Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Hindi Kartavya Komudi Khand 2
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सेठिया जेनगन्यमाला पुष्प नं. ३९ श्री गुलाब-वीर-ग्रन्थमाला-वद्वितीय कर्तव्यकोमुदी-हितायग्रन्थ हिन्दी-भापानुवाद सहित रचयिता- रबडी-सम्प्रदाय शतायधानी पं० मुनि-श्रीरनचन्द्रजी सामी। प्रकाशक- भैरोंदान जेठमल सेठिया बीकानेर (राजपूताना) सेठिया-जेन पयालय (बीकानर) फी योर से भेट घोर म० २४५१ विषम म० १९८३ आर्ट पेपर पछी ३० १९२० जिल्द आठआने प्रथमावृत्ति मूल्य पाच आने, -- ३००० प्रति
.
"घसत मुद्रणालय' मा चीमनलाल ईश्वरलाल म्हेताप छाप्यु
सोवील इस्पीतालनी सामे-अमदावाद
श्रीमान् अगरचंद भैरोदान सेठिया की
जैनपारमार्थिक सस्थाएँ
वोकानेर.
निम्न लिखित मस्याए मूल धन (Capital धौ य
फण्ड)का जो २००००) चीस हजार रुपया वार्षिक व्याज
तथा मकानभाडा आताहै उससे चल रही है। मूल धन
सिवा मस्थाओंके लिए एक विशाल भवन (बिल्डिंग) भी
दिया गया है। इस समय कार्यक्षेत्र विस्तृत करदेनसे
खर्चभी बढगया है, श्रीमान् सेठ साहबने उसकी पूर्ति करने
की उत्साह पुर्वक उदारता दिखाई है। मूल धन (धोव्य
फण्ड) और चिडिग स्टी आपके सुविनीत उस्माही
ज्येष्ट पुत्र श्रीयुत जेठमलजी कर दिये गये हैं।
निम्न लिखित सस्थाओं में पण्डित अध्यापक (मास्टर)
अध्यापिका लेखक तथा अन्य कर्मचारी सब मिल्फर
धर्तमानमें २५ जैन और १० अजैन कुल ३५ व्यत्ति कार्य
कर रहे हैं।
विद्यालय (स्थापित विक्रम स. १९७०).
इम विद्यालयमें छात्रोंको हिन्दी, अग्रेजी, महाजनी
(धाणिका) धर्मशास्त्र मस्त व्याकरण न्याय साहित्य
अलङ्कार छन्दशास्त्र प्राकृतआदि का अध्ययन कराया जाता
है, तथा कलकत्तो गनमेन्ट सस्कृत कालेज आदिकी
परीक्षा भी दिलाई जाती है। प्रिन्टिग प्रेप्स (छापखाना)
का तथा व्यापार लाइन का काम भी सीखनेको इच्छा र
१
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यालोको सिखाया जाता है। मेट्रिक या इससे अधिक
अग्रेजीको योग्यता घाले जन विद्यार्थी यदि धार्मिक मस्कृत
प्रातका अध्ययन करना चाहते हों ता उनके लिये, और
अनाथ निराधार जैन बालकांके लिए रहनेको स्थान भोजन,
पर आदिका प्राध क्यिाजाता है।
श्राविका-पाठशाला
इस पाठशालामें श्राविकाका हिदी धार्मिक नेतिक
व्यायहारिक शिक्षा तथा सोनापिरोना क्सीदा करना गोटा
चिनारी बनाना आदि सिखाया जाता है।
ग्रन्थालय (स्थापित विक्रम स १९७८)
इसमें हस्तलिखित-जैनशास्त्र मस्त प्राकृत, पाली,
हिन्दी, गुजराती, अगरेजी पुस्तकमा मग्रह पटो बोजसे
क्यिाजाना है, का मामिक तथा साप्ताहिक समाचारपत्र
भगाये जाते हैं, जो वाचकांको विनापीम घाचनेको मिलते
द। इम ग्रथालय विद्वान् जैन लून सिद्धान्तका मशोधन
तथा हि दो अनुवाद करते हैं। लेखकांसे सन सिद्धातकी
प्रतियां लिखाइ जाती है, तथा प्राचीन प्रतियासे मिलान
किया जाता है। इस ग्रथालयसे जैन धर्म सम्म धी ग्रन्थ
प्रकाशित हाते हैं जिनका मूल्य लागतसे भी कम रक्खा
जाता है, तथा कुछ पुस्तकें अमूल्य भी वितरण की जाती हैं।
इस प्रथालयसे दीक्षाभिलापियामास्वाध्याय तथा कण्ठस्थ
करनेो लिए दशवेकालिक, उत्तराध्ययन, नमिपवज्जा
महापौर जिनस्तुति (पुच्छिमुण) आदि ग्रथाल्यसे प्रका
शित हुई पुस्तकें मगानेसे नाम पता पुरा स्पष्ट अक्षरोंमें
आनेपर एक एक प्रति भेंट भेजी जाती है। इस स्थानमें
५ दीक्षाभिलापी (वैरागी भाई और धैरागिन याई)को दीक्षा फा ममय निश्चित होने पर घर पाप रजोदरण आदि दीक्षा उपकरण और हस्तलिग्वित मूलपाठ -दशका- लिक, उत्तराध्ययन, नन्दी, सुसविपाक आदि सशाधन की गई प्रतियां, तथा कई एक ग्रन्थालयसे छपी हुइ पुस्तकें विना मूरप मिलती है । इस सत्याद्वारा-जेन लायोरी (जेन पुस्तकालय) सभा, मण्डल, ज्ञानभण्डार पोपधशाला उपा- श्रय आदि ऐसे स्थानों में जहा जैनधर्मको पुस्तकोंका मग्रह होता हो, यहापर इन प्रन्यालयसे निकाली हुइ पुस्तके मगयानेसे जो विनामूल्यको उपलब्ध पुस्तकें है उनमें से एक एक प्रति अमूल्य और मूत्यषाली पुस्तके आधे मूल्यसे धी पी द्वारा भेजी जाती है । इम मस्थासे जवापर जेन धर्म की पढाई होती है ऐसे विद्यालय अनायालय पाठशाला श्राविकारम आदि मस्याओं को म थालगसे प्रसिद्ध हुई मामायिक तथा प्रतिक्रमणसूत्र की पुस्तकें मगानेपर आधी कीमतसे घी पो द्वारा भेजी जाती है, और इनके माथ अध्यापक तथा अध्यापिकाओं के लिए एक एक प्रति भेट भेजी जाती है। निवेदक- निमम स० १९८१ व्याकरणाचार्य न्यायतीर्थ- पं० रमानाथ जैन शास्त्री सेठिया जैनग्रन्थालय यीकानेर, (राजपूताना) पोप शुक्र ३
उपोद्घात व निवेदन.
-.--
मसारक प्राणीमात्रम मानथ जीयन मर्याय माना
गया है, क्योकि माय म ऐमी स्याभाधिवशति पिध
मान है कि यदि यह अपने कर्तव्यका पूर्णतया पारा
करता रहे तो शने शने अपन मुटम्यया अपनो जातिका
अपने दशा अभ्युस्थान कर सकता है, तथा आमाको
शतिका पुण विकाश हानेपर मम्पण विश्वया उद्वार पर
नेमें ममथ हो सकता है । उमो मर्याय-साधय क्तव्यका
दिखानेगले इस पर्त ययौमुदीमामय प्रथया हिदी
अनुवाद ग्यावर प्रकाशन करता हुआ में अपने जीवन
को पृतार्थ समझता । ग्रन्थका मा य इस माथा नाममे
पिदित होता है। इस प्रथा का बडी-संप्रदायये
श्री श्री १००८ शतावधानी प० रत्नच दजी महाराज हैं।
आपका जन्म म० १९३६ पैशाख शुबर १२५ दिन पीस।
ओसषश (घीमा आसया- जाति) में हुआ तथा पूज्य
पादश्री १००८ मुनिश्री गुलाच द्रजी स्थामीय पाम
स १९५३ ज्येष्ठ शुक्र ३ दिन पवित्र दोषा ग्रहण की।
दीक्षा ग्रहण करने के बाद आपने शीघ्रही सस्तया अध्य
यन प्रारम्भ परदिया और मिद्धा तद्रिका मिहात
कीमुदी, तत्ययाधिनी, मनाग्मा, पचमहाशय अपार मा
हि य, नाटक आदिका पूर्ण ज्ञान प्राप्त करके, न्यायविपयका
तर्वमग्रहसे लेकर जगदीशगदाधरके याध-अनुमिति प्रय
तक भली भाति अध्ययन किया। पश्चात सारयदर्शन,
पातजलदर्शन प्रातभापा आदिका ज्ञान प्राप्त किया।
इस प्रशर अध्ययन ममाप्त होनेपर स०१९६६ से व्यारयान
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देना और अपधान करना प्रारम्भ कर दिया, और भाय.
पूर्ण तात्विक गुजराती, सस्कृत, प्राकृत तथा अर्धमागधी
भापामें अनेक प्रथ रचकर जन-समाजका बडा भारी उप
कार किया है। स० १९८० में अहमदाबाद के चातुर्मानमें
इस कर यकीमुदी द्वितीय ग्रन्थको रचना की, तथा स०
१९८१ में वढयाण केम्पके चातुर्माममें जेन-मिद्वान्तकोमुदी
(अर्धमागधी-व्याकरण), प्राकृत पाठायलि, अर्धमागधी-
धातुम्पमग्रह आर प्रातधातुमग्रह इन चार ग्रन्थोकी रचना
को और पाठियागाड देशके उमरडा नामक ग्राममें समा
प्ति की। ज्ञान-वृद्धिके लिये इस सस्था (सेठिया-जेनग्रन्था
लय) को देने को उदारता को है जोकि इसी सेठिया जैन
ग्रन्थमालामें प्रकाशित होनेवाले हैं। वतमानमें आप चार मुनी-
श्वराने साय (पाचठाणे) विचर रहे हैं। महाराजश्रीने
इस ग्रन्थको रचना करके सम्पूर्ण जनताका महान् उपकार
किया है। यह अनुपम ग्रन्थ जैन जैनेतर, स्त्री, पुरप,
वाल, युया, वृद्ध मनी लाभदायक है। हमें पूर्ण विश्वास
है कि विद्वत्ममाजमें इसका पूर्ण आदर होगा। इस कर्त
व्यकौमुदी नामक ग्रन्थये दा भाग हैं। पहला भाग गुज.
राती तथा हिन्दी भाषामें विवरण सहित अनुयाद पहले
प्रकाशित हो चुका है, गृहस्थ-कर्शयका प्रतिपादक यह
प्रथमभाग तीन खण्डामें विभक्त है। प्रथम मण्डमें कतय के
लक्षण, अधिकारी, काल, क्षेत्र, व्यवस्था आदि दिपाते हुए,
ग्रन्थकार महोश्यने कर्तव्य बाधक प्रोध, मात्मय-निन्दा
दुर्भापण आदिी परिहारका तथा प्रतिज्ञानिहका नि
वेचन गभीरता पूर्वक किया है। द्वितीय सण्डर्म गमावस्था
में पालक मस्कारको उत्पत्ति सन्तानपर माताको शिक्षा
का प्रभाव, वाह्य शिक्षा, ब्रह्मचय, आरोग्य नियम, आज्ञा
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पान
पालन सहाध्यायी पालकोंरे साथ सद्वर्तन इत्यादि विधा
थियोंके वर्तव्य तथा १ घतयोडा, २ मासाहार, ३ सुरा
४ धेश्यागमन, ५ परनी लाम्पट्य, ६ चोरी, ७
शिकार, आदि छोट बडे च्यसनीका निषेध विद्वत्ता पूर्वक
किया है। तीमरे खड़में सासु ससुर, पतिआदिये साथ
स्रोका कम्य विधयाव्य, कन्याधिक्रय-निषेध कृतज्ञता,
परोपकार, उदारता, सहनशीलता इत्यादि मानय धमका
सार गमित विवेचन घडी गहरी दृष्टिसे वियागया है।
कव्यकौमुदीका द्वितीय भाग (प्रथ) आपये हस्तगत है।
यह अथ दो खण्डोंमें घिभन्न है, पहले खण्डमें गृहस्थमा
काव्य और दूसरे माधुका काय उडी उत्तम शेलीसे
विवचन दिया गया है। प्रथम खण्डमें सेषाधम, मेत्री
समाद तारण्य माध्यस्थ ग्रामीण शाला, विद्यालय छात्रा
श्रम शिक्षापद्वति चिकित्सालय, अपागसेवा विधवा
श्रम पशुरक्षणशाला, (पिंजरापोल) आदिको पूर्ण आध
श्यक्ता दिखाते हुए महाराजश्रीने वृद्धधया विधषा
विवाहका मयुक्तिक निषेध और स्वदेशसेघा आदि गृहस्थ
वे मुरय मुस्य कव्यिकिा हृदयग्राही मर्मस्पर्शी वर्णन
अनुपम शेरीसे चिपाहै तथा द्वितीय खण्डमै भुनिधर्म
(सन्यासोंचे काय ) का विवचन नूतन प्रणालोसे उत्तम
प्रकार किया है। इस माथको पदतेही मनुष्य मात्र हृदय
में काव्यि-पालनके भाव जागृत हो जाते है। ऐहोषित्र
व पारलौकिक सुख प्राप्त करनेको आकामा रखनेवालोको
तमार्ग-प्रदर्शक इस अनुपम प्रयका अघलोकन करना
परमावश्यक है तथा नियस्त विषय स्वदेश सेवा अहि
सा आदिका अनुशीलन तथा पालन कर मानयजोपनको
समुन्नत धनाना चाहिये । पहातक कहा जाय आधुनिक
९ आचरणीय कर्मव्यका प्रतिपादक यह ग्रथ अपने ढगका एकही है। महाराजश्रीने समस्त जनताको हितकामनासे इसको मरल भापामे बनाया है। हमारी आन्तरिक भावना है कि मनुष्य मात्र इमसे लाभ उठायें। हमारी इच्छा पुस्तकका मूल्य रमनेको नहीं थी, किन्तु कई सजनों आग्रह करनेपर तथा विनामूल्यको पुस्तकका योग्य आदर न देखकर लागतसेभी कम मूल्य रकम्वा गया है सा भी ज्ञान प्रचारमें ही लगेगा। स्थान बीकानेर स० १९८१ पो० शु०३ } भेगदान टिमल सेठिया विषयानुक्रमणिका विपय पृष्ट १ मङ्गलाचरण १ २ प्रथम ग्रन्थका इस ग्रन्थी साथ सम्बन्ध ૨ ३ तीसरी और चौथी अवस्था कर्तयका तारतम्य ३ प्रथमखण्ड ४ सम्यग्दर्शनका स्वरूप देय गुरु और धर्मका लक्षण धमका माहात्म्य धर्म का फल ५ मम्यचारिय-व्रतका पालन अहिंसा व्रतका स्वरूप अहिंसा व्रतको पालना ६ मत्यव्रत ७ अचौर्यग्रत ७ .
१० १२ . ८ ग्रह्मचर्यव्रत शीलवती आवश्यकता इद्रिय पराधीनता का दुग्य ब्रह्मचय पालनेकी मर्यादा परिग्रह परिमाणत्रत तृष्णाका निराध १. दिशा ओर भोगापभोग परिमाणवत १५ अनर्थदण्ड त्यागवत १२. सामायित्रित सामायिश्वतको आवश्यकता १३ देशासाशिर प्रत १० पोगधयत १५ अतिथिसत्यार व्रत १५ सैयाधम-पृथश पग जीयन उत्तम यम्नु परोपकारके लिए होती है प्राणियोमा परोपकार वृत्ति सवाधम में प्रवेश परने द्वार १७ मंत्री भावना-येरफा त्याग मर जीयक साथ भ्रातृमाय थमा की भिक्षा मित्रता का प्रम (मेघसाफी घातक प्रकृतिका परित्याग धमभेदसे मित्रताका घात नहीं हाता ईदा और इमसे सदा दुस १८ प्रमाद भायना-दूसरे को सुपी देखकर प्रसा होना १८ १९ २० ૨૨ ૨૨ ૨૨ २४ २८ २९ ir innan ૨૨ १९ करुणा भावजा- करुणाका फल करुणा बिना सब निष्फल पुण्यवृक्षको सींचनेके लिए करुणाको आवश्यकता करुणापात्र जीय माध्यस्थ्य भावना-महनशीलता पापी मनुष्यका भी तिरस्कार नहीं करना पापियों का नाश न करके पापका ही नाश करना शान्तिपूर्वक मध्यस्थ भावमे विजय २१ मनुष्य सेवा-अनाथ बालकों की सेवा बालसेवा प्रति साधारण मनुष्योंका पर्तव्य भिन्न २ प्रकारके मनुष्योंको भित सेया २२ गावमें पाठशाला २३ शूद्रशिक्षा २४ गरीनोंको पुस्तकादिशी सहायता २० छायाश्रम (बोर्डिंग हाउस) २६ धामिक शिक्षा २७ परीक्षा और पारितोषिक २८ धाम्मिक शिक्षाके लिए पुस्तके २९ रोगियांकी सेवा ३० आरोग्य सेवा ३१ औषधालय ३२ अपाङ्गोंको सेवा ३३ निरुधमतारुप रोगका निवारण ३४ निरुधमताके कारणोंको निवृत्ति ३५ निरुद्यमियों को उद्यममें लगाता ३६ ૨ ३३ ४६ । १८ ४९ ४९ ५७ ३६ किसानोको सेया ३७ श्रमजीवियां की सेवा ३८ मजूरी का सद्वर्ताव का शिक्षा ३९ विधवाओंकी सेवा १० विधाऑकी आजीविका का प्रय-ध ४१ विधवाओं पर अकुश की मर्यादा ४२ विधवाश्रम की स्थापना ४३ वृद्वसेवा ४. वृद्धोंके अनुकूल आचरण ४५ वृद्धोंका समाधि मरण ४६ पशुरक्षा ४७ पशुपक्षियांकी हिंमाश निषेध ४८ पशुरक्षा नियम ४९ बच्चे और बूढे पशुओकी रक्षा ५० पिजरापोल की व्यवस्था ५१ जातिके अन्तगत भेदका परिवार ५२ जातिये नेताओं की व्यवस्था ५३ जातिके फरक का परिहार ५६ कुरूढिवा निराकरण ५५ वृद्धविवाह आदि कुप्रथाओं का परिहार ५६ स्वदेश सेवा ५७ स्वदेशका हितचितन ५८ स्वदेशके आचारकी पालना ५९ स्वदेशी वस्तुका उपयोग ६० देश के उपत्यका नाश ६१ स्वचा और परचम्से देश की रक्षा ६२ अधिकारियों के उपद्रघ का निराकरण ५८ ६० ६० હર ६६ १३ ६३ आपत्ति के समय सेवा ३६ द्वितीय खण्ड. ७० १ जगत्सेयामें आत्मसेया २ मसार को सेवा ३ विश्वप्रेम ४ सरसे उत्तम विश्वप्रेमी ५ अत्मदृष्टिसे जगत्का निरीक्षण ६ तीन प्रकारका थैराग्य ७ तृतीय चराग्यवे दो भेद ७१ ८ पराग्य का अभ्यास હર स्त्र का अध्ययन ઉર १० गुरुकृपा ७३ ११ पैर ग्य का परिपाक ७४ १२ घेराग्य को परीक्षा ७ १३ शिष्या लक्षण १४ गुरसा रक्षण १५ दाक्षामिलापीका कुटुम्चियों की आशा १६ आशा न मिलने पर भाय मयम १७ घेराग्य का निश्चय हाने पर दीक्षा १८ गृहस्थ वेप और नारका त्याग १९ साधुका वेप २० किस लिए वेषका परिवर्तन २१ अहिंसा और सत्यको प्रतिक्षा २२ अचौर्य और ब्रह्मचर्यको प्रतिज्ञा २३ परिग्रह त्यागको प्रतिक्षा २४ प्राध मान त्यागकी प्रतिक्षा ૮૨ २५ माया लोभ रागद्वेष करह और दोषारोपण के ७. ७७ ७८
४८
५३
३६ किसानोंको सेवा
३७ श्रमजीवियों की सेवा
३८ मजूरी को सद्वर्ताय का शिक्षा
३९ विधवाऑकी सेवा
४० विधवाऑकी आजीविका का प्रबंध
४१ विधवाओं पर अकुश की मर्यादा
४२ विधवाजम की स्थापना
४३ वृद्धसेवा
४३ वृद्धोंके अनुकूल आचरण
४५ वृद्धोंका ममाधि मरण
४६ पशुरक्षा
४७ पशुपथियांकी हिंसाका निषेध
४८ पशुरक्षाके नियम
४९ बच्चे और बूढे पशु की रक्षा
५० पिजरापोल की व्यवस्था
५१ जातिव अतगत भेदका परिहार
५२ जातिये नेताओं की व्यवस्था
५३ जातिके फ्रङ्कका परिहार
५४ कुरूढि का निराकरण
५५ वृद्धधिवाह आदि उप्रथाओं का परिहार
५६ पदेश सेवा
८७ स्वदेशका हितचिन्तन
५. संदेशके आचारको पालना
५९ स्वदेशी वस्तुका उपयोग
६० देश के उपद्रघका नाश
६१ स्वचक्र और परचक्से देश की रक्षा
१२ अधिकारियों के उपद्रव का निराकरण
६४
