Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Jal Bhed

Vallabhacharya · 2012/08

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॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ ॥श्रीमवाचार्यचरणकमलेग्यो नमः॥ ग्रन्थ-परिचय जलभेद तथा पञ्चपद्यानि ग्रन्थ क्व कहा और किसके लिए लिखे गये इसका विवरण कही मिलना नहीं है जलभेदमे भगवत्कथाकै वक्ताके उत्तम मध्यम तथा कनिष्ठ स्वरूप निर्धारित किये गये हैं, तया पञ्चपद्यानिमे श्रोता उत्तम मध्यम और कनिष्ठ स्वरूप निर्धारित किये गये हैं यद्यपि भागवतके प्रथम स्कन्यका भी वर्ण-विषय यही है फिरभी सवाशमे दोना ग्रन्थ प्रथम स्कन्धका ही अनुसरण करते है ऐमा नहीं कहा जा सकता है भागवतके प्रथम स्कन्धमे स्वयम् भागवतके वक्ता तथा श्रोता के उत्तम-मध्यम-कनिष्ठ अधिकारोका निरूपण किया गया है जबकि इन जलभेद और पञ्चपद्यानि में भागवनोक्त धर्म शरणागति तथा निर्गुणा भक्ति के अगभूत, भगवान्के स्वरूप गुण एवम् लीलाओ के श्रवण-म्मरण-कीर्तनार्य अपेक्षित, वक्ताआ तथा श्रोतामओ के उत्तम मध्यम-कनिष्ठ अधिकारका विवेचन किया गया है यहा भागवतपुराणके प्रवचन या श्रवण का प्रश्न नही है अपितु भागवतानुसारी भगवान्के स्वरूप गुण एवम् लीलाओ के श्रवण-स्मरण-कीर्तनके एक व्यापक सन्दर्भमे ही श्रीमहाप्रभुने जलभेद तथा पञ्चपद्यानि ग्रन्यका उपदेश दिया है अतएव भाग- चतके लिए श्रीमहाप्रभु आशा करते है- यदोपनिषद श्रीभागवतमेव पणिनामेव तद्धि स्यात्स्त्रीशूद्राणा ततोन्यथा ।। (भाग नि ३११७८) अर्थ ओपनिपद तथा श्रीभागवतके ज्ञान का अधिकार उपनयन सस्कारवाले विजोका ही होता है-अनुपनीत स्त्री या शूद्रो का नही आजरल चल निकली चन्दा एकमित करनेके लिए होती भागवत सप्ताहको हास्यास्पद रीतिसे विपरीत भागवतके प्रवचन और श्रवण के कुछ गम्भीर नियम श्रीमहाप्रभु स्वीकारते है अतएव आना र रते हैं कि 'भागवन प्रसगो न यथाकश्चिद् पत्रकुचिद् कर्तव्य किन्तु महान्तश्चेद बहब शुद्धास्तीर्थनिरता प्रार्थययुस्तदैव प्रमग कर्तव्य एतादृशेपि श्रोतरि न सहसा भागवत वक्तव्य किन्तु तद्हृदयमवगाहब रीतिरिय सदा' (भाग. नि ११२२-२५) अर्थ जसे मनमे आये वैसे, जहा मनमे आजाये वही, भागवतका प्रसग छेड नहीं देना चाहिये किन्तु अनेक महापुरुष तीर्थवागनिरत शुद्ध श्रोलामा द्वारा प्रार्थना किये जानेपर ही भागवतका प्रसग छेडना चाहिये फिर ऐसौके सम्मुख भी सहसा नही पहले श्रोताको हार्दिक उत्कण्ठा एवम् जिज्ञामुता को अच्छी तरह पहचान कर ही प्रमग छेड़ना चाहिय आदि- प्रवचनकर्ताआकी यही रीति थो और आज भी तथा सर्वदा यही रीति हमे निभानी चाहिये श्रीपुरुषातमजी कहते हैं कि इसके विपरीत जव अनधिकारी लोग पशोसिप्सा, पनलिप्सा ज्ञान पा।

या स्पर्धा के वशीभूत होकर स्वयम्को भागवतप्रवचनके योग्य अधिकारी मान बैठते हैं और यत्र- तत्र सर्वत्र प्रवचन करने लग जाते है तो भागवतकें प्रवचन पाठन या पठन का अधिकार तो दूर भागवतोक्त धर्म पालनके अधिकारी भी वे रह नही जाते है- "ये पुनरेतानि वाक्यान्या. थित्य स्वस्यापि पाठाधिकारमापादयन्ति तेषा मात्सर्यादिदोषग्रासेन श्रीभागवतधर्मेप्वप्यनधि- कार कि पुन पाठे.. नतु श्रावणीय वा विध्यभावात्' (भाष्यप्रका १।३।३८) यहा जलभेद और पञ्चपद्यानि में किन्तु जिस वक्ता या श्रोताको आदर्श माना गया है उसका उपनोत या द्विज होना अनिवार्य नहीं है क्योकि इस वक्ताका वेदादि शास्त्रोका प्रवचनकर्ता होना भी आवश्यक नही है वेदादि शास्त्रोंसे अविरुद्ध भगवत्स्वरूप-गुण-लीलाके निर्व्याज अहनिश चिन्तनमे सप्रेम तत्पर होना ही यहा पर्याप्त है भागवतमे आता है कि तद्वाग्विसर्गो जनताधविप्लवो यस्मिन्प्रतिश्लोकमवववत्यपि । नामान्यनन्तस्य यशोकितानि य- च्छण्वन्ति गायन्ति गृणन्ति साधव ।। अयं भक्तोके मुख से नि सृत वाणी, लोकिक भाषामे गाये गये गीति-पद अथवा सस्कृत भाषाम गाये गये गीतगोविन्द जैसे काव्य, प्राणिमात्रके सभी पापोको नष्ट कर देते हैं यह सम्भव है कि इनम छन्द व्याकरणको दृष्टिसे कुछ त्रुटिया हो अथवा गानेको प्रक्रियाम भगव- प्रामके अक्षरोका तानकर गान करनेमे परस्पर सहभाव टूट जाता हो पर अनन्तकीर्ति भगवानो पशोकित अनन्त नाम भक्तिमान् वक्ताओके मुखसे सुने जानेपर या भक्तिमान् श्रोताओं के सम्मुख गाये जानेपर अथवा स्वयम् भी एकाकितया लिये जानेपर सारे कल्मषोको दूर कर देते हैं (सुबो १०५.११) अतएव भागवतमे वक्ता और श्रोता के उन्नीस भेद माने गये है यथा अधिकारी वक्ता या श्रीवा निर्गुण सगुण असाधारण साधारण H सात्विक राजस तामस स ती सा राता साश्विक तामस रा ता सा गता सा रा सा इस वर्गीकरणमे निर्गुण अधिकारी उत्तम माना गया है असाधारण अधिकारीके सात्विक सात्विक राजस-सारिवक आदि नौ भेद होते हैं. यै मध्यम अधिकारी हैं. इसी तरह साधारण अधिकारीके भी पूर्वोक्त रीतिके अनुसार नौ भेद होते हैं और इन्हें कनिष्ठ माना जाता है यह उत्तम-मध्यम-कनिष्ठ कक्षा भक्ति वैराग्य तथा द्विविध ज्ञान (अनुभवपर्यवसायी अर्थज्ञान तथा अनुभवविहीन केवल शादिदक ज्ञान) की चारो कसोटीपर खरे उतरनेवाले को उत्तम, अनुभवपर्यवसायी अर्थज्ञान तथा भक्ति रहनेपर भी वंराग्यरहित होनेपर मध्यम ; तथा वैराग्यरहित केवल शाब्दिक ज्ञान एवम् भक्तिवाले अधिकारीको कनिष्ठ कक्षा मानी जाती है तदनुसार ही जलके भेद भी सुबोधिनीमे उन्नीस ही माने गये हैं, जहा श्रीमहाप्रभु यह विवेचन करते है कि “उनीस मेद होनेपर भी बहता हुआ जल और स्थिर जल ये दो मुख्य भेद हैं' (दृ. सुबो १०१३३३) जवकि यहा जल और वक्तृभाव दोनोके बीस भेद स्वीकारे गये है इससे भी यही सिद्ध होता है कि प्रथम स्कन्धमे निर्धारित अधिकारभेद वल भाग- वतके सन्दर्भमे ही विवक्षित है जबकि यहा भगवत्स्वरूप भगवद्गुण या भगवद्लीला का भागवतानुसारी या भागवत-अविरोधी होना अनिवार्य होनेसे, वक्ताका भी भागवतानुसारी या भागवत-अविरोधी होना अनिवार्य है, परन्तु एतावता प्रत्येक वक्ताका भागवतपुराणपर प्रवचनकारी होना आवश्यक नहीं है यहा तो पुष्टिमार्गीय श्रोताको भगवत्कथाका श्रवण- स्मरण-कीर्तन कैसे वक्ताके सत्संग द्वारा सम्पन्न करना चाहिये यही विवक्षित सन्दर्भ है अतएव श्रोताके भी उन्नीस भेद न दिखलाकर केवल तीन या चार भेद ही दिखलाये गये हैं अतएव उन्नीस और बीस के भेदको विवक्षाप्रयुक्त मानना चाहिये फलत पुराणप्रवचनकी अनिवार्य शर्त उपनयन-सस्कार या द्विजत्व अथवा पुरष होना भी यहा अनिवार्य नही लगता है. परन्तु इसके सिवा अन्य गुण जो भागवतके वक्ताको उत्तम- ताके परिचायक हैं यथा उसका स्वसम्प्रदायकी परम्पराके अनुसार सत्गुरुपके मुखसे भगव- दलीला एवम् सिद्धान्त का श्रवण किये हुए होना, स्वयम् धनोपार्जनके हेतु भगवतकथाम प्रवृत्त न होना एवम् ज्ञान-भक्ति-वैराग्य-सम्पन्न होना आदि, उन्हें इस सन्दर्भम भी आवश्यक माना जा सकता हैं- “वनाधिकारी सर्वज्ञ सम्प्रदायेन सन्मुखात् श्रुतभागवतो भक्तो...." (भाग नि ११२३). जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि, श्रीमहाप्रमुके अनुसार, चितका श्रीकृष्णमे तन्मय हो जाना है इसके दो साधन दिखलाये गये- १) तदाधय-प्रपत्ति २) तदीयता- भक्ति विवेकर्याधय ग्रन्यम तदाश्रयके उपायल्प विवेक धैर्य एवम् अनन्यायय का निरूपण किया गया है इसी तरह तदीयताके उपायरूप आत्मनिवेदन सर्वसमर्पण, सर्वभावसे तनुवित्तजा सेवा, भगवत्कपाका श्रवण-स्मरण-कीर्तन आदिका सिद्धान्तरहस्य नवरत्न चतुश्लोकी सिदान्तमुक्तावली तथा भक्तिवधिमी मे निरूपण किया गया है. मक्तिवधिनीमे भक्तिके बोजभावको दृढ़ करनेका उपाय, यदि व्यक्ति अव्यावृत्त हो तो, स्वगृहमे स्ववर्णाश्रमाचारको निभाते हुए भगवत्सेवा-कथा-मय जीवनयापन करना माना गपा है. व्यक्ति के व्यावृत्त होनेके कारण पदि भगवत्सेवाका निर्वाह शक्य न हो तो उसे भग- वरकथाके श्रवण स्मरण कीर्तनमे तलर रहना चाहिये, बीजभावको दृढ़ करने के लिए. भीज- भावके दृढ होनेपर गहत्यागकी प्रेरणा भी दी गयी है. गृहत्यागकी शक्यता न हो तो भगव- स्मेवा कथा-परायण भगवदीयो द्वारा की जाती भगवत्सेवामे परिचारक-सहायक बननेका और अथवा भगवरकथा (जव वे करते हो)मे प्रवणार्थ सम्मिलित होनेका विधान भी किया गया है. इस तरह अनेकविध उपायोसे बीजभावसे लेकर प्रेम आसक्ति व्यसन सर्वात्मभाव या अलौकिक सामथ्यं तक के विकाकी रूपरेखा दिखलायी गयी है इन सभी विकल्प और अनुकल्प द्वारा भक्तिमार्गमे भगवत्कथाकी असाधारण महत्ता एवम् उपादेयता स्पष्ट होती है भगवरकथाम वक्ताकी अपेक्षा रहती है श्रवणार्थ, तथा श्रोताको अपेक्षा रहती है कीर्तनाथ स्मरण स्वतः भी सम्भव है परन्तु फिरभी किसी समानशील भगवदीयको सरसगतिम भगवरस्मरणका एक अलग ही रूप निखरता है इसमे सन्देह नही. पुल मिलाकर श्रोता एवम् वक्ता दोनोको भगवत्कथाके श्रवणार्थ एवम् कीर्तनाथ पर- स्पर एक-दूसरे को अपेक्षा रहती ही है. ऐसी स्थितिमे योग्य वक्ता तथा योग्य श्रोता के अभावमे न केवल भगवत्कथामे रसाभास होनेकी अपितु वीजभावके भी दृढ होनेके बजाय सण्डित होगेको सभावना रहती है अतएव जलभेदमे योग्य वक्ताका स्वरूप श्रोताके श्रव- पागके रूपमे समनाया गया है तथा पञ्चपद्यानिमे योग्य श्रोताका स्वरूप वक्ताके कीर्त- नागरे रूपमे समनाया गया है नित्याभिवन्दनीय श्रीरिके सर्वतापहारी एवम् सर्वसुखकारी गुण भी वक्ताओंके हृदयके भावपातमे भरे होनेपर कुछ न कुछ भिन्न स्म धारण कर लेते हैं जैसे जल स्वत शीतल स्वच्छ अध्यक्तमपुर सर्वशोधक एवम् तापशामक होनेपर भी जिस आधारभूमिगे (उदाहरण- तया कप-तलाव-नदी-समूद्र-शरला नाला-गड्ढे आदिमे) भरा हुआ होता है वहाचे गुणधर्मोसे गुक्त हो जाता है, येमे ही तेत्तिरीय सहिताक सातवे काण्डमे जलके बीम रूप तिमे गिनाये गये हैं यथा (१) कूप (२) नहर (३) पंतकी नाली (४) नदी के जलमे बना गदा (५) गन्दे नाले या मोरी ये जलमे बना गा (६) नदोके जलसे बने बड़े तालाव (७) पीने लायक पानीवाले बड़े तालाब (८) मुन्दर मरोत्रादि पुष्पवाले बड़े सरोवर (९) छोट तलाय (१०) पकबहुल तालाब (११) वर्षाका जल (१२) म्वेदनल-पसीना (१३) जलप्रपात-मरना (१४) ओसके जलविन्दु (१५) बरसातो नदी-नालो जमा अस्थिर प्रवाहाला जल (१६) वारहमामी नदियोका पिरामवंदा ममान रूपमै परनेवाला (१७) निरनर उद्गमवाली ऐमो नदिया जिनका जण वर्ण या प्रोममे वाता था घटा हो (१८) समुदमे मिलनेवाली महानदिया (१९) समुन (२०) अन्य भी इनमे से भरे गये अथवा गिरे हुए जल स्वभावत एकरूप भी जल अपने इन आधारोके गुण-धर्मोके अनुरूप अनेकरूपता प्रकट फरता है. इसी तरह भगवान्के एकरूप गुण भी भगवतथाके वक्ताको योग्यता एवम् भावो के अनुरूप अनेकरूपता धारण कर लेते हैं. यथाः (१) भगवद्-गुणोका स्वर-ताल-लयाश्रित गान करनेवाले विश्रुत गन्धर्वोके जैसे लोग कुएको तरह होते हैं कुछ कुए मीठे जलके होते हैं तो कुछ खारे जलके कुछ पवित्र शास्त्रीय माहात्म्पवाले होते हैं यथा न्यग्रोध वृक्षसे उत्तरको दिशामे स्थित कूप अथवा द्वारकाका दामोदरकूप या प्रजका गोपकूप कुछ कुए अपवित्र-मलिन जलवाले होते हैं ऐसे ही सभी भेद गायकोमे भी होते हैं कुछ गायक स्वर तालके अगरूपेण भगवद्-वर्णनात्मक शब्दोका योजन करते हैं, तो कुछ गायक भगवद्-वर्णनात्मक शब्दोंके अगरूपेण स्वर तालका योजन करते हैं. प्रथम प्रकारके गायकोको सारे जलवाले कुएकी तरह समझना चाहिये और दूसरे प्रकारके गायकोको मीठे जलके कुएको तरह गहरे कुएका जल ठडीमे गरम और गरमी ठडा लगता है. इसी तरह भावगाम्भिर्यवाले गायको द्वारा किया गया भगवद् गुणगान सांसारिक तापसे तप्त श्रोताको आध्यात्मिक-आधिदैविक शीतलता प्रदान करता हैं, और सासारिक मोहसे जडीभूत-ठिठुरते हृदयाको भगवद्-भावको कुछ उष्मा भी इन गायको द्वारा किये गये मगवद्-गुणगानसे मिल सकती है (२) पौराणिक • पुराणकथा सुनानेवाले नहरकी तरह होते है नहरका जल अपना- स्वयम्का नहीं होता किन्तु किसी नदी या सरोवर से जुड़ा हुआ होता है. इसी तरह पुराण- कथा सुनानेवाले वक्ताका भाव स्वयम् उसका न होकर केवल पुराणकथा करते समय कयावेशसे प्रयुक्त होता है अतएव अश्रुपात कण्ठावरोय या उल्लास केवल कयाकालमै ही प्रकट होते हैं सर्वदा नही (३) अपने कुटुम्बपोपण धन या यश की कामनासे जो कथा करते है वे खतको जल पहुचानेवाली नालियोकी तरह होत खेतकी नालीके जलका मुख्य प्रयोजन धान्योत्पादन है उसी तरह इस वक्तामोकी भगवत्कथाका भी मुख्य प्रयोजन मसार वढाना ही होता है अत वही फल श्रोताको भी मिलता है (४) वेश्या या स्वैरिणी स्त्रियोसे घिरे, द्यूत और मद्यपान आदि व्यसनोंसे प्रमत्त वक्ता नदीके जलसे बने गन्दे जलके गड्ढे की तरह होते हैं इन्हें पेदम 'प्रदर' कहा गया है तथा इनका माधमन भी निषिद्ध माना गया (५) भगवानक गुणगानको आजीविका बनाकर उदर या कुटुम्ब का पोषण करनेवाले गायक या पौराणिको के भाव, घरकी गन्दी मोरियोम से निकलनेवाला मलिन जल चारो योर फैल न जाये इसके लिए जो गड्ढे खोदे जाते हैं उनम भरे हुए जल जैसा अपवित्र होता है जैसे उस गन्दे जलका स्पर्श मशुचिकर होता है वैसे ही भगवद्गुणगानको आजीविका बनानेवालाका प्रवचन भी (६) नदियोके जलसे जमे कही जलाशय बनाया जाता है या कभी नैसगिक रूपसे स्वय- मेव भी बन जाता है इसी तरह गीता भागवत पाञ्चरात्रादि भगवद् शास्त्रोके निरन्तर अम्यासमे व्यक्तिके हृदय और बुद्धि मे भगवद्-भावका एक विशाल जलाशयसा भर जाता है बडे जलाशयाका जल न तो धूपके कारण सूख सकता है और न उसे भैस जैसे पशु मलिन ही बना सकते है ठीक इसी तरह इन शास्त्राभ्यासियाका भाव न तो सासारिक तापोंसे मुष्क होता है और न कुर्तक या असम्भावना-विपरीतभावना से मलिन ही. (५) म्वयम् निरन्तर शास्त्राभ्यास करना एक बात है और श्रोता सन्देहीको निवारण कर पाने का सामर्थ्य दूसरी बात है अत सन्देह निवारक वक्ता मानो पीने लायक पानीवाले बडे जलारायसी तरह होते हैं एसे स्वच्छ निर्मल जलाशय कि जिनमे न नो पक और न शैवाल ही पैदा होते हो (८) स्वयम् भगवद्-शास्त्रोका निरन्तर अभ्यास तथा दूसरोके सन्देहीको भी निवारण करनेकी क्षमता होनेपर भी कभी-कभी वक्तामें स्वयम् भक्ति-भाव नहीं होता. परन्तु वह भी यदि प्रकट हो जाये तो ऐसे वक्ताको सुन्दर सरोजवाले रम्य सरोवरकी तरह समझना चाहिये (९) कुछ वक्ताओम भगवत्प्रेम होता है पर वे स्वयम् अल्पश्रुत होते है ऐसे वक्ताओको छाट तालाबोकी तरह समझना चाहिये, जो स्वयम् स्वच्छ जलवाले होनेपर भी भैस जैसे पशुओ द्वारा मलिन बनाये जा सकते है, अल्प जलराशीके कारण ही ऐसे ही अल्पश्रुतताके कारण इनके भाव कुतर्कोसे दूपित हो सकते है. (१०) जिन वक्ताोंने स्वयम् न तो शास्त्रीय विषयोका श्रवण भलीभाति किसी सद्गु- रके मुखसे किया हो और न भगवद् भक्ति ही जिनमे पर्याप्त हो, फिर भी जिनको निष्काम धर्माचरण- कर्मानुष्ठानम निष्ठा दृढ हो, ऐसाको यदि भगवतथा प्रवचन करनेको वृत्ति जगे ता इन भाव भी छोटे तलावकी तरह ही समान चाहिये छोट तलावका जल शीघ्र ही मूख भी जाता है और शोश मलिन भी हो सकता है (११) जिन म्यक्तियोंका मन योगध्यान आदिकी प्रक्रियामै लगा हुआ हो, उनके भाव स्वत ता निर्मल हो सकते है, परन्तु श्रोताओंसे घिरते हो इनके भावोम परिवर्तन आने लगता है यौगिक साधनाका निखार एकान्तमें आता है अत जनतामै घिरे रहनेकी वृत्ति- पाल योगौरी ममची योगसाधना निष्फल चली जाती है अतएव इनका भाव वर्षाजलवी तरह हाता है जो स्वयम् स्वच्छ होनेपर भी जहा गिरा वहारे गुणयम शोधतया स्वीकार लेता है. (१२) क्वस तपोशान-बंराग्यादिसरी साधनामे निरत व्यक्ति जब भगवतकथाका प्रव- पन रले हुए मि तो उनके भाको स्वेदजलको तरह समझना पाहिये. स्वेदजल-पसीना मिग माता है पर उसके परियममा ठा चातक होता है, परन्तु दूसरे कामना वह मही होता इसी तरह म्पतिको तपश्चर्या या भक्तिहीन शुत जानवराग्य-माधना स्वयम् व्यक्तिक द्वारा लिए हुए बाप्पामा परिश्रमकी बात तो होती है, परन्तु अन्य श्रोताओके लिये तो व्यर्थ हो! (१३) पर्वतारसे गिरते जलप्रपात-झरने का जल, निर्मल शीतल मयुर सतत तथा श्रवण दर्शन स्पर्शन स्नान आचमन पान आदिमें मनोहारी तापहारी एवम् सुखकारी लगता है. इसी सरह भगवत्कृपाके कारण अथवा महान् भगवदीयोकी कृपाके कारण, जिन्हे स्वयम् श्रीहरिके दिव्य मपुर गुणोका अलौकिक ज्ञान प्राप्त हो गया हो तो ऐसे वकाओके मुषसे भगवद्- गुणगान सुनना किसी मनोहारी शरनेके सामने पहुंच जानेको तरह एक सुखद प्रसंग होता है. यह सर्वत्र-सर्वदा सुलभ नही होता. जैसे भरनेके सामने पहुचनेसे पहले, कुछ दूरीपर से ही उस जलप्रपातकी ध्वनिसे उसके अस्तित्वका बोध हो जाता है. इसी तरह इन भगवदीयोके पद-ग्रन्थ आदि रूपमे शब्दोके श्रवणमाषसे ही इनको अलौकिक अनुभूतिका निर्णय हो जाता है. (१४) सकाम उपासनाके अंगभूत श्रोत या पौराणिका, वरुण इन्द्र दुर्गा गणपति भैरव नवग्रह आदि, देवताकि उपासक यदि श्रीकृष्णकी कथा करते हो तो उनके भावोंको ओसके विन्दुओकी तरह समसना चाहिये. ओसके जलविदु जिस स्थानपर गिरते है वहा उमरे हुए दिखलायी पडते हैं. पर वह वास्तविकता नही होती. इसी तरह अन्यदेवोपासक वक्ताके मुखसे श्रीकृष्णकथा अन्यदेवोकी उपासनामूमिपर श्रीकृष्ण द्वारा गिराये गये ओसके क्षुद्र बिन्दुओको तरह होती है. ओसको जसे केवल देखने भरको शोभा होती है, इसी तरह इस कृष्णकथाकी केवल श्रवणमात्रकी ही शोमा होती है. स्नान-पानमे ओसके जलबिन्दु अनुपयोगी होते हैं और थोड़ी सी धूप निकलते ही ओझल हो जाते है इसी तरह इनके भाव भी श्रोताके लिए उययोगो नही होते. कथाकालमे ही केवल प्रक्ट होकर पश्चाद् वे ओझल हो जाते है. (१५) वर्णाश्रमपर्मको निभाते हुए श्रीकृष्णको नवधा भक्तिमे तत्पर वक्ताओमे यदा- कदा प्रेमावेशके कारण भगवदीय धर्मोंका स्फुरण होता रहता है, इनके भावको बरसाती नदीके प्रवाहकी तरह समझना चाहिये. (१६) कुछ नदिया बारहमासी होती है. इनमें न तो पूर आता है और न इनका जल घटता है. इसी तरह भगवत्कयामे न जिन्हें प्रेमावेशका पूर आता हो और न उनको रुचि हो कभी क्षीण होती हो ऐसे मर्यादामार्गीय वनाओके भाव स्थिर प्रवाहवाली नदीके तुल्य होते है. (१७) कुछ नदियोके उद्गमस्यलपर निरन्तर पानी उभरता रहता है. अत.इनका प्रवाह कभी रुकता नहो, पर वर्षा-आतपके कारण इनके जलस्तरमे निरन्तर वृद्धि-हास होता रहता है. इसी तरह जिन वक्ताओका भाव उनके आसपासके व्यक्तियोको सगतिके कारण कभी वृद्धिगत होता हो और कभी क्षीण होता रहता हो परन्तु भावप्रवाह कभी अवरुद्ध न होता हो, तो ऐसोका भाव अनेक जन्मोसे चली आ रही भावसाधनाके कारण निरन्तर उद्गम- वाली नदीके समान होता है. (१८) कुछ महानदिया समुद्रगामिनी होती हैं जो ऋतुचक्रमे अप्रभावित रहती है. इनमें पूर आता है पर जल कभी कम नही होता. जिन वक्ताओं के भाव संगदोषसे अप्रभावित रहते हैं उन्हें समुद्रगामिनी महानदियोंके तुल्य समझना चाहिये. (१९) समुद्रोके अनेक भेद शास्त्रोंमे वर्णित है. यया (क) क्षारोद (R) इक्षुरसोद (ग) सुरोद (ध) घृतोद (ड) क्षीरोद (च) दधिमण्डोद (छ) शुद्धोदया अमृतोद.ये सब अगाय एवम् वृद्धि-शयरहित होते है इसी तरह, लौकिक गुणोके मिश्रण, पेदिक गुणोके मिश्रण तथा लोकवेदमिथित गुणोके मिश्रण से, भगवद्गुणों के वर्णन करनेवाले समुद्रोपम वक्ताओ माव भी अनेकविध होते है. (क) श्रीराम या श्रीकृष्ण को साक्षात् परमेश्वर न मानकर केवल महापुरुष अर्थात् महान् मनुष्य माननेवाले वक्ताओके भाव क्षारोद समुद्रके जलकी तरह ग्वारे होते हैं. इनसे भक्तकी तृषा मिट नही सकती. भगवदवतारोके चरित्रकी मानवीय व्याल्या करनेवाले वक्ता- ओका भाव भक्तिमार्गीय दृष्टिकोणसे खारा अरुचिकर तथा तृषा-अनिवर्तक होता है (ख) परमात्माको अप्राकृत गुणधर्मोसे युक्त माननेपर भी अवतारोको प्राकृत गुण-धर्म- युक्त माननेवाले वस्तओका भाव इक्षुरसोदके तुल्य होता चूसनेगर प्रारम्भमें मधुर लगता है किन्तु अन्तमें विरस हो जाता है. (ग) स्वयम् मोहवश अथवा मोहप्रवर्तनको भगवदाज्ञाके वशीभूत होकर जो भगवान् के गुगोगो मायिक मानते है तथा ब्रह्मको निर्गुण निराकार निधर्मक मानते है, उनको भगवरकथाका श्रवण सुरोरके आचमनको तरह होता है. सुरासे जैसे स्वरूप- विस्मृति आदि अनेक प्रमाद प्रकट होते है, वैसे ही ब्रह्मको अयवा भगवदवतारोको निर्गुण अथवा मायिक गुणोवाला माननेवालोके उपदेश सुननेसे भी अनेकविध मोह उत्पन्न हो जाते है. बहुधा ऐसे वसा स्वयम् परम भगवदीर होते है-अगाष समुद्र जैसे,पर उपदेश इनके भक्तिमार्ग-बिरोधी होते है जैसे परम भागवत श्रीमहादेवको भगवदाज्ञाश मायावादका प्रवर्तन करना पडा. (घ) भगवान के दयालुता आदि गुणोपर जो मार देते हुए भगवत्कया करते है उनसे भगवद् गुणगान सुनना घृतोद सपुदके आवमनकी तरह भक्तिबल को बढानेवाला होता है (८) श्रीहरिके सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् सर्वदु खहर्ता आदि गुणोपर मार देते हुए जी भगवरकया करते है उनसे भगवद्-गुणगान सुनना क्षीरोदके आवमानको तरह होता है यह म्यादिष्ट-शक्तिवर्धक और पवित्र होना है. (च) केवल वैदिक्ष मर्यादाओको स्थापनाके सोमित प्रयोजनको प्रस्तुत कर जो वक्ता भग- यवतारचरितोगी व्याख्या करते है उनके भाव दधिमण्डोदको तरह होते है. दधिमण्ड-मठा मुपाच्य तथा स्वादिष्ट होनेपर भी नवनीतके निकल जानेसे सारहीन होता है वैसे ही भकारो स्वरूपानुभवो द्वारा परमानन्दका दान, जो अवतारका मुख्य प्रयोजन है, इनकी भगवद्-गुणगानको रीनिो पारण कपामें से बाहर निकल जाता है फरत इनकी कथा सारहीन हो जाती है. (७) शुदोर समुद्रको हो श्रीमहाप्रभु 'अमृतोद' भी कहते है. श्वेतदीपके चतुर्दिक परिखा-साईक रूपमें भरे हुए 'अर' और 'ज्य' नामक समुद्रीका वर्णन वाराह पुराणमें भी उपलब्ध होता है- "अरनामामृताम्भोधि. ण्यनामामृतमागर" ऐसे ही छान्दोग्योपनिषदें भी "अरश्च वै प्यश्च अर्णवो ग्रहालोके .. तदरमदीय सरः" कहा गया है इनसे प्रतीत होता है कि 'शुद्धोद' और 'अमृतोद' पर्यायवाची है. सनत्कुमारोको उपदेश देनेवाले सकपर्ण शेप, अपने आत्मज शुकको भागवत पढानेवाले भगवद्-जानावतार महर्षि वादरायण व्यास, अग्निपुराणके वक्ता अग्नि, वायुपुराणके वक्ता मारुत या हनुमान भी, रहूगण राजाको ज्ञानोपदेश करनेवाले अवधूत जडभरत, अनेकधा मक्तिशास्त्रोके उपदेशक नारद, सनत्कुमारके शिष्य तथा विदुरके गुरु मैत्रेय; और भी ऐरो पूर्ण भगवदीयोके उपदेशश्रवणको अमृतोदके पानके तुल्य समझना चाहिये. जलभेदके इस अंशपर एक स्वतन्त्र लेख लिखनेवाले श्रीश भट्टके अनुसार इन उल्लिखित भक्तोको परम्पराको परोहरको सम्हालनेके लिए प्रकट हुए शेषावतार श्रीरामानुजाचार्य, व्यासावतार श्रीविष्णुस्वामी, अग्निके अवतार महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्य, वायुके अवतार धीमध्वाचार्य, जडभरतके अवतार श्रीरामानन्द, नारदके अवतार श्रीचंतन्य, सनकके अवतार श्रीनिम्बार्काचार्य आदि मुख्य चार वैष्णव सम्प्रदाय तथा अवशिष्ट उपसम्प्रदायोके आचार्य या भक्तोंके उपदेश भी अमृतोदके तुल्य मानने चाहिये स्वयम् श्रीमहाप्रभुने भी मुख्य चारो भक्तिसम्प्रदायोका भगवत्प्रवर्तित होना तृतीय स्कन्धको सुबोधिनीमें स्वीकारा है- "एवम् चतुर्विधोपि भगवता प्रतिपादित" कह कर. अत इस श्रीश भट्टकी व्याख्यारीतिमें कोई विप्रतिपत्ति दिखलायी नहीं देती है प्राकृत या मायिक गुणोसे रहित श्रीविष्णुके सभी अप्राकृत-दिव्य-शुद्ध सच्चिदानन्दरूप गुणोते वर्णन-स्मरण कीर्तन करनेवाले ये विचक्षण बक्ना अमृतोद सिन्धुके समान है इनके वचनामृत का पान वस्तुत जीवनको सुदुर्लभ उपलब्धि है इनमे से कुछ पुष्टिभक्तिमार्गीय और कुछ मर्यादामार्गीय है पर सभी अमृतोद सिन्धुक समान है विष्णुदूतोके वचन जैसे अजामिलके कानोमे पडे तो उसकी कृति मति और भावना सभीमे चमसारिक परिवर्तन आगया. इसी तरह अकस्मात् भी इन अमृतोदके तुल्य वक्ता- आके एकाद वचन अमृतके बिन्दुपानके समान होनेसे तृप्निप्रद न भी हा पर निश्नयेन मुस- प्रद तो होते ही हैं और जब इनवे वचनामृतोके सतत श्रवणसे राग अज्ञान काम क्रोध आदि मनोविकार दूर हो जाते है तो वह अमतके बिन्दुपानकी तरह नहीं किन्तु लेहन की तरह समझना चाहिये अमृतोदके अमृनका ऐसा लेहन कि जिसमे परमानन्दकी अभिव्यक्ति हो जाती है श्रोता कृतार्थ हो जाता है ! (२०) इनके अलावा अन्य जो वक्ता या उनके भाव होते है उन्हें इन्ही कूप आदि उन्नीस जलस्यानोमे से भरे गये अथवा गिर गये जलको तरह समसना चाहिये तदनुसार उनसे कथा श्रवण करने के फलका भी यथायथ स्वरूप विचार लेना चाहिये, इस तरह विष्णुके एकरूप गुण तत्तद् जीवोकी वागिन्द्रिय-वाणीपर कैसे अनेकरूप धारण कर लेते है, और कैसे फल उनसे मिलते है आदि बातोंका निरूपण सम्पूर्ण हुआ. पञ्चपद्यानिमें णित श्रोताका स्वरूप बक्ताके अधिकार और स्वरूप तथा तदनुसार उनके मुखसे श्रवण-कीर्तनके फलके निल पणके बाद अब श्रोताके अधिकार तथा स्वरूप का निरूपण श्रीमहाप्रभु पञ्चपद्यानिमें करते हैं. भगवत्कयाका श्रवण-स्मरण-कीर्तन भगवास्वरूपसेवाके साथ-साथ सेवाके अनवसरमें चलता रहे तो वह भगवत्स्नेहके पूर्वोत्तर दल (संयोग एवम् विप्रयोग) दोनोमें भक्तिके पूर्ण आविर्भावका उपाप बनता है. परन्तु किसी व्यक्तिको भगवत्स्वरूपसेवाको सुविधा आजीवन सम्भव नहीं हो पाती. ऐसी स्थितिमे केवल भगवत्कयाके श्रवग-स्मरण-कीर्तनको प्रणालीसे भी प्रेम-आसक्ति-व्यसन-सर्वात्मभाव या अलौकिकमामयं आदि क्रमिक सोपानोंपर भक्तिका आरोहण दाक्य बन जाता है. तदनुसार सेवाके साथ-साथ जो कथा श्रवण-स्मरण-कीर्तनका भी सतत निर्वाह कर पाते है वे उत्तम श्रोता होते है. अन्यया सेवाके अनुकल्पके रूपमें जो भगवत्कथाका निरन्तर समाश्रयण करते है वे मध्यम प्रकारके श्रोता होते है. जो यदा-कदा श्रवण कर पाते है वे निम्न प्रकारके श्रोता होते है. यह एक दृष्टि श्रोताके उत्तम-मध्यम-निम्न प्रकारोंको निर्धारित करनेकी दिखलायी देती है. दूमरी दृष्टि यह है कि शुद्धपुष्टि पुष्टिपुष्टि मर्यादापुष्टि तथा प्रवाहपुष्टिके अधिका- रिभेद के अनुसार श्रोताको त्रिविध कक्षायें निर्धारित की जायें. शुद्धपुष्टि या पुष्टिपुष्टि आदि अधिकारोकी पहचान पुष्टिप्रवाहमर्यादा ग्रन्यम- "पुष्टया विमिधा. सर्वज्ञाः प्रवाहेण क्रिया- रताः . " मे दी गयी है. तीसरी दृष्टि, श्रोताके उतम-मध्यम-कनिष्ठ अधिकारकी, वक्ताके ज्ञान-भक्ति-वैराग्य गुणों के अनुरूप (१) जिज्ञासुता-पवणोत्सुकता (२) रुधि तया (३) इतर साधनोके दुराग्रहपूर्ण अनुष्ठान या अभिमान का अभाव, तज्जन्म क्षुद्र फलोमे अनासक्ति, इस तरह तीनो गुण जिरा श्रोतामे मिलते ही वह उतम, दो मिलते हो वह मध्यम, तथा किसी एकाद गुणका विद्यमान होना उसके निम्न अपिफारसा द्योतक होता है. चतुर्थ दृष्टि - पुष्टिमार्गीय उत्तम, मर्यादामार्गीय मध्यम, तथा प्रवाहमार्गीय या चर्षणी पोताको भषम माननेको- उचित होनेपर भी यहा अप्रासगिक लगती है. क्योकि पुष्टिमार्गीय जीवीके लिए ही श्रीमहाप्रभुनै पोडशग्रन्धका प्रगथन किया है अत जिन जीवोका अपुष्टि- मार्गीय होना निश्चित हो उन्हें पुष्टिमार्गी सिद्धान्त या भगवल्लीला का उपदेश ही श्रीमहामभुके अनुसार अनुमोदनीय नहीं है, जलभेदमे भी जो मर्यादामाथि दबाका, म्जरूप दिसलाया गया है वह उन बसाओंसे पुष्टिमार्गोय उपदेशको आशा न रखने के लिए ही है क्योंकि वक्तृवयनमे अधिक सावधानी अपेक्षित है, अत जलभेद जितना विस्तार पञ्चप- पानिम अपेक्षित नहीं है पानगेष्टिके अनुसार, बैंगे पास्त्रार्थ प्रारको अन्तिम भागमे भगवत्मेवा करनेवालोके विविध अधिकार दिखलाये है- उन्हे मगवरूपादे श्रवणाधिवाला भी उपलक्षण माने तो यह असगत नहीं होगा यया : जिज्ञासुता-श्रवणोत्सुकता दो तरहकी हो सकती है । (१) प्रमाण (शास्त्र) तपा प्रमेय (भगवान्के स्वरूप गुणधर्म एवम् सोला) दोनोके बारेमे, मया (२) इन प्रमाण या प्रमेय में से किसी एकके बारेमे, इसे केवल शब्दनिष्टा' तथा 'अर्षनिष्ठा' भी कहा जा सकता है इसी तरह कपारतिके भी दो भेद सम्भव है (१) सामान्य रुचि, और (२) उत्कट रति. इनके परस्पर मिश्रणये अनेक प्रकारके विकल्प बन सकते हैं. मथा. (१) पाश्रवणकी उत्कट रति एवम् कपाने उभयपक्ष---शब्द (प्रमाग) पक्षा और अयं (प्रमेय) पक्ष-- जिज्ञासुता-श्रवणोत्सुकता रखनेवाले उत्तमाधिकारी ज्ञानी-भक्त जैसे माने जाने चाहिये. (२) कथाश्रवणमे उत्कट रति न होनेपर भी उसमे सामान्य रुचि रखनेवाले तथा कपाके उभय पक्षोमे से शब्द रक्षपर भार देनेवाले शम्दनिष्ठ जिज्ञासु प्रेमके अमावके कारण मध्यमाधिकारी ज्ञानी जैसे माने जाने चाहिये (३) कथाश्रवणमे रति रखनेवाले तथा कथाके शाब्दिक प्रमाणपक्षके बारेमें श्रवणो- स्सुक न होनेपर भी अर्थ (प्रमेय)पक्षके बारेमें जिन्हें तीन जिज्ञासा हो ऐसे अकनिष्ठ श्रवणोत्सुकोको शानाभावके कारण मध्यमाधिकारी मक्त मानना चाहिये. (४) जिन्ह न तो उत्कट रति और न अर्थनिष्ठा (कथाके अपं-प्रमेय भगवानके स्वरूप गुण पा लीलाके बारेमें श्रवणोत्सुकता) ही तीव्र हो ऐसे सामान्य रुचिवाले-शान-प्रेम-उभय रहित श्रोताको कनिष्ठ निम्न या अधम कोटीका मानना चाहिये (दृष्टय्य शा नि "एव सर्व तत सर्व स इति ज्ञानयोगत या सेवते हरि प्रेम्णा श्रवणा दिभिरुत्तम. प्रेमाभावे मध्यम स्थात् ज्ञानाभावे तपादिम उभपोरयभावे" कारि. स १०१-२) छठी दृष्टि यह भी सम्मव है कि आरम्भके मुख्य-मध्यम-अघम प्रवणाधिकार, क्रमश 'रसविक्षिप्तमानस', 'रसविक्लिनमानस' तथा कदाचित रमावेशसे 'रसावेशविकलमानस' विशेषणोंके द्वारा, भक्तिमार्गीप श्रवणाधिकारके रूपमें विवक्षित है पाचवे अन्तिम श्लोकम वणित 'अनन्यमानस' विशेषणद्वारा अन्याश्रय रहित प्रपत्तिमार्गीय श्रवणाधिकार विवक्षित है पुष्टिमक्तको इस भूतलपर मिलती परमफनको अनुभूति अलौकिक-सामर्थ्य या तनुनवरव- का लाभ प्रपत्तिमार्गीय अधिकारीको नहीं मिलता. पर विद्यमान देहकै पातके बाद उन्हे सायुज्य-मोक्ष मिल सकता है. अतएव देश-कान द्रव्य कर्ता-मन्त्र-कर्मादिके अन्याश्रय स्पागके कारण इन अधिकारियोंने उत्तम होनेपर भी, विद्यमान देहादिरो भूतलपर परम फलकी अनुभूतिसे वञ्चित होनेके कारण, इन्हें 'मर्त्य' कहा गया है. क्योकी श्रीकृष्ण- सायुज्यका लाभ इन्हे मृत्युके पश्चात ही होता है पश्वभयानिने प्रथम चार श्लोकोमें बणित अधिकारियोको 'मर्त्य' नही कहा इमसें उनका मतिमार्गीय होना अनित होता है सर्व. निबन्ध- “सर्वत्यागेऽनन्यमावे कृष्णमाकमानरो सायुज्य कृष्णदेवेन शीघ्रमेव ध्रुवम् फलम्" कारिकाके प्रकाश-"एव देहपातनपर्यन्तं कृष्णकमानसस्य सायुज्यं शीघ्रमेव भवति कायवाविनियोगामावेपि स्वस्नेहाभावेपि मनोमात्रस्थितो फलमेतद्" कहकर प्रपत्तिमार्गीय पोटके 'अनन्यमानस' होनेपर उसे उत्तमाधिकारी माना है. इन विभिन्न दृष्टीकोणोसे श्रवणाधिकारका विचार करनेपर पञ्चपद्यानिके पाच पद्यो: भिन्न-भिन्न कक्षा पाच अधिकारियोकी चर्चा है - मुख्याधिकारी एकविध है और अमुख्या- धिकारी विविध यो कुल चार प्रकारके अधिकारियोको चर्चा है - 'मुख्य' तथा 'उत्तम' को पर्यायवाची शब्द मानकर तथा उपक्रम और उपसहार में एक ही अधिकारीको विवक्षित मानकर कुल विविध अधिकारियोको चर्चा है --इनमे से इदमित्थतया किसी एक व्याख्या- रीतिका समर्थन जरा कठिन काम है. फिर भी मुख्य और अमुख्य तथा भक्ति और प्रपत्ति के भेदको लक्ष्यमें रखकर आरम्भके प्रथम श्लोकमें मुख्य भक्तिमार्गीय श्रोताका निरूपण तथा अवशिष्ट चार श्लोकोमें भक्तिमार्गीय विविध अमुरूप श्रोता तथा एक प्रपतिमार्गीप श्रोता का वर्णन है ऐसा सोचनेमे कोई असगति सामने नहीं आती है. क्योकि जो बात श्री महाप्रभु कह रहे है पान श्लोकोमें वह इस तरह है। (क) दशम स्कन्धके सातवे अध्मायकी “यावतोपत्परतिवितृष्णा सत्व च शुद्धत्यचि रेण पुस. भक्तिहरो तत्पुरुषे च सत्य तदेव हार वद मन्यते चेत्" कारिकाको सुबोधिनीमें श्रीमहाप्रभुने भगवस्तथाके पाप परिणाम गिनाये है (१) भगवत्-चरित्रमें अरतिकी निवृत्ति (२) भक्तिका प्राकटभ (३) सांसारिक तृष्णाको निवृत्ति (४) सरव-अन्त करणको शुद्धि (५) भगवदीयोके सत्सगरूप सख्यकी वृद्धि पाच परिणाम जिस थोतामे प्रकट होने जा रहे हो उसे भगवरकथा श्रवणका मुख्याधि- पारी मानना चाहिये. अतएव श्रीमहाप्रमु आगा करते है कि भक्तिरसके आलम्बन-विभावरूप श्रीकृष्ण के नामात्मक स्वरूपको कथाश्रवण-कालमें वाह्यानुभूति तया भक्तिरसके स्थायि- भावरूप (माहात्म्यज्ञानपूर्वक सुदृढ् सर्वतोधिक स्नेह) रसको आन्तर अनुभूतिके चक्रो तीववेगमे चल पडने के कारण जिनका मानस विक्षिप्त साहो जाता है, उनके लिए भगवरकथा दुम्त्यज हो जाती है अर्थात् वे चाहं या न चाहे उनकी वाणी और कर्णेन्द्रिय निरन्तर भगवस्कया करते रहने और सुनते रहने के व्यसनवाली जाती है एम कृष्णरसविसिपमानस श्रोताओको भगवञ्चरित्रम स अरति निवृत्त हो जाती है भन उन्हे 'अरनिवजिना' कहा जाता है. इनका निस न तो लौकिक विषयोकी ओर आकृष्ट होता है और न वैदिर मोनादि फलागे ओर हो. सामारिक विषपोमे तृष्णाबन्धनके टूट जानेमे इन्हें इन विषयो, निति अर्थात् सुख-सन्तोषकी अनुभूति नही होती. भगवस्कथाकी प्रणालोसे इनके सस्व-अन्त:करणकी शुद्धि हुई होनेसे केवल ज्ञानी या विरक्तों की तरह वैदिक फल स्वर्ग-मोश-अपवर्गको कामना भी इनके मनमें रह नही जाती. अतः इन्हे वेदमें भी अनिवृत्ति हो जाती है। ऐसे श्रोता भगवल्लीलाके प्रवणको उत्सुकताके कारण निरन्तर भगवदीयोका सम्प या सत्संग खोजते रहते हैं। निरोधकी सिद्धिके कारण इन्हे भक्तिमार्गीय मुख्य श्रवणाधिकारी समझना चाहिये. (ख) कुछ श्रोताओका मन श्रीकृष्णभक्तिके रससे इतना आद्र-क्लिप्न हो पाता है कि कथाप्रवणकी वेलामे ये मगवत्स्मृतिसे विव्हल हो जाते है. भगवत्कयाके शाब्दिक प्रमाणपदा- में इनकी रुचि तीव नही होतो. परन्तु अयनिष्ठा- यथाके प्रमेय अर्थात् भगवत्स्वरूप- गुणधर्म-लीलाके श्रवणमें इनको निष्ठा वड़ी प्रवल होती है, इसी अर्यनिष्ठाके कारण इनमें जानकी लालसा कम होनेपर भी प्रेमको स्पष्ट विद्यमानताके कारण इन्हे भक्तिमार्गीय मध्यम कदा श्रवणाधिकारी सममना चाहिये, (ग) कुछ अन्य श्रोताओमे ऐसी अर्यनिष्ठा नही होतो पर शन्दनिष्ठा तीव्र होती है. फलतः प्रमाण विवेचनको प्रक्रिया द्वारा इन्हें नि मंदिग्य ज्ञानके प्राप्तिको लालसा रहती है. ऐसे श्रोताओकी मास्था तो स्पष्ट होती है कि केवल श्रीकृष्ण ही सर्वभावसे भजनीय है परन्तु भाव निरन्तर उद्बुद्ध नही होता रहता. कभी-कभाक कथारसके आवेशके कारण अथवा प्रपञ्च-विस्मृतिपूर्वक भगवदासक्ति को तात्कालिक अभिव्यक्ति के कारण ये स्नेहविकल हो पाते है; अन्यथा ज्ञानिजनोचित स्वास्थ्य (1) इनका बना रहता है. तात्कालिक पूर्ण भावोदयके कारण यह पूर्ण अनिष्ठा भी इनकी तात्कालिक ही होती है अतएव ये कयाश्रवणकालको तन्मयताके बाद पुनः भन्यासक्त हो जाते है. ये भक्तिमार्गके अन्तर्गत कनिष्ठ प्रकारके श्रवणाधिकारी है. (प) प्रपत्तिमाय जीव अन्यमार्गोय श्रोताओको अमेसा उत्तमाधिकारी माना जा सकता है, पर शर्त इममें यह है कि देश-काल-द्रव्य-कर्ता मन्त्र-कर्म-आदि अनेकविध धार्मिक साधनो- के अभिमानोको छोड़कर श्रीकृष्णके स्वरूप-गुणधर्म-मोलाओके श्रवण-स्मरण-कीर्तनमें जब उसके मनकी अनन्यरुचि पनप जाये यह प्रपत्तिमार्गीय श्रवणाधिकार अन्य मर्यादामार्गीय कर्मज्ञानोपासनाके अधिकारोसे तो उत्तम ही होता है. इस तरह वक्ता एवम् श्रोता के अधिकारोका विवेचन यहा सम्पूर्ण होता है. प्रस्तुत संस्करण वि. सं. १९७६ में प्रकाशित संस्करणका ऑफसेट प्रोसेसद्वारा पुनर्मुद्रित रूप हैं. उस सस्करणमे इन दो अन्धो जलमैद और पञ्यपद्यानिके अलावा परिशिष्टके रूप में मेवाफतको तीन टीकार्य भी प्रकाशित हुई थी. उन्हे यथास्थान रराने के उद्देश्यसे यहा प्रकाशित नहीं किया गया है. उा सस्करणके सम्पादक श्रीमूलचन्द तुलसीदास तेलीवाला तथा श्रीधीरजलाल प्रजदास साकलिया और प्रकाशक गोस्वामी १००८ श्रीजीवनलालजी महाराज (पोरबदर) थे इन सभी महानुभावोका हम इस पुन.प्रकाशनके अवसरपर हार्दिक कृतज्ञता. पूर्वक स्मरण करते है शोधपत्रम् । आ सप्रह मुद्रित पई गया पछी श्रीमद्गोसामिनीअनिरुदलालजी महाराजश्रीनी कृपाथी अलमेदनी भावार्यहोधिनी तथा श्रीपुरषोतमजीनी पश्चपाटीका ए हस्तलिखित पुस्तको जामनगरस्थ श्रीमदनमो. हनलालमन्दिरस्य समहमांना प्राप्त यया, तदाबारे मा द्वितीय शोधपत्र आवश्यक जणायु छे. जलभेदशोधः। प पं. अशुद्धम् शुद्धम् प. पं. अशुद्धम् ३८119 क्रिया शश्चा ४४४१० सर्वाभोग्यवमित्यधिकं सुधाविशेषणम् । ३१. दोष विषय ४४।२७ देव देह २५४२५ निवर्तन विवर्तन ४४॥३. प्रापक माप्पक ४०1११ शीतलयुफ शीतलकमळयुक्त ४५१९ न कार्य कार्य करिन पहिल ४५१५ रहित ४३११० ४५/२. यदा v४/२ मोहन मोहेन | ४५।२२ तिरोहित मायया तिरोहित १५ असौ भक्त्यर्थं सायुज्या ४५।१७ पूर्वोक्का अमृत पूर्वोक्तामृत ४४।२४ गुणान् न्यून गुणान् नतु न्यूनाधिक्य | १५:३१ मल बाह्य सर्वथा यदा अन्तिमलोकविवरणमेवं वाचनीयम्-पता जीवाना भगवर्दशत्वामानात्व वा प्राप्ता एतादशा भगवतो विष्णोव्यांपकस्य सर्नेषु भावरूपेण प्रकटस्य गुणा स्वरूपत एतादृशं स्वरूपमिति फलतच एतादृशं पलमिति निरूपिता नितरी सपिता सरूपेण प्रकटीकृता इत्यर्थ । श्रीमदाचार्यपादाजरेणवो ममि संततम् । कृपयन्तु सदा वीर्य मन्वा कृष्णप्रचोपका ॥१॥ धीविठ्ठलपदाम्भोजरेणसकाक्षिणा मया । विकृतिलमेदस कृता भावार्षदोधिनी ॥३॥ पञ्चपद्यशोधः। भश्चदम् ५४१७ भक्तिहेतु भफिदिदेव ५५1 ५४11. भगवत्तीतून मगवरकृपया कीर्तन ५५11 ५४१ संबन्धि ५५२ ५४५५ भार सम्भवस्त भाषसंभवरुप ५11 विदुरमैत्रयज्ञान विदुरे मैत्रेयापनसकमस्य ५५।। मैत्रेये विदुरभफिसम्मस्य ५६४ ५२१ तारशमेव ताशामेव अशुद्धम् अथ तन संबन्ध सैबन्धाद्य तत् दिश्यते दीरशे तपाहि तन हि पतितपावनादिक पतितपावनत्वादिक थानारोपितरूपं प्रस्तावना। श्रीमुदामापुरीरय श्रीमद्गोस्वामि धौजीवनलालजीना नि संकोच द्रव्यसाहाम्पथी चार टीका सहित सेवाफल, छटीका सहित निरोधलक्षण, भने प्रष्ट टीका सहित सन्यामनिर्णयनु प्राकट्य थयु उक्त प्रण पुस्तकना मुद्रणमा वपरायल दव्य पुस्तकोनो विक्रय करी पाटु ऐवानी भापधीनी इच्छा म हती, परन्तु विक्रपमाथी प्राप्त यता द्रष्यथी अन्य सांप्रदायिकमन्यो छपायवा एपी हती सदिरछानु सार उक्त पुस्तकोना येचाणमाथी उत्पन्न चपला द्रव्यसाहाय्यथी चार टीका सहित जरभेद, सेना में स्वतंत्र लेख, ने टीका सहित पंचपद्य, तया नूतम प्राप्त थपली सेवाफलनी प्रण टीका- मो ए सर्वनु मुद्रण थाय छे अर्थात् मा प्रन्यनु प्राकट्य पण उपर दांच्या प्रमाणे श्रीजीवनलालजी महाराजश्रीनी संपूर्ण कृपायी थयु छ, भने यैष्णवो एतदथ एओश्रीना ऋणी छे भापधीनी कृपा हो भने वैष्णवोनु सौभाग्य हो तो चतुर्दश टीका सहित भक्तियर्धिनीनु दर्शन पण सरवर यशे , जछमेद उपर धार टीकामो प्राप्त थइ छे तेमा प्रथम श्रीकल्याणरायजीनी छे उक्त टीकानी एक प्रति तो धीहरिरायजीना निज श्रीहस्ताक्षरमा लखेली छे आ टीकाना मुद्रणमा मुख्य भाधार तेनो ल लीधोटे पर तु अन्य प्रतिओ पण वारवार मुद्रणमा उपयोगी थई पढी हती नीचे जणावेली प्रतिओने आधारे मा टीकानु मुद्रण ययु छे , श्रीहरिरायजीना श्रीहताक्षरनी, २ मटपुरस्य माझण धैष्णव तापीमाईनी, ३ पडित गढूलालाजीनी ४ श्रीनीवनकालजी महाराजनी, ५ प गडूलालाजीनी मूतन, ६ प गठूलालाजीनी मानीन, . प गटूलालसग्रहस्थ मूल श्रीपीतांवरजीपी प्राचीन आ सप्त इसकोने आधारे मा टीकानु शोधन करी मुद्रण कयु से टीकाकार श्रीकल्याणरायजी श्रीगुसांइजीना पौत्र याय अने धीहरिरायजीना पितृचरण थाय विक्षेप परिचय एभोधीनो सेवाफरमा कराव्यो के २ द्वितीय टीका श्रीपुरुषोत्तमजी महाराजनी छे एओश्रीनो परिचय सेवाफलादिमा कराव्यो है पोधीनी टीकानु मुद्रण नीचे जणावेली प्रातओना आधारे धयु छ । शास्त्रीभाइ नारायणनी प्राचीन शुद्ध २ प गलालाजीनी ननन, ३ प गहूलाराजीनी नूतन युटित ४ प गलालातीनी प्राचीन शुद्ध, ५ श्रीमद्गोस्वामि श्रीनीवनलालगीनी नूतन शुद्ध, ६ मभनीयस्थ शास्त्री भद्शकरनी प्राय भा सर्व पुरको मुद्ध छे ३ तृतीय टीका अमे श्रीवल्लभ श्रीगोकुलनाथजीना मामथी मुद्रित करी छे, परन्तु ए टीका श्रीव सुमनी छे एम कहेवामा भमारी कल्पना विना अन्य प्रमाण नयी अमारी कल्पनानो आधार आहे मा टीका थमने हरीण्ठायी श्रीनाथद्वारादि अमे गया हता त्या प्राप्त थई ए प्रति उपर नाम नथी मान या उपर 'जल टी गो' आलु प्रत्येक पत्र उपर लख्यु छे सवत् १७५८ मालरोली से परपरा एण छे के श्रीगोकुलनायजीए जलभेदनी टीका लषी आ टीकानी भाषा तथा आरम तथा अन्तना मगलाचरणना सोको श्रीगोकुलनाथजीनी निरोधलक्षण तथा सेवाफलनी टीकाभोना सदृश 'भग्नि, शन्दनो अर्थ घीकल्याणरायजीए श्रीमदलमाचार्यजीपरत्वे पटाव्यो, ते सबन्धमा सप्रदायमा गहान् ऊहापोह ययो हतो एम श्रीहरिरायजीना 'पूर्णा भगवदीया' ५ श्लोकना स्वतन लेखथी मालूम पहे है भाटीकामां तेज तात्पर्य रागद्वेषयी मुक्त भई स्वीकार्यु ले श्रीगोकुलनाथजी निज शिष्य श्रीकल्याणरायसी तपा श्रीहरिरापजीनु मत अयुक्त नथी ए दर्शावे छे, छतां 'अग्नि' शब्दनो रुद' भथ करनार टीका कार प्रति समभाव राखे से 'भग्नि नो अथ रद छे एम कथनार टीकाकार जो श्रीद्वारकेशजी-तृतीय सालजी भीमालकृष्णजीना ज्येष्ठ पुत्र होय तो उपर जणावेल अनुमान सर्वथा असभवित नथी लागत ४ चतुर्थ रीका कोनी कहेवी ए पण सशयग्रस्त छे अमारी पासे भक्तिवर्धिनीनी एफ रीका छे, जेनु मगलाधरण भने अग्र मुद्रित टीकानु मगलाचरण याचता उभयनु एककर्तृत्व स्पष्ट स्फुरे छे उक १ रत्यन्खेदविन्दुप्रितमुपकमलस्तामवष्टभ्य जातो निष्पन्द प्रान्तियुक्तो मलयजपवनासेवित पुष्पतपे। औराधावकपमाइतमधुचिरद्र पानपूर्णापमानोद्रिक सेहाद्रदृष्टि प्रतिफलतु शो शीघ्रमेव प्रजेश ॥in 1 मकिर्थिनीनी टीकामी में प्रति ममा पासे से,तेमा एक उपर दीपालकृष्णीकृत टीका एम खेल होबाथी अमे 'श्रीबालकृष्णकृत' मा टीका छे एम कश्प्यु परन्तु तेज पुक्षकनी मन्य प्रति उपर श्रीद्वारफेशकृतटीका एम ज्वेलुछे जो एमज होय तो मा टीका श्रीद्वारकेपाहत मानधी उचित छे. श्रीद्वारकेशजीनी बालबोपकृष्णाश्रयादि उपर करेली टीकामोमु दर्शन मापणने भाव से श्रीपुरुषोत्तमजी पण मा टीकाकार धीद्वारकेशजीना मतनो उपन्यास यालयोधादिमा करेले अन्न मुदित करेली जलभेदनी तृतीय टीकाना कर्ता-श्रीगोकुलनामजीने भा टीकाकारनी सपर छे अनि सम्पनो अर्थ रुद भाज टीकाकार करेठे आ टीका पण माथी बहु प्राचीन ठरे छे मा टीकानी एकज प्रति पडित गलालाना सप्रहमाथी प्राप्त पई इती, प्रा प्रति अनेक स्थले श्रुटित, सदिग्ध अने अशुद्ध हवी बहु प्रयासथी टीका अमे शोघी छ, छता एमा स्नलमो अमे न ज फयों होय तो प्रमुहपा ज समजवी ५ 'पूर्णा भगवदीया' ९ श्लोक उपर निजपितृचरण श्रीकल्याणरापमीनी टीका मयुक्त नयी पु दावनानो काइक रागयुक्त प्रयत श्रीहरिरायजीए अम कयों छे आनी प्रण प्रति प्राप्त यईले एक प गटूलालानी, द्वितीय यात्रामायी, अने तृतीय कचरामाथी या परिशिष्ट प्रथम छे ६ 'पूर्णा मगवदीया' उपर कोइनो श्रीश-मटेश श्रीनायमद्दनो स्वतन लेख के आ लेख श्रीवाल कृष्णजीनी श्रीमथुराष्टकी टीकाना पुमतकने अन्तेलखेलो हतो आ लेख युकवा अयुक्त छे वा आचार्या शाय प्रकाश करे , के नहि से चर्चामा नाहि उतरवा एदलु तो कहीशु के ए वाचवामा विनोद छे पुस्तक प गलालानु छे आ परिशिष्ट द्वितीय छे - पपनी टीका प्रथम श्रीहरिरायनीकृत छ मा टीकानु मुद्रण प्रण पुस्तकना आधारे कयु के एक श्रीजीवनलालजी महाराजनु अने अन्य दय प गहलालाजीना सग्रहना ८ पचपद्यनी द्वितीय टीका श्रीपुरुषोत्तमजीकृत छे आ टीकानु मुद्रण वे पुस्तकमा आधारे थपु के प्रथम प गहलालाजीनु, अने द्वितीय भगवदर्मपरायण प पलभद्रशर्मानु ९ सेवाफलनी अमुद्रित ऋण टीकाओ ला टीकाओ अमने यात्रामा प्राप्त थई ले प्रत्येकनी एक एक प्रति मळी हती मा टीकाओना कर्ताओना नाम अमने अज्ञात छे मा सर्व टीकाओ प्राचीन छे. १० जलभेद प्रत्य तैत्तिरीयसहिताना मन उपरथी सूचित थयलो एमा जलदृष्टान्तथी वकाना गुण-भावनु निरूपण छे डॉ राजेन्द्रलालमित्र कल्पे छे तेम रोगोना जलोपचारनु निरूपण नयी पध पपमा श्रोताना गुणभावनु निरूपण छे " जलभेदनी श्रीकस्याणरायजीनी दीकानी प्रति धीरजलाट काशीनाथ पड्याए करी हती सीपुरषोत्तमशीनी टीका तथा 'पूर्णा भगवदीया' उपरनो श्रीहरिरायजीनो लेख, तथा पचपचनी यो दीका यहेचरदास मगनलाल शाहे प्रेसमाटे सखी भापी हती श्रीवल्लभनी टीका शास्त्री कल्याणजीए पती भापीहती भने श्रीबालकृष्णकृत टीका तथा 'पूर्णा भगवदीया' नो द्वितीय स्वतन लेख शास्त्री गदराकर अपशकरे सपी भाप्यो हतो आ सर्वनु निरपेक्ष साहाय्य स्तुत्य सर्वनो उपकार स्वीकारीए डीए पुस्तक सप्रहमा पतित गहालानीनी सस्थानो उपकार सर्वमा अविस्मरणीय छे तदुपरान्त प बलमदशर्मा, प गोकुलदासजी, शास्त्री भद्राकर, गटपुरस्थ वैष्णवतापीवाई ए सनु साहाय्य विस्म रणीय नधी आश्विन शह सप्तमी मूलचन्द्र तेलीवाला. धैर्पलाल सांकलीया.

कृष्णयजुः
तैत्तिरीयशाखासंहिता का. ७प्र. ४ अ. १२.
कृप्याभ्यः स्वाहा क्ल्याभ्यः स्वाहा विकृर्षीभ्यः स्वाहाऽय्याभ्यः स्याहा खन्याभ्यः
खाहा होभ्यः साहा सूर्याभ्यः स्वाहा सराभ्यः स्वाहा वैशन्तीभ्यः स्वाहा पल्व-
स्याभ्यः खाड़ा वोभ्यः साहाऽवया॑भ्यः साहाँ हादुनीभ्यः स्वाहा पृथ्वोभ्यः
खाहा स्सन्दमानाभ्यः साहा स्थानुराभ्यः साहा नादेयीभ्यः साहाँ सैन्धवीभ्यः
स्वाहा समुदियाभ्यः स्वाहा सर्वाभ्यः साहा ॥१३॥
जलभेदः।
नमस्कृत्य हरिं वक्ष्ये तद्गुणानां विभेदकान् ।
भावान् विंशतिधा मिन्नान सर्वसन्देहवारकान् ॥ १॥
गुणभेदास्तु तावन्तो यावन्तो हि जले मताः।
गायकाः कूपसङ्काशा गन्धर्वा इति विश्रुताः॥२॥
कूपभेदास्तु यावन्तस्तावन्तस्तेपि सम्मताः।
कुल्याः पौराणिकाः प्रोक्ताः पारम्पर्ययुता भुवि ॥३॥
क्षेत्रप्रविष्टास्ते चापि संसारोत्पत्तिहेतवः।
वेश्यादिसहिता मत्ता गायका गर्तसंज्ञिताः॥४॥
जलार्थमेव गर्तास्तु नीचा गानोपजीविनः ।
हृदास्तु पण्डिताः प्रोक्ता भगवच्छास्त्रतत्पराः॥५॥
सन्देहवारकास्तत्र सूदा गंभीरमानसाः।
सरकमलसम्पूर्णाः प्रेमयुक्तास्तथा बुधाः ॥ ६ ॥
अल्पश्रुताः प्रेमयुक्ता वेशन्ताः परिकीर्तिताः ।
कर्मशुद्धाः पल्बलानि तथाल्पश्रुतिभक्तयः ॥ ७ ॥
योगध्यानादिसंयुक्ता गुणा वाः प्रकीर्तिताः ।
तपोज्ञानादिभावेन खेदजास्तु प्रकीर्तिताः ॥८॥
अलौकिकेन ज्ञानेन ये तु प्रोक्ता हरेर्गुणाः ।
कादाचित्काः शब्दगम्याः पतच्छब्दाः प्रकीर्तिताः॥९॥
देवाद्युपासनोद्भूताः पृष्वा भूमेरिवोद्गताः।
साधनादिप्रकारेण नवधा भक्तिमार्गतः॥१०॥
प्रेमपूर्त्या स्फुरदर्माः स्यन्दमानाः प्रकीर्तिताः।
यादृशास्तादृशाः प्रोक्ता वृद्धिक्षयविवर्जिताः॥११॥
स्थावरास्ते समाख्याता मर्यादैकप्रतिष्ठिताः ।
अनेकजन्मसंसिद्धा जन्मप्रभृति सर्वदा ॥ १२॥

सङ्गादिगुणदोषाभ्यां वृद्धिक्षययुता मुषि। निरन्तरोद्गमयुता नधस्ते परिकीर्तिताः ॥ १३ ॥ एतादृशाः खतनाश्चेत् सिन्धवः परिकीर्तिताः। पूर्णा भगवदीया ये शेपव्यासानिमारुताः॥१४॥ जडनारदमैत्रायास्ते समुद्राः प्रकीर्तिताः। लोकचेदगुणैर्मिनभावेनैके हरेर्गुणान् ॥ १५॥ वर्णयन्ति समुद्रास्ते क्षाराद्याः पट् प्रकीर्तिताः । गुणातीततया शुद्धान सचिदानन्दरूपिणः ॥ १६ ॥ सर्वानेव गुणान्विष्णोर्णयन्ति विचक्षणाः । तेऽमृतोदाः समाख्यातास्तदाक्पानं सुदुर्लभम् ॥ १७ ॥ तादृशानां कचिद्वाक्यं दृतानामिय वर्णितम् । अजामिलाकर्णनवद्विन्दुपानं प्रकीर्तितम् ॥१८॥ रागाज्ञानादिभावानां सर्वथा नाशनं यदा । तदा लेहनमित्युक्तं स्वानन्दोद्गमकारणम् ।। १९ ॥ उद्धृतोदकवत्सर्वे पतितोदकवत्तथा । उक्तातिरिक्तवाक्यानि फलं चापि तथा ततः ॥२०॥ इति जीवेन्द्रियगता नानाभायं गता भुवि । रूपतः फलत्तश्चैव गुणा विष्णोर्निरूपिताः ॥२१॥ इति श्रीमहल्लमाचार्यप्रकटिवो जलभेदः समासः । पञ्चपद्यानि। श्रीकृष्णरसविक्षिप्तमानसा रतिवर्जिताः। अनिवृता लोकवेदे मुख्यास्ते श्रवणोत्सुकाः ॥१॥ विल्लिन्नमनसो ये तु भगवत्स्मृतिविद्वताः । अर्धकनिष्ठास्ते चापि मध्यमाः श्रवणोत्सुकाः ॥२॥ निःसनि कृष्णतत्वं सर्वभावेन ये विदुः। ते स्वावेशात्तु विकला निरोधादा न चान्यथा ॥ ३ ॥ पूर्णभावेन पूर्णार्थाः कदाचिन्न तु सर्वदा। अन्यासत्तास्तु ये केचिदधमाः परिकीर्तिताः॥४॥ अनन्यमनसो मा उत्तमाः श्रवणादिषु। देशकालद्रव्यफर्तृमश्रकर्मप्रकारतः ॥५॥ इति श्रीमदल्लमाचार्यविरचितानि पचपपानि ।

श्रीकृष्णाय नमः। जलभेदः। श्रीकल्याणरायविरचितवितिसमेतः । मावितं विविधैर्भावः प्रेष्ठभावितया मुहुः । मावये राधया कृष्णं भवितुं भावभावुकः ॥ १॥ यद्वाक्पीयूपमावानां भावनादभवो भवः । भावये तान्निजाचार्यपदो भावोपलन्धये ॥ २ ॥ श्रीकृष्णे केवलभावेनापि केवलेन हि मावेनेति वाक्यात् तत्प्राप्तेः 'नैष्कर्म्यमप्यच्यु- तमाववर्जित'मित्यादिभिर्भावहीनस्य जानादेरप्यसमर्थत्वादलेहभोजनमिव भावहीनं सर्वमिति श्रीवल्लभाचार्यचरणाः स्वीयानां भावपोपार्थ कृपया भावनिरूपणं प्रतिजानते नमस्कृत्येति । नमस्कृत्य हरिं वक्ष्ये तद्गुणानां विभेदकान् । भावान विंशतिधा भिन्नान सर्वसन्देहवारकान् ॥१॥ नमसो गतिसंज्ञकत्वात् कुगतिप्रादय इति समासादन त्या विसर्गस्य सकारो 'नम- पुरसोर्गयो' रिति । 'यो भावान् भक्तमाहात्म्यं ज्ञापयिलोद्धवादिषु । अहरत्सर्वदुःखानि वन्दितोमीटदोस्तु स' इत्याशयेनाहुः हरिं नमस्कृत्येति । भगवति नमनातिरिक्तस्य कर्तुमशक्यत्वात् । वक्ष्य इति । निरूपिता भावाः प्रथमत आत्मने फलन्तीत्यात्मनेपदम् । तद्गुणानां विभेदकानिति । ते प्रसिद्धाश्च ते गुणाः सत्त्वरजस्तमांसि तेषां विभेद- कान् निवर्तकानित्यर्थः । यद्वा । भगवतो ये गुणा धास्तेषां निवर्तकान् । भगवतो भक्तार्थ सर्वसमलादेस्त्यागात् । 'ये भजन्तीति वाक्यात् । यद्वा । तेषां जीवानां गुणा धर्मास्तेपां वैलक्षण्यसम्पादकानित्यर्थः । अथवा भगवतो ये धर्मास्तानानीयात्र दायकानि- त्यर्थः। भावान् विंशतिधा भिन्नानिति । भावशब्दस्यानेकार्थत्वेप्यत्र हस्तज- न्याश्रावस्थाविशेषा भावा उच्यन्ते । रतिर्देवादिविपया भार इत्यभिधीयते' इत्यादिभिः स्नेहाभिधानात् । गुणभेदैः कृत्वा विंशतिप्रकारैभिन्नान् । सर्वसन्देहवारकानिति । विधेयविशेपणमेतत् । भगवद्भजने सर्वेषां साधनानां स्वरूपतः फलतश्च ये सन्देहास्तन्निवा- रकान् । यद्वा । भावैर्भगवति स्फुरिते सर्वे सन्देहाः खत एव निवय॑न्तीत्यर्थः॥१॥ भावानां खत एकस्वरूपत्वेपि गुणभेदैरेव भेदाभावभेदकान् गुणमेदानेवाहुः गुणेति । गुणभेदास्तु तावन्तो यावन्तो हि जले मताः। गायकाः कृपसङ्काशा गन्धर्वा इति विश्रुताः ॥ २॥ जले पापन्तो भेदा वेदेन सम्मता ज्ञाता वा तावन्तो गुणभेदास्तथेत्यर्थः । वेदोक्त- २ जलभेदः। जलभेददृष्टान्तकरणादावानां शुद्धत्वालौकिकत्वतापहारकत्वशोधकत्वाप्यायकत्वानि ध्व- नितानि । अब 'कूप्याभ्यः स्वाहे'सारभ्य 'सर्वाम्यः स्वाहे'त्यन्ता तैत्तिरीयश्रुतिरनुसन्धेया । तत्र प्रथमं गानप्रियवानोविन्दस्य गायकानां भावमाहुः गायका इति । गन्धर्वा इति प्रसिद्धाः गाननिपुणाः कूपतुल्यास्तेषां भावः तजलतुत्य इत्यर्थः । यथा कूपजलं जाड्यकाले कोष्णत्वाजाध्यनिवर्तकमुष्णकाले शीतलखात्तापनिवर्तकं व्यवहियमाणं वर्धते, समीचीनं च भवति, तथैतेपां भावोतिजाध्ये पुंसि जाध्यनिवर्तकः, संसारतते तापनिव- तको गीयमानो वर्धते, समीचीनश्च भवति । यथा रउवादिभिः कूपजलं गृह्यते तथा गान- द्वारैवैतेषां भावो ग्राह्यः ॥२॥ ननु गायकाः सर्वे तुल्या एव नेत्याहुः कूपभेदास्त्विति । कूपभेदास्तु यावन्तस्तावन्तस्तेपि सम्मताः । कुल्याः पौराणिकाः प्रोक्ताः पारम्पर्ययुता भुवि ॥ ३ ॥ यथा केचित् कूपाः स्वादुपरिणामसुखकारिजलाः, केचिदमिष्टजलाः, केचित् क्षार- जलाः, तिक्तजलाः, परिणामदुःखजलाश्च, तथा गायका अपि पुरुषोत्तमतद्विभूतिगुणाव- तारांशादिलीलाभेदेन भगवन्तं गायन्तः सत्त्वगुणादिमिरुपलक्षिताश्चाकामा मोक्षकामाः स्व- र्गकामा लौकिककामाश्चेति बहुधा इति पूर्वोक्तरूपविशेषैस्तुल्या इति तेषां भावस्तुजलतुल्य इत्यर्थः । अत एवोक्तं कपिलदेवैर्देवहुर्ति प्रति भक्तियोगो बहुविधो मागैर्भामिनि भाव्यते । स्वभावगुणमार्गेण पुंसां मावो विमिद्यते । अमिसन्धाय यो हिंसां दम्भमा- सर्यमेव च । संरम्भी भिन्नग्मावं मयि कुर्यात् स तामसः । विषयानमिसन्धाय यश ऐश्वर्यमेव वा । अर्चादावर्चयेद्यो मां पृधग्मावः स राजसः कर्मनिहारमुद्दिश्य परस्मिन् वा तदर्पणम् । यजेयष्टव्यमिति वा पृथग्भावः स सात्त्विकः । मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्व- गुहाशये । मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोम्युधौ । लक्षण भक्तियोगस्य निर्गुणस्या- प्युदाहृतम् । अहैतुक्यप्रतिहता या भक्तिः पुरुषोत्तमे ।' इत्यादि । अत एव खभाव- भूतानां गुणानां मार्गेण वृत्तिभेदेन पुंसामभिप्रायो भिद्यते इति फलसझल्लभेदाद्भक्तिभेद इति गुणानां मिश्रणेन तामसादिमक्तिपु प्रयनयः प्रकारा इति श्रवणादिषु प्रत्येक नवनव मेदा इति सगुणा भक्तिरेकाशीतिप्रकारा, निपुण, खेकविधैवेति. दूसरीतिकार भलि प्रयतेतराम् । तदेव श्रीमदस्मप्रभुचरणैर्मक्तिहंसे निरूपितम् । 'श्रवणादिनवकमप्यधिका- रिगेदेन क्रियमाणं सत्कर्मज्ञानोपासनामत्तिमागीयत्वेनानेकविधं भवतीति । द्वितीयं भापमाहुः फुल्याः पौराणिका इति । फुल्या अल्पा कृतिमा सरित् । पुराणमधीयते मिदन्ति वा पौराणिकाः पुराणेतिहासपाठकाः कृत्रिमालपनदीतुत्याः, तेपां भावस्तअल- तुल्य इत्यर्थः । यथा भूमौ कुन्या जलाशयेन पारम्पर्ययुताः परम्परासम्बद्धाम्तथा एतेपि भरि पुराणार्थप्राप्ती पारम्पपंयुताः सद्गुरूपदेशादवगतपुराणायी: । सहरूपदेश विना ३ भीकल्याणरायविरचितवितिसमेतः । श्रीमागवतविष्णुपुराणादौ भापावयासुरव्यामोहकलीलास्वरूपाज्ञाने सर्वमनर्यकं स्यात् । यया प्रत्यहं यत्ने क्रियमाणे कुल्या प्रवहति, नान्यया, तथा पुराणपाठ एव तेषां मावोदयो, नान्यदेति दृष्टान्तेन सूचितम् ॥ ३॥ क्षेत्रमविष्टास्ते चापि संसारोत्पत्तिहेतवः । वेश्यादिसहिता मत्ता गायका गर्तसंज्ञिताः॥४॥ तृतीयं भावमाहुः क्षेत्रप्रविष्टा इति । च पुनस्ते पूर्वोक्ताः । 'क्षेनं पनी- शरीरयो रिति कोशादेहकुटुम्पयोः पोषार्थ पुराणेतिहासपाठकाः स्वसंसारस्योत्पत्तिहेतवो भवन्तीत्यर्थः । कुल्याजलान्यपि क्षेत्रप्रविष्टानि सम्यक् सारस्यान्नस्योत्पत्तिहेतवो भव- न्ति । न पहिरन्तःशुद्धिहेतुखानाचमनादौ हेतवस्तथैतेपि न स्वर्गापवर्गहेतवो भवन्ति । अपिशब्दात् क्षेत्रप्रविष्टा गायका अपि संसारहेतवो भवन्तीत्यर्थः । अत एवोक्तं भ- क्तिहंसे 'वृत्त्यर्थं चेत् कृषिवल्लौकिक एवेति । गीतायां च 'ये यथा मां प्रपद्यन्त' इति । श्रीमागवते चोक्तम् । 'यस्त आशिप आशास्ते न स भृत्यः स वै वणिक् । आशासानो नवै भृत्यः स्वामिन्याशिप आत्मनः ।। त्वलादुके ह्यविरतं परि ये चरन्ति ध्यायन्त्यमद्रनशने शुचयो गृणन्ति । विन्दन्ति ते कमलनाममवापवर्गमाशासते यदि त आशिप ईश नान्य'इति । चतुर्थं मावमाहुः वेश्यादिसहिता इति । आदिपदात् कुलटातत्संगितादय उच्य- न्ते । 'न तथास्स मवेन् मोहो यन्वश्चान्यप्रसङ्गतः । योपित्सङ्गायथा पुंसो यथा तत्सङ्गि- सहत' इति कपिलदेववाक्यात् । एतादृशा गायका गर्ततुल्यास्तेपां भावस्वजलतुल्य इत्यर्थः । यदि विपयैर्वाप्यमाना अपि दुराचारा अपि समयभेदेनापि भगवन्तमेव मजेयुस्तदापि समीचीना भवेयुस्तदपि नास्त्रीत्याहुः मत्ता इति । अतः खस्खाम्यनुसन्धानरहिताः । नयेते प्रीत्या माहात्म्यधिया या कृष्णं गायन्ति, किन्तूत्तमखरगीतवशात् कदाचिदतो गर्ततुल्या एवेत्यर्थः । अतो नैपां भावस्य कूपकुत्याजलवदाप्यायकत्वादिगुणयोग इत्यर्थः । अमत्तास्तु कूपभेदेषु ज्ञेयाः ॥ ४ ॥ जलार्धमेय गास्तु नीचा गानोपजीविनः । हदास्तु पण्डिताः प्रोक्ता भगवच्छास्त्रतत्पराः ॥५॥ पञ्चमं भावमाहुः जलार्थमेवेति । प्रक्षालनोच्छिष्टजलप्रक्षेपार्थमेव ये गर्तास्तत्तुल्या नीचा गानोपजीविन इत्यर्थः । नीचत्वेन वायोत्कर्पामावागानोपजीवनेनान्तरोत्कीमावादु- च्छिष्टजलगर्ततुल्यत्त्रमेवैपां, तेनोच्छिष्टगतजलवत्तेपां भावो न सद्विग्राह्य इत्यर्थः । यद्वा । जलनिःसार्थ गती इत्यर्थः । पौराणिकनिरूपणानन्तरं पुनर्यगायकनिरूपणं तदेतादृशानां पौराणिकानामेतद्गायकतुल्यत्वज्ञापनार्थम् । पष्ठ मावमाहुःहदास्त्विति । तुशब्दः पण्डित- प्रकरणयोधनार्थः । भगवच्छास्त्रं गीतामागवतादिकं तत्र तत्पराः । न तु मायावादादिमते । एतादृशाः पण्डिता हृदतुल्याखेपां भावो हदजलतुल्य इत्यर्थः । यथा हदजलमन्तःशी- ४ जलभेदः। तलवादगाधत्वाच नातपेन पश्वादिभिश्च तापयितुं कलुपयितुं वा शक्यमेवमेषां मावोपि सांसारिकतापेन कुतर्कादिमिथ न तापयितुं कलुपयितुं वा शक्य इति भावः ॥५॥ सन्देहवारकास्तत्र सूदा गंभीरमानसाः । सराफमलसम्पूर्णाः प्रेमयुक्तास्तथा बुधाः सप्तमं भावमाहुः सन्देदेति । भगवच्छाने सन्देहवारकाः गम्भीरं मानसं येषामित्यन्त- निष्ठा एतादृशाः पण्डिताः। सुष्ठु उदकं येषां तादृशहदविशेषतुल्यास्तेषां भावस्तबलतुल्य इत्य- थः । यथोत्तमोदकानां जलं मनःप्रसादहेतुरप्येवं भगवच्छास्त्रसन्देहवारकानामन्तनिष्ठानां मा- वोपि मनाप्रसादहेतुरपीति भावः वाप्यो वासूदा उन्यन्ते । अष्टमं भावमाहुःसर-कमलस- म्पूर्णा इति । भगवच्छास्त्रे संदेहवारकाः अन्तनिष्ठा वा ज्ञातारःप्रेमयुक्ताः सन्तः, सरःसंबन्धि- कमलानि सम्पूर्णानि यासु तादृश्य आप एतत्तुल्यभावा इत्यर्थः । जलाशयं विहायात्र जलद्द- टान्तकरणादेतेषामपि भावतुल्यत्वं सूचितम् । यथा एतादृश्य आपः सकलेन्द्रियसुखहेतवः । कमलसौरममृगसारसादिसाहित्यात् तयैतेपां भावा अपीति भावः ॥ ६ ॥ अल्पश्रुताः प्रेमयुक्ता वेशन्ताः परिकीर्तिताः। कर्मशुद्धाः पल्बलानि तथाल्पश्रुतिभक्तयः ॥७॥ नवमं मावमाहुः अल्पेति । अल्पं श्रुतमध्ययनं येपां ते प्रेमयुक्ताः सन्तो वेशन्तोऽ- ल्पसरस्तत्तुल्यास्तेषां मावस्तजलतुल्य इत्यर्थः । दशमं मावमाहुः कर्मशुद्धा इति । कर्ममिः शुद्धाः, कर्माणि कृत्वेश्वरे ये समर्पयन्ति तेषां कर्म चित्तशोधकं भवतीति कर्मशुद्धाः। 'यत्करोपि यदनासि यज्जुहोसि ददासि यत् । यत्तपससि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पण'मिति भगवद्वाक्यात् । एते पल्वलमल्पसरोविशेषस्तत्तुल्यास्तेषां भावस्तजलतुल्य इत्यर्थः । असा श्रुतिः पुराणादिश्रवणं भक्तिर्येपाम् , अल्पश्रुत्या वा भक्तिर्यपामिति तेपि तथा, पत्वलजलतुल्या इत्यर्थः । यया वेशन्तपल्वलयोरलतडागत्वात्तजलं पूर्व निर्मलमपि वराहायवगाहितं कलुपं भवति, तथा 'अग्निहोत्रं जुहुयात्' 'वर्गकामः अग्निष्टोमेन, वर्गकामो यजेते'त्यादिवाक्यात् सकामानामेव यागाधधिकारात् फलाश्रवणेपि विश्वजिन्यागेन फलकल्पनानेश्वरार्पणार्थ कर्म कर्तव्यम्, किन्तु फलार्थमेव, यागानधिकारिणामेव मक्तावधिकार इत्यादिभिः कर्मजडानाम- सादस्वेपामपि भावः कलपो भवति । तेषां 'मत्कर्मपरमो मव, मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि, मन्मना भवेत्सादिप्रमाणानामज्ञानादित्यर्थः । वेशन्तपत्वलयोलोंके पर्यायत्वेपि 'वेशन्तीम्यः स्वाहा, परवल्याम्यः स्वाहेति श्रुत्या तयोर्जलयोर्भेदनिर्देशात् । खादुसौरमादितदमावाम्यां वा मेदो ज्ञेयः॥७॥ योगध्यानादिसंयुका गुणा थप्योः प्रकीर्तिताः। तपोशानादिमायेन स्वेदजास्तु प्रकीर्तिताः॥८॥ एकादरामावमाहुः योगप्पानादीति । योगोप्टाप्तः, ध्यान प्रादेशमापादे, ५ श्रीकल्याणरायविरचितवितिसमेतः । मादिपदाद पायपदायांस्मृतिः, एतत्समानाधिकरणा गुणा भावा वर्ष्याः प्रकीर्तिताः । घृष्टिजलतुल्याः कयिता इत्यर्थः । यथा दृष्टिसमये वृष्टिजलं सर्वदेशं व्यामोति, सर्वत्र सुलभमाघारगुणमादाय कार्यविशेषमन्नादिकं च जनयति, तयेतेपी योगादि- समय एव भगवद्भायो देहेन्द्रियादि सर्व व्याप्नोति, सुलमः पात्रविशेषे खसजा. तीयं मावविशेषं च जनयति, अत एव संयुक्ता इत्यनेन सम्यग्योगो निरूपित इति भावः । द्वादशं भावमाहुः तपोज्ञानादिभावेनेति । तपः पञ्चामिसहनादि, ज्ञानं जी- वात्मनः, आदिपदाद्वर्णाश्रमाचारश्य, प्रत्येकमेतान्येव भावस्तपोजानादिभिर्वा यो मावस्ते- नोपलक्षिताः स्खेदजलतुल्याः कथितास्तेषां भावः खेदजलतुत्य इत्यर्थः । केचित् तपसैव भगवानाराध्य इति मन्यन्ते । वस्तुतो भक्तिप्राप्य एव । 'मन्ये धनाभिजनरूपतपःश्रुतौ- जस्तेजःप्रभाववलपौरुपबुद्धियोगाः । नाराधनाय हि मवन्ति परस्य पुंसो भक्त्या तुतोप भगवान् गजयूथपाये'त्यादिवाक्यैः । केचिदितरभिन्नत्वेन स्वात्मज्ञानान्मोक्ष इति तदेव भजन- मिति मन्यन्ते । वस्तुतस्तु 'तमेवं विद्वानमृत इह भवती'त्यादेभंगवज्ञानमेव मोक्षसाध- नम् । 'श्रेयःस्रति भक्तिमुदस्स ते विमो क्लिश्यन्ति ये केवलयोधलब्धय' इति वाक्ये केव- लात्मज्ञानस्य निन्दितत्वाच । केचित्तु 'वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान् । विष्णुरारा- घ्यते पन्या नान्यत्तत्तोपकारण मिति वाक्यावर्णाश्रमाचारमेव भगवद्भजनं मन्यन्ते । तदपि न विचारक्षमम् । वर्णाश्रमाचारस्साधिकारिविशेषणत्वादाराधनं तु श्रवणादिरूपं भिन्नमेव । 'धर्मः सत्यदयोपेतः, धर्मः स्खनुष्ठितः पुंसाम्, विषाद्विपद्गुणयुतादरविन्दनामपादारविन्द- विमुखात् श्वपचं वरिष्ठम् । मन्ये तदर्पितमनोवचने हितार्थः प्राणं पुनाति स कुलं न तु मूरिमान' इत्यादिमिर्मगवद्भजनामावे मगवद्वैमुख्ये च धर्मस्याप्रयोजकत्वनिरूपणात् । 'वर्णा- श्रमवतां धर्म एप आचारलक्षणः । स एव मद्भक्तियुतो निःश्रेयसकरः पर' इति भगवतो- द्धवं प्रत्याचारमच्योर्मेदेन निरूपणात् । द्विजपत्यनुग्रहे द्विजैर्भगवद्वैमुख्ये त्रिवृद्विया- दीनां धिक्कारोक्तेश्च । 'ये विहासक्तमनस' इत्यादिवाक्यैः सर्वकर्माणि कुर्वतामपि भग- बद्वैमुख्योक्तेश्च । अत एव 'परमापदमापन्नो हर्षे वा समुपस्थिते । नैकादशी सजेधस्तु यस्य दीक्षास्ति वैष्णवी ।' 'समारमा सर्वजीवेपु निजाचारादविच्युतः । विष्णवर्पिताखिलाचारः स हि वैष्णव उच्यत' इत्येमिः पुराणवाक्यैर्माधवाचार्यः कालमाधवीये वैष्णवलक्षणमभि- धाय वैष्णवस्मातयोमदो निरूपितः । वर्णाश्रमाचारस्यैव भजनरूपत्वे सम्प्रत्युक्तसकलविरो- धात् । यथा खेदजलं न शुद्धिहेतुस्नानाचमनाथुपयोगि तर्पनिवर्तकं तापहारकं वा भवति, तथैतेषां भावोपीति भावः ॥८॥ अलौकिकेन ज्ञानेन ये तु मोक्ता हरेर्गुणाः। फादाचित्काः शन्दगम्याः पतच्छन्दाः प्रकीर्तिताः॥९॥ अयोदशं भावमाहुः अलौकिकेनेति । महदनुग्रहादिना प्राप्तज्ञानेन ये सर्वदुः- ६ जलभेदः। खहर्तुर्गुणा ऐश्वर्यादयः प्रोक्ताः कदाचिदेव प्रतीयमानाः वेदादिगम्यास्ते गुणाः दुरात् पर्वतादे/रारूपेण पततां जलानां ये शब्दास्तत्सदृशाः प्रकीर्तिताः कथित्ता इत्यर्पः । यथा धाराजलशन्दाः (पर्वतपतित)पाराजलानां ज्ञापकास्तयोच्यमाना मगवद्गुणा अपि वक्तृणां धाराजलसदृशमावज्ञापका इत्यर्थः । यथा धाराजलं नैर्मत्यशैत्यमाधुर्याविच्छेदयो- गादर्शनस्पर्शनखानाचमनपानादिभिर्मनोहारि तापहारि सौहित्यसुखकारि, तथैतेषां काव्या- दिपु प्रतीयमानो भावोपीति भावः ॥९॥ देवाद्युपासनोद्भूताः पृष्वा भूमेरिवोद्गताः । साधनादिप्रकारेण नवघाभक्तिमार्गतः ॥ १०॥ प्रेमपूत्या स्फुरद्धाः स्यन्दमानाः प्रकीर्तिताः। चतुर्दशं भावमाहुः देवा इति । श्रीपुरुषोत्तमध्यतिरिक्तानां देवानामादिपदात् पितृमातृपतिज्येष्ठमात्रादय उच्यन्ते । एतेपामेव उपासनेऽयमेव देवः परमेश्वरो, वयं परमेश्वरमजनमेव कुर्मः । पितवास्माकमीश्वरः, पितृसेवां विष्णुमजनमेव कुर्म इत्येवमादयो ये उद्भता भावास्ते, अथ च देवाः शिवादयः आदिपदाद् यक्षरक्षःपिशाचादयः । तेपा देवा- दीनामुपासनमुद्भूतमुद्गतं येषु भगवद्भावेपु ते भावा देवाधुपासनेन सह वोद्भता भगवद्भावास्ते च भूमेरुगताः पृष्वा इव । 'अवश्या यजन्याः पृप्वा' इति वेदभाष्ये । पृथ्वा जलबिन्द- वस्तुपारकणाः जलबुद्धदा वा त इवेत्यर्थः । तेषां भ्रान्त्या भजनातुल्यतयैव सर्वभजनाय । महापुरुषाणां भगवद्भक्तानां मजनं तु भगवत्प्रीतिमक्तिशुद्ध्या दिसाधकलाद्भिन्नरूपमेव । अत एव श्रीमागवते 'मद्भक्तपूजाभ्यधिका । तुलयाम लवेनापि न स्वर्ग नापुनर्भवम् । भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मत्यांनां किमुताशिषः । प्रसङ्गमजरं पाशमात्मनः कवयो विदुः । स एव साधुषु कृतो मोक्षद्वारमपावृतम् । सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदः। न तथा छपवान् राजन् पूयेत तपादिभिः । यथा कृष्णार्पितप्राणस्तत्पूरुषनिषेवया । किरातहणान्धे'त्यादि । पिनादिसे- वायाः स्वर्गादिसाधकत्वान्न भगवत्फलसापकत्वम् । अत एव भगवता गीतायां 'येप्यन्य- देवतामक्ता' इत्यत्र, स्वयजने विधिपूर्वकत्वाभाव उक्तो, विध्यभावे कर्मणि फलाभाववद- त्रापि भगवत्फलं न भवतीसाशयेन । ('यान्ति मद्याजिनोपि माम् । देवान् देवयजो यान्ती' तिवाक्यैः पुरुषोत्तमभजनकर्तुरेव पुरुषोत्तमप्राप्तिस्तस्यैव भगवान् योगक्षेमं वहतीति 'पुरुषोसमाती पुरुषोतममजनमेव विधिनतु केनापि प्रकारेणान्यमजनमित्यत्र विध्यमावात् फलाभावो युक्त इति भावः।) यथा विन्दवस्तुपारकणाः बुद्बुदजलं वा न सानाचमनपाना- दिमिः शुद्धितृप्त्यादिसाधकं तथैतेषां भावोपिन शुद्ध्यादिसाधक इत्यर्थः । पञ्चदशं भावमाहुः साधनादिप्रकारेणेति । साधनमादिः फलात् यस्मिन् प्रकारे तेन प्रकारेण नवधा भक्तिरेव मार्गों भगवत्प्राप्तिसाधनं तस्मात् क्रमेण प्रेमपूर्त्या स्फुरन्तो धर्मा येपां श्रवणादयो ..(तविद्वान्तरितभागः प्राचीनपुस्तकेषु न दृश्यते।

. श्रीफल्याणरायविरचितविविसमेतः । नटवेशादयो वाते स्सन्दमानाःप्रस्रवणजठतुत्यमावाः प्रकीर्तिता इत्यर्थः। भक्तिमार्गे मर्यादया भगवदगीकारादकामोपहतैरखिलवर्णाश्रमघमैंः सत्त्वशुद्धौ भगवद्भक्तिरेव पुरुषार्य इति शास्त्रार्यनिश्चयाच्छ्रवणादिभिस्तेषां भाव इति । यया पर्वतोपरि वृष्टितडागादिसावे प्रस- पणजलं वर्धते तदभावे हसत इति तत्सापेक्षं शुद्ध्यादिहेतुश्च, तथैतेषां मावोपि सा- धनानुसारी शुद्ध्यादिहेतुश्चेति मावः । इदमेवोक्तं भक्तिहंसे । 'आधस्तु तत्साधने भवति प्रवृतस्तयैव तद्वरणात् , परन्तु स्नेहोसत्तिपर्यन्तं विधिरेव तत्र प्रयोजकस्तदुत्पत्त्यनन्तरं च रागादेव तत्सम्बन्धिपदायें यतिष्यत इति विधेरप्रयोजकत्व'मिति । एकादशस्कन्धे च 'भक्तियोगः पुरैवोक्तः प्रीयमाणाय तेनघ । पुनश्च कथयिष्यामि मद्भक्तेः कारणं परम् । श्रद्धामृतकथायां मे शश्चन्मदनुकीर्तनम् । परिनिष्ठा तु पूजायां स्तुतिभिः स्तवनं मम । आदरः परिचर्यायां सर्वाडैरमिवन्दनम् । मद्भक्तपूजाम्यधिका सर्वभूतेषु मन्मतिः । मदर्थेष्वङ्गचेष्टा च वचसा मद्गुणेरणम् । मर्पणं च मनसः सर्वकामविवर्जनम् । मदर्थेऽ- र्थपरित्यागो मोगस्य च सुखस्य च । इष्टं दत्तं हुतं जसं मदर्थं यद्वतं तपः । एवं धर्म- नुष्याणासुद्धवात्मनिवेदिनाम् । मयि समायते मक्तिः कोन्योर्थोऽस्यावशिष्यते' इत्यादि- मिर्निरूपितम् । नवधा भक्तिस्तु 'श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् । अर्चनं वन्दनं दास्सं सख्यमात्मनिवेदनम् । इति पुंसार्पिता विष्णोर्मक्तिश्चेन्नवलक्षणा । क्रियते मगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तम मिति प्रहादैनिरूपिता ॥ १० ॥ यादृशास्तादृशाः प्रोक्ता वृद्धिक्षयविवर्जिताः ॥११॥ स्थावरास्ते समाख्याता मर्यादैकप्रतिष्ठिताः । पोडशं मावमाहुः यादृशा इति । यादृशाः पूर्वमव्यवधानेन प्रोक्तास्तादृशा वृद्धि- क्षयविवर्जिताश्चेत्, मर्यादैकप्रतिष्ठिताः मर्यादायामेव केवलाः प्रतिष्ठिताः, न तु ततोधिक- विशेषाङ्गीकारयुक्तास्ते स्थावरा आपः स्थिरजलतुल्यमावाः समाख्याता इत्यर्थः । यद्वा । ये केचित् येनकेनचित् प्राप्तवृद्धिक्षयविवर्जितप्रेमाणस्ते तयाप्रोक्ता इत्यर्थः । अत एव प्रे- मखरूपं श्रूयते । 'आविर्मावदिने न येन गणितो हेतुस्तनीयानपि क्षीयेतापि न चापराध- विपिना नया नयद्वर्धते । पीयूपप्रतिवादिनस्त्रिजगतीदुःखद्रुहः सांप्रतं प्रेम्णस्तस्य गुरोः किमद्य करवै वादिनष्ठता लापव' मिति । यथैतजलं नातपेन शुष्यति सानादिहेतुश्च भवति, तथैतेषां मावोपिन संसारतापकुतर्कादिभिर्गच्छति शुद्ध्यादिहेतुश्च भवतीति भावः ॥११॥ अनेकजन्मसंसिद्धा जन्मप्रभृति सर्वदा ॥ १२ ॥ सद्गादिगुणदोपाभ्यां वृद्धिक्षययुता भुवि । निरन्तरोद्गमयुता नद्यस्ते परिकीर्तिताः ॥१३॥ सप्तदश भावमाहुः अनेकजन्मेति । ये मावा अनेकजन्मसु 'जन्मान्तरसहस्रेषु तपोध्यानसमाधिभिः । नराणां क्षीणपापानां कृष्णे भक्तिः प्रजायते' इति वाक्यात् तपे- जलभेदः ध्यानसमाधिभिः सम्यसिद्धाः तअन्मारभ्य सदा भुवि आधारमूते चात्मनि समः सत्सा आदिपदादनकालविशेपदेशविशेपाः दुष्टसङ्गादयश्च तेषां यौ गुणदोपौ ताभ्यां क्रमेण वृद्धिक्षययुताः, निरन्तर उद्गम उद्यो गमनं च तेन युताः। एतादृशास्ते भावा नघः स्वतोऽ. समुद्रगामिनदीजलतुल्याः परकीर्तिता इत्यर्थः। यथा नदीजलं वृथ्यातपाभ्यां वृद्धिक्षयवद्भवति, भूमिपर्वतादिगुणदोपाम्यां गुणदोपवद्भवति, शुद्धितृत्यादिहेतुच भवति, तथैते मावा अपि तपोध्यानसमाधिसाध्यपापक्षयद्वारा जनिता इति शुद्ध्यादिहेतवः सत्सङ्गादिभिर्गुणवन्तो भवन्ति, वर्धन्ते च, दुष्टसहादिभिर्दोपवन्तः भवन्ति, हीयन्ते चेति भावः ॥ १३ ।। एतादृशाः खतनास्ते सिन्धवः परिकीर्तिताः। पूर्णा भगवदीया ये शेपव्यासानिमारुताः ॥ १४ ॥ जडनारदमैत्राद्यास्ते समुद्राः प्रकीर्तिताः। अष्टादशं भावमाहुः एतादृशा इति । अव्यवधानेनोक्ता भावाः स्वतत्राः निरु- पाधिकाचेत्तदा ते सिन्धवः स्वतःसमुद्रयामिन्यो महानघस्तअलतुल्याः परिकीर्तिता इत्यर्थः । सिन्धुषु नदा अपि गृह्यन्ते । यथा महानदीजलप्रविष्टाः समुद्रं प्रविशन्ति, तथैतद्धावानुसारिणोपि दयासमुद्रं भगवन्तं प्रविशन्ति, महानदीजलवदेते भावाः शुद्ध्या- दिहेतवोपि भवन्तीति भावः । एकोनविंशं भावमाहुः पूर्णा भगवदीया इति । ये भगवदीयाः मक्या सेवया पूर्णा 'भगवदीयत्वेनैव परिसमाप्तसर्वार्थाः' येपामात्मा- दिकं भगवदर्थमपेक्षितं नत्वात्मायय भगवान् सेव्यस्ते समुद्राः रलाकरतुल्याः प्रकी- तितास्तेषां मावस्तजलतुल्य इत्यर्थः । भगवदीयशन्दस्तु नामधेयस्य विकल्पेन वृद्धत्वाच्छे- पार्थे छप्राप्ती 'बहुलं छन्दसी'ति छसो विधानात् सिद्धः, पुराणप्रसिद्धोपि, वाचस्पत्या- दिवलोके ज्ञेयः। तान् प्रसिद्धान् गणयन्ति शेपव्यासाग्निमारता इति । जडनारद- मैत्राचा इति । शेपो भगवद्गुणपरः शय्यादिभावेन भगवन्तं सेवते विभूतिरूपश्च । 'अन- न्तथास्मि नागाना मिति वाक्यात् । न्यासः कलावतारः सदा भगवद्धर्मनिरूपणपरो यस्य पूर्णभगवद्धर्मनिरूपणेनात्मप्रसादः अग्निर्भगवदास्यरूपाः स्वयमेव येषां सर्वाशे सर्वस्वरूपः कृष्ण एव । मारुतो हनुमान् श्रीरघुनाथतद्गुणतत्परः। जडो जडमरतो योन्तःपूर्णभावाबहिर्जड इव प्रतीयते। नारदः सदा पुरुषोत्तमगुणगानैकतानः । मैत्रो मैत्रेयः पराशरशिष्यो भगवद्धर्म- वक्ता । आधपदाडुद्धवादयः । समुद्रदृष्टान्तेन यथा चन्द्रदर्शनादधिरुत्तुगतरलिततरजो भवति, तथा भगवन्मुखचन्द्रदर्शनादेतेपि प्रवर्धमानभावा भवन्तीति भावः । अयमेव भावः कपिलदेवैरुक्तः 'सालोक्यसा¢िसामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत । दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः । स एव भक्तियोगाख्य आत्यन्तिक उदाहृत' इति ॥१४॥ पूर्णभावान् खरूपज्ञानभेदेन विलक्षणान्निरूपयन्ति लोकवेदगुणैरिति । ।

९ श्रीकल्याणरायविरचितवितिसमेतः। लोकयेदगुणैमिश्रमायेनैके हरेर्गुणान् ॥१५॥ वर्णयन्ति समुद्रास्ते क्षाराद्याः पद प्रकीर्तिताः । एके लोकमिश्रमावेन । एके वेदमिश्रमावेन । एके गुणमिश्रमावेन हरिगुणान् वर्णयन्ति । ते क्रमेणोच्यन्ते । रामकृष्णादयो मनुष्या एव, परं पलादिनाधिका इति ज्ञात्वैके हरेर्गुणान् वर्णयन्ति । ते क्षारसमुद्रतुल्यास्तेपां भावस्तु तजलतुल्य इत्यर्थः । यथा क्षारजलं न तृपादिनिवर्तकं न वा तृप्तिसुखकारि तथैतेषां भावोपीति भावः । एके 'तूझतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना' इत्यादिना वेदे मूम्सुद्धारादेः कृष्णकर्तृकत्वेन नि- रूपणात् जगत्कर्तेच विविधशरीरपु आविश्य कार्य कृत्वा तानि सजतीति ज्ञात्वा हरे- र्गुणान् वर्णयन्ति । ते दधिमण्डोदतुल्यास्तेपां भावस्तअलतुल्य इत्यर्थः । यथा दधि- मण्डस्सासारत्वान्न पुष्टिहेतुत्वम् । तथैतेपां मावस्यापीति भावः । मायागुणेविना भगवतः कर्तृत्वाभावात्तद्गुणैरेव भगवान् सर्व करोतीति ज्ञात्वा हरेर्गुणान् ये वर्णयन्ति ते सुरोदतुत्यास्तेपां भावः सुरातुत्य इत्यर्थः । यथा सुरायाः स्वरूपविस्मारकत्वं दोपजन- कत्वं तथैतद्धावस्यापीति भावः । भगवान् सर्वेश्वरः सर्वं कर्नु समर्थ इति ज्ञात्वा ये हरे- गुणान् वर्णयन्ति ते क्षीरोदतुल्यास्तेपां भावः क्षीरतुल्य इत्यर्थः । यथा क्षीरं साधु मधुरं पुटिजनकं तथायं मावोपीति भावः । भगवान् महावीर्यः खमत्तानपि चीर्यवतः करोतीति ज्ञात्वा ये हरेर्गुणान्वर्णयन्ति ते घृतोदतुल्यास्तेषां भावो घृततुल्य इत्यर्थः । यथा घृतं वीर्यहेतुस्तथा भावोपीति भावः । 'तं यथा यथोपासत' इतिश्रुतेः 'भ- गवान् लक्ष्मीकलत्रः सेवितो मुक्ति मुक्तिं च यच्छतीति ज्ञात्वा ये हरेर्गुणान्वर्णयन्ति ले लिनुरसोदतुल्यास्तपां भाव इक्षुरसतुल्य इत्यर्थः । यथेक्षुरसो मधुरोन्तस्तापनिवर्तक- स्तयायं मावोपीति मावः । 'यशःखानुद्धरेत् कृष्णो यादृशांस्तादृशानपि । सर्वथा शरणं यातानतः सेव्यः स एव हीति ज्ञात्वा ये हरेर्गुणान्वर्णयन्ति ते शुद्धोदतुल्यास्तेषां भावः शुद्धोदकतुल्य इत्यर्थः । यथा शुद्धोदकं तापनिवृत्तिनमल्यतृप्त्यादिहेतुस्तयायं भा. चोपीति । भगवान् चिद्रपो ज्ञानपूर्णो ज्ञानगम्यः सर्वसमो मोक्षार्थ सेव्य इति ज्ञात्वा ये हरेर्गुणान्वर्णयन्ति ते दधिमण्डोदतुल्यास्तेषां मावो दधिमण्डतुल्य इत्यर्थः । मगवान् वैरा- ग्यपूर्णो न किंचिदपेक्षते गृह्णाति वा सर्वैः पावित्र्यार्थ विहितत्वात्सर्व समर्पते स्तूयते चेति ज्ञात्वा ये हरेर्गुणान्वर्णयन्ति ते क्षारोदतुल्यास्तेषां भावः क्षारजलतुल्यो, भगवद्वरा- ग्यस्य भिन्नरूपत्वादिति मावः ! केवलसमुद्रदृष्टान्ते क्षारोदः शुद्धोदो वा ज्ञेयः ॥ १५ ॥ पूर्णमगवदीयेप्वत्युत्तमान्निरूपयन्ति गुणातीततयेति । गुणातीततया शुद्धान सचिदानन्दरूपिणः ॥१६॥ सर्वानेव गुणान्विष्णोर्वर्णयन्ति विचक्षणाः । तेऽमृतोदा समाख्यातास्तवाक्पानं सुदुर्लभम् ॥ १७ ॥ २ जल० १० जलभेद। तादृशानां कचिदाक्यं दृतानामिय वर्णितम् ।. अजामिलाकर्णनवद्विन्दुपानं प्रकीर्तितम् ।। १८॥ रागाज्ञानादिभावानां सर्वथा नाशनं यदा। तदा लेहनमित्युक्तं स्वानन्दोद्गमकारणम् ॥ १९॥ ये भगवदीयाः 'तमु स्तोतार' 'यस्मारक्षरमतीतोहम्' 'मनिटं निर्गुणं स्मृतम्' 'लोकवतु लीला कैवल्य'मित्यादिश्रुतिस्मृतिपुराणन्यायैर्मगवन्नामरूपधर्माणां गुणातीतत्वं. निश्चित्य भगवन्नाम सचिदानन्दात्मकं भगवान् क्षराक्षरातीतः पुरुषोत्तमो भगवनिष्ठं सर्व निर्गुणं भगवतो लोकवदपिया लीला सैव कैवल्यं मोक्षः फठरूपा गुणातीता स्मरणादिनान्येषां मोक्षसाधिका चेत्येवं निरूपणेन विष्णोः पुरुपोचमस्य सर्वानेव गुणान्नवनीतादिचौर्यगोचारण- वेणुवादनगोवर्धनोद्धरणादीनपि शुद्धान्गुणातीतत्वेन मायासंवन्धरहितान्नित्यान्सचिदानन्द- रूपवतोवर्णयन्ति तेऽमृतोदाः सुधासमुद्रतुल्याः समाख्याताः कथितास्तेपां भावः सुधातुल्य इत्यर्थः । ते भगवञ्चौर्यादिप्रयोजनज्ञातारो, यतो विचक्षणाः, ततस्तद्वाक्यानां तेषां पचना- मृतस्य पानमन्तनिवेशनं तत उपदेशग्रहणं सादरश्रवणं च सुदुर्लभं सुतरां दुःप्रापम् । अत एव नामस्वरूपज्ञानार्थमेतादृशानामुपदेष्ट्रणामुपसत्तिः कार्येसाशयेनाह श्रुतिः 'महस्ते विष्णो सुमति भजामहे' इति । ते त्यत्संपन्धिनं सुमति निर्दोषपूर्णगुणत्वेन भगवन्तं जानन्तं भ- गवद्भक्तमित्यर्थः । अत एव तत्त्वसागरेप्युक्तं 'दुर्लभे सद्गुरूणां तु स्यात्चत्सङ्ग उप- स्थिते । तदनुज्ञा यदा लब्धा स दीक्षावसरो महानि'ति । अत एव नित्यानन्दमयपुरुषो- तमत्वेन भगवत्स्वरूपाक्षाने ज्ञानकर्मादिकं व्यर्थमित्याह भगवा नवजानन्ति मां मूढा' इत्यारम्य 'प्रकृति मोहिनीं श्रिता' इत्यन्तेन । नित्यानन्दमयपुरुषोत्तमत्वेन भगवज्ञाने सर्ववित्वं सर्वभावेन स्वभजनं चोक्तं भगवता 'यो मामेवमसंमूह' इति श्लोकेन । तद्वाचो महिमानमाहुः तादृशानामिति । पूर्णमगवदीयानां वाक्यं कचित् यत्र प्रसन्नतया खेच्छया वदन्ति, नत्वनुरोधेन प्रेरणया वा, तत्र दूतानां सन्देशहराणाभिव वर्णितं ज्ञेयं, यथा दूतमुखेन राजा वदति, तथा तन्मुखेन भगवानपि दूतानामिव प्रभू- स्कर्षवर्णने तेषां न शक्षा चेति भावः । अतो भगवत्कृपया फले भाविन्येतादृशानां समा- गमो मवति । अत एव श्रीभागवते 'भवापवर्गों भ्रमतो यदा भवेशनस्य तहच्युतम- समागमः । सत्सङ्गमो यर्हि तदैव सद्तौ परावरेशे लयि जायते मतिः। महद्विचलन नृणा'- मित्यादि । अत एवैतद्वचनामृतबिन्दुपानमेभ्य उपदेशग्रहणं लोकमानमवणं शिक्षा पाप्यजामिलाकर्णनवत् । अजामिलस्य यदाकर्णनं विष्णुदूतेभ्यो भगवद्धर्मबलनवणं शिक्षा वा तद्वत् प्रकीर्तितम् । यथाजामिलस्य तदनन्तरं न पुनर्नरकसम्बन्धो भगवद्धर्माचरणेनोत्कृष्ट- फलासिस्तथैतद्विन्दुपानकर्तुरपीति भावः । यद्वा ! अजामिठस्साकर्णनं यस्मिन् तदजामि- लोपाख्यानं वेन यया भगवद्रूपनामादिमाहात्म्यं ज्ञातं भवति, तथैतद्विन्दुपानेनापि भवतीति ११ श्रीकल्याणरायविरचितविवृतिसमेतः । भावः । अत एव श्रीभागवते 'किरातहूणान्धे ति 'यत्पादपङ्कजे'ति । एतद्विन्दोः पानापेक्षया रसास्वादोधिक इति तत्परिचायकमाहुः रागाज्ञानादिभावानामिति । रागः खेहो गृहादिषु, अज्ञानं भगवत्स्वरूपस्स, आदिपदात् गृहाद्यासक्तिः, एतान्येव भावाः । यद्वा । अज्ञानमविद्या आदिर्थेषां भावानां शोकमोहादीनां तेषां यदा सर्वथा नाशनं, तद्वासनापि न तिष्ठति, तदा ठेहनं रसास्वादनं पूर्णमुक्तम् । यद्वा, रागाज्ञानादिभावानां यदा सर्वया नाशनमस्फूर्तिस्तदेति । इदमेव विन्दोः पानं लेहनं रसास्वादनमुक्तम् । श्रवणादौ व्यसने सम्पन्ने तदेवावाद्यमानममृतं भवतीत्यर्थः । तत्स्वानन्दोद्गमकारणं खस्य यो भगवदानन्दस्यो- नमस्तस्य नित्यत्वात् तत्र कारणम् ।. रसं खेवायं लब्ध्वानन्दी भवतीति श्रुतेः । स्सस्स तिरोहितानन्दस्य य उद्गमः प्राकट्यं ज्ञानफलं तत्कारणतुल्यं यत्रेति च । अझभावानन्तरं भक्तिप्राप्तेः । भगवति क्रमेण प्रेमासक्तिव्यसनैः प्रापभिकास्फूर्ती न किश्चिदवशिष्यते । अत एवोक्तगेकादशे 'भक्तिं लन्धवतः साधोः किमन्यदवशिष्यते । मय्यनन्तगुणे ब्रह्मण्यानन्दा- नुभवात्मनि । एवं धर्मनुष्याणामुवात्मनिवेदिना'मित्यादिना च । तथोक्तं भक्तिव- पिन्यां श्रीवल्लभाचार्यचरणैः 'लेहाद्रागविनाशः सादासत्या सागृहारुचिः । यदा स्याट्यसनं कृष्णे कृतार्थः स्यात् तदैव हि ॥ १६-१९ ।। उद्धृतोदकवत्सर्वे पतितोदकवत्तथा । उक्तातिरिक्तवाक्यानि फलं चापि तथा ततः ॥२०॥ विशं भावमाहुः उद्धृतोदकवदिति । अव्यवधानेनोक्तामृतोदतुल्यातिरिक्तानां वाक्यानि तथा तेषामेव सर्वे भावाश्च भाववतामप्रत्यक्षदशायामादरेण गृहीतानि वाक्यानि भावाश्थोद्धृतोदकवदुपकारं कुर्वन्ति । यथा कथञ्चिद्वहीतानि पतितोदकवअलाश- पात् पृथक् स्थितोदकवत् । अथवा, प्रासादादितः पतितोदकक्दुपकारं कुर्वन्ति । अथवा । भाववदप्रत्यक्षदशायां सर्वे भावा अमृतोदतुल्यातिरिक्तानामुद्धृतोदकवत्फलं साधयन्ति । पाक्यानि च पतितोदकवत् फलं साधयन्तीत्यर्थः । ततस्तेभ्यो भावेभ्यो वाक्येभ्यश्च फ- लमपि तथा तदनुरूपमेवेत्यर्थः । यथोद्धृतजलानि स्वप्रभवगुणसदृशानेव गुणान् विद- पते, न तु तानेव, तया तत्तदावा अपि तत्तगुणसदृशान् गुणान् विदधते । सुधा तु सदै- करूपमेव गुणं विधत्त इति भावः ।। २० ॥ इति जीवेन्द्रियगता नानाभावं गता भुवि । रूपतः फलतश्चैव गुणा विष्णोर्निरूपिताः॥२१॥ उपसंहरन्ति इतीति । इतीति समाप्तौ । अनेन प्रकारेण वा । जीव आत्मा इन्द्रियाणि च तेषु गताः प्राप्ताः । अत एव भुवि आधारे नानाभावं अनेकविध सा- विकादिमावं गताः प्राप्ताः, नानात्वं वा प्राप्ताः, एतादृशा विष्णोर्भगवतो गुणास्तेषां भावानां मगवदीयत्वात् तद्रप्रत्वाद्वा । रूपतः स्वरूपतः ईदृशमिति यत् स्वरूपमिति । फलत १२ जलभेदः। इतीदृशमेतत्फलमिति निरूपिता विवेचिता इत्यर्थः ॥ २१ ॥ जलानामिव भावानां भेदा यत्र निरूपिताः। जलभेद इति ख्यातो ग्रन्योयं मावयोधकः ॥१॥ श्रीपिलेशाभिसरोजपीठं कल्याणरायेण मुदा प्रणम्य । तातापिने च गुरून् पितृन्यान् टीका कृतेयं जलभेदनामः ॥२॥ श्रीगोविन्दसुतप्रोक्ता टीका रागवतां हरौ । भावपूर्णा मुदे मयासुन्दरीवात्पमापिणी ॥३॥ मृपोद्यमनवयं वा बालसेव कृपालवः । क्षमन्तां विट्ठलाधीशचरणाः प्रभवो मम ॥ ४॥ इति श्रीविट्टलेश्वरचरणकतानश्रीकल्याणरायविरचिता जलभेदटीका सम्पूर्णा ॥ श्रीकृष्णाय नमः। जलभेदः। श्रीपुरुषोत्तमकृतविवृतिसमेतः। नत्वा श्रीवल्लभाचार्यान् भगवन्तं च तद्गुणान् । गुणस्वभावयोधार्या या वाचस्ता उपास्महे ॥१॥ अथ श्रीमदाचार्यचरणाः भक्तिवर्धिन्या त्यागिनां गृहस्थानां च भक्तिवृद्ध्यर्थं श्रय- णरूप कीर्तनरूपं च साधनमुक्त्वा तदर्थमर्थयलात्कीर्तयितुः श्रोतुथ प्राप्ते सझे स किं यस्य कस्यापि कर्तव्य उत भगवदीयत्वेन परीक्षितस्पेत्याकांक्षायां योकादशस्कन्धे 'स्वमूर्त्या लोकलावण्यनिर्मुक्त्या लोचनं नृणां, गीर्मिस्ताः स्मरतां चितं पदैस्तानीक्षता क्रियाः, आन्छिय कीति सुश्लोकां वितत्य राखसानु को, तमोनया तरिष्यन्तीत्यगारखं पदमीवर' इति शुकवाक्ये भगवत्कीर्तेः संसारात्मकतमस्तारकत्वेन कथनातस्याश्च गुणजन्यत्वात्तेपा- मपि श्रूयमाणानां कीर्यमानानां स्मर्यमाणानां कचित् दृश्यमाणानां च संसारतारकत्वमे- वोचित, भगवता तदर्थमेवानवतारदशायां कीर्तिद्वारा प्रकटनात् , 'साढत्यं पारिहास्य वा स्तोमं हेलरमेल का, बैकुण्ठनामग्रहणमोपायहरं विदुरिति पठस्कान्थे शुकवाक्यादा- मिलस पुत्रोपचारितनामकीर्तनमात्रेणैव संसारत उद्धाराच, यस्य कस्यापि सरः कर्तव्य इ- त्यङ्गीक्रियते, तदा 'मिक्षाशया ये गृहन्ति मम नामानि चार्जुन, अमुख्यास्ते जनाः पार्थ दूरतः परिवर्जये'दित्यादिपुराणवाक्येषु निन्दास्मरणस्य, सप्तमस्कन्धे समाप्ती, 'अहं पुराभवं कश्चिद्गन्धर्व उपयर्हण' इत्यादिमिर्नारदेन स्वपूर्वजन्मवृत्तान्तकथने गायतो गतस्स म- त्तत्यत्रीपरिवृतस्त्रपुरुलम्पटत्वैः स्वस विश्वसग्दत्तशापकथनस्य च कथमविरोधः । किया प्रथमस्कन्धे नारदेन सस्य शूद्रजन्मनि योगिसङ्गतदुक्तभगवत्कथाश्रवणान्यां स्वस भ- श्रीपुरुषोत्तमतवितिसमेत । गवद्रत्यादिकथन, एकादशस्कन्धे च भगवता कथाश्रवणापयं सत्सहसैव कथन च कथ सङ्गच्छते, तथा गुणकर्मानुरूपभगवन्नामोचारयित्णा भिक्षाशामानेण कथ निन्द्यत्व, गुण- गातुरुपयर्हणस्य च कथ विश्वसग्म्य शाप । किचैव भावभेदेन नामाधुच्चारपितृणा गुणगातृप्रभृतीना च स्वरूपमेदे फलभेदे चावगम्यमाने कथ द्विविधवाक्यानामविरोध इति सन्देहे स्वीयाना जाते तद्वारणार्थ 'तदभिध्यानादेव तु तलिजात् स' इति न्यायेन भगवानाकाशदिभूतेष्वाधारेषु तत्तपेण स्थित्वा तत्तत्कायं करोति, तथा मगवद्गुणा अपि मगवद्रूपत्वाद्भौतिकेपु तत्तद्वावरूपेष्वाधारेषु तत्तद्रप्रेण स्थित्वा ततद्भावानुसार्येव कार्य कुर्वन्तीति भगवद्गुणानामाधारवशेन फलत स्वरूपतच नानाप्रकारता वदिष्यन्तस्तदा. धारनिरूपण प्रतिजानते नमस्कृत्येति । नमस्कृत्य हरि वक्ष्ये तद्गुणानां विभेदकान् । भावान्विशतिघा भिन्नान्सर्वसन्देहवारकान् ॥१॥ हरि 'हराम्यघ यत्स्मर्तृणा'मिति' भारतवाक्यात्स्मरतामघहर्तार भगवन्त नमः स्कृत्य, तगुणानां तच्छब्दस्य सन्निहितपरामर्पित्वातस्य हरे गुणानामुत्कर्षापायकानाम् धर्माणा विभेदकान् विशब्दो नानार्थ नानाभेदजनकान् विंशतिप्रकारेण भिनान्, सर्वसन्देहवारकान् गुणखरूपफलविषयका सर्वे पूर्वोक्तप्रकारका अन्ये च ये ताशा सन्देहास्तेपा निवर्तकान् भावान् जीवाना मनोविकारान् वक्ष्ये कथयिष्यामि । अन सर्वसन्देहवारकानितिविशेषणेन सन्देहनिवृत्तिरूपफलसूचनात्तदर्थ गुणाधारभूतान् भावान् वक्ष्यामीत्यर्थ । न चार गुणेषु तदभिध्यानन्यायाङ्गीकारे किं मानमिति शक्यम् , उपस हारवाक्ये, 'इतिजीवेन्द्रियगता नानाभाव गता भुवी सन जीवेन्द्रियगताना नानाभावप्राप्ति- कथनेन तदभिध्यानसूनोक्तन्यायस्येव सूचितत्वादिति ॥१॥ नन्वाधाराणा जीवेन्द्रियधर्मत्वेनानन्त्यात्कथ विंशतिधाभिन्नत्वमेव प्रतिज्ञायत इत्याकाक्षाया पोपसौकर्यार्थ श्रीतवासनया दृष्टान्तेन तथा भिन्नत्व बोधयन्त्यर्धेन गुणभेदा इत्यादि। गुणभेदास्तु तावन्तो यावन्तो हि जले मताः ॥ १३ ॥ तु शङ्कानिरासे, उक्तसख्याविषयिणी शङ्का न कार्या, हि यतो हेतो गुणभेदा- स्तावन्तः यावन्तः यत्सख्याका जले मता श्रुतिसमता । तथा चाधारानन्त्येपि यथा जलस्स विंशतिमेदास्तथा गुणानामपि । जल हि शैत्यगुणक स्वच्छ अव्यक्तमधुररस स- वंशोधक स्वसम्बन्धेन द्रव्यान्तरस्य मूयस्त्वापादकमाप्यायक च स्वभावत सदपि यागाधारे पतति तादृक्स्वभाव लोके भवति, गुणदोपौ च जनयति, तथा गुणा अपि खभावत एक- विधा आनन्दरूपा ब्रह्मण सकाशात्प्रकाशाश्रयन्यायेन मिन्नाभिन्ना अप्यनेकखभाववत्ता- मनेकगुणदोपवत्ता चापद्यन्त इति तदृष्टान्तेन तथोच्यते । श्रौतदृष्टान्तस्यैव बोधार्थमझी. १हराम्यध यस्मा हविभाग ऋतुष्पह । वर्णध मे हरिष्टस्तस्मादह हरि स्मृत ।

१४ जलमेदः । कारादित्यर्थः । तत्र तैत्तिरीयसंहितायां सप्तमकाण्डे 'कूप्याभ्यः स्वाहा, कूल्यायः खाहा, विक-म्यः स्वाहा, अवद्याम्यः स्वाहा, खन्याम्यः खाहा, हृयाभ्यः स्वाहा, सूधाभ्यः स्वाहा, सरसाम्यः स्वाहा, वैशन्तीभ्यः स्वाहा, पल्वल्याम्यः स्वाहा, वाभ्यः स्वाहा, अवाभ्यः स्वाहा, हादुनीभ्यः स्वाहा, पृश्व्याभ्यः स्वाहा, स्यन्दमानाम्यः स्वाहा, स्थावराभ्यः स्वाहा, नादेयीभ्यः स्वाहा, सैन्धवीम्यः स्वाहा, समुद्रियाम्यः स्वाहा, सर्वाभ्यः स्वाहेति मयु विंशतिविघा आप अपां होमे उक्ताः ॥१३॥ तत्र प्रथमं कूप्या उक्ता इतीहापि कूपसमानं गुणाधारं प्रथममेकेनाहुः गायका इत्यादि । गायकाः कूपसंकाशा गन्धर्वा इति विश्रुताः॥२॥ कूपभेदास्तु यावन्तस्तावन्तस्तेपि संमतः । गायका गानकर्तारः कृपसंकाशाः कूपोपमाः, कूपाश्च केचिदुत्तमाः यथा स्कान्दे पुरुषोत्तममाहात्म्ये, 'न्यग्रोधादुत्तरे कूपः सर्वतीर्थमयोस्ति वै, यथा च द्वारकायाम- वन्यां च दामोदरकूपः, केचिच कदाचिदुत्तमाः, यया व्रजे गोपकूपः, 'सोमवत्याममायामेव सर्वतीर्थमयो नान्यदा', एवं साधारणा अप्रयोजकाश्च ज्ञातव्याः, तथा गायका अपि, तेपि न साधारणाः, किन्तु गन्धर्वा इति पुराणे घेदे च श्रुताः विशेषेण प्रसिद्धाः । तु पुनः यावन्तः कूपमेदास्तावन्तस्ते गन्धवी अपि संनताः सम्यग्विचारिताः । तथा च कूपे भवाः कृप्यास्ता यथा कूपरूपाधारभेदेन रूपतः फलतच नानाविधा भवन्ति, एवं गन्धर्वैर्गीय- माना गुणा अपि गन्धर्वस भगवद्भक्तत्वे तदभक्तत्वे साधारणत्वे लम्पटवादिदोपविशि- प्रत्वे च तद्धावसमानाकारा भवन्तस्तदनुरूपमेव फलं जनयन्ति । एतेनोपपईणस शा- पोऽन्येपां गन्धर्वाणां शापामावः 'भिक्षाशया ये गृह्णन्ती तिवाक्यं च समर्थितं ज्ञेयम् । तेन 'गुणगाने सुखावाप्ति'रित्यादिना निरोधलक्षणग्रन्ये गुणगाणां स्वरूपफलोत्कर्षों या- बुक्तौ तावपि 'निवृत्ततरुपगीयमाना दिति श्लोकोतरीतिकेप्वेव पर्यवस्सत इति पोधितम् । इदं 'पूर्णा भगवदीया य' इत्यत्र स्फुटिष्यति ॥ २३॥ कूल्याभ्यः स्वाहेति श्रुतिमनुसृत्य द्वितीयं भावमाहुः कुल्या इत्यादि । कुल्या पौराणिकाः प्रोक्ताः पारंपर्ययुता मुवि ॥३॥ श्रुतौ फूल्या इति दीर्घः छान्दसो वर्णविकृतिरूपः । पौराणिकाः कुल्याः मोक्ताः 'कुल्या स्यात् कृत्रिमा सरि दिति कोशात् महतो जलाशयात्अन्यत्र जलानयनाथ या कृत्रिमा नदी क्रियते सा कुल्या । पौराणिकाः पुराणवाचयितारस्ताः प्रोक्ताः । अत्रोप- मापाचकपदामावादूपकं ज्ञेयम् । 'उपमैव तिरोमूतमेदा रूपकमिप्यते' इति काव्यादर्श क्षणातनापीदमाधिक्यन्यूनत्वयोरनुक्तत्वादनुभयोक्तिरूपक नेयम् । केपामिदलदाराणां क्रिषिययोजनार्य शालेगीकारसानुमानिकरो ततिपयश्रुती च दर्शनादिति । एवमग्रेपि योध्यम्। पौराणिकानां फुल्यातीत्ये हेतुगर्भ विशेषगमाहुः पारंपर्ययुता भुयीति । तथा श्रीपुरुषोत्तमतवितिसमेतः । च भूमिष्ठत्वात्परंपरया मूलसम्बन्धाच ते कुत्यातुल्या इत्यर्थः । तेन यादृश्य आपः कु- त्यायां भवन्ति ताशस्तेषां भावः । ता यथा नधादिरहिते देशे कृत्रिमोपायेन नीताः अवहन्त्यः पानखानाचमनादिरूपपरोपकाराय भवन्ति, तथा तेषां गावोपि । पाने माघमा- हात्म्ये वैश्यं प्रति देवदूतवाक्यजाते 'विचारयन्ति ये शास्त्रं वेदाभ्यासरताच ये। पुराणसंहितां ये च श्रावयन्ति पठन्ति च । व्याकुर्वन्ति स्मृति ये च ये धर्मप्रतियोधकाः । वेदान्तेषु निविष्टा ये तैरियंजगती धृता। तेषामन्यासमाहात्म्यैः सर्वे ते हतकिल्विपाः । गच्छन्ति ब्रह्मणो लोकं यत्र मोहो न विद्यते । ज्ञानमज्ञाय यो दद्याद्वेदशास्त्रसमुद्भवं । अपि देवास्तमर्चन्ति भवबन्धविदारक'मिति पौराणिकानामुत्कृष्टत्वकथनात् । अत्र भुवी- तिकयनात् पूर्वलोकोक्ताः स्वर्गस्था इति घोधितम् । अन्यथा तद्वैयर्थ्यापातादिति ॥३॥ अतः परं 'विकर्याम्यः स्वाहेति श्रुतिमनुसृत्य तृतीयं भावमाहुः क्षेत्रेयादि । क्षेत्रप्रविष्टास्ते चापि संसारोत्पत्तिहेतवः । च पुनः ते पौराणिका अपिशब्दाद्गन्धर्वाः क्षेत्रप्रविष्टाः, क्षेत्रशब्देन यथा केदार उच्यते, तथा 'क्षेत्रं पत्नीशरीरयो'रिति कोशात् 'पले क्षेत्रे महीमुज' इति 'इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयत' इत्यादिवाक्याच शरीरपल्यावप्युच्येते । एवं सति कृत्रिमजलमार्गे कृते तद्वारा केदारप्रविष्टाः कुल्याया आपो यथा उसस्य वीजस्य वृक्षस्य वा यः संसारः अभिवृद्धिः तदुत्पत्तितवो भवन्ति, तथा पौराणिका गन्धर्वाय खदेहे पन्यां वाभिनिविष्टाः संसारस्साहन्ताममतात्मकस्योत्पत्तिहेतवो भवन्ति । अतस्तेपा मावो विकर्यातुल्यः । कृ विक्षेपे, सदोरप्, विशेपेण विविधं वा कीर्यते विक्षिप्यते असौ विकरः, केदारे कुल्याजलानयनाथ कृतो मार्गस्तत्र भवाः विकर्याः, ता यथा क्षे- विमिः स्वान्नसिद्ध्यर्थ यतस्ततो नीयन्ते तथा तद्भावा अपीति । तादृशा गन्धर्वपौराणिकाः विकरतुल्या इत्ययः । एवं च द्वितीयस्कन्धसुबोधिन्यां कामनाकरणमुपक्रम्य 'वसुकामो वसून् देवा नित्यस्य द्वितीयव्याख्याने यदुक्तम् । 'एवं धनस्यापि, मगवद्भक्तेष्वानत्यर्थ श्रव- णादिसिद्ध्यर्थ उपदेशनार्थ या देयमपेक्ष्यते, साधनरूपश्रवणादिकं ताशैरेव भवतीति । तत्रापि धनदातुः सत्फलं प्रतिगृहीतुस्तु संसारोत्पतिः । 'मिक्षाशयेति वाक्यात् । यदि तु ससविचारार्थमुदरमरणोपयोग्यन्नमा गृहाति, तदा तु तीर्थपर्यटितृवन्न दोष इति यो- ध्यम् । एतदपि तदा यदा पौराणिकानां पारंपर्ययुतत्वं भवति । तदभावे तु वक्तृश्रो- नोरुमयोरपि संसार एव । स्वबुद्ध्यान्ययाव्याख्यानान्ययायोधयोः संभवाचेति ज्ञेयम् । ननु ब्रह्मवैवर्ते श्रीकृष्णजन्मखण्डे 'कल्याणसूक्तसामानि हरेन मैकमङ्गलम् । कुर्वन्ति वि- ऋयं ये वै तेषां मारेण पीडितेति ब्रह्माणं प्रति पृथिवीवाक्यात्, 'मन्नामविक्रयी विप्रो न हि मुक्तो भवेत् ध्रुवं । मृत्युकाले च मन्नामस्मृतिमात्रं न विद्यते' इति श्रीनन्दं प्रति भग- वद्वाक्याच, नामविक्रयस्य दोपत्वे शिष्येभ्यो भगवन्नामोपदेशस्यापि दोपत्वापत्तिः । तत्र , जलभेदः । शिष्योपदौकितग्रहणेन नामविक्रयसंभवादिति चेत् । सत्यम् । तथापि गुरुत्वस साहजिक- ब्राह्मणवृत्तित्वेनात्याज्यत्वात् , 'सहज कर्म कौन्तेय सदोपमपि न त्यजेत् । सर्वारम्मा हि दोपेण धूमेनामिरिवावृता' इति भगवद्वाक्यात् । श्रुतावपि पडाचार्यब्राह्मणारम्मे जनक- समीपे याज्ञवल्क्य आगते जनकेन, 'याज्ञवल्क्य ! किमर्थमचारीः पशूनिच्छन्न' 'एवं ता'निति गोर्थ सूक्ष्मवस्तुनिर्णायकाभान्मत्तः कारयितुं वागतोसी'ति पृष्टे या- ज्ञवल्क्येन 'उभयमेव समा'डित्युक्त्वा, राजप्रश्ने अप्रवी'न्म उदकः शौल्वायन' इत्यादिना प्राणब्रह्मविद्योपदिष्टा, ततो जनकेन हस्त्यृपमसहस्रं ददामीत्युक्ते याज्ञवल्क्येन 'पिता मे- मन्यत नाननुशिष्य हरेते'त्युक्त्वा पूर्णा ब्रह्मविद्योपदिष्टा, ततो जनकेन विदेहाः स्वात्मा च याज्ञवल्क्याय समर्पितः, तदा याज्ञवल्क्यस्तदङ्गीकृतवानिति थावितत्वेन ब्रह्मविद्योप- देशोत्तरं शिष्योपदीकितग्रहणस्य प्राप्ततया तन्नयायस्सात्रापि वक्तुं शक्यत्वाच । किञ्च, गीतायामेव सहजकमायागमुक्त्वा, 'असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः । नैष्कर्म्य- सिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छती'रात्र असक्तबुद्धित्वादिमिस्तत्कर्मसंन्यासेन नैष्कर्म्यसि- द्धिप्राप्तिं कथयता भगवता तदोपपरिहारोपायस्योक्तत्वाच तथा करणे दोपाभावादिति । एवञ्च यत्प्रभुचरणैरुक्तं 'विचार्यैव सदा देयं कृष्णनाम विशेषतः । अविचारितदानेन स्वयं दाता विनश्यतीति । तत्रापि स्वस्य शिष्यस्य चोद्धार विचार्यैव देयम् । लोभादविचा- रितदाने तु नामविक्रयापत्त्या दाता स्वयमपराधमाग्मवतीत्यर्थो ज्ञेयः । प्रकृतमनुसरामः । तेन गन्धर्वाणां पौराणिकानां च सङ्गस्तत्वरूपं विचार्य कार्य इति योधितम् ॥ ३॥ अतः परं 'अवधाम्यः स्वाहेति श्रुतिमनुसृत्य चतुर्य भावमाहुः वेश्यादीत्यादि । वेश्यादिसहिता मत्ता गायका गर्तसंज्ञिताः ॥ ४ ॥ आदिपदेन खैरिणीसङ्ग्रहः । ईदृशाः गायकाः गर्तसंज्ञिकाः । गर्तलक्षणं तु कात्यायन- स्मृती 'धनुःसहस्राण्यष्टौ तु तोयं यासां न विद्यते । न ता नदीशब्दवहा गर्तास्ते परि- कीर्तिताः' इति । आपः नदीसम्पन्धियोपि नदीशन्दवहा न, किन्तु ते जलाशया गर्ताः शानेषु सर्वत्र कीर्तिता इत्यर्थः । तया च 'नद्या यच परित्यक्त'मित्यादिवाक्यान्तरात् तसलं यहुलमपि न शिष्टानां स्नानपानादियोग्यम् । तथा तादृशां भावोपीत्यर्थः । यद्वा, 'प्रह्लादो हवै कायाधः विरोचनरवपुत्रमुदास्यत्, स प्रदरोऽभवत्, तस्मात्प्रदरस्य नाचामे दिति श्रुतावापस्तम्बस्मृतौ च न वर्पधाराखाचामेत्तथा च प्रदरोदक इति तअलाचमननिषेधात् । तत्र 'प्रदरो गर्त' इति सापणीयादौ व्याख्यानाचेपामापोऽवयाः, न उद्यन्त इत्यवद्याः पूर्वो- क्तश्रुतिस्मृतिभ्यां तदाधारनिन्दातः ता अपि निन्या इत्यर्थः । तादृशां भावस्य दुष्टत्वात्तद्गीता गुणा न समीचीनफलदाः गाणां श्रोतृणां चेति ताशा सहो न कर्तव्य इति भावः ॥४॥ अतःपरं 'खन्याम्यः स्वाहेति श्रुतिमनुसृत्य पञ्चमं मावं वक्तुमन्यानपि ततो हीनानाहुः जलायमित्यादि ।

श्रीपुरुषोत्तमकृतविकृतिसमेतः । १७ जलार्थमेव गर्तास्तु नीचा गानोपजीविनः । हस्तपादप्रक्षालनगण्डूपादिदुष्टजलस्य सर्वत्र प्रसारामावाथै ये गर्ताः कृतास्तादृशाः । तथा च तसलं न समीचां योग्यम् । जात्या नीचाः गानोपजीवनेनैव ये उदरंगरयस्ते यथा तथा तेषां भावोपीति तद्गता गुणा अपि तादृशा इति तत्सको न कार्य इति भावः । श्रुतौ 'अवद्याभ्यः साहे'त्यनन्तरं 'खन्यान्यः खाहे'त्युक्तम् । अन्न खननेन निष्पन्ना आपः खन्या इति व्याख्यानम् । तथा सति तत्सङ्ग्रहार्थमत्रापि प्रकारान्तरेण पुनर्व्याख्येयम् । तुशन्देन तथा सूचनात् । तथा च नीचा गानोपजीविनः जलार्थमेव गताः। तु पुनः नीचा गानोपजीविनः जलार्थमेव गर्ता इति । एतस्मिन् पक्षे चायमर्थः। जलायं जलनिष्पादनार्थ खननेन निष्पादिता ये गर्तास्ते जलार्थमेव गांधोद्राणीति यावत् । नीचा गानोपजी- विनस्तादृशाः तेषु नीचत्वं जातिदोषः, गानोपजीवित्वं च कर्मदोष इति । चोद्रजलं पुनः खननात्कलपं निर्मलमपि संस्कारं विना नानाजातीयजनोच्छिष्टसंसर्गदोपाच यथा शिष्टायोग्य, तथा तद्भावनिविष्टा गुणा अपि स्वरूपतः फलतश्च दुष्यन्तीति तादृशामपि सनोन कार्य इति पोधितम् । एवं पञ्चविधा मावा उक्ताः । एवमत्र गातृविषयकाः सन्देहा निवारिताः ॥४॥ अतः परं कीर्तयितृविषयकांस्तान् निवारयितुं 'हयाम्य स्वाहेति श्रुतिमनुसृत्योत्तम पष्ठं भावमाहुः हदास्त्वित्यादि । हदास्तु पण्डिताः प्रोक्ता भगवच्छास्त्रतत्पराः ॥५॥ सन्देहवारकास्तत्र सूदा गंभीरमानसाः। सरकमलसम्पूर्णाः प्रेमयुक्तास्तथा बुधाः ॥६॥ अल्पश्रुताः प्रेमयुक्ता वेशन्ताः परिकीर्तिताः । फर्मशुद्धाः पल्पलानि तथाल्पश्रुतमक्तयः ॥ ७ ॥ अन तुशब्दः प्रकरणं भिनत्ति । पण्डा शास्त्रजन्या बुद्धिः खामीष्टार्थवाहिका च तद्वन्तः पण्डिताः प्रकर्षेण पुराणादिपूक्ताः । शास्त्रदर्शित्लेपि विशेपमाहुः भगवच्छास्त्रत- रूपरा इति । भगवता प्रोक्तं शास्त्रं गीताश्रीमागवतपञ्चरात्रवाराहपुराणादि तन्निष्ठाः ये ते इदाः । जलाशयो जलाशास्तत्रागाजलो हद' इति कोशात् महान् जलाशयो हृदः, पर- घेकदेशमूतो नदीसंलमः । 'कालिन्यां कालीयस्थासीत् हृद' इति 'शुष्यद्भदाः कृशतटा पत सिन्धुपल्य' इत्यादी तादृशेष्वेव हदपदप्रयोगात् । तथा च तेषां भावे निविष्टा भगवद्गुणा अपि हृद्यजलतुल्याः । तद्यथा सर्वकार्येषु स्वरूपतः प्रशस्तं फलतश्चोत्तम, तथा तैर्विचार्य- मोणास्तेभ्यः श्रूयमाणाश्च गुणाः स्वरूपतः फलतधोत्तमा इत्यर्थः । अत्रापि 'विचारयन्ति ये शास्त्रं पेदाभ्यासरताच ये' इति पूर्वोपन्यस्तमाघमाहात्म्योक्तं स्वरूपवाक्यं फलवाक्यं चानुसन्धेयम् । सूद्याम्यः स्वाहेति श्रुतिमनुसृत्य तस्मादुत्कृष्टं सप्तमं भावमाहुः सन्देहे- स्यादि । तत्र तेषु भगवन्छास्त्रतत्परेषु येऽज्ञानां श्रोवृणां मगवच्छानविषयक सन्देहं वार- १८ जलभेदः। यन्ति, ते सूदाः, सुष्ठु समीचीनं स्वादु सगुणं उदमुदकं येषां ते सूदाः । तत्र हेतु- माहुः गंभीरमानसा इति । अगा, दुरवगाहं हृदयं येषां तादृशाः । तथा च श्रोतुर्हृदयं बुद्धा तदधिकारानुसारेण तद्धित्तं योधयन्ति, न तु सर्व शास्त्रार्थमित्यर्थः । तेन यादृशं ज- लमुक्तं तादृशस्तेषां मावः स्वरूपतः फलतश्चोत्तम इति ताशा सङ्गः कर्तव्य इति भावः । अत्रापि 'पूर्वोक्तज्ञानमज्ञाय यो दद्या'दिति वाक्यं गच्छन्ति ब्रह्मणो लोक मिति तत्फल- वाक्यं चानुसन्वेयम् । एवमत्र मर्यादामार्गीयं भावदयमुक्तम् । श्रीकल्याणरायास्तु 'सूदा इत्यनेन वाप्योदा उच्यन्त' इति पक्षान्तरमाहुः । तदा तस्मिन् पक्षे गंभीरत्वं निम्नत्वं स- न्देहवारकत्वं च तत्र सोपानस्थानापन्नं ज्ञेयम् । तत्रैव श्रोतृणां विशेषतस्तत्सङ्गादिति । अतः परं 'सरस्साम्यः स्वाहेति श्रुत्यनुसारेण तत उत्कृष्टं पुष्टानुसृतमष्टमं भावमाहुः सर इत्यादि । भगवति प्रेम्णा युक्ताः निवृत्तलौकिकरागाः, तथा पूर्वोक्तवत् धुधाः भगवन्छा- खतत्पराः श्रोतुः सन्देहवारकाः ये ते सर:कमलसंपूर्णाः, सरसि यानि कमलानि तैः स- म्पूर्णा सम्परमरिता या आपस्तादृशाः । न च श्रुती सरस्यापदेन सरोधिकरणकत्वमानला. भादत्र कमलसम्पूर्णत्वस्य कुत उक्तिरिति शंक्यम् । सरस्सापदस्य 'सारसं सरसीरूह'मिति कमलनामस्मारणेन तत्संबन्धार्थमेव तत्प्रयोगात् । अन्यथा हृयासूचाम्यां विशेषाभावात्तद- नुलेखापत्तेरिति योध्यम् । अत्र पूर्व जलपाराणां दृष्टान्तत्वमुक्त्वात्र यदाप एव दृष्टान्त- स्वेन सूचितास्तेन तेषां भावव्याप्तत्वं सूयते । तथाच यथा ता आपः सौगन्ध्यभ्रमर- झंकारप्रभृतिमिः सर्वेन्द्रियाहादिन्यस्तथा तेषां मावोपि श्रोतृपु ज्ञानभक्ती संकामयन् तेषां सःन्द्रियाहादी मवति, फलतयोत्कृप्यत इति तद्गता गुणास्तथेत्यर्थः । अत एवैका- दशस्कन्धे संवादसमासी भगवतोक्तं य एतन्मम भक्तेषु संप्रदपात्सुपुष्कलं, तस्याहं प्रसदायस ददाम्यात्मानमात्मनेति । अतःपरं 'वैशन्तीम्यः साहेति श्रुतिमनुसृत्य ततो न्यून नयगं मावमाहुः अल्पश्रुता इत्यादि । अल्पं श्रुतमध्ययन श्रवणं वा सत्पुरुषवा- क्यसम्पन्धि येषां ते अल्पश्रुताः भगवद्विपयकप्रेमयुक्ताय । ते वेशन्ताः अल्पसरस्तुल्याः । 'वेशन्तः परवलं पाल्पसरे' इति कोशात् । 'विश प्रवेशने विशन्सस्मिन् मेकादय' इति निरुतेथ । मम चाल्पश्रुतप्रेमयुक्तपदयोः समभिन्याहारामकावपि स्वत्पत्वं सून्यते । तेन 'वैशन्तीम्यः स्वाहेति शुत्युक्ता या बापस्तत्तुल्यस्तेषां भाव इति पोधितम् । तथा च प्रेमवत्त्वेन पूर्वोक्तजातीयखेप्यत्पत्वायया तबलं महिपादिमिरवगाद कलुपं भवति, तथा तमामोलि शुनप्रेम्पोरत्पत्ताद्विजानीयशास्त्रादिसंसर्गेण कलुपितो भवतीति तत्सहोऽप्रयोजक वेत्पर्यः । अतः परं 'पत्चत्याम्यः स्वाहेति शुत्सनुस्तं पेशन्तसजातीयं दशमं मावमाहुः कर्मत्यादि । श्रुतं च मक्तिय श्रुतमक्ती, तया पूर्वोक्तादसे श्रुतमती येपां ते तपास- भूतमतयः । पूर्वोकास्पिः फर्मशुदा इति । भगवदप्तेिन फलासगरहितेन कर्म- निहारोसतो या कृतेन कर्मणा शुद्धाः तदनुरूपविशुद्धियुक्ताः पत्वलानि । पेशन्तपत्व- श्रीपुरुपोत्तमकृतषितिसमेतः। १९ लयोः शक्यतावच्छेदकतौल्येपि श्रुतौ 'पल्वत्याभ्यः स्वाहेति निर्देशभेदात् पलगतौ पलति पल्यते वेति निरुक्तिभेदाच तयोः कश्चित् भेदो वाच्यः । स चात्र कर्मशुद्धिभेदादवग- न्तव्यः।तेनैवं पूर्वस्मादाधिक्येपि गन्तृत्वान्महिपादिगम्यतया कालुष्याच तत्तुल्यकक्षत्वमेव । तथाच तेषां भावस्तजलतुल्य इति तत्सझोप्यप्रयोजक इवेत्सर्यः । एवमत्र कीर्तयितृविषयकाः सन्देहा निवारिताः । कीर्तयितयु च श्रोदणामुपकाराय वाच एव प्राधान्यात्तस्याश्च पहि- रिन्द्रियत्वात्तदाधारभूतस्थूलदेहे प्राधान्येन गुणाधार एव जलाधारसाम्येन निरूपिताः । अतः परं भावयितृविषयकान् सन्देहान् वारयितुं तेषु लिङ्गशरीरस्य मनस एव मापान्याद्गुणा विशेषतो वहिर्न निर्गन्छन्तीति दुर्लमत्वाद्गुणानामेव जलतुल्यत्वं निरूपयन्तो 'वाभ्यः स्वाहेति श्रुतिमनुसृत्य पूर्वस्माद्विलक्षणमेकादशं मारमाहुः योगेत्यादि । योगध्यानादिसंयुक्ता गुणा वाः प्रकीर्तिताः। योगश्चित्तवृत्तिनिरोपो, यमाधष्टानसहितः । यया द्वितीयस्कन्धे प्रथगाध्याये 'गृहा- अनजितो धीर' इत्यादिना स्थूलभगवद्विपयकधारणावानुक्तः । 'यतः सन्धार्यमाणायां यो- मिनो भक्तिलक्षणः । आशु संपद्यते योग आश्रयं भद्रमीक्षत' इत्यनेन तस्यापि भक्तिसा- धकत्वोक्तः । ध्यानं सप्रयत्नश्चित्तव्यापारः । यया 'केचित्वदेहान्तर्हदयावकाशे प्रादेशमात्रं पुरुष वसन्तम् । चतुर्भुजं कजरथाङ्गशझगदाधरं धारणया स्मरन्ती'सादिपूक्तं, आदिपदेन धारणा, एतैत्रिभिः समुचिरेकैकेन वा संयुक्ता भगवतो गुणा योगप्रभावादयो रूपली- लादयन्ध । कपिलदेवैः "स्थितं ब्रजन्तमासीनं शयानं वा गुहाशय'मिति घ्यानविपये लीला- नामप्युक्तत्वात् । तादृशा गुणा वर्ष्याः वृष्टिस्तित्सम्यन्धिन्य आपो वर्ष्याः, ता यथा दिव्याः भूमौ पतन्यो जलाशयान् खकाल एव भरन्ति, तथा योगादियुक्ता भगवद्गुणा अपि योगिषु वर्तमानाः भूमौ दुर्लभाः अधिकारिविशेषान् कृतार्थयन्ति, न सर्वानित्यर्थः । ययपि वृष्टिजलं क्षेत्रादौ पतितं सत् संसारहेतुर्भवति, तथापि सोशो नाम दृष्टान्तफल- तयाभिप्रेतः । तेषां योगित्वादन्तनिधत्वेन तथावस वक्तुमशस्यत्वात्, कुयोगित्वापा- तेन विदूरकाष्ठत्वापाताच, 'वैराग्यं सांख्ययोगौ च तपो भक्तिश्च केशवे, पञ्चपर्येति विधेयं यया विद्वान् हरि विशेदिति निबन्धे योगस्य विद्यापर्वत्वेनोक्ततयात्रोत्कय तहणाच । दान्तिकतयान गुणानामेवोक्तवाच । अन्यथा तु भावकथनसोपक्रान्तत्वेन तद्विरोधाप- तेश्य । तस्मात्पूर्वोक्तमेव दृष्टान्तफलं प्राथम् । इतः पूर्व कर्मशुद्धानामुक्तत्वादन तत्प्रस- लेन योगस्मरणं, योगस्यापि कर्मविशेषत्वादिति ॥७॥ अतःपर 'मवाभ्यः स्वाहेति श्रुतिमनुसृत्य कर्मसम्बन्धिनमेव द्वादशं भावमाहुः तप इत्यादि। तपोज्ञानादिभायेन खेदजास्तु प्रकीर्तिताः ।।८।। तुः प्रकरणभेदकः । 'तप सन्तापे,' शरीरेन्द्रियादिकं तपति यत्कर्म कृच्छ्चान्द्राय- णानशनादिरूपं तत्तपः, ज्ञानं सेघरसांख्यादिसिद्ध, आदिपदेन त्यागः, तेषां भावेन वि- , २० जलभेदः। धमानतया संयुक्ता ये गुणास्ते खेदजाः प्रकीर्तिताः । अत्र योगध्यानादिसंयुक्तपदैकदेश- मूतं संयुक्तं पदमनुषअते । तथा च ताशा गुणाः खेदजाः प्रकीर्तिताः, "विदा गावप्रक्ष- रणे,' धर्मश्रमादिना सन्तप्तादात्रात्प्रस्तं यजलं सः खेदस्तस्माजाता वर्षजलभिन्नत्वेपि विन्दुरूपत्वाद्वर्ण्यतुल्या अवर्ष्याः या आपो वस्त्रादावेकीमूतास्तत्तुत्याः । ता यथा न समी- चीनव्यवहारयोग्याः, किन्तु तद्गारखैव तापनिवारिकाः, नान्यस्य, एवं तद्गता गुणा अ- पीत्यर्थः । तेन तादृशामपि सङ्गो न प्रकृतोपयोगी । तपादिष्वेव विशेषामिनिवेशेन गुणानां गौणत्वात्कचिन्मुख्यत्वेपि प्रकृतानुपयोगित्वादिति । अवर्ण्यत्वं च वय॑भिन्नत्वे सति तत्समानत्वं, तच्च भूयः प्रक्षरणाद्वोध्यम् । सायणीये तु वर्ण्यनरपेक्ष्येण भूमाववस्थिता अवा इति व्याख्यातम्, तन्नास्माकं रोचते । पर्युदासस्य सदृग्नाहित्येन माववस्थिते तत्सदृशत्वामावात् । अतस्तदर्थं तत्र खेदजलमेव ग्रामं, भूयः सादृश्यादिति ॥ ८ ॥ अत-परं 'हादुनीम्यः स्वाहेति श्रुतिमनुस्य कीर्तयितृनिष्ठमुत्कृष्टं त्रयोदशं भावमाहुः अलौकिकेनेयादि। अलौकिकेन ज्ञानेन ये तु प्रोक्ता हरेर्गुणाः । फादाचित्काः शब्दगम्याः पतच्छन्दाः प्रकीर्तिताः॥९॥ तुः पूर्वोक्तसादृश्यभेदकः । अलौकिकं भगवत्कृपाजन्यं महदनुग्रहजन्यं वा अलौकिकार्यप्रकाशकत्वालोकविलक्षणं यत् ज्ञानं, तेन प्रत्यासत्तिमतेन मनसि तेषां माना. चेनैव श्रोतुरधिकारस्यापि भानात् प्रकर्षेण तदधिकारानुसारेणोकाः कादाचित्काः श्रोतृणां कस्मिंश्चित्कालविशेप एव पुद्धिगोचराः शन्दगम्या आसवाक्यादेव ज्ञायमाना ईदृशा ये हरेः सर्वदुःखहर्तुर्गुणाः रूपलीलाविशेपाः प्रकर्षेण कीर्तिताः । 'पल्ल गतौ,' पतन् सर्वतो गच्छन् शब्दो हादो यासामपां ताः पतन्छन्दास्तादृशाः प्रकर्षण कीर्तिताः। तथा च भगवतो रहस्सा ये गुणास्त्रे तारशेभ्य एक कीर्तयितभ्यः श्रोतृभिः प्राप्यन्ते, न सर्वैः । अतस्तादृशाधिकारस- मची तादृशां की यिवणां साः सर्वया कार्य एवेति भावः ॥ ९ ॥ गत परं 'पृगाभ्यः स्वाहेति श्रुतिमनुसृत्य चतुर्दशं जघन्यं भावमाहुः देवेत्यादि । देवापामनोद्भूताः भ्या भूमरिवोद्गताः। देन.: श्रीताः राणि" शिवाडिगागपपतिपगृतय आदिशन्देनान्ये मिल- मामादयस्तपापासनं भरूपगिन्तनं सेवन वा तेनोगता उपासके उद्गताः स्वयम- न्यैशानुभ्यमाना इति यत् । ईशा ये गुणाः ज्ञानयलसामर्थ्यादयस्ते पृप्वाः अवश्याय- जन्या गापः पृष्वा इति सायणमाम्ये व्याख्यातं, तत्तुत्याः । ता यथा पापापम्मी पतिताः, तत उनता इस मासन्ते, न तु नास्तदीयाः, एवं तेऽपि गुणा मगवदीया एष, 'यपदिति- मन्मत्त श्रीमर्पितमेव या, तत्तदेवावगन्छ व मम नजोशसम्मयामिति गीतावाक्योक्त- श्रीपुरुपोचमकृतविवृतिसमेतः। २१ न्यायात् । परन्तु तानुपासकाः स्वीयत्वेन देवीयत्वादिना वा प्रमान्मन्यन्ते, तेन च उत्सिन्यन्ते साहंकारा भवन्तीति यावत् । अतस्तेषां स्वरूपं फलं च जघन्यमेव । नीहारेण प्रावृता इति श्रुतौ नीहारस ज्ञानतिरोधायकत्वेनोक्तत्वादिति तेपूत्कर्पबुद्धिस्तादृशां सङ्गश्च न कार्य इत्यर्थः। अतःपरं 'सन्दमानाम्यः स्वाहेति श्रुतिमनुसृत्य पञ्चदशं मावमाहुः साधनेत्यादि । साधनादिमकारेण नवधा भक्तिमार्गतः ॥ १०॥ प्रेमपूर्त्या स्फुरद्धर्माः स्यन्दमानाः प्रकीर्तिताः। साधनानि वर्णाश्नमधर्मास्ते आदयो यस्स तादृशो यः प्रकारो मर्यादामार्गीयो निष्कामतकरणरूपस्तेन प्रकारेण यो नवधा भक्तिमार्गः। 'श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनं । अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् । इति पुंसार्पिता विष्णो मक्तिश्चेन्नवलक्षणे ति वाक्योक्तो मार्गो भगवत्प्राप्युपायः । ततो या प्रेम्णः मगवद्भक्ति- रूपस्स पूर्तिर्हदये व्याप्तिस्तया कृत्वा स्फुरन्तो भगवद्धर्मा येपु ते स्यन्दमानाः प्रकीर्तिताः । स्सन्द प्रस्रवणे, प्रसवणरूपा या आपस्तादृशाः । ता यथा स्नानपानाचमनादौ प्रशस्ताः खसंयुक्तां भूमि शीतलां कुर्वन्ति, मर्वानुपकुर्वन्ति च, तथा तादृशगुणाधाराः पुरुषा अपि पूर्वोक्तप्रकारेण सर्वान् श्रोहन् द्रष्टुंश्च खात्मनच भगवदुपयोगिनः कुर्वन्तीति ताशां सङ्गः कार्य इत्यर्थः ॥ १० ॥ अतःपरं 'स्थावराभ्यः स्वाहेति श्रुतिमनुएत्य पोडशं भावमाहुः यादृशा इत्यादि । यादृशास्तादृशाः प्रोक्ता वृद्धिक्षयविवर्जिताः ॥११॥ स्थावरास्ते मया ख्याता मर्यादैकप्रतिष्ठिताः। यादृशाः साधनादीत्यारम्य धर्मा इत्यन्तेन यत्प्रकारकाः सिद्धास्तादृशास्तत्प्रका- रकाः सन्तः प्रोक्ताः प्रकर्पण शास्ने उक्ताः, ये गुणाधारा वृद्धिक्षयविवर्जिताः न वर्धन्ते, न वा क्षीयन्ते, किन्त्वेकरूपास्तिष्ठन्ति । किञ्च, मर्यादैकप्रतिष्ठिताः । 'एके मुख्यान्यके- वला' मर्यादायामेव एके च ते प्रतिष्ठिताश्च एकप्रतिष्ठिताः मुख्याः प्रतिष्ठां च प्राप्ताः ते गुणाधारा मया स्थावरा एकत्र प्रतिष्ठिता या आपस्ताः स्थावराः तत्तुल्याः ख्याताः प्रकथिताः । ता यथा एकत्रैव तिष्ठन्ति साधारमेव च शीतलीकुर्वन्ति, गुणवत्तया ख्यापयन्ति च । नतु खत उद्यम्यान्यानुपकुर्वन्ति, तया ते गुणाधाराः पुरुषा अपि वसम्बद्धान् स्वाधार च ख्यापयन्ति । तेन तादृशां सनस्तावन्मात्रगुणकः, न तु विशेषानुग्रहफलक इत्यर्थः । अत्र मयेत्युक्त्या नान्येषां सम्मतिरिति बोधितम् । अन्येषां मर्यादाप्रतिष्ठितत्वेन पुष्टि- स्वरूपस्याज्ञानान्मार्यादिकपूरकृष्टयुद्धेरिति ॥ ११ ॥ अतःपरं 'नादेयीभ्यः साहेति श्रुतिमनुसृत्य सप्तदशंभावं सानाहुः अनेकेत्यादि । अनेकजन्मसंसिद्धा जन्मप्रभृति सर्वदा ॥ १२॥ सङ्गादिगुणदोपाभ्यां वृद्धिक्षययुता भुवि ।

२२ जलभेदः। निरन्तरोद्गमयुता नद्यस्ते परिकीर्तिताः ॥ १३ ॥ अनेकेषु जन्मसु संसिद्धाः सम्यक्सिद्धाः पूर्वानुरूपतया सिद्धाः । जन्मप्रभृतीति क्रियाविशेषणम् । एतजन्मारभ्य, सर्वदा सर्वस्मिन्काले सातगुणदोपाम्यां, आदिशब्देन कालकर्मदेशस्वभावास्तत्कृतौ यौ गुणदोपौ ताम्यां कृत्वा भुवि भवनं भूः उत्पतिर्विधमा- नता वा तस्यां वृद्धिक्षययुताः सत्सङ्गेन समीचीनदेशकालकमखमावैर्वृद्धिमन्तः दुःसंगा- दसमीचीनकालकर्मदेशस्वभावैः क्षयं प्राप्नुवन्तः, ईदृशाः सन्तोपि निरन्तरोद्गमयुता निर- न्तरो यदुनमः प्रयाहस्तेन युतास्तादृशा ये गुणास्ते नादेयीनामपामाधारभूता या नद्यस्त- तुल्या कीर्तिताः । तथा च नयो यथा काचित्खभावतः शुभाः काश्विदुष्टाः, यथा गङ्गा- दयः, कर्मनाशादयश्च, काश्चन कालतः, यथा 'कलौ वेत्रवती ग 'ति । गङ्गा च न पूर्वव- खानमात्रेण कुठं हरतीति, तथा देशतः, यया भागीरयो महानदी च प्रवाहदेशभेदात् । एवं संगादपि ज्ञेयाः, यथा श्रीयमुनासङ्गेन गंगा उत्कृष्टा जाता, तासां जलं च तादृशमेव, तथा तद्भावा अपीति तनिष्ठा गुणा अपि तत्स्वरूपा इति तादृशां संगो न निश्चयेनोत्तम- फलद इत्यर्थः । अत्र च नदीनामेतावद्विशेषणकथनं दान्तिके एतेषामेव धर्माणां प्राप्त्य- र्थम् । तेन भावेषु गुणेषु तदाधारेषु चैत एव धर्मा अतिदेष्टन्याः, नेतर इति सूचितम् । अन्यथैतावत्कथनवैयपित्तेरिति ॥ १२ ॥१३॥ अतःपरं 'सैन्धवीभ्यः स्वाहेति श्रुतिमनुस्त्याष्टादशं भावमाहुः एतादृशा इत्यादि । एतादृशाः स्वतन्त्राचेत् सिन्धवः परिकीर्तिताः। अत्रैतादृशा इत्यनेनाधन्तविशेषणयोः संग्रहः । खतन्त्रा इत्यनेन मध्यविशेषणनि- रासः क्रियते । तथा चैतादृशा अनेकजन्मसंसिद्धा निरन्तरोद्गमयुताः खतधाः जन्मप्रभृति सर्वदा संगगुणदोपाभ्यां वृद्धिक्षयरहिताश्चेत्स्युः तदा ते जीवाः सिन्धवः समुद्रगामिन्यो महानद्यो मदानदाश्च तत्तुल्याः परिकीर्तिताः । तेषां भावो महानदीजलतुल्यः । तपथा दृष्टं स्पृष्टं समीचीनव्यवहारेण शुभफलं गृहादावानीतमपि शुभम, तथा तद्गता गुणा अपि स्वरूपतः फलतश्योत्तमा इति ताशां संगः कर्तव्य इति भावः ॥ १३ ॥ अतःपरं 'समुद्रियाम्यः स्वाहेति श्रुतिमनुसृत्य तत उत्तममूनविंशं भावमाहुः पूर्णाइत्यादि। पूर्णा भगवदीया ये शेपव्यासानिमारुताः॥१४॥ जडनारदमैत्रावास्ते समुद्राः प्रकीर्तिताः। पूर्णाः मानक्रियामकिसाफल्ययुक्ताः भगवदीया भगवत्सम्बन्धिनः । भगवदीय- शुन्दो अव्युत्पन्नो वैडूर्या दिशन्दवद्र्दो 'मगवदीयत्वेनैव परिसमाससयों' इति श्रीभाग- यतपसमस्कन्धे प्रयोगादवगन्तव्यः । य इति दुर्लभत्वं तेपा सभ्यते । तान् गणयन्ति शेपेत्यादि । शेषः संकर्षणः सनरकुमारोपदेष्टा । य्यासो भगवान् यादरायणः, भगवतो ज्ञानावतारः, समाधी भगवत्स्वरूपं लीला चानुभूय श्रीमागवतगुक्तनान्, शुकं च पानि- श्रीपुरुपोत्तमकृरावितिसमेतः । पान् । अमिरमिपुराणवक्ता, मारुतो वायुपुराणवक्ता, जडो रहूगणोपदेष्टा, नारदः प्रसिद्ध एव, सनत्कुमारशिष्यः प्राचीनपहिर्गुरुः, मैत्रो मैत्रेयः विदुरोपदेष्टा, आदिपदेन शिवादिसम्रहा। ते समुद्राः प्रकीर्तितास्तेयां मावः समुद्रजलतुल्यः । समुद्रजलं यथातिगम्भीरं अक्षोम्यं स्नानामाकरमूतं तथा तेषां मावोप्यत्यन्तगम्भीरोऽक्षोम्यो नानाविधमावाकरश्चेति तन्निष्ठा गुणा अपि तथेति ताशां संगः सेवा स्वरूपतः फलतवोत्तमेति सा कार्येत्यर्थः ।।१४३।। पूर्व भावनिरूपणारम्भे श्रुतिपुराणसिद्धाः गन्धर्वाः 'कूपमेदास्ति'त्यर्थेन यथा नानामेदा उतास्तथा अन्ते पुराणादिप्रसिद्धान् भगवदीयानपि नानामेदान् द्वाभ्यामाहुः लोकेत्यादि । लोकवेदगुणैर्मिश्रभावेनैके हरेर्गुणान् ॥ १५ ॥ वर्णयन्ति समुद्रास्ते क्षारायाः पट् प्रकीर्तिताः । गुणातीततया शुद्धान्सचिदानन्दरूपिणः ॥ १६ ॥ सर्वानेव गुणान्विष्णोर्वर्णयन्ति विचक्षणाः । तेऽमृतोदाः समाख्यातास्तढाक्पानं सुदुर्लभम् ॥ १७ ॥ लोकश्च वेदश्च गुणाश्च लोकवेदगुणास्तैमिश्रभावेन मिलितत्वेन एके मुख्यमगवदीयाः हरेः सर्वदुःखहर्तुगवतो गुणान् वर्णयन्ति । यया वाल्मीकी रामायणे रामगुणान् लोकमि- श्रानुक्तवान् । यथा चाध्यात्मरामायणे शिवो रामगुणान् वेदमिश्रान् । यया विष्णुपुराणे पराशरः सत्त्वगुणमिश्रान् । यथा च मनुःस्मृत्यारम्भे रजोमिश्रान् । 'स्वयंभुवे नमस्कृत्ये'- त्युक्त्वा पश्चादने सृष्टिं वर्णयिष्यन् 'ब्रह्मा नारायणाख्यस्तु सुप्वाप सलिले तदे'त्युक्तवान् । यथा च वायुर्यायवीये शिवरूपमेव ब्रह्मत्वेनोक्तवान् । न च मनोर्मगवदीयत्वामावः शंक्यः । तृतीयस्कन्धे तस्य तथात्वसाधनात् । न वा पायोः । हनुमदवतारे तस्य रामम- क्तत्वेनैव सुप्रसिद्धलादिति । न च गुणमिश्रवर्णने गुणाभिमानिवर्णनमिति शंस्यम् । तत्र तदुत्तेपु ब्रह्मविष्णुमहेश्वरेषु अमिमानित्वापादकस कालमयस्सानु क्तत्वात् । अतो गुणा- वतारा एव तत्रोच्यन्ते, न जीवाः । एवमत्र लोकवेदगुणमिश्रभावेन पचैव सिध्यन्ति, न पाठः, अतो लोकवेदगुणेरुपलक्षितान् मिश्रभावेनोपलक्षितान् हरेर्गुणान् वर्णयन्तीति व्या- ख्येयम्, तथा सति संकीर्णपुराणवक्तारः षष्ठा भविष्यन्तीति तैः संख्यापूर्तिः । एवञ्च तत्त. द्रावस्तत्तमलतुल्योवगन्तव्यः । तजलं यथा क्षाराम्तमादनाव्यक्तमधुरस्नेहव्यक्तमधुरगुणकम् , तथा तेषां मावोपीति तनिष्ठा गुणा अपि लोकादिप्रधानास्तदनुरूपफलदा इति तत्संगोषि तपेत्यर्थः । न च गुणाद्युपलक्षिता गुणा न मूलगुणा इति शंक्यम् । 'यदादित्यगतं तेज' इति न्यायेन तेषामपि मागवतले बाधकामावादापाततः प्रतीतेरप्रयोजकलाच, अत एव नि- पन्धे 'सर्वस्वरूपी कृष्णस्तु का तेषु तयोदित' इति स्थितमिति न काचिच्छङ्गा । एवं पद समुद्रतुल्यान् भगवदीयानुफ्वा सर्वत उत्तमान् सप्तमानाहुः गुणातीततयेत्यादि। स्वस्य गुणातीततया शुद्धान् लोकवेदगुणामिश्रान् सचिदानन्दरूपिणः सचिदान- २४ जलभेदः । न्दात्मकान्, विष्णोरित्यस्य वा विशेषणं, तथा च सच्चिदानन्दरूपिणो विष्णोः तादृशान् शुद्धान् सर्वान् गुणान् स्वयं गुणातीततया विचक्षणाः सर्वज्ञातारः सन्तो ये वर्णयन्ति, ते अमृतोदाः शुद्धोदसमुद्रतुल्याः सम्यक्झकारेण आख्याताः कथिताः । अतस्तादृशां भावो गुणातीत एवेति । तत्र भगवद्गुणा अपि स्वस्य यथावत्स्वरूपतया प्रकाशमाना भवन्तीति तेषां संगो दुर्लभ इति तद्वाक्यानां तेषां या वाचस्तासां स्वान्तःप्रवेशनं सुतरां दुर्लभमि- सर्थः । अत्र शुद्धोदा इत्यनुक्त्वा यदमृतोदा इत्युक्तं तेन घेतद्वीपादिपरिखाभूतावर- ण्याख्यौ 'अरश्च ह वैण्यश्चार्णवौ ब्रह्मलोके' इति श्रुत्युक्तौ 'अरनामामृतांभोधियॆनामामृत- सागर' इति वाराहपुराणोपहिती समुद्रावपि संगृहीती ज्ञेयौ। किञ्च, 'कूप्याम्य' इत्यादि- श्रुतौ 'सर्वाम्यः स्वाहेति समाप्तायुक्तम् । तत्र सर्वशन्दस्य पूर्वोकसंग्राहकत्वे अपां ऊनर्वि- शति भेदा एव भवन्तीत्यभिप्रेत्य सर्वशन्दस्य समुद्रजल एव निवेशः कृतः । एतदभिप्रा- येणैव 'नद्यः प्रसन्नसलिला' इत्यस्य सुयोधिन्या 'मापो पहुविधा एकोनविंशति भेदा' इत्यु- क्तम् । न च पूर्व शेषादीन् सप्तोक्त्वा ततो लोकेत्यादि सार्धद्वयेन समुद्रविभागस्सोक्तत्वा- च्छेपादय एव सप्तात्र ग्राह्याः, नेतर इति शंक्यम् । तत्र यथायथं क्रमेण ग्रहणे शेपन्यासयोः क्षारदधिमण्डोदतुल्यत्वापत्त्या प्रतिलोमग्रहणे च मैनेयनारदयोस्तथात्वापत्या निकांपत्तेः । अतस्तत्रापशब्दोक्ता इतर एव किश्चित्तद्धर्मसाम्येन पट् ग्राह्याः । तेन पू. र्वोक्ताः सप्तामृतोदेष्वेव प्रविशन्तीति मम प्रतिभाति ॥ १५-१७॥ नन्वेवं सति तेषां तादृशां च दुर्मिलत्वात्तद्वाक्यानामिदानीन्तनानां कालादिदोषदुः- टानामलम्यमेवेति वक्तव्यं, न तु सुदुर्लभमिति शङ्कायामाहुः तादृशानामित्यादि । सादृशानां फचिद्वाक्यं दूतानामिव वर्णितम् । अजामिलाकर्णनवद्विन्दुपानं प्रकीर्तितम् ॥ १८ ॥ तादृशानामपि कचिद्भगवतोद्धार्यत्वेन विचारिते केनचिदपराधादिना भगवद्वियुक्ते पुरुप भगवतस्तवारोदिधीर्षायां वाक्यं श्रुतिगोचरं भवतीति शेपः । तत्र प्रमाणमाहुः इतानामिव वर्णितमिति । यया पष्ठस्कन्धे भगवद्दतानां वर्णितं वाक्यमजामिलस श्रुतिगोचरमभूतपेदानीमपि मगवदुविधीपाविपयस भवतीति नालम्यम्, किन्तु सु दुर्लममेवेत्सर्यः । एवं ताशां सङ्गं तद्वागन्तःप्रवेशं च साधयित्वा श्रोवणामुद्दिधी- विशेपपिपयत्वप्रकारज्ञापनाय पाने विशेपमाहुः अजामिलेत्यादि । अजामिलेन यथा पभद्तान् प्रत्युत्पमानं भगवडूतवाक्यमाकर्णितं, तथा चेदाकर्णयेत्तदाकर्णनं बिन्दुपानं प्रकीर्तितम् । जलबिन्दोर्यथा पानं न तृप्तिदं, किन्वीपत्सुसद, तथा स्वोदेशेनान्यान प्रत्यु- प्यमानं तदुदेशेन वा तान् प्रत्युच्यमानं स्वयमाकर्णयेत्तदा तहिन्दुपानतुल्यं स्वदोपज्ञानेन सामारिकग्लानिजनक पचासन्मान्तरे भगवत्प्राप्तिफलक चेत्यर्थः । यदा लेतदुदेशेनैव १बास्मोकिमिसरासरमन्यासः ।

श्रीपुरुपोत्तमतविवृतिसमेतः । भगवगुणयोधकं वाक्यममृतोदतुल्यैरुच्यते, तदा विहैव भगवत्रासिफलदमिति तत्स्व- रूपमाहुः रागेत्यादि । रागाज्ञानादिभावानां सर्वधा नाशनं यदा । तदा लेहनमित्युक्तं खानन्दोद्गमकारणम् ॥ १९ ॥ रागम्य अज्ञानं च ते आदियेपा तादृशा ये भावाः कामक्रोधादिविकारभाजस्तेषां यदा नाशनं निवृत्तिरमृतोदानां वाक्येन भवतीति 'शेपः । तदा तद्वाक्पानं तत्कालमेव स्वगुणं जनय- लेहनमित्युक्तं, लिह आखादने, आखादनमित्युक्तम् । तत्र हेतुः । स्वानन्दोद्गमकारण- मिति । स्वस्य भगवतोय आनन्दःखरूपात्मको लीलात्मको वा तस्य य उद्गम उच्चैः प्राकट्यं तस्य कारणं, तथा चैवं दोपनिवृत्तिपूर्वकपरमानन्दसाधकत्वात्तत्पानं लेहनरूपमित्यर्थः । एव- मपां ऊनविंशतिभेदपक्षादरणेन सर्वे भावास्तद्वन्तो जीवास्तद्गता गुणाश्च प्रपश्येन निरूपिताः। अतः परं सायणीये 'सर्वाभ्यः स्वाहे'त्यस्य तक्ष्यतिरिक्ता इत्यर्थ उक्त इति तमनुसृत्य पूर्वेभ्योतिरिक्तं विशं भावमाहुः उद्धृतेत्यादि । उद्धृतोदकवत्सर्वे पतितोदकवत्तथा । उक्तातिरिक्तवाक्यानि फलं वापि तथा ततः ॥२०॥ सर्वे पूर्वोक्तातिरिक्ता ये गुणा गावास्तदाधाराश्च ते उद्धृतोदकवत् कूपतडागादिन्यः पात्रेपूद्धृतं यदुदकं तद्वत्, उद्धृतं जलं यथा परिमितं यादृशभाण्डस्थं तदनुरोधेन शुद्ध्य- शुद्धिमच्च भवति । कचित्किञ्चित्वाकारानुकार्यपि भवति । तथा ते उक्तातिरिक्ता भावा अपि परिमिता आधारानुसारेणाकारानुसारेण घ शुद्ध्यशुद्धयादिमाजः । तथेति वैयधिकर- ण्यदृष्टान्तवोधकं, उक्तातिरिक्तानां भावाधिकरणानां वाक्यानि, पतितोदकवत् पात्रेभ्यः पतितं यदुदकं तद्वत् । पतितोदकं यत्र पतति तदाकुर्वत् कचिद्गुणं कचिदोपं च विधत्ते । तथा तेपां वाक्यानि आधारमार्दीकुर्वन्ति, तदनुसारेणैव गुणदोपकराणि । त्य- नादरे, आत्मनः फलमपि तथा, आत्मनो गुणाधारस्य फलमपि तथा भावयदेव । चकार- पाठे तु च पुनरित्यर्थों वक्तव्यः ॥ २० ॥ एवं भगवद्गुणाधारभूतान् जीवानां भावान् तदधिकरणभूतान् जीवांश्च भगवद्गुण- खरूपफलभेदार्थ निरूप्योपसंहरन्ति इतीत्यादि । इति जीवेन्द्रियगता नानाभावं गता भुवि । रूपतः फलतश्चैव गुणा विष्णोर्निरूपिताः॥२१॥ इति उक्तप्रकारेण भुवि भूलोके जीवेन्द्रियगताः, जीवाः शरीरविशिष्टाचेतनाः, इन्द्रियाणि मनोवाक्चक्षुःप्रभृतीनि, तद्गतास्तेपु स्थिताः नानाभावं गताः, ता सित्यैव १ रागनिवृत्तिः प्राचीनवर्हिष. जाता । यथा चासननित्तिः रहूगणस्य जाता । यथा च आदिशन्देन द्वेषस्तनिवतिः विदुरस्य जाता । एपमन्यत्र । ४जल.

