Scl
Pindagalachand Suthram
Front matter
- ७ २२) अस्मत्प्रकाशित-धर्मशास्त्र-कर्मकाण्ड-ग्रन्था:- १ अग्निष्टोमपद्धतिः। “आध्वर्यवपद्धतिः" "श्रौद्गात्रपद्धतिः- "हौत्रपद्धतिश्च"-सन्निविष्टाः १-२ खण्ड २ आपस्तम्वगृह्यसूत्रम् । अनाकुला-तात्पर्यदर्शनी-व्याख्यायुतं ५) ३ आपस्तम्बधर्ससूत्रम् । उज्ज्वलावृत्त्या सहितम् ४ कात्योधनश्रौतसूत्रम्-कर्कभाष्य सहितम् । सम्पूर्णम् ५ कृन्वैसारसमुच्चयः ! गङ्गाधर मिश्रकृत टिप्पणीपरिशिष्ट युतः ॥) ६ गोभिलगृह्यसूत्रम् । मःम मुकुन्दशर्मकृत "मृदुला" व्याख्या युतं ३॥) तिथिनिर्णयः । भट्टोजिदोक्षितकृतः, नागोजिमकृतश्च १३) ८ निर्णयसिन्धुः । कृपणंभट्टकृत व्याख्या सहितः ९ पारस्करगृह्यसूत्रम् । हरिहर गदाधर-जयराममाययत्र युतं ५) १. पौरोहित्यकमलारः। परिवद्धित संस्करणः । सपूर्णः १) ११ बौधायनधर्मत्रम् । श्रीगोविन्दत्वानिप्रणीतविवरणसमेतम् ५) १२ याज्ञवल्क्यस्मृतिः । वीरमित्रोदय' 'मिताक्षरा' द्वयोपेता १३ याज्ञवल्क्यस्मृतिः । 'बालम्भट्टो मिताक्षरा टीका व्य. अ.१६॥) १४ लाटयायनश्रौतसूत्रम् । अग्निष्टोमान्तम् । सटीकम् २॥) १५ वर्षकृत्यदीपकः ! म. म. श्रीनित्यानन्दपन्त पर्वतीयकृतः १६ संस्कारदीपकः। प्रथमो भागः ३॥) १. वीरमित्रोदयः। म.म. मित्रमिश्रविरचितः । परिभाषा प्रकाश:- संस्कारप्रकाशश्च १६॥) मासिकप्रकाशः ६) पूजाप्रकाशः ६) लक्षणप्रकाशः १०॥) राजनीतिप्रकाशः ७॥) तीर्थप्रकाशः ४) व्यवहारप्रकाशः ६) धाद्धप्रकाशः६) समयप्रकाशः ॥) भक्तिप्रकाशः ३) शुद्धिप्रकाशः ४॥) संपूर्ण ८॥) १८ व्रात्यताप्रायश्चित्तनिर्णयः तथा-व्रात्यताशुद्धिसंग्रहः १९ श्राद्धकल्पलता। श्रीनन्दपण्डितकृता ४॥) २. श्राद्धपतिः। म०म० वाचस्पतिमिश्रकृता परिशिष्ट सहिता २१ श्राद्धचन्द्रिका । भारद्वाज दिवाकरम निर्मिता ३) २२ श्रौत्रसूत्रम् । कात्यायनप्रणीतं देवयाक्षिकपद्धति सहितम् २३ षडशीतिः। शुद्धिचन्द्रिकाख्यव्याख्यया समलंकृता २) २४ संस्कारगणपतिः । पारस्करगृह्यसूत्रस्यातिविस्तृतव्याख्यानस्वरूपा २५ स्मृतिसारोद्धारः । अत्युत्तमोऽयं धर्मशास्त्रग्रन्थः प्राप्तिस्थानम्-चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालय, बनारस सिटी। १......!
॥ श्रोः॥
* हरिदास-संस्कृत-ग्रन्थमाला *-
१८३
Chec
श्री पिङ्गलाचार्यावनिक
पिङ्गलच्छन्दःसूत्रम्
हलायुधवृत्तिसहित
(वैदिकच्छन्दःप्रकरणान्तम् )
व्याकरणाचार्यश्रीअयोध्यानाथसान्यालशर्मरचितया
कादम्बिनी भाषाटीकया टिप्पण्या च सहितम् ।
व्याकरणसाहित्याचार्यन्यायशास्त्रिणा
श्रीरामगोविन्दशर्मशुक्लेन प्राक्कथनेन..
समलङ्कृत्य सम्पादितम् ।
प्रकाशक:
जयकृष्णदास हरिदास गुप्तः,
चौखम्बा संस्कृत सीरिज आफिस
विद्याविलास प्रेस, बनारस सिटी ।
-
सं० २००४ ]
मूल्य 1)
[ई. १९४७
अस्य प्रन्थस्य सर्वेऽधिकाराः प्रकाशकाधीनाः]
[ Registered According to Act XXV of 1867. )
PRINTED BY
JAYA KRISHNA DAS GUPTA
VIDYA VILAS PRESS, BENARES CITY.
1947
( All Rights Reserved by the Publishers. ]
- - श्रीरामेश्वरशरणम् - प्राक्कथनम् - वेदोंको ही शब्दप्रमाण माननेवाले पर प्रमाण मानते हैं। क्योंकि वेद अनादि अपौरुषेय ईश्वरीयशान हैं। जैमिन्यादि महषियोंने भी अनुमानका वहीं आदर किया है जहां पर वेद विरोध नहीं पड़ता। इससे यह सिद्ध होजाता है कि वेद स्वयं सबको प्रमाणित (प्रतिष्ठित) करता है उसको प्रमाणकी आवश्यकता नहीं है। किसी भी विद्वान्ने अनुमानका सर्वत्र आश्रयण नहीं किया है। क्योंकि कुछ स्थानोंको समतल देखकर सब स्थानोंको समतलका अनुमान करके विषमपथपर दौड़ने वाला अन्धा जैसे गिरे बिना नहीं रहता बैले सर्वत्र अनुमान का आश्रयण करनेवाला व्यक्ति कभी भी धोखेमें पड़े विना नहीं रह सकता। हस्तस्पादि. वान्वेन विषमेपथि धावता । अनुमानप्रधानेन विनिपातो न दुर्लभः। अतः शुष्क तर्क द्वारा वेद प्रामाण्य का निश्चय करना भारी भूल है। क्योंकि वेद अपने लिए स्वयं प्रमाण है। इसपर यह शंका उठती हैं कि सोमेन यजति इस बेद बाक्यसें सोम यागका विधान किया है। यदि सोमयाग से ही स्वर्गादि फल मिलते तो मनो सोम पी जानेवाले कमी स्वर्ग चले गए होते । अतः वे जब स्वर्ग नहीं जा सकते तो यशके सोममें स्वर्ग भेजने का सामथ्र्य कहां से भाया ? यदुदुम्बरवर्णानां घटीनां मण्डलं महत् । पोतं न गमयेत्, स्वर्ग किं तत्क्रतुगतं नयेत् । (ध्या० म० भाष्य१।१।११) किन्तु जैसे रूपरस गन्धादि प्रत्येक या क्षिति जल वहि पवनादि प्रत्येक पृथक पृथक कुछ भी कार्य नहीं करसकते । मिलने पर पान फल सा फल तैयार होता है और उसे सब भादर करते हैं। इसी तरह विषफल तैयार होता है जो घातक बनता है। इसी प्रकार सोम भी यशमें पीने से स्वर्ग अवश्य उत्पन्न करता है। संसारके प्रत्येक पद या पदाथों में एक शक्ति निहित है। क्योंकि किसी शब्द के सुननेसे हर्ष किसी शब्दके सुनने से दुःख, किसीसे विषापहण होता है। इसी प्रकार पाम्रफल और विषफल दोनों में एक विचित्र शक्ति देखो गई है। इसमें कहीं दृष्ट फल कहीं अदृष्ट फन होता है। सर्पके काटलेनेपर मन्त्रद्वारा सर्प विषापहरण होता है । भूताविष्ट व्यक्ति स्वस्थ होता है। इसी तरह कारीरी यागसे वृष्ठि देखी गई है, पुत्रेष्टिसे महाराज दशरथने भगवान् श्रीरामचन्द्र- को अपना पुत्र बनाया है । ऐलो अवस्थामें यागका स्वर्गादि अदृष्ट फल अवश्य ही मानना पड़ता है । अतः दृष्टाऽदृष्टफलद्वारा वेद प्राणीका उपकारक है यह सिद्ध हुवा । धर्मशास्त्रियोंने 'ब्राह्मणेन निष्कारणं षडंगो वेदोध्येयो शेयश्व' कहा है । वेदका श्रङ्ग सहित अध्ययन ही दृष्टाऽदृष्ट फलका उत्पादक वन सकता है। क्योंकि अनुष्टुभा ऋचा यजति, बृहत्या ऋचा गायति, गायच्या ऋचा स्तौति, इत्यादि वाक्योंके श्रवण के बाद यह जिज्ञासा होती है कि अनुष्टुप् , वृहती, गायत्री क्या वस्तु है । इस जिज्ञासाको दूर करने का प्रयास महर्षियोंने किया है । ऋषियों के ज्ञान भी वेद मूलक ही है । ऋषीणामपियज्ज्ञानं तदप्यागमपूर्वकम् । (वाक्यप. २३०१) ठीक भी है। आजन्म वेदार्थ परिशीलनाध्ययनाध्यापनमें समय बिताने वाले महर्षि नहीं वेदके छन्द और अर्थको पहचानेगे तो क्या जीवन भर विदेशी भाषा पढ़ने वाले लम्पट पहचानेगें। - . . .
२ प्राक्कथन हाँ, तो अनुष्टुवादिछन्दोंके महर्षियों द्वारा लक्षण वने हैं । वे सव वेदाङ्ग हैं क्योंकि व्याक. रण शास्त्रके रचयिता भगवान् पाणिनि ने कहा है कि 'छन्दः पादौ तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम्। अत: वेद का पाद छन्द है यह सिद्ध हुवा। विना परके चलनाही कठिन है अतः छन्दः शास्त्र का अध्ययन अनिवार्य सिद्ध हुवा। अतिने तो छन्दः शान के विन। वेदाध्ययनभी पाप बतलाया है जैसे-(योह वा अविदि. तायच्छन्दोदैवतविनियोगेन ब्राह्मणेन मन्त्रेण याजयति वाऽध्यापयति वा स स्थाण्णुं वछति गर्ने वा पद्यते प्रमीयते वा पापीपान् भवति यातवामान्यस्यच्छन्दांसि भव- न्ति" (छान्दोग्यब्रा ३.७५। ) ऐतरेय ब्राह्मण में भी- "स श्छन्दोभिर्यजेदित्याहुः, सवै छन्दोभिरिष्ट्वा देवाः स्वर्गलोकमजयं स्तथै वेतद्यजमानः सवश्छन्दोभिरिष्ट्वा स्वर्ग लोक जयति । ( ऐ. ब्रा. २।३।) महपि कात्यायनने भी कहा है- छन्दांसि गायत्र्यादीनि एतान्यविदित्वा योऽधीतेऽनुक्नूते जपति जुहोति यजते तस्य निर्वीर्य यातयाम भवति । अथान्तराचगर्त वा पद्यते स्थाणुंवच्छति प्रमीयते का पापीयान् भवति । (सर्वानुक्रमसूत्र ) वृहदेवता, मी ( ८।१३२७ मे कहा है। अविदिस्वा ऋर्षि छन्दो दैवतं योगमेव च । योऽध्यापयेज्जपेद्वापि पापीयाजायते तु सः॥ इन उक्त प्रमाणोंसे भी यही सिद्ध हुवा कि वेदका अध्ययनाध्यापन जप भी छन्दशानके विना करना उत्तम नहीं है। अतः प्रतिदिन सन्ध्यावन्दन करने वालेको भी छन्दः ज्ञान श्रावश्यक है छन्दः शब्द विचार मैंने ऊपर छन्द शब्दका अर्थ नहीं कहा अतः यहां छन्दः शब्दका विचार कर रहा हूँ। यास्काचार्यने निरुक्तके (अ.७ पा ३ खं-१२ ) में छन्दांसि द्वादनात् विवरण किया हैं। जिमसे छादन करने के कारण छन्द कहे जाते है यह अर्थ प्रतीत होता है। यद्यपि-'घटाच्छा. दितः-प्रदीपः, वस्त्राच्छादितं द्रग्यम्' इत्यादि प्रयोगोंमें छदि धातुका तिरोधानही अर्थ देखा गया है तथापि अन्न छादयेदाज्येन इत्यादि प्रयोगों के दर्शनसे तिरोधानके अलावा अन्यार्थ भी प्रतीत होता है। छान्दोग्यप्रकरणमें तो ( बदेभिरात्मानमाच्छादयन् देवाः सृत्योर्विभ्यतः तच्छन्दसां छन्दस्वम् ) देवोंके स्वरूप का रक्षक माना गया है। छन्दः मेद विचार छन्द दो प्रकार के होते है वैदिक और लौकिक । वैदिक छन्दों का उपयोग केवल वेदार्थज्ञानमें उपयोगी होता और लौकिक छन्द संस्कृत या हिन्दी साहित्यादि के निर्माण के काम में लाए जाते हैं । समुपलब्ध छन्दः शाखोंमें महर्षि पिङ्गालाचार्य का विरचित छन्दः शाल ही सर्व प्राचीन होने के कारण तथा अत्यन्त उपयोगी होने के कारण प्रसस्त है।
प्राकथन ३ यथापि कुछ लोगों का सिद्धान्त है कि इसके पहले भी कुछ प्राचार्य हो चुके हैं । जिसमें उरो वृहती यास्कस्य इस सिंगलसूत्र से यास्काचार्य मालूम पड़ते हैं । तथापि काकदन्त परीक्षा की तरह हम इसपर विचार नहीं कर रहे हैं वर्ण विचार वर्ण दो प्रकार के होते हैं। गुरु और लघु । यही वर्णद्वय छन्दः शास्त्र के मूलाधार हैं। पिकलशास्त्र में गुरु और लघु वर्ण से ही समस्त कार्य सिद्ध होता है। इन्हीं के संयोग ते - गुरु लघु विचार दीर्घ अक्षरको गुरु और हस्व अक्षरको लघु कहते हैं। महर्षि पाणिनिने भी हवं लघु ११।४।१०। दीर्घञ्च ।।४।१२ सूत्रों द्वारा लघुवर्ण की हस्व और दीर्घ वर्ण की गुरु संज्ञा का विधान किया है । इसी प्रकार संयोगे गुरु।१।४।११॥ सूत्र द्वारा संयोगमें भी गुरुका अतिदेश करते हैं। प्राचार्य पिङ्गलके मतसे अनुस्वार विसर्गयुक्त पादान्तस्थ वर्ण भी गुरु होता है। इसी दातको कालिदास जीने अपने श्रुतबोधनामक स्वरुप छन्दः ग्रन्थमैं लिखा है । संयुक्काचं दी सानुस्वारं वित्तर्गसम्मिस्रम् । विशेयमक्षरं गुरु पादान्तस्थ विकल्पेन ॥ गुरु लघु परिचायक संकेत (s) रेखासे गुरु और (।) इस रेखासे लधुका शान कियाजाता है। मात्रा विचार वर्णके उच्चारण में जो काल लगता है उसे मात्रा कहते हैं। जिसके उच्चारणमें अल्पकाल लगता है उसे लघु एवं जिसमें अधिक काल लगता है उसे गुरु कहते हैं। इसी लिए (एकमात्रो भवेनस्वो द्विमात्रो दीर्घ उच्यते ) इस वाक्य द्वारा इस्ववर्णमें एकमात्रा एवं दीर्घ वर्णमें दो मात्राका निर्णय किया गया है । यद्यपि व्यजनंचार्धमात्रिक विमानोप्लुत विशेयः, इन वचनों के प्रमाणसे ध्यानकी भाधीमात्रानथाप्लुतकी तीनमात्रा मानना चाहिए। तथापि प्राचार्य पिंगलके सिद्धान्तमें इनका परिगणन नहीं है। यह व्यवस्था केवल व्याकरण शास्त्र में ही लगी है। संगीतशास्त्रवाले भी इसका आदर करते हैं। गण विचार: तीन वर्ण के समूहको गण कहते हैं। वे आठपकारके होते हैं। मगणो यगणश्चैव सगो रगणस्तथा । जगणस्तगणश्चापि भगणो नगणोऽप्यथ। श्रुतवोध । प्रकार इनके लक्षणभी अनुष्टप्छन्छमें किए गए हैं । जैसे आदिमध्यावमानेषु भजसा यान्ति गौरवम् । यरता लाघवं यान्ति मनौ तु गुरुलापत्रम् ।। अर्थात् भ भगण, ज-जगण, स-सगण, क्रमसे आदि, मध्य और अन्त्यमें गुरु होते हैं। शेष लघु संशक वर्ण होते हैं। य-यगण, र-रगण, ततगण क्रमसे आदि मध्य और अन्त्यमें लघु होते हैं । म मगणके सब अक्षर गुरु एवं न-नगणके सब अक्षर लघु होते हैं। पिछ० भू० प्राकथन इसी वातको किसीने स्पष्ट कर दिया है-जैसे- मस्त्रिगुरुखिलवुश्च नकारो भादिगुरुः पुनरादिलघुर्यः। जो गुरुमध्यगतो रलमध्यः सोन्तगुरुः कथितोऽन्त लवुस्तः। भगवान् पिङ्गलाचार्यने स्वरचित सूत्रोंका मगणादिक्रमसे ही निर्माण किया है। जिसमें मुख्य दो कारण हैं, एक तो मगण सर्व गुरु होता है। अतः ग्रन्थ पादरणीय वने यह अभि- लाषा । दूसरा मगण गणका फल लक्ष्मी विस्तार समझ कर किया गया है। गणों के देवता और उनका फल यद्यपि यह ही कोष्टमें प्रथमाध्यायके अन्तमें टीकामें लिख दिया गया है तथापि अभ्यास के लिए एक संग्रह श्लोक लिखरहा हूँ। जिसके आधारपर गणचक्र बनाया गया है। मो भूमिः श्रिममातनोति य जलं वृद्धि र चाग्निम॒तिम् । सो वायुः परदेश दूरगमनं, त व्योमशुन्यं फलम् । जः सूर्यो रुजमाददाति विपुलं, भेन्दुयशो निर्मलम् । नो नाकश्च सुखप्रदः फलमिदं प्राहुर्गणानां वुधाः । पिङ्गलच्छन्दः सूत्र आचार्य पिंगलने अपने सूत्र में वैदिक और लौकिक दो प्रकरण वनाए हैं। जिसमें चतुर्थ अध्यायके सप्तम सत्र तक वैदिक प्रकरण एवं उसके बाद अध्याय चतुर्थ के आठवें सूत्र से आठवें अध्याय की समाप्ति तक लौकिक छन्दः प्रकरण है। वैदिक छन्दः प्रकरण को प्राचीनता आचार्य पिंगलने लौकिक छन्दोंका निर्माण करते समय बैदिक छन्दोंके ज्ञानके लिए उनका भी निरूपण किया। जिससे वेदार्थ ज्ञानमें सहायता प्राप्त हो। किसीने लिखा है कि "पिंगलसूत्रका वैदिक छन्दः प्रकरण अत्यन्त प्राचीन है क्योंकि वैदिक छन्दमें प्रति पादित सभी छन्द ऋग्वेदादिमें प्रस्तुत हैं । ऋग्वेदसे बढ़कर वैदिक छन्दकी प्राचीनताकी पुष्टि के लिए और क्या प्रमाण हो सकता है।" यह वैदिक इतिहासके विरुद्ध है। विद्वा- नोका सिद्धान्त है कि वेद अनादि या ईश्वरीयशान है। दोनों अवस्थामें यह ही मानना पड़ता है कि परमात्माने उन छन्दोंमें ही वेदको सुनाया । अब पहले वेद वना या छन्द वह कौन कह सकता है। ऋग्वेद या किसी वेदमें किसी च्छन्दके रहने से उस च्छन्दकी प्राचीनताका अनुमान नहीं किया जा सकता। आजके हिन्दी कवि मनमानी काव्य बनारहे हैं उनमें कौन छन्द हैं यह कौन जानता है कदाचित् कभी उनकाभी नामोल्लेख किया जाय। शर्माजीके लेखसे यह बात स्पष्ट प्रतीत होती है कि ये ऋग्वेद ही सबसे प्राचीन वेद मानते हैं जो संस्कृत इतिहासके विरुद्ध है। माचार्य पिङ्गलमुनि पिंगलच्छन्दः सूत्रके रचयिताप्राचार्य पिंगलमुनिके इस प्रन्थका संस्कृत साहित्यमें बहुतही बड़ा स्थान है। आचार्य पिंगलमुनि पिंगलनाम नामसेभी प्रसिद्ध है। इनके विषयमें तीन प्रसिद्ध प्राक्कथन सत है। (१) महाभारतके अदि पर्वमें श्रीव्यासजीने निष्ठानको हेमगुहो नहुषः पिंगलस्तथा । ३५।९। इस वाक्यसे सर्पसत्रमें जलनेसे बचे हुए सपोंके नामों में पिंगलका भी नाम पाया है। किन्तु यह छन्दः शास्त्रके कर्ता नहीं सिद्ध हो सकते । क्योंकि सर्पसत्रके बचे हुए नागका नाम कहीं मुनित्वेन प्रसिद्ध नहीं है । (२) मत्स्यपुराणके "वोधिनगःसौगमाक्षिक्षारयोरिकि रेवच १९६६ रवचनसे 'नग' के पुत्र पिंगल सिद्ध होते हैं । अत एव वही पर "शास्वायनो हरिवाश्यः पैङ्ग- लश्च तथैव च। १९६।३२॥ यद वचनभी है। इससे पिंगलके पिता पिंगल नामक नगके पुत्र नाग यानी पिंगलनाग हो सकते हैं । वही पिंगल नाग छन्दः शान के रचयिता भी माने जा सकते हैं । (३) षड्गुरुशिष्यने तो "सच्यते हि भगवता पिंगलेन पाणिन्यनुजेन क्वचिन्न- काश्चत्वारः(पि. सू. ३३३।" वह स्वरचित 'वेदार्थ दीपिकामें लिखा है। जिससे पाणिन्य- नुज पिंगलाचार्य सिद्ध होते है । इसी बातको प्रमाण सिद्ध करनेके लिए, ज्येष्ठ मातृभि विहितो व्याकरणेऽनुजस्तन्न भगवान् पिंगलाचार्यस्तन्मतमनुभाग्य शिक्षा वक्तुं जानीते', इस वाक्य से पाणिनिके कनिष्ठभ्राता सिद्ध किया है। किन्तु यह बात प्रतीत नहीं होती कि पाणिनिके भ्राता रहे हों पिंगलनाग। मेरे मतसे तो महर्षिपतञ्जलि ही आचार्य पिंगल है। क्योंकि भगवान् पतअलिके सर्प- राज होने में किसीको विवाद नहीं है । एक विचित्र विद्वान् भी हो चुके हैं। पुनः समुद्र प्रवेश सी बात भी "मुजंगप्रयातं चतुभिर्यकरः, इस सूत्रसे स्पष्ट है। सर्वे सर्व पदादेशा दाक्षीपुत्रस्य पाणिनेः शालातुरीयस्वाह, इत्यादि भाष्यके वचनोंसे तक्षा गोनदोयस्त्वाह वह अपने विष- पक बचनोंसे यह सिद्ध हो जाता है कि पाणिनि और भाष्यकार दोनों दो देशके थे। पद्गुरु शिष्यके कथनका तात्पर्य गुरुभ्रातृत्वेन कनिष्ठभात व्यवहार यदि मान लिया जाय तो "वर्ष" के कनिष्ठशिष्य होनेसे लवुभ्राता भी माने जासकते हैं। श्रमः यह ही पक्ष उत्तम है कि महा. भाष्यकार पतञ्जलिही पिंगलाचार्य है श्रीपिंगलाचार्यका देश यह कहांक थे यह बताना तो कठिनही है तथापि 'गोनीयस्त्वाह' इस वाक्य से तथा 'नोटा' इस नामके साम्यसे ये अयोध्याके उत्तर या पश्चिम सरयू तटके निकट कान्यकुब्जदेशके प्रतीत होते हैं। समुदतटपर मरनेसे किसीका देश निीत नहीं शेता। जापान आदि देशोमें मरनेवाले किसी नेताका वह ही देश नहीं होता है। भट्ट हलायुध भट्ट हलायुध नामक विद्वान् पिंगलच्छन्दः सूत्रके वृत्तिकार किस देशके थे इस विषयमें अनेक किं वदन्तिया है। जिसमें- १-वंगदेशके महाराज द्वारा बुलायेजाने वाले पण्डित नारायण भट्टके वंशज इलायुधभट्ट नारायणभट्टको वारहवीं पीढ़ी में उत्पन्न हुए । तथा लक्ष्मणसेनसिंहके सभापंदित थे। (पि. छ. सूत्र प्र छात्र पुस्तकालय कलकत्ता) २-मट्टइलायुध पिंगलसूत्रके टीकाकार गौड़ देशवासी श्रीपुरुषोत्तमभट्टके पुत्र थे। ये दशवों सदीमें विद्यमान थे। (हि. वि. कोश, कलकत्ता) । - ६ प्राक्कथन ३-इहहि भवति दण्डकारण्य देशे स्थितिः (पिं.स.वृत्ति०७३श तथा पनाम्बिकातीर्थयात्रा. गतानेक सिद्धाकुले । पि. सू.पू. ७३॥ इन बचनोंसे दाक्षिणात्य प्रतीत होते हैं। छ, निणे. प्रे. बम्बई) यह सब विवाद है। किन्तु हलायुधभट्ट रचित-निम्नलिखित रलोकसे यह सिद्ध होता है कि भट्ट इलायुध नारायण भट्टके पुत्र वंगदेशाधिपति महाराज लक्ष्मणसेनके समा पण्डित एवं. धर्माधिकारी थे। राजालक्ष्मयसेन का समय १०३० शाकाब्द है। अतः इनकी भी यही समय कहा जा सकता है। प्रमाणभूत लोक जैसे- यद्यपि इस - वाल्ये ख्यापितराजपण्डितपदः श्वेतांशुऽविम्बोज्ज्वलः । छन्दोसिक्तमहामहास्तनुपदं दत्वा नयेनौपमै । यस्मै यौवनशेषयोग्यमखिलक्ष्मापाल नागयणः । श्रीमॉलक्ष्मणसेनसिंहनृपतिर्धाविकारं ददौ । पिंगलच्छन्दः सूत्रकी उपादेयताके सम्बन्ध, अब कुछ कहना व्यर्थ हो है । भट्ट हलायुधने उस पर मृतसंजीवनी वृत्ति बनाकर स्वर्गसुगन्धका योग ही कर दिया है । वृत्तिके रहते किसी प्रकार की टीकाकी आवश्यकता न थी। तथापि, काशी, विहार, बंगाल, पंजाब, अयोध्या पण्डित परिषद् आदि परिक्षावों में निर्धारित होनेके कारण मध्यम कक्षा के छात्रोंकी कठिनाइयोंको ध्यानमें रखकर बंगाली पण्डित प्राचीन व्याकरणाचार्य श्रीधयोध्यानाथ सान्याल महोदयने कादम्बिनी नामकी हिन्दी टीका, तथा उपयुक्त संस्कृत टिप्पणी का निर्माण करके बहुतही उपकार किया है। मैं आशा करता हूँ। कि बालक वर्ग इस ग्रन्थसे विशेष लाभ उठावेंगे। मैंने यद्यपि सावधानीसे ही इस ग्रन्थका संशोधन कार्य किया है तथापि गुणक पक्षपाती विद्ववर्ग मेरी असावधानी तथा प्रेसके छपाई के दोषसे जो दोष रह गए हों उन्हें स्वयं शुद्ध कर अनुगृहीत करेंगे। मैं चौखम्भा संस्कृत पुस्तकालयके अध्यक्ष श्रेष्ठिप्रवर बाबू जयकृष्ण दास गुप्त महोदयको बन्यवाद देता हूँ जिन्होंने मुझे बुलाकर इस ग्रन्थका संशोधन कार्य सौपा । जिससे मैं भी कुछ अपने विचार आपके सामने प्रकट कर सका । इसके बाद मैं पं० रामचन्द्र झाजीका बहुत ही बड़ा ऋणी हूँ जिन्होंने संशोधन कार्यमें मेरी बहुतही बड़ी सहायता पहुचाया है। अन्तमें परमकारुणिक भगवान श्रीरामचन्द्र जीसे करबद्ध प्रार्थना है कि वे दिजाति मात्रके हृदयमें छन्दः शास्त्रके स्वाध्यायकी विशेष रुचि उत्पन्न करें। . अक्षय तृतीया प्रो. संन्यासि-संस्कृत-कालेज, काशी । १. मेष २००४ वि० विदुषामनुचरः श्रीरामगोविन्द शुक्ल ।
॥ श्रीः॥ श्रीमत्पिङ्गलाचार्यविरचित पिङ्गलच्छन्दःसूत्रम् अथ प्रथमोऽध्यायः। धीश्रीखी म् ॥१॥ वरा सा य ।।। का गुहा र् ॥३।। वसुधा स् ॥४॥ सा ते क त ॥५॥ कदा स ज ।।३।। किं वद भ ।।७। न हस न् ॥८॥ गृ ल् ॥९॥ गन्ते ॥३०॥ धादिपरः॥१॥हे ॥१२॥ लौ सः॥१३।। ग्लौ ॥१४॥ अष्टौ बसव इति ॥१५॥ इति प्रथमोऽध्यायः ॥शा अथ द्वितीयोऽध्यायः। छन्दः ॥११॥ गायत्री ॥२॥ दैव्येकम् ।।। आसुरी पञ्चदश ॥४॥ प्रा. जापत्याष्टौ ॥३॥ यजुषां षट् ॥६॥ साम्नां द्विः ॥ ऋचां त्रिः ॥ द्वौ द्वौ साम्नां वर्धेत ।।९।। त्रीस्त्रीनृचाम् ॥१०॥ चतुरश्चतुरः प्राजापत्यायाः ॥१॥ एकैकं शेषे ॥१२॥ जह्यादासुरी ॥१३॥ तान्युष्णिगनुष्टुम्वृहतीपङ्: क्तित्रिष्टुब्जगत्यः ॥ ४॥ तिस्रस्तिस्रः सनाम्न्य एकैका ब्राहम्यः ॥१५॥ प्राग्यजुषामार्ण्य इति ॥१॥ इति द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ अथ तृतीयोऽध्यायः। पादः ।।१।। इयादिपूरणः ॥२॥ गायत्र्या वसवः ॥३॥ जगत्या आ. दित्याः॥४॥ बिराजो दिशः ॥५।। बिटुभो रुद्राः ।।६।। एकद्वित्रिचतुष्पादु. तपादम् ॥७॥ श्राद्यं चतुष्पाहतुभिः ॥८॥ क्वचित्रिपाहषिभिः ॥९।। सा पादनिवृत् ॥१०॥ षट्कसप्तकयोर्मध्येऽष्टावतिपानिवृत् ॥११॥ द्वौ नवको षट्कश्च नागी ।।१२।। विपरीता वाराही ।।१३।। षटकसप्तकाष्टकैवर्धमाना ॥१४॥ विपरीता प्रतिष्ठा ।।१५।। तृतीयं द्विपाज्जागतगायत्राभ्याम् ।।१६।। त्रिपात्त्रैष्टुभैः ।।१७।। उष्णिग्गायत्री जागतश्च ।।१८।। ककुम्मध्ये चेदन्त्यः ॥१६॥ पुर उष्णिक पुरः ॥२०॥ परोष्णिक् परः ॥२१॥ चतुष्पादृषिभिः
[ २ ]
२२॥ अनुष्टुब्गायत्रैः।।२३॥ त्रिपात्कचिज्जागताभ्यां च ॥२४|| मध्येऽन्ते
च ।।२५।। बृहती जागतस्त्रयश्व गायत्राः १।२३।। पथ्या पूर्वश्चेत्तृतीयः ॥२७॥
न्यङ्कुसारिणी द्वितीयः ।।२८।। स्कन्धोपीवी क्रौष्टुकेः ॥२९॥ उरोवृहती
वारकस्य ॥३०॥ उपरिष्टाबृहत्यन्ते ।'३॥ पुरस्ताबृहती पुरः ।।
क्यचिन्नवकाश्चत्वारः ॥३३।। वैराजो गायत्रौ च ॥३४॥ त्रिभिर्जागतैर्महा-
बृहती ॥३५॥ सतोबृहती ताण्डिनः ।।६। पक्तिर्जागतौ गायत्रौ च ॥३७॥
पुर्बो चेदयुजौ सतः पङ्क्तिः ॥३८॥ विपरीतौ च ।।३९॥ प्रस्तारपङ्क्तिः
पुरतः ॥४०॥ आस्तारपङ्क्तिः परतः॥४१॥ विष्टारपङक्तिरन्तः ॥४॥
संस्तारपक्तिर्बहिः ॥४३॥ अक्षरपङक्तिः पञ्चकाश्चत्वारः ॥४४॥ द्वावप्य-
ल्पशः ॥४५॥ पदपङ्क्तिः पञ्च ॥४॥ चतुष्कषट्को त्रयश्च ॥४७॥ पथ्या
पञ्चभिर्गायत्रैः ॥४८॥ जगती षड्भिः॥४९।। एकेन त्रिष्टुब्ज्योतिष्मती
१॥५०॥ तथा जगती ॥५१॥ पुरस्ताज्ज्योतिः प्रथमेन ॥५३॥ उपरिष्टाग्ज्यो-
तिरन्त्येन ॥५४॥ एकस्मिन्पञ्चके छन्दः शङ्कुमती ।।५५।। षटके ककुम्म
(अ)ती ॥५६॥ त्रिपादणिष्ठमध्या पिपीलिकमध्या ॥१७॥ विपरीता यव-
मध्या ॥८॥ ऊनाधिकेनैकेन निवृद्भुरिजौ ॥५९॥ द्वाभ्यां विराट्व-
गजी ॥०॥ आदितः सन्दिग्वे॥शा देवतादितच ॥३२॥ अग्निः सविता
सामो बृहस्पतिमित्रावरुणाविन्द्रो विश्वेदेवा देवताः ॥६३॥ स्वराः षड्जा-
दयः ।।६।। सितसारङ्गपिशङ्गकृष्णनीललोहितगौरा वर्णाः ॥६५॥ आग्नि
वेश्यकाश्यपगौतमाङ्गिरसभागैवकौशिकवासिष्ठानि गोत्राणि ||६||
इति तृतीयोऽध्यायः॥३॥
अथ चतुर्थोऽध्यायः।
चतुःशतमुत्कृतिः ॥१॥ चतुरश्चतुरस्त्यजेदुत्कृतेः ।।२।। तान्यभिसंब्या-
प्रेभ्यः कृतिः ॥३।। प्रकृत्या चोपसर्गवर्जितः ॥४॥ धृत्यष्टिशक्वरीजगत्यः
पृथक्पृथक्पूर्वत एतान्येवैषाम् ।।३। द्वितीयं द्वितीयमतितः ॥॥
.