- साधुओं की दिनचर्या समाज मर्यादा-आचार्य और उपाध्याय आचार्यपद की योग्यता आचार्य का कर्तव्य १०७ उपाध्याय का कर्तव्य तपश्चर्या-बाह्यतप १०८ आभ्यन्तर तप ११२ धैयावृत्य स्वाध्याय के भेद ज्ञान के आठ आचार स्वाध्याय की सिद्धि चित्त के आठ दोप आसनों के भेद प्राण और मन का सम्बन्ध प्राणायाम का पहला भेद रेचक पूरक ओर कुम्भक प्राणायामका फल भाय प्राणायाम १२० प्रत्याहार १२० धारणा ૨૨૨ ध्यान का लक्षण ૨૨૨ ध्यान की आवश्यकता १२२ ध्यानके स्थान ૨૩ 11 की स्थिति पिचय और अपाय विचय १२४ विचय और सस्थान घिचय १२५ के आलम्बन और भावना 8 त्यागी प्रतिज्ञा २६ चुगली आदि पाच पापार त्यागकी प्रतिज्ञा ८३ २७ अठारह पापान त्यागकी प्रतिज्ञा २८ सयम धीजको उत्पत्ति ८५ २९ ईयाममिति-गमन विधि ३. विधिरहित गमन करनेस उपर हुए दोष ८६ ३१ भापासमिति (बोलन ) में यतनाचार ८६ ३२ देसी भाषा बोलनी चाहिये ८७ ३३ अयोग्य भाषा का त्याग ८८ ३० पपणासमिति (भिसा) ८८ ३५ भिक्षाकी विधि ३६ रसगृद्धिका निषेध ९० ३७ आहार लेने छह प्रारण ३८ सहचारियों में आधारादिका समान विभाग ३९ आहारादिका सप न करता ९२ ४० पधादि लेने की निधि ४१ स्थानकी पपणाविधि ४२ उपाधयम बिना कारण साधु साथियों के गमन का निषेध ५३ साधु साध्वियों के एक जगह ठहरनेको मर्यादा ९४ ४३ प्रतिवन्ध रहित विहार ५५ साधुआं का पैदल विहार ४६ घनादिके उठाने धरने की विधि ४७ धनादिवे प्रतिलेखनकी दिया ४८ भूमि या पट्टे पर शयन ९७ ५९ मल मूत्रादि त्यागने को चिघि ५० क्षुधादि २२ परिषद १०८ ५१ साधुओं की दिनचर्या ५२ साधुसमाज मर्यादा-आचार्य और उपाध्याय आचार्यपद की योग्यता १०६ आचार्य का कर्तव्य १०७ उपाध्याय का कर्तव्य ५३ तपश्चर्या-बायतप आभ्यन्तर तप ११२ घेयावृत्य स्वाध्याय के भेद ११३ झाश के आट आचार स्वाध्याय की सिद्धि चित्त के आठ दोष आसनों के भेद प्राण और मन का मम्मन्ध प्राणायाम का पहला भेद रेचक ११८ पूरक और कुम्भक ११९ प्राणायामका फल ११९ भाय प्राणायाम १२० प्रत्याहार १२० धारणा १२१ ध्यान का लक्षण ध्यान की आवश्यक्ता ૨૨ ध्यानके स्थान ૨૨૨ ध्यान की स्थिति १२४ आज्ञा पिचय और अपाय विचय १२४ पिपाक रिचय और सस्थान पि धर्म के आलम्पन और १८ . ३ है मयनी नजेजने इमतिये मचरित्र करनी दानामा पगुपति . सक्ती स्पोयेजने इमलिय मचरित करना वृद्धनामा पशु पक्षि) हो चाहिये कितूत्तम चाहिये जातिक . ६ ८ चाहिये फिन्तूत्तम चाहिये जातिरे ६० ३ ६ का चधरामना दधलमना कुले घनजायें ममयाचित्त ६३ ६४ ८ यनजाय समयोचित ६. सुरवेषा ममतामयीये गृहीतु नथा मधमा ममतामाम्म्ये प्रदीनु ८० ८० अहिंमा भयेन गृहीया क्यचिदहो मथुन २ ८१ तथा अहीसा भयने गुहीया स्यचिदहो मथुन किन्तु मानुगा चाहिय बोलने में योलना चाहिय बोल १७ १२ ८५ मानगा चाहिये (बारने म योलनी चाहिये याले माप्तहुए ५ ८८८ ६ प्राप्त का ९२ सायियो माधुना काट लिय २ माध्यिया माधूना काठ लिये श्रत्या आदिका सुभीते मायूना गर्मित है ७ आदिक्षी मुभीत शाधूना गर्भिते है २ NAMuv A AMw सेटिया जन प्रग्यमालग समस्त विश्व टपणमें देह के ग्रातविम्बकी तरह स्पष्ट झडपता है, उम ग्योतिको मै मन-वचन-और यायसे अपनी इट सिद्धि के रिये नम स्कार करता है !॥ १॥ पूर्वोत्तरग्रन्थमम्य ध । पूर्वाद वयसोईया. प्रथमयो-नीनि समालोचिता, सद्योऽय समयस्ततीयवयस' कर्तव्यसदर्शने । विद्या येन समर्जिता धनमपि प्राप्त कुटुम्मोचित, तेनावश्यतया पगनिरत कार्य निज जीवनम् ॥ २॥ प्रथम प्रथया इम अथ मन्य ध । भावार्थ-- पहिली और दूसरी अवस्था में आचरण फग्ने योग्य नीति अर्थान् त य कर्मश विचार प्रथम भागमें पिया गया है । अब तृतीय अवस्था में पाटन करने योग्य त यर्म की व्याग्या फग्नेका अवसर प्राप्त है। जिस पुम्पने पिया प्राप्त की तथा युटुम्यपाग्न योग्य धन भी समह क्यिा, उसे अब अपना जीवन परमार्थ म ही रिताना चाहिये ॥२॥ तृतीयचतुर्थययसो पर्तव्यतारतम्यम। अभ्यासार्थमिद चतुर्थग्यसो नून तृतीय वयो, ययत्तत्र च सर्वथा भवति तदेशेन भाव्य लिह । मायस्ता महानतानि विषय याग कुटुम्म जगन्, सा या यत्र रघुरतानि विरति स्मूला समाज कुलम्।।३
Pra
कसन्य-चौमुदी
तीमरी और चौयी अयम्या ये कर्तव्यका तारतम्य।
भावार्थ-तीसरी अवस्था, चीथी अगम्या कंपन्या अम्यास
करने दिये है, क्योंकि चौथी अवस्था में जो कनय सर्वथा अर्थात्
परिपूर्ण पारन फियाजाता है यह तीमग अवस्थाम एक देश अर्थात्
परिमितरूप आचरण कियाजाता है, चतुर्थवयम ममस्त विषया को
त्याग सम्पूर्ण ससारको कुटुम्ब ममान मानकर महावत धारण किया
जाता है। तीसरी पयम स्थूर पापा से निवृत्त होरर समान को युटु-
यसमान समगने पर अणुवतका साधन होता है ॥३॥
प्रथमखण्ड. प्रथम परिच्छेद । सम्यग्दृष्टि । सम्यग्दृष्टिविलोकित हि सकल सद्धर्मकृत्य भनेत्, सम्यग्दृष्टिरदाहृता जिनवरैस्तत्त्वार्थरच्यात्मिका । सदेव मुगुरु सुधर्म इति सत्तत्त्वत्रय कथ्यते, ज्ञात्वा तत्परमार्थत कुर रुचिं तत्त्वतये निर्मले ॥४॥ सम्यग्दशन का स्वरूप । भावार्थ-सम्यग्दशनपूवर स्यिागया समस्त जाचरण सम्यक चारिकरूप होता है, जिनेद्र भगानने तत्वश्रद्धान को सम्यग्दशन न्हा ह वीतरागदेव, परिग्रहाहित गुर आर दयामय यम ये तान सम्यक्तत्व है उन तीन निमरतत्वों का वास्तविक स्वरुप जानर श्रा करनी चाहिये ॥४॥ दयगुरधर्मलक्षणम्। देव कर्मचतुष्टयक्षयकर सद्धर्मसस्थापको, रागद्वेषविघातकस्त्रिजगता चेतश्चमत्कारक । निग्रन्थ समग महानतधरचित्तै कनिष्ठो गुरु- धर्म शान्तिदयादिसद्गुणमयो रत्ननयोतक ॥॥
कर्तव्य-कौमुदी
देव गुर और धर्मका लक्षण ।
भावार्थ-रागद्वेष का सर्वथा क्षय करनेवाग अर्थात् वीतगग,
ज्ञानावरण आदि चार घातीकर्मका नाश करनेवाला अर्थात् सर्वज्ञ और
सय धर्मका प्रवर्तक अर्थात् हितोपदेशी, एव अकिक आमप्रभाश्मे
तीनललेक के जीवोंके चित्तमें चमकार उत्पन्न करनेवाला सत्यदेव है।
चित्तको वशमें रखनेवाग अर्थात् जितेन्द्रिय सम्यादृष्टि महात्रतधारण
करनेवाग परिग्रहरहित सदगुर है। ओर सम्यग्दर्शन सम्याज्ञान
सम्यक्चारिनरूप रत्नत्रयका प्रकाश करनेवाला क्षमा दया आदि सद्गु-
गोका भण्डार सत्यधर्म ॥ ५॥
धर्ममाहात्म्यम्।
धर्मः कल्पतरुभणिर्विपहरो रत्न च चिन्तामणि-
धर्म कामदुघा सदा मुखकरी सजीवनी चौपधिः ।
धर्मः कामघटच फल्पलतिका विद्याफलाना खनिः,
प्रेम्णैन परमेण पालय हृदो नोचेद्वथा जीवनम् ॥६॥
धर्मका माहात्म्य ।
भावार्थ--धर्म वृक्षोम कल्पवृक्ष, मणिया में विपहरण मणि और
रनोम चिन्तामणिरत्न-समान हे, पशुओं मे कामधेनु आर आषधियों
में सजीवनी औषधि समान सदा सुग्वदायी है, पानी में कामघर र ताओं
मे परता ओर विधा तथा कलाओंकी खानि है इसलिये इसे
परम प्रीति पूर्वक हृदयसे पालन करना चाहिये इसके बिना जीवन
॥ निष्फर है ॥६॥
शेठिया जैन प्रन्थमाग ६ naniwwwwwranewwwwanam धर्मफलम्। धर्म. कृन्तति दुग्नमुन्नतसुख दत्ते समा युद्भव, दुष्कर्माणि रणद्धि शक्तिमतुला मादुफ्फरोत्यात्मन। ज्ञानज्योतिरपूर्वमर्पयति स स्वर्गापवर्गमद- स्तन्नास्तीह महत्समुन्नतिपद यन्नैव दयादयम् ॥५॥ धर्मका फल। भागार्थ--धर्म दु खोंका नाश करसे शान्तिसमाधि से उपन हुए अ युत्तम निराकुर सुखको देता ह, दुपमा को रोककर आमा म अतु- सामथ्य उ पन करता है, ज्ञान याति बताकर स्वग और मोक्ष को देता है, इस सेग्में ऐसा को उकृष्ट उन्नतिपद नहीं है जो कि धर्मसे प्राप्त नहीं हो मक्ता अथात् ममस्त उत्कृपद को देनेवाला एक धम ही है ॥ ७॥ द्वितीय परिच्छेद। सम्परचारित्रे व्रतपालनम्। विज्ञाय बतलक्षणानि निकटे शास्त्रार्थवेत्तुर्मुने- *रानन्दो निखिलनतानि जगृहे भो ' स्वीकुर व तया । नाट-आनन्द-आन दनामा श्रापका य श्रीमहावीर प्रभुममीपे द्वादश व्रतानि जग्राह । भा० आन दनामक श्रायकन महावीरस्वामी के ममीप बारह व्रत धारण किये।
V www Anvvvv vwwwww कर्तव्य-कौमुदी शक्तिों यदि तावती प्रथमतः सोत्साहममीकुरु, पश्चाणुनतकानि धर्मविधिना सम्यक समीपे गुरोः॥॥ मम्यचारिध-प्रकरणमें प्रतका पालन। भावार्थ---हे भव्य । शास्त्र रहस्यको जाननेवाले मुनिसे बतो के लक्षण भिन्न२ जानकर जिस प्रकार आनन्द नामके श्रापकने सम. स्त व्रतोंको अछी तरह समझकर धारण किया, उसी प्रकार तुम भी अङ्गीकार करो। यदि इस समय सम्पूर्ण व्रत ग्रहण करने की शक्ति नहे। हे तो प्रथम गुरु के समीप पच अणुव्रतको उसाह सहित निधि पूर्वक सम्यकप्रकार अङ्गीकार करो ॥ ८॥ अहिंसावतम् । रक्ष्या ययपि सर्वजीवनिवहासत्रापि जीवास्त्रसा- वैशिष्टयेन हि तोऽतिदुरित तस्माभिदन्यान तान । नाप्यन्येन विधानयेत्कथमपि व्यर्थ न च स्थावरान् , हिंसात्याग-विधायक प्रतमिद धर्मेच्छया पालयेत् ॥९|| अहिंसावत। भावार्थ--यपि मनुष्यमानको त्रस और स्थावर सम्पूर्ण जीनो की रक्षा करनी चाहिये । तौभी चलने फिरनेवाले उसजीकी विशेष रूपसे रक्षा करनी चाहिये। क्योंकि उसजीगोंकी हिंसासे भयकर पाप उत्पन्न होता है । इसलिये इन आरोकी हिंसा कदापि स्वय न करे, है और न दूसरामे करवाने । विशेष कारण पिना व्यर्थ स्थावर एफेन्द्रिय. जीवोंकी भी हिंसा न करे, इस हिंसा~यागरूप अहिंसात्रतको धर्मबुद्रिसे पान करना चाहिये।
सेटिया
जैन
प्रयमाटा
८
अत वधनधन
हिमानतपालनम् ।
पापद्धि. पललाशन च मदिरापान निपिद्ध ह्यतो-
निसातवसहिना नियमतस्तत्र प्रतभ्रगनात् ।
यहन्तु नसहिमया समजनि त्याज्य च तत्सर्पया,
स्यादन्पायतिचारदोपरहित सेव्य तथाऽऽय नतम् ॥१०॥
अहिमालतकी पालना।
भावार्थ--शिकार मासभक्षण और मदिरापान इन तीनोर
शास्त्राम निषेध ६, क्योंकि इनमे सेवनसे उसजीमती हिमा अध्य
होती है, तथा हिंसात्रतमा भग होता है जो वस्तु उमनीवासी हिसा
से - पन हाता । वह सपया त्याग करने योग्य
आदि अतिचार रहित इस प्रथम अहिंसात्तो पाउना चाहिये ॥१०॥
सयव्रतम ।
हास्यत्रोधभयप्रलोभनभव स्यात् कचिनान्त,
नाप्यन्येन च भापयेत् निकरणरेतच्च सत्यवतम् ।
अभ्यार यानपरापपादलपन विश्वासघातस्तथा,
मिथ्यासाक्ष्यपरमतारणमिहातर्भाव्यमेतद्विधम् ॥२१॥
मत्यव्रत।
भावार्थ- हाम्य बोध भय और रोभरे कारण मन वचन फाय-
द्वारा कापि अमय न वाल इसी तरह दूसरेसेभी न बुज्यावे तय
सयनता पारन होता है, तथा मिथ्यादोपारोपण परनिन्दा विश्वास-
घात झूठी-गवाही और दूसरेको ठगना ये भी अमलम गर्मित हे
सयत पाग्नेवारे को इन सब बातोमा त्याग करना चाहिये ॥११॥
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कर्तव्य-कौमुदी
अस्तेयवतम्।
वस्तु स्यात् पतित पये गृहगत कस्यापि चौर्येच्छया,
ग्राह्य तन्न विनाऽऽक्षया विपरणै प्यन्यतो ग्राहयेत् ।
ज्ञात्वा स्तेयधन कथाश्चिदपि तन्नादेयमप्यल्पक,
साहाय न विषयमस्य तदिद दत्तनत पालयेत् ॥१२॥
अचौर्यम्रत।
भावार्थ-क्सिीसी कोई वस्तु मार्गमें पड़ी हो अथवा घरम
खरबी हो स्वामीकी विना आज्ञा मन वचन आर कायद्वारा स्वय न
उटावे आर दूसरेसे भी न उठवावे, तथा जानाझकर थोडीसी भी
चारीसी वस्तु किसी तरह न ले और चोरीके कामम सहायता न करे
तव स यतका पूरीतरह पारन होता है ।। १२ ॥
ब्राह्मचयनतम।
स्यादाढ यदि सर्वथा स्वमनसो ब्रह्मात गृह्यता,
नोचेदेकनिस्त्रियैर सतत सन्तापत्तिरा।
सपर्कोऽपि परसिया न कुधिया कार्यः सदाचारिणा,
स्वीपुसोभयशीलरक्षकमिद मोक्त चतुर्थ नतम् ॥१३ ।।
ब्रह्मचर्यग्रत।
भावार्थ:-यदि मन स्थिर ह तो पूर्ण ब्रह्मचर्य ग्रहण करनाही
योग्य है, यदि इतनी दृढता न हो तो स्वदार सन्तोपवृत्ति और स्त्रीको
स्वपति सतोपरत धारण करना श्रेष्ट है, सदाचारी पुरुष दुष्टबुद्धिसे परस्त्री
का स्पर्श भी न करे, आचार्योने इस चतुर्थ ब्रह्मचर्यत्रतको स्त्री और
पुरष दोनों के शीट की रक्षा करनेवाग कहा है ॥ १३ ॥
सेठिया जैन प्रग्यमा १० शायरम्यावश्यकता। व्य मानवजीवन मविभव पीर पिना गोमन, व्यर्या नीलगुण विना निपुणता शाये फलाया तथा । गर्ष माधुपद च नापकपद शील पदा वग्डित, मेगाधर्मसमाढगे न मुलभ भीलवत चान्तरा ॥ १४ ॥ पृ.पी सत्पुरष विना न मावरा चट विना शर्वरी, लपीनगुण विना वनलता पुष फल या विना। आदिन्येन विना दिन मुग्वकर पुन विना सत्तुल, धर्मोनैव तथा धृत भ्रतधरै गील पिना गोभते ॥१०॥ शोलवलको आप यक्ता। भावार्थ-जीनिका भपण शीगुण है, इससे विना सवयी जीवन तथा शास्त्र और ककी निपुणता निफर है, यदि प्रत्यर्य खण्डित ह तो सा उपद या नायस्पद यर्थ है,शी के बिना सेवा धमका पान नहीं होमाता ॥१४॥ जैसे सपुरुष बिना पृथ्वी, चट पिना गरि, दानगुण विना र मी, पपुर विना वनरता, सूर्य विना दिवम और मुसकागे पुत्र ग्निा उत्तम- र शेभा नहीं देता, इसी तरह शी-विना ग्रामवताओं से धाग्य कियागया धर्म भी शोभा नहीं देता ॥ १५ ॥ इद्रियपाग्यश्यदु ममा एकैकेन्द्रियपारवश्पनिहता मन्स्या पतङ्क मृगा, दृश्यन्ते पिल दुर्दशामुपगता भृाव हम्न्यादय ।
. कर्तव्य-कौमुदी ये पञ्चेन्द्रियकामभोगविवशा नक्तं दिव लम्पटा- स्तेपा स्यादिह का दशा परभवे स्थान च लभ्य किमु॥१६॥ इन्द्रियपराधीनता का दुख । মাথ -जन कि केवल एक एक इन्द्रियकी पराधीनता के कारण हाथी मछली भौरा पतग और मृगादि प्राणियों की दुर्दशा देखी- जाती है, तो जो मनुष्य रातदिन पाचों इन्द्रियों के विषयभोग में लम्पट है उनकी इसलोक में क्या दशा होगी? तथा परलोफ में कौनसा स्थान मिटेगा ॥ १५ ॥ ब्रह्मचर्यव्रतपालनमर्यादा । नैव कापि दृशाऽन्ययोपितमहो पश्येदयोग्येच्छया, दृष्टा चेद्भगिनीयमस्ति जननीत्येव द्रुत भाव्यताम् । नो हास्य सममेतया न च कदाऽप्येकान्तसभापण, न क्रीडा न सहासन न चल्न कार्य प्रतारोहणे ॥१७॥ सेव्य मादकवस्तु नो रसभृत भोज्यं न वा नित्यशो- दायान्मोहकवस्त्रभूपणभर नो वाशुश्रूपणम् । कुर्यादिन्द्रियनिग्रहार्थमुचित पर्वानुसार तपो- ययत् किं बहुनाऽस्य शुद्धिजनक तत्तद्विधेय पुनः॥२८॥ ब्रह्मचर्यग्रत पालनेकी मयादा। भावार्थ--ब्रह्मचर्यत्रतधारी क्सिी जगह बुरी भाग्नासे परस्त्री पर दृष्टि न टाले तथा दृष्टिगोचर होनेपर यह मेरी माता है, बहिन है, ऐसा शीघ्र चिन्तरन करे, तथा व्रतकी रक्षार्थ परखीके साथ हसी दिल्लगी एकातमें वापि और कौतुकनीटा न करे, साथमें उठना 4 सेठिया जन प्रग्यमाला wwnnnn यत्कस्यापि न पापकर्मविपये कुर्यात्मनार मेरण- मेतलक्षणमटम प्रतमिद फांघसरोधकम् ॥ २२ ॥ পাকা গৱেযাশন। मात्रार्य--धनका नाश अथया पुत्रादिकी मृत्यु होनेपर चित्तमें रिचित मार शोर न करना अप यान अनर्थदण्ड त्यागत है। जीन रक्षा कायम प्रमाद नहा करना, प्रमारचर्या अनर्थ ण्टयागत है जीपहिसक अवशस्त्र आदिका सचय न करना, हिंसर शस्त्रसंचय अनर्थ दण्ड यागवत है। तथा पापस्म में दूसरेकोप्रेरणा न करना पापोपदेश अनर्थदण्टन्यागरत है । इसप्रकार यह आठगाँ अनथदण्टसागवत निरर्थक कायसे उपन हुए क्म-समूहको रोस्नेगा है ॥ २२ ॥ मामायिवतम। रागद्वेपरपायतो विषमता या जायते स्वात्मन- स्तरीकरणाय साम्यजना सामायिकसरप नतम् । कायोत्सर्गसमाधिशास्त्रमनन स्वाभ्यापनापश्रुती स्त्यक्त्वा न प्रियता च कार्यमपर घण्टामितेऽस्मिन् नते ॥२३॥ नयमा मामायिकग्रत। भावार्थ-रागडेप आर पायके कारण आमामें जो विकार उत्पन्न होताहै उसको दुग्मर समता भामो उत्पन्न करनेवाग सामा यिर नामका व्रत ह, प्रत्येक मनुष्यको प्रतिदिन ए या अधिक सामा यिक कग्नेशी प्रतिज्ञा करनी चाहिये । सामायिकमा जघन्यसाल दोघडी अर्थात् ४८ मिनिट है, सामायिर ने पालम छायोसर्ग, ध्यान, आ या.
