टि से अनेक स्थल महत्व के हैं। २ सितम्बर १८१७ को मेरी के तीसरा शिशु एक लड़की पैदा हुई जिसका नाम 'कारा' रक्खा । शेली का स्वास्थ्य फिर खराव हो चला था, हैरियट और फेनी की दुखद मृत्यु, बच्चों को छीने जाने का शोक, और तीसरे शिशु से भी वंचित किये जाने का भय, यह सब उसके बिगड़े स्वास्थ्य के कारण थे। उधर जैनी के सम्बन्ध में लार्ड पायरन से मिलकर बात करने की आवश्यकता थी। इङ्गालैण्ड की चप्पा-चप्पा भूमि मास्तिक और विद्रोही कवि को काटने दौड़ रही थी। इसलिए शेली ] [ पंद्रह १२-मार्च १८१८ को शेनी अपने परिवार सहित इटली के लिए अपनी जन्म भूमि से प्रस्थान कर गया । जहाँ से बह फिर कभी न लौटा । इटली का यह प्रयास शेली की काव्य-कला को परिपक्वतर बनाने में वड़ा सहायक हुश्रा । इटली की सुरम्य भूमि की नयनहारी सुषमा के बीच अनेक प्रसिद्ध कविताओं का प्रणयन हुा । यह दिन उसकी रचना काल के चरम उत्कर्ष के दिन थे। लार्ड बायरन से शेली अकेले ही मिलने गया। वह उन दिनों वन्ना' में था। बायरन ने 'ऐलोगोरा' (तरा से अवैध पुत्री) को सुदूर एक कारागृह जैसे एक कान्वेन्ट में भेज दिया गया, जहाँ उसकी कुछ वर्ष पश्चात् महामारी के प्रकोप में मृत्यु हो गई। इन दिनों शेली को यायरन के स्वभाव को निकट से परखने का अवसर मिला। बायरन के क्लोरा और ऐलोगोरा के प्रति कठोर व्यवहार ने उसे शेली की आँखों में गिरा दिया। यो उनकी परस्पर मित्रता बनी रही। इन्हीं दिनों इटली के भिन्न भिन्न प्रदेशों में घूमते हुए उनके दोनों बच्चों का दहान्त हो गया। लेकिन १८१६ में मेरी के चौथा बालक, एक पुत्र पैदा हुआ। जिसका नाम पर्सी फ्लोरेंस शेली रखा जो शेलिगों के वंश को चलाता हुआ १८८६ ई० तक जिया । यहाँ के प्रमुख मित्रों में बायरन के अतिरिक्त गिसबोर्न-परिवार विशेष रूप से उल्लेखनीय है । उसकी एक कविता जो श्रीमती गिस- बोने को एक पत्र रूप में लिखी थी। उसके जीवन-विपयक अनेक तयों पर प्रकाश डालती है। यहीं उसका परिचय एक इटैलियन निम्न वर्ग की महिला सुन्दरी 'कौन्टेसीना विवियानी' से हुआ, जिसके दैनिक प्रेम की प्रेरणा 'ऐपिपसाइसीडियन' (१८२० ई०) के काव्य में प्रस्फुटित हुई । इस काव्य में प्रेम की 'ल्टोनिक प्रेम की बड़ी मर्मस्पर्शी व्यंजना हुई । पर इससे पूर्व शेली की अनेक महत्वपूर्ण रचनायें लिखी जा चुकी थीं। 'जूलियन और मंडालो' (१८१८ ई०) में शेली ने अपनी और बायरन की एक सार्यकाल की बातचीत को ही पथरूप में अभिव्यक्त किया है । 'बाथ आफ फैराकेला' के बसों के बीच शैली के अमर काव्य 'प्रोमेथियस अनबाउण्ड (१८१६ ई०) के तीन खंडों की रचना हुई। यह काव्य प्रमुख रूप से प्रगीतमय है, प्राचीन ग्रीक कथा का आश्रय लेकर शेली की कल्पना समूचे दिगदिगंत को अपनी दृश्य परिधि में बाँध कर अमर मानवता की मुक्ति का महागान गाती सोलह ] [ शेक्षी हुई, काव्य-शक्ति की पराकाष्ठा पर पहुँची है। यह अमर कवि की अमर रचना है, और विश्व-काव्य-कानन का अन्यतम पुष्प है। हमारे 'धरतीमाता' तथा प्रगीत अंश इस गौरवशाली काव्य का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ हैं, इसकी पूर्ण शक्ति का अनुभव समग्र काव्य के अध्ययन से ही हो सकता है । यह काल इग्लैण्ड तथा मध्य यूरोप में उथल पुथल का काल है। १८१६ के पीटरलू (मैनचेस्टर) में हुए मजदूरों पर गोली कांड ने, पहले श्रमिक वर्ग के संगठित आन्दोलन ने शेली की कविता धारा को नई शक्ति दी। इस हत्याकांड पर उसने प्रसिद्ध 'मास्क आफ ऐनार्की' की रचना की। हमने इसी संग्रह में 'आह्वान' शीर्षक से उसके कतिपय पदों का अनुवाद किया है, जो शेली के बढ़ते हुए समाज- बादी दृष्टिकोण का व्यक्तीकरण करता है। इसी कविता के साथ इसी काल की उल्लेखनीय अन्य कविताओं में 'केशरलिय के शासन' में, 'इग्लैण्ड के मनुष्यों से', 'इग्लैण्ड १८१६', 'स्वाधीनता के रक्षकों से' शीर्षक राजनीतिक कविताएँ हैं। वई सवर्थ के 'पीटर बैल-द फर्स्ट' पर लिखा शेली का व्यंग काव्य, पीटर बैल-द थर्ड, इसी काल की बेजोड़ व्यंग-रचना है। १५२० ई० के वर्ष में शेली के सर्वप्रसिद्ध लधुगीत और प्रगीतों का-'पाश्चात्य प्रभजन' के प्रति, 'बादल,' 'अबाबील' 'स्वाधीनता के प्रति नैपिल्स के प्रति, इत्यादि का प्रणयन हुआ। वृहद काव्य में, "विच आफ ऐटलस' 'ऐपिपसाइशीसियन' और व्यंग 'काव्य 'स्वेलोफुट-द टाइरेन्ट' प्रमुख हैं। २३ मई १५२१ को रोम में कीटस की उसके क्षय रोग एवं आलोचकों की निन्दात्मक आलोचनाओं से, मृत्यु हो गई, जिस पर शेली ने अपना शोककाव्य 'ऐडोनेस' लिखा-जो अँगरेजी साहित्य में शोकगीतों (ऐलेजी) में सर्वोत्कृष्ट समझा जाता है। इस काव्य में मानवीय संवेदना अत्यंत उत्कृष्ट कलात्मकता के साथ प्रकट हुई है। इसी वर्ष शेली की मित्रता 'पीसा में यूनान के विद्रोही राजकुमार प्रिंस अलेक्जेन्डर माकोवाडाटो से हुई, जिसकी प्रेरणा से हेलास (१८२०ई०) काव्य की रचना हुई-जो इसी मित्र को ही समर्पित किया गया है-हैलास' शेली की 'हेलेनिक कल्चर' को अनूठी श्रद्धांजलि है, उनके नये जागरण का जिसका नेतृत्व उसी ग्रीक प्रिंस के हाथ में था-काव्य है । यहाँ इस काल के एक और मित्र परिवार का उल्लेख अत्यावश्यक शेनी] [ सत्तरह है, वह है विलियम और श्रीमती जेनी विलियम । शेली की अन्तिम काल की रचनाओं में लगभग आधा दर्जन कवितायें इन्हीं को संबोधित करते हुए लिखी हैं । यह परिवार शेली परिवार के अन्तिम समय तक साथ रहा । इनमें परस्पर अत्यंत स्नेह और घनिष्ठता थी। इन्हीं के द्वारा शेली का परिचय, उसके अन्तिम काल के मित्र और बाद के जीवनी लेखक 'दिलोनी' से हुआ। ट्रिलोनी, विलियम का पुराना मित्र था, यह देश विदेश का साहसी घुमक्कड़ यात्री, साहित्य से भी परम अनुराग रखता था। शीघ्र ही, कवि से इसकी प्रगाढ़ मित्रता होगई और उनकी गोष्ठी में उसने अपना प्रमुख स्थान बना लिया। ट्रिलोनी ने अपने संस्मरणों में कवि से प्रथम भेंट का बड़ा रोचक वर्णन किया है। वह लिखता है- "हम लोग (टिलोनी, श्री, एवं श्रीमती विलियम) बैठे बात चीत कर रहे थे। मैं चौंक उठा-अन्धेरे में दो आँखें चमक रही थी श्रीमती विलियम मेरी आँखों का अनुसरण करती हुई और द्वार पर जाती हुई हँसती बोली, "आओ न शेली ! ये हमारे मित्र 'ट्रि' हैं," अभी आये हैं।" "तुत गति से निःशब्द आते हुए लड़कियों के समान झेपते हुए एक लम्बे पतले से व्यक्ति ने प्रवेश किया और यधपि मैं उसकी ओर देख कर शायद ही विश्वास कर सका कि यह भी कोई कवि हो सकता है तो भी मैंने प्रसन्नता से हाथ मिलाया।मैं आश्चर्य से अवाक था, क्या यह विनम्र स्मश्रुविहीन लड़का भी वह दुर्दम दानव हो सकता है, जो सारी दुनिया से लोहा ले रहा हो ? चर्च के पादरियों द्वारा बहिष्कृत, लार्ड चांसलर द्वारा नागरिक अधिकारों से वंचित और हमारे साहित्य के प्रतिद्वन्द्वी संतों द्वारा 'शैतान स्कूल के संस्थापक के रूप में निन्दित ।..... 'अवश्य यह सब छल है। उसकी श्रादतें 'लड़के जैसी थी । दर्जी द्वारा बेढंगी सिले काली जाकिट और पायजामा पहिने था। श्रीमती विलियम ने मेरी परेशानी को भाँप लिया, मुझे छुटकारा देने को उससे पूछा 'कौनसी पुस्तक है हाथ में ? उसका चहरा खिल उठा, तुरन्त उत्तर दिया, "कोल्डरेन की 'मेजीको प्रोजीवियोको' में इसका अनुवाद कर रहा हूँ।" अठारह ] [ ली में 'तो पढ़ो कुछ हमें भी अपने अरुचिफर साधारण घटनाओं के तट से हट कर जैसे यह निज प्रिय वस्तु को पा गया। तब सिवाय पुस्तक के कुछ और ध्यान न रहा। जिस अधिकारपूर्ण ढंग से उसने लेखक की प्रतिभा का विश्लेषण, कथा की सरल व्याख्या और जिस सहज भाव से स्पेनिश कवि के अत्यंत गम्भीर और कल्पनापूर्ण पदों का अगरेजी अनुवाद किया, वे अद्भुत थे! इस स्पर्श के पश्चात् मुझे उसकी पहिचान में संदेह न रहा। एक गहरी खामोशी छा गई। ऊपर दृष्टि उठा कर मैंने पूछा, 'कहाँ है यह श्रीमती विलियम बोली, "कौन ? शेली ! अरे, वह तो प्रेत के समान आता और चला जाता है, कोई नहीं जानता कि कब और कहाँ ?" इससे पूर्व, अगस्त १८२१ में म्यूसियोली पेलेस में यह बायरन का अतिथि रहा, जहाँ दोनों ने मिल कर ले हन्ट को इंगलैण्ड से बुला कर 'लिबरन' नाम से एक पत्र निकालने का निश्चय किया । ५ जुलाई १८२९ को इंट आ गया । शेली अपने मित्र से मिलने, 'कासामेग्नी' से (जहाँ, शेली और विलियम के परिवार रहते थे) पीसा गया। ७ जुलाई को तीनों मित्र पीसा में घूम रहे थे । सहसा शेली ने हंट की ओर मुड़ कर कहा, "यदि कल मारा भी जाऊँ तो भी अपने पिता की आयु से अधिक जी लिया। मेरी श्रायु नव्वे वर्ष की है." कैसी भविष्य वाणी थी! जुलाई ८, को अपनी छोटी सी नौका पर, बैठकर शेली और विलियम, अपने तरुण माझी, चार्ल्स के साथ 'कासामेंग्नी' चल दिये। समन्दर में तूफान उठरहा था। छोटी सी नौका की क्या बिसात ? 'इसके कुछ बरस पश्चात् एक पादरी के सामने 'पाप स्वीकारोक्ति में एक मल्लाह ने बताया, जिसमें पता चला कि शेली की सूफान में घिरी नाव पर इटैलियन जलदस्युओं ने लार्ड थायरन की नौका समझ कर, सोने के लालच में पाक्रमण किया था। यदि उपरिथुक्त बात पथ है तो इससे यही पता चलता है कि ऐसी असाधारण की मृत्यु क्या यो साधारण तरीके से होती? [उन्नीस शेली ]

अपनी कविता में अनेक स्थानों पर समन्दर की लहरों में खोजाने
की कामना की थी।
कवि की कामना पूर्ण हुई।
मृत्यु से कुछ दिन पूर्व, 'जीवन की जय' शीर्षक कविता लिख रहा
था, कि मृत्यु द्वारा वह जय कर लिया गया। कविता का अंत इन
पंक्तियों द्वारा होता है,
तब जीवन क्या है? मैं चिल्लाया।
इसका उत्तर वह मृत्यु में खोज रहा था।
कई सप्ताह की द्विविधा के पश्चात् लाशों का पता लगाया गया ।
जुलाई १७, और १८ को तीनों की लाशें निकली। सभी के शरीर क्षत
विक्षत हो चुके थे। शेली की एक जेब में सोफोक्नीज का ग्रंथ था और
दूसरे में 'हंट' की दी गई कीट्स की एक कविता पुस्तक थी, जो 'द ईव
आफ सेन्ट ऐग्नस' पर मुड़ी हुई थी।
बालू पर शेली की चिता जलाई गई। बाइरन ने कहा, "क्या है
मनुष्य का शरीर ?'' देखो ! यह पुराना चिथड़ा इसके पहिनने वाले
से अधिक दिन जिया।"
चिता जलरही थी...."शेली के सुन्दर कपाल को बायरन ने
निकालने का प्रयत्न किया, तभी कड़क कर फूट गया ..."पर उसका
विशाल हृदय नहीं जला। दिलोनी ने लपटों में हाथ डालकर हृदय को
निकाल लिया, जो बाद में मेरी को भेज दिया गया और भस्म को,
रोम के एक पुराने कब्रिस्तान में, जिसके पास ही कीट्स भी लेटा है,
और जिसके फूलों और पत्तियों का वर्णन अपने पत्र में इतनी रोचकता
से किया है, दफना दिया गया ।
और इस प्रकार इस महान कवि और महानतर मानव का असमय
में ही देहावसान होगया।
it.."जब तक न सुन मैं अपने मरखे मानस पर
लेते हुए समन्दर को अंतिम निश्वास घुटन से भर"
--(नेपक्स के निकट लिखित पद)
बीस]
[ शेती

जीवन भर वह निन्दा, उपेक्षा, घृणा, संघात और प्रवंचना सहता रहा, पर मनुष्य जाति के प्रति उसने कभी अपने प्रेम को कम नहीं होने दिया। कष्ट के झंझावात में उसके विश्वास की वर्तिका कभी नहीं बुझी। उसके मुख पर चरित्र और बुद्धि की गहरी छाप थी। यह उदारता असांसारिकता और निःस्वार्थता की साक्षात मूर्ति था । शारीरिक और नैतिक साहस उसके अन्दर चरम सीमा में थे। जीवन के प्रारंभ से ही वह सब प्रकार की निरंकुशता और बंधनों के विरुद्ध विद्रोह करता आया था, और अंत तक अडिग रहा। सत्य का इतना एकान्तनिष्ठ साधक शायद ही किसी युग में पैदा हुआ हो। स्वाधीनता की पुकार उसके रोम रोम में व्याप्त थी। वह अत्यंत विचारवान और वैज्ञानिक बुद्धि का दार्शनिक था । अपने विचारों को भली भांति प्रकट करने की उसके अन्दर प्रखर प्रतिभा थी। साथ ही, दूसरों के दृष्टिकोण को सुनने और समझने में अत्यंत सहिष्णु था। बायरन, जो उसे उसकी चमकीली आँखों, पतली काया, चापहीन गति, तथा अल्पाहारिता के कारण 'साँप' कहकर पुकारता था, उसका अत्यंत सम्मान करता था। उसके शब्दों में, शेली, "अत्यंत सज्जन, अत्यंत विनम्र, और अल्पतम सांसारिक बुद्धि का मनुष्य था। कोमलता से पूर्ण और सबसे उदासीन । उच्च प्रतिमा के साथ थी उसमें अत्यंत सर- लता, जो जितनी ही प्रशंसनीय है, उतनी ही विरल, वह था सर्वोत्कृष्ट, उन्च्चतम आदर्श सौन्दर्य का साक्षात प्रतीक, इस आदर्श का उसने जीवन भर अक्षरशः पालन किया।" इससे अधिक उसके बारे में क्या कहा जासकता है ? "अत्यंत प्रदीत नक्षत्र जीवन स्त्रीत को पीने के लिये, इतना उम्मत " निष्प्रभ होगया। उसके प्राणों की बरणी, तटसे, दर धकेली गई, सुदूर कापते जन-संकुल से, कभी नहीं माके सम्मुख, जिसके पास मुके थे। (पडोनेस) शेती] [ इक्कीस

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शेली की काव्य-साधना

"अहो, महा मामल!
तेरी गम्भीर धार में,
यह युग हिल उठता है, अवहेलक झमा में-
बनती बॉस-नली है जैसे"
(काव्यांश १८१८)

