Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Kunwari Saleeb
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कुंआरी सलीब 0 प्रकाश माधुरी
राजस्थान साहित्य अकादमी प्रकाशन
हिन्दी उपन्यास १९९०ई०
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WHA
कुंआरी
साय
सकाशमान
*
0 कुंआरी सलीब (उपन्यास)
प्रकाशक
राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर
मुद्रक : मेसर्स महावीर प्रिंटिग प्रेस, उदयपुर
संस्करण
१९८० ई०
मूल्य
पन्द्रह रुपए नब्बे पैसा मात्र
राजाराम ध्यास
*
:
*
आवरण
@ KUNWARI SALEEB (Hindi Novel)
BY
PRAKASH MADHURI
* PRICE Rs 1500 only
अपनी बात इन मास की जा हिप्पी सांकृति के नाम के कारणों . को खोजते हुए, मानस में हुआ. इस पर भारत के उन समो परिवारों को धाया है जो एक साथ पूर्व और पश्चिम को जाना चाहते हैं। पाठकों को उपधारा - सम्भव है' हा भटपटा व काल्पनिक लगे, कन्तु मैं पूर्व-पश्चिम को इस काम को अपने चारों ओर गीता-जागता देखता रहा हूं, 'वर्षों से। शायद वे हो' वर्ष इस , उपन्यास के प्रसव वर्ष बन गए थे। मैंने सुबोध, नौता को महानगरों में देखा है तो शिवाकर और गीता को मो वहीं । और अब तो मे. लोग गांवों में भी आगए हैं। 'परिवार के परिवार 'ईसी संशमित ' परिवेश में जी रहे हैं। उपन्यास का दिवाकर संसार को ओड़ी हुई शराफत से अमा हुआ वह हर इन्सान है जो अपनी औकात मे कहीं अधिक शराफत का नकली मुखौटा पहिन लेता है, पर उससे उसे न उतारते बनता है, . न पहिनते हो। उपन्यास की एक और जीवंत समस्या "तलाक" है। मैने * इस उपन्यास में पश्चिम के तलाक और भारत के तलाक के अंतर को ईमानदारी से चित्रित करने का प्रयास किया है। पश्चिम का तलाक बड़ा आसान और जुतहा है.। भारत में तलाक होने तो लगे हैं, परन्तु बड़ी हो. कठिनाईयों के साथ ! कहा- यह जाता है, कि भारत.का कानून इस सम्बंध में बड़ा कठोर है, किन्तु मै कछ और विधारता है भारत की नैतिक-भूमि इतनी उपजाऊ नहीं है कि तलाक स्पी फसल यहां तेजी से फल-फूल सके । तलाक भारतीय दम्पत्ति के लिए एक अभिशप्त प्रक्रिया है.। - उण्यास का अंत ऐसी ही टीस लिए प्रस्तुत किया है । प्रबुद्ध पाठक और तोगी दृष्टि बाले आलोचक इसमे न जाने पया क्या.पोज ले, मैं नहीं जानता। मैंने विगत दशक में अपने चारों ओर जो भोगा है, उसे ईमानदारी के साथ व्यक्त किया है। भाषा को यथा सम्भव सरल रखने का प्रयास किया है, जिससे हर वर्ग का पाठक इसे अपना समझे। यदि कहीं मानसिक संघर्ष के वर्णन में क्लिप्टता आ भी गई हो तो मैं वहां मजबूर हो रहा होऊंगा। आलोचक वृद.भाषा में कमजोरी खोज ले तो खोज लें, उन्हें - खोजनी भी चाहिए । मुझे केवल पाठक तक अपनी बात पहुंचाने को चिता है । आशा है मेरे सहृदय पाठक मुझे निरन्तर सहयोग देंगे। अंत में मैं उन सभी जाने अनजाने व्यक्तियों को धन्यवाद अर्पित कर दूं जिन्होंने इस उपन्यास के सृजन में प्रत्यक्षतः व अप्रत्यक्षतः मुझे प्रेरणा दी है। अकादमी ने इसका प्रकाशन कर मुझ पर जो अनुग्रह किया है उसके लिए मैं उसका आभार हृदय की गहराईयों से स्वीकार फर नवम्बर 1980 ई० 131104 बुध की हाट भरतपुर (राज.) सकाशा
प्रकाशकीय
राजस्थान माहित्य अकादमी की प्रकाशन योजना के
अन्तर्गन यह इमरा हिन्दी उपन्याम प्रकाशित हो रहा है । अभी
कुछ ही समय पूर्व, राजस्थान के युवा कथाकार श्री प्रफुल्ल
प्रभाकर का हिन्दी उपन्यास गलत सन्दमं प्रकाशित हुआ था
और अब प्रस्तुत है गजस्थान 'ही के उठते-उभरते कथाशिल्पी
श्री प्रकाश माधुरी का यह उपन्यास 'कुमारी सलीय।
श्री प्रकाश माधुरी ने प्रस्तुत उपन्यास के माध्यम से
भारतीय दाम्पत्य जीवन की उस विषम टीस को अभिव्यक्त
किया है, जिसने पारिवारिक मूल्यों और वैयक्तिक निष्ठा
में आशंकाओं और संकटों की विभीपिका को जन्म दिया
है। थी प्रकाश माधुरी का यह उपन्यास भाषा, शिल्प और
कथाप्रवाह की दृष्टि से अत्यन्त मशक्त और प्रभावोत्पादक है।
हमें प्राशा है कि श्री प्रकाश माधुरी राजस्थान के
कराकम को और उल्लेखनीय योग प्रदान करेंगे।
उदयपुर
বার বাম
नयम्बर,1980
निदेशक
-
. ".."हम भारतीय नारिया दूसरों पर अत्याचार क्या करेंगी। हमे तो पत्यापार का कर ग भी नहीं पाता। हम 'अत्याचार फरती नहीं है, देखती भर है। भोगती भी नहीं है, क्योंकि हम अमर वेलें है। हमारे प्राधार वृक्ष पर होता हा अत्याचार ही माग अत्याचार है, उसे भी हमें भोगना नहीं पड़ता, वरन् उसे भी हम भोगना हा देयती भर है क्योंकि हमारा अस्तित्व तो उन धूम माथ है, जिमको हर अनुभूति का. हर घड़ान का माथ हमे देना पड़ता है। भोगे हुए प्रन्यानार में भी अपनापन तो होता है, परन्तु अपने वक्ष पर हो रहे अत्याचार को हम अपना प्रत्याचार मै कहे, जति माग प्रपना भी नहीं।"
१ कारा कुटीर, अबोध मम्योधित तुम, तुम्हे अनधिकार मप्रेम वन्दे । अटपटे सम्बोधित करते हुए भी, मैं तुम्हारे मायाजाल भे विधी हुई, अपने को अनुभव करती हूं। तुम क्या भाते रहे, मैं तुमसे विन बिधे भी बिधी रही। मैं यह जानते हुए भी कि मैं तुम्हें अपनाना नहीं चाहती, तुम्हें मैं प्रेम करती हूं, ऐमा भी में नहीं मीनतो, परन्तु तुम कही मेरे अंततंतम की गहन कारा में धुंध्रले से कैद हो । जहां भांवकर तुम्हे देखना अच्छा लगता है, बस और कुछ नहीं । मैं कौन हूं. यह तुम्हे मेरे हस्ताक्षरो से ही विदित हो सकता है। उक्त भावों में पहनी हुई मुझने नहीं । तुम हस्ताक्षर देख चुके होगे, अब मैं क्यों और अधिक अपने को धोसे में र। गुम जानने के बाद तुम्हें पापचयं हो रहा होगा कि मैं तुम्हे हम प्रकार का पर यो लिा रही हूँ? यह तो तुम अच्छी प्रकार से जानते हो कि वे और तुम कितने अभिन्न मित्र है । इस अभिन्नता से मायद मेरे अपया कहूं आपके कारण उनमें और मुभमे दरार पड़ जाये। इस मव की तह मैं कुछ प्रातिया है अथवा हो माता है किसी एक पक्ष में दोपहो। मैं मापद भांति ही इसे समझती हूं। ये प्रांतिया गया है ? उन्हें मैं तुम्हें सिय रही हूं। इन। अच्छी तरह अध्ययन कर तुरन्त पले आयो भन्यथा मायद पुष अपत्पनीष पट जाये।
भ्रांति १. मुझे तुम्हारी मादगी से प्रेम है। २. मैं तुम्हारी सात्विकता से प्रेम करती हूं। ३. मैंने स्पष्ट शब्दों मे उनसे कहा कि तुम मुझे उपरोक्त वातो के कारण अन्छे लगते हो। ४. तुम मेरे मन में बराबर बने रहते हो । ५ मैं तुम्हारी आदतो से तुम्हे प्रेम मा करने लगी हूं लेकिन प्राप उमसे भी कही अधिक मेरे मन मे गहरे हैं। यह भी पूर्ण विश्वाम के साथ कहा है। जबसे मैने उनसे यह सब कहा है, वे खोये खोये रहते हैं। कहते कुछ ही, पर बहुत कुछ चुप-चाप कह जाते है। मेरा घर मेरी 'कारा' बन गया है । मैं वाहर नहीं जा सकती, मैं हम ही सकती । तुम्हारे द्वारा उन्हे प्रदन वस्तुए देख कर, देख नही सकती हूं । उन्हें सा नहीं सकती, सिवाय रुलाने के । मुझे मेरी कारा से मुक्ति दिलवाओ । उन्हें मातियो से दूर कगे। जिससे रा व उनका जीवन प्रसन्नताओ से भर जाये। केवल एक बार, वय ! एक दार तुम आओ तो फिर भ्राति दूर होकर, जीवन की फुलवारी लहलहा उठे। विश्वास है तुम अवश्य आओगे। हालाकि वे तुम्हारा पाना शायद अच्छा न समझे। अबोध मैं--- नीता पन्न सामने खुला छोड़कर दिवाकर ने सर हाथो मे थाम लिया। वह पन कई बार पढ चुका था किन्तु उसकी समझ में नहीं आता था कि नीता को क्या हो गया है ? उसका पन्न उमको आखो मे हजारो आड़े-तिरछे शहतीर बनकर घुस जाना चाहता था, पर वह है कि अपनी पसीजतो हथेलियो की ढाल से उन्हे रोकने का भरसक प्रयत्न कर रहा है। हथेलियों के बीच में भी वह अपने को रोकते हुए, पत्र को देख लेता है कि वह यथार्थ में पन ही है या कि एक स्वप्न मात्र लेकिन हर बार पत्र की उपस्थिति उसे दहला देती है। नीता ने आज जिस रूप मे उसके जीवन में प्रवेश किया वह बहुत अटपटा था । उसने कभी भी नीता को इस दृष्टि से नही देखा था। यदि कभी उसकी २0 कुआरी सलीव
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अपनी गलती पर यह शमिदा होकर थोडा जोगी निगाहों में भेज पर फैली मेल की पतं को घूरता रहा । यह दम बिकट परिस्थिति में आने का उपाय मोच हो रहा था कि फिर से स्टाल वाले ने पूधा-क्या आपकी तबीयत गगय है। इममें दिवाकर को एक बहाना मिला । वह बोला-हां भाई मि. आज कुछ अनमना है। एक गिलाग पानी भर पिला दो। मिद यत्र चालित सा चला गया। म्टाल से भी वह उठ आया पर अपने दिन में न जा गा मोना घर चल हूँ, शायद वहा कुछ राहत मिले, लेकिन इग निए उसे अपने गाहब मे पूछना होगा जिसे वह कभी भी उचित नहीं समझता था। भागे कदमो से वह अपने केबिन में चला आया। पास वाली मेज पर राग हितपो बंटने थे। वे हितेपी भी ममी के ये लेकिन यथार्थ मे हितैषी बन कर ये गाथियो के रहस्य डूढते फिरते थे और फिर उन्हे "बनाते" थे। यह उनका अपना नित्य का कार्यत्रम था। वह बहुत देर से दिवाकर के चेहरे पर आते जाते भावों का अध्ययन कर रहे थे जय उन्होंने अब भी दिवाकर को नॉर्मल होते न देता तो वे सोन बैठे कि कही न कही कुछ दाल में काला है। मिस्टर हितपो अपनी सीट छोडकर आए और बड़े नम्र लहजे में बोले- साथी यह उनका सामान्य बोल-चाल का शब्द था । दिवाकर ने उलझी हुई निगाहो से हितपो को भोर ताका । साथी, मुझे बताओ तुम्हें क्या परेशानी है ? दिवाकर की उठी हुई मूक निगाहे यथास्थान आ गई। बताओ साथी। दिवाकर ने हितैषी को फिर देखा और फिर चुप हो गया। साथी कुछ कहो न । दिवाकर की निगाहों मे हृदय की उक्ताहट बुरी तरह उतर आई । वह एक तो हितैषी को वैसे ही पसंद नहीं करता था और फिर जिसमे वह स्वयं अपने आपसे लड रहा था, उमे क्या बताए ? केवल कठोरता पूर्वक यही कहा कुछ नहीं हितैषी अपना काम देखो। हितैषी को यहा मात खानी पड़ रही थी पर वह भी एक जिद्दी व्यक्ति था । उसने फिर कुछ कहने के लिए ज्यों ही मुंह खोला उसको निगाहे दिवाकर से ४. कुआरी सलीब " जा टकराई। उनमें माफ भलवतो कठोरता को वह नजरअंदाज न कर सका और अपनी मीट पर चला गया । दिवाकर फिर अपने में खो गया । २ यह गीता की आदत थी कि वह जब तक दिवाकर की साईकिल नजर न आ जाती तब तक दरवाजे पर खड़ी रहती, लेकिन ज्यों ही उमे साईकिल नगर आती वह चुपचाप अदर खिमक जाती। दिवाकर दरवाजे पर से ही चिल्लाता था- श्रीमद्भागवत गीता क्या हागिर है ? इसके बाद गीता आकर उसको टोकरी से टिफिन कैरियर व अन्य मामान उठाकर चल देती और चलते समय एक मीठी चितवन से देख जाती। तभी दिवाकर जाती हुई गीता का आंचल थाम लेता और तब तक न छोडता जब तक कि गीता के कपोलों पर एक गर्म चुम्बन न चिपक जाता। और फिर तो जैसे घर में तूफान उठ भाता | दिवाकर जल्दी से साईकित एक ओर रखता और फिर उसके मुक्त कहकहे उठने प्रारम्भ हो जाते । दिवाकर की पुरानी आदत थी कि वह बड़ी ही संजीदगी से गीता के हर काम पर टिप्पणी करता और जब वह खीमती तो उसे मनाता । इसी मान क्रीड़ा मे वे अपने बिस्तरो पर पहुच जाते। आज भी वह पूर्ववत् द्वार पर खडी थी कि दूर से उसे दिवाकर की माईकिल नजर आई। वह लपक कर अंदर चली गई। दिवाकर और दिनों की भाति न अाज चिल्लाया और न गीता को आवाज दी। बस चुपके से माइकिल उसने रखी और सामान उठाने लगा। गीता ने जब साईकिल रखने की आवाज सुनी तो उसे बडा अटपटा लगा, ऐसा कभी होता नहीं था। फिर आज ऐसा क्यों हुआ? वह अनजाने भय से सकपकाती हुई वाहर आई। पता नही क्या बात है ? शायद आज तबियत खराब हो गई हो। उसे गैलरी में आता दिवाकर मिला। कदम भारी-भारी, आखों में एक अनजानी पीडायुक्त पहेली की झाइया झांकती सी । कुंआरी सलीव ०५ गीता ने मूरष्टि दिपाररमी मोर देगाहर मौसा ग आंग नही मिला मका । यह गहन गिान मे पाय मापा । आगिरयर मीना योग जयाय दे। यह रही है रि उगो गोवामान मोर निगमान नही पुरा था । आगिर उगेगा पाटीरन तो देना ही होगा। गीता ने उमे फिर गया और गरमी भाग में प्रमा- मग यात है ? सामान उमहाप से से निपा । पुरानी आक्षा में अनुमार उगने तिकी गिनयन में देया और बहन पोगे मे ही अनजाने में उगने मुग दिपार को मोर बहा दिया। दिवाकर अपने आप को बड़ा गया कर रहापा, पतु अपने पंदर हो रहो 'उठा-पटक' में यह अपने को भय तक मुक्त नहीं पर पा गया था। अय जय गीता का पढ़ा हुआ पोस उगा देगा तो उगे अपने निन्य सायं की यादमाई, सेरिन सब तक देर हो पुषी थी। गीता में यह गमम, पर फिदियार यास्तव में अपने को स्वस्प अनुभव नहीं कर रहा है, युझे हुए मन में अपना गुण हटा लिया । दिवाकर अपनी भूल सगम, गुपा था। उसने बई टाईम में आगे यह गर, उमा एक बहुत ही हल्का गा चुम्बन लिया। पर प्पयं, यह अपने पापको नॉर्मस मही कर सका। गीता मामान उटार अपनी रसोई में यह देवो भर को पनी गई कि कही कोई गठवह तो नही है। फिर यह आहिस्से से कपड़े उतारते दियाकर के पान आई । उमने बहुत ही प्रेम भरे स्वर में उनका हाय पाम कर रहा- या यात है ? आज यू क्यों बुझे बुझे नगर आ रहे हो। दिवाकर ऊपर से पम से कम अपने को बहुत पुछ रायत पर पुका था। वह थोडी भारी आवाज मे बोला- मैं आज अपने को स्वस्य अनुभव नही कर रहा हूँ। इस झूट को वह बोल तो गया पर यह स्वयं ही जैसे अपनी झूट के द्वारा पकड़ा गया हो। एक प्रकार में सहम सा गया । गीता ने एक सद्गृहणी के समान उसके माथे को हुआ, उसकी नब्ज़ देखी, जैसे वह उसकी बड़ी पुरानी चिकित्मिका हो। सद्गृहणी अपने पति की सबसे बड़ी चिकित्सिका भी तो होती है । गीता ने मर्म भरी निगाहो से देखा और थोडा मुस्करा कर बोली - आप तन से तो बीमार नही लगते शायद मन से हैं । फिर वह अपने व्यग्य का प्रभाव दिवाकर के चेहरे पर देखने लगी। पर वहा एक ठण्डी गूढता देखकर यह सहम गयी और आगे वोली- कोई बात नहीं, आप शायद आज अधिक कार्य करने के कारण थक गए है । मैं अभी आपके लिए थोडा सा दूध गर्म कर दूं। इसमे आपको माराम ६ 0 कुंआरी सलीव मिलेगा 1 मे आप चाय पी लिया करें तो यह जान लेवा थकान आपकी दूरही जाया करे। और दिन होता तो दिवाकर चाय की इस पैरवी से भड़क उठता, परन्तु यहां तो आज उसके सारे अन्र्तमन को जैसे नीता रूपी तूफान ने झकझोर कर रख दिया था। वह नीता और उमरे पन के अतिरिक्त कुछ सोच ही नही रहा था । वस एक निरीह सी दृष्टि से उसने गीता को देखा और फिर वह दूमरी ओर देखने लगा। गीता के पाम इतना ममय वहां था कि यह दिवाकर के माथ ही बैठी रहे । उसको अपनी भी एक जिम्मेदारी थी। जो दिवाकर के घर में आ जाने के साथ आगे बढी थी । वह रसोई में अथवा इधर-उधर काम अवश्य कर रही थी, लेकिन बार बार दिवाकर की ओर झांक कर भी देख लेती थी कि दिवाकर में अभी परिवर्तन आया कि नही । उसका स्वयं का मन भी खिन्न हो गया था। वह स्वय भी वुझ गई थी । दिवाकर को कुछ हो जाय और वह प्रभावित न हो, यह सम्भव नही था । वह पुराने विचारों वाले परिवार में पली-बढ़ी थी। वह स्वयं को अमरवेल मानती थी । एक ऐसी लता जो सहारे और पोषण के लिये माध में वृक्ष चाहती है। वृक्ष का अनिष्ट उसका अपना अनिष्ट था । दिवाकर तब तक कुर्मी पर ही बैठा रहा, जब तक सौम के साये बहुत सम्वे व गहरे न हो गए और रात्रि की काली चादर ससार पर फैल न उठी । वह उठा भी तब जब गीता ने झकझोर कर कहा कि क्या आप आज नित्य कर्म से भी निवृत न होंगे? दिवाकर ने मर को एक हल्का सा झटका दिया और फिर असफल मुस्कान को सफल बनाने का प्रयत्न करते हुए बोला - गीता मैं तुमसे पहिले ही कह चुका हूं कि मैं अपने को स्वस्थ अनुभव नहीं कर रहा हूँ । गोता की अनुभवी आखें इस बात को पहित ही अच्छी तरह से परख चुकी थीं कि दिवाकर को कोई शारीरिक व्याधि न होकर मानसिक व्याधि है । तभी उसे एक झटका सा लगा । कही उमके अथवा उनके परिवार में गड़बड़ तो नही है । दिवाकर के परिवार मे तो ले दे कर उसकी एक अध्यापिका मा मात्र है जो भी अव रिटायर होने वाली है । रहा उसके यहां तो मां बाप दोनों ही हैं। दादी भी जिन्दा है शायद दादी को कही कुछ हो गया हो । उस पर सर्वाधिक प्रेम दादी का ही था। उसकी आंखो में अचानक नमी उत्तर आई । उसने आकुल वाणी मे पूछा - कही कोई बुरे समाचार का पत्र मेरे या आपके यहां से तो नहीं आया। कुमारी सलीब ०७ दिवाकर के चेहरे पर इतनी देर के बाद एक मद मुसान की रोशनी की लकीर सी उभरी पर वह पल भर ही रही। उसने तुरन्त सोचा- ये गृहणियां भी अजीब होती हैं, जो दूर है उनके लिए इनकी आयो में नमी बितनी जल्दी तर जाती है, वाणी आकुल हो जाती है विशेषकर अपने मैके वालो के लिए, परन्तु तुरन्त ही उसे ऐसा लगा कि वही वह गीता के माथ अन्याय पर रहा है । उमने उमके सूखे परिवार में आकर सभी कुछ सुला दिया था। उमी की जिद पर उमने लगी हुई नौकरी छोडी थी जिससे पहिले उमके परिवार को महाग मिलता था, और बाद मे उसे सहारा मिलता पर शक्की दिवाकर यह कैम गवारा करे कि उसकी पत्नि मरे खपे और खिलाए उसके सुमराल वालो को हालाकि गीता ने कभी नहीं कहा था कि वह अपने घर वालो को मपोर्ट करना चाहती है परन्तु दिवाकर ने पहिली बार में गीता को समझा नहीं था। उसे याद आया एक बार उसका भाई कुछ सहायता मांगने आया था, तब गीता कमाती थी, उमने यही कहा कि अपने जीजा साहब से मागो । तब वह यह समभा कि वह उसे यह बता देना चाहती है कि उसे उसके पैसे की परवाह नहीं है. परन्तु वह उसको महायता दे सकती है । झल्ला कर दिवाकर ने सौ रुपये अपने साले को मौप दिए। बाद में गीता ने बडी चख चख की थी। इतना धन लुटाते रहे उन्हे तो हम क्या खायेंगे। फिर भी वह उसे नौकरी छोड़ने को मजबूर करता रहा । नौकरी न भी छूटती, किन्तु पुराने सस्कार व नए संस्कारो के सस्करण से बनी गीता जो पुरानी अधिक नई कम थी, ने भी नौकरी रखने की जिद न की। फिर दिवाकर मे नई शादी की मस्ती व अदूरदर्शिता थी। यदि ये दोनो बातें न होती तो नौकरी रही आती। गीता ने लगभग झिझोडते हुए उसे रुआंसे करुण स्वर में पुकारा- बोलते क्यो नही ? क्या बात है ? किसकी तबियत खराव है ? और गीता ने इतना कहते अपने दो बूद आसू टप से फर्श पर टपक जाने दिए । चुप्पी से विश्वास हो चुका था कि कही न कही कुछ बडी गडबड हो गई है । सामान्य बीमारी पर भी दिवाकर का चहकना इस प्रकार नहीं रुक पाता था कि वह एक दम प्रस्तर-प्रतिमा की तरह जड़ बन जाए। दिवाकर ने जब उसे रोते देखा तो उसे अपनी गलती का भान हुआ वह जानता था कि यदि गीता ने रोना प्रारम्भ कर दिया तो फिर उसके लाख ममझाने पर भी विश्वास न होगा, न रोना रुकेगा। ऐसी दशा में शायद उसे नीता के पत्र के बारे मे बताना पड़ेगा । जो शायद उसके हक में ठीक न हो। बह गीता को धीरे-धीरे अपने अंक मे समेटता रहा और उसकी आखो को अपने हथेलियो से ८0 कुआरी सलीब सुपाता रहा, फिर बोला मीना वायती बनती हो। मैंने कहा कि मेरी तबियत ठीक नहीं है। रही मे गलत गरर का पत्र नही आया बम थोडा सा आफिग मे भगडा सा हो गया है, जो नियट जायेगा। यह एक सफेद झूठ और बोल गया, परन्तु पहिले की भाति वह भय से मिमटा नही । एक के बाद जैसे दूसरी भूट उमे शन गर्ने भय मुक्त करती जा रही थी। गोता ने दिवाकर की आवो मे झापाकर देगा- वहां किमी अनहोनी का मकेन नही था । पर एक अनवुझ पोडा का भयकर मागर लहरें मार रहा था। मे यह पता था कि दिवाकर मभी प्रकार के नगो से, शिवायो में पर रहता था । आफिम में अमर उग गहरे झगडे उनको बहमो मे हो जाया करते थे लेकिन इतना कभी नहीं कि वह इस तरह में जड हो जाये । उमकी वाणो ही अवरुद्ध हो जाय । झ्गडो के बाद तो उमकी वाणी और अधिक प्रसर हो जाया करती थी। आफिम को झ झलाहट गीता पर ही उतरती थी फिर भी यह सुन कर गीता के मीन पर छाता हुआ भार तुरत हट गया । यह योली-फिर आप इमी पर इतने बुझ गए। यह नोक झोक तो बहुधा आपको और अधिक वाचाल बना जाती थी। दिवाकर उसका क्या जबाव दे। वह बार बार अपने को नीता के पत्र से अलग करना चाहता था । लेकिन वह तो जैसे अजगर की भयंकर लपेट के समान उमे अपनी कुण्डली में बुरी तरह कराता ही जा रहा था किन्तु उमे किमी न किमी तरह अपनो इम स्थिति से निकलना ही होगा। वह और तो कुछ न कर मका परन्तु एक युमीमी मुम्कान उमकी ओर हालकर हा मुंह धोने गुमलखाने में चला गया। सर भारी-भारी सा लग रहा था, मानो उममें तूफान की सांय-माय हो रही हो। उमने सर पर अच्छी तरह पानी डाला। तब उसे ऐमा लगा कि योडी सी समल्ली आई है और नीता का पत्र पानी के इस बहाव मे कही थोडासा फीका पडा है । गुमलखाने मे बाहर आया तो सचमुच गीता ने उसके लिए दूध तैयार कर रखा था। वह दूध देखकर भी ऐसे ही भडक उठता था जमें चाय या शराब । वह थोडा नॉर्मल हो ही चुका था। उसकी वाचालता फिर से लौट आई थी। तुनककर बोला-अच्छा जी तो आप बालक के लिए दूध ले आई। ये लो आपको एक तो दूध लाएं और आपको ऊपर से मुनें और । गोता इम परिवर्तन से पुलक उठी। गीता तुम जानती हो कि दूध वालको का प्रिय.पेय हैं.न.कि मेरा । अजी रहने दो बुहऊ महाराज, थोडासा पीलो ताजगी जायेगी। । कुआरी सली बालक को तो मां का दूध पिलाया जाता है। कहो तो आपकी माताजी को एक छटाक दूध के लिए तार दे दूं। वम दिवाकर खुल गया- आगई अपनी औकात पर। अपनी तरह औरो को भी समझती हो। मेरी मा को तार देर में मिलेगा अपनो माताजी को दे दो। गीता की क्षुद्र घंटिका सी हमी खिल पड़ी। हंपते हसते घोली- प्रोहो तो आपको अब मेरी मा का दूध पीने का शौक चर्राया है। जानते हैं फिर मेरा आपका नया रिश्ता क्या होगा। दिवाकर अपनी जगह से उछला और उसने गीता को दबोच लिया। फिर तो जो कह रूहों का तूफान उठा तो जाने कहाँ नीता और कहाँ नीता का पत्र । बारह का घडियाल बज चुका था। दिवाकर की आबो की नीद उड़ गई थी । दस बजे तक तो गीता की उपस्थिति में उसे नीता के पत्र ने परेशान नहीं किया किन्तु दम बजते बजते जब गीता गहरी नीद में सो गई, उमके सामने फिर से स्थिति मुह फाडे खडी हो गई। गीता अधिक देर तक जाग नहीं सकती यो । अब भी अचेत गीता उमके पहलू में अस्त व्यस्त पड़ी थी। हल्के नीले प्रकाश में उमका शरीर भी जैसे रात्रि में मिमटता सा नीले कमल जैसा लग रहा था। धोती घुटनो से ऊपर चढ गई थी। सासें नींद का बोझ लिए बहुत धीमी गति से चल रही थी । मानो वे दिन भर के थके यात्री हों और अब पडाव नजदीक देखकर और अधिक थक गए हों। दिवाकर के सामने एक एक कर विगत के चित्र उभर रहे थे। वह गीता से क्या कहे- जिसने अपना सब कुछ मम्पूर्ण विश्वास के साथ उसे सौंप रखा है । अभी गीता की क्ग आयु है ? यही बाईम-'तेईस और वह खुद तीस-बत्तीस का । सिद्धान्तो ने जल्दी शादी न करने दी और परिस्थितियो ने उसको मजबूर किया कि इतने आयु अतराल के होते हुए सोचता था कसे निभेगी, लेकिन गोता ने उमरू जीवन का रुप ही पलट दिया । वह तो जैसे उसका एक अनिवार्य अंग होकर रह गई है। एक छोटी मी मुलाकात उमरी मवमे बडो मुलाकत बन गई। पहिली बार जब वह कानपुर से अपने एक इन्टरव्यू में अमफन होकर आ रहा था तय एक छरहरे तन की, चांदनी मी शुभ्र युवती अपने समस्त सामान को लिए बुकिंग - विन्डो पर खड़ी हुई बाबू से वहम में मशगूल थी। वह कहता था १०० कुआरी सलीब वह शादी करे।