इति पिङ्गलच्छन्दःसूत्रे चतुर्थाऽध्याये वैदिकच्छन्दःप्रकरणं
समाप्तम् ॥४॥
पिङ्गल छन्दःसूत्राणां वर्णक्रमेण सूची। अष्टौ वसवः जगती षड्भिः ६ किंवद् भू ८ पृ० पृ. (अ) एकेन त्रिष्टुब्ज्यो. (छ) तिष्मती छन्दः अनुष्टुब्गायत्रैः ४७ । एकस्मिन् प० (ज) अक्षरपक्तिः पश्च० ५६ एकद्वित्रि. ३६ । जह्यादासुरी अग्निः सवितासोमो० ६७ (क) जगत्या आदित्याः ३६ (आ) कदा सज ८ ५६. आसुरी पञ्चदश १६ | ककुम्मध्ये चेदन्त्यः ४५ (त) श्राद्यं चतुष्पाहतुभिः ४० का कुदा तथा जगती प्रास्तारपतिः परतः५५ तान्युष्णिगनुष्टुप्० ३. भादितः सन्दिग्धे ६६ । कचित्रिपादृषिभिः तान्यभिसंव्याप्रेभ्यः आग्निवेश्यकाश्यप० ६६ | कचिन्नवकाश्चत्वारः ५१ कृतिः ७ (इ) (ग) तिमस्तिस्रःसनाम्न्य. ३० इयादिपूरणः है तृतीयं द्विपा० गायत्री १८ उष्णिग्गायत्री जागतश्च४४ गायत्र्यावसः द्वाप्यल्पशः उरोबृहती यास्कस्य ५० गृल ६ द्वाभ्यां विराट स्वराजौ६६ उपरिष्टाबृहत्यन्ते ग्लो १४ | दैव्येकम् १८ उपरिष्टाज्ज्योतिरन्त्येन ६२ (च) देवतादितश्च ६७ (ऊ) चतुरश्चतुरप्राजाप- द्वौ द्वौ साम्नां. ऊनाधिकेनैकेन नि. त्यायाः २५ द्वौ नवको झुरिजौ ६५ | चतुष्पातिभिः ४. द्वितीयं द्वितीयमतितः ७६ चतुष्कषट्को प्रयश्च ५७ (ध) ऋचां त्रिः २१ चतुश्शतमुत्कृतिः ५ चतुरश्चतुरस्त्यजे- घ्रादिपर; एकैकं शेषे २६ दुत्कृतेः ७१ / धृत्यादिशक्करी ७३ ३७ / गन्ते ५६ . घीश्रीस्त्रीम् .
विषयसूची। २ लौनः पृ० (न) (ब) षट्कसप्तका ४२ वृहती जागतरून. नहस न् ४८ | षटके ककुम्म (झ)ती ६४ न्यकुसारिणी द्वितीयः ४६ मध्येऽन्ते च मध्येज्योतिर्मध्यमेन ६२ सतोबृहती ताण्डिनः ५२ संस्तारपङ्क्तिबहिः ५५ पथ्यापूर्वश्चेत्तृतीयः ४६ साते कत् यजुषां षट् २० पतिर्जागतौ० ५३ साम्नां द्विः २० पदपकूक्तिः पश्च ५७ खा पादनिवृत् १४ पथ्या पञ्चभिर्गायत्रः ५८ (व) सितसारङ्गपिशा ६६ परोष्णिक परः बरा सा य ६ स्कन्धोपीबी क्रौष्टुकेः ४६ पादः वसुधा स् स्वराः षड्जादयः प्रस्तारपक्तिः पुरतः ५४ विराजो दिशः (ह) ७३ / विपरीता वाराही ४२ प्राजापत्याधौ विपरीता प्रतिष्ठा ४३ (घ) नाग्यजुषा ३२ विपरीतोच ५४ त्रिष्टुभो रुद्राः ३६ पुरउष्णिक पुरः ४६ विपरीता यवमध्या ६५ | त्रिपातत्रैष्टुभैः पुरस्ताज्ज्योति ६१ विष्टारपक्तिरन्तः ५५ | त्रिपाकचि. पुरस्ताबृहती पुरः ५० वैराजी गायत्री च ५१ त्रिभिर्जागतैमहा० ५२ पूर्वी चेदयुजौ० ५३ त्रिपादणिष्ठमध्या. ६५ पृथक् पृथक ७४ | षटकसप्तकयोम ४१ श्रीस्त्रीनृचाम् २४ ७ प्रकृत्या चोप० . ४७ प्राप्तिस्थानम् चौखम्बा-संस्कृत-पुस्तकालय, बनारस सिटी श्रीः। श्रीमत्पिङ्गलाचार्यविरचितं पिङ्गलच्छन्दःसूत्रम् हलायुधवृत्तियुत-कादम्बिनी- भाषाटीका सहितम् प्रथमोऽध्यायः। नमस्तुङ्गशिरश्चम्बिचन्द्रवामरचारवे । भैलोक्यनगरारम्भमूलस्तम्भाय शम्भवे ॥१॥ श्रीमत्पिङ्गलनागौक्तच्छन्दःशास्त्रमहोदधौ वृत्तानि मौक्तिकानीव कानिचिद्विचिनोम्यहम् ॥ २॥ कादम्बिनी। वृत्तिकार ( हलायुध भ) स्वरचित वृत्तिको निर्विघ्न समाप्तिके लिये भगवान शङ्कर का नमस्कारात्मक मंगल करते हैं जो शंकर भगवान सब देवताओंसे श्रेष्ठ होने के कारण सबके प्रणम्य हैं, अत्यन्त उन्नत जिनके मस्तक हैं ऐसे मस्तक पर चन्द्र रूपी चामरके होनेसे जो सुन्दर प्रतीत होते हैं और तीनों लोक रूपी नगरकी रचना करने में जो मूलस्तम्भ नीव या वीजस्वरूप हैं ऐसे भगवानको नमस्कार है॥१॥ मैं महर्षि पिङ्गक रचित छन्दःशास्त्र रूपी महासमुद्र में मोतियोंकी तरह कुछ वृत्तों का संग्रह करता हूँ॥ २ ॥ वेदानां प्रथ(१)माङ्गस्य कवीनां नयनस्य च । पिङ्गलाचार्यसूत्रस्य मया वृत्तिर्विधास्यते ॥ ३ ॥ क्षीराब्धेरमृतं यद्वदुधृतं देवदानवैः। छन्दोऽब्धेः पिङ्गलाचार्यैश्छन्दोऽमृत तथोवृतम् ॥४॥ (१) छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ कथ्यते । ज्योतिषामयनंचक्षुनिरुक्तं मौत्र- मुच्यते । शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम् । इति शिक्षावचने छन्दसः प्रथमोपा. दानात् प्रथमाजत्वम् ।
- ૨ सटीकपिङ्गलच्छन्दःसूत्रे- जो पिङ्गलसूत्र वेदोंका प्रथम अज और कविओंका नेत्र है मैं ऐसे पिछल- सुत्रकी वृत्ति बनाऊंगा ॥ ३ ॥ देवता और दैत्योंने क्षीरसमुद्रको मथकर जैसे अमृत निकाला है, उसी प्रकार छन्द समुद्रसे पिङ्गलाचार्यने छन्द रूपी अमृत निकाला है ॥ ४ ॥ मयरसतजभनलगसम्मितं भ्रमति वाङ्मयं जगति यस्य स जयति पिङ्गलनांग: शिवप्रसादाद्विशुद्धमतिः ॥ ५॥ भगवान् शङ्करकी कृपासे विशुद्ध बुद्धि ऐसे पिङ्गलनागकी जय हो जिनके वाङ्मय समस्त साहित्य जगतमें म, य, र, स, त, ज, म, न, ल, और गये दश व्याप्त हैं। विशेषः-तात्पथ यह हैं कि प्रत्येक शास्त्रकारने अपने शास्त्रको 'क्षेपसे समझाने के लिए पृथक २ संकेतका निरूपण किया है, जैसे व्याकरण शास्त्रमें अक् , अच् , अण् आदि पदोंके द्वारा अ इ उ आदि अनेक वर्गों का बोध होता है और इन संक्षे. पसे वर्णबोधक पदोंको प्रत्याहार कहा जाता है उसी प्रकार छन्दशास्त्रमें संक्षेपसे रु लघुबोधक पदोंको गण कहा जाता है। तीन २ अक्षरोंका एक गण होता है ये गण कुल आठ हैं। जैसे तीनों अक्षरोंके सभी अक्षर गुरु हैं इसका ज्ञान एक 'म' वर्णसे हो जाता है इसे मगण कहते हैं इसी प्रकार यगण, रगण, सगण, तगण, जगण, भगण और नगणको समझना चाहिये। कितने गुरु या लघु होनेसे कौन २ गण होता है इसे आगेके श्लोकोंसे धृत्तिकार और शास्त्रों द्वारा सुत्रकार सविस्तर वर्णन करेंगे। केवल एक अक्षर का गुरु या लधु बोधक ग और ल् वर्ण है अर्थात् जहाँ ग्या ल से निर्देश किया जाय वहाँ एक ही अक्षरको गुरु या लघु समझना चाहिये ॥५॥ त्रिगुरुं विद्धि मकारं लध्वादिसमन्वितं यकाराख्यम् । लघुमध्यमंचरेफं सकारमन्ते गुरुनिबद्धम् ॥ ६ ॥ जिसमें तीनों गुरु हों उसे भगण, जिसमें आदि लघु और दो अक्षर गुरु उसे यगण, जिसमें आदि और अन्तके अक्षर गुरु तथा मध्यके अक्षर लघु हो उसे रगण, और आदि के दो अक्षर लघु तथा अन्तके एक अक्षर गुरु जिसमें हों उसे सगण कहते हैं ॥६॥ लम्वन्त्यं हि तकारंजकारमुभयोलघु विजानीयात् । ।
प्रथमोध्यायः। ३ आदिगुरुश्च भकारं नकारमिहपैङ्गले त्रिलघुम् ॥ ७ ॥ जिसमें आदि, मध्य गुरु तथा अन्त में लघु हो उसे तगण, आदि मध्य गुरु और अन्त में लघु हो उसे जगण, जिसमें आदिके अक्षर गुरु हों शेष लघु हों उसे मगण और जिसमें तीनों अक्षर लघु हों उसे नगण समझो। तात्पर्य यह है कि आदि गुरु मगण, मध्यगुरु जगण, अन्तगुरु सगण, आदि लघु यगण, मध्यगुरु रगण, अन्तलघु तगण, तीनों अक्षर गुरु मगण, और तीनों लघु नगण होता है ॥ ७ ॥ दीर्घ संयोगपरं तथा प्लुतं व्यञ्जनान्त(२)मुष्मान्तम् । सानुस्वारश्च गुरुं क्वचिदवसानेऽपि लघवन्त्यम् ॥ ७ ॥ आदिमध्यावसानेषु यरता यान्ति लाघवम् । भजसा गौरवं यान्ति मनौ तु गुरु लाघवम् ॥8॥ दीर्घ, संयुक्तवर्ण परे रहते पूर्व ह्रस्ववर्ण, प्लुत, व्यञ्जन वर्ण के पूर्व ह्रस्ववर्ण, विवर्ग, जिह्वामूलीय और उपध्मानीय के पूर्व वर्ण को गुरु समझना चाहिये ।। आदि लघु यंगण, मध्यलघु रगण, अन्तलघु तगण, आदि गुरु मगण, मध्य गुरु जगण, अन्तगुरु सगण, तीनों गुरु मगण और तीनों लघु जगण होते हैं ॥९॥ त्रिविराम दशवर्ण षण्मात्रमुवाच पिङ्गलः सूत्रम् । छन्दोवर्गपदार्थप्रत्ययहेतोश्च शास्त्रादौ ॥ १० ॥ इस श्लोकसे वृत्तिकार प्रथमसूत्र धी, श्री, स्त्री, म् , का तात्पर्य्य वर्णन कर रहे हैं। इसमें धी, श्री, श्री, तीन विराम हैं, ध , ई, श, ९ , ई स् , त् र् ये दशवर्ण हैं, और घी-दो मात्रा, श्री-दो मात्रा स्त्री-दो मात्रा इस प्रकार छःमात्रा हैं। तीन विरामों से तीन प्रकार का छन्द रूपी पदार्थ सूचित किया गया है। छन्दके तीन भेद है, लौकिक, वैदिक और उभयसाधारण । अथवा गण छन्द, मात्रा छन्द और अक्षर छन्द। दर्शवों के द्वारा म, य, र, स, त, ज, भ, न, ग, और क इन वर्गवर्ग रूप पदार्थको सूचना दे रहे हैं। छः मात्राओं से आठवें अध्याय में वर्णित प्रस्तार, नष्ट, उद्दिष्ट, एकद्वयादिलगक्रिया, सन्त्यान, अध्ययोग, नामक छः प्रत्यय सूचित हो रहे हैं ॥१०॥ . (१) व्यजनान्तमित्यनेनैव गतार्थत्वे उष्मान्त ग्रहणं विसर्जनीयस्य तदुत्पन्न जिह्वामूलीयोपध- मानीययोरप्युपलक्षणार्थम् । विसर्जनीयपरोऽप्युष्मशब्दोविद्यते । तथा च पाणिनीयशिक्षायाम- प्रोभावश्च विवृत्तिश्च शपसारेफ एव च । जिह्वामूलमुपध्मा च गतिरष्टविधोष्मणः । , OC ५ सटीकपिङ्गलच्छन्दःसूत्रे- इह हि त्रैवर्णि(१)कानां साङ्गवेदाध्ययनमाम्नायते।मर्थावबोधप. र्यन्तश्चाध्ययनविधिः। वेदाङ्गश्च छन्दःततस्तदध्ययनं विधिबोधित(.). त्वादनुष्ठेयम् । अथ त्रिष्टुभा यजति, वृहत्या गायति, गायच्या स्तौ. तीत्येवमादिश्रवणादायातमनुष्टुबादिक्षानम् । किञ्च छन्दसामप- रिज्ञानात् प्रत्युत प्रत्यवायः श्रूयते । यथा-'यो ह वा अविदिताय- च्छन्दोदैवविनियोगेन ब्राह्मणेन मन्त्रेण योजयति वाऽध्यापयति स स्थाणु वर्छति गतं वा, पतति प्रमीयते वा पापीयान भवति, यातयामान्यभ्य छन्दांसि भवन्ति ।' (छ. ब्रा० ३७५) तस्माच्छ- न्दापरिक्षानं कतव्यम् तदर्थमिदं शास्त्रमारभ्यते । तत्र लघुनापा- येन शास्त्रावबोधसिद्धयर्थं संज्ञाः परिभाषते सुत्रकार:- इस शास्त्रमें त्रैवर्णिक को ही छः अझो के सहित अध्ययन कहा जाता है अध्ययन का प्रयोजन(३) अर्थ ज्ञान ही है छन्द भी वेदाङ्ग हैं अत: इसका भी अध्ययन वेद में कहे गए अधिकारी को ही कहा गया है। विशेष:--स्वाध्यायोऽध्येतव्य, इस वेदवाक्य से वेद का अध्ययन गुरु के द्वारा करके समावर्तन संस्कार करें यह प्रतीत होता है । यद्यपि वेदाध्ययन विधि में फल विशेषके श्रवण न होने से इसका फल विश्वजित, यज्ञ की तरह (स स्वर्गः सर्वान् प्रत्यविशिष्टस्वात् ) इस सूत्र से अष्ट मानना चाहिए था तथापि मध() फल कल्पनापेक्षया अर्थज्ञान रूप दृष्ट फल मानना उत्तम है यह मीमांसाशास्त्रका निर्णय है किसको पड़ावे इस प्रश्न पर 'उपनीतमण्यापयीत' इस वाक्य से उपनयन संस्कार वाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यको पदावे यह सिद्ध होता है । और "स्त्रीशूद्र द्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचराः" इस वाक्य से भी त्रैवर्णिक को ही वेद पढ़ने का अधिकार सिद्ध हुमा । (१) वसन्ते प्रामणमुपानयीत, ग्रीष्मे राजन्य, शरदि वैश्यमिति अतिः । अनया ब्राह्मणा- दीनामुपनयने अधिकारित्वबोधनात् । (२) उपनीय गुरु शिष्यं महान्याहृतिपूर्वकम् । वेदमध्यापयैदेनं शौचाचारांश्च शिक्षयेदिति स्मृतेश्च उपनीतस्येवाधिकारः। (३) स्थाणुरयं भारहारः किलाभूत् अधोत्यवेदं न विजानाति योऽर्थम् । नि, अ, १, पा, (४) सम्भवति दृष्टफलकत्वेऽदृष्टफलकल्पनाया भन्याव्यवाद ।
प्रथमोध्यायः। ५ और त्रिष्टुभा यजति, बृहत्या गायति, गायत्र्या स्तौति । अर्थात् अनुष्टुप् से यागकरे । बृहती से सामगान करे और गायत्री से स्तुति करे, इस प्रकार श्रुति मिलती है। छन्दः शास्त्रके ज्ञानके विना अनुष्टुप् आदि का ज्ञान होना असम्भव है और अनुष्टुप् आदिके ज्ञान हुए विना उल्लिखित श्रुतियोंका अर्थ किस प्रकार मालूम हो सकता है, इसलिये यह सिद्ध हुआ कि अनुष्टुप् आदि के ज्ञान के लिये छन्दःशास्त्र का अध्ययन आवश्यक है। विशेषः-जैसे सन्ध्योपासन आदि नित्यकर्मक अनुष्ठान न करनेसे प्रत्यवाय होता है उसी प्रकार ज्ञानके विना याग कराना या वेद पढ़ाना प्रत्यवाय जनक है। जिस मन्त्रका ब्राह्मणसे याग कराना हो या जिन मन्त्रों को पढ़ाना हो उन मन्त्र या ब्राह्मणों का ऋषि, देवता, छन्द और विनियोगको जाने विना जो याग कराता है या पढ़ाता है वह वृक्ष योनिको प्राप्त होता है या नरकमें जाता है या वेदोक्त आयुको प्राप्त नहीं करता है, वह अत्यन्त पापी होता है। उसके पढ़े हुए वेद फलोत्पत्ति करनेमें असमर्थ हैं । इस लिये छन्दःशास्त्रका ज्ञान परम आवश्यक है। इसी लिये छन्दःशास्त्रका आरम्भ किया जाता है। धीश्रीस्त्रीम् ॥ १॥ धोश्रीस्त्री इत्यनेन गुरुत्रयं संशित्वेनोपलक्षयति, मकारश्च संज्ञा- त्वेन । ततश्चायमर्थः-सर्वगुरोस्त्रिकस्य (sss ) 'म' इति संज्ञा परिभाष्यते। ध्यादीनामुपादानप्रयोजनमुपरिष्टावक्ष्यामः । देशाः 'विद्युन्माला मौ गौ' (पि. सू० ६।६) इत्येवमादयः ॥१॥ अब लघु उपायके द्वारा शास्त्रज्ञानके लिए सुत्रकार छन्दःशास्त्रका सङ्केत बना रहे हैं । इनमें म, य, र, स, त, भ, ज, ग और ल इन दश अक्षरोंसे छन्दः शास्त्रके सभी सङ्केत दिखलाये गये हैं। इस सुत्रसे लेकर "न, हस, न्" सूत्र तक मगण आदि आठों गणकी संज्ञा की है। तीन अक्षरों का एकगण होता है। इस सूत्रमें धी श्री स्त्री ये तीनों अक्षर तीन गुरुओंका बोधक है और तीनों गुरुओं को 'म' संज्ञा करने के कारण वह संज्ञी है और 'म' संज्ञा है। इस लिये इस सूत्र का अर्थ यह हुआ कि जिन तीनों अक्षरोंके सबके सब गुरु हो उसे मगण कहते हैं। जैसे धी श्री स्त्री ये तीनों अक्षर गुरु होने के कारण मगण हुआ। प्रत्येक शास्त्रमें लघु उपायसे व्यवहार सिद्धि के लिये सङ्केत किया जाता है इसलिये मन- ६ सटीकपिङ्गलच्छन्द सूत्रे- जिन स्थानों में 'म' व्यवहार किया गया है वहां पर ही इसका प्रयोजन समझना चाहिये जैसे “विद्युन्माला मौ गौ" इस सूत्र का अर्थ है कि जहां पर दो मगण और दो गुरु हो उसे विद्युन्माला छन्द कहते है "म"से तीन गुरुसमझना चाहि- ये अर्थात् आठ गुरु ssssssss जिसमे हो उसे विद्युन्माला कहते हैं । यदि संज्ञा नहीं की जाती तो इतने कमशब्दोंमे इतना अधिक अर्थ नहीं समझाया जा सकता। धी आदि शब्दों के द्वारा क्यों निर्देश किया गया है इसका तात्पर्य वृत्तिकार स्वयं सूत्रार्थ मे कहेगें ॥ १ ॥ धरासाय् ॥ २॥ वरासा इत्यनेनादिलघोस्त्रिकस्य (IST) 'यः इति संज्ञा परि- भाज्यते । यप्रदेशाः भुजङ्गप्रयातं य (पि० स०६।३६) इत्येवमादयः इस सत्र मे आदिलघु और बाकी दो गुरु को ही "बरासा' इन अक्षरों से निर्देश किया गया है अर्थात् जहाँपर आदि के अक्षर लघु और दो बाकी अक्षर गुरु हो उसे यगण कहते है। जैसे:- वरा सा यह यगण हुआ। जिस सूत्र में 'य' से व्यवहार किया जायगा वहाँ पर 'य' का अर्थ आदिके एक अक्षर लघु और बाकी दो गुरु ऐसा समझना चाहिये "भुजङ्गप्रयातं यः" इत्यादिसूत्रों में ही इसका व्यवहार किया गया है। चार य यगण अर्थात् ISS ISS ISS Iss जिसके पहला चौथा सातवा और दशवां अक्षर लघु हो वाकी अक्षर गुरु वह भुजङ्गप्रयात कहलाता है। ISS ISS ISSISS भुजा प्रयातं भवेद्येश्चतुभि । वृत्तरत्नाकर ॥ २ ॥ का गुहा र ॥३॥ कागुहा इत्यनेन मध्यलोस्त्रिकस्य (SIS) 'र' इति संशा परि- भाष्यते । रप्रदेशाः 'स्रग्विणी र (पि० सू०६।३७ ) इत्येवमादायः॥ इस सूत्र मे मध्यलधु और बाकी दो गुरु को ही कागुह इन अक्षरों से निर्देश किया गया है अर्थात् जहांपर मध्य के अक्षर लघु और वाकी आदि अन्त के अक्षर गुरुहो तो उसे रगण कहते है। जैसे का गुहा यह यगण का स्वरूप है। जिन सूत्रों में '' व्यवहार किया जायगा। वहां पर र का अर्थ मध्य के एक अक्षर लघु और बाकी गुरु ऐसा समझना चाहिये। य य प्रथमोध्यायः। "स्रग्विणीरः, (६॥३७१) इत्यादि सूत्रों मे इसका व्यवहार किया गया है। चार र सगण रगण Ssssssss अर्थात् जिसके एक पादमें दूसरा, पांचवां, आठवां और ग्यारहवां अक्षर लघु हो शेष अक्षर गुरु हो उसे स्रग्विणी छन्द कहा जाता है ॥३॥ वसुधा स् ॥४॥ वसुधा इत्यनेनान्त्यगुरोस्त्रिकस्य (।।5) 'स' इति संज्ञा परि- भाष्यते । सप्रदेशाः 'तोटकं सः' (पि० सू० ६।३१) इत्येवमादयः॥ इस सूत्र में अन्त का गुरु और शेष आदि मध्य दो लघु को ही (वसुधा), इन अक्षरों से निर्देश किया गया है । अर्थात् जहाँ अन्त के अक्षर गुरु और शेष दो अक्षर लघु ही उसे सगण कहते हैं जैसे ॥ यह सगण का स्वरूप है। जिन सूत्रों में (स ) से व्यवहार किया जायगा वहां पर (स) का अर्थ अन्तका एक अक्षर गुरु, आदि और मध्यके दो अक्षर लघु ऐसा समझना चाहिये । 'तोटक सः' (पि. सू. ६।३१) इत्यादि सूत्रों मे इसका व्यवहार किया गया है। चार अर्थात् जिसके एक चरणमें तीसरा, छठा, नवां, और बारहवा गुरु हो तथा शेष के अक्षर लघु हो ऐसे १२ अक्षरके पाद वाला छन्द तोटक कहलाता है । तोटकमम्बुधि सैः प्रमितम् । वृत्तरत्नाकर॥४॥ सा ते कत् ॥५॥ सातेक इत्यनेनाम्त्यलोस्त्रिकस्य (ssi) 'त' इति संज्ञात्वेनोपा. दीयते । तप्रदेशाः 'तनुमध्या त्यौ' (पि० सू०६।२) इत्येवमादयः ॥५॥ अन्तके एक अक्षर लघु और बाकी गुरु को ही 'सा ते क' इन अक्षरों से निर्देश किया गया है अर्थात् जिसमें अन्तका अक्षर लघु, बाकी दो अक्षर, आदि और मध्य के गुरु ही उसे तगण कहते है जैसे 55। यह तगण का स्वरूप जिन सूत्रों में 'त' से व्यवहार किया जायगा वहां पर 'त' का अर्थ अन्तके एक अक्षर लघु और शेष अक्षर गुरु ऐसा समझना चाहिये । 'तनु मध्यात्यौ' (पि. सू. ६।२) इत्यादि सूत्रों मे ही इसका व्यवहार किया गया है। जिसके एक पाद मे तगण और यगण हो उसे तनुमध्य छन्द कहते हैं ॥५॥ S - य ISS SS सटीकपिङ्गलच्छन्दःसूत्रे- कदास जू ॥ ६ ॥ कदास इत्यनेन मध्यगुरोस्त्रिकस्य (151) 'ज' इति संशा परि- भाज्यते । जप्रदेशाः 'कुमारललिता उसौ ग्' (पि० सू०६३) इत्येव- मादयः॥६॥ मध्य के अक्षर गुरु और शेष अक्षर लघु को हो "क दा स" इन अक्षरों से निर्देश किया गया है। अर्थात् जिसमे मध्य के अक्षर गुरु और बाकी आदि और अन्तके अक्षर लघु हो उसे जगण कहते हैं। जैसे ।ऽ। यह जगण का स्वरूप है। जिन सूत्रों में "ज" का व्यवहार किया गया वहां पर इसका अर्थ मध्यका अक्षर गुरु और शेष अक्षर लघु ऐसा समझना चाहिये। कुमार ललिता सौ ग (पि. सू ६ । ३ ) इत्यादि सूत्रों मे 'ज' का प्रयोग किया गया है इसलिये इस सूत्र का अर्थ जिसके एक पाद में जगण और सगण और एक गुरु हो उसे 'कुमारललिता छन्द' कहते हैं ऐसा होता है ॥ ६ ॥ किंवद भू ॥७॥ किंवद इत्यनेनादिगुरोस्त्रिकस्य (5।।) 'भ' इति संज्ञा शाप्यते । भप्रदेशाः 'चित्रपदा भौ गौर (पि० सू०६।५) इत्येव मादयः ॥ ७ ॥ किंवद इन अक्षरों से आदि गुरु और अवशिष्ट लघु को ही निर्देश किया जाता है । अर्थात् आदि के एक अक्षर गुरु और शेष दो, मध्य और अन्तके अक्षर लघु हो उसे भगण कहते हैं। जैसे ॥ यह भगण का स्वरूप हैं। जिन सूत्रों में 'भ' से व्यवहार किया जाय वहां पर इसका अर्थ, आदि के अक्षर गुरु और अवशिष्ट अक्षर लघु ऐसा समझना चाहिये । "चित्रवदा भौ गौ" (पि. सू ।६।५) इत्यादि सूत्रों में इसका प्रयोग किया गया है। दो भगण और दो गुरु जिस के एक पाद मे हो उसे चित्रपदा छन्द कहते हैं ॥७॥ नहस न् ॥८॥ नहस इत्यनेन सर्वलघोस्त्रिकस्य (।) 'न' इति संशोपदिश्यते । नप्रदेशाः 'दण्डको र' (पि० सू० ७॥३१) इत्येवमादयः ॥८॥ न हस' इन अक्षरों से सब के सब लघुओं का निर्देश किया गया अर्थात् तीनों लधु युक अक्षर समुदाय को ऐसी संज्ञा की जाती है जैसे "न ह स" है प्रथमोध्यायः। यहा पर तीनों लघु वर्ण होने के कारण नगण कहा जाता है जिन सूत्रोंमें 'न' से व्यवहार किया जाय वहां पर इसका अर्थे तीनों अक्षर लघु ऐसा समझना चाहिये "दण्डको नौ रः' ( पि. सू ॥३३ ) इत्यादि सूत्रों में इसका प्रयोग किया गया अर्थात् जिसमे दो नगण और सात रगण हो उसे दण्डक कहते हैं ॥ ८ ॥ इन आठ सूत्रों से पिझलाचार्य ने आठ गणों का स्वरूप निर्देश किया है इसके आगेके सूत्रों से गुरु और लघुका सङ्केत निर्देश किया जायगा ॥6॥ गृ लू॥९॥ गृ(१) इत्यनेनोपलक्षितस्य हुस्वस्य (1) 'ल' इति संहा परिभाष्य. ते । लशब्दश्च लघुवाचकः । तेन हस्वमक्षरं लघुसंदं भवतीत्येवमर्थः प्रपद्यते । लप्रदेशाः 'ल: समुद्रागणः' (पि०सू० ४।१२) इत्येवमादायः 'गृ' यह पद ह्रस्व का बोधक हैं । लोकमें । लोकमें या शास्त्रान्तर में इससे ह्रस्व का बोध कहीं भी नहीं होता है परन्तु पिङ्गलाचार्य लाघवार्थ विशेष को सामान्य- परक रख कर 'गृ'शब्द से ह्रस्व का बोध कराना चाहते हैं। ह्रस्वल ऐसा सूत्र यदि होता तो अर्थ स्पष्ट होता परन्तु उसमें तीन मात्राका गौरव समझकर उन्होंने ऐसा नहीं किया। पाणिनि जी ने "हस्वं लघु (पा० १.४.१०) ऐसा ही सूत्र का निर्माण किया है ॥ ९॥ गन्ते ॥१०॥ गृ-हणमनुवर्तते । गृ-शब्दोपलक्षितस्य इस्वाक्षरस्य पादान्ते वर्स: मानस्य गुरुसंशातिदिश्यते । 'ग' इति प्रथमाक्षर-प्रतीकेन गुरुश- ब्दस्य ग्रहणम्॥ ननु 'ग्लिति समानी' (पि० सू०५।७) इत्यादीनां पादान्ते वर्स- मानस्य हस्वस्य गुरुत्वं न दृश्यते । नैष दोषः । सर्वत्र पादान्ते वर्त. मानस्य हस्वस्य गुरुत्वमुत्सगंसिद्धम् । तब लकारभुत्यपवादेन बाध्यते । यथा-'ग्लिति समानी' (पि० सू० ५।७) 'गीत्यार्या ल. (१) गृ इत्यनेन हस्व एव विवक्षितोऽर्थः सोऽपि लावार्थः "हस्वं लघु (१-४-१०) इति पाणिनिकृते सूत्रे षड् मात्राः सन्ति । अत्र तु सार्द्धकमात्रा, पिङ्गलमते एकमात्रैव, व्यञ्जन- स्याद्धमानत्वेनगणना पाणिनेरेवेति महत् लाघवम् । वस्तुतस्तु नहि मात्राकृल्लाघमेवादर्तव्य किन्तु प्रतिपत्ति लाघवमपीति 'हवं लिस्येव सूत्रयितुमुचितम् ।