(१) विषय प्रवेश- आगरेजी आलोचक और निबंधकार चेस्टरटन का कथन है कि अगरेजी साहित्य की महानतम घटना इङ्गालैण्ड के बाहर ही घटी और यह घटना थीफ्रांस की राज्य-क्रान्ति, जिसका अन्यन्त व्यापक प्रभाव तत्कालीन अङ्गरेजी साहित्य पर पड़ा और बहुत काल तक फ्रांस इङ्गलैण्ड के आकर्षण विकर्षण का केन्द्र बना रहा । बों, इजलैण्ड में भी इस राज्य क्रान्ति के पूर्व मानववादी परम्परा का उन्मेष हो चुका था । परम्परावादी कवि पोप की कविता की प्रतिक्रिया 'कूपर', 'कावेट' और 'ब्लेक' के काव्य में जन्म ले चुकी थी। में की ऐलेजी में ग्रामीण जनता के प्रति संवेदना के भावों की अभि- व्यक्ति हुई । राबर्ट बन्से के काव्य में तो कविता धरती पर उतर आई और सरन ग्राम्य जीवन की श्री विहग के कलरव सी मुखरित हो उठी। ग्राम्य लोकगीतों के संकलन पर्सी की रैलिक्स ने कविता क प्रकृत स्वरूप को प्रस्तुत कर अपनी गहरी सहज संवेदना से तरुण हृदयों में हलचल मचादी! यही परम्परा आगे चल कर अङ्गारेजी साहित्य में सबसे महत्वपूर्ण-युग-रोमानी काल की जननी हुई। इसकी पहली पीढ़ी में बड्सवर्थ, कालरिज, और स्कॉट प्रमुल थे, यह राज्य क्रान्ति के समकालीन थे। इनमें से बड़सवर्थ और कालरिज ने विप्लव का अपने गीतों से अभिनन्दन किया। इन स्वरों में इङ्गालैण्ड का नवोन्मेषित पूँजीवाद बोल रहा था जो अभी विकास के मार्ग खोज रहा था । इजलैण्ड के सामन्तीय ढाँचे की नीय अभी इतनी कमजोर नहीं हुई थी। शासक वर्ग फ्रांस की अपेक्षा अधिक सशक्त और सतर्क था। रूढ़िवादी लेखक बर्क के नेतृत्व में क्रान्ति विरोधी खूब विष उगल रहे थे। जनबल के संगठन का कोई स्पष्ट चित्र इस पीढ़ी के समक्ष नहीं था। बाह्य परिस्थितियाँ भी अभी अनुकूल नहीं थीं। अतः इसका परिणाम यह हुआ कि यह पीढ़ी शीघ्र ही अपने अभिनन्दन गीतों के लिए पश्चाताप करने लगी। और राज क्रान्ति की 'असफलता' ने इनमें निराशा भर दी । वईसवर्थ ने संघर्ष पथ को छोड़ पलायन पथ को महण किया और अपने अन्त समय तक प्रतिक्रियावादी बना रहा। पर वास्तव में क्रान्ति असफल नहीं हुई थी। क्रान्ति का अभी यह प्रथम चरण था। इसमें पूंजीवादी नेतृत्व में जनता ने सामन्ती हाथों से सत्ता छीनी थी। दूसरा चरण तब पूरा होता जब सत्ता पूँजीवादी हाथों से छीनी जाती। पर इसके [ पचीस. शेती ] लिए अभी परिस्थितियों का पूर्ण विकास नहीं हुआ था। अभी संघर्ष शील वर्ग श्रमिक वर्ग संगठित अस्तित्व में नहीं आया था । क्रान्ति का यह चरण अभी जारी है। पिछली क्रान्ति अपने उद्देश्य को पूरा करने में सफल हुई थी पर जिन्हें मानव जाति के क्रमिक विकास का वैज्ञानिक अध्ययन नहीं था, उन्होंने इस 'असफलता' से मानव जाति में अपनी अनास्था प्रकट कर 'प्रकृति की ओर प्रत्यावर्तन' का नारा लगाया। इनके दा दशक पश्चात् रोमानी काल की दूसरी पीढ़ी, छोटी पीढ़ी प्रकाश में आई, जिनके लिये राज्य क्रान्ति एक वास्तव घटना म होकर इतिहास का एक परिच्छेद बन चुकी थी। पर क्रान्ति के ज्वालामुख के हड़कम्प की थरथराहट अभी वातावरण में वर्तमान थी। 'असफलता' की प्रतिक्रिया वातावरण में गहरी निराशा भर गयी थी। पर अब पार्थिव परिस्थितियाँ इन दो दशकों में काफी बदल चुकी थीं। पूँजीवाद अब एक शक्ति के रूप में विकसित हो रहा था। राजतंत्र ओर सामंतवाद विशंखलित होकर पतनोन्मुख थे। फलस्वरूप, नई शक्ति की चेतना उठ रही थी, जिसका इस पीढ़ी को ज्ञान था और अपने अपने राष्टिकोण से युग की विद्रोही प्रवृत्तियाँ इनके काव्य में स्वर पा रही थीं। इस पीढ़ी को एक और विशेषता यह थी कि इसका विकास लगभग असम्पूर्ण रह गया । अत्यन्त अल्पावस्था में ही इसके विकास की अपरिसीम शक्तिमना प्रतिभायें असमय में ही मरण-सिंधु की हिलोरों में खो गई। इस पीढ़ी में प्रमुख थे लार्ड बायरन, पर्सी विशी शेली और जॉन कीदरा ! इन तीनों में कीट्स की मृत्यु अल्पतम आयु (२५ वर्ष) में हुई । उसकी कविता के विकास की सभी दिशायें लगभग अपूर्ण हैं। सबसे अधिक अवस्था ( ३६ वर्ष) लार्ड बायरन ने पाई । और परिपक्वता की दृष्टि से उसे इन सबसे अधिक अवसर मिला । एक दृष्टि से उसका विकास पूरा हो भी चुका था। शेली की मृत्यु इन दोनों के विपरीत एक दुर्घटना में हुई, तब वह तीसवीं में प्रवेश कर रहा था। पर वास्तव में उसे विकास का सबसे कम अवसर मिला क्योंकि उसकी प्रतिभा की शक्तियाँ इन दोनों की अपेक्षा जटिल और आकांक्षायें अधिक व्यापक थीं। वह मृत्यु के समय अपनी परिपक्वता के चरण में प्रवेश कर रहा था । इस अवस्था तक उसकी प्रतिमा अनुभवों की आँच में निखर आई थी। जीवनी लेखक जे० छब्बीस] [ शेती , ऐडिंगटन साइमौण्ड के अनुसार अपने जीवन के अन्तिम चार वर्षों में यह और भी अधिक निखर उठा था। आग की प्रखरता और भी बढ़ रही थी। चरित्र और भी पुष्ट और प्रतिभा सम्मृष्टतर हो रही थी। वह अपनी सबसे गौरवशाली प्राप्ति के शिखर पर खड़ा था। अपने पंख खोले और भी ऊँची उड़ान भरने को तत्पर था। ऐसे क्षण में जबकि जीवन उसे श्राराम, कार्य की अनथक शक्ति और सुख देने को था, काल ने उसके परिपक्व संसार को छीन लिया । भविष्य के पास तो उसकी अपरिपक्व काल की उत्पत्ति और उनके अन्त समय का शोक ही है। (२) विप्लव की मूर्ति शेली- पर उसकी इस अविकसित अवस्था में भी जो कुछ हमें मिलता है, नसके भविष्य का स्पष्ट संकेत देने के लिये, उसे अमरता के आमन पर प्रतिष्ठित करने के लिये पर्याप्त है। उसके स्वरों में हम मानवता की तीव्रतम अनुभूतियों का, वेदना, प्यार और विद्रोह का उच्चत्तम स्पन्दन सुनते हैं ! उसके अन्दर जीवन और बुद्धि के प्रति अनन्य भक्ति थी। वह मानव जाति की उन विरल मूर्तियों में से था, जिनको तर्क और अनुभूति तरुणाई के साथ-साथ क्रान्तिकारियों में परिवर्तित कर देती है। अत्यंत मेधावी, भाव प्रवण और उद्दीप्त स्वभाव का होने के कारण वाह भाति प्रारंभ से ही क्रान्ति के प्रभाव में आ गया था। उसकी क्रान्ति में, यद्यपि अठारहवीं सदी की सभी मर्यादाएँ वर्तमान थीं। गौडविन और प्लेटों के अतिशय प्रभाव ने इनको और बढ़ा दिया था। तोभी, इन सबके होते हुए भी उसके अन्दर समाज की प्रगतिशील शक्तियों का प्रतिनिधित्व है, और क्रमशः उसके काल्पनिक श्रादर्शों और आका- शीय उड़ानों का हास एवं उत्तरोत्तर यथार्थवाद और मानववाद का स्वरूप दिखाई देता है। लार्ड बाइरन के विद्रोह का स्वरूप शेली की अपेक्षा बहुत कुछ स्पष्ट है । बायरन भी शेली के समान अभिजातीय वंश में पैदा हुआ था। अपने विशाल राजनैतिक अध्ययन और अनाकाशी, सचेत व्यवहार बुद्धि के कारण शेली से कहीं अधिक इस तथ्य की जानकारी थी कि उसके वर्ग का अब शक्ति रूप में हास हो गया है । अपने काव्य में अभिजात वर्ग की नैतिक मान्यताओं की उसने खूब खिल्ली उड़ाई है। यह यद्यपि शेली के समान पूरी तरह अपने वर्ग से असम्बद्ध नहीं शेनी] [ सत्ताईस - हो पाया था, अपने दर्प और पाशव असंयम में वह अभिजात वर्ग से अपने आपको जोड़े हुए है, और न शेली के समान उसका मान ही जन जीवन में रमता था, पर उसके अन्दर अवश्य ही प्रखर क्रान्तिकारी व्यक्तित्व था, जो बहुत कुछ उसकी चारित्रिक असंयतता के प्रवाह में दूसरी दिशा में मुड़ गया था। अपने उत्तर काल में, मृत्यु-से कुछ बरस पूर्व, जब उसके इस वेग में 'काउन्टेस न्यूसिमालो' के सम्पर्क से स्थैर्य आ गया था, इस व्यक्तित्व को उभरने का मौका मिला। उसने शेली के समान अपने काव्य में 'स्वाधीनता' का नाद गुंजाया, पर शेली से और दो कदम आगे बढ़कर इटली और यूनान के स्वातंत्रिय संघर्षों में सक्रिय सहयोग किया। यूनान के आजादी के आन्दोलन के मध्य ही ज्वराक्रांत होकर उसकी मृत्यु हो गयी, जिसे समस्त यूनान ने अपने 'राष्ट्रीय शोक' के समान मनाया । बायरन के इस व्यक्तित्व की न केवल सभी बुर्जा आलोचकों ने उसकी 'सनक' कहकर अवहेलना की है, वरन्, यह मार्क्स का जर्मन भाषा में 'शेली एक 'समाजवादी' शीर्पक निबंध में, यह मत दृष्टव्य है । 'जो लोग शेली और बायरन के काव्य से परिचित है, वे शेली की अल्पायु मृत्यु पर उतना ही दुख प्रकट करेंगे, जितना कि यागरत की' पर उन्हें हर्ष होगा। प्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक स्व० कॉडविल ने भी इसी दृष्टि से अपनी काव्यालोचना पुस्तक 'इल्यूजन एण्ड रिपलिटी' में बायरन के विद्रोही पक्ष को 'सनक और रोमान्सवाद' का मिश्रण' बताया है, जो 'अभिजात वर्ग की पाँत में जहाँ एक ओर फैली निराशा की सूचना देता है, यहाँ दूसरी ओर उसके प्रति विद्रोह भी है। और ऐसे लोग 'क्रान्ति के निराशनायक की धारणा से अधिक ऊँचे नहीं उठ सकते पर बायरन के काव्य को उदारतापूर्वक परखने से उसकी क्रान्तिकारिता की सच्चाई से इन्कार नहीं किया जा सकता। उसके 'चाइल्ड हेरोल्ड', 'डानजुआन 'अपनी मूढ़ जाति के अवशेष' राजों और सत्ताधीशों के ऊपर की गई सीधी-सीधी व्यंग बोछार से भरे पड़े हैं। "जब मनुष्य इन दुध नृपों को नियम भंग करने देते तो हेक्ला सोते सा, मेरा खून खोल, खौल, पठता है" अट्ठाईस] [शेती इन पंक्तियों के लिखने वाले की अल्पायु मृत्यु पर हर्ष नहीं प्रकट किया जा सकता। "पानी के समान खून बरसेगा, और कुहासे के समान पास, पर अन्त में जीत जनता की होगी। मैं नहीं रहूँगा यह देखने के लिये, पर मैं इसे अपनी पूरष्टि से देखता हूँ।" जो जनता की जीत इस अदम्य विश्वास से मना सकता है, यह अवश्य क्रान्तिकारी है। जॉन कीट्स के काव्य में उसके सभी विकास चिह्न असम्पूर्ण हैं, इसलिए उसके विषय में कोई निश्चित् धारणा बना लेना आसान नहीं है । पर तो भी उसके काव्य में अनेक स्थलों और पत्रों से यह प्रकट होता है, कि उसका दृष्टिकोण काफी सुलझा हुआ था। वही सबसे प्रथम महान् कवि है, जिसे इस बात का भी ध्यान रखकर चलना पड़ता है कि उसकी कविता बाजार में बिकेगी और जीविका का साधन बनेगी। यह तथ्य उसे अपनी समाज व्यवस्था की अधिक से अधिक जानकारी देता है। राज्यक्रान्ति से विमुख होने वाले वर्ड्सवर्थ इत्यादि के लिये जो, अपने प्रतिगामी स्वरों में ऊँची नैतिकता का राग अलाप रहे थे, वह लिखता है- "हम ऊंचाई को कोई नहीं छीनेगा" छाा चली गई। "सिवाय उमके, जिनके लिये जगती का न्य, है अब भी दैन्य ही और न करने देगा उन्हें पाराम !" उसकी कविता का प्रारंभ ही, शासन के विरुद्ध विद्रोह से हुआ था। अपने मित्र और पथ-प्रदर्शक, ले हन्ट की गिरफ्तारी पर ससने पहली कविता लिखी थी। पर कीट्स की क्रान्ति भी अंततः यसवर्थ की भांति कल्पनामय थी। वर्ड्सवर्थ का पलायन प्रकृति की गोद में था, कीट्स का पलायन जगत उसकी नई शब्दावलि, रत्न- जड़ित, वर्णगंधमय, सौन्दर्य का विश्व है। क्रिस्टोफर कॉडविल के शब्दों में- "काव्य के नूतन जग में प्रविष्ट कीट्स कातेज के सघश निहारता है। पुरातन के वेष से मुक्ति देने को चैपमैन के स्वयं प्रदेशों का अस्तित्व शेली] [ उन्तीस प्रभूत मा. पर कितना ही इसमें यात्रा की जाये, है तोभी यह केवल कल्पना का जगत ही ।" (इल्यूजन एप रियलिटी) वास्तव में, इन रोमानी कषियों का पलायन नव पूंजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध उठते नई चेतना के संघर्षों से पलायन है, उनका क्रान्तिकारिता सादन्तीय और पणिकवादी व्यवस्था से इस शक्ति के जूझते रहने तक ही होती है। किन्तु इनमें शेली अपवाद है, उसका काव्य इसके विपरीत, अपनी समस्त सीमाओं के बावजूद अत्यंत स्वाभाविक क्रान्तिकारी भावनाओं और संघर्षशील प्रवृत्तियों से ओत- प्रोत है। उसके विप्लय का अनल गान पूँजीवादी शक्ति की जय तक ही गूंज कर नहीं शीतल हो जाता, वरन् सर्वहारा वर्ग की नई शक्ति का, अपनी व्यवस्था के निर्माण करने के लिये आह्वान गील बनकर उठता रहता है। उममें पनायन लेशमात्र भ नहीं है। उसका व्यक्तित्व अपने युग की सबसे प्रबल क्रान्तिकारी शक्ति के रूप का प्रतीक है। (३) युग का गायक- शेली के विद्रोही काव्य में उसके युग का मूर्तिमान स्वरूप अक्षित है। उसके अन्दर पुराने युग के ध्वंस की राख का ठण्डापन है, नई चिनगारियों की गरमाई है। उसकी प्रसर स्टिनं समाज की इमारत का कोना काना छान डाला है, उसकी असीम कल्पना-शक्ति प्रवृत्तियों के सूक्ष्मतम स्पन्दनों को अपनी गति में बाँध लेती है। उसकी प्रभजन-शक्ति युग के श्राकाश पर छाये निराशा के बादलों को छितराती है, यद्यपि स्वयं धरती के व्यक्तिगत वेदना के जलाशयों से स्वयं भीगी भीगी रहती है, अपनी उद्दाम गति से कभी हरे किसलय से मोहित करने वाले, पर बाद में उन्हें कटीले पचों में बदल देने वाले विरवों का वह उपहास करती है, म से भरे जीर्ण पन्नों को उड़ाती हुई, नये बीजों का समाज-भूमि में वपन करती है। अपने समय की निराशा का चित्रण करते हुए शेली एक पत्र में लिखता है। "निराशा और श्रमानवीयता इस युग की जिसमें कि हम रहते हैं, एक विशेषता हो गई है। इस प्रभाव ने युग के साहित्य को भी उन मानसों की, जिनसे कि यह निःसृत होता है, निराशा से भर दिया है।" तीस] [शेती शेली के समय तक शासन के संगठन के प्रति असंतोष बढ़ता जा रहा था। लोगों में भुखमरी फैल रही थी । पार्लमेन्ट पर सामन्तों का कब्जा था, जिसका एक मात्र उपयोग जनता के अधिकारों के कुचलने में होता था। लगभग दोसौ अपराध ऐसे थे, जिनके लिये फाँसी का दण्ड दिया जाता था, इनमें से एक जमीनदार की फसल की चोरी भी थी। आक्सफर्ड और फैम्ब्रिज विश्वविद्यालयों पर चर्चा का निरंकुश अधिकार था। धर्म के विरुद्ध कहने का किसी को साहस न था। किन्तु इग्लैण्ड में अब नई शक्तियाँ उभरने लगी थीं, जिनके साथ-साथ जनमानस में नवीन परिवर्तन दृष्टिगोचर हो रहे थे। शेली, इस. नूतन जीवन की अंगड़ाई से पईसवर्थ और कॉलरिज के समान बेखबर नहीं था, वह लिखता है- - किन्तु मनुष्य जाति मुझे अब अपनी निद्रा से उठती हुई प्रतीत होती है। मैं उसके धीमे, शान्त और शनैः शनैः परिवर्तन से अवगत हूँ।" अपने 'बईसवर्थ के प्रति एक सौनेट में, इस पलायनवादी कवि को सम्बोधित करते हुए कहता है, एक हानि मेरी भी है। जिसका प्रागुभव तुझे भी है, पर दुखी मैं ही हूँ! सू था एक एकाकी सितारे की भाँति, जिसकी धति विश्वरी भी शरद निशीथ की गर्जना में, किसी गर्जा नौका पर ! अंधे मौर संघर्षशील जनसंकुल पर! सम्मानित निर्धनता के मध्य सेरी वाणी में बुने थे सत्यता और स्वाधीनता के गीत, इन्हें सजकर, तू मुझे तजता है, शोक करने के लिये, अतः तेरे होते हुए भी, तेरा पोना अब रुक गया है ! पर्ड्सवर्थ के प्रति क्रियावादी काव्य 'पीटर चैल, द फर्स्ट' के शेली ने अपना प्रसिद्ध व्यंग-काव्य, पीटर वैल द, थर्ड' लिखा, जिसमें प्रतिक्रियावादी साहित्यिकों के साथ-साथ समूची सामाजिक व्यवस्था के खोखलेपन पर तीन व्यंग कसे है। शेली ] [ इकत्तीस - उससे बढ़कर साधारण जनता की गरीबी और बदहाली का किसी उत्कालीन कवि ने वर्णन नहीं किया। 'क्वीन मैव' में ऐसे अनेक पद भरे पड़े हैं, जिनमें जनता को 'नरक की यातना देने वाले सत्ताधीशों और धर्म का स्वाँग फैलाकर शोषण करने वाले पादरियों के खिलाफ अपने तरुण कवि ने तीन रोप का प्रदर्शन किया है। इग्लैण्ड की साधारण जनता के लिये लिखे गये गीतों में (सौंग आफ मैन आफ इग्लैण्ड) से एक सॉनेट १८१६ में इग्लैण्ड' को देखिये- वृद्ध, विशित, अन्ध, घृणित, और क्षयमान नृपति, राजा, अवशेष अपनी मूङ जाति के, जो बहती है, जन घृणा के द्वारा, पंकिल बसंत की पंक में! शासक जो न देखते है, न अनुभव करते हैं, म जानते हैं, किन्तु 'लीच' के समान, अपने मूञ्छित देश से चिपटे हैं! जब तक वे गिरे नरक में अंधन हो, बिना किसी प्रहार के" एक जनता क्षुधित और पायल हुई अन जुते खेतों में, एक संना जो मुक्ति करती और बध करती है, बनाती है एक दुधारी कृपाण के समान उन सबको जो रोकते हैं, सुनहरे और लाल चमकीले कानून जो उकसाते और बध करते हैं, धर्म इसायिहीन ईश्वर हीन मुहर बन्द पुस्तक है, लोनेट धनठही निकृष्टतम मूति, यह करें हैं जिनसे एक गौरवशाली प्रेत निकल सकता है, हमारे संकामय विषम को ज्योतित करने। १८१६ के पीटरलू गोली काण्ड पर लिखी गई 'मास्क' के कुछ पद देखिये। दासता है यह काम करने के बाद वाम, नित्य प्रति जी भर के ही लिये पाते हो, जैसे अन्ध कोठरी में, वैस निज प्रमों में पी, शोषकों के शाम त वास किये भार हो! 'माहान' और देखिये- गधे और सूअर भी और पाठ है उन्हें वक्त पर ठीक-ठीक साथ मिल जाता है। काज बत्तीस] [शेली घर तो सभी का अंग्रेजी पर हो तो, काम करने के बाद और तक ग पाता है ! ( वही) शीर्षक कविता में दासता और शोषण की इमारत के नीचे इस वर्गभेद को पहिचानता है- तुम बोले हो बीज काटते किन्तु दूसरे ! दौलत तुम खोजते और का घर है भरता ! कपड़े तुम चुनते पर और पक्षिनते फिरते, अस्त्र हालते तुम, पर और जिन्हें है गहता ।। ( इजलैया के मनुष्यों से) वह ललकार कर कहता है- बोनो बीज, न जुल्मी जिन्हें काटने पाये ! सोनी दौलत, परम जाप यह ठग के घर में ! कपदे चुनो! आलसी कोई पहिन न पाये । बालो मा ! गही अपनी रक्षा को कर में ! (बी) अपने एक काव्यांश में निजी सम्पत्ति को सामाजिक सम्पत्ति बनाने का आह्वान करता है। 'विलियम शेली' शीर्षक कविता में शोपकों और धर्म ध्वजों की मृत्यु की घोषणा करते हुए कहता है कि- सहा न जुलमी राज करेंगे, ५ मा र कुपथ पुजारी सा नहीं इस पृषी पर, नये हुए यह उसी कुछ गन के तट पर, भर दी मौत इन्होंने जिलकी लहरों जिनकी भूख सहन बानियों से गहरी, इनके चारों और अब फेमिल सहरी । इनके दराड, पाण, भगम मौकानों से, देख रहा मैं शाश्वत साक्षरों पर बहते। 'मास्क' के अन्तिम पद में जनता को संगठित होकर उठने का आवाहन करता है। शेली] [ लेतीस - जागो! सिंहों से बहार, घोर नींद छोड़ पाम! उठो! अब अजेय संख्या में झूम-झूम कर ! खलाये तुमने जो पहिनी थी नीम में, ओस दसम हिला कर गिरादो भूमि पर, तम हो असंख्य और ये हैं बस मुट्ठी भर, (आह्वान) स्वाधीनता का अर्थ उसके लिए हवाई यातें या नैतिक उपदेश नहीं है, बल्कि इसका ठोस अर्थ है जनता को रोटी, कपड़ा, रहने को मकान ! अन्यथा सब दासता है । हे स्वतन्त्रता की देवि! तू है मजदूर की, रोटी जो कि रक्खी हुई एक स्वच्छ मेज पर एक शुद्ध और सुख-पूर्ण गृह मध्य पह। पाये उसे पाये जम श्रम से ही लौट कर। x शासकों की ठोकरों से मस्त जम समूह को। अम, पस्त्र और अग्नि तू ही है स्वतन्त्रता! श्राज जैसा मेरा देश है अकाल-शाप-प्रस्त किसी भी स्वतन्य देश को हूँ मैं न देखता ! x x x . क्या शेली की उस युग की वाणी में आज की हमारी तड़पनी भारतीय जनता की पुकार नहीं है ? शेली ने केवल अपने देश की ही जनता के लिए शापकों के जुए से परित्राण पाने की कामना नहीं की, वरन् उसका स्वर देश और काल की मर्यादाओं को लाँघ कर देश-मेश की, युग-युग की इलित मूक जनता की वाणी बन गया है। १८२० को स्पेन की सैनिक क्रान्ति का अभिनन्दन करते हुए उसने स्वाधीनता के प्रति एक बहुव बड़ी कविता लिखी। यूनान विद्रोह के ऊपर अपने नाट्य काव्य 'हैलास' की रचना की थी। यह एक स्थान पर सारी दुनिया के शोषित वर्ग को, शोषकों के विरुद्ध उठ पड़ने के लिये ललकारता है, क्योंकि उन्होंने विप्लव के अंधड़ की सम्भावना से ही अपना पवित्र गठबंधन कर लिया है। ('रिवोल्ट' की भूमिका के अप्रकाशित अंश का सार) युद्ध को जनता को गुलाम और पंगु के चौतीस ] [ शेली बनाये रखने का शासकों और राजनीतिज्ञों का अस्त्र कह कर पुकारता है, मनुष्य-मनुष्य की स्वाधीनता के ऊपर, प्रेम, भाईचारे से स्थापित शान्ति की प्रस्थापना की बात स्थान-स्थान पर अपने काव्य में कहता है। बंद करो! क्या धृणा, मृत्यु, अब नौटेंगे ही ? बन करो! क्या मनुज बंधेगे या मृत होगे ? बंद करा! तिक्ततर भविष्यत वाणी के इस, भस्ममान की अंतिम करा तक नहीं पियो ! जगती प्रतीत से थकित पाह! मर जायेगी, वर्ना इसको अपनी चिर थकम मेटने दो! ( हेमास) नई दुनिया की तामीरें इस पुरानी दुनिया के ध्वंसों पर खड़ी होगी, इसका उसे अदम्य विश्वास है । 'विश्व का नवयुग प्रारम्भ होता है फिर से। शोषण और दासता के अलमबरदार शीघ्र रात की कालिख न समान अब बिदा होनेवाले हैं ! 'और निरंकुश, दास रजनि की छायाएँ भव ! तेरे भोर उजाले के रथ के पीछे सब (४) गौडविन का अनुयायी---- विलियम गौडविन की वाणी में इग्लैंड में रूसो के विचार जन्म ले चुके थे । गौडविन ने रूमा की विचार-धारा को और तर्क संगत बना कर आराजक समाज की विशद रूपरेखा 'प्रस्तुत की। उसके 'पोलिटिकल जस्टिस' नामक प्रसिद्ध ग्रंथ ने इग्लैंड के बौद्धिक समाज में बहुत दिनों तक हलचल मचाई। इसमें अराजक समाज की परि- कल्पना के पीछे पुरानी सामन्तीय शासन व्यवस्था के प्रति गहरे असंतोष की अभिव्यंजना थी। धर्म के विकृत रूप और शोषण के स्तम्भों पर कठोर प्रहार था। इसलिये इस क्रान्तिकारी प्रथ का नई पीढ़ी पर व्यापक प्रभाव पड़ा। पर अन्य मानववादी दार्शनिकों की भाँति गौडविन की यही भूल थी। क्रान्ति की 'असफलता' ने उसका विश्वास भी जनबल से हटा दिया था। उसका कहना था कि जब तक 1 । शेली ] [ पैंतीस जनता शिक्षित नहीं होगा, तब तक उसे शोपण से परित्राण नई। मिलेगा। अशिक्षा दासता का मूल है। शिक्षा मे क्रान्ति होगी। शिक्षित व्यक्ति ही जनता का सुधार करेंगे। गोडविन का सुधार का तरीका यह था कि पहले शोषण और 'अन्याग की तस्वीर दिखाकर उनके अन्दर 'हृदय-परिवर्तन करो, फिर स्वर्णिम भविष्य के अक्कन से उन्हें सक्रिय करो, सत्ताधारी इस जागृति से तुरंत भाग जायेंगे । श्रपनी तत्कालीन व्यवस्था से अत्यंत असंतुष्ट तरुण शेली को गोडविन की यूनी बनाई व्यवस्था मिल गई और उसे आत्मसात् कर और उसमें प्लेटो (अफलातून) के प्रेम के सिद्धान्त को जोड़ कर अपने काव्य में,लेखों में तथा जीवन में उसको अभिव्यक्त किया। उसकी 'तर्क की वाणी' (जो 'कीन मैब' का एक अंश है) इस का समुचित प्रमाण है । उसके शोपको और अत्याचारियों के विरुद्ध अग्नि-स्वरों के पीछे गोडविन के सिद्धान्तों की छाया है। गौडविन की भाँति प्रारंभ में वह भी जनता को अज्ञानियों का समूह मात्र कहता है, जिनके भाग्य विधाता या तो शासक है अथवा चंद शिक्षित लोग ! 'रिवोल्ट' में उसका क्रान्ति का स्वरूप पेसा ही है । जहाँ टर्की की जनता को 'लाओ' और 'सिन्धिया' मुक्ति दिलाते हैं। शेली के भी सुधार का यही ढंग है। यही भाव उसकी 'प्रोमे०' में है। भागे चलकर वह जनता के संघर्षों और अपनी तीस्वी वेदना से बहुत कुछ सीख चुका है, अब वह जनता को मात्र मृत्तिका का पिण्ड ही नहीं समझता, वह उसे अपने भाग्य का स्वयं निर्णायक बनने के लिये आहान भी करता है। किन्तु फिर भी वह 'रक्तहीन कान्ति' की धारणा से अपने को पृथक नहीं कर पाया ! "जैसे वन होता है, मन और स्वरहीन, ऐसे सुम खड़े रहो, प्रशान्त हा चित्त में, कर हो तुम्हारे बद्ध, और वह हिमा हो, बनती हैं लीषण मन्त्र जो अजेय युद्ध के।" (माखान) - "हाथ जोष को, हिले म पुष्टि रंच मान भी, भय का मिशान, विस्मय का म देश हो, समकी ओर देखो, मष जैसे ही तुम्हारा करें। उनका प्रचंड रोष 'जब तक मशेष हो।" (पही) छत्तीस [ शेली (५) प्लेटोवादी : शेली-- गौडविन के समान प्लेटो का भी शेली ने बचपन से ही अध्ययन और मनन किया था। उसकी प्रांजल शब्दावलि और रूपकमयता से यह बड़ा प्रभावित था। शेली की सामाजिक, राजनीतिक धारणाओं, कविता और साहित्य सम्बन्धी प्रस्थापनाओं तथा धार्मिक, नैतिक मान्यताओं की पृष्ठभूमि में प्लेटो के ही सिद्धान्त हैं, जो शेली की भावभूमि पर अपनी विराट छाया डाले हुए हैं। वास्तव में एक बड़ी सीमा तक शेली के पार्थिव जगत से इतने अपार्थक्य और आकाशीय होने का कारण प्लेटो के भाव जगत् में उसका इतना अधिक विचरना ही है। 'ऐलास्टर' के कवि की सौन्दर्य-शोध के पीछे प्लेटो के सौन्दर्य की ही धारणा ही है। 'ऐपिप' के पार्थिव प्रेम की अभिव्यंजना का आधार प्लेटो के प्रेम सम्बन्धी. विचार ही हैं । 'प्रोमे' के काल्पनिक मानववाद का रहस्य प्लेटो के प्रेम के प्रभाव को ही दरशाता है। शेली पर यूनानी सभ्यता का इतना अधिक प्रभाव होने पर भी, वह इसके विनाश के कारणों -दासता का अस्तित्व, अप्रकृत व्यभिचार, नारी जाति का अपमान इत्यादि से भली भाँति अवगत था। जब वह 'हैलोनिक कलचर' की इतनी अधिक प्रशंसा करता था, तो वह इन तथ्यों को अपनी आँख से ओझल नहीं करता था। शेली ने प्लेटो के जिन विचारों को ग्रहण किया, उनमें से कुछ ये हैं- प्रात्मा की अमरता-प्लेटो के अनुसार सम्पूर्ण ज्ञान स्मृति मात्र है। उसका कहना है कि स्वर्ग में आत्माएं रहती हैं। पार्थिव बंधनों से मुक्ति पाकर पाल्मा सौन्दर्य के संसार में विचरती है । शेली ने इस भाव को अनेक स्थलों पर अपने काव्य में प्रकट किया है। 'रिवोल्ट' में, 'मृत्तकों के देश' में, 'लामो' और 'सिन्थिया' की आत्माएँ विचरती हैं। 'ऐडोनेस' में सभी, जीवित एवं मृत्त, कवियों का कीट्स के लिये शोक करना, इसी विश्वास का घोतक है । वह मृत्यु को जगजीवन के सपने से जागरण मानता है। "क्या तू सुनता नहीं है कि जो मर जाते हैं, भावों के विश्व में नमन खोलते है" (रिवोल्ट) अथवा 'ऐडोनेस' में, "शान्ति ! शान्ति ! यह मृत नहीं, यह नहीं सो रहा, उसकी अभी जिन्दगी के सपने से आँख खुली, जागा है।" शेली ] [ सेंतीस के खगोलीय परिकल्पन-प्लेटो अपनी Timacus में कहता है कि सम्पूर्ण खगोल पूर्ण मेधा का ही विकसित रूप है। अपनी अपनी बुद्धि से भूमण्डल के सभी अङ्ग परिचालित होते हैं। सूर्य भी महान शक्ति का दृश्य प्रतीक है। पृथ्वी भी दैविक है। शेली को प्लेटो इस विचार ने बड़ी प्रेरणा दी है। वह 'प्रोमे में इसकी विशद कल्पना करता है । पूरा काव्य ऐसे प्रतीकों से भरा पड़ा है, जो शेली की काव्य-शक्ति का प्रबल प्रमाण है, जिसका भली भाँति निर्वाह शेली के ही बस की बात थी। अपने 'अपोलो के गीत' में भी इसका दिग्दर्शन किया है। दार्शनिक धारणाएँ-शैली के 'आदर्शवाद' के तत्वों का श्रोत शेली ही है। आदर्श प्रेम, श्रादर्श सौनये, आदर्श समाज व्यवस्था, जिनमें वह शीघ्र ही व्यष्टि से समष्टिगत होजाता है। उसका द्वंद- वाद भी, जिसका 'प्रोम' में अच्छा निरूपण 'हुश्रा है, प्लेटो पर ही आधारित है। 'प्रोमेथियस' मानव की पारमा है, उसका मस्तिष्क मद का प्रतीक है। जुपीटर में मानव के असद का अंरा है। उराकी पाप- मयी वासनाएँ उसमें केन्द्रित हैं। 'डिमोगोर्गन' के प्रेम से उसे मुक्ति मिलती है। प्रेम-शेली की प्रेम की धारणा के पीछे तो प्लेटो का सिद्धान्त अत्यन्त स्पष्ट है । वह प्लेटो के समान प्रेम को आदर्श प्रेम मानता है और उसे समस्त विश्व के संचालन की गुल शक्ति एवं सर्वव्यापक मानता है। इसी प्रकार शेली के सौंदर्य, सत्य, प्रकृति, भविष्य-वक्तृता इत्यादि पर प्लेटो की आप स्पष्ट परिलक्षित है। (६) शेली का मत-- प्लेटो और गौडविन को समझने के पश्चात् शेली के मत से अपरिचय नहीं रह जाता। उसके काव्य और जीवन दोनों ही में जो असंगतियों और परस्पर असम्बद्धता प्रकट होती है, उसका कारण यही शेली के मत के विरोधी तस्य है। एक छोर यथार्थवादी गौडयिन, दूसरी ओर आदर्शवादी प्लेटो है। एक ओर तर्क है, दूसरी ओर कल्पना है। इसीलिए उसके काव्य में और जीवन अड़तीस] [ शेली । , में धरती-आकाश की मिलापट है। जहाँ एक ओर वह तीखे वरामान का रूप प्रस्तुत करता है दूसरी ओर स्वर्गिक स्वर्णिम भविष्य की झाँकी दिखलाता है। जहाँ एक 'बादल' 'अबाबील' 'विच' का मान- वेतर काव्य है, तो 'मास्क' जैसी कविताओं में यथार्थ स्वरों की व्यंजना हैं। एक ओर उसका आदर्श प्रेम सर्व व्यापक होकर आकाशीय हो गया है, तो दूसरी ओर उसके प्यार में तीखी कचोट और वेदना का गहरा स्पर्श है। उसकी यह दो दुनियाओं में रहने की प्रवृत्ति ही शेली का अपना स्वरूप है। यही शेली का 'शैलीत्व' है । एक ओर गौडविन उसे शोपण की शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा देता है, तो दूसरी ओर प्लेटो जो उसके हृदय के साथ है उसे आकाश में उड़ाता है और उसके मानवेतर काव्य का मूल है। 'कीन मैब' 'पीटर बैल' 'हैलास', 'मास्क' आदि में उसके मत के गोडविन पक्ष हैं, तो, 'ऐलास्टर' 'ऐपिप' 'विच' इत्यादि उसके प्लेटोवादी पक्ष हैं । 