कि छुट्टे पैसे लेकर आओ और वह तेज स्वरो मे कहती थी मैं अपना सामान छोडकर कहां जाऊँ । पैसे भी वह छोडना नहीं चाहती थी। वह ठगा सा उसे देखता रहा फिर उसने आगे बढ कर बाबू से कहा था भाई इन्हें क्यो तग करते हो यदि खुले पंसे हो तो दे क्यो नहीं देते । बुकिंग बाबू शायद उसे विन्डो पा और अधिक खडा रख कर आंखें सेंकना चाहता था। शायद उस पर खुले पैसे थे भी । क्योकि एक बूढा जो टिकिट अभी ले चुका था। कह रहा था- अरे अभी अभी छुट्टे पैमे दिए है और अब कहता है नहीं है। सालो मे ईमानदारी से काम करने का तो मादा ही नहीं है। दिवाकर ने इतना सुना तो उसे एक शह मिल गई। वह थोडे तीखे स्वर मे बोला- जनाब देखिये ये सज्जन अभी अभी आपको- छुट्टे पैमे दे चुके है । फिर आप किस प्रकार इन्कार कर मकते है बाबू भी थोड़ा तीखे स्वर में इङ्गलिश मे बोला- "हाई आर यू इन्ट 'फीयरिंग व्हाइल यू आर नॉट रिलेटेड' उससे भी और अधिक तीखे स्वर में दिवाकर बोला 'यू थिक माई केन इजीली बी इन्फ्लुएन्सड विद योर डर्टी इङ्गलिश | आई एम एन इन्डियन एण्ड आलवेज स्पीक इन हिन्दी, यू डिम्ओनेस्ट वन ।' बाबू ने तीखे स्वर मे इम फट कार का जवाब दिया लेकिन बूढा जो पढ़ा लिखा था, उममे भी तीखे शब्दो मे बोला- जनाब मैं आपको छुट्टे पैसे दे चुका । आप इन्हें टिकिट दे, पैसे दै. और औगे को Bिस्ट लेने दें। दुर्भाग्य है हमारा हम सामान्य बातें हिन्दी मे करेंगे और जब दिखावे का समय आयेगा तो इङ्गलिश में बोलेंगे । बाबू ने देखा कि अव जनमत बदलेगा। उमने जलती निगाहों मे बूढे और दिवाकर को देखा और फिर हार कर टिकिट और छुट्टै पैमे दे दिए । जब दिवाकर की बारी आई तो बाबू ने छुट्टै पैमो की फिर मजबूरी दिखाई । गाडी आचुकी थी। दिवाकर विवश होकर इधर-उधर देखने लगा। वास्तव में अब छुटे पैमे चुक गए थे। उस लड़की ने उमको विवशता को भाप लिया और तत्काल जो छुट्टे पैसे उसकी मुटी मे बद थे उमके पागे रख दिए । दिवाकर ने और कोई चारा न देख कर उनमे से छुट्टे पैसे उठाकर बाबू को मॉप और बधा नोट उमकी हथेली पर रख कर अपनी अटेची और बंग उठाकर गाडी की ओर लपका । लडकी के पास सामान अधिक था वह इतना सामान लेकर चल नही पा रही थी। दिवाकर ने यह देखा तो चुपके से उसका भी सामान उठाया और चल पड़ा। गाड़ी मे वे चुपचाप ही रहे। कुछ स्टेशन पार हो जाने के बाद उसने चोरी से उसे देखा तो उसे भी अपनी ओर देखते हुए पाया। दोनों की निगाहे टकराई और झुक गई। एक सज्जन तो बहुत देर से उन्हें देख रहे थे। धीरे से । कृआरी सलीव ०११ दिवाकर से बोले- आप अभी अभी विदा कराकर लौटे है शायद । उमकी यह बात सुन कर लडकी कानो तर लाल हो गई परन्तु वह बोलना चाह कर भी न बोल सकी। कई स्टेशन इस प्रकार गुजर गए। फिर दिवाकर ने ही इम चुप्पी को तोडा । क्या आप चुप रहना ही पसंद करती हैं ? वह लड़की मुस्कराई और फिर मानो नाराज हो एक तरफ मरक गई। दिवाकर बोलने का आदी था। उसमें धूप कहा रहा जाता । फिर वोला- आपको कहा तक जाना है। लड़की ने कहा कुछ नहीं, टिकिट दिखा दिया। इस बीच वह बूढा उतर गया था। नए अनजान यानी आ गए थे। दिवाकर मुस्कग पडा । तभी लडकी ने उसका एक रूपए का नोट उसे वापिम किया। दिवाकर बोला- छुट्टे पैमे कहा है अपने पास । लडकी मुस्करा पड़ी और पहली बार बोली-मैं आपमे छुट्टे तो नही मागनी। दिवाकर नपाक से वोला- मैं आपसे नोट तो नही मागता । लडकी झेप गई और उमने हौले से नोट उमकी गोद में डाल दिया। दिवाकर ने उसे उठाकर उसके हाथ पर रखा । उसको नर्म हथेली से उसकी उंगलियो ने म्पर्श किया तो एक विद्य त तरग मी उसके शरीर में प्रविष्ट हो गई । शायद ऐसा ही उसके साथ था। फिर तो बातो का जो बाध टूटा तो सारे रास्ते बातों की फुलझडिया छूटती रहीं। इमी बीच उसे मालूम हुआ कि वह एक प्राथमिक विद्यालय मे अध्यापिका है । दिल्ली स्टेशन पर जब दोनो उतरे तो साझ का झुटपुटा मा था। लड़की का पिता उसे लेने आया था। दिवाकर को यह विदित हुआ कि उसकी गाडी जा चुकी है तो वह बहुत निराश हुआ । उसकी निराशा देख कर लड़की ने प्रस्ताव किया कि वह उसके घर पर चले । पर वह एक छोटी मी मुलाकात को इतना बड़ा रूप कैसे दे। फिर लडकी के पिता ने तो यह प्रस्ताव रखा नही था। अंत में पिता ने भी जब आग्रह किया तो वह माथ चला गया। इस प्रकार वह मुलाकात पनो की मस्कार युक्त मीढी पार करती हुई, उमके मन की दहलीज को पार कर उसके आगन में उतर आई । आज वही उसका सर्वस्व है। उमने एक उचटती मी निगाह वेसुध मोती गीता पर डाली और लम्बी माह उमफे सीने में निकल कर होठो पर तडप गई। १२ 0 कुआरी सलोव जहाँ इम मोठी स्मृति ने उसे गुदगुदाया था वही आज नीता के इस पत्र ने कडवाहट भी भर दी थी कि नीता का रुझान भी उसकी ओर होगा। उसे इस बात की कभी आशंका भी नहीं थी कि वह नीता जो कालेज के समय मे उसकी ओर थाम्न उठा कर भी नहीं देखती थी, वह इस रूप में उसके सामने आयेगी। यदि मुलाकातें भी होती थी तो महग अध्ययन की समस्याओं के कारण नोट्स की गरज से। नीता फैशन को पुजारिन थी। उमका दायरा भी फैशनेबल लडके- लडकियो ने ही था। जिमने अच्छा पहिता, अच्छा खाया, वह आज न जाने क्यो उमके शुष्क जीवन में प्रवेश कर रही है। जो हमेशा उमे ढोंगी कहती थी, काल्पनिक कहती. यथार्थ जीवन से परे का आदमी कहती, मंत आदि न जाने क्या क्या कहा करती । वही उसकी मादगी मे प्रेम कर उठी है, शायद उसे न चाहते ए भी चाहती है। उसे मबसे बड़ा आश्चयं तो इस पत्र की भापा पर था कि उसके सम्बोधन कितने अटपटे है। फिर मारे पत्र मे तुम के अलावा और किमी मम्बोधन शब्द का प्रयोग नहीं है। इतना नजदीकी, इतना आत्मीय सम्बोधन तो शायद उसे कभी गीता ने भी नही किया। नीता का तो प्रश्न ही नहीं उठता। यहां तक कि नीता मे मुत्रोध के लिए भी इतना नजदीकी मम्बोधन उमने नहीं सुना था, शायद सुबोध के प्रति उमका यह एकान्तिक मम्बोधन हो। नटखट वह प्रारम्भ मे ही थी। ऐमा तो नहीं लगता कि यह कही कोई शंतानी कर रही हो। इस विचार से उमे थोड़ा मन: मतोप हुआ। फिर उसने पत्र निकाला, उसे पढा तो लगा कि इतना बडा कदम भहज शैतानी के लिए नहीं उठाया जा सकता । यह पत्र तो स्वय मे एक चिन्गारी है जो उसकी हरी-भरी गृहस्थी को फूक कर रख देगा। घडियाल दो बजा रहा था और नीद थी कि दिवाकर की आखो में आ ही नही रही थी। नीता की शादी के बाद का रूप उमकी आखो के आगे चल चित्र की भाति तैर उठा । वह नटखट और च चल नीता सुवोध के आगोश मे आकर मानों बाधित हो गई हो । चचलता तो मानो छू हो गई थी। जब देखो तब सुबोध को लताडती- तुम ये पीना छोडो वो पीना छोडो, यहां जाना छोड़ो, वहां जाना छोडो । मुबोध जब भी मिलता तो अपनी रामकथा ले बैठता, लेकिन यह सब तो दिखावा मान था। उनके रहन सहन मे रंच मान भी अतर नही आया था। अन्दर से दोनो बेहद खुश, बेहद मन्तुष्ट । कुमारी सलीब 0१३ सुबोध जिसने अपने को कमी जमीन पर नही समझा, वह तो अपने आपको हमेशा मुक्त गगन का पछी समझता। नीता ने भी उमे कभी नहीं बांधा क्योंकि नीता बम भी मुक्त विचारी बाली थी। एक दूसरा अपने को पूरक ममझ रहा था, अनिवार्य नही। सुबोध जो आराम पता तो महीनों पढ़ने का नाम न लेता और फिर पढ़ता तो भूत की तरह लग कर। किमी भी क्षेत्र में वह पीछे नहीं रहना चाहता था। वह तो ऐसा चौपटा था जिसे जहां चाहो फिट कर दो, जचेगा। आज नीता अपने उसी मनमीत से ऊब गई है ऐसा क्यो हुआ? क्या मुबोध अधिक पोने लगा है ? कही वह पीते पीते भटक तो नहीं गया है ? पत्र जैसे उसके लिए नागपाण बन गया था। वह मोच रहा था कि पत्र से गीता को परिचित करायें या नहीं। यदि उसे पन बनाता है तो पता नही गीता उसके बारे में क्या धारणा बना ले, आखिर वह भी एक औरत ही है। पन को उससे गोपन रखना ही उसे |यकार लगा। समय आने पर ही उसका बताना ठीक होगा, पही उसने अतिम रूप से विचारा । घडियाल अब तीन बजा रहा था। नीद लेने के प्रयास दिवाकर ने करवट बदली पर नींद कहा? प्रातः होने ही वाली है. गीता भी उठने वाली है, और वह नहीं सो पाया तो उसकी चोरी पकड़ी जायेगी अतः वह फिर सोने की सोचने लगा किन्तु अनायास ही नीद में गाफिल गीता की बाहें उससे लिपट गई । उसने बड़े टण्डे रूप से उसकी बाहों को हटाया और फिर अतिम निर्णय सा लेते हुए उसने सोचा- कुछ दिन उसे प्रतीक्षा करनी चाहिए। यदि सुबोध और नीता की मिली-जुली भगत है तो शायद चार पाच दिन में मुबोध का पत्र भाजायेगा. नही नो वह स्वयं चला जावेगा। एक करवट बदल कर मोती हुई गीता को उसने देखा और भावावेश में आकर उसने उसका भरपूर आलिंगन लिया। सर पर से एक भार हलका हो रहा था, इसे यह पिछले दिन के मध्यान्ह के उपरान्त मे ही ढोता आ रहा था। झूठी तसल्ली ही सही, इस भार को फिलहाल उतार फेंकने के लिए काफी थी। दो-तीन दिन तो दिवार ने पन की प्रतीक्षा में विता दिए, परन्तु ज्यो ज्यो अधिक ममय गुजरता गया और पत्र के आने में देरी होती गई, जमकी अकुलाहट बढ़ती गई। एक पन सामान्य समाचारों का उसने भी डाला था, रिन्तु उसकी भी कोई प्रतिक्रिया जैसे उन लोगो पर नहीं हुई थी। १४० कुमारी रालोद अब फिर से अपने अदर पनप रहे विषधर की कुलबुलाहट वह अनुभव कर रहा था। आखिर क्या रहस्य है कि एक मन उसे चण्डीगढ की ओर धकेलता है तो दूसरा उसे न जाने के लिए बार बार कोंचना है। गीता उमके इम परिवर्तन पर फिर से व्याकुल हो उठी उमको समझ में नही आ रहा था कि दिवाकर को यह फिर क्या हो गया है ? उराका स्वास्थ्य दो- तीन दिन मामान्य रहा, पहिले जैसा हास्य उसके अधरो पर लौट आया और अब यह पुन बुझ सा गया है। गीता उमसे कुछ भी पूछती तो वह या तो चुप्पी खींच जाता या फिर हो हूँ मे ही उत्तर देता। अंत में दिवाकर ने निर्णय कर ही लिया कि वह नीता के पाम अवश्य जायेण । यदि सुबोध उममे झगडा करता है तो वह शान्तिपूर्वक उसकी सुनेगा और उसे समझायेगा। आखिर इस अमह्य भार को वह कब तक यू ढोता रहेगा. उसे स्थिति की वास्तविकता से तो परिचित होना ही होगा। इस आने वाले रविवार को उमने जाना निश्चित कर लिया। प्रश्न था गीता मे क्या कहे कि वह चण्डीगढ क्यो जाना चाहता है ? ऐमा कोई ठोस कारण उसके पास न था, जिसे वह उसे बता सके, फिर भी उसे जाना तो होगा ही। शनिवार को मां से ही वह गीता से कहने का प्रयास कर रहा था, किन्तु वह माहम नहीं कर पा रहा था कि कहे किम प्रकार । झूठ बोलने से पूर्व झूठे व्यक्ति की गति बडी विचित्र हो जाती है । वह कहे तो किस प्रकार, अभिनय करे तो किस प्रकार, हर एक तो अभिनेता नही होता। फिर साहम का बालू पैरों तले खिसकता रहता है, झूठ का यात्री, रेगिस्तान का यात्री होता है। अंत मे सोते समय वह गीता से बोला- मैं प्रातः काल पहली गाडी से चण्डीगढ़ जाऊंगा। गीता ने अचरज भरी निगाहों से उमे देखा और पूछा क्या बात है ? क्या सुवोध बाबू का पत्र आया है । आपने बताया तो नहीं । दिवाकर अपने अंदर हो प्रदर सकपका गया। शायद गीता सब कुछ जान गई है फिर भी इसे खोद खोद कर पूछना अच्छा लगता है । भूठ से भयभीत मनुष्य शिकार में घिरे पशु के समान होता है, जिसे हर उस गति से चौंक जाना पड़ता है जो उसे अनुभव होती है । यही स्थिति इस समय दिवाकर की थी, वह भी कुंआरी सलीम 0 १५ गीता रूपी शिकारी मे भयभीत शिकार था उमने एक और मन गन्न झुट बोला- सुबोध की तबियत कुछ खराब है। क्या पत्न आया था ? पन्न ही आया था। क्या मतलब आपका 'पन्न ही आया था से । अपने में सिमटते से दिवाकर ने कहा- यही कि एक व्यक्ति समाचार दे गया था। दिवाकर को लगा कि शायद वात अब खुली कि अब बुनी हालाकि उसे विश्वास था कि पत्र का पता गीता को लग ही नही मकना यह पूर्णतः सुरक्षित है। गीता एक दम व्याकुल होकर उठ खडी हुई और बोली- तो आप तभी इन दिनो यो आकुल व्याकुल थे। आपने मुझसे कहा क्यो नहीं ? क्या मैं सुबोध बाबू के लिए कुछ अनिष्ट सोच सकती थी ? दिवाकर ने निवृति की स्वाम ली। बोला कुछ भी नहीं । गीता फिर बोली- आप जा रहे हैं तो मैं भी साथ चलनी इसको सुनकर मानो दिवाकर के सर पर हथौड़े की सी चोट पहुंची। वह तिलमिलाकर तुरत बोला, तुम क्या करोगी अभी? तुम्हारी क्या जरूरत है वहा ? गीता तुनक कर बोली- आप मुझे पराया समझते है। तभी तो समाचार भी नहीं दिया । अब मुझे ले चलने के नाम पर घबरा रहे हैं जैसे वास्तव मे मैं आपके मित्र के लिए अनिष्टकर ग्रह है। दिवाकर ने सर थाम लिया । वह थोडा बुझे म्बर मे बोला- गीता तुम समझा करो। हम एक दम घर अकेला छोडकर कैसे चल दे। फिर सुबोध की ओर से भी तो कोई समाचार नहीं मिला है। गीता ने तीखे स्वर मे कहा- ठीक है, आप जाइये। मैं कौत होती हूं? दिवाकर एक और झूठ की तैयारी में जुट गया। वह थोडा रुककर वोला- गीता हम किसी अच्छे काम के लिए तो जा नहीं रहे हैं। मैं वहा जाकर वस्तु स्थिति से तुम्हे पत्र या तार द्वारा अवगत करा दूंगा। फिर जैसा तुम उचित समझो कर लेना। गीता ने बुझे मन से स्वीकृति दे दी। O १६ ० कुआरी सलीब ३ सुबह की पहली बस दिवाकर ने पकड़ी। इन दिनो वह पानीपत ही स्थानांतरित होकर आ गया था। गीता से उसने कह दिया कि वह चाहे तो अपने पिता के पास भी जा सकती है। हालाकि कहने के बाद उसने स्वयं सोचा था कि रात को उसने घर की दुहाई देकर ही गीता को रोका था। गीता यह समझो हुए भी कुछ न बोली वह स्वाभिमानिनी थी। उसके सस्कारी गृहणीमन ने उसे कुछ न कहने दिया । जाते हुए से कहना उचित नहीं समझा जाता है। फिर वह स्वभाव से पति-विरोधिनी और जिद्दी भी न थी। दिवाकर तो चला गया परन्तु गीता के सरल हृदय में एक शका की विष-बेल का बीजारोपण हो गया। प्रातःकालीन बस में आमतौर पर भीड़ नहीं रहती। एक पूरी सीट पर वह टांगे पसार कर अथलेटा हो गया । गाड़ी की रफ्तार के साथ-साथ उसके विचारों की गाड़ी भी पुनः रफ्तार पकड़ने लगी। वह चला तो पाया है, किन्तु यदि परिस्थितिया वाकई पत्र के अनुसार ही हुई तो सुबोध से वह किस प्रकार आंखें मिलायेगा आखिर सुबोध उसके बचपन का मित्र है । उसके हृदय पर क्या बीत रही होगी फिर कहीं वह उसकी सूरत देखते ही भड़क न उठे, यदि उसने देखते ही उस पर हाथ चता दिया तो क्या होगा? उसकी क्या इज्जत रहेगी? फिर उसे क्या पता कि वह निर्दोप है या नहीं ? शायद उसे अपनी निर्दोपिता प्रमाणित करने का अवसर ही न मिले । पत्र के बारे मे सुबोध को ज्ञान अवश्य ही होगा। जब नीता ने लिखा है कि उसका घर ही उमको कारा है तो उसकी प्रत्येक गतिविधि पर दृष्टि तो रखी ही जा रही होगी। इस अवस्था में इस पत्र का डाला जाना भी उमसे छुपा न होगा । यदि उसे इस बात का ज्ञान है तो अवश्य ही उसकी प्रतीक्षा बड़ी व्याकुलता से कर रहा होगा और भरा बैठा होगा। कूआरी सलीब 0 १७ तभी एक विचार और उसके मन में कौंधा- कहीं इसके अतिरिक्त एक और परिस्थिति से उसको सामना न करना पड़े। वह जानता था कि नीता के ही मकान मे सुबोध रहता है । सुबोध का अपना कुछ न था। कालेज मे वह सजा-धजा जरूर रहता था, किन्तु यह सब वह अतिरिक्त समय मे काम करके पैदा करता था, आज यदि कुछ उसके पास है तो वह सब नीता द्वारा प्रदत्त । ऐमी दशा में कही नीता ने उद्दण्डता पूर्वक सुबोध को ठुकरा न दिया हो । यदि इस प्रकार की स्थिति से उसका सामना हुआ तो क्या होगा ? एक दूसरा विचार तुरंत उसे छू गया। यदि यह महज शरारत हुई तो आज रविवार होने के कारण दोनो सज्जन घर पर न होकर पंजोर में मुगल गाईन्स मे होगे । इस विचार मात्र से उसे शाति मिली। एक हल्की सी मुस्कान उसके अशात मुखडे पर उभर आई और अनायाम ही एक भोह के साथ उसके मुख से निकला, काश ! ईश्वर ऐसा ही करे । इन्ही विचारो मे गोते लगाता हुआ वह अपने को नॉर्मल करने का प्रयाम करता रहा । वहां वह किम प्रकार से बातें करेगा, यह विचारता रहा । अंत में वह भयावह मजिल आ ही गई। कापते हुए उसने बस से नीचे कदम रखे । वह सुबोध के द्वार तक अभी नहीं पहुंचा था, किन्तु उसके कदम उमका साथ यही से नही दे रहे थे। उसे अपनी ही स्थिति पर एक शेर को कडी याद आ गई--- वो डगमगाए मेरी पुश्त की जानिव, सामने होते तो क्या होता ? उसने सवारी लेने के बजाय पैदल ही जाना उचित समझा क्योकि उसे पहुंचने से पूर्व अपने आपको हर-प्रकार को परिस्थिति का मामना करने के लिए तैयार करना था। जितना वह समय ले सके उतना ही अच्छा था। धीरे-धीरे चलता हुआ जब वह सुबोध के सेक्टर में पहुंच गया तो उसे विदित हुआ कि वह तो अपनी मंजिल पर पहुंच गया है। वह इस बीच मोच भी नहीं पाया कि वह क्या करेगा। थोडे ही फासले पर सुबोध का मकान था | धडकते हृदय से उसने कोर्ट- यार्ड मे प्रवेश किया। अंदर एक अनवूझ सी हृदय पर भार डालने वाली शाति थी मानो वहां के जीवन मे से किसी ने चाचल्य रूपी मासे खींच ली हो । मानो कि वे विद्य त से चलने वाले खिलोने मात्र हो । बाहर श्यामा मिल गया। वह इस घर का १८ 0 कुंआरी सलीब ।
सबसे पुराना र विश्वस्त नौकर था। वह उमे देखते ही अंदर पर करने का आदी था लेकिन आज उमने केवल उसे भूनी आंखों से देखा भर और फिर वह अपनी पुरानी और आदत मे पड़ी हुई तेजी से अदर चला गया । उममें तेजी जरूर थी, किन्तु उनमें से जैसे कुछ कट गया हो। शायद यह दिवाकर के. मन का वहम ही हो । नीता और मुबोध की उपस्थिति पत्र की सत्यता प्रमाणित कर चुकी थी। श्यामा ने बाहर आकर उसे बताया कि वह अन्दर जाये । यही प्रारम्भ था। ऐमा कभी नहीं हुआ। हर बार जब भी मुबोध को पता लगा कि वह आया है तो वह अन्दर से ही दिषु .....दिबु कहता, चिल्लाता आता था और वह भी भावावेश मे उमे सुबोध न कह मुत्री ही कहता था नोता तो दूर खड़ी दर्शक के ममान उनका मिलन देखनी थी और अमर कहा करती थी कि देखो आधुनिक राम और भरत मिल रहे है । वह तो मात्र दर्शक रहती। दिवाकर के मन में एक भावी शमा का विषधर तन पर बैठ गया । आखिर जिमका उमको भय था वही हुआ फिर भी विचार पूर्ण मुद्रा में प्रदर की ओर बढ़ गया । साथ में आते हुए ण्यामा से अनायाम ही उमने पूछा- क्या सुवी का स्वास्थ्य खराब है ? श्यामा ने रिक्त स्वर मे कहा- शायद । तब तक दिवाकर अदर चला आया । सामने नीता थी मुबोध अभी तक नजर नहीं आया। नीता ने एक अर्थ पूर्ण मुस्कान से उमका स्वागत किया। वह मुम्कान ऐसा लगता था कि शायद अर्थपूर्ण होते हुए भी कही ऊपर से ही तर कर आई हो। उमने इधर उधर देख कर पूछा- मुबी कहाँ है ? नीता ने हाथ से मुसलखाने की ओर इशारा कर दिया। मुबोध को अपने सामने न पाकर दिवाकर ने एक गहरा श्वास लिया और हल्की दबी हुई प्रावाज मे नीता मे पूछा- क्या वह पत्र तुमने ही लिखा था ? इसकी स्वीकृति में हिलते नीता के सर ने कही गहरे में दिवाकर को हिला कर रख दिया। उसने एक प्रश्न और बडी आकुलता और त्वरा से पूछा- क्या मुबी को इसका पता है ? नीता ने दिवाकर की आखो मे झांका और फिर एक संक्षिप्त नहीं में उत्तर दे दिया, किन्तु उसको आँखे मानो-पूछ बैठी कि क्या सुवोध परेशान होगा। कुआरी सलीब 0१६ । - ? - इम जानकारी से दिवाकर के मुख परसे कुछ परेशानियों के भाव टल गए । वह जब तक मुबोध आए तब तक नॉर्मल हो जाना चाहता था नीता कमरे से जा चुकी थी। कमरे मे एक तीखा मौन उतर आया था । यह मौन उसे यहां कभी अनुभव नही हुआ। इस बार जब अशाति ममी के दिलो मे गहरी उरर आई हो तो फिर बाहर जो कुछ शेप होगा वह एक अमह्य मौन ही तो होगा । एक मिनिट बाद ही तौलिया लपेटे हुए सुबोध गुमलखाने मे बाहर आ गया । दिवाकर ने उठकर मुबोध को बाहों में भर लेने का असफल अभिनय किया। ऐमा ही सुवोध की ओर से भी हुआ । एक मौन उन दोनों के मध्य त्रिशकु बन कर लटक आया । मुबोध कपड़े पहिनने लगा । दिवाकर टकटकी लगाये उसे देखताभर रहा । अंत में उमने ही बात प्रारम्भ की मुबी इम ममय गुमल में कैसे ? क्या तुम्हारा स्वास्थ्य ठीक नहीं ? हा... आ-ठीक तो है। एक अति ठण्डा म्वर उभरा। क्यो? इस प्रकार में बुझ से क्यो हो ? नहीं तो। शायद तुम्हारा बहम हो, और एक गहरा निश्वाम उमके मीने से उठा और होठो पर आकर अटक मा गया । सुबी... और दिवाकर इससे अधिक कुछ न कह सका । सुबोध ने एक मार्मिक दृष्टि से दिवाकर को देखा। एक तीखा मौन फिर उभर आया था। थोडी देर में ही नीता मुबोध के लिए चाय ले आई। वह पूर्व को भानि चौका, परन्तु फिर शात हो गया। यहां का यह नियम मा बन गया था कि जब तक दिवाकर रहता उमके सामने चाय नहीं लाई जाती थी और यदि लाई भी जाती थी तो इस प्रकार के वातावरण मे कि हमी खुशी दूसरो के द्वारा पी ली जाती थी और उसका जलना भुनना प्रारम्भ हो जाता था। उमके भाषणों में और अधिक तीखापन आजाता था। आज तो जैसे मब कुछ जैसे बदला-बदला सा था । सुबोध ने केवल एक बार उसे कनखियो मे देखा भर और सिप करने लगा । जैसे वह अपने व्यवहार से यह बताना चाहता हो कि दिवाकर तुम कितने बनते थे, तुम्हारा भण्डाफोड तो हो ही गया। दिवाकर इम मौन से घबरा उठा। आखिर सुबोध कुछ बोलता क्यों नही? यदि इसे पत्र के बारे मे सब कुछ पता है तो भडकना क्यो नही ? यदि मालूम नहीं है तो अपना दिल खोलता क्यो नही ? २०० कुआरी सनोद अचानक सुबोध की सपाट आवाज ने मौन भंग किया- दिवाकर तुम आराम करो। यात्रा से थके आए हो। मैं जरा बाजार तक हो आऊँ । दिवाकर को लगा जैसे यह आवाज सुबोध की न होकर किसी और की हो । जैसे यह बहुत दूर के किसी निर्जन मरुस्थल से आ रही हो। सुबोध ने उठने का उपक्रम किया । उसके उठने में भी दिवाकर को यह अहसास हुआ जैसे वह कह रहा हो- अच्छा भाई लो मम्हालो हम चले । उमका यह वेगानापन दिवाकर के अंदर कहीं बहुत गहरा चुभ गया। वह तडप कर वोला- सुबी यदि मेरा आना तुम्हें अच्छा नही लगा हो तो मैं लौट जाता है। पता नहीं तुम आज इस प्रकार क्यों उखडा- उखड़ा व्यवहार कर रहे हो । सुबोध ने बिना किसी उत्तेजना के कहा- दिबू । पहली बार जैसे उमने दिवाकर को पुकारा हो- तुम समझते क्यो नही ? मानो एक प्रखर पीड़ा उसकी वाणी मे उतर आई हो। वह इससे अधिक और कुछ न कह सका। दिवाकर भी सुबोध के माथ ही उठ गया । उसने वहां पर और अधिक रुकना उचित न समझा। नीता जो इतनी देर से इस नाटक को एक मौन दर्शक की भांति देख रही थी। तड़प कर बोली-आप स्पष्ट शब्दों में क्यों नही कह देते कि दिवाकर बाबू को मैं छोड़े जा रहा हूं । दोनों प्रेमी आपस मे सलाह कर लें। जैसे भयंकर वज्रपात हुआ हो । दिवाकर व सुबोध दोनो ही इस बात से चोंके । यह प्रहार उस मौन की बोझिलता को बहुत देर तक झनझनाता रहा । उठता हुआ सुबोध फिर हताश होकर बैठ गया। दिवाकर में इतनी शयित भी शेप नही रही कि वह बैठ तो सके । मूक दृष्टि से वह सुबोध और नीता को ताकता रहा, ताकता रहा, निनिमेष । न जाने वह कब तक ताकता कि नीता की अचानक फूट पड़ी भलाई ने उनको इस स्थिति से अचानक एक झटका देकर उबार लिया । अब जैसे उममे कही मोया हुआ माहम जाग उठा हो उसकी बुझती हुई आंखों में मानो रोशनी की किरण दर किरण फूट पड़ी हो । उसका सोया हुआ दर्प जाग उठा । उसको वाचालता मानो अंगड़ाई लेकर उठ बैठी हो। वह थोडा संयत और तीखे स्वर मे सुबोध को झझोड़कर वोला-सुबो, यह सब क्या गोरख-धन्धा है । उसने अनजान बन रहे सुबोध को टटोला। सुवोध बहुत ही संजीदगी से नीता को ताकता रहा, ताकता रहा, फिर पता नहीं क्या हुआ कि उसने एक हिंस्र पशु की भाति हुंकार भरी और अचानक कुंभारी मलोब ० २१ नीता के गाल पर एक तीपा चाटा जड़ दिया । जिसको आवाज गूंज गई। यह सब इतना अप्रत्याशित था कि दिवाकर ठगा सा पडा रहा । उसका चेहरा एक दम श्वेत हो गया मानो उमके सारे ही शरीर में से किसी ने उसका रक्त पींच लिया हो । नीता ने कोई भी प्रतिवाद नहीं किया वह कुर्मी से उठकर धम्म से पास में पड़े कोच पर पड गई और सुबकती रही। अनानक उसका सुबकना गहरी चुप्पी में बदल गया । आसू थम गए । मानो उसने रुदन मे किनारा कर लिया हो। उसकी आखो की झील में एक गहरो पोडा का मौन उतर आया था। मुवोध पहिले ही की भाति मुमुर्ष बना ताकता रहा। उसमें फिर वही पुराना मौन फिर साकार हो गया था। दिवाकर ने यह सब देखकर समझ लिया था कि प्रारम्भ हो चुका है। वह यदि यहां और अधिक रुका तो शायद अनर्थ हो जाय। उसे अब अपने आने पर बहुत दुःख हो रहा था कि वह यहां आया ही क्यों पा ? कभी सुबोध मिलता तो पूछ लेता । उसने चुपचाप अपना सामान उठाया और चलने को उद्यत हुआ तो लपक कर विध त गति से नीता ने उसकी अटेची पकड़ ली और बोली जाने से पूर्व मुझे इस कारा से मुक्त कराते जाओ। दिवाकर पडा रह गया । सुबोध में मानों पुनः हिंसता जाग उठी थी। वह तड़ा कर बोला- नीता तुम मम्हल कर बात करो । पहिले हो तुमने मेरे मित्र का अपमान किया है। अब पह मत दुहराओ। मैंने अपमान किया है या आपने । नीता तड़प कर बोली। चुप रहो । सुबोध तड़प कर बोला । चुप रहूं। मैं बोलती ही कब थी जो चुप रहूं। दिवाकर ने निरीह आंखों से सुबोध को देखा, किन्तु सुबोध दिवाकर से आखें नहीं मिला सका । झुकी नजर किये हुए ही वोला-दिवू तुम रुक जाओ। मैं परेशान हूं और यदि मैं कुछ कर बहू मा कह दूतो बुरा न मानना भाई, मैं कितना परेशान हूं, इसे तुम नहीं जान पाओगे। दिवाकर को अटेची रख देनी पड़ी । सुवोध की इस अपील मे बडी वेदना थी। वह अपने आपको और सयत न रख सका। सुबोध के कंधे पकड कर वह बोला-सुबी तुम इतना कैसे सहते रहे । मुझे लिखा तक नहीं कि तुम मुझ पर अविश्वास करते थे। उसके अविश्वास शब्द पर सुबोध ने उसके मुंह पर हाथ रख २२७ कुंआरी सलीब दिया और आकुल शब्दो में बोला-तुम पर अविश्वास करके मैं अपने ही अस्तित्व को नकारता क्या? नीता ने तुरंत तड़प कर कहा-यह आप पर अविश्वास करते रहे हों या नहीं मुझ पर तो करते ही रहे हैं । सुबोध ने आद्र कण्ठ से कहा-मुझ पर अधिक अत्याचार न करो नीता मैं तुम पर या दिवू पर बिल्कुल अविश्वास नहीं करता। परन्तु क्या करू मैं अपने आप पर विश्वास नहीं कर पा रहा । अब वातावरण मे वार्ता के लिए एक क्षीण सा मार्ग बन गया था। मौन की वाप्प धीरे धीरे छट रही थी । दिवाकर बोला-सुबो क्या मुझे अपना दुःख नहीं बताभोगे । क्यों हुआ आखिर यह सब । कैसे हुआ ? नीता ने बोलने के लिए मुह खोला ही था कि सुबोध ने उसे इशारे से चुप कराते हुए कहा-नीतू मुझे ही कह लेने दो। शायद मैं हल्का हो जाऊ यह कह कर । इसी बीच श्यामा ने आकर बाधा दी कि सुबोध का टेलीफोन भाया है । सुबोध उठकर साथ मे लगे आफिस के कमरे में चला गया । दिवाकर ने पहली बार भरपूर निगाहों से नीता को ताका । नीता अस्त व्यस्त मी कोच पर पडी थी । गाल पर सुबोध की उंगलियों की छाप उभर आई पौ । गोलों पर आंसुओ का खार स्पष्ट उभर भाया था। आखों में शेष गम धीमे धीमे पिघल रहा था । एक हल्की सी भार हीनता उसके मुखड़े पर शनैः शनैः उतर रही थी । दिवाकर ने पहिली बार यह अनुभव किया कि नीता तो वास्तव में प्रेम करने के ही लायक है । क्या देह यष्टि है । सुडौल काया, कही भी उसमें दोप नहीं। रंग अवश्य हल्का गंदमी, परन्तु नाक-नक्श तोसे । चेहरे पर मृदुलता । अंगों में एक तीखी मैक्स अपील । आज पहिली बार वह इस प्रकार नीता को देख रहा था । फिर स्वयं ग्लानि के अहसास से दब उठा। उसने धीरे से अपनी निगाहों को फिरा लिया। नीता अपने विचार प्रवाह मे निमग्न थी। उसे इस बात का पता तक नहीं था कि दिवाकर आज उसे अन्य प्रकार की निगाहों से ताक रहा है। दिवाकर ने जो फिर चोरी से देश के मन में कहीं-बहुत गहरा दबा हुआ जानवर जाग रहाँ यौ। इस जानवर के अंश प्रत्येक में होते हैं, किन्तु कुछ लोग अपने संस्कार व संयम से उसे अपने अन्दर मला देते हैं और कुछ उसके उमी रूप में कुआरी सलीब 0 २३ । . हूँ अमना रूप प्राप्त कर लेते हैं । दिवाकर ने यही किया था। वह अपने दानव पर अपने सस्कार व सयम से विजय पा रहा था, किन्तु आज जमे वह दानव नीता की चुटकी से जाग रहा है। वह अपने को शिक्षारता भी जाता था देखता भी जाता था । अपने को बहुत रोकना चाहता था परन्तु वह अपनी उस दुदंगनीय लालसा का क्या करे जो शायद कभी कॉलेज में नीता के लिए अनजाने में जागी हो। पास यह नीता की तुलना गीता से कर रहा था। गीता जहा सागर के समान गहरी थी तो नीता चचरा नदी। हालांकि गीता का रंग और उसका मुष नीता से कहीं अधिक सुन्दर और मुखर था । उमकी देह यष्टि में भी कही दोप न था, किन्तु उसके व्यवहार मे, अग प्रदर्शन मे सैक्स को वह सुलो चुनौती नहीं थी जो नीता में थी। गीता ने बनना मवरना कभी न जाना। मामान्य मा पहिनावा, नित्य प्रति का एक ही हेपर स्टाइल जवकि नीता हर हफो अपना स्टाइल बदलती थी। दोनों ही बड़े शहरों में पली व बढ़ी थी. परन्तु दोनो के रहन-सहन व विचारो मे जमीन-आममान का अन्तर। इसीलिए तो दिवाकर ने पहिली ही दृष्टि में गीता को पसंद कर लिया था। यदि कभी वह उसे सजने संवरने के लिये कहता या जिद करता तो वह अपने बालों को खुला छोड देती और अधिक माधारण पहिनावा कर डालनी और झंझला कर कहती कि यह लो यह मेरा मूल केशविन्यास है । तब वह उमे और अच्छी लगने लगती। नीता शायद पिछले दिनो से अपने को बदलने का प्रयास कर रही थी। सामान्य सी एक चोटी जिसमें कोई रगीन रिवन आदि नहीं, हल्के रंग की धोती। कोई पाउडर की तह या लिपिस्टिक आदि नहीं । सामान्य पहिनावा, परन्तु उसमे भी उमकी शैली अलग । कपडे सामान्य पर टाइट | धोती मामान्य पर कमर पर इम प्रकार बांधी गई कि नितम्बों का उभार साफ दिखे । आनल इस प्रकार डाला हुआ कि उरोज का अभार साफ भालके । ऊपर से बदली नीता अन्दर से मानो अपनी ओरिजिनालटी मे ही व्यस्त । यदि नीता को किसी बात से उसे बिड़ थी तो उसके दिखावे से। नीता ने करवट बदल कर जो देखा तो दिवाकर को अपनी ओर देखते हुए पाया। यू यह तो नहीं था कि दिवाकर यहा आंखों पर पट्टी बांध कर आता हो, परन्तु वह कभी भी नीता को ओर भर कर नहीं देखता था। बात करता था, वह कता था, वहसे करता किन्तु मिवाय इसके कि क्यों नीता.