जलभेदः। रूपतः फलतच अनेकभावं प्राप्ताः, विष्णोर्व्यापकस्स भगवतो गुणा धर्माः निरूपिताः, नितरां कथिताः । तथा च भगवन्निष्ठत्वेनैकरूप्येप्याधारभेदेन तल्लिङ्गास्तदनुरूपफलाश्च भव. न्तीति तदाधारस्वरूपं विचार्य तज्ज्ञानार्थ जीवसङ्गो भगवद्भक्तैर्विधेयो, नतु कथञ्चित् गुणसत्तामात्रेणेत्यर्थः । अनोपसंहारे गुणा निरूपिता इति कथनेन गुणनिरूपणमेव मु. ख्यम् । भावतदाधारनिरूपणं तु तदुपोद्धाततया प्रासङ्गिकमिति चोधितं ज्ञेयम् ॥ २१॥ इति श्रीमदल्लभाचार्यचरणैकतानपीताम्बरात्मजपुरुपोत्तमविरचिता जलभेदविवृतिः सम्पूर्णा ॥ श्रीकृष्णाय नमः। जलभेदः। श्रीवल्लभकृतवितिसमेतः। श्रीमदाचार्यचरणसरोजे शरणं सदा । तेनैव खलु तद्वाक्यमावार्थावगतिर्मम ॥१॥ नानामार्गेषु विविधभावस्ते तेऽधिकारिणः । प्रवृत्तास्तत्तदेवात्र मन्यन्ते भजन हरेः ॥२॥ अतस्तन्मार्गभावाधिकारिणां तत्स्वरूपतः । फलतश्च निजाचार्याः सन्देहविनिवृत्तये ॥३॥ वेदचोधितकूपादिजलद्दष्टान्तभेदतः । विवेक चक्रिरे तत्तदावार्थो हि प्रकाश्यते ॥४॥ तत्र प्रथमं 'निवृततरुपगीयमानादित्यत्र भगवगुणानुवादे 'आत्मघाती कर्मजडो निन्दितार्यरतः सदा । पशुस्नी च एतव्यतिरिक्तानां सर्वेषां प्रवृत्तिरुक्ता । ते च मुक्तमुमु- क्षुविपयिणः । तमुक्तानां 'आत्मारामाश्च मुनय' इत्युक्तप्रकारेण प्रवृत्तिः । मुमुक्षूणां वि. हितभक्तिज्ञानयोगतपःकर्मादिसाधनप्रकारेण बहुधा सा भवति । विपयिणां तु तत्र रामा- दिमाधुर्यतः प्रवृत्तिर्न तु धर्मतः । तथा च, 'वेदे रामायणे चैव भारते' इत्यत्र 'हरिः सर्वत्र गीयते' इत्युक्तत्वात् सर्वत्र सर्वेषु धर्मेपु भगवद्गुणप्रवेशस्यावश्यं वक्तव्यत्वात् तेषां सर्वेषां साधनफलयोरेकरूपत्वं या नानात्वमिति सन्देहे तन्निर्णायक ग्रन्यं निरूपयितुं श्रीमदा- चार्यचरणाः प्रतिजानते-- नमस्कृत्य हरि चक्ष्य तद्गुणानां विभेदकान् । भावान्विशतिघा भिन्नान्ससन्देदवारकान् ॥१॥ हरि नमस्कृत्य भावान् वक्ष्ये । मावास्तु 'इति जीनेन्द्रियगता' इत्यत्रोपसंहारे जीवगता एकोक्ता इत्युपकमेपि त एष ज्ञेयाः । तैरेव भगवद्गुणानामनेकरूपत्वम्, अन्यथा मगवद्गुणाः सर्वे ततस्वरूपात्मका इलेकरूपत्वमेव, गुणगुणिनोरभेदात् । आधारगुणः सम्पन्यादेव तेषां भेद इति विशेषणमाहुः तद्गुणानां विभेदकानिति । भगवद्गानां धीवाभाडेयरी विषये उपोद्धानो द्रष्टय ।

२७ श्रीवल्लभपतविवृतिसमेतः । स्वरूपतः पृथकारकान् भिन्नत्वेन ज्ञापकानित्यर्थः । अथवा स्वखभावानुसारेण फलसाध- कान्, न तु तदनुसारेणेत्यर्थः । एतदेव भेदकत्वं भावानाम् । ते भेदाः कतीति प्रमाण- माहुः विंशतिधा भिन्नानिति । तत्रापि द्वैविध्यम् । एके जीवाधिकारानुसारिणः । एके पुनः कृपया भगवद्दानजन्याः खरूपनिष्ठाः खतत्रास्ते भिन्नाः, ते एवाने अमृतोददृष्टान्तेन वाच्याः । एते सर्वेपि भेदा वेदे कथिताः 'कूप्याभ्यः स्वाहा' इत्यादिना । एतद्विवेचने सर्वेषां स्वरूपज्ञानेन सर्वे सन्देहा निवर्तन्त इत्याहुः सर्वसन्देवारकानिति । एतद- र्थमेव वेदेप्युक्ताः ॥१॥ ननु कूपादिदृष्टान्तेन भेदज्ञानं कथं भविष्यति तनाहुः- गुणभेदास्तु तावन्तो यावन्तो हि जले मताः। गायकाः कूपसंकाशा गन्धर्वा इति विश्रुताः॥२॥ नमन कूपादिदृष्टान्तः, किन्तु तत्तस्थितगुणदोपसहितजलदृष्टान्तोभिप्रेतः । तेन यावन्तो जले भेदास्तावन्तो भेदा गुणानामपि भवन्तीति भावः । तर प्रथमं प्रथमाधिका- रित्वाद्विपयिणां मावमाहुः गायका इति । गायका भगवद्गुणगायकाः । ते तु गन्धर्वा वि- श्रुताः प्रसिद्धाः । तेपामयमेव सहजो धर्मः यत्सङ्गीतशास्त्रोक्तं भगवद्यशः प्रवन्धरागताना- घालापकुशला रागादिमाधुर्यविषयत्वेन गायन्ति, न तु भगवद्धर्मस्वरूपं ज्ञात्वा, परन्तु भृतकाध्यापनवन्न गायन्ति, तादृशास्ते कूपसकाशाः कूपतुल्याः प्रोक्ताः । सामान्यतः कूप उक्तो, न तु गुणदोपयुक्त इति । यथा कूपो महान् रमणीयः, जलमपि समीचीनमेव, परन्तु दूरे अधस्तलं, तेनेतरविपयप्रयत्नत्यागेन रज्ज्वादिसाधनपूर्वकं तदाहरणे तत्प्राप्तं भवेत्, तथा तेषां मगवद्यशोगानं तूतममेव, परन्तु तस्य परमफलमन्यविषयकप्रयत्नत्यागे तदेक- निष्ठगुणगानेन प्राप्तं भवेत्, नो चेद दूर एवेति भावः सूचितः । वस्तुखभावात्तथा भवेद- पीति सामान्यदृष्टान्त उक्तः ॥२॥ एतादृशा गन्धर्वा अपि वहुविधा इति तद्भेदानाहुः- कृपभेदास्तु यावन्तस्तावन्तस्तेपि संमताः। कुल्याः पौराणिकाः प्रोक्ताः पारंपर्ययुता भुवि ॥३॥ यथा कूपभेदा यहवस्तथा गायका अपि बहुविधा ज्ञेयाः । तानेवाग्रे 'वेश्यादिस- हिता' इत्यनेन वक्ष्यन्ति । मध्ये पौराणिकान्निरूपयन्ति कुल्या इति । यद्यपि गायक- प्रकरणमध्ये पौराणिकनिरूपणं न संभवति, तथापि यन्निरूपितं तत्ताशपौराणिकानां गा- यकतुल्यत्वमेवेति ज्ञापनायोक्तम् । अनायं भावः । गानं द्विविधम् । एकं संगीतशास्त्रोक्तं रागतालमूर्च्छनादिभेदेन । अपरं वक्तृश्रोतृसद्भावे पुराणाकथनद्वारा गुणानुकीर्तनम् । उभ- येपि तत्तदुपजीविनः, परन्तु भृतकाध्यापनवन्न गायन्तीति सामान्यदृष्टान्तेन ज्ञायते । वृत्युपजीविनामने निन्दितत्वाच । एवं सति सामान्यत उभयेषां समानधर्मत्वादायकानां

जलभेद ।
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मध्ये सामान्यत पौराणिकानपि निरूपयन्ति कुल्या इति । तेपा पुराणादिकथन तु
परपराप्राप्तम्,
न तु कञ्चनोद्दिश्य ते कथयन्ति, तादृशास्ते कुल्या अल्पा कृनिमा सरित
प्रवहणशीलास्तत्तुल्या इत्यर्थ । यद्यपि ता अपि पारपर्ययुता , यत आनीयन्ते तनागाधता,
तथापि स्वय त्वल्पा कृषिमा , न तु सहजा । तेनोपरोभे रुद्धा अपि भवन्तीति सूचि
तम् । तथा तेऽपि यत पुराणार्थीवगत स गुरुर्महान् , परन्तु स्वय त्वल्पपानरूपा
साहजिकभगवद्धर्मप्रवृत्तिरहिता । ससारस्थिता । उपरोधे रुद्धा अपि भवन्ति तादृशा ।
परन्तु प्रवहणशीलत्वात् कुल्याना तदृष्टान्तेन पुराणकथनद्वारा यथाधिकार धर्मोपदेशका
इनि गायकसकाशादेतावान् विशेषः । अत एव द्वितीयभावत्वेन निरूपणम् ॥ ३॥
ताशा अपि केवल वृत्त्यर्यमेव पुराणपाठका , तदा ततोपि हीनत्वमाहु
क्षेत्रप्रविष्टास्ते चापि ससारोत्पत्तिहेतवः ।
ते च पुन क्षेत्रप्रविष्टा क्षेत्र पत्नीशरीरयो रिति श्रीपुत्रादिमरणपोपणा) पुराणा-
दिपाठे प्रविष्टास्तदा ससारोसतिहेतवो भवन्ति । यथा कुल्यासवन्धिन्य आप क्षेत्रेषु
प्रविष्टा यदा तदा ससारोत्पत्तिहेतवो रजोगुणयुक्तत्वेन रते पोपकवस्तूपादकत्वादविद्या-
धर्माणामेयोत्पादिका भनन्ति, न तु प्रवहणदशावच्छोधकत्वमुपकारकत्ल या तेपा, तथा
तेपि सासारिकस्त्रीपुनादिभरणपोपणमानोपयोगित्वेन पुन पुनर्जन्ममरणादियुक्ता एवं
भवन्ति, न परोपकारका स्वात्मशोधका वा भवन्ति । तादृशश्रवणपाठात् शक्तिहासे पुरा
णार्था फलदा न भवन्तीति भाव । एतेन तेपा नृतीयमार्गप्रवेशो निरूपित ॥ ३३ ॥
एव भेदद्वयमुक्तमत पर गायकभेदानाह .
वेश्यादिसहिता मत्ता गायका गर्तसंजिताः ॥४॥
पूर्वोक्ता गायका भृतकधर्मरहिता । तेपामन्यधर्माधिकारामावात् गाने भृतकधर्म-
राहित्यमानमेनोत्तमत्वम् । तादृशा पुनर्वेश्यादिसहिता , आदिपदेनान्येपि विधर्मा पाना-
दय सूचिता । अत एव मत्ता , स्वपरधर्मविवेकरहिताश्चेत्तदा गर्ततुल्या । गौन जलर-
हितान्धप । स यथावस्तलपर्यन्तगत दुष्टनीवककालादिस्थानभूतोन्येपा पतनहेतुथ
मवति, तथैतेपि सय वधोगता एवान्येषामपि पातहेतनो भवन्तीति भाव ॥४॥
एव चतुर्थं भावमुक्त्वा पञ्चम भापमाहु
जलार्धमेय गर्तास्तु नीचा गानोपजीविनः।
गर्ती अपि पहुविधा इति ये जलाथ जलसद्दार्थमेव क्रियन्ते, गानोपनीविनो भृत-
काध्यापनपत् गन्ध स्तनुल्या । यथा तबलस्य प्रयोजनमुपजीवनमेन, नान्यत्, कर्माधु-
। पयोगिताभावातीधरूपत्यामावाय । तथा तेपामपि तेन गानेनोपजीवनमेव मवति, न
तु कश्यन पिशिष्टो धर्मो भाति, प्रत्युत पापमपि भवेनिपिद्धत्वातस्येति भाव । एप
गन्धर्वाणा प्रयो भेदा उत्ता ॥४॥

२९ श्रीवल्लभकृतविवृतिसमेतः । एवं विषयिणां भावानुक्त्वा मुमुक्षुणां मावानिरूपयन्तः पाठं भावमाहुः- हदास्तु पण्डिताः मोक्ता भगवच्छास्त्रतत्पराः॥५॥ दास्त्विति । पूर्वे तु सन्मतित्वाभावादपण्डिताः, एते तु पण्डिताः धर्माधर्मविवे- किनः कर्ममार्गीया यद्यपि गृहादिसंसक्तास्तथापि निवृनिमुखाः । अत एव मोक्षेच्छया भगवच्छास्ने तत्परा जाताः । ताशास्ते हृदा हृदतुल्या इत्यर्थः । अनापि सामान्यतो हद उक्तो, न तु कयन विशेषः । तेन हदो यया प्रवाहधर्मरहितो निर्मलः, तथा तेपि प्रवा- हधर्मानिवृत्ता निर्मलमज्ञा इति सूचितम् । तत्परत्वकथनेन तद्धर्मजिज्ञासैवास्ति, न तु निःसन्दिग्धं धर्मा ज्ञाता इति ज्ञाप्यते । एतेन तेषां प्रथमप्रवृत्तिः सूचिता ॥ ५॥ ततोग्रेतनभावविशिष्टं स्वरूपं निरूपयन्तः सप्तम भावमाहुः- सन्देहवारकास्तत्र सूदा गम्भीरमानसाः। सराफगलसंपूर्णाः प्रेमयुक्तास्तथा वुधाः ॥ ६॥ तत्र भगवच्छास्त्रेषु ये सन्देहवारकाः, यहूनां मतानां कथनात्तेपु सन्देहा उत्पधन्ते, तेषां ये निवारकास्ते सूदाः । सुष्टु शोभनमुदकं येपां तादृशा हदास्वद्रपाः । शोभनत्वकथ- नेन गुणविशेष उक्तः। किच, गम्मीरमानसा इति गंभीरं मानसं येपां, भगवद्धर्मज्ञाने- नान्ययाभावनाविपरीतभावनादिना कलुपितं न भवतीति मावः । पूर्वेपु गंभीरत्वसूदत्वा- दिगुणाभावात्सामान्यत्वमुक्तम् । तत्र विशिष्टधर्मत्वाततो विशेप उक्तः, तथा दान्ति- केपि सन्देहपारकलविशेषः । परन्तु ज्ञानस्यैव विशेपो न क्रियाया इति दृष्टान्तेन सूचितं भवति । अतः परं पूर्वतो विशिष्टमष्टम भावमाहुः सर:कमलसंपूर्णा इति । पूर्व तु शास्त्रज्ञानेन पूर्णा उक्ताः, गंभीरमानसत्वकथनेन ज्ञानस्थैर्यमप्युक्तम् । एते तु बुधाः ज्ञानिनः पुनः प्रेमयुक्ता भक्तियुक्ता इति सरःसंपन्धिन्यः कमलेश्च संपूर्णाः आच्छादिताः ताश्य आपस्तद्रूपाः । सरस्तु विहितं गवति । तत्र कमलं भक्तिरूपं, तेन पूर्णा आपः रसरूपाः । तत्तुल्यत्वकथनेन विहितभक्तिसहितप्रेमयुक्ताः ज्ञानेन च वासितास्तादृशास्त इति सूचितम् । तेनात्र क्रियापि सूचिता । रसय विहितसर संवन्धित्वेन विहितभचयनु- सार्येव प्रेमापि तेप्विति सूचितम् । एवमेते अयोपि क्रमत उत्तरोनरविशिष्टधर्मसहिताः सामान्यतो विहितभक्तिमार्गीया उक्ताः ॥ ६॥ अतः परगेतेष्यप्यवान्तरमेदान्निरूपयन्तो नवम भावमाहुः- अल्पश्रुताः प्रेमयुक्ता पेशन्ताः परिकीर्तिताः । कर्मशुद्धाः पत्चलानि तथाल्पश्रुतभक्तयः ॥७॥ पूर्वोक्तेषु सरोदृष्टान्तीयेपु केचनात्यं श्रुतमध्ययनं येपामेतादृशाः, परन्तु भगवद्गुणेषु प्रेमयुक्ताः, ते पेशन्ताः अल्पसरोरूपाः परिकीर्तिताः । प्रेमयुक्तत्वेपि विहितत्वेन प्रवृत्त- त्वात् संपूर्णभगवद्धर्मज्ञानं विना गक्तिईदा न भवतीत्यल्पसरोदृष्टान्त उक्तः । यथाल्पसरो

३०
जलभेदः।
नष्टमपि भवेत्तथैतेपा भावा अपीति मावः । एतेन पूर्वापेक्षया हीनभावस्वमुक्तम् । एतदेवोक्तं
तत्त्वार्थदीपे 'शास्त्रज्ञानाभावेपि प्रेम्णा भजते स मध्यम' इति । एवं सर्वमित्यत्र । अतोपि
होनत्वेन दशमं भावमाहुः कर्मशुद्धा इति । कर्मणैव शुद्धाः निःकामकर्मादिना चित्तशु-
द्वियुक्ताः, नतूत्पन्नज्ञानभक्त्यादयः, ते तु पल्वलतुल्याः । यद्यपि वेशन्तपल्वलयोन भेद-
स्तथापि वेदे यथेन्द्रमहेन्द्रयोर्भेदः स्वीकृतस्तथा वेशन्तपल्वलयोरपि 'वेशन्तीम्यः स्वाहा
परवल्याभ्यः स्वाहे'यत्र भेदनिर्देशः कृत इति तथात्वेन दृष्टान्तः। परं तत्रैतावान् विशेषः ।
पल्वलमपि द्विविधम् । एक कमलादिरहितम् , अपर तत्सहितम् । पूर्वोक्तेषु भक्तित्वा(सत्त्वात्
कमलसहितवेशन्तदृष्टान्त उक्तः, कर्मशुद्धेषु विहितैकनिष्ठेपु तद्रहितदृष्टान्त इति, यथा प-
त्वलं स्वल्पं सर्वदा स्थिरजलं न तिष्ठति, वर्षाकाले पुनः पूर्ण भवति, तदपि खरूपतः
खल्पं, तथा कर्मपूर्ती पूर्णता, तस्य क्षये शुष्कतेति जन्ममरणादिसहिता निरूपिताः ।
पूर्वोक्तेषु कमलादिसहितवेशन्तदृष्टान्तेन भक्तिमत्त्वेन जन्ममरणाद्यभावोपि संभवति ।
यथा कमलादिसंपत्तिशोभादर्शनादिना कदाचित्तस्य महत्त्वं रक्षां च कश्चित्कारयति तथे-
त्यर्थः । एतेषु तदभावान्न तथेति भावः । कदाचिजन्मान्तरे तादृशो ज्ञानी भवतीति निवन्धे
निरूपितम् । किन्च, यथा एतादृशाः पत्वलरूपाः प्रोक्तास्तथा वेशन्तदृष्टान्तीयानां पूर्वम-
ल्पश्रुतलं प्रेमयुक्तत्वं च निरूपितम् । ते पुनरत्पश्रुतभक्तयो भवन्ति, तदा पल्वलतुल्या
एवेति भावः । श्रुतं तु पूर्वमप्यत्पमेव केवलं प्रेमयुक्तखेन कमलसहितवेशन्तदृष्टान्त उक्तः ।
तदमावापत्वलतुल्यत्वं युक्तमेव ॥ ७॥
एवं कर्ममार्गीयानां खरूपमुक्त्वा योगादिभावानांखरूपं निरूपयन्तः एकादशं भावमाहुः ।
योगध्यानादिसंयुक्ता गुणा पाः प्रकीर्तिताः ।
तपोज्ञानादिभावेन स्वेदजास्तु प्रकीर्तिताः ॥ ८ ।।
योगोज्याः । तत्र ध्यानादिः कल्पितमूर्तस्तेन संयुक्ता ये गुणास्ते चर्पाः वर्षासम्ब-
धिजलतुल्या इत्यर्थः । वर्षा यथा शून्यावलम्धिन्यः, न स्वरूपावलम्बिन्यस्तत्रापि फल-
साल्पत्वात् ता अपि प्रथमोद्भता विरलाः पतनमात्रेण शुष्का भवन्ति, न तु क्वचिदातां
संपादयन्ति, तथा तादृशा अपि न भक्तिफलाधिकारिणः । किन्तु तत्साधनानुसारिफला.
धिकारिण इति भावः । यतः परं द्वादशं भायमाहुः तपोज्ञानादीति । केचन तप एव
परं मला कुर्वन्ति, केचन ज्ञानमेव केवलं परं मन्यन्त इति तेषां स्वरूपमाहुः-तपः प-
शामिसापनादीनि, जानं केवलं, तर प्रवृत्तानां मावाः खेदजा खेदजलतुल्याः कथिता
इत्ययः । यया श्रमेण खेदजलं सवति । ऊप्मणा या । अपवित्रमप्रयोजनकं च भवति,
तयैवते मावा. अमसाधकाः, न तूकृष्टफलदाः । अग्रेषि तापकारकाः संसारकरणादिति
मापः । अत एप 'रहुगणैतत्तपसा न याति न चेज्यया निपगाइहादा । न उन्दसा
नैव जलामिसूर्यविना महत्पादरजोमिपेक मित्युक्तम् ॥ ८॥

निरासाय चतुर्दशं भावमाहुः । श्रीवल्लभकृतयिवृतिसमेतः । अन्ये केचन वेदमाहात्म्यज्ञानैकनिष्ठास्तेषां स्वरूप कथयन्तक्षयोदशं भावमाहुः- अलौकिकेन ज्ञानेन ये तु मोक्ता हरेर्गुणाः। कादाचित्काः शब्दगम्याः पतच्छन्दाः प्रकीर्तिताः ॥९॥ अलौकिकेन ज्ञानेन वेदोक्तार्पज्ञानेनेत्यर्थः । प्राह्मणानां वेद एव परस्तद्ग्यास एव तेषां धर्म इति तत्पाठकरणरूपा ये गुणाः प्रोक्ताः, तेपि कादाचित्काः, न सर्वदा स्थिराः, तेपि शन्देनैव गम्याः, शब्द एव गम्यो येषां, नत्वर्य इति वा, तादृशास्ते पतन्तः उयतः पतन्तो ये जलौपास्तेषां शन्दा इव । अथवा दूरात् कर्णे पतन्तः शब्दा इव प्रकीर्तिताः । यया ते निरर्यकाः, दूरात् पतनजशब्देनैव ज्ञायन्ते, न तु ते प्राप्तुं शक्यन्ते, तथा वेदपाठका एष, न तु ते वेदार्थ जानन्ति, न मुख्यफलं प्राप्नुवन्तीति भावः । आपाततो ज्ञानेपि का- दाचित्कलेन न मुख्यफलमिति भावः ॥९॥ ननु तेपि देवाद्युपासनां कुर्वन्ति, वेदार्थाज्ञाने तु सानोपासना न भवेदित्याशक्षा- देवाद्युपासनोद्भूताः पृष्वा भूमेरिवोद्गताः । साधनादिप्रकारेण नवधा भक्तिमार्गतः ॥१०॥ प्रेमपूर्त्या स्फुरद्धर्माः स्यन्दमानाः प्रकीर्तिताः । यद्यपि केचन देवादीनामुपासनां कुर्वन्ति । न ह्येतावानेव वेदार्थ इति तावन्मान- ज्ञानेन क्रियमाणा सा न परमफलदायिनीति तादृशा गुणा भावाः भूमेरुद्गताः पृप्ता जल- पिन्दवो बुद्धदास्तपाः । यथा ते यत्रैवोत्पन्नास्तत्रैव लीना भवन्ति, तथा यस्य देवस्यो- पासना तत्रैव पर्यवस्सन्ति, न तु ब्रह्मपर्यवसाना इत्यर्थः । अतः परं वैष्णवधर्मनिष्ठस्य भा. सान्निरूपयितुं पञ्चदशं भावमाहुः साधनादीति । देशादिसाधनेषु भूतशुद्ध्यादिप्रका- रेण नवधा भक्तिमार्गतः श्रवणकीर्तनादिद्वारा प्रेमपू- स्फुरन्तो धर्माः अवपुलकादिरूपा येषां तादृशाः सन्दमाना भूमितः प्रसवणशीला आपस्तम्पाः। पूर्वापेक्षया प्रस्रवणशील. स्वात् किञ्चिदुपकारकत्वं सूच्यते । तेनोपासनायामपि तात्रिकरीत्या विष्णूपासना ज्ञेया । परन्तु वृरिक्षयसहिताः, श्रवणस्याल्पत्वाद्विभूतिपर्यवसानत्वाच ततोप्यागमनगमनादिक संभवतीति सूचितम् । एतेन सकामतापि सूचिता ॥ १०३ ।। एते तु वृद्धिक्षायसहिताः, ते एव पुनर्वृद्धिक्षयरहिता भवन्ति, तेपां भावमाहुः पोडशम् । याशास्तादृशाः प्रोक्ता वृद्धिक्षयविवर्जिनाः ॥११॥ स्थायरास्ते समाख्याता मर्यादैकप्रतिष्ठिताः। यादृशाः पूर्व प्रोक्तास्तादृशा वृद्धिक्षयविवर्जिताथेत्तदा स्थावराः स्थिरजलतुल्याः स्थिरजलाशयाः स्थिरप्रवाहा नदीरूपा वा, तत्सदृशाः । स्थिर राखरूपमाहुः मर्या- दैकप्रतिष्ठिता इति । यावत्प्रमाणमर्यादया विहितास्तावन्मर्यादया सर्वदा स्थिराः।

३२ जलभेदः। अत एव तावति धर्मे वृद्धिक्षयरहितत्वमुक्तम् । तेन निरन्तरपूजाप्रवाहसहिताः स्वमर्या- दाधर्मयुक्तास्तादृशा भक्ताः जन्ममरणादिरहिता मोक्षपर्यवसायिनः स्वमर्यादयेति ज्ञापि- तम् । यथा तादृश्यो नद्योपि परंपरया नद्यन्तरसङ्गेन समुद्रगामिन्यस्तथेति भावः । जला- शयपक्षे वृद्धिक्षयराहित्यमेव जन्ममरणाभाव इति तथात्वम् ॥ ११॥ अथ भक्तिमार्गीयभेदान् वक्तु सप्तदशं भावमाहुः । अनेकजन्मसंसिद्धा जन्मप्रभृति सर्वदा ॥ १२॥ सङ्गादिगुणदोपाभ्यां वृद्धिक्षययुता भुवि । निरन्तरोगमयुता नद्यस्ते परिकीर्तिताः ॥ १३ ॥ प्रथमजन्मारभ्यानेकजन्मसाधनैः सम्यक् सिद्धि प्राप्ताः । सर्वदेति साधननैरन्तर्य- मुक्तम् । तेन 'जन्मान्तरसहस्रेषु तपोध्यानसमाधिभि'रित्युक्तसाधनसिद्धाः प्रावाहिकभ- क्तिमन्तो भक्ताः सामान्यतः प्रोक्ताः । ते प्रथम साधनदशायां सङ्गादिगुणदोषाम्यां वृद्धि- क्षययुक्ता भवन्ति, परन्तु निरन्तरमुद्गम उदयस्तेन युता भगवद्धर्मप्रयत्नवन्तः सदोषेण क्षयेपि तद्धर्मनिष्ठां न त्यजन्ति । तादृशा नद्यः नदीरूपा नदीजलतुल्या इत्यर्थः । यथा नद्यः वाजलेन वर्धन्ते, ग्रीष्मसङ्गेन क्षीणा भवन्ति, परन्तु मूलतः प्रवाहस्य निरन्तरमुद्ग- मस्तिष्ठति, तेन परंपरया समुद्रगामिन्यो भवन्ति, तथा तादृशमावा अपि सत्सङ्ग्रेन वर्धन्ते, असत्सङ्गेन क्षीयन्ते, तथापि निरन्तरं भगवद्धर्मनिष्ठात्यागाभावात् कदाचिद्भगव- समुद्रगामिनो भविष्यन्तीनि भावः । पूर्वोक्तापेक्षया हीनाधिकार उक्तः ॥ १३ ॥ अतः परं च शिष्टान निरूपयन्तोष्टादश भावमाहुः । एतादृशाः स्वतन्नाक्षेत्सिन्धयः परिकीर्तिताः। पूर्णा भगवदीया ये शेपव्यासानिमारुताः ॥१४॥ जडनारदमैवाद्यास्ते समुद्राः प्रकीर्तिताः। एतादृशा पूर्वोक्तधर्मवन्तः प्रवाहमार्गीयाः खतघाश्चेत् न केनचिदृद्धिं क्षयं वा प्रा- मुवन्ति, ते समुद्रपर्यन्त समुद्रगप्रवहणशीलाः सिन्धवः महानद्यो नदा वा तद्रूपा ज्ञेयाः । यया तादृश्यो नयः स्वयमप्रतिबद्धाः सत्यः समुद्रं प्रविशन्ति, तथा ताशा भक्ता अपि खमार्गानुसारेण भगवन्तं प्राप्यन्तीति भावः । अतः पर केवल भगवद्धर्मकपूर्णान् निरू- पयन्त एकोनविंशं भावमाहुः पूर्णा इति । एते सर्वे भगवदीयाः भगवद्धर्मकनिष्ठाः ज्ञातारो पक्तारम्प सर्वदा तदेकरसपूर्णाः, न तु कदाचिदपि न्यूनमावयुताः पादयः । तन शेपो गुणगानपरः सनदा मनवधर्मवक्ता । व्यासः सकलपुराणकती, तद्वारा समस्तधर्मवक्ता । अगिः वयमेव । अयं भावः । श्रीनदाचार्यसरूपे अशद्वयमन्ति, मर्यादामार्गोपदेपृलं पुष्टिमार्गोपदेष्टत च । नेन सरूपमपि द्विविधम् । पर सति मर्यादामागीयान् प्रति नापसन मास्टयं भवति, न चलीफिकस्य वाहमाष्टकसोंचमाधुक्तस्पेति ताशस तन्म- ३३ श्रीवल्लभस्तविकृतिसमेतः। ध्यपातित्वेन गणना कृता, अत एव 'च्यासोस्माक गुरु'रित्युक्तम् । अन्यथा पुष्टिमार्गगुर- वस्तु खामिन्य इति तद्भावात्मकभगवन्मुखारविन्दाधिष्टारलौकिकामिरूपस्य खस्स य्यास- गुरुत्व न सभवतीति न तथोक्त स्यात् । एव सति शेपादिमध्यपातित्वेन भगवद्गुणनिरूप- पसाम्याधुक्तैव गणनेति सर्वमनवद्यम् । केचित्चमि रुद्राग्निरिति वदन्ति । रुद्रस्य भक्त- त्वात् । मारुतो हनूमान् परमभक्त । जडो जडभरत । नारद पञ्चरागागमप्रवर्तक । मैनो मैत्रेयो धर्मवक्ता । एते सर्वे मर्यादामार्गीया भक्ता गुणज्ञा , न तु म्वरूपनिठेकभावा इति समुद्ररूपा प्रकीर्तिता । समुद्रो यथा म्वमर्यादायामेन तिष्ठति, तथतपीति भाव । अन समुद्रोपि शुद्धोदो ज्ञेय । अन्यानने वक्ष्यन्तीति । किच, एतेषु सामान्यत समुद्र- दृष्टान्त उक्तो, न तु कश्चन गुणदोपरिशिष्टो धर्मस्तस्सोक्त इति प्रवाहमार्गाद्भिन्नत्य पूर्ण- वागायत्वादयो धर्माश्च सूचिता । यथा समुद्रमध्ये रलानि सारभृतानि, तथैरोपा हृद- येषु भगवद्धर्मा इति भाव ॥ १४ ॥ अत पर समुद्रा अप्यनेकविधा इति तद्भेदानिरूपयन्तो निंश भावमाहु । लोकवेदगुणैर्मिश्रभावेनैके हरेर्गुणान् ॥ १५ ॥ वर्णयन्ति समुद्रास्ते क्षाराद्याः पद प्रकीर्तिताः । अय भाव । के भगवतो गुणा लोकसमाना लोको यथा प्राकृतस्तथा भगमगुणा अपि प्राकृता एव, भगवानपि नास्ति, कर्मणैव सर्व भवतीति मन्यन्ते, ते क्षारोदतुल्या , न काचन तै पुरुषार्थसिद्धिरिति भाव । केचन वेदानुसारेण धर्मान् म- न्यन्ते, ज्ञानेन्छादयो जगत्कर्तृत्वादयो धर्मा भगवति सन्तीति तादृशा दधिमण्डोद- तुल्या । उभयाशसत्वात्तत्तुल्यता । तेपि तावन्मानधर्मानेव मन्यन्ते, न तु खरूपमव- तारादिक चेति तादृशा मावा न पुरुषार्थसाधका इति भाव । अपरे गुणैः प्रकृतिगुणैरवि धाधर्म कृत्वा धर्मा मासन्ते, वस्तुतो धर्मा एव न सन्तीति मन्यन्ते, ते सुरोदतुल्या, स्पर्शमापि धर्मनाशका मिथ्यावादिन पुरुषार्थनाशका इति सर्वथा त्याज्या एवेत्यर्थ । एते नयोप्यमिश्रा । अथ मिश्रानाहु । केचित्तु ये धर्मा लौकिकमावसहितास्ते लोकिका एव, ये ब्रह्मधर्मास्तेउलोकिका सर्वे सन्तीति मन्यन्ते, ते मिश्रा क्षीरोदतुल्या । स यथा म्वरूपतो खुत्तमस्तथापि मथनानन्तर नि सारो जात , सफलरलाना निर्गमात्, तथा तेपा तावन्मानधर्मवत्त्वेपि परमपुरुषार्था न मिध्यतीति, न ते ग्राह्या इति भाव । यतो मगनतो 'लोफरल्लीलापि केवल्य मित्युतत्वात् तनालोकिरतुद्धिनिष्ठाभारात् न सत्सम्मता इत्यर्थ । अन्ये वेदोक्तधर्मा जगत्कर्तृत्वादयो यद्यपि सन्ति, तथापि न पास्तवा अविद्या सवलिता, ब्रश तु निर्विकारमेवेति मन्यन्ते, ते घृतोदतुल्या , घृत विकृत भवति, क्षीर- परिणामो दधि तत्परिणामो घृतमतन्तेपि विकृतत्वाङ्गीकारान्न ग्राह्या , पुरपार्थासाधकत्वात् । एके पुनर्भगवति धर्मा सन्ति, पर वनतारादिधर्मास्तु प्राकृता इति मन्यन्ते, ते इक्षु. एव, - . .

जलभेदः । रसोदतुल्याः, ययेक्षुरसः स्वरूपतो मधुरः, परन्तु परिणामविरसस्तथैते धर्मा अपि परिणामे विरसत्वाङ्गीकारान्न पुरुषार्थसाधका इति मावः । पूर्वापेक्षया पण्णामेतेषां ही- नभावत्वमुक्तम् । एवं विंशतिधा जीवाधिकारानुसारिणो मावा निरूपिताः । साधनसाध्या लोकवेदप्रसिद्धा इति ॥१५३।। अतः परं लोकवेदातीतः साधनासाध्यो भगवदानेनैवोत्पद्यते, नान्यथेत्येतादृशोपि कश्चन भावो वर्तत इति स्वकीयानां ज्ञापनार्थ कृपया तादृशभावस्य यथार्थवरूपं वदन्त एकविंशमपि भावं लक्षयन्ति । गुणातीततया शुद्धान्सचिदानन्दरूपिणः ॥ १६॥ सर्वानेव गुणान्विष्णोवर्णयन्ति विचक्षणाः। तेऽमृतोदाः समाख्यातास्तवाक्पानं सुदुर्लभम् ॥ १७॥ ये पुनर्विष्णोप्पकस रसात्मकस्य च भगवतः सर्वे गुणाः, लोकानुसारिणो था- लचरित्रादयो, वेदानुसारिणो माहात्म्यप्रतिपादकाः ब्रह्मधर्माः गुणानुसारिणः स्थित्युद्भव- प्रलयरूपाः, रसात्मकलीलारूपाश्च, गुणातीता एव शुद्धा दोपरहिता निर्विकाराः सच्चि- दानन्दरूपिणः सन्तीति मन्यन्ते, ते भक्ता अमृतोदतुल्याः, यथा अमृतस्य पडूसात्मत्वेपि मधुरत्वमेवैवं भगवद्धर्माणामपि तत्तद्रूपत्वेपि सचिदानन्दरूपत्वमेव, न त्वन्यथा । यथा खरूपमानन्दरूपं रसात्मकम् , तथा गुणा अपीति निरूपितम् । किञ्च, समुद्रस्यागृतरूप- त्वेनान्येभ्यो विशेष आधिक्यं दूरत्वमगावत्वं मरणादिदोपनिवर्तकत्वं देवोत्तमैरेव भो- ग्यत्वं चोक्तं यथा, तथैते धी अप्येतावद्धर्मवन्त एतदधिकारिभिरेव भोग्या इति सूचि- तम् । अत एवाधिकारिविशेषणं विचक्षणा इत्युक्तम् । तथा चोक्तं 'मुहुरहो रसिका भुवि भानुकाः' इति । अत एव रसिकजनानुभवैकवेद्यत्वादेते भावाः सर्वोत्तमाः । तादृम्भा- यवन्तो भक्ता अपि सर्वोत्तमा इति सर्वोत्तमाधुक्तस्वरूपामेः कथनमतेषु युक्तम, न तु पूर्वोक्तेषु शेपादिपु, सर्वसाधारणत्वात् । अतस्तत्राग्निशब्दसं तया निरूपणं कृतम् । य. पमिशब्दस्य कयनान्योप्यों भवेत्तदा स एवोत्तमः, नास्माकं तत्राग्रहः । यथा विरोधो न भवेवधा ग्रन्थार्थों व्यारयेय इति भावः । एवं सतत्रभक्तिभाषखरूपनिर्देशमपि कृत्वा तस्य दुभत्वमाहुः तदापानं सुदुर्लभमिति । अत एव 'भक्तिः खतना शुद्धा च दुर्लभे'त्युक्तवादनापि ते गावा नोच्यन्ते इति भावः । अत एव 'शुद्धा प्रेम्णातिदुः सैमा' इत्यप्युक्तम् ॥ १७॥ एवं दुर्तमले को हेतुस्त्रबाहुः । ताशानां फचिदाक्यं दूतानामिय चर्णितम् । अजामिलाफर्णनवद्विन्दुपानं प्रकीर्तितम् ॥ १८॥ ताशानां वास्यं कचिदेव गवनि । उचमाधिकारियोगे भवनि, यया शुरूपरी- ३५ श्रीवल्लभकृतषिवृतिसमेतः। क्षितयोः । यथा वा 'अक्षण्वता'मित्यादि । यथा वा भ्रमरगीते उद्धवं प्रति श्रीखामिनी- वाक्यानि । पुनस्तत्तत्स्वरूपज्ञानेनोद्धववाक्यानि । तादृशं वाक्यं दूतानामिव वर्णितं भ- वति । दूतास्तु यथार्थवक्तारो यथानुभूतं कथयन्ति, तथा तेषां वाक्यं खानुभूतत्वेन तथार्थमिति प्रमाणमित्यर्थः । ननु तादृशवाक्यस्यातिदुर्लभत्वेनाशक्योपदेशकथनं व्यर्थमि- साशय तबाहुः अजामिलेति । यथा अजामिले सर्वथानधिकारिण्यपि परमकृपया स्व- नाममाहात्म्यं प्रकटितवान् प्रभुः, तथा तादृशे निःसाधनेपि कृपया परमानुग्रहेण ताम् वाक्यं कदाचित्प्रकटीकरोति । अत एव क्वचिद्वाक्यं भवतीत्युक्तम् । अत एव तद्वाक्यम- मृतरूपविन्दुपानं प्रकीर्तितम् । यथामृतस्य बिन्दुपानेप्यमरत्वं सिध्यति, तथा तावन्मात्र- वाक्यश्रवणेपि ताग्रूपत्वं समस्तभगवन्माहात्म्यखरूपज्ञानं च भवतीति भावः ॥ १८॥ ननु माहात्म्यज्ञाने जातेप्यविद्याधर्माणां विद्यमानत्वात्कयं परमफलं सेत्स्यतीति तनाहुः । रागाज्ञानादिभावानां सर्वथा नाशनं यदा । तदालेहनमित्युक्तं स्वानन्दोद्गमकारणम् ॥ १९ ॥ तद्विन्दुपानमात्रक्षणे स्त्रीपुत्रादिपु यो रागः लेहः, अज्ञानं भगवत्स्वरूपधर्मयोः, आदिपदेनासंभावनाविपरीतभावनादीनां च सर्वथा नाशनं नाशकारकं तद्वाक्यं भवति,एतद्यदा भवेत्तदालेहनं भगवत्स्वरूपनिष्ठभावैस्तदास्वादनं जायते, तेन प्रतिवन्धनिवृत्तिः सूचिता । इष्टप्राप्तिमाहुः स्वानन्दोद्गमकारणमिति । तदास्वादे पूर्व तिरोहितानन्दस्य प्राकट्यम् , पश्चात् प्रेमासक्तिसङ्कल्पव्यसनोत्पादनेनान्तर्भगवत्स्वरूपानन्दाविर्भावो भवतीति भावः।।१९॥ ननु पूर्वोक्ता शेषादयः पूर्णा उक्ताः, तथाप्येतदपेक्षया न्यूनत्वात्तेपां धर्माणां कयं पूर्णलं फलसाधकत्वं च तनाहुः- उद्धृतोदकायत्सर्वे पतितोदकवत्तथा । उक्तातिरिक्तवाक्यानि फलं चापि तथा ततः॥ २० ॥ उक्तातिरिक्ता अमृतोदतुल्यातिरिक्ताः शेषादयः तेषां वाक्यानि उद्धृतोदकवत्, यथा गङ्गात उद्धृत्य गृहे समानीतं जलमपि गङ्गाजलमेव, तथापि मर्यादामार्गविधिना सानपू- जादिफलं प्रवाहस्थजल एव भवेन्नास्मिन् , तथा तेषां धर्माणामपि मगवद्धर्मरूपत्वं पूर्ण- स्वादिकं च तिष्ठत्येव, परन्तु पुष्टिफलप्रापकत्वं नेति गावः । पुष्टिफलं तु तादृग् बिन्दु- पानजनितरसास्वादेनैव भवेन्नान्ययेति सूचितम् । एवं सति मर्यादामार्गीयभक्तिरसपूर्णत्वं पुरुपोत्तमसायुज्यफलकत्वं तेषां सम्पन्नमिति ज्ञापितम् । किम्य, एतत्पोषकत्वेन द्वितीय दृष्टान्तमाहुः पतितोदकवदिति । यथा वर्षाजलमाकाशात् पतितं यद्यपि शुद्धं निर्मलं, तथापि मध्ये गृहीतं चेत् कर्मादियोग्य न भवति, भूमौ पतितं चेत्कर्मादियोग्यं भवति, तथा तानि वाक्यानि शुद्धानि निर्मलानि, तथाप्येताशमक्तिरसभावाशयसंवलितत्वाभावा- देतत्फलरूपस्वरूपसपन्धकारकाणि न मवन्तीति भावः । एतदेवोक्तं फलं चापि तथा -- -~- जलभेः तत इति । यादृशो मार्ग यादृश वाक्य तादृशमेव फल भोदिति भावः । अथवा, पूर्व सतत्रतया प्रमेयवलमाश्रित्योक्तम् , अधुना शास्त्रक्रमानुसारेणोच्यते । तथाहि, उक्ताति रिक्ता अमृतोदतुल्यातिरिक्ता शेषादयस्तेपा नात्यानि उद्धृतोदकरदुपकार कुर्वन्ति । यथा जलाशयादुद्धृत गृहे समानीत जल गृहादिशोधकत्येन लानाचमनादिनात्मशोधकत्यन पाकादिकर्मकारकतेन तृपादिनिवर्तकत्वेन चोपकारक भवति, तथा तेषा वास्यानि वा- क्योक्तधमाचरणादिना अविद्यौपाधिककर्मनाशकवेन ज्ञानादिधर्मोत्पादकलेन सासारि कतापनिवर्तक चेन मुक्तिफलकत्वेन च प्रतिक्षणमुपकुर्वन्तीति मात्र । तादृशस्थितौ विशे पानुग्रहवेत्तदा पुष्टी प्रवेश , नो चेत्तदुपकार एवेत्यर्थ । एतदेवोक्त सिद्धान्तमुक्तावल्या 'उभयोस्तु क्रमेणैव पूतिर फलिप्यतीति । अतएव पुष्टिमार्गाधिकारो मुक्तानामेनेति 'मु तोपसूप्य' इत्याद्युक्तम् । किञ्च, एतत्पोषकत्वेन द्वितीय दृष्टान्तमाहु पतिनोदकव- दिति । वर्षाजल पतितमुपकरोति, परन्तु मर्यादया पतित चेत् । नो चेत्सर्वसम्यादिनाशक भवेत् । एव मर्यादया धर्माचरणे फल भवेत् , नो चेदीद्धत्येन सर्वधर्मनाशो भवेदिति नेपा वाक्यानामुपकारकत्व पूर्णत्व फलसाधकत्व चोक्तम् । अत एव फलं चापि तथा तन इत्युक्तम् । ततस्तादृशवाक्यात् फल च तथा तदनुसार्येव सायुज्य भवेदिति भाव ॥२०॥ अत परगुपसहरन्ति । इति जीवेन्द्रियगता नानाभावं गता भुवि । रूपतः फलतश्चैव गुणा विपणोनिरूपिनाः॥२१॥ इति प्रकारका नीरेन्द्रियगता , जीवगता आगामिन , इन्द्रियगता विषयगा- मिनः । अत एव भुति स्वाधारे नानाभाव गतास्तादशा विष्णो व्यापकम्य रसात्मकस्य च गुणा भाना रूपत सरूपत फ्लतच निरूपिता ।एतेन सन्देहनिवृत्तिपूर्वक भगवन्मा- गंप्रवृतो फल भविष्यतीति शापितम् ॥ २१ ॥ यथामति मया भावा रूपत फलतोपि हि । निरूपिताम्तन किश्चिद् द्विदोपेण यद्भनेत् । अन्यथा तसकरुणा क्षमता प्रमसे मम ॥१॥ इति श्रीवल्लमकृतं श्रीजलभेदविवरणं संपूर्णम् ॥

श्रीकृष्णाय नमः। जलभेदः। श्रीवालकृष्णकृतविवृतिसमेतः। श्रीराधिकावदनपद्ममरन्दपानघूर्णायमाननयनः स्फुटलाञ्छनश्रीः । मन्दस्मितो रतिविलासजयोदितागकान्तिः सदा स्फुरतु मद्धृदि गोपिकेशः ॥१॥ मावाब्धिमथनाचार्यचरणान् नौमि संततम् । गोपीशभावभावाप्तिर्यत्कृपातो न दुर्लभा ॥२॥ श्रीमदाचार्यचरणाः स्वीयानां भावज्ञानेन पूर्णप्रेमभावोत्पत्त्यर्थ भावनिरूपणं प्रति- जानते । यथा निर्पिमतासिद्ध्यर्थे मङ्गलाचरणस्य शिष्टाचारत्वं, तथात्र खीयेषु निर्विघ्नमा- वोत्पतिसिद्ध्यर्थ भगवन्नमस्करणात्मकं महलमाचरन्ति नमस्कृत्येति । नमस्कृत्य हरिं वक्ष्ये तद्गुणानां विभेदकान् । भावान् विंशतिधा भिन्नान् सर्वसन्देहयारकान् ॥१॥ हरिमकारणसर्वदुःखहतीरं नमस्कृत्य तद्गुणानां तदीयमक्तगुणानां विभेद- कान् विशेषेण भेदवोधकान् भावान् वक्ष्ये इति सम्बन्धः । विंशतिप्रकारेण भिन्नान् तान् वक्ष्य इत्यर्थः । ननु एतत्कयनं किंप्रयोजनकमित्याकाहायामाहुः सर्वसन्देहवा- रकानिति । यच्छ्रवणात् सर्वेषां सन्देहाभावः स्यादित्यर्थः । यद्वा, सर्वे भगवति प्राप्ति- सन्देदवारका इति भावः ॥१॥ एवं प्रतिज्ञाय भेदानेवाहुः गुणभेदा इति । गुणभेदास्तु तावन्तो यावन्तो हि जले मताः। गायकाः कूपसङ्काशा गन्धर्वा इति विश्रुताः ॥२॥ यावन्तो जले भेदा वेदोक्तास्तावन्तो गुणभेदा ज्ञातव्या इत्यर्थः । अत्र 'कूप्याभ्यः खाहे'त्यारभ्य 'सर्वाम्यः स्वाहे'सन्ता श्रुतिरनुसन्धेया । गुणानां जलसाम्पोक्त्या स्वतः शुद्धत्वं योध्यते । 'आपः स्वभावतो मेध्या' इत्यादिवाक्येभ्यो जलानां स्वतःशुद्धत्वं, तथैव भगवत्सम्बन्धित्वाद्गुणानामिति भावः । यथा जलमन्यमेलने तदात्मकनां भजते, तत्र च खस्वरूपात्मकतां च करोति, तथा भगवानपि भक्तभावमेलने स्वगुणान् तद्भावसा- म्यान् करोति, तं च म्खीय खसमं करोति । ननु मक्तस्य प्रभुसाम्यता कथमिति चेदुच्यते । तदसाम्यत्वे भक्तत्वमेव न स्यात् । अत एवोक्तं 'देवो भूत्वा देवान् यजेत्' 'यो यच्छ्रद्धः स एव सः' इत्यादि च । तस्माद- १ स्फुटालतीरिति मूले पाठ । ।

३८ जलभेदः । तत्वेपि न हानिर्यतो तद्भजनस्यैव स धर्मों, न त्वन्यधर्म इति त्वदुक्ताशङ्कागन्धलेशोपि नेत्यलम् । तर प्रथम भगवतो रसरूपत्वाद्रमणकस्वभावत्वात् तत्र च गानमुख्यता श्रुत्यो- च्यते 'यदा खलु वै पुरुषो श्रियमश्नुते तदा वीणास्मै वाद्यते' इत्यादि । तस्माद्गानप्रियो भगवानिति गायकाना भावमाहु गायका इति । चिश्रुताः प्रसिद्धा गानरसज्ञा ये गायकास्ते कूपसाशास्तपा भाव कूपजलतुल्य इत्यर्थ । यथा कूपोदक शीतकाले अन्त रुष्णं, धर्मकाले बाह्यत शीत, तथैतपामपि भावोपि श्रवणानन्दत्वेनोपरि शीतलस्तदनन्तर रसबोधे भगवत्प्राप्त्यर्थं मनस्तापक । तथा सति अतिप्रचुरबाडतापे सति भगवच्छूषणसुख- दत्वेनान्त शीतल इति भाव । ननु एतेपा भगवद्गुणसम्बन्धत्वेन गानाभावात् कथ भग पद्भाव इति चेत् ? उच्यते । भगवत्स्वरूपस्य नादब्रह्मात्मकत्वाद्यथास्थितनादस्वरूपज्ञाने भगवत्प्राप्तिरिति भाव । अत एव सहीतशास्त्रे निरूपित 'वीणावादनतत्त्वज्ञ श्रुतिजाति- विशारद । तालक्रियाप्रयासेन मोक्षमार्ग लभेत हि' इति । यथा कौप जल गुणेनैव ग्राह्य, तथैतेपा भावो भगवत्त्वगुणत्वेनैव गृह्यत इति भाव ॥२॥ ननु गायकानामनेकभेदयत्त्वात् कथ सर्वेपा तुल्यतेत्याशङ्कयाहु कृपभेदास्त्विति । कृपभेदास्तु याचन्तस्तावन्तस्तैपि सम्मताः । कुल्या पौराणिकाः प्रोक्ताः पारम्पर्ययुता भुवि ॥ ३॥ यावन्त कूपभेदा सन्ति तावन्त एव गायकभेदा सम्मता इत्यर्थ । यया केचित् वूपा मिटानपरिपाचकत्ये सुरतरुपक्षस्था , केचिद्गुरुत्वादनपरिपाककारिण , केचित् क्षारा शुद्ध्या- दिहेतर , एवमनेकभेदास्तथा तेपि भगवद्गुणनियन्धार्थज्ञानयुक्ता , केचिच नादब्रह्मात्मक- स्वरूपज्ञा , केचिद्गानमाधुर्यपरा बहुभेदा सन्ति इति यावन्तस्ते तानन्तस्तेषामपि भेदा ज्ञेया इति भाव । प्रथमभान निरूप्य द्वितीयमाहु कुल्याः पौराणिका इति । पोरा णिका पुराणज्ञा कुल्या प्रोक्ता । कृनिमसरित्तुल्या उक्ता इत्यर्थ । यतो भुवि पारम्पर्य- युता , घरण्या यथा परम्परया पुराण श्रुत्ला वर्णयन्ति, न तु खतो विचारयन्ति, तेपा भावस्तजर तुल्य इत्यर्थ । यथा कृनिगा नदी प्रत्यह खननादियानरेव प्रवहति, प्रमादाद- प्यप्रयसनो वालुकादिभि सुनिहता भाति, तथा तेपामपि नित्य पुराणादिदर्शन एप मानो भाति, नान्यदा। यथा तस्या पारम्पर्यता भुव्येप तडागादिपु, न तु खत प्रमहन्न- दीरवत् सादित्व समुद्रमत्व घ, तथैतेपामपि पुराणदर्शनकाल एवोत्पत्तिम्तत्रैव च म. माप्तिनं तु दयासमुद्रभगनामित्वम् ॥ ३॥ तृतीयमाह क्षेत्रप्रविष्टा इति । क्षेत्रप्रविष्टास्ते चापि ससारोत्पत्तिहेतवः । पेटयाधिसरिता मत्ता गायका गर्तसज्ञिकाः॥४॥ ते च पौराणिका । गायकनिरूपणानन्तर पौराणिनिरूपणेन पुनश्च गायकनि- , ३९ भीयालकृष्णकृतवितिसमेतः । रूपणेन पुराणोक्तभगवल्लीलानिरूपका गायका इवेत्यर्थः । गानस्य यथा चित्तहारकत्वम्, तथा पुराणानामपीति तन्मध्यनिरूपणमिति भावः । क्षेत्रप्रविष्टाः स्वकुटुम्बपोपणाजीवि- कार्य पुराणनिरूपकाः ये ते संसारोत्पत्तिकुटुम्बपोषणसाधनोत्पत्तिहेतवो भवन्ति इत्यर्थः । चकारेण भगवद्गुणवर्णकानामनुचितः संसारः, तथापि तदर्थमेव कृतत्वात् तथेति भावो पोध्यते । अपिशब्देन संसारोत्पत्तिरपि भगवद्गुणविक्रेतुर्न भवेत्, परं भगवन्माहात्म्यव- त्येवेति बोध्यते । यथाल्पसरिदपि क्षेत्रे प्रविष्टा सती संसारोपत्तिहेतुरन्नाद्युत्सादिका गवति, न तु सानपानयोग्या । तथैतेषां भावोपि पुराणदर्शनेन खात्मशोधको न भवति, किन्तु जीवि- काहेतुरेव भवतीत्यर्थः । अत एव पुराणोपजीवका नीचा उक्ताः । 'नीचा पौराणिकाः स्मृता' इति । चतुर्थ भावमाहुः वेश्यादिसहिता इति । वेश्यादिसहिता मत्ता ये गायकास्ते गर्ततुल्या इत्यर्थः । यदि गानखरूपज्ञानेन दोपरहिताः स्युस्ते नादं ज्ञात्वा मुक्त्यधिकारिणो भवेयुः, परं मत्तत्वाद्विपयाभिनिविष्टास्तेन तेपां भावो गर्तजलतुल्य इत्यर्थः । यथा गृहमध्यकृतगर्तसञ्चितजलस्य तह एव व्यवहारयोग्यत्वम्, न तु कूपा- दिवत् सर्वोपयोगित्वं शुद्धिकरत्वं वा; तथैतेषां भावो गानमाधुर्यादिना तद्भुदयानन्दकर एच, न तु पुरुषार्थसाधकोपि, तदर्थमपि नादस्य ब्रह्मात्मकत्वाद्भगवतो गानप्रियत्वात् तद्रसज्ञत्वा- त्तेष्वपि आनन्दोद्भवो मगवता दीयत इति भावः । मत्तत्वादिदोपरहिताः पूर्वोक्तसहिता गायकाः कूपादितुल्या इति भावः । यथा कूपोदकं गुणैकग्राह्यं भवति, जलग्रहणपर्यन्त- मेव गुणकार्य, न तु तदनन्तरमपि, तथा स्रीगानस्य मधुरत्वात् तद्वारा नादब्रह्मानन्दानु- भवार्थमेतत्साहित्यमिति भावः ॥४॥ पञ्चमं भावमाहुः जलार्थमेव गर्तास्त्विति । जलार्थमेव गर्तास्तु नीचा गानोपजीविनः । हदास्तु पण्डिताः प्रोक्ता भगवच्छास्त्रतत्पराः॥५॥ तुशब्दः पूर्वगतसाम्यवं निराकरोति । प्रक्षालनोच्छिष्टजलनिःसरणार्थ ये गर्ताः ततुल्या गानोपजीविन इत्यर्थः । यथा गर्तजलं नीचादिस्पर्शयोग्यमेव, न तु शुद्धयादिकर, तथैतेषां भावोपीत्यर्थः । नीचत्वादेतेपां गानश्रवणमपि भगवद्भक्तैर्न कार्यमिति भावः, त- गानस्यानन्दराहिल्यादित्ययः । षष्ठं मावमाहुः हदास्त्विति । गगवच्छास्त्रगीतापञ्चरात्र- श्रीभागवतादिषु तत्परास्तदेकनिष्ठाः पण्डिताः हृदाः प्रोक्तास्तेपां भावो हदजलतुल्य इत्यर्थः । तुशब्देन भगवन्छास्त्राभ्यासरतो न त्वन्य इत्यर्थो ज्ञाप्यते । यथा हृदजलं तरमावर्तादिरहितं अन्तःशीतलं जलक्रीडादियोग्यं भवति, तथैतेषां भावोपि पण्डितत्वात् चाचल्यरहितमनोनिवर्तनाउनुपहतो मगपच्छास्त्रतत्परत्वात् अनिरूपितमगवरकीडानि- रूपणयोग्य इति भावः ॥५॥ .

जलभेदः।
सप्तमं भावमाहुः सन्देहवारका इति ।
सन्देहवारकास्तत्र सूदा गंभीरमानसाः।
सरकमलसम्पूर्णाः प्रेमयुक्तास्तथा वुधाः ॥ ६॥
तत्र भगवच्छास्त्रसन्देहवारकाः सर्वमतनिराकरणपूर्वकमगवन्मार्गस्थापका गम्भीर
मनो येषां ते सूदाः सुषु उदकं येपामेतादृशा हृदविशेषतुल्याः । तेषां मावस्तद्दोदतुल्य
इत्यर्थः । जले शुक्तिशैवालायावरणरहिताः गम्भीरमानसोक्त्या अन्तः कालुप्यान्याश्रया-
दिदोपरहिता इति भावः । यथा हृदजलं गम्भीरत्वे धर्मकालेऽन्तःशीतलं उपरि तप्तच
भवति; तथैतेषां भावोप्यन्तर्भगवत्सम्बन्धाच्छीततो पहिलौकिकनिवृत्यर्थ सन्तप्त इति
भावः । अष्टम भावमाहुः सरस्कमलसम्पूर्णा इति । यथा पूर्वोक्तमकारकमन्देहवा-
रकाः बुधाः प्रेमयुक्ताः सन्तः सर सम्बन्धिकमलपरिपूर्णाः, परन्तु नादगायकतुल्यास्तेपां
भावस्तजलतुत्य इत्यर्थः । यथा तअलं सुरभिशीतलयुक्तत्वात् लक्ष्मीनिवासयुक्तभगवत्से-
वोपयोग्य, तथतेषां भावोपि । सौरभवत् प्रसररूपः परतः पावनो हकमले मजसीमन्ति-
नीमावस्थितिसहितभगवत्सेवोपभोग्यो भगवचरणाजमकरन्दपानमत्तमधुपायितचित्रकुन्त-
लालिश्चेति भावः ॥६॥
नवमं भावमाहुः अल्पश्रुता इति ।
अल्पश्रुताः प्रेमयुक्ता वेशन्ताः परिकीर्तिताः ।
कर्मशुद्धाः पल्बलानि तथाल्पश्रुतिभक्तयः ॥ ७ ॥
अल्पं श्रुतमध्ययनं येपा ते प्रेमयुक्ताः सन्तो वेशन्ताः सरस्तद्वत् परिकीर्तिताः ।
तेपां भावस्तबलतुल्य इत्यर्थः । यथा तज्जलं वर्षाशरत्काले निर्मलं धर्मकाले पश्चात्प्रसङ्गाच
कलिलं भवति, तथैतेषां भावोपि भगवरसेवादिपु प्रेमयुक्तलानिर्मलो भवति, परगल्पाध्यय-
नत्वात् असकृलौकिकतापादिना कालुप्यादिकमाप्नोति इत्यर्थः । दशम भावमाहुः कर्म-
शुद्धा इति । कर्मत्वेन ये भगवत्परिचयां कुर्वन्ति ते कर्मशुद्धाः, अत एव भगवतोक्तं
'मकर्मपरमो भवेत्यादि । अन्यथा कर्मणा न शुद्धत्वकारणं स्यात् । अत एव 'यस्य
स्मृत्या'दि स्मर्यते । तस्मात् सर्वोत्कृष्टत्वयज्ञकर्मात्मकत्वमेव सेवायज्ञत्वात् सेवन्ते, ते
कर्मशुद्धास्तेषां भावः पल्वलमल्पसरोविशेपस्तत्तुल्य इत्यर्थः । यथाल्पसरोजलं पानयोग्य
भवति, न तु स्नानावगाहनयोग्य, तथैतेषां भावोपि मगवत्पूजाकर्मत्वाद्यत्किचित् फलदो, न
तु भगवदवगाहनयोग्य इति भावः । तथैवाल्पश्रुतिभक्तयः अल्पं श्रुतिः श्रवणं भागवतादिषु
भगवन्माहात्म्यस्स, तया भक्तिर्येषां तेपि तत्तुल्या एवेत्यर्थः । अल्पश्रुत्युत्पन्नभक्तित्वेनादृढ-
त्वात् तथेत्यर्थः ॥ ७॥
एकादशं भावमाहुः योगध्यानादिना संयुक्ता इति ।
योगध्यानादिसंयुक्ता गुणा वाः प्रकीर्तिताः।
तपोज्ञानादिभावेन स्वेदजास्तु प्रकीर्तिताः॥८॥

श्रीवालकृष्णकृतवियतिसमेतः । योगोऽटामः, ध्यानं प्रादेशानुष्ठमात्रादेः । तत्संयुक्ताः गुणाः भावाः वर्ष्याः तअल- तुल्याः प्रकीर्तितास्तेषां भावस्तत्तुल्य इत्यर्थः । यथा वर्षाकाले जलं सर्वन सुलभं परम- चिरस्थायि ततेपामपि योगादिसमय एव भगवद्भायो, न सर्वदेति भावः। द्वादशं भाव- माहुः तपोज्ञानादिभावेनेति । तपः कृच्छादि, ज्ञानं जीवात्मनः । आदिपदेन विद्या- विद्यावन्धमोक्षज्ञानं पोडशपदार्थज्ञानं लौकिकैः (कर्म)मिर्यो भावस्तेन संयुक्ताः खेदजास्तु प्रकीर्तिताः स्खेदजतुल्याः कथिताः इत्यर्थः । तेषां भावः खेदजतुल्य इत्यर्थः । केचित् तप- सैव भगवान् प्राप्यत इति ज्ञात्वा तप एव कुर्वन्ति, केचित् ज्ञानेन जीवात्मज्ञानेन मोक्षो भवति, 'ज्ञानादेव हि कैवल्य मिति ज्ञात्वा ज्ञानार्थमेव यतन्ते । केचित् पोडशपदार्थज्ञा- नेनैव मोक्ष इति तज्ज्ञानार्थ न्यायादिकं पठन्ति, ते सर्व एवाज्ञाः । यतो भगवत्प्राप्तिस्तु भक्त्यैव, न तैः, अत एव भगवतोक्तं 'नाहं वेदैर्न तपसे'त्यारम्य 'भक्त्या त्वनन्यया शुक्य' इत्यन्तम् । 'रहूगणैतत्तपसे ति च । तस्मात् तेषां भावस्तत्तुल्य इत्यर्थः । यथा खेदजं जलं खानाघयोग्यं, अखादु, तापकरम् । तथैतेषां मावोपि नात्मशोधकः, नापि भगवटाप्तिकरः, तापक्लेशादिकर एवेत्यर्थः । जलसाम्यत्वेन हेयार्थश्च वर्णित इत्यर्थः ॥८॥ प्रयोदशं भावमाहुः अलौकिकेन ज्ञानेनेति । अलौकिकेन ज्ञानेन ये तु प्रोक्ता हरेर्गुणाः । कादाचित्काः शब्दगम्याः पतच्छब्दाः प्रकीर्तिताः॥९॥ अलौकिकेन भगवहत्तेन महत्तमचरणरजोभिषेकजेन वा ज्ञानेन हरेरकारणसर्वदुः- खहर्तुः कादाचित्काः कदाचिदेव स्त्रीयानां दर्शनतापनिवृत्त्यर्थ प्रकटीकृताःप्रतीयमाना गुणाः शब्दगम्याः वेदादिगम्याः श्रुतिरूपव्रजवरवधूरूपैकगम्याः ये वर्णयन्ति ते पतच्छब्दाः पर्वत- शिखराद्धारापतने ये शब्दाः तत्सदृशाः प्रकीर्तिताः निरूपिताः इत्यर्थः । तेषां भावस्तजलतुल्य इत्यर्थः । यथा धाराजलशब्दाः तत्र जलस्थितिज्ञापकास्तथा तद्वर्णनमपि तद्धृदि भगवस्थिति योधयतीत्यर्थः । घारा अपि शन्दगम्या भवन्ति, भावा अपि तथैवेत्यर्थः ॥९॥ चतुर्दशं भावमाहुः देवाशुपासनोद्भूता इति । देवाद्युपासनोद्भूताः पृष्या भूमेरियोङ्गताः। साधनादिप्रकारेण नवधा भक्तिमार्गतः ॥१०॥ प्रेमपूर्त्या स्फुरद्धर्माः स्यन्दमानाः प्रकीर्तिताः। यादृशास्तादृशाः प्रोक्ता वृद्धिक्षयविवर्जिताः ॥११॥ स्थायरास्ते समाख्याता मर्यादैकप्रतिष्ठिताः। देवाः शिवादयः, आदिपदादुमादुर्गाभैरवादयः, तेषां उपासने प्रोद्भताः तत्र भग- वत्वेन भर्वेश्वरत्वेन मोक्षसाधकत्वेन ये भावास्ते भूमेः सकाशादुत्पन्नाः तुपारजलकणा इवे- त्यर्थः । तेषां मावस्तजलतुल्य इत्यर्थः । तेषां तदजनेन किचित्फलं, किन्तु भगवतो- जल.

४२ - जलभेदः। ऽन्यथा चिन्तितत्वानरकः । अत एव 'योन्यथा सन्तमित्युक्तम् । यथा तबलं न साना• दियोग्यं किन्तु साधारमपि पंकिलं करोति, तथैतपां भावोपि न शुद्ध्यादिकमुत्पादयति, मोक्षसाधको वा भवति, परं देवानां भक्तत्वात् स्वाधिसान्यतया भजन्तमनुकारयति इत्यर्थः । पगदर्श भावमाहुः । साधनादिप्रकारेणामिहोत्रनित्यकर्मादिसहितश्रवणादिनवधाम- क्तिरूपो मार्गस्तेनैव प्रेमपूर्त्या ये स्फुरद्धर्मास्ते स्यन्दमानास्ते प्रस्रवणतुल्याः प्रकीर्तिता इत्यर्थः । तेषां भावस्तजलतुल्य इत्यर्थः । यथा तबलं पर्वतादिवृष्टिबाहुल्यात् वर्धते, आतपादिषु थ हीयते, तथैतेषां भावोपि साधनसत्सङ्गैर्वर्धते, दुःसङ्गादिभिध गौणतां प्राप्नोतीत्यर्थः । अत एव कपिलदेवैः साधनलेन देवहूति प्रति सत्मा उक्तः 'सहस्तेप्वय ते प्रार्थ्य' इति । यद्वा, नवधाश्रवणादिरूपभक्तिमर्यादामागीयसाधनादिप्रकारेण स्फुरद्र्पा धर्माः दानवततः पोहोमेत्यादिरूपाः येषु तेषां भावः स्यन्दमानजलतुल्य इत्यर्थः । यथा तजलं वृष्टयादिसापेक्षं तथैतेपां भावोपि धर्मसापेक्षः इति भावः । पोडशं भावमाहुः यादृशाः पूर्वमुक्तास्तादृशाः सहादिना वृद्धिक्षयविवर्जिताः सम्यक् प्रकारेण प्रसिद्धा इत्यर्थः । निरूपिता वा । यथा नवधाभक्तिमार्गमर्यादायामेव मुख्यतया प्रतिष्ठिताश्चेत् तदा ते स्थावराः समाख्याताः सम्यक् प्रकारेण प्रसिद्धा इत्यर्थः । निरूपिता वा। यथा तज्जलं नातपादिमिहाँसं प्राप्नोति, न या वृष्टयादिभिर्षित, न तरङ्गफेनावादिभिः क्षुब्ध भवति तथैतेषां भावोपि दुःसङ्गादिभिर्न क्षीणतां भजति, न वा भक्तसङ्गेन वर्धते, तदर्शनेन न क्षुब्धो भवतीत्यर्थः ।। ११३।। सप्तदशं भावमाहुः अनेकजन्मसंसिद्धा इति । अनेकजन्मसंसिद्धा जन्मप्रभृति सर्वदा ॥१२॥ सगादिगुणदोषाभ्यां धृद्धिक्षययुता भुवि । निरन्तरोद्गमयुता नद्यस्ते परिकीर्तिताः ॥ १३ ॥ अनेकजन्मभिः कृत्वा सम्यक्प्रकारेण सरसझादिभिः भगवत्कृपया वा सिद्धाः साक्षात् सेवायोग्यं जन्म प्राप्तवन्तः जन्मप्रभृति आजन्मतो भगवद्भजनतत्पराः सर्वदा सर्वजन्ममु एतादृशाः भगवद्भक्ताः समुद्रगामिनदीतुल्याः परिकीर्तिताः कथिता इत्यर्थः । तेपां भावस्तअलतुल्य इत्यर्थः । यथा तेषां बलानों वर्षादिजलवृद्धिसापेक्षत्वे, स्वतश्च समुद्रगा- मित्वं, तथैतेपां भावोपि सापेक्षो भगवद्गामी चेत्यर्थः ।।१३।। अष्टादशं भावमाहुः एतादृशा इति । एतादृशाः स्वतन्नासिन्धवः परिकीर्तिताः । पूर्णा भगवदीया ये शेषव्यासानिमारुताः॥१४॥ जडनारदमैत्रायास्ते समुद्राः प्रकीर्तिताः। एतादृशाः पूर्वोक्ताः खतनाः श्रवणसझायपेक्षारहिता निरुपाधिकाः । स्वतन्ना एव भगवद्भजनपराः सिन्धवः समुद्रगामिनदीतुल्या इत्यर्थः । तेषां भावस्तारुतुल्य ४३ श्रीवालकृष्णकृतविवृतिसमेतः । इत्यर्थः । यथैतअलं न वृष्ट्यादिजलसापेक्षं खतः समुद्रगामि, तथैतेषां भायोपि नान्यसापेक्षो दयासमुद्रं भगवन्तं प्रविशतीति भावः । एकोनविंशं मावमाहुः पूर्णा भगवदीया इति । ये पूर्णा भगवदीया भगवत्तोपं विना नान्यं जानन्ति, येषां सेवयैव तापापगमः, भग- वदाज्ञाकारिणस्ते समुद्राः प्रकीर्तिताः कथिता इत्यर्थः । तेषां भावो रत्नाकरतुल्य इत्यर्थः । तानेव वर्णयन्ति शेपव्यासानिमारुताः इति । शेपो भगवत्सेवापरः खसुखादिक- मविचार्य शय्यादिभावेन भगवन्तं सेवते, तेनैव चात्मसुखं मन्यते । व्यासः कलावतारः सर्वोद्धारार्थ भगवद्गुणनिरूपणपरः, यस्य साक्षात् समाधिलब्धभगवदर्शनानन्तरं भक्ति- शास्त्रनिरूपणेनात्मप्रसादः । अग्निमहादेवो यः सर्वविरुद्धमोहशास्त्रमपि सृष्टयावर्थ म- गवदाजया खस्स तदीयत्वेन कृतवान् । अत एव 'वैष्णवानां यथा शम्भुः' इति श्रीभाग- वते । अन महादेवस्य नाम विहायाष्टमूर्तिस्थामित्वकथनेन मोहशास्त्रकरणे जयापदहक- स्वमुक्तम् । मारुतो हनुमान् श्रीकोशलेन्द्रचरणसेवनपरः । जडो जडभरतः भगवलम- मानसत्वाजडवत् तिष्ठति । नारदः सदा भगवद्गुणगानेन भगवतोप्यानन्दजनकः । अत एव श्रुतिः 'यदा खलु वै पुरुपः श्रियमश्नुते तदा वीणाऽस्मै वायत' इति । मैत्रो मैत्रेयः पराशरशिष्यो भगवद्धर्मवक्ता। आद्यपदात् प्रहादादयः । तेषां भावो समुद्रतुल्यः रक्षाकर- तुल्य इत्यर्थः । यथा समुद्रोन्तः रत्नमयस्तथा चैतेप्यन्तर्भावयुक्ताः, अत एव कपिलैरुक्तं 'भक्तियोगो बहुविधो मागै मिनि भाव्यते' इति । पूर्णमावान् मार्गखरूपज्ञानभेदेन विशेपतो वर्णयन्ति लोकवेदगुणैरिति । लोकवेदगुणैर्मिनभावेनैके हरेर्गुणान् ॥ १५ ॥ घर्णयन्ति समुद्रास्ते क्षाराद्याः पद प्रकीर्तिताः। एके लोकमिश्रभावेन एके वेदमिश्रमावेन हरेगुणान् वर्णयन्ति । ते यथाक्रम क्षाराद्याः क्षार आदि]पांते पदसंख्याकाः प्रकर्षण कीर्तिताः कथिता इत्यर्थः। तेषां तेपां भावो भिन्न- भिन्नतया तत्तत्समुद्रजलतुल्य इत्यर्थः । रामकृणौ मनुष्यावेव परं पलतेजोधिकाविति देवी वेति ज्ञात्वा गुणवर्णनपराः क्षारसमुद्रतुल्यास्तेषां भावस्तजलतुल्य इत्यर्थः । यथा क्षा- रजलं न तृपानिवर्तकं, नापि खानादिसुखकारि, किन्तु गम्भीरं मलादिनिवर्तकं तथैतेषां भावोपि न संसारतापनिवर्तको, नापि श्रवणेऽन्येषां भक्तिसम्पादकः, किन्तु देवादिज्ञानेन तत्स्वरूपशोधकः । पलाधिक्यादिगुणश्रवणेनान्येषां मर्यादाभक्तानां यत्किञ्चिदानन्दका- रीति भावः। ये तु वेदरक्षार्थ भगवदवतारः, नतु मगवानानन्दमयः श्रीकृष्ण एवेति ज्ञात्वा गुणवर्णनपरास्ते दधिमण्डोदतुल्यास्तेपां भावस्तजलतुल्य इति भावः । यथा दधिमण्ड- सासारत्वात् न प्राणपोपूकत्वं न वा चित्ततापनिवर्तकत्वं, तथैतेषां मावस्यापि सचिदानन्द- मयज्ञानामावान मोक्षौपयिकत्वं न वा संसारनिवर्तकत्वमिति भावः । मायया सत्त्वा- दिगुणैर्गुणमयं देहमाश्रित्य भगवान् सृष्ट्यादिकं करोति न खत इति ये गुणान् वर्णयन्ति जलभेदः। तेषां भावः सुरोदतुल्य इत्यर्थः । यथा सुरा स्वरूपविस्मारिका पानकर्तुरिन्द्रियदोपजनिका, तथैतेषां भावोपि भगवद्गुणानां सम्बन्धित्वेपि मायामोहनस्वरूपविस्मारणं कारयति, खस- भ्यन्धनान्यसापि तयात्वं सम्पादयतीति भावः हरिः सर्वदुःखहर्ता 'स सर्वज्ञः सर्व- शक्तिरित्यादिश्रुतिगोचरात् कारणमूतः सर्व खेन्छयैव करोतीति ये गुणान् वर्णयन्ति ते क्षीरोदतुल्यास्तेषां मावस्तजलतुल्य इत्यर्थः । यथा क्षीरे सादुलं वीर्यजनकत्वमग्मित- सत्वे माधुर्याधिक्य, तथैतेषां भावसापि मनोहरत्वमधिकगुणगानाथ शुक्ष्याधिक्यं ता. पानन्तरं च रसात्मकलीलाकर्तृत्वज्ञानानन्तरं तन्निरूपणेन माधुर्यत्वमिति मावः । भग- वानलौकिकवीर्यवान् स्वीयान् साधनरहितान् अपि खवीर्येणैव मोचयतीति ये गुणान् व- मयन्ति वेपां भावो घृतोदतुल्यः इत्यर्थः । यथा घृतं अन्यसम्बन्धं विनापि खपानेन ब- लवन्तं रोगमुक्तं च करोति, तथैतेषां भावोपि संसारसागरतरणाय योग्यदेहं करोतीति मावः। भगवान् हरिः शिवदुर्गाप्रभृतिभिः प्राप्तस्थानलक्षणस्वैर्मुहुरमिप्रार्थ्यचरणरेणुरिति चतुर्व- यं स एव सेव्य इति ये गुणगानपरास्तेषां भाव इक्षुरसतुल्य इत्यर्थः । यथेारसो मधुरो- न्तस्तापनोदी, तथैतेषां मावोपि सर्वसेन्यत्वज्ञान मधुरः सेवनप्रवृत्तौ च त्रिविधतापनिवा- रकश्चेति भावः । 'अन्ये चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्' इत्यादिवाक्येभ्यः पु- राणपुरुषोचमो भगवान् एवाल्पाश्रयरहितोऽसौ भक्त्यर्थ सेव्य इति ये गुणवर्णनपरास्ते शुद्धोदतुल्यास्तेषां मावः शुद्धोदतुल्य इत्यर्थः । यया शुद्धोदं तृषादिनिवर्तक स्नानादिना मलनिवर्तकं तापापहारी च, तथैतेषां भावोपि तृष्णादिनिवारकः पापनिवर्तकस्तापनिव- तक इति भावः॥ १५ ॥ पूर्णभगवदीयेषु मुख्यान्निरूपयन्ति गुणातीततयेति । गुणातीतया शुद्धान सचिदानन्दरूपिणः॥ १६ ॥ सर्वानेव गुणान् विष्णोवर्णयन्ति विचक्षणाः। तेऽमृतोदाः समाख्याताः तद्धाक्पानं सुदुर्लभम् ॥१७॥ ये गुणातीतभावनाशुद्धाः केवलं सचिदानन्दरूपिणो भगवद्पाः गुणा इति ये सर्वा- नेव गुणान् न्यूनाधिकामावेन सर्वान् एव, श्रीयशोदायामाविर्भावमारम्य रासोत्सवप्र-. भूत्यानृतपर्यन्तं विष्णोर्ध्यापकस्य सर्वत्र तत्तद्रपस्स ये वर्णयन्ति विचक्षणाः मगवल्ली- लादिकरणरसज्ञातारः ते अमृतोदाः समाख्याताः सम्यक् प्रकारेण कथिताः । तेषां मावः सुघासम इति मावः । यथा सुधायाः अमृतसम्पादकत्वं देवभोग्यत्वं तथा एतेषां भावस्थापि भगवत्सेवायोग्यदेहसम्पादकलं भगवनोग्यत्वं तदितराभोग्यत्वं चेति भावः । एतादृशाना तद्वाक्पानं तेषां वचनामृतस पानं श्रवणं सादरं मनसा ग्रहणं अन्त- निवेशनं मुदुर्लभं सुतरां दुष्प्राप्यं, सुदुर्लमत्वोक्त्या तत्सङ्गस भगवत्प्रापकस्वमुक्तमिति भावः । अत एव मगवतोतं 'सत्सङ्गेनैवे'सारभ्य 'सिद्धा मामीयुरलसे'सन्तेन, 'अधीते' श्रीयालकृष्णकृतवितिसमेतः । इत्यारम्य 'सत्सङ्गान्मामुपागत्' इत्यन्तं च । तद्वाक्यमाहात्म्यमाहुः तादृशानामिति । तादृशानां कचिदाक्यं दूतानामिव वर्णितम् । अजामिलाकर्णनवद्विन्दुपानं प्रकीर्तितम् ॥ १८॥ पूर्णमगवद्भक्तानां वचनामृतपानं दुर्लभम् , ते कचित् कृपया वाक्यं वदन्ति, त- द्वाक्यं दूतानामिव सन्देशहाराणामिव वर्णितं कथितमित्यर्थः । यथा दुतवाक्यं तत्प्रमुवा- क्यमेव, तया तादृशानामपि वाक्यं भगवद्वाक्यमेव । भगवान् उद्दिधीर्घः स्वीयमुखेन ख- धर्मान् न ज्ञापयतीति भावः । अत एव कपिलदेवेनोक्तं 'सगस्तेष्वथ ते प्रार्थ्य' इति त- रसङ्गस मगवति प्रार्थनमुक्तं, न तु खकरणत्वं, तद्भगवानेव फलं दास्यन् करोतीत्याशये- नान्यथान कार्य इत्येवोक्तम् । तस्मात्तु तादृशानां वाक्य श्रवणं सादरं मनसोपदेशवत् ग्रहणं मिन्दुपानममृतपिन्दुपानं प्रकर्षेण कीर्तितमित्यर्थः । यथामृतपानेनामरत्वं देवत्वं, तथैतत्पा- नेन नाशाभावपूर्वकभगवत्सेवौपयिकत्वमेवेति भावः । अत एव श्रीभागवते 'परस्परं त्वद्गुण- वादसीधुपीयूपनिर्यापितदेहधर्मा' इत्युक्तम् । 'महिमामृतसमुद्रविग्रुप' इति च । अन्नानुभू- तनिदर्शनमाहुः अजामिलाकर्णनवदिति । यया विष्णुदूतेभ्यो भगवद्धर्मबलश्रवणेन भगवद्धर्म एव रुचिरमूत् , तदितरेष्वरुचिः, तथैतद्विन्दुपानकर्तुरपि भवति ॥१८॥ लौकिकाचासक्तिरहितविन्दुपानेन रसास्वादो न भवति, तदर्थमाहुः रागाज्ञानादि- भावानामिति । रागाज्ञानादिभायानां सर्वथा नाशनं यदा । तदा लेहनमित्युक्तं स्त्रानन्दोद्गमकारणम् ॥ १९ ॥ रागः लेहः पुत्रादिपु, अज्ञानं भगवत्सरूपस्य, आदिपदेन सर्व विषयायासक्तिः, त- भावानां यदा नाशनं स्यात्, तदा लेहनमित्युक्तं भवति, रागादिमावानां नाशनं नामादर्शनं सवासनं तत्त्याग इत्यर्थः । तदेव लेहनं रागाद्यमावपूर्वकविन्दुपानं खानन्दस्स भगवदान. न्दस्योगमार्थ कारणं भवतीति भावः । खस जीवभावेन तिरोहितानन्दस्सोद्मे प्राकट्ये सम्यक् तत्कारणं मवतीत्यर्थः ॥ १९॥ विशं भावमाहुः उद्धृतोदकरदिति । उद्धृतोदकवत्सर्वे पतितोदकवत्तथा । उक्तातिरिक्तवाक्यानि फलं चापि तथा ततः ॥२०॥ पूर्वोक्ता अमृतोदतुल्यातिरिक्तानां वाक्यानि तथैव तेषां सर्वेषां भावाः भगवद्भाव- वचनेन गृहीताः । वाक्यानि च तथैवादरेण श्रुतानि उद्धृतोदकवदुपकुर्वन्ति यथा, तथा गृहीतानि प्रासादात् पतितोदकवत् उपकारं कुर्वन्तीत्यर्थः । उद्धृतोदकं यया स्वस्थ खान- पानदशासु यनगृहीतत्वात् यत्किश्चित्सकोचेन योग्यं भवति, तथैतेषां मावोपीति भावः । तयैतेषां फलमपि भवति । पतितोदकं यथा मलखानादियोग्यं, न तु पानादिषु, तथैतेषां जलभेदः। ४६ भावोपीत्ययः । उद्धृतोदकं यथा पानादिदशायामेव तृपाशान्ति करोति, खोत्सतिस्थानसह- शान् गुणान् विदधति, स्वस्थितिवशाच शीतोष्णभावं भजते, सुधा तु सदैकरूपेति सदै- करूपमेव गुणं विदधातीति भावः ॥ २० ॥ उपसंहरन्ति इतीति । इति जीवेन्द्रियगता नानाभाचं गता भुवि । रूपतः फलतश्चैव गुणा विष्णोनिरूपिताः॥२१॥ इतीति समाप्तौ प्रकारेण वा । जीवे इन्द्रियेषु गताः प्राप्ताः भुवि नानामावं सा- त्त्विकादिभावं गताः प्राप्ताः एतादृशा विष्णोर्भगवतो गुणाः स्वरूपतः फलतम्व निरू- पिता विवेचिता इत्यर्थः ॥ २१॥ इति श्रीयालकृष्णकृतजलभेदवियूतिः समासा ॥ परिशिष्टम् प्रथमम् । पूर्णा भगवदीया इत्यत्र । अत्र हि सामान्यत पुष्टिमर्यादामार्गयोः पूर्णा ये भगवदीयास्त उच्यन्ते । अत एव विवृतौ भक्त्या सेवया च पूर्णा इत्युक्तम् । तत्र म- यौदामार्गीयास्तु भक्त्या माहात्म्यज्ञानसहितलेहेन पूर्णाः सर्वदा गुणपरा धर्मद्वारैव धर्मि- पराः, पुष्टिमार्गीयास्तु धर्मिमात्रपराः, तेषां परोक्षे गुणपरत्वं धर्मिपरतयैव । तद्विरहे स्वरूप विना सातुमशक्त्या तत्परत्वात् । तत्र पुष्टौ गुणा अपि गीयमाना धर्मिरूपा एव । अत एव 'तव कथामृत'मित्यत्र कथाया अपि गुणरूपाया भगवत्समत्ववोधनाय पड्गुणत्वमु- क्तम् । तेत् खरूपात्मकत्व एव सम्भवति । अन्यथा गुणे गुणानङ्गीकारेण तेषु पद्गुण- स्वोक्तिविरुद्धा स्यात् । तत्र शेपः पुष्टिमार्गीय एव, अन्तरङ्गलीलासम्बन्धित्वात् । व्या- सस्तु मर्यादामार्गीयः, समाधिरूपसाधनेन भगवदर्शनवत्वात् । 'अपश्यत् पुरुषं पूर्ण मिति वाक्यात् । अग्निस्तु प्रभुरस्माकं पुष्टिमार्गीय एव, पुष्टिभक्तिरूपमुखारविन्दरूपत्वात् । मारुतोपि तथा, मर्यादापुरुषोत्तमेपि पुष्टिमार्गप्रकारेणान्तरङ्गभक्तत्वात् । अत एव श्रीसी- तामनःसमाहितये लढायो तिकाया इव तस्स प्रेषणम् । जडो मर्यादामार्गीयः, पूजा. परत्वाद्दुःसङ्गसमयलात् देहावसानप्रतीक्षकत्वाच । नारदोपि तया, सततं गुणपरतया तावन्मात्रेण स्वस्थत्वाच । मैत्रेयोपि मर्यादामार्गाय एव, भगवसारोक्ष्यपि विदुरोपदे- मृलेन स्वस्थत्वात् । अन्ययोद्धव इव क्लिटोनुमूतान् निजस्वामिगुणानेव स्थातुमशक्ततयानु- वदेत् । एवं सति पुष्टिमर्यादामागीयत्वाविशेषेण मतेषु पूर्णत्वमेवादाय समुद्रस्वमत्रोच्यते,न गुणपरत्याए । २५गलम् ।

परिशिष्टम् । तु विशिष्य । तया च यया समुद्राः पूर्णाः, तथैतेपि गुणैर्भगवदीयैर्मावैध पूर्णाः । यया वा ते चन्द्रदर्शनेन तरलिततरजा, तथैवैतेपि गुणगानावसरे भावभावनावसरे च भगव- द्वदनविधुदर्शनेन मावतरनितान्तःकरणा इति तात्सर्याज्ञानादेव पुष्टिमार्गीयाचार्याणां म. र्यादामार्गीयमक्तपक्षिपाठोनुचित इति मत्सरिकयनं नीरमयनसदृशमेव । अत एवाने 'लो- फवेदगुणैर्मिनमायेने'त्यनेन समुद्रसदृशभक्तेष्वेव पड्डिधाः मिन्नाः कृताः, एकविधाः पुष्टि- मार्गीया गुणातीततया 'शुद्धा' नित्यनेन मिन्नाः कृताः । भगवद्गुणानां पवियत्वेन मर्या- दामार्गीयाणां पविधत्वम् , पुष्टिमार्गीयाणां तु धर्मिखरूपमात्रपरत्वेनैकविधत्वम् । पूर्व हि मिश्रभावाः, तद्भावेषु गुणानां मिश्रणात् । तहारैव तेषां प्रमौ भाववत्त्वाच । उत्तरे तु शुद्धमावाः केवलस्वरूपेण तन्मात्रपरत्वात् । अत एव तदीयमानगुणेष्वपि खरूपात्मक- त्वमभिप्रेत्याग्रे 'गुणातीततया शुद्धान् सचिदानन्दरूपिण' इत्यनेन शुद्धत्वमुक्तम् । अत एव विवृती 'पूर्णभगवदीयेष्वत्युत्तमान् निरूपयन्तीति गुणातीततये'त्यस्यामास उक्तः । तदर्यस्तु पुष्टिमर्यादासाधारण्येनोक्तपूर्णभगवदीयेष्वत्युत्तमान् केवलपुष्टिमार्गीयान् निरूपयन्तीति ज्ञेयः । अत एव पूर्णत्वेन समुद्रसदृशत्वस्य सर्वेषु सत्त्वेपि तेष्वमृतोदतुल्यत्वनिरूपणम् । तस्मादेवमभिप्रायमवगत्य नास्मपितृचरणविवृतावज्ञमत्सरिभिः संशयलेशोपि विज्ञेयः । ननु तयापि ताशपंक्तिपाठस्तदीयानां तानेव सर्वोत्तमत्वेन जानतां न मनोरमो भवतीति चेत् ? सत्यम् । नेदं तदीयजनवाक्यं, येन संभावितमप्यन्यत्र तत्साम्यमुच्यमानं न स- हेयुः, क पुनर्वदेयुः, किन्तु निजाचार्यचरणानाम् । ते तु कश्चिद् धर्ममादाय बहुपु स्य- लेषु तथा वदन्त्येव, अन्यथा 'अर्थ तस्य विवेचितु'मिति वाक्ये 'मां व्यासव'दिति दृष्टा- न्तेन व्याससाम्यं कथं वदेयुः । न हि भगवता निजाचार्यवत् पुष्टिपथप्रकटनाय व्यास आविर्भावितः, किन्तु कीरवत् तन्मुखतः शन्दात्मकं श्रीभागवतमाविर्भावयितुम् । अर्थस्स भगवद्पत्वेन तत्प्रकटनं तु खयमेवात्मनात्मान'मिति वाक्यरूपेणैव भवतीति तत्प्रकट- नाय तदात्मकानाचार्यानेव, तत्रापि भागवतार्थो भक्तिरूप इति भक्तिरूपास्यरूपानेवा- विर्मावितवान् । तथा च शब्दात्मकं श्रीभागवतं व्यासात् प्रकटितम्, अर्थात्मकमेतेम्यः प्रकटितमिति तावद्धर्ममादाय यथा तत्र स्खस्मिन् तदृष्टान्त उक्तः, एवमत्रापि पूर्णमग- वदीयत्वमात्रमादाय तन्मध्ये खस्यापि गणनेति न दोपः । वस्तुतस्तु पूर्णत्वं मगवदी- यत्वं चाचार्येषु मिन्नमेव । मगवदीयत्वं तदास्यरूपत्वेन, तत्त्वेन भक्तिरूपत्वं, अभी रसात्मकत्वयत् । अत एव यथा प्रमौ रसलीलायां तद्धर्माविर्मावो ब्रह्मत्वं च तादृशस्यैव, तयात्रापि भगवदाजया अवतीर्य जनशिक्षार्थ मजने मक्तिधर्माविर्मावो, मगवत्त्वपीति मगवत्वमगवदीयत्वे अपि संभवत इति नानुपपत्तिः काचित् । पूर्णत्वमप्यत्र खरूपपूर्ण- त्वमेव । चेतस्तत्प्रवणसेवायां निरोधे पचात्मकस्वरूपेणैव पूर्णत्वात् । अत एव 'रासस्त्री- मावपूरितविग्रह' इति प्रमोर्नाम । इतरत्र तु गुणैरेव तथात्वमिति विभेदः । पूर्णमगवदी- .

जलभेदः। यत्वं तु सामान्यतः सममिति तमादाय तथोक्तिरुचितैव । अन्यथैकादशे प्रभुणा खामि- नीमावनिरूपणे 'यथा समाधौ मुनयोधितोय' इति स्वामिनीमुनिदृष्टान्तकथनं न स. गच्छेत । स्वामिनीभावयोगयोः सुमेरुसर्पपवत्तारतम्यात् । अत एवात्र स्वस्स श्रीमाग- वतप्रकटकत्वेन तत्समतया व्याससमीप एव निरूपणम् । नैतावताचार्येष्वंशतोपि तत्स्व- रूपसाम्यमायाति । कलावतारपुरुषोत्तमयोः साम्यसम्भावनाया अप्पसम्मयात् । अन्यथा भगवति पुरुषोत्तमे पुरुषरूपत्वसंभावनाऽसंभवेन 'पुरुषः शक्तिभिर्यये त्यादिना पुरुषष्टा- न्तकथनं पाध्येत । अतो धर्मेणैव केनचित् सर्वत्र समतोक्तिरिति नात्र दोपलेशोपि । अत एव, आनन्दरूपतया सहजनीले भगवति नीलनीरदृष्टान्तोपि युज्यते । किन्ध, 'अङ्गी- कृती समर्याद' इति सर्वोत्तमे नामनिरूपणेन प्रादुर्भावदशायां मर्यादापरिग्रहात् तत्पूर्ण- त्वमपि खस्मिन् बोधयितुं तत्पंक्तिपाठो निरूपितः । नैतावता न्यूनत्वमायाति । 'अधिक तत्रानुप्रविष्ट, न तु तद्धानि रिति न्यायात् । अपरच, यथा शुकेन सर्वावतारगणनायां श्रीकृष्णमपि निरूप्य 'कृष्णस्तु भगवान् स्वय'मिति तत्र विशेष उक्ता, अवतारकार्यकर- णात् पुष्टिकार्यकरणाञ्च । तथाचार्यध्वपि यज्ञादिमर्यादाकार्यकरणात् सेवादिपुष्टिकार्यकर- पाचोभयविधकार्यकर्तृत्वमस्तीति घोषयितुं प्रथमतस्तन्मध्ये निरूपणं विधाय पयादा- चार्याणां 'गुणातीततये' यादिना निरूपणं कृतमित्यस्मपितृपदविवृतावन्यथामतयोविज्ञा- तखपतय एवेति विद्वद्भिराचार्यचरणानौरवधेयमिति दिक् । अभिज्ञविवृतावज्ञाः पूर्वपक्षं प्रकुर्वते । अशक्ता अपि सुज्ञास्तु विश्वसन्ति तदीरिते ॥१॥ शक्तास्तदाश्रयवलादभिप्राय विदन्ति हि । समादधति ते सर्वमतिमूढजनोदितम् ॥ २ ॥ गुरवः पितृपादा मे कथितेन सुते मयि । दासीभूते प्रसीदन्तु यच्छन्तु विमलां मतिम् ॥३॥ इति श्रीहरिदासविरचितं 'पूर्णा भगयदीया' इत्यस्य संशय- निराकरणम् ॥ परिशिष्टम् द्वितीयम् । अथेदं विचार्यते । श्रीवलभैः 'पूर्णा भगवदीया ये शेषव्यासानिमा- रुताः। जडनारदमैत्राद्यास्ते समुद्राः प्रकीर्तिताः' इति जलभेदभावग्रन्ये चतुर्दिशं सामान्यतः चत्वारः समुद्रा इव शेषाचा उक्ता भगवदीयाः (त्रुटिपत्रम् ।) अत्र समुद्रशब्दो यौगिकोऽपि ग्रायः । तथा च मुद्रया सहिताः समुद्राः । मुद्रात्र वै- दिकतात्रिकमिश्रमखवैष्णवधर्मप्रवर्तनसम्प्रदायरूपा तप्तशीतलचकादिचिधारणरूपापि १पंक्तिर्गणना पर गणनायां पाटो निरूपित । २ व्यूहकार्यम् ।

४९ चार्या उक्ताः । परिशिष्टम् । पाया । तेऽत्र चत्वारो वैष्णवधर्ममार्गसम्प्रदायिन आचार्याः परिगृहीताः । तत्र शेपः श्रीमन्नारायणोपासनमुख्यकवैदिकधर्मपरायणतप्तमुद्राङ्कितसात्त्विकाचार्यरामानुजरूपः स- म्भूत उक्तः । व्यासः श्रीगोपीजनवल्लभोपासनमुख्यकृतात्रिकधर्मपरायणशीतलमुद्राक्षितरी- जसोपचाराचार्य विष्णुस्वामिखरूप उक्तः । अग्निः पुन उत्सन्न एव तत्सम्प्रदाये विलक्ष- णप्रकारतः सर्ववेदेतिहासपुराणादिसारोद्धारसम्मिश्रितश्रीगोपीजनवल्लभसेवनमुख्यकधर्मप- रायणशीतलमुद्राङ्कितनिर्गुणभक्तिमार्गाचार्यश्रीवल्लभरूपः तत्स्थान उक्तः । मारुतो वायुजो हनूमान् महाविष्णुपूजनोपचारमुख्यकवैदिकतात्रिकधर्मपरायणतप्तशीतलोभयविधमुद्राङ्कित- राजसतामसोपचाराचार्यमध्वाख्यरूपः संमूत उक्त इति चत्वारो मुख्यसम्प्रदायिन आ- अथ तेषां क्रमेणानिमानुपसम्प्रदायिनो निरूपयन्ति जडनारदमैत्राद्या इति । जडनारदमैत्राणामाचा मूलमूता इति । जडो रामानन्दसरूपः सन् सर्ववर्णसंकलितो वै- ष्णवधर्मप्रवर्तकत्वात् शेपरामानुजस्स उपसम्प्रदायीमूतः । नारदस्तु कृष्णचैतन्यमुनिख- रूपः। तथैव व्यासविष्णुस्वामिवल्लभा(चार्यो)पसम्प्रदायकप्रवर्तकः सनातनमैत्रो मैत्रेयः श्रीरूपाख्यः सम्मूतः। उत्सन्ननिम्बार्कमार्गसोपसम्प्रदायप्रकाशकश्रीभट्टहरिव्यासमतस्य इति केचित् । वस्तुतस्तु श्रीरूपः सहजीव एव खयं मूलभूताचार्यवायुरूपमध्वाख्यस्योपसम्प्र- दायी जात उक्तः । एतदुपष्टम्भकं श्रीमदाचार्याणामेव खेषां वचनं, यथा श्रीमागवते तृतीयस्कन्धे 'प्रायोचं मक्तियोगस्य खरूपं ते चतुर्विध'मित्यत्र 'भेदः पारमार्थिक' इति शास्त्रं पुरस्कृत्य त्रिविधो भक्तियोग उक्तः । ते च सम्प्रति विष्णुखाम्यनुसारिणः तत्त्व- वादिनो रामानुजीयाचेह तमोरजःसत्त्वैः भिन्नाः (भक्ताः), अस्मत्प्रतिपादितश्च नैर्गुण्यः । एवं चतुर्विघोपि भगवता प्रतिपादितः, 'अभिसन्धाय योऽहिंसां' इत्यादिभिरिति । पद्मपुराणे तु 'श्रीब्रह्मरुद्रसनका वैष्णवाः क्षितिपावनाः । चत्वारस्ते कलौ भाव्याः सम्प्रदायप्रव- तकाः । श्रीविष्णुस्वामिनिम्यार्कमध्वरामानुजाख्यया । भविष्यन्ति प्रसिद्धास्ते द्युत्कले पु- रुषोत्तमा दित्युक्तम् । तत्र श्रीसम्प्रदायिकाः शेपरामानुजीयाः, ब्रह्मसम्प्रदायिनो माध्वाः, रुद्रसम्प्रदायिनो व्यासविष्णुस्वामिसम्प्रदायानुवर्तिनः, सनकसम्प्रदायिनो निम्बार्कश्रीमट्ट- हरिव्यासीयाः साम्प्रतम् । एतदभिप्रेत्यैवमेव सम्प्रदायप्रदीप ग्रन्थे गदाधरद्विवेदिनावेदि- तम् । भारतीये वैशम्पायनोक्तसहस्रनामस्तवेपि 'अहःसंवर्तको वह्निरनिलो धरणीधर' इत्यत्र पृथक् पृथगेतदाचार्यचतुष्टयखरूपनामैवोक्तम् । तदेतत्सहस्रनामटीकायां श्रीवि- प्णुवल्लभाख्यायां द्रष्टव्यम् । वियदर्थवमुग्लोभिर्मितेऽन्दे मोदनामनि । चैने सिते गुरौ देते श्रीशः काश्यामदोऽलिखत् ॥१॥ १तामस श्रीकृष्णाय नमः। पञ्चपद्यानि। श्रीहरिरायकृतचिवरणसमेतानि । एवं जलभेदे पूर्वलोकविंशतिधा मिन्ना मक्तास्तभावाश्च निरूपिता जलदृष्टान्तेन, तेषामन्यहृदयसार्दीकर्तृत्वज्ञापनाय । तेपां च पुनर्भक्तानामष्टादशविधाप्रतिपादितमगवद्- णानामष्टादशविघत्वेन तन्मात्रपरतया केवलमर्यादामार्गीयाणामष्टादशविधत्वात्, पुटिमा गीयाणां मिश्रशुद्धभेदेन द्विविधत्वात्सगुणनिर्गुणभेदेन दशविधानां मर्यादापुष्ठिभेदेन द्वि- विधत्वादा विंशतिविधत्वम् । तद्धावानामपि तद्वर्तित्वेन तया संख्यावत्त्वम् । अतः परं त- द्वाक्यद्वारा तद्भावग्राहकान् श्रोतॄन् पुष्टिमर्यादामेदेन द्विविधान्, पुष्टिमार्गीया एकविधा उत्तमा एव, मर्यादामार्गीयास्तु मध्यमाघमोत्तमदैनिविधा इति चतुर्विधांध निरूपयितुं प्रथम मुख्यत्वेन पुष्टिमार्गीयान्निरूपयन्ति । श्रीकृष्णरसविक्षिसमानसारतियर्जिताः। अनिवृता लोकवेदे मुख्यास्ते श्रवणोत्सुकाः ॥१॥ श्रीकृष्णः श्रिया परमशोमया लक्ष्म्या वा युतः कृष्णः सदानन्दो निर्दोपनित्यगु- णपूर्णो रसिकशिरोमणिस्तस्य यो रसो भजनानन्दरूपः, अथवा स एव रसः स्थायिभा- वात्मा विरहरूपः, तेन परोक्षे हृदयागतेन विक्षिप्त स्थानात् प्रचलितं यन्मानसमन्तःकरणं तत्र याऽरतिश्चरितश्रवणविषयिणी तया वर्जिता इत्यर्थः । अयमर्थः । भगवचरिताकर्णन- विपयिणी अरतिद्वैधा निवर्तते, मर्यादापुष्टिमार्गभेदैन । तत्र मर्यादामागे 'शुश्रूषोः श्रद्दधा- नस्पेति वाक्यान्महत्सेवापुण्यतीर्थनिपेवणादिभिः रुचिरुदेति, ततोऽरतिनिवर्तते । पुष्टि- मागें तु तद्रसस्थामाव्यादेव 'दुस्त्यजस्तत्कथार्थ' इति वाक्यानिवर्तते । तथा च पूर्वोक्तेषु पुष्टिमार्गीयत्वावगतय एवमुक्तम् । एवं चरित्रश्रवणे तेषामरत्यभावं निरूप्य तन्मात्रविषय- करति निरूपयितुं लोकवेदानिवृतिमाहुः अनिता लोकपेद इति । लोकयुक्ते बेदे प्रवृत्तिमार्गीयधर्मयोधके भगवदितरभजनविधायके । अथवा लोके वेदे चानिवृता निर्वृति- रहि अस्सस्सा इसथः । उभयोरपि सोफवेदयो. 'थे सतलोकमाथेति पास्यास्पर ज्यत्वेन तुल्यताबोधनाय समस्तं पदम् । अत एव लोकानिवृतिबोधनाय 'पतिसुतादिमि- रातिदैः कि'मित्यादिवाक्यान्युक्तानि । वेदानिवृतियोवनाय "मममुद्धर गोविन्दे'त्युक्तम् । त्वमेव साक्षादतिदुःखसागरे निमग्नं ब्रजमुद्धर, नतूद्धृतेन वेदेन वयमुद्धर्तव्या इत्याश- येन । एवं ये पुष्टिमार्गप्रकारेणारत्यभावरतिभावयुक्तास्ते मुख्याः पुष्टिमार्गीयत्वेन श्रेष्ठाः । विषयोगे गुणगानं विना स्थानुभशस्यम् । २ अस्वास्थ्यम्।

श्रीहरिरायकृतविवरणसमेतानि । अपक्षा, मुखं पुष्टिमार्गीया भक्तिस्तत्रभवा मक्तिरूपमगवन्मुखारविन्दसलमाठकफुल- लेनोच्यमानाः सम्भूय भक्तिमानाश्रयेण पुष्टिमार्गमुक्ता जीवा मुण्या इत्यर्थः । ननु पूर्व- मनिता लोकवेद इत्यनेन भगवति रतिरुक्ता, न श्रवणादिष्विति तेषु गौण्येव सेति कर्य मुख्यश्रोतृत्वमित्याशपाहुः अवणोत्सुका इति । भगवति रतावपि वियोगे अवण एवोत्सुकाः । औत्सुक्यं तत्रैव । प्रियप्रीत्यापि परोक्षे तत्सन्देशहारके प्रीती अव- पौत्सुक्यस स्पष्टत्वात् । अत एवोक्तं 'इति स्म सर्वाः परिवरुत्सुकास्तमुत्तमश्लोकपदा- म्युजाश्रय मिति । तथा च रसिका रसविक्षिप्तमनसश्चरितसहजभावाः वियोगार्तियुताः प्रियवार्ताश्रवणमात्रैकमतयः पुष्टिमार्गीयाः श्रोतार इति सिद्धम् ॥ १॥ एवं पुष्टिमार्गीयान्मक्तान् निरूप्य मर्यादामार्गीयांस्तानिरूपयितुं तमोत्तमा अति- दुर्लभा इति प्रथमं मध्यमानिरूपयन्ति । विक्लिन्नमनसो ये तु भगवत्स्मृतिविहलाः। अर्थैकनिष्ठास्ते चापि मध्यमाः श्रवणोत्सुकाः ॥ २॥ विशेषेण क्लिन्नं तदेकपरतया कोमलत्वादाई मनो येषामित्यर्थः । यथा वस्तु स्व- सम्बदमप्यायति, तथा येषां मनः खसम्पन्धिनामपि रूक्षत्वेन शुष्काणां चेतः सानै विदधाति, शुकादीनामिव त इत्यर्थः । य इत्यनेन सर्वत्र प्रसिद्धाः मर्यादामार्गीया उक्ताः । तुशम्देन पूर्वोक्ताः पुष्टिमार्गीया व्यावर्तिताः । ननु विक्लिन्नमनस्त्वं पुष्टिमार्गीयेष्वपि त- द्रीत्या मवतीति तव्यावर्तकं धर्ममाहुः भगवत्स्मृतिपिहला इति । श्रवणावसरे या चरित्रसम्वन्धितया भगवतः पडणपूर्णस्य स्मृतिः स्मरणं तेन, न तु स्थायिभावात्मकेन रसेन बिहुलास्तलीलाविशिष्टप्रभुदर्शनाय व्याकुला इत्यर्थः । ननु पूर्वोक्तधर्मद्वयेनापातत उत्तमत्वमेव तेषु भासत इति व्यक्ततया मध्यमवयोधकं धर्ममाहुः अर्थैकनिष्ठा इति । ते पूर्वोक्तधर्मयुग्मेनोत्तमतया भासमाना अपि अर्थः पुरुषार्थों मोक्षादिः, अथवाऽर्थः प्र- योजनं स्वकृतार्थत्वादिः स एवैको मुख्यस्तन्निष्ठाः, न तु मुख्यतया चरित्रनिष्ठाः । फल- सापेक्षत्वान्मध्यमा इत्यर्थः । ननु तादृशाः श्रोतार एव न भवन्ति, तत्र तात्पर्यामावा- दित्याशङ्कयाहुः श्रवणोत्सुका इति । तत्साध्यफलतात्पर्यवस्नेपि श्रवणे मगवचरित्र- श्रवणे उत्सुका औत्कण्ठ्यवन्त इति तेषां श्रोतृलेन मध्यमत्वमित्यर्थः । यथा परीक्षिदा- दीनाम् । तेषामितरापेक्षया पूर्णवैराग्यवत्त्वेनोत्तमत्वेपि सोपाधिकप्रवृत्तेर्विदुरोद्धवायपेक्षया मध्यमत्वमेव । अत एव 'प्रायोपविष्टो गङ्गाया' मिति वाक्यात्परीक्षितः स्वकृतार्थताहेतु- त्वेन गङ्गायपेक्षा । अन्यथान्यत्रैवोपविष्टः सात् । भगवचरित्रं तु मगवानिव न वफल- साधनेन्यदपेक्षत इति स्वार्थनिष्ठत्वमेव तत्र प्रयोजकमिति तत्र तथात्वम् । विदुरस्स तु 'यन मित्रासुतो मुनि'रिति वाक्याद्वक्तृसन्निहितस्थलत्वेनैव तत्र गमनं, न गहोद्देशेनेति सार्यनिष्ठत्वागावाचरित्रमात्रनिष्ठत्वेनोत्तमत्वमेवेत्यर्थः । मर्यादामार्गीयत्वं तु परीक्षिति- १ अलिकुलेति पार. । २ चरित्र । ३ मोक्षादि । । मुक्त्यर्थम् । ५ वेषु मध्यमत्वम्) - ५२ पपगानि । दुरयोः समानं शुद्धिसापेक्षफलसिद्धः । अत एव तीर्थाटनसत्सनाम्यामेव विदुरे अवणा- धिकारः सिद्धः । परीक्षिति तु स्पष्ट एव । अत एवास्मदाचार्यरुक्तं 'मर्यादासस्तु गमायां श्रीमागवततत्सर' इत्यन्येपामपि तथाविधानां चित्तचापल्यामायसाधनत्वामिप्रायेण ॥२॥ एवं मध्यमानिरूप्याधमानामप्रयोजकत्वेन मिन्नतयाऽनिरूपणीयत्वादुत्तमनिरूपण- मध्य एव केनचिद्धर्मेण ताग्निरूपयितुमुत्तमानेव प्रथमं निरूपयन्ति । निःसन्दिग्धं कृष्णतत्त्वं सर्वभावेन ये विदुः । ते त्वावेशात्तु विकला निरोधाया न चान्यथा ।। ३ ।। कृष्णस सदानन्दस्स तत्त्वं वास्तवं रूप रसात्मकं ताशकरपादादियुक्तत्वेन सा- कारं व्यापक खेच्छया मायापसारणेनाविर्माववत् निःसन्दिग्धं शानखानुभवाम्यां सन्दे- हरदितं तत्रापि सर्वभावेन 'यावान् यथास्मीति वाक्याद्रसात्मकः साकार एव सर्वरूप इति भावेन तात्पर्येण विदुर्जानीयुरित्यर्थः । नन्वेयं दृवज्ञाने श्रवणापेक्षाऽभावान श्रोतृ. त्वगुपपद्यत इत्याशझ्याहुः ते त्विति । ते पूर्वोक्ता दृढनाना अपि ज्ञानेनं हृदये भगव- दावेशात् तु विकला ज्ञातृत्वेन स्वस्फूर्तिरहिता इति तदुपपयत इसर्यः । अत एवोक्तं 'हरेर्गुणाक्षिप्तमतिर्भगवान् बादरायणि रिति । तुशब्देन रसावेशवन्तो व्यावर्तिताः । तेपो रसावेशस्य सार्वदिकलेन कदापि स्वरूपज्ञानानुदयात् । ज्ञानस्य च रसोदयप्रतियन्धक- त्वात् । अत एव सर्वव्यापकस्य सान्तःस्थितस्यापि प्रभोरन्वेपणादी प्रवृत्तिः । (सर्वदा रसावेशवतामन्वेपणादौ प्रवृत्तिः । रसात्मकस्वरूपव्यापकखरूपज्ञानोदये सति अन्वेप- णादौ प्रवृत्तिर्न स्यात् । गोपिकानां तु सर्वदा रसावेशवत्वम् । अतः प्रवृत्तिः ।) तदेवोक्तं सिदज्ञानेन श्रीशुकेन 'पप्रच्छुराकाशवदन्तरं घहिर्भूतेषु सन्त'मिति प्रभुविशेषणकयनेन । अत एवोक्तं प्रभुणापि 'न ज्ञानं न च वैराग्यं प्रायः श्रेयो भवेदिति । ननु भगवदावेशे भगवत इव सर्वज्ञत्वमुचितं, तत्कथमेतेषां वैकल्यं, यतो हेतोर्गुणश्रवणे प्रवृत्तिरित्याशय पक्षान्तरमाहुः निरोधावेति । तेषां गुणैरेव निरोधात् । प्रपथविस्मृतिपूर्वकं भगवदा- सक्तिसम्पादनात् । गुणानामपि स्वातध्येण निरोधकत्वं श्रूयते 'मगुणश्रुतिमात्रेणे'त्यादौ । थतो निरोधेन वा वैकल्यमित्यर्थः । नचान्यथेति स्वरूपनिरोधान तथेत्यर्थः ॥ ३ ॥ एवं श्रोतृत्वमुपपाद्य कदाचिन्मोक्षार्थनिष्ठतैतेषामपि भविष्यतीत्याशयाथैकनि- ठत्वप्रयुक्तं मध्यमत्वं वारयन्त आहुः । पूर्णभावेन पूर्णार्थाः कदाचिन्न तु सर्वदा । अन्यासक्तास्तु ये केचिद्धमाः परिकीर्तिताः॥४॥ सर्वत्र पूर्णो यो भगवद्भावो ज्ञानेन भगवदावेशाद् निरोधाद्वा सर्वत्र भगवत्स्फुर: णात्तेनैव पूर्णः अर्थः पुरुषार्थो येषामिति, न तेषामन्यः खार्थ इति, तन्निष्ठत्वेन मध्यमत्वं न, किन्तु भगवन्मात्रनिष्ठत्वेनोत्तमत्वमित्यर्थः । नन्वेवं पुष्टिमार्गीयेभ्यो न भेद आयाति, तेषामप्येवंविधत्वादित्याशयाहुः कदाचिन्न तु सर्वदेति । एतेषां भावनावसरे गुण- ५३ श्रीहरिरायकृतविवरणसमेतानि । गणाकर्णनावसरे वा तात्कालिकनिरोधात् तयात्वम् । पुष्टिमार्गीयाणां तु सदैव तथात्व. मित्यर्थः । अत एव शुकादीनां न सर्वदा लीलेतराननुसन्धानम् । अन्यया 'मयुराया बर्ज गता' इति ताटस्थ्येनोक्तिर्नोपपद्येत । पुष्टिमार्गीयमक्तमावस्स तु सार्वदिकत्वं प्रभुरेवाह एकादशे 'ता नाविद'निति पये नीरनिधिनीरप्रविटनदीदृष्टान्तेन । नहि महाजलधिजठ- प्रविष्टा नद्यः कदापि पूर्वभावं प्राप्नुवन्ति । स्वरूपेण स्थिता अपि न भेदेन व्यपदिश्यन्ते । अतः पुष्टिमार्गीयेषु भगवदितरस्फूर्तिरहितमाववद्भगवदीयत्वं भगवत्त्वं च, मगवता सही- तप्रोतन्यायेनैक्यात् मर्यादामार्गीयेषु श्रवणादिना मगवदीयत्वमेवेति महानेव मेद इत्य- लमुच्या । एवं पहिःसंवेदनामावदशायां मर्यादामार्गीयोत्तमानिरूप्य पहिःसंवेदनद- शापन्नांस्तान्निरूपयितुं वहिःसंवेदनप्रसङ्गेन मध्येऽधमानिरूपयन्ति अन्यासक्ता इति । ये केचित् गाह्मणत्वशूद्रत्वादिभिरुत्कर्पापकर्पयुक्ता अप्यन्यवहादिकं तत्रानच्या वृत्त्यादि- सम्पादकत्वेन लोकानामग्रे कथनार्थ भगवद्गुणश्रोतारः 'क्षेत्रप्रविष्टा' इत्यादिनोक्तगुण- गायकमावग्राहका अधमाः परिकीर्तिता इत्यर्थः । तुशन्देन भगवदर्थकगृहासक्ता व्याव- र्तिताः । तस्यास्तु पुष्टिमार्गीयमोक्षरूपलेन उत्तमत्वसम्पादकत्वात् ॥ ४ ॥ एवं मध्येऽधमान्निरूप्य पुनर्वहिःसंवेदनदशापनानुत्तमान्निरूपयन्ति । अनन्यमनसो मा उत्तमाः श्रवणादिषु । देशकालद्रव्यकर्तृमनकर्मप्रकारतः॥५॥ बहिःसंवेदनदशायामपि न विद्यते अन्यः भगवदतिरिक्तो यत्र एतादृशं मनो येपामित्यर्थः । ननु को विशेपस्तदान्तःसंवेदन इत्याशङ्कयानन्यनेतस्वे प्रकारभेदमाहुः देशकालेत्यादि । अन्तःसंवेदने हि देशादयो भगवत्त्वेनैव स्फुरन्ति, न देशत्वादिमिः । केवलभगवदाकारान्तःकरणे सर्वत्रावरणनाशात् , यहिःसंवेदने त्वन्तःकरणस प्रपञ्चप्रवे- शेन तदाकारत्वे देशत्वादिप्रकारेण तत्स्फूतों तत्र भावनामात्रेण मगवद्गुद्धिरिति विशेष इत्यर्थः । ननु तदानीं कथं भगवत्वेन सर्वस्फूर्तिः, नेदानीम्, अन्तःकरणस्य तस्यैव ख- रूपतः सत्त्वादित्याशझ्याहुः मा इति । अन्तःसंवेदने हि ते भगवद्रूपा एव, माव- नया तदात्मकत्वात् , अतो न तेषामन्यस्फूर्तिस्तदा, पहिःसंवेदने तु मर्त्यत्वादितरस्फूर्ति- रिति तत्र देशादिषु शास्त्रेणाहायर्या भगवगुद्धिरित्यर्थः । एतादृशा मर्यादामार्गे श्रवणादिषु, आदिपदेन कीर्तनप्रभृतिषु चोत्तमा इत्यर्थः ॥५॥ माववतस्तद्भावान् निरूप्य पूर्व ततो भक्ताः । मार्गद्वयेन चोक्ताः श्रोतारः श्रीमदाचार्यैः ॥१॥ आचार्या निजकरुणामात्राः कुर्वन्तु सन्तुष्टाः । नामा मां हरिदासं रूपेणापि खतः प्रभवः ॥२॥ इति श्रीहरिदासीयं श्रोतृवातुर्विध्यकथने निजाचार्यश्लोकपनक- विवरणं संपूर्णम् ॥

श्रीकृष्णाय नमः। पञ्चपद्यानि । श्रीपुरुषोत्तमकृतविवरणसमेतानि । अयश्रीमदाचार्यचरणाः भक्तिनर्धिन्या वीजभावदार्योत्तरं मत्तिवृद्ध्यर्थ श्रवणकीर्तने साधनत्वेनोक्तवन्तः, धीजदाार्थ च पूजा श्रवणादीनि च नवापि साधनत्वेनोक्तवन्तः । तत्र, श्रवणं नाम भगवद्वाचकपदवाक्यानां शक्तितात्पर्यनिधीरः । कीर्तनं च तन्निर्धारपूर्वकं मुखादुच्चारणम् । एवं तयोः स्वरूपस्य साधारणले सागानन्तरं क्रियमाणयोः कुतो भक्ति- हेतुत्वम्, ततः पूर्व क्रियमाणयोश्च कुतो वीजदायमान एवोपकारकत्वमित्याकांक्षायां निरोधलक्षणे 'महतां कृपया यावत्' 'महतां कृपया यदिति श्लोकाग्यां यथा कीर्तने विशेष उक्तः, महत्कृपाभिव्यक्तभगवत्कीर्तनस्सानन्दसन्दोहजनकत्वमिति प्रथमाधिकारे म. हतां कृपया यथा भगवदीयकृतं कीर्तनं सुखदं, तथा लौकिकसम्बन्धकीर्तनं न सुखदं, किन्त्व- रुधिविषय इति, तत उत्कृष्टाधिकारे विशेषः कीर्तनस्याधिकार्यनुभवमेदविचारणोक्तः । तथा श्रवणस्य कुत्रापि नोक्त इति तदर्थ पयश्लोकान् श्रीकृष्णरसविक्षिसेत्यादिकान् हरेभक्ता इति निगमनान्तान्वदन्ति । प्रथममुत्कृष्टं भक्तिवृद्धिजनकं सागिनां भा. वमाहुः श्रीकृष्णेत्यादि । किञ्च, ननु यथा स्वस्मिन्मगवद्भाव सम्भवरूपं श्रवणफलसि- द्धयर्थ श्रवणस्योत्कर्थ च वक्तृभावान् परीक्ष्य तत्सङ्गः श्रवणार्थं विधेय इति जल- भेदे प्रतिपादितम्, तथा वक्त्रापि भगवद्भावसम्भवरूपकीर्तनफलसिद्ध्यर्थ श्रोतृभावः परीक्ष. णीयः, तृतीयस्कन्धे विदुरमैत्रेयसंवादे विदुरमैत्रेयज्ञानसंक्रमस्य च परस्परसंवादेन प्रति. पादितत्वात् । अतः कीर्तनसिद्ध्यर्थं श्रोतृन विचारयन्ति श्रीकृष्णेत्यादि । श्रीकृष्णरसविक्षिसमानसा रतिवर्जिताः। अनिता लोकदे ते मुख्याः श्रवणोत्सुकाः ॥१॥ अत्र अनिता लोकवेद इति विशेपणं त्यागवत्त्ववोधकम् । तादृशमेव हि लोके वेदे चानिदेतेः । रतिवर्जिता इति विशेषणं तु रती रमणं बहिर्भगवत्प्राकट्येन भगवता सह संलापादिकं, तद्रहिता इत्यर्थकम् । एतेन निरोपलक्षणे 'क्लिश्यमानान् ज. नान् दृष्ट्येति श्लोकद्वयेन यादृशोधिकार उक्तस्तद्राहित्यं सूचितम् । तेन ततः पूर्व यो गुण- गानाधिकारः, यथोत्कृष्टः कीर्तनाधिकारस्तदुभयं कोडीकृतम् । तदत्र आहुः श्रीकृष्ण- रसविक्षिसमानसाः श्रवणोत्नुका इति पदद्वयेन । तथाच श्रीकृष्णस्य भगवतो यो रसो लीलासम्बन्धिभजनानन्दात्मकः, तेन विक्षिप्त मानसं येषां ते तथा, एतेन तेषां स्वार्थाननुसन्धानं सूचितम् । एते पुष्टिमार्गीया उक्तधर्मणावगन्तव्याः । किन्च, श्रवणे

श्रीपुरुषोत्तमकृतविवरणसमेतानि ।
उत्सुका उत्कण्ठायुक्तास्ते भक्ता मुख्याः श्रवणाधिकारिणः । अथ यतदोर्नित्यसम्बन्ध
इत्यध्याहारः । एतेन ये कीर्तने द्वितीयाधिकारिणो ये च गुणगाने प्रथमाधिकारिणस्ते
तुल्या इत्युक्तम् । कीर्तनगानयोर्मानपूर्वकत्वात्तस्य च श्रवणपूर्वकत्वादि दृश्यते, श्रवणे
तादृशत्वस्यैव सिद्धेरिति । नन्वेकादशस्कन्धे 'अध भागवतं ब्रूत यद्धर्मों यादृशो नृणाम्'
ययाचरति यद्भूते यैलिर्भगवलिय' इति जनकप्रश्ने हरिणा योगीश्वरेण 'सर्वभूतेषु यः प.
श्येद्भगवद्भावमात्मन' इत्यादिमिरेकादशभिः शोकैः कर्मज्ञानभक्तिमिश्रा भागवता उक्ताः,
सुबोधिन्यां व्याख्याताश्चेति त एवात्र कुतो नोक्ता इति चेत् ? उच्यते । तथादि, प्रश्ने
नृणामिति पदात्साधारणा एव भागवताः पृष्टाः, नत्वात्यन्तिका इत्यतस्तदनुक्तिः । किन्य,
तत्र तेषां फललक्षणे 'विराजति हृदयं न यस्य साक्षाद्धरिरवशाभिहितोप्यघौपनाशः, प्रण-
परशनया धृतांत्रिपद्मः स भवति मागवतप्रधान उक्त' इत्यनेन भगवतः सर्वदा तद्धृदय-
स्थिति(गवतप्रधानलक्षणत्वेनोक्ता । सा च समागम्यत्वेन तत्र स्फुटति, नत्वन्यगम्य-
त्वेनेसन्यगम्यं लक्षणं तत्सद्वार्थ वक्तव्यम् , तदत्रोन्यत एवेति पुष्टिमार्गे यादृशा विवक्षिताः
तेत्र लक्ष्यन्त इति तदनुक्तिरिति जानीहि । तत्र प्रथमविशेषणद्वयेन यद्धर्मत्वं, तृतीयेन
यादृशत्वं, तुरीयेण यथाचरतीयोक्तं सिध्यतीत्यपि योध्यम् । 'तथा न कामकर्मवीजा-
ना'मिति श्लोकोक्तलक्षणवत्वमपि सिध्यतीति च योध्यम् ॥ १॥
एवं शुद्धपुष्टिमार्गीयान् मुख्यान् श्रवणाधिकारिणो निरूप्य पुष्टिमर्यादामार्गीयान्
मध्यमानाहुः विक्लिन्नेत्यादि ।
विक्लिन्नमनसो ये तु भगवत्स्मृतिधिहलाः ।
अथैकनिष्ठास्ते चापि मध्यमाः श्रवणोत्सुकाः ॥२॥
विशेषेण क्लिन्नं तदेकपरतया कोमलत्वाद्भगवद्रसेना मनो येषां ते तथा । तु
पुनर्ये भगवतः स्मृत्या स्मरणेन विहला विवशतां प्राप्ताः, च पुनर्ये श्रवणोत्सुकाः श्रव-
णोत्कण्ठायुक्तास्ते त्रिविधा अपि अर्थेकनिष्ठाः अर्थः प्रयोजनं स्वकृतार्थतारूपं भक्तिबी-
जदार्यरूपं वा, तम एका मुख्या निष्ठा नितरां स्थिति]पां तादृशाः सन्तः मध्यमा
भक्ताः । एवं च ये गृहस्थाः आसक्तेर्व्यसनस्य वा साधनपरास्ते पूर्वोक्तधर्मवत्त्वेपि साधन-
परत्वात्तेपां भगवन्निष्ठायास्तादृशसाधन एवोपयोगात्पूर्वोक्तधर्मवत्त्वेपि मध्यमा एवेत्यर्थः ।
अनापि प्रयमविशेषणेन यद्धर्मत्वं द्वितीयेन च यादृशत्वं वोधितम् । तेनैवाचरणोक्ती अपि
सूचितप्राये घोध्ये ॥२॥
एवं पुष्टिमर्यादामार्गीयान्मध्यमानुक्त्या मर्यादापुष्टिमार्गीयान् जपन्यानाहुः नि:.
सन्दिग्धमिति द्वाभ्याम् ।
निःसन्दिग्धं कृष्णतत्त्वं सर्वभावेन ये घिदुः ।
ते त्वावेशातु विकला निरोधादा न चान्यथा ॥ ३ ॥

सेवाफलम् विवृतिसमेषम् । पूर्णभाषेन पूर्णाः फवाचित तु सर्वदा । अन्यासकास्तु ये फेचिदघमाः परिकीर्तिताः॥४॥ कृष्णतत्त्वं भगवतः सर्वकर्तृत्वं पहुणवत्त्वं परमकृपालत्वं दीनपन्धुत्वं भक्तिज्ञाना- दिजनकत्वं पतितपावनादिकत्वमनारोपितं निःसन्दिग्धं यया साचया सर्वमावेन भगवतः सर्वत्वेन ये विदुः जानन्ति, तु पुनरावेशाद्भगवदावेशानिरोपावा ये विकठाः, च पुनर न्यया न । किय, पूर्णमावेनेति श्लोकोतकालपरिच्छिन्नधर्मवन्तस्ते ज्ञानप्रधानत्वाद न्यावेशेन भक्त्युत्कर्परहित्याच जपन्या इत्यर्थः । तेन ताशां ताशां सङ्गे पक्कुरपि ता- शतादृशमावस सिद्धिरिति यथासम्भवमुत्कृष्टसङ्ग एप प्रयतनीयमिति बोध्यम् ॥३॥४॥ ननु मवत्वेवं तयापीदानी जपन्यानामपि दुर्मिठत्वाकीर्तनमुन्छिन्नप्रायं भवेदिति तदभावार्य सामान्यतः श्रवणादिगक्त्यधिकारिण बाहुः अनन्यमनस इत्यादि । अनन्यमनसो मा उत्तमाः श्रवणादिपु । देशकालद्रव्यकर्तृमश्रकर्मप्रकारतः॥५॥ प्रफारत इति ल्यय्लोपे पममी । तथा च देशादीन् प्रकारान् प्राप्य ये भग- वदेकमनसस्ते श्रवणादिषु भक्तिषु सद्गार्थ मृग्याः, यदि पूर्वोक्ता न मिलन्ति । मिलने तु नैतादृशेषु सञ्जनीयमिति न काचिदनुपपत्तिरित्यर्थः ॥ इति श्रीमबल्लभनन्दनचरणेकतानश्रीपीताम्यरतनुजश्रीपुरुषोत्तम- विरचितं श्रीकृष्णरसविक्षिसेत्यादिश्लोकपञ्चकस्य विवरणं संपूर्णम् ।।

बीम-पत्लभाचार्य महामम-विरचित-योगश-प्रन्यानतर्गत:-चतुर्दश: संन्यासनिर्णयः अष्टटोकाभिः समलंवृतः १. श्रीगोकुलनापानाम् ५. श्रीगोपेश्वराणाम् २. श्रीरघुनाथानाम् ६. श्रीपुरुषोत्तमानाम् ३. श्रीगोकुलोत्सवानाम् ७ फाका श्रीवल्लभानाम् ४. पावा भौगोपेश्वराणाम् ८. पावा भीगोपेशानाम् श्रीमद्-वल्लभाचार्य-महाप्रभु-वंशावतस-नित्य लीला-स्थित- गोस्वामिश्री-१००८-श्रीद्वारकेश्वरलाल महाराजश्री- स्पेतेपा-स्मृती-तदात्मजः- गौस्वामिश्री-१००८ श्री किशोरचन्द्र-महाराज प्रकाशित वि.सं. २०३७ श्रीवल्लभादा : ५०३

प्रकाशक:
गोस्वामियी १००८ श्रीकिशोरचन्द्रजी महाराज
मोटी हवेली, माडवी, कच्छ, ३७०४५५ भारत,
साधारण संस्करण २००० प्रति
राज संस्करण १००० प्रति
श्रीवल्लभान्द ५०३
ग्रन्थ-परिचय लेखक : गोरवामी श्याम मनोहर
मुद्धक:
स्टुडियो नहार, २३-ए, सेन्ट्रल चौपाटी बिल्डिंग चौपाटी, बम्बई-४०० ००७

गोस्वामिश्री १००८ श्रीद्वारकेशलालजी महाराज ।। श्रीकृष्णाय नमः ।। ॥ श्रीमदाचार्यचरणकमलेन्यो नम." ग्रंथ-परिचय मिते" संन्यासनिर्णयकी रचना वि. स. १५५१ मे बदरिकाश्रमको यात्राके अवसरपर नरहरि सन्यासीके लिए की गई ऐसी एक किंवदन्ती मिलती है' श्रीयदुनाथजी-विरचित श्रीवल्लभ-दिग्विजयके अनुसार श्रीमहाप्रभुने बदरिकाश्रमकी यात्रा तीन चार को थी. द्वितीय यात्रामें कृष्णदास मेघनके आपके साथ होने का उल्लेख तया व्यासाश्रम पधारनेका उल्लेख भी मिलता है इस प्रसगको सूचना वहाके तीर्थपुरोहित- को दिये गये वृत्तिपत्रमे भी मिलती है. इस वृतिपत्रम यात्राकाल "देवाम्मपतिमू (१४३३) 'तदनुसार वि. स. १५६८उल्लितित है. अत: यदि वि. स. १५५१ बाली किवदन्ती प्रामाणिक हो तो उसे प्रथम यात्राका काल मानना पडेगा इसकी पुष्टि चौरासी वैष्णवन्की वार्तासे भी होती है। "सो एक समय नरहर सन्यासी बद्रिकाश्रम फिरते-फिरते आये. तहा श्रीआचार्यजी महाप्रभु पधारे सो नरहर सन्यासीको दरसन भये तव नरहर सन्यासी श्रीआचार्यजी महा- प्रभुनसो विनती किये- 'महाराज मै पहिले सन्यास ग्रहण कियो हतो. पाछे आपको कृपाते भक्तिमाररामे आयो सो सन्यासके प्रकार हैं सो तो मैं जानत हो और भक्तिमारगको कहा प्रकार है सो मैं जानत नाहि. सो मोको कृपा करि कहिये तब श्रीआचार्मनी कहे- 'तोसो भक्तिमारग सन्यासको प्रकार कहत हो , तब श्रीमाचार्यजी 'सन्यास निर्णप' पन्य करि नरहर सन्यासीको पढाय भाव कहि सूनायो तब नरहर सन्यासीके हृदयम पुष्टिमारगको सिद्धान्त स्थिर भयो, तब श्रीठाकुरजोको लीलाको अनुभव भयो सो मग्न होय गये. पाछे श्रीआचार्यजी आगे पधारे नरहर मन्यासी स्वरूरानन्दमे मग्न होय फिरिबो करते" श्रीमहाप्रमुके चरित्रवर्णोंमें सर्वाधिक प्राचीन (वि.स १६१० में) गदाधर द्विवेदी लिखित सम्प्रदाय-प्रदीपर्म भी एक 'सन्यासनिर्णय' का उल्लेख मिलता है ". श्रीवल्लभा निर्गत्य गगातीरे उपविष्टा तत्र त्रिदण्डविधिना सन्यास निर्णय उक्त यथा विष्णुस्वामी तथा यतिर्भूत्वा काश्या गता" (चतुर्थ प्रकरण) किन्तु यहा 'सन्यासनिर्णय' ग्रन्थबारक है अथवा अन्यरूपेण निवद्ध न किये गये विसी मौखिक उपदेशका वाचक है, यह निश्चित नहीं हो पाता है इसके अलावा-'त्रिदण्डविधिना' पदार भी ध्यान देना चाहिये क्योकि पोडश- ग्रन्यान्तर्गत प्रस्तुत सन्यामनिर्णय ग्रन्यमे कही भी त्रिदण्डविविसे सन्यास ग्रहण करने या न करने का कोई भी विचार उपलब्ध नही होता है 1 पैजयवाणी (प्रय ४ वर्ष १९७९) में श्रीनागरदाम शास्त्रीद्वारा लिखित रेष पष्ठात्मज श्रीयदुनापजी विरचित श्रीवल्लभदिग्विजयमे, काशीम आसुरव्यामोह-लीला करनेम पूर्व दामोदरदास प्रमृति वैष्णवोद्वारा सन्यासको अध्ययना करनेपर उनके लिए सन्यासको अनावश्यकता दिखलाने के लिए एक मौखिक उपदेशका वर्णन मिलता है उरा सन्यासनिर्णयके उपदेशसारको भी वहा सालित किया गया है, जिसे प्यानसे पढनेपर यह म्पष्ट हो जाता है कि प्रस्तुत पोडशयपान्तर्गत सन्यायनिर्णय और उक्त मन्यासनिगंप मे उपदिष्ट विपय भिन्न-भिन्न हैं. कुल मिलाकर दो सम्भावना सामने आती है। १) बदरिकाश्रमकी प्रथम यात्रा-समयत वि स. १५५१-मे नरहरि मन्यासी के लिए प्रस्तुत पोडशन यान्तर्गत सन्मासनिर्णय लिखा गया था २) लोकगोचर देहदेशत्याग अर्थात् आसुरख्यामोह-लीला करनेी तृतीय भगवदाशाके पश्चात् अन्त करणप्रबोध ग्रन्थको रचना जमे थीमहाप्रभुने स्वयम् के लिए को, वैसे हो सन्यास लेनेमे पूर्व इस सन्यासनिर्णय प्रत्यको रचना भी आपने स्वपके लिए ही की है. अर्थात् वि.स १५८७ मे इनमे प्रथमा तो पूर्वोवन चरित्रप्रन्योको एकवाक्यतासे मष्ट होता ही है. द्वितीय सम्भावनाका भी समर्थन हमें श्रीपुरुषोत्तमजीवी प्रस्तुत सन्यासनिर्णय प्रन्यकी व्याख्यामें मिलता है श्रीमुरुषोत्तम जीरे अनुसार क्योकि प्रस्तुत सन्यासनिर्णय ग्रन्थका प्रणयन तृतीय भगवदाज्ञाके बाद हुए पश्चातापको दूर करने के लिए ही हुआ है अतः वि स १५८७ रचनाकाल ही श्रीपुरुषोतमजीको मान्यतया सिद्ध होता है श्रीपुरुपोत्तमजीके अनुसार इसका आधार वे स्वयम् इन गब्दोंमे देते हैं- "गया तु तेषा परस्परविसम्मतिमवलोक्य अन्त.वरणप्रबोधग्रन्थस्य पश्चाताप'-'परित्याग' पदयो अत्र प्रत्य- भिज्ञानात् स एव परचतापो अब निवार्यत्वेनादृत". परन्तु केवल दो समान पद 'पश्चाताप' तथा 'परित्याग' के पुनरावर्तनको ' परम्पराप्राप्त इतिवृत्तसे बलवत्तर नहीं माना जा सकता है इसके अलावा सर्वोतमस्तोत्रमे- "विरहानुभकार्थ-सर्वत्यागोपदेशक" नामके द्वारा श्रीप्रभुचरण मी प्रस्तुत सन्यासनिर्णय ग्रन्थके-"विरहानुभवार्थ तु परित्याग प्रशस्पते" उपदेशका ही परामश करतेसे प्रतीत होते हैं वहा- "पिरहानुभवैकार्थसर्वत्यागप्रशसक' अथवा "विरहानुभकार्यसत्यागपरायण न कहकर "उपदेशक" कहना इस द्योतक लगता है कि प्रस्तुतसन्यासनिर्णय ग्रन्थ श्रीमहाप्रभुने अन्त करणप्रबोधकी तरह स्वयमके लिए नही किन्तु अपने अनुयाईओके लिए उपदेशके रूपमे प्रकट किया है इसके अलावा श्रीपुरुषोत्तमजी भाष्यप्रकाश (३।४६४२) म- "बहिस्तूभमथापि स्मृतेराचाराच' के भाष्याशकी नथा प्रस्तुत सन्चासनिणय ग्रन्थकी एकवाक्यता स्वीकारते (१) आशा पूर्व तु या जाना मगामागरस गम । यापि पश्चा मधुवन न कृत तद्प मया ।। ददेशपरित्यागस्तृतीयो लोकगाधर । पश्चात्ताप क्य तत्र सेवकोह न चान्यथा ॥ (अन्त करण ५-७) " घातका है.--"एतस्प प्राच संन्यासनिर्णयप्रथादवगतम्यः". यहा प्रारम्भमें भक्तिमार्गके मध्यम कक्षाये अधिकारीके लिए आवश्यक साधनत्यागका विचार इस अधिकरणका प्रमुख उद्देश्य है ऐसा दिखलाते है-"अय भक्तिमार्गीपमध्यमजयन्पयो. फलविचारोसर मध्यमस्य त्यागरूपं साधन चिन्त्यते." भागबनके एकादश स्कन्ध अठाहरवे अध्यायमे -"यदा वर्मविपाकेषु लोकेषु निर- यात्मसु विरागो जायते सभ्यड, न्यस्ताग्नि प्रजेत्ततः'' कारिकासे प्रारम्भ कर सोलह कारिकाओमे पहले भगवान्ने उद्धवको त्रिदण्ड मन्यासका स्वरूप समझाया है, और इसके वाद-माननिष्ठो विरतो वा मद्भक्तो वानपेक्षकः सलिगानाथमास्त्यक्त्वा वरेदविधि- गोचर." कारिकामे चतुर्थ आश्रमम्प सन्यासरो मिन्न एक सन्यासको आज्ञा दी गई है। यह सन्यासकी आज्ञा पूर्वोक्त भाष्य (३।४४२) तया सन्यासनिर्णय ग्रन्थ का आधारभूत वाक्य है. उद्धवने भी इस मन्यासको आनाके बाद सर्व-परित्याग किया था तथा यह परित्याग मध्यमाधिकारम्प था, यह त्रिविधनामावलोके-"उववादिमध्यमभावबोधकाय नम "से स्पष्ट होता है ऐसा श्रीपुरुषोत्तमजी स्वीकारते है ऐसो स्थितिम मन्यायनिर्णय ग्रन्थ श्रीमहाप्रभुने स्वयम्के लिए लिसा यह कहना कुछ असमजस सा लगता है क्योकि मर्वप्रथम तो सन्यातनिर्णय ग्रन्थमे मध्यामधिकारी के त्यागके प्रकारको प्रतिपाद्य विषय माना गमा है, और स्पषं ही श्रीमहाप्रभुस्वयम् के बारेमे मध्यमाधि- कारिताका निर्णय लें यह मान नही लगता श्रीपुरुषोत्तमजी के अनुसार तृतीय भगवदाज्ञा भो "लोकपरित्यागविषयिणी" यो. इप आज्ञाका तात्पर्य मध्यमाधिकारबाले सन्यासग्रहगार्थ लेनेमे कोई विशेष हेतु दृष्टिगत नहीं होना है "स्वीयबन्धनिवृत्यर्ष वेश सोपि न चान्यथा" में मन्यासपिन्होको अनियतता या उपेक्षा का जो बोध होता है, वह भो श्रीमहाप्रभुके सर्वथा आग्रहपूर्वक यथाका कुटिचक बहूदक हस तथा परमहस के क्रमनिर्वाहमे उतना सगत नहीं होता. इन वाताको दृष्टिगत रखनेसे ऐसा प्रतीत होता है कि लोकगोचर देहदेशमागको तृतीय भगवदाज्ञाके परिपालनार्थ श्रीमहाप्रभुने संन्यासनिर्णय ग्रन्थमें वर्णित मध्यमाधिकार- वाला सन्यास नही किन्तु चतुपधिमाप नित्यसन्यास ही आपने लिया था " • आश्रमचतुष्ट- यपक्षे नित्यसन्यासो भवति तत्र पाह्मण्यं, क्य पूर्वाश्रमानन्तर्य च प्रपोजन न जानादि" (सुबो ३।१२।१२), सन्यासनिर्णयमे "कर्ममार्गे न वर्तव्य सुरा कलिकालन" वचत द्वारा जिस चतुपाश्रमरूप सन्यामकी भक्तिमार्गोय मीबोके लिए अनुपायना, तथा सर्वनिर्णयम- "त्रिदण्ड परिगृहणीत सर्वशास्त्राविरोघि तत् . प्रतित्तिरिय सा देहस्य" वचन द्वारा जिस चतुर्थाश्रमाप मास्वविहित मन्यासकी ब्राह्मणदेह के लिए आवश्यकता शास्त्रमम्मत मानी गई है, वही सयामका प्रकार श्रीमहाप्रभुने स्वीकारा था पुष्टिमार्गमें फलानुभूति इम मूलार ही उतम मानो गई है-"भगवानेव हि फल य यषा- चिर्भवेद् भुषि" (प्र म.). आगे चलकर सेवाफलमें भी वर्णित उत्तम फल 'अलौकिक सामथ्र्य सन्द्रियों से भगवानको रमारिमका अनुभूति इसो भूतलपर स्मोकारो गई है. पर प्रभु जब आचार्य वरणको लोकगोवर देह-देश-स्पागकी अशा प्रदान कर रहे थे, मर्यादामार्गीय . कर देना उनिन होता है-"पिरहानुभवातु परित्याग प्रसस्यरी रीजभावके दूर होनेपर भसाो यह स्वतएव ममममे आने लगता है जि-गृहस्थिते. रत्कृष्टत्व न भगवदीयत्वमाण शिन्तु भगवता मह स्थिरया मगरमार्थि या अन्यथा न स्पातम्यम्" (सुबो १२) पुनश्च यहां यह अवधैय हो जाता है कि श्रीमहाप्रभु समक्ष न तो भक्ति योगभावी दृढ करनेकी कोई समस्या थी और न म्यगृहम भगवरसेवा अनिर्वाही ही. न सतन गृह- स्थितिसे भक्तिरे दीनभावये विनाशको ही और न विरहानुभवायं परित्यागी भी पोकी सन्यासमै मुक्तिसे अधिक अव्यग्रता तो सम्भव नही, जबकि मुक्तिो बारेमे आपका स्पष्ट अभिप्राय है कि- "म्वतन्त्रमनानां तु गोपियादितुल्पाना सर्वेन्द्रियस्तथान्त करणे म्वरूपेण चानन्दानुमप अतो मानानां जीवन्मुक्त्यदाया भगवतपासहितगृहाश्रम एव विशिष्यते" (शास्त्रार्थप्रकरण) इसी तरह सर्वोत्तममे आपयो- "रासलोलेरतात्पर्य" यहा गया होनेसे विरहानुभवार्थ भी सन्यासमे आपका प्रवृत्त होना यहुत अर्थपूर्ण नही रह जाता स्वगृहम भगवत्सेवा-कमामय जीवनयापन उत्तमाधिकारका घोता है तथा वह मम्भव न हानेपर भग वद्विरहानुभवार्थ सन्यासग्रहण वरना भक्तिमार्गीय मध्यमाधिकारका घोतक है यद्यपि "कृत्स्नमावात गहिणोपराहार' (ब्रह्ममूत्र ३४७) ने मायके उपसहारम, "कुछ दुर्लभ प्रकार क-राजा आशकरणदास जंस- भान भगवगवा परते हुए भी गृहत्याग कर देते हैं " ऐसा उल्लख मिलता है परन्तु उस गृहत्यागरे जो कारण यहा दिसलाये गये हैं, वे यो हैं- "केचन भक्ता भाषणादिलोलादर्शन विना स्थातुमसत्ता प्रचुरमायिवशाशया गृहास्त्यक्त्वा वन गच्छति '' स्पष्ट है यह वात श्रीमहाप्रभुपर लागू नहीं होती अतएव भाष्य- कार यही कहते है- "तेन भगवदभजन एव तत्रापि पुष्टिमार्ग एव श्रुतैभर इति ज्ञायते" अत जिन्ह भगवत्सेवाका सोभाय नही प्राप्त होता उनके लिए विरहानुभवायं सन्यासका कल्प है इसम यह सुदृढ हाता है कि श्रीमहाप्रभु सन्यासके स्वरूप एवम् प्रयोजन इस भन्यासनिणयमें निम्नपित भक्तिमार्गीय मध्यमाधिकारक पोतक मन्यासके म्वरूप एवम् प्रयो. जन से भिन्न ही थ अतएव दामोदरदाम प्रभृति वैष्णवोको सम्पासम भी आप अनुवर्तनको प्रार्थनाका थीमहाप्रभुने अस्वीकार कर दिया था, श्रीयदुनाथजीके शब्दोमे, 'ततो दामोदरादीना राया- नाथ सन्यासग्रहणार्थ चायना जाता अथाचा पुष्माक भागवतसन्यासीत्येव मत्काथिम् उद्धादिवदिद्वैव स्थातव्यमित्युक्त्वा सन्यासनिणय श्रावत 'भागवत सन्यास से अपना नात्सर्य ब्रह्मपम्बन्धगद्यद्वारा आत्मनिवेदनके बारेमे ही प्रतीत होता है स्वयम् श्रीमहाप्रभुरे विदण्डविधिसे सन्याराग्रहणका प्रयोजन भावदाज्ञाका पालन ही था अत वैमो आज्ञाव अभावर्षे अन्य अनुपाईओके लिए सन्यासम आपका अनुवर्तन सवथा अनावश्यक था नरहरि तो पहले ही सन्यास ल चुक ये और एक आश्रमरा सर आश्रममे एक बार पहुचनके बाद पुनरावर्तन सर्वथा शास्त्रनिषिद्ध है, अतएव वृन्दावनम पहले नरहरिको त्रिदण्ड- विधिसे अर्थात् शास्त्रसम्मत रोतिम संन्यास लिवाया गया और बादमें बदरिकाश्रममें उन्हे इस संन्यासनिर्णय ग्रन्थ के उपदेश द्वारा मादिरहानुभवमे दीक्षित किया गया ! संन्यासका विधान पुऔषणा वित्तपणा और लोकपणा से ऊपर उठनेवालोके लिए शास्त्रम मिलता है. परन्तु शिष्यपणामें ये तीनो वासनायें छम रूपसे मिगुणित हो जाती हैं. पुत्र तो दोचार पंदा हो जाये तो लालसा सन्तुष्ट हो जाती है, परन्तु शिष्यषणा तो दो. चार हजार चेलोके जुट जानेपर भी सन्तोपका नाम नहीं लेती ! अतएव अपने सहज परिवारके पोषणके लिए वित्तको अपेक्षा उतनी नही होती जितनी कि मठ या आश्रमो में जुटे चेलोंके पोपणके लिए होती है. एक सासारिक व्यक्ति अपने गुणोकी कीर्तिकी लालसा से उतना ग्रस्त नहीं होता जितना कि एक आधुनिक परमहंस अपने त्यागकी कीर्तिको लाल- सासे ग्रस्त होता है ! वस्तुतः विरक्तको त्यागमायना और त्यागीको वैराग्यसाधना में बड़ा अन्तर पर जाता है! वास्तविक वैराग्य व्यक्तिको किसी सीमा तक ऊपर उठा सकता है परन्तु वैराग्यहीन त्याग हमे और नीचे धकेल देता है श्रीमहाप्रभुका सिदान्त है कि किसी वस्तुके व्यर्थ त्याग- की अपेक्षा उसे भगवान को समर्पित कर देना उचित वात है अतएव जव हम समर्पित नही कर पाते तब केवल विरक्तिके आधार पर प्राप्त वस्तुके त्यागके गजाय भगवदनुरक्तिको तन्मयतामे उसका त्याग किया जाये तो बात बन सकती है ! त्याग अपने-आपमे एक स्वतत्र मार्ग होनेको महसा नही रखता है मार्ग तो तीन ही होते है. (१) कर्ममार्ग (२) ज्ञानमार्ग (३) भक्तिमार्ग कर्म ज्ञान मा भक्तिके अगरूपेण स्मागकी महत्ता अवश्य मान्य हो सकती है, किन्तु इनमे रहिल पंवलत्याग तो मनुष्यको केवल परिव्राजक ही बना पाता है--कही पहुचाता नही । श्रीमहाप्रभु सन्याराका निर्णय केवल वैराग्यके सन्दर्भमे देना पसन्द नही करते हैं कर्म ज्ञान या भक्ति में से किसी एकके साय वैराग्यके प्रकट होनेर सन्यास या त्याग का विचार प्रासगिक बनता है. भागवत (११५२०१७-८) में आता है कि-"योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नणा श्रेयो विधिस्सया ज्ञान कर्म च भक्तिश्च नोपायोन्योस्ति कुचित, निविष्णना ज्ञानयोग... कर्मयोगस्तु कामिना...न निविष्णो नातिमवतो भक्तियोगोस्य सिद्धिदः" अर्थात विरक्ति- प्रधान साधकके लिए ज्ञानयोग, सकाम सापकोके लिए कर्मयोग; एवम् न विरक्त और न अतिसकाम ऐसे सापको लिए भक्तियोग सिद्धिप्रद होता है. इन कर्म ज्ञान या भक्ति के मार्गपर आगे बढ़नेपर अर्थात् वैराग्यके दृढ होनेपर संन्मामका विचार मासगिक बनता है. इस विषय में सुबोधिनी (३।१२।४२) में एक विस्तृत सप्टोकरण श्रीमहाप्रभुने दिया है. उसका अनुवाद देख लें: "ब्राह्मणके लिए यह आवश्यक है कि वह चारों पाश्रमोमे क्रमश. प्रविष्ट हो.. किसी एक आश्रममे स्थिर होना भी, वैसी कामना होनेपर, शास्त्रानुमत है... जो कर्यरेतस भक्त - . रीतिसे, तब तदनुरूप पारमहस्य सन्याम भी आपने ग्रहण किया "मपामेन देहत्यागं करोति स परमहतो नाम स परमहसो नाम ।" (जाबालोपनिषद्) अतएव अन्त करणप्रबोधके- "प्रोडापि दुहिता यद्वत् स्नेहान प्रेष्यते वरे तथा देहे न कर्तव्य" तथा रार्वनिर्णयके-न्यासे सर्वपरित्यागी तादृशस्य बलाद्वापि देहत्यागो विमु- क्तिद" इन दोनो वचनाकी तुलना करनी चाहिये फलत सन्यासनिर्णय, यह सहज सम्भव है वि, श्रीमहाप्रभुने वरिकाश्रमकी प्रथम यात्राके समय नरहरि सन्यासीके लिए ही बनाया हो भक्तिवधिनीमें यह दिखलाया गया था कि जिनका बीजभाव दृढ़ हो वे गृहत्याग करने भगवत्कयाक श्रवण-कीर्तन द्वारा भी अपनी भक्तिको विकसित कर सकते है अन्यथा बीज भावके दृढ न होनेपर उसे दढ करनेके लिए व्यसिका ययावसर भगवत्सेवा और भगत कथा दोनोको अपनाना चाहिये, यदि वह अव्यावृत्त हो तो अन्यथा व्यावृत्त होनेको अवस्थामे अर्थात् निजगृहमें भगवत्सेवाकी रावयता न होनेपर बीजभावको दृढताके लिए केवल भगवत्कथाक श्रवणादिमे भी प्रेमासक्तिम्पसनको उत्तरात्तर अवस्थाओमे भक्ति विकसित हो सकती है भगवतथाके श्रवणादिस जब स्नेह उत्पन्न होता है तव सासारिक विषयोमे अनुराग नष्ट जाता है- भगवदासक्ति स्थिर होनेपर भगवत्मेवामे अनुपयोगो गृह, भक्तको अरपि हो जातो है- भगवत्सेवार्थ उपयोगम न आनेवाल घर और घरको सारी बस्तु भवनको भक्तिमे बाधक लगने लगती है-धीरे घोरे या जब कृष्णभक्ति व्यमनदशापर पहुच जाती है तब जीव कृतार्थ हो जाता है एसो व्यसनदशापर पहुवनेवाले व्यक्ति के लिए भी भगवत्स्वार्थ अनुपयोगी परम सतत निवास करना, कभी भक्तिम व्यवधानवा हेतु बन सकता है भक्तिका विनाशक हो सकता है अन भक्तिको दृढताके लिए केवल कृष्णदर्शनको तीन लालसासे जो गृहत्याग कर पाते हैं, उन्हें सर्वोत्कृष्ट परा सुदृढ भक्तिका लाभ होता है (भक्तिवधिनी) इसके बाद मक्निवधिनीमे जो इस प्रकार का त्याग नही कर पाते उनके कर्तव्य दिख- लाये गये है, परन्तु जो त्याग करनेम समर्थ हो उन्हें वह त्याग कैसे किस अवस्थाम, किस भावनाक साथ और किस लक्ष्यको प्राप्तिक लिए करना चाहिए इत्यादि विषयोका निरूपण नहीं हो पाया जिनसे स्वगृहमे भारसेवा न निमती हो और जो गृहत्यागक लिए भी अपने- आपको समर्थ न पाते हो उन्हे यह मुझाया गया था कि उन्हे ऐसे भावदीयोके समीप वसना चाहिये कि जो सेवा कथा परायण जीवनयापन करत हा वे यदि छूट दे ता उनके द्वारा की जाती भगवत्सेवामे सहयोमो-परिचारक भो बनना चाहिये अन्यथा कमसे कम उनके द्वारा की जाती भगवत्कयामें श्राताके रूपमें तो सम्मिलित होना ही नाहिये इसी सन्दर्भमें भगव- (कयाके लिए आवश्यक योग्य वक्ता एवम् श्रोता का स्वरूप बीवमें जलभद और पञ्चपद्यानि में समझाया गया था अत अवशिष्ट गृहत्यागका विचार आवश्यक पा ही, जिसे इस सन्मास- निर्णय ग्रथ द्वारा पूण किया जा रहा है सर्वनिर्णय निबंध कारिका १९१ मे कारिका २१४ तक सन्यास त्याग भक्ति आदि अनेक विषयोका निरूपण किया गया है, पर वह मुख्यतया पुष्टिमागीयोंके लिए नहीं, अपितु सभी देवी जीवोको लक्ष्यमें रखकर किया गया उपदेश है. अतएव कारिका १९६ में- "भक्तिः स्वतन्त्रा शुता च दुर्लभेति. न सोच्यते" वचन उपलब्ध होता है. अतएव वहा, संन्यासग्रहण के शास्त्रीय प्रकारपर बहुत मार दिया गया है- "त्रिदण्डं परिगृल्लीत सर्व- शास्त्राविरोधि तत्" जबकि यहा सन्यासनिर्णयमें सामान्य रूपसे "वेशः सोपि न चान्यथा" कहनेमे वह भार दिखलाई नहीं देता. क्योकि देवो जोवोके लिये आवश्यक सन्यासके सामान्य प्रकारसे भिन्न एक विशिष्ट प्रकारके संन्यासको आशा यहा श्रीमहाप्रभु दे रहे है. सर्वनिर्णपान्तर्गत संन्याससम्बन्धी विचारके प्रारम्भमें श्रीमहाप्रभु आज्ञा करते हैं कि ब्रह्मचर्य गृहस्य वानप्रस्थ अथवा सन्यास में से किसी भी एक आश्रममें नैष्ठिक होकर रहा जा सकता है, अथवा क्रमश उत्तरोत्तर आश्रमोमें प्रवेश किया जा सकता है, अथवा आयु- ष्यके चार समान भाग करके एक-एक भागका यापन एक-एक आश्रममे दिया जा सकता है. सर्वत्र फल तुल्य ही होता है क्योकि शास्त्रोमे सभी आश्रमोकी प्रशमा मिलती है एसो स्थितिम समनन्तरम और आयु क्रम वाले कल्पमे सन्यास एक शास्त्रीय आवश्यकता प्रतीत होती है जबकि पोडपग्रन्थान्तर्गत सन्यासनिर्णयमे, कर्ममार्ग, ज्ञानमार्ग या अदृढ बीजभावको अवस्थामे भक्तिमार्ग में भी श्रीमहाप्रभु सन्यासको अनुमोदनीय नहीं मानते इन दोनो दृष्टिकोणोको एकवाक्पता इस तरह घटित हो जाती है कि पुष्टिमार्गीयेतर देवी जीवोंके लिए आश्रमकम अथवा आयु क्रम कल्पमे, चतुर्थाश्रमरूप सन्यास वर्णाश्रमधर्मके रूपमे शास्त्रविहित होनेके कारण, ज्ञानमार्गीय साधक एवम् मर्याभक्तिमार्गीय साधक के लिए अनुष्ठेय ही है, भगवस्साक्षात्कार के न होने पर्यन्त. भगवत्साक्षात्कार होनेके बाद उसको तन्मयनामे आश्रमयोका त्याग निन्दनीय नही रह जाता यह नियम किन्तु पुष्टि- मार्गमे अनिवार्य नही है- “अन्तःकरणे सस्कारविशेषाधायकत्व च प्रतीयते सन्यासस्य. स च सस्कारः फलोपकायंगमित्यावश्यक सन्यासो मर्यादामार्ग. पुष्टिमार्गे स्वत्यैव व्यवस्था- 'न ज्ञानं न च वैराग्य प्राय श्रेयो भवैदिह' इति वाक्यात्" (अणु ३२४६१७)." अत. पुष्टिमार्गीय साधक यदि अपावृत होकर स्वगृहमे भगवत्सेवाको निमा पाता है तो गृहत्याग या सन्यास अनावश्यक है--"त्यागे वाऽ मनतोरेव भगवति विनियोगो न सर्वेन्द्रि- पाणाम् हिमस्तु सर्व प्रकारमंजन मवति इति परिजनश्च कृतार्थो मवतीति भजने कृस्नता" (अणु ३१४१४७). अन्यथा स्वगृहमे भगवरमेवा न निमनेपर अर्थात् किसी पुष्टिभक्तके व्यावृत्त होनेपर सर्वप्रथम उसे स्ववर्णाश्रमोचित धोका पालन करते हुए भगवत्कयाके. श्रवण-मनन-बीन द्वारा भक्ति के बीजभावको दृढ़ बनाना चाहिये. वीजभार दृढ होनेपर अपने घरमे भगवरस्वरूपके मेवा-दर्गन-स्पर्शन आदिके संयोगसुखके न मिलनेके कारण तथा पारिवारिक अशटोम भगवद्विप्रयोगजन्य दुखानुभूतिमे मो व्यवधानोको देखते हुए गृहरपाग वाद, होते हैं वे चाहें तो नैष्ठिक ब्रह्मचर्य आश्रममे स्थिर हो सकते हैं. सर्वया वैराग्यरहित अर्थात् उत्कट कामनावालेके लिए गार्हस्थ्य ही ठीक रहता है. उसे वेदोके यथाशक्ति अध्ययन करने शास्त्रीय विधिके अनुसार विवाह करके, यावद्जीवन अग्निहोत्रादि कर्मोके अनु- ष्ठानमे तत्सर होना चाहिये . अतएव आपस्तम्बकारने सभी आश्रमोको तुल्प माना है. किसी भी आश्रमके कर्तव्योका यथावत् पालन करनेपर सिद्धि मिलती है. कही-कही एक आश्रमकी प्रशसा करने के लिए अन्य आश्रमोकी निन्दा भी दिखलाई देती है. पर वास्तविक तात्पर्य उसका किसी आश्रम-विशेपकी प्रशसाके रूपमे ही लेना चाहिये अन्यथा श्रुतिवच- नोंमे परस्पर विरोधाभास होने लगेगा, जबकि ब्राह्मणोका यह कर्तव्य है कि किसी भी श्रुति- वचनको अप्रामाणिक न माने." कर्म ज्ञान और भक्तिके तीन प्रमुख भद और तदन्तर्गत अन्य भी उपभेदोको दृष्टिगत रखनेपर इस प्रस्तुन सन्यासनिर्णय ग्रन्थमे कुल आठ प्रकारके सन्यासोके बारेमे हमे निर्णय मिलना है बोघसौकर्यके लिए उन्हें इस वर्गतालिका द्वारा सममा जा सकता है - सन्यास कर्ममार्गीय भक्तिमार्गीय ज्ञानमार्गीय कर्मफल त्यागरूप चतुर्थ आश्रमरूप (२) ज्ञानार्थ (७) ज्ञानोत्तर (८) भक्त्यर्य भक्त्युत्तर भक्ति साधक प्रवणादि निहाथ विरहानु- भवार्थ भक्ति वाधक गृहादि त्यागार्य (४) प्रपन्च विस्मृति पूर्वक भगवदासक्ति- स्वमावसिद्ध आत्मोसारके तीनो ही मार्गामे सासारिक अहन्ता ममताको बाधक माना गया है सासा- रिक अहन्ता-ममतासे पर उठनेके सच्चे उपाय वैराग्यसहित कर्म ज्ञान अथवा भक्ति तो हो सकते हैं, पर केवल त्याग या सन्यास नही. फिरभी मामक उत्साहवश बहुधा लोग स्वमार्गमे पूर्ण निष्ठा तया वैराग्य के अभावमे ही त्याग या मंन्यास की उतावल कर यंठते हैं और स्वमार्ग तथा सन्मार्ग से भटक जाते हैं। पुष्टिमार्गीय जीव भी यदा-कदा ऐसे पिथ्यानारनाले त्याग या संन्यास के फेरेमे पद सकते हैं. विशेषत, स्वगृहने भगवत्सेवा न निभा पानेवाले दृढ़ बीजभाववाले भक्तोके लिए श्रीमहाप्रभुने भी गृहत्यागका जो उपदेश भक्तिवधिना दिया है, उसका तात्पर्य भलीभाति न समझ पानेके कारण, पुष्टिमार्गीय विवेकके बिना उतावलमें कोई त्याग या संन्यास की गलती कर सकता है ऐसोके पल्ले पछतावेके अलावा और कुछ नहीं पड़ता ! अपने पुष्टिमार्गीय जोय ऐसे मिथ्याचारके फेरेमें पह कर अपने पुष्टिमार्गीय फलसे भी वचित न रह जाये- सारे जीवनको ही एक महापापण्डका नाटक न यना लें एतदर्थ श्रीमहा- प्रभु त्याग सन्यास सम्वन्धी अपने विचारोको स्पष्ट करते है. ताकि त्याग या संन्यास के चक्करमें फसनेवाले सम्भावित पश्चातापसे बच पायें, और जो नरहरि मंन्यासीकी तरह सन्पास ले हो चुके हो उन्हें पुन पर अग्रसर होनेको दिशा सूश पाये- पश्चातापसे उभर कर! (१) कर्मफल-स्यागरूप कर्ममागीय सन्यास ततद् वर्ण या आश्रम आदिको दृष्टिले जो कर्म नियत होते हैं उनका परित्याग उचित नहीं होता. (इ. गीता ३/८) सर्वनिर्णय प्रारम्भम यह कह दिया गया है कि केवल नित्य- कर्मका फल आत्ममुखरुप होता है तथा उसके त्याग करनेपर प्रत्यवाय--अपराध लगता है. पही नित्यकर्म ब्रह्मविद्या के सहित हो तो ग्रहानन्दया दान भी करता हैं- "भगवदानन्दरूप फल ब्रह्मज्ञानमुक्तस्प गयोतकमकर्तुरेव" (सर्वनि ४) हर गूरतमे वर्णाश्रमा चारादि शास्त्र- विहित नित्य कर्तव्योका त्याग देहाभिमान बने रहनेतक शास्त्रनुमोदित नहीं है (यावद् देहाभिमान. तावद् वर्णाश्रमधर्म एत स्वधर्म. सुबो ३१२८१२). निष्काम कर्मानुष्ठान करनेवाला भी ब्रह्मसस्थ हो सपता है, ऐसा थोशंकराचार्य नही मानते-"तस्माद् य एव ब्रह्मसस्य स्वाश्रमविहितकर्मवता सोमृतत्वगेति न. मंनिमित्तविद्या- प्रत्ययोविरोधान्" (छा मा २।२३।१). किन्तु गोता (३१५-८) के अनुसार श्रीमहासमुके मलमे नियत कर्मका त्याग उचित नहीं होता अत ब्रह्मचर्य गार्हस्थ्य या वानप्रस्थ में से किमी भी एक आथममें नैष्ठिक प्रत धारण कर स्वाथमोचित यतंयोका जो निमाम अनु- प्ठान करता है उसे आत्ममुषरूप कर्ममार्गीय मोक्षको प्राप्ति होती है (दु. गीता २५०-५१) यदि ब्रह्मविद्याके माथ कोई निष्काम कर्मानुष्ठान करता है तो ज्ञानमार्गीय ब्रह्मानन्दकी प्राप्ति भी सम्भव है (इ गोता ४१२४) भगवद्मदिन साथ निष्काम कर्मानुष्ठान करनेवालोको मजनानन्दकी प्राप्ति भी सम्भव है (गीता ९३४). बृहदारण्यकोपनिषद् (१।४।२२) मे- "तमेत वेदानुववनेन वाह्मणा विविदिपन्ति यजेन दानेन तपसानारावेन एतमेव विदित्वा मुनि. मति" कह कर ब्रह्मचर्य, नैष्ठिक ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य और वानप्रस्थ आयमके वर्तव्योंके निष्काम अनुष्ठानको भी चित्तको ब्रह्मज्ञानोपयोगी शुद्धि- विविदिषामें साधन माना गया है. वेदानुवचन यश और दात का आश्रमधर्म होना छान्दोग्य (२।२३।१) - "त्रयो धर्मस्कन्धा. यज्ञोध्ययन दानमिति. प्रथमस्तप एव. द्वितीयो ब्रह्मचार्याचामंकुलवासी. तृतीयो:- त्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन्. सर्वे एते पुण्यलोका भवन्ति, ब्रह्मसस्थोऽमृतत्वमेति." वचनरी एकवाक्यता करनेपर स्पष्ट होता है. 'वेदानुवचन' और 'अध्ययन' समानार्थी हैं. 'यन' और 'दान' तो बृहदारण्यक एवम् छान्दोग्य दोनोमि समानरूपमे मिलते ही हैं छान्दोग्यमे इन अध्ययन दान और यज्ञ के ब्रह्मविद्यारहित अनुष्ठानका फल पुष्पलोककी प्राप्ति माना गया है,तपा ब्रह्मविद्यासहित अनुष्ठानका फल "ब्रह्मसस्थोऽमृतत्वमेति" कह कर ब्रह्ममानोत्पत्ति द्वारा मोक्ष भी माना ही है. 'आचार्यकुलवामी' पद द्वारा इन कर्तव्योकी आश्रमधर्मता भी स्पष्ट की गयी है. गीता (१२२४५७) मे भी भगवान्ने अतएव इन कर्मोके त्यागको अनुचित माना है- "निश्चय शृणु मे तत्र त्यागे • यज्ञदानतप कर्म न त्याज्य कार्य मेय तत्, यज्ञो दान तपश्चैव पावनानि मनीषिणा, एतान्यपि तु कर्माणि सगं त्यक्त्वा फलानि च कर्तव्यानीति में पार्य निश्चित मतमुत्तम, नियतस्य च संन्याम कर्मणो नोपपद्यने मोहातस्य परित्याग तामस परि- कोयते". फर्मसन्यास और कर्मयोग मे कर्मयोगकी उत्तमता दिखलाते हुए वर्मयागका भी ब्रह्मसस्थ होकर अनुष्ठान- "ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सग त्यक्त्वा करोति य लिप्यते न म पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा".(गोता ५०१०) भगवान्ने राम्भव माना ही है कर्ममार्गमें अतएव काम्पकमै अथवा कर्मफलाशा का त्याग तो उचित माना है किन्तु नियत कर्मोके त्यागको उचित नहीं माना गया है. "अनाधित कर्मफल कार्य कर्म करोति य स सन्यासी च योगी वन निरग्निर्न चाक्रिय" (गोता ६११) आदि अनेक वचनोसे काम्म- कर्म तथा कर्मफलाशा के त्यागको सच्चा सन्यास माना गया है, नियत कर्मों के त्यागको नहीं सर्वनिर्णय (कारिका २४६ के प्रकाश) मे श्रीमहाप्रभुने कहा है-"गृहस्थस्यैतन्मुख्यम्. एवं कुर्वन् सकुटुम्बी भगवत्सायुज्यमश्नुते. ब्रह्मचारिप्रमृतीनागपि सेवकसाधनसम्पत्ती एत- (कर्तव्यम्" इससे सिद्ध होता है कि पुष्टिमार्गमे भी देहाभिमानके बने रहने तक नियत कर्मों के त्याग किये बिना भक्तिमार्गीय कर्तव्योका पालन आवश्यक होता है चतुर्थाश्रममे गृहत्याग विहित होनेसे स्वगृहमे भगवरसेवाके निवाहका प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता अत उसमें कृष्गदर्शनलालसा साय निरन्तर तीर्थयात्राका उपदेश दिया गया है, यही सर्व- निर्णयमें. अत पुष्टिमार्गीय जीवके लिए कर्ममार्गीय दृष्टिकोगसे याबद्-देहाभिमान स्ववर्णाश्रम- पर्मका त्याग उचित नहीं है, तया साधनदशामै भी गृहत्याग उचित कराव्य नहीं रह जाता है- "कर्ममार्ग न कर्तव्य" शास्त्रनिपत वर्णाश्रमधर्मोके अनुष्ठानमे पाम्यकर्म तथा कर्मफलाशा तो त्याज्य हैं ही "वर्णाश्रमवता धर्म एष आचारलक्षण म एव मद्भक्तियुतो नि श्रयसकर पर (भाग. ११.१८॥४). (२)धतुर्याधमहप कर्ममार्गोय स्याग जैसे नैष्ठिक व्रतक साथ ब्रह्मचर्य गृहस्य या वानप्रस्थ आथमोका विधान है. वैसे ही क्रमश चतुर्थाश्रममे प्रवेश करनेका मी विधान मिलता ही है यथा पूर्वोदाह्त बृहदारण्यकके वचनमे ही यह आता है कि "एतमेव प्रवाजिनो लोकमिच्छन्त. प्रवजन्ति.. पुढेषणायाश्च वित्तपणायाश्च लोकपणायाश्च व्युत्यायाय भिक्षाचर्या चरन्ति नैन कृताकृते तपत ' अर्थात् वेदाध्ययन दान यश तप रूप कर्मवाले ब्रह्मचर्य गृहस्य और वानप्रस्थ आश्रमोके द्वारा ब्राह्मण जिस ब्रह्मक ज्ञानको प्राप्ति करना चाहते है, सन्यास-आप्रम द्वारा भी उसी ब्रह्मकी प्राप्ति चाही जाती है पुत्र धन या लोकके बारेमें मभी तरहको कामनाओको छोडकर जो भिक्षाचर्या करते है.. उन्हे कृताकृत कर्मोके फल भुगतनेका सताप नही होता जाबालोपनिपद्म भी- "ब्रह्मचर्य समाप्य गृही भवेद्, गृही भूत्वा वनी भवेद्, वनी भूत्वा प्रजेद्” यो क्रमश एक आश्रमके अनन्तर दूसरे आश्रममे प्रवेश करनेका क्रमपक्ष दिखलाया ही गया है मनुस्मृति (१८६-८७) के भी-"ब्रह्मवारी गृहस्यश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा चत्वार पृथगाथमा सर्वेपि क्रमशस्त्वेते यथाशास्वनिषविता यथोक्तारिणं विप्र नयन्ति परमा गतिम्" वचनमे क्रमपक्षका उल्लेख मिलता है भागवत ( ११॥१८॥११-२७) में वानप्रस्थको रीति समझाकर वतुर्थाश्रमरूप मन्यास. धर्मका निरूपण भी किया गया है इसके अन्तर्गत त्रिदण्ड-सन्यामकी रीति भी समझायी गयी है "यदा कर्मविपाकेषु लोकेषु निरयात्मसु विरागो जायने मम्यड न्यस्ताग्नि प्रव्रजेत्तत ' आदि वचनो द्वारा इसरो मिद्ध होता है कि चतुर्थाश्रमरूप सन्यासग्रहण भी एक नियत कर्तपमा है जो 'तृतोयेऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन्" वचनके अनुसार नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका व्रत धारण नही कर लेते, अपवा "यावज्जीवमग्निहोत्र जुहोति" वचनके अनुसार नैष्ठिक- गार्हस्थ्यका व्रत धारण नहीं कर लेते, अथवा 'अरण्यमियात् ततो न पुनरेयात्"वचन के अनु- सार नैष्ठिक वानप्रस्थका प्रत धारण नही कर लेते, उन्हें क्रमपक्षके अनुसार तीन आश्रमोंके बाद चतुर्थ मन्यासाश्रममे भी प्रवेश अवश्य करना चाहिये इसका अपवाद भी यद्यपि जाबालोपनिषद्म दिखलापो देता है-"यदि वेतरथा ब्रह्म- चर्यादव प्रव्रजेद् गृहाता बनाता अथ पुनरवती वा व्रती या, स्नातको बास्नातको वा, उत्सनाग्निरनग्निको वा यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रवजेत्" किन्तु यह प्रकार सर्वसाधा- रण नही हैं किन्तु अतिविरक्त ब्रह्मज्ञानियोके लिए ही है- "एष पन्या ब्रह्मणा हानुवित्त- स्तेनैति सन्यासी ब्रह्मविद् इति एवमेव एप' (वही ) साथ ही साथ यह नहीं भूलना चाहिये ब्रह्मनानी भी इस प्रकारका सन्यास प्रतिबंराग्यक प्रकट होनपर कर मकते हैं, अन्यथा नही. अत. इस वचनमे प्रवज्यापर विपिभार नहीं है अपितु वैराग्यको अनिवार्यतापर विधिभार है-" यदहरेव विरजेत तदहरेव प्रवजेत" अन्यथा वैराग्यके अभावमै सन्यास नहीं लेना पाहिये इसका वर्णन मागे चलकर 'ज्ञानोत्तर सन्यास' के रूप दिया जायेगा चतुर्याश्रमरूप त्रिदण्डधारणात्मक वैध सन्यास पूर्वोदाहृत अणुभाष्य (३।४।१७) के "सच संस्कार फलोपकायंगमित्यावश्यकः संन्यासो मर्यादामार्ग. पुष्टिमार्गेतु अन्यव व्यवस्था" वचनके अनुसार मर्यादामार्गीय साधकोंके लिए आवश्यक है ही. भागवत (११॥२१॥३१-३४) के-"तस्माद मद्भक्तियुक्तस्य योगिनो में मदात्मनः न ज्ञान न च वैराग्य प्राय श्रेयो भवेदिह, यत्कर्मभियंत तपसा ज्ञानवैराग्यतश्च यत्, योगेन दानधर्मेण श्रेपोभिरितरैरपि, सर्व मद्भक्तियोगेन मद्भक्तो लभतेऽजसा, स्वर्गापवर्गमदाम कश्चिद् यदि वाच्छति नकिश्चित्साधवो धीरा भक्ता ोकान्तिनो मम, वाछन्दयपि मया दत्त कंवल्यमपुनर्भवम्' इस वचनमे मोक्षको भी स्पृहा न रखनेवाले भक्तोके लिए शान-वैराग्य- तप-दान-धर्म आदिकी अपेक्षा रह नही जाती है अत ऐमे पुष्टिजीवोके लिए चतुर्थाथमरूप सन्याम भी अनावश्यक हो जाता है इसके विपरीत ज्ञान वैराग्यके विना चतुर्याश्रमरूप त्रिदण्ड मन्याम लेकर जोनेवालोकी भागवतमे निन्दा की गयी है- 'यस्त्वसयतषड्वर्गो प्रचण्डेन्द्रियसारथि ज्ञानवैराग्यरहित त्रिदण्डमुपजीवति, सुरानात्मानमात्मस्प निन्हुते मा च धर्महा, अविपक्वकपायोस्मादमुष्माच्च विहीयते " अतः चतुर्थाश्रमरूप त्रिदण्डधारणात्मक कर्ममार्गीय सन्यास गर्वथा शास्त्रमिद्ध एवम् शुद्ध भी होनेपर कलियुगमे बहोत अनुमोदनीय नहीं है पहापुराणमे आता ही है कि कलियुगमे भक्ति तरणो तथा उसके दोनो पुत्र ज्ञान और वैराग्य जराजर्जरित हो गये है- "अह भक्तिरिति ख्याता इमो मे तनयो मतो ज्ञानराग्य- नामानो कालायागेन जर्जरो' अत जीर्ण ज्ञान और जीर्ण वराप्य वाले साधकोमे त्रिदण्ड सन्यासके नियम निम पाने कठिन है श्रीमहाप्रभु अतएव निषेध करते है-"मुतरा कलिकालत ." कलियुग के दुष्प्रभावके कारण ज्ञानवैराग्यरहित अधिकारियोके लिए चतुर्थाश्रमरूप कर्ममार्गीप सन्यास वैध होनेपर भी असाध्य न मही पर दु माध्य तो है ही अत सुतरा पुष्टिजीवोके लिए भी अनुमोदनीय नही है. (३) भक्तिसाधक श्रवमादिके निर्वाह द्वारा भक्ति की प्राप्तिके लिए सन्यास भागवत (११॥२०॥९) के-"तावत्कर्माणि कुर्वीत न निविद्येत यावता मत्कथाश्रवणादों वा श्रद्धा यावन जायते' वचनके प्रयमावलोकनमे ऐसा लगता है कि भगवत्कथा-प्रवणके लिए यहा मन्यासका विधान किया गया है वास्तविकता पर यह है कि इस वननका मुरूष सातार्य वैराग्योदय या कथाश्रद्धोदय के बाद कर्मत्यागके विधानमे नही अपितु वैराग्योदय या प्रदोदय पर्यन्त कर्मत्याग न करनेमे है अत. स्नेहात्मिका मतितके साधक थवण-कीर्तन-स्मरण-पादसेवन-अर्चन-वन्दन- दास्य- सस्प-आत्मनिवेदनरूप नौ अंगोके निर्विघ्न अनुष्ठानके लिए सन्यास लेनेमे पाच विप्र- तिपतिया हैं : (१) क्योकि सन्यासधर्मके अनुसार व्यक्तिको निरपेक्ष और एकाको विचरण करना चाहिये-"एक परेन्महीमेता नि संग: संयतेन्द्रिय.” (भा १२॥१८॥२०), जबकि भक्तिके नवविध अग श्रवणादिके अनुष्ठानके लिए किसी भक्तिमान् सहयोगीफे सत्संगको अपेक्षा रहती है (२) क्योकि श्रवणके लिए वक्ता, कीर्तन स्मरणके लिए अन्य-तुलसीमाला-गोमुपी, और पादसेवन-अर्चन आदिके लिए भगवद्विग्रह, अर्चना सामग्री पुष नपेद्यादि या अर्चनापात्र आदि अनेक साधनोको रक्षा करनेमे चित्तके व्यग्र होनेकी सम्भावना रहती है. यह संन्यासके अपरिग्रहके नियमझे विपरीत है-"विभृयाच्चे मुनि म कोपोनाच्छादनं पर त्यक्त न दण्ड. पात्राभ्यामन्यत्किञ्चिदनापदि (भा ११।१८।१५) (३) क्योंकि सन्यासके कारण म्वयम्के ज्येष्ठ आश्रममे अवस्थित होनेका अभिमान जगता है- सभी सन्यासो 'स्वामिजी' बन जाते है ! जबकि भक्तिमे दैन्य अपेक्षित होना है 'दास' बनने का. श्रवणमे तत्वनिर्धार के लिए कभी बादचर्चा उपयोगी हो सकती है परन्तु गन्यासमें वह वजित है-''वेदवादरतो न स्यात्" ( भाग ११।१२।२०) सन्यासमे जीवात्मा और परमात्मा के बीच अभेदबुद्धिका अभिमान-'सोहम्' जगाना पडता है जबकि भक्ति 'दासोहम् की भेदबुद्धिमे घटित होतो है भक्ति के प्रारम्भमे भगवान्के स्वामी होनेका और स्वयम्के सेवक होने का अभिमान अधिक उपयोगी होता है (४) क्योकि भक्तिके श्रवणादि अगोको पुन पुन आवृत्ति विहित है- "तस्माद् भारत सर्वात्मा भगवान् हरिरीश्वर श्रोतव्य कीर्तितव्यश्च स्मर्नव्यश्वेच्छताभयम्" (भाग. २६१२५) इस को सुबोधिनीगे कहा गया है कि "विहिते श्रवणकीर्तने सदा भवत प्रयाणा देहपातपर्यन्तमावृतानामेवाभयसाधकत्वम् उत्तरावधिदेहपात एव. पूर्वापषि संसारभयज्ञानम्". यह किसी भक्तके समीप रुके बिना सम्भव नही है. सन्यासके लिए जबकि निरन्तर एकाकी परिभ्रमण श्रेष्ठ माना गया है- "वासे वहुना कलहो भवेद् वार्ता द्वयोरपि एकएव चरेद् भिक्षुर (भा ११९१०) (५) क्योकि भक्त्याभूत श्रवणादि नवविध धोका अन्तिम प्रयोजन भगवत्सेवार्ष योग्यता सम्पादित करना है और मन्यासधर्म साधकको सिद्धान्तामिमत मेवाके स्वरूपके अयोग्य बना देते है. अत. चतुर्थाश्रमरूप सन्यास या म्वतन्त्र सन्यास, पंध या अवैध, किमी भी प्रकारका संन्यास भक्तिसाधक श्रवणादिके निर्वाहाथं अनुमोदनीय नही रह जाता है (४) भक्तिवायफ महादिके त्यागरा भक्तिको प्राप्तिके लिए सम्पास भक्तिवर्धिनीमे कहा गया था कि "गृहास्याना बाधकरयमनात्मस्य च भासते" अत: जब गृहस्थित सकल मम्वन्धिजन और पार्थ भक्तिमे वाधक होते हो तो उनका परित्याग करना ही चाहिये. फलत भक्तिको निर्विघ्न अभिवृद्धि हो पायेगी. परन्तु भक्तिके बीज भावके दृढ़ न होनेकी स्थितिम इस तरह के गार्हस्थ्यमोतोका त्याग अन्नमें निरे पापण्डम ही कभी न कभी पर्यवसित होता है. भक्विधिनीमे भी आएवं कहा गया है कि स्यागम दुसंग और अन्नदोष के कारण अधिक अधपातके भयस्थान है. वही वात यहा भी तीन तरहकी विप्रतिपत्तियो द्वारा समझायी जा रही है (१) क्योकि त्याग करने के बाद भी भिक्षाटन के लिए पुन गृहस्थोके द्वारपर जाना पड़ता है ये गृहस्थ-दाता सन्यास लेनेवालेके परिवारमे कोई अलग ढंगके नही होते. इनके घरका अन्न भगवान्को निवेदित किया हुआ हो यह जरूरी नहीं. अत. से अन्नमे मति भृष्ट हो सकती है (२) क्योकि कलियुगके प्रभाव के कारण मब कुछ बाहरमे छोड़ देनेपर भी यह महज सम्भव है कि आन्तरिक आमक्ति मा वासना न टूटे और व्यक्ति त्यागी के बजाय पापण्डी वन जाये (३) क्योकि इस तरह त्यागका पापण्ड करनेवाले विषयाात व्यक्तिके देहम कभी हरिका आवेश सम्भव ही नही अत पुष्टिमार्गीयोको इस तरहकी अदृढ बोजमाववाली भक्तिकी साधनावम्यामे आश्रम- रूप या म्वतत्र, वैध या अवैध, किसी भी प्रकारका भाग मा म-यास नहीं लेना चाहिये, यदि भक्तिसुख लेनेकी कामना हो तो (५) भगवद्-विरहानुभावार्थ भवत्युत्तर सन्यास भक्तिवपिनीमे भक्ति का व्यसनदशा पर्यन्त विकास दिखलाया गया है उसके सिद्ध होने- पर, स्वगृहमे निश्चयेन भगवरमेवाके न निभनेपर, और तीव्र विप्रयोगकी अनुभूतिम घरमारपी शशटोके कारण विघ्नको सम्भावना दिखलायो देती हो, तव गृहत्यागकी छूट दी जा सकती है यह सन्यास बोजभावकी दृढताके बाद किया गया होनेसे कभी भी भक्तको पथभृष्ट नही करता भागवत (११।१८।२८-३६) मे-" ज्ञाननिष्ठो विरक्तो वा मद्भक्तो वानपेक्षक सलिंगानाश्रमास्त्यक्त्वा चरेदविधिगोचर ....शौचमाचमन स्नान न तु चोदनया चरेत् अन्याश्च नियमान् ज्ञानी यथाह लीलयेश्वर." यहा चतुर्थाश्रमरूप सन्यासमें भिन्न एक परित्यागकी आज्ञा स्पष्ट दिखलायी देती है. इसी म्कन्धके वारहवें अध्यायमे भगवान्ने समझाया है-"केवलेन हि भावेन गोप्यो गावो खगा मृगा येन्यै मूढधियो मागा सिद्धा मामीयुरजसा, मं न योगेन साख्येन दानवत- तपोध्वरः व्याख्यास्वाधायसंन्यास प्राप्नुयाद् यत्नवानपि रामेण सार्घ मथुरा प्रणीते श्वाफ- ल्किना मम्यनुसतचित्ता विठभावेन न मे वियोगतीब्राधयोन्य ददृशु मुखाय. ताना. विदम्मम्यनुषडबदधियस्वमात्मानमदस्तथेद, यथा समापौ मुनयोब्धितोये नद्य प्रविष्टा इव नामरूपे तस्मात्त्वमुद्धयोत्सृज्य चोदना प्रतिचोदना प्रवृत्त च निवृत्त च श्रोतव्य श्रुतमेव च, मामेकमेव शरणमात्मान सर्वदेहिना याहि सर्वारमभावेन मया स्या ह्यकुतोभयम्' यहा प्रवृत्ति- धर्मकी तरह निवृत्तिधर्मके भी त्यागका विधान किया गया है भक्तिकी व्यसनदशामे प्रकट होते विगाढभाव या सर्वात्मभाव के द्वारा चित्तको निरन्तर भगवदेकतान बनाये रखने और उसमे तीव वियोगजन्य तापको सहायक माननेको इस भगवदनुरक्तिप्रधान वैराग्यमूलक सन्यासको रीतिका हो-मद्भतो. सलिगानाश्रमाम्त्यक्त्वा चरेद" मे विधान किया गया है. गीता (१२१६-८) मे इसी सन्यासका निरूपण है-"ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्यस्य मत्परा अन्यनैव योगेन मा घ्यायन्त उपासते तेपामह समुद्धर्ता मृत्युससारसागरात् भवामि न चिरात्पायं मय्यावेशितचेतसा, मय्येव मन आपत्स्व मयि बुद्धि निवेशय, निवसिष्यसि मय्येव अत अध्वंम सराय घेत इस प्रकारके परित्याग करते समय यदि परिवारके लोगोका मोह अपने बारेमे टूटता न हो तो सन्यासोका वेश धारण कर लेना चाहिये अन्यथा वह अनिवार्य नही है " परित्यागके इस प्रकारम प्रषोच्चार आदिके लिए किसो गुरुकी अपेक्षा नहीं है पूर्वो- दाहृत उद्धवोपदेशमे भगवान्ने गोपिकानो भगवदनुरागमूलक वैराग्यके वर्णनद्वारा जैसे उद्धवको भक्तिमार्गीय सन्यासको प्ररणा दी,तदनुसार इस प्रकारो सन्यासमै गुरु प्रजको गोपिकाओको ही मानना चाहिये कौण्डिन्य ऋषिके चरित्र (मविष्योत्तर) मे भी इम प्रकारचे परित्यागका उदाहरण मिलता है अत वे भी गुरुतुल्य है साधन पूर्वोदाहृत उद्धवोपदशम जमे भगवान्ने गोपिकाओंके सर्वपरित्यागके कारणभूत केवल भाव'को प्रशसा की है, तदनुरूप इस विरहानुभवाथ सन्यामम केवलभाव ही साधन है भावोद्योधनका उपाय भगवान्के मथुरा पधारनेपर जैसे गोपिकाको तीव्र विरहानुभूतिके कारण चित्तको निरन्तर भगवदेकतानता सिद्ध हो गयो थी, उसी तरह अपने घरके व्रजम जव हमे भग- वरसेवाका सुख न मिल पाता हो, तब भगवान्के मथुरागमनको भावना करना चाहिय इस भावनाके कारण भक्तके हृदयमे गोपिकाओरी तरह तीव्र विरहवेदना प्रकट होने लगेगी और एकदिन अकस्मात् मन इतना विकल हो जायेगा कि भात घरके बाहर निकल पडेगा अपने भगवान्को सोजने ।

यह त्याग प्रपञ्चके दोपदर्शनमूलक केवल शुष्क वैराग्यसे प्रेरित न होकर प्रभुके दिव्य मपुर गुणोवे प्रति पनपे सरस अनुरागसे प्रेरित होता है. अतः परिस्यागका यह प्रकार भक्तिमार्गमे प्रशसनीय है. त्यागके इस प्रकारको कोई अनुचित न मान बैठे इसीलिए भगवान्ने-"चरेद् अविधि- गोचर" कहकर उत्तमाधिकारियोंके लिए इस प्रकारके त्यागकी अनुशा तथा मध्यमा- धिकारियोंके लिए आज्ञा दे दी है. अतएव ययाधिकार 'घरेद' के 'अनुगा' और 'आशा' दोनो ही अर्थ स्वीकारनेमे कोई विप्रतिपत्ति नहीं है. "सूर्य अस्त हो रहा है। जैसे एक ही वाक्यके दो तात्पर्य : ब्राह्मणके सायसन्ध्या उद्यत होनेके रूपमे; और गृहिणीके सायंकालके खाना पकानेको उद्यत होनेके रूपमे, अधिकारिभेदसे ले सकते हैं. गोपालतापिनी उपनिषद्म- भक्तिरस्य भजनं तदिहामुत्रोपापिनराश्यनय ममुष्मिन् मन कल्पनम् एतदेव च नैष्कर्म्यम्" कह कर इसी भक्तिमार्गीय सग्यासका रुप 'कम्य' पदसे धोतित किया गया है परिणाम इस विरहानुभवार्थ परित्यागका परिणाम किन्तु अच्छा नहीं होता ! वार्ताप्रसगमे इसके बारेमे एक मजेदार प्रश्न और उत्तर मिलते हैं . प्रश्न "तिहारे सेवक ऐरो दुवले क्यो?" उत्तर "बरजे हते पर मारगमे आये ताको फल पाय रहे हैं !" विरहानुगवार्थ जो परित्याग दिया जाता है उसमे तदनुरूप भावनाओको करनेपर एक दिन विरहवेदनाकी टीस मनमे उठी, अथवा भावनापा प्रवाह बहते हुए कही-किसी भावके मागरमे पर्पवसित हुआ कि हृदयमे प्रेमका सागर लहराने लगेगा। उसकी अनेक लहरे -(चक्षुराग मन सग सकल्प निद्राच्छेद तनुता विषपनिवृत्ति अपानाश उन्माद मूळ और मरण उठ कर आत्मा और देह के दोनो तटवन्धोको तोड़ देंगी। देह इंद्रिय अन्त.करण प्राण आत्मा सभी कुछ प्रमके पूरसे प्लावित हो जायेंगे। यह प्रमजन्य विकलता और अस्वास्थ्य भक्तिकी चरमप्रकृति या स्वभाव ही है. इसे लौकिक या प्राकृत अस्वास्थ्यकी तरह नहीं समझना चाहिये यह तो परमानन्दरूप परमात्मा- का जीवात्माके साथ घनिष्ठ सस्पर्श है । एक प्रेमाद्वैतसे सारे द्वैतोंके प्लावित होनेपर भी बचा हुआ प्रियतम और प्रमी का-भगवान् और भक्त का-एक मधुर द्वैत है। इमे प्रहावादी शुद्धाद्वैतज्ञानकी, अथवा ब्रह्मके शानमार्गीय गुणो (यथा- ब्रह्मकै सर्वव्यापी होने, सर्वत्र विद्यमान होने, सर्वनिरपेक्ष आरमाराम होने, निराकार-व्यापक होने) की चर्चामे म्वयम् या अन्य कोई मिटान दे इसकी सावधानी बरतनी चाहिये. क्योंकि यह ज्ञान तथा परमात्माके ज्ञानमार्गीय गुण भक्तिमार्गीय भावके दाधक होते हैं ज्ञान-वैराग्य-सन्याम आदि विशपताओके कारण जैम ज्ञानमार्गीय साधन सत्यलोकमे , अवस्थित होता है, वैसे ही भक्तिमार्गीय जीव भावनाके वलपर व्यापिवैकुण्ठमें चलती भगवानकी नित्य यजलीलाओमें अवस्थित हो सकता है. अत: "परमात्मा व्यापक होनेसे मथुरा नही जा सकता-वह तो सर्वत्र विद्यमान है" ऐसी ज्ञानमार्गीय वातोसे भावखण्डन नहीं होने देना चाहिये. स्नेहकी जो दस अवस्थायें चतरागसे मरण पर्यन्त गिनायी, उनमें दसवी अवस्था मरण तब तक सम्भव नहीं, जब तक विरहदशा सर्वथा असह्य नहीं हो जाती. गाढ़ अनुराग और वियोग के कारण आसक्तिभ्रमन्यायसे भक्तके अन्तरमे भगवान्को सारो लोलाये अनुभूत होती रहती हैं. कभी ये लोलायें बाहर भी प्रकट हो जाती है. एक बार बाहर प्रकट हुई कि फिर इनका अप्रकट होना भक्त के लिए असह्य हो जाता है. वसा यदि कमी हो जाये तो फिर भक्तके लिए प्राणधारण अशक्य हो जाता है. काष्ठमें अग्नि तिरोहित रहती है परन्तु एकबार यदि पूर्णतया प्रकट हुई तो वह बुझते-बुझते काष्ठको भी पूरी तरह से जलाकर राख बना देती है इसी तरह स्थापिभावके रूपमे हमारे अन्तरमै छिरे हुए परमानन्दात्मक श्रीकृष्ण यदि आलम्बन विभावके रूपमे एक भार वाहर प्रकट हो कर तिरोहित हो जायें तो सारे देहादिके इन्धन टूट जाते है! इस स्थितिपर पहुचनेसे पहले दिप्रयोगमे भक्तके प्राणोको भगवान्के गुण ही टिकाये रपते है भगवान्के मस्तिमार्गीय गुणोकी स्मृति अयवा कीर्तन मे भक्तको जो पुन पुन- मन्तोष मिलता रहता है, उसोसे उसके प्राण अपने प्राणप्रिप प्रमुके सगरहित होनेको स्थितिमे भी टिके रहते है. विप्रयोगानुभूतिको इस प्रक्रियामे भगवान्के रसात्मक रवरूपको अनुभूति पूर्णतापर पहुच जाती है क्योकि रसशास्त्रकारोने रतिको द्विदलात्मक अर्थात सयोग और वियोग रूप माना है. तदनुसार यह विरहानुभूति भी भगवान के रसात्मक अनुभवका एक अग ही है. फलन इस अनुभूतिको अपूर्णतामे भगवान् प्रकट होकर स्वयम् भक्तको फलप्राप्तिम बाधा नहीं पहुंचाते हैं. एक शंका यह उठ सकती है कि फिर उद्धवके द्वारा रवयम् भगवान्ने ज्ञानमार्गीय मन्देश गोपिकाओको विरहवेदनासे स्वस्थ करनेके लिए क्यो भेजा ' इसका उत्तर यही है कि भगवान्को यह पता था कि उद्धवके ज्ञान का रण गोपिनाभीपर नही चढ़ेगा प्रत्युत उद्धव. पर ही गोपिकाभोके प्रेमका रग चढ़ जायेगा. अतएव भगवान्के सदेश-स्वास्थ्यवाक्योको गोपिकाओंने स्वीकारा नही. इसी तरह उनके अनुकरणपर विरहानुभवार्थ परित्याग करनेवालोमे यदि किसी ज्ञानी अथवा मर्यादामार्गीय भक्त द्वारा भावखण्डनकी बातें सुनायी जा रही हो तो उन्हें अनसुनी कर देनी चाहिये. चाहे वे वाते वेदान्तादि शास्त्रोसे प्रामाणिक ही क्यो न हो इन शास्त्रीय सिद्धान्तोकी उपेक्षासे भगवान् नाराज हो जायेंगे ऐसे नहीं मान लेना चाहिये.

क्योकि वे दयाल है. अन जैसे मानावशम शास्त्रीय मर्यादारे उल्लपनका परा नही मानते वेगे ही भावावेशी गोपिकाओ द्वारा की गयी भगयदुपदेशकी उपेक्षापा भी बुरा नही माना था. (६) प्रपञ्चविस्मृतिपूर्वक भगवदापितके स्वभावसे प्रयुक्त भवरयुसर सन्यास भारतमार्गीय मध्यमाधिमारम्प मन्याम, जिन गोपियामोती लोर-यदत्यागपूर्यव सर्वात्मभाववाली भक्तिको भावना बरसे हुए किया जाता है, वह गोपिकाओवा परित्याग न ना आश्रमम्प है मौर न बंधही चतृथिमम्प मन्यास केवल ब्राह्मण पुरुषर लिए ही विहित है, अयाहाण या स्त्रियोंके लिए नही. गापिकाओका त्याग अतएव किसी शास्त्रविधिसे प्रेरित न था किन्तु उन नित्ती भगवदवतानसामे प्रयुवरा था उनी भगवदासक्तिने स्वभावका सहज अग या स्वयम् भगवान्ने उनके इस अनुरागमूलक परित्यागका वर्गन इन शब्दोंमे किया है- "ता मन्मनस्या मत्प्राणा मद त्यस्तदंहिता में त्यक्तलोरधर्मा मद" वस्तुत गोपि. काओका त्याग केवल प्रेमभावसे विवश होकर किया गया स्याग था. त्यागका यह प्रकार बहुत दुर्लभ है। (७) मामार्य सन्यास पुष्टिमार्गीय जोव के लिए ज्ञानागं सन्यास बहुत लाभकारी नहीं होता. ज्ञानार्ष सन्यास लेनेरौ पहले पूर्वाश्रमके वेदाध्ययन दान यज्ञ आदि कर्तव्यो द्वारा चित्तको शुद्ध करना आवश्यक होता है अन्यथा वेवल त्याग या वैराग्य से चित्तशुद्धि नलियुगमें धारय मही है. जो लोग इस तरहवा विविदिपासन्यास कलियुगमें लेते है, या तो उन्हें बादमें पछताना पश्ता है और अन्यथा वे सन्यासका पापण्ड करनेमें दक्ष हो जाते है. अतएव मनुस्मृति (६१३४--३७ ) में कहा गया है कि "माश्रमादाश्रम गत्त्वा हुतहोमो जितेन्द्रिय भिक्षा- बलिपरिश्रान्त प्रव्रजन्प्रेत्य वर्धते ऋणानि वीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत, अनपाकृत्य मोक्ष तु सेवगानी व्रजत्यध, अनघीत्य द्विजो वेदान् अनुत्पाद्य तथा सुतान् अनिष्ट्वा चैन यश्च मोक्षमिच्छन् बजत्यप कुछ लोग कहते है कि यह अविरक्त विविदिपुकी निन्दा है, विरक्त विविदिपकी नही यहा विचारणीय यही है कि मोक्षच्छामे सन्यास लेनेकानिषेध किया जा रहा है और मोक्षेच्छा वैराग्य के अलावा और क्या हा सकती है ? ऋणत्रयके अपाकरणके बिना चित्तशुद्धि सम्भव नही--अशुद्ध चित्तम ज्ञान वैराग्य स्थिर नहीं हो सकते- अत ऐसोके द्वारा लिया गया सन्याम पश्चात्ताप अयवा पापण्ड मे ही पर्यवसित होता है " यह बात सभी तरहक जीवोपर लागू होती है, अत पुष्टिमार्गीय जीवापर भो श्रीमहाप्रभु अतएव स्पष्ट निषध करते है- 'तस्माद् ज्ञान न मन्यमेन्" ज्ञानप्राप्तिके निमित्त सन्यास नहीं लेना चाहिये.' (८) मानोत्तर संन्यास जानोतर सन्यास स्वभावप्राप्त होता है पैराग्य प्रकट होनेपर . अतएव एतदर्थ आज्ञा नहीं किन्तु अनुजा उपनिषद स्मृति पुराण आदिने मिलती ही है जादालोपनिषद -"यदि वेतरथा... यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेत्" वचनम यही ज्ञानोत्तर संन्यास विवक्षित है. फिर भी पुष्टिमार्गीय जीवोंके लिए इस प्रकारके गानोतर संन्यासकी, उसके फलकी तथा जानकी भी विशेष महत्ता नही है, अतएव भागवत् (१५१२) में आता है कि- "नष्का- म्यंमप्यच्युतभाववजितं न शोभते ज्ञानमल निरंजनम्, गीता (१२२२-५) मे भी ज्ञानमार्गीय अध्यक्तोपासना तथा कृष्ण भक्ति के तुलनात्मक महत्वका विचार करते हुए भगवान्ने मानमार्गीय अव्यक्तोपासनासे कृष्णभक्तिको उपयुक्त माना है-"मय्यावैश्म मनी में मा नित्ययुक्ता उपासते श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मता., ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्त पर्युपासतै सर्वत्रामचिरय च कूटस्थमचल ध्रुवम्, सनियम्पैन्द्रियग्राम सर्वत्र समबुद्धयः, ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रता. क्लेशोधिकतरस्तेयामव्यक्तासक्तचेतसाम्, अव्यक्ता हि गनि? स्व देहवभिरवाप्यते" हजारो वर्षातक मानमार्गपर यात्रा करनेके बाद कभी-कभाक जोय श्रीकृष्णकी अनन्य- भक्तिको दिशाकी ओर मुद्द पाता है-"बहूना जन्मनामन्ते ज्ञानदान्मा प्रपद्यते, वासुदेव. सर्व- मिति स महात्मा सुदुलंम (गीता १९) अत: कृष्णाभिमुख सुदुर्लभ महात्माओको पुनः अधिक क्लेश देनेवाली अव्यक्तोपासनाकं ज्ञानमार्गको और ताकना ही नही चाहिये. अतएव कहा जाता है कि-'जन्मान्तरसहस्त्रेषु तपोशानसमाधिभि नराणा क्षीणपापाना कृष्ण भक्ति. प्रजायने" (पाण्डवगीता ४१). अतएव ज्ञानोत्तर सन्यास लेनेवालेको सहस्रजन्मका अन्तराय कृष्णभक्ति के हेतु हो जाता है ! भक्तिमार्गमें भी दोषसम्भावना और उसका निराकरण जैमे दोष कर्ममार्ग और ज्ञानमार्ग मे दिखलाये, यथा पापण्ड या विषयासक्ति आदि, घे भक्तिमार्ग में भी सम्भव है। यह आशका अनुचित है क्योकि दोपोत्पत्ति तीन तरहसे सम्भव है (१) कालकै प्रभावसे (२) जीवात्माके स्वभावसे (३) परमात्माको इच्छा (१) कलियुगका प्रभाव भक्तिमार्गपर नही पडता है- "पुसा कलिकृतान् दोषान् द्रव्यदेशात्मसम्मवान् सर्वान् हरति चित्तस्थो भगवान्पुरुषोत्तमः, विद्यातप प्राणनिरोपमंत्री- . १) अतएय मुण्डकोपनिषद् - "अन्येनंय नीयमाना स्थाया " भादिम पुहस्थाश्रम आदिके कर्माकी निन्दा करके भी विरक्ती के लिए उपदेश्य वैरान्तमान अध्यापन तथा अध्ययन का अधिकार पुन' इन्हीका ही मान्य किया है-"क्रियावन्तः श्रोनिया बहानिष्ठा स्वय उदत एफर्षि वन्तः तेषामेवा अविद्या वदेन शिरोश्न विधिवद् यस्तु पीर्ण,मैनचीजतोवी.