वर्तव्य-कौमुदी मिकशास्त्रका मनन, स्वा याय, जाप तथा शास्त्रश्रवणके सिवाय दुसरा सासारिक कार्य नहीं करना चाहिये ॥२३॥ मामायिकम्यायश्यकता। मात भागशनात् प्रसन्नमनसाऽवश्य विदध्यादल, स्वच्छ शान्तनिकेतने प्रतिदिन सामायिक भावतः । स्यतच्या विस्था मनस्तनुवचोदोपाः समग्रा. स्वतो- नैर्मल्य च भवेयथा परिणतः स्थैर्य च कार्य तथा ॥२४॥ मामायिय प्रतकी आवश्यकता। भावार्थ---प्रतिदिन प्रात कार भोजन करनेसे पहिले शुद्ध होकर प्रसन्न मनसहित निरपद्रव स्थानम जार भावपूर्वर कमसे कम एक सामायिक तो अपग्यहीं करना चाहिये । सामायिक के काटम भोजन,स्त्री, देश और राजसम्बधी चारा विस्थाओं को तथा मन के दश, पचन के दश और काय के बारह दोपोंको दृरकर ऐसा कार्य करना चाहिये जिससे मानी निर्माता आर परिणामसी स्थिरता हो ॥ २४ ॥ देशायकाशवतम। पष्ठे यद्विहिता दिशा परिमितिस्तत्रापि सक्षेपतो. द्रव्यादे. परिमाणमादरधिया कृत्वाऽऽथयो रयते । मोक्त तदशम प्रत मुनिवरै-देशावकाशाभिध, पट्कोट्या प्रतिपालनीयमनिश काल यथेष्ट पुनः ॥२५॥ देशासाशिफ्वत। भावार्थ-छठे गिवतम जो दिशाओकी मर्यादा की गई है उसमें भी सकोच करके आदखुद्धिसे द्रव्य लेन कार ओर भानका परि•
सेठिया जैन ग्रन्थमाला
माण करनेमे स्मश्नर गेस्नवाग दसना देशमाशिमत्रत उपन
होता है ऐमा मुनीश्रराने कहा है, इसको दवानुमार छह कोरीम
नित्य पान सरना चाहिये ॥२५॥
पौषधम्रतम्।
त्यक्त्वा भूपणमाल्यमेकदिवस कृत्वोपवावस पर,
हित्या पापकृति गृहीतनियमस्तिष्ठेश्च धर्मस्थले ।
धर्म यानपरायण शुभमतिस्तत्पौपधारय प्रत,
ग्राह्य पर्वदिनेषु दोष रहित पाल्य विशुद्धयाऽऽत्मनः॥२६॥
पीपधवत।
भावार्थ--माधारण वस्त्र के सिराय ममस्त अरङ्गार पुष्पमाडा
आदि का त्याग र एक दिन अर्थात २४ घटे चउरिहार उपवाम
धारण करे तथा सन सामारिस णपक या मे निवृत्त हो नियम धारग
कर धमस्थान में रहे और वहा परमधर्म ध्यान में लीन रह कर शुभ
भाना मे रात्रिदिवम यतीत करे इसे पोपधान रहते है, धामिन
गृहस्प को अष्टमी चतुदशी आनि पगिनों में आमा की शुदि के
रिये दम बत से अप य पाग्न करना चाहिये ॥ २६ ॥
अतिथिदानप्रतम।
ये स तोऽतिथयो यहागणगतास्तेपा पुरस्सारतो-
योग्यानोदक्वखपात्रनिग्य यद्दीयते श्रेयसे ।
एतद् द्वादशर प्रत समुदित निष्कामदानात्मक,
सेव्य भाग्नयाऽशनादिसमये योगे तु दानेन वा ॥२७॥
runny-
मत य-कौमुदी
अतिथिमन्यारव्रत।
भावार्थ-नो सपुस्य अतिथिरूपमं घरे आगनमें आये हा
उनकी म कारपूर्वक योग्य अन्न जर वस्त्र पात्र स्थान जादि वन्तु निष्काम
शुद्धिये केन? आम कल्याणके ये प्रदान करना निष्कामदानरूप
बारह नत ह गृहस्थको भोपनाति के समय भाग्ना भाना चाहिये,
अथवा गोग मिलने पर दान देकर दस व्रतका अर य पारन रना
चाहिये ॥ २७ ॥
तृतीयपरिच्छेद।
सेवाधर्म ।
यदेशीयजलानिलैपुरिद सधारित पोषित,
यच्छिक्षाव्यहारतो निपुणता बुद्धेः समासादिता।
यस्माजीग्नसाधनानि सनाऽनादीनि लगानि गा,
तेपा प्रत्युपकारिणी सुमनुजाः । सेवा समाश्रीयताम् ॥२८॥
सेयाधम।
भागार्थ-जिस देशकी जल्पायुसे यह शरीर बना आर पुष्ट
हुआ है, तथा जिस समाजरी शिक्षा और व्यवहारसे बुद्धिमें निपुणत
आई है और जिन मनुष्यों से जीरन के माधाभृत अन्न वस्त्रानि
प्राप हुए है. हे सपुरषो । उनका सेवाद्वारा प्रयुपमा ग्ना परम
आवश्यक है ॥२८॥
m-
मेठिया जैन प्रन्यमाला
माण करनेमे मआश्रयो गेग्नेशाय दमों देशनाशिकवत उपन
होता है ऐसा मुनीश्वराने रहा है, इसको द छानुमार छह बोरीम
नित्य पाग्न सरना चाहिये ॥२५॥
पोगधनतम् ।
त्यक्त्वा भूपणमाल्यमेकदिवस कृत्वोपवावस पर,
हित्या पापकृति गृहीतनियमस्तिष्ठेश्च धर्मस्थले ।
धर्म यानपरायण शुभमतिस्तत्पौषधाग्य उत,
ग्राह्य पर्वदिनेषु दोष रहित पाल्य विशुद्धयाऽऽत्मन ॥२६॥
पौषधमत।
भावार्थ--माधारण वस्त्र के मिपाय समस्त अरगार पुष्पमाग
आदि का त्याग कर एक दिन अयात २४ घटे चविहार उपनाम
धारण रे तथा मर सासारिक पापात्यों से निवृत्त हो नियम धारग
कर धमस्थान म रहे और वहा परमधर्म ध्यान में लीन रह र शुभ
भानों से रारिटियस यतीन को दमे पोपधात रहते हैं, धामिन
गृहस्थ को नष्टमी चतुर्दशी आदि पदिनों में आमा की शुद्धि के
लिये इम बन से अप य पाग्न करना चानिये ॥२६॥
अतिथिदानव्रतम् ।
ये सतोऽतिथयो हागणगताम्तेपा पुरस्कारतो-
योग्यानोदकवस्रपाननिल्य यदीयते श्रेयसे ।
एतद् द्वादशक प्रत समुदित निष्कामदानात्मक,
सेव्प भारनपाऽशनादिसमये योगे तु दानेन वा ॥२७॥
F पर्तय-कौमुदी वृक्षका परमार्थजीयन भावार्थ-रे ल' तृ पत्र पुप फर मूर आदि समस्त अव- यथामे आफ्धरूप बनकर रोग दूर करता है पत्राचाग पशुगेका तथा मिल्याउम मनु गका पोषण करता है, तेरे पुष्प प्रतिग्नि सपुरपा के मसर तथा पूजारिधिम काम जांत है, आर नेग बाट यती में मामी नारा जादि वाहन बनानम गृहनिर्माणम तया भोगनपानम काम जाता है और तेगे घाट, वमल-पत्र बनानेम काम आती है। 71 पयर आनिमे सतानेवाली भी त मोट कर देता तेरी गीतरदाया पथिका यम दूर करती हैं, तृ तृष्टि आदिका आपण कर वायु गुद्र करता है, शीत उष्ण और वर्षा की गाथा सहर प्राणी मानी सेना रग्नेनारे हे तरतर' तूने यह अनुपम परोपकार नत रिममे मीसा ॥३०॥३१॥ पगपयागमन सस्त मस्तित्वम । मृर्षी भ्राम्यति नाशनाप तमसो लोकोपकाराय च, मेघो वर्पति जाति वायुरगला बालादिमर्यादतः। नयो भूमितले वहन्ति नितरा नृणा हरन्त्यो मल, सद्भावोद्भपन परार्थमनो मायेण विनायते ॥३॥ उत्तमयस्तु परापकार पियेही होती है। भावार्थ (~अन्धकारमा नाश क प्रकाश आर गमा पहुँचाकर ममम्न विश्वका उपकार करनेरे लिये सूर्य नि य भ्रमण करता है, मध यथाममय जर बरमाता है, ऋतु आदिरी मर्यादा अनुसार वायु हमेशा चग करता है, तथा नदियाँ मनुष्यास मर दूर करती हुई पृथ्वी पर
सेठिया जैन म यमाला
प्रत्युपधाग्वृत्तापयता।
नमा पोपणाकाय ददति स्वाय सुपक फल,
जर वा एकतणानि दयममल गारोऽर्पयन्त्यन्यहम् ।
धानाऽप्युपकारपस्थ निम्प नो रिस्मरन्ति भण,
न्यान् म युपकारसिद्धनियम धीमान् मनुष्य स्थम् ॥२९॥
प्रत्युपकारवृत्तिकायापकता।
भावार्य- पोपण करनयाको पारिश और पो फल देते
द, गाय सूया घाम ग्यास प्रतिदिन निर्मर मिष्ट दूध नी है, अरे
ने भी पगि का घर क्षणभर भी नहीं भूरते, अर्थान जी जान से
घरमी रखा करते है । जन मि जन प्राणियाम भी प्रयुपकारवृत्ति
यी नानी ह तर बुद्धिमान् मनुष्य इस प्रसिद्ध जार याप नियमना
भग क्या करते है ॥२९॥
वृक्षम्य परार्थजीयनमा
व सर्वावयर्गद नरसि भो' निप्पार भैपज्या,
पत्रै पोषयसे सदा पशुगणान् दुभिक्षाले नरान् ।
युज्यन्ते कुसुमानि ते प्रतिदिन सत्कारपूजाविधौ,
काष्ठ ते कृपिनौटहान्नपचने न्वा युज्यते वल्कले ॥३०॥
पष्टपाररपकारिणामपि फल मिष्ट ददासि हत,
पान्याना तु पय श्रम हरसि वा त्व छायया शीतया।
दृष्टयापकायुशुद्धिजनक शीताऽऽतपादे सह ,
केनेद तव शिक्षित तस्वर' मान्य परार्थ प्रतम् ॥१॥
कर्तव्य-कामुदी VAJA द्वार है। दूसरे सुसी देसार प्रमोद करना दुमरा द्वार है। दुसी जीना पर त्या ग्ना तीसरा और शत्रु पर द्वेष न कर पेक्षा अर्थात म यस्थमार धारण करना चतुर्थ द्वार है ।। ३४ ॥ चतुर्थपरिच्छेदः। मैत्रीभावना। यरत्याग । चैर दुखवानलोद्भवकर चिन्तालनाम्भोररो, धर्माम्भोजहिम महाभयम्वनिः कर्ममाहाऽऽश्रयः। रागद्वेपमहीधरायशिरसर विक्षेपवशोत्सवो, मैत्री मथयणायमुक्षिप हृदश्चतत्समूल द्रुतम् ॥३॥ वैग्या त्याग। भावार्थ-खरूप दारानि उ पन करनेवाग यह थैर, चिन्तारूप लतामा सींचने के लिये मेघतुय और धर्मरूप मिटको जलाने के लिये हिमसमान है, महाभयकी सानि, धार मध का साग, राग द्वेष रूप पर्वतमा ऊचा शिग्वर ओर चित्तविशेषरूप वशो बहानाय है, अत एच मंत्री भावनारी रक्षाके ये हत्यमे हम परकी जटको समृट उखाट देना चाहिये ।। ३५ ॥ मर्यऽपि प्रातर। भ्रातत्वेन भवान्तरेषु जनिता सर्वेऽपि जीपुरा, नैकोऽप्यस्ति तयावियो न रचिता येनार सम्बन्धिता। म मैठिया जेन यमाग .. निरन्तर पग ग्ताह ममारम प्राय मब उत्तम वस्नुओंस : पत्ति परोपकारमय प्रतात हाती ह ॥ ३२ ॥ प्राणिनामपि पगपधारवृत्ति । कोशेय रचयन्ति भूक्ष्मकमयो नक्तंदिर यत्नत , स्वादिष्ट मप्रमक्षिका मधुमर सचिन्वते सततम् । मुक्ता विभ्रनि भुक्तयो पि जठरे पस्तुरिका सन्मृगा, एतेषामसुधारिणामपि जनुलोकोपकारार्थकम् ॥३॥ प्राणियांकी भी परापकारगृत्ति । भावार्थ-पाटे २ को रातदिन परिश्रम करके रेशम उपन करते हैं, मधुमश्यिया निरन्तर योग सम्वादिष्ट मधु मचय करती है सीप अपने उ-रम मोती तथा उत्तम मृग नाभिमें कस्तूग धारण करते हे न सब खुद्र प्राणिया का जीवन भी पर परेपसार ये है स्वाथरे रिये नहीं ॥ ३३ ॥ বঘমহাৰাগি। सेवाधर्मपुरमेवेशकरणे द्वाराणि चत्वारि वै, मैत्री सर्वजनैन केनचिदपि रेगस्तदाय नतम् । मोदोन्यस्य सुखेन यस्तदपर द्वार तृतीय दया, दुखाऽप्लेषु चतुर्थमुग्रकलुपे योपेश्रणाऽऽश्रीयते ॥३४॥ सेवाधर्ममें प्रवेश करने द्वार । भावार्थ-मेवाधर्मरूप नगरमें प्रवेश करने न्येि चार वाजे हैं, किसीमे क्लेश द्रोह न कर मनुष्यमानके साथ मंत्री भार रसना प्रथम २३ कर्तव्य-कौमुदी मैत्री धमा मैत्रीकल्पलता प्रयाति वितति शतविकाशो यथा, तस्यास्तिष्ठति मूलमात्मनिलये सन्यस्तु सम्बन्धिपु। शाखा देश-समाज-मानगगे विस्तारमापयते, सर्वपाणिगणे तदीयशिखर मान्ते जगवामुत्ते ॥३८॥ मित्रता का प्रम। भावार्य-यो यो आमा शक्ति का रिकाश होता जाता है त्या त्या मनीम्य कापरता फटती जाती ६, दम मनीरूप क परता का मूल अपने घरमे रहता हे अर्थात मी प्रथम धम्म प्रारम्भ होती है, उमका रस्य कुटुम्विया म शासा समान देश आर मनुष्यमानमे तथा शिखर प्राणीमात्र में रहता है अतम ब.ते २ यह नत्रीप क-परता समार में व्याम हो जाती है ॥ ३८॥ मंत्रीघातकप्रकृते परिहार । बेधार्थ यदि तत्त्वानश्चयधिया सर्व समालोचना, वैदेश्य यदि यता नयगुणस्तस्मात्य दीयनाम् । बैनात्येऽपि विगेरभावजनन दोपावह सर्वथा, भेदेऽपि प्रकृते योरनुचित मैत्रीपयोत्सर्जनम् मिश्ताघातक प्राति का परित्याग । भावार्थ- यदि कोई व्यक्ति विधा अर्थात् भिन्न धर्मना है तो उसके माय विरोध न करके तपानिधय ग्नेकी मुहिमे तत्वाचार करना चाहिये, कोइ विदेशी है उस से नवीनगुण सीमना तथा मियाना चाहिये, दूसरी जाति वाले पुरुष के साथ घर पिगर करना गया सेठिया जैन ग्रन्थमाला पुत्रा रस्त्यग्विलागिनो भगवत कर्तृखवादे पुन रेवमग्विला जना' समभवन् ते भ्रातरः सोदरा ॥३८॥ मर आवाय माध भ्रानभाय ॥ भावार्थ- 4-~~सय तीर पहिरे रिसौनक्सिी भत्रम अपने मात्र हा चुक है, [मा एक भी नीर नहीं जिसरे साथ 7 उपने रा १३ । न । हुआ हा, जो लोग दश्वरको मष्टिी मानते है उनके मन से ममम्न जीन इश्वर के पुत्र है, दम प्रसार क्त्तावानी और अक्त्तावादी इन दोनों के मत से प्राणीमान भाई सिद्ध नए, अताप मान के साथ विगध इग्ना मईया अनुचित हे ।। ३६ ॥ थमायाचाम्। नानिष्ट मनसापि चिन्त्यमग्विल-भ्रानात्मकमाणिना, फित्विष्ट मनसा धनेन वचसा कायन कार्य सदा। येपा बायजनि क्षति स्थमपि त्वत्तोऽज्ञताया नदा, तास्त्व शुद्धधिया क्षमापय मुदा स याहये नित्यश ॥३७॥ क्षमा को मिला। भावार्थ-ममस्त प्राणी भाई है, अत र मनसे भी उनका बुरा चितवन न क्गे, रितु मन वचन माय मे तथा धन से उनका सता भग क्गे स्मिी समय अज्ञानवश तुम से किसी को क्मिा तरहती हानि पहुँची हो तो उचित ह कि तुम गुद्ध अत करण में हर्पपूर प्रान और मायकार दोना समय नित्य उनमे भमा मांगो।। ३७॥
कत्तल्य-कौमुदी
है। (उत्तर) भाई । मेरी वनस्पति जाति का उदय देखकर मेरे हृदयमें
दाह वर उ पन होता है, इस रिये में जाता हूँ। (प्रश्न) इस पृथ्वी
पा तेरे समान दूसरा कोन है जो विना कारण दुसी होता है।
(उत्तर) मुझसे भी अधिक दुःखाग्नि से जोडा वे मनुष्य है जो ईपी
करते है ॥४१॥
ईग्यांत सर्दय दुग्दम।
भार्या भव्यतरा मुताश्च मुधियः सम्पत् परा कोटित-
ईप्यालुन सुख तथाऽपि लभते दन्दद्यते मानस।
नो पश्येत् मुखिन कदापि यमपि चापीह भूमण्डले,
तोवैप भवेत सूखी परमहो नेहस्थितेः सभव ॥४२॥
ईया में सदा दुम होता है।
भावार्थ --उत्तम पतिनता ती मि हो, पुत्र बुद्धिमान हो,
और कगेटा से भी अधिक सम्पति हो तथापि दप्या रंनवाला मनुष्य
कभी सुरस का अनुभव नहीं कर सस्ता कारण कि वह नि य मनम
जा करता है, यदि हम भूमण्टट पर कहीं पर किसी समय मुखी
मनुष्यको न देये तन ईर्ष्यालु मनुष्य सुयी हो मरता है किन्तु ऐमा
होना अमभन है अर्थात टयाल मनुष्य सुग्यको सामगी के होते हुए
भी सदा दुसी है। बना रहता है ॥४२॥
२४ सेठिया जन प्रथमारा हानि सरक? नशा स्वभावभेट होन पर भी मंत्रीमाग का त्याग उग्ना अनचिन उधम्गादिषु मरर पिन मग्रीघात । उम्प पि म तिष्ठति सदा किं द्रव्यपवन का। वेदय पि चशेरचन्द्रकुमुदे हासो न मैन्या सदा। जा ५ऽपि वन संदेर तरबस्तिष्ठन्ति बस्यादिभि , कि त्या या मनुस्तदा मुख मैन्यल्पभेदोद्भवे॥४॥ धभ-भदादिप गन पर भी मनोवा घात नदी हाता! भावार्थ-जीगादि यह दया| म्यभार भिन्न मिन तथापि य द य म राम्म सपना एक साथ हते है, उमुट चर और चकोर भिन २ देशम रहते है कि तु कभी इन की मत्री का हाम नहीं होता, वृक्ष और स्ताआ म जाति भेद ह तो भी दनम एक साथ नियाम करते है, कि उक्त पटायी म स्वभाष भेट, देशभेट और जातिभेद मंत्री के बाथन नहीं होते तो क्या मनुष्योंका उचित है मिथोमा भेट रहने पर मना सुसनायिनी मित्रता का त्याग कन्हें ॥४०॥ इयर्यादाप । रे दुर्भागियरासक' ज्वलसि पिं काले म्युवाहोदय, दृष्ट्या जातिमहादय मनमि में दाइवरो जायते । म्यात्मचिजगतीतले त्वदुपमो निमारण दुखितो, मनोऽप्युग्रविपाददग्धदया ईर्यायो मानवा ॥४॥ ईध्यारूप दोष। भावार्थ-अरे दुभागे जवासिया ' तू वास्तुम क्यों जरजाता ~ -- २९ मा बत्तय-ौमुदा करने टगते हैं चोर मेघसी बिन्दु पार भति आनन्दित होते है. क्या रसी प्ररार ह मानर ' तु भी माना गयुमो का अभ्युटय देवर सी हर रोमाच धाग्ग र अथात् प्रमान हो ||3||2|| अध्यायमादया पटम् । पाः फल पास्यामि प्रगुणिनामीप्या परेभ्यः पुन- मोदम्योत्कटमोदमेव जगतम्ब रम्यमे प्राचलम् । मोदन्ता मम सम्पदा परजना पुन्तु नेप्यामिनि, वाडा ते मनसम्नतोभन मटा मोट माया न्यनारा पा और प्रमोदमा पर। भावार्थ-यदि तुम ट्यगी टप्यों करोगे तो हम भी तुम्हाग दुनी दुर्गा कसो, तथा तुमन्मा की अतिम रूप मनायोगे ता दगी भी ९॥ तुम्हारी उन्नतिमें अशिप मनावग बात होरा फट इशा और ता। हमा का हप है यदि तुम्हारी हका ऐगी है कि मग मिनीत- सपत्ति में हरेर हात हा कट भी ईप न कर तो रित है कि तुफ है, दमकी दया न का माहप कगे ॥१५॥ सूस जागा पष्ट परिन्दः। तो टमा 1 !! करुणाभावका মক্ষন গুলি কি वर्मतरास्तदव कवित्र का दयरोगादिता- ये केनचित्पीड़िता। न्ति ये ये शुधा, शान्ति साहाग्यकम् ।।२०।।
पञ्चमपरिच्छेदः। प्रमोदभारना। परमम्पत्तो प्रमोद । पर्तव्यत्रतपालने यदि रचिस्तरतस्त्पन्पता- मीर्यालेशमिताऽपि दोपजनिका सेवापाटार्गला। दृट्वो रुपवत परान् समुदितान् मन्मानितान सादर, मोदस्त्र वमल विशुद्धमनसा पद्म यथायोदयम् ॥४॥ वृक्षा पलपिता लता पुलरिता पुप्पैर्वसन्ते यथा, श्रु वा म्भाधरगर्जना गिरित मत्ता मगरा यथा । लम्चा तोपदपि दुमति पिपुल हर्प यया चानको, दृष्ट्वा न्युजन भयोन्नततर रोमाञ्चितस्व तथा १४४॥ दमरे का मम्पतिशाग देखकर प्रसग होना। भावार्थ-~-यति वन याप त पाने की उमण्टा हे तोश मात्र भी टपी नहीं करना चाहिये, गनि ३ा सेनाप को बद करनेवा ? आग है, दूसरे को नतिशासी तथा हर्षित एप आदर में म मान पाने गुपया शुद्र रदय रो अतिप्रमाा होना चाहिये, जमे सूयमा उल्य देवर नमः प्रम होना है। चमतरतु म आगमन टेम्वर वृक्ष नवीन पल्लव को तथा रताए पुष्पों साग रोमन को धारण करती है, मेघी गना मुन मगर मन होर नृत्य
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বি। সব মান্নান H यमगामायना। भाग जन भागमम पर गायो समाप का नया बौद्र आर पदिय धममे इस धमम्प का ? पताया, दयाग्निा साधुपना और पारस्पना दुम है, तथा रम पिना संगमगरूप माग पर पार ग्मना टपर है ॥ १६ ॥ करणापमा सोऽपि मियनीवनास्तनुभूतो यान्नि सौम्य मदा, दुग्य कोऽपि न पानि त्वमित्र नो मृत्यु न चाना गम्। यार वासि देबि तारणपाऽन्येभ्यो जनेभ्यो मुद्रा, व तत्माप्स्यसि देतो मानर मपक्ष याने ॥१७॥ पाणा का पर। भावार्थ 1-मा प्राणियों को माना जीवन प्रिय, सप जीर तुम्हारी तरह मदा मुरपणी इन्छा रखने है, तथा दुमयु और अनादरमे मुह मोडते है तुम पिस यम्नु को चाहने हो उसे प्रसन्नतापूर सरेको त फार प्रान यगे भाग्यरसे तुम्ट भरपूर मिमी ॥१७॥ करणा थिमा मर्य फिल्म। विद्रव्येण फल न येन परणापाप्रम्य दुव हुन । विदेहेन न योऽपित शितितले प्रनाहिना रसणे । फि शत्या न ययोढना परणया दुखार्दिता. माणिन , किं युद्धया न ययादित शिवपय फायविधिउत्परि८॥
vn- वर्तव्य-कौमुदी २९ वरणा यिना मा निफल। भावार्थ-निस दयसे करणापात्र जीनामा दुःय दर न किया मद्रय से क्या फ? निम शरीर मे पीडित प्राणियाकी रक्षा न की उम गिर मे क्या लाभ ' वह शक्ति किस कामनी निसस करणापूर्वक दुषितजीनामा उद्धार न रिया, उस बुद्धि से क्या + जिसमे मका नाश ग्नेगा। मोक्षमाग नही पहिचाना ॥१८॥ पुण्यवृक्षसेचनाय करणा । साम्राज्य सुयशः सुप च मुहदो चिया विनीता मुना- स्तानीमानि फलानि पुण्यसुतरोः पाप्तानि सयस्त्वया । सिञ्चन करणाजलेन सतत चेद्रमितु वासि, नो चेन्छोपमुपैयति हततर सौरय च ते नड्यति।। ८९॥ पुण्यरप-वृक्षको सींचने के लिये काणा की आवश्यकता। भावार्थ-गयरमी कत्ति सुरय पिया मित्र आर विनीत-- पुन जो कुछ इस समय प्राप्त ये सन पुण्यरूपवृक्ष के फर है, यदि इस पुण्यवृक्ष को सना हरा भरा रखना चाहते हो तो इस का निर तर करणाजल से सिंचन करो अ यथा वह शीन सूख जागा और तुम्हारी मुससामग्री अदृश्य हो जायगी ।। ४९ ॥ करणापामाणि । ये दीना विफलानिनो विधिहता दारिद्रयरोगादिता- वृद्धा वा विधचा अनाथशिशो ये केनचित्पीड़िताः । दुर्भिक्षे तृणधान्यदुर्लभतया सीदन्ति थे ये सुधा, ते सर्वे करुणास्पद धनवता वा-उन्ति साहायकम् ।।२०।।
३० सेठिया जेन ग्राथमाला परणापात्र जीय। भावार्थ-तीन अपँग भाग्यहीन टन्टिी गेगी वृद्ध विधवाएँ पनायगार क्सिी द्वारा सताये गये निगर मनुष्य तथा भक्षसमय जन्न धाम विना भृग्य मग्नेबारे प्राणी ये मन करणापान है तथा धनवाना से जार्थिक सहायता की - छा रखते है ॥ ५० ॥ सप्तमपरिच्छेद । मायस्थ्य रायना। पापेभ्य परिमोचनाप जगतश्चेत्ते मनोभावना, मा यस्थ्य परिशीलनीयमनिश तस्यास्तदा सिद्धये । गा यस पेन विना मनस्समतुला वैपम्यमापयते, चैपम्येण पतेरस्वय गुणगणारेऽन्यमुक्त क्या ॥१॥ माध्यम्ध्यभावना। भावार्थ-तुम यदि ससारके प्राणिया को पाप से छुटाना चाहते हो तो निरन्तर म यस्थ-भावना का अभ्यास गे, क्याति म यस्थभावना के पिना मन की समता, विषमता का रूप धारण करदेती है सरेको पापमे मुक्त करना तो दूर रहा विषमता के कारण आप म्वय गुण ममूह से गिरनाना है ॥५१॥ महिष्णुता। सेवाया जनतोपकारकरणे धर्मस्य सवारणे, सत्योत्कृष्टसहिष्णुता मनसि तेऽवश्य सदाऽपेक्षिता ।
पत्त य-कौमुदी इन्युस्चा मतिपक्षिणस्तदपि नो कोपो पिपादोऽथवा, नयेनापि च धैर्यमल्पमपि चेत्ते कार्यसिदिस्तदा ॥५ महनशीलता। भावार्थ-देशसभा, मानव समान का उपकार जोर धमप्रचार करो करिये हृदयम मपदा विशार महनशीरता पना आर यक हे, यदि शत्रु मारने को भी ग्यत हो तो रोप जया सेद न करे जोर मिचि मात्र धयको न छोडे तर ही कार्यकी मिद्धि हो सस्ती ॥५२॥ पापिनामपि न तिरम्कार । भूयासोऽपि विरोधिनस्तुनुमृतः स्युः पापकार्ये रता- यो यास्ते मृदुनम्रोधवचनै सामायुपाखिभिः । करत्वान्मृदुता भजन्ति न च ते केनाप्युपायेन चेत्, फर्तव्य तदुपेक्षण न च तिरस्कारो-थवा ताडनम् ॥ ३॥ पापी मनुष्य का भी तिरस्कार नहीं करना चाहिये। भावार्थ- आमन् ' इम समारंम बहुत से प्राणी तेग विरोध कग्नेया है जो कि पापम में स्वलीन है उनको साम दाम और भेट इन तीन उपायों से तथा मीठे नीर मोमल उपदेश द्वाग समयाना चाहिये यदि वे दूरजीव स्मिी प्रसार कृरताको बोटकर कोमरता धारण न तो उनकी उपेक्षा कानाही उचित है मितु उन निम्म्यार अथवा ताटना करना उचित नहीं ।।५३ || सेठिया जन प्रथमाग पापर्यय नाशा न तु पापिनाम् । सार्य पापविनाशन तदपि नो नागेन पायङ्गिनी, पाते पापिजनस्य हिंसक्तया पापस द्धिर्भवेत् । वसादमलनाशनार्थमुचित नो सन्छेिदन, मितत्पावनल्न तत्र मृदुता रखान्मलोत्सर्जनम् ॥५॥ पापियों का नाश न करक पापकाही नाशकाना चाहिये। भावार्थ--पाप का नाश करना चाहिये रितु पापा नाश करना अनुचित है क्या कि पापीमनुष्य का घात करने से हिंमा होता है और हिंसा से पापी वृद्धि होती है, पत्रआनिया मे दृर करने के रिये वयमा छेदन करना युक्ति सगत नहीं, मितु जल से खो कोमट बनामर मर दुर करना ही युक्ति सगत है दमी प्रकार पापीरो कोमल बचना द्वाग पाप मे छु ाना योग्य है ॥४॥ शान्तिपूर्वकमा यस्येनेय विजय । सामऽपि सहिष्णुता समुचिता सेवादिकार्ये सब, दौर्बल्य यदि मन्यते तदपि नो सम्यग् स्वसच्चोदयात् । शातिक्षान्तिसमाश्रयेण सतत मा यस्थपभावाश्रये, जास्तत्मतिपक्षिणोऽप्यवनता धाटय च पापाग्रहम् ॥१५॥ शातिपूर्वक मध्यम्यभाय से ही विजय होती है । भावार्थ-~-शत्रु से बदलाने की शक्ति होने पर भी देशसेगा आदि कार्य करनेवारे को सहनशीरता धारण करना उचित है, सहन शीरता को दुर्बरता मानना युक्त नहीं, क्यों कि आमाका बल प्रकट १३ TV पर्तग्य-यौमुदी होनेम ही सहनशीपनाउपन्न होती है, अत एव शाति और क्षमा का अपम्मन पर मध्य भार धारण करना चाहिये, ऐमा करने से तुम्हारे शत्रु भी अपनी ता आर क्याग्रह को छोट नम्र हो जायगे ॥ ५५ ॥ + अष्टमपरिच्छेद। मनुष्यमेधा। निर्मायाः पशवो यथा करुणया पवाल्ये यत्ननी- रक्ष्यन्त परुणालभिभरिजन कृत्वापि भूरिव्ययम् । नि या मनुजाम्तथैव फरणायुद्ध या मुरक्ष्याः सदा, यत्सन्ति प्रथमेऽधिकारिण इमे बुद्ध शादिवैशिष्टयत ॥५६॥ मनुष्य-सेया। 1 भावार्थ-मे क्ष्याट भन्यमनुष्य पणानुद्धि से बहुत धन सन फरक पिंजरापोर बनाते है और उसमे बटे य न से अनाथ पशुओं की रक्षा करने है। इसीप्रकार करणानुद्धि से अनाथ मनुष्यों की रक्षा करना परम आवश्यक है । कारण कि पशुआ से मनुष्या में ज्ञान अधिक होता है, अत एव रक्षा कार्यमें इनरा प्रथम अधिकार है। अर्थात् पहरे मनुष्यों की रक्षा करना चाहिये ।। ५६ ।। अनाथयारमेया। येपा नास्ति पिता नचापि जननी नोभी न च भ्रातरी- पागस्ते करुणाग्या विधिहता भ्राम्यन्त्यनाथा यतः .