'रिवोल्ट' और 'प्रोमे' में इन दोनों का मिला-जुला रूप मिलता है, जिसकी सर्वोत्कृष्ट कलात्मक व्यंजना 'ऐडोनेस' में व्यक्त हुई है, जहाँ धरती की वेदना कला के स्वर्गीय पर लगा कर आकाश में उड़ी है यह प्रवृत्ति अन्त तक शेली के काव्य में रही। उसकी अन्तिम कविता 'जीयन की जय' जीवन का गान होते हुए भी उसे आकाशीय बनाना नहीं (७) कविता के समर्थन में- कविता के विषय में शेली की धारणा उसके कविता के समर्थन में ('इन डिफेंस आफ पोइजी) में भली भाँति व्यक्त हुई है। वह उसमें लोगों का ध्यान इस बात पर आकर्षित करता है कि प्राचीन काल में कवि गण ही समाज व्यवस्था के नियामक होते थे। कवि का भविष्य-वक्ता का रूप शेली के मस्तिष्क में प्रायः चक्कर काटा करता था। पाश्चात्य प्रभजन के पद में- कर विकीर्ण मेरे भूत भावों को, अविरत भू-मण्डल पर, जैसे छितरे मृत परतव, नव जीवन पाने को भू पर । और इसी मेरी कविता के सम्मोहन द्वारा सत्वर, ज्यों अनुबुझ भट्टी से गिरते भस्म अग्नि के कण साकर। स्यों ही तुमसे बिखरे मेरे शब्द मनुजता के भीतर मेरे अधरों के ही द्वारा तू इस सोती पृथ्वी पर । भूला। - शेली ] [ उन्तालीस १ इस भविष्य वाणी का बन जा अथ दू शंखनाद भरपूर, यदि भाया है शरद रह सकेगा धन फिर क्या अब दूर (पाश्चास्य प्रभजनक अनि) वह कवि की उपमा वीणा से देता है- मुमको बीन बनाले अपनी, ज्यों कानन है तेरी धीन ! पर वह कवि और वीणा के छान्तर को स्पष्ट करते हुए कहता है कि वीणा वायु के साथ स्वर देती है, पर कवि के अन्दर ऐसी शक्ति है जो केवल गीत ही नहीं पैदा करती, बल्कि साम्यता भी लाती है वह कवि के लिए कहता है---- "वह वर्तमान में भविष्य देखता है और उसके विचार नवीनराम काम के फल और फूलों के बीज हैं।" उसका विश्वास है कि भविष्य के सुखी चित्रों के मलकाने से ही संसार सुधरेगा। कवि का कर्म भविष्य-वाणी करना है। यह भविष्य-वाणियाँ स्वयमेव कवि के अन्तर से उद्भूत होती हैं, जब कवि कल्पना के तन में खोया रहता है। पर यहाँ भी प्लेटो की ही प्रतिध्वनि है, 'इयोन' में प्लेटो कदवा है- "क्योंकि कवि एक ज्योति है, समय और पवित्र बस्तु है, और जथ तक वह प्रेरणा न पाये और चेतना से बाहर न हो जाये तब तक उसक अन्दर कोई नवोन्मेपणा नहीं होता। यह नवोन्मेषण ही भविष्य-वाणी है, जिसे सम्पूर्ण कल्पनामयता की स्थिति में कवि श्रवण करता है। इसीलिये गोडविन के विपरीत तके के स्थान परकल्पना को प्रमुख क्रियात्मक शक्ति मानता है। तके तो कल्पना का ही परिणाम है वह कहता है-- "जैसे कार्यवाहक के लिये यंत्र, प्राप्मा के लिए शारीर, तस्व के लिये छाया है, ऐसे ही कल्पना के लिए तक है।" कविता की उत्पत्ति तके से नहीं होती, वह तो कल्पना का गुण है । वह तो हृदय से उद्भूत होती है, न कि मस्तिष्क श्रथवा कठिन कर्म का परिणाम है। वह तो 'बाध सत्यों में व्यजित जीवन का ही बिम्ब अथवा कल्पना की अभिव्यक्ति है। । चालीस ] [ शेती एकाकी कुछ जगत (८) प्रेम का पुजारी- प्लेटो की प्रेम सम्बंधी धारणा के अनुसार नारी मात्र ही प्रेम का केन्द्र नहीं रहती, प्रकृति भी उसका एक अङ्ग बन जाती है। शेली के काव्य में प्रेम के इस स्वरूप की भलीभाँति अभिव्यक्ति की गई है। प्लेटो के समान शेली का भी प्रेम आदर्श और वायवी है । वह प्रेम को प्लेटो के समान संवेदना की धनी अनुभूति और मानवीय आत्मा में स्थित आदर्श सौन्दर्य के विपरीत को प्राप्त करने की अभिलाषा कहता है। यही 'उत्कट आकर्षण है जो केवल नारी में ही नहीं प्रकृति में भी है । निर्भर क नाद में विहगी के कलरव में, मेघों की गर्जन में उसी की ध्वनि व्याप्त है । प्रह गण, नक्षत्र सभी प्रेम की डोर से बंधे हुए हैं--- और एक थान, अपर चारों ओर, एक ध्वनि, नीचे चारों ओर ऊपर, घूम रही थी, यही प्यार की प्रास्मा थी, (मोमे०) में, सब वस्त मियम दैनिक से आपस में, में क्यों न मिलू फिर तुम से? (प्रेम-दर्शन) उसके एक बिखरे काव्यांश को देखिए- "श्रो, तू अमत्र्य देववा! तेरा भासन के भाष की गहराई में मैं तेरी शक्ति और तेरा भाराधन करता हूँ, उस सबसे, मनुष्य जो हो सकता है, उस सबसे जो नहीं है उस सबसे जो रहा है, और होगा।" इसी आदर्श प्रेम के अभाव में अब 'पावर्त्य-सरित' 'सुरधनु, नहीं बुनती 'अश्रुकणों की उपत्यका धूमिल हो गई है। प्रेम की इसी आकाशीय धारणा का परिणाम यह है कि शेली प्रेम का महान उपासक होते हुए भी, उसे मानव जीवन को परिवर्तित करने और सुखी बनाने का साधन मानते हुए भी, 'और है प्रेम जो समस्त कलह की चिकित्सा करता है। उसका प्रेम मानवीय नहीं रहता। घुल-घुल मिलती मानव शेली [इकवालीस me उसमें वास्तव का स्पर्श नहीं है। यदि यह मानवीय वासनाओं को गाता है तो ऐसे जैसे दूर श्राकाश से बोल रहा हो। इसी आदर्श प्रेम की व्यंजना उसके 'ऐपिप' में हुई है। विपय है नारी का प्रेम-जिसमें व्यक्तिगत अनुभूति है, पर यह शीघ्र ही व्यक्ति से समष्टिगत हो जाती है। इसी विषय को लेकर अपने नाटकों में ब्राउनिंग ने कैसा सुघड़ रूप दिया है, यही विषय बायरन की पाशव उद्दाम शक्ति का प्रेरक है। इसी को अपने माँसल सौंदर्य से कीट्स ने कैसा मोहक रूप दिया है । पर शेली में, प्रेम को सत्ता के स्थान पर प्रतिष्ठित करने- वाले शेली ने, उसकी अपार्थिव व्यंजना की है, देखिये-- वह जहाँ खड़ी है, देखो तो! एक मयं प्राकृति सनी हुई, प्रेम, जीवन, प्रकाश, देविकणा से और गतिमयता से, जो बदल सकता है, पर मिट नहीं सकता। किसी उज्ज्वल चिरन्तनता का एक बिम्ब ! किसी स्वर्णिम स्वपन की एक छाया, एक भाभा तजते हुए तीसरे मण्डल को पथ-प्रदर्शन विहीन, एक कोगला, प्रतिबिम्ब प्रेम की शाश्वत शशिका, जिसके पालोचनों के नीचे, जीवन के मद्धिम झोंके चलते हैं ! मधुमास, तारुण्य, और प्रभात का एक रूपक ! अमल का एक मूर्तिमान दृश्य ! चेताते हुए अपनी मुस्कामों और भासुमों से कुहासे के कंकाल को उसकी ग्रीष्म समाधि में। (ऐपिप) उसका प्रभाव भावनामय वस्तु हो गया है । इसलिये यह आदर्श सौंदर्य का प्रेरक होते हुए भी महज तत्वहीन और प्रभावहीन है। अपार्थिव है। इसमें कीट्स की भाँति रक्त और माँस' नहीं है। वह पार्थिव स्वरूप को भी आकाशीय बना देता है- कुमारी सोफिया स्टेसी को लिखी पंक्तियों का एक पद- तेरे गम्भीर नयन, एक पुरे उपग्रह के समान घूरते हैं शुद्धतम को विक्षितता में अपनी कोमल, स्पष्ट ज्याला के साथ पवन जो इस पर पंखा झलते हैं, मृदु के उल्लास के घे विचार है, घयालीस] [शेली जो जिफर्स के समान भकोर पर तेरी उदार प्रास्मा को सिरहाना बनाती " प्रोमेथियस में 'ऐशिया' कहे शब्द जैसे उसके लिए भी हों। "तू बोलता है, पर तेरे शब्द वायु। मैं उनका अनुभव नहीं करता। उसे इस श्राकाशीयता का स्वयं आभास है, भीत तुम्हारे चुम्बन से मैं सौम्य सुन्दरी पर न तुम्हें मेरे चुम्बन से करना है भय ! उसकी इस आकाशीय पुकार से भी पार्थिव दर्द छिपते नहीं छिपता- नहीं दे सकता हूँ मैं तुम्हें मनुज, कहते हैं जिसको प्यार । करोगी पर तुम क्या स्वीकार ? प्रो० क्रम्प के विचार इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है - "उसने अपना सम्पूर्ण जीवन पूर्णता की खोज में व्यतीत किया, जिसे कभी स्वाधीनता कहा, कभी सौंदर्य, कभी प्रेम-शेखी के तीनों परस्पर पर्यायवाची थे ! पूर्ण स्वाधीनता बिना पूर्ण प्रेम के असंभव थी और पूर्ण सौंदर्य इन दोनों का परिणाम था। मनुष्य की स्वाधीनता की प्रेम द्वारा संचालित विश्व में ही प्राति हो सकती है।" पर शेली के प्रेम की प्लेटोवादी धारणा के बावजूद भी मानवीय प्रेम का उससे बढ़कर कोई कवि नहीं है। अपने अनेक प्रगीतों और लघु कविताओं में अपने मानवीय प्रेम को साधारण जीवन के दुःख- दर्द में लिपटे हुए प्रेम को, उसने अत्यन्त सरल और स्वाभाविक रूप में अभिव्यक्त किया है। कहीं-कहीं उसके अन्तर का दर्द अपनी चरम सीमा पर है। माह ! रे दुर्भाय ! सपण शब्द जिन पर कि मेरी आश्मा, प्रेम के विरत भूमंडल की ऊँचाई को भेदेगी, मेरी जंजीर हैं सीसे की जिसकी अग्नि के उड़ान के चतुर्दिक मैं छोफता हूँ, सूबता हूँ, कॉपता हूँ, मिटता हूँ! (ऐपिप) शेली] तालीस उसका निरंतर क्षीण होता स्वास्थ्य और 'कृश आकृति' जिसके कि प्रति वह सचेत है, उसके शब्दों में व्यजित है- पाह! नहीं आशा है, मेरे पास, स्वास्थ्य का शेषन कण, नहीं शान्ति है मेरे मन में, मिनी प्रशान्ति नहीं बाहर ! (नैपिक्स के निकट लिखित पद) यही पीड़ा पाश्चात्य प्रभंजन के भैरव रव के साथ अपने स्वर मिलाती है! पाह! उठाले मुझे लहर सा, पल्लवला, बादल सा पान ! विधा पढ़ा जीवन काटी पर, तन है मेरा लहू-लुहान! उसे अपनी कठिनाइयों का ज्ञान है, जिसकी अवशता उसकी वेदनाओं का मूल है। हाय ! समय के कठिन भार के नीचे मैं बदी नत शिर! 'दीप हुश्रा जब भग्न' शीर्षक गीत शेली के मानवीय प्रेम की ही सुन्दर अभिव्यंजना है, जिसके पीछे उसके स्वयं के अनुभव हैं, यहाँ वह आकाशीय प्रेम को स्वर नहीं दे रहा, उसकी स्वयं की वेदना कवि के अधरों पर बैठ गई है, जिससे ढल-ढलकर यह पंक्तियाँ निकल रही हैं- पाह! प्रेम ! तूरोता है यदि सकत वस्तुएँ यहाँ प्रसार ! निज सूखा, घर, अरथी को तू चुनता क्यों नश्वरतम! प्यार! (8) प्रकृति का प्रेमी- शेली के काव्य में प्रकृति का महत्वपूर्ण स्थान है। वह स्वयं प्राकृतिक सौन्दर्य का उत्कट उपासक था। अधिकांश समय प्रकृति के साहचर्य में ही फटता था। इसीलिए उसके काव्य में नदियों, सागरों झीलों के चलदृश्य, गहन वन प्रान्तर की स्तब्धता, तारों भरी रजनी की छायाएँ, शिशिर साँझ का श्वेत कुहासा, पर्वतों पर मेघों का आवारा- पन, कुहरित पट को भेदती शारदीय धूप, फूलों के अनगिन वर्णों और सौरभों का सौन्दर्य, विहग बालों का कलरव, अलबम में सजे हुए चित्रों बवालीस [शेली के की भाँति अंकित है । इटली के प्रवास में प्रकृति के दिव्य सौन्दर्य के पान का उसे अभूतपूर्व अवसर मिला। उसके प्रसिद्ध काव्यों की रचना या तो बसुधा के सौन्दर्य के अन्यतम स्थलों पर हुई है, या अपरिसीम नीलिम सागर के वक्षवर नौका विहार के समय। वह प्रायः मानव जीवन की कटु यथार्थता से मेल न खाकर खेतो-खलिहानों में जंगली खरगोशों की तरह छलाँग भरने का आदी था। ऐसे समय में, वह समाज के सभी कृत्रिम बंधनों को भूल जाता था। उसके भोजम में, रहन-सहन में, सभी में प्रकृति का सामीप्य था। प्रकृति के प्रति उसका दृष्टिकोण संगी-साथी के समान था। उसने न तो प्रकृति को मानवीय अभिनय के लिए दृश्य पटल की भाँति समझा और न उसे मानवीय विचार अथवा अध्यात्मिक चिन्ना के लिए प्रक्षेप के रूप में देखो। उसके इस दृष्टिकोण में प्लेटो का प्रभाव स्पष्ट है। प्लेटो अनुसार सौन्दर्य केवल नारी रूप में ही नहीं होता, वरन् प्रकृति का भी इस विस्तृत भूमण्डल की सौन्दर्य व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान है। शेली के काव्य में भी इस सत्य की उद्भावना है । प्रकृति उसकी काव्य की प्रेरक और जीवित संगिनी है। शेली की तुलना अन्य कवियों के प्रकृति काव्य से करने से इस पक्ष पर अधिक प्रकाश पड़ता है। शेली के पूर्ववर्ती वसवर्थ ने, जो प्रकृति के कवि के रूप में ही विख्यात है, प्रकृति की उपासना एक दिव्य आध्यात्मिक भावों की स्रोतस्विनी के रूप में की है। प्रकृति के अन्दर वह आध्यात्मिकता के दर्शन करता है, जो उसके काव्य-दर्शन का आधार बनता है । वह मानवता के पुनरोन्नयन के लिये प्रकृति के सामीप्य को ही साधन मानता है। इसके विपरीत शेली के लिये प्रकृति प्रेम की प्रतीक है। वह प्रेमी की भाँति उसके सौन्दर्य का पान करता है, वह उसके साथ हँसता और रोता है, खेलता है और अपने को खोजता है। वह मानवता के पुनरोत्थान का साधन प्रकृति न मानकर प्रेम को मानता है, जो सब जगह व्यापक है। प्रकृति उसके लिये आध्यात्मिक अथवा नैतिक शक्ति की प्रदाता नहीं है। वईसवर्थ ने अपने काव्य में प्रकृति में आनंद के ही दर्शन किये हैं, जबकि शेली सभी भावों का, प्रमुख रूप से विषाद का अङ्खन करता है। एक और अन्तर है, वईसवर्थ के काव्य में प्रकृति का स्वरूप बहुग कुछ केन्द्रित-सा हो गया है, उसमें अपरिचय की भालक नहीं [पैंतालीस शेली ] मिलती। उसका स्पन्दन स्थिति शील अथवा अत्यन्त धीमा व सीमित है। शेली के समान उसमें प्रबल प्रभंजन का सारव नहीं है । वई सवर्थ के प्रकृति काव्य में घरेलूपन-सा है, वह इसी जीवन और धरती की बात कहता है, आकाशीयता को भी भूमि के उपमान देकर भूमिका बना देता है । उसका अबाबील धरती से प्राकाश में उड़ कर पुनः अपने नीड़ में बसेरा लेने वाला अबाबील है। इसके विपरीत शेली भूमि की वस्तु को भी आकाशीय बना देता है। उसका अबाबील धरती से उड़ कर शीघ्र ही आकाशीय संगीत का प्रतीक मात्र, स्वर मात्र रह जाता है। वर्डसवर्थ के लिए प्रकृति चिरन्तनता का वसन है, तो शेली के यह है उसकी गति, वह अपने काव्य में चित्रमयता से अधिक गतिमय स्वरूप को ही देखता है। पारेथ्यूजा (प्रोमे० में) चट्टान से कूदती है, राका सुन्दरी पश्चिमी तरंगों पर द्रुत गति से विचरती हैं । वर्ड्सवर्थ के प्रकृति पट का घरेलू हो जाने का एक कारण यह है कि इसकी परिधि अत्यंत सीमित है। इसके विपरीत शेली के पर्यवेक्षण पटल का निरंतर विस्तार होता रहता है । आर्नो और यूजियन की पहाड़ियों से लेकर अटलांटिक की मेध मालिकानों और हिलोरों तक वह व्याप्त है। - शेली ने प्रकृति के अन्तःस्पन्दनों के साथ-साथ उसके वाह्य स्वरूप का भी बड़ी सफलता से--पर्ड्सवर्थ से कई गुनी अधिक सफलता के साथ-चित्रण किया है। वह प्रकृति के बिम्बों का जो उसके लचकीले कल्पना पट पर पड़े हैं, बड़ी खूबी से निरूपण करता है। यह महान् 'इम्प्रेसनिस्ट' है जो धूप-छाँह के सभी बिम्बों के तथा वस्तुओं के उड़ते संयोगों का सुन्दरता से अदन करता है। नीचे देखिगे- "धूमिल और अंगशुत शशि नीचे तरकी, दिया उडेल प्रभा का सिन्धु, चितिज बट पर ! जिससे उमड़ चले पर्वत, पीला कुहरा, भरा असीम फिजा में उसने जी भर कर । पीत सुधा को पिया, म चमका एक नखत, महीं एक स्वर सुना, प्रमंजन जो पहिले। थे भय के निदुर संगी, अथ सुस हुये, वहीं शैल पर, उसके हुद आलिंगन में" (कविका अवसान) छियालीस] । शेली शेली के दूसरे पूर्ववर्ती, पर वर्ड्सवर्थ के समकालीन महाकवि कॉलरिज में शेली के प्रकृति काव्य की अनेक पूर्व कल्पनाएँ मिलती हैं। शेली की आकाशीयता की कॉलरिज की 'मोन्ट ब्लान्क' में झलक देखिये- उठो! पृथ्वी पर से अगुरूमंघ के समान ! शेली के समान कॉलरिज़ में भी प्रकृति के गतिशील स्वरूप का- उसके अन्तःस्पन्दनों का अङ्कन है। वह अपनी 'डिजेक्शन श्रोड' में कहता है कि प्रकृति में सौन्दर्य्य उसके अन्तस्तल में हैं, बाह्य स्वरूप में नहीं । पर कॉलरिज में भी शेली के समान बाथ चित्रण की बारीकी मिलती है। कितनी गम्भोरता के साथ लटकता हुआ माधवीलता पुज । मूलता है, इसके पातायन से सम्पूर्ण पयन हैं शान्त ! कुटिया की चिमनी से उठा घुओं जिसमें प्रकाश का स्पर्श है। स्तम्भों में उठता है! शेली की 'पीसा की साँझ' शीर्षक कविता देखिये- दिवसावसान है, विहग शयन को होते आतुर, श्वेत पवन में दत गति से चमगीवर पाते होती है लय, सरक रहे गीले कोनों से बाहर मन्द नरम से दादुर, और लाभ की साँस विवरती इधर-उधर फिरती है निर्भय । शेली के समान कॉलरिज़ के काव्य में भी धाराधार बारिश और हिमानी पर्वतों के दृश्य मिलते हैं ! नीचे की पंक्तियों में शेली के काव्य की सी ध्वनि है-- प्रभु ! जलधारों को राष्ट्र के घोषों के समान देने को उत्सर, प्रभु शब्द की ही हो प्रतिध्वनि हिमानी पर्वतों में। घरही के निमरी ! गानो प्रभु को ही शपने हर्ष प्रदायक स्वर में, देवदारुनो! तुम भी, अपनी, कोमल, पारमावत फिज़ाओं में । प्लेटो के प्रभाव से मुक्त भौतिकवादी कीट्स के लिए, शेली के विपरीत, प्रकृति अधिक यथार्थ थी । कीट्स इसके सौंदर्य का मुक्त रूप से पर्यवेक्षण करता है। वह न इसमें आध्यात्मिक रूप देखता है, न यौखिक, अपितु अपनी इन्द्रियों द्वारा इसकी सुपमाओं का पान शेली ] [सैंतालीस हैं करता है । प्रकृति उसके लिए एक विराष्ट्र काव्य-पुस्तक के समान है। उसके लिए कला और प्रकृति एक सा आनन्द देती है। प्राकृतिक आनन्द ही कलाकार के मस्तिष्क में सभाकर कला का रूप लेता है। शेली की भाँति प्रकृति उसके लिए जीवित या प्रतीक नहीं है, और न कीट्स शेली की भाँति अपने प्राकृतिक चित्रण में, अस्पष्ट, आकाशीय और दैविक है, इसके विपरीत, कीट्स के अङ्कन में एक वास्तवता शान्ति और घरेलूपन है। शेली के शङ्कन में प्रायः बादल, तूफान, आकाश, पर्वत, सागर का वर्णन पाते हैं, कीट्स के काव्य में वर्ण, वन, खेत, फूल का शान्त सौंदर्य मिलता है। "जब प्रकृति को पईसवर्थ आध्यात्मिकता प्रदान करता है, और शेली बौद्धिकता तो कीट्स अपनी इन्द्रियों द्वारा उसकी व्यंजना करता है। वर्णावलियाँ, गंध, स्पर्श, स्पंदित संगीत ये सब वस्तुएँ जो उसे गम्भीरता से आन्दोलित करती हैं।" (डले) शेली के समान बायरन में भी प्रकृति के उन्मत्त स्वरूप में रुचि थी। पर उससे वह कोई दार्शनिक उद्भावना नहीं करता था। बायरन के लिए प्रकृति मानवीय प्रवृत्तियों के अभिनय के लिए शानदार पृष्ठ-भूमि के समान है। यह प्रकृति से प्रानन्द पाने के बजाय उत्तेजना पाता है। शेली के समान प्रकृति के जीवंत रूप को निरखने की भावना हमें हिन्दी छायावादी कवियों में भी मिलती है। श्रीमती महादेवी धर्मा की इन पंक्तियों को देखिये- लिन्धु का उच्छयास धन है, तक्षित तम का विमल मन है। भीति क्या, नम है व्यथा का आँसुओं से सिक अंचल ! अथवा, धीरे धीरे उतर दितिज से, श्रा, वसंत रजनी, जो सहज ही शेली की- स्वरितमयी पश्चिमी लहर पर, हे, राका, तू विचरण कर ! पंक्तियों का स्मरण दिलाती हैं। अड़तालीस] - [शेली शेली का पाश्चात्य प्रभजन' कवि के मृत्त भावों को मनुजता में बिखराकर भविष्यवक्ता हो जाता है। 'निराला' का 'बादल' विप्लव की मूर्ति बनकर सौष शृङ्गों को भूमिसात् करता हुआ त्रसित कृषक के लिये आनन्द की वर्षा करता है। है, सुन्ध तोष रुख कोष, अंगना-प्रश से भी लिपटे। भातक-प्रा पर कॉप रहे हैं धनी, वन गर्जन से बादल ! यही बादल, शेली के 'बादल' के समान लुक-छिपकर आकाश में खेल खेलता है ! कभी 'किरण-कर पकड़-पकड़कर' 'मुक्तगगन' पर चढ़ता है । कभी सृष्टि के अंतहीन अम्बर से, घर से क्रीड़ारत बालक के समान उमड़ पड़ता है। यमुना की आकुल लहरें नटनागर की गौरव गाथा कहती हैं। प्रिया की स्मृति 'लघु लहरों की-सी चपल-चाल' चलती है। श्री सुमित्रा नंदन पंत के 'बादल' में, यद्यपि शेली के 'क्लाउड' का परोक्ष प्रभाव दिखाई देता है, पर तो भी अत्यंत मौलिक है। उसमें 'क्लाउड' के समान अन्तर्मन का गहराई से पूर्ण चित्रों में रम्यांकन नहीं है, पर पंत जी ने छोटी-छोटी रेखाओं से, 'धूम धुआरे, पादर कारे' का जो बायांकन किया है, वह बड़ा सजीव और अनूठा है। पंत जी की संगीतात्मकता और चित्रण-कुशलता अनेक स्थलों पर अपनी चरम सीमा पर है- किन्तु पन्त जी के काग्य में प्रकृति के इस रूप की अपेक्षा उसके मांसल सौन्दर्य का अंकन अधिक है अथवा वायरन के समान उसे मानवीय अभिनय की यवमिका बनाकर उसका चित्रण किया है, कहीं-कहीं बड्सवर्थ के समान प्रकृति के अन्दर आध्यात्मिक रूप को भी देखा है- - उठाकर लहरों से कर कौन निमंत्रण देता मुझको मौन ? . - वास्तव में, पंत जी के अन्दर रोमानी काग्य की सम्पूर्ण प्रवृत्तियों परिलक्ति होती हैं, पर प्रमुख रूप से कीट्स का ही प्रभाव शेनी ] [उनम्बास लघु बहरों के पल पलनों में हमें मुलाता जब सागर । वही चोल सा झपट बाँह गह हम को ले जाता ऊपर। x X कभी चौकड़ी भरते मृग से, भू पर चरण नहीं धरते । मत-मतङ्गम कभी झूमते, सजग-शशक नभ में चरवे। x पर शेली का प्राकृतिक चित्रण जहाँ सब से अधिक गहरा है, यहाँ उसका प्रसार भी अति व्यापक है। उसकी दृष्टि समुद्र तल के नीचे उगनेपाली वनास्पतियों पर भी जाती है। किन्तु दूर नीचे खिलाणे, सामुद्रिक पुष्प, व स्पंदित यन, वारिध-तल के नीरस कोपन दन का पहिने हुए वसन ! तेरा रव सुन, सहसा होते, भय से पीले कम्पिस म्लान, आतंकित हो लुटित होते, स्वयं सभी, सुन, हे पवमान! ('पाश्चास्य प्रभजन) शेली के प्राकृतिक चित्रण में वर्षों के प्रति उसकी रुचि देखिये । कपिल श्याम और पीने, ज्वर से रक्तिम पर्य, पर्ण नियमाथ! अथवा नीलिम द्वीप, और शोभित है पारदर्शिनी शक्ति प्रवल, मील लोहिता दोपहरी की, हिमाच्छादित शैलों पर, (नेपएस के निकट) शेली को विज्ञान से भी अधिक रुचि थी, इसका प्रभाव उसके प्रकृति चित्रण पर भी मिलता है। 'बादल' की निम्नलिखित पंक्तियाँ उसके वैज्ञानिक ज्ञान की परिचायक हैं-- मैं दुहिता प्रिय कोमल, है माँ-बाप मृत्तिका, जल, पोषक है यह नीलाम्बर । x x x x छिद्रों से सागर तट के-जाता हूँ मैं घेखटके, मैं परिवर्तनशील, किना हूँ भषिनश्वर। x x x x पचास] [ शेती और पवन रवि की किरनों के उन्नत सदर कणों से अपने, निर्मित करते हैं समीर का नील शिखर । (बादल) काव्य में वैज्ञानिकता का स्वरूप हमें लॉर्ड टेनीसन के काव्य में भी मिलता है। अस्तु, हम देखते हैं कि शेली का प्रकृति चित्रण आन्तरिक और बाह्य दोनों रूपों में अन्य कवियों से विशिष्ट है, अधिक गम्भीर और व्यापक है। प्रकृति उसके लिये जीवित मनुष्य की भाँति बौद्धिकता का श्रोत है, प्रेम की प्रतीक है, सौन्दर्य का आगार है। ०) शेली की शैली- रचनाओं की दृष्टि से शेली की शैली का अध्ययन निम्नलिखित चार भागों में बाँटकर, कर सकते हैं (१) बृहद् काव्य (२) प्रगीत काव्य (३) नाटक (४) व्यंग काव्य (१) वृहद्काव्य में 'क्वीन मैब', 'ऐलास्टर', 'विच' 'रिवोल्ट' इत्यादि पाते हैं। इनमें काव्य की दृष्टि से अनेक स्थल बहुमूल्य हैं, पर कथानक की दुर्बलता और कहानी कह सकने की क्षमता के अभाव के कारण इनका स्थान शेली के काव्य में, काव्य की दृष्टि से द्वितीय है। (२) प्रगीत काव्य-प्रगीत अथवा लघु कविताओं में ही शेली के कवि की सर्वोच्च प्रतिभा के दर्शन होते हैं। इनमें निजी वेदना, अनुभव, और मानवीय संवेदन भावों की अच्छी अभिव्यक्ति हुई है। 'पाश्चात्य प्रभजन', 'बादल', 'अबाबील', 'नेपल्स के निकट लिखित पद', इत्यादि प्रगीत अङ्गरेजी साहित्य में प्रसिद्ध हैं । इसका आगे हम पृथक् विस्तृत विवेचन करेंगे। (३) नाटक-शेली का युग वास्तव में नाटकों के अनुकूल न था । इसलिये इस युग में नाटकों की संख्या नगण्य है । शेली ने प्रमुख शेली ] [इक्यावन रूप से 'हेलास' 'प्रोमे', 'चिची' नामक नाटक लिखे हैं। इनमें नाटक की घष्टि से अंतिम हो नाटक सफल और उच्चकोटि का कहा जा सकता है। इसका प्रदर्शन भी हो चुका है। शेष नाट्य साहित्य में प्रगीतों का ही प्राचुर्ण्य है। (४) व्यंग-व्यंगकार के रूप में समग्र दृष्टि से शेली को इतना उच्च स्थान प्राप्त नहीं है । पर वो भी अनेक स्थानों पर उसकी उच्च व्यंग की प्रतिभा की अनुपम झलक मिलती है। उसके प्रमुख व्यंग काव्य हैं, 'यूडीपस' 'पीटर वैल' और 'मास्क' । इन सभी में उसने कस-कस कर शासकों और पादरियों की खबर ली है। पहला, वास्तविकता से दूर जा पड़ने के कारण इतना सशक्त नहीं है। दूसरे में, उसकी उच्च व्यंगकार की प्रतिमा के स्थान-स्थान पर दर्शन होते हैं। 'नरक' शीर्षक से लंदन नगर पर कसा गया व्यंग घड़ा चुभता है। वह नरक से लंदन नगर की उपमा देता हुआ, शासकों, धर्मध्वजों, लाडौं, फैशनेबुल मारियों तथा प्रतिक्रियावादियों पर तीन व्यगों की वर्षा करता है। 'मास्क' में व्यंग के साथ-साथ उसकी कलात्मकता भी मिल गई है। कथि बाडम्बर' 'करम' 'प्रवंचना' इत्यादि का वर्णन करता है, पर इनके पीछे नाम ले-लेकर तत्कालीन शासकों को अपना शिकार बनाता है। इसके अतिरिक्त शेली ने गध भी लिखा था। जिसमें अनेक राजनीतिक पर्ये, और मित्रों तथा सम्बंधियों को लिखे गये पत्र एवं डायरी और अनेक निबंध हैं जिनमें 'कविता के समर्थन में प्रेम, साहित्य, धर्म, कला सौंदर्य के विषयों पर अपने विचार प्रकट किये हैं। अधिकांश इनमें अधूरे रह गये हैं। इनमें शेली ने विपय का बड़ी गम्भीरता और तर्क संगत भाषा में प्रतिपादन किया है। अनेक स्थलों पर गय की भाषा इतनी निखरी हुई है कि अगरेजी साहित्य में बेजोड़ है। शेली ने अपनी कविता प्रत्येक छह में की है, छंदों के अनेक प्रयोगों के साथ-साथ, उसने अनेक कठिन छदों को सुधड़ता से प्रयोग कर पुनर्जीवन दिया है। 'टरजारीमा' छंद का प्रयोग जो उसकी 'जीवन की जय' शीर्षक अधूरी कविता में मिलता है, शेली की छन्- कुशलता का प्रमाण है । छगों का अनुक्रम विलकुल स्वाभाविक है। बावन ] [शेली कविता की भाषा के सम्बंध में शेली की दृढ़ धारणा थी कि इसमें कृत्रिमता तनिक भी न होनी चाहिये। भावों की अनुरूपिणी भाषा अपने सहज स्वाभाविक सौन्दर्य के साथ हर जगह बोध- गम्य है। -- - (११) शेली की प्रगीतज्ञता जैसे कीट्स का नाम प्रशस्तियों के लिए प्रसिद्ध है, वैसे ही शेली का प्रगीतों के लिए। शेली की प्रतिभा का सबसे अधिक निखार उसके प्रगीत काव्य में ही है। प्रगीत काव्य का वह अगरेजी काही क्या विश्व साहित्य का अनुपम कवि है । वास्तव में, ड्रिंक वाटर के शब्दों में उसका सम्पूर्ण काव्य ही प्रगीत है। चाहे 'बादल' या 'अबाबील' जैसी लघु कविताएँ हों अथवा 'प्रोमे' जैसे बड़े काव्य हों, समी में उसने उच्च कोटि का प्रगीत तत्व भर दिया है। अर्नेस्ट रिस के अनुसार 'वह गीत-प्रदेश का द्वार-रक्षक है । उसकी गीतात्मकता के लिए हम उसी के शब्म जो उसने दान्ते के काव्य के लिए प्रयुक्त किये थे, प्रकट कर सकते हैं- "उसके समूचे शब्द ही आत्मा से ज्योतित है, प्रत्येक एक चिनगारी के समान है, अनचुम विचार के घिर प्रज्वलित कण के सहश।" उनकी व्यंजना अत्यन्त स्वाभाविकता से होती है, जो गीतात्म- कता के लिये अत्यन्त आवश्यक है । जैसे प्रसूनों से सुरभि और नासिका से श्वासोच्छवास' वैसे ही शेली के अन्तर से गीतों की स्रोतस्विनी फूटती है । दृश्य जगत का सौंदर्य्य उसके कल्पना दर्पण से टकराकर शतवर्णी इन्द्रधनुष के समान बिखर उठता है। संगीत स्वयमेव उसके साथ चला आता है। और जब तक यह गाते गाते अबाबील की भाँति, मनुष्य मात्र से एक स्वर, एक गीतमयता की प्रतीति नहीं हो जाता गायक का व्यक्तित्व उसके गीतों में निरन्तर पिघलता रहता है। गीतों को यह किसी नियम-प्रणाली के सहारे नहीं उतारता, वे अवश रूप से उसके अधरों पर आ बैठते हैं। स्वाभाविक संगीतात्म- फता को जहाँ-तहाँ हल्के स्पर्श से हेर-फेर करना शेली की अपनी विशेषता है। शेली के अन्दर उच्च कोटि के प्रगीतकार के सभी गुण वर्तमान थे। न्यूटन के अनुसार प्रगीतज्ञ के अन्दर भाव प्रवणता, [ तिरेपन शेली ] । और कल्पना शक्ति का अतिरेक होना आवश्यक है, क्योंकि प्रगीत काव्य व्यक्तिगत भावना या अनुभूति की व्यंजना ही है। इसके अतिरिक्त प्रगीत काव्य के अन्य आवश्यक गुण संगीत, सरलता, प्रवाह-हादिकता (आकस्मिकता), विचारों की क्रमबद्ध निःसृति और बिम्ब की ग्रहणशीलता इत्यादि है। शेली के अन्दर इन सभी गुणों का प्रबल प्राचुर्य था। उसका अधिकांश काव्य ही व्यक्तिगत है। 'भारतीय पवन' १८१४ के पद' 'नेपल्स के निकट...' इत्यादि में उसके निजी दर्द की अभिव्यक्ति है। 'अबाबील' और 'बादल' जैसे नियक्तिक काव्य में भी शेली का ही रूपान्तर है। 'पाश्चात्य प्रभंजन' में इन दोनों अनुभूतियों का समन्वय है। भावुकता और काल्पनिक शक्ति परिसीम है। वह तनिक सी अन्याय की बात से भड़क उठता है। उसकी लचीली कल्पना भावनात्मक वस्तुओं को भी मूर्तिमयी कर देती है । सरलता के साथ उच्च कोटि की स्वाभाविक संगीतात्मकता में सनी हुई कविता में अदम्य प्रवाह है। संगीत की दृष्टि से वह रोमानी युग का सर्वोत्कृष्ट गायक है। रिखनबर्न की ट्रिक्स' (चाल) और टेनीसन की कृत्रिमता के विपरीत, उसका, काव्य-संगीत अत्यन्त प्रकृत है। उसके अन्दर हार्दिकता का गुण अन्य कवियों की अपेक्षा सर्वाधिक है। उसकी हार्दिकता का नीचे-से-नीचा तल भी दूसरे हार्दिक कथि, बायरन के ऊँचे-से-ऊँचे तले से उत्कृष्ट है। उसके प्रगीतों की तुलना प्रायः ब्लेक से की जाती है । पर, ब्लेक के विपरीत उसके सर्वोत्कृष्ट गीत प्रारम्भिक नहीं हैं उसके समान शेली सुख और भोलेपन के गीत नहीं गाता, और न उसकी सी उसके अन्दर मानवीय लय ही है । उसके गीतों की एक विशेषता यह है कि जहाँ ब्लेक के गीतों की लय शीघ्र ही समाप्त हो जाती है, वहाँ शेली के गीत निरंतर उत्कृष्टतर होते चलते हैं । शेली के गीत ब्लेक की अपेक्षा अधिक मर्मभेदी हैं। उनकी प्रेरणा सुख से नहीं दुख से है। 'मधुतम गीत यह निज करते, प्रति दुख भावों का व्यंजन' (अषावील) एक उदाहरण जीवन, पहुषी शीशे के गुम्यज सा कर देता, कलुषित धयक्ष कान्ति को चिरता की, जब तक न पगों से पम कर देता चूर चूर । (एडोनेस) बौवन ] [ शेली सचमुच उसके गीतों में मधु का प्रवाह तभी उमड़ता है, जब वह बुलबुल के समान, काँटे से अपनी छाती विधा लेता है। और दुख, प्रेरणा का स्रोत बनता है। जब यथार्थ की शिला पर उसका प्लेटोमय स्वप्न भंग हो जाता है, तो अतीव वेदना की चीख उसका प्रगीत बनकर घुमड़ उमड़ उठती है । भाह ! उठाले मुझे घास से, प्रिय, निष्प्रभ, मूर्छित होता मैं ! (भारतीय पवन के प्रति) ब्लेक और शेली के प्रगीत काव्य के अन्तर को स्पष्ट करते हुए आर्थर साइमन ने लिखा है- "शेली अपने सारे जीवन भर स्वप्न बटा ही बना रहा, वस्तु रष्टा नहीं, हम उसकी 'ऐशिया के समान पर्वत अंग पर ही उसका ध्यान करते है, कहते हुए, मेरा मस्तिष्क बोमिल होता है, क्या तू कुहरे में प्राकृतियाँ देखता है ? शेली को कुरा उसके दर्शन वस्तु का भाग था। उसने कभी जीधन या कला में सिवाय कुहरे के द्वारा कुछ नहीं देखा । इसके विपरीत उलेक निरन्तर षट की ही स्थिति में रहा, जबकि शैली भदृष्ट की। जो इलेक ने देखा, शेली देखना चाहता था। प्लेक कमी नहीं अपनाया, पर शेली कमी नहीं जगा, उस स्वपन ले, जो उसका जीवन था । उपरियुक्त अवतरणों में यद्यपि शेली के उस पक्ष को नितांत अनदेखा किया गया है, जो प्लेटो की प्रभाव परिध से बाहर था, पर तो भी इससे दोनों कवियों के मोलिक अन्तर पर अच्छा प्रकाश पड़ता है। शेशी की गीतात्मकता अतुलनीय है। इसके समान पूर्ण दक्षता के दर्शन कहीं नहीं होते, और न इतनी ऊँचाई से गिरती सधन ध्वनि अन्यत्र कहीं पाते हैं। सचमुच कधि की वाणी कभी इतनी निर्बाध होकर गीतों में नहीं उमड़ी। हर स्थान पर शेली का संगीत स्वतः निःसृत होता रहता है । क्योंकि उसकी अनुभूति की शक्तियाँ तीव्रता के साथ लय मय हो गई हैं। शेली ] [ पचपन शेली की कवि वाणी आवेश की स्थिति में जल के सोते के समान फूटती है । जब पावन तम का उन्माद उस पर छा जाता था, और दृश्य परिधि में प्रेम, प्रकाश और जीवन के रूप जीवत हो उठते थे । तब कल्पना की शाखों से सूखे पत्तों के समान भरते हुए ज्वलित विचारों को वह अपने स्वरों से बटोरने लगता था और लय में बाँध कर गीतों में विखराता था। वह निरंतर उच्चतर प्रयत्न, उद्दीप्त सघनता, आत्मिक प्रस्फुटन और प्रेरणा की पवित्रता धरती के अनूठे बिम्बों के साथ समन्विन का अपनी कविता में निजी वेदना के रस में भिगो कर सुनाता रहता था। पर सदा ही इस अपरिसीम पवित्र और गौरवशाली चिन्तना के कणों को यह पकड़ पाने में सफल न होता था। अनेक स्थानों पर उसके न कह सकने की वेदना उसकी अप्राप्य की घास के साथ मिलकर घुमड़ती सी जान पड़ती है। नीचे के पद्यांशों को देखिये- दुखी होना, पर कोई तृप्ति न पाना-दुखी होना, पर भटकना लघु उन्मन पगों से-रुकना, सोचना, और अनुभव करना माहू को शिराओं में प्रवाहित होते और भावेशित 'देखकर जहां व्यस्त विचार और अन्य स्पन्दन मिलते हैं। अननुभूत स्नेहिल परस के बिम्ब को पोसना जब तक कि धूमिला कल्पना नहीं प्राप्त कर लेती अब सजित छायाएँ (एक अधूरा काण्यांश) ऐसे और भी अनेक स्थल हैं, जहाँ वह अपनी चिर दुष्कल्पना में बसे सौन्दर्य को पाठकों के सामने प्रस्तुत नहीं कर पाया । इस आवेशमयता तथा कल्पना शक्ति की प्रखरता से जिसे वह काव्य का प्राण मानता है, और जिसका 'अपनी कविता के समर्थन में इतना प्रतिपादन करता है, उसका काव्य सदोष रह गया है। उसमें शीघ्रता है, अपूर्णता और असामंजस्यता है, वस्तुगत सत्यों को ग्रहण करने की अक्षमता है, क्रियाओं के प्रयोग की लापरवाही है। पर इन सब दोषों का, जिन्हें कि अपनी तनिक सी प्रयत्नशीलता से 'सैन्सी' और 'ऐडोनेस' के स्तर तक पहुँचा सकता था, और जिनका कि अन्य समकालीन कवियों में सर्वथा अभाव है, मूल कारण यही अधैर्य की स्थिति है। साइमौण्ड के शब्दों में- room छप्पन ] [ शेली न केवल अभी कवि ही तरुण था, परन् उसके तरुण मस्तिक के फस को अनुभव की धूप में अच्छी तरह पकने से पूर्व ही तोर खिया गया था।" उसने कलालाकता की ओर तनिक भी ध्यान नहीं दिया क्योंकि कविता को वह मस्तिष्क से असम्बद्ध मानता था, इसी को लक्ष्य कर कीट्स ने उसे लिखा था। "Curb your magnimity and load every rift with ore." बारीकी में उसे कम ही रुचि थी, कम से कम उस बारीकी में, जो उसकी दृश्य परिधि में स्वयं ही नहीं पाजाती थी। इसीलिये उसमें 'गेटे' की सी सुघड़ाई नहीं मिलती। उसे अपने प्रति कहीं-न-कहीं अनास्था अवश्य थी, जो उसकी उन परिस्थितियों का परिणाम थी, जिनके भीतर उसे सृजन करना पड़ता था। इसलिये वह आवेश के दौर के बीत जाने पर रचना के प्रति विमुख हो जाता था और उसे अधूरा छोड़ कर नये सूजन में जुट जाता था, यही कारण है कि वह अपनी बड़ी रचनाओं में छोटी रचनाओं की भाँति अन्तिम पूर्णता नहीं दे पाया। पर यही आवेश का आधिक्य, जिसने उसके काव्य को इतना असंयत और वेगमय बना दिया है, उसके अन्दर चमत्कार और प्रखरता और मधुर तरलता भरता है । यही भावेश जो उसकी कविता को दोषयुक्त करता है, उसके काव्य की शक्ति है। जो बात बर्न्स के गीतों के लिये सत्य है, वही शेली के प्रगीतों के लिये, उसके समस्त काव्य के लिये, उसके सम्पूर्ण जीवन के लिये, सही है। यही शक्ति जो उसे भटकाती है, उसके गीतों को जीवित रखेगी। संक्षेप में, शेली का काव्य अत्यंत स्वाभाविक, संगीतमय, मर्मस्पर्शी और नूतन चेतना का वाहक है, उसका प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रवाह गहराई से विश्व साहित्य पर पड़ा है और पड़ रहा है, जब तक काव्य से तारुण्य उद्दीप्त रहेगा, और तारुण्स से काव्य को स्फूर्ति मिलेगी, शेली का नाम अमिट कीर्ति के पटल पर चिर युगों तक दैदीप्यमान रहेगा। -- शेली.] [सचापन