जी-यो नीता जी के अलावा वह और कुछ नहीं कहता था नीता से। आज जैसे वह आखों ही आँखों मे नीता को जाना चाहता था। नीता ने भी इमे अनुभव किया किन्तु वह भी पूर्व की भांति अपने आप मे सिमटी नहीं । २४ कुआगे सलीव पहले यदा-कदा एक या दो बार ऐसा हुआ भी तो वह स्वयं सिमटमी जाती थी और यदि कभी नीता ने दिवाकर को इस प्रकार कभी देखा था तो दिवाकर अपने आप मे सिमटसा जाता था। फिर आंखों में ही अपनी गलती की क्षमा हो जाती थी। लेकिन नीता आज चाहती थी कि दिवाकर उसे आंखों से ही पी डाले । हालांकि वह जानती थी कि दिवाकर और सुबोध मे, सुबोध ही अधिक मौदर्य का अधिकारी है । वह लम्बा, भग पूरा युवक है । उसका रग दिवाकर से कही अधिक साफ है। दिवाकर लम्बा अवश्य है, परन्तु उमकी देह यष्टि दुबली है चेहरे पर अनिरिक्त स्वास्थ्य की एक दृढता और जो लुनाई है वह सुबोध में नहीं। यही अन्तर है दोनो मे। सुवोध को आंखो में और दिवाकर की आखो मे भी अंतर है । सुबोध की आखें कभी किमी स्थान पर स्थिर नहीं रहती । उनमें एक शैतानी, एक चचलता हमेशा तैरती रहती है, उसकी आखे हमेशा मे कुछ टटोलनी रहती है। दिवाकर की आखें शात, गहरी काली झील सी जिनमे जिज्ञासा की भूख हमेशा बलवती रहती है। सुबोध हमेशा कहा करता था दिबू यदि किसी प्रकार की सम्पदा तुम्हारे पास है तो वह है तुम्हारा यह मुखडा और इस मुखडे में तुम्हारी ये आखे । वह नीता से हमेशा कहता था- नीता इस मेरे यार के पास जो आखें हैं उनसे बचकर रहना । यह गीता जैमी सुन्दरी को आंखों के जाल में बाध लाया है । नीता शरारत पूर्ण अदा के साथ चहकती- ओहो, देखे तुम्हारे मित्र, इनकी जैसी सैकड़ो आंखें तो मेरे जूड़े मे जड़ी रहती हैं। फिर तीनो हो... हो करके बेतहाशा हस पड़ते । नीता भी दिवाकर की आखो में आज झांकते हुए यही सोच रही थी। शायद मुझे इनकी आखों ने ही बांध लिया है। वह भी मानों दिवाकर को आंखों से पी जाना चाहती थी। आज वह शायद उसे सचमुच में ही दिल दे बैठी थी। किन्तु उसके हृदय की अमीम गहराइयो में कही सुबोध अडा बैठा था। मुबोध के कदम कमरे की ओर आते सुनाई दिये । वह अब बहुत कुछ नॉर्मल हो गया था | उसके सर से मानो वह भार उतर गया जिसे वह पिछले तीन चार माहों से ढोता चला आ रहा था । आते ही बोला- नीता हम अपनी राम कहानी फिर सुनाते रहेगे। पहले इस बेचारे दिबू के पेट का तो व्याल करो। हमने तो चाय पी ली है, लेकिन इसे तो अभी पानी तक मयस्सर नहीं हुआ है। कुंआरी मलीन 0 २५ दिवाकर भी मानौं सोने में जाग उठा । उसने अपने वंग पर हाप रमा तो उममें रखा हुआ टिफिन करियर उमने महगूम कर लिया। वह बोला- नीता जी पाना बनाने का तकल्लुफ न करना, खाना मेरे माप है। रह याना में अपने विचार प्रवाह में ऐमा बहता रहा कि उमे गाने की मुधि ही न रही । सुबोध बोला-भाई दिवू, तुम आ गए हो तो गर्म गाना तो मिल जाने दो। नीता जाते-जाते क गई। पृक शब्दों में बोली- तो गोया कि अब तक मैंने आपको ठण्डा और ठे स्वाद खाना ही खिलाया है। आप व्यंग्य करने के स्थान पर साफ बात क्यों नहीं करते । इस प्रकार चुटकियां क्यों ले रहे हैं। दिवाकर ने सोचा- लो मेल फिर विगः गया। मुबोध का अब फिर मूड ऑफ हो जावेगा, किन्तु ऐसा नहीं हुआ। सुबोध ने जाती हुई नीता का पल्लू थाम लिया और बडी ही मंजीदगी से बोला- यह ठीक है कि मैं तुम्हारे लिए गायद इन दिनों अच्छा न लगा होऊ, लेकिन क्या यह गलत है कि विगत तीन माहो मे जीवन हमने जिया है वह एक सामान्य जीवन था? नीता ने अपना पल्ला छुड़ाते हुए कहा- तो जनाब इसमें मेरा धपा दोष । आप स्वयं ही समय पर खाना न खायें तो इसमें मेरा क्या दोष । समझौता सा करते हुए मुबोध बोला- अन्धा दोप मेरा ही पही नीतू लेकिन क्या कभी मैंने तुमसे यह कहा था कि तुम अपने आप को इस प्रकार बदल डालो कि हमारा जीवन महज एक बोझ बन कर रह जाय । मेरे अकेले का ही दोप था क्या? कभी मुझे नॉर्मल करने का प्रयाम तुमने किया । नीता ने जाते जाते कहा- शायद मैं खुद बड़ी नॉर्मल थी। दोनो मित्रो ने आपस में एक दूसरे को देखा और फिर चुपचाप अलग- अलग दिशाओ मे देखने लगे। नीता जो किसी कारण वश उस कमरे में लौट कर आई थी तो दिवाकर को ख्याल माया कि खाना अभी बैग में ही है। उसने टिफिन कैरियर नीता की ओर बढ़ा दिया । सुबोध ने जब यह देखा तो उसने नीता से कहा- इसे भी ले जाओ। गर्म कर लेना और अब तुम खाना क्या बना पाओगी। श्यामा को भेजकर होटल से खाना मंगवा लो। नीता बोली- शायद आप अब भी यही चाहते हैं कि पिछले दिनों की पुनरावृत्ति हो। २६ 0 कुंआरी सलीब सुबोध ठण्डे लहजे में बोला- तुम्हें शायद परेशानी हो ? नीता का तीखा उत्तर था- मै तो शायद अपने आपको नॉर्मल कर सकू परन्तु लगता है आप न तो स्वयं नॉर्मल होगे और न मुझे ही नॉर्मल होने देंगे। मुबोध शांत स्वर मे बोला- जैमा तुम चाहो। मुझे तो तुम्हारा ख्याल था। नीता विना उत्तर दिये तुनक कर चली गई। थोड़ा रुक कर सुवोध भी अदर चला गया। आयद समझौते के आमार नजर आ रहे थे। दिवाकर को अपने मन पर से एक बोझ मा उतरना अनुभव हुभा । उसे लगा कि शायद उमका आना सार्थक हुआ। भोजन करते समय सुवोध प्रसन्न नजर आ रहा था । नीता भी हौले-हौले मुस्करा उठती थी। बार-बार उमका हाथ उस कपोल पर चला जाता था, जहां कुछ घटे पूर्व सुबोध के हिंस पुरुप ने अपनी छाप छोडी थी। सुबोध इस बात को बहुत देर से नोट कर रहा था अंत में वह बोला- नीतू क्या चाटा बहुत जोर का पड गया नीता ने शरारत पूर्ण स्वर में कहा- नही जी वह तो फूल सा लगा था। 'सुबोध ने अपना दोप स्वीकारते हुए कहा- नीतू मै भावावेश में आकर ऐसा कर बैठा था, आशा है तुम इसे भुलाने का प्रयास करोगी । नीता ने शांत वाणी में कहा- सुवोध, औरत तो हिन्दुस्तान मे पैदा ही इसलिए होती है कि वह सब कुछ भूलती चली जाय । यहां तक कि वह अपने अस्तित्व को भी भूल जाय कि वह क्या थी ? और पुरुष हमेशा यह याद रखे कि वह है, उसका अस्तित्व है, वही सर्वेसर्वा है। यह रोप में नहीं कह रही। यह एक हकीकत है कि वह जब तक अपने आपको भूल नही जायेगी । वह अपने आप में सार्थक न होगी, लेकिन भूलने की क्रिया मे, उसे मैं समझती हूं न जाने कितनी सीढियां, कितने जन्म पार करने होगे। आसिर उसका भूलना हर उस पुरप के साथ तो नही हो सकता, जिसे वह अपनाती है। हो सकता है वह इस जन्म में जिसे अपना रही है, वह उसका वह पुरुप न हो जिसमें उसे आत्मसात होना है। उसे तो जन्म जन्म यह खोज करनी पड़ेगी। चाहे भारत में नारी कितनी ही स्वतन्त्र हो जाय वह अपने भोलेपन से हर बार ठगी जाती है। फिर भारत ही क्यो नारी तो सभी स्थानों पर पूजाई होने के बाद भी मातृत्व की मजबूरी के कारण ठगी जायेगी। उसे जन्म-जन्म मे यह खोज करनी पड़ेगी कि उसका अभीष्ट पुरुष कौनसा है ? कुआरीमलीव ० २७ थोड़ी देर हा कर एक गूढ दृष्टि उमने दोनो पुरुपों पर डागी ओ आश्चर्य से पृह फाडे उसकी बाते सुन रहे थे । उमने एक एक चपाती उनकी थालियो मे और डालकर उन्हे चेताया कि खाना भी माना है। फिर एक दीर्घ स्वाम लेकर आगे उसने कहा- कभी कभी उसे अभीष्ट पुरुप तब मिलता है जय वह किसी और का चुनाव कर चुकी होती है। इसे सुनकर दोनो मित्र एक साथ चौके । उसने धागे कहा- लेकिन यदि वह नारी है तो उसे सब कुछ सहते हुए, एक लम्बी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी और क्या पता यह क्रिया फिर फिर दुहराती रहे। मुबी, मैं तो दोपों से परिपूर्ण एक अधूरो नारी हूं तुम मुझे भूलने के लिए कहन हो तो शायद बहुत कुछ भूल जाना चाहती हूं किन्तु क्या करू', मैं शायद ऐमा न भी कर पाऊँ । नारी का दूसरा रूप विकृति भी है जो ईर्ष्या, द्वैप, क्रोध और युद्ध बनकर पुरुप में फूट उठतो है । मैं तो यही समझती हूं कि शायद नारी न होती तो पुरुष मात्र में इतना विद्वप भी न पनपता । फिर वह थकी सी निढाल होकर कुसौं की पीठ से लग गई दोनों मित्र कुछ देर तक शात भोजन करते रहे। फिर सुवोध बोला- नीतू आज मैंने जो रूप तुम्हारा देखा है। उसने मुझे बहुत प्रभावित किया है। आज की यह पोमांमक नीतू अब तक कहां थी ? नीता ने आखें बद किए हुए ही कहा, नौता कहां नहीं थी हर जगह थी। महज उसके अन्वेपक नहीं थे और अनायास हो उमके मुख से निकल पड़ा- जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ और इसे पूरा किया अचानक दिवाकर ने ही वोरी डूबन डरी, रही किनारे बंठ । नीता झटके से जैसे जाग उठी हो ऐमे चौंको । सुबोध मुस्कग भर दिया। दिवाकर आखिरी निवाला निगलते हुए बोला- नीना जी तुमने बात कही लेकिन वह अधूरी है। तुम्हारी बातें एकतरफा ही रही पुरुप यदि यह कहै कि वह स्वयं नारी में आत्मसात होने का उपक्रम करता है तो यह गलत न होगा, लेकिन हां मैं दूसरे जन्मों की बात नहीं जानता उसे तो इसी जीवन में यह सब भोगना पड़ता है । यह यदि अपनी नारी में विलीन होने की बात नहीं सोच पाता तो स्वयं में जीवित ही कहा है ? तुम्हारा यह आरोप कि पुरुष अपने 'मैं' मे डूबा हुआ दम्भी प्राणी है तो यह शायद तुम्हारी भूल हो । उसे भी तो अपने को बहुत कुछ बदलना पड़ता है फिर जीवन्त संघर्ष को भोगने का श्रेय तो पुरुष को ही मिलता है में २८० कुंआरी सलीम ..
विदेशों की बात नहीं जानना परन्तु अपने देश की बात जानता हूं कि यहां यदि मारी पुरुप रूपी मशीन का ईधन है तो पुरुष घटने वाली मशीन । जो अपने पुर्ज दिन रात घिमता हुआ प्रत में नष्ट हो जाता है। फिर हम विदेशों को भी क्यों छोड़े । मुझे तो सभी स्थानो पर पुरुषों का सक्रिय आधिक्य नजर आता है । नीता ने शात स्वर में कहा-यही तो आपका दम्भ है। यदि नारी इम मसार के रजत पट पर कही नहीं है तो क्या हुआ, वह तो पुरुष के अणु अणु में ध्याप्त होकर उसे चला रही है । सुवोध ने बहुत ही धीरे से कहा- दिवू, नीतू- यह सब मैं तुम्हारी बहसों से बकवाम समझने लगा हूं। केवल सहयोगी समझौते की भावना का ही अस्तित्व है । अन्यथा बाकी सब जड़ है, यह चेतन नहीं । नीता ने उठते उठते कहा- अपने अपने विचार है । अपने अपने रास्ते है । उमने श्यामा को घुलाकर कहा- ये यतंन ले जाओ । महरी से कहना कि साझ को भले हो न भागे । अब तुम भी जा सकते हो। सुबोध हाथ साफ करते हुए बोला- अच्छा दिबू में थोडा बाजार तक हो भाऊ । एक पार्टी से बातें करनी हैं। अभी थोडी देर पहिले उनका टेलीफोन भी प्राया था, किन्तु उम पर पूरी पाते हो नहीं सकी थी। दिवाकर अकेला यहां रुकना नहीं चाहता था । अपनी वार्ता के दौरान जैसे नीता ने अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया था। वह बोला- यदि हर्ज न हो तो मैं भी तुम्हारे साथ चानू। सुबोध ने उसका कन्धा थामकर बडो संजीदगी से कहा- नीता से घबरा रहे हो। मुझे देखो मैंने कितना भोगा है और सचमुच जब भरपूर निगाहो से दिवाकर ने सुबोध को देखा तो उसने पाया कि उसकी आखों के नीचे काले घेरे साफ नजर आ रहे थे। वह कुछ बोल न सका । सुबोध ने ही फिर कहा- रात्रि को ही मैं अब मद बयान करूंगा। मेरी ओर से शंका न करना। तुम मेरे दिल के आईने में वेदाग हो और यह कहकर बडो तेजी से चला गया। उमके बाद नीता आई और सुबोध को वहा न पाकर बोनी-क्या चले गए? दिवाकर ने कहा- हा किसी पार्टी से बात करनी थी। नीता ने केवल अच्छा कहा । दिधाकर और वह बहुत देर तक शांत बैठे रहे। दिवाकर क्या बात करे । उराको यह समझ में नहीं आ रहा था। फिर जब उसे और कुछ न सूझा तो उसने कुमारी सलीब ०२६ उचित समझा कि वह नीता का पत्र वापिस कर दे। एक औरत के लिए उसके प्रेम पन्न लोटा देना जहा एक ओर अपराध है, यहा दूसरी और पवित्र कार्य भी । जिसमें विवाहित नारी का पत्र रखने का तो उसे पतई अधिकार नहीं है। ऐसा विचार कर उसने पत्र अपनी जेब से निकाला और नीता के सामने रप दिया। पन देखकर नीता चौंकी । उसने निरीह आंखो से दिवाकर को देया फिर वह अपने में सिमटती सी बोली- दिवू, मुझे राह बताओ मैं या करूं? यह उच्चारण दिवाकर को वडा अटपटा लगा । इतनी आत्मीयता से यह कहा गया पा कि दिवाकर अचकचा गया । यह परम्पराओ से हट कर था । आज तक नीता ने उसे इस प्रकार से सम्बोधित नहीं किया था। फिर भी उसे उत्तर तो देना ही था। अपने अन्दर बिखरते साहस को उसने बटोरा और बोला नीता तुम्हें क्या हो गया है ? क्या तुम सुधी से ऊब गमी हो या सुधी तुम पर अधिक अत्याचार करता है ? नीता का थरथराता स्वर केवल इतना ही कह पाया- ऐसा नहीं है । फिर क्या है ? दिवाकर बोला- फिर क्यों तुम दोनो मे यह दीवार खड़ी हुई, इस प्रकार का अटपटा पन तुमने क्यो लिखा। सोचो जरा यदि किसी प्रकार यह पत्र गीता को मिल जाता तो क्या होता ? वह मया सोचता ? क्या मेरी हरी. भरी गृहस्थी के लिए यह विगारी सावित न होता। नीता ने अपराधिनी के समान सकपकाते हुए कहा- दिबू मैंने सब कुछ सोचा था, लेकिन स्थिति बहुत ही बदतर होती जा रही थी । यदि तुम प्राज भी न आते तो शायद हम में से कोई एक ही तुम्हे जिन्दा मिलता । यह सुनकर तो दिवाकर को साप मा सूघ गया। वह ठगा सा नीता को देखता रहा। नीता ने ही फिर कहा- मैंने केवल उनसे इतना ही एक बार बातचीत के दौरान कहा था कि आपके मित्र दिवाकर महोदय मुझे बढ़े अच्छे लगते हैं। देखिए, वे न नशा करते है न किसी प्रकार का फैशन । यह बात आई गई हो गई लेकिन उनमें कही शंका का बीज बो गई और मुझ मे अचानकही परिवर्तन हो गया। मैं अपने को सामान्य करने लगी। सभी श्रृगार की वस्तुएं क्रमशः छोड़ने लगी। कभी तुम्हारी याद भर मुझे पाती थी कि तुम कितने अच्छे हो । कही भी तो प्रेम हो ऐमा मुझे नहीं लगता, पर नही यह मेरी भूल थी। वे अपने आप मे, मुझमे परि- वर्तन देखकर सिमटते चले गए और मुझमे तुम्हें चाहने की इच्छा उतनी ही तीव्रतर होती गई। सुबी मे कोई कमी हो या वह मुझसे कोई प्रेम न करता हो, ऐसा कही भी तो मुझे नहीं लगता । परन्तु अपने में हो रहे परिवर्तन का मैं क्या करू? वे ३० 0 कुआरी सलोव इसे देखते थे और जलते थे । जब कभी मैं फैशन के अनुमार अपने को मजा लेती यह मुस्कराते लेकिन फिर मुझे लगता कि उनकी मुस्कान में तुम मुझ पर हम रहे हो। मैं फिर वही दूसरा जीवन जीने लगती और वे वुझ से जाते । नीता ने लम्बी श्वांस खीच कर चुप्पी माध ली। दिवाकर सोच में डूब गया । आखिर इन छोटी छोटी बातो से जीवन में कडवाहट इस प्रकार क्यों भर जाती है ? उसे स्पष्ट लग रहा था कि न इसमे नीता का दोप है न सुबोध का और न उसका अपना । प्रत्येक में सोई हुई भावनाये होती है जो समय पाकर बलवती हो उठती है। उनका ममय पर शमन न हो सके तो परिवार इस उठ रही लपट में अवश्य झुलम जायेगा । नीता ने लम्बी स्वास भर कर कहा- क्या सोच रहे हो ? मुझे बताओ न आखिर इस सब का क्या परिणाम होगा ? क्या सुवी इसी तरह घुटते रहेगे ? दिवाकर ने एक लम्बी श्वांस ली और थके-थके अंदाज मे बोला- नीनू गलती तुम्हारी है । तुम्हें यदि बदलना ही था तो पहले सुबी से प्रारम्भ करती। मेरा रूप तो तुम सुबी में भी पा सकती थी। नीता ने एक माह भर कर कहा- मैं उन्हें क्या बदलती, उन्होने स्वय अपने आपको बदलने का भारी प्रयत्न किया । चाय छोड़ी, शराब छोड़ी, सिगरेट छोडी, परन्तु जब वे सारी मारी रात इनकी कमी मे कराहते रहते तो मेरे प्रदर की नारी कहाँ चली जाती। मैं स्वयं साकी बनती और उन्हे जबरदस्ती ढाल ढाल कर पिलाती । कुछ दिन खुशिया आती और फिर मुझ पर अपने को बदलने का, तुम्हारे अनुरूप ढालने का भूत सवार हो जाता । आखिर ऐसा क्यों होता था? मैं स्वयं नहीं जानती थी। बस एक दुर्द मनीय भावना मुझ मे ऐंठती रहती थी- कि आखिर इन्ही को एक थाली मे खाने वाले दिवाकर हैं फिर ये वैसे क्यों नहीं ? मैं ही वैसा बन सकती है तो वनू और फिर अपने को बदलने बैठ जाती। यह हम दोनों में गोत-युद्ध चल रहा है । जो बराबर हम दोनो को खाए जा रहा है । दिवाकर इसका क्या उत्तर दे । उमको तो यह अनुभव ही नहीं था कि कोई किसी की शादगी से ही प्रभावित होकर उमसे प्रेम कर सकता है जब कि वह पहले इस प्रकार की सादगी से नफरत करता रहा हो । उसने एक ही निष्कर्ष निकाला कि या तो ये लोग अपनी इस दिखावे की भावना से ऊब जाते है या फिर नीता के हृदय में कहीं गहरे में दिवाकर बैठा है। इस विधार मात्र में ही यह कोप भारी मनीष 0.
उठा। यदि ऐसा है तो अब तक वह अपने मित्र के प्रति अत्याचार करता रहा है। उसे उनके रास्ते से हटना होगा। शायद उसे इसके लिए अपनी अब तक अजित सम्पूर्ण सम्पदा की आहुति भी देनी पड़ जाय । उसे विचारो मे इवा देख कर नीता बोली- दिबू, अब लगता है पानी सर मे गुजरने वाला है। यह सुनकर ही दिवाकर कांप उठा । उमने नीता की आंखो मे झांका तो पहा उसे अपने लिए सम्पूर्ण समर्पण के भाव दिखाई दिए । जिन्हें देखकर वह और अधिक सकपका उठा । अब क्या करे वह । वह उत्तेजना में उठकर टहलने लगा। नीता उसका इस प्रकार टहलना देखकर बोली- तुम बस सुन भर रहे हो । कहते कुछ नहीं। उसने दिवाकर का हाथ पकड लिया और अपने ही सोफे पर उसे बिठा लिया। यह सब इतनी तेजी के साथ हुआ कि दिवाकर कुछ कर भी न सका । वह केवल काप कर रह गया। उसके माथे पर पसीने की बून्द्र झलक आई । नीता को पता नही जाने क्या सूझा कि उसने अपना सर दिवाकर के कधे से लगा दिया और फिर धीरे धीरे सुबक उठी। सुबकते सुबकते ही कहने लगी- तुम... मेरी... हरी... भरी गृहस्थी मे क्यों आए? दिवाकर क्या कहे। उसके सर पर हाथ फिराता रहा । वर एक दम मशीन के समान जड था, केवल हाथ भर चल रहा था। यदि उसके शरीर या मन में कही कोई चेतना थी तो इतनी ही कि यह जो कुछ हो रहा है, गलत हो रहा है परन्तु उसमे इतनी चेतना नही थी कि वह यहा से परे हट जाय । तभी नीता बोली- (उसके सुबकने के ज्वार में स्थिरता आ रही थी) मैं तुम्हारे जीवन में गीता बन कर पहले क्यो नही पाई । काश, और उसने एक लम्बी श्वांस खीची। गीता के नाम ने ही चमत्कार किया। दिवाकर को जैसे अंगारा छू गया हो । वह तडपकर उठा और एक ओर खडा हो गया, फिर कुछ ऋद्ध निगाहों से नीता को घूरकर बोला-नीता होश मे आओ । तुम मेरे मित्र को पनि हो । आखिर न तो तुम्हे और न मुझे यह शोभा देता है । मुबोध को सम्हालना तुम्हारा फर्ज है। नीता ने बडी निरीह निगाहो से उसे देखा जैसे वह उनसे क्षमा माग रही हो और फिर वह रुलाई न रोक पाने के कारण प्रदर शयन कक्ष मै भाग गई। बाहर बैठे दिवाकर को बस नीता की सुवकिया ही सुबकिया अपने चारो और यिनरती सुनाई पड़ रही थी। ३२. कुमारी सलीय ४ संध्या के लगभग सुबोध लोटा । अधेरा हो चुका था, लेकिन ड्राइङ्ग रूम मे अभी रोशनी नहीं की गई थी। उसके हृदय मे शंका ने सर उठाया पर बह वही थम गया। उसे दिवाकर पर विश्वास था । वह हर परिस्थिति में उसे परख कर देख चुका था कि वह खरा कंचन है। उसने ड्राइङ्ग रूम मे आकर आहिस्ते से रोशनी की तो दिवाकर मानो सोते से जागा। सुवोध ने देखा कि ड्राइङ्ग स्म मे दिवाकर एकाकी अधेरै मे छत को घूर रहा था उसने नौता के लिए पूछा तो दिवाकर ने वंडरूम की ओर इशारा कर दिया । सुबोध बिना एक भी शब्द बोले बैडरूम में चला गया रोशनी को तो देखा नीता रोते रोते सो गई है । तकिए का एक भाग आसुओ से भीगा हुआ है । वह बहुत ही हल्के कदमो से शहर आ गया। दिवाकर की ओर देख कर सुबोध बोला- बस दिबू में पिछले कई महीनो से यही भोग रहा है। क्या करूं समझ में नहीं आता। दिवाकर ने एक लम्बी साम ली। दोनो मित्र एक दूसरे को काफी देर तक आपस मे उलझी निगाहों से घूरते रहे। फिर एक निश्चय सा कर दिवाकर उठा । बैडरूम के बाहर से ही वह बोला नीता जी- नीता जी। नीता ने एक करवट बदलो। फिर आखों पर रोशनी पडने से आखें खोल दी। बाहर सुबोध को आया जान तेजी से उठी और बिना बोले ही तेजी से गुमल में चली गई। नीता के जगाने के बाद दिवाकर बोला- मुवी, मैं मारी स्थिति से वाकिफ हो ही चुका हूं। अब मुझे चलने की आज्ञा दो। जो भी बम या ट्रेन उपलब्ध होगी मैं उसी से चला जाऊंगा। कुंआरी सलीब ०३३ सुबोध ने पीक कर कहा- मा कहते हो ? अभी चले आओगे दिदू । मुझे इस प्रकार अधर में लटका छोड़कर । वह कुछ देर चुप रहा और फिर बोला- हा दिव तुम मेरे साथ आखिर कब तक रह सकते हो। दिवाकर उसके आतुर कण्ठ को सुनकर सकपका गया। आखिर वह क्या करे ? उसका यही रहना नीता को और अधिक अव्यवस्थित कर देगा। हालांकि सुबोध अधिकाधिक नॉर्मल हो जायेगा । फिर उसको भी तो अपनी जिम्मेदारियां हैं। चुप देखकर सुबोध बोला-दिवू ठीक है चले जाना। शनि वाली गाडी ही अब तुम्हें मिलेगी। तब तक तो यहा बैठो। हम कुछ तो इस समस्या पर मोचें । आखिर कोई तो हल होगा। नीता गुमल से ताजा होकर आई थी। उसके चेहरे पर ताजगी की चमक विद्यमान थी। उसने सुबोध की ओर मुखातिब होकर पूछा- क्या खाने का प्रबंध करू । श्यामा को तो साझ को आने को मना कर दिया है, महरी भी नहीं पायेगी। यह उन दोनो का नियम था कि रविवार के दिन दोनों नौकरी को वे अवकाश देते थे और उस दिन या तो नीता स्वयं खाना तैयार करती थी या होटल से मगाया जाता था। किन्तु विगत माहों से उनमे जो तनाव भा गया था, उसके कारण दोनों नौकरों को सुबोध रविवार को भी रोक रहा था । आज नीता का मूड बदल जाने के कारण उन दोनों को कई माह बाद रविवार का आधा अवकाश मिल पाया था। नीता की बात सुनकर सुबोध ने दिवाकर की ओर ताका । दिवाकर ने कहा- सुबोध मैं तो खाना खाऊंगा नहीं। अभी अभी कुछ घंटे पहिले हो पाया है। सुबोध ने भी यही उत्तर दिया, परन्तु वह नीता यह पूछना न भूला कि वह भी खायेगी या नहीं। नीता ने वास्तविक मुस्कान के साथ कहा- जैसा दोनो श्रीमान् चाहे । तो की गुलाम हूं। यदि पह बात उमने मुस्करा कर न कही होती तो शायद फिर से तनाव पैदा हो जाता । सुबोध ने यह सुना तो मुस्करा दिया और बोला नीनू क्या तुम्हारा पैट हमारे पेट के भरे रहने से ही भरा रहेगा। नीता ने फिर मुस्करा कर उत्तर दिया- नहीं यह तो नहीं कहती, परन्तु भूटी भूम ती मंक्रामक होती है। एक साथी को लगे तो दूसरे को भी लग आती है। दोनो साथी मुस्करा पहे। ३४०भारी सलीर मैं दूर से बडी हल्की टेलीफोन की घंटी को आवाज आ रही थी। नीता ने उसे सुना तो वह बोली- जाइये आपका टेलीपोन आपको पुकार रहा है। सुबोध चला गया। नीता दिवाकर की ओर एक प्रश्न सूचक चितवन डाल कर चली गई। सुवोध वही से चिल्ला रहा था- नौतू...