तीर्थाभिषेकप्रतदानजय नात्यन्तशुद्धि लभतेन्तरात्मा पपा हृदिस्पे भगवत्यनन्ते" (भाग. १२॥३।४५-४८) स्वयम् भगवान् भी गीता (९।३०-३१) में कहते है-"अपि घेरसुदुराचारो भजते मामन्यभाक् साधुरेव स मन्तव्य सम्यग् व्यवसिनो हि स, क्षिप्रं मवति धर्मात्मा शश्वन्छान्तिं निगच्छति, कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्त प्रणश्यनि" अतएव उद्धवोपदेशमें भी भगवान्ने कहा है-"वाध्यमानोपि मद्भक्तो विपयरजितेन्द्रिय , प्राम प्रगल्भया भक्त्या विपर्या- भिभूयते" (भाग-११।१४।१२). अत न भक्तिके प्रारम्भमें और न उसकी प्रगल्भतामे कलिकाल अथवा विषयासक्ति भक्तिमार्गमें दोष उत्पन्न कर सकते है. पुराणोमें भी तपस्वी आदिकी तरह भक्तके भटक जाने के कोई दृष्टान्त दिये नही गये हैं. (२) जीवात्माके स्वभावसे दोषोत्पत्तिकी जहा तक सम्भावना थी तो उस अवस्था तक तो भक्तिमार्गमें भी त्याग न करनेको बात समझायो हो गयी है. भक्तिकी व्यसनदशाके एकबार विकसित होनेपर यदि गृहत्याग किया जाता है तो भटक जानेका कोई भी भय नहीं रहता क्योकि जैसे-जैसे भक्तिका बोजभाव दृढ होने लगेगा वैसे-वसे लौकिक तथा वैदिक दृष्टिसे भक्त अस्वस्थ होने लगेगा-"लोके स्वास्थ्य तथा वेदे हरिस्तु न करिष्यति पुष्टिमार्गस्थितो यस्मात्" (नवरत्न ६) यह पहले कहा जा चुका है. ऐसे अस्वस्थ भक्तों में, लौकिक अथवा वैदिक दृष्टिसे पुन स्वस्थ बनानेवाले लौकिक कर्म या वैदिक कर्मों का त्याग एकवार कर देनेपर, जीवके स्वभाववश भी भगवद्भावमें बाधा अस्थित होनेको सम्मा- वना नहीं रह जाती है. (३) गोपिकाओको ज्ञानोपदेशदारा स्वयम् भगवान्ने विरहव्याधिसे उबारना चाहा था. उद्धवजीको इसी हेतुसे ब्रज भेजा गया था. अत: इस अवस्था में स्वयम् मगवान् बापा पहुना सकते है पर ऐसी आशंकाका निराकरण पहले ही कर दिया गया है कि भगवानको पता था कि उद्धव के ज्ञानोपदेशसे व्रजभक्तोके भावखण्डन होनेके बजाय स्वयम् उद्धवका ज्ञानाभिमान खण्डित हो जायेगा अत इस विरहव्याकुलताको भावतन्मयता परमात्मा बाधा पहुंचाता हैं ऐसा नहीं मानना चाहिये. भक्तिकै बीजभावको आत्मामे रोपित कर-सत्सगादिके अवसर द्वारा उसे सिञ्चित कर-प्रेमात्मना अकुरित कर-आसक्तिके रूपमे पल्लवित कर- ध्यसनके रूपमें जव फल परिपक्व होने जा रहा हो तब इस भक्त-मनोरथपूरक भक्तिके कल्पद्रुमको काट देना - स्वयम् हरिके भी वसको बात नही है । फिर काल-कर्म-स्वभावकी तो क्या बिसात ? अपने स्तनका दूध पिला-पिलाकर जिस बच्नेको पाल-पोसकर बड़ा किया ही उसे कौन मा खतम होने देगी!

अत. ज्ञानियोंके वाक्यसे भगवान् भक्तोमे मोह उत्पन्न करते है ऐसा नहीं मानना चाहिये क्योकि भागवत् (४।३१।१२-१३) मे-"किंवा योगेन सांख्येन न्यासस्वाध्याययोरपि, किंवा श्रेयोभिरन्यश्च न यत्रात्मप्रदो हरि, श्रेयसामपि सर्वेपामात्मा ह्यवधिरयंत , सर्वेपामपि भूताना हरिरात्मात्मद. प्रिय" अर्थात् योग सास्य संन्यास स्वाध्याय ग अन्य भी सारे थेय साध- नोको करनेसे कोई लाभ नही, जिनके करनेपर भी हरि आत्मप्रद नहीं होते हो क्योकि सारे धेयकी अवधि आत्मा होती है और प्राणियोके लिए हरि आत्मरूप आत्मप्रद तथा प्रिय हैं ऐसी स्थितिमें सर्वदा भक्तपराधीन रहनेवाले प्रभु-"अह "भक्तपराधीन. ह्यम्वतन्त्र इव द्विज .. नाहमात्मानमाशासै मद्भक्तः साधुभिविना" (भाग ९।४१६३-६४), अपने भक्तोको न तो स्वयम् मोहित करेगें और न ज्ञानियोके वचनसे मोहित होने देंगे अत. बीजमावके दृढ़ होनेपर-भक्तिको व्यसनदशामे- स्वगृहमे भगवत्सेवा जो न निभ पाती हो - तो ऐसी स्थितिम गृहका परित्याग कर देना चाहिये. अन्यथा ऐसे घरमे रहनेसे कभी भावका उपशमन भी हो सकता है. भक्त अपने स्वार्थ अपने प्रभुके रसात्मक अनु- भवके लाभ-से वञ्चित हो सकता है. यह श्रीमहाप्रभुका दृढतर अभिप्राय है उपसहार इस तरह श्रीकृष्णके प्रसादसे महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्य द्वारा किया गया सन्यासनिर्णय कि वह भक्तिके दृढ़ होनेपर ही लिया जा सकता है- अन्यथा ज्ञानमार्गीय या कर्ममार्गीय रीतिसे पुष्टिमार्गमे सन्यास लेना, पुष्टिसोपानोपर आरोहण करते हुए अब पतित होने का कारण बनेगा, पूर्ण हुआ प्रस्तुत सस्करण वि. स. १९७४ में प्रकाशित सस्करणका ऑफसेट प्रॉसेस द्वारा पुनर्मुद्रित रूप है. उस सस्करणके सम्पादक थे श्रीमूलचन्द तुलसीदारा तेलीवाला तथा श्रीधीरजलाल प्रजदास साकलिया. पोरबन्दरके गोस्वामी १००८ श्रीजीवनलालजी महाराजके आर्थिक सहयोगसे वह सस्करण प्रकाशित हुआ था इन सभी महानुभाव का हम इस पुन प्रकाशनके अवसरपर हार्दिक कृतज्ञताके साथ स्मरण करते हैं.

Idilois' Nole. de Sixteen Sacrel Dols of Sree Vallabhacluarga, Sannyası Yirmaga stınds fourteenth. The circumstances under which Handyåsa may Lo taken by the Aspirant are discussed in this book 8 reo Vallat lacuarga says that in harma margs, it should not letakcu, specially in Kali Yuge in bakti margs, it should not to taken up in the Sadhana stage, for the convenienco of Stavana &c, it can only be tchen up for experiencing-for the realisation of the Separation of thousands of years from the Lord, ris, feira ATTATA Aardmanlarda Thuus Sannyasa is very difficult to obtain, it can only be liad by love, the love of the Copikas, who were the best among devotees, the dust of whose feet was revered by Srimad Udaya, and the oliligalian of whoso selt less lore erea the Lord of Lore, Koshan Ilmself, could not recompense In this 14a Bhakti Marga, nyen as the begin ning one can take Saanyåst, if ordered by God, as taught loy 8 res Krushno to Vel hava bonuse we never hear of any devotee leing pained by Sannyass of this type Ia Juina llarga, Sanngas is not cletiralile either in the beginning or in the final stage To men of the present generation, the discussion a more or less of academic interest ataly, lant it does give some consolation to these devotees, who find themselves In a world engrossed in trifling pursuits, and who are in search of a way to rench the Ananılmaga Bralınan As in Dirodha Lakshana, wo hase added a Gujarati translation of Sr t'urusliuttaninis tikr, for the benefit of those who do not hoow banskrit We have been able to publish eight Commentaries, yız, those of (1) 8 reo Gohulasathajee, (%) reo Ragimnathajee, (3) S teo Gokviotsavajee, (4) Sree Gopesvarnjee, ("ree Copesarajec, (6) Srce Parushottamajoe, (7) Sree Vallaolajee and (8) Chacha Sree Gopeshnjec, son of Ghanasyamajet Tho last the same Chacha 8 ree Gopesnjee whose commentaries on Sevåphala and Nirodha Lalshana have been Iulilished by us We have tried to collect all the commentaries, but we to not mure whether we are successful in our attempt If anyone is left out, and if it is sent to us we shall cousider it a great tavour, and stall publisis at at once We have been able to collect more copies of all the commentarıcs etcept twoti ose of Chacha Sree Gopeswaruji and Vallabhajec, of each of which we got only one copy from Pandita Gattulala a library 8 ree Vallabhalalajee respectively Fortunately the latter copy turned out to be very old and very very correct The Deccan College MIss of $ rce Purushottama jee s tika 19 very old, and corrected and revised by Sree Purushottamajev Lyself It is very unfortunate that attempts have been made at the interpolation of the word Forgotea, in the copy of this take, obtained from Sree Vallabhlalajee, with a view, as it seems, to take the origin of the fampradiya far hegund Sree Vallsubacharyajee of the four copies obtained by us, three, including the old one from the Deccan College collection, which seems to have been corrected hy Sree Purushottnmsjee himself, have not got the interpolated word amarada! We have spared o pains in comparisons, Roung important readings, and making necessary corrections and the reader will find the printed texts much better than the MISS It gives us great satisfaction to note that we have been getting [64. from all ayarlalle sources As before, we got a large numer from Pundit Gattulalaji s Labrary, through Sheth Tribharaadas and Mr Kasludas Dr S K Belralkar gave as all the Mss of these tikas from the Government collection of the Deccan College Mr Taugakhram Manassakhram gave us the Mss from Shastri Dhalal s collection in tha Dahalakshmi Library of Nadiad, Sree Jeevanslalajee, Sree Govardhanlalayes, Sree Vallabhalalajee, Sree Vrajrataalalajee, Goswamiato Sree Krislunapriyajee 8 Astri Kalyanjee, Sastri Bhadrashapkar, Sastra Vasastras, Keertankars Baladequas, M. Natyarlal Itchbaram Desar of the Gujaratz Press, Mr Yadilal, Secretary to tho Vashnava Parishad, all were kad enough to give the list in their possexstoa We take this opportunity to thank them all, and request them to contiate their support in this very important and usefal work Jo making and comparing copies of these tukas, we were greatly helped bg Mesure Chandalal Chunilal Shah, Vrajacharidas Maganlal Shah, Utsavla! Race krishna Papuga, Dbairgalal Kasbinath Pandya, ruloband Vithaldas Shah and Alohanlal Narottamdas Shah, B , It vas chiefly due to their hard and duinterest ed work and particularly to the goodness of Utsavlal Pandys who gladly gave us all facilities for work at his place at Anand, that the Sandgåsa Nirnaya was ready for the press before the Narodha Lakshana was finished We sincerely thank them, and hope they will continne to give their valuable help Like Seraphala and Nirodha Lakshana this work also is printed from the fuads supplied by Goswam. $res Jegyapalalajee of Porebender and our sincere thanks are due to His Holiness, With feelings of oy, wo offer this frant of our labour of lore at the Lotus-keet of Lord 8 rea Krishna BOMBAT, Malachandra TTelirala March, 1918 Dhirajal v Sankiua लालूभट्टकृतसंन्यासनिर्णयशङ्कानिरासः । हरिरत्र न होनि कर्तुं बाधा कुतोऽपरे । भन्यथा मातरो बालान् न स्तन्यै पुपु कचित् ॥ हरि पर रिहानुभवे बापा प्रतिबन्ध कर्तुं न शक्नोति न समयों भवति । अपरै कालादय कुत करिष्यन्तीत्यर्य । मनु पर्दुमकर्तुमन्यमा समर्थस्य भगवत्तोसामर्थ्यकयन सर्वशास्त्रविरुसमित्याशा परिहरन्तो न भगवत शतिन्यूनताप्रयुक्तमसामर्थ्यमपि तु भकमात्सल्यमिति दृष्यन्तेना--पन्यये. त्यादिना । मातर यालान् स्तन्यैरेव पुपुषु । अन्यथा अन्यप्रकारेण न पुपरित्यर्थः । यथा पत्रवात्सल्य वशीभूता सर्वा मातरो वालाना स्तनदानेनेच पोपण हितरूप चक्कु, अन्यथा प्रकारान्तरेण न चक्रुर, एवं ममष्टिमारभ्य म्यवस्थित, तथा भगवानपि भक्तवात्सल्यपरदश भक्तस्य परमेशरूप विरहानुभव सापयति, नामिविरहानुभवे प्रतिबन्ध करोतीति भाव । केचित्वत्र बालान् न स्तन्ये पुण्येयुचित वक्तुमुचित, मनु लिप्रयोग उचित इत्याहुः । तत्र । पूर्वोत्तरीत्या प्रन्थलापने लिदप्रयोगस्य निरवद्यावात् ।

संन्यासनिर्णयना सम्बन्धी कांइक. ડિશ મન્થમાના સેવા અને નિરોધક્ષણ મુદ્રિત કરીને વૈષ્ણવોને નિવેદન કવી છે હવે સન્યાસનિર્ણય તેવી જ રીતે અષ્ટ વિવરણસહિત અ ગર્જાનુવાદસદિત પ્રકટ થાય છે સન્યાસનિર્ણય ત્ર મેદાચાર્યએ નિજસેવક નરહરિ સન્યાસીને સન્યાસનું શુદ્ધ સ્વરૂપ ઉપરાવાને પ્રપટ કર્યો છે આ સન્યાસનું સ્વરૂપ ની પ્રારે સ્પષ્ટ થાય છે मंन्यास कर्ममागीय शानमार्गीय भक्तिमार्गीय (નિષિદ્ધ અને ખાસ કરીને ચા જમાનામાં ) વિવિદિષા સંન્યાસ વિદ્વાન સન્યાસ સાંધનાર્થે કલાર્ષે (ખાવહ નથી) (વિરહાનુભવને માટે કન્ય,ને પ્રભુની પ્રેરણા (૭ભય દોષયુક્ત દવાથી નષિદ્ધ) તેવી હોય તો ) અર્થાત, કર્મમાર્ગ વા શાનમાર્ગમા સન્યાસ લેવા અયુ છે, જ્યારે ભક્તિમાર્ગમા સાધનસિદ્ધયર્થ પણ સુખદાયક નથી અનન્ત વર્ષથી પ્રભુને આપણને જે વિગ થયો છે, તે વિરહના શાસનના અનુભવને માટે જે પ્રભરણ થાય તો તે સન્યાસ ઇષ્ટ છે, નહિ તે આચાર્યએ દર્શાવેલી પ્રણાલિકાથી તવિરની સેવા જ કરીને સ્વમયાદામાં રહેવુ આવુ ગ્રન્થનું સૂકમ તાત્પર્ય છે આ મમી આઠ ટીઝને સમટ કર્યો છે – ૧ કુલનાથ, ૨ થીરપુનાથજી, ૭ થી સવજી ૪ ચાચાએ પેશ્વરજી, ૫ શ્રીપેશ્વરજી, શ્રીપુરુત્તમ, શ્રીવલ્લભ, અને ૮ચાથી પેશક આ સર્વે મા સરસ્કૃતમાં છેપ્રત્યેક ટીકાની અનેક પતિઓ પ્રભુકૃપાથી પ્રાપ્ત થઇ, તદનુસાર યથાશક્તિ યથામતિ રોધીને તે સર્વે મુદ્રિત કરી છે સંસ્કૃત નહિ જાણનારા વેષ્ણને માટે પુસ્તમજીની ટીકાનું ગુજર ભાષાન્તર પણ આપ્યું છે. અમને આશા છે કે આથી સસ્કૃત કે સંસ્કૃતાતભિન્ન સર્વે વૈષ્ણવે આ ગ્રન્યને આદર કરીને અમારા વહ૫ પ્રયનને સલ કરશે પડિત ગલાલના પુસ્તકસમ, નડીયાદની ડાહીલમી પુwાલયસ્થ શાસ્ત્રી ભાઈલાલને સહ, ડેક્કનકેલે જમાન રારકારી સમ ગુજરાતી સિને સંગ્રહ શ્રીમવૈષ્ણવ પરિષસ્લમ, શ્રીવલ્લભવાલ, શ્રીજીવનલાલજી, શ્રીગોવર્ધનલાલજી, શ્રીબનરાજી, ગોવામિની શ્રીકૃષ્ણપ્રિયા, શાસ્ત્રી વસન્તરામ, શાસ્ત્રી ભદ્રશકર શાસ્ત્રી કલ્યાણજી, અને કર્તનકાર બલદેવદાસ તરફથી આ ગ્રન્થનુ સાહિત્ય અમને મળ્યું છેઆ સર્વને તેમની નિરપેક્ષ tહાથમાટે અમે અત કરણુથી આભાર માનીએ છીએ પુસ્તક તથા રીંકાએ લિખનમા ઉસવલાલ રામકૃષ્ણ પક્યા દુલાલ ચુનીલાલ શાહ, વ્રજચડીદાસ મગનલાલ રાહ ધીરજલાલ કાશીનાથ પડ્યા, કુલદ વિઠ્ઠલદાસ શાહ મેહનલાલ નરોત્તમદાસ શાહ બી એ વગેરેને વસાહપૂર્વક નિ૫ પરિશ્રમ પણ ધન્યવાદને પાત્ર છે અણુના અમારા મિન વસવાલ રામકૃષ્ણ પક્ષાએ અમને કાર્યો કરવાને સૂર્ય પ્રકારની અનુકૂલતા પિતાને ત્યા કરી આપી તેથી તેમનો તથા ભગવતીય ભતીજાઇને ઉપકાર વિસ્મરણીય નથી આ ગ્રન્થ માટલા ૯૫ સમયમા, પ્રતિબધે હોવા છતા, શ્રીકૃષ્ફચન્દ્રચરણકમલમા અર્પવાને અમે શક્તિમાન થયા છીએ, તેનું મુખ્ય કારણ ગાસ્વામિથીરુવનલાલજીનું નિ સંકેચ દ્રવ્યાદિનું સાહાએ, અને નિત્યલીલા મહાનુભાવો એને ક૨ણુકટાણ, તથા વિધમાન મહાનુસાવીએનો સદ્ભાવ જ છે મુબઈ. મૃલચન્દ્ર તેલીવાલા. વસોrs ૧૭૪ લાલ સાંડલીયા, ग्रन्थसङ्ग्रहपरिचयः । , सर्वविधरणाधारत सन्यासनिर्णयो मुद्रितोसामि , तय विद्यमाना पाठभेदा अपि दर्शिता । २ श्रीमगोकुलनाथप्रकटितविवरणस्य दशपुम्नकान्युपलब्धानि । तर एक श्रीवलभालाना शुद्ध प्राचीन स. १७३५ आश्विन शुक्लपञ्चम्या लिखितम् । दिनीय श्रीग्रजरसानाम्, नूतनम् । नृनीय थीजीवनरालाना नूतन प्राय शुद्धम् । चतुर्थ श्रीनृसिहलालतनयश्रीगोवर्धनलालाना प्राचीन, प्राय शुद्धम् । पञ्चम गोस्वामिनीधीकृष्णप्रियामिर्दत्तम् । पष्ठ प० गढूलालसद्महत प्राप्त, प्राचीन माय गुदम् । सप्तम 'गुतराताप्रेस'सनहत प्रासम् द्वय स्तम्भतीर्थस्थशाखिभद्राकरस्य । दशम श्रीमद्वैष्णवपरिपत्सवहत प्राप्तम् । ३ श्रीमद्रघुनाथप्रकटितविवरणस्य पुनरुदयमुपलब्धम् । एक प० गद्दालसाहत प्राप्तम् , मानीन शुद्ध च । द्वितीय श्रीनीवनलालानाम्, नूतन प्राय शुद्धम् । ५ श्रीगोकुलोत्सवप्रकटित विवरणस्य पुस्तकत्रय प्राप्तम् । द्वय प० गढूलालसद्गृहस्थम्, एक प्राचीन, शुद्ध प । द्वितीय नूतनमशुद्ध च । तृतीय 'गुजराती प्रेस' सद्गहत प्राप्तम्, प्राय शुद्धम् । ५ चाचाधीगोपेश्वरकृतटीकाया पुस्तकमेकमेवोपलब्धम् । प्राय शुद्ध, परन्तु पीत् सन्दिग्धम् । इद पुम्नक श्रीद्वारकेश्वराणा, सवत् १८१० वर्षे लिखित, ५० गहलालसनहर प्राप्तम् । नैवैय रीका श्रीघनश्यामतनयचाचाश्रीगोपेशानाम् । ६ श्रीगोपेश्वरकृतविवृते पुम्नत्रय प्राप्तम् । एक शास्त्रिवसन्तरामत प्राप्तम्, सवत् १७२३ आश्विनामावास्याया लिखितम् , शुद्धम् । द्विताय प. गहलालसाहत प्राप्तम्, प्राचीन प्राय शुद्धम् । तृतीय श्रीमद्वैष्णवपरिपसङ्गहत प्राप्तम्, नूननम् । ७ श्रीम पुरपोत्तमप्रकटित विवरणस्य पुस्तकचनुष्टय प्राप्तम् । एक 'उक्न कॉलेज' हम्नलिखि तसङ्ग्रहस्थम्, प्राचीनमतायशुद्धम् । इद पुस्तक श्रीमत्पुरुषोत्तमर्निजहताक्षरै शोभितमित्यसाक प्रतिभाति, कचित् धचित् वियरणे शुद्धरि सिता फक्किा हरितालेन लुस्या, नूतना अधिका निवेशिता अत्र पनद्वय त्रुटितम् । द्वितीय पुस्तक श्रीजीवनलालानाम्, नूतन, प्राय शुद्धम् । तृतीय श्रीमद्वष्णवपरिष सहत प्राप्तम् नूतन, न केनापि वाचित शोधित वा। चतुर्थ श्रीवल्लभरालानाम्, नूतन, अशुद्ध च । अस्मिन् पुस्तके क्वचित् कल्पिता पाठा निवेशिता दृष्टा । श्रीपुरुषोत्तमकृतैतद्विपरणे अते यथाविधि सन्यास गृहीत्रा अरेलमा मात् काश्यामागता' इति विद्यमानेषु भसद्दष्टेषु पुस्तकेषु वतते। श्रीवलमलालत प्राप्त पुस्तके 'यपानिधि नारायणेन्त्रतायत सन्यास गृहीत्वे त्याद पतते । भन 'नारायणेन्द्रतीयत' इत्यधिक केन कृत, कुत कथमागतम् , तन्न निश्चीयतेऽस्मामि । एतद्रीत्या विष्णुस्वामिपरम्परासमधन तु तस्या याथातथ्य शिथिलीकरोतीत्यविवादम् । श्रीम पुरुषोत्तमकृताचार्यचरित्रोपन्यास श्रीद्वारकेश्वर कृतशिक्षाश्लोकविवरणेप्यम्ति, तत्रापि 'नारायणेद्रतीयत' इति न विद्यते । एतेन येन मिचिद यमशुद्ध पाठ श्रीपुस्पोत्तमवृतत्रिवरणे निक्षिप्त , तेन साहसमेव कृतमिनि मन्यामहे । ८ श्रीवल्लभकृतटीकाया एकमेव पुस्तकमुपलब्धम् । प्राचीनमनावशुद्धम् श्रीवल्लभलारानाम् । ९ श्रीधनश्यामतनयचाचाश्रीगोपेशकृतटीकाया पुम्नकचतुष्टयमुपलब्धम् । एक भाईलालगा त्रिण , तनमुखरामै प्रदत्तम्, प्राचीनम्, शुद्धम् । द्वितीय प० गटूलालसङ्गहत प्राप्तम्, प्रायोऽशुद्धम् । पुस्तकद्वय श्रीमजरसानाम् , उभयमपि नूरानम्, एक शोधित वान्छुद्धम्, द्वितीयमशुद्धम् । भस्य विवरणस्य यद्यपि पुस्तकचतुष्टयमुपलब्धमसामिम्नयापि सर्वाण्यपि नामरहितानि, अत कै महानुभावैरिद विवरण प्रकटितमिति तन्निश्चेतु प्रथम ययमशक्ता । भाषासाम्येनेय टीका चाचाश्रीगोपेशानामेयेत्यम्माक हदि प्रतिक्षण स्फुरितम् । एतद्विवरणभापाया साम्य असन्मुदितघाचा शुदा फक्किा . .

। श्रीगोपेशकृतसेवाग्लनिरोधलक्षणरियरणाभ्यां महास्यन्त यतते । श्रीपुरोत्तमततद्वियरणोपन्यासेन नि सन्दिग्धतयेद चाचाधीगोपेशानामेयेति निधीयते । विशेष प्रमगाइयत इति । भसिन पुमासयये ५० गहराएसंस्थाया 'कार्याध्यक्ष काशीदास नारायणदाप्त दलाल, पी ए, एष पर थी, मुरयष्टीधेष्टीग्रिभुयनदास,' इत्येतेपा महायुपनि । गोस्वामिश्रीजीवनसालाना, गोस्वामिनीनृसिंहलालतनयश्रीगोवधनसालाना फ्ल्या शामिण, गोस्वामिधीवामलालाना, गो स्वामिधीयजरसाना, गोस्वामिनीश्रीकृष्णप्रियाणां, परदेयदासस्यापि महायुपकृति । शाखिवस. न्सराम हरिकृष्णा, शानिभद्शहर जयशकर, सनमुग्पराम मन मुगराम त्रिपाठी बी एनट परलाल इच्छाराम देसाई यी ५, डॉ एस् के बेस्वरकर एम् ए, पी एप्सी, रयते सहपं प्राचीनहम्लरिसितपुस्तकप्रदानेन ययमसन्तमनुगृहीता. । श्रीमद्वैष्णयपरिपन्मनिवाडीलालस्यापित थैवोपकृति । 'चन्दुबास चुनीलाल शाह, प्रजधरीदास मगनलाल शाह, उग्सवलाल रामकृष्ण पण्च्या, धर्यलास फाशीनाथ पव्या, फुलचन्द विठ्ठलदास शाह, मोहनराल भरोत्तमदास शाह यी प'इस्ये सेपी पुस्तकलिखने महायुपकृति । अस्य यायामाप्यविवरणसमेतस्य सन्यास निर्णयस मुदणम्ययो गो- स्वामिधर्यश्रीजीवनलाले सहर्ष कृत इति तेषामुपति पय सचिनय स्मराम । प्रार्थयामहे धान्येपि गोस्वामिन धीमम्तो पैष्णवाचनाननुस्युरिति । एतेषा गोस्वामिवर्याणा कृपयैव मन्यासनिर्णयोर• विवरणसमेत मुद्रिस साम्प्रदायिकानां मुगमो भविष्यतीति । विवरणकृतां परिचयः। , तत्रादा श्रीमदलभाचार्यप्रकटित सन्यासनिर्णयोरवियरणसमेत सम्मुच्यते । स्वीपानुग्रहा धेमाचार्यं स प्रकटीकृत इति । आचार्याणा प्रादुर्भावस्तु १५३५ वर्षे चैनकृष्ण एकादश्या रविवासरे। तेपा चरिमादिक नु साम्प्रदायिक्वातादिपु प्रसिमिति नेह निम्तर । पोडशमन्वय सन्यासनिणयश्व तुर्दशसङ्ख्या भजते । २ प्रथम मुद्रित विवरण श्रीमद्वलभानाम्, श्रीमगोकुलनाथानाम् । श्रीमद्गोकुलनापास्नु श्रीमद्विदृलेश्वरमभुचरणाना चतुर्थमूनव मार्गशीर्ष शुक्षसप्तम्या १६०८ वर्षे काशीसमीपस्यारेलप्रामे प्रादुर्भूता । पीपकृष्णनवम्या १६९७ वर्षे धीमगोकुले सिद्धिं गता । श्रीमप्रभुचरणलालेपु इमे अति प्रसिद्धा । चित्पादाना सन्यासपापण्दिना गुखमर्दन पृत्या मोगलराजजहागिर च वशीकृत्य स्वमार्ग रक्षामेत एव कृतवन्त । निजमहायरनेन सता कण्टे माला घ तैरेव सुरक्षिता 1 ताताकपरायणरव तु तेपामतीव प्रसिद्धम् । श्रीमदाचार्यप्रकटितश्रीमद्भागवतसुबोधिन्या विशेषणचारस्तु तैरेष कृत , अत. स्तेषा 'श्रीसुबोधिनीमवर्तका' इति नामापि प्रसिद्धम् । निजश्रीहताक्षरयुतश्रीमत्सुबोधिनी कपडवणने श्रीबहेनजीराजगृहमधुनाप्यररोति । साम्प्रदायिक्वातादीना प्रकटीकर्तारोपि ते एव । स्वसम्प्रदाय प्रचाराध प्रवृद्यर्थ च गुर्जरभूमिरनेकवार स्वचरणनलिनरजोभिने पवित्रीकृता । दक्षिणे पुण्यपत्तनपर्य न्तमेकदार तदधमेव गता , परन्तु तत्रत्यान् कृष्णप्रेमरसानविकारिण दृष्ट्वा ततो न्यवर्तन्त। दाक्षिणात्या 'भंसा इयुपहासम्तरेव कृत । तद्वार्ताप्रसङ्गादिपु च प्रसिद्ध । श्रीसर्वात्तमम्नोत्रश्रीवल्लभाष्टकसिद्धा न्तमुक्तावलिपुष्टिप्रवाहमर्यादामिद्धान्तरहसान्त करणप्रबोधचतु श्लोकीविवेकधैर्याश्रयभक्तिवर्धिनीत्यादीनां अ थाना विवृतय तेपा नयनगोचरीभवन्ति । अस्मन्मुद्रितसेवाफले अन्तिम नामरहित विवरणमपि तेषामेवेति तत्कृतश्रीसर्वोत्तमम्तोत्रहट्टीकोपन्यासात् ज्ञायते । “विबुधेश्वर' इत्यस्य विवरणे एतत्सेवा फलविवरणस्योपन्यासो वतते । श्रीकल्याणभकृतकझोले व्यारास्थश्रीगोपालदासकृतमालामसङ्गे च तेषा चरित्रादिक मुविस्तृतम्, विशेपजिज्ञामुभिस्तत्रैवावलोकनीयम् । २ द्विनीग मुद्रित विवरण श्रीमद्रघुनाथानाम् । एते श्रीमद्रघुनाथास्तु श्रीमद्विहरेश्वरप्रमुचर जाना पश्चमसूनव कानिकशुक्लद्वादश्यां १६११ वर्षे प्रादुर्भूता । तेभ्यो विद्यादान श्रीमगोकुलनाथै कृ तमिति परम्परातो ज्ञायते। तदशे च रसाब्धिकाव्यकार श्रीदेवकीनन्दना श्रीसुबोधिनीलेखकृतश्व श्रीयलमाः प्रादुर्भूताः । चतुर्थलालश्रीमदोलनायवत् तेषां पितृभक्तिरपि निरपमा । पोडशमन्योपरि तेपो ब्यारयानानि हगोचरीभवन्ति । श्रीवल्लभायाधीमधुराष्टकोपरि तेषां च्याएयानमुपलभ्यते । भक्ति- हंसमक्तिहेतू घ तैः स्वतन्यारयया समलंकृती। श्रीपुरषोत्तमनामसहरामपि सैः नामचन्द्रिकया सर- लीकृतम् । तेषां भापासारत्यं वसन्तं बनते । रमणीयानि तत्प्राटितमोग्राण्यपि दृश्यन्ते । ३. तृतीयं व्यारानं श्रीगोकुलोत्सवानाम् । इमे श्रीगोकुलोत्सवाः श्रीमरमभुचरणद्वितीयकुमार- श्रीगोविन्दरायाणां द्वितीयसूनवः, श्रीमस्वल्याणरायाणामनुजाः, श्रीमदाररायाणां पिज्यचरणा', संवत् १६३५ वर्षे ज्येएकृष्णचतुभ्यां प्रादुर्भूताः । पोडसमन्थोपरि तेषां न्यारयानानि मिलन्ति । ४. चतुर्थ व्याख्यानं चाचाश्रीगोपेश्वराणाम् । के इमे श्रीगोपेश्वरास्तनिश्चेतुं मैव शस्यतेऽस्लामिः । यद्यपि अन्यान्ते अस्लामिः श्रीधनश्यामतनयचाचाश्रीगोपेशकृतमिति लिसितम्, तयापि नैतधुनमेवेति प्रतिभाति । एतद्विवरणस्यैकमेव पुनकै मिलितम्, तदुपरि एवं लिखितम्:-'चाचाजीधीगोयेश्वरजीकृता टीका, संवत् १८१०, श्रीद्वारकेश्वराणामिदम्' । यद्यपि एतद्विवरणं प्राचीनं, तथापि चाचाश्रीगोपेशाला श्रीघनश्यामतनयानां तु नैय । अन्नान्ते मुद्रित विवरणमेव तेपामिति श्रीपुरोसमततदुपन्यासाद् भापासाम्याच निश्चीयते । ५. पजम विवरणं श्रीगोपेश्वराणाम् । इमे श्रीगोपेश्वराः श्रीकल्याणरायाणां सूनवः, श्रीमद्धार रायाणामनुजाः, संवत् १६४९ ज्येष्ठ शुरुद्वादश्यां प्रादुर्भूताः । शिक्षापग्राणि पतेषु श्रीहरिरायः प्रेषि. तानि । शिक्षापत्राणां भापाण्यारपान तस्कृतमेव सम्प्रदाये प्रचलति । पादकथानामकोन्यो भन्योपि तेषां पर्वते, पुष्टिभक्तिसुधायां प्राङ्मुद्रितश्च । एतेषां भापा किनिद्विलक्षणा वर्तते । तद्न्यान्ते श्लोकोय:-- गीर्भिर्गोपालदासस्य श्रीगोकुलनिवासिनः। गोपेश्वरेण विवृतिः कृता संन्यासनिर्णये । ६. पई विवरणं दशदिगन्तविजयिधीमत्पुरषोत्तममरणानाम् । श्रीमदाचार्यतः पुरषगणनया सप्तमी संख्या विभूपयन्तो भाइपरशुलदशम्यां १७१४ वर्षे प्रोद्भूताः । तेषां विवरणं शारीसा- सुभुसुमोधकमिति प्रतिभाति । विशेषतम्या परिप्रजिज्ञासुभिः पुष्टिभक्तिसुधेति मासिकपनिकाया पञ्चमवर्षय तृतीयाको द्रष्टव्यः । यात्माप्यं वाह्यमातरं वा तेषां चरित्रादिकममामिलौव निवेगित- मिति न पुनरनूद्यते। ७. सप्तमं विवरण काकाश्रीवलभानाम् । इमे धीवलमाः श्रीमप्रभुचरणपजमपुत्रधीरघुनाथत. श्यतुर्थी संख्या विभूपयन्तः स. १६२९ वर्षे कार्तिककृष्णद्वादश्यां प्रादुर्भूताः । श्रीविठ्ठलरायाणां कनी. यांसः मूनवः । पोडशप्रन्योपरि तेषां विवरणानि सुबोधिन्यनुसारीणि दृश्यन्ते । श्रीसुबोधिनीलेखस्थापि प्रणेतारले एव । अणुभाथ्योपरि व्यारयान तैः प्रकटीकृतमिति लालूमकृतोपन्यासादयाम्पते । एतः वर्षस्य विभाजनयं कृतम् प्रथमे विमागे श्रीमगोकुलचन्द्र सेनमानाः श्रीगोकुले विराजितवन्तः। द्वितीये विमागे कदम्बरवण्यां निवसन्तः ग्रन्थान् विवरणानि च योजितवन्तः । तृतीये विभागे सदुपदेशः जीवानुवर्नु भारतवर्ष पर्यटन्त. सेवां स्वीकृतवन्तः । विशेप तु पुष्टिभक्तिमुधायाः सप्तमवर्षस नवमाडे प्रपयितं, जिज्ञामुभिस्तत्रैवावलोकनीयम् । ८. अष्टम विवरणं श्रीधनश्यामतनयचाचाधीगोपेशानामेव । इमे श्रीगोपेशाः श्रीमप्रभुचरणानां ससमनश्रीघनश्यामानां सूनवः। पोडशमन्योपरि बहवनपा टीका दृश्यन्ते । तस्कृतनिरोधलक्षणविवरण रवधुनेवासामिः प्रकटितम् । भाद्रपदकृष्णपवम्यां १६५२ वर्षे प्रादुर्भूताः। अत्रास्मामिरपलब्धानि भष्टरिपरणानि प्रक्टीक्रियन्ते, एतान्येव प्रसिद्धानि, तथापि एतावन्त्येव विवरणानि, नेवाधिकानीति नैव शश्यते वरतुमसामिः। अतो यदि भग्रामुद्रितं संन्यास निर्णयम्पाख्यानं केषाचिन्महानुभावानां पुस्तकसङ्ग्रहे विधेत चेत्, तदा ते कृपया यदि तदसत्सकाशं प्रेपयिष्यन्ति, सदा तदपि सोपकार स्वीकृत्य मुदयिष्यामः । प्रार्थयामहे व विद्वांस: असदेनां प्रार्थनां कृपया स्वीकृत्य सम्प्रदायसेवा कर्तुं स्वजीवनं च सफलयितुमुपता भवन्विति ।

नवल विशेप. ગત ઉષ્ણકાલની રજામાં સૌરાષ્ટ્રમાં આવેલા જૂનાગઢમાં શ્રીદામોદરજી તથા શ્રીમદન મોહનલાલજીના મદિરસ્થ હસ્તલિખિત પુસ્તક સચહના દર્શનનો લાભ ભગવદ્ધર્મપરાયણ રા રણછોડદાસ વૃન્દાવનદાસ પટવારી તથા રા રણછોડદાસ શ્યામજીની સહાનુભૂતિથી મળ્યો હતો મારી સાથે ચાર પાચ સન્મિત્રો હતા જેથી ત્યાંના મદિરમાં વિદ્યમાન સર્વ સાંપ્રદાયિક બધોમાના હસ્તલિખિત પુસ્તકોનું નિરીક્ષણ કરવાનો અપૂર્વ લાભ પ્રભુકૃપાથી મઢ ઘણી વાર મેં શ્રવણ કર્યું હતું કે જૂનાગઢમાં દેવકીનન્દનલાવાને ત્યાં શ્રીમહાપ્રભુજીની શ્રીમદ્ભાગવત ઉપર પ્રકટ કરેથી સૂક્ષ્મ ટીકા છે એ સૂમ ટીકાના દર્શનનું અહોભાગ્ય પ્રાપ્ત કરવાની ઉકઠા મને બહુ વાર થતી, પરંતુ એ ઉકઠા શાત કરવાનો પ્રસંગ અદાપિ પર્યન્ત મળે નહિ આ સમય ભગવદીય રણછોડદાસ શ્યામજી તથા ભગવર્મપરાયણ રા. રણછોડદાસ પટવારીએ સર્વ પ્રકારની અનુકૂળતા કરી આપી જેથી ઉના પુસ્તકસમયનુ યથેચ્છ નિરીક્ષણ થયું શ્રી મહાપ્રભુજીની શ્રીમદ્ભાગવતના સમગ્ર સૂમ ટીકાના દશનનું સૌભાગ્ય તો અમને પ્રાપ્ત ન થયું, પરંતુ શ્રીદશમસ્કંધના આરંભના વિશેક પાનું દર્શન થયું પરંતુ ઉક્ત પુસ્તકસચહનું સાગોપાગ નિરીક્ષણ કરવામાં અને તેની સૂચિ તૈયાર કરવામાં અન્ય નવ વિશેષ પણ જાણુ- વામાં આવ્યું ઉક્ત સંગ્રહમાં શ્રી સુબોધિનીની જુની સુંદર પ્રત વિરાજે છે, તથા તે ઉપરનો પ્રકાશ શ્રી પુરુષોત્તમજીનો સારો છે પરંતુ ત્યાં પણ દશમસ્કંધનો માત્ર લેખ છે, પ્રકાશ નથી નિબંધ ઉપર પણ આવરણુભગાદિની પ્રતિઓ છે શ્રીમદભાગ્ય ઉપર કાશીથ શ્રીગિરિધરજીનું વિવરણ તથા મરીચિકાવૃત્તિ વિના અન્ય કોઈ નથી જોડશ ગ્રંથનું સાહિત્ય સારા પ્રમાણમાં છે અને પ્રકટ કરેલા પ્રદર્શાવરણસતિ સેવાલમાં બે વિવરણ નામરહિત હતા તેમા અાિમ નામરહિત વિવરણ શ્રીમવિઠ્ઠલેશ્વરસ્મભુચરણના ચતુર્થ પુત્ર શ્રીગોકુલનાથજીનું છે એમ મને એઓશ્રીના શ્રી સર્વોત્તમજીની બડી ટીકા વાચતા માલુમ પડ્યું હતું પરંતુ શ્રી તમજીની પછી મુકિત કરેલ વિવરણ કોનુ તે જૂનાગઢના પુસ્તકસમ્રથી માલૂમ પડે છે ઉક્ત વિવરણના કર્તા શ્રીમથુરાનાથાત્મજ શ્રીદારકેશજી મહારાજ છે એ વિવરણનો અતિમ ભાગ કાઈક ત્રુટિત હતો તે આ પ્રકારે છે –“માર 'ને બદલે આમ વાચવું - अगदिच्छाभावनपरेण स्थेयम् । भगवदिच्छाभावनमाने सु श्रीगोपीजनवलभोसमभु पुष्टावही कृतामना स्वपमेयोद्वेगादिक निवार्य यभाधिकारमेतद्वन्योक फल दास्यतीति सिद्धम् । આવકમકમોનોપાળાનૂ કામવૃત્તિના विचारिता मयाप्ये पूर्वटीकानुसारत ॥ इनिनीयोस्वामिमथुरानाथारमजद्वारिकेशकृतसेपाफलविवृतिप्रकाश समास । બીજુ આ શ્રીદ્વારિકેશજી મહારાજના અને યોનિથીગેશ્વરજીના ચિત્રના એકજ પત્ર ઉપર દર્શન કર્યા, અને શ્રીદ્વારકેશજીના અમુક પુસ્તક ઉપરના હસ્તાક્ષરના પણ દર્શન થયા તે ઉપરથી અને હવે લાગે છે કે સન્યાસનિર્ણમા છાપેલી ચોથી ટીકા ચાચાશ્રીગોપેશ્વરજીના નામથી છાપેલી તે યોગિશ્રીગોપેશ્વરજીની છે જે પ્રતિ ઉપરથી આ ચતુર્થ ટીકા છાપી તેના ઉપર જિમિ એમ લખેલું હતું, તે અને “ રાજનીતી' એમ લખેલું હતું જે હસ્તાક્ષરમાં આ લખેલું હતું તે અને શ્રીદ્વારકેશજીના હસ્તાક્ષર એક જ હેવાથી, અને ઉભયના ચિત્ર સાથે હોવાથી શ્રીદ્વારકેશ યોનિ શ્રીગોપેશ્વરને જ જાવા શ્રીગોપેશ્વરજી કહેતા તેય એમ સંભવ હોવાથી ઉક્ત ટીકા યોગિશ્રીગોપેશ્વરજીની છે એમ હવે મારી મતિ છે મુલચન્દ્ર તેલીવાલા.

श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः । संन्यासनिर्णयः। पश्चात्तापनिवृत्त्यर्थं परित्यागो विचार्यते । स मार्गमितये प्रोक्तो भक्तौ ज्ञाने विशेपतः ॥१॥ कर्ममार्ग न कर्तव्यः सुतरां कलिकालतः । अत आदी भक्तिमार्गे कर्तव्यत्वादिचारणा ॥२॥ श्रवणादिप्रसिद्धयर्थ कर्तव्यश्चेत् स नेष्यते। सहायसङ्गसाध्यत्वात् साधनानां च रक्षणात् ॥ ३॥ अभिमानानियोगाच तद्धमैश्च विरोधतः । गृहादेर्षाधकत्वेन साधनार्थ तथा यदि ॥४॥ अग्रेपि ताशेरेव सङ्गो भवति नान्यथा। स्वयं च विषयाक्रान्तः पापण्डी स्यात्तु कालतः ॥ ५ ॥ विषयाक्रान्तदेहानां नायेशः सर्वदा हरेः। अतोत्र साधने भक्तो नैव त्यागः सुखावहः ॥ ६ ॥ विरहानुभवार्थ तु परित्यागः प्रशस्यते । स्त्रीयबन्धनिवृत्त्यर्थ वेपः सोन न चान्यथा ॥७॥ कौण्डिन्यो गोपिकाः प्रोक्ता गुरव साधनं च तत् । भावो भावनया सिद्धः साधनं नान्यदिष्यते ॥ ८॥ विकलत्वं तथाऽस्वास्थ्यं प्रकृतिः प्राकृतं न हि । ज्ञानं गुणाश्च तस्यैवं वर्तमानस्य बाधकाः॥१॥ सत्यलोके स्थितिमा॑नात् संन्यासेन विशेषितात् । भावना साधनं यत्र फलं चापि तथा भवेत् ॥१०॥ ३. सर्वधेति पाठ.। १. प्रात्यमिति पाठक। २. वामत इति पाठः ।

तादृशाः सत्यलोकादी तिष्ठन्त्येव न संशयः । पहिश्चेत् प्रकटः स्वात्मा वहिवत् प्रविशेद्यदि ॥ ११ ॥ तदैव सकलो पन्धो नाशमेति न चान्यथा । गुणास्तु सङ्गराहित्याज्जीवनाथ भवन्ति हि ॥१२॥ भगवान् फलरूपत्वान्नात्र बाधक इप्यते । स्वास्थ्यवाक्यं न कर्तव्यं दयालुन विमध्यते ॥१३॥ दुर्लभोयं परित्यागः प्रेम्णा सिध्यति नान्यथा । ज्ञानमार्ग तु संन्यासो दिविधोपि विचारितः॥१४॥ ज्ञानार्थमुत्तराङ्गं च सिद्धिर्जन्मशतः परम् । ज्ञानं च साधनापेक्षं यज्ञादिश्रवणान्मतम् ॥ १५॥ अतः कलौ स संन्यासः पश्चात्तापाय नान्यथा । पापण्डित्वं भवेचापि तस्माज्ज्ञाने न संन्यसेत् ॥ १६ ॥ सुतरां कलिदोपाणां प्रयलत्वादिति स्थितम् । भक्तिमार्गेपि चेद्दोपस्तदा किं कार्यमुच्यते ॥ १७ ॥ अत्रारम्भे न नाशः स्याद् दृष्टान्तस्याप्यभावतः। स्वास्थ्यहेतोः परित्यागाद्वाधः केनास्य सम्भवेत् ॥१८॥ हरिरन्न न शक्नोति कर्तुं बाधां कुतोपरे । अन्यथा मातरो यालान्न स्तन्यैः पुपुपुः कचित् ॥ १९ ॥ ज्ञानिनामपि वाक्येन न भक्तं मोहयिष्यति । आत्मप्रदः प्रियश्चापि किमर्थ मोहयिष्यति ॥ २० ॥ तस्मादुक्तप्रकारेण परित्यागो विधीयताम् । अन्यथा भ्रश्यते स्वार्थादिति मे निश्चिता मतिः ॥२१॥ इति कृष्णप्रसादेन वल्लभेन विनिश्चितम् । संन्यासवरणं भक्तावन्यथा पतितो भवेत् ॥ २२ ॥ इति श्रीमद्वल्लभाचार्यचरणप्रकटितः संन्यासनिर्णयः समाप्तः। १.नादृश इति पाठः। २. स्थितिरिति पाटः।

श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः। श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः । संन्यासनिर्णयः। श्रीमद्गोकुलनाथविरचितविवरणसमेतः। नमामि तातचरणान् स्खीयानां सर्वकामदान् । यैः कृत. स्वाभिधानार्थ. प्रकटः कृपया मयि ॥ १॥ स्वमार्गीयपरित्याग वक्तु परित्यागविचार प्रतिजानते, तद्धेतुमाहुः पश्चात्ताप- निवृत्यर्थमिति । पश्चात्तापनिवृत्त्यर्थं परित्यागो विचार्यते । स मार्गदितये मोक्तो भक्ती ज्ञाने विशेषतः ॥१॥ भक्तिमार्गीयपरित्यागेतरसर्वपदार्यान् विचार्य त्यागविचारामावजनितस्वपश्चात्ताप- निवृत्यर्थ भक्तिमार्गीयपरित्यागविचारमारमन्ते पश्चात्तापनिवृत्यर्थमिति । उक्तपश्चात्ताप- निवृत्यर्थं यः परित्याग. स विचार्यते, न तु विधीयते, विधाने विधिशेषत्वमापयेतेति सर्वकर्तृकत्वमापघेत, अत उक्त विचार्यते । स्वरूपत साधनतः फलतश्च तस्य विचारे परित्यागसामान्यादन्यमार्गीयस खविचार्यमाणस्य च तारतम्यज्ञापनार्थमन्यमार्गीयमप्याहु. स मार्गडितये इति । मार्गद्वयमेवाहुः भक्तो मर्यादापुष्टिभेदमिन्नभक्तिमार्गे । मर्यादाभक्ती श्रीमदुद्धवप्रटेन भगवता 'मदर्थपरित्यागो भोगस्य च सुखस्य च । इष्ट दत्त हुत जात मदर्थे यद्रत तप.' इति सागो विशेषत. प्रोक्त । पुष्टिभक्तिमार्ग रास- मण्डलमण्डनाभिरपि 'सन्त्यज्य सर्वविप निति । तल्लीलायामेव चतुर्थाध्याये ता प्रत्येव 'एव मदर्थोज्झिते'त्यत्र विशेषतस्त्याग प्रोक्त । (नेनूभयनाप्यविशेपेण साग- कथनादुमयोस्त्यागयोः साम्यमस्तीति चेत्, अब वदामः । यद्यपि मर्यादाभक्तिपरित्याग- कथनेपि 'मदर्थपरित्याग' इति वाक्ये स्वप्राप्त्यर्थं परित्याग उक्तः, तद्वदेव फल- प्रकरणचतुर्थाध्याये शुद्धपुष्टिमार्गीयभक्तस्वरूपनिरूपणे 'एव मदर्थोज्झितलोकवेदस्खाना-' १ पश्चात्तापखरूपमाहु मफीति । भफिमार्ग पदार्थपरिलागादितरसर्वपदायाना परित्याग इत्यर्थ । तथा च लौकिकपदार्थपरित्यागो विचार्यत इति निष्कप । २ नन्विलारभ्य वेदितव्ये त्यन्त विवरण नोपलभ्यते कुत्रचित ।

२ संन्यासनिर्णयः । मित्युक्तं, तथापि मर्यादाभक्तिमार्गे त्यागस्य मदर्थित्वं यदुक्तं, तत्स्वप्रात्यभिप्रायेण, न तु खाभिलपितसिद्ध्यमिप्रायेण, तन्मार्गे तस्यासम्भावितत्वात्, पुष्टिमार्गीयमक्तखरूपनिरूपणे 'एवं मदर्थोज्झितलोकवेदखाना मिति लोकवेदस्वपरित्याग उक्तः । तत्र यद्यपि स्वपदेन ज्ञात्यर्थात्मान उच्यन्ते, तत्रैतासां ज्ञात्यर्थपरित्यागस्य व्रज एव स्थित्याऽसम्भावितत्वात् स्व- पदस्यात्मपर्यवसायित्वमेव सम्भवति । यद्यपि विद्यमाननित्यदेहानामात्मत्यागोऽसम्भावितः, तथाप्यात्मत्यागोक्तेरयमाशयः । यथा श्रुतौ 'आत्मने वै कामाय सर्व प्रियं भवतीति। यत्र प्रियत्वं तत्रात्मौपाधिकमेव, न तु प्रकारान्तरेण । एतासां यदात्मनि प्रियत्वं तन्न खात्मत्वेन, किन्तु खात्मनो भगवतः प्रीतिजनकहेतुत्वेन । अत एव भगवदमिलनदशायामात्मनोऽ. नुपयोगं ज्ञात्वा न मण्डनादिपुरस्कारस्तासाम् , उपयोगसमय एवात्मपुरस्कार इति नात्मनः स्वभावतः प्रियत्वम् , किन्तु भगवदुपयोगित्वेनेत्ययमेवात्मनस्त्याग इति शुद्धपुष्टिमार्गीय- त्यागस्य मर्यादामार्गीयत्यागस्य च महदेव वैलक्षण्यमित्युभयत्रापि त्यागपदोपादानादुमयोः साम्यमस्त्वित्साशङ्का निरस्ता वेदितव्या ।) ज्ञाने ज्ञानमार्गेपि विशेषतः प्रोक्तः । स च विशेपो 'यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजे'दिति श्रुत्या विविदिपा विद्वद्भेदाभ्यां च तच्छास्त्रे निरूपित इति विशेपत इत्युक्तम् ॥१॥ कर्ममार्गस्यापि मार्गान्तःपातात् तत्रापि परित्यागप्राप्तिमाशक्य निषेधन्ति कर्ममार्ग न कर्तव्य इति । कर्ममार्गे न कर्तव्यः सुतरां कलिकालतः । अत आदौ भक्तिमार्गे कर्तव्यत्वाद्विचारणा ।। २॥ तत्र 'यावजीवमग्रिहोत्रं जुहोती ति विधिना संन्यासग्रहणसानवसरपराहतत्वात् । यद्यप्यायुपश्चतुर्थो भागश्चतुर्थाश्रमेण नेय इति कुत्रचिदुक्तं तत्रापि निषेधमाहुः सुतरा- मिति । अस्सायमर्थः । कलिदोपेण मनुष्याणामल्पसामर्थ्यवत्त्वादायुपश्चतुर्थभागस्यातिजरा- व्याप्तत्वादाश्रमधर्मस्य चातिकष्टसाध्यत्वेनानिर्वाहाद्विपरीतफलसाधकत्वं भवेदिति सुतरां कलिकालत इत्युक्तम् । एवं ज्ञानमार्गे परित्यागस्य कर्तव्यत्वं निरूप्प तस्मैव कर्ममार्गे सोपपत्तिकमकर्तव्यत्वं च निरूप्य भक्तिमार्ग तस्य कर्तव्यप्रकारविचारमारभन्ते अत इति । यतः अकारभेदेन पूर्व मार्गद्वयेपि कर्तव्याकर्तव्यभेदेन परित्यागो यद्यपि निर्दिष्टस्तथापि विचारारम्भे पूर्व भक्तिमार्गस्योद्दिष्टत्वादतः कारणादादौ प्रथमतः भक्तिमार्गीयपरित्यागस्य प्राप्तत्वात्तस्य विचारणा विचारः क्रियत इत्यर्थः । विचारणा च कदा कर्तव्यः, कथं कर्तव्यः, किमर्थं कर्तव्य इति ॥ २॥ मतिमार्गे श्रवणादिसाधनसिद्ध्यर्थं कर्तव्यपक्षं निराकुर्वन्ति श्रवणादिप्रवृत्यर्थमिति । १ पुष्टोति पाटः। २ मर्यादापुष्टिमार्गीयसागस्यति पाट. ।

श्रीमद्गोकुलनायविरचितविवरणसमेतः । श्रवणादिप्रवृत्यर्थ कर्तव्यत्वेन नेप्यते । सहायसगसाध्यत्वात्साधनानां च रक्षणात् ॥३॥ अषणादीसारभ्य नेष्यत इत्यन्तेन । स परित्यागो नेष्यते, इच्छाविषयत्वेनापि नाङ्गीक्रियत इत्यर्थः । अनङ्गीकारे हेतुमाहुः सहायेति । 'एकाकी निःस्पृहः शान्तः पाणिपात्रो दिगम्बर' इत्यादिवाक्यस्त्यागिन एकाकित्वेनैव स्थितेरुचितत्वान्छूषणादीनां सहायसङ्ग- साध्यत्वात् सहायाः प्रेरकास्तेपां स्वस्वमतानुसारिश्रवणप्रेरकत्वात्तत्तन्मार्गीयश्रवणानां पुष्टिमक्तिमार्गविरोधित्वान्न मक्तिमार्गसाधकत्वम् । तद्यथा । मायावादिनां श्रुतीनामपि कल्पितत्वात्तत्प्रतिपाद्यब्रह्मधर्माणामपि व्यवहारोपयोगित्वेनापारमार्थिकत्वाद्रह्मणो निर्धर्मक- त्वाद्रक्तिमार्गविरोधित्वम् । नैयायिकमते तु 'श्रोतव्यः श्रुतिवाक्येभ्यो गन्तव्यचोपपत्तिमि' रिति जगत्कर्तृकत्वेनेश्वरसिद्धावपि ज्ञानेच्छाप्रयत्नातिरिक्तधर्माभावाद्भक्तिमार्गविरोधित्वम् । मीमांसकानां निरीश्वरवादित्वादेव श्रोतव्याभावान श्रवणार्थिप्रेरणम् , तत्तन्मार्गीयप्रेरक- प्रवृत्ती तत्तन्मार्गीयैरव सङ्गात्तन्मार्गीयश्रवणस्यैव सिद्धेस्तच्छ्रवणस गक्तिमार्गविरोधित्वान्न भक्तिमार्गसांघकत्वम् । बाधकान्तराण्यप्याहुः साधनानां च रक्षणादिति । साध- नानामाश्रमसाधकधर्माणां लानशौचप्रणवजपादीनां रक्षणं यथोक्तप्रकारानुष्ठानम् । तेनैव सर्वकालन्यात्या न भक्तिमार्गीयश्रवणादिप्रवृत्त्यवसर इत्यनङ्गीकारः॥३॥ अभिमानान्नियोगाच तद्धमैश्च विरोधतः । गृहादेर्वाधकत्वेन साधनार्थ तथा यदि ॥४॥ अग्रेपि तादृशैरेव सङ्गो भवति नान्यथा । स्वयं च विपयाक्रान्तपापण्डी स्यात्तु कालतः ॥५॥ किच, अभिमानात् सर्वादरणीयत्वेन स्वस्मिन्नाश्रमज्येष्ठत्वाभिमानात्तस्य च भ- क्तिसाधनविरोधित्वात्तथा। किञ्च, नियोगादुक्तपरित्यागस शाम्राज्ञाधीनत्वाद्वक्ष्यमाणस्य च तदनधीनत्वात्तथा । किञ्च, तद्धर्मश्च विरोधतः । तद्धमैवक्ष्यमाणभक्तिमार्गीयपरित्या- गधर्मः, चकारात्स्वरूपेण च विरोधात्तथा । ननु श्रवणादिप्रवृत्त्यर्थ त्यागकर्तुमक्तिमार्गीयश्रव- णाद्यज्ञानात्तत्तज्ज्ञानहेतुकत्यागस्य तदङ्गत्वेन गौणत्वात्तस्साकर्तव्यत्वमस्तु । भक्तिमार्गीयश्र- वणादिस्वरूपज्ञानवतः गृहस्थितौ व्यासङ्गेन तदनिर्वाहं ज्ञात्वा तत्परित्यागस्य मुख्यत्वम- स्त्वित्यपि पक्षस्य वक्ष्यमाणत्यागवैजात्यात् सहेतुकमकर्तव्यत्वमाहुः गृहादेरिति । उक्त- परित्यागानन्तरमपि साधनदशायां भक्तिमार्गीयपूर्णभगवद्भावामावान्निरन्तरनिर्वाहस्साश- क्यत्वेन चित्तचाञ्चल्यादेतन्मार्गविजातीयैरेव सङ्गो भवति, मान्यथा । अतादृशैः सङ्गोन भवतीत्यत उक्तमपीति । विजातीयानां च विषयाकान्तचित्तत्वात्तत्सद्गस्याल्पस्यापि पूर्व- भावनिर्वाहनाशकत्वेन खस्यापि विपयाक्रान्तिसम्भवात् कालक्रमेण पूर्वमावनिर्वाहामावात् संन्यासनिर्णयः । कृतस्यापि त्यागस्य मुख्यफलासाधकत्वाद्भक्तिमार्गविचारे पापण्डित्वमेवेत्सत उक्त स्वयं चेति । विषयाकान्तपापण्डीत्यत्र कर्मधारयः । तुशब्देनापापण्डित्वपक्षनिरासः ॥४॥५॥ यद्यपि दुःसंगो भावस्थिती बाधकस्तथापि भावस्थित्यर्थमेवोपक्रमाद् दुःसंगेपि कदाचिद्भावस्तिष्ठेदिति पक्षनिराकरणमाहुः विपयाकान्तदेहानामिति । विपयाक्रान्तदेहानां नावेशः सर्वदा हरेः। अतोऽत्र साधने भक्तो नैव त्यागः सुखावहः ॥ ६॥ विपयाचक्षुरादिसर्वेन्द्रियविषयाः रूपरसादयस्तैराकान्तः व्याप्तः देहो येषां तेषां सर्वदा हरेरावेशो न भवति । यत एते प्रकारा पापका अतः अत्र साधने भक्ती साधनरूपभक्तिमार्गे भक्तिसाधनार्थ त्यागः सुखावहो न, पुरुषार्थसाधको न भवतीत्यर्थः । एवकारेण सर्वात्मना पुरुषार्थासाधकत्वमुक्तम् ॥ ६॥ तर्हि भक्तिमार्गे त्यागकथनस प्रयोजनामावाद्वैयर्थ्यमायातीति चेत्तत्र प्रयोजनमाहुः विरहानुभवार्थमिति । विरहानुभवार्थ तु परित्यागः प्रशस्यते । स्वीयवन्धनिवृत्त्यर्थ वेपः सोऽत्र न चान्यथा ॥७॥ ननु विरहस्य संयोगपूर्वकत्वात् साम्प्रतं तस्याभावात् कथं विरह इति चेत्, सत्यम् , वक्ष्यमाणपरित्यागस्य पूर्णपुष्टिमार्गीयभगवद्भावानन्तरभावित्वेन तत्पूर्वदशायां भगवत्स्वरूप- सेवनस्यावश्यकत्वात्तन भावपूर्वकश्नीमुखदर्शनतत्तदङ्गस्पर्शजनितसगामिलापाया अतिप्रचुर- त्वेन तच्छान्यभावजन्यत्वात् सङ्गमपूर्वकत्वं विरहस्य भगवद्विरहस्यानुभवः निरन्तरं तद्भावापत्तिस्तदर्थं तत्सिद्ध्यर्थमित्यर्थः । तेन शुद्धपुष्टिमार्गीयपूर्णभाववानधिकारीति ज्ञापि- तम् । तादृशस्य सर्वात्मभाववद्भक्तसम्बन्धिरासादिलीलाविचारसावश्यकत्वेन तस्याश्च परम- फलत्वेन स्वस्यापि तन्मार्गीयत्वेन तत्फलोत्कटामिलापया साम्प्रतं तत्पूर्वभावात्तत्पूरक- स्याधुना दर्शनाधभावाद्विरहस्यावश्यकत्वम् । गृहस्थिती गृहस्थितानां तद्भाववैजात्यात् तत्सदस्यैतद्भावनाशकत्वेन तदनुभवाभावाद्गृहत्यागस्यावश्यकत्वम् , तस्य परित्यागज्ञापनार्थ वेषकल्पनमाहुः स्वीयेति । स्वीयाः भार्यापुत्रादयस्तत्कृतो बन्धः, सागे प्रतिबन्धः, तन्निवृत्त्यर्थ वेपकल्पनम् । स वेपः अत्र अस्मिन्मार्गे प्रतिबन्धनिवृत्त्यर्थमेव । न चान्यथा, अन्यप्रयोजनार्थं न भवतीत्यर्थः । यथा मर्यादामार्गीयचतुर्थाश्रमपरिग्रहहेतुत्वे- नावश्यकत्वाय वेपकल्पनं तयास्मिन्मार्गे न भवतीत्यर्थः ॥७॥ मार्गद्वये परित्यागाविशेषेपि मार्गभेदनिरूपणार्थ परित्यागनिमित्तं बेपकल्पननिमित्तं चोक्त्वा गुरून् साधनं च निरूपयन्ति कौण्डिन्यो गोपिका इति । कौण्डिन्यो गोपिकाः प्रोक्ता गुरवः साधनं च तत् । भावो भावनया सिदः साधनं नान्यदिष्यते ॥८॥ .

श्रीमद्गोकुलनाथविरचितविवरणसमेतः । कौण्डिन्य ऋपिः अनन्तव्रतप्रस्तावे निरूपितः । गोपिकाः प्रसिद्धा इति न प्र- कारविशेषोक्तिः । यद्यपि कौण्डिन्यस्य मर्यादामार्गीयत्वेनैतन्मार्गाज्ञानादेतन्मार्गोपदेतृत्वा- सम्मवाद्गुरुत्वं न सम्भवति, तथापि दत्तात्रेयवत्ववैराग्योपयोगितत्तद्धर्मशिक्षणेनोपदेष्मृत्वा- भावेपि पृथ्व्यादिषु यथा गुरुत्वाङ्गीकारस्तथा कौण्डिन्यस्याप्यनन्तगुणश्रवणेन तन्मिलना- तिजनितविप्रयोगभावजनितवैक्लव्येन च प्रश्नायोग्येष्वपि प्रश्नकरणात्सहसा तत्यागस्सैत- न्मार्गीयत्यागस्य चैतावद्धर्मसाम्यात्कौण्डिन्यपि गुरुत्वकथनम् । गोपिकानामप्युपदेतृत्वा- मावेपि तन्मार्गप्रकटनेन तद्भावानुरूपाचरणेन च 'दुहन्त्य' इत्यनेन विरहेण गृहत्यागेनापि गुरुत्वम् । गुरूनुक्त्वा साधनमाहुः साधनमिति । यदग्रे वक्ष्यमाणं तत्साधनमित्यर्थः। तदेवाहुः भाव इति । स्वस्मिन् गोपिकामावानुरूपभावनया सिद्धभावस्य साधनत्व- मिष्टम् , अन्यद् दानवतादिकमपि साधनलेन नेएमित्यर्थः ॥८॥ नन्वेतद्भावापत्त्यनन्तरमाव्यवस्थाया बुद्धिविपर्यासहेतुत्वेन दुःखहेतुत्वेन च प्राकृत- त्वमित्याशहां तद्भावखरूपनिरूपणेन परिहरन्ति विकलत्वमित्यादिना । विकलत्वं तथास्थास्थ्यं प्रकृति प्राकृतं न हि । ज्ञानं गुणाश्च तस्यैवं वर्तमानस्य बाधकाः॥९॥ धिकलत्वं वैलव्यं तथा तद्वदेव अवास्थ्यं कुत्रापि स्वास्थ्यामावः प्रकृतिर्विप्रयो- गमावस्य प्रकृतिः स्वाभाविको धर्मः प्राकृतं लौकिकं न भवतीत्यर्थः । हि युक्तश्चायमर्थः । यत्रैकादशे श्रीमदुद्धवष्टेन भगवता श्रद्धानिरूपणप्रसावे आध्यात्मिक श्रद्धादीनां सगुणवं निरूप्य 'सात्विक्याध्यात्मिकी श्रद्धा कर्मश्रद्धा तु राजसी । तामस्यधर्मे या श्रद्धा मत्सेवायां तु निर्गुणे ति खपूजाश्रद्धाया निर्गुणत्वं निरूपित, ज्ञाननिरूपणप्रस्तावेपि कैवल्यादिज्ञानानां सगुणत्वं निरूप्य 'कैवल्यं सात्विकं ज्ञानं रजो वैकल्पिकं च यत् । प्राकृतं तामसं ज्ञानं मनिष्ठं निर्गुणं स्मृत'मिति स्वविषयकज्ञानस्य निर्गुणत्वं निरूपितम् । यत्र मर्यादामार्गेपि ससम्ब- धित्वेन वस्तुनो निर्गुणत्वं, तत्र साक्षात्सर्वाधिकभक्तिमार्गीयभगवद्भावजधर्माणां निर्गुणत्वे किं वायमिति हिशब्देनोक्तम् । ननु भगवत्सम्बन्धित्वेनालौकिकत्वानिर्गुणत्वमस्तु, तथापि दुःखात्मकलात् कथं सर्वोत्कृष्टत्वमिति चेत्, सत्यं, दुःखत्वामावादेवोत्कृष्टत्वं वदामः । तद्यथा पुरुषोत्तमस्वरूपस्स 'रसो वै स'इति श्रुत्या रसात्मकत्वेन प्रतिपादित- त्वाद्रसस च संयोगविप्रयोगात्मकत्वेन द्विरूपत्वाच्या विरोधिकृतक्षतनिप्पीडनताडनको- पादीनां दुःखात्मकत्वं, तथा क्षतत्वादिधर्मसाजासेपि संयोगरसान्तःपातित्वेन परमानन्दरू- पलं, तथा विप्रयोगरसजनितवैलव्यादीनामपि विश्योगरसात्मकत्वेन कर्मादिजन्यवैक्ल- व्यक्प्रतीयमानत्लेपि रसरूपत्वान तेषां दुःखत्वम् । यथा आनन्दादप्यथूणि, शोकाद- प्यथूणि । न हि तवाश्रुत्वसाजात्यादुभयोरेकफलत्वं सेत्स्यति, तथात्रापि तत्तद्धर्मसाम्येपि १ लौकिको भाषो न भवतीत्यर्थः ।

६ संन्यासनिर्णयः । न तत्तद्रपत्वमिति सर्वमनवधम् । एतादृगवस्थापत्त्यनन्तरमपि व्यावहारिकज्ञानलौकिक- विवेकादिगुणसत्त्वेपि को विरोध इति चेत्तवाहुः ज्ञानमिति । ज्ञानं मर्यादौमार्गीय गुणास्तन्मार्गीया एव मनःस्वास्थ्यहेतुरूपाः । तस्य पूर्वोक्तभक्तिमार्गीयमाववतः एवं वर्तमानस्य पूर्वोक्तवैक्लव्यादिभावपूयैव स्थितस्य, याधकाः रसानुमवे फले वा पूर्वोक्त- भावनाशकत्वादातिवन्धकाः ॥९॥ ननु मार्गद्वयेपि त्यागस्याविशेषात्कथं ज्ञानमनःस्वास्थ्यादीनां ज्ञानमार्गे साधकत्वं भक्तिमार्गे वाधकत्वमिति शङ्कानिरासाय फलभेदेन समाधानमाहुः सत्यलोक इति । सत्यलोके स्थितिञ्जनात् संन्यासेन विशेपितात् । भावना साधनं यत्र फलं चापि तथा भवेत् ॥१०॥ सत्यलोके नहालोके 'वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थी' इति श्रुती ज्ञानयुक्तसंन्यासिन एव ब्रह्मलोकस्थित्यनन्तरमेव ब्रह्मणा सह मोक्षनिरूपणाद्ब्रह्मलोकगतौ ज्ञानस्यैव मुख्यत्वा- न्मनःस्वास्थ्यव्यतिरेकेण ज्ञानस्थैर्यामावाज्ज्ञानमनःस्वास्थ्यादीनामेव फलसाधकत्वम् । भक्तिमार्गे साक्षात्पुरुषोत्तमसम्पन्धस्यैव फलत्वात्तस्य 'रसो वै स' इति श्रुत्या रसात्मक- त्वात् रसस्य च भावात्मकत्वात्तत्सम्यन्धे पूर्वोक्तविप्रयोगरसात्मकभावस्यैव साधनत्वात् ज्ञानमनःस्वास्थ्यादीनां तद्भावरूपसाधननाशकत्वाद्वापकत्वमित्यत आहुः भावनेति । यन्त्र भक्तिमार्गे ॥ १० ॥ एवं मार्गद्वयेपि प्रकारभेदेन साधनफले निरूप्य ज्ञानमार्गे फलप्राप्तौ विलम्बहेतुं भक्तिमार्ग विलम्बाभावहेतुं च ज्ञानमार्गे प्रकारकथनेन भक्तिमार्ग दृष्टान्तकयनेन चाहुः तादृशा इति । तादृशाः सत्यलोकादौ तिष्ठन्त्येय न संशयः । बहिश्चेत्प्रकटः स्वात्मा वहिवत्प्रविशेद्यदि ॥ ११ ॥ तदैव सकलो यन्धो नाशमेति न चान्यथा । तादृशाः संन्यासयुक्तज्ञानिनस्ते सकामनिष्कामभेदेन सत्यलोकादौ ब्रह्मलोकादौति. छन्त्येचा सन्यासाश्रमग्रहणमात्रेणैव सत्सलोकस्थितिपक्षनिराकरणाथन संशय इत्युक्तम् । सत्यलोकादावित्यत्र तद्गुणसंविज्ञानो वहुव्रीहिः । तेन निष्कामानामेव सत्यलोकस्थितिः, स- कामानां लोकान्तरेपि स्थितिरिति ज्ञापितम् । एवकारेण सत्यलोकस्थितौ गुक्तिविलम्बे च हेतु- रुक्तः। तत्रोपपत्तिः । 'ब्रह्मणा सह मुच्यन्त' इति वाक्याब्रह्मणः द्विपरार्धावसायित्वात्तावत्पर्यन्तं मुक्तरसम्भवात्स्थितेरावश्यकत्वज्ञापनार्थमेवकारः । ज्ञानमार्गे विलम्वहेतुं निरूप्य भक्तिमार्गे दृष्टान्तेन विलम्बामावहेतुं निरूपयन्ति । तत्र दृष्टान्तमेवाहुः बाहिरिति । वहिवदिति कथना- दारुस्थितवह्निदृष्टान्तोभिप्रेतः। तन्न प्रकारः । यथा दारुणि विद्यमानस्य वह्वेदारसंयोगे सत्यपि १ सर्वमनदातमिति पाठः । १ लीफिकमिति पाटः। ३ सत्यज्ञानयुक्ता इति पाठः।

७ . श्रीमद्गोकुलनाथविरचितविवरणसमेतः । न दारुदहनयोग्यत्वं, यदा मथनेन तत एव पहिः प्रकटीभूय पुनस्वेन सह सम्बध्यते, तदा सम्बन्धमानेणैव दारुत्वनिवृत्या दारुणोमित्वसिद्धिस्तथा भक्तहृदये विद्यमानत्वेपि मथने- नामिनाकठावद्विगाढभावेन भावात्मकतया बहिःप्राकट्ये सति पुनरन्तःसम्बन्धः, तदा सम्बन्ध एव फलसम्बन्धहेतुः प्रतिवन्धं दूरीकरोतीति फलस्स रसात्मकत्वेन तदनुभवहेतु- रसात्मकता सम्पादयतीति एतत्प्रकारातिरिक्तसैतत्फलसाधकत्वाभावार्थमुक्तं न चान्यथे- ति । एवमस्मिन्मार्गे विलम्बामावोपि सिद्धः॥ ११ ॥ ननु पूर्वोक्तविगाढभावस्य साक्षात्सङ्गाभावहेतुत्वेन सझार्थ स्वरूपानुसन्धानस्याव- श्यकत्ववद्गुणानुसन्धानस्याप्यावश्यकत्वेन साक्षात्स्वरूपेण स्वास्थ्यहेतोरसम्भावितत्वाद्गुणै- रेव कथं स्वास्थ्यमिति चेत्तत्राहुः गुणास्त्विति । गुणास्तु सगराहित्याज्जीवनाथ भवन्ति हि ॥१२॥ गुणानां धर्मरूपत्वाद्विपयोगस्य संयोगाभावहेतुत्वेन तदतिरिक्तस्य स्वास्थ्यहेतोरमा- वात्कदाचिदतितापेनाश्रयामावाजीवनानुपपत्त्या गुणैरेव जीवनसम्पत्तिरित्यत उक्तं जीव- नार्थ भवन्तीति । यथा 'तव कथामृत'मित्यन। हि युक्तधायमर्थः। परमानन्दविरहे जीव- नानुपपत्तो परमानन्दगुणानामेव जीवनसम्पादकत्वमुचितमित्यर्थो हिशब्देन द्योत्सते । तेन गुणानां ययाकयश्चिजीवनमात्रसम्पादकत्वं, न तु खास्थ्यहेतुत्वमपि । तुशब्देन सङ्गाति- रिक्तधर्मः स्वास्थ्यपक्षो व्यावर्तितः । अथवा, ननु भगवद्विप्रयोगस्यातिप्रचुरतापात्मकत्वेना- समत्वात्क्षणमात्रमपि प्राणस्थित्यसम्भवस्वभाववत्त्वात् कुभचित्तत्कालमेव प्राणस्थित्यदर्शनम् यथा द्विजपल्याम् । क्वचित्तथात्वेपि प्राणस्थितिदर्शनमिति कथमेकस्यैव स्वभावविपर्यासेन कार्यद्वयकर्तृत्वमिति चेत्, सत्यम् , तस्स खभावविपयीसाभाववत्त्वेपि यन शीघ्रं मनसो भगवद्गुणग्रहणेन व्यासगामावस्तत्र शीघं पूर्वोक्तखकार्यकर्तृत्वम् । यत्र भगवदिच्छया शीघं तद्गुणव्यासगस्तत्र गुणानां ताइग्मावेपि जीवनकखमावत्वेन तत्स्वभावत्वादेव प्राण- स्थितिरित्यभिप्रेयोक्तं गुणास्त्विति । ननु ठोके गुण्यपेक्षया गुणानामल्पसामर्थ्यवत्त्वदर्शनात् कथं पूर्णानन्दरसात्मकपुरुषोत्तमविरहस क्षणमात्रमपि प्राणस्थितिविलम्यासहिष्णोस्त- स्मिन्समये तद्गुणानां कथं प्राणस्थितिहेतुत्वमिति चेत् , सत्यम् । यद्यप्यन्यत्र गुण्यपेक्षया गुणानामल्पसामर्थ्यमस्त्वेव, तथाप्यत्र साक्षात्पुरुषोत्तमस्साचिन्त्यानन्दपूर्णस्य पड्गुणैश्वर्यसम्प- नस्य गुणा अपि तादृशा एवेति मन्तव्यम्, गुणगुणिनोरेकरूपत्वात् , अन्यथा तद्विप्रयोग- दशायां गुणानां जीवनसम्पादकत्वं न भवेत् । अत एव ब्रजसीमन्तिनीभि 'स्तव कथामृत' मित्यस्मिन् शोके पड्मिविशेपणैः कयायाः भगवतुल्यत्वं निरूप्यैव स्वप्राणस्थितिहेतुत्वं निरूपितम् । यदि खरूपतुल्यत्वं गुणानां न भवेत्तर्हि खसमाजस्य जीवनमेव न भवेत् । तस्मा- पुरुषोत्तमगुणानां गुणितुन्यत्वमेव, न तु न्यूनत्वमपि। तथापि गुणगुणिनोरेतावान् विशेषः । २प्रवणेति पादः। १ सयोगेनि पाठ..

८ संन्यासनिर्णयः । यथा गुणिसम्बन्धेन विप्रयोगजतापनिवृत्तिपूर्वकं सर्वेन्द्रियाप्यायनपूर्वकं च परमानन्दानुमवेन खास्थ्य, तथा गुणैर्न सम्पद्यत इति तेषु गुणत्वकथनम् । एतदेव मनसि कृत्वा श्रीमदाचार्य- रुक्तं गुणास्तु सगराहित्यादिति । सद्गराहित्यं वियोगस्फूर्तिः । ननु कयं कुत्रचिच्छीनं मनसो जीवनहेतुगुणग्रहणव्यास) भगवदिच्छा कुत्रचिन्नेति को हेतुरिति चेत् , सत्यम् , यत्र पूर्णविप्रयोगानुभवहेतुः पुनः पुनर्मूर्छा जागरणत्तादात्म्पादिसर्वभावानुभावनेच्छा तत्र गुणेषु शीघं चित्तव्यासहं कारयित्वा पश्चादविलम्येन स्वप्राप्तिसिद्ध्यर्थ तझावस्वमावकार्यकरणम् । ये पूर्वमेवानुमूतसर्वविप्रयोगमावास्तेषां स्थिती प्रयोजनाभावात्तत्कालमेव स्थित्यभाव इति नानुपपत्तिः काचित् ॥ १२ ॥ ननु कर्तुमकर्तुमन्यथाकतुं समर्थस्य भगवदिच्छामात्रेणापि स्वास्थ्यसम्पादकत्वात्कयं न सम्पादयतीति चेत्, तबाहुः भगवानिति । भगवान् फलरूपत्वान्नात्र याधक इष्यते । स्वास्थ्यवाक्यं न कर्तव्यं दयालुने विमध्यते ॥१३॥ भगवत्पदेन पहुणैश्वर्यसम्पन्नः पुरुषोत्तम उक्तः । अस्मिन्मार्गे खस्यैव फलत्वा- स्वप्रासावेतद्धावस्यैव फलसाधकत्वाद्भावस्य च तापैकस्वभावत्वात्तदमावे फलप्राप्त्यमावाच स्वस्यैव तदभावसम्पादकत्वकयनेन खस्यैव फलप्राप्तौ प्रतिबन्धकत्वेन च स्वस्य फलत्वमेव न सिध्येदित्यत उक्तं फलरूपत्वान्नात्र बाधक इष्यत इति । ननु स्वस्य फलात्मकत्वा- रफलदित्सायाश्च सिद्धत्वाखरूपेण तापापगमं मा करोतु, तथापि यत्किश्चिदस्वास्थ्यं स्वप्ने वचनेन कथं न निवारयतीति चेत्, तबाहुः सास्थ्यवाक्यमिति । भगवता तादृशं प्रति यत्किञ्चित् स्वास्थ्यहेतुकमपि वाक्यं वचनं न कर्तव्यं न वक्तव्यमित्यर्थः । तत्र हेतुः । वचनेन यावांस्तापो निवर्तिष्यते तावानेव फलप्राप्तौ विलम्यो भविष्यतीति ज्ञात्वा वचनेनापि स्वास्थ्यं न करोति, यदि कुर्यात्तर्हि फलविलम्बे स्वयमेव हेतुः स्यादिति स्वस्यैव विरोधित्वं स्यादिति यत्किञ्चित्सास्थ्यहेतुभूतस्यापि वाक्यस्याकरणम् । ननु यकि- श्चिद्विलम्बहेतुत्वे को दोष इति चेत्तत्राहुः दयालुरिति । दयालुरत्यसाधारणदयासमुद्रः। यदि यत्किञ्चिद्विलम्बसहिष्णुत्वमपि चेद्भवेत्, तदा तावद्दयांशस्य न्यूनत्वात् दयालुत्वं नोपपद्यतेति न तादृग्वाक्यकरणम् ॥१३॥ एवं भक्तिमार्गीयसंन्यासस्वरूपं साधनफलप्रकारविचारेणोपपायोपसंहरन्ति दुर्ल- भोयमिति । दुर्लभोयं परित्यागः प्रेम्णा सिध्यति नान्यथा। अयमुक्तप्रकारका परित्यागः दुर्लभः, तपोदाननतादिसाधनैरप्यसाध्यः । ननु वस्तुमात्रस्य दानादिसाधनसाध्यत्वात्कथमस्य दानादिसाधनासाध्यत्वमिति चेत्, सत्यम् । यथा तत्तच्छास्त्रे तत्तत्फलसाधकत्वेन तानि तानि साधनानिगणितानि, स्वर्गकामस्य ज्योतिष्टो- ९ श्रीसद्गोपालनाथविरचितविवरणसमेतः । मवत् । नहि तथा भक्तिमार्गीयपरित्यागसिद्धौ साधनशास्त्रोक्तं कियित्साधनमस्तीत्यस्य दुर्लभ- त्वम् । ननु वस्तुमात्रस्य साधनसाध्यत्वाद्भक्तिमार्गीयपरित्यागस्यापि वस्तुत्वेन निरूपणात्तस्य च शास्त्रोक्तदानादिसाधनासाध्यत्वकथनात् केन साधनेनास्य सिद्धिरिति चेत्, तत्र साधन- माहुः प्रेम्णेति । प्रेम्णा भगवत्सरमासस्या सिध्यति । अथवा, प्रेम्णा भगवप्रेम्णा । ननु कथं जीवे भगवत्प्रेमेति चेत्, सत्यम् । एतन्मार्गप्रवर्तकाचार्यैस्तन्निष्कपटप्रपतिसन्तुष्टैः कृपया अस्सैतन्मार्गीयफलसिद्धिरस्त्वितीच्छया भगवन्निवेदनानन्तरं तस्मिन्नाचार्यकृपा- खेह ज्ञात्वा स्वयमपि सन्तुष्टस्तस्मिंस्तत्फलदित्सया प्रेमयुक्तो भवतीति तेन प्रेम्णास्यापि ताशत्वं सिध्यतीत्यत उक्तं प्रेम्णा सिध्यतीति । नान्यथा, अन्यथा एतदति- रिक्तसाधनैन सिध्यतीति सुष्ठुक्तं दुर्लभोयमित्यादि ॥ १३ ॥ एवं भक्तिमार्गीयत्यागविचारं उपसंहृत्य ज्ञानमार्गीयपरित्यागोपसंहारमारमन्ते ज्ञानमार्गे त्विति । ज्ञानमार्गे तु संन्यासो दिविधोपि विचारितः॥१४॥ ज्ञानार्थमुत्तराङ्गं च सिद्धिर्जन्मशतैः परम् । ज्ञानं च साधनापेक्षं यज्ञादिश्रवणान्मतम् ॥ १५॥ अतः कलौ स संन्यासः पश्चात्तापाय नान्यथा। पापण्डित्वं भवेच्चापि तस्माज्ज्ञाने न संन्यसेत् ॥१६॥ सुतरां कलिदोपाणां प्रयलत्वादिति स्थितम् । त्विति पूर्वसमुच्चयः । संन्यासः ज्ञानमार्गीयः विविधोपि, विविदिपाविद्ववेद- युक्तः । सोपि साधनफलभेदेन विचारितः । वैविध्यमेव प्रकटयन्ति ज्ञानार्थमिति । ज्ञाना) ज्ञानरूपफलसिद्ध्यर्थमेकः । चकारसमुचितं द्वितीयमाहुः उत्तराद्धं चेति । 'ज्ञानादेव हि कैवल्य'मिति वाक्यान्मुक्तेर्ज्ञानसिद्धघुत्तरफलत्वाद्विद्वत्संन्यासस्योत्तराङ्गत्वं मुक्त्यङ्गत्वमित्यर्थः । यद्यपि ज्ञानमार्गीयद्वितीयसन्न्यासस्य मुक्त्यगत्वं तथापि 'बहूनां जन्म- नामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ' इति भगवद्वाक्यात् प्रपत्तेश्च भक्तित्वाद्भक्तिव्यतिरेकेण केवलज्ञानस्य मुक्त्यसाधकत्वात् । 'जन्मान्तरसहस्रेषु तपोज्ञानसमापिमिः । नराणां क्षीणपापानां कृष्ण भक्तिः प्रजायत' इति वाक्याच ज्ञानस्स मक्तिप्रतिवन्धनिवर्तकत्वोत्या 'विना महत्पादरजोभिपेक' मिति वचनेन मक्तेश्च महदनुग्र- हकैलभ्यत्वोक्त्या च यावत्पर्यन्तं न मक्तिसिद्धिस्तावत्पर्यन्तं पूर्णज्ञानस्यापि न मुक्तिरिति जापनायोक्तं सिद्धिर्जन्मशतैः परमिति । यथा बहुशब्दस्य सङ्ख्याऽनियमवाचित्वं तथा शतशब्दस्यापीति ज्ञापनाय जन्मशतैरित्युक्तं । परं निर्धारितमित्यर्थः । एवं ज्ञानिनां मुक्तिप्रकारमुक्त्वा ज्ञानस्य साधनसाध्यत्वज्ञापनाय साधनानि निरूपयन्ति ज्ञानमिति । यज्ञ आदिर्यस्य श्रवणस्य, ज्ञानस्य चित्तशुद्धिहेतुकत्वायज्ञस्य च चित्तशोधकत्वोच्या २ संन्यासनिर्णयः । निष्कामकर्तृत्वमुक्तम् । यतस्तादृग्यजसैव चित्तशोधकत्वम् । तदनन्तरश्रवणस्य ज्ञानसा- धकत्वं मतं निश्चितमित्यर्थः । अतः कलाविति । यतः स ज्ञानमार्गायः संन्पास: एतावलयनसाध्यः अतः कली तावत्पयनसिद्धेरसम्मावितत्वात्तव्यतिरेकेण संन्यासस फलसाधकत्वाभावात् पश्चात्तापहेतुलमेवेति ज्ञापनायोक्तं पश्चात्तापायेति । नान्यथा उक्तफलाय नेत्यर्थः । ज्ञानमागीयसंन्यासस्सैतावत्प्रयससाध्यत्वमपि ज्ञात्वा प्रतिष्ठार्थमपि चेत्कुर्यात्तदा यथोक्ताश्रमधर्मानिर्वाहात् संन्यासव्यवहारम्य वेपमापर्यवसायित्वेन पाप- ण्डित्वमेव भवतीत्यत उक्तं पापण्डित्वं भवेदिति । चकारः संन्यासाश्रमधर्मानाचरण- पापसमुच्चयार्थः । यतः ज्ञानमार्गीयसंन्यासस्यैतायदोपयत्त्वं तस्मात् कारणात् कली ज्ञाने ज्ञानमार्गे न संन्यसेत् संन्यासग्रहणं न कुर्यात् । यद्यप्याश्रमधर्मानिर्वाहात् कलौ ज्ञान- मार्गीयसंन्यासनिषेधः कृतस्तथापि कश्चिदाश्रमोत्कर्ष श्रुत्या पलात्कारेणाप्यायमधर्मनिर्वाह करिष्यामीति सुधा कुर्यादिति तम्यापि निषेधमाहुः सुतरामिति । सुतरामतिशयेन कलिदोपाणां प्रयलत्वात् प्रापल्यात् पूर्वकृतव्यवसायनाशकत्वात् , इति हेतोस्तस्सा- कर्तव्यत्वमेव स्थितं निश्चितमित्यर्थः ॥ १४, १५, १६ ॥ एवं ज्ञानमार्गीयसंन्यासस्य क्लवद्वाधकप्रतिबन्धकत्वेन सोपपत्तिकमकर्तव्यत्वमुपपाद्य सागाविशेषाद्भक्तिमार्गत्यागेपि तेषां धाधकत्वाशङ्कानिरासाय स्वत एव माधकत्वं सम्मान्य निराकुर्वन्ति । तत्र सम्भावनामाह भक्तिमार्गेपीति । भक्तिमार्गेपि चेहोपस्तदा कि कार्यमुच्यते ॥ १७ ॥ अपिशब्दः पूर्वोक्तत्यागसमुच्चयार्थः । भक्तिमार्गेपि चयदि तद्वदेव दोपसम्भा- वना तदा तद्दोपनिवृत्त्यर्थ किं कार्यमिति पूर्वपक्षसम्भावनमुक्त्वा तनिरासं प्रतिजा- नते उच्यत इति । अथवा यदि मक्तिमार्गेपि दोपसम्भावना तदा तदोपनिवृत्यर्थ भक्ति- मागीयेण किं कार्य कि कर्तव्यं भवता उच्यत इत्यर्थः ॥ १७ ॥ प्रतिज्ञातं दोषागावमुपपादयन्ति अनेति । अत्रारम्भे न नाशः स्याद् दृष्टान्तस्याप्यभावतः । स्वास्थ्यहेतोः परित्यागाहाधः केनास्य सम्भवेत् ॥ १८॥ अवास्मिन्मार्गे आरम्भे त्यागोपक्रमे इत्यर्थः । भारम्भपदे उद्देश्यस्यानुक्तत्वेपि त्यागस्सैवोपक्रान्तत्वात्तस्यैचोद्देश्यत्वेन तदारम्भ एवेत्यर्थः । अत्रेतिपदात् ज्ञानमार्गीयत्या- गारम्भकर्तुरपकत्वात्पूर्वोक्तदुःसद्गसहायादिना नाशः सम्भवति, भक्तिमार्गे तु त्यागारम्भ- कर्तुरलौकिकागवद्भावपूर्णत्वेनातिपकत्वाद् दुःसङ्गसम्भावनाया-अप्यसम्भावितत्वात्तदन्यस्त नाशकत्वाभावान्न नाश इत्युक्तम् । ननु दुःसद्गाभावानाशस्थासम्भावितलेपि कालकर्म- स्वमानांशोस्त्विति चेत्, न । यथा मर्यादागार्गीयत्यागिनामानीधभरतादीनां कालादि- भिस्त्यागनाशो दृष्टस्तथा शुद्धपुष्टिमायित्यागकर्तुः कुत्रापि नाशो न दृष्ट इत्यत उक्त ११ श्रीमदोकुलनाथविरचितविवरणसमेतः । दृष्टान्तस्याप्पभायत इति । ननु पूर्वोक्तः कालादिभिर्नाशासम्भवेपि स्रक्चन्दनादीनां शीतलत्वेन तापहारकत्वात्तलेपादिना तापनिवृत्त्या स्वास्थ्येन तदितरानुसन्धानात्तद्भाव- शैथिल्यात्तापनिवर्तकमस्त्विति चेत्तत्राहुः स्वास्थ्यहेतोः परित्यागादिति । स्वास्थ्यहे. तोश्चन्दनादेहत्यागेन सहैव परित्यागात् तैर्न सम्बन्धसम्भावनेति न तैर्नाशसम्भवः । भथवा, सगादीनां धर्मपित्तप्रकोपादिजनिततापनिवृत्तिहेतुत्वातन्निव-तापस्यावास गवान्न तेषामस्मिन् स्वास्थ्यहेतुत्वमित्यनुसन्धानेनाप्युक्तं खास्थ्यहेतोरित्यादि । तस्यायमर्थः । एतत्तापस्य भगवद्भावात्मकत्वाददृष्टस्य च तदजनकत्वेन तन्नाशकत्वस्याभाव इत्युक्तं वाध: केनास्य सम्भवेदिति । अस तापस्य केनापि बाधो नाश इत्यर्थः ॥ १८ ॥ एवं दृष्टादृष्टोपायानां नाशकत्वाभावमुक्त्वा भगवतोपि नाशहेतुलमाशय निराकु- र्वन्ति हरिरिति । हरिरत्र न शक्नोति कंतु बाधां कुतोऽपरे । अन्यथा मातरो यालान्न स्तन्यैः पुपुपुः कचित् ॥ १९ ॥ यद्यपि हरिः सर्वदुःखहर्ता तथाप्यत्रास्मिन्मार्गे ईश्वरत्वाद्वाधां कतु न शमोति । अत्रोपपत्तिः । यस्य यथा खरूपं तस्य तथात्वेन ज्ञानमीश्वरस्यैव भवति, अतः अस्य भावस्य नाशे हेत्वभावमपि जानाति, खस्स भक्तभावाधीनत्वमपि जानातीति स्वस्साशक्यत्वं ज्ञात्वा न प्रवर्तत इत्यत उक्तं हरिरत्र न शक्नोति कतु याधामिति । एवं भगवद्धतुकवाधामावं निरूप्य कैमुतिकन्यायेन तदितरहेतुकवाधाभावमाहुः फुतोऽपर इति । अत्र व्यतिरेके दृष्टान्तमाहुः अन्यथेति । अन्यथा यद्येवं न, तदा मातरोपि स्वयालान् स्तन्यैः न पुपुपुः, पोपणं न कुर्युः । मातर इति पहुवचनं सर्वजात्युपलक्षकम् । कचित्पदेन सर्वदेशकालनियमो ज्ञापितः । ( अथवा हरिरत्रेति । अत्र पूर्व हरिपदमुक्त्वा अग्रे वाघां कर्तुं न शक्नोतीति यदुक्तं तस्सायमाशयः । यद्यपि हरिपदेन सर्वदुःखहरणसामर्थ्यमायाति तथापि दुःखहर्तृत्वमनुक्त्वा यद्वाधाभावकर्तृत्व- मुक्तं, तेनास विगाढभावस्य स्वरूपात्मकत्वात् खरूपस्य च द्विदलरसात्मकत्वादस्य मावस रसात्मकत्वमेव, न तु दुःखरूपत्वम् । यद्यस्य दुःखरूपत्वं स्यात् तदा हरित्वेन तनिवृत्ति कुर्यादेव, अन्यया नाशार्थस्य याथार्थं न स्यात् । अत एव हरित्वमुक्त्वा फलवाधाभावकथनमेवोक्तं, न तु दुःखहर्तृत्वमुक्तम् । स्वयमेव चेत्स्वास्थ्यं कुर्यात्तदा खस्यैव फलप्रतियन्धकत्वं भवेदित्येतदभिप्रायज्ञापनामप्युक्तं हरिरत्र न शक्नोति कतु याधां फुतोऽपरे इति ।) यथा मातृणां घालपोपकत्वाभावाशक्यत्वमेवमत्रेश्वरस बाधाकरणमिति भावः ॥ १९॥ यद्यप्येतन्मार्गीयतापस्य सर्वानाश्यत्वं, तथापि ज्ञानमार्गस्तापनाशमाने प्रसिद्ध इति तन्मार्गयोधकवचनस्तापनाशमाशय तेपामपि तापनाशकत्वाभावमाहुः ज्ञानिनामपीति । ज्ञानिनामपि वाक्येन न भक्तं मोहयिष्यति । आत्मप्रदः प्रियश्चापि किमर्थ मोहयिष्यति ॥२०॥ .

१२ संन्यास निर्णयः। तत्र हेतुः । ज्ञानमार्गस्य भक्तिमार्गापेक्षया दुर्वलत्वेन भक्तिमार्गस्य च प्रथलत्वेन तद्वाक्यानां नैतद्रावाभिभावकत्वम् । ज्ञानभक्तिमार्गयोर्दुर्यलत्वप्रमलत्वविचारः श्रीम- दाचार्यदशमस्कन्धविवरणे 'मों मृत्युच्यालमीत' इत्यत्र कालनियामकत्वमुक्त्वापि मत्युनेकानन्तरं समुद्विजे भवद्धतोरिति वचनेन ज्ञानमार्गीयमाहात्म्योपमर्दनपूर्वकं भक्ति- मार्गपावल्यमेव निरूपितमिति विस्तरमिया नात्र विचारः । तथापि ज्ञानमार्गस्यापि प्रामा- णिकत्यात् कदाचित् ज्ञानिवारयश्चित्तव्यासङ्गमात्रत्वमपि भवेदिति तस्याप्यभावार्थ भगवत्कृतां रक्षामाहुः न भतं मोहयिष्यतीति । (जन्मप्रकरणीयतृतीयाध्याये भगवत्प्रादुर्भावानन्तरं वसुदेवस्तुत्यनन्तरं देवकीमातृचरणैर्मर्यादामार्गीयमाहात्म्यज्ञान- पूर्वक 'रूपं यत्त' दिति स्तुतावन्ते ‘मों मृत्युच्यालमीत' इति पये कालनियामकत्वेन पूर्व स्तुत्वापि पथा'दुपसंहर विश्वात्मन्निति प्रार्थनानन्तरं व्यूहरहितशुद्धपुरुषोत्तमप्रा- कट्यानन्तरं शुद्धभक्तिमार्गीयभावप्राकट्ये सति पूर्वस्तुतिहेतुभूतमर्यादामार्गीयभावत्वेन पूर्वस्तुत्युक्तमर्यादामार्गीयमाहात्म्यज्ञानजनितकालनियन्तृत्वादिज्ञाननिराकरणसामर्थ्य शुद्ध- मैक्तिमार्गीयभावस्यैव दृष्टम् । न तु पूर्वभाववैतद्भावनिराकरणसामर्थ्यम् । यद्येवं न स्या- त्तद्वैपरीसं स्यात् । तस्माद्भक्तिमार्गस्यैव सर्वमार्गाधिकप्रावल्यं विचार्यैवाचार्यरक्तं न भक्तं मोहयिष्यतीति ।) रक्षाकरणे हेतुमाहुः आत्मप्रद इति । आत्मानं स्वरूपानन्दं प्रकण ददातीत्यात्ममदः । यधप्यधुना तत्प्रकारकदानस्याप्रतीतिस्तथापि वर्तमान- सामीप्ये वर्तमानवद्वेति शास्त्राच्छीनं दास्यतीति सिद्धवदेवोक्तमात्मप्रद इति 1 हेत्वन्त- रमप्याहुः प्रियश्चेति । यो यस्स प्रियः स तत्कार्यसिद्धौ यदि विलम्ब सहेत तदा प्रियत्व- मेव न स्यादिति शीघ्रं तत्कार्यसिद्ध्यर्थ चित्तव्यासंगमसहमानोऽविलम्वेन रक्षामेव कृतवान् , न तु विलम्बम् , अतः सम्यगेवोक्तं प्रियश्चापीति । एवं रक्षायामव्यभिचारिहेतुद्वय. मुक्तम् । ज्ञानिनामपि वाक्येन न भक्तं मोहयिष्यतीत्यत्र मोहामावार्थ रक्षाकरणं निरूप्य रक्षाकरणस्यावश्यकत्वाय तद्गतधर्मद्वयपूर्वकं रक्षामुक्त्वापि पुनर्यदुक्तं किमर्थ मोहयिष्यतीति तत्रायमाशयः । भक्तत्वेपि यत्रारमप्रदानेच्छा तत्रैव ज्ञानिवाक्यजमोह- निवृत्त्यर्थं रक्षा, यत्र नात्मप्रदानेच्छा तत्र ज्ञानिवाक्यजमोहनिवृत्तिरक्षापि नेत्यर्थः । तत्र निदर्शनम् । द्विजपलीनां ब्रजसीमन्तिनीवद्रसानुभवोपयोगिदेहयत्त्वमत्यार्तिभरण गत्वा सवां करिष्याम इति बुद्ध्या सर्वसामग्रीसम्पादनपूर्वक पत्यादिसर्ववन्धुनिराकरणपूर्वक चागमनम् । आगतासु ताखिव भगवद्वचनं तद्वदेवोत्तरदानेन सर्वप्रकारसाम्येप्यात्मप्रदाने- च्छाऽभावान्न प्रीतयेनुरागायेत्यादिज्ञानमार्गीयवाक्यैर्जनितमोहस्य निवृत्त्यर्थं न रक्षाक- रणम् । ब्रजसीमन्तिनीष्यात्मप्रदानेच्छाप्राचुर्यात्तथा रक्षा कृता । यथा 'रजन्येपे'त्यादि- मयांदाधर्मवाक्यैः 'श्रवणाद्दर्शनादित्यादिज्ञानमार्गीयवाक्यैश्च मोहसम्भावनापि नाभूत् । प्रत्युत्त स्वविचारितप्रयोजनविरोधित्वेन तन्निराकरणमभूत् । अग्रेपि चतुश्चत्वारिंशाध्याये १ एपि।

१३ श्रीमद्गोकुलनाथविरचितविवरणसमेतः । भगवपितः श्रीमदुद्धवः 'श्रूयतां प्रियसन्देश' इति भगवत्सन्देशव्याजेन तापवैलव्याय- भावार्थमुपदिष्टस्यापि ज्ञानस भगवता स्वात्मप्रदानेन रक्षितत्वेन सर्वात्मना खोपदिष्टमार्गमो- हामावदर्शनपूर्वकं 'दृष्ट्वैवमादिगोपीनां कृष्णावेशात्मविक्लव'मिति पूर्वोक्ततापवैक्लव्यादिदर्शनेन सर्वात्मना स्वप्रयासनिष्फलत्वं तापादिभावस्यातिप्रवलत्वं दृष्ट्वा तासु सर्वाधिकानिर्वचनी- योत्कर्पदर्शनेन स्वस्मिन् मगवत्कृपापात्रत्येप्यसपकर्षस्फूर्त्या खस साक्षात्तचरणारविन्देषु शिरःस्पर्शनेन नमनायोग्यत्वं ज्ञाला 'वन्दे नन्दव्रजस्त्रीणां पादरेणु'मित्यनेनैकरेणुमेव यत्र नमस्कृतवान् । तस्माद्यत्रैवात्मप्रदानं तत्रैव ज्ञानमार्गीयवाक्यमोहाभावः, नान्यसेताव- स्प्रमेयं मनसि कृत्वोक्तं किमर्थं मोहयिष्यतीति ॥ २० ॥ एवं संन्यासनिर्णयमुपपायोपसंहरन्ति तस्मादिति । तस्मादुक्तप्रकारेण परित्यागो विधीयताम् । अन्यथा भ्रश्यते स्वार्थादिति मे निश्चिता मतिः॥ २१ ॥ यस्माद्भक्तिमार्गीयः संन्यासप्रकार एतादृशोऽतो यदि तादृक्प्रकारपत्वं तदैतदुक्त- मकारेण परित्यागः विरहानुभवैकार्थः परित्यागो विधीयतां क्रियतामित्यर्थः । अन्यथा एतदुक्तप्रकाराकरणे स्वार्थात् स्वस्सात्मनोर्थात् पुरुषार्थसिद्धेः सकाशाद्भश्यते च्युतो भवतीत्यर्थः । इति एवंप्रकारिका मे मदीया मतिः । मदीयत्वकथनेन मतेरनुमवरूपत्वं निरूपितम् । निश्चिता निःसन्दिग्धेत्यर्थः ॥ २१ ॥ एवं पूर्वश्लोके मतेनिश्चितत्वकथनान्निथितत्वे हेतुमाहुः इतीति । इति कृष्णप्रसादेन वल्लभेन विनिश्चितम् । संन्यासवरणं भक्तावन्यथा पतितो भवेत् ॥ २२॥ इतीति समाप्तौ, कृष्णप्रसादेन कृष्णः सदानन्दः पुरुषोत्तमः, तस्स प्रसादः प्रसन्नता पूर्णकृपेत्यर्थः, तेन साधनेन कृत्वा बल्लभेन श्रीकृष्णवल्लमेनेत्यर्थः । विनिश्चितं विशेषेण इदमित्यतया नितम् । निश्चये कृष्णप्रसादस्य साधनत्वोक्त्या तदितरसाधना- साध्यत्यमुक्तम् । नितिमेवाहुः संन्यासवरणं भक्ताविति । भक्तो भक्तिमार्गे संन्यासवरणं संन्यासागीकारप्रकारः । अथवा भक्तौ भक्तौ सत्यां अथवा भक्ती भक्त्यर्थ भजनार्थ इदं संन्यासरूपं भगवतो वरणं वरणमेवेत्यर्थः । विपरीते बाधकमाहुः अन्यथेति । अन्यथा भक्तिव्यतिरेकेण करणे उक्तप्रकारामावात् पतितो भवेत्, तस्मान्मार्गात् च्युतो भवेदित्यर्थः ॥ २२॥ पितृपादाजकृपया विवृतोऽस्ति यथामति । संन्यासनिर्णयस्तेन प्रसीदन्तु मयीश्वराः ॥२॥ भक्तिमार्गे पुमर्था ये सिद्धास्ते सर्वथा मयि । तैरेव च कृतार्थोहमिति में सुदृढा मतिः ॥२॥ इति श्रीमत्प्रभुचरणकधनेन श्रीवल्लभेन विरचितं मंन्यासनिर्णयविवरणं सम्पूर्णम् ।।

श्रीकृष्णाय नमः।
श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः।
श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः ।
संन्यासनिर्णयः।
श्रीमद्रधुनाथविरचितविवरणसमेतः।
विठ्ठलेशपदाम्भोज भत्त्या नत्वा विचार्यते ।
आचार्यप्रोक्तसंन्यासनिर्णये तत्प्रसादतः ॥१॥
अथ कर्ममार्गकनिष्ठानां भगवत्प्राप्तिलक्षणमुख्यफलासम्बन्धाकेशनरन्तर्यदर्शनेन
जारठेपि तल्लेशजनितग्लान्यभावाच कदाचित्सङ्गवशाद्भगवदीया अप्येवंविधा मा भूवन्नित्ये-
तदर्थमादावेव सुखोपायं संन्यासं निरूपयन्ति पश्चात्तापनिवृत्यर्थमिति ।
पश्चात्तापनिवृत्यर्थ परित्यागो विचार्यते ।
स मार्गद्वितये प्रोक्तो भक्तौ ज्ञाने विशेषतः॥१॥
शरीरादिवैकल्ये जाते पूर्वदशां स्मृत्वा मया तदानीमेव भगवदर्थ किमिति न यत्त-
मितीदृशो यस्तापः स पश्चात्तापः । भगवत्तद्वक्तातिरिक्तविषयाणां परितः सर्वतो वाह्याभ्य-
न्तरराहिसेन यस्त्यागः स परित्याग इत्युच्यते । स पूर्वोक्तपरित्यागो मार्गद्वये कर्तव्यत्वे-
नोपदिष्ट इत्यर्थः ॥ १॥
तृतीयमार्गस्यापि सस्वात्तत्रापि कथं नेत्यत आह कर्ममार्ग इति ।
कर्ममार्गे न कर्तव्यः सुतरां कलिकालतः ।
अत आदी भक्तिमार्गे कर्तव्यत्वाद्विचारण॥२॥
अत्र कर्ममार्गपदेन सकामान्तःकरणस्य संन्यासनिषेधो पोध्यते । अन्यथा प्रवृत्ति-
मार्गे संन्यासविधायकवाक्याश्रवणादेवाकरणे सिद्ध तन्निपेधो नोपपद्येत । प्राप्तिपूर्वकत्वान्नि-
पेधस्य । युगान्तरे तु शरीरशोपणव्रतादिनाप्यन्तःकरणस्य विषयपरामुखतोपपद्यते । कलौ तु
तत्साधनप्रतादिकर्मणां साद्गुण्याभावाधयोक्तफलानहत्वेन संन्यासानुपयुक्तत्वात्सुतरां न
कार्य इत्यर्थः । तदेवं मार्गद्वय एव कर्तव्यत्वेन प्राप्तौ ज्ञानापेक्षया भक्तरम्यर्हितत्वात्प्रथम
मक्तिमार्गे कथं कर्तव्य इत्येतादृशी विचारणा क्रियत इत्यर्थः ॥२॥

श्रीमद्रघुनाथविरचितविवरणसमेतः । श्रवणादिमवृत्त्यर्थं कर्तव्यश्वेत्स नेप्यते । सहायसङ्गसाध्यत्वात्साधनानां च रक्षणात् ॥ ३ ॥ श्रवणादीति । वैययोमावपूर्वकं भक्तिसाधनश्रवणादिपु प्रवृत्त्यर्थ सन्यासवेत्क- तव्यस्तदा स एवंविधः इह भक्तिमार्गे न स्वीक्रियत इत्यर्थः । ननु श्रवणादिसाधनानां मण्यनुकूलत्वाद्भक्तिसाधनश्रवणादिसम्पत्त्यर्थं संन्यासः कुतो नेत्यत आह सहा- यसगसाध्यत्वादिति । भगवत्तत्त्व जिज्ञासोरेकाकिनः श्रवणादेः सहायस्स समः सम्पत्तिस्तत्साध्यत्वात् । नहि श्रावयितारं विना श्रवणं सम्भवति । नच श्रुतस्यापि अन्यपर्यालोचनगुरूपसत्त्यादिना विना स्थैर्यम्, अतस्तदंशस्य त्यक्तस्यापि पुनः स्वीकारे वान्ताशित्वमेव । इदमेकं बाधकम् । अपरमाह साधनानामिति । अल्पकालपर्यन्तं श्रवणादिसाधनमादरणीयमित्यपि नास्ति, यतो यावजीवमपककपायर्योगिभिः साधनानि रक्ष्यन्त एव । इदं द्वितीयम् ॥३॥ अभिमानादिति । अभिमानानियोगाच तद्धमैश्च विरोधतः । गृहादेर्याधफत्वेन साधनार्थ तथा यदि ॥ ४॥ विपिदिपादशायां सर्वथा कामक्रोधायनपगमान्थादिपक्षपातेन प्रतिवादिनिरा- करणाय यलोपि सम्भाव्यते, तादृशथाभिमानकृतः सन्यासे कृतेऽल्पोपि नोचित इत्यर्थः । इदं तृतीयम् । नियोगादिति । गुर्वाज्ञा नियोगः । तदकरणे प्रत्यवायः, तत्करणे व्यासङ्गः, तया सति नेप्टसिद्धिरिति भावः । इद चतुर्थम् । तद्धमैरिति । सन्यासे सर्वत्यागस्य मुख्य- त्वात् श्रवणादीनां ग्रन्थादिस्वीकारसाध्यत्वात् परस्पर धर्मविरोधाद्भक्तिमार्गेन्यशेषत्वेन संन्यासो न प्रशस्त इत्यर्थः ॥ ४ ॥ भगवद्धर्माचरणे अनर्थोकरगृहादीनां वापकत्वात् प्रतिबन्धापगमाय सन्यासो यदि कर्तव्यस्तदापि वाधकत्वमाह अग्रेपीति । अग्रेपि तादृशैरेव सङ्गो भवति नान्यथा। स्वयं च विषयाक्रान्तः पापण्डी स्यात्स कामतः॥५॥ गृहादिसनाभावाय सन्यासे कृतेपि तदनन्तर तादृशैः पूर्वोक्तसहायादिमिरेव सङ्गो भवति। अन्तःकरणस्य सर्वोशे भगवत्परत्वाभावात् । नान्यथा।(न) भगवदेकपर- तेत्यर्थः । ननु भगवदर्थत्वेनैवमपि क्रियमाणे फल भविष्यत्येवेति चेत्तनाह स्वयं चेति । भक्तिमार्गविरुद्धमिदमिति ज्ञात्वापि यः संन्यसेत् , स पिपयवासनावलितान्तःकरणत्वेन भगवदसाननुभवात्यक्तविषयेष्वेवामिनिविशेत् । स कामतः कामित्वाद्विपयाकान्तः १ वराग्यभावपूर्वमिति पाट । २ वर्तव्यत्यन प्राप्ती नानापेक्षया भक्तिमार्गे न सीक्रियत इति पाठ । ५ असाधवत्वमिति पाठ । ३ जनावरणA पाट संन्यासनिर्णयः । पापण्डी च भवेत् । धर्मध्वजित्वात् । दृढतरवैराग्याभाने ताशधर्माचरणं निष्फलमेर। तदुक्तं भगवता 'दुःसमिसेव यत्कर्म कायम्लेशमयात्यजेत् । स कृत्वा राजसं त्याग नैव त्यागफलं लभेत् । अन्यदपि, 'कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् । इन्द्रिया- र्थान् विमूढाल्मा मिथ्याचारः स उच्यत' इति ॥ ५॥ नन्वेतादृशानामपि कदाचिन्महता कालेन फलं भविष्यत्सेनेति चेतनाह विपया. फ्रान्तेति । विपयाफ्रान्तदेहानां नायशः सर्वदा हरेः । अतोऽम्र साधने भक्तो नैव त्यागः सुग्वावहः ॥ ६॥ विपयामिनिविष्टान्तःकरणानां हरेरावेशः चित्ते हरिस्वरूपस्थितिर्न भवतीति शेषः । तच सर्वदा, न कालनयत्येन । अत इति । यतः पूर्वोक्तानां दोपाणां सम्मवः अतः कारणादन अस्मिन्विचारे, भक्ती भक्तिमार्गे, साधन इति निमित्तसप्तमी । तेन साधन- सम्पत्यर्थ यः परित्यागः स सुस नावहति, न करोतीत्यर्थः । न केनल सुखाभावः, किन्तु दुःखमपि इति भावः ।। ६॥ तर्हि किं लिप्मुः प्रवर्तेतेत्यपेक्षायामाह विरहेति । चिरहानुभवार्थ तु परित्यागः प्रशस्यते । खीययन्धनिवृत्यर्थ चेपः सोऽत्र न चान्यथा ॥ ७॥ 'तन्मनस्कास्तदालापा' इत्यादिपु प्रसिद्धो यो बसुन्दरीणां श्रीकृष्णागसद्भनियो- गकालीनो भावविशेषः कश्चनानिर्वचनीयः अनुभवैकवेयो यः सोन विरहपदेनोच्यते, तस्यानुभवः साक्षात्कारः,तदर्थ तु संन्यासो भक्तिमार्गीयः प्रशस्त इत्यर्थः । उक्तमपि पुनः शिक्षार्थमाहुः स्त्रीयेति । स्वस्य बन्धो बन्धनहेतुहादिः, तन्मात्रैकनिवृत्त्यर्थं चेत्सन्यासः, तदा सोत्र भक्तिमार्गे धन्ध एव ज्ञेयः, तस्य स्वमागीययथोक्तफलासम्पादकत्वात् । नान्यथा । बन्धातिरिक्तफलासम्पादक इत्यर्थः । अन चेदिति पदमध्याहार्यम् ॥ ७॥ नन्विाचार्यवान् पुरुषो वेदे' त्यादिवाक्यैर्गुवनुग्रहलभ्यत्वं संन्यासादेः श्रूयते, तदुक्त- साधनाचरण च । तच सर्व प्रकृते कथ सेत्स्यत इत्यत आह कौण्डित्यगोपिका इति । कौण्डिन्यगोपिकाः प्रोक्ता गुरवः साधनं च तत् । भायो भावनया सिद्धः साधनं नान्यदिष्यते ॥ ८॥ कौण्डिन्यनामा यो महर्षि ।याश्च रासमण्डलान्तर्वतिन्यो गोपिकाः कौण्डिन्यश्च गोपिकाश्चेति द्वन्दू. । विरहानुभवार्थिसन्यासे गुरव उपदेष्टार एताः मोक्ताः सम्यगुक्ताः । नहि भक्तिमार्गे एतदतिरिक्तस्यान्यस्यैवविधत्व सम्भवति । यद्यपि तासां साक्षादुपदेष्ट्रत्वं न दृश्यते, तथापि तदाचरण श्रुत्वा दृष्ट्वा वा यः प्रवर्तते, त प्रति तादृशालौकिकमार्गप्र- ५ तर न सर्वदेति पाट ।

श्रीमद्रघुनायविरचितविवरणसमेतः । दर्शकत्वातासामेव गुरुत्वं युतम् । श्रूयते च भविष्योत्तरे अनन्तव्रतकथायां कौण्डिन्यस्य सर्वत्यागपूर्वकं भगवदेकपरतया स्थितस शीघ्रमेव तत्प्राप्तिः । तपथा ततो जगाम कौण्डिन्यो निर्वेदाद्वनगह्वरम् । अनन्तं मनसा ध्यायन् कदा द्रक्ष्यामि केशवम् । व्रतं निरशनं कृत्वा ब्रह्मचर्य जपन् हरिम् । विहलः प्रययौ सोप्यरण्यं जनविवर्जित' मित्यादि । जसुन्द- रीणां तु 'गत्यानुरागस्मितविनमेक्षितै' रित्यादिषु स्फुटमेवालौकिकतथाविधत्वम् । यद्यप्ये- तासां साम्यं कर्तुं मनसाप्यशक्यम्, तथापि त्यागसेतोधिकस्य सर्वथा अभाव एवान्यति ज्ञापनार्थम् । एतादृशसर्वात्मभावपूर्वकान्यविषयपरित्यागे झटिति भगवत्राप्तिरिति भावः । साधनं च प्रोक्तमित्यर्थः । किं तत्साधनमित्यपेक्षायामाह । तनोति स्वरूपानन्दानुभवं विस्तारयतीति तत् । तादृशो यो यस्स भक्तस्य यादृशी भावना तया सिद्धः सम्पन्नो भावविशेपः स एव साधनस्थानीयः । एतदतिरिक्तस्यान्यस्य यागादेः साधनवं नेष्यत इत्यर्थः । यद्वा तद्गुरुत्वेनोक्तं यत्तत्साधनम् ॥ ८॥ एवंविधसंन्यासवतः प्रवृत्तिवैलक्षण्यमन्यापेक्षया ज्ञानादिभिरप्रतीकार्यत्वं चाहुः विकलत्वमिति । विकलत्वं तथास्त्रास्थ्यं प्रकृतिः प्राकृतं न हि । ज्ञानं गुणाश्च तस्यैवं वर्तमानस्य वाधकाः ॥९॥ उद्देश्यवस्त्वप्राप्तिदशायां चिन्ताबाहुल्याद्विकलत्वं विक्षिप्तचित्तत्वम् । तथैवा- स्वास्थ्यं शरीरे तदलाभे वैवर्ण्यपाण्डुरत्वादि । एतद्वयमपि प्रकृतिः स्वभावान्तःपात्येव, नौपाधिकम् । तादृशावस्थस्य उपायान्तराप्रतीकार्यदुःखत्वमाह प्राकृतमिति । भगवल्ली- लोपयिकस्वरूपज्ञानापेक्षयान्यद्यच्छास्त्रजन्यमल्पसारं ज्ञानं तदा प्राकृतमुच्यते । गुणा- थाणिमाद्यैश्वर्यादियोगसिद्धयः । तदिदं सर्वमप्येवं वर्तमानस्यैतादृशावस्थस्य न हि या. घकाः, न समीहितान्तरायहेतवो भवन्तीत्यर्थः। एवंदशापन्नस्य शास्त्रीयं माहात्म्यादि- बोधकं ज्ञानं न तच्छोकनिवर्तकम् । यत्र सर्वसम्मतस्वास्थ्यहेतुज्ञानस्याप्यप्रयोजकत्वम्, तत्र किं वाच्यमैश्वर्यादीनामिति भावः । प्रकृतेरिति पाठे वैकल्यं विपर्यासः । अन्यत् समानम् ॥९॥ ज्ञानमार्गीयसंन्यासापेक्षया यया भक्तिमार्गीयस संन्यासस्योत्तमसाधनत्वं तथैव तत्फलस्यापीत्साहुः सत्यलोक इति । सत्यलोके स्थितिज्ञानात् संन्यासेन विशेपतः। भायना साधनं यत्र फलं चापि तथा भवेत् ॥१०॥ सत्यलोको ब्रह्मलोकः । तत्र ज्ञानात् संन्यासाश्रमरहितकेवलज्ञानादपि स्थिनिर्भ- वति । संन्यासेन सहिता तु विशेपतः पुनरावृत्तिरहितेत्यर्थः । तथा च नारायणे श्रूयते 'वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्याः संन्यासयोगायतयः शुद्धसत्वाः । ते ब्रह्मलोके तु परान्तकाले

१८
सन्यासनिर्णय ।
परामृतात् परिमुच्यन्ति सर्व' इति । मत्तिमार्गीयमाह भायी। यन यस्मिन् फले
भावनेव साधन भवति तन फलमपि तथा भावनानुरूपमेव भवेत् । यथा प्रय
लोकप्राप्तिसाधनाना फ्रगुत्वादत्पपलसम्पादकत्वम्, न पूर्णस, एव गावनानामनन्तसात्
फरम्साप्पानन्समिति भार । अत एवाचार्यरुक्तम् 'प्राकृता सकला देवा गणितानन्दक
बृहत् । पूर्णानन्दो हरिस्तस्मात्कृष्ण एव गतिममेति । भगवचिन्तनपरस्स प्रालोको
नानुरूप फलमिति तु श्रीविष्णुपुराणे श्रूयते । तघया, 'यस्मिन् न्यस्तमतिर्न याति नरक
वर्गोपि यचिन्तने तिमो यन निशितात्ममनसो ग्रामोपि लोकोऽल्पक । मुक्ति चेतसि
य सितोऽमलधिया पुसा ददायव्यय कि चित्र यदध प्रयाति निलय तनान्युते
कीर्तित' इति ।। १०॥
तादृशः इति ।
तादृशः सत्यलोकादौ तिष्ठन्त्येव न संशयः।
यहिश्च प्रकटः स्वात्मा पहिवत् प्रविशेद्यदि ॥११॥
तदेय सकलो यन्धो नाशमेति न चान्यथा ।
कि प्रत्ययान्तस्य बहुवचनम् तादृश इति ज्ञेयम् । ये केवलज्ञानमार्गीयास्ते
सत्यलोकादावेव तिष्ठन्ति, नतु पुरुषोत्तमे, भक्तिमार्गानन्त पातित्वात् । आदिपदेन
सकर्पणादिस्थान ज्ञेयम् । यद्यपि 'ब्रह्मणा सह मुच्यन्त' इति वाक्याद्रसलोकादप्यग्ने
गतिस्तरस्थाना थ्यते, तथापि मननानन्दाननुभवादेतदपेक्षया तुच्छत्वमेवेति भाव ।
तर्हि ब्रह्मलोकस्थानामपि कुत्तो न भवनानन्दानुभन ? भानीयस्वरूपम्यात प्रवेशाभावा
दित्याह पहिश्च प्रकट इति । आकाशवदन्तयहिश्च प्रकट सिद्धोपि स्वात्मा भगवानन्त
स्थितोपि यहि प्रकटीभूय स्खलीलाभिनिमिष्टचित्तेषु यदैव प्रविशेतवान्तर्हितो भवेत्,
तदैव सकरो पन्धो गृहादिर्नाशमेति, तिरस्कृत भवति, न त्वन्येनापि प्रकारे
णेत्यर्थ । अत एवोक्तम् 'प्रशमाय प्रसादाय तनैवान्तरधीयते'ति । यथा शुष्ककाष्ठस्थितो
वदि शीतशातनासमर्थ , स एव मन्थनादिना पहिभूतो ज्वालादिरूपेण तव काष्ठ
प्रविष्ट काष्ठ स्वात्मसारकृत्वा शीत निवर्तयति, एव घहि स्थितमानन्दघनस्वरूपमपि
भक्तभावनाभावित यापन पुन प्रविशति, तावन तत्स्वरूपप्राप्तिरिति भाव । ज्ञानमार्गी
याणा तद्गन्धलेशाभावान तत्प्राप्तिशङ्कापि ॥ ११॥
ननु विरहावस्थाया किमवलम्बन जीवनमित्यत आह गुणास्त्विति ।
गुणास्तु सगराहित्यानीवनाय भवन्ति हि ॥१२॥
भगवत्सङ्गस राहित्यात् । अन ल्यन्लोप पञ्चमी । तेन सगराहित्य प्राप्य स्थिते
सति गुणाम्तस्येवानुक्रियमाणा लाम्तदीयगुणानुवादो वा । तदुत्तम् 'तव कथामृत
तसजीवन मिति । त एव जीवनाय भवति । हिशब्द प्रसिद्धौ ॥ १२ ॥

, श्रीमद्रधुनाथविरचिवविवरणसमेतः । भगवानिति । भगवान् फलरूपत्वान्नान वाधक इष्यते । स्वास्थ्यवाक्यं न कर्तव्यं दयालुने विरुध्यते ॥ १३ ॥ अवास्मिन् जीवने अन्तर्हितो भगवानेव वाधकश्वेत्सोपि फलरूपत्वान्नैवंविधो भवतीत्यर्थः । ननु गुणानां जीवनहेतुत्वोक्तावपि यावन दृग्गोचरत्वं वरूपस भवेत् , ताव- तापापायोपि नेति तदर्थ स्वास्थ्यजनक प्रकारान्तरेण योधकवाक्यं कर्तव्यं चेतत्राह स्वा- स्थ्यवाक्यमिति । न कर्तव्यं न स्वयमन्यस्माच्छ्रोतव्यम् । न चान्यस्मै श्राव्यमित्यर्थः । तयाच स्वास्थ्यं मगवानेव करिष्यतीत्याह दयालरिति। यतो निरुपधिपरदुःखप्रहाणेच्छुः, अतो भक्तानामेताहगवस्थां ज्ञात्वा विलम्यं न करिष्यति, अतो न विरुध्यते, न प्रतिकूल- माचरिष्यति । प्रत्युत परोक्षभजनानन्ददानेपि भक्तकृत्यं प्रति स्वस्स ऋणित्वमेवाङ्गीकरोति । तच भगवतैवोक्तम् 'न पारयेहं निरवद्यसंयुजा'मित्यादि । एवविधानां खास्थ्यवाक्यसह- सैरपि नेष्टसिद्धिरिति परमार्थः ॥ १३ ॥ दुर्लभोयमिति । दुर्लभोयं परित्यागः प्रेम्णा सिध्यति नान्यथा । अयं भक्तिमार्गीयो यः परित्यागः स प्रेम्णा निरुपधिस्तेहादेव सिध्यति, अतो दुर्लभः, अन्यैः साधारणैः कर्तुमशक्य इत्यर्थः ॥ १३३ ॥ भक्तिमार्गीय निरूप्य ज्ञानमागीयमाह ज्ञानमार्ग इति । ज्ञानमार्गे तु संन्यासो दिविधोपि विचारितः ॥ १४ ॥ ज्ञानार्थमुत्तराझंच सिद्धिर्जन्मशतैः परम् । ज्ञानं च साधनापेक्षं यज्ञादिश्रवणान्मतम् ॥ १५ ॥ अतः कलौ स संन्यासः पश्चात्तापाय नान्यथा। पापण्डित्वं भवेच्चापि तस्माज्ज्ञाने न संन्यसेत् ॥१६॥ सुतरां कलिदोपाणां प्रबलत्वादिति स्थितिः। विचारोत्रोपपत्तिस्तस्मादित्यर्थः । स द्विप्रकारकोऽपि ज्ञेयः । अपिशब्दोऽत्र गर्दायाम् । वैविध्यमाह ज्ञानार्थमिति । ज्ञानोत्पत्त्यर्थमेकः । उत्तरस्य मोक्षस्याङ्गं तदर्थमिति यावत् । यद्यपि ज्ञानार्थस्यापि मोक्षाङ्गत्वमेष, तथापि प्रयोजनपशाद्वैविध्यम् । अन्यथा कर्मणोपि दैविध्यं न स्यात् । परन्तुमाभ्यामपि जन्मशतैर्षहुजन्मभिरभ्यासेन सिद्धिर्मोक्षो भवति । न भक्तिमार्गीयवज्झटिति । अत एव भगवताप्युक्तम् 'यहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ' इति । व्यवहारेपि विद्वत्संन्यासो विविदिषा- संन्यास इति श्रूयते वैविध्यम् । भक्तिं विहाय केवलज्ञानार्यमेव यः संन्यासः स दोष- अस्तत्वान्न कर्तव्य इत्याहुः ज्ञानं चेति । चकारान्मोक्षोपि साधनसापेक्ष एव । तत्र हेतुः ।

॥ संन्यासनिर्णयः । यज्ञादिद्धयणात् । पनादिकं साधनत्लेन थ्यत इत्यर्थः । इदं तु गीतापाम् 'द्रव्य- यजास्तपोयना' इत्यादिपु स्फुटम् । यनादीनां सालानामेव फलमम्पादनक्षमत्वात्, तथ फली सर्वथैव न सम्मपतीत्सतम्तकरणं पधारफलदायां तापाय, न सुखाय । पूर्वोक्त- धर्मध्वजित्वेन पापण्डित्वमेव म्पात् । अपिरान्दादपि फसामावः । यत एवं श्रीमद्भाग- वते 'श्रेगःसुति मक्तिमुदम्ये' त्यादिनोक्तम् । यत एवंकरणे पणातापः फटासम्पन्धध । तस्मात् ज्ञाने न, ज्ञानमार्गे न संन्यमेत्, कली साधनपलम्याल्पलात्कालनदोपाप्पा प्रावल्यासुतरामेव न कार्य इनि वस्तुस्थितिरित्यर्थः ॥ १४,१५,१६३ ।। एवं भक्तिमार्गेपि दोपमाशा समाधते भक्तिमांगपीति। भरिमार्गपि पेडोपस्तदा कि कार्यमुच्यते ॥ १७ ॥ अप्रारम्भे न नाशः स्याद् दृष्टान्तस्याप्यभावतः । सारथ्यहेतोः परित्यागाद्वाधः केनामा सम्भवेत् ॥ १८॥ हरिरन न शमोति फतु यायां कुतोऽपरे । अन्यथा मातरो पालान स्तन्पैः पुपुपुः धचित् ।। १९ ।। अनारम्भ इति । अस्मिन्मक्तिमार्गीयसंन्याससोपक्रममापि कृते न नाशः, न कृतोपक्रमवैयर्य, नापि निको भयेत्, नापि प्रत्यवायः । तदुक्तं मगवता 'नहामिक्रम- नाशोस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । सत्पमप्यस्य धर्मस्य प्रायते महतो मयादिति, श्रीमागवतेपि 'तथा न ते माधव तायकाः क्वचि'दित्यादिना । क्रिम, पूर्वमेवं चिकीर्पोः कस्यचिदन्यथागाव इत्यर्थे सर्वसम्मतरष्टान्तस्याप्यमावात् , अतो ज्ञानमायिवदप्रसस्स न पातादिशक्रेत्यर्थः । भक्तिरहितज्ञानमार्गीयस्य तु पातः श्रूयते श्रीभागवते 'येऽन्येऽररिन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्त्व- प्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः । आरुह्य कृष्ण परं पदं ततः पतन्यधोनादृतयुष्मद य इति । किय, असिद्धस्स स्वास्थ्यहेतोस्तुच्छविषयादेः परितः सर्वतस्त्यागादेव न पापः सम्मपति । अन्तर्वहिः सिद्धविपयस्य तु खेएफलत्वादेव न तत्सम्भव इत्यर्थः । यदि तदेकाश्रिताना- मपि तस्मादेव याधः स्यात्तदा मातृमात्रैकजीवनान् पालान्मातरोपि न फचित्पुपुपुर्न स्तन्यैः पुष्णीयुः, पुष्टाः न कुर्युः, प्रत्युत्तानिष्टं च कुर्युः, न त्वेवं कुत्रचिदस्तीसतो न पाध- शझालेशोपीति भावः ॥१७॥ १८॥ १९ ॥ अल्पज्ञं प्रत्याहुः ज्ञानिनामिति । ज्ञानिनामपि धाक्येन न भक्तं मोहयिष्यति । आत्मप्रदः प्रियश्चापि किमर्थं मोहयिष्यति ॥ २० ॥ ज्ञानमार्गप्रशंसावाक्यैरपि तद्वारा स्वभजने प्रवृत्तं न मोहं प्रापयिष्यति । इदमुत्कृष्ट- मिदं वेसेवंविधम् । ननु कर्तुमकर्तुमन्यधाकर्तुं समर्थस्स स्वतन्त्रस्य कदाचिदेवमपि करणं , .

श्रीमद्रघुनाथविरचिसविवरणसमेतः । २१ सादिति चेत्तत्राह आत्मप्रद इति । स्वखरू मक्तेभ्यो दत्तवान् , तदधीनसेन स्थापित- वान् , यश्च स्वात्मत्वेन प्रियश्च । अत एवोक्तम् 'प्रेष्ठो भवांस्तनुभृतां किल वन्धुरात्मेति । अपिशब्दादेवमजानतामभक्तानामप्रियश्च । चकारात् खस्स भक्तस्य कृत्यनुवुभूपुत्वमपि । एतादृशस्यापि मोहकत्वे न किमित्कारणमस्तीत्यर्थः ॥ २० ॥ उपसंहरन्ति तस्मादिति । तस्मादुक्तमकारेण परित्यागो विधीयताम् । अन्यथा भ्रश्यते स्वार्थादिति मे indता मतिः ॥ २१ ॥ उक्तप्रकारेण भक्तिमार्गे स्थित्वा विरहानुभवार्थमेव क्रियताम्, अन्यथा इमं प्रकारान्तरं त्यक्त्वा प्रकारान्तरेण तदाचरणे स्वार्थात् स्वस्मिन्नेवार्थ्यते अन्विष्यत इति खार्थो भगवान् तस्मादृश्यते दूरे पततीत्यर्थः । इति एवंप्रकारिका मे निश्चिता बुद्धिरित्यर्थः । यद्वा, स्वार्थात् समीहितफलादित्यर्थः ॥ २१॥ इति कृष्णप्रसादेन वल्लभेन विनिश्चितम् । संन्यासवरणं भक्तावन्यथा पतितो भवेत् ॥ २२ ॥ इतीति । कृष्णः प्रसाद्यते येन, कृष्णस्य प्रसादोन्येपां यस्मादिति वा । तत्प्रसाद- रूप एवेति वा । ईदृशेन वल्लभेन भक्तौ भक्तिमार्गे संन्यासस्य वरणं चरतीति स्वीकर- णम् । इति उक्तप्रकारेण निशेषतो निश्चितं निर्धारितन् । भक्तिमार्गे प्रवृत्तस्येदं विहाया- न्यथा अन्येन ज्ञानमार्गाद्युक्तप्रकारेण खीकरणे पातित्यमेवेत्यर्थः ॥ २२ ॥ आचार्यचरणाम्भोजरजोरजितवागहम् ॥ कृतवान् भक्तिसंन्यासविचारे सुविचारणाम् ॥ १॥ कर्मणा मनसा वाचा प्राणेर्दारैर्धनैरपि ॥ विठलेश त्वदीयोस्मि नान्यथा ज्ञातुमर्हसि ॥२॥ इतिश्रीवल्लभनन्दनचरणैकशरणश्रीरघुनाथकृती संन्यासनिर्णयविवरणं समाप्तम् ।।

श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः । श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः। संन्यासनिर्णयः। श्रीगोकुलोत्सवविरचितविवरणसमेतः । यत्पदाञ्जरसास्वादविस्मृतान्यसुखा मुहु । रमन्ते तद्गुणालापेस्त वन्दे गोकुलेश्वरम् ॥ १॥ अथ सकलश्रुतिस्मृतिपुराणन्यायादिप्रमाणसम्मत्या भगनदानन्दानुभव एव सर्वेपा परमफलम् । तत्रापि भजनानन्दानुभव श्रीगोपीजनवल्लभस्य । तथाहि । 'रसो वै स' इत्या दिभ्यो भगवान् रसरूप । रसश्च भृगार । स च सयोगविप्रयोगभेदेन द्विविध । तेन तदुभयभावात्मकभगवदानन्दानुभव एव परमफलम् । स च लीलामृष्टी प्रवेशे सति सम्भवति । तत पूर्वदशाया तु सयोगाभावात् सर्वपरित्यागपूर्वक विप्रयोगभावानुभव एव परमफलम् । सर्वपरित्याग विना लौकिकाशस्य सत्वादव्यग्रतया विप्रयोगानुभवासम्भवात् । स च परि त्याग कस्मिन् मार्गे कर्तव्य , कदा वा कर्तव्य , कथ वा कर्तव्य , किमर्थ वा कर्तव्य , करणानन्तर च तस्स कीदृशी दशेपेतत्सर्वनिर्धाराय विचारप्रयोजनमनुवदन्त एवाचार्या परित्यागविचार प्रतिजानते पश्चात्तापनिवृत्यर्थमिति । पश्चात्तापनिवृत्त्यर्थ परित्यागो विचार्यते । स मार्गड़ितये प्रोक्तो भक्तौ ज्ञाने विशेषतः॥१॥ भक्तिमार्गे ज्ञानमार्गे च परित्यागः कर्तव्य , तत्रापि सिद्धदशायामेव, न तु साधन- दशायाम् । साधनदशायामत्यन्तवैराग्यामानेन परित्यागानि हात् पापण्डिल्वप्रसङ्गेन कृतोषि परित्याग पश्चात्तापाय भवति । एतावत्तारतम्यज्ञानाभावे भगरदीया अपि पूर्वमेव परित्यक्त साथी सन्त पश्चात्तप्ता भवेयु , तथा तान् दृष्ट्वा स्वयमपि पश्चात्तप्ता भवेयु , तथा चान्यपा स्वस्य च पश्चात्तापस्यानाविर्भावार्थ परित्यागो विचार्यत इत्यर्थ । यद्वा । सकलदेवजीवाना भगवत्प्राप्त्यर्थ भगवदाज्ञया ह्याचार्याणा भूलोकतार । सा भगवत्राप्तिधाचार्यभक्तिमार्ग । प्राकट्येन नियते । तर यया सर्मसिद्धान्तमुक्तवन्तस्तथा अन्यग्रतया निरन्तर निप्रयोगमावा नुभवार्थ परित्यागोपि पूर्वमेर कथनीय । तथा चैतावत्काल वृथा विलम्ब कृत इति य पश्चात्ताप तस्स निवृत्यर्थ परित्यागो विचार्यत इत्यर्थ । अथवा । परित्यागेन पूर्वमहर्निश २३ श्रीगोकुलोत्सवपिरचिवविवरणसमेतः । विप्रयोगभावानुभवः, तदनन्तरमलौकिकदेहेन संयोगभावानुभवः । तथा च पथात् परित्यागा- नन्तरं तापच निवृत्तिश्च तापनिवृत्ती, तयोनिमित्तं परित्यागो निचार्यत इत्यर्थः । तेनोमय- प्रकारकभगवद्भावानुभवे आचार्योद्यम एव हेतुरिति सूचितम् । यय 'निरहानुगवैकार्थसर्व- त्यागोपदेशक'इति सर्वोत्तमे उक्तम् । तदव्यवधानविक्षया सवासन इति परिशब्दार्थः । ननु परित्यागः कस्मिन्मार्गे कर्तव्य इति चेत् ? तबाहुः स मार्गद्वितये प्रोक्त इति । विशेष आधिक्यम् , तेन सिद्धदश विशेषः । विशेषतः इति ल्यब्लोपे पञ्चमी । तथा च भक्तौ ज्ञाने च विशेष सिद्धदशां प्राप्य मार्गद्वितये भक्तिमार्गे ज्ञानमार्गे च स परि- सागः प्रकर्पण उक्तः, कर्तव्यत्वेन कथित इत्यर्थः ॥१॥ कर्ममार्ग न कर्तव्यः सुतरां कलिकालतः । अत आदौ भक्तिमार्ग कर्तव्यत्वादिचारणा ॥२॥ अथ कर्ममार्ग साधनदशायां ज्ञानमार्गे उपासनामार्गे साधनदशायां भक्तिमार्ग च परित्यागः पश्चात्तापायेति तन्निवृत्यर्थ परित्यागस्स विचारः क्रियते । विशेषतः विशेपं प्राप्य । स च सिद्धदशा उभयोः । यद्वा, बहुजन्मसु परित्यागः कर्तव्य इति आवृत्ति- बाहुल्यमेव विशेष इति ज्ञानमार्ग एव विशेषत इत्यन्वेति । निष्कामतया कर्मकरणं चित्त- शुद्ध्यर्थम् , कर्ममार्गे पत्नी विना च यज्ञादिकरणमसम्भवीति न परित्यागः सम्भवति । पत्नी- साहित्येपि निष्कामतया कर्माचरण सन्यास एवेति चेत् सोपि कलौ देशादिशुद्ध्यभावान्न सम्भपतीत्याहुः सुतरां कलिकालत इति। यद्वा । आयुषश्चतुर्थभागे संन्यास इति यन्मतं तस्मिन्नपि मते भक्तिं ज्ञानं च विना केवल कर्ममार्गे विरक्तिं विना न कर्तव्यः परित्यागः किन्तु विरक्तावेवेति भक्तर्ज्ञानस्य वा सिद्धदशां विना न सम्भवतीति कर्ममार्गे न परि- त्यागः, सुतरां कलिकाले ॥२॥ श्रवणादिप्रसिद्ध्यर्थं कर्तव्यश्चेत्स नेप्यते । सहायसङ्गसाध्यत्वात्साधनानां च रक्षणात् ॥ ३॥ अभिमानान्नियोगाच तद्धर्मश्च विरोधतः । गृहादेर्वाधकत्वेन साधनार्थ तथा यदि ॥ ४॥ अग्रेपि तादृशैरेव सगो भवति नान्यथा। स्वयं च विपयाक्रान्तः पापण्डी स्यात्तु कालतः॥५॥ विपयाक्रान्तदेहानां नावेशः सर्वदा हरेः। अतोऽत्र साधने भक्तो नैय त्यागः सुखावहः ॥ ६ ॥ विरहानुभवाय तु परित्यागः प्रशस्यते । स्वीययन्धनिवृत्त्यर्थं वैषः सोऽत्र न धान्यथा ॥७॥ श्रवणादीनां निरन्तरमन्यातया सिद्ध्यर्थं यदि स नेष्यते भावोदोधकत्वाद्भगव- श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः । श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः । संन्यासनिर्णयः। श्रीगोकुलोत्सवविरचितविवरणसमेतः । का यत्पदाञ्जरसास्वादविस्मृतान्यसुखा मुहु । रमन्ते तद्गुणालापेस्त वन्दे गोकुलेश्वरम् ॥ १ ॥ अथ सकलश्रुतिस्मृतिपुराणन्यायादिप्रमाणसम्मत्या भगादानन्दानुभव एव सर्वेषा परमफलम् । तत्रापि भजनानन्दानुभव श्रीगोपीजनवल्लभस्य । तथाहि । 'रसो चै स' इत्या दिभ्यो भगवान् रसरूप । रसश्च शृगार । स च सयोगविप्रयोगभेदेन द्विविध । तेन तदुभयभावात्मकभगवदानन्दानुभव एव परमफलम् । स च लीलारप्टो प्रवेशे सति सम्भवति । तत पूर्वदशाया तु सयोगाभावात् सर्वपरित्यागपूर्वक विप्रयोगभावानुभव एव परमफलम् । सर्वपरित्याग विना लौकिकाशस्य सत्त्वादव्यग्रतया निप्रयोगानुभवासम्भवात् । स च परि साग कस्मिन् मार्गे कर्तव्य , कदा वा कर्तव्य , कय वा कर्तव्य , किमर्थं वा कर्तव्य , करणानन्तर च तस्य कीदृशी दशेत्येतत्सर्वनिर्धारार्थ विचारप्रयोजनमनुवदन्त एवाचायी परित्यागविचार प्रतिजानते पश्चात्तापनिवृत्यर्थमिति । पश्चात्तापनिवृत्त्यर्थ परित्यागो विचार्यते । स मार्गद्वितये प्रोक्तो भक्तौ ज्ञाने विशीपतः॥१॥ भक्तिमार्गे ज्ञानमार्गे च परित्याग कर्तव्य , तनापि सिद्धदशायामेव, न तु साधन दशायाम् । साधनदशायामत्यन्तवैराग्याभावेन परित्यागानिरीहात् पापण्डित्वप्रसङ्गेन कृतोपि परित्याग पश्चात्तापाय भवति । एतावतारतम्यज्ञानाभावे भगनदीया अपि पूर्वमेव परित्यक्त सर्वार्थी सन्त पश्चातप्ता भवेयु , तथा तान् दृष्ट्वा स्वयमपि पश्चात्तप्ता भवेयु , तथा चान्येपा खस्य च पश्चात्तापस्यानाविर्भावार्थ परित्यागो निचार्यत इत्यर्थ । यद्वा । सकलदैवजीवाना भगवत्राप्त्यर्थं भगवदाज्ञया ह्याचार्याणा भूलोफेजतार । सा भगवत्प्राप्तिधाचार्यभक्तिमार्ग प्राकट्येन नियते । तर यया सर्वसिद्धान्तमुक्तान्तस्तथा अयग्रतया निरन्तर विप्रयोगभावा नुभवा) परित्यागोपि पूर्वमेव कथनीय । तथा चैतावत्काल वृथा विलम्न कृत इति य पथात्ताप तस्य निवृत्त्यर्थ परित्यागो विचार्यत इत्यर्थ । अधया । परित्यागेन पूर्वमहर्निश २३ श्रीगोकुलोत्सवविरचितविवरणसमेतः । विप्रयोगभावानुभवः, तदनन्तरमलौकिकदेहेन संयोगभावानुभवः । तथा च पश्चात् परित्यागा- नन्तरं तापश्च निवृत्तिथ तापनिवृत्ती, तयोनिमित्तं परित्यागो विचार्यत इत्यर्थः । तेनोमय- प्रकारकभगवद्भायानुभवे आचार्योद्यग एव हेतुरिति सूचितम् । यच्च 'विरहानुभवैकार्थसर्व- त्यागोपदेशक'इति सर्वोत्तमे उक्तम् । तदव्यवधानविवक्षया सवासन इति परिशब्दार्थः । ननु परित्यागः कस्मिन्मार्गे कर्तव्य इति चेत् ? तत्राहुः स मार्गद्वितये प्रोक्त इति । विशेष आधिक्यम् , तेन सिद्धदशा विशेषः । चिशेपतः इति ल्यव्लोपे पश्चमी । तथा च भक्तौ ज्ञाने च विशेपं सिद्धदशां प्राप्य मार्गद्वितये भक्तिमार्गे ज्ञानमार्गे च स परि- त्यागः प्रकर्षण उक्तः, कर्तव्यत्वेन कथित इत्यर्थः ॥१॥ कर्ममार्गे न कर्तव्यः सुतरां कलिकालतः । अत आदी भक्तिमार्ग कर्तव्यत्वाद्विचारणा ॥२॥ अथ कर्ममार्गे साधनदशायां ज्ञानमार्गे उपासनामार्गे साधनदशायां भक्तिमार्गे च परित्यागः पश्चात्तापायेति तन्निवृत्त्यर्थ परित्यागस्य विचारः क्रियते । विशेषतः विशेष प्राप्य । स च सिद्धदशा उभयोः । यद्वा, यहुजन्मसु परित्यागः कर्तव्य इति आवृत्ति- पाहुल्यमेव विशेष इति ज्ञानमार्ग एव विशेषत इत्यन्वेति । निष्कामतया कर्मकरणं चित्त- शुद्ध्यर्थम् , कर्ममार्गे पत्नी विना च यज्ञादिकरणमसम्भवीति न परित्यागः सम्भवति । पत्नी- साहित्येपि निष्कामतया कर्माचरणं संन्यास एवेति चेत् सोपि कलौ देशादिशुद्ध्यभावान्न सम्भवतीत्याहुः सुतरां कलिकालत इति । यद्वा । आयुपश्चतुर्थभागे संन्यास इति यन्मतं तस्मिन्नपि मते भक्तिं ज्ञानं च विना केवलं कर्ममार्गे विरक्तिं विना न कर्तव्यः परित्यागः किन्तु विरक्तावेवेति भक्तानस्य वा सिद्धदशां विना न सम्भवतीति कर्ममार्गे न परि- सागः, सुतरां कलिकाले ॥२॥ श्रवणादिप्रसिद्ध्यर्थ कर्तव्यश्चेत्स नेष्यते । सहायसङ्गसाध्यत्वात्साधनानां च रक्षणात् ॥ ३ ।। अभिमानानियोगाच तद्धमैश्च विरोधतः । गृहादेर्वाधकत्वेन साधनार्थ तथा यदि ॥४॥ अग्रेपि तादृशैरेव सङ्गो भवति नान्यथा। स्वयं च विपयाकान्तः पापण्डी स्यात्तु कालतः ॥५॥ विपयाफ्रान्तदेहाना नावेशः सर्वदा हरेः। अतोऽत्र साधने भक्तो नैव त्यागः सुखावहः ॥ ६ ॥ विरहानुभवार्थ तु परित्यागः प्रशस्यते । स्वीययन्धनिवृत्त्यर्थ वेपः सोऽन न चान्यथा ॥७॥ श्रवणादीनां निरन्तरमच्यग्रतया सिद्ध्यर्थ यदि स नेष्यते भावोद्बोधकत्वाद्भगव- - - २४ संन्यासनिर्णयः। दीया सहायास्तेषां सगेन श्रवणादयः साधनीयाः। पूजादीना साधन च रक्ष्यम् , साधन- दशायां अभिमानच वियते । 'तारकर्माणी'ति वाम्यात् साधनदशायां पूर्णविरक्यभावा- वेदादिरूपमगवनियोगाद्वर्णाश्रमधमा कर्तव्या एव । सन्यासधर्मः सह श्रवणादीनां निरो- थोऽपि । गृहे भगवदीये. सगामानात्यागः कार्य इति चेत्तनाहुहादेरिति । गृहत्यागे कदाचित्कुचित्सत्सग. सादित्याशया कार्य इति चेत्तनाहुः स्वयं चेति । विपरन्त करण आक्रान्ते सत्सगार्थ तस्सोघम एव न भवतीति भावः ॥३॥४॥५॥६॥७॥ कौण्डिन्यगोपिकाः प्रोक्ता गुरवः साधनं च तत् । भावो भावनया सिद्धः साधनं नान्यदिप्यते ।। ८॥ विकलत्वं तथास्यास्थ्यं प्रकृतिः प्राकृतं न हि । ज्ञानं गुणाश्च तस्यैवं वर्तमानस्य पाधकाः ॥९॥ सत्यलोके स्थितिञ्जनात् संन्यासेन विशेपितात् । भावना साधनं यत्र फलं चापि तथा भवेत् ॥ १०॥ तादृशः सत्यलोकादी तिष्ठन्येव न संशयः। पहिश्चेत्प्रकटः खात्मा पहिवत्मविशेद्यदि ॥ ११ ॥ तदैव सकलो पन्धो नाशमेति न घान्यथा। गुणास्तु सद्गराहित्याज्जीवनाय भवन्ति हि ॥१२॥ कौण्डिन्यादायपि भावनयैव भार सिर इत्याहु वो भावनयेति । ज्ञानं प्रसज्ञानम् , गुणा सत्त्वादयश्व, भगवविच्छ्या यदि भान्ति तदा ते चापका या भावना साधन तर भावनानुरूप फलम् । ननु तादृश ज्ञान गुणाश्च कथ वाधका भवेयुस्तनाहु- भर्भावना साधनं यत्रेति । तथा च यादृशी भावना तदनुरूप फलम् । तेन यावत्पर्यन्त तल्लीलाभावना तावत्तदनुरूप फल, यावद् ब्रह्मज्ञानेन सर्वन ब्रह्मभावना तावत्तदनु- रूप फल, यावच्च सत्त्वादिगुणे कृत्वा विपयेषु भावना तावत्तदनुरूप फलम् । तथा च भावभावनाना साधारण्यात् फलेपि तथात्वम् । बाधकत्व विवृण्वन्ति तादृश इति । ब्रह्मभावनादियुका सत्यलोकादावेव तिष्ठन्तीत्यर्थ । ननु ब्रह्मभावनया कि स्मादित्यत आहुयेहिरिति । यदि यहि प्रकाश एव न साद्यदि च पश्चाद्वह्निवदन्तन प्रविशेत्तदापि न ससारलय. । यदि गुणेष्वासक्ति स्यात्तदा ते बाधका भवेयु , परन्तु ताशाना पूर्वमेव गुणेष्वासक्तेर्निवृत्तत्वाद्गुणा केवल जीवनाय भवन्ति, न तु वन्धका । यद्वा । तादृशानां सर्वसागादन्यै. कैश्चिदपि न सद्ग , प्रचुरविप्रयोगे च जीवनमशक्यम् । यदि च भगवदीयैः सङ्ग स्यातदा तद्वार्तयापि जीवन स्यात्, भगवतश्च तादृशानामपि जीवनमन्येपामुद्धारार्थ सम्पादनीय भवति । तदा भगवास्तेषा जीवनाथ प्राकृतेष्वपि गुणेषु तेपा मनो यत्किश्चित्स- N २५ श्रीगोकुलोत्सवविरचितविवरणसमेतः । योजयति । नन्वेवं गुणेष्वासक्त्यभावादत्यन्तवियोगे जीवनं न स्यात् , तथा च जीवनविघा- तकत्वेन भगवान् यापकत्वेनामिमतः स्यादित्याशंक्याहुर्भगवानिति । भगवान् फलरूपत्वान्नात्र बाधक इष्यते। स्वास्थ्यवाक्यं न कर्तव्यं दयालुन विरुध्यते ॥ १३ ॥ दुर्लभोयं परित्यागः प्रेम्णा सिध्यति नान्यथा ॥१३३ ॥ जीवनविघातकत्वेपि प्रतिक्षणं फलरूपभगवद्भावानुभावकत्वान्न बाधकः। न हि तदव- सातो जीवनमधिकमस्ति । यद्वा । ननु यदि मगवांस्तेषां मनो गुणेषु किञ्चित्संयोजितवांस्त- दोत्तरोत्तरं गुणेप्वधिकासक्तया भगवद्भावस्य विघातः स्यात्, तथा च भावविपातकत्वेन भगवान् याधकः सादित्याशंक्याहुः भगवानिति । नहि भगवान् भावं विहन्तुं गुणेषु तेषां मनः संयोजयति, किन्तु तेषां जीवनार्थम् । तथा च यावता तेषां जीवनं भवति तावदेव तेषां मनो गुणेषु योजयति, न तु गुणेष्वधिकामासक्तिं जनयति । कुतः । फलरूपत्वात् । नहि फलं बाधकं भवति । ननु भगवान् सतोन्यद्वारा तेपां स्वास्थ्यवाक्यान्येव कथं न सम्पादयति, येन स्वस्थतया जीवनं भवेत् , तत्राहुः । स्वास्थ्यवाक्यमिति । विप्रयोगभावं याधित्वा जीवनसम्पादनमनुचितं यतः । न हीतोपि जीवनमधिकमस्ति, अर्हे तव्यः । तथा करणं चाशक्यम् । न घेतद्भावस्य याधनं भगवतान्येन वा कर्तुं शक्यम् । वक्ष्यन्ति च 'हरिरत्र न शक्रोती'ति । शक्यार्थे तव्यस्तदा । ननु परमदयालुः कथं तेषां जीवने उपेक्षा करोति, तबाहुः दयालुरिति । न तादृशमावसम्पादकस्य दयालुता विरुध्यते ॥१३, १३३ ।। ज्ञानमार्गे तु संन्यासो द्विविधोपि विचारितः॥ १४ ॥ ज्ञानार्थमुत्तराङ्गं च सिद्धिर्जन्मशतैः परम् । ज्ञानं च साधनापेक्षं यज्ञादिश्रवणान्मतम् ॥ १५ ॥ अतः कलौ स संन्यासः पश्चात्तापाय नान्यथा। पापण्डित्वं भवेचापि तस्माज्ज्ञाने न संन्यसेत् ॥ १६॥ सुतरां कलिदोपाणां प्रयलत्वादिति स्थितम् ॥१६३ ॥ ज्ञानमार्गे विविदिषाविद्वत्तामेदेन द्विविधोपि संन्यासो विचारितः । तद्वयमाहु - नार्थमिति । ज्ञानार्थ ज्ञाननिमित्तं यः संन्यासः स एकः, विविदिपासंन्यास इति यावत् । उत्तराई ज्ञानापेक्षया उत्तरं अग्निमं मुक्तेरहूं यः संन्यासः स द्वितीयः, विद्वत्संन्यास इति यावत् । परन्तु ज्ञानमार्गीयसंन्यासे बहुजन्मभिर्मुक्तिः, न त्वेकजन्मना । 'बहूनां जन्मनामन्त इति भगवद्वाक्यात् । तयोर्मध्ये विविदिपासंन्यासस्तु युगान्तरे कर्तव्यः, न तु कलावित्याहुः ज्ञानमिति शोकेन । तमो रजय विहाय केवलसत्वान्तःकरणः सन् निष्कामतया यदि .

२६ संन्यासनिर्णयः। यनादिकं करोति तदा जानमुत्पद्यते । संन्यासे च सामम्यभावाद्यज्ञादिकं न सम्भवति । ज्ञाने च यज्ञादिकं सामग्यत्वेन श्रूयते । सर्व विहाय वनं गत्वा योगादिना ज्ञानसाधनं च कलौ न सम्भवति । विनानां पाहुल्येनान्तःकरणे लौकिकवासनानामनिवृत्तवान्मनः- स्थैर्याभावाद्योगादिकमेव न सिध्यति यतः । अतो विविदिपादशायां संन्यासः कलौ पश्चा- त्तापायैव भवति, न तु सन्तोपायेत्यर्थः । किश्च । चित्तस्थैर्याभावे सति ततोधिक पापण्डित्वमपि भवेदित्यपिशब्दः । चकारातत्कार्यरूपो नरकच । तस्मात् ज्ञाने ज्ञाननिमित्तं विविदि- पादशायां न संन्यसेत् । अथवा ज्ञानेन हेतुना संन्यसेत् , नतु ज्ञानोत्पतेः पूर्वम् । युगा- न्तरे सम्भवेदपि, कलौ तु दोपाणामतिप्रवलत्वात् कथमपि न निर्वहतीत्याहुः सुतरामिति । स्थितं पर्यवसन्नम् ॥ १४,१५,१६, १६३ ॥ ननु यदि कलौ दोपाः प्रवला एव, तदा भक्तिमार्गेपि कथं फलसिद्धिरित्याशंक्य भक्तिमार्गे दोपलेशोपि नास्तीत्याहुः भक्तिमार्गपीति । भक्तिमार्गेपि चेदोपस्तदा कि कार्यमुच्यते ॥ १७ ॥ अवारम्भे न नाशः स्याद् दृष्टान्तस्याप्यभावतः। खास्थ्यहेतोः परित्यागाद्वाधः केनास्य सम्भवेत् ॥ १८॥ हरिरत्र न शक्नोति कर्तुं याधां कुतोऽपरे । अन्यथा मातरो यालान्न स्तन्यैः पुपुपुः कचित् ॥ १९ ॥ ज्ञानिनामपि वाक्येन न भक्तं मोहयिष्यति । आत्मप्रदः प्रियश्चापि किमर्थ मोहयिष्यति ॥२०॥ तस्मादुक्तप्रकारेण परित्यागो विधीयताम् । अन्यथा भ्रश्यते खादिति मे निश्चिता मतिः॥ २१ ॥ यदि भक्तिमार्गेपि दोपसम्भावना तदा कर्तव्यलेन किगुच्यते । एकोपि दोपो नास्तीति ज्ञापनार्यमेकवचनम् । तमेव दोपाभावप्रकारमाहुः अत्रारम्भ इति । अत्र भक्तिमार्गे आरम्भे प्रवेशमान एव नाशो न भवति । यदि भक्तिमार्गेपि दोपाः स्युः, तदा कदाचिन्नाशोपि स्यात्, न खेवम् , तेन दोपसम्भावनैव नास्ति । ननु भक्तिमार्गीयाणामपि कचित्कामक्रोधादयो दृश्यन्ते, तत्कथं सर्वात्मना दोपाभाव इति चेत् । सत्यम् । (तरसम्ब- न्ध्यङ्गीकारो) भगवदगीकारो हि नित्यः । नहि भगवानगीकृतं कदाचिदप्यनगीकरोति । तेन यन कचिद्दोपा अपि दृश्यन्ते, तत्रापि क्रमेण दोपानपसार्य भगवान् फलं सम्पादयत्येव । अतो यथा यथा भगवान् तेपां हृदि भक्तिमार्गमानयति, तथा तथा दोपापगमः । अतो यदशे मक्तिमार्गाप्रवेशस्तदंश एव दोपसत्त्वम् , तेन भक्तिमार्गे दोषाणामसम्बन्ध एव । मिश्च । न या क्वचिदिदं दृष्टचरं श्रुतं या यशक्तिमार्गे प्रविष्टस्यापि नाशो जात इति । तेन दृष्टान्त- श्रीगोकुलोत्सपविरचिसविवरणसमेतः। स्याप्यभावान भक्तिमार्ग दोपलेशोऽपि । अत एव भरतस्य जन्मान्तरायेपि फलसिद्धिः। अत एव मथुरास्थसत्रिणां मध्ये पहिर्मुखत्वेपि पश्चात् पश्चात्ताप एव । ननु भक्तिमार्गे नाशो न भवतीति सत्यं, परन्तु यदि भक्तिमार्ग न यजेत् । तथा च साधनदशायामत्यागेपि सिद्ध- दशायामत्यन्तविप्रयोगक्लेशमसहमानः सन् मनःस्वास्थ्यनिमित्तं तन्मार्ग परित्यज्य लौकिकपदा- र्थमेव यदि किवितरिगृह्णीयात्तदा नाशो भवत्येवेति चेत्तत्राहुः स्वास्थ्यहेतोरिति । यदैव मगवन्मार्गे प्रवेशस्तदैव लौकिकस्स परित्यागः, तदनन्तरं च यथा यथा भगवद्भाव- स्तथा तथा लौकिकेप्वधिकाधिकैवाऽरुचिर्जायते । तथा च लौकिकस्स स्वास्थ्यहेतोः सर्वस्यैव परित्यागात् केन पदार्थेनास्य भगवद्भावस्य वाधः अन्तरायः सम्भवेत् , न केना- पीत्यर्थः । यदि कदाचिदत्यन्तं विप्रयोगमावेनातिक्लेशादिदमपि मनस्यायाति यत्कथमपि यद्ययं भावो निवृत्तो भवेत्तदा सम्यगिति तथाप्यशक्यो भावस्य परित्यागः । न ह्येतादृशः क्षण- मपि भगवन्तं विस्मर्तुं शक्नोति । न वान्येन पदार्थेनैतादृशस्य मनःस्वास्थ्यं सम्भवति । यद्वा, खास्थ्यहेतोः सास्थ्यनिमित्तम् ।लौकिकं हि सर्वं तस्योद्वेगकारीति स्वास्थ्यनिमित्तं सर्वस्य लौकिकस्य परित्यागात् केन पदार्थेन अस्य भावस्यान्तरायो भवेत् , न केनापीत्यर्थः । अथवा । स्वास्थ्यहेतोः स्वास्थ्यनिमित्तं परित्यागात् भगवद्भावस्य परित्यागात् । अयं भावः । भगवद्भावत्यागो हि खास्थ्यनिमित्तं कर्तव्यः, तथान्येन न सम्भवति । न घेतादृशस्या- न्येन स्वास्थ्यं सम्मवति । तथा च केनान्तरायः सम्भवेत् , न केनापीत्यर्थः । वस्तुतस्तु मावत्याग एव न सम्भवतीति पूर्वमुक्तमिति निगर्वः। नन्वेतादृशस्य स्वयं भावत्यागो न सम्भव- तीति सत्यम् । परन्तु यदि कालादयः प्रतिवन्धं कुर्युः, तदा नाशो मवेदेवेति चेत्, तत्राहु- हरिरिति । अत्र विप्रयोगभावे भगवानपि प्रतिवन्धं कर्तुं न शनोति, तत्र के वराकाः कालादय इत्यर्थः। न चैवमसामर्थ्य भगवतः । वस्तुन एव तथात्वात् । ननु भक्तिमार्गे प्रवेशे सति सर्वथा न सम्भवति नाशः, परन्तु भक्तिमार्गप्रवेशे तु केवल भगवदगीकार एव मूलम् । नहि भगवदगीकारं विना भक्तिमार्गरुचिर्भवति । भगवतश्च किं प्रयोजनं येन प्रवेशयेत् , तथा च कयं फलसिद्धिरित्याशंक्य भगवान् केवलं कृपयैव प्रवर्तयतीति दृष्टान्तेन योधयन्ति अन्यथेति । यदि प्रयोजनं विना कोपि न प्रवर्तदेव, तदैतावत्कालं विश्वस्मिन् यालान् मातरो न पुपुपुरियेव त्वयोक्तं स्यात् न त्वेवम् । किन्तु पुपुपुरेव । तथा भगवानपि प्रयोजनं विनैव केवलं कृपयैव सर्व सम्पादयतीत्यर्थः। अग्रे यालानां प्रयोजनसहरसाधकले पि मातृणां तदुद्देशेन न प्रवृत्तिः, किन्तु केवलं वात्सल्यादेव सर्व सम्पादयतीत्याशयः । ननु भगवदगीकारात् प्रवृत्तस्यापि यदि ज्ञानमार्गीयैः संसर्गः स्यात् , तदा तद्वात्यैर्बुद्धि- विपर्यासे कथं फलसिद्धिरिति चेत्, तपाहुना॑निनामपीति। न हि भगवदगीकारममिभूय तद्वाक्यानि बुद्धि विपर्यासयितुं शनुवन्ति । भगवांश्च यं भक्तिमार्गेगीकृतवांस्तं कदापि ज्ञानिवाक्यैर्नान्यया करोति । सिद्धदशायां तु न सम्भवत्येव, कदाचित्साघनदशायां २८ संन्यासनिर्णयः। सम्भवेदित्याशंक्येदमुक्तम् । यद्वा । ज्ञानिनो विविधयुद्धिप्रकारकुशलाः । तेनात्यन्त- चतुरेणाप्यन्यथा योधयितुमशक्यो भक्तः । अग्रेपि कदापि मोहं न जनयतीति भविष्य- प्रयोगः । ननु कयं ज्ञायते भगवान्नैव मोहयिष्यतीति, न घुत्तमपदार्थ कोपि कस्मैचिद्दातुं समीहत इति चेत् , तनाहुरात्मप्रद इति । यः स्वात्मानमपि प्रयच्छति तस्य सर्व- फलदाने कः सोचः । ते न महोदारत्वात् सर्वस्वमपि ददाति, न तु मोहयति । प्रियश्च अतः प्रीतिकर्तृभ्यः सर्वखदानमुचितमेव । परमकृतज्ञत्वात् निर्णयमाहुस्तस्मा- दिति । उत्तप्रकारेण सिद्धदशां प्राप्य स्वार्थात् स्वप्रयोजनात् ॥ १७-२१ ॥ उपसंहरन्ति इतीति । इति कृष्णप्रसादेन वल्लभेन विनिश्चितम् । संन्यासवरणं भक्तावन्यथा पतितो भवेत् ॥ २२ ॥ कृष्णः श्रीगोकुले प्रकटः । नहि तत्प्रसादं विनैतद्भावतत्त्वं ज्ञातुं शक्यम् । अत एव तबल्लभत्वं खस्मिन् नावाहुः । संन्यासवरणं सन्यासाङ्गीकारः । भक्तो भक्तिमार्गे । यद्यपि ज्ञानमार्गेपि संन्यास निर्णय उक्तः, तथाप्येतद्विचारं मनस्यागते तस्य पुरुषार्थेष्वेव गणना जायते । अन्यथा सिद्धदशां विना पातः पूर्वस्थितमावात् अच्युतिः ॥ २२ ॥ प्रणम्य च प्रभुं टीका गोकुलोत्सवसूरिणा । श्रीगोविन्दसुतेनेयं कृता संन्यासनिर्णये ॥१॥ इति श्रीगोवर्धनधारिचरणकमलैकतानश्रीगोकुलोत्सव- विरचितं संन्यासनिर्णयविषरणं समाप्सम् ॥

श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः। श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः । संन्यासनिर्णयः। चाचाश्रीगोपेशविरचितविवरणसमेतः । पदारविन्दद्वन्दं तद्वन्देऽहं दिव्यमद्भुतम् । हृदि यद्धारणात् कोपि तापः प्रादुर्भवत्सलम् ॥१॥ मुदा तत् श्रीमदाचार्यपदार्ज दैन्यदाम् । मुहुः प्रणम्य संन्यासनिर्णयो विवरिष्यते ॥२॥ तयाहि । यावलोम यत् सकलं पुष्टिमार्गीयमस्ति तत् । तावद्विचारितं तत्र संन्यासो न विचारितः ॥३॥ इति तत्स्वरूपविज्ञानामावेनैव कृते सति । तस्मिन् स्खीयो भवेन्मार्गाभ्युतो हीति सुनिश्चितम् ॥४॥ तदानिष्ट स्वकीयस्य मार्गे स्यादिति चेतसि । पश्चात्तापो महान् श्रीमदाचार्याणामभूत्ततः ॥५॥ तनिवृत्त्यर्थमेतस्य विचारोपेक्षितस्ततः । हेतुसाधनतथैव फलतच स्वरूपतः ।। अधिकारादपि परस्तादृशः स निरूप्यते ॥ ६॥ तत्र प्रथमं खमार्गाझीकृतस्य स्खमार्गीयमजने प्रवृत्तस्स भक्तिभावदानान्तरासक्ति- सिद्ध्यर्थं श्रीमदाचार्याः परित्यागविचारोपक्रम कुर्वन्ति । पश्चातापनिवृत्त्यर्थं परित्यागो विचार्यते । स मार्गमितये प्रोक्तो भक्तौ ज्ञाने विशेषतः॥१॥ पूर्वपीठिकोक्तपश्चात्तापनिवृत्यर्थमित्यर्थः । अन्यत्स्पष्टम् । विचारमेवाहुः स इति । परित्यागा, मार्गदितये, भक्ती पुष्टिमार्गीयायां ज्ञाने च विशेषतः कर्तव्यलेन प्रोक्तो, नान्यमार्गे ॥१॥ ननु यथा भक्तिः ज्ञानं च मागौं तथा कर्माणि मार्ग इति तनापि स कर्तव्य इति चेत्, तत्र निषेधमाहुः।

३० संन्यासनिर्णयः । फर्ममार्गे न कर्तव्यः सुतरां कलिकालतः। अत आदी भक्तिमार्गे कर्तव्यत्वाठिधारणा ॥२॥ कर्ममार्गे तु न कर्तव्यः । सुतरां कलिकालतः । 'यावजीवमग्निहोत्रं जुहुयादिति श्रुतेः अहर्निशं कर्मविधिकृतेरेवावश्यकत्वात् परित्यागानवसर एव । यद्यप्यायुपश्चतुर्थो भागस्तुरी- याश्रमेण नैय इति तत्रापि विपिर्वतते, तथापि सुतरां कलिकालदोपेण रोगादिजराजनित- पीडया संन्यासाश्रमधर्मनिर्वाहः कर्तुमशक्य इति विपरीतफलकत्वान कर्तव्य इति भावः । अतः कारणात् मार्गयोः एव कर्तव्यत्वस्य प्राप्तत्वात् तत्र च खोपयोगित्यात् आदी भक्तिमार्ग तस्स विधारणा विचारकरणम्, तच कदा, किगर्थ, कर्तव्य- मित्यादिरूपमित्यर्थः ॥ २॥ तदेव निरूपयन्ति । यथा ज्ञानगार्गे विविदिपाविद्वन्द्वेदेन परित्यागस्य द्वैवि- ध्यम् , तथा भक्तिमार्गेपि साधनसिद्ध्यर्थ फलसिद्ध्यर्थं च कर्तव्यत्वे प्राप्त तत् वैविध्यं संभवतीति, तत्र श्रवणादिनवधाभक्तिसाधनार्थ तत्करणे स्वकीयस्य वक्ष्यमाणानिष्टं भवि- प्यनीति तनिषेधमाहुः । श्रवणादिप्रसिद्ध्यर्थं कर्तव्यः स च नेष्यते । सहायसङ्गसाध्यत्वात्साधनानां च रक्षणात् ॥३॥ अभिमानानियोगाध तमश्च विरोधतः। गृहादेाधकत्वेन साधनार्थ तथा यदि ॥ ४ ॥ अग्रेपि तादृशैरेव सङ्गो भवति नान्यथा। स्वयं च विषयाक्रान्तः पापण्डी स्यात्तु कालतः॥५॥ विषयाफ्रान्तदेहानां नाशः सर्वदा हरेः। अतोऽन्न साधने भक्तो नैव त्यागः सुखावहः ॥ ६॥ परित्यागं कृत्वा श्रवणादीन्साधयामीति यदि कर्तव्यस्तदा स परित्यागो नेष्यते नाहीक्रियते, इष्टसाधकाभावात् । तत्र हेतूनाहुः । श्रवणादीनां सहायसगसाध्यत्वात, श्रवणकीर्तनादिकर्तारः भगवद्धर्मपरा अपि मार्गस्वरूपज्ञानात् गृहस्थिता एव । तेषां सङ्केन साप्यत्वम्, नान्यथा । अस्य तुत्सागानन्तर मेकाकी निस्पृहः शान्त' इत्यादिवाक्यादे- काकित्वेनैव स्थितेरावश्यकत्वात् सत्सङ्गाभावेनैव कुतः श्रवणादिसिद्धिरिति तदर्थ न कर्तव्य- मेवेति भावः । किच, कदाचित्तत्सङ्गेपि तेषां गृहस्थत्वेन सांसारिकत्वज्ञानात् त्यागिनः तेषु प्रवृत्तिरेव न । प्रवृत्तावपि ते ह्यस्याग्रे किमपि न कथयन्ति, यतस्ते मार्गस्वरूपज्ञातारः, अयं तु मार्गाश्युत इत्यतस्तदर्थं सर्वथा न कर्तव्य इत्यर्थः । यतः स्वमार्गीयसङ्गाभावे साधा- रणसङ्ग्रेन वक्ष्यमाणावस्यैव भवेत्, न तु स्वमार्गज्ञानमपि । किञ्च, साधनानां च रक्ष.