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शेली का काव्य-लोक
महाप्राण ! यह सीमाहीन भाव का अणव,
निज कल्पनातीत गुम्फों में तुझे पालता ।
जिनमें तू एकाझी स्थित, ज्यों मम मानल में,
स्वर देता इसकी रहस्यमय हिल्लोलों को!
(काव्यांश १८२२)

Liberty
(1)
The fiery mountains answer each other,
Their thunderings are echoed from zone to zone
The tempestuous oceans awake one another,
And the ice-rocks are shaken round Winier's throne,
When the clarich of the Typhoon is blown.
( 2 )
From a single cloud the lightning flashes,
Whilst a thousand isles are illumined around;
Earthquack is trampling one city to ashes,
An hundred are shuddering and to ttering-the Sound
is bellowing underground.
( 3 )
But keeper thy gaze than the lightnings glare,
And Swifter thy step than the earthquack's tramp;
Thou deafenest the rage of the ocean, thy stare
Makes blind the volcanoes; the suns's light lamp
To thine is a feu-fire damp.
From billow and mountain and exhaltation
The sunlight-is darted through vapour and blast,
From Spirit to spirit, from Nation to nation,
From city to hamlet, thy dawning is cast,
And tyrants and slaves are like shadows of night
In the van of the morning light,
(1820)
Pat ]
[ Raft

কঙ্কাল। होते जागृत अग्नि-शैलमालिका परस्पर देती प्रान्त-प्रान्त प्रतिध्वनित कड़क घोषों से जिनके । मंभालोदित सिन्धु परस्पर हिम के खण्ड चतुर्दिक ढहते शिशिरासन के, अठते दीर्घ घोष जब विपक्ष की ( २ ) दुभि से! शिखा तषित की चमक फमकती एक मेष से, किन्तु सहस्त्र द्वीपखंडों को छु तिमय करती। भस्मसात है एक नगर ही भूमिकम्प ले, किन्तु एक शत में भया वह कम्पन भरती- घोर गर्जना भू-मन्तर विहरती। में पण मुखतर।। किन्तु तपित ले तेरे हग की शिखा प्रखर है, भूमिकम्प के डग से तेरे सिन्धु-रोष को षधिर, अंध ज्वालामुखियों को- करती सस्वर, और अंशु की ज्योति प्रखरतर- लगती धुधियाती सीनी तेरे समह पर! झंझा, () दिनकर पातप, लहर और पर्वत-पठार से, धाप-पटल से ही छनकर पाता है। प्राण-प्राण से, राष्ट्र-राष्ट्र से और नगर से- कुटिया तक, तेरा प्रभाव ही मुस्काता है। और निरंकुश, वास, रजनि की छायाएं अब, तेरे भीर बजाले के रथ के पीछे सब । (२०) शेली ] [ तीन

गीत
दीप हुआ जब भग्न, धूल में,
मृतक ज्योति हो गयी विलीन !
बिखर गयी जब मदनी होती,
इन्द्रधनुष की प्रभा मतीन ।
याद नहीं मृदु ध्वनियाँ रहती,
टूटे जबकि बीन
अधर हुए मुखरित यदि रहता
जीवित नहीं परस्पर प्यार!
के तार,
( १ )
दीप बीग अब म होगये,
शेष न प्रभा और संगीत ।
प्राण मूक, तो उर की गूंजें,
नहीं सुमाती कोई गीत।
गीत न, शोक रागिनी करती,
टूटे म से शोर पवन ।
अथवा करुण हिलोर उठाती,
सुत नाविक-घंटी से स्वम ।
(३)
एक बार दिल मिले, छोड़ता,
प्रथम बार ही प्रेम सुवास ।
दुल हृदय विक्षग हो करता
गत पाने के लिये प्रयास ।
माह । प्रेम तू रोता है यदि,
सकल वस्तुएँ यहाँ असार ।
निज गला, घर, अरथी को
चुमना क्यों नश्वरतम, प्यार!
चार]
[शेली

(४)
।
झमा सम लिप्साएँ इसकी,
कर देंगी
कागों-से खंड।
उज्ज्यक्ष सर्क तुझे भेदेगा,
शिशिर-निलय में ज्यों मार्तण्ड
तेरे गरुनील सम घर का,
शहतीर
नग्न सजेगा, हसने को, जब,
करें पर्ण और शीत समीर ।
जायेगा हर
(२२)
शेली.]
[ पाँच

पीसा की साँझ दिवसावसान है; विहग शयन को होते आतुर, श्वेत पथन में, द्रुत गति से धमगीषद पति होती हैं लय । सरक रहे गीले कोनों से, बाहर मन्द मरम से दादुर, और साँझ की सास विचरती, इधर उधर फिरती है निर्भय, घूम रही है निझर के चंचल-जन-तल पर मंथर गति से ! पर न जगाती एक उर्मि को भी निज ग्रीष्म-स्वपन की रति से। और यह , पाज न हरियाले तुगल पर एक तुहिन कम, बची नहीं सीलन तरुओं की कहीं छाँह में। हक्का, शुष्का स्पन्दनहीन प्रभंजन, बिखराता फिरता घर कर अपने प्रवाह में। रज के कण, सूखे तिनके, वह मंद समीरणा, भवराता नगरी के पथ करता विचरण। (३) तीन प्रवाहित सरिता की उस मीर-सतह पर, सोया पड़ा हुआ है बिम्ब नगर का लहरिल। है अशान्त यह बंधा हुमा है एक जगह पर चिरकम्पित है, पर है अक्षय, भाभा झिलमिन। देखो जाकर तुम होकर परिवर्तित ऐसा ही पाओगे। वहाँ के ऊपर, बन्ध हुमा वह गर्स, भग्न है जिसमें दिनकर, भस्मिन-धन की घनतम प्राचीरों से भावृत्त। ठसा पड़ा हो ज्यों पर्वत पर्वत उगता, बढ़ता, संकुल की ओर प्रवर्तित । और नीर-सी-नीली जगह हुई साम-तारिका चमकती जिसमें होकर! (१२१) के ] [ शेली

गायन
तप रहा हूँ, जो वैविक है, उस गायन को,
मेरा हृदय प्यास में अपनी, कुसुम मरणमय !
परसो! मंत्रों से अभिर्विचित मथु सी ध्वनि को,
तुम चांदी के निझर-सी अब शिथिल करो लय ।
मैं हूँ क्यों तृणहीन भूमि है, मृदु जस्त कन से,
निय, अचेत, जब तक न जागरन उसका फिर से !
उस मृतु ध्वनि की आत्मा को दो मुझको पीने !
और। और !! पर हाय तुषाकुल,
कितना व्याकुल
खोल रही है ज्याल, जिसे जकड़ा चिन्ता ने,
मेरे उर पर, घुटते प्राण विकल जो पल-पल !
विचर रही संगीत लहर है अब घुल घुल कर !
शिरा शिरा से, बह-यह फर, मम उर मानस पर !
का
जैसे एक बमक्शा सौरभ
मुरमाया,
जोकि रुपहले मीलफूल पर उगा हुआ था !
ऊष्म-चाल ने सुहिन-चषक से पी सुलकाया !
इसकी प्यास बुझाने कुहरे का न धुआँ था!
हुधा बनशा मृत्त, सुरभि होगयी पलायित,
पवन परों पर चढ़कर, नीले जल पर विचरित !
ज्यों फेमिला, उज्ज्वल, मर्मर करती मदिरा की,
मोहक प्याली पीकर कोई ध्यास बुझाता!
ऐन्द्रजालिका बनी है उसकी साक्री !
उसके दिव्य स्नेह चुम्बन का न्यौता पाता !
प्रबल
(२)
शेली ]
[ सात

कनिस्तान की एक ग्रीष्म सध्या पोंछ ले गया विस्तृत नभमंडल से पयन बाष्प का हर कन, जिससे ढकी हुई थी अब तक अस्त सूर्य की किरन सुगहली । धूमिलसर उस कुन्तल-दल से, अपनी किरन भलक का ग्रंथन, दिन के मकिन नयन के चारों ओर कर रही संध्या पीली । मौन, और संध्या-प्रकाश, जो हैं अप्रिय मानव को लगते, उस अस्पष्ट सामने की घाटी में हो कर बद्ध सरकते। (२) मुंद दिवस की ओर छोड़ते अपनी सुषमाएँ वे जिनसे, मर भर डाले, वसुंधरा नक्षत्र, पवन पौ' सरिता सागर । ध्वनि, प्रवाह औ' उजियाला देसे अपने समर्थ कम्पन से, इस रहस्य से भरे हुए जादू का ही अभिनन्दन-उत्तर ! रुके पवन, या जब चलते हैं, तो उनके वे स्पन्दन कोमल, मही जान पाती हैं किंचित वर्च-शिखर की शुष्क तृणावलि । (३) अग्नि-राशि ! तेरे इन शिखर नुकीलों से है वेदी बनती, ऐसा लगता जैसे अग्मि-विरागिढ उठे हुए हो, नभ पर । तू भी उमक मधु गम्भीर रहस्यों का धुप शोफर करती, पाशा पालन, धूमिल दूर शिखर पर स्थगिक वर्ण सजाकर । जिमके उचस्तक के, जो हैं जयशः, और हगों से भोमल, होते हैं संकुलित चतुर्दिक, नक्षत्रों में निशि के पावन । - P - - मृत्तक मनुष्य सो रहे हैं अपनी समाधियों के ही भीतर, और एक रोमांचमयी ध्वनि करके जप चे यशः शायित । अर्थचेतना, भावना, तम में उठती स्पन्दित होकर, प्राणित वस्तु चतुर्दिक उनकी कीटमयी सेजों से श्वासित । और शान्त निशि, मूक निलय के संग, जिसे वे करते हैं लाय, जिसके दुखमय सरसर स्पन्दन का अनुभव होता अनध्यमय । पाठ ] शेली

मृत्यु इस तरह अनुष्ठान से पावन और नरम हो होकर,
नम्र और भयमुक्त बनी है, इस प्रशान्तमय निशि सहश ही।
प्राशा करवा. मैं जिज्ञासु थान सा क्रीडा कर समाधि पर,
कहीं मृत्यु बिलकुल भीमल कर पाती, मानव-हग पथ से ही-
मधुर रहस्यों को, अथवा उच्छ्वासहीन निद्रा के भीतर,
वे मृदुतम सपने, अविरत प्रशयन ने रक्या जिन्हें संजोकर ।
(121)
eStees...
शेली]
[ नौ

प्रवासील के प्रति
ममुक्ति प्राण ! तुझे अभिवादन !
कभी न था तू खग निश्चय !
नभ के या इसके समीप से,
परस
रक्षा सम्पूर्ण हृदय !
पूर्व-चिन्तना-दीन कलामय, गीतावलि से भर अतिशय !
--
ऊँचे और बहुत ऊँचे चढ़,
धरती से कुदान भर कर ।
अनल-मेघवत, प्रयाबील तू,
बढ़ता
नीलिम पंखों पर,
उहने को चढ़ता तू गाता, गाता जब चढ़ता ऊपर।
प्रस्तोम्मुख होते दिनकर की,
कनाक फमक हो रही द्रवित ।
जिसके उपर उज्ज्वल बादल,
तू तिरसा, होता धावित ।
ज्यों अशरीरी किसी सौख्य की दौड़ हुई हो प्रारम्भित !
(४)
पीत अरुणिमा तव उड़ान के
यही चतुर्दिक द्रव होकर,
व्यापक दियालोक में होता,
नहीं गोचर,
जैसे तू भी, पर सुनता मैं तेरे प्रखर उल्लखित स्वर ।
क्यों नक्षत्र
दस]
[ शेली