? १० सटोकपिङ्गलच्छन्दःसूत्रे- (पि२ सू०४१४७ ) इत्यादौ । सामान्येन विशेषस्य बाधः कस्य न सम्मतः? तस्मात कुचोद्यमेतत् ॥ केचिदिदं सूत्रं व्यवस्थितविभाषया व्याचक्षते । 'ग्लिति प्रमाणी' पि० सू० ५%) इत्यादोनामन्ते गुरुत्वमेव, 'समानो' (पि० सू० ५७) इत्यादीनमन्ते लघुत्वमेव । तस्मादियं व्यवस्था प्रमाणम् । शेषाणामिच्छया गुरुत्वं लघुत्वं चेति, तदनुपपन्नम् , विकल्पस्याप्र. स्तुतत्वात्कस्य व्यवस्थेति न विनः। ननु' केनाप्युक्तम् ‘वा वादान्ते ग्वक्र (वृ. र. १६) इति गुरु- त्वम् । सत्यमुक्तम् , दुरुक्तं हि तत् । “वान्ते ग्वक्र इति प्रोक्तं यैस्तु(१) श्वेतपटादिभिः । उत्सर्गस्यापवादेन वाधस्तै वधारितः॥" इत्युक्ते। इच्छया गुरुत्वं लघुत्वञ्च नोपपद्यते । कस्येच्छा? किं शास्त्रकारस्य ? कवेर्वा ? । न तावदाद्यः पक्षा, सूत्रेवदर्शनात् । नापि द्वितीयः, कवे. रपीच्छायाँ व्यवस्थाभावात् । को जानाति कस्य कीदृशीच्छेति ॥ भन्ये त्याहुः-ननु पादान्ते वर्तमानस्य हस्वस्य पाणिनिना गुरु- संशा न कृता । तेनोक्तम् 'संयोगे गुरु' (पा० सू० ३३।११), 'दी च' (पा० सू० ११४१२) इति । नायं संयोगादिन च दीर्घः। तस्मा. त् 'गन्ते' इति सूत्रमयुक्तम् ॥ अत्रोच्यते-पाणिनिना स्वशास्त्रप्रयाजनाथं गुरुसंशा कृता । 'गुरोश्च हल' (पा० सू० ३।३।१०३) इत्यकारप्रत्ययो यथा स्यात्- कुण्डा, हुण्डेत्यादौ, ईहाचक्रे, ऊहाञ्चक्रे, इत्येवमादिषु 'इजादेश्व गुरु- मतोऽनृच्छ।' (पा० सू० ३।११३६) इत्याम् प्रत्ययश्च । पादान्ते वर्ग: मानस्य,लघोगुरुत्वातिदेशे पाणिनेः प्रयोजनमेव नास्ति । किञ्चानु- स्वारादिपूर्वस्य वर्णस्य 'बलम्' 'संपदित्यादौ स्थितस्य गुरुसंशा पाणिनिना न कृता, किमेतावताऽन्यैरपि न कर्तव्या? । तस्मात्सूत्र- मिदम् 'गन्ते' इति । गप्रदेशाः 'गावन्त भापोड (पि० सू० ५।२२) इत्येवमादयः॥ १०॥ पिङ्गलने लघु शब्द का एक अक्षर 'ल'को हो लघुवाचक माना है वह जैसे सत्य- भामा को सत्य या भामासे प्रयोग किया जा सकता है उसी तरह लोकसिद्ध है। (2) जैन विशेषः। - - प्रथमोध्यायः अतएव ह्रस्व को ल् संज्ञा होती है यही सूत्रार्थ हुआ। जिस जगह ल् से व्यवहार किया जाय वहाँपर ल का अर्थ ह्रस्व ही समझना चाहिये, इसका प्रयोग 'ल: समुद्रागणः' (पि. सू. ४। १२) इत्यादि सूत्रों में किया गया हैं। इस सूत्रमें पूर्व सूत्र से गृ का अनुवर्तन होता है । गृ से ह्रस्व का बोध होता है, यह पूर्व ही कहा जा चुका है । अत एव गृ शब्द से उपलक्षित हस्ताक्षर किसी पादके अन्त में यदि वर्तमान हो तो उसकी गुरु संज्ञा होती है। गुरु शब्दका जो एक देश 'ग' है यह प्रथमाक्षर है उससे पूर्व सूत्र में कहे हुए की तरह गुरु का ही प्रहण होता है ऐसा समझना चाहिये। प्रश्न-इस सत्र से पाद के अन्त मे स्थित लघु को भी गुरु संज्ञा की जाती है परन्तु ग्लितिसमानि (पि.सू. ५१६) समानी छन्द मे पाद के अन्त मे भी ह्रस्व देख पड़ता है यह पूर्वापर विरोध क्यों ? गन्ते सूत्र के अनुसार वहां पर भी पादान्त लघुको गुरुत्वातिदेशकरना चाहिये। उत्तर-एक उत्सर्ग शास्त्र होता है दूसरा अपवाद, शास्त्रान्तर में भी इस तरह की व्यवस्था देखी जाती है । जैसे व्याकरण शास्त्रमे "कर्मण्यम्" (पा.सू. ३-२-१) इस सूत्र में सभी धातुओं से कर्म उपपद रहते अण् प्रत्यय का विधान किया गया है कुम्भकारः, कुण्डलापः इत्यादि उदाहरण इस सूत्र के अनुसार उपसर्गरहित आकारान्त धातुओं से भी अण प्रत्यय प्राप्त हैं परन्तु "आतोऽनुपसर्गे क' (पा. स ३-२-३ इल सूत्र में आका- रान्त उपसर्गरहित धातुओं से 'क' के विशेष विधान होने के कारण 'गोदः, कम्व- लदः' इत्यादि स्थलोंमें 'क' प्रत्यय ही होता हैं 'अण' नही ऐसे स्थलों में 'अण्? प्रत्यय करने से अशुद्ध समझा जाता है। क्यों कि 'कर्मण्यण' (पा. सू. ३।२।११) सूत्र में विशेष धर्म के उल्लेख न होने के कारण धातुमात्र से अण् प्रत्यय प्राप्त है अतः वह सामान्य विधि हैं। और आतोऽनुपसर्गे कः' (पा. सू. ३।२।३।) सूत्र में आकारान्त उपसर्ग रहित धातु यह विशेष धातुओंके उल्लेख होने के कारण विशेष विधि है । नियम है कि सामान्य शास्त्र का विशेषशास्त्र अपवाद होता है अर्थात् जिस स्थल पर सामान्य और विशेष दोनों नियम प्राप्त हैं वहांपर विशेष नियम ही लागू होता है, सामान्य नहीं। इस शानमें भी इस सार्वत्रिक नियम का व्यतिक्रम नहीं किया गया है। अत एव 'गन्ते' इस सत्र में विशेष धर्म का उल्लेख न होने के कारण यह पाद के अन्त हैं सटीकपिङ्गलच्छन्दःसूत्रे- स्थित लघुओं को, चाहे वह पाद किसी छन्दका हो, गुरुत्व का अतिदे श करता परन्तु (ग्लिति समानी (पि. सु. ५।६। (गीत्यार्यालः ) पि. सु. ४।४७) इत्या- दि सूत्रों द्वारा 'समानी' 'गीती आर्या' इत्यादि विशेष छन्दों के पादान्त स्थित लघुओं में लघुत्व के रहने का ही विशेष विधान है। अत वह विशेष शास्त्र है। इसलिये 'समानी 'गीती' इत्याति छन्दों में विशेष नियम के अनुसार पादा न्त मे भी लघु ही रहता हैं । 'गन्ते' सामान्य सूत्र के अनुसार गुरु नहीं होता कुछ लोग इस सूत्र को व्यवस्थित विभाषा मानकर उक्त प्रश्न का समाधान करते है उनका कहना है कि ग्लिति प्रमाणी (पि. सू. ५।८) सूत्र में प्रमाणी छन्द के पादान्त में गुरुत्व की व्यवस्था है और रिलति समानी (५।६ ) इत्यादि सूत्रों के अनुसार समानी गोती आदि छन्दों के पादान्त मे लघुत्व की व्यवस्था है जहां व्यवस्था नहीं देखी जाती है ऐसे अवशिष्ट स्थलों में इच्छा से गुरु या लघु किसी की व्यवस्था कर लेनी चाहिये ? । यह समाधान ठीक नहीं जंचता है; क्यों कि विकल्प प्रस्तुत नहीं है । यदि विकल्प प्रस्तुत होता तो उस विकल्प की व्यवस्था की जा सकती थी; परन्तु 'गन्ते' सुत्र पादान्त स्थित लघु को नित्य ही गुरुत्व का अतिदेश करता है । विकल्प कहां से आया जिसकी व्यवस्था करते हो। इसलिये वहां पर गुरु ही होगा और समानी मे लघु ही रहेगा। वृत्तरत्नाकर आदि अन्धकार और कुछ छन्दोविद् जैन विद्वानों का कहना है। कि पादान्त में लघु की गुरु संज्ञा विकल्प से होती है उनके मत से व्यवस्थित विभाषा से समाधान अनुचित नहीं है परन्तु उनलो!ने उत्सर्गशास्त्र अपवाद शास्त्र से वाधित होता है, इस सार्वत्रिक नियम का विचार नहीं किया है। यदि किसी नियम को न मानकर केवल इच्छा से ही कहीं गुरु और कहीं लघुकी व्यव. स्था करोगे तो वह व्यवस्था किसकी इच्छा से होगी, शास्त्रकारकी इच्छासे या कविकी, शास्त्रकार महर्षि पिङ्गल का पादान्त में विकल्प से गुरुत्वविधायक सुत्र न होनेके कारण शास्त्रकारकी इच्छासे गुरुत्व लघुत्व की व्यवस्था नहीं कर सकते हो। कवि की इच्छा से ऐसी व्यवस्था की जा सकती है, ऐसा भी नहीं कह सकते क्यों कि इस स्थल पर अमुक कवि की ऐसी इच्छा थी यह किस प्रकार जान सकोगे। कौन जानता है किस कवि की कैसी इच्छा थी। कुछ विद्वान् इस सुत्र पर आक्षेप करते हैं उनका कहना है कि महर्षि पाणिनिने प्रथमोध्यायः। १३ पाद के अन्त स्थित लघु की गुरु संज्ञा नहीं की है उन्हों ने 'संयोगे गुरु (पा. सू. १।४।११ और 'दीर्घ च (पा. सू. १।४।१२) इन दोनों सूत्रों से संयोग से पूर्व- वर्ती लघु और दीर्घ इन दोनों को ही गुरु संज्ञा की है। पादान्त स्थित लघुवर्ण न संयोगादि ही हैं और न दीर्घ ही, फिर इन्हे किस प्रकार गुरु संज्ञा करते हो इसलिये 'गन्ते' सूत्र व्यर्थ ही है। इस पर वृत्तिकार का कहना है कि पाणिनि ने व्याकरण शास्त्र के लक्ष्यों को सिद्ध करने के लिये वैसी ही संज्ञा की और पिङ्गल ने छन्दःशास्त्र के प्रयोजन सिद्ध करने के लिये और तरह संज्ञा की है दोनों का प्रयोजन एक नहीं है फिर संज्ञा किस प्रकार एक हो सकती है। 'गुरोश्व हलः' (पा.सू .३।३।१०३) इत्यादि सूत्रोंसे गुरुसंज्ञकवर्ण जिनमें हो ऐसे व्यञ्जनान्त धातुओं से 'अ' प्रत्यय विधान करने के लिए पाणिनि ने संयुक्त व्यजनों के पूर्ण वर्णो को गुरु संज्ञा की है । अतएव कुडिदाहे (पा. स्वा.धा. २०) 'कुडि- वैकल्ये' (भ्बा. धा. ३२२) हुडि 'संघाते' (भ्वा.धा. २६९) 'हुडि वरणे (म्बा. धा. २७७) इन धातुओं से 'इदितो नुम् धातोः' (पा. सू. ७१।५८ ) से नुम् करने पर 'ण्ड' इन संयुक्त व्यञ्जनों के पूर्व लघु वर्ण के गुरु संज्ञा हो जाने से (गुरोश्च हल: (पा.सू. ३।३।१०३) सूत्र के अनुसार मा प्रत्यय हो जाता है। और ईकार उकारादि इजादि जैसे ईह चेष्टायाम् ( भ्बा. धा. ६३२) उह वितके (भ्वा. धा. ६४८ ) इत्यादि, धातुओं से 'इजादेश्च गुरुमतोऽवृच्छः' (पा.सु. ३।१।३६) गुरुसंज्ञकवर्ण है जिसमें ऐसे इजादि धातुओं से आम् प्रत्यय होता है। इस सूत्र के अनुसार दीर्घ की गुरु संज्ञा करने के कारण आम् प्रत्यय हो जानेसे ईहाम्चक्रे इत्यादि प्रयोग सिद्ध हो जाते हैं। संयोगादि और दीघं की गुरुसंज्ञा करने का प्रयोजन व्याकरणमें मिलता है परन्तु पादके अन्त स्थित लधु को गुरु संज्ञाकरने का फल व्याकरण शास्त्र मे नहीं है इस लिये पाणिनि ने उनकी गुरु संज्ञा नहीं की है परन्तु छन्दः शास्त्र में प्रयोजन है इसलिये पिङ्गलने पाद के अन्तस्थित लघुकी गुरु संज्ञाकी है। 'बलं' 'संपद्' इत्याद प्रयोगों मे अनुस्वार विसर्गादि के पूर्व लघुवर्णकी भी गुरु संज्ञा पाणिनि ने प्रयोजन न रहने के कारण नहीं की है। परन्तु छन्दः शास्त्र में प्रयोजन रहने से पिझलने उनकी गुरु संज्ञा की है। अनुस्वारादिपूर्व लघुवर्णो की गुरु संज्ञा पाणिनि ने नहीं की है इसलिये क्या छन्दःशास्त्र के प्रयोजन सिद्धके लिये पिङ्गल भी उनकी गुरु संज्ञा नहीं करना चाहिये । इसलिये 'गन्ते' यह सत्र व्यर्थ
सटीकपिङ्गलच्छन्दःसूत्रे-
नहीं । पूर्वोक्त आक्षेप सर्वथा निर्मूल है। गावन्त आपीड (पि. स. ५।२२। इत्या-
दि में इसका प्रयोजन है ॥ १० ॥
ध्रादिपरः ॥११॥
ध्र इति व्यजनसंयोगस्योपलक्षणार्थमेतत् । ध्र प्रादिर्येषां ते ध्रा.
दयः । आदिशब्देन विसर्जनीयानुस्वारजिह्वामूलीयोपध्मानीयानां
ग्रहणम् । भ्रादयः परे यस्मात्स. ध्रदिपरः । ततश्चायं सूत्रार्थ:-व्य.
जनसंयोगात्पूर्वस्य हस्वस्यानुस्वारविसर्जनीयजिह्वामूलीयोपध्यानी.
येभ्यश्च गुरुसंज्ञातिदिश्यते ॥ ११ ॥
इससे ब्यजनों का संयोग लक्षित किया जा रहा है। ध्र अर्थात् व्यञ्जन-
संयोग आदि में हो जिनके ऐसे वर्ण आदि से विसर्ग, अनुस्वार, जिह्वामूलीय
और उपध्मानीयों का ग्रहण समझना । अब ध्रादि अर्थात् व्यञ्जन संयुक्त वर्ण, अनु.
स्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय और उपध्मानीय आगे ही जिन वर्गों के ऐसे वर्गों की
गुरु संज्ञा होती हैं। फलितार्थ यह हुआ कि संयुक्तवर्ण, अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वा-
मूलीय और उपध्मानीय वर्गों से पूर्व लधुवर्ण की गुरु संज्ञा होती है ॥ ११ ॥
हे ॥१२॥
ग इत्यनुवर्तते । हे इति द्विमानोपलक्षणार्थम् । ततश्चायं सूत्रार्थः-
द्विमात्रिकस्य दीर्घस्य 'ग' इति संज्ञा क्रियते ॥ १२ ॥
गन्ते इस सत्र से ग का अनुवर्तन होता है । 'है, इससे द्विमात्र का उपलक्षण
समझना, तब सूत्रार्थ यह होता है-द्विमात्र की गुरु संज्ञा होती है ॥ १२ ॥
लौ सः ॥ १३ ॥
स इति गकारस्य परामर्शः। स गकारो छिमात्रो द्वौ लघू कृत्वा
गणयितव्यः ॥ १३॥
'स' इससे गकार का परामर्शकर लेना चाहिये, उस 'ग' अर्थात् गुरुसंज्ञक
द्विमात्रिकको दो लघु वर्गों की तरह गिनना चाहिये ॥ १२ ॥
ग्लौ ॥१४॥
भधिकारोऽयमाशास्त्रपरिसमाप्तेः । यत्र विशेषान्तरं न श्रूयते तत्र
'ग्लौ' इत्युपतिष्ठते, 'गायच्या वसवः (पि० सु०३।३) इत्येवमादि-
पत्। प्लुतेनेह व्यवहारो नास्ति ॥१४॥
प्रथमोध्यायः। १५ इस शास्त्र की समाप्ति पार्यन्त 'ग्लो इस सूत्र का अधिकार रहेगा। अर्थात् जहां पर विशेष विधिका श्रवण न रहेगा वहां पर जैसे गायत्री का पाद कहने से आठ समझा जाता है अर्थात् गायत्री के पादशब्द से आठ की उपस्थिति होती है उसी प्रकार 'ग्लो' से गुरुलघु की उपस्थिति होगी। परन्तु इस शास्त्र में प्लुत का व्यवहार नहीं किया जायगा। जैसे आसुरी पञ्चदश (२॥३) सूत्र में वृत्तिकार कहेगें 'तानि च अक्षराणि ग्लो इत्यधिकारवशात् 'गुरुणि लघुनि च' आसुरी गायत्री पन ह अक्षरों की होती है वह पन्द्रह अक्षरों से "ग्लो" इसके अधिकार होने के कारण गुरु संज्ञक और लघु दोनों का ही ग्रहण करना चाहिये ॥ १४ ॥ अष्टौ वसव इति ॥१५॥ अत्र शास्त्रे वसव इत्युच्यमानेऽष्टसंख्योपलक्षिता गुरुलघुस्वरूपा वर्णा गृह्यन्ते । लौकिकप्रसिद्ध्युपलक्षणार्थमिदं सूत्रम् । तेन चतुर्णा समुद्राः, पञ्चानामिन्द्रियाणि, इत्येवमादयः संचाविशेषा लौकिकेभ्यः प्रत्येतव्याः। इतिकारोऽध्यायसमाप्तिसूचकः ॥ इह भ्यादीनामुपादानप्रयोजनं वर्ण्यते-अध्ययनाद्धोभवति । यस्य धीस्तस्य श्रीः, बुद्धिपूर्वकत्वाद्विभूतेः । यस्य श्रीस्तस्य स्त्री, अर्थमूलकत्वादाहस्थ्यस्य । 'वरा सा' इत्यनेन सर्वेषां स्त्रीसाधनो. पायानां बुद्धरुपायस्य महात्म्यं दर्शयति । तथा चोक्तम्- 'मर्धाङ्गुलपरीणाहिजिह्वामायासभीरवः । सर्वाङ्गोणपरिक्लेशमबुधाः कर्म कुर्वते ॥" तत्राह शिष्य:-'का गुहा' ? गुहाशब्दः स्थानवाचकः । का गुहा यत्रासौ तिष्ठति ? उपाध्यायो व्रते-'वसुजा' । पृथिव्यां लभ्यते धीर्मात्र विषादः कर्त्तव्यः । पुनरप्याह शिष्य:-सा ते क ? सा धीस्त्वयोपदि- शा पृथिव्यां काश्रयस्थितेन लभ्यते ? । तत्रपुनराचार्य आह–'गृहे' पुनरप्याह शिष्यः-'कदास स गृहस्थः पुरुषः कदा कस्मिन्काले तां धियं प्राप्नोति । ततोऽन्तरं गुरुराह-'ध्रादिपर धारणार्थावबोधप- रोऽसौ यदा स्यात्तदा धियं लभते । भूयोऽपि शिष्यः पृच्छति-'किं १६ सटीकपिङ्गलच्छन्द-सूत्रे- वदः कि कुर्वन्नसौ तां धियं लभते ? तद्वद । तत्राह गुरु-नह सन्' हासादिचापल्यमकुर्वाणस्तां धियं लभत इत्यर्थ ॥ १५ ॥ इति भट्टहलायुधकृतायां छन्दोवृत्तौ प्रथमोऽध्यायः । इस छन्दशास्त्र मे 'वसु' शब्द से गुरु और लघु संज्ञक आठ अक्षरों का बोध करना चाहिये। इस सत्र से लोक मे जितनी संख्याबोधक शब्दों को प्रसिद्धि है उन सबों का उपलक्षण समझना । जैसे समुद्र से चार का, इन्द्रिय से पांच का, रस से छः का, दिशा शब्द से दश का, इस प्रकार लौकिक संज्ञायोंसे ज्ञान कर लेना चाहिये इस सूत्र में इति शब्द अध्याय समाप्ति का द्योतक है प्रथम अध्याय समाप्त हुआ यही सूचित कर रहा है म् , य, र् आदि संज्ञा विधान करने के लिये धी आदि शब्दों का उपादान सुत्रकार ने क्यों किया इसका उत्तर भट्ट हलायुध इसप्रकार दे रहे हैं-अध्ययन से ही बुद्धि बढ़ती है, जिसकी बुद्धि है उसी को लक्ष्मी मिलती है क्यों कि बुद्धि के विना कोई व्यवसाय नहीं किया जा सकता है बल्कि जो अधिक बुद्धिमान् है वही पुरुष अनेक प्रकार के विचित्र उपायों द्वारा अर्थ कमा लेते हैं और जिसके समीप अथ है उसको स्त्री मिल ही जाती है अथवा कहना चाहिये कि गार्हस्थ्य सञ्चालन अर्थोपा- र्जन के ऊपर निर्भर करता है। "वरासा' इस सूत्र से बुद्धि की प्रशंसा की जाती है वह बुद्धि अन्यान्य अर्थोपार्जन साधनो से श्रेष्ठ है कहा भी है कि- आधा अङ्गुल विस्तृत जिह्व । प्र के कष्ट से डरे हुए मूर्खलोग जिससे समस्त शरीर में कष्ट होता है । ऐसे कर्म करते हैं अध्ययन से केवल जीभ का ही कष्ट होता है परन्तु अध्ययन से डरने वाले लोगों को शारीरिक परिश्रम से ही अर्थोपार्जन करना पड़ता है यही इसका तात्पर्य है। फिर शिष्य पूंछता है कि 'कागुहा' स्थान कहां है अर्थात् जहां बुद्धि प्राप्त हो सकती है वह स्थान कहां है ? उपाध्याय कहता है कि 'बसुधा' अर्थात् पृथ्वी में ही बुद्धि मिल सकती है, इसलिये दुःख नहीं मानना चाहिये। शिष्य पूछता है. 'सा ते कर जिस बुद्धि प्राप्त करने का उपदेश आप दे रहे हैं वह बुद्धि पृथ्वी की किस जगह रहकर प्राप्त की जा सकेगी? गुरु कहता है-'गृहे' घर में ही बुद्धि मिल सकती है उसके लिये कहीं भन्यत्र जाने की आवश्यकता नही हैं।
प्रथमोध्यायः। शिष्य पूछता है 'कदा सः' वह गृहस्थ पुरुष किस कालमें बुद्धि प्राप्त करता है? इसका उत्तर है 'ध्रादिपरः' जब गृहस्थ पुरुष निर्जन गृह में बैठकर चित्तको किसी एक लक्ष्य में स्थिर कर देता है तब इस प्रकारकी योगका छठा अङ्ग धार. गासे चित्त स्थिर और शान्त हो जाता है और चित्तके शान्त होने से ही बुद्धि में सूक्ष्मता आती है । इससे आचार्य बुद्धि प्राप्त करनेका सर्वोत्तम उपाय धारणा का उपदेश दे रहे हैं। शिष्य फिर पूछता है। किंवद' क्या करता हुआ गृहस्थ बुद्धि प्राप्त कर सकता है अर्थात् बुद्धि प्राप्त करनेका साधारण उपाय क्या है ? उत्तर है 'न हसन्' हास्य आदि चाञ्चल्य अर्थात् जिस क्रियासे मनमें चा. ञ्चल्य उत्पन्न होता हो ऐसी कियाको त्याग देनेसे ही बुद्धि प्राप्त की जा सकतीहै। अर्थात् किसी प्रकारसे चित्तवृत्तिके निरोध करनेसे ही बुद्धि प्राप्त हो सकती है इति सान्यालोपा श्रीअयोध्यानाथशास्त्रि विरचितायां कादम्बिन्याख्य भाषा टीकायां प्रथमोऽध्यायः । गण चक्रम् । गणस्वरूपम् SSS ISS संख्या गणनाम १ मगणः २ यगणः ३ रगणः सगणः तगणः SIS गणदेवता भूमिः जलम् अग्निः वायुः व्योम सूर्यः गणफलम् लक्ष्मी बृद्धिः दाहः दूरगमनम् शुन्यम् रोगः SSI ६ जगणः S। यशः সাগঃ नगणः स्वर्गः सुखम् २पि० छ० १८ सटीकपिङ्गलच्छन्दःसूत्रे- द्वितीयोऽध्यायः। अथ छन्दोऽधिकारः-- (१)छन्दः ॥ १॥ अधिकारोऽयमाशास्त्रपरिसमाप्तेः। इत ऊध्वं यद्वक्ष्यामश्छन्द. स्तत्रोपतिष्ठते । छन्दःशब्देनाक्षरसंख्यावच्छेदोऽत्राभिधीयते ॥१॥ कादम्बिनी। इस शास्त्रकी समाप्ति पर्यन्त छन्दःशब्दका अधिकार रहेगा। इसके अन- न्तर जो कहा जायगा उसमें 'छन्दः' की उपस्थिति होगी। छन्दः शब्दसे यहां पर अक्षरोंकी नियत संख्या विशिष्ट वाक्य समझना ॥ १ ॥ अथ गायत्र्यधिकार:- (२.गायत्री ॥२॥ अधिकारोऽयमाद्वादशसूत्रपरिसमाप्तेः । 'तान्युष्णिग- (पि० २११४) इत्यादिसूत्रात्प्राग्यदुच्यते छन्दस्तद्वायत्रीसंशं वेदितव्यम् ॥२॥ वारहवें सूत्र पर्यन्त गायत्री शब्दका अधिकार रहेगा। तान्युणिक् ।२।१७ इत्यादि सूत्रसे पहले जो छन्द कहा जायगा उसे गायत्री संज्ञक समझना चाहिये । दैव्येकम् ॥ ३ ॥ एका(३)क्षरं छन्दो दैवी गायत्री संज्ञायते । तत्रायं प्रदर्शनोपाय:- (१) छन्दांसि छाद्नात् (नि०७-३-१२ ) छदि संवरणे, संवृणोति हृदयमानन्दातिरेके. णेति छन्दः। हादकत्वमेवच्छन्दस्त्वं 'चदि' आहादे असुनि प्रत्यये चन्देरादेच्छत्वे च कृते छन्द इति वैयाकरणाः। (२) गायत्री। गायतेः स्तुतिकर्मणः ॥ (नि. ०७ या० ३ ख. १२) गीयन्ते स्तूयन्ते देवा यया सेत्यर्थः । त्रिगमना वा विपरीता (नि ७३।१८) अथवा त्रिषु. ऋग्यजुः सामसुगमनं पादशो यस्याः सा । विपरीता वर्णव्यत्ययमापन्ना (त्रि-गायत् गायत्री) गायतो मुखादुदपतत् इति च ब्राह्मणम् । (नि० ७।३।१२।६) गायतो ब्रह्मणो मुखात् त्रिभ्यो वेदेभ्यः सकाशात उदपतत् निरगादिति तदर्थः। गायन्त त्रायते यस्मात् गायत्री सा ततः स्मृता । इति च स्मृतिवचनम् । (३) एकाक्षर छन्दः वेदे देवी गायत्री संशक भवति । दैवी गायत्र्यादीनामुदाहरणानि वृत्तिकारेण न प्रदर्शितानि तथापि यथा लब्धं प्रदयिष्यन्ते तानि कथंचिदुन्नेयानि । दवी गायत्र्या उदाहरणं यथा-ओ३म् ।
द्वितीयोऽध्यायः। चतुरङ्गक्रीडायामिव चतुःषष्टिकोष्टान् लिखित्वा (प्रथमपङ्क्तो आर्षीनाम लिखित्वा द्वितीयादिकोष्ठेघटानामुपरि गायत्र्यादिलप्त. च्छन्दसा नामानि विन्यसेत् । ) तत्र द्वितीयायां पङ्क्तो प्रथमे कोष्ठे देवीशब्दं विन्यसेत् , संज्ञाज्ञापनार्थम् । द्वितीये एक संख्याक- मतविन्यसेत् ॥ ३॥ एकाक्षर छन्दको दैवीगायत्री कहते हैं । गायत्री उणिक आदि सात प्रकार छन्द होते हैं। उनमें हर एकके देवा, आसुरी, प्राजापत्या, याजुषी, साम्नी, आर्षी और ब्राह्मी, ये आठ भेद होते हैं। कौन कितने अक्षरों का होता है इसे अच्छी तरह समझाने के लिये हलायुधभहने एक मण्डल तैयार किया है उस मण्डलको इस अध्याय की समाप्तिमें दिखलाया जायगा। उसके बनानेकी पद्धति यह है कि सतरज के खेल की तरह आठपंक्तिके चौसठ कोष्ठका एक मण्डल बनाओ। फिर उसकी पहली पंक्तिके प्रथम कोष्ठमें आषी ऐसा लिखो। द्वितीयसे अष्टम कोष्ठ तकके ऊपर भागमें क्रमशः गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुम् , बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप् और जगती छन्दोंका नाम लिखो पुनः द्वितीय पंक्तिके प्रथम कोष्ठमें देवी ऐसा शब्द लिखो । संज्ञा समझाने के लिये द्वितीय कोष्ठ में [१] अङ्क लिखना चाहिये ॥ ३ ॥ आसुरी पञ्चदश ॥ ४॥ (१)मासुरी गायत्री पञ्चदशाक्षरा । तानि चाक्षराणि 'ग्लो' (पि. सू० ११२०) इत्यधिकाराद्गुरूणि लघुनि च यथासम्भवं द्रष्टव्यानि । अत्र तृतीयायां पङ्क्तौ प्रथमे कोष्ठे मासुरोशब्दं व्यवस्थाप्य द्वितीये कोष्ठे पञ्चदश [१५] संख्या लिखेत् ॥ ४॥ पन्द्रह अक्षरोंकी असुरी गायत्री होती है । "ग्लो" ( १११४) गुरु और लघु का अधिकार चल रहा है इसलिये आसुरी गायत्री आदि शब्दों में कहे गये अक्षरों से गुरु और लघुसंज्ञक दोनोंका प्रहण करना चाहिये। पूर्वोक्त मण्डलकी तृतीय पंक्तिके प्रथम कोष्ठमें आसुरी शब्द लिखकर द्वितीय कोष्ठमें [१५]पन्द्रह अङ्क लिखना चाहिये ॥४॥ (१) पञ्चदशाक्षरा गायत्री प्रासुरी भवति । उदाहरणद्वयं यथा- (क) नमो वरुणाया धिष्ठितो वरुणस्य पाशः ॥ (शु० य०८२३) (ख) उपयाम गृहीतोऽसि मित्रावरुणाभ्यां त्वा॥ (शु० य० ७.९) । ।
सटीकपिङ्गलच्छन्दःसूत्रे-
प्राजापत्याष्टौ ॥ ५॥
(१)प्राजापत्या गायव्यष्टाक्षरा भवति। यत्र क्वचिद्वेदेऽष्टाक्षरं छन्द-
स्तत्प्राजापत्या गायत्रीति शेयम् । चतुर्थ्यामत्र पङ्क्तौ प्रथमे कोष्ठे
प्राजापत्याशब्दं लिखित्वा द्वितीयेऽष्ट 1] संख्याङ्क लिखेत् ॥ ५ ॥
जिस छन्दमें आठ [८] अक्षर हों उसे "प्राजापत्या" गायत्री कहते हैं ।
जहां पर किसी पदमें आठ अक्षरका छन्द हो उसे “प्राजापत्या गायत्री" सम-
झना । पूर्वोक्त मण्डल की चौथी पंक्तिके पहिले कोष्ठमें प्राजापत्या" शब्द लिखकर
दूसरे कोष्ठमें [] आठ ऐसा अङ्क लिखो ॥ ५ ॥
यजुषां षट् ॥ ६॥
(२)यजुषां गायत्री षडक्षरा भवति । यत्र कचिद्वेदे षडक्षरं छन्द-
स्तद्याजुषो गायत्रोति संज्ञायते । अत्र पञ्चम्यां पक्को प्रथमे कोष्ठे
याजुषोशब्दं व्यावस्थाप्य द्वितोये षट् [६] -संख्याई लिखेत् ॥ ६ ॥
जिस छन्दमें छः अक्षर हों उसे "याजुषी गायत्री" कहते हैं । जहां कहीं
वेदमें छः अक्षरोंका छन्द दाख पड़े उसे "याजुषी गायत्री" समझना। पूर्वोक्त
मण्डलकी पांचवीं पंक्तिके पहिले कोष्ठमें याजुषी शब्द लिखकर उसी पंक्तिके
दूसरे कोष्ठमें छः [६] अङ्क बैठाना ॥ ६ ॥
मान्नां द्विः ॥७॥
(१) प्राजापत्यागयत्र्या उदाहरणद्वयं-यथा
(क) अग्निर्व! ज्योतिर्वः।