। चाचानीगोपेशविरचित विवरणसमेतः । ३१ णादिति । अहोरात्रिप्रणवप्राणायामादिसाधनविधेरेव रक्षणसावश्यकत्वात् श्रवणादिअपना- नवसर एवेति । किच, प्रपन्नत्वसम्गवेपि तस्य साधकलामावमाहुः अमिमानादिति । संन्यासग्रहणानन्तरं तत्त्वमस्यादिवाक्यादात्मनि सोहमित्यमिमानो भवति, भक्तिमार्गे तु समर्पणानन्तरं देहनाणेन्द्रियादीनां भगवदधीनत्वं भवति, तदादासत्वान्न ममेत्यभिमान इति । स्वधर्म विहाय स्वकीयस्य श्रवणार्थ परधर्मरूपत्यागकरणे इष्टप्राप्यभावः, प्रत्युत विपरीत- फलमपि भवेदिति स न कर्तव्य इति भावः । किञ्च, नियोगादिति । स्वमार्गाङ्गीकृत- स्थान्यत्र विनियोगः सर्वथा ह्यनुचितः । त्यागानन्तरं विहितत्यागसाधनकरणे देहादीना- मन्यत्रैव विनियोगो मवेत्, नतु साक्षात्पुरुषोत्तम इति । स्वमार्गफलासाधकत्वात्तथेति भावः । किश्च, तद्धमैरिति । पुष्टिमार्गधर्मैश्च विरोधतः । अयं परित्यागो विधिप्रयुक्तत्वान्मर्यादा- मार्गीयो भवितुमर्हति, न पुष्टिमार्गीयः । पुष्टिमार्गो हि समस्तविधिमिरस्पृष्टः, तदा तत्प- रित्यागः सुतरां तथेति प्रमाणातीत इत्युभयोधर्माणामपि मेदाद्विरोधः स्यादिति तथा । चकारात् स्वरूपफलयोरपि मेदः । एवं स्वमार्गाङ्गीकृतस श्रवणादिभक्तिसिद्ध्यर्थ संन्यास- निषेधकथनेन 'गृहे स्थित्वा खधर्मतः। अव्यावृत्तो भजेत् कृष्णं पूजया श्रवणादिभिरित्युक्त- प्रकारेण स्वधर्मनिष्ठया सेवैव कर्तव्या, नान्यदिति सूचितम् । ननु गृहमेव याधकं भवेत् तदा तु कर्तव्य इत्याशंक्य तस्यापि निषेधमाहुः । गृहमादिपदेन तत्सम्बन्धिनश्च सर्वे ययपि धर्मप्रतिकूला एव, तथापि श्रवणादिसाधनार्थ संन्यासग्रहणं न कार्यम् । किन्तु तत्परित्यागेन भगवदीयैः सह सेवा कर्तव्येति ज्ञाप्यते । अत एव मार्यादिरनुकूलथे' दित्यादिपु साधनार्थमनुकूलतद्रहणाभिप्रायेण प्रतिकूलगृहत्याग एवोपदिश्यते, न तु संन्यासग्रहणम् । तथोक्त 'गृहे स्थित्वा स्वधर्मत' इति भक्तिवर्धिनीवचनविरोधः स्यात् । किञ्च, श्रीभागवतेपि भक्तिसाधनार्थं 'मदर्थेऽर्थपरित्याग' इत्यारभ्य एवं धर्मनुष्याणा'मित्यादिभिसर्वसमर्पणरूपः त्याग उक्तो, न तु संन्यासः, अन्यथा 'वयोपभुक्तस्रग्गन्ध' इत्यनेन विरोधः स्यात् । यतः सेवाकरण एवोच्छिष्टभोजनम् , न तु संन्यासे, सेवाभावात् । एवं सति साधनार्थमपि त्याग उक्त इति तत्व- रूपज्ञानेन स्वमार्गीयः कश्चित् संन्यासग्रहणं कुर्यादिति प्रकृते तन्निपेध उक्त इति सर्व- मनवद्यम् । अतः परं गृहादेर्यापकत्वेन संन्यासग्रहणे तादृशैः सह सङ्ग एव भवेत् , किन्तु स्वयमपि तादृशो भवतीत्याहुः । स्वयमपि तथा । ते साधनत्यागिनः धर्मध्वजिनः विषयामान्ता वेशमात्रधारिणः पापण्डिनः, तथा स्वयमपि तत्सङ्गेन विपयाक्रान्तः पापण्डी च स्यात् । तत्र हेतुः कालतः। कलिकालदोपत इत्यर्थः । अथया कालत इत्युप- लक्षणम् । कालकर्मखभावेम्य इत्यर्थः । यतः मार्गच्युतजीवस्य कालाद्यधीनत्वमेव, मार्ग- स्थितस्यैव तदनधीनत्वेन तस्य भगवदधीनत्वेन भगवान् रक्षां करोति । तादृशत्यागिनो भगवदधीनत्लागावाद्रक्षाऽभावेन तथात्वमेवेति भावः। एवं तत्सङ्गदोपं निरूप्य फलाभाव- संन्यासनिर्णयः। माहुः । यदैवं विपयाक्रान्तो भवेत्तदा विषयाकान्तानि, देह इत्युपलक्षणम्, किन्तु, देह- प्राणेन्द्रियान्तःकरणानि येपाम् । सर्वदा सर्वकालं मवेत् , प्रवेशस्सावकाश एव नास्त्रि, तदावेशो न भवतीति सिद्धान्तात् तस्यापि भगवदावेशो न भवेदिति सर्वखहानिरव भवतीति भावः । अतः कारणादा पुष्टिमार्गे पुष्टिमार्गीयस्स साधने भक्ती साधनभक्तिसिद्ध्यर्थ त्यागः सुखायहो न भवति, अनिष्टपर्यवसानात् । अतः स सर्वथा न कर्तव्य इति ज्ञापितम् ॥ ३-६ ॥ ननु तर्हि कदा किमर्थं च कर्तव्यं इत्याकांक्षायां तस्य प्रयोजनकयनेनैवाधि- कारिणं चाहुः। विरहानुभवार्थ तु परित्यागः प्रशस्पते। खीयपन्यनिवृत्त्यर्थ वेपः सोऽत्र न घान्यथा ॥७॥ कौण्डिन्यो गोपिकाः प्रोक्ता गुरयः साधनं च तत् । भावो भावनया सिद्धः साधनं नान्यदिष्यते ॥८॥ विकलत्वं तथास्थास्थ्यं प्रकृतिः प्राकृतं न हि । ज्ञानं गुणाश्च तस्यैवं वर्तमानस्य बाधकाः ॥९॥ सत्यलोके स्थितिज्ञानात् संन्यासेन विशेपितात् । भावना साधनं यत्र फलं चापि तथा भवेत् ॥ १०॥ तादृशाः सत्यलोकादौ तिष्ठन्स्येव न संशयः । पहिश्वेत्प्रकटः स्वात्मा वह्निवत्मविशेद्यदि ॥ ११ ॥ तदेव सकलो बन्धो नाशमेति न चान्यथा । गुणास्तु सगराहित्याज्जीवनाथ भवन्ति हि ॥१२॥ भगवान् फलरूपत्वान्नात्र बाधक इष्यते । स्वास्थ्यवाक्यं न कर्तव्यं दयालुन विरुध्यते ॥१३॥ दुर्लभीयं परित्यागः प्रेम्णा सिध्यति नान्यथा ।। १३३ ।। विरहानुभवार्थ परित्यागोस्मिन्मार्ग प्रशस्तो भवति । अन्यथा नेत्यर्थः । अत्रेदमाफूतम् । खमार्गीयस्साङ्गीकारादारभ्य श्रीकृष्णसेवैव कर्तव्या, नान्यदिति सिद्धान्तः । तदुक्तम् 'कृष्णसेवा सदा कार्येति । सा सेवा साधनरूपा फलरूपा चेति द्विधा । मानसी सा सेवा फलरूपा, तत्साधनरूपा तनुजवित्तजात्वेनोक्ता । एवं सति मार्गनिष्ठया सर्व- समर्पणपूर्वकं सर्वेषां तनुवित्तादीनां भगवत्येव विनियोगकरणेन सेवाकरणे तत्स्वरूप प्रेम जायते । एतदेवोक्तम्। 'गृहे स्थित्वा वधर्मत' इत्यारग्य ततः प्रेमे'त्युक्तं भक्तिवर्धिन्याम् , नो चेदिह स्थानस विजातीयत्वेन बाधकत्वात् साम्प्रतं वाखानुसन्धानाभावेन पुनर्विजातीय- ३३ चापाश्रीगोपेशविरचितविवरणसमेतः । सझेपि तस्य न नाश इति तत्रैव 'यावजीवं तस्स नाशो न कापी'त्युक्तम् । एवं सति अस्स सागस्य पूर्णपुष्टिभाववानेवाधिकारी, नान्यः, तस्स प्रयोजनमपि प्रचुरभावपोपेण विरहा- नुभव एवेति सुष्यूक्तं तथा । ननु तर्हि परित्याग एव कर्तव्यः, संन्यास एव किमर्थ कार्यः, तत्र हेतुमाहुः स्वीयेति । खीया गृहसम्वन्धिनस्तक्रियमाणो यो पन्धः तन्नित्त्यर्थ वेषः । अन्यथा संन्यासाश्नमो धर्माचरणार्थं न भवतीत्यर्थः । विजातीयमिलनस्य भाव- घातकत्वात् । तदुक्तं फलप्रकरणे 'अस्माक्ष्म तत्प्रभृति नान्यसमक्ष'मित्यत्र । 'यथा व्याघ्राग्रे देहाभिमानी'ति । ननु तथापि भक्तिमार्गीयभावपोपार्थमपि विहितत्वात् गुरूपदेशं विना कथं तसिद्धिरित्याशक्य गुरून्निरूपयन्ति । कौण्डिन्य ऋपिरनन्तगुणश्रवणेनानन्तस्वरूपा- सक्या तत्कालमेव सर्वत्यागं कृतवान् , पुनस्तद्विरहेण विकलः सन् जडादिष्वपि प्रश्नं चक्रे । तथास्यापि खरूपसेवाकरणे प्रेमासत्यनन्तरं पुष्टिमार्गीयभावोदयक्षण एव त्यागः कर्तव्य इति साम्येन स गुरुरुक्तः । अपरे गुरवो गोपिकाः । यथा पूर्वगप्यासक्ती सत्यां वेणुनादश्रवणानन्तरं त्यागे कृते प्रभुसङ्गमस्तासामप्यभूत् । अग्रे पुनरन्तरासक्ति- दाथि विरहानुभवोपि जातः, येन 'तन्मनस्कास्तदालापा नात्मागाराणि समरु' इत्यादि विकलत्यास्वास्थ्यादिरूपावस्थाप्यासीदिति साम्येन तासां च गुरुत्वं निरू- पितम् । एवं सति तद्रीत्या तथा कृते एतस्यापि फलं सेत्स्यतीति भावः । ननु यथा 'यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजे'दिति श्रुत्या ज्ञानमार्गीयसंन्यासे वैराग्यं साधनम्, तथात्र किं साधनम् , तदाहुः साधनं चेति । भावनया सिद्धो यो भावः तत्साधनम् । पूर्वमपि भावो जायते, परं कृत्रिम इति । तादृशस्य साधनत्वं न, आसक्त्य- नन्तरं 'भगवता सह संलाप' इत्याधुक्तप्रकारकमनोरथात्मकभावनया सिद्धि प्राप्तो यः पूर्णः पुष्टिमार्गीयो गूढो भावः तत्साधनम् । न अन्यदिति । अतिरिक्तं साधनं नेष्यते । सापेक्ष्यतत्त्वाभावान्नापेक्षित इत्यर्थः । एवं सति वैराग्यमप्येतदेव, न ज्ञानमायिम् । यतो भगवत्स्वरूपव्यतिरिक्त सर्वत्रारुचिरिति भक्तिवर्धिन्यां 'स्नेहाद्राग- विनाशः स्या'दित्यादिना तथा स्फुटीकृतम् । ननु ज्ञानमार्गे वैराग्येण त्यागे कृते विपया- घमिलापाभावात् देहेन्द्रियैः प्राकृतधर्मराहित्य चित्तादिखास्थ्यं च भवति, प्रकृते त्यागादारभ्य प्रतिदिनं तथा भावने वैकल्यमस्वास्थ्यमेव सकलेन्द्रियेषु वर्धत इति प्राकृतविषयधर्मवत्त्वमेव लक्ष्यते, तत्कथं फलसिद्धिरित्याशंक्य तद्धर्मखरूपमाहुः । बाह्यानु- सन्धानराहित्यपूर्वकमन्तःस्वरूपानुभवसमानाधिकरणचेष्टितं यत्सकलेन्द्रियाणां तद्विकलत्वम् , पहिरपेक्षया विपरीतान्तर्मावरूपाः कलाश्चेष्टा येपां तेषां भावस्तत्त्वमित्यर्थः। तथा बहिः प्रिय- सङ्गामावनिताा सकलेन्द्रियाणां स्वास्थ्यामावोस्वास्थ्यम् । एतद्द्यमपि विप्रयोगभावस्य प्रकृतिः साहजिको धर्मः । यथा ज्ञानमार्गे चैकल्याभावः स्वास्थ्यं तस्य प्रकृतिः, तथा पुष्टिमार्गे तद्विपरीतधर्गवत्त्वं तद्भावस्य प्रकृतिः । अनेन यावपर्यन्तं विकलत्वास्वास्थ्यादि- ३४ संन्यासनिर्णयः। रूपा प्रकृतिः न सिध्यति, तावत्पर्यन्तं तद्भावस्यापि न पूर्णत्वमिति सूचितं भवति । अत एव तदायानन्तरं पुनर्नाशामावेन प्रयलाभाव उक्तः 'यावजीव'मिति भक्तिवर्धिन्याम् । ननु तर्हि विषयसम्बन्धित्वमायातमित्याशंस्य तन्निराकुर्वन्ति प्राकृतं न हीति । प्रकृतिगुणविका- रजन्यं तदुभयमपि न भवति । हीति निश्चयः । अयं भावः । पुरुषोतमस्वरूपं तु रसात्मकम् , रसो हि द्विविधः, संयोगविप्रयोगभेदेन, इति स्वरूपमपि तया, तत्र संयोगे स्वरूप पहिः प्रकटं भवति । विप्रयोगे भावात्मकतया तत्तदिन्द्रियेष्याश्लिष्टं सदन्तरेव रसपोपं करोति । परन्तु तापरूपेण स्थितत्वाददर्शने च तापं जनयति, इति तजनिततीक्ष्णभावमावनया पूर्वोक्त- प्रकारेणान्तःस्वरूपानुभवे तदनुसारिचेष्टाकरणेन विकलवं पहिः प्रतीयते । दर्शनाभावे- नास्वास्थ्यं चेत्सुमयधर्मस्य रसात्मकमगवत्स्वरूपजन्यत्वेन रसात्मकत्वादलौकिकानन्दरूपत्व- मेव । न तु प्राकृतत्वमिति सुष्ठूक्तं प्राकृतं न हीति । एतेन यथा यथा विकलत्वमखास्थ्य स्वात्तथा तथा फलविलम्याभाव इति सूच्यते । एतत्प्रकृतिं निरूप्य यथा (ज्ञान) मार्गे परित्यागानन्तरं सकलपदार्थस्फूर्त्या सर्व ज्ञानं गुणाध भगवद्धर्मरूपात्मानुभवेन साधकास्तथा प्रकृतेपि तेषां साधकत्वमाशंक्य साधकत्वस्य का सम्भावना, प्रत्युत वाधकलमित्याहुः ज्ञानमिति । एवं वर्तमानस्य विकलत्वाखास्थ्यरूपमप्राप्तस्स ज्ञानं पहिरनुसन्धानेन पदार्थस्फूर्त्या सर्वगुणा भगवल्लीलादिधर्मरूपाश्च कदाचित्रच्युतास्तेन व्यभिचारिभावानां वैचित्र्याद्वा हृदि स्फुरति, तदा मनस्तदवलम्बनं भवति । यथा महासमुद्रे मअतः तृणस्येव । तदा तजनितयत्किञ्चिदपि स्वास्थ्ये फले धाधका एव, न तु साधकाः । किञ्च, ये लीलागुणाः पूर्व भावपोपणे साधकाः जातास्त एव गुणाः साम्प्रतमेताहगवस्थायां जीवनसम्पादकत्वेन बाधका भवन्ति । एतेन दिरहानुभवस्य पूर्णत्वेन जातत्वात् जीवनस्थितेः प्रयोजनाभावात् । अतः परं मूर्छादीनां दशम्येवावस्था फलसाधिकेति तेषां बाधकत्वमुक्तमिति ज्ञापितम् । एवं सति लीलादीनां धर्मरूपत्वेन पावकत्वकथनात् केवलधर्मिस्फूतिरेव फलसाधिकेत्यपि ज्ञापित भवति । ननु ज्ञानमार्गे ज्ञानगुणमनःस्वास्थ्यादीनां साधकत्वम् , भक्तिमार्गेपि कथं वाधकत्वमित्याकांक्षायां मार्गभेदेन साधनफलभेदात् तथात्वमाहुः । संन्यासेन विशेपिसात् सम्यक् साधितात् ज्ञानात् प्रथमं सत्यलोके स्थितिर्भवति । पश्चाब्रह्मणा सह मुक्तिरुक्तेति ज्ञानानन्तरमेव सत्यलोकस्थितेः कथनात्तत्र मनःस्वास्थ्यगुणादीनामेव साधकत्वम् , तन्यतिरेकेण ज्ञानस्थैर्याभाव इति तेषां साधकत्वमुक्तम् । एतेन ज्ञानमार्गस्य साधनं फलमपि चोक्तम् । प्रकृते 'भगवता सह संलाप'इत्याधुक्तप्रकारकसाक्षात्स्वरूप- सम्पन्धभावनैव साधनम् । तत्र च तत्सम्बन्धव्यतिरेकेण स्वास्थ्यसम्भावने च स्वास्थ्यमेव फलसाधकम् , नो चेत् फलमेव न भवेत् । तत्रापि यादृशी पूर्वोक्तप्रकारिकान्तर्भावना ताशमेव सर्वेन्द्रियाखायं पहिरनुभवात्मकं फलमपि भवेत् , न तु ज्ञानमार्गलाभान्मध्ये सत्सलोके स्थितिः, पवादन्तरेव केवलमात्मलयमात्रमिति फलं थापि तथा भवेदियुक्तम् । किय, ३ ३५ . चाचाक्षीगोपेशविरचितविवरणसमेतः । लयोप्यक्षर एव, न तु पुरुषोत्तमे । सोपि ब्रह्मणा सहेति फलसिद्धी महान् विलम्य उक्तः । तत्रापि साधनफलभेदः । प्रकृते साक्षापुरुषोत्तमस्य रसात्मकत्वात् रसस्य संयोगविप्र- योगात्मकत्वाबाह्याभ्यन्तरभेदेन संयोगे विप्रयोगे च खरूपरसानुभव एव । न तु साधनफलभेदः । एवं सति विकलत्वासास्थ्यादिदशायाः पूर्वोक्तरीत्या साधनरूपायामपि साक्षात्स्वरूपानुभव एव भवतीति ज्ञानमार्गफलापेक्षया एतत्साधनस्यापि सर्वोत्कृष्टत्वं निरूपितम् । ननु ज्ञानस्य फलं मुक्तिः, सत्यलोकस्थितिः किमर्थं भवतीत्याशझ्याहुः । तादृशाः संन्यासविशिष्टपूर्णा ज्ञानयुक्ता अपि सत्यलोकादौ तिष्ठन्त्येवेति निश्चयः। अत्र संशयो न । यतस्तेषां तु ब्रह्मणा सहैव मुक्तिसम्भवात्तावत्पर्यन्तं तत्रैव स्थितेर्नियतत्वात् तत्र सा मर्यादास्तीति । आदिपदेन ताशत्वाभावे लोकान्तर एव स्थितिः । ननु तत्रापि फलसिद्धौ महान् विलम्बो निरूपितः । प्रकृते तादृगवस्थायां यदि गुणाघनुसन्धानं न भवेत्तदा तत्कालमेव फलसिद्धिरिति तत्प्रकारं निरूपयन्ति यहि रिति । पूर्वोक्तभावनया मगवान् एव स्फुरतीत्यर्थः । स चेदतिविगाढभावेन तदात्मकतया गुण- गानद्वारा साक्षाहहिः प्रकटो भूत्वा रसानुभवं कारयित्वा पुनस्तिरोहितः प्रचुरतापात्मकः सन्नन्तःप्रविशेत् , तदेव तत्क्षणमात्रेणैव सकलो पन्धः प्राकृतदेहरूप एव पहिः साक्षा- त्फलानुभवे प्रतिवन्धः, स ताशप्रचुरतापेन मूछीदिदशमावस्थां नाशमेति । तत्र दृष्टान्तः चह्निवत् । यथा दार्वन्तर्गतो वह्निः सदैव तिष्ठति, परन्तु दारुदहनोपयुक्तो न भवति । यदा पुनर्मथनेन पहिः प्रकटो भवेत् , तदा तत्सम्बद्धः सन् तदन्तः प्रविश्य क्षणेनैव सर्व दावेशं प्रज्वालयति । न केवलं तावन्मात्रम् , किन्तु तत् खसदृशमपि करोति, तथा अयमपि खात्मरूपत्वेन तदन्तर्गतो विगाढभावेन मथनेनैव तथा मूत्वा पुनस्ति- रोभूयान्तस्तापरुपेण प्रविशेत्तदा तं तथा कृत्वा खसदशी रसात्मकतामलौकिकवयोगुणादि- सम्पत्तिमपि करोतीति दृष्टान्तधर्मसाम्येन सूचितं भवति । एवं सति यया दारुण्यार्द्रत्वं यदि मवेत्तदा सोप्यसमर्थो धूममेव जनयति, तथा प्रकृते यत्किञ्चित्वास्थ्यस्यार्द्रत्वस्थानीयत्वात् धूमवगुणगानादिकमेव मवेत् , तदा तत्सम्बन्धः सः, न तु अन्धनिवृत्तिरित्याशयेनोक्तं 'न चान्ययेति । एतत्प्रकाराभावे न भवतीत्यर्थः । एतत्सर्व फलप्रकरणीयद्वितीयाध्याये 'गायन्त्य उरित्यस्स विवरणे 'शब्दो हि धूमवलोक' इत्यादिना निरूपितम् । एतेनास्वास्थ्यादावेव फलविलम्याभाव इति तदेव साधकम् , न गुणादिस्फूर्तिरिति पूर्वाशक्षा निरस्तेति भावः । ननु विप्रयोगस्य केवलमस्वास्थ्यकप्रकृतिकत्वात् तदुत्तरक्षण एव प्रतिवन्धनिवृत्तिं कथं न करोति । मध्ये गुणाद्यवलम्बनं कारयति । अत एवोक्त मन्तर्हिते भगवती'त्यस्य विवरणे 'यावत्स तापोन्तः प्रविशेत् तावता भगवलीला प्रविष्टे'ति । तत्प्रवेशे तस्य तदेकस्वभावात् । तदनुभवामावो यतः। एवं सति विप्रयोगभावार्थ जीवनसम्पादकत्वेन गुणानां साधकत्वं तस्मिसाते प्रयोजनामावा- १ एतत्यकारभावेन भवतीति पाटः।

तथा ३६ संन्यासनिर्णयः । तागवस्थायां स्वास्थ्यकारकत्वेन बाधकत्वमिति न कोपि विरोधः । अत एव ज्ञान गुणाश्चेति पूर्व पापकत्वमधुना गुणास्त्वित्यनेन साधकत्वं चोक्तम् । एतेन भगवतोपि बाधकामावो निरू- पितः । एवं गुणानामवस्थाभेदेन वाधकत्वसाधकत्वनिरूपणात् भगवतो पापकत्वागावं निरू- प्यातःपरमपि चेद्गुणाधवलम्ब स्थापयेत्, तदा स्वास्थ्ययुक्तत्वात् बाधफत्वं भवेदिति तदभाव- माहुः । एवं सम्पूर्णे विरहानुभवे जाते पहिःसाक्षात्फलदानार्थं यतो भगवानलौकिकैश्वर्य- वीर्यगुणादिसकलखोपयोगशक्तिसहित स्वरूपं कृत्वा स्थितो भवति । अतः फलरूपत्वात्स्वस्थ अत्र दशायां फलयाधको गुणाधवलम्बो नेप्यते, भगवता नेष्यत इत्यर्थः । अयं भावः । फलानुभवार्थ भक्तस्य यावती परीक्षा भगवतः कर्तव्या भवति, तावती सर्वा विरहानुभवेन सम्पन्ना जातेत्यतःपरमपि फलविलम्बे जाते स्वस्यैव बाधकत्वं मवेत् , तदधिकारस्य जातत्वात्। अतः सुष्ठूक्तं नाति । ननु ताहगवस्थायामपि तादात्म्यतया यथा प्रियेण सह भायणादिकं प्रियाया भवति, तथा तादृशभावनया प्रियस्यापि तत्सम्भवतीति तदेव वाक्यं स्वास्थ्य- कारकं भविष्यति । अथवा 'हा नाये'त्यत्र क्रियाशक्या तागवस्थायां स्वास्थ्यकरणम् , प्रकृते चापि वचनेनापि तत्सम्भवतीत्याशंक्य तत्राहुः स्वास्थ्येति । यद्यपि पूर्वावस्थायां तथा करोति, तदनन्तरं तदपि स्वास्थ्यवाक्यं न कर्तव्यमिति न करोति, प्रयोजनस्स जा- तत्वात् । अत्र हेतुः । दयालुरिति । अतो न विरुध्यते । विरोधित्वेन न भूयत इत्यर्थः । विरोधी स एव यः परस्यानिष्टं करोति । अयं परमदयालुरिति सकलेप्टसिद्धिं कृतवानिति मावः । एवं सति तादृशस्य स्वरूपस्थितौ गानम् , लीलाप्रवेशे प्रलाप इति मूछो तदवस्थया निरूप्यते । अतः परं दशमावस्थायाः पूर्वोक्तप्रकारेण प्रतिबन्धनिवृत्त्या फलसिद्धिरिति सर्व- मवदातम् । एतदेव सर्व फलप्रकरणेपि निरूपितम् , विरहानुभवेन परीक्षानन्तरं 'रुरुदुः सुस्वर'मित्यारभ्य 'तन्वः प्राणमिवागत'मित्यादिना । एवं स्वमार्गीयपरित्सागखरूपं निरूप्प, अस दुर्लभत्वमाहुः । अयमिति स्वरूपनिर्देशः । तथा चेापः परित्यागः, साधना- साध्यत्वादति दुर्लभः । तर्हि कथं सिध्यति तत्राहुः प्रेम्णेति । श्रीमदाचार्योक्तनिष्ठया साक्षात्स्वरूपसेवाकरणेन तत्स्वरूपे प्रेमासक्तिव्यसने सम्पन्ने चैतत्परित्यागाधिकार इति तदा सिध्यति, नान्यथा । अन्यसाधनप्रकारेण नेत्यर्थः । अत एव दुर्लभप्रेमासक्तिजनितस्वरूप- सम्बन्धामिलापजन्यदुःखं तेन लाभो यस्येति तथा निरूपितम् । अथवा । प्राकृतस्याप्राकृते प्रेमासम्भव इति तद्धेतुं पक्षान्तरेणाहुः प्रेम्णा भगवत्प्रेम्णा इति । श्रीमदाचार्याङ्गी- कारवशेन स्वरूपानन्ददानोपयोगि प्रेम भगवतस्तस्मिनायत इति तस्यापि तत्सम्भवतीति तथोक्तम् ॥ ७-१३१ ॥ एवं स्खमायिकर्तव्यविधि निरूप्य तारतम्यज्ञापनार्थ ज्ञानमार्गीयतद्विधि निरूपयन्ति ज्ञानमार्ग इति ।

पापाश्रीगोपेशविरचितविवरणसमेतः ।
३७
ज्ञानमार्गे तु संन्यासो दिवियोपि विचारितः ॥१४॥
ज्ञानार्थमुत्तराङ्गं च सिद्धिर्जन्मशतैः परम् ।
ज्ञानं च साधनापेक्षं यज्ञादिश्रवणान्मतम् ॥१५॥
अतः कली स संन्यासः पश्चात्तापाय नान्यथा।
पापण्डित्वं भवेचापि तस्माज्ज्ञाने न संन्यसेत् ॥ १६ ॥
सुतरां कलिदोपाणां प्रबलत्वादिति स्थितिः॥ १६ ॥
ज्ञानमार्गे तुसंन्यासो मया द्विविधो विचारितः । तदेव द्वैविध्यं विचारपूर्वकमाहुः।
एकः संन्यासः ज्ञानसाधनाथ, अपरः ज्ञानोत्तरं मुक्त्यगमित्यर्थः । तत्र संन्याससिद्धिस्तु
जन्मशतैः अनेकशतसहस्रजन्मानन्तरं भवति । न तु शीघ्रम् । तत्र हेतुः । ज्ञानमिति । ज्ञानो-
त्तरं संन्यासाधिकारः । तत् ज्ञानं च साधनापेक्षम् , साधनं चित्तशुद्धिः; तदपेक्षा ।
तत्पुनर्यज्ञादिश्रवणान्मतं सम्मतम् , नान्यथा । आदिपदेन तपआदीन्यन्यान्यपि ज्ञेयानि ।
तत्रापि निष्कामत्वेन कृते चित्तशुद्धिः । तत्रापि बहुजन्मानन्तरम् । अत एवोक्तं पहनां
जन्मनामन्ते ज्ञानवान् भवतीति । कदाचित् ज्ञाने जातेपि सत्यलोकस्थितेरावश्यकत्वान्मुक्ते-
विलम्यः एवेति सिद्धिर्जन्मशतरपीत्युक्तम् । एवमुत्तराद्गसंन्यासं साधनफलसहितं
निरूप्य, अत्रापि ज्ञानसाधनार्थ स चेद् भवेत्तदा तस्य फलासाधकत्वं विपरीतफलकत्वं चाहुः।
यतः पूर्वोक्तसंन्यासाधिकारो यज्ञादिकरणेन शतसहस्रजन्मानन्तरं चित्तशुद्ध्या ज्ञाने जाते
भवति अतः कलौ चित्तशुद्ध्यमावेनैव कृतः संन्यासः पश्चात्तापायैव भवत्, न त्वन्यथा।
उक्तफलाय नेत्यर्थः । सकलेन्द्रियाणां कलिकालाधीनत्वे वखविषयासक्तत्वात्तत्यागे तेपां
लोलुपत्लेन स्थैर्यामावात् । मया वृथैव संन्यासः कृत इति पश्चात्तापो भवेदिति
मावः । केवलं पश्चात्तापमानमेव न भवेत् , किन्तु क्रमेण विषयासक्त्या वेपमात्रपर्यवसायि-
त्वमपि । तदाहुः पापण्डित्वमिति । अन्तर्विपयासक्तिर्वहिस्तदाश्रमवेपमानं पापण्डस्त-
द्युक्तत्वं मवेत् । चकारादारूढपतितत्वजनितं पापमपि भवेदित्यर्थः । तस्मादनिष्टपर्य-
वसानात् ज्ञाने ज्ञानसाधनार्थ न संन्यसेदिति भावः । नन्वेवं निषेधः कथम् । कश्चित्समी-
चीनः खेन्द्रियनिग्रहादिना तमर्थ सापयति चेत्तत्राहुः सुतरां कलिदोपाणां प्रबल-
त्यादिति स्थितिः ॥१४-१६३ ॥
भक्तिमार्गेपि तेपा बाधकर्तृत्व सम्भवेदित्याशङ्कां खयमेवोदाटयन्ति ।
भक्तिमार्गेपि चेद्दोपस्तदा किं कार्यमुच्यते ॥ १७॥
अवारम्भे न नाशः स्याद् दृष्टान्तस्याप्यभायतः।
स्वास्थ्यहेतोः परित्यागाद्वाधः केनास्य सम्भवेत् ॥ १८॥
हरिरत्र न शक्नोति कर्तुं याधां कुतोऽपरे ।
अन्यथा मातरो वालान स्तन्यैः पुपुपुः कचित् ॥ ११ ॥

३८ सन्यासनिर्णयः । ज्ञानिनामपि वाक्येन न भक्तं मोरयिष्यति । आत्मप्रदः प्रियश्चापि किमर्थ मोहयिष्यति ॥ २० ॥ तस्मादुक्तमकारेण परित्यागो विधीयताम् । अन्यथा भ्रश्यते स्वार्थादिति में निश्चिता मतिः ॥ २१ ॥ भक्तिमार्गेपि चेत्त्यागिन पूर्वोक्तदोप प्रसज्येत तदा फि कार्यमिति प्रश्नः । तत्रोच्यते, ससाधनमित्यर्थ । तदेवाहु अनारम्भे । भक्तिमार्गीयत्यागारम्भे । यद्यपि आरम्भभेदेन विरहानुभवानन्तर प्रचुरभावावस्थामावसमयो ज्ञाप्यते, तथापि पुनर्नाशो न स्यात् । यतस्तस्य पूर्वमेन सकलेन्द्रियाणा भगवदधीनत्वात् , तत्रैव विनि- योगकरणेन भगवत्स्वरूपैकनिष्ठविपयव्यसनवत्त्वमेव जातम् । न तु प्राकृतपिपयग्रहणख भावोपि स्थित , तत्तदभावे कुत तत्तदोपसममणावकाश इति भाव । एतेन तादृशभावस्यापि फलान्त पातित्वमेव, न तु साधनत्वमिति ज्ञापितम् । ननु तथापि विपयभोगपदार्थेषु दृऐपु यत्किञ्चित्स्वास्थ्य भवेदपि दृष्टो योऽन्त नाशक पदार्थ तस्याप्यभावान नाश इत्यर्थ । पदार्थे दृष्टे कदाचित्सम्भवेदपि, प्रकृते व्यसनानन्तर गृहस्थितेर्वाधकत्व मत्वैव तत्पदार्थाना साग कृत इति दर्शनस्याप्यभावात् तथेति भाव । अत एव 'यदा स्याध्यसन कृष्ण' इत्युक्त्या 'तादृशस्यापि सतत'मित्यनेन तस्य त्याग उक्त । ननु तथापि वासना चेत्तिष्ठति, तदपि तथा भवेदिति, तदभावमाहु खास्थ्यहेतोरिति । स्वास्थ्यहेतुपदार्थस्य परित स्त्यागाद्वासनासहितत्याग परित्याग , वासनया विषयग्रहण भवति, तदभावाद्वाप केन पदा थेनास्य सम्भवेत् । अपि तु न केनापीति भाव । वासनासहितत्यागकथनेन दृष्टेपि तस्मिन् न तद्ब्रहणमिति सूचितम् । अनेन पदार्थास्तादशस्य स्वास्थ्यहेतवोपि न भवन्ति, किन्तु भगव स्वरूपनिष्ठा एवेति ज्ञापित भवति । एतदेवोक्त निरोधवर्णने 'याधशङ्कापि नास्त्यन तदध्या सोपि सिध्यतीति । ननु तर्हि अदृष्टादिना स कदाचित्सम्भवेत् तपाहु । यद्यपि हरिः कालकर्मादीनामपि सर्वेषा नियन्ता सर्वेश्वर , तथापि तादृगवस्थानन्तर स्वस्य रसात्मकत्वेनैव तादृशस्य विलम्बजनितबाधा कर्तुं न शक्नोति । तत्करणे न रसो न वा कीर्ति , यत स्वय हरिः एताहगवस्थाजनितदु स हन्तुमेव रसात्मकसाक्षात्फलरूपत्वेन प्रकट । एतदेव 'पीताम्बर धर स्रग्वी' सेतस्य विवरणे विवृतमित्यनापि हरिपदेन स एवं भाव उक्त इति ज्ञापित भवति । एतेनेदानी बाधाकरणे खस्य फलरूप हरित्व च गच्छतीत्यनापि हरिपदेन स एवं भाव उक्त । तद्भावोत्कर्षश्च निरूपित । अत एव 'न पारयेह'मित्यादिवचनम् । एव सति हरिरेव न शक्नोति तर्हि अपरे कारकर्माद्यदृष्टादय कुत शक्ता भवन्तीत्यर्थ । अशक्तो दृष्टान्तमाहु अन्यथेति । यद्येतादृशस्यापि हरिधिा करोति, तदा मातरोपि स्खया रान् स्तन्यै पोषण न कुर्यु । यथा तासा खवालवाधकरणमशक्यम् , किन्तु पोषणमेव कुर्वन्ति, तथा हरेरपीति भाव । एतेन हरिरपि तसोपणमेव करोतीत्यपि सूचितम् । अथवा , , चाचाभीगोपेशविरचितविवरणसमेतः । हरेर्मातृदृष्टान्तकथनात् युक्तत्वानुपपत्तेः क्रियायाश्च विध्यर्थकस्सापेक्षितत्वात् पुपुपुरिति मृतार्थकतप्रयोगानुपपत्तेय कश्चन गूढामिसन्धिरस्तीति लक्ष्यत इति पक्षान्तरेण स एवोच्यते । तथाहि । हरिरत्र न शक्नोति कर्तुं वाधामित्यवासाधारणो हेतुः, यतो मातरः पुपुपुः इत्यन्वयसम्बन्धः । अयं भावः । पूर्व श्रीगोपिकानां गुरुत्वमत्र निरूपितमिति गुरुत्वात्ता एव मातृरूपा ज्ञेयाः। यथा गुरोर्वरदाने फलसिद्धिः, तथा तासां दान एव तावतैव सिद्धिः, नान्यथेति । तास्तादृशे अङ्गीकृते स्वभावपोपणं कृतवत्यः । अतस्तत्कृतौ प्रमोरपि शक्त्यमावो युक्ततमः, तद्भावाधीनत्वादिति भावः । ननु ता एतावत्किमर्थं कुर्युरिति चेत्तत्राहुः । अन्यथेति । यद्येता एव स्वस्स गुरुत्वात्तस्मिन् पुत्रत्वेपि सिद्ध एव पोपणं न कुर्युस्ततस्ताः अन्याः साधारण्यः सहजकठिनाः स्त्रियः । तास्तु मातरः स्वयालान् स्तन्यैर्न पोषयेयुरित्यर्थः । एतेन यदि ता अप्येवं कुर्वन्ति पुत्ररूपे तस्मिन् , एतासां परमवात्सत्यस्वभावात् पोपणं युक्तमे- वेति निरूपितम् । एतदेवोक्तं निरोधवर्णने 'पुत्रे कृष्णप्रिये रतिः'।एवं सति पूर्वोक्तानुपपत्तिद्वय- मपि निरस्तं भवतीति सर्वमनवद्यम् । अत्र दृष्टान्ते दान्तिके चमातर इत्यस्यावृत्तिः कर्तव्या। ननु यथा ज्ञाने स्वस्मिन् ब्रह्मभावस्फूर्त्या सर्वत्र ब्रहात्मकत्वमानादैक्यमेव भासते, नतु द्वितीय- पदार्थभानम् , तेन च तेषां सर्वदा स्वास्थ्यं तिष्ठति, तथा प्रकृतेपि खस्मिन् भगवदावेशे नासा- वहमियादिरूपज्ञाने केवलं तदैक्यमानमेव, न द्वितीयपदार्थस्येति ज्ञानमार्गीयैक्यप्रतिपादक- वाक्येन ऐक्यसाम्येन कदाचिदैक्यभावजनितमोहेन स्वास्थ्यं सम्भवेदित्याशंक्य तदभाव- माहुः । पूर्वोक्तैतावत्प्रत्येकप्रत्यूहेषु सत्स्वपि यदि तन्निवारणेनैतावत्पर्यन्तं तद्रक्षामेय कृतवान् प्रमुः, तदा ज्ञानिनामपि वाक्येनैक्यप्रतिरूपेण भक्तं तादृशं न मोहयिष्यति । तथा चोक्तंभ्रमरगीते श्रीमदुद्धवोक्तैः श्रूयतां प्रियसन्देशः' 'मवतीनां वियोगः' इत्यायैक्यप्रतिपाद- कज्ञानिवाक्यैस्तासां मोहो न जातः, किन्तु तच्छ्रवणेन प्रत्युतातितप्ततैलपतितजलबिन्दुवत् प्रचुरतीवविरहामिज्वालजालज्वलितास्ता अभवन्निति । प्रकृतेपि तादृशावस्थायां तथा न करि- प्यति, प्रत्युत तद्रीतिमेव करिष्यतीति भावः। नन्वेवं सर्वथाऽखास्थ्यकारक तापमेव कथं स्थाप- यति, तत्र हेतुमाहुः आत्मप्रदः प्रियश्च, अतः किमर्थं मोहयिष्यति । अयं भावः । अत्र मगवान् रसात्मकः साक्षात्वरूपानन्ददानार्थम् , मुख्यतस्तत्र प्रीतिरूपो गुणश्च हेतुः । स वै ताशावस्थाभावे पुष्टो न भवति, किन्तु च्युत एव तिष्ठति, तत्पुष्टत्वाभावे तद्दानमपि न सि- ध्यति, रसात्मकत्वादेव साम्ये सर्वदा स्थापयति । एवं सति यत्र भगवतः खरूपानन्ददानेच्छा प्रियत्वं च,तत्र तद्वाक्यजनितमोहो न भवति । यत्र नैतदुभयम् , तत्र मोहो भवतीति सूच्यते। तथा चोक्तं दशमस्कन्धे 'द्विजपत्नीषु तदानन्ददानेच्छाभावात् पुष्टिमार्गीयप्रियत्वामावाच न प्रीतये अनुरागाये'त्यादिज्ञानिवाक्यजनितमोहो जातः । यतः ताः परावृत्य स्खगृहानगमन् । फल- प्रकरणे तु श्रीस्वामिनीनां सर्वत्यागेनागमनपूर्वकमनन्तरमेव पूर्ववदेव 'श्रवणाद् दर्शना'दित्या- दिवाक्यैः खात्मदानेच्छासद्भावात् पुष्टिमार्गीयप्रियत्वस्यापि विद्यमानत्वान्मोहो न जातः, प्रत्यु- - संन्यासनिर्णयः । तेश्वरवाक्यानां सर्वाधिकमलत्वेपितन्निराकरणं चकुरिति सुसूक्तं किमर्थं मोहयिष्यतीति । अतः परमेतावदुक्तस्य निर्गलितार्थमाहुः । यस्मात्साधनार्थपरित्यागो विधीयतां क्रियतामित्यर्थः। अन्यथा पुष्टिमार्गीयभावाभावे तस्मिन् कृते स्वार्थात् पुष्टिमार्गीयपुरुषार्थादश्यते च्युतो भवतीत्यर्थः । अत्र प्रमाणमाहुः इति मे निश्चिता मतिः। इति यस्य धर्मस यथा खरूपं तत्स्वरूपज्ञानादेव तस्मिन्निश्चयः । खमतेरेवेति स्वस्यैव मतिः प्रमाणत्वेनोक्ता ॥१७-२१॥ एवं संन्यासनिर्णयं कृत्वोपसंहरन्ति । इति कृष्णप्रसादेन वल्लभेन विनिश्चितम् । संन्यासवरणं भक्तावन्यथा पतितो भवेत् ॥ २२ ॥ इत्येवं प्रकारेण भक्तौ सत्यां एव संन्यासवरणं कर्तव्यत्वेन निश्चितम् । तत्र हेतुभूतं साधनद्वयमाहुः कृष्णप्रसादेन वल्लभेन चेति । कृष्णपदेन रसानन्दात्मक- गूढभावात्मत्वं सूचितम् । तादृशस्य प्रसादेन, प्रसादस्यापि नैकविधत्वं सम्भवतीत्युक्तं वल्ल- भेनेति, अतिप्रियेणेत्यर्थः । एवं एतेन भावात्मकप्रीतिगुणविशिष्टत्वं प्रसादस्य ज्ञापितम् । तादृशत्वाभावे परित्यागखरूपज्ञानमेव न मवेत् , निश्चयः कथं कर्तुं शक्यः । तत्रापि विशेषेणेदमित्यतयेति मदुक्तस्स सन्देहो न कार्य इति निरूपितम् । निश्चयकरणप्रयोजनमाहुः अन्यथेति। एतत्करणाभावे परित्यागस्वरूपाज्ञानात् अधिकाराभावे कृते त्यागे साङ्गीकृतोपि पतितो भवेत् , पूर्वोक्तप्रकारेण भक्तिमार्गाष्टो भवेदित्यर्थः । एवं सति परमकारुणिक- स्वभावात् स्वकीयानां रक्षैव कृतेति भावः ॥ २२ ॥ श्रीमदाचार्यकरुणां वर्णयामि कथं यतः । यतः स्वतस्त्यागभावप्रकाशं मादृशेऽकरोत् ॥१॥ ययेमे ज्ञापिता भावाः स्थापयतु स एव तान् । यादृशस्तादृशः स्वीयस्त्वदेकशरण विभो ॥२॥ यदन मन्मतेर्दोपाविरुद्ध प्रभवः स्वतः । क्षमन्तां तत्र च तवाश्रयण शरणं मम ।। ३॥ इति श्रीघनश्यामात्मजश्रीगोपेशविरचितं संन्यासनिर्णयविवरणं समाप्तम् ॥

श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः। श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः । संन्यासनिर्णयः। श्रीगोपेश्वरविरचितविवृतिसमेतः । विविधविरहभावावेशजक्लेशभाजामनुभवविषयः सन् गोपिकानां कृपाब्धिः । कलयति निजरूपानन्दपीयूषपानं सकृदपि स कृतार्थ मां प्रसन्नः करोतु ॥ १॥ श्रीगोपिकाधीशपथानुगानां सेवाकथासक्तिसमर्थनाय । य एक एवास्ति विभुस्तमेव श्रीवल्लभाख्य मुहुराश्रयेहम् ॥ २ ॥ श्रीमद्बलभसूनोः श्रीविठ्ठलनामधेयस्य । पदकमलद्वयममलं मनसि मदीये समुल्लसतु ॥३॥ स्वाचार्यचरणपङ्कजपरागपुरुरागपरभागान् । अभिवन्दें पितृचरणानहमतिभक्त्या तदाप्तमतिः ॥ ४ ॥ अथामायाद्यखिलप्रमाणप्रतिपन्नरसात्मकश्रीपुरुषोत्तमविरहानन्दविविधभाववृन्दानुभव- स्य सर्वात्मभावप्रपत्तिमात्रप्राप्यत्वात् सर्वपरित्यागमन्तरेण तदसम्भवादावश्यको भक्तिमार्गे स च कर्मज्ञानभक्त्यादिमार्गभेदाद्विभिन्नरूप इति स्वमार्गीयपरित्यागमतिवि- लक्षणमनाकलयतां ततत्संशयवशंवदानां निजमार्गाङ्गीकृतजीवानामविचारितः परित्यागः पश्चात्तापायैव भवितेति सकलसंशयापनुतिपुरःसरं तदपगमाय स्वभक्तेपु परमानुपमकृपा- किर्मीरितमूर्तयः श्रीमदस्मदाचार्यचरणाः किश्चित्प्रयोजनं प्रकटमुदीरयन्तस्तद्विचारप्रतिज्ञा- माचरन्ति पश्चात्तापनिवृत्त्यर्थमिति । पश्चात्तापनिवृत्त्यर्थं परित्यागो विचार्यते । स मार्गदितये प्रोक्तो भक्तौ ज्ञाने विशेषतः॥१॥ मक्तिमार्गे पुरुषोत्तमखरूपमेव फलमितरत्तत्सम्बन्धित्वेनैव तथात्वेनोच्यत इति राद्धा- न्तात् तस्य च 'रसो वै स' इत्यादिश्रुतिभ्यो रसत्वेन सिद्धत्वादुमयविधमुख्यरसात्मनः खमार्गपतेः स्वरूपानन्दं श्रीमदाचार्यपर्यवरणवशात्प्रभुसेवादिपरतया सुखं गृहादिषु सतां संयोगप्रकारेण ययाधिकारमनुभवतामपि विप्रयोगप्रकारेण तदनुभवाभावादन्तरेपोन्मिप- परित्यागः, ४२ टस्ताप सन्यासनिर्णय । द्विरनन्तविधैरमिलापे सन्तत दन्तुरितस्वान्तानामस्माक शुद्धपुष्टिमार्गाचार्यसम्यन्धिनामपि स्वमार्गमुख्यफलविप्रयोगभावानुभवो न भविष्यति । तस्य सर्वात्मभावान्तर्गतसर्वत्याग साध्यत्वादस्मासु तज्ज्ञानस्याप्यभावेन क तदाचरणतत्फलादिसम्भावनापीत्येवरूपो य उत्क स पश्चात्तापपदेनानोच्यते । यतोयमुररीकृतमुररिपुमार्गनिपुणतराणामाचार्यवर्यपद- पद्मप्रसादजुपामेवाधिहृदयमुदयमासादयति, न पुन साधारणानाम् , तन्निवृत्तिश्च भक्तिमार्ग प्रवर्तकश्रीमदाचार्यचरणेकसाध्येति । तदर्थ परित्यागः सन्यास स्वमार्गीय श्रीमदाचार्य चरणैर्विचार्यते । स्वरूपत फलत सम्यक्तयामागीन्तरीयतदसङ्कीर्णत्वेन निरूप्यत इत्यर्थ । तथा च वक्ष्यमाणविधया विचारित स्वमार्गीयसन्यासस्वरूपादिक सम्यगवगम्य भगवदशी काराधिकारतारतम्यभाजस्ता प्रवर्तमाना विगलितपश्चात्तापास्तदनुरूप फलमनुभविष्यन्तीति भाव । यद्वा । भक्तिज्ञानयो सिद्धदशायामेव सन्यास साधीयान् , न साधनदशाया, तदा तादृशरैराग्यविरहेण कृतस्यापि तस्गनिर्वाहात् पश्चात्ताप एव पर्यवसित इत्येतत्तारत म्यानवगमे त्यक्तासिलानागपि भक्ताना पश्चात्ताप तदर्शनेन स्वस्यापि स स्यादिति तदनु- पत्त्यर्थं परित्यागो विचार्यत इत्यर्थ । अथवा, जीवाना प्रभुप्राप्त्यर्थ भक्तिमार्गमाविष्कृत पनि श्रीमदाचार्यचरणेरवश्य खमार्गीय परित्यागोपि मुख्यफलसिद्ध्यर्थं प्रागेव निरूप णीय । स तदैन न क्य निरूपित । किमिति विलम्ब कृत इति य पश्चात्तापो भवेत्तद पगमाय परित्यागो विचार्यत इत्यर्थ । ननु विचारविषय परित्याग कर्तव्यतया क्वाभिहि तस्तदनन्तर तनिर्णयवार्तेत्याकाक्षायामाहु स मार्गद्वितय इति । स परित्यागो मार्ग- द्वितये भक्तौ ज्ञाने विशेषतः विरक्षणफलसाधकत्वलक्षणाझ्यावर्तकधर्मत प्रोक्त, श्रुतिश्रीभागवतादिष्वभिहित इत्यर्थ । अत एव 'सन्त्यज्य सर्वविपया'नित्यादिपु य सर्व त्याग श्रीवास्थभक्तेपु स पर्यवसितविप्रयोगानुभवफल एव, ज्ञानमार्गीयेषु तु स नेवविध , किन्त्वपरर्गपर्यवसायी । यद्वा, विशेप परिपाकदशा भक्तिज्ञानयोस्तदनन्तरमेव परित्याग प्रोक्त । अन्यथा तद्धर्मनिर्वाहाभावेन दोपविशेषपर्यवसानापातात् । निशेपत इति ल्यप्लोपे पञ्चमी । तया च भक्ती ज्ञाने च विशेष सिद्धदशापनत्व प्राप्येति वार्थ । अथवा, विशे पत इत्यस्य प्रत्यासत्तिवशाज्ज्ञान इत्यनेनेवान्वय । इत्यथैकजन्मनि परित्यागेन ज्ञानमार्गे मुक्त्यमावादनेकजन्ममु तत्करणमेव विशेषपदार्थोवसेय ॥१॥ नन्वेष कर्ममार्गेपि परित्यागकरणे किं बाधकमित्याशकाया ततिषेधमाहु फर्ममार्गे न कर्तव्य इति । फर्ममार्ग न कर्तव्यः सुतरा कलिफालतः । अत आदी भक्तिमार्गे पर्तव्यत्याद्विधारणा ॥२॥ कर्ममार्गो हि सकामनिष्कामभेदेनानेकरिधर्मकरणरूप , तयाधिश्रुतिनिरूपित, तस्मिन्परित्यागो विकाश इति न कर्तव्यः । न च 'यदहरेव मिग्ने' दिति श्रुत्या योधित त्यापरित्यागः सनि निवेदे दुगार इति वाप्यम् । कर्ममार्गस कलनादिक्तनाकन्दरितका श्रीगोपेश्वरविरचितविवृतिसमेतः । मनाकलापस निर्वेदोदयनिदानभावायोगात् । न च निष्कामकर्मकरणं मनोमलिनिमानमप- नीय विरक्तिमुत्पादयिष्यतीति वाच्यम् । तत्रापि सहधर्मिणीसाहित्यनयत्येन तव्यत्यूहानपा- यात् । न च निष्कामकर्मकरणमेव संन्यास इति वाच्यम् । कर्मत्यागस्यैव तथात्वौचित्यात् । न च काम्यकर्मत्यागमादाय तयात्वं शक्यवचनम् । सोचे मानाभावात् । कचित्तस्मि- अपि तत्प्रयोगस्यौपचारिकत्वात् । मुगुक्षणां सर्वतत्यागदर्शनाच । न च मुमुक्षुपु जीव- न्मुक्तेषु च तत्तत्कर्मकृतिव्यापतिरुक्तैवेति वाच्यम् । भगवनियोगेनैव तेपु लोकसहाद्यर्थ- त्वात्तस्याः । किवास्तामन्यद्वाधकम् , काल एव वलवद्वाधकस्तत्रेत्याहुः सुतरां कलिका- लत इति । कलिकालस्तावद्भगवद्भजनस्यैव साधकस्तदतिरिक्तस बाधक एवेति तत्र तत्र सिद्धम् । तया च तथाभूतात्तस्मादनिर्वाहप्रत्यवायादिकं प्रतीत्य कर्ममार्गे सुतरां संन्यासो न कर्तव्य इत्यर्थः । एतेन काम्यकर्मत्यागलक्षणो गोपोपि त्यागः प्रत्युक्तः । मुख्याहत्या- कालो निर्दिष्टः, परमय देशादीनामप्युपलक्षकः । तेन कलौ देशक यशुद्ध्यापि न परि- त्यागः कर्ममार्गे सिध्यति । अत एवायुपस्तुर्यमागे संन्यास इति मतमपि वैराग्यं विना तदसम्भवेन भक्तिज्ञानपरिपाक एव तहाडयन तत्रैव सावकाशमिति कालादिदोपार कर्ममार्गे निरवकाशमिति ध्येयम् । एवं कर्ममार्गे परित्यागं प्रतिपिध्य भक्तिज्ञानमार्गयोः कर्तव्यतया परिशेपिते तस्मिन् प्रथमं कुत्रत्ये विचारः कार्य इत्यत्राहुः अत आदाविति । यतः कर्ममार्गे याधप्रौव्यात् परित्यागो न कर्तव्योतो भक्तौ ज्ञाने च कर्तव्यतया तद्विचारस्य प्राप्तौ स्वस्य भक्तिमार्गप्रवर्तकत्वात् भक्तेः प्राथम्याच सिद्धदशायां च तस्य कर्तव्यत्वादादी भक्ति- मार्गे परित्यागस्य विचारणा । भक्तिमार्गे कि साधनदशायामेव परित्यागः कार्यः, किं वा फलदशायामाहोखिदुभयत्र वेतिरूपा क्रियत इति शेषः ॥ २॥ ननु भक्तिमार्ग परित्यागः स्थापितश्चेत्तदा साधनदशायामपि स वर्तव्य इत्याशक्य सहेतुकं तदनङ्गीकारमाहुः श्रवणादिप्रसिद्ध्यर्थमिति । श्रवणादिप्रसिद्ध्यर्थ कर्तव्यशेत् स नेष्यते । सहायसङ्गसाध्यत्वात् साधनानां च रक्षणात् ॥ ३ ।। अभिमानानियोगाच तद्धर्मश्च विरोधतः । गृहादेोधकत्येन साधनार्थ तथा यदि ॥ ४ ॥ अग्रेपि तादशैरेव सङ्गो भवति नान्यथा। स्वयं च विषयाक्रान्तः पापण्डी स्यात्तु कालतः॥५॥ विषयाक्रान्तदेहानां नावेशः सर्वदा हरेः। अतोऽत्र साधने भक्तो नैव त्यागः सुग्बावहः ॥६॥ श्रवणादीनि यानि साधनरूपाणि तेषां प्रकर्षेणान्यग्रतया सिद्धिनिष्पत्तिहादिपु व्यासलकेषु न सम्भवतीति तदर्थ स परित्यागः कर्तव्यश्चेत् , नेप्यते नांगीक्रियत इत्यर्थः ।

, संन्यासनिर्णयः। श्रवणादीनां प्रसिद्धिरुत्कृष्टफलं तदर्थ परित्यागः कर्तव्यश्चेन्नाङ्गीकियत इति कार्थः । कुत इत्याकांक्षायामाहुः सहायसगसाध्यत्वादित्यादि । गृहादिपु तत्कार्यव्यासङ्गसानि- वार्यत्वादेकान्ततः श्रवणादिसाधननिवाहो न भवतीति तत्परित्यागेन कचित्तचित्तैकाम्येण सम्पादनीयमिति मनसिकृत्य यस्त्यागः स कयमुपपद्यतां, यतः श्रवणादीनि सहायसहसा- ध्यानि, सहायाः कथकादयो विविधखमावाः, तेपां सङ्गः सद्भावेन तदुपसत्तिरूपः, तेन सम्पा- घान्यतस्त्यागानन्तरमावश्यकस्यासङ्गत्वादेर्भङ्गप्रसङ्गतः प्रशिथिलवैराग्यात् पुनस्तत्तदाकांक्षो- न्मअनेन च न श्रवणादिसाधना) परित्यागः शक्याभ्युपगमः । किश्य, त्यागमात्रान्न कार्य- सिद्धिरिति श्रवणादिसिपाधयिपोस्तत्साधनानां तत्तदवसरे उपेक्षितानां रक्षणं कर्तव्यं, तत- स्त्यागः कथं लब्धात्मकः स्यात् । अपि च, साधनमार्गीयस्स कृतेपि त्यागे तत्तत्पदार्थेषु श्रवणाद्यर्थमपेक्ष्येषु नाभिमानो निवर्तते, प्रतिक्षणमुदेत्येव, त्यागे च स निवर्तनीयः सर्व- थेति तत्सत्त्वे स न युज्यते । साधनदशायां वेदाज्ञारूपभगवनियोगाच वर्णाश्रमधर्माणा- मुलधनं न शक्यमित्यशक्य एव सागः । अन्यच, श्रवणादिसाधनानां तद्धमैः परित्या- गधर्मः पर्यटनादिभिः समं विरोधो न शायविधूनन इति न कथमपि साधनभक्तिरूपन- वणादिषु परित्यागः सम्भवति । ननु तथापि गृहादिकं सत्सङ्गासम्पादकतया श्रवणादिपु प्रति- पक्षभूतमतस्तदर्य तत्परित्याज्यम् , तथा सति कदाचित् सत्सङ्गोपि स्यादित्याशंक्य समाधान- माहुः गृहादेरिति । बाधकत्वेन श्रवणादिविरोधित्वेन । साधनार्थ श्रवणाद्यर्थम् । सथा यदि परित्यागश्चेत् । तदा अग्रेपि त्यागानन्तरमपि तथाविधदायाभावात्ताशेरेव परित्यक्तश्रवणादिपरिपन्थिगृहादिसशैरेव सङ्गो भवति, अन्यथा प्रकारान्तरेण गृहा- दिपरित्यागरूपेण श्रवणादिकं तु न भवतीत्यर्थः । ननु भवतु भवनादिपरित्यागकर्तुस्ताह- गपरसङ्गः, तथाप्यन्तरुद्गतवैराग्यादिनैव श्रवणादिनिर्वाहो भविष्यतीति न तत्त्यागोनुचित इति चेत्, तत्राहुः स्वयं चेति । यदि वैराग्यमन्तर्जागरूकं भवेत् , तदा क्रमेण बाधक- निबर्हणे निर्वहेदपि श्रवणादिकम् , परन्तु साधनदशायां तादृशं तदेव दुरापम् , अतस्त्यागस्तु विरोधिभिर्विधूयेतैव, किन्तु स्वयमपि तु पुनः विपयैरागन्तुकैरनेकरूपैर्भोग्यैराकान्त उपम- दितः सन् कालतः कलिरूपात् भक्तातिरिक्तपरिपन्थिनः पापण्डी तत्तद्विरुद्धाचरणवान् भवेदित्यर्थः । सकामत इति पाठे क्रोधलोभाधुपलक्षकात् कामतो बलिष्ठदोपात् स तथा स्पादित्यर्थः । तेन विना वैराग्य त्यागोधमः, तत्तद्विषयप्रतिहतः, फलाय नावकल्पते, प्रत्युत प्रत्यवायमेव सम्पादयति, प्रमाणविरुद्धाचरणमुत्पाद्येति भावः । ननु विपयैराक्रमणेपि श्रवणादिभिर्भगवदावेशस्यापि सम्भवात्तन्महिना त्यागो निष्प्रत्यूह इति चेत्तत्राहुः विष- याक्रान्तदेहानामिति । भगवदावेशे सति त्यागे न कापि क्षतिः । किन्तु विपर्दैहा- दिकं येषामाकान्तं तेषां हरेः सर्वदुःखहर्तुर्विपयदोपदवीयसो निर्दोपसेव्यस्साशो हृद- यादावागमनं तत् सर्वदा कस्मिन्नपि काले न भवति । किन्तु 'विषयान् ध्यायत' इत्युक्तरीत्या नाश एव भवतीत्यर्थः । न च विषयाणां श्रवणायनभिभावकलान तत्प्रयुक्तमगवदावेशा- श्रीगोपेश्वरविरचितवितिसमेतः । नुपपत्तिरिति वाच्यम् । 'नराणां क्षीणपापाना'मिति वाक्यात्तादृशेष्वेव श्रवणादि प्रयोज्य प्रभ्वावशस्योपपत्तेः । न च 'पाध्यमानोपि मद्भक्त' इत्यादिवाक्यैर्विषयसत्त्वेपि का क्षतिरिति वाच्यम् । उक्तवान्यानां विषयसुखवैमुख्येन सेवमानस्य प्रमादात्तत्कृतयाधेपि प्रभुरति- कृपास्तदोषमपाकरोति, अतो न विषयाभिभव इत्यभिप्रायकत्वात् । अत एव प्रायःपदमु- पात्तं तत्र ।एतद्वाक्याभिप्रायान्तरमस्मपितृव्यचरणकृतौ विवेकधैर्याश्रयविवृती विलोकनीयम् । एवं साधनभक्तिमार्गे समर्थितं सागाभावमुपसंहरन्ति अतोनेति । यतो यहून्येव पाधकान्युक्तान्यतोत्र साधने भक्तौ श्रवणादिरूपसाधनभक्तिमार्गे त्यागः संन्यासः सुखावहः आनन्दहेतुनैव भवतीत्यर्थः । साधनपदमेवकारश्च फलभक्ती त्यागस्य सुखनैयत्यापगत्यै ॥ नन्वेवं भक्तिमार्गे न युक्तश्चत्परित्यागः, तर्हि ज्ञानमार्ग एवास्ताम् , एवध भक्तिमार्गे व्यर्थस्तद्विधार इति चेत्तत्राहुः विरहानुभवार्थमिति । विरहानुभवार्थ तु परित्यागः प्रशस्यते । स्वीयबन्धनिवृत्त्यर्थ वेपः सोऽत्र न चान्यथा ॥ ७॥ कौण्डिन्यो गोपिकाः प्रोक्ता गुरवः साधनं च तत् । भावो भावनया सिद्धः साधनं नान्यदिष्यते ॥८॥ विकलत्वं तथास्वास्थ्यं प्रकृतिः प्राकृतं न हि । ज्ञानं गुणाश्च तस्यैवं वर्तमानस्य बाधकाः ॥९॥ सत्यलोके स्थितिज्ञानात् संन्यासेन विशेपितात् । भावना साधनं यत्र फलं चापि तथा भवेत् ॥ १० ॥ तादृशाः सत्यलोकादौ तिष्ठन्येव न संशयः। यहिश्चत्मकटः स्वात्मा यहिवत्प्रविशेद्यदि ॥ ११ ॥ तदैव सकलो पन्धो नाशमेति न चान्यथा । गुणास्तु सद्गराहिल्याजीवनार्थं भवन्ति हि ॥१२॥ भगवान् फलरूपत्वान्नान याधक इष्यते । स्वास्थ्यवाक्यं न कर्तव्यं दयालुन विरुध्यते ॥ १३ ॥ दुर्लभोयं परित्यागः प्रेम्णा सिध्यति नान्यथा ॥ १३ ॥ तुशन्दः साधनमार्गीयत्यागव्यावृत्त्यर्थः । साधनमक्ती परित्यागस वहुवाधका- स्कन्दितवेनासम्भवेपि रसात्मकस प्रभोः परगफलरूपद्वितीयदलविविधभावास्वादन- लक्षणो यो विरहानुभयस्तदर्थ परित्यागः सर्वात्मभावाङ्गभूतः संन्यासः प्रशस्यते, प्रशस्तो भवति, किंवा प्रकण मोक्षाधिककक्षापन्नत्वेन कथ्यत इत्यर्थः । तेनातिशयितभगवदगी. कारात्तयाधिकाराधिगमैन विधीयमानः परित्यागः परमपुमर्यरुपतद्विप्रयोगरसानुभावक- तया भक्तिमार्ग भव्यतम एवेत्येतद्विचारः गुचारुतर इति भावः । ननु ज्ञानमागीयसंन्यास- . संन्यासनिर्णयः। ग्रहणे यथा विहितत्वात् कापायवखवेपः क्रियते, स हि सातिशयो मोक्षार्यः, तथा भक्ति- मार्गीयसंन्यासग्रहणे स न भवतीति किमर्थ तत्सम्पादनमिति चेत्तत्राहुः स्वीयबन्धनि- घृत्त्यर्थमिति । अत्र विरहानुमवार्धे भक्तिमार्गीये परित्यागे ज्ञानमार्गीयसंन्यासे प्रसिद्धो वेपस्तं विना मार्यादिभिः प्रतिबन्धः कार्य इति स्वीयैर्दारादिमिर्यो यन्धः प्रतियन्धः, किंवा स्वीयेषु यन्ध आसक्तिः प्रतिवन्धरूपा तन्निवृत्त्यर्थ कर्तव्यो, न चान्यथा, प्रकारान्तरण ज्ञानमार्गीयेण न कर्तव्य इत्यर्थः । यथा ज्ञानमार्गीयसंन्यासे तादृग्वेपस्यादृष्टविशेपद्वारापवर्गोपयोगित्वम्, न तथा भक्तिमार्गीयसन्यासे, तस्य स्वीयबन्धनिवृत्तिमात्रप्रयोजनत्वेनैवात्र कर्तव्यत्वादित- स्था तदभावादिति भावः । ननु ज्ञानमार्गे गुरुतदुपदिष्टसाधनादेरिष्टसिद्धिः, न पुनः संन्यासमाबाद, भक्तिमार्गीयसंन्यासे तु तदप्रसिद्धः कथं फलसिद्धिरित्याशझायां तत्प्रसि- द्धिमाहुः कौण्डिन्यो गोपिका इति । कौण्डिन्यो महर्पिः स गुरुः प्रोक्तः, गोपिका पोपभूपणरूपाः सीमन्तिन्यः, ता भक्तिमार्गीये विरहानुभवपर्यवसायिनि संन्यासे गुरवः प्रोक्ताः, श्रीभागवतादिषु सम्याथिता इत्यर्थः । अत्रायमभिप्रायः । कौण्डिन्यस्यानन्तगुण- वर्णनाकर्णनोदीर्णतदभ्यर्णगमनादिमनोरयाणवभवदनन्तभावसन्तप्ताशेपकरणवृत्तेः कृत्लप- रित्यागेन विपिनगहरादिपु तद्वेपणविवशस्य सर्वपरित्यागपूर्वकताटगार्तिलक्षणविर- हानुभवहेतुभावप्रकाशकत्वमस्ति । गोपिकानां तु स्वप्राणप्रेष्ठप्रस्फुरत्सर्वात्मभाववत्तया रासोत्सवादिप्रस्तावे तथात्वं स्फुटतरमेवेति लोकवेदातीतशुद्धपुष्टिमार्गीयप्रकारस्य प्रभुणा स्वप्रयोजनार्थ सभोग्यभत्तस्थापितस्य प्रथमं तत एव प्राकट्यात्तत्रैव गुरुत्वं समलसतमम् । महौ तु तद्दर्शनार्तिप्रकर्षतौल्यातदुक्तिः, प्रमाणमार्गीयस्यात्र मुख्यं गुरुत्वमयुक्तमिवेति । तेन गुरुत्वमचैतत्परित्यागफलसाधनीभूतभावप्रकाशकत्वं विवक्षितम् , न तूपदेष्ट्रत्यम् , तस्य प्रकृतेऽभावात् । एतत्संन्यासस्य ज्ञानमार्गीयतद्विलक्षणत्वेनैतादृशस्यैव तस्य वक्तुमौचित्यात् । उपदेतृत्वस्यापि तदर्थज्ञापनमात्रौपयिकतया फलतो विशेपाभावाच । अत एव 'एवं सत्यस्मि- न्मार्गे खामिन्य एव गुरव इति ज्ञापितं भवतीति निरोधविवृतिप्रकाशे श्रीमदस्मत्प्रभुचरणचा- रूक्तियकास्ति । 'स्वामिन्य एवेत्येवकारान्मुख्यं गुरुत्वमेतासामवसेयमित्यन्यदेतत् । किश, न केवलमेता एतादृशभावमात्रस्य निजमार्गीयस्य प्रकाशिकाः, किन्तु यथा स्वभजनपरा- णामेतद्भावफलं सिध्यति, तथानुकम्पा सम्पादिका इति विरहानुभवात्मकफलौपयिकधर्म- वत्त्वलक्षणं साधनत्वं गुरुत्वेपि न विरुद्धं, करिव निमित्तकारणत्वमित्याशयेनाहुः साधनं च तदिति । तत्प्रसिद्धं मुख्यं साधनं गोपिका एवेत्यर्थः । चोप्यर्थे । तेन श्रीम- दाचार्यचरणानुग्रहमरविजृम्भिततत्प्रकटितैतन्मार्गीयप्रकारपरिकलनावतामेतनावसजातीयभाव- वत्तयैतद्भजनपूर्वकं प्रभुभजने यथोक्तमुख्यफलं भवतितरां निर्विचिकित्समिति भावः । अत् एव भगवद्जनापेक्षयाप्यतासां भजनमुत्तममिति सूक्तिः श्रीमदाचार्यचरणानाम् । नन्वेवमेतासु गुरुत्वे व्यवस्थापितेपि किमेतप्रकाशितं स्वमार्गीयं साधनमित्यत आहुः भाय इति । सर्वात्मभावयुक्तानां भक्तानां विप्रयुक्तत्वदशावशाझुन्मिपतो मनोवागविषयस्य श्रीगोपेश्वरविरचितविवृतिसमेतः । मावस्य भगवत्स्वरूपात्मकत्वेन रसात्मकत्वात्तस्य भावनया खाचार्यानुग्रहमरसगुत्यतयाविध- भगवदगीकारादेवोदयमानया सिद्धः पर्यवसितो यस्तत्सजातीयोऽनुभवकगम्यो भावः स एव तन्मागायतया पूर्वोक्ते परित्यागफले साधनमिष्यते, अन्यत् ज्ञानमार्गीयत्यागे प्रसिद्धं किमपि साधनत्वेन नेष्यते, नागीक्रियत इत्यर्थः । यद्वा । असिद्धस्य मावस्य सा- धनत्यायोगेन प्रियतमस्स गुप्ततया स्थितस्य विप्रयोगरीया तत्तद्भावपोपकस्य तादग्भक्त- निजविषयकोत्कटार्तिनिरीक्षणेन प्रतिक्षणविलक्षणरसभावानुभवविचक्षणस प्रभोः शुद्धपुष्टि- भक्तकर्तृकया परमार्तिपूर्वकप्रियान्वेषणतर्वादिप्रश्नगुणगानतत्तदवस्थासम्बन्धिभावविषयिण्या भावनया तेष्वेव सिद्धः फलितो यः कोप्यनिर्वचनीयोनुभवैकविषयवैभवः स्वविषयातिरिक्त- स्मरणहरणखमावः स एवोक्तभक्तानामनुग्रहेणैव कदाचिदन्यत्रापि कचिदुदितः परित्याग- फले साधनमिप्यत इत्यर्थः । एतेनोक्तभक्तानां गुरुवं सम्यगुपपादितं भवतीति भावः । नन्वहर्निशं विरहमावनामभ्यस्यतस्तत्परिपाकदशायां नियमतो वैकल्यावस्थ्यादिकं यद्भवति तत् कथं फलरूपरसभावेऽन्त वाहम्, लौकिकतत्तुल्यरूपत्वदर्शनेन प्राकृतत्वस्स दुरित्वादिति चेत्तत्राहुः विकलत्वमिति । विकलत्वमनुसन्धेयस्याननुसन्धेयस्य चा- ननुसन्धानानुसन्धानान्यथानुसन्धानादिजनको व्यभिचारिभावः । तथा तत्सदृशं व्यमिचारि- मावरूपं प्रथमानुभूतप्रियविषयकतत्तदर्थोत्कटामिलापजनितमस्वास्थ्यं, येन तदतिरिक्त वस्तु- नि रुचिव्याघातः । ईदृशभावानामन्येपामुपलक्षणमेतद्वयं फलीभूतस्स विरहभावस्य प्रकृतिः प्रकारः स्वभावो वा, हि यतः प्राकृतं लौकिकं दुःखादिजन्यं न भवति, अतः फलरूपरसभा- चान्तर्भावो नैतस्यानुपपन्न इत्यर्थः । नहि यजातीयं कार्य दुःपादितो जायते, न तजातीयं सुखादित इत्यस्ति नियमः । शोकादिव हर्षादप्यश्रृगमादेर्दर्शनात् । अत एवैवमुक्त श्री- मदाचार्यचरणैर्दशमस्कन्धविवरणे, 'नहि दोपेणैव कार्य भवति, गुणेन न भवतीति वक्तुं शक्यम्, दुःखादप्यश्रूणि आनन्दादप्यशृणीति । एवं संन्यासफलसाधनादभिधाय, तत्सम्पत्तिमतो वाधकान्याहुः ज्ञान मिति । एवं विकलत्वाखाथ्यादिना वर्तमानस्य सतस्तस्य भक्तिमार्गीयपरित्यागवतः । किञ्चैवं परित्यागप्रकारेण वर्तमानस्य भक्तिमार्गीयस्स तस्स विकलत्वास्वास्थ्यादिभावस्य ज्ञानमात्माभेदानुभवरूपं पहिःसंवेदनाधभावद्वारा तार- क्तीवतापोपशामकतया स्वास्थ्यप्रयोजक, गुणा भगवतो धर्माः, पूर्व पहुधानुभूता वह्व एवानुभवैकवेद्या ये सजातीयभावभक्तैः सम्भूय भूयः क्रमेण मिथो गीयमानाः स्वास्थ्यमु- पजनयन्ति, पाधका विरोधिन इत्यर्थः । ननु ज्ञानमार्गे संन्याससहकृतात् ज्ञानाधादृशं फलम् , भक्तिमार्गेपि लागातादृशमेव भविष्यतीति न फलत कोपि विशेष इति चेत्तत्राहुः सत्य- लोक इति । फलभेदः सामग्रीभेदप्रयोज्य इति ज्ञानमार्गीयेण संन्यासेन विशेषितात् ज्ञानात् तत्त्वज्ञानात् सत्यलोके स्थितिब्रह्मलोकप्राप्तिरिति यावत् , सा ज्ञानमार्गीयस्य संन्या- सिनो भवति, भक्तिमार्गीयस्य तस्य रिहमावानुभावकभावमिद्धिहेतुभूतया भावनया संन्यासनिर्णयः । सहकृतत्यापन भक्तिमार्गीयत्यागे, भावना साधनं प्रयोजिका, तत्र फलमपि तथा, तेनैव प्रकारेण विरहानुभवात्मकं भवेत् । नतु सत्यलोकादिसशं, कारणानुरूपस्यैव कार्यस न्याय्यत्वात् । सत्यलोकायेतत्यागफलयोस्तारतम्यं तु सुमेरुसर्पपयोरिव सुप्रसिद्धमेवेति क इतोधिको विशेपोभिधेय इति भावः । किय, ज्ञानमार्गीयस्य त्यागिनः फलं यन्मुख्य- तयासातमपवर्गाख्यम्, तदपि न त्वरितमेव भवति, किन्त्वतिविलम्वेनैवेत्समिसन्धायाहुः ताशा इति । तादृशाः संन्यासविशिष्टज्ञानवन्तः सत्यलोकादौ ग्रहलोकादाक्वान्तरफल- तयोपनते तिष्ठन्त्येव, न तु झटिति मुच्यन्त इत्यर्थः । ते ग्रह्मलोके विति श्रुत्सा तन्मुक्तिवि- लम्यावधारणातल्लोकस्थितिरसन्दिग्धेति न संशय इत्युक्तम् । तेन भक्तिमार्गीयत्याग- फलचिन्तायामविचारितरुचिरस्याप्यस्यातिचिरेणैव चेत्प्राप्तिः, तदा तदाशामप्यवलम्ब्य स्थितिः श्रेयसी, न पुनरेतद्रुचिलयोप्युचित इति भावः । नन्वेवं भक्तिमार्गीयत्यागेपि कुतः शीनं फलसम्भवो यतस्त प्रतिवन्धकस्तत्तदहन्ताममतादिरूपो पन्धस्तदवस्थस्तन्नाशश्च ज्ञाना- दिकं विना कथमित्याशंक्य तत्प्रकारमाहुः यहिश्चेदिति । सर्वपरित्यागानन्तरं विर- हमावभावनाभ्यासभूयस्त्वादन्तस्तद्भावरूपेण स्थितोऽत एव खात्मा निरुपधिप्रियवाजीवन- हेतुत्वाच तत्त्वेन स्फुरितः स कदाचिदत्युत्कटतापवैकन्यादिभावस्वभावाद्यादृशोन्तर- नुभूयते तादृशो पहिः प्रकटो गादिगोचरश्चेद्भवति, तथाभूतश्च यदि पुनरन्तःप्रविशेत् तत्र दृष्टान्तो वह्रिवदिति । यथा काष्ठनिष्ठो वह्निः कदाचिन्मयनादितो बहिः प्रकटीमूय पुनस्तन्मध्ये प्रविष्टः काष्ठतामपाकृत्य पहिरूपता सम्पादयति, तथा भगवानप्यात्मत्वे- नान्तःस्थितो विरहभावोद्रेकादहिरागतः पुनः सम्बद्धः सर्वथा प्रतिबन्धकमपनीय निज- भावरूपता सम्पादयतीत्यर्थः । वह्निदृष्टान्तेन स यथा तापहेतुरूपेणैवं सम्बद्धः स्वरूपात्म: कत्वं कुरुते, तथा भगवानपि विप्रयोगभावप्रकारेणैव सम्बद्धस्तद्भावरूपतामित्यपि सूचितम् । सदैव पुनः प्रवेशक्षण एव सकलः सर्वोपि तत्तदहन्ताममतारूपो बन्धो नाशमेति प्राप्नोति, न चान्यथा, प्रकारान्तरेणात्र प्रतिबन्धकस्स नाशो न भवतीत्यर्थः । नन्वेवं काररूपेऽहन्ता- ममतात्मकस्य बन्धस्य विलये प्रलयानलादप्यतिप्रवले विप्रयोगे च प्राचुर्यमञ्चति, जी- वनमेवाशक्यं स्यात् , तत्तद्रसभावानुभवस्तु दूरदूरतर इत्यत आहुः गुणास्त्विति । तुशब्दः प्रकारान्तरव्यावृत्त्यर्थः । गुणाः स्वरूपात्मका भगवद्धर्मात्मकाः ते पूर्व तथा तथा- नुभूता वियोगदशायां सङ्गराहित्यात् पहिःप्रियदर्शनायमावात् अतिविरहतापविह्वलतया कमपि प्रकारं प्राप्नुवतां भक्तानामग्रिमैवंविधरसानुभवाय भगवता सर्वभावेन रक्षणी- यानां जीयनार्थ भवन्ति । नतु स्वास्थ्यमप्युसादयन्ति येन तद्भावान्तरायः सात् । हि युक्तोयमर्थः । रसात्मकस्य धर्मिणो विरहेण सन्दिग्धस्थितीनां जीवनं स्वरूपात्मकतया तदीयगुणानामेव शक्यं यतः । यद्यपि धर्मिणो विरहस्य सर्वाधिकपलतया सर्वतिरोधाय- कल्लाजीवनं कथमपि न जाघटीति, तथापि तस्य प्रियगुणगानप्रादुर्भावावकाशप्रदत्वाचेपां ४९ श्रीगोपेश्वरविरचितवितिसमेतः । च पर्यायेण मुहुरुपगीयमानानां पेपीयमानपीयूषवजीवनजननखभावस जागरूकत्वान्न काप्यनुपपतिः । न चैवं गुणैर्जीवनसम्पत्यनन्तर विरहमावस तिरोभावः प्रसज्येतेति वाच्यम् । तेषां जीवनाधिककार्यानुपधायकत्वेन तस्स तादवस्थ्यात् । विरहानुभवार्य ती- वनमावस भगवचिकीर्पितत्वाच । नन्वेवं सति खविरहसन्तापभरपीडितखान्तानाम- वस्थां विचार्य सर्वसमर्थो भगवानेव यदि कदाचिदपि लोकसिद्धसास्थ्यादिना प्रकारा- न्तरेण वा तद्भावमुपशमयेत् , तदा स्वयमेव बाधकः स्यादिति चेत्तत्राहुः भगवानिति । अत्र अस्मिन् स्खविप्रयोगतीवतापादिभावानुभवे भगवान् यद्यपि सर्वेश्वर्यसहितः, त- यापि बाधकः केनापि प्रकारेणास विघातको नेष्यते, कुतः, फलरूपत्वात् , निरवध्यानन्द- रसात्मकत्वादित्यर्थः । यदि भगवान्मनागप्येतद्भावमपनयेत्तदा रसस संयोगविप्रयोगगे- देनोमयरूपत्वादन्यतरभावानुभवाभावे स्वस तथात्वमेव न सिध्येत् । सर्वात्मभाव- वस्तु स्वरूपात्मकं रसमविरतं वितरत एव फलरूपत्वाम्युपगमादिति भावः । एवं च 'रसो वै सः रसं वायं लब्ध्वानन्दीभवति । एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजी- पन्ती'त्यादिश्रुतिव्याकोपोपि नोपनिपतति । ननु तथापि परमकरुणापरीतो भगवान् भक्तानां भूरितरमात्मविरहक्लेशमसहमानस्तदुपशमाय सर्वथा सास्थ्यप्रतिपादकवाक्यानि करि- प्यति, अन्यथा खदयालुत्वविरोधः स्यादिति चेतनाहुः स्वास्थ्यवाक्यमिति । स्वास्थ्य- मागन्तुकक्लेशनिवृत्त्या पूर्ववस्थितिः, तत्प्रतिपादकं वाक्यं प्रभुणा न कर्तव्यम् । न धैवं सति सामर्थं दुःखदर्शी कीशो दयालरिति शनीयम् । एवंविधविरहक्लेशादि- मावस्य परमपुमर्थरूपत्वेनैतदभावसम्पादन एव दयापचयापातो यतः । अतः खत एवै- तादृशमावनिवहान्निजेष्वनिशं विशदयतो नियूंढो दयातिशय इति मनसिकृत्योक्तं द- यालुन विरुध्यत इति । न ताशभावानां प्रतिक्षणं संरक्षणपोपणादितोप्यधिकं कपि- किश्चित्कृपाकार्यमस्ति । क्लेशादित्वेन प्रतीतिमात्रमत्र परं प्राकृतानाम् , वस्तुतस्त्वमी रसात्म- का अनुभवैकवेद्या निवद्यभगवावा इति सुस्थमखिलम् । स्वास्थ्यवाक्यमित्येकवचनेनै- कमपि तादृग्वाक्यं प्रभुन करोति, येनैतद्भाववाधः स्याद्, बहूनां तु सम्भावनैव केति भावः । एवं भक्तिमार्गीय परित्यागमभिधाय तस्स दुरापत्वं वदन्तस्तत्सिद्धथुपायमाहुः दुर्लभोय- मिति । अयं भक्तिमार्गीयपरित्यागो दुर्लगः, शुद्धभगवत्स्नेहातिरिक्तसाधनालभ्यत्वात् । अत एव तथामूतप्रभ्वनुग्रहप्रभयेन प्रेम्णा शुद्धलेहेन सिध्यति, तस्य तत्तत्वकार्यपरम्परया तन्निर्वाहकत्वात् , नान्यथा, न तु विहितेन केनापि प्रकारेणेत्यर्थः । तेनैतदर्थिनां तदीयाना प्रेम्णि प्रयत्नः प्रतिष्ठितो भवतीति भावः । यतत्साधनस्य प्रेम्ण एव दुर्लभत्वम्, तब तत्साध्यपरित्यागस दुर्लभत्वं किं वक्तव्यमिति कैमुतिकन्यायो घोत्यते ॥ ६-१३ ॥ एवं खमार्गीय संन्यासं विचार्य ज्ञानमार्गीयसन्यासविचारमाहुः ज्ञानमाली इति । ज्ञानमार्गे तु संन्यासो दिविधोपि विचारितः ॥१४॥ , ५० संन्यासनिर्णयः । ज्ञानार्यमुत्तराग च सिद्धिर्जन्मशतैः परम् । ज्ञानं च साधनापेक्षं यज्ञादिश्रयणान्मतम् ॥ १५ ॥ अतः कली स संन्यासः पश्चात्तापाय नान्यथा। पापण्डित्वं भवेचापि तस्माज्ज्ञाने न संन्यसेत् ॥ १६ ॥ सुतरां फलिदोपाणां प्रयलत्यादिति स्थितम् ॥ १६६ ॥ तुशब्दो भक्तिमार्गीयत्यागयावृत्त्यर्थः । ज्ञानमार्गे मोक्षार्थ विविदिपाविद्वत्तामे दैन द्विविधोपि संन्यासो विचारितः । तदेवाहुः ज्ञानार्थमिति । ज्ञानार्थ ज्ञानप्रयोजनार्थ यः स विविदिपासंन्यासस्तस्स ज्ञानेच्छाप्रयुक्तस्य ज्ञानोत्पादनोपयोगित्वात् । उत्तराझं मु. फ्त्यङ्गं यः स तु विद्वत्संन्यासस्तस्स ज्ञानोत्तरमाविनो मुक्तावेवोपक्षयात् । चकारेण मुक्तिचर- मकारणे ज्ञानेपि तदुपयोगः सूयते । तत्र विविदिपासंन्यासः कलौ न सम्भवतीत्यमि- भासते । विद्वत्संन्यासस्तु यद्यप्यस्ति, परं तस्मिन् सिद्धिमुक्तिर्जन्मशतैरनेकजन्मभिर्भवति । 'बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यत' इति प्रभुवाक्यात् । ज्ञानार्थ संन्यासस्तु कला न सिध्यतीत्याहुः ज्ञानमिति । ज्ञानं च न केवलं संन्यासाद्भवति, किन्तु साधनापेक्ष यज्ञदानावधीनं मतं, साधनत्वेन यज्ञादीनां श्रवणात् । तमेवं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिपन्ति यज्ञेन दानेने ति श्रुतेः । तानि च देशकालादिसाध्यानि, तच्छुद्धिः कथमपि कलौ न भवति । यतोतः कलौ स विविदिपासंन्यासः कृतः पश्चात्तापायैव भवति, नान्यथा, यतः फलान्तरमपि शंक्येतातः सर्वथैव न कर्तव्य इति भावः । किंध, न केवलं पश्चातापस्तस्य पर्यवस्थति, किन्त्वन्यदपीत्याहुः पाण्डित्वमिति । पापण्डित्वं स्वधर्मविरुद्धाचरणं च भवेत् । अपिशब्दस्तअन्यपापसमुच्चयार्थः । यस्मादीदृशोयं संन्यास- स्तस्मात् ज्ञाने ज्ञाननिमित्तं न संन्यसेदित्यर्थः । यद्वा । ज्ञानेन हेतुना संन्यसेत् , नतु तेन विना तथेत्यर्थः । अपिच युगान्तरे यथा कथचिद्विविदिपासन्यासस्य निर्वाहः शझोतापि, कलौ तु कलयापि नेत्याहुः सुतरामिति । कलिदोपाणां बहूनां प्रबलत्वादशक्यबाधत्वादिति स्थित, पर्यवसन्नमित्यर्थः ॥ १४-१६६ ॥ ननु यदि कलिदोपप्राबल्याज्ज्ञानमार्गे न संन्यासस्य निर्वाहस्तर्हि तत एव भक्तिमा- र्गेपि तस्य तथेति तुल्यमित्येवमाशकन्ते भक्तिमार्गेपीति । भक्तिमार्गेपि चेदोपस्तदा कि कार्यमुच्यते ॥ १७॥ अत्रारम्भे न नाशः स्याद् दृष्टान्तस्याप्यभावतः। खास्थ्यहेतोः परित्यागाद्वाधः केनास्य सम्भवेत् ॥ १८ ॥ हरिरत्र न शक्नोति कर्तुं याधां कुतोऽपरे । अन्यथा मातरो घालान्न स्तन्यैः पुपुषुः कचित् ॥ १९ ॥ 44 श्रीगोपेश्वरविरचितविवृतिसमेतः । ज्ञानिनामपि वाक्येन न भक्तं मोहयिष्यति । आत्मप्रदः प्रियश्चापि किमर्थ मोहयिष्यति ॥ २० ॥ तस्मादुक्तप्रकारेण परित्यागो विधीयताम् । अन्यथा भ्रश्यते स्वार्थादिति मे निश्चिता मतिः ॥ २१ ।। भक्तिमार्गेपि चेत् कलिसम्बन्धी दोपः प्रबलस्तदा नाश एव स्यात्, नतु त्यागस्य फलपर्यवसानमिति किं कार्य, स्वीकार्यो वा ज्ञानमार्गीयः परित्यागः, परिहार्यो वा भक्तिमार्गी योपीति महत्सङ्कटमिति प्राप्ते, उच्यते, समाधानमिति शेपः । तदेवाहुः अत्रारम्भ इति । ज्ञानमार्गे संन्यासस्योपक्रमे कलिकालादिदोपैः साधनवैगुण्यात्तदनिर्वाहे नाशः फलाभायो युज्यते। न च तत्र दोपसत्त्वे किं मानमिति वाच्यम् । 'कलेर्दोषनिधेरिति वाक्येन भगवद्भजना- तिरिक्त तत्सद्भावस्य पोधितत्वात् । दृष्टस्य श्रुतस्य वा नाशस्यैव दोषोन्नायकवाच । अत्र भक्ति- मार्गे आरभे उपक्रम त्यागस्येति शेषः नाशः फलाभावो न स्यात् , कलेरन्यत्र वाधकस्यापि भक्तिमार्ग साधकत्वेन साधनवैगुण्याप्रसक्त्या संन्यासस्यानिर्वाहासंभवात् । भक्तिमार्गस्य ज्ञान- कर्मादिम्यो बलवत्त्वस्य बहुलमुपलम्भात् । 'न कहिचिन्मत्परा नक्ष्यन्ति' 'न मे भक्तः प्रणश्यती' यादिभिभक्तस्य नाशाभावावधारणाच्च । एकादशस्कन्धे 'नागोपक्रमे नाशो मद्धर्मयोद्धवा- ण्वपी'त्यनेनारम्भदशायामपि तदभावस्स प्रतिज्ञातत्वाच । तेन भक्तिमार्गे दोपलेशोपि न शद्वितुं शक्य इति भावः। किञ्च, भक्तिमार्गे परित्यागवान् कश्चिन्नष्टो दृष्टः श्रुतो वायेन तद्दष्टान्तेना- न्यस्मिन्नप्याधुनिके नाशः शक्यवचनः स्यादतो दृष्टान्तस्थाप्यभायतो भक्तिमार्गे न कश्चिदुन्नेतुमपि शक्यते दोष इति न नाशसम्भावनालेशोपि । ननु तथापि विरहव्यथाव्या- कुलः सन् यदि कोपि कदाचित् स्वास्थ्यसम्पादकं कमपि पदार्थमुपादद्यात्तदा तस्य भावस्य वा याधः स्यादेवेति चेत्तत्राहुः स्थास्थ्यहेतोरिति । स्वास्थ्यहेतोः खास्थ्यप्रयोजकस्य येनैवैतद्भावविघातकं किञ्चिदपि स्वास्थ्यं भवति तस्य सर्वस्मैव पूर्वमेव सर्वभावेन त्यागादस्य मावस्य यागिनो वा बाधः प्रतिपातः केन पदार्थेन सम्भवेत् , न केनापीत्यर्थः । ननु लौकिकस्स वाधकस्यासम्भवेप्यलौकिकाः कालादय एव पाधका भविष्यन्तीति चेतनाहुः हरिरिति । यद्यपि हरिः सर्वदुःखहर्ता समर्थः सदयश्थ, तेन भक्तक्लेशलेशमपीक्षितुं न क्षमः, तथाप्यत्र अस्मिन्नतिप्रचुरविप्रयोगभावे याधां नाशं खरूपरसामृतैरेतनावरूपैर्भक्तानामपोषणरूपं कर्तुं न शक्नोति, समर्थो न भवति । अपरे कालादयः कुतो वाघां कर्तुं शक्ष्यन्तीत्यर्थः । इहायमभिसन्धिः । भगवान् हि रसत्वेनैव रसोवै स' इत्यादिश्रुत्या निरूपितः, तत्वं च संयोग- विप्रयोगात्मके शृङ्गार एवं विश्रान्तमिति तदुभयात्मकः खयं स्वस्वरूपात्मकानेव तत्तद्रस- मायांस्तत्तद्विहृतिभिरत्यनुगृहीतेष्वाविर्भाव्य तदनुभवं विदधत्तदुद्दोधितनिजभावनिचयानां चानुभवमनिर्वचनीयानेकप्रकारैर्भक्तानां सम्पादयन् स्वरूपानन्ददायको महोदारो मुहुर्मुहुर्वि- प्रयोगादिभावपोषणमेव कर्तुमर्हति, न तु तद्विपातमषि, स्वस्य भावात्मकत्वात्तेपां चातिप्रव- ५२ संन्यासनिर्णयः। लत्वाद्भक्तविपयकर्मावः स्वस्य तदधीनत्वभावनात् निरवधिकृपानिधित्वस्य प्रकटितत्वाच ननु तथापीधरः स्वतत्रः कदाचिद्भावमन्यययेदेव, न तु नियमेन पोषयेदित्याशय तर खभाव एवेशो यदेतदावं पोपयत्येव, न तु नाशयतीतीममर्थ व्यतिरेके दृष्टान्तेन समर्थयन्ति अन्यथेति । यदि भगवान् स्वरूपामृतैरुक्तभावभक्तान पोपयेत् कचित् , किन्त्वेतद्भावपाधनमेव कुर्यादिति तदा लोके मातरो जनयित्र्यो पालान् स्तनन्धयान् स्तन्यैः कचित् न पुपुपुर्न पोपि- तपत्य इत्यपि स्यात् । ततु तयाभूतखभावानां तासां सर्वथैवाप्रसिद्धमसम्भावितमशक्यं च, एवं भगवतोपि स्वस्वरूपामृतैर्भक्तानामपोपणमेतद्भावनाशनरूपमित्यर्थः । तेन स्तन्यादिदानेन या. लकानामपोषणे यया मातृपु वात्सल्यसमावस्य तेपांजीवनस्य चान्यथाभावः स्यात् , तया खरू पामृतदानेन भक्तानामपोपणे स्वरूपात्मकानुभूयमानविप्रयोगमावयाधनलक्षणे भगवति तादृक्- खभावस्य भक्तानां जीवनस्स चान्यया भावः सादिति भावः । ननु यद्यप्ययं भावः सर्वाशक्य- पाधस्तथाप्येतद्भावस्स यहिःसंवेदनदशायामेवोद्गमसम्मवेन ज्ञानस्स च तन्नाशकत्वेनैता- दृशभाववतो भत्तस्य भगवदिच्छया ज्ञानिभिः संगे सति तद्वाक्यरतद्भावविपर्यासेन चित्तस्यान्य- यावृत्तिरूपो मोहो भविप्यत्येव, तेन च फलप्रतिवन्ध इति चेत्तत्राहुः ज्ञानिनामपीति । यद्यपि 'तस्मान्मद्भक्तियुक्तस्ये'त्यादिवाक्यैर्ज्ञानस्य तादृशभक्तिपरिपन्थित्वमिति तद्वत्संगे भवति भाववैपरीत्यं, तथापि भगवान् भक्तं तादृशं ज्ञानिनामपि वास्येन ज्ञानानक्तेराधिक्य- ज्ञापनाय तन्मार्गीयाणां संसर्ग संपायापि तद्वाक्येन वहिःसंवेदनविघटनद्वारा तद्भावविरो- धिना अत्युत्कटभाववन्तं न मोहयिष्यति, तथा सति तद्भावमेव तस्य न सम्पादयेत्, प्रयो- जनाभावात् । अग्रे तस्स ज्ञानिवाक्यादिभिर्निरस्सत्वात् । किश्चैवं सर्वश्रुतिस्मृतिपुराणसिद्धं ज्ञानमार्गाद्भक्तिमार्गस्याधिक्यमुत्सिदेत् । अतो भक्तस्य भावः केनाप्यन्यथा कर्तुमशक्य इति न फलप्रतिपन्धसम्भावनापीति भावः । लप्रयोगेणापि मोहानुत्पादः सूयते । ननु प्रभु- कृतिप्रयोजनमाकलयितुमशक्यं तदिच्छामन्तरणेति कदाचिद्दत्तमपि भावं प्रत्यादिसुश्चेत् , तदा ज्ञानिवाक्यै क्तमपि मोहयेदेवेत्याशंकायामाहुः आत्मप्रद इति । यत आत्मानं रसरूपं भक्तेभ्यः प्रकर्षण विमुक्तसंकोचतया ददाति, प्रियः प्रीयाश्रयश्च, अपिशब्दात्तदधीनश्च भवति, अतो दित्सितस्य स्वरूपस्यैतद्भावातिरिक्तप्रकारेण दानासम्भवादेतद्भावरहिते तदानाभावेना- स्यादेयतापतेः प्रीत्यन्यथात्वप्रसक्तः प्रयोजनामावभौव्याच किमर्थ मोहयिष्यतीत्यर्थः । एवं स्वमार्गीय परित्यागं सम्यग्विचार्य तं कर्तुमुपदिशन्ति तस्मादिति । यस्मादृतातिरिक्त प्रकारेण कृतः परित्यागः पश्चात्तापैकपर्यवसितस्तस्मादुक्तो यः प्रकारो 'विरहानुभवार्थ त्वि'त्यादिना तेन परित्यागो भक्तिमार्गीयः संन्यासो विधीयतां क्रियतामित्यर्थः । तथा सति पश्चात्तापनिवृतिपूर्वकमुक्तफलमप्रत्यूहं भविष्यतीति भावः । ननूक्तपरित्यागफलस्यैतत्प्रकारेणैव सिद्धावपि प्रकारान्तरकृतपरित्यागे किश्चित्प्रयोजनं भविष्यत्येव, तस्यापि तत्र तत्रोक्तत्वादिति चेत्तत्राहुः अन्यथेति । अन्यथा प्रकारान्तरेण संन्यासे स्वार्थात् स्वप्रयोजनात् दृश्यते भ्रष्टो भवति, तेन पश्चात् तप्त एव भवेदिति मे एतद्भावतत्त्वाभिज्ञस्य निश्चिता मुतिर्निःसन्दि- तस्य प्रसाद, श्रीगोपेश्वरविरचितवितिसमेतः । ग्पा बुद्धिरतो मदीयैरेतन्मत्यनुसारिभिः प्रकारान्तरं सर्वथैव नोपादेयमित्यर्थः ॥१७-२१॥ उपसंहरन्ति इतीति । इति कृष्णप्रसादेन वल्लभेन विनिश्चितम् । संन्यासवरणं भक्तावन्यथा पतितो भवेत् ॥ २२॥ इतिशब्दः समाप्तौ । कृष्णप्रसादेन कृष्णः फलात्मा, यशोदाद्युत्सङ्गालालितः, परमकाष्ठापन्नोऽनुग्रहः, तेनासाधारणालौकिकहेतुनालौकिकस्यैतनिश्चयजनना- सामर्थ्यात् वल्लभेनेति प्रथितेन प्रभोः प्रियेणात एव रसात्मकतत्स्वरूपस्य संयोगविप्रयोग- मावतदवान्तरमेदानुभववता भक्तौ फलरूपायाम् संन्यासवरणं पुष्टिमार्गीयपरित्यागा- गीकार इति यावत्, तत् विशेपेण स्फुटतया गुप्ततया वा निश्चितं निर्धारितं, अन्यथा एत- निश्चयामावे फलरूपभक्त्यभावे या प्रकारान्तरेण संन्यासमुरीकुर्वन् पतित उक्तखमार्गीय- संन्यासफलात् प्रच्युतो दोपवांश्च भवेदित्यर्थः ॥ २२ ॥ श्रीविठ्ठलेशचरणाजयुगानुगश्रीकल्याणरायतनयेन मुदा विचार्य । गोपेश्वरेण विहिता विवृतिर्वितन्यात् संन्यासनिर्णय इयं विदुषां विनोदम् ॥१॥ इतिश्रीश्रीगोकुलाधीशपदसरसिजसेवापथप्रवर्तकश्रीवल्लभाचार्य- चरणाजरजोणुशरणश्रीकल्याणरायात्मजश्रीहरिरायानुज- श्रीगोपेश्वरविरचिता संन्यासनिर्णयविवृतिः सम्पूर्णा ॥ १ गीमिगोपालदासस्य श्रीगोकुलनिवासिनः । गोपेश्वरेण विवृति कृता संन्यास निर्णये ॥ इत्यधिकम् ।

श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः । श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः । संन्यासनिर्णयः। श्रीपुरुपोत्तमकृतविवरणसमेतः। खाचार्यवर्यचरणोदितभक्तिमार्गप्रारम्भकालिकजनत्यजनप्रकारम् । संन्यासनिर्णयमयं विवृणोति दासः श्रीवालकृष्णपदपमनिवेशितात्मा ॥१॥ अथ श्रीमदाचार्यचरणा यदा देहदेशपरित्यागविषयकं भगवदाज्ञाद्वयं पुरःस्फूर्तिक- विचारेण न कृतवन्तः, तदा सेवकत्वात् पश्चातापे जाते, लोकत्यागविपयिण्यां भगवतस्तृती- याज्ञायां जातायां, विचारितवन्तः, किं भगवान् मदुपर्यप्रसन्नोस्ति, नवेति । तत्र यधप्रसन्नः स्मात् , उपेक्षेतैक, न त्वाज्ञापयेद्, अतो द्वितीयैव कोटिः; परं तत्र किं कारणमिति विचारे सूक्ष्मटीकानिवृत्त्याऽतिसर्जनरूपदेशत्यागस्य, माधवभट्टकाश्मीरिनिवृत्योपचयरूपेदह- त्यागस्य च भगवतैवं कारितत्वात् पूर्वाज्ञयोर्देशदेहशब्दो यौगिकाववगतौ । ततस्तदाज्ञाद्वयं भग- वतानेन प्रकारेण साधितमित्येव कारणमिति निश्चित पूर्वाज्ञाद्वयवतृतीयसा अपि दुर्जेयतां निश्चित्य, यद्यप्याज्ञाद्वयं सम्पन्नम् , तथापि खतस्तु न कृतम् । अतस्तदकरणजः पश्चात्तापः कथं निवर्तत इति विचारे करिष्यमाणाज्ञाविषयविचारादेव भगवान् निवारयिष्यतीति निश्चित्य स्वावस्थासूचनपूर्वकं परियागनिरूपणं प्रतिजानते पश्चात्तापेत्यादि । पश्चात्तापनिवृत्त्यर्थ परित्यागो विचार्यते । स मार्गदितये-प्रोक्तो भक्तो ज्ञाने विशेषतः ॥१॥ अत्र केचित् प्राञ्चो भक्तिमार्गीयपरित्यागेतरसर्वपदार्थान् विचार्य त्यागविचाराभाव- जनितस्वपश्चात्तापनिवृत्यर्थं परित्यागविचारप्रतिज्ञेयाहुः । अन्य तु कर्ममार्गीयाणां संसार- वैराग्यस्य वार्धक्येप्यभावात् तत्सङ्गवशेन कदाचिद्भगवदीया अपि तादृशा मा भूवनिये- तदर्थ सुखोपायस्य संन्यासस्स निरूपणप्रतिज्ञेत्युक्त्वा, शरीरवैकल्ये जाते पूर्वदशां स्मृत्वा, मया पूर्वमेव भगवदर्थ किमिति न यत्नः कृत इतीदृशो यो भगवदीयानां तापः स पश्चात्ताप इत्याहुः । ईतरे तु भक्तिमार्गे ज्ञानमार्गे च साधनदशायां सिद्धदशायां च परित्यागः कर्तव्यत्वेनोक्तः, १ श्रीमगोकुलनाथचरणा। २ श्रीमद्रपुनाथपरणाः। ३ श्रीगोकुलोतरावा. ।

. श्रीपुरुपोत्तमकृतविवरणसमेतः । तत्रापायां पूर्णवैराग्यामावेन सम्यक्परित्यागासम्भवात् पापण्डित्वप्रसङ्गेन पश्चातापायैव सः सात्, एतत्तारतम्यज्ञानाभावेन भगवदीया अपि पूर्व परित्यजन्तः पश्चात्तप्ता भवेयुः, तथा तान् दृष्ट्वा स्वयमाचार्या अपि पश्चात्तापमाप्नुयुरिति तदुभयविधपश्चात्तापानुदयाय प्रतिज्ञेत्याहुः । अपरे तु आचार्यनियन्धे 'त्रिदण्डं परिगृहीत सर्वशास्त्राविरोधि त'दित्याज्ञापनात्तद्वीक्ष्य पुष्टि- मार्गीयोपि तुरीयाश्रमत्येन त्रिदण्डं परिगृह्णन् पश्चात्तापमाप्नुयाद्, अतस्तदनुदयाय पुष्टि- मार्गीयसन्यासविचारारम्भ इत्याहुः । अन्ये तु श्रुत्यादिप्रमाणप्रतिपन्नस्य रसात्मकस्स भगवतो विरहात्मकभावानुभवः सर्वात्मभावप्रपत्त्येकलभ्यः सर्वपरित्याग विना न सम्भवतीति तस्य सागस्य खरूपादिकमविदुपां ज्ञानादिमार्गेष्वपि परित्यागस्योक्तत्वात् सन्दिहानानां स्वीयानाम- विचारतः परित्यागः पश्चात्तापायैव भवेदिति तदभावाय विचारारम्भ इत्याहुः । मया तु तेपां परस्परविसम्मतिमवलोक्यान्तःकरणप्रबोधग्रन्थस्थपश्चात्तापपरित्यागपदयोरत्र प्रत्यभिज्ञा- नात् स एव पश्चात्तापोत्र निवर्त्यत्वेनात इति न दोपः । ननु भगवदाज्ञाया जातत्वात् तया तत्कर्तव्यतायाः वयं च निश्चितत्वाद्विचारस्य किं प्रयोजनमत आहुः स इत्यादि विचारणेत्यन्तम् । स परित्यागः मार्गद्वितये प्रोक्तः, मार्गस्य द्वितयं मार्गद्वितयम् । अत्र संख्याया अवयवे तयनित्यनेन द्विशब्दादवयवे तयप् । अवयवशब्दश्च 'अहं प्रतीकोवयव' इति कोशादङ्गाख्य एकदेशे रूढः, सोत्र न सङ्गच्छते, सख्याया गुणत्वेन तम देशभे- दस्य वक्तुमशस्यत्वात् , किन्तु 'सत्यं यवयवः प्रोक्तः सर्वावयविनामिहे'ति द्वादशस्कन्धे उपादानकारणेपि प्रयुक्त इति तदत्र ग्राह्यम् । तथा च सख्यायाः कारणं संख्येयं तदा वदति । समासे मार्गस्येत्यभेदे पष्ठी, तेन मार्गाभिन्नौ यौ द्वित्वसंख्यासंख्येयौ तयोः प्रकणावश्यकर्तव्यत्वेनोक्त इत्यर्थः । तत्र को तौ मार्गावित्यपेक्षायां, कुतश्च तत्रोक्त इत्यपे- क्षायां चाहुः भक्तौ ज्ञाने विशेषत इति । भक्तिमार्गे आरम्भदशायां सिद्धदशायां च, ज्ञानमार्गे विविदिपादशायां विद्वदशायां च वैराग्याचतिशयरूपं विशेषमभिप्रेत्योक्त इत्यर्थः ।।.१॥ ननु 'योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयो विधित्सया, ज्ञानं कर्म च भक्ति'त्येका- दशस्कन्धे भगवद्वाक्यात् त्रयोपि योगा नृणां श्रेयःसाधकत्वात्तुल्या इति कर्ममार्गे कुतो नोक्त इत्यत आहुः कर्ममार्ग इत्यादि । कर्ममार्गे न कर्तव्यः सुतरां कलिकालतः। अत आदी भक्तिमार्गे कर्तव्यत्यादिचारणा ॥२॥ चातुराश्रम्यपक्षेण यद्यपि कर्ममार्ग उक्तस्तथापि 'कर्मयोगस्तु कामिना'मिति भगवता तस्स कामाधिकारकत्वेनोक्तत्वात्सरित्सागस्य च वैराग्याधिकारकत्वात्तत्र न कर्तव्यः । यद्यपि 'वनाद्वा प्रवद्विद्वानातुरों वाय दुःखित' इत्यङ्गिरसा आतुरभयभीतयोरप्युक्तस्तथापि कलि- १ श्रीद्वारकेश्वरा । २ श्रीगोपथरा । - संन्यासनिर्णयः । कालतः कलिकालं प्राप्य सुतरां न कर्तव्यः । कलिवयेषु संन्याससापि गणनादित्यर्थः । तर्हि मास्तु कर्ममार्गे तस्स कर्तव्यता, तथापि यत्रोक्तस्तेनैव यथा कर्तव्यो, विचारस किं प्रयोजनमित्याकांक्षायामाहुः अत इत्यादि । अतः तत्तन्मार्गे तत्तदशायां परित्यागस्सोक्तत्वात् भक्तिमार्गे आदी आरम्भे कर्तव्यत्वमभिप्रेत्य विचारणा यथा कयचित्सनातमक्तेः पुंसो मक्युत्कर्पजनकश्रवणादिनिर्वाहार्या एका आरम्भदशा, तैरम्यस्तैरासक्तिसिद्ध्यर्या द्वितीया, तदुत्तरं व्यसनसिङ्ख्या तृतीया, तत्र यस्यां दशायां कलिकालादिकृतदोपसम्पन्धो न मवति तदर्य तदीयदशाफलखरूपप्रकारविचारः क्रियत इत्यर्थः । एवं सार्धन प्रयोजनमुक्तम् । अत्रायमर्थः । एकादशस्कन्धस्स सप्तदशेध्याये, 'यथानुष्ठीयमानेन त्वयि भक्तिर्नृणां भवेत् । स्वधर्मेणारविन्दाक्ष तन्मे व्याख्यातुमर्हसी'त्युद्धवप्रश्ने चातुराश्रम्यं वदता भगवताष्टा- दशाध्याये 'इष्टया यथोपदेश मा मित्यादिभिः पथदशभिः संन्यासाश्रमरूपः परित्याग उक्तः । तदनन्तरं भक्तिवैराग्ययोराधिक्ये 'ज्ञाननिष्ठो विरक्तो वा मद्भक्तो वानपेक्षकः, सलिङ्गाना- श्रमांस्त्यक्त्वा चरेदविधिगोचर' इत्यादिभिः साधैर्दशमिरवैधश्च परित्याग उक्तः । अत्र च ज्ञानमक्तिमार्गिणोधर्माः समाना एव सङ्कीर्योक्ताः । एवं पूर्वोक्तेपि योध्यम् । तथा 'न्यासे कुटीचका पूर्व बहोदो हंसनिष्क्रियाविति चत्वारो भेदाः संन्यासस्य तृतीयस्कन्ध उक्ताः, तेन मार्गत्रयेपि तस्य कर्तव्यता । यद्यपि कर्ममार्गे तृतीयस्य चतुर्थे पादे 'पुरुषार्थोतःशब्दादित्य- धिकरणस्थे वाचारदर्शना'दित्यादिषु पञ्चसु सूत्रेषु वशिष्ठादीनां ब्रह्मविदाममिहोत्रादिकर्म- करणाचारदर्शनात् , 'जनको ह वै बहु दक्षिणेन यज्ञेनेज' इति ब्रह्मविदोपि जनकस कर्म- करणश्रुते 'स्तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते पूर्वप्रज्ञा चेति श्रुतौ विद्याकर्मभ्यां फलारम्भश्रावणात्, 'अमिष्ठो ब्रह्मा तं दर्शपूर्णमासयोवृणीत' इति कल्पश्रुतौ ब्रह्मविदोपि ब्रह्मत्वेनर्विक्त्वश्रावणात्, 'आश्विनं धूम्रललाममालभेत यो दुब्राह्मणः सोमं पिपासेत् , ऐन्द्रानं पुनरुत्सृएमालभेत य आतृतीयात् पुरुपात् सोमं न पियेत् , विछिन्नो वा एतस्य सोमपीयो यो ब्राह्मणः सन्नातृतीयात् पुरुपात् सोमं न पियति । यावजीवमग्निहोत्रं जुहुया'दित्यादिश्रुतिभिः कर्मकरणस्य नित्यताश्रा- वणात्, कर्मणश्च दम्पत्यधिकारकत्वाजैमिनिमते आश्रमपक्ष एव, यथा कथञ्चित्कर्मकरणाशक्ती सर्वत्यागकरणम्, 'यदहरेवे' त्यादिश्रुतिस्तु कर्माशक्ततदनधिकार्यन्धपग्वादिविपयेति न तद्वैयर्थ्य- मिति कर्मविचारकजैमिनिसिद्धान्तात् कर्ममार्गे न कर्तव्यः । अथ 'तुल्यं दर्शन'मित्यादिसूत्रेषु शुकसंवर्तारुणिजडभरतदृष्टान्तेन दर्शनस्य साधारणतया कर्मावश्यकत्वासाधकत्वात्तेनैव च परित्यागस्यान्धपंग्वाधिकारकत्वनिरासेन जैमिनिमते प्रव्राजश्रुतिवैयर्थ्यप्रसङ्गस दुर्वार- त्वात् , 'एतद्ध स्म वै तद्विद्वांस आहुः ऋषयः कावषेयाः किमर्या वयमध्येष्यामहे, किमर्या वर्ग यक्ष्यामहे, एतद्ध स्म वैतत्पूर्वे विद्वांसोग्निहोत्रं न जुहवायकिरे,' 'एतावदरे खल्वमृतत्वमिति होक्त्वा याज्ञवल्क्यः प्रवबाजे'त्यादिभिर्वह्रीभिः श्रुतिभिः प्रवाजयोधनेन कर्मकरणश्रुतेरसार्व- त्रिकत्वनिश्वायनात् । 'मशिष्ठो ब्रह्म'त्यत्रापि ब्रह्मपदेन वेदस्साभिप्रेततया तद्विद एवालिंज्ययो- .

श्रीपुरुषोत्तमकृतविवरणसमेतः । धनेन तया श्रुत्या ज्ञानस्य कर्मशेषताया आपादयितुमशक्यत्वात् । 'आश्विनं धूमललाम'- मित्यादिषु कर्मनियमवत् 'न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशु'रित्यादौ त्याग- नियमसापि श्रावणेन रागोपाधिक एव कर्मनियम इति निश्चयेनाविशेपात्, उत्तरे वयसि तुरीयाश्रमतया द्रव्ययज्ञत्यागेपि जरामर्याग्निहोत्रश्रुत्या तत्सिद्धौ यावज्जीवामिहोत्रादिश्रुतेर- प्ययाधाच जैमिन्युक्तदूपणपरिहारे जाते कर्ममार्गीयचातुराश्रम्यपक्षस्याक्षुण्णत्वात् कर्ममार्गे परित्यागः कर्तव्यत्वेनायाति, तथापि अग्निहोत्रं गवालम्भं संन्यासं पलपैतृकं, देवराच सुतो- सत्तिः कलौ पञ्च विर्वजयेदिति वर्जनस्मृत्या कलिकालतस्तत्र न कर्तव्यः। यदि च, 'यावद् वर्णविभागोस्ति यावद्वेदः प्रवर्तते । संन्यासं चाग्निहोत्रं च तावत् कुर्यात् कलौ युगे'इति प्रतिप्रस- वात् कर्ममार्गेपि कर्तव्यत्वं त्यागस्य विभाव्यते, तदापि जावालश्रुतौ चातुराश्रम्यपक्षं पूर्वमुक्त्वा, ततः 'यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रबजेद् गृहाद्वा वनाद्वाथ पुनरवती वा व्रती वा स्नातको वालातको योत्सन्नाग्निरनग्निको वा यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रबजे'दिति समाप्ती विरागस्यैव सर्वत्राधिकारत्वेन आवणात् , एकादशस्कन्धे 'यदा कर्मसु काम्येषु लोकेषु निरयात्मसु । विरागो जायते सम्यङ्न्यस्ताग्निः प्रव्रजेत्तत' इत्यादिना वैराग्य एव तस्य पक्षस्य भगवता कथितत्वात् कली च सर्वधर्मशून्ये वैराग्यस्यासम्भवात् सुतरां न कर्तव्यः । अतथातुराश्रम्य- पक्षण प्राप्तस्सेदानीमधिकाराभावाद्यदा ज्ञाननिष्ठा भक्तिनिष्ठा वा भवति, तदा तस्मिन्मार्गे कर्तव्यः । तत्र स्वस्य भक्तिमार्गीयत्वेन भक्तिमार्गे कर्तव्यत्वादादौ पूर्व विचारणा तत्प्रकार- चिन्ता क्रियते, तथा च स यद्यस्मिन्नेव मार्गे उक्तः स्यात् , यदि वा मार्गत्रयेप्येकविध एवोक्तः स्यात् , तदा भगवदाज्ञावाक्ये सन्देहाभावान्न विचार्यः स्यात्, अस्ति तु सर्वत्रो- क्तः, तत्र कः कीदृशो वा भगवदाज्ञाविषय इति निश्चेतुं विचार्यत इत्यर्थः ॥ २ ॥ एवं प्रयोजनमुक्त्वा विचारमारभन्ते श्रयणादीत्यादि । श्रवणादिप्रसिद्धयर्थं कर्तव्यश्वेत् स नेष्यते । सहायसङ्गसाध्यत्वात् साधनानां च रक्षणात् ॥३॥ अभिमानानियोगाच तद्धमैश्च विरोधतः । गृहादेाधकत्वेन साधनार्थ तथा यदि ॥४॥ अग्रेपि तादृशैरेव सगो भवति नान्यथा। स्वयं च विपयाक्रान्तः पापण्डी स्यात्तु कालतः॥५॥ विपयाक्रान्तदेहानां नावेशः सर्वदा हरेः। अतोऽन्न साधने भक्तो नैव त्यागः सुग्वावहः ॥ ६॥ श्रवणादीनां नवविधभक्तीनां प्रकर्पण अविच्छेदेन सिद्ध्यर्थ परित्यागः कर्त- व्ययेत् सः पक्षः नेप्यते नाङ्गीक्रियते । अयमर्थः । भगवता हि नृणां श्रेयोविधि- १. 'मार्गदूये' इति पाठः ।

संन्यासनिर्णयः। त्सया ज्ञानकर्ममक्तिरूपं मार्गत्रयमुक्तम् , निर्विण्णाः, कामिनः, न निर्विण्णा नातिसक्ताश्चेति यथायथं तदधिकारिणश्योक्ता एकादशे 'योगात्रय' इत्यादिना । त्रिवपि संन्यासश्च तत्र निरूपितः । तथा न कणे'ति श्रुतौ च त्यागस्य अमृतत्वरूपं फलमुक्तम् । तच फलं मार्गा- देव, न तु केवलात् त्यागात् , त्यागस्य तत्तन्मार्गाङ्गत्वेन तत्र फलश्रुतेरर्थवादत्वस्यैव विचारित- त्वात् । यन्न योगेन सांख्येन दानव्रततपोध्वरैः, व्याख्याखाध्यायसंन्यासैः प्रामुयाद्यनवानपी'ति वाक्ये त्यागमात्रेण खप्राप्त्यभावस्स मगवता कथनाच । अतस्तस्य कथञ्चिदुपकारकत्वमेव । तत्राधिकारश्च वैराग्यात् , तद्यथा यथोत्कृष्यते तथा तथा त्यागो मार्गस्योपकरोति । तस्योत्कर्पश्च कथं सादिति विचारे केवलादृष्टमात्रेण तदसम्भवान्मार्गानुकूला दृष्टसामग्री श्रवणायविच्छेदरूपा ग्राह्या । अतस्तत्सिद्ध्यर्थं त्यागः कर्तव्यश्चेत् , स पक्षो नाप्यते, न भगवन्मतेङ्गीक्रियते । अयमर्थः । भगवता हि 'यदा कर्मविपाकेष्वि'त्यादिभिः साधनदशा- पन्नस्य परित्यागकथने अटनमेव तस्योक्तम्, न तु क्वचित्स्थित्वा श्रवणादिकरणम्, ततो 'ज्ञाननिष्ठो विरक्तो वा मद्भक्तो वानपेक्षक' इत्यादिभिः सार्धेनवभिः परित्यागं सिद्धदशापन्न- यो निभक्तयोरुक्त्वा ततो ज्ञाननिष्ठस्यापरोक्षज्ञानामावे 'दुःखोदपु कामेषु जातनिर्वेद आ- मवान्', 'अजिज्ञासितमद्धर्मो गुरुं मुनिमुपव्रजेत् । तावत्परिचरेद्भक्त्या श्रद्धावाननसूयकः, यावद्ब्रह्म विजानीयान्मामेव गुरुमात' इति द्वाभ्यां विविदिपासंन्यासोपि संगृहीतः । ततो 'यस्त्वसंयतपवर्गः प्रचण्डेन्द्रियसारथिः, ज्ञानवैराग्यरहितस्त्रिदण्डमुपजीवति । सुरानात्मान- मात्मस्थं निद्भुते मां च धर्महा । अविपक्ककषायोस्मादमुष्माच विहीयत' इति द्वाभ्यां ज्ञानवैराग्यराहित्ये अविपक्वकषायत्वाल्लोकद्वयहानिरुक्ता । भक्तिमार्गीयस्य तु साधनदशायां संन्यासे किमप्यधिक नोक्तम् , किन्तु 'भिक्षोधर्मः शमोऽहिंसे'त्यादिद्वाभ्यां संक्षेपेण चातु- राश्रम्यधर्ममुक्त्वा 'इति मां यः स्वधर्मेण भजेन्नित्यमनन्यमाक् । सर्वभूतेषु मद्भायो मद्भक्ति विन्दते दृढा'मिति फलोक्तिपूर्वकं चातुराश्रम्यधर्मनिरूपणमुपसंहृतम् । तेन भक्तिमार्गीयस्यापि तत्र सन्निहितो भिक्षुधर्म एव मुख्य इति सिध्यति । एवं सति यदि श्रवणाधर्थ संन्यासः क्रियेत, तत्स्वरूपेण तद्धर्मेश्च विरोधः स्यादित्याशयेन प्रथमं संन्यासस्वरूपविरोधात्मकं दोपं व्युत्पादयन्ति सहायेत्यादि । संन्यासस्वरूपं हि जाबालश्रुतौ 'तद्वैके प्राजापत्या'मि- सारभ्य ‘एवमेवैतद्भगव'नित्यन्तेनोक्तम् , तदेवैकादशस्कन्धे 'इष्ट्वा यथोपदेशं मां दत्वा सर्वस्वमृविजे । अग्नीन्खप्राण आवेश्य निरपेक्षः परिग्रजे'दित्यनेनोक्तम् । तथा सति 'अग्न्यु- पचयनं कृत्वा जीवश्राद्धविधानतः' श्राद्धाष्टकं विधाय प्राजापत्यामिष्टिं कृत्वा मत्रेणानीन् स्वप्राण आवेश्य नैरपेक्ष्येण सर्वत्र परिभ्रमणमिति सिध्यति । श्रवणादिकं तु सहायसन- साध्यम् , सहायः समानशीलतया सहकारी, तत्सङ्गेन साध्यम् । नहि श्रावयितारं विना श्रवणं सिध्यति, न वा श्रोतारं विना कीर्तनम् । ती च नैतेन सह परिभ्रमत इति न श्रवण- कीर्तनयोः सिद्धिः । प्रवृत्यर्धमिति पाठे तु प्रकर्पण वृत्तिर्विद्यमानतेति पूर्वोक्त एवार्थः ।

श्रीपुरुपोत्तमझतविवरणसमेतः । अयतेन सह परिश्रमतस्तदा नैरपेक्ष्येण सर्वत्रैकाकिपरिभ्रमणरूपं संन्यासस्वरूपं विरुन्धः (स नेप्यत इत्यर्थः।) कियेदानीमुत्कटमेधाविशेपामावात् श्रुतमपि स्वरूपलीलादिकं न हृदि तिष्ठतीति तत्स्थित्यर्थ पुस्तकादिकं रक्षणीयम्, अर्चनार्थं तदुपकरणमपि रक्षणीयम् , तदपि नरपेक्ष्यं विरुणद्धि । अतः श्रवणादीनां सहायसनसाध्यत्वाचसाधनानां रक्षणाच संन्यास- खरूपविरोधतः स नेप्यत इत्यर्थः । यद्वा, 'यस्त्वसंयतपवर्ग' इति द्वाभ्यामसंयतपवर्गस्य त्रिदण्डोपजीवने बाधकं कययता भगवता पूर्वोक्तविदण्डिसाधनरक्षणं सूच्यते, तद्रक्षणं च 'एकवरेन्महीमेता'मित्यादिमिर्ये धर्माः पूर्वमुक्तास्ते एव कर्तव्यत्वेन सिध्यन्ति, न तु श्रवणादिकम् , एकचरणे सहायसङ्गामावात् , सत्यपि सहायसङ्गे स्थितेः कर्तुमशक्यत्वात् । तथा च संन्यास उक्तानां साधनानां संन्यासे अवश्याचरणात् । एवं सत्यत एव परस्पर- खरूपविरोधेन तथेत्यर्थः । यद्यपि मूले खरूपविरोधत इति पदं नास्ति, तथाप्यग्रे तद्धर्मेश्य विरोधत इति चकारदर्शनात् मयैवं व्याख्याने समुचित इति न दोपः । अथ त्रिदण्डिनोपि चातुर्मास्य एकत्रस्थितेः स्मरणात् भगवतापि “विविक्तक्षेमशरणो मद्भावविमलाशय' इति कथनात् साधनरक्षणपूर्वकं स्थित्वा श्रवणादिसाधने को दोप इत्याकांक्षायां परस्परधर्म- विरोधरूपं दोपान्तरं व्युत्पादयन्ति अभिमानादित्यादि । अभिमानो गर्वः, अहन्ता- ममतात्मको वा, तस्मात् , स्थितौ हि, तत्र 'भिक्षा चतुर्पु वर्णेपु विगर्वान् वर्जयंश्यरेत् , सप्तागारानसंलप्तांस्तुप्येल्लब्धेन तावता । पहिर्जलाशयं गत्वा तत्रोपस्पृश्य वाग्यतः । विभज्य याचितं शेपं भुखीताशेपमाहृत'मिति द्वाभ्यामेको भिक्षाप्रकार उक्तः । तत्र सप्तागारेपु कस्य- चित् दुष्टान्ने प्राप्ते तद्दोषमज्ञात्वा च तस्य भक्षणे कृते विविदिपादशायामिव श्रवणादि- साधनदशायामपि ग्रन्थादिपक्षपातेन शरीराभिमत्या च प्रतिवादिनिराकरणार्थं पारुष्याव- मानयोः सम्मवात् । 'अतिवादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कञ्चने'ति संन्यासधर्मेषु भगवदुक्तस्या- तिक्रमेण तद्धर्मविरोधः। किञ्च, नियोगात् नितरां योगो नियोगः, 'तस्मात्सर्वात्मना राजन् हरिः सर्वत्र सर्वदा । श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च स्मर्तव्यो भगवान्नृणा'मिति द्वितीय- स्कन्धवाफ्यात्तपामावर्तनं तस्मात् । न हि सकृत् कृतं श्रवणादिकं प्रेममक्किं जनयति, किन्लावय॑मानम् , आवृतिश्च स्थित्या, सा च 'एकथरेन्महीमेतां निःसङ्गः संयतेन्द्रियः । आत्मक्रीड आत्मरत आत्मवान्समदर्शन' इत्याधुक्तैः परित्यागधर्मेंविरुध्यते । अतो हेतुद्व- योपपादिताद्धर्मविरोधादपि तयेत्यर्थः । ननु मास्तु श्रवणाद्यर्थं संन्यासरूपो वैधः परित्यागः, तथापि गृहादीनां विपयासक्तिजनकतया भगवदासक्तियाधकत्वेनावश्यं त्याज्यत्वात् । 'ज्ञान- निष्ठो विरक्तो वा मद्भक्तो वानपेक्षकः । सलिङ्गानाश्रमांस्त्यक्त्वा चरेदविधिगोचर' इत्युक्त- रीतिकस्य त्यागान्तरस्य भगवदासक्तिसाधनार्थ करणे को दोषः, तादृशल्यागे च स्वरूपधर्म- विरोधरूपपूर्वोक्तवाधकामावात् , वैराग्यस्य ज्ञानाजनकत्वं यदा, तदा गृहत्यागः कर्तव्य इति पक्षस्य नलकूवरमणिग्रीवस्तुतितापर्यनिरूपणप्रसङ्गे निर्णीतत्वाचेत्याशंकां परिहर्तु व्युत्पादयन्ति गृहादेरित्यादि । गृहधनादेर्मगवदासक्तिबाधकत्वेन सापनार्थ भगवदासक्ति- ६. संन्यासनिर्णयः। साधनार्थ, यदि तथा अवैषत्यागः कर्तव्यश्चेत् सोपि नेष्यत इत्यर्थः । नेष्यत इति पदद्वयं अन्नाप्यनुपज्यते । एवमनूद्य परिहरन्ति अग्रेऽपीत्यादिद्वाभ्याम् । त्यागो हि न स्वतत्रं साधनमपि तु मार्गाङ्गतयेति पूर्व व्युत्पादितम् । तथा सति मार्ग एव खतरः साधकः । स च 'भक्त्या सखातया भक्त्येति वाक्यात्पूर्व श्रवणादिकमेवापेक्षते । तच्च श्रावयित्रादिरूपं सहायम् । ते च 'हृदास्तु पण्डिताः प्रोक्ता भगवच्छास्त्रतत्परा' इत्यादिना जलभेदे ये निरूपिताः, ताशा- स्त्विदानी दुर्लभा इति 'गायकाः कूपसंकाशा' इत्यादिना य उक्ता गायका वा पौराणिका वा मिलन्ति, ते च यथा स्वयं गृहासक्तो विरजिष्यमाणो वा तादृशा एव, न तु खत उत्कृष्टाः, अतोपि तादृशैरेव संगो भवति, नान्यथा, नोत्कृष्टप्रकारकः । तथा च संगदोपेण स्वाभिप्रेतफलाभावान्नेष्यत इत्यर्थः । अथ यदि तादृशा मध्यमाधिकारिणो मिलन्ति, तदा गृहपरित्यागे को दोष इत्याशंकायां स्वीयदोषादपि तथात्वमाहुः स्वयं चेत्यादि । चोप्य- र्थे । स्वयमपि विपयाक्रान्तः । 'इन्द्रियैर्विषयाकृष्टैरिति न्यायेन पञ्चेन्द्रियविषयाकृष्ट- मानसस्तानभिध्यायन् पापण्डी स्यात् , 'कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् । इन्द्रि- यान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते' इति गीतावाक्यात् तादृशः सन्नुपधर्मात्मकाधर्म- शाखाछायास्थः पापण्डी स्यात् । तत्र कालस्यापि सहायतामाहुः तु कालत इति । तु पुनः धर्मप्रतिपक्षरुपात् कलेरपि तथा स्यात् । अतस्तादृशानां संगेपि पाषण्डित्वात् पतितः सादतो नेष्यत इत्यर्थः । अथ कलि समाजयन्यार्या' इत्यादिवाक्यैः कलेः (श्रवण) कीर्तनाथ- नुगुणत्वेन गृहत्यागे दोपामावो विमान्यते, तदापि दोपमाहुः विषयेत्यादि । सत्यं कालः कीर्तनानुगुणः, तथापि फलांशे एवानुगुणो, न तु साधनस्वरूपांशे, तेपु वाक्येषु तथैवोपल. म्मात् । अतो विपयाक्रान्तदेहानां पूर्वोत्तरीत्या विपयारूढस्थूललिंगशरीराणां कालतः कलेः सकाशात् हरेरावेशः सर्वदा न, भगवचित्तता सर्वदा न भवति, किन्तु कदा- चित् । तथा सति यदा आसुरावेशः स्यातदा पूर्वोत्तस्य सर्वस प्रतिबन्धात् पापण्डित्व- मेव भवेत् । अतो नेप्यत इत्यर्थः । कामत इति पाठे तु काम इच्छा, तथा च विषयका- मनया तया स्थादित्यर्थो योध्यः । तदेतन्निगमयन्ति अतोनसादि । अतः उक्तेभ्यो दोपेभ्यः, अघ्र काले, भक्ती भक्तिमार्गे, साधने साधनदशायाम्, तादयंसप्तमीपक्षे आसक्तिसाधनार्य वा, त्यागो गृहपरित्यागः नैव मुखावहः । इदानींतनवीतरागिवत् पाप- ण्डिलमापादयन् भगवदासक्तिरूपं सुखं न जनयति, तस्मात् मध्यमायामपि सापनदशायां सर्वथा न कर्तव्य इत्ययः । अत्र भक्तिमार्गे भगवता कर्तव्यत्वेन प्रोक्तस्य परित्यागस प्रेममक्तिसाधनदशायामकर्तव्यत्वे साधिते पारिशेप्यात् तत्सिद्धत्वदशायां फलोपकार्यहलेन कर्तव्य इति मिद्धम् ॥ ३-६॥ तत्र 'भक्या बनन्यया शस्य अहमेवंविधोर्जुन । ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं प परंतपेति गीतायां भगवाफ्यात् फलस प्रयी विधा । तर कस्मै फलाय कर्तव्य इति श्रीपुरुपोत्तमकृतविवरणसमेतः । विचारणायां प्रवेशस्य मत्कर्मकृन् मत्परम इति वाक्योक्तसाधनान्तरसापेक्षखात्ततः पूर्वमुक्त- योनिदर्शनयोरर्थे कर्तव्य इत्याशयेनाहुः विरहेत्यादि । विरहानुभवार्थ तु परित्यागः प्रशस्यते। स्वीयबन्धनिवृत्त्यर्थं वेशः सोऽन न चान्यथा ॥७॥ कौण्डिन्यो गोपिकाः प्रोक्ता गुरवः साधनं च तत् । भावो भावनया सिद्धः साधनं नान्यदिष्यते ॥ ८ ॥ विकलत्वं तथास्वास्थ्यं प्रकृतिः प्राकृतं न हि । ज्ञानं गुणाश्च तस्यैव वर्तमानस्य वाधकाः ॥९॥ सत्यलोके स्थितिञ्जनात् संन्यासेन विशेषितात् । भावना साधनं यत्र फलं चापि तथा भवेत् ॥ १०॥ तादृशः सत्यलोकादौ तिष्ठन्त्येव न संशयः। यहिश्चत्प्रकटः स्वात्मा वह्निवत्मविशेद्यदि ॥ ११ ॥ तदैव सकलो वन्धो नाशमेति न चान्यथा । गुणास्तु सङ्गराहित्याजीवनाथ भवन्ति हि ॥ १२ ॥ भगवान् फलरूपत्वान्नात्र याधक इप्यते । स्वास्थ्यवाक्यं न कर्तव्यं दयालुन विरुध्यते ॥ १३ ॥ दुर्लभोयं परित्यागः प्रेम्णा सिध्यति नान्यथा ॥ १३ ॥ विरहस्यानुभवो विरहानुभवः, विरहसामयिको वानुभवो विरहानुभवः, विरहान- न्तरोनुभवो वा विरहानुभव इति त्रिधा सम्भवति, तदर्थ कर्तव्य इति फलति, तमाघे पक्षे जीवस्य सृष्टयादौ व्युच्चरणाजातो यो विरहस्तस्योद्वोधन आसक्त्या कृते तस्याभीक्ष्णमनुभ- वार्थ, द्वितीयपक्षे तु, भक्तियोगमायाभ्यां सह कृत्यासक्तिभ्रमन्यायेनोत्पादितोध्यासरूपो यो भगवदनुभवस्तदर्थ, तृतीयपक्षे तु 'तासामाविरभूदित्यादिनोक्तो यः साक्षात्काररूपोनुभव- स्तदर्थ, तथा चैवं त्रिविधो विरहानुभवोर्थः प्रयोजनं यस्स तद्विरहानुगवार्थ, क्रियाविशेषण- मेतत् । तदर्थं तद्यथा स्यात्तथा परित्यागः प्रशस्यते। एकादशस्कन्धे भगवता 'वाग्गद्गदा द्रवते यस्य चित्त'मित्यनेनात्यन्तं स्तूयते, अतस्तदर्थं कर्तव्यः । अत्रायमर्थः । पुष्टिमार्गीयाणां जीवानां भगवद्रुपसेवार्थ कायात् सृष्टिः । ते तु जीवाः शुद्धमिश्रभेदाद् द्विधा । तत्र मि- आणां कदाचिदन्यासत्तया वाहंकारेण वा मर्यादास्थापनार्थ वा शापादिना भगवद्वियोग इति पुष्टिप्रवाहमर्यादायां स्थितम् । तथा गधेपि सहस्रपरिवत्सरमितकालाद्वयुचरणेन भगवद्वियोगः। स च केनचित्यकारेण वाऽनन्यभक्त्या वा भगवता निवार्यते । मक्तिमार्गाश्च बहुविधाः । तत्रास्मिन्मार्गे यदा निवारयितुमिच्छति तदा तस्य केनचित्प्रकारेण विरहौन्कट्यमुतादयति । १ विरहोत्कण्ठागिति पाठः।

६२ संन्यासनिर्णयः। किञ्च, माया ह्यन्यत्र स्थितमन्यत्र प्रत्याययतीति 'ऋतेथ यत्प्रतीयेते'त्यत्र सुबोधिन्यां स्थितम् । मगवांश्च रसलीलायां योगमायामुपाश्रयतीति पश्चाध्याय्यारम्भे स्थितम् । सा च न विश्वमा याऽपि तु भगवद्योगार्था माया ! एवं सति यदा मगवानेनं जीवं युयुक्षति, तदास्य योग- मायया खाज्ञानं विरहं चोत्पादयति, अनन्यभक्तिश्च परमा तिरोधाननाशिका । अन्तर्यहिश्य भगवन्तमनुभावयति । भगवांस्तु सर्वमन्तर्बहिाप्नुवानोपि विरुद्धधर्माश्रयत्वात् परिछिन्नः । एतन्मार्गे च भगवतो बहिः प्राकट्यमेवाभीष्टं, तदैवेश्वरवादोन्यदा शून्यवादः । एवं सति युयुक्षाविपयस्य भक्तस्थानन्यभक्तिकृतो योन्तःसाक्षात्कारस्तस बहिष्ट्वमापादयन्ती माया आसक्तिधमन्यायकं करोति । तादृशो यः साक्षात्कारः, सर्वात्मभावजन्यो भूमविद्यायां सर्व- विधप्रत्ययविलक्षणतया सिद्धः, स एव विरहानुमवपदेन बोषितः । तदर्थ यः परित्यागः स एकादशस्कन्धे चतुर्दशाध्याये भगवता अत्यन्तं स्तूयते । किञ्च, विरहानन्तरमावी अनुभवो पहिः साक्षात्काररूपं सम्यग्दर्शनं, तदर्थं यः परित्यागः स भगवता प्रकर्पण, 'यथा अपनो लब्धधने विनष्टे' इति सार्धद्वाभ्यां पञ्चाध्याय्यां स्तूयते, अतस्तदर्थं कर्तव्य इत्यायाति । एतयोरायस्य प्रशंसा व्युत्पाद्यते । तथा हि, 'क्दन्ति कृष्ण श्रेयांसी'त्यादिना चैदिकोक्तसाध- नानां भगवदुक्तभक्तेश्च तारतम्ये पृष्टे, भगवता 'धर्ममेके यशश्चान्य' इत्यादिना भक्तेः फलो- कप, 'अकिसनस्स दान्तस्से'त्यनेन सरूपोत्कर्ष, 'न पारमेष्ठय'मित्यादिभिरनन्यमक्तो- त्कर्ष, 'निःकियना' इत्यनेन खसुखोत्कर्ष, 'पाध्यमानोपी'ति द्वाभ्यां खमक्तेलवत्त्वं, 'न साधयती' त्यनेन खवशीकर्तृत्वं, 'मक्तिः पुनाती'त्यर्थेन मक्तेरत्यन्तपावनत्वं, 'धर्मः सत्ये'- त्यनेन धर्मादीनामताशत्वं चोक्त्वा, 'कयं विना रोगहरं द्रवता चेतसा विना । विनान- न्दाश्रुकलया शुध्येद्भक्त्या विनाशय' इत्यनेन ऊर्जितां भक्तिं लक्षणैः परिचाययित्वा, ततो 'वाग्गद्दा द्रवते यस्स चित्तं, रुदत्यमीक्ष्णं हसति कचिच विलअ उद्गायति नृत्यते च मद्भः कियुक्तो भुवनं पुनाती'त्यनेन विरहावस्थाव्यानपूर्वकं ताशमक्तिमानत्यन्तं स्तूयते । अतस्तसां दशायां जातायां तदर्थ कर्तव्य इत्यर्थवलादायाति । तथा तत्रैव द्वितीयाध्याये कविनापि 'मन्येऽतथिद्भयमच्युतस्य' 'यानाथाय नरो राजनित्यादिमिर्मगवद्धर्मानुपक्रम्य, 'शृण्वन् सुमद्राणि रयांगपाणेर्जन्मानि कर्माणि च यानि लोके । गीतानि नामानि तदर्थकानि गायन् विठयो विचोदसंगः । एवंवतः स्वप्रियनामकी. जातानुरागो दुतचित्त उचैः । हसत्ययो रोदिति रीति गायत्युन्मादवकृत्यति लोकयायः । सं वायुमग्नि सलिलं महीं च ज्योतीपि सत्वानि दिशो मादीन् । सरित्समुद्रांथ हरेः शरीरं यत्किय भूतं प्रणमेदनन्यः । भक्तिः परेशानुमयो पिरक्तिरन्यत्र चैप त्रिक एव कालः । प्रपद्यमानस्स ययानतः स्युस्तुष्टिः पुष्टिः शुदपायोनुपासं । इत्यच्युतानि भजतोनुवृत्या मक्तिपिरक्तिमंगवायोधः । भवन्ति वै भागव- तस्स राजंस्ततः परां शान्तिमुपैति साक्षा'दित्यन्तेनोप्यते । एतत्सुपोधिन्यां प प्रयमस्कन्पीये 'नामान्यनन्तसे'नि नारदवाक्य कर्मशानमकीनां प्रयाणां फठसापकस्तधितयानुकल्पो य भीपुरुषोत्तमझतविवरणसमेतः । उक्तस्तत्वरूपमत्र कविनोच्यत इत्येवमवतायैते पञ्चश्लोका व्याख्याताः । तत्र प्रथमे 'आदौ गृहानिर्गत' इति कयनेन त्यागावस्था योधिता, भगवजन्मादिश्रवणं तद्गानं विचरणं ठा- भावश्य, अनुकल्पखरूपत्वेन योषितः । ततो द्वितीये 'एवं व्रत' इत्यायुक्तैरष्टधर्मः प्रकृत्युलबने- नालौकिकत्वरूपं लोकवाहलं बोधितम् । तेन विरहानुसन्धानावस्थैव स्फुटीकृता । ततस्तु- तीये एवं विचरणकर्मणा लोकपरित्यागेन ज्ञानमक्ती एकहेलया युगपनिरूपिते । तत्र खादिषु समुद्रान्तेषु लौकिकप्रत्यक्षविपयेषु प्रणमनक्रियाकर्मत्वं हरिशरीरत्वेनोच्यते । तेन तेषु तया- त्वज्ञानमर्यादाक्षिप्यते । अत आक्षिप्तेन 'ज्ञाले'सन्तेन ज्ञानं 'प्रणमेदनन्य' इत्यनेन साधन- भक्तिर्योध्या । ततश्रतुर्थपश्यमाभ्यां दृष्टान्तपूर्वकं परमभक्तिभगवज्ज्ञानतदितरविरक्तीनां युग- पद्भवनेन साक्षात्परमशान्तिरूपं फलमुक्तम् , तेनापि कर्मज्ञानमतीनां यत्सरम फलं तदनेन मार्गवितयानुकल्परूपेण परित्यागेन मवतीति तादृशत्यागप्रशंसैव सुबोधिन्युक्तप्रकारेण सिध्य- तीति चोध्यम् । नन्वेवं सत्यत्र संन्यासवेशः कुतो नोक्त इत्यत आहुः स्वीयेत्यादि । खीयाः पुत्रदारादयः तत्कृतो यो बन्धः, स्वस्य तेष्वासस्यमावेपि तेषां स्वस्मिन्याऽऽसक्तिस्तन्नि- त्यर्थ, अत्र अस्मिन्मक्तिमागीये संन्यासे, स वेशः, त्रिदण्डकौपीनधारणादिवेशः । न चान्यथा।चोवधारणे, अन्यथा तत्कृतवन्धाभावे सति, न च नैवापेक्षितः, अतो यस्य अन्ध- संभावना तस्स स वेश आवश्यको, नान्यस्येत्यसार्वत्रिकत्वान्नोक्त इत्यर्थः । ननु भगवदुक्तेषु प्रशंसावाक्येषु परित्यागो न प्रकटतया प्रतीयते, कविवाक्येषु च ज्ञानमिश्रभक्तेः प्रशंसा प्रतीयते । खं वायुममिमिति वाक्यात् । तथा सति शुद्धभक्तिमार्गीयस्य त्यागस्य प्रशंसा कथं निश्चेतुं शक्या, तासिद्ध्यभावादित्याकांक्षायां तत्प्रसिद्ध्यर्थमाहुः कौण्डिन्यो गो- पिकाः प्रोक्ता गुरच इति । कौण्डिन्यो ह्यनन्तदोरकस्साग्नौ प्रक्षेपेणोत्पन्नादपराधाद दा- रिद्यमापनः, स्वपन्याः शीलाया वाक्यादनन्तापराधजन्यं तदुवा निर्विण्णोनन्तं ध्यायन क द्रक्ष्यामीत्याशया गृहाद्वनं निर्गतो, निरशनं तं ब्रह्मचर्य च कृत्वा हरि जपन् निर्जनेरण्ये चूतवृक्षं गोप्रभृतींश्चेतनानचेतनांश्च वहून् पप्रच्छ, तैः सर्वैरपि नानन्तोस्माभिर्दष्ट इत्युक्ते विहलीभूतो जीविते निराशो दीर्घमुष्णं च निश्वस्य भूतले पपात, ततः किश्चित्कालोत्तरं संज्ञां प्राप्यानन्तेति जल्पन तस्मिन्क्षणे सुनिर्विष्णोऽभूत् । ततः कृपयाऽनन्तदेवोषि वृद्धमा- ह्मणरूपेण प्रत्यक्षीय इन एही खुफ्त्वा पातलं परेषा, कौण्डिन्य दक्षिणे करे गृहीत्वा खपुरी दर्शयामास । तन दिव्यसिंहासनस्थितं खात्मानं च खायुधगरुडाधुपशोभितं दर्शया- मास । ततस्तं दृष्ट्वा परया मुदा प्रसन्नः कौण्डिन्या 'पापोहं पापकर्माहं पापात्मा पापसम्भवः । त्राहि मां पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत । अद्य मे सफलं जन्म जीवितं च सुजीवितम् । यतवांप्रियुगांभोजे मन्मूर्धा भ्रमरायत'इत्युक्तवान् । भगवांस्तु तस्मै दारिद्यनाशनं धर्म सनातनं विष्णुलोकं च वरं दत्तवानिति भविष्योत्तरे भगवता युधिष्ठिरं प्रत्युक्तम् । तेनार्य परित्यागः ख्यादिकृतबन्धामावात् संन्यासवेपरहितः खफलसाधने साधनान्तरापेक्षारहितः संन्यासनिर्णयः। प्रसन्नध्येयसाक्षात्कारफलकः अवैधः शुद्धभक्तिमार्गीयश्चेति सिध्यति । अत एव वेदस्तुतौ "एकदा नारदो लोका'नित्यत्र सुबोधिन्यामुक्तम् । एवमेव च परिभ्रमणं कर्तव्यं यथा कौण्डि- न्येन कृत'मिति । गोपिकानां तु फलप्रकरण एव भगवत्प्राप्त्यर्थं सर्वपरित्यागः पूर्वमुक्तः । ततो मदमानाभ्यां भगवत्तिरोभावे भगवद्विचयनं, ततः प्रसादार्थ गानं, ततो दैन्येन रोदनं, ततो भगवमादुर्भावः, ततो भगवत्कृता तत्त्यागप्रशंसा, ततो लीलानुभव उक्तः, तत्रापि पूर्ववदेव वेपराहित्यादिकं फलपर्यन्तं सिद्धम् , अतस्त एवात्रैतत्परित्यागप्रवर्तकत्वाद्गुरवः, तथा चैवं शास्त्रप्रसिद्धत्वात् । 'एवं मदर्थोज्झिते'त्यादिना भगवता ब्रजभक्तकृतत्यागस्य प्रशंसनाचैकादशस्कन्धीयप्रशंसावाक्यानामप्येतदारंभावस्थासूचकतयैतत्प्रशंसायामेव तास- यम् । तत्रापि द्वादशाध्याये रामेण सार्थ'मित्यादिभिस्तत्कृतसाधनस्यैव प्रशंसनात् , उद्धवस्य तदर्थसन्देह एवाग्रिमग्रन्थानताराच । उचितं चैतत् , यदारम्भः प्रशस्तस्तस्य परमा काठा प्रश- स्तेति । अतस्तत्रैव सा प्रशंसा निश्चयेत्यर्थः । अत्र कौण्डिन्यग्रहण निरपेक्षभक्तानांबहुविधत्वा- तत्कृतपरित्यागार्थ योध्यम् । एतत्प्रशसायास्तद्वददर्शनात् , विरहोत्तरभाव्यनुभवार्थमानत्वेनैव विवक्षितत्वाच । एवं च यो यो यादृग्भक्तिमान् त्यागं चिकीर्पति तस्स तस्स तादृग्मक्ता एवेगव- स्थाका गुरव इत्यपि घोधितम् । भगवदुद्धवसंवादसमाप्तौ अअसा सिद्धिहेतुप्रश्ने 'देवासुरमनु- प्येषु मद्भक्ताचरितानि चेति भक्तचरिताश्रयणस तथात्वेनोपदेशादिति । एतेषां गुरुत्वं च खचरितेनैतन्मार्गप्रवृत्तिप्रयोजकत्वादत्तात्रेयगुरूणां पृथिव्यादीनामिव योध्यमित्याशयेनाहुः साधनं च तदिति । एतनोपदेशानपेक्षाप्या पोधिता । अत्र विरहानन्तरभाविनां तत्कृतानां साधनानां बहुत्लात्तानि सर्वाणि कर्तव्यान्युत किश्चिदेकमित्यपेक्षायां तत्सर्वप्रयोजकमादिभूतं यत्माधनमनश्यं विवक्षित तदन कार्यतयेष्यत इत्साहुः भावो भावनयेत्यादि । भगवति परमा रतिर्भावः । 'रनिर्देवादितिपया मान इत्यभिधीयत' इति वास्यात् । सोपि न स्वतः मिद्धो विवक्षितः,तम्य सामानिकलात्, किन्तु भावनया निरन्तरचिन्तया सिद्धः प्रचितः ताशस्यैव साक्षात्कारफलफनायाः साधनान्तरसाधकनायाश्च पूर्वोक्तोपारयानद्वयेपि सिद्ध- त्यात् । अतः स एव साधनं, नान्यदिष्यते, अन्यद्विचयनादिकं माधनत्वेन नेष्यत इत्यर्थः । ननु तम्यापि तर मत्वात् कुनः साधनलेन नेष्यते इत्यत आहुः विकलत्यमि- त्यादि । जडेप्ययोग्येषु न प्रभो शिफलला । तया अस्वास्थ्यं प्रकृत्या स्थित्यभारः । एतत् दूयं प्रकृतिः सिरहामन्याम्बभारः । तत्रापि हेतुः प्राकृतं न हीनि प्रकृतिमम्बन्धि प्राकृतं, पम्पारस्याप्राप्त न इश्यने, दि यतो हेनोः, तथा च तपदि म्यम्यानम्याहेतुकं म्याचदा साधन- त्वेनेप्यत । अतम्नदमारायन इत्यर्थः । ननु तथैकादशस्कन्धे 'शृण्वन् गुभद्राणी'त्यादि- सोकरयोक्तगगनमन्मामानिनगानादयः गर्नत्र भगान्छरीरलेन जान च सम्मान- म्याधमलान् मापनपन्यमापनातीधर्मवादित्यारांक्षायामा: शानमित्यादि । शानं . .

श्रीपुरुपोत्तमकृतविवरणसमेतः । ६५ सर्वस्य भगवच्छरीरत्वेन ज्ञानम् । गुणाश्च श्रवणकीर्तनगानविपया भगवद्गुणा अपि, तस्यैव भावनाप्रचितभावस्यैव, वर्तमानस्य तदन्तःकरणादिपु च्याप्तस्य, पाधकाः वर्तमानता- नाशकाः, यथायथं शुकादिपु मथुराप्रयातभगवद्वियुक्तविशोकगोपिकासु च दृष्टाः, अतो नेप्यन्त इत्यर्थः । ननु तादृशज्ञानं साक्षात्कारफलकम् , गुणाथ शोकाभावफलकाः, 'विशोका अनी निन्युरिति वाफ्यात् । अतः विरहानुभवखरूपवाधेपि को दोप इत्याकांक्षायां प्रथ- मतः ज्ञानभावनयोः फलतारतम्यं व्युत्पादयन्ति सत्येत्यादि । संन्यासेन विशेपितात् सहकृतात् सर्वत्र ब्रह्मस्थितियोधकात् परोक्षज्ञानात्, सत्यलोके चतुर्मुखलोके स्थितिः । 'वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्धाः संन्यासयोगायतयः शुद्धसत्त्वाः । ते ब्रह्मलोके तु परान्तकाले परामृतात् परिमुच्यन्ति सर्व' इति (तैत्तिरीय) श्रुतेः। असां श्रुतौ वेदान्तविपयकनिश्चितपरो- क्षज्ञानवतां संन्यासिनां शुद्धसत्त्ववत्त्वेन ब्रह्ममुक्तिकाले परामृतं प्राप्य मुक्तिरुक्ता । छान्दोग्ये तु 'यथा कतुरस्मिँलोके पुरुपो भवति तथेतः प्रेत्य भवतीति मरणानन्तरमेव भावनानुरूपं पारलौकिकतात्कालिकफलं श्रावितम् । अतो यत्र पुरुपे भावनासाधनं तत्र तथा तादृशमेव फलं भवेत् । चोवधारणे । तथा च ज्ञाने फलस्य भेदः कालस्य विलम्बश्च दोष इत्यर्थः । ननु 'यथैधांसि समिद्धोग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथेति गीतावास्यात् प्रबले ज्ञाने कर्मणां निःशपनाशात् न कालविलम्यः । 'हरेः शरीर'मित्युक्ततया ज्ञानस भगवद्विपयत्वाच न फलभेद इत्याशंकायामाहुः तादृश इत्यादिसा- र्धम् । तादृशः प्रबलज्ञानवान् सत्यलोकादौ विद्युदरुणेन्द्रप्रजापतिलोकेषु तिष्ठत्येव, तत्र- त्यभोगेन स्वप्रारब्धमपनयन्नातिवाहिकवैद्युतपुरुपागमनपर्यन्तं स्वप्रारब्धानुसारेण तिष्ठत्येव न संशयः। परान्तकालप्रतीक्षाऽभावेपि वैद्युतपुरुषप्रतीक्षाया आतिवाहिकाधिकरणे सिद्धत्वात् । ज्ञानप्रावल्येपि तादृशस्य विलम्चे सन्देहो नेत्यर्थः । नन्विदं भावनापक्षेपि तुल्यमित्याशंकायामाहुः यहि रित्यादि । अरणिमथनप्रायल्येन वहिरिव भावनाप्रावल्येन पहिः प्रकटः स्वात्मा पुरुषोत्तमो यदि वह्निवद्वहिप्प्य पुनरन्तःप्रविशेत् , तदैव तस्मिन्नेव काले सकलो पन्धो वाहा आभ्यन्तरश्च नाशमेति, निवर्तते, नचान्यथा अन्यथा न निवर्तते एव। तथा च 'यदा सर्वे प्रलीयन्ते कामा येस्य हदि स्थिताः । अथ मोऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नत' इति श्रुत्या तदानीमेव बन्धाभावस्स फलाध्यायद्वितीयपादारम्भे 'वामनसि दर्शनादिति सूत्रे विचारितत्वात् अन्ताहगतगोपिकासु तथैव दर्शनाचेतिन भावनापक्षस्यज्ञानतौल्यम् ।अतो विलम्पापादकत्वात् ज्ञानं साधनत्वेन नेष्यत इत्यर्थः । एतेन शुद्धभक्तिमार्गीयत्यागे ज्ञानमिश्रपक्षोपि निवारितः । तर्हि गुणानां तथात्वम- स्त्वित्याकांक्षायामाहुः गुणास्त्वित्यादि । तुः शहानिरासे । श्रवणादिविपया गुणाः सङ्ग- राहित्यात् , भावनासिद्धस भावस्याप्रायल्ये भगवतो वहिः प्राकट्याभावेन तत्सगराहित्यादुद्बुद्धे विरहे जीवनार्थ भवन्ति । हि निश्चयेन । विशोकवाक्ये तप्तजीवनवाक्ये च तथैव सिद्ध- त्वात् । अतो विलम्यापादकत्वेन मध्यमाधिकारे ते उपयुज्यन्ते । अतो मुख्याधिकारे तेपि साधनत्वेन नेष्यन्त इत्यर्थः । ननु यद्येवं गानादिविषयाणां गुणानामपि बाधकत्वम् , तर्हि संन्यासनिर्णयः । - . भाव्यमानस्य भगवतोपि विलम्बापादकत्वेन बाधकत्वं कुतो न स्यादित्यत आहुः भगवा- नित्यादि । स हि फलरूपः, प्राप्तश्चेत् फलमेव जातं साधनस्य, अतः फलरूपत्वात् साथ- नावस्थानिवर्तकत्वेपि बाधकत्वेन नेष्यत इत्यर्थः । एतेन येषु यहिः प्राकट्योत्तरमन्तःप्रवेश- स्तेषां सद्योमुक्तिः, येषु च पहिः प्राकट्यमेव, नान्तःप्रवेशस्तेपामिहैव लीलानुभव इति मुख्ये- प्वपि व्यवस्था सूचिता । तेन न कोपि कापि विरोध इति ध्येयम् । ननु यदि भगवान् फल- रूपत्वान्न बाधकः, तदा फलरूपत्वादेव यया विजने दर्शनार्थ यतमानाय नारदाय दर्शनं दत्वा तिरोहितः सन् पुनर्दर्शनार्थ यतमानं तं प्रति 'हित्वावधमिमं लोकं गन्ता मजनतामसी'ति स्वास्थ्यार्थं वाक्यमुक्तवान् , तस्य स्वास्थ्यं च कृतवान् , तथा अत्र कुतो न वक्ति १ स्वास्थ्य च कुतो न करोतीत्यत आहुः स्वास्थ्येत्यादि । स्वास्थ्यं च वाक्यं स्वास्थ्यवाक्यम् , विभापैकवद्भावः । स्वास्थ्यसहितं वाक्यं स्वास्थ्यवाक्यं तत्, भगवतः न कर्तव्यम् , अहे तव्यः, कर्तुं योग्यं न भवति । तत्र हेतुः, दयालुन विरुध्यत इति । अयमर्थः । नारदो हविपक्ककपायः परं शुद्धभाव इति तस्य स्वास्थ्यार्थं तिरोहित एव वाक्यमुक्तवान् । खास्थ्यं च कृतवान् । प्रकृते त्वन्तहगतानामिवास्स पन्ध एव तत्कालं नाशनीयः । स पन्धो यदि प्रारब्धकृतस्तदा भगवद्विरहजतीवतापभगवदाविर्भावजालेपसुखाभ्यामेव निव- तनीय., भावस्पोत्कट्यात् । यदि तादृशेपि वाक्यं वदेत् , स्वास्थ्यं वा कुर्यात् , तदा सघो- मुक्ति विरुन्थ्यात् । अतो दयालुत्वान्न विरुध्यते । अयं कर्मकर्तरिप्रयोगः । तथा च खा. स्थ्यवाक्यकरणमेव दयालु विरुणद्धि । स्वयं तु दयालन विरुध्यते । अतः परमकृपया स्वय- मेव शीघं यन्धनिवृत्तिं विधास्सन् तत् द्वयं न करोतीत्यतः स्वास्थ्यवाक्यं कर्तुमनहमित्यर्थः । ननु ययेवं तर्हि 'वाग्गद्दे'त्यादिना भुवनपावनत्वेन यः स्वयं प्रशंसितः, तादृशस्य स्वास्थ्या- दिकमपि न करोतीत्याशंकायामाहुः दुर्लभोयमित्यादि । अयं सयोमुक्तिसम्पादकः परि- त्यागः तादृशस्यापि दुःप्रापः । तत्र हेतुः । प्रेम्णा सिध्यति नान्यथेति । तथा च ते यद्यपि परममक्ताः, तथापि सर्वज्ञत्वात् केचन पुष्टिमिश्राः, केचन गुणज्ञत्वान्मर्यादामिश्राः, न तु शुद्धाः सदा प्रेमप्लुताः स्वरुपमात्रपराः । अतस्तादृगधिकाराभावात् करोतीत्यर्थः । एवमत्र भक्तिमार्गीयत्यागे गुरुदयस्य कयनेन फलविलम्यशेध्यतात्कालिकफलकथनेन चावस्थाभे- दादिसूचनादधिकारिभेदात् प्रैविध्यं निरूपितम् , स्वरूपं च सपरिकर विचारितम्, प्रेमभेद एवं तत्र तत्र ताशाधिकारसम्पादक इति च साधितम् ॥ ७-१३ ।। अतः परं नन्वेकादशस्कन्धीयप्रशंसायाः मक्तिपरमकाष्ठारूपेऽस्मिन् दुर्लभे परित्यागे पर्यवसन्नतायां प्रारम्मदशानन्यस परित्यागस पिलम्यवत्या ज्ञानमार्गीयत्सागतीत्येन विशेषामावादविचारितत्वाचैतं विहाय विचारितो ज्ञानमार्गाय एव कर्तव्यः, किमेतद्विचारेणे- सायंकायां भक्तिमागीयसारम्भदायां निःप्रत्यूहत्वं वक्तुं मानमागीयस सरिगतामतिबिल- पपत्तां च सापयन्ति ज्ञानमार्गे इत्यादि ।

६७ . श्रीपुरुषोत्तमझतपिवरणसमेतः। ज्ञानमार्गे तु संन्यासो शिविघोपि विचारितः॥१४॥ ज्ञानार्थमुत्तराग घ सिद्धिर्जन्मशतः परम् । ज्ञानं च साधनापेक्षं यज्ञादिश्रवणान्मतम् ॥ १५ ॥ अतः कलौ स संन्यासः पश्चात्तापाय नान्यथा। पापण्डिस्वं भवेचापि तस्माज्ज्ञाने न संन्यसेत् ।। १६ ।। सुतरां फलिदोपाणां प्रयलत्वादिति स्थितम् ।। १६ ।। तु: पूर्वोक्तशानिरासे । ज्ञानमेव मार्गों ज्ञानमार्गः । तत्र द्विविधोपि सन्यासा ज्ञानार्थमुत्तराद्रं च यथा स्यातया विचारितः । क्रियाविशेषणद्वयमेतत् । उत्तरतः तृतीयस्य तुरीये पादे 'ऊर्ध्वरेतासु च शन्दे हीति' सूत्रे विविदियो नोत्पत्यर्थतया जातज्ञानस्य फला- नुभवप्रतियन्धनिवारकत्वेनान्तरणतया च कर्तव्यत्वेन निर्णीतः । परं सिद्धिः साक्षात्काररूपा जन्मशतैः, न तु शीघ्रम् , 'यहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मा प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ' इति गीतावास्ये परोक्षज्ञानवतो 'वासुदेवः सर्व'मिति खप्रपत्तेर्बहुजन्मान्ते कथनात् । प्रपतिरपरोक्षं ज्ञानम् , तस्स बिलम्बन भवने हेतुं व्युत्सादयन्ति ज्ञानं चेत्यादि । ज्ञानं गीतावास्योक्तरीतिकसाक्षात्काररूपं साधनापेक्षम् , कर्मज्ञानमक्तिरूपे साधनं खोत्पत्ताव- पेक्षते । अन प्रमाणम् , यज्ञादिश्रवणात निष्कामानामपि यज्ञकरणस 'अथाकामयमान' इति श्रुतौ प्रतिपादनात् , तदेतत् 'सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरधव दिति सूत्रे विचारितम् , ज्ञानं च न शमदमादिमात्रेण सम्पद्यते, किन्तु यथाश्रममाश्रमकर्मापि शमादिसहकारित्वेनापेक्षत इति सहकारित्वसूत्रे व्युत्पादितम् । अतः देशद्रव्यादिरूपसाधनवैगुण्येन विहितकात्मक- सहकारिशून्यैः केवलैः शमादिमिर्ज्ञानानुदयात् स विविदिपादशोक्तः संन्यासः कलौ पश्चात्तापाय अनन्तरं खेदाय । तर्हि विद्वद्दशोक्तः कर्तव्य इत्यत आहुः नान्यथेति । अन्यया विद्वाकारकः कलौ तत्साधनासम्मवान्नेत्यर्थः । किश्च, न खेदमा किन्तु पाप- ण्डित्वं चापि भवेत् । भिक्षादिशुद्ध्यमावेनोपधर्मसंसर्गवत्त्वम्, चकारादवकीर्णित्वम्, अ- पिशब्दात, "आरूढो नैष्ठिकं धर्म यस्तु प्रयवते पुनः । प्रायश्चित्तं न पश्यामि येन शुध्येत् सारनहेति कपोक्तः पातः संग्रहाते। सिद्धमाहुः तस्मादित्यादि । यस्मात् हिलिदिशा- संन्यासस्य कलौ खेदादिजनकत्वम्, विद्वत्संन्यासस्य भासम्भवस्तस्मात् ज्ञानमार्गे वैधं संन्यासं न कुर्यात्, तत्र हेतुः, सुतरामित्यादि इति स्थितमिति । कलौ संन्यासं निपे- धादिः शास्त्रकारैरेव नितिमित्यर्थः । तेन संन्यासप्रतिप्रसवशास्त्रं क्वाचित्कत्वान्न सर्वत्रोपयु- ज्यत इति योधितम् । एवमत्र मगवदाज्ञया कर्तव्यस्य परित्यागस्य विचारणायामेतावत् सिद्धम् । कर्ममार्गे जैमिनिमते परित्यागस्साकर्तव्यता, मतान्तरे चातुराश्रम्यपक्षेण कर्तव्यत्वेपि कलिकालादकर्तव्यता, भक्तिमार्गे कर्तव्यत्वेनोक्तवेपि श्रवणादिप्रसिद्ध्यर्थ करणे संन्यास- खरूपतद्धर्मयोविरोधात् संन्यासत्वेन रूपेणावैधत्यागरूपेण चाकर्तव्यता, तयैव स्नेहसाधनार्य संन्यासनिर्णयः । करणेपि प्रेमानन्तरं त्ववैधस्य परित्यागस्य खत एव सिद्धिर्मुख्याधिकारिणः । तत्र च नाज्ञा- पेक्षा, तथैव मध्यमस्यापि । परं तस्य प्रारब्धप्रतिवन्धेनेपद्विलम्बः फले । तथैव ज्ञानमिश्रस्या- पि । ज्ञानमार्गे तु विविदिपादशायां विचारितोपि कलिकालजदोपसम्भावनान कर्तव्यः, विद्वत्सन्न्यासस्य तु कलिदोषेण ज्ञानासम्भवादसम्भव एव ॥ १४-१६३ ॥ अतः परं प्रेमारम्भदशायां परित्यागोवशिष्यते, तं विचारयितुं प्रश्नमुखेनाशकन्ते भक्तिमार्गेपि चेद्दोषस्तदा किं कार्य मिति । भक्तिमार्गपि चेद्दोपस्तदा कि कार्यमुच्यते ॥ १७॥ अनारम्भे न नाशः स्याद् दृष्टान्तस्याप्यभावतः। खास्थ्यहेतोः परित्यागाद्वाधः केनास्य सम्भवेत् ॥ १८॥ हरिरत्र न शक्नोति कतु बाधां कुतोऽपरे । अन्यथा मातरो बालान स्तन्यैः पुपुपुः कचित् ।। १९ ।। ज्ञानिनामपि वाक्येन न भक्तं मोहयिष्यति । आत्मपदः प्रियश्चापि किमर्थं मोहयिष्यति ॥ २० ॥ तस्मादुक्तप्रकारेण परित्यागो विधीयताम् । अन्यथा भ्रश्यते स्वार्थादिति मे निश्चिता मतिः ॥२१॥ भक्तेः प्रेमरूपाया यो मार्गः उपायभूतः परित्यागस्तत्रापि कलिप्रभृतिभिः कृतो दोष उत्पद्यते चेत्तदा तत्परिहारार्थ किं कार्यमित्यर्थः । तत्रोत्तरमुखेन समादधते उच्यते । अत्रेत्यादि । अत्र प्रेमभक्तावारम्भे आरम्भदशायां परित्यागे नाशः कलिग्रभृतिभिः कृतेन दोपेण तदवस्थातो हीनत्वसम्भवः स न स्यात् । तत्र हेतुः । दृष्टान्तस्याप्यभावत इति । अत्र नाशपदं सप्तम्या विपरिणतं पुनरन्वेति, तथा च अत्रारम्भे नाशेऽनुमीयमाने दृष्टा- न्तस्याभावात् अपिना दोपान्तराच, तथा हि उक्तारम्भदशायां गृहत्यागकर्ता नश्यति, तदानीं त्यागकर्तृत्वात् , अन यदेवं तदेवमित्यन्वयव्याप्तौ दृष्टान्ताभावः, व्यतिरेके तु यत्र यत्र तादृशत्यागकर्तृत्वे सति नाशाभावः, तत्र तत्र त्यागकर्तृलाभाव इति व्याप्तेरेव शून्यता, तादृशत्यागकर्तृत्वे सतीति विशेपणानङ्गीकारे तादृशव्याप्स्या गृहस्थादिष्वेवानाशसिद्ध्या तादृशत्यागकर्तृत्वस्यैवालाम इति दृष्टान्तामायः । यदि तु भक्तिमार्गीयारम्भदशायां तत्त्यागक- तृत्वात् अविपक्ककपायत्वाद्वा सङ्गदोपसंभवाद्वा श्रवणादिप्रसिद्ध्यर्थत्यागकर्तृवदित्यनुमातव्यम्, तदाप्यसङ्गतम् , नारदपूर्वजन्मदृष्टान्तेन आद्ययोः साधारणत्वात् , तृतीयस्स तु 'गायन्विलजो विचरेदसङ्ग' इति वाक्येन स्वरूपासिद्धत्वात् । पूर्वोक्तदशायां गृहत्यागकर्ता न नश्यति, पूर्वोक्तारम्मदशायां त्यागकर्तृत्वात्, पूर्वजन्मीननारदपदिति प्रत्यनुमानेन निरस्तत्वाच । न चेदमप्रयोजकम् । नारदपूर्वजन्मकयासन्दर्भीयवास्यैस्तादृशां नाशस्यैयासिद्धत्वादिति । अनेनैव हेतुना नाशानुमाने तु सिद्ध एव दृष्टान्तामाव इति मुठूक्तं दृष्ट्यन्तस्साप्यभावत श्रीपुरुषोत्तमकृतविवरणसमेतः । इति । किश्य, अयं त्यागो हि भगवद्धर्मः । 'धर्मान्भागवतान् यूते ति निमः प्रश्ने कविना ये पै भगवता प्रोक्ता उपाया यात्मलन्धये । अञ्जः पुंसामविदुपां विद्धि भागवतान् हि तान्' इति लक्षयित्वा कायेन वाचे'त्यादिभिः कथ्यमानेषु 'गायन् निलजो विचरेदसङ्ग' इत्यनेनासङ्ग- विचरणरूपस्य त्यागस्यापि योधनात् । भगवद्धर्मस्यारम्भेपि न ध्वंस इत्यपि भगवतैयोक्तं 'न घडोपक्रमे ध्वसो मद्धर्मस्योद्धवाण्यपीति । तथा चातोपि न नाश इत्यर्थः । न चैवं सति श्रवणादिप्रसिद्ध्यर्थ कृते त्यागे कथं ध्वस इति शंश्यम् । तस्यां दशायामज्ञानाचत्करणेन उपक्रमत्वाभावात् । 'ज्ञात्वारम्भ उपक्रम' इति कोशेन ज्ञात्वारम्भस्यैवोपक्रमत्वादिति । ननु मास्तु नाशस्तथापि देहरक्षणार्थ भिक्षादेरावश्यकत्वात् फलविलग्यसम्पादको बाधः केन वा- येतेत्यत आहुः स्वास्थ्येत्यादि । सागिनः स्वास्थ्यस्य हेतुर्हि विगी भिन्नेषु चतुर्यु वर्णेपु भिक्षा तस्यास्त्यागात् । 'चीराणि किं पधिन सन्ति दिशन्ति भिक्षां नैवाधिपाः परभृतः सरितोप्य- शुप्यन् । रुद्धा गुहाः किमजितोवति नोपपन्नान् कस्माद्भजन्ति कवयो धनदुर्मदान्धान्' इत्युक्त- रीत्या त्यागात् । यद्वा, अत्र स्वास्थ्यहेतुपदं परित्यागविशेषणम् , परित्यागादिति त्यब्लोपे पञ्चमी । तथा च खस्मिन् तिष्ठतीति स्वस्थः स्वरूपावस्थित इति यावत् । तस्य भावः स्वास्थ्यम् , तद्धेतुर्यः परित्यागस्त प्राप्य जीवन्मुक्त एव जात इति । अस्यैतादृशस्य पाधः केन सम्भवेत् , न केनापीत्यर्थः । नन्वेवमरियाकामादीनां वाधकत्वाभावपि कालादिभिर्वाधः केन वार्यतेत्याकांक्षायां कैमुतिकन्यायेनावाधमुपपादयन्ति हरिरित्यादि । हरिः स्मर्तुः सर्वाघदुःसहा सोपि अबास्मिन् परित्यागे बाधां कर्तुं न शक्नोति । अस्य भगवद्धर्मस्स स्वयमेवोक्तत्वात् , 'वक्ता कर्ता विना नान्यो धर्मस्याच्युत ते भुवी ति वास्येन खयमेवाव- नाच । तथा सति अपरे कालादयः कुतो हेतोः कर्तु शानुयुः । ते हि भगवदधीना इति न तत्कृतोपि घाघसम्भव इत्यर्थः । अत्र तर्कमाहुः अन्यथेत्यादि । अत्र पुपुपुरिति अत्यन्ता- पह्वये लिवक्तव्य इति वार्तिकालिद । तथा च स्वधर्मोत्पादको रक्षकथ भगवानेव यदि याधां कुर्यात् , तदा मातरो जनयिन्यः पालान् खोत्पन्नान् यत्स्तन्यैः पुष्णन्ति, तन्न पुपुपुः, ततथ तत्कृतं पोपणमत्यन्तापहृतमेव स्यात् , तथा च भगवत्कृतो वाधस्तादपि पापित इत्यर्थः । ननु भवत्येवं, तथापि मोहनार्थ नियुक्ता या माया सा तु स्वकार्य मोहं कुर्यादेव, 'ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा, बलादाप्य मोहाय महामाया प्रयच्छतीति वाक्ये मगवत्प्रियतमस्य ज्ञानिनोपि तत्कृतमोहस्योक्तत्वादित्यत आहुः ज्ञानिनामित्यादि । 'जानिनामपी'ति यास्यं ज्ञानिनामपि वाक्यं उत्तरपदलोपी समासः । तथा चानेन मार्कण्डे- यवाक्येन ज्ञानिनामेव मायाहतो मोह उक्तो, न तु भक्तानां, अतः सा भक्तं न मोहयि- प्यति । गीतायां 'दैवी ोपे'ति वाक्ये भगवता तस्याः प्रपत्तितरणीयत्वकथनात्, उक्तविध- भक्तस्य च प्रपन्नत्ये सन्देहाभावात् , अतो दूरापास्त मोहनमित्यर्थः । न चेति कारणाभावे शानिनामिति पदस्य कथ वात्ययोधकत्वमिति शंस्यम् , प्रक्षिप्ताध्यायेषु 'यावद्वत्सके ति लोके'म विष्णुमय गिर'इत्याचार्यः श्रीधरेण च सर्व विष्णुमयमिति पदद्वयस्येति कारणामा-

७०
वता
संन्यासनिर्णयः।
वेपि 'सर्व विष्णुमयं जगदिति वाक्यप्रतीकताया अङ्गीकारेणात्रापि तथोक्तौ दोपाभावा-
दिति । चाचामतेप्येवम् । किञ्च, अयं भक्तः आत्मप्रदः आत्मानं भगवते प्रकर्पण
सर्वसाहित्येन समर्पितवान्, न तु स्वार्थमात्मानमपि स्थापितवान् । तथा प्रियश्चायं भग-
'यो मद्भक्तः स मे प्रियः' इति वाफ्यात् । माया तु भगवतस्तद्भक्तेभ्यश्च जिहेति,
'विलजमानया यस्य स्थातुमीक्षापथेमुया। विमोहिता विकत्थन्ते ममामिति दुर्धिय' इति
द्वितीयस्कन्धवाक्यात् । उक्तभक्तस्य तु न दुर्धीत्वम् , भगवति पद्धसौहृदत्वात् । नाप्यन्यत्रा-
सक्तिः । अतः किमर्थं मोहयिष्यति । तथा चोक्तहेतुभिः सापि न भक्तं मोहयितुं शक्ते-
त्यर्थः । एवमेतेन विचारणेनास्यामारम्भदशायामपि भक्तिमार्गीये त्यागे न पश्चात्तापादिदोष-
सम्भावनेति सिद्धम् । तद्वदन्त उपसंहरन्ति तस्मादित्यादि । यस्मादन्ये त्यागप्रकाराः
सदोपाः असम्भविनश्व, मुख्यस्त्वाज्ञां नापेक्षते । तादृशभावपृष्ठलग्नत्वेन खाभाविकत्वात् ।
अतोऽयमेवाज्ञाविषयो भवितुमर्हति, तस्मात् उक्तमकारेण भगवतोद्धवं प्रत्याज्ञप्तेन प्रका-
रेण भक्तिमार्गीयः परित्यागो विधीयताम् , भक्तैः कर्तव्यः । अन्यथा उक्ताधिकारा-
भावेपि त्यागकरणे अधिकारसद्भावेपि तदकरणे च स्वार्थात् स्वस्य यः अर्थः प्रयोजन
विरहानुभवो भगवत्प्रसादश्च तस्माद्भश्यते, च्युतो भवतीत्यर्थः । अत्र खस्य निश्चय-
माहुः इति मे निश्चिता मतिरिति । एवंप्रकारिका निश्चयवती मम बुद्धिरित्यर्थः ।
श्रीमदुवकर्तृकश्च परित्याग एवंरूपस्तृतीयस्कन्धे चतुर्थाध्याये 'इहागतोहं विरहातुरात्मे'-
ति 'सोहं तद्दर्शनाहादवियोगार्तियुतः प्रभो' रित्येताम्यां वोधितः । तृतीयस्य चतुर्थे पादे
'यहिस्तूभयथापि स्मृतेराचाराचे'सधिकरणे विचारितश्च । तत्र हि प्रचुरमगवद्भावमात्रवतः
साक्षात्स्वरूपमोगवतो वा गृहत्यागः कर्तव्यो न वेति संशये फलस्य सिद्धत्वान्नाद्यस्य
कर्तव्यः । 'मद्वार्तायातयामानां न पन्धाय गृहा मता' इति वाक्यात् गृहाणां बन्धकत्वा-
भावेन द्वितीयस्यापि न कर्तव्य इति प्रासे आह 'यहि रित्यादि । उक्तपूर्वपक्षनिरासाय
तुशन्दः । भावमात्रे साक्षाद्भगवत्सम्यन्धे चेत्युभयथापि पहिः गृहादहिर्गमनम् गृहत्याग
इति यावत् । स आवश्यकः । तत्र प्रमाणमाह 'स्मृतेराचाराचेति । 'त्वं तु सर्व परित्यज्य
खेहं खजनयन्धुपु । मप्यावेश्य मनः सम्यक् समक् विचरख गा"मित्यादि स्मृतिर्भगव-
भाववतस्तत्सद्गविशिष्टस्यापि यहिर्गमनमाह । तदाचारोपि तथैव श्रूयते, अतस्तयेति निष्कर्ष
उक्तः । अयं प त्यागो नाश्रमधर्मरूपः, तस्य पूर्व 'उध्यरेतःसु च शन्दे ही'त्यत्र विचारि-
तत्यात् । न चैपमस्सास्सिन्स्त्र उक्तले विचारितत्वेनेति कुतो नोक्तमिति शश्यम् ।
प्रकारस्यानुलेखेन तथात्वाभावात् । शुकसंवर्तादिकर्तृकस्स ज्ञानमार्गीयस्सावधसन्याससापि
तपात्याचेति ॥ १७-२१ ।।
एवं सागप्रकार तत्कर्तव्यताप्रकारं घ निरुप्योपसंहरन्ति इति कृष्णप्रसादेनेति ।
इति कृष्णप्रसादेन पलभेन विनिश्चितम् ।
मंन्पासपरणं भक्कावन्यथा पतितो भवेत् ॥ २२ ॥

श्रीपुरुपोचमतविवरणसमेत। एव सर्व प्राम्य आहु ! मम त्वन्यत् प्रतिभाति, उपक्रमे परित्यागो विचार्यत इति कथनात् , उक्तश्लोके च परित्यागो विधीयतामिति कथनाच तयोपसहारप्रत्यभिज्ञानात्, इति कृष्णप्रसादेनेति श्लोकस्तु तव विशेषान्तरस्य वोधनाय । तथा हि । आचा- र्याणा पुर स्पतिकविचारेण देहदेशपरित्यागविषयकभगवदाज्ञाद्वयाकरणाभिमानजनितसेदे सति यदा लोकपरित्यागरिपयिणी तृतीयाज्ञा जाता, तदा तद्वान्यार्थविचारेऽनेन प्रकारेण कृते भगनार विशेपत प्रसन्नो भूत्वा तस्य सन्यासरूपतामाचार्याणा मनसि स्फोरितवान्, तदेतदस्मिन् श्लोके वोधयन्ति इति कृष्णप्रसादेनेति । इति एव पूर्वोक्तप्रकारेण परित्यागे विचारिते सति य कृष्णप्रसाद पूर्वस्मादतिरिक्त तेग कृत्वा यलभेन भगवत्प्रियेण मया भनौ भक्तिमार्गे सन्यासवरणं उद्वववत् सन्यासाङ्गी करण चिनिश्चित विशेपतो निश्चितम् । अन्यथा एवमाज्ञाऽभावे तत्करणे पतितो भवेत् । भक्तिनागीयधर्माणा सन्यासधर्माणा चेतरेतरविरुद्धत्वात् भत्तिमार्गतश्च्युतो भवेदि वर्थ । विशेपनिश्चयस्तु, 'आहितामेस्तु सन्यासो वेराग्यादुत्तरायुपि । यावजीवश्रुतेस्तन न निरोध कथञ्चन । यजमानोऽभिवचनाजरामर्याग्निहोमता । आत्मयागनिधानाच द्रव्य यागनिनिन्दनात् । श्रेयानित्यादिवचनादपुनर्भाववाक्यत । न्यासो विधेयस्तनादौ प्रातहुँदा यथापिपि । मार्यानुना तु नापेक्ष्या देवादारादिवाक्यत । त्ल ब्रह्मेति च नापेक्ष्य पुत्राणा लौकिक नत । आगूपचयन मृत्ला जीवश्राद्धविधानत । आभ्युदेवप्रकारेण शाद्वान्यष्ट समाचरत् । वर्गनय प्रसिद्ध हि तत आत्मनय मतम् । देहेन्द्रियप्राणदेवा पञ्चमे देवता मता । शिर पाण्याद्यगदेवा यन्तुदेवास्त्वगादिका । गोलाधिष्ठानदेवा, चक्षुराधास्तत परम् । निधाहङ्कतिदेवाश्च रद्र सङ्कार्पण शिव । सप्तमे गुणदेवास्तु ब्रह्माया अष्टमे मता । ततो दण्डनय शिक्य पनि जलभाजनम् । पान चेति समादाय तथा बापरियाति मियादिपु लोकेषु यतते । सर्वो ग्रन्थ उत्सन्न , पूर्णी न लभ्यत इत्यत एते लोका न पिनियन्ते । अतस्तदुत्तप्रकारस्तत्तच्छासीयसन्यासपद्धतिभ्योवगन्तव्य । भगवता सन्यासस्य स्पोरणादेवाचायनिदण्डसन्यास एव कृत । भार्यादिभिराज्ञाया अदाने खपण शापारन प्रदर्य तेर्निगच्छत शीघ्र निर्गच्छतेत्युक्ते करककोपीने गृहीत्या निर्गता । ततो ऽग्निरपि शात । ततो यथाविधि सन्यास गृहीत्वा अरेलग्रामात् काश्यामागता । मासमान चानशन कृतम् , दिनाष्टक च मौनव्रतम् , तेन पूर्वाज्ञाद्वयस्थदेशदेहसागो पाक्षिकदोपप रिहारेण कृतो । तत आपाढशुह द्वितीयाया सिद्धिं गता उति नाचा वास्यादवगम्यते । क्मापसहतिगतश्रुतिसूनग ययघोधित भगवता नितभृत्यमुख्ये । यातरत्तदनुमृत्य च वाक्यजात सन्यासनिणयमय व्यवृणोत्तदीय ॥१॥ इति श्रीपीताम्परात्मजश्रीपुरुषोत्तमविरचित विवरण सम्पूर्णम् ॥ नारायणे दतीथत इलाधक श्रीभगत उपर ये नूतनपुस्तक।

श्रीकृष्णाय नमः।
श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः।
श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः ।
संन्यासनिर्णयः।
श्रीविठ्ठलेशात्मजश्रीवल्लभकृतविवृतिसमेतः ।
विचारितपरित्यागा पश्चात्तापनिवृत्तये ।
प्रसीदन्तु सदा मह्यमङ्गीकृतपितृत्वका ॥१॥
पश्चात्तापनिवृत्यर्थ परित्यागो विचार्यते ।
स माद्वित्तये प्रोक्तो भक्ती ज्ञाने विशेषतः ॥१॥
भक्तानां स्वहिताज्ञानेपि भगवास्तेपां हितमेव सम्पादयतीति वस्तुस्थितिः । अतः
साधनदशाया भक्तेन चिकीर्पितेपि परित्यागे तस्य पतनमाशय तन विघात करोति । ततो
भक्तस्य तत्स्वरूपाज्ञानात् पश्चात् सेवानसरे भावनादशायां तापो भवति, मया चिकीपितेपि
महाफले परित्यागे भगनाननिघात करोति, अतो मयि न कृपति मम फलमुसाधिकाराभावात्
सनमेन व्यर्थमित्येवरूप । तन्निवृत्त्यर्थ परित्यागः केन कर्तन्य., कदा कर्तव्यः, किं वा
तम्य स्वरूपमित्येव विचार्यते, स्वमनस्सेव युक्तिभिः परिशील्यते, तत्स्वरूप पश्चात्तप्ताय
योध्यते, न तु कर्तव्यत्वेनोपदिश्यते । साधनदशाया निपेधस्स फलदशायां च वकृत्य-
माध्ययम्य यध्यमाणत्यादित्यर्थः । भक्तिमागीयेण फलानुभकाले कृतो देहेन्द्रियादिए
सीयत्वस्यागोधिकारिभेदेन पूर्वमिद्धतत्यागो या परित्याग इति कर्तृकालसरूपाणा प्रयाणा-
मुत्तर भनिप्यनि, तन्नाने मग सावनदशापन्नत्यागगस्तद्विपात कृपयेव करोतीनि स्वस्मिन्
कृपानानेन पश्चात्तापनिवृत्तिभरिप्यतीति भाव । युक्तिभिः स्वमागायनिधारायं सामान्यतः
सनिर्णयमाहुः स इति । फलरूपभक्त्यनुभागाधं च मार्गद्वये विशेषतः मोक्त इत्यर्थः ।
यपि कर्ममार्गेप्याश्रमधर्मत्वेनोक्त', तथापि यानीववारपस्यापि विद्यमानत्वात् विशेपनो
नोक्त इत्यर्थः॥१॥
फर्तव्यतायोधकास्येन पारिककर्तव्यतमाशश्न तदपि निराकुर्वन्ति फर्मनि ।
फर्ममार्ग न फर्नव्यः सुतरां फलिकालतः।
अत आदी भक्तिमार्ग फर्तव्यत्यादिधारणा ॥ २ ॥

७३ . श्रीवरभकृतविवृतिसमेत । यावजीववाक्येन प्रत्यवायश्रवणात् पाक्षिकोपि दोष परिहरणीय इति न्यायेन न कर्तव्य इति भाव । वास्यद्वयस्य रागारागभेदेन व्यवस्थायामपि कलो तु 'अगिहोर गवा लम्भ'मित्यादिवाक्यै प्रत्यक्षत एव निषेधाद्देशादीना दुष्टत्वाच न कर्तव्य एवेत्याहु सुतरा मिति । स्वस्स भक्तिमार्गविचारकत्वात्तन्मार्गीयर्तव्यतामेव विचारे हेतुत्वेनाहु अत इति । तनापि साधनदशाया निषेधमाहु श्रवणादीति । श्रवणादिप्रसिद्धयर्थ कर्तव्यश्चेत् स नेप्यते । सहायसद्गसाध्यत्वात् साधनाना च रक्षणात् ॥ ३॥ अभिमानानियोगाच तदर्भश्च विरोधत. । गृहादेोधकत्वेन साधनार्थ तथा यदि ॥ ४ ॥ अग्रेपि तादृशैरेव सङ्गो भवति नान्यथा । स्वयं च विपयानान्तः पापण्डी स्यात्तु कालतः॥५॥ विपयात्रान्तदेहानां नावेश. सर्वदा हरेः। अतोऽत्र साधने भक्तो नैव त्याग. सुखावहः ॥६॥ एतेपा साधनरूपाणा प्रकपण गेहीयानामनुकूलत्वेपि कदाचित् स्वासक्तिसम्पादनेन प्रति वन्धकानामससगंण सिद्ध्यर्थ कर्तव्य इति चेत् ? स परित्यागोस्माभिर्नेष्यते, इLफरमाधक वादित्यर्थ । प्रतिकूले तु त्याग उचित एवेति भाव । तद्विशदयन्ति सहायेति । श्रवणे सहायभूतो यस्तादृशाना सगस्तत्साध्यत्वात् श्रवणादीनामिति शेप । एकाकिनस्तदसम्भवात् ग्रन्थावलोकनादिना स्वत एव शक्तितात्पयनिधारमम्भवे दोपा तरमाहु साधनानामिति । पु स्तकादीनामित्यर्थ । तावत्स्थापनेपि परित्यागो न सिद्ध इति भाव । अत एव 'ग्रन्थान् नेवाभ्यसेत् यहू'निति वास्यम् । यत्किञ्चिद्न्याभ्यासस्तु पुस्तक विनापि भवतीति बहूनित्युक्तम् । एपस्वरू पासाधक दोपद्वयमुक्तमित्यनयो समुच्चयेनेकरूपत्नयोधनार्थ चकार । फलासाधक दोपद्वयमाहु अभिमानादिति । भूयोभ्यासेन प्रतिभोत्पत्तो पुस्तकादिरूपसाधनत्यागेपि अन्त करणाशुद्ध्या अह ज्ञानीत्यभिमानो भवेत्। ततो मुख्यफलासिद्वि । तीर्थादिमिरन्त करणशुद्धानभिमानाभावे दोपान्तरमाहु नियोगादिति । नियोगो विधिस्तस्माद्धतोरित्यर्थ । मुख्यफलस निध्यस्पृष्टत्वा द्विहितत्वेन कृतेन त्यागेन न तत्सिद्धिरिति भाव । एव फलासाधक दोपद्वयमुक्तमिति चकार । मुख्यदोषमाहु तद्वमैरिति । तस्स भगवतो भजनकर्मणो धमस्तनुवित्तजसेवारूपेविरोधात् । त्यागे सति तादृशसेवाऽसम्भवादित्यर्थ । तथा च फलरूपाया मानस्या पूर्वोक्तदोपैरसिद्धि । तनुवित्ततायाथ त्याग इत्युभयभ्रश इति भाव । नन्वेव सति सेवाश्रवणादिसाधकस्थापनेन भार्यादेरनुफूलत्वेपि स्वासक्तिसम्पादनरूपपाक्षिकदोपसद्भावेन वाधकत्वात् पाक्षिकोपि दोप परिहरणीय इति न्यायेन त्याग कर्तव्य इत्याशङ्का निषेधन्ति गृहादेरिति । भार्यादेरियर्थ । साधनार्थमिति । अन्यमानासक्त्या सेवाश्रवणादिसम्पादनार्थमित्यर्थ । तादृशैरिति । रागिभि स्वस्मिन्नासक्तिसम्पादकैरित्यर्थ । नान्यथेति । अतिविरक्तरित्यर्थ । तादृशेरुच्छ्वले १०

संन्यासनिर्णयः।
सेवाश्रवणादिकमपि न सिध्येदिति भावः । ननु ने कीदृशा अपि भवन्तु, स्वस्य किं दूपणमित्यत
आहुःस्वयं चेति । ते विषयाक्रान्तास्तत्सङ्गात् स्वयं च तदीयविपये रूपादिभिराक्रान्तो लुन्धः
सन् पाखण्डी वेदविरुद्धविषयभोगकर्ता मवेदित्यर्थः । ननु दृढचित्तः कथमेवं भवेदित्यत आहुः
कालत इति । कलिकालस्यादायसम्पादकत्वादिति भावः । साधनदशायां कालस्य प्रबलत्वा-
निश्चितमेव स्यादिति पक्षान्तरनिरासकस्तुशब्दः । मार्यादिसहभावे विषयाक्रमणेपि पाखण्डित्वं
तु न भवेदिति भावः । ननु निपिद्धविपयाक्रमणे भवतु नाम वेदमार्गविरोधः, स्वमार्गीयफलस्य
तु विध्यस्पृष्टत्वात् तत्र किं वाधकमित्याशय खमार्गविरोधमप्याहुः विपयेति । स्वकीयैरनिपि-
द्धविपरन्तःकरणमेवाकान्तं भवति । तदपि देहेन्द्रियप्राणानामनामान्तत्वात्तैः सेवाश्रवणादि-
करणे निवर्तेत । तदा नित्यभगवदावेशो भवेत् । परकीयैर्निपिझैस्तु दुर्लभत्वेन निरन्तरभावनया
रैर्दुरदराजनकः प्रातिलोम्येन देहपर्यन्तमाकान्तं भवति । तथा च देहपदेनेन्द्रियप्राणान्तः-
करणानामाक्रमणं कैमुत्येन सूचितम् । तादृशानां सर्वस्यापि सङ्घातस्य विषयाक्रान्तत्वेन सेवाध-
सम्भवात् तैर्विष यान्तीति व्युत्पत्त्या विषयैर्मृत्युरूपं दुःखमेव भवेत् , न तु दुःखहर्तुरावेशेना-
मृतरूपभगवदानन्द इति भावः । सर्वदेति । एवमपि गुणगानादिना तत्काले कदाचिद्भग-
वदावेशो भवेदपि, न तु सर्वदा । तादृशस्तु कादाचिकत्वेनागन्तुकत्वादसमर्थ इति भावः !
उपसंहरन्ति अतोत्रेति । अतो भगवदनावेशादेव हेतोरत्र मार्गे साधनमक्तिसिद्ध्यर्थ
परित्यागो न मगवदानन्दप्रापकः, किन्तु मृत्युरूपदुःसप्रापक इत्यर्थः ॥ ३-६ ॥
द्वितीयदलानुमवाय फलानुभवकाले त्यागाभ्यनुज्ञामाहुः विरहेति ।
विरहानुभवार्थ तु परित्यागः प्रशस्यते ।
स्वीययन्धनिवृत्त्यर्थ वेपः सोऽत्र न चान्यथा ॥७॥
कौण्डिन्यो गोपिकाः प्रोक्ता गुरवः साधनं च तत् ।
भावो भावनया सिद्धः साधनं नान्यदिप्यते ॥ ८ ॥
विकलत्वं तथास्वास्थ्यं प्रकृतिः प्राकृतं न हि ।
ज्ञानं गुणाश्च तस्यैवं वर्तमानस्य याधकाः ॥९॥
सत्यलोके स्थितिआनात् संन्यासेन विशेषितात् ।
भायना साधनं यत्र फलं चापि तथा भयेत् ॥ १०॥
तादृशाः सत्यलोकादौ तिष्ठन्त्येव न संशयः ।
पहिवेत्प्रकटः स्वात्मा पहियत्प्रविशेद्यदि ।। ११ ।।
सदेव सफलो पन्धो नाशमेति न घान्यथा ।
गुणास्तु सहराहित्यानीयनाथ भवन्ति दि॥१२॥
भगवान् फलरूपत्यान्नान याघक इप्यते ।
स्वास्थ्पयाक्यं न कर्तव्यं दयालुन विमप्यते ॥ १३ ॥
दुर्लभोयं परित्यागः प्रेम्णा सिध्पति नान्यथा ॥ १३ ॥

७५ श्रीवल्लभकृतविवृतिसमेतः । पूर्वसंयोगव्यावृत्त्यर्थं तुशब्दः । सुप्तप्रबुद्धन्यायेन । तदनन्तरं जातस्तु संयोगो विर- हामिन्न एव, तदर्थ परितस्त्यागो देहेन्द्रियादीनामप्यननुसन्धानरूपः । प्रकण गुरूपदेश- मार्याम्पनुज्ञादिव्यतिरेकेणैव फलसाधकत्वेन शस्यते । तर्हि वेपोपि तथा न स्यादित्यतस्त- त्प्रयोजनमाहुः स्वीयेति । पहिस्तथावेषाभावे स्वीयानां मार्यादीनामन्तःकरणबन्धो वासनारूप एतस्मिस्तिष्ठेदेव, वेपे तु कृते अयमस्मदुपयोगानह इति ज्ञानेन स्वीयानां वासना एतस्मानिवर्तेतेति तदर्थ स त्रिदण्डिवेपोत्र मार्गे शस्यते इति पूर्वेणान्वयः। न चान्यथेति । फलार्थ चकारात् साधनसिद्ध्यर्थ च नेत्यर्थः । ननु गुरूपदेशामावे 'यस्त्वि- च्छया कृतः पुम्मि'रिति वाक्याद्धर्माभासत्वेनाधर्मवस्वमेतस्य स्यादित्यत आहुः कौण्डिन्य इति । कुण्डिने भवा कौण्डिनी, आद्यमहिपी । तत्प्रधानत्वात् तस्सा एव सर्वत्राविष्टत्वात् सर्वा एव महिष्यः कौण्डिन्यः । तथा च कौण्डिन्यो गोपिकाश्चेति वाचिककायिकतिरोधान- द्वयजनितद्विविधविरहानुभवविशिष्टं गुरुद्वयमित्यर्थः । तथा च तयोर्नियामकत्वान्न खेच्छाकृति- रूपो दोपः । ननु तत्कृतोपदेशासम्भवात् कथं गुरुत्वमत आहुः साधनं चेति । तत् एत- इये निरन्तरमावनया सिद्धं स्थायिभावरतिरूप क्रमेण तिरोधानद्वये वचनैः स्वरूपेणोत्कटं सत् साधनम् । चकारात् फलमपि तत्र सिद्धो विरहानुभव एव । तथा च साक्षादुपदेशा- भावेपि साधनफलयोधकत्वात् गुरुत्वमिति भावः । नन्वेवं साधनसाध्यत्वे 'नायमात्मेति वाक्यविरोध इत्यत आहुः भाव इति । भावनया चर्वणया सिद्धं स्थायिमावरतिरूपं विरहानु- भवस्य साधनं वरणादन्यत्प्रवचनादिरूपं नेष्यते, किन्त्विदं सर्व वरणान्तःपात्येवेति न पूर्वोक्त- वाक्यविरोधः। ननु विरहे विकलत्वाखास्थ्याभ्यां दुःखानुमानात् कथं फलत्वम् ? आनन्दसैव फलत्वादित्यत आहुः विकलत्वमिति । एतद्द्वयमन्तःस्थितस्य विरहात्मकस्यानन्दरूपस्य भगवत एव प्रकृतिः खमावो धर्म इति यावत् । न त्वानन्दतिरोभावेन दुःखरूपायाः प्रकृतेधर्म इत्यर्थः । तादृशे दुःखधर्मत्वं नोचितमिति हिशब्दः । एवं सर्वदा द्वितीयदलानुगवे पूर्वदला- ननुमवात् पूर्णरसानुभवो न भवेदतः पूर्वदलानुभवमाहुः ज्ञानमिति । ज्ञानं तदृष्ट्वा भगवान् कृष्णः प्रियायाः प्रेमवन्धन'मित्यत्रोक्त प्रेमवन्धनदर्शनम् , गुणा ऐश्वर्यादयश्च क्रमेण तस्यैवं वर्तमानस्य गुरुद्वयस्य वाधकाः, पूर्वानुभवं याधित्वा पुनः संयोगरसानुमावका इत्यर्थः । तत्र प्रकारमाहुः सत्येति । ज्ञानात् तत्पूर्वोक्कात् सत्यस्याक्षरब्रह्मणः श्रीवत्सस्स लक्ष्म्याश्च लोके विशाले स्थाने वक्षसि स्थितिः 'आशिष्य बाहुना राजनित्यत्रोक्ता भवति । नन्वेवं प्रकारं ज्ञानं तु पूर्वमप्यासीदतः कथं पूर्व तिरोभावसम्पादनमत आहुः संन्यासेनेति । सम्यक् न्यासेन विरहे देहेन्द्रियायननुसन्धानेन विशेपितं प्रेमबन्धनज्ञानं जातमित्यर्थः । नित्यज्ञानवत्वपि रसमार्गस्थस्स भगवतो रसमर्यादयैव ज्ञानोदोध इति सिद्धान्तात् । नन्वेतादृशज्ञानस्य सत्यलोकस्थितिरूपस्य फलस्स चाद्यमहिष्यामेवोक्तत्वात् कथं सर्वासां गुरुत्वमित्यत बाहुः भाषनेति । पूर्वोक्तं भावसापकभावनारूपं साधनं तथा आघमहिपी- सदृशं यत्र मक्तेषु भवेत् फलं चकारात् तत्साधनं भावश्च तथा पूर्वसदृशं विरहानु- संन्यासनिर्णयः। भवरूपं यन भक्तेषु भवेत् तादृशा भक्ताः महिपीरूपाः सत्यलोके आदिपदेन 'तामु- त्थाप्य चतुर्भुज' इत्यत्रोक्तोन्थापनकेशसमूहनवनमार्जनादिना भुजादिषु च तिष्ठन्त्येव, ताव- सिद्धौ तावपि युक्तमेवेत्येवकारः। तनै वाथान्यासामपी'त्यतिदेशादन संशयो न कार्य इत्याहुः न संशय इति । ननु पूर्वमपि सयोगस्य विद्यमानत्वात् कय विरहानन्तर जात- स्यैव फलत्वमत आहु. पहिरिति । खस्य भक्तस्यात्मा भगवान् चाचिकतिरोधानलीलया पहिः प्रकटो भक्तखरूपादहिभूतो भिन्नश्चेत् सन् पुनर्मक्तस्वरूपे प्रविशत्, सत्यलोकादी तत्स्थापनेन तत्प्रत्यङ्गेपु सयुज्य स्थितो भवेत् , तदैव सकलो देहेन्द्रियादिषु वासनारूप आध्यात्मिकोपि बन्धो नाशमेति, नान्यथा तिरोभावातिरिक्तप्रकारेण न भवतीत्यर्थः । विर- हेतितापेन देहेन्द्रियाननुसन्धाने सर्वाशेन तद्वासनानिवृत्तिः, तदनन्तर सयोगेप्याध्यात्मिका- विद्याया निवृत्तत्वादेहेन्द्रियादिकमात्मा च भगवदीयत्वेनैव प्रियो भवति, भगवानपि भगवत्त्वे- नैवेति मुख्यो निरोधो सिद्धो भवतीति पूर्वसंयोगेप्याध्यात्मिकवन्धम्य विद्यमानत्वान्न तस्य फलत्वम्, किन्त्वस्यैव निरोधस्यैव फलत्वादिति भावः । तत्र दृष्टान्त. वह्निवदिति । यथा वह्नि- मथनेन काष्ठाद्वहिर्भूतः सन् पुनः काठे यदा प्रविशति तदा काष्ठांश निवर्तयति तथेत्यर्थः । एव याचिकतिरोभावे वचसोत्कटेन भावेन विरहानुभवः, ज्ञानेन सयोगानुभव. पुनरेवमिति पौनीपर्येण दलद्वयानुभव एव, नान्यावस्येति प्रथमगुरौ साधन फल चाभिहितम् । द्वितीयगुरौ कायिकतिरोभावे स्वरूपणोत्कटेन भावेन विरहानुभव., गुणैः सयोगानुभवः, सयोगेपि न निरहवाध , विरहेपि न सयोगवाध इति सार्वदिकशवलितरसानुभव इति । ततोपि विशिष्ट साधन फल चेत्यभिप्रेत्य पुनः पूर्वदलानुभवे साधन दलखरूप चाहु. गुणास्त्यिति । पूर्व गुरौ ज्ञान सर्वांशेन तिरह बाधित्वा सयोगानुभावकमुक्तम् , न तथा गुणा अति तुशब्द । किन्त्वेकांशेन विरह बाधित्वा सयोगानुभावका इति । सगराहित्यादेहेन्द्रियादिमियः सहस्तद्राहित्यात्तत्तिरोभावाद्धेतोः स्वयमेव देहेन्द्रियादिरूपा भूला फलानुमनाय जीवनसम्पादनार्थ साधनरूपा भवन्ति । न तु सर्वधा विरहवाधिका इत्यर्थः । विरहेणात्युपमर्दिना देहेन्द्रियादितिरोभावे भगवद्गुणा एव तद्रपा भूत्वा तत्र स्थिता इति चतु- याव्याये निरूपितम् । अत एव पक्षमाध्यायेपि गुणरूपा एव ता इति निरूपितम् । तथा च सगमेपि चिरहेड्यात्युत्कटदिक्षासत्त्वेन न सर्वथा रिरहवाध.। अत एव सहमपि 'दिक्षितदृशो- भ्यगम निति वाक्यम् । रिरहेप्यान्तररमणान सीया सयोगयाधः। अत एव 'वर्णयन्त्सोमिरमिरे 'रेमिरेहस्सु तमिना.''रिशोका महनी निन्यु रित्यादिवास्यानिएव शालितरसानुभवः सर्वदा, नोकतरवाय.। अन कदाचिदिक्षापूर्तिप्रलापादिभावा अपि जायन्ते । उद्योपदेशानन्तरमावे तु मदेव नयेति तसात्यन्तिकन्यम् । ननु पिरहमासम्म प्रनलन्याहुणेर्याधामम्भवेपि भगवान् म्यसनेन तसायाधक स्यादित्याशमाहुः भगयानिति । भगवानुभयकलरूप इति स्वरूपतो स्तरपायक प्यार,किन्तु यास्य स्वास्थ्यजनक सिरहमानिरर्तक 'मया परोक्ष भजता निरोहित'मिन्यादिम्प पदति साश पारपतु एतामिन कर्तव्य न मन्तन्य, 'सागन' इत्यादि- श्रीवल्लभकृतविकृतिसमेतः । वाक्यवत् । एतासां स्वरूपमात्रनिष्ठत्वाद्वाक्यैः पूर्वभावोपमर्दो न भवतीत्यर्थः । ननु दलयो- रुभयोर्विरुद्धत्यादेकदैवोमयदलरूपो भगवान्मर्यादया विरुध्यत इत्यत आहुः दयालुरिति । भगवानेतासु दयालुरतो दयया शवलितपूर्णरसदित्सया मर्यादामप्यतिक्रम्य लीलां करोति । अतो न विरुध्यते, विरोधविषयो न भवतीत्यर्थः । ननु विरहभावात् पूर्वमप्यात्मारामोप्यरी- रम'दिति प्रकारकमावस्य जातत्वात्तदैव देहेन्द्रियादितिरोभावरूपः परित्यागः कुतो न सम्पन्न इत्यत आहुः दुर्लभइति । अयं पूर्वोक्तः परित्यागो दुर्लमः, दुःखेन वियोगात्मकेन लभो लाभो. यस्य तादृशः । तत्र हेतुः । प्रेम्णा भावनासिद्धेन रत्याख्येन सिध्यति, नान्यथा, प्रकारान्तरेण न सिध्यति । तादृशप्रेमौत्कट्यं तु विरहात्मकदुःखे एव भवति । अतो दुर्लभवान वियोगात् पूर्वं तत्सिद्धिरित्यर्थः ।। ७-१३ ॥ ज्ञानमार्गीयं निरूपयन्ति ज्ञानमार्ग स्विति ॥ ज्ञानमार्गे तु संन्यासो द्विविधोपि विचारितः ॥१४॥ जानार्थमुत्तराङ्गं च सिद्धिर्जन्मशतः परम् । ज्ञानं च साधनापेक्षं यज्ञादिश्रवणान्मतम् ।। १५॥ अतः कलौ स संन्यासः पश्चात्तापाय नान्यथा। पापण्डित्वं भवेचापि तस्माज्जाने न संन्यसेत् ॥ १६॥ सुतरां कलिदोपाणां प्रपलत्वादिति स्थितिः॥ १६३ ॥ भक्तिमार्गीयोस्माभिर्विचारितः, ज्ञानमार्गीयस्तु प्रमाणगम्यत्वात् तैर्विचारित एव । अस्माभिस्त्वनूयते, परप्रीतिविभेदनापनाय तुशब्दः । विविदिपाविद्वद्भेदेन द्विविधोपि प्रमाणे- विचारितः । साधनमपि विचारितमित्याहुः ज्ञानार्थमिति । भक्तिमागीयेण त्यागेन विरहान- भवार्य साधनत्वेन भावः पूर्वमुक्तः । ज्ञानमार्गीयेण 'यदहरेव विरजे'दिति प्रकारेण त्यागेन आत्मापरोक्षरूपज्ञानार्थ साधनत्वेन उत्तरं मुख्यमङ्ग श्रवणं, तदपि विचारित 'मात्मा वारे द्रष्टव्य' इति वाफ्यादित्यर्थः । पूर्वस्मादेतस्य वैलक्षण्यमाहुः सिद्धिरिति । परमत्र जन्मशतैरनेक- जन्मभिः सिद्धिर्भवति, तत्र तु न विलम्बा, 'बहूनां जन्गनामन्ते' इति वाफ्यादिति भावः । नन्वायुमागप्रकारेण कृते कर्मगार्गीवेपि संन्यासे तुरीयाश्रमे ज्ञानमेवाभिहितम् । अतो विशेषाभावात् कर्ममार्गीयोपि कुतो न कर्तव्य इत्याशक्य मार्गद्वयीयज्ञानयोर्भेदार्थ कर्ममागायज्ञानस्वरूपमाहुः ज्ञानं चेति । ज्ञानमार्गे पञ्चाग्निप्रकारेणाधिकारिदेहस्य सिद्ध- खाज्ञानमस्मिसन्माने साधनानपेक्षम् , , श्रवणरूपं तु साधनं फलनान्तरीयकत्वात् फलागमेव, अत एवोतराङ्गमित्युक्तम् । कर्ममार्गीयं तु ज्ञानमस्मिन्नपि जन्मनि साधनापेक्षम्, गाईस्थ्ये यज्ञादयः काव्या इति श्रवणाद्धेतोर्मतं सम्मतमित्यर्थः । चस्त्वर्थे, पूर्वज्ञानव्यवच्छे- दाय । अतः साधनाधीनत्वात् साधनानां कलौ देशादिदोषेणासिद्धत्वाचित्तशुद्ध्यभायेन ज्ञानानुदयान्नया वृथैव परित्यागः कृत इत्याकारकपलातापाय स कर्ममार्गीयः संन्यासो - संन्यासनिर्णयः। भवेत् । नान्यथेति । ज्ञानभक्तिप्रकारकस्तु साधनानपेक्षत्वात्तथा न भवेदित्यर्थः। न केवलं पश्चात्तापमानं किन्तु दोपसम्बन्धोपि भवेदित्याहुः पापण्डित्वमिति । चित्त- चाञ्चल्याद्वेदविरुद्धकार्यकर्तृत्वमपि भवेत् । कदाचिद्दोपाभावेपि पाक्षिकदोपसम्भावनाया विद्यमानत्वात् फलसिद्भ्यभावाच न कर्तव्य इति चकारः । पूर्वोक्तपश्चात्तापसमुच्चयार्थमपि- शब्दः । तस्माद्धेतोाने साधनापेक्षज्ञानसिद्ध्यर्थ न संन्यसेत् , संन्यासं न कुर्यादित्यर्थः । ननु कालदोषा इव कर्मापि प्रमाणसिद्धमतः कालेन कथं कर्मवाध इत्यत आहुः सुतरामिति । कलिदोपाणां सुतरां कर्मापेक्षयापि प्रबलत्वात् । काले कर्मविधाने कर्मणः कालाधीनत्वात् कालस्य कर्मापेक्षया प्रवलत्वम् । 'रश्म्यनुसारी'सारभ्य 'योगिनः प्रति स्मर्यते स्मार्ते चैत' इति सूत्रेण कर्मणि कालवाधस्स व्यवस्थापितत्वादिति स्थितिरित्युक्तम् ॥१४-१६६ ।। ननु तत्र तु ज्ञान एव कालानपेक्षोक्ता । अतः कर्मणीव भक्तावपि कालबाधः प्राप्त इत्याशक्य तत्समाधानमाहुः भक्तिमार्गेपीति । भक्तिमार्गेपि चेहोषस्तदा किं कार्यमुच्यते ॥१७॥ अत्रारम्भे न नाशः स्याद् दृष्टान्तस्याप्यभावतः। स्वास्थ्यहेतोः परित्यागाद्वाघः केनास्य सम्भवेत् ॥ १८॥ हरिरत्र न शक्नोति कर्तुं याधां कुत्तोऽपरे । अन्यथा मातरो यालान्न स्तन्यैः पुपुपुः कचित् ॥ १९ ॥ ज्ञानिनामपि वाक्येन न भक्तं मोहयिष्यति । आत्ममदः प्रियश्चापि किमर्थ मोहयिप्यति ॥२०॥ तस्मादुक्तप्रकारेण परित्यागो विधीयताम् । अन्यथा भ्रश्यते स्वार्थादिति मे निश्चिता मतिः ॥ २१ ॥ किं कार्य, भक्तिमार्गेणैव स्येयं, तं मार्ग परित्यज्य ज्ञानमार्गो वा आश्रणीय इत्याश- झायां समाधानमुच्यते । व्यासस्य ज्ञानावतारत्वेन ज्ञानरूपत्वातन्मार्गसमाधानं व्यास- रुक्तम् । अस्माकमास्यत्वेन भक्तिरूपत्वाद्भक्तिमार्गसमाधानमस्माभिरुच्यते इत्यर्थः । तम ज्ञानमार्गे फलदशायामेव बाधामाव उक्तः । अत्र तु साधनदशायां फलदशायां च तयेति ततोपि वैशिष्टययोधनार्थ पूर्व साधनदशायां वाधाभावमाहुः अप्रेति । आरम्भे साधन- दशायामित्यर्थः । याधो हि स्वरूपतः फलतः साधनतश्चेति । तत्र प्रथम स्वरूपतस्तदभाव- माहुः न नाशः स्यादिति । भगवतः सर्वतः प्रबलस्य रक्षकत्वान्न भवत्येवेति स्यादिति विधिरुक्तः । फलतस्तदभावमाहुः दृष्टान्तस्येति । कालदृष्टो यः अन्तः फलं तस्यामायात् । स्वदृष्टमेव हि फलं कालेन नाश्यते, इदं तु फलं कालातीतम्, अतः कयं फतनाराद्वारा श्रवणादिसाधननाशः कालेन शक्यतेत्ययः । साधनतस्तदमायमाहुः स्वास्थ्येति । कालमृतनाशस्स विवक्षितत्वात् सं कालस्तत्स्यत्वं श्रवणादीनां नाश इति यावत् । सर्वमेव नष्टं सत् कालस्यं मयति । तादृशनाशस्य हेतुर्पिपयादिः। विपयोपाधिकमेव श्रपणादिकं नाश- श्रीवल्हमतवितिसमेतः । प्रतियोगि भवति, न तु भगवदीयम् , स्वास्थ्यस्य नाशस्य हेतोर्विषयादेः परित्यागात् स्थितस्स च भगवति समर्पणादित्यर्थः । भगवदीयो विषयस्तु स्थितोपि कालेन नाशयितुमशक्य इति साधनतोपि नाशाभाव उक्तः । अतः प्रकारत्रयस्याप्यभावादस्य साधनभूतश्रवणादेः कालकृतो वाधः केन प्रकारेण सम्भवेदित्यर्थः । फलस्य तु बाधः सम्भावयितुमपि न शक्य इति तत्र कैमुत्यमाहुः हरिरत्रेति । दुःखहर्तृत्वेन सर्वात्मना विरहं बाधितुगुचितोपि तदा वस्यापि भगवद्पत्वेन प्रबलत्वात्तद्वायां कर्तुं न शक्नोतीत्युक्तम् । अपरे कालादयः कुतो हेतोः करिष्यन्ति, एकांशेनापि वाधहेतुभूतयोज्ञानगुणयोरपि कालायतीतत्वात् कुतो हेतोरि- त्युक्तम् । भगवान् संयोगं पुनरनुभावयितुं तं भावमेकांशेन ज्ञानगुणाभ्यां यावयति, सर्वां- शेन तु पाधनेऽशक्तः। कालादयस्तु वाघहेतोः संयोगरूपफलस्य ज्ञानगुणरूपस्य साधनस्य च सागम्यत्वात् कुतो हेतोरेकांशेनापि बाधितुं शक्नुवन्तीत्यर्थः । एवं भगवतोऽशक्तौ स्वरूपमेव हेतुरिति दृष्टान्तेन वोधयन्ति अन्यथेति । भगवतो बाधकत्वे मातरो न पुपुपुरित्यपि स्यात् । तथा च यथा मातृखरूपस्यैव तथात्वान्मातरो बालान् स्तनैर्न पुपुपुरित्यसम्भावितम् , तथा भगवत्स्वरूपस्यैव तथात्वाद्भगवता सर्वांशेन भावयाधनमप्यसम्भावितमिति विम्ब- प्रतिविम्वभावसिद्ध्या दृष्टान्तालङ्कारसिद्धिः । ननु तर्हि भवतीनां वियोगो मे न ही'त्यादीना कथं विरहामावयोधनमित्यत आहुः ज्ञानिनामपीति ।ज्ञानिनां ज्ञानमिश्रभक्तिमार्गीयाणामपि सम्बन्धिना ताशवाक्येन भक्त ज्ञानांशरहितं शुद्धभक्तं न मोहमिष्यति, पूर्वसिद्धविरहानुभव- रहितं न करिष्यति । ज्ञानमिश्रभक्तिमार्गीयाणामेव तादृशैर्वाफ्यैर्विरहवाधो भवति । एतासां तेर्वाक्यैः प्रत्युत स भाव उत्कटो जातः । एतच विवृतं तत्रैव । ननु ज्ञानिन इव भक्तमपि कुतो न मोहयति, अशक्तावपि तुल्यवलत्वादधिकप्रयासेन तत्सम्मवादित्याशङ्कप तत्र प्रयोजनामावं हेतु- खेनाहुः आत्मप्रद इति । ज्ञानमिश्राणां विरहे विप्रयोगरसात्मकस्य स्वरूपस्य न प्राकट्यम्, अत आत्मनः खरूपमूतस्यानन्दस दानार्थ पूर्वभाव पाधयति । सुखदातृत्वेनैव च प्रियः, अतो दुःखावाधे प्रियोपि न स्याद्, अतः पूर्व वाधयतीत्यात्मदाने प्रीतिरूपप्रयोजनद्वयं भगव- निष्ठं भक्तनिष्ठं च निरूपितम् । एतासां तु विप्रयोगरसात्मकखरूपानुभवाद्विरहेपि भगवान् आत्मप्रदः । निरुपाधिकप्रीतिविषयत्वात्तादृशदुःखेपि प्रियः । अतः प्रयोजनद्वयस्य तदापि सिद्धत्वात् किमर्थं कस्मै प्रयोजनाय मोहयिष्यतीत्यर्थः । तत्र 'नीलाम्बुदश्यामो हृदयाद- पसरवि'त्यादिनोक्तोपि भावो जायते इति चकारः । परं तस्य व्यभिचारिभावत्वान्न स्थायि- भावरूपपीतेहीनिः । तादृशस्वरूपदानेपि प्रीतिसूचनायापिशब्दः । एवं गुरुद्वये सिद्धं सर्व निरूपितम् । तत्राधुनिकस्य यावत्कर्तव्यं तदाहुः तस्मादिति । यतो भक्तिमार्गीयस्य न वाधस्तस्माद्धेतोरुक्तेन गुरुदये सिद्धेन प्रकारेण परित्यागो विधीयतामित्सभ्यनुज्ञा । गुरौ दल- द्वयमुक्तम् । तत्रैकदलार्य तत्सम्पादकः परित्याग आधुनिकेनापि कर्तव्यः । अपरस्य तु दलस्य तर सिद्धस नाधिकार इति तदाकाक्षायां वाधकमाहुः अन्यथेति । परित्यागादन्यप्रकार- करणे इत्यर्थः । अपरदलेच्छायामपि स्वस्मिन् सिद्धादर्थात् फलाद्श्यते, ततोप्यधः पतती- , ८० संन्यासनिर्णयः। त्यर्थः । अयोग्यमिच्छन् पुरुषः पतस्येवेत्यवधारणात् । एतस्य फलापान्तरनिचारस्स प्रमाणा- गम्यत्वात् स्वस्यैवाऽस्सत्वेन भक्तिरूपस्य मतेः सम्मतिमाहुः इति मे निश्चितामतिरिति । उपसहरन्ति इनि कृष्ण इति । इति कृष्णप्रसादेन वल्लभेन विनिश्चितम् । संन्पासवरणं भत्तावन्यधा पतितो भवेत् ।। २२॥ कृष्णस्य प्रमादेन करणेन तम्यैव वल्लभेन की निनिश्चित, भक्तो फलरूपक्तिमिद्ध्य- थम् । सन्यासो नियते स्वीक्रियते अनेन करणेन तादृशो विचारः संन्यासवरणम् । इति समाप्तमित्यर्थः । 'अत आदौ भक्तिमार्गे कर्तव्यत्वाद्विचारणे'त्यनेन भक्तिमार्गीयम्य तात्पर्य- विपयत्वेनोपकान्तत्वात्तेनैनोपसहारः । म्यनिधितमिदमेन । ज्ञानमार्गीय तु प्रमाणैनिश्चितमेक, म्वयमनूदित परमिति भाव । अन्यथाकरणे याधरूमाहुः अन्यधेति । स्वय निश्चितात् फल- मागीयादनूदिताच ज्ञानमार्गायादन्यथा साधनमार्गप्रकारेण कर्ममार्गप्रकारेण वा करणे तस्मात् साधनात् पतितो भवेत् , निरुद्धाचरणात् स्वयमेन पतितो भोत् । ननु भगवांस्तत्पातक इति क्लेशे स्वामिनामग्रहणस्य हेतुत्वेनायुक्तत्वात् कर्मपदमित्यनेन वृनवास्यविवरणे प्रगूक्ता भक्ति- मार्गमर्यादा सूचिता । स्यस्येतन्निश्चयस्य सिद्धत्वेपि करणकर्तृकथनेनैवविधनिश्चये कृष्णप्रसाद एव साधनम् , तत्प्रियत्वमेव च स्वरूपयोग्यतासम्पादकमित्यनुग्रहेतरसाधनासाध्यत्वं सूचितम् । नन्वेव सति स्वस्य दामत्वमायाति, अत एव ग्रन्थान्तरपि 'इति श्रीकृष्णदासस्से'त्युक्तम् , अन्यत्र च वैश्वानराद्वापते' रित्यनेनाधिदैविकास्यत्व स्वयमेनोक्तम् , अतः कथ विरोधपरिहार इति चेदुच्यते । यथा भगवतो 'जीवय मृतमिन दास'मित्यादिवाक्यम्तथात्वमप्युच्यते, तत्र रसात्मकत्वस्य प्रमाणसिद्धत्वाद्रसस्स च ताद्विधत्वामिग्राहकमानेनोभयरूपत्वम्, न तु कस्यचिदारोपितत्वमिति निर्णयः, तथा प्रतिपि रसात्मकन्वेन दास्यरसानुभवार्थमाविर्भावा- त्तद्रसस्यैव तथाविधत्वादुमयरूपत्वम् , न तु किश्चिदारोपितम् ,अतो यधार्धवादित्वेनाप्तत्वात्तद्वा- क्यमखिलप्रमाणमूर्धन्यमिति तदनुग्रहभाजनैरवगन्तव्यम् । एवमेवाग्निकुमारचरणेष्वपि भगवत्व 'यावन्ती पदपद्मानी'त्यादिपूक्त तद्दासीत्वमित्यादिक यद्यद्रसानुभने यद्यदुक्त तत्तत्सर्वमनारोपि तमेवेति ज्ञेयम् । एतेन विरुद्धधर्माश्रयत्वकथनेन भक्तेभ्य. स्वस्य भगवत्त्वमेव सूचित भवति, मानुपभावस्वीकारादनधिकारिणा पर न तथा प्रतीतिरिति विभावनीयम् । पूर्वप्रणि- पातादिकरणेपि 'न पारयेह'मित्यादिवात्यै भक्तप्रकारक दास्स न सम्पन्नम् , अत एवमाविर्भूय ग्रन्थद्वयोक्तप्रकारेण स्वामिनीदास्यरसत्वमनुभूतवानिति भावः ॥ २२ ।। स्वीयेषु कृपयोक्तस्य ग्रन्थस्यास्य महात्मभि । वदनानलदासोक्ता व्याकृति पूर्णतामगात् ॥१॥ इति श्रीविठ्ठलेशात्मजश्रीवल्लभकृता संन्यासनिर्णयस्य विकृतिः सम्पूर्णा ॥