नीतू यह तुम्हारी सहेली, तुम्हें बुला रही है। यह आवाज नीता तक पहुंचना मुश्किल था । वह अन्दर के कमरे मे थी और ऑफिम काफी दूर था । दिवाकर ने ही नीता को बुलाना उचित समझा । वह मंदर पहुंचा तो देखा कि नीता श्रृंगार मेज के सामने बैठी है। उसने इस समय पेटीकोट व ब्लाउज ही पहन रखा था इस अवस्था में वह उसके नजदीक नहीं जाना चाहता था। उसने पीछे हटने का उपक्रम किया तब तक शीशे मे नीता उसे देख चुकी थी। रिवाल्विंग चेयर को धुमाकर उमने पूछा- "कहिए" यह कहिए बहुत ही अदा के साथ कहा गया था। दिवाकर सकपका उठा। जल्दी से बोला- तुम्हारा फोन आया है । और बड़ी तेजी से मुड़कर चला पाया । नीता की हसी रजत घण्टिका मी खित पड़ी। नीता फोन अटेण्ड करके आई तो चहक रही थी। सुबोध से बोली- यदि आप लोग फील न करें तो मैं लेट शो मे मिसेज घोप के साथ चली जाऊ। मुबोध ने हंसकर कहा- मैं आपको आजादू । मेरो तो खुशी का ठिकाना नहीं है कि आप खुश होकर आज कम से कम शो में जाने की पूछ रही है । नीता के चेहरे पर यह सुनकर विषाद को एक हल्को लहर पल भर को आई पर फिर वह मुस्करा कर बोली- चलिए आपको खुशी तो हुई और वह तेजी से अपने शृंगार कक्ष में चली गई। सुबोध ने एक लम्बी सास खीच कर कहा- चलो बला टली। इसका पता नहीं चलता कि यह कब पल में तोला और पल मे माशा हो जाय । दिवाकर ने भी निवृत्ति की मांस खीच कर कहा- चलो इम प्रतगल में तुम कुछ कह तो सकोगे । वरना नीता के रहते हुए यह सम्भव ही नहीं था। सुवोध बोला- अरे नहीं, मैं इस स्थिति पर पहिले ही विचार कर चुका था। हम ही यहां मे शो का बहाना करके चलते । और नीता साथ जाने को कहती तो- दिवाकर ने शा प्रकट की। कुआरी सलीय ०५ फिर जो होता सो देखा जाता पार | मुबोध में उल्लाम लौट रहा था। शायद यह नीता के परिवर्तन का परिणाम था। नीता जब सज-धज कर निकली तब पुरानी आदत फे अनुसार हिपटॉप थी। चुस्त स्लीवलेस ब्लाउज, भड़कीले लाल रंग की कांजीवरम की साड़ी, इसी रग के जूते और मेकअप का मैचिंग कलर भी यही । गुवोध उसे देखकर फहक उठा और अनायास ही उमके मुह से निकला- वाह । मीता एक मम्त चितवन डालकर मस्त चाल से चली गई। दिवाकर पल में तोला और पल में माशा सुन्दरी को जाता देखता रहा और अचानक ही कह उठा। वो चले गए कयामत इन कर- पता नही कितने अब फना होंगे। सुबोध ने दिवाकर को ऐसे देखा-जैसे वह किसी अपरिचित को देख रहा हो । उसने बहुत दिनों बाद यह शेर उसके मुह मे मुना था। वह कॉलेज में भी अक्सर मुबोध और नीता को माथ-साथ देख कर इसे पढ़ा करता था। तत्र वह मुह विचका कर कहता था। आज जैसे वह कहीं विंध गया हो, इम - वे दोनो बहुत देर तक चुपचाप बैठे रहे। सोचते रहे क्या कहें ? अंत में दिवाकर ने ही वात प्रारम्भ करने के लिए पूछा- अच्छा मुनी यह बताओ कि तुमने मुझे पर क्यो नहीं सिम्बे ? जो कुछ यहा हो रहा था, उसमे में अवगत की होता यदि यहां न माता तो। यह नीता के पत्र की बात साफ झुपा गया । मुबोध उसे गिरोह पूर्वक देखता रहा। उसने कुछ कहा नही वह उठा और एक ओर रखी टोकरी उठा लाया फिर उसे फर्श पर उलट दिया। दिवाकर ने देखा कि वहा फटे हुए पत्रो के अनगिनत टुकड़ों का ढेर लग गया है । उसे समझने में देर न लगी कि वह परिस्थिति पर पत्र लिखे जाते रहे हैं किन्तु वे मन स्थिति के ठीक न रहने के कारण डाले न जा सके वरत फाड़े जाते रहे। सुबोध ने दिवाकर की आखों में झाक कर कहा- देख लिया । दिवाकर यहुत देर तक उस ढेर को घूरता रहा फिर सहमें शब्दों में बोला- मुत्री क्या तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं था कि मैं तुम्हारे गलत मे गलत पत्र को भी पाकर तुम्हारे पास न आता या तुमसे कट कर अलग हो जाता। ३६ कुमारी मलीब सुबोध ने बहुत ही मंद स्वर में कहा, जैसे इतना सब बोलने के लिए वह साहस जुटा रहा हो, मैंने यह तो नही कहा । दिवाकर ने बात आगे बढ़ाई-फिर क्या बात थी कि तुमने मुझे दो पंक्ति भी न लिख कर भेजी। सुबोध ने जमीन की ओर ताकते हुए कहा- मैं तुम्हें कैसे लिखता । जब स्वयं अपने पर ही विश्वामहीनता की दशा मे था, तब क्या यह आवश्यक नहीं था कि मैं तुम पर भी अविश्वास न करता । दिबू, तुम धया जानो मैं इन तीन माहो मे क्या क्या भोगता रहा हूं। बीसी बार तुम पर भी अविश्वाम हुआ। नीता पर भी झुंझलाहट आई, हर बार परन्तु तुम लोगो से ईर्ष्या करने के अतिरिक्त मैं और कुछ न कर सका । अपने में ही घुटता रहा । बीसो पत्रों में तुम्हे लिखा कि नीता तुम्हारी धरोहर है, नीता तुम्हारी है, पाकर सम्भाल लो पर इतना साहम न था कि उन पत्रों को तुम्हे पोस्ट कर देता, आफ्टरआल मैं तुम्हे जानता था। फिर प्रश्न केवल नीता, मेरा अथषा तुम्हारा न था । एक और अनजान जीवन भी इस दुखद प्रकरण से जुड़ा हुआ था। वह कुछ देर तक तो चुप रहा और दिवाकर को देखता रहा । फिर बोला- और वह जीवन था गीता का। दिवाकर ने अनुभव किया कि मुबोध ने गीता का नाम किम आदर और सम्मान के साथ लिया है। दिवाकर ने ही पूछा- क्योकि सुबोध तो एकदम दम साध चुप्पी लगा गया था सुबी फिर भी तुम मुझे किसी न किसी प्रकार का इशारा भर तो कर सकते थे। फिर इस स्थिति तक पहुचने से पूर्व कुछ न कुछ तो तुम्हे करना ही चाहिए था। सुबोध की आखो मे पीडा उतर आई। वह बोला- दिबू कहना आसान होता है, करना नहीं। मैं नीता के लिए इन दिनो तुम्हे ही जो रहा था, लेकिन जब जब मैं तुम्हें जीने का प्रयास करता तो नीता मुझे जीने का प्रयास करती और इस कशमकश मे हम एक दूसरे को ही नही जी सके । अब लगता है इस संघर्ष मे या तो मैं हार गया हूं या नीता, कौन कहे ? एक लम्बी श्वास लेकर वह चुप हो गया । दिवाकर भी कुछ न कह सका । एक लम्वी चुप के बाद दिवाकर ही बोला- सुबी, अब लगता है, मुझे तुम दोनो के लिए, तुम लोगो को जीना होगा। नीता तुम्हारी रहे यह मैं हमेशा कुमारी सलीम 0 ३७ से चाहता रहा हूं, लेकिन नीता का साथ देने से पूर्व, यदि तुम्हें याद हो तो मैंने कहा या- "सुवी, नीता को बहुत सम्हाल कर रखना यह बहुत ही नाजुक शीशा है।" पर शायद तुम उस समय मेरी बात नहीं समझ पाये थे। सुबोध बोला- शायद तुम ठीक कहते हो । मैंने यह भूल की हो... उसकी बात को लपक कर दिवाकर बोला- तुम फिर भूल रहे हो, नीता क्या तुम्हे नही चाहती? क्यों नहीं, वह मुझे न चाहती हो, यह तो मैंने नहीं कहा, या उमे नहीं चाहता हू यह भी मैंने नही कहा, परन्तु क्या करूं, इस दिल का जो बार बार यही कहता है कि अब तुम नीता के योग्य नहीं रहे । जब नीता तुम्हारी आदतो से प्रेम करती हो उसके अनुमार बदल सकती हो तो क्या फिर तुम नीता को खुश करने के लिए, दिवाकर का सा आचरण नहीं कर सकते, महज अभिनय भी नहीं, परन्तु जब जब मैंने ऐमा किया। नीता ने मेरे अनुरूप बदलना प्रारम्भ कर दिया। आखिर मुझ मे अविश्वास क्यो नही पनपता, परन्तु मैंने अपने को ही तो सजा दी और किसी को तो नहीं। यही तुमने भूल की सुनी । यदि तुम स्पष्ट शब्दो मे नीता से यह कह देते कि तुम चाहे दिवू की आदतें पसन्द करो, परन्तु मैं तो अब नही बदल मकता, परंतु तुममे प्रारम्भ से ही कही कमी थी, कमजोरी थी, शका थी कि कही नीता दिवाकर की ओर झुक न जाय । इसीलिए तुम उसे जीतने के लिए मुझे जीने का प्रयास करते रहे। तुम ठीक कहते हो दिवू शायद यही बात रही हो। फिर सुबी तुमने अपने अन्दर नासूर पाल लिया । नीता ने मुझे जीने का शायद ही प्रयास किया था। वह तो अपनी इस चकाचौध से ऊब चुकी थी। उसके सामने दिवाकर तो महज एक मार्ग मूचक नक्शे के रूप मे था। पदि दिवाकर तुम्हारा ऐसा मित्र न होता तो कोई भी और दिवाकर बनकर आता या न भी आता वह अपनी ऊब का रास्ता तो खोजती ही, लेकिन मित्र तुममें कही चोर बैठा था। तुम नीता से नही कही दिवाकर से भयभीत थे और परिणाम यह हुआ कि ज्यों ज्यो तुम जीतना चाहते गए वह एक मामान्य दिवाकर से परे हटती गई और विशिष्ट दिवाकर को जीती चली गई। एक उडती सी निगाह उसने सुवोध पर डाली, जो दृष्टि झुकाये सुन रहा था। वात जारी रखते हुए उसने कहा- मुबी, अब स्थिति नाजुक हो गई है तो बुरी ३८ 0 कुआरी सलीब उसे तरह बौखला उठे । मुझे पत्र न लिखना भी मुझे सजा न देने के समान मान कर भी तुम समा देने का प्रयत्न अपने सुप्त मन से करते रहे । नीता न कभी तुम मे बेवफा रही है और न रहेगी ही। परन्तु यदि तुमने उसके भावों का, उसकी असामान्य भावनाओं का सही निराकरण न किया तो फिर शायद नीता तुम्हारे साथ साथ मेरे और गीता के लिए भी सरदर्द बन जाय । दिबू, तुम जो कह रहे हो वह अक्षरशः मही होगा, किन्तु अब मेरे बस का रोग नहीं है । मैं इस मर्ज को अब ला इलाज ममझता हूं | फिर मेरी भी तो भाव- नाएं है । मैं यह महसूम करने लगा हूं कि मैं नीताके द्वारा प्रदत्त जीवन जी रहा हूँ। सुबी ममझ से काम लो, भाई । ऐमा कुछ नहीं है। यह भावनाओ का ज्वार कुछ दिनों का है। जब तक तुम्हे जोडने वाला एक और प्राणी न आ जाये तब तक का । फिर सब उफनते दूध का उफान पानी के छोटे पड़ने जैसा शांत हो जायेगा। दिवाकर और सुबोध ने एक साथ एक लम्बा श्वांस अपने सीनों में भरा फिर शनैः शन. खाली कर दिया। एक मौन दोनों के मध्य उतर आया था। दोनो मौन कुछ देर तक वैटे रहे फिर दिवाकर ही लम्बी सांस खीच कर बोला- अच्छा मुवी तुम कुछ नहीं कर सकते तो मुझे ही कुछ करना पडेगा । शायद मैं अपने मिशन में मफल भी हो जाऊं । पर तुम इतना तो आश्वासन मुझे दोगे कि अब भविष्य में अधिकाधिक नॉर्मल बने रहोगे। स्थिति कैसी भी हो, मुझे प्रति सप्ताह मूचित करते रहोगे। अब यह ददं तुम्हारा अपना ही नहीं मेरा भी हो गया है। सुबोध निरीह आंखों से उसे देखता रहा कह कुछ न सका । नहीं बोलोगे तो यह भार हल्का कैसे होगा । दिवाकर ने शात मार्मिक वाणी मे कहा । सुबोध ने एक दीर्घ श्वाम लेकर कहा- दिवू मुझे क्या पता था कि तुम भी इस आग में कूद पड़ोगे । बहुत दुखी हूं, तुम्हें इम परिस्थिति में पहुंचा कर । दिवाकर ने उसके कन्धे पर हाथ रख कर कहा- सुवी । बावले हो। मैं दुखी होऊंगा, तुम्हारा दुख वटा कर । यह तुमने कैसे कह दिया। मुझे विश्वाम दिलाओ सुवी, तुम और अधिक अब अपने को नहीं सताभोगे । फिर धीरे धीरे अपने को बदलो । शायद नीता यही चाहती हो और फिर यह सव जीवन का विशेष भला भी तो नहीं करते । इनसे छुटकारा ले मक्त हो तो क्या ही सुन्दर हो । परन्तु दिवाकर अपने अन्तिम गन्दों के खोखलेपन मे म्वय ही हिल उठा। कुंआरी सलीच 0 ३६ सुबोध ने आरों उठाकर देवा और जैसे आश्वासन दे रहा हो . . जैसा तुम चाहोगे वैसा ही होगा। फिर दोनो साधी चुप हो गए। एक अन्तराम के माद मुबोध उटने हुए बोला- साओ पाय बना लूं। परन्तु उसने अपनी गलती तुरन्त पकड लो वोला- पर सुमतो पाय पीते ही नहीं। दिवाकर ने तुरन्त एक फैमला कर डाला- अरे सुची बना डालो यार। मैं अब आज से ही अपने को बदल हालू । शायद यही एक इलाम है जिगर मैं नीता को अपनी ओर से, विशिष्ट दिवाकर की ओर से मोहम। फिर ऐसे सामान्य जीवन से भी क्या ? जो दूसरो के जीवन में विष घोल दे। सुबोध यह सुनकर प्रस्तर प्रतिमा सायमा यहा रह गया। फिर घुटती मी आवाज में बोला, जैसे कोई उसका गला दबा रहा हो- दियू तुम या कह रहे हो । क्या हमारे लिए तुमने जो अब तक सचित किया है, मे नष्ट कर दोगे। नहीं यह मैं कैसे सहन कर सकता हूँ। मुबी, भावुक बनने से काम न चलेगा। अब मुझे यह स्पष्ट नजर आ रहा है कि इसके अलावा शायद कोई चारा नही है । चलो, उठो बनायो और पदि तुम नहीं बनाते हो तो मैं ही बनाकर लाऊ। दिवू यह न होगा। क्या न होगा ? तुम मुझे यहा हो तो रोक सस्ते हो । सभी स्थानों पर नहीं। इसे मुनकर मुबोध को लगा कि शापद वह उसे उसके दृढ निश्चय से डिगा न मकैगा । वह कन्धे सिकोड कर बैठ गया। दिवाकर ने साहस बधाते हुए कहा- सुबी, मित्रता के लिए यदि सिद्धातो की हत्या भी हो जाये तो कोई बात नहीं। मैं मिन्नता निभाना पसन्द करूगा । यह बलिदान नहीं है रे, स्वार्थ सिद्धि है । शायद मैं इम ओढ़ी हुई शालीनता से ऊब रहा हो। यह अवसर भर खोजा हो । फिर गीता बडी प्रसन्न होगी । उठो मित्र उठो। भारी कदमो से सुबोध रमोई घर की ओर चला, साथ में दिवाकर के पैर हके उठ रहे थे, जैसे उसने कोई गढ़ जीत लिया हो। चाय पीने के बाद, दोनों मित्र थोड़ा सा मुस्कराये । एक की मुस्कान में हार का विषाद था तो एक की मुस्कान विजय मे खिल रही थी। ४.०कुआरी सलीव नीता आ गयी थी। दिवाकर जाने की तैयारी में था । विदा लेते हुए, दोनो के चेहरों पर मृदु विषाद युक्त मुस्कान खेल रही थी। गाडी मे चढ़ते समय भी दिवाकर ने सुबोध को फिर स्मरण दिलाया- सुबी, प्रति सप्ताह पत्र डालते रहना और मैं अपने परिवर्तित रूप मे प्रति माह आता ही रहूंगा। मत: काल दिवाकर गीता को जाने के लिए द्वार खटखटा रहा था। ५ दिवाकर चण्डीगढ से जब आया से था। तब से गीता केलिए एक अनबूझ पहेली बनकर रह गया था। यह समझ नहीं पाती कि उममे इतने परिवर्तन किस प्रकार हो गए । जब तब वह चाय का आदेश देता रहता है। यही तक नही वह मिगरेट फूकता रहता और फिर घण्टों बांमता रहता है। घर देर से आना अब उमका नित्य का कार्य हो गया है । द्वार पर प्रतीक्षा करना अब गीता ने छोड दिया। जब भी दिवाकर देर से आता तो शराब की गन्ध बिखेरता हुआ आता । गीता पिछले दिनो रातो रोती रहती है । अब तो उसके आसू सूख गए। यह पढ़ी लिखी रमणी है, बी एड प्रशिक्षण मे उसने मनोविज्ञान का अध्ययन किया था, परन्तु दिवाकर के परिवर्तन का विश्लेषण किसी भी प्रकार से नहीं कर पायी, कि इसकी तह मे क्या है ? हालांकि उसके समझने मे देर नहीं लगी थी कि इस परिवर्तन का मूल कही चण्डीगढ मे सुबोध-नीता के यहा है, लेकिन यह है क्या ? इसके मूल मे वह अभी नहीं पहुंची थी। दिवाकर का रुख गीता की ओर गलत हो गया हो ऐसा भी नहीं था। वह उसी गहराई से उसे प्रेम करता था, परन्तु पहिले की तरह उसके प्यार में गर्मी का अभाव था, जमे इस गर्मी को किसी मुदूर रहस्यमय भय ने सोख लिया हो । इसके अतिरिक्त उसमें एक और भी परिवर्तन आया था और वह यह कि वह गीता को अधिकाधिक सजाधजा देखना चाहने लगा है और यह जिद जब तक कुआरी सलीम ०४१ चलती रहनी तब तब उमरे अनुम्प यह शृगार न कर ले । फिर अधमुदी आखो में वह उमे घण्टो लेटा हुआ देखता रहता, मिगरट पूकता रहता। गीता अन्तर्मन में यह नही चाहती थी कि दियार और लोगो की तरह इन व्यसनो का आदी बन जाय, वह यदि कभी कभी कहती थी तब भी वह चुटकी लेने की गरज से ही । अब जब दिवाकर ने इनका मुल कर प्रयोग करना प्रारम्भ कर दिया था तो इसे भी उमने नियति का लेख मान कर ग्वीकार कर लिया था लेकिन वह शराब का क्या करे जिग उमकी मनातनी मस्कार की मात्मा स्वीकार नहीं करने देती थी। दिवाकर का घर में देर में आना भी उमे खलता था। वे नए स्थान पर आ गए थे । वह अकेली यहा बुढती रहती थी। कहाँ जाय किमक पाम वैठे। कई बार दिवाकर से उमने कहा भी, रूठ भी गई. परन्तु वह हा हू के अतिरिक्त कुछ न करता। कभी होले मे वायदा भी करता तो एक दिन दो दिन ठीक रहकर फिर भूल जाता। इस ना म्यान अम्बाला में उसका स्थानान्तरण प्रमोशन के रूप में कई माहो मे चर्चा का विषय बना हुआ था। अब तक वह इम स्थान पर इसलिए नही आ पाया था कि उमने ही ढिलाई वरती थी। वह यह सोचता था कि दिल्ली से अधिक दूर न जाय । उसकी मां मेरठ में अध्यापिका थी। वह अम्बाला जा कर उनसे और दूर हो जाता । पहले जब उमकी मा चण्डीगढ़ में सेवारत थी, तब यह दिल्ली की ओर कम, अम्बाले को और अधिक जाना चाहता था। उसकी मा ने सेवा के अन्तिम दिनो मे एक प्रमोशन की खातिर अच्छी-खामी जगी-जमाई नौकरी को छोडकर मेरठ में अपना अड्डा जमाया था । उन्हे प्रशासनिक पद लेने की उत्कट लालसा थी। जहा वे थी वहा ऐमा सम्भव न था । दूसरे वे इस प्राइवेट कॉलेज की प्रिंसीपल बन कर इमलिए आई थी कि शायद उनके रिटायरमेन्ट के समय में और अधिक वृद्धि हो जाय । पर अब मैनेजमेन्ट को इम पद हेतु एक अन्य महिला कम वेतन पर मिल रही थी। अतः वह इन्हे हटाने की पेशकश कर रहा था। दिवाकर ने अब अम्बाला जाने का निर्णय दो बातो को सोच कर लिया था। पहला यह कि शायद उसकी मा रिटायरमेन्ट के बाद चण्डीगढ मे हो बसना पसन्द दूसरा यह कि वह जब अपनी आदते बदल रहा है तो नए स्थान पर उसे लोगो की चर्चा का विषय नहीं बनना पडेगा, फिर चण्डीगढ के वह और नजदीक पहुंच जायेगा। ४२० कुमारी मलीव अम्बाला मे अधिक किगी मे मुनना न पा । जो दो एक लोग पहले से उसे जानते थे उन्होंने एक दो बार आश्चयं प्रगट किया, कुछ मुस्कराये भर और ममझौता कर लिया गया। यह ममझ पर किस प्रकार के शोफ गौक नहीं अनिवार्यताए हैं। नेविन गीता को दम स्थान पर अपने आपया एजम्ट करने में बडीकठि. नाई का मामना करना पड रहा था । एक तो दिवाकर पा परिवर्तित होना हुआ रूप और दूगरा कोट में खाज अनजान पडोमियो का माथ। वह आज भी रमाई मै जलती भृननी काम कर रही थी और अपने प्रारक का कोम रही थी कि वह उसके माथ गा सिलवाड कर रहा है। मोननी थी कि यदि आज दिवाकर जल्दी आ गए तो वह दो टूक उत्तर मागेगी कि आखिर वह चाहता क्या है ? वह इस प्रकार क्यो यदन रहा है ? वह इममे अपनी हार समझ रही थी कि उममे कही कोई कमी है जिसके कारण दिवाकर अपने को भूलने का प्रयास कर रहा है लेकिन यह इम निगोडी नीद का क्या करे जो उसके आने के ममय से पूर्व ही मुला देती है । वोमों आयाजों के बाद वह उठतो और अनिद्रावस्था में ही दिवाकर की मांगे पूरी करती। आज और दिनो की अपेक्षा दिवाकर जन्दी आ गया । माईकिल रखते समय वह गुनगुनाता भी जा रहा था। दो सूट पिला दे ऐ साकी, पता नहीं इस पल का, यह रहे बाको या न बाकी । इन दिनों वह पुराने तरीके मे नही पुकारता था, परन्तु आज वह शायद बेहद मुग था, उसने उमी तहजे में आवाज दी, श्रीमद्भागवतगीता क्या हाजिर हैं ? गीता ने जब यह सुना तो उसे अपने कानों पर विश्वास न हुआ कि ये पहले वाले दिवाकर फिर कहा से जो उठे। वह खुशी से दौडती हुई बाहर आई सामान की उसने हाथ मे छीन कर एक ओर डाला और उमसे लिपट गई, फिर अपने आप शर्म से गढ़ गई जमे नई दुल्हिन ने अपने प्रियतम मे आलिंगन बद्ध होते ममय किमी और को उसे देखने पार देख लिग हो । वह मुस्कगती हुई अन्दर भाग गई। दिवाकर 'इस गुशी को देख कर मुश न हो मका । उसके हृदय मे एक शूल सा चुभ गया । वह औरों के लिए अपनी खुगियो का गला घोट रहा है । एक आह उसके मीने में फैलकर होठो की राह बिखर गई । उसके मुख पर फैला हुआ कुंपारी गली D४३ आहलाद जैसे बुझ सा गया ! वह पीडा से तिलमिलाता हुआ अन्दर आया। जब गीता ने उसे फिर बुझा बुझा पाया तो वह ममझ न मकी कि अभी अभी जो दिवाकर थे वे कौन थे और अब कौन हैं ? गीता के चेहरे पर जब दिशकर ने बुभती मुस्कान देखी तो उगने सम्हलना उचित समझा। वह बोला- अरे खड़ी घडी मेरा मुह क्या देख रही हो ? क्या आज मुझे कुछ पीने को न मिलेगा। गीता सोते से जागी- ओह क्षमा करिये मुझ से भूल हुई। 'जामोशमा किया' एक नए अन्दाज में दिवाकर ने कहा। उमो इस कहने के अन्दाज नै जाती जाती गोता को मुड़कर देखने के लिए मजबूर कर दिया । वह सोच रही थी कि आखिर क्या वह कोई फिल्म देख रही है जिमक दृश्य पल-पल बदल रहे हो । उमकी आँखों में उलझा हुआ भय भी था कि कहीं वह फिर उस प्रिय दृश्य को म्रो न बैठे। गीता को अपनी ओर देखता पाकर, मम्हलता हुआ दिवाकर एक शरारत पूर्ण मुस्कान के माथ अपनी एक आंम्म दबा गया। गीता यह देख कर कि दृश्य बरकरार है एक पुलक मे भर उठो । घर में मानो समय को कंद से छूटी स्तुशी का आगमन हुआ हो और अब उसका मुक्त हास घर की चाहर दीवारी का कोना छू लेना चाहता हो । वह प्रमशान मा घर अब पर लग रहा था। रात को सोते समय आखिर गौडा पूछ ही बैठी- क्या मैं आप से कुछ पूछने की गुस्तात्री करू ? दिवाकर की मानों सांप नै मूध लिया। उसे भय लगा कि अब वह नीता का रहस्य जानना चाहेगी । वह गीता का मुख टुकुर-टुकुर देखता रहा । कोई उत्तर न गोता उमको तृप्पी का अर्थ लगाते हुए बोली- क्या आप मुझे नही बताना चाहते? दिवाकर को मजबूरी में उत्तर देना पड़ा- पूछो वैसे मेरा तुमसे छुपा ही बहुत कुछ आपका पहले मुझ से कुछ छुपा हो या नहीं, परन्तु अब छुपा है या आप धुरा रहे हैं ? ४0 कुंआरी सलोर ........ हां । आप । शायद शायद क्या, क्या आप पिछले दिनो में एक अन्य कटी हुई जिन्दगी नही नहीं जी रहे हैं ? कटी जिन्दगी । किमसे ? मुझ में। एक लम्बी श्वास स्वीचने के बाद वह बोला- नही गीते, तुमसे नहीं । तुमसे अपने को काट कर तो मैं शायद अपने अस्तित्व से ही हाथ धो बैठू । यदि मुझ मे कुछ शेष बचा है तो वह तो तुम केवल तुम हो । तुमसे कट कर मैं कहाँ जी सगा, लेकिन हा शायद मैं अपने आपसे कट कर रह गया है। बात तो एक ही है । मुझ मे कट रहे हैं तो, स्वयं मे कट रहे है तो, वह जीना तो मुझ मे कट कर जीना है । नही गीता नहीं । तुम यह कह कर मुझ पर और साथ-साथ अपने पर अत्याचार कर रही हो । आप पर अत्याचार नहीं हम भारतीय नारियां दूसरो पर क्या अत्याचार करेंगी। हमे तो अत्याचार का क ख भी नहीं आता । हम अत्याचार करती नहीं हैं, देखती भर हैं, भोगती भी नही, क्योंकि हम अमरवेलें हैं । हमारे आधार वृक्ष पर होता हुया अत्याचार ही हमारा अन्याचार है। उसे भी हमे भोगना नही पड़ता वरन् उसे भी हम भोगता हुआ देखती भर है, क्योकि हमारा अस्तित्व तो उस वृक्ष के साथ है, जिसकी हर अनुभूति का हर धडकन का साथ हमे देना पडता है । भोगे हुए अत्याचार मे भी अपनापन तो होता है, परन्तु अपने वृक्ष पर हो रहे अत्याचार को हम अपना अत्याचार कैसे कहे, जबकि हमारा अपना कुछ भी नहीं । 