(ख) ज्योतिः सूर्यः सूर्यों ज्योतिः ।
-
शु०य०३९
-
(ग) श्रप नः शांशुचद्रधम्
(शु० य० २२।१९)
(२) षडक्षरा गायत्री याजुषी संशका भवति । उदाहरणत्रयं यथा
(क) सुत्राम्णे पन्यस्व
(शु० य०१९।१)
(ख) अस्यश्विभ्यां पच्यस्व
(ग) 'वर्ष वृद्धांस' (य० ते० सं० १॥१॥२) ॥२॥
द्वितीयोऽध्यायः। (१)षडित्यनुवर्तते । द्विरिति क्रियाभ्यावृत्ति दर्शनात्करोतिर- ध्याह्रयते । द्वादशाक्षरेत्यभ्यावृत्त्या क्रियते । तेन द्विः कृता द्विगुणिता षटसंख्या साम्नी गायत्री भवति । यत्र क्वचिद्वेदे द्वादशाक्षरं छन्दः तत्साम्नां गायत्रीति संज्ञायते । अत्र षष्ठयां पङ्क्तौ प्रथमे कोष्ठे लाम- शब्द लिखित्वा द्वितीये द्वादश[१२] संख्या लिखेत् ॥ ७ ॥ पूर्वसूत्रसे (षट् ) इसपदकी अनुवृत्ति होती है 'द्विः' इस पदमें क्रियाकी आवृत्ति अर्थमें सुच् (२)प्रत्यय होता है । हिन्दीमें उइका अर्थ दोहराना या दो बार उधारण करना होता है। इससे छः संख्याके दोहरानेसे अर्थात् दोगुणा करने से जो संख्या होती हो वह संख्या "साम्नी गायत्री की आती है। तात्पर्य यह हुवा कि जहां कहीं वेदमें बारह । १२ ] अक्षरों का छन्द दीख पड़े उले "साम्नी गायत्री" समझना। पूर्वोक्त मण्डलकी छठी पंक्तिके पहिले कोठेमें साम शब्द. लखकर उसो पंक्तिके दूसरे कोठेमें बारह [१२] अङ्क रखना चाहिये ॥ ७ ॥ (३)ऋचां त्रिः॥८॥ षडित्यनुवत्ते । अत्रापि पूर्ववत् क्रियाभ्यावृत्तिः, तेन त्रिगुणिता षटसंख्या ऋचां गायत्रो भवति । यत्र क्वचिदेऽष्टादशाक्षरं छन्द- स्तदूचां गायत्री ज्ञेया । अत्र सप्तम्यां पङ्क्तौ प्रथमे कोष्ठे ऋक्शब्दं व्यवस्थाप्य द्वितीयेऽष्टादश [१] संख्याधुलिखेत् ॥ ८ ॥ (१) 'साम्नां द्वादश (१३०१२) इति-प्रातिशाख्यसूत्रेण "साम्नां स्याद् द्वादशाक्षरा" इत्याग्नेयच्छन्दःसार वचनेन च सामगायत्र्या द्वादशाक्षरत्वं सिद्धतीति शेयम् । उदाहरण्यं यथा- (क) वाचे में वक़दा वर्चसे पवस्व (शु० य० ७।२७) (ख) अग्नि पुरीष्यमगिरस्वद्भरामः । (शु० य०११।४७) (ग) घृतेन सीता मधुना समज्यताम् (शु० य० १२१७०) (२) द्वित्रिचतुभ्यः सुच (पा० सू० ५।४।१८) (३) आर्ची,गायत्री यथा- (क) नमो वञ्चते परिवञ्चते स्तायुनां पतये नमः (शु० य०१६।२१) 7 (ख) वसवस्त्वा धूपयन्तु गायत्रेण छन्दसाङ्गिरस्वत (शु० य० १११६०) सटोकपिङ्गलच्छन्दःसूत्रे- 'ष' इस पदकी अनुवृत्ति आती है। इस सूत्रमें भी क्रियाकी आवृत्ति पूर्ववत् समझना । छः संख्याको तीन से गुणा करनेपर जो संख्या होती है वही "आर्ची गायत्री" की संख्या है । अर्थात् जहाँ कहीं वेदमें आठारह [१८] अक्षरों का छन्द होता है। उसे "आर्ची गायत्री" समझना। अब पूर्वोक्त मण्डलकी सातवी पंक्तिके पहिले कोठेमें 'आर्ची' शब्द लिख- कर उसी पंक्तिके दूसरे कोठेमें अठारह १८ अङ्क रखो ॥८॥ द्वौ द्वौ साम्नां(१) वर्धेत ॥९॥ गायत्रीत्यनुवर्तते। साम्नां पङ्क्तौ गायत्री द्वौ द्वौ संख्याको गृ. (१) तत्र सामोणिक् यथा- उदायुषा स्वायुषोंदस्थाममृता 5 अनु ।' (शु० य० ४।२८) सामानुष्टुप् यथा- रात्रिः केतुना जुषता सृज्योति ज्योतिषा स्वाहा ।। (शु० य० ३६।२१) सामवृहती यथा- (क) दिवः सूनुरस्यैष ते पृथिव्याँलोक श्रारण्यस्ते पशुः । ( शु० य०६।६ ) (ख) परि माग्ने दुश्चरितादाधस्वा मा सुचरिते भज । (शु० य० ४।२८) सम्नीपडितर्यथा- (क) एधोऽस्येधिषीमहि समिदसि तेजोऽसि तेजो मयि धेहि ॥' (शु० य० ३८.२५) (ख) 'देवस्य वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम् ॥" (शु० य०५२६) सामत्रिष्टुप् यथा- (क) 'इन्द्रश्च सम्रावरुणश्च राजा तो ते भक्षं चक्रतुरन एतम् ॥ (शु० य०८:३७) (ख) 'उद्ययस्व वनस्यत ऊों मा पाह्य हस आस्य यशस्योदृचः ॥' (शु० य. ४.१०) सामजगती यथा- 'अनु वा माता मन्यतामनु पिताऽनु भ्राता सगर्योऽनु सखा सयूथ्यः॥ (शु. य० ४।२०) - द्वितीयोऽध्यायः। २३ होत्वा पूर्वात् पूर्वार्धेत यावदष्टमं कोष्ठं प्राप्नोति तत्र साम्नां पङ्क्तौ तृतीयादिषु कोष्ठेषु क्रमेण वधितान्यक्षराण्यकेन विन्यसेत् ॥ ६ ॥ इस सूत्र में भी "गायत्री" पदकी अनुवृत्ति आती है। छठी पंक्तिमें जो सामगायत्री की संख्या है उसे दो दो संख्यासे बढ़ाकर उसी पंक्तिके तीसरे कोठेसे आठवें कोठे तक बैठाना । अर्थात् छठी पति के दूसरे कोठेमें सामगा[४]यत्रीका अङ्क [१२] बारह है उसमें दो जोड़ने से तीसरे कोठेमें [१४] हो जाता है, पुनः चौदहमें दो जोड़ने से चौथे कोठेमें [१६] हो जाता है । इसी तरह पांचवें में [१८], छठे में [२०], सातवें में [२२], और आठवें में [२४] बैठेगा। तात्पर्य यह हुआ कि सामगा- यत्रीमें जो अक्षर संख्या है, उसी संख्यामें दो संख्या और जोड़ देनेसे सामो. णिककी अक्षर संख्या निकल आती है। इसी प्रकार सामानुष्टुप आदिको भी (ख) कोसि कतमोऽसि कस्यासि को नामासि । यस्य ते नामामन्महि यं त्वा सोमनातीतृपाम। (शु० य० ७।२९) (ग) दक्षिणामारोह त्रिष्टुप् त्वावतु वृहत्साम पञ्चदशस्तोमो ग्रीष्मऋतुः क्षत्रं द्रविणम्। (शु० य०१०११) पाची त्रिष्टुप् यथा- (क) एषा ते शुक तनूरे तद्वर्चस्तया सम्भव भ्राजं गच्छ । जूरसि धृता मनसा जुष्टा विष्णवे । (शु० य०४।१७) (ख) एता भसदनसुकृतस्य लोके ता विष्णो पाहि पाहि यज्ञ पाहि यज्ञपति पाहिमा यशनियम् ।। (ते सं० १११११) (ग) अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्या मितच्छकेयं तन्मे राध्यताम् । इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि (शु० य०२।१) आचीजगती यथा- (क) 'बधान देव सवितः परमस्या परावति शतेन पाशेयोऽस्मान् देष्टि यं च वयं द्विष्मस्त- मतो मा मौक। (ते० सं० १९९६) (ख) यस्ते अश्वसनिर्भक्षो यो गोसनिस्तस्य त इष्टयजुषस्तुतस्तोमस्य शस्तोक्यस्योप हृतस्योपहूतोभक्षयामि। (शु० य०८१२) २०१७ - । - - - - ।
। सटीकपिङ्गलच्छन्दःसूत्रे- अक्षर संख्या निकल आती है। जैसे सामगायत्री की अक्षर संख्या १२ है इसलिये १२+२0१४ सामोष्णिक् । १४ + २०१६ सामानुष्टुप । १६+२-१८ साम. वृहती। १८+२२० सामपतिः । २०+२=२२ सामत्रिष्टुप् । २२ + २०२४ सामजगती । त्री(१)स्त्रीनृचाम् ॥ १०॥ गायत्रीत्यनुवर्तते । ऋचां गायत्री त्रोटीन संख्याङ्कान् गृहीत्वा पूर्ववद्वर्धेत । अत्राप्यचां पङ्क्तौ तृतीयादिषु कोष्ठेषु त्रि[३]संख्याङ्क: क्रमेण वृद्धमङ्घ स्थापयेत् ॥ १० ॥ इस सूत्र में भी गायत्री पदका अनुवर्तन होता है, सातवी पति जो "आ- चर्ची गायत्री" का कोष्ठ है उसमें [१८] अठारह संख्या है। उस अठारह संख्या में तीन जोड़नेसे "आर्ची उष्णिक की अक्षर संख्या आती है, पुनः तीन जोड़ने L - (१) आची उष्णिक यथा- (क) तदग्निराह तदु सोम आह पूषा मा धात्सुकृतस्य लोके । (अथ० सं० १६।९।२) (ख) इन्द्रस्य स्यूरसीन्द्रस्य ध्रुवोऽसि ऐन्द्रमसि वैश्वदेवमसि (ते. आ. १०।२७) आची अनुष्टुप् यथा- (क) 'अन्नात्प रस्रतो रसं ब्रह्मणा व्यपिबत् क्षत्रं पयः सोम प्रजापतिः । (शु० २०१९/७५) (ख) 'देवो वः सवितोत्पुनात्वच्छिद्रेण पवित्रेण बसोः सूर्यस्य रश्मिभिः । ते. .सं. ११३५१) प्राची बृहती यथा- (क) मध्वा यश नक्षति प्रैणानो नराशंसो अग्निः सुकृदेवः सविता विश्ववार: (अ० सं०१५।२७३) (ख) उपयामगृहीतोऽसि विश्वम्यस्त्वा देवेभ्यः एष ते योनि विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः ॥ (शु० य०७३३) प्राची पंक्तियथा- (क) 'वसन्त हन्तुरन्त्यो ग्रीष्महन्युरन्त्यः। वर्षाण्यनुशरदो हेमन्तः शिशिर हात्रुरतः ।।' (सा० सं० पू० ६२।३।।१३) ।
द्वितीयोऽध्यायः । २५ - से आर्ची अनुष्टुप्की अक्षरसंख्या आ जाती है। इसी प्रकार लगातार तीसरे कोठेसे आठवें कोठे तक पूर्व की तरह [३] तीन अङ्क-जोड़े जानेसे क्रमशः तीसरे कोठेमें २१, चौथे में २४, पांचवें में २७, छठे में ३०, सातवें में ३३, और आठवें में ३६ अङ्क बैठेगा। अतएव १८ शक्षरों की आर्ची गायत्री, २१ अक्षरोंका 'आर्ची उष्णिक', २४ का "आर्ची अनुष्टुप्', ५२ की "आची बृहती" ३० की "आर्ची पंक्ति, ३३ की "आर्ची त्रिष्टुप्" और ३६ की "आर्ची जगतो" होती है । (१)चतुरश्चतुरः प्राजापत्यायाः ॥ ११ ॥ प्राजापत्यायाः पक्तौ गायत्री चतुरश्चतुरः संख्याङ्कान् गृहीत्वा (१) प्राजापत्योष्णिगादीनां क्रमशः उदाहरणानि प्रयन्त- तत्र प्राजापत्योष्णिक यथा- निर्दग्ध रक्षो निर्दग्धा अरातयः ।' (ते० सं०का० १३० १ अ० ७) प्राजापत्यानुष्टुप् यथा- (क) रेवती रमध्वं बृहस्पते धारयावसूनि (शु० य०६८) (ख) यथायं वायुरेजति यथा समुद्र एजति (शु० य० ना२%) प्राजापत्याबृहतो यथा- (क) 'अपां पेरुरस्यापो देवी स्वदन्तु स्वातं चित्सई बहविः ।। (शु० य० ६.१०) (ख) 'भग्न अङ्गिरः शतं ते सन्त्वावृतः सहस्रं त उपावृतः ॥' (शु० य० १२१८) प्राजापत्या पक्तिर्यथा- ( क ) 'उत श्रवसा पृथिवी स *सो दस्व महाँ असि रोचस्व देववीतमः ॥' (शु० य० ३८११७) (ख)'प्र व इन्द्राय वृत्रहन्तमाय विप्राय गाथं गायत यं जुजोषषते ॥' (साम० सं० पू. ५।२।६।१०) प्राजापत्यात्रिष्टुप् यथा- (क) 'उपयामगृहीतोऽसीन्द्रायस्वा षोडशिन एषते योनिरिन्द्राय वा षोडशिने (शु० य० ॥३४) । - - २६ सटीकपिङ्गलच्छन्दःसूत्र- वर्धेत । अत्रापि तृतीयादिषु कोष्ठेषु विन्यासः पूर्ववदेव ॥ ११ ॥ चौथी पंक्तिमें "प्राजापत्यागायत्री" चार चार संख्या से बढ़ती हुई तीसरे कोठेसे आठवें कोठे तक क्रमशः बैठेगी। अर्थात् उसी पंक्तिके दूसरे कोटेमें "प्राजापत्या गायत्री” को संख्या [८] है अतएव [४] से बढ़ती हुई तीसरे कोष्ठ में बैठेगी १२, चौथेमें १६, पांचवें में २०, छठेमें २४, सातवेंमें १८ और आठवें में ३२ । इसलिये “प्राजापत्या उष्णिक" की अक्षर संख्या १२, “प्राजा. पत्या अनुष्टुप की १६, प्राजापत्या बृहती, की २०, "प्राजापत्या पंक्ति" की २४, "प्राजापत्या त्रिष्टुप्" की २८, और "प्राजापत्याजगती” की अक्षरसंख्या ३२ समझना चाहिये। (२)एकैकं शेष ॥ १२॥ ( ख ) 'उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय वा मरुस्वत एष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते ।' (शु० य०७३८) प्राजापत्या जगतो यथा- ( क ) हरिः पतङ्गः पटरी सुपर्णः। दिविक्षयो नभसा य एति सन इन्द्रः कामवर- ददातु ॥ (ते० प्रा० ३११) (ख) प्रत्युष्ट रक्षः प्रयुष्टा रातयो निष्टनरक्षो निष्टता अरातयः । उवन्तरिक्षमन्वमि ॥ (शु० य०१७) (१) एकैकं शेषे इति सूत्रेण दैव्युष्णिगादीनां यांजुष्युष्णिगादीनाञ्चैकदेव स्वरूप प्रदर्यतः उमयोरेकधर्मस्वात् । तत्र देव्युष्णिगादन निदर्शनानिसंस्थाप्यन्तेदैवी उष्णिक यथा- (क) 'मुक (ते० प्रा०प्र०१० अ० २७ ) (ख) 'कोऽसि (शु० य० ७॥२९) (ग) मधु (शु० य०३७.१३) दैव्यनुष्टुप् यथा- (क) 'मखोऽसि (ते० प्रा० ४।२) (ख) 'धूरसि (शु० य०१४) (ग)'इषेवा' (शु य० १११) देवी वृहती यथा- (क) भूर्भुवः स्वः।' (शु० य०३५) द्वितीयोऽध्यायः। (शु० य० १७/१२) (ख) 'स्वविदे वेट । दैवी पंक्ति थथा- (क) बहिषदे वेट ।। (ख) 'नमो गणेभ्यः। । (शु० य०१७/१२) (शु० य०१६॥२५) (ग ) 'नमः सभाग्यः।" (शु० य०१६।२४) (शु० य० २२।२८) (शु० य०५१) - (शु० य० १६१४१ (शुय० १६६३२) (शु० य०८२३) (शु० य०६।२१) देवी त्रिष्टुप् यथा- (क) 'नक्षत्रेभ्यः स्वाहा (ख) 'अग्नेस्तनूरसि ।' दैवी जगती यथा- (क) 'नमः शङ्कराय च।' (ख) 'कनिष्ठाय च नमः। इदानी याजुष्युष्णिगादीनां निदर्शनानियथाक्रम प्रदयन्ते तत्र याजुष्युष्णिक यथा- (क) 'माहि भूमा पृदाकुः। (ख) 'समुद्रं गच्छ स्वाहा। याजुष्यनुष्टुप् यथा- ( क ) 'अनु त्वा देवबीतये (ख) 'उपयामगृहीतोऽसि । (ग) दिव्यं नमो गच्छ स्वाहा याजुषी बृहती यथा- 'रक्षोहणं वलगहनम् । 'मित्रावरुणो गच्छ स्वाहा।' याजुषी पक्ति यथा- ( क ) होता यक्षदश्विनौ छागस्य । (ख ) उपयामगृहीतोऽसीत्वा। (ग) 'उपयामगृहीतोऽस्यूजे त्वा।' (शु० य०५:९) (शु० य० ७१२५) (शु० य०६।२१) (शु० य०१२३) (शु० य०६।२१) - (शु० य० २११४३) (शु० य० ७३०) (शु० य०७।३०) " २८ सटीकपिङ्गलच्छद-सूत्र- अनुक्तः शेषः। यत्र गायत्र्यां संख्यावृद्धिोक्ता सैकैकं संख्या गृहीत्वा वर्धेत । दैवी याजुषी च शेष शब्देनोच्यते। आसुर्या विशेषा. भिधानात् । तेन दैवी तृतीयादिषु कोष्ठेषु क्रमेणैकैकमक्षरं गृहीत्वा वर्धेत । तथैव याजुषी ॥ १२॥ जिन गायत्रियोंके सम्बन्ध में विशेष विधान नहीं किया गया हो उन की अक्षर संख्या एक संख्यासे बढ़ती हुई तीसरे कोठेसे आठवें कोठे तक बैठेगी। देवी और याजुषी ही ऐसी गायत्री हैं जिनकी संख्या वृद्धि का विधान नहीं है वे "शेष शब्द से कही गई है। आसुरी गायत्रीका विशेष विधान आगेके सुत्रसे करने हो वाले हैं। उसकी भी संख्यावृद्धि नहीं होती है। बल्कि संख्याका ह्रास होता है। इसलिये मण्डलकी दूसरी और पांचवी पंक्तिमें जो देवी और याजुषी कोष्ठ हैं उसमें दैवी गायत्रीको अक्षर संख्या [१] एक और याजुषी गायत्री की अक्षर संख्या [६] छः है उनकी वृद्धि आठवे कोठे तक एक संख्याके द्वारा होती चलेगी। अर्थात् दैवी उष्णिक को अक्षर संख्या [२], देवी अनुष्टुप् की [३], दैवी बृहती को [४], दैवी पंक्तिकी [५], दैवी त्रिष्टुपको, [६] और देवी जगती की अक्षर संख्या [७] हैं। याजुषी उष्णिकको अक्षर संख्या [५], याजुषी अनुष्टुपकी [८], याजुषी बृहतरी की, [९], याजुषी पंक्ति की [१०], याजुषी त्रिष्टुप् की [१५] और याजुषी जगतीकी अक्षर संख्या [१२] हैं। (१)जह्यादासुरी ॥ १३ ॥ याजुषी त्रिष्टप् यथा- (क) होता यक्षत् सरस्वती मेषस्य । (शु० य० २११४४) - (ते० प्रा० ४।२।१५) (ख) अग्निजा असि प्रजापतेरेत: याजुषी जगती यथा- 'नमः वाय च प्रतिश्रवाय च।' (शु० य० १६३४) - नमः शर्वाय च पशुपतये च तै० सं०४।५।५।२) (१) इदानीमासुय्युष्णिगादीनां निदर्शनानि यथालब्धानि संख्थाप्यन्ते । तत्रासुर्युष्णिक यथा- (क) 'उपयामगृहीतोऽस्य हसस्पतये त्वा । (शु० य० ७२७) - - " द्वितीयोध्यायः । २% एकैकमित्यनुवर्तते । आसुरी गायत्रो एकैकमक्षरं त्यजेत् । उत्त. रेषु कोष्ठेषु बृद्धौ प्राप्तायां हासो विधीयते । तेऽङ्काः क्रमेण स्थाप्या:१३॥ पूर्वसूत्रसे एकैक पदका अनुवर्तन होता है तृतीय पंक्तिमें आसुरी गायत्री एक एक संख्या छोड़ती हुई द्वितीय कोष्ठसे अष्टम कोष्ट तक क्रमशः बैठेगी। जैसे तृतीय पंक्तिके द्वितीय कोष्ठ में आसुरी गायत्रीकी अक्षर संख्या [१५] पन्द्रह है, उस [१५] से [१] घटाकर तृतीय कोष्ठमें [१४], बैठेगी उस से पुनः [१] एक घटानेसे जो [१३] संख्या होगी वह चतुर्थ कोष्टमें वैठेगी। इसी प्रकार पञ्चम कोष्ठ में [१२], षष्ठ में [११], और सप्तम में [१०] और नवम कोष्ठ में [९] संख्या बैठेगी ॥१३॥ (ख) चतुयो मे वर्षोंदसौ बर्च ते पवेथाम् । (शु० य० ७॥२७) आसुय॑नुष्टुप् यथा- (क) 'उपयामगृहीतोऽसि तपस्यायत्वा (शु० य० ७।३०) (ख) प्राणाय मे वर्गोंदा वर्चसे पवस्व ।। (शु० य० ७२७) (ग) न्यानाय मे बर्दा वर्च से पवस्व ।' (शु० य० ७२७) प्रासुरीबृहती यथा- (क) 'बाचे मे वर्गोंदा वर्चसे पवस्व ।' (शु० य० ७२७) (ख)उपयामगृहीतोऽसि मधवे त्वा (शु० य० ७।३०) आसुरीपंक्ति यथा- (क) इन्द्र मरत्व इह पाहि सोमम् (शु० य०७३५) (ख) अरिप्रा आपो अप रिप्रमस्मत् ।' (श्रथ० सं० १२।१।१०) आसुरी त्रिष्टुप् यथा- उरुष्य राय एषो यजस्व ।' (शु० य०७४) स्वधा पितृभ्यःपृथिविषभ्यः। (अथ० सं० (१८१४७८) श्रासुरोजगती यथा- (क) सोमायलवाना लभते । (शु० य. २४।२४) (ख) 'मधुत्वा मधुला करोतु ।' (ते. आ० ४।२।१८) । T - - सटीकपिङ्गलच्छन्दःसूत्रे- अर्थात् आसुरी उष्णिककी अक्षर संख्या [१४], आसुरी अनुष्टुप्की अक्षर संख्या (१३], आसुरी बृहतीको [१२], आसुरी पंक्तिकी [११], आसुरी त्रिष्टुप् की [१०] और आसुरी जगतीकी अक्षर संख्या [९] होती है ऐसा समझना चाहिये। तान्युष्णिगनुष्टुब्बृहतीपतित्रिष्टुब्जगत्यः ॥१४॥ तानि छन्दांसि गायत्र्याः पुरस्तात् उष्णिग-अनुष्टुब्हती-पति- त्रिष्टुब्-जगत्याख्यानि क्रमेण भवन्ति ॥ १४ ॥ गायत्री छन्द के अनन्तर द्वितीय कोष्ठसे अष्टम कोष्ठ पर्यन्त क्रमशः उ. णिक , अनुष्टुप् , बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप् और जगती छन्द होंगे। अर्थात् गायत्री छन्दके जैसे देवी, आसुरी, प्राजापत्या, याजुषी आदि भेद होते हैं उसी प्रकार उष्णिक आदि छन्दके भी भेद होते हैं। ये भेद पूर्व दिखाये गये हैं। तिस्रस्तिनः सनाम्न्य एकैका ब्राह्मयः (१)।।१५।। (१) इदानी ब्राझी गायत्र्यादीनां यथालब्धानि निदर्शनानि प्रदश्यन्ते । तत्र ब्राह्मी गायत्री यथा- देवी द्यावापृथिवी मखस्य बामद्य शिरो राध्यास देवयजने पृथिव्याः। मखाय त्वा मखस्यत्वाशीयरें। (श. य०३७३) ब्राह्मयष्णिक यथाः देवीद्वारो अश्विना भिषजेन्द्रे सरस्वती। प्राणं न वीर्यं नसि द्वारो दधुरिन्द्रियं वसुवने बसु- (शु० य० २११४९) ब्राहम्यनुष्टुप् यथा- अबभून निचुम्पुण निचेहरसि निचुम्पुणः । अवदेवैर्देवकृतमेवोऽयासिषमवभय॒मय॑कृतं पुरुराशो देव रिषस्पाहि ॥ (शु० य० ३४८) ब्राझीबृहती यथा- #तु वाजी कनिक्रदन्नानंदद्रासमा पत्वा भरनग्निं पुरीष्य मा पाधायुषः पुरा। वृषानिवृषणं भरनंपा गर्भऽसमुद्रियम् । प्रश्न आयाहि वीतये ॥ (शु० य०११३४६) ग्राहीपंक्तिर्यथा- । । धेयस्य व्यन्तु यज॥ - - T 1 द्वितीयोध्यायः। m याजुषों पङ्किमारभ्य तिस्रो याजुषी, साम्ती, श्रार्ची चेति गा. यव्यो मिलिता एका षट्त्रिंशदक्षरा ब्राह्मी गायत्रो भवति । सनाम्न्य इत्येकसंज्ञा इत्यर्थः । तिनस्तिस्त्र इति वीप्सया परेषामुष्णिगादोना- मिह ग्रहणम् । तथैकैकेति वोप्सया ताएव ब्राह्मयो भवन्तोति विधी. यते । ब्राह्मय इति गायच्यादीनां जगतीपर्यन्तानां विशेषणम् । एवं याजुषो, साम्नी, आर्ची चोणिड्मिलिता एकीकृता द्वाचत्वारिंशद- क्षरा ब्राहूम्युणिग्भवति । एवं तिस्रोऽनुष्टुभः संगताः सत्योऽष्टाच. त्वारिंशदक्षरैका ब्राहम्यनुष्टुव् भवति । ता एव तिस्रो बृहत्यः संग. ताः सत्यश्चतुःपञ्चाशदक्षरा एका ब्राह्मी बृहती भवति । ता एव तिस्त्रः पङ्क्तयः संगताः षट्यक्षरा एका ब्रह्मोपङ्क्तिर्भवति । ता एव तिन. स्त्रिष्टुभः संगतः षषष्ठयक्षरा एका ब्राह्मो त्रिष्टुप् भवति । ता एवं तिनो जगत्यः संगता द्वासप्तत्यक्षरा एका ब्राह्मो जगती भवति । मत्राष्टभ्यां पङक्तौ प्रथमे कोष्टे ब्राह्मोशब्दं व्यवस्थाप्य द्वितीयादौ क्रमेण गायत्र्यादीनां षत्रिंशदा [३६] द्यान् विन्यसेत् ॥ १५ ॥ याजुषी, सान्नी और आर्ची गायत्री इन तीनों को मिला देनेसे (३६) अक्षरों अदित्यास्त्वा मूदन्नानिम्मि देवयजने पृथिव्या इडायास्पदमसि वृतवत् स्वाहा । अस्मे रमस्वास्मे ते बन्धुत्ने रायो मे रायो मा व्या रायस्योषेणवियोष्म तोतो रायः ।। (शु० य०४।२२) ब्राझीत्रिष्टुप् यथा- षोडशी स्तोम ओजो द्रविणं चतुश्चत्वारिक शस्तोमो वर्गों द्रविणन् । अग्नेः पुरीषमस्यप्तो नाम तो त्वा विश्वे अभिगृणन्तु देवाः । स्तोम पृष्ठा घृतवतीह सीद प्रजावदस्मे द्रविणायजस्व ॥ (शु० य० १६३५ ) ब्राह्मीजगती यथा- उद्दिव स्तमानान्तरिक्षं पुणदृहस्व पृथिव्यां धुतानस्वा मारुतो मिनोतुमित्रावरूणौ । भ्रवेण धर्मणा। ब्रह्मवनि स्वा क्षत्रवनि रायस्पोषवनि पहमि । ब्रह्म दृह क्षत्रं दुहायुदह प्रजा दृह (शुय० ५।२७) ३२ सटीकपिङ्गलच्छन्दःसूत्रे- की एक "ब्राह्मी गायत्री होती है। इसी प्रकार याजुषी, साम्नी, और आर्ची, इन तीनों उष्णिक छन्दों को मिला देनेसे [४२] अक्षरोंकी एक ब्राह्मी उष्णिक, याजुषी, साम्नी, और आर्ची अनुष्टुप , इन तीनोंके मिलजानेसे [४८] अक्षरों का एक ब्राह्मी अनुष्टुप् , याजुषी, साम्नी, और आर्ची बृहती, इन तीनों के भिल जानेसे [५४] अक्षरों की एक "ब्राह्मी बृहती" याजुषी, साम्नी और आर्ची पंक्ति के मिल जाने से ६० अक्षरोंकी एक 'ब्राह्मी पंक्ति' याजुषी, साम्नी और आर्ची त्रिष्टुपके मिल जानेसे ६६ अक्षरोंमें एक "ब्राह्मी त्रिष्टुप्" एवं याजुषी, सानी और आर्ची, इन तीन प्रकार जगती छन्दोंका मिला देने से ७२ अक्षरों की एक ब्राह्मी जगती होती है। अब पूर्वोक्त मण्डल की अष्टम पंक्ति के प्रथम कोष्ठमें ब्राह्मी शब्द लिखकर उसी पंक्तिके द्वितीय कोष्ठमें [३६], तृतीय कोष्ठ में [४२], चतुर्थ कोष्ठमें [४०], पञ्चम कोष्ठमैं [५४], षष्ठ कोष्ठ में [६०], सप्तम कोष्ठ में [६६] और अष्टम कोष्टमें [२] इन अकों को बैठाना चाहिये । प्राग्यजुषामाय(१) इति ॥ १६ ॥ (१) इदानीं यथालब्धं भाषीगायत्र्यादीना मुदाहरणानि प्रदश्यन्ते तत्राी गायत्री यथा- (क) शं नो देवीरभीष्टय आपो भवन्तु पीतये । शंयोरभिस्रवन्तु नः ॥ (शु० य० ३६४१२) (ख) आपो हिष्टा मयो भुवस्तान ऊर्जे दधातन । महेरणाय चक्षसे । (शु० य०३६।१४) आयुष्णिग यथा- (क) अग्ने वाजस्य गोमंत ईशानः सहसो यहो । अस्मे धेहि जात वेदो महि अवः ॥ (शु० य० १५६३५) (ख) व्यायुषं जमदग्नः कश्यपस्य व्यायुषम् । यद्देवेषु व्यायुषं तन्नो अस्तु व्यायुषम् ॥ (शु० य० ३६३२) आयनुष्टुप् यथा- (क)पुनन्तु मा देवजनाः पुनन्तु मनसा धियः । पुनन्तु विश्वा भूतानि जातवेदः पुनीहि मा। - द्वितीयोऽध्यायः। ३३ ३ - - - · L (ख) ईशा वास्य मिद सर्व यत्किंच जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीया मा गृधः कस्य चिद्धनम् ।। (शु० २०४०।१) आषीवृहती यथा- अत्र पितरो मादयध्वं यथा भागमा वृषायध्वम् । अमीमदन्त पितरो यथा भागमावृषाथिषत ॥ (शु० य० ॥३१) आधी पडक्तिर्यथा- गृहा मा बिभीत मावे पवमूज विव्रत एमसि। ऊजै विभ्रदः सुमनाः सुमेधा गृहानैमि मनसा मोदमानः॥ (शु० य० ३६४१) आषत्रिष्टुब् यथा- तनपा अग्नेऽसि तन्व मे पायायुदा अग्नेस्यायुमे देहि वर्बोदा अग्नेऽसि वों मे देहि । अग्ने यन्मे तन्वा ऊन तन्म आधण ॥ (शु० य० ३१७) L भाषीजगती यथा- युजते मन उत युज्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः । वि होत्रा दथे वयुनाविदेक इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः ।। (शु०य०११।४).... इदन्वत्र बोध्यम्-बहवो मन्त्रावेदेषु दृश्यन्ते। ये खलु कास्यायनादिभिरक्ताऽपि पिङ्गला. चार्य कृलगायव्यादिलक्षणलक्ष्या न भवन्ति, ते तु वक्ष्यमाणनिवृत् भुरिग-विराट-स्वराः समाधेयाः। यथा स्त्ररित्यस्येकाक्षरस्वेऽपि देवीविराटरूपेण नानुष्टुप् छन्दस्व विरुद्धम् । यतो हि कात्यायनादिभिः सर्वानुक्रमणिकार, प्रातिशाख्यकारादिभिश्च तत्तन्मत्रेषु दृष्टाण्येव यानिच्छ- न्दांसि विहितानि तेषामेव यथाशास्त्रत्व प्रतिपादनार्थ पिलाचार्येण छन्दः शास्त्रमिदं प्रणीत न तु तेषां बापनार्थमिति । तथा ह्येकाक्षरादि च्छन्दसां शालविहिवरख प्रदर्शनपुरस्सर मेदा: प्रदयन्ते। अक्षरा गायत्री विशेषनाम । अक्षरा गायत्री विशेषनाम देवी मुरिक,(१)प्राजापत्यानिवृतर भुरिक प्राजापत्या . याजुषी स्वराट् स्वराट मुरिक याजुषी विराट स्वराट् (१)साम्नी विराट(२) नित ११ साम्नी निवृत् प्राजापत्या विराट . १ otu " ३ पि०० सटीकपिङ्गलच्छन्दःसूत्रे- तिस्रस्तिन इत्यनुवर्तते । यजुषां पङ्क्तः प्राक् प्राजापत्या प्रा- सुरी देवीति यास्तिस्रो गायच्या, ताः संगताः सत्यश्चतुर्विंशत्यक्षरा एका मार्षी गायत्री भवति । ता एव तिन उष्णिहः संगता अष्टावि. शत्यक्षरा एका प्रार्षी उष्णिक संपद्यते । तिनोऽनुष्टुभः संगताद्वात्रिं. शदक्षरा एका आर्षी अनुष्टुब् भवति । ता एव तिस्रो बृहत्यः संगताः षटत्रिंशदक्षरा एका भार्षी बृहती भवति । ता एव तिस्रः षङ्क्तयः संगताश्चत्वारिंशदक्षरा एका आर्षी पङ्क्तिर्भवति । ता एवं तिस्रस्त्रि ष्टभः संगताश्चतुश्चत्वारिंशदक्षरा एका आर्षी त्रिष्टुब् भवति । ता एवं तितो जगत्यः संगताः अष्टाचत्वारिंशदक्षरा एका आर्षी जगती भवति । भत्र प्रथमायां पङ्क्तो प्रथमे कोष्ठे श्रा(शब्दं व्यवस्थाप्य द्वितीयादिषु क्रमेण चतुर्विशत्याद्यवान् विन्यसेत् । प्रथमपङ्क्तद्धि तीयादिकोष्ठेवतानापमुरि गायच्यादीनि नामानि विन्यसेत् । अयं स्पष्टतरः प्रदर्शनोपाय:- तिस तिस्र इन पदों की अनुवृत्ति पाती है। प्राजापत्या, मासुरी और देवी-गायत्री, इन तीनों छन्दोंकी मिलानेसे [२४] अक्षरकी एक आषर्षी गायत्री होती है। इसी प्रकार प्राजापत्या, आसुरी, और दैवी इन तीनों प्रकारके उणिक अक्षरा २४ " गायत्री विशेषनाम गायत्री विशेषनाम भुरिक(१) आसुरी बिराट(२)। २३ निवृत् १४ स्वराट(१)मासुरी निवृत(२) १५ प्रामरी मुरिक भुरिक्,(१) श्राची विरा[२]/ २६ स्वराट स्वराट[२] आची निवृत[२] ३४ ब्राह्मी विराट १८ प्राची निवृत् २५ . भुरिक " " स्वराट ३७ मुरिक २१ पादनिवृत् स्वराट २२ भाषी विराट् . उष्णिगादिच्छन्दसामध्यनया रीत्यावरसंख्योहनीया । एवमेवाथर्ववेदोक्तमन्त्रेष्वपि छन्दः समाधानमूहम् ।