श्रीकृष्णाय नमः। संन्यासनिर्णयः॥ चाचाश्रीगोपेशविरचितविवृतिसमेतः । . नियन्धे 'त्रिदण्डं परिगृह्णीत सर्वशास्त्राविरोधि तत्' इत्यादिवचनैरुपेत्यात्र त्रिदण्ड- विपयकेष्टसाधनताप्रमाद्रभसवशेन पुष्टिमार्गीयोपि तुरीयाश्रमत्वेन त्रिदण्डं गृह्णन् पश्चात्ता- पमामुयाद, भतस्तदनुदयाय पुष्टिमार्गसंन्यासस्य विचारमारमन्ते । पश्चात्तापनिवृत्त्यर्थं परित्यागो विचार्यते । स मार्गचितये प्रोक्तो भक्तौ ज्ञाने विशेषतः ॥१॥ कलिकालजन्यदोपाकान्तत्वात् कर्ममागीयस्य विलम्येन फलजनकत्वात् ज्ञानमार्गीयस्य च परित्यागस्य सदोपत्वमुद्भाव्य पुष्टिमार्गीयपरित्यागस्य किं प्रयोजनं, कोत्र गुरुः, किंवा साधनं, का च परित्यागिनो व्यवस्थितिरित्यादिविचारः क्रियते इत्यर्थः । तथा चैवं विचारेण परित्यागे निणीते सत्यन्यत्र प्रवृत्त्यनुयात् पश्चात्तापानुदय इति भावः । स इति । यस्य विचारः क्रियते स परित्यागो भक्तौ भक्तिमार्गे ज्ञाने ज्ञानमार्गे च कर्तव्यत्वेन प्रोक्त इत्यर्थः । विशेषत इति । मार्गद्वितयोक्तावपि ज्ञानमार्गे विशेषत उक्त इत्यर्थः । तथा च वेदस्मृतिपुराणेतिहासेषु सर्वत्र प्रसिद्धत्वाद्विशेषेणोक्तः, भक्तिमार्ग तु भगवदनुग्र- हैकलभ्यभजनानन्दानुभवयोग्यतासम्पादकविरहानुभवार्थ भगवत्कृतवरणरूपस्तद्रसिकेप्वेवप्र- सिद्धत्वाद्विशेषेण नोक्त इति भावः ॥१॥ ननु मार्गद्वितयप्रोक्त एव विचायते, न तु कर्ममार्गीयः, तथा च तस्याविचारे को कर्ममार्ग न कर्तव्यः सुतरां कलिकालतः । अत आदौ भक्तिमार्ग कर्तव्यत्वाद्विचारणा ॥२॥ वस्तुतो ज्ञानमार्गेपि न कर्तव्य एव, अनन्तजन्मभिः सिद्धिसम्भवात्, परन्तु ज्ञानमार्गे दैवात् ज्ञानसिद्धौ पाक्षिस्यपि सिद्धिः, अतः कर्तव्योपि, कर्ममार्गे तु न कर्तव्य एवे- त्याशयेन सुतरामित्युक्तमिति योध्यम् । तत्र हेतुः कलिकालत इति । कर्ममार्गस्य देश- कालद्रव्यकर्तृमत्रादिसापेक्षत्वात् कलौ तु देशादीनामशुद्धत्वात् कर्ममार्गीययावत्पदार्थसिद्धिः कालत्रयेपि वाधितेत्याशयः। तथा च कलिकालजन्यदोपाकान्तत्वेनाकर्तव्यत्वात्तद्विचारोपि न क्रियते इति भावः । अत इति । सत्वरासन्दिग्धफलजनको निदोषोऽवश्यकर्तव्यश्च, अतो हेतोः ज्ञानमार्गीयपरित्यागविचारात् प्रथमं भक्तिमार्गीयो विचार्यते इत्यर्थः ॥२॥ तत्र प्रथमं परित्यागप्रयोजनं विचारयन्तः प्रयोजनानन्तरमाशय दूपयन्ति । हेतुरित्यत आहुः ।

८२ । संन्यासनिर्णयः। श्रवणादिप्रसिद्धयर्थ कर्तव्यश्चेत् स नेप्यते । सहायसङ्गसाध्यत्वात् साधनानां च रक्षणात् ॥ ३॥ अभिमानानियोगाच तद्धर्मश्च विरोधतः। गृहादेयोधकत्वेन साधनार्थ तथा यदि ॥४॥ अग्रेपि तादृशैरेय सङ्गो भवति नान्यथा । स्वयं च विपयाकान्तः पापण्डी स्यात्तु कालतः ॥५॥ विपयाक्रान्तदेहानां नावेशः सर्वदा हरेः। अतोऽत्र साधने भक्तो नैव त्यागः सुखावहः ॥ ६ ॥ प्रेमजनकश्रवणादीनां गार्हस्थ्ये व्यासद्वान्तरेण सम्यगसिद्धः, प्रकर्पण सिद्ध्यर्थ परित्यागः कर्तव्य इति पक्षो नेष्ट इत्यर्थः । अनिष्टत्वे हेतुमाहुः । श्रवणे सहायाः श्रवण- कारयितारः तत्सङ्गसाध्यत्वात् श्रवणस्येत्यर्थः । तथा च परित्यागे सर्वसङ्गराहित्येन स्थितिरपेक्षितेति भावः । ननु मास्तु श्रवणार्थ, कीर्तनस्मरणादिनिमित्तपरित्यागे को दोष इत्यत आहुः साधनानामिति । कीर्तनस्मरणादिसाधनानां वामनसादीनां प्रेमाभावात् खतोऽप्रवर्तमानानां प्रयत्नेन कीर्तनस्मरणादिपु रक्षणात् स्थापनात् प्रवर्तनादिति यावत् । तथा च खतःप्रवृत्तिरहितानीन्द्रियाणि बलेन प्रवर्तनाद्विक्षेपमासादयन्तीति भावः । एवं पा- दसेवनादिषु सर्वत्रेन्द्रियप्रवृत्तौ स्वयमूह्यम् । दायार्थ हेत्वन्तराण्याहुः अभिमानादिति । मया सर्व परित्यक्तं, मत्समः कोपि नास्तीत्येवमादिरूपाद् गर्यादित्यर्थः । तथा चैवं गर्वे सति सर्वेषामुद्वेगजननात् ऐहिको वेदस्मृत्यादिनिन्दनात् पारलौकिकश्योपद्रव इति भावः । नन्व- भिमानत्यागे को दोपोत आहुः नियोगादिति । ईश्वराज्ञालक्षणाद्वेदादेरित्यर्थः । तथा च वेदादिप्रसिद्धयतिधर्मानुष्ठाने सति अनुष्ठानरूपन्यासगात् श्रवणस्य सम्यगसिद्धिः, तदनुष्ठाना- भावे त्वारूढपतित एव स्यादिति नियोगादुपद्रव इत्यर्थः । ननु तावत्कर्माणि कुर्वीत न निर्वि- घेत यावता । मकथाश्रवणादौ पा श्रद्धा यावन्न जायत' इति वाक्याद्भगवदीयैकसङ्गः सन् श्रवणादीनि कुर्वाणः सत्सङ्गवशात् शनैः शनैः स्वतः प्रवर्तमानेन्द्रियो गर्वमप्यकुर्वन् उक्तवा- क्याघतिधर्मानपि नानुतिष्ठन् सत्सङ्गातिरिक्तं सर्व परित्यजेत्तदा को दोप इत्याशङ्कयाहुः तद्ध- मैरिति । पुष्टिमार्गीयपरित्यागधर्मरित्यर्थः । तथा च पुष्टिमार्गीयरसिकानुभवैकसाक्षिकभगव- द्वरणरूपपरित्यागे भावनासिद्धभावातिरिक्तयावत्साधनानामनभिमतत्वात् भावपोपकविरहानुम- वातिरिक्तयावत्पदार्थस्य व्यासङ्गान्तरजनकत्वेन तत्तदनुभवसाक्षिकभावरूपैः प्रकृतपरित्याग- धमैंः विरोधात् परित्यागकारणीभूतप्रेमजनकश्रवणादिसिद्ध्यर्थ कर्तव्यो नेत्याशयः । तथा च वि- चारस्सारब्धत्वात् प्रकृतप्रयोजनकातिरिक्तपरित्यागकथनम् ,वस्तुतस्तु विरहानुभवातिरिक्तप्रयो- जनकः परित्यागः पुष्टिमायिभक्तानां बुद्धिस्थोपिन प्रभवति, कुतोस्य कर्तव्यतेति ध्येयम् । ननु भावविरोधित्वान्मास्तु श्रवणाद्य), परन्तु पुष्टिमार्गीयभकोपदिष्टप्रकारेण साध्यमाने भावलक्षणे “वरूपानन्दस्य साधने प्रतिवन्धकीभूतभार्यादेस्यागे को दोप इत्याशङ्याहुः गृहादेरिति । सा- ८३ पाचाश्रीगोपेशकसवितिसमेतः । धनार्थ साधनं मावस्तत्सित्ययं यदि चेत्तया परित्यागः कर्तव्य इत्यर्थः । तथा च प्रतिवन्यक- निवृत्तिरवश्य सम्पादनीयेति गृहादेर्भावोत्पत्तौ प्रतिवन्धकलेन चेत् परित्यागो भावरूपसाधन- सिद्ध्यर्थमिति मावः। दोपमाहुः अग्रेपीति । तादृशैर्मावसिद्धौ प्रतिवन्धकैरेवेत्यर्थः । तया च कृतेपि भेपजे नक्षान्तो व्याधिरिति न्यायापात इति मावः। नान्यथेति । ये अन्यथा अतादृशा भवाधकाः साधका इति यावत्तैः सङ्गो न भवतीत्यर्थः । तथोक्तं निवन्धे विवृतौ 'सन्ति प्रह्मभावं प्राप्ता नवेतादृशा भक्ता' इति। यद्यपि 'प्रतिकूले गृहं त्यजे'दिति निबन्धे प्रोक्तं, तथापि स परि- सागः पूजानिर्वाहजनकत्वेनोक्तः, न त्वेतदेहावसान एव भजनानन्दरूपफलार्थमिति पूजानि- हको भिन्नः, अयं च भिन्न इत्यनुसन्धेयम् । तथा च पूजानिर्वाहके तु सहायसङ्गेत्यादिनो- क्तमेव दूषणमित्यपि ध्येयम् । तर्हि प्रकृतगृहादिपरित्यागस का गतिरिति चेत्, न । प्रकृते तु गृह एव तिष्ठन्नविरतमेव तन्मार्गायोपदिष्टप्रकारेण भावनां कुर्वाणः सिद्धभावलक्षणसाधनः सन् गृहादि सर्व परित्यजति विरहानुभवार्थ, न तु साधनसिद्ध्यर्थमिति सर्वमवदातम् । ननु बाधक गृहादि परित्यज्य सर्वसङ्गरहितः सन् भावनया भावलक्षणं साधनं साधयेत्तदा को दोप इति अत बाहुः स्वयं चेति । आहारादिविषयाप्राप्त्या क्लिष्टः सन् तदेवध्यायन् विषयाकान्तः स्यात् । ततो मनसेन्द्रियार्यान् स्मरन् मिथ्याचारपदवाच्यः पापण्डी तु भवेत्, तथा च मावरूपेष्टसिद्धिस्तु दूरे, प्रत्युतानिष्टसिद्धिरिति भावः । नन्विन्द्रियनिग्रहे सर्वमुपपद्यत इत्यत आहुः फालत इति । कलाविन्द्रियनिग्रहस्स दुःसाध्यत्वादित्यर्थः । विपयाक्रान्तत्वे पापण्डि- त्वम् , एकमनिष्टमुक्त्वा द्वितीयं बलवदनिष्टमाहुः विषयाक्रान्तेति । देहो लिङ्गशरीरं तस्य मोक्षपर्यन्तमनवरतमुपचीयमानत्वादेहपदेनोक्तिः, एवञ्च लिङ्गशरीराध्यक्षत्वेन (अध्यस्तत्वेन) तदभेदं मन्यमान आत्मैव (देह) पदेनोच्यते, तथा च विषयाक्रान्तात्मनां भगवदावेशः कदापि न भवतीत्यर्थः । इत्थं च यदर्थं सर्वोप्युद्यमस्तस्यैवासिद्धर्महदेवानिष्टमित्यर्थः । उप- संहरन्ति अतोत्रेति । यत उक्तदूपणानि अतो भक्त श्रवणादिसिद्ध्यर्थ अत्र साधने अनन्यमावलक्षणसाधनसिद्ध्यर्थं च परित्यागो नैव सुखावह इत्यर्थः ॥३-६॥ एवं प्रयोजनान्तरेण प्रयोजनान्तरकृतपरित्यागे च दूषणमुक्त्वा प्रकृतप्रयोजनमाहुः । विरहानुभवार्य तु परित्यागः प्रशस्यते । स्वीययन्धनिवृत्त्यर्थ घेपः सोऽत्र न चान्यथा ॥७॥ कौण्ठिन्यो गोपिकाः प्रोक्ता गुरवः साधनं घ तत् । भावो भावनया सिद्धः साधनं नान्यदिष्यते ॥८॥ विकलत्वं तथास्वास्थ्यं प्रकृतिः प्राकृतं न हि । ज्ञानं गुणाश्च तस्यैवं वर्तमानस्य घाधकाः ॥९॥ सत्यलोके स्थितिर्ज्ञानात् संन्यासेन विशेपितात् । भावना साधनं यत्र फलं चापि तथा भवेत् ॥१०॥ सादृशाः सत्यलोकादौ तिष्ठन्त्येव न संशयः।

८४ संन्यासनिर्णयः । यहिश्चत्प्रकटः खात्मा वह्निवत्प्रविशेद्यदि ॥ ११ ॥ तदेव सकलो यन्धो नाशमेति न चान्यथा । गुणास्तु सङ्गराहित्याज्जीवनाथ भवन्ति हि ॥१२॥ भगवान् फलरूपत्यान्नान वाधक इप्यते । स्वास्थ्यवाक्यं न कर्तव्यं दयालुन विरुध्यते ॥१३॥ दुर्लभोयं परित्यागः प्रेम्णा सिध्यति नान्यथा ॥ १३ ॥ निरोधलक्षणे 'हरिमूर्तिः सदा ध्येया सकल्पादपि तन ही त्याद्युक्तप्रकारेणान्तररम- णान्त-पातिसयोगविशेपानुभवनोत्पन्नस्योत्कण्ठारिशेपस्य पिपयीभूतानां भगवत्स्वरूपनिष्ठतत्त- पदार्थानामनवाप्तर्भवति हि विरहस्तदनुभवाय परित्यागः प्रशस्त इत्यर्थः । प्रयोज- नमुक्त्वा प्रकारमाहुः । अनास्मिन् परित्यागे वेदादिषु प्रसिद्धः स वेशो बन्धुजनकृतनन्ध- नाशनिमित्तत्वेनैव स्वीकार्य., न तु सस्कारत्वेनेत्यर्थः । कापायदण्डादिधारण तत्प्रयोजन चोक्त्वा गुरुमाहुः । भगवदर्थमेव सर्वरिपयत्यजनात् कौण्डिन्यो गुरुः, गोपिकास्तु सर्वप्रकारेपु गुरव इत्याशयः । गुरुमुक्त्वा साधनमाहुः साधनं चेति, । तत् पुष्टिमार्गीय- रसिकेषु प्रसिद्धमित्यर्थः । किं तदत आहुः भाव इति । ननु भावे किं साधनमित्याकां- क्षायामाहुः भायनयेति । भावे भावनैव साधनम्, अन्यत् साधनान्तर तद्रसिकसम्मत नेत्यर्थः । तथा च ज्ञानमार्गीयपरित्यागे श्रवणमननादिभिरुत्पन्न ज्ञान मोक्षे साधनं, तथा भावनया सिद्धो भाव. स्वरूपानन्दे साधन मिति भावः । साधनमुस्त्वेदानीमस्य ज्ञानिस- दृशी दशान्याशी वेत्यत आहुः । विकलत्वमात्माद्यनुसन्धानराहित्यम् । अखास्थ्यमभिल- पितार्थीनवाप्तेर्यावद्विपयनिर्वेदादनिवृत्तिरिति यावत् । तथा च सकल्पप्रतिभाते भगवति जातासु चक्षुरागचित्तासङ्गसङ्कल्पनिद्राच्छेदतनुताविपयनिवृत्तिनपानाशोन्मादमूीन्तासु नव- खवस्थासु विषयनिवृत्तिपर्यन्तानामस्वास्थ्यपदेन नपानाशोन्मादमूर्जानां विकलत्वगि- त्यनेनोक्तिरिति ध्येयम् । एव च अस्वास्थ्य विकलत्व च भावनासिद्धभाववतः प्रकृतिः स्वभावः स्वाभाविकमिति यावत् । हि निश्चयेन प्राकृत न, प्राकृता. सत्वरजस्तमोगुणास्त- सम्बन्धि न भवतीत्यर्थः । ननु गुणजन्यज्ञानेनापि जडोन्मतसदृग्व्यवस्थाजननात् भवति विकलत्वं, तथा तमोगुणजन्यप्रमादमोहाज्ञानैरपि तजायते । एव रजोगुणजन्यलौकिकवि- पयलोभे सति लौकिकविषयानवाप्तेरपि सादस्वास्थ्यम् । तथा चैतेपि विक्लवास्वास्थ्ये प्राकृते एवेत्याशक्याहु. ज्ञान मिति । एव वर्तमानस्य विकलत्यास्वास्थ्यसहितैतादृशभाववतो निर्गु- णमपि ज्ञान वाधक, गुणा अपि वाधकाः, तथा च यद्यप्रतिनध्य निर्गुण ज्ञान स्यात्तदैकाम्य- स्फुर्त्यादयः, यदि च सत्वरजस्तमासि स्युम्तदा सगुणज्ञानलौफिकविषयलोभप्रमादमोहाज्ञा- नैश्च प्रतिवन्धजननात् अय भाव एव नोत्पद्यतेत्यन्यथानुपपत्त्या ज्ञानस्य गुणानां चाभाव- निश्चयाद्विकलत्वास्वास्थ्ययो. प्राकृतत्व दुर्वचमित्याशय । न च गतिस्मितप्रेक्षणेत्यादिनिरूपि- काल्यरतिरपि प्रतिबन्धिकास्त्विति वाच्यम् । तस्यास्तूतरसामयिकभावान्तरेण प्रतिवध्य- ८५ चाचाश्रीगोपेशकृतविवृतिसमेतः । त्वात् । यद्यपि पुष्टिमार्गीयकाम्यस्फूर्तिलक्षणं रसान्तःपाति निर्गुणं ज्ञानमप्रतिवध्यमप्रसिद्धमेव, तथापि 'मनिष्ठं निर्गुणं स्मृत'मिति भगवद्वाक्याद्भगवद्विपयकं भगवचरणारविन्दरूपाक्षरविष- यकं च ज्ञानं सत्त्वगुणजन्यमपि ज्ञानं निर्गुणमेव, तचाप्रतिवध्यं सत् प्रतिबन्धकमिति चो- ध्यम् । एवं च निर्गुणं ज्ञानं प्रतिवन्धकं यत्र, तत्र गुणानां प्रतिबन्धकत्वे किं वक्तव्यमिति कैमु- तिकन्यायप्रदर्शनपूर्वकं गुणानां प्रतिवन्धकत्वाय ज्ञानमित्युक्तमिति विभावनीयम् । ननु रज- स्तमसोरास्तां लौकिकविषयलोभादिजननेन प्रतिबन्धकता, सत्वस्य तु ज्ञानमात्रजननेन कथं प्रतिवन्धकतेत्याशय तुरीयाश्रमविहितश्रवणादिना सत्वगुणोद्रेकात् जातस्य सगुणज्ञानस्य मोक्षरूपफलान्तरविषयकेच्छाजननपूर्वकं सत्यलोकलक्षणफलजननात् प्रतिवन्धकत्वमाहुः । विशेषितात् सहकृतादित्यर्थः । नन्वत्र ब्रह्मणा सह मोक्षोपि, ततोकि ब्रह्मलोकीयसुखानुभव इति फलद्वयजननेन पुष्टिमार्गादुत्कृष्ट इत्यत आहुः । यत्र भावे यथा भावना कारणं तत्र तथा फलमपि स्यात्, तथा च भावनया यथा भावो जन्यते, तथा भावेन स्वफलमपि जन्यत इत्यर्थः । एवं च भावनयास्मिन्नेव जन्मनि भावो जन्यते यथा, तथा भावेन भजनानन्दलक्षणं स्वफलमपि झटित्येतदेहावसानाव्यवहितोत्तरक्षण एव जन्यत इति भावः । एवं भावस्पोत्कर्षमुक्त्वा ज्ञानस्यापकर्षमाहुः तादृशा इति । अप्राप्तमोक्षा एवेत्यर्थः । इत्थं चानेकजन्मक्रियमाणयोगाभ्यासादिभिज्ञानं विलम्वेन जन्यते यथा, तथा ज्ञानमपि ब्रह्मस्थितिपर्यन्तं ब्रह्मलोके स्थापयित्वा ब्रह्मणा सह मोक्षजननाद्विलम्वेनैव स्वफलमपि जनय- तीत्येवमादिरूपाद्भावात् भावसाधनात् भावफलाच स्फुटतर एव ज्ञाने ज्ञानसाधने ज्ञानफले चापकर्प इति भावः । नन्वास्तां तावत् भावस्त्वरया फलजनकः, परन्तु यदुक्तं स्वसाधनी- भूतभावनातः सत्वरमुत्पन्नत्वात् खफलमपि सत्वरमेव जनयति भावस्तन्न साधु । नहि वर्ष- शतेन पुष्टो दृढदण्डो घटजननेऽचिरयति, नवा सत्वरमुत्पन्नं कपालं सति प्रतिबन्धे सजीभवति घटमुत्पादयितुम् , तथाच को हेतुर्भावस्य सत्वरफलोत्पादन इत्याशय आहुः । यथा दारुण्य- मिभूतो पहिर्मथनेनोद्भूतः सन्नन्तःप्रविष्टः सर्वं भस्मसात्करोति तथाविर्भूतो भगवान् सर्वमप्य- विद्यारूपं बन्धं नाशयतीत्यर्थः । तथा च व्यापकत्वात् सर्वत्रैव भगवानस्ति, यदा तु मक्तया अन्तःकरणे प्रकटीमयान्तःकरणे प्रकटो भवति, न कदाचित्तिरोधत्ते इति यावत् , तदा झटियविद्यानाशात् स्वरूपानन्दानुभव इति भावः । न चेति ज्ञानमार्गीयप्रकारेण नैवमित्यर्थः । ज्ञाने तु खापप्रवोधवदुदयानुदयाभ्यां चिरेण ब्रह्मणा सह मुक्तिरिति भावः । नन्वविद्यावद्धस्स जीवनं सम्भवति, नत्ववद्धस्य । तथा च बन्धे नष्टे किं प्रयोजनं जीवनस्य, किंवा जीवनसाधनमिति आशक्याहुः । तुशब्दात् कारणान्तरव्यावृत्तिः । भगवद्गुणा एवं जीवनं सम्पादयन्ति । हि निश्चितोयमर्थ इत्यर्थः । ननु गुणाः किमर्थं जीवयन्तीत्यत आहुः सङ्गेति । साहित्याद्विरहात् प्रयोजनीभूतादित्यर्थः । तथा च भजनानन्दानुभवयोग्यता- सम्पादकविरहानुभवसिद्धिनिमित्तं गुणा एव जीवनाथ भवन्तीत्याशयः । ननु सर्वसमर्थों भगवान् यथा गुणैर्जीवयति, तथा संयोगेनैव कुतो न जीवयति, यतः किश्चित् सास्थ्यमाप ८६ संन्यासनिर्णयः। सादित्याशश्याहुः भगवानिति । यदि संयोगं सम्पादयेत्तदा मजनानन्दानुभवयोग्यताजनक- विरहनाशजननेनास्वाथ्यापगमात्, स्वयमेव प्रतिबन्धकः सात् , तया च फलरूपस्य स्वस. प्राप्तौ प्रतिबन्धकत्वं नोचितमित्यर्थः । नन्वतिलेशात् कदाचियेणास्स मनसि फलप्राप्तिसन्दे- होदयजन्यमस्वास्थ्यं स्यातन्निवृत्त्यर्थ सन्देहनिवारकं वचनं वक्तव्यम् , यथा ग्रझानन्ददानार्य यतमानं नारदं प्रति 'गन्ता ममनतामसी'त्युक्तवांस्तयेत्याशपाहुः सास्थ्येति । कर्तुमेव योग्यं न भवति यतोऽयं दयालुरनुग्रहकर्ता यतश्च स्वयं न विरुध्यते । निरोधी नातो हेतोः, तथा च स्वेच्छयानुगृह्य दुर्लभपरित्यागपर्यन्तं सर्व सम्पादितवान् , अतो दयालर्यतश्च खप्रापकभावोत्पत्तौ प्रतिबन्धकं न कृतवानतोऽविरोधी, इत्यं चाविरुद्धानुग्राहको भगवा- स्तथैव मनः प्रेरयति यथा न सन्देहोदयः, न च तमन्यमस्यास्थ्यमिति ताशवाक्यं प्रयो- जनाभावान्न कर्तुमुचितमिति भावः । इदानी प्रकृतपरित्यागाधिकारं यदन्त उपसंहरन्ति दुर्लभोयमिति । ज्ञानमार्गायवैराग्यमिवान व्यसनरूपं प्रेम साधकम् । तथा च प्रेमवानधि- कारीत्यर्थः । नेति । प्रेमाभावेऽयं परित्यागः सिध्यत्येव नेत्यर्थः । दुर्लभो भगवदनुग्रहै- कसाध्यत्वाद्दुःप्राप इत्यर्थः ॥ ७–१३३ ।। इत्यं प्रकृतमुपसंहृत्य ज्ञानमार्गीयसंन्यासे किश्चिदाहुः । ज्ञानमार्गे तु संन्यासो दिविधोपि विचारितः॥ १४ ॥ ज्ञानार्धमुत्तराङ्गं च सिद्धिर्जन्मशतैः परम् । ज्ञानं च साधनापेक्षं यज्ञादिश्रवणान्मतम् ॥ १५ ॥ अतः कलौ स संन्यासः पश्चात्तापाय नान्यथा । पापण्डित्वं भवेचापि तस्माज्ज्ञाने न संन्यसेत् ॥ १६॥ सुतरां कलिदोपाणां प्रबलत्वादिति स्थितम् ॥ १६ ॥ षिचारित इत्यविचारेपि सिद्धवनिर्देशाद्वस्तुतोत्र न किञ्चिद्विचार्यमस्तीत्यर्थः । तथाहि, विद्वत्संन्यासस प्रकृतपरित्यागविचार एव प्रसङ्गाद्यवस्थोक्तैव सत्यलोक इत्यादिना । परमवशिष्यते विविदिपासन्यासः, तस्य तूच्यत एवेति न किचिदपि विचार्यमस्तीत्याशयः । अवशिष्टव्यवस्थामाहुः ज्ञानार्थमिति । उत्तरस्य स्वजन्यज्ञानोत्पत्त्यनन्तरमुत्पत्स्यमानस्य मोक्षस्य अद्गपरम्परया प्रयोजकः, न तु साक्षाजनकः, तथा चैतादृशपरित्यागो ज्ञानोत्पत्यर्थ चेस्क्रियतेत्याशयः । दोपमाहुः सिद्धिरिति । परन्तु तत्फलमनेकैजन्ममिर्भवतीत्यर्थः । ननु सत्वरमेव कुतो न भवतीत्यत आहुः ज्ञानं चेति । यज्ञा आदिर्यस्येदृशश्रवणाद्भवति, यतः साधनापेक्षं मतं कारणसापेक्षं स्वीकृत सर्वैरित्यर्थः । तथा च यतेमानसमखानामावश्यकत्वात् कृतिपूर्वकमेव श्रवणमुचितम् । इत्य च मानसमखश्रवणयोस्तत्तदिन्द्रियनिग्रहाधीनत्वानि- ग्रहस्य सुतरामशस्यत्वाचानेकैरपि जन्ममिः सिद्धिर्दूरतरा ज्ञानस्सेति भावः । उक्तं च निबन्धे 'तपसा वेदयुक्त्या च प्रसादात् परमान्मनः । विद्यां प्राप्नोत्युरुक्लेशः कचित् सत्ययुगे पुम्ग निति ध्येयम् । इममेवार्थमाहुः अत इति । सत्ययुगे कदाचिदपि सिद्धिः, कलौतु पश्चात्तापातिरिक्तं चाचाश्रीगोपेशकृतवितिसमेतः । किमपि फलं न भवतीत्याशयः । नेति । अस्मिन्नर्थे न काचिद्विप्रतिपत्तिरित्ययः । एवमष्ट- सिद्ध्यभावमानं न, किन्त्वनिष्टसिद्धिरपि भवतीत्याहुः पापण्डित्यमिति । यथोक्ताश्रम- धर्माणामनाचरणाद्वेदमार्गाच्युतेः पापण्डित्वं, चकारानरकोपि स्यादित्यर्थः । उपसंहरन्ति तस्मादिति । ज्ञाने ज्ञानमार्गे संन्यासो न कर्तव्य इत्यर्थः । इत्यमकर्तव्यत्वसाम्यादुपस्थित- ज्ञानमार्गीयसंन्यासस्य स्थूणानिखननन्यायेन पुनरकर्तव्यतामाहुः सुतरामिति। कलिदोप- प्रावल्यात् सुतरां न कर्तव्य इति स्थित, प्रथममेवोक्तममून्मयेत्याशयः । तया चोगावपि न कर्तव्यौ, समानदोपत्वादिति भावः ॥ १४-१६६ ॥ एवं मार्गान्तरीययोः सदोपत्वमुक्त्वा प्रकृतस्य सयुक्तिकं निर्दोपत्वमाहुः । भक्तिमार्गेपि चेहोपस्तदा कि कार्यमुच्यते ॥१७॥ अत्रारम्भे न नाशः स्याद् दृष्टान्तस्याप्यभावतः। स्वास्थ्यहेतोः परित्यागाद्वाधः केनास्य सम्भवेत् ॥ १८॥ हरिरत्र न शक्नोति कर्तुं बाधां कुतोऽपरे । अन्यथा मातरो बालान्न स्तन्यैः पुपुपुः फचित् ॥ १९॥ ज्ञानिनामपि वाक्येन न भक्तं मोहयिष्यति । आत्मप्रदः प्रिययापि किमर्थं मोहयिष्यति ॥ २० ।। तस्मादुक्तमकारेण परित्यागो विधीयताम् । अन्यथा भ्रश्यते स्वार्थादिति मे निश्चिता मतिः ॥ २१ ॥ भक्तिमार्गे परित्यागकृतौ यदि दोपसम्भावना तदा किं कर्तव्यमित्यर्थः । तथा च परित्यागः कर्तव्यो न कर्तव्यो वेत्याशङ्कायां समाधानमुच्यत इत्यर्थः । समाधानं वदन्तः प्रथमं प्रवृत्तिप्रतिवन्धकविनरूपं दोपमाशय तदभावमाहुः । अघास्मिन् परित्यागे आरम्मे प्रवृत्ती नाशो विघ्नो न मवेदित्यर्थः । ननु मास्तु प्रवृत्तौ प्रतिवन्धकस्तदभावस्यानुभविकत्वात् परन्तु फले प्रतिबन्धकान्तरानुमाने को दोष इत्यत आहुः दृष्टान्तेति । अनुमानस्य दृष्टान्त- सापेक्षत्वातदभावादनुमातुं न शक्यत इत्यर्थः । अपिशब्दात् सद्धेतोरप्यभावान्नानुमानमित्या- शयः। ननु लौकिकविषयानुरागात् स्वर्गाद्यक्षरानन्दतागुष्मिकफलाभिलाषाधास्वास्थ्यनाशेन फलप्रतिवन्धलक्षणो दोपः प्रकृतपरित्यागेपीत्याशझ्याहुः स्वास्थ्येति । स्वास्थ्यहेतोरस्वास्थ्यना- शकस्सेत्यर्थः। तथा च मजनानन्दातिरिक्तयावदमिलापविपयाणां प्रथममेव तुच्छीकृत्य परित्यक्त- त्वात्तदभिलापामावेन फलप्रतिपन्धः केन स्यात् ,न केनापीत्यर्थः। ननु कालादयथेप्रतिबन्धका स्युरत आहुः हरिरिति । अपरे कालादय इत्यर्थः । पूर्वपक्षिणं मनसिकृत्याहुः अन्यथेति । प्रश्ने चासन्नकाल इति सूत्रेणासन्नकालिक्या क्रियायां पृच्छमानायां पुपुपुरिति लिट् । अन्यथा पापां करोति भगवानिति, यदि त्वं निश्चितोसि तदाहं पृच्छामि, कचिदध प्रातः सद्गवे वा मातरो बालान् स्तन्यैर्न पुपुपुः किमित्यर्थः । तथा चैतावत्कालं तु मातरोभकपोषणपरा एव सर्वसंमतास्त्वया त्वद्य किमपुष्णन्यो दृष्टा इतीदृशः प्रश्नः पुपुपुरित्यस्य पान्यः । इत्यं च ८८ संन्यासनिर्णयः। यद्यसम्भावितमर्मकपोपाभावमद्राक्षीस्तदा भगवत्कृतबाधामपि मनस्यानयः । एवं चोमयमपि शशविपाणायमानमिति भावः । ननु दैवात् मिलिता ज्ञानिनः स्वानुभवज्ञापनपूर्वकं खमार्गो- पदेशं कुर्युस्तदा का गतिरत आहुः । यद्वा, ननु भगवान् स्वयं प्रतिवन्धं न जनयति, परन्तु सर्वमोहिका माया चेन्मोहमुत्पाद्य मार्गान्तररुचिलक्षणं प्रतिवन्धं जनयेदित्याशंफ्याहुः । ज्ञानिनामपीति च वाक्यं चेति कर्मधारयः। तथा च 'जानिनामपि चेतांसि देवी भग- वती हि सा, बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छतीति वास्येनेत्यर्थः । एवं चास्मिन् वास्ये ज्ञानिनामित्युक्तम्, नतु भक्तानामपीत्यतो ज्ञानिमोहजनन एवासा शक्तिर्न तु भक्तमोहजनन इत्याशयः। मोहेति । अतीतवर्तमानमोहयोरभावस्त्वतन्मार्गान्यथानुपपत्त्यैव निश्चितः, परम- वशिष्यते सन्दिग्धसम्भवो भविष्यमाणः स तु पाक्षिकोपि दोपः परिहरणीय इति न मोहयि- ध्यतीत्यनेन परिहियत इति ध्येयम् । ननु भगवदिच्छाया दुरूहतरत्वाद्भगवतः स्वतत्रतमत्वात् कदाचित्स्वयमपि मोहयेदतआहुः आत्मप्रद इति। लुब्धो द्वेष्टा वाऽभविष्यदमोहयिष्यद्भगवां- स्तु जीवकृतिसाध्यसाधननिरपेक्षः सन् स्यात्मानमपि प्रकर्पण दददुदारः, तथा द्वेष्टापि न भवति, उदासीनोपि न भवति, अपि तु प्रियः, तथा च प्रयोजनयोः लोभद्वेषयोरभावान्नैव मोहयि- प्यनीत्यर्थः । अत्रापि अतीतवर्तमानमोहयोरभावस्तु वरणान्यथानुपपत्त्यैव निश्चितः,अवशिष्टस्य तूच्यत एवेति ध्येयम् । एवं प्रकृतपरित्यागे दोपाभावमुपपाय प्रवृत्तिं विदधति । यस्मात्स- वैधा निदोर्पस्तस्मादुक्तप्रकारेण 'स्वीययन्धनिवृत्यर्थ वेश' इत्याधुक्तप्रकारेणेत्यर्थः । स्वार्थाद्विर- हानुभवलक्षणस्खप्रयोजनात् रहितो भवतीत्यर्थः । किमत्र प्रमाणमत आहुः इति मे इति । निश्चिता साक्षात्कृतविपया मतिरेव प्रमाणमित्याशयः ॥ १७-२१ ॥ नन्वय परित्यागः किं तुरीयाश्रमः, किं वा गक्तिमार्गीयः साधनविशेष इति सन्दिहानं इति कृष्णप्रसादेन वल्लभेन विनिश्चितम् । संन्यासयरणं भक्तावन्यथा पतितो भवेत् ।। २२ ॥ इति समातोयं ग्रन्थ इत्यर्थः । भगवत्प्रसन्नतया हेतुमूतया साक्षात्कृतमित्यर्थः । भक्तो भक्तिमार्गे संन्यासवरणं परित्यागलक्षणो भगवदगीकारः । तथा च नायं तुरीयाश्रमः, न वा भक्तिमार्गीयः स्वकृतिसाध्यः साधनविशेषः, किन्तु भगवत्कृतो जीवस्याङ्गीकाररूपोयं परित्याग इत्याशयः । अन्यथागीकाराभावे पतितोऽस्मान्मार्गात् व्युतो भवेत् । तथा चैत- न्मार्गाभ्युतिः पातित्यमेवेति पतितपदप्रयोग इति बोध्यम् । इत्थं च भगवानेव स्वभिन्नयाव- लौकिकालौकिकविषयेभ्योन्तःकरणं निरुध्य यदि स्वस्मिन् व्यसनं सम्पादयेत्तदायं परित्यागो भजनानन्दानुभवयोग्यतासम्पादकविरहानुभवार्थ कर्तव्यः, नो चेत्तनुवित्तजैव सेवा कर्तव्येति श्रीमदाचार्यचरणानामाशयोऽनिशमनुसन्धेयः । तथा चोक्तं विद्वन्मण्डने श्रीमत्प्रमुचरणैः 'तस्माजीवानां मर्यादेव हितकारिणी'ति ।। चाचाश्रीगोपेशकृता संन्यासनिर्णयविवृतिः सम्पूर्णा ॥ प्रत्याहुः।

श्रीमद यल्लमाचार्य-महाप्रभ-विरचित-पोडश-प्रन्पान्तर्गत-पञ्चस- निरोधलक्षणम् पभिष्टोकाभिस्समलंकृतम् १. चाचा श्रीगोपेशानाम् ४. श्रीवल्लभानाम २. काका श्रीवल्लभानाम् ५. धोपुरषोत्तमानाम् ३. श्रीहरिरामाणाम् ६. भोव्रजराजानाम् परिशिष्टयोपेतम् १ श्रीहरिराया प्रयमा असम्पूर्णा टीका २. श्रीलालभट्टष्कृत-निर्णयार्णवान्तर्गत- एतद्न्याशयनिरास. ३. श्रीलालभदृष्टत-निरोषस्थरूपनिरूपणम्- दशमसुबो. योजनान्तर्गतम् श्रीमद्-वल्लभाचार्य-महाप्रभु-वशायत्तस-नित्यलीला-स्थित-गोस्वामिधी- १००८- श्रीपुरुषोत्तमलालजी-महाराजधी-त्येतेषा-स्मृती- तदारम:-गोस्वामिश्री-१०००श्रीगोपाललाल-महाराजे प्रकाशितम् वि.सं. २०३७ श्रीवल्लभाब्द: ५०३

प्रकाशक:
गोस्वामिश्री १००८ श्रीगोपाललालजी महाराज
श्रीमहाप्रभुजीका बडा मन्दिर, पाटनपोल, कोटा,
राजस्थान, ३३४००६, भारत.
साधारण सस्करण २००० प्रति
राज सस्करण १००० प्रति
श्रीवल्लभाब्द ५०३
यथ परिचय लेखक . गोस्वामी श्याम मर्म
स्टुडियो बहार, २३-ए, सेन्ट्रल चौपाटो बिल्डिग, चौपाटी, बम्बई-४००००७

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NRN
गोस्वामिश्री १००८ श्रीपुरषोत्तमलालजी महाराज

॥श्रीकृष्णाय नमः ॥ ॥श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो ममः।। ग्रन्थ-परिचय निरोपलक्षण अन्य श्रीमहाप्रभुने गुजरातके आपके शिष्य राजा दवे और माधव दवे के लिए लिखा या. एक किंवदन्तीके अनुसार इसका रचनाकाल वि स. १५६६ है. चौरासी वैष्णवोकी वार्ताके अन्तर्गत इन दोनो भाईओकी कथा भावप्रकाशम यो मिलती . "राजा दुवे - माघौ दुबे के माता-पिता मादे भये तव दोऊ बेटानसो कहें-'अब हमको या समे श्रोरनछोडजोके दरसन करावो तो वहोत आछो.' तब वे दोऊ डोली माडे फरि माता-पिताको बैठारि धीठाकुरजीको सग ले चले सो थोरनछोड़जीने दरसन माता-पिता- को कराये. तव तहा कछुक दिनते श्रीआचार्यजी द्वारकामे हते .. तब राजा दुबे-माधो दुबे लोगनसो पूर्छ-'इहा कहु कथावार्ता--भगवतवर्षा होत होई तो तहा जये ..तव एकने कही- 'श्रीवल्लभाचार्यजो पृथ्वी परिक्रमा करि इहा पधारे है सो कथा वहोत आछी कहत है'..तव दोऊ भाई प्रसन्न होई आगे आई बैठे. तव श्रीआचार्यजो नन्दमहोत्सवको वर्णन - श्रीभागवत दशमस्कन्धवे पायमे अध्यायको वर्णन किये सो नन्दालयकी लीलाको प्रकट अनुभव दोऊ भाईनको कराय दिये. श्रीआचार्यजीके पास बड़े सबेरे भाई बिनती किये- 'महाराज! हमको सरनि लीजिये.' तव श्रीआचार्यजी दोऊ माईनको फेरि न्हवाईके नाम सुनाये ब्रह्मसम्बन्ध कराये पाछे श्रीआचार्यजी कहे-'अब तुम भगवत्सेवा करो '.. सो श्रीआचार्यजी श्रीठाकुरजीको पञ्चामृत स्नान कराई राजा दुबे-माघी दुबे के माथे पधराये और आज्ञा किये-'सब ठोरते मन छुटाई निरोध करि भगवरसेवा करो.' तब राजादुबे-माधौदुबे विनती करि जो- 'महाराज! निरोधको स्वरूप कहा है?'... या प्रकार दो भाईनकी दीनता सरल स्वभाव देखिके दशमस्कन्ध जाको 'निरोध- स्कन्ध' कहे हैं ताको पार निरोपलवाण' ग्रन्थ करि दोऊ भाईनको पाठ करायके कहें- 'तुम दोऊ भाईनको निरोध सिद्ध होईगो' सो तत्काल दोऊ भाईनको मन अलौकिक है गयो लीलारसको अनुभव होन लग्यो तब श्रीआचापंजी कहे-'अब अपने घर जाय सवा करो... देवी जीव आ तिनको नाम दीजो. तुमको निरोप मिद भयो और जो तुम्हारो सग मन लगायके करेगो साहूको निरोध सिद्ध होयगो' 1 वणवाणी (अक ४ वर्ष ७९) श्रीनागरदास शास्त्री लिखित लेख सो अपने गाम मगुदमे आये.परमे दोऊ भाई भगवररोया करना सागे. कछुक द्रष्य परमे हतो तामें निर्वाह करें. काहूसो बहोत बोले नाही. जो आवे तापर दया करिके खानपानको समाधान करे. भगवद्वार्ता करि दोऊ माई श्रीठाकुरजीको लोला रसमे मगन रहते !" भगवान्के भक्तोमे तथा भक्तोंके भगवानमै तल्लीन ही जानेकी कथा भागवत के दशम स्कन्धमे निरोघलीलाके रूपमे वणित हुई है. भगवान्की इस निरोघलीलाके फलस्वरूप यह वहा कहा गया है कि उन भक्तोंको ऐसी स्थिति हो गई कि ये सोते-जागते, चलते वार्तालाप करते, क्रीडा या स्नान करते और भोजन करते हुए भी अपनी सारी सुध-वृष ग्वोकर केवल श्रीकृष्णमे हो तल्लीन रहते - "शय्यासनाटनालापकोटास्नानाशनादिषु न विदु सन्तमात्मानं वृष्णय कृष्णचेतस:"(भाग १०-९०.४६)यह निरोधका परिनिष्पन्न स्वरूप है. योगका लक्षण हमारी केवल चित्तवृत्तियोका निरोघ माना गया हैं-"योगश्चित्तवृत्ति- निरोध". केवल चितवृत्तिका निरोप किन्तु भक्तिमार्गमे अपर्याप्त माना गया है. पुष्टि- भक्तिरूप निरोघ श्रीकृष्णके संयोग एवम् वियोग को गहराईसे अनुभूत करना है. केवल चित्तवृत्ति ही नहीं अपितु देह-इन्द्रिय-प्राण-मन-बुद्धि-अहंकार-चित्त-आत्मा, तथा अन्य भी आरमीय वस्तु और परिजनो का कृष्णमजनमें विनियोग या तत्पर हो जाना पुष्टि- मार्गीय निरोध है इस भक्तियोग निरोधको व्याख्या उसके (१) कारणलक्षण (२) स्वरूपलक्षण (३) कार्यलक्षण एवम् , (४) प्रयोजनलक्षण के आधार पर चार तरहसे दी जा सकती है कारणलक्षण भागवतके द्वितीयस्कन्धके दसवे अध्यायकी छठी कारिका-"निरोधोस्यानुशयनमात्मनः मह शक्तिभि " में निरोधके कारण लक्षणका निरूपण हुआ है. श्रीमहाप्रभुने भी भागवतार्य निवन्ध (१०.१४-१७) मे इसका विवेचन किया है. वहा यह समझाया गया है कि अपनी दुर्विभाव्य शक्तियोके साथ श्रीकृष्णका इस घरातलपर क्रीडार्थ प्रकट होना निरोप है. 'निरोध' के इस तरह के लक्षण में 'निरोध' शन्दका रूढार्थ नही किन्तु यौगिकार्थ विवक्षित होता है नवमस्कन्यका वर्षा-विषय भक्ति और दशमस्कन्यका वर्ण-विषय निरोध माना गया है. इनके पूर्वापर होनेको क्रमसगति यह मानी गयी है कि नवमस्कन्धमे निदिष्ट भक्ति जिनमे प्रकट होती है ऐसे भक्तोका, उन्हें विमुक्त करनेके लिए भगवान्के द्वारा, जो रोध किया जाता है, उमे 'निरोध' कहते है क्योकि जोश्रीकृष्णके द्वारा निरुद्ध होते है वे रासारसे मुक्त हो जाते है. संसारावेश भक्तिको अशुद्ध बनाता है अत भक्तिकी शुद्धताके लिए श्रीकृष्णके द्वारा भक्तोका निरोध आवश्यक है दशमस्कन्धमे वर्णित भगवानको प्रत्येक लोलाको चरम परिणति यही दिखलायी गयी है कि कैसे उन-उन लीलाओसे सम्बद्ध भक्त श्रीकृष्णके प्रति प्रवल आकर्षणके कारण प्रपञ्चको मूल कर श्रीकृष्णमे अनम्यतया आसक्त हो गये थे.

बात्सल्यभाववाले नन्द-यशोदाको यही गति हुई सख्यभाववाले गोपावालकोकी यही गति हुई माधुर्यभाववालो गोपिकाओको भी यही गति हुई. गजके तो पशु-पक्षी-वृक्ष-मयंत-नदी पर्यन्तको यही गति वणित हुई है. आगे चल कर मपुरालीला या द्वारकालीला से सम्बद्ध भक्तोकी भी प्रपञ्चविस्मृति और कृष्णासक्ति ही पूरे अवशिष्ट दशमस्कन्धका प्रमुख वर्णनीय विषय है इस जगतमे भगवान्की जैसी लीलाके कारण भरत, प्रपञ्चको भूलकर, भगवान्मे अनन्य- तया आसक्त हो पाता हो वह भगवान्की लीला भक्तके भगवान्मे निरुद्ध होनेका कारण मानी जाती है. अत ऐसी भगवल्लीला निर्देश द्वारा निरोधको व्याख्या, निरोधका कारण- लक्षण माना जाता है भगवान्की मनोहारी लीलाओके द्वारा अवतारकालमे तो भक्तोका निरोघ भागवतके दशमस्कन्धमे वर्णित हुआ है, किन्तु आधुनिक भक्तोंके निरोधको सम्भावना कितनी हो सकती है। इस शकाका समाधान श्रीमहाप्रभुने भागवतार्थ-निवन्धके गुणप्रकरणमे किया है. वहा यह कहा गया है कि जैसे पर्मिरूपमे श्रीकृष्णके स्वयमेव प्रकट होनेपर भक्त उनमे निरुद्ध हो गये, इसी तरह भगवान के गुण-धोका निरन्तर श्रवण-स्मरण-कीर्तन करनेसे, आधुनिक भक्त भी भगवान्म निरुद्ध हो सकते है अतएव दशमस्कन्धके अन्तमे छह अध्याय गुणप्रकरणके रूपमे योजित किये गये है परमात्मा परमार्थत यदि निर्गुण निर्धर्मक निराकार निर्विशेष हो तो कृष्णावतारकी लीलाको मायाका कपटनाटक मानना पडेगा. इसी तरह परमात्माका मूलरूप श्रीकृष्ण म हो तो यशमस्कन्धमे वर्णित लीलाओको आधिदैविक महत्ता खण्डित हो जायेगी अत परब्रह्म परमात्मा भगवान् स्वयम् सगुण-साकार श्रीकृष्ण हैं, यह दिखलानेके लिए अन्तिम गुणप्रकरणमे श्रीकृष्णके दिव्य अकुण्ठित एवम् पारमार्थिक, ऐश्वर्य वीर्य यश श्री ज्ञान और वैराग्य रूप, छह गुणोका द्योतन छह अध्यायो द्वारा किया गया है (भा नि १०४१८॥ -४२०) अवतारकालमे अपने स्वरूपात आकर्षणसे भगवान् भक्तोको अपनेमे निराद्ध करते है. अनवतारकालमे स्वयम् भावान्के प्रकट न होनेपर भी भगवद्गुणोका ऐसा माहात्म्म है कि गुणगानकर्ता भक्त भगवान्मे निरुद्ध हो ही जाते है अर्थात् भगवद्गुणोके सकीर्तन करनेरी भी प्रपन्चको विस्मृति और भगवदासक्ति सुलभ हो जाती है- "स्कन्यायंस्तु" निरोयो हि हलस्टेनोपसहतिः अपेपि ये भविष्यन्ति कीर्तनातैपि तादशा" (भा नि १०१८६६ इससे सिद्ध होता है कि भगवल्लीलासे प्रत्यक्ष सम्बन्धको तरह परोक्षमे उसका श्रवण- स्मरण-कीर्तन भी प्रपञ्चविस्मृति और भगवदासक्ति रूप निरोधका कारण बनता है मपितवपिनीमे अतएव दोनो कल्प दिखलाये गये है : मेवा और कथा, तथा केवल कथा- भागवतार्य-निवन्धक तामसफल-प्रकरणके उमसहार (10११०-१११) मे यह कहा गया है कि "गुणगान-कथा परोक्षमे करनी चाहिये प्रत्यसमे भजन-सेवा श्रेष्ठ होती है इस तरह वियोग एवम् सयोग की अनुभूतियोका चक्रकी तरह बावर्तन निरन्तर पलने लग जाये तो निरोपदयाकी सिद्धि मान लेनी चाहिये." अनवतारकालम भगवरसेवा पुष्टिमार्गमें भगव- ल्लोसाकी प्रत्यक्ष अनुभूतिकी तरह मान्य है. अतएव सेवाके अनवसरमें कपाका समाश्रयण मावश्यक हैं. स्वरूपलक्षण निरोधके कारण-लक्षणकी पहचान के बाद स्वरूपलक्षण मुबोध हो जाता है. प्रपञ्चको सर्वथा भूलकर भगवानमे ही अनन्यतया आसक्त हो जाना निरोपका स्वरूपलक्षण है "प्रपञ्च- विस्मृतिः तस्मात् कृष्णासक्तिश्च वष्यते" भागवतके नवम स्कधमे भक्तिका वर्णन अभिप्रेत है. ऐसी भक्तिवाले जीव प्रपञ्चको भूलकर अनन्यतया भगवान्में आसस्त किस तरह हो पाये, यह दिखलाना दशम स्कन्यमे अभिलपित है. तदनुसार पोडसमन्पमै भी,भक्तिवपिनीमें पहले भक्ति के विदिप प्रकारोका वर्णन किया गया है। और बादमे निरोघलक्षण प्रन्पमे ऐसी भक्तिवाले जीवोके लिए अनन्यतया भगवान्में निरुद्ध होने के उपाय सममाये गये है एतदर्थ भक्तिवधिनीमे वर्णित भक्तोके पापो प्रकारपर पोडासा दृष्टिपात उपयोगी होगा: भक्तिमार्गीय जीव दृढबीजभाव (१) गृहत्यागपूर्वका- - श्रवणकीर्तनादि- परायण मदृढनीजभाव वर्णाश्रमधर्मानुरूप गृहस्थितिपूर्वक भगवद्- भजनपरायण अव्यावृत्त व्यावृत्त (२) पूजा-प्रवणादि- परायण केवलश्रवणादि- परायण + जातव्यसन अजातव्यसन . (३) गृहत्यागी भगवदीयसंगी • ये दोनो प्रकार अन्तमें एक ही बन जाते हैं. (४) परिषर्या-क्या- श्रवणादिपरायण (५) केवलकथा- श्रवणादिपरायण " " . " " " " " " इस तालिकापर दृष्टिपात करनेके बाद यह समझ लेना भी आवश्यक है कि पोश- अन्योने कोनसा अन्य किरा अधिकारीके लिए मुख्यतया उपदेशाई है. इसके अन्तर्गत निरोप- लक्षण अन्धके उपदेशापं अपेक्षित अधिकारीके गानसे इस प्रत्यकी, अन्य भक्तिवपिनी यादि अन्योंसे, सगति तथा तात्पर्य का निर्धारण सरल हो जाता है : किस अधिकारोके लिए १) यमुनाष्टक मनितवपिन्युक्त पाचो के लिए २) यालबोष ३) सिमान्तमुक्तावली ४) पुष्टिप्रवाहमर्यादा ५) सिवान्तरहस्य २ तथा ४ के लिए ६) नवप्न भक्तिवर्षिन्युक्त पांचोके लिए ७) अन्त करणप्रबोध ८) विवेकपाधय विशेषत ४ और ५, सामान्यतया सभी के लिए ९) कृष्णाश्रय समीके लिए १०) चतुश्लोकी २ तथा ४ के लिए ११) भवितवधिनी सभी के लिए १२) जलभेद १३) पंचपद्यानि १४) सन्यासनिर्णय १, ३ तथा ५ के लिए १५) निरोधलक्षण सभी के लिए १६) सेवाफल २ तथा ४ के लिए इस तालिकापर भी दृष्टिपाव कर लेनेसे अब निरोपलक्षण अन्यको सर्वविध अधिकारि- योके लिए उपयोगिता मान्य करनेपर इसके तात्पर्य निर्धारणमे क्लेश नहीं रह जाता है जो भक्त अपने गार्हस्थ्यके साथ, राजादुय-माथीदुदेकी तरह, परमे भावान्को सेवा और कथा दोनोको निमा पाते हों, उनके लिए गृहत्याग निरर्थक हो जाता है. क्योकि पूर्वोक्त रोतिसे सेवा-कथाके सतत भावतंनसे ही उन्हें प्रपञ्चकी विस्मृति और भगवान्म आसक्ति दृ४ हो जाती है. यह मुख्य कारण है स्वगृहमै भगवत्सेवा न निमनेपर, परगृहमे उस गृहस्वामी भगवदीयके परिचारक बनकर उसके द्वारा की जाती भगवत्सेवामे सहयोग देना अर्यात् परिचर्या करना, और जब वह भगवत्कया करता हो तर श्रोताके रूपमे उसमे सम्मिरित होना, यह भगवदीय पड़ोसीके निकट रहनेवाले अज्ञातव्यसन भक्तिमार्गीय जीवके लिए आवश्यक माना गया है निरोधकी सिद्धिके लिए यह भी एक गोणकल्प स्वीकारा गया है, गृहत्यागके विकल्परूपमे. " , . " भक्तिवधिनीमे इन दोनो कल्पोको (अर्थात् स्वगृहमे मगवत्सेवा-कथा-मय जीवनयापन, अन्यथा ऐसे किसी भगवदीयके समीप पर बनाकर रहना और परिचर्यायं एवम् क्या- श्रवणार्थ उस भगवदीयका सग करना, यो दोनो क्ल्पोको) लक्ष्यमे रसकर-"सेवाया वा कथाया वा यस्यासक्तिढा भवेत् यावज्जीव सस्य नाशो न क्वापीति मतिमंम" आश्वासनद्वारा श्रीमहाप्रभु निरोपसिद्धिकी वात ही समझा रहे है क्योकि निरोघरे अभावम-"हरिणा ये विनिमुक्तास्ते मग्ना भवसागरे ये निरुद्धास्त एवात्र मोदमायान्त्यहनिशम्" इस निरोपलक्षण ग्रन्यके वचनके अनुसार भवसागरमे मग्न होना निश्चित माना गया है अत. परगृहमें भी भगवत्परिचर्या तथा भगवत्कथाश्रवण को प्रणालीसे निरोधको सिदि स्वीकारनी ही पडती है कार्यलक्षण कारण और स्वरूपके विमर्शके वाद अव निरोधके कार्य अर्थात् इसके कारण पैदा होने- वाले प्रभावोका विचार आवश्यक हो जाता है जो भक्त प्रपञ्चको विस्मृतिके साय भगवान्मे आसक्ति जोड़ पाता है, उसे भगवान सयोग एवम् वियोग की अनुभूति तीव्रतासे होने लगती है जैसा कि व्रजभक्तोके वारेमे वर्णन मिलता है- "गोपीना परमानन्द आसोद्गोविन्ददर्शने क्षण युगशतमिव यासा येन विनामवत्" (भा १०।१९।१६) भवितवपिनीमे इस अवस्थाको 'व्यसनदशा' कहा गया है निरोधका स्वरूप निप्पन्न होते ही निरोधका प्रभाव अर्थात् व्यसनदशा व्यक्त होने लग जाती है भग- वत्सयोगमे परमानन्दकी अनुभूति और एक क्षण भी भगवद्-वियोग सह न पाना यह निरो- धका कार्य माना गया है- 'भगवद्विरहसामयिक-परमदु खकारणत्वे राति भगवत्सयोग- सामयिकपरमानन्दसापकत्व निरोधत्वम्" (निर्णयार्णव). भगवदनवतार-कालमै भगवत्सेवाका अवसर भगवत्सयोगानुभूति है तथा अनवसर वियोगानुभूति है अत कार्यलक्षण भी अवतारकाल और अनवतारकाल दोनो परिस्थितियों उपपन्न हो जाता है प्रयोजनलक्षण भागवतम तथा भागवतार्थ-निबन्धमे भी निरोधका प्रयोजन मुक्ति एवम् आश्रयभावापत्ति स्वीकारा गया है- निरोघोस्यानुशयनमात्मन सह शक्तिभि मुक्निहित्वान्यथारूप स्वरूपेण व्यवस्थिति , आभासश्च निरोपश्च यतश्चाध्यवसीयते स आश्रय पर ब्रह्म परमात्मैति शब्द्यते' (भा २॥१०॥६-७) इसी तरह भागवताथ निबन्धमे भी कहा गया है-"भक्ता पूर्वत्र निर्दिष्टा ते रोदव्या विमुक्तये, कृष्णे निरुद्धकरणात् भक्ता मुक्ता भवन्ति हि" (भा नि १०।१५-१६) और "हरिराश्रय इत्युक्तो मुक्तानामिति वणितम्' (भा. नि १२।१७) पोडसग्रन्धको निरूपणशैलीसे इसमे योडासर यह अन्तर है कि यहा निरोपोत्तर दो अवस्था (१) मुक्ति और (२) आश्रपभावापति स्वीकारी गई है पोडशप्रन्यमे जबकि निरोध- लक्षण अन्धके बाद आते सेवाफल ग्रन्थमे रोवाके तीन फल (१) अलौकिक सामभ्यं (२) सायुज्य; और (३) वैकुण्ठादिषु सेयोपयोगिदेहो स्वीकारे गये हैं स्पष्ट है कि इनमें 'सायुज्य' और 'मुक्ति' समानार्थी पद है, इसी तरह 'वैकुण्ठादिपु सेवोपयोगिदेह' और 'आश्रयमावापत्ति' भी अन्तत एक ही अवस्थाके योतक है जहा तक 'अलौकिक सामध्य' के अलग होनेका प्रश्न है तो उसमे यह ज्ञातव्य है कि भागवतके दशमस्कन्ध तामस राजस एवम् सात्त्विक प्रकारके भक्तोके मक्तिको प्रेम मासक्ति एवम् व्यसनदशा का वर्णन क्रमश, प्रमाण प्रमेय और साधन के रूपमे हुआ है साधनके बाद तीनो ही प्रकारके भक्तोको फलावरथाका भी वर्णन दिया गया है. निरोधकी यही फलावस्था सेवाफलमे अलौकिकसामप्य रूपमे वणित है. इसे 'व्यसनोत्तर-कृतार्थवा' 'सर्वाश्मभाव', 'पानसी सेवा' अथवा 'फालनिरोध' कहो बात एक ही बनती है पोडशग्रन्थ पुष्टिमार्गीयोके लिए श्रीमहाप्रभुने प्रकट किया है. पुष्टिप्रवाहमर्यादा ग्रन्थको --"भगवानेव हि फल स यथाविर्भवेद् भुवि गुणस्वरूप देन तथा तेपा फल भवेत्" (वा १७) कारिकामे यह समझाया ही गया है कि पुष्टिमार्गमै फल स्वयम् भगवान है, वे गुण या स्वरूप के भेदसे जैसे भी इस भूतलपर प्रकट हो, तदनुसार, उन्हें फल माना जाता है. स्वयम् स्वरूपात्मना इस भूतलपर भगवान्का भक्तोके बीच प्रकट होना पुष्टिमार्गीय फल है इसी तरह गुणगानकी प्रक्रिया द्वारा भी भक्तके हृदयमे भगवानका प्रकट होना फल ही है दोनो ही तरहके भगवत्प्राकटपके कारण भक्त प्रपञ्चको भूलकर भगवदासवत हो पाता है हर सूरतमे इस भूतलपर यदि भगवदनुभव नहीं होता तो इस देहके छूटनेके बाद भगवान्मे सायुज्यरूप मोक्ष मिलेगा अथवा वैकुण्ठ आदि लोकमे मेवोपयोगी देह मिलेगा ये दोनो ही फर इस भूनलपर घटित होनेवाली अनुभूति नही हैं, अत पुष्टिप्रवाहमर्यादा ग्रन्थमें परिभाषित पुष्टिमार्गीय फलानुभूतिको तुलनामे ये कुछ गौण अनुभूतिया है अतएव इन अनुभवोंके सामर्थ्यको 'अलौकिक' नहीं कहा गया है, क्याकि इन लौकिक अनुभव होनेकी शका ही नही उठ सकती है. फलनिरोप इस भूतल- पर होनेवाली अनुभूति है, मानसीसेवाकी तरह, अत इसके अनुभवको 'अलोकिक सामय' कहा गया है अन्यथा भूतलपर घटित होती अनुभूतिको कोई लौकिक समा सकता है वास्तविकता जवकि यह है कि यह इस लोकमै घटित होनेपर भी अलौकिक घटना ही है निरोध अपने दोना रूप, अर्थात् साधननिरोध एवम् फलनिरोध, मे इस लोकमें घटित होनेवाली अलौकिक घटना है "प्रपञ्चे क्रीडन हरे' वचनमे श्रीमहाप्रमु अतएव मारपूर्वक प्रपञ्च अर्थात् इम लौर का उल्लेख करते है इस भूतलपर मक्तोके वीच भगवत्कोडा साधन- निरोध है और एसी लीलाके कारण जब भा जगत्को भूलकर जगदीशम अनन्यतया आसक्त हो जाता है तो वह फलनिरोध है इस स्पष्टीकरणक वाद निरोधका प्रयोजन- लक्षण सुगम हो जाता है भगवदवतारकालमें भूतलपर प्रकट होनेवाले भगवद्रुपकी वह लोला कि जिसका प्रयोजन जीवात्माको सरिमभावका दान करना हो वह निरोप' कहलाती है. अवतारकालमें सापुग्य. मुक्ति या आश्रयमावापत्ति प्रदान करनेके लिए, जो वियोगानुभव भगवान् कराते है। और इस तरहके तीर वियोगमें, भक्तका निरन्तर भगवान् के गुणगानमें तल्लीन हो जाना भी निरोप ही है. ये दोनों तरह के लक्षण भगवदवतारकालकें हैं. अनवतारकालमें लीलाका स्थान तनु-वित्तजा सेवा ले लेती है और गुणगानका स्थान भगवत्कथाका श्रवण-स्मरण-किर्तन ले लेते है. तदनुसार निरोधका प्रयोगन सेवाफलमें वर्णित अलौकिक सामर्थ्य, सायुज्य एवम् वैकुण्ठादिलोकमे सेवोपयोगी देह का लाभ माना जाता है. अवतारकाल हो या अनवतारकाल सच्चे पुष्टिभक्तकी भक्ति निरुपाधिक-निष्कारण- निष्प्रयोजन ही होती है. भरत केवल भगवान्को ही चाहता है, मुक्तिको नहीं, पर भनि अवांछित फलप्रदान करती ही है. यह तृतीयस्वन्धमे कहा गया है. अतः प्रपोजनलक्षण भक्तके भाव-अभिप्रायको दृष्टिगत रखकर नहीं दिया गया है किन्तु भक्तिके स्वभावको दृष्टिगत कर दिया गया है. इसका अलावा एक और दृष्टिमे भी निरोधका लक्षण-याख्यान किया जा सकता है वह है: १) करण-निरोष २) व्यापार-निरोप ३) फल-निरोष १) फरण-निरोध सुबोधिनी तथा भागवतार्य-निबन्ध के तामसप्रकरणके प्रारम्भमे इस विषयको विवेचना हुई है कि जीवके स्वभावका बदलना स्वयम् जीवके लिए सर्वथा अशरय बात है. अत. जीवके साविक राजस या तामस स्वभावोके अनुरूप स्वरूप धारण कर भगवान्, जब भूतलपर प्रकट होते हैं और भक्तोके बीच लीला करते हैं, तव अपने-अपने स्वभावोके अनुरूप जीव भगवान के स्वरूप एवम् लीलामो मे आसक्त हो ही जाते हैं. इस लीलाविहारी श्रीकृष्णमें आसक्तिके कारण प्रापश्चिक विषयोमे आसक्ति अनायास स्वतएव टूट जाती है. अथवा स्वार्थबुद्धिरहित केवल भगवदुपयोगिताको भावनामे रूपान्तरित हो जाती है. यह विलक्षण परिवर्तन जिस लौलाके कारण सम्भव होता है, उस भगवल्लीलाको करणात्मक निरोष माना जाता है. 'करण' यानि असाधारण कारण. दशमस्कन्धमे वर्णित भक्तो- विशेषत. व्रजभक्तो- को जो प्रपञ्चविस्मृति मोर कृष्णासक्ति की सिद्धि मिली, उसका असाधारण कारण भक्त. स्वमावानुरूप भगवद्रूप एवम् भगवल्लीला ही पे. अतएव कहा गया है-" ते नाधीतश्रुतिंगणाः नोपासीतमहत्तमा. अव्रतातप्ततपस. सत्सगाल्मामुपागता केवलेन हि मावेन गोप्यः गाव. नगा मृगाः येन्ये मूढधियो नागा. सिद्धाः मामीपुरवसा, ये न योगेन गोल्येन दानवततपोवरः म्याल्पास्वाध्यायसन्यास प्राप्नुयाद् यलवानपि" (भा. १९३१२१७-१). यहा जिस सत्संग और जिस भाव को स्वप्राप्तिमे भगवान्ने साधन माना है, वह स्वयम्का लीलारमक संग तपा लीलासक्तिरूप भाव ही है. अन्य सभी योग साप दान प्रत तप यज्ञ म्याख्यान स्वाध्याय एवम संन्यास रूप साधनोकी अकिश्विस्करता स्वपय भगवान्ने ही वणित कर दी है इसे 'साधननिरोध' अथवा 'भगवान्का भक्तो निरोध' माना जाता कहा जाता है. इससे सिद्ध होता है कि भक्तोंके स्वभावानुरूप भगवान्की लीला, मक्तोंके निरोप अर्यात प्रपञ्चविस्मृति और भगवदासक्ति का असाधारण कारण है २) व्यापार-निरोष कारण दो तरहके होते हैं : (१) उपादान (२) निमित मिट्टी घडेका उपादान कारण होती है चक्का दण्डा आदि उपकरण निमित्त कारण माने जाते हैं निमित्त कारणके निष्क्रिय होनेपर कार्य उत्पन्न नही होता. अतः सक्रिय-क्रियाव्यापार करनेवाले कारणको 'करण' या 'उपकरण' कहा जाता है. भगवल्लीलाको निरोधकी उत्पत्तिमं करण माना गया है. तदनुसार ही कुछ व्यापार भी होना चाहिये अत. प्रपञ्चविस्मृतिपूर्वक भगवदासक्ति यह भगवल्लीलाका व्यापार है. जैसे पक्केफा फिरना या दण्डेसे फिरना, इन व्यापारोंके कारण चक्का-दण्डा आदि उपकरणोको 'करण' कहा जाता है. ३) फल-निरोष भक्तके स्वभावानुरूप करण-भगवल्लीला, और उसके व्यापार-प्रपञ्चविस्मृतिपूर्वक भगववासक्तिके फलस्वरूप भक्तके प्रापश्चिक विषयोंके सारे वन्धन ट्ट जाते हैं इनका अभाव हो जाता है यह दो प्रकारसे होता है या तो भक्तरो सम्बन्धित सारे लौकिक पदार्थ और भावो में भगवदावेश अलौकिकता अर्थात् सच्चिदानन्दात्मकता प्रकट हो जाती है, या फिर लौकिक पदार्थ और भावो से मुक्त होकर जीव सायुज्य या वैकुण्ठ आदि लोकोंमे सेवोपयोगी देह प्राप्त कर लेता है अतएव श्रीमहाप्रभु कहते हैं- “लौकिकेषु तु भावेषु यत्रय हरिवेशन निवर्तते तदेवान वन्हेरुमय यथा" (सुबो. १०५।१). जिन-जिन नौकिक भावोंमे या पदार्थोमे भगवदासनिके कारण भगवदावेश ह. जाता है उन सभी पदार्थों और भावो मे तिरोहित चिदश और मानन्दारा पुन प्रकट हो जाता है यो सच्चिदानन्दाशके पूर्ण प्राकटपके कारण वे ब्रह्मारमक हो जाते हैं काष्ठमे तिरोहित अग्नि जैसे एक बार प्रकट हो जाती है तो काष्ठ स्वयम् अग्निरूप हो जाता है ऐसे ही जिस भक्तमे प्रपञ्चविस्मृतिके साथ भगवदासक्ति प्रकट हो जाती है, उसके सभी पदार्थ और भाव अन्तत. सच्चिदानन्द ब्रह्मका रूप धारण कर लेते हैं. वैसे भी जगतको प्रत्येक वस्तुका वास्तविक या आन्तरिक स्वरूप तो ब्रह्मात्मक ही होता है, पर अज्ञानवश हमे विपरीत भान होता है, और वह भान निवृत्त हो जाता है.

मतियो मिथ्या-मायिक प्रपञ्चकी तरह यह प्रपञ्चका याधशान नहीं है. न नंपायि- को अनित्य प्रपञ्चकी तरह यह प्रपञ्चरा नारा ही है सास्परे प्रारत प्रपञ्चकी तरह इसे विकृतिका प्रकृतिमे पुन लीन हो जाना भी माना नहीं जा सकता है. प्रपञ्चके ग्रहहारमा हो जाने का तात्पर्य केवल इतना ही है कि दृष्टा-जीवको वह ब्राह्मारमन होनेपर भी वैसा दिखलाई नही देता है, पर निरुद्ध भक्तको दृष्टिम अपने प्रियतम परमारमाके अलावा अन्य बुछ आता ही नहीं, फलत जदजगतके विभिन्न पदार्थ भी उसे सच्चिदानन्दात्मक दिखलायी पढ़ने लगते हैं इसी तरह जीवजगत्वे भी सभी रूपोगे ब्रह्मात्मकतावा भान होने लगता है. जड़ जीवारमक जगतकी जहरूपता एवम् दुसरूपता तिरोहित हो जाती है. इस अपम इप्स अवस्थाको कमी 'प्रपञ्चप्रलय' या 'प्रपञ्चनाग' कहा जाता है यह फलनिरोध है अर्थात् भक्तका भगवान में निरोध है इसका प्रयोजनलक्षणके अन्तर्गत विचार हुमा है दशम स्कायमे भगवान्को लीलाका वर्णन चतुर्धा हुमा है : (१) प्रमाण-निरोध (२) प्रमेय-निरोध (३) साधन निरोध (४) फल-निरोध (१) भगवान्की प्रमाणरूपा निरोघलीलामोके कारण भक्त अपने स्वभावके अनुरूप पारण किये गये भगवद्रूपको जान पाता हैं अत: ऐमी लीलाको 'प्रमाणनिरोष' कहा जाता है. प्रमाणलीलाके करण यननेपर व्यापार भक्तके हृदयमे प्रेमके रूपमे प्रकट होता है. इसका फल भक्त के हृदयमे प्रमेयकी स्थिरता होती है (२) भगवान्की प्रमेयरूपा निरोघलीलाके कारण मक्त-स्वभावानुरूप धारण किया गया भगवानका रूप-प्रमेय भक्तके हृदयमे सर्वथा आरूढ हो जाता है अत ऐसी सोलाको 'प्रमेयनिरोष' कहा जाता है प्रमेयलीलाके करण बननेपर व्यापार भवतये हृदयमे भगवदा- सक्ति-भगवानसे अलावा अन्य सभी विषयोमे अनि के रूपमे प्रकट होता है इसके फलस्वरूप भक्त अपने मनोरथोक मनुरूप भगवान्के रूपकी प्राप्तिके साधनोमे जुट जाता है (३) भगवाम्की साधनरूपा निरोघलीलाओके कारण भक्त-स्वभावानुरूप पारित भगवान्के रूपकी प्राप्तिके साधनोंमे मक्त तसर हो पाता है अत ऐसी लीलाको 'साघननिरोप' कहते हैं साधनलीलाके करण बननेपर व्यापार भक्तके हृदयमे भगवद्व्यसनकै रूपमे प्रकट हो जाता है अब भगवान्के बिना भक्त रह नहीं पाता फलस्वरूप अपने मनोरयके अनुरूप भग- वद्रूप एवम् भगवल्लीलाकी अनुभूति उसे होने लगती है (४) भगवान्की फलरूपा निरोधलीलामोंके कारण भक्त-स्वभावानुरूप पारित भगव- द्रूपकी लीलामे भक्त सम्मिलित हो पाता है अत एती लीलाको 'फलनिरोध' कहा जाता है फलात्मिका लीलाके करण बननेपर व्यापार मक्तके हृदयमे मानसी सेवा, सर्वात्मभाव आदिके रूपमें प्रकट होता है. फलस्वरूप भगवान्के वाह-आभ्यंतर अनुभयोका चक्र भक्तके हृदयमै निरन्तर चलने लग जाता है. भक्त भगवान्मे तन्मनस्क तदालाप तद्विचेष्ट तदात्मक तद्गुणगानपरायण होकर अपने देह-गेहकी सुध-बुध खो देता है ! भजनानन्दकी इस परा- काष्ठाको तुलनामे भक्तको ब्रह्मानन्द कभी सुहाता नही है !! ब्रह्मानन्दमे एकरसता होती है शुद्ध-अद्वैतरूप, जवकि भजनानन्दमे अनेकविध मधुरता रहती हैं : दैतरूप भी और प्रदेतरूप भी !!! सायुज्यरूप मोक्ष अथवा ब्रह्मभावातिरूप बैकुण्ठादि लोकमे मेवोपयोगीदेह भी इस पूर्वोक्त अलौकिक-सामर्थ्यको तुलनामे भक्तके मनको लुभावने नही लगते हैं. भगवत्संयोग- सेवा और भगवद्वियोग-कथा के अहर्निश चलते चक्रसे बढ़कर केवल विप्रयोगको माना नही जा सकता है यही कारण है कि मुक्ति या आश्रयभावापत्ति की ओर ले जानेवाले भ्रमरगीतमे वर्णित वियोगका स्थान फलप्रकरणमे न हो कर प्रमेयप्रकरणमे है. "मथ्यावेश्य मन कृत्स्न विमुक्ताशेपवृत्ति यत्, अनुस्मरन्स्यो मा नित्यमचिरान्मामवाफ्यथ" (भा १०४७।३७) की मुबोधिनीमे इस अवस्थाकी व्याख्या करते हुए श्रीमहाप्रभु कहते है- "अहं हि कृत्स्नः प्रसादेनापि प्राप्त कृत्स्नेनैव साधनेन प्राप्तु योग्य: सान कृत्स्नता अस्या- मेवावस्थाया भवति नान्यथा" अर्थात् तामसफल-प्रकरणमे भगवान्के रसात्मक रूपका अनु- भव यद्यपि पूर्णतया हो ही गया था, किन्तु वह साधनावस्थाके बाद फलावस्थाके क्रमानुसार न होकर भगवदनुग्रहवश साधनावरणको पूर्णतासे पूर्व ही फलानुभूतिके सम्पन्न हो जानेकी तीला थो अव राजसप्रमेय-प्रकरणमे, अर्थात् जो राजस भक्नोके लिए प्रमेयरूपा निरोध- लीलाका प्रकरण है, वहा तामसभक्तोको तो फलानुभूतिका नहीं किन्तु साधनानुभूतिका ही स्तर है "आन्तर तु पर फलम्" (सुबो. १०।२६॥१) अथवा युगलगीतमे वणित "प्रिंशेऽन्तर्गो. पिकाना स्वानन्द भगवान् हृदि पूरयामास तेनैव पूर्णानन्द इतीर्यते" वाला परमफलात्मक वियोग भ्रमरगीतमे पणित वियोग, नही है. अतएव श्रीप्रभुचरणने इस वियोगानुभूतिका वास्तविक स्वरूप इन शब्दोमे समझाया है- "एतासा तु अघुनैव वहिस्सगमो अभिलपितः तदभावादस्मदनभिप्रेतामपि अस्मदधिकारविरुद्धामपि ज्ञात्वा ईश्वरभाषेनाझापितवान्, अन- भिप्रेतमपि बलाद् ग्राहयितुम् इति अनाकर्णनीम् इद भवति यद्यपि, तथापि प्रियतमसम्बन्धि. त्वेनैव ध्रुतत्वात् तयैव फलिष्यति, नतु उपदेशत्वेनेति ज्ञापनायाग्रे सन्देशपदम्" (टिप्प. १०॥ ४४।२९). प्रमेयस्वभावके विवश बजभक्तोने वियोग स्वीकारा है-निज भाव या अभिलाषा के वश नही. भगवत्कथाके श्रवण या कीर्तन का फल, भगवत्स्वरूप एवम् भगवल्लीला का पहले आन्तर और बादमे बाह्म अनुभव स्वीकारा गया है. बाह्यानुभवके अभावमे केवल आन्तर व्यर्थ होता है- "बाह्याभावे तु आन्तरस्य व्यर्थता" (सुबो १६१). इस आन्तर अनुभव और बाह्य अनुभव के सूक्ष्म रहस्यको समझने के लिए निरोधके दो और भी रूपोको समझना आवश्यक हो जाता है.

(क) रवरूप-गुण-उभयकृत निरोप (ख) केवल-गुणकृत निरोप (क) तामसफल प्रकरणके विवेचनमें श्रीमहाप्रभुने यह समझाया है कि यहां सात अध्या: योमे, अर्थात् २६ वें अध्यायसे लेकर ३२ वें अध्याय तक, क्रमशः (१) ऐश्वयं (२) वीर्य (३) यश (४) श्री (५) धर्मी (६) वैराग्य (७) ज्ञान यो छह भगवद्गुण और सातवें स्वयम् धर्मी भगवान्के स्वरूपका वर्णन अभिप्रेत है. इस फलरूपा निरोघलीलाके स्वरूपका भलोमांति विमर्श करनेपर यह स्पष्ट हो जाता है कि सातो अध्यायोमें फलरूपलीलाका ही वर्णन अभिप्रेत होनेपर भी धमिनिरूपक पांचवे अध्याय तथा ज्ञाननिरूपक सातवें अध्याय का कुछ विशिष्ट महत्त्व है ही. अतएव प्रारम्भमें रूपलीलाके –'वाह्याभ्यन्तरभेदेन" -जो दो प्रकार दिखलाये गये हैं, वे इन दो अध्यायोमें चरमोत्कर्षके रूपमें वणित हुए है. मिप्रकरणमें बाह्य संयोगसुखका तया ज्ञानप्रकरणी आन्तर संयोगका वर्णन हुआ है. "ज्ञान भक्तिश्च सतत चक्रवत् परिवर्तते" को उक्तिके अनुसार यहा परोक्ष और प्रत्यक्ष दोनों में सयोगसुखका ही वर्णन अभिप्रेत है. अतएव इसे फलप्रकरण माना गया है. (स) इसके विपरीत राजसप्रमेय-प्रकरणमें ब्रजभक्तोकी अनुभूतिका स्वरूप श्रीमहाप्रभुने इन शब्दोमें दिया है- "अन्तनिष्ठा या विरहो वा, द्वयमेव, नतु तासामन्या लौकिकी अवस्था" (सुबो. १०४४।४८). यहाँ पूर्वोद्धृत "आन्तर तु परं फलम्" वचनके आधारपर अन्तनिष्ठाको तो परमफलरूप मानना ही पडेगा.परन्तु द्वितीयाश विरहको फलरूप माननेका कोई भी आधार मिलता नहीं है यह विरह अतः फलरूप न होकर पूर्ववणित 'साधनकरस्नता' ही है इसीलिए श्रीमहाप्रभु इसे 'फलरूप' न कहकर 'फलसाधक' कहते है.-"... फलसापकत्वाद् भक्तिमार्गे विरह एव पुरुषार्थ.." विरहावस्थामे किये जाते गुणगानके सुख और भगवत्स्वरूपानुभवके सुख का परस्पर तारतम्य समझाते हुए श्रीमहाप्रभु कहते हैं- "पर विरलममृतम्. केवल मरणोपस्थिती तनियर्तकमेवेति, नतु राम्भूयैकत्र रसजनकम्. रसपिण्डयोरिव तव कथायाश्च विशेष अन्यथा कथार्थमेव यत्न कृत स्यात्. पर विरहे मरणनिवर्तकत्वेन तदुपयोग इति भगवत्वेन स्तूयते". भगवत्कथाके श्रवण-स्मरण-कीर्तनके कारण भरतके प्राण तीव्र विरह- वेदनामें भी निकल नही जाते- टिके रहते है. एतावता भगवान्की तरह भगवद्गुणगानको भी प्रशसा की जाती है वास्तविकता परन्तु यह है कि भगवत्स्वरूपकी रसानुभूति मे सुख पनी- भूत होता है और भगवत्कथामे वह तरल हो जाता है. इससे सिद्ध होता है कि केवल गुणकृत निरोधमे बाह्य एवम् आन्तर सयोग सुखकी फलानुभूतिका चक्र सतत नहीं चलता. वहा विरहदु ख और अन्तनिष्ठाके सयोगसुख का चक्र वत् आवर्तन चलता है अत इसके अधाशमे साघनरूपता और अपांशमे फलरूपता है. जवकि रसात्मक होने के कारण द्विदलात्मक, और द्विदलात्मक होनेके कारण सयोग-वियो- गात्मक या 'नटवर' वपु रूप भगवान्का फलरूप होना, वियोगमे अन्तनिष्ठाके कारण मिलते .

आन्तर संयोगसुख और संयोगमें स्वरूपानुभूतिके कारण मिलते वाह्य संयोगसुखको लक्ष्यमे रखकर स्वीकारा गया है. आन्तरसुख-दान रसनाटन है तथा वाह्यसुख-दान रसरूप प्रत्यग्र- भोग है. यह 'यहाँपीड' इलोकको सुबोधिनीसे सिद्ध होता है. अत. उत्तरदलमे अन्तनिष्ठाके अंशमे फलरूपता तथा विरहांश या घर्मिविप्रयोग के अंशमे साधनरूपता है. केवल विरहके फलरूप होनेका उल्लेख श्रीमहाप्रभु अथवा श्रीप्रभुचरण के किसी भी वचनमे मिलता नही है. आन्तर- संयोग-सुख प्रदान करनेवाला विप्रयोग स्वतन्त्र अंगोरुप निरोध है. जवकि केवल विरह भान्तरसंयोग-सुखके अभावके कारण, मुक्ति या आश्रयभावापत्ति का अंगरूप निरोप माना जाता है.इसे केवलगुण-कृत निरोध, 'धर्मिविप्रयोग' 'केवल विरह', 'मुक्त्यग निरोध' या 'आथयमावापत्यंग निरोध' कुछ भी कहो अथं एक ही होता है. इस तरह निरोधके कारण-स्वरूप-कार्य-प्रयोजन-रूप चतुर्विध लक्षण, विविध स्वरूप करण-व्यापार-फल-रूप; तथा स्वरूप-गुण-उभयकृत और केवलगुणकृत निरोध के रूपमे अने- कधा भेद-उपभेदोंके विस्तृत विमर्श करनेपर निरोधलक्षण ग्रन्यको समझना एकदम सरल हो जाता है. फिरभी ग्रन्यके अनुवादसे पूर्व एक और स्पष्टीकरण अत्यन्त आवश्यक है. उसे देखनेके बाद ही ग्रन्यानुवाद देखेंगे. वैसे तो हमने देख ही लिया कि निरोघलक्षण, भक्तिवधिनी ग्रन्थमें वर्णित पानो प्रका- रके अधिकारियोको लक्ष्यमे रखकर उपदिष्ट हुआ है फिरभी इसे सोपपत्तिक समझ लेना अत्यावश्यक है. सन्यासनिर्णय ग्रन्थके- "कौण्डिन्यो गोपिका प्रोक्ताः गुरवः साधन च तद्- भावी भावनया सिद्ध" वचनमे प्रजभक्तोके भावीका भावनात्मक अनुसरण विरहानुभवार्थ गृहत्याग करनेवालोके लिए आवश्यक माना गया था ब्रजभक्तोके भावोकी भावना केवल गृहत्यागियोके लिए ही है ऐसा नही समझना चाहिये. क्योकि "भजनीयो व्रजाधिप.” कहकर ग्रजभावनाकी उपमोगिता सभी पुष्टिभक्तोके लिए सर्वदा ही चतुश्लोकोमै आवश्यक मानी गयी है इसी तरह पुष्टिप्रवाहमर्यादा ग्रन्यमे पुष्टिजीवोके फलानुभवके प्रकारमै गुण-स्वरू- पका प्रभेद मान्य हुआ ही है. "म्मरण भजन चापि न त्याज्यम्" वपनद्वारा भग- वत्सेवा-कथाकी आवश्यकता चतुश्लोकीमे प्रतिपादित हुई है. अत सेवा और कथा दोनोमे ही व्रजभावना आवश्यक है अत इस निरोघलक्षण ग्रन्थमे सभीके लिए सर्वप्रथम प्रज- भावनाका स्वरूप रामझाया जा रहा है निरोधकार्य संयोगसुख-वियोगदुःखको भावना जिन भक्तोसे सेवा और कथा दोनो निभ पाती हो उन्हे अपने मावके अनुरूप सेवा करते समय गोकुलकी भावना और कथाके समय वृन्दावनकी भावना करनी चाहिये. गोचारणके लिए प्रतिदिन भगवान् वृन्दावन पधारते हैं. तब गोकुलमे वात्सल्यभाववाले नन्द-यशोदा आदि भक्तोको तथा श्रृंगारभाववालो गोपिकाओको जसे विप्रयोगदुखको अनुभूति होती है, वैसी दुखानुभूति-विरहवेदना हमे कयाकालमे कब होगी !

सायंकाल गोचारण कर भगवान् गोकुल लोटते हैं. तब गोकुलमें गोपिकाओंको तथा अन्य भी सभी ग्रजवासियोको अनेक रीतिसे भगवत्सेवाद्वारा जैसा मयोगमुष मिलता है, वैसा सुख सेवाके समय भगवान् मुझे कब प्रदान करेंगे ! इस तरह तामसफल-प्रकरणके "शान भक्तिश्चः सततं चक्रवत्परिवर्तते" वचनमें वर्णित रायोग-वियोग-रूप अवस्थामे निरोधके कार्य मुस-दुसको भावना करनी चाहिये. जिन भक्तोरो सेवा-कथा एक साथ नहीं निभ पाती, ऐसे मध्यमाधिकारियोको पहले, राजसप्रमेयप्रकरणमे वर्णित तीन विप्रयोग-वेदनाको भावना करनी चाहिये और बादमें कथाश्रवणकालमें अन्तनिष्ठाके साथ आन्तरसयोग-मुखकी भावना करनी चाहिये, उद्धवके बज आनेपर उनके साथ भगवत्कथा श्रवण-स्मरण-कीर्तनमें जैसा एक सुमहान् उत्सव प्रकट हुआ, वैसे उत्सवको अनुभूति कथा-श्रवण करते समय हमारे मन में कब होगी ! गोकुलमें सख्य-वात्सल्य भाववाले व्रजभक्तोको और वृन्दावनमें सस्य-माधुर्य-भावपाले बजः भक्तोको उद्धवके साथ भगवद्गुणगान करते समय जैसा आल्हाद अनुभूत हुआ वह मेरे हृदय, कव प्रकट होगा। केवल कथाका समाश्रयण करनेवाले भक्तको ऐसी भावना करनी चाहिये. इस तरह यहा निरोधका कार्यलक्षण श्रीमहाप्रभुने सूचित किया है निरोधके कारणभूत गुणगानको आवश्यकता कार्यलक्षणको सूचित करनेके बाद श्रीमहाप्रभु निरोधके कारणलक्षणको सूचित करना चाहते है. पूर्वोक्त भावनाओको करते रहनेपर भी हृदयमे भावोका उदय सहसा नहीं हो पाता है महान् भक्तोकी कृपा होनेपर ही भगवान ऐसी दया हमपर करते है कि हमारे हृदयमे भाव अकुरित हो पाते है. इस बीच आनन्दसन्दोह-सुखसिन्धु भगवान् श्रीवजाधिपके रूप गुण लोला एवम् नामो का सकीर्तन हमें करना चाहिये. इससे भक्तिमार्गपर हमारी यात्रामे हम सुखपूर्वक आगे बढ पायेगे. थीप्रभुचरण आज्ञा करते है कि "तादृशी भावना कार्या यया भावाकुरोदय , श्रीमदा. चार्यकृपया भवेद् भावो न चान्यथा....भावो भावनया सिद्ध इति वाक्यात्प्रतीयते, तद्वाक्यपरि- निष्ठाना हदि भावाकुरो भवेत् " अत श्रीमदाचार्यचरण, श्रीयमुना तथा पुष्टिपयके आय- पथिक-गुरु श्रीब्रजभक्तो की कृपा होनेपर भगवत्कृपाभाजन बननेका अधिकार प्राप्त होता है. पी चुपड़ी हुई गरम रोटी और रूखीसूखी वासी रोटीके स्वादमें बहुत अन्तर पड़ जाता है. इसी तरह स्नेहभावकी ऊष्मावाले पूर्ण भगवदीयोके मुखसे, उनकी कृपादृष्टिकी स्निग्धताके साथ, भगवत्कीर्तनका श्रवण जितना सुखद होता है, उतना लौकिक प्रयोजनकी पूतिके लिए ठहें दीमागसे जोड़तोड़ बैठाकर, भगवत्कथामे प्रवृत्त होनेवाले व्यक्तिके मुससे भगवत्कया सुनना सुखद नही होता वह तो रूक्ष कीर्तन लगता है. भगवान् गोविदके गुण- - " गानमे जैसा सुख श्रीशुकमुनि जैसे निर्ग्रन्य आत्माराम मुनियोको मिलता है, बसा उन्हें अपनी ब्रह्मात्मैक्यको अनुभूतिमे भी नही मिलता है. अतएव श्रीशुक -" परिनिष्ठितोपि नर्गुण्ये उत्तमरलोकलीलया गृहीतचेता राजर्षे आख्यान यदधीतवान्" (मा. २।१।९) वचनकी व्याख्यामे श्रीमहाप्रभुने विवेचन किया है "आत्मलाभसे उत्कृष्ट कुछ भी नही है ऐसे शास्त्रीय वचनोके अनुसार आत्मपर्यवसायी गुणातीत समाधिमे नित्य स्थित होनेपर भी भागवतके रसको अनुभूति होनेपर, उसको अप्राकृतता-दिव्यता समझमे आनेपर, श्रीशुकयो यह समझमे आया कि ब्रह्ममे लीन होनेवालेको जव समापि-अवस्थाको गरज नही रह जाती, तब ब्रह्मानन्दसे भी अधिक रमप्रद भागवतके कथारसको छोडकर कौन समाधिवे' चक्करमे पडे ।। इस भगवद्गुणगानके कारण भक्तके हृदयमे भगवदासक्तिरूप स्थायी भाव, जय भगवद्विरहक्लेशके कारण तापयुक्त हो जाता है, तव हृदयमे छिपे हुए भावात्मा भगवान् सदानन्द श्रीकृष्ण कृपायुक्त होकर बाहर प्रकट हो जाते है, आलम्बन-विभावके रूपमे भावात्मना हृदयमें विराजे अथवा भावके आलम्बनात्मना बाहर प्रकट हो, भगवान् सर्वत सर्वथा आनन्दमय ही होते हैं इस आनन्दमय परमात्माका मर्वात्मभावके रूपमे प्राकटय उस परमात्माकी परमकृपामयी आनन्दानुभूति है यह कृपा मुदुर्लभ है भक्तके हृदयमे भावके रूपमे भरा हुआ सेतु, मगवद्गुणगानके श्रवण-कीर्तनके सरित्प्रवाहसे अहर्निश भरे जानेपर एक दिन छलक जाता है । इस तरह कि भवतके देह इन्द्रिय प्राण अन्त करण आत्मा तथा भन्य भी आत्मीय वस्तुओ को यह अपनी अलोकिक रसानुभूतिरो प्लावित कर देता है !! अत सदानन्द श्रीकृष्णके द्वारा निरुद्ध अर्थात् पुष्टिमार्गमें अगीकृत जीवाको चाहिये कि सारी लौक्कि आसक्तियोको छोड़कर देवल भगवान्के गुणगानमें वे तत्पर हो जाय गुणगानने कारण अन्तत सर्वत्र ब्रह्मरूपताको अनुभूति भवनको अपने देह इन्द्रिय-अन्त करण तथा आत्मा से भी होने लगेगी प्रपञ्चकी अनुभूति रह ही नहीं जाती तो स्मृति कहासे होगी? फलस्वरूप प्रपञ्चविस्मृति और भगवदासक्ति प निरोध सिद्ध हो जाता है निरोधके वास्तविक स्वरूपके उपदेशक श्रीमहाप्रभु छान्दोग्योपनिषद्में आता कि देवता देवविद्या और आत्मविधा का उपदेश ता कर सकते हैं, पर गति तो आचार्य ही दिखला सकते है, आचार्यसे जव विद्या मिलती है तो वह मिद्धतम होती है-"ते होनुरुपकोसलपा सौम्य तेऽस्मद्विद्या आत्मविद्या च, आचार्य. स्तु ते गति वक्ता" (४।१४।१) 'आचार्यायव विद्या विदिता साधिष्ट प्रापतीति" (१९४३) भागवत (५।१२।१२) म भी गुरुकृपाकी महत्ता महत्पादरजोभिषकक रूपमें प्रशगित हुई है- "रहगणतत् तपसा न याति न चेज्यया निवपणाद् गृहाहा न छन्दसा नव जलाग्नि- सूर्यविना महत्पादरजोभिपकम पत्रोत्तमश्लोकगुणानुवाद प्रस्तूयते ग्राम्यकथाविधात निषेग्यमाणोनुदिन मुमुक्षोर्मती सती यच्छति वासुदेवे' इससे सिद्ध होता है कि भगवन्मार्गमे आचार्यकी महत्ता असाधारण है अतः स्वयम् भगवान्ने भी आज्ञा दी है कि "आचार्य मा विजानीयात् नावमन्येत कहिचित् न मयंयुद्धपा- सूयेत सर्वदेवमयो गुरु" (भा. ११३१७२७). अर्थात् आचार्यको साक्षाद् भगवद्रूप ही समझना चाहिये - मत्यबुद्धिसे आचार्यको देखना आचार्यके साथ असूपाका व्यवहार है. आचार्यके माध्यमसे ही भगवान् अपनी गति व्यक्त करते हैं-"आचार्यचैत्यवपुषा स्वगति ध्यानक्ति" (भा. ११॥२९॥६). निरोधके कारणलक्षणमे यह समझाया गया था कि इस भूतलपर भक्तोके बीच भग- बान्का प्रकट होना करणनिरोध है, अर्थात् भगवान्का भक्तोमें निरुद्ध होजाना है. अतएव श्रीमदाचार्यचरणका भूतलपर प्रकट होना उनका भक्तोमै निरुद्ध होना ही है. इसे सर्वोत्तम- स्तोत्रके चार नामो-"श्रीभागवतगूढार्थ-प्रकाशन-परायण.", "जनशिक्षाकृते कृष्णभक्तिकुई" तथा "मर्वासक्तो भक्तमात्रासक्त." के अवलोकन करनेपर अच्छी तरह समझा जा सकता है. श्रीप्रभुचरणने अतएव वल्लभाष्टकमे-"घोषापोश तदेमे कथमपि मनुजा प्राप्नुयु नैव देवीसृष्टिव्यं च भूयाग्निजफलरहिता देव वैश्वानरपा" कह कर श्रीमदाचामंचरणके प्राकट पके करणनिरोध होने की पुष्टि की है. स्वयम् श्रीमदाचार्यचरणने भी--"अयं तस्य विवेचित नहि विभु वैश्वानराद्वाक्पते अन्यस्तत्र विधाय मानुषतनु मा व्यासवत् श्रीपति. दत्वाशा च कृपावलोकनपटु - यस्मादतोह मुदा गूढार्थ प्रकटीकरोमि" (सुबो. १३११) कह कर अपने प्राकटयको निरोधरूपता ही ध्वनित की है वही करणनिरोधरूपता अपने प्राकटपकी श्रीमहाप्रभु "अह निरुदो" वचनद्वारा यहा सूचित कर रहे हैं पुष्टिमार्गीय जीवोको भगवदासक्ति और प्रपञ्चविस्मृति मे कही कोई बाधा न आ जाये एतदर्थ आपने पृथ्वीपरिक्रमा करके उनके समक्ष स्वयम् भगवत्सेवा तथा भगवत्कथा के अलावा अन्य सभी वस्तुओकी विस्मृतिका उदाहरण स्थापित किया. इस व्यापारनिरोधको ही यहा 'रोघेन' पद द्वारा सूचित करते हैं इस व्यापारनिरोधके कारण ही फलनिरोध भी आपके अनुयायीओंमे प्रकट हुआ है. इसका सूचन सर्वोत्तमस्तोत्रमे-"सान्निध्यमात्र-दत्त-श्रीकृष्णप्रेमा" द्वारा श्रीप्रभुचरणने भी किया है यही 'निरोधपदवी' है, जिसे श्रीमहाप्रभुने पुष्टिमार्गमें भगवान्के द्वारा निरुद्ध या अगीकृत देवी जीवोके निरोधके लिए पारण को है-"रोपेन निरुद्ध निरुताना तु रोधाय निरोधपदवी गतो अह ते निरोघ वर्णयामि". अगवा वार्ता में हम देख गये हैं कि राजा-माधो दवेको आपने आज्ञा दी थी-"अब अपने घर जाय सेवा करो, देवी जीव आवे तीनको नाम दीजो तुमको निरोध सिद्ध भयो और जोतिहारो सग करेगोताहूको निरोध सिद्ध होयगो!"यदि यही भाव यहा भी स्वीकारें तो अन्वय यों हागा- "रोधेन निरुतो निरोधपदवी गतो अह निरुद्धाना तु रोधाय ते निरोध वर्णयामि" जैसे श्रीमहाप्रभुको सेवा-कथामय दिनचर्या करणनिरोध तथा व्यापारनिरोध-से राजा- मापो दवेको फलनिरोध-प्रपञ्चविस्मृतिपूर्वक भगवदासक्ति सिट हुई थी, वैसे ही राजा-माघौ दवेके सेवा-कथामय जीवनसे पुष्टिमार्गमें निरुत अनेक जीवोंको प्रपञ्चविस्मृति और भगव. दासक्ति का लाभ होगा. यह वरदान श्रीमहाप्रभु इस श्लोकमें दे रहे है. निरोधका स्वरूप मुक्ति और आययभावापत्ति, (अर्थात् सायुज्य और वैकुण्ठादि लोक सेवोपयोगीदेह) की प्राप्तिको तुलना में, निरोधकी महत्ता यही है कि वह इस भूतलपर होनेवालो भगवदतुभूति है, जोवन्मुक्तिकी तरह. सायुज्यमुक्तिमें जीवात्मा परमात्मामें लीन हो जाती है. भक्तके हृदय में किन्तु ऐसे मनोरथ नहीं चल सकते. भगवान् स्वयम् कहते हैं कि "अनिच्छतो गतिमण्वी प्रयुक्ते'' (माग ३।२५ । ३६). अतएव वेणुगीतकी सुबोधिनीमें श्रीमहाप्रभुने निरोध और मुक्ति की तुलना : नेत्रवान् व्यक्तिको किसो सुरम्य दर्शनीय स्थल दिखाने और उसे निबिड अन्धकारवाले यूपमें बन्द कर देने से की है- "इदमेव इन्द्रिपवता फलं मोसोपि नान्यथा यथान्धकारे नियता स्थितिःनाक्ष्णोः फलं भवेत् एवं मोक्षोपि इन्द्रियादियुक्ताना सर्वथा नहि" इसी तरह आश्रयमावापत्तिके भी अनेक प्रकार वणित हुए हैं. उनमें,वैकुण्ठादि लोकोमें नूतन सच्चिदानन्दात्मक दिष्य देह, यदि सेवोपयोगी मिलता हो तो, ऐसे दिव्य देहेन्द्रियोंसे भगवदासक्ति तो सम्भव है ही,अतः उसे भक्त भी स्वीकार सकता हैं तात्कालिक आवश्यकता परन्तु भक्तको इस भूतलपर इन देहेन्द्रियोंसे अपने प्रियतम परमात्माके अनुभूतिकी है. प्रपञ्चविस्मृतिपूर्वक भगवदासक्तिसे जीवके सम्पन्न होनेपर यह अनुभूति सम्भव है अन्यथा श्रीहरि जिन्हें विनिर्मुक्त करते है, अर्थात् जिन्हें निरुद्ध नहीं करते, वे भवसागरमें मग्न हो जाते है-डूब जाते हैं. यहा इस भूतलपर भगवान्को मान्तर एवम् बाह्य सयोगामुभूतिके कारण; अथवा सेवा और कया के कारण अहर्निश मोदप्रमोदका अनुभव तो भगवान्के द्वारा निरुद्ध जीव ही कर पाते है. लौकिक रूप-रस-गन्ध-स्पर्श-शब्दोमे आसक्त अर्थात् ससारावेशरो दूषित हमारी इन्द्रियो- की दर्शनरति आस्वादनरति आघ्राणरति स्पर्शनरति श्रवणरति, या अन्य भी कर्मेन्द्रियोके एवम् अन्त.करणके व्यापारोमे रतिओ का अहित दो तरहसे हो सकता है या तो उन्हे किशो भी प्रकारके निग्रहके विना लोकिक क्षुद्र सुखोकी खोजमें निरन्तर भटकते रहने दिया जाये,या फिर उनका पूर्णतया निग्रह करके उन्हे सर्वथा खतम ही कर दिया जाये, विषमव्या- मुखकरने के बजाय. विषयोंसे व्यामुष करनेकी बात तो समझमे आ सकती है पर नेत्रोको दर्शमरतिसे पश्चित करनॅमें नेत्रवान्को क्या लाभ हो सकता है ? इन्द्रियवृत्तियोका ऐसा दमन या निरोप 'कुयोग' कहलाता है. श्रीमहाप्रभु कहते हैं- "सर्वेषामेव निरोधने तत्तद- धिष्ठातृदेवद्रोहो भवत्येव भगवत्समर्पणे तु तद्वचनेन तदुक्तमेव कृतमिति न कोपि दोष. सम्मवति" (सुबो श४१७) इन्द्रियोकी रत्यात्मक वृत्तियोका दमन उचित नहीं है. इसी तरह लौकिक विषयोमे इन्द्रियदृत्तियोका दुरुपयोग भी उचित नहीं है. अत इनके दुरुपयोग या अनुपयोग के बजाय कुछ भगवदुपयोग खोज लेनेपर इनका सदुपयोग हो जाता है सुबोधिनी (३।१४।४६) मे श्रीमहाप्रभुने इसका विस्तृत निम्पण किया है-"प्राणिपोम सतरह तरहकी वृत्तियां होती है दस कर्मज्ञानेन्द्रियोको वृत्तिया, चार अन्त करणकी वृत्तिया, एक देह सम्बन्धी वृत्ति, एक प्राणसम्बन्धी वृत्ति और एक आत्मसम्बन्धी वृत्ति. इन सभी वृत्तियोको भगवत्सम्बन्धी-भगवतिपयक बनानेसे सर्वभवनसमर्थ-सर्वभावापन्न भगवान् प्रसन्न होते हैं" यही 'भूमासुख' अथवा 'सर्वात्मभाव' कहलाता हैं."भूमासम्प्रसादादध्युपदेशात" (१३३१८) ब्रह्मसूत्रमें यह निरूपण किया गया है कि सभी वृत्तियोंसे भगवदनुभूति भूमासुख है-"यो ये भूमा तत्सुख नाल्पे सुखमस्ति","यत्र नान्यत्पश्यति मान्यच्छृणोति नान्पद्विजानाति स भूमा" (छान्दोग्य ७।२३।१और ७२४१). अत' इन्द्रियादिकी वृत्तियोके सर्वथा अनुपयोग अथवा लौकिक विषपोमें दुरुपयोग में उनका अहित-अल्पसुख होता है. भूमा-पुरुषोतम श्रीकृष्णमे उन्हें गोजित करना उनका वास्तविक सदुपयोग एवम् हित है इसे ही 'प्रपञ्चविस्मृतिपूर्वक भगवदासक्ति' भी कहते है यह भक्तका भगवान्म निरोध है. भगवत्स्वरूपमें यह मुख्य निरोध जिनके लिए शक्य न हो उन्हे भगवान्के गुणोके श्रवण-स्मरण-कीर्तनम अपना चित्त लगाना चाहिये. मुरवरी भगवान्के गुणो आसक्ति और प्रपञ्चविस्मृति सिद्ध हो जानेपर, न तो सासारिक क्लेशोकी अनुभूति होगी और न भगवद्विरहक्लेशकी ही भगवान्के गुणानुवादमे भी साक्षात् भगवान्की तरह सुखदानका सामर्थ्य है केवल गुणकृत निरोध इस केवल गुणकृत निरोध द्वारा यदि भगवान् सुखदान न करते होते तो उन्हें दयालुके बजाय क्रूर ही मानना पडेगा. क्योकि प्रपञ्चविस्मरणके कारण लौकिक सुखोके छूट जानेपर, भगवान् यदि भक्तको भगवरस्मरणको प्रक्रिया सुखदान न करते हो तो, भक्ति दु खनिवर्तक ही मानी जायेगी, सुखप्रद नही परन्तु गुणकृत निरोधमे भी इतनी सामर्थ्य है कि भक्त सासारिक क्लेश और भगवद्विरहजन्य क्लेश, दोनोसे ही उभर सकता है भागवत (१०1८७।२०) में कहा गया है “अपने दुर्जेय आत्मस्वरूपका भक्तोको सुखानुभव करानेके लिए भगवान् अनेक रूप धारण करते है इन रूपोमे भगवान् अनेकविध लीला भूतलपर प्रकट करते हैं ऐसे भगवच्चरित्रके सुखसागरमे तरनेवाले भक्त भगवान्के परण- सरोजोके बीच निवास करनेवाले हस परमहसोके कुलमे प्रविष्ट होनेकी कामनासे निजकुल परिवारीको छोड देनेपर भी, अपवर्ग या सायुज्यमुक्ति की कामना नहीं करते हैं" यहाँकी मुबोधिनीमे कहा गया है-“यतोवतीर्णस्य कृष्णस्य चरित्रमात्रथवणेपि तादृश आनन्दी जायते येन विचारका: अपवर्गमपि परमानन्दप्रापनपरिलन्ति कदाचिदपि न वाञ्छन्ति ... गृहे हि महत्सुखं भवति. तत्सिद विद्यमानं तदपि परित्यजन्ति. यदि भगवति सहस्रांशेनापि आनन्दसन्देहो भवेत् तहि विद्यमानं को वा त्यजेत् ... चरणसरोकाश्रया ये हंसास्तेषां कुलं समूहः नेषां संगार्थ विराष्ट स्वगृहं यस्तैः सह परमानन्दो बहुधा भोक्तव्य इति मोक्षापेक्षयापि भगवतकथाश्रवणरसोधिको निरूपितः." अतः केवलगुण-कृत निरोधको अवस्थामें भी, प्रपञ्च- विस्मृतिके कारण न तो सासारिक क्लेशकी अनुभूति होती है और न भगवद्-विरह-जन्य क्लेशकी अनुभूति ही होती है, भगवदासक्तिवश होती आन्तर सपोगानुभूतिके कारण. इस गुणकृत निरोधको प्रारम्भिक अवस्थामे केवल मन वाणी और श्रवण इन्द्रियोका हो भगवान् मे विनियोग होता है. सकल इन्द्रियोंका नही. ऐसी स्थितिमे अवशिष्ट इन्द्रिया कभी अपने अपने लौकिक विषयोमे रही आसक्ति के कारण प्रपञ्चविस्मृति अथवा भगवदा. सक्ति में बाधा पहुंचा सकती हैं ! ऐसी पाका गुणकृत निरोधके बारेमें नही करनी चाहिये. क्योकि गुणकृत निरोधमे भी प्रपञ्चविस्मृतिपूर्वक भगवदासक्तिके एक बार सिद्ध होनेपर, सभी इन्द्रियोंसे 'आसक्तिभ्रमन्याय' (प्रेमी या प्रेमिका को गाढ़ आसक्तिके कारण एकदूसरेके आगमनकी या उपस्थितिकी भ्रान्ति जैसे होती रहती है) से भगवान्का अध्यास, या भगवान्के गुणोका अभ्यास, लौकिक विषय-व्यक्तियोमें तथा लौकिक रूप-रस-गन्ध स्पर्श-शब्द आदि गुणोमे भो बना ही रहता है. अत: लौकिक विषय इस अध्यासके कारण निरोधमे बाधा उपस्थित नहीं कर सकते. अतएव छान्दोग्योपनिषद्मे इस सर्वात्मभावको अनुभूतिमे आसक्तिभ्रमन्यायसे होने विभिन्न सञ्चारिमावोका वर्णन तदादेश अहकारादेश और आत्मादेश के रूपमे किया है- "स एवाथ- म्तात् स एवोपरिष्टात् म पश्चात् स पुरस्तात स एवेद सर्वमिति अपातो अहंकारादेश एवाहमयस्तादहमुपरिष्टादहम् .. अहमेवेदं सर्वमिति. अथात आत्म्गदेश एपात्मैवाधस्तादात्मवो- परिष्टादात्मा पश्चादारमा पुरस्ताद्... आरमैवेदं सर्वमिति. स एप एव पश्यन् एव मन्वान एवं विजानन् आत्मरतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानन्द स स्वराट् भवति तस्य सर्वेषु लोकेपु कामचारो भवति." (७।२५।१-२). निरुद्ध भक्तको कभी अपनेमे भिन्न परमात्माको अनुभूति कभी स्वयम्को ही अनुभूति सर्वत्र होने लग जाती है-कभी अपनेसे अभिन्न परमात्माको अनुभूति सर्वत्र होने लग जाती है। रामपञ्चाध्यायीमे भगवान्कै तिरोहित होने- पर "कृष्णोह पश्यत गति ललितामिति तन्मना" (१०१३०१९) वचनोंमे गोपिकाओके इमी तरहके अध्यासका उदाहरण मिलता है सर्व विषयोमे भगवान्के अध्यासके कारण पुन लोकिक विषयासक्तिमे मनके भटक जाने. को आशका भी नहीं करनी चाहिये क्योकि उन लौकिक विषयोमे लौकिक-विषयत्वेन तो विराग ही रहता है. ऐश्वर्य वीर्य यश श्री ज्ञान वैराग्य मे भगवद्धोंके भक्तमे भी आवेशके पारण, इन धर्मोके आवेशसे पूर्व भी परमानन्दरूप भगवान्के धर्मरूप स्थायिभाव-भगवतिके कारण भी लौकिक विपयोमे विराग स्थिर रह सकता है. मत्मिभावको भी भगवद्धर्मरूप सर्वत्र होती है माना गया है, अत सर्वात्ममावरूप भगवद्धर्मके कारण भी लौकिक विषमोमें विराग स्थिर रह सकता है. इस विषयवराम्पके साथ भगवान्के गुणोके अहनिश श्रवण-स्मरण-किर्तनके कारण गुणोके माध्यमसे सर्वदुःखहारो श्रीहरिका आन्तर सुखस्पर्श वना ही रहता है. अत. दुखी होनेका तो कोई सवाल ही नही उठता. सर्वात्मभावको अनुभति ज्ञानमार्गमें भी होती है और भनितमार्गमें में भी. ज्ञानमार्गीय सर्वात्मभाव शान्तरसारमक होता है. तथा भक्तिमागीय सत्मिभाव यथायय धूगार सख्य वात्सल्य या दास्य भावात्मक होता है. ज्ञानमागीय सर्वात्मभावमें वेवल आत्मना ब्रह्मान- न्दकी अनुभूति होती है पर भक्तिमार्गीय सर्वात्मभावमें सर्वेन्द्रिय अन्त करण तथा आत्मा से भी भजनानन्दको अनुभूति होती है. अतएव भ्रमरगीतको सुनोधिनीमें यह कहा गया है कि सकल. इन्द्रियोसे अतीत अघोक्षज भगवान्को सकल इन्द्रियोका विषय बनाना मुनियोके लिए भी दुर्लभ अनुभव है, जो गोपिकाओको सर्वात्मभावके कारण मुलम हुआ (सुयो १०४४।२५-२७). हरिकथा-वर्णनके श्रवण-स्मरण-कीर्तनके कारण पनपे इस सरस निरोधका यह उरकर्प, ज्ञानमार्गीप रूक्ष नीरस चित्तवृत्तिके निरोधको तुलनामें, स्वीकारना ही पड़ता है हरिकथा श्रवण-कीर्तनमें दो सावधानियोकी अतिशय आवश्यकता है. प्रथम तो यह कि इस हरिकथाको, स्पर्धा- ईर्ष्या-द्वेषको हमारो तुच्छ मनोवृत्तियोको सन्तुष्ट करनेका माध्यम न बनाया जाये दूसरे हरिकथाको उदरपूर्ति यश कीति अथवा चन्दा एकत्रित करनेके लोभ- वश न किया जाये अन्यथा यह हरिकथा भक्तिमार्गीय उत्कृष्ट निरोप सिद्ध करनेमे विफल हो जाती है-"अमत्सरै अलुब्धैश्च वर्णनीया सदा गुणा". गुण-स्वरुप-उभयकृत निरोप अवतारकालमे तो स्वेच्छया स्वरूपका प्राकट्य होता है. अनवतारकालमे स्वरूपके प्रकट न होने के कारण स्वरूपकृत निरोध सम्भव है कि नही यह प्रश्न विचारणीय हैं तामराफल-प्रकरण (१०।२६।१३) मे इस प्रश्नका खुलासा इस शब्दोमे दिया गया है- "ज्ञानभवत्योस्तु आविर्भावार्थमुपयोग आविर्भावश्चेदन्यथासिद्ध तदा न ज्ञानभक्त्योपयोग अत्रतु भगवान् स्वतएव आविर्भूतः, मुक्तिदानार्थ सर्वसाधारण्येन. ईश्वरेच्छाया अनियम्यत्वात् मत आविर्भाव स्वेच्छया भक्त्या ज्ञानेन वा भगवदवतारातिरिक्तकाले द्वयमेव हेतुः अव- तारदशाया तु न तयो प्रयोजकत्वम् वर्षाकाले जल सर्वत्र मुलममिति न कूपनदीनामनुपयोग शकनीयः" अर्थात् भगवदाविर्भावके लिए ज्ञान या भक्ति की आवश्यकता है अवतारकालमे तो भगवान स्वेच्छया स्वतएव सभोके समक्ष प्रकट हो जाते है अत उस समय ज्ञान-भक्ति अनावश्यक हो जाते हैं. एतावता अनवतारकाल मे उन्हें अनुपयोगी नही मान लेना चाहिये सर्वनिर्णय-निबन्ध (का. २२८-२२९) मे भगवान्के भक्तिमार्गीय आविर्भावकी प्रक्रिया दिखलायी गयो है : (१) साकारब्रह्मवादके सिद्धान्तके अनुसार वस्तुमात्रके ब्रह्मात्मक होनेसे भगवन्मूर्तिके भगवदारमक होनेमे किसी प्रकारके सन्देहको आवश्यकता नही है. (२) मक्तिका बीज भगवदनुग्रह ही होता है. अत मक्तके हृदयमे किसी विशेष भगवन्मूर्तिके प्रति लगाव पैदा होता हो तो उसका बोज, उस मूर्तिरूपद्वारा भक्तोदारके, भावान्के सवल्पमे निहित होता है (३) भक्तके भक्तिमार्गीय भावनामय सकल्पके कारण भी भक्तके सेम्य-स्वरूपको "भगवान्के एक विशेष-व्यक्तिगत अवतार" के रूपमे मान्म करना चाहिये ब्रह्म व्यापक मी है और साकार भी. अतएव भगवन्मूर्तिको मायिक अथवा चित्तको एकाप बननेका एक उपकरण माननेकी रीति वाल्लभ सिद्धान्तसे विपरीत है "ये मया मा प्रपद्यन्ते तान् तथैव भजाम्यहम्" (गीता ) वचनके अनुसार मूर्तिमे साक्षाद् प्रजाधिपकी सच्चे हृदयसे भावना करनेपर सचमुच ही प्रजाधिपका उस रूपमे प्राकटप होता है. भगवान्के इस कृपामय सकल्प और भक्तके भावनामय सकल्प के बलसे प्रकट हरिमूर्ति- का ध्यान अपने हृदयमे, भवनको अन्य सभी रूपोको भूलाकर, सदा-निरन्तर बनाये रखना चाहिये. यह भगवान्के स्वरूपमे अन्त करणका निरोप है इसी तरह इसी स्वरूपके नेत्रोंसे दर्शन तया स्पर्शेन्द्रियसे स्पर्शन के लिए आतुरता होनी चाहिये. हाथोको इस स्वरूपको सेवा के लिए उद्यत रखना चाहिये परोको इस स्वरूपके दर्शनार्थ या मजनार्य दोडनेको उद्यत रखना चाहिये कानोसे भगवद्गुणगान सुनते समय, वे गुण, इसी मगवत्स्वरूपके गुण हैं, ऐसी भावना करनी चाहिये. वाणीमे कीर्तन, इस स्वरूपके रूपसौदर्यका गुणमाधुर्यका और लीलालावण्य का करना चाहिये. यसमर्पित अन्न वस्त्र पुष्प गन्ध आदिका त्याग पहले ही सिद्धान्तरहस्यमे-"असमर्पित. वस्तूना तस्माद् पर्जनमाचरेत्" द्वारा समझा दिया गया है. अत पुनरुक्ति अनावश्यक है यहा यह अवधैय है कि इन्द्रिया तीन तरह की होती हैं (१) जिनका साक्षात् भगव- द्विनियोग वाक्य हो यथा नेत्र त्वचा कर्ण वाणी हस्त धरण और अन्त करण (२) कुछ इन्द्रि- पोका विषय भावस्वरूपको साक्षात् नहीं बनाया जा सकता है जैसे रसना और नासिका अत इन्हें भगवरप्रसादरूप अन्न तथा गन्ध के ग्रहणके व्रतमे दीक्षित करना चाहिये (३)पूर्वोक्त दोनो प्रकारकी इन्द्रियोके व्यापार ग्रहणात्मक होते है विसर्जनात्मक नही अत उनका विषय साक्षात् भगवत्स्वरूप अथवा या स्वरूपसम्बन्धी प्रसादी अन्न-गन्धको बनाया जा सकता है, पर पायु मोर उपस्थ इन्द्रियोका व्यापार ग्रहणात्मक न होकर विसर्जनात्मक होता है अत इनका पिनियोग कथमपि साक्षात् भगवत्स्वरूप या तत्सम्बन्धी पदार्थोके ग्रहण मे शक्य नहीं है फिरभी पायसे मलाशत्यागके द्वारा शुद्ध देहको भगवत्सेवोपयोगी बनाया जा सकता है इसी तरह कृष्णसेवामे सहयोगी सन्ततीके जन्मके लिए उपस्यका भी उपयोग सम्भव है-"पुत्रे कृष्णप्रिये रति" इम तरह जिस इन्द्रियका, साक्षात् अथवा परम्परया भी भगवत्स्वरूपभे विनियोग अथवा भगवत्कार्याष उपयोग दिखलायी न देता हो, उसका निश्चयेन भन्छो तरह निग्रह करना चाहिये. इस नियमके पालनसे अनवतारकालमे भी गुण-स्वरूप-उभयकृत निरोप शक्य बन जाता है भक्तको भगवत्सेवा तथा भगवत्कथा के द्वारा प्रपञ्चविस्मृति और भगवदासक्ति सिद्ध हो जाती हैं निरोधकी सिद्धि साधनावस्थाकी अन्तिम अवधि है कोई भी साधन पोडशग्रन्थमे वर्णित अष्टाक्षरपञ्चासर-मन्त्र (या अन्यत्र गणित मन्त्र-" हा हा कृष्ण मुखारविन्दविरहाग्ने" भी) उभयकृत निरोघसे अर्थात् कृष्ण-सेवाकथा-मय जीवनसे परतर-उत्कृष्ट साधन नहीं है न इस पोडशग्रन्यमे वर्णित यमुनाष्टक या कृष्णाश्रय से स्तव (या अन्यत्र भी वर्णित सर्वोत्तम आदि स्तोत्र भी) इस निरोधसे परतर-उत्कृष्ट सापन है. भाष्य निबन्ध अादि अन्योंमे वणित अनेकविध ब्रह्मविद्यायें या सर्व निर्णय आदि अन्योमे प्रशसित तीर्थाटन भी इस गुण- स्वरूप-उभयकृत निरोधसे परतर साधन नहीं हैं इस निरोपसे परतर यदि कुछ है तो वह है आगे रोवाफलमे वर्णित होनेवाला अलौकिक सामर्थ्य रूप फल, जो इस निरोधका प्रयोजन है परन्तु उसे तो 'फलनिरोध' ही पुन कहा- जाता है निरोधलक्षण अन्यका प्रस्तुत सस्करण, वि स १९७३ में प्रकाशित सस्करणका ऑफ- सेट् प्रसिसद्वारा पुनर्मुद्रित रूप है. इसमे दिये परिशिष्टोको हमने यथोचित क्रममे पुनर्योजित किया है पूर्वसस्करणके प्रकाशक थे गोस्वामीत्री १००८ श्रीजीवनलालजी महाराज (पोर- वन्दर) सम्पादक थे श्रीमूलचन्द तुलसीदास सेलीवाला तथा श्रीधीरजलाल प्रजदास सांकलिया इन सभी महानुभावोका हम हार्दिक कृतज्ञताके साथ स्मरण करते हैं ग्रन्थसङ्ग्रहपरिचयः । १ सर्वा मुद्रितटीका अन्यपुसकद्वय च दृष्ट्वा श्रीमदाचार्यप्रकटित निरोधलक्षण मुद्रितमस्मामि । तम्र विधमाना पाठभेदा श्लोक्क्रममैदान जिज्ञासुमिर्विवरणेपु मुदितेषु द्रष्टव्या । मूलमानस्य पुस्तकद्वय उक्नकॉलेजहस्तलिखितसमहस्थ, प्राय शुद्ध प्राचीन । २ घाचाधीगोपेशकृतविवरणस्य पुस्तकपञ्चकमुपलब्धम् । तत्र पुस्तकदप १० गडूलालहस्त लिखितसमहरथम, एक प्राचीन विन्तु अशुद्ध, अन्यत् नूतन, प्राय शुद्धम् । एतीय शुद्ध नूतन च थीवछभलालानाम् । चतुर्थ प्राय शुद्ध, प्राचीन च रा० तनमुखरामसकाशादुपलब्धम् । पत्रम श्रीजीवनलालानाम् , शुद्ध टिप्पणयुत च । ३ श्रीविठ्ठलैशाएमजश्रीवल्लभकृतटीकाया पुसकद्वयमुपलब्धम् । एक प. गहूलालसग्रहस्थम्, अन्यत् श्रीमजरनानाम् । प्रथम प्राचीन प्राय शुद्ध, द्वितीय नूतन, परन्तु चित् शोधितम् । ४ श्रीहरिधनचरणकृतविवृते द्वादशपुस्तकानि प्राप्तानि । तत्र पुस्तकत्रय प. गहलालसम हस्थ, अन्यत् पुस्तकत्रय डकगकॉलेजसमहस्थ, द्वय श्रीजीवनलालानां, एक श्रीनृसिंहलालतनयधीगो वर्धनलालाना, एक गोस्वामिनीश्रीकृष्णप्रियाणां, एक रा० तनसुखरामसकाशादुपलब्धम् । एक भाई नारायणशास्त्रिण । सर्वाण्येतानि प्राचीनानि प्राय शुद्धानि । एक तु थीहरिरायहस्ताक्षरयुतमिति प्रतिभाति । श्रीहरिरानिरोधलक्षणविवरण वारद्वय लिखितमिति प्रतिभाति । पम्बाच्छोधि वा विस्तृरय लिखित विवरणमत्र मुदितम् । पूर्व लिखित तु जिज्ञासुवृत्यर्थ परिशिष्टे निवेशितम् । पूर्व लिखितविवरणस्य पुस्तकद्धय मिलितम् । एक श्रीवल्लभलालानाम् अन्यत् रा० तनसुखरामसकाशादुपलब्धम् । उभय मपि प्राचीन प्राय शुद्ध परन्तु अरितम् । यथायमेव परिशिष्टे मुदितमसामि ।रा. तनमुखरामत उप लब्ध पुस्तके एवमपि भापाया लिखित 'निरोधलक्षणकी टीका प्रथम श्रीहरिरायजुने कीनीधी पत्र २२' इति । एतेनाम्मदुक्त समर्थ्यते । ५ चतुर्थ मुद्रित व्याख्यान श्रीवल्लभानाम् , श्रीगोकुलनाथानाम् । एतद्विवरणस पब पुस्तकाम्यु पलब्धानि । एक प. गट्टलालसाहस्थम् । द्वितीय इकनकॉलेजसप्रहस्थम् । तृतीय श्रीजीवनलालानाम् । चतुर्थ सुरतिस्थगोस्वामिश्रीगिरिघराणां गोस्वामिनीधीकृष्णप्रियामि कृपया प्रदत्तम् । पञ्चम सुन्दर हाल माणिक्यचन्द्र मी ए इत्येतेन प्रापितम् । इद नूतनमशुद्ध च । श्रीजीवनलालाना त सरश नूतन, माय शुद्धम् । वनकॉलेजसमहरथ प्राचीन माय शुद्धम् । भन्यस्य प्राय शुद्धम् । ६ पञ्चम श्रीपुरुषोत्तमानाम् । अस्यापि पद पुस्तकानि मिलितानि । एक योगिधीगोपेश्वराणां हस्ताक्षरैलिखितटिप्पणयुत शुद्ध प्राचीन च, प. गहूलालसनहस्थम् द्वितीय गोस्वामिश्रीनृसिंह लालतनयश्रीगोवर्धनलालानाम् । इदमपिप्राचीन प्राय शुद्धम् । तृनीय गोस्वामिश्रीजीवनलालानाम्, नूतन, प्राय शुरुम् । चतुर्थ गोस्वामिनीश्रीकृष्णप्रियामि प्रदत्तम् , प्राय शुभम् । पबम काशीस्थ श्री गिरिधरजीमहाराजाश्रितरामकृष्णभहस्य, गुजराती अधिपतिनटवरलारेन सहर्ष प्रदत्तम् । पर स्तम्भतीर्थस्थशानिमाईनारायणस्य । ७ पष्ठ श्रीवजराजानाम् । एतद्विवरणस्पैकमेव पुम्नकमम्माभिरपलब्धम् । कुत्रापि एतन मिलति । भस्य एक पुस्तक पहच्या सुरनिस्यश्रीगिरिधराणा मन्दिरस्थसग्रहे उपलब्धम् । तत् तनत्यगोस्वामिनी श्रीकृष्णप्रियाभिरतिकृपया बल्देवदासकीतनकृद्द्वारा भसत्सकाश प्रेषितम् । एतदुर्लभ पुस्तकप्रदानेन पपमत्यन्तममुगृहीतास्तामि । प्राथयामहे चान्या अपि गोस्वामि य एना अनुकुर्युरिति । अम्मि पुस्तक समये प. गटुलालसस्थाया 'कार्याध्यक्ष काशीदास नारायणदास दसाल, पी ए एल पर, श्री मुम्यष्टी श्रेणी विभुवनदास श्येतेषां महस्युपहति । डॉ एस् के मेलवसकर एम् ए पी एच. टी प्रत्यल, गोस्वामि श्रीगोवर्धनलालाना, कस्याणशामिणच, गोस्वामिधीवल्लभलालाना गाभवतास्त्रिणम, गोस्वामिधीजीपनलालाना, गोस्वामिनीयीकृष्णप्रियाणा, पलदेवदासस्थापि, गोस्वामिश्रीमजरसानां शामिभाईनारायणस्य च महत्पुपकृति । तनमुखराम मन सुखराम त्रिपाठी बी १, सुदरदास माणि क्यचन्द्र श्री ए, नटवरलाल सूर्यराम देसाई बी ए इत्येते सहर्ष प्राचीनहस्तलिखितपुस्तकमदानेना स्यन्तमनुगृहीता पयम् । 'भसन्मित्रोरसवलाल रामकृष्ण पट्या' इत्यस्य प्रतिरिखने कचिदुपकार । अस्स पावत्मान्यविवरणासमेतस निरोधलक्षणस मुद्रणव्यप गोस्वामिवर्थ श्रीजीवनलाले सहर्ष कृत इति सेपा मुपकृति वय सविनय सराम । प्राधयामहे चायेपि गोस्वामिन श्रीमती वैष्णवाचनाननुम्युरिति । एतेषां गोस्वामियाणा रुपयैव निरोधलक्षण पड्विाणयुत मुदित साम्प्रदायिकाना सुगम भविष्यतीति । विवरणकृता परिचय । , तादी धीमहलभाचार्यप्रकटित निरोधलक्षण पशिचरणयुत समुद्यते । स्वीरानुग्रहाथ माचार्यसप्रकटीकृतमिति । आवायर्याणां प्रादुर्भावस्तु १५३५ वर्षे चैत्रकृष्ण एकादश्या रविवागरे । तेषां परिमादिक साम्प्रदायिकत्रातादिपु मसिद्धमिति मेह विस्तर । पोडशमायेप्वय निरोधलक्षण मन्य पदशसख्यो भजते । २ प्रथम मुदिन विवरण चाचाश्रीगोपेशानाम् । इमे श्रीगोपेगा श्रीमप्रभुचरणाना सप्तम पुत्रधीनश्यामाना सूनव । पोडशम थोपरि ययातेपाटीका रयते । तत्कृतसेवाफल टिप्पणी वधु वाम्मामि प्रकरिता भाइपदकृष्णपम्पो ६५२ वर्षे प्रादुर्भूता । ३ द्वितीय विवरण श्रीविठ्ठरेशा मजश्रीवल्लभानाम् । इमे धीवतमा श्रीमग्यभुपरापमपुत्र श्रीरघुनाथती सध्या विभूपत १७२९ वर्षे कातिमकृष्णद्वादश्या मादुर्भूला । नवरसटि प्पणामस्यासनिणयटीकासेवापटीकाशना प्रणेतार एत एव । नवरवटिप्पण्या एक प्राचीन पुस्तकम समामिरपल-धम् । तर श्रीविहररायान्मधीवल्लभकृता नवरलम्पिणी तिसमाप्तो बतते । एतापुनक धीमगोस्वामिधीद्वारकेश्वरारमधीगिरिधराणां सवत् १८३२ पौषशुक्ले लिखितम् । तरपुसकोपरि अमपितृव्यचरणानां रेटेर इति रिखितम् । सप्रदायवशवृझे तेपा सम्बन्ध एवं दर्शित । श्रीविठ्ठलराय -धीविडलेश धीगिरिधरजी श्रीवल्लभजी १७२९ श्रीद्वारकेशजी 1 धीगिरिधरजी ७७९ एतेन सेवाफलच्याफ्यानस्य प्रणेतारोपि श्रीरघुनाथवश्या इत्यनुमीयते । दशमस्कअनीसु बोधिनीस्वस्थापि प्रणतारम एपेति प्रतिभाति । विशेष तु पुष्टिभक्तिसुधाया सप्तमवस्ख नवमांक प्रपचितम् , जिज्ञामुभिग्नग्नैव द्रष्टव्यम् । ५ मृनीय न्यारयान श्रीमरिधनचरणानाम् । श्रीहरिराया इति प्रसिद्धा हि ते । श्रीमध्यभु धरणदिनीयरमारधीगोवि दरायम्पेहपुत्रश्नीकल्याणरायार्णा ज्येष्ठसूनव भादपदकृष्णपक्षम्यां .

पर्षे प्रादुर्भूता । एषां प्रमसम्बन्धसंस्कारस्तु श्रीविठ्ठलेघराणां चतुर्थबाटै श्रीवटी श्रीगोकुलनाथेति- प्रसिद्बस्त कृत । श्रीहरिरायाणामसण्याता सूक्ष्मग्रन्या पयन्ते । सम्प्रदाये प्रसिदानि शिक्षापत्रा प्यपि ते प्रादुर्भावितानि । श्रीमचरिधनधरणस्वरूपे तु शुदपुष्टिमार्गीय फलामक रसात्मक विषयो। गारमक साक्षान्य मूर्तिमत् मादुर्भूतमनुभूयते । तेषां व्याएयानानि सर्घाण्यपि मक्तपनुगुणानि । नि साधनजीवानुग्रहार्थमेव तेपा प्राकट्यमिति मतिमाति । भत एपात्र मुदित तेषां निरोधलक्षणव्या- ख्यान निगूढ मत्त्यनुगुण सरस भक्तिनिष्ठजनानुग्रहार्भ विराजते। ५ चतुर्थ व्यारयान श्रीवल्लभानाम् इदम्यारयान श्रीमद्गोकुलनाथानामिति पेचिद्वदन्ति।आदर्शप पुस्तकद्वये श्रीवल्लभकृतमिति लिखितम् । अन्यसिमझादर्शनये विमपि नाम नास्ति । श्रीगोकुलनाथा प्रसिद्धासु स्वकृतटीकामु श्रीमद्विठ्ठलेश्वरप्रभुचरणान् स्वपितृचरणस्वेन आरमे नमस्कुर्वन्ति, अथवान्ते तथैव स्मरन्ति । असिन् निरोधलक्षण विवरणे यद्यपि श्रीमरप्रभुचरणा नमस्कृता, तभागि सामान्यत: न तु स्वपितृचरणत्वेन । अत एव फचित्सन्देह । श्रीमद्गोकुलनाथास्तु धीमद्विष्ठलेश्वरप्रभुचरणानां चतुर्थसूनव मार्गशीर्पशुसप्तम्या १६.८ व प्रादुर्भूता । पोपकृष्णनवम्यां १६९७ वर्षे सिविं. गता । श्रीमरप्रभुचरणलालेषु इमे अतिमसिया । पिपादीनां सन्यासपापण्डिना मुखमर्दन करवा मोगलराजजहागिर च वशीकृत्य स्वमार्गरक्षा एतैरेव कृता 1 सता कण्ठे माला स तैरेव सुरक्षिता स्वस्वरूपपलेनेव । यीमदाचार्यप्रकटितधीमद्भागवतसुबोधिन्या विशेषप्रचारस्तेरेप कृत , भसस्तेपा श्रीसुषोधिनीप्रवर्तका इति नामापि प्रसिद्धम् । साम्प्रदायिकवार्तादीना प्रकटीकर्तारोपि ते एव । स्व सम्प्रदायस्य प्रचारार्थ प्रवृक्षार्थ च गुर्जरभूमिरनेकवार स्वचरणनलिनरजोभित पवित्रीकृता । दक्षिणे पुण्यपत्तनपर्यन्तमेकवार तदर्थमेव गता । परन्तु तत्रत्यान् कृष्ण भक्तिरसानधिकारिण दृष्ट्या तस्साच्य वर्त त । दाक्षिणात्या 'भंसा' इत्युपहास तैरेव कृत । त कीतनादिषु च प्रसिद्ध । श्रीसर्वोत्तमस्तोन्नसि- बान्तमुकापलिपुष्टिप्रवाहमर्यादासियान्तरहस्या-त करणप्रबोधचतु श्लोकीभक्तिवर्धिनीत्यादीना प्रन्याना विवृतय तेपा नयनगोचरीभवन्ति । श्रीकल्याणभट्टकृतकल्लोले श्रीगोपालदासकृतमालामसगे पतेपा चरित्रादिक सुविस्तृत, विशेषजिज्ञासुभिस्तनवावलोकनीयम् । ६ पञ्चम व्याख्यान श्रीपुरुषोत्तमानाम् । श्रीमदाचार्यत पुरुपगणनया सप्तमी सप्या विभूप यन्तो भाद्रपदशुक्लदशम्यामेकादझ्या बा १७२४ या १७१४ वा वर्षे प्रोभूता । तेपा विवरण शा स्वाथरीत्या बुभुसुबोधकमिति प्रतिभाति । विशेषत तेपा चरित्रजिज्ञामुभि पुष्टि भक्तिसुधेति मासिक पत्रिकाया पन्नमवर्षय तृतीयाको द्रष्टष्य । यावत्प्राप्य बाझमान्तर वा तेपा चरित्रादिकमस्माभित्र त्रैव नियेशितमिति भात्र पुनरनूयते । अत्र मुदित तेषा निरोधलक्षणविवरण शास्त्रायरीत्या बुभुमुबोध कमाचार्याशय सप्रमाण प्रकटीकुर्यत् विराजते । ७ पर व्यापयान श्रीश्यामलमुतश्रीवजराजानाम् । इमे श्रीब्रजराजा माघकृष्ण द्वितीयायां १६८२ वर्षे प्रादुर्भूना । श्रीमाभुचरणधीनिलेश्वरतृतीयकुमारश्रीमहालकृष्णाना प्रपौत्रा दशदि गन्तविजमिगोस्वामिश्रीमत्पुरुषोरामानां पितृव्यचरणा । अधुना सुरतिपुरमलकुर्वन् श्रीबालकृष्णप्रभु गोकुले श्रीमहारकाधीश्वरप्रभोरुत्सगे विराजितवान् । स्वाग्रहेण तरस्वरूप स्वशिरसि श्रीवजराज सुरतिपुरे सेवितम् । अत्र निरोधलक्षणव्याख्याने मगलाचरणे श्रीवजराजस्त स्वरूपमैच निरोधाधरवेन सूचितम् । तेषा रोचिषा श्रीमहालकृष्णप्रभु सुरतिपुरे श्रीपुरुषोत्तमाना मूर्तिं विराजितवान् । स एव श्रीमदालकृष्णप्रभुलशस्योरामस्वात् श्रीवजरलानां शिरसि अधुना विराजते । श्रीपुरपोसमा स्वपितृष्यचरण धीवराज स्ववसामणिं गणयन्ति । श्रीप्रजराजाना प्रन्या भाषपूर्णा बहव दृश्यन्ते । गीतामृततरगिणी रसगोपालभहन काश्या श्रीपुरुषोत्तमनाम्ना प्रकटरीकृता । सप्तश्लोकीचतु श्लोकी कृष्णाश्रयादिपोशमयेषु यहूना व्याख्यानानि भावामकानि ते प्रादुर्भावितानि दृग्गोचरीभवन्तीति । भन्न असामिरपलब्धानि पहिवरणानि प्रकटीफियन्ते एतान्येव प्रसिद्धानि, तथापि एतावन्त्येव विवरणानि नवाधिकानीति नैव शश्यते वनुमसामि । अतो यदि भवामुदित निरोधलक्षण-पाख्यान साहित् महानुमायार्मा पुलकसंग्रहे विग्रेत क्षेतवा है कृपया यदि समस्तका प्रेशमियांत, सदा सदपि सोपकार स्वीकृत्य मुदयिष्यामः । प्रार्थयामहे व विद्वांसः अमादेती प्रार्थना कृपया स्वीकरण सम्प्रदायोति कर्तुमुपता भविष्यन्तीति । कोटामामस्थवालशासितः भुतमेवासामियर श्रीमधुरापी- समन्दिरसमहे निरोपछाणस्य अन्यत् टीकाइयं वर्तते, एका श्रीकस्याणरायाणाम्, द्वितीया श्रीदेवकी- नन्दनानाम् । मयते कृतेपि नासामिसद्विवरणयमुपलब्धम् । अतस्तरसंप्रहमन्त्र कतुं वयमशक्का इति । वामनजयन्ती १९५३. मुम्बई धैर्यलाल सांकलीया. } मूलचन्द्र तेलीवाला.

॥ श्रीकृष्णाय नमः॥ श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः। श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः। निरोधलक्षणम् । यच दुःखं यशोदाया नन्दादीनां च गोकुले । गोपिकानां तु यद् दुःखं तद् दुःखं स्यान्मम कचित् ॥१॥ गोकुले गोपिकानां तु सर्वेषां व्रजवासिनाम् । यत्सुखं समभूत् तन्मे भगवान् किं विधास्यति ॥ २॥ उद्ध्यागमने जात उत्सवः सुमहान् यथा । वृन्दावने गोकुले वा तथा मे मनसि कचित् ॥३॥ महतां कृपया यावद्भगवान् दययिष्यति । ताचदानन्दसन्दोरः कीर्त्यमानः सुखाय हि ॥ ४ ॥ महतां कृपया यद्वत् कीर्तनं सुखदं सदा । न तथा लौकिकानां तु स्निग्धभोजनरूक्षवत् ॥ ५॥ गुणगाने सुखावाप्तिर्गोविन्दस्य प्रजायते । यथा तथा शुकादीनां नैवात्मनि कुतोन्यतः ॥६॥ क्लिश्यमानान् जनान् दृष्ट्वा कृपायुक्तो यदा भवेत् । तदा सर्व सदानन्दं दिस्थं निर्गतं यहिः ॥७॥ सर्वानन्दमयस्यापि कृपानन्दः सुदुर्लभः । हगतः स्वगुणान् श्रुत्वा पूर्णः लाययते जनान् ॥ ८॥ तम्मात् मय परित्यज्य निम्दैः सर्वदा गुणाः। सदानन्दपरैगेयाः मचिदानन्दना तैनः ॥९॥ ३ सदानन्दमयस्सापीति पाट । । २ पनि पाय - पनि पाट ४ गत पद ।

अहं निरुदो रोधेन निरोधपदयीं गतः। निरुद्धानां तु रोधाय निरोधं वर्णयामि ते ॥१०॥ हरिणा ये विनिमुक्तास्ते मग्ना भवसागरे । ये निरुद्धास्त एवात्र मोदमायान्त्यहर्निशम् ॥ ११ ॥ संसारावेशदुष्टानामिन्द्रियाणां हिताय थे। कृष्णस्य सर्ववस्तूनि भून ईशस्य योजयेत् ॥ १२॥ गुणेष्वाविष्टचित्तानां सर्वदा मुरवैरिणः । संसारविरहक्लेशौ न स्यातां हरिवत्सुखम् ॥ १३ ॥ तदा भवेदयालुत्वमन्यथा क्रूरता मता । बाधशङ्कापि नास्त्यत्र तध्यासोपि सिध्यति ॥१४॥ भगवद्धर्मसामाद्विरागो विषये स्थिरः। गुणैर्हरिसुखस्पर्शान्न दुःखं भाति कर्हिचित् ॥ १५ ॥ एवं ज्ञात्वा ज्ञानमार्गादुकों हेरिवर्णने । अमत्सरैरलुब्धैश्च वर्णनीयाः सदा गुणाः ॥१६॥ हरिमूर्तिः सदा ध्येया संकल्पादपि तत्र हि । दर्शनं स्पर्शनं स्पष्टं तथा कृतिगती सदा ॥ १७ ॥ अवर्ण कीर्तनं स्पष्टं पुत्रे कृष्णप्रिये रतिः। पायोमलांशत्यागेन शेपर्भावं तनौ नयेत् ॥ १८॥ यस्य वा भगवत्कार्य यदा स्पष्टं न दृश्यते। तदा विनिग्रहस्तस्य कर्तव्य इति निश्चयः ।। १९ ।। नातः परतरो मन्त्रो मातः परतरः स्तवः। नातः परतरा विद्या तीर्थ नातः परात्परम् ।। २० ॥ इति श्रीमद्वल्लभाचार्यचरणप्रकटितं निरोधलक्षणम् समासम् । १ तमिति पाठ । २ भूग्नि द्वादश योजयदिति पाठ । ३ हरे मुखादिति पाठ । ४ उत्कर्षमिति पाठ । ५ गुणवर्णने इति पाठ । ६.स्वेटमिति पाठ । ७ वायोरिति पाठ ।८ शेषभागमिति पाट ।

धीकृष्णाय नमः।
श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः ।
श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः ।
निरोधलक्षणम् ।
चाचाश्रीगोपेशविरचितविवृतिसमेतम् ।
సంతం
श्रीमद्भागवतसुघोधिन्यामन्येषु च स्वग्रन्थेषु निरोधस्य निगद्यमानत्वात् तमाचक्षाणाः
तदवश्यमावसूचकं मनोरथखरूपमाहुः ।
यच दुःखं यशोदाया नन्दादीनां च गोकुले।
गोपिकानां तु यद् दुःखं तद् दुःग्वं स्यान्मम कचित् ॥१॥
गोपिकानां त्वित्यन्तेन सर्वोत्कृष्टता स्वेप्टतमता च सूचितेति ज्ञेयम् । स्यादिति
प्रार्थनायां लिङ् । कचिदिति दुर्लभवम् । तथा च पहिराविर्भूतो भगवान् मातृचरणादीनां
विरहानुभवजननाय-यदा मथुरां गतस्तदा यद्विरहारमकं दुःखं समजनि तद्भवेदित्यर्थः॥१॥
विप्रयोगदशायां तादृशरसिकानुभवसाक्षिकान्तरसुखविपयकं मनोरथमाहुः ।
गोकुले गोपिकानां तु सर्वेषां ब्रजवासिनाम् ।
यत्सुखं समभूत् तन्मे भगवान् किं विधास्यति ॥२॥
त्विति पूर्ववदेव । यद्यपि नास्त्यत्र संशयस्तथापीटतमस्यार्थस्य सिद्धी सन्देहा-
स्पदताया लोकेऽपि दुर्निवारत्वात् किमुत सर्वसाधनाप्राप्यस्साखिलप्रमाणागोचरम्येति
विभावनीयम् । ननु विहाय सर्वप्रसिद्धं संयोगसुखं कथमान्तराभिलाप इति चेत् । न ।
आन्तरस्य महाफलत्वादस्पामवस्थायामस्यैवोचितत्वादुत्कृष्टसंयोगसुखस्य च विजातीयवपुः-
साध्यत्वादितिदिक् ॥२॥
अघ 'सर्वेन्द्रियसुखासादो यत्रास्तीत्यभिमन्यते । तत्प्राप्तीच्छां ससझल्पामुत्कण्ठां
कवयो विदु'रितिलक्षणलक्षितोत्कलिकाजनकोत्सवविषयकमाहुः ।
उद्धवागमने जात उत्सवः सुमहान् यथा ।
घृन्दावने गोकुले वा तथा मे मनसि कचित् ॥३॥
यदा भगवदुक्तं वाचिकमादायोद्धवः समागतस्तदा जातो यश्च पृन्दायने रास-
कीडायां भगवदन्तर्धानानन्तरमाविर्भूते सति जातो यो वा गोकुले जात इत्यर्थः । सर्वेपामपि
प्रत्येक विजातीयोत्कलिकाजनकत्वेन स्पृहणीयत्वात् सर्वविषयक स इति ध्येयम् ॥३॥

निरोधलक्षणम् ।
अवान्तरभेदविशिष्टान्तरविषयकमाहुः ।
महतां कृपया यावगवान दययिष्यति ।
तावदानन्दसन्दोहः कीर्त्यमानः सुखाय हि ॥४॥
'अस्मिन्मार्गे स्वामिन्य एव गुरव' इतिश्रीप्रभुचरणोक्तिरनुसन्धेया। तथा च
महत्पदवाच्यास्ता एवेति तादृशगुरूणामनुकम्पयेत्याशयः । सुखायेति । सुखजनका
सादित्यर्थः । सुखसमूहरूपो भगवान् यद्यल्लीलाविशिष्टः कीर्त्यते ततलीलासहितो हया-
विर्भूतः सन्नन्तरानन्दमनुभावयतीत्याशयः ॥४॥
इदानी विजातीयकीर्तनविषयकं तमाहुः ।
महतां कृपया पद्वत् कीर्तनं सुखदं सदा ।
न तथा लौकिकानां तु लिग्धभोजनरूक्षवत् ॥५॥
स्वामिनीनां कृपया हृदि स्फुरितस्य भगवतो यत्कीर्तनं तदेव सर्वदा मनसि सुखं
स्यात्, न तु लौकिकानां विहितकीर्तनोपदेष्ट्रणां कृपयेत्यर्थः । एषां मर्यादास्यत्वेनोत्कृष्ट-
पुष्टावप्रवेशात् । तत्कृपास्फुरितकीर्तनस्य विहितकीर्तनस्य च तारतम्येन सुखजनकत्वे दृष्टान्त-
माहुःलिग्धेति । रूक्षपदेन रूक्षभोजनम् । तथा च त्रिग्धभोजनरूक्षभोजनयोस्तारतम्येन
सुखजनकत्वं यथा तथा तत्कीर्तनयोरपीतिभावः । एवय महत्कृपया स्फुरितस्यैव कीर्तनं मे
हृदि सुखजनक भवत्वित्थं मनोरथ इति ध्येयम् ॥५॥
ननु मर्यादामागीयविहितकीर्तनेपि अश्रुपुलकादीनां सत्त्वात् कथमत्रैवाग्रह इत्या-
शंकामासस्य समाधानमाहुः ।
गुणगाने सुखावासिगोविन्दस्य मजायते ।
यथा तथा शुकादीनां नैवात्मनि कुसोन्यतः ॥ ६ ॥
गोविन्दस्य गोगोकुलपतेरनन्यगोकुलखामिन इति यावत् । गुणगाने क्रियमाणे
यथा आनन्दो भवति तथा विरक्तानां ग्रहमावापन्नानां शुकादीनामपि आत्मनि
न भवति, किमुतान्यनेत्यर्थः ॥६॥
एवं निरोधसाधनीभूतभापविषयकं निरोधावश्यंभावसूचकं मनोरथमुक्त्वेदानी
तादृशमनोरथरिपयोगते दु.से जायमाने कदाचित् कृपया आन्तर सुखमपि प्रयच्छति तदाहुः।
लिश्यमानान् जनान् दृष्ट्वा कृपायुक्तो यदा भयेत् ।
तदा सर्व सदानन्दं हृदिस्यं निर्गतं यदिः ॥ ७ ॥
भयेदिति देहलीदीपन्यायेनोभयनाप्यन्वेनि । यदा कृपालुर्भवेत् तदा शिरहदुःसा-
नुमवितृहृदयस्थितं सदानन्द मगरम्वरूपं सर्य साशन मायोद्धाटनेन अयोगोलके
पहिवत् फियित्कालं हदय एवं पहिराविर्भवेदित्यर्थः ॥ ७ ॥

३ श्रीगोपेशविरचितवितिसमेतम् । ननु 'शृण्वन्ति गायन्ति गृणन्समीक्षणशः स्मरन्ति नन्दन्ती'त्यादिमर्यादामार्गीय- श्रवणादिमिरप्यानन्दो भगवदाविर्भावश्च भवेतामेव तत्कोयमाग्रहो दुःखानुभव इत्याशंक्याहुः। सदानन्दमयस्यापि कृपानन्दः सुदुर्लभः । हृद्गतः खगुणान् श्रुत्वा पूर्णः प्लावयते जनान् ॥८॥ केशं विना कृपानन्दो नेत्याशयः । तर्हि गुणगानस्य किं फलमत आहुः हृद्गत इति । स्वगुणश्रवणेन कृपया पूर्णः सन् स्वरूपानन्देनाप्लुतान् करोतीत्यर्थः । यथा बाह्य- रमणे रासक्रीडायां विरहानुभवानन्तरं 'जयति तेधिकं जन्मने'त्यादिना कृते गुणगाने कृपया पूर्णः सन् स्वरूपानन्दं प्रायच्छत् , तथात्राप्यान्तररमणे संकल्पप्रतिभातो भगवान् भजनानन्दस्य कवन लेशं ददातीत्याशयः । 'यद्यपि गतिस्मितप्रेक्षणे'त्यत्र गुणगानं नोक्त- मान्तररमणे, तथापि बाझरमणानन्तरमन्तर्धाने विनापि गुणगानं आन्तरमास्ताम्, परन्तु साधनदशायामेतच्छरीरावच्छिन्नात्मनीयमेव सरणिरिति ध्येयम् । ननु विकलवास्वास्थ्य- नाशकान्तररमणसम्पादनं भगवतो नोचितमिति चेत्, न । विप्रयोगस्यैवोद्बोधकमिदमा. न्तरमित्यधिकतरास्वास्थ्यविकलत्वयोजनकमेव । तथा चोक्तं श्रीमद्वजरत्नपृष्टेन श्रीगोपी- जनवलभेन 'ययाधनो लब्धधने प्रणष्टे तचिन्तयान्यन्निभृतो न वेदेति । तथा च किञ्चित्कालिकोऽयमाविर्मावो निधनस्याल्पकालिकधनलाभ इव भक्तस्य सङ्कल्पप्रतिभाते मगवत्स्वरूपे संयोगरससादुलाभः । ततस्तदनवाप्रधिकतममखास्थ्यं विकलत्वं च मवतीति ध्येयम् ॥ ८॥ एवं कृपोद्रेकजनकगुणगानमावश्यकमित्याहुः । तस्मात् सर्व परित्यज्य निरुद्धः सर्वदा गुणाः। सदानन्दपरैर्गेयाः सचिदानन्दता स्वतः ॥९॥ निरुदैः पुष्टिमागीयैः सदानन्दपरैः श्रीकृष्णमाननिष्ठान्तःकरणैः एवंकृती खतोऽनमिलपितापि सचिदानन्दता स्फुरतीत्यर्थः । तथा च गुणगानं तु कृपोद्रेक- जननार्थमेवेयं तु स्वत एव भवतीति भावः ॥९॥ नन्वीदृशालौकिकप्रकारे किं प्रमाणमित्याशक्य खानुभवमेव प्रमाणमाहुः । अहं निरुद्धो रोधेन निरोधपदवीं गतः । निगद्वानां तु रोधाय निरोधं वर्णयामि तम् ॥ १० ॥ निरुद्धः पुष्टिमार्गीयोऽहं रोधेन भजनानन्दातिरिक्तयावत्फलेभ्यो निवृत्या निरोध- पदवीं निरोधाधिकरणतां प्राप्तः सन् निरुद्धानां पुष्टिमार्गीयाणां रोधाय रोधसिद्ध्यै यदधिकरणतामहं प्राप्तस्तं निरोधं कथयामीत्यर्थः । ते इति पाठे कमपि यक्ष्यमाणशका- वन्तमभिमुखीकृत्य ते तुभ्यं कथयामीत्यन्वयः ।

४
निरोधलक्षणम् ।
ननु निरोधस्य भगवताग्रे सम्पादयिष्यमाणत्वान्निरुद्धानामिति वचः कथं सङ्गच्छत
इति चेत्, न । भगवतो विषयाव्यभिचारिण्यामेवविधस्वरूपानन्ददित्सायां सम्प्रदान-
खेन विषयीभूते पुष्टिजीने सिद्धवत्कारेण निरुद्धपदप्रयोगे न काचिदप्यनुपपत्तिरिति ध्येयम् ।
ननु कोयं रोध , को वा निरोध इति चेत्, उच्यते । लोकवेदसमाधिभापाप्रसिद्धपशु-
पुत्रादिपुरपोत्तमसायुज्यान्तयारत्फलेभ्यो निवृत्ती रोध., रोधपूर्विकात्मोपाधिकप्रियत्वा-
निनन्वना भगवन्मानोपाधिकप्रियत्वनियन्धना भगवत्परता निरोधः । रोधे भजनानन्दाति-
रिक्तयारत्फलनिरपेक्षता, निरोधे तु स्वात्मनोपि निरपेक्षता, यतो भगवान् स्वार्थ न प्रियः,
किन्तु स्वात्मापि भगवदर्थमेव प्रियो, भगवानपि भगवत्त्वेनैवेत्ययमेव नितरां रोधो
र स्वात्मनोपि निवृत्ति । तथा च रोधनिरोधयोरय भेदः । इत्थ च 'न वा रे पुत्रस्य कामाय
हुन ग्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पुत्र प्रियो भवती तिश्रुतेः सर्वनात्मोपाधिकमेव
प्रियतम् , तन्निनन्यनेन च प्रवृत्तिः, अत्र तु स्वात्मनो भगवतश्च प्रियत्वे भगवानेनोपाधि-
रिनि भगन्मात्रोपाधिनिवन्धनैव भगवद्विपयिणी प्रवृत्तिर्भजनानन्ददित्साविषयीभूते जीवे
पून रोब सम्पाद्य भगवता निरोध. सम्पायत इति भार । ननु निरोधो भगवतः क्रीडा,
तत्कयमिद लक्षणमिति चेत्, न। रोधनिरोधयो. सम्पादनगपि भगवतो विशिष्टकीडायामेव
निविशन, न लतिरिच्यत इति दिक् । तर्हि रोधस्स भगवदेकसम्पाद्यत्वे रोधसिद्ध्यर्थ
श्रीमदाचार्यकर्तृक निरोववर्णन कुनोपयुज्यत इति चेत्, न । 'नमामि हृदये शेपे
लीलाक्षीगन्विशायिन'मित्युक्त निरोधपदवीं गत' इत्युक्तेश्चानवरतमन्तःकरणे श्रीमगोपी-
जनपलभो भगान् रममाणम्तिष्ठति । तथा चान्तःकरणस्थो भगवानेवाचार्याणामानन-
सरोजेन पुष्टिजीवानामुक्तलक्षणकरोवसिद्ध्यर्थं निरोध वर्णयामीति वदतीति ध्येयम् ।
उक्तश्चन्यभूतोर्य श्रीमदाचार्यचरणैर्दशमस्कन्धस्य प्रथमाध्याय स्थैतन्निशम्य भृगुनन्दन
साइरादम् । चैयासकि सभगानथ विष्णुरात'मित्यस्य श्लोकस्य विवरणे 'भगवता सहित.
तदन्त स्थितो भगवानेवोत्तर प्रयच्छती'सनेन सभगवानितिपदव्याख्यानेन 'वाण्या यदा
तदा स्याम्प प्रादुर्भूत चकार हे'ति सर्वोत्तमे श्रीमप्रभुचरणोतेर्भगवन्गुसारविन्दमेव
श्रीमदाचार्या इति तदीयर पिरतमाकलनीयमिति दिक् । इत्य च भगवानेव निरोधवर्णनेन
निगेधम्य मत्कृिष्ट वेन ज्ञानमुत्पायोक्तफलेभ्यो निवर्तयतीति भगवत्सम्पाद्यत्व रोधस्येति
गई गुम्थम् । वम्नुतस्तु यदन साधन यच फल तत्मा वरणैकलम्यत्वाद्भगवदेकसाध्य-
मंाति फिमेभिरमत्तरिति भाग्यपद्विनिमारनीयम् । निम्द्वानां विति तुशन्दादन्या)
न वर्णयामीनि भार ॥१०॥
नमु पुनः सपि न निरूप्यत इसाफाहायामाहुः ।
रिणा ये विनिर्मुकास्ते ममा भयसागरे ।
ये निग्राम्त एयान मोदमायाल्यरर्निशाम् ॥ ११ ॥

श्रीगोपेगविरचितविकृतिसमेतम् । सर्वदु खहर्नापि येऽन्यरिपयेभ्यो रिमोच्य वखरूपलिप्सो न कृतास्तेपा मन्द- भाग्यानामर्थे कथ निरूपणीयमिति भार । यद्यपि तेपा मार्गान्तरेण यत्किञ्चिदपि फल जायताम् , तथाप्येतदतिरिक्तपरेपु सामान्य बुद्धिरेव श्रीमदाचार्यचरणानामत एव भवसागरे मन्ना इत्यचिरेतराम् । श्रीमद्भागवतेपि 'स्वर्गापवर्गनरकेष्वपि तुल्यार्थदर्शिन' इति ॥ ११॥ भावनासायनीभूता माधनतापन्ननिरोधपदवाच्या भावनामाहु । संसारावेशदुष्टानामिन्द्रियाणां हिताय थे। कृष्णस्य सर्ववस्तृनि भृन्न ईशस्य योजयेत् ॥ १२ ॥ रूपरसादितन्मात्रासु पर्यवसन्नत्वाद् दुष्टाना चस्रसनादिज्ञानेन्द्रियाणा नि- पिद्धनानारियाजनकाना कर्मेन्द्रियाणा तत्तदोपनिरसनपूर्वक तत्तत्फलसिद्ध्यै सदानन्दस्य सर्वान् रूपादीन् पदार्थान् तत्तदिन्द्रिययोग्यान् योजयेदित्यर्थ । नन्वनवरतमन्तरग भक्तैर्भज्यमानस्य भगवतस्तन तत्रोपयुक्ता सर्वे पदार्था कथ योजयितु शक्या इत्या. शङ्कायामाहु भूम्न इति । ईशस्य सर्वसमर्थस्य भून्न बहुत्वात् । तथा च युगपद- नेकेषु स्थलेपु मायोद्घाटनेनाविर्भवति भगवति सर्वमुपपद्यत इति भाव । योजनप्रकारस्त्वग्रे वक्ष्यते ॥ १२॥ ननु मनोमानयोजनेन निःप्रत्यूहं ब्रह्मरूपं रूपरसादिविपयवैराग्य- जनकमविदितदुखं निहाय कथमेवविधप्रकारे प्रवृत्तिर्जायतेतिशङ्कानिरासाय ज्ञानमार्गे यत्परमफल तदन गुणवर्णकस्य निनिडाच्छन्ननौकया गच्छतोऽनाशास्समानशीतसदाग- तिस्पर्श इव मध्येमार्गमिदमवान्तर फलमित्याहु । गुणेष्यायिष्टचित्तानां सर्वदा मुरवैरिणः । संसारविरहक्लेशौ न स्यातां हरिवत्सुखम् ॥ १३ ॥ संसारस्य विरो लौकिकविषयवियोगजन्य दुख क्लेशो रोगादिजन्यो द्वावपि न भवेतामित्यर्थ । न हि क्षार कूपपानीय पियत पामरस्यापि पानकपानसम्पत्ती ताशपपानीयनिरहो दृष्ट श्रुतो वा । एव प्रकृतेप्यासानविरसान् नश्वररूपादीन् मुखानस्य स्वरूपानन्दानुभवसम्पत्तौ न ससारविरह इति भाव । हरिवदिति । खरूपानन्दो यो मगवतानुभूयते स एवानेनेति भाव ॥ १३ ॥ ननु गुणमाननिष्ठया कुत एव करोतीत्याशङ्कायामाहु । तदा भवेद्दयालुत्वमन्यथा क्रूरता मता। याधशङ्कापि नास्त्यत्र तदध्यासोपि सिध्यति ॥१४॥ यदि गुणमाननिष्ठयैव न कुर्यात्तदा क्रूरता मता । दयालुत्व न स्यात् । तथा च निरोधलक्षणम् । निसर्गदयालु भगवत्स्वरूपं कथमन्यथा भवेदित्यन्यथा क्रूरतेत्यस्यार्थः । इत्थं च सर्वतो बलवती ह्यन्यथानुपपत्तिरितियुक्तिरुक्तेति भावः । एवं ज्ञानमार्गोपास्सेऽव्यक्ते मनो- योजनेन यत्फलं जायते तदन्न गुणमात्रे मनोयोजनेनेति ध्येयम् । निःप्रत्यूहमित्यत्राहुः याधेति । देशकालादिसापेक्षसाधनसाध्यफले हि कालादिकृतप्रतिबन्धशङ्का स्यादयं तु भगवदनुग्रहातिरिक्तसर्वसाधनरहित इति न तच्छतेति भावः । ब्रह्मेत्यत्राहुः तदिति । तद्ध्यासोऽक्षरात्मता । यद्यपि नेयमिष्टा तथापि गुणगानेन संसारावेशनाशे सति खस्वरूपस्फूर्तिरनाशास्समानापि निसर्गादेव जायते, यतो जीवस्य मूलमक्षरं ब्रह्मेति ध्येयम् । तथा चोक्त सिद्धान्तमुक्तावल्या विवृती ब्रह्मयोधनमित्यस व्याख्यायां तथापि वस्तुखभावाद्भवत इति ॥१४॥ रूपेत्यत्राहुः । भगवद्धर्मसामाद्विरागो विषये स्थिरः। गुणैर्हरिसुखस्पर्शान्न दुःखं भाति कर्हि चित् ॥ १५ ॥ ज्ञानमार्गे 'मानास्पर्शास्त्वि'तिवाक्येन यत्नपूर्वकमनित्यत्वादिभावनेन पलान्निर्वेदः, अतोऽस्थिरश्च भवति, प्रकृते तु तन्मनस्कत्वादिसिद्ध्यानवरतमानन्दमात्रकरपादमुखो- दरत्वादिभगवद्धर्मस्फूर्त्या सर्वत्र मनश्चक्षुरादीनां रागात् प्रवृत्तेः कदर्येषु विपयेषु जायमानो विरागः स्थिर एव भवतीत्यर्थः । अविदितेत्यत्राहुः गुणैरिति । सर्वदुःखहर्तु-. येत्सुखं तस्स स्पर्शादीपत्सम्बन्धमानादित्यर्थः । तथा च सर्वाशेन तदनुभवस भगवतो विजातीयवपु-सम्पादनेन करिप्यमाणत्यादन स्पर्शमात्रमेवोक्तमिति ध्येयम् ॥ १५ ॥ उपसंहरन्ति । एवं ज्ञात्वा ज्ञानमार्गादुत्को हरिचर्णने। अमत्सरैरलुब्धैश्च वर्णनीयाः सदा गुणाः ॥ १६ ॥ उत्कर्षों गुणेति पाठे ज्ञानमार्गाद्गुणवर्णने उत्कर्षोऽस्ति एवं ज्ञात्वेत्यन्वयः । अमत्सरैरिति । एतन्मार्गीयभगवद्भक्तेपु द्वेपरहितैस्तेपामनवरतमेतद्भावावेशेन मावात्मक- भगवदात्मकत्वात् स द्वेषो भगवसर्यवसायी भवतीत्याशयः । अलुन्धैरिति । स्वस्सैवं- विधमगवदीयत्वख्यापनेनोदरदरीमपूर्यद्भिरित्यर्थः ॥ १६ ॥ प्रासतिकमुक्त्वा प्रस्तुतमिन्द्रिययोजनप्रकारगाहुः । हरिमुर्तिः सदा ध्येया संकल्पादपि तत्र हि । दर्शन स्पर्शनं स्वष्टं तथा कृतिगती सदा ॥ १७ ॥ अपर्ण फीर्तनं स्पष्टं पुने कृष्णप्रिये रतिः । पायोमलांशत्यागेन शेपमा तनौ नयेत् ॥१८॥ १ मगर उभरेपरहिल रिति पाठ । पे पाड.। ३ शेषभापमिलपि पाटा।

७ - श्रीगोपेशविरचितविवृतिसमेवम् । मुख्यं तु विजातीयवपुःसाध्यमिति तदसम्भवात् सपादपि दर्शनादि सर्व भावयेदित्यर्थः । अनाक्षण्वतां फल'मित्येतदमाख्यायां 'भगवता सह संलापो दर्शनं मिलितस्स च । आक्षेपः सेवनं चापि स्पर्शश्चापि तथाविधः ।। अधरामृतपानं च भोगो रोमोद्गमस्तथा । तत्कृजितानां श्रवणमाप्राणं चापि सर्वतः ॥ तदन्तिकगतिनित्यमेवं तद्भावनं सदे'त्येतत्सर्वमनुसन्धेयम् । स्पर्शनं स्पष्टमिति पाठे अत्रैव लोके प्रकटमाधि- दैविकमुत्तमं 'कामाख्यं सुखमुत्कृष्टं कृष्णो भुंक्ते न चापर' इत्यनुसन्धेयम् । पुत्र इति । सकल्पाजातत्वात् सङ्कल्पस पुरे कामे इत्यर्थः । अत एव 'भगवानपी तिश्लोकविवरणे 'कामपितामहं मन उत्पादितवा'नित्यनेन कामपितामहत्वमुक्तं मनस इति ध्येयम् । नन्वत्र काम आपामरप्रसिद्धो ग्राह्योऽन्यो वेत्याशझायामाहुः कृष्ण इति । अलौकिक इत्यर्थः । उक्तं 'चात्मारामोऽप्यरीरम'दित्येतद्व्याख्यायां ‘किया सर्वापि सैवान परं कामो न विद्यत' इति श्रीमदाचार्यचरणैरिति ध्येयम् । रतिरिति । अलौकिकं तमुद्भाष्य स्पर्श- विशेपो भावनीय इत्यर्थः । नन्विन्द्रियेषु पायोरपि सत्त्वात् तस्य का गतिरित्याशङ्काया- माहुः पायोरिति । मलांशत्यागमात्रैकप्रयोजनकस्योपरोधजदुःखनिवर्तकस्य सुखाजन- कस्यास्य शेषभावं गौणत्वं प्रापयेदित्यर्थः । तथा चाकिश्चित्करत्वाद्यर्थमेवेति भावः । वायुमिति पाठे अजामरण्यं नयतीतिवत् स्पष्ट एवान्वयः ॥ १७ ॥१८॥ तर्हि स्त्रीपुमवयवविशेषयोः का गतिरित्याशङ्कायामाहुः । यस्य वा भगवत्कार्यं यदा स्पष्टं न दृश्यते । तदा विनिग्रहस्तस्य कर्तव्य इति निश्चयः ।। १९ ॥ विनिग्रहस्तिरस्कारोऽवगणनेति यावत् । तथा च यथास्थ्यादीनि मलानि च तथानुपयोगात् पुमवयव विशेष इति तस्य निग्रह इति भावः । वेति पिकल्पादेकसास्तूप- योग इति ध्येयम् ॥ १९ ॥ एवं निरोधमुक्त्वा खानुपदिशन्ति । नातः परतरो मन्त्रो नातः परतरः स्तवः। नातः परतरा विद्या तीर्थ नातः परात्परम् ॥ २० ॥ मनो मननीयो नितरां गोपनीयश्च । स्तवो भगवत्प्रसादहेतुः । विद्या काम्य- मानयावदर्थसाधनम् । तीर्थ प्रतिबन्धकीभूतदुरितनिचयनिरसनपूर्वकं तत्प्राप्तिसम्पादक- भागधयोद्बोधकमित्यर्थः ॥ २० ॥ इतिश्रीविठ्ठलेश्वरमभुचरणात्मजनीघनश्यामतनयश्रीगोपेशगोस्वामि- विरचिता निरोधलक्षणविकृतिः समाप्ता ।।

श्रीरप्णाय नम । श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः । श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः। निरोधलक्षणम् । श्रीविठ्ठलेशात्मजश्रीवल्लभकृतनिरोधलक्षणविवृतिसमेतम् । देयासु प्रार्थित मधमनुरूपफलद्वयम् । व्यासेन च समासेन फलनययुता खयम् ॥ १॥ निरोधलक्षणमिति ग्रन्थनाम । निरोधस्य लक्षण लक्ष्यत अनेन ताशमिति करण व्युत्पतिरन । तथा च लक्षणनिरूपणेन निरोधजापकमित्यर्थ । तर लक्षण द्विविधम् , स्वरूपलक्षण कार्यलक्षण चेति । तन स्वरूपलक्षण यथा 'सत्य ज्ञानमनन्त ब्रह्मेति । कार्यलक्षण यथा 'ज-माद्यस्य यत' इति । तन स्वरूपलक्षण दशमस्कन्धे पहुधा निरू- पितमिति कार्यलक्षणान्यवोच्यन्ते यचेत्यादिना । यच दुवं यशोदाया नन्दादीनां च गोकुले । गोपिकानां तु यद् दुखं तद् दु ख स्यान्मम कचित् ॥ १ ॥ नन्दादीनां घेत्यनादिपदेन उपनन्दादय । चकारेण अन्तरङ्गगोपा । तथा च यशोदाया नन्दस्य उपनन्दादीनामन्तरङ्गगोपाना च यदुवं येन पूर्वोक्तनयाणा दिवा वनगमने भगवचिन्तनमन्तरङ्गगोपाना च रानौ गुणगान तद्दु सम् । चकारात् पूर्वोक्ताना चतुर्णा सुख लीलानुभवरूप निरोधलक्षण भगवदासक्तिकार्यमित्यर्थ । गोपकृतगुण गानस्यासक्तिकार्यत्वमष्टादशाध्यायकारिकासु स्फुटम् । अन्येपु लक्षणेप्यन्यस्यानधिकारात् स्वपरत्वेनर तानि निरूपयन्ति गोपिकानां त्विति । 'निन्युर्दु सेन वासरा निल्सनोक्त दु स च निरोधकार्यम् । इद तु क्वचिन्मम स्यात् , अन्यस्य तु सर्वथा दुर्लभमेवेत्यर्थ । अन्यव्यावृत्तये तुशब्द । चकारपक्षे इदमपि दस निरोधकार्यमिति समुच्चय ॥१॥ मुरारूप निरोधलक्षणमा गोकुले इति । गोकुल गोपिकानां च सर्वेषां नजयासिनाम् । यमुग्वं ममभृत् तन्मे भगवान् किं विधास्यति ॥२॥ गोपिकानां चकारेण अन्तर्ग्रहगताना यन्मुस पूर्वदलानुभररूपम् । सचिन- पामिपदेन अन्तरादास्य उच्यन्ते । पुलिगपद परोक्षपादाय । तेपा च यत्सुसमत्यन्त ।

श्रीवल्लभकृतनिरोधलक्षणविवृतिसमेतम् । रङ्गलीलादर्शनरूपं समभूत् तदपि निरोधलक्षणम् । अन्यसायोग्यमतो भगवान् मे कि विधास्सतीत्याशंसेत्यर्थः । अत एव अष्टकान्ते विठ्ठलपदाभिधेये मय्येवेत्येवकार उक्तः ॥२॥ आत्यन्तिकविरहानुगवरूपं मुख्य लक्षणमाहुः उद्धवागमनेति । उद्धवागमने जात उत्सवः सुमहान् यथा । वृन्दावने गोकुले वा तथा मे मनसि फचित् ॥ ३ ॥ उत्सव आत्यन्तिकविरहानुभवरूपः । एतस्य मुख्यफलत्वसिद्धान्तात् सुमहा- नित्युक्तम् । अयमुत्सवो गोपिकानां नन्दादीनां च भ्रमरगीतप्रसङ्गे अध्यायद्वयेनोक्त इति वृन्दावने गोकुले वेत्युक्तम् । अत्र अन्यस्यानधिकार इति मे मनसि स्यादिति उक्तम्। दुर्लभत्वख्यापनाय फचिदिति । एतेषु स्वाशंसाकथनेन पूर्व 'यच' इत्यर्थेनोक्ते दुःखसुसे अन्येनापि भक्तेन मयि सादिति आशास्स इति सूचितम् । तथा च यशोदाया नन्दस्योप- नन्दादीनामन्तरगगोपानां च दुःखसुसानि निरोघलक्षणानि भक्तेन खपरत्वेनाशासानि । गोपिकानां दुःखसुखे, अन्तरगगोपीनां अन्तर्ग्रहगतानामन्तरङ्गदासीनां सुसम् , सर्वेपा- मात्यन्तिकविरहानुमवश्व । इमानि निरोधलक्षणानि स्वरूपतो ज्ञेयानि, न तु खपरत्वे- नाशास्सानि, तत्रानाधिकारादित्युक्तम् । भगवान् कृपया सम्पादयेचेदस्तु, स्वयं नाशास्सा- नीत्यर्थः ॥३॥ स्वपरत्वेन आशास्यस्य पूर्वोक्तस्यापि फलस्य दुर्लभत्वेन चिरकालसाध्यत्वात् तसिद्धिपर्यन्तं फ्लेशाभावायावान्तरं निरोधफलमाहुः महतामिति । महतां कृपया यावद्भगवान दययिष्यति । तावदानन्दसन्दोहः कीर्त्यमानः सुखाय हि ॥४॥ महतामत्रत्यगुरूणां स्वामिनीनां कृपया भगवान् यावद्दययिष्यति पूर्वश्लोकार्थोक्तं फलं सम्पादयिष्यति तायत् कीर्त्यमान आनन्दसन्दोहो भगवान् सुखाय भवति । गुणगान सुखं निरोधस्यावान्तरफलमित्यर्थः ॥ ४॥ मुख्यफलस्य खामिनीकृपासाध्यत्वमुक्त्वा अवान्तरफलमप्यत्र तत्कृपासाध्यमेव ज्ञेयमित्याहुः महतामिति । महतां कृपया यमत्कीर्तनं सुखदं सदा । न तथा लौकिकानां तु लिग्धभोजनरूक्षवत् ॥५॥ लौकिकानां लोके प्रसिद्धानां नारदशुकादीनां कृपया जात कीर्तनम् , तथा स्वामिनीकृपया सजातकीर्तनप्रकारकमुसदं नेत्यर्थः । तत्र हेतुं दृष्टान्तेन स्पष्टयन्ति निन्धे- ति । लिग्घमोजनं रूक्षभोजनं च तद्वदित्यर्थः । स्वामिनीकृपया अन्तर्मगवत्राकट्यात् १ श्रीविठ्ठलेश्वरप्रभुचरणप्रकटितखामिम्मरकोपन्यासोन । २

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निरोधलक्षणम् ।
कीर्तनस्य स्निग्धभोजनतुल्यत्वम् । अन्यत्र तु मानस्सा मूर्तेः कल्पितत्वेन वस्तुतः प्राकट्या-
भावात् कीर्तनस्य रूक्षभोजनतुल्यत्वम् । महतामित्यस्य कीसैमानेनाप्यन्वयः । तत्कृतं
कीर्तनं न वन्येनोपनिबद्धमित्यर्थः । मुख्यफलप्राप्तिपर्यन्तं गुणगानं कर्तव्यमित्युक्तम् ।।५।।
तत्र कर्मणापि तावत्सर्यन्तं क्रममुक्तिप्रकारेण स्वर्गादिसुखावाप्तिसिद्धौ किमर्थ
गुणगानाग्रह इत्याशयाहुः गुणगाने इति ।
गुणगाने सुखावासिर्गाविन्दस्य प्रजायते ।
यथा तथा शुकादीनां नैवात्मनि कुतोऽन्यतः ॥६।।
गोविन्दस्य गुणगाने यत्प्रकारिका सुखावाप्तिस्तत्प्रकारिका सुखावाप्तिः
शुकादीनां सिद्धज्ञानानां तत्रापि आत्मनि आत्मविचारदशायामपि न जायते,
तर्हि अन्यतः कर्मभ्यः कुतः सादित्यर्थः । अत एव 'परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य' इत्यादि
याक्यानि ॥६॥
तत्कृतकीर्तने विशेपमाहुः हिश्यमानानितिद्वयेन ।
क्लिश्यमानान् जनान् दृष्ट्वा कृपायुक्तो यदा भवेत् ।
तदा सर्व सदानन्दं हृदिस्थं निर्गतं वहिः ॥७॥
सदानन्दमयस्यापि कृपानन्दः सुदुर्लभः ।
हृद्गतः स्वगुणान् श्रुत्वा पूर्णः प्लावयते जनान् ॥८॥
सदानन्दं सद्रूप आनन्दो यस्मिन् तादृशं स्वरूपं क्लिश्यमानान् जमान
दृष्ट्वा यदा कृपायुक्तो भवेत् तदा बहिनिर्गतं भवति, स कृपानन्दस्तु सुदुर्लभः।
कर्मणा ज्ञानेन वा न भवति, किन्तु क्लेशेनैव भवति, अतस्तथेत्यर्थः । सदानन्दस बहिर्नि-
गेमनं विवृण्वन्ति हृद्गत इति । तत्तद्धृदिस्थो भगवान् स्वगुणान् अन्योऽन्यं वर्णितान्
श्रुत्वा पूर्णो भवति । इदं द्वात्रिंशाध्यायकारिकायां स्फुटम् । स्वयं पूर्णः सन् जनान्
प्लावयते, स्वरूपानन्दे निममान् करोनि, तेपामन्तर्यहिः खरूपानन्दं प्रकटीकरोति । इदं
सदानन्दस पहिर्निर्गमनमित्यर्थः ॥ ७,८ ।।
सष्टीकर्तुमुपसंहरन्ति तम्मादिति ।
तस्मात् सर्व परित्यज्य निरद्वैः सर्वदा गुणाः ।
सदानन्दपरैगैया: सच्चिदानन्दता ततः ॥९॥
सर्व कर्मज्ञानादिप्रयास परित्यज्य निरुद्धर्भक्तः सह सदानन्दपरैः कर्तृभिः
गुणा गेयाः। एतस्य फलस्य अवान्तरलं साधयन्ति सचिदानन्दसति । ततो गुणगानात्
सचिदानन्दता भयति, थलौकिकशरीपाया परमफले स्वरूपयोग्यता भवतीत्यर्थः ।
स्थत इति पाठे गुणगानस्वभावादेव भवतीत्यर्थः ॥ ९॥