३४
सैठिया जैन प्रथमाला
तेषा रक्षणहेतवे स्वविपये सस्थाप्य पालाश्रम,
साहाग्य धनिकै जनै समुचित द्रव्येण कार्य स्वयम् ॥२७॥
अनाथ बालकांधी मैया।
भावार्थ---जिन बालों के माता पिता भाई आदि मोट रक्षा
ऋग्नेगा न हो ऐसे करणापात्र अनाथ वाक दुर्भाग्यवश इधर
उधर मारे फिरते है धनिक पुस्पोंका तय है कि इन अनाथ निरा
धार बाटमों की रक्षा और शिक्षा के लिये अपने देश में अनाथालय
स्थापन करें तथा यथाशक्ति द्रव्यद्वारा स्वयं सहायता करें और दूसरों
से परवावे ।। ५७ ॥
बालसेवा विपये माधारणजन कर्तव्यम् ।
सामायैरपि मानजनपदे पर्यव्य पृथ्वा जनान् ,
शोभ्या नायविहीनदीनशिशव समृध तानाश्रम।
रक्ष्या रक्षणपद्धतिश्च मुशा लोलुक्यता नित्यश ,
स्यात्तत्र सवलना कयश्चिदपि सातानायफान प्राप्यताम्।।५८
बाल सेवा प्रति माधारण मनुष्यों का वर्तव्य ।
भावार्य-जिन मनुष्यों की द्र य से सहायता करने की शक्ति
नहा है, उनका तन्य हे सिये देश भित २ स्थाना में घूमें । तथा
उन २ ग्रामों के मनुष्यों से पूछार दीन हीन अनाथ बालका को दें,
और रक्षानिमित्त अनाथाश्रममें सग्रह करें तथा नियप्रति आश्रमका
कार्यरम और रक्षापद्धति का अछी तरह निरीक्षण करें। यदि इस में
स्मिी प्रकार की त्रुटि शिदित हो, तो आश्रम के मुग्वियाओं को
सूचित करें ॥ ५८ ॥
कर्तव्य-कौमुदी
भिन्नभिन्नप्रकारेण सेवार्जनम् ।
विद्वॉश्चित्पठनीयतान् सरलया रीत्या मुदा पाठय,
शिल्पी चेदुचिताश्च शिक्षय कला निष्कामच्याखिलाः।
वक्ता चेदसि दर्शय प्रवचनैः सन्नीतिमार्ग सदा,
वैधश्चेत्कुरु रोगनाशनकृते तेषा व्यवस्था शुभाम् ॥ ५० ॥
वैश्यश्चेद्भव कार्यवाहकतया वस्तुव्यवस्थापका,
श्रीमाथेच्छिशुयोग्यवम्बनिकर देहि प्रसङ्गोत्सवे ।
मामान्यो यदि शसनेन जनतामध्यऽस्य सञ्चारगं,
सेवामय येन केनचिदपि व स्वात्तिं विना ।। ६०॥
भिन्न भिन्न प्रकारके मनुष्यों की भिन्न २ सेवा।
भावार्थ- सेवा की इच्छा रखनेवाग विद्वान् आश्रम के बालकों
मो प्रेमपूर्वक सुगमर्गति मे पदावे, कारीगर निष्कामवुद्धिसे सपूर्ण योग्य
कलाकौशल सिखावे, वक्ता उपदेशद्वारा सदा उत्तम नीतिमार्ग दिखावे
वैद्य खानपानादि की उत्तम व्यवस्था रे जिससे वाटफ नीरोग रहें
अथवा रोग उपन्न होने पर योग्य चिकित्मा को, वैश्य कार्यभार
धारण र-आश्रमरी वस्तुओंको व्यवस्था करे धनवान विवाहादि
उसव पर अनाथ चालकों के योग्य वस्त्रादि प्रदान करे साधारणपुरुप
जनसमुदाय में कार्य की यथार्थ प्रशसाद्वारा आश्रम का प्रचार करे
अर्थात् प्रयेक व्यक्ति को उचित है कि स्वार्थ त्यागर यथाशक्ति सेना
करने में कटिबद्ध रहे ।। ५९ ॥६०॥
नवमपरिच्छेद । ग्राम्यशाला। पदामे शिशुशिक्षणाय न भवेच्छालादिक साधा, सेवाम्यानमिद बर सुपिपा विधाथिशिक्षात्मकम् । श्रीमतोऽपि च शक्नुवन्ति धनत' सम्थाप्य शालामिह, सेवापुण्यमुपाजितु च पितता कीर्ति जनाशीर्वच ॥६॥ गाय में पाठशाला। भावाथ-जिस गार में पारका की शिक्षा के सारन पाठ- शार आदि न हो तो विद्वान पुरष शक्ति अनुसार विद्याथियों को विद्याभ्यास करायें, आर श्रीमान् पुरप धनमठ से शाग म्थापित करें अथात् प्रत्येक मनुष्य विद्यार्थी सेवा के शुभ अवसर को हाथ से न जान दें कारण मि इस से पुण्य का उपातन, कत्तिमा पिरतार और जनसमुदाय का आशीर्वाद दयादि एक साथ अनेक राम होते है॥६॥ शूद्रशिक्षणम् । शुद्राणामपि शिक्षणेन चरित शुद्ध भयेनैतिक, नश्येदुर्व्यसनोद्भव च दुरित दैन्य च दूरीभवेत् । सेवाक्षेत्रमिद धनाढयविदुपोर्भव्य विशाल तत- स्ताभ्या शूद्रकशिक्षणार्यमुचित कार्य माधो पर ॥१२॥ - Pur- कर्तव्य-कौमुदी शूद्रशिक्षा। भावार्थ-शुद्रों को शिक्षा देने से उन का नतिक चारित्र पनिन हो जाता है । जूआ चोरी मदिरापान आदि दुर्यसन का नाश होने से उससे होनेवाडा पाप तथा दीनता दूर हो जाती है, विद्वान् ओर धनवान दोनों के लिये यह सपात्तम ओर पिशाट संवाक्षेत्र है। अतएव विद्वानों और धनवानों का कर्तव्य ह मि शूद्रा री शिक्षा का योग्य प्रनन्ध करें ।। ६२ ।। दीनाना पुस्तकादिमाहाग्यम । ये दीना' म्वमुतान्न रचितुमल गेहेदरिद्रत्वतो, नैवाप्यर्पयितु समाः मुविदिते यालाश्रमे लज्जया। तेभ्यो गुप्ततयाऽन्नपुस्तकपटान् देहि स्वय दापया- न्येभ्य' पाठयितु सुतानिजगृहे यन्टरनुयुम्ते मुखम् ॥६३॥ गरीन को पुस्तकादि को महायता । भावार्थ-जो निर्धन पुरीन मनुष्य धन के अभारसे अपनी सन्तान की रक्षा शिक्षा का प्रबन्ध नहीं कर सकते, तथा रजापश अनाथाश्रम आनि प्रसिद्ध सस्थाओं में भी नहीं भेजसस्ते, ऐसे मनुष्यों को मन वस्त्र पुस्ता आदि का गुप्तदान स्वय दें और दूसरों से दिला जिस से वे अपने घर में सन्तान की रक्षा शिक्षा का प्रश्रय सुसपूर्वक करसकें ॥३॥ विधार्थिगृहम् । वाग्छन्त्युत्तमशिक्षण पुरवर ग्रामस्थविद्यार्थिनो, नो चेत्पानिवासमन्दिरमिह स्यात्तत्र तदुर्दशा।
नवमपरिच्छेद । प्राम्यशाला। यदामे शिशुशिक्षणाय न भवेच्छालादिक साया, सेवास्थानमिद वर भुविदुपा विद्याथिशिक्षात्मकम् । श्रीमतोऽपि च शक्नुवन्ति धनत सम्थाप्य गालामिह, सेवापुण्यमुपाजितु च वितना कीर्ति जनागीच ॥६॥ गाव में पाठशाला। भागाथ-निस गार में पाया की शिक्षा के सापन पाठ- पाय आदि न हो तो विद्वान् पुस्प शक्ति अनुमार पिचाथियों को विद्या याम करावें, और श्रीमान् पुरुष धनपर से शारा स्थापित करें अथात् प्रये मनुष्य विद्यार्थी सेवा के शुभ अपमर को हाथ से न जाने दें कारण कि दम से पुण्य का उपार्नन, कीतिरा पिरतार और जनसमुन्गय का आशीवाद दयादि एक साथ अनेक राम होते हैं।६१॥ शूद्रशिक्षणम् । शूद्राणामपि शिक्षणेन चरित शुद्ध भवेनैतिक, नश्ये र्व्यसनोद्भव च दरित दैय च दूरीभवेत् । सेवाक्षेत्रामिद धनान्यविदुपभिव्य विशार तत-- स्ताभ्या शूद्रकशिक्षणार्यमुचित कार्य प्रवधो वरः ।।६२ ३७ कर्तव्य-कौमुदी शूद्रशिक्षा । भावार्थ-शृटी को शिक्षा देने से उन का नेतिक चारित्र पवित्र हो जाता है । जूआ चोरी मदिरापान आदि दुर्व्यसन का नाश होने से उससे होनेवाला पाप तथा दीनता दूर हो जाती है, विद्वान ओर धनवान दोनों के लिये यह सवात्तम आर पिशाट सेवाक्षेत्र है। अतएव विद्वानों और धनवानों का कर्तव्य है कि शुद्रा की शिक्षा का योग्य प्रनन्ध करें ॥ ६२ ॥ दीनाना पुस्तकादिमाहाय्यम् । ये दीनाः स्वसुतान्न रक्षितुमल गेहेदरिद्रत्वतो, नैवाप्यर्पयितु क्षमाः सुविदिते वालाश्रमे लज्जया। तेभ्यो गुप्ततयाऽनपुस्तकपटान् देहि स्वय दापया- न्येभ्य पाठयितु मुतानिजगृहे यन्उक्नुयुस्ते सुखम् ॥६॥ गरीनों को पुस्तकादि को महायता । भावार्थ-जो निर्धन कुलीन मनुष्य धन के अभावसे अपनी सन्तान की रक्षा शिक्षा का प्रवन्ध नहीं कर सकते, तथा रज्जावश अनाथाश्रम आदि प्रसिद्ध सस्थाओं में भी नहीं भेजसस्ते, ऐसे मनुष्यो को अन्न वस्त्र पुस्तक आदि का गुप्तदान स्वय दें और दूसरों से दिलायें जिस से वे अपने घर में सन्तान की रक्षा शिक्षा का प्रबन्ध मुखपूर्वक करसकें ॥६३॥ विद्यार्थिगृहम् । चान्छन्त्युत्तमशिक्षण पुरवर ग्रामस्थविद्यार्थिनो, नो चेत्पानिवासमन्दिरमिह स्यात्तत्र तदुर्दशा। "
सेठिया जैन अन्यमाग
३८
तेपा दु खनिवारणाय धनिकै पेनापि सडेन वा,
स्थाप्य शिक्षणधर्मसाधनयुतो रियाथिनामाश्रम ॥४॥
छापायाम (वाडिंग दाउम)
भारार्थ-प्रामीण घार उन शिक्षा पाने की दया रयते है
मितु गावा म ऐसा साधन नहीं है, अत उन्हें शहर में रहना पड़ता
हे और वहा पर उनकी भोजन शयन आदि के रिये योग्यस्थान न
मिग्ने से बहुत स्प्ट सहना पटना है । इसरिये श्रीमानों को उचित है
विप वा अनेस मिकर उनका पट दर परने के लिये बोटिंग
म्यापित कर निसमें शिवा और धम के उत्तमोत्तम साधन हों ॥६४॥
छाधाश्रमव्यवस्था।
नि याश्रमवद्भवेदयमपि क्षेत्र हि सेवाधिना,
गन्तव्य क्रमशो जनैत्रिचतुरैछात्राश्रमे नित्यश ।
तेपा भोजनपद्धतौ यदि भवेन्यौय निवासाल्ये,
तरे क्रियता स्वय हितधिया यद्वाऽधिपायोन्यताम् ॥६५॥
छापाश्रम की व्ययस्था।
भावार्थ-अनाथाश्रम की भाति यह छावाश्म भी सेवार्थी
पुरुषों का सेनाक्षेत्र है, वाश्रम की देखभाल करने के निये दो २
चार २ सेवार्थी महाशयों को प्रतिदिन यहापर जाना चाहिये तथा
छात्रों की भोजनादि यवस्था म न्यूनता प्रतीत होने पर हितबुद्धि से
स्वय दूर करना चाहिये अथस आश्रम, अधिप्राता को सूचित
करना चाहिये ॥६५॥
कर्तव्य-कौमुदी AM न्याय्ययुद्या व्ययम्था। कुर्युस्ते न परस्परेण कलह नो दुलानादर, वर्तेरन् स्वसहोदरा इव सदा योज्य तथा नायकै.। को दीनो धनिकश्च क' करणया दृष्टया निरीक्ष्योऽत्र को, ज्ञात्वा सर्वमपक्षपातमतिभिः कार्या व्यवस्थाऽखिला॥६६॥ न्यायधुद्धि से व्यवस्था । भावार्थ-यवस्थापक रोग विद्यार्थियों सी ऐसी व्यवस्था कर निस से ये परस्पर कह न कर सके, बरमान दुर्बलको न सता समें, सदा भाई ममान व्यवहार करें सन छात्र धनिक है और कौन दरिद्र अथवा कोन अधिक दया का पान है ऐसा जानकर प्रार कत्ती पतपात रहित यथायोग्य सब प्रपन्य को अर्थात् ऐया प्रबन्ध करे निप्त में रिसी रात्र को कोई कष्ट न हो ।। ६६ ॥ धामिकशिक्षणेनध विधामाफरयम्। विद्या धार्मिकशिक्षणेन रहिता नो शोभते सर्वथा, वस्त्राभूपणभूपिताऽपि महिला शीलेन हीना यथा । वियन्ते सकला कला न सफला धर्मेण युक्ता न चे-- दीनारः रिमु मुद्रयैव लभते मूल्य मुवर्ण विना ॥६७॥ धार्मिक शिक्षा से ही विद्या की मफलता । भावार्थ-जैसे वस्त्र आमपण से सजी हुई स्त्री शीविना शोभा नहीं पाती, ऐसे ही व्यावहारिक शिक्षा भी धार्मिक शिक्षा के विणा शामा नहीं पाती, समस्त करआ म निपुण होना भी एक धर्मका दिना सेठिया जन ग्रन्थमारण निरथर ह जसे खोग मुहर मुत्रण मिना सिके मात्र से मूय नहीं पा मस्ती ॥ ६७ ॥ कीदृश धार्मिक शिक्षणम। स्याच्छिष्टाभिजनोचित सुचरित विद्याधिना सर्वदा, शुद्ध निर्व्यसन स्वधर्मनिरत नीयाश्रित चोन्नतम् । श्रद्धा शुद्धतरा मतिश्च विमला ज्ञान भोत्तात्विक, देय शिक्षणमीदृश सचरितौपम्येन सस्ट्रिक्षकै॥ ६८॥ धार्मिक शिक्षा कमी नी धादिय । भावार्थ-जिस शिला से विद्याथियो का चरित्र सना सजन पुस्पा के योग्य निमः “यसन रहित धाम्मक नीति-अनुटर और उन्नत बने, धर्मश्रद्धा अन्य त शुद्ध रहे, बुद्धि निर्म होती जाने और तावित ज्ञान व ता जाने एसी शिक्षा उन सच्चार। उदार शिक्षरों से दिल निन के सदाचार से उक्त शिक्षा का अभ्यास होता रहे।६८। धामिकशालास्थापना। तस्मादामिकशिक्षणोठ्याने विद्यार्थिवर्गेऽमले, सेवातत्परमण्डलेन सुहृदा स्थाप्या. मुशाग' पुन । अगोदार पिया परार्थनिभि सेवा विधेया श्रिया, देय शिक्षणमुत्तम स्वयमल सेवगार्थिभि शिक्ष ॥६॥ धार्मिक विद्यालयको स्थापना । भावार्थ--शुभचिन्ता सेवक मण्टर को निर्मठ विद्यार्थी वर्ग में धार्मिक शिक्षा की उन्नति के ग्यि उत्तम विचारय स्थापन करना
.