द्वितीयोऽध्यायः। ३५ छन्दोंके मिलानेसे [२८] अक्षरों में एक आषी उष्णिक , प्राजापत्या, आसुरी, और दैवी अनुष्टुप्के मिलानेसे | ३२] अक्षरोंका एक आर्षी अनुष्टुप् छन्द, प्रा. जापत्या, आसुरी और देवी बृहती, इन तीन छन्दोंके मिल जानेमें [३६] अक्षरोंकी एक आर्षी बृहती, प्राजापत्या, आसुरी और दैवी पंक्तिके मिलनेसे [४०] अक्षरों को एक आर्षी पंक्ति, प्राजापत्या, देवी, और आसुरी इन तीनों प्रकार त्रिष्टुप् छन्दों को मिला देने से [४४] अक्षरों का एक आर्षी त्रिष्टुप् छन्द, एवं प्राजापरया, मासुरी और देवी जगती, इन तीनोंके मिल जानेसे [४८] अक्षरों को एक आर्षी जगती होती है। . (श्रीहलायुधमविरचितं चतुःषष्ठिकोष्ठात्मकं मण्डलम् ) अङ्कानां वृ. छन्दः गायत्री उष्णिग अनुष्टुब बृहती पक्तिः त्रिष्टुब् जगती |द्धिक्षय कमी १.आर्षी २४ २८ ८ . २ ४ वृद्धिः दैवी १ ३ ५ १ वृद्धिः ३.आसुरी १५ W १४ १२ १हासः प्राजा- पत्या १२ २४ २८ ३२ ४ वृद्धिः ५ याजुषी ६ १२ | १ वृद्धिः ६साम्नी १२ १६ २२ २४ २ वृद्धिः ७. आची १८ २४ ३० ३३ ३ वृद्धिः ब्राझी ३६ ४२ ५४ ६० ७२ ६ वृद्धि:* इति भट्टहलायुधकृतायां छन्दोवृत्तौ द्वितीयोऽध्यायः॥
सटीकपिलच्छन्दःसूत्रे- पूर्वोक्त मण्डलकी पडक्तिके प्रथम कोष्टमें आर्षी शब्द लिखकर, द्वितीय कोष्टमें [२४], तृतीय कोष्ठ में [२८], चतुर्थ कोष्ठ में [३२], पञ्चम कोष्ठमें [३६], षष्ट कोष्ठ में [४], सप्तम कोष्ठ में [४४], और अष्टम कोष्ठमें [४८], अङ्क बैठाना चाहिये और द्वितीय कोष्ठके ऊपर गायत्री, तृतीय कोष्टके ऊपर उष्णिक , चतुर्थ कोष्ठके ऊपर अनुष्टुप् , पञ्चम कोष्ठके ऊपर बृहती, षष्ठ कोष्ठ के ऊपर पक्ति, सप्तम कोष्टके अपर त्रिष्णुप् और अष्टम कोष्ठके ऊपर जगती, इस प्रकार सातों छन्दका नाम लिख देना चाहिये। वृत्तिकार हर एक सूत्र में छन्दोंके भेद भली भांति समझनेके लिये किस पंक्तिके किस प्रकोष्टमें कितने भङ्क बैठाने चाहिये यह दिखलाते आये हैं। भब उन सबको मिला देने से एक पूर्ण मण्डल बन जाता है। जिसे ऊपर दिखाया गया है। यही मण्डल ही समस्त वैदिक छन्दोंके भेदों को जाननेका एक सर्वोत्तम उपाय है। इति सान्यालोपाह श्री अयोध्यानाथशास्त्रिविरचितायां कादम्बिन्याख्यः भाषाटीकायां द्वितीयोऽध्यायः । अथ तृतीयोऽध्यायः। पादः ॥ १ ॥ अधिकारोऽयमाध्यायपरिसमाप्तः। यदित ऊर्वमनुक्रमिष्यामस्तत् 'पादः इत्यधिकृतं वेदितव्यम् । वक्ष्यति च--'गायत्र्या वसवः (पि० सू०३३) इति ॥१॥ कादम्बिनी। तृतीय अध्यायको समाप्ति पर्यन्त 'पाद' शब्दका अधिकार रहेगा। अर्थात् इसके आगे जो कुछ कहा जायगा वह 'पाद' के विषममें ही कहा जायगा। द्वितीय अध्यायमें गायब्यादि छन्दों में कितने अक्षर होते हैं और अक्षरोंके भेदसे गायत्री आदि छन्दोंके कितने भेद होते हैं इसका विचार किया गया; परन्तु किस छन्दमें कितने पाद होते हैं इसका विचार नहीं किया गया है । इस अध्यायमें गायत्री आदि सातों छन्दों में किसके कितने पाद होते हैं और उन पादोंके भेद होने गायत्री आदि छन्दोंके भी भेद हो जाते हैं इसका विवेचन किया जायगा।
तृतीयोऽध्यायः। परन्तु पाद शब्दके अधिकारसे केवल सूत्रार्थ करने में सहायता होती है । जैसे ( गायत्र्या वसवः' ) यह इस अध्यायका तीसरासूत्र है-इसमें पाद शब्दकी उपस्थिति होनेसे जहां पर गायत्रीके पाद शब्दसे कहा जायगा वहां पर बसु अर्थात् आठ संख्याका बोध होता है ॥१॥ इयादिपूरणः ॥ २॥ 'पादः' इत्यनुव ते। इयादिः पूरणो यस्य स इयादिपूरणः । आदि. शब्देन उवा(*)दयोऽपि गृह्यन्ते । तत्रायमर्थः-यत्र गायत्यादिच्छन्दसि, (1) 'उवादय' इत्यादिशब्देन यसंयोगसवर्णदोघेगुणवृद्धिध्यूहादयो गृह्यन्ते । तथा च शौनकः न्यूहेदेकाक्षरीभावान् पादेषूनेषुसम्पदैः क्षेप्रवर्णाश्च संयोगान् व्यपेयात्सदृशैः स्वरैः॥ इति (ऋ० पा० १७१३६) सर्वानुक्रमणिकाकारोऽपि 'पादपूरणार्थन्तु क्षेप्रसंयोगैकाक्षरीभावान् व्यूहेत्' (१३) अत्रैतद्भाप्यकारश्च क्षेप्रसंयोगो यकारवकार संयोगः, यण संयोग इत्यन्ये, । कुतएतत् यर हे क्षिप्रं भवति इति क्षेपः। दध्यत्रंत्यादावेकमात्रामर्थनात्रां करोतीति । 'एकः पूर्वपूरयोः (पा० सू० ६१४८४) इत्यधिकारसम्पन्नःसंधिरेकाक्षरीभावः। तच्चद्वेऽक्षरे एकाक्षरीक्रियते इति। सत्र यण्व्यहोयथा-(यणपदेन यरलवा गृह्यन्ते ) 'दिवस्पृथिव्याः पर्योज उद्धृन् (ऋ० सं० ४१७।३५२) 'नि नो होता वरेण्यः (ऋ० सं० १।२०१२) इत्यादौ 'परियोजः वरेणियः' इति यकारं व्यूहेत 'एवा स्वामिन्द्र वजिन्' (० सं० ३६।१।११) इत्यादौ 'वजरिन' इति रकारं व्यूहेत् । सवर्णदीर्घव्यूहो यथा- 'प्रद्याथाश्वश्व (ऋ० सं. ६१४३९।२) इत्यादावध अध इति सवर्णदीर्घ व्यूहेत । गुणव्यूहो यथा- (भ० स० ५.१) इत्यादौ 'उप इन्द्र' इति विगृह्य पंत - - उपेन्द्र वव वीर्य - सटीकपिलच्छन्दःसूत्रे- पादस्याक्षरसंख्या न पूर्यते, तत्रेयादिभिः पूरयितव्या। यथा-'तत्स. वितुर्वरेणियम्' (ऋ० सं० ३।४।१०।५), "दिवं गच्छ सुवः पत' ( यजु. १२१४) इत्यादयः ॥ २॥ पाद शब्दका अधिकार आ रहा है । 'इयादिपूरण का अर्थ है कि (इयादि शब्द पूर्ण करने वाला शब्द है जिस पाद का। आदि शब्द से उव् , पूर्वसर्वण आदि का भी प्रहण समझना । अर्थात् गायत्री आदि छन्दों के किसी पादमें यदि अक्षर संख्या कम हो तो उस न्यून अक्षरों की पूर्ति इय्, उव आदि पदोंसे करना चाहिये । जैसे आर्षी गायत्रीके प्रथम पादमें आठ अक्षर होते हैं । परन्तु ( तत्सवितुर्वरे- ण्यम् ) गायत्रीके इस पादमें सात ही अक्षर देख पड़ते हैं। इसलिये (तत्सवितु वरेणियम् ) ऐसा पाठ करना चाहिये। इससे गायत्रीके इस पादमें आठ अक्षर हो जाते हैं। गायत्र्या वसवः ॥३॥ 'पादः इत्यनुवर्तते । परिभाषेयम् । गाय(१)च्याः पादोवसवोऽष्टा- क्षराणि भवन्ति । यत्र गायत्र्याः पादोऽभिधास्यते तत्राष्टाक्षरो ग्राह्यः 'पादः सूत्रसे पाद पदकी अनुवृत्ति आती है। यह परिभाषा सूत्र है। गायत्री का षाद आठ अक्षरोंका होता है इसलिये जहाँ कहीं गायत्रीके पाद शब्दसे व्यवहार किया जायगा वहां पर आठ अक्षरों का बोध होता है। इस सूत्र में गायत्री शब्दसे आर्षी गायत्रीका ही प्रहण करना चाहिये क्योंकि ब्राह्मी - वृद्धिव्यूहो यथा- 'प्र ब्रौ तु सदनादृतस्य' (ऋ० मं०५।४।११) इत्यादौ 'ब्रह्म एतु' इति विगृह्म पठेत् । पूर्वसवर्णव्यूहो यथा- 'इन्द्र वाजेषु नोडव' (ऋ० सं० १२१११३१४) इत्यादौ 'नो भव' इति विगृह्य पठेत् । (*) अत्रेदमवधेयं. यद्यपि दैव्यादि गायत्रीषु न्यूनाधिकसंख्याः सन्ति तथापि निरूपाधिकगायत्री शब्देनाषींगायत्री एवं गृह्यते । "गायत्री सा चतुर्विशत्यक्षरा श्रष्टाक्षरास्त्रयः पादाः" इति अप्रतिशाख्ये ( ११:१६) दर्शनात् । वस्तुतस्तु गुणवृध्यादितचातरीयसंशा इव गायत्री पादत्वादीनामपि स्वशास्वीयसंकेतविषयत्वावच्छेदकं तेन जगती पादादीनां द्वादशाक्षरत्वादिना कचिदप्रसिद्धावपि न पतिः ।
ato तृतीयोऽध्यायः। गायत्री आदिका पाद नव अक्षरों का भी होता है। ऋक्-प्रातिशाख्य आदि प्रन्यों में गायत्री शन्दसे आर्षी गायत्रीका ही व्यवहार देखा जाता ॥३॥ जगत्या आदित्याः ॥४॥ 'पादः' इत्यनुवर्तते । जगत्याः पादो द्वादशाक्षरो भवति । यत्र क्वचिजागतः पादस्तत्र द्वादशाक्षरो गृह्यते ॥४॥ "पादः" सूत्र में पाद पदकी अनुवृत्ति भाती है। यह परिभाषा सूत्र है। जगतीका पाद द्वादश अक्षरका होता है। जहां कहीं जगतीका पाद कहा जाय वहां बारह अक्षर समझना चाहिये ॥४॥ विराजो दिशः॥५॥ 'पादः' इत्यनुवर्तते । यत्र क्वचिद्वैराजः पाद इत्युच्यते, तत्र दशा. क्षरः प्रत्येतन्यः॥५॥ (पादः) इस पदकी अनुमति माती है । जहां कहीं विराट का पाद ऐसा कहा जाय वहां दस अक्षर समझना चाहिये ॥५॥ त्रिष्टुभो रुद्राः ॥ ६ ॥ त्रैष्टुभः पादः' इत्युक्तेसर्वत्रैकादशाक्षरो गृह्यते । मस्मिन्नेवाध्याये परिभाषा पताश्चतस्रः ॥६॥ जहां कहीं 'त्रिष्टुनका पाद' ऐसा व्यवहार किया वहां ग्यारह अक्षर समझना। केवल इसी अध्यायमें ही इन चार परिभाषायोंका प्रयोग किया जायगा (अन्यत्र नहीं)॥६॥ एकद्वित्रिचतुष्पादुक्तपादम् ।। ७॥ एभिश्चतुभिलक्षणैरुक्तः पादा यस्य तत् 'उक्तपादं छन्दः । यस्य च्छन्दसो यादृशः पादः परिभाषितस्तच्छन्दस्ते नैव पादेन क्वचिदेक- पात् , क्वचिद्विपात् , क्वचित्रिपात , क्वचिच्चतुष्पाद् भवति । गायत्री च त्रिपदैव(*)। चतुर्भिरष्टाक्षः पादैरनुष्टु()बव स्यात ॥७॥ (*) वैदिकछन्दोमन्त्रविषयकमिदं, लौकिकं तु पादश्चतुथभागः। (पि० सू० ३१०) इति विशेषस्य वक्ष्यमाणत्वात् । 'छन्दः एकादिपादकम् । (१३०१२ ) इत्यादिनिये 'पत्र रक्तः षट' इति सांख्यायन सूत्रे (२७)। (i) उपलक्षणमेतत् द्वादशाक्षरपादादीनामपि ।
. । सटीकपिङ्गलच्छन्द सूत्रे- पूर्वोत्त चार सूत्रोंसे जिन छन्दों में जैसा पाद कहा गया हो वह छन्द उसो पादसे कहीं एक पाद, कहीं द्विपाद, कहीं त्रिपाद और कहीं चतुष्पाद होता है परन्तु गायत्री त्रिपाद ही होती है, क्योंकि आठ अक्षर से युक्त चार पद जिस छन्दमें हों उसे अनुष्टुप् ही कहते हैं ॥४॥ आध() चतुष्पाहतुभिः ॥ ८॥ 'ऋतु' शब्देन लक्षणया षडक्षरः पादोऽभिधीयते । तैः पादैश्चतु- पादं गायत्रं छन्दो भवति । एवं चतुर्विशत्यक्षराणि संपद्यन्ते। यथा- 'दोषो गाय वृहद् (१) गाय धुमद्धेहि (२)। श्राथवेण स्तुहि (३) देवं सवितारम् (४) ॥' (अथर्वघेदे-कां०६ सु०१०) ॥८॥ ऋतु शब्दकी छः अक्षरों से युक्त पादमें लक्षणा है। अर्थात् जिसके हरएक पादमें छः छः अक्षर हों ऐसे चार पार्टोसे युक भी गायत्री छन्द होता है। जैसे अथर्ववेदके उत्त उदाहरणमें (२४) अक्षरों के चार पाद देखे जाते हैं ॥८॥ कचित्रिपादृषिभिः॥९॥ क्वचिद्वेदे सप्ताक्षरोपलक्षितैः पादैनिभिर्गायत्येव भवति । एव. मेकविंशत्यक्षराण जायन्ते । यथा- 'युवाकु हि शचीनां (१) युवाकु सुमतिनाम् (२) । भूयाम वाजदावनाम् (३)॥' (ऋग्वेदे-१०१ अ० १ २०३२ मं० ) ॥ ६ ॥ जिसके प्रत्येक पादमें सात अक्षर हों इस प्रकार तीन पादोंसे युक्त इक्कीस अक्षरों का भी गायत्री छन्द किसी वेदमें देखा जाता है। कहीं पर वेदमें सात अक्षरोंसे युक्त तीन पाद वाले छन्दकी गायत्री 'ज्ञा ही होती है। इसी प्रकार इक्कीस अक्षरोंका भी गायत्री छन्द होता है ॥९॥ (*) पाचमिति-अस्मिन्नध्यायेऽनुक्रान्तेषु प्रथमम् । सकलच्छन्दसामादिभूतश्च । 'गायत्री प्रथमा छन्दसाम् इति शतपथश्रुतेः । गीतासु च स्वयं भगवता 'गायत्री छन्दसामहम्' (१०॥३५) इत्युक्तवाद प्रधानभूतश्चेति षडगुरुशिष्यः ।। ईदृशस्य गायत्रीछन्दसो वेदेषु प्रायोऽदर्शनात् , उत्तरत्र लक्षितस्य सप्ताक्षरपादत्रयोपेतस्य सर्वत्रव बाहुल्येनोपलम्मात् । गायत्र्यानिपादत्वस्यैव प्रसिद्धेश्च 'मायं चतुष्पादृतुभिः वृचित इति पत्रपाठ एव युक्तः । 'लक्ष्यानुसारि हि लक्षणं भवति' इति न्यायात् ।
तृतीयोऽध्यायः। ४ । सा पादनिवृत् ॥ १०॥ सैव(*)गायत्री पानिवृत्' इति संज्ञां लभते। प्रयोक्तुरदृष्टाभ्युदय- लंबन्धज्ञापनामियं संज्ञा वेदस्यानादित्वान्महत्त्वेऽपि च न दुष्टेति ॥१०॥ उसी सात अक्षरोंकी त्रिपदा गायत्रीको 'पाद निवृत्' कहते हैं। इसके प्रयोग करनेवालेको शुभ अदृष्ट उत्पन्न होता है। इसी बातको सूचित करने के लिये ही ऐसो संज्ञा की गयी है। वृत्का अर्थ हिंसा करना हैं और नि उपसर्ग लग जानेसे उसका विपरीत अर्थ हिंसा न करना है। अर्थात् जिस छन्दके प्रयोग करनेसे यज्ञमानका किसी प्रकार भी हनन न हो। वह शुभ अष्ट से ही हो सकता है। यही भाव इस प्रकार संज्ञा करने का है ॥१०॥ षट्कसप्तकयोमध्येऽष्टावतिपादनिचत् ॥११॥ प्रथमः षडक्षरः, द्वितीयोऽष्टाक्षरः, तृतीयः सप्ताक्षरः। एवं त्रिभिः पायर्या गायत्री सा 'मतिपादनिवृत्' इति संज्ञा लभते । “त्रिपात्' इत्यनुवर्तनीयम् । यथा- 'प्रेष्ठं वो अतिथिं (१) स्तुषे मित्रमिव प्रियम् (२)। अनि रथं न वेद्यम् (३) ॥' (ऋग्वेदे-म०६ म०६१०५ मं०१) ॥११॥ जिस गायत्री छन्दके प्रथमपादमे छः अक्षर, द्वितीय पाद में आठ अक्षर, और तृतीय पाद में सात अक्षर हों उसे 'अतिपादनिचत्' कहते हैं । द्वौ नवको षट्कश्च नागी ।। १२ ।। द्वा नवाक्षारों पादौ, षडक्षरस्तृतीयः । एवं त्रिभिः पादः 'नागो' नाम गायत्री भवति । यथा- (') तथा च कात्यायन:-“यः सप्तकाः पादनिचत् शोनकनाप्युक्तं, ऋप्रातिशाख्य (१६.१८)- युवाकु हीति गायत्री त्रयः समाक्षराविराद् । सैषा पादनिचन्नाम गायत्र्यैवैकविंशिका ।। यजुर्वेदेऽप्पयं दृश्यते। श्रमी षु णः सखीनाम् (१) अविताशरितृणाम् । (२) शतं भवास्यूतये (३) (शु० य०२७/४१) - - - ४२ सटोकपिङ्गलच्छन्दःसूत्रे- 'अग्ने तमद्याश्वं न स्तोमैः (१) क्रतुं न भद्रं हृदिस्पृशम् (२)। ऋदुध्यामा त ओहैः (३) ॥' (ऋग्वेद-अ०३ ० ५ व. १० मं०१)॥१२॥ जिस गायत्री छन्दके प्रथम दो पादोंमें नौ अक्षर और तृतीयपादमें छः अक्षर हों उस त्रिपदा गायत्री को 'नागी' कहते हैं ॥ १२ ॥ विपरीता वाराही ॥ १३ ॥ इयमेव नागो गायत्री विपरीता यदा भवति, तदा 'वाराही' नाम भवति । प्रथमः पादः षडक्षरः द्वितीयतृतोयौ नवाक्षरौ। यथा- 'वीत स्तुके स्तुके (१) युवमस्मासु नियच्छतम् (२)। 'प्र(*) प्र यज्ञपति तिर (३)।' (तै० प्रा० प्रपा०३१० ११ मं० २०) ॥१३॥ यही नागी गायत्री यदि विपरीत हो जाय; अर्थात् प्रथम पादमें छः द्वितीय और तृतीय पादमें यदि नौ अक्षर हों तो उसे वाराही गायत्री कहते हैं । षट)कसप्तकाष्टकैर्वर्धमाना ॥ १४ ॥ षडक्षरःप्रथमः पादः, द्वितीयः सप्ताक्षरः, तृतीयोऽष्टाक्षरः। एवं त्रिभिः पादः 'वर्धमाना' गायत्री भवति । यथा- 'स्वमग्ने यज्ञानां (१) होता विश्वेषां हितः (२)। देवेभिर्मानुषे जने (३) ॥ (ऋग्वंदे-अ०४ अ०५ व० २१ मं०१)॥१४॥ जिस गायत्री छन्दके प्रथम पादमें छः अक्षर द्वितीय पादमें सात अक्षर, और तृतीय पादमें अष्टाक्षर हों उसे वर्धमाना गयात्री' कहते हैं ॥ १४ ॥ . । । (*) इति व्यूहान्नवाक्षरत्वम् । उदाहरणान्तरं मृग्यम् । (1) उदारणान्तरमपि यजुवंदे यथा- कया त्वं न ऊत्या (१) मि प्र मन्दसे वृषन् (२) कया स्तोतृभ्य आ मर। (३) (शु० य० ३६७१) प्रातिशाख्ये वर्धमानाया भेदान्तरमपि दृश्यते 'अष्टको मध्या:पटक एकेषामुपदिश्यते ।' (१६।२२) इति उदाहरणन्तु-निषसाद धूपवतो (१) वरूणः प्ररूपा श्स्व । (२) साम्राज्याय सुक्रतुः (३) (ऋ० सं० अ०१० २ १० १७ मं०५) तृतीयो न्यूहे नाष्टाक्षरः ।
- तृतीयोऽध्यायः। विपरीता प्रतिष्ठा ॥ १५ ॥ सैव वर्धमाना गायत्री विपरीता यदा भवति, तदा 'प्रतिष्ठा' नाम गायत्री भवति । अष्टाक्षरः प्रथमः पादः, द्वितीयः सप्ताक्षरः, षडक्षरस्तृतीयः। यथा- 'आपः पृणीत भेषजं (१) वरूथं तन्वे ३ मम (२)। ज्योक्व सूयं दशे (३) ॥ (ऋग्वेदे-भ० १ ० २ व०१२ मं०१) ॥१५॥ वही वर्धमाना गायत्री यदि विपरीत हो । अर्थात् जिसके प्रथम पादमें आठ द्वितीय पादमें सात और तृतीय पादमें छः अक्षर हों उसे 'प्रतिष्ठा गायत्री कहते हैं। तृतीयं द्विपाजागतगायत्राभ्याम्(*) ॥ १६ ॥ तृतीयशब्देनैतदध्यायस्थसूत्रपाठक्रमापेक्षया विराजमाह । तथा चोक्तम्-विराजो दिशः' (पि. सू० ३।५) इति । यदा द्वादशाक्षरो- ऽष्टाक्षरश्च पादः स्यात् ततस्ताभ्यां 'द्विपाद विराड्' नाम गायत्री भवति । यथा- 'नृभिर्येमानो हर्यतो विचक्षणो (१) राजा देवः समुद्रियः (२) ॥' ऋग्वेदे-अ०७ म० ५ व० १५ मं०१) ॥ १६ ॥ कादम्बिनी। तृतीय शब्दसे यहां पर तृतीय अध्यायस्थ सूत्रके पाठ क्रमकी अपेक्षासे विराट का ग्रहण करना चाहिये 'विराजो दिशः' (पि. सू. ३५) इस सूत्रसे दश अक्षरकी 'विराट' संज्ञा कहो गयी है जिस गायत्रीके एक पादमें (१२) अक्षर और एक पादमें (0) अक्षर हों उसे 'द्विपाद् विराट' नामकी गायत्री कहते हैं । . - (*) अत्रक्रमोऽविवक्षितः । जागतग्रहणं श्रेष्टुभस्याप्युबलक्षणकम् । तेन- 'वसुरनिर्वसुश्रवा (१) अच्छानक्षिघुमत्तम रयिंदाः (२) (ऋ० सं० अ० ४ अ० १५० १६ म०२) इत्यादीनामपि सङ्ग्रहः। यद्यपि भूम्ना विराडाख्यं स्वतन्त्रमेवच्छन्दः श्रूयते । तथापि लीघ- वार्थमस्य भेदानां तत्र तत्रान्तर्भावः सप्तछन्दोबादावष्टम्मे न विहित इति बोध्यम् ।
सटीकपिङ्गलच्छन्दसूत्रे- त्रिपात्त्रैष्टभैः ॥ १७ ॥ 'तृतीयम्' इत्यनुवर्तते। एकादशाक्षरैः पादः 'त्रिपाद विराड्' नाम गायत्री (*)भवति । यथा- 'दुहीयन्मित्रधितवे युवाकु (१) राये च नो मिमोतं वाजवत्यै(२)। इषे च नो मिमीतं धेनुमत्यै (३) ॥' (ऋग्वेदे-अ० १०८ व० २३ मं०४) ॥ १७ ॥ तृतीय शब्दकी अनुवृत्ति इस सूत्र में भी आती हैं । तृतीय शब्दसे विराट का प्रहण होता है यह कहा गया हैं। और त्रिष्टुभ शब्द में ग्यारहका प्रहण होता है । 'त्रिष्टुभो रुद्राः' (३।६) इसलिये सूत्रार्थ यह हुआ कि जिस गायत्री छन्दको ग्यारह ग्यारह अक्षर तीनों पादोंमें होते हों उसे त्रिपाद् विराड नामकी गायत्री कहते हैं ॥ १७ ॥ उष्णि()ग्गायत्री जागतश्च ॥ १८ ॥ यत्र गायत्रावष्टाक्षरौ पादौ, जागतश्च द्वादशाक्षरः, एवं त्रिभिः (*) शौनककात्यायनाभ्यां विदमनुष्टुब्भेदेपु परिगणितम् ) तृतीयाध्यायगायच्या भेदा: सोपतः प्रदश्यन्ते। (१) आषर्षीगायत्री (८,८,८-२४) (२) पाद निचत् गायत्री-(७, ७,७%२१) (३) अतिपाद निचत् गायत्री-(६, ८, ७ = २१) (४) नागीगायत्री-(९,९,६:२४) (५) वाराही गायत्री-(६,९, ९२४) (६) वर्धमानागायत्री-(६,७ ८-२१) (७) प्रतिष्ठा गायत्री-(८,७,६-२१) (८) द्विपाद विराटगायत्री-(१२, ८% २० ) दिपाद् (९) त्रिपाद् बिराट गायत्री-(११, ११, ११:३३) अथमत्र संग्रहः आपी पाद निचुन्नागी यतिपादनिवृत्तथा । वाराही च प्रतिष्ठा च वर्धमाना द्विपाद्विराट् ॥१॥ ततस्त्रिपाद् विराट् चैव मुक्तिमुक्ति प्रदायिनी । महद्भिर्वेदविनाशै गायत्र्यी न बधा स्मृताः ॥२॥ (1) उष्णिक शब्द निर्वचनमाह निरूक्ते (७१२)। उष्णिक उत्स्नाता भवति ।' गायत्रीतचतु. मिरचरैरधिरूद्धेष्टिता इव । 'स्निधमतेर्वा स्यात्कान्ति कर्मणः' । उदाधिक स्निग्ध हि देवानामिति तदर्थः। 'उष्णिषिणी वा इत्यौपमिकम् । उपमानिबन्धनमुष्णीषवतीय भवति । चत्वार्यक्षराण्य- मस्या गायत्रीतोऽधिकान्युम्पीमिवलक्ष्यन्ते तेनेयमुष्णिक । -
तृतीयोऽध्यायः।
पादैः 'उष्णिग्' नाम छन्दो भवति । अत्र च क्रमो न विवक्षितः ।
पाइसंख्यामात्रं विधीयते ॥ १० ॥
जिस छन्दके दो पाद आठ अक्षरके और एक पाद बारह अक्षरका हो उस
त्रिपाद छन्दको उष्णिक कहते हैं। इस छन्दमें किन पादों में आठ अक्षर हों
और किन पादोंमें बारह अक्षर हों यह नियमित नहीं है। नियम है केवल आठ
और बारह अक्षर वाले तीन पाद मात्रका ॥ १८ ॥
क(*)कुम्मध्ये चेदन्त्यः ॥ १९ ॥
गायत्रयोः पादयोर्मध्ये जागतश्चेत्पादो भवति, तदेयम् उष्णिक्
'कुप: सशां लभते । यथा
'युग्माकं स्मा रथां अनु (१) मुदे दधे मरुतोजीरदानवः (२)।
वृष्टोद्यावो यतीरिव (३)
(ऋग्वेदे-अ०४ म०३ व० ११ मं० ५) ॥ १६ ॥
पूर्व सूत्र में जो अन्त कहा गया है वही यदि मन्यमें हो। जैसे-पूर्व सूत्र में
जागत शब्दका उल्लेख अन्तमें है और जागत शब्दसे पूर्वपरिभाषाके अनुसार
बारह अक्षरोंका प्रहण होता है । इसलिये सूत्रार्थ यह हुआ कि जिस छन्दका
(*) कुकुभो निबंचनमित्य निरूक्ते (११८) 'कुकुप् कुकुभिनी भवति' सैघोष्णिक जागतेनपादे
नोपहतेन मध्यतः कुकृवित्युच्यते । सतस्यामध्यतः कुबुबिव भवति । कुकुमिनीव कुकुम्। तथा
च कुकुन् । वत्वाच्छन्दोऽपि कुकुप् । कुकुविति पृष्ठे समुन्नतः प्रदेशः, यच्च कुम्जस्येव भवति ।