ज्यो तीखे शर हैं उस, रजत- प्रभा-मण्डल के पल पल पर । जिसकी गहरी ज्योति पीण हो, गिरती शुभ्र अषांचल पर । जब तक नहीं अष्ट, सोचते है यह है गगमस्थल पर! ६) यह समस्त पृथिवी, ज्योमाचल, गुजित तेरे ही स्वर से। ज्यों रजनी जय होती सूनी, एकाकी शशि परसाता किरन, निलय भावावित होता इस जल से ! धादन से- (७) तू क्या है धम नहीं जानते, तुमसा क्या बहुत मृदुल ? वित्र न सके इसने के कन जो, बरसाता जितना चमकीला मृदुमन्य तुझसे बर्षित गीतों का जख! यादव! (८) छिपा भाव-पालोक-लोक में, कोई कवि करता गुजित, अनचाहे गीतों को अविरत, जय तक विश्व न संवेदिस- होता भय प्राशों के प्रति, थे पहले इससे जो, पेशित ! ज्यों कुलीन सुन्दरी कुमारी, बैठी सौध-शिखर ऊपर शेजी ] [ ग्यारत अपने गुरु प्रणयाहत प्राणों को करती, गुप्त रणों में तर। प्रिय-सा-मृधु संगीत बहाकर उमदा पड़ता, कस-सुघर । (१०) कनकवर्ष तुहिन कनों की घाटी में ज्यों, चंचल विखराता है रंग पायधी, तृण कुसुमों पर जो अविरन । ओ दम लेसे उसे नजर से फैला कर कोमल आँचल ! (११) जैसे उस गुलाब के बनते, हरित पर्ण के कुछ सघन ! पीसे सुरभि, ऊष्म पवनों से, तथ तक करते रहे सुमन, हुश्रा न जब तक इन योझिल-पर-युत-चोरों का मूर्षिछत मन । वासंतिक फुहार पज हरित तृणावलियों पर, के स्वर। वर्षा-जागृत-कुसुमानन थे, सस्मित, स्वच्छ, व सथ, सुधर! सब कुछ सुन्दर, पहुँच म सकता, सव संगीत-स्तर तक पर सिखा हमें, हे भास्मा ! या खग ! क्या क्या तेरे गीत मधुर ऐसे प्रणय याकि मदिरा के कभी न सुने प्रशंसा-स्वर जिनसे नि:स्त हो, ऐसे वैविक मा गीतों का निर्भर । बारह ] [ शेली (४) हो समवेत गान परिणय के, या हो जय की गीत लहर । पर तेरी तुलना में लगते, रिक्त-गवं-युत ऐसी वस्तु अभाव किसी का कहती जो अपने भीतर ! स्वर। सुख गीतों पान कौन जिनसे बहता, तेरे का निर। समतल भू. कैसा नभ, और शैल-शिखर ? कैसा प्रेम, और पीड़ा के अनजाने वे कैसे स्वर? कैसे खेते, लहर, (१६) दुर्वलता न झांक सकती है, तरे धवन-हास-पट पर, और रोष की छाया तेरे, श्रा सकती न निकट पलभर ! तुम करते हो प्यार, प्यार का दुःख न तुम्हें छूता है पर । ( १७ ) जगते था सोते आता हो, ध्यान मृत्यु का भी पल भर ! वस्तु और सब गहरी तुझको, न जिन्हें नश्वर, वर्ना इतना स्फटिक स्वच्छ, संगीत-स्त्रोत होता क्योंकर ! जान सके शेली ] [ तेरह ( १८ । गत प्रागत को लखते खोते, व्यर्थ बाखलामो में तन। और हमारे हास्य सत्यतम में भी घुले वेदना-कण । भूचुतम गीत बही निज जिनसे अति दुख-भावों का व्यंजन । (१६) तो भी यदि भय, घृणा, गर्व का, कर सकते प्रवाहलग ही। वस्तु, जनमती हैं जो, हुलकाने को अच तो क्या हम तेरे प्रमोद के पा सकते थे पास कहीं ! नहीं, ( २० ) श्रेष्ठ साधनों से जिनले, उठते हर्षपदायक स्वर। पुस्तक के पो पर अंकित, कोषों से भी बड़ कर हे वसुधा के अवहेलक ! कवि को तेरा ही गुण प्रियसर ! ( २१ ) सिखा मुझे भी दे भाधा, उल्लास बुद्धि वेरी परिचित । ऐसी नियमित मादकता, कवि अधरों से होगी नि:स्त । सुनता त्यो उनको भी सुन लेगी यह संपति। (१८२०) ज्यों न मैं चीनह] [ शेली राका-गीत - स्वरितमयी, पश्चिमी लहर पर, हे राका! तू विचरण कर ! बाहर कुहरित पूर्व-गुहा से, जहाँ दीर्घ एकान्त दिवाभा में बुनती, भय, सुख के सपने, करते तुझको भयतर, प्रियवर ! हो तेरी उड़ान इसतर! तू सपेर अपनी भूरी चादर, श्राकृति पर, तारक-अंकित मूंद दिवा-रग निज कुन्तल से, घूम उसे जब तक न वह थके, विचर नगर, सागर, धरती पर, फिर निज मादक छह से छूकर दीर्घ प्रतीक्षित! जब मैं उषा को देखा, प्राह भरी। मैं जगा, तुमको ज्योति उठी जब तुहिन पलायित, कुसुम झुमों पर, दुपहर शायित । थकित दिवा ने किया शयन जब, रुक कर अतिथि भयाचित-सा सब, सुमको मैंने माह भरी। तेरा भाई यम पाया, तुझको पुकारता, मुझे चाहते हो तुम क्या ? तेरा प्रिय शिशु शयन' नयन मिल्ली से ढकता, गुग गुन कर बोला, दुपहर की मधुमक्खी ला, शेली ] [ पन्द्रह

दे सकते क्या नीड़ मध्य में मुझे शरण ही "
मैंने उत्तर दिया तुरत ही,
'नहीं, तुझे
सुमे भी नहीं।"
जय न रहेगी, तू जीवित यम आयेगा ही,
पर दी, अति सस्वर ही,
जप तू उड़ जायेगी, शयन धुलायेगा ही !
दोनों का अहसान चाहिये, मुझे नहीं पर,
मुझे तुम्हारा मिले अनुग्रह राका पियतर ।
तेरी आगामिनि उडान हो मृत से सतर,
मा सस्वर! हे राका सुन्दरि ।
(१८९१)
सोलह]]
[ शेली

'बादला के प्रति ऊपर ! . मैं लाता हूँ नव जन कन, पीते जिनको तृषित सुमन ! समुद्र निरी से भर-भर! दुपहर-स्वप्न-निरत पल्लव, ले हल्का साया नीरव! देता उनके मेरे पर से मर-मर माती, तुहिन बूंद जिनले जग जातीं! मृद्ध कलियों उनमें से हिन दुल कर, थपको पा लोती, छाती पर धरती मा होती, सूर्य चतुर्दिक मर्तित घह जब! उपल-मस्त्र के विकट प्रहार, रोक तुरत, फिर कर में धार! हरित धरा को इम से श्वेत किया करता। फिर मुझसे यह तुरत नवित, घुल जल में होते बर्षित। अब प्रवेश करता गर्जन में हंस पड़ता। पथ ( २ ) मुझसे ही हिम छन-छनकर, गिरता पर्यंत-शिखरों पर, जिनके दीर्घ चीड़ के तरु होते कम्पित ! इन पर मैं पूरी निशिभर, इन्हें श्वेत सिरहाना कर, मंझा की बाहों में हो जाता निद्रित ! राजित मेरे स्तूपों पर-जो मेरे पाकाशी धर! विद्युत मेरी पर्शक! किसी गुहा में पुद्ध निरस-बन्दी सरित-घोष अविरत, कर करता रव घर्षक! प्रेतनीर पर होकर मोहित, भटका करता नीलिम लोहित, सागर की गहराई पर, झरनों पर, चट्टानों पर, औ' पर्वत के शिखरों पर! कीलों पर, मैदानों के नीचे जाता-जहाँ जहाँ वह सपनाता, प्रिया, संग है पर! इतने में, मैं शीरहित, होता पी नीली नभस्मिति, तब यह बह जाता वर्षा में घुल घुल कर ! गिरि, नद, भारमा, शेली ] [सत्तय वह सूर्योपय रकारुण, धूमकेतु से लिये नयन, और ज्वलित अपने पंखों को फैलाकर, मेरा अंश गगन पर तिरता-उसके पीछे कुदान भरता, जय कि भोर तारिका चमकती वृत्त होकर ! जैसे किसी पहाड़ी पर-की नोकीली चोटी पर, जो हिलता-मुलता रहता भूकम्पन में। ज्यों हो कोई गरुड़ ज्वलिस, छन भर को ही हो राजित, अपने कनकवर्णमय पर की भाभा में, जब अरुणास्त श्वास ले ले, नीचे जले उदधितन से, प्रेम और विश्राम-सुगन्धों को पीता और वसन तब संध्या का पिघले सोने के रंग का- नभ की गहराई के ऊपर से गिरता तब मैं अनिल नीद ही पर, हरता थकन समेटे पर शान्त कि ज्या ध्यानस्थ कबूतर ! .. अर्थचक्रवत युवति विमल, भरे हुए ज्यों अमला धवल, चन्न जिसे सब कहते हैं प्राणी नश्वर, सरक रही वह झिलमिल कर, मेरे मखमल के सलपर, बिखरी है निशीथ के नलों से सस्वर । जहाँ जहाँ पढ़ती उसकी-ताल अलक्षित पगतल की सकते ही केवल, जिससे मेरी पतली छत-का पाना होता है पत, उसके पीछेरही मॉकसी नीहार मिलमिल, सम्हें देखता मैं इसते, ज्यों सबसे हो मैंषराते स्वर्ण भ्रग के बल नम में। अपना विस्तृत-जर्जर शिविर-वायु-निर्मित जब तक, मत जलाशय सरिता सागर में,- जो लगते उच्चस्तन से-गिरी पष्टियाँ ज्यों मुमसे, बसते उड्डगन चन्द्र नहीं उनके मन में ! मैं करता अठारह] [ शेली बधा करता हूँ सूरज का सिंहासन-ज्वलित-वृत्त का मैं लेकर के शुभ्र-वसन, मुक्तावलि से चंद्रासन रखता सजधज । ज्वालामुख धूमिल हो जाते-तिरते नखत भीत थर्रात, जब पवमान ककोर उड़ाते मेरा धज | खादी से मैं खाड़ी पर-सेतु सा प्राकृति धरकर, उफनाठे अम्बुधि हो रवि-किरनों का शोषक द्रुत, लटका मैं बनता उसकी छत, जिसके खम्बे होते हैं यह शैल-शिखर ! बह जय-अद्ध'-चक्र होकर, जिसमें बढ़ता मैं लेकर, अपने भावात, अनल और हिम के कन, जकड़े वीर प्रभंजन के.-बांधे नीचे . पर है प्रासन के बरन! ऊपर इसके रंग कोमल-करते निर्मित वृत्त अनन जबकि धरित्री गीली नीचे करती रही हास्य विवरन ! . (६) मैं हूँ दुहिता प्रिय, कोमल, हैं मा बाप मृतिका, जना, पोषक यह नीलाम्बर । कियों से सागर तट के-जाता हूँ मैं बेखटके, मैं परिवर्तनशील, किन्तु हूँ अविनश्वर ! पयोंकि बाद में वर्षा के, रहते नहीं बिन्दु जल के, सूनापन छा जाता है नभ-यांगन पर! और पवन रवि की किरणों के उस उदर कणों से अपने, निर्मित करते हैं समीर का नील शिखर ! मैं हसता मन में लखकर, अपना यह स्मारक नभ पर, फिर मैं वर्षा गुम्फो से आता बाहर भात शिशु, ज्यों जननि-कोख से-प्रेत निकलते ज्यों समाधि से, उठता मैं इनको खण्डित करता सस्वर । (२०) शेली ] [उन्नीस पश्चिमी प्रभजना के प्रति है, प्रमत पश्चिमी प्रभंजन, शरषकाल के जीवन प्राण ! हुए पलायित, मेरी साख उपस्थिति से पल्लव निष्प्राण । जैसे प्रेत पलायन करते तांत्रिक से होकर भयमान, कपिल, श्याम और पीले ज्वर से रकिम वर्ण, पर्ण नियमाण, पड़े ढेर के • ढेर महामारी से जैसे हो मर्दित, पिठा सपल बीज निज रथ में, पहुँचाता तू उन्हें स्वरित, काली, शिशिराई राख्या पर, जहाँ अंधशीतल-तल पर, तब तक है प्रत्येक सुस, ज्यों शव समाधि के हो भीसर, अब तक तेरी नील बहिन वासंती, नहीं गुजाती स्वर, माकर अपनी तुरही से, इस रवपिनन धरती के ऊपर, (हॉक मूदुल कलियों के दल को खाने हवा) नहीं भरती, जब तक प्राणित वों, गम्धों से पर्यत, समतल धरती, है, उन्मत्त ! सकल जल थल पर धूम रहा तेरा ही तन, रूम और ब्रह्म सू दोनों! सुन मेरी, पाश्चात्य पवन ! च विलोदित गगन मध्य में, तेरे नुतनद के ऊपर, स्वर्ग और अधुधि की ही गुम्फिस शाखों से मार कर कर, गिरे धरित्री के मन पर्यों से श्री, शिथिल बलाहक बस, वर्षा विधु ति के ये सब उपदेष, हैं अब मिश्चन तेरी उस पवमान लहर की नील सतह ही के ऊपर, ज्यों लहराते हों उस्कट, सज्वल, चक्ष कुम्वल हर छहर, किसी भयंकर भीन के सिर पर से उस्थित हो होकर, धूसर क्षितिज तटी से ले, अम्बर की ऊँची चोटी पर, केश-गुच्छ है उस प्रागामिनि, घाँधी के ही तो व्यापित ! दूबनता मर्सिया वर्ष का, मरणोन्मुख है जिसकी गति, जिसके पहब समाधिस्थल पर यह रजनी जो गममोक्त- होगी गुम्बजा तेरे सब केन्द्रीकृत अभ्रकुल की छत, जिसके सघन वायुमण्डल की छाती से ही फट फटकर, बरसेंगे काले धनकण, औ' बाल, उपन दूजा सुन कर ! *कौलिकी बीस.] [शेली तूने उसे जगाया जब था प्रीष्म-स्वप्न में आत्म विमोर, वह नीलिम भुमध्यार्णय, जो कंकरीले टापू की ओर । 'वैयाई की खाड़ी में था, पड़ा नींद से अलसाया, अपनी स्फटिक-निझरों की कुण्डलि द्वारा था दुलराया, और देखता था निद्रा में यह प्राचीन सौध, मीनार, जी करते हिलोर के धनतर-दिवस-मध्य में 'कम्प-विहार ! नीली काई कुसुमदलों से आच्छादित ये सष सुन्दर ! इसने भूदु थे मन होता था मूरिछत उनका चित्रण कर ! तू बढ़ता दुर्द धेग ले महासिन्धु की छाती चीर ! पथ देते तरक्षण तुझको, भयकम्पित अटलान्टिक के वीर ! किन्तु दूर नीचे खिलते सामुद्रिक पुष्प व स्पंदित वन, पारिधि तन के नीरस कोंपल बल का पहिने हुए घसन ! तेरा व सुन, सहसा होते, भय से पीले कम्पित म्लान, आतंकित हो लुठित होते स्वयं सभी सुन, हे पवमान ! होता यदि मैं जीर्ण पत्र, तो तू घरला निज अचल में ! संग व्योम में उहता तेरे, होता यदि बुत बादल में ! पनि हिलोर ही होता, तेरी शक्ति तले पिस लेता श्वास! पर तेरे अकूत बन का मैं, कर पाता पलभर आभास । हे अवम्य ! केवल तुमसे मैं होता यदि थोड़ा स्वच्छंद । काश! कहीं होता ऐसा मैं, शेशव में था ज्यों निषध ! नम्न मैं तेरा साथी बनकर, भरता चक्कर अम्बर पर, चाह कि तेरी आकाशी गति से हो जाऊँ मैं ब्रुततर, नहीं दिवा सपना सा लगता, कभी नहीं तब यो रोकर, विधश प्रार्थना तुझसे करवा कठिन आपदा में फंस कर ! पाठ ! उठाले, मुझे लहर-सा, पल्लव-सा, बादल-सामान ! विधा पड़ा जीवन काटों पर तन है मेरा माहू हाम! हाय ! समय के कठिन भार के नीचे मैं बन्दी नतशिर, मैं भी तो तुझसा ही हूँ इडल, बुत, अभिमानी नर । *एक प्राचीन जल मग्न नगर । . शेली ] [इक्कीस

अपनी बीन पना मुझको भी ज्यो कामन है तेरी चीन,
इससे क्या, यदि मैं भी होता, ऐसे ही मृत पन्न-विहीन !
तेरी शक्तिमयी भैरव रवलहरी दोनों से निश्चय,
खेगी वह गहरी, शिशिराई, ध्वनि, मृदु, यद्यपि करुणामय !
बना पाज तू मेरे प्राणों को ही निज प्राणों का धाम !
रुमधाण! सूचनजा मुझसा, हो जा मुझसा ही उद्दाम !
कर विकीर्य मेरे मृत भावों को अविरल भूमण्डल पर,
जैसे छितरे मृत पल्लव नव जीवन पाने को भूपर ।
और इसी मेरी कविता के सम्मोहन द्वारा सत्वर,
ज्यों अनबुम भष्टी से गिरते, भस्म अग्नि के कण उपकर,
स्यों हो तुमसे विखरें मेरे शब्द मनुजता के भीतर ।
मेरे अधरों के ही द्वारा तू इस सोती पृथ्वी पर,
इस भविष्यवायी का बन जा अब तू शंखनाद भरपूर,
भाया है यदि शरद रह सकेगा बसंत फिर क्या अब दूर।
(141)
पाईस]
[शेली

नेपल्स के निकट लिखित पद दिनकर की गरमाई फैली, नील गगन है अब निर्मल, स्वरित और चमकीली लहरें, नाच रही हैं सागर पर । नीलिम द्वीप, और शोभित है पारदर्शिनी शक्ति प्रबल, नीललोहिता दोपहरी की, हिम-प्राच्छादित शैलों पर । गीली धरती का उच्छ्वास मन्द मन्थर है रहा विचर, चारों ओर मुकुलहीना अपनी कलिकामों के दल के, रूप अनेक स्वरों का घर कर एक हर्ष ही रहा बिखर, वही पषम में, खग-कलरच, में प्राप्लावन में सागर के और 'नगर' स्वर स्वयं-समी कोमल 'निर्जनता के स्वर से। (२) देख रहा हूँ मैं गहराई का अब यह अममर्दित तल, हरित और अंजनी समुद्री तृणदल, बिखरा है ऊपर । देख रहा हूँ मैं तट पर आती वे बहरें उपहल, ज्यों तारों के मरनों में बिखरा प्रकाश है घुल-घुल कर, बैठा हूँ मैं सागर तट के रेणुकणों पर एकाकी। दोपहरी के ज्वार भरे अर्णव से उठ-उठ कर अतिमय, घिरी चतुर्दिक मेरे फिरती, धमक झमक उस चपला की। नपी तुली गति में बंध कर के उठती एक अनोखी लय, कितनी मृदुमय ! काश संग जो होता कोई अन्य हृदय . आह ! नहीं प्राशा है मेरे पास, स्वास्थ्य का शेष न कण, नहीं शान्ति है मेरे मन में, मिली प्रशान्ति नहीं बाहर ! और नहीं संतोष, तुच्छ जिसके समक्ष होता है धन, जिसको पाया सन्यासी ने मग्न साधना में होकर! विचरा करता जो अन्तर का गौरव-छन्न शीश पर धर, नहीं कीति है, नहीं शक्ति है, नहीं प्यार, अवकाश नहीं, देख रहा हूँ औरों को मैं, माता इन सबसे घिर कर ! मुस्काते वे जीते, जीवन को कहते हैं हर्ष यही । पर मुझको-वह प्याली हाय ! न जाने कैसी भरी गई ! शेली] [ तेईस

कर,
४ )
तो भी भब नैराश्य पियक्ष हो पाया है स्वयं नरम,
जैसे, अब ये पवन और जल की धारायें है मृदुतर !
काश ! कहीं नीचे सो पाता, थके हुए बालक के सम!
रो पाता मैं जो इस चिन्तामों से पूरित जीवन पर !
जिसको अब तक सहता पाया, अभी और सहना जीकर,
जब तक शयन समान काल की छाँह न गिरती है मुझपर,
और न जय तक ऊष्म समीरण में पाऊँ मैं अनुभव कर,
गाल शीत; जब तक न सुनू मैं अपने मरते मानस पर,
लेते हुए समन्दर को, अंतिम निश्वास घुटन से भर ।
अपनी शोकमयी वाणी में कह सकते कुछ, यदि शीतल
मैं होता, जैसे मैं हूँ जब बीत गया है विधस मधुर !
इतनी जल्दी बूढ़ा होकर, जिसका मेरा खोया दिल !
अपमानित करता इसको असमय यह शोक प्रदर्शन कर !
कुछ शोकातुर कह सकते हैं क्योंकि एक मैं ऐसा नर,
जिसे न प्रीत मनुज करते-तो भी होते हैं शोकान्धित,
इस दिन के विपरीत-जोकि यह तब हो जायेगा दिनकर
इसके दोषहीन गौरव के ऊपर-जब यह अस्तंगत,
लटकेगा, तो भी सुखदायक-स्मृति में ज्यों उस्लाम विगत !
(१८१८)
चौबीस]
[ शेती

'मा सिक रूपनी के प्रति किसी अष्ट शक्ति की यह अभिशापित छाया, सबसे अश्य तिरती है विचरण करती, इस अनेकरूपा जगती के अपर, यह अपने पंखों से, जो इतने अस्थिर हैं जितने फूल-फूल का सौरभ जेते, से ग्रीष्मानित है, शशि-किरनों के सहश बरसते हैं जो देवदार पर्वत के पीछे। यह निज अस्थिर दृष्टि डालती, है प्रत्येक मनुज के उर धानन पर, विचरण करती जैसे सांध्य-नागन पर उठती गीत-हिलोरे वर्णावलियां, जैसे तारक-ज्योतित-पट पर, फैले दूर-दूर तक बादल, जैसे हो संगीत मधुर की बीतीस्मृति, अथवा हो कुछ भी, जो इसकी प्रामा को हो प्रिय, या प्रियतर एसके रहस्य को । - है सौन्दर्य देवि! मानव के भावों पर, रूपों पर अपने- वों से हो राजमान करती उनको है सुन्दर पायन ! कहाँ गई तू? क्यों तूने तज दिया हमारे इस प्रदेश को ? यह धूमिल विस्तृत उपत्यका अभुकणों की, कितनी निर्जन- औ एकाकी पूछ कि रवि की रश्मि न बुनती हैं क्यों सुरधनु इस सम्मुख पावस्य सरित पर क्यों कोई जो कभी ज्योति से, उठता एक बार भरभर कर, अब हो जावा असफल, निष्प्रभ ! क्यों भय और स्वप्न पूर्व यह जम्म मरण के प्रश्न चिरंतन, इस धरती की दिवसाभा पर गज रहे हैं अपनी छाया ? करुणामय क्यों है मनुष्य को ऐसी जगह कि जिसके अपर, घूम रहे हैं प्यार, घृणा, और प्राश, निराया। - और किसी विश्व से नहीं मिला है, अब तक किसी संत और कवि को इसका उत्तर। इसीलिये राक्षस, व प्रेत, या स्वर्ग, नरक की संज्ञायें सब। बनी रही है ये प्रतीक अब तक उनके असफल प्रयास की! नश्वर जादू, जिनकी अभिम्यजित पाभा भी, नहीं विलग हमको कर सकती संदेहों से, अवसर से नौ' गतिमयता से, शेली ] [पच्चीस उन सबसे, जिनको सुनते या देखा करते । तेरी मात्र ज्योति से जैसे गिरि का सघन कुहासा फटता! अथवा निशा पवन के द्वारा किसी शान्त संगीत वाथ के तारों से टकरा टकरा संगीत बिखरता ! अथवा धवज-सुधा निशीथ की निरिणी के ऊपर पाती! जीवन के प्रशान्त सपने भी पाते सस्य, और सुन्दरता। . प्यार श्राश, और आत्म प्रतिष्ठा मेधों से प्राते जाते हैं। किन्ही अनिश्चित क्षणों हेत ही जैसे उन्हे उधार लिया हो ! यदि मानव होता अमर्य, औ' सर्वशक्तिमय, तो तू होती नहीं अजानी, दुखदायी जैसी तू अथ है। तब तेरी गौरवमय गति को स्थिर कर रखता अन्तराज में ! तू संदेशवाहिनी संवेदन भाषों की, जो प्रेमिक के नयनों में घट, बढ़ते हैं। तू जो मनुन भावनाओं को पोषक जननी, ज्यों मरणोन्मुख ज्योतिशिखा के लिये तिमिर है ! मत जा, अपनी परछाई के प्रा जाने पर ! मत जा, वर्ना यह समाधि भी बन जायेगी, जीवन भय के सघश तिमिरमय कटु यथार्थवा । जय था शिशु मैं फिरता, प्रेतों की तलाश में, गुंजित कक्षों, गुम्फों, ध्वंसों, नखत-ज्योतिमय वन प्रान्तर में। मृतमानष के विषयक अतिशय बातों के पीछे पीछे, अपने भय कम्पिरा धरणों से घूमा करता! मैं विषमय वचनावलियों को सुगता जिनको- सुनते, सुनवे ऊब गया है तरुण प्राज का। मैंने उनको नहीं सुना, देखा न उन्हें ही! जब जीवन के प्रश्नों पर मैं करता चिन्तन गहराई से, जबकि पवन की मृदुल भाकोरों से मधुमय होता था क्षण-क्षण। सभी प्रमुख वस्तुएँ जगाही जी लाने को, कलियों और विहग बालों के समाचार को, सहसा गिरी ज्योति परछाई तेरी मुझ पर, मैं भर कर चीरकार, पख कर हाथ विभोर हुभा भावों में। छब्बीस.] [ शेती

मैंने तब प्रण किया कि अपनी सर्वशकिया,
तुझको ही कर दूंगा अर्पित, तुमको तेरे लिए नहीं क्या-
किया पचन का मैंने पावन अब भी अपने-
कम्पित उर से और निर्मरित-युगल-भयन से
मैं सहन घटिकाओं के प्रेतों का करता हूँ आवाहन !
जो प्रत्येक सुम्स अपनी निस्वम समाधि में,
अध्ययन के प्रावेशयुक्त या स्नेहिल धर्मगमय,
दृश्य-कुंज-पोतों से अपनी वे निहारते मुझे रहे हैं-
कितनी ही ईष्यालु निशा उन्हें ज्ञात है-
मेरीभ को कभी न सुख ने धमकाया है,
बंधनमुक्त रहा इस पाशा से कि कमी तू
अंधदासता के पाशों से मुक्त करेगी इस पृथ्वी को,
कि तू हे अभिशापमयी मोहकता देगी उनको जो कुछ
शब्दों से रह गया अध्यजित !
दोपहरी के बाद विषम भी हो जाता
पावनतर गम्भीर और है मधुर साम्यता
शिशिर कान में भी पाभा शारदीय गगन पर,
जिसे सुना या देखा जाता नहीं ग्रीष्म में
जैसे यह ही नहीं, न होना इसका सम्भव ।
अस्तु तुम्हारी शक्ति प्रकृति के सत्य सरीखी
मरे मेरे निष्क्रय यौवन पर भरदे निज
विमल शान्ति का रस भावी जीवन में मेरे।
उसके जो करता पाया तेरा श्राराधन,
अर्थन करता जी तेरे प्रत्येक रूप का
जिसको तेरे सम्मोहन ने, शुम्र सुन्दरी !
प्रधित किया अपने से होने भीत, प्रीत करने लेकिन सम्पूर्ण मनुज को।
(141)
शेली ]
[सचाईस

स्मृति के विहगों से इम दूर रही। पर रहो ! दूर रहो ! रहो ! तुम दूर भो स्मृति के विहगो ! मुझसे दूर रहो ! खोजी कोई दूर शाम्ततर नीर वास्थल की शुलना सुभग! खग! इस निजद हामी मत के पतकर को, की खबरों को। मेरे अन्तर अपने इस मिथ्या बसंत एक बार ही इसे छोड़ ध्यर्थ तुम्हारा यहाँ हुआ जाने पर, माना फिर। विगो। तुम जी रचते हो तिनकों से घर, उस भविष्य के ही गुम्बज की चोटी पर। भग्नाशाएँ, प्राशाओं पर है उन्मन! मरते सुख, यम ने घोटी, जिसकी गर्दन ! होंगे शुम्हारी को वे उपयोगी, बहुत काल वक यह शिकार-सुख भोगेगी। (IRI) * मूल में यहाँ 'देवायम' पक्षी का माम आया है, जो प्रायः मबली पकरने के लिए सिखा पड़ा कर काम में लाये जाते हैं। महाईस [रोनी

एक क्षण
विदा हुए हम जैसे होता नहीं मिलन,
कहीं दृश्य से अधिक हमारा है अनुभव
मेरी छाती के भीतर है बोमिन मन,
मेरे प्रति शक से पूरित वक्षस्थल तक,
बना अमुक्त, मुक को चला गया है पण ।
चला गया, वह पण, सदेव को चला गया,
ज्यों, दामिनी चमक करके नि:शेष हुई।
था हिम-पर्स गिरी, सरिता-जल गला गया,
या जैसे सूरज की किरन, विकीर्ण हुई,
उठे ज्वार पर बील गई काली छाया ।
।
समय बीच अस्तित्व पृथक था उस पण का,
जैसे दर्द भरे जीवन का पहिला हो!
भ्रम के रस से मिला हुआ ध्याला सुख का,
कितना था मधु पूर्ण, व्यर्थ था लेकिन जो,
इसमा मधुर कि मुझसे घिर को दुमा विदा!
मधुर अधर | मेरा यह हृदय छिपाता जी,
'मष्ट हुमा था तुमसे ही इसका जीवन"
विदा न तुम से कभी मरण तब पाता यों,
धरे जिसे तब चमकीला नीहारित कण!
सोच रहा हूँ कितनी हल्की थी कीमत
उस लय की, जो यो पाया, यों हुआ विगत!
(10)
[ उन्तीस
शेली]