११ श्रीवल्लभक्तनिरोधलक्षणविकृतिसमेतम् । ननु यः सह गुणा गेयास्ते निरुद्धाः कथं ज्ञेया इत्याशा तदमिज्ञापकं कथया- मीत्याहुः अहमिति । अहं निरुतो रोधेन निरोधपदीं गतः । निरुद्धानां तु रोधाय निरोधं वर्णयामि ते ॥१०॥ रोधेन निरोधपूर्वावस्थापनेन भावविशेषेण अहं निगद्धः निरोधस पदयी मार्ग पूर्वोक्तमुख्यफलपर्यन्तं गतः प्राप्तः । अतो गोपिकानां वित्यादिनोतफले इव अमि- ज्ञापककयने मम न प्रयोजनम्, किन्तु अन्यायं कथयामीत्याशयेन कश्चित्सेपकमभिमुखी- कृत्याहुः ते इति । तव निरुद्धानां सम्पन्धि यो रोधस्तदर्थं त्वयि तादृशभावसिद्ध्यर्थ- मित्यर्थः । निरोधं वर्णयामि अभिज्ञापककथनेन कथयामीत्यर्थः ॥ १० ॥ विविच्य कथनाय व्यावानामपि अमिज्ञापकमाहुः । हरिणा ये विनिर्मुक्तास्ते मना भवसागरे । ये निरुद्धास्त एवात्र मोदमायान्त्यहर्निशम् ॥ ११ ॥ सर्वदुःखापि पे विनिर्मुक्तास्ते भवसागरे मना इति व्यावानामभि- ज्ञापकमुक्तम् । निरुद्धानामभिज्ञापकमाहुः ये इति । अत्र गुणगानादौ इत्यर्थः । यथा सर्वज्ञ- त्वमलौकिकं तेजश्च ज्ञाने निदर्शनम्, तथा गुणगानादौ मोदो निरोधे निदर्शनम् । एवं निदर्शनेन निरुद्धान् ज्ञात्वा तैः सह गुणगानं यच' इत्यर्थेनोक्तफलसिद्धिपर्यन्तं कर्तव्यम् । फलप्राप्यनन्तरं तु तत्स्वगावप्राप्तमेव सर्वं भविष्यतीति न तत्र कथनापेक्षेति भावः ॥१३॥ ननु परमदयालुर्मगवान् कथं कांधिजीवान् मुश्चति येन ते भवसागरे मना भवन्तीत्याशय धर्मिग्राहकप्रमाणसिद्धमेतदिति आहुः गुणेवितिसार्धेन । गुणेष्याविष्टचित्तानां सर्वदा मुरवैरिणः । संसारविरहक्लेशौ न स्यातां हरिवत्सुखम् ॥ १२ ॥ तदा भवेदयालुत्वमन्यथा क्रूरता मता। समाधानं तु निवन्धे 'आत्मसप्टेन वैपम्य'मित्यनेनोक्तमत्र ज्ञेयम् । येन संसारक्लेशो भगवद्विरहक्लेशश निवर्तते, हरेरिव सुखं च भवति, तादृशगुणावेशो यदा भवति तदा मगवतो दयालुत्वं भवेत् । एतावत्फलपर्यन्तं प्राप्ता भक्तिमार्गीया एव भवन्तीति भक्तिमार्गीयेषु दयालुत्वं भवतीत्यर्थः । अन्यथा भक्तिमार्गीयत्वामावे भगवतः करता तेपां मोचनम्, येन ते भवसागरे ममा भवन्तीत्यर्थः । फर्ममार्गे पुनरावृत्तिकथनात् संसारे मजनम् । ज्ञानमार्गेपि 'ज्ञानिनामपि चेतांसी' ति वाक्यात् तथा । इदं निबन्धे द्वितीय- प्रकरणान्ते व्यवस्थापितम् । इदं सर्व प्रमाणसिद्धमेवेति मतेत्युक्तम रा२२ ॥

१२
निरोधलक्षणम् ।
ननु ज्ञानमार्गे मायेव अगापि कश्चिद्वाधतेत्याशझ्याहुः ।
वाधशङ्कापि नास्त्यत्र तध्यासोपि सिध्यति ॥१३॥
अन वाधसम्भावनापि नास्तीत्यर्थ । तर हेतु तदध्यासोपीति । माया हि
ससारे अध्याससम्पादनेन मजयति, अन तु भगवदीयत्वेनैव अध्यासो भवतीत्यर्थ ।
गृह सर्वात्मना त्याज्यगिति त्यागपक्षसमुच्चयाय अपिशब्द. ॥ १३ ॥
गुणावेशेन उभयक्केशाभावे हेतुमाहु ।
भगवर्मसामादिरागो विषये स्थिरः ।
गुणैर्हरिसुसस्पर्शान्न दुखं भाति कर्दिचित् ॥ १४ ॥
गीयमाना ये भगवद्धर्मास्तरसामर्थ्यात् विपयवैराग्य भवति, तेन ससारश्लेशाभाव ।
गुणे हरिसुखस्पर्शाद्विरहरूशाभाव इत्यर्थ ॥ १४ ।।
मार्गान्तरेभ्य उत्कर्ष स्फुट कर्तुमुपसहरन्ति एवमिनि ।
एवं ज्ञात्वा ज्ञानमार्गादुत्कर्षी गुणवर्णने ।
अमत्सररलब्धश्च वर्णनीयाः सदा गुणाः ॥१५॥
ननु 'पराशि सा'नीतिवाक्यादिन्द्रियाणामन्यपरत्वस्य साहजिकत्वात् ते. सर्वदा
पिपयभोगे गुणगान क्थ भविष्यतीत्याशङ्कय तदुपायमाहु ।
संसारावेशदृष्टानामिन्द्रियाणां हिताय चै ।
कृष्णस्य सर्ववस्तृनि भृन्न ईशस्य योजयेत् ॥ १६ ॥
एतेपा हिताय भगवत्परतासिद्धये कृष्णस्येशस्य वस्तूनि एतै सह योजयेत् ।
प्रपश्ये ब्रह्मभानना कुर्यादितिसिद्धान्तमुक्तावल्युक्तोर्थीनुसन्धातव्य. । भूम्नेति चतुर्थी ।
भूमा सर्वात्मगानम्तदर्थमित्यर्थ । भगवदीयैरेव वस्तुभि सर्वव्यवहारसिद्धौ सर्वोप्यात्मनो
भागो भगति मिटरे भवनीत्यर्थ ॥१६॥
भगनदीयवस्तूनामिन्द्रिय सह योजनेन सिद्ध भूगान निवृण्वन्ति हरिमूर्तिरिति ।
हरिमृतिः सदा ध्येया संकर पादपि तत्र हि ।
दर्शनं स्पर्शनं टेष्ट तथा कृतिगती सदा ॥१७॥
श्रयण कीर्तनं स्पष्टं पुने कृष्णप्रिये रतिः।
पायोमलांगत्यागेन शेपभागं तनौ नयेत् ॥ १८॥
पर या भगवत्कार्य यदा स्पष्टं न दृश्यते।
तदा यिनिग्रहस्तम्य कर्तव्य इति निश्चय ॥१९॥
नातः परतरो मत्रो नातः परतरः स्तष ।
नात. परतरा विचा तीर्थ नात. परात्परम् ॥ २० ॥

१३ श्रीवल्भरतनिरोघरक्षणविवृतिसमेतम् । आवचरणेन मनसो भाव उक्तः । इन्द्रियाणामाहुः सङ्कल्पादपीति । दर्शनसर्शन- कृतिगतिश्रवणकीर्तनानि चक्षुस्त्वक्पाणिपादश्रोत्रवारकार्याणि सङ्कल्पादपि तन भगव- सेन सम्पादनीयानि । भगवद्विपयकाण्येव दर्शनादीनि सङ्कल्पनीयानि, न तु विपयविषय- काणीत्यर्थः । मुख्यतस्तु भगवद्विपयकाणि तानि कर्तव्यानि । तदसम्भवे सङ्कल्पमात्रमपि कर्तव्यमिति सङ्कल्पस्य ततो गौणत्वसूचनाय अपिशब्दः । भगवद्धर्मसामर्थ्य सिद्धवैराग्य- सरूपं तेन साध्यं फलं च पदन्तः पायोर्विनियोगमाहुः पुत्रेति । कृष्णप्रिये पुत्रे रतिः की, पायोर्मलत्याजकेन्द्रियाद्धेतोर्मलांशस्य प्राकृतभावस्य त्यागेन शेपभागं अलौकिकत्वं तनी नयेत्प्रापयेदित्यन्वयः । मलत्यागस्य पायुकार्यत्वात् पायुग्रहणम् । अत एवा सिरक्षोः पुर. पुर्या नाभिद्वारमपानत' इति देहत्यागस्य अपानकार्यत्वमुक्तम् । अपानं इन्द्रियमिति उत्तरपान पायुश्चत्येकमेव । कृष्णप्रिय इति । भगवदीयेषु रागो अन्यन निराग इति लक्षण वैराग्यस्वरूपमुक्तम् । कृष्ण. प्रियो यम्य तादृशे भगवदीये । तथा च भगवदी. यवन राग इत्यर्थः । पुत्रपदमुपलक्षणम् । भार्यादिष्वप्येवम् । 'नापुनस्स लोकोस्ती'सादि- पायैः पुत्रे रागस्य प्रमाणसिद्धत्वेन कर्तव्यत्वशझ्या पुत्रपदम् । अन्यत्र आत्मन एव निस्पपिस्नेतिपयत्वात् पुत्रस्य च 'आत्मा वै पुत्रनामासी'त्यादिवाक्यरात्मत्वकथनात् तर राग उक्तः । अन तु भगवत एव निरुपधिस्लैहरिषयत्नाद्भगवदीये एव रागोन्यत्र राग इति भावः । मल द्विविधम् , प्रतिजन्मनि जायमान देहरूपमेकम् , प्रत्यहं जायमा- नमपरम् , उभयविधमलनिवृत्तेः पायुकार्यत्वादेककथने द्वितीयमप्युक्त जातमिति ज्ञेयम् । प्राणरसनोपस्थाना विनियोगमाहु. यस्य वेति । अन्येषां भगवति विनियोगसङ्कल्पो विषय- भोगसइल्पनिग्रहश्योक्तः । एतेपामधुना भगवति विनियोगसङ्कल्पासम्भवात् निग्रहमात्र कर्तव्यम् । एतैपियभोगो न सङ्कल्पनीय इत्यर्थः । वाशब्दोऽनादरे। यस्य एव इन्द्रियस्स कार्य भगवत्सम्यन्धि गदा यस्मिन् काले स्पष्टं न दृश्यते तदा तस्मिन् काले तस्ये- न्द्रियस्य विनिग्रहः कर्नव्यः । तदिन्द्रिय विषयान्तरे न प्रवर्तनीयम् , पतिमतावत्तूष्णीं स्पेयमित्यर्थः ॥ १७,१८,१९,२० ॥ खीयेपु कृपयोक्तस्य ग्रन्थस्यास्य महात्मभिः । वदनानलदासोक्ता व्याकृतिः पूर्णतामगात् ॥१॥ इतिश्रीविठ्ठलेशात्मजश्रीवाभकृता निरोधलक्षणविवृतिः सम्पूर्णा ॥

श्रीकृष्णाय नमः। निरोधलक्षणम् । श्रीहरिरायकृतनिरोधलक्षणविवृतिसमेतम् । नमामि श्रीमदाचार्याननल्पकरुणायुतान् । निरोधफलदानाय प्रभुणा प्रकटीकृतान् ॥ १॥ यदीयचरणाम्भोजं वरण मूतिमत्प्रभोः । तत्कृपातः करिष्येह निरोधविवृति मुदा ॥२॥ तदाविर्भावितश्रीमत्प्रभुसवारसात्मकः । अस्मत्प्रभुः कृपयतु प्रियः श्रीविठ्ठलेश्वरः ॥ ३ ॥ वन्दे पितृपदाम्भोज श्रीमदाचार्यमश्रितः । यतोऽहमभव सर्वसाधनाभाववानपि ॥ ४ ।। अथोपोद्वाततया इदं विचार्यते, को निरोधः? किञ्च तस्य कारणम् ? कथ वा तस्य फलत्वमिति । तनोच्यते । प्रपञ्चविस्मृतिसहिता आसक्तिनिरोध इति । न च आमक्तिमान स इति वाच्यम् । विपयासक्तौ व्यभिचारात् । न च तर प्रपञ्चविस्मृति , किन्तु विशेषतः तदभिनिवेश एव । न चासक्तिनिषयातिरिक्तप्रपञ्चविस्मृतेरुभयसाधारण्येन अतिव्याप्तिरिति वाच्यम् । प्रपञ्चशब्दस्य नसामान्याभिप्रायत्वात् । न च लौकिकास- क्तिविषयो न प्रपञ्च. इति वाच्यम्, तद्रपस्य तादृशशक्त्यैवोत्पादकत्वात् । न च प्रपञ्चमानास्मरण आसक्तेनिर्विषयत्तापात इति वाच्यम् । प्रपश्चातीतम्य तद्विपय- त्वात् । न च तद्विपयस्य तदतीतत्वे प्रापश्चिफजीवासक्तिविपयत्व न स्यादिति वाच्यम् । योगजधर्मप्रत्यासत्या अतीन्द्रियार्थस्य इस भक्त्या प्रपञ्चातीतस्य विषयलोपपत्तेः । किश्य, श्रुतानुरार्गस्थले लोकेऽपि अतीन्द्रियार्थस्य तद्विपयत्वमस्ति एव । अत एव कल्पतरुकाम- धेन्वादिमाहात्म्यश्रवणेन दृश्यते अखिलाना लोकानाममिलापः । वस्तुतस्तु प्रपश्चातीतम्य अपि ऐन्द्रियकत्वमेव, चक्षुरवेद्यत्वेऽपि श्रयणवेद्यत्वात् । 'कश्चिद् धीर' इति श्रुते'दिव्य ददामि ते चक्षुः' 'तस्मिन् दृष्टे परारे' 'पश्यन्ति ते मे' 'त एव पश्यन्ति' इत्यादि- स्मृतिभ्यश्च विशिष्टचक्षुर्वेद्यत्वाच । ननु लक्षणे प्रपश्यत्याग एव कुनो न निरोपविशेषण- तयोच्यत इति चेत् । न । तम्य ज्ञानमागीयमोक्षसाधनत्वेन अन अनुपयोगात् । अन तु भजनान्यथानुपपत्त्या ममतापरावर्तनस्यैर त्यागपदार्थत्वेन तम्स तद्विस्मृतिमानपर्ययमि- तत्वात् । अत एव 'वन्माययात्मात्मजदारगेहेप्यासक्तचित्तस्य' इति वृतरचः । उक्त च प्रभुभि. श्रीभागवतार्थतत्वदीपे 'ग्रसभावात् तु गताना गृहमेव निशिष्यत' इति । तस्मात् तद्विस्मृतिमानमेनपान मृग्यनिति । जत एए मरताचार्योप्याह तलक्षण 'या तु व्यसन- सम्वामिनिरोध म तु कथ्या' इसी । व्यसन च प्रपयनिस्मृनिर्विका आसक्तिरेय । अत चिन्ता प्रातसिमामुपासान विदुयुधा । २धुतातुरागस्येतिपाट ।

श्रीहरिरायपृतनिरोधलक्षणविवृतिसमेतम् । एव क्षणमपि तत्र तेन विना स्थातुमशक्तिः । अंशतोप्यन्यस्मरणे क्षणं तेन निर्वाहात् । अत एव प्रोचुः परमदुर्लभत्वमेव वदन्तः श्रीमदाचार्याः भक्तिवर्धिन्यां 'यदा स्याट्यसनं कृष्णे कृतार्थः स्यात् तदैव हि' इति । विशेपेण असनं क्षेपणं सर्वस यस्मादितिव्युत्प. त्यापि तस्य भावस्स प्रपञ्चविस्मृतिरूपत्वमेव मिध्यति । स च निरोधो द्विविधः । भागवतोऽन्यश्च । अत एवोत्तमाचार्यः 'निरोधो यदि भक्तानां खस्मिन् स्वम्य च तेषु हि, तदोभयसुसम्बन्धात् दृढो भवति नान्यथेति । तन आयो भगवतः प्रपश्यविस्मृतिपूर्वकभक्तविपयकामक्तिरिति । 'निरोधोऽस्सानुशयनमा- त्मनः सह शक्तिभिरितिवचनात् । अम्येति पछया भेदेन निर्देशात् । 'निरोधोऽस्यानु- शयनं प्रपञ्चे क्रीडनं हरे रित्याचार्यचरणैर्विवृतत्याच । लीलारूपेषु सर्गादिपु परिगणि- तत्वाच । स च गोपीभिः स्तोभित' इत्यादिना निरूपितः । नन्या लक्षणमिदमनुपपन्नम् , भक्तानां प्रापश्चिकत्वेन भगवतम्तद्विपयकासक्ती प्रपञ्चविस्मरणाभावादिति चेत्, उच्यते । अवधारितं च तेषु त्वया प्रापचिकत्वं केन प्रमाणेन ? न तावत् प्रत्यक्षम् , तेषां लीलासृष्टयतिरिक्तजनप्रत्यक्षागोचरत्वात् । भक्तविशेष- प्रत्यक्षस्याप्रापचिकतानुकूलत्वात् । 'सदा पश्यन्ति सूरय' इति श्रुतेः, 'यद्धि पश्यन्ति मुनयः' 'ते एव पश्यन्ति' 'पश्यन्ति ते मे' इत्यादिवाक्यैः । एतत्प्रपञ्चान्त पाते भक्तानां सगुणग्विपयताया अनिवार्यत्वात् । अत एवाप्रापचिकत्वं बोधयन् निजैश्वर्यस्य 'दिव्यं ददामि ते चक्षुरिति प्रभुरुक्तवान् । नाप्यनुमितिः, अनुकूलतर्कामावात् । न च दृश्यत्वा- देरनुकूलतर्कत्वमिति वाच्यम्, दृश्यत्वस्य प्रागुक्तप्रकारैर्व्यवस्थापितत्वात् । शब्दस्तु 'जयति जननिवासः', 'तद्विष्णोः परमं पदम्', 'मनिष्ठं निर्गुणं स्मृतम्', 'तं भजन् निर्गुणो भवेत् ', 'मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात् ', 'मुक्ता अपि लीलाविग्रहं कृत्वा भजन्त' इत्यादिवाक्यैरनुकूल एव इति नानुपपन्न किश्चित् । ननु अस्तु भक्तानां तथात्वम्, तथापि भगवतोप्रतिहतज्ञानशक्तेः प्रपञ्चविस्मरणं कथमुपपाद्यत इति चेत्, इत्थम् । भगवान् हि पुष्टिमार्गे अङ्गीकुर्वन् स्वधर्मानपि त्यजति, विपरीतांश्च विदधाति । 'आत्मारामोऽप्यरीरमत् ', 'आत्मारामोऽप्यस- ण्डितः', 'ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्', 'न पारयेह'मित्यादिवाक्यैः। एवं सति यत्र निरोधं चिकीर्षुर्मवति प्रभुः, तत्र तदनुकूलखखरूपमपि सम्पादयतीति तदर्थमज्ञत्वमपि युक्ततरम् । विविधानन्तशक्तिमत्त्वेन तत्र सर्वोपपत्तेः । न च विरोधादज्ञत्वे सर्वज्ञत्वमनुपपन्नमिति वाच्यम् । विरुद्धविविधधर्माधारत्वस्य भगवति तदेजति तन्नैजति' इत्यादिश्रुतिसिद्धत्वात् । एतच्च यथा तथा अस्मत्स्यामिभिर्निरूपितं विद्वन्मण्डने । नच अज्ञवस्य अविद्याजन्यत्वनियमेन भगवति तदभावात् तथात्वमसम्भवीति याच्यम् । अवियाया अपि 'श्रिया पुष्टये तिवाक्यात् तच्छक्तित्वेन तदधीनत्वात् । न च 'बन्धोस्सा- विद्यया अनादि'रिति वाक्यादविद्याश्रयत्वे तया घन्धसम्भव इति वाच्यम् । तस्यास्पति- निरोधलक्षणम् । पदेन जीवविषयत्वस्य वाक्ये एवोक्तत्वात् । अत एव श्रीमदाचार्यनिरूपितं निबन्धे, 'विधाविये हरेः शक्ती माययैव विनिर्मिते, ते जीवस्यैव नान्यस्य दुःखित्वं चाप्यनीशतेति । तं च धर्म प्रभुः पुष्टिमार्ग एव आविर्भावयतीति 'मदन्यत्ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपी तिवचनादवसीयते । अत एव निरूपितं केनचित् भगवत्खरूपतत्त्वाभिज्ञेन 'संमुष्णन्' इत्यादि । तदेतत् सर्वमाचा यथार्भकः स्वप्रतिविम्बविभ्रम' इत्यत्र निरूपित- मिति सहृदयैस्तत एव विभावनीयम् । अथ किं तस्स कारणमिति चिन्त्यते । न तावनिरोधो लोक इव वासनया जन्यत इति वक्तुं शक्यम् । तस्या अनुभवजन्यत्वात् । भगवतश्च साक्षात्कारात् प्राक् लौकिक- विषयविषयीन्द्रियाविषयत्वेन अननुभवात् । साक्षात्कारे तु दिव्यदृष्टिदानेन तथात्वसम्भ- वात् । 'दिव्यं ददामि ते चक्षुरिति वाक्यात् , 'कश्चित् धीर' इतिश्रुतेश्च । नापि भक्तिः, सा हि द्विधा, मर्यादापुष्टिभेदेन, तत्र न तावदाया, तस्या भक्त्या त्वनन्यया,' 'विशते वदनन्तरम्,' 'ज्ञानयोगश्च मन्निष्ठो नैर्गुण्यो भक्तिलक्षणः, द्वयोरप्येक एवार्थों भगवच्छब्द- लक्षण' इत्यादिवाक्यैः सायुज्यमुक्तिफलकलेन निरोधाजनकत्वात् । ननु भत्त्या सक्षातया भत्तये त्यादिवाक्यैर्मर्यादाभक्तेः पुष्टिभक्तिफलकत्वेन तस्याश्च निरोधसाधकतया कथं न परम्परयैतस्या अपि तजनकत्वमिति चेत् , न, पुष्टिभक्तेरपि तजनकत्वस्य विचार्यत्वेन मर्या- दायामप्रसक्तेः । न हि सापि साक्षानिरोधं साधयति, किन्तु भगवतः साक्षात् तत्साधनत्वे निमित्तमात्रं सा । अन्यथा 'कृष्णेन चोद्धृता' इतिवाक्यं विरुध्येत । न हि निरोधः कदाचिदपि स्वकृतसाधनैः सिध्यति । अत एवोक्तमाचार्यः 'आसक्तिः प्रेमपूर्वव प्रेमापि हरिणा कृत'मिति । अत एव मजसीमन्तिनीष्वेव निरोधः सिद्धः, नान्येपु, भगवता तत्रैव तया सम्पादितत्वात् । अत एव श्रीमदाचार्यभक्तिवर्षिन्यां 'यदा स्यान्यसनं कृष्णे कृतार्थः सात् तदैव ही ति दुर्लभत्वमेवोक्तम् । तर्हि किमाकस्मिकतैवेति चेत्, न, स्वरूपस्सैवानुग्रह विशेपसहकृतस्य हेतुत्वात् । तद्विशेपश्च सर्वात्मभावसाध्यफलदानेच्छैवेति सद्धेपः । यद्यपि भावनागुणगानादेः साधनता श्रूयते, तथापि फलस्स निःसाधनलभाभिया योगक्षेम- साधारणं साप्यत्वमादाय सा वक्तव्येति भावः । अप कयं तम्य फललमिति चिन्यते । सुखदुःखामावान्यतरत्वाभावात् । प्रत्युतासक्के खविपयाप्राप्त्या दुःखसहफ़्तत्वायेति । अयमर्थः । निरोधो हि प्रपथ- विस्मृतिसहिना आसक्तिः, सा च स्वविषयविपयकविविधमनोरयजनको भावः, तस च रसरूपत्वेन सुखरूपत्वात् । 'रसं हि एवायं लब्ध्या आनन्दीमवती'ति श्रुतेः । प्रपत्र- विस्मृतिरूपत्वेन प्रापयिकदुःखामावरूपत्वाय । किय, फलं पुरुषार्थः, तत्त्वं च तेन पचितयेप्यमाणत्वम् । तथा च आसक्तिमध्यपतितदुःखसापि आकाहपीयत्वेन तथा- १ पुरुषोत्तमसापुरपति पाउः।

श्रीहरिरायकृतनिरोधलक्षणवितिसमेतम् । लम् । 'विपदः सन्तु ताः शश्वत्' इतिवाक्यात् । अन्यथा श्येनादावपि तजन्यनरकस्य तदुभयरूपत्वाभावेन फलत्रं न स्यात् । गनु शत्रुविपत्तिरेव तत्र फलम् , न नरक इति चेत्, न । 'भूयान् मे नरकोऽपि शत्रुर्विपद्यतामि'तिधिया श्येनकरणात् । सुखसाधनं तदिति चेत्, तदा प्रकृतेऽपि दीयतां दृष्टिः । न च सुसम्रगात् प्रवृत्तिरिति वाच्यम् । नरके सुखभ्रमायोगात् । तस्मात् पुरुषार्थस्यैव फलत्वेन दुःससम्मिन्नस्सापि निरोधस्य फलत्वमिति । वस्तुतस्तु दुःसमेव न, किन्तु रसान्तर्गतखेन प्रभुप्राकट्य- साक्षाद्धेतुतया परमानन्द एव । अत एव श्रीशुकैर्दिवा वियोगदुःखानुभवसमयेपि 'रेमिरे हःसु तचिता' इत्युक्तम् । श्रीमदाचारग्यभिहित मतो निरोधो महाफल' इति । तस्मा- निरोधः सकलफलमूर्धन्यं फलमिति सिद्धम् । ननु कथमत्र निरोधस्य दशमार्थस्य परमफलत्वसिद्धिः । तदुत्तरवर्तिस्कन्धद्वयप्रति- पाद्यलीलाद्वयरूपमुक्त्याश्रययोरन्यतरस्याश्रयस्यैव वा तथात्वोत्यौचित्यादिति चेत्, न । मुक्त्याश्रययोरेतदुपयोगित्वेन स्कन्धद्वयेन प्रतिपादनात् । तथाहि । निरोधे चास्ति प्रकार- द्वयम् , सगुणनिर्गुणभेदेन, निर्गुणे त्वन्यैव व्यवस्था । सगुणे तु निरुद्धभक्तदेहस्य भौतिक- तया निवर्तनीयत्वेन भक्तिमार्गप्रकारेण निवर्त्य देहमलौकिकं लीलोपयोगिनं सम्पाद्य स्वान्तः- स्थापयित्वा ततो लीलेच्छायां स्तस्थानाद्विमोचयति, पुनः तदुपरतौ वाश्रितानेव करोतीति लीलाद्वयं सगुणनिरोधोपयोगित्वेन निरूपितमिति न परमफलत्यसिद्धिविरोध इत्यर्थः । अतःपरं निरोधरूपपरमफलं निरूपयन्तः तत्साधनं साक्षात्परम्पराभेदेन गौणमुख्य- भेदेन वा निरूपयितुं तन्निमित्तकारणभूतयोर्भावभावनगुणगानयोर्मध्ये प्रथमं श्लोकत्रयेण मुख्यं भावभावनं दुर्लभवयोधाय स्खविपयवतयैव प्रार्थनारूपेण निरूपयन्ति यच दुःख- मिति । निरोथे हि साधनद्वयम् , तद्भावभावनं गुणगानं वा । तत्र भावनीयभावश्च सर्वात्म- भावेन निरुद्धानां सुखदुःखात्मको, 'विकलत्वं तथास्वास्थ्य'मिति याक्यात् । तथा च तद्भावनं साधनं निरूपयितुं प्रपश्यविस्मृतिसम्पादकतया अभ्यर्हितं प्रथम भावप्रथमांश दुःखं प्रार्थयन्ते यच्च दुःख मिति । यच दुःखं यशोदाया नन्दादीनां च गोकुले । गोपिकानां तु यद् दुःखं तद् दुःखं स्यान्मम कचित् ॥१॥ यदिति प्रसिद्ध श्रीभागवतादौ परमार्तिरूपं प्रभुप्राकट्यकारणं युगपदनुभूताखिल- लीलानुभावकं लोकविलक्षणं प्रमुखरूपात्मक वस्तुतः फलरूपं चकारात् तत्संवलित- सुखशवलितमपि दुःखं यशोदाया अशास्त्रीयभक्तायाः सर्वथा दयाधिकरणभूतायाः यावद्भाववद्धृदयदेशाधिष्ठितस्थायिभावोत्पत्तिनिमित्तभूतायाः, तथा नन्दादीनां श्रीनन्द- प्रभृतीनामखिलव्रजवासिनां चकारात् तत्सम्बन्धिनामन्येपामपि यद्गुःखं भगवता परमफल- दिसुना दत्तं येनैवं कथनं 'मनसो वृत्तयो नः स्युः कृष्णपादाम्बुजाश्रया' इत्यादि, तदपि - ३

१८
निरोधलक्षणम् ।
गोकुले सर्वथा निरोधस्याने स्थानस्थितानामेव सम्पादितं दुःखं मम फचिदपि स्यादित्य-
ग्रिमेण सम्बन्धः । एवं श्रीयशोदानन्दादिदुःसं भगवतो दानक्रमेण प्रार्थयित्वा अतिदुरापं
गोपिकादुःसं प्रार्थयन्ते गोपिकानां त्विति । तुशब्दः पूर्वस्मादोत्कट्यवैलक्षण्यादि-
योधकः । गोपिकानां ब्रजसीमन्तिनीनामात्मत्वमक्तवश्यत्वादिभिर्धर्मः सर्वथा निरुद्धानां
यत्स्वरूपात्मकं रसात्मकतया प्रसिद्धं श्रीमागवतादी, घस्तुतो भावांशमूततयानन्दरूपं
तहःग्वं मम कचिदपि देहेन्द्रियप्राणान्तःकरणेषु स्यादिति अमिलाप इत्यर्थः । ननु
ब्रजवासिनो हि सर्वपि सर्वथा सर्वात्मभावेन भगवन्तमानन्दनिधि प्राप्ताः परमानन्दसमुद्र-
निमग्ना दुःखलेशसम्भावनारहिताः स्वाश्रितशोकनिरसनसमर्थाः आनन्दसृष्टिसमुत्पन्नाः,
तदुःखप्रार्थनमसम्भावितमिव भातीति चेदुच्यते। 'रसो वै स' इतिश्रुत्या मगवान् रसात्मक
इत्यविवादम् । स च स्वशास्त्रसिद्धप्रकारक एव तया भवतीति प्रभोरपि तथा मन्तव्यं
रूपमकामेनापि त्वया । तथा च पूर्वरसरीत्या सरूपानन्ददानं 'आत्मना प्रथमा लीले'
त्याधुक्तप्रकारेण पञ्चधा देहेन्द्रियप्राणान्तःकरणादिपु जायत इति तेपामतिव्यक्ततया
तनिष्ठस्वरूपानन्दस्यापि व्यक्तत्वेन पश्यतां तत्र सुखत्वव्यवहारः, यत्रोत्तररीत्या रसदानं
तन्मनस्येवेति तम्याच्यक्ततया तनिष्ठवरूपानन्दस्वापि तथालेन पहिःप्राकट्याभावात् तत्र
दुःखत्वव्यवहार इति तमादाय दुःखमित्युक्तम् । वस्तुतस्तु स महानानन्द इति दशम-
स्कन्धविवृतावसकृदभिहितमिति सहृदयैः तत एव विभावनीय मिति दिया ।। १ ।।
एवं भावना) भावप्रथमांशं दुःखं प्रार्थयित्वा श्रीयशोदानन्दादिसुखप्रार्थनस्स रास-
स्त्रीभावपूरितविग्रहत्वेन स्वस्यायोग्यतया तदप्रार्य गोपिकानामेव सुखं भावोत्तरांशभूत
प्रार्थयन्ते गोकुले गोपिकानामिति ।
गोकुले गोपिकानां तु सर्वपां व्रजवासिनाम् ।
यत्सुखं समभूत् तन्मे भगवान् कि विधास्यति ॥२॥
भगवतो हि स्थानद्वये गोपिकासम्बन्धिनी लीला, सैव ताभिर्विरहे सर्वदा अनु-
भूयते सड़ेनेव च तत्र सुखमिति । तत्र प्रथमं गोकुले भगवतो लीलाभिर्वत्सपुच्छाव-
लम्बनहैयङ्गवस्तेयनृत्यगीतपीठकानयनादिभिर्गोपिकानां सर्वथा परिगृहीतानां चकारात्
तद्वारकमन्येपां गोपादीनां शय्यास्तरणस्थलसमीकरणादिभिरसकोचेन सर्वेषां ब्रजवासिनां
तत्सम्बन्धिसम्बन्धिना पक्ष्यादीनां च यत्सुखमनुभूयमानलीलालयसम्पादकमभूत् तत्
किं मे मम मत्सम्बन्धी वा हृदयस्थो भगवान् किं विधास्यति विशेषेण करिष्यति
पोपयिष्यतीति वार्थः । किमिति प्रश्नार्थकाव्ययप्रयोगेण एतत्सुखप्रासेलीलारूपप्रभुप्राकट्या-
धीनतया पूर्वोक्तदुःखातितो दुर्लभत्वं सूचितम् । अन्यत्र तथा करणे सामर्थ्याभाव-
माशङ्कयाहुः भगवानिति । स हि सर्वत्र सर्व कर्तुं समर्थः, अतः कृपायामन्यत्रापि तथा
करिष्यतीत्यर्थः ॥२॥

श्रीहरिरायकृतनिरोधलक्षणविवृतिसमेतम् । एवं भावनार्थ भावांशद्वयं प्रार्थयित्वा कदाचिदतितीव्रविरहभावोत्पत्ती नाशसम्माव- नानामुद्धवागमनजनितोत्सवोऽपि तथामावनिवर्तकतया स्फूर्ति विपयो जात इतिभावान्तः- पातेपि लीलाजनितसुखविलक्षणत्वादेकदेशभूतं तमप्यंशं प्रार्धयन्ते उद्धबागमन इति । उद्ध्यागमने जात उत्सवः सुमहान् यथा । वृन्दावने गोकुले या तथा मे मनसि कचित् ॥३॥ उद्धवस्य उत्सवात्मकस्स आगमने जातः प्रकटीभूतो यः सर्वविलक्षणो भगव- सरूपावयवदर्शनेन तदीयत्वनिर्धारणात् उत्पन्नः यः स्वार्थदूतप्रेषणाभिमत्यात्मको य उत्सवो ब्रजसीमन्तिनीनां यथा येन प्रकारेण तथा तेनैव प्रकारेण तद्भावभावनायां मे मम मनसि कचित् कदाचिदपि स्यादित्यभिलाप इत्यर्थः । अयमुत्सवो नन्दादीनां गोपिकानां च जात इति व्यवस्थया स्थानद्वयं निर्दिशन्ति वृन्दावने गोकुले वेति । पृन्दावने पुष्टिस्थाने रहसि व्रजस्त्रीणाम् , गोकुले गोष्ठे नन्दादीनामिति व्यवस्था । 'गच्छोद्धव ग्रजम् ,' 'प्राप्तो नन्दबजमिति सामान्योज्यावसीयते । नन्वागमनोत्सवप्रार्थने प्रम्वागमनसगयोत्पन्न स्तं विलोक्यागत'मित्यादिनोक्तः स कथं न प्रार्थित इति चेत्, तबाहुः सुमहानिति । प्रियागमनोत्सवापेक्षया विरहे तहतागमनोत्सववैशिष्टयसानुभवसिद्धतया विरहरसपोपकल्येन चायमुत्सवः ततोपि सुतरां महानित्यर्थः ॥ ३॥ एवं अलौकिकसामर्थ्यरूपो मुख्यो निरोधः खस्यैवेति तत्साधननिर्देशः प्रार्थना- च्याजेन स्वविपयतयैव कृतः, अन्येषां तु भगवान् महापुरुपकृपया तदधिकारानुसारेण सायुज्यं सेवोपयोगिदेहं वादास्यतीत्यभिप्रायेण तावत्पर्यन्तं स्थितिप्रकारमाहुः महतामिति । महतां कृपया यावद्भगवान् दययिष्यति । सायदानन्दसन्दोहः कीर्त्यमानः सुग्वाय हि ॥ ४ ॥ यावत् भगवान् दययिष्यति फलोन्मुखां दयां करिष्यति तावत् कीर्त्य- मानः कीर्तनविपयीक्रियमाणः एव स सुखायेत्यर्थः । ‘महस्ते विष्णो सुमतिं भजामहे,' 'विना महत्पादरजोभिषेकम्', 'किरातहूणान्न,' 'देवर्षिौ प्रियतमः' 'त्वत्पादपोतेन महत्कृतेन' 'सदनुग्रहो भवा' नित्यादिवाक्यैर्भगवतो दयायां च नान्यत्कारणमिति वक्तुमाहुः महतां कृपयेति । महतां भगवद्धः महत्वमापन्नानां कृपया करुणयेत्यर्थः । अन- वतारदशायां विशेपतो महापुरुपद्वारैवोद्धारात् । एतेन इदानीं भक्तिमार्गस्य ते एव निर्वा- हुमा इत्युक्तं भवति । ननु कीर्त्यमानेपि भगवति फलपर्यन्तं श्रमेण कर्मादिष्विव दुःस- मेवेसाशझ्याहुः आनन्दसन्दोह इति । भगवत आनन्दसमुदायरूपत्वेन तद्गुणानामपि तदमिन्नतया खरूपसमानयोगक्षेमत्वात् साधनदशायामपि तत्कीर्तनेन आनन्द एव भवति, न कर्मादिभिरिव दुःसमित्यर्थः । अत एव अवगतभगवत्कथारसः परीक्षित् एतदर्थकमेव - निरोधलक्षणम् । 'श्रोत्रमनोभिरामा 'दितिगुणानुवादविशेषणमुक्तवान् । हीति युत्तोयमर्थ । कीर्तन पिपयम्यानन्दगन्दोहरूपने सुखम्य युक्त्तन्यात् ॥ ४ ॥ ननु कीर्तन हि सुबसायनम् , तर महता कृपयेति को वाग्रह यधाकथञ्चिदपि कृत तत्तयेति प्रश्नत्याह महनां कृपयेति । महतां कृपया यहत्कीर्तनं सुगद् सदा । न तया लौकिकानां तु स्निग्धभोजनक्षत् ॥ ५॥ यत् यया मरतां महापुरपाणा कृपया करुणया लोकविलक्षणाना भगर मम्नन्धिना कृपया निस्परिपरटु सप्रहाणेच्या सदा कालापरिच्छेदन कीर्तनं सुखदं तापनयनिवत्तिपन परमानन्ददायक निरोधनक पा तथा लौकिकानां लोकसम्म दिना महापुरपद्वारा अभगमरणागतानाम् , अत एन कनलसमारासताना कीर्तनं न तथेत्यर्थ । वरक्षण्य नक्तु रोकिक दृष्टान्तमाहु स्निग्धभोजनरुक्षवदिति । लिम्बन तदोलनञ्च स्निग्धभोजनम् , तब रूक्ष च, अर्थात् रूक्षभोजनम् , तयोरिव तद्वदित्यर्थ । तया च यथा स्निग्धभोननरूक्षभोजनयोस्तारतम्य तथा महापुरुपकृपाविशिष्टतदविशिष्ट कीर्तनयोरपीत्यर्थ । एतेन निग्धभोजनम्य पुष्टिसापासवत् महापुरुपकृपानिशिष्टकीर्तनस्य पुष्टिफलसाधकतम् , रूक्षस्य तदमावकत्वात् लोकिककीर्तनस्य तत्फलासाधकत्वमुक्त मितिभार । निग्धम्य घृतप्लुतस्या नादेर्भोजने रूक्ष प्रीतिरहितस्तस्य भोजनमिवेत्यर्थ । यथा कम्यचित् जराधभिभूतस्य स्निग्ध वस्तु न रोचते तस्य यथा तद्रसानभिज्ञरसज्ञस्य प्रतिदिन क्षीयमाणशरीरस्य न तोजन पुष्टिफल, तथा महापुरुपकृपाऽभावरूपदोप युक्ताना तादृशफीतने रूक्षाणा लौकिकाना कीर्तनस्य न पुष्टिफल वमिति भाव । यद्वा, निम्ब भोजन यस्य स चार्यात् तद्रक्षश्च तयोरिव तद्वदित्यर्थ । तथा च यथा निग्वभोननरूक्षभोननयोस्तारतम्य तथा अलौकिकलोकिककीर्तनकनारपीत्यर्थ ॥ ५ ॥ ननु सुससिद्ध्य दयापर्यन्त कीर्तन कर्तव्यतेन निरूपितम् , तर 'तरति शोकमान्मपित्' 'ब्रह्ममम्थोऽमृतत्वमेती'त्यादिश्रुतिभि ज्ञानेनेव दु सनिवृत्या सुखप्राप्ते जानानस्थया स्थेयम् किं गुणगानेन इति चेत् , तत्राहु गुणगान इति । गुणगान मुगागासिगोविन्दस्य प्रजायते । यथा तथा शुकादीनां नैवात्मनि कुनोन्यतः॥ ६ ॥ यथा गोविन्दस्य गोगोकुल्पतनि साधनाधिपस्स गुणाना गाने स्तुतिवुद्ध्या कथने शुकादीना सिदज्ञानफलानामपि सुसम्, तथा तेषामेव आत्मनि स्वात्मविषये जायमान ब्रह्माम्यक्सोधन सुस न तथेत्यर्थ । यद्वा यथा भक्त क्रियमाणे गुणगाने तपणेन गोपिन्दम्य प्रभो मुखानाप्तिद्द्वक्ता यन गायन्ती'तिनाफ्यात् तथा तत्कई- णामपि शुकादीना आत्मनि अन्त करणे नेत्यर्थ । तथा च प्रभोरतिशयिततोप- . श्रीहरिरायफवनिरोधलक्षणविवृतिसमेतम् । २१ हेतुतया ज्ञानमार्गस्थित्यपेक्षया सुखाधिक्याच गुणगानेनैव स्थातव्यमिति भावः । अत एव 'लोकांच लोकानुगतान् पशूश्च हित्वाश्रितास्ते चरणातपत्रम्,' 'परस्परं त्वद्गुणवादसीधु- पीयूषनिर्यापितदेहधर्माः, 'अथ ह वाव तव महिमामृत, 'यदनुचरित,' 'तव कथामृतम् , 'श्रवणादर्शनात् , येऽन्योन्यतो भागवता' इत्यादिवाक्यैर्गुणगानपराणां इतरनरपेक्ष्यो- त्यापि स्वतःपुरुषार्थत्वं सर्वाधिकफलत्वं चावगम्यते गुणगानस । इतोऽपि तदेव कर्तव्य- मिति भावः । तदेवाहुः कुतोऽन्यत इति । अन्यतः ज्ञानादिभ्यो विपयादिभ्यो वा कुत एतत्सुसमित्यर्थः । 'ज्ञाने प्रयासमुदपास्य,' 'निवृत्ततः, 'नेपातिदुःसहे त्यादिवाक्यैः श्रीभागवते तथैव निरूपणात् । ननु 'तरति शोकमात्मवित् , ' 'तमेव विदित्वातिमृत्युमेती'- त्यादिश्रुतेः का गतिरिति चेद, अत्र वदामः । तस्मा अद्भक्तियुक्तस्ये त्यादिवाक्यैक्तिगतो ज्ञानानपेक्षणात् ज्ञानिनस्तु नैष्कर्म्यमपी'त्यादिवाक्यैः सर्वथा भक्त्यपेक्षणात् तन्निरपेक्ष- भक्तिमार्ग एव समीचीनः। तथा च मोक्षरूपाक्षयसुखसाधकत्वं ज्ञानस्सापि भक्तिसहकृतस्यै- वेति केवलज्ञानस्थितिमपहाय केवलभक्तावेव स्थितिः कर्तव्येत्यर्थः । श्रुत्यादिषु ज्ञान- फलोक्तिस्तु दुःसाभावपर्यवसन्नैव । परमानन्दावाप्तिस्तु भक्त्यैव । वस्तुतस्तु दुःखामावोऽ- प्येतदधीन एव । 'अनर्थोपशम'मितिवाक्यात् । अत एव आचार्यैरानन्दमयाधिकरणे 'एव सती'त्यारभ्य 'स्वीयत्वेन वरणे भक्तिभावात् सहकारियोग्यतासम्पत्त्या पुरुषोत्तमप्राप्ति- र्भवतीति निर्णीयत इत्यभ्यधायि ॥६॥ ननु कृते गुणगाने किं भवतीत्याशय तत्र प्रवृत्त्यर्थं परिचायक फलमाहुः क्लिश्यमानानिति । क्लिश्यमानान् जनान् दृष्ट्वा कृपायुक्तो यदा भवेत् । तदा सर्व सदानन्दं हृदिस्थं निर्गतं यहिः ॥ ७ ॥ गुणगाने तत्स्वरूपस्मृत्या तत्पात्यर्थ क्लिश्यमानानुपतपतो जनान् दृष्ट्वा अव- लोक्य यदा परीक्षासाधनसम्पत्ती कृपायुक्तो भवेत् तदा सर्व सर्वांशपूर्ण सदानन्द परं ब्रह्म यशोदोत्सङ्गलालित हृदिस्थ परमव्योग्नि प्रादुर्भुत बहिः प्रकट भवतीत्यर्थः । अत १ कर्मादिभ्य इति पाठ । २ सर्वथा दु साभावस्य भक्त्यधीनत्वादेवेसर्थ । एव सतीत्यादिप्रथम्या. यमाशय । ब्रह्मविदामोति परमित्यत श्रुतौ अक्षरप्रमविद परमनप्राप्तिरित्युच्यते । नायमा मा प्रवचनेन लभ्य' इतिधुत्यन्तरे च ज्ञानादीनां साधनवानपेधपूर्वक परणस्यैव साधन व प्रतिपाद्यते । एव सति श्रुतिद्वय विरोधपरिहाराय अक्षरब्रह्मशानेन अविद्यानिवृत्या शुदवसपादनेन पुरुषोत्तमप्राप्ती खरूपयोग्यता सपाद्यत इति ब्रहाविदामोतीतिथुखाशय । एवं योग्यतासपत्तावपि पुरुषोत्तमप्राप्तिस्तु तादशज्ञानवतो जीवम्य स्वीयत्वेन वरणे सरी भक्तिभावोत्पत्तावेव भवताति 'नायमा मेलिश्रुखाशय इति भाज्ये एव सनीत्यादिमयेन निर्णीयते । एव च ज्ञानेनाविद्यानिवृनावपि पुम्पोनमप्राप्त्यभावनिता ग तु नाति । तस्मात् सर्वात्मना दु साभावरतु मक्यारेसमार्गे भाष्यमप्यनुकूलमेवेति भाव ।।

२२
निरोधलक्षणम् ।
एव ब्रजसीमन्तिनीना गुणगानेन हृदि प्रादुर्भूय 'तन्मनस्का' इत्यादिना तथाभावसम्पत्ती
कृपया भगवान् प्रादुर्भूत इत्युच्यते । तदेवोक्तमाचार्य 'नहि साधनसम्पत्या हरिस्तु-
प्यति कस्यचित् । भक्ताना दैन्यमेपैक हरितोपणसाधन'मिति ! सदानन्दहृदिस्थमितिपाठे
सदानन्दस्य भगवतो हृदिस्थ अभिप्रायादिक बहिर्निगत भरतीत्यर्थ । अयमाशय ।
'रुरुदु सुस्वर'मित्यादिना गुणगानममय एपातिदेन्यभाने यदा कृपायुक्तो जातस्तदा तर
खामिप्राय प्रभुणैत्र ‘मया परोक्ष भजता,' 'न पारयेह'मित्यादिना आनिर्धारित इत्यन्यत्रापि
गुणगाने केशेन प्रादुर्भूय स्वकृपा ज्ञापयिष्यतीति तदाशया गुणगानमेन कर्तव्यमित्यर्थ ॥७॥
ननु किमिति कृपापेक्षया गुणगानेन केश सम्पादनीय , ज्ञाननिष्ठया ब्रह्मनिष्ठतेव
सम्पाद्यतामिति चेत्, तबाहु सर्वानन्दमयस्यापीति ।
सर्वानन्दमयस्यापि कृपानन्दः सुदुर्लभः ।
हृगतः स्वगुणान् श्रुत्वा पूर्ण: प्लायते जनान् ॥ ८॥
'एतस्येवानन्दम्यान्यानि भूतानि मानामुपनीनन्ती तिश्रुते सर्वन स्थितो य आनन्द
स भगति प्रापुर्यण वर्तत इति तदाश्रितम्य मानुपानन्दमारभ्याब्रह्मानन्द न कस्यापि
दुर्लभतम् , 'सने मद्भक्तियोगेन' इतिवास्यादपि, तथापि कृपानन्दः कृपारूपो य
आनन्द , भगवद्धर्माणा स्वरूपाभिन्नतया आनन्दरूपत्वात् । यद्वा, पुष्टिमार्गप्रवेशानु
कूटानुग्रहरूपया कृपया य आनन्दो भजनानन्दाख्य स सुतरा दुर्लभ । ब्रह्मानन्दम्यापि
दुर्लभन्यात् । 'सुटुर्लभ प्रशान्तात्मा कोटिपि महामुन' इतिगास्यात् । भजनानन्दस्तु
टुर्रम एन । सम्भनति साधनमिह किञ्चिदिनि चेत् ? गुणगानमेवेति गृहाण । अत
एव दुर्लभनेर तम्योक्ता श्रीमदाचार्य । 'लोकिकस्त्रीषु समिद्धम्तद्वारा पुरुषे भनेत्,
खानन्दम्थापनार्थाय योग्यतापि निरूपिता, अतो हि मजनानन्द वीषु सम्यग विधार्यत'
इत्यादि । एतदर्थम्तु तत एव विमान्यताम्, विस्तरमियान न लिख्यते । तथा च
योतागनुग्रहम्तनैतदपिकारि वात् तदानन्दप्राप्तिरित्येतदभिसन्धायोक्त कृपानन्द
मुलभ इति । त्रीभागननेपि 'नेम चिरिच्य ,' 'नाय सुसाप ,' 'केमा त्रिय'
'आमामहो' इत्यादिशाक्यले भवनिरूपणाच । कंध दुर्लभ इति आकाहाया तनिरूपक
तत्कार्यमाहु, हनन इति । हनन. हृदयप्रविष्ट स पानन्द स्वरूपात्मक स्वगुणान्
गीयमानान् श्रुत्या पूर्ण प्रतिक्षण प्रार्धमानो रसपूरए सन् जनान् जननादिधर्म-
युक्तानपि प्लाययने म्यारिभाषिनग्ममिन्धी निमजयतीयर्थ । अत एन 'यह पीडे'तिपये
म्यामिनीना हरि णुपग्निमुपाद्वाग भागा मक प्रभुन्त प्रविष्टोऽसण्यता'मित्यादिभिम्त-
द्वणितगुणेन देहटियप्राणान्त करणादिपु 'पूर्ण क्रीडामयतामेन सम्पादितना'-
नित्यमिहितम । अन पोलमाचार्ययुगरगीने 'अन्न प्रविष्टो भगवान् मुखात्य वर्णयो,
पुननिरश्यते मम्पर तदा भाति मुधिर' इति ॥८॥

२३ श्रीहरिरायकृतनिरोधलक्षणविवृतिसमेतम् । एवं सोपपतिक गुणगानकर्तव्यतामभिधायोपसंहरन्ति तस्मादिति । तस्मात् सर्व परित्यज्य निरुद्वैः सर्वदा गुणाः । सदानन्दपरैर्गेयाः सचिदानन्दता ततः ॥९॥ यस्माद्धेतोः कर्मज्ञानोपासनामार्गेम्यो भक्तिमार्गो निरतिशयितनिजविषयो 'ये लिहासक्तमनसः,' 'यदक्षरं वेदविदो वदन्ति,' 'विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः,' 'पूजा- दिना ब्रह्मलोक'मित्यादिवाक्यैः तस्माद्धेतोः सर्व कर्मज्ञानोपासनादिकं परित्यज्य सवासनं त्यक्त्वा निरुद्धैर्भगवता स्वीयत्वेन वृतैः अत एव किञ्चिद्विस्मृतप्रपञ्चैः, तदर्थ साधनानि विदधद्भिः, सर्वदा निरन्तरं 'सवै मद्भक्तियोगेनेति वाक्यात् सर्व ददतीति सर्वदाः सर्वेष्टदातारो गुणा एव गेया इत्यर्थः । ननु 'वेदमार्गानुसारेणे'तिवाक्यात् तथा भजने क्रियमाणे तन्मार्गस्य व्याख्यातृभिरन्यथाकृतत्वात् के पक्षं अवलम्ब्य गुणान् गायेदित्याशङ्कायामाहुः सदानन्दपरैरिति । सदानन्दः साकारानन्दमयः परः पर- मात्मा परमकाष्ठापन्नो, न तु पुच्छादिभावापन्नो येषां तादृशैरित्यर्थः । अधिकारिविशे- पणमेतत् । अनेन मायावादादिमतमनादृत्य ब्रह्मवादे स्थित्वा गुणगानं कर्तव्यमित्युक्तम् । प्रलवादे एवानन्दमयस्यानन्दमयाधिकरणे परमकाष्ठापन्नत्वोक्तेः । ततः किं गवती- त्याकाहायामाहुः सचिदानन्दता तत इति । ततस्तेभ्य एव गीयमानेभ्यो गुणेभ्यो जीवस्य सचिदानन्दता गुणत्रयाविर्भावेनाक्षररूपतया पुरुषोत्तमावि वयोग्यता भवतीत्यर्थः । स्वत इतिपाठे गुणगाने क्रियमाणे खत एव वस्तुस्वभावात्तथात्वम् , न तु तदर्थ प्रयत्नान्तरापेक्षेत्यर्थः ॥ ९॥ एवं निरोधार्थ गीयमाना गुणा निरोधलक्षणलीलासम्बन्धिन एव भवितुं युक्ता इति तत्स्वरूपज्ञापनाय स्वस्य निरोधविवृतिकर्तृत्वमितिवदन्तः फलाव्यभिचारितासिद्धये खेपामर्थे प्रभुं विज्ञापयन्त इव स्वानुभवनिरूपणेन स्वजनप्रवृत्तिं द्रढयन्ति अहं निरुद्ध इति । अहं निरुद्धो रोधेन निरोधपदवीं गतः । निरुद्धानां तु रोधाय निरोधं वर्णयामि ते ॥ १०॥ अहं रोधेन सर्व रोधयति प्रतिवध्नाति भगवदतिरिक्तमिति रोधो निरोधलीलानु- सन्धानजन्यः सर्वन बाधकत्वस्फूर्तिरूप आसक्तिधर्मभूतो भावविशेषः, तेन निरुद्धः प्रपञ्चविस्मृत्या तदासक्तो, निरोधस पदवीं श्रुतिविमृग्यां स्वतत्रभक्तिरूपां गतः प्राप्त इत्यर्थः । ननु एतादृशस्य किं निरोधवर्णनप्रयासेनेत्यत आहुः निरद्धानां त्विति । निरु- दत्वे प्रकारान्तरद्योतनाय तुशब्दः । भगवता शास्त्रानुसारेण महापुरुषद्वारा प्रमेयवलेन वात्मसात्कृतानां रोधाय निरोधजनकासक्तिधर्मरूपभावविशेपसिद्ध्यर्थं निरोधं लीलारूप विधेयविशेषणमिति पाठः।

२४ निरोयलक्षणम् । मक्तेषु भगवत्कृतं धर्णयामीत्यर्थः । वर्तमानक्रियापदात् स्वस्स सर्वदैतदभिनिवेशः सूचितः । अत एवातिकरुण इति प्रभुभिः श्रीवल्लमाष्टके विशेषणं निरूपितमाचार्याणाम् । खेपामर्थे भगवन्तं विज्ञापयन्तः इवाहुः त इति । त्वत्सम्बन्धिना तेषां त्वत्सम्बन्धिनं निरोधं वा । अत उभयथापि तवैवायं भार इति भावः ॥१०॥ नन्वेतादृशेषु गुणेषु विद्यमानेषु कथमत्र सर्वे न प्रवर्तन्त इत्याशङ्कर तदभाग्यमेव हेतुत्वेनाहुः हरिणेति । हरिणा ये विनिर्मुक्तास्ते मना भवसागरे । ये निरुद्धास्त एवात्र मोदमायान्त्यहर्निशम् ॥११॥ ये इति भाग्यरहिता यतस्ते हरिणा सर्वदुःखापि भगवता विशेषेण नितरां मुक्ताः सर्वथा त्यक्ताः । उपसर्गद्वयं कथमपि तेषां प्राप्यभावाय । 'निरन्धायासुरी मते'ति प्रयोजनाभिधानात् । 'मामप्राप्यैवेति शिरश्चालनेनार्थनिरूपणे यथाकथश्चित् तत्सम्पन्धे सति प्राप्तिस्तु प्रमेयपलेनेतिदिक् । अत एव व्यासोपि श्रीमागवते 'विना पशुमा दित्युक्तवान् । ननु तेषां किं फलमित्याकाहायामाहुः ते मना इति । ते आसुराः कर्मिणो देवा अपि भवः जन्ममरणप्रवाहः स एव सागरस्तत्र मनाः सर्वानुसन्धानरहिता इत्यर्थः । तस्य सागरत्वं नक्रादिगिलनसम्भावनया, तत्र तथा पुनरुन्मजनासम्भवः, एवमनापि कामादिभिसेन पुनर्मोक्षमार्गप्रवेशासम्भव इत्येतद्धर्मसाम्येन निरूपितम् । निरुद्धानां व्यवस्थामाहुः ये निरुद्धा इति । भगवता ये निरुद्धा महापुरुपद्वारा स्वतो या आत्मसात्कृतास्त एवान गुणगाने मोदमानन्दमासमन्ताद यान्ति प्राप्नुवन्ति । एच- कारेणान्येषामनिरुद्धानां कथचिदपि मोदासम्भव इति निरूपितम् । तेषां शुणेयरुः । तद्रुचिस्तु भगवदनुग्रहेणैव । अत एव नलवरमणिग्रीवाभ्यामनुग्रहानन्तरगेन 'वाणी गुणानुकथन' इत्यादि निरूपितम् । उक्त च तथैवास्मत्प्रभुचरणैर्भक्तिहसे 'तदर्यित्वस्सैर वरणकार्यत्वादिति । अहर्निशमिति । न तेपां क्षणमपि सांसारिकदुःससम्भव इत्युक्तम् । 'गद्वार्तायातयामाना मितिवास्यात् । याममानमप्येतद्वार्तापरत्वे गृहादेरवन्धकत्वमित्यहनिशं तधात्वे किं वक्तव्यमित्यर्थः ॥ ११ ॥ ननु गुणगानं निरोधसापकतया कर्तव्यमित्युक्तम् , तदिन्द्रियाणां वैमुख्ये न सम्भवतीति तग्निवर्तकमुपायमाहुः मंसारावेशदुष्टानामिनि । संसारावेशदुष्टानामिन्द्रियाणां हिताप वै । कृष्णस्य सर्ववस्तृनि भृग्न ईशम्य योजयेत् ॥ १२॥ संसारस्स अहन्ताममतारमरम्प प्रपञ्चासक्तिमम्पादकम्य य आदेश आममन्ता दिन्द्रियेषु प्रोशम्तेन दुष्टानां मगामुस्यरूपदोपयुक्तानामिन्द्रियाणां चक्षुरादीनां हिताय भगापरतया हित गर्नु मर्यवस्तृनि दारागारपुत्रादीनि कृष्णस्य २५ श्रीहरिरायफतनिरोधलक्षणवितिसमेतम् । सदानन्दस योजयेद् युक्तं कुर्यादित्यर्थः । कर्मादीनां सम्पन्धमात्रविवक्षायां पष्ठधेवेति सप्तम्यर्थे पष्ठी । ननु कृष्णे सर्ववस्तुसमर्पणेन कयं इन्द्रियाणां दोपनिवृत्तिरित्याशक्य आहुः ईशस्येति । स हि समर्थ आधिदैविकतामपि सम्पादयितुं तपेन्द्रियमात्रदोपनिवर्तकत्वे किमाश्चर्यमिति भावः । यद्वा, इन्द्रियाणि स्वतो पिमुसान्येव, 'पराधि खानि व्यतृण- स्वयम्भूरिति श्रुतेः, तेषां हिताय कृष्णस्य भगवतः सम्बन्धीनि सर्ववस्तूनि लीलासृष्टिस्थानि भावनयेन्द्रियैः सह योजयेदित्यर्थः । एतदेवाक्षण्णता'मित्यस्य विवरणे 'भगवता सह संलाप' इत्यादिना निरूपितमिति तत एव विगावनीयम् । नन्वीशत्वेपि सर्वनेन्द्रियादिषु सम्पन्धाभावे कथं दोपनिवर्तकत्वमित्याशयाहुः भून्न इति । भूमा सर्व- व्यापकोऽतो ये यया भावयिष्यन्ति तत्र तथा प्रकटीमूय सम्बद्धो भविष्यतीत्यर्थः । यद्वा, भूम्न इति तादयं चतुर्थी । तथा च 'भूम्नः फतुवज्ज्यायस्त्वं तथाहि दर्शयतीति तार्तीयीकाधिकरणनिरूपितमूमशन्दवाच्यसर्वात्मभावरूपफलसिद्धये सर्ववस्तुसमर्पणं कर्त- व्यमित्यर्थः। तत्राधिकरणे 'यो वै भूमा तत्सुख'मित्युक्त्वा भूमखरूपजिज्ञासायां 'यर नान्यत्पश्यती'त्यादिना सर्वात्मभावस्वरूपमेव निरूपितम् ॥ १२ ॥ ननु मगवतो दयावधि महतां कृपया गुणगानं कर्तव्यमित्युक्तम् , सा च पुनर्गुण- गाने क्रियमाणे कदा गवतीत्याकाहायामाहुः गुणेष्वाविष्टचित्तानामिति । गुणेष्वाविष्टचित्तानां सर्वदा सुरवैरिणः । संसारविरहक्लेशौ न स्यातां हरिवत्सुखम् ॥१३॥ तदा भवेद्दयालुत्वमन्यथा क्रूरता मता ॥१३॥ ॥ यदा भगवतो गुणेषु ऐश्वर्यादिषु सौन्दर्यादिषु वा सर्वदा अव्यवधानेनाविष्ट- चित्तानामन्यानुसन्धानरहितान्तःकरणानां 'तद्गुणेषु प्रसक्ता हि तदासक्ता भवन्ति ही'त्याचार्यवचनादासक्तया वर्धमानया संसारो लौकिकेष्वहन्ताममतारूपः विरहक्लेशो भगवद्विरहेण क्लेशश्च तावुभौ न स्यातामित्यर्थः । 'शृण्वन् गृणन् संस्मरयंश्च चिन्तयन् नामानि रूपाणि च मगलानि ते । क्रियासु यस्त्वचरणारविन्दयोराविष्टचित्तो न भवाय कल्पते,' 'परस्परं त्वद्गुणवादः,' 'ये योन्यतो भागवताः,' 'तव कथामृत'मित्यादि- वाक्यैर्गुणाविष्टचित्तानां संसारविरहक्लेशागावोक्तेः । अन्यथा सर्वपरित्यागो नियोगे जीवन च न सम्भवेत् । यद्वा, संसारस्तेन च यो पिरहल्लेशो अमिलपितविनाशे तो न साता- मित्यर्थः । अत एवोक्त श्रीभागवते 'तस्मिन्महन्मुखरिता' इत्यारभ्य 'तान्न स्पृशन्त्यशन- तृड्भयशोकमोहा' इत्यन्तम् । अथवा संसारो भगवत्यहन्ताममतारूपस्तस्य विरहेणामावेन यो क्लेशौ अन्यसम्बन्धप्रम्बसम्बन्धजन्यौ तौ न सातामित्यर्थः । गुणाविष्टचित्तत्वे सर्वथा भगवद्विपयकमंसारोत्पत्तेरन्यसम्बन्धामावाच । ननु संसारः सर्वथा हेयः, कथं भगव- द्विपयकः फलसाधक इति चेत्, न । भगवद्विषयककामादेरिव तस्यापि फलसापकत्वेन ४ निरोपरक्षणम् । सतामपेक्षणीयत्वात् । अत एव 'कुर्वन्ति गोवत्सपद'मित्यत्र वत्सपदमानकरणोक्या 'भहमेतद्दासो अय मम खामी'त्येतावान् संसारः स्थापितो मातीति निरूपितमाचार्यः । गुणाविष्टचित्तत्वेऽनिष्टनिवृत्तिरेव न, किन्तु इष्टप्राप्तिरपीत्याहुः हरिवत्सुखमिति । यया हरेः सर्वदुःसहर्तु. भगवतः सर्वदैवान्तर्धानदशायामपि मक्तसाहित्येन सुखं पूर्णा- नन्दत्वाच, तथा गुणाविष्टचित्तानामपि अन्तस्तदाविर्मावान् सर्वदा प्रमुसाहित्येनान्तर- रमणेनानन्दपूर्णत्वाच, तेषामपि सुग्पमित्यर्थः । 'सदा सत्सङ्गयुक्तानामवस्यैवं यदा मवेत्, तदा दयालुता दैन्यदर्शनात् तु हरेर्भवे'दित्याशयेनाहुः तदा भवेद् दयालुत्वमिति । यदा पूर्वोक्तरीत्या गुणगान सिध्यति तदा भगवतो दयालुत्व प्रादुर्भावहेतुमूतं भवेदित्यर्थः। अन्यथेति । मक्तानामेवंभूतत्वाभावे भगतोपि पूरता अनवेक्षकत्वेन मता सर्वशास्त्र- सम्मता इत्यर्थः । अत एव 'नवात्मन' इति शोके भगवत आत्मनः प्रमोनिजलामपूर्णस्स विद्वजनोपहृतमानाग्रहीतुः करुणया किङ्करनिवेदितानुग्राहकत्वमुच्यते श्रीभागवते । सा च पूर्वोक्तभावेनैव भवतीति सर्वमनवद्यम् ॥ १३,१३॥ ॥ ननु कालकमखमावादिभिर्बुद्धिनाशोद्वेगादिदोपैः प्रतिपन्धसम्मवे कथं गुणगान- निर्वाह इति चेत्, तनाहुः याधशङ्कापि नास्त्यति । याधशकापि नास्त्यत्र तयासोपि सिध्यति ॥१४॥ भगवद्धर्मसामादिरागो विपये स्थिरः। गुणैर्हरिसुग्नस्पर्शान्न दु.सं भाति कर्टिचित् ॥१५॥ अत्र गुणगाने कालादिवाधशङ्कव न, यतो भगवतैवोक्त श्रीभागवते, 'न कर्हि- चिन्गत्परा शान्तरूपे नक्ष्यन्ति नो निमिपो लेढि हेति'रिति । अन्यनापि 'आयुर्हरति वै पुसा उद्यन्नस्त मयन्नसौ । तस्यर्ते यः क्षणो नीत उत्तमश्लोकवार्तये'ति । एव गुणगाने वाधामावमुक्त्ता सर्वन तदवभासरूप प्रत्युत साधक धर्ममाहु तदध्यासोपि सिध्य- तीति । गुणगाने तस्य भगवत अध्यास सर्वनावभास सोप्यवान्तरफलतया सम्यक सिद्धिविपयो भविष्यतीत्यर्थ । अध्यासपद पटादिसर्वपदाथेषु भगवदवभासस्य भावः प्रयुक्तत्वेन वस्तुत आसक्तिम्रमवोधनाय । अन्यथा घटादेः पुरुषोतमाभिन्न स्यात् न हि घटादि साक्षात् तदभिन्न , किन्तु परम्परया। तस्याक्षरात्मतया तद्द्वारा तथात्वात् । अन्यथा तावद्धर्मविशिष्टत्व तेषप्यभिदध्यात् । ननूच्यन्त एव ब्रह्मधर्मा सचिदानन्दा- दयस्तेविति चेत्, अक्षरगतानामेव तेषा तदृत्तितया व्यपदिश्यमानत्वात् । अन्यथा व पीडलादयोपि व्यपदिश्येरन् । न चेष्टापत्ति , तदसाधारणवर्माणामन्यन कथनस्यानु- चितत्वात् । किश्य, सर्वेपा धर्माणा साधारणले तद्वतासाधारणधर्माभावे लक्षणामावाद- निरूप्यत्व सर्वसमत सवैशिष्टयेनाभननीयत्व च स्यात् । तस्मादभेदस्साक्षरसमानाधि- करणत्वेन तद्धर्मव्यपदेश एव, न पुरुषोत्तमधर्मगन्धोपीति बुध्यस्ख । नन्वैश्वर्यादयो व्यपदिष्टा

,
.
श्रीहरिरायकृतनिरोधलक्षणवितिसमेतम् ।
एव, किं न ते पुरुषोत्तमधर्मा इति चेत् , सत्यम् , तद्धर्मा एव, परन्तु अक्षरस्य चरणरूपत्वेन
सदमिन्नतया तेषां तत्र सद्भावात् । यतो व्यासादिष्वपि तदिच्छयैव तत्सद्भावः । 'युक्तं
भगैः खैरिति वाफ्यात् । एवं सति 'उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः,' 'पुरुषः स परः पार्थ, 'मेदव्यप-
देशाचे'त्यादिश्रुतिसूत्रमीमांसया अक्षराभेदः पुरुषोत्तमभेद इति भेदाभेदवादोऽस्माकमिति
दिक् । ननु 'निवृत्ततर्परुपगीयमानादिति वाक्यात् वैराग्यस्य गुणगानाङ्गत्वेन अतिदुर्लभस्या-
भावेगहीनत्वेन कयं फलसिद्धिरित्याशङ्कम तदप्यनेनैव भविष्यतीति साधनसाधकत्वरूप-
मुत्कर्षमाहुः भगवद्धर्मसामर्थ्यादिति । भगवद्धर्मोत्र गुणगान, गीयमाना ये भगवतो
धर्मा ऐश्वर्यवीर्यादयः, तस्य तेषां वा सामर्थ्याद्वस्तुशक्तेरेव, विषये भगवदतिरिक्तविपये,
विरागो रागामावः, स्थिरः अन्यापरिमाव्यो भवतीत्यर्थः । 'सा श्रदधानस्य विवृद्धमाना
विरक्तिमन्यत्र करोति पुंस' इति वाक्यात् । यद्वा, भगवद्धर्मा लीलादयः, तत्सामर्थ्यादासक्ति-
जननरूपादेय विपयविषयकविरागो भवतीत्यर्थः । अत एवोक्तं श्रीभागवते, 'परिनिष्ठितोपि
नैर्गुण्य उत्तमलोकलीलया गृहीतचेताः,' 'इत्यंभूतगुणो हरिरित्यादि । ननु भगवद्धर्म-
सामयेन सुखसाधनेषु विषयेषु विरागे गुणगायकानां दुःखं सादित्याशमाहुः गुणे-
हरिसुखस्पर्शादिति । गुणानां स्वरूपाभिन्नत्वात् तैरेव हरिसुखस्य प्रभुसम्पन्धिसुखस्स
हृदयदेशे स्पर्शात् सम्बन्धाद्विपयविरागेण शीतोष्णक्षुधादिसहनेपि कहिंचिदपि दुःखं न
भाति, भगवदानन्देन पूर्णत्वादित्यर्थः ॥१५॥
एवं सोपपत्तिकं गुणगानकर्तव्यतामभिधायोपसंहरन्ति एवं ज्ञात्वेति ।
एवं ज्ञात्वा ज्ञानमार्गादुत्कर्ष गुणवर्णने ।
अमत्सरैरलुब्धैश्च वर्णनीयाः सदा गुणाः ॥१६॥
एवं पूर्वोक्तेन प्रकारेण ज्ञानमार्गाद्गुणवर्णने उत्कएँ ज्ञात्या सर्वापेक्षा
परित्यज्य सदा कालाव्यवधानेन गुणा एव वर्णनीयाः । अत्र वाधकद्वयं त्यागार्थमाहुः
अमत्सरैरलुब्धैरिति । मात्सर्यलोभयोरत्यन्तवाधकत्वात् त्याज्यत्वम् । 'निर्मत्सराणां
सता मिति वाक्यात् । लोभश्च लौकिकक्षेत्रादितुल्यतापादकतया बाधकः । अत एवोक्तं
मक्तिहंसे 'वृत्त्यर्थं चेत् कृषिवल्लौकिक एवेत्यादि ।। १६ ॥
ननु गुणगानं रागतानादिवशीकृतचित्ततया न कार्य निरोधार्थत्वादिति तसिद्ध्यर्थ
गीयमानलीलाविशिष्टस्वरूपध्यानं साधनमाहुः हरिमूर्तिः सदा ध्येयेति ।
हरिमूर्तिः सदा ध्येया संकल्पादपि तत्र हि ।
दर्शनं स्पर्शनं स्पष्टं तथा कृतिगती सदा ॥१७॥
श्रवणं कीर्तनं स्पष्टं पुत्रे कृष्णप्रिये रतिः ।
पायोर्मलशात्यागेन शेपभागं तनौ नयेत् ॥१८॥
यस्य वा भगवत्कार्यं यदा स्पष्टं न दृश्यते ।
तदा विनिग्रहस्तस्य कर्तव्य इति निश्चयः ॥ १९॥

२८ प्रति निरोधलक्षणम् । हरेः प्रभो. मृर्तिः स्वरूप सदा ध्येया स्मरणीयेत्यर्थः । नन्वदृष्टरूपस कथ ध्यानमित्याशक्य तस्यान्याशक्यमनोरथपूर्तेः सर्वथा नि.साधनस्य गजेन्द्रस्व रक्षार्थ भगवाना- विर्भवतीति न दर्शने दौर्लभ्यमिति झापयितु हरीति । ननु योग इव कल्पितमूर्तरुपास- नायामिन सम्पादिताध्यस्तक्रियाविशेषप्रयुक्तमूर्तीना ज्ञान इव सोपधानमूर्तेानमिहापि भविष्यतीत्याशक्याहु मूर्तिरिति । भक्त्याविर्भूतरूपस्यैव ध्यानम्, न त्वन्यथाभूतस्येत्यर्थः । अन्यथा कल्पिताकारले यथाकथञ्चिद्धरिय॑य इत्येव वदेयुः । ध्येयेति कृत्यप्रत्यये- नावश्यकत्व द्योतितम् । ननु ध्यानसहितगुणगाने फि भवतीत्याशश्च तदवान्तरफलमाहुः सङ्कल्पादपीति । ध्यानस्य का कथा, यत सङ्कल्पाद्विचारमानादपि तन ध्यानविषय प्रभुस्वरूपे प्रादुर्भावाद्भगवतो दर्शनं सर्वावयवावलोकनरूपम् , स्पर्शनं चरणादितद्रपम्, तथा कृतिः शिरसि कराम्जधारणादिरूपा, गतिपिलासरूपा, एतत्सर्वं ध्यानपूर्वक- गुणगानेन सङ्कल्पमानात् प्रादुर्भूतभगवत्स्वरूपे स्पष्टमपाधितम्, न तु भ्रगप्रतीत्या, क्षणमनुभूत भवतीत्यर्थ । ननु श्रुताना पुन कीर्तनेन स्थिरीकृताना गुणानां गान सम्भव तीनि तदर्थ श्रवणकीर्तने आहु श्रवणं कीर्तनमिति । श्रयणं हि भगवद्वाचकाना पदवाक्याना शक्तितात्पर्यनिर्धार , तदनु कीर्तनं श्रुतस्य स्थैर्य सिद्धये पुन पुन स्वत सर्वत्र कथनम् , एतद्वयमपि सङ्कोचादिकमकृत्वा कर्तव्यम् । अन्यथा श्रवणकीर्तनयोरसम्भा- वनाविपरीतभारने स्याताम् । अत एवोक्त श्रीमदाचार्य श्रीभागवततत्त्वदीपे 'सर्वथा तद्गुणा- लाप नामोचारणमेव वा, सभायामपि कुति निर्भयो निस्पृहस्तत' इति । श्रोतृसापेक्ष कीर्तनम् , तन्निरपेक्ष गानमिति तयोविवेक । ननु 'काममयोय पुरुष' इति श्रुते सर्वथा ध्याने सङ्कल्पानन्तर यत्किञ्चित् कामसम्भवात् गुणगाने कीदृश काम कर्तव्य इति तमाहु पुत्रे कृष्णप्रिय इति । पुत्रे सङ्कल्पपुने सङ्कल्पोत्पन्ने कृष्णस्य सदानन्दपुरुषोत्तमस्य अलौकिके सर्वपरित्यागपूर्वकधामस्वरूपमाताभिलापरूपे कामे रतिः प्रीति कार्येत्यर्थः । एतेन सल्लभानमापन सर्वदा कर्त यमित्युक्तं भवति । तस्य भायमानस्य कामस्य शरीरपरि- वर्तनलक्षण फलमाहु पायोरिति । पायो. सर्वशरीरगतमलाविष्ठानस्य समलाशमावे- णैवासिलशरीरलोकिकतापादकस्य सम्बन्धी यो मलांशो लौकिकरिपयभोगजन्यस्तस्य सनात्मभानभावने 'सन्त्यज्य सतविपया'नित्यादिवाक्यै सकारणस्य त्यागेन तनी शरीरे सा अलोरिक्कामरनि शेपभागं मलरहिताशरूप भगवत्सम्नन्वयोग्यतापादक नयेत् प्रापयदित्यर्थ । पुत्र उतिसामान्यपदमस्यार्थस्यातिगोप्यत्वेन परोक्षवादसूचनाय । नन्वे ताशस्यापि 'तादृशस्यापि सतत मितिवाक्याद् दु सङ्गादिन। भावनाशसम्भवादुपायमाहु यस्येति । यस्य पुनादरिन्द्रियादेर्वा भगवत्कार्य सेवागुणगानादि स्पष्टं प्रातिकूल्येन न दृश्यते शिक्षायामपि, तदा सति सामर्थ्य तस्य विशेषेण भरणादिकमकृत्वापि निग्रहः कर्तव्य इत्यर्थ । अन्यथा सत्या शक्ती तदनिग्रहे 'अप्रतिपिद्धमनुमत भवतीति न्यायेन .

२९ श्रीहरिरायकृतनिरोपलक्षणवितिसमेवम् । तगतौ पुत्रे कृष्णप्रिय इत्यनेन विरोधापत्तिरित्यत आहुः इति निश्चय इति । इदमुक्तं मवति । भगवत्कार्यानुकूल्ये रतिः, प्रातिकूल्ये निग्रहः, सर्वथा असम्म त्यागः, शरणमावनं वा कर्तव्यम्, 'प्रतिकूले गृहं सजेत्', 'अशक्ये हरिरेवास्ती'तिवाक्यादिति भावः ॥ १७,१८,१९ ॥ एवं निरोधे साधनद्वयं निरूप्य सर्वेभ्यः साधनेभ्यः तयोरुत्कर्ष वदन्त उपसंहरन्ति नातापरतरो मन इति । नातः परतरो मम्रो नातः परतरः स्तवः । नातः परतरा विद्या तीर्थ नातः परात्परम् ॥ २० ॥ मत्रे हि कामितफलदत्वं देवतावशीकरणं च प्रसिद्धम् , तदन्न कामनाप्रसरगनो- रथान्तफलसिद्ध्या अनिर्वन्धेन प्रभुवशीकरणादतः साधनयुग्माद् मत्रः परतरः । अवि- लम्येन साधकत्वात् कर्मादिभ्य उत्कृष्टत्वेपि एतस्मादतिशयेन नोत्कृष्ट इत्यर्थः । ननु प्रभुप्रसादहेतुतया अनिर्बन्धेन खामिवशीकरणाच स्तवस्योत्कृष्टत्वं भविष्यतीत्याशझ्याहुः नातः परतरः स्तव इति । स्तवस्य मत्रादिभ्यः प्रसादसाधकतयोकृष्टत्वेपि प्रभुवशी- करणामावादेतस्मादतिशयेन नोत्कर्ष इत्यर्थः । ननु ब्रह्मविधायाः 'प्रियो हि ज्ञानिनोत्यर्थमहं स च मम प्रियः' 'ज्ञानी त्वात्मैव मे मत' इत्यादिवाक्यैः प्रभुप्रीतिसाधकतया साक्षात्कार- हेतुत्वात् सकलपातकभस्मीकाराच उत्कृष्टत्यमित्याशझ्याहुः नातः परतरा विद्येति । विद्या हि पञ्चपर्वा, स्वसिद्धौ साक्षात्कारमान सम्पाद्य तत्र लयं विधाय केवलमनसा ब्रह्मा- नन्दमनुभावयति । तदुक्तं अस्मदाचार्यः श्रीभागवततत्त्वदीपे 'ब्रह्मानन्दे प्रविष्टानामात्म- नैव सुखप्रमे'ति, मावभावनगुणगाने स्वस्मिन् प्रभुः प्रादुर्भावं सम्पाय देहेन्द्रियप्राणान्त:- करणादिपु स्वरूपात्मकमानन्दं पूरयित्वा सर्वैरिन्द्रियैरन्तःकरणैरात्मनापि तदानन्दमनुभाव- यत इत्यन्येभ्य उत्कृप्यापि विद्या नैतस्मात् साधनयुग्गादुत्कृष्टेत्यर्थः । अखिलपापभस्मी- कारस्तु 'दुःसहप्रेष्ठविरहे'तिवाक्यादवाप्यवगन्तव्यः । नन्वैतत्सर्वं चित्तशुद्धौ सम्भवति, अशुद्धचित्तस्य सर्वसाधनवैफल्यात् तच्छोधकतीर्थाश्रयस्यावश्यकत्वात् तीर्थस्योत्कृष्टता- माशय आहुः तीर्थ नातः परात्परमिति । तीर्थस्य सकलसाधनमूलभूतमनोमार्जक- तयोस्कृष्टत्वेपि गुणगानादेः 'सत्वं च शुध्यत्यचिरेण पुंस' इतिवाक्यादविलम्बेन चित्त- शोधकत्वात् सर्वतीर्थरूपत्वाच साम्प्रतं तेषां दुष्टावृतत्वेन तिरोहिताधिदेवत्वेन चासाध- कत्वादेतस्मात् परात् सर्वोत्कृष्टात् साधनयुग्मात् तीर्थ न परं उत्कृष्टमिति खसिद्धान्त निष्कर्पो निरूपित इति दिक् ।। २० । खाचार्यचरणद्वन्द्ववन्दनादरसाधनात् । निरोधलक्षणग्रन्थं विवने हरिदासकः ॥१॥ इतिश्रीमलिजाचार्यचरणाभिषेकलब्धमहाराज्यसुखानुभूतिश्रीहरिदास- विरचिता निरोधलक्षणविवृतिः समासा ॥

श्रीकृष्णाय नमः। निरोधलक्षणम् । श्रीवल्लभकृतनिरोधलक्षणविवरणसमेतम् । भक्तभावात्मरूपाय तन्मार्गव्यञ्जकाय च । तहानायात्तदीक्षाय वाचार्यप्रभवे नमः॥१॥ विरागादिन्द्रियाणां वै निग्रहे सति साधनैः। यमादिभिश्च विज्ञाने ज्ञाने भवति सत्फलम्।।२॥ तदभावेन सर्वेषु प्राकृतांशानिवृत्तितः । भक्तिमार्गे कयं साक्षात् फलं भवति तततः ॥३॥ निःसाधनाङ्गीकृतस्य स्यात् फलं रोधतो यथा । तदर्थ साधनं रूपं तस्य स्वाध्वनि वर्ण्यते॥४॥ प्रथमं दशमार्थनिरूपणे निरोधशब्देन 'निरोधोस्सानुशयनमात्मनः सह शक्तिमिः प्रपये कीडनं हरे' रिति वाफ्यात् साक्षाद्भगवत्झीडनमुक्तम् । तत्पीडनं लीलामृश्यन्तर्गत- भक्तानां प्रपञ्चविस्मृतिपूर्वकं सकलेन्द्रियनिरोधे सति भवेदिति दशमस्कन्धे मक्तानां चित्त- वृत्तिनिरोध उक्तो भक्तिमार्गे । तत्र पुनः प्राकट्यदशायां तु साक्षादगीकृतानां पुष्टिमार्गीय- मोद्भूतभावाकराणां परमभाग्यवतां व्रजसम्बन्धिनां निरोधः स्वरूपेणैव कृतः, साम्प्रतं तत्या. कट्याभावादाधुनिकानां स्वाङ्गीकृतानां स्वमार्गीयतत्साधनाज्ञानात् कदाचिद् ज्ञानरीतिनिरो- घसाधनेषु प्रवृत्तिर्भवेदिति तदभावार्थ श्रीमदाचार्यचरणाः कृपया ज्ञानमार्गीयसाधननिषेध- पूर्वकं स्वमार्गीयनिरोधसम्भवे सर्वथा यदपेक्षितं मूलकारणं तन्निरूपयन्ति यच्चेति । यच्च दुःखं यशोदाया नन्दादीनां च गोकुले। गोपिकानां तु यद दुःखं तद् दुःखं स्थान्मम कचित् ॥१॥ अत्रेदमाकूतम् । गोकुलं तु विविधविहरणेच्छाजनितसहजकृपया साक्षाद्भगवता पुष्टिमार्गेङ्गीकृतमतः स्वानन्ददानार्थं लोके प्रकटितमपि तादृशाङ्गीकाररूपपीजखभावजनित- तद्वासनया तदनुरूपोद्भूतभावाङ्करमेवासीदिति तद्भावखमावादुःखमपि तत्र स्थितम् , येन साक्षाद्भगवत्प्राकट्यमभूद्, अग्रे सुखादिकमपीत्यधुना स्वकीयानामपि ताशनिरोध- मार्गिणां तादृशमेव दुःखं तत्तनिरोधेन तत्माकट्यसाधकम् , अतस्तदेवैवं खस्मिन्सम्भाव- नया सर्वदा भावनीयमिति खकीयान् प्रति लक्षयन्ति । तथा हि । अन्वयार्थस्तु स्पष्ट एव । यदित्यनिर्वचनीयत्वमुक्तम् । चकारोप्यर्थकः सम्भावनायाम् । तथा च सुखं तु दुर्लममेव ! दुःखमपि चेत्स्यादिति । एतदुःखस्स ब्रह्मानन्दसापि तुच्छकर्तृत्वात् सर्वो- स्कृष्टत्वेनातिदुर्लभाधिकारज्ञापनाय सम्भावनैवोक्ता, न तु प्रार्थनम् । तत्रापि कचित् २ निरोभे इति पाठः। भकभावखरूपायेति पाठः ।

३१
श्रीवाहमानिरोधलक्षणविवरणसमेतम् ।
कदापि भविष्यति, यदि भवेत्तदा किं वायमिति सर्वदोत्कण्ठापेक्षितेति सूचितम् ।
एवं सति एतद्भावानुरूपं दुःसमव निरोधसाधकमिति नेपम् । दुःसं तु भगवत्प्रादुर्भावात्
प्रागपि श्रीमातृचरणानां श्रीनन्दादीनां च पुत्रोत्पतितलालनकीडावलोकनादिविविध-
मनोरयात्मकमासीदेव, तथैव श्रीखामिनीनामपि प्रभुप्राकट्याशया तत्तन्मनोरयात्मकं
तथा । ततः प्राकट्यानन्तरमपि पात्ये पूतनादिदर्शनजनितभयेन फूरदृष्ट्यादिपतनरूपम् ।
ततः प्रमोरतिचचलखमावेन जयमिभयरूपं क्रीडासत्या भोजनादिविलम्बजनिताति-
रूपं च । श्रीस्वामिनीनामपि प्राकट्यानन्तरं क्षणमात्रावलोकनाभावेन स्थातुमशक्त्या
विविधकार्यव्याजेन मुहुर्मुहुः श्रीमातृचरणसमीपागमनं तद्धेतुकमेवेति तादृशं तथा ।
प्रातर्यावत्पर्यन्तमुनिद्रायतविकसन्नवमरोजदलसदृशमीक्षणयुगलगुन्मीलयेत्प्रभुस्तावत्तत्तापा-
सहिष्णुतया 'चिरविरहे'त्युक्तप्रार्थनहेतुरूपं च। ततो गोचारणगमनादिपु प्रातरारम्य
सन्ध्यावधि तददर्शनजनिततत्तन्मनोरथात्मकं च । अग्रे नादनिष्ठागृतपानानन्तरं स्वामिनीनां
तु सप्टमेव । अग्रेपि रासलीलायां साक्षात् पूर्णरसदानपर्यन्तं तिरोधानजनितविचित्र-
मावात्मकं च । पुनरग्ने विप्रयोगस्फूर्ती स्पष्टमेव । ततस्तस्य 'संस्मृस संस्मृत्ये-'
त्युक्तत्वाततलीलानुस्मरणकीर्तनादिना सर्वदा तदात्मकत्वात्तदस्फूर्ती दुःखभानाभावाच्या
पूर्वमेव प्रभुस्थिति मन्यमानानां भक्तानां श्रीमदुद्धयोपदेशेन महदुःखार्णवनिमजनं चेत्यादि
रूपम्, तथा चेपे दुःखे जाते पूणों निरोधः सिद्धो भवतीति श्रीमदाचार्यरेतदुःखान्त-
गतानिर्वचनीयसुखानुभवहेतुभावात्मकैः कृपया स्वकीयानामप्येवमेव तदपेक्षितमिति तदेव
सम्मावनीयमिति तथोक्तम् ॥१॥
एवं तेषां दुःखं सम्भाव्य तत्तदनन्तरजनितमनिर्वचनीयं तत्तत्सुखमपि तद्दुःखानु-
मये सम्भावयन्ति गोकुल इति ।
गोकुले गोपिकानां च सर्वेषां व्रजवासिनाम् ।
यत्सुखं समभूत् तन्मे भगवान् कि विधास्यति ॥२॥
तदुःखहेतुकप्राकट्यानन्तरं महोत्सवादिवाल्यमारभ्य प्रेपर्यवान्दोलनादिरिगण-
क्रीडादानदधिदुग्धादिचौर्यान्तर्गतयावस्केलिवत्सगोचारणान्तनिलायनप्रभृतिवेणुगीतव्रत-
गोवर्धनोत्सवरासान्तं स्वस्खमनोरथपूरकं तथा । तदनन्तरं विप्रयोगे जाते तलीलास्मरणेन
तदात्मकतया दुःखमानामावात् तदस्फूर्त्या यथा पूर्वबुद्ध्या मिश्रितं सर्वविलक्षणं च श्री-
स्वामिनीनां तथा सर्वपां व्रजवासिनां च श्रीगोकुले यत्सुखं सम्यगनिर्वचनीय
मभूत्तन्मे भगवान् कि विधास्यतीति पूर्वोक्तरीत्यैव तदमिलापोपेक्षित इति भावः ।
यद्यप्यतिदुर्लभं तथापि सर्वसामर्थ्यवत्वेन पूर्व यथा स्वयमेव कृतवांस्तथाधुनापि करिष्यतीति
नापनाय मगवत्पदम् ॥२॥

३२ निरोधलक्षणम् । एवं निरुद्धानां दुःखमुखामिलापं स्वस्मिन्निरूप्य पुनस्तादृशसुखानन्तरं विप्रयोग- जनिते दुःखेपि विलक्षणसुखविशेपोत्पादकः कश्चनोत्सवो जायत इति तं सम्मावयन्ति उद्धवागमन इति । उद्धवागमने जात उत्सवः सुमहान् यथा । पृन्दावने गोकुले वा तथा मे मनसि फचित् ॥ ३ ॥ यथा देशान्तरगते प्रिये तत्प्रेपितगृहसेवकागमने तन्मात्रादीनां विशेषतः प्रियायाथ प्रियकृतस्वस्मरणजनितौत्सुक्यविशेषणोत्सवो भवतीति लोकरीतिः, प्रकृते तथोद्धवस भगवद्धावेन सर्वदोत्सवरूपस्य प्रियसन्देशहारकस्य भगवदीयस्यागमने उत्सवः सुतरा. मलौकिकत्वेन महान्यथा जातः, सुमहत्पदेन तस्योत्सवस्स तदनुभवैकवेद्यत्वेनाशक्य- निर्वचनमुक्तम् । कुत्रेत्याकाहायामाहुः घृन्दावने गोकुले वेति । वेति चार्थे । तेन वृन्दावने श्रीस्वामिनीनां गोकुले श्रीमातृचरणानामिति विवेकः । तथा मे मनसि कदापि भविष्यतीति तथापेक्षित इत्यर्थः । उत्सवस्तु मानसोत्साहरूपो मनोधर्म इति मनस्सेवामिलाप . उक्तः । अत्राय भावः । भगवदीयस भगवत्सम्बन्धिनि समागते साक्षाद्भगवानेवागत इति तादृशोत्साहः सर्वथापेक्षितः, नो चेत्, तत्त्वमेव न भवतीति सिद्धान्तः । एते तु सर्वथा प्रपन्नाः परमभगवदीया इति तेषां सर्वदोत्सवरूपस्सोद्धवस्यागमने प्रथमं तत्स्वरूप- दर्शनेत्र कोयं भगवद्वेशधारीति विस्मयेनोत्कण्ठारूपोत्सवो जातः, पश्चाद्भगवदीयत्वेन निर्धारितत्वेऽस्मप्रियसम्बन्धी गृहे समागतः, तत्रापि परमभक्तो निकटवर्ती ज्ञायते, अहो महद्भाग्यमस्मदीयं यतोऽस्मासु तत्सम्बन्धित्वज्ञानेऽयमत्रागतः प्रेपितो वा, नो चेद्भगव- दीयस्तदन्यत्र किमर्थ गच्छेत् । तेन प्रभुकृपाप्यस्मासु भविष्यतीत्यपि ज्ञायते, यतस्त- स्कृपाऽभावे भगवदीयस्यागमनं न सम्भवति । किश्य, तगृहमेव न भवति यत्र भगवदीयो नायाति, यतस्तदागमने भगवानप्यागच्छतीति प्रभुस्नेहभरवशादुद्धवेऽपि तत्सम्बन्धित्व- जनितनिरुपधिस्नेहवात्सल्येनोत्साहभरवशात्तत्सत्कारादिकरणे परमोत्सवो जातः । कचि- दित्येतादृशस्य दुर्लभत्वमुक्तम् । एवमाधुनिकानामपि निरोधमार्गीयाणां तत्सम्बन्धाः भावजनितदुःखं सर्वदापेक्षितम् , भगवदीयागमने तादृश एवोत्सवोप्यपेक्षितः । एवं सर्वात्मना चित्तादिनिरोधे जाते तेन च साक्षात् प्राकट्येन कृपया सुखमपि दास्यतीति भावोपि ज्ञाप्यत ॥३॥ ननु ज्ञानमार्गे तु चित्तनिरोधे जाते ध्यानादिना आत्मसुखं भवति, अत्र दुःखेन चित्तनिरोधेपि दुःखगेव तिष्ठतीति क उत्कर्षस्तवाहुः महतामिति । महतां कृपया यावद्भगवान् दययिष्यति । ताचदानन्दसन्दोहः कीर्त्यमानः सुखाय हि ॥ ४॥ येषां भगवदीयदर्शनमात्रात् परमानन्दानुभावको महानुत्सवो भवति सर्वदा - ३३ , श्रीवल्लभकृतनिरोधलक्षणविवरणसगेतम् । भगवदावेशात् । स्वयमपि उत्सवरूपा अन्तरङ्गास्ते भक्ता महान्तः, तेपां कृपया यावद्धग- पान दयां करिष्यति, कृपया प्रादुर्भूय स्वरूपानन्दं दास्यति, तावत्तसोद्भूतप्रचुरभावभंग- वदीयैः सह कीर्त्यमानो भगवान् साक्षादन्तःप्रकटीभूय सकलेन्द्रियाणामासक्ति स्वखरूपे विधाय सुखाय भाति, न दुःखायेति। हृदयस्थ एव तत्तदिन्द्रियेषु सानन्दं पूर्यतीत्यर्थः । यत आनन्दसन्दोहरूपः । यथा सरूपं तादृशं तथा गुणा अपि, तेन कीर्तनद्वारापि तया आनन्ददातेति गुणगानमेव तेन कर्तव्यम्, नान्यदिति ज्ञापितं भवति । अनेन तदुःखमपि रसभावात्मकमानन्दात्मकम्, न तु लौकिकविषयात्मकम् । यत्र दुःखस्यापि रसानन्दात्म- कत्वम् , तत्र सुखस्सानन्दरूपत्वोत्कर्षः किं वाच्य इति सूचितम् । किञ्च, अब प्रभुदयायां हेतुत्वेन महत्कृपोक्ता, तेन महच्छब्देन स्वामिन्य एवोक्ता इत्यवगम्यते । यतोयं रसस्तासामेव, भगवानपि तदधीन एव रसानुभवं करोतीति तत्कृपाऽभावे प्रभोरपि न दयेति महत्कृपयैव सर्वं भविष्यतीति सूचितम् । अत एव 'तद्वारा पुरुपे मवे'दित्यत्र 'तासामनुग्रहद्वारे'त्युक्तम् । अथवा तद्रावस्वरूपत्वेनात्मसूचकमेव महत्सद दत्तमिति ज्ञायते । तेनाधुनिकानां श्रीमदा- चार्यकृपयैव प्रभुः कृपां कृत्वा आनन्ददानं करिष्यतीति भावः ॥४॥ ननु भगवद्गुणगानं सर्वैरेव क्रियते, तेन च सर्वेषां सुखमेव भवति, निरुद्धानां तु को विशेषः, तबाहुः महतामिति । महतां कृपया यद्वत्कीर्तनं सुखदं सदा । न तथा लौकिकानां तु लिग्धभोजनरुक्षवत् ॥५॥ महतां पूर्वोक्तानां कृपया स्वभावदानात्मिकया कृत्वा यथा कीर्तनं निरोध- मार्गीयाणां सदा सुखदं भवति, यतः परस्परगुणानुवादे प्रोञ्छलितरसेन सकलेन्द्रियाणां स्वरूप एव निरोधेन प्रपञ्चविस्मृतिपूर्वकं तदानन्दमना एव तिष्ठन्तीति पुनस्तद्रसवासना न गच्छतीति सदेत्युक्तम् । तथा लौकिकानां प्रमाणधर्मनिष्ठानां तादग्भावाभाव- वतां भक्तानां ज्ञानिनामपि तथारूपप्राकट्याभावात्तत्कीर्तनं तथा सुखदं न भवतीत्यर्थः । तत्र दृष्टान्तः लिग्धभोजनेति । एकं खिग्धभोजनम्, अन्यद्रक्षम् । लिग्धभोजन यथा सकलेन्द्रियाणां सुखदमाप्यायकं भवति, न तथा रूक्षम्, लौकिकेषु तद्भावाभावा- द्रक्षत्वमेवेति तथा । अत्रैतन्मार्गीयभावाभाववत्सु भक्तेषु ज्ञानिपु च लौकिकपदकयनेन यथा लौकिकालौकिकयोर्यावत्तारतम्यम् , तावत्तारतम्यमेतयोरपीति ज्ञाप्यते । एवं सति निरुद्धानां कीर्तने महानेव विशेष उक्तः ॥५॥ ननु सुखदत्वेपि दुःखं तु सर्वदा तिष्ठत्येवेति क उत्कर्पो गुणगाने, एतदपेक्षया ज्ञानिमां सकलेन्द्रियादीनामात्मनि लयेऽत्यन्तदुःखसम्भावनारहितात्मसुखानुभवः सर्वोत्कृष्ट प्रमाणसिद्ध इति चेत्तत्राहुः गुणगान इति । . .

३४ , निरोधलक्षणम् । गुणगाने सुखायाप्सिगोविन्दा प्रजापते । यथा तथा शुफादीनां नैवात्मनि कुनोऽन्यतः ॥ ६॥ गोविन्दस्य गोकुलेन्द्रस्य रसात्मकलीलाविशिष्टस्य गुणगाने सुखावाप्तिर्यथा निरुद्धानां जायते प्रकर्पण, तथा पूर्णज्ञानिनां तत्राप्येकान्तभक्तानां शुकादीनामात्मनि आत्मसुखानुमवदशायां नैव भवति, फुतोन्यतः भक्तिरहितवित्यर्थः । एवेति निश्च- या ! गानद्वारा सुखप्राप्ती प्रकर्षः साक्षात्म्यरूपप्राकट्यजनित एवेति ज्ञेयम् । यद्यपि श्रीशुकैरेवेयं लीला वर्णिता, गक्तिरसेनापि ते पूर्णाः, तथाप्येतदानन्दानुभवस्तेपामपि न जात इति मुख्यतया शुकपदमेवादी दत्तम् । एवं सति तत्कृपयैवायमानन्दः प्राप्यः, नान्यथा । तत्रैतद्दुःखमेव साधकमिति तस्यैव परमपुरुषार्थत्वम्, नान्यस्येति । यत्रात्म- सुखापेक्षया तद्दुःखस्यापि सर्वोत्कृष्टत्वम् , ता किम वक्तव्यः सुखोत्कर्ष इति कैमुतिकन्याये- नापि ज्ञाप्यते ॥६॥ गनु परमपुरुषार्थत्वेन सर्वदा तेषु दुःखमेव स्थापयति भगवान्, किं वा कदापि पहिः सुरामपि प्रयच्छति, तबाहुः क्लिश्यमानानिति । क्लिश्यमानान् जनान् दृष्ट्वा कृपायुक्तो यदा भवेत् । तदा सर्च सदानन्दं हृदिस्थं निर्गत पहिः ॥७॥ एवं क्लिश्यमानान् साक्षात्स्वरूपसम्बन्धामिलापजनितप्रचुराग प्रतिक्षणमूळजाग- रणाद्यवस्थाभेदेनानिशं क्लेशानुभवं कुर्वतः स्वीयान् जनान् दृष्ट्वा प्रभुर्यदा कृपायुक्तो भवेत्तदा सर्च सदानन्दं सर्वाशपूर्ण सदानन्दखरूपं तत्तदिन्द्रियेषु भावात्मकतया सर्वांशेनानन्दपोपार्थ हदिस्थमलौकिककामरूपं वा साक्षातत्स्वरूपं पहिर्निर्गतं प्रकट करोति, पहिरानन्ददानार्थ हृदयात् प्रकटो भवतीत्यर्थः ॥७॥ एवमयमानन्दः कृपैकसाध्य इत्यतिदुर्लभत्वमाहुः सर्वानन्दमयस्येति । सर्वानन्दमयस्यापि कृपानन्दः सुदुर्लभः । हृद्गतः खगुणान् श्रुत्वा पूर्णः प्लाययते जनान् ॥ ८॥ ब्रह्मानन्दपर्यन्तं यत्र यत्रानन्दो गणितस्तन्मयस्यापि कृपानन्दः सुतरां दुर्लभः । अयवा सर्वेषां तन्मयस्य स तथा । मुक्त्यादिषु य आनन्दो मवति, सोप्येतदंश एव, परन्तु स साधनैर्भवति, अयं कृपैकसाध्यः, यतो दानं विना न भवति, अतः सुतरां दुर्लभः, न केनापि प्राप्तुं शक्यः । अथवा सुतरां दुःखेन शोभनेन वा लभो लामो यस्खेति । समस्तसाधनासाध्यत्वादन्येषां दुर्लभः, तद्वतामेव सुलभ इति सूचितम् । तत्प्राप्तिप्रकारमाहुः अद्भुत इति । तादृशदुःखजनिततापामिथो गुणानुवादेन स्वगुणान् श्रुत्वा सद्गत एव पूर्णः सकलेन्द्रियव्याप्तः, तजनितोच्छलितरसान्धिपूरेणान्तःपुष्टः सन् पहिः खखरूप .

श्रीवल्लभकृतनिरोधलक्षणविवरणसमेतम् ।
प्रकटीकृत्य जनान् स्वीयान् प्लावयते, तत्तद्रसान्धितरङ्गेषु तरणं कारयति । यथा यथा
सकलेन्द्रियाणां दुःखं जातम्, तथा तथैव तेषु स्वानन्दं पूरयतीति भावः ॥८॥
अतः परमेतत्कथनप्रयोजनमाहुः अहमिति ।
अहं निरुद्धो रोधेन निरोधपदवीं गतः ।
निरुद्धानां तु रोधाय निरोधं वर्णयामि तम् ॥ ९॥
अहं स्वयं साक्षात् प्रभुणा पूर्व निद्धः, निरुद्धानां मार्गेऽङ्गीकृतः, पश्चाद्रोधेन
गुणगानद्वारा सकलेन्द्रियाणां रोधेन निरोधस्य पदवीं गतः, फलदशां प्राप्तः। निरुद्धेति
पाठे निरुद्धानां पदवीं गतः, तन्मध्यवर्ती सन् तदानन्दानुभवं प्राप्तः । अतस्तदाज्ञया
निरुद्धानामाधुनिकानां रोधाय तमेव निरोधं वणर्यामि, कथयामि । एतेन मदुक्त-
रीतिकरणेन सर्वथा निरोधसिद्धिर्भविष्यतीति ज्ञापितम् । त इति पाठे तुभ्यं त्वदर्थ वर्ण-
यामीति कमपि भाग्यवन्तं नरयुक्तमित्यन्येषामानुपङ्गिकी शिक्षा सूचिता । किच, यतोहं
प्रभुणा साक्षात् स्वयं निरुद्धः, अतो मम वर्णनशक्तिः, नो चेत्, केन वक्तुं शक्य इत्यपि
सूच्यते ॥ ९॥
एवं निरोपखरूपमुक्त्या सर्वथा कर्तव्यत्वमाहुः तस्मादिति ।
तस्मात् सर्व परित्यज्य निरुद्धैः सर्वदा गुणाः।
सदानन्दपरैर्गेयाः सचिदानन्दता ततः ॥१०॥
यस्मादेवं सर्वोत्कृष्टत्वेन पराकाष्ठापन्नः सर्वदुर्लभः कृपानन्दः तस्मात् सर्व परित्यज्यै-
तापकत्वामावात् सर्व सवासनं सक्त्वा निरुद्धः उद्भूतभावारैः सर्वदा गुणा एव
गेयाः, तेपामयमेव सहजो धर्म इति तदभिलापिभिरपि तदेव कर्तव्यम् , नान्यदिति भावः।
गुणास्तु तत्तल्लीलात्मका पहुविधा इति कीदृशानां गानं कर्तव्यमित्यपेक्षायां विशेषणमाहुः
सदानन्दपरैरिति । सदानन्दः साक्षादसात्मकः पुरुषोत्तमः, तत्परैस्तनिष्ठैः सद्भिः,
न वितरखरूपनिष्ठैः । रसखरूपनिष्ठत्वकथनेन गुणा अपि रसात्मका रासादिलीलारूपा
एवं गेया इति सूचितम् । सदानन्दपरैस्तादृशैर्भगवदीयैः सहेति या योज्यम् । तेन
तादृग्व्यतिरिक्तः सह न गेया इत्युक्त भवति । तत्र कथने सर्वया हानिरेवेति भावः ।
सर्वदेति क्षणमात्रमप्यन्यथाभावसम्पन्धगन्धाभावार्थम् । ततः सचिदानन्दता भवति,
सर्वत्र भगवदावेशातत्खरूपात्मकतैव भवेदिति भावः । अथवा सचिदानन्दता ब्रह्म-
मावसम्पत्तिः, तेनान्तःसाक्षात्पुरुषोत्तमाविर्भावयोग्यता गवति, तस्य तदधिष्ठानत्वादिति
चितम् । कुत्रापि खत इति पाठः । तदा सचिदानन्दता भगवद्धर्मरूपता, सा
त्वस्मिन्मार्गे खत एवानायासेनैव भवतीत्यानुषङ्गिकत्वमुक्तम् । यत्र ज्ञानमार्गीयपरमफल-
मपि गुणगानस्यानुपङ्गिक फलम् , तत्र साक्षात्फलखरूपं किमु याच्यम् ॥१०॥

निरोधलभणम् । ननु निरुद्धानामेव रावपरित्यागपूर्वकमेतदुच्यते, न अन्येपा साधननिष्ठानाम् , तत्किमिति तबाहुः हरिणेति । हरिणा ये विनिर्मुक्तास्ते मग्ना भवसागरे । ये निम्दास्त एवात्र मोदमायान्त्यहर्निशम् ॥ ११ ॥ हरिणा सर्वदुःसहा ये विशेपेण त्यक्ताः, म्यानन्ददानेन दुःसदूरीकरणेच्छाऽभा- वात् त्यक्ताः, ते तु भवसागरे मन्नाः, साधनान्तरप्रवृत्ता अपि एतदानन्दाभावात् तन्मना एवेति भावः । ये तद्दानेच्छया निमद्वाः पुष्टिमार्गाङ्गीकृताः, केवलखरूपनिष्ठ- भावैकसाधनाः, त एव तत्कृपया तादृशं मोदमायान्ति, याह्याम्यन्तरं रसपूर्णाः सन्त- स्तदानन्दसमुद्रममा एव तिष्ठन्ति, तदप्यहर्निशम् , क्षणमानमपि न तदानन्दविच्छेद इति भावः । अतो निरुद्धानामेवायमानन्दः, न साधननिष्ठानामपीति तदर्थमेवोच्यत इति सर्व सुस्थम् ॥११॥ ननु निरुद्धानामपि पूर्वस्थितसंसारस विद्यमानत्वात् ततद्विपयासक्तेन्द्रियाणां तद्विस्मरणमशक्यमिव भाति, तदभारे गुणगानादिप्रवृत्तिरप्यशक्या, तनाहुः संसारेति । संसारावेशदुष्टानामिन्द्रियाणां हिताय । कृष्णस्य सर्ववस्तृनि भून्नि दादश योजयेत् ॥ १२ ॥ निरोधार्थ केवलपुष्टिमार्गेऽङ्गीकृतस्स साधनान्तरप्रवृत्तिनिवृत्त्योरप्रयोजकत्वादगीकार खभावेन यथा स्वरूपे सेहात्मिका प्रवृत्तिर्भवति, न तथा विपयेषु, किन्तु तत्सम्बन्धदोपे निवारणीय इति संसारावेशदुष्टानां तत्तद्विपयभोगादिषु अहन्ताममतात्मकावेशेन दुष्टानां तअनितबन्धेन दुःखज्ञानाभावेन तन्निवर्तकधर्मविमुखानामिन्द्रियाणां हिताय प्रीतये पूर्वोक्तमेहेन हेतुना कृष्णस्य सदानन्दस सर्ववस्तूनि प्रकरणादेकादशेन्द्रियाणि सम्पूर्णस्वरूप च,तानि प्रत्येकसमुदायाभ्यां तत्तन्मनोरथात्मकभावनाया भूमीः समस्तखेन्द्रिय- विपयाधिष्ठानानि कृत्वा स्वकीयान्यात्मसहितानि दादश तत्र योजयेत्। यद्यपि निरुद्धस्य लेहस्वभावेनैव भगवत्स्वरूपासक्तिः सकलेन्द्रियेषु भवतीति नियमविधिरयम् , तथापि संसा- रावेशिनामतिलेशं वीक्ष्य एतत्सम्बन्धेन ममापि क्लेशदुःखमेव भविष्यति, न तु नेहासक्तिज सुखमिति भयेन ततः सांसारिकधर्मेभ्यः प्रत्यावर्त्य समस्तेन्द्रियाणि तत्र योजयेत् । यत्कि. चित्सम्बन्धेनापि विनोमा भूदिति कर्तव्यविधिरुक्तः । किन, इन्द्रियाणां स्वखविषयप्रवृत्तिः सहजा, तथा चातितुच्छ विपय साजयित्वा परमानन्दरूपविषयेषु तानि योजनीयानि । तथा चोक्त मक्षण्वता'मित्यस्य विवरणे 'इन्द्रियवतामिदमेव फल मिति, 'भगवता सह संलाप' इत्यारभ्य 'एवं तद्भावन सदे'त्यन्तम् । अत्र तु द्वादशैव तद्विषया उक्ता इत्यत्रापि तावसंख्यैवोक्ता । एवं सत्याधुनिकानामपि सांसारिकधर्मेभ्यः परावर्त्य तानि मगवति . . श्रीवल्लभकृतनिरोधलक्षणविवरणसमेतम् । ३७ योजनीयानीति शिक्षा सूचिता । एवं योजनेन तदासक्तौ सत्यां साक्षात्स्वरूपसम्बन्धाभावात् तगुणेष्वेवासक्तिवशादावेशो भवेत्, न त्वन्यत्रेति भावः ॥ १२ ॥ ननु एवं योजनेपि तत्तदिन्द्रियाणां पूर्वसंसाराध्यासात् ततद्विपयेषु यत्किञ्चिदहन्ता- ममतात्मकः संसारस्तिष्ठेदेवेति तत्त्यागजनितक्लेशोऽपि तत्प्राप्यमावाद् भवेदिति कयं सुसम् १ तबाहुः गुणेविति । गुणेप्चाविष्टचित्तानां सर्वदा मुरवैरिणः । संसारविरहक्लेशौ न स्यातां हरिवत्सुखम् ॥ १३ ॥ एवमासच्या गुणगाने क्रियमाणे तत्रैवाविष्टचित्ता भवन्तीति मुरवैरिणस्तत्र प्रति- पन्धनिवर्तकस्य गुणेष्वाविष्टचित्तानां तेषां संसारः पूर्वोक्तस्तत्त्यागजनितक्लेशश्च तो न स्याताम् । तेषां प्रपञ्चविस्मृतिपूर्वकं गुणगागाविष्टत्वेन पूर्वोक्ताध्यास एव नश्यति, फुतस्तत्त्यागजक्लेशसम्भावनेति भावः । एतदेवोक्तं वेणुगीते 'क्रीडास्तन्मयतां ययु'रित्यस्य विवरणे 'जाग्रत्स्वनेषु क्रीडामेव पश्यन्तीति । ननु तथापि पूर्ववद्विपयभोगेष्वेव तेपामा- सक्त्या तत्सुसमपि पूर्वोक्तविपयजन्यसुखसदृशमेवेति चेत् , तबाहुः हरिवदिति । पूर्वोक्त- भोगासत्तया संसार एव । अत्र तु हरियथा सर्वदुःसहर्ता नियालौकिकरसारमकानन्दरूपश्च, तथा तस्स सुखमप्यग्रे दुःखसम्भावनारहितं ससारनिवर्तकं तादृशमेव, न तु पूर्वरादृशं भवतीति महद्वैलक्षण्यमुक्तम् ॥१३॥ एवं सर्वेपां विषयवासनारहितढासक्तौ यद्भवेतदाहुः तदेति । तदा भवेद्दयालुत्वमन्यथा क्रूरता मता। याधशङ्कापि नास्त्यत्र तदध्यासोपि सिध्यति ॥१४॥ एवं प्रचुरतापात्मकभावासक्त्या सकलेन्द्रियाणां प्रपञ्चाध्यासरहितः पूर्णो निरोधः वरूपात्मकतारूपो यदा सिध्येत्तदा दयालुत्वं प्रभोर्भवेत्, स्वास्थ्यादिकरणेन प्रतिवन्धको न भवेदित्यर्थः । अन्यथा ताशासत्यभावे यूरता निश्चिता । साक्षात्खीय- त्वेनाङ्गीकृतस्य स्वधर्मरूपभगवदभिप्रेताकरणे प्रभोरामोशी भवतीत्यपि यूरपदेन सूचितम् । ननु सर्वत्यागेन गुणगानमा प्रवृत्तौ कालकर्मादिककृतबाधः सम्भवेत्तनाहुः बाधशद्धेति । पापस्य शझापि नास्ति । कुतो वाधः । अत्र गुणगान इत्यर्थः । राकलेन्द्रियेषु भगवत एवा- निष्टत्वेन स्थितत्याद्वाधः केन कर्तु शक्यः, स्वयमपि भगवान् न शक्नोति, तदा कोन्य इति नैव शहोदयः । एतदेवोक्त सन्न्यास निर्णये 'अत्रारम्भे न नाशः स्यादित्युपक्रम्य 'हरिर'- त्यन्तम् । अत्रेति कथनात् तत्तज्ज्ञानमार्गीयसाधनेषु बहवो विनाः सन्तीत्यपि ज्ञाप्यते । ननु तथापि स्वरूपमिलनामिलापस्य विद्यमानत्वात् स्वस्स भगवता सह भेदज्ञानं तिष्ठत्येव, तच तदभिमानेन सम्भवति, स च पाधरूप एवेति चेत्तवाहुः तद्ध्यास इति । यथा २भगवद्विषयभोगे इति पाट । भक्काविति पाठ. ।

३८
निरोधलक्षणम्
ज्ञाने 'सोह'मिति स्फुरति, तथा खस्मिन् सर्वत्र देहादौ तस्य भगवत एवाध्यासः, तसत्वेनैव
भानं 'कृष्णोह'मित्यादिरूपः सिध्यति, न तु स्वस्मिन् मिन्नत्वं स्फुरति । सिध्यति
सिद्धि प्रामोतीत्युत्तया यथा संसारावस्थायां तादृशाध्यासः स्थितः, तथेदानीन्तनावस्थायां
सत्यां साक्षाद्भगवत्स्वरूपाध्यास एव भवतीति खभावपरावृत्तिर्जायत इति सूच्यते । एत-
देव 'तन्मनस्का' इत्यस्य विवरणे द्रष्टव्यम् ॥ १४ ॥
ननु तथापि वैराग्याभावे कथं पूर्वोक्तप्राकृतविपयाभ्यासनिवृत्तिस्तत्राहुः भग-
वद्धमेति ।
भगवद्धर्मसामाद्विरागो विपये स्थितः ।
गुणैहरेः सुखस्पर्शान्न दुःखं भाति कर्हिचित् ॥१५॥
भगवतः सकलैश्वर्यादिगुणयुक्तस्य धर्माः गुणगानद्वारान्तःप्रविष्टास्तेषां साम-
ादिपये प्राकृते तद्भावत्वेन भगवत्सपि वा तादृशस्य विरागः स्थितोस्ति । स्थिर
इति वा पाठः । विषयत्वेन सर्वत्र वैराग्यमेव, किन्तु तेषां पराकाष्ठापन्नालौकिकानन्दरूपे
साक्षाद्भगवति निरुपघिलेहेन केवलतदीयत्वबुद्ध्यैव तथा प्रपन्नतेति 'सन्त्यज्य सर्व विषया'-
निति निरूपणेन ज्ञायते । अत एव भगवानपि खयं कृपया तादृशानन्दमनुभावयतीति
सर्वमक्दातम् । तर्हि दुःख कथं भवति ? तनाहुः गुणैरिति । हरेः सर्वदुःखहर्तुर्गुणैः
सुखस्पर्शान्न कहिँचिद्दुःखभानम् । तेषामन्तस्तत्वरूपानन्दपूर्णानां सर्वदा तदात्मक-
तया दुःखस्स भानमेव नास्ति, कुतस्तत्सम्भावनेति भावः । तापात्मकं यद् दुःख दृश्यते
तस्स रसरूपत्वात् सुखरूपत्वमेव, न दुःसरूपत्वमिति ज्ञेयम् ॥१५॥
अतःपरमुपसहरन्ति एवं ज्ञात्वेति ।
एवं ज्ञात्वा ज्ञानमार्गादुत्को गुणवर्णने ।
अमत्सरैरलुब्धैश्च वर्णनीयाः सदा गुणाः ॥ १६ ॥
साक्षाद्भगवदानन्दम्य सर्वेन्द्रियावाद्यत्वनिरूपणेन तत्साधनरूपगुणगानस्य सुख-
रूपत्वेन च ज्ञानफलस्याक्षरलयपर्यवसायित्वात् तत्साधनस्य च कप्टसाध्यत्वाच ज्ञान-
मार्गाद्गुणवर्णने महोत्कर्ष इति ज्ञात्वा निरुद्धै. साक्षाद्भगवद्धाररूपाङ्गीकारादारभ्य
सर्वपरित्यागेन गुणा एव वर्णनीयाः, न त्वन्यत् । दृढासक्त्यनन्तरं तत्स्वभावात् स्वयमेव
गुणगानं भविष्यति, साम्प्रतं तदभानादन कर्तव्यविधिरुक्त इति सर्वमनवद्यम् । तर
प्रतिवन्धकरूपमान्तर दोपदय सर्वया साज्यमित्याहु. अमत्सरैरिति । मात्सर्य परो.
स्कर्षासहन लोभन तद्रहितैः कर्तव्यम् । भगवदीयेषु मात्सर्येण सौहार्दामावे गुणवर्णन-
मशक्यम् , लोभे तु स्वार्थार्धमेवेति कुतम्तदावेशः, प्रत्युत सर्वधानुचितत्वाद्भगवद्भक्तानां
सर्वस्वहानिरेवेति सर्वया दोपद्वय सक्तव्यमिति भावः । सदेति कार्यान्तरन्यासझे माव-
शथिल्याभागायोक्तम् ॥ १६ ॥

भीयल्लभक्तनिरोधलक्षणविवरणसमेतम् । ननु श्रीमुखावलोकनादीनां भावजनकत्वेन सर्वदा भगवत्खरूपसेवेव कर्तव्येति भक्तिसिद्धान्तः, प्रकृते मुख्यतया गुणगानमेवोच्यते तत्कयमित्याशय तत्राहुः हरिमूर्ति- रिति । हरिमूर्तिः सदा ध्येया संकल्पादपि तत्र हि। दर्शनं स्पर्शनं स्पष्ट तथा कृतिगती सदा ॥१७॥ श्रवणं कीर्तनं स्पष्टं पुग्ने कृष्णप्रिये रतिः । पायुमैलांशत्यागेन शेपभावं तनौ नयेत् ॥ १८ ॥ अनेदं प्रतिभाति । भगवानुद्धारार्थ मर्यादया सर्वानेवानीकरोति । तेषां खेहरूपा मानसी सेवा फलरूपेति तत्साधनलेन मार्गनिष्ठया सेवाकरणमावश्यकम् । येपां साक्षा- सुष्टिमार्गे निःसाधन एवाजीकारस्तेषां तदात्व एवोतनेहभावाङ्कराणां खरूपसम्बन्धाभि- लापेण 'भगवता सह संलाप' इत्यादिरूपा भावनैव जायते, भावना तु मनोधर्मः, तद्भावनायां मनसस्तत्परता भवतीति तद्रूपा मानसी सेवा जायते इति पूर्वोक्तसेवाया अधुना प्रयोजक- त्वामावात्तदायार्थ गुणगानमेव मुख्यमिति तदेवोक्तम् । अत एव भगषद्वरणानन्तरमेवो. भूतभावामिः कुमारिकामिः पूजादि सबै निहाय गुणगानमेव कृतमिति 'भूयानन्दसुतः पति'रित्यत्र विवरणे विवृतम्, साधनमार्गीयशरणागतानामपि साधनरूपसेवाकरणेन खेहा- नन्तरमावोत्पत्ती गुणगानद्वारा तद्दाार्थ त्याग एवोक्तो भक्तिवर्धिन्यां 'तादृशस्यापी'त्यारम्य 'यागं कृत्वे'तीति सर्वमनवधम् । किञ्च, पूर्वोक्तसाधनरूपसेवाकरणेन सेहभावजनितं तापात्मकं दुःखं जायते, तद्दुःसनिवृत्तिस्तु विरहानुमवे गुणगानेनैव भवतीति तदेव मुख्यत्वे- नोक्तम् । तथा च यतस्तादृशपुष्टिमार्गाहीकारखभावोद्भूतलेहमावाकुरजनितमनोरथप्रकारेण हरिमूर्तिः सदा ध्येया भावयितुं योग्या भवति, अतस्तअनिततापनिवृत्यर्थं तदा च गुणगानमेवोक्तमित्यन्वयः । तर्हि ज्ञानमार्गेपि ध्यानमेव कियते, ततो गुणगाने को विशेष- स्तनाहुः सङ्कल्पादिति । सत्यात्पूर्वोक्तप्रकारकविविधमनोरथकदम्बादपि तत्र मावनायां भावात्मकतया साक्षात्प्रकटस्य भगवतो दर्शनं स्पर्शनं स्पष्टमनुभूतं भवति, तथैव कृति- स्तदन्तिके गतिथ, तथैव श्रवणं तत्कूजितानां, कीर्तनं भगवता सह संलापादिरूपं च तथा । पूर्वोकज्ञानसाधनध्याने तु न तथेति स्पष्टमित्युक्तम् । तर तु प्रत्यक्षेपि आत्मनि न तथानुमवः । गाने तु सकसमानादपि स्पटमनु मूतं भवतीत्यपिशब्देन योत्यते । एवं भावनायां प्रकटीभूय तापारमकं दुःख हरतीति नापनाय हरिमूर्तिरित्युक्तम् । ननु भगवदगीकारेण तत्कृपया एतत्सर्वं भवेदिति 'कृपायुक्तो यदा भवे'दित्यनेनोक्तम्, परन्तु तत्र भगवत्कृपायां महत्कृपा पूर्व हेतुत्येनोक्ता महतां कृपये'त्यनेनेत्यस्य तदधीनत्वेन तत्कृपामापे स कथं प्राप्यतेत्यत आहुः पुत्र इति । यतः पूर्वोक्तभक्तास्तु पराकाष्ठापन- रसभोक्तारो मात्सर्यादिदोपरहिता भगवत्कृपापियेषु सहजवत्सलशीला इति तेषां - निरोधलक्षणम् । तादृशे कृष्णप्रिये कृष्णः प्रियो यस कृष्णस्य फलदानसमुखस्स प्रिये वा पुत्रे पुत्ररूपे रतिः प्रीतिरेव भवति । खप्रियप्रीतिहेतुत्वेन कृपया भावदानात्तेपां गुरुत्वात्तस्मिन् पुत्रत्वं सिद्धमेवेति तद्रूपत्वमुक्तम् । तासां गुरुत्व तु सन्न्यासनिर्णये 'कौण्डिन्यो गोपिका' इति स्फुटीकृतम् । किश्य, यथा पुनस्य कामप्याति दृष्ट्वा तस्मिन् वात्सल्येन तदुपचारः क्रियते, तथात्रापि ताशीमाति दृष्ट्वा वात्सल्येन तद्दानं तैरपि क्रियत इति ज्ञापनाय पुत्ररूप इत्युक्तम् । अन्यच, पुत्रे यथा तद्विहितविविधापराधादपि वत्सलतैव भवति, तथा तादृशे कृपापाने प्रीतिहेतोरपि तथोक्तम् । प्रीतिरपि तेषां भावात्मिकैव भवति, न तु तद्रहितेति ज्ञापनाय रतिपदमुक्तम् । रतिहासचेति तद्रूपत्व तस्याः स्पष्टम् । एवं सति तेषामपि कृपा तादृशे जायते इति स रसोपि तेन प्राप्यत इति सुक्त तथा । किश्य, यथा तादृशानां तादृशे भक्ते पुनभावस्तथा तस्यापि तादृशेषु भक्तेषु सर्वदा मातृभाव एव स्थापनीय इत्यपि सूचितम् । अथवाऽत्रायमपि गूढाभिसन्धिरनुमीयते । कृष्णप्रियास्तु बहुविधा . परन्तु स्फुरत्कृष्णप्रेमेति श्लोकोक्तरूप कृष्णस्यानन्दरसात्मकस्य प्रियव श्रीमदाचार्येष्वेव विलसति नान्येषु, तद्धेतुक साक्षात् श्रीस्वामिनीनामपि प्रियत ताम्बात्सल्येनैतेष्वेव सम्भवति, नान्येषु । यत. श्रीमदाचार्याणामेव तद्भावात्मकत्वं तन्मध्यपातित्व च विजयते । तथा च कृष्णस्स प्रिये पलमे मयि पुत्र इव रति- स्तेपां वर्तत इति मदगीकृतेन्यस्मिन्नपि तादृशे भविष्यतीति भावः । अथवा कृष्णपिये मयि रतिर्वर्तत इति कथनात् खस्य तद्भावात्मकत्वात्तदन्तर्गतत्वायाधुनिकानां स्वकृपयैर भविष्यतीत्यपि सूचितम् । एव तत्कृपया जनितो रतिरूपो भारो निसिल प्राकृतांश त्याजयित्वा क्रमेणालौकिक साक्षाद्भगवदात्मक तत्तद्विपयमिन्द्रियेपु योजयतीति स- दृष्टान्त निरूपयन्ति वायुरिति । वायुः सर्वदेहेन्द्रियव्यापी भुक्तमाननिसिलवस्तूनां यो मलांशस्तस्य त्यागेनापोद्वारेण पहिरुत्सर्गेण शेपभाव साराश तनी नाडीद्वारा तत्तदधिष्ठाने यथा प्रापयति तथायमपि प्राकृतांश साजयित्वा शेपभावं सर्वं भगति नयेदित्यन्वय. । तनाविरयुपलक्षणम्, किन्तु देहाणेन्द्रियादिनित्यर्थः । अपना ज्ञानमार्गीयस्य योगादिधा- रणाया प्राणायामादिकरणेन सकलेन्द्रियाणां तत्तत्प्राकृतविपयग्रहणादिरूप मलाश त्याजू- यित्वा वायु- शेपभावभून प्राकृततद्विन्नीभूत आत्मान तानि च परमात्मनि यथा योजयति तयानापि स भार इनि नेयम् । भागमिनि पाठे स्पष्टमेव । अथवा वायुयथा कलुपित- जराना यो मलाशम्नन्मध्यस्थ. पवम्तम्य सागेन शेपभाग मलाशापशिष्ट जल तनी सस्मिन्नयति शोषणद्वारा गृहानि, तथा स भागोपि प्राकृतागत्यागेन पभागं मतनो सदेहादिम्पे प्रभी प्रापयेत्, तदात्मको भातीति भारः । अथवा नना स्वतनी यत्सन शेपभाग तनुव्यतिरिक्त मन प्रभृनि तन् साल नयेत्, हरि प्रापयेत् , भातीनि पूर्ववन् । एप पूणों निरोप मिद्धो भनि ॥ १७,१८ ॥ - एतत्स्वरूपारमको शिववक्षिी पाह।

श्रीवल्लभकृतनिरोधलक्षणविवरणसमेतम् । ननु तद्भावस्वभावात्स्वत एव भविष्यतीति कर्तव्यविधिः किमर्थमुच्यते ? तपाहुः यस्य चेति । यस्य वा भगवत्कार्य यदा स्पष्टं न दृश्यते । तदा विनिग्रहस्तस्य कर्तव्य इति निश्चयः ॥ १९ ॥ चेत्सनादरे । यद्यपि तद्भावस्वभावादेव तादृशस सर्व भवति, तथापि लौकिकजना- नुरोधेन यस्येन्द्रियस्य भगवत्कार्य भगवदावेशेन तत्कृतिरिव कृतिर्यदा स्पष्टं प्रकटं न दृश्यते तदा लौकिकसर्वपरित्यागेन पूर्वोक्तः भगवदीयैः सह गुणगानेन तस्येन्द्रियस्स विनिग्रहोन्यतः प्रत्यावर्स सरूपग्रहणैकस्वभाव एव कर्तव्य इत्येतदर्थ कर्तव्यविधिरुक्त इति निश्चयो ज्ञेय इत्यर्थः॥ १९ ॥ एवं पूर्ण निरोधस्वरूपं निरूप्य तत्साधकत्वाद्गुणगानस्य सर्वोत्कृष्टत्वमाहुः नात: परतर इति । नातः परतरो मन्त्री नातः परतरः स्तवः। नातः परतरा विद्या तीर्थं नातः परात्परम् ॥ २० ॥ मत्रस्तवविद्यातीर्थादीनां लोकवेदोत्तफलप्रापकत्वालोके वेदे च महत्त्वं भवतु, न तु तदतिरिक्ते । गुणगानस्स तदतीतफलप्रापकत्यातदतीतसर्वोत्कृष्टत्वमपीत्येतज्ज्ञापनार्य फल- स्तुतिरुक्ता । यद्यपि मघादिद्वारा चित्तशुद्धया निग्रहादिकं भवति, तथापि महता क्लेशेन, तत्राप्येतदपेक्षया फल खल्पतरं, गानद्वारा निग्रहादिकमपि सुसेन भवति, फलमपि महत्, सर्वोत्कृष्टमिति गुणगानस्सैव सर्वातिशयवत्त्व निरूपितम् ।। २० ॥ श्रीमदाचार्यचरणसरोजसततस्मृतेः। ममार्थावगतिर्जाता दुर्योधप्यत्र निश्चितम् ॥१॥ तेन सङ्गतमेवाहं मन्येन तदपि स्वतः । संशोधयन्तु सुधियः कृपया मयि वत्मलाः ॥२॥ अहर्निशंविचारेस्मिन्नेवं निष्ठति यन्मनः । अतो हि लिएने नूनं प्रवृत्तिम न चान्यथा ॥ ३॥ श्रीविष्टलेसम्पदाम्बुजरेणुग्व सर्वस्वमित्यनिशमस्तु ममामिलापः ।। यस्पर्शतः सपदि दैवजने खतः श्रीवैश्वानरोक्तपदवी फलिताखिला स्यात् ॥४॥ इतिश्रीनिरोधलक्षणविवरणं श्रीवल्लभकृतं समाप्तम् ।।

श्रीकृष्णाय नमः। निरोधलक्षणम् । श्रीपुरुपोत्तमकृतविवृतिसमेतम् । प्रणम्य श्रीमदाचार्यान् स्वीयेपु करुणावतः । निरोधलक्षणग्रन्धं तदासश्चिन्तयत्ययम् ॥१॥ अथ श्रीमदाचार्यचरणाः सन्यासनिर्णये भक्तिमार्गीयत्यागस सिरहानुभवार्थ कर्तव्यतां गुरुद्वयकथनमिन्नकालफलवोधनाभ्यामधिकारिभेदं च सूचयित्वा, तस्य त्यागस प्रेमैकसाध्यत्वं, तत्र साधनाकाक्षायां भावनासिद्धस्य भावमानस्यैव साधनलं, ततो विलक्षणाधिकारे गुणानां जीवनहेतुत्वं चोक्तवन्तः । तत्र कीदृशस्याधिकारिणः कीदृश्या भावनया जातः कीदृशो भारः साधनतां प्राप्नोति, गुणाश्च तन बाधकत्वेनोक्ता अपि कीदृशाधिकारे केन प्रकारेण जीवनहेतुतया साधकत्वं प्राप्नुवन्तीत्याकासोत्पद्यते । किंच, भक्तिवर्धिन्यां जातभक्तिदृढयीजभावस्य भगवदुक्तस्वविचारितरीत्या भजमानम्य भक्ति- प्रवृद्ध्यर्थं गृहत्यागपूर्वकश्रमणकीर्तनरूपं साधनमुक्तवन्तः । अहढवीजभावस तु गृहे स्थित्वा पूजाश्रवणादिभिः स्नेहासक्तिव्यसनपर्यन्तमुपाय तेन कृतार्थतां चोक्त्वा, अग्रे त्यागकरणादे- रावश्यकत्वमुक्तवन्तः । तनापि भक्तिवृद्धे. किं स्वरूपमित्याकाहोत्पद्यते । तथा सेवाफल- विवरणे चायफलाभावे सेवाया अनाधिदैविकीत हेतुत्वेनोक्तवन्तः । तत्रापि सेवाया आधिदैविकीत्व कथ स्यादित्याकासोत्पद्यते। एव तर तनाकाटोत्पत्तौ तरत्यास्ता आकाक्षाः पूरयितु यथा भगवानवतारदशायां भक्तरग्गोचराभिर्गुणलीलाभिः प्रपञ्चनिस्मृतिपूर्वक- स्वासक्तिरूप निरोध प्रमेण विदधानो जीवानुद्वरति, तथेदानीमनसतारदशायामपि अवणकीर्तनादिगोचराभिर्गुणलीलाभिरेव क्रमेण निरुन्धानो जीवानुद्वरतीति योधनाय स्यागपूर्वक श्रवणजन्यभावनया भजता, त्यागपूर्वक कीर्तनेन भजता, गृहे स्थित्वा पूजादिना च भजता, यथाधिकार भक्तिप्रवृद्ध्यात्मकपोक्तनिरोधार्य यतमानेन भाव्यम् । तत्रापि त्यागपूर्वक श्रवणजन्यभावनया भजता कृपा परीक्षणीया, गुणाश्च गातन्या., स्वावस्था च परीक्षणीया, स्वाधिकारानुसारेण स्वस्मिन् निरोधोत्पत्तिराशसाविशेपै. परीक्षणीया । कीर्तनेन भजता तु कीर्तनजन्यसुखविशेभक्तिवृद्धिः परीक्षणीया, केपा च परीक्षणीया । गेहे स्थित्वा १. तमुवित्तजयोस्तु भावनाप्रधानत्वमिति भाव । आधिदैविकी सेवा प्रेमद्वारा त्यागसाधिकेति । ३ सागसभ्यासयोर्भेदो गीतायाम् । प्रवर्तकरवात् तनाहु । ५ शानस्वेन कपारवेन कार्यकारणभाव । २. सध्यामाधम उक्त्वा गृहस्थाश्रम भा। ४ तथा फलस्य ४३ श्रीपुरुषोत्तमकृतवितिसमेतम् । मजता तु रोवाया आधिदैविकीलाय श्रवणकीर्तनध्यानान्यभीक्ष्णं विधेयानीत्युपदेष्टुं निरोधलक्षणग्रन्थमारभन्ते। मनास्य ग्रन्यस्य सन्न्यासनिर्णयादिशेपत्वेन विचारे किं बीजमिति चेत् ? उच्यते । अत्र अन्यकरणप्रतिज्ञाऽभावेन यत्किचित् साकाहसे निश्तेि, सन्यास- निर्णयस्थभावनादेः स्वरूपाकाझोत्यापकत्वात्, गुणानां जीवनहेतुत्वकथनम्य च प्रकाराकाटोत्थापकलात् , भक्तिवर्षिनीस्थमक्तिवृद्धिपदस्य च स्वाभिधेयखरूपाकासो- स्थापकत्वात् , सेवाफलविवरणस्थानाधिदैविकीपदम्य चाधिदैविकीकथंभावाकाडोत्थापक- वात्, अनत्याशंसागुणकीर्तनादिकथनस्य चाकस्मिकतया कैमर्थ्याकाहोत्थापकत्वात्, परस्पराकाहापूरकत्वं दयालुत्वादिश-दानां तत्रत्यप्रमेयस्यापि प्रत्यभिज्ञानं चेति जानीहि । न च भक्तिवर्धिनीस्थपदप्रत्यभिज्ञाऽभावात् तच्छेपन्याभावः शमः । सन्यासनिर्णयप्रमेये- गैव तत्प्रमेयस्यापि क्रोडीकरणाददोपात् । परस्पराकाहापशादेव श्रीहरिरायैरपि 'श्रीकृष्ण- रमविक्षिप्ते'सादिश्लोकपञ्चकस्य स्वतनत्वेन प्रतीयमानम्यापि जलभेदशेपत्वमङ्गीकृतम् । तस्मादेवं शेषत्वैकवाक्यत्वयोगीकारे न किविद्वाधमिति तच्छेपत्वेन व्याख्यायते । तन मन्यासनिर्णये त्यागिनो भावनामात्रसिद्धभावस्यैव साधनलेन साधितत्वात् , न्यागिषु प्रथमाधिकारिकृतस्य त्यागस्य विरहविषयकानुभवार्थत्वात, रिहम्य च प्राकट्यतिरोभाव- जनितदुःसात्मकत्वात् , तादृशस्याधिकारिणः कृष्णे आमक्त्या गृहम्पानां याधकत्या- नात्मत्वयोर्भासने कृते, ईपत्प्रपञ्चविस्मृतिपूर्वनया भगवदामक्ती जातन्वे, व्यसनेन च भगवद्गुणलीलाप्राधान्यं निहाय भगवत्स्वरूपपरतायां जातायां, दैन्ये मति जन्मप्रकर- णोत्तरीत्या भक्तदुःखस्यैव भगवत्प्रादुर्भावहेतुत्वज्ञानात् , तादृशदुःयागमयोत्पचन इति । तत्र ताटगदुःखजनकातिगयन्यैव भक्तिवृद्धिरूपत्वं, प्रपश्यविस्मृतिभगवदामक्तयोराधि- क्यात । अतः नाशनिगेधम्य प्रस्तृयमानदु.सागंमारूप तझारनाम्प च कार्यलक्षणमिति प्रथमं तदाहुः यचेत्यादि। पच दु:ग्वं यशोदाया नन्दादीनां च गोकुले। गोपिकानां तु यद् दुःग्वं तद् दुग्यं स्यान्मम कचित् ॥१॥ नत्र दुःपाधारभूतानां प्रयाणां कथनेन तेपा भाषनैविध्यं योनितम् । चकारत्रयेण तत्तत्मगातीयभावयन्तः कमादेः कालतोऽज्ञानाच दुःखभाजः मंगृहीना. । तदानी कंसादि- वदिदानीमध्यमुरान्तराणां मभवात् । कालाज्ञानयोगपि संभवाच । फयिदिति अनिर्णीत- देशविशपोल्या तत्र तत्र भगरहेगेषु पर्यटितृत्वसूचनेनाधिकारिणस्यागिन्यं योधितम् । एवमग्रेपि ज्ञेयम् । नधा च ये बालादिभारे, ये च पोगण्डादिमावे, ये च प्रौदादिमाये आसक्ताः, तेषां दुःरा दृष्ट्वा तन्नित्यर्थ तादृशतादृशरूपेणेय भगवान् तत्तद्भावानुमृतं सुखं दातुं प्रकटीभवतीति भगवत्प्राको तादृश दुःखमेव साधनमिति सस्मिन् तदाशंसोत्पादको .

४४ निरोधलक्षणम् । यः प्रपञ्चविस्मृतिपूर्वकभगवदासक्तिरूपो निरोधः स एव कृष्णे व्यसनस्स फलम् । तदाशंसैन प्रथमाधिकारिणो भक्तिवृद्धिलक्षणमित्यर्थः । अन स्यादित्याशंसासूचकम् । यद्यपि आशंसावचने लिडिति सूत्रेण आशमावाचिन्युपपद एव लिइ विहितस्तथापि लोक उपपदाभावेपि देवदत्तश्चेदागच्छेद् मत्कार्य भवेदित्यादिप्रयोगदर्शनान्न दोपः । यदि च लोकोक्तिर्न प्रमाणमिति प्राधिनायां या सम्भावनायां वा लिडिप्यते, तदापि तयोराशंसामूलक- त्वादाशंसा न व्यभिचरति, तस्माददोपः ॥१॥ अथ मध्यमाधिकारिकृतस्य त्यागस्य विरहसामयिकासक्तिममन्यायकमगवदनु- भवार्थत्वात् तस्य भक्तिवृद्धिखरूपं तादृशनिरोधलक्षणकथनमुसेनाहुः गोकुल इत्यादि । गोकुले गोपिकानां तु सर्वेपां ब्रजवासिनाम् । यत्सुखं समभूत् तन्मे भगवान् किं विधास्यति ॥२॥ तुशब्दः पूर्वव्यावृत्त्यर्थः । एपोत्यन्त विप्रयोगेण दुःखित इति रसप्रधान इति प्राकट्यजनिका अत्यन्तासक्तिरेव तस भक्तिवृद्धिरिति यथाकथञ्चित् दर्शनजन्यसुखाकाहा- रूप कार्य तद्भक्तिवृद्ध्यात्मकनिरोधलक्षणमिति ज्ञापनाय पूर्व गोपिकापदोक्तिः । अन्येषां तद्वत् सर्वात्मभावाभावेन ततो न्यूनत्वात् पश्चाटुक्तिः । किंशब्दो विकल्प द्योतयति । 'विकल्पे किं किमूत चेति कोशात् । आशसायां भविष्यत्काले लट् ॥ २ ॥ अघोत्तमाधिकारिकृतस्य विरहानन्तरभापिसाक्षात्कारार्थत्वात् तस्य तत्साक्षात्कारोत्तर यदा पुनर्बजस्थानामिप तिरहस्तदा तस्य पूर्वानुभूतस्य लीलासुखादिस्मरण- सवलितविरहमामयिकानुभववत्त्वात् तदा भगवतः स्वस्मरणोत्पादको निरोध एव तस्य भक्तिवृद्धिरूप इति तम्य स्वस्मिस्तदभिज्ञापक लक्षणमाहुः उद्धवेत्यादि । उद्धवागमने जात उत्सवः सुमहान् यथा । वृन्दावने गोकुले चा तथा मे मनसि कचित् ॥ ३ ॥ अनापि पूर्वश्लोकोक्ता स्यादिति क्रिया अनुपजते । तथा च तादृशस्मरणोत्सवा- दिविपयिणी आशसैव स्वस्मितादृशभक्तिऋद्धिज्ञापक लक्षणमित्यर्थः । अत्र निष्वपि श्लोकेषु गोकुलादोक्त्या पूर्वोक्तरीतिको भाष श्रीनजनाथम्परूपास- तानामे निक्षित., नान्यस्वरूपासतानामिति ज्ञापितम् । ते एप परमानुग्रहविपया इति च । तृतीये नृन्दापनपदोक्तिस्तु तेष्वपि आधिक्यज्ञापनार्येति बोध्यम् । तेनैतादृशपुष्टिमा गीयविषयक एवाय विचार., न तु सर्वसाधारण इत्यपि बावितम् । चाचामते स्वन लोकत्रये मुसोधिन्यायुक्तम्य निरोधस्सानश्यभावस्चको मनोरथ एवोच्यते । श्रीहरिरायाणा मते तु निरोधनिमित्तकारण मनयोर्भावनगुणगानयामध्ये प्रथम भावनमुच्यते, तच दुर्लगत्व- योधनाय म्यविषयकतया प्रार्थनारपेणोच्यते । मन्मते विदमाशसाय भक्तिवृद्धिज्ञापक- लक्षणतयैवोच्यत इति ततो भेद इति जयम् ॥ ३ ॥ त्यागस्य 'महतां कृपय'ति पदद्वयमनाप्यनुपाते । अतो महता कृपया गोविन्दम्य गुण- ४५ । श्रीपुरुपोरामकृतविवृतिसमेतम् । एवं त्यागिपु ये श्रवणजन्यभावनामात्रपरास्तेपां भक्तिवृद्धिरूपं भावनात्मकं निरोध- माशंसारूपकार्यमुसैनामिज्ञानामुक्तता, ये त्यागिषु ततोऽधिका गुणगानासक्तास्तेपा भक्तिवृद्ध्यात्मकनिरोधस्य स्वस्मिन्नभिज्ञापकं लक्षणं निर्विदन्त प्रथमं गुणगातृपु प्रयमाधिकारिणः स्वसिंन्तदभिज्ञापक लक्षणमाहुः महतां कृपयेत्यादि । महतां कृपया याबद्भगवान् दययिष्यति । तावदानन्दसन्दोहः कीर्त्यमानः सुग्वाय हि ॥४॥ अत्र यावदिति पदमुत्तराधिज्ञापकं तावत्पद च पूर्वावधेः । महत्पदं च पारोक्ष्येण प्रजभक्तज्ञापकम् । तथा च तासां कृपया भगवान यावद्दययिष्यति वक्ष्यमाणरीतिकबैकतानत्वसंपादिकां दयां करिष्यति तावत् तत. पूर्व कीर्यमानः 'नामान्यनन्तस्यै त्युक्तरीत्या स्मरणपूर्वक वर्ण्यमान. आनन्दसन्दोहः श्रीमद्न्दा- पनेन्दुप्रकटितरसिकानन्दस्स य. समूहः लीलारूप. हि निश्चयेन सुखाय भवतीति शेषः । अतन्तस कीर्त्यमानलीलया सुसजनन व्यसनोत्कर्परूपस्य निरोधस्स खस्मिन्नभिज्ञापक लक्षणम् । हननपवेन प्रपञ्चविस्मृत्याधिक्यादित्यर्थः ॥ ४ ॥ अथैवकर्नु पूर्वदशात आधिक्य कीर्तनपरता च पूर्वोक्तमहत्कृपयाधिका भवतीति ताशनिरोधस्य स्वस्मिन्नभिज्ञापक लक्षणमाहु. महतां कृपया यदित्यादि । मरतां कृपया यद्वत् कीर्तनं सुखदं सदा । न तथा लौकिकानां तु स्निग्धभोजनरूक्षवत् ॥५॥ महतां पूर्वोक्तानां कृपया यद् यथा कीर्तन लौकिकस्साग्रे निषेध्यत्वात् भक्तकृतं लीलाविषयक कीर्तनं सदा सुग्वटं तथा लौकिकानां न, लौकिककर्तृकं लौकिक- विषयकं च कीर्तन न, सुसद न। अनापि भवतीति शेप । तन दृष्टान्त । स्निग्धभोजन- रूक्षवदिति । स्निग्ध भोजन यस्यासौ स्निग्धभोजन , स्निग्धभोजनस्य रूक्षेण तुल्य भवतीति निग्धभोजनरूक्षात् । तथा च लौकिककर्तृके तद्विपयके च कीर्तने असुखदत- मानपूर्वकमलौकिकपिपयके मक्तकृते कीर्तने यत्सुसदत्व 'कय विना रोमहर्प द्रवता चेतसा पिना, पिनानन्दाश्रुकलया शुद्ध भत्तया विनाशय' इत्युक्तधभैज्ञीयमान यत्सुखदत तदेव पूर्वस्मादुत्कृष्टम्य निरोधस्य सस्मिनभिज्ञापक लक्षणमित्यर्थः ॥५॥ अथ ततोप्युत्कृष्टाधिकारे पूर्वस्मादधिकस्य निरोधग्य म्वस्मिन्नभिज्ञापक लक्षणमाहुः गुणगान इत्यादि। गुणगाने सुग्वावाप्सिर्गोविन्दस्य प्रजायते। यथा तथा शुकादीनां नैवात्मनि अतोन्यतः ॥६॥ गाने रागानुसारेण भगवद्गुणोपयन्धयुक्तपदवाक्यानां कीर्तने सुग्वायाप्तिर्यथा येन ४६ निरोधलक्षणम् । प्रकारेण प्रजायते प्रकर्षाजायते, तथा तेन प्रकारेण शुकादीनां ज्ञानिभक्ताना आत्मनि हृदये न. अन्यतः कुतः । ज्ञानभक्तिभ्यामेव चेन्न भवति तदा तदतिरिक्ता- खेतोः कुतः स्यादित्यर्थः कैमुतिकेनोत्तः । तथा च भगवद्गुणगाने तादृशसुखावाप्तिः पूर्वस्मादुत्कृष्टस्य निरोधस्य खस्मिन्नभिज्ञापकं लक्षणमित्यर्थः । एवं च त्यागकर्तृणां मध्ये कीर्तयितृषु गुणगातृषु च महत्कृपा हेतुत्वेनापेक्षितेति घोधितम् ॥ ६ ॥ सा कृपा तत्कार्यभूतं गुणकीर्तनादिजन्यं सुखं च कथं स्यादित्यपेक्षायां तत्र भगव- स्कृपारूपं हेतुं प्रकारभेदेनाहुः क्लिश्यमानानित्यादि । क्लिश्यमानान् जनान् दृष्ट्वा कृपायुक्तो यदा भवेत् । तदा सर्व सदानन्दं हृदिस्थं निर्गतं बहिः ॥७॥ जनान् जननधर्मवतः स्वकीयान् क्लिश्यमानान् खप्राप्त्यर्थं दुःखितान् दृष्ट्वा यदा कृपायुक्तो भवेत् अत्यनुग्रहं कुर्यात् तदा हृदिस्थ सर्व सदानन्द यहि- निर्गतं भवेत् । पूर्वार्धाता भवनक्रियाऽत्राप्यनुपजते । तथा च कीर्तयिवृणां भगवद्दयया भावनाप्रावल्ये दहरविद्योत्तस्येव सर्वस्यान्तरम्य बहिःप्राकट्येन महतामपि प्राकट्यात् तत्कृपया स निरोधः फलमुपदधातीत्यर्थः । तेनेदमपि फलोपधायकस्य निरोधस्यैव लक्षणम् ॥७॥ अनः परं की यिनृषु ननो विशेपं वक्तुं तथा तमाहुः सर्वेत्यादि । सर्वानन्दमयस्यापि कृपानन्दः सुदुर्लभः। हगनः स्वगुणान् श्रुन्या पूर्णः प्लापयते जनान् ॥ ८॥ उत्तरीत्या मर्यम्य मदानन्दम्पम्य पहिः प्राकट्य जाना या सदानन्दता, तेन सर्वानन्दप्रमुग्म्यापि कृपाजनिनो य आनन्दः सः गुनगं दुर्लभः । कुन इत्याकाङ्क्षायां तस्स भगवद्दानहतुकलं म्फुटीकुर्वन्नि हगत इत्यादि । हदि स्थिनो भगवान् कीर्यमानान म्बगु- पान शुन्या पूर्णः बहुधा निविष्टः, कृपापदम्य पूर्वमुत्तत्वान् कृपया वा पूर्णः सन् जनान सकीरान शाययन, अन्नही ग्मन्यामान कगति । अत्र श्रुत्वनि पदागुणानां कीर्त्य- मानन्वमाविकम् । नवा च न कृपया जनिना यो भगवदानन्दः नन नद्भवति, नान्यत इन्यता दुर्लभ प्रत्यर्थः । अन इदं फलामकम्प निरोधम्य लक्षणम । एव च भनिवृद्धः म्परूपमा पयानोति । तेन पनि न्यागपु माधनांदतान्यपि 'मन्टन उभयाविशेषा'- दिनि न्यायेन यत्र भगवतम्न ककन्यगुणगानकीर्तनयोः अयणेन्छा नपा गुणगानादी प्रवृत्तिः, यत्र च मा न नेपां भारनामात्र पर प्रनिरिति मुग्याधिकारिषु व्यसम्या पोध्या । एतेन पापक्षणप्रसार उक्तः ॥ ८॥ *. - J ४७ श्रीपुरुपोत्तमतपितिसमेतम् । एवं नानाविधस्स निरोधस्स लक्षणान्युक्त्वा तत्र साधनमुपदिशन्ति तस्मादित्यादि । तस्मात् सर्व परित्यज्य निरुद्धः सर्वदा गुणाः । सदानन्दपरैर्गेयाः सचिदानन्दता खतः ॥ ९॥ यस्माद्भावनापेक्षयापि भगवान् गुणगानेन अधिकं प्रसीदति तस्मात् सर्व परि- त्यज्य भक्तिमार्गरीत्या प्रेरणा सर्व गृहादिकं सवासनं त्यक्त्वा निरुद्धः प्रपञ्चविस्मृतिपूर्वक- भगवदासक्तियुक्तः सदानन्दपरैः हृदयस्थलीलामृष्यकतानैः सर्वदा अभीक्ष्णं काला- विच्छेदेन वा गुणाः गेयाः गानविषयीकार्याः । तत्रावान्तरफलमाहुः सचिदानन्दता खत इति । खतो यदृच्छातः गुणगानातिरिक्तसाधनं विनैव सचिदानन्दता अक्षरब्रह्मता भवति । ततः इति पाठे गुणगानादेवेत्यर्थो योध्यः । एतेन गुणगातुः सावस्थापरीक्षण- प्रकारचोक्तः । एवं च सिद्धान्तमुक्तावत्यां 'ततः संसारदुःखस्स निवृत्तिह्मयोधन'मित्यनेन यदवान्तरफलमुक्तं तदीदृशानामेव भवतीति घोधितम् ॥ ९॥ एवं त्यागिपु मुख्याधिकारिणां यादृग्निरोधस्य सिद्धिः तत्खरूपमुत्तवा तत्र खानुभवमग्रिमसिद्ध्यर्थ प्रमाणयन्तस्तद्वर्णनप्रयोजनमाहुः अहमित्यादि । अहं निरुद्धो रोधेन निरोधपदवीं गतः। निरुद्धानां तु रोधाय निरोधं वर्णयामि तम् ॥१०॥ अहं निरुद्धः पूर्वोक्तरीत्या भगवदासक्तः रोधेन संसारावेशराहित्यादिन्द्रियनि- ग्रहेण निरोधपदवीं गतः निरोधमार्ग प्राप्तः सन् निरुद्धानां रोधाप संसारावेशरा- हित्यार्थ तं पूर्वोक्तनिरोधं वर्णयामि । तुः प्रयोजनान्तरशङ्कानिरासे । त इति पाठे तु चतुर्थी । तथा च यः कथं भक्तिवृद्धिरित्यादिकं पूर्व पृष्टयान् तस्मै तुभ्यं तदर्थमग्रे वर्णयामीत्यर्थः ॥ १० ॥ एवं मध्यमाद्यर्थ निरोधवर्णनं प्रतिज्ञायोपपादनपूर्वकं तदुपयोगिनिरोधस्वरूपमाहुः हरिणेत्यादि । हरिणा ये विनिर्मुक्तास्ते मग्ना भवसागरे । ये निरूहास्त एवात्र मोदमायान्त्यहर्निशम् ॥११॥ थिनिर्मुक्ताः विशेषेण त्यक्ताः, स्वीयत्वेन नाङ्गीकृता इति यावत् । अत्रेति गुणगाने भावनायां च । तथा च संसारावेशस्य भगवदनङ्गीकृतलक्षणत्वातद्विरुद्धा या गुण- गाने, भावनायां चाहर्निशं मोदमातिः. मा निरुद्धानां सामान्यलक्षणमित्यर्थः सिध्यति॥११॥ एवं लक्षणं निरूप्य मावकापेक्षया गुणगातृपु विशेपमाहुः गुणेष्वित्यादि। गुणेप्याविष्टचित्तानां मयंदा मुरवैरिणः। संमारविरहगो न स्यानां हरियमुग्णा १. यमन इति श्रुते ।

निरोधलक्षणम् । मुरवैरिणः जडदोपनिवर्तकस्स गुणेषु गोवर्धनोद्धरणादिषु सर्वदासक्तचित्तानां संसारच विरहक्लेशश्च न स्यातां किन्तु हरिवत् सुखम् । तथा च भावकाना दुःसा. शसया सुखाकाझ्या भगवत्कृतस्मरणाकाङ्क्षया च विरहकृत दु खमेव बहुलम्, तत एव च शीघ्र लयः । गाणा तु ससारावेशाभावान्न लौकिक दुखम्, विरहस्फूर्तावन्तर्निष्ठा, पहिरनुभवे च गुणगानम् । अतो भगवत इव सुखमित्यर्थः ॥ १२ ॥ एव भावयिटगानोविशेपमुक्त्वा तस्य कृपाहेतुकत्व निगमयन्ति, मध्यमाधिकारे हेतु तघ्यवस्था च वदन्ति तदेत्यादि । तदा भवेदयालुत्वमन्यथाऽक्रूरता मता। थाधशङ्कापि नास्त्यत्र तदध्यासोपि सिध्यति ॥ १३ ॥ यदा पूर्वोक्ता रीति तदा भगवतो दयालुत्वं भवेदिति पूर्वोक्तम्य निगमनम् । अय मध्यमस्य व्यवस्थोच्यते अन्यथेत्यादि । अन्यथा यदि न गुणाविष्टचित्तता तदा अक्रूरता भगवत , अघातकता तस्मिन् भक्तिमार्गच्युत्यभारहेतुतेति यावत् । सा मता ससारापेशाभावगुणाविष्टचित्तत्वाभावाभ्या युक्तिभ्यामनुचिन्तिता। तथा च तेन मध्यमाधि- कार इत्यर्थ । एतव्यवस्थामाहु याधेत्यादि । अत्र अक्रूरताया वापशड्डा भगवद्विपयका- ज्ञानकृता निरोधच्युनिशङ्का, अपिशब्दात् भावनाप्रावल्यकृतो लयश्च नाम्ति, तदध्याम आसक्तिभ्रमन्यायको भगवदध्यासच मिध्यति । तेनेय सनी मभापनाकट्यरती मध्यमा धिकारिय्यरस्थेत्यर्थ । एतदेव कार्य तअनकम्य ताशनिरोवम्य रक्षण ज्ञेयम् । एतावता भक्तिनपिन्या 'बीजभारे रढे तु स्यात् त्यागाच्छपणकीर्तना'दित्यनन यक्तिद्विमायन- मुक्त तस्य फलमुपपादित ज्ञेयम् ॥ १३ ॥ अधाढयीजभापम्प पूजादिभियंतमानम्य ममाग शसत्त्वात् तम्य व्यवस्था विभि- वदन्त तत्कृतसेवाया आधिदैविकीस्वाय पूर्वमुद्गनिनर्तक सर्वप्रस्तुममर्पणरूप सापनमाहु संसाराशेत्यादि । संसारापेशदुष्टानामिन्द्रियाणां हिनाप । कृष्णस्य मर्ववस्तृनि भन्न ईशाम्य योजयेत् ॥ १४ ॥ भगवर्ममामयोचिरागो रिपये स्थिरः। गुणेर्ह रिमुग्रस्पर्शाग्न दृः भानि चित् ।। १५ ॥ एवं ज्ञात्वा ज्ञानमार्गादृत्कर्ष गुणवर्णने । अमत्मररलुब्धेश्च वर्णनीया. सदा गुणाः ॥ १६ ॥ ताइन दि समारामेशदुष्टानान्द्रियाणि निग्राधागि । तानि च निगृह्ममाणानि क्षोम समाधीशमार गुपी पुरानी यापारमाधम भात, मसियान प्रापभप पर।

४९ श्रीपुरपोत्तमश्वयितिसमेतम् । जनयन्ति, अतस्तदमावार्थ तेषां हिताय वै निथयेन सर्वाणि वस्तूनि खीयानि कृष्णस्य भून ईशस्य योजयेत् । समर्प्य भगवत्सम्बन्धमिश्रितान्यनुसन्दध्यात् । फलात्मकत्वयोधनाय कृष्णस्येति । अवतारादिवारणाय भूम्न इति । एतावन्मानसाध- नकरणेपि विषयव्यासंगनिवारणसामर्थ्यवोधनाय ईशस्येति । 'तं यथा ययोपासत' इति श्रुत्या तत्कतुन्यायेन चोक्तधर्मपुरस्कारेण चिन्तनसावश्यकत्वात् पदत्रयकथनम् । तेन फलमुपपादयन्ति भगवदित्यादि । एकादशस्कन्धे 'दारान् सुता'निति प्रबुद्धवाक्ये सर्ववस्तुसमर्पणस्य भगवद्धमत्वकथनात्, कविवाक्ये च 'भक्तिः परेशानुभवो विरक्ति'- रियादिश्लोकद्वये विपयवैराग्यस्य फलत्वेन कथनात्, सर्ववस्तुसमर्पणस्य भगवद्धर्मस्स सामर्थ्याद्विपये विराग स्थिरो भवति । तथा च भक्तियर्विन्यां 'स्नेहाद्रागविनाशः सा'दित्यनेन यत्फलमढवीजभावस्स स्नेहादुक्तम्, तत्स्थैर्यकथनेन तजनकस्य स्नेहस्य दाळमवनमन फलत्वेन बोधितम् । एव सर्वसमर्पणात्मकं योजनमेतादृशस्य निरोध- लक्षणमिति च । आसक्तिदााय साधनान्तरमाहुः गुणैरिति । द्वितीयस्कन्धे 'विचक्षणा यचरणोपसादना'दिति शुकवाक्ये कीर्तनप्रणालिकया भगवतिं प्राप्नुवतां गतलमत्वकथनेन कीर्त्यमानैर्गुणः हरिसुखस्पर्शात् लौकिक दुःखं कर्हि चिदपि न भाति, न ज्ञानविषयीभवनीत्यर्थः । अत्र सर्ववस्तुयोजनस्स पूर्व कथनेन तस्या- धिकाररूपता पोधिता । तेन 'श्रद्धामृते'त्यारभ्य आत्मनिवेदिनां भक्तिफलयोधक- मेकादशस्कन्धीय भगवद्वाक्यजातं स्मारितम् । तेनात्मनिवेदनपूर्वक क्रियमाणेन गुण- गानेन दुःसानुसन्धानाभावरूप फलं सिध्यतीति बोधितम् । एवं फलमुपपाय दाार्थ तस्कृतिमुपदिशन्ति एवमित्यादि । एवं पूर्वोक्तरीत्या गुणवर्णने ज्ञानमार्गादुत्कर्ष- माधार्य, अमत्सरैरलन्धैश्च परोकर्पामहन भत्सर., लोभो गर्धः, अत्यन्तामिलापः, ताभ्यां दोपाभ्यां रहितै., सर्वदा गुणा वर्णनीयाः । उत्कर्ष इति प्रथमान्तपाठे तु गुणैः हरिसुखस्पर्शात् दुःखाभान ज्ञात्वा गुणवर्णने ज्ञानमार्गादुत्कर्ष. सिध्यतीति शेषेण वाक्यं पुरणीयम् । तथा चैतदज्ञात्वा गुणवर्णने दुःखाभानमानम् । ज्ञात्वा वर्णने खेप उरकर्प इत्युक्त भाति । तथा चैव गुणवर्णने ते वामक्ती 'तगुगेपु प्रसक्ता हि तदासक्ता भवन्ति हीति न्यायेन भगवदामक्किदाधे भक्तिवर्धिन्युक्ता गृहामचि हस्सानां पाधकल्यानात्मत्व- भान च दृढीभवतीत्यर्थचलन घोधितम् । एन गुणगान चासक्तिगतो निरोधलक्षणमित्यपि । अथ व्यसनदाटीय भगानि साक्षात् परम्परया च म्पीयेन्द्रियविनियोगादिरूप साधनान्तरमाहुविभि हरिमूर्तिग्त्यिादि । हरिमूर्तिः सदा ध्येया संकल्पादपि तत्र हि । दर्शन स्पर्शनं स्पष्टं तथा कृतिगती सदा ॥ १७ ॥ १दुसानुसन्धानरूपमिति पाट।

५० निरोधलक्षणम् । श्रवणं कीर्तनं स्पष्टं पुत्रे कृष्णप्रिये रतिः । पायोर्मलांशस्यागेन शेषभावं तनो नयेत् ॥१८॥ यस्य वा भगवत्कार्य यदा स्पष्टं न दृश्यते । तदा विनिग्रहस्तस्य कर्तव्य इति निश्चयः ॥ १९ ॥ योऽदृढचीजः व्यसनाथ यतते, तेन हरेभंगवतो मूर्तिः स्वयं सेव्यमाना सदाभीक्ष्णं निरन्तरं या ध्येया, भगवदभिन्नत्वेन ध्यातव्या । हि यतो हेतोः । तत्र मूर्ती संकल्पा- दभिन्नताविचारादर्शनं स्पर्शनं चक्षुपस्त्वच कार्यं स्पष्टं स्वरूपदर्शनेन तत्स्पर्शनेन च भगवत्सम्बन्धितया स्फुटम् । पूजाप्रवाहेण तत्र सन्निधाने लन्धे अन्तर्यामिब्राह्मणो- क्तन्यायेन, गुणोपसंहारे कार्याख्यानाधिकरणे 'सम्बन्धादेवगन्यत्रापी ति सूत्रेहीकृते, निवन्धे च तद्रूपं तत्र च स्थित'मित्येतद्वोधिते भगवदावेशे, वह्ययोगोलकन्यायेन च भगवतस्तद्व्याप्य बर्भािवात् स्फुटमित्यर्थः । एतदेव हस्तपादयोः कार्येऽतिदिशन्ति तथा कृतिगती सदेति । उक्तन्यायेन यथा पूर्वोक्तं द्वयं भगवत्सम्बन्धि स्फुटम्, तथा कृतिगती हस्तपादयोः कार्ये भगवत्सेवायां तदर्थ चलने च सदा भगवत्सम्बन्धिनी स्पष्टे । पूर्वोक्तं स्पष्टपदगन विभक्तिलिङ्गविपरिणामेन सम्बध्यते सन्देशात् । श्रोत्रपाक- कार्ययोस्तथात्वमाहुः श्रवणं कीर्तनं स्पष्टमिति । एतयोः प्रकारान्तरेणापि भगव- सम्बन्धित्वस्य मर्वमम्मतन्वं बोधयितुं स्पष्टपदम्य पुनरुक्ति । उपस्थे भगवदुपयोगित्वस्या- स्फुटव्यात् तस्य भगतत्सम्बन्धित्वाय प्रकारमाहुः पुत्रे कृष्णप्रिये रतिरिति । 'कामः राहत्पनः स्मृतः,' 'महल्पप्रभवान् कामा'नित्यादिवाक्यैः सङ्कल्पस्य पुत्रे कामे कृष्णम्य प्रिये सति रतिरुपस्थकार्य भगवत्सम्बन्धि भवतीति शपः । गोपालतापनीये 'यं मां स्मृत्वा निष्कामः सकामो भवती'नि गान्धर्वी प्रति भगवामयम्म श्रारणाद्वगवड्यानात् ताश- सङ्कल्पेन भगवद्विपयककामोत्पत्तौ सापि भवतीत्यर्थः । भगवद्विपयककामाभावे तु यधो- पस्थहितं भाति तथा प्रकारस्त्वग्रे वाच्यः । पायोनियोगमाहुः पायोरित्यादि । पायो कार्य हि विसर्गः, स चात्र मलांशत्यागरूपः, तेन कार्येण तजनकस्पेन्द्रियम्य तनी शेपमा नयेत् । भगवति विनियोज्यमाने स्वशरीर तच्छोधनद्वारा गुणभाव प्रापयेत् । अनायमर्थः । वेणुगीते अक्षण्वता'मित्यत्र सुनोविनीस्थास्थिन्द्रियफलचोधिकासु कारिका यद्रोमोद्मरूपं पायुकार्यमुक्तम् , तथा 'एपां तु भाग्यमहिम नि प्रक्षिताध्यायश्लोक विवरणे 'रोमायखेदो दशमकार्य' मिन्युक्तम् । या तृतीयस्कन्धे 'मुश्चन्मीलदृशाऽशु च' इत्यनानन्दाचमोनगरूपं तत्कार्यमुक्तं. तत् प्रणमापिकारे न सम्भवति, द्वितीय कन्ये 'तदश्ममारं हृदय मित्सन तथा निर्णयात् । अतोत्र 'अन्नमशिनं वेधा भवतीत्यादि- सन्दोगश्रुत्युक्तोऽननयोः स्थूलधातुः मूवपूर्णपात्मको यश्च 'कफः पित्तं मलः खेपु प्रवदो गखलोम च । कर्षविपिका चेति धातूनां क्रमशो मला' इति वैद्यकोक्तो मलांशः, म हि पायुनवेन्द्रियेण तत्तदेहछिद्रद्वारा निर्गच्छति । तायतैर तस्पेन्द्रियम्स विनियोग इनिगौणत्वेन शेपता । किय, पूर्व 'ससारापेशदुष्टाना'मितीन्द्रियविशेषणेन मध्ये घामत्सरैर- श्रीपुरुपोचमकृतवितिसमेतम् । लुपैवेति कथनाद्गुणवर्णनकर्तृपु तत्सत्तायोधनेनान्ते चोक्तपायुकार्यकथनेन चैतेषा जघन्या- धिकारित्व योधितम् । तेन ये भक्तिवर्धिन्यामढवीजमावा उक्तास्तदर्थोयमुपदेश इति सुचितम् । किश्य, अन मन प्रभृतीना नवाना विनियोजनप्रकार उक्त', घ्राणरसन योस्तुविनियोग. कोपि नोक्त । फिथ, भगवत्प्रिये कामे उपस्थविनियोगकथनात् तदभावे तदभान. सूचित । तथा सति तेपा भगनदुपयोगाभावे कि कार्यमित्याकाक्षाया- माहु यस्य चेत्यादि । वेत्यनादरे । यस्पेन्द्रियस भगवत्कार्य यदा स्पष्टं न दृश्यते तदा तस्येन्द्रियस्य विशेषेण निग्रह सयम कर्तुमावश्यक इति निश्चय । तथा च यदि तन तेषा निग्रह न कुर्यात् तदा, नो चेत् 'प्रमत्तमसदिन्द्रियाजिसूता' इत्युक्तन्यायेन विषयदस्युपु पाते ससारावेशरूप महदेवानिष्ट स्यात्, अतस्तदारश्यामि- त्यर्थ । एवञ्च जघन्याधिकारिणा यदुक्तोपदेशरीत्या करण तदपि तदुचितनिरोधस्येव लक्ष णम् । तत्रापि मुत्प्राप्तिश्चेत् , तदा गुतरा तथेति षोध्यम् । एव करणे उद्वेगनिवृत्या कमेण सेवाया आधिदैविकीत्व सम्पद्यत इत्येतदेन नघन्याधिकारिणा मुरय साधनमिति सिध्यति । एवं सर्वमुपदिश्य नपन्याधिकारिणामेतत्प्रवृत्तिमुत्पादयितु ग्रन्यान्तर उपदिष्टेभ्य साधनान्तरेभ्य एतस्स मापनम्योत्कर्ष वदन्ति नात इत्यादि । नातः परतरो मन्त्रो नात परतर स्तर । नानः परतरा पिया तीर्थ नात परात्परम् ॥१०॥ जघन्याधिकारिणामत. उत्तात् मापन तानान् परनर उत्क्रानर मन्त्रोप्टर रादिर्न । तदावर्तन हि सेवाकरणागवनोक्तम् , अनुकल्पनेन च, भतम्तय यथ । एवमगपि योध्यम् । स्तन वाणा प्रयादिम्तोत्रपाठ, गोपि नया, अनुकल्प यादङ्गत्वाच, पिनक धैर्याश्रये तथैवाहीकारादिति । चिया उपासना, ती गङ्गादि, नयोरपि भगवत्पाभारे निलम्नेन परमाधक वात् , श्रुतानन्यायादग्णात्, भारते च यज्ञती यो ममान फलसेन कथनात् तयोरत्र पृधगति । तेन उपन्यानामपिकारिणामनोक्त योजनादि साधनत्रयमेवात्यावश्यकम् । तार मतामा यसनाना नमेण गृहत्यागोत्तर पूषाक्तनिरोधा स्मकभक्तिद्धिमिद्रिरिति निक। । । गोपा श्रीहरिगयाश्च हरिया ये मिनिमुक्का' इति श्लोकोत्तर समारास गा पान नदय च 'गुणवाषिप्रचित्ताना मित्यादीन् क्रमेण लोकान पर्यात नानाम्नु यन रमेण पेठ, तेन कमेण मया व्याग्व्यातम् । न्याग्न्यानप्रकारम्नु मापा ना इति मया म नानूदित इति दिक् ॥ २० ॥ आचाययकृपया हयाम्पिनेन यत् परिन भगता नरनायकेन । तद्वाजातमसित् पुम्पोत्तमार श्रीविहलेशचरणातदासदास ॥१॥ निभाना साना र समग विचिना निगेधलक्षणपणन विति। ता नापिदिति वामयन अन सत्र मात्र द्वितमुफाव युक्त 1 इत्या कमी माता उद्यत गया मध्यति । २ सयरामपणामा योनन तदा । ३ व्याख्याने प्रकारद्वयम् । भगायनुगुण शाश्वा गला युवोधक्य । तत्राय लिाग ।

r श्रीकृष्णाय नमः। -- निरोधलक्षणम् । श्रीश्यामलात्मजश्रीब्रजराजकृतविवरणसमेतम् । अजस्त्रीहृद्यगिरिपु रोमालियमुनातटे । तदाहुलतिकावृन्दे फ्रीडन्कृष्णो विराजते ॥१॥ गोपीशरतिमार्गाजमार्तण्डाचार्यसंस्कृतः । मयि श्रीगोपिकाधीशनिरोधोऽस्तु महाफलः॥२॥ खाचार्यचरणाम्भोजकृपया तन्निरूपितः । स्वीयसौकर्ययोधाय निरोधः क्रियते स्फुटः ॥३॥ श्रीविठ्ठलेशपादाब्जकृपारससुवृष्टिभिः । निरोधकल्पवृक्षो मे सिञ्चितः फलितोमवत् ॥४॥ श्रीमदाचार्यचरणाः स्वीयेषु कृपया निरोधफलदित्सया निरोधखरूपं विवृण्वन्ति । तस्य फलात्मकानुशयनरूपत्तात्तत्र च प्रथम प्राकट्यमपेक्ष्यत इति यथा प्राकट्यपूर्वका सिद्धो भवेत्तथा निरूपयन्ति । यथेति पूर्व येन प्रकारेण बजे निरोधार्थ प्रभुराविर्भूतः स मयि नास्तीति तदभावजदैन्येन तत्प्राप्त्यर्थ तथा प्रार्थनीयो यथा स भावो भवतीत्याहुः यच दुःखमिति । यच्च दुःखं यशोदाया नन्दादीनां च गोकुले । गोपिकानां तु यद् दुःखं तद् दुःखं स्यान्मम कचित् ॥१॥ यदुःखं यशोदाया नन्दादीनां गोपिकानां गोकुले भगवदाविर्भावात्पूर्वमभूत् तदुःखं मम कचित्स्यादिति सम्बन्धः । भगवदाविर्भावाज्ज्ञायते यत्सर्वेषां तवत्यानां तादृशं दुःखमभूयेन भगवदाविर्भावोऽजनि । अन्यथा भगवान्निःसाधनः दुःखाभावेन प्रकटो भवेत् । चकारत्रयेण तत्सम्बन्धिनामपि तादृग्दुःखमभूदिति भावो ज्ञाप्यत । अन्यथा संसर्गतोपि दोषः स्यात् । कचिदिति स्वस दैन्याधिक्यार्थमयोग्यत्वज्ञापनाय । गोकुल इति पदात्सर्वथा तत्रत्यानां निर्दोपलं ज्ञापितम् । यतस्तत्रानभिज्ञतेति न चातुर्यकापट्या- दिना दुःखमभूत् , किन्तु साहजिकमेव ।। १ ।। एतद्दुःखानन्तरमावि भगवदाविर्मावजं सुखं तरसानामिव भवेदिति प्रार्थनीय दैन्येनेदेसाशयेनाहुः गोकुल इति । गोकुले गोपिकानां तु सर्वेषां ब्रजवासिनाम् । यत्सुखं समभूत् तन्मे भगवान् कि विधास्यति ॥२॥ गोपिकानां गोकुले इन्द्रियकुले, तु पुनः सर्वेषां ब्रजवासिनां भगवदाविर्भावे जाते श्रीप्रजराजकृतविवरणसमेतम् । पत्सुखं समभूत्तत्सुखं भगवान् कि मे विधासति । अत्राय भावः । गोपिकानामिन्द्रियकुले 'आत्मानं भूपयाचक्रु'रिति न्यायेन जात आनन्दो भगवान् पद्गुणैश्चर्ययुक्तः सर्वं कृत्वा सर्वदानसमर्थस्ताक्वरूपं सम्पाट तथा दानं करिष्यतीति समग्रो मनोरथः । तस्य भावस्यात्यन्तं दुर्लभत्वात्क्रमेण भविष्यतीति भावः।तु पुनः सर्वेषामेव प्रजवासिनां भगवदा. विर्माये जाते य आनन्दो जातः, येन वृद्धा पालाम्य उल्लसितहृदयाः नृत्यं छतवन्तरतादृशं भगवान् विधास्यति ॥२॥ ततो भगवन्नित्यस्थित्यात्मकानन्दसुखप्रार्थनामाहुः उद्धवेति । उद्धवागमने जात उत्सवः सुमहान् यथा। वृन्दावने गोकुले वा तथा मनसि फचित् ॥ ३॥ उद्धवागमने जाते वृन्दावने व्रजस्त्रीपु गोकुले नन्दादिपु यथा सुमहानुत्सयो जात- स्तथा मे मनसि कचिद्भगवान्करिष्यतीति सतापमनोरयः । सुमहानिति पदेन पूर्वोत्सवाद्वि- शिष्टत्वं ज्ञाप्यते । तथा हि, उद्धपागमनात्पूर्व मथुरास्थानां ततो भगवानत्रागत इति तत्रया न भगवदीया इति ज्ञानं भगवतो प्रजनित्यस्थित्यज्ञानेन भवेत्तत्र च श्रीमदुद्धवैरत्र नित्यस्थिति ऐति तथैव ज्ञान भविष्यतीति मनस्युत्सवः पूर्वस्माद्विलक्षणो जातस्तथाचार्यः श्रीभागवतयिवृती प्रपश्चितम् । तादृश उत्सवो मम मनसि कचित्स्यादिति भावः । यद्वा, गोकुले वृन्दावने या उद्धवस्यागमने जाते सति तत्रत्य भक्तदर्शनेन तझावप्राप्त्यर्थं तचरण- रजासम्बन्धयोग्यजन्मप्रार्थनात्मक उत्सयो जातस्तथा मम मनसि स्यादिति भावः । यद्वा, उद्धवो भगवता सर्वात्मभावार्थमत्र प्रेपितरतेनावत्यभक्तानामाधिक्यं स्वस च नित्यस्थिति- ज्ञापिता, तेन तस्यागमने जाते सति य उत्सवो वृन्दावने गोकुले वा जातस्तथेति भावः । यतो सर्वात्मभावस्तथैव भवत्येतदेव निरोधस्थानं, तेन तथा दानेच्छा येषु तवैव प्रेष्यन्त इत्युस्सयो भवति तदानायं वा तथा मे गदुपरि भगवन्मनसि तासां वा स्यादिति भावः ॥२॥ नन्तावान्मनोरयो भावनयैव कथं सिध्येदित्याशक्य श्रीमदाचार्यकृपयैव सेत्स्यतीति विश्वासपूर्वकं भावनीय, तेन भविष्यत्येवेत्याहुः महनामिति । महतां कृपया यायगगवान दययिष्यति । तावदानन्दसन्दोहः कीर्त्यमानमुखाय हि ॥४॥ महतां कृपया भगवान्यावत् दयिष्यति दयां करोति तावदानन्दसन्दोहः कृपारूपः कीर्यमानसुखाय पूर्वोक्ताय स भावो भवतीत्यर्थः । यद्वा, भगवान्यावत् महतां कृपां करोति तावरकृपया जीवस्स सतापदैन्यदर्शनेन यां करिष्यति तदा आनन्दसन्दोहा कीय॑मानमुग्वाय स्यादिति भावः । भगवान् कीत्यमार्नसुखाय यावन्महतां कृपया दययि- प्यति तावा स्यात् । अयमर्थः । यावत् गगवान् दयां करिष्यति तावत् महतां कृपया पूर्वमेव दयातः कीर्त्यमानसुखाय आनन्दसन्दोहः स्यादिति भावः ॥ ४॥ भाव्येति पाउः।१ नित्यस्थितिदृश्यति पाठः।

निरोपरभणम् । ननु श्रीमदुद्धवागमनजातोत्सनम्स विप्रयोगस्फ़ा दुसमम्मावनरूपत्यात् मुखस महत्कृपया जातेपि तस्मिन् कथं निर्वाह इत्याशयाहुमहतामिति । महतां कृपया यद्वत्कीर्तनं सुग्नदं सदा । न तथा लौकिकानां तु लिग्धभोजनरूक्षयत् ॥५॥ महता कृपया सदा कीर्तन सुखद भनतीनि शेप । अय भान. । सदा तस्मिनपि समये कीर्तन तेपामेव कृपया सुसदम्, प्राणाधाया जीरनार्थ भवतीति भार । यद्वन्महत्यमित्यर्थ । ननु विप्रयोगे गुणाना जीवनल नानुभासिद्धमित्याशयास्यालौकिक- त्वात्तथा भवति । लौकिकाना न तपात्वमित्याहु न नोति । तु पुन लोकिकाना न तथा सुख भवतीत्यर्थ । तर निदर्शनमाहु सिग्धभोजनरूक्षवदिति । स्निग्धभोजकस्स रूक्षवत् , रूक्षभोजन यघा न सुख जनयति तथेत्यर्थ ॥ ५ ॥ ननु ज्ञानस्य दु सनिवारकत्व श्रूयते, न गुणगानस्येत्याशङ्कयाहु गुणगान इति । गुणगाने सुग्वावाप्तिर्गोविन्दस्य प्रजायते । यथा तथा शुकादीनां नैवात्मनि कुतोन्यतः॥ ६॥ गोविन्दस्य गुणगाने यथा सुसावाप्ति प्रजायते तथा शुकादीनामात्मनि नैव जायते, अन्यत कुत स्यादित्यर्थ । शुकस्य चेद्गगानेन सुरस स्यात्तदा स्वानुभूत स्वयमेत्रा वश्यः कथयेन तु स्वामिन्य एव गान कुर्वन्तीति वदेत् । यद्वा, गुणगाने कृने गोविन्दस्य भगवतोपि यथा सुसावाप्ति प्रजायते तथा शुकादीनामात्मनि नैव भवतीत्यर्थ । अन्यथा भगवानिय तेपि तहु खदु खिता भवेयु । भगवतस्तथाल 'मणिधर' इति श्लोकादिपु निरूप्यते । यद्वा, गोविन्दस गुणगाने या सुखावाप्ति पुटिस्थाना भवति, सा शुकादीना भगवद्गुणगानानन्दसुखानामपि नेत्यर्थ । अयमर्थ । गोविन्दपदेन ब्रजवधूनामिन्द्रियस्य ये गुणास्तद्गुणगानेनैवासा तथा भवति । शुकादीना सर्वावतारचरिन मिश्रगुणगानात्तथाल न भवतीति भाव । अत एव निरोधचरिनकथनग्रस्तावे प्रथमाध्याये सूतोक्तौ तदन्त स्थितो भगवानेवोत्तर प्रयच्छतीति ‘सभगवानथ विष्णुरात'मित्यसिन्पद्ये निरूपितम् ॥६॥ गुणगानमानेणैव कथ भगवान्निरोधात्मके कृपा कुर्यादित्याशक्य तत्स्त्ररूपमाहु लिश्यमानानिति । क्लिश्यमानान् जनान् दृष्ट्वा कृपायुक्तो यदा भयेत् । तदा सर्वसदानन्दं हृदिस्यं निर्गतं यहि ॥७॥ जनान् क्लिश्यमानान् दृष्ट्वा यदा कृपायुक्तो भवेत्तदा हृदिस्थ सर्वसदानन्द वहिनिर्गत कुर्यादिति सम्बन्ध । अवाय भाव । गुणगानस्स विप्रयोगतापे जीवनकम्यभावलात्त त्तापाप्त्यर्थे भगवदिच्छाकाइया तापसहने गुणगाने कृते सति जनान् रौकिकदेहयुक्तान्, यतोऽलौकिकदेहे तापस्त्वानन्दरूप एव भवति, तान् क्लिश्यमानान् दृष्ट्वा, यदेति तस्य ५५ श्रीब्रजराजकृतविवरणसमेतम् । दुर्लभत्यात् कृपायुक्तो भवेत्तदा हृदिस्थं सहदिस्यं सर्वसदानन्दमाधिदैविकशक्तिरूपं पहिर्निर्गतं कुर्यादित्यर्थः । गुणगानकर्तुभावात्मकखरूपं तवृदिस्थ यहिः प्रकटं कुर्यादिति वा ॥७॥ ननु भगवतः सर्वमेवानन्दरूपमिति गुणा अप्यानन्दरूपाः, तेन गुणगानस्याप्यानन्द- रूपत्वात्कृपया भावात्मकानन्दस्य यहिःप्रकटकरणरूपस्य को विशेष इत्याशझ्याहुः सर्वानन्दमयस्यापीति । सर्वानन्दमयस्यापि कृपानन्दः सुदुर्लभः । हृद्गतः स्वगुणान् श्रुत्वा पूर्णः प्लावयते जनान् ॥८॥ सर्वानन्दमयस्यापि कृपानन्दः सुदुर्लभ इत्यर्थः । सर्वानन्दमयशब्देन भगवतो गुणा- दयोपि भगवद्रमा जीवेषु रसरूपप्रतिपादकपूर्वकरसदातार इति ज्ञाप्यते । एतज्ज्ञापनापैव मयदप्रयोगः । मयट प्राचुर्ये । तेन सर्वमेव भगवदीयमानन्दप्रनुरमित्यर्थः । अत एव गुणगानेन रमणं फलप्रकरणान्तर्गतद्वितीयाध्याये निरूपितम् । अपिशब्देन पहिःखरूप- प्राकट्यात्मककृपानन्दस्य कथनविशेपो ज्ञाप्यते । स च कुमारिकाग्रतायावान्तरफलपरमफल- रूप इति भावः । तासां च गुणगानानन्तरं परमफलप्राप्तिस्तथैव सर्वत्र निरोधाधिकारिणा- मित्याशयः । कृपानन्दस्य दुर्लभत्वोक्त्याऽनुग्रहैकलभ्यत्वं ज्ञाप्यते । नन्वनुग्रहेतरासाध्यत्वे गुणानामपि तथात्वं स्यादित्याशयाहुः हृद्गत इति । हृद्गतः स्वगुणान्कृत्वा पूर्णो भूत्वा जनान् प्लावयते ममान् कुरुते । रासान्धाविति शेपः । कृपयैव पूर्वमष्टादशाध्यायोक्तन्यायेन वेणुद्वारा हृद्तो मवति, ततस्तथैव तद्वर्णनेन स्वयं तत्तापयुक्तो भवति, एतदेव पूर्णत्वम् । अत एव द्वात्रिंशाध्यायेऽस्मद्भावप्राणनाथै'त्रिंशेऽन्तर्गोपिकाना'मित्यारभ्य 'तेनैव पूर्णानन्द इतीर्यत' इत्यन्तं पूर्णत्वं निरूपितं पूर्वतदभावज्ञापकम् । यद्वा, खगुणान् तद्वर्णनेन तापका न्कृत्वा विप्रयोगदलेनापूर्णत्वात्खरूपस्स द्वितीयं दलं प्रकटीकृत्य पूर्णः सन् रसैः प्लावयत इति भायः । स्वगुणोद्भूततापानां स्वस तेपो दुःखदूरीकरणं युक्तमेवेति भावः । भगवद्गुणानां रसारमकानां रसरूपतापोद्रोधकता तु 'पूर्णाः पुलिन्य' इत्यादिपु स्फुटमेव निरूपिता । तेन गुणगानस तत्साधकरवमिति भावः । गुणानां च भगवद्रपत्वादनुग्रहेतरकोटिसम्भावना न कर्तव्या ॥८॥ यस्माद्गुणानां तत्साधकत्वं तस्माद्गुणगानं स्वरूपज्ञानपूर्वकं कर्तव्यमित्याहुः तस्मा- तस्मात् सर्व परित्यज्य निरुदैः सर्वदा गुणाः। सदानन्दपरैर्गयाः सचिदानन्दता स्वतः ॥९॥ यतो गुणास्तत्साधकास्तस्मात्सर्व परित्यज्य सर्वदा सर्वकालनिरुद्धस्तद्भावापन्नैर्गुणाः गेया इत्यर्थः । सदानन्दत्वेन परिज्ञेया इति मावः । अयं मावः । 'सन्त्यज्य सर्व विषया'निति दिति ।

५६
निरोपलक्षणम् ।
तत्सर्वं परित्यज्य निरुद्धः सहेति शेषः । 'स्वसखीम्योन्ववर्णय'नितिवत्तैः सह गुणा गेया
इति भावः । गुणान्विशिनष्टि स्वरुपज्ञानार्यम् , सदानन्देन कृष्णेन परिक्षेया इति भावः ।
अयमर्थः । गुणगानगुणाः प्रभुणैव ज्ञेया येन तान् श्रुत्वा स्वयं तदशो भूला खरूपरसदानं
करोति । ननु गुणेषु सदानन्दत्वामावादेतज्ज्ञाने कयं तत्र तत्वं सादित्याशझ्याहुः
सचिदानन्देति । स्वतस्तेषु सच्चिदानन्दता सिद्धेत्यर्थः । यतस्तेषु सत्तःसचिदानन्दता,
अतस्तथा ज्ञात्वा गेया इति भावः ।। ९ ।।
ननु निरुद्धानां गुणगानं युक्तमिति सिद्धं, फलासाधकानां साधनदशायां कथं
गुणगानं सादित्याशय खानुभवात्मकपूर्वस्वोक्तनिरोधस्वरूपमाहुः अहमिति ।
अहं निरुद्धो रोधेन निरोधपदवीं गतः।
निरुद्धानां तु रोपाय निरोधं धर्णयामि ते ॥१०॥
अहं रोधेन निरुद्धः, निरोधपदवी गत इत्यर्थः । अवार्य भावः । भगवता येषु जीवेषु
कृपया निरोपो विचार्यते, स च निरुद्धभक्तसंगेनैव सिद्धो भवति, नान्यथेति निरुद्धाना-
ज्ञापयति भुवि प्राकट्यार्थ, तत्संगेन जातो यस्तीनतापः सः रोधपदवाच्यो भवति । श्रीमदा-
चार्याणामपि दैवजीवभक्तिनिरोधार्य प्राकट्यात्प्रवाशाद्वयाकरणातत्सङ्गजनिततापस रोधत्व-
मिति भावः । एवं च सत्युक्तरीत्या तेषां रोधेनानुरोधेन भगवता निरुद्धः निरोधपदवी पुरः
प्रकटरूपेणैर गत इति भावः । निरोधफलस्य विप्रयोगतापानन्तरभावित्वादाचार्याणां
च लीलामध्यपातिखरूपस विप्रयोगासम्भवाद्भगवता जीवेषु कृपया तदर्शनार्थ तथा
प्राकव्यार्थमाज्ञप्त, श्रीमदाचार्यैरपि तद्दर्शनार्थ खानुभव एवं प्रदर्श्यते । यथा अहं रोधेन
रुद्धस्तथास्वम् । तथा लौकिके निरुद्धानां रोधार्थ निरोधं कथयामीत्याहुः निरुद्वानां
त्विति । लौकिक इति शेषः । यद्वा, निवेदनेनैतत्स्वरूपेणैव निरोधयोग्यता भवती-
साशयेनाहुः निरुद्धानामिति । निरुद्धानां खनिवेदितानां रोपाय भगवत्कृतलौकिका-
सत्पभावाय निरोधं वर्णयामीति भावः । ते तवेत्यर्थः । त इलोकवचनेनैतन्छोतुर्दुर्लभत्वं
ज्ञापितम् ॥ १०॥
एवं प्रतिज्ञाय निरुद्धस्वरूपमेवाहुः हरिणा य इति ।
हरिणा ये विनिर्मुक्तास्ते मना भवसागरे ।
ये निरुद्धास्त एवात्र मोदमायान्त्यहर्निशम् ॥११॥
हरिणा ये विनिर्मुक्तास्ते भवसागरे मना भवन्तीत्यर्थः । अनाय भावः । अकारणं
सर्वदुःखहर्ता तत्साधनमविचार्य दुःखहरणशीलेन ये विशेषेण निर्मुक्ताः भावात्मकखरूपो-
दोधरहिताः कृताः, येन च सागरे संसारसागरे ममा दुःखमेव प्राप्नुवन्तीत्यर्थः । ये तु अत्र
अस्मिन्नेव जन्मनि भावात्मकस्वरूपेण निरुद्धास्ते अहर्निशं मोदमायान्ति, सन्तोपं प्रामु-
वन्तीत्यर्थः । अहर्निशपदेन भावात्मकतया गोपनीवझोपवच्च मोदं प्राप्नुवन्तीति व्यज्यते ।
अनि मजवरविलासिनीवत्, रात्रौ गोपवत् ॥११॥

श्रीग्रजराजकृतविवरणसमेतम् ।
ननु तासां तेषां च विप्रयोगलेशे गुणगानदशासमयः (स) तस्स कथं मोदरूपतेत्या-
शमाहुः गुणेप्चिति ।
गुणेवाविष्टचित्तानां सर्वदा मुरवैरिणः ।
संसारविरहक्लेशो न स्यातां हरिवत्सुखम् ॥ १२ ॥
मुरवैरिणः गुणेषु आविष्टचित्तानां सर्वदा संसारविरहक्लेशौ न स्यातामिति सम्बन्धः ।
अवार्य भावः । मुरस्य जलदोपात्मकत्वात्सागरस्थितस वैरित्वोक्त्या रससागरदोपनिवारकत्वं
व्यज्यते । तस्स गुणेष्वानन्दमयेषु विरहसामयिकोत्कटतापनिवारकजीवनहेतुभूतेष्वाविष्ट-
चित्तानां तौ न सातामिति भावः । चित्ते ह्यावेशोत्यान्यावेशाभावो योध्यते । अत एव
सर्वदेत्युक्तम् । भगवत्सेवार्थव्यावृत्तावपि तत्परत्वार्थम् । यथोक्तं जीवोत्कटतापनिवर्तका-
चाक्तिवर्धिन्यां 'व्यावृत्तोपि हरौ चित्तं श्रवणदौ यतेत्सदे' त्यादिना । एवं गुणाविष्टचि-
तानां भगवति संसारस्साहन्ताममतात्मकस्स विरहाभाव इति यावत्, विप्रयोगजः क्लेशश्च
तायुमावपि न स्याताम् । अयमर्थः । भगवत्सहन्ताममतासहितनित्यसंयोग एव भवेत्, सुखं
मवेदिति शेषः । तत्र निदर्शनमाहुः हरिवत् । हरिवत्तौ न स्यातां, सुखं भवेत् । अवार्य
भावः । भगवतो जीवेष्वहन्तागमताभायो कदापि यया न भवति स्वकीयत्वात्तेपां तद्वि-
प्रयोगजक्लेशोपि तथा। 'मवतीनां वियोगो में न हि सर्वात्मने'ति भगवतैवोक्तस्तदभावः ।
निवेदनानन्तरं भगवत्स्वरूपात्मकतैव सिध्यति । एवं सति भगवानिव तौ न स्याता, सुखं
च स्यादेवेति भावः ॥ १३ ॥
भगवत एवं करणे दयालुतां हेतुत्वेनाहुः तदेति ।
तदा भवेद्दयालुत्वमन्यथा क्रूरता मता ।
याधशङ्कापि नास्त्यत्र तद्ध्यासोपि सिध्यति ॥१४॥
यदा पूर्वोक्तप्रकारेण सुखं सात्तदा भगवति दयालुत्वं भवेत् । अन्यथा मर्यादा-
दिप्रवेशेन करता मता सम्मता, पुष्टिस्थानामिति शेपः । भगवता एवं करणेभिमाना-
दियाधशङ्का मर्यादाधतिकमात्तत्कृतबाधो वा भवेदित्याशक्य नेत्याहुः। याधशङ्कापीति।
अत्र अस्मिन्मार्गे पाधशद्वापि नास्ति । अपिशब्देन तच्छकैव नास्ति कुतः पुनधि इति
भावो व्यज्यते । भगवदध्यासस्य दृढत्यादेहाध्यासाभावान्न बाधश त्याहुः तदिति ।
तस्य भगवतोऽध्यासोऽपि सिध्यतीति भावः । अपिशब्देन मगवतोप्येतदध्यासो रसरीत्या
सिध्यतीति योध्यते ॥१४॥
ननु भगवतो दयालुत्वे सुखोत्पादकता भवतु, परमस्य लौकिकत्वाद्भगवतो.
लौकिकत्वात्कयमेतस्य लौकिकनिरूद्धा निरोधसिद्धिरित्याशबाहुः संसारेति ।
संसारावेशदृष्टानामिन्द्रियाणां हिताय वै ।
कृष्णस्य सर्ववस्तूनि भून ईशस्य योजयेत् ॥ १२॥

निरोधलक्षणम् । संसारावेशेन दुष्टानामिन्द्रियाणां हिताय वै निश्चयेन तानि ईशाय योजयेदिति सम्बन्धः । अबायमर्थः । संसारावेशेन भगवद्विनियोगप्रतिवन्धः स्यात्, तेन तदावेशो दुष्ट इति तदभावार्थमिन्द्रियाणां निश्चयेन यथा हितं भवति, तानि भगवदर्थ योजयेत् , तेन तथालं भवेत् । नन्वेतत्सामय्याः पूर्व लौकिको दोपो निरूपित इत्याशक्य तस्स दोपस्य वस्तुखरूप- ज्ञाने सुरूपतेति वस्तुस्वरूपमाहुः । यतो वस्तूनि सर्वाणि भूसः कृष्णस । अतो समर्पिते लौकिकत्वं नाशकनीयमिति भावः । 'क्रीडार्थमात्मन इदं त्रिजगत्कृतं ते' 'क्रीडामाण्डमिदं विश्व'मित्यादिपु तथैव निरूपितम् । किञ्च, स भूमा समर्थो भवति लौकिकनिवारणपूर्वकम- लौकिकत्व(सम्पादकत्व)सम्पादकः, स्वयं च लौकिकरसभोगार्थ खखरूपमर्यादोलबनेनापि खभक्तवश्यता स्थित्या तद्भावानुसारेण तस्य रसादानार्थ रमणं करिष्यतीतिमावः । यद्वा, संसारावेशदुष्टानामिन्द्रियाणां सम्यन्धीनि सर्ववस्तूनि भावात्मकानि वै निश्चयेन कृष्णस्य हिताय रसभोगार्थ योजयेत् । भूम इति विशेषणेन स्वस्यापि रसमोगः सिध्यतीति ज्ञाप्यते । कीदृशाय हिताय ईशाय आधिदैविकायेत्यर्थः ॥ १४ ॥ ननु संसाराविष्टचित्तदुष्टानां कथं तत्र विरागेण भगवत्यनुरागपूर्वक समर्पणं स्यादित्या- शक्याहुः भगवद्धर्मसामर्थ्यादिति । भगवद्धर्मसामाद्विरागो विपये स्थिरः । गुणैर्हरिसुखस्पर्शान्न दुःखं याति कहिचित् ।। १५॥ भगवद्धर्मसामर्थ्याद्विपये विरागः स्थिरः स्यादित्यर्थः। भगवद्धर्माणामेतादृशमेव सामर्थ्य येन तद्धर्मप्रवेशमात्रेणैव लौकिके विषये विरागः स्यात् , तदनन्तरं गुणैः भगवदी- यैर्वर्णितैरलौकिकखरूपेण हरिसुखं हरेः सुखस्य स्पर्शे प्रामोति । कहिचिद्भगवदिच्छया परीक्षाधर्थकृतमपि दुःखं न यातीत्यर्थः । यद्वा, भगवद्धर्मसामर्थ्याद्विपये भगवदीये विशिष्टो रागः स्थिरः स्यात् । किञ्च, गुणैः हरिसुखस्पर्श याति । अयं भावः। गुणगानेनालौकिकले सम्पन्ने हरेरपि सुखरूपः स्पर्शो यस्य तादृग्मावं प्राप्नोतीत्यर्थः । किच, हृदयतो दुःखं विप्रयोगक्लेशानन्दानुभवात्मकं कर्हिचिदपि न गच्छतीति भावः ॥१५॥ एवं निष्प्रत्यूहं तत्स्वरूपं निरूप्य तत्कर्तव्यप्रकारमाहुः एवमिति । एवं ज्ञात्वा ज्ञानमार्गादुत्कर्ष गुणवर्णने । अमत्सरैरलुब्धैश्च वर्णनीयाः सदा गुणाः ॥ १६ ।। एवं पूर्वोक्तप्रकारेण ज्ञानमार्गादुत्कर्षो निरूपितस्तं गुणवर्णने ज्ञात्वा अमत्सरैमत्सरादि- दोपरहितीनादिषु अलुब्धैः स्वस्य रसभोगेच्छायां भगवदिच्छा) गुणाः सदा वर्णनीया इति भावः । सदेति पदेन क्षणमप्यन्यथा न स्थयमिति ज्ञापितम् । यद्वा, गुणवर्णने य उत्कर्षस्तं ज्ञानमार्गात्सर्वं भगवदर्थमितिरूपाद्भगवदुपदिष्टगोपतुलयाद् (1) ज्ञात्वा सदा अमत्सरैः श्रीप्रजराजपूतविवरणसमेतम् । सापत्यादिदोपरहितैरलुब्धैर्भगवतः स्वामृतग्रहणसमये मानादिदोषरहितैर्गुणा वर्णनीयास्ता- दावाप्यर्थ, ब्रजविलासिनीवत्वसमानशीलेविति शेपः ॥ १६ ॥ एवं गुणवर्णनम्यावश्यक सोपपत्तिकमुपपाय तद्वर्णने फेशसहनात्मकं दूपणमुद्भाव्य परिहरन्ति हरिमूर्तिरिति । हरिमूर्तिः सदा ध्येया संकल्पादपि तत्र हि। दर्शनं स्पर्शनं स्पष्टं तथाकृतिगती सदा ॥ १७ ॥ सदा हरिमूर्तिध्येयेति सम्बन्धः । अकारणसर्वदुःखहर्ता दुःखहरणार्थमेव मूर्तिधारक- स्तस्य ध्येयेति भावः । हीति युक्तथायमर्थः । स्वस्य तदर्थप्रयोजनारसैय ध्येया । ननु तड्यानमात्रेण कथं दुःखनिवृत्तिः सादत आहुः दर्शन मिति । ध्यानेन दर्शनं स्पर्शनं च स्पष्टमेव भवतीत्यर्थः । ननु दर्शनं स्पर्शनं च योग्यरूपाभावे कथं स्थादित्यत आहुः तथेति । ध्यानेन तथा आकृतिर्गतिश्च भवेताम् । सदेति नित्यमित्यर्थः । न स भावः पुनरन्यथा भवेत् ॥ १७॥ नन्वेतत्सर्वं फलदशायां सम्भवति, न साधनदशायामित्याशय साधकानां तत्सिद्ध्य- र्थमुपागमाहुः श्रवणमिति । श्रवणं कीर्तनं स्पष्टं पुत्रे कृष्णप्रिये रतिः । पायोर्मलांशत्यागेन शेपभागं तनौ नयेत् ॥१८॥ श्रवणं कीर्तनं तथात्वसम्पादकं स्पष्टमेव, तस्मात्कर्तव्यं, तत्करणेन तथात्वं स्यादि- त्यर्थः । तथाभूतस्य दुःसंगवर्जनमातुः । मगतदप्रियस त्यागे निदर्शनमाहुः पायुरिति । मलांशत्यागेन यया पायुद्यते तथा पहिर्मुखपुत्रादित्यागेन शेपभागं तनौ स्वकीयत्वेन नयेत् ॥ १८॥ ननु सर्वेपामात्मा मगवानेवास्ति, तस्मात्कथं सक्तव्याः, खान्तरङ्गवादपि त्यागो- नुचित इत्याशझ्याहुः यस्येति । यस्य वा भगयत्कार्यं यदा स्पष्टं न दृश्यते । तदा विनिग्रहस्तस्य कर्तव्य इति निश्चयः ॥१९॥ यस्स भगवत्कार्य स्पष्टं न भवति स न भगवदंशः किन्तु प्रकृत्यंश एव, आन्तरं तथा भाने थासमपि तथैव भवति, अन्यथा तु पापण्डित्वमेव । अत एव निवन्धेऽस्मत्राणेश्वरैः 'कृष्णसेवापर'मिति शोकविवरणे सेवापरगुरुरित्यादिना तथैव निरूपितम् । विकल्पेन यसार्थे भगान् खकार्य रसरूपं स्पष्टं करोत्येवं न दृश्यत इति व्यज्यते । तदापि निरूपितो यो हस्तः वामहस्तस्तम्य विधिः कर्तव्यः । अयमर्थः । यथा गलांशत्यागानन्तरं वामहस्तस शुद्धिं विधाय सर्वकार्योपयोगित्वं क्रियते तथा तस्स खात्मजत्वात्तन खांशभगवति निवेदनं कृत्वा खांश खस्मिन्नावश्य तस्य त्यागो विधेयः । अस्मिन्न न सन्देह इत्यर्थः ॥१९॥ ।

६० निरोधलक्षणम् । एवं निरोधस्वरूपं निरूप्यान्यनिषेधपूर्वकगेतत्करणार्थगस्य सर्वाधिकत्वमुक्त्वोप- संहरन्ति नात इति । नातः परतरो मन्त्रो नातः परतरः स्तवः । नातः परतरा विद्या तीर्थ नातः परात्परम् ॥ २० ॥ अतः परतरो मम्रो नास्ति, तेन मधादिषु विश्वासं विहायायमेव ग्रन्थो जाप्यः । एतदुक्तप्रकारेण सेयमित्यर्थः । अतः परतरोन्यः स्तयो न । तेनैतदुक्तप्रकारेणैव प्रभुः स्तुत्य इत्यर्थः । अतः परतरा विद्यापि न । या विद्यकोनविंशाध्याये प्रतप्रस्ताये निरूपिता सेयमेवेत्यर्थः । अतः परतरं तीर्थमपि न । तीर्थे प्रतिवन्धकपापनिवर्तकत्वमस्ति, न त्वाधि- दैविकप्रतिबन्धनिवर्तकत्वम्, अस्स चाधिदैविकतन्निवर्तकत्वमस्तीति नातः परतरं तनिवारक- मन्यदिति भावः । तस्मात्प्रतिवन्धकापगमार्थमेतदेव स्तोत्रं सेव्यमिति भावः ॥ २० ॥ इति श्रीगोपिकाधीशवल्लभाचार्यसूचितः। निरोधो विवृतस्तेन सदा तुष्यन्तु ते मयि ॥१॥ निरोधसंशयोऽनेन प्रकारेण सदा युधैः । छेत्तव्य इति हि ज्ञात्वा तस्कृपातो विवेचितः ॥२॥ इति श्रीश्यामलात्मजश्रीब्रजराजविरचितं निरोधलक्षण- विवरणं सम्पूर्णम् ॥

परिशिष्टम् । 'निरोधलक्षणकी टीका प्रथम श्रीहरिगयजुने कीनीथी पर २२' अथ विचार्यते, को निरोध ? शि तम्य सारणम् ' कथ या पसायमिनि । प्रपथविरतिपूर्षिका भासत्तिनिरोध इति । न चामनिमाण निरोध इति वाच्यम् । ण्यिायी व्यमिचारात् । म प रान प्रायविम्मी , मिनु तदभिनिवेशापासतिविपयानि रितपरिगोपियसाधारण्येनानिव्या- तिशिल याच्यम् । प्रपशशरस्य नसामान्यामिप्रायन लोकापनि विषयो न प्रपत्र : नन मपथमायागरण आसनेनिर्विपयावापात इनि याच्यम् । प्रपसातीतस्य तद्विषयस्यात् । न च सद्विषयम्य मदनी प्रापशिकीसविपयामिति यायमा योगजधर्मप्रसासरया अतीन्द्रियाम्मेव भक्त्या प्राजानीतम्य विषय योपपत्त । ननु प्रपन्नत्याग कुतो न निरोधविदोपणमिनि चैन । न । तस्य शान- मागीयमोक्षमाधनायात । भगाना गृहमेव विशिष्यत हायुतण्याचा तम्माद्विग्मृतिमाश्रमेयाय मृग्यमिति सच निरोधो शिविध । भागवतोऽयता भागवतो भगवत प्रपगाविस्मृतिपूर्वक भनविषयकाम किरिति । 'निरोधोऽस्यानुशयनमारमन सह शनि मिरति वचनात् । अस्यैनि पध्या भेन्न निर्देशाय । 'निरोधोऽस्यानुरायन प्रपशीलन हरे रित्याचार्यचरणनिवाशालीलारूपेषु मांदिषु परिगणितापाच । नन्दन लक्षणमिदमनुपपन्नम्, भताना प्रापचिकन्येन भगवतम्नतिपयकासक्ती प्रपत्रविसरणाभारादिनि येत्, उच्यते । प्रापतिक केन प्रकारेण न तावत् प्रत्यक्षम्, अस्मदादिप्रत्यक्षागोचरस्वामनुभवात् । भक्तविशेषप्रत्यक्षरवरखामापतिकरयानुकूलत्वात् । अत एप तयाव योधयन् भगवान् भाानामध्न प्रति 'दिग्य ददामि ते चक्षु रियावान् । यदि पश्यन्ति मुनयो गुणापाये समाहिता इनि श्रीभागवत- पायाच । नाप्यनुमिति , अनुकूलतांगावात् । न च पश्यत्वादेरनुपसतावमिति वाष्यम् , रश्यावस्प भागुतप्रकारर्यवन्यापितत्वात् । यस्तु 'जयनि जननिपारा', 'तद्विष्णो परम पदम्' 'तद्रिमास , 'मभिष्ट निर्गुण स्मृतम्, 'त भजन निर्गुणो भवेत् , ' 'मुक्तोपराप्यव्यपदेशान् ,' 'मुमा अपि लीलाविग्रह कृत्वा भजन्त' इत्यादिवास्यरनुस वेनि नानुपपन्न किशिा । ननु अस्तु भक्तानां तथारषम् , तथापि भगवतोप्रतिहतमानशक्त प्रपशविसरण कथगुपपात इनि घेत, इस्थम् । भगवतोऽनन्तशक्तिमायेन यदा यदर्थ यो शक्तिमाविर्भावयति, सा रादा तत्कायर्यानगुणा भवति । एवञ्च सनि 'थिया पुष्टपति पाक्ये मुरयशनिमायपाटादविद्याया अपि सापेन तदाविर्भावनापरवमप्युपपमम् । न प विरोधाद शाये सर्पशायमानुपपनमिति वाच्यम् । निरविविधधर्माधारत्वस्य 'तदेजति तागती स्यादिश्चतिसिद्ध स्वान् । एतच यथा तथा सविस्तरमसरस्वामिभिनिरुपित विद्धन्मण्डने । न च 'बन्धोमयाविद्ययाऽनादि' रिनि वाक्यादविद्याश्रयत्वे तया यन्धप्तम्भव इन वाच्यम् । तस्स मुरपमायाशनिजन्याविद्याशषिजन्य स्वात् । 'विद्याविद्ये मम तनू विदयुद्धव शरीरिणाम , यन्धमोक्षकरी भाय मायया मे विनिमित' इति वाक्यात् । तदेव श्रीमदासायनिरूपित निबन्धे, 'विद्या विद्ये हरे शती माययैव विनिमिते, ते जीपस्यैव नान्यस्य दुखिस्व चाप्यनीशते नितां च प्रभु भक्तिमार्ग एवं आविर्भावयतीनि 'मदन्यते न जानन्ति नाह तेभ्यो मनागपी ति वचनादवसीयते। अत एव निरूपित केनचित् भगवास्वरूपतायामिझेन 'समुष्ण' इत्यादि। तदेतत् सर्वमाचार्य यथाभक रूप्रतिविम्पविभ्रम' इत्यत्र निरूपितमिनि सहृदयमात एवं विभावनीयम् । अथ किं तस्स कारणमिति चिन्त्यते । न तापठोक इय यासनया जन्यत इनि पतु शरयम् । तसा अनुभवजन्यत्वात् । भगवराव सातारकारात् प्राए लोक्किविषयविषयीन्द्रियाविषयस्येन अनुमवात् । साक्षात्कारे तु दिग्याष्टिदानेन तथात्वसम्भरात् । 'दिन्य वदामि ते पधु'रिति याक्यात् , 'कथित पीर' इति श्रुतेश्च । नापि भत्ति , सा प द्विविधा, मयांदापुष्टिभेदेन, तत्र न तावदाचा, तस्या ९नि.क.