फत य-कौमुदी
४१
चाहिये, उदार बुद्धिवाले परोपकारी धनाढ्यों को चाहिय कि धनद्वारा
उक्त विद्यालय की यथेष्ट सेवा कर तथा सेवार्थी शिक्षकों को
उचित है कि स्वय निदाप विद्या का अभ्यास कराने, अर्थात् प्रत्येक
व्यक्ति अपनी२ योग्यतानुसार इस कार्य में सहायक बनकर धर्म सेवा
का परिचय दें ॥१९॥
धर्मशिक्षणाभिरुचिसम्पादनम् ।
तत्तद्धर्मपरायणाः मुगृहिण• सर्वेऽपि पियाकृते,
मेप्येयुम्तनुजान्निजान् गतिदिन काले यथा निश्चिते ।
न स्यात्कारणमन्तरकदिवसः शुन्यो यथा पत्रके,
छात्र तत्पितरौ तथापिधरुचिं सम्पादयतामुभी ।। ७०।।
धर्म शिक्षा में रुचि उत्पन्न करना।
भावार्थ-~-अपने अपने धर्म म त पर सब सद्गृहस्थाको उचित
है कि वे अपने पुत्रा को विद्याऽव्ययन के लिये प्रतिदिन नियत समय-
पर पाठशाला में भेजा करें, माता पिता को छात्र के हृदय में ऐसी
रूचि उत्पन्न करना चाहिये जिससे बालक की एकदिन भी गैरहा
जिरी न होने पाने ॥ ७० ॥
सुपरिणामं पिना शिक्षणयेफल्यम् ।
किं तद्धाम्मिकशिक्षणेन न यतो विद्यार्थिना जीवन,
जात धर्मपरायण दृढतरश्रद्धाऽन्वित साविकम् ।
किं चिन्तामणिना यतो पिनिहता नैकाऽपि चिन्ता हृदो,
दारिद्रय दलित न येन दुरित तत्कल्पवृक्षण किम् ॥७॥
सेठिया जैन ग्रन्थमा अच्छा परिणाम न होने पर शिक्षा की निमलता। भावार्थ-निस धामिक शिक्षा से रिचाथिया का जीवन धार्मिक " श्रद्धापरा और साविन यने उस धार्मिक शिक्षा से क्या राम' वह चि तामणि रन रिस कामा निस से मन को इन्धा पूर्ण न हो, उम क प न मे क्या लाभ निस से रहिताम्प दुर्म नष्ट न हो, अथात् धामिक शिया प्रेमी चाहिये जिसमें छात्र धर्मश्रद्धा वा और सदाचारी बन ॥७॥ परीक्षोपायने । सप्ताह प्रतिमाममेरुमयवाऽवश्य परीक्षा सक्द्, माया तन परीम नियमत पृवाऽर्थशुद्धशादिकम् । पाला येऽत्र भवेयुरुन्नततयोनीर्णा सदाऽऽगन्तुफा- स्तेपा देयमुपायन समुक्ति प्रोत्साहनार्य पुन १७॥ परिक्षा और पारितोषिक । भावार्थ-छा की साप्ताहिक या मासिक परीक्षा सदा होते रहना चाहिये, जिसमें शुद्ध उच्चारण शब्दार्थ भावार्थ और तापर्य आदि की आँच की जाय, और अछे नम्बरों से उत्तीर्ण हुए छात्रों को तथा हमेशा हाजिर रहनेवाको रसाट् बढाने लिये यथायोग्य पारि सोपिक देना चाहिये ॥७॥ धार्मिक शिक्षणपुस्तकमाला रम्या नीतिस्था महात्मचरितान्याचारगर्माणि वा, तत्व यत्र सयुक्तिक सरल पारीन्या निवद्ध भवेत् ।
ANWARwr -~- V पत्तव्य-कौमुदी ४३ भाव्य तादृशपुस्तकैरभिनवैः सद्धर्मशिलोचित- निर्मयानि च तानि पण्डितवरै सेवाथिभि सेवा ७॥ धार्मिक शिक्षा के लिये पुस्तके । भावार्थ-जिनमें उत्तमोत्तम नीति की कथाएँ आर सदाचार पूर्ण आदर्श पुरपयों के चरित्र हो, धर्म के तत्व युक्ति पूर्वक सरलतासे वर्णन रिये गये हों, ऐसी छानजीवन को आदर्श बनानेनारी पुस्तकें धार्मिक शिक्षा के योग्य होती है,उक्त प्रकार की पुस्तकं यनि न हों तो सेवार्थी विद्वानी और लेवकों को तप्यार करना चाहिये ॥७३॥ दशमपरिच्छेदः। रोगिमेवा । कश्चिन्नास्त्युपचार को निजटः यस्यार्ति रोगोद्भो, स्याट्टद्धस्तरणोऽपि वा स पलो वैश्यो द्विज' क्षात्रयः । मत्वा त निजबान्धव मुमनसा सेवा विधेया स्वय, पथ्याऽनौपपदानमिष्टपचनाऽभ्यऽऽसनाऽभ्यदनैः ॥७॥ रोगियांकी मेया । भावार्थ-जिसके घरमें रोग या दु सके समय परिचर्या करने पाला कोई नहीं है वह रोग या दुससे पीडित मनुष्य वृद्ध हो या तरण, ब्राह्मण हो या शद्र, बस्य हो या क्षत्रिय, सरको अपना भाई समस मिष्टवचनपूर्वक पध्यभोजन तथा योग्य औषध देकर शान्ति सेटिया जन प्रग्यमाला ४२ 44 अन्छा परिणाम न हाने पर शिक्षा की निम्परता । भावार्य-निस धामिक शिक्षा से विद्याधियों का जीवन धामित्र दृढ श्रद्धापी आर सचिरन बने उस धार्मिक शिक्षा से क्या राम' वह चितामणिग्न स्मि धामा निम से मन की इदा पूर्ण न हो, उस परत मे क्या लाभ निस से दरिद्रताप दुर्म नष्ट न हो, अपात धामिर शिक्षा ऐमी चाहिये जिससे धान धर्मश्रद्धा और सगचाग बनें ॥७॥ परीक्षापायने । सप्ताह पातेमासमेकमथवाऽवश्य परीशा साद, ग्रामा तत्र पपकै नियमत पृष्ठाऽर्थशुद्धपादिकम् । पारा येऽत्र भवेयुस्चततयोत्तीर्णा सदाऽगन्तुका- स्तेषा देयमुपायन समुचित प्रोत्साहनार्थ पुनः ॥७॥ परिक्षा और पारितोपि । भावार्थ-भागों की साप्ताहिर या मामिर परीना सदा होते रहना चाहिये, जिसमें शुद्ध उच्चारण शब्दार्थ भावाथ और तापर्य आदि की जाँच की जाय, और अच्छे नम्बरों मे उनीण हुए दानों को तथा हमेशा हानिर रहनेवा को उसाह बढाने के लिये यथायोग्य पारि तोपिक देना चाहिये ॥७॥ धार्मिकशिक्षणपुस्तकमाला । रम्या नीतिस्था महात्मचरितान्याचारगाणि वा, तत्त्व पत्र सयुक्तिक सरल या रीत्या निबद्ध भवेत् ।
फर्तव्य-कौमुदी
श्रीमानोंको ऑपधालय स्थापन करना चाहिये, तथा उत्तमचरिनवाले
साधारण सज्जनों को भी चाहिये कि वे रोगियोंकी सेवा सुशृपा करें
तथा आपाय यस्यादि कार्यमें भाग लेकर उत्तमसेनाका परि-
चय दें॥ ७६ ॥
विकलाशिमेवा।
येऽन्या. पामरपगुमूकबधिरा दुःख पर भुञ्जते,
तेपा शिल्पकलादिशिक्षणपद विद्यालय स्थापयेत् ।
ये योग्या न च शिक्षणे हितकरे ये रक्तपित्तादिता-
स्तेपा रक्षणहेतवे मुहृदयै स्थाप्यो निवासालय ॥७॥
अपागोंकी मेधा ।
भावार्थ-~-जो अन्ये हो लंगटे बहिरे गृगे आदि अपाग दु ससे
पीडित हैं उनसे शिल्पका आदि मिसाने निमित्त विद्यालय मोल्ना
चाहिये, तथा बुद्रिती मदतासे या अन्य कारणसे हितकारी शिक्षा
पानने योग्य नहीं है अथवा रक्तपित्तादि रोगोंसे पीडित है उनकी रक्षा
के लिये सहृदय पुस्पोंको कगाटरसाना स्थापन करना चाहिये ॥७॥
अपानमेवाफलम् ।
सम्पूणीऽचयवेन्द्रियाणि बहुला सम्पचिर जीवन,
यचारोग्यसुख वल च पिपुल प्राप्त यया साम्पतम् ।
जानीहि त्वमपाङ्गिना करणया सेवा कृता या पुरा,
तस्या एव फलानि तानि कुरु तत्तामेर पुण्यपदाम् ॥७॥
, सेटिया जैन ग्रन्थमाला उपर ग्ना चान्यि, तथा पासम बटर तैमर्दन आदि अनेक उपायोद्वारा हृदय में रोगीकी सेवा करना चाहिये ।। ७४ ॥ आरोग्यरक्षा। जायन्तेऽशुचिवम्नुद्धिकरणे क्षुद्रा भृश जतवो, प्रत्याराग्यमिमे मनुष्यवसतौ कुर्वन्ति रोगोद्भयम् । पोया अनजनाम्तथा हितधिया स्वारोग्यरक्षाकृते, ग्रामादौ न मलादिकञ्चम्भर विस्तारयेयुर्यथा ॥७॥ आराग्य रक्षा। भावाथ-~-द मनु य अपने घरों या गरियॉम सटी गली चन्तु टायर गन्दगी बाले है, उससे टॉस मदर आदि अनेक मारक छाटे २ असग्य जतु उपन्न होरर वसतीमें अनेक रोग उपन करते है, आरोग्य नियमसे अनभिन उन मनुष्योंको स्वास्थ्य- सभा के रिये प्रेमपूरक समझाना चाहिये जिसमे ग्राम और नगरमें मैग कृया सकट आदि नहीं बनने पारें ।। ७५ ॥ राग्यालय । ग्रामे वा नगरे न यत्र सुलभ रोगोपचारौपथ, सस्थाप्य करणाधियाऽत्र वसती रोग्यालय श्रीमता । वैयावत्य विधानतो गदवता तस्य व्यवस्थाऽऽदित , सामान्परपि सजनै मुचरितै सेवा विधेया शुभा ॥७६॥ चिकित्सारय ( औषधालय ) भावार्थ-जिस ग्राम या नगरम रोग दूर करने लिय शुद्ध औषधि सर्वसाधारण को सुगमता से नहीं मिल सस्ती हो, उस असतीमें १७ uvvvw. A vA । फत्तव्य य-कौमुदी निरमिताकारणाना निवृत्ति ईडन्ते बहुल धन च सहसा द्यूतेन केचित्परे, देवाराधनमन्त्रतन्त्रविधिना स्वर्णादिसिद्धयाऽपरे । ते सर्वेऽप्यलसा निरथमतया नश्यन्ति दारिद्रवतो, गोभ्यास्ते हि भवेयुरुषमपरास्त्यक्त्वा निरुक्तभ्रमम् ।।८०॥ निरुधमताये कारणों की निवृत्ति । भावार्थ-कितनेही रोग झूए या सट्टेसे एकदम अधिक धन प्राप्त करना चाहते हैं, कई एक देवताओंको प्रसन्न कर अथवा मन्त्र तन्त्रका साधन कर- धनवान बनना चाहते है और कितनेही सोना आदिकी सिद्रि अर्थात् कीमिया करके दरिद्रता दूर करनेमें प्रयत्नशील है, ये सब निरचमी गाठका द्वय खोकर दारिद्रयदु सका अनुभव करनेवाले है, सहत्य पुरषोंको उपदेशद्वारा इनका उक्त भ्रम दूरकर उद्यमी बनाने के निये पूर्ण प्रयत्न करना चाहिये ।। ८० ॥ निरुपमानामुपमपदारोपणम | येपा नास्ति सद्यमो न च धन निर्वाहयोग्य गृहे, याचन्ते गृहिणोऽपि ते विधिहता दातुः सकाशे धनम् । नैभ्यो देहिधन यतः पुनरपि स्यात्तादृशी तद्दशा, किन्तूद्योगपरायणोश्व कुरु तान् यन्निवहेयुः स्वयम् ॥८॥ निरुघमियाको उधममें लगाना। भावार्थ-जिनके घरम निर्वाह योग्य धन नहीं तथा उत्तम घधा भी नहीं ऐसे लोग कुटुम्बवारे होकर भी दुर्भाग्यवश दाताओं के
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सेठिया जेन प्रथमारा
अपाङ्गकी सेयाका पर।
भावार्थ--हे मानर । इस समय जो तुझे सम्पूर्ण ओर सुन्दर
शरीरके अवयर, सुघड पाचा इन्द्रियाँ, विपुल धनसम्पत्ति, दीर्घ आयु,
नीरोगताका मुख, शारीरिक मानसिक तथा वाचनिन यथेष्ट बर आदि
प्राप्त हुए है उन्हें पूर्वजन्ममें करणापूर्वक कीगई अपागसेवाका कर
समझ । यदि तुझे औरभी सुखकी इच्छा है तो परमपुण्यदायिनी इस
अपाङ्गसेवाको अङ्गीकार कर ।। ७८ ।।
एकादशपरिच्छेद।
সিমিমাত্র বিশ্বালমু।
श्रीमन्तोऽपि निरयमा यदि तदा दीना भान्ति क्रमाव,
सामान्यम्य तु का कथा व्यवहत्तौ रोगस्ततोऽय महान् ।
दारिद्रयोपहता बुभुक्षिततका कुर्वनि पाप न कि ?
रोगस्याऽस्य निवारणे मुकृतिभिर्यलो विधेयस्तत ११७९॥
निराधमवारूप रागका निवारण ।
भावायसाधारण मनुष्यी तो बातही क्या श्रीमान् पुरुष भी
उद्योगहीन होनेसे धीरे २ दरिद्र हो जाते है, वास्तसमें यह निरयोग
व्यवहारमें बटा मागे रोग माना गया है, दरिद्रतासे पीडित मनुष्य
भूख के मारे क्या क्या पाप नहीं करते। अत एव इस निरुद्यमता
रूप रोग दूर करने लिये योग्य परिश्रम करना चाहिये ॥ ७९ ॥
कर्तव्य-कौमुदी श्रमजीरियों की मेया । भावार्थ-~-जो श्रमजीग शरीर की परमाह न करे मिल आदि रिसाना में बटे परिश्रम मे रातदिन काम करते हैं उनको अपने टुम्नपाटन निमित्त उचित मजूरी दनी चाहिये, जिन को मर्यादा से धिक स्वास्थ्य को हानि पहुचानेनाग श्रम करना पता हो अथरा र कोई अयाचार होता हो तो उनकी सहायता करना मनुष्यमात्र - कर्तव्य है ।। ८३ ।। कर्मधरमर्तनशिक्षणम । एते कर्मकरा निवृत्तिसमये सप्ताहसप्ताहके, व्यारयानेन च शिक्षया बुधवों यास्तथा गोधके । कुर्युव परस्परेण कलह नैवापि सार्दै पर- तादिव्यसन व्यय च विफल पान सुरायास्तथा ॥८॥ मजुर्ग को मद्वार की शिक्षा । भावार्थ--विद्वानोंको उचित है कि मजूरी को अवकाश के समय तिसप्ताह या यान देकर अपना सिखा पहारर उनम इतनी योग्यता स्य उपर की कि वे आपस में या दुसरी के माय कलह न रने पान ओर जूआ मदिरापान आदि तया फिजूलपचर्चा मे मुंह डरे ।। ८४ ॥ ८ मंठिया जैन प्रथमाग निकट याचना करते फिरते है, ऐमी स्थिति म दव्य दो से थोता सफ्ट तो निरारण हो सरना है, परतु ऐसा करनेमे उनकी आरत निगट जायगी और वही नशा बनी रहेगी, अत उहे य न देकर मे उद्योग म लगाना चाहिये निस में वे स्वयं अपना निनाः पर सो॥ ८१ ॥ कृषिकारसथा। ये कुर्वन्ति परिश्रमेण सतत कृप्यादिकार्य निन, धान्य जीवनसाधन जनपदे सपूरयन्ति म्वयम् । तेपामाक्रमण भवेयदि नृपाद् न्यापारिवर्गान पुना रक्ष्यास्तेऽपठितास्तदा कपिपरा सेवाथिभिः सज्जने ॥२॥ क्सिान की मेया। भावार्थ-जो किसान शीत उष्ण आर वषा का घोर कष्ट सहार शारीरिक श्रमद्वारा अपना कृषिकाय करते है और जीवन का साधन अन उपन्न कर देशको सुग्व की नाद सुलाते है, उन अनदाता मि साना पर राजा अथवा यापारी वग अत्याचार रे तो उदार मेराथि पुरुपों का तन्य है कि वे शान्तिपूर्वर अत्याचारको रोकें और उनसे पहा रिखा कर शिक्षित बनावे ॥ ८२ ॥ कर्मकरमेया। यऽनाहत्य शरीरसस्कृतिविधि यन्त्रालयादिस्थले, कार्य मकरा श्रमेण महता कुत्ति रानिन्दिवम् । नेपा स्यात् स्वकुटुम्बपोपणमल तावद्भुति दापय- मात्यन्ताक्रमण श्रमाधिकतया रक्ष्यास्तथा तेजखिला८३ कर्त य-कौमुद्री श्रमजीधियां की मेया । भावार्थ--जो अमजीनी शरीर की परवाह न करे मिर आदि कारमानो मे बटे परिश्रम से रातदिन काम करते है उनको अपने उष्टुम्रपान निमित्त उचित मजूरी देनी चाहिये, जिन को मर्यादा से अधिक स्वास्य को हानि पहुचानेवाला श्रम करना पता हो अथवा और कोई अयाचार होता हो तो उनकी महायता करना मनुष्यमात्र का तय ह ।। ८३ ॥ कमकरमवर्तनशिक्षणम । एते कर्मफरा निवृत्तिसमये सप्ताहसप्ताहके, व्याग्यानेन च शिक्षया बुधवोध्यास्तथा बोधकैः । कुर्यु- परस्परेण कलह नैवापि सार्द्ध परै- तादिव्यसन व्यय च विफलं पान मुरायास्तथा ॥८४|| मजूर्ग को महत्तार की शिक्षा । भावार्थ-विद्वानोंको उचित है कि मजरों को अवकाश के समय प्रतिसप्ताह व्यारयान देकर अथवा सिसा पहार उनमें इतनी योग्यता अगस्य उपन्न कन्दें कि वे आपस में या दूसरों के साथ कहन करने पान ओर जूआ मदिरापान आदि तया फिजूलपा से मुँह मोडले ॥ ८४ ॥ - द्वादशपरिच्छेद । विधवासेवा। यामा कोऽपि न विद्यते निजकुठे पोध्योऽथवा पोपर- स्तादृश्यो विधवाश्रम हि विधरा अर्हन्ति सरक्षणम् । कतन्य विषयोचित च सरला निर्वाहयोग्या पत्रा, सेवा धार्मिकतत्वोपसहिता तत्रार्थत शिक्षयेत् ॥ ८५ ॥ विधवाकी सगा। भावार्य-जिन विधनाओं के कुटुम्ब म न तो कोर्ट पाटन करने योग्य स तान है आर न मोद पापण करनेवाला पुरुष ही है ऐसी विधनाएँ विधवाश्रम म सुरक्षित रसो योग्य है । वहा पर इनको विधवाओके योग्य बत्तय आर घर बेठे निवाह के न्येि मीनापिरोना रसीदा करना आदि की शिक्षा देनी चाहिये, तथा धामिक्नान में साथरवास्तपिन मेवा रे पनित्र भाव टन हदय म अङ्कुरित करना चाहिये ॥ ८॥ पियाजीविकाप्रबन्ध । पुनादिमतिपन्धतो निजगृह त्यन् न सन्ति क्षमा- या दै यानिजमन्ततेरपि गृहे कर्तु न रक्षामलम् । तासा कोऽपि कुले भवेयदि धनी तेन व्यवस्थाप्यता, नो चेन्मण्डलसज्जने समुचितः कार्य प्रवन्ध स्वयम् ॥८६॥ - कर्तव्य-कौमुदी विधयाआंकी आजीविका का प्रवन्ध । भावार्थ-जो विधनाएँ पुत्रादि के वचन से अपने घर को नहीं छोटमम्नी और द्रव्य के अभान से घग्म वठी रहकर अपनी मतान की रक्षा भी नहीं करसकती, ऐसी स्थिति में कुटुम्न के धननान् पुस्पा को उनकी भोननादि व्यवस्था करनी चाहिये यदि उक्त मापन न होतो सेवासमिति के सग्नना को उचित है कि इन अनाथ- विषयाआका उचित प्रबन्ध ॥ ८६ ॥ विधवाना नियमनमर्यादा । म्यान्तन्यान भवेयुरुद्धततरा नाचारहीना यथा, तावनेतृजनैश्च तन्नियमन कार्य यदावश्यकम् । याः सत्यो विधवा स्वभावसरला सीयैर्जनैनिदेयैः, पीड्यन्ते फिल पीडनात् सपदि ता मोन्या स्वयसेवकै ॥८७॥ विधवापर अकुश की मर्यादा । भावार्थ-विधवाएँ स्वतन्त्र होकर स्वच्छन्द तथा आचारहीन न अनजाँय इसरिय उनपर कुटुम्ब के नायकोरा उचित अदुश रहना परमावश्यक है, जो मुशीग सरल स्वभाववाली विधवाएँ कुटुम्ब के निर्दयोलोगों में विना कारण सतायी जाती है। स्वयसेवकों का कत्र्त य? कि उन निरपराधिनी अबलाओं को उक्त आपत्ति से छटा ।। ८७ ॥
-- सेठिया जैन प्रघमाग पूचना तथा माठे बचना से पेय बघा चाहिये। निडाने और पदि नने के मैच पास निराम साप सुथरे कपः यदर देना तथा भोजनाटिकाचित याम्था करना अयापाया है और उनके मामने स्मार्ग नया आमा शाति उत्पन्न नेगाधार्मिक पुस्तक पटना नागिये जिस से उन परिमाण निर्मट बने रह॥११॥ करना। वृदनामानुल्यमम्पादनम । चित्तपा यदि भाति काऽपि हृदये युक्त्या द्रुत ता हरेद् , रोग कोऽपि भवेनदा नु भिपना योग्योपध योजयेत् । वैषम्य प्रकतो भवेद् यदि तदा सदोषविज्ञापन , कोरडेपविपादलोभहरणात् माम्य च सम्पादयेत् ॥२॥ पर्धा व अनुक्र आचरण মানায়- -द मनुष्यों के चित्तमें स्मिी प्रसार की चिन्ता रहती हो तो युक्तियाद्वारा उससे दूर करना चाहिये, रोग उपन्न होने पर वैद्यकी सम्मति मे योग्य आपध की योजना करना तथा प्रकृति में फिमी प्रकार का विकार उपन होनेपर उत्तम शिक्षा और उपदेशद्वारा मोध द्रेप विपाद और गेम का परिहार र समता रपन करना चाहिये ॥ ९२ ।। वृद्धाना ममाधिमरणसम्पादनम् ॥ योपा मरण विभाति निकटे दुःसा यरोगोद्भवात , प्रत्यार यानसमाधिभावजननैराराधना कारयेत् ।
कर्तव्य-कौमुदी चित्त शान्तिपरायण भगवतो ध्याने निमग्न भवेत् , स्यादेपा हि यथा समाधिमरण यत्न विद-यात्तथा ॥९॥ अन्तिम अवस्था में वृद्रिोका ममाधिमरण । भावार्थ-अमा य रोग उत्पन्न होनेपर जिन वृद्ध लोगा की मृत्यु निरुट प्रतीत होने लगे उनको सम्पूर्ण वस्तुआका त्याग करवाना चाहिये, तथा शान्ति उत्पन्न कर धर्म की आराधना करवाना चाहिये और ऐसा यन रिना उचित है जिस से उनका चित्त शान्तिरसमें लीन होकर भगवान् के यान में लगा रहे और समाधिपूर्वक मरण हो।९३॥ चतुर्दश. परिच्छेदः। पशुरक्षणम् ॥ यस्था दुग्मघृतादिना नरतनु पोपुष्यने सर्वथा, वाणिज्य कृषिकर्मभारवहनं यज्जातिमालम्पते । सा रक्ष्या पशुजातिरुत्तमजनै कर्चव्यसेवाधिया, हिंसातो बलितोऽतिभारभरणात् क्रौर्याद् भृश ताडनात्॥ ४॥ पशुरक्षा। भावार्थ-जिन के दूध और घी से मनुष्यका शरीर परिपुष्ट होता है, जो जानि वाणिज्य कृषि और भार लदने के है। मनुष्यमान का तय है कि मेयबुद्धि मे ऐसी मेटिया जैन ग्रन्थमाग A - जाति का परिदान ग तथा जयनिमित्तसे होती हुई हिंसा रोग, और मयात्रा मे जमिन भारदना तथा बुरी तरह से पीटना इत्यादि अत्याचारा म उमकी रक्षा र ॥ ५४॥ । पशु ( पशि ) वधप्रतिबध । न्यन्न पशुपक्षिणश्च बहुशो मासास्थिमेदाजिने, नस्य स्यादुपयोजन प्रतिदिन न्युन तथा चौधयेत् । देवा नो पशुमासभक्षणपग इत्येवमायेय तान , भ्रातान युक्तिपुरस्सर पलिविध कार्यो निरोधो द्रुतम्।।२५।। पशुपपिहिमा का निगेध । भावार्थ- [-माम हटी चना और चमडे के निमित्त बहुत पशु वध किये जाते हैं, अत उक्त वस्तुओंश उपयोग प्रतिदिन स्म होता जाय पेसा उपदेश टना चाहिये, कितनेही मनुष्य बलिदानानिमित्त पशुआ पी हिसा क्यिाग्ते है उनको सुयुक्तियोंदाग समयाना चाहिये कि दे तो अमृतभोगी है अनमोजा सत्पुरप भी अपवित्र मास को चूना पापननर समझते हैं तब सवा कष्ट देन ऐमे अशुचि मास का भण से कग्गे' इत्यादि नको रोम्ना चाहिय ॥
५७
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कर्तव्य-कौमुदी
दौल्ये गदसभरे पशुपती रक्षेत पशु य नतो-
भाव्य तादृशशासनैनरपते राज्ये हितार्थ पशोः ।। ९६ ॥