भारतीय पवन के प्रति तेरे सपनों से मैं जगता, पहिले मधुर शयन में निशि के ! जय हौले समीर है बहता, उजियारे तारे जब चमके जगता मैं तेरे सपनों से, पारमा वै चरणों में मेरे, जो ले भायी जाने कैसे, मुफको वातायन में तेरे। भ्रान्त पवन बेहोश हो रहे, तम पर औ स्तब्ध झरनों पर, चम्पक, सौरभ व्यर्थ खो रहे, मृदुल स्वप्न-भावों से होकर, हाय 1 शिकायत बुलबुल की तो, उसके दिल पर ही होती निय, तुझ पर मुझको, तू है इतनी क्योंकि मुझे प्रिय ! मरना जैसे पलक, तब पाह! ठाले, मुझे घास से, मृत, निषभ, मूञ्छित होता मैं। पीत अधरों पर बरसे, स्नेह, घुम्बम-बरखा में मम कपोल हैं श्वेत शीतमय, बढ़ती जाती दिल की धड़कन ! श्राहा सटा के अपने से यह अहाँ थमेगा अन्तिम कम्पन! (142) वीस ] [, शेती प्रल १८१४-के पद दूर रहो! शशधर के नीचे काला है अवनीतल, स्वरित मेघ पीगये सकि की अन्तिम पीव किरन को। दूर रहो ! टेरेंगे तम को, शीघ्र पायु के संकुन । धन-निशीथ कफनायेगा ही अब नभ-ध ति पावन को। सको नहीं, अब समय गया, तो दूर ! कह रही, हर ध्वनि, असत-धन्धु-भावना न अन्तिम प्रासू-कण से उकसा! शीव-वीस-प्रिय-श रुकने का करता नहीं समर्थन । दिखलाते, कर्तव्य, भूल, तुझको फिर पथ निर्जन का! पूर! दूर! अपने उदास, खामोश, उसी घर को चल, और तिकतर अनु बहा इसके उजड़े अलाय पर । प्रेतों सी आती-जाती, निहार छायाएँ धूमिल, जातीं करुण-हास के जो अजनयी जाला उलझा कर ! रेंगे तब शीश चतुर्दिक शिशिर-वन्य पल्लव, मृत, चमकेंगी तय चरण तले घासंतिक कलियाँ पोसिल ! मृत को ढकते कुहरे से जग, या प्रारमा, होगी क्षत, पूर्व, अनिशि-भ्र , उषास्मिति, तुम और शान्ति, सकें मिल ! ( ३ ) है विधान्ति निशीथ मेघ-छाहों के पास स्वयं की, क्योंकि श्रोत पवमान मौन, शशि गहराई में खोया ! पावा है पाराम तनिक भय चिर अशान्त अर्णव भी, जो भी करता कम्पन, श्रम, दुख, नियत नींद में सोया ! तुझे कान में शयन मिलेगा, करें न त पलायन, किया तुझे प्रिय जिन्हें कि इस गृह, कुज और उपयन ने ! मुक न तेरी याद, न पश्चाताप, दो स्वर के संगीत, एक मधुमय स्मिति की ही युति से (१८१५) . न तेरे गायन, शेली ] [फलीस हे, मसलते! है। प्रसनते ! विरल पिरन ही, तू है माती! आज मुझको इसने दिन से दूर कहाँ गई थी। पोव हारे-हारे हैं मुझको निसिवासर, चक्षी गई ऐसे तू समको जब से तज कर । पा तेरा फिर, सकता कैसे मुझसा प्राणी संग। की साथिन पर पर कसती व्यंग! छोड़ उन्हें, जिनको है तेरी नहीं जरूरत, मिथ्या देवि! किया है तूने सबको विस्मृत! मुक-हर्षितों ज्यों विस्तझ्या परवाई से कम्पित पक्जय की। स्यों तू भगती दुख माई से, निश्वासों 'द समीप है नहीं,' शिकायत इसकी करती, .पर इस परत कान तनिक भी कप है धरती। की। में बन्द जाओ, तो ये गीत करू हर्षित करण न भावा, पाती है पर, पाने को आमन्द। भायेगी ज्यों पंख काटेगी, होगा फिर संग रहना मेरे। बत्तीस] तेरे, [शेली वेषि, प्यार तू जिनको करती, मुझे प्रीतिमय सथ भूमि, नव पर्ण पहिमती, मिशि तारकमय जब । शिशिरकाल की साँझ सवेरे प्रालमा लेती है जब पति स्वर्णिम! का जन्म , हिम हैं प्रिय, सब रूप चमकते। प्रिय लगते मुझको तुषार के ! लहर, पवन, तूफान, गरजते, सब बनते हैं पात्र प्यार के ! जितने भी हैं रूप प्रकृति के प्रिय लगते, घे भी मनुज दैन्य से पावन हो सकते ! (७) मुझे शान्त निजनता है प्रिय, प्रिय समाज है ऐसा । मेरे तेरे मध्य, शान्त मय, और सद जैसा, मन्तर क्या ? बस यही हुई अपलब्ध सुमे, खोज रहा मैं अभी, किन्तु कम प्रिय न तुझे! प्रिय है प्यार किन्तु उसके पर उप जाता षह घुति यति सा। सब है प्रिय पर मुझको प्रियवर, देवि नहीं है तुमसा । तू ही मेरी प्यार, जिन्दगी, मामा सस्वर, हे प्रसन्नता देवि! बना मेरा र निज घर ! (14) शेती ] [ तेतीस ক্সি আখি খন্তু एक प्रखर प्रामामय, हर्षित पह दुपहर था, जब चमकीले जून मास का शान्त हुआ था! जब उत्तरी पवन उठकर संकुल बन जाते, चाँदी के बादल, शेजों से तिरते पाते ! क्षितिज-कूल से, और जिस तरह है शाश्वतता, निर्मल नम इन सबके परे, निर्वसन करता! सकन पस्तुएँ, आनंदित जो रवि के नीचे, धन्य तृणावलि, सरिता, खेत बाँस के पोरे । वत' पत्र जो मंद मोरों में मुस्काते । और दीपवर तहों के भी सुहद पसे। । यह था शरद, मृत्त हो जाते जब विहंगदल, गहम धनों के भीतर और मीन जब निश्चल- हो जाती अभेद्य हिम में कर देती हैं जो, सष्णा जलागारों के पंक और पलवल को- बहरदार इहों से, जो हैं सख्त ईट से। मिज बच्चों से घिरे, तापले अब जनसुख से- बड़े अलाव चतुर्दिक, कपते हैं तो भी जब ! हा ! बेघर बूढ़े, भिक्षुक क्या करते हैं तम! (२०) शेली चौवीस

के प्रति
भीत घुम्पनों से सेरे मैं, सौम्य सुन्दरी !
मेरे चुम्बन से पर तुमे न करना है भय !
भरी हुई है मेरी आत्मा इतनी गहरी.
नहीं बोम बन सकती तेरे ऊपर निश्चय !
मैं तेरी नजरों से, लय से, गति से डरता,
पर तुमको मेरे इन सबसे तनिक न हो भय!
है निर्वाष भकि मेरे घर की, मैं करता
जिससे हूँ तेरा पूजन, पाराधन, मृयुमय !
(२०)
शेली ]
[ पेंतीस

संगीत
कोमल वनियाँ मर जाती है, लेकिन उनका,
संगीत मनममाया करता है स्मृति-पट पर,
जब मुरझा जाते सुमन, जिया करता सौरभ,
उससे ही जगी चेतना के भीतर बसकर
जैसे गुलाम के मरने पर सब पंखरिया,
हो जाती है संकुलित, प्रिया की शैया पर!
ऐसे ही तेरी याष, न होगी जब दू प्रिय,
सो जायेगा यह प्यार पर्व भपकी लेकर।
(१८२१)
बत्तीस
[शेली

चेतावनी गिरगिट पोषित होते, वायु, उजाला, पीकर, प्यार और यश ही होता है, कवि का भोजन ! काश! कहीं चिन्ता से पूरित विस्तृत अग पर, कर पाने उपलब्ध सहज ही इसको कविगण ! हाँ, यदि वे भी अपने को गिरगिट सां करते, तो पा सकते थे इसको कर कम से कम श्रम ! पाते बदल रंग कवि भी जो गिरगिट के सम ! जिसको वे अनुरूप हर किरन के हैं धरते, बीस बार दिन में रंग निज काया में भरते कवि भी ऐसे ही इस शीतल जगतीतल पर, यों, वे गिरगिट के होते समान जग भर में अनजाने प्रारंभिक जन्म काल से लेकर, सागर के नीचे पे दूर किसी गहर में, जहाँ उजेला है गिरगिट होते परिवर्तित । जहाँ न मिलता प्यार, वहाँ कवि बदला करते ! यश भी तो है छष्म धार यदि कुछ पा जाते- तो कमी न होना इस पर विस्मित, कवि (हम दोनों छोर बीच) होते परिवर्तित । कोई सा, तो भी करो न दुस्साहस लेकर धन या वसा, कवि के मुक दिव्य-मानस को करने कलुषित ! पायें अन्य खाय यदि यह वन-गिरगिट-दल, घोष वायु और धूप, शीघ्र ही होंगे विकसित, ऐसे ही, जैसे हैं और भूमि पर जीवित ! भन्य भ्रातृजम, छिपकलियों के ही समान हो! तुम हो फिर, मन शुभ्रतर की संसानी ! तुम अवनीश परे की हो, आत्माएँ उज्ज्वन ! लौटा दो यह दान इसी पन ! शेली ] [सैंतीस क्षयशा शाशि से - और एक मृण्मय महिला ली कृश औ' पीली, कम्पित, पतनोन्मुख, 'धेष्टित रेशमी घसन में, अपने सौध-कस से बाहर, वह परिचाखित- अपने अयश: मानस की उम्मद औ' दुर्थल, भ्रान्त अलपप विहारों द्वारा, उठती है शशि, कृष्णवर्ण-प्राची में, धवल अरूप राशि सी! - (काव्यांश-१२०) अंग्रेजी में 'शशि' को स्त्रीलिंग माना जाता है। अड़तीस] [ शेती

परिव
ता
क्षम है वे बादल निशीथ के, जिनसे बैंक जाता है शशधर,
जो कितने प्रशान्त होकर के, चलते, चमके, कम्पित होते!
भरते ज्योति-शिरामा से निज तम को, तो भी रजनी सस्वर,
घिरती चारों ओर, और ये अपने को हैं चिर को खोते ।
या हम वे विस्मृत वीणा है, जिनके उलझे हुए तार से,
हर परिवर्तित वायु कम्प से, निःसूत होते हैं अनेक स्वर,
जिसकी कृशकाया जाती है महीं दूसरे गति-प्रहार से,
एक भाव, अथवा दुहराती नहीं विगत संगीत नहर पर।
हम सोते तो-धन हमारा कर सकता है शयन गरलमय,
जो जगते सोमान्स भाव ही दिन को कलुषपूर्ण कर सकते !
सोचें, समझ, सर्फ करें, या हसें, करें हम नयन अश्रुमय,
प्रिय दुख का करते भालिंगन, या चिन्ताय दूर ल्यागते !
"
यह सब बात एक ही सी है, सुख ही हो विषाद हो अथवा,
अब भी पायाहीन पड़ा है। इसके जाने का है रस्ता!
हो भी नहीं मनुज का बीता-कन उसके भावी कल जैसा,
क्योंकि सभी कुछ अस्थिर जग में थिर तो बस परिवर्तनमयता!
(१८९५)
शेली ]
[ उन्तालीस

कधूचित
खोल, शयम के द्वार सुनहरे !
शक्ति, रूप का मिलन जहारे!
बने बिम्ब उनका उजियारा!
जलधि-कुहरमय में ज्यों तारा!
निशि, खख नीचे सब तारों से!
सम, रो! पावन भोस-भक्षु से !
अस्थिर शशि न कभी मुस्काई,
इतने सच्चे
जोदे पर रे।
खोल शयन के द्वार सुनहरे !
गन बखें निज हर्ष स्वयंरे।
शीघ्र, स्वरित घटिका अक्सर तव
उड़ान का हो, और पुनर्नव !
परी, देव, श्रास्मा, रक्षक हो,
पावन तारी! कुछ न भूल हो,
जौठो सोया हुआ जगाने,
उपसि। देर तक दो मत सोने !
क्या होगा श्री, हर्ष, मोह भय,
होगा अगर न जो सूर्योदय ?...
संग भाषी रे!
खोख, शयन के द्वार सुमहरे !
(11)
पालीस]
[शेती

विलियम शेली' के प्रति लहर फुलांचे भरती हैं तट के ऊपर, तरणी है जर्जर दुर्यल! कृष्ण वर्ण है सिंधु, पवन हैं गये विखर, घिरते हैं काले बादल हे प्रसन्म बालक ! तू मेरे सँग अब चल चल तू मेरे संग लहर पद्यपि पागल । और प्रभजग शिथिल, नहीं हमको रुकमा, लेंगे सत्ताधीश छीन तुमको वरना। सेरे भाई और यहिम को छीन लिया, किया उन्होंने उन्हें व्यर्थ है अब तुमको। मुरझा दी मुस्कान, प्रश्नु को सुखा दिया। हाय, उन्होंने जो होते पवित्र मुझको । अन्ध-पन्थ औ' अपराधी कारण से ही, दास हुए हा! वे अबोध बचपन से ही। मेरा नाम और सुझको कोसेंगे थे, क्योंकि सदा निर्भीक और हम मुक्त रहे। था तू मेरे में मेरे यक्ष, बाला साथ सोया है दूसरा शान्तमय । निकट जननि-उर के चिन्ता से जो विकल। जिसे बनायेगा तू सुखमय ! अपने विस्मय की बिखरा मुस्कान सुधर, उस पर जो सचमुच ही अपना है प्रियतर ! सुदूरतर देशों में तू जायेगा। सबसे प्यारा सखा उसी को पायेगा! सदा म जुल्मी राज करेंगे तू मत डर, कुपथ-पुजारी सहा महीं इस पृथ्वी पर ! होली का पुत्र, जिसकी इटली के प्रयास में मृत्यु हो गई। [हमालीस शेली।।

खादे हुये यह उसी कुछ सव के तट पर, भर दी मौत इन्होंने जिसकी लहरों पर। जिनकी भूख सहन घाटियों से गहरी, इनके चारों ओर कुछ फेनिल चहरी । इनके दरख, कृपाण, भग्न नौकानों से, देख रहा मैं शाश्वत नहरों पर बहते । जक्षित, चुप चुप चिखा मत भोले बालक मेरे, नौका का हिलना-जुलना, शीतल दें। करती क्या भयभीत, प्रमत्तगर्जनारे ! लेटा तू हम दोनों बीच नयन दे। मेरे, अपनी माँ के, हमको बह भगा जिसके भय से तू है कम्पित! उसकी काली भूखी को इतनी कम। कर दास सचा के जितने, फिरते अब! रक्षक नहरों पर से तुझे छीनवे सब । तेरी स्मृति में यह घंटा हो सपने सम, बीते हुए दिवस का शीघ्र बनेंगे रहने को ही नीले सागर के तट पर- स्वर्णमयी इटली के, जो है पावनतर, या हम ग्रीस, मुक्त जन की जो है माता! उनके वीरों की प्राचीन शौर्य-गाथा, लिमलाऊँगा मैं तेरी शिशु-मिक्षा को! लपट बनायेगी जो तेरी आत्मा को। पीक कथा की इस प्रकार तू पा सकता, देशभक्ति अधिकार जन्म से जो मिलता। (141) हम, -- 'नयालीम] [शेती भोजरफाइन का गीत (ऐना के मैदान में पुष्प चुनती हुई) १) पावन देवि ! धरित्री माता! तेरी अमर कोख से पात--- जन्म मनुज, पशु और देवता । पर्ण, कुसुम, किसलय मुस्काते, पोजरपाइन! अपने शिशु पर- कुसर पिलाकर साध्य सुहिन के, कला-कुसुमों की है पोषक ! धड़ियों के शिशु, सुघर म बढ़ते, होकर वर्ण, गंधमय जब तक! बिखरा निज प्रभाव स्वर्गिकतर, प्रोजरपाइन ! अपने शिशु पर। (1०२०) *धरती माता के लिये, प्रयुक्त यूनानी शब्द ! शेली ] [तेतालीस

मो, जग! जीवन ! प्रो काल!'
बढ़ता हूँ जिनके अन्तिम सोपानों पर,
जहाँ खवा पक्षले, अब कम्पित हो उस पर,
कब गौरव-प्रौदता तुम्हारी लौट रही ?
कभी नहीं, हा! कभी नहीं !
रजनी और दिवस की सीमा से बाहर,
चला गया क्लास कमी का महान भर!
सयपसंत, प्रीष्म, औ' शारद, श्वेत हिममम !
मूञ्छित मन में डोली पीर, उठी सुख-लय ?
कभी नहीं, हा! कभी नहीं !
(151)
प्रस्तुत रचना का सौन्दर्य मूल में उसकी संगीता-
स्मकता के गुण के कारण है, जो अनुवाद में नहीं मा
पाया। पर इस कविता में कवि के सम्पूर्ण जीवन
की व्यथा मूत हो उठी है।
चौवालीस ]
[ शेली

नृपति नहीं होना चाहूँगा!
शापपूर्ण है, प्रेम दिखाना-
सत्ता के पथ
को, जो बालू
और कठिन, शासित, मंझा से !
नहीं चाहता पढ़ना मैं साम्राज्य-पीठ पर,
अवस्थित जो हिम के ऊपर,
जिले
भाज्य
अंशु,
इष्रच-मध्याह-काका
में
पिघला कर कर देता पानी।
तब, हे भूपति, विदा तो भी मैं-
होता एक न जिससे चिन्ता'
इसनी शीघ्र भेंट कर पाती!
वह और मैं, होते सुदूर प्रति,
रखते पशु दल अपने, उच्च हिमालय अपर!
(काग्यांच-1)
शेती]
[ पैंतालीस

केशरलिय' के शासन में लिखित .) कन में बोले शव बन्द, मूक जड़ है पाषाण मनीन । कोख में भ्रय हुए और उनकी माँ, रक्त विहीन । श्वेत तट 'ऐलथियमा सम दीन, नहीं है अब किंचित स्वाधीन ! हैं मृत्ता पुत्र है उसके पथ के खंड, अचेतन मिट्टी कुछ समान । पगों से मर्दित, मड़ हस्पिण्ड, धार कर गर्भ जो कि निष्प्राण- मुक्ति है, करती जो कि प्रमाण, मृत्यु से देशित अब नियमाण । माह ! aष कुचल, मनामानंद, बध्य तेरे का रसक कौन ? सभी का तू स्वामी स्वच्छंद, दूध का, भ्रूणों का शव मौन-- उसी के सब रे, सब तेरे, निबंध, पाटते का तलक का पंभ! ५) शोर-गुरु उत्सव का निधि, 'काम' और 'ध्वंस' पाप का हाल! सुन रहा क्या 'वैभव' का नाद? गुंज जिसकी सत्यानाश! १-रोली के समकालीन इग्लैण्ड के शासक का नाम । २ सालगड का प्राचीन नाम। छयालीस ] [ शेली देवता वैचामन चामल' की जीत, कर रही है सच को जो मूक, बनेगी तेरा परिणय-गीत! भयावह पत्नी को मा पाह! 'भीति', 'संघर्ष 'प्रशान्ति' संवार- जिन्दगी-आंगन में इस पार, बिछायें सेज तुझे; कर व्याघ, 'मष्टि' से, मो, शुल्मी, साषीश- दिखायेगा तुझको वह राह, वधू की शैया तक, यह ईश! (121) -मदिरा का देवता। शेली ] [सैंतालीस इग्लेण्ड के मनुष्यों से अग्नि देश के मनुजो! क्यों या भूमि जोतते ? उनको, जो हैं धनशाली, तुम मिनसे मर्दित ? इतनी चिन्ता और परिश्रम क्यों तुम करते, इन वस्त्रों को, जिनसे शोषक होते सज्जित ! . क्यों सुम, उन्हें खिलाते, पहिनाते और करते- रता सनकी, मूले से लेकर समाधि तक' प्रकृतज्ञ रानीमावी के ये, नहीं पसीना केवल, खून पियेंगी अनथक ! मुण्ड सभी यग्लिदेश फी मधुमक्खियो! अस्त्र, जंजीरें, औ' को शुम ढाल रही हो, बोलो किसको ? संकाहीन मक्खियों तुम्हारी ताकि न कर, मष्ट तुम्हारे स्वेदश्रम की विवश उपज को! . क्या अवकाश, शान्ति प्राराम, कभी भी पाने, खाना और पनाह प्यार का मरहम शीतल । क्या है जो इतना महंगा गुम हो खरीदते, सह अशेष पीलम, इतने भय से हो माकुला ! सुम थोते हो बीज, काठसे किन्तु दूसरे । दौलत तुम खोलते, और का घर है भरता ! कपड़े तुम चुनते, पर और पहिनसे फिरते, पस्न बालो तुम, पर और जिन्हें है गहता! २ -शेती की सर्वसाधारण के लिये लिखी गई कविताओं में सबसे प्रसिद्ध कविता-इसकी राजनैतिक कविताओं का संकलन इसी नाम से प्रकाशित हुआ-उसकी मुत्यु के पश्चात् । भाङ्गतालीस ] [शेली

बोनी बीज, म शुल्मी जिन्हें काटने पायें।
खोजी दौलत। पर न जाय वह उग के घर में।
कपडे धुनो! मालसी कोई पहिन न पाये,
बालो अस्त्र ! गही अपनी रक्षा को कर में!
६
कॉप रहे तुम चिनो, कोठारों से घर में।
रहते और भव्य भवनों में तुमसे पनते।
हिला रहे क्यों अंखल, खुद कसली जो कर में
इष्टि डालता है इस्पात,
इस्पात, उता जो तुमसे।
अपने इल, फायदे, और हसिये करपे से
खोदो, अपनी कम समाधी करो विनिर्मित !
खुनते चलो, कफम अपना, जब तक्षक नहीं ये,
सुघर अग्नि-भू वृहद मकबरे में हो परिणत ?
(141)
शेली ]
[उनचास

शशि से
-
क्या पड़ी पीली धकन से ?
निक्षय पर चढ़ते हुए, लखते धरा को ही निरंतर,
या बिना लंगी भ्रमण से,
बीच में उन तारको के, जन्म जिनका दूसरा पर,
और परिवर्तित सदा जी, हर्षहीम-नयन सा की,
योग्य अपने स्धेच्य को ही, जोन पाता पान कोई।
(11)
पास]
[शेली

(.)
पीली, शीतल और चन्द्रमामय स्मिति को यह,
तारकहीन निशा उल्का के महश गिराती,
एकाकी और घिरे जलधि से उस टापू पर,
पूर्ष कि प्रसंदिग्ध आभा हो सूर्योदय की,
जो है जीवन शिया, हमारे चरण चतुर्दिक
मंद भग रही, उनके बल के भय से पहले !
श्रो, मानव ! मामा के साहस में जकड़े रह,
अपने का सांसारिक पथ की तूफानों छहों में होकर ।
और मेघ गर्जन करना फूस्कार चतुर्दिक,
विस्मयपूर्ण दिवस की प्राभा में मोयेगा!
जहाँ नरक और स्वर्ग मुक्त तुमको रक्खेंगे,
जाने को निर्वाध नियति के भू-मण्डल को ।
विश्व हमारे सर्वज्ञान का ही पोषक है,
जो कुछ भी हम अनुभव करते, उसकी जननी,
और मृत्यु प्रागमन भयावह उस मानव को,
जो इस्पात-शिराओं से माधुत्त नहीं
जय सब ज्ञान और अनुभव, वर्शन यह सारा,
एक अवास्तव रहस्य सा बीतेगा अपना!
(४)
सभी गुप्त । वस्तुएँ कब की यहाँ मिलेंगी,
लेकिन इस ढाँचे को सुम म वहाँ पायोगे।
यदि यह सुन्दर नयन, कान विस्मय से पूरित,
अब फिर दर्शन और श्रवण को नहीं रहेंगे।
इस सबका जो है महाग, पाश्चर्य पूर्ण सब,
इस श्रशेप परिवर्तन के असीम प्रान्तर में।
शेली ]
। क्यावन

(५)
कौन कह रहा है अनकहनी कथा मृत्यु की ?
कौन कर रहा निरावरण है इस भविष्य को ?
कौन कर रहा चिनित छायाएँ जो नीचे,
विस्तृत मुदती गुम्फों में जन पूर्ण कब की ?
या भाषी भाग्याओं को है कौन मिलाता,
बम भय और प्रेम से, जो है हमको गोचर ?
(118)
[ बावन
शेली]

अपोलो के प्रति
शयमहीन घंटे है जब मुझको निहारते,
अम्बर के ऊपर से विस्तृत चन्द्रावप ले,
अब मैं लेटा डाले तारक-अंकित पर्ने,
मिन हग के व्यस्त स्वप्न पर पंखा झलते ।
मुझे जगाते, शुभ्र उषा उनकी जननी जब,
कहती नसे, गये स्वप्न और धंद्र सभी प्रब!
(२)
तब मैं उठता, मीलिम नभ गुम्बज पर बढ़ता,
धूमा करता, पर्वतों और शहरों पर,
सिन्धु-फेन के ऊपर अपना बसन छोड़ता,
मेरे घरण अग्नि मेघों में देते है भर!
मुमसे दीप्ति भरी गुम्फों में हरित भूमि को,
पषम छोड़ देता मेरे नग्नालिंगन को!
सूर्य-किरण, जिससे बन करता मेरे शर हैं,
'छल' का, जिसको प्रिय है तमला, भय दिनसे।
सभी मनुज जो दुष्कर्मी, या दुष्कल्पक
भगवे मुझसे मेरी किरनों के गौरव से,
सद मानस और मुक्त कमै मृतम बल पाते,
जब तक नहीं निशा के शासन में खो जाते।
मेघों, सुरचापों, कुसुमों का करता पोषण,
देकर स्वर्गिक वर्ण उन्हें, मैं घृत घन्म का,
और पवित्र सितारों के वे कुंज चिरंतन,
सुत्य बसन के मेरे बल से अन्धन सबका,
. कला साहित्य का देवता!
शेली ]
[तिरेपन

दीपित जिसने दीप स्वर्ग या पृथ्वी पर ही,
एक शक्ति के आम सभी जो है मेरी ही!
रजित होता दोपहरी को व्योम शिखर पर,
फिर अनचाहे चरणों से नीचे पाता हूँ !
घूमा करना पटलांटिक मेघों में जी भर,
हो विक्षुब्ध रुदन करते, जब मैं जाता हूँ!
और दृष्टि क्या हर्षदायिनी है उस स्मिति से,
जिससे उन्हें शान्त करता पश्चिमी द्वीप से ?
(६ )
मैं ही नयन, स्वयं को या भूमण्डल जिससे,
लवता और जामता अपने को स्वर्णिक यह ।
सभी रागिनी वाय-यंत्र से या कविता से,
सय भविष्यवाणी, औषधियाँ मेरी ही यह ।
सभी निसर्ग कला की प्रामा मिली गीत से,
मेरे, विजय-शंसा निज अधिकार शक्ति से 11
(१९२०)
चयन ]
[ शेली

के प्रति
है, अगम्य अम्बुधि ! तेरी लहरें हैं वत्सर !
गहन व्यथा की धारें तेरी, काल महार्णव ।
खारी हैं, वे मानव के आँसू पी पी कर ।
तू अकूल प्राप्तावन, जकड़ा करते है तब
ज्वार और भाटे, नश्वरता की सीमायें,
जथा षध से, पर तू अधिक क्षुधाकुल होकर,
रे! मग्नीश उगलता
निज अशिष्ट तट पर ।
छली, जबकि तू शान्त, भयावह ममा में, पर
ऐसा कौन कि मी तुझसे समता कर पाये?
है, अगम्य सागर।
(१२)
शेली ]
[ पर्षपन

प्रेम-दर्शन
निर सरिता से मिलते,
सरिता मिलती सागर में !
पषमान गगन के घुलते,
चिर को भावना मधुर में।
एकाकी कुछ न जगत में,
सब वस्तु नियम देषिक से।
घुल घुल मिलती आपस में-
मैं क्यों न मिणू फिर तुम से ?
लो, शैक्षा चूमते नम को,
हैं शर्मियों परस्पर मंथित!
है षमा न कुसुम-बहिन को,
करती यदि पन्धु उपेक्षित!
रवि-फर से भू का बंधन,
घूमती जलधि शशि किरने।
किस अर्थ सभी थे
यदि मुझे न थूमा तुमने ।
(18)
छप्पन]
[ शेली

प्रोज़ीमण्डियस
प्रत्यावर्तित
मुझे मिला प्राचीन देश से
यात्री,
जिंसने कहा,
विराट और अर्धानहीन, प्रस्तर के
वो पग खड़े हुए मह में, जिनके समीप बालू पर,
भई-भग्न, विश्वस्त एक मुख शायित, अपर जिसके-
5 , मुरमा सब, शीतल माशा का उपहास, बताते ।
इसका शिल्पी भली भांति समझा था वे लिप्सायें,
जो अब भी जीवित, अङ्कित इन जब चीजों के अपर,
बाहु ईसा जो उन पर, डर था जिसने इनको पोसा,
"औ' भाधार-स्तक्ष के ऊपर देते शब्द दिखाई।
मेरा नाम है पोजीमैपिडयस, राजों का मैं राजा
देखो मेरे कार्यों को तुम भो! वनवाम, निराशित !"
शेष नहीं कुष वृहद भग्न के पतन चतुर्दिक सूनी
समसब मन असीम बालकाराशि दर तक व्यापित,
(140)
शेली ]
[ सत्तापन