'और एक गहरी पोडा गीता की आखो मे उतर आई । उसने उसके भार को अधिक न पहन कर पाने के कारण अपनी आखें बन्द कर ली और अपना कपोल दिवाकर के कपोल मे सटा दिया फिर धीरे-धीरे उसका सर दिवाकर के सीने पर आकर टिक गया। दिवाकर कुछ न कह मका । उमके मन में शेर की एक दर्द भरी पक्ति उतर आई- ...... कुंआरी सलीब 0 ४५ गिला ददं अपने ना गामोश रया फिर भी क्यो गली गली चर्चा हुई। गीता की सुकिया प्रयल येग से फूट पड़ी। यह उन्हें अपने में ही समाप्त कर देना चाहती थी। जिसके परिणाम बाप रारा शरीर बुरी तरह हिलने लगा। दिवाकर मौन रहकर बम उमके वालो में कधी मी करता रहा । उममें इतना साहम नही था कि वह गीता के चेहरे को देय मने, यस छत की रष्टियां गिनता रहा। कुछ देर बाद जब गीता योहा व्यवस्थित हुई तो उठकर मटके से पानी लेकर प्रपना मुह धो आई । फिर वडी ही निरीह निगाहों से यह दिवाकर को एक टक निहारती रही। दिवाकर इन निगाहो को और अधिक न सहन कर मका और दृष्टि झुकाये-झुकाये ही उमने अवरुद्ध कण्ठ से कहा- गीता मुझे क्षमा करना" पर बहुत अधिक अत्याचार करता रहा हूँ गीता ने उसके मुख पर हाथ रख कर कहा और आपको धमा, राम राम। तुम दिवाकर ने हाथ हटाकर कहना जारी रणा गीता क्या वह मैं बड़ा ही मजबूर हूँ। आखिर क्यो ? एक बडा सा प्रश्न चिन्ह गीता ने लगा दिया । मैं उसे भी बयान नही कर सकता । एक मिशन है, जो मुझे पूरा करना है । उसमे मैं सफल भी हो सकता है या नही, नहीं कह सकता । इसमे मैं तुमसे खो भी मकता हूं और नही भी । यह मब कुछ है, किन्तु तुममे कहा नहीं जा सकता। उसे मैं अकेला ही भोग सकता हूं, तुम नहीं । क्या आपकी अमरवेल उससे अछूती रहेगी। उसके बिना आप भी तो नहीं भोग सकते। हा लेकिन अमरवेल में प्रत्यक्ष नहीं भोग सकती। परोक्षत: तो क्या वह कम भोग रही है ? एक बडा सा विराम चिन्ह दिवाकर ने लगाया । गीता दृकुर टुकुर उसे देखती रही। फिर आद्रं कण्ठ से बोली- आप भोग रहे हैं, इससे मैं बचा नही सकती । सघर्षशील आपका जीवन है, परन्तु आप क्या मधपं के लिए घर पर आकर शक्ति का सचय करना मुनासिब नहीं समझते । भोगते-भोगते नष्ट हो जाने का इरादा भर हो तो फिर मेरा यहा क्या अस्तित्व है। ४६ ० कुमारी मलीब म में कम एक पड़ाय पर सो मुम्ता मेता है पानी । उगने ममभौते के लिए प्रस्ताव दिया। हो तुम ठीक महती हो गीत - यात्री को पिसी एक पाय पर आकर मुस्ता हो लेना चाहिए, परन्तु उसके पदम उसे पढ़ाय तक सा ही न ग तो। कदमों की भारत तो अपनी छा शक्ति को तारत है । यह ही उमे पड़ाव सक ला मरती है, गीता ने एक गोटी और फेको । शायद यहां तक पहनने से पूर्व मय बुध चुफ गायें । विसो के स्पर्श भर का सहारा भी उगे वहो सर मा गाता है । गीता को एक अन्य माल । हा सहारा देने थाने के बदम यहुत मजबूत हो तो हो सकता है । उमके वक्ष्म बहुत मजबूत हैं । ये साधी यात्री के कदमो से ताकत लेकर या उगे ताकत देकर चलना जानने है । जैमें गीता ने अपनी गमम्त आम्था व आत्म विश्याम प्रगट कर दिया हो। दिवाकर ने स्नेहाई नयनों में गीता को देखा और धीरे-धीरे में अपने प्रगाढ़ालगन में बांध लिया। इम आलिंगन की पवित उमा ने आलिंगन-पदावस्था में ही दोनो को धीरे धीरे स्वप्न लोक में पहुंचा दिया । ur अर दिवाकर घर पर यहे ही प्रसन्न मूड में आता था, हालांकि जो उसने निश्चय मुबोध को अपने मे जो कर, नीता अं. मार्ग से हटने का, किया था, वह दृढ था। उसने शराय पीना छोड दिया था किन्तु भभिनय का रिहर्मन अच्छी प्रकार से कर लिया था। पाप मिगरेट भी घर पर कम हो गई थी, किन्तु अब वह उनका सार्वजनिक प्रयोग करके बाहर का रास्ता बोल चुका था। लोग उसे यदि आफर करें आरी सलीध ०७ तो यह मना कैसे करे और लोग मागे तो दे कैग नहीं। हो साहर का मुक्त प्रयोग घर भाकर बन्द हो गया था। पाय को गीता शौकीन थी ही, इसलिए उमका रास्ता सुल गया. अत. पर पर निस्य उमका मिलना अबाध गति से कम रहा था। विशेष कर सदियों में तो गीता दो ममय मेती थी, मो अब यह समय में चार और चार ले छ वार हो गया। गीता ने भी ममभोते . अनुमार अपने में घाटा परिवर्तन किया था। वह अब रात्रि में अपने दिवाकर के लिए श्रृंगार करती, वह अभिमारिका बनतो, रिन्तु एक के लिए, और दिवाकर इसे देखकर मुक्ता कि गीता को उसके लिए इतना बदलने की क्या आवश्यकता है ? परन्तु धीरे धीरे इमे भी अपने अभिनय को रिहसंल भर समझ कर संतोष कर रहा था। बुढन अब सात्यिक जलन में परिवर्तित हो गयी थी। दो महीने के लगभग होने आए थे न तो नीता का हो और न सुबोध का ही पत्र जसे मिला था। इसमें वह अनुमान लगा रहा था कि या तो स्थिति सामान्य है या फिर एक दम असामान्य उसने निश्चय कर लिया था कि इस रविवार को वह अवश्य जावेगा। एक बी बी इच्छा उममे नीता को देखने को उभर भी रही थी, जिसे यह अपनी उत्सुकता भर समझ रहा था। शनिवार को प्रातः ही उमने गीता से वह दिया था कि वह जाना चाहता है। गीता ने स्वयं भी चलने का प्रस्ताव किया तो दिवाकर ने बड़े मोठे स्वर में उसे समझाया था कि उमका जाना तब तक उचित नही जब तक माँ स्वयं चण्डीगद न पहुच जाये। बस चन्द महीनों की हो तो बात है। फिर दुवारा भी उसने जिद पकडी तो उसने उलहाने भरे स्वर में कहा भच्छा अब तो सहारे का यात्री भी पडाव छोडकर यात्रा पर निकल पड़ना चाहता है। गीता इस एक वाक्य से ही स्थिति को गम्भीरता समझ गई। उसने क्षमा याचना करते हुए अपना प्रस्ताव वापस ले लिया, किन्तु बडे ही कातर नयनों से उमने उसे देखा था। मानों पूछ रही हो फिर तो पहले की तरह चण्डीगढ़ से लौट कर मुझमे खो तो न जाओगे और आखो में ही दिवाकर ने उत्तर दिया था- क्या सुबह का भूला हर साझ को फिर भटक जाता है। शनिवार को दुपहर बाद को बम मे ही दिवाकर चला गया। ज्यो हो वह बस से उतरा उसने सुबोध को एक व्यक्ति के साथ बिल्कुल नए ही रूप में देखा । पहली दृष्टि में यह उसे पहिचान ही नहीं पाया कि क्या यही मुशोध है ? कहा टाइट फ्टि में सजा मुबोध और कहा होला पायजामा, लंबा ४८ आरी सलोर चण्डीगढ़ कुर्ता और चप्पलों वाला सुवोध । उसे अब भी विश्वास नहीं हो रहा था कि यह सुबोध ही है उसने निश्चय करने के लिए उसे आवाज दी- सुयी । सुबोध ने चौंक कर देखा कि सामने दिवाकर हाथ में मिगरेट लिए अपने पुराने ही देश में उसके सामने खड़ा है। दिवाकर अपनी वेशभूपा का मोह न त्याग सका था। उसके हाथ में सिगरेट देख कर सुवोध इस प्रकार चौका मानो उसका नगा पैर कही अगारे पर पड़ गया हो । वह कुछ पल तो बोल ही न मका, पर फिर दिबू कह कर उमगे लिपट गया। अपने पहले साथी से उसने शालीनता पूर्वक क्षमा याचना की और दिवाकर का मामान उससे लगभग छीनते हुए ले चला। मारे राम्ते दोनो मित्र विधारो मे हुवे रहे । घर के नजदीक आने पर दिवाकर ने पूछा- सुवी, क्या नीता का खप्त अब भी उस पर मवार है ? क्या हाल है उमका? सुवोध ने मृदुल मुस्कान के साथ कहा- चल कर देख लेना, किन्तु तुमने यह क्या खप्तीपन किया है। कुछ नही । दिवाकर ने गम्भीरता को उतारने का प्रयास करते हुए कहा। वे कोर्टयार्ड में पहुंचे ही थे कि बाहर आता हुआ श्यामा पहिले की ही भांति उसे देख कर अन्दर खबर करने भागा। बीबीजी देखिए कौन आए हैं ? नीता उसकी स्नेह युक्त आकुल वाणी सुन कर ही समझ गई कि दिवाकर आया होगा। फिर भी बनावटी लापरवाही से बोली- ड्राइंग रूम में बिठाओ, मैं आती हूं। पता नही वे ऐसे ममय मे कहा चले जाते है । उसने अपने को भरसक वेगाना और उपेक्षा-भावयुक्त बनाकर कहने का प्रयास किया था परन्तु दिवाकर के मेज कानो ने और विचार शक्ति ने उसमें निहित बनावट को भांप लिया था। उसने नीता के आने से पूर्व ही सुबोध को वहा से हट जाने का इशारा किया। वह अपने अभिनय की पूरी परीक्षा करना चाहता था, जो धीरे धीरे उसका सम्चा जीवन बनता जा रहा था। सुबोध चुपचाप बोझिल मुस्कान लिये वहां से हट गया। नीता जब रसोई से निकल कर आई तब उसकी आंखों में जल भर रहा था। वह शायद प्याज काद कुर आ रही थी । दिवाकर ने बैठे बैठे ही कहा-नमस्ते नीता जी कुंभारी सलीम D४९ . नीता ने आंखें साफ करते नमस्ते के लिए हाथ जोड़ने को जो हाथ उठाये तो वे उठे के उठे हो रह गए, परन्तु तत्काल मुस्करा कर दोली- शायद वे जल्दी में इमे यहा छोड गए हैं। लाइये मैं फेंक हूँ। उसने मिगोद लेने को हाथ बहाते हुए कहा- परन्तु वे अब काफी कुछ बदलने लगे है । दिवाकर ने इसे बड़े गौर से देखा फिर खिलखिला कर हसा, रहने दीजिए, इसे सुवी नही छोड गया है, हम साथ लाए हैं और गहरा कश लेकर उमने उसके मुख को भोर छोड़ दिया। नीना का आगे बढा हाथ वही का बही थम गया और अनायाम ही उसके मुख से निकला नहीं नही " मिगरेट और भाप । और फिर उसका मुंह खुला का खुला रह गया, आखें फटी-फटी हो गई। इतने में सुबोध भी आ गया } उमने भी बडा सफल अभिनय किया चौकने का ! अरे दिबू तुम, पर यह क्या, सिगरेट और तुम मीता को जैसे होश आया। यह बड़ी ही खोई हुई आवाज में बोली जैसे यह उसकी अपनी आवाज न हो- यह मैं क्या देख रही हूं। यह स्वप्न है या मत्य ? और वह सुबोध के कन्धे से लग कर खड़ी हो गई। गुरू गम्भीर वाणी में दिवाकर ने जवाब दिया- यह स्थान नहीं मत्य है। काटु सत्य, एक ऐसे व्यक्ति का जो 'पर उपदेश कुशल' बहुत था। नीता अपने आपको और अधिक जस्त न कर मकी, उसने ऋद्ध मिहनी की भांति लपक कर जलता सिगरेट दिवाकर के हाथो से छीन लिया और फिर उसे फर्श पर डाल कर चप्पलों से वही वेदर्दी से तब तक मसलती रही जब सा उमका जर्रा जर्रा अलग न हो गया और फिर कण्ठ तक आती हुई मलाई को जन्त न करने के कारण वह अपने शयन कक्ष में भाग गई। दोनों मित्र एक दूसरे का मुंह देखते रहे । दिवाकर अपनी सफलता पर मंद मंद मुस्कराता रहा। रसोई में सब्जी जलने लग गयी थी परन्तु नीता न आई नौ न आई । सुबोध ने जाकर स्टोव्ह पर से सटजी को उत्तारा । उसका खमित खासते बुरा हाल हो गया। स्टोन्ह को युमा कर वह नीता के कमरे तक गया। वह तकिए में मुंह छिपाए फफक रही थी। अपने को वह नियतित नहीं कर पा रही थी। दिवाकर ने गर्म लोहे पर ही चोट करने की दृष्टि से कहा- ५.0 यारी सलीय ........ मान क्या खूब .. मुधी रहने दो, अतिथि का स्वागत बहुत ही सुन्दर ढग से हुआ है। किसी के दिल पर चोट करने जैमा मेरा कोई आचरण तो नग, फिर भी मेरा अप उसका अतिम शब्द अधुरा ही रह गया । नीता रुलाई को भरसक रोकते हुए, हिवकियों के मध्य बोलो- अ... प हिच् मे... रा कि .. या... आ... आ... प... का है। दिवाकर ने और अधिक प्रभाव जमाने के लिए सरोप कहा- वाह यह भी म्यूब रही उल्टा चोर कोतवाल को डाटे । नीना को हिचकियो ओर मुक्यिों का ज्वार लगभग थम सा गया था। वह बोली- आप ने मेरा .. अपमान नहीं किया तो और किंगका किया है । आपको मैं अपना देवता, पथ प्रदर्शक मान कर चल रही थी। मेरा मारा हृदय आपने छलनी कर दिया है। एक व्यंग भरी हमी हम कर दिवाकर वोला- क्या खूब मैं और आपका देवता । आपने मेरे मित्र का भी अपमान किया है। दो मिन्नों को बांटने का प्रयास किया है। अब तक अपने पर वह काबू पा चुकी थी, परन्तु उसकी आँखो मे अब भी फटी आस्था के टुकडे तैर रहे थे। वह बोली- मैंने किसी का भी अपमान नहीं किया है। देवता पर प्रेम नहीं किया जाता श्रद्धा की जाती है । दिवाकर की यारी वाचालता इसे सुनकर काफूर हो गई । उसे व सुबोध को क्या पता कि इन दिनों वह उसे प्रेम के स्थान पर श्रद्धा का पात्र समझने लगी थी, लेकिन नहीं उसे प्रभावित नहीं होना होगा । नहीं तो उसका मारा किया कराया पल भर में नष्ट हो जायेगा । वह और भी अधिक तीखे स्वर में बोला- नीता जी देवता पत्थर के होते है, जो ढोंगियों के ही समाज मे आज जीवित है, ये हाडमाम के अनूभूति प्रधान नहीं। हाइ मांस का यदि तुम्हारा देवता है तो उसमे केवल प्रेम किया जा सकता है, श्रद्धा नहीं नीता ने बहुत ही दर्द भरी वाणी में कहा- देवता तो हाड़ मास के ही होते है । पत्थर का रूप तो प्रतीक मान है । बात बिगड जायेगी, यह सुबोध ने भाप लिया था। पिछले दिनो में उसने कितना कुछ भोगा या, इसे वह जानता था और अब फिर वही भोगना नही चाहता था। प्रभाव और गहरा जमें इस हेतु वह बोला- नीतू यदि अब तक अपमान नहीं किया है तो अब कर रही हो। न बैठने को पूछा और न पीने को, सगी रोने, कुंआरी गलीब 0 ५१ संयम से काम लो मुझे भी देखो वह थोड़ी देर को जैसे जो कुछ वह कह रहा है यह प्रभात्री भी है या नहीं, यह देखने के लिए और बोला- मैं भी तो इसका पुजारी बनता जा रहा था। मुझ पर जो गुजरी है, वह क्या कम है। मेरे तो पिछले माहों को तपस्या ही भग हो गई। बात को और अधिक तूल देने के लिए दिवाकर ने एक शह और दी मुवी रहने दो। मैं शायद वेगानों में आगया हूं चलने का उपक्रम करते हुए अपना मूटकेस उठाता है। जमे ही दिवाकर ने मूटकेम को हाथ लगाया तो मुबोध ने उसका हाथ पकड लिया और बोला- दिवू तुम कुछ भी बन जाओ, परन्तु इतना तो कम से कम न करो कि हमे वेगाना बनाओ। दिवाकर ने हम कर कहा- मुबी रहने दो तुम्हारे दिलो को छलनी मैंने किया है, तुम्हागे तपस्याएं मैने भग की है, महज एक मिगरेट पीने मे । मैंने किमी की हत्या तो नहीं की...... । नीता ने खोई आवाज में कहा- हत्या....... हत्या यह तो तुम कर चुके हो। वह अनायास ही आप से तुम पर उतर आई। दिवाकर चौंका- मैंने और हत्या नीता ने उसी विश्वास के साथ कहा-हा तुमने । घबरा कर बोना- किसकी? मेरे देवता दिवाकर की, मेरी आस्था दिवाकर की। दिवाकर का एकबारगी सर भन्ना गया । नीता को उस पर इतना अधिक विश्वास है, इतनी अधिक श्रद्धा } यह उसने आज जाना ! शायद यह स्वयं भी इतना विश्वास अपने पर नहीं करता, परन्तु उसे खुशी थी कि वह अपने मिशन में सफल हो गया है । वह घृणा के बीज बो चुका है, रोमी घृणा के गेज जो उसके मित्र के लिए हितकर हैं। वह थोड़ी दवो वाणी में योला- हो सकता है। फिर उसने यह दिखाने के लिए कि उस पर उसकी बातो का कोई प्रभाव मही पहा है~ एक और सिगरेट मुलगाई। नौता तड़फ कर उटी और उसने यह भी उसमें छीन कर पैरों तले रौंद डाली। फिर बड़ी ही कातर वाणी में चोलो-मत पियो दिवू । मत पियो । मैं तुम्हारे परी पड़ती हूं, मत पियो। उसकी आखो से फिर अधुजस बहने लगा। - ५२० कुमारी सलीम . सुबोध उसकी यह दशा न देख सका और उसने आखें झुकाली । उसे आज पता लगा कि नीता कितनी गहराई से दिवाकर की पूजा करती आ रही है । परन्तु उसके अन्दर सोये साप को इससे शाति न थी। उसका भय-सर्प, दिवाकर के इस प्रभाव को देखकर और अधिक तन बैठा। दिवाकर ने भी और अधिक प्रहार करना उचित न समझा । वह सर झुकाए चुपचाप खड़ा रहा और फिर बाहर निकल आया, तो देखा श्यामा उसे देखकर तो दिवाकर हिल उठा। उमने देखा कि उमकी अपनी प्रादतों का इन सब पर कितना गहरा प्रभाव था, परन्तु मब कुछ देखते हुए भी उसे पत्थर बने रहना था । श्यामा ने मुबकते हुए एक बहुत बड़ा सत्य कह डाला- दिवाकर बाबू भाप जैसा मित्र मसार मे न होगा। दिवाकर ने बड़े ही उलझे स्वरों में पूछा- श्यामा क्या कह रहे हो ? वे लोग मुझे हत्यारा कह रहे है और तुम...... मैं ठीक कह रहा हूँ साब, मैं अच्छी तरह जानता हूं कि आपने किस तरह अपना खून किया है, बीवीजी और वावूजी के बीच में मे हट जाने के लिए। श्यामा को तीव्र बुद्धि की मन ही मन सराहना कर उठा । श्यामा ने आसू पोंछ कर आगे कहा परन्तु साव, बीबीजो अब तक आपको देवता ही मानती थी। मैंने आखों से देखा है माब बीबीजी बाबूजी के पैर पकड कर खूब रोती थी और कहती कि वे अपने को यों न मारे । मैं आपकी हूं विश्वास कीजिए । मुझे आपका वही रूप पसन्द है, परन्तु मैं अपने को मामान्य करने मे अब रोक नहीं सकती हूं, तब बाबूजी भी यही कहते थे- मुझे बनने दो नीतू- कुछ बनने दो। शराव और जुआ, चाय, मिगरेट और क्लब ही तो जिदगी नहीं, लेकिन जैसे कहीं बाबूजी झूठ कह रहे हो, ऐसे उनकी जवान लडखड़ा जाती थी। वह शायद आपसे बहुत भयभीत थे। पिछले महीनो की तरह ही फिर इम घर पर मनहूसियत छा गई थी। बाबूजी द्वारा आपको पत्र लिखे जाते, फिर फाड-फाड कर ढेर लगा दिया जाता परन्तु फिर भी मजबूरी मे ही मही आपने इन क्लबो और शराब के दास लोगों को सही रास्ते पर ला दिया । अपना नुकमान करके । क्या यह वड़ी बात नहीं । साहब हम छोटे लोग तो इसे ही बड़ी बात मानते है । दिवाकर फिर भीतर चला आया जहा नीता फर्ण पर घुटनो में मर दिए बैठी थी। कुंभारी मंत्री ०५३ उसने एक कड़वी मुस्कराहट लाकर सुशेध और नोता की ओर देना, फिर कहा- मुबी, तुम नीता को सम्हागो मैं तो चला नीता ने रुख कण्ठ मे कहा- आप न जायें । मैं अपनी भावुकता के लिए क्षमा प्रार्थी हूं। एक लम्बी सांस खीच कर उसने फिर कहा- मेरा आप पर अधि- कार ही क्या था ? परन्तु मापने मुझ में जो ज्योति जला दी है, वह शायद जलती रहे या शायद बुझ जाय, कह नहीं सकती। दिवाकर ने मन ही मन कहा- बुझ ही जाय तो अच्छा है नहीं तो मेरा एक मित्र मुझ से अवश्य ही छिन जायेगा । वह ठगा सा सडा यही मोचता रहा । नीता ने मूटकेस उठाया और अंदर के कमरे में ले गई। यह उसे रुकने का सकेत था। भोजन के समय तीनो मे बाते नहीं हुई। इसके बाद दिवाकर ने कहा कि उसे वह कहीं ले चले, वरना उसका यहाँ दम घुट जायेगा. परन्तु नीता ने सुबोध की ओर देवकर बड़ी ही कातर वाणी में कहा- तुम तो चले जाओगे किन्तु मैं । दिवाकर का प्रस्ताव था कि तुम भी चल सकती हो। किन्तु नीता ने बड़े ही ठण्डे रूप में कहा- कोई भी न जाय तो ज्यादा अच्छा है। दिवाकर ही फिर बोला- लेकिन मुझे फिर सिगरेट की या अन्य किमी चौज की जरूरत पड़ी तो फिर वह नाटक दुहराया जायेगा । नीता ने एक आह भर कर कहा- अब तो मर कुछ लुट गया है नाटक करके अब और क्या आना होगा? तीनों चुप रहे। नीता की आंखों में अचानक एक लपट मी दौड गई, जैसे वह कोई भयंकर निश्चय कर रही हो। उसने एक बहुत ही दर्द भरी और बोझिल वाणी में, जिसमे एक करारा व्यंग भी था और साथ-साथ एक ऐसी उत्सुकता भी जैसी कि एक पगे- अ मे परीक्षा लेते समय होती है, कहा- में मिगरेट लाती हूं आप पीजिए.. और यह कहते कहते वह अन्दर सुवोध के कमरे में चली गई। जहां से मुबोध का एक पुराना मिगरेट का टिन उठा लाई। दो सिगरेट सुलगा दी और फिर मुबोध को दे दी और कहा- एक अपने मिन्न महोदय को दे दें। ५४ 0 कुआरी सलीय ... सुबोध सकपका गया। दिवाकर भी इस परिस्थिति से घबरा मा गया, परन्तु उसने चेहरे पर कोई भाव आने न दिया। नीता ने फिर दृढ शब्दों में कहा- जव मंस्थापक ही संस्था की आस्था खण्डित कर दे, सब तुम्ही क्यों अपने से लड़ो। पीजिए, मैं सच कहती हूँ, इममे मुझे पेहद खुशी होगी आप पीजिए। यह उस रोपित घृणा का शायद पहला अंकुर था । फिर वह भोर अधिक कटु मुस्कान के साथ व्यंग्य भरी वाणी में बोली- दिवाकर महोदय यदि लाल परी का शौक भी पाल लिया हो तो मैं अपने पति की आज्ञा से साकी भी बन सकती हूँ, यह कहते कहते उसने एक सिगरेट सुबोध के मुख से लगा दी। मजबूर मुबोध को एक कश लगाना ही पड़ा। दिवाकर स्थिति की नाजुकता समझ चुका था। उसका काम उमकी समझ में समाप्त हो गया था । उसने ऐश ट्रे मे स्वय मिगरेट उठाया और धीरे- धीरे कश लगाने लगा। नीता ने व्यग्य भरी वाणी में कहा- कहिए तो फिर परी हाजिर करू । दिघाफर ने दृढ निश्चय कर लिया- जो कुछ करना है, वह सम्पूर्ण तैयारी के साथ व आस्था से करना होगा । अत. मुम्कराकर, जिसमे चुनौती स्वीकार करने की व व्यंग्य की भावना स्पष्ट थी, कहा- यदि आतिथेय की यही इच्छा है तो मुझे क्या हानि हैं। सुबोध के मुख से सिगरेट छिटक कर दूर जा पड़ा। वह घबरा कर बोला-क्या? दिवाकर ने अपने को नॉर्मल करते हुए कहा- क्यो चौकतें हो? शोक करू तो एक ही क्यों? फिर धीरे से उसने आंख से इशारा कर दिया और फिर दृढ शब्दों में नीता से बोला- लाइये न, देर किस बात की हो रही है । नीता की मारी आस्था हिल उठी। उसने सकपका कर दिवाकर की ओर देखा। वहाँ उमने एक व्यंग्य भरी दृढता देखी, जिसमे चुनौती की स्वीकृति साफ झलक रही थी। उसमे पनप रही धृणा ने जोर मारा और एक तीखी मुस्कान सुबोध पर डाल कर, फिर दिवाकर की पोर पूरकर वह चली गई। लौट कर आई तो उसके हाथो में सचमुच शराब थी, पेग थे । उसने बिना किसी की ओर देखे और बोले-पेग तयार करने प्रारम्भ कर दिये, किन्तु मोडा न पाकर उमने दबे कण्ठ से कहा- सोडा तो है नहीं, पानी ही मिक्म कर दू। कृारी सलीग ०५२
प्रभाव को और अधिक स्थाई जमाने की दृष्टि से, उसने नीता के हाथ से
पेग लेने के लिए हाथ बढाते हुए कहा- नोट भी चल सकती है ।
तभी दो वू द आसू नीता की आखो से चुपचाप ढलक कर पेग में गिर पडे
मानो वे उसे हल्का करने के लिए अपना बलिदान कर रहे हों। और आते हुए
सासुभो को नीता ने ओह काट कर रोका और मुस्कराने की चेष्टा करने लगी।
दिवाकर ने बेहद प्यासे के समान पेग छीन लिया और एक श्वांम में
उसे खाली कर दिया और फिर मुमुपं सुमोध पर एक दृष्टि डालकर बोला- लाओ
और भरिये।
नीता ने मरोप उसे देखा और फिर एक नया पेग भर दिया।
वह उसे भी एक श्याम में पी गया।
नीता ने तीसरा पेग भरना प्रारम्भ किया तो सुबोध ने उसे रोकते हुए
कहा- नीता बस करो। दिवाकर तुम्हारे पहले के व्यवहार के कारण पागल हो
गया है। क्या उसे मार ही डालना चाहती हो ?
दिवाकर बडे ही अंदाज से बोला-
एक जमाना था,
जब माकी और सागर में मुहब्बत यो।
मयखाने में प्यार था.
मदहोश मे दुलार पा.
लेकिन अब क्या करु ?
ऐ ! मेरे खुदगर्ज यार,
जब साकी और सागर के बीच,
मालिके मयखाना आगए है।
नीता ने सुबोध का मागे बड़ा हाय भटक दिया और तीसरा नाम भी
भर दिया। दिवाकर उसे भी एक विशेष अदा के साथ गटक गया।
मुबोध ने माथा थाम लिया। चीया- जाम भरा जाना था कि उसका
भरपूर तमाना नीता के गाल पर पड़ा । बोतल और पेग हाथ से चिंटक कर दूर
जापहे और भन्नाटे के माथ टूट कर बिखर गए।
नीता पत्थर की मूर्ति बनी उसे पुरती रही फिर भारी कदमों से अपने
शयन पक्ष में चली गई।
५६ ० कुआरी सलीम
सुबोध ने दिवाकर के कंधे पर हाथ रखकर बड़ी ही मंजीदगी से कहा- दिबू मुझे माफ कर देना। मैं ऐसा नालायक मित्र तुम्हें मिला कि मैंने तुम्हारा सब कुछ लूट लिया। दिवाकर कुछ न बोला उस पर शराब अपना असर दिखा रही थी वह लड़खड़ाता हुआ उठा । सुबोध भी उसके साथ उठा । उसने उसे उसके बिस्तर पर पहुंचा दिया। सुबह दिवाकर देर से उठा। उमका मारा सर भन्ना रहा था। माखो में अलन थी । ता अपना नित्य का कार्य निपटा चुकी थी। सुबोध आज फिर से सूट में था। यह नीता की ही जिद थी। दिवाकर अंधमुंदी आखो से उसे देखकर मुस्कुराया । वह उठा और गुसलघर में चला गया। अंदर से उसने दरवाजा बद किया और फिर अप और अधिक स्वस्थ करने के लिए उसने उगली डाल कर वमन किया । दमन की आवाज सुनकर नीता भागी भागी आई, परन्तु फिर न जाने किस शक्ति ने उसके प्रामे बढ़ते कदम थाम लिये । वह न आगे घढ सको और न पीछे लौट सकी। पीछे से मुबोध ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कातर वाणी मे बोला- क्या अन्दर दिबू है। नीता ने बहुत ही संजीदा वाणी मे कहा- शायद ! और वह लौट गई। दिवाकर जब गुमल करके निकला तो काफी स्वस्थ अनुभव कर रहा था। सुबोध ने उसे प्रसन्न मुख देख कर सतोप की सास ली। कपड़े बदल कर उसने सुबोध से कहा- अच्छा सुची मैं अब चलूगा । सुबोध मना करता रहा, किन्तु वह मका नहीं । नीता के रूम से दिवाकर ने अपना सूटकेस उठाया, तब उसने देखा कि उसकी आखों मे घृणा मिश्रित कातरता है जैसे घृणा भी उस पर प्रभाव जमा रही हो, और आस्था भी परन्तु दोनों मे से जम कोई भी न पा रही हो। वह बोली तो कुछ नहीं, परन्तु उसकी आखें कह रही थीं, क्या यहां इमी मब के लिए आए थे। कुमारी मलीन ०.