'कुकुप् कुब्जश्च-कुजतेर्वा उम्जते । कौटिल्यार्थकस्य कुजतेः कुकुप् रूपं भवति । तेन हि
वऋतामावद्यते । ३। अप्नु अन्तः इति ब्यूहात्पादपूर्तिः ।
अथ संक्षेपत, उष्णिगभेदाः प्रयन्ते
कुकुप् (८।१२।८)॥१॥
पुरउष्णिक (१२।८।८)॥२॥
परोष्णिक (८।८।१२)॥३॥
चतुष्पाद् (७।७।७। ७)
अयमत्रसग्रहः।
पुर उष्णिक परोष्णिक् च चतुष्पाच कुकुस्तथा । महर्षिपिङ्गलाचाय चतस्र उष्णिहः स्मृताः॥१॥
भावन्तमप्यगायासां पादाभवन्ति जागताः । गायत्र्यधान्यपादेषु त्रिपाद उष्णिहः श्रुताः ॥२॥
ततश्च चरणैवेदैर्चतुष्पाञ्च' चतुः पदा। चतुर्युचापिवेदेषु चरत्येकाकिनी पृथक् ॥३॥
- - सटीकपिङ्गलच्छन्दःसूत्रे- प्रथम और अन्तका पाद आठ अक्षरोंका हो और बीचका पाद यदि बारह अक्षरोंका हो तो उस उष्णिक छन्दकी 'ककुप' संज्ञा होती है । पुरउष्णिक्पुरः ॥ २०॥ स एव पादो जागतश्चेत् प्रथमो भवति, गायत्री च परतः, तदा 'पुरउष्णिक' नाम भवति । यथा- "अप्स्वन्तरमृतमप्सु भेषज (१) सपामुत प्रशस्तये (२)। देवा भवत वाजिनः (३) (ऋग्वेदे-१०१ अ०२ व० ११ मं०४) ॥ २० ॥ जिस छन्दके पहिले पादमें बारह अक्षर, और शेष दो पाद आठ आठ अक्षर के हों उसे 'पुरउणिक' कहते हैं ॥ २० ॥ परोष्णिक परः ॥ २१॥ एवं जागतः पादः परतश्चेद्भवति, पूर्वी च गायत्रौ, तदा 'परो. "णिक्' नाम छन्दो भवति। 'उष्णिग्गायत्री जागतच' (पि० सू. ३।१८) इत्यनेन गतार्थमेतत्। विशेषसंज्ञाभिधानाथं पुनरुच्यते । प्रथमसूत्रे (पि० सू०३।२०) उणि. ग्ग्रहणमधिकारार्थम् । "मग्ने वाजस्य गोमत (१) ईशानः सहसो यहो (२)। अस्मेधेहि जातवेदो महि श्रवः (३) " (ऋग्वेदे-म०१ म०५ व० २७ मं०४) ॥ २१ ॥ जिस छन्दका अन्तिम पाद गरह अक्षरोंका हो और आदिके दो पाद आठ अक्षरों के हों उसे 'परोष्णिक' कहते हैं। चातुष्पादृषिभिः ॥ २२ ॥ सप्ताक्षरैश्चतुर्भिः पादेः 'उष्णिक' एव भवति । यथा- 'नदं व ओदतीनां (१) नदं यो युवतीनाम् (२)। पतिं वो 'अन्यानां (३) चेनूनामिषुध्यसि (४)॥' (ऋग्वेदे-म०६ अ०५ व०५ मं० २ ॥ २२ ॥ जिस छन्दके प्रत्येक पादमें सात अक्षर हों और चार पाद हों, उस चतुष्पाद छन्द को भी 'उष्णिक' कहते हैं ॥ २२ ॥ यथा- - तृतीयोऽध्यायः। ४७ अनुष्टुब्गायत्रैः ॥ २३ ॥ 'चतुष्पाद' इत्यनुवर्तते । गायत्रैरष्टाक्षरः पादैश्चतुपाच्छन्दः "अनुष्टुप" संश भवति । यथा- "सहस्रशीर्षा पुरुषः (१) सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमि विश्वतो वृत्वा (३) त्यतिष्ठदशाङ्गुलम् (४) ॥" ( ऋग्वेदे-अ. -अ. - म०४ व० १७ मं०१) ॥ २३ ॥ पूर्व सूत्रसे 'चतुष्पाद' शब्द की अनुवृत्ति आती है। जिस छन्दमें गायत्री के चार पाद हों। अर्थात् जिस छन्दके चार पाद हों और प्रत्येक पादमें आठ आठ अक्षर हों उसे अनुष्टुप् कहते हैं। आर्षी गायत्री में आठ आठ अक्षरों के तीन पाद होते हैं और अनुष्टुपमें आठ आठ अक्षरोंके चार पाद होते हैं। यही आर्षी गायत्री और अनुष्टुप् में अन्तर है ॥ २३ ॥ त्रिपात्कचिज्जागताभ्यां च ॥ २४ ॥ 'मनुष्टुब्' इत्यनुवर्तते । चकारा गायत्रग्रहणं च । गायत्रेणैकेन पादेन, ततो द्वाभ्यां जागताभ्यां क्वचित् "त्रिपादनुष्टुब्' भवति ॥२४॥ 'अनुष्टुप्' शब्द की अनुवृत्ति पूर्व सूत्रसे आती है। इस सूत्र में 'च' ग्रहण है इससे 'गायत्र' पदकी भी अनुवृत्ति आती है। यदि एक पाद गायत्रीका हो शेष दो पाद जगतीके हों ( अर्थात् एक पादमें आठ अक्षर और दो पादों में बारह बारह अक्षर हों ) तो उस त्रिपाद छन्द को भी अनुष्टुप् कहते हैं । कौन पाद गायत्रीका हो और कौन पाद जगतीका हो यह क्रम अगले सूत्र में कहा जायगा ॥ २४ ॥ मध्येऽन्ते च ॥ २५॥ जागतयोः पादयोर्मध्येऽन्ते च यदा गायत्रः पादो भवति, तदाष्य. नुष्टुबेव स्यात् । यथा- 'पर्यषु'प्रध(*)न्व वाजसातये (१) परिवृत्राणि सक्षणिः (२)। द्विष स्तर()ध्या ऋणया न ईयसे (३)॥' (ऋग्वेदे-अ०७० ५ व०२२ मं० १) () () 'प्रधनुव "आविया" इत्युवियशब्दाभ्यां पादपूर्तिः।
सटीकपिङ्गलच्छन्दःसूत्रे- - अन्तपक्ष उदाहरणम्- 'मा कमै धातमभ्य(*)मित्रिणे नो (१) माकुत्रा नो गृहेभ्यो धेनवो गुः(२) । स्तनाभुजो(t) अशिश्वीः (३)" (ऋग्वेदे-अ० १ अ०८ व० २३ मं०३) ॥ २५ ॥ (क) जगतीके दो पाद आदिके और अन्तके ही बीचका पाद गायत्रीका हो । अर्थात् जिस छन्दके पहिले पादमें बारह अक्षर दूसरेमें आठ अक्षर और तीसरे पादमें पुनः बारह अक्षर हों तो इस प्रकार का भीत्रिपाद मनुष्टुप् कहा जाता है। (ख) जिस छन्दके पहिले पादमें बारह, दूसरे पादमें वारह और तीसरे पादमें आठ अक्षर हों इस प्रकार का भी 'त्रिपाद् अनुष्टप(क) कहा जाता है। बृह()ती जागतस्त्रयश्च गायत्राः ॥ २६ ॥ एको जोगतः पादः, त्रयश्च गायत्राः, तदा 'बृहतो नाम छन्दो भवति । यथा- 'मत्स्वा सुशिप्र हरिवस्तदीमहे(१)त्वे आभूषन्ति वेधसः (२)। तव श्रवास्युपमान्युक्थ्या सुतेविन्द्र गिर्वणः (४) ॥' (ऋग्वेधे-अ०६म०७व०३ मं०२)॥२६॥ (*)-(1) अभिय' (अशिशुवी) इति पादपुतिः () अनुष्टुपदनिर्वचनं निरुक्ते (७-३-१२) "अनुष्टुबनुष्टोभनात्। अनुपश्चाद् स्तोमनापादबन्धेकरोधनात् । किविदमनुष्टोमनमिति तत्रैवाह 'गायत्रीमेव त्रिपदा सती चतुर्थेन पादेनानुष्टोमतीति च ब्राह्मणम् । गायत्री त्रिमिरष्टा- घरैः पादैः समाप्यते तस्याश्च पुनरपरच्चतुर्थपादो भवति येन तामेव. गायत्रीमनुष्टीमति प्रतिरुणद्धि तस्मादनुष्टुवित्यर्थः । ननु त्रिपादप्युनुष्टुम्भवतीत्युक्तस्वातत्रोक्तान्वर्थस्यानर्थकयमिति शक्यम् , तस्य काचि. स्कत्वात् 'भाषिक्येन व्यपदेशा भवति'ति व्यपदेशनियमात् । अनुष्टुलभेदाः कश्मनो (८,८,८,८,)॥१॥ (१२,८,१२) ॥२॥ (१२,२,८)॥३॥ अयमत्र संग्रहः। पादे यदाक्षराण्यष्टौ गायत्रीतिबुधः स्मृता । चतुर्थपादयुक्त्यव सानुष्टदुसंशका भवेत् ॥१॥ गायत्री यदि मध्यस्था भवेदन्तर्गता पिवा । जगत्यः शिष्टपादेषु साचानुष्टुम्मवेत्रिपात् ॥ २ ॥ इत्यनुष्टुप्प्रकरणम्। (8) वृइती परिवहयात्' (नि ११२।१०) तृतीयोऽध्यायः। ४० जिस छन्दमें जगतीका एक पाद और शेष तीन पाद गायत्रीके हों ( अर्थात् जिस छन्दके किसी एक पादमें बारह अक्षर हों और शेष तीन पादोंमें आठ आठ अक्षर हों) उसे 'बृहती' छन्द कहते हैं ॥ २६ ॥ पथ्या पूर्वश्चेत्तृतीयः ।। २७ ।। 'बृहती' इत्यनुवर्तते । *पूर्वः पादो जागतो यदि तृतीयो भवति, अन्ये गायत्राः, तदासौ वृहती 'पथ्या' नाम छन्दो भवति । यथा- 'मा चिदन्यद्विशंसत (१) सखायो मा रिषण्यत (२)। इन्द्रमित्स्तोता वृषणं सचा सुते(३)मुहुरुक्था व शंसत(४)॥ (ऋग्वेदे-श्र. ५१०७ व०१० मं०१)॥ २७॥ पूर्वसूत्रसे 'बृहती पदकी अनुवृत्ति आती है। पूर्व सूत्र में संज्ञीकोटिमें पठित प्रथम जगतीका पाद यदि तृतीय हो और प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ पाद यदि गायत्री के हों (अर्थात् जिस छन्दके प्रथम पादमें आठ, द्वितीयमें आठ, तृतीय पाद में बारह और चतुर्थ पादमें आठ अक्षरहों) उसे 'पथ्या बृहती' कहते हैं ॥ २७ ॥ न्यङ्कुसारिणी द्वितीयः ॥२८॥ 'पूर्वश्चेद्' इत्यनुवर्तते । पूर्वश्चेजागतः पादो द्वितीयो भवति, शेषाश्च गायत्राः, तदा 'न्यसारिणी' नाम्नी बृहती भवति । यथा- 'मत्स्यपायि ते महः (१) पात्रस्येव हरिवो मत्सरो मदः (२)। वृषा ते वृष्ण इन्दु (३) जी सहस्रसातमः (४) ॥' (ऋग्वेहे-अ० २ अ०४ २०१८मं०१) ॥२७॥ पूर्वसूत्रसे पूर्व शब्दकी अनुवृत्ति चली भारही है । प्रथम सूत्रके संज्ञीकोटि में प्रथम पठित जगतीका पाद वह यदि द्वितीय हो और शेष प्रथम, तृतीय और चतुर्थ पाद यदि गायत्रीके हों। (अर्थात् जिस छन्दके पहिले पादमें आठ अक्षर, दूसरे में बारह अक्षर, तीसरे और चौथेमें फिर आठ आठ अक्षरहों) उसे 'न्यनुसारिणी' बृहतो कहते हैं ॥ २८ ॥ स्कन्धोग्रीवी क्रौष्टुकेः ॥ २६ ॥ इयमेव 'न्यकुसारिणी' क्रोष्टुकराचार्यस्य मतेन 'स्कन्धोपीवी' पूर्व सूत्रे उधेश्यकोटौ प्रथम इत्यर्थः । । 'मरसीय' इति । । 'वृषण इति पूर्त्यां विराटवादा न दोषः । पि० छ० - * ५० सटीकपिङ्गलच्छन्दःसूत्रे- नाम छन्दो भवति । आचार्यग्रहणं पूजार्थम् ॥ २६ ॥ क्रौष्टुकी आचार्य के मतमें इस 'न्यङ्कुसारिणी' की 'स्कन्धोपीवी' संज्ञा है ॥२९॥ उरोबृहती यास्कस्य ॥ ३० ॥ इयमेव 'न्यङ्कुसारिणी' यास्कस्याचार्यस्य मतेन 'उरोहती नाम्नी भवति ॥ ३०॥ यास्काचार्य इसी न्यङ्कुसारिणीको उरोबृहती कहते हैं ॥ ३० ॥ उपरिष्टाबृहत्यन्ते ॥ ३१ ॥ यदा जागतः पादोऽन्ते भवति, तदा 'उपरिष्टाहती' नाम भवति । यथा- 'न तमंहो न दुरितं (१) देवालो अष्ट *मय॑म् (२) सजोषसो यमर्यमा (३) मित्रो नयन्ति वरुणो अतिद्विषः (४)' (ऋग्वेदे-अ० अ०७ व०१३ मं०१) ॥३१॥ जब जगतीका पाद अन्त में हो पहिला, दूसरा, तीसरा पाद गायत्रीका हो तो उस बृहतीकी 'उपरिष्टात् बृहती' संज्ञा होती है। (अर्थात् पहिले पादमें आठ, दूसरेमें आठ, तीसरेमें भी आठ और चौथे पादमें यदि बारह भक्षर हों तो) उसे 'उपरिघाबृहतो कहते हैं ॥ ३१ ॥ पुरस्ताबृहती पुरः ॥ ३२॥ स एव जागतः पादः पूर्वश्चेद् भवति, शेषाश्च गायत्राः, तदा भिर्वाधनिपिखयामहे ॥ ४) (शु० य०११ । ४२) * 'मतीयम्' इति पूर्तिः। पथ्या बृहती यथा यजुर्वेदे- कदाचन स्तरीरसि(१) नेन्द्र सश्चसि दाशुषे (२) । उपोथेन्नु मघवन् भूय इन्नुते (३) दान देवस्य पृच्यते न्यङ्कुसारिणी यथा यजुर्वेद) (शु० य०३३४) अपो देवीस्य सृज (१) मधुमवीरयक्ष्माय प्रजाम्मः । (१) तासामास्थानादुज्जिहता (३) मोष धयः सुपिप्पलाः (शु० य० ११ । ३८)। उपरिष्टाहती यथा यजुर्वेदे- ऊर्ध्व ऊ षु पाऊतये (१) तिष्ठा देवो न सविता (२) ऊो वा जस्य सनिता ३) यदक्षि- - - तृतीयोऽध्यायः। १५ 'पुरस्तावृहती' नाम भवति । यथा- 'महीयस्पतिःशवसो *असाम्या (१)महो नृम्णस्य तूतुजिः(२) । भर्ता वज्रस्य धृष्णोः (३) पिता पुत्रमिव प्रियम् () ॥' (ऋग्वेदे-१० ७ १०७ व०६ मं०३) 'बृहती जागतस्त्रयश्च गायत्रा (पि० सू० २६) इत्यनेनैव गतार्थमेतत् । संज्ञाविशेषप्रदर्शनार्थं पुनरुच्यते ॥ ३२ ॥ वही गजतीका पाद यदि पूर्वमें हो और शेष दूसरा, तीसरा और चौथा पाद यदि गायत्रीका हो, (अर्थात् जिस छन्दके पहिले पादमें बारह, दूसरेमें आठ, तीसरे और चौथेमें भी आठही अक्षरहों) उसे 'पुरस्ताबृहती' कहते हैं ॥३२॥ 'बृहती जागतस्त्रयश्व गायत्राः' इस सूत्रसे बृहतीका सामान्य लक्षण कहा गया है परन्तु विशेष स्वरूप निर्देश के लिये ही पुनः विधान किया गया है ॥ किचिन्नवकाश्चत्वारः ॥ १३ ॥ क्वचिद्वेदे नवाक्षराश्चत्वारः पादा दृश्यन्ते, सापि वृहत्येव । यथा- चक्षुषोहेते मनसो हेते (१) वाचो हेते ब्रह्मणो हते (२)। यो माघार्युरभिदासति (३) तमग्ने मेन्या मेनि कृणु (४)॥' (कृ. यजुर्वेदे-तै० ब्रा० का० २ प्र० ४ ० २ मं० १) ॥३३॥ वेदमें किसी किसी स्थल पर चार पादकी ऐसी 'बृहती देखी जाती जिसके प्रत्येक पादमें नव अक्षरके होते हैं ॥ ३३ ॥ वैराजौ गायत्रौ च ॥ ३४॥ यत्र वैराजो पादौ पूर्वी दशाक्षरौ भवतः, ततो गायत्री बृहतो । यथा- 'कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारा (१) मार्दी ज्वलन्ती तृप्तां तर्पय- न्तीम् (२)। पझेस्थितां पद्मवर्णा (३) तामिहोपह्वये श्रियम् (४) ॥' (ऋग्वेदे-अ०४ अ०४ परि० मं०४) ॥३४॥ जिस छन्दके प्रथमपादमें दश अक्षर द्वितीय पादमें भी दश अक्षर, तृतीय और चतुर्थपादमें आठ आठ अक्षर होते हैं, उसे भी 'बृहती' कहते हैं ॥३४॥ च, सापि * 'असामिया' इति पूरणात्पादपूर्तिः। । क्वविदिति प्रयोगाल्पत्वं सूच्यते इति षड्गुरुशिष्यः । प्रथमपादेऽक्षराधिक्याद् भुरिकरूपा। 8 द्वितीयेऽक्षराधिक्याभुरिकरूपा ।
- सटीकपिङ्गलच्छन्दःसूत्रे- त्रिभिर्जागतैर्महाबृहती ॥ ३५ ॥ त्रिभिर्जागतः पादश्छन्दो 'महाबृहती' नाम । यथा- 'मजीजनो अमृत म]ध्वाँ*(१) ऋतस्य धर्मन्नमृतस्य चारुणः(२)। सदासरो वाजमच्छा ल निध्यदत् (३) ॥' (ऋग्वेदे-म० ७ अ० ५५० २२ मं०४)॥३५॥ जिसके तीन छन्दमें बारह बारह अक्षरके तीन पाद हों उसे 'महाबृहती' कहते हैं ॥ ३५॥ सतोवृहती ताण्डिनः ॥ ३६ ॥ इयमेव महायहती ताण्डिन आचार्यस्य मतेन 'सतोबृहती' नाम भवति ॥ ३६॥ आचार्य ताण्डीमुनि इसी महाबृहतीको 'सतोबृहती' कहते हैं ॥ ३६ ॥ इति बृहत्यधिकारः। पिक्तिर्जागती गायत्रौ च ॥ ३७॥ यदा द्वौ पादौ जागतौ भवतस्ततो गायत्रौ च, तदा 'पङ्क्तिः नाम छन्दः॥ ३७ ॥ जिस छन्दमें दो पाद जगतीके और दो पाद गायत्रीके हों (अर्थात् बारह बारह अक्षरोंके दो पाद और आठ आठ अक्षरोंके दो पाद जिस छन्दमें हों) उसे 'पक्ति' कहते हैं ॥ ३७॥ पूर्वी चेदयुजो सतः पङ्क्तिः ॥ ३८ ॥ , . , " सूत्राक्षराण्येवानुष्टुन्छन्दसा विपरिणम्य संक्षेपतो बृहत्या भेदाः प्रदयन्ते । पच्या पूर्वस्तृतीयश्चेत् (१) (८, ८, १२, ८) द्वितीयोन्यकुसारिणी (२) (८,८, ८, १२) उपरिष्टाबृहत्यन्ते (३) (८,८,८,१२) पुरस्ताबृहती पुरः । (४) (१२, ८,८,) विराजो चापि गायत्रो (५) (१०, १०,८,८) चत्वारो नवकाः कचित् (६) (९,९,१) जागताश्चत्रयो यत्र स्यान्महावृहती ततः } (७) (१२, १२, १२) 'मर्तियेषुवा' इति इयुष्' शब्दाभ्यां पादपूर्तिः । + पडिपदनिर्वचनं निरुक्त-(७३।१२) (पक्तिः पञ्चपदा पञ्चभिः पादः पििप्रत्युच्यत इति तदर्थः । (पक्ति विंशति। पा०।५।१५९) * - तृतीयोऽध्यायः। ५३ यत्र पूर्वोहिष्टौ पादावयुजौ भवतः, प्रथमतृतीयौ पादौ जागता- वित्यर्थः, द्वितीयचतुर्थौ च गायत्रौ तच्छन्दः 'सतः पङ्क्तिः' नाम भवति । यथा- 'अग्निना तुर्वशं यदुं परावत (१) उमादेवं हवामहे (२) । मग्निर्नयनववास्त्वं बृहद्रथं (३) तुर्वीतिं दस्यवे सहः (४)॥' (ऋग्वेदे-अ० १ म० ३ व० ११ म०३) ॥३८॥ जिस छन्दके पहिले और तीसरे पादमें बारह बारह अक्षर, दूसरे और चौथे पादमें आठ आठ अक्षर हों उसे 'सतः पक्ति' कहते हैं ॥ ३८ ॥ विपरीतौ च ॥ ३९ ॥ यदा तात्रेव पादौ विपरीतौ भवतः, तदापि सतः पङ्क्तिरेव । मयमर्थः-प्रथमतृतीयौ पादौ गायत्रौ, द्वितीयचतुर्थौ च जागतो, तदापि सतापङ्क्तिरेव भवति । यथा- 'य ऋग्वः श्रावयत्सखा(१)विश्वेत्स वेद जनिमा पुरुष्टुतः(२) । तं विश्वे मानुषा युगे (३) न्द्रं हवन्ते तविष यतनुवः (४) ॥' (ऋग्वेदे-अ०६ अ० ४ व०३ मं०२) ॥ ३ ॥ पूर्व सूत्रमें जो कहा गया है। वही यदि विपरीत हो जाय (अर्थात् जिस इत्यादि सूत्रे पञ्च पदानिपरिमाणमस्येति पङ्क्तिश्छन्द इति काशिका । तथा च तदस्य परिमाण- मित्यर्थे पञ्चन् शब्दात्तिप्रत्ययः । प्रपञ्चन शब्दस्य टिलोपः “चो कुः (पा०६२।३० इति कुरखम् । एवञ्च ऋप्रातिशाख्ये (१६ । ५१ ) 'पतिरष्टाक्षराः पञ्च' कात्यायनोऽपि-'पञ्चमं पतिः पञ्चपदा।' उब्बटाचार्योऽपि-“सा पङ्किरिष्यते यस्या अष्टाक्षराः पञ्च पादा भवन्ति' नन्विदं लक्षणमनुपपन्नम् ! अष्टाक्षरः पञ्चभिपादैः पङ्किरिति 'पथ्यापला वेव समन्वेति 'पथ्या पञ्चभिगायत्रैः' (पि० सू० ३ । ४८) इत्युक्तत्वात् , 'पतिः पञ्चपदा “इति यास्कबामन मतेऽपि (पदपडितः पञ्च(पि० सू० ३।४६ ) इत्युक्तेन पदपतौ च समन्वयेऽपि प्रस्तार विस्तार सस्वारादि पछितषु व्यभिचार एव । अत्रोच्यते-नेदं लक्षणं कित्त्वन्वर्थमात्रकथनं तेन दोषाभावात् । वस्तुतस्तु। पडितर्जागतो गायत्री च" (पि० सू० ३॥ ३७) इति पङक्तेः सामान्यलक्षणानुरोधेन नेदमनुपपन्नमेवेति दिक् । * लापवाय 'भुजौ चे' ति वक्तव्य गुरुमूतो न्यानो 'विपरीता' इति सहाव्यास्तीति सूचनार्थः । तथाचोक्तं शौनकेन-(विपरीता विपर्यये' (प्रा. शा०१६। ५४) सटीकपिङ्गलच्छन्दःसूत्रे- छन्दके पहिले और तीसरे पादमें आठ आठ अक्षरहों दूसरे और चौथे पादमें बारह बारह अक्षर हों) उसे भी 'सतः पङ्क्ति' कहते हैं ॥ ३९ ॥ *प्रस्तारपङ्क्तिः पुरतः॥४०॥ यदा जागतौ पादौ पूर्वी भवतः, गायत्रौ च परतः, 'तदा 'प्रस्तार. क्तिः नाम । यथा- 'भद्रमिद्भदा कृणवत्सरस्वत्य(१) किवारी चेतति वाजिनीवती(२) गृणाना जमदग्निवत् (३) स्तुवाना च वसिष्ठवत् (४) ॥' (ऋग्वेदे-अ० ५ ०६ व०२० मं० ३) 'पङ्क्तिर्जागतौ गायत्री च' (पि० सू० ३।३७) इत्यनेन गतार्थमिदं संशाविशेषज्ञापनाथं पुनरुच्यते ॥ ४० ॥ जिस छन्दमें आदिके दो पाद बारह बारह अक्षर के हों और शेष दो पाद भाठ आठ अक्षरके हों ऐसे चतुष्पाद् छन्दको 'प्रस्तारपति' कहते हैं। 'पतिर्जागतौ गायत्रौ च' इस सूत्रसे गतार्थ होने पर भी संज्ञा विशेषके ज्ञापन के लिये 'प्रस्तारपतिः पुरतः' इत्यादि सूत्रोंका आरम्भ समझना चाहिये । पूर्वोक्त सूत्रसे पक्तिका सामान्यलक्षण कहा गया है और आगेके सूत्रोंसे पङक्ति का विशेष लक्षण कहा जायगा ॥ ४० ॥ आस्तारपतिः परतः॥४१ ॥ यदा जागती पादौ परौ भवता, गायत्री च पूौं, तदा आस्तार- पङ्क्ति' नाम । यथा- 'भद्र नो मपि वातय (१) मनो दक्षमुत क्रतुम् (२) । * कचित् पुस्तके प्रथममास्तारपडिक्तरूपं लभ्यते । तदयुक्तम् , 'प्रस्तारपब्क्तिःपुरतः पच्चादास्तारपक्तिका" इत्यग्निपुराणविरोधात् सर्वानुक्रमविरोधाच । +पादेऽस्मिन्नेकादशाक्षरवात् संयोगादेरभाव्यूहस्थाप्यवकाशविरहाकथं प्रस्तारपडित. स्वमिति ध्येयम् । उदाहरणान्तरं मृग्यमेवेति । कात्यायनमते स्वियं दशाक्षरपादद्वयवती द्विपाद विराट् । शौनकेन तु पक्षद्वयमप्युक्तम्- 'विराजो द्विपदाः केचित्सर्वा आहुश्चतुष्पदाः । कृत्वा पञ्चाक्षरान् पादांस्तथाचाक्षरपतयः ॥" इति (म० प्रा० शा० १७ । ५०) सांख्यायनोऽप्याह- 'उत्तरस्या दशाक्षरौः, तामक्षरपङ्किरित्यप्याचक्षते । (ौ० सू०७।२७) - तृतीयोऽध्यायः । ५५ मधा ते सख्ये अन्धसो वि वो मदे (३) स्णन गावो न यवसे विवक्षसे (४) (ऋग्वेदे-अ० ७ म० ७ व० ११ मं०१)॥ ४१ ॥ जिस छन्दमें अन्तके दो पाद बारह बारह अक्षरके हों और आदिके दो पाद आठ आठ अक्षरके हों उसे 'आस्तारपङ्कि' कहते हैं ॥ ४१ ॥ विष्टारपङ्किरन्तः ॥ ४२ ॥ यदा जागतौ पादौ मध्ये भवतः, आद्यन्तयोश्च गायत्री, तदा 'विष्टारपक्ति' नाम । यथा- 'अग्ने त श्रवा वयो (१) महि भ्राजन्ते अर्चयो विभावसो २)। वृहद्भानो शवसा वाजमुक्थ्यं (३) धासि दाशुषे कवे (४)॥' (ऋग्वेदे-अ० ८ म०७ व २८ मं०१) ॥४२॥ जिस छन्दमें बीचके दो पाद जगतीके हों और आदिमें गायत्रीका, अन्तमें भी गायत्रीका पाद हो (अर्थात् जिस छन्दके पहिले पादमें आठ दूसरे और तीसरे पादमें बारह और चौथेमें फिर आठ अक्षर हो) उसे 'विष्ठारपक्ति' कहते हैं ॥४२॥ संस्तारपतिर्बहिः ॥४३॥ यदो तावेव जागतौ पादौ बहिर्भवतः, मध्ये च गायत्रो, तदा 'संस्तारपङ्क्तिः नाम छन्दः । यथा- पितुभृतो न तन्तुमित्सुदानवः (१) प्रति दध्मो यजामसि (२) । उषा अप स्वसुस्तमः (३) संवतयति वर्तनि सुजातता (४)।' (ऋग्वेदे-अ०८ म० - व०३० मं० ३,४) ॥ ४३ ॥ जस छन्दमें आदि तथा अन्तके पाद जगतीके हों और बीचके दो पाद गायत्रीके हों (अर्थात् जिस छन्दके पहिले और चौथे पादमें बारह बारह अक्षरहों तथा दूसरे और तीसरे पादमें आठ आठ अक्षरहों) उसे 'संस्तारपक्ति' कहते हैं॥४३॥ अक्षरपतिः पञ्चकाश्चत्वारः ॥ ४४ ॥ पञ्चाक्षरैश्चतुर्भिः पादः 'मक्षरपङ्क्तिः' नाम छन्दः । ननु चत्वा- रिंशदक्षरा पङ्क्तिश्छन्दः, तत्कथं 'पञ्च काश्चत्वारः' इत्युच्यते ? तत्रो. * मुरिकरूपत्वादेकाक्षराधिक्यम् । कात्यायनेन तु (पश्चकाश्चत्वारः षट्कधकः' सर्वा० (४२) इत्येव सूत्रितम् ।
- ? ५६ सटोकपिङ्गलच्छन्दःसूत्रे- चरम्-'द्वावप्यस्पशः' (पि० सू० ३।४५) इत्यस्मात् सिंहावलोकि. तन्यायेनाल्यग्रहणमनुवर्तते, तेन पङ्क्तेरल्पत्वं विशेषात्प्रतिपादित भवति । यथा- 'पश्वा न तायुं (१) गुहा चतन्तं (२) नमो युजानं (३) नमो वहन्तम् (४)॥' (ऋग्वेदे-अ०१ अ०५०१०१॥४॥ जिस छन्दमें चारो पाद पांच पांच अक्षरके हों उसे 'अक्षरपङ्क्ति' नामका छन्द कहते हैं। प्रश्न-चालीस अक्षरोंका पक्तिछन्द होता है। यहां पांच पांच अक्षर के चार पाद होनेसे बीस ही अक्षर होते हैं कैसे उत्तर-"द्वावप्यल्पशः" इस सूत्रसे अल्पशः पदको सिंहावलोकन न्यायसे लाना चाहिये। इससे इस छन्दका कदाचित् ही प्रयोग होता है यह तात्पर्य निकला ॥४४॥ द्वावपल्पशः ॥ ४५ ॥ पञ्चग्रहणमनुवर्तते । पञ्चाक्षराभ्यां पादाभ्यामल्पशः पङ्क्तिर्नाम छन्दो भवति, क्वचिदेव वेदे न सर्वत्र । यथा- 'सदो विश्वायुः (१) शर्म सप्रथाः ।' ( ते० प्रा०। ४११)॥ ४५ ॥ पूर्व सुत्रसे 'पञ्च पदकी अनुवृत्ति आती है। जिस छन्दमें दो ही पाद हों और प्रत्येक पादमें पांच पांच अक्षर हों उसे 'अल्पशः पक्ति' कहते हैं ॥ ४५ ॥ पदपतिः पञ्च ॥ ४६ ॥ 'पञ्चका" इत्यनुवर्तते । यदा पञ्चाक्षराः पञ्च पादा भवन्ति, तदा 'पदपजक्तनाम छन्दः । यथा- 'घृत *न पूतं (२) तनूररेपाः (२) शुचि हिरण्यम् (३)। वस्तुतोऽत्रक्रमो न विवक्षितः। यथा कञ्चित् पादत्रयं पश्चाक्षरम् , एकश्चतुरक्षरः, एकश्च षडक्षरः इत्यर्थः । अत एव (दौ वा पादौ चतुष्कश्च षटककत्रिपञ्चकाः' (मु० प्रा० शा० १६ । १५) इति शौनकीय लक्षणम् । (दौ पादौ एकचतुष्का, एका षटकाः, त्रयश्च पञ्चाक्षरा भवन्तीति क्रमनरपक्ष्येणे व व्याख्यौ तद्भाष्यकारः । तत्राघचतुष्कान्त्यषटकोदाहरणम्- भधा अग्ने० ( म० सं० १।५।१०।२) इत्येव । तृतीयचतुष्कान्त्यषट्कोदाहरणम्-
-
तृतीयोऽध्यायः।
५७
तत्ते रुक्मो न (४) रोचत स्वधावः (4) ॥'
(ऋग्वेदे-म०३ १०५ व०१० मं०६)॥१६॥
इस सूत्रमें भी 'पञ्चका पदकी अनुवृत्ति आती है। जिस छन्दमें पांच पाद
हों और प्रत्येक पादमें पांच पांच अक्षरहों उसे 'पदपङक्तिछन्द कहते हैं ॥ ४६ ॥
चतुष्कषट्को त्रयश्च ॥ ४७ ॥
चकारः ‘पञ्चकाः' इत्यनुकर्षणार्थः । यदा प्रथमश्चतुरक्षरः पादः,
द्वितीयः षडक्षरः, ततस्त्रयः पञ्चाक्षरास्तदा पञ्चपदा पदपङ्क्तिरेव ।
यथा-
'मधा हम्ने (१) क्रतोभद्रस्य (२) दक्षस्य साधोः (३) ।
एमिनों अक (१) भवानो अर्वा (२) स्वर्णज्योतिः (३) अग्ने विश्वेमिः (४) तुमन ।
अशोकः (५)।' (म० सं० ३।५।१०।१ ) चतुर्थ चतुष्क पञ्चमषट्कोदाहरणम्-
अग्ने तमद्या-(१) श्वं नस्तोमः (२) ऋतुं न भ्रदं (३) हृदिस्पृशन् (४) मध्यमा त
ओहै। (५) ॥ (म० सं० ३।५।१०।१ ) अन्यान्यप्युदाहरणानि शाखान्तरे मृग्याणीति दिक् ।
। यथाप्यस्याः प्रथमेऽर्धे पादद्वयम् , उत्तरार्धेच त्रयमिति प्रायो दृश्यत तथापि कचिद्वै.