काव्यांश
"भटक रहा है वह, श्रापारा दिवास्वप्न-सा,
मानस की धूमिल भारण्यकताओं में से।
सूने धनों, पथों से, जो प्रतीत होते हैं,
महासिन्धु, गृहहीन, असीम, अनावेष्टित से।"
(काव्यांश १८९१)

जक गूंजेगा तार्क की नाद ये स्वत्त मक्खियों, जो, कचहरी की धूप में गरमाते हुए, इसके भृष्टाचार से मोटी हुई हैं, वे क्या है ? समाज की रानी मक्खी ! पोषित होती हैं जो, यांत्रिक के श्रम पर, सुधाग्रस्त खेतिहर, उनके लिये विवश करता हठीली भूमि को देने को, अनयटी इसकी फसलें और सामने झमाग्रस्त प्राकृति, मालहीन दैन्य से भी पतली, जो व्यर्थ करती है, सूर्य वंचित जिन्दगी अस्वास्थ्यकर खानों में, श्रम में सोखती है दीर्घ मृत्यु को, उनकी गौरवाभा के पूर्ण पोषण के लिये, शनेक मूच्छित होते हैं पिसते हुए श्रम में, साकि कुछ को श्रालस्य के दुख और विताओं का ज्ञान हो । तू पता तो, यह राजा और परोपजीवी कहाँ से पैदा हुए। कहाँ से आई रानी मक्षियों की प्रकृत कतार, जो लादती हैं श्रम, और अपार देन्यता, उनके ऊपर, जो बनाते हैं उनके महल, चलाते हैं उनकी दैनिक रोटियाँ ! (ये पैदा हुए है) दुगुण से, काले घृणित दुर्गुण से, बलात्कार से, पागलपन से, धोखेबाजी से, और भन से, उन सबसे जो दीनता पैदा करती है, और बनाती है, इस धरती में कंटकाकीर्ण बन्यता; लिपसा, प्रतिशोध और हिंसा से और जब गूंजेगा तक का माप, प्रकृति की वाणी के समान, जो वीय होकर जगा देगा राष्ट्रों को, और मनुष्य देखेगा कि दुगुण है, अनैक्य, थुद्ध, और वेन्यता, कि गुण हैं शान्ति, और सुख और ऐक्य, जब मनुष्य की परिपक्वतर प्रकृति उपेक्षा करेगी अपने बचपन के खेलने की वस्तुओं की, शेली ] [ उनसठ

रामसी भाभा अपनी चकाचौंध की शक्ति खो देगी,
इसकी सत्ता चुपके से नियोष हो जायेगी,
मजित सिंहासन खड़े होंगे अगोधर,
राजसी-कप में तीनता से पत होते हुए,
भावकिवचमा की वणिम उतनी ही चणामय
और अक्षाभकर हो जायेगी,
जैसी अब सत्य की।
(काल्यांश-वीगमे से--1)
साठ]
[ शेली

१ (.) मरक है एक मगर, लम्बन की तरह का, भीड़ से भरा हुआ, धुएँदार है सब प्रकार के मनुष्य, नष्ट हो गये हैं ओ, मनबहलाव से अप या नितान्त शून्य ! शहर ! (२) वहाँ एक, .है, खो चुका है निज, पुद्धि को दिया है बेच, म जो किसी को ज्ञात! घूमता है यत्र तत्र वुहरे प्रेत के समान, और यद्यपि है कृश, जितनी हो प्रवंधना, धनवान और तर होता ही जाता है। ३ ) वहाँ 'चौसरी कोर्ट' और एक है नृपति, निर्माण करती भीड़, चोरों का एक दख, शन जैसे चोरों के प्रतिनिधि, एक सैन्य - इल और एक राज्य-ऋण का - मसार है। ! ( पार की है, किन्तु एक कागज की योजना, और है साधन; कि जिपकी है व्याख्या यों, मधु मशिकाओ। मोम रालो, मधु दो हमें ! और हम बोयेंगे जक व्योम धूपमय, फूलों को जो कि काम, जादे में आयेंगे। चर्चा बड़ी वहां होती इनकलाष की और अवसर बसा है एकतंत्र का यहाँ, शेती ] [ इकसठ जमंग सिपाही है, मेरे और कोलाहल, गर्जन है, जोटरी हैं और विदे यहाँ । नमजात भास्महत्या, 'मेथडवा है। कर का प्रसार है, गोश्त पर, रोटी पर, मदिरा पर, चाय औ' पनीर भी म मुक्त हैं, पोषित हैं जिनसे विशुद्धतम देशभक्त पीते गुणित इनका ये, और लड़खड़ाते हुए निज शैया तक जाते हैं। हैं सस्त बस (७) हैं वकील, जज, युद्ध पंग के पियक्कर हैं, साहूकारों के दलाल चांसलर यौ' पादरी। छोटे लुटेरे; और छंदकार, पर्नेबाज, सह के धनधे में बागे मनुष्य और बड़े (८) युद्धों के गौरव से भूषित, यशस्वी मन, वस्तुएँ है, जिनकी वणिज स्त्रियों पर है, बक्षनामा, झुकना, औ' मुस्कराना धूर धूर, जब सक म जो कुछ भी स्वर्गिक है नारी में, हो जाय कर, शिष्ट, चिकना, अमानवीय ! भ्रम, और आरोप, चीरकार, क्रन्दन, अभंग, उपदेश, ऐसे कोलाहल हर व्यक्ति अनथक निज श्रम करके ही, सोचता कि लूटता हूँ अपने पड़ौसी को। और ये मिलते सब राजलीय भोजों पर, उरसों की दावतों, महान कवियों के संग, घासठ ] [ शो

राजनीतिमय चाय, जलपाम पर महाँ,
शीघ्र शुद्र वार्ताएँ, ब्धि में बदलती है।
और ये है नरक कि जिसके गुबार में,
सब निन्दनीय, लीन निज पाप कर्म में,
हर एक दूबता हुयाता अपने को है,
एक दूसरे से पापमय हो गये हैं सब,
कर्म करने को प्राता
को पाता है
न दूसरा।
(१२)
यह सब झूठ है कि प्रभु नाश करता है,
स्वर्ग का प्रमुख वकील तय था कहाँ गया?
पहली बार जब इस झूठ को गढ़ा गया,
इन सय शर्मनाक बातों का हो अन्त अय
यह विष धातुओं से भी हुई खान हैं!
(काम्यांश, 'पीटर बैल र थर्ड 141)
पूरी कविता काफी लम्बी है और सम्बन के ऊपर लिखी तीन प्रसिध
कविताओं में इसकी गिनती है। शेली ने तत्कालीन सयमान समाज का जीता
जागता चित्र इस कविता में प्रस्तुत किया है।
शेली ]
[तिरेसठ

सचा चार उपेक्षा से न देख, मेरी देवि ! भाव के, सयमा जम्म के, हन प्रसूमों को जिन्हें अपने अंतरतम से या बिरया उगाता है, जिसका फल, तेरी सूर्यताप सी दृष्टियो द्वारा सम्पूरित है, होगा मन्बम बन के दमों के समान ! विवस भागया है, और तू मेरे माथ उड़ जायेगी। मंद मयंता का जो कुछ भी मेरा है उसकी ओर, पर तू रहेगी मुझे तो भी एक कुमारी यहिन के सरश सघन, गम्भीर, और अक्षय की ओर । जो मेरा नहीं, बल्कि मैं ही हूँ, फिर तुम भी मिल जामोगी? एक वधू की सी, हसते, हसते! घड़ी भागई है। नियत नक्षन्न उग पाया है। उतरेगा जो एक शून्य पन्दीघर पर । जिसकी दीवारें ऊँची है, द्वार सुबह है, और है मोटे संसरियों का समूह ! लेकिन सच्चा प्यार, कभी इस प्रकार दमित नहीं हुआ। यह सभी प्राचीरों को लाँघ जाता है। सहित के अश्य तीयता से! समान इसके बंधनों को चीरते हुए, आकाश की मुक्त वायु सा, जिसे वह छु तो सकता है, पर पकड़ नहीं सकता ! पम के साशतर, जो विचार पर सवारी करता है और अपना मार्ग बनाता है ! मंदिर, मीनार, महल, और अस्त्र की पाति में ! वह या सनकी अपेक्षा कमी अधिक सशक्त होता है। क्योंकि यह अपने शव का भी विस्फोट कर सकता है। और अवयवों को सलाओं से, हृदय को बर्द से, प्राण को धूल और कोलाहल से, विमुक्त कर सकता है। (काम्याश-ऐपिप' --14.) चौंसठ] [ रोली ग्राहकाना! दासता है यह, काम करने के बाद दाम, नित्य प्रति जीने भर के ही लिए पाते हो! जैसे अंध कोठरी में, वैसे मिज अंगों में ही, शोषकों के लाभ हेतु घास किये पाते हो! - ताकि बनी रह सके तुम्हारी जिन्दगी ही इन- करघा, कृपाण, हल फायड़े निमित्त हो! इच्छा या अनिच्छावश शोषकों की रक्षा और, पोषण के लिए हों तुम्हारे सब कृत्य ही ! दासता, तुम्हारे लाल सूरत सूख मरते और, पीली कमजोर उनकी माएँ हुई जाती हैं ! मैं तो यहाँ बोलता हूँ, किन्तु मृत होके वाँ, गिरते हैं शिशिराई वायु जब आती है। दासता है, भूख से तड़पना उस अन बिना, जिसे धनवान उन कुत्तों को खिलाते हैं ! जो कि मोठे मस्त होके उनकी श्रीख के समक्ष, अति तृप्त होके निदियाते हुए पाते हैं। भाते परवार खोज से है जब हारे धके, तंगनीष में परिन्दे भी विराम पाते हैं। हिंस्त्र जन्तुओं को भी तो वन्य माद देती और, ममा और हिम जब वायु में समाते हैं। १ प्रस्तुत काव्यांश शेली की 'मास्क प्रांफ ऐनाकी (विद्रोह का म- पेश) से सबृप्त है। उक्त कविता का स्वतन्त्र भावानुवाद है। अंग्रेजी जनता की जिस विषमता का इस कविता में चित्रण किया है, यह हमारे देश के लिए भी उतनी ही घटती है । इस कविता में कार्ल माक्स के 'मजदूरी के जौह नियम' (iron law of wages) की पूर्व कल्पना है। शेली ] [ पैंसठ

दिन भर काम करने के बाद आते जब,
घोष थैल का भी होता अपना निवास है!
पवन गरजते तो उष्ण द्वारों धीच तय
पाले हुए श्वानों का ही होता निज पास है।
गधे और सूपर भी और पाते हैं उन्हें,
वक्त पर ठीक ठीक साथ मिल जाता है।
धर तो सभी का है अंग्रेज, पर दू ही तो,
काम करने के बाद और तक न पाता है !
यही दासता है, जिसे बर्बर मनुष्य या कि,
अपनी तंग मांद बीच जंगल के जीव भी!
सहते कभी न जैसे तुमने यह सहा है सब,
ऐसे दुगुणों का जानते हैं वे न नाम भी!
क्या है तू स्वतन्त्रता जाय इसका जो काश !
जीवित समाधियों से दास दे पाते कहीं ?
मांग से ही, सपने के धूमिल प्रतीक सम,
अत्याचारियों के झुण्ड भागते तुरन्स ही।
सू, हे स्वतन्त्रता! न जैसा छली का है,
कि एक छाया के समान शीघ्र मिट जाती है।
अन्ध-सस्य तू नहीं है, या कि नाम जिसकी बस।
कीर्ति की गुहा में अनुगूज रह जाती है?
हे स्वतन्त्रता की देवि! तू तो मजदूर को है,
रोटी जी कि रक्खी हुई एक शुभ मेज पर
एक स्वच्छ और सुख पूर्ण गृह मश्य यह
पाये उन्हें पाये निज शाम से ही लौट कर ।
शासकों की ठोकरों से ग्रस्त जन समूह को,
अन्न, वस्त्र, और अग्नि, तू ही है स्वतन्त्रता!
भाज: जैसा मेरा देश है अकाल, शाप-प्रस्त,
किसी.मी स्वतमा देश को हूँ मैं म देखता।
छयासठ ]
[शेला

तू है प्रतियन्ध ! मन अंध धनशानियों को,
देर के शिकार के गले पर धरते हैं जब ।
तेरी हुँकार पध्य सांप सा फुकारता
जालिमों के मुण्ड भी उछलते गिरते हैं सब!
तू ही न्याय ! जिसकी पवित्र इन विधियों को,
बेच सकता है न कोई स्वर्ण मानदयड से !
विकते थे जैसे इग्लैण्ड में, तू देखती है-
ऊँच, नीच सबको ही स्टि निज प्रखंड से।
तू है बुद्धि कभी नहीं, वे मनुष्य जो स्वतन्त्र,
प्रभु-दण्ड की न रंच, करते हैं कल्पना,
खोले पोल यदि धूर्त धर्मध्वजा-धारियों की।
करे वे पाखण्ड की प्रचंड यदि खंडना।
होने दो इकट्ठा देशवासियों को एक ठौर,
अति गम्भीरता से शब्द घे उच्चारी तो!
जिनको न पहले सुना गया कभी, 'तुम्हें
प्रभु ने बनाया है स्वतन्त्र, तुम स्वतन्त्र हो ।'
एक दुत और पाश्चर्यपूर्ण गर्जना से,
अत्याचारियों से चारों ओर घिर बायोगे।
सीमाहीन होते हुए सिन्धु के समान उनके,
रणमत सैनिकों को बढ़ता हुआ पाओगे !
.और उनकी तोपों के मुख भी प्रलय की ज्वाल,
पर अबाध बरसाते हुए पायेंगे।
जब तक न मृत वायु प्राणित बनेंगी इन,
अश्व-दापों, रथ-चक्रों की वर्षयाओं से।
शेली]
[ सरसठ

सधी हुई संगीत यदि निज तीखी नोक, आतुर हो अगरेजी लोहू में डयाने को। चमकाने दो यदि यह चमकाती इसे, जैसे व्यग्र होता है क्षुधित अन्न पाने को! जैसे धन होता है सघन और स्परहीन, ऐसे तुम खरे रहो प्रशान्त हुछ चित्त से! कर हो तुम्हारे बद्ध, और वह दृष्टियाँ हो, बनती हैं वीषण अस्त्र जो अजेय युद्ध के ! और इसके बाद अत्याचारियों की हो मजाक्ष, रोक्ने बढ़े जो प्रश्व टापों से तो रोको मत ! चायुरु के प्रहार, पार तलवार छुरियों के रोको मत, करना चाहे जो कुछ भी हो प्रमत्त ! हाथ जीबनो, हिले नष्टि रच मान भी, भय का निशान, विस्मय का ग लेश हो। उमकी भोर देखो, बध जैसे ही तुम्हारा करें। इनका प्रचंड रोष जय ब न शेष हो। . तय यह हार मान शर्म से गहेंगे और, भाये थे, जहाँ से वे वहां से लौट जायेंगे । और शोहू अपने ही आप तब बोलेगा, गालों पर निशान लाल खज्जा. के छायेंगे । हर नारी देश की इन्हीं को लषय कर तुरंत, संकेत देतु अपनी उंगलियों उठायेंगी। साहस न होगा अभिवादन करें भी, पदि, धुनों की भीष पथ जो में मिल जायेगी। घुद्धों के सपाके पलथान सच्चे शूरवीर, क्याति पाई रण मापदाओं के हटाने में । जायेंगे थे इनकी और जो स्वतन्त्र होंगे, और, शर्म से गड़ेंगे, ऐसे नीच संग जाने में। अरस] [शेली

प्रेरणा असीम वह संसार देगा और,
वाष्प के समान सारा देश उठ जायेगा!
भोज का प्रसार, श्री संकेत हो भविष्य का ही,
भूमि-कम्पनाद दूर दूर सुना जायेगा।
और यह शब्द तय प्रास्मान
चीरेंगे,
शोषकों के लिये मृत्यु फैसला सुनायेगी !
हर मस्तिष्क, और उर में उठेगी गूंज,
बार, बार, बार, यह ध्वनि सुनी जायेगी!
जागो ! सिंहों से दबाब, घोर नीद छोड़ पाज,
उठो! अब अजेय संख्या में झूम फून कर !
शृङ्खलायें तुमने जो पहिनी थी नींद में,
हिला कर गिरादो, प्रोस बूंद सम भूमि पर !
तुम हो बेशुमार, और वे है बस मुट्ठी भर ।
(काभ्यांश, मास्क प्रॉफ ऐनाकी'-151)
शेली ]
[उनहत्तर

शूकर का कोरल
--
तुमको प्रणाम, तुकको प्रणाम, दुष्काल वीर !
सेरा सिंहासन शोणित पर, पसन, पीर ।
शैतान | जिन्दगी तेरी करना भूमर्पित
नूतन गिरजी के संत, नीति के दम्भ, हरित
थैले', जब तक करुणा, न भीति तुझ से जागृत
तुझसे सुधियों के प्रायोजन हो गये मित ।
जय उठता है, कंकाल रूप, तेरा अकान !
लुढ़कें चहुदिशि में माँस-खंड, हड्डी, कपाल !
रे ! सुके बधाई देगे हम करके अमंद,
वो हर्षनाद होगा जिससे सूफान मंद !
तुमको प्रणाम, तुमको प्रगाम, दुभकाला वीर,
तुमको प्रणाम, धरती के राजा, महावीर ।
जब सू उठता, अधिकारों को करता खंडित,
जम तू उठसा, शोषण हो जाते हैं लुपिठत !
घिरता, तेरी भीषण मुस्कानों का घमंड ।
महलों, मंदिरों, और कत्रों पर, हे प्रचण्ड !
हम दौड़ेंगे, होने मेरे मंत्री गुलाम !
वेरी कतार के पीछे, करवे नष्ट-भ्रष्ट !
अब तक न एक सी हो जायेगी खिल सुष्टि !
(काव्यांश'स्वैखोफुट व टाइट'-१२०)
1-Green Bags से प्राशय नण्य की थैलियों से है।
सत्तर ]
[शेली

कॉक का अवसान यम के धूमिल और अंगमय शशि नीचे लटकी, लिम्धु प्रभा का दिया उडेल क्षितिज तट पर, जिससे उमड़ चले पर्वत, पीला कुहरा भरा भसीम फिजा में, उसने जी भर कर । पीत सुधा को पिया, न चमका एक नखत, नहीं एक स्वर सुना, प्रभंजन जो पहले थे भय के निष्ठुर संगी, सम सुश हुए वहीं शैल पर, सके हद पासिंगन में मंझावात! अंधगति तेरी से, खंडित मलिन निशा औ' सूकंकाल बृहद् ! जिससे संचालित इसका दुर्दम जीवन अपनी ध्वंसक सर्वशक्तिमयता में सू! इस नश्वर जग का नृप; हत्या के रक्तिम खेत और दुगंधित थरपताल से ले देशभक पावन शैया भोलेपन की- सेज हिमानी, शूली, राजा की गद्दी, एक भाषाहन करता ध्वंस टेसा, भाई यम को एक विरल और राजसी राजली वध्य जिसे तैयार किया जिसने घूम घूम दुनिया में, तृप्त हुआ स्खा जिलको, हर थकन ! मनुज जायेंगे निज कत्रों को फूलों या तेरी काली वेदी पर इससे न अधिक धड़ी कभी अपहेलित भेंट भग्न घर की। जय उम्मेषित हरित विराम स्थान हुमा तब पंथी के चरण गिरे, वह समझा प्रय मृत्यु हकेगी उसे स्वरित, उसकी अन्तिम दृष्टि समक्ष बृहद चंदा जिमने विस्तुत वसुधा की पश्चिम रेखा पर चढ़ करके मीचे बलशाली अंगों को खिसकाया, रख तेरा रंगे कीड़े सम; शेक्षी ] इकहत्तर जिसकी बादामी बादामी किरनों में चुनी हुई समला यह लगती घुलती सी; सोता यह कटी शैल मालाओं पर, हो भग्न बृहद् घूमकेतु वह दूबा; कवि शोणित धड़का जो कि सदैव रहस्य भरे संवेदन में, औ' निसर्ग के पालोदन गतिमयता पर, हाय ! मंद और क्षीण हुआ धीरे धीरे । आह ! उब गया तू न कभी जागेगा फिर अब न कभी मायावी दृश्य निहारेगा, जो है तुमको रहा शुद्धतम उपदेशक जो है, पर तू नहीं, पीत अधरों पर जो पाय भी इतने मृदु अपनी खामोशी में, उन आँखों पर, बिम्म मृत्यु में सोता को उस प्राकृति पर, रक्षित कीट-क्रोध से जो एक न प्रभु बहाना, उस पर एक नहीं, प्रश्न कल्पना में भी, और न वे रंग जय चले गये हैं, वे पविनतम गुण भी अब सचेत वायु से से रह पायेंगे ही, सरल गीत के क्षण विराम में ये जीवित ! उच्च शोकगीतों से मत दुहरामी स्मृति, उसकी जो अब नहीं रहा, या चित्रकला व्यर्थ लुटाती बैन्य, या कि दुर्थन रूपक वास्तुकला के, जो वे कहते हैं शीतल अपनी शक्ति-कथाएँ, कला, अषतता, अषमृता, या जगती के ये सभी दिखावे, व्यर्थ सणिक, उस चिनष्टि पर रोना, जिसने परिवर्तित किया प्रकाशों को इस काली छाया में ! यह विषाद गहरा इतना आँसू न जिसे प्रकट कर सकेंगे, खंडित है सभी सुत्रा एक साथ ही, एक गुजरती श्रात्मा जप जिसकी आभा में मंडित था विश्व सकला सजती है उसको जो पीछे रह जाते नष्ट बाहचर] [शेती

यह मैराश्य
महीं हिचकियाँ पाई शीत अथवा लिपटी,
माशा का सहीस माद, लेकिन पीक्षा
और शीतल वह खामोशी,
जो निसर्ग का है विराट ढाँचा, जाला
मानवीय चीजों का, जन्म, समाधि, कभी
जो थी, अब पहले जैसी है नहीं रही!
( काव्यांश--ऐलास्टर-151)
शेली ]
[तिहत्तर

कली कुसुम आतिथ्य उसय ग्राम एक तम बन के भीतर पदा दिमाई, से सजे पर्ण अब बिखर गये मुरझाकर । भूग्या झंझावात, खून से भीगी धरती इसकी, शून्य साक्षावो से दीवारें, ढेर, मृत्त थी लपटें । श्रय म घरों बीच, जीवन के चिह्न प गये सारे, उन सब काशी के भीतर सं, लेकिन वह विस्तृत नभ, प्राप्तावित था चपला से, सिर अपर था वह खक्षित, काले शहतीरों के द्वारा, सोये हुए चतुर्दिक मर, नारी, शिशु, किया गया अध अधाधुध ही जिनका! (१) मरने के तट से चलते मैं उतरा एक जगह पर, जो था हाट, और फिर मैंने उन लाशों को देखा, अपनी दृष्टि कटीली से, जो तकती हुई परस्पर एक दूसरे का मुख, पृथ्वी शून्य वायु और मुझको ! जलधारों के निकट जहाँ में अपनी प्यास बुझाने, नीचे मुना मगर सकुषाया, पी न सका सिल भर भी, क्योकि रक्त के स्यारीपन से स्वाद नीर का अवला, लेकिन बाँधा दृष्टुं एक ओर फिर खोजा इस हो, गाव हो कोई जीवित, इस भीषण विनाश के भीतर ! (२) किन्तु नहीं था कोई जीवित छोड़ एक नारी को, जिलको मैंने पाया गलियों में भावारा फिरसे, और हुई घच जज सी थी ज्यों मानव की प्राकृति किसी अजनबी दैन्य-शाप से प्रेत सघश हो जाये । शीघ्र सुनी आहट मेरे चरणों की, कूदी मुझ पर, और धर दिये मेरे अधरों पर जलते चुम्बन, फिर, एक दीर्घ उन्माद भरे तम अहहास से हसकर, बोली, 'नश्वर मर, तू अब गम्भीर पी चुका है यह ! (३) मेरा नाम महामारी है, इस सूखी छाती से कमी पालती दो बच्चों को एक बहिन, एक भाई पर अब बोट, रक में समा एक था लेदा, घातक भाप तीम थे, लपटों में दूजा भी खोया, चौहत्तर ] [ शेली तब से मैं भय नहीं रही हूँ माँ, मैं हूँ बस केवल सिर्फ महामारी होकर के फिरती हूँ गलियों में घूमा करती, ताकि कर सकूँ अध, या घोहूँ गर्दन, वे सब अधर, जिन्हें हैं मैंने चूमा, मुरझायेंगे, किन्तु न यम के, यदि वह सूची, हँस संग काम करेंगे। 'पाया तू क्यों यहाँ । चाँदनी की गिरती है धारें, उस भीगी घाटी में से उठ रही तहिन, जो मेरी, बच्ची को वर कर देंगी, बच्चे के धावा को भी, जिसमें अब की हैं, सू भी जिन्हें देखता ही है ! पर पहले, तू बता, खोजता किसे ? "खोजता भोजम" "अच्छा यह तू पायेगा, प्रेमी "मकान' दावत पर करता इन्तजार अपना, है ययपि क्रूर भयानक किन्तु न लौटाता, निज घर से उसको जिसके अधरों को मैंने धूगा, वह कभी नहीं लौटाता" (५) ज्यों ही वह बोली, सशक मुझको तब अकड़ा उसने उन्मादी लिगन में फिर मुझे ले गई अनगिन चस्त अलावों से होकर जानेक खाशों के ऊपर और अन्त में हम भाये सूनी कुटियों में, भू ही फर्श जहाँ थी, भयावनी निज मिति से उसने उजड़े हुए घरों से फिर फिर किये इकट्ट, सस्वर तीन ढेर शुष्क रोटी के, जिन्हें मृत से बीना जिनके चारों ओर शीत से करे बालकों के शव, ' रक्खे गोलाई में उसने थे जो स्तब्ध, घूरते ! (६) एक ढेर पर बह उछली; फिर निज विक्षित रष्टियाँ ऊँची छठा पुकारा उसमे, "स्वामी ! शामिल हो श्रो! इस महान दापस में, कल हम सभी मरेंगे" और फिर निज पीले पग से उन टुकड़ों को ठुकराया अपने रकहीन मेहमानों को, यह दृष्टि देखकर मेरी आँखों और हृदय में पीर छठी, वह जिसने किया प्यार मुझको, निज खोये इष्टि शरों से उसमे घोर निराशा दवा, दिखा सकता था मैं हमदी, पर मैंने खा लिया खाय, परसा जो उस नारी ने ! (७) ( काव्यांश-रियोल्ट आफ इस्लाम-11३) [पिचहत्तर शेली] वसंतश्री शिशिर मकोरे पंखयुक्त बीजों को बीजों को बिखरा देते, उखा-सड़ा कर धरती के ऊपर प्राते तदनन्तर, हिम, पारिश, तूफान, कुहासे, जिन्हें उदास शरद ऋतु, ले जाती 'शीथियन गुहा से, बाहर पात बनली, देखो! वासंतिका, अवनि से है घटोरती जाती, निज वायपो परों से भरती हुई दिन की बन्द, सुमन खिलाती गिरि पर, फल बिखराती मैदानों पर, बहरों और वनों में भरती चलती गायन, भ्यार, बस्तई चेतन पाती, शान्ति पदार्थ अधेवन ! अपना पषम [ २ ] है, बसंत रूपसि! उज्ज्वलतम, मर्वश्रेष्ठ, सुन्दरतम, पंखमय प्रतीक है तू, आशा और प्यार की, और जवानी की, खुशियों की; जब तू पाती तब यह- काक्षी शरद व्यथा से भरती, श्या तू होती शामिन, অঞ্জয় में, जो सोते तय उज्वल मुस्कानों में ? तू है यदिन हर्ष की, शिशु है, जो धारण करती अपनी जमनी की नियमान मुस्कराहर, मृदु. कोमल तेरी माता, शरद, क्योंकि उसकी समाधि को तू ही धरती सद्य कुसुम प्रदीक्षि फूलों सी, मृदुल चरण से, चलती, ताकि न जगे पर्ण जो कफन बने हैं उसका। 'गुण', 'माया', और 'प्यार', ज्योति, नभ के समान होते धेरै हुए अवनितल को हम चुने वास हैं उनके नहीं इमारी मारमा के क्या चक्रवात ने हाँके- अमर सस्य के बीज, भाव के सुदूरतम गहर में? लो! अब आता शरद, विषाद अनंक कर का बनकर होकर मृत्यु-तुषार पकाण प्रभंजन का होता है * शीथियम-प्राचीन काल के यूनानी यायावरों का सम्प्रदाय विशेष बिहत्तर] [ शेक्षी श्राखावन हो जिसकी लाल हिलोरे सात्रिक के शब्दों को 'मत' पर हिम-सा-जद कर देती। और बांधती हृदय मानवी, निज विश्रान्ति धुण्य सी। [ ] बीज मृत्तिका के भीतर हैं शयन कर रहे तव आलिम अपने तहखानों को बध्यों से भरता भरता है। पीत शहीद सुरक्षित शूली के ऊपर मुस्काते, क्योंकि नहीं वे कुछ अब सकते है; दिन-दिन सुयशा विज्ञान चंद्रमा का धरता जाता है, मध्य सितारों में अपने उस निविद तिमिर के भीतर धरती के बेटे मिथ्या देवों को रहे और जयी हैं धवन पुरोहित मोंका या प्रहार सम- स्वार्थ चिन्तना की छाया मानवी दृष्टि पर पड़ती। यही शरद है इस जगती का, हम जिसके भीतर है मरते, जैसे शिशिर काल के पवन हो रहे निभ सूखी और कुहासामय समीर के ऊपर हो। देखो ! वातंतिका उतरती, यद्यपि गुजरेंगे इम ओ लाये सम्भावना जन्म की इसकी; छाया मृत्यु हमारी से, ज्यों गिरि गिरा रही है भविष्य को-विराट सूर्योदय थों श्रावदित कर। जैसे अपर-छाया करते पंखों के पर सँग, लिज अंधी-संखक्ष खादी से या धरा गरुष सी सठती! (काव्यांश-रिवोल्ट आफ इस्लाम-1500) शेती [सतहत्तर