५७ ७ आज लगभग एक वर्ष दिवाकर को पूरा हो चला था, किन्तु यह फिर सुबोध के यहा न गया, किन्तु वह नीता को न भूला पाया । गीता में वह पूरी तरह से रमने का प्रयाम करता, किन्तु कही जैसे उमके हृदय में शूल चुभ कर निकल गया हो और उसकी चुभन का मानो अहसास उसे साल रहा हो । नीता के पेग में ढलने आमू, उसकी आकुलता रह-रह कर उसे वर्ष भर कोंचती रही है। रातों में भी वह उसे भुला न पापा । वह स्वयं नही समझ पा रहा था कि आखिर क्या बात है जो नीता उसमे गढ कर रह गई है उसके व्यक्तित्व में चिपक कर रह गई है। कभी- कभी वह गीता में नीता को टटोलता था। बीच-बीच मे मुबोध स्वय अम्बाला आकर उममे मिलता रहता था। मी से उसे समाचार मिलता था कि नीता अब नॉर्मल है। वह न बहुत सामान्य है और न बहुत ही फैशन के प्रति असामान्य । दिवाकर इसे सुन कर खुश तो होता था कि चलो उमके कारण मित्र को सुख मिला, किन्तु बीच बीच में सुवोध पर छा जाने वाले विषाद को वह नोट करने से रह नहीं पाता था । सुबोध का उसे और निगाहो से देखना माल जाता था । जैसे सुबोध उसके लिए कहीं अपने आप से बहुत बड़ा संघर्ष कर रहा हो । उसका सुबोधके 'प्रति यह सहयोग उसे थोड़ा महंगा पड़ा । चायसिगरेट को लत उसे लग गई थी। शराब तो उस के बाद जैसे उसने फिर कभी छुई ही नहीं। इधर यह चर्चाएं भी जोरो पर थी कि उसका स्थानान्तरण चण्डीगढ हो जाय । मा उसकी चण्डीगढ पहुंच हो चुकी थीं। वे वहां रिटायर होकर पहुंची थी। वहाँ उनका अपना स्थाई प्रभाव मा था। जिससे ऐमा लगता था कि उसका स्था. नान्तरण अवश्य ही अम्बाला से चपटीगढ हो जायेगा। हालाकि इतनी शीघ्रता से उसके विभाग में स्थानान्तरण नहीं होते। ५८० कुआरी सलीब उसे इमको न तो विाल प्रतीक्षा ही थी और न इतनी अनुत्सुकता ही थी कि वह इसका पण्डन करे । पर गीता बड़ी बेकली से इसकी प्रतीक्षा कर रही थी। इस बीच में सुबोध का आगमन कम ही हुआ था। दिवाकर किमी अन्य प्रकार की घटना की प्रतीक्षा में या नहीं। वह नीता और मुबोध के बीच से बडे नाटकीय ढंग से निकल आया था। यही उसको निश्चितता का कारण था। उसके मन में नीता को देखने को हूक अवश्य उठती थी, किन्तु वह नियंत्रण रखे हुए था । परन्तु एक दिन अनायास ही उसकी निश्चितता की दीवार, चालू को दीवार की तरह धसक गई । अचानक ही मुबोध का एक पत्र से मिला। चण्डीगढ़ प्रिय दियू. तुमसे अभी पिछले माह में ही मिलकर आया था और अब इस माह मे आशा कर रहा था कि तुममे फिर मिलू गा, किन्तु यहा बाधाएँ पुनः सर ऊ चा किए बड़ी चली आ रही है । मै उनके बारे में क्या लिवू ? मेरा साहस उत्तर दे रहा है । मैंने पहले तुम्हे जिम आग मे तपाया था, वह मुझे ही क्या कम तपिश दे रही है, फिर तुम्हारा क्या हाल होगा। नीता को फिर से वही सात सवार हो गया है। वह मानव सेवा संघ की सदस्य बन गई है। तब से तो मानो वह सन्यासिनी हो गई है। इम मबके चक्कर में उसने अपना स्वास्थ्य भी चौपट कर लिया है। आखों के चारो तरफ काले घेरे वन गए है । बालो का रूखापन पहले फैशन था । अब वह अनिवार्यता हो गया है। पहले लाइट कलर के वस्त्र पहिने जाते थे और अव नितात श्वेत जैसे वह विधवा हो गई हो । मुझे यह वाक्यांश नही लिखना चाहिए, परन्तु हृदय में जब कसक उठती है तो लिखना ही पड़ता है । मैं स्वयं भी इस फैशन को लम्बी दौड से उकता चुका हूं लेकिन कुछ ऐसा स्थायित्व मन पर छा गया है कि ये मब अब अनिवार्य से लगते है । शायद में अपनी इच्छा पर नियंत्रण नहीं रख पाता या शायद यहा ममाज और वातावरण मुझे इससे निकलने की प्रेरणा नहीं देता । लिख नहीं सकता, लेकिन तितली नीता को क्या कहा जाय, वह तो इस तरह रग पलटती है कि गिरगिट भी उसके आगे मात खा जाये । शायद नारी मन एक अबूझ पहेलो ही है। कुंआरी सलीब 0 ५६ मेरे मित्र. पहले तुम्हें नीता ने युनाया या, अब मैं युना सा एक दिन के लिए फिर आ जाओ, यहां गुन रहा हूं कि दियार आ रहा है। मां भी आगई हैं। तुम अवश्य आओगे में रविवार को प्रतीक्षा कर रहा हूं। यदि दरा बोध कुछ नया हुआ तो पहने हो लिग दुगा) तुम्हारी विक्स प्रतीक्षा में- सुबोध इस बार इस पत्र का प्रभाव नीता के पत्र के ममान नहीं था। हा उमेइमकी थोडी चिता अवश्य हो गई थी कि कही यह अब नीता के मामले को लेकर बदनाम न हो जाय या फिर कही गोता उसके बीच में दीवार घड़ी न हो जाये। यह चण्डीगढ़ जाना भी चाहता था । मा का पत्र भी आ गया था, लेकिन अब उसका जाना निश्चित मा ही था । मुबोध उमे बुता ओर वह न जाये यह उमी लिए सम्भवमथा। इम दिन भी वह थोडा थोडा बुमा या घर पहवा तो नीता ने चुटकी ली। "कहिए गीता के भाष्यकार महोदय गोता का कौन सा श्लोक आपको परेशान कर रहा है ?" दिवाकर ने इस मुलझे हुए व्यग्य का अर्थ बहुत गहरा लिया और उसका मन शंका के निविड़ अंधकार से भर उठा । वह उसके उत्तर में केवल मुस्करा भर दिया और उगको यह मुम्कान बडी मुनी-गूनी और खोई-खोई थी। उसके मन मे शका के बीज इमलिए अंकुरित हो जाते थे, कि गौना की यह चुटकिया तब ली जाती थीं, जब वह कपड़े उतार कर हाय मुंह धोकर लौट कर आता था। वह समझता या कि गीता ने पत्र को जैव से निकाल कर देख लिया है। जब कि गीता यह चुटको पहले आने हो लिए नहीं लेती थी कि - वह शायद यका मादा आया है इसलिए ऐसा है, पर बाद में इसलिए लेती थी कि हाथ मुहे धोने के बाद भी वह मामान्य क्यों नहीं हुआ गीता दिवाकर की मुस्कान का अर्थ अब बडी पनी दृष्टि से लगाती थी और उसने अनुभव किया था कि कही, कोई गडबड अवश्य है। इन दिनो उमकी ताड़ने की शक्ति यह भी गई थी। गर्भवती महिलाएं गर्भावस्था के दिनों में पतियों के प्रति बहुत ही भावुक हो जाती है । ६. कुंआरी मलीद रात्रि को जब गीता को अवकाश मिला। तो उसने इमका कारण जानना चाहा । वार्तालाप प्रारम्भ करते समय उसने एक बडी ही मामिक चुटकी ली थी- आप तो कहते थे कि नारी मन एक अनबूझ पहेली है, परन्तु यहा तो मुझे इसके विपरीत दिखाई देता है। दिवाकर इसे मुनकर फटकर रह गया । फिर उसे सुबोध के पत्र की पक्ति भी याद आ गई। अचानक एक शका-मर्प उसके मन मे तन बैठा, परन्तु फिर उसे अपने पर झुंझलाहट आ गई। वह बोला- गीता आजकल तुमने यह पार्थ की धनुर्विद्या कहां मे सीख ली है ? उमकी समझ मे यह उमका उपयुक्त चुमता “हुआ प्रत्युत्तर था। गीता हमकर बोली मैं तो अनाडी नारी हू धनुविद्या का अधिकार तो केवल पार्थ को ही है। फिर वही ..... । दिवाकर इतना ही कह सका। गीता समझ गई कि दिवाकर इम ममय गहन विचारों में व्यस्त है । उससे इस समय कुछ कहना उचित नही । वह शात होकर टुकुर टुकुर देखती रही। गीता की निरीह चितवन को दिवाकर आखिर कहा तक सहता । वह झिझकते हुए बोला- तुम कुछ और न समझना । मुझे जब भावुकना का ज्वार आता है. तब मैं बहुत हल्की हल्की बातों से भी चिढ़ जाता है । और वुझती हुई गीता मे जैसे चेतना लौट आयी । वह तपाक से बोली- और भाटा कब प्राता है श्रीमान् के विचार-मागर में। दिवाकर इम उक्ति को सुनकर मुस्करा पड़ा और बोला- जब गीता के विचार-प्रवाह का ज्वार प्रारम्भ होता है । गीता भी मुस्करा उठी । दोनो ने मुक्ति भरी मुस्कान से एक दूसरे को देखा और करवट बदल ली। दूसरे दिन फिर एक पत्र उमकी प्रतीक्षा मे था! यह पत्र तुरंत सुपुर्दगी का होने के कारण उमे पहुंचते ही मेज पर मिला था। पत्र का लेख देखते ही वह पहिचान गया कि पत्र नीता द्वारा लिखा गया है। नीता का पत्र है, इमी भावना मात्र ने उसके अन्तर्मन को झंझोडकर रख दिया । अनजाना भय उसमें व्याप्त हो गया, परन्तु आज वह गीता को अपनी उदामी का क्या जबाव दे मकेगा। आज जो कुछ भी उम पर गुजरेगा, उसे वह कैसे छुपायेगा । उमने कम्पन युक्त हायो से. लिफाफा खोला । पन नीता का ही था । कुमारी सलीब ६१ , चण्डीगढ़ मेरे मानस के मेघ दिवू जी, सप्रेम वन्दना। आपने चण्डीगढ से मुख इस प्रकार से मोडा कि शायद आप अब चण्डीगड के बारे में भी नहीं सोचते होगे । कल सायकाल से कुछ समय पूर्व ही मुझे विदित हुआ कि उन्होंने आपको यहा पाने के लिए निमन्त्रण दिया है। उनका आमन्त्रण है तब आप अवश्य आये, लेकिन इतना आप भी विचार करते हुए भायें कि मुझे मेरे घर पर मेरा अपमान सहन न होगा। पहले भी आपने मेरी भावनाओं से खिलवाड़ करके, मेरा अपमान किया था। वे तो आज भी यही कहते है कि दिवाकर अब पहले जैसा दिवाकर नहीं है । मैं तो अब भी यही समझती हूं कि वे अपने मार्ग पर मुझे लाने के लिए झूठी बातें कहते हैं। ईश्वर करे उनकी बातें सच न हो। आप स्वयं एक बात पर विचार करते हुए आयें कि यदि मैं अपने आप में किसी प्रकार का परिवर्तन करती हूँ तो उन्हें चिढ क्यो लगती है ? उनसे मैंने आज तक यह नहीं कहा कि वे क्या करते है । और कहाँ जाने है ? और इसमें यदि उन्हे हानि होती है तो मुझ से कहे । आपको बार बार मध्यस्थ क्यों बनाया जाता है ? जहां तक मैं समझती हूं उसमे हानि नहीं होनी चाहिए । हा उन्हें शंका हो कि मैं आपके प्रेम में डूब रही हूं तो जो भी सोचें अच्छा है। मैंने तो अब तक यही सुना है कि "त्रिया चरित्र जाने नहि कोई......." परन्तु यहाँ तो लगता है कि यह उक्ति उल्टा ही प्रभाव जमा रही है। या फिर यह उक्ति प्रारम्भ मे ही गलत रही हो। इसका प्रचार शायद इसलिए इतना बढ़ा कि सत्ताधारी पुरुप हो इसके निर्माता और प्रचारक रहे हैं। आप आ रहे है. अवश्य आयें, परन्तु विशाल हृदय और मुक्त विचार धारा लिये । अपने में इतना साहस लिए कि मैं भावनाके सागर में गोते लगाती एक नारी के पास जा रहा हूं। जो पन में आप घृणा और पल में श्रद्धा करने लगती है। मैं नहीं समझती कि आप वदले भी हैं । वे कहते हैं, कहा करें। उसदिन की पटना शायद आपका सबसे बड़ा बलिदान थी। इसी विश्वास पर तो मैं अब तक अपने आपको आपका सममती रही हूँ आप मा अवश्य आये। आपकी नीता पत्र को पढ़ने के बाद दिवाकर का सारा अस्तित्व ही हिल उठा। आज वह देख रहा था कि नारी किस तरह आस्थावान होती है। उस पर छाता हुआ भय तिरोहित हो गया था। पत्र बहुत ही संयत भाषा मे था । मानों वर्ग मे उफनती नदी अब शांत गम्भीर शरत्काल की नदी बन गई हो । अंतिम पक्तिया अवश्य अटपटी थी और यही एक कारण था कि दिवाकर बार-बार डर रहा था । कही नीता उसे अपने प्रेम पाश में तो नहीं फंसाना चाहती या वह स्वयं तो कही फिसलन भरी राह के दोराहे पर नहीं आ खड़ा हुआ है । खर कह कर उसने एक लम्बी श्वांस भरी और पन उसने शांत मन मे जेब के हवाले कर दिया। साझ पड़े जब वह घर लौट रहा था तो पत्र के बारे में बिल्कुल भूल चुका था । उमने शनिवार को चण्डीगढ़ जाना निश्चित कर लिया था। उसके भय निवारण का एक मुख्य कारण यह भी था कि उसे अब सुबोध के यहा ठहरना नहीं था। मां के पाम ठहर सकता था और शायद मुबोध ने अपने पत्र में इसीलिए मा के समाचार को लिखकर इंगित किया था। संध्या गीता के माथ बडी चुहलबाजी मे कटी । जैसे कुछ भी न हुआ हो । मुक्रवार की प्रातः फिर एक तुरंत सुपुर्दगी का पत्र उसे मिला । यह पत्र मुबोध की ओर में था । सुबोध का पन पाकर इम चार दिवाकर का मन शंका से व्याकुल हो गया। पता नही क्या बात है जो चण्डीगढ जाने में पूर्व ही उसे पत्र लिखा गया है। चण्डीगढ प्रिय दिबू, तुम्हे एक पत्र पहले भी लिखा था और इस रविवार को तुम्हारे आगमन को प्रतीक्षा भी थी, किन्तु परिस्थितियो ने कुछ इस प्रकार से पलटा खाया है कि शायद तुम्हारा यहां आना कलह- अग्नि में घृताहुति देना हो जाय । मैं जब स्वयं अपनी आग में जल रहा हूँ तब तुम्हे उस आग में जलाने से क्या लाभ । मेरा फैलाया हुआ मुझे ही समेटने दो। जब देखू गा कि यह मेरी शक्ति मे परे होता जा रहा है, तब तुम्हें अवश्य बुलाऊंगा। आशा है तुम बुरा न मानोगे। तुम्हारा अभिन्न सुबोध कुमारी मलीव०६३ सुबोध के पत्र नै दिवाकर को गहरी चिंता में डाल दिया। आखिर क्या घट गया कि सुबोध ने उसका आना भी रोक दिया। उसने अपनी मेज पर पड़े कागजातों को मन लगाकर पूरा करना चाहा, परन्तु मन में बार बार मुबोध का पन्न सर उठाने लगता । आखिर क्या हुआ वहा? क्या हुआ? यही एक बड़ा प्रश्न चिन्ह उमके सामने नाच उठता। दुपहर की डाक में एक पत्र और आया। यह पत्र उमकी मां का था बडे ही उलझे मन मे उमने पत्र खोला। जानता था कि सिवाय सामान्य बातो और उसके होने जारहे स्थानान्तरण की चर्चाके उसमें कुछन होगा, परन्तु एकवात खटकने वाली थी कि यह पनि समय से पूर्व आया था, फिरभी पन तो खोलनाही था। चण्डीगढ़ पिप दिवू, सदेव प्रसन्न रहो तुम्हारे पत्र मदेव समय समय पर आते रहे हैं। मेग यह पत्र तुम्हे मेरे कार्यक्रम से पूर्व ही तुम्हें लिखा जा रहा है । तुम मेरी आदतों से परिचित हो ही। मैं अपने कार्यक्रम को तोड़ कर पत्र लिखना पमद नही करती बशर्ते कि कोई विशेष बात न हो। अब भी एक विशेष बात है और उसका सम्बन्ध तुम्हारे मित्र सुबोध की पत्नि से है। . दिवाकर ने पत्र पढना बद कर दिया उसका मन का से भर गया कही मां इस सब हलवल से परिचित तो नहीं हो गई हैं किन्तु फिर उसने साहस कर पन पढ्ना प्रारम्भ किया...... सुबोध की पलि नीता दो दिन पूर्व सीढियों से फिसल गई है। उसे चोट अधिक नहीं आई है, सिर्फ चद खराश भर है, परन्तु इससे भी भयानक खबर यह है कि उसके चार पांच माह का हमल था और वह फिसलने की वजह से गिर गया है। बात यहां तक होती तो शायद कोई बात न थी, परन्तु न जाने क्यो सुवोध के मन मे शका घर कर गई है कि नीता जानबूझ कर सीढियो से फिसल गई है। नीता बार बार मुझसे कह रही है कि तुम आकर सुबोध को समझाओ। मेग आदेश तुम्हारे लिए यह है कि तुम अभी मत आना | ताजा पाद और तामा आग अधिक कष्टकर होते है। शायद तुम्हारा यहा आना और अधिक . गड़बढ़ कर दे। ६४ कुआरी सलीव तुम्हारे बुलाए जाने को मैंने बहुत टाला है, किन्तु पता नहीं क्यों नीता तुम्हारे बुलवाए जाने पर जोर दे रही है। इसकी तह मे क्या है ? मैं नही जानती, परन्तु तुम्हारा अभी यहां आना हितकर न होगा। एक और समाचार है कि तुम्हाग स्थानान्तरण अगले माह के अंत तक अवश्य हो जायेगा। गीता को आशीर्वाद देना । यदि असुविधा अनुभव न करो तो गीता को कुछ दिन के लिए मेरे पास छोड़ जाओ । वह नीता को देख भाल भी कर लेगी। अपनी सुविधा असुविधा अवश्य देख लेना। समय पर पत्र अवश्य डालना तुम्हारी मां सूर्यवती माँ के पत्र ने दिवाकर के सामो सारी स्थिति स्पष्ट कर दी। नीता का साहस यहां तक बढ़ गया है । अब उमका चण्डीगढ जाना उचित नहीं । ऐसी स्थिति मे गीता का भेजना भी उचित नहीं है । पता नहीं कब नीता खुल जाय । साझ को उसने घर में प्रवेश करते ही मां का पत्र गीता के हाथो मे रख दिया । गीता मा का पत्र देखते ही चौकी, बोली क्या बात है ? यह असमय में ही मां का पन्न क्यो? दिवाकर ने शका-उलझे स्वर में कहा- पढ लो। गीता शका भरे मन से उसे शीघ्र शीघ्र पड़ने लगी। एक श्वास में आधा पन समाप्त कर वह बोली- आप नीता को प्रारम्भ से लापरवाह बताते रहे हैं। उससे इससे अधिक और क्या आशा की जाती। दिवाकर की ओर देख कर वह बोली- अरे आप इतने सुस्त क्यों है ? यह कहते हुए वह फिर पढने लगी। सारा पन्न समाप्त करने के बाद बोली- अम्मा जी को भी पता नहीं क्या क्या वहम मवार हो जाते हैं । अरे आपको न बुलाए तो किसको बुलवाए। उनके आगे पीछे गहरा आत्मीय इतने पास है ही कौन । इतना कह कर उसने पन दिवाकर को सौंप दिया, उमका सामान उठाया और अन्दर चली गई। दिवाकर ने सोवा- ठीक हो तो है, उनका आस-पास आगे पीछे यहां है कौन, यदि उसने इस गाढे समय में उसे स्मरण कर लिया तो क्या गुनाह कर दिया। वह पुनः ठिठका सा वही खडा रह गया । दुपारी सलीव ०६५ गीता ने उसे अंदर आता न देकर वहीं से इंची आवाज में कहा • आप तो ऐसे बुझ गए है मानो बहुत बही घटना पटना घट गई हो। कृपया अपना मूर ठीक करें। ऐमी घटनाए तो नारी के जीवन में घटती ही रहती हैं। दिवाकर भारी मन और कोमिल कदमो से अदर आ गया। दिवाकर विचार कर रहा था कि गीता क्या जाने कि यह घटना जितनी भयकर है और शायद यह सुबोध और दिवाकर के परिवारों में कितने भयंकर मोड लायेगी। उनकी मानसिक शाति को इमी आशंका ने तो लील लिया है। इसी तरह इबने उत्तराते और गीता के व्यंग्य वाण मुनते दिवाकर को एक मप्ताह और गुजर गया । न तो मां का हो पत्र आया और न सुबोध का ही। दूमरे मप्ताह के प्रारम्भ में फिर एक पत्र नीता का आया । पत्र क्या था एक प्रकार से नीता में धुमै हुए दर्द की दर्दनाक पुकारें पी। चण्डीगढ़ मेरे मन के सिमटते हुए मेष, सप्रेम वन्दना. आपकी यहाँ आना था, परन्तु आप यहाँ न आये । पुरुष स्वार्थी होता है, यह मैं जानती थी, परन्तु यह मैं न जानती थी कि मेरे दिवाकर भी ऐसे होगे, नितात कायर। आप सोचते है कि मैं दूर रह कर अच्छा कर रहा हूं। शायद यह आपका बहुत ही गलत विचार है। वे मुझ पर शका करके सोचते हैं कि वे मया कर रहे हैं, तो वे भी कहाँ ठीक कर रहे हैं। मैं आपसे प्रेम नहीं करती, यह एक कठोर सत्य है, परन्तु भार और आपके मित्र का व्यवहार मुझे बार बार उकसाता है कि मैं आपसे अब खुलकर प्रेम करु श्रद्धा को प्रेम में परिणित करना और प्रेम को पूणा में परिणित करना नारी के लिए बहुत आमान है, शायद पुरुष के लिए में हो। मेरी अस्वस्थता के समय अपने मन की शंका को व्यक्त कर उन्होंने आपकी तस्वीर मेरे मन मे और स्थाई बनाने का ही प्रयास किया है न कि धुघलाने का। वह आपमे कुछ नहीं कहेंगे क्योकि मैं जानती हूं कि उन्हे आप पर विश्वास है। अविश्वास का पात्र हूं तो मैं । १६० कुआरी सलीम मेरी समझ में यह नहीं आता है कि आप पुरुष लोग अभी तक रूढियों में जकड़े हुए क्यों है ? एक ओर ढिंढोरा पीटते हैं कि हमने नारी को स्वतन्त्र करने का बीड़ा उठाया है दूसरी ओर उसे शेका के कठघरे में बांधना चाहते है। मान लीजिए मुझे मापसे प्रेम हो करना हुभा तो मिस्टर सुबोध इसमें पया कर लेगें ? रहा प्रश्न आपका कि आप मुझे चाहते हैं या नहीं तो मैं आपसे यह भी कहने नही जाती कि आप मुझे चाहे, प्रेम करें। प्राचीन समय से ही पुरुष नागे के तन की नैतिकता का मूल्यांकन करता माया है, उसके मन के मूल्याकन के लिए उसकी न्याय सहिता मे कोई स्थान नहीं। मैंने अपने तन को नैतिकता को आंच नही माने दो है । अब मन का क्या करू। जो किसी के गुणो पर रोझ गया हो। मों को भी पता नहीं क्या हो गया है. वे भी निगाहो से सका के बाण चताती है । ठीक भी तो है बुढापे में औरत भी एकाकी रहते रहते कोर पुरुप जैसी बन जाती है। कई बार मन करता है कि उनसे साफ माफ कह दूं वे बहुत हो सुलझे विचार वाली और विशाल हृदया है। परन्तु मन नै उन्हे भी कही पुरुष मान लिया है, इसलिए उनसे कहने का भी साहस नही होता। आप अव मेरी और से कभी आयें । मैं प्रतीक्षा तो कर रही हूं। जानती हूं आप जपने जन्म स्थान पर अवश्य आयेंगे । इस विश्वास का एक कारण है, शायद मां ने आपको लिख दिया हो कि उन्होने अपने रिटायर होने के बाद मिले धन से आपके लिए एक छोटा सा मकान यही पर खरीद लिया है। अब ऐसी दशा मे आज नहीं तो कल या रिटायर्ड होने पर तो आप अवश्य आयेंगे। खैर आप आयें या न आयें आपकी मर्जी। आपकी नीता नीता के पत्र ने इस बार दिवाकर में पनप रही नीता के प्रति सारी अनास्था को एक झटके के साथ तोड़ कर रख दिया था। उसे ऐसा लगने लगा था कि शायद नीता उसे ही अपना सब कुछ मान बैठी है किन्तु समाज के भय के कारण वह इस मुलम्मे युक्त भाषा का प्रयोग कर रही है । स्वय दिवाकर के मन में भी कभी- कभी यह विचार उठता कि क्या वह नीता का वरण नही कर सकता, परन्तु फिर कुधारी मलीन ०६७ वह इम विचार कुत्सा से भयभीत हो जाता । उसे रुझान के इस बहाव में गीता का स्मरण हो माना और यह स्मरण ही उसे इस कल्पना से बाहर निकाल लाता। मकान को खरीद की विश्वस्त सूचना ने जहा उसके मन मे एक विश्वास और सतोप के भाव भरे थे वही इसने उसमे चण्डीगढ़ निवास के प्रति भय भी भर दिया था कि कहीं वहां का निवाम उमके लिए नए गुल न खिला दे । आज उमने स्वयं अपनी ओर से एक पत्र लिखा । उमकी स्थिति सुबोध और गीता के लिए अब स्पष्ट ही थी। सुबोध को भी यह पता था कि नीता उमे पत्र लिखती है । सुवोध तो लिख ही रहा है। पत्र मे उसने प्रयास किया था कि इस रोज-रोज की कलह वा निपटारा अब हो ही जाना चाहिए। अम्बाला प्रिय सुबी और नीता, सप्रेम वन्दे । समय समय पर तुम दोनो के पत्र मिलते रहे हैं किन्तु मैंने ही समय पर उनका उत्तर देना उचित न समभा। अब तुम्हारे पत्रो ने मुझे मजबूर किया है कि मैं तुम्हें पत्र लिखू। न चाहते भी कि मैं यह सयुक्त पत्र लिखू, मुझे यह लिखना पड रहा है। इससे मुझे कितनी पीड़ा होगी, यह तुम क्या जानों, या हो सकता है तुम इसे मेरा दम्भ माव समझो। नीता का सीढ़ियों से फिसल जाना और फिर उसके पलन्वरूप गर्भपात की स्थिति का आना । सुबोध, मेरी दृष्टि मे कोई अपराध नहीं है । मैं पहले भी तुमसे एक बार कह चुका हूं कि तुम मुझ पर अविश्वास करते हो। प्राज पुनः मैं उमी कथन का समर्थन कर रहा है। क्या नीता को फिसलन आकस्मिक नहीं हो सकती है ? दुख है कि तुम कैमे निर्दयी पति और पिता हो जो इतना हो जाने के बाद भी नीता को मानसिक कष्ट दे रहे हो। इससे नीता का भविष्य मां बनने की चाहना से ही घृणा करने लगेगा । या फिर मैं एक बहुत ही कड़वा सत्य लिख दूं। इच्छा तो नहीं है कि बिला वजह इतना बड़ा दोष मैं मेरे ही मत्थे मढ लू परन्तु मैं समझता हूं कि यह शंका तुम्हारे अंदर पनप चुकी है, फिर में ही उसे अपनी ओर से क्यों न बोल हूँ। इसके सिवाय मेरे पास वारा ही क्या है ? तुम इसे मुझसे कह सकते नहीं, घुटोगे अवश्य । हालांकि इतना बड़ा झूटा इल्जाम तुम मेरे लिए सोचो और मैं चुप रहे, ६८0 कुंआरी सलीम परन्तु मिन्न, में मित्र हूं दुशमन नहीं। खंर . तुम मेरे चरित्र पर शंका कर रहे हो, करो, परन्तु इतना गलत न सोयो कि हमारी तुम्हारी प्रीति की डोर में ही गांठ पड़ जाय। लगता है, चलती-फिरती धूप सा तुम्हारा मन कहीं मुझे तोड़ कर न रख दे। मुझ में यदि अब किमी प्रकार का विकार पैदा होता है तो उसके दोपी तुम दोनो ही होओगे। नीता, यदि सुबोध से तुम्हें इतनी ही नफरत पैदा हो गई है तो मैं कहूंगा कि ऐमा सामीप्य हो दुखद होगा । बेहतर है कि तुम दोनों अलग-अलग हो जाओ। सुबोध ने एक बार तुम्हारे बारे में कहा था- कि पंछी को मैंने पिंजरे में कैद कर लिया है । लगता है वह मोठी कैद तुम्हें बड़ी कठिन लगी या शायद फिर तुम उस मोठी कंद के योग्य नहीं । तुम्हारा स्वतन्त्र मन आज भी उन्मुक्त गगन विचरण करने के लिए विकल है । तब फिर किसी और का जीवन दुर्वह करने से बेहतर है कि तुम अलग हो जाओ। बम अब मैं और अधिक न लिख सफूगा । पत्रोत्तर की आशा नहीं करता। गर्भपात की घटना पर खेद प्रकाश करना, वह भी मेरी ओर से शायद, भाप लोगो को दिखावा लगे इसलिए ऐसा भी नही लिखता। तुम्हारा मिछुडा साथी दिवाकर दिवाकर ने पन डाल तो दिया, लेकिन उसके भोर मन ने अब अन्दर ही अन्दर छटपटाना प्रारम्भ कर दिया था। उसके सामने कई भय भयावह धन कर उठ खड़े हुए थे। जैसे सबसे पहला भय तो उसे यही पुरेदने लगा कि कही दोनों कुआरी सलोष ०६९ यह न समझ बैठे कि वह उन दोनों को हमेशा के लिए अलग करना चाहता है । दूसरा और सबसे डरावना भय यह था कि कही मुयोय इग पर या अन्य अर्थ लगाकर यह न समझ बैठे कि मैं वास्तव में नीता को माहता हूं और उमसे उसे छीनने के लिए मेरे पड्यन्त्र की यह पहली किश्त है आदि आदि । उसमता हुआ मन तर और उमझ जाता है जब कुछ अप्रत्याशित घटनाएं अनायास ही घटित हो जाती हैं। परेशान दिवाकर की परेशानी उसकी मा फै पाने और बढ़ा दी। पत्र क्या था एक प्रकार की एक अबूझ पहली थी। जिसका उत्तर पदा-विषer दोनों ओर जाता पा। फिर इस प्रकार का पन मूवती नहीं लिखती थी परन्तु न जाने किस मानसिक स्थिति में उन्होंने यह पत्र लिखा था। न जाने यह कौन सा क्षण या जो उस समय उन्होने जिया या पन पर कर दिवाकर ने जेब में डाल लिया था, किन्तु वह उसे पुनः पढने से अपने को नहीं रोक पाया था। चण्डीगड प्रिय दिवू. सदैव प्रसन्न रहो। कई दिनों की कशमकस के बाद आज मुझे यह पत्र लिखना पड़ रहा है। तुम्हारा स्थानान्तरण यहां हो गया है । आशा है शोध हो तुम्हें आदेश प्राप्त हो जायेंगे। बड़े प्रयास से ही यह स्थानान्तरण मैं करा पाई हूं। लेकिन अब मैं चाहती हूं कि तुम पहा न आओ तो ही अच्छा है, शायद तुम स्वयं मा गीता यहा आने के मूड में न हो, या लगता है कि शायद मैं तुम्हारा आना पसंद नहीं कर रही, फिर सोचती हूँ कि आखिर यह भागम भाग मैंने क्यों की थी। खैर तुम्हारा माना शायद तुम्हारे व मेरे हित में हो सकता है, परन्तु यदि अहित हो उठा तब क्या होगा ? तुम मममदार हो, आना चाहो भा जाना, न आना चाहो न आना । लेकिन तुम्हे आना ही चाहिए, शायद वे लोग अर्थ का अनर्थ लगा ले। फिर मेरी इज्जत का भी प्रश्न है। खुशी होगो तुम्हें कि अपना मकान हो गया है, परन्तु मैं शायद खुश नहीं है। खैर शेष मिलने पर ही बातें करूंगी। में न जाने क्या क्या बेतिर पर की बातें लिख गई हूं। तुम्हारी मां सूर्यवती ७. कुमारी सलीव मम्बोधन व प्रतिम वही पुराना परन्तु शेष पत्र ऐसा जैसे उसकी मां में कही नीता पंठ गई है। उसी प्रकार का विरोधाभास लिए लेखन । अपने ही विचारों का स्वयं द्वारा खण्डन । एक ओर दिवाकर को जहा चण्डीगढ़ स्थानान्तरण को खुशी थी वहीं मा द्वारा इ गित बातों से एक अनजाने भय का कोहरा उस पर छाता जा रहा था। इतने मे ही साहब के केविन से आवाज पडी। बड़े अनमने मन से वह मेज पर से उठकर अपने अधिकारी के पाम गया। बाहर हो चपरासी ने बडे मोठे अंदाज से मुस्करा कर उसका स्वागत किया और द्वार का आधा पल्ला हटा दिया । दिवाकर का मन तो कही और भटक रहा था। उसे क्या पता कि कोन रोया और कौन मुस्कराया। अधिकारी के पास पहुंचने तक वह अपने आपे में नहीं था। उसी समय स्टेनो कृण्णा की खिलखिलाहट ने उसे चौंका दिय और दनदनाती हुई बधाई उसके अधिकारी की उसके कानो मे पडी। बधाई हो दिवाकर,आप चण्डीगढ कम जारहे हैं। जी...