परीत्यस्यापि सत्त्वान्न तथा नियमः । यथा-
"नकि देवा मिनीमसि (१) नकिरा योपयामसि (२) मन्त्रश्रुत्यै चरामसि (३) प्रक्षेभिरपि
कक्षेभि (४) रत्रामि संरेभामहे (५)॥)
(म० सं०८।७२।७)
(२) 'महा पङ्क्तिः षडष्टका' (प्रा० शा० १६१७१)
इति शौनकः । कदाच्चिदत्रापि मूले ( महतीतिपाठ ) सम्भाव्यते ।
अथ पडिक्तछन्दसः संक्षेपतो भेदाः प्रदयन्ते
भवेता जागतौ पादौ, गायत्रौ यत्र चादको । पङिक्तमतां विजानीया, न्निखिलश्रुतिगोचराम् ॥१॥
प्रथमे जागतो यस्य, तृतीयेऽपि तथा भवेत् । गायत्रो चान्यपादेषु, सतः पििक्रतिस्मृता ॥२॥
पूर्वोक्तलक्षणे विद्वन् , विपरीतौ यदि श्रुतौ । पिङ्गलस्य सतः पक्ति, विपरीता मतान्तरे ॥३॥
पुरो भागे जागतौ चेत् , प्रस्तारपक्तिका भवेत्। गायत्रौ चाधभागेचेत् , प्रास्तारपङ्क्तिका तदा।।४॥
अन्तो विष्टारपक्तिः स्यात्, संस्तार पंक्तिका बहिः। चत्वारः पञ्चका यत्र, साक्षरपतिका स्मृता
पादौ यत्र भवेतां दौ, पञ्चाक्षरसमन्वितौ । अल्पश इति सा पङिक्तः, क्वचिदेव प्रयुज्यते ॥६॥
पञ्चस्वपि च पादेषु, पञ्चपञ्चाक्षराणि चेत् । चतुर्युचापि वेदेषु, पदपङ्क्तिहिंगीयते ॥ ७ ॥
पादौ यदीयो प्रथमद्वितीयौ चतुष्कषटकाक्षरवृन्दभाजौ।
त्रयश्च पादा यदि पञ्चवर्णा पदादिपङिक्तर्मुनिभिः प्रविन्ना ।।।
गायत्रः पञ्चभिः पथ्या विद्वद्गोष्ठो प्रतिष्ठिता। षड्भिश्च जगती प्रोक्ता महापक्तिमतान्तरे ॥९॥
सटोकपिङ्गलच्छन्दःसूत्र- रथीतस्य (४) बृहतो बभूथ (५) ॥' (ऋग्वेदे-अ० ३ ०५ व० १० म०२) ॥४७॥ इस सूत्र में 'पञ्चकाः' इस पदका अनुकर्षण करने के लिये ही चकार रखा गया है। जिस छन्दके पहिले पादमें चार अक्षर और दूसरेमें छः अक्षरहों । तथा पांच पांच अक्षरके शेष तीन पादहों उसे भी 'पदपङक्ति' कहते हैं ॥४॥ पथ्या पञ्चभिर्गायत्रैः ॥४८॥ पञ्चभिरष्टाक्षरैः पादः 'पथ्या' नाम पक्तिर्भवति । अस्योदा. हरणम्- 'यो मर्यो मतभोजनं (१) पराददाति दाशुषे (२) । इन्द्रो अस्मभ्यं शिक्षतु (३) विभजा भूरि ते वसु (४) भक्षीय तव राधसः (५)॥' (ऋग्वेदे-म०१ भ०६०२ मं०१)॥४। जिस छन्दमें पांच गायत्रीके पादहों (अर्थात् आठ आठ अक्षरोंके पांच पाद हो ) उसे 'पथ्यापक्कि' कहते हैं ॥ ४८ ॥ जगती षभिः॥४९॥ 'गायत्रैः' इत्यनुवर्तते । गायत्रैः षडभिः पादैः 'जगती' नाम च्छन्दो भवति । यथा- 'महि वो महतामवो (१) वरुण मित्र दाशुषे (२)। यमादित्या अभि द्रुहो (३) रक्षथा नेमघं नश (४) दनेहसो व ऊतयः (१) सुऊतयो व ऊतयः (६) ॥' (ऋग्वेदे-अ०६ १०४ व०७ मं०१) ॥ ४६ ॥ इति पङ्क्त्यधिकारः। . (१) (क) सतः पङ्क्तिः (१२, ८, १२, ८) अक्षरपङिक्तः (५,५,५,५) (२) (ख) सतः पतिः (८, १२, ८, १२) (5) अल्पशः पंक्तिः (५,५,) (३) प्रास्तारपडितः(८,८,१२१२) (९) (क) पदपङ्गिः (५,५,५,५,) प्रस्तारपङ्क्तिः (१२, १२, ८,८,) (१०)(ख) पदपक्तिः ( ४,६,५,५,५,) विस्तारपङिक्तः (८,१२,१२,८) पथ्यापक्तिः (८,८,८,८,८) संस्तारपडितः । (१२, ८,८,१२) (१२) जगती पङ्क्तिः (८,८,८,८,८,८) इति पतिप्रकरणम् ।
। तृतीयोऽध्यायः। પહ 'गायत्रः' इस पदका अनुवर्तन होता है। जिसः छन्दमें छः गायत्रीके पाद हों ( अर्थात् आठ आठ अक्षरोंके छः पादहों ) उसे जगती कहते हैं ॥ ४९ ॥ अथ त्रिष्टुःजगत्यधिकारः । एकेन त्रिष्टुब्ज्योतिष्मती ।। ५० ॥ त्रिष्टुभः प्रस्तुतत्वात्प्रत्यासत्तेश्च तस्या एव सम्बन्धः। एकेन अष्टुमेन पादेनाधिकाराच्चतुर्भिर्गायत्रैः पञ्चपात् त्रिष्टुब्ज्योतिष्मतो' नाम छन्दो भवति । त्रैष्टुभेन सह पञ्चभिर्गायत्रैः। (पि० सू० ३।४८) इत्युत्ते चत्वार एव गायत्राः पादा लभ्यन्ते । यथा 'उपाध्यानेन सह पश्च शिष्या भागता' इत्युक्ते उपाध्यायपञ्चमाः प्रतोयन्ते ॥ ५० ॥ त्रिष्टुभका ही प्रकरण है और त्रिष्टुभ शब्द निकटमें भी हैं। इसलिये एक शब्दका त्रिष्टुभशब्दके हाथ हो सम्बन्ध करना युक्तियुक्त है । गायत्रीका अधिकार भारहा है। 'पञ्चभिः गायत्रैः' (पि० ३।४८) सूत्रकी जो आवृत्ति भारही है उसमें यदि.( एकेन त्रिष्टुभे पादेन ) इन दो पदोंको भी मिला दिया जाय तो पूरा वाक्य होगा ( एकेन त्रिष्टुभेन पादेन पञ्चभिर्गायत्र स्त्रिष्टुब् भवति)। (अर्थात् एक त्रैष्टुभ पादके साथ पांच गायत्रीके पाद यदि हो तो * त्रिष्टुष्पदनिर्वचनमित्यर्थ निरुक्त-(नि० ७-७२ ) 'त्रिष्टुप् स्तोमत्युत्तरवदा स्तो. मत्युत्तरपदं यस्याः सेयं त्रिष्टुप् । अस्यत्रस्तोभत्युत्तरपदे । तत्र त्रिशब्दोऽस्ति तन्निवचनः पुनः पृच्छति (कातु त्रिता स्यात् ?) अथ पूर्वपदे येयं त्रिता त्रित्वंभूयते 'त्रि' इति एतत्किमर्थकमिति ? उत्तरमाह- 'तीर्णतम छन्द: स्तुततममिदं छन्दः गाय च्यादिभ्यो बहुत्वाद सेयं तीर्णतमा च स्तोभति- चेति त्रिष्टुप् । यदा "त्रिवृद्वज्रस्तस्य स्तोमतीति वा" वज्रमायुधं तत्र पुनस्त्रिसन्धि शरः, शृङ्ग, शल्यमिति वा तस्य स्तोमति स्तुति करोति ऋषिरनयन्ति त्रिष्टुप् । यद्वा 'यत्रिरस्तोमत्-तस्त्रिष्टुभस्त्रिष्टुभव मिति विज्ञायते' यत् अनया त्रिवारमस्तोमत् स्तुतवान् ऋषिः तेन त्रिष्टुप् । एवं जगतीनिर्वचनं निरूक्ते ( ७।१३) (जगती गततमं छन्दः ) गततममन्त्यम् । अतः परम तिच्छन्दांसीत्यर्थः । 'जलचरगति' अथवा जलचरबत् तस्या गतिः । जलोमिंप्रकारो हि तस्याः प्रस्तारः तथाहि । 'लचर' शब्दस्य पृषोदरादित्वाल्लोपे डी (पा०४-१-४५) अथवा 'जगल्यमानोऽसृजदिति च ब्राह्मणम्' 'ग्लै हर्षक्षये' क्षीणहर्ष व किलेतां प्रजापति- रस्जदाश्यत् । नित्यत्वादेव छब्दसा स्रष्टुमसामाद्धि हर्षक्षयः॥ .. - सटोकपिङ्गलच्छन्दासूत्रे- उसे त्रिष्टुभ छन्द कहते हैं)। त्रिष्टुभके साथ पांच गायत्रीके पाद हो ऐसा करने पर एक पाद त्रिष्टुभका और चार पाद गावत्रीके ऐसा प्रतीत होता है । जैसे उपाध्याय के साथ पांच शिष्य आये हैं इस वाक्यसे चार शिष्य और पांचवा उपाध्याय ऐसा प्रतीत होता है उसी प्रकार यहां पर भी समझना। यह वृत्तिकार . का अभिप्राय हैं इसकी विशेष आलोचना *टिप्पणीमें देखिए । वृत्तिकारके मतसे सूत्रार्थ यह हुआ कि "जिस छन्दमें त्रिष्टुभका एक पाद हो (अर्थात् ग्यारह अक्षरों का एक पादहो) शेष पाद गायत्रीके हों (अर्थात् उनमें आठ आठ अक्षर यदि हों) तो उसे त्रिष्टुभ छन्द कहते हैं ॥ ५० ॥ तथा जगती॥ ५१ ॥ पकना जागतेन पादेन चतुर्भिर्गायः पादैः पञ्चपाजगती 'ज्यो. तिष्मती' नाम छन्दो भवति ॥ ११ ॥ जिस छन्दमें बारह अक्षरों का एक पाद और चार पाद आठ आठ अक्षरों के हों इस प्रकारका पञ्चपाद छन्दको ज्योतिष्मती जगती कहते हैं ॥५१॥ पुरस्ताज्ज्योतिः प्रथमेन ॥५२॥ प्रथमेन त्रैष्टुभेन पादेन, शेषश्च गायत्रैः पादः 'पुरस्ताज्ज्योतिः' नाम त्रिष्टुब भवति । यथा- 'कृधी नो भयो देव नवितः (१) स च स्तुषे मघोनाम् । सही न इन्द्रा वह्निभि (३) न्येषां चर्षणीनां (४) चक्रं रश्मि न योयुवे (५)॥' (ऋग्वेद-१०८ १०४ व० २७ मं०४) * इदन्वतासङ्गतमेव 'उपाध्यायेन सह पञ्चशिष्या भागता' इत्युक्ते 'उपाध्यायकर्तृका- गमन समानकालिका गमनवन्तः पञ्चसंख्याः शिष्याः' इत्येव शाब्दबोधः समभिव्याहृत पदार्थः समकालिकस्वरूपस्यैव सहार्थत्वात् । किञ्च पुत्रेण सह स्थूल इव शिष्यवृत्ति पश्च संख्यकत्व स- मानकालिकपञ्चसंख्यकत्ववानुपाध्याय इति बोधस्य सर्वानुभवाविरूद्वत्वात्। पञ्चाभिः पुत्रैः सहा- गतः पिता इत्यनेनापि तथात्वापत्तेश्चा। विस्तरस्तु लघुमजूषायां व्युत्पत्तिवादेऽप्यनुसन्धेय इति दिक् । वस्तुतस्तु एकेनेति 'पथ्याः पञ्चभिर्गायत्र: (३।४८) इत्यते। गायत्रपादस्थ प्रस्तुतत्वात् प्रत्यासोश्च तस्यैव संम्बन्धः स्यात् । गायत्रेनेकेन पादेनाधिकारात् त्रिभिस्टुभैः पापश्च- तुपात् त्रिष्टुप् 'ज्योतिष्मती' नाम इति ब्याख्मातमेवमुक्तम् 'ततो ज्योतियतोऽष्टकः। (ऋ० प्रा० १६।१६) इति शौनकीयमप्येवं सङ्गच्छते प्रयोगबाहुल्यमपि दृश्यते ॥ एकेन गायत्रेण पादेन चतुर्भिश्च जागतैश्चतुपाद्' 'ज्योतिष्मती' इति व्याख्यानान्तरम् * द्वितीयचतुर्थपादयोन्यूँ हेनाक्षरपूर्तिः।
तृतीयोऽध्यायः। पूर्वेणैव गतार्थत्वाद्विशेषसंज्ञापनार्थमिदम् । 'तथा जगती' इत्य. नुवर्तनीयम् । तेनाधेन जागतेन पादेन चतुर्भिश्च गायत्रैः 'पुरस्ता- ज्योतिः' नाम जगती भवति । यथा- 'नमोवाके प्रस्थिते अध्वरे नरा (१) विवक्षणस्य पीतये (२)। श्रोयातमश्विना गत (३) मवस्युर्वामहं हुवे (४) धत्तं रत्नानि दाशुषे (५)' (ऋग्वेदे-अ० ६ म०३ २०१७ मं०५) ॥ ५२ ॥ जिस छन्दके पहिले पादमें ग्यारह अक्षर और शेष चारों पादमें आठ भाठ अक्षरहों तो उसे पुरस्ताज्ज्योति नामक त्रिष्टुब् कहते हैं। इसी प्रकार जिस छन्द के पहिले पादमें बारह अक्षरहों और शेष चारों पादमें आठ आठ अक्षरहों ऐसे पश्चपाद छन्दको 'पुरस्ताज्ज्योति जगती कहते हैं। यहां एक बात ध्यान देने योग्य हैं उपरिधाज् (३।५४) सूत्र तक 'तथा जगती' (पि० स० ३।५१) सूत्रसे जगती शब्दका अनुवर्तन होता है और एकेन-(३१५.) सूत्रसे त्रिष्टुप् का भी, इसलिये त्रिष्टुप् और जगती दोंनो छन्दोंका साथही साथ लक्षण किया गया है ॥ ५२ ॥ मध्येज्योतिर्मध्यमेन ॥ ५३॥ यदा मध्यमस्रष्टुभः पादो भवति, उभयतश्च द्वौ द्वौ गायत्रौ, तदा 'मध्येज्योतिः' नाम त्रिष्टुब् भवति । मध्येज्योतिरित्यलुक्स- मासः । यथा- 'वृहद्भिरग्ने श्रर्चिभिः (१) शुक्रण देव शोचिषा (२)। भरद्वाजे समिधानो यविष्ठ्य (३) रेवन्नः शुक्र दीदिहि (४) धमत्पावक दीदिहि (५) ॥' (ऋग्वेदे-अ०४ म०८ व० २ मं० २) 'तथा जगती' इत्युवर्तनीयम् । तेन मध्यमेन जागतेन एकेन जागतेन मध्यमेन तृतीयेनोभयतश्च द्वौ द्वौ गायत्रौ, तदा 'मध्येज्यो. ति: नाम जगती भवति । यथा- 'यन्मे नोक्तं तद्रवतां (१) शकेयं यदनुब्रुवे (२) । निशामतं निशामहै मयि व्रतं (३) सह ब्रतेषु भूयास (४) ब्रह्मणा सङ्गमेमहि (५) ॥' (ऋग्वेदे-अ०८०८०६ परि० मं०४)॥ ५३ ।। - सटीकपिङ्गलच्छन्दःसूत्रे- जिस छन्दके पहिले दो पाद और अन्तके दो पाद आठ आठ अक्षरों के हो और शेष बीचका तीसरा पाइ ग्यारह अक्षरोंका हो तो उसे 'मध्येज्योति' नामक त्रिष्टुप कहते हैं। इसी प्रकार जिस छन्दके पहिले दो पाद और अन्तके दो पाद आठ आठ अक्षरोंके हों तथा बीचका तीसरा पाद यदि बारह अक्षरोंका हो तो उसे "मध्ये ज्योति" नामकी जगती कहते हैं ॥ ५३ ॥ उपरिष्टाजज्योतिरन्त्येन ॥ ५४॥ यदा चत्वारा गायत्राः पादा भवन्ति, अन्ते च त्रैष्टुभः, तदा 'उपरिष्टाज्योतिः' नाम त्रिष्टुम् भवति । यथा- 'संवेशिनों संयमिनी (१) ग्रहनक्षत्रमालिनाम् (२) । प्रपन्नोऽह शिवां रात्री (३) भद्रे पारमशीमहि (४) भद्रे पारमशीमह्यों* नमः (१) ॥' (ऋग्वेदे-अ०भ०७व०१४ मं०४) 'तथा जगती' इत्यनुवर्तनीयम् । तेनान्तेन जागतेन पादेन शेषैश्च गोयौश्चतुर्भिः 'उपरिष्टाज्योतिः' नाम जगती भवति । यथा- 'लोकं पृण छिद्रं पृण (१)। मथो सीद शिवात्वम्। (२)। इन्द्रानो वा बृहस्पतिः (३) । अस्मिन् योनावसीषदन । (४)। तया देवतयाङ्गिरस्वध्रुवा सीद (५)॥' (यजुर्वेदे-तै० ब्रा० अ० ३ प्र० ११ म०६ मं०३) ॥ ५४ ॥ इति त्रिष्टुब्जगत्यधिकारः। जिस छन्दमें आदिके चार पाद आठ भाठ अक्षरोंके हो और अन्तका : हि ओं इति ब्यूहेनाक्षरपूर्तिः । + तु अ इति व्यूहेनाक्षरपूर्तिः। * अक्षराधिक्याभुरिक । एवमेवोत्तरत्रसमाधेयम् । अथ त्रिस्टुब्जगत्योः संक्षेपतो भेदाः प्रदर्श्यन्ते । पञ्चपादः । (१) पुरस्ताज्योतिः त्रिष्टुप् ( ११,८,८,८,) (१) पुरस्ताज्ज्योतिःजगती (११,८,८,८,८ ) (२) मध्येज्योतिः त्रिष्टुप् (८,८,११,८,८) (२) मध्ये ज्योतिः जगती (८,८,१२,८,८) (३) उपरिधाज्ज्योतिः त्रिष्टुप् (८,८,८,८,१९) (३) उपरिष्टाज्ज्योतिः जगती (८,८,८,८,१२) इति त्रिष्टुम्जगत्यधिकारः।
तृतीयोऽध्यायः। ६३ पांचवा पाद यदि ग्यारह अक्षरोंका हो तो उसे 'उपरिष्टाज्योति' नामक त्रिष्टुप् कहते हैं। इसी प्रकार जिस छन्दमें आदिके चार पाद आठ आठ अक्षर हों और अन्त का पांचवा पाद यदि बारह अक्षरोंका हो तो उसे 'उपरिष्टाज्ज्योतिनामको जगती कहते हैं। पूर्वकी तरह एकेन-(३॥५०) तथा जगती (३।५१) सूत्रोंसे सिद्ध होने परंभी विशेष 'ज्ञा विधान करने के लिये ही और तीन सूत्र कहे गये हैं ॥ ५४ ॥ अथ गायच्यादीनां विशेषसंज्ञाधिकारः। एकस्मिन्पञ्चके छन्दः शङ्कुमती ॥ ५५ ॥ रदैकः पञ्चाक्षरः पादो भवति, अयश्च षडक्षराः,* तदा 'शङ्कुमतो' 8 'यदकः पञ्चाक्षरः पादो भवति त्रयश्च द्वादशाक्षरास्तदा 'शकुमती जगती' भवति इति क० मु० पु० टिप्पण्या लिखित पुस्तके च । * इदं चिन्त्यमेव एकस्य पादस्य पञ्चावरत्वमात्रं ह्यत्र विवक्षितम् तथा च लाघवमपि- (१) युक्तेन मनसा वयं (१) देवस्य सवितुः सर्वे (२) । स्वाय शक्त्या (३) ।। (२) उष्णिहो यथा- सुबीर्य स्वश्व्ये (१) सुगन्यमिन्द्र दद्धिनः (२) । हातेव पूर्वचित्तये प्राध्वरे ॥ (ऋ० सं०६।१.६८) (३) अनुष्टुभो यथा- पितु नु स्तोष (१) महो धर्माणं तविषीम् (२) यस्य त्रितो व्योजसा (३) वृत्रं विधर्वमदयंत् (ऋ० अ० २ अ० ५ १०६ मं० १) (४) बृहत्या यथा- वास्तोष्यते ध्रुवा स्थूणां (१) क्षेत्र साम्यानाम् (२) द्रप्सा भत्ता पुरां शश्वतीना (३) मिन्द्रो मुनीनां सखा (४) (ऋ० सं०६२२४।४) (५) पडत्या यथा- अग्ने तव स्यदुकटयं (१) देवेश्वस्त्याप्यम् (२) । स नः सत्तो मनुष्यदा (३) देवान्यक्षि विदुष्टुरो (४) - - । - ।
- सटीकपिङ्गलच्छन्दःसूत्रे- ६४ नाम गायत्री । यथा- 'तिम्रो देवीबहि(१)रेद्सदन्त्विडा (२) सरस्वती भारती(३)। मही गृणाना (8) यतैत्तिरीयसंहिता-कां०४प्र० १ ० ८ मं०६) छन्दोग्रहणे प्रकृते पुनश्छन्दोग्रहणं छन्दोमात्र प्रतिपत्त्यर्थम् । तेन सर्वेषु छन्दःसु पञ्चाक्षरैकपादलक्षिता शङ्कमती भवति । इतरथा ह्यन- न्तरमेव सम्प्रत्यय: स्यात् ॥ ५५ ॥ जिस छन्दमें एक पाद पांच अक्षरोंका हो और शेष तीन पाद छः छः अक्षरों के हो तो उसे शङ्कुमती गायत्री कहते हैं। यहाँ पर (छन्दः)(पि. सू. २११)सूत्रसे छन्दः शब्दका अधिकार सिद्धहीथा पुनः इस सूत्रमें छन्द शब्दकाग्रहण सामान्यत: समस्त छन्दोंका बोध कराने के लिये ही किया गया है । इसलिये यह नियम सभी छन्दोंके लिये समझना चाहिये । अत एव गायत्री, उष्णिक , अनुष्टुप् आदि सातों प्रकारके वैदिक छन्दों के लक्षण कहे हैं। जितने अक्षरोंके जितने पाद कहे गये हैं यदि उनमें किसी एक पादमें पांच अक्षर पाये जायें और शेष पादों में जितने मक्षर कहे गये हैं उतने ही अक्षर होतो उन छन्दोंको भी शङ्खमती समझना। जैसे- आर्षी अनुष्टुप छन्दमें आठ आठ अक्षरके चार पाद और कुल बत्तीस अक्षर कहे गये हैं अब उनके यदि किसी एक पादमें पांच अक्षरहों और शेष तीनों पादमें माठ आठ अक्षरहों तो उसे शङ्कुमतो अनुष्टुप् समझना। इसी प्रकार अन्यान्य छन्दोंमें भी कल्पना कर लेनी चाहिये ॥ ५५ ॥ षट्के ककुम्म(मोती ॥५६॥ एकस्मिन् षडक्षरे पादे, अन्येषु यथालक्षणमुपातेषु छन्दो. मानं 'ककुम्म(म)ती' नाम भवति ॥५क्षा पूर्वोक्त जिस कीसी छन्द के यदि छः अक्षरो का कोई सा पाद तो उसे कुकुमती समझना ॥ ५६ ॥ वित्तं में अस्य रोदसी (५)। (ऋ० सं० ११७२२।३) (६) त्रिष्टुभो यथा- विधु देद्राणं समने वहूनाम्(१) युवा न* सनो पलिती जगार (२) देवस्य पश्य काव्यं महित्वाधाममार(३) स यः समान(४) ॥ ( ते० प्रा० .४।२०१३) (७) जगत्या मृग्यम् ।
तृतीयोऽध्यायः। ६५ त्रिपादणिष्ठमध्या पिपीलिकमध्या ॥५७ ॥ यदाधन्तो पादौ बनरी, मध्यमोऽल्पतराक्षरः तदाणिष्ठमध्या सती पिपीलिकमध्या' नाम भवति । अयमर्थ:-माद्यन्तौ पादावष्टा- क्षरी, मध्यमव्यतरः, एवं त्रिपाद्वायत्री 'पिपीलिकमध्या' नाम भवति । एवं चतुरक्षरे पञ्चाक्षरेऽपि मध्यमे पादे पिपीलिकमध्या सिद्धयति । यत्किञ्चित्रिपाच्छन्दो लघुमध्यमपादं तत्लवं पिपीलिक- मध्यमुच्यते ॥ ५७॥ जिस छन्दके भादि और अन्त के पाद बहुत अक्षरोंसे युक्त हों और मध्म का पाद स्वल्प अक्षरोसे युक्त हो, तो इस प्रकार की गायत्रीको पिपीलिकमध्या कहते हैं। स्पष्टार्थ इस प्रकार है-जिस छन्दके आदि और भन्तके पाद माठ आठ अक्षरोंके हों और मध्यका पाद तीन अक्षरोंका हो इस प्रकारकी त्रिपाद् गायत्रीको पिपीलिकमण्या कहते हैं। इसीप्रकार जिस छन्दमें मध्यका पाद चार या पांच अक्षरोंका हो तो उसकी भी 'पिपीलिकमण्या' संज्ञा होती है केवळ गायत्री के लिये ही यह नियम नहीं हैं किन्तु कोई भी त्रिपाद् छन्द क्यों न हो यदि उस त्रिपाद छन्दमें बीचका पाद कम अक्षरोंका होगा तो उसकी भी पिपीलिकमध्या संज्ञा होगी ।। ५७ ॥ विपरीता यवमध्या ॥५८॥ माद्यन्तौ पादा लध्वक्षरौ, मध्यमश्च बहक्षा, सा गायत्रो 'यव. मध्या' नाम भवति । एवमुष्णिगादिष्वपि योज्यम् ॥ ५ ॥ जिस छन्दके आदि और अन्तके पादमें अल्प अक्षर हों एवं मध्यके पादमें यदि बहुत अक्षर हों तो उसे 'यवमध्या' कहते हैं। इसी प्रकार उष्णिक मादि छन्दों में भी मथ्यका पाद यदि बहुत अक्षरोंसे युक्त हो, तो उनकी भी 'यवमध्या' संज्ञा होती है ॥ ५८॥ ऊनाधिकेनैकेन निद्भुरिजौ ।। ५९॥ चतुर्विशत्यक्षरा गायत्रो एकेनाक्षरेण न्यूनेन सा 'निचत्' इति विशेषसंज्ञां लभते । एकेनाधिकेन 'भुरिक इति । एवमुष्णिगादिवपि द्रष्टव्यम् ॥ ५६॥ चौबीस अक्षरकी गायत्रीमें यदि एक अक्षर कम हो (भर्थात् तेईस अक्षर ४॥ पि० छ० ।
- ६६ सटोकपिङ्गलच्छन्दःसूत्रे- हो) तो उसकी 'निवृत्' संज्ञा होती है और उसी चौबीस अक्षरको गायत्रीमें यदि एक अक्षर अधिक हो (अर्थात् पचीस अक्षर हो) तो उसकी 'भुरिक संज्ञा होती है। इसी प्रकार उष्णिक आदि छन्दोंमें भी समझना चाहिये ॥ ५९॥ द्वाभ्यां विराट-स्वराजौ ॥ ६० ॥ 'ऊनाधिका ग्रहणमनुवर्तते । ब्राभ्यामक्षराभ्यां न्यूनाधिकाभ्यां गायत्री यथाक्रम विराट-संज्ञा भवति । एवमुग्णिगादिष्वपि द्रष्टव्यम् ॥ ६०॥ जिस गायत्री छन्दमें दो अक्षर कम अथवा दो अक्षर अधिक हो तो उसकी क्रमशः विराट और स्वराट् संज्ञा होती है। आर्षी गायत्रीमें २४ अक्षर होते हैं। यदि २२ अक्षरकी गायत्री देख पड़े तो उसे 'विराट् गायत्री' समझना और यदि २६ अक्षर देख पड़े तो उसे स्वराद गायत्री समझना। इसीप्रकार उष्णिक आदि छन्दोंमें भी अक्षरों की कमी और अधिकतासे विराट और स्वराटका ज्ञान करलेना चाहिये । ६०॥ आदितः (*)सन्दिग्धे ॥ ६१ ॥ यदा षडविंशत्यक्षरं छन्दो भवति, तदा किं प्रतिपत्तव्यम् । किं गायत्री स्वराड् ? उतोष्णिग्विराड ? इति । एवं सन्दिग्धे सति छन्दस्यादिभूतात् पादानिर्णयः कर्त्तव्यः । यदि प्रथमः पादो गायच्या. स्तदा गायव्येवासौ । मथोणिहस्तदोष्णिग् इति । एवं सर्वत्र ॥११॥ जब किसी छन्दमें छब्बीस अक्षर हों तो क्या उसे 'स्वराड् गायत्री' समझना चाहिये या 'विराड् उष्णिक ? क्यों कि पहिले सूत्रमें कहा गया हैं कि किसी छन्द में यदि दो अक्षर बढ़ जायं तो उसे स्वराट और दो अक्षर पट जायं तो उसे विराट् समझना चाहिये। जैसे चौबीस अक्षरोंकी आर्षी गायत्रीमें यदि दो अक्षर और बढ़ जायं (अर्थात्.छब्बीस अक्षर हो जायं) तो वह स्वराट् गायत्री हो जाती है। इसोप्रकार (२८) अक्षरोंका आर्षी उष्णिक छन्द होता है यदि उसमें (*) भवत्येव संशये छन्दसां दैवतेनाध्यवसायः, यथा-'तव स्वादिष्ठा'-(ऋ० सं० झ६।१०।५) 'शिवा नः सख्या'-(म० सं० ३।५।१०।८) इत्यनुष्टुबुष्णिहोर्मध्ये 'घृतं न पूर्त' (ऋ० सं० ३।५।१०।६०) इति षड्विंशत्यक्षरे दे-ऋचौ देवतेन स्वराजी गायत्र्यावध्यवसीयेते, चरिणावृष्णिहो।" इतिऋप्रातिशाख्यव्याख्यायामुग्वटः ।
तृतीयोऽध्यायः। ६७ दो कम हो जाये तो उसकी 'विराट् उष्णिक' संज्ञा होगी। अब इन्बीस अक्षरके छन्द होने से उसकी स्वराट् गायत्री संज्ञा होगी । अथवा विराट् उष्णिक संज्ञा होगी। ऐसे स्थलपर सन्देह होता है। उन सन्दिग्ध स्थलों में छन्दोंका निश्चय होना असम्भव है। इसीलिये इस सूत्र में उसीका उपाय कहा जारहा है। यदि ऐसा स्थल मिल जायतो वहांपर प्रारम्भका पाद देखकर व्यवस्था करना चाहिये। यदि प्रारम्भका पाद गायत्रीका हो तो उसे गायत्री समझना और यदि प्रारम्भ का पाद उष्णिकका हो तो उसे उष्णिक ही समझना। इसी प्रकार सब जगह जान लेना चाहिये। मेरे विचरसे ऐसे स्थलों पर जहां कि 'स्वराट् गायत्री' या 'विराट् उब्जिए । का सन्देह होता हो वहां पर प्रारम्भका पाद देखकर निर्णय करना असम्भव क्यों कि दो गायत्रीके पाद और एक जगतीका पाद जहां पर हो उसे उष्णिग कहा गया है ( देखो ३।१८) उष्णिक छन्दके आदि पादमें भी गायत्रीका पाद हो सकता है। इस लिये यह नियम इनके अतिरिक्त (*)स्थलों में ही मान्य होगा ॥६१॥ देवतादितश्च ॥ ६ ॥ इदमपरं निर्णयानिमिचमुच्यते । सन्दिग्धे छन्दसि देवतादेच निर्णयः कर्तव्यः। श्रादि ग्रहणं स्वरादिपरिग्रहार्थम् ॥ ६२ ॥ सन्दिग्धस्थलों में निर्णयकेलिये दुसरा उपाय भी कहा जारहा है। जिस छन्दमें छब्बीस अक्षरों को देखकर सन्देह होता है। कि यह स्वराट् गायत्री है या विराट उष्णिक, वहां पर देवता देखकर निर्णय कर लेना चाहिये । जैसे गायत्रीका अग्नि देवता है और उष्णिकका सविता । इसलिये यदि अग्निदेवताका बिधान मिलता हो तो उसे गायत्री छन्द यदि सविताका उल्लेख हो तो उसे उष्णिक छन्द समझना चाहिये। किस छन्दका कौन सा देवता है यह मागे के सूत्र में कहा जायगा। आदि पदसे स्वरोंका भी प्रहण होता है ॥ १२ ॥ कस्य छन्दसः का देवता, तथा निर्णयः कर्तव्यः इत्यपेक्षायामिदमुच्यते । आग्निः सविता सोमो वृहस्पतिमित्रावरुणाविन्द्रो विश्वेदेवा देवताः।। ६३ ॥ (*) यथा ( यो अग्नीषोमा हविषां सपर्या (क) हेवीचा मनसा यो धूतेन (२) तस्य व्रत रक्षतं पातमहसो (३) विशेजनाय महि शर्म यच्छतम् (४) (ऋ० सं० १।६।२९।२.)