शशि का गीत
मेरे जीवनहीन पर्वतों के ऊपर,
हिम हो शिथिल सुलक्ता नि.मर में गा कर !
मेरे ठोस सिन्धु, बहते, गाते, चमके,
मेरे अन्तर से उक्लास समवता है!
मेरी शीत-नग्न-छाती को
अप्रत्याशित जन्म-घगन यह ले करके,
मह उल्लास भात्मा है जो तेरी ही!
डकी नग्नता मेरीही!
बकता है-
तुझे निहार, सोचता मुसको परिचय है,
डण्ठल फूट
फुटे हरे,
हरे, कुसुम श्राभामय है,
माणित प्राकृतियों मेरी छाती पर,
है संगीत समन्दर और समीरण पर,
पखिल पावन उहते फिरते इधर उधर,
परग्बा से श्यामसमय कसिया देख रहीं सपने में हो।
प्यार | प्यार ! या सभी और तुमी तो है।
(काग्यांश प्रोमे १८१६)
अठहत्तर ]
[शेली

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का
गीत
प्रेम-प्रवीण साश,
में
मैं तो कवि के अधरों पर ही सोती आई।
सपनो में खोती पाई,
उस ध्यान में, जो उसकी निश्वासों से पाई।
खोज प्राप्ति करता न पार्थिव प्राशीषों की,
पर बह जीता पाकर पाकाशी चुम्मन ही,
प्राकृतियों के भाव-वन्यताओं
भटकी
सवय अस्त तक जो कि रहेगी उससे गोचर,
जबकि झील पर प्रतिविम्बित होता है दिनकर,
कपिल मृङ्ग मंडराते है माधवी
माधवी पुष्प पर!
क्या है यह पदार्थ नखता न यत्न करता पर,
इनसे ही यह लेता है अभिनव लरजन कर
प्राकृतियों का, जीवित मानव से पास्तवतर
जिनमे है शाश्वतता पोषित होनी आई
मैं तो कवि के अधरों पर ही सोती आई।
(काभ्यांश प्रोमे १८)
शेली ]
[ उमासी

एशिया का गीत
मंत्र-मुग्ध-तरणी सा मेरा
प्राण।
तिरता
सोते इंस समान!
गायन की
रजत उर्मियों पर।
तेरे मधु
देवदूत सा होकर के तेरा राजित,
चक्र सहारे करता है यह पंचालित,
जयकि समस्त पवन संकृत मृदुस्वर पीकर ।
लगता जायेगा चिर चिर को तिर तिर कर,
बहुधारों में वितरित सरिता के ऊपर ।
मध्य घाटियों शैलों
धन प्राम्तर ऊपर ।
भारण्यकता का है स्वर्ग सजा सब पर,
चलता ज्यों है महाजलधि को सपना गत,
स्यों ही जब तक मैं भी, चहुँ दिशि चिरविस्तृत,
पाणी के घनतम सागर में नहीं तरित ।
(काव्यांश प्रोमे. १८९)
अस्सी]
[शेली

प्रकृति प्रारमा की स्तुति! जीवन के जीवन | ज्योतिस तेरे अधरों से, उनके मध्य श्यास को करता, स्नेह उन्हीं का, और तेरी मुस्कानें, पहले तय होने से, करती शीतल वायु अग्निमय, डाल यवनिका-- उन नजरों को ताक जिन्हें भूञ्छित हो जाता, उनके भवर काल से यह फिर निकल न पाता! है प्रकाश के शिशु ! सेरे अवयव हैं जाते, जाकिट' में सं. उन्हें प्रावरित सा जो करती, ज्यों प्रभात की दीपत शिरायें, मेषों में से, अपने वितरित होने से पहले, मुस्काती ! चाहे जहाँ विकीर्ण, ज्योति तू अपनी लेकर, यह पवित्रतम फिजा कफन डालेगी तुम पर ! अन्य रूपमय नहीं तुझे तुझे कोई निहारता, पर तेरा स्पर गूंज रहा जो मद्धिम कोमक्ष ! सुन्दरतम के सरश क्योंकि वह तुझको करता, नजरों से अपनी बह पिषती भाभा मोमल- अनुभव करते सभी, तुझे लखते न कभी पर, ज्यों में अनुभव करता भय, चिर-विलुप्त होकर ! दीप धरा के; जहां कहीं जासा, सू इसकी धूमिल छायाओं को पामा पहिगाता है। मंधर मधर पवमानों पर विचरण करती, उनकी मात्मायें, जिनको र अपनाता है। अब तक नहीं व्यर्थ होते, ज्यों मैं होता हूँ, उन्मद और विलुप्त नहीं, तो भी रोता हूँ। (कापाश-मोमे-110) 1-पत्र-विशेष शेली] इक्यासी धरती माता - मैं हूँ भूमि ! तेरी माता! यह हूँ जिसकी पथरीली शिराओं में, सच्चतम चूत के अन्तिम किललय तक हिमानी पक्षन में जिसके कृश पल्लव कपि, उल्लास दौषा, जैसे जीवित प्राकृति में लाहू, जब उसकी गोद से सू कीर्ति के बादज की तरह उठा, तीय हर्ष का प्राण बनकर ! और तेरे स्वर पर उसके चीथ के पुत्रों ने उठाई अपनी भूण्यापित अकुठियाँ कानुषित रज से, और हमारा सर्वशक्तिमान शासक मृत्यु के भय से पड़ गया पीला, जब तक न सके गर्जन ने तुझे यहाँ बाँध दिया, तब तू देख उन करोड़ों संसूतियों को जो जलती हैं, जुतकती हैं, हमारे चारों ओर । इनके निवासियों ने देखा- मेरी ज्योति की घटते बढ़ते विस्तृत श्राकाश में विलोपित या अजनबी तूफान से, और नई आग ने शुहिम के भूकम्प-खंडित पर्वतों से, अपने बोझिल कुस्तल को हिलाया गगन की भ्रकुटि के नीचे, तषित और परसा से भर गये मैदान । नीले नगरों में खिले, खाबहीन वादुर विलासोन्मत्त कचों से थरथराने लगे, जब महामारी मनुज, पशु और कीट पर फैली, बीमारी और अकाल और जब एवं तक, अनाज, लताओं, और चरागाह की घास पर, गिरी काली रोग पाया और फैली अमिट विषेती वन्य धमास्पतियाँ । उनके विकास को सुखाने-पयोंकि मेरा व शोक से शुष्क था! और कुश वायु, मेरी साँस, कलुषित हो गई थी एक मात-घृणा के स्पर्श से, जो उपसित हुई थी, अपने मान के हत्यारे पर, भाद, मैने सुना तेरा शाप बह, जो तुझे स्मरण नहीं, पर मेरे इन असंख्य- बयासी] [शेली

सागरों ने, निझरों में, पर्वतों ने, गुम्कों ने, प्राधियों मे,
और उस व्यापक सम्मुख वायु ने तथा मृत्तक के-
मूक जन संकुल ने सुरक्षित रक्खा है, जादूकी संचित निधि को,
हम चिन्तना करते हैं गुम उल्लास और पाशा के साथ
पर उनको कहने का साहस नहीं।"
(काम्याश-प्रोमे०-१८११)
शेली]
[ तिरासी

ऐथेन्स ज्योति " स्वतन्त्रते ! यद्यपि तव धज शीर्ण, बहरता तो भी, ज्यों प्रतिकूल पवन के बहती गर्जन-मंझा-धारा" (पायरन) एक यशस्वी जनसंकुल ने फिर तड़काया, राष्ट्रों की उड़ाम सहित को, स्वतन्त्रता भी हत्य, हृदय, गुम्बज गुम्बज से स्पेन' देश पर पास्मान में संक्रामक शोले भड़काती- चमक उठी मेरे प्राणों ने मटक तोब दी- उदासीनता की निज शृंखल हो भावेष्टित, उरथ हड़ गीतों के द्रुत पर से अपने को, जैसे तरण गहरू उडमा है भोर बनों में, अपने चिर अभ्यस्त-गध्य पर वाह मंडराता, जब तक नहीं देवि' का भवर प्रभान हकसा- इसको, अतर कीति-नभ से अपने पासन से, श्री जीत शिखा के उस सुदूरतम वन- की जो भरता है दुराव, था जो पीछे स्थित, गिरी किरन, ज्यों नौका की इति फेन बनाती तभी सुनी ध्वनि गहराई से करता उद्धृत ! R "सूर्य और शाम्ततम चंद्रमा आगे निकले जलवे नखत अगाध विवर के पटक दिये थे नम के गहरे तल में, यह रहस्यमय पृथ्वी जो कि द्वीप थी निखिल विश्व के महा सिन्धु में "मोडलिवर्टी' कविता की रचना, जिसका कि यह काव्यांश है, स्पेनिश जनता के १८२० विनोह के अभिनन्दन में लिखी थी। ३ यह अवतरण शेली की द्रुत कल्पना-बिम्य का अच्छा उदाहरण । अनुवाद यथासम्भव शब्द शः है। पर फिर भी पूरा चिन्न स्पष्ट नहीं हो पाता। इसका कारण मूलकवि की अनुभूति और अभिव्यंजना का चौरासी] [शेली इसके पवन सर्वधाहक में अधर घरी जो! पर यह देविक तम भूमण्डन अब भी केवल या प्राराजकता अभिशाप मात्र ही सारा। क्योंकि नहीं थी सू, पर सत्ता निकृष्टतम से, पैदा करती निकृष्टता पशुओं की प्रात्मा बिहगों की, जल प्राकृतियों की, अलती थीं सय उनमें था संघर्षण सबमें और निराशा, उनमें फैली, भड़की; गिना संधि, शर्तो' के । उनकी उत्तेजित पोषिका-कोख हो भाई भीतिमान, थे क्योंकि वन्य पशु, पशु मे जूमे, कीट-कीट पर,मनुज मनुज पर,हर दिन था तूफान नरक सा मानव ने साम्राज्य वेश में किया विभाजित तय अपनी पीढ़ी को क्रीवान के नीचे सूरज के सिंहासन के प्रासाद पिरामिड मन्दिर और कैघर कीटों सी जनता को जैसे कटे गुम्फ पास्य मेड़ियों के हो! पर यह मानव का जीवित संकुल वर था चतुर और अन्धा असभ्य यह, क्योंकि नहीं तू वहाँ रही, पर अनाकीर्ण निर्जन के ऊपर ज्यों हो एक भयावह मेष नष्ट नहरों पर यो बठका था शुल्म और जिसके नीचे थी पूजित पशुता बहिन, गुलामों की संकलिका! अपने व्यापक पंखों की परछाई में ही पाराजक और धर्म पुरोहित, स्वर्णरतपर जीते हैजो, जबतक नहीं कलुषमय होता उनके प्राणों का अन्तरतम हांक रहे थे विस्मय मूक रेवड़ों को हर एक विशा में! मुके सिन्धु में भूमि खण्ड, औ' मीलम टापू और मेघवत पर्वत, पाखंडित हिटलोंने ग्रीस देश की, लेती थीं गौरवमय अमा खुली हुई मुस्कानों में, अनुकूल गगन की! उनकी मंत्रासिक गुम्फों से हुई विकीणित शेली] [पिचासी संतों की अनुगूजों से धूमिल स्वर-लहरी, उस अज्ञेय धन्यता पर, अंगुर लतायें, बाल अन्न की और नरम जैतून उगे थे, जो श्रसंध-मानव-प्रयोग को अमी बनैले, और सिन्धु के तले अनावेष्टित कुसुमों से, जैसे मनुज विचार अंध, शिशु के मानस में, शल कुछ से, जो कुछ के संभाषन को धरता ! और कला के अनहत स्वप्न सुप्त थे श्रावृत्त बहुल शिरायों से ही 'परीमन' प्रस्तर की, शिशु सा वाणी हीन काव्य गुनगुन करता और दर्शन तुझको अपलक हग था भारी करता- प्रमुख 'ऐजियन' पर, एथेन्स उठा, ज्यों नगरी रश्य बनाती है चेंजनी कगार रूपहली मीनारों पर, ओ रणग्रस्त धनों के, व्यंग साश लगते हैं अति राजसी राजगीरी पर, सागरतल इसे पाटते, सांध्याकाश बना क्रीडाक्षाय। इसके बार भरे पषनों से गजेन-क्षेत्रित, था प्रत्येक शीश सज्जित मेधित पंखों में रवि की ज्वाल-माल से, कैसी देषिक कृति थी। पर ऐथेन्स और वैविकतर, प्रवीस था वह निज स्तम्भों के श सहित, मानव इच्छा पर जैसे हीरे के पहाड़ पर वह बैठा हो! क्योंकि रही तू, तेरी सर्वसुजक चतुराई, जन संकुलित हुई उन रूपों से जो हंसते, सजाममेरी श्रमस्यता में! धही शिखर, तब प्रथम पीठिका, अंतिम पायी। चिस्मृतों पर, तीन प्रवाहित सरिता की उस नीर सतह पर, सोया पड़ा हुआ है इसका बिम्ब सहरमय ! चिर कम्पित है। पर है अक्षय भामा मिलमिल ! गरज रहीं तेरे कवियों, सन्तों की वाणी, छियासी] [ शेली

भू-भागृत करने वाले झोंको समान जो,
उन अतीस-गुम्फों के द्वारा, मूष रहा है,
धर्म चक्षु निज, मूक जुल्म है भय से होता !
हर्ष प्यार, विस्मय की नभचारी पनि उड़ती,
वहां जहाँ, आशा भी कभी न थी उड़ पाई,
वीर रही जो काल देश के प्रावरणों को,
एक सिन्धु पोसता, मेष निझर, नीहार,
एक सूर्य धमकाता नभ,
भाती जीवन और प्यार से करती फिर मव
संघर्षण को, जैसे होती है यह दुनिया,
फिर नवीन ऐथेन्स ज्योति की किरने पाकर !
(काव्यांश-प्रोड लिवर्टी-१९२०)
है
वृहत थारमा
शेली ]
[ सतासी

"एडोनेस के कुछ स्फुट पद - रोता हूँ 'एखानेस" को मैं, माह हो गया है यह मृत; एडोनेस को रोश्रो ! यद्यपि नहीं आँसुमों का वर्षण- पिघला सकता है तुषार, जिससे भास हुआ प्रिय शिर हे, उदास घटिका! सब वर्षों में से थी तू घुनी गयी! ताकि हमारी पति पर दो शोकित, उदयोधित करके निज- समतुल्यों को, जो न स्पष्ट श्री' सिखला उनको अपना दुख काह, मेरे ही साथ 'एडोनेस' हुमा मृत्त; अब तक भावी विस्मृत करे न गत को, होये नहीं भाग्य औ' उसका यथ, एक प्रतिध्वनि और ज्योति बनकर शाश्वतता के पट पर ! (२ शक्तिमयी माँ! कहाँ गई थी। जब वह सुप्त हुआ था, जब सोया था तेरा नाल, विधा शर से, जो उड़ता- भन्धकार में है, 'उरानियों देवी कहाँ गई थी, नव एडोनेस' मृत्त हुआ था? यह तब मूंदे मयना भाव स्थित थी, जबकि एक कोमल मिश्वाल स्नेहमय, करतो थी ज्योतित फिर से, निष्प्रभ संगीत स्वरों को, जिनसे, पुष्पा सा, मीचे शय पर सम्यंग जो इसते, किया अलंकृत और छिपाई यम की बोमिल काया - पर अब वेरा सब से प्रिय, सबसे छोटा मृत होता, हाय ! सहारा तेरे विधवा जीवन का-जी विकसित पीत पुष्प सा हुआ, जिसे थाहा उदास सुन्दरि ने . । स्फुटिक पद होने के कारण इस काव्यांश का तारतम्य नहीं बच पाता है। पर इसका काम्य-सौंदर्य वेदना क गहरे तन को स्पर्श कर उठने वाले विचारों के अंकन में है। धीरे-धीरे इनकी पंक्तियों का यदि पाठ किया जाये, तो अनेक पदों में मूल का आनंद मिल सकता है। ---कवि कीट्स की मृत्यु पर लिखित शोक गीत । ऐडोनेस कीटस के लिए प्रयुक्त हुआ है। २-खा की देवी। अट्ठासी] [शेली और तुहिन की जगह पस्यस्नेहिल आँसू से पोसा! शोक प्रदर्शक दल की है, सबसे संगीतमयी, रो! तेरी अति दूरागत पाशा, मोहकतम और अन्तिम पुष्प कि जिसके पाटल, मुरझाये मुरझाये खिलने से पहले मुस हुआ फल की आशा पर, पर्थ हो गई है अथ ! खंडित कलिका सोती है मा तो उतर गया है। ( ५ ) यन, प्रान्तर, निर्भर, हरियाले खेत, शैल, सागर से, वरित जिन्दगी पृथ्वी के अन्तर से फूट पड़ी है। जैसे इसने किया सवा परिवर्तन भो जबसे पहली बार विश्व के उस महान प्रात: में, ऊषा-सा मुस्काया प्रभु कोलाहल पर, पाये मम के दीपक ले कोमलतर ज्योति वाष्प से इसकी, सभी असदतर वस्तु, हॉफसी शुचि-जीवन-तृष्णा संग, अपने को विकीर्ण करतीं, भौ' प्रेम-हर्ष में खोती, प्रवाह से अन्य जनों के मध्य, एक कृश प्राकृति अति साधारण, पाई ज्यों हो, प्रेत मानवों में, मानवों में, निस्संग अकेला, जैसे अन्तिम मेघ किसी निशेष प्रभजन का हो, जिसका गर्जन था इसका स्वन 'एक्टाइन' सम उसने मेरा यह अनुमान, प्रकृति की निरावरण सुषमा को घूर घूरकर देखा था, श्री' अब है विषश पलायित, इधर उधर मद्धिम पग धर कर, विवश वग्यता पर पह, और उसी के भाव, कह श्वानों से कठिन हगर पर, अपने जनक, अध्य के पीछे लगे हुए थे धाकर । W शान सी पास्मा थी यह सुन्दर और स्वरामय, प्रेम छम प्रावरित हुना, ज्यों निजनता में लिपटा- हो कोई बल दुर्पक्षता से हो सकता विमुक यह अति कठिनाई से छाती पर धरा बोझ घटिका का, शेली [नवार यह म्रियमाण प्रदीप; एक है, या निझरित फुहारा यह इंडित तूफान बाहर • हम अब भी जबकि बोलवे- हुश्रा नहीं क्या खरिडत है यह ? मुरझे हुए कुसुम पर यह मारक मार्तण्ड प्रखर भुस्काता है, कपोल पर, जीवन जल सकता लोह में, चाहे भग्न हृदय हो! (७ ) रहता एफ, अनेक बदलते और गरजते नभ की-- धति रहती चिरदीक्ष, भूमि की छायाएँ सड़ जाती जीवन बहुवर्णी शीशे के गुम्बज सा, कर देता कलुषित धवल कान्ति का सिरसा की, जब तक न पगों से यम कर देवा चूर चूर; मर, यदि होता तू सँग जो, उसके, जिसे चाहता, जा सू वहीं जहां सब जाते नीला नम, प्रसून, पायल, यह सब वृध्द मूर्तियाँ, रोम नगर के, दुवा अमिव्यंजन हैं उस यश के, जिसको विकीर्ण करते अनुरूप सत्य से ! संगीत, शब्द अलाभकर शान्ति ! शान्ति ! यह मृत्त नहीं यह नहीं सीरहा, उसकी, अभी जिन्दगी के सपने से आँख खुषी जागा है। यह तो हम हैं, जो तूफानी दृश्यों में खोकर के करते हैं संघर्ष प्रेत छायानों से श्री' उन्मद निद्रा में हम निज आत्मा के चाकू से अक्षय मास्तियों पर करते है प्रहार हम जयशः राध रक्षक में धरे शवों से, भीति और दुख हमको, करते हैं बीमार दिन प दिन छमको चूस रहे हैं, शीताशे कोटी सी उड़ती, निज जीवन-मिट्टी में। क्यों रुकता क्यों पीछे मुषता, क्यों कम्पित मेरे बिल पत्र प्राशाये गई पूर्व ही, यहाँ सभी चीजों से, *(७) में शेली की लचकीली कल्पना का अन्यतम दाधरण । नब्बे] [शेली एक ज्योति वे कर गई पलायन, अब है बिदा तुगे भी लेनी, अथ विगत हुई। घूमते हुए वत्सर से नर से, और नारी से, जो तुमको प्रिय अब भी करता प्राकर्षित मर्दन को आदानित निष्प्रभ करने को, कोमल नभ मुस्काता, फुस फुस करता मंद समीरण-- एडोनस पुकारता जल्दी जल्दी करी वहाँ समीप ही और न खंडित करे जिन्दगी जिसे मरण जोड़ेगा ! (..) यह प्रकाश जिसकी स्मिति से है, ज्योसित राशला शुवन यह वह सौंदर्य, पदार्थ सभी जिसमें राशिय और स्पंदित ग्रहणमना अभिशाप जन्म का, भी न तृप्त कर पाया, वह सच्चिदानन्द और वह प्रेम भारमय जो उस जाली से अाधा हो होकर जिसे मनुज, पशु, धरती, पवन, सिन्धु चुनते है, जलता है उजला या धूमिल चूंकि सभी हैं वे वर्षण उस ज्वाला के ही जिसके बिये तृषा सब झलक उठी है, अब जो मेरे अपर शीतला मरणशीलता के अन्तिम मेघों को पीकर । नम साँस कि जिसकी शक्ति गीत में माहानित है मेरे, उतरी है मुझ पर मेरे प्राणों की तरणी तट से दूर धकेली गई, सुदूर काँपते जन संकुल ले, कभी नहीं मरका के सम्मुख जिसके पाल झुके थे। भारयुक्त पृथ्वी वतु लाभार होते खंडिस! हाय ! भयंकर अन्धेरी पूरी में विवश पड़ा हूँ, जबकि स्वर्ग के अन्ततम के पर्दे में से ज्यों प्रदीप्त तारिका, श्रात्मा एडोनेस की स्यों दील हो रही शयनस्थल से, जहां चिरन्तन सोये । (काव्यांश-एडोनिस --- १८२१) मलनी। की शेली ] [इक्यानवे

"जीर्ण शीर्ण हो गई यनिका,
भूमण्डल की,
श्रामा के पर लगा विश्य हैं,
वन्य कपोतों से छितराये।
स्थान निचार, न छत है उस पर
और बीच मेधिल वेदी के,
ज्योति शासना मध्य सिमिरमय
पारदर्शनी नील शिखा में
स्वर्णिम विश्य, बिनर्तित, दीपित
'में
ज्यों सहन अषाय नम
बामायें उठती व्यापित
भयावने तमिन, गर्जन से
ज्योति और गायन है जगमग !
(अधूरे 'प्रोलीग टु हेलास का एक काम्यांश १८२१)
पर
है
-
पानवे ]
[शेली

नया यूनान होता है प्रारम्भ विश्व में फिर नूतन युग, लौट रहे हैं स्वर्णिम परसर! पृथ्वी व्याल समान केंचुली बदल रही है ! उसकी शिशिर सृणालियाँ श्रम कर, झर गिरतीं। गगन मुस्काराता, विश्वास, राज्य, दीपित हैं, जैसे गलते हुए स्वपन के शेष चिह्न हो ! एक प्रखरतर 'हेलस" पोषित करता पर्वत, दूर शान्ततर हिल्लोली से। एक नवीन 'भ्युस, निज झरने लपेटता ! भोर तारिका के विपश्यं में ! जहाँ सुघरसर मंदिर चमके, वहाँ सो रही वरुण 'साइक्लड और चमकती गहराई पर ! माह ! नहीं फिर अब दुहरामो 'ट्राय' कथाको! यदि पृथ्वी को मरणपन्न बनकर रहना है। 'लेभन' रोष को, अस प्रमोद में मत अब धोलो, मुक्त मनुजता पर प्रभात सा मुस्कावा जो! यद्यपि और गम्भीर म्फिन्स" पुर्नमव करता, 'यौविस" को अज्ञान, मृत्यु की प्रहेलिकाएँ । फिर से नव ऐथेन्स उठेगा प्रवनीतख पर, और सुदूर भविष्यत भी उससे पायेगा, १-यूनान का नाम । २-यूनानी नदियों का देवता । ३-ऐजियन' सागर में गोलाकार द्वीप-मालिका । ४-भारतीय राम-रावण युद्ध से मिलती शुलती यूमानी-युद्ध आख्यायिका । ५-ईसा से २०० वर्ष पूर्व यूनान का एक प्राचीन वंश जो अपनी क्रूरता के लिये विख्यात था। ६-यूनानी बंत कथा के अनुसार मिभ से आई क्रूर राक्षसी, जो थीय के निवासियों के समक्ष प्रहेलिका प्रस्तुत करती थी, उसर न पाने पर उनका वध किया जाता था । -यूनामी-' काव्य में वर्णित मिश्र की नील नदी के किनारे स्थित विश्व का प्राचीनतम मगर । होमर के काव्य में इसका भव्य वर्णन किया है। अब भी र इसके पुरातन वैभव के साक्षी है। शेली] [विरानवे ,

जले निलय पटल पाता दिवसावसान से
इसके गौरव की भाभायें औ' चोदेगा
इतना दीस शून्य यदि जीवित रह सकता हो
सारी पृथ्वी ले सकती है अथया वे सकता है यह नभ !
बम्ब करो! क्या घृणा, मृत्यु भय लौटेंगे ही?
बन्द करो। क्या मनुज बधेंगे या मृत छाँगे?
बन्द करो, तिकतर भविष्यतयाणी के इस
भस्म मात्र को अन्तिम कण तक नहीं पियो !
जगती अतीत से थकित पाह! मर जायेगी
वर्ना इसको अपनी चिर थकन मेटने दो!
( काव्यांश--हेलास-१२)
चौरानवे]
[ शेनी

ऐन्द्रजालिका का गीत
जीयन-प्रभात में वह आया जैसे सपना,
उड़ गया छाँह सा, होते होते दोपहरी !
वह चला गया, पर मेरी शान्ति, प्रशान्त बना,
मैं भटक रही, घट रही, थकी ज्यों यह शशि री!
ओ, मृदुल गुज, तू जग जगकर,
तू मेरे लिये तनिक
अन्तर,
दे देना जब यह टूट रहा धो मेरा उर!
हों, तेरे अधर मृदुल, निश्छल, री! कितने ही!
पर मेरे उर का कभी न गा सकते गायन !
यह परछाई जो प्राण-ग्रहण में घूम रही,
ला सकसी पुनः नहीं उसको भूला चुम्बन !
वह चला गया, ओ, मृदुल अधर,
मेरी सुनसान उगर में पर,
भर कर अनुपस्थिति तिमिर, जो कि यम से यवतर!
(एक अधूरे ड्रामा का काव्यांश (२२)
शेली]]
[पिचानवे

Sheyli

Author
Yatendra Kumar
Title
Sheyli
File name
Sheyli
Text
OCR done
Citation
1968
Published
2006\5
Language
Sanskrit
Pages
167
Library
A. U. A
Classification
Literature
DLI number
485962
Barcode
5990010099476.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
z9vRZ0AOxqh
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