ई... ई और तब कही जाकर दिवाकर अपने आप में फैल रहे भावना जाल से निकला- जी अभी तो कोई विचार नही । अरे कल तक तो तुम रोज डाक देखते थे आज... .. सर हुआ कुछ नही, किन्तु आज ही तो नहीं जाया जा सकता। अच्छा... हमते हुए मिस्टर खन्ना ने कहा । भाई मैंने आज ही तो सुमको नही भगाना है । मैंने तो तुमसे सिम्पली रूटीन की बात पूछी थी। शायद तुम बुरा मान गए। नही तो सर... और अपने सर को झटका मा देकर दिवाकर ने कहने के लिए मुंह खोला कि कृष्णा तपाक मे बोल उठो । दिवाकर साहब की तबियत शायद आज खराब है, मर । देखिये न किसी बान का भी जबाव सही नहीं दे रहे है । भाई दिवाकर गमगीन क्यो हो ? क्या भाभीजी से झगड़ा कर आए हो..... । अब तक दिवाकर सम्हल चुका था । वह भारी स्वर में बोला, नही यह घात तो नहीं है, किन्तु हां, मैं भारीपन जरूर अनुभव कर रहा हूं। खन्ना ने उसे जाने का इशारा करते हुए कहा- तुम चाहो तो मैं आज संध्या तक ही तुम्हें कार्य मुक्त करवा दूं। लंच में तुम्हारा फेयर चल हो जायेगा । और मुनो तुम अकेले हो तो नही जारहे हो । कृष्णा भी तो चण्डीगढ़ ही जारही है। कुंआरी सलीब ७१ जी... मनायास ही दिवाकर पूछ बैठा- हमारे स्थानों की पूर्ति कौन करेगा। पाना मुस्करा कर बोले- स्टेनो कृष्णा के स्थान पर कोई नए सज्जन आर. के. शर्मा आ रहे हैं और तुम्हारे स्थान पर तुम्हारे पुराने साथी राम हिलपी प्रमोट होकर आ रहे हैं। अब दिवाकर मुस्कुराया। पन्ना ने अपने विजाव लगे बालों पर प्यार में हाथ फेर कर, निचले ओंठ को थोड़ा तिरछाकर व आमो को नचाकर दिवाकर से कहा- दिवाकर तुम तो गए ही भाई परन्तु मेरे तो बॉफिस की बहा और उनके शब्द मुंह के मुह में ही रह गए । कृष्णा गुरांती हुई तनकर खड़ी हो गई फिर जैसे स्प्रिंग टूट गई हो, वैसे ही वह दिवाकर की मुस्कुराती आयें दंश कर सहम गई । वह दिवाकर से डरती थी, वरना उसे भय था कि कहीं दिवाकर धन्ना साहब से ही न उलझ पड़े। पन्ना का उमगता मन बुझ सा गया, वह उस मोठी चुटकी को फिर न ले सका। बस बुझे मन से इतना ही पूछ मका- कि क्या वह भाग ही कार्य मुक्त होना चाहता हैं ? दिवाकर ने इन्कार करते हुए कहा- क्या आप मुझे भगाने पर ही तुले हैं । बहार यदि जाती है तो खिना को कुछ दिन और रहने दीजिए। यह चुटकी लेता हुआ वह बाहर चला गया । बन्ला माहब की खिस-विम हमो और कृष्णा की दबी जुबान, उसका बाहर कुछ दूर तक पीछा करती रही। बाहर भी सब मे यह खबर चपरासी हरसुख ने पूर दी थी। अतः बाहर भाते ही प्रत्येक अपनो मेज में उठ उठ कर उसे बधाई देता और फिर मन्दर्भ युक्त मोठी मुस्कान मुस्कुरा देता । कुछ ने तो दबी जबान पीठ पीछे कह ही दिया- खुद तो गए ही साथ में हमारे सनम को भी ले गए। जैसे ही वह अपनी मेज पर पहुंचा कि हरसुख ने आकर माहब का ऑर्डर सुनाया। आपकी तबियत ठीक नहीं है। आप घर जाना चाहें तो जा सकते हैं । चपरासी के जाने के बाद भी वह कुछ देर और बैठा रहा। इसी बीच सभी अपना अपना काम छोड़कर उसकी मेज के इर्द गिर्द इकट्ठा हो गए और बोले- भाई कुछ भी हो दिवाकर, तुमने हाथ मार ही लिमा, अपने इच्छित स्थान पर पहुच रहे हो । केण्टीन में एक अढिया सा लंच देकर ही जाभोगे । वे लोग उसके पीछे पड़ गए। हार कर इसके लिए दिवाकर को स्वीकृति देनी पड़ी। ७२० कुमारी लीव उन लोगों के हटने ही उसने घर चलना अच्छा समझा वरना कुछ साधी तो उसे उमी दिन उधेडने के मूड में नजर आ रहे थे। रास्ते में पन की बात पुनः उम पर हावी हो गई। इस बार एक नए ही भय की सृष्टि हुई- कही नीता ने उसका सारा कच्चा चिट्ठा तो मा से नहीं खोन दिया, जिस कारण मा ने उसे आने मे रोका है। ऐसी दशा मे उसका चण्डीगढ पहुचना दो पाटों के बीच में पिसने के समान हो जायेगा। इधर मां की झिड़कियां, उधर जब गोता मारा मामला सुनेगी तो वह अलग खाने दौडेगी। मित्रो के मध्य जो उठा पटक होगी वह व्याज मे ही। घर पर उसका समय से पूर्व आना गीता के लिए अजीब सा लगा। उसने आते ही पूछा- कैसे ? आज इतना शीघ्र कैसे ? दिवाकर ने हौले से बुझी चुझी मुम्कान के माथ रहा- कुछ नहीं थोडा सर भारी था और फिर... फिर क्या ? मेरा स्थानान्तरण आदेश आ गया है। इमे सुन कर गीता धावलियों के समान दिवाकर में लिपट गई । दिवाकर ने महा भाव मे उसे शपने मे हटाते हुए झिड़का । बाबली हुई हो, बाहर रास्ता है, लोग आ जा रहे है और तुम बच्चो के ममान मुझनै लिपट पड़ी, छी। गलती गीता ने स्वीकार कर ली, फिर वह खुशी खुशी अंदर भाग गई। पोझिल कदमो मे यह पर के अदर गया । गीता से उमका यह वुझापन छुप न मका । वह अपनी चौकडो भूलकर फिर सफापकाप्ती सो उसके पाम आई घोर दिवाकर के सीने पर अपना मर रखकर बोली- आर नारान तो नहीं हैं न । नही तो। संक्षिप्त सा उत्तर या दिवाकर का । फिर क्या सर मे अधिक दर्द है। नहीं... है भी, नही.. भी। पया मतलब ? यह छिटक कर दूर खड़ी हो गई। दिधाकर इस उनमे हुए पतं.प्य को देकर भड़ा पछताया। यह कुछ दोन न सका, बरा गीता को ठण्डी निगाहो से घूरता रहा । बारी सनी ०७३ गीता ने उलमले से अंदाज में पूछा- क्या फिर आज कोई पन आया है ? दिवाकर मा का पत्र उमे दिखाना नहीं चाहता था। उसने टानने के स्वर में कहा- किमी का भी तो नहीं आया। गीता ने यह भाप लिया था कि दिवाकर कुछ छिपा रहा है। वह रूठने के से प्रदाज मे बोली- आजकाल मुभमे बहुन कुछ छुप जाने हैं। आज मैं आपकी बात नहीं मानूगी। आपके पास कोई पत्र अवश्य आया है। मुब ध का न मही नीता का मही । आप मुझे दिखायें। नौता ये नाम से ही दिवाकर मकपका गया। वह भय को दबाने हार बोला- नहीं भाई, मानो गोता। यह पन नीता का भी नहीं है। फिर किसका है, आप बताते क्यों नहीं ? नीता का नहीं है तो फिर और किमी का पन छुपाने का तो अर्थ ही नहीं होता दिवाकर को जमे किमी ने गर्म लोहा छुआ दिया हो। वह तड़प कर बोला- क्या मतलब तुम्हारा ? मतलब, बतलब कुछ नहीं, आप आज कल बहुत कुछ ट्रपति में रहे है, हो सकता है कि आप नीता का पत्र आने पर मुझमे छुपा जाते हों। मके मतलब यह हुआ कि मेरे सम्बन्ध नीता मे कुछ और हैं ? उभी तेजी में गीता बोली- यह दोष तो मैं आप पर नहीं लगाती। पता. नहै आप तीनों में क्या होडी बुदबुदा रही है ? मुझे क्या पता ? न मुझे, सुबोध के पत्र देखने को मिलते है न नीता के । बम सूचना मिलती है कि पत्र आमा है, मैं तो तुम्हारे ही हित में, उन लोगों के पत्र तुम्हें नहीं दिखाता है। उनके मध्य लगी हुई भाग में सुम क्यों जलो ? ठीक है, यह भी मेरे हित में है कि मैं आपके पाम मार हार पत्रों को न देव। यह भी मेरे हित में है कि आप दुनिया भर के ऐयों में दूर रह कर फिर ऐष करने लगे । आप यूंबुझे रह कर अपना स्वास्थ्य चौपट कर रहे हैं, यह मे हित में है। मैं चोरीम पटे घर की बाहर दीवारी में कैद रहूं पाप बाहर धूमो रहें यह भी मेरे हित में ही होगा। मारे सुख-दुख का भार से आपने ही उउ लिया है। आप जिसे सुख देना समझते है. म मुख भोग से तौबा करती 1 मैं पनि को दुपारी मती उसके मुंह से पूरा वाक्य भी न निकल पाया था कि एक भन्नाटेदार तमाचा उसरे गाल पर दिवाकर ने बड़ दिया। गीता जैसे प्रस्तर प्रतिमा बन गई हो। उसी पलकें स्थिर हो गई ह जनती हुई स्थिर आखों से कुछ क्षणे उसे देखती रहो, फिर वह एक झपाटे के माप अपनी खाट पर जाकर औंधे मुह पड़ रही और फफर फराक कर रोने लगी। दिवाकर भी अपने इस कृत्य पर मुमुपं मा खडा रह गया। उसने जो कुछ किया वह इतनी त्वरा के साप किया था कि वह अपने कृत्य का औचित्य अनौचित्य न ममझ सका । नीता के पत्र के आरोप ने ही उसे इस कदर उत्तेजित कर दिया था कि वह अपना आपा खो बैठा । उमे भगा कि गोता सब कुछ जान गई है। फिर उमने मोना, यदि जान हो गई थी तो उसके व्यवहार मे अंतर तो आया नहीं था, फिर यह इतना उत्तेजित क्यो हुआ ? अब वह पछता रहा था । नो कुद हा था वह उसके दाम्पत्य जीवन में पहली बार और बहुत ही अप्रत्याशित था। अब वह चाह रहा था कि अपनी इम क्षणिक भावुकता के लिए समा माग ले, किन्तु उसके अंदर बैठा हुआ सस्कारी पुरुष उमे ऐमा करने से रोक र था और मोढा हुआ सम्प मान उमे वार-पार गीता को मनाने के लिए उत्साहित करता था। ढिवादी पुरातन पुरुष कहता- क्या उसकी बदजुबानो सहनीय थी, उमकै लिए जो कुछ किया है वह क्या उमके अहित मे था ? इसी ऊहापोह में कुछ क्षण और गुजर गए और फिर झिझकता हुआ गर वह गीता के मिरहाने जा खडा हुआ। उसकी झिझक ने उसे कुछ क्षणो के लिए थाम लिया। वह उलझता सा फिर आगे बढ़ा और उसने गीता को खाट की पानी पर एक हाथ टिकाकर गोता का एक हाथ थामना चाहा तो गीता ने उसका हाथ भटक दिया, वह अभी तैश मे थी। दिवाकर सहमा सा कुछ देर निर्दोष आखों से गीता को ताकता रहा । उसने फिर दृढता से गीता को उल्टे से सीधा कर दिया । मीता रिफरी सिंहनी गो करवट बदल गई। दिवाकर को इस समय उसे छेडना उनित न लगा । वह उठकर चला आया। फिर कुछ सोच कर रसोई मे धुम गया और बिना किसी पूर्व विचार के उसने स्टोन्ह को सुलगा दिया। फिर भगोनी में पानी रख दिया । गीता ने भी अब भावना-ज्वार से निकल कर मौचना प्रारम्भ कर दिया था । श्या उसका इस प्रकार अनर्गल प्रलाप उचित था । कोई हारा थका ऑफिर कुमारी सलीब 0 से आए, तो क्या उसे इस प्रकार जली-कटी सुनानी चाहिए, लेकिन उसका स्त्री सुलभ हठ उसे समर्पण करने के लिए नहीं कहता था । वह पिछले दिनों से जो भोग रही थी, उसका गुबार अब इतना अधिक एकत्रित हो गया था कि वह बस ऐसे ही किसी अवसर की खोज में था, कि फट पड़े। इतने में ही उसके कानों में रसोई से आती हुई स्टोव्ह की भरं भरं की आवाज पडी। एक बार तो तडप कर वह उठ बैठी, पर फिर उसके आत्माभिमान ने उसे धिक्कारा कि वही पहल क्यों करे, परन्तु उसके रूढिवादी मन ने इसे नहीं स्वीकारा । फिर उसके मन ने ही तक किया कि पहल तो उन्होने ही की है, यह आखिरी विचार आते ही वह तेजी से रमोई घर की ओर भागी । भागते कदमो की आहट रसोई से बाहर आते दिवाकर के कानों में भी पड़ी । वह बरबस ही अपनी कर्तव्यपरयणा पनि के प्रति सहानुभूति से भर उठा । ज्यों ही गीता पास आई तो उसने उमे' अंक में भर लिया और फिर एक गहरा चुम्बन जो उसके कपोलो पर अंकित किया तो उसे आसुओ का खार जुवान पर तैरता हुआ अनुभव हुआ । अचानक ही उसने थूक दिया । गीता की मृदु खिलखिलाहट बोझिल वातावरण में खिल उठी । दिवाकर भी हंसे बिना न रह सका। तनाव एक अनोखी आवाज करता हुआ टूट कर बिखर गया। दिवाकर एक मर्मभेदी मुस्कान छोडकर अपने ऑफिस के कपडे उतारने चला गया। चाय अभी बन कर तैयार भी नहीं हुई थी.कि गेलरी मे घंटी टनटना उठी। दिवाकर ने वस्त्र बदल लिए थे, बस वह चाय लेने की तैयारी हो कर रहा ग. झु झलाता सा वह द्वार पर पहुंचा । द्वार पर पहुंचने के बाद उसके आश्चर्य की सीमा न रही, जब उसने अपने मामने कृष्णा को खडे पाया। वह आश्चर्य में इतना डबा कि वह कृष्णा में न तो प्रदर आने के लिए कह सका और न कृष्णा के अभिवादन के लिए जुड़े हाथो का ही उत्तर दे सका । । कृष्णा ने ही इस जड़ता को भंग किया, बोली- क्या घर आए अतिथि का इसी प्रकार सम्मान होता है श्रीमान् के यहां. ओह क्षमा करें। तद्रा से जागते हुए दिवाकर बोला- आइये... आइये और यह एक ओर हट गया। ७६ ० कुंआरी सलीब पृष्णा शायद ही किसी कर्मचारी के घर जाया करती थी। कम से कम दिवाकर के यहां तो नहीं ही, इसलिए दिवाकर के यहां उसका आगमन आश्चर्य नही होता तो क्या होता? घर में घुसते ही कृष्णा का पहला प्रश्न था-क्या गीताजी को पहले ही रवाना कर दिया है ? लेकिन उसे अपनी कही बात का तुरत उत्तर मिल गया, गीता को शर्म से सजाती हुई नमस्ते से। गीता ने पश्नवाचक दृष्टि से दिवाकर को देखा-जैसे पूछ रहो हो, क्या यह भी कोई छुपाने वाला पन है ? दिवाकर ने गीता का भाव समझते हुए कहा- गीता, इनसे मिलो यह अपने ऑफिम में बड़े साहब को स्टेनो हैं, कुमारी कृष्णा चायला । गीता कृष्णा को प्रदर के कमरे मे ते गई। यहां चाय पर ही बात प्रारम्भ हुई। कृष्णा निष्प्रयोजन नहीं आई थी, वह बोली- दिवाकर महाशय आप तो स्थानान्तरण मे चण्डीगढ़ जा रहे हैं और शायद जानते ही है कि मैं किस प्रकार से चण्डीगढ़ जा रही हूँ। भनजान बनते हुए दिवाकर ने एक पूंट चाय सुकते हुए कहा- नही तो मैं नहीं जानता। जनाब मैं वहां सहायक सचिव बनकर जा रही हूं। मुझे आर्थिक लाभभी है। तो मुबारक हो । दिवाकर मुस्कराया। सूखा मुबारकबाद । कृष्णा चहको.। जी नही.... चाय के साथ में..... दिवाकर ने हंसती' आँखों से कहा और मब हस पडे । फिर गम्भीर होकर कृष्णा बोली- मैं हुजूर से मुबारकबाद लेने नहीं आई हूँ। कुछ और भी कार्य है ।। वह क्या? दिवाकर ने भोलेपन के साथ कहा । वह यह है कि आप फटाफट कार्य मुक्त हो जायें। मेरे कार्यमुक्त होने से आपके कार्यमुक्त होने मे क्या अपन पड रही है । पड़ रही है। जोर देकर कृष्णा बोली। कुमारी सलीब. ०७७ कैसे? यही कि आपको एक दिन स्टाफ लंच देगा, फिर एक दिन आपसे लेगा, तब कही जाकर आप कार्यमुक्त होंगे। इस प्रकार ये तीन दिन तो कम से कम लगने ही है। फिर आपमे यह भी प्रार्थना करने की तैयारी है कि आप कुछ दिन और रके जिससे आपके स्थान पर आने वाले राम हिनपी आ जायें। मैं तो कृपणा जी अब भी इममें कोई अहमत नहीं मममता हूं। अजी आप क्यों समझेगे? अपने प्रमोशन पर तो उसी दिन भाग आए थे न । आपको पता होना चाहिए कि साहब ने मुझे भी आपके साथ ही कार्यमुक्त होने के लिए आदेश दिया है अब माप ममझे । ओह आप सीनियरिटी और जूनियरिटी के चक्कर में । वाह । क्या आपने भी यही नहीं किया था जो मैं करना चाह रही हूं। ओह ...। और कोई बात कहता दिवाकर रुक गया फिर वह बात चवाकर बोला- और यदि मैं जाना ही नहीं चाहूं तो, क्या आपको भी रोका जायेगा। वाह आप यह क्या कह रहे हैं ? बड़े प्रयन्नों मे आपकी माताजी ने मापका स्थानान्तरण कराया है और आप हैं कि जायेंगे ही नहीं। शायद नहीं भी। वह गम्भीर हो गया । गीता इसको सुनकर चौंकी, परन्तु बोली कुछ नही । यह उसकी, मादत थी कि वह अपने पति और किसी मे बात हो रही हो रही हो तो बीच मे बोलना पपद नहीं करती थी। कृण्णा ने एक मर्ममेदी निगाह से गीता की ओर देखा और कहा- क्या गीता जी चण्डीगढ नहीं जाना चाहती है। अब गीता शांत न रह सकी। क्योकि यह आक्षेप उसी पर सीधा आ रहा था। वह बोली- आप शायद भूल कर रही है, मैं तो तुरंत चल देना चाहती हूँ। फिर....... कृष्णा उलझती मी बोली । कुछ अन्य कारण भी हो सकते हैं, जो स्पष्ट नहीं किए जा सकते। दिवाकर ने फैसला सा कर दिया। कृष्णा चुप हो गई उसके पाम अब आगे कहने के लिए कुछ भी नहीं था। एक बोभिल सी चुप्पी तीनो के मध्य उतर आई थी। इम चुप्पी को भी दिवाकर ने तोडा, बोला वैसे मैं जाऊंगा ही, कुछ ७८ 0 कुआरी मलीव कारण यदि बन गए जिनके कारण मैं न जा मका तो बात और है। यदि गया तो शीघ्र ही जाऊंगा। यह मेरी ओर मे आश्वामन है । तुम्हारा अहित नहीं होगा । फिर कृष्णा इधर-उधर की बातें कुछ देर तक करती रही ओर आधा घटे उपगन्त उठ कर चली गई। सांझ तक तनाव का मा हो वातावरण बना रहा। गीता फूली-फूली घूमती रही। एक बोझ मा दिवाकर भी अनुभव करता रहा। दोनों ने एक दूसरे से बातचीत नहीं की। रात को सोते समय गीता ने मुह खोला। आप चण्डीगढ क्यो नहीं जाना चाहते है? दिवाकर मूक रह कर केवल गीता को देखता भर रहा । गीता ने फिर प्रश्नभरी निगाहों मे दिवाकर को घूरा, परन्तु दिवाकर केवल निगाहें चुराता रहा। एक तनाव बिखर उठा। फिर गीता ने ही दूसरा प्रश्न दुहराया- आपने उस पत्र के बारे मे भी अभी तक नहीं बताया, आखिर यह तनाव युक्त. रहस्य मय भीवन हम कब तक जीते रहेगे। दिवाकर मथते हृदय का नूफान लिए फर्श को अपलक घूरता रहा, उसमे बोलने का भी माहम नही रहा। वह क्या उत्तर दे ? इम ममय वह ऐसे चौराहे पर खड़ा था- जिमके एक मार्ग पर गोता थो, दूसरे पर नीता तो तीसरे पर सुबोध और चौथे पर मा आकर खड़ी हो गई थी। किसका पक्ष ले, किसका न्याय करे फिर वह स्वयं एक उलझी गुत्थी बन कर रह गया था, उमको वाणी इसी हृदय में मचल रहे तूफान मे कही खो गई थी। हारकर अतिम रूप से, मजल नयन लिए, कातर वाणी में गीता ने फिर कहा- क्या आप मुझे इतना ही अबोध समझते हैं कि आपको जिस बात ने इतना परिवर्तित किया है, उसे मैं महज ही लोगों की पर्चा का विषय बना दूंगी। मूक विचार ने अपना भीम आसन बदल कर तोड़ा-गीता, मैं जो कुछ कर रहा हूं, वह सब तुम्हारे भले के लिए कर रहा हूं। ठीक है कि मेरा स्वास्थ्य व परित भी गिर रहा है, लेकिन क्या करूं। परिस्थितियां ही ऐसी आ गई हैं, जिनके कारण मुझे यह सब करना पड़ रहा है और यह सब कुछ तुम्हें सहना पड़ रहा है। कुंआरी सलीब 0 गीता नै बात को बीच में काटते हुए कहा- आप जो कह रहे हैं, वह ठीक कह रहे हैं किन्तु क्या वास्तव में जो कुछ हो रहा है, यह इस योग्य नहीं कि उसे मुझेवताया जा मकै । खेर ठीक है, न बताइये परन्तु चण्डीगढ़ न जाने का कारण तो बताइये। आखिर मा का परिश्रम क्या यही निकल जायेगा। थोडा आवेश मे आकर दिवाकर ने कहा- क्या मा... मा... की रट लगा रखी । मा हो तो... और वह एक दम चुप हो गया मानो उमकी वाणी की पतंग हन्थ पर से कट गई हो। गीता तपाक बोली- आप फिर बात दना गए। आप आखिर माफ माफ क्यों नहीं कहते हैं ? क्या मा ने कुछ लिखा है ? यदि मा ने कुछ लिखा है तो फिर आप अब तक छुपा क्यों रहे है ? दिवाकर ने प्रत में निर्णय कर लिया। वह बोला- क्या माहम है तुममें, अपने पर लगाए गए आरोपो का मामना करने का ? गीता मे नारी सुलभ उत्सुकता जाग उठी। वह तडप कर बोली- आपने मुझे अभी ममझा नहीं. यह मेरे भाग्य की कितनी बडी विडम्बना है 1 कृपया पत्र दिखाएं और फिर देखिए कि मुझ मे माहम की कितनी गहराई है। दिवाकर को पत्र देना ही पडा। पढकर गीता कुछ देर तक गुमसुम बनी रहीं 1- जैसे किसी ने गीता को मन से शापित कर मूक कर दिया हो, फिर एक लम्बा हुकाग भर कर वह बोली- बम इमी के लिए परेशान थे। यह तो वृद्धा होती साम का मामान्य मा परिवर्तित होता मनोपरिवेश है। दिवाकर मुह वाय गीता को ताकना रहा। उसे इस बात को कभी भरोमा न था कि गीता अपने आप पर लगाए गए अकारण दोष को यू सामान्य समझ कर नकार जायेगी । अब उसे लग रहा था कि इतना जलने भुनने से बेहतर या कि प्रारम्भ मे ही सभी पत्रों को उसे दिखा देता परन्तु तुरन्त ही उसे अपनी भून का भान भी हो गया।' गीता एक लम्बे निश्वास के बाद बोली- आधा पत्र तो ठीक है परन्तु शेष भाग की भाषा समझामे नहीं आती। मां तो कभी ऐमें पन लिखती नहीं थी । कहीं यह हमारे परिवारो के मध्य किसी अन्य मारी या पुरुष का पड्यन्त्र तो नहीं और फिर एक बार पत्र को पुन. देखा तया उसझी सी एक हूंकारी भरी तया फिर कहा यह लेख मौर हस्ताक्षर तो मां बी का ही है। । २.Dकुआरी सलीम कुछ समय तक एक प्रखरने वाली चुप्पी छाई रही। अंत में गीता को खिलखिलाहट से मौन टूटा, सुनो मुझ पर यह आरोप तो इसलिए लगाया गया है कि आपने इस बार मा जी के कई पत्रों का उत्तर नही दिया है । हर मां अपने पुत्र को तो अन्छा समझती है, परन्तु पुत्र वधू पर शका करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझती है और यह है भी स्वाभाविक । रहा प्रश्न पत्र के अगले लेखो का तो बहुत सी बातो का उत्तर तो सरल है । शयद पड़ोम अच्छा न मिला हो, आपका अफसर ठीक न हो, या शायद उन्हे कृष्णा पर ही सन्देह हो, जिसका प्रमोशन आपके स्थानान्तरण के साथ साथ ही हुआ है। मां जी आखिर में एक अनुभवी महिला है। उनका इस प्रकार की शका करना थ्यथं ही नहीं है । शेष कुछ होगा। हमे व्यथं की चिंताओ को अपने सरो पर क्यो ढोना चाहिए। दिवाकर ने निवृति को एक श्वास ली और गीता के भोलेपन पर मुस्कुरा कर रह गया । तनाव का बादल छिन्न भिन्न होकर छितरा गया था और निवृति की मंद बयार वह उठी थी। क चण्डीगढ में आए हुए गीता को दो महीने से ऊपर हो गए थे। कोई विशेष घटना नहीं घटी थी। न तो मां ने ही गीता को कुछ बताया था और न गीता ही कुछ जान सकी थी। नीता ने भी अपनी भावुकता का परिचय नहीं दिया था। वरना प्रारम्भ के कुछ दिनों मे दिवाकर भय से विड़ित रहा था। मा का भी उसे सख्त आदेश था कि वह सुबोध तथा नीता के मध्य हो रहे मतभेद में न पड़े, अपने काम से काम से, फिर भी दिवाकर छिपे रूप से सुबोध से कई बार मिल चुका था। सुबोध ने भी स्वयं उससे मिलना जारी रखा था। नीता ने एक को प्रयास उससे मिलने के किए थे, परन्तु वह उनमे मा की सतर्कता और कृमारी मलीन D१ डर के मारे गफल न हो सकी थी। घर पर या ऑफिम मे यह मिलना नहीं चास्ती थी। इधर गीता की जिद चल रही थी कि वह नीता मे मिलना चाहती है, परन्तु न तो नीता ही गीना से मिलने की इच्छा थी और नही मा को ही ऐमी आज्ञा थी। उसे भय था कि कहीं भावुकता में आकर नीता सारा वह न उगल जाय, जिसे वह अब तक बड़ी कामत देकर अपने हृदय में दफन किए चला आ रहा है । मा की दूरदर्शी निगाहो ने नीता का रुभान उमकी और नोट किया था और उमी के फलस्वरूप वह पत्र लिखा गया था। इम प्रकार दिवाकर यही ही शाति से अपने जीवन को चलाने लग गया था। सुबोध और नोना के मध्य में क्या कुछ घट रहा है, उसका उसे विशेष पता नहीं था हालाकि सुबोध मिलता रहता था, परन्तु मुबोध का मिलना भी अब औपचारिक ही होता था। वह अपने ऊपर अब हमेशा एक रहस्य की चादर सी ओढे रहता था। कही न कही इस शाति के पीछे कोई तूफान मचल रह था किन्तु दिवाकर उमसे अनभिज्ञ था। सुबोध भी बचना चाह कर मिलता था और इमी प्रकार दिवाकर भी। लेकिन एक रोज अनहोनी घटना घट कर ही रही। मां की आज्ञा से और गीता की सेहत की तरफ एव रुचि को ध्यान में रखते हुए, वह इम रविवार को गीता के साथ पंजोर के मुगल उद्यानो मे सैर करने के लिए चला गया । वही पर एकाकी गीता मे मुलाकात हो गई । नीता ने हालाकि बडे ही सयत स्वर मे ही वार्तालाप किया था किन्तु वात को तो गीता के सामने खुलना ही था, मो किसी अन्य रूप मे वह गीता पर इशारे के रूप मे खुल गई। वार्तालाप कुछ हल्के-फुल्के रूप में इस प्रकार प्रारम्भ हुआ अरे दिवाकर माहब तो आअकल दूज के चाद हो गए हैं । ओह नीताजी आप,दिवाकर का सकपकाया स्वर अत मे और लड़खडा गया। वाह गीता जी भी हैं ! नमस्ते । नमस्ते। गीता का नम्र किन्तु संक्षिप्त उत्तर या अपने में सिकुडा सिमटासा । फिर एक प्रस्ताव किमी शात स्थान पर टिक वैठने का, जिसका अनुमोदन गीता द्वारा तपाक से हुआ और दिवाकर द्वारा वोझिलता से । आग्रकुजो के एकान्त मे नीता पुगनै सम्बोधन पर उतर आई जिससे गीता को बड़ा अटपटा सा लगा। वह अपने पति की कसमसाहट को भांपती है, नीना की त्वरा युक्त वाणी और फिसलती चितवन को आंबती है, और आंकती है ८२ कुमारी सलीव उसके रूप आमंत्रण को जिसमें छुपी छुपी वेकल सैक्म- अपील है। वह समझने का प्रयास करती है कि सुबोध में और नीता में कमी पट रही है। इस बीच शिकवे और शिकायतें प्रारम्भ होती हैं। दियू, तुम्हें चण्डीगढ़ आए बहुत दिन हो गए किन्तु घर पर नहीं आए, क्या मुझसे नाराज़ी है? इमको कहते समय गीता ने नोट किया कि नीता की सामान्य वेश भूपा में भी नीता के अंग अपना पूरा प्रदर्शन कर रहे थे । उमने नीता को प्रारम्भ से ही अच्छा नहीं समझा था । उसका यही रूप उमै पमद न आया था । समयानुकूल फैशन को वह बुरा नहीं मानती थी। इधर उमने दिवाकर की हरकतो को भी नोट क्यिा था कि वह दबी छुपी भूखी निगाहो मे नीता को देख लेता है, लेकिन वह चुप थी। दिवाकर ने बहुत ही संयत और सस्कारित भापा मे उत्तर दिया ममय न मिल सका नीता जी। अब क्यों आने लगे, जब वे स्वयं हो पहुंन जाते हो तो । नहीं, यह सब तो नहीं है। वही मब है, वही हांडी अन भी पकती है । फर्क है तो वम इतना ही कि अब हाडी रसोई के द्वार बन्द करके पकाई जाती है। दिवाकर वोला- क्या फिर तुम पर वही भूत मवार हो गया है। वह भूत तो अब देवता का वरदान है, देवता की पूजा है। लेकिन देवता की मूर्ति तो खण्डित हो गई है. तब भी। दिबू जी आप गल्ती पर हैं। देवता की मूर्ति कभी सण्डित नहीं होतो, आस्था के ही टुकड़े होते हैं । मूरत हो जय अशुद्ध होजाये तो किसी की आस्था क्यों न डगमगाएगी। गीता मैचारी उन दोनों की प्रतीकात्मक लडाई टुकुर टुकुर देख रही थी। वह अभी तक ममझे हुई थी कि सुबोध और नीता में आपमी मन-मुटाव पैदा हो गया है किन्तु इस वार्तालाप से ऐमा लगता था कि शायद कहीं इम मनमुटाब में तोमरा पक्ष भी है और तीमरा पक्ष वहीं उसके स्वयं को और वह अझ भय को मिहरन से सिहर उठी। वह उनके मध्य चल रही नोकभोक में अपने को फैमाना नहीं चाहती थी । कमसे कम इस स्थान पर तो नही हो, शिल ......- नीता ने उसे फेमा ही दिया । नारी नीता ने गीता की और ताककर कहा- क्यों गोताजी मैं गलत तो नहीं पह रही ? दिबू भी मूत्तिके आचरण के पक्षपाती है, जबकि आस्था तो अंतर्मन देखती है। गीता को उत्तर देना ही पडा। उसने तीखा व सक्षिप्त उत्तर दिया- भूगत तो आस्था के लिए सहारा है । वह सहारा ही टूट गया तो मास्था की नी। हिलनी ही चाहिए। नीता ने मरोप निगाह लिए कहा- और कही आपकी आस्था की मूरत चटक गई हो तो क्या आपको आस्था स्थिर रहेगी? दिवाकर सकपका कर रह गया। मोह नया पड गया। इस गीता और नीता दोनों ने नोट किया। गीता बोली- मूर्ति का चक जाना कोई बड़ी बात नहीं, उसके मूल निम्ब सुरक्षित हो तो मूर्ति को फिर से जोड़ा जा सकता है। नीना ने मुंह विचका कर कहा- आपकी दलोले अनुभव पर आधारित नहीं है. इसलिए उनमे ने वजन है न ठोम माधार । गोता भी अपने वक्तव्य से मतुष्ट न थी, बात को घुमाकर उसने एक प्रकार से नीता ही का समर्थन किया था, लेकिन बात को गीता ने गिरने देना मीषा न था। वह इम ममय सार्वजनिक स्थान पर थी । सस्कार युक्त मन उसे उलझने नहीं दे रहा था। उमने अध्यापन किया था और अध्यापन के क्षेत्र का व्यक्ति अपने तक को उल्टा सीधा करके प्रमाणित करने का प्रयाम करता है और उसका आदी होता है । उमने लम्बी श्वास लेकर कहा- मैं बहस को लम्बा नहीं करना चाहती है। इसका अर्थ है कि आप मुझसे सहमत हैं । किमी की मजबूरी उमकी सहमति तो नहीं हो सकती। यह एक सामान्य सा वहाना है। आप जैमी पडी लिखी नारी यदि वहम से इस प्रकार भागे तो फिर पढ़े लिमे व बिना पढ़े मे प्रतर ही क्या रहेगा। गोता थोड़े तीखे लहजे में बोली- मैं व्यक्तिगत प्रहम का स्थान ऐमा सार्व अनिक स्थान नहीं समझती। हम यहां घूमने आए हैं न कि वकीतों और नेताओं की तरह वहम करने। आप घर पाएं, आपका स्वागत है । नीता ने आमों में कडवाहट पोल कर कहा- जो यही बहस से किनारा करता है, वह घर पर क्या करेगा? २४ कुंआरी सलीब .