. 'भतया स्वनन्यया, "विशते तदनन्तरम्' 'ज्ञानयोगश्च मनिष्ठो नैगुण्यो भक्तिलक्षण ,' इत्यादिवाक्य पुरुषोत्तममायुज्यपरकरवेन निरोधाजनकत्वात् । ननु भक्त्या सज्ञातये सादिवाक्यमर्यादाभते पुष्टिभ तिपलयावेन, सा च निरोध इति कथ न निरोधजनक वमिति चेत्, उच्यते, तस्या अनुग्रहसहकारित्वेन परम्परासाधनत्वात् । अन्यथा 'नोपामितमहत्तमा' इति वाक्य विरुध्येत । महदुपासनस मयांदा भक्तिरूपत्वात् , न द्वितीया । तम्याम्नदमिन्नत्वात् , न हि स्वमेव स्व प्रति साधन भवति । तहि विमा कम्मिकत्वमेवेनि चेत् , न, तादृशविशेपानुग्रहस्य कारण वात् , ताशय गुणगानसहकृत व विशेपश्च तथा फलदानेच्छैयेनि सक्षेप । वस्तुतस्तु न गुणगानादेरपि साधनत्य, नि साधनत्वभगात्, तथापि योगक्षेम माधारणसाध्यत्वमादाय तथोक्तम् । अथ कथ निरोधस्य फर त्यमिति । सुखदु खाभावान्यतरभावात् । प्रयुतासक्ते स्व विषयाप्रात्या दु खसहकृतवाञ्चेति । उच्यते । निरोधो हि प्रपञ्चविस्मृतिसहिता आसक्ति , सा च स्वविषयविषयक विविधमनोरथजनको भाव , तस्स च रसरूपत्वेन मुखरूपत्वात् । 'रस हि एघाय लब्ध्वा आनन्दीभवती ति श्रुते । प्रपञ्चविस्मृतिरूपत्वेन प्रापत्रिकदु स्वाभावरूपत्वाच । किञ्च, फल हि पुरुषार्थ , तत्व प तेन स्ववृत्तितयेप्यमाणस्वम् । तथा च आसक्तिमध्यपतितदु खस्य भाकाक्षणीयत्वेन तथा वम् । 'विपद सन्नु ता शश्वदिति वाक्यात् । अन्यथा श्येनादावपि तजन्यनरकस्य तदुभयरूपत्वाभावेन फलत्व न स्यात् । 'भूयान् मे नरक शत्रुर्विपघतामिति धिया श्येनकरणात् । सुखसाधन तदिति चेत्, तदा प्रकृतेऽपि दीयता रष्टि । न मुखभ्रमात् प्रवृत्तिरिति वाच्यम् । नरके सुखभ्रमायोगात् । तसात् पुरुषार्थ एव फलम् । वस्तुतस्तु दु खमेव न, किन्तु परमानन्द एव । अत एव श्रीशुकै सर्वान्ते 'रेमिरे' इत्युक्तम् । अत एव धीमदाचार्य 'रतो निरोधो महाफल' इत्यभिहितम् । एव सति भक्तिमार्ग निरोधस्यैव फलत्वात् ससाधनतनिरूपण कुर्यन्त श्रीमदाचार्या तस्य दुर्लभत्यज्ञापनाय प्राथनारूपेण निरूपयन्ति यच दुख'मिति । निरोधो हि प्रपञ्चविस्मृतिपूर्वक भगवदासति । सा च स्त्र विषयदर्शनाभ्या मुखदु खामिका । यदिति पदात दुख घ लोकविलक्षण स्वरूपारमकत्वात् कोटिकोम्यानन्दरूप युगपसर्वलीलानुभावक भगवदाविर्भावकम् , अतो निरोधस्य प्रथमाशो दुख प्रपञ्चविस्मृतेर्भगवदर्यदु खजन्यत्वात् । अतो मूलभूत वादन्तेप्यस्यैन पलवादस्य हितत्वेन प्रथमाश दुख प्राथयन्ति 'यय दुस'मिनि। यद दुम्ब यशोदाया नन्दादीना चकारात्म्येपा गोकुले अस्ति तदु ख मम पचिदपि स्यादिति सम्बन्ध । नन्यसामर्व निरोधस्य फल थे, तदेव तु न, मुतयारन्यस्यैव तयारवमम्भवादिति चेत् । न, अनाकलनात् । 'मानसी सा परा मता' 'तम्तटावण सेये त्यादिमि सिद्धान्तमुनावरयामाचार्यनिरोधपदार्थस्यैव फलरूपसेपारयेनोस वात् , अतो न काचि- सयकेति भाप Iमातृचरणदु पस्य स्त्रीस्वभावतोऽधिकस्यात् मथम्गेनि । ननु पूर्वक्लेशेन भगवदानन्दनिधि माता कि लिटा एवेति चेत् । अग्राय भाव । भगवति मथुरा पनि प्रस्थिते, तत भारभ्य मातृचरणादी ना स्वरूपारमकविधयोगदानेन ते लिष्टा एव, पर स महारसो विलक्षणानन्द । पररयेयमेन पर्यवमिनिर्यदेवमानन्दानुभष , अतस्तम्मनोरथ कुर्वन्ति 'स्पान्मम पचिदिति ॥ ॥ व यशोदादिदु र प्रायिवा भतिदुराप गोषिकादुम्ब प्राथयन्ति गोपिकानां चिति । नुशन्द पूर्वसादुरकटावप्रदर्शक । गोपिकाना पजसीमन्तिनीनो यत् थीभागवतादी निरतिशयरवेन प्रसिद खरपारमक तत् पचिदपि देहेन्द्रियमाणेषु स्यादिति मनोरय । यशरेदानन्दादीनामे तामुसल स्वस्थ रामखीभावपूरितविप्रहापेन भयोग्यतथा भगाधनीयम्वाइ गोपिकादर्शनामेव गुरांश प्रार्थयन्ति 'गोरे गोपिकानां घेति । गोकुरे भगवतो टीटामिर्वेणुनादादिरूपामिगापिकाना, पकारातोपाना सर्वेषा प्रगपासिनो पापि पामुखमनुभूपमानसीएलयसम्पादकमभूत्, तन् कि मे रिचारपनि । भन्यत्र सधाकरणे सामा भावमाशायाहु "भगवा निति । स हि सर्व कर्नु समर्थ । अतोऽन्यत्रापि सथा करिव्ययेवेपथ ॥२॥ एष दुम प्रायिवा सीलामियरमुख सदपि प्रायिवा आत्यन्तिकविप्रयोगदानानम्तरं परमुग्ण तरपि प्रापयन्ति, उद्धवागमन इति। उपस्वागमने जाते पधा गोपिकानां मनसि भगवरारुष्य दानेनोत्सवो जातसया मे मनासे पचिदपि न्यादिति सम्बन्धः । युन्दावने गोकुले येति । पान्दा समुपयार्यः । या तद्गुणानेय गायन्यो जसीमन्तिन्यः सम्भय स्वितासन पृन्दायने, तासा मन्दादीनाच गोकुले य उत्सवः स इति ततिशोदवासो मन्ननमित्यादिसामान्योतया. वसीयते । ननूरमवः कश्रित पूर्वतन एव, विलोम्यागसमित्यादिनोक्तः प्रार्थनीय इति चेत्, तत्राहुः तुमहानिति । पूर्वस्तु महान् मुक्त्यादिम्या, भयं तु प्रत्यायुत्तरकालीनयान सुतरामेष महान्, सुविम्मि- ताः कोयमपीच्यदर्शन इत्यादिमोक्तः॥३॥एवमलौकिकसामर्थ्यरूपो गुण्यो निरोधः स्वय सदधिकारियन स्वविषयतयव मार्यितः । अन्येपो तु भगवान् महापुरपकृपया साधिकारानुसारेण सायुज्यं वैकुण्ठादिषु संयोपयोगिदहं या दास्यतीत्यमिप्रायेण तावत्पर्यन्त स्थितिप्रकारमा : महतामिति । यापत् भगवान् फलोन्मुसा दयां करिष्यति तावत् कार्यमानः कीर्तनविषयी क्रियमाण एव मुखायेरयर्थः। 'महस्ते विष्णो मुमति भजामहे,"विनामहत्पादरजोमिकम् , किरातहूणान्ध', 'देवर्षि मे प्रियतमा', 'स्वरपादपोतेन महकनेम', 'सदनुग्रहो भया'नित्यादिवास्यभंगवतो दगायर्या च नान्यत्कारणमिति पतुमाहुः महतां रुपयांत । एतेन भकिमार्गस्य त एव निर्वाहका इस्युकं भवति । ननु पोयमानेपि भगवति फळपर्यन्तं अमेण कर्मादिविय दुःनमेयेयाशंक्याहुः मान्दसन्दोह इति । भगवतस्तभावेन तहणानामपि तदभिन्नतया स्वरूपसमानयोगक्षेमत्वात् साधनदशायामपि तरकीर्तनेनानन्द एष भवतीत्यर्थः । अत एवं भगतमगवरकयारसः परीशिदेव तदर्थकमेव 'योगमनोमिरामा दिति विशेषणमुक्तवान् । हि युक्तो यमर्यः । आनन्दे फीयमाने सुखम्य युक्तस्वात् ॥५॥ ननु कीर्तनं हि सुखसाधनम्, रात्र महतो कृपयेति को वामहः, यथाकनिदपि कृतं तरमुखसाधनमिति प्रभेनेत्याहुः महतां कृपयेति । यया महतो कृपया अलौकिकानां भगवासम्यन्धिता सदा कालापरिच्छेदेन कीर्तन सापनिवारकं भगवतः प्रादुर्भावक निरोधजनक, तथा लौकिकाना लोसन्धिना महापुरुषद्वारा भगवाकरणगताना कीर्तनं न तथे- त्यर्थः । तत्र टान्नमाहुः मिग्धभोजनरूक्षयदिति । निग्धस्य पदार्थस्य भोजने रूक्षं दो मिन्नप्रकारत्ययोत्तनाय । निग्ध पदार्थस्य भोजने स्स प्रीतिरहितस्येत्यर्थः । यथा कस्सपिज्य. राभिभूतस्य निग्धं वस्तु न रोमते तस्य यथा तसान मिशरसज्ञस्य प्रतिदिनं क्षीयमाणस्य न तमोजन पुष्टिफलम् , तथा प्रकृनेपि महापुरुषकपाभावरूपदोषयुक्तानां ताशकीर्तने रूक्षाणां लौकिकानां कीर्त- नसन पुष्टिपलरवमिति भावः । यद्वा, निग्धं भोजनं यस्य स च कक्षा रूक्षभोक्ता सयोरिव तन- दिति । तया च यथा निक्षभोजनयोसारतम्य तयाापीत्यर्थः ॥५॥ ननु 'तरति शोकमात्मविदिति शुन्या ज्ञानेनैव दुःखनिवृत्त्या मुखप्राप्तानावस्थयैव स्थेयं, कि गुणगानेनेति चेत्, नत्राःगुणगान इति । सथा गोबिन्दस्य गोगोकलपतेर्गुणानां गाने सुतिबुद्ध्या कयने शुकादीनां पूर्णज्ञानवतामपि सुखं तथा नेपामेद यात्मनि स्वात्मविपये प्रहाल्पयशानेन जायमानं या न तयेत्यर्थः । अत एव व्यासस्येतर. पुराणनिहासकथनेप्यपरिनोप, परितोष श्रीभागवतकथनेनेति दिशा अत एव 'लोकांश्च लोकानुगतान पशृंश हित्वाश्रितास्ते चरणातपत्रम्, परस्पर त्वगुणवादसीधुपीयूषनियोपितदेहधर्माः' । 'अथ ह वाच सर्व महिमामृत, यदनुचरित, तब कयामृत, श्रवणार्शनात् , येन्यतो भागवता'। तन अन्यतः भन्ये अन्यतः विषयादिन्यो वा अन्यत्र देहादी कुत इत्यर्थः । साविमत्तिकस्तसिल । 'ज्ञाने प्रयासमुर- पास्य, निवृत्ततः, नेपातिदुःसहा' इत्यादि वाक्यैः श्रीभागवते सथैव निरूपणाश । ननु तरति कोकमा. वित्, तमेव विदित्वातिगृत्युमैतीत्यादिश्रुतेः का गतिरिनि चेत्, अत्र यदामः, तस्मान्मदतियुक्त- स्येति पाश्यानिमतो ज्ञानानपेक्षणारशानिनस्तु कम्यंगपीत्यादिनाक्यैर्भक्तयपेक्षणात्तनिरपेक्षमता मार्ग एय समीनीनः । भुत्यादिषु शामफलोक्तिस्तु दु स्वाभावपर्यवसानैव, परमानन्दावाशिस्तु भ. मयय । धस्तुतस्तु दुःखाभावो येतदधीन एव ।भनपिशममिति यास्यात् । अत एवासायरानादम- पाधिकरणे एवं सतीत्यारम्य बीयत्वेन परणे भक्त्यभावान सहकारियोग्यतासमस्या पुरुषोत्तममाप्ति- भवतीनि नियत इत्यभिधायि ॥ ६॥ ननु गुणगाने कृतेपि किं भवतीत्याशय सत्र प्रवृत्यर्थ परिधायकं फलमाहुः क्लिश्यमानानिति । गुणगानेन तरलपरमृत्या तदात्यर्य हिश्यमानान् । उपतपतो जनान् दृष्ट्वा यदा कृपायुक्तो भवेत् तदा सर्च सर्वात्मक सदानन्द पर ब्रहा हदित्य परमव्योनि प्रादुर्भूत बहि प्रकट भवतीत्यर्थ । अत एव ब्रजसीमन्तिनीना गुणगानेन हदि प्रादुर्भूय तन्मनस्का इत्यादिना तथाभावसम्पत्तौ कृपया भगवान् प्रादुर्भूत इत्युच्यते । तदेवोतमाचार्य 'नहि साधनसम्पत्या हरिस्तुष्यति कस्यचित्, भक्तामा दैन्यमेवैक हरितोपणसाधन मिति । यद्वा, सदानन्दस्य । भगपतो हृदिस्थ अमिमायादिक यहिर्निर्गत भवतीत्यर्थ । अत्रायममिसन्धि । 'हरुदु सुस्वर राज'मि. त्यादिना तारशभावे यदा कृपायुक्तो जातस्तदा भगवतीमिप्राय प्रभुणैव मया परोक्ष भजता, न पारयो निरवद्यसयुजामित्यादिनाविर्भावित इति तथेत्यर्थ ॥॥ ननु किमिति कृपापेक्षया गुणगानेन पेश सम्पादनीय , ज्ञाननिष्ठया ब्रह्मानन्द एव सम्पाद्यतामिति चेत्, सबाह 'सर्वानन्दमयस्यापी'ति । एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानीति श्रुते सर्वत्र स्थितो य आनन्द स भगवति प्राचुर्येण वतेत इति तदा श्रितस्य मानुपानन्दमारभ्य ब्रह्मानन्दो न कस्यापि दुर्लभस्वम्, 'सर्व मद्भक्तियोगेने ति याक्यात्, तथापि कृपागन्द कृपारूपोय आनन्द सभगवधर्माणांवरूपसमानयोगक्षेमत्वात् कृपया वायो भजनानन्दाय सत मुतरा दुर्लभ एव । महानन्दस्यापि दुर्लभस्वात् । सम्भवति साधनमिह विश्चिदिति चेत् ? गुणगान- मेवेति गृहरण । अत एवोक्तमाचा 'लौकिकस्त्रीषु ससिद्ध तद्वारा पुरपे भवेत् । स्वानन्दस्थापनार्थ हि मोग्यतापि निरूपिता । तो हि भगनानन्द सीपु सम्यग विधार्यत' इति । एतदर्यस्तु प्रभुचरण रेव विवृत । 'भजनानन्दस्य स्वरूपारमकरवेन रसरूपत्वात् तस्य च स्वशास्त्रसिद्धस्यैव तथास्वाद भावदतिरिक्तलोके विवाहबतीपु सम्यकसिद्धो भवति । तत् एतस्कथाश्रवणेन तद्भावोदये पुरुषेपिस रसो भयेत्, नान्यथेति स्त्रीष्वेव तानिमित्यर्थ इति । तत्रैव द्वितीयकारिकार्थनिरूपणे यहा, बलदेवे स्वधर्मान् निरुपयता भगवता 'गोप्योन्तरेण शुजयोरपि यरस्पृहा श्री रिति वाक्ये श्रियोपि स्पृहानिरूपणेन तस्या अपि दुर्लमो यो रस त प्राप्य गोप्यो धन्या इति जसोवेव स्वानन्दानुभवयोग्यता निरूपिता, मान्येपु नान्यासुपेत्यर्थ । तया च तवैतदधिकारिस्वात् सयेति भाव इस्येतत्सर्वं हदिकृत्योक्त कृपानन्द मुद्द लभ इति । 'माय मुलाप' 'नेम मिरच एता पर 'केमा यि, नाप श्रिय' 'भासागहो' इत्यादि वाक्य श्रीमागवतेपि तस्य तथास्वनिरूपणाच । कपानन्दस्य दुर्लभस्वबोधक तत्कार्यमाहु 'हन्त 'इति। नत दयप्रविष्ट स्वगुणान् श्रुरवा पूर्ण गुणगानेन प्रतिक्षण मान. जना भावयते रससिम्धी निमययतीत्व । अत एव 'यापीडे"ति पये स्वामिनीना मुधाद्वारा भावात्मक. 'भभावता'मित्यादि मिसावर्णितगुणश्रवणेन पूर्ण क्रीडामयतामेव सम्पादितवान् । श्रीमदाघार्युगलगीते 'अन्त प्रविष्टो भगवान् मुसादुदस्य कर्णयो , पुन प्रपश्यते सम्यक् तदा भवति मुस्थिर'इति । एतद्विवरणे यथार्थस्तथैवासामिरुत इति सर्थमनवचम् ॥ गुणगान तास्वरूपम् निरूप्य कतम्यरवेन तदुपसहरन्ति 'तस्मादिति । यस्मात्कर्मज्ञानोपासनादि- मार्गो मतिमार्गो निरतिशयितनिजविपप निकमपि पूनादिना ब्रह्मलोक"मित्यादिवाक्यात् सम्मादेतो सर्व कर्मज्ञानोपासनादिक परिपन्य सवासन सतया मर्भगवता स्वीपरवेन पृतैरत एप फिधिदिस्यतमपमेसर्थ साधनानि विदधदिर्गुणा एव सर्वदा सर्वेष्टदातारम्मकसंख्यरषेन शैया इत्यर्थ । ननु पेदमार्गानुसारेणेति पाश्यात् सन्मार्गस्य व्याल्यावृमिहुविधरवात् केपल म्यगुणान् गायेदिति हाहापामा सदानन्दपरेरिति । सदानन्द. भानग्यमय पर परमारमा परमकायापयो मन शुष्पादि पे तारीरित्ययः । विघया विशेषणमैतत् । भनेम प्रमवादे स्थिरया गुणगान कम्पमित्यु भवति । सत तेग्य एष गुणेम्पो जीपल सचिदानन्दता गुणत्रयापि पन भक्षररूपतपा पुरुषोत्तमा- विमोचयोग्यता मधीलाम्यत इति पारे गुणगाने क्रियमाणे स्वत व परम्याभाम्यातपारवम्, नत तर पारामेति रुपेत्यर्थ एव गुणगानम्म्यताममिधाप निरोपलक्षगठीलयेय तसिदि- रिविवस सीपार्थमेव निरोपवित्तिवमिति परत तस पछाम्यमिवारिताशामाप स्टात निरूपय. नसन सानुमा प्रमाणपस्ति, मनिष्यतामहमशोधन स्वरूप दिमाहणोति तारो गुणेम प्रभुरन्त प्रविष्टो भत एवोक्त ॥ एवं सोपपतिक तयेत्यर्थ । अयमर्थः । गुणाविष्टचित्ताना सर्वत्र संसारण अहन्ताममतारूपेण अमिलषितप्राप्तितदमा- धाभ्या य क्लेश पश्च ससाराभावेन भगवत्यपि तदभावेन भवति सोपि तथेत्यर्थ । भगवद्विषयकसंसा रस्य सतामप्यपेक्षीयत्वात् । अत एव 'कुर्वन्ति गोवसपद' मित्यग्रत्यस्य गोवत्सपदमात्रकरणोक्त्या भहमेतहासोश्य मम स्वामीत्येतावान् ससार स्थापितो भवतीति निरूपितमाघाय. । स व क्लेश 'केशोधिकतरस्तेपा' मित्यादिना भगवता गीतायामेव वर्णित ॥ १३ ॥ ननु गुणाविष्टचित्तस्वेप्यनिष्ट निवृत्तिरेव किमित्याशफायामाहु 'हरिव सुख मिति ।हरे सर्वदु सहर्नुभंगवतो यथा सर्वदैव भत्तसाहि स्पेन मुख पूर्णानन्दस्वाद्भगवतस्तथा गुणाविष्टचित्तत्वेऽन्तस्तदाविर्भावाद्भगवत्साहित्येन तथैव सुखमिवर्ष । 'सदा सरसगयुक्तानामवस्थैव यदा भवेत् । तदा दयालुता दैन्यदर्शनात्तु हरेभंवे' दित्याशयेनाह तदा भवेद् दयालुस्वमिति । अन्यथेति । एव भावाभावे भगवतोपि क्रूरता अवकृपालुता अनपेक्षकरवेन मतामा सम्मतेत्यर्थ । अत एव नैवात्मन इति लोके भगवत भारमन प्रभोनिजलाभपूर्णस्य अवि द्वजनोपकृतोपराग्रहीतु करुणया किकरनिवेदितानुग्राहकत्वमुच्यते श्रीभागवते । सा च पूर्वोक्तभावे नैव भवतीति सर्वमनवयम् । ननु कालकर्मस्वभावादिमिर्बुद्धिनाशवयम्योद्वैगादिदोषसम्भवे कथ गुण गाननिर्वाह इति चेत्, तबाहु याधशद्वापि नास्त्यति । अत्र गुणगाने कालादिवाधराय न, यतो भगवतैवोक्त श्रीभागवते 'न कर्हि चिन्मस्परा शान्तरूपे नस्पन्ति नो निमिपो लेटि हेति'रिति । विध। नाब भगवतापि याध कर्तुं शक्य , तत्र के वराका कालादय इत्यथ । अत एवोक्तमाचार्य हरिरत्र न रानोति फर्नु पाधा कुतोपर' इति । ननु सर्पकृतिसमर्थस्य भगवत कथमेतलायमाघकृत्यसमर्थरव मिति चेत् सत्यम्, परन्तु सर्वस्य वशीति श्रुत्या सर्वावश्यस भगवतो भवतवश्यतेव सर्वसमर्थस्य भक्त भाववाधासमर्थत्वमिनि भाव । एवमनिष्टनिवृत्तिमुक्त्वा इष्टप्राप्तिमा तदध्यासोपि सिध्यतीति । गुणगानेन तस्य भगवत अभ्यास सर्वप्रावभास सोप्यवान्तरफलतया सम्यक् सिद्धिविषयो भवतीत्यर्थ । अध्यासपद घटादिषु तदवभासस्य भावप्राशयुक्त वेन वस्तुत आसक्तिभ्रमबोधनाय । अन्यथा घटादे पुरुषोत्तमामिनत्व स्थात्, नहि घटादि साक्षात्तदमिन्न , किन्तु परम्परया । तस्याक्षरारमतया तारा तथारयात् , अन्यथा तायद्धर्मविशिष्टत्य तेप्वायमिथ्यात् । ननूच्यन्त एव ब्रह्मधर्मा सचिदानन्दादय स्तेविति चेन, अक्षरगतानामेव तेश दृत्तितया व्यपदिश्यमानत्वात् । अन्यथा बहाँपीडरवादयोपि भ्यप दिश्येरन् । १ च इष्टापत्ति । तदसाधारणधर्माणामन्यत्र कथनस्यानुचितत्वात् । विज, सर्वेपा धर्माण साधारण वे तद्गतासाधारणधर्माभावे रक्षणाभावादनिरूप्यस्व जीवसमत्वमभजनीयस्व च स्यात् । तसादभेद स्याक्षरसमानाधिकरणत्यैन तद्धर्मव्यपदेश एव, म पुरषोत्तमधर्मगन्धोपीति घुसस्व । नन्व मर्यादयो व्यपदिया एव, किं न ते पुरुषोत्तमधमा इति चेत्, सत्यम्, तद्धा एव, पररवक्षरस्य वरण रूपायेन तदमिन्नतया तेण तग्र सद्भावात् । यतो व्यासादिष्वपि तदिच्छया सहाव , युक्त भग स्वैरिनि पारपात् । एव सति 'उत्तम पुरपस्वन्य' 'मेदव्यपदेशाचे'त्यादिस्मृतिसूप्रमीमांसया अक्षराभेर पुरषोतमभेद इति भेदाभेदवादोऽस्माकमिनि दिक् ॥ १५ ॥ ननु पैराग्यस्य गुणगानाङ्गस्येन तदभावे साहीनत्वेन न सफ्लावमित्याशार तदप्यनेनैव भवतीति साधनसम्पादकरूपमुत्कर्षमाहु भगयर मसामर्यादिति । भगवदो गुणगान तरसामसुशोरेर विप्रो भगतिसिसिपये विरागो रागाभाव स्थिर, अन्यापरिमाप्यो भवतीत्यधं । 'सा थधानस्य विवृदमाना विरत्तिमम्पन्न करोति पुस' इति धाश्यात् । यता, भगवमा भगवाहीलादय , सरसामध्योदय तास्वभावादेष पिरतो भवतीत्यर्थ । मत एवोलमिरथ भूतगुणो हरिरिति ॥ ५॥ एवं सोपपतिक गुणगानकर्तग्यताममि धाय सदुपसहरम्ति एप शात्वेति । एवं पूर्वाचन प्रकारेण ज्ञानमाात् गुणवर्णने उरूपं जारवा सपिशी परित्यम्य सदाकालाम्यवधानेन गुणा एप पर्णनीपा । भत्र बाधकर्ष त्यागामाहु। ममत्सरग्लुम्धरिन । भारसयमयोरत्यन्तवाभावात् स्थाज्यापम्, मिर्गलाराणा सतामिति दा. पपात 100 गमु गुणगान रागतानादिवशीतपिततया कार्य इत्यागस्य तापले गुणगानस षतिगुरुपीरोभाभिमाररूपरणार गया भागापरपणाममापप सागमा हरिमाल सदा ध्येयति । एप हो सकारण भम्पाराषयपूरणामोरयल या सामल गोगायेष रक्षा भगयागाविभपतीति शापयितु हरिरिति । मनु योग इस परिपतगरपासमाषामिप सम्पादित:- भ्यम्माणियाविदोषयुतगतिंगा गादप सोपधामगागनिहापि भविष्यातील्यापाः हरिगति- रिति । भायापिyरासरूपस्य ध्यागम्, ग पायभागूख स्पर्थः । यी विध्याममे aire श्पकरप मोगर 1 गनु पासपूर्णपगुणगानमाण कि भयतीलाITE सपादपी। सहपारिचारमासादापि यत्र भगवन्यता प्रादुर्भायात् भगवती दशा स्पर्शन गमवाचित भवाी। तथा एतिः पराक्षक्षेपणारिस्पा, गतिः पिलासगरि, एमाप मामपूर्वपसारशगुणगाोग रोभा. भगवास्यरूपे स्पष्टमयाशित भाभा भपतीस्पर्श । रोषोपयोगिराधमातराण्यालथयण पीतंग- मिनी । अयण धीभागपा, पीराम, गायमपि स्पष्टग, सोयापिगपा कर्मम । भग्यमा थपणे पीनने भसम्भाषाविपरीतगायो स्यागार, गधा च भगः स्यादिशी भाष । भोगापेक्ष पीम, तनिरपेक्ष गाममिति सयोपिंपेका । मिस पुग्ने एष्णप्रिये एप्णय प्रिया प्रणा मियो पा गए सथाभो रतिः पार्यत्पर्य । पुरे कृष्णप्रिय इति म्यासेग एणप्रियत्यय रसियार्या, ग पुनस्पति गापा राप्यते । म पर साधासमुदापm frरूपपरतः शरीरपरिपालाण मनियरािफरणमातु। पायुरिनि । सपरिकरण गुणगाने मरटे भगा रापरणमपरदगम्धपाद स्यविपरीः मविशन पारीरग- समलाश सोपणयोग्य शोपयित्वा रायोग्य स्मोक्षिप्य राती पोपभाग शेष भपशिए परणरेणु- सम्बन्धी भाग गयेत् प्रागुयात् । राणा र भगिय शरीरे अलौपिपरपराम्परया पुरुषोतमाममा उमपयोग्यता भयप्तीपापोतदतिरित्तसाधनेरप मीपग्धो ग निर्गत इत्युतय । सारासापि दु संगापिना भाषणाशसम्भपादुपायगा। यम्यगी । यस्य पुनाभंगपरकार्य सेवाषिरूप पर प्रकर प्राशियेन म यते शिक्षायामपि, गदा सति सागय राम्य विशेषेण भरणादिकमपाल महा फोप्य इलः । भग्यथा सीमामध्ये सदनि सतिपिम गुमरा भवती म्याग तो मे रणप्रिय तिरियोग विरोधापरोरियत भातुः इति तय गर्ये शिप्रा एप परम्य इति भाय । इपगुस्त भी । कृष्णप्रियापे सीरपटप्रभुपार्यपरणे औदासीय शागिपर राति सम्म पागस्य सेयाप्रतिपूछापा महा, मसम्म त्याग या भागारमतिमार्ग प्रयेग ही ॥७॥ ॥10॥१॥मत पर साधास्पीरुपयमा साधनानाराणाममयोजयरपं म लालूभट्टकृत 'निर्णयार्णवा'न्तर्गतैतद्ग्रन्थसंशयनिरासः । संसारावेशदुष्टानामिन्द्रियाणां हिताय वै । कृष्णस्य सर्ववस्तूनि भूम्न ईशस्य योजयेदिति । कृष्णय सर्ववस्तूनि कृष्णसंबन्धिरूपरसादीनि विषयरूपाणि इन्द्रियाणां हिताय योजयेत् । भगव- दूपादौ चक्षुरादीना विनियोग कार्यो, न स्वन्यग्रेति फलितोऽर्थः । ननु जीवानां नानादेशस्थानां भगवदूपादिदीलम्यारकथ विनियोग स्यादित्याशश्याहु 'भूम्न इति । व्यापकस्येवर्य । ननु व्यापकरवेपि तिरोहित वादौरभ्य दुर्निवारमित्याशाहु ईशस्येति । सर्वत्र सर्वरूपेण सर्वकरणसमर्थस्पेत्यर्थ । एष सति मूर्यादिरूपेण प्रकटस साक्षाद्भगवत्वात्तत्र चक्षुरादिविनियोगस सोकयमिति कृतार्थता सिदैवेति सामर्थ्यसूचकमीशपदम् । अग्रेव-हरिमूर्ति सदा ध्येयेत्यादि । ध्येयेति । अनेनाऽन्त करणस्य भगवरयुपयोग उक्त । दर्शन स्पर्शनमिति चक्षुस्त्वचो । तथा कृतिगती इति करपादयो । श्रवण कीर्तन स्पष्टमिति श्रोतबाचो । पुरे कृष्णनिये रतिरिति । कृष्ण मियो पख कृष्णस प्रिय इति वा विप्रहेण भगवद्गत इत्य । कृष्ण प्रिये पुरे इत्पन्न "निमित्ताकर्मयोग' इति सूत्रेण सप्तमी । रतिरिति फर्मपदम् । अध्याहृतेन कर्तव्येति पदेन कर्मणोऽभिधानादाभिहिते रतिरूपे कर्मणि प्रथमा । प्रथमान्तेन कर्मवाचकरतिपदेन योगात्पुत्रे कृष्णप्रिये इत्यत्र निमित्तसप्तमी । तथाच कृष्णप्रियपुग्रार्थ रति कर्तब्येत्ययों भवति । अनेन व्यवाये दियस्य परम्परया मगवरसेवोपयोगो निरूपित । भगवत पुन उत्पत्स्यत इति बुद्ध्या भोग कार्यो, नवग्ययेति भाव । पुत्रपदेन स्वभार्यायामेष ताय भोग कार्यो, न स्वाच्छन्धेनेत्यनुज्ञातम् । पायोरिति । राद्वारा मलारात्यागो दर शुद्धो भगवरसेवायामुपयोक्ष्यत इति पायो परम्परयोपयोगी क्षेय । यस्य घेति । अन्त करणवहि करणानां मध्ये यस्य चक्षुरादेयंदा यस्मिन् समये भगवत्कार्यविनि- योगो न पश्यते, तदा, तस्मिन् समये तस्य विनिग्रह कर्तव्यो, न तु भगवदितरपदार्थे विनियोग इत्यर्थे । केचिदत्र 'यस्य वा भगवरकार्य मित्यनेन व्यवायेन्द्रियमात्रस्य निग्रह उस साहु । तत्र । यस्य यदा तस्य तदेत्युत्तयोर्यत्तस्यन्दयोवैयांपते । श्रत साक्षात्परम्परया वा यथायकचिदपि भग वद्विनियोग सातदेन्द्रिपाणि विनियोजयितव्यान्यन्यथा नु सर्वस्यवेन्द्रियगणस निमह कार्य इत्यबा पार्यवाणामागयो, न तु वेयल व्यवायेन्दियमायनिग्रहे तात्पर्यमिति ज्ञातव्यम् । मनु निरोधलक्षणमन्ये 'यच दुख यशोदारा' इत्यादिना श्रीमदाचायंवर्भगवहिरहादिमाम यिकदुखादि स्वर यानितमेतावता निरोधस्य सिक्षण सिद्धमिति चेत् । शुस । भगवद्विरद सह दु ग्व भगयरमयोगे परमारहादौत्यादि कार्य निरोधजन्यमेव । यतो निरदानामेव भगवद्विरदे इस भूयते । सयोगे महानानन्दध । 'गोपीनां परमानन्द आसीगोविन्दने ! क्षण युगरातमिर यामो येन गिनाऽभर"दिति पाश्यात् । एष सति तारा गनिरोधकार्यत्यारकार्यरक्षणमा मुखमाध्यमित्या करय । भगवदिरहसामधिकपरमदु पकारण निरोधाम भगवरसयोगसामयिकपरमानन्दसाधकार निरोधस्वमित्यादिलक्षणानि निरोधस्य सिध्यन्ति । निरोधस्य नियन्धसुबोधिन्योर्वहुधा निरूपितस्य पर परविस्वतपा मनीयमानलक्षणस्य सम्यगविरोधप्रकारो मया सुबोधिनीयोजनायो विकृत इति विशेष विज्ञामा ततोवधेयम् । एतदन्ते मुदितम्।

लालूभट्टकृतनिरोधस्वरूपनिरूपणं श्रीदशमस्कन्धसुबोधिनीयोजनान्तर्गतम् । श्रीगोवर्धनधारी तनोतु मदलानि । श्रीगोवर्धनधारिणं शुभकरं कारमूर्ति मजे । वन्दे नन्दपुराणपुण्यफलितं श्रीबालकृप्या प्रभुम श्रीमदलभविष्लेश्वरविभू प्यायामि सदन्दितौ । कुर्वे सरकृपया निरोधधितो सन्देहविश्वंसनम् ॥ भय निरोषस्य स्कन्धार्थत्वात् प्रथमं तत्स्वरूपं विचार्यते । तय 'निरोधोसानुशयनमात्मनः सह- शक्तिमिरिति पास्यादात्मनः पुरुपोत्तमस्य शक्तिभिरनुगायनं निरोधः भारमपदानिर्गुण परं प्रम माझम् । गौणधारमशब्दादित्यचारमशन्दस्य परवाचकताया निर्धारितस्यात् । तन्न 'कृषिभूवाचकः शरदो णय निर्वृतिवाचकः, सयोरक्यं पर मझ कृष्ण इत्यभिधीयत' इति ध्रुतेः, 'कृष्णस्तु भगवान्वय'मित्यादि। माक्याच परमारमावं कृष्णस्य सिद्धम् । अतः कृष्णस अनुसपनं निरोधः । अनुशयनं नाम लीलानुरूपा स्थितिः । 'विष्णुः सर्वगुहाशय' इत्यादी शोधातोः स्थित्यर्थकस्वात् । न हि गुदायां होते' इति ग्युरप- क्षेम गुदाशयशम्देन निदातीलः सिध्यति, निदाया भविद्यावृत्तित्वात् । भतः शोधातोतारा- स्पितिरत्रायः । एवं सति शक्तिमिः सह भगवतः स्थितिः शयनं, भनुरूपसोपसर्गाथैः । करसानुरूपे- स्याकांक्षायां स्थितेलीलाप्रयोजनकरवाष्ठीलानुरूपेति बोध्यम् । एवं घ कृष्णस्य लीलानुरूपा स्थितिरनु- सायनमिति सिवम् । स्थितिरपि लीलाविशेपोनेकविधलीलासाधकः । अतः सर्वलीलासाधिका स्थितिरूपा लीला निरोधपदायों भगवदर्भः,सप प्रपश्चमध्य एवं स्फुटः। कृष्णावतारस्य प्रपञ्च एव जातत्वाए। तबुकं निपा स एव कदाचिमगदुदारार्थ अखण्डः पूर्ण एव मादुर्भूतः कृष्ण इत्युच्यत' इति । भसोनेक- पाकिमिः सह कृष्णस्य प्रपले मीसा निरोध इति फलितम् । एतदुक्तं मुबोधिम्या 'निरोधोस्यानुशयनं भपश्चे कीपन हरेः । शक्तिमिर्दुर्विभाध्यामिः कृष्णस्येति हि लक्षण'मिति । इह कारिकायां कृष्णस्येतिपद मूलस्पास्मपदव्याल्यानरूपम्, भागपवमते कृष्णस्यैवारमरूपरवात् । अत एवावतारान्तरलीलायो रकन्या- म्वरप्रतिपापायांनातियाप्तिरिति भावः। एवं निरोपशब्दोऽनुशयने रूद इत्युक्तम् । विश, मपञ्चविस्मृति- पर्विका मगवदासक्तिनिरोधा, नितरों रोधो निरोध इति व्युत्पत्तेः । रोपः कस्यपेक्षायां भक्तानामिति- स्कन्पार्यसाया लम्यते, कस्माद्रोध इत्यपादानापेक्षायां प्रपश्चोग्रासः। तथा सति प्रपश्चादोष इति सि- ध्यति माप्रपयानोपेपि कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आसे मनसा सरन् । इन्द्रियान्विमूढारमा मिथ्या- चारः स उच्यत' इतिवापसरणं चेत्तदा भगवलीलानुभषे गुरुयोधिकारो न स्यात्, भतः प्रपञ्चविस्मर- समपेक्षितर, तदुपसर्गेण लम्यते, नितरां रोधः पप्रचविसरणपूर्वकः स निरोध इति । कम्मिशिरोध इत्य- पैक्षायां मगवति निरोप इति शेयम् । स हि परमरुत्युत्पादकलीलाजन्यत्वेन परमसुखरूपावादासक्तिरूपो भवितुमईति । एवं यौगिकम्युरपस्या प्रपञ्चविस्मृतिपूर्विका भगवदासक्तिनिरोध इति फलितम् । 'या तु व्यसनसंप्रातिनिरोधः स तु कथ्यत' इति भरताचार्यवाक्ये व्यसनपदवाच्याया आसरेय निरोधस्वकय. माघ । साच इविमन्दादयो गोपाः कृष्णरामकमा मुदा, कुर्वन्तो रममाणाश नाविन्दन् भवदना'मिस्थन स्फुटममिहितम् । शय्यासनाटनालापवानक्रीडाशनाविषु, न विदुः सन्तमात्मानं वृष्णयः कृष्णदेवता' इत्यत्रच स्फुटममिहिता। एवमुभयं निरोधपदयाच्यम् । समुदायो जम्मवानी क्रीदापुरुस्य व हरेमपत्र- विस्मृतिः सक्रिमकानां चापि योगत' इति निबन्धात् । लरोधमान्दस्य यौगिकत्वपो मक्तकर्मकनिरोधवत भगवरकर्मको निरोधो गोप्यतया विवक्षितः । पथा भगवता टीकाभिर्निरद्धा भक्ता भगवदशे भवन्ति, एवं पुष्टिमीठाभिर्निरदो भगवान् मफवश्यो भवति । भत एव भगवता भत्तेतरविपयशानाभावः स्वस्मिन्प्रदरितो नाहं तेभ्यो मनागपी' त्यनेन । इममर्थ सूचयितुं स्वदश्योरे भगवतः शयनमापाय रुतं नमामि इदये शेषे' इत्यनेन । 'अन्यत्र गतिरहितो य' इनि टिप्पण्यां न्यारयातं च । भन्यच 'भाभास लिरोयन यतचाप्ययसीयते, स आश्रयः परं ब्रह्म परमारमेति शम्चत' इादौ प्रलयो निरो. 1 भगवत धपदवाच्य । स च प्रपञ्चप्रतियोगिक । एव च सुबोधिन्युक्तया टिप्पणी व्युत्पादितया पूर्वोत्तरस्कन्धार्थ समत्या नवमदशमार्थसन्नतिविचारे भताना प्रपञ्चप्रलयो निरोध इत्यायाति । अत एव द्वितीयस्कन्धः सुबोधिन्यां 'भक्ताना प्रपञ्चाभायो निरोध' इत्युा इहेव सुबोधिन्याम् । अतो 'निरोधो भकानां प्रपा सस्पेति निश्चय' इत्यभाणि । तथा च भक्ताना मपञ्चस्य प्रलयतिरोधान नित्यलीलोपयिकदेहत्वफलको जाख्यात्मकप्रपसभावालय इति यावत् । तदुक्त सुयोधिन्या 'अतो निरोधो भक्ताना प्रपञ्चस्पति निश्चय' इति । सूतोकलक्षणेपु निरोधस्थाने सस्था पठिता, सस्था च 'नैमित्तिक प्राकृतिको नित्य भास्यन्तिको लय । 'सस्थेति कविभि मोक्तश्चतुर्दास्य स्वभावत' इत्यनेन प्रलयरूपा व्याख्याता । अतो निरोधः शब्देन प्रलय उच्यते, 'निरोधोखानुशयन'मित्यस्य सुबोधिन्यामपि शक्ती शाययित्वा तदोगार्थ शयनमिति घ्याल्यातम् । तत्रापि शक्तिशयनानन्तर शयनकयनेन प्रलय उक्त । अतो भक्त- प्रपन्चसम्पादिका शक्ती स्वस्वरूपे तिरोहिता कृत्वा तिष्ठति, ततो भक्तान प्रति प्रपञ्चलिरोभवति, भतो भक्ताना प्रपञ्चनिवृत्तिरिति सिध्यति । एतदभिसन्धायोक्तमन एव सर्वगतो विष्णु प्रकटवेत तद्विशेद, पापस लीयते सर्पमिति कृष्णसमुद्यम' इति । इदमन शेयम् । स्वच्छन्दलीलाभिमंगवाविरोध्य भक्तानां देहादिसकलप्रपञ्चे स्वानन्द प्रवेशयन् तिरोहितानन्दमयाविभावयति, ततो भगषदानन्दानुभवयो ग्पालीक्किदेहत्यप्राप्ती जाह्यादिरूपपूर्वप्रपञ्चमायो लीयते, अयमेव प्रलयपदार्थ । मतो भकानां प्रपघालयो निरोध इनि फलति स्म । तथा च प्रपने शक्तिभिर्भगवरक्रीडम भत्तानां प्रपश्चधिस्मृतिपू- पिका भगवदासक्तिभचानां प्रपञ्चाभाववैति प्रप निरोधपदवाच्यम् । तत्र भगवरकीटन करण, भगव पासतिर्ष्यापार , भत्तानो प्रपसाभाव फलमिति त्रितयरूपो निरोध स्कन्धार्थ । एवमद सिवम् । भावाननेकादिभि करणरूपनिरोधारिमका फोटो कुर्वन् प्रपत्रविम्मृतिपूर्वकासक्तिरूपनिरोधात्मक प्यापारेण प्रपश्चाभावरपफ्लारमकनिरोध सेवकानां सपादयतीति विष्वपि निरोधपदव्यपहार सुपोधि. भीनियम्यादिपूपलभ्यत इति सर्पमदुष्टम् । विच, 'लौकिफेषु तु भावेषु यत्रैव हरियेशन । निवर्तते सदे. पान पोवोधमय यति फारिकाया फलामको निरोध वक्त । तथाहि, लौकिकेतु भाषेषु पदार्थेषु पत्र पत्र भगवान् मविशनि, सन्न तर चिदानन्दयोस्तिरोभूतयोराविर्भावाप्तदेव पूर्वस्थितस्वरूप तिरो हितानन्दक निवर्वते, प्रसारमक भवति, प्रकटसनिदानन्दक भवतीति यावत् , तत्र स्टाम्प , पहेरि. स्वादि । पहिप्रवेशे दारूणां पतिरूपता सरदिस्यर्थ । एव भवानी प्रपसमलयो पोप । अन्यथा पाकिगपमानन्तरपपनवाचक अनुशपनराम्दे गोम्योोपि विपक्षित , सदनुसारेण स्कन्धारम्भ कन्या रूप भगवस्त ममस्पति धीमदाचार्यधरणलीलाक्षीराम्पिशायिन एक्ष्मीसहलीलामि सेप्यमान कलानिधिमिरयुषया रहस्यठीलायो निरोधपदवाध्याय सूचितम् । तदनुसारेण प्रभुधारिपच्या 'भमु. गम्यते मनेने तिकरणपुत्पति माश्यं निगरमापकरण पेन सरोष इत्युक्त्या स्वपीयेषु स्वविषयक- भाषोत्पादन पया छोटया फियते, सानिरोधपदवाप्पयुकवमिर्गराठीमाया स्कम्पासा प्रतिपापिरोति शिक्षिर्विभाषनीपम् । एवम, श्रीगुशोक्तिमुबोधिनी टिप्पणीषु सर्वत्राविरोध हरपेक एवारापखपाणी पातुर्मपति मावा साद सिटम् । देहाती पिशाययोः मास्टर मायादिपराभावप्रसप पल- को मरोप सिदा शामिन् सति प्रपो विचमानानामपि भयानम्दानुभवपोम्पदेश्य रिपनि । रामेष यगुनार 'ममातु सव सम्धिी वनुनदायमेतापते' नेन माधित, तो मिसलीष्ठा• मोगा यक्षिपवाया, निरोषष्ठीलायां मनामा साधारणमापागुजारिलायेपि लीलास्यभक्तनिया भारतमापागुगापासवन कोहिसारयायव प्राणादी, ती मनायोगमापागुणनिती मिपमा गुलियो गुनिता निर्माणपमिति दिए । मुक्तिपिपारूपाल बारागुगरपाम्यपाहापा।

श्रीमद्-वल्लभाचार्य-महाप्रभु-विरचित-पोग्श-प्रग्यान्तर्गतम्-अन्तिमम्
सेवाफलम्
राविवरणम्
चतुर्दशटोकाभिस्समलंकृतम्
१. श्रीकल्याणरायाणाम्
२. पचा योगोपेशानाम्
३. श्रीदेवकीनन्दनानाम्
४. श्रीहरिरायाणाम्
५. कोयल्लमानाम्
६. बीपुरुषोत्तमानाम्
७. श्रीनारकेशानाम्
८. श्रीलालूभट्टानाम्
९. श्रीजयगोपालभट्टानाम्
१०. श्रीलक्षाणभट्टानाम्
११. श्रीगोकुलनायानाम्
१२. केषाञ्चित्
१३. केवाञ्चित्
१४. श्रीवगभूषणानाम्
श्रीमद्-वल्लभाचार्य-महाप्रभु-वंशावतंस-गोस्वामिश्री-१.०८
श्रीगोविन्दराप-महाराजश्रीपत:-प्रकाशितम्
श्रीवल्लभाव : ५०३
वि.सं. २०३७

प्रकाशक:
गोस्वामिश्री १००८ श्रीगोविन्दरायजी महाराज
गोविन्दनिकेतन, भाटिया बाजार,
पोरवन्दर, गुजरात, ३६०५७५, भारत.
साधारणसंस्करण २००० प्रति
राजसंस्करण १००० प्रति
श्रीवल्लभाब्द: ५०३
प्रन्थपरिचपलेखक : गोस्वामी श्याम मनोहर
स्टूडियो वहार, २३-९, सेन्ट्रल चौपाटी बिल्डिंग, चौपाटी, बम्बई, ४०० ००७.

Pr-MAMI गोस्वामिश्री १००८ श्रीजीवनलालजी महाराज गोस्वामिश्री १००८ श्रीरणछोडलालजी महाराज ॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ ॥धीमदाचार्यचरणकमलेम्पो नमः ।। pagination No ग्रन्थ-परिचय फल और उसके विवरण की रचना श्रीमहाप्रभुने आगरामे विष्णुदारा छोपाके लिए कंवदन्तीके अनुसार इसका रचनाकाल वि. स. १५८२ माना जाता हैं.. वातमि पक उल्लल यो मिलता है: आगरेके पासके गाममे एक छीपाकै घरमें प्रकटे. सो बडे भये, बीस वर्षके, तब तो. सो पिता घस्त्र छाप देय विष्णुदास आगरेमे जाई बेच लावें. सो ऐसे करत एक आचार्यजी आगरे पधारे. सो विष्णुदास सुन्दर छोटकै पान लै आगरे गये तब ओआचार्यजीने कृष्णदासमो कही-'यह छीपाके पास छीट आछौं है सो तू ले. जो मागे सो दे.' तव कृष्णदासने विष्णुदासतो कही- 'यह छोटके मान सारे हमको दे. याके दाम हैं सो तू ले.' सो विष्णुदासने चौगुनौ मोल कह्मो. सो कृष्णदासने सगरे रुपया गिन दिये. और कहे- 'और आछे पान होई सो ले आऊ !' तव विष्णुदास भक्त होई रहे जो ए तो बड़े महापुरुष अलौकिक जीव हैं । जो मोल न कियो, सगरे थान लिये, ताके दाम दिये ! सो इनको छोट देनो उचित नहीं है. इनको पैसा मेरे घर आवेगो तो सगरो पर वैरागी होई जायेगो ! तब विष्णुदासने कही- 'ये सगरे अपने रुपया लेऊ. मेरे छोटके पान फेरि देऊ 'सब कृष्णासने कही-'तू वडो मूरख दीसत है। ते मोल कहो सो दाम दिये अब यह थान कबहू फिर नाही. तेरे टोटा होई तो और हूँ रुपया ले. चौगुने तो वाम लिये !' तब विष्णुदासने कही-'तुम महापुरुष हो ताते तिहारी द्रव्य परमे आये सगरो घर बैरागी होईगो याते मैं तुमको नाही वेचत. जो थान न देहू तो यह रुपया हू रासो. और पान ह राखो. परन्तु रुपैया तिहारो मोको पचे नाही ' तब कृष्णदासने काही- 'यह थानको श्रीमाचार्यजीने श्रीमुखसो सराहना करिके कहै-"लेऊ." सो तू फोटोन उपाय करे तो यह पान फिरे नाही और श्रीमाचार्यजी विना सेवक ओरको कछु लेत नाही...' तब विष्णुदासने कही-'श्रीआचार्यजी कहा है " उपनिपने मेक ही तो कहा है कि परमात्मा न तो प्रवचनसे मिलता है, न मेषामे और न बहुश्रुततासे ही परमात्मा कहा है किसे मिलता है ? उत्तरः परमात्मा जिसे खोज रहा हो वही परमात्माको खोज पाता है। परमात्मा जिससे मिलना चाहता है वही परमात्मामे मिल पाता है- "यमेवैप वृणुते तेन लम्य." (कठ. १-२-२३). १वैष्णववाणी (अक ४ वर्ष १९७९) यौनागरदास शास्त्री लिखित लेख ?" भारतवर्षको तीन-तीन परिक्रमाओमे श्रीमहाप्रभु इन्ही विष्णुदासोको तो खोज रहे थे तभी तो विष्णुदास भी पूछ सके- "श्रीआचार्यजी कहा है निरोधलक्षण ग्रन्थमे कहा गया है कि भक्तोंके वीच भगवान्का इस भूतलपर प्रकट होना करयानिरोध है प्रपञ्चको भूल कर भक्तोका भगवान्मे मासक्त हो जाना व्यापार. निरोप है इस प्रपञ्चविस्मृतिपूर्वक भगवदासक्तिके व्यापारद्वारा भक्तके देह-इन्द्रिय-अन्त करण- प्राण आत्मा सभीसे सर्वत्र-सर्वदा भगवान् के स्वरूप या लीला का निस्तर अनुभव होना (मानसी सेवा) फलनिरोध है तदनुसार विष्णुदासको छोटपर श्रीमहाप्रभुका रीझना करण- निरोप था विष्णुदासका- "श्रीआचार्यजी कहा हैं ?" पूछना व्यापारनिरोध था और सेवाके विना ही विष्णुदासको इस 'सेवाफल' का दान फलनिरोध था । “यमेवप वृणुते तेन लम्य तस्यैष आत्मा विवृणुते तनु स्वाम्!" जीवात्माका वरण करणनिरोध है और परमात्माद्वारा निजरूपका विवरण फलनिरोध वार्तामें आता है कि "तव श्रीआचार्यजी श्रीयमुनाजीके तीर पधारी विष्णुदासको न्हवाई नाम सुनाये ब्रह्मसम्बन्ध कराये विष्णुदासने विनती करी- 'महाराज ! मै मूरख हो सो ऐसी कृपा करो जो श्रीमागवत आदि आपके ग्रन्थनमे कछु ज्ञान होई, आपके मारगको सिद्धान्त जान्यो जाई' तब श्रीआचार्यजी 'सेवाफल' ग्रन्थ करी विष्णुदासको सुनाये सो सुनिके विष्णुदासने विनती करी-'महाराज! 'सेवाफल' प्रत्यके सुनेते सगरे शास्त्रपुराणको शान भयो परन्तु 'सेवाफल' ग्रन्थको अभिप्राय समुझिवेमे नाही आयो तब श्रीआचार्यजी कहें- 'अन्य' 'सेवाफल' ऐसो ही कठिन है भली करी ते पूछयो !' पाछे आप 'सेवाफल' की टीका करिके सुनाये तब सगरे मारगको सिद्धान्त विष्णुदासके हृदयारूढ भयो सो मगन होई गपे सो विष्णुदास पोरो सो कपडा छापें सो आगरे बचि आवे जामे देहनिर्वाह होई और सगरे दिन-रात मानसी सेवा श्रीआचार्यजीके ग्रन्थ श्रीसुबोधिनीजीके भावमे मग्न यह मानसी सेवा परासेवा है, यह सिद्धान्तमुक्तावलीमे कहा गया था मानसी सेवाकी सिद्धि तनु वित्तजा सेवा करनेसे होती है, यह भी वही कहा गया था इस पुष्टिमक्तिरूपा रोवा अधिकारी पुष्टिीव ही होते हैं, सभी नही, यह पुष्टिप्रवाहमर्यादामे निरूपित किया गया है सिद्धान्तरहस्यमे पुष्टिजोदोको पुष्टिभवितल्पा सेवामे दीक्षित करने के लिए आत्म- समर्पणका प्रकार समसाया गया है इससे मोगासक्ति पुष्टि-मकिनमे बाधा पहुचानेमे असमर्थ बन जाती है नवरलमे सेवाको उद्वेगरहित बनानेके लिए चिन्तात्यागकी बात समझायी गयी है अन्त करणप्रबोध विवेकपर्याश्रय तथा कृष्णाशय द्वारा इसी पुष्टिमार्गीय भगवरसेवामे विघ्नरूप उदेग एवम् प्रतिदायो से बचनेके उपाय दिसलमे गये हैं चतुश्लोकोगे इस सेवाका पुष्टिमार्गीय धर्मापंवाममोसवी पुरुषापंचतुष्टमीम या रपान है यह दिखलाया गया है भक्तिवर्घनीमें इस सेवाके बीजभावसे लेकर व्यसनदशातक होते विकासको रूपरेखा खीची गयो है. सेवाके बनवसरमें चित्तके भगवत्प्रवण बने रहनेमे कोई व्यवधान न आये एदतर्थ जलभेद-पञ्चपद्यानिमे भगवत्कथाके श्रवण-कीर्तनका स्वरूप समझाया गया है. यह सेवा न निमती हो तो भोगासक्तिपर काबू पानेके लिए गृहत्याग कर देना चाहिये. यह गृहत्याग व्यसनदशा सिद्ध होनेपर ही करना चाहिये अन्यथा नही. संन्यासनिर्णयमे यह सावधानी बरतनेकी सलाह दी गयी है. निरोषलक्षणमें इस सेवाके मानसी रोवाके रूपमें विकासके सहायक कारणोको परिभाषित किया गया है. अब सेवाफलमे उक्त तनु-वित्तजा सेवाका फलित रूप फलनिरोप अर्थात् अलौकिक-सामर्थ्यके रूपमे दिखलाया जा रहा है. यह परमात्माके भूमारूपमें सकल वृत्तियोका पोजन है. इसे 'सर्वात्मभाव' भी कहते हैं. समग्र पोडशग्रन्योंको एकवाक्यता या आधारशिलाके जैसी केन्द्रीय धारणा, पुष्टिप्रवाह- मर्यादा प्रन्यके-"भगवद्पसेवायं तत्सृष्टि: नान्यथा भवेत्," वचनमे श्रीमहाप्रभुने स्पष्ट कर दी है. अतएव पोडशग्रन्यके उपसंहाररूप सेवाफलमे पुष्टिमार्गीय फलसे भिन्न किसी फलका निरूपण स्वीकारनेपर; अपवा पुष्टिमार्गमे भी सेवासे भिन्न किसी कर्तव्य या अवस्था को पुरुषार्थ या फलरूप माननेपर, उपक्रम-उपसंहार आदि तात्पर्यनिर्धारक अंगोमें परस्पर विसंवाद उपस्थित हो जायेगा. अतएव इस ग्रन्यके उपसंहारमें श्रीमहाप्रभु आशा करते हैं- "कुसृष्टिरत्र वा काचिदुत्पद्यत सवै भ्रम.". इस ग्रन्थमें सेवाफलके रूपमे वर्णित 'अलौकिक सामयं,' 'सायुज्य' तथा 'वैकुण्ठादिषु सेवोपयोगिदेह' को अनेक व्याख्याये विभिन्न टीकाकारोदारा दी गयी हैं. यथा: १) ये तीनों फल पुष्टिसर्गके तीन अवान्तर वर्ग पुष्टिपुष्टि मर्यादापुष्टि तथा प्रवाह- पुष्टि की विविध कक्षाके जीवोंके फल हैं २) तनुनवत्वरूप अलौकिकसामर्थ्य भगवद्विरहको फलात्मिका अनुभूति है. सायुज्य भगवयोगको फलात्मिका अनुभूति है. नवतनुत्त्वस्वरूप सेवोपयोगिदेह उभयसाधारण अधि- कारकोटीका फल है. ३) अलौकिक सामथ्यं पुष्टिभक्तिका फल है। तथा सायुज्य और सेवोपयोगिदेह मर्या- दाभक्तिके फल है. ४) अलोकिकसामध्यं सायुज्य और सेवोपयोगिदेह क्रमश. उत्तम मध्यम तथा साधारण कोटीके फल है. ५) संयोगानुभूतिरूप सायुज्य परम फल है. वियोगानुभूतिरूप अलौकिकसामर्थ्य तथा सेवोपयोगिदेह अधिकारसिद्धिरूप अवान्तर फल है. ६) अलौकिक सामष्य और सायुज्य पुष्टिक्तिके फल है तथा सेवोपयोगिदेह मर्यादाभक्तिका फल है.

७) अलौकिकसामर्थ्य अति-अन्तरग सेवाका फल है अन्तरग सेवाके द्विविध सायुज्यरूप फल होते हैं केवल आत्मना अनुभूयमान सायुज्य और अलौकिक-देह-इन्द्रिय-अन्त करण- आत्मना अनुभूयमान सायुज्य. सेवोपयोगिदेह बहिरंग सेवाका फल है ८) सर्वेन्द्रियोकी भगवत्परता अलौकिकसामर्थ्य है. देहनाशक विगाढभावसे अन्यस्फूर्ति- रहित आन्तर सयोग सायुज्य है मानसी सेवाकी सिद्धि होनेपर, वैकुण्ठादि भगवद्धामोमे जैसे देह होते हैं वैसे, सेवोपयोगिदेहकी सिद्धि तृतीय फल है भगवान्के द्वारा प्रदत्त भावोंके अनुसार भगवदनुभूतिके अनेक प्रकारोंमे भक्तोको फल. रूपता प्रतीत होती है. अत सभी व्याख्याकार अपनी-अपनी फलरुचिके अनुसार फलको व्याख्या करते रहते है. इनमे यदि मतभेद दिखलायी पडना है तो वह भी अपनी-अपनी फल- रुचिको मस्तीका मधुर मतभेद है अत मतभेद भी फलात्मक है । अन्धके तात्पर्यका जहा तक प्रश्न है तो वह भागवत (३।५।३२-४०) के नो श्लोकोकी सुबोधिनीमे श्रीमहाप्रभुने सुस्पष्ट किया है. वहा भी सेवाफलको तरह भक्तिके तीन फल दिख- लाये गये हैं जोवन्मुक्ति सायुज्य और वैकुण्ठलोकप्राप्ति अत अलौकिकसामर्थ्य और जीवन्मुक्ति को एकरूप मानना चाहिये, तथा वैकुण्ठादिषु सेवोपयोगिदेह और वैकुण्ठलोक- प्राप्ति को एकरूप मानना चाहिये, उभयत्र सायुज्य तो समान है ही. इस एकरूपताको निर्धारित करनेके वाद सुबोधिनीमे जो विस्तृत विवरण फ्लत्रयका दिया है तदनुसार सेवाफल ग्रन्यमे निर्दिष्ट फलत्रयका भी स्वरूपनिर्धारण सुकर हो जाता है अलौकिकसामर्थ्य प्रकट होता है, इस भूतलपर भगवत्सेवा करते हुवे, सकल इन्द्रियोसे भगवदनुभूतिके रूपमे, यही पुष्टिमार्गीय जीवन्मुक्ति है इसे 'फलनिरोध,' 'सर्वात्मभाव, 'व्यसनोत्तर-कृतार्थता, 'तनुनवत्व' या 'मानसीसेवा' कुछ भी कहो, एक ही अवस्थाके विभिन्न पहलुओका निरूपण है स्थूल दृष्टिसे शब्दार्थ भिन्न भिन्न है पर पदार्थ सर्वत्र एक ही है भागवतके दशम स्कन्धका वयं-विषय निरोप है. एकादश स्कन्धका वर्ण्य-विषय मुक्ति है द्वादश स्कन्धका वर्ण्य-विषय आश्रय-ब्रह्मभावापत्ति है इस स्कन्धनयोके विषयक्रम तथा श्रीमहाप्रभुके-'एवं भेदत्रय निरूपित सायुज्य वैकुण्ठ जीवन्मुक्ति ति” (सुबो ३।२५।४०) वचन की एपावाक्यताको दृष्टिगत करनेपर यहा सेवाफलग्रन्थमे वणित फलत्रपका रूप स्पष्ट- तया निर्धारित हो जाता है अलौकिकसामध्यं फलनिरोध है, इस भूतलपर घटित होनेवाली भक्तोकी जीवन्मुक्तिकी तरह, जो दशम स्कन्धकै मनोके जैसी भगवदनुभूतिका एक अलौकिक प्रकार है सायुज्य परमात्मामे लय है, विदेहमुक्तिको तरह, जो एकादश स्कपका वर्ण्य-विषय है. धैकुण्ठादिपु-सेवोपयोगिदेह माश्रय-ब्रह्मभावपत्ति है, वैकुण्ठादि दिव्य भगवद्घामोंमे दिव्य देह प्राप्त करके पुन भगवद्भजनके सुअवसरकी प्राप्ति है, जो भागवतवे दादश स्कन्धका वयं विषय है इस तरह तीनोको एकवाक्यता निर्णरित हो जानेपर निरापलक्षण अन्यके बाद सेवाफल प्रन्यकी क्रमसंगति भी स्पष्ट हो जाती है. निरोधको साधनावस्थामा निरूपण निरोधलक्षणमे अभिलपित है तथा निरोधको फलावस्थाका निरूपण यहा सेवाफलमे जैसे सेवाकी साधनावस्था सिद्धान्तमुक्तावली तथा सिद्धान्तरहस्य मे विवक्षित है और सेवाको फलावस्था यहा सेवाफलमे. विभिन्न ध्याख्याफारोके इस फलविचारके वारेमे इतने जादा मतभेदका कारण एक मधुर कलह है. पुष्टिभक्तिमे भगवान्को सयोगानुभूति परमफल है कि विरहानुभूति. इस प्रश्नका उत्तर देते समय विभिन्न व्याख्याकार अपनी-अपनी भावधिके विवर उलझ जाते हैं. अतः सेवाफल ग्रन्थके अध्ययनसे पूर्व एतद्विषयक श्रीमहाप्रभु-श्रीप्रभुचरणके मन्तव्योका अध्ययन उपकारक होगा. तैत्तिरीयोपनिपझें ब्रह्मको 'मानन्दमय' (२१५) कहा गया है और 'आनन्द' (३१) भी. इसी तरह यही (२७) ब्रह्म को 'रस' भी कहा गया है-"रसोय स.." ब्रह्मसूत्रके- "आनन्दमयोभ्यासात्" सूत्रमे दो बातें निर्धारित की गयी हैं. एक तो 'आनन्द' पदके साथ 'मय (६)' प्रत्यय प्रचुरताके अर्थ प्रयुक्त हुआ है अत: 'आनन्दमय' का अर्थ होता है : प्रचुर आनन्दरूप. दूसरे 'आनन्दमय' शब्द परमात्माका वाधक है. इन सारी बातोंको लक्ष्यगत करनेपर दो प्रश्न उठते हैं : १) क्या 'आनन्द' और 'आनन्दमय' शब्द पर्यायवाची होनेपर भी अपंछायाके भेदके कारण ब्रह्मके किन्ही दो रूपोका निरूपण करते हैं या नही २) यदि करते हो तो "रसो वै सः" वचन द्वारा प्रहाके किस रूपको, क्या आनन्दरूपको अथवा आनन्दमयरूपको, 'रस' कहा जा रहा है। निश्चयेन कहा जा सकता कि श्रुतिका भार परमात्माको रापतापर अधिक है नमोकि स्पष्टतया वहां कहा गया है-"रसी पै स रस हवाय लब्ध्वा आनन्दी भवती." इस विषयमे श्रीहरिरायचरणकी धारणा है कि परमात्माके वहि.प्रकट साकृति रूपको 'मानन्दमय' कहना चाहिये और भक्तक हृदयमे प्रकट होती परमात्माके प्रति स्नेहानुभूति याप्रीति को 'आनन्द' कहना चाहिये. रसशास्त्रमे रति अर्थात् प्रीति को 'रस' एवम् 'स्यापिभाव' कहा जाता है. जिस व्यक्तिके वारेमे रति या प्रीति होती है उस व्यक्तिको रसशास्त्रमे 'भालम्बनधिभाव' कहा जाता है. रसशास्त्रका प्रमुख विवेय दिपप हमारे प्रमुख मनोभाव, उनके विषय, उद्दीपका, अनुभाषक एवम् अगभूत अस्थायी मनोभावो के स्वरूपोका निर्धारण है. अतः रस अर्थात् स्थायी मनोभाव को रसमास्त्रमे धर्मो माना जाता है। और इन प्रोति भय कोष उत्साह निर्वेद जैसे मनोभावोके विषय उद्दीपक आदि अन्य सभी अंगोको धर्म माना जाता है. तदनुसार श्रीहरिरायचरणकी धारणा है कि वहिप्रकट परमात्माका रूप, क्योकि भक्तके स्नेहमय स्थायी भावका ही मालम्बनविभागके रूपमें हृदयके बाहर प्राकटय है अत उसे .

धर्मसहित धर्मी मानना चाहिये. इसके विपरीत भक्तके हृदयमे प्रकट स्थायीभाव, जिसकी स्पष्ट अनुभूति विरह्दशामे ही सम्भव है, उसे केवलधर्मी मानना चाहिए. "एतावान्पर विशेषो यद् बहि प्रकट रूपं रसधर्मसहितम् 'आनन्दमय' शब्देनोच्यते, धर्मिमात्र केवल भाव रूपम् 'आनन्द' शब्देन इति" (प्रमप्रादुर्भावविवार). अत. केवल धर्मीको उपनिषद्म 'रस' कहा गया है. श्रीहरिरायचरणके अनुसार 'आनन्द' और 'रस' पर्यायवाची शब्द है, और, 'आनन्दमय' का अर्थ होता है : रसधर्म-आलम्बनविमावसहित स्थायिभाव. 'मानन्दमय' और 'रस' पर्यायवाची नहीं है. अणुभाष्यमे परन्तु भाष्यकार किञ्चित् भिन्न प्रकार दिखलाते है- "अग्रे 'रसो वै सः' इति वक्ष्यमाणत्वात् तस्य च स्थायिभावात्मकत्वात् तरयंब आनन्दमययत्वाच्च" (अणुभा. ३२२१५). यहा 'आनन्दमय' और 'रस' को पर्यायवाची माना गया है. ब्रह्मको आनन्दरूप माना गया है- “आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्". ब्रह्म अपरिच्छिन्न- अनन्त-पूर्ण आनन्द है, पर भक्तके हृदयमे जब उस परमात्माके लिए प्रीति प्रकट होती है तो उसके अनुभवका सुख,ब्रह्मको केवल तत्वानुभूतिसे कही अधिक पूर्णतर-प्रचुर होने के कारण, 'आनन्दमय' कहलाता है अत भाष्यकारके मनमे 'रस' का पर्यायवाची शब्द 'आनन्दमय' है तैत्तिरीयोपनिषद् (२१५) मे अतएव विज्ञानमयकोशके भीतर आनन्दमयकी उपस्थिति दिखलायी गयी इस आनन्दमयकी भारमा आनन्द है यह-"आनन्द आत्मा" (वही) कह कर-दिखलाया गया है ऐसी स्थितिमे आनन्दको धर्मी मानना चाहिये कि आनन्दमयको ? यदि आनन्दको धर्मी मानते हैं तो आनन्दमय धर्म बनेगा और यदि आनन्दको धर्म मानते हैं तो आनन्दमयको धर्मी मानना पड़ेगा हमने देखा कि रसशास्त्र प्रेमको धर्मों मानता है और प्रियतम आदिको धर्म क्योकि रसशास्त्र भावविवेचना है और प्रेम एक भाव है. अत अपने पारिभाषिक अर्थमे प्रियतम रसशास्त्रके लिए धर्म बन जाता है क्योकि प्रियतमके स्वरूप गुणधर्म या विभिन्न प्रकारो का विवेचन, रसशास्त्रको, प्रेमके जनक और प्रेमके आलम्चन-विषय के रूपमे अमीष्ट है-स्वतन्त्र- तया नहीं. भागवतमे भगवान्से भिन्न किसी लौकिक चरित्रके रसात्मक वर्णनका कोई स्थान नहीं ऐसे ब्रह्मके शुष्कता वक विवे वनार्थ भो भागवत प्रस्तुत नहीं है भागवत भगवान् के रसा- त्मक रूप एवम् लीला के वर्णनार्थ प्रवृत्त हुयी है अतएव कभी रसशास्त्रीय परिभाषाओके सहारे भगवान्के स्वरूप एवम् लोला का वर्णन होता है तो कमी ब्रह्मशास्त्रीय परिभाषाओके सहारे भी. कभी भक्तोको भक्निके अगके रूपमे भगवान्का वर्णन होता है, तो कभी भगवल्लीलाके अगके रूपमे भक्त और उनको भगवद्भक्ति का वर्णन होता है कभी अतएव भक्तिको धर्मी मान कर सदंगभूत भगवान्का धर्मके रूपमे वर्णन होता है (यह रसशास्त्रीय विवेचनशैली है) और कभी भगवान्को धर्मी मान कर उनको लीलाके अगभूत भक्ति और भक्तो का धर्मरूपेण निरूपण होता है (यह महाशास्त्रीय विवेवारीलो है), इनमेसे मिसी एकतर परि- भाषाके अनुसार विवेचनाका हुठाग्रह सरस तो हो सकता है पर सर्वांगीण नही, अतएव भागवतानुसारी भगवान् के रसात्मक रूपये निरूपणमे दोनों वर्णनशैलियोका पचापच उपयोग अभीष्ट होता है. भक्तोंके प्रियतम भगवान्को सभी 'पर्मी' रहा जाता है और उनके स्वरूप गुण एवम् लीला आरपंण पारण प्राट होती प्रीतिलो 'धर्म'. सुबोधिनी (१।१९।१६) मे श्रीमहाप्रमुने यह समझाया है : "स्नेह एक विलक्षण पदार्थ है. स्नेही आपार और विषय दोनो ही भगवान ही होते हैं जितना-जितना कोई भगवान्के निकट पहुचता जाता है, उतना उसमे भगवान्के शान ऐश्वयं आदि गुणोबा सत्रमण भासित होने लगता है, जैसे अग्नि के निकट स्थित वस्तुओमे उष्णता समान होती है. इसी तरह जितनी जितनी निकटता भगवान के साथ हमारी यढतो जाती है, उतनी-उतनी मात्रामे भग- पदम प्रीति भी हमारे भीतर यहती चली जाती है". प्रीति भगवाना आरमरतिरूप धर्म है. पर भगवान के निकट होनेपर यह हमारे भीतर भी प्रकट होने लगता है अतएय थोमहा- प्रभु कहते है--"प्रीतिस्तु भावधर्म (मुयी २।२१७). यह पह्मशास्त्रीय विवेचनौलो है. प्रेम, प्रिमताये कारण, प्रेमीये हृदपमे प्रकट होता है प्रेमये अति गाढ होनेपर, प्रियतम- पी अनुपस्थिति में भी आगक्तिभमन्यायमै, उस प्रेमके यारण प्रियतम भी पभी प्रकट हो सकता है प्रियतममे प्रकट होनेवे रूप प्रेम यर्म तथा प्रियतम धर्मी माना जाता है. पर प्रसाद अवरधाम प्रेमके कारण प्रियतमक प्रक्ट होनेपर, प्रेम धर्मी और प्रियतम धर्म बन जाता है. अत. प्रेम और प्रियतम का भेद पडा लचीला है-"विरहमाये तु ज्ञानादिसर्वतिरोधानेन अग्रिमरसानुभको न भविष्यतीति स्वयमेव (भालम्वनविभाव एव')दनुभयात्मको भवतीति जापनाय विज्ञानसमुच्यने तदनुभवविषय आनन्दमय इति तस्वरूप मुख्यते. तत्र निष्पधिप्रीतिरेख मुख्या नात्यदिति शापनाप प्रियस्प प्रधानागत्वमुच्यते. स्थायिमाव- स्यक रूपस्यादारमत्वमुध्यते. यत ततएव ( स्थायिभावादेव') विभावादि विविप- भावोत्पति" (अणुभा. ११११) प्रेम ही जन प्रगाड यन कर प्रिपरम पम बाहर प्रकट हो जाता है तो यहि प्राट रूपो आनन्दमय' कहा जाता है और अन्त स्थित प्रेमको आनन्द'. अन्यथा प्रियतम भगवान् आनन्द है और भगवरम आनन्दमय. अणुभाव्य (२१३३१०) यह यहा गया है कि जमे तन्तुओके आसान-वितान चुने जानेपर जो पट प्रकट होता है वह तन्तुओमे मित्र नहीं होता, इसी तरह आलम्बन विभाय (ध्ययम् भगवान् ) उद्दीपन विमान (जुनाद आदि) अनुभाव (अमृगादि) तथा सम्मारिमाय (मान- देमादि) परस्पर आतानवितानमे जिस स्थायिभाव (भगवतीति) का प्रारटप होता है यह स्वयम् भगवान्गे भिन्न नही होता. अत आनन्द और आनन्दमय भंद बस्तुगत न होकर विवक्षागत होता है १पाठान्तर्गत शब्द मयका है अवतारकालमै भगवान् अपनी लीलाओके द्वारा भक्तोके हृदयमे अनेक प्रकारके स्नेह प्रकट करते है. ऐसे स्नेही भस जव भगवद्विरहमे भगवान्के गुणगानमे तल्लीन हो जाते है तव हृदयस्थित स्नेह भगवद्विषयक विविध मनोरथोके सापेमे ढलकर स्वयम् भगवान् एवम् उनकी लीलाओ का रूप धारण कर लेता है. अनवतारकालमें इसी तरह सेव्य-स्वरूप सेवार्ताके हृदयमे स्नेह प्रकट करते है. यह स्नेह भगवत्कथाके श्रवण-कीर्तन-कालमें भक्तके हृदयमें भगवत्स्वरूपानुभूतिरा रूप भी धारण कर लेता है. तामस-प्रमेय-प्रकरणको सुबोधिनीमे अतएव भगवान्का स्वरूप 'नटवरवपु'के रूपमे वर्णित हुआ है : "रसानुभूतिके दो प्रकार सम्भव है प्रथम प्रकार होता है जहा प्रेम (स्थायिभाव-धर्मी) और प्रियतम (आलम्बनविभाव-धर्म) दोनोकी अनुभूति हो द्वितीय प्रकार होता है : प्रियतम (मालम्वनविभाव-धर्म) अनुपस्थित हो, पर प्रेम (स्यायिभाव धर्मी) की अनुभूति हो रही हो नाटयमे, द्वितीय प्रकारसे, केवल रति या प्रेम को ही वास्तविक अनुभूति होती है. प्रियतम-आलम्वनविभावके रूपका तो केवल नाटन ही होता है. साक्षात् उपस्थिति नही. सयोगमें आलम्बनविभाव और स्थायिभाव दोनो ही उपस्थित रहते हैं. नेत्रोके समक्ष वाहर आलम्बनविभावरूप भगवान् उपस्थित होते है और हृदयके भीतर स्यायिभावरूप भगवति भी अवस्थित होती है सयोग- लीलामे अतएव 'वर' की तरह प्रत्यप्रभोग माना जाता है। और विप्रयोगलीलामे गाढ स्नेहवश 'आसक्तिभ्रम'को तरह अनुभूत होती भगवदुपस्थिति 'नट' को तरह केवल नाटन मात्र है अत नटवत् और परवत् लीला करनेवाले भगवान् के स्वरूपका 'नटवर "पु' कहा जाता है क्योकि श्रृंगाररसके अनुसार प्रत्यग्र-साक्षात् सम्भोग जरो वर-पतिका कार्य है, वैसे ही नाटयमे सम्भोगका नाटन नट-अभिनेताका कार्य होता है भगवान् एककालावच्छदेन उभविघकार्य सम्पन्न करत है वाह्यमे प्रकट होकर रमानुभव प्रदान करने का, तया हृदयमे तीव आसक्तिवश प्रकट होती अनुभूतिमै रमाभिनय करनेका भी शानियोद्वारा उपासनार्थ कल्पित रूप हृदयमे अनुभवमुष प्रदान कर सकता है पर भक्तो के लिए तो उनके द्वारा भावित रूपको धारण कर भावान् बाहर भी प्रकट होते है सभी इन्द्रियासे अनुभूत होने का मुम्ब भक्तको प्रदान करते है इस वहि पकट भावित रूपको मायिक कल्पित, देहदेहिमावन्यायसे परमात्माचे वास्तविक स्वरूपको आवृत करनेवाला कोई भिन्न रूप नही माना जा सकता है यह भावित-बहि प्रकट रूप उतना ही पारमार्थिक होता है जितने कि स्वयम् परमारमा" (मुबा १०.१२५५). इस प्रसगमे रसशास्त्रीय रीतिके अनुमार निरूपण किया गया है मतएव भगवदतिरी तुलनाम भगवानुनो धर्म रूपमे पणित किया गया है फिरभी लभ्यम रखने लायक वात पहा पह है कि वृन्दावनमे प्रत्यग्रमोनाफे रूपमे, तथा व्रजको गोपिकाआवे हृदयमै वृन्दावन को आन्तर लीलानुभूतिके दानद्वारा, रूप एवम् लीला का नाटक करते हुवे, अपना उमयविध (नटवत् और वरवत्) रूप भगवान्ने एककालायच्छेदेन प्रवाट किया है भगवान् स्वयम्को वहि प्रकट न करे तो ज्ञानियो और भक्तो के सुसमे कोई तारतम्य नहीं रह जाता है. प्रत्युत भवतोके लिए केवल हृदयमे भगवान्का अनुभूत होना तो एक दुःखको वान बन जाती है ! (हृयेव प्राकटधै तु मनोमात्रभोग्यत्वम्. वहि प्राक्टये सर्वेन्द्रियभोग्यत्वम्. एव सति चक्षु- राद्यविषयत्वे प्रियपदार्थस्य मनोमानविपयस्व दुखदमित्यनुभवसिद्धमतो भक्तायं तथेति नतु स भगवान, एव तथा आत्मभिन्नवपुषो मर्ता इत्यर्थः. सुबो टिप. १०॥१८॥५). यदि आनन्दको स्थायिभावात्मक मात्मस्थानीय धर्मी माना जाये तो यहि प्रकट आन- न्दमय स्वरूप अर्थात् आलम्बनविभावरूप वपु उस स्थायिमावसे भिन्न नही होता. इसी तरह यदि मानन्दको आलम्वनविभावरूप धर्म माना जाये तो भी प्रत्याभोक्ता 'वर' के रूपसे केवल-रसरूप आनन्दमय धर्मी 'नट' रूप भगवान् मिस नही होते. "पत्रकापता तत्राविशेषात्" (४१११११) ब्रह्मसूत्रके माध्यमे यह कहा गया है कि "जिन भक्तोको मान्तर भगवदनुभूति होती है या जिन भक्तोको वाल भगवदनुभूति होती है उनके भाव या अनुभूयमान भगवत्स्वरूप में किसी भी प्रकारका तारतम्य नहीं होता." आन्तर-समोगमे भक्तहृदयस्थित भाव भगवदाकार ग्रहण कर लेता है, तथा बाह्यसयोगमे भगवान् भक्त के हृदयमे भावाकार ग्रहण करते चले जाते हैं दोनो ही नरह समानता है, पुरुषोत्तमकी अनुभूतिस पूर्व अनिवार्य सर्वात्मभाव, अतएव, वियोगकी तरह भरत-मग- पाम्के सयोगमे भी स्वीकारा गया है. वेणुगीतको सुबोधिनीमे सरल इन्द्रियोंके भगवान्मे विनियोगको सर्वात्मभाव कहा गया है वाणीसे भगवान्के साथ सलाप, नयनोसे दर्शन, बाहुओसे भगवान्का आलिंगन, हाथोसे सेवा, त्वचारो स्पर्श, रानामे अधरामृतपान, कानोरो वेणुषजनका श्रवण, नासिकासे भगवद्गन्धवा आधाण, चरणासे भगदानके निकट गमन, अन्त करणसे भगवरस्वरूपकी भावना, पायपस्थेन्द्रियोसे रोमोद्गम और भोग को वेणुगीतमे इन्द्रियवानोका परमफल माना गया है सकल इन्द्रियोके भगवान्मे ऐगे विनियोगकी तुलनामे मुक्ति तो भक्तोको अपनी सर्वविध सम्पूर्ण निष्फलता ही प्रतीत होती है जैसे किसी नयन- बानको सदा-सर्वधाके लिए अधिकूपर धकेल देना मा मे नयनोसे वञ्चित कर देना दोनोमे कोई विशेष अन्तर नहीं होता है जागतिक विषयोम अनुरागके नष्ट होनेपर तया सर्वात्मभावरी सम्पन्न होनेगर भवतको सकल इन्द्रियो द्वारा भगवत्स्वरूपानन्दकी अनुभूति मिलती है-"चाधकाना परित्यागे साधकाना न तद् भवेत्" (वेणुगीत सुबो कारिका) इन कारिकाओं मे सयोगकालीन सर्वात्मभावका वर्णन है श्रीप्रभुचरण उल्लिखित'बाधक' का अर्थ मापचिक विषयोमे अनुराग, तथा 'साधक' का अर्थ मात्मभावपूर्वक भजन करते हैं सर्वभाव मिद्ध होने पर ही भक्त सायुज्य मुक्ति (भगवान्मे लीन होने से बन सकता है अर्थात प्रस्तुत शैवाफल विवरणमे विवक्षित प्रथगफल 'अलाविक सामथ्य' के सिद्ध होनेपर भक्त, द्वितीयफल 'सायुज्य से बच सकता है सायुज्य वाद " तृतीयस्कन्ध-सुबोधिनीके एतद्विषयक विचारोसे एकवाक्यता करनेपर पुन नूतन अलोकिक देहको प्राप्तिका भी एक प्रकार मान्य किया गया है अत अलौकिक सामर्थ्य के बाद सीधे सेवोपयोगिदेहको प्राप्ति, अथवा सायुज्योपरान्त सेवोपयोगिदेहकी प्राप्ति, अथवा सायुज्य ही केतल,यो फलानुभूतिके अनेक प्रकार सम्भव है परन्तु यह निश्चित है कि इन्द्रियवानोका मुख्य फल तो सर्वात्मभाव या अलौकिकसामर्थ्य ही है. अन्यथा तृतीयस्कन्धके- "हृतात्मनो हृतप्राणाश्च भक्तिरनिच्छतो गतिमयी प्रयुक्ते" वचनमे निरूपित गौणफलरूप सायुज्य मिलता है. इन्द्रियादिसे रहित होकर भगवान्के दर्शन-म्पर्शन-श्रवणादिके सुखसे वञ्चित होना इन्द्रियवान् भक्तोके लिए एक विडम्बना है। भ्रमरगीतके "सर्वात्मभावोधिकृतो भवतीनामपोक्षजे" (१०।४४।२७) वचनमे विप्रयोग- कालीन सर्वारमभावका वर्णन है और वेणुगीतमे सयोगकालीन. यहा यह अवधेय है कि रसशास्त्रीय दृष्टिसे करुणविप्रयोग और श्रृगारविप्रयोग मे, एक महत्त्वपूर्ण अन्तर यही है कि जहा पुनर्मिलन निश्चित हो, वहा विप्रयोग श्रृगाररसात्मक माना जाता है, पर जहा पुनर्मिलन असम्भव हो अथवा जन्मान्तरमें सम्भव होतो ऐसा विप्रयोग श्रृंगाररस न रहकर करुणरस बन जाता है "युनोरेकतरस्मिन् गतवति लोकान्तर पुनरलभ्ये विमनायते यदेकस्तदा भवेत्करुणविप्रलम्भाख्य (साहित्यदर्पण ३१२०९) "शोकस्थायि- तया भिन्नो विप्रलम्भादय विप्रलम्भे रति. स्थायी पुन सम्भोगहेतुक" (सा द ३१२२६) परमफल सयोगको मानना चाहिये कि विप्रयोगको, इस विवादमें अतिवादी दृष्टिकोण अपनाने पर, या नो अधूरे श्रृगारको महत्ता माननी पडती है या श्रृगारविप्रयोग और करुण- विप्रयोग के मौलिक भेदकी उपेक्षा हो जातो है क्योकि रसशास्त्र में यह माना गया है कि विप्रयोगवे बिना केवल मपोगानुभूतिमें वह चमत्कृति नही आती है. अतएव पूर्वरागोत्तर मानोत्तर और प्रवामोत्तर सयोगमे विशेष चमत्कृति का हेतु पूर्वराग, मान या प्रवास जनित विप्रयागको ही माना गण है-'न विना विप्रलम्भेन सम्भोग पुष्टिमश्नुते पायिते हि यम्बादी भूपान् रागी विवर्धते' धीमहाप्रभु भी अतएव जैरा- "वाघामावे तु आन्तरस्य व्यर्थता" का विधान करते है वैस हो-"आन्तर तु पर फलम्" भी स्वीकारते ही है श्रीप्रभुचरणने भी अतएव स्पष्ट वान्दोम इसका खुलासा- "म रसस्तु सयोगविप्रयोगाभ्यामेव पूर्णो भवत्यनुभूतो नक्तरेण' (अणु ४२११)ह कर दिया है क्यल विप्रयोग अथवा केवल सयोग को परमफल मानना भगवान्वे 'नटवरव' रूपकी अम्वीकृति है विप्रयोगम भनो हृदय भगवान्को आन्तर अनुभुति होती है नट चत्और मयागमें मस्तके नेत्र आदि इन्द्रियोद्वारा भगवान्को गहर अनुभति होती है, वरवत्.श्रीमहा- प्रभु किन्तु वे बल नटवत् या केवल वरवत् रूपरो पल न मानकर 'नटवर धपु' के रूप भगवानका-'इदमेवेन्द्रिययता फ्लम्" स्वीकारते है लौकिक गारमें विप्रयोगकालीन आन्तर मंयोगकी अनुभुतिको मारावितवश पंदा होतो केवल भ्रान्ति ही माना गया है क्योकि गायक अथवा नापिका की अनुपस्थितिमे उनको अनुभूति वास्तविक नही हो मरती है किसी भी देश अथवा काल में परन्तु सर्यव्यापी सनातन परमात्माका अनुपस्थित होना अकल्पनीय बात है. अनुभूत होते हो पा नहीं पर, हृदयमें और हृदयके बाहर, सर्वत्र-रावंदा भगवान् तो विद्यमान हैं ही. अतः भगरदनुभूतिपर भ्रान्तिको परिभाषा लागू हो नही हो पाती है । भक्तिके घटक तत्त्व दो माने गये है एक माहात्म्यशान और दूसरा सुदृढ सर्वतोधिया स्नेह- यह माहात्म्य भगवान्का ही हो सकता है कि ये वाहर अप्रकट होनेपर भी भक्तके हृदयमे भावात्मना प्रविष्ट होकर भक्तिको करुणरस होनेसे वचा लेते हैं. इसी तरह सुदड़ सर्वतोधिक स्नेहमे भी यह सामर्थ्य स्वीकारना पडता है कि उसके वशीभूत होकर भगवानको भक्तके मनोरथोरे अनुरूप बाहर प्रकट होगा पड़ता है इस विषयमे श्रीप्रभुनरणको यह उक्ति मननीय है कि- "भगवविरहस्य सर्वसाधारण- वेपि स्थायिभायात्मकरसरूपभगवत्प्रादुर्भावो यस्य हदि भवति तस्यैव तदप्राप्तिजः तापः तदनन्तर नियमत: सरप्राप्तिश्च भवति" (अणु. ४।२।११). भक्तिवमिनीमे भक्तिकी चार अवस्था स्वीकारी गयी हैं . (१) बीजभाम (२) प्रेम (३) आसक्ति (४) व्यसन "भावरकुरिन" कारिका और उसके व्याख्यानमे, अवतारकालीन मुठ सर्वतोधिक भग- वदति, जो बिना किमो प्रकारके माहात्म्यज्ञानके ही ग्रजभक्तोमे प्रकट हो गयी थी, की चारके बजाय सात अवस्याओका वर्णन श्रीप्रभुचरण तथा श्रीहरिरायजी ने किया है : (१) भाय (२) प्रेम (३) प्रणय (6) स्नेह (५) राग (६) अनुराग (७) व्यसन- भावरकुरित महीमगदशामाकल्पमासिञ्चितम् प्रेम्णा कन्दलित मनोरथमय वाखाशत सम्भूतम् मौल्यै पल्लवित मुदा कुसुमितं प्रत्यागया पुष्पितम् सीलामि फलित भजे बजवनोगारकल्पद्रुम् ।। (श्रीमत्प्रभुचरण) भाव प्रेमप्रगम स्नेहो रामानुरागम्यसनानि । अंकुरकन्दलशालापल्लबकलिकाप्रसूनफलानोति ॥ (श्रीहरिरामवरण) यह रसशास्त्र और भगवत् शास्त्र के समन्वयपर अवलम्वित भवितशास्त्रीय दिवेचन है, अन्यथा चल रसशास्त्र के अनुसार रतिको दस अवस्थाये स्वीकारी गयी है : (१) धराग (२) मन सग (३) सकल्प (४) जागर (५) तनुता (६) विपयद्वेष (७) लज्जात्याग (८) उन्माद (९) मूर्छा (१०) मरण इन्हें भक्तिवधिनीमे गित चार अवस्थाओम बाट कर देखना हो तो इस तरह देखा जा सकता है: (१) बीजभाव-- (क) चक्षुराग (ख) मन सग (ग) सकल्प (२) प्रेम---(क) जागर (ख) तनुता (३) आसक्ति -(क) विपयद्वप (ख) लज्जात्याग (४) व्यसन--(क) उन्माद (ख) मूर्छा (ग) मरण यहा अवधेय यह है कि व्यसनदशाम उन्माद एवम् मूर्छा तक तो वाह्म या आन्तर सयो- गकी अनुभूति सम्भव है अतएव इन्हें निरोधलीलाके अन्तर्भूत माना जा सकता है क्योकि निरोध जब भगवत्स्वरूप एवम् भगवदगुण उभयकृत होता है तो वह स्वयम् फलात्मय होनेसे अगीरूप माना जाता है अन्यथा केवल भगवद्गुणकृत निरोध एकादश द्वादशस्कन्धमे वर्ण्य मुक्तिलीला और आश्रयभावापत्ति की लीलाका अग होनेसे 'साधनकृत्स्नता' रूप माना गया हैं. मुक्ति या आश्रय लीलाके अगरूप निरोधवाली व्यसनदशामे स्नेहकी दसवी अवस्था मरण सम्भव हो जाती हैं भक्त इरा भौतिक देहको छोडकर या तो भगवान्मे लीन हो जाता हैं या फिर नूतन अभौतिक सच्चिदानन्दात्मक दिव्य देह व्यापिवकुण्ठ-नित्यलोलाम प्राप्त कर लेता हैं-"ब्राहोग ब्रह्मसम्बन्धिना ब्रह्मणा भगवर्तव स्वभोगानुरूपतया सम्पादितेन सत्यज्ञाना- नन्दात्मकेन शरीरेण पूर्वोक्तान् अश्नुते' (अणु ४।४।५). इस दिथ्य देहान्तरसे लम्य पुन सयोगको भगवच्छास्त्रीय दृष्टिसे बड़ी महत्ता है, मुक्ति के रूपमें रसशास्त्रीय दृष्टिसे किन्तु देहान्तरलभ्य सयोग श्रृंगाररसको मर्यादासे वहिर्भूत या विपरीत है अतएव भक्तिशास्त्रमें एमे सयोगपी कलरूपता गौण मानी गयी है-"भग- वानेव हि फल स यथाविभवेद् भुवि" (पु प्र म ) वचन में भूतलपर ही आविर्भूत भगवानको पुष्टिफल मानकर अतएव भक्तको मुक्ति या आश्रय लीलाकी ओर हठात् ले जानेवाली भक्तिका वर्णन स्वयम् भगवान्ने इन शब्दोम किया है- 'अनिच्छतो गतिमण्वी प्रयुक्ते' भ्रमरगीतपर टिप्पणीमें श्रीप्रभुचरण ऐसी भगवल्लीलाका -"अस्मदधिकारविरुद्धा कहते हैं साप(१) अलौकिक सामध्ये सर्वात्मभावस्प हानेके कारण सयोग या वियोग दोनो अब- स्थाओम फ्लनिरोघरूप है इम तनुनवत्व' या 'मानसी सवा' भी कहा जा सकता है पुष्टि- भक्तोरे लिए यह जीवन्मुक्तिके जैसी अनुभूति है (२) सायुज्य विदेहमुक्ति है पुरुषोत्तमम लीन हो पाना (३) वैकुण्ठ आदि सानोमे सेवोपयोगी देहवी प्राप्ति नवतनुरव है इसे 'ब्रह्म भावापत्ति' या 'आश्रयमावापत्ति' भी कहा जाता है समपाराप्रपम प्रस्तुत सवाफा प्रन्य श्रीमहाप्रभुरे स्वयकृत विवरण वावजूद अति क्लिष्ट और मूत्रारमय भापाम लिमा गया प्रत्य है छन्दशास्त्रो दृष्टिम वैसे तो इम प्रन्पम सार सात सारिकायें है पर वावयार्थापया दृष्टिस वापविमर्श कानेपर इमम पद.

रह सूत्रात्मक यापप दृष्टिगोचर होते है. पापिनीमूनोपी तरह यहुधा इनमे भी-"सूत्रेध्यदृष्ट पद सूत्रान्तरादावरांतीय सर्यत्र" नियम लागू होता दिखलायी देता है सदनुसार उन्हें पृषक पृपा करके देखोगा प्रयास अब हम मरना है इसमें दो तीन तस्य मार्गदर्शक मानने पडगे उदाहरणतया पर्वचाक्य सिी अशसे उतरवाक्य पूर्ण होता हो तो उमे पूर्ण कर लना चाहिये सेवाफलविवरणमे स्वयम् श्रीमहाप्रभुने जिस अस्पष्ट शब्दवा जो भषं दिया हो उसे गोप्टकमे रखवर उस अर्थको स्फुट या पूर्ण पर तंना नाहिये कभी साकाक्ष पदोषी आरक्षिा- पूर्तिके लिए योष्ठसमें सम्बन्धघटव सवनामादिपदोरा विन्यास भी दिया जा सकता है. तद्नुसार प्रथम वाक्य तो एक्दम स्पष्ट हो मिल जाता है १)यादशो सेवना प्रोक्ता तरिसको पालमुच्यते सिद्धान्त मुक्तायलोरे-"कृष्णसवा सदा यार्या मानसी सा परा मता, चेतस्तस्प्रवण सेवा तसिद्धपै तनुवित्तजा' वचनम, चतुश्लोपी- "सर्वदासर्वभावेन भजनीयो प्रजाधिप स्वस्यायमेव धर्मो हि नान्य कत्रापि वाचन" वचन में, तथा भविनयपिनोथे'-"बीजदार्प- प्रकारस्तु गहे स्थित्या स्वधमत अध्यावृत्तो भजेसृष्ण पूजया श्रवणादिभि" वचनमें रोवार जो स्वरूप समझाया गया उगरे पम्पन्न हाउपर सेयाकी फ्लरूपतारा स्वरूप यहा समझाया जा रहा है २) अलौकिकस्य दाने हि चाच. सिध्ये-मनोरथ आध प्रन्थ यमुनाप्टवके सातव श्लाम पणित- ममास्तु तव सन्निधौ तनुनवस्वमेतायता न दुर्लभामा रतिर्मुररिपो मुकुन्दप्रिये । प्राथनाम व्यक्त हुये मनोरयषी सिद्धि, जय भगवान अलौक्षिसामध्यका दान करते है तभी सम्भव है अन्यथा अलौविसामध्यये दानये अभावम भगवगेवापरायण भगत या नो पुरुषोत्तममें लीन हो जाता है, या फिर वैपुण्ठ आदि भगवरधामोमें, भौतिर देहब छूट जानेवे वार अलौकिक दिव्य सेवोपयोगिदेह प्राप्त पर लेता है ३) सत्र (रोवाया) फल (अलौशिकसामध्य) वा, अधिकारी (सायुग्य सेवोपयोगिदेहो वैकुण्ठादिषु) या (भवतु) काल नियामक म (भवति) पुष्टिप्रवाहमर्यादा ग्रन्थमें यह यहा गया थापि पुष्टि जीयोको उनका फल भगवत्स्वरूपसे ही मिलता है- कायेन तु फल पुष्टी वही यह भी यहा गया था fr 'भगयानेव हि फल स यथाविभवेद् भुवि, गुणस्वरूपभेदेन तथा नेपा पल भनेत अर्थात् यथाधिकार हृदय में भगवद्- गुणोका अथवा नयनोरे समक्ष साक्षात् भगय स्वरूपमा इस भूतलपर प्रकट होना पुष्टिजीवोकी फलानुभूति है भगवान ही जब फल हा, और वे यदि माल-मर्म-कर्ता मन्त्र द्रव्य देश स्वभाव आदि हेतुओ अथवा साधनो ये अधीन न हो तो पुष्टिमार्गीय फलामिका सेवा भयवा अधिकारारिमका सवा का नियामर काल परा हो पायेगा। अलौविसामध्ये या तनुनपत्य के साथ भगयरसेवा सम्पन्न हो पाती हो तो वह सवायी फलरूपता है अन्यथा यह न होोपर रोवारे वारण पुरुषोत्तमम सायुज्य या यंकुण्ठ आदि भगवद्घामोमे सेवोपयोगी नूतन दिव्य देह प्राप्त होता है, भगवत्सेवा करनेवाले भक्तके भौतिक देहके छूटनेके वाद. अत.ऐमो भगवत्सेवा फलरूपा न होकर अधिकाररूपा मानी जाती हैं. फल हो या अधिकार, पुष्टिभक्तिमे भगवान् हो नियामक है, काल-कम-स्वभावादि नही. ४) (सेवाया) बाधकं तु उद्वेगः प्रतिबन्धो वा भोपो वास्यात्, भगवतः अकर्तव्य चेद. काल-कर्म-स्वभाव यद्यपि फ्ल या अधिकार में नियामक नहीं है, फिर भी, फल दान या अधिकारसम्पादन की भगवदिच्छाके न होनेपर भगवत्सेवामे उद्वेग प्रतिबन्ध अथवा भोग बाधक बन सकते है जैसे फल तीन माने गये है, सेवामे, ऐसे ही विघ्न भी तीन हो माने गये है. इनमे उद्वेग के अनेक रूप नवरत्न एवम् विवेकर्याश्रय मे दिखलाये गये है. वहा आश्रयभावको दृढताके लिए अष्टाक्षरका उच्चारण तथा लोलाभावना की बात समझायी गयी है अतएव उद्वेग और उससे बचने के उपायके बारेमे अब पुनः यहा किसी निरूपणकी आवश्यकता नहीं है अत इस सेवाफलके विवरणमे प्रतिवन्ध एवम् भोग रूप विघ्नोका विचार होगा. प्रतिवन्ध दो प्रकारके होते है एक साधारण और दूसरा भगवत्कृत. साधारण प्रतिबन्धोका निवारण लोकचातुरीसे करना चाहिये. श्रीप्रभुचरणने अपने आरमगोको लिखे एक पत्रमे ऐसी लोकचातुरोका उपदेश दिया है "अन्यच्च यवनादयो ठाकुरद्वारे आगच्छन्ति यथापूर्व भाषणमिलनप्रसादादिक कार्यम् यद्यपि हादै न भवति, वाहतोपि कार्यम्' ऐसी लोकचातुरीका प्रयोजन निविघ्न भगवत्सेवाका निर्वाह ही होना चाहिये. आत्मसम्मानको खोकर सरकारी अफसरोकी चापलुसीका नही. अतएव इमो पत्रमें सावधान भी किया गया है-"साबधान सहारस्परस्नेह अवहिदृष्टिसेवक- परे स्थयम्" भगवत्कृत प्रतिबन्धका निराकरण जोवके सामर्थ्य के बाहर होता है अत विचार वादमे किया जायेगा इमी तरह विविध भोगका विचार भी आगे किया जायेगा ५) भगवत सर्वया अकर्तव्य चेद (भगवत्कृनश्चेत् प्रतिबन्ध तदा) गति न हि (भगवान् पल न दास्यतीति मन्तव्य, तदा अन्यसेवापि व्यर्या, तदा) यपा वा (आसुरोय जीव इति) विवेक (तदा ज्ञानमार्गेण स्थातव्यमिति, अन्यया) (त्रयाणा माधन-) परित्याग (कर्तव्य इनि) साधन मतम् . पुष्टिमार्गीय जोव देवी होने के कारण कभी प्रवाहमागीय या आमुरी सृष्टिका हो नही सक्ता फिर भी यह मम्भव है कि उसके देह इन्द्रिय-प्राण-अन्तःकरणमे किसी समम मा किसी जन्ममै आमुरमावोका आवेश हो जाये अतएव पुष्टिप्रवाहमर्यादा ग्रन्थमे-'आसक्तो भगवानेव शाप दापयति क्वचित्" द्वारा पुष्टिजीवोमे आमुरावेश धारणरूपम भगवदिच्छाको मान्य किया गया है मुबोधिनी (३।२५।३२) म-'ये वा देन्या सम्पदि जाता तेषामपि (इन्द्रियाणि) देवरूपाणि भवन्ति आमुराष्यपि भवन्ति" कहा गया है. वही यह भी कहा गया है कि " मस्तिरेव भवति नामुर" प्रत जिस जन्ममें पुष्टिभानके देहन्द्रियादिमें देवी उसका तत्त्वनिर्धार बाधकानां " गुणोका आवेश प्रबल नहीं होता, उस जन्ममें पुष्टिप्रभु उस जोवरो फलारिमा सेवा लेना नहीं आते हैं, ऐसा समझ लेना चाहिये ऐसी स्थिति में अन्य कोई रह नहीं जाता, जिसक आश्रय या भजन से मायरसेवामें पैदा होनेवाले विघ्न दूर हो पायें,या अन्य कोई उपाय शक्य मान पाये अतएव श्रीमहाप्रभु कहते हैं-"तदा अन्यसेवापि स्या" भगवामार्ग में भगवदिच्छारे बिना कोई विघ्न आ नही सरते और भगवदिच्छा कारण आये हुवे विघ्नाको कोई डर नहीं कर सकता है नवरत्नभ अतएव महा गया है कि "अज्ञानादयवा ज्ञानात्तृतमात्मनिवेदन में कृष्णसारवृतप्राण तेषा का परिदेवना | "अत पुष्टिनीयको जब प्रभु ससारासक्तिमें फसाये रखना चाहते होता अन्याश्रय या अन्य भजन से बुछ भी साप्त हो नहीं पायेगा. तत्त्वदीपनिवन्ध शास्त्रायंप्रकारणम 'कृष्णपदेन यहिभजनमेव मुल्यमिति निरुपितं 'यो वैद निहित गुहायाम्' इति तु ज्ञानमा" (कारिता १३) कहा गया है. भागवतार्थ प्रकरणम भी भगवदवतारकालीन भजनका विकल्प ज्ञान माना गया है-"पुरुषाणा तथा स्त्रीणा रात्री च दिवसे तथा ज्ञान भक्तिश्च सतत चक्रवत् परिवतते" (१०।१११-११३) भक्तिवधिनी (५) में भी "व्यावृत्तोषिहरो चित्त श्रवणादो न्यसेत्सदा" कहा है इसी तरह "सेवाया या कथायां वा कारिकामे 'मेवा और कथा' को उत्तमक रूप माना गया है, तया सेवा या कथा' को गौणल्प माना गया है अणुभाप्य (४१५८) म- 'एव वहि प्राकटधमुक्त्वा आन्तर तदाह भावनौरकटघदशाया व्यभिचारिभावारमसतमस्मृति- रूपध्यानादपि हृदि प्रकट सन्नामीना भवतीत्यर्थ ' पहा गया है इन सभी उद्धरणोपर लक्ष्यपात करने यह स्पष्ट हो जाता है कि सवापलम पणित 'जानमागं मर्यादामार्गीय ज्ञानवाला नहीं है, किन्तु पुष्टिमार्गीय ज्ञानका लेकर ही यहा 'ज्ञान- भार्ग' शब्द प्रयुक्त हुआ है पुष्टिमार्गम भगवामेवा भक्ति है तथा भगवद्गुणगान या भग- यत्कथा ज्ञान है भगवदगुणानुवादयो प्रणालीस हृदयम सतत भगवदध्यान या भगवस्मृति को बनाये रखना 'ज्ञान' कहलाता है निरोधलक्षण- गुणवाविष्टचित्ताना सवदा गुरवरिण ससारविरहक्लेशो न स्याता हरियरसुखम' कहा गया है अत भगवान्के गुणानुवादने शोका- भाय' सिद्ध होता है यह पुष्टिमार्गीय विवेक ह जिनसे यह कथामिका भक्ति भीम निभतो हा सनके लिय विवेकधैर्याश्रय तथा कृष्णा- श्रय में प्रपत्तिमार्गका निरूपण दिया गया ह- अलौषिमन सिद्धी सवथा शरण हरि, एव चित सदा भाव्य वामा च परिकीतयेन (दिये १३) इसी तरह अजामिलादिदोषाणा नाशवोनुभवे ज्ञापिताबिलमाहात्म्य कुष्प एवं गतिर्मम विवेक्धर्यभस्तया दिरहितस्य विशेषत पापासक्तस्य दीनस्य कृष्ण एव गतिमम (कृष्णा और ९) वहा गया ह पूर्णभक्ति के दो अग मान गये हैं एक वाहा अग माहात्म्यज्ञान और दूसरा आन्तर अग सुदृढ सर्वताधिक स्नेह अल मुदृढ मवतोधिक स्नेहके बिना सेवा कथाका निर्वाह शभ्य नही होता फिरभी माहारभ्यतानपर अवलम्वित शरणागति-आश्रय-प्रपत्तिरूप उपाय शक्य हा ता उसे अपनाना चाहिये. अतएव माहात्म्यशान मूलक होनेके वारण प्रपतिमार्गको भी पुष्टि- मागमे शान माना जाता है. प्रतिवन्ध जो भगवत्कृत प्रतीत न होने हो पर हमें पुष्टिमरतोचित विवेक या पंप से वञ्चित करते हो तो, उनसे बचने के अनेक उपाय नवरत्न तथा विवर्याश्रय में दिखलाये गये है. यथा-प्रार्थनात्याग, अभिमानरयाग, हठस्याग, अनाग्रह, महिष्णुता, असामध्यंभावना, भगवल्लीलाभावना, मनवाणीसे सनत शरणभावना, अन्यापयत्याग, दृढ विश्वास तथा प्राप्त मुख-दुसको ममताद्वैप-रहित स्वीकृति आदि. उद्वेगवे हेतुओं, साधारणप्रतिबन्ध हेतुओ तथा लौकिक भोगके हेतुओं का त्याग करनेपर सेवाका निर्विघ्न निर्वाह सुकर बन जाता है. उद्वेग और उससे विभिन्न हेतुओ के निवारणका उपाय नवरल ग्रन्धमे समझाया गया. साधारण प्रतिबन्ध तथा उसके हेतुओके निवारणका उपाय विवेकर्याश्रय ग्रन्यमें समझाया गया है. अब लौकिक क्षुद्र भोग और अलोकिक महान् भोग का प्रभेद तथा अन्य भी तत्सम्बन्धी विवेचन आगे किया जायेगा. ६) भोगे अपि यापकानां परित्याग एक साधनं मतम्. भोग दो तरहके सम्भव है : एक लौकिक भोग और दूसरा अलौकिक भोग लौकिक भोग त्याज्य होता है भगवान को असमर्पित-अनिवेदित वस्तुओका उपभोग भगवत्सेवामें वापक बनता है. यह सिद्धान्तरहस्य (कारि ४) में-"अन्यथा सर्वदोपाणा न निवृत्तिः कथञ्चन, असमर्पित. वस्तूना तस्माद् वर्जनमाचरेत्" कह कर समझाया गया है. अत असमर्पित-अनिवेदित वस्तुओका उपभोग बाधक है और उनका परित्याग हमारे लिये एक साधनने रूपमें कर्तव्य है. ७) तथा भोगे परं निष्प्रत्यहं साधनम् अपि मतं (यत.) महान (अलौनि कस्तु) भोग (फ्लाना मध्ये) प्रथमे सदा विशते (प्रविशति). सिद्धान्तरहस्य ग्रन्थम जैसे असमर्पितके त्यागकी बात समझायो है,नसी तरह समर्पित के उपभोगको आवश्यकता भी दिखलायी गयी है-"निवेदिभिः समप्येव सर्वं कुर्यादिति...मेव- काना यथा लोके व्यवहार प्रसिद्धयति तथा कार्य समप्येव सर्वेषा ब्रह्मता तत." भगवान्को ममर्पित भगवरप्रसादरूप सक् गन्ध वस्त्र अलकार अन्न गृह तथा परिवारिक जन, सासारिक मोहके नही, किन्तु भगवद्भावके वर्धक होते है ब्रह्मको समर्पित मभी कुछ ब्रह्मात्मक हो जाता है जैसे गदी नालीका जल गगामें मिल कर गगाजल बन जाता है अणुभाष्य (३।३।३९) मे अतएव कहा गया है-"सर्वनि दनपूवक गृहेषु भगवत्सेवां कुर्वता तदुपयोगित्वेन तेभ्यएव मुक्ति भवतीत्यर्य एतादृशाना गृहा भगवद्गृहा एव आदिपदेन स्त्रीपुत्रपश्वाट्य सग्रहयन्ते एतेन ज्ञानादिमार्गादुकप उक्तो भवति वाधकानामपि साधकत्वात्' अन्यमार्गमे भोगक साधन अन्नवस्त्रगृहपरिवार आदि वाधक माने जाते है, पुष्टिमार्गम भगवत्सेवाके जानेपर, इन्हें साधक माना जाता है क्योकि वे लौनिक आसक्तिको बढानेके बजाय शन शनै हम अलौकिक सामर्थ्य अर्थात् सर्वेन्द्रियोको भगवत्परताको ओर ही ले जानेवाले बनते है. निरोधलक्षण ग्रन्थम इमे-'यसारावेशदुष्टानामिन्द्रियाणा हिताय वै कृष्णस्य अग बन सर्ववस्तूनि भूम्न ईचत्य योजयेत्' कहा हैं. भगवनिवेदित वस्तुमा भगवत्प्रसाद के रूपमें उपभोग, सेवाके प्रथम फल अलौकिना- सामर्यको प्राप्त करने की दिशा में अप्रसर होना है. अत वह अलौकिक भोग होनेसे निष्प्रत्यूह- निर्दष्ट है, महान् है. ८) सविघ्न अल्पो (भोग ) बलात् घातक. स्यात्. "यो वै भूमा तदमृतम् अथ यदल्प तन्मत्यम्" (छान्द व ७।२४११) इस श्रुतिम मर्यत्वेन निन्दित अल्पमोगका परिहार भगवत्समर्पितके उपभोगसे यक्प बन जाता है. अतएव डान्दोग्योपनिपके इसी प्रकरण में- 'आहारशुद्धी सत्वशुद्धि सत्वगुखौः ध्रुवा स्मृति. स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्योना विमोक्ष (७४२६॥२) वचनद्वारा आहारशुद्धिके उपलक्षणसे प्रत्येक भोगको शुद्धिको आवश्यकता दिखलायी गयी है, मत्य-अल्प-क्षुद्र लौकिय भोग कभी शोकमोहसे हित नहीं होता है. अत. अनेकविध शोकमाहरूप विघ्नोसे युक्त अन्न भोग स्वयम् मर्त्य होनेपर भी मारक होता है. भगवत्सेवोचित भावना बलवान् घातक होता है अत: लोकिक भोग त्याग्म है ९) बलाद् एतो (प्रतिवन्धको) सदा मती भक्तिवधिनी (6) में कहा हो गया है कि "तादृशस्यापि सतत गेहस्थान विनाशरम्" अत लोकिक भोग और भगवत्कृत प्रतिवन्ध भगवत्मेवामें बहुत बलवान् प्रतिवन्धक सदा होते हैं इनम लौगिक भोगका त्याग तो शक्य है पर भावरकृत प्रतिवन्धका निवारण माश्य नही है यह अब आगे कहा जायेगा १०) दिसाये (भगवत्कृत-प्रतिवन्धे ज्ञान स्थित्यभावेच) ससारनिश्चयात चिन्ता सर्वया त्याज्या सर्वनिर्णय-प्रकरण (कारिका २४५) में यह दिसलाया गया है कि किन-किन स्थितियोमे भगवत्सेवा छोड देनी चाहिये यथा- क) आसुरावेशके कारण हमारी इन्द्रियोकी भगवस्मेवाम स्वत प्रवृत्ति सम्भव न लगती हो तो हठपूर्वक उन्हें भगवत्सेवाम लगानपर विक्षप उत्पन्न हो जाता है ऐसी स्थितिमें सेवा छोड देनो चाहिये. ख) अतिवाधक्य या शारीरिक व्याधिया के कारण किसी व्यक्तिमे भगवत्मेवार्थ अपेक्षित शक्ति न रह जाती हो तो मेवा छोड़ देनी चाहिए ग) पारिवारिक सामाजिक या राजनैतिक दृष्टि से जिनके अधीन होने कारण हम विवशतवा भगवत्सेवा न कर पाते हा तो वह भी एक प्रतिवन्ध सेवाग सम्भव है घ) सेवा करते रहने पर भी निरन्तर चित्तम अन्यज्यासम या व्यग्रता बनी ही रहती हो तो भगवस्मनोचित भावना हृदपम कदापि प्रकट नही हा पाती ड) अन्य पारिवारिक जन भगवरसेवार्य अपेक्षित भावनामे रहित हो, गभगवत्सवाम प्रति. कूल हा, पर वे हमार द्वारा की जातो भगवत्मवाम लौषिय हतुओरे वक्ष सहयोग देनेनो बाधित होते हो तो, उन्हें वह सेवा पीडाजनक प्रनीत होगी ऐसी परपीडाजन भगदलोया " नहीं करनी चाहिये. श्रीमहाप्रभु स्पष्ट शन्दोमे आजा करते है कि इन स्थितियोमें सेवा छोर देनी चाहिये. सेना छोड देनेपर उसका अनुकल्प भगवाफया माना गया है कथानुष्ठान पुष्टिमार्गमें भक्तिकी गानगागंसे जुडी हुई सीमाकी तरह है परन्तु यहां इस सीमाके भीतर भी रहना जो शक्य न हो तो माहात्म्यज्ञानमूलक प्रपत्तिमार्गमै अवस्थित होना चाहिये. एतदर्थ विवेक धैर्य और आश्रय को अपनानेकी बात समझायी गयी है. पर जब वह भी शक्य न हो तो समझ लेना चाहिये कि इस जन्ममें प्रभु हमे ससारावेशसे छुटकारा देना नहीं चाहते हैं विवेकधैर्याश्रय ग्रन्थमें अतएव-" अशपये वा सुशक्ये वा सर्वथा शरण हरिः" बहकर तथा नवरत्न प्रन्थमें-"चित्तोद्वेग विधायापि हरि यद्यत् करिष्यति तथैव तस्य लीलेति मत्वा चिन्ता द्रुत त्यजेत्, तस्मात्सर्वामिना नित्य श्रीकृष्ण शरण मम वद्भिरेव सतत स्थैयमित्येव मे मति (८-९) के उपदेशके अनुसार चिन्ताका त्याग कर शरणभावना करनी चाहिये ११) नाये (आयफलाभावे) तु (भगवत आधिदैविकसेवा-) दातृता नास्ति मेवा निरन्तर करते रहने पर भी अलौकिकसामयके प्रकट होनेके कोई चिन्ह दिखलायी न पडते हो तो सवाकी न्यूनता नही मान लेनी चाहिये पिन्तु भगवान्को आधिदैविकी सेवाके मुखदानकी इच्छा नहीं हैं, ऐसे समझना नाहिये आधिदैविकसेवा-सुखको पात्रता भगवान्की दातृताएर अवलम्बित है यह तो कहा हो गया है कि पुष्टिमार्गीय फल या अधिकार की प्राप्ति भगवान्के देनेपर ही होती है, साधनाभिमानमें नही. १२) तृतीये (भोगाभाव-सिद्धाभावे) तु ग्रह बाधकम् स्वगृहमें निरन्तर सेवा करते रहनेपर भी भोगाभाव यदि सिद्ध न होता हो तो गार्हस्थ्य- गृहका ही बाधक समझना चाहिये अतएव भक्तिवधिनी और मन्यासनिर्णय ग्रन्थोम, ऐसी स्थितिमें, कथाश्रवण परिचर्या या गृहत्याग के अनुकल्पोको अपनाने की बात समझायी गयी है १३) इय (भगवतो दातृता) अवश्या सा भाम्या अन्यत्सवं मनोभ्रम तदीरपि तत् (दातृताभावन) कार्य (यतो भगवान्) पुष्टो नव विलम्बयेत् नवरल प्रन्यमें कहा गया था कि आत्मनिवेदन करनेवाले पुष्टिभक्तको कभी चिन्ता नही करनी चाहिये क्योकि पुष्टिप्रभु भगवान्, किमी एकाद् जन्मम लौकिक स्थिति जैसी स्थिति पुष्टिजीवको करते भी हा, परन्तु गति कभी लकिक या प्रावाहिको नही करगे अत भक्तिके भलीभाति निर्वाह न होनेको स्थितिमें अन्य पुष्टिमार्गीय भगवदीयोके साथ बैठकर अपने आत्मनिवेदनका म्मरण-भावन करना चाहिये "भगवानपि पुष्टिस्थो न करिष्यति लकी च गति, निवेदन तु स्मर्तव्य सर्वथा तादृशे जन सर्वेश्वरश्च सारमा निजेच्छात परिष्यति" (१-२) होता वही है जो भगवदिच्छा होती है मिलता वही है जा भगवान् हम देना चाहते है भगवान्को फलदानेन्छा किसी के वमको बात नही है वह 'अवश्या' है. उसपर क्सिोका जोर नही चरता है भगवान् परन्तु दयालु भी है वे केबल सर्वेश्वर ही नहीं अपितु सर्वात्मा भी है. अत: जिस जीयका पुष्टिमार्ग में वरण भगवान्ने कर लिया हो उसे पुष्टिभक्तिके दानमें अधिक विलम्ब नही करेंगे. इस तरह भगवान्के पुष्टिफलदाता होनेकी भावना सदा करनी चाहिये. साथ ही साथ निरोधलक्षण अन्यमे यह भी कहा गया था कि "महतो कृपया पावत् भगवान् दयिष्यति, तावदानन्दसन्दोह कोश्यमानः सुखाय हि" अतः जिनरो सेया आदि न निभ पाती हो ऐसे दयनीय पुष्टिजीवोये प्रति अन्य भगवदीयोरा भी यह पतंथ्य है कि ये भगवान्वे ऐसे गुणो एवम् परितो का कीर्तन करें कि जिससे साधारण पुष्टिजीवोके हृदय और बुद्धि में भगवान्के पुष्टिफलदाता होनेकी आस्था एवम् धारणा दृढ हो जाये. यह जिससे रोवा- पामय आदर्श जीवन निम पाता हो ऐसे एक पुष्टिजीवका दूसरे, जिससे नहीं निभ पाता, उसके प्रति कर्तव्य है. वालबोध ग्रन्थये उपदेशद्वारा श्रीमहाप्रभु अतएव भगवरसेवापं असमर्ष जीवोम सदीयता और तमाश्रय के भावोको उद्बोधित करना चाहते है. जलभेद और पञ्चपद्यानि ग्रन्थमें अतएव वक्ता एवम् श्रोता मी उत्तम-मध्यम-निम्न रक्षायें समझायी गयी है उनके भलीभाति गात हो जानेपर जिस पुष्टिजीवसे सेवारिमका भक्ति नहीं निभ पाती वह भी कथा-श्रवण-कीर्तन-स्मरण आदिवी प्रक्रियाके द्वारा अपने पुष्टि- भावोके पोषणमे सक्षम हो पाता हैं १४) गुणक्षोभे मपि एतदेव दृष्टध्यम् इति मे मति भक्तिवधिनी ग्रन्थम पह दिखलाया ही गया है कि स्यगृहमे भगवरसेवारामय जीवन- यापन सभी पुष्टिजीवोके लिए शक्य नहीं होता. इरावे अनुकल्परूप गृहत्याग लिये आवश्यक भक्तिका व्यसनदशाम विकास भी अतएव यहुत दुर्लभ बात है गृहत्यागका विकल्प किसी भगवदीयको मत्सगतिमे रहकर भगवत्परिचर्या करना और भगवस्कपाके श्रवण-कीर्तनग मम्मिलित होना दिसलाया गया है परन्तु जिस भगवदीयका सरसग हम करना चाहते हो उसमे मानव स्वभाव-गुलभ दोपदर्शन होनेपर भक्तिभावमे बाधा पहमनेकी आशका उठी थी इसके परिहारार्य एकान्तवासके औचित्यका भी वही विचार पिया गया था एपान्तवासवे बजाय भगवदीयको सर्गात 'अदूरे-विप्र की नीति बरतनेशा गुझाव दिया गया पा. क्योकि अपरिपक्व सिद्धान्तबोधकी स्थितिम एकान्तयाम करने पर भी अपमिसान्तोके म्वाध्यायी सम्भावना रहती है स्वमार्गीय सिद्धान्त अत स्वमार्गीय वक्ताके मुखसे सुननेका आग्रह रसना पाहिये भनत्याचारोपदेशाधनानावाक्यनिरूपक" श्रीमहाप्रभुने ग्रन्योरा ही चाहिये मारे गुणक्षोभ इससे शान्त हो जायगे, ऐसा श्रीमहाप्रभुषा आश्वागन है १५) मत्र कुसृष्टि वा काचिदुत्पधेत स५ भ्रमः पोडनान्यो उपत्रमरूम यमुनाष्टरम- "ममास्तु तव सन्निधौ तनुनवस्वम् " वह पर भगवस्मयार्य अपेक्षित देहकी नूतनताको प्रार्थनाके द्वारा भगवरसेवाको महत्ता दिग्पलायी गयी है पाइशग्रन्थवे उपसहारप रोवाफल ग्रन्थका नामाभिधान 'भक्तिपल' 'कयाफल' 'त्यागफन' स्वाध्याय करना 'निरोधफल' या 'प्रपत्तिफल' न कह कर 'सेवाफल' करना; तथा अलौकिकसामध्यंके रूप मेवाका फल पुन: सेवाको ही मानना भी, पुष्टिमार्गमें सेवाकी महत्ताका ही प्रमाण है, मिदान्तमुक्तावली, पुष्टिप्रवाह्मर्यादा, सिद्धान्तरहस्य, 'भक्तिपिनी तथा निरोध. लक्षण ग्रन्थोमै शब्दमा ; तया अन्य प्रपोमे तात्पर्याः सेवाके महत्त्वक पुनःपुनः उल्लेख द्वारा जो अभ्यास किया गया है, उसके आधारपर भी पुष्टिमार्गमें सेवाको असाधारण महता सिद्ध होती है. चतुश्लोकीमें-"सर्वदा सर्वभावेन भजनोयो प्रजाधिप. स्वस्यायमेव धर्मों हि नान्य. क्वापि कदाचन" द्वारा की गयो कृष्णसेवाको प्रगसा, तथा निरोधलक्षणमें की गयी-"नात. परतरो मन्त्र. नात. परतर स्तव. नात. परतरा विद्या तीयं नात: परात्परम्" वचन द्वारा अन्य उपायोकी निन्दा, द्वारा अर्थवादने विनारसे भी भगवत्सेवाकी महता सिद्ध होती है. श्रीमहाप्रभुके भन्य प्रन्थोमें भी यथा निवन्ध भाष्य या मुबोधिनी में सेवाका उल्लेख मिलता है, परन्तु भगवरसेवाका मागोपाग-सपरिकर स्वरूप जैसा पहा पणित हुआ है, यह अन्यत्र सुलभ नही है. सेवाका अन्तरगरूप भाव-भावना है. सेवाके वहिरंगरूपमें आरमसमर्पण, तनुवित्तजा सेवा, गृहस्थित वस्तु एवम् परिजनों का भगवत्सेवामें विनियोग तथा अन्य भी नवघा भक्यगभूत श्रवण-कीर्तनादि उपाय माने गये है. इन सारी बातोका जैसा स्पष्ट एवम् सुसगत विचार, अपूर्वतया यहा पोडमग्रन्योमे हुआ है, वह अन्यत्र दुर्लभ है पुष्टिमार्गमे भगवत्सेवा द्वारा किसी फलकी कामना नहीं जाती क्योकि मेवाका फल मेवा ही होती है. अतएव विवरणमें-"सेवाया. फलत्रयम्" न कह कर "मवायां फलत्रयम्" कहा गया है- अत तीनो ही फलावस्था षोडशग्रन्पमे मुख्यतया प्रतिपाय मेवाके अन्तर्भूत ही है. इस फलसकीर्तनसे भी षोडशमन्थोका तासयं भगवत्संवोपदेशम ही पर्यवसित होता है अन्तिम तात्पर्यनिर्धारक लिंग उपपत्ति माना गया है अन्य प्रमाणोसे किसी एक बातका खण्डित होना सम्भव नही है, इस तरहका निरूपण करना 'उपपत्ति' कहलाता है. अतएव श्रीमहाप्रभु आज्ञा करते है कि इन सोलह ग्रन्थोमे मुख्यतया प्रतिपाद्य भगवत्सेवाके स्वरूपको अन्यान्य साधनोको तुलगामे गौण बनानेवालेको पुष्टिको सुन्दर सृष्टिमें कुसृष्टिरूप ही समः झाना चाहिये-“कुसृष्टिरत्र वा काचिदुतद्येत स वै भ्रम." ऐसे ही भ्रमोके निवारणा अन्त करणप्रबोध लिखा गया है इस तरह उपक्रमोपसहार, अभ्यास, अर्थवाद, अपूर्वता, फल और उपपत्ति रूप छहो तातार्यनिर्धारक लिंगोके द्वारा यह नि सन्दिाधतया सिद्ध होता है कि पुष्टिजीवोके लिये स्वगृहम श्रीकृष्णके पुष्टिस्वरूपकी सेवा, बजभक्तोके भावोका भावनात्मक अनुसरण करते हुवे, निजतन-मन-धनका भगवान्मे विनियोग; तथा उसके अनबसरमे एतदभावधिका भगवत्स्थाका श्रवण-स्मरण-कीर्तन करना प्रथम एवम् चरम कर्तव्य है यहा वहा भटकनेवाले चितकी सभी वृत्तियोका निरोध भगवन्सेवा और भगवकथा म होना चाहिये क्योकि 'ये निरुदास्त एवात्र मोदमायान्स्यहनिशम् ।" का नियम ध्रुव और अकाट्य है सेवाफल प्रन्थमा प्रस्तुत सस्परण वि. म १९७३ म प्रकाशित गस्करणका ऑफसेट प्रॉसेस द्वारा पुनर्मुदित रूप है उस प्रथम सस्करणमें प्रकाशित न हो पानेके कारण सेवाफलकी जो तीन टीकार्य जलभेदके साथ प्रकाशित हुई थी, उन टोकाआको हमो यथास्थान यहाँ निविष्ट कर दिया है इसके अलावा सेवाफलरी मूल कारिफा तथा विवरण यहां पृथ-पृथक एपे थे, उन्हें यथामति हमने उपर नीचे योजित रिया है प्रथम संस्करणमे श्रीपुरुषोत्तमजीके वाद जिस "तदनुसारिणा" गो टौवा मुद्रित हुई थी, नामनिर्देशरहित, उस टीकाके लेखक का नाम हम कोटायात्राम मिल गया श्रीमन्मथुराधीश मन्दिरये हस्मलिसित ग्रन्यगारको रजिस्टर सख्या (२१०/३) को हस्तलिखित प्रतिमें इस टोवाक 'श्रीमयुरानाथारमज द्वाराकेशात सेवाफल विवृति प्रकाश' नामका उल्लेख उपलब्ध होता है कारोलीवाले महाराजश्रीके पास इन धोद्वारपेशजीके पुपके हस्ताक्षरोम लिखित एक प्रति विद्यमान है एसा ग्रन्थपरिचय-लेखषको लिखे एर पत्र गोस्वामी श्रीग्रजेशकुमार (काकरोली) मूचित करते है श्रीवल्लभवशयमे इन श्रीमपुरानाथात्मजश्री द्वारकेशजीका उल्लेख या मिलता है (प्रथम |२ गृह जन्म वि. स १८५२) इसके अलावा बाकरोली- विद्याविभागमें स्थित श्रीव्रजभूषणजी (द्वितीय) की विदामण्डन टीकाका मगलावरण सपा यहा १४ ये मम मुद्रित सेवाफलवियतिप्रकाश टोवाका मगलाचरण समान होनेस, यह टीका श्रीब्रजभूषणजी विरचित है, एसा गोस्वामी श्रीवजशकुमार महाराजश्रीका अनुमान है सेवाफल और सुबोधिनी पी एकवाक्यतावे प्रदर्शक (सुबो ३।२५।३२.४०) अशको हम नूतनतया यहा पाठमोके सुविधायें प्रकाशित कर रहे है प्रथम सस्करणवे सम्पादक नीमूलचन्द्र तुलसीदास तलोवाला तथा श्रीधीरजलाल प्रज- दारा सांवलिया ये प्रकाशनार्य आर्थिक सहयोग गोस्वामी श्री १००८ श्रीजीवनलालजी महाराज (पोरबन्दर) ने दिया था इन सभी महानुभावोका इस पुन प्रकाशनये अवसरपर हम हार्दिक कृतज्ञताये साथ स्मरण करते है श्रीकृष्णार्पणमस्तु Editors' Nolr. Sevaplıala is the last and the most important of thio famous Sixteen small Sacred Books of Shri Vallabhacharya It clearly states the threa sou ts of rcalisations, according to one's 'adhihara,' viz, (1)spiritual power, which, going beyond the worid, oltains a vision of God, and enjoys indescribablo blise with Him, or (2) Sayujya with Purushottama or tho A last (3) a lody fit for service of God in Vaikuntha, Gokula etc detailed description of all these, and also of hindrances in their way will be found in the Sanskrit introduction and the commentaries It gles us very much pleasure to note that we have been able to collect all the rare commentaries yet known on this important work,--50 liope the last one is of Shri Vrajanathaji, and to publish them all together Moreover, we have secured several copies of many commen taries, and it gives us great satisfaction to find that our printed texts have become much better than the oldest manuscripts in our possession, on account of comparisons with and necessary corrections from other manuscripts of the gume texts Elsewhere we have noted various extra passages whuch we found in some Mos, after the text was printed, we have noted only those readings which gave quite different meanings and wolwe reframed from adding unnecessary 'other' rcadings We «incerely thank all who have kindly supplied us with theso catitmely rare Mss The first among these is Pandit Gattulalaji's Library from which we got a large collcction and we are highly obliged to Shetla Tribhuvandas Varjiwandag and Mr Kashidas Dalal who allowed us the use of tho same Next Dr S K Belvalkar M A., Ph D favo tired us with a loan of several Msa, including the extremely rare one of Jay agopal Bhatta from the Govt collection in the Deccan College Shu Vallabhalalji and h19 Shastri Madhavzi also supplied us with several Ilog Vr Utsavial Sanl alchand also gave us one rare commentary and Mr Tansukhram Survaram also gave us some Ms. Mr Lalubhai Chhaganlal gave us the use of his block of the photograph of Shrimad acharyaji To all these, we offer our heartfelt thanks HH Shri Jivanalalyi Maharaja of Porebander has put us under a deep debt of gratitude by supplying us with the necessary zeal and funds, without which this work could not have been published We are also indebted to the manager of the NS Pregs for printing this work within eight weeks With feelings of joy, we offer this fruit of our labour of love, at the Lotus Feet of Lord Krishna 1912 December 1916 } M T Telivala DV Sankalia ग्रन्थसट्सहपरिचयः। १ २ ५ ६ शुद्ध प्राचीन भीमदाचार्यकृत सेवापल तद्विवरण च यावाप्राप्यटीकास्ता सर्या वा मुद्रितमसि । रात्र विद्यमाना पाठभेदा सोमवमभेदायास्मामितत्रैव दर्शिता । श्रीकस्याणरायकृतसेवापष्टीकाया पुमाइयममामिरपलब्धम् । प्रथम मा मा घे मप गट्टलाएहस्तलिखितसमहत्यम् । तत्र प्रथम प्राचीनम्, माय शुद्धम् । द्वितीय वनकोलेजहसलिखित समहस्य प्रायोगद तपापि पायादिशोधना कचित् पचिदत्यन्तमुपयोगि। चाचाश्रीगोपेशटीकाया पुस्तकाय प्राप्तम् । तन पुनकदय प गहलालसमहस्यम् । अन्य 'दानकोरेजस्यसग्रहस्थम् । इद पुम्ननयमपि प्राप शुद्ध प्राचीन च । एतहीकाया मुद्रणानन्तर मेकमन्यप्राचीन पुस्तक प्राप्तम्, तत्र विद्यमाना पाटमेदा परिशिष्टे दर्शिता । श्रीदेवकीनन्दनकृतटीकाया पुनकाय प गहलालसग्रहस्थम् । तत्रैक प्राचीनमभ्यय नूतनम् । तत् प्राचीनपुस्तकमपरम्य यावरछज्य सावरपर्यन्त सशोध्य मुदितमस्मामि । श्रीहरिरायफूतटीकाया स्तकत्रय मिलितम् । इद युद्ध प्राचीन पर एक केनचिन चासुदेवेन वपटना लिखितमस्ति । इद पुस्तकत्रय प गहलालसग्रहस्थय । श्रीवल्लभकूनटीकाया एक पुस्तक मिलित प गहलालसाहत । इद प्राय च । एतदपि यावरहस्य सशोध्य मुद्रितमस्मामि । एतद यमदणानन्तरमस्या अन्यत्पुम्नक मिलितम् । तन सेवाफलविवरणानुसारेण लोकप्रममादाय सेव टीका पुनलिखितेति प्रतिभाति । तत्र नियमाना उपयोगिपाठभेदा परिशिष्टे दर्शिता । धीपुरपोपमतटीकाया पुस्तकत्रयमुपलब्धम् । तत्र पुस्तकाय प गलालसमहरयम् । नृतीय दकनकोलेजसमहस्थम् । एतरपुस्तक शुद्ध पक्ष्म पूर्व लिखित श्रीपुरुषोत्तमै । परतु तस्सेदाफ्ल टीका धीपुरपोत्तमै सविस्तर पुन लिखितेनि प गहलालसग्रहस्थादर्शयदर्शनेनाशिष्टतया निश्चीयते । पगढूलालसग्रहस्थादर्शदप समवलम्ब्य एतद्विवरण मुदितमनास्मामि । एतन्मुद्रणानन्तरमेकमति शुद्ध प्राचीन पुस्तकमेतद्विवरणसमिलितम् । तनत्योपयोगिपाठभेदा परिशिष्ट दर्शितर । एतापुस्तक प गहूलालसग्रहस्थम् । अस्य कर्तृनाग न विद्यते । यथारटमेव मुदितममामि । इद श्रीपुरुपोत्तमविपरणानुसारि विवरणम् । लालभकृप्तटिप्पण्या पुस्तकद्वयमुपलब्धमस्मामि । एक ढक्कनकोलेजसग्रहस्थम् , द्वितीय प गटूलाल सग्रहस्थम् । प्रयम माचीन माय शुद्धम् , द्वितीयमपि तथैव परतु नूतनमिति प्रतिभाति । १. जयगोपालभकृतटीकाया एकमेव पुस्तक डानकोलेजस्थसग्रहादुपरब्धम् । अस्मिन्पुस्तके ५३ तम पर नु न मिलति । दव पुस्तक ग्रन्थकृतो मूलमे वेति प्रतिभाति । तन्न एकचार विवरण समाप्य परमतखण्डनाय २० पत्राणि पश्चादनेन लिखितानि । कि तस्स मत तत्तु पूर्व तेन स्वटीकायामेव दर्शितम् । २१ सदमणभकृतटीफाया एक पुस्तक श्रीगोकुलेशचरण परारानुरागि उसवलाल साकलचद्र' इत्यनेन दत्तम् । इद पुस्तक प्रयकृता स्वयमेव लिखितमिति प्रातभाति । अस्य विवरणस्य कर्तृनाम न विद्यते । अस्स पुस्तकमेक गहलालसग्रहस्यम् । प्राय शुद्धम् । परन्तु चिरसन्दिग्धम् । यथाष्टमेव मुदितमम्मामि । ९ . अस्मिन्पुस्तकसचये प गहलावसस्थाया 'कार्याध्यक्ष काशीदास नारायणदास पलाल पीठ, हाईकोर्ट, मुख्यत्रस्टी प्रेष्टि विमुषनदास' इत्येषां महायुपकृति । 'टा. बेलवलकर' इत्येतेषां महरयुपकृति पुस्तकमदानतोऽभूत् । भसन्मियोत्सयलाप्यस्यापि तथैवोपकृति । चतुर्थपघमपीठाधीश्वर- गोस्वामिधीवछमसालानो माधवशास्रिणा इसलिखितशुदपुसकप्रदानतो महायुपकृति, परन्तु मुद्रणानन्तर सरखकानां प्राप्तस्वादुपयोगिपाठा राप्त विद्यमाना परिशिष्टे निवेशिता । विवरणकृतां परिचयः। Bo- 1 ३ वय शनुम तवादी भीमसमाचार्यप्रकटित सेवाफल द्वादशटीकायुत समुद्रयते । तत्र प्रथम सेवाफल- विवरण तु भीमदाचार्यकृतिरेष । स्त्रीयाननुगृहीतुकामे धीमदाचार्य धरणस्तर प्रकटीकरामिति । २. द्वितीय मुद्रित विवरण श्रीमरकल्याणरायाणाम् । इमे श्रीकल्याणराया श्रीमदाचार्य धीवछ- भाधीश्वरद्वितीयकुमारधीमदिहलेश्वरप्रमुचरणद्वितीयसूनुश्रीमद्गोविन्दरायाणा सूनव । मार्गशीर्पकृष्ण सप्तम्या ११२५ वर्षे प्रादुर्भूता । श्रीमद्धरिरायाणा पितृचरणा अपि ते एव । सेपामनेकमन्या सूदमा भपि सिद्धान्तमर्मयोधका सरलाच सन्ति । निवन्धोपरि टिप्पणी तेषा प्राचीनतमा, अधुनापि हस्त लिखितप्रन्याफारेण विराजते । उत्सव निर्णायका भपि केचिहन्यात मादुर्भारिता मयनगोचरीभवन्ति । पोखरामम्योपरि तेपो म्याएयानानि श्यन्त भन्यान्यपि । तृतीय प्यारयान चाचाश्रीगोपेशानाम् । इमे धीगोपेशा श्रीम प्रभुचरणविट्टलेश्वराणां ससमपुत्रश्रीपनश्यामाना सूनब , घचा वा चाचा चेतिप्रसिदा । पोडशमभ्योपरि वहवस्त्रेपा टीका विद्यमाना श्यन्ते । भाद्रपदकृष्णपशम्या १६५२ वर्षे प्रादुर्भूता । चतुर्थ ग्यारयान धीमद्दवकीगन्दनानाम् । के इमे देवकीनन्दनास नि शकतया निश्चेतु । तथापि श्रीपुरषोत्तमकृततद्विवरणोपन्यासाज्ञायते यत् ते श्रीपुरुषोरामानां प्राय । श्रीमद्विष्ठलेश्वरमभुचरणपजमपुत्रीरघुनाथाना सूनव श्रीदेवकीनन्दना मार्गशीर्ष शुक्लसप्तम्या १६२५ वर्षे प्रादुर्भूता । कदाचित् त एव एते, परन्तु तत्पुयश्रीरघुनायकृतत स्तोत्रे तस्कृतमन्यानां प्राय रसाब्धिकाव्यबालबोधनकाशादिसर्वेपामपि नामानि गृहीतानि, तत्रास म्याग्यानल नामादर्श नारसन्देश । श्रीदेवकीनन्दनाना पीना अपि श्रीदेवकीनन्दना बभुयु । तेपि १६८५ श्रावणशुरूपूर्णि मार्या प्रादुर्भूना । तेपि श्रीपुरुषोत्तमाना प्राश्च । कदाचित तेप्यस्य प्रणेतार स्यु । पञ्चम व्याख्यान श्रीमदारिधनचरणानाम् । श्रीहरिराया इति प्रसिद्धा हि ते । तेषां प्रादुर्भी वस्त भाद्रपदकृष्णपञ्चम्या १६५७ वर्षे। एपी प्रझसम्बन्धसरकारस्तु धीविष्टलेश्वराणां चतुर्धेलाले श्रीवाठमै श्रीगोकुलनाथेतिप्रसिद्वैस्तै कृत । श्रीहरिशयाणामसरयाता सूक्ष्मग्रन्या दृश्यन्ते । श्रीमद्दरिधनमरणस्वरूपे तु शुद्धपुष्टिमार्गीय फलारमक रसामक विप्रयोगात्मक साक्षान्य मूर्तिमत् प्रादुर्भूतमनुभूपते । तेया व्याख्यानानि सर्वाण्यपि भायनुगुणानि । नि साधनजीवाननुगृहीतुमेव मेषां प्राकव्यमिति प्रतिभाति । अत एवात्र मुदित तेषां सेवाफरब्यारयान भक्त्यनुगुण सरल भक्ति निष्ठजनानुग्रहाय विराजते । पर श्रीविठ्ठलेश्वराणां सूनुना श्रीवल्लभानाम् । काकाधीवलभजीतिप्रसिद्धा हि ते श्रावण कृष्णचतुर्दश्या ७०२ वर्षे श्रीमत्प्रभुचरणज्येए पुनश्रीगिरिधरत पुरपगणनया तृतीयसरया विभूपयन्त प्रोद्सा । श्रीसुबोधिनी लेखकारा अप्येते "प । षोडशम थोपरि नेपामन्यानि म्याण्यानानि दृश्यन्ते । निरोधलक्षणनिवृतिस्तेषाम सविधे प्रतते । इमे श्रीवल्लभा श्रीदेवकीनन्दननन्दना , १६७२ माध ५ ६ सेवाफलतात्पर्यम् । --Dococon- श्रीकृष्णं वरमुन्दरं मधुरिमामूति तदास्यप्रभून् । सेवायां मकरन्दपानमधुपी लोकोत्तरी तस्मुतौ । माया तानखिलान् निगृहृदयान् सेवारसास्वादकान् । प्यारयानानि पिलोक्य तानि निवृत्ति सन्दोहरूपा यते निःसाधनजनोद्धारप्रकटिततनुभिः श्रीमदाचार्यवयनिजजनाः खत्पेनैव प्रयासेन सर्व- सिद्धान्तं जानीयुरितिकृपया पोडशनन्धाः प्रकटीकृताः । यद्यपि तं तमधिकारिणमुद्दिश्य आचार्यरेते ग्रन्याः प्रणीतास्तथाप्याचार्याणां यावन्त्य उक्तयस्तासां न्यायरूपत्वात् तत्ता- त्पर्य सर्वथा सर्वदा त्रिकालायाध्यमपरिछिन्नमिति तु निर्विवादं तद्वन्धाध्येवणाम् । यथा नवरत्नो देवश्रीगोविन्दमुद्दिश्य प्रकटीकृतस्तथैव सेवाफलं श्रीविष्णुदासमुद्दिश्य प्रकटितम् । पोडशग्रन्येपु सेवाफलग्रन्यस्त्वन्ते वर्तते । अस्य अन्धस्य निगूढार्थत्वात् सकलपुरुषार्थ- पर्यवसानप्रतिपादकत्वात् खयमेवाचार्यास्तं विवृण्वन्तः । विवरणसहित एवं सेवाफलान्यो महानुभावस्तस्तैर्गोस्वामिभिर्भट्टैश्च ययाशक्ति यथामति विवृतः। तत्र मिलितानां द्वादशविवर- णानां संग्रहोत्र कृतः । ययप्येतासां टीकानां विपयोयं ग्रन्थस्तधाप्यस्य गूढार्थत्वं तु नैवापैति । आदौ तावद्यया घालयोधोस्माभिः पूर्व पुष्टिभक्तिसुधायां प्रस्तरेण स्पष्टीकृतस्तथैवे- ममपि ग्रन्थ प्रस्तरेण स्पष्टीकरिप्यागः, एतेनास्य ग्रन्धस्याशयो विशेषतः सुगमो भविष्यतीति । सेवा प्रतिबन्धः अलौकिक- सामध्यम् (पुष्टिपुष्टिः) सायुज्यम् (पुष्टिगर्यादा) सेवापयिकदेहः (पुष्टिप्रवाहः) उद्गः भोगः अलौकिक लौकिका (त्याज्यात्याज्यः) (त्पाज्यः) प्रतिबन्धः (प्रायः) । साधारणः (न्याज्य) भगवत्कुतः (अयाज्य.) तावनिर्धारः (आसुरवनिश्चयः) चिका (ज्ञानमार्गेण स्थितिः) शोकाभावः सेवा-नणामात्यन्तिकनिःश्रेयससिद्ध्यर्थ श्रीमदाचार्यः पूजामार्गामिनः सेवामार्गः तेहप्रधानः प्रवर्तितः । अस्मिन् मार्गे स्नेहस प्राधान्यं न विधेः । सेवाशब्दार्थः श्रीमदा- चार्यः सर्वनिर्णयपि दर्शितः । 'भक्तिशब्दस धात्वर्थः सेवा प्रत्ययार्थः प्रेमेति' । अनर्यमूला- हन्ताममताया नाशं गिना चित्तस प्रवणं भगवति न भवतीत्येतदर्थ प्रथमं तनुजवित्तज- सेयोपदिश्यते श्रीमदाचार्यः । अहन्तारूपस्य देहस्य ममतारूपस्य वित्तस्य सिगियोगो यदा भगवति सर्वांशेन भवति तदा तादृश्यहन्ताममताया विपरिणामो भगति, चित्तस्य सर्वतः सम्बन्धे निवृत्ते तस्य भगवति स्थितिर्भवति । भगवदीयस्स तदाहन्ताममतापि भगवदीया भवति । सा तु न घाधिका, प्रत्युत परमफलसाधिका । देहवित्तस्य भगवति विनियोगः साक्षान्ट्रीमगोपीजनवालभोपदिष्टप्रकारेण महाप्रतिज्ञारूपसर्वखसमर्पणद्वारा श्रीमदाचार्यैः सशरणागतजीवानां कृतः। तदैव ते जीवा भगवदीया भूत्वा ज्ञाननिष्ठजीवानां परमकप्टेनासाध्यं जीवन्मुक्तिनसावयोधरूपमवान्तरफलमनायासेन प्राप्तरन्तः । एतादृक् प्रकारेण चित्तप्रवणद्वारा यदा भगवदीयस्य सेवा मानसी आधिदैविकी भवति, तदा सा स्वतःफलरूपा भवति । तादृशां विरलभक्तानां तु सेवां विना न किमप्यपेक्षितम् । एत- देवोक्तं श्रीभागवते 'मधुद्विदसेवानुरक्तमनसामभवोपि फल्गुरिति । ईदृशी स्वत.फलरूपा सेवा केवलभगवदनुग्रहेकलन्या । अतोस्मिन् ग्रन्थे यत्फलमुच्यते तत्पुष्टिमार्गीयसेवाया एव, न केवलमर्यादामागीयाया वा केवलप्रवाहमार्गीयाया था। अन श्रीहरिराया वा श्रीमदाचार्य: केवलाया मानस्सा एव फलमुच्यत इति रिचार्य तस्याः फलमयमुक्तवन्तः । श्रीपुरुषोत्तमाः तनुजवित्तजसहितमानसीसेवायाः फलमुच्यत इति विचार्य तम्याः फलमुक्तरन्तः । केचित्पुष्टिपुष्टिपुष्टिमर्यादापुष्टिप्रवाहसेवायाः प्रमेण फलजयमुक्तमाचारिति वदन्ति । सरपि सिद्धान्तमुक्तावलीप्रोक्ता सेवोपन्यस्यते । श्रीमदाचार्याणा वाचा निगूढार्थत्वात् विवरण- काराणां भिन्नभिन्नाधिकारवत्त्वात् याशोधिकारस्तादृशी स्फतिरिति सर्वेषा मतानामाचार्या- शयाविरुद्धत्वात् सर्वेपामविरोधस्तु सिद्ध एच 1 अय सेवामार्गस्तु केनलप्रेमप्रधानः, नेवार क्रियाया वा ज्ञानस्य प्राधान्यम् । भगवद्भावयता सर्वेपामनाधिकार. । एतादृशी- पुष्टिमायसेवायाः फलमयमुच्यते, उत्तममध्यमसाधारणभेदकमेण । तमोत्तमाया. फलम- लौकिकसामर्थ्य पुष्टिपुष्टेः । सायुज्य मध्यमाया. पुष्टिमर्यादायाः । सेवोपयोगिदेहो चैकुण्ठा- दिपु साधारणायः पुष्टिप्रवाहाया । जयगोपालभट्टास्तु एतत्सम नैवागीदुर्वन्ति । तेषां मते तु सायुज्यमेर परम फलम् , अलौकिकमामादि गौण फलम् । लक्ष्मणभट्टास्तु अत्यन्तरगान्तरगबहिरगानां सेवानां क्रमेण फल दर्शयन्ति । अलौकिक्रमामयम् : --भगवता सहगामादिसामध्यं मुख्यानामिप्रतिश्रीकल्याण- राया. अलौकिकमजनानन्दानुभये खरूपयोग्यतति श्रीगोपेशा । श्रीमद्रजम्योत्तरीन्या उतर- प्रमाणागोचरमितरसाधनाप्राप्य सर्मात्मभावकलम्यभजनानन्दानुभवलक्षणमितिश्रीदेवकी- तन योपुरषोत्तमात् प्राकालीन ० ८ शुदसप्तम्या प्रादुर्गुता इति केपाशिगत रामामनगरमधीमदनमोहनलालमन्दिरस्यधीमुपोधिनी- सेरोतिश्रीवो गिरदापापासाक प्रापम् । भापासाम्येनापि निधीयते यत् श्रीमुबोधिनीरेपनि रेषेप टीका लिपितनि । सेपालस तेषां श्रीगुदोभियनुसारिग्यारयान सदेव शापयति । एतेन गीतातस्वदीपिकावारा श्रीपाठमा श्रीमुबोधिनीरेहता श्रीषमा उमे भिसा, यदि गी। तबदीपिकापारा धीयछमा प्रीदेयरीनन्दनन्दना एय स्युरिनि । परामगृहे दी श्रीवल्लभी प्रादुर्भूती । तयोरेक श्रीदेषकीनन्दननन्दन १६०३ मार्गशीर्ष पुलसप्तम्यां प्रादुर्भूत । अन्यत्र थीविठलरायसूनुः १०२९ कार्तिकरुणादश्यां प्रादुर्भूतः । स तु श्रीपुरषोत्तमदर्वाचीन इति न स ऐखकृत् । जामनगरस्थधीमदनमोहनलालमन्दिरस्थीमुमोधिनीलेरोतिधीतो ज्ञायते यदि श्रीपाठभा काकाधीवाभजीतिप्रसिदा यीविठ्ठलेशसूनव । श्रीविवरेशानुर्न कोपि श्रीवाम पामगृहे प्रादुरभूत् । तमात् धीरघुनाथवश्यस्य कस्यापि धीवल्लभस्स देखकर्तृत्व नैव समीचीनम् । सप्तम श्रीमरपुरुषोत्तमानाम् । श्रीमदाचार्यत पुरुषगणमया सप्तमी सण्यां विभूपयन्तो भाद्रपद शुक्लदशम्यामेकादश्यां पा १७२४ वर्षे प्रोद्भता । तेपा विपरण शास्त्रीयमाचार्याशपतल रपीति प्रतिभाति । विशेषत स्रोपां परिप्रजिज्ञासुमि पुष्टिभक्ति तिमासिकपत्रिकाया पधमवर्षस्य तृवीयाको दएष्य । यावत्प्राप्य पासमान्तर या तेषां परिवादिक्रमसामिस्तमेव निवेशितमिति नान्न पुनरनूयते । मनुसरति । अष्टम व्याख्यान केषाधिगोस्वामिनाम् । इद प्यारयान धीपुरुषोत्तमानुसारिधोकान्वय नवम प्यारयान लालूभट्टानाम् । केपिदाचार्यज्ञातिजनाम्लगदेशीया विद्वांसो पाहाणा श्रीमद्विवलेश्वरप्रभुचरणर्गोकुले समानीता । ते सा धीमप्रभुचरण कन्यादानन्यपहारो रक्षित । एनादृशेषु माह्मणेषु द्वी भ्रातरौ गोविन्दकृष्णभट्टी यमुवतु ययाभगिनी श्रीरुक्मिणी श्रीमत्प्रभुचरण स्वपत्रिस्येन स्वीकृता । आत्रेयापस्खम्बविश्वनाथस्य पुत्री हि एतौ । विश्वनाथभटवश्येणु कश्चिन्मधुसूदन भट्टो यभूव । तस्य मधुसूदनभहस्य सूनव ते लालमहोपनामयालकृष्णदीक्षिता । समादसवाई जयसिंहस्साधिता । सवाई जयसिहस्तु सवत् १६८८ वर्षे प्रादुर्भूत , १७२८ वर्षे पञ्चस्व गत् । जतोस्मिन्समये लालमहा विद्यमाना भागन् । प्राय श्रीमदोस्वामिना दुहेतृतो वश्या भट्टा इस्युष्यन्ते । लालूभष्टा अपि तथैव । गास्वामिधीगिरिधारिणा शिष्या पानेका निखिता श्यन्ते । तपा रेखनशैली तु सरला यतते । तरसारल्यमसिन व्याख्यानपि मक्टीभवति । अणुभाप्यनिगूढार्थ प्रकाशिकाधीमुवाधिनीयोजनानिमन्धयोजनासेवाकौमुदीनिणयाणवपमयरनाणवषोडशप्रन्यपिपरणादयो बहवो ग्रन्यानपा प्रकाशकर्तन् प्रतीक्षते। दशम पारयान मटपातजयगोपाल भट्टानाम् । एते चिन्तामणि दीक्षितस्य सूनव । ने श्रीमत्प्रभुचरणश्रीपिरवरद्वितीयकुमारथ्रीगोविन्दरायन्ये पुनश्रीकल्याणरायाणा शिप्या तत्तिरीयभाये बहिमुसमुनवसे च सपरिचयमेव कारयन्तिा प्रणमामि हरि धीमदलभाचार्यरूपिणम्, श्री विश्वराज्याश्च प्रभून् स्वाभीष्टसिद्धये । श्रीमहोकुलनाथान् श्रीमत्कल्याणरायगुरुचरणान् । नामनिवेदनदातून प्रणमामि मुहुमुहु प्रम्णा । तैलगयज्वचिन्तामणितनयो मटपति वविख्यात जयगोपाल उपानपटाप वितनात तत्तिरीयाणाम् ॥ , शीमदलभविठ्ठलेभरहरि श्रीगोकुलेशप्रभन् । मत्या भक्तिपथप्रचारचनुरान् श्रीकल्याणरायान् गुरुन् । तातापदाम्बुजातयुगल पावा च सर्वास्त कुर्वे प्रयमह वहि मुसमुपध्वयामिध वैगवा ।, तैलगाभरणधीचि तामणिदाक्षितागजानेन । जयगोपाल ९ १. - स्वकृत ।

कृता कृतिरेपा चन्दतारकं जयतात् ।' भट्टेषु हमें लालूभवानामपि प्रायः । भवापिपर्यन्तमशासपूर्वा हि ते। पं. गलाललेखेष्वपि तेषां न किमपि विद्यते । परन्तु एतेषां पैदुष्यं तु निर्विवादम् । बहसोपि कृतपोषामुपलभ्यन्ते । संसिरीयमाध्ययहिर्मुखमुखवसयित्वमंगलकृतकृष्णकर्णामृतटीकाशुद्धपुष्टि- मागायसेवादयः प्रबन्धास्तपा मयनगोचरीमयन्ति । सरस्वतिकृतसंगीतस्प्रटीकायाः परयं सनमुसरा- मैगुजरातीपणदीपायल्यके संवत् १९७० वर्षे मुदितम् । भक्तिवर्धिन्या स्वकृतीकाया उपन्यासोस्मि- और सेवाफलम्याल्याने तेः क्रियते । मुण्डकोपनिषदाध्यमपि तः शवमिति सम्माम्यते इति माहत- तैत्तिरीयमाप्याज्ञायते । सेवाफलम्याख्यानमपि तेशामतिरसिकं वर्तते । एतरस्य म्याख्यानहान्तिम पाणि स्वकृत विवरणमेकवारं समाप्य पुन श्रीहरिरापादिमतखण्डनाय पश्चालिखितानि । तेपा परमत सण्डनं नामाक सन्तोषप्रदम् । एतदप्रे स्पष्टीकरिष्यते । १. एकादशं ग्यारयानं मटेशलक्षमणमहानाम् । इमे मणमा मटेराग्रीनाथमहाअगोपी. नाथमहसूनव । हमे नु सर्वथा अज्ञातपूर्वा । यद्यपि प्राधान्ते तेषां नाम न विद्यते तथापि पुस्तकोपरि "श्रीनाममट्टम्प पुनश्रीगोपीनाथमहस्य पुमलक्ष्मणमस्पद मिति ८श्यते । एतेषामन्येपि ग्रन्या. प. गहू- लारहम्नलिसितसंग्रहे श्यन्ते । तथापि ग्रन्थान्ते इतिश्री समाना। १२ अस्य विवरणस्य कर्तृनाम न विद्यते । अत एवाम्मामिरन्ते मुदितम् । जयगोपालकृततदुपन्या- मादिमे केपि प्राचीमा इनि निश्चीयते । प्रसिद्धासु सेवाफलटीकामु श्रीवजनाथकृता टीका मास्मामिरप. लब्धा । जामनगरे श्रीमदनमोहनलालमन्दिरस्यपुस्तकसंग्रहे तस्या पुम्नवनय विद्यते, परन्तु तन्म- न्दिराविष्टातृश्रीअनिरुदाना कृपाऽभावात् सा टीका नास्माकं मिरिता । तेषु पनद्यमपि प्रेपित परन्तु- तरदानायापि नेपामवकानो न मिलित इति प्रत्युत्तराभादादनुमीयते । अस्मिन्मुद्रणे त एव पाटा रक्षिता ये फेचिदपि आदर्शपुस्तकपु विद्यन्ते । कुनाप्यादर्शपुस्तकेऽनु- पलभ्यमान पाठस्तु, यत्रापि आदर्शे विद्यमान पाठोशाकमसमीचीनो भात , तथापि नैव निशित . यतम्नथैव करणे प्रचिन्महानन भवति । केनचित् कुवाप्यादपुम्न विधमान सावग्रहपाठनिलेशने- नाशु कस्मिता पाटो निवेशिय , टीकाकारान् प्रति महानन्यायश्च कृत । प्रार्थयामदे च साप्रदायिक- अन्य मुद्रणकार प्राचीनादरे विद्यमानानेब पाटान् मुद्रणे रक्षन्तु, न तु वमन करितान् , यतो य पाटोसाकमशुद्ध प्रतिभाति स अन्येपामत्यन्तयमीनीनो मातीनि । अम्प यावन्प्राप्यटीकासमेतमेयापरग्रन्थस्य मुद्रणव्ययो गोस्वामिवर्यश्रीजीवनलाल महर्पत इति तेषामुपकृति वय सविनय स्मराम , प्रार्थयामहे धान्येपि गोस्वामिन श्रीमन्तो वैष्णदाश्च एनाननु- युर्शित । एतेपा गोस्वामिवर्याणा कृपयेव सेवाफ्ल द्वादशविवरणयुत मुदित साप्रदायिकाना मुगम भविष्यतीति। मार्गशीर्षकृष्णनवगी, ग्राम भुचरणाकटयोमत मूलचन्द्र तेलीवाला। धैर्यलाल सांकलीया।

नन्दनाः । भगवतः कोटिसूर्यामिरूपस्सासन्तिकफलदित्सायां सर्वलीलाविशिष्टस्य प्रमो- हृदयप्रवेशे तदनुमवसामर्थ्य मिति श्रीहरिधनचरणाः । सर्वामोग्यसुधेतिश्रीवल्लभाः । पर- प्रातिविवरणश्रुत्युक्तभगवत्स्वरूपानुभवे 'प्रदीपवदावेश' इतिसूत्रोक्तरीतिकभगवदावेशजा योग्यता यया रसात्मकस्य भगवतः पूर्णस्वरूपानन्दानुभव इति श्रीपुरुषोत्तमाः । तदनु- सारिणश्चानुक्तत्वात् तथैव । साक्षात् श्रीवृन्दावनादौ श्रीकृष्णवरूपदर्शनस्पर्शनादिकृति- क्षमत्वमितिलालूभट्टाः । कस्यचिदेतत्सहाते कस्यचिदेतदेहपातोत्तरं वृन्दावनादिष्वलौकिक- समातेन प्रियतमभगवरसङ्गम इति जयगोपालभट्टाः । भगवत इवालौकिकमेव ज्ञान- क्रियाभ्यां सामर्थ्य जगद्व्यापारवर्जमिति लक्ष्मणभट्टाः । साक्षाद्भगवत्सम्बन्धरूपम्, हीन- जीवस्योत्तमभगवता सह साम्येन रती रसोदोधश्चेतिविवृतिटिप्पणीकाराः । इदं त्ववधेयम् । अन सर्वेपां टीकाकाराणां मतानि प्रायो भिन्नानीसतोनुमीयते यदत्राचार्ने किमपीदमित्यतया विषक्ष्यते । जयगोपालभट्ट विना सर्वेपि टीकाकारा अलौकिकसामर्थ्यमुत्तमफलत्वेन मन्यन्ते । नैवेदं फलं जीवकृतिसाध्यम् , परन्तु केवल- भगवदनुग्रहैकसाध्यम् । ब्रह्मानन्दात् समुद्धृत्येद फलं भगवता वृतेषु विशेषकृपया दीयते । कीदृशं तहानं तनिश्चेतुं नैव शक्यते, मगवदिच्छाधीनत्वात् तस्य । एतत्फलं तु गोपवधू- सदृशवतत्रप्रेमात्मकोत्कटमक्त्या परमसंतुष्टेन भगवता विशेषानुग्रहख्यापनाय कचिद् दीयते । कोटिनह्माण्डादीनामखिलनियामकः सन्नप्यत्र खेन्छया भक्तमनोरथपूरणाय भगवान् तश्यो भवति । अखिलं जगत् खेच्छया लीलया नर्तयन्नपि परमाद्रीो भूला भक्तमनोरथानुसारेण तद्वशः सन् स्वयं नृत्यति भगवान् । सर्वज्ञो भूत्वापि यशोदायाः सन्निधौ महामुग्धवत् तिष्ठति । भक्तमम्बरीपं स्वयं रक्षन्नपि भक्तापराधक्षमाकरणाय खस्साशक्तिं कथयन् दुर्याससं प्रति भक्तवश्यतां प्रकटयति । अखिलं विश्वं खमायया पन्धयन्नपि श्रीमन्मातृचरणानां भक्त्यतिशयेन स्नेहातिशयेन तद्वशः सन् स्वयं श्रीमयशोदया १ ननु किमर्थ भगवानेतावत्रत्वा पन्धनरूपो जात इति चेत् तमाह एवमिति । एवमपकारिणि के खकीयस्वमात्राभिमानेनापि एतावतीमभूतपूर्वा कृपा करोतीति स्वस्य भकवयता प्रदशिता । प्रदर्शन. स्थापि प्रयोजनमा हरिगेति । रा हि सर्वदु सहर्ता तत्प्रसिद्धर्धमसम्यन्धेन सहरवेतिप्ररोगात् ससार- रिलय स्यादिति राम्बामापाचनो प्रदर्शयति । कृपा च सर्वधर्मधर्मिभ्यो पलिटेति पतु भकश्यता- पारदेनचोला । ना भत्या पेवर्मधर्मिणामुपमर्द क्रियते तदा स्वरूपस्य प्रच्युतरवार फलाभावात प्रदर्शन. मपि पर्थ स्वादिलारामयाह ववशेनापीति । स दिसवश एव, न फेनाप्युपमर्द । अनेन फलगाधरप. मुफम् । परस्परचमाह कृष्णेने ति। नन्वे हवे अन्यो महान् मन्नादिन गस्यते, ततो माहारम्यस न्यूनभावाम तथा फसत्यमित्याशुपयाद यस्सेद सेश्वरं वश इति । सत्तदभिठातृदेवतासहित सर्व गस जगत् पसे। भतो नान्यभावन केनचिदपि काययमिति भाव । नेम गिरिडवो न मयो न औरप्यंगधिया प्रणा मिरे गोपी पत्तप्राप विमुनिदाए । एव समनोरणे शिदे- दासा पद्धो भवति । ईदृशं किषिप्रकारकं सामर्थ्य यत्र मत्यतिशयेन प्रेमातिशयेन भगवान् गतवश्यः सन् तत्कामान् पूरयति तन प्रकटीभवति । इदमेवोत्तम फलं श्रीमदाचार्याणामभिप्रेतमिति नान संशयः । श्रीमगोकुलनाथानां श्रीमसुरुषोत्तमा- नामप्ययमेवामिप्रायः । 'सोचते 'श्रुतिरपि भक्तस्स विविधरसमोगचतुरेण रसेश्वरेण भगवता सह भोगं निरूपयन्ती भत्तस प्राधान्य भगवतो गौणत्वं सष्टमेव कथयति । प्राप्तं फलं यावत्पर्यन्तं स्वाधीनं न भवति तावत्पर्यन्तं तस्य फलत्वमपि न प्रकटी- भवति । रसशास्त्रेषि रसाधिस्ये घुमावः प्रतिपाधते । अर्थाद्भगवतो गौणत्वं मक्तस्स प्राधान्यं यत्र भवति तनैवालौकिकसामर्थ्य प्रकटीभवति । सस्स स्वातश्यं पालयन् भक्ताधीनो भूत्वा तन्मनोरथान् पूरयन् स्वस्स विरुद्धधर्माश्रयत्वं महामाहात्म्यं च प्रकटीकुर्वन् भगवान् श्रीकृष्ण एव परमफलरूपोऽलौकिकसामर्थ्य रूपः श्रीमदाचार्याणां हृदयशेपे नित्यं रमते स्म । पहिरपि श्रीमदाचार्याणां सनिधी असिललीलाविशिष्टो भगवान् कृष्णो रममाणः प्रकटतया भक्तवश्यतां प्रदर्शयन् निरन्तरं स्वग्यिपयो भवति । एतादृशं भगरतः परम फर वाचनसागोचर सत् शब्दः कथं प्रतिपादयितुं शक्यते । अनुभवैकवेद्यत्वात् तम्य । अत एवाचायः तादृशनिगूढत्वप्रदर्शनाय 'अलीफिकसामर्थ्य'- मिति परमनिगूढशब्दप्रयोग. कृत इति प्रतिभाति । अत्रापि सर्वेपां टीकाकाराणाम- निरोधस्तु अनुक्तसिद्ध एव । सर्वेपां भिन्नाधिकारवत्वात् भगवतः स्वतनेच्छत्वाय कीदृशं दानं भगनान् करिष्यति तन ज्ञात गम्मत इति । श्रीपुरुषोत्तमचरणैस्तु अविरोधप्रकारो- तिसुन्दरनया प्रतिपादित., अतम्त५पास्माभिरत्रानूद्यते । एतत्सर्व भगवतो नानाविध- प्रवेशहेतुकत्याद्भगदिच्छायाश्च ज्ञातुमशक्यत्वादुपपन्नमिति । सायुज्यम्-सह युनक्तीति सयुक् , सयुजो मानः सायुज्यम् , सहभावः गोपाना- मिति श्रीकल्याणरायाः । भक्त्या माममिजानातीत्युक्तो भगवत्स्वरूपे लय इति श्रीगोपेश- श्रीदेवकीनन्दनश्रीपुस्पोत्तमा. लालूभट्टाथ । निवृतिटिप्पणीकारा अपि तथैव । संयोगानु- भवसामर्थ्यम् , भगवता सह सततस्थिनिरेर सार्वदिकसयोगरसानुभव इतिश्रीहरिधन- धरणाः । मोनुत इतिश्रुन्युक्तमहभानेन भगाना सह भोग इतिश्रीवल्लभाः। शुद्धपुष्टिमार्गीय भेदमम्पन्धघटित केवलेन हि मानेनेत्यादिवास्यरत्युत्तमकृपया ब्रह्मभानज्ञानवैराग्यनिरपेक्ष- प्रेमासक्तिन्यमनरूपकेग्लभानजनितमगरत्महगारनिगिष्टमार्गकालिकमकामभोगरूपमिति जयगोपालभट्टा । उभयविधमपि सायुज्यमितिलक्ष्मणभट्टा. । तथा चान द्विषिष सायु- ज्यम् । रूढार्थकं यौगिकार्थक च । तत्राचं ज्ञानमिनितानामेकत्वरूपम्, अभेदरूप भेदात्यन्ताभानरूपमारमनैश्यम् । शुद्धभक्तानामपरम्, भेदतस्तद्दत्तससित्ततम्तदानन्दानु- भवात् । पूर्वन देहेन्द्रियप्राणान्तःकरणानि पिहायेह स्वात्मनैव केवलेन तदानन्दानुमवः, १ यत्रय भरूस्य सातभ्य तदिच्छानुसारेण भगवरकृतियथा दामोदरलीलायो सा पुरि। नि.३.२. . ।

अपरन सहैव तैरिति सार्थकतैपाम्, अन्यत्र नेति । अघापि पूर्ववदविरोधस्तु सिद्ध एव । व्याख्यानस प्रकारद्वयम् । एक शास्त्रीयम्, अपर भक्तिमार्गीयम् । श्रीहरिरायादयो भक्तिसरणीमनुसृत्य यौगिकार्थक सायुज्यमशीकुर्वन्ति । श्रीपुरुषोत्तमादय शास्त्रीयसरणी- मनुसरन्तो रूढार्थक सायुज्यमगीकुर्वन्ति, तथापि यौगिकार्थसायुज्यग्रहणे नैव तेषां प्रद्वेप , प्रत्युत सम्मतिरपि वर्तते, यत तैरपि निबन्धे 'आदिमूर्तिः कृष्ण एव सेव्य. सायुज्यकाम्यये' सत्र तथैव सायुज्यशब्दो यौगिकार्थे व्याख्यात । श्रीपुरुषोत्तमरीत्या विचार्यमाणे इद सायुज्य पुष्टिमर्यादाया फल भवति । श्रीहरिरायरीत्या विचारिते तु इदमपि फल मानसा शुद्धपुष्टेरेवेति भेद । अत्रेदमपि ध्येयम्, शास्त्ररीत्या जीवस्य प्राप्यफलस्य विचार्यमाणे सायुज्यपर्यन्त बुद्धिरारोहति, तदतीते अलौकिकसामर्थ्य तु न । अत एवाचार्या प्राय सर्वत्र फल निरूपयन्त सायुज्यशब्द प्रयुञ्जन्ति । स्वस्मिन् लयं कारयित्वा अनुग्रहविशेषेण पृथगाविर्भावयित्वा यदा फल दातु प्रभुरिच्छति, तदा भक्तस तदनुभयोपि नैव स्वरूपेण, परन्तु भगवत्कृततत्प्रवेशहेतुक , प्रभुरेव तस्यानुभवात्मा तदैव भवति । तस्यामवस्थाया यत्र सर्वोपि व्यवहारो भगवदीय एव, आत्मत एव इद सर्वम् , तर द्वैताद्वैतयो प्रश्नो नैवोत्तिष्ठति । तथापि भेदेनानुभव विना भक्तिरसस्यानुभवो सामा- न्यतो न भवतीति विचार्य श्रीगोकुलनाथश्रीहरिरायादिमितविशिष्टाद्वैतपक्ष कचिदुप- । वास्तव श्रीमदाचार्यप्रतिपादित शुद्धाद्वैतमेवाखण्डित तेषा मते भवति । तथापि तत्पक्षमनुसृत्य ते सायुज्यशब्दस्तथैव यौगिकार्थे व्याख्यात । अतो न कुत्रापि विरोध । अन जयगोपालमट्टास्तु श्रीहरिरायवत् सायुज्यशब्द यौगिकार्थकमनीकुर्वन्त. सायुज्यमेव परम फलमलौकिकसामर्थ्यादि गौण फलमिति मन्यन्ते, तन्नैवास्माक मन- स्यायाति । विप्रयोगस्य परमफलव सयोगस्स मध्यमफलत्व यच्छ्रीहरिधनचरणै प्रोक्त तदपि परमाग्रहेण खण्डयन्ति । परन्तु तत्रापि दृष्टिभेदत एव विचारवैषम्य भासते । श्रीहरि- रायादय विप्रयोगमेव परमफलत्वेन मन्यन्ते, सयोगादयस्तेपा मते व्यभिचारिभात्रा विप्रयोगस्तु स्थायिभार । श्रीमत्रभुचरणा सयोग परमफलत्वेन मन्यन्ते, तर सयोग- स्थायिमाय , विप्रयोगादय व्यभिचारिभावा । आचार्यास्तु 'आन्तर तु महाफल'मित्सन विप्रयोगस महाफरत्व दर्शयन्ति । अन निरोधस्तु नेवाणुरपि । आचार्याणा निप्रयोगरूपत्वात् श्रीमत्प्रमुचरणाना सयोगरूपत्वादुभयरूपेण प्रभु फलरूपेण उभय- द्वारा प्रकरीभवन् खीयाना मनोरयान् पूरयिष्यन् निता सुधा वर्पयिष्यति कध क्षेति न ज्ञातु शक्यते । अत सर्वमन प्रतिक्षणनूतनत्वात् रमणीयमेव । फिय, रसरूप प्रभुरेप परम पलम् । रसम्योमयदलपिशिष्टत्वात् सयोगरूपेण विप्रयोगरूपेण वा फलत्व तस्स नैव व्यभिचरति । यम्प निष्ठा विप्रयोगे भवति स त प्रधानी कृत्य सयोग मध्यमपलत्वेन मन्यते, यथा श्रीहरिरापादय । यम्प निष्ठा सयोगे भवति म न प्रधानीकृत्य पिप्रयोग न्यस्त .