न म्युस्तादृशशासनानि पिपये यस्मिन दया भारत-
स्तनोत्पाय दयावल वृहतर नव्यानि निर्मापयेत् ।
पाल्यन्ते न च तानि सन्त्यपि जने राज्याऽव्यवस्थादित-
स्तेपामादरपूर्वपासनविधी कुर्यात प्रयत्न शुभम् ।। ०७॥
पशुग्या नियम ।
,
भावार्थ--उत्तम गजा के राज्य में पशुरक्षा निमित्त ऐमे नियम
होने चाहिये कि कोई भी मादी आदि म मर्यादा से अशमान भी आधिक
भार न राद सके, वृद्ध अथवा वरहीन पैर वगैरह को जोनने न
पारें तथा दुर्वर या रोगी पशु की उसरा स्वामी यानपूर्वक रक्षा करे ।
निम देश में पशुरक्षा के पेमे नियम न हो तो वहा के गोगाम दया-
भार उत्पन्न क नवीन और सुदृढ़ नियम बनवाने चाहिये, जिस
देश म नियम तो बने हो किन्तु राज्य की अयवस्था आदि कारणोंसे
लोग उनसी पारना न करते हों तो ऐसा प्रयत्न करना चाहिये जिस
मे उन नियमा का आदरपूर्वक पाटन होता रहे ॥ ९६ ॥ ७॥
पशुपतिवृहपशुरक्षणम् ।
नो यावत्तृणमक्षकाः क्षितितले पोता पशूना स्वय,
तावत्ते निनमातुरेव पयसा पोप्याः पशुस्वामिभिः ।
विकारयो न पियातकाय विगते स्वार्थेऽपि देय तृण-
मित्य शासनपद्धति नृपगुरद्वारा च निर्मापयेत् ॥१८॥
५८
सेठिया जेन प्रथमाला
w
মাধ---
बच्चे और बूर पशुआंशी रक्षा ।
पार आनि पशुआ के बच्चे जनता स्वय
जमीनपर की बॉस खार अपना पेट न भरसर तबतक पशुम्वामिया
को उचित है कि चर्चा को माता का दृध पिलर ही पोषण
कर पीत् उनरा अपनी माता से पियोग न करें, तथा अपना म्याथ
मिद होतानेपर कोद मा मनुष्य पशुओं से क्माई वगैरह के हाथ
वेचने न पाप, और वृद्ध तथा वल्हीन पशुआ को उनके स्वामी
समय पर घास पानी देते रहें आवारा न पिरने दें, ऐसा नियम राना
से अथवा रानगुर मे बनवाव ॥ ९८ ।।
पश्वालयव्यवस्था ।
वृद्धा दुर्वरोगिण शतहता निर्नाथका व्यङ्गका,
नि शक्ता. पशवो बुभुक्षिततरा नेया सुपचालये ।
भैषज्येन च रोगिणा क्षतवता कुर्यात् स्वय सेवन,
मन्येषामपि रक्षणाय तनुयात्तत्र व्यवस्था राम् ।।०९।।
पिंजरापोल को हयषम्या ।
भावार्थ-जो
पशु वृद्ध दुबर रोगी या जग्वमी होगये हों
आवारा फिग्नेवाले अशक्त अपाङ्ग या भूखे मरनेवाले हो ऐसे पशुओं
को पिनरापोर में हेनाना चाहिये और वहापर उन रोगी या जग्वमी
पशुओं की दवा मरहमपीद्वारा स्वय से करे आर दूसरा से भी
करता, इसी प्रभार अय पशुओं की रक्षारा भी योग्य प्रबंध करना
पचदश परिच्छेदः।
शातिमत्काऽऽ-तम्भेटपरिहार |
तुल्याचारकुटुम्बसहतितया ज्ञातिः समारभ्यते,
विस्तीर्णा हि यथा यथा भवति सा तस्या वल स्थानथा।
सा भेदैर्यदि खण्डिता बहुविौः शावहा स्यात्तदा,
नस्मादान्तर भेद खदहरणे यत्नो विधेयः परः॥१००॥
जाति के अन्तर्गत भेदका परिहार ।
भावार्थ-समान आचारविचार वाले तथा समान रीति ग्विाज
वारे मुटुम्या के मिलने से जाति की रचना होती है न्यो न्यो यह
कुटुम्बममूह बढताजाता है त्यो त्यो उसका बल भी बदताजाता है
अर्थात् जाति नितनी विशाल होती है उतने अशमें वह बरिष्ट गिनी-
जाती है तथा अपनी और परकी रक्षा करने में समर्थ होती है, किन्तु
जब उमरा अग अनेक प्रकार के भेदों से खण्टित होजाता है तब
वह बहीन होर अनेक दु सों का अनुभव करती है इसलिये
जातिके अतर्गत भेद दूर करने का पूर्ण उद्योग करना चाहिये ॥१००॥
মামিনঅসংখ।
नेतल न कुलक्रमागतमल किन्तूत्तमै सद्गुणै-
रन्याय यदि तन्वतेऽल्पमपि ये कि फल नायकैः ।
म्वार्थ साधयितु मनागपि वरानिष्ट वितन्वन्ति ये,
तन्नेतृत्वविवर्तनेन जनता सेग समापयते ॥१०॥
६२ सेठिया जेन प्रथमाला वृदविवाह आदि कुप्रथा का परिहार । भावार्थ- स्त्री के दो पति होना वास्तव में जयाय और मगन - म्या को भी उचित है कि एक पनीत्रत धारण कर विशेष कारण पिना दसरी स्त्री से पाणि ग्रहण न कर जार बुढापम या अध पन म विवाह कर चार्ग जनगआ पर अ याचार न करें, निम नानि में वृवियाह या अनुचित बहुविवाह होने हा उम जाति हितमा विद्वाना का स्त्त य ह कि वे पूण आन्दोग्न टन कुप्रथा का समृर नाश करे आर जातिमया का परिचय - ॥ १०४ ॥ M-0-0- पोडश परिच्छेद ॥ जन्मभूमि । यदेशानजलानिले गुभतरै पुष्टिं गता ते तनु- स्तरेशोन्नतयेऽस्तु ते धनमनस्तन्वर्पण सर्वथा । या भूमिर्जननीव पालनपरा स्वर्गादपि श्रेयसी, तस्या स्वल्पमनिष्टचिन्तनमहो तजस्य पापावहम्॥१०५। स्थदश सेरा। भावार्थ-जिस देश के उत्तम अन जर ओर वायु से तुम्हार शरीर पुष्ट हुआ है तुम्हाग तय है कि उस देशी उन्नति के लि अपना तन मन और धन अर्पण कर दो, जो भूमि माता के समान कर्तव्य-कौमुदी . पालन पोषण करनेनारी है तथा स्वर्ग से भी अधिक सुरस देनेवाडीह उस भारतमाता मा सिञ्चित्मात्र कुरा चिन्तन करना उसकी सन्तान के रिये महापाप का कारण ह ॥ १०५ ॥ जनपदजागरिका। को दुःन्वी सुखिनश्च के जनपदे चिन्त्य तदेतत् सदा, स्थादुःख यदि कस्यचित् किमपि तदन्यानिजैः साधनैः। धतादिव्यसनेषु कोऽपि पतितश्चेत् सत्पये त नयेद्, वीज म्यान कलदस्य चेझारति तयुक्त या दहेच सर्वथा । २०६ | स्वदेशका हितचिन्तन । भावार्थ-~-देश म कोन दुःखी ह ओर कोन सुसी ह सहन्य पुरषा का सदा ऐसा विचार करना चाहिये यदि कोई दुःखी प्रतीत हो और अपने पास उसके दु व दूर करने का साधन भी हो तो उचित है कि उसरा दुःग्य तुरन्त दूर करदे, कोर्ट मनुष्य जूआ चोरी आदि दुर्व्यसना में फसा हो सजन पुरपो का तय हे कि प्रयन कर उसे उत्तम मार्ग पर ले आये, तथा देश समाज या जाति में कलह मचा हो सुयुक्तियोंद्वारा उसका मू कारण मिटार शान्ति स्थापित करें ।।१०६॥ स्यदेश्याचारपालनम। देश स्व न कदापि विस्मरति यो गत्वाऽपि देशान्तर, जाद्यानो निजदेशवेपरचना देशाभिमानी जनः । साचार विजहाति चञ्चलमना प्रान्याऽऽर्यजात्यर्चित, देशद्रोहफरोऽधम. स पुरुषो धर्माधिकाराच्युतः॥१०७॥ . -
मेठिया जैन ग्रन्थमाग
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दत
भ्यदश-आचार को पारना ।
भावार्थ-ना मनुष्य पिटेश में जार भी अपनी जन्मभूमि
को भी नहीं भूत तथा अपने देश का पहनार रहन सहन और
मानार विचार को नहीं छोडते है येही देशाभिमानी हैं, चच मनपा
पुस्प रिटेशम जार प्राचीन नातीयाचार और रेशआचार यो छोड
गद्रोही और अपम है उन को धर्म अधिकार में पतिम
समझना चाहिये ।। १८७ ।।
म्यदेश्ययम्नपभाग!
देशोयोगविवर्द्धनाय पुषधारोग्यरक्षा कृते,
दीनाना निजनेगिना फरणया दारिद्रयविनि उत्तये ।
युज्यन्ते वसनानि भोज्यमखिल भोग्धानि रसून्यपि,
देश्यान्येर विभूपणान्यमल्यो सीपुसयो सर्वथा ॥१०॥
स्वदेशी वस्तु का उपयोग ।
भावार्य-स्थदेश के उद्योग को ऊत्तेना देने के येि शरीर
की नारोग्यरथा के रिये तमा अपने देश के गर्गर मनुष्योंपर करणा
कर उनका दारिद्रय दूर करने के लिये प्रये मनुष्य को पहिनने के
सन वस्त्र, साने पीने की सम्पूर्ण सामग्री तथा स्त्री पुस्प के उरे आम
पण इत्यादि समस्त उपभोगमें जानेवारी वस्तुएँ स्वदेश की बनी हुई
होनी चाहिये और उन्हीं को काम म लाना मनुष्यमान का कर्तव्य
हैं ॥ १०८ ॥
कर्तव्य-कौमुदी देशोपनयनाशनम् । देश. स्यान्निरुपद्रो नृपतिना श्रेष्ठेन सरचित- स्तद्वद्धर्मसमाजरक्षणमयो विज्ञानद्धिस्तदा। देश कोऽपि समुद्भवेदमिभको माद्योऽथवाऽभ्यन्तर- स्तन्नागे यतितव्यमुत्तमनधर्मादिरसाकृते ।।२०।। देश ये उपहपका नाश। भावार्थ--जन देश उत्तम राजा से मुरक्षित होकर उपयरहित होता है तब देश में धर्म और समान की रक्षा ही नहीं कि पिनान की पूर्ण वृद्धि होती है, देश को यदि कोई वार या अभ्यन्तर उपटर सताने लगे तो उदारपुरपा का पर्तव्य है कि उन उपन्यासा नाशका, धर्म और समान की रक्षा कर ॥१०॥ भ्यचकपरचमता देशरक्षणम् । देशस्याऽऽक्रमण यदा स्वपरयोश्चक्रेण सम्पयते, स्वाम्य नश्यति जायते क्षतिततिव्यादिहान्या भृशम् । साहाय्य करणीयमन समये तदेशस्तव्यकैः, संवरेर जनैर्धनेन वापा उद्धा तथा सेवया ॥१०॥ म्यचन्न और परचम मे देश को रक्षा । भावार्थ-जब खचक या परचमदाग देगपर आक्रमण होता हो, प्रनाका स्वास्थ्य विगटता हो, द्रव्य आदि की हानि के साथ साथ अनेक प्रकारको हानि होती हो अर्थात् मरी ग हैना आदि रोगो' उप- द्रव होता हो मे समय में देशगामी मनुष्यमात्र का पतय है कि तन मन धन और सेना द्वारा देश मी सगपता ॥११०॥ ५
...
अमिराण्ट अतिवृष्टि संग हजा आदि प्रजा का सहार पग्नेवाल
मंठिया जैन प्रन्थमाग
अधिकारिणामुपद्रगनियतनम् ।
ये गा निजदेशरसस्तया योग्य पदे म्यापिता ,
म्युस्ते पामरभसका यदि नृपाऽमान्यादयोऽन्यापिन
ससाध्यैश्याल तदाऽखिलजनस्तदेशवास्तव्य,
कार्य तत्परिवर्तन विनयतो राक्ष नियोनमै ॥१॥
अधिकारियाय उपनय या निराकरण ।
भावार्थ-गजा ने निनशे अपने देशी रमानिमित्त य१२
पद पर नियत दिया है ये अधिकारी रोग यदि अन्यायी होकर प्रन
रक्षक की जगह प्रना भक्षण यनजायें तर शनिवासी उत्तम पुरुडा
पतय है कि सब एकमत हो राजा से विनय पूर्वर निवेदन करें
और उस अयाचारी अधिकारी वर्ग मा परिवर्तन करो ।।१११॥
आपत्कालीन सेवा।
भूकम्पादिग्दैवकोपननितापत्ति पटाचिनिने,
देशे कापि समागता यदि महाऽऽनर्यक्यसम्पादिनी।
गला तर सहैव साधनभरेरापगताना पृणा,
साहाय्य समयोचित्त मुखफर कर्तव्यमर्यादिभि ॥१२॥
आपत्ति प समय सेवा।
भावाथ----जब कभी अपने देश के किमी भाग में भूकम्प
शरिर आपत्तिया उपस्थित हों उस अवसर पर स्वयसेवक रसाई
साधन जुटाकर घटनास्थर
मनुष्यों की समयानुकूल सहायता करके उन्हें शान्ति और मुख
पर पहुँचे और आपतिप्रस्त
पहुँचारें ॥ ११२॥
द्वितीयखण्डः। प्रथमपरिच्छेदः। आत्मदृष्टिः। जगत्मेयायामात्ममेया। एपोऽय समयो मनुष्यजनुपो लब्धु प्रकृष्ट फल, तत्रोवेव निजात्मनश्च जगतो निफामबुद्धया परा। केचित् कारणकार्यभावमनयोराहुस्तदेक मत, सम्यक्तचविचारणे तु जगतः सेवेव सेवात्मन' ॥११३॥ जगत्सेवामें आत्म सेया । भावार्थ-देश की सेवा करनेके बाद मनुष्य जीवन का सघाच- फर प्राप्त करनेका समय आता है । वह फट सेवा ही है । चाहे आत्म सेमा हो अथवा निष्कामवुद्धि से ससार की पेवा हो। कोई कोई आम सेना और जगत्सेवा का परस्पर कार्यकारणभाव अर्थात् जगसेवा मे आ- मसेवा और आमसेमा से जगसेवा होती है ऐसा मानते हैं। किन्तु असरी स्वरूप पर विचार करने से माझम होता है कि जग मेवा आत्ममेवा है और ना ही जायेगा 20223॥ .
६८ सेठिया जैन प्र यमाग , जग सेया। कृत्वा भवनमा मन पर जगरसेगा समुद्धारिणी, या जगनो विधाय परित सेरा विधेद्यात्मन । मोद्धारमयी मनाऽत्र जगत सा चेत्मत्यात्मिा, नेपाम्पान च गाढवजनिका न्यूना निटत्या न सा १२८ मसार की संया। भावाय-वारे आमसेवा करने के बाट विश्व का उदार करने वान समार की सेवा कगे अश्या मसार की संवा करने के पश्रात आममेगा करो दोनों ही समान है । यहा पर मेवा शन्न मे तापर्य भतिर तथा का पनि उनतिम महायना पहुंचाने का नहीं है रितु समार को दुग्य मे छुटाने का । यद्यपि यह सेवा प्रवृत्तिम्प है ता भी इस में निकाम उद्धि होने से न तो यह गाढ-मनन्ध का कारण हे अर न निवृत्ति-माग से मिमी प्रकार क्म है । अथान निकामप्रवृत्ति भी निति-ममान ही ॥१२४॥ विश्वप्रेम। विश्वमनिवन्धनाय करणा धर्मस्य रक्षाकृते, रागद्वेपनिवारणाय समता भारापिरोहाय च । म यस्वात्मसमानमेतदखिल दु से मुसे चा जगन्- मुगे पाणिगण कुटुम्पसमा नक्तदिन भावय ॥११५।। विश्वप्रेम । भावार्थ-समम्न मसार के साथ प्रेम का वचन नापने केटि ww - पत्त य-कौमुदी ६९ न्याधर्म की रक्षा के लिए, रागद्वेष का निवारण करने के लिए तथा समताभार की सील पर पान रखने के ाि मुख तथा दुःख सम्पूण को अपने समान समझो। तथा समस्त प्राणियों को अपने उद्धम्बियों की तरह मानने की रात दिन भावना करो ॥११५॥ विश्वप्रेमिण मत्तिमत्वम् । आत्मीय जडदेवमेव मनुते सर्वाधमो मानव', पुनाय मनुजोधमो निनकुल ग्राम पुनम यमः। सोऽय मानव उत्तमो जनपद नैजान्मवन् मन्यते, यो विश्व निखिलं विशालहृदयः सर्वोत्तमोऽसौ नर ।।२१।। मर से उत्तम विश्वप्रमी। भावार्थ-नो अपने स्थल जट गरीर को ही अपना मानता है वह मनुष्य जपम म भी अपम है । जो पुन स्त्री आदि अपने टुम्बिया को अपना समझता है यह अधम है। अपने गोमाग को अपना माननेवाला मनुष्य म यम तथा स्वदेश अर्थात् ज मभूमि को सता अपने रूप माननेवाला उत्तम हे । सपात्तम मनुष्य यह है जिस के विशाल हृत्य में मारा ससार निजम्प से प्रतिभासित हो रहा है ॥ ११६ ॥ चतन्यदृष्ट्या जगनिरीक्षणम् । रखा मोहरल विहाय ममता स्त्रीये निरद्धा कुले, पश्यत्व निग्विल जगद्धिततया चैतन्यदृष्ट्या सदा ७२ सेठिया जैन मयमाला ney घराग्याभ्याम । भृगाया रमानभाजनरमाससर्गहानादिमि , मा वाचारविचारपालनमयाऽभ्यासो विधेयश्विरम् । चेन्द्रियनिग्रहेण मनसो दान्त्यात्मशान्त्या पर, गग्य परिशीरनीयमुचित विविधिम् ॥ १२० ॥ गग्य का अभ्याम। भाथ-वैगग्य को दृढ करने के ये वप दो वर्ष तक गाय का अभ्यास करना चाहिये अर्थात् ममिपर सोना, रूपया मूसा भोजन मग तथा स्त्री का समग नहीं होने देना चाहिये । इस प्रकार माना जसा आचरण पारन पन्त हुए इन्द्रिय का दमन और मन । निपट कर आमशाति पूर्वक चराग्य या अभ्यास करना चाहिये ॥ १२०॥ गावाध्ययनम्। सा पाचारविचारपोरजनक शाह यथानुक्रम, ज्ञानार्थ पठितव्यमादरधिया स्थित्वा समीपे गुरी। तत्त्वज्ञानविशिष्टशास्वनिवहाऽभ्यासोऽपि पार्यो मुदा, सन्मार्गादिविनिश्चयाय मुधिया जिज्ञासुना श्रेयसे।।२०१॥ शाख का अध्ययन । भावार्थ-मोन की इच्छा स्पनेमागे को साधुओं के आचार विचार का बोध करानेवारे शास्त्र या अनुनम से अभ्यास करना चाहिये । यह अ यास गुरु के समीप में रहार समानर्वक होना
कर्तव्य-कौमुदी
चाहिये । बुद्धिमान जिलामुआ को आचारशास्त्र के साथ साथ सत्य
माग का विशेष निश्चय करने के न्येि तथा आमकल्याण करने के
ये तत्वज्ञान के प्रतिपादकशास्त्रों का भी अभ्यास करना चाहिये ।।१२१॥
गुरुकृपा।
विद्या सिद्धपति सद्गुरोः सुकृपया पीयपमरपा दृत,
गुर्वाज्ञायशवर्तितादिसुगुणै सम्पायते सा कृपा ।
भत्तपा स्वार्पणरूपया त्वहरहः कृत्वा च सेवा गुरोः,
सम्पाया विनयेन सद्गुरकृपा जिज्ञासुना श्रेयसे ||१२२॥
गुरुकृपा।
भावार्य--अभ्यासमात्र से विद्या की प्राप्ति नहीं होती किन्नु
मदर की अमृतमय पा से सहज ही विद्या की प्रामि होती है।
और यह रूपा गुरी आज्ञापालनादि सटगुणा से सम्पादन की
जाती है । अत एव जितासु को चाहिये कि विनयपूर्वक द्रव्यादि देकर
नमा परमभक्ति से प्रतिदिन गुर की सेवा कर के गुर का अनुग्रह
ग्राम रे ।। १२२॥
यगग्यपरिपाक ।
वैराग्य क्षणिक तु निष्फलमहो! नो योगनिर्वाहक,
भाव्य तेन नुनिष्ठितेन नियत प्राप्तेन पकां दशाम् ।
मत्सद्देन विरागधर्मकथया चैकान्तयामेन बा,
माध्यायेन मृचिन्तनेन तपसा कुर्याच तन्निष्ठितम् ।।
सेठिया जेन प्रन्यमाला घेगग्य का परिपाक । भावार्थ-व -वगग्य यदि क्षणिक है तो निष्फर समझना चाहिये क्यों कि उममे सयम का निर्वाह नहीं हो सक्ता, इम न्येि वैराग्य परि- पातमा चरममीमा को प्राप्त होना चाहिये । अत मोक्षाभिगापी सरुपा की मगति करके वगम्यवर्द्ध धमकथाओं को सुनकर नथा एकान्न म रहर शास्त्र स्वा याय आमयान तथा यथाशक्ति ता द्वाग वैगग्य को परिपक बनाना चाहिये ।। १२३ ॥ यराग्यपरीक्षा। चित्त यस्य न चञ्चल विकृतिमद् दृष्ट्वाऽपि देवाङ्ग भूत्वा कण्टकतुल्पेशवचन क्षुभ्येन यन्मानसम् । धैर्य मुञ्चति नो मनाग बहुजनैर्यष्ट्या च यस्ताडितो- या तत्परिपकता सहृदयैरेतै शुभैलक्षणे ॥ १२ ॥ वैराग्य की परिक्षा । . भावाथ-सामाय स्त्री की तो बात ही क्या '५ मुन्दर गुस्ती स्त्री को देखकर भी चित्त में विकार न होना, समान हृदयविदारस शत्रु के कठोर वचनों को सुनकर भी क्षोभ न होना, अनेक मनुष्यों से लाठीआदि द्वारा पीटेजानेपर बनीरहना, चित्त का चचर न होना ये वैरागी के शुभ सहृदय पुरुषों को इन्हीं लक्षणों से है-- चाहिये ।। १२४॥
वर्तव्य-कौमुदा NA शिष्यलक्षणम्। नम्रः कोमलमानसोऽतिसरलो लज्जाविवेकान्वितो- निर्दम्भो निरहङ्कतिनिरलसः सौम्यः शशीव स्वयम् । मज्ञावान् मितभाषक सुचरितः श्रद्धायुतो यो भवे. दौदास न्यमुमुभुलक्षणपट' शिष्य' स एवोत्तम ॥१५॥ शिष्य के लक्षण । भावार्थ--परिपक वैराग्य के साथ साथ जो शिप्य विनयवान् कोमल हृदयवाला मरल चित्त र जागान् और बिकी है। छलरहित' निरभिमानी 'स्यहीन और चद्रसमान साम्य आतिवान्ग है, बुद्धि- मान् परिमित-भाषण करनेवाला सच्चरित्र अटल-धर्मश्रद्धासाला तथा उदासीनता आदि मुमुक्षु के लक्षणों से भूपित है उसे उत्तम-शिष्य समझना चाहिये ॥ १२५ ॥ गुरुलक्षणम् । योगीन्द्र श्रुतपारग. समरसाम्भोगै निमनः सदा, शान्तिक्षान्तिनितान्तदान्तिनिपुणो धर्मकनिष्ठारतः । शिष्याणा शुभचित्तशुद्धिजनकः ससर्गमाण यः, सोऽन्यास्तारयति स्वयंच तरति स्वार्थ विना सद्गुरु ॥१२६।। गुरुके लक्षण । भावार्थ-नो मुनीश्वर श्रुत के पारगामी है, और समतारसके समुद्र में सदा मग्न रहेते है, शान्ति और क्षमा गुणसे निमषित है, इन्द्रियों का दमन करते हैं तथा धर्मआचरण में लीन है, जिन ७८ मेटिया जन प्रत्यमाग ममर्गमात्र से शिष्यों की मीन चित्तवृनि शुद्ध हो जाती है । प्रेस मगुर स्वय समाग्समुह से पार होते हैं और पिना स्वार्थ के मग को हतारम्बन दयर पार करते हैं॥१२६ ॥ मम्यधिनामाशा । पुत्रारिम्नजना कथाश्चिदपि ते सार्थेन मोहेन वा, कुन्ति प्रतिपन्धन यदि यमे नश्यविक्रया नोचिता । तान विमाप्य मृदूपदेशाचनै सन्तोप्य तन्मानस- माशीर्वादपुर सरा नियमता ग्राद्या तदामा स्वया ॥१२॥ फुटुम्यिया की आशा । भागर्थ-- -----ऊपर कहे अनुसार शिष्य और गुर का योग मिउने पर लीला का अधिकार प्राम होता है, किन्तु दीरेने के पहि" दीभेच्छ को कुटम्बियों की आज्ञा ग्राम वरना आप-या है । यदि माना पिता स्त्री पुत्रादि कुटुम्ब के योग साधरश तथा माहबश दामा में किसी प्रकार की कारट परने हा तो उनका निरम्यार नहीं करना चाहिये, नितु उन्हें कोमा उपदेश के वचना मे समझाना चाहिये, उनी मन को सतुष्ट करके उनसे आशीर्वाद पक दीक्षा की आना ग्राम करना चाहिये ।। १२० ॥ आज्ञाया अभाय भायर्मयम । नो शक्तो यदि गारपन्धनस्यो रेप परावर्तितु, स्थित्वाऽसौ निल्येऽपि पापविरतो वैराग्ययुक्तरतदा । .