गीता ने उमी तीखेपन से उत्तर दिया- मैं ऐसे स्थान पर गम्भीर बहस को छिछोरापन समझती हूं। नीता ने यह मुनकर मषिणी सा बल खाया। ओठों को दातों से भीच लिया। उसके सुन्दर रसोले गुलाबी मोठों पर दो दातों के निशान गहरे लाल रंग में उभर आए और उसके रूप में और भी वृद्धि कर वह तुनकना चाह कर भी तुनक नमकी, किन्तु बुझी बुझी मी उठी और दिवाकर की ओर रुख कर बोली- अच्छा दिबूजी चलती हूँ। गोता को अपनी गलती का तुरन्त अहसाम हो गया। वह तो साफ हृदय वाली थी। उसे श पता कि इस वार्तालाप का गूढ प्रयोगन क्या था? उमने उठ कर नीता का हाथ पकड़ लिया और क्षमा याचना के स्वरों में बोली • नीता जी मैं जल्दी ही तैश में आ जाती हूँ । आशा है आप क्षमा करेंगी। नीता ने एक गहरा निश्वाम छोडा और बोली- दोप तुम्हारा नही गीता, दोप मेरा है । तुम्हे तो देवता सीधा सच्चा हो मिला है। तुम भाग्यशाली हो । गीता ने उसी सन्दर्भ में कहा- नीता जी हम भारतीय नारिया हैं हमें अपनी मूर्ति के साथ ही आस्थावान बन कर जीना होता है । आपकी और मेरी बातों मे शब्द भेद हो सकता है, मर्यान्तर नहीं। तुरन्त नीता के चेहरे पर एक चमक आई तथा दोनों ने अपने शब्दो पर ज्यो ज्यों गौर किया तो पाया कि वे बिना वजह ही लड़ रही थी। पहले मुस्कराई और फिर दोनों ही खिलाखिला कर हम पड़ी। दिवाकर भो वकका बना इम परिवर्तन को देखता रहा । अन्त मे नीता ने भी अपनी गलती मान कर क्षमा याचना की कि उसे भी वहम को सार्वजनिक स्थान पर नही छेडना चाहिए था। इसके कभी कभी भयंकर परिणाम निकल आते हैं। नीता अपनी मजबूरी बता कर चली गई । नीता के जाने के बाद, गीता ने जलती दृष्टि से दिवाकर को ओर देखा और कई मेकण्ड तक उसे निनिमेष देखती रही। एक भयंकर बोमिल चुप्पी, उम जन संकुल स्थान पर भी उन दोनों के मध्य तर आई शान्ति से गुजर जाने के बाद गोता ने निर्विकार दृष्टि में कहा चलिए हम भी अब चलें । यहां मन नहीं लगेगा। दिवाकर ने निरीह दृष्टि से गीता को देखा, किन्तु रोप का आधिपत्य देष पर यह चुप रहा और उठ खड़ा हुआ। - पुआरी सलीव ०५ नीता ने गीता को और नाककर कहा- बयों गीताजी में गलत नो नही वह रही ? दियू जी मूतिके आचरण के पक्षपाती हैं, जबकि आस्था तो अंतर्मन देखनी है। गीता को उत्तर देना ही पड़ा । मर्न तीया व सशिप्त उत्तर दिया- मूरत तो आस्था के लिए महारा है । यह सहारा ही टूट गया तो आस्था की नीवे हिलनी ही चाहिए। नीता ने गरोप निगाह लिए कहा- और कहीं आपको आस्था की मूरत चटक गई हो तो क्या आपकी आस्था स्थिर रहेगी ? दिवाकर मकपका कर रह गया। मोड नया पड़ गया। इसे गीता और नीता दोनो ने नोट किया । गीता बोली- मूर्ति का चटक जाना कोई बड़ी बात नहीं, उसके मूल बिम्ब सुरक्षिन हो तो मूर्ति को फिर से जोड़ा जा सकता है । नीना ने मुह विचका कर कहा- आपकी दलीलें अनुभव पर आधारित नहीं है, इसलिए उनमे न वजन है न ठोम आधार । गीता भी अपने वक्तव्य से संतुष्ट न थी, बात को धुमाकर उसने एक प्रकार से नीता ही का समर्थन किया था, लेकिन बात को गीता ने गिरने देना मीखा न था। वह इस ममय सार्वजनिक स्थान पर थी । सस्कार युक्त मन उसे उलझने नहीं दे रहा था। उसने अध्यापन किया था और अध्यापन के क्षेत्रका व्यक्ति अपने तक को उल्टा सीधा करके प्रमाणित करने का प्रयास करता है और उमका आदी होता है । उमने लम्बी श्वांम लेकर कहा- मैं बहस को लम्बा नहीं करना चाहती हूं। इसका अर्थ है कि आप मुभसे सहमत हैं । किसी की मजबूरी उसकी सहमति तो नही हो सकती। यह एक मामान्य सा बहाना है । आप जैसी पढी लिखी नारी यदि बहस से इस प्रकार भागे तो फिर पढे लिखे व बिना पढे मे अतर ही क्या रहेगा। गीता थोडे तीखे लहजे में बोली- मैं व्यक्तिगत बहम का स्थान ऐसा सावं. जनिक स्थान नहीं समझती। हम यहा धूमने आए हैं न कि वकीलों और नेताओ की तरह बहस करने । आप घर आएं, आपका स्वागत है । नीता ने आंखों में कडुवाहट घोल कर कहा- जो यही बहस से किनारा करता है, वह घर पर क्या करेगा? ८४ 0 कुंआरी सलीव गीता ने उमी सोखेपन से उत्तर दिया- मैं ऐसे स्थान पर गम्भीर बहस को छिछोरापन समझती हूं। नीता ने यह मुनकर मरिणी सा बन खाया। ओठों को दातों से भीन लिया। उसके सुन्दर रसोले गुलाबी ओठों पर दो दातों के निशान गहरे लाल रंग में उभर आए और उसके रूप में और भी वृद्धि कर वह तुनकना चाह कर भो तुनक नमकी, किन्तु बुझी वुझो मी उठी और दिवाकर की ओर रुख कर बोली- अच्छा दिबूजी चलती हूं। गीता को अपनी गलती का तुरन्त अहसाम हो गया । वह तो साफ हृदय वाली थी। उसे या पता कि इस वार्तालाप का गुड प्रयोजन क्या था? उसने उठ कर नीता का हाथ पकड़ लिया और क्षमा याचना के स्वरों में बोली- नीता जी मैं जल्दी ही तैश मे आ जाती हूं । आशा है आप क्षमा करेंगी। नीता ने एक गहरा निश्वाप छोडा और बोली- दोष तुम्हारा नही गीता, दोष मेरा है । तुम्हें तो देवता सीधा मचा ही मिला है। तुम भाग्यशाली हो । गीता ने उसी सन्दर्भ में कहा- नीता जी हम भारतीय नारियां हैं हमें अपनी मूर्ति के साथ ही आस्थावान बन कर जीना होता है । आपको और मेरी बातों में शब्द भेद हो सकता है, अर्थान्तर नहीं । तुरन्त नीता के चेहरे पर एक चमक आई तथा दोनों ने अपने शब्दों पर ज्यो ज्यो गौर किया तो पाया कि वे बिना वजह ही लड़ रही थी। पहले मुस्कराई और फिर दोनों ही खिलाखिला कर हंस पड़ी। दिवाकर भौचक्का बना इम परिवर्तन को देखता रहा । अन्त मे नीता ने भी अपनी गलती मान कर क्षमा याचना की कि उसे भी बहस को सार्वजनिक स्थान पर नही छेड़ना चाहिए था। इसके कभी कभी मयंकर परिणाम निकल आने हैं। नीता अपनी मजबूरी बता कर चली गई। नौता के जाने के बाद, गीता ने जलतो दृष्टि से दिवाकर की ओर देखा और कई सेकण्ड तक उसे निनिमेष देखती रही। एक भयंकर बोभिल चुप्पी, उस जन मंकुल स्थान पर भी उन दोनो के मध्य तर आई शान्ति से गुजर जाने के बाद गोता ने निर्विकार दृष्टि में कहा चलिए हम भी अब चलें। यहां मन नहीं लगेगा। दिवाकर ने निरीह दृष्टि से गीता को देखा, किन्तु रोप का आधिपत्य देव कार यह चुप रहा और उठ खड़ा हुआ। कुमारी सलीब ८५ रात को गीता ने सीधा प्रश्न किया । वह अब दिवाकर से कम झिझकने लगी थी। नारी की जुबान एक बार बेलगाम हो जाय तो फिर काबू में कम आती है और कही साईस ढीला हुआ तो फिर लगाम का होना न होना सब बेकार होता है । इन दिनों गोता भी खुल गई थी- आपका नीता से क्या सम्बन्ध है ? दिवाकर काम कर रह गया । परन्तु इस ममय उत्तर देना ही था अत: वह भी उसी तीखे अन्दाज में बोला- जैमा भी तुम समभो । मुझे तो दाल मे काला नजर माता है । साफ साफ कहो ना यही कि प्रापके सम्बन्ध कही उमसे गहरे हो गए हैं । कैमे गहरे ? प्रेमिका से...... जैसे कही गर्जना के साथ भयकर बिजली गिरी हो । दिवाकर एक दम सहम कर काला पड गथा । फिर वह क्रोध से काप उठा, उसका हाथ गीता पर उठा, परन्तु उठा का उठा ही रह गया। यह उमके अन्तरमन के भाव का नग्न सत्य था, जहां वह भूले बिसरे नीता को प्रेमिका के रूप में देख लेता था। गीता की मच्चाई ने ही उसे मारने से रोका था। गीता ने भी दिवाकर का यह विकराल रूप देखा, वह भी सहम गई, किन्तु वह नारी थी। जो काटा उसके चुभा था, उसकी पीर तो वही जानती थी। फिर नारी शूल को चुभाए रखना पसद नहीं करती, यह तो पुरुष ही होता है जो शूल का नासूर बना लेता है । एक तीखा मौन दोनों के मध्य व्याप्त था। अचानक इम मौन को गीता की फूट पड़ी रुलाई ने तोडा । दिवाकर इसी की प्रतीक्षा मे था । वह जड़ बना कुछ समय तक बैठा रहा। अचानक फूट पड़ा रुलाई का वेग भी अचानक ही रुक गया और सुवकते हुए गीता ने कहा- आप बोलते क्यो नही । बाग मे आपकी निगाहो मे जागी भूख को मैंने परखा है । पुन गीता की वाणी प्रखर हो गई । दिवाकर ने अब कुछ भी छिपाना उचित न समझा, लेकिन वह उसे प्रती- कात्मक ढंग से ही समझाना चाहता था वोला- गीता पुरुषो पर आक्षेप स्त्रिया लगाती ही आई हैं। इसमें तुमने कोई नई बात नहीं की, लेकिन तुम जैमी पढी ८६ कुंआरी सलीब लिखी, जो थोडा बहुत मनोविज्ञान का भी ज्ञान रखती हो, इस परिवर्तन का तर्क पूर्ण पोस्टमार्टम किए बिना, इस प्रकार फट पड़ेगी, इमसे मेरे मन को बहुत ठेस पहुंची है । तुम स्वयं निर्णय कर लेना कि मैं नीता का प्रेमी हूं या नीता मेरी प्रेमी है । फिर तुमने अपनी कमियां भी नहीं खोजी, जिनके विश्लेषण से तुम यह जान पाती कि यदि मेरा रुझान हुआ हो, तो क्यों कर? गीता नम्र स्वर मे बोली- लेकिन पया मुझ में कोई कमी आपने पाई ? गीता तुमको सीधे रूप में कहना तो बर्र के छत्ते मे हाथ देने के समान हैं। मैं तुम्हे बता रहा हूँ कि एक पलि को क्या क्या होना चाहिए । सब समझ लेना कि तुममे खामी थी या मुझमें । गीता एक पनि पति के लिए न केवल पत्ति ही होती है वरन् वह उसके लिए ममप ममय इन रिश्तों के से कार्य और स्नेह प्रदान करती है उसे बहिन, मा, अनुभवी सलाहकार, मच्चा मित्रा और वेश्या. . क्या ? अनायाम ही गीता के मुख से निकल पड़ा। वह वेश्या के नाम मे चौंकी थी. बोली मलाहकर, मिन का रूप तो समझ में आया, किन्तु आपने उमे पति को मा बहिन कैसे बना दिया और फिर उमे वेश्या भी यह नही है कि भुनो- मां का पवित्र स्नेह उमे पति को भोजन कराते समय, रोग में और निराणा काल में, पति पर विखे रना चाहिए । बहिन का निष्कपट स्नेह उसे जब पति को प्रदान करना चाहिए, जब उमे बलिदानी स्नेह की आवश्यकता हो । अपने को नष्ट कर भाई को जीवित रखने की मी भावना भी पति के प्रति पत्नि में रहनी चाहिए । वेश्या उसे रतिकाल में बनना चाहिए, जिससे उमका पुरष जो भंवरा प्रकृति का होता है उमी मे लिपटा रहे लेकिन इसका वह उभे कर्मक्षेत्र मे हटा दे। नारी का आकर्षण ही तो उमे बाधे रहता है। इमलिए पनि को रतिकाल में हर प्रकार से वैश्या के गमान अपनी भोर आकर्षित रखना चाहिए। कुछ देर शात रह कर वह बोली- यह तो ठीक है मुझमे इनमें से बहुत पया हैं या होंगी। हां नीना का अंग प्रदर्शन पर अपना अधिकार है. वह कुछ भी करे । पुरुप उसकी ओर देखने को बाध्य हो जाता है, किन्तु आपका झुकाव उसकी और इतना क्यों है ? आप इतने क्यों बदले ? जब कि आप स्वयं ही कहा करते थे कि पुरप तो गम्भीर सायर है । कुआरी सलोद 0 ८७ गीता, में अधिक गहराई में जाकर तो तुम्हे बताऊंगा नहीं। इतना समझ लो कि हर प्राणो अपने वर्तमान से सुश नहीं है। वह छटपटा रहा है कुछ नए के लिए और नया बनना उसके मंस्कारों पर आधारित है। मैं समझी नहीं। गीता ने शंका की। गीता समझना भी नहीं, नहीं तो जीवन दूभर हो जायेगा । जब यह समझ जागती है तो फिर प्रतिपल मनुष्य गिरगिट बना फिरता है। यही भूख सुबोध और नीता के मध्य जागी थी। आप भी तो थोड़ा जगे हैं, गीता ने थोडा विहस कर कहा । शायद । और दिवाकर ने चर्चा को आगे गोल ही रखना उचित समझा। गीता ने फिर कुछ बोलने के लिए मुह खोला तो दिवाकर ने उसे रोकते हुए कहा- बम गीता मैं इससे अधिक कुछ भी स्पष्ट नहीं कर सकता । समय ही इन रहस्यमय गुत्थियो को सुलझाएगा। गीता ने भी क्षमा याचना की दृष्टि से दिवाकर की ओर ताका और दिवाकर ने भी क्षमा किया ऐसा भाव प्रदर्शन कर गीता को अपने अंकमें भरलिया । १० सर्दी की अलसाती एक सुबह में, कुछ दिन बाद ही सुबोध ने दिवाकर को या जगाया। इस समय तक न तो गीता ही उठी थी न मां ही। बाहर की सर्दी से सुबोध यदाकदा कांप जाता था । उसने जो समाचार दिए, वे इतने भयानक थे कि दिवाकर इस सर्दी मे भी अपनी पेशानी पर पमीना अनुभव करने लगा। दिवाकर अंदर आया तो उसने देखा कि गीता बड़े बेढगे रूप मे सो रही थी। यह उसके यज्ञ की पूर्णाहति थो । उसने एक मार्मिक दृष्टि से उसे देखा और कमरे से जितना धन वह एकत्रित कर सकता था, किया, कपड़े पहिने और बाहर निकल आया। ८८० कुआरी सलीब सुवोध के मकान पर जैसे मनहूसियत माकार हो उठी थी। श्यामा बुझा- बुझा मा बैठा था । आंखो में लाल डोरे चमक रहे थे, जैसे वह सारी रात रोया हो। दिवाकर ने उडती हुई निगाहों से देखा और सुबोध के कान में कोई बात कही । वह वही शौचादि से निवृत्त हुआ । नहाकर जब वह चलने लगा तो सुबोध ने उसे एक मोटा सा लिफाफा देना चाहा, जिसे दिवाकर ने आखो ही आखो मे धुडकते हुए लोटा लेने के लिए इशारा किया । ११ सुबह जब मूर्यवती उठी तो दिवाकर का कमरा खाली देखकर ठिठकी परन्तु यह सोच कर कि शायद दिवाकर जल्दी ही उटकर धूमने चला गया है, चुप रही, लेकिन दिवाकर जब गीता के उठने के समय तक भी लौट कर नहीं आया तो वह शंकित हो उठी,लेकिन फिर भी उनको दैनिक दिनचर्या में कोई अतर नही आया । लेकिन दिवाकर को न आना था सो माझ तक न आया । दोनो सास बहू अब चितित हो गई कि आज तक तो दिवाकर बिना कहे कही इस प्रकार गया नहीं । फिर आज कहा चला गया। दिन में उसके कार्यालय से भी पूछने का ध्यान न रहा । सूर्यवती उमी समय दिवाकर के अधिकारी के घर चली गई । वहा भी अधिकारी से पूछने पर उत्तर मिला कि वह तो आज कार्यालय आया ही नहीं । न उसने किसी प्रकार का प्रार्थना-पत्र मिजवाया है जबकि ऐसा कभी नहीं हुआ। वे स्वय चितिन थे। दिवाकर के अधिकारी वडी ही शात प्रकृति के व्यक्ति थे । अनुभव की रेखाएँ एक एक कर उनके मुख पर घनी हो गई थी। सेवानिवृत्ति का समय भी निकट था इसलिए अब वे अधिक गम्भीर हो गए थे, दिवाकर के बारे मे उनके विचार बड़े संतुलित और सुलझे हुए थे वे उसे उत्तरदायित्व के प्रति जागरूक और परिश्रमी युवक मानते थे । वे भी चिंताकुल स्वर मे पुनः बोले- वह इस प्रकार कभी - कुंआरी मलीब D६ नहीं जाता था । लगता है उसके इस प्रकार जाने में कोई भयंकर बात है। आप घर जाकर उसकी पत्नि से तो पूछिए । सूर्यवती कुछ कहना चाह ही रही थी कि उसने अपने को रोक लिया और अनमने ढग से उठकर चली आई। घर पर गीता से ही उन्होंने आकर पूछा- बहू कहीं तुममें कोर्ट अनबन तो नहीं हो गई। गीता ने आश्चर्य चकित हो कर रहा- झगडा, ऐमी बात कैसे हो सकती है । आजकल तो वे बहुत ही सौम्य व शात रहते हैं। मुझे कभी कभी क्रोध न करने की सलाह देते रहते हैं। मूर्यवती छत की और ताकने लगी । रात घिर आई थी। वे पुन जाने के लिए उठी तो गीता ने रोक कर कहा- इस समय आप बाहर न जायें, सर्दी विकट पड रही है । कही मर्दी लग गई तो लेने के देने पड जायेंगे । वे किसी कार्यवश ही बाहर चले गए हैं, आते ही होंगे। सूर्यवती को आशा जागी वह बोली- जा उमके कमरे में देख । शायद वह कुछ सूचना लिख कर रख गया हो । फिर वे कपाल पर हाथ मार कर बोली.निगोडी नीद भी आज गहरी आई। वरना जब घण्टी टनटनाई थी, तभी उठ जाती तो मब समझ में आ जाता। गीता ने कमर की सामान्य,असामान्य सभी जगह देख शली, किन्तु कुछमी न मिला। हां जो दिवाकर की आलमारी में दो सौ से ऊपर धन रखा था । वह नहीं था । अब गीता का माया ठनका कही वे लम्बे तो नहीं निकल गए । वह जड बनी मोचने लगी। पिछले वर्ष की मारी घटनाए चलचित्र की भाति उमके मामने गुजरने लगी। वह ज्योज्यो इस चित्रावली मे उलझती गई । उसको स्वयं पर ही ग्लानि आती चली गई। पंजोर की घटना ने उसे विश्वाम दिला दिया कि हो न हो वे नीता इससे आगे वह सोच नहीं सकी कि उसकी आखो के आगे अधियारी छा गई। वह गिरने ही वाली थी कि अन्दर आती हुई मूर्यवती ने उसे सम्हाल लिया । गीता अधिक देर बेहोश न रही। पडोम में ही डॉक्टर रहते थे, मूर्यवती की आवाज पर वे तुरन्त चले आए । गीता के ठीक होने पर वे निर्देश दे गए कि उममे अधिक बातें न की जायें। इसको कोई हल्का सा मदमा लगा है, साथ मे यह कमजोर है ही। । -- १०० कुआरी सलीय गीता फटी-फटी निगाहों से छत को धूरती रही उम रास सूर्यवती भी न सो सकी। सुबह शीघ्र ही जब वे उठकर चलने लगी तो गीता ने अवरुद्ध कण्ठ से पूछा- कहा जा रही है ? सूर्यवती चलते चलते बोली- मैं सुबोध के घर जा रही हूं। बुझे स्वर में गीता बोली- आपको वहा से भी निगश लौटना पडेगा। अब तक सूर्यवती बाहर निकल चुकी थी । शब्द उनके कानो में पड़ चुके थे, किन्तु वे रुकी नहीं। सुबोध के घर पर तो आलम ही और था । न वहा सुशेध था, न नीता और न दिवाकर हो । प्रायः सभी कमरो पर ताले लगे हुए थे । केवल वहां श्यामा मौजूद था । श्यामा का हाल बुरा था । वह अधबूढा जो इस घर में सदैव हमी-खुशी का वातावरण ही देखता आया था, प्राज वहा की अवस्था और मुर्दनी से अधमरा हो गया था । वह कही बहुत बुरी तरह से टूट गया था । मूर्यवती ने उसी से पूछा- यह मैं क्या देख रही हूँ। और श्यामा की थोड़े समय से रुकी रलाई फूट पडी। वह रुलाई के मध्य ही बोला- कल बहुत ही......सुबह दिवाकर साहब आए थे। मालिक ही शायद उन्हे लिवाकर लाए थे। फिर नहा धोकर न जाने कहा चले गए । मालिक बाबू सारा घर बन्द कर गए हैं और मुझे कह गए हैं कि जब तक हममे से कोई न लौटे तब तक यही रहना । सूर्मवती ने गम्भीर होकर कहा- दोनो मे से किसी ने, किसी म्यान का । नाम बताया। .. किमी ने नहीं बताया । श्यामा रुआंसे स्वर में बोला- किन्तु लगता है कि दिवाकर बाबू दिल्ली की ओर गए हैं और मालिक शायद शिमला की भोर . शिमला की ओर...क्यो ? सूर्यवती ने शंका की। अरे आपको पता नहीं। शिमला में एक दूर के रिश्ते की बिटिया की मोसी रहती हैं। अरे तो क्या नीता भी कही बाहर गई हुई है। जी ........। जैरे श्यामा फिर रो पडेगा ऐमे स्वर में बोला- बिटिया का तो परसों से ही पता नहीं है । पता नहीं वो कहां चली गई है कुआरी सोम ०९ और आखो में तैर आई नमी को ध्यामा ने अपने कुत को बाजू मे पाहा। सूर्यवती फिर वहा नही रुकी और तीर की मी तेजी से निकल गई। हाफती हुई घर पहुंची तो गीता को जाग्जार रोती हुई पाया । वे तीसे मादो मे बोली- मुर्खा इसमे रोने की क्या बात है ? अपने को मयत करके रख । सुवोध और नीता के मध्य कोई बड़ा मन मुटाव हो गया है। उमे सुलझाने ही वह गया है। मैं दिल्ली जाती हू तू मम्हल कर रहना । दिल्ली का नाम सुनक २ गीता खडी हो गई और रुधे गले में बोली- मैं भी चलू गी। सूर्यवती ने उसे झिडका तो गोता ने उनके पर पकड लिए और कातर स्वर में बोली- मैं जरूर चलू गी। सूर्यवती गीता का दृढ निश्चय टाल न सकीं। १२ दिवाकर बारह बजे तक दिल्ली आ गया । यह आ तो गया,, विन्तु नीता को इस महानगरी मे इ दे कहा ? फिर रह रह कर एक शका उमके मन मे कौंध्र जाती थी कि कही उमने आत्म.... और वह इससे आगे को कल्पना नहीं कर पाता। एक झुरझुरी उसकी रीढ मे रेंग जाती। दिवाकर की आखो के आगे नीता का आमन्त्रण देता, घृणा और प्रेम के झूले पर झूलता, मुखड़ा नाच उठता। वह माथा थाम कर रह जाता। दिवाकर ने फिर भी साहम नहीं छोड़ा। यह तो उसे पता ही था कि नीता यदि कहीं ठहरी होगी तो किसी अच्छे होटल मे ही चाहे वह बड़ा न हो, हो शात व अच्छा । वह अपने को बदल रही थी, किन्तु अच्छी वस्तुओं के प्रति उमका रुझान अभी मिटा न था । इसलिए उसने अपने एक साथी मिस्टर वर्मा से सम्पर्क स्थापित कर पूछा कि क्या वह उसे अपने कार्यालय मे टेलीफोन की सुविधा प्रदान ६२ कुंआरी सलीव करवा सकता है। उसे इच्छित उत्तर मिला। मित्र का गर्मागर्म आमन्त्रण भी । वह मोधा मित्र के कार्यालय पहुंचा ! उसका मित्र जन सम्पर्क कार्यालय में एक किमी विशिष्ट पद पर था । जाते ही उमने वहा. पहले मुझे टेलीफोन और टेलीफोन डायरेक्ट्री दिलवाओ। भौचक्का मा वर्मा दिवाकर का मुंह देख रहा था। दिवाकर के चेहरे पर हवाइया उड रहीं थी, इममे वह उद्वेलिन हो गया, लेकिन उसके तेवर देख कर सहम गया । टेलीफोन व डायरेक्ट्री उमके हवाले करते हुए वर्मा बोला- मैं घर माकर तुम्हारी भाभी को मूनना कि दिवाकर आया है जिमसे तुम्हारी पेट-पूजा का प्रबन्ध हो । वह जाते जाते चपरामी से कह गया कि जब तक ये साहब न कहे अन्दर किसी को मत जाने देना। दो घण्टे के लगातार प्रयल के बाद दियाकर अपने प्रयत्न में सफल हो गया । नई दिल्ली के एक बहुत ही माधारण होटल मे उसे नीता का पता मिल गया। जैसे उसके मर से एक बोझ उतर गया हो । उमने लगे हाथों ही सुबोध को शिमला के कॉल कर दिया। उसे सूचना दी कि यह यथाशीघ्र चला आये । इमी सब में उसे चार बज गए। जब वह बाहर आया तो पाया कि वर्मा बैठा बैठा बोर हो रहा था । अब उसके मुख पर प्रफुल्लता देख कर वह आश्वस्त हुआ। दोनी मित्र अव मिले, जैसे पहले मिले ही न थे और फिर बातों को बाढ में बह गए । सांझ को खाना खाकर दियाकर उस होटल की ओर चला गया । वर्मा से कह गया कि आया तो जल्दी लोटूगा अन्यथा नही ही। सांझ के छुटपुटे मे ही वह होटल पहच गया । होटल पो तो सामान्य ही किन्तु बड़े ही शात एकांत स्थान पर थी । दिल्ली का शोर शराबा वहां अधिक नही था। काउण्टर पर एक पकी उम्र की महिला बैठी थी । उसी से नीता का कमरा उसने पूछा । उसने दूसरी मजिल के कोने वाले कमरे का नाम लिया। कमरे का द्वार उढका हुआ था। दिवाकर ने नीता को चौंका देने की दृष्टि से एक दम भड़ाक से दरवाजा खोल दिया। नीता द्वार की ओर पीठ किए बैठी थी। वह न चौंको हो न मुडी ही । दिवाकर सकपका कर खड़ा रह गया । उसे नीता से यह भागा न यो । तुरन्त हो एक विचार तेजी से उसके मस्तिष्क में पौधा कहीं नीता ने कुछ कर तो नहीं लिया, परन्तु तुरन्त ही उसके विचार को बाधा पहुंची। कुमारी सतीय D१३ नीता ने गम्भीर वाणी मे कहा-दियू ! यम फेंगे गए, आमओ मैं तो दो दिन मे तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही थी। तुम मुझे चौंकाना चाहते थे। यह कहते हुए धूम गई। दिवाकर की आंखें नीता की वेशभूपा देवकर दंग रह गई। हालांकि कपडे स्वच्छ सफेद थे, परन्तु पहनने का ढग बडा ही पीलिंग था । श्वेत वस्त्रो में नीता ने सेक्स-अपील को बडे तीये अन्दाज में पैदा किया था। दिवाकर महाशय ठगे से पड़े रह गए। नीता मुस्कुरा कर बोली- क्या पूर-पूर कर देख रहे हैं । आप लौटाने आए है मुझे, तो बैठिए तो सही । दिवाकर मिभकता सा पास की घाट पर बैठ गया। यह नीता से इतना अभिभूत हो गया था कि वह बोल भी न सका । मौन मानों असहाय बना लटक गया हो । धीरे धीरे दिवाकर ने अपने को संयत किया। वह बहुत धीरे से बोला- नीता क्या मुझसे तुम कुछ बात कर सकोगी? नीता बोली- वात अरूर कगी। कुछ नहीं बहुत सारो, परन्तु पहले पह बताइये कि आपके पास समय भी है या नहीं? दिवाकर बोला- समय तो है, किन्तु...... किन्तु, परन्तु कुछ नही । घबराइये नही, एक अलग कमरा भी भापके लिए ले लिया है। पहले आप खाना आदि खा लीजिए, फिर थोड़ा विश्राम कीजिए, इसके उपरांत बातें होगी। दिवाकर नीता के इस बदले हुए सम्बोधन से चौंका, फिर मुस्करा दिया, बोला- खाना तो खाकर आया हूं, इसके लिए तकल्लुफ न करें। नी बिना कुछ कहे नीचे चली गई। लगभग पांच मिनिट मे नीता वापस आ गई । उसने आते ही दिवाकर को आदेश दिया कि वह कपडे बदल कर, आराम से कम्बल ओढ कर बैठे, सर्दी जोरों से पड़ने लगी है। दिवाकर हंस दिया, बोला- आप तो इस प्रकार आदेश दे रही हैं, जैसे आप अपने घर मे बैठी हों या मैं अपने घर में बैठा होऊ। नीता हंस कर बोली- मैं ठीक कह रही हूं। आपने जो गर्म कपड़े पहने है, उन्हे तो उतारेंगे ही। ६४ 0 कुंआरी सलीब हारकर दिवाकर ने अपनी जाकेट उतारी मफलर को खोल कर रखा तथा कम्बल को अच्छी तरह से परों पर लपेट कर बैठ गया। नीता भी उसी खाट पर, उमी कम्बल के दूमरे सिरे मे पैर लपेट कर बैठ गई । दिवाकर को बड़ा बुरा लगा। वह भयभीत निगाहों से नीता को देखने लगा । नीता ने प्रत्युत्तर में मुम्बुग कर कहा- घबरा क्यो गा! आप । क्या मैं कोई हिंस्र पशु हूं? दिवाकर कुछ बोला नही, एक ओर मिमिट सा गया । यह विचारता हुआ द्वार की ओर देखने लगा, जैसे कि वह बुग फंम गया हो । नीता ने उसके और अधिक निकट माते हुए कहा- आप बहुत घबरा रहे हैं । खाना खाने के बाद अपने कमरे में विश्राम कर मकते है । द्वार की ओर देश कर न झिकिए। कोई आप पर उंगली भी नही उठा सकता, मुबोध भी नहीं । क्या मतलब ? दिवाकर चौका क्योकि 'सुबोध भी नहीं' पर विशेष व्यग्यात्मक भार दिया था नीता ने । अरे आपको सुबोध ने नहीं बताया । नहीं तो। ओह । और नीता कुछ देर के लिए गम्भीर हो गई, फिर बोली- खैर मुबोध आप पर अविश्वास कर सकते है, मैं नही । माखिर बात क्या है ? दिवाकर अपनी उत्सुक्ताको नहीं रोक सका। मेरे और सुबोध के मध्य तलाक हो गया है । जैसे कोई भयंकर बम फटा हो, ऐसे चोक कर दिवाकर एक ओर मरका और गिरते गिरते बचा । फिर सम्हल कर बोला आखिर कब ? बड़े ही सहज स्वर में नीता बोली एक सप्ताह पूर्व ही तो। दिवाकर नीता के इतने सहज स्वर से चौका । इतना बड़ा काण्ड हो गया और नीता इतनी महज है कि वह इमकी कल्पना भी नहीं कर पा रहा था। उसने फिर पूछा- फिर तुम घर छोड़ कर क्यो आई ? वह तो तुम्हारी निजी सम्पत्ति था । हम कर नीता बोली- आप क्या समाते हैं कि मैं मुबोध को दर दर का भिखारी बना देती। मैं यह नहीं कहता। उसका अपना अलग व्यापार हो गया है, तुम्हारा अलग, वह तो घर किराये पर भी ले सकता था। कुबारी मनीय ०६५ नीता ने जलती निगाहो में दिवाकर को देखा और धोनी- वे मुझे न चाहें, आपिर थे तो मेरे पति ही । इतनी फर तो मैं नहीं हो सकती। फिर गलत ममगी। मैं र बनने को यात नहीं करता। प्रश्न है तुम्हारे यहा से अचानक पलापन का ? मैं उस वातावरण में नहीं रह सकती थी जबकि सुबोध यहां टिके हुए थे। अब दिवाकर को समझ में आया कि सुरोध की बेशर्मी अधिक थी। वह बोला- लेकिन तलाक लिया क्यों और किमने लिया। सुबोध ने लिया, लिया इसलिए कि आपका निर्देश था । दिवाकर के काटो तो मून नहीं । अब उमे लगा कि उसके पत्र का परिणाम है यह जो अब मामने आया है। धोला- आप दोनो ने मेरे पत्र का गलत अर्थ लगाया। दोनो ने नही, फेवल सुबोध ने । दिवाकर ने एक ठण्डी स्वास पीची और सर झुकाकर बंट गम। इतने में वेयरा पाना ले आया। नीता सभी कुछ भूलकर बोली- अच्छा अब मनहमियत छोडिये खाना . खाइये । तलाक हुआ चलो बला टलो । राजीनामा होना हो तो भी बला टले । खाना तो खा ही लेना चाहिए, आइये और नीता ने दिवाकर झंझोड दिया । वेयरा दुबारा आया था, पूछने लगा- क्या एक जगह और खाना लगा कर लाऊ। नीता ने सस्त स्वर में कहा- मैंने एक ही थाल के लिए कहा था, तब मुना नहीं था-क्या । जाओ पानी और सब्जियो का प्रबंध अलग अलग कर लाओ। दिवाकर बुझेमन से बोला- नीता में खाना खाकर आया हू, विश्वास करो। नही, खाना तो खाना ही होगा, चाहे खाकर आए हो या नहीं। नीता मानो, खाकर चला हूं। तो इसका मतलब कि मुझे भी भूखा रहना होगा। लीजिए मैं भी नहीं खाती। नीता रूठी मी बैठ गयी। दिवाकर बोला- ओह आप बहुत जिद्दी हैं । मैं खाकर आया हू । फिर भी पाप मेरे कहे का विश्वास नहीं कर रही। चलिए उठिए, खाना खा लीजिए । - ६६ 0 कुंआरी सलीव तो क्या नही मैं नही खाऊंगी, जब तक आप न खायेंगे । अच्छा बाबा तुम्हारा साथ दे दूंगा। चलो एक प्लेट अलग से मगवा लो। अछूत हूं जो अलग से प्लेट मगवा लू। मेरे माथ नहीं खाना हो तो, वैसे कहिए फिर साथ खाया भी तो है । भई, नीताजी तब बात और थी, तब सुबोध रहता था। तो क्या अब सुबोध के न रहने से मैं अछूत हो गई हूं। हार कर वह उसी के साथ खाना खाने बैठ गया। खाने के बाद बहुत देर तक बातें होती रही। सुबोध के तलाक से नीता खुश भी थी और नही भी थी । वह अपने को मुक्त अनुभव कर रही थी। बातो ही बातों में वह बहुत खुल गई। दिवाकर से सटकर ही बैठी रही। कभी उसके कधे पर सर रख देती कभी बड़ी प्यासी निगाहों से देखती। दिवाकर का सोया साप अपनी गुजलक मे ऐंठ रहा था, तन रहा था. लेकिन सामाजिक बंधन उमे वांधे रहे वरना वह भी तो दमित इच्छाओं और बाढी हुई शराफत का सामान्य सा इंसान था। बातों का तोड इस बात पर आया कि यदि सुबोध उमसे पुनः सम्बन्ध स्थापित करना चाहते हैं और साथ रखना चाहते है जो उम पर शक और बधन न लगाए जायें। दिवाकर इसमे खुश ही हुआ कि चलो उसे अपने प्रयत्न मे मफलता तो मिलो । उसने उठते हुए कहा- अच्छा अब मेरा कमरा तो दिखाओ । फिर सुबह चलने का कार्यक्रम बनायेंगे। नीता में दिवाकर का हाथ थाम लिया । बडी निरीह भूखी और प्यामी निगाहों से उसे वह ताकती रही। उसकी आखों में इतना विल भामंत्रण था कि दिवाकर हिल हिल गया। वह नीता के हाथ के खिनाव के साथ थोड़ा खिंचा भी, फिर न जाने कौन सी शक्ति ने उसे झटका दिया । वह तन कर सीधा हो गया। नीता जैसे कहीं टूट गई, बोली नही । दिवाकर जब द्वार पर पहुंचा तो वह जगे मोते मे जागी और बाहर माकर दिवाकर को उमके कमरे की ओर इशारा कर दिया। वह अब अलग खड़ी थी, ग्लानि मिश्रित बुझापन लिए । सारी रात दोनो कमरो में नीद पर जागरण का पहरा बना रहा । कुबारी मलीद ९७ गुबह दियारूर उठा और शौचादि में नियुक्त होकर नीता के कमरे में गया तो पापा फि उगरे कमरे मे द्वार पर हए है । यह गुपपाप पंदर चला गया। नीना बड़े ही येरगेपन से सो रही थी। कम्पन से एक पर जपाओस नग्न बाहर निकला हुआ था। दियाफर बाहर चला आया। उगने एक तार अपने कार्यालय को दो दिन गै सुट्टो यहाने के लिए दिया, फिर यह वर्मा के पर की ओर निकल गया। यहीं पर उसे दम बज गए। लोट कर माया तो नीता सामान्य सी गूती धोती में भी शोला बनी हुई थी। यह उमे देशार दहल गया। भी नन के लिए नीता ने जय बहा तो दिवाकर बोला पा लिया जायेगा। नीता आमत्रण को एक कसरती चितवन डाल कर नीचे चली गई। दोनों ने आज भी साथ साथ खाना खाया, चुहल भी पलती रही और नीता का दिवाकर को बार बार बना भी। दिवाकर आकुल होता रहा, अपने को जन्त करता रहा । इसी मे ग्यारह बज गए । वे दोनी बातें करते रहे, सुबोध को नासमझी की, सामाजिक बंधनो की। द्वार उढका हुआ था। नीता बेहद खुल रही थी। फिर अचानक दिवाकर बोला- अच्छा नीता मैं समझता हूं कि सुबोध आने ही वाला होगा । वह खडा हो गया। उसने अपनी जाकेट कंधों में डाली तो बटन लगाने नीता खड़ी हो गई। वह दिवाकर से सटकर इस प्रकार खड़ी हुई कि उसके उरोजो की गोलाइया उससे सट गई। बडी प्यामी निगाहों से उसने दिवाकर को देखा। दिवाकर अपने को जब्त न कर सका । उसने नीता के उत्तप्त रसीले ओठो पर अपने उप्ण ओंड रख ही दिए । कुछ देर वे शांत खड़े रहे। फिर छिटक कर नीता अलग हो गई, लेकिन दिवाकर का सोया हुआ शैतान तो अब जाग उठा था। उसने अलग होती हुई नीता को अपने अक में पुनः समेटने के लिए, उसे दबोच लिया और ताबड़ तोड़ चार पांच विकल चुम्बन नीता के कपोलो पर उसने अकित कर दिए कि तभी बिजली को सी गति से दो काम एक साथ हुए । ९८ 0 कुआरी सलीब एक करारा तमाचा नीता का दिवाकर के मुंह पर पड़ा और दूसरा सुबोध ने उसी समय दरवाजा खोला और खोलने के साथ ही लौट गया । दिवाकर जड़ बना ताकता रहा, फिर वह ज्यों ही चलने को मुड़ा कि उमेद्वार पर गीता और मां नजर आई। वह पल भर को तो झिझका फिर एक झपाटे के साथ द्वार से निकल गया। गीता और मूर्यवती ने एक जलती हुई निगाह नीता पर डाली और नीचे की ओर लपक गई। नीता सहमे कदमो से बरामदे मे आई तो उसने मुख्य द्वार से सुबोध को, फिर दिवाकर को और फिर तेजी से गीता और सूर्यवती को द्वार से जाते हुए देखा। वह इतनी जड़ बन गई कि कुछ बोल भी न सकी। वह उस रिक्त द्वार को कुछ इस प्रकार घूरती रह गई जैसे वह स्वयं एक कुआरी नगी सलीब हो और उसके मसीहे उसे दिखाकर ही लौटा लिए गए हों।
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