६. सटीकपिङ्गालच्छन्दःसूत्र- गायच्यादीनां जगतोपर्यन्तानां यथाक्रममन्यादयो देवता वेदि. तव्याः। तत्र सन्दिग्धे छन्दसि यदाग्नेयं, तदा गायत्री। यदि सावित्रं, तदोष्णिग। एवं सर्वत्र । वैदिकेष्वेव छन्दामु निरिजौ, तथा विरा स्वराजौ च दृश्येते; न लौकिकेषु । अतो लौकिकेषु सन्देहाभा- वासनिर्णयनिमित्तभृता देवतादयो नेष्यन्ते ॥ ६३ ॥ पहिले कहा गया है कि देवतों को देखकर छन्दों का निर्णय करना चाहिये परन्तु कौनसे छन्दका कौन सा देवता होता है यह नहीं कहा गया है इस सूत्र में यही कहा जा रहा है। गायत्रीसे लेकर जगती पर्यन्त जो सात छन्द हैं गायत्री, उष्णिक , अनुष्टुप् , बृहती, पति, त्रिष्टुप् और जगती इन छन्दों के क्रमसः अग्नि, सविता, धोम, बृहस्पति, मित्रावरुण, इन्द्र और विश्वदेव देवता होते हैं। जैसे गायत्री का अनि, उष्णिकका सविता, अनुष्टुपका सोम, बृहतीका वृहस्पति, पत्रिका मित्रावरुण, त्रिष्टुप्ता इन्द्र और जगतीका विश्वदेव देवता होता है । अतः किसी मन्त्रका अग्नि देवता है तो गायत्री छन्द और सविता देवता है तो उष्णिक छन्द है ऐसा समझना चाहिये । इसीप्रकार और भी समझना । स्वराट् विराट् आदि भेद वैदिक् छन्दोंमें ही होते हैं लौकिक छन्दों में ये भेद नहीं होते। इसलिये लौकिक छन्दोंमें सन्देह न होने के कारण उनमें देवता का उपयोग नहीं है ॥६३ ॥ . स्वराः षड्जादय: ।। ६४।। षड जर्षभगान्धार-मध्यम-पञ्चम-धैवत-निषादा: स्वरा गायच्या. दिषु क्रमेण द्रष्टव्याः ॥ ६४ ॥ गायत्री प्रमृति सात प्रकारके छन्दोंके षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद ये सात स्वर क्रमशः होते हैं। गायत्रीका षड्ज, उणिकका ऋषभ, अनुष्टुपका गान्धार, बृहतीका मध्यम, पत्रिका पञ्चम, त्रिष्टुपका धैवत और जगतीका निपाद स्वर होता है। यदि किसी स्थल पर स्वराट और विराट दोनोंका बन्देह हो तो वहां पर स्वर देखकर भी निर्णय किया जा सकता है। जैसे (१६) अक्षरों के छन्दमें यह सन्देह हो रहा है कि यह स्वराट् गायत्री है या विराट उष्णिक, वहां पर तृतीयोऽध्यायः । यदि षड्ज स्वरका उल्लेख पाया जाता है तो गायत्री समझना चाहिये और ऋषभ स्वर का यदि उल्लेख पाया जाता हो तो उष्णिक छन्द समझना ॥३४॥ सितसारङ्गपिशङ्गकृष्णनीललोहितगौरा वर्णाः ।। ६५ ॥ गायच्यादिषु क्रमेण वर्णा वर्णनिर्णयनिमित्तमभिधीयन्ते ॥६॥. गायत्री प्रभृति सातो छन्दके वर्ण भी सात प्रकारके होते हैं। वह इस प्रकार है, सित, सारस, पिशा, कृष्ण, नोल, लोहित और गौर ॥ ६५ ॥ आग्निवश्यकाश्यपगौतमाङ्गरसभागकाशक- धासिष्ठानि गोत्राणि ।। ६६ ।। गायत्र्यादीनां क्रमेणैतानि गोत्राणि भवन्तोति वाक्यशेषः । अत्र 'रोचनामाः कृतयः, श्यामान्यांतच्छन्दांसि', इत्येवमादिकमधीयते छान्दसाः। (*)तन्नोपपद्यते। कृतीनातिच्छन्दसां च निचद्भुरिजौ (*) सनोपपद्यत इत्येव नोपपद्यते 'दाभ्यां (पि० स २६०) इत्यस्योपलक्षणार्थवेन न्यूनाधिकेष्वतिच्छन्दःसु स्वराट् विराजोः प्रवेशसम्भवेन तत्रापि निर्णायकान्तरापेक्षासवाद । एतत्स्त्रत्रयत्यागेऽपि प्रत्यध्यायसमाप्तिशापति शब्दाभावेनात्र तृतीयाध्याय समाप्स्यनिश्चयात् । अविच्छिन्नवैदिकाध्ययनपरम्परया गोरचना भा: कृतयो दृथतिच्छन्दों हि श्यामलम्' १३३०।२२ ) इत्यमिपुराणेअनुगददर्शनेन चास्य वाक्यस्य प्रामाणिकत्वनिश्चयेनानुपेक्ष्यमाणत्वाच्यतिहिक! अनेदं वोध्य-शुक्लमुच्छ विजनीयानीचं लोहिनमेव च । श्यामं तु स्वरितं विद्यात् अग्निरूपस्य देवता ।। नीचे सोमं विजानीयात स्वरिते सविता भवेत् । उदात्तं ब्राह्मयं विधानीचं क्षत्रियमेव च ॥ वैश्यं तु स्वरितं विद्यादुदात्तं तु भारद्वाजम् । नीचं गौतममित्याहुईग्य तु स्वरितं विदुः॥ विधादुदाचा गायत्री नीचं त्रैष्टुभ मेव च । जागतं स्वरितं विद्यादेवमेव नियोगतः । "गान्धर्ववेदे ये प्रोक्ताः सप्त षड्जादयः स्वरा: त एवं वेदे विज्ञेयास्तथा उच्चादयः स्वराः॥ उच्ची निषादगान्धारौ नीचावृषभधैवतो । शेषास्तु स्वरिता शेयाः षड्जमध्यमवताः ॥" इति याज्ञवल्कीयशिक्षोंक्तनिष्टुभो लोहितो वर्णः, सोमो देवता - ऋषभधैवतौ स्वरी, गौतम सटीकपिङ्गलच्छन्दःसूत्रे- विराट स्वराजोश्च प्रदेशाभावात् कश्चिन्नास्ति संशयः। यस्य निर्णयनि मित्तं वर्णोपन्यासः क्रियते, तदपि ऋषिदेवतास्वरवर्णानां ज्ञानान्निः श्रेयसमिच्छन्ति छान्दसाः ॥ ६६ ॥ इति भट्टहलायुधकृतायं छन्दोवृत्तौ तृतीयोऽध्यायः । गायत्री आदि सातों छन्द के सात प्रकारके गोभ भी होते हैं जैसे गायत्रीका आग्निवेश्य, उष्णिकका काश्यप, अनुष्टुपका गौतम, बृहतीका माक्षिरस, पलिका भार्गव, त्रिष्टुपका कौशिक, जगतीका वाशिष्ठ । वैदिक लोग 'रोचनामाः कृतयः श्यामान्यतिच्छन्दांसि' ऐसा पढ़ते हैं। उनका तात्पर्य है कि चतुर्थाध्यायमें वर्णित कृति और अति छन्दोंका क्रमशः रोचन की तरह काला रंग होता है ऐसा वैदिकों का कहना ठीक नहीं, क्यों कि कृति और अति छन्दसोका ऐसा कोई अवसर नहीं आता जिसमें स्वराट और विराट दोनोंका सन्देह हो। जब सन्देह ही न हो तो वहां निर्णय की आवश्यकता ही क्या। गायत्री आदि छन्दोंके जो वर्ण कहे गये हैं केवल सन्दिग्ध स्थलों में निर्णय करने के लिये। तब सन्देह मिटाने के लिये उनकी आवश्यकता न होने पर भी ऋषि, देवता, स्वर और वर्णो के ज्ञानसे मोक्षप्राप्ति रूप फल उन्होंने स्वीकार किया है ॥६६॥ अथ चतुर्थोऽध्यायः । चतु:शतमुस्कृतिः॥१॥ चतुरधिकं शतं चतुःशतम् । मध्यमपदलोपी समासः। अथवा चत्वारि च शतं च चतु:शतम । द्वन्द्वसमासः।कर्मधारयस्तु नेष्यते । तत्र चतुःशतानीति प्राप्नोति । यत्र चतु:शतमक्षराणां संख्या भवति, तत् (") उत्कृति' नाम छन्दः । यथा--- 'छागस्य हविष आत्तामद्य (१) मध्यतो मेद उभृतं (२) पुरा ऋषिः। जगत्याः श्यामो वर्णः, सविता देवता, षडजमध्यमपञ्चमाः, स्वराः, गाग्य-ऋषिरित्या. दिभिः पिङ्गलोक्तं यद्वैमत्यं दृश्यते तत् शाखाभेदेन परिहरणीयम् । इति तृतीयोऽध्याय ॥३॥ (*) उस्कृत्यादीनां छन्दसामुदाहरणानि श्रीमता हलायुधभट्टेन न प्रदर्शितानि । सर्बोप- कृतये मया तानि न्यक्षेण वृत्तिमध्ये निवेशितानि ।
चतुर्थोऽध्यायः। द्वेषोभ्यः (३) पुरा पोरुषेय्या गृभो (४) घस्तां नूनं (५) घासे अज्रा. या यवलप्रथमानां (६) सुमत्क्षराणां शतरुद्रियाणाम् (७) मग्नि- ध्वत्तानां पीवोपवसनानां (6) पार्वतः श्रोणितः (8) शितामतः उत्सा- दतः (१०) अङ्गादङ्गादवत्तानां (१२) करत एवाश्विना (१२) जुषेतां हविः (१३) ॥' (शुक्लयजुबैदे-म० २१ मं० ४३)॥१॥ जिस छन्दमें एकसौ चार अक्षर हों उसे 'उत्कृति नाम का छन्द कहते हैं ॥१॥ चतुरश्चतुरस्त्यजेदुत्कृतः॥२॥ चतु शताक्षराच्छन्दसः क्रमेण चतुरश्चतुर संख्याविशेषांस्त्य. जेत्। एतदुक्तं भवात-उत्कृतेरारभ्य चतुर्मिश्चतुभिरक्षरेन्यूनानि छन्दां- स्थन्यानि स्थापयेत् , अष्टाचत्वारिंशदक्षरं यावत् ॥ २॥ उत्कृतिसे लेकर चार चार अक्षरोंको घटाते हुए दूसरे छन्दोंकी (४८) अक्षर तक रखना चाहिये ॥२॥ तान्यभिसंव्याप्रेभ्यः कृतिः ॥ ३ ॥ तान्युत्कृतेरनन्तराणि छन्दांसि अभि-संवि-माज-प्र इत्येतेभ्यः पराणि 'कृति' संज्ञानि भवन्ति । तत्र शताक्षरं छन्दः 'अभिकृतिः । यथा- 'देवो मग्निः स्विष्टकृत् (१) । देवान्यक्षद्यथायथम्(२) । होतायरा- विन्द्रमश्विना (३)। वाचा वासरस्वतीम् (४)। मसग्नि सोम् स्विष्टकत् (५) । स्विष्ट इन्द्रः सुत्रामा (६)। सविता वरुणो भिषक (७)। इष्टो देवो वनस्पतिः (5) स्विष्टा देवा श्राज्यपाः (8)। इष्टो अग्निरग्निना (१०)। होता होत्रे स्विष्टकत् (११) । यशो न दद्ध- दिन्द्रियम् (१२) । ऊर्जमचिति स्वधाम् (१३) ।' (तैत्तिरीयब्राह्मणे-अ०२०६० १४ मं० ११) षण्णवत्यक्षरं संकृतिः। यथा-- 'देवो अग्निः स्विष्टकृत (९) मुद्रविणा मन्द्रः कविः (२) । सत्य मन्मा यजो होता (३)। होतु)तुरायजो यान (४) । भग्ने यान् देवा- नयाट् (५)। याँ श्रपि प्रेः (६) येते हो। अमत्सत (७)। ता* सस. नुषों होत्रां देवंगमां () दिवि देवेषु यज्ञमेरयेमम् (8)। स्विष्टकृष्वग्ने होवाभूः (१०)। वसुवने वसुधेयस्य नमो वाके वोहि (१३)" (तैत्तिरोयब्राह्मणे--अ०३०६८०१४ मं०१) ७२ सटोकपिङ्गलच्छन्दःसूत्र- द्वानवत्यक्षरं विकृतिः। यथा-- 'इमे सोमा सुरामाणः (१) । छागैर्न मेषैर्ऋषभैः सुताः (२)। शप्पन तोकमभिः (३)। लाजैर्महस्वन्तः (१) ।मदा मासरेण परिष्कृताः (५)। शुक्राः पयस्वन्तोऽमृताः (६)। प्रस्थिता वो मधुश्चतः (७)। तानश्विनी सरस्वतो (८) । इन्द्रः सुत्रामा वृत्रहा (९)। जुषन्ता सोन्यं मधु (१०)। पिबन्तु मदन्तु वियन्तु सोमम् (११) ।' तैत्तिरीयब्राह्मणे-म०२३०६ अ० ११) श्रष्टाशीत्यक्षरमाकृतिः यथा- 'तश्चक्षुर्देवहितं (१) पुरस्ताच्छुकमुच्चरत् (२) । पश्येम शरदः शतं (३) जोवेम शरदः शतं (४) नन्दाम शरदः शतं (५) मोदाम शरदः शतं (६) भवाम शरदः शत (७) शृणवाम शरदः शतं (6) प्रत्रवाम शरदः शतं (8) मजीताः स्याम शरदः शतं (१०) जोक्च सूर्य दृशे ॥' (तैत्तिरीयारण्यके-प्र०४ भ०४२ मं० २२ } चतुरशीत्यक्षरं प्रकृतिः । यथा- 'मग्निश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः (१)। पापे. भ्यो रक्षन्ताम् (२)। यदहा पापमकार्षम् (३)। मनसा वाचा हस्ताभ्याम् (४)। पद्भ्यामुदरेण शिना (५)। महस्तवलु. पतु (६)। यत्किञ्च दुरितं मयि (७)। इदमहं माममृतयोनौ (6)। सत्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा (E) ॥' (ते० प्रा०प्र० १० अ० २४) ॥३॥ उत्कृतिके अनन्तर कृति शब्दके पूर्व अभि, सम, वि, भाछ और प्र इन पांच उपसर्गों को मिलादेने से जो शब्द बनते हैं उन्हीं पांच नामके पांच छन्द होते हैं। उनकी 'कृति' संज्ञा है क्यों कि इसी कृतिके पूर्व ही इन पांच उपनगों के लग जानेसे पांच प्रकारका भेद हो जाता है। जैसे अभिकृति, संकृति, विकृति, आकृति और प्रकृति । अर्थात् पूर्व नियम के अनुसार (१०४) से पांच संख्या (प्रकृति) तक चार चार भकों के घटाते जानेसे जो जो संख्या निकलती जायगी वही अक्षरों की संख्या उस छन्दको समझना चाहिये। जैसे-
-
चतुर्थोऽध्यायः ।
७३
-
उत्कृतिकी साक्षर संख्या १०४
उनमें (४) चार अङ्क घटा देनेसे अभिकृतिको संख्या निकल जाती है देखिए-
उत्कृति १०४-४=१०० अभिरुति ॥ १ ॥
संकृति ९६-४ =९२ --विकृति ॥३॥
विकृति ९२-४=८८.-आकृति ॥ ४॥
आकृति ८८-४-८४ --- प्रकृति ॥ ५ ॥३॥
प्रकृत्या चोपसरजिन्नः ।।४।।
उपसर्गेण वर्जितः शुद्धः कृतिशः प्रकृया स्वरूपेणैवावतिष्ठते ।
तेनैतदुक्तं भवति-अशोत्यक्षरं छन्दः 'कृति' नाम । यथा -
'देव इन्द्रो नरास (१) त्रिवज्यास्त्रबन्धुरो (२) देवमिन्द्रम-
वधयत् (३)। शतेन शितिपृष्ठानामाहितः (१) महत्रेण प्रवर्तते (1)
मित्रावरुणेदस्य होत्रमहतो (६) वृहम्पतिः स्तोत्र (७) विनाध्वर्यवं
(5) वसुवने वसुधेयस्य वेतु यज (ह)'
(शुक्लयजुव दे-अ० २८० ११)॥॥
उपसर्गरहित शुद्ध कृति शब्दकी स्वाभाविक रूपसे स्थिति रहेगी ( अर्थात्
जिस छन्दमें (८०) अक्षर हों उसको 'कृति' संज्ञा होती है।) पहिले (८४) अक्षरों
को 'प्रकृति' कही गयी है । अब उनमें (सु. ४।२) सूत्रके अनुसार (४) घटादेनेसे
जो अङ्क शेष रहता है (अर्थात् (८.) अङ्क) यही 'कृति छन्द की अक्षर संख्या है।४।
धृत्याष्टिशकरीजगत्यः ॥ ५ ॥
कृतेरधस्ताद्धृतिरष्टिः शकरो जगतीत्येते शब्दाः क्रमेण व्यव.
स्थापनोयाः॥ ५ ॥
'कृति' शब्दके नीचे धृति, अष्टि, शक्करी और जगतो इन शब्दों को यथा-
क्रमसे लिखना चाहिये। कुछ लोग इस सूत्रका अर्थ कहते है कि कृति शब्दके
अनन्तर धृति, अधि, शकरी और जगती कहे जायेगें। परन्तु मेरी समझमें अधस्तात्'
और 'व्यवस्थापनीयाः' इन दोनों शब्दोंसे और (२) सूत्रकी वृत्तिमें भी
(छन्दस्यिन्यानि स्थापयेत् ) इस स्थापन शब्दसे 'उत्कृति से लेकर जगती
पर्यन्त एक पङ्कि बनाकर समझाना चाहिये। जिसमें उत्कृति से लेकर जगती एयन्त
(१.४) में से क्रमशः चार चार अङ्क घटाते हुए एकके नीचे दूसरा इसीप्रकार
रखना चाहिये ॥५॥
७४ सटीकपिङ्गलच्छन्द सूत्रे- पृथक्पृथक्पूर्वत एतान्ये वैषाम् ॥ ६ ॥ एषांधृत्यादीनां पूर्वतः पृथक्पथगेतान्येव शब्दरूपाणि विन्यसेत् । पृथक्पृथग्रहणं प्रत्येकं पूर्वत्वज्ञापनार्थम् अन्यथा हि समुदायपूर्वव. मेषां स्यात् । तेनायमर्थ:-तिशब्दात् पूर्व धृतिशब्दः, अष्टिशब्दा. त्पूर्वष्टिशब्दः शक्वरीशब्दात्पूर्व शश्वरीशब्दः, जगतीशब्दात् पूर्व जगतीशब्दः ॥६॥ पहिले सूत्र में कहा गया है कि एक पति बना कर क्रमशः प्रकृतिके नीचे धृति, उसके नीचे अधि, उसके नीचे शकरी, और उसके नीचे जगती शब्द लिखना चाहिये । अब इस सूत्र में कहा जारहा है कि पति में लिखित धृति आदि शब्दके पूर्व दूसरा धृति मादि शब्द लिखना चाहिये। जैसे धृति शब्दसे पूर्व 'धृतिः अधि शब्द से पूर्व 'अधि' शकरी शब्द से पूर्व 'शक्करी' और जगती शब्द से पूर्व जगती' शब्द ॥ ६ ॥ द्वितीयं द्वितीयमतितः ॥७॥ अत्र द्वितीय द्वितीचं शब्दरूपतिशब्दात्परतः प्रयोक्तव्यम् । एवं सत्युत्तरेषां छन्दसामेताः(*) संज्ञा क्रमेण भवन्ति । तत्र षटसप्त. त्यक्षरा भतिधृतिः । यथा- 'स हि श? न मारुतं तुविणि (१) रमस्वतापूर्वरास्विष्टनि (२) रातनास्विनिः (३)। अदद्धव्यान्यादाद (1) र्यक्षस्य केतुरहणा (५)। मध स्मास्य हर्षतो हृषाव (६) विश्व जुषन्त पन्यां (.) नरः ( * ) कात्यायनोक्तः पादनियमो यथा- पादा प्रतिजगत्यास्तु त्रयो द्वादशकाः परौ। अष्टको शक्करीपादाः सप्तवाष्टाक्षराः स्मृताः ॥ अष्टिशकरपादौ द्वौ कर्तव्यौ षोडशाक्षरौ। जागतोऽथाष्टको चाष्टिपादाः षोडशकात्रयः॥ श्रष्टको चात्यष्टिपादौ जागतौ चाष्टकास्त्रयः। जागतश्चाष्टमाश्चायतिपादौ तु जागती। पादानयोऽष्टकाचाथ षोडशाक्षर एव च । अष्टकश्चाथातिधृतौ द्वौ पादौ जागतो ततः । त्रयोऽष्टका जागतश्च तथाष्टाक्षरकावपि । इति ।
७५ चतुर्थोऽध्यायः। शुभेन पन्थाम् (८). (ऋग्वेदे-अ० २१०१३० १३ मे १) द्वासप्तत्यक्षरा धृतिः। यथा- 'अवर्मह इन्द्र दाहि श्रुधी नः (१) शुशाच हि द्यौः क्षा न भीषाँ मद्रिवे (२) घृणान भीषाँ अद्रिवः (३) शुष्मितमो हि शुष्मिभि (४) धेरुभिरोयसे (५)। मपूरुषघ्ना अप्रतीत शूर सत्त्वभि (६) स्त्रिसप्तैः शूरसत्वभिः (७) ॥' (ऋग्वेदे-म०२ म०१ व. २२ मं०६) अष्टषष्टयक्षरा अत्यष्टिः। यथा- 'श्रदर्शि गातुरुरवे वरोयसी (१) पन्था ऋतस्य समयंस्त रश्मिभि (२) श्चक्षुर्भगस्य रश्मिभिः (३)। धुकं मित्रस्य सादत (१) मर्यम्णो वरुणस्य च (५) । अथावधाते वृहदुक्थ्यं वय (६) उपस्तुत्यं वृहद्वयः (७) (ऋग्वेदे-म०२ अ० १ व २६ मं२) चतुःषष्ठयक्षरा मष्टिः । यथा- 'त्रिकद्रकेषु महिषो यवाशिरं (१) तुविशुष्मस्तृपत्लोममपिब (२) द्विष्णुना सुतं यथावशत् (३) । सई ममाद् महि कर्म कर्तवे महामुरं (४) सनं सश्चद्देवो देवं (५) सत्यमिन्द्रं सत्य (*)इन्दुः (६) ॥ (ऋग्वेदे-अ०२ १०६ व० २८ मं०१) षष्टयक्षरा अतिशकरी । यथा- 'साकं जातः क्रतुना साकमोजमा ववक्षिथ (१) साकं वृद्धो वीयः साहि{घो विचर्षणिः (क)। दाता राधः स्तुवते काम्यं वसु (३) सैन सचदेवो देवं (४) सत्यमिन्द्रं सत्य ()इन्दुः (५) ।' ऋग्वेदे-म०२ म०६ व०२८ मं०३) षट्पश्चादशक्षरा शक्करी। यथा- 'प्रौप्यस्मै पुरोरथ (१) मिन्द्राय शूषमर्चत (२) । अभीके चिदु लो. ककृत् (३) सङ्गे समत्सु वृत्रहा (४) ऽस्माकं बोधि चोदिता (५) नभ. न्तामन्यकेषाम् (६) ज्याका अधिधन्वसु(१) (७)॥' (ऋग्दे-प्र० म०७व०२१ मं०१) द्विपञ्चाशदक्षरा अतिजगती । यथा- 'स भ्रातरं वरुणमन्न नववृत्स्व (१) देवाँ अच्छा सुमती यशवनसं (२) ज्येष्ठं यशवनसम् (३) ऋतावानमादित्यं चर्षणीधृतं (6) :राजानं चर्षणाधृतम् (५) । (ऋग्वेदे-अ०३ म०४ व० १२ मं०२) (*) (+) (+) एषु व्यूहान्यूनता परिहार्या । - - ७६ सटीकपिङ्गलच्छन्दःसूत्रम् । अष्टावत्वारिंशदक्षरा जगती । यथा- "इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमूतये(१)मारुतं श! अदितिं हवामहे (२)। रथ न दुर्गाद्वसवः सुदानवो (१) विश्वस्मानो अंहसो निम्पिपर्तन (४)।' (ऋग्वेदे-अ.. १०७ व० २४ मं १)॥ ७ ॥ इति भट्टहलायुधकृतायां छन्दोवृत्तौ चतुर्थाध्याये वैदिकच्छन्दःप्रकरणं समाप्तम् । पूर्व सूत्र के अनुसार दोहराया गया जो धृति आदि शब्द (अर्थात् धृति आदि शब्दों के पूर्व पङ्किमें लिखे गये जो धृति आदि शब्द) उनके आगे अति शब्द लख देना चाहिये । जैसे धृति शब्दसे पूर्व जो धृति शब्द लिखा गया है उसके भागे अति शब्द लिख देने पर ( अति धृति) शब्द बन जाता है। उसी प्रकार अष्टि शब्दसे पूर्व लिखा गया जो अष्टि शब्द है सके आगे अति शब्द लिख देनेसे 'अत्यष्टि'। इसी प्रकार 'शक्करी' ( अति शक्करो, ) 'जगती' ( अति जगती) आदि शब्दों को पङिमें एकके नीचे दूसरे लिखते जाना चाहिये । पीछे प्रत्येक शब्दके अनन्तर चार चार अङ्क घटाकर जो भङ्क अवशिष्ट रहता है उसे रखते जाना चाहिये । वृत्तिकारके कथनानुसार सबको समझाने के लिये एक पति बनाकर नोचे दी जाती है। उसीसे अच्छी तरह समझ लेना चाहिये ॥ ७ ॥ इति सान्यालोपाल श्रीअयोध्यानाथशास्त्रिविरचितायां कादम्विन्याख्यभाषा टीकायां चतुर्थाध्याये वैदिकच्छन्दःप्रकरणं समाप्तम् । अथोत्कृत्यादि छन्दसामक्षरसंख्याबोधिका पंक्तिः । छन्दः संख्या छन्दोनाम अक्षर संख्या छन्दःसंख्या छन्दो नाम अक्षर संख्या उत्कृतिः धृतिः अकृितिः अत्यधिः ६८ संकृतिः अष्टिः विकृतिः ९२ अतिशक्करी ६० भाकृतिः १२ शकरी प्रकृतिः १३ भतिजगती ५२ कृतिः जगती भतिधृतिः समाप्तश्चायं प्रन्थः। १०४ १ २ ८४ मुद्रका-विद्याविलास प्रेस, बनारस सिटी।
रामवनगमनम् सटिप्पण-सान्वय-सुधा-इन्दुमती-चतुष्टयप्लावितम् याद रखिये सन् ४८ की नवीन नियमावलीके अनुसार निणयसागर प्रेससे प्रकाशित वाल्मीकिरामायणके मूलाधार पर यही एक विशुद्ध प्रामाणिक सर र प्रका- शित हुआ है । इसकी प्रथम परीक्षोपयोगी सुधा' टीकामें अन्वय, पयाय, समास, कोश तथा प्रन्योपक्रमसे टिप्पणी में पौराणिक कथायें भी दी गयी हैं जो कि परीक्षामें प्रश्न आने योग्य है और अन्य किसी भी संस्करणमें इसका उल्लेख नहीं किया गया है। एवं सुधा टीकाके साथ साथ 'हन्दुमती' नामकी विस्तृत भाषा टीकामें श्लोकोंके गूढार्थ अभिप्रायोंको इस तरह सरल शब्दों में अभिव्यक्त कर दिया गया है कि विद्याथियोंको श्लोकार्थ समझने में प्रायः शिक्षकों की आवश्य- कता नहीं ही होगी। प्रन्यके शुरूमें प्रत्येक सर्गका परीक्षोपयोगी संक्षिप्त कथासार भी दे दिया गया है । परिष्कृत अभिनव द्वितीय संस्करण १।।1) श्रीमहालक्ष्मीपूजापद्धतिः सर्वदेवपूजाविधान, पूजनमीमांसा, सम्पुटित श्रीसूक्त श्रादि विविध परिशिष्ट युत भाषा टाका सहित । डेढ़ सौ वर्ष पहले के प्राचीन महर्षियों द्वारा लिखित सिद्ध पुस्तक के आधार पर जो कि कठिन परिश्रम और अधिक व्यय से प्राप्त हुआ है, यह अभिनव संस्करण प्रकाशित किया गया है। जो २ सज्जन इस पद्धति के अनुसार कार्य किये हैं उन्हें आशातीत सफलता मिली है। जो पुस्तक में छपी भूमिका से सहज में ही जानी जा सकी है। मूल्य ) महामहोपाध्याय ५० अमृतनाथ झा विरचितः- कृत्यसारसमुच्चयः (अभिनव परिर्वाद्धत द्वितीय संस्करण) पण्डित गङ्गाधर मिश्र कृत टिप्पणी तथा परिशिष्ट से विभूषित संस्करण का इस द्वितीय संस्करण में स्थान २ पर टिप्पणी देकर परिशिष्ट में अधिकाधिक ज्ञातव्य विषय बढ़ाया गया है तथा ग्रन्थ के अन्तमें तुलादानपद्धति भी देदी गई है जिससे पूर्व संस्करण की अपेक्षा यह संस्करण अधिक उपयुक्त हो गया है ३॥) प्राप्तिस्थानम्-चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालय, बनारस । १......"
सिद्धान्तकौमुदी जेबी-गुटका सिद्धान्तकौमुदीका ऐसा सुन्दर जेबी गुटका का मनोहर संस्करण यह प्रथम बार ही छपा है। प्रति दिन सिद्धान्तकौमुदी की आवृत्ति करना विद्यार्थियोंके लिये श्रावश्यक है । सुबह-शाम घूमते-फिरते समय तथा परदेश-यात्रा करते समय विद्याथियोंका बहुत ही समय व्यर्थमें व्यतीत होजाता है । अब जहाँ कहीं जाना हो इस संस्करण को जेबी में रख लीजिये और जब चाहे सिद्धान्तकौमुदी की श्रावृत्ति कीजिये। सूत्रसूची-धातुसूच्यादि परिशिष्ट सहित । सिद्धान्तकौमुदी-५० गोलशास्त्रीनेनेकृत परीक्षोपयोगी 'सरला' टीका तथा रूपलेखनप्रकार-पंक्तिलेखनप्रकार आदि परीक्षोप. योगी विविध परिशिष्ट सहित स्त्रीप्रत्ययान्त ॥) काराकान्ल २) प्रबन्ध-पारिजातः इसमें परीक्षार्थी छात्रों को संस्कृत प्रबन्ध रचना लिखने के नियम अत्यन्त सरल रूपमें समझाये गये हैं और तदनुसार परीक्षोपयोगी 'प्रबन्ध लेखनप्रकार' (परीक्षामें आने योग्य निबन्धों का उत्तर) इस तरह सरल और संक्षिप्त में लिखा गया है कि अभ्यास कर लेने पर भी विद्यार्थी परीक्षामें पूरी सफलता प्राप्त कर सकते हैं। इतना ही नहीं अन्त में(१) पत्र लेखन प्रकार'(चिट्ठी-पत्री, श्रावेदन पत्र आदिका उल्लेख ) तथा प्रसंगोपयुक्त (२) 'सुभाषितगद्यावली'(३) सुभाषित. पद्यांशावली' और (४) लौकिक न्यायमाला' श्रादि विषयोंका समावेश करके श्राधुनिक चतुरल विद्वान् बननेका सुगम रास्ता दिखाया गया है। विश्वास है कि श्राजतक के प्रकाशित प्रबन्धोपयोगी प्रन्यों में इस 'प्रबन्धपारिजात' के समान दूसरी कोई भी पुस्तक नहीं है। शीघ्रता कीजिये कठिन परिस्थिति के कारण इसकी बहुत कम प्रतियाँ छपी हैं विदुलोपाख्यानम् सान्वय-लीला विलास-सस्कृत-हिन्दोटोकाद्वयोपेतम् । सन् ४८ के नवीन पाठयक्रम के अनुसार यह प्रन्थ प्रकाशित किया गया है। इस प्रन्थकी लीला' नामक संस्कृत व्याख्यामें अन्वय, पर्याय, समास, कोशादि देकर श्लोकों की अति सरल व्याख्या कर दी गयी है। साथमें 'विलास' नामकी विस्तृत हिन्दी भाषा टीका होनेसे तो इस संस्करणकी उपयोगिता और भी अपि बढ़ गयी है। प्रथमाके सुकोम-लमति विद्याथियोंके लिये यही एक सब संस्करण सिद्ध हो चुका है। शीघ्रता कीजिये इसकी बहुत ही कम प्रतियां गयी हैं। द्वितीय सस्करण प्राप्तिस्थानम्-चोखम्बा सस्कृत पुस्तकालय,बनारस। १""
No text on this page.
No text on this page.
No text on this page.
No text on this page.