७७ कर्तन्य-कौमुदी स्वायायादिपरायणः कमलवनिर्लिप्तचित्तः सदा, ससेवेत हि भावसयममल मुक्त्वा ममत्व हृद' ॥१२८|| आज्ञा न मिलनेपर भावमयम। भारार्थ-~-वराग्य रहते हुए भी कुटुम्बीजनों के गाढन धन से आना न मिलने पर यद्यपि वेप बदल कर द्रव्यदीक्षा नहीं ले सस्ता है, ता भी समस्त पापो का त्याग कर पैराग्ययुक्त हो अपने घरम रहे, स्था यायादि शुभ कामों में रीन रहकर जलकमल की नाई सदा चित्त को निप रक्से तथा हृदय से ममता को निकारकर भावसयम सा सम्यकप्रकार सेवन करता रहे ॥ १२८ ।। तृतीय परिच्छेद समारत्याग । वैराग्यनिश्चयपूर्तिका दीक्षा । याव जीवमनुत्तमेन मनसा वैराग्यभाव दृढ, निश्यामि पराक्रमेण सतत कस्मिन् प्रसङ्गेऽप्यहम् । दत्येर सात निश्चये दृढतरे त्याला कुटुम्ब ६, गन्तव्य गुरुसन्निधौ मतिमता दीक्षा ग्रहीतु पराग्॥२०॥ वैराग्य का निश्चय हानेपर दीक्षा। भावार्थ-जिस मुमुक्षु को ऐसा दृढ निश्चय हो जाने कि मेरे जीरनपर्यत गग्य के उपर परिणाम रहेंगे तथा फिट प्रसन्न .* से दिया जन प्रग्यमाला देशोऽया यग्विर जगत्तनुभृत सऽपि कौटुम्मिमा, - पव परिदर्शनाय जगती प परायते ॥23॥ किमरिय यग या परियतन'। भावार्थ-लासा न के पहिले जो जाति युटुम्ब परिमित रेश नामा साटि सेक तथा सम्बधियों के साथ ममच सम्बध नया यह मध अस तोड दिया है और गमन्त ससार यो अपना देश तथा ममार के प्राणिया को युटुम्नी मान रिया है, ससार का यर यात दिलाने के यि जाति और देशमा वेप छोटकर साधुरा क्षेप धारण पिया जाता है ।। १३३ ॥ चतुर्थ परिच्छेद महाग्रत धारण और पापम्यान या परिहार । अहीमा मत्य प्रतिज्ञा । जातेऽपि क्षुपया तपा परिभवे र्या न हिंग मनाक, पायाऽगिपु कस्यचित्तनुभृत सङ्कल्पमाप्रादपि । यस्मिंश्चित् समयेऽपि दारुणतरे क्रोधेन लोभन बा, हास्येनापि भयने पाऽनृतवचा या न किश्चित्स्वयम्॥१३४ अहिमा और माय को प्रतिज्ञा | भावार्थदीला रेते समय निमोक्त प्रतितास की जानि है । । भूख प्यास रोगाटि प्राणात करने वाले साग के आनेपर भी छह कर्तव्य-कौमुदी rwwwmarwanam vvvv काय के जीनों की हिंसा वचन और कायसे तो क्या ? सकल्पमान से भी नहीं करूगा न करवाऊगा और न करते हुए को अच्छा सम अगा, इस को अहिंसा प्रतिज्ञा कहते है । भयकर समय आनेपर भी कोषसे लोभसे भयसे तथा हास्य से रेशमात्र असत्य न बोलगा, न बुग्याऊगा और न असत्य बोल्नेगा की अनुमोदना करुगा, यह दूसरी सय प्रतिज्ञा है ॥ १३४ ।। अस्तेय ब्रह्मचर्य प्रतिज्ञा | हुन्छ वस्तु तृणादिक वरतर वस्त्रादिक मूल्यवद्, गुहीया न विनाऽऽज्ञया स्वचिदहो । तन्नायकस्य स्फुटम् । मवेयापि न मैथुन त्रिकरणैर्दिव्य च मानुष्यक, सन्नद्धो नवाभिश्च गुप्तिभिरह दहावसानाधिम् ।।१३५॥ अचोर्य और अामचर्य को प्रतिज्ञा । भावार्थ- नृणादि तुछ वस्तु हो चाहे वस्त्रादि बहुमूल्य वस्तु हो स्वामी की मिना आज्ञा कभी न ग्रह्ण करूगा, न करवाऊगा आर को अछा मानृगा, इसी प्रकार देवसम्बन्धी मनुष्य- सम्बधी तथा तिर्यंच सम्बधी मैथुन का मग्णपयन्त न सेवन करगा न करवाउगा और न सेवन करनेया का अनुमोदन करूगा किन्तु ब्रह्मचर्यमी नागुप्ति अर्थात नी वालमा सदा आगधन करूगा ॥१३५।। निष्परिग्रहप्रतिक्षा। स्यक्त क्षेत्रगृह च रूप्यानरु धान्य कुटुम्ब धन, रिग्रहश्च निग्विको ने छेपमेन पुनः । न करते ८४ MANY मेठिया जैन प्रथमारा अगन नहा सगा । ३ । माया सहित असयको तथा मिथ्या रूप महाशुन्यको जडमे उसाट दृगा॥१३९॥ आगदशपापपरिहारप्रतिज्ञा। इत्यष्टादशसइपकानि कलुपस्थानान्यह सर्वथा, सेयापि न सेवयेय मनसा वाचा तथा कर्मणा। जानीया न वर निरीक्ष्य नितरा ससेवमान पर, वत्साक्ष्येण गुरो कृपाऽमृतनिधे । कुर्वे प्रतिज्ञामिमाम्।।१४० अठारहपापति त्यागकी प्रतिज्ञा। भावार्थ-~-उपर बताये गये हिंसासे टेकर मिथ्या व पयन्त में यारह पापोका मै माथा मन वचन और कायमे कदापि सेवन नहीं दूसरेको मेग्न नहीं करवाऊगा और दूसरेका सेवन करते हुए देखकर भला नही मानुगा । ह टयामृतके सागर गुस्महारान! आपका साक्षीसे मैं यह प्रतिज्ञा करता हूँ इसको जीवनपय त पागा ।।१४०॥ करूगा, पञ्चम परिच्छेद ॥ उप्त हृद्भुत्रि समितिमकरणे सयमधीजोद्म । प्रतिज्ञामय, नो भवेत् ।
वर्तव्य कौमुदी सयमपीजकी उत्पत्ति । - भावार्थ-गुर के समक्ष शिप्यकी की गई प्रतिज्ञा ही सयममा चीन है । इस निर्मल बीजको शिष्यने अपनी हदय भूमिमें चोया है, यदि इसका जलसे सिंचन न कियाजावे तो यह ठीक समय पर अङ्कुर उपन नहीं करसकता, इसलिये गुरकी दीगई शिक्षाम्प अस सिंचन कर अभ्यासरूप क्यारीद्वारा इसकी सतत रक्षा करनी चाहिए जिससे यह बीज पत्ते डालियों आदिसे विस्तारवाला वृक्ष होकर इंछित मोअफरको उत्पन्न करसके ॥ १४१ ।। गमनविधि गन्तव्य न विना प्रयोजनमथो चारित्रिणा यत् कचित्, स्वस्थाने निजयोगसाधनविधौ स्येय विधा गुप्तिभिः। आहारादिनिमित्तके तु गमने प्राप्त समित्याऽनया, गच्छेनिम्नदृशा धरा युगभिता सम्यग् निरीक्ष्याग्रतः॥१४२।। ईयर्यासमिति-गमनविधि। भावार्थ-दीक्षा लेने बाद चारित्रधारी विना प्रयोजन कहीं- पर न जावे, अपने स्थानमें योगका साधन करता हुआ मनोगुमि वच- नगुप्ति और कायगुमिका पालन करे, मन वचन सायका पापसे गोपन करें। यति आहारादि निमित्त बाहर जाना पड़े तो ईर्यासमिति का साधन परताहुआ नीची दृष्टि रसकर भागे चार हाथ ममिको देखता हुआ मार्गमें गमन करे ॥ १४२॥ mope ९२ सेठिया जैन प्रयमाला • ना या ना रह जपन भागमें स वितरण करे। तपथात् अपना । भाग गग्स हा या नाग्म समभाव से आहार रे ॥ १५१ ।। आहाराचसह । यावन्मानमपक्षते मधुकरीत्या कि तापन्मित्त, ग्रस नगृहाग्नेन गृहिणा न स्यारथा न्युनता। राजा नाशनसह समुचित क्रोशद्वयाद्वाऽपर- मानीत न च युज्यते सुयमिना यामत्रयातीतमम् ॥१५॥ आहारादि का संग्रह न करना। भावार्थ-भिभु एकशर के भोजन में जितना चाहिये उतना ही आहार अनेक घरों में धूमकर मधुररा वृत्ति से योदार लेगे । जिस प्रकार मधुकर अथात् भौंरा अनेक पुष्पों मे थोटा २ रस लेता है रितु पुप्पो को कष्ट नहीं पहुँचाता ठीक इसी प्रकार सयमी अनेक गृहस्थों के घर से थोडार आहार पानी रेचे । जिम से गृहस्थों से कोई कष्ट न हो । दिन में राया हुआ भिक्षा का अन्न दिनमें हो समाप्त करदे रात्रि में वासी न रखे । दो कोश उपरान्त से लाये हुए तथा तीन पहर पीतने के बाद का आहार को राम में न लाये ॥१५॥ वघ्रादिग्रहणविधि । वस्त्रादिगणेपणाऽपि बहुशो रीत्याऽनया शोभना, तेषागपि सश्चय समुचित कालादिमानाधिर । स्त्रीपुसादिनिवामसङ्गरहित स्थान मुनीना वर, प्रामे वा विपिन मुखासनकृते शो-य समित्या सता॥१३॥ - - कर्तव्य कौमुदी घघ्रादिक लेने को विधि। भावार्थ-भिक्षु आवस्यक सादिक भी प्राय पूक्त रीति में देोष टाटकर एपणासमिति पूर्वक गृहस्थ से लें । मर्यादा से अधिक वस्त्रादि का सचय करना अनुचित है । मुनियों के ठहरने का स्थान गृहस्थों के निवास और संग से अलग होना चाहिये वह स्थान गाँव में हो या वन में, स्वा याय ध्यानादि के लिये सुखकारी हो ऐसा योग्य स्यान मुनीश्वर एपणासमिति से देख शोध लें ॥ १५ ॥ म्यानपणाविधि। स्थानस्याधिपतेर्जनस्य नितरामाज्ञा विनैकक्षण, स्थातु नोचितमात्मनिष्ठितवता स्थेय नियोगे ततः । यस्याज्ञानिलयस्य तस्य किमपि ग्राद्य न भोज्यादिकं, स्थित्वा तत्र यथोचित न ममता स्वल्पाऽपि कार्या सता।।१०४॥ स्थान की एपणा निधि । । भावार्थ-मकान के मालिक की आज्ञा पिना आ मज्ञानी मुनि को एक क्षण भी ठहरना उचित नहीं, उस की पूरी आज्ञा मिलनेपर ही टहरना उचित है । जिस व्यक्ति से मकान में ठहरने की आज्ञा दी है उस को शास्त्रों में शय्यातर कहा है । भिभु उस के घर का अन्न जल औषध आदि कुछ न ले । उस मकान में उचितकार तक टहरे, किन्तु उस में लेशमान भी ममत्र परिणाम न को, अर्थात् प्रीति न को ॥१५४। न सेठिया जैन गन्थमाला वसाय निग्विल निजोपकरण स्कन्पादिनोगा सय, पादेनेव पर बिहारकरण सन यासिना श्रेयसे ।।१५९।। साधुओं का पैदल विहार । मावार्थ-साधु ऊँट घोटा गाडी आदि सवारी पर नहीं बैठे । तथा पिना कारण नार पारसी आदि पर भी न चहे । वस्त्र पानादि अपना सपूर्ण उपकरण मजूर आदि मे नहीं उठवानें, अपने कधेपर उठाएर पदर विहार करें । यह वृत्ति साधुओं के लिये कल्याणकारी वसाधादाननिक्षेपरिधि । वसादेन च यत्र तत्र धरण किन्तु व्यवस्थापुरो, न्यासी योग्यपदे सदा यतनयाऽऽदान पुन कारणे । तत्सर्व घटते विना न यमिना सम्गार्जन वीक्षण, तबाह्य न्यमनीयमत्र सकल सम्माज्यं दृष्ट्वा तथा ।।१६०॥ चनपानादि के उठान रखने को विधि । भावार्थ--मुनि अपने वस्त्रादि उपररण जहा रहीं न धर, फिन्तु “यवस्थापूर्वक यतना से योग्य स्थान पर धरें और काम पड़ने पर यतना से उठा । मुनियों को सब काम पिना देसे बिना झाडे करना अयुक्त है, अत एव सम वस्तुओं को देखकर और माजनी से याडरर धरना उठाना चाहिये ॥१६०॥ वस्त्रादिप्रतिलेखन निया। उद्युक्तो दिवसे सदा नियमत मातश्च साय यमी, वखादे मतिलेखन विधियुत कुर्याच मूक्ष्मेक्षया ।
है AMMUH H MAA फर्तव्य कौमुदी स्थादेव यमरक्षण न च भवेत् सूक्ष्मागिना हिंसन, नाप्पालस्यनिपेषण निजतनो रक्षालिसपादितः ॥१६॥ घखादि के प्रतिलेपन की प्रिया । भावार्थ-दिन में दो वार प्रातःकाल और सायकाल सयमी उद्यमशीर होकर विधिपूर्वक सूक्ष्मदृष्टि मे वस्त्रादि का प्रतिलेसन कर। ऐसा करने से यत्रादि पर चढ़े हुए छोटे छोटे न तुओं की रक्षा होती है, अत अम्सिा सयम दृढ होता है अन्यथा जीनों की हिंसा होने से सयम का धात होना निश्चित है । तथा आलस्य दूर होता है, इतना ही नहीं ब िक सर्प विवू आदि निपेठे ज तुओं से अपने शरीर की रक्षा भी होता है ॥१६॥ पट्टादो शयनाशनम् । पल्पके शयनासनादियमिना नै क्वचिद् युज्यते, नो त्रासनमञ्चिादिषु पुन:पापि सट्दादिके । पट्टे काष्ठमयेऽथवा क्षितितले दर्भादिसस्तारके, साधूना शयनासन समुचित हन्तु ममादादिकम् ॥१६॥ भूमि या पटे पर शयन । भावार्थ-सयमी परङ्ग साट आरामकुरसी मच आदि पर सोना बैठना न करें, स्न्तुि काट के पट्टे पर भूमिपर या दर्भ घाम आदि विचार सोन, बैठ, क्या कि ऐसा करने से निहा तन्द्रा आलस्यादि दूर होते है ॥२६॥ 19 ९८ सेठिया जैन ग्रन्थमाला परिष्ठापनाधिधि । त्याज्य यत्र मलादिक तदपि वा स्थान निरीक्ष्य पुरा, सच्छिद्र न जनाकुल न यदि तनिम्न न वा नोन्ननम् । नो मार्गों न च देवताधिक्सन नो मूक्ष्मजन्वाचित, कार्यस्तत्र मलादिकस्य मुनिनात्याग समित्या सदा॥१६॥ मलम्चादि त्यागनेकी विधि । भावार्थ-साधुओं को जिस जगह मटमूनादि का त्याग करना हो उसे पहरे देख शोध टेना चाहिये । जिस स्थानमें चीटी चुर आदि के बिल न हों, न मनुष्या का अधिक आनानाना हो। जो स्थान न बहुत नीचा हो और न बहुत ऊचा हो, न मार्ग हो न देवताओं का निवासस्थान हो, तथा सूक्ष्म जतुओं से व्याप्त न हो। ऐसे स्थान में मुनियों को यननापूवक मलमूनादि का त्याग करना चाहिये ।। १६३ ॥ -- पष्ठपरिच्छेद। परिपहविजयः। क्षुधादिपरिषद । मिक्षाया न च रभ्यतेऽशनजल शुद्ध कदाचित् कचिद्, दैन्य नान तृप क्षुध परिपही जेयस्तपोभावतः ।
AN AAKAM कर्तव्य कौमुदी ग्रीष्मे वा शिशिरे भवत्परिपहस्तापस्य गीतस्प वा, शौर्येणैव पराजय फिल तयोः कार्यों लादात्मनः।।१६४॥ सुधाभादि परिणह। भागार्थ-साधु को मिक्षा के समय कदाचित् निदाप जन्न जल न मिले और भूस प्यास की बाधा भी सताती हो उस समय साधु- दीनता न दिखाने, किन्तु इसे कर्मी निर्जरा करनेवाली तपस्या समझ सुधा तृपा का परिपद पर पराजय प्राप्त करे । इसी प्रकार ग्रीष्मस्तु में गमा का और शरदस्तु में ठड का परिपद प्राप्त होनेपर शूरतामे तथा आमबल से इनपर विजय प्राप्त कर ।। १६४ ॥ मशकादिपग्पिह । कापि स्युर्मशकादयस्तदपि नो ग्लानिः सता शोभते, नो दैन्य वसनावलम्भननित कष्टेऽपि नैवारति । नो स्त्रीभिश्चलन श्रमेण पथि नी सियेत चित्ते कदा, स्थिन्यैकाऽऽसनतश्विरेण मनसोधैर्य न मुश्चेन्मनार ॥१६॥ मच्छर आदिका परिपह । भावार्थ--फिसी जगह टॉम मदर आदि का उपदर होता हो तो भी मुनिको इससे सेदखिन नहीं होना चाहिये, क्योंकि ऐसी का- यरता आत्मबली सत्पुरुषों को शोभा नहीं देती। रिसी समय वस्त्रादि की प्राप्ति न होनेपर साधु दीनता न दिखाने तथा कष्ट आनेपर खेद न करे। एकात में स्त्रीसे परिचय होनेपर भी चअयमान न हो।
सेठिया जन प्रयमाला N मार्ग में पैदल चलनेमे थाट होनेपर चित्त में कमी गेद न मानें। स्वा याय ध्यान आदि के ग्यि बात कारता र जगट बैठे रहना पटता है, इससे घबराकर जरा भी धैर्य को न छोड मितु शरवीरतास उक्त पम्पिहों पर रिनय प्राप्त करें ॥१६५।। शय्यादिपरिपह । नो माता वसति शुभा तदपि नो चित्त पिपादोदय, श्रत्वाऽऽक्रोशपचोऽपि नैव सहसा शानो मुनि कुप्यति। नो द्विष्टे धधवन्यनेऽपि न तथा भिक्षाटने लज्जते, नालाभे न गदोदये निजतनोचिन्ना विधत्ते पुनः ॥१६६।। शय्या आदिशी परिपह। भाथि-माधु विहार करता हुआ किसी गाँनमें पहुंचे और वापर टहरने को सुभीत का स्थान न मिग्नेपर वृथके नीचे ठहग्ना पटे तो भी साथ अपने चित्त में रेश मान विषाद न करे। कोट शत्रु मनमाने कठोर वचन बोरे तथाऽपि शातमुनि सहसा योप न करे क्षमा धारण करे। कोद दुष्ट मनु-य लाठी जादिसे मारने गे या रस्सी से घाव दे तो भी मुनि द्वेष न करे अपने कार्यम लगा रहे। अपनी जाति या कुल्या अभिमान कर गृहस्थ के यहा भिता के लिये जाने में स्नान करे। रिसी समय किसी वस्तु के नहीं मिटने पर या शरीर में रोग प्रकट होनानेपर हाय ' अब मेरा क्या होगा। मैं क्या करू' ऐसी चिन्ता न करे रितु श या आमन आदि परिपहों को सहन रे ॥ १॥ ।
Ary
कर्तव्य कौमुदी
तृणस्पादिपरिषद ।
दर्भादौ गयनेऽपि समिमुनि. कुर्यान खेद मनाइ,
नो ग्लानि मलिनाम्बरादिभिरयो गर्न न सकारत ।
औरकट येऽपि मतेन मायति तथा मान्येऽपि नो खिपति,
मियाऽऽहम्परतोन मुदति पुननित्वारियूनान्तरान्।।१६७॥
तृणम्पर्शादि परिषद।
भावार्थ-शगरमें चुभनेवारी दाभ आदि की शपया पर मोनेसे
सयमी मुनि विचित मान खेद न करे। अपने वस्त्र तथा शरीर को
मरिन देसर मनम ग्यान न करे। दूसरा से अपना बहुत आदर
सन्मान होते हुए देगार रेशमान गर्न न करे । यदि बुद्धि तीक्ष्य
हो तो पूरे नहीं, तथा अदि मद होनेपर शोक न करे। दूसरे लोगों
के मिथ्या आडम्बग्से मोहित न हो रितु रागादि अतरङ्ग शत्रुओं को
जीनार सयम में स्थिर रहे ॥१६७।।
सप्तमपरिच्छेदः।
शापूना दिनत्यम् ।
पे जगरण निमोऽन्त्यचरगे बाध्याय आवश्यक,
वा पाया प्रतिलेखन च यमिना यामे दिनस्यादिमे ।
१०२ सेठिया जैन ग्रन्थमाला ध्यान याममित ततो मधुकरी यामे तृतीये पुन- स्तुर्येऽपि प्रतिरेखन च पटन मार दिनावश्यकम् ।।१६८।। साधुओं की दिनचर्या। भावार्थ--साधु रातिमा एक पहर बाकी रहे तन उठे और उस समय त्या याय तथा रात्रिका प्रतिरमण करे। इस के बाद दिन के पहले पहर में प्रतिहेसन तथा स्वा याय करे। दिन के दूसरे पहर में एक पहर तर ध्यान धरे। तीसरे पहरमें मधुपरी वृत्ति से भिक्षा आहाराटि रे । चौथे पग्में पढे' तथा प्रतिरेसन करे। और साय कार दिन आवश्यक प्रतिक्रमण करे ।। १६८॥ व्यर्थसमयाभाव । स्वा याय' क्षणदैत्याममनघ ज्यान निशीथावधि, निट्रैक महर ततो विधिरय सन्न्यासिना नैत्यकः । स्यादेतत्कमपालन यदि तदा कालोऽवशिष्येत नो, साधूना विकथा-प्रलाप-कला-सूया-वितण्डा कृते ॥१६९॥ समय व्यर्थ न खोना। भावार्थ--सायकारका प्रतिक्रमण करने पर साधु रात्रिका पहला पहर स्वाध्यायों और दूसरा पहर निर्म - ध्यानम बितारे। इस प्रसार म यरात्रि बीतनाने पर एक पहर तक निद्रा रे। साधुआका यह नित्यकर्म ह। यदि उक्त प्रकार क्त्तव्यमा पान कियानावे तो १ पढना स्वाध्याय में गर्भिते है। १ कर्तव्य कौमुदी साधुओंको कुकथा, व्यर्थ भाषण, कलह, ईपी तथा रितण्डागाद करनेका मिलकुल अवकाश नहीं मिल सकता, अत एव समयका पूरा पूरा सदु- पयोग करना चाहिये ॥ १६९ ॥ प्रमादयिजयार्य समयमर्यादा । यावत्पञ्चविधप्रमादविजयो न स्पाद्गुणारोहण, तावनेत मनेस्ततः प्रतिदिन र यात्ममाढाश्रयम् । तद्रोधाय तडागसेतुसदृशी नद्धा जिनेन्द्ररिय. मर्यादा समयस्य रानिदिनयो रक्ष्या च सा सर्वदा ॥१७॥ प्रमादपर विजय पाने के लिये समयको मर्यादा । भावार्थ -~-जबतक मत पियफपाय निदा और किया इस तरह पाच प्रकार के प्रमाद पर विजय प्राप्त न हो तबतक गुणस्थान फी ऊपरकी श्रेणीपर चढ़ नहीं सकते, अत सावु प्रमाद आत्रवो रोकनेके रिये पनी को रोकने वाली तागवकी पाठ के समान जिनेन्द्र भगनान्ने उपरोक्त समयकी मर्यादा राधी है, उस मर्यादाका मुनि भरे प्रकार पालन करें ॥१७॥ पालममोलधनेऽपि कालमानस्यनोप्लवनम् । देशाचारविशेषतो गधुकरी काले यदि व्यत्यय- स्तत्रापि प्रहरव्य तनुकते निद्राशनादिक्रिया । ध्यानार्य परिपूर्णयामयुगल स्वा यायससिद्धये, रक्ष्य यामचतुष्टय मुनियों कालमानोत्क्रम ॥१७ AN । मेठिया जैन प्रन्यमाला एवं शास्त्रविदग्रणीर्गुणमणि स्यात्पाठकोऽप्येकको- नाचार्येण च पाठफेन रहितो गन्छो भवेन्छोभन ॥२७॥ आचाय और उपाध्याय । भावार्थ---गाय के साधुआरी रक्षारे लिये निसमें सबसे उत्तम साधुके गुण पाये जावें, तथा जो शास्त्रके रहस्य को जाननेवाग हो, सम्पूण सघ मिरकर उस प्रभावशाली मुनियो सधर नायस्पद पर स्थापन करे अर्थात आचार्य बनाने । इसी प्रकार जो शायरे ज्ञाताओं में अमेमर हो, तथा समता भार आदि अनेर गुणोंमे भूपिन हो, एक उत्तम साधुको उपाध्याय-पद पर नियुक्त करे । क्योंकि आचार्य और उपाध्यायके पिना गच्छ शोमा नहीं पाता ॥१७॥ आचार्यपदयाग्यता। सपा हितसाधने समदृशा शक्तिर्यदि स्यात्परा, सम्पत्स्यात्सलाऽपि शास्त्रविहिताचार्यस्य योग्योदिता । ग्राह्य मुरिपद समुन्नततर तेनैर मेधाविना, नोचेद्दत्तमपि स्वय हितपिया त्याज्य विलम्ब विना ॥१७॥ आचार्यपदकी योग्यता भावार्थ-साधु साध्वी श्राफ और श्राविका इस चार प्रकार के सघको समान दृष्टिसे देखनेसी तथा सबका समान हित करनेकी जिस में पूर्ण शक्ति हो, तथा दशा तस्वन्धमें कहीग- आचार्य के योग्य समस्त प्रभारी शक्ति विद्यमान हो, उसी प्रतिभाशाली पुरुष A कर्तव्य कौमुदी १०७ को सोच आचार्यपद ग्रहण करना चाहिये। यदि ऐसी योग्यता न हो तो सघद्वारा दिया हुआ आचार्य पद भी समाजकै हितके लिये विना विलम्ब के स्वय छोटदेना चाहिये ॥ १७५॥ आचार्यकर्तव्यम् । गच्छाचारमुपालन सयमल गाउपास्थापन, भाषिक्लेशनिदान पीनदहन ज्ञानक्रियोद्धारणम् । धर्मोत्साइविवर्द्धन जगति सद्धर्मस्य सञ्चारणं, सड़े स्सा यसमाधिसाम्यजनन कृत्य हि मूरेरिदम् ॥१७६।। आचार्यका वर्तव्य। भावार्थ----आचार्य स्वय शास्त्रमें कहे हुए आचरणको पाग्न करे, और अपने गच्छके साधु साचियोंसे भी निषि आचरण पाटन करना । तथा गच्छकी पुर्ण व्यवस्था करे। भविष्यमें होने वाले देश के चिह माइम होने लगें तो त कार उसके मूल कारणको मिटा दे। ज्ञान ओर क्रियाकी पूर्ण वृद्धि करे। समाजमें धार्मिक उत्साह बहारे। तथा समाजके चागें मोनों में धर्मका प्रचार करे। सघमें स्वास्थ्य शान्ति तथा समभास्की प्रवृत्ति करे। यह सब आचार्यका कर्तव्य है॥१६६॥ उपाध्यायकर्त्तव्यम् । पाठयाः पुत्रदृशा सदैव मुनय सर्वेऽपि विद्याथिनो, नो चौर्य न च पक्षपातकरण तत्वार्थपाठे कदा। सन्डैल्या पठनाईशाखरचना कार्या पुनर्नव्पयो- पाध्यायेन विचक्षणेन समये स्वीये परम्भिस्तथा ॥१७॥ ।
सेठिया जैन गधमारा प्रायभित्त। भावार्थ----मूलगुण तथा उत्तरगुण में छोटा या बना कोई दोप मा हो नो साधु ताठ गुरके निकट जाफर अपने लगे हुए दोपों का आगचना कर । गुर रे सम्मुख दोषा से सार साफ रहे। दोप की शुद्धि के रिये गुरमहारान छन्तप अथवा और कोई प्रायश्चित्त दें सा उसको प्रसनतापूर्वक शीन पान को हमे प्रायश्चित्त तप करते द, यह जाभ्य तर तपा पर भेद है ॥ १८३ ॥ यिनय मूल धर्भतरो फ्लिाम्नि विनयः सप्तमकारो मत सेवा सर्वविधोऽपि दर्शनगतो भेदो भिमेण । उत्थानासनदानचन्दननमस्सारैश्च भक्त्यादिभि- गुर्वादी विनय क्रियेत मुनिभिम्यस्त्वाऽखिलाऽऽशातना ॥२८४॥ विनय। भावार्थ-धमरूपी घृतका भूर पिनय है उसके सात भेद है, ये सब पान करो योग्य हैं, तो भी इनमें दर्शन नामरा भेद विशेष आदरणीय है। मुनीश्वर सम्पूर्ण आराातना रो टास गुर आदि बटे पुस्पॉो आनेहा देय भक्तिपूर्वक सेटे होना, ऊचा आमन रेना, व दना ओर मिस्कार करना इत्यादि सकारद्वाग उनका भक्तिपूर्वक पिनय को ॥ १८४ ॥ .
-AwnAHARW~ wnAnamrunawane कर्तव्य-कौमुदी वैयावृत्यम्। भिक्षायानयनेन भारवहनोपाङ्गादिसम्पादन- यावृत्यतपस्तपस्विभिरल कार्य श्रुतज्ञानिनाम् । एव ज्ञानिभिरप्पभीष्टतपसा ग्लानत्वरोगोद्भवे, भेपज्यानयनादिसाधनभरैः सेव्यास्तपोधारिणः ॥ १८५॥ येयाश्य। भावार्थ-तपस्वी सायु, श्रुतपरायण विद्वान् मुनियों को भिक्षा आदि लार देव, पिहार में उनका बोझा उठा लें, उनके हाथ पान दवावे, इत्यादि अनेक प्रकार मेगा भक्ति कर के वैयान्य नाम के तीसरे आभ्यन्तर तप का सेवन करें। इसी तरह ज्ञानी मुनीश्वर भी तपस्वियों की ग्लान अवस्था में तथा रोग प्रकट होनेपर ओपध पथ्य भोजन आदि सायनोंद्वारा पूर्ण सेवा करके वेयातत्य तप का पाग्न नरें ॥ २८५ ॥ दशमपरिच्छेदः। स्याध्यायप्रकाश । शास्त्राणा फिल वाचन च मनन तद्वनिदिध्यासन, स्मृत्यर्थ पठन रहस्यसहित तात्पर्यसशोधनम् । शङ्काया गुरसन्निधौ सविनय पृच्छा तदुच्छेदन, • मापाशानपुरस्सर विनायना स्वार्थ पिना पाठनम् ॥१८ h ८ सेठिया जैन ग्रन्थमाला १२८ V AM उदे माणगतेमनोगतिरपि च्छिन्नैव तस्या पुन- मिन्दे विषय सहेन्द्रियगतिर्नष्टेत्र सिद्धिस्तन ॥१९३॥ प्राण और मनका मभ्यग्ध । भावार्थ -जनता प्राणवायुसे गति नियमित नहीं होती है, तम ता मनभी स्थिर नहीं होता है। क्यारि मन और प्राणवायुका दुधपानी की तरह धनिष्ट मनध है । इमरिये प्रागरी गति नजाने पर मनमरी गतिभी रस्नाती है। आर मनमी गति सनानेपर विप योंमे इन्द्रियकी प्रवृत्ति हट जाती है। पियासे दन्टियरी प्रमृत्ति के हट जानेपर सटज ही ध्यानसी मिद्धि होती ह ॥ १९३ ॥ प्राणायाम 1 प्राणायाम उपाय एक उदितो ध्यानस्य ससिद्धये, श्वासोन्यासगतिच्छिदात्मरतया रयात पुन स विधा। वायु कोष्ठगतोऽतिमन्दगतितो नि सार्यते यहि , सोऽय रेचकनाममोनिगदितो भेदस्तदीयोऽग्रिम ॥१९४॥ प्राणायामका पहला भेद-रेचक । भावार्थ-'यानसरी सिद्धिरिये प्राणायाम एक मुरय उपाय बताया है। श्वासोच्छासकी गतिका रकनाही प्राणायाम है। कोठे के अन्दर गये हुए वायुसरा अलिम दगतिमे धीरे धीरे बाहर निसाना रेचक नाममा प्राणायामका पहला भेद है ॥ १९ ॥ 1 कत य-कौमुदी पूरकरम्भको। घाणाद्वादशकाकुलस्थपवन याकृष्य यत्पूर्यते, कोष्ठे पूरकनामकः स मुनिभिर्भेदो द्वितीयो यत । नाभावेव स पूर्यमाणपनो यत्नेन यह यते, सोऽय कुम्भकनामकः मुविदितो भेटम्तृतीय पुन ॥१९॥ पूरक और कुम्भक। भावार्थ-नासिकासे बारह अगुर दूर पर रहनेवारी बाहरकी वायु सेंचकर जो कोटेम भरी जाती है, उसे मुनियोंने पूरक नामबाग नाणायाम का सरा भेट रहा है । तथा कोठमें भरीहुई वायु को यन वर्गक नाभिम रोक रसना कुम्भकनामका प्राणायामका तीसरा भेद बनाया है ॥ १९४ ॥ . प्राणायामफलम्। माणापानसमानकप्रभृतयः पञ्चानिला देहगा, स्तत्स्थानादिकोयनेन मुनिना कार्यः शुभस्तनय । स्यात्माणादिजये शरीरमखिल नीरोगमभ्यासतो- हृत्पद्म विफसेच सत्वरमल सा या भरेद्धारणा ॥१६॥ प्राणयामया फ। भावार्थ -प्राण अपान समान उदान ओर व्यान ये पाच वायु शरीरमें होते है। इनका स्यान और स्वरूप जानकर मुनीश्वर उनपर विजय प्राप्त करें। क्याफि प्राणादि यायुपर विजय प्राप्त सटिया जैन प्रग्यमाग mu ALAN नौगेग होता है तथा अभ्याम परत परत दयकमा सिमित होकर धारणा शनिको गीत पूर्ण-वृद्धि होती है ॥ १५ ॥ का भायप्राणायाम । याबमाणीवशाधन न सफल स्यात्सर्वथा योगिना- मनास्ति क्षतिसम्भयोऽपि न सतोऽस्या-त्यादर शोभन । तत्यत्तवा रहिगत्मभावमखिल भार निर्यान्तर, स्थातव्य परमात्मभावशिखरे ध्यानागमेतद्वरम् ॥१०॥ भाय प्राणायाम। भावार्थ-द्रव्य-प्राणायामसे शरीगदि या प्राणी शुदि होरर रोगादि की नियत्ति तो होती है, स्नि आम यानी योगियों इसे पूर्ण सफलता नहीं समझनी चाहिये। तथा तथ्य--प्राणायामसी मिरिमें थोलीसी न्यूनाधिस्ता होने पर हानिकी सम्भावना भी रहती है। इस रिये टसरा अति आदर करना योग्य नहीं। रितु मारप्राणायामका स्वरूप ममशार उसका आदर करना योग्य है। भावनाणायाम में पहिरामभावको रेचा अतरामभावको पुरस कुम्भर करना चाहिये। यह भार प्राणायामही है।॥ १९७ ॥ + M यारद्धारति पनि स्थाञ्चित्त मलिन या
कर्तव्य-कौमुदी
१२१
Army
Mu
MA
AM
N
अनावश्यक इद्रियार्थविजयश्चित्त विधातु स्थिर,
प्रत्याहार उदाहतोऽयममलो योगस्य सत्साधनम् ॥१९८॥
प्रत्याहार।
भारार्थ -जनतक चचर इद्रिया बाहरके शब्दादि विषयों की
तरफ दौटा करती है। तनतक चित्त माटिन होकर उनके पीछे पीये
बाहर भटका करता है। ऐसी अवस्थामें ध्यानकी मिद्धि होना असभव
। इसलिए मनको स्थिर करने के रिये विषयोंकी तरफ दौरती हुई
इन्द्रिया को अपने वशमें करना चाहिये, इस को प्रत्याहार कहते है।
प्रत्याहार योगमा दोपरहित उत्तम साधन है ॥ १९८॥
है।
धारणा।
नासाग्र हृदय मुख च नयन नाभिश्च भाल अति-
स्तालु भू रसना च मस्तकमिति स्थानानि योगस्य वै ।
एपामन्यतमे स्थलेऽभ्यसनतश्चित्तस्य यद्वन्धन-
मेतलक्षणधारणाऽपि सतत सा या समाध्यथिमि ॥१९९॥
धारणा।
भावार्थ-नामिका का अप्रभाग हत्य, मुख, नेत्र, नाभि, ललाट,
जान, ताल, भी, जीभ, और मस्तक ये ग्यारह “यान अथमा धारणाके
स्थान हैं। इनमसे फिसीएक स्थानपर अभ्यासके बलसे चित्तको
स्थिकरना ही धारणा है। समाधिके इच्छुकों को निरन्तर अभ्यास कर
उक्त धारणाकी सिद्धि करनी चाहिये ॥ १९९॥
mwwwA anwr ndwranAN AM सैठिया जेन-पथमाला जातेऽस्मिन् घनघातिकमरिरह' ससारनाशस्ततो- व्युत्सर्गे परिनिष्ठिते च सफले सर्व हि निष्ठा गतम् ॥२२३॥ भावव्युभग तप । भावार्थ--भाष युसर्ग तप भी ससार कप य और मके भेदसे तीन प्रकार का है। इनमें से पहले पहल क्षपाणी पर आरूढ होकर कपाय का क्षय करना चाहिये । कपाय का क्षय होनेपर चार घातीकर्म का नाश होता है और क्म का नाश होते ही ससरसा भी नाश हो जाता है । इसलिये व्युत्सग-तप की सिद्धि को सर कार्य की सिद्धि समयनी चाहिये ।। २२३ ॥ - ध्यानतपसो. फक्यम् । ध्यान यानिजनम्य पाकसमये दत्ते शुभ यत्फल, दवादन फल तदेव शमिन पक्या तपस्या ध्रुवम् । मध्ये ययपि भाति साधनविधौ भेद स्थश्चित्तयो- निष्ठाया तु तयो फलैक्यकलनान्नास्त्येव भेदो मना॥२२० ध्यान और तप के फल की एकता। मावार्थ- ~~ध्यान करनेाठे महामाआ को परिपाक के समय “यान जो शुम कर देता है वही फल शान्तिपरायण तपस्वियों को परिपक हुइ तपस्या भी देती है । यद्यपि मध्य में सधन के भेद से उन दोना में किसी प्रकार भेद माश्म होता है तथापि परिणाम में राय ही कर प्रतीत होता है इसलिये इन दोनों में कुछ भेद नहा है। ज्ञानाभ्यासियों को स्वाध्याय तथा ध्यान में समय व्यतीत धरना चाहिय और तपस्त्रियों को तपस्या में काम ६५॥२२ नयकौमुदी . - www ग्रन्थकारप्रशस्ति । गच्छे स्वायजरामरो दिनमणिर्लोकाभिधे विश्रुत- तत्पट्टे मुनिदेवराजवियुधः श्रीमौनमिइस्तत । मरिनिदादयः श्रुतधर पट्टे तदीयेऽभवत्, स्वामित्रीनथुजिद्गणी गुणखनि शिष्यस्तदीय. पुनः॥२२५॥ र यात स्वामिगुलाबचन्द्रवियुग श्रीपीरचन्द्राग्रज- स्तन्छिप्येण तु रत्नचन्द्रमुनिना कर्त्तव्यमार्गावहः । यथोऽय ख गजा--भू-परिमिते वर्षे शरत्पूर्णिमा- सौम्यादि प्रथितोऽथ राजनगरे पूर्णीकृतः श्रेयसे ॥२२६॥युग्मम् ग्रन्थकारप्रशस्ति । भानाथ राकागच्छ के यदी-स प्रदाय म मूर्य के समान प्रसिद्ध पू० श्रीअजरामरजी स्वामी हुए । उनके पत्रपर पू० पटितश्री देवरानजी स्वामी और इनके बाद पू० श्री मोनसिंहजी स्वामी उनके पटपर विराजमान हुए । इन के पट्टपर शास्त्रमें निपुण पू० श्री देवनीस्वामी, तपश्चात् इन के शिष्य गुणगणमटित पू० श्री नाथूनीस्वामी हुर। उन के प्रायात-शिष्य पटित-श्रीगुलावच द्रजीरनामी और इन ग्रेच्यु भ्राता महाराज श्रीवीरजीस्वामी अभी विद्यमान है ! पनि गुलद- चदजीस्वामी के शिष्य पटित मुनिश्री-रतनचन्द्रनीने कर्तव्य मार्ग के दिखानेवाय यह कर्तव्य-कोमुटी नामके द्वितीय अन्य का द्वितीय खण्ट विक्रम संवत् १९८० की आश्विन शुद्ध-पीमा वुधार के दिन . देश में प्रसिद्ध रामनगर अपग्नाम महमदावाद ११४ विश्व मसार यावृय सेवा घेगग्यपद्धक वेगग्य घटानेवाला व्यवस्था प्रवध, इन्तिजाम व्याधि शरीरपीडा शास्त्र जो हथियार पकडकर माराजाता है, जैसे तलवार दुर्ग आदि शाखरेता शास्त्रांका ज्ञाता थमजीवी मजूर सतत सदा समभाव ममानपरिणाम, गगद्वेगका अभाव समभावजनित समभावसे उत्पन्न हुआ सहृदय उदार सक्रमण परिवर्तन, यदलना सतप्त संतापयुत्त, दग्ध सम्पादन माम मसर्ग परिचय, सम्म ध महार नाश साधन पालन मिति सापद्य मदाप मध पेडका धड स्मरण याद स्वचन निजसेना स्दार-म तोप-वृत्ति अपनी स्त्रीमही मतोप हृदयविदारक हृदयको छेदनेवाला हस्तायलम्चन हाथका, *
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१४४ प्रवध, इतिजाम विश्व समार घयाय मेया घगग्यवद्वक घेराग्य बढानेवाला व्यवस्था व्याधि शगरपीडा जो हथियार पकडकर माराजाता है, जैसे तल्यार दुरी आदि शाखवत्ता शास्त्रोका ज्ञाता श्रमजीवी मजूर सतत सदा ममभाव ममानपरिणाम, रागद्वेपका अभाव. समभायजनित ममभावसे उपन्न हुआ महृदय उदार मयमण परिवर्तन, पदलना मतप्त संतापयुरा, दग्ध सम्पादन प्राम ममर्ग परिचय, मम्मन्ध मदार नाश माधन पालन मिति मायध मदोष पडका घड स्मरण याद स्यचा निजसेना स्थदार-सत्ताप-वृत्ति अपनी स्त्रीमहो म ताप, हृदयविदारय हृदयको छेदनेवाला इस्तायलम्यन
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