. मध्यमफलत्वेन मन्यते, यथा जयगोपालादय । श्रीमदाचार्यास्तूभयदलविशिष्टमपि प्रभुखरूप परमफलरूप मन्वाना निप्रयोगस्य कचित्राधान्य दर्शयन्ति, कचित्सयोगस्य । उभयस्य परमफलत्वे तु नैव सन्देह , तथापि यादृश भगवता दान तादृशी रुचिरुत्पद्यते । अतो भगवतो रसरूपत्वात् तस्य च भावविभावानुभावै पुष्टत्वात् , वपूर्णप्राकट्यकरणायै- वान विविधमतप्रदर्शन भगवता स्ववृतभगवदीयद्वारा कृतमिति प्रतिभातीति सर्व समससम् । सेवापयिकदेहो वैकुण्ठादिषु,-सेवाया क्रियमाणायामेवानुग्रहविशेषाभावात् साक्षात् सेवानुपयोगे अन्यै तादृशसाक्षाद्रमानुभवकर्तृमि कियमाणाया सेवाया उप समीपे योग सम्बन्ध तद्वत्पक्ष्यादिशरीरप्राप्तिरितिश्रीहरिधनचरणा । देहेन्द्रिया सुहीन पुरुषस्त्रीपशुपक्षिवृक्षाद्याकृति सथानविशेष इति श्रीपुरुषोत्तमचरणा । व्यापि- वैकुण्ठादौ पार्षदादिदेहप्राप्तिरिति लालूभट्टा । 'गोकुल पनवैकुण्ठमितिकृष्णोपनिषदुक्ते प्रपञ्वातीतभगवन्निवासस्थान व्यापिवैकुण्ठान्तर्गत वृहदन नन्दीश्वर चोच्यते । आदिपदेन श्रीवृन्दावनश्रीमद्गोवर्धनादि च । तर सायुज्यफलादानेधिकार सेवौपयिकदेहरूपो वायवा भवतीत्यर्थ । वैकुण्ठान्तरस्य शुद्धपुष्टिमार्गीयफलरूपभगवल्लोकत्वाभावाद् गोकुल स्वैव ताग्भगवलोकत्वाद् वैकुण्ठपदेन श्रीगोकुलम्, आदिपदेन वृन्दावनादिक चाभि प्रेतमितिजयगोपालभट्टा । अप्राकृतमूतभोतिकतृणलतीपधिवृक्षपशुपक्ष्यादिदेह अधि कारात्मा, तन सेवोपयोगी बोध्य , वैकुण्ठपदेन मुख्येऽमुख्य च । आदिपदेन स्वर्गादिषु विष्णो स्थानेष्वपि तथेतिलक्ष्मणभट्टा । अरौकिकदेहवयोगुणादिकमितिविवृतिटिप्पणी कारा । रमाप्रार्थितवैकुण्ठक्षीरोदश्वेतद्वीपेषु भगवत्सेवायोग्यदेहप्राप्तिरितिश्रीगोपेशा । तथैव श्रीदेवकीनन्दना । आदिपदेन श्रीमथुरावृन्दावनादिक ग्राह्यमितिश्रीवल्लभा । आदिपदेन भूलोके उद्धवादीनामिव गवादीनामिवेति वा सेवोपयोगिदेहप्राप्तिरितिश्रीकल्याणराया । अनेद ज्ञेयम् । श्रीगोपेशा श्रीदेवकीन दना क्रमेण मर्यादाभक्ते प्रावाहिकभक्ते फल वदन्ति, अन्ये तु पुष्टिभक्ते साधारणभक्तेर्वा फल वदन्तीति दृष्टिभेदतस्तारतम्यम् । उद्वेग -सेवाया क्रियमाणायामन्यन गमनेच्छादिरितिश्रीकल्याणराया । मनस सेवाया क्रियमाणायामुत्कृष्टो वेग , सर्वधा तत्रास्थिरता वाहिर्मुख्यमितिश्रीहरिधनचरणा । मनसोन्यपरतेतिश्रीवलमा । उच्चैर्मय चलन वा, सेवाया क्रियमाणाया दुष्टादिभ्यो मनसो भय पापादिना बुद्धेश्वाञ्चल्यमितिद्विप्रकारकमुद्वेग श्रीपुरुषोत्तमा आहु । भगव सेवासगये चित्तक्लेशप्रदश्वाञ्चल्यविशेष इतिलालूभट्टा । अन्ये तु विशेप न कश्चनाहु । अयमुद्वेग सेनाया प्रतिवन्धरूपत्वात् त्याज्य । आचार्या प्रथममुद्वेगादित्रय ससाधन त्याज्यत्वेनोस्त्वाग्रे तत्त्याज्यत्वात्याज्यत्व विभाग च कृत्वा पचावयो साधारणप्रतियन्ध- लौकिकभोगयो साज्यत्व निरूपितवन्तो न तूद्वेगस्यापि, अत उद्वेगस्य कश्चिद्भिन्न एव प्रकारोभिमत इति विचार्य श्रीपुरुषोत्तमाम्तम्या अनुक्ते कारण दर्शयन्त उद्वेगस्यामुकाशेन अत्याज्यत्वमपि सूचयति ।

प्रतिबन्धः-सेवासमये लौकिकवैदिककार्यान्तरासक्तिरन्यकृतान्तरायादिश्चतिश्री- कल्याणरायाः श्रीहरिरायाश्च । वेदनिन्दा म्लेच्छवलिष्ठबहिर्मुखजनितोपद्रवश्चेतिश्रीगोपेशाः। कायस्यान्यपरतेतिश्रीवल्लभाः । तत्प्रतिफूलो निग्रह इतिश्रीपुरुषोत्तमाः । सेवायां रुची सत्यामपि तत्समये लौकिकवैदिककायिकादिकार्यासक्तिरूप इतिश्रीपुरुषोत्तमास्तदनुसार- णश्च । प्रतिवन्धक तूदासीनं दुःखसुखे प्रयच्छत्तीतिलालूभट्टाः । अयं प्रतिवन्धो द्विविधः । साधारणो भगवत्कृतश्च । साधारणो घुझ्या साज्यः । भगवत्कृतस्तु न । भगवत्कृत- प्रतिवन्धे तत्त्वनिर्धारविवेकौ साधनरूपौ, तेन फलं शोकाभावः, न मुक्तिः । विशेषस्तु स्पष्टः, टीकासु दर्शितत्वादत्रानुपयोगित्वाद् विस्तरभयाच नानूद्यते । तत्त्वनिर्धाररूप आसुरत्वनिश्चयः, भगवान् फलं न दास्यतीति विवेकश्च स्पष्टतया टीकाकारैरनूदितौ । मोगः-लौकिकालौकिकभेदेन द्विविधः । लौकिकस्त्याज्यः । लौककभोगस्तु गृह- त्यागं विना न सिध्यतीत्यतो 'भोगाभावस्तदैव सिध्यति यदा गृहपरित्याग' इत्याचार्य- रुक्तम् । अलौकिकमोगस्तु प्रायः । भगवन्निवेदितानां भोगोऽलौकिकभोगः । अलौकिक- सामर्थ्य मिति प्रायः सर्वे वदन्ति, श्रीवलभास्तु प्रथमफलं सेवोपयोगिदेह इति वदन्ति । भगवत्स्मरणसहितकृतभोगस्तु नैव बाधकः । एवं सेवायाः फलं बाधकं चोक्त्वा आचार्याः स्वोक्तेः सर्वदा भावनमुप- दिशन्ति । यद्यपीयं भावना न खकृतिसाध्या तथापि कर्तव्येति तथैव संवरनूयते । गुणक्षोभेपि तद्भावनमेव कर्तव्यम् , अन्यत् सर्व मनोभ्रमः । गुणक्षोभशब्दस्तु टीका- कारैविधा सामान्यतो व्याख्यातः । केचिदनुपुलकादिक्षोभ इति वदन्ति, अन्ये तु सत्त्वरजस्तमसां क्षोम इति वदन्ति । उमयथापि भगवच्छरणभावनमेवाचार्याणां स्पष्टम- भिमतमिति तु नैव सन्देहः । तदीयैरपि तदेव कर्तव्यम् , फलाविलम्वाय, यतोधुना जीवानां पुष्टिमर्यादायामेवाङ्गीकारः । यथाहुः श्रीहरिधनचरणाः 'साम्प्रतं तु पुष्टिमर्या- दायामेवाधुनिकानागद्गीकाराद्भजनसिद्धिविलम्बसद्भावेन तावत्पर्यन्तं प्रोपितभर्तृकाया इव फलप्रतिवन्धमावन सर्वदा कार्य'मिति । अत्राचार्यरुक्तं 'अवश्येयं सदा भाव्या सर्व- मन्यन्मनोभ्रमः' इति वाक्यं पुष्टिमार्गीयस्याधुनिकस्य कीदृशं कर्तव्यमिति स्पष्टतया ज्ञाप- यति । सर्वप्रमाणातीतो वाचनसागोचरः सर्वतयखतयो भगवान् केनचित्साधनेन प्राप्यते इनि तु नैव वक्तु शक्यम् । अत एव भगवत्प्रापकत्वेन कियित्साधनं भगवदतिरिक्तं पुष्टिमार्गे वर्तते इत्यपि तु यक्त नैव शक्यम् । साम्प्रतं वेदमार्गस प्राय उत्सग्नत्वात् सोपि भक्ति मार्गम्य पुष्टिमार्गस्याङ्गत्वेनाव प्रविशति । अतः पुष्टिस्थितो भगवान् मर्यादास्थितसाध- नव प्राप्तुं शक्यते, अत एवोभयथा पुष्टिमार्गस्य निःमाधनत्वं स्फुट प्रतीयते । तथापीदं विचारणीयम् । श्रीहरिरायश्रीपुरुषोत्तमादिमिरधुनानयताग्दशा प्रचलनीति प्रतिपाद्यते, . मांप्रत जीनानां पुष्टिमार्गीयाणामहीकारोपि पुष्टिमर्यादायामेव भवतीत्यपि तेरेवाच्यते ।

तेन यद्यपि जीभगवत्प्रेरणं विना किमपि कर्तुं स्तबलेन नैव शक्यते, तथापि भगवत्प्रेरणया भगवद्वलेन यच्छम्यं भवति तदवश्यं कर्तव्यम्, खनिहाय प्रोपित- भर्तृकावत् । यद्यपि एतत्फलरूप भाग्न भगवत्कर्तृकमेव तथापि एतदेव भगच्छरण- भावनं कर्तव्यं न तु तूष्णी स्पेयम् । पुष्टिमार्गम्य भगरद्रपन्नाद्रगयनो विरुद्वधर्माश्रयवत्वात् तस्यापि तथात्वादस्मिन् मार्ग भासमानो विरोधोपि पिगेवाभास इवालकाररूप एव । साधन- फलरूपो भगवानेव । तथाहुः श्रीमत्प्रभुचरणा नियन्ये 'भक्तिमार्ग तु भगवान् स्वत एव यदा भक्तेपु सर्व सम्पादयति खीयत्वेन, तदा भक्तः स्वाङ्गीकार सर्वात्मना ज्ञात्वा स्तुत्या- दिपु स्वाधिकारं जानाति ततः स्तौति । अथना सर्वात्मना सांगीकारज्ञानेनान्तरानन्दे पूर्णे बहिरपि सर्वेन्द्रियेपु प्राकट्यसमये वाचि स निर्गच्छन् स्तुतिरूपो भरती ति। यावन्ति साधनानि तानि न भगवत्प्रापकाणि, तेषां खरूपयोग्यतासम्पादकत्वात् । विशेषस्तु स्थलसकोचाद् गुजर्रानुवादे प्रतिपादयिष्यत इति । ॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ।। मार्गशीपंकृष्णनवगा, गृलचन्द्र तेलीवाला। श्रीमत्प्रभुचरणमाम्योत्सव धैर्यलाल सांफलीया । ३८ तमे पृष्ठे प्रकाशितसेवाफलविवृतिव्याख्यानान्ते अधोलिखितों- शोऽधिक उपलभ्यते श्रीमन्मथुराधीशग्रन्थागारे (२१०/३) क्रमाकित सन्दर्भसूच्याम् } "भगवदिच्छाभावनमाव तु श्रीगोपीजनवल्लभो अस्मत्प्रभु पुष्टावगीतात्मना स्वयमेवोद्वेगादिक निवार्य यथाधिकारमतद्ग्रन्थाक्तफल दाम्यति इनि मिद्धम । श्रीवल्लभप्रभोर्नामोच्चारणात्प्राप्तवुद्धिना । विचारिता मयाप्येपा पूर्वटोकानुसारत । इति श्रीगोस्वामिमयरानाथारमजद्वारिकेशन वृत. रोवासनविवृतिप्रवाश. समाप्त ॥ श्रीगोपीजनवल्लभार्पणम ॥ मिति कार्तिक सुदि ४ सवत्मर १९३५ । पुस्तक मथुरादास को लिखन पियो हरिदास । मन्दिर श्रीमथुरेश का दडोतिसिला पास ॥

॥ सेवाफलं सविवरणम् ॥ पादशी सेवना प्रोक्ता तसिद्धो फलमुच्यते । अलौकिकस्म दाने हि चाद्यः सिध्येन्मनोरथः ॥१॥ फतं वा ाधिकारो वा न कालोन नियामकः । सेवाया फलनयम् अलौकिकसामथ्र्य सायुज्य सेवोपयोगिदेहो' वैकुण्ठादिषु. उद्वेगः प्रतिबन्धो वा भोगो वा स्यातु बाधकम् ॥२॥ अकर्तव्यं भगवतः सर्वया चेद् गतिर्नहि । पया वा तत्त्वनिर्धारो विवेकः साधनं मतम् ॥३॥ बायकानां परित्यागो भोगेप्येकं तया परम् । निष्प्रत्यहं महान् मोगः प्रथमे विशते सदा ॥४॥ सेवाया प्रतिवन्धकवयम् उद्वेगः प्रतिबन्धो भोगो वा. बयाणा साधनपरित्यागः कर्तव्यः भोगो द्विविधः लौकिकोऽलौकिकरच. तन्त्र लौकिकस्त्याज्य एव. अलौकिकस्तु फलाना मध्ये प्रथमे प्रविशति. प्रतिवन्धोपि द्विविधः साधारणो भगवत्कृतश्च. तत्र आयो बुद्धया त्याज्यः. भगवत्कृतश्चेत् प्रतिवन्धः तदा भगवान् फल न दास्यतीति मन्तव्यम्. तदा अन्यसेवापि व्यर्था. तदा आसुरोय जीव इति निर्धारः तदा शान- मार्गेण स्थातव्य शोकाभादायति 'विवेक'. ननु साधारणो मोग कथं त्यक्तव्य इत्याकाक्षायामाह- सविनोल्पो घातकः स्याद् बलादेतो सवा मतो। 'सविघ्नो अल्पो पातकः स्याद् इति सविघ्नत्वाद् अल्पत्याद् भोगस्त्याज्य:- 'एतो' प्रतिवन्धको. सेवोपपिरदेह इयपि पाठ द्वितीय तथा चिन्ता स्याश्या समारनिश्चमात् ॥५॥ द्वितीयो भगवत्कृतप्रतिवन्य ज्ञानस्थित्यमावे चिन्ताभावार्थमाह द्वितीय' इति नत्वाचे दातृता नास्ति आधफलामा भगवतो दातृत्व नास्ति तदा सेवा नाघिदविकी इरयुक्त भवति तुतीये बाधक गृहमा भोगामावस्तदेव सिध्यति यदा गृहपरित्याग अवश्येय सदा माझ्या सर्वमन्यन्मनोभ्रम ॥६॥ तबीयरपि तत कार्य पुष्टो नंद विलम्बयेत । गुणक्षोभेपि दृष्टायमेतदवेति में मति ॥७॥ कुष्टिरन वा चिदुत्पद्येत स भ्रम । ॥ इति श्रीमद्वल्लभाचायचरणप्रकटित विवरण सवाफल। समाप्तम् ॥

॥ सुबोधिन्येकवाक्यतया सेवाफलस्वरूपनिर्णयः॥ सुबोधिन्या सेवनास्वरूपम्। एकगनस पुरुषस्य सर्वेन्द्रियाणा सत्त्वमूर्ती भगवति या स्वाभाविकी घृति सा भक्ति इति.. ये देव्या सपदि जाता तेषामपि देवरूपाणि (इन्द्रियाणि) भवन्ति आमुराण्यपि भवन्ति एकस्मिन्नेव गोलके उभयमपि तिष्ठति यानि पुननिषिद्धे लौकिके च रज्यन्ते तानि बलाद् विहिते पवर्तमानान्यपि न परितुष्टानि भवन्ति इत्यासुराणि तव भक्ति देवरेव भवति नासुरै किञ्च तान्यपि कर्मयोगज्ञानादिवहरूपे वैदिक कर्मणि प्रवर्तमानानि पूर्ववासनयाभ्यासात् भवन्ति तेषामपि यदि फलावस्था भवति तदा सत्त्व एव शुद्धसत्वरूपे भगवत्स्वरूपे प्रवर्तमानानि स्वभावतो भवन्ति वस्तुत- स्तु गुणातीते भगवति स्वाभाविकी वृत्तिरिति भगवच्छास्त्रम्, "मनिष्ठ निर्गुण स्मृतम्" इत्यादियाक्ये सर्वा भगवत सामग्री निर्गुणा मनोपि विविध देवा- सुरविभदन तत्रामुर मकल्पविकल्पात्मक नानाभावापन्न मननात्मकमेव ..मनमा तु द्वितीयेन न भायमेव तथामति इन्द्रियाणा पूर्वोक्ता नि न स्यात्. अत ए. स्वभावापन्न मनो यस्य तस्यैव भक्ति . अन्यपा तु ययाकञ्चित् क्रियमाणा भगवति खण्डशो वृत्तिरक्षयत्वात् बहुभिन्मभि पुष्टि गता अन्तिमजन्मनि भक्तिरूपा वृत्ति जनयिष्यति इति न काप्यनुपपत्ति वृत्ति तनिष्ठता नतु ग्रहणमात्रम् जन्मनि सा अनिमित्ताभवति स्वतन्ता, भगवग्निमित्ता वा, भगवत सकाशात् फलानि निमित्तानि. या अनिमित्ता सा भक्ति भवतीत्युत्तरेण सम्बन्ध , किञ्च सा चंद् भागवती भवति, साक्षाद् भगवन्त विषयीकरोति भगवद्भाव वा पगुणरूपता- मापद्यत मुक्तस्सायुज्यादपि इय भक्ति गरिष्ठा (सुयो. २२५१३२-३३) सुबोधिन्याम् अलौकिकसामय॑स्वरूपम् : सादृशभक्ताना शानिनामिवाग्रिमकृत्यमाह प्रकारद्वयेन, तन्न प्रयममाह निभिर्नका- स्मतामित्यादिमि.. जीवता सापनावस्था फ्लरूपा तया परा सायुज्य प तृतीय स्यादतोनोस्त्रान्तिप्रापण तन प्रथम भक्तानां साधनावस्थामाह- नकात्मता मे स्पृहयन्ति केचित् मत्पादसेवामिरता मदोहा । पग्योग्यतो समाजयन्ते मम पौरवानि ॥ भागवता प्रसग्यय इय फलस्पा भक्तिीतल्या, ते भरता यावज्जीवन्ति च तावत्फलरूपां भक्ति कुर्वन्तीत्यर्य. फलरूपता तदेव भवति यदा भजनादसोऽभिव्यक्तो मवती तस्या अभि- व्यक्त निदर्शन भगवत एकात्मता सायुज्यरूप फल न स्पृहयन्ति प्रार्थना तु दूरे ते भक्तेषु विरला' प्रसगानिस्प्यन्ते केचिदिति दुर्लभा तेषा कायवाडमनोवृत्ति स्वभावत एव भगवति भवतीरयाह मत्सादेत्यादिना मम पादसेवायामेव अभिरति- मंनोवृत्तिर्येपाम्. सर्वतो गत्वा भगवत्कार्य कर्तव्यमिति पझ्या सेवेत्यर्थ अन्यतु सुष गमनानन्तरसाध्यम्. इय मनोवृत्तिनिरूपिता. कायिकोमाह मदीहा इति. मत्सम्बन्धिन्येव ईहा चेष्टा मेषाम्. तेपा वाचनिकोमाह अन्योम्यत इति M तेषा फलावस्थामाह- पश्यन्ति ते मे इचिरावतस- प्रसन्नवदनारणलोचनानि । रूपाणि दिव्यानि वरप्रवानि साक बाब स्पृहणीयां वदन्ति । ते मे रूपाणि पश्यन्ति निरन्तर भगवत्साक्षात्कारो भवति. यथा मिस्सह डन्ति प्रथमत पश्यन्ति भगवतो रूपाणि वर्णयति रुचिरापवतसानि कर्णाभरणानि येषाम् अननवृन्दावनादी भगवत्साक्षात्कारो भवतीत्युक्तम् प्रसन्नानि यक्वाणि अरुणानि लोच- मानि येषामिति रूपाणीति परमोपासकानामेक रूप कदाचित् साक्षात्कृत भवति तेपातु बहूनि. तानि च दिव्यानि लौक्किबुदया न गृहीतानि. अलौकिकभाव वा प्रकट- यन्ति. तान्प्रत्यैव प्रकटानीति तथा सति नातिप्रसक्ति तेपामन्यदोयम्यावृत्त्यर्थं निदर्शनान्तरमाह वरप्रदानीति न हन्यन पर दातु शक्यते. प्रसनरूपादेतेपा दलमण्यमाह साक वाचमिति. जीवन्त एवंत एतस्मिन्नेव लोक भगवता सह स्पृहणीया वाच बदन्ति. यथा मिवैस्सह इप्टालापा त्रियन्ते (सुबो ३॥२५॥३४-३५) मुबोधिन्या सायुज्यस्वरूपम्ः तर माया- तदर्शनीया पदेहवार- विलासहासाक्षत वामसूक्तं । हतात्मनो हतप्राणारच भक्ति. अनिग्छतो गतिमन्दों प्रयुक्ते ।

इत्युक्तम, सवस्यापि विपयस्य भगवदीयाना भगवदधीनत्वाय षष्ठी तामित्यलो- भगवद्मजनमनु भगवन्तमनु प्रविष्टा थिय सर्वामेव सम्पत्ति मोक्षपर्यन्ताम्, भागवती प भगवरवृतसम्पत्ति च यत्यनादर, सर्वमेव वा अस्पृहयन्ति, भद्रा मोक्षासम्पत्तिमपि मध्यमा भक्ति पतमवश्य प्रयच्छति इति, यधन्यव तेषा भोगो न रोचत तदा वैकुण्ठ एव तभ्यो भोग प्रयच्छतीत्याह परस्य मे तेऽश्नुवते न लोव इति, परस्य उदारत्व तस्य सर्वोपकारकरवाय, भगवतो हि लीला सर्वेषा सर्वपुरुषार्थदायिनीति कालादिनामप्यगम्यम् अतिसूक्ष्ममेव भगवदात्मक फल प्रयच्छति (सुबो. ३३२५॥३६) मायाविनो विभति पुनधनादिरूपा स्वर्गादिरूपा च. न तन्न भोग्यमस्तीति मायाविन विकी सर्वलोकसिद्धा वा एश्वयमणिमादि, अष्टागानि यस्येति सर्वश्वर्यप्राप्ति. ते पूर्वोक्तरूप अनुभवसमय एव आनन्दजनक दर्शनीया अवयवा येषाम् उदारो विलास , हासपूर्वकमीक्षित वाम मनोहर सूक्न वाक्य च येपाम्, ते हृतान्त करणाना यशीवृतेन्द्रियाणा च सा पूर्वोक्ता भक्ति, तामनिच्छतोप्यण्वी गति सायुज्य प्रापयति भक्तस्य चतुर्विधपुरुषार्थसिद्धयर्थ चतूम्पत्व च साध्यते तन, दर्शनीया अवयदा यामपूरया , उदारो विलास अयंजनक , हासपूर्वकमीक्षित धर्मजनकम्, वामसूक्तानि मोदाजनकानि, कामो हि विषयमौन्दर्येण अन्त शक्त्या च सिध्यति. अतो दर्भ नीति विशेषण बहिरलौकिकसौन्दर्याणम् विलासो हि अपस्य नानाप्रकारकत्वास, भगवत्वम् हासो देहादौ अध्यासजनक अन्यथा निरन्तर धर्मो न सिध्येत् हासपूर्वक घशान घमंजननमेव सूक्त हितकारी अविद्यानाशकम् वाम परमानन्ददायकमिति सूक्ष्मा हि गतिरेकरूपानन्दस्वरूपा, रूपाणि च अनन्तानन्दरूपाणि, अतएपानिच्छा, अतएवान्त करणेन्द्रियाणा च तैराकर्षण सन्द्रियसुखरूपत्वात् स भगवान् स्वार गच्छन् तानपि न्यति, ते तु इन्द्रियाणि मनश्च नयन्ति, भक्तिस्तु फलावश्यभाविनी सुबोधिन्या वैकुण्ठादिषु सेवोपयोगिदेहस्वरूपम् : एव सायुज्यरूप फलमुक्त्वा सालोक्यादिरूप फलमाह- अयो विभूति मम मायाविनस्ता- मैश्वर्यमष्टांगमनुप्रविष्टाम् । धिय भागवती वाऽस्पृहमन्ति भद्रा परस्य ते मेऽनवते न लोके ॥ अथो इति. सा चद् भक्तिर्मध्यमा भवत्, ततोय भिन्नप्रक्रम : अथो मम मालाददाराच्च, लोरे व्यापिर्वकुण्ठे, सर्वमैश्वर्यादिकमश्नुवते (सुबो ३।२५५३७) सुबोधिन्यां फलाधिकारयोः कालानियम्यत्वरूपम् : ननु लोकाना कालमयस्य विद्यमानत्वात् 'क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोफ विशन्ति' इति स्वस्थानत्यागात् किं वैकुण्ठलोके विषयानुभावेन इत्याशक्याह- न कहिचिन्मत्परा शान्तरूपे नश्यन्ति नो मेऽनिमियो लेडि हेति । पेपामह प्रिय आत्मा सुतश्च सखा गुरु सुहृदो देवमिष्टम ॥ शान्त रूप यस्येति सर्वदोपविजिते वैकुण्ठे वा अहमेद परो येषा ते न नक्ष्यन्ति, क्षीणपुण्या नश्यन्ति पतन्ति वा न वा हेति कालचक्र तान् भक्षयति तन हेतु . कालस्य मन्न विषयस्तन प्रवर्तते. तस्याष्टो विपया -विपया , देह , पुत्रा, मित्राणि, गुरव , सम्बन्धिन, इष्टदेवता कामश्चेति तस्मिन् लोके नेते सन्ति किन्वेतेपा पार्यमहमेव करोमि अतएव तेपामहमे वाष्टविध . नहि कालो मा विषयी करोति नेपा मदन्य कोपि नास्ति दहादि, प्रियो हि विषयो भवति, वैकुण्ठस्तु मद्रूप इति तनामेव विषय सारूप्यस्य च प्राप्तत्वात् देहोप्यहमेव, देहेन विषयेषु भुज्यमानेषु प्रकृति सूयत इति सुता भवन्ति. तव विषयभोगेनापि अहमेव भवामि, पुत्रस्नेहस्तनत्यं मय्यद क्रियत तत्र वाह्यरेपि सखा अहमेव, तनत्याना पुरुषाणा मद्रूपत्वात एत चत्वार एहिका पारलौक्किाश्चत्वार गुरुरपदेष्टा वैकुण्ठं त्वमेव. गुरोरुपदेशानन्तर ये तन हितायं यतन्ते ते वान्धवा सुहृद , सुहृत्कार्य तु तत्वत्यैरेव क्रियत इति देव देवता, पूज्य , फलदाने स प्रयोजक . फन च इष्टम् अत तेषा नाशाभाव उचित एव (सुबो ३।२५।३८) सुयोधिन्या फलनिष्कर्ष. एव भदनय निरूपित सायुज्य वैकुण्ठ जीवन्मुक्तिश्चति (सुबो. ३।२५१३९-४०) ॥ इति श्रीमद्वल्लभाचार्यधरण-विरचित - सुबोधिन्यकवाक्यतया सेवाफल- स्वरूप-निर्णय ॥ ॥समाप्त ॥

श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः। श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः । सेवाफलम्। श्रीकल्याणरायविरचितसेवाफलोक्तिविवृतिसमेतम् । श्रीमदाचार्यमार्गेण सेव्यमानोस्मदीश्वरः । निवारयतु नस्तापान सुखसन्दोहसिद्धये ॥१॥ श्रीमदलभाचार्यमार्गोक्तप्रकारेण सेव्यमानो भगवानितोधिकं किश्चित् फलं दास्यति मुक्तिमेव वेति सन्दिग्धचेतसां समाधानार्थं श्रीमदल्लभाचार्याः सेवासिद्धौ फलं निरूपयन्ति यादृशी सेवनेति । यादृशी सेवना प्रोक्ता तत्सिद्वौ फलमुच्यते । भक्तिमार्गे सेवा मया याशी प्रकर्पणोक्ता 'चेतस्तत्प्रवणं सेवेति तत्सिद्धौ सत्या यत् फलं भवति तदुच्यते । अस्स ग्रन्थस्य गूढार्थत्वाद्विवरणमपि श्रीमदाचार्याः कृतवन्तः । सेव्यमानो भगवान् प्रसादानुसारेणोत्तममध्यमसाधारणप्रकारेण फलं प्रयच्छतीति त्रैविध्याद्विवरणे सेवायां फलत्रयमित्युक्तम् । तत्रोत्तम फलमाहुः अलौकिकसाममिति । भगवता सह गानादौ सामथ्र्य, गुख्यानामिव । मध्यमं फलमाहुः सायुज्यमिति । सह युनक्तीति सयु, सयुजो भावः सायुज्यं सहभावः, गोपानामिव । साधारणं फलमाहुः सेवोपयोगी देहो वैकुण्ठा- दिग्विति । आदिपदायूलोके उद्धवादीनामिव । सेवासिद्धी मत्यां यदि भगवानलौकिकं देहादिकं सम्पादयति तदा फलविषयको मनोरयोन्योपि सिध्यतीत्याहुः अलौकिकम्यनि । अलौकिकस्य दाने हि चायः सिध्यन्मनोरधः ॥१॥ अलौकिकस योग्यस्य शरीरादेर्दाने सति अधिकारसम्पत्तौ सत्यां पूर्वोक्तं फलं प्रामोतीत्यर्थः । हीति युक्तश्यायमर्थः । एतत् फलं साधनानां साधनासाध्यत्वात् । चोप्यर्थे । मपापानिति पाठः । सेवाफलविदामिति पाट: । ३ भूलोकेषु गवादीनामिवेति पाठः।

२ सेवाफलम् । चाल्प इतिपाठे साधारणहीनमध्यमयोः कथञ्चिसिद्धावपि भगवानं विनोत्तमं फलं न सिध्यतीत्यर्थः ॥१॥ कालकर्मवशादंदं कदाचिद्भवेदित्साशंक्याहुः फलं वेति । फलं वा घधिकारोवान कालोत्र नियामकः । भजनानन्दलक्षणफले तदधिकारयोः कालो नियामको दाता प्रतिवन्धको वा न भवतीत्यर्थः। सेवासिद्धौ व्यवस्थया फलमुक्त्वा सेवासाधनदशायां पाधकान्याहुः उदेग इति । उदेगः प्रतिवन्धो धा भोगो या स्यात्तु बाधकम् ॥ २॥ सेवायां क्रियमाणायामन्यत्र गमनेच्छादिरुदेगः । सेवासमये लौकिकवैदिककार्या- न्तरासक्तिः अन्यकृतान्तरायादिश्च प्रतिवन्धः। भोगो विषयाणाम् । एते त्रयः प्रत्येकं बाधकाः । तेनैतेषां साधनपरित्यागः कर्तव्यः। भोगो दिविधः । लौकिकोऽलौकिकश्च । लौकिको लोकसिद्धः । यथा लोकाः खार्थ- मुच्चावचान् पदार्थानानीय भोगं कुर्वन्ति स लौकिको वुझ्या त्याज्यः । एतेन श्रुतिस्मृतिपुराणादिसिद्धो भोगो व्यावर्तितः । अलौकिको भगवदत्तः अम्बरीपादेरिव । स तु साधारणमध्यमोत्तमफलेषु प्रथमफले प्रविशति, यथा सेवोपयोगिदेहं दत्वा सेवां कारयित्वा प्रसादत्वेन दत्तानां भोगं कारयति भगवान् स अलौकिकभोगो न त्याज्यः । प्रतिबन्धोपि विविधः । साधारणो भगवत्कृतश्च । तत्र साधारणः पूर्वमुक्तः। स बुद्धया साज्यः । यस यत्साधनस्य च प्रतीकारो न सम्भवति स भगवत्कृतः।' स यदा भवति तदा भगवान् फलं न दास्यतीति ज्ञातव्यम् ॥२॥ अकर्तव्यं भगवतः सर्वथा चेद् गतिर्न हि । यथा घा तत्त्वनिर्धारो विवेकः साधनं मतम् ॥ ३॥ अकर्तव्यं भगवतः। अस्स श्लोकस्य विवरणं भगवत्कृतश्चेदित्यारभ्य विवेक इत्यन्तम् । तदान्यसेवापि व्यर्थेति । महादेवना दीनां भक्तिदातृत्वश्रवणान्महादेवा- दिसेवया सेवातत्फलसिद्धिर्भविष्यतीत्याशया कृता महादेवादिसेवापि व्यर्था, नैतत्फलसा- धिकेत्यर्थः । तदेति । तदा आसुरः आसुरावेशवान् आसुरभाववान् वायं जीव इति निधारो निश्चय इत्यर्थः । जीवस्यासुरले सेवायां प्रवृत्त्यनुपपत्तेः । तदा कथं ममैवं भवतीति शोकाभावाय भगवानीश्वरः स्वेच्छया सर्व ददाति मम प्रायेण मुक्तिमेव दास्यतीति ज्ञात्वा ज्ञानमार्गेण श्रवणमनननिदिध्यासनानि कुर्वता स्थयमित्यर्थः । यथा तत्वनिर्धारो भवति तथायं विवेको वा साधने इत्यर्थः । अत्राय भावः । दुःसंगाद चाहिर्मुस्ये भक्तापराधे वा भगवान् प्रतिवन्ध करोति तदा अन्यसेवया स्वतो वा मुख्यं फल न भवतीत्यर्थः ।। ३॥

श्रीकल्याणरायविरचितविवृतिसमेतम् । ननु साधारणो लौकिको भोगः किमर्थं त्याज्या, भोगेनैव सेवा कर्तव्येसाशंक्याहुः सविनोल्पो घातक इति । सविनोल्पो घातकः स्याद् घलादेतौ सदा मतौ । दितीये सर्वथा चिन्ता त्याज्या संसारनिश्चयात् ॥४॥ घाधकानां परित्यागो भोगेप्येकं तथा परम् । निम्प्रत्यूह महान् भोगः प्रथमे विशते सदा ॥५॥ सविनत्वात् सर्वथा न सिध्यति । जायमानोग्यल्पसुखजनको भवति, भावघातकोपि भवति, अतस्त्याज्यः । ननु सावधानतया स्थितेन भोगप्रतिवन्धकयोधकत्वमित्यत आहुः सावधानेपि मोगप्रतिवन्धी वस्तुसामर्थ्यादेव प्रतिवन्धको सम्मतावित्यर्थः । बाघकानामितिशोक एवं योजनीयः। बाधकानां परित्यागः कर्तव्यः । भोगेप्येक परमुत्कृष्टमेकं भोग निहाय तथा परित्यागः कर्तव्य इत्यर्थः। यतो निःप्रत्यहं यथा स्यात्तया महान् भोगः प्रथमे प्रविशति । पूर्व व्याख्यानमतत् । ज्ञानस्थितीति । ज्ञानमार्गेण स्थितावपि प्रतिवन्धे या चिन्ता तेदमावार्थमित्यर्थः । अनायं भान. । पूर्व ज्ञानमार्गेण स्थात- व्यमित्युक्तम् । अधुना श्रीकृष्णप्रसादाभावान्मुक्तिरपि न भवतीति खस्स संसारनिश्चयात् फलाथै चिन्ता न कर्तव्येत्यर्थः । ननु पूर्वकुतसेवायाः सत्त्वात् फलं कथं न भवेदियाशं- क्याहुः आयेति । आधेन भगवता भगवत्कृतप्रतियन्धेन फलाभावे कायवामानोमिस्त- त्परतया कृतत्वाभावात् सा सेवा नाधिदैविकी, कायवामनोमिस्तत्परतया कृतत्वेपि भक्तापराधादिता भगवांश्चत्तां न मन्येत तदा मा सेवा नाधिदैविकी भवति, भगवदामिनी न भवति । आधिदैविक्या एवैतत्फलसाधकत्वात् । भोगेति । गृहपरित्यागः गृहासक्तिपरित्याग इत्यर्थः । दितीय इति । द्वितीयो भगवत्कृतः प्रतिबन्धस्तस्मिन् सति फल कथ स्यादिति चिन्ता ससारनिश्चयात् सर्वथा त्याज्येत्यर्थः ॥४॥५॥ ननु प्रतिवन्धसाधारणभोगयोः सत्त्वेपि साधनकरणे फल स्यादित्याशंक्याहुः न त्वाये इति । न त्याद्ये दातृता नास्ति तृतीय याधकं गृहम् । अवश्येयं सदा भाव्या सर्वमन्यन्मनोनमः ॥ ६॥ आद्ये भगवत्कृतप्रतिवन्धे भगवतो दातृता नास्ति । तृतीये साधारणभोगे गृहासक्तिवाधिकेत्यर्थः । अवश्येयमिति । इय रीतिरवश्या, कर्तुमशक्यापि फलाथै सदा कर्तव्यत्वेन भान्या । अन्यत् सर्वसाधन मनोभ्रम. म्यान्तान्तिरित्यर्थः ॥ ६॥ ननु भगवदीयाना 'स्वत एवैतत्फल भविष्यति किमर्थ पूर्वोक्त कार्यमित्याशझ्याह. तदीयैरिति । १ दुष्टमितिपाट । ३तद्भापायमितिपाठ ।

सेयाफलम् । सदीयैरपि तत् कार्य पुष्टौ नेय विलम्ययेत् । भगवदीयैरपि पूर्वोक्तसापनं कार्यम् । मर्यादायामंगीकारात् । ननु मक्तिमार्गप्रवेश- मात्रेण कचित् फलं दृश्यत इत्यत आहुः पुष्टाविति । पुष्टयंगीकारे तु भगवान् विलम्पं नैव कुर्यात् , तेन शीघ्र फलसिद्धिरित्यर्थः । रजस्तमोभ्यां मनसः क्षोभेपि एतदेव साधनं कर्तव्यत्वेन द्रव्यमित्याहुः गुण- क्षोभेपीति । गुणक्षोभेपि द्रष्टव्यमेतदेवेति मे मतिः ॥७॥ मम निश्चय एतापानवेत्याहुः मे मतिरिति ॥७॥ ननु साधनानां यहूनां सत्लात् किमिति एतदेव साधनमित्यत आहुः फुसृष्टिरनेति । फुसृष्टिरत्र वा काचिदुत्पद्येत स वै भ्रमः ॥ ७॥ ॥ अनास्मिन्फले कुसृष्टिः कुत्सितानां साधनानां या सृष्टिः कल्पना उत्पन्ना सात् सा भ्रम एव इत्यर्थः ॥ ७॥॥ सेवाफलोक्तिविवृतेः स्वाचार्याणां यथामति । कृता कल्याणरायेण विवृतिः स्वसुखाय च ॥१॥ इतिश्रीवल्लभचरणकतानश्रीकल्याणरायविरचिता सेवाफलोक्ति- चितिः समाप्ता।

श्रीकृष्णाय नमः। श्रीगोपीजनवल्लभाय नमः। श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः । सेवाफलम् । चाचाश्रीगोपेशविरचितवितिटिप्पणीसमेतम् । खमार्गोक्ततनुवित्तजायाः सेवाया मानसीसेवाफलमिति सिद्धान्तमुक्तावल्यां श्रीमदा- चार्यचरणोक्तेर्निवन्धे तु मक्ति स्वतन्त्रा शुद्धा च दुर्लभेति न सोच्यत इत्युक्तेः सन्दिहानान् सानुपदिशन्ति । यारशी सेवना प्रोक्ता तत्सिद्धौ फलमुच्यते। यादृशी यत्प्रकारिका सेवना सेवा प्रोक्ता खग्रन्थेषु पुष्टिपुष्टिपुष्टिमर्यादामर्या- दाभेदैर्मया विविच्योक्ता तत्सिद्धौ तस्यां स्वफलजननखरूपयोग्यतायां सत्यां तत्प्रकारक फलमुच्यत इत्यर्थः। तत्र प्रथम भगवदथं निरूपधिसर्वखनिवेदनपूर्वकं तत्रैव वदेहविनियोगे प्रेम्णि जाते यन्मुख्यं फलं भवति तदाहुः । अलौकिकस्य दाने हि चाद्यः सिध्येन्मनोरथः ॥१॥ अलौकिकस्य सरूपानन्दस्य, दाने वितरणे, हि निश्चिते सति, तथा च भगवतश्चिकीर्पिते सतीत्याशयः । आद्यः स्वरूपानन्दानुभवात् प्रथममुत्पन्नो मनोरथः 'यय दुःखं यशोदाया नन्दादीनां च गोकुल गोपिकानां तु' इत्यादिना निरूपितखरूपो लिप्साविशेषः सिध्येत् सद्विषयकः सादित्यर्थः । इत्यश्च प्रेमोत्पत्त्या सिध्येत् तद्विषयकः स्सादित्यर्थः । चेति मनोरयश्च स्यात् सिद्धश्च स्थादित्याशयः । इत्थच प्रेमोत्पत्यनन्तरं भगवतः स्वरूपानन्ददित्सायां फलरूपखविषयसहिनस्य मनोरथस्योत्पतिः। दित्साया अभावे तु तदनुत्पत्ती पूर्वोक्तप्रेमान्तसेवायाः पुरुषोत्तमसायुज्यं फलं भवतीति ध्येयम् । वक्ष्यन्ति चेममर्थं न त्वाचे दातृता नास्तीत्यनेन ॥१॥ एवं पुष्टिपुष्टिमजनस्य फलमुक्त्या पुष्टिमर्यादामर्यादाभजनयोः फलमाहुः । फलं चा ह्यधिकारो या न कालोर नियामकः । फलं पुष्टिपुरुषोत्तमसायुज्यं पुष्टिमर्यादाभजनफलमित्यर्थः । चेत्यनादरे । अधिकारो १ तम्या तिपाट ।

मेवापलम् । रमाप्रार्थितवैकुण्ठक्षीरोदश्वेतद्वीपेषु भगवत्सेवायोग्यदेहप्राप्ति मर्यादामजनफलमित्यर्थः । नेति । अन फलनये कालो न प्रतिवन्धक इत्यर्थ । विवृतौ सेवायां फलत्रयमलौकिकसामर्थ्य सायुज्यं सेवीपयिकदेहो धैकुण्ठादिनित्यनेन नियामक इत्यन्तग्रन्थो व्याख्यात । अलौकिकसामर्थ्य मलौकिकभजनानन्दानुभवे स्वरूपयोग्यतेत्यर्थ । मूले सेवाया प्रतिबन्धकान्यपराण्याहु । उद्धेग प्रतिपन्यो या भोगो वा स्यात्तु बाधकम् ।। २॥ उद्वेगः श्रवणे कीतने भगवदर्शनसेवाया च जराव्याधिजनितापाटवेन खतो प्रवर्तमानानामिन्द्रियाणा प्रसघ प्रवर्तनाद्विक्षेप इत्यर्थ । प्रतिवन्धो वेदनिन्दा म्लेच्छन लिष्ठवहिर्मुखजनितोपद्रवश्व, साधारणो भगवत्कृतो पाहिर्मुख्यरूपश्चेति दिविधो पीत्यर्थ । भोगो रूपरसगन्धशब्दस्पर्शना लौकिकविपयाणामत्यासक्त्या सेवनमित्यर्थ । त्विति । एतत्रय तु प्रतिवन्धक भवेदेव । कालस्तु न सादित्यर्थ । विवृती सेवाया प्रतियन्धकत्रयं उदेगः प्रतियन्धो या भोगो वेसनेन याधकमित्सन्तप्रन्यो व्याख्यात ॥२॥ मूले प्रतीकारमाहु वाधकानामिति । यापकानां परित्यागो भोगेप्येक तथा परम् । निष्प्रत्यूह महान् भोग. प्रथमे विशते सदा ॥३॥ बाधकानामुद्वेगसाधारणप्रतिबन्धलौकिकमोगसाधनाना परित्यागः कर्तव्य इत्यर्थ । तर उद्वेगसाधन प्रसझेन्द्रिययोजनम् । वेदनिन्दाया म्लेच्छकृतोपद्रवस्य बलिष्ठवहिर्मुखकृतोपद्रवस्य च जननात् साधारणप्रतिवन्धसाधन स्वस्मिन् भक्तत्वस्फूर्ति निवधनो हलगर्वविशेप । लौकिकभोगसाधन रूपरसगन्धस्पर्शशब्दा । तत्साधनत्रय सजेदित्यर्थ । लौकिकालौकिकसाधनयोलौकिकभोगसाधनस त्याग कर्तव्यो न त्वलौकिकभोगसाधनस्येत्याहु भोग इति । भोगे यत्साधनद्वय तत्रैक तथा तादृश लोकिकमोगरूप प्रतियन्धजननात् त्यक्तव्यमित्यर्थ । परं द्वितीय साधन पूर्वोक्तप्रे मान्तसेवारूप निष्प्रत्यूह निर्गत प्रत्यूह प्रतिरूपो भोगो यस्मात्तत्तथा । एवञ्च सागहेतो प्रतिवन्धस्साजननान सक्तव्यमित्यर्थ । ननु भोग प्रतिवन्ध इत्युक्तम् । तथा च तजननात् कथ न सक्तव्यमत आहु महानिति । पूर्वोक्तप्रेमान्तसेवालक्षण साधन कारयित्वा भगवता दत्तो दुःखविशेषसुखविशेषानुभवट क्षणो 'पच दुख' मिसादिना निरूपितस मनो रथस्य विषयतामापनो भोगो महान् खेप्टतम एवेत्यर्थ । कथमिष्टतमत्वमत आहु प्रथम १ अभक वामिविपाट । तथा च । श्रीगोपेशाविरचितवितिसमेतम् । इति।प्रथमे उत्तमफले विशते प्रविष्टो भवति । तथा च फलरूपः ।अत एव न प्रतिवन्धरूप इति । तत्साधनं न त्यक्तव्यमिति भावः । रसिकानुभवाद्वेय मान्तरं तु महाफल मिति श्रीमदा- चार्यचरणोक्तिरत्रानुसन्धेयेति दिक् । भोगेपीत्यपिशब्दात् प्रतिवन्धेप्येकमेव त्यत्तव्यम् । द्वितीयस तु भगवत्कृतलेन तत्यागस्य शशविपाणायमानत्वादिति ध्येयम् । विवृती नयाणां साधनपरित्यागः कर्तव्यः। भोगो दिविधः। साधा- रणो भगवत्कृतश्च । सनायो घुद्ध्या व्याज्यः । अलौकिकभोगस्तु फलानां मध्ये प्रथमे प्रविशतीत्यनेन विशत इत्यन्तग्रन्थो व्याख्यातः त्रयाणां साधनेति साधनपरित्यागान्मूलोच्छेदो मवेदतः पुनरुदमो न सादित्याशयः । तथा च यनैतत्रितयस्य त्याग उच्यते तत्र साधनसहितस्य त्यागो ज्ञेय इत्यभिप्रायः । त्याज्य एवेति । लौकिक- मोगस्तु असन्दिग्धं त्याज्य एव, परन्तु अलौकिको न त्याज्य इत्याशयः । तत्राद्य इति । साधनसहितस्त्याज्यः । तथा च साधारणप्रतिवन्धसाधनस्स गर्वविशेषस घुया त्यागात् ससाधनस्यापि तस्य त्याग इत्यर्थः ।। ३ ।। मूले भगवत्कृतप्रतिवन्धे यत् कर्तव्यं तदाहुः । अकर्तव्यं भगवतः सर्वथा चेद्गतिर्न हि । हि निश्चयेन सर्वथा सर्वप्रकारैर्भगवतः सर्वसमर्थस्सापि चेदकर्तव्यं फलदानं नचिकीर्पितं चेदित्यर्थः । ननु भगवदीयकुलोत्पन्नस्य पित्रादिशिक्षया बाल्ये कृतमगयत्सेवा- कस्सानवरतमसन्छास्त्राभ्यासादाविर्भूतवाहिर्मुख्यस्यापि 'श्रेयान् खधर्मो विगुणः परधर्मात्स्व- नुष्ठिता दितिवचनात् सेवामेव निर्यन्धेन हठेन कुर्वतः किं स्यादतआहुः गतिर्न होति । प्रतिवन्धस्स जागरूकत्वाद्यावरफलाभाव इत्यर्थः । विवृती भगवत्कृतश्चेत् प्रतिबन्धस्तदा भगवान् फलं न दास्यतीति मन्तव्यम् ,तदान्यसेवापि व्यत्यन्तेन 'नहीं'त्यन्तो ग्रन्थो व्याख्यातः । तथाचोकं नियन्धे 'सर्वथा चद्धरिकृपा न भविष्यति यस्य हि । तस्य सर्वमशक्यं स्यान्मार्गेस्मिन्सुत- रामपीति मूलमुक्त्वा खयमेव व्याचच क्षिरे ‘परमन न सर्वेषां मुख्यफलाधिकारः, किन्तु येषु भगवत्कृपा । कृपापरिज्ञानं च मार्गरुच्या निश्चीयत' इत्यनेन । इत्यञ्चैतन्मार्गारचिरेव भगवत्कृतप्रतिवन्धः । इदमेव पाहिमुख्यमितिविभावनीयम् । 'बुद्धिप्रेरककृष्णस्य पादपद्म प्रसीदत्यि'ति श्रीमदाचार्यचरणोक्ते रेप ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उनिनीपति एप उ एवासाधु कर्म कारयति तं यमधो निनीपती'तिश्रुतेश्व भगवानेवासच्छास- प्रवर्तनेनासुरावेशं सम्पाद्य वाहिर्मुख्यरूपं प्रतियन्धं करोतीत्यप्यनवरतं निरन्तरमनुसन्धेयम् ।

८ सेवाफलम् । तदान्येति । यदा वाहिर्मुख्यमाविर्भूतं तदा कृता तु व्यर्थव । किन्त्वन्या वाल्पे कृता सापि व्यर्थी निःफलेत्यर्थः । मूले अतः परं तेन किं विधेयमत आहुः । यथा वा तत्वनिर्धारो विवेकः साधनं मतम् ॥ ४ ॥ यथा यत्प्रकारको वा विकल्पेन तत्त्वनिर्धारस्तजीवनिष्ठस्यासुरत्वस निश्चयः । तथा च आवेशासुरत्वनैसर्गिकासुरत्वयोर्याशासुरत्वप्रकारको निधयस्तस्मिन् सति विवेको ज्ञानं साधनं शोकानुत्पत्ती कारणं मतं सर्वप्रमाणसम्मतमित्यर्थः । वेति विकल्पवाचकमव्ययं देहलीदीपन्यानोभयत्रान्वेति । तथा च तत्त्वनिर्धारोपि वैकल्पिकः, साधनमपि वैकल्पिक मेव । इत्यमावेशासुरत्वप्रकारको यदि निश्चयः तदा संमृतिरेवेतिभावः । वक्ष्यन्ति चेममयं हितीये सर्वयेत्यनेन । विवृतौ तदा आसुरोयं जीव इतिनिर्धारः। तदा ज्ञानमार्गेण स्थातव्यं शोकाभावायेतिविवेक इत्यनेन मतमित्यन्तग्रन्थो व्याख्यातः । तदेति । यदा बाहिर्मुख्यमाविर्भूतं तदैवेत्यर्थः । विवेकः साधनमितिव्याचक्षते । तदा ज्ञानेनेति । यथावे- शासुरवनिर्धारस्तदा ज्ञानमार्गेण ज्ञानजनकोपायेन स्थातव्यं वर्तितव्यम् । शोका. भावाय शोकानुत्पत्त्या इति । अस्मिन्नर्थे विवेकः साधनं भवतीत्यर्थः । तया च सत्य लोकस्थितिरक्षरानन्दो वा नास्स फलमिति भावः । ययप्येवंविधदुर्भगः स्वमार्गवहिर्मुखो. धंतमः प्रविशतां, का क्षतिः १ तथापि स्वमार्गीयभगवद्भक्तरेतोजन्तुरयमिति तदुद्भवदया- हृदयाः श्रीमदाचार्यचरणास्तादृशेप्युपदिशन्तीति ध्येयम् ॥४॥ मूले लौकिकभोगस्य साधारणप्रतिबन्धस्य च त्यागे प्रयोजक रूपमाहुः । सविनोल्पो घातकः स्याटलादेतौ सदा मतौ । सविप्न आधिव्याधिलक्षणप्रेत्यूहसहितः । अल्प आशुतरविनाशीत्यर्थः । साधारण इति । साधारणो वेदनिन्दादिः । साधारणप्रतियन्धस्य तदाहुः धातेति । घातका पातजनकः । यलात् सामर्थ्यात् । स्यात् भवेत् । तथा च साधारण प्रतिवन्धो बलवद्धातकः स्यादित्यर्थः । तथा हि वेदनिन्दात्वस्य पलात् होने जन्मरूपं पातं करोति । म्लेच्छबहिर्मुखकृतोपद्रवादस्य सर्वस्वहामि शरीरपात च वलादेव कुरुते । अतो हेतोः साधारणप्रतिवन्धोत्पत्वात् सविनस्वाय भोगः सदा निरन्तरमेती प्रतिवन्धको मतो साधनसहितौ त्याज्यत्वेन सम्मताविति भावः । शिवृता साधारणो भोगः कथं त्यक्तव्य इत्याकांक्षायामाह सपि- प्रोल्पो घातकः म्यादिति । सविनवादल्पत्याहोगस्त्याज्य: । एको ९ श्रीगोपेशविरपितपितिसमेतम् सदा प्रतियन्धकावित्यनेन मतावित्यन्तग्रन्यो व्याख्यातः । साधारण इति । साधारणो वेदनिन्दादिः साधारणप्रतिवन्धः भोगो लौकिकरूपरसादिसेवनं कर्ष कुतो हेतोरित्यर्थः । सविनत्वादिति । द्वाम्यामाभ्यां हेतुभ्यां मोगस्त्याज्यः । शिष्टाद् घातकत्वरूपाद्धेतोः साधारण प्रतिवन्धस्त्याज्य इत्याशयः । ननु सविनत्वमत्पत्वं च भोगापकर्पजनकम्, न तु सेवायाः। तथा साधारणप्रतियन्धनिष्ठं घातकत्वं चतुर्य- संस्थापकारजनकम्, न तु विशिष्य सेवाया एवेति किमनयोः त्यागप्रयोजक रूपमित्याश- कायामाहुः एताविति । प्रतिवन्धकत्वमेव सागप्रयोजकम् । सविनत्वादिकयनं तु भोगसाधारणप्रतिवन्यस्थदोपोबाटनार्थम् । तथा च सेवाप्रतिवन्धकत्वात्तु त्याज्यावेव । निसर्गदुष्टत्वादपि साज्यावित्याशयोनुसन्धेयः । आवेशासुरस विवेकसाधनमिति प्रागुक्तमिदानी नैसर्गिकासुरस्य का गतिरित्याकां- क्षायामाहुः। दितीये सर्वधा चिन्ता त्याज्या संसारनिश्चयात् ॥५॥ अन्योत्पत्तिकाल एव भगवताऽसुरत्वसम्पादनान्नैसर्गिकासुरः । तथा च भगवान् तस्मिन् तदानीमेव म्वमार्गात् सर्वप्रामाणिकमार्गेभ्यश्च वाहिर्मुख्यलक्षणप्रतिबन्धं कृतवान् । दत्यप वेदनिन्दादिसाधारणप्रतिवन्धाद् द्वितीये भगवत्कृते एवंविधप्रतिवन्धे निर्धारिते सतीत्यर्थः । चिन्ता जन्ममरणदुःखनिवृतिर्मम केन प्रकारेण स्यादिति विचारः सर्वथा सर्वप्रकारेण प्रमाणैर्युक्तिभिश्चेति यावत् । सा त्याज्या न कर्तव्या । तत्र हेतुः । संसार- निश्चयात् । संस्तेरवश्यमावस्स निश्चितत्वादित्यर्थः । तया च 'दैवी सम्पद्विमोक्षाय' 'नियन्धायासुरी मता' इत्यादिप्रमाणे 'स्तस्मादपरिहार्येर्थे न त्वं शोचितुमहसी'सादिनामा- णिकयुक्तिमिधाधेः समाधिः सम्पादनीय इति भावः । विवृत्तौ ज्ञानस्थित्यभाये चिन्ताऽभावार्थमाह दितीय इति । दितीयो भगवत्कृतः प्रतिबन्ध इत्यनेन निश्चयादित्यन्तग्रन्यो व्याख्यातः । ज्ञानेति । 'प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुरा' इति भगवद्वचनात् सहजासुराणां ज्ञानमार्गेपि स्थितिर्न भवतीत्याशयः ॥५॥ मूले 'अलौकिकस्स दाने ही त्यनेन भगवतः स्वरूपानन्ददित्सायां मनोरथः सफलो मवेदित्युक्तम् । यदि स न सिध्येत् तदा का गतिरित्याकांक्षायामाहुः । न त्वाये दातृता नास्ति तृतीये बाधकं गृहम् । नाये वित्यन्वयः । तथा चायाभावे वित्यर्थः । इत्थय तत्फलमनोरथाभावे तु भगवतो मजनानन्ददित्सा नास्तीति भावः । .

सेवाफलम् । विवृतौ आद्यफलाभावे भगवतो दातृत्वं नास्तीति तदा सेवा नाधिदैविकीत्युक्तं भवतीत्यनेन नास्तीसन्तग्रन्थो व्याख्यातः । न त्याद्य इति मूलमाद्यफलाभाव इत्यनेन व्याख्याय दातृता नास्तीति मूलं ध्याचक्षते भगवतो दातृत्वं नास्तीति । फलितार्थमाहुः तदेति । यदा फलसहितस्स मनोरथ- स्यामावस्तदाधिदैविकीसेवाभजनानन्दो न भवेदिति । अयमर्थो न त्याचे दातृता नास्तीति मूलेन कथितोस्तीत्यर्थः । इत्यश्च प्रेमान्तसेवया पुरुषोत्तमसायुज्यं भवतीति भावः। मूले बाधकानां परित्यागइत्यनेन तत्साधनत्यागपूर्वकस्तत्प्रतिवन्धकतत्याग उक्तः । तत्र लौकिकमोगसाधनीभूतरूपरसगन्धस्पर्शशब्दाना त्यागे प्रतिवन्धकमाहुः तृतीये याधकं गृहम् । भोगस्य तृतीयप्रतिवन्धकत्वात् तत्साधनमपि तृतीयं साधनं तत्परित्या- गोपि तृतीयः परित्यागः । तथा प तस्मिन् गृहं प्रतिवन्धकमित्यर्थः । इत्थच रूपादित्यागो गृहत्यागाधीन इति भावः । विवृती भोगाभावस्तदैव सिध्यति यदा गृहपरित्याग इत्यनेन गृह- मित्यन्तग्रन्थो व्याख्यातः । भोगेति । भोगाभावः ससाधनभोगपरित्याग इत्यर्थः । मूले पुष्टिपुष्टिपुष्टिमर्यादामर्यादाभजनानां फलं प्रतिबन्धकं तत्प्रतीकारं चोक्त्वा व्याख्याय चेदानीं सेवामुपदिशन्ति । अवश्येयं सदा भाव्या सर्वमन्यन्मनोभ्रमः । अवश्या स्वस्य वश्या न । तथा च वकृत्यंसाध्या भगवदनुग्रहैकसम्पाघेति यावत् । इयं श्रीमदाचार्याणां हृदि अनवरतमुत्पयमानत्वात् साक्षात्कृतस्तरूपा भावनारूपा मानसी सेवा, सदा निरन्तरं, भान्या सम्पादनीयेत्यर्थः । तथा च स्वरूपानन्दसाधनी- भूतभावविशेषसिध्यर्थमनवरत भावना कर्तव्येसाशयः। इदमेव मनसः प्रधान कार्यमित्याहुः सर्वमिति । मनसा यदन्यत् किश्चित् प्रमारूपमपि कार्य जन्यते तत् सर्वमपि भजना- नन्दापर्यवसायित्वाद् भ्रम एवेत्यर्थः ॥ ६॥ तर्हि चक्षुरादिभिरिन्द्रियैः किं सम्पादनीयमित्याकांक्षायामाहुः । तदीयैरपि तत्कार्य पुष्टौ नैव विलम्बयेत् । मनसोनुचरैश्चक्षुरादिभिरिन्द्रियैस्तत्कार्य मनःकार्यमेव सम्पादनीयम् । तथा च श्रीमदाचार्यमार्गपक्षपातादविरतं सेव्यखरूपेप्याविर्भूतस्य संकल्पप्रतिभातस्य वा भगवतो दर्शनसेवादिना वखव्यापारेण मनःकार्यरूपा भावनाख्या मानसी सेवा सम्पादनीयेति- भावः । इत्यश्च चक्षुरादिसर्वेन्द्रियैरपि स्वस्वव्यापारो भगवति सम्पादनीयो, 'भगवता सह संलाप' इत्याधुक्तप्रकारेणेति ध्येयम् । ननु कियचिरमेवंकृतिरतआहुः पुष्टाविति । १ सर्वानिति पाठ । , - २ खसाधनसाध्या नेति पाट:

। . . . श्रीगोपेशविरचितवितिसमेतम् । पुष्टिर्मावः तस्मिन् सिद्धे सति स्वरूपानन्दः सत्वरमेव भवेन तु विलम्यं कुर्यादित्यर्थः । तथा च भावोसत्तिपर्यन्तमेवंकृतिरितिमावः । पाक्षिकोपि दोपः परिहरणीय इतिन्यायात् कदाचित् कमपि प्रतिवन्धकगाशंक्य तप्रतीकारमाहुः । गुणक्षोभेपि द्रष्टव्यमेतदेवेति मे मतिः ॥७॥ गुणाः प्राकृतसत्वरजस्तमांसि, तत्कृतक्षोभोमार्गान्तररुचिः, लौकिकविपयलोमैत- न्मार्गारुषय इत्यर्थः । एतदेवास्मटुक्त मवश्येयं सदे'तिपद्यमेव द्रष्टव्यम् । तथा चैतत्पयोक्त- साधनेनैव सर्वप्रतिपन्धनिवृत्तिरितिमावः । ननु सत्सु प्राकृतगुणेषु निरन्तरक्रियमाणायामपि भावनायां भावो नोत्पत्स्यत इति चेत् ? सत्यम् । यावत्कालं मनस्याविर्भूय भगवानन्तःकर- णसम्बद्धो न भवति तावदविद्याया विद्यमानत्वाद् गुणा अपि सन्ति । तथा चानियमेवं- कृतौ कृपालुभंगवानाविर्भूयान्तःकरणसम्बद्धः सन् अविद्यामेव नाशयेत् , तदा सुतरां गुणनाशः, ततो निरन्तराया भावोसत्तिरितिध्येयम् ॥ ७॥ खोक्तप्रमेये निःसन्दिहानेनैव स्थेयमिति खानुपदिशन्ति । कुसृष्टिरन वा काचिदुत्पद्येत स वै श्रमः। कुसृष्टिः दूपणामासः, अनास्मदुक्तौ, चेत्सनादरे, वस्तुतस्तु नोत्पत्स्यत एवे. त्याशयः । काचिद्दुःसंगेन मगवदस्मरणनिवन्धनक्षणिकासुरभावेन वा काचिद्वत्पद्येत जायेत चैद, वै निश्चयेन, स तु भ्रम एव भान्तिरेवेत्यर्थः । तथाचोत्तरक्षणोसत्स्यमान- विशेपदर्शननाश्यत्वादकिचित्करेतिभावः ॥ ७॥॥ इतिश्रीविद्यलेश्वरात्मजश्रीघनश्यामतनयश्रीगोपेशगोस्वामिविरचिता सेवाफलविवृतिटिप्पणी सम्पूर्णा ॥

धीरुष्णाय नमः। सेवाफलम् । श्रीदेवकीनन्दनविरचितविवृतिटिप्पणीसमेतम् । करुणाचार्यचरणवरणं शरणं मम । यत्पथे सुकथे सेवाफलं कृष्णः प्रयच्छति ॥१॥ ननु स्वतत्रपुरुषार्थत्वेन क्रियमाणसेवायाः फलान्तरकथनं कथमुपपद्यत इति चेत् । इत्यम् । यावजीवं तथा क्रियमाणसेवया देहावसाने जीवस या गतिर्भवति सात्र फलपदेनोच्यते । तच फलमाधुनिकमजनानुस्यूतसर्वात्मभावप्राप्यविशिष्टमजनानन्दात्मक- मेवेति न तस्स सेवातिरिक्तत्वमायाति येन फलान्तरत्वमुच्येत । 'यं यं वापि स्मरन् भावं सजत्यन्ते कलेवर'मिति भगवद्वचना दन्ते या मतिः सा गति'रिति न्यायाच सेवाफलं सेवैवेति नोक्तविरोधः शंकनीयः । तत् कीदृशं किमिति जिज्ञासायामाचार्याः किञ्चित् खमतसिद्धं तत् साधैः सप्तभिः श्लोकैर्निरूप्य सुगमत्वाय खयमेव विवृण्यन्ति । यादृशी सेवना प्रोक्ता तत्सिद्धौ फलमुच्यते । यादृशी सेयनेति । प्रोक्तेति । मयेत्यध्याहार्यम् । तेन खसिद्धान्ते याशी सेवना मया प्रोक्का, तादृशी सेवना विवरणे वक्ष्यमाणफलप्रापिका भवति, न तु प्रमाणा- न्तरसिद्धा, मतान्तरसिद्धा वा तया । अन्यथा तत्र तत्र कचिदुक्ता प्रसिद्धा भवेत् । अत्र तु साक्षादाचार्योक्तत्वादनुभवसाक्षिकत्वाच न काचिदसंभावनेति ज्ञाप्यते । सापि याव- जीवमविच्छेदेन कृता, खफलदानं तु कियत्कालं कृत्वा, परित्यक्तापीत्याहुः तत्सिद्धा. विति । सिद्धिरन यावजीवं निर्वाहः । तदुक्तमाचार्यचरणैः 'सेवायां वा कथायां वेति । फलमिति । एकवचनं त्रितयाभिप्रायेणेत्याहुः सेवायां फलनयमिति । अनार्य भावः । भक्तिमार्गे पुष्टिमर्यादाप्रवाहभेदेन जीवेषु भगवदंगीकारः विविधः । तेनाधिकारिभेदेन सेवा त्रिविधा, ततः फलमपि विविधं कमेणोक्तम् । तत्रादौ पुष्टिसेवाफलमाहुः अलौकिक- सामर्थ्यमिति । अत्रायमाशयः । श्रीमदनजस्थोक्तरीत्या सर्वात्मभावैकलन्यभजनानन्दा- नुभवलक्षणं फलमलौकिकमुच्यते । तस्येतरप्रमाणागोचरत्वमितरसाधनाप्राप्यत्वमलौकि- कत्वम् । तदनुभवयोग्यतालक्षणोधिकारश्च सामर्थ्यपदेनोक्तः । तसातिगोप्यलाय तथोक्तिः। द्वितीयफलं सायुज्यम् । तदत्र पुरुषोत्तमे वेदितव्यम्, न त्वक्षरे । अक्षर- सायुज्यं तु केवलमर्यादायां ज्ञानादिनापि भवतीति ततः पुष्टेविशेषकथनावश्यकत्वात् । सायुज्यानन्तरमपि पुष्ट्या कदाचिदायमलौकिकं फलमपि भगवान् प्रयच्छेदित्यपि ज्ञेयम् ।

, - श्रीदेवकीनन्दनविरचितटिप्पणीसमेतम् । अन्यथा पुष्टिसेवाफलं सायुज्यमानं न वदेयुः । भक्तौ तद्वासनाया अभावात् । 'ये यथा मां प्रपचन्त' इति भगवनियमाय । तेन पुष्टिमर्यादायामादौ सायुज्यम्, मध्ये भजनानन्दानुभवः, अग्रे पुनः पूर्वसासुज्यमित्युक्तं भवति । अतो मध्यमफलत्वम् । तृतीयं फलं वैकुण्ठादिदेहः । आदिपदेन भूमावपि तथा भावनायां ताशदेहप्राप्तिरुका । तत्राप्युचनीचदेशभेदा पहुवचनेनोक्ताः । व्यापिवैकुण्ठस्य सायुज्यापेक्षया दुर्लमत्वेन साधारणफलत्वकथनसा- युक्तवादा रमाप्रार्थित एव स इत्यवगम्यते । तत्र कदाचिन्नाधफलसंभावनेति साधारण- फलत्वम् । अत एव वैष्णवतानामेकादश्यादीनां फलत्वेन स्मृतिपुराणेषु स एवोच्यते । ननु सायुज्यवैकुण्ठयोः प्रमाणसिद्धत्वेन तदर्थ जीवप्रयत्नः संभवति, आयफलस्य तु लोकवेदातीतत्वेन प्रमाणावगोचरखान्न सकृतिसाध्यत्वम्, यत् पुनः तत्साधनं तस्यापि तथात्वम् , अतः कथमाघमनोरथः सिध्येदित्यत आहुः अलौकिकस्य दान इति । अलौकिकस्य दाने हि चायः सिध्येन्मनोरधः ॥२॥॥ फलं वा घधिकारो वा न कालोत्र नियामकः । अलौकिकमायफलं तरस दाने, अर्थाद्भगवता कृते सति तन्मनोरथः सिध्येत् , न त्वन्यथापीत्यर्थः । आद्य इति । सायुज्यवैकुण्ठमनोरथापेक्षया स आद्य इत्यर्थः । अल्प इति पाठे यधपि लीलामध्यपातिभक्तानुभवैकवेयफलसंबन्धिमनोरथो जीवस्य साधनतः स्वरूपतथाल्प एव । अप्यर्थे चकारः। तथा चाल्योपि तथापि स्वतः प्रभुदानेन तसिद्धिः । सिध्येदिति प्रार्थने लिइ । आचार्यप्रार्थनया प्रभुः संपादयेदेवेति भावः । आयफलस्स स्वरूपैकसाध्यले प्रसिद्धिमाह हिशब्दः । ननु भगवानपि तादृशाधिकारामावे मनोरयं कयं पूर्यदित्यत आहुः न काल इति । अत्र फले इत्यधिकारे वा ॥ १॥॥ अो प्रतियन्धकत्रयोक्तिरिह साधनदशायामेय । तदुक्तं भूले वाधकानां परित्यागेति । उदेगा प्रतिबन्धो वा भोगो वा स्यात्तु वाधकम् ॥ २॥ याधकानां परित्यागो भोगेप्येकं तथा परम् । निःप्रत्यूह महान् भोगः प्रथमे विशते सदा ॥३॥ तद्विवरणं प्रयाणां साधनपरित्याग इति । साधने सनि स्वरूपतः त्यक्तुम- शक्यत्वात् । भोगेप्येकगित्यादि विशते सदेत्यन्तविवरणं भोगो द्विविध इत्यारम्य प्रविशतीयन्तेन । तदनुसारेण मूलमेचं योजनीयम् । सजेदिति क्रियापद- मध्याहार्यम् । यया प्रतिबन्धद्वये एकस्त्याज्योपरो न, तथा भोगेपि एक लौकिकं भोगं सजेदपरमलौकिकं न । यतो निःप्रत्युहमनन्तरायमूतम् । तत्र हेतुः। महानिति । अली- किकमोगः स्वरूपतो लौकिकत्वादयोपि फलतो महान् , अलौकिकत्वात् । अतो न त्याज्य इति भावः । अलौकिकत्वे निमित्तमाहुः प्रथम इति । प्रथमे आधुनिकमजने सदा निरन्तर विश्ते, मजननिर्वाहकत्वेन तदंगतां प्रामोतीत्यर्थः । एतदेव विवरणे स्फुटीकृतम् ।

सेवाफलम् । अलौकिकभोगस्तु फलानां सेवाफलांगम्तवस्तूनां मध्ये प्रथममझं प्रतियन्धा- भावस्तन पिशतीति न तत्यागः । तथा चोपपादितमेकादशस्कन्धे । 'कायेन वायेति शोकविवरणे ॥३॥ अकर्तव्यं भगवतः सर्वथा चेद् गतिने हि। यथा या तत्त्वनिर्धारो विवेकः साधनं मतम् ॥ ४ ॥ अकर्तव्यं भगवत इति श्लोकविवरणं भगवत्कृतश्चेत्यारम्य यिवेक इत्य- न्तेन । अयमर्थः । आसुरस्यापि दैवाद्भगवदीयसंगे जाते सेवायां प्रवृत्तिर्मवति । तेन केन- चित्रकारणानिवार्यप्रतिबन्धे जाते स भगवत्कृत इति ज्ञातव्यम् । तेनाग्रे फलामावश्च । तेनान्यकृतापि सेवा प्रतिबन्धात् पूर्व कृता सापि व्यर्या । तस्यासुरत्वनिर्धारश्च । तदा तजनितशोकाभावाय ज्ञानमार्गेण सर्व तत्त्वं बुद्धा स्थितिः विवेकः साधनम् । यद्यप्यासुर- प्रसंगोत्र न वक्तव्यः, तथापि कश्चिदेव मगवदीयेष्वपिदृश्येत चेत्तदा तथा भावनीयम्, न तु स्वीयस भगवानेवं करोतीति प्रभो दोषारोपः कर्तव्य इति ज्ञापयितुं तदुक्तिरिति ज्ञायते ॥४॥ सविनोल्पो घातकः स्याद् यलादेतो सदा मतौ । हितीये सर्वधा चिन्ता त्याज्या संसारनिश्चयात् ॥५॥ न त्याचे दातृता नास्ति तृतीये याधकं गृहम् । सविनोल्प इत्यस्य विवरणे सविनत्वादापत्यादिति । साधारणभोगः सविघ्नो विनसहित । तादृशोप्यल्पा, स्वरूपतः फलतश्च । सोपि न त्यज्यते चेत्तदा घातकः सेवाप्रतिवन्धकः स्यात् । अतः सर्वथा त्याज्यत्वाहलादाग्रहादपि एतौ साधारणभोगप्रतिबन्धको मतौ, साज्याविति शेषः । तदुक्त विवरणे सदा प्रति- बन्धकाविति । द्वितीयो भगवत्कृतः प्रतिवन्धः । तत्र ज्ञानमार्गण स्थातव्यमिति चिन्तानिवृत्तिसाधन पूर्वमुक्तम् । तदसभवे साधनान्तरमाहुः द्वितीये सर्वथेति श्लोकार्थेन । तदामासो ज्ञानस्थित्यभावे चिन्ताभावार्थमाहेति । तत्प्रतीकोने द्वितीय इति । विवरणमाद्यफलाभाव इत्यादि भवतीत्यन्तम् आद्यफल जीवस्य दैवत्व, तदभावे भगवतो दातृता नास्ति, तदा आधि- दैविकी फलसम्बन्धिनी सेवापि नेत्यादुक्त भवति । तत्सर्वं द्वितीयप्रतिवन्धे जाते ज्ञात्वा सर्वयोक्तफल विपयिणी चिन्ता त्याज्या । तर साधारणो हेतुः । संसारनिश्चया- दिति । 'तानह द्विपत. कुरान् ससारेपु नराधमान्' इति भगवदुक्तससारम्स निश्चया- दन्यथा न भवतीति सर्वथैत्युक्तम् । न त्वाद्य इति 1 आये पूर्वोक्तसाधारणप्रतिवन्धे दातृता भगवतो नास्तीति न, किन्तु वर्तते, अत तन्निवृत्तये चिन्ता कर्तव्या, न तु द्वितीय स सर्वथा त्याज्येति माय. । एमाद्यद्वितीययोर्व्यवस्थामुक्त्वा तृतीय. साधारण- श्रीदवेकीनन्दनविरचितटिप्पणीसमेतम् । भोगकृतः प्रतिपन्धस्तत्र कर्तव्यमाहुः । तृतीये बाधकं गृहमिति । अलौकिकमोगेन साधारणभोगपरित्याग आनुपंगिकः पूर्वमुक्तः । अन्यथा अलौकिकमोगो न स्यात् । उगयो रेकाधिकरणत्वाभावात् । यदि साधारणभोग सक्तुं न शकुयात् तदा सेवाप्रतियन्धकलेन तन्मूलभूतं गृहं सजेदित्याशयेन तद्विवरणं भोगाभायस्तदेत्यादि । ननु त्यागतः प्रतिवन्धनिवृत्तिमात्रेण सेवाया असम्भवे तदधिकारिणां कयं तत्फल- प्राप्तिः । तदभावे च द्वितीयतुल्यता स्यात् । जीवस दैवत्वमपि व्यर्थं भवेत् । तस्मादन त्यागोक्तितात्पर्य किमिति न बुध्यत इति चेत्, इदमाभाति । सेवाधिकारिणां मध्ये येषां गृहमनुकूलम् , तेषामन्यतः प्रतिवन्धः साधारणः, तेन तनिवृत्तिः कर्तुं शक्या। ततः सेवया तत्फलपातिः । भोगश्च तेपामप्रतिवन्धहेतुरलौकिकत्वादिति पूर्वमुक्तम् । येषां पुनः गृहमेव प्रतिवन्धकम् , तेषां तत्परित्यागादेव लौकिकभोगनिवृत्तिः । सागोपि सन्यासनिर्ण- योक्तप्रकारेण भक्तिमार्गीयो ज्ञेयः, न तु कर्ममार्गीयो ज्ञानमार्गीयो वा । एवं सति तत्फल- प्राप्तिरग्रे तेपासपीतिमनने तु नोक्तविरोधः शंकनीयः ॥ ५॥ ॥ अग्रिमश्लोकद्वयस्य विवरणाभावादेवं योजना । अवश्ययं सदा भाव्या सर्वमन्यन्मनोभ्रमः ॥६॥ तदीयैरपि तत् कार्य पुष्टी नैव विलम्वयेत् । गुणक्षोभेपि द्रष्टव्यमेतदेवेति मे मतिः ॥७॥ कुसृष्टिरत्र वा काचिदुत्पद्येत स वै भ्रमः ॥७॥ इयमुक्तरीतिः । अवश्या स्वतो भावयितुमशक्यापि मदुक्तत्वात् सदा भाव्या । अवश्यं भाव्येति वा । यत्र यथा दृश्येत तत्र तथा भाव्येत्यर्थः । ततः किमि- त्यत आहुः सर्वमिति । उक्तरीतितोन्यत् सबै मनोभ्रम इति ज्ञायत इत्यर्थः । सर्वैः कयमेवं नांगीक्रियत इत्याशक्याहुः तदीपैरिति । भ्रमसंवन्धिमिरासुरैतत् कार्य कर्तव्यमित्यर्थः । भक्तिमार्गीयैस्तु मदुक्तिभावनायां विलम्यो न कर्तव्य इत्याहुः पुष्टौ मैति । कदाचिदासुरसापि सेवाप्रतिवन्धे जातेपि भगवद्गुणश्रवणादिना प्रेमलक्षणं पुलकादि दृश्यते तत्र किं भावनीयमित्यत आहुः गुणक्षोभेपीति । क्षोभोचपुलकादिः, स तु गुणवस्तुस्वभावादासुरस्यापि भवतीति गुणमाहाल्यमेव । अत एतत्पूर्वोक्तमेव तत्रापि द्रष्टव्यं भावनीयमित्यर्थः । उक्तविश्वासार्थमाहुः मे मतिरिति । मतिः सम्मतिः । भ्रमखरूपमाहुः कुसृष्टिरिति ॥ ७॥॥ यथामति कृता सेवाफलोक्तिविवृतौ मया । टिप्पणी पर्वणीवेन्दुः प्रकाशयतु सर्वतः ॥१॥ यदनानुचितं किविदलेखि मतिमान्यतः । क्षम्यतां तत्प्रहस्सायेंः शिशौ धौतमिवेप्सितम २ इतिश्रीदेवकीनन्दनकृता सेवाफलोक्तिविकृतिटिप्पणी समाप्ता ।।

धीरुष्णाय नमः। सेवाफलम् । श्रीहरिरायकृतसेवाफलोक्तिविवृतिसमेतम् । తండ श्रीकृष्णं कुलदैवतं तदनु च श्रीवल्लमाख्यान् निजान् । आचार्यानथ विठ्ठलेश्वरमहं नत्वा प्रभुं सर्वथा ॥ श्रीगोविन्दमतीवभावविवशं तातं समर्यादया । ख्यातं मफलजातहेतुमधुना किविद्वदाम्यक्षमः ॥१॥ अथ श्रीमदाचार्याः स्वीयानां बहुलग्रन्यावलोकनप्रयासमसहमानाः संक्षेपेणैव स्वमा गीयसेयाफलप्रतिवन्धसाधनानि निरूपयन्तः प्रथम फलं निरूपयन्ति यादृशी सेवनेति । यादृशी सेघना प्रोक्ता तत्सिद्धौ फलमुच्यते । यादृशी यादृप्रकारिका. स्वतःपुरुषार्थत्वेन कालापरिच्छेदेनावश्यकर्तव्यत्वेना. करणे प्रत्यवायजनकत्वज्ञानेनं क्रियमाणखसाधनभूततनुवित्तयुतसेवाद्वययुतमानससेवना भा- वरूपा सदानन्दसेवा मया प्रकर्पण मुख्यतया फलरूपतया चोक्ता निरूपिता सिद्धान्त- मुक्तावल्या 'चेतस्तत्प्रवणं सेवे'ति । तस्साः सिद्धौ यावजीवनिर्वाण प्रपञ्चविस्मृतियु- ततदासत्या व्यसनरूपत्वसिद्धौ यत्फलं तदुत्पाद्यं फलत्वेनाभिमतम्, तदुच्यते निरूप्यत इत्यर्थः । ननु सेवायाः सर्वत्र ग्रन्धेषु फलरूपत्वोक्तेस्तत्फलोक्तिरनुपपनेत्याशं. क्याहुर्विवरणे सेवायां फलत्रयमिति । सेवायामेव क्रियमाणायामेतत्रयं भवतीति । तदुत्तरमपि सेवासत्त्वेन तन्मध्यपतितया न तस्याः खतःपुरुषार्थत्वहानिरित्यर्थः । अत एव सेवायामित्यत्र पष्ठीमनादृत्य सप्तमी विभक्तिरुक्ता । तत्रयमेवाहुः अलौकिसामर्थ्य सायुज्यं सेवोपयोगिदेहो वैकुण्ठादिष्विति । तत्रालौकिकसामर्थ्य हि भगवतः कोटिसूर्यामिरूपस्यात्यन्तिकफलदित्सायां सर्वलीलाविशिष्टस्य प्रभोर्हृदयप्रवेशे तदनुभव- सामर्थ्यम् । तच न शरीरान्तरे सम्भवतीति तादृशसामर्थ्यवच्छरीरप्राप्तिर्मुग्या । सा च प्रभुणैवापारकरुणेनैव सम्पाद्यत इति प्रभुसंपादितालौकिकशरीरनिष्ठस्वरूपानुभवक्षमसामर्थ्य- मेव प्रमाणाननुरोधिप्रमेयसाध्यं मुख्यं फलमित्यर्थः । अत एवोक्तं प्रभुभिः श्रीयमुनां प्रति प्रार्थयद्भिर्भमास्तु तव सन्निधौ तनु नवत्व'मिति । नवलं च तादृक् सामर्थ्यमेव । अत एव तनुनवत्वमेवोक्तं न तु नवतनुत्वमिति । तथा च यथा प्रजरनानां सर्वदा लीलासुखमनु- १ज्ञापनेनेति पाट।

श्रीहरिरायविरचितटिप्पणीसमेतम् । भवतामन्ते तादृक् सामर्थ्यमेव सम्पादित येन स्वदत्तस्वरूपानुभवो निष्प्रत्यूह भवति नान्यावस्था । तथान्यत्रापि तदनुग्रहत परमानुरागेण तथा फलदित्साया पूर्वदेह खवियोगामिना शुद्ध विधाय तस्मैवालौकिकत्व सम्पाद्य तन ताक् सामर्थ्य प्रकटयती त्सलोकिकसामर्थ्यमेव मुख्य फ्लमितिभाव । प्रमाणानुरोधिप्रमेयसाध्य मध्यम फलमाहु सायुज्यमिति । सह युनक्तीति सयुक् तस मावस्तत्त्वम् । भगवता सह सततस्थितिरेव सार्वदिकसयोगरसानुभव इति यावत् । तथा च लक्ष्मीवदन्तर्ग्रहगोपिकावद्वा भक्तिमार्गीयेण प्रकारेण युगपदखिलपुण्य- पापक्षयद्वारा पाचभौतिकदेह निव-लौकिक दत्वा खस्मिन्नेव स्थिति विधाय ततो निष्कास्य स्खलीलानुभव प्रभुकारितो मध्यम फलमिति भाव मध्यमत्व चास्स विप्रयोगरसानुभवमपेक्ष्य तदुत्कर्षस्य सहृदयानुभवसाक्षिकत्वात् । उभयसाधारणमधिकाररूप तृतीय फलमाहु सेयोपयोगिदेहो वैकुण्ठा- दिग्विति । सेवाया क्रियमाणायामेवानुग्रहविशेपाभावात् साक्षात् सेवानुपयोगे अन्यै. ताशसाक्षाद्रसानुभवकर्तृभि क्रियमाणाया सेवाया उप समीपे योग , तद्वत्पक्ष्या दि- शरीरप्राप्तिस्तृतीय फलमित्यर्थ । तस्य चान्तररमणानुकूलत्वात् फलत्वर, यहि साक्षात् सम्बन्धामावादधिकाररूपत्वमित्यर्थ । अत एव 'प्रायो वताम्ने'सन मुनीना पक्ष्यादिश- रीरप्राप्त्या खाधिकारानुसारेण सेवा तद्रसानुभवयोग्यता चेति निरूपितम् । एवं फलनय निरूप्य आधफलस्य दुर्लभत्व निरूपयन्त फलनैविध्ये हेतु च समर्थयन्तो दानमानसाध्यत्व प्रथमफलस निरूपयन्ति अलौकिकस्येति । अलौकिकस्य दाने हि चाद्यः सिध्येन्मनोरथः ॥१॥ अलौकिकस्य स्वविरहानुभवक्षमसामर्थ्यस्य दाने भगवता खाग्रहेण दु सानु भवरूपतया तदनिच्छायामपि तथा सम्पादने, चकारात् तदेहेन्द्रियादिपु खस्वरूपस्थापने सति आद्य. प्रथमफलविषयक सस्काररूपसमर्पणसमयक्रियमाणो मनोरथस्ताप हेशानन्दप्राप्तिरूप सिध्येदित्यर्थ । हीति युक्तोयमर्थ । यतो लीलास्थितेष्वपि केपाश्चिदेव रासमण्डलगण्डनायमानाना तदानम् । अत एवान्तहगताना प्रतिवन्ध इत्यत केवलप्रभुदानैकसाध्यत्वमिति भाव ॥१॥ अत पर सायुज्यसेवोपयोगिदेहातिरूपयो फलतदधिकाररूपमध्यमान्तरफलयो पूर्वफलवदनियतत्वामावात् कदाचित् कालसाध्यत्व ज्ञानादीनामिवाशक्येत तदभावार्थमाहु फल चा घधिकारोवेति । फलं वा धधिकारो या न कालोत्र नियामक । फल सायुज्यम् । अधिकारः सेवोपयोगिदेहाति । अतदुभयो फ्लयो सेवाफलम् । कालो न नियामकः सत्यादिरूपः फलदः कठिरूपः प्रतियन्धको वा नेत्यर्थः। एतेन कालानियम्यत्वेनैतत्फलस नित्यत्वमपि सूचितम् । अत एव कपिलदेवैरपि 'नो निमिपो लेदि हेतिरिति निरूपितम् । अन वाशब्द(यमधिकारसापि फलरूपतया तत्समकक्षल. योधनाय । एवं सोपपत्तिकं फलवयं विविच्य प्रतियन्धकत्रयं विवेचयितुं निरूपयन्ति उदेग इत्यादि। उमेगः प्रतिवन्धो वा भोगो या स्यात्तु वाधकम् ॥२॥ मूले पाघकमियेकवचनेन मिलितानामेव पापकतेत्याशंक्याहुः विवरणे सेवायां प्रतिबन्धकत्रयमिति । उद्धेगो नाम मनसः सेवायां क्रियमाणायामुत्कृष्ट वेगः सर्वथा तत्रास्थिरता चाहिमख्यमिति यावत् । स च सेवाया अनाधिदैविकीत्वसम्पादकतया प्रतिवन्धकः । तस्मिन् सति क्रियमाणसेवायाः केवलकायिकीत्वान्मानसीत्वाभावेन प्रतिबन्धेनानाधिदैविकीत्वात् । एवमुद्वेगं निरूप्य प्रतिवन्धमोगौ निरूपयन्तः प्रथम प्रतिपन्धस्यानिवार्यत्वेन पाठक्रममनपेक्ष्यार्थक्रमेण भोगं निरूपयन्ति भोगो विविध इति । भोगे वैविध्यं लौकिकालौकिकभेदेनेति तदाहुः लौकिकोऽलौकिकश्चेति । तत्र लौकिको लौकिकपदार्यानां भगवत्सम्बन्धरहितानां स्वत आसक्या भोगः । अलौकिकस्तु प्रभुसम्बन्धी । स तु प्रतिवन्धक एव न भवति । तस्य फलानां मुख्यमध्यमसाधारणानां मध्ये प्रथमफलेऽलौकिकसामर्थ्येन प्रभुस्वरूपानुभवरूपरसमोगे प्रवेशात् । यतः सर्वेन्द्रि. यैस्तत्सम्बन्धिपदार्थेष्वनुभूयमानेषु तत्र तत्र स्थितो रसात्मा प्रभुरेवानुभूयत इति भावः । एवं भोग निरूप्य प्रतिवन्धं निरूपयन्ति प्रतिवन्धोपीति । साधारणः सर्वसाधारणः, सेवायां लौकिकवैदिककार्यान्तरव्यासक्तिः । भगवत्कृतप्रतिबन्धस्यासुरमात्रविषयत्वेना- साधारणत्वादनिवर्सत्वेनावक्तव्यत्वाच त्रय एव वाधका उद्वेगलौकिकमोगसाधारणप्र. तिबन्धा इत्यर्थः । ननु कथमेतेषां सिद्धानां त्याग इत्याशक्याहुः प्रयाणामिति । उद्वेग- लौफिकभोगसाधारणप्रतिबन्धकानां त्रयाणां साधनं तअननहेतुभूतं तस्स परित्यागः कर्तध्या, हेतूच्छेदे पुरुषव्यापारात् । सिद्धस्स खरूपलामे त्यागानहत्वात् । नहि केनापि स्वसामग्रीसम्पादितं सुखदुःखादि किश्चिदपि स्वयत्नशतेनापि त्यक्तुं शक्यते । ननु साधा- रणप्रतिबन्धे सेवायां लौकिकवैदिककार्यापत्तिरूपे साधनस्स लोकवेदसिद्धतयाऽशक्यत्या. गत्वात् कथं तत्त्याग इत्याशंक्य तदुपायमाहुः तत्राद्य इति । तत्र साधारणभगवत्कृत- प्रतिवन्धयोराद्यः साधारणः बुद्ध्या उपायचातुर्येण त्याज्य इत्यर्थः । बुद्धिस्तु सेवायां प्रतिवन्धत्वेन यदापतति लौकिकं वैदिकं तस्य पूर्वमेव सेवानवसरसमयमवेक्ष्य निर्धारो विधेयो यथा न सेवां प्रतियभाति । तथा च पुत्रविवाहादेवथैव लसादि विधारणीयम् १ फलेपु प्रथमपले अलाविवसामयें तत्प्रयेशस्य वक्तव्यत्वात् प्रवेशश्वालौकिकसामर्थ्येन प्रभुस्वरूपानु- भवस्य रसभोगरूपलादिति पाठान्तरम् । २ लयमेनेति तृतीयान्त. पाठः ।

- श्रीहरिरायविरचितटिप्पणीसमेतम् । यथा न सेवाप्रतिवन्धः । परोपकारादेस्तु धर्मस्य गोगधर्मत्वज्ञानेन त्यागः । कालान्तरे वा करणम् । एवमन्यत्रापि सर्वत्र हरिचरणरतिप्रतिवन्धविमझनी युद्धिरनुसन्धेया । यद्वा । कदाचिदावश्यकलौकिकवैदिककार्यापाते तत्प्रयत्नसम्भवेन सागः कथं शक्यत इत्यत आहुः बुद्धयेति । शरीरादिना तत्कार्यकरणेपि तत्र बुद्धिर्न स्थाप्येत्यर्थः ॥ २ ॥ एवं साधारणप्रतिपन्ध निरूप्य भगवत्कृतप्रतिवन्धं निरूपयन्ति । अकर्तव्यं भगवतः सर्वथा चेद्गतिन हि । अकर्तव्यमिति मूले । विवृत्ती भगवत्कृतश्चेत् प्रतिवन्ध इति । भगवतः सर्वसमर्थस्यापि स्वतच्छतया यस्मिन्न किञ्चिदपि कृतिविषयः सर्वथा सर्वप्रकारेण प्रार्थना- यामपि तदागतिनिस्तारोन सर्वथा फलाभाव इत्यर्थः। हीति युक्तोयमर्थः। सर्वमार्गफलदातुः प्रमोः प्रातिकूल्ये केनापि मार्गेण फलासिद्धेः । अनापमाशयः । भक्तिमार्गे विशिष्टेच्छायाः कारणत्वान्न सामान्येच्छारूपमूलेच्छया मर्यादया वा फलसिद्धिः प्रतिवन्धो वा । किन्तु खयमंगीकृत्य यस्मिन् जीवे प्रभुर्यदा यथेच्छति, तदा तत्र तथा करोतीति वस्तुस्थितिः । तथा च भक्तिमार्गे प्रवृत्तस्य निरन्तरं सेवां कुर्वतोपि कदाचिदुःसंगादिनाऽतिपक्षपातिप्रमु• प्लियप्रद्वेषेण तद्रोहे प्रमोरतिकोधेन प्रार्थनयापि क्षमासम्भावनारहितेन तस्मिन् प्रभुः फलप्र- तिवन्धं करोतीति स मगवत्कृतप्रतिवन्धः । तस्मिन् सति सर्वथा सर्वमार्गफलाभाव इत्यर्थः । ननु भगवत्कृतप्रतिवन्धेप्यन्येषां फलदावृणां सेवया फलान्तरं भविष्यतीत्याशंक्याहुः तदान्यसेवेति । यदा 'फलमत उपपत्ते'रिति न्यायेन सर्वत्र फलदातुः प्रभोः प्रातिकूल्यं तदान्येपामपि तदधीनानां फलदातृत्वाभावात् तत्सेवापि फलासाधकत्वाद् व्यर्थत्यर्थः । ननु सर्वथा फलाभाव आसुरेष्वेवेति कथं देवस्य भगवत्कृतप्रतिवन्धेतयात्वमित्याहुः तदा- सुरोयमिति । जीवानां हि सृष्टयादावपि 'निबन्धायासुरी मते ति वाक्येन भगवत्कृतप्रति- वन्धादेवासुरत्वम् । यच यदा प्रभुः कर्तुमिच्छति तदैव भवतीति तदा तस्मिन्नेव सम- येऽयं यस्मिन्नेवंप्रतिवन्धः स जीव आसुरः सेवादिना दैवत्वेन प्रतीतोपि आसुर एवेति निर्धारो निश्चय इत्यर्थः । एतेनैतत्प्रतिवन्धखरूपविद्भिः सर्वथा दुःसंगादिषु सावधानः स्पेयमित्युक्तं भवति । ननु ताशस्य पश्चात्तापे शोकोत्पत्त्या पूर्व भक्तिमागीय इति तदभावार्थ तत्त्वनि- धारोपायमूतं विवेकरूपं साधनमाहुः यथा वेति । यथा या तत्वनिर्धारो चिचेक साधनं मतम् ॥ ३ ॥ वाशब्दोनादरे । येनैव प्रकारेण । नासाग्रहः । एतत्तत्त्वनिर्धारस शोकाभावमा- प्रार्थलानीपनिपज्ज्ञानमपेक्षितम् , किन्तु यथाकथधित् सांख्ययोगेनान्येन वा भापाप्रवन्धा- दिनोपायन तत्वनिर्धारं विधाय शोकामावार्थ विवेकः सम्पादनीय इत्यर्थः । विवेकस्तु २० सेवाफलम् । ममैतदेव प्रभुणा कृतं सर्व ब्रह्मात्मकं कोहं किच साधनं किं फलं को दाता को वा भोक्तेत्यादिरूपः । तमेव च तत्वनिर्धारोपायं विवृतौ विशदयन्ति ज्ञानमार्गेणेति । ज्ञानमार्गण ज्ञानसाधनोपायेन स्थातव्यमित्यर्थः । किश्च ज्ञानस्थित्यापि न तन्माया मुक्तिः, किन्तु शोकामाव एवेत्याशयेनाहुः शोकाभावायेति ॥३॥ अतः परं यदर्थमेषां निरूपणं यापकानां तत्प्रयोजनमाहुः याधकानामिति । यापकानां परित्यागो भोगेप्येक तथा परम् । निष्प्रत्यूहं महान् भोगः प्रथमे विशते सदा ॥४॥ याधकानामुद्वैगमोगप्रतिवन्धानां परित्यागः परितस्त्यागः कर्तव्य इत्यर्थः । भोगस पापकत्वेन त्याज्यत्वमुक्त्वाऽलौकिके तदभावमाहुः भोगेपीति । भोगेप्येकमलौकिक- भोगरूपं फलप्रविष्टतया तथा तेनैव प्रकारेण, परं प्रतिवन्धयोः परं भगवत्कृतप्रति- बन्धलक्षणमशक्यत्यागत्वेन विहाय तथेत्यर्थः । ननु भोगयोरपि तुल्यतामाशंक्य तस्मिन्नलौ- किके वैलक्षण्यमाहुः निष्प्रत्यूहमिति । अलौकिकसामध्यरूपे प्रथमफले भगवत्स्वरूपा- नन्दानुभवरूपे भोगे क्रियमाणे प्रत्यूहोन्तरायः केनापि कालादिनापि न कर्तुं शक्यत इति निष्प्रत्यूहं स एव सिध्यति । लौकिके तु सर्वथा तदभाव इति महद्वैलक्षण्यमित्यर्थः । अत एवोक्तं प्रभुभिः सन्यासनिर्णये 'हरिरत्र न शक्नोति कर्तुं बाधां कुतोपर' इति । केञ्च महानिति । सरूपतः फलतः साधनतश्च महान् । विषयानन्दब्रह्मानन्दापेक्षया जनानन्दस्य महत्वादित्यर्थः । अत एव फलेष्वपि प्रथमफल एवालौकिकसामर्थ्यरूपे रकर्षेण प्रविशते प्रविशतीत्यर्थः । किश्च सदेति । त्रैकालिकावाधविषयलादित्यर्थः ॥४॥ एवमलौकिकभोगे वैलक्षण्यं निरूप्य लौकिकभोगसाधारणप्रतिवन्धावेकीकृत्य तद्ध- मनिरूपणपुरःसरं वैलक्षण्यं निरूपयन्ति सविनोल्पो घातकः स्यादिति । सविनोल्पो घातकः स्याहलादेतो सदा मतौ । लौकिको हि मोगः सवितो विनसहितः, कर्मकालादिभिस्तत्र विधसम्भवात् । अल्पश्च । स्वरूपतः फलतः माधनतश्च परिच्छिन्नत्वादित्यर्थः । साधारणप्रतिबन्धो हि घातकः । सेवाकालोपरोधकतया तद्वातकः । एतौ भोगसाधारणप्रतिवन्धी सविमत्वाल्प. वघातकत्वादिभिधमहेतुभूतैस्त्यागमप्यर्हत इत्याशयेनाहुर्विवृतौ ननु कथमित्यारभ्य घा- तकः स्यादित्यन्तम् । सविनत्वादपत्वायोगः प्रतिवन्धन घातकत्वाच त्याज्य इत्यर्थः । एवं लौकिकभोगसाधारणप्रतिवन्धयोस्त्यागहेतुभूत धर्मगुक्त्वा भगवत्कृतप्रतिवन्धे त्यागासम्भवेन ज्ञानमार्गस्थित्लानधिकारिणो मन्दमतेः फलचिन्तया शोको भवतीति तदमावाय चिन्ता न कर्तव्येत्याहुः दितीय इति । .

२१ श्रीहरिरायविरचितटिप्पणीसगेतम् । द्वितीये सर्वथा चिन्ता साज्या संसारनिश्चयात् ॥५॥ द्वितीये भगवत्कृतप्रतिवन्धे सर्वया सर्वप्रकारेणान्यतोपि फलसम्बन्धाभावाचिन्ता फलविपयिणी त्याज्येत्यर्थः । तत्र हेतुमाहुः संसारनिश्चयादिति । संसारोऽहन्ता- ममतात्मा सर्वानर्थमूलं प्रवाहपथफलरूपः, तस्य निययाद्गवत्कृतप्रतिवन्धे संसार एव, न फलान्तरमितिनिश्चयादित्यर्थः ॥ ५॥ प्रतिवन्धविचारमतिविचार्यत्वेन विधायोकेंगरूपप्रथमप्रतिबन्धेन फलाभावे भगवतो दातृत्वाभावं हेतुत्वेन निरूपयन्ति नन्यायइति मूले विवृतावाद्यफलेति । नन्याये दातृता नास्ति तृतीये बाधकं गृहम् । आयेन प्रतिवन्धेन फलाभाव इत्यर्थः । नन्विति विरोधोक्तौ । आये उद्वेगरूपप्र- तिवन्धे भगवतः सर्वसमर्थस्साप्यन्तःकरणकसम्बन्धितया तद्विक्षेपरूपोद्वेगे क्रियमाणे सेवाया अमानसीत्वेन भगवत्सम्बन्धाभावादनाधिदैविकीत्वे तत्प्रयुक्तः प्रभोः फलदातृवाभाव इत्यर्थः । अन्यथा सर्वदोपनिवारकस्य फलदातृत्वाभावो न घटेत । एतदेव विवृतौ विशदयन्ति तदा सेवेत्यादि । एवमुद्वेगवाधकमुक्त्वा भोगवाधकं विवृण्वन्ति तृतीय इति । तृतीये लौकिकभोगे गृहमेव वाधकमित्यर्थः । अत्रायमाशयः । भोगो हि सर्वथा बाधकः, भगवद्वैमुख्यसम्पादकत्वादिन्द्रियादीनां वैफल्यापादकत्वाच । स च यावद्गृहस्थितिः, यलेनापि निवर्त्यमानो न निवर्तते । गृहस्य सर्वथा वाधकत्वात्तत्र स्थितावंशतोपि मोगसम्भवागृहपरित्यागः । कृष्णार्थप्रयोगेण तदासक्तिपरित्यागो वा भोगाभावाय विधेय इत्यर्थः । एतदेव च विवृतौ विवृतं भोगाभावस्तदैव सिध्यति यदा गृहपरित्याग इति । अत एवास्मदाचार्निवन्धे निरूपितं भगवद्वचोनुवादरूपेण 'गृह सर्वात्मना त्याज्यं तच्चत्यक्तुं न शक्यते । कृष्णाथं तत्प्रयुजीत कृष्णः संसारमोचक' इति । एवं फलत्रयं प्रतिवन्धत्रयं च निरूप्य निजान् प्रत्येतद्विचारमेवाहर्निशं कर्तव्यत्वेन वक्तुमुपसंहरन्ति अवश्येयमिति । अवश्येयं सदा भाच्या सर्वमन्यन्मनोभ्रमः ॥६॥ इयं फलत्रयी प्रतिवन्धत्रयी चावश्या, न स्वशक्या । भक्तिमार्गे फलप्रतिवन्धप्राप्ति- निवृत्त्योः केवलभगवदधीनत्वात् । तथापि सदा निरन्तरं भाव्या कर्तव्यत्वेन विचारणीया, विचारे हि भावनायाः साधनलात् कदाचित् फलसिद्धिः, प्रतिवन्धतश्च सावधानतया स्थिति- सिद्धिरित्यर्थः । ननु फलान्तरं प्रतिबन्धान्तरं वा भक्तिमार्गे किविद्भविष्यतीत्याशक्याहुः सर्व- मन्यदिति । एतत्फलत्रयं प्रतिवन्धत्रयं चापहायान्यत्सर्वं फलपतिवन्धादिकल्पनं मनो- भ्रमा स्वान्तान्तिरित्यर्थः । अत्रेदगुक्तं भवति । भक्तिमार्गे सेवाया उत्तममध्यमसाधारणाधि- कारक्रमेण एतत्फलपयमेव, न मोक्षादिः । प्रतिवन्धकं चोद्वेगादिकमेव, न पापादिकमिति ।

२२ सेवाफलम् । सपादमूलं भजत' इति वाफ्यात् । तथा चतत्फलपिहिताशरेतलतिबन्धसावधानैरन्यतो निश्चिन्तः सर्वः सवैव विधेयेति भावः ॥६॥ नन्वेतत्फलप्रतिवन्धकादि निरूपणं तदानितान्प्रति पटते तदीयदेहादेरामत्वात्, तदीयानां तु देहेन्द्रियादेः साक्षापुरुषोत्तमसमर्पितलेन फलरूपप्रमुसम्बन्धात् प्राप्तफल- नया तान्प्रति फलप्रतिवन्धनिरूपणं घ्यर्थमित्याशंम्य आहुः तदीयैरपीति । तदीयैरपि तत् कार्य पुष्टी नैय विलम्बयेत् । तदीयैः कृतात्मसमर्पणैरपि तत्फलप्रतिबन्धकादिभावनं कार्यमवश्यकर्तव्यम् । पुष्टिमर्यादायामंगीकारेण फलविलम्पारजनं कारयित्वैव फलदानान् । अविलम्बस्तु केवल पुष्टावेवेत्याहुः पुष्टौ नैव चिलम्बयेदिति । पुष्टी केवलपुष्टी गर्यादाऽभावेन साक्षा- दंगीकारान्न मिलम्वः । साम्प्रतं तु पुष्टिमर्यादायामेवाधुनिकानामगीकाराशजनसिद्धिविल- म्बसद्भावेन तावत्पर्यन्तं प्रोपितभर्तृका इस फलप्रतिवन्धभावनं सर्वदा कार्यमित्यर्थः । एतदेव निमित्तमन्यत्राप्यतिदिशन्ति गुणक्षोभेपीति । गुणक्षोभेपि द्रष्टव्यमेतदेवेति मे मतिः ॥७॥ तदीयानां गुणक्षोमोपि विलम्बादेव निमित्ताद् देशान्तरस्थपतिकाया इव भवति । तत्राप्येतदेव फलप्रतिवन्धकादिभावनं साधनलेन द्रष्टव्यम् । एतद्विचारेण चित्तस्स प्रभु- परतया गुणक्षोभोपि न भविष्यतीत्यर्थः । ननु गुणक्षोभनिवर्तकानि साधनान्तराणि भविष्य- न्तीत्याशेक्याहुः मे मतिरिति । विचारे क्रियमाणेऽस्मन्मतेरत्रैव पर्यवसानान्नान्यत्साधन- मित्यर्थः ॥७॥ गन्वत्र काचित् कुसृष्टिरत्पयते, तदीयत्वे नियमेन फलसम्भवात्, तदवैयापत्ति- मिया प्रतियन्धासम्भवाच, तदीयत्वे [भयाभावादेवं न निरूपणमुचितमित्याशंक्याहुः कुरष्टिरिति । कुसृष्टिरत्र वा काचिदुत्पद्येत स वै भ्रमः ॥७॥ ॥ अत्रास्मिन्नर्थे वाशब्दोवधारणार्थः । अप्रैव या कुसृष्टिरुत्पद्यते सा सर्वथा दोषा- भावाम एवेत्यर्थः । अनुपपत्तिपरिहारस्तु पुरैव प्रभोः खतरेच्छत्वनिरूपणेन कृत इति तत एव विभावनीयमिति दिक् ॥ ७॥॥ इतिश्रीवल्लभाचार्यचरणान्जदासानुदासश्रीहरिरायविरचिता सेवाफलविवृतिटिप्पणी सम्पूर्णा ॥

श्रीकृष्णाय नमः। सेवाफलम् । श्रीवल्लभविरचितटीकासमेतम् । । यारशी सेचना मोक्ता तत्सिद्धौ फलमुच्यते । अलौकिकस्य दाने हि चायः सिध्येन्मनोरथः ॥१॥ याहशी यत्प्रकारिका 'चेतस्ततावण'मित्यारभ्य 'कृष्णमेव विचिन्तये 'दित्यन्ते- नोक्ता । तत्सिद्धाविति । तस्याः सेवायाः मानसीत्वरूपफलावस्थासिद्धौ फलमुच्यते फलं निरूप्यत इत्यर्थः । कुत्रेत्याकांक्षायामाहुः टीकाया सेवायामिति । फलनयमिति । फलतावच्छेदकत्रयमित्यर्थः । यथा स्वर्गस्य फलत्वं तदवच्छेदकं चामृतपानादिकं तथा मान- ससेवायाः फलत्वं तदवच्छेदकं चेदं फलत्रयम् । सेवायां फलनयमित्यनेन पूर्वार्धार्थ उक्तः । उत्तरार्धार्थमाहुः अलौकिकसामर्थ्य मिति । मूलेग्लौकिकस्येसलौकिकस्य सामर्थ्यस । अलौकिकसामर्थ्य सर्वामोग्यसुधा । तस्या दाने । आप इति । आयो मनोरयो 'भगवता सह संलापो दर्शन मिलितस्य चेत्यादिभिरुक्तः पूर्वोक्तसुधा- भोगरूपः सिध्येत् पूर्णो भवतीत्यर्थः । अनेन शृंगाररसस पूर्वदलानुभव उक्तः । चका- रादलौकिकसामर्थ्येनैव तदुत्तरदलानुभवोपि भवति । स तु परितो गलनरूपवर्णनेनामि- रमणात्मको ज्ञेयः । एतेन दीयमाना सुधा साधनं भुज्यमाना सुधैव तु फलमिति सूचि- तम् । वेणुगीते 'वर्णनायां मुखे समागच्छन्ती मुखमपि सभोगयोग्यं करोती ति निरूपितम् । 'वर्णयन्सोभिरेभिर' इत्युत्तरदलानुभवोपि सुधापूरणनैव निरूपितस्तत्सम्मतिसूचनाय हि- शब्दः॥ १ ॥ फलं चा घधिकारो चा न कालोत्र नियामकः । फलं या ह्यधिकारो वेससार्थमाहुः सायुज्यमित्यादिना । मूले फलं वेति । सायुज्यस सोनुतइत्यादिश्रुती फलतेनैव प्रसिझ्या फलपदं सायुज्यवाचकम् । तथा च द्वितीयं फलं सायुज्यमित्यर्थः । तृतीयं फलमाहुः अधिकार इति । एतदर्थमाहुः टीकायां सेवोपयोगिदेहो वैकुण्ठादिष्विति । अत्र आदिशन्देन श्रीमधुराश्रीवृन्दावनादिकं प्रायम् । मूले न काल इति । अत्र सेवोपयोगिदेहे कालो न प्रेरकः । यथा लीलारष्टिया आम्रवृक्षादयो न कालपर्याः, किन्तु भगवदिच्छयैव पुष्प्यन्ति फलन्ति च, एवं जंगमा अपि सेवोपयोगिनो देहाः भगवदिच्छ्यैव अवयवादिसम्पत्तिं लभन्ते ।

२४ मेवाफलम् । उठेगः प्रतियन्धो वा भोगो या स्यात्तु बाधकम् ॥२॥ उद्वेग इति । लोकार्थमाहुः सेवायामिति । उद्वेग इति । मनसोन्यपरता उद्धेगः । कायस्पान्यपरता प्रतियन्धः । इन्द्रियाणामन्यपरता भोगः । इदं प्रयं पाप- कम् । तनुवित्तजसेवायां फलजननसामर्थ्यस भक्तिरहस्समजनस्य यापजनकं विसामग्रीहेतुः प्रतिवन्धकमिति मूलार्यः ॥२॥ अकर्तव्यमित्यारभ्य विशते सदेत्यन्तस्वार्थमाहुविवरणे त्रयाणामित्यारम्य विवेक इत्यन्तेन । त्रयाणामिति । उद्वेगसाधारणप्रतियन्धलौकिकमोगानामित्यर्थः । साधनेति । एतत्रयाणामेव याधकत्वात् । ननु कथमेतत्रयस्यैव पाधकत्वं न तु पधाः नामित्यतो व्यवस्थामाहुः भोग इत्यादिना । लौकिक इति । अनिवेदितपदार्थानां समर्पणं विना विषयासक्त्योपमोगो लौकिको भोगः । अलौकिक इति । निवे- दितानामर्थानां भगवोगार्थ विनियोगे जाते तदत्तप्रसादत्वेन खोपभोगकृतिरलौ- किको भोगः । तत्राय इति । आधो लोककृतः साधारणः । बुद्ध्या इति । विभावनयेत्यर्थः । फलानां मध्ये इति । यस फलप्रयमपि भवति तस्स सेवो- पयोगिदेहरूपे प्रथमे फले प्रविशति सम्बद्धो भवतीत्यर्थः । एतद्भोगस्यैतत्फलसाधकत्वेन पूर्व फलसम्बन्धः । तदुत्तरं च दासधर्मत्वेनैतत्करणादुत्तरं सम्बन्धः । इत्यश्च पूर्वोत्तरमपि फले व्याप्तो भवतीति प्रोपसर्गार्थः । अयं मूले सदेत्यव्ययार्थो ज्ञेयः । निःप्रत्यूहमिति हेतुगर्मम् । यतोयमदृष्टादिकृतविधाभावानिःप्रत्यूहं सिध्यत्यतो महा- नित्यर्थः । यद्यपि पाठक्रमेण सेवोपयोगिदेहस्य तृतीयफलत्वम्, तथाप्यनुक्रमानुरोधात् तस्य प्राथम्यमेव सिध्यति । किञ्चैतस्याधिकारत्वेन निरूपणादपि तथा । भगवत्कृतपः तिवन्धश्चेदिति । श्रवणकीर्तनादिना हरिश्चेमृदये निविशते तदा पूजा सर्वदा निर्वहति । तस्या अभ्यासे तसां भक्तिरहस्सभजनरूपं सामर्थ्य सिध्यति । क्रियमाणेपि श्रवणकीर्त- नादौ हरिश्चेन निविशेत तदाभ्यासो न भवति । तेन जाता तनोरन्यपरता या स भगव- त्कृतप्रतिवन्धः । तदा भगवत्कृतप्रतिवन्धे अन्यसेवा महापुरुषादिसेवा व्यर्थी निःफ- लेत्यर्थः । अपिना भगवत्सेवापि तथेति ज्ञेयम् । क्रियमाणेपि श्रवणादौ चेन्न हरिनिवेश- स्तदेत्यर्थः । पूर्वमेव ज्ञानादिमार्गप्रवृत्ती तु नासुरत्वमिति बोध्यम् । नन्वासुरत्वे श्रवणादौ प्रवृत्तिरेव कथमित्यत आहुः । जीव इति । स जीव आसुरस्तस्यान्तःकरणं तु दैवमतः प्रवृत्तिरिति भावः । ननु तर्हि किमासुरेण कर्तव्यमित्याकांक्षायामाहुः तदा ज्ञानमार्गे- णेति । अन्तःकरणस दैवत्वे इत्यर्थः । अन्तःकरणसासुरत्वे तु संसारनिथयाच्छोकामावं वक्ष्यन्तीति ज्ञेयम् । शोकामावसाधककंसोपदिष्टज्ञानमार्गेणेत्यर्थः । विवेक इति । आयो युझ्या साज्यः द्वितीये त्वासुरज्ञानमार्गेण स्थेयमिति द्वयोः प्रतिवन्धयोविवेकः इसर्यः ।

, पए श्रीवल्लभाविरचितविवृतिसमेतम । भगवत्कृतश्चेदित्यारभ्य विवेक इत्यन्तेनाकर्तव्यमित्यस्य विवरणं ज्ञेयम् । इस्थ- । योक्तत्रयाणामेवात्र बाधकत्वम् । अलौकिकभोगस्य प्रथमे प्रवेशाज पाधकत्वम् । भगव- । स्कृतप्रतिवन्धेपि सामर्थ्यानुत्पाद एव न तु जातस्स बाधोतस्तस्यापि न वाधकत्वम् । प्रतियन्धकत्वं तु भवत्येव । प्रतिबन्धो विसामग्रीतद्धेतुः, प्रतिबन्धक इत्यत्र विसामग्री- पदस सामग्रीवाधात्यन्ताभावोभयवाचकल्लादिति बोध्यम् । अकर्तव्यं भगवतः सर्वथा चेद् गतिर्न हि । यथा या तत्त्वनिर्धारो विवेकः साधनं मतम् ॥३॥ याधकानां परित्यागो भोगेप्येकं तथापरम् । निःप्रत्यहं महान् भोगः प्रथमे विशते सदा ॥४॥ मूले श्लोकद्वययोजना । भगवतः सर्वथा सेवायां सामर्थ्य अकर्तव्यं चेत् तदा गतिः फलं न हि न भवतीत्यर्थः । ननु तदा तम्य किं साधनं शोकामावायेत्यत आहुः यथा वेति । येनात्मतत्वनिर्धारो भवति तादृशो विवेकः आत्मानात्मविवेकः शोकाभाव- साधनं मतमित्यर्थः । तस्माद्भद्रे स्वतनयान् मया व्यापादितानपि मानु शोचे'त्यत्र तस्स ज्ञानस्य शोकाभावहेतुत्वकथनान्मतमित्युक्तम् । भोगेप्येकमिति । जात्यभिप्रायेणैकवचनम् । अपरमिति । न परमपरम् , हीनम् , पापकत्वात्याज्यमित्यर्थः । ननु कथं न द्वितीयो पाधकस्तत्राहुः निःमत्यूहमिति । निर्वितम् । हेतुगर्भमिदम् । यतो निर्विनं यथा भवति तथा सिध्यति, अष्टादेवीधकत्वाभावात् । अतो महान् । एतादृशो भोगः प्रथमे फले सेयोपयोगिदेहे सदा विशते, पूर्वमुत्तरं च सम्बद्धं भवतीत्यर्थः । पाठकमं दृष्ट्वा अलौकिकसामर्थ्य प्राथम्यं मन्वानस्य प्रमनिरासाय टीकायां फलानां मध्य इत्युक्तम् । यस फलनयमपि भवति तस्य यत्प्रथम फलं सेवोपयोगिदेह इत्यर्थः ॥ ३ ॥ ४ ॥ सविमोल्पो घातकः स्याद् बलादेतो सदा मनौ। हितीये सर्वथा चिन्ता त्याज्या संसारनिथयात् ॥५॥ सविन इत्यत्र टीकायां सविनत्वादिति । अत्रापि सविमपदं हेतुगर्भम् । तथाचायमर्थः । घातको लौकिकमोगः, यतः सविभः, अतोल्पः स्यादिति हेतोस्त्याज्य विति । साधारणभगवत्कृतौ चलाद्धेतोः सदा प्रतिबन्धको मतौ। मनस इन्द्रियाणां चान्यपरतारूपाबुद्वगभोगी सामर्थ्यवाधकों । नन्वन्यपरतारूपाविमौ तु कारणम्यैव वाधको । तनुजसेवैवानभ्यस्ता अपत्यतो बलिष्ठत्यात् प्रतिबन्धनामकादेव जातावित्यर्थः । ज्ञानस्थित्यभाव इति । पूर्वोक्तासुस्ज्ञाने स्थित्यभावे । द्वितीय इतीति । द्वितीये भगवत्कृतप्रतिपन्य जाते । मूले संसारनिश्चयादिति । अन संसारपदं देहादिपरम् , तथा च "विरोचनोक्तदेह एव महस्य' इत्यादिरूपनिश्चयादित्यर्थः ॥ ५॥ ननु मबोपयोगिदहम्य कथमविकारत्वम्, अविकारले वा कथं फलत्वमित्यत आहुः नवाद्य इति । .

२६ सेवाफलम् । नन्याचे दातृता नास्ति तृतीये धायकं गृहम् । अवश्येयं सदा भाव्या सर्वमन्यन्मनोभ्रमः ॥६॥ नन्विति कोमलामपणे । आधे सेवोपयोगिदेहरूपफले सति या भवति फलद्वय- दातृता सा सेवोपयोगिदेहरूपाधफलाभावे नास्तीत्यायफलस्साधिकाररूपतेपर्यः । तथा च यस्यायफलमेव फलं तं प्रत्यायस फलत्वमेव । यस्य च पुनरपि सायुज्यादिफलं तं प्रति आयफलस्साधिकारत्वमेवेति भावः । एतेन फलत्रये तारतम्यमपि सूचितमिति बोध्यम् । टीकायां तदा सेवेति । आयफलामावेत्यर्थः । मूले तृतीय इति । लौकिक- मोगरूपप्रतिबन्धके सति पाधकं गृहं सेवाप्रतिवन्धक लौकिकमोगसअकं भार्यादि साज्य- मिति शेपः । अपश्येयमिति । इयं प्रतिबन्धकत्रयी फलत्रयी च सदा निरन्तरं भाव्या विभावनीया । भावनया प्रतिबन्धककृतप्रतियन्धनिवृत्तिर्भविष्यतीति भावः । सर्वमिति । ज्ञानादीनां साधनत्वं तत्साध्यमोक्षम्यैव फसत्वमिति मनोम्रममात्रम् ॥ ६ ॥ ननु 'तथा निवेदने चिन्ता त्याज्या श्रीपुरुषोत्तमे' इत्यनेनात्मनिवेदिनां प्रति- वन्धकमयाभावात् किं निवर्तनेनेत्यत आहुः तदीयैरपीति । तदीयैरपि तत्कार्य पुष्टो नैव विलम्पयेत् । गुणक्षोभेपि द्रष्टव्यमेतदेवेति मे मतिः ॥७॥ भगवदीयैरपि पूर्वोक्तत्रयीद्वयविभावनेन प्रतिबन्धनिवर्तनं कार्यमेव । पुष्टाविति । तथा सति पुष्टौ मर्यादांशत्यागे भगवान् विलम्ब न कुर्यादित्यर्थः । अन्यया। तु यद्यपि निवेदनपदार्थो न नश्यति तथाप्यलौकिकदेहप्राप्तौ विलम्बो भवत्येवेति । ननु गुणै- चित्तक्षोभे भावनाया असम्भवात् कथं तन्निवृत्तिरित्यत आहुः गुणक्षोभेपीति । सोप्येतेनैव निवर्तिष्यत इति भावः । ननु गुणक्षोभनिवृत्यर्थ हंसावतारेण एकादशस्कन्धे प्रकारान्तर- मुक्तमित्यत आहुः इति मे मतिरिति । मन्मतिसिद्धोयं प्रकारः । तथाच मर्यादापुष्टि- भेदेन व्यवस्थेति भावो द्रष्टव्यः ॥७॥ ननु स प्रकारो भगवदुक्तः, अयं च पौरुप इति कथं तुल्यपलत्वमित्यत आहुः कुसृष्टिरिति । कुसृष्ठिरत्र वा काचिदुत्पद्येत स वै भ्रमः ॥ ७॥ ॥ वाशब्दोनादरे । ममापि वाक्पतित्वादत्र मद्वाक्ये पूर्वोक्ता अन्या वा काचित् कुसृष्टिः किमुत्पद्येत १ नोत्पद्यतेत्यर्थः । यदि चेदुपयेत तदा तस ताशं ज्ञानं भ्रम एव । तद्वोधनार्थ नास्मप्रवृत्तिः, किन्तु 'सालिका भगवद्भक्ता' इत्युक्तानां तादृशामेव बोधना- र्थमेवास्मत्प्रवृत्तिरिति भावः ॥ ७॥॥ इतिश्रीविठ्ठलेशात्मजश्रीवल्लभकृतसेवाफलविकृतिः समाप्ता । तत्र हेतुमाहुः श्रीकृष्णाय नमः। सेवाफलम् । श्रीपुरुषोत्तमकृतसेवाफलविवृतिप्रकाशसमेतम् । प्रणम्य श्रीमदाचार्यचरणौ तस्कृपावलात् । सेवाफलोक्तिविवृतेर्विवृति वितनोत्ययम् ॥ १॥ अथ श्रीमदाचार्यचरणाः श्रुतिब्रह्मसूत्रगीताश्रीभागवततात्पर्यगोचरखसिद्धान्तस्स तनुवित्तजसेवात्मकस्य साधनस्य भगवत्प्रेमात्मकसेवामिद्धिपर्यन्ततां संक्षेपेण सिद्धान्त- मुक्तावल्यां बोधसौकर्याय निरूप्य सेवाफलग्रन्थे तथैव तत्फलं निरूपयितुं प्रतिजानते यादृशीत्यादि । यादशी सेवना मोक्ता तत्सिद्धौ फलमुच्यते । यादृशी यत्प्रकारिका सेवना सेवा, ण्यासश्रन्यो युजिति युजन्तत्वाद्धारणा विनिगमनेत्यादिवत्स्त्रीत्वम्, प्रोक्ता सिद्धान्तमुक्तावल्यां व्युत्पादिता, तत्सिद्वौ तस्सा- स्तत्रोक्तमानमीसेवासाधकतायां सत्यां फलं यत् प्राप्यत्वेन विवक्षित तदुच्यत इत्यर्थः । अस्य ग्रन्थस्य सक्षिप्तत्वेन दुरूहत्वात् स्वयमेव गृह्णन्तो व्याकुर्वन्ति सेवायां फल- त्रयमित्यादि । अत्र सेवायामिति सयर्थया सप्तम्या साधनसाध्यरूपयोयोरपि संपयो. सत्ता विवक्षितेति योध्यते । तेन साधनरूपाया आवर्तने तन्निर्वाहः, साध्यरूपायाश्च निरन्तरम्यैयं विवक्षित गवतीति सूच्यते । फलनयमित्यनेन मूले यादृशीति सेवाविशे- पणेन यत्तदोनित्यसम्बन्धस्मारणात् फलंपि तादृशमिति प्रकारचोधकं विशेषणं स्मार्यते । तथा च तनोत्तममध्यमजघन्यभेदेन वाह्यमानस्सोस्यैविध्यस्य सिद्धत्तादवापि फलनय- मुच्यन इत्यर्थः । नहि किं तत्फलनयमित्यपेक्षायां टीकायां तत्स्वरूपं विभजन्ते अलौकिक सामर्थ्यमित्यादि । तत्रालौकिकमामणे नाम परप्राप्तिविवग्णश्रुत्युक्तभगवत्स्वरूपानुभवे 'प्रदीपदावेश' इतिसूत्रोक्तरीतिकभगवदावेशना योग्यता यया रसात्मकम्य भगवतः पूर्ण- स्वरूपानन्दानुभवः । श्रीदेवकीनन्दना अप्येवमाहुः । श्रीहरिरायास्तु भगवद्विरहानुभव. सामर्थ्यमित्याहुः । श्रीकल्याणरायास्तु भगवता सह गानादिसामर्थ्य मुख्यानामिवेत्साहुः । चचागोपीशास्त्वलौकिरभजनानन्दानुभव स्वरूपयोग्यतेत्याहुः । एतत्मर्व भगवतो नाना- निधप्रवेशहेतुकन्याद्भगवदिन्छायाश्च ज्ञातुमशस्यवादुपपन्नम् ।

सेवाफलम् । सायुज्यं 'भक्त्या मामभिजानाती'त्युक्तो भगवत्स्वरूपे लयः । चचा अप्येवम् , श्रीदेवकीनन्दनाथ । श्रीहरिरायास्तु सह युनतीति सयुरु सयुजो भावः सायुज्यं संयोगा- नुभवसामर्थ्यमित्याहुः । श्रीकल्याणरायास्तु गोपानामिवेति विशेपमाहुः । सेयोपयोगिदेदोक्षरात्मको देहेन्द्रियासुद्दीनः पुरुपतीपशुपक्षिवृक्षाद्याकृतिः संस्थानविशेषः । तदेतत् फलत्रयं विविधसेवायां यथायथं योध्यमित्यर्थः । ननु 'यथाफतु'रिति श्रुतौ तत्क्रतुन्यायस्योक्तत्वात् संन्यासनिर्णये 'भावना साधनं यत्र फलं चापि तथा भवे'दित्याचार्यरपि तदंगीकारान्यायत एवानापि तादृशफलप्राप्तिसिद्ध- विशेषतस्तत्कथनस्य किं प्रयोजनमित्याकांक्षायां तत्र हेतुं वदन्ति मूले अलौकिकस्य दाने हीत्यादिपादत्रयेण । अलौकिकस्य दाने हि चाद्यः सिध्येन्मनोरथः ॥१॥ फलं वा ह्यधिकारो वा, अत्र हिहेतौ । चोवधारणे । यतो हेतोरलौकिकस्य सम्पद्याविभीवाधिकर- णोक्तरीतिकस्याक्षरात्मकविग्रहस्य दान एव आद्य आदी भव उत्तमफलविषये विद्यमानो मनोरथः निश्चयशब्दोक्तकामचारात्मकः सिध्येत् । अदाने तु फलं चा हि निश्चयेन अधिकारो वा सिध्येदित्यनुपज्यते । तथा च : लोकवत्तु लीला कैवल्य'मिति न्यायेन भगवता अलौकिकम्य सम्पद्याविर्भावसूत्रोक्तदेहम्य दाने एव तत्सम्बन्धिफललाभान तत्कतु- न्यायमात्रेण पूर्वस्य सिद्धिरित्यतस्तन्निरूपणमित्यर्थः । पाद्वयमनादरे । तेन तत्क्रतुन्यायेन कदाचित् तद्वयं भवतीति चोधितम् । नन्वधिकारस्य कार्यान्तरयोग्यतारूपत्वात् तस्य च साधनदशायामपि सत्त्वात् कथं फलत्वमित्यत आहुः । न कालोत्रनियामकः ॥ १॥ ॥ इति । अत्रेत्यधिकारे । तथा च कालनियम्यत्वाभावेनानावृत्त्या नित्यत्वादस्वापि फलत्वं निःप्रत्यूहमित्यर्थः । एतये एकं दानहेतुकमन्यवयमपि भगवदनुग्रहैकहेतुकम् । मर्यादा- मार्गे निर्गुणाक्षरविद्यया ताशतत्प्राप्तेः सगुणया सन्मनोमयदहरादिविद्यया च 'जक्षन् कीडन् रममाण'इत्यादिनोक्तश्चर्यपर्यन्तप्राप्तेरेव श्रावणात् ततोधिकस्य सेवोपयोगिदेहादे- स्तत्र केवलया भक्तिरहितमर्यादया वक्तुमशक्यत्वात् । तया तदुपगमे 'यमेवैष ' इत्यादि- श्रुते भक्त्याहमेकया ग्राह्य' इत्यादिस्मृतेश्च विरोधस्य दुष्परिहरत्वाच । अतस्तत्रयमत्रो- च्यत इति भावः । अत्राद्यस्य दानेन सिद्धौ ‘रुद्रादीनां वचः श्रुत्वे'त्यादिकृष्णोपनिषन्मत्रा वृहदामनीयकथा ‘संकल्पो विदितः साध्व्यः' इति कुमारिकाः प्रति भगवद्वाक्यं प्रमाण- खेन बोध्यम् । द्वितीये च नकात्मतां म' इत्यारभ्य 'गतिमण्वीं प्रयुक्त' इत्यन्तं कपिल- २९ । . श्रीपुरुषोत्तमविरचितप्रकामसमेतम् । वास्यम् । तृतीये च 'को वामिहैत्य भगवत्परिचर्ययोचे'रिति जयविजयी प्रति सनकादि- वाक्य ज्ञेयम् । तयो पातस्तु भगवदिच्छात एवेति तव निवन्ध प्रतिपादितमिति न कश्चित्सन्देह. ॥ १॥॥ ननु भवत्वेवमनुग्रहरैविध्यात् फलपैविध्यम , तथापि 'नित्य हरौ विदधत' इति वाक्ये कामक्रोधादीनामपि भगवति नित्य विधाने तन्मयत्वस्योक्तत्वात् तन्मय च सायुज्यस्यैव युक्तत्वात् सिद्धान्तमुक्तावल्याम प्युभयोस्तु कमेणैव पूर्वोक्तैच फलिप्यती' त्यनेन मानस्सा एप फलत्वेनोक्तत्वात् तयापि तन्मयताया सिद्धौ तस्यैव युक्तत्वात्कथं तदभावो येन तृतीय फलमित्यत आहुः । उद्देगः प्रतिबन्धो वा भोगो वा म्यादिति । सेवाया क्रियमाणायामिति शेप । फि तावतेत्याकाक्षाया तपा खरूप टीकाया विवृणन्ति सेवायां प्रतिवन्ध इत्यादि । प्रतिवन्धो नाम पिसामग्री तजनक प्रतिवन्धक । तदनोद्वेगादित्रयम् । तत्रोद्वेगो नाम उच्चैर्मय चलन वा । ओविजी भय चलनयो । तदन पाया नियमागाया तुशादियो मनसो भर पा पापादिना उटे 17 वा। अन द्वितीयमटतन्यम् । एतदुभयमप्यान्तरमता द्विविधोप्युद्वेगो चाह्यसेवाफ्लरूपाया मानसीतत्समानाधिकरणनिरुद्वसामग्रीरूपस्तत्प्रतिवन्धक । प्रतिवन्धो नाम तलक्षीकृत्य वा तत्प्रतिकूलो पा निगह विश्रणे ननिसल्ये गा । य ने। सोन सेवाया रुचौ सत्यामपि शरीरादिमामम राकिदिकसायिकादि यापाररूपो वाह्यसेनासामानाधिकरण्यात् तद्विरुद्धसामग्यात्मकस्तत्स्वरूपप्रतिबन्धक कादाचित्क । भोगो नाम सुसटु समाक्षात्कारोन्यवहाररूप प्रसिद्धो देहेन्द्रियोभयनिष्ठत्वादुभय- विधमेनानिमामग्रीरूपो बलिष्ठ स्वभावत प्राप्त । तथा च नेपा मेगापिन्द्वकायिकाचिक- मानसिफसामयुत्पादकत्वन मानम्या जघन्य पिादनात् तया तन्मयताया अमिद्वौ सुसेन तृतीयस्य फलस्य सिद्धिरित्यर्थ । ननु भवत्वेव तथापि यदन मुख्य फल तत्त दानैकसाध्यमित्युक्तम् । दान तु पूर्व ज्ञातुमशक्यम् । तथा सति स्वन पुरुषार्थत्वेन सेवाकरणे गम कि फलं भविष्यतीति सन्देह कथ निवर्ततेत्यत आह । तु वाधकमकर्तव्यं भगवतः सर्वथा चेनतिर्न हि यथा वा इति । नुः शकानिरासे । याधकं पूर्वोक्त वयमकर्तव्यं भगवतः सर्वधा चेत् तदा हि निश्चयेन गतिन, प्राणाना देहादुलमग न । मनसो वा भगवद्व्यतिरिक्ते गतिर्न, किन्तु 'वामनमि दर्शनाच्छ -दाय त्यधिकरणोकन्यायेन भगवत्येव लय । 'ता नापिदनि- १ विगामष्णुत्पादात्वान् प्रतिययम्वमिति पाए । माकरण ३० सेवाफलम् । त्युक्तरीत्या भगवदेकतानत्वं हि निश्चयेन । एतेन मुख्यफलभवनविषयकसन्देहनिवृत्ति- रित्यर्थः । यथावेति भिन्नं वाक्यम् । अत्रापि बाधकं भगवतः अकर्तव्यं चेदि- त्यन्वेति । तथा च यथा येन प्रकारेण सेवा, यत्तदोनित्यसम्बन्धातथा तेन प्रकारेण वाधकं भगवतोकर्तव्यं चेत्तदा, वा फले विकल्पः, सेवा मध्यमा चेन्मध्यमम्, जपन्या चैअपन्यं फलमित्येवं सन्देहनिवृत्तिरित्यर्थः । अथवा । ननु सेवा हि भक्तिमार्गीयं साधनम् । भक्ति- मार्गश्चानुग्रहैकलभ्यः पुष्टिप्रवाहमर्यादायां स्थापितः, निवन्धे च 'सर्वथा चद्धरिकृपा न भविष्यति यस्य हि । तस्य सर्वमशक्यं हि मार्गेस्मिन् सुतरामपी'त्यनेन । एवं सत्यस्मिन् मार्गे प्रतिवन्ध एव कथं येन फलत्रैविध्यमित्यत आहुः तु धाधकमित्यारम्य यथा- वेत्यन्तन् । अन त्रीणि वाक्यानि, तेपु विष्वपि वाधकपदं चैत्पदं चान्वेति । तथा च पाधकं पूर्वोक्तं भगवतः अकर्तव्यं चेत्तदा प्रतिवन्धस्सामावाद्गतिर्मध्यमं फलं भवति । याधकं सर्वथा चेत्तदा न हि निश्चयेन सेवाफलमेव न । वाधकं यथा तथा चेत्तदा वा विकल्पः । तथा चैवं भगवदिच्छातवैविध्यमित्यर्थः । तर्हि विकल्प किं कार्यमित्यत आहुः । अतत्वनिर्धारोऽविवेकः साधनं मतम् ॥३॥ बाधकानां परित्याग, इति । अत्रोक्तवाक्यद्वयस्य त्रयस्य वाऽसन्दिग्धत्वादतत्यनिर्धार इत्यादिकं व्याकुर्वन्ति ! प्रयाणां साधनपरित्यागः कर्तव्य इति । प्रयाणां पूर्वोक्तानां वाधकानां यत्साधनमतत्त्वनिर्धाराविवेकरूपं तस्य परित्यागः सर्वथा त्यागः कर्तव्यः। तत्प्रतियोगि- भूततत्त्वनिर्धारविवेकयोरम्यासेन तयोः प्रागभावानिवृत्तिः सम्पादनीया, ध्वंसो वा । तथा च नवीनतदुत्पादकसाधनत्यागे यथा भोजनपरित्यागे पूर्वाजीर्णस्य निवृत्तिः भाविनश्चानुत्पत्ति- स्तथा तत्वनिर्धारे जाते बुद्धिदोपरूपस्योद्वेगस्य निवृत्त्या विवेके च जाते प्रतिबन्धमोग- योनिवृत्त्या तयोनिःशेषनाशः सम्पादनीय इत्यर्थः । ननु बाधकत्यागे कर्तव्ये भोगयाग आगतः, तथाकृते शरीरस्थितेलादेश्वासम्भवात् सेवाया एवासिद्धिः, प्रतिवन्धस्स चादृष्टजन्यत्वात् तत्त्यागस्याशक्यत्वमिति सेवासिद्धिरेव दुर्घटेयाशंकायां तदथै विभागमाहुः भोगेपीत्यादि । भोगेप्येकं तथा परम् । निःप्रत्यूह महान् भोगः प्रथमे विशते सदा ॥४॥ अपि समुधये । भोगे, अपि शब्दात् प्रतिवन्धे, एकं परित्याज्यमिति शेषः । तथेति वैधम्य दृष्टान्तः । यथा भोगप्रतिवन्धयोरेकं परित्याज्यं तथा परं द्वितीयं निःप्रत्यूहं विभशून्यम् । भोगस्य निःप्रत्यूहत्वे हेतुर्महान् भोगः प्रथमे विशत इति । ' , श्रीपुरुपोत्तमविरचितप्रकामसमेतम् । ३१ प्रतिनन्धस्य तथात्वे हेतुः सदेति । तदेतत् सर्वं मन्दादेर्दुष्करं दुर्गेयं चेति तदर्य गृह्णन्तो व्याकुर्वन्तः प्रतिलोमनगमादाय प्रथमतो भोग विभजन्ते भोग इत्यादि । भोग उक्तरूपो द्विप्रकारकः । तयोर्मध्ये लोकासक्तिजन्मा सार्वदिकत्वेन वलवद्वापकत्वादवश्य यक्तव्य एवेत्यर्थः । ततो न्यून प्रतिवन्धं निभजन्ते प्रतिबन्धोपीत्यादि । तस्य कादाचित्कत्वेन खल्पत्वात् पूर्व तत्त्यागप्रकारमाहुः तत्रेत्यादि । तयोः प्रतिबन्धयोर्मध्ये आद्यः साधा- रणः बुद्धया उपायचातुर्येण त्याज्यः। यद्यपि तत्त्वनिर्धारविवको पूर्व प्रतिवन्ध- निघातकत्वेन सूचितौ तथापि न तावन्माण निवृत्तिः, किन्तु युद्धिरपि तत्सहकारित्वेना- पेक्षिता । अतस्तया साज्य इत्यर्थः । ननु भवत्येव तथाप्यलौकिकभोगात्यागे किं वीज- मित्याकांक्षायां तर यीजमाहुः अलौकिक इत्यादि । तुः शकानिरासे । अलौकिको भगवदत्तप्रसादत्वेन क्रियमाणो मोग. फलानां मध्ये प्रथमे आद्यमनोरथात्मके प्रवेशं प्रामोल्यतो निःप्रत्यहत्वान्न त्याज्य इत्यर्थः । अयमेव हेतुर्मूले महानिति पदेनोक्तो योध्यः । द्वितीयप्रतिवन्धस नि.प्रत्यूहले यो हेतु. सदा पदेनोक्तस्त व्युत्पादयन्ति भगवत्कृत इत्यादि । सेवाया खस्स रुचेः सामग्रीसम्पत्तेश्च सत्त्वेपि यदा पुनः पुनस्त- द्विघटनेन तन्निर्माहाभाव. सेवायामरुच्यादिर्वा स भगवत्कृतप्रतिवन्ध । तत्रैव हि खस्या- न्येपां च 'दैवमत्र विघातक'मिति बुद्धिरुदेति । तादृश स चेद्भवेत् तदा भगवान् फल पूर्वोक्त विविधमपि सेवाफल न दास्यतीनि मन्तव्यम् । तेन सेवाप्रतिवन्धवता युक्तिमिर्विचारणीयम् । तदान्येपा गुदीना सेवा चेत्तदर्थ कुर्यात्तदा सापि व्यर्थी । एतत्फलरूपार्थविरहितेति मन्तव्यमिति पूर्वेण सम्बन्ध । तदाय जीव — एवं पञ्चविधं लिंग'मिति चतुर्थस्कन्धवाक्योक्तश्चेतनायुक्तसघात आसुर इति निधीरः कार्य इति प्रायपाठादायाति । तदा ज्ञानमार्गेण स्वात्मनि प्रपञ्चे चाक्षरब्रह्मत्वभावनपरेणास्थूलादि- सदाद्युपासनपरेण वा स्थातव्य शोकाभावाय । आत्मज्ञानस्य शोकनाशकत्वश्रावणात्तथा स्थितौ तस्मिन् सघात निवृत्ते एतस्याक्षरसायुज्य वा तर स्थितिर्वा भवतीति विवेका सेवाफलात् पृथकरणमित्यर्थ । अनैतन्यदर्शनेन गमेद प्रतिभाति । आसुरजीना हि पुष्टिप्रवाहमर्यादायां 'जीवास्ते ह्यामुरा. सर्ने प्रवृत्तिं चेति वणिता' इत्युक्तलक्षणका अज्ञदुभेदेन द्विविधा निरूपिता. । ते तु नोपदेशाही । 'सात्त्विका भगवद्भक्ता ये मुक्तावधिकारिण । भवान्तसम्भवा दैवात् तेपामर्थे निरूप्यत' इति प्रतिज्ञावाक्येन तथा निधयात् । अत पर 'प्रवाहेपि समागत्य पुष्टिस्थस्तैनं युज्यते । सोपि तैस्तरकुले जात कर्मणा जायते यत' इत्युक्तोवशिष्यते । यथा अलीखानादि । अतस्तादृश तद्देश्य प्रति वायमुपदेश इति ॥ ४ ॥ एवमलौकिकभोगभगवत्कृतप्रतिवन्धयोस्त्यागानहत्वे वीज व्याख्याय साधारण- प्रतिवन्धलौकिकभोगयोस्त्याज्यले वीज वक्तुमवतारयन्ति ।

३२ सेवाफलम् । सविनोल्पो घातकः स्याद् पलादेती मदा मती । हितीये सर्वधा चिन्ता त्याज्या मंसारनिश्चयात् ॥५॥ साधारण इत्यादि । कथमिति हेतुरूपप्रकारवोधकम् । नया चैतयोस्त्यक्त- व्यताप्रयोजकः प्रकारः क इत्यर्थः । अन्यथा प्रयाणां साधनपरित्यागः कर्तव्य इति पूर्व- अन्पविरोध आपोतेति । व्याकुर्वन्ति सविसत्वादित्यादि । कालादिकृतरिमसाहित्यात् खरूपतः साधनतः फलतश्चात्पत्वात् तथेत्यर्थः । एवं भोगे त्याज्यत्वयीजदये व्याख्याते शिष्टो पातकत्वरूपो हेतुः साधारणप्रतिवन्धनिष्ठ इत्यर्थादेव योधितम् । ननु प्रतिवन्धकन्यागप्रसारम्य पूर्वमुक्तत्वात्पुनस्तत्कयनस्य किं प्रयोजनमत आहुः पलादेतापिति । व्याकुर्वन्ति एतापित्यादि । यत एती लौकिकमोगसाधारण- प्रतिबन्धौ सदा क्षणे क्षणे प्रतिबन्धकावतो युद्ध्या उपायचातुर्येण पलाद् इदात् त्याज्यो । यथा भुक्तं चेन्ममेदानीन्तना सेवा गता, मया गानाधासक्त्या जागरः कृतश्चेदिदानी निद्रायाति, तस्मादेवं न विधेयमित्येवं युद्ध्योपायचातुर्येण सर्नया त्यक्त- व्यावित्येतदर्थ पुनः कथनमित्यर्थः । द्वितीये सर्वथेति व्याकुर्वन्ति । द्वितीय इत्यादि । पूर्व भोगप्रतिवन्धयोरुभयोरुतत्वात् कोन द्वितीय इति शकानिरासायैतदुक्तम् । ननु भगवत्कृते प्रतिवन्धे यादृशी स्थितिरपेक्षिता सा तु पूर्व विवृतैवेति पुनस्तदुक्तेः किं प्रयोजनमत आहुः ज्ञानेयादि । तथा च पूर्वोक्तादपि यो हीन. सिद्धान्तमुक्तावल्यां 'भक्त्यभावे विति कारिकयोक्तस्तस्य ससारेत्यन्ताभिनिवेशनिवृत्त्यर्थमिदमित्यर्थः॥५॥ ननु पूर्वमुद्वेगादित्य ससाधन साज्यत्वेनोक्त्वाग्रे तत् त्याज्यत्वात्याज्यत्वविभागं च कृत्वा पश्चाद्वयोरेवावश्यं त्याज्यत्वं यन्निरूपित न तूद्वेगस्यापि, तत् कुत इत्याकांक्षायामाहुः । न त्वाद्ये दातृता नास्तीति, अत्र प्राञ्चः पाठं द्विधांगीकुर्वन्ति केचिन्नन्विति । केचिच्च नत्वेति । तत्रापि नु इति मिन्नं पदं निश्रयार्थकमिति मम प्रतिभाति । आये उद्वेगे । तुः शंकानिरासे । नु निश- येन वा न, चिन्ता फलसावनविपयिणी न त्याच्या । तर हेतु । दातृता नास्तीति । अदात्ता नास्तीति वा । तदेतद्व्याकुर्वन्ति । आधफलेत्यादि । आधं यत् फल- मलौकिकसामर्थ्यरूप, तस्याभावे अप्राप्ती, भगवतो दातृत्वं नास्ति, तदा तस्मिन् दानसमये सेवा अनाधिदैगिकी। उद्वेगो हि मानसो, मानस्सा एव विरुद्धसामग्रीजनक., सा दानसमये 'चेतस्त- अयण' 'ता नाविदन्' इतिवद्भगवति लीन न करोति, तेन सा सेवा अनाधिदैवि- की युक्त भवति । अत उद्वेगे तन्निवृत्त्यर्था चिन्ता भगवद्भावनरूपा न साया, किन्तु १ सागरनुपनि पार ।

श्रीपुरुषोत्तमविरचितप्रकाशसमेतम् । सदा कर्तव्यैव । द्वितीयपक्षे उद्वेगेन कृत्वा फलाभावे मुख्यफलाप्राप्ती भगवतोऽदातृत्वं नास्ति किन्तु तदोद्वेगदशायां सेवानाधिदैविकीत्युक्तं भवति । अतस्तस्या आधिदैविकीत्व- सम्पादनायोगिनिवृत्त्या चिन्ता न त्याज्या किन्तु कार्येव । तथा चोद्वेगस मुख्य- फलातिरिक्तफलाप्रतिवन्धकत्वाद् मुख्यफलस्य केवलं दानमात्रसाध्यत्वाद् दित्सायाश्च 'अनिच्छतो गतिमण्वी प्रयुक्त' इतिवाक्येन 'कहिचित् स्म न भक्तियोग'मिति वाक्येन च ज्ञातुमशक्यत्वानोक्तमित्यर्थः । अत्रानाधिदैविकीत्युक्तं भवतीति कयनेन सेवाया अनाधिदैविकीत्वसम्पादकलरूपमुद्वेगत्याज्यताबीजमप्युक्तं ज्ञेयम् । ननु तत्त्वनिर्धारविवेकाम्यां प्रतिवन्धत्यागे यतमानस्यापि त्रयाणां त्याज्यवीजं जान- तोपि यदा न प्रतिबन्धनिवृत्तिः तदानेन किं कार्यमित्यत आहुः । तृतीये बाधकं गृहमिति । तदेतद्विवृण्यन्ति भोगाभाव इत्यादि । उद्विग्नः साधारणप्रतिवद्धोपि निरुपधि थाकयञ्चन भक्तिमान् सेवेत तदापि तृतीयं फलं भक्तिमत्त्वाद्भवति तस्मिन्नपि भोगो लौकिकः प्रतिबन्धं करोति । अतस्तृतीये भोगरूपे प्रतियन्धेऽशक्यत्यागे सति भगवता गृहत्याग एवानेन प्रकारेण बोध्यत इत्यनुसन्धाय वाधकभूतं गृहं त्याज्यम् । यतो भोगाभावस्तदेव सिध्यति यदा गृहपरित्यागः । तथा च तदानीमयमेवोपायो नेतर इत्यर्थः । अयं त्यागो न भक्तिमार्गीयसंन्यासरूपः, अधिकाराभावात् , किन्तु 'तादृश- सापि सततं गेहस्थानं विनाशन'मित्यादि भक्तिवर्धिन्युक्तभक्तिसाधनसम्पादनार्थ इति ज्ञातव्यम् । एवमत्र यावान् कठिनांशः सोत्र स्खय व्याख्यातः । अतःपरं य एवं गृहत्यागमपि न कर्तुं शक्नुयात् तदर्थं मूले उपायमुपदिशन्ति । अवश्येयं सदा भाव्येत्यादि । इयं फलत्रयी प्रतिवन्धकत्रयी च अवश्या, यथायथं भगवदनुग्रहैकलभ्यत्वा- गवद्विचारमानसाध्यत्वाच अवश्या, न स्वकृतसाधनाद्यायत्ता । अतः सदा भाव्या प्रतिबन्धोपस्थिताववश्यत्वेनैव स्वदैन्याय तदा तदा विचारणीया । अत्र सदापदेनेदमेव पोयते, न तु कालनैरन्तर्यग् । 'निवेदनं तु स्मर्तव्यं सर्वदे'त्यादीनां विरोधापत्तेः । सर्वमन्यन्मनोभ्रमः ॥ ६ ॥ फलस्य वकृतसाधनायतत्वमावर्ग प्रतिवन्धस्य सकृतसाधनान्तरनाश्यत्वभावनं च मनोभ्रमश्चित्तबाहिर्मुख्यसम्पादकं चायल्यमात्रम् , भगवदिच्छां विना कथमपि केनापि किश्चिदपि कर्तुमशक्यत्वात् । 'एष उ एव साधु कर्म कारयती'त्यादिश्रुत्या तथा योधनात्। 'अनन्याश्चिन्तयन्तो मा मिति वाक्ये तादृशां योगक्षेमवहनस्य खकर्तव्यताया उक्तत्वादन प्रतिबन्ध निवृत्त्यादियोगक्षेमस्यापि भगवतैव कर्तव्यत्वादेकादशस्य विशेध्याये 'जातश्रद्धो मकथामु निर्विष्णः सर्वकर्ममु । वेद दुःखात्मकान् कामान् परित्यागेप्यनीश्वरः ॥ ततो ५ सेवाफलम् । मजेत मां भक्त्या श्रद्धालुढनिश्चयः । जुपमाणध तान् कामान् दुःखोदकाँध गर्हयनि- त्यन्तेन तथा करणस्याज्ञापनाच ॥६॥ ननु ययेवं तदा भावनस्यापि कि प्रयोजनम् । नहि जीवकृतया भाषनया सत्य- संकल्पो भगवान् स्वविचारितादन्यया किमपि करोति । तथा सति किं मावनोपदेशेनेत्यत आहुः तदीयरपीत्यादि । तदीयैरपि तत् कार्य पुष्टी नैव पिलम्पयेत् । एते हि तदीयाः, सर्वसमर्पणात् सर्वप्रकारेण मगवत एव भावनाच भगवदीयाः, तैरपि तदुक्तं भावनं कार्यम् । तत्र हेतुः । पुष्टी अनुग्रहविपये, भगवान्नैव बिलम्वयेत् । एतत्कृत्या विलम्ब न कारयेत्, न कुर्याद्वा । रामो राज्यमचीकरदितिवत् खार्थे णिच् । तथा च पुष्टिमर्यादायां स्वयमेव साधनानामुपदेशादस्मात् साधनद्वारा वोदिधीपति, तानि विना वा न वेति न ज्ञातुं शक्यते, अतो विलम्यामायायायमुपदेश इत्यर्थः । ननु ‘सत्त्वं रजस्तम इति गुणा जीवस्य नैव मे । चित्तजा यैस्तु भूतानां सजमानो निवध्यत' इत्येकादशस्कन्धे भगवद्वाक्यात् चित्तजा गुणाः कालकर्मखभाववशात् क्षुम्य- माणाः प्रतिवान्येव तदा किं कार्यमित्सत आहुः गुणक्षोभेपीत्यादि । गुणक्षोभेपि द्रष्टव्यमेतदेवेति मे मतिः ॥७॥ गुणक्षोभोपि परंपरया भगवदिच्छाधीन इति तत्रापि एतदेव भगवत्कृतं विलम्बन- मेव कारणत्वेन द्रष्टच्यम् । इति मे मत्तिः । इदमस्माभिरेवोच्यते । अन नान्यस्य सम्मतिरित्यर्थः ॥ ७॥ तत्र हेतुः कुसृष्टिरित्यादि । कुसृष्टिरत्र या काचिदुत्पद्यत स वै भ्रमः ॥ ७॥॥ शास्त्रे तदर्थ साधनान्तरोपदेशदर्शनाद्विरुद्धयुक्तिसप्टिस्त्र या विकल्पेनोत्पयेत, परं स विकल्पोधिकारभेदानवधानाद् वै निश्चयेन भ्रमः । भगवता 'दैवी खेपा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति त' इति गुणमूलनिवृत्तये खप्रपति- मानस्सैव साधनस्योक्तवात् । साधनान्तरकरणे च निःशेषतन्निवृत्त्यमावात् । भगवत्कृत- विलम्यभावने तु भगवानेव शरणमिति बुद्ध्युत्पत्तेः । अतोस्माभिरिदं भगवदमिप्रेतमेवोच्यत इति तथेत्यर्थः ।। ७॥ ॥ इति तत्प्रेरणप्राप्तबुद्धिस्तु पुरुषोत्तमः । सेवाफलोक्तिविवृतेर्विवृतिं चैवमुजगौ ॥१॥ इतिश्रीमद्वल्लभाचार्यचरणकतानश्रीपीताम्बरात्मजस्य श्रीपुरुषोत्तमस्य कृतौ सेवाफलविवृत्तिप्रकाशः सम्पूर्णः ।।

श्रीकृष्णाय नमः। सेवाफलम् । विवृतिविवरणसमेतम् । नला श्रीवल्लभाचार्यान् विडलेशान् निजान् गुरून् । सेवाफलस्य विवृतिव्याख्यानं वितनोम्यहम् ॥१॥ अथ दैवोद्धारप्रयत्नात्मानः श्रीमदाचार्या निजानां सुखेन सिद्धान्तमुक्तावल्युक्त- सेवायाः सिद्धये तत्फलप्रतिबन्धसाधनानि निरूपयन्तः प्रतिज्ञां कुर्वन्ति यादृशी सेव- नेति । एतद्वन्यस्यातिसंक्षिप्तत्वेन दुर्योध्यत्वात् स्वयमेव विवृति रचयन्तः सेवाया निजग्रन्थेषु फलत्वांगीकारेण तत्फलेवन्येपूच्यमानेषु सेवायाः साधनतामाशंक्य साधनताममं वारयन्तः फलनामान्याहुः सेवायामिति । यादृशी सेवना प्रोक्ता तत्सिद्धौ फलमुच्यते । अलौकिकस्य दाने हि चाद्यः सिध्येन्मनोरथः ॥१॥ सेवायां फलत्रयम्, अलौकिकसामर्थ्यम् , सायुज्यम्, सेवोपयों- गिदेहो वैकुण्ठादिषु । सर्वत्र साधनान्ते फलम् । फले लब्धे साधनत्यागः । अत्र सेवासाधकसेवायां क्रियमाणायामित्युक्त्या न तद्भमस्यावकाशः । यादृशी सिद्धान्तमुक्ता- वल्यां कथिता मानसी सेवा, तसिद्धी मानसीत्वे सिद्धे, तस्यां यत्फलत्रयमलौकिकादि, तदुच्यते । आधफलस्थालौकिकसामर्थ्यस्य प्रभुणा दाने कृते, चकारातदेहेन्द्रियादिषु खरूपे स्थापिते, आदी उत्तमफले जातो मनोरयः सिध्येत्, तस्यादाने फलं सायुज्यं वा मिध्येतु, अधिकारः सेवोपयोगिदेहो वा सिध्येदित्यग्रिमेणान्वयः । हि युक्तोयमर्थः । अत्र द्वौ वाशब्दो पूर्वफलतुल्यत्रयोधकौ ॥ १ ॥ फलं या घधिकारो वा न कालोत्र नियामकः । उद्देगः प्रतिवन्धो वा भोगो या स्यात्तु बाधकम् ॥२॥ सेवायां प्रतियन्धकत्रयम्, उढेगः प्रतिवन्धो वा भोगो वा । फलमिति । आधफलमनियतम् , परमानुग्रहैकलम्यत्वान् । एवं चायरस दानैकहेतुत्वम् । फलद्वयस्य साधारणानुग्रहहेतुत्वम् । नन्वधिकारस्य सेवापूर्वकाले स्थितत्वात्कथं फललमित्यत आहुः न काल इति । अस्मिन्नधिकारे सत्ययुगादिरूपः कालो नियामको न । अतः कालानियम्यत्वात्फलताधिकारस्य । एवं सोपपत्तिकं फलत्रयमुक्त्वा प्रतिबन्धकायमाहुः मूले उद्वेग इति, विवृतौ सेवायामिति । उदधिको वेगः मयम्, अपराधादिना मन- साञ्चल्यं वा पापादिना । स च सेवाऽरुचिसम्पादनेन वाधक । प्रतिबन्धश्च सेवायां रुची सेवाफलम् । सत्यामपि तत्समये लौकिकवैदिककायिकादिकार्यासक्तिरूपः । स च तत्समयरोधनेन बाधकः । मोगश्च शरीरवृत्त्यनुसारेणाभ्यवहारशयनादिरूपः । सोपि पूर्ववद्वाधकः ॥२॥ ननु फलानामनुग्रहलभ्यतयानुग्रहस्स च भगवदिच्छाधीनत्वात्सेवायां क्रियमा- णायां मम फलं भविष्यति न वेति सन्देहः कथमपेयादतस्तन्निवारणाय तु बाधकमित्या- रभ्य यथा वेत्यन्तमाहुः । अकर्तव्यं भगवतः सर्वथा चेद्गतिन हि। यथा वाऽतत्त्वनिर्धारोऽविवेकः साधनं मतम् ॥ ३॥ बाधकानां परित्यागः, प्रयाणां साधनपरित्यागः कर्तव्यः । भगवतो वाधकत्रय न करणीयं चेत् तर्हि मनस अन्यत्र गमनं न, फल तु यथा वा । येन प्रकारेण सेवा तथा तेन प्रकारेण फलमिति सन्देहाभावः । यद्वा भक्तिमार्गो भगवदनुग्रहलभ्यः । तस्मिन् कथं प्रतिबन्धक नयमित्यतस्तु वाधकमित्यादि यथा वेत्यन्तमाहुः । वाक्ययमत्र । वाधक पूर्वोक्त भगवतीकर्तव्यं चेत्तदा गतिनीम सेवायां सायुज्यम् ॥ १॥ बाधक चेत् सर्वथा तदा न हि फलाभाव इत्यर्थः ॥ २॥ यत्तदोनित्यसम्बन्धाद्यथा वाधक तथा चेत्तदा वा नाम फले विकल्पः ॥ ३॥ तथा चैवं भगवदिच्छयानुग्रहस्य विध्यात् फले त्रैनिध्यम् ! तथा च यस जीवस्य यादृशोधिकारः स तादृशी सेवां करिष्यति, तस्य स्वाधिकारयोग्य फल च भविष्यतीति सन्देहाभावः । एक फलविकल्प प्राप्ते कि कार्यमत आहुः अतत्व निर्धार इत्यारभ्य बाधकानां परियाग इत्यन्तम् । निवृतौ त्रयाणामिति । प्रयाणामुढेगादीनां साधनसातत्त्वनिधीरस्याग्वेिकस्य च तत्त्वनिर्धारस्य विवेकयोरम्यासेन सर्वतस्त्यागः कर्तव्यः । ननु तत्त्वनिरिदिवेको किंरूपौ? तथा हि, तम्य लोकोदप्रसिद्धस्स पुरुषोत्तमस्य मानस्तत्वम् , तम्य निर्धरण निधार. । 'सबै सत्विद ब्रह्म,' 'स हैतावानास, 'अराण्ड कृष्णन'दित्यादिभिः सर्वन भगवद्भाननम् । रिवकस्तु 'हरि. सर्व निजेच्छातः करिष्यतीति सर्वन गगवत्कृतिः । ननु वाधकानां मध्ये भोगस्यापि त्यागे जाते त विना शरीरस्थितेरमम्भरात् मेयाया असिद्धिमाशा त्यागे व्यवस्थामाहु. भोगेपीति । भोगप्येक तथा परम् । निःप्रत्यूहं महान् मोगः प्रथमे विशते सदा ॥ ४ ॥ भोगो हि द्विविधा, लोकिकोलाकिसश्च । तत्र लौकिकस्त्याज्य एव ।प्रतियन्धोपि विविधः, साधारणो भगवत्कृतथेति । तत्राद्यो युद्ध्या त्याज्यः । अलौकिकभोगस्तु फलानां मध्ये प्रथमे प्रविशति । भगवत्- तोत्मनियन्धस्तदा भगवान्फलं न दास्यतीनि मन्तव्यम् । तदान्य- मवापि व्यर्धा। तदासुरोपं जीय इति निर्धारः। तदानानमार्गेण स्थातव्यं विवृतिविवरणसमेतम् । शोकाभावायेति विवेकः । भोगप्रतिवन्धयोरेकै परित्याज्यम् । अपिशब्देन प्रतिवन्धस ग्रहणम् । तथा परं द्वितीयं निष्प्रत्यूह विनरहितम्, तर हेतुः, महान्मोगः । एवं प्रतियन्धरूपं वस्त्वपि निष्प्रत्यूहम् । तत्र हेतुः, सदेति । एतत्सर्वं मनसि कृत्वा विवृतौ तात्पर्यमाहुः सूचिकटाहन्यायेन । पूर्व भोगवैविध्यमाहुः भोग इति । लौकिका- लौकिकमैदेन मोगो द्विधा। तत्र अलौकिको भोगो लौकिकासक्तिरूपत्वात् सेवासमय- रोषकत्वात्याज्यः । एवं लौकिकमोगं निरूप्य हेतुसहितमलौकिकभोगं निरूपयन्ति तथेति । विवृतौ अलौकिकेति । अलौकिको यो भोगः स तु फलत्रये यदायमलौकिकसामर्थ्य तस्मिन् सति भगवदत्तप्रसादेन भवतीति तत्प्रवेश उक्तः । एवं च तस्यात्याज्यत्वे यीज- मुक्तम् । एवं द्विप्रकारकं भोगं निरूप्य द्वितीयप्रतिवन्धस्य निर्विवत्वे यो हेतुर्मूले सदा- पदेनोक्तस्तं विवृतौ भगवत्कृत इत्यादिना विशदयन्ति । सेवायां प्रवृत्तस्य यदा दुःसङ्गा- दिना भगवदीयद्रोहे कृते प्रभुः स्वयं प्रतिवन्धं करोति, तदा सेवायामरुचिर्भवति, तदा सर्वथा फलाभावः, तदा तदुपायार्थमन्यसेवन न कर्तव्यम् , व्यर्थत्वात् , तदायं जीव आसुर एव । दैवजीवे सर्वथा फलाभावाभावात् । तदा एतादृशे प्रतिवन्धे चिन्तानिवृत्त्यै आदि- सृष्टी भगवान् जीवं यथा विचारितवांस्तथैव निजेच्छया करिष्यतीत्यादिरूपेण ज्ञानमार्गेण सात यम् । एवमलौकिकभोगभगवत्कृतप्रतिवन्धयोरत्याज्यतामुक्त्वा साधारणप्रतिवन्ध- लौकिकमोगयोस्त्यक्तव्यत्वे निवृती वीजमातारयन्ति माधारणति । माधारणो भोगः कथं त्यक्तव्य इत्याकाहायामाह सविमोल्पो घातकः स्यादिति । ननु लौकिकमोगसाधारणप्रतिवन्धौ कन हेतुना केन प्रकारेण च त्यक्तव्यापिति व्याकुर्वन्ति मविनइनि । लौषिको भोग' सविनत्वात्पन्याभ्यां हेतु गा गन्ठान्या य. । घातकलन हेतुना साधारणः प्रतिवन्धस्त्वाच्यः । नन्वेतत्यागप्रकारस्तत्त्वनिर्धारतिकरूपः पूर्वमुक्त इति पुनः किमर्थमुच्यते ? सत्यम् । पूर्व यदुक्तः स तु नवीनतदुत्पादकमाधनत्यागरूपः । अयं तूत्पन्नयोस्त्यागप्रकारोत उच्यते । सविनोल्पो घातकः स्याहलादेता सदा मता। सविनत्वादल्पत्वाद्रोगस्त्याज्यः । एतौ सदा प्रतिवन्धको । बलादिति । यत एतौ सदा क्षणेक्षणे सेवासमयरोधकत्वेन मतो ज्ञातौ । अतो पलाद्धटादुद्ध्योपायचातुर्येण याज्यौ । तत्खरूपं श्रीपुरुषोत्तमा आहुः । तथाहि, 'यथाधिक भुक्तं चेन्ममेदानीतना सेवा गता, मया गानाद्यासक्त्या जागरः कृतश्चेदिदानी निद्रायाति, तस्मादेव न नियमिति । प्रकृतमनुसरामः । अत पर ज्ञानस्थित्ययोग्यानां भगवत्कृतप्रतिवन्धे स्थितिप्रकारमाहुः । ठितीये सर्वथा चिन्ता त्याज्याऽसंमारनिथगत् ॥ ॥ द्वितीयो भगवत्कृतप्रतिवन्धः । ज्ञानस्थित्यभारे चिन्ताभारार्थमाह द्वितीय इति । द्वितीय इति भगवत्कृतप्रतिवन्धे ज्ञानस्थितावपि पुष्टिमागीयफलत्रिपयिणी चिन्ता सर्वथाs- सेवाफलम् । त्याज्या । कुतः ? असंसारनिश्चयात् । अत्रायमर्थः । 'अस्मिन्पातभयं नास्ति मोचक सर्वथा यत' इति वाक्येन अलीखानादिरिव जन्मान्तरे उद्धरिष्यति । एवं भोगप्रतिवन्धौ त्याज्यत्वेन विचार्य उद्वेगत्यागे वीजं वदन्ति नन्विति । नन्वाये दातृता नास्ति तृतीये बाधकं गृहम् । आद्यफलाभावे भगवतो दातृत्वं नास्ति तदा सेवानाधिदैविकी त्युक्तं भवति । अत्र पाठद्वयम् । नन्विति, मत्विति । नु निश्रयेन, आये उद्वेगे सति फलविषयिणी चिन्ता न त्याज्या । तत्र हेतुमाहुः भगवतो दातृता नास्ति । एतदेव विवृतावाद्येत्यादिनोक्तम् । एवं च सेवाया अनाधिदैविकीत्वसम्पादकलादुद्वेगोपि साज्यः, यदिच्छाकृतो यस्तूद्वेगः, स एवैनं निवारयिष्यतीतिविचारेण त्याज्यः । एवं जानतोपि यथाकथश्चित्सेवायां प्रवृत्तस्य यदा लौकिकभोगः प्रतिबन्धं करोति तदा कर्त- व्यमाहुः तृतीय इति । विवृतौ तदपि भोगेलादिना व्याचक्षते । भोगाभावस्तदेव सिध्यति यदा गृहपरित्यागः । तृतीये मोगरूपे प्रतिबन्धे गृहमेव सजेत्, कृष्णा- र्थमेव गृहं प्रयुजीत । तथा कृते भोगसालौकिकत्व सिध्येदिति लौकिकभोगस्त्यक्त एव । अवश्येयं सदा भाव्या सर्वमन्यन्मनोनमः ॥ ६॥ तदीयैरपि तत् कार्य पुष्टौ नैव विलम्वयेत् । गुणक्षोभेपि द्रष्टव्यमेतदेवेति मे मतिः ॥७॥ कुसृष्टिरन्न वा काचिदुत्पद्येत स वै भ्रमः । एवं कठिनाशं स्वयं व्याकृत्य गृहत्यागेऽसमर्थानां यत्कर्तव्यं तदाहुः अवश्येति । इयं फलजयी प्रतिबन्धकत्रयी चावश्या, अतो पाधकानामुपस्थिती स्वदैन्यसिद्धये सदा विचारणीया । अन्यत्सर्वमिदं साध्वसाधु वा भत्कृतमित्यादिरूपं मनोभ्रमः चित्त- वाहिर्मुख्यमेवेति ज्ञेयम् । ननु भगवान् सत्यप्रतिज्ञः, यथा पूर्व विचारितवांस्तथैव करिष्य- तीति किमेतेनेत्याशंस्याहुः तदीयैरिति । एते हि समर्पणेन तदीयाः । स्वकीयानां सर्व चिन्तनं भगवत एव करणीयम् । अतो भगवदीयेरपि तदुक्तमावनं कार्यम् । एतेनानन्य- शरणान् ज्ञात्वा पुष्टापनुग्रहे भगवान् बाधकेषु सत्खपि नैव विलम्बयेत्, फलं दद्यादेव । ननु चित्तनानां गुणानां क्षोमे विचारे क्रियमाणेपि प्रतिबन्धो भयेदेव तदा यत्कार्य तदाहुः गुणेति । सत्त्वादिगुणेषु भुम्यमाणेप्वपि भगवत्कृतः प्रतिबन्ध एवं कारणमिति द्राएव्यम् । तदापि भगवदिन्याविचारणमेवोपायो नान्यः । मम मतेरत्रैव पर्यवसानम् । सर्वमन्यन्मनोग्रम इति पूर्वमुक्तत्वात् । अत्रास्मिन्यिपये काचिकुराष्टिः कुबुद्धियुक्तिः मगवत्कृतप्रतिपन्धस निवारणे अन्योप्युपायोस्त्येतद्रपा मनसि जायेत तदा सापि अमरूप- बेतिक्षेपम् । एतेनानन्यमावनपूर्वकं भगवदीयैः स्यम् ॥ ६ ॥ ७॥ इतिश्रीसेयाफलयिपृतिच्याख्यानं समाप्तम् ॥

श्रीकृष्णाय नमः। सेवाफलम् । लालूभट्टोपनामश्रीवालकृष्णदीक्षितविरचितटिप्पणीसमेतम् । श्रीराधावदनेन्दुश्रीपानमत्तचकोरकम् । गोवर्धनधरं वन्दे ब्रजराजकिशोरकम् ॥१॥ श्रीमदाचार्यवर्यश्रीनिलेशकृपावलात् । सेवाफलस्य विवृतेर्विवृतिं नितनोम्यहम् ॥ २ ॥ यादृशी सेवना प्रोक्ता तत्सिद्धी फलमुच्यते । सेवायां फलचयमिति । सेवायां सिद्धायां सत्यामित्यर्थः । मूले याशी सेवना प्रोक्ता तत्सिदी फलमुच्यत इत्यत्र सिद्धावितिकथनात् सिद्धस्यैव सर्वत्र फलसापकत्वात् । तथा च यादृशी सेवना तृतीयस्कन्धे देवहूति प्रति कपिलदेवेन 'देवानां गुणलिंगानामानुश्रमिककर्मणाम् । सत्त्व एवैकमनसो वृत्ति स्वाभाविकी तु या ॥ अनिमित्ता भागवती भक्तिः सिद्धगरीयसी'त्यनेन भक्तिशब्देनोक्ता, तस्याः सिद्धौ मुख्यमध्यमहीना- धिकारभेदेन फलवय ज्ञेयम् । तदेव फलनयमाहुः अलौफिकसामर्थ्य सायुज्यं सेचौपयिकदेहो चैकुण्ठादिग्विति । अलौकिकसामर्थ्य तु साक्षात् श्रीवृन्दा- वनादी श्रीकृष्णस्यरूपदर्शनस्पर्शनादिकृतिक्षमत्वम् । 'पश्यन्ति ते मे रुचिरावतसप्रसन्न- पक्रारुणलोचनानि । रूपाणि दिव्यानि वरप्रदानि साक वाच स्पृहणीयां वदन्ती'तिवाक्या- दिह 'पश्यन्ति त' इति तच्छब्देन 'नकात्मतां मे स्पृहयन्ति केचिन्मत्पादसेवाभिरता मदीहा.' इति पूर्वश्लोके उक्ता मोक्षाभिलापिणो गृह्यन्ते । तेपा मोक्षान्तपुमर्थानमिलापात् स्वतन्त्रसेवैकाकांक्षया अलौकिकसामर्थ्य भवति । तेपां पूर्वोक्तभक्त्या प्राकृतलिंगशरीर नश्यति । 'जरयत्याशु या कोश' मितिवाक्यात् । ततो लिंगशरीरनाशे सति भगवदर्शनाद्य- भावे प्रसक्ते सायुज्ययोग्यतायां यदि भगवान् कृपयति तदा दिव्यान्यलौकिकेन्द्रियाणि सम्पादयति, ततस्तैर्भगवद्दत्तैरप्राकृतेन्द्रियैः ‘पश्यन्ति ते मे' इति श्लोकोक्त दर्शनादि सिध्यति । तदेतदुक्त मूले । अलौकिकस्य दाने हि चाद्यः सिध्येन्मनोरथः ॥१॥ अर्थस्तु अलौकिकस्यन्द्रियवर्गस्स दाने भगवता कृते सति आद्यः पश्यन्ती'- सादिलोकत्रयोक्तेपु निषु फलेषु प्रथमो मनोरथो भगवदर्शनादिपियकः सिध्येत् , फलपर्यवसायी भवतीति भगवद्दर्शनादेः परमफलत्वम् । 'अक्षण्वतां फलमिद'मितिश्रुति- ४० सवाफलम् । . रूपगोपिकावाक्यात् । अक्षण्वतामिन्द्रियवतामित्यर्थः । तस्मादलौकिकेन्द्रियदानं भग- वत्कर्तृकमपेक्षितम् , अन्यथा पूर्वोक्तभक्त्या 'जरयत्याशु या कोश मितिवाक्यालिंगशरीरभंगे दर्शनादिकं न सिध्येदिति भावः । न च मास्तु दर्शनादि, सायुज्यमेवास्त्वितिवाच्यम् । 'नैकात्मतां मे स्पृहयन्ति केचिदितिवाक्येन तेषां तदनभिलापात् । इह एकात्मतां न स्पृहयन्ति, अपि तु दर्शनादिकमेव स्पृहयन्तीत्यर्थादायाति । 'मत्पादसेवाभिरता' इति वाक्यात् । अत एव मूले स्पृहापदपर्यायः मनोरघशब्दः उक्तः । अत एव वृत्रासुरेणोक्तं 'न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा समअस त्वा विरहय्य कांक्षे' इति । अर्थस्तु अपुनर्भवं मोक्ष- मपि त्वां विरहय्य न कांक्षे अपि तु त्वामेव फलत्वेन कांक्ष इति । एतदेव श्रीवजसुन्दरी- मिरुक्तं 'अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदाम' इति । परो मोक्षः सायुज्यादिरिति सुबोधिन्यां व्याख्यातं च । अत इन्द्रियवतामिदमेव रसात्मकं पुरुषोत्तमस्वरूपमेव फलम् । भगवता सह संलापो दर्शनं मिलितस्य चेति सुवोधिन्यां सर्वेन्द्रियभोग्यत्वेन कथनात् । अत एवाक्षण्वतामित्यस्य सुबोधिन्या मात्मलाभान्न परं विद्यते'तिश्रुतेर्मोक्षस्यैव पुरुषोत्तम- खरूपमेव फलम् , तद्रहितानां तु मोक्ष एव फलमिति व्यवस्थापितम् । पुष्टिभक्तास्तु भगवदत्तेन्द्रियाणि लब्ध्वा सकलेन्द्रियैः रसात्मकं सरूपमनुभवन्ति । न घेतादृक्त्वं सायु: ज्यादाविति । 'ब्रह्मानन्दे प्रविष्टानामात्मनैव सुखप्रमा संघातस्य विलीनत्वादितिनिबन्धात् । अत एव 'दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जना' इत्यनेन सालोक्यादीनामग्रहण- मुक्तम् । न च मोक्षसुखाज्ञानान गृह्णन्तीतिवाच्यम् । 'मत्सेवया प्रतीतं च सालोक्यादि- चतुष्टयम् । नेच्छन्ति सेवया पूर्णाः कुतोन्यत्कालविप्लुत मितिवाक्ये सेवया पूर्णा इत्युक्त्या तेपां भगवता सभाजनात्, अन्यथा अज्ञत्वान्न गृह्णन्तीति भगवान् तेषां निन्दामेव कुर्यान्न स्तुतिम् । अतो ज्ञायते भगवत्सेवायां मोक्षादप्यधिकरसोस्तीति। 'मधुद्विद्रसेवानुरक्तमनसाम- भवोपि फल्गु रिति वाक्याच । अतः फलदशायामाधिदैविकवृन्दावनादौ या फलरूपा भगवत्सेवा सा मोक्षादप्युत्कृष्टा । अतः सा भगवता परमानुग्रहभाजनाय तादृशाधिकारिणे पुष्टिमक्ताय दीयते, न तु सर्वेभ्यः भक्तम्य इति ज्ञेयम् । 'अस्त्वेवमंग भगवान् मजतां मुकुन्दो गुक्तिं ददाति कर्हि चित्स्म न मक्तियोग'मिति शुकवाक्यात् । इह भक्तियोगमित्यस फलरूपपुष्टिभक्तियोगमित्यर्थो ज्ञेयः । एतस्मिन् श्लोके मुक्तिं ददाति भक्तिं न ददाती- त्युक्त्या भगवत्कर्तृकदानं विना तादृशी भक्तिर्न प्राप्यत इत्युक्तं भवति । अत एवात्रापि मूले अलौकिकस्य दाने हि चायः सिध्येन्मनोरथ इत्यनेन दानमेवोक्तम् । तया र सिद्धमेतत् । अलौकिकसामर्थ्यरूपं फलं पुष्टिमार्गीयसेवायामेव,फल- द्वयं तु मर्यादामक्तानाम् । ननु तृतीयस्कन्थे कपिलवाक्ये 'देवानां गुणलिंगाना'मित्यत्र मक्तेलक्षणमुफ्त्या 'पश्यन्ति ते में' इत्यादिना भक्तिफलत्वेन फलमयमुक्तम् । तर कय. १ शुद्धियोगी पारः।

४१ लादभट्टविरचितटिप्पणीसमेतम् । मुच्यते सेवायां फलनयमिति चेत् । न । भक्तिशब्देन सेवाया एवाभिधानात् । भज सेवायामितिधात्वर्थात् । 'लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य खुदाहृतम् ,' 'अहैतुक्यव्यवहिता या भक्तिः पुरुषोत्तमे,' 'सालोक्यसार्टिसामीप्यसारूप्यकत्वमप्युत । दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः स एव भक्तियोगाख्य आत्यन्तिक उदाहृत' इत्यत्रादौ भक्तिपद- मुक्त्वा, मध्ये सेवनपदं पठित्वा अग्रे स एव भक्तियोगाख्य इति भक्तिपदमुक्तम् । अतोपि ज्ञायते भक्तिशब्देन सेवैव । 'देवानां गुणलिंगाना मितिलक्षणमुक्त्या 'नैकात्मतां मे स्पृहयन्ति केचिन्मत्पादसेवाभिरता मदीहा' इत्यत्र 'सेवाभिरता' इत्यनेन सेवैवाभिहिता, अतोपि भक्तिशब्देन सेवैव । तदुक्तं निवन्धे सर्वनिर्णये, 'भक्तिशब्दस्य धात्वर्थः सेवा प्रत्ययार्थः प्रेमेति । तथा च प्रेमसेवा भक्तिशब्दार्थः। इयमेव प्रेमसेवा मानसी सेवेत्युच्यते 'चैतस्तत्प्रवणं सेवेति सिद्धान्तमुक्तावल्यां मनोवृत्तेः सेवात्वकथनादत्रापि 'मनसो वृत्तिः खामाविकी तु ये'त्यनेन मनोवृत्तेर्भक्तित्वकथनात् । अतो 'यादृशी सेवना मोक्ते- सन सेवनाशब्देन मानसी सेवोच्यते । तस्याः सिद्धौ अलौकिकसामर्थ्यरूपं फलं भवति, तस्सास्तारतम्ये गौणं फलद्भयमुक्तम् । अतो भक्तिशब्देन मुख्यतया मानसी सेवाभिधीयते । तथा च इदं त्ववधेयम् । 'देवानां गुणलिंगाना'मिति भक्तेः खरूपलक्षणमुक्त्वा, 'नैका- स्मतां मे स्पृहयन्ति केचिन्मत्पादसेवाभिरतामदीहा' इत्यनेन भक्तेः कार्यलक्षणमुक्तम् । मोक्षान्तपुमर्थस्पृहाराहित्यसम्पादकत्वं तादृग्भक्तित्वमिति भक्तेः कार्यलक्षणम् । एवं सति सर्वपुमर्थान् भक्ता न स्पृहयन्तीत्युक्ते भगवत्स्वरूपमात्र स्पृहयन्तीति सिध्यति । एवं सकलपुरुषार्थाभिलापशून्ये पुरुषोत्तमस्वरूपमात्रफलाभिलापिणि भक्त परमानुग्रह- परयशो भगवान् स्वरूपात्मकफलप्राप्तये तत्फलप्राप्त्यनुशलमलौकिकमपातं सम्पाद्य म्वयं फलरूपेण सर्वेन्द्रियविपयो भवति । तदेतदुक्तम् । अलौकिकस्य दाने हि चायः सिध्येन्मनोरथः इति मूले, अलौकिकसामर्थ्यमित्यनेन टीकायां विवृतं च । ननु तृतीयस्कन्धे अलौकिकविग्रहप्राप्ति!क्तेति कथमत्राचार्यरलौकिकसामर्थ्य फलत्वेनोक्तम् । तल्किप्रमाणकमिति चेत्, श्रूयताम् । 'पश्यन्ति ते मे रुचिरावतंस प्रसन्नवक्रारुणलोचनानी त्यनेन भगवदर्शनादीनां फलत्वेनोक्तिरत्र मानम् । अन्यथा तादृशमलौकिकमंघातं विना 'पश्यन्ति ते म' इत्यत्रोक्ता दर्शनाद्युक्तिविरुध्येत । लौकिकेन्द्रियवर्गस्य निवृत्तत्वात् । 'जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथे'तिवास्यात् । अतो दर्शनाद्यन्यधानुपपत्या अलौकिक- देहेन्द्रियप्राप्तिराक्षिप्यते । सर्वतो बलवती ह्यन्यथानुपपत्तिः । तथा च मिद्धमलौकिक- सामर्थ्यरूपमुत्तम फलमुत्तमानाम् ॥१॥ एवमुत्तमाधिकारिणामुत्तमफलमुक्त्वा मध्यमाधिकारिणां फलमाहुः सायुज्यमिति । 'मद्भक्ति लभते परा' 'भक्त्या मामभिज्ञानाती'त्युक्त्वा 'विशते तदनन्तर मित्यत्रोत्तं सायु- ६ ४२ सेवाफलम् । ज्यमित्यर्थः । इदं मध्यम फलम् , अलौकिकसामर्थ्यापेक्षया हीनम् , सेवौपयिकदेहापेक्षयो तमम् । अतो मध्यमम् । अलौकिकेन्द्रियवर्गस्य दानसापेक्षत्वान्मध्यमानां तदलाभे सायुज्य भवति । तदुक्तं मूले, फलं वेति । फलं वा ह्यधिकारो वा न कालोन नियामकः । फलशब्देन मायुज्यम् । साधारणमर्यादया सर्वेषां भक्तिमतां तत्प्राप्तेः । 'हृतात्मनो हृतप्राणांश्च भक्तिरनिच्छतो मे गतिमण्वी प्रयुक्त' इति तृतीयस्कन्धवाक्यात् । न चान वाक्ये 'अनिच्छत' इतिपदेन मोक्षेच्छाशून्यानां पुष्टिमत्तानां ग्रहणात्तेषामेव सायुज्य- लाभोस्तीतिवाच्यम् । मोक्षस्पृहयैव तैर्भगवद्भक्तेः कृतत्वात् । अनिच्छाकथनं तु भक्तिमहिना कदाचित्तादृशभावोदयात् । न ह्यय भावस्तेपां सार्वदिकः । अतो भगवति प्रेमाप्येतेषां सोपाधिः । मोक्षदातृत्वेन भगवति जातत्वात् । अत एतेषां सायुज्यप्राप्तिर्भवति । एतच तृतीयाध्यायभाष्ये स्फुटम् । पूर्वोक्तालौकिकसामर्थ्यरूपफलाधिकारिणां तु भगवति निरुपा- धिक प्रेग। सायुज्यादिपुमर्धम्य स्पृहाराहियेनैवोत्पन्नत्वात् । अतो भगवत्स्वरूपस्य सकले: न्द्रियास्वायत्वेन तेपामपेक्षितत्वादलौकिकसपातं दत्वा सर्वेन्द्रियाखायो भवति, येपां मोक्षदातृत्वेन सोपाविक हरौ प्रेम तेषां सायुज्यमितिविवेकः । एव मध्यमानां फलगुक्त्वा हीनाना फलमाहुः सेवौपयिकदेहो चेनि । व्यापि- वैकुण्ठादौ पापदादिदेहप्राप्तिरित्यर्थः । 'अथो विमूर्ति मम मायाविनस्तामैश्वर्यमष्टांगमनु- प्रवृत्तम् । श्रिय भागवती वा स्पृहयन्ति भद्रा परस्य मे तेनुवते तु लोके' इतिकपिलाक्यात् । एतदाभासे 'सालोक्यादिरूप फलमाहेति सुयोधिन्यामुक्तत्वात् । अन केचिद्वैकुण्ठशब्देन व्यापिवैकुण्ठेतरवैकुण्ठाना ग्रहणमिति वदन्ति । तन्न । 'व्यापिवैकुण्ठे सर्वमैश्वर्यादिकमश्नुवत इत्यर्थ' इति सुमोधिन्यामुक्तन्यात् । न चालौकिक- सामध्ये मुख्यफले तादृशविग्रहमानिरुक्ता, एप तृतीयपि सेवौपयिकदेहम्याग्राकृतस्य प्राप्ति- रुच्यने, अन प्रथमतृतीययोः साम्यमापतितमिति वाच्यम् । प्रथमफले भगवतः सर्वेन्द्रिय- भोग्यवेन तमोगानुगुणदहलाभः, तृतीये तु सेवामानयोग्यदेहलाभ इति विशेपलक्षण्यात् । इदमन नेयम् । अलौकिकमामयरूप फल व्यापिवैकुण्टान्ततिनि आधिदैविके पृन्दारनयनादी प्राप्यते । 'पश्यन्ति ने मे रुचिरास्तसे'सम्य व्यारयाने वृन्दावनादी भगन्माक्षात्कागे भातीति गुमोधिन्यामुक्तवान्मूले अधिकारशन्देन सेवापयिकदेहो गृह्यते, तादृशदेहम्य मेगापिकाररूपलात् । एर फलप्रयमुक्तम् । नत्रालौकिम्मामर्यरूप फल पुष्टिभक्तानाम् । सायुज्यं सेवी- पपिरहो मर्यादाभत्तानाम् । अत पर नरमनियन्धे 'देहमा दृढे तु म्याद्भक्तानां कृष्णदामना । मायुन्य वान्यथा तम्मिन गगातीरे न मंशय इत्यनेन गंगामेवातः मायुज्य. मेवीपपिदिशानिरत्ता । मिद्धालमुक्तारल्या 'मर्यादाम्यस्तु गंगायां श्रीमागतनपर' ४३ लालभट्टविरचितटिप्पणीसमेतम् । इत्यनेन मर्यादास्थस्य तु गंगासेवनमुक्तम् । अत एव 'मर्यादाभक्तिमार्गस्य काठा गंगा परा मते'ति निवन्धे उक्तम् । अत एव मर्यादाभक्तेः सायुज्यादिफलम् । पुटिभक्तेस्तु नित्यलीलाप्रवेशरूपं फलमिति स्पष्टमेव तृतीयचतुर्थाघ्यायभाष्ये निरूपितमिति दिक् । न कालोन नियामकः । अन फलरयेपि कालो न नियामकः। फलनयं कालपरिच्छेयं न भवतीत्यर्थः । न कहिचित्मत्पराः शान्तरूपे नक्ष्यन्ति नो निमिपो लेढि हेति'रिति कपिलवास्यात् , 'मत्परा न नक्ष्यन्ती'त्युक्त्या मत्परशब्देन फलप्रयप्राप्तानां ग्रहणात् ॥ १॥ कार्यमानप्रतिवन्धकाभावत्वेन कारणतास्वीकारात् सेवासिद्ध्यर्थ सेवाप्रतियन्धा दूरी- कर्तव्या इति तदर्थ प्रतिबन्धकानिरूपयन्ति । उदेगः प्रतिवन्धो वा भोगो वा स्यात्तु बाधकम् ॥२॥ बाधकानां परित्यागो भोगेप्येकं तथा परम् । सेवायां प्रतिवन्धकत्रयम्, उद्वेगः प्रतिवन्धो वा भोगो धा। उगो भगवत्सेवासमये चित्तशप्रदश्वाञ्चल्यविशेषः । स च भगवत्सेवां प्रतिवधाति । भोगः सुखसाधकतया विषयासक्तिमम्पादकत्वेन भगवदासक्तिविरोधात् सेवाविरोधी । एतत्प्रति- पन्धकद्वय दुःससुससाधक प्रतिवन्धरूपम् । 'प्रतिवन्धक तूदासीन दुःखसुखे प्रयच्छ- ती'त्यस्य न नामान्तरेण निर्देशः, किन्तु प्रतिवन्धशब्दवाच्यतैव । 'कायेन वाचा मनसेन्द्रियैी धुळ्यात्मना वानुमृतस्वभावा दित्यन वायनसोविशिष्टकार्यमादाय इन्द्रिये- भ्यः पृथक्तया गणनात् । एवमुद्वेगभोगयोरपि दुःखसुखप्रदत्वेन विशिष्टत्वात् पृथड्- निर्देश । अन्यथा प्रतिबन्धकशब्देनैव उद्वेगभोगयोहणसम्भवात् पृथइनामनिर्देशो व्यर्थः स्यात् । त्रयाणामिति । उद्वेगप्रतिवन्धभोगानां यानि साधनानि हेतवस्तेपा परित्यागः कर्तव्यः । माधनपरित्यागे प्रतिबन्धानामनुत्पत्ते । मूले पाधकानां परित्याग इत्यम्य तेषां साधनपरित्यागः कर्तव्य इति व्याख्यान टीकायाम् । प्रतिवन्धकेषु भोगशब्देन लौकिको भोगो ग्राह्यो न त्वलौकिक इत्याहुः भोगो विविध इत्यारभ्य लौकिकस्त्याज्य एवेति च्याख्यान टीकायाम् । मूलार्यस्तु मोगे लौकिकालौकिकभोगे एक लौकिकभोगात्मक परं प्रतिवन्धक- मिति । तत्राद्य इति । साधारणप्रतिबन्धभगवत्कृतप्रतिवन्धयोर्मध्ये आद्यः साधारणप्रति- वन्ध इत्यर्थ । तस्य म्वरूप तु सुखदु.साजनकत्वेन सेवाप्रतिवन्धकत्वम् । यथा सेवा- समये उदासीनेन वागादिव्यपहार क्रियते स सेवां प्रनिवनाति, उदंगभोगी तु दुःखसुरत- जनको, सेवाप्रतिनन्धकाविति विवेक. । युद्धया त्याज्य इति । चातुर्येणत्ययः । तथा च च्याहारचातुर्यण सेवानवसरे लौकिक कार्य नथा कर्तव्य यथा सेपावसरे तादृश वागादि- व्याहारकार्यमेव न पतेदियर्थ । अथवा साधारणप्रतिसन्धो वेदनिन्दारूपः पापरूपश्च । स , -- + सेवाफरमा तु बुद्ध्या त्याज्य , बुद्धिपूर्वक तस्य त्याग कर्तव्य इत्यर्थ । अलौकिकभोगस्त्विति । भगवत्सेवार्थ मुखदुर्वासनादिदोपनिवृत्तये ताम्बूलभक्षणादिरूप , भगवद्गामित्वादलोकिक 'मन्निष्ट निर्गुण स्मृत मितिमाक्यात् । 'कायेन वाचा गनसेन्द्रियैर्या' इति श्लोके भगवदर्थं कृतस्य दन्तधापनादेरपि भगवद्धर्मत्वस्य नवयोगिप्रसगे कविनोक्तत्वात् । 'धर्मान् भाग यतान् ब्रूते'ति प्रश्नोपक्रमात् । श्रीमत्प्रभुचरण स्वतत्रे तथा व्याख्यानाच । फलाना मध्ये प्रथमे प्रविशतीति । साधनत्वेन प्रतिशतीत्यर्थ । अलौकिकसामर्थ्यरूप- ! पलसाधको भ्वतीति यावत् । अतोयमलोकिकभोगो न त्याज्य । तदुक्त मूले । निष्पत्यूहं महान् भोगः प्रथमे विशते सदा । अर्थस्तु महान् भोगः पूज्यो भोगो भगवत्सेवार्थमगरागलेपादिरूप निष्पत्यूदं निर्विघ्न यथा स्यात्तथा प्रथमेऽलौकिकसामर्थ्यरूपे फले प्रविशति, तत्फलसाधको भवतीति यावत् । साधारणप्रतिवन्धस्य बुद्ध्या त्याज्य इत्यनेन निवृत्त्युपाय उक्त ॥२॥शा एव भगवत्कृतप्रतिवन्धकस्यापि निवृत्त्युपायो वक्तव्य इत्याशक्य नास्य कश्चिन्निवृत्त्यु पाय इत्याहु भगवत्कृतश्चेदित्यारभ्य विवेक इत्यन्तेन । तदा भगवान् फलन दास्यतीति । सेवाफल मुक्तिरूप न दास्पतीत्यर्थ । तदान्यसेवापीति । मुक्तिप्राप्त्यर्थ मन्यस्य तीथीदेरित्यर्थ । तर हेतु । तदाऽसुरोयमिति । आसुरस्य तु 'निनन्धायासुरी मते'ति भगवद्वाक्यात् तस्य मुक्तिर्न मवतीति तीर्थादिसेवापि व्यथेति भाव । तदुक्त मूले । अकर्तव्य भगवतः सर्वथा चेद् गतिर्न हीति । ननु यस्य भगवत्कृत प्रतिबन्ध स आसुर , तस्य सर्वथा मुक्तिनास्तीति निरूपितम् , तर्हि फलाशाराहित्यजनितक्लश स्यात् , तरक्लेशनिवृत्ति कथ स्यादित्याशक्य क्लेशनिवृत्युपायमाहु तदा ज्ञानमागणेति । येनाहमुत्पादित तेन परमेश्वरेण यद्विचारित तथैव भविष्यतीति मया दुस साज्यमित्यादिज्ञानरूपेण साधनेन नेश्चिन्येन थेयमित्यर्थ । तदुक्त मूले । यथा पा तत्वनिर्धारो विवेक माधन मतम् । साधनमिति शोकाभावसानिमित्यर्थ । एव साधारणप्रतिवन्धो बुद्ध्या त्याज्य इत्युक्त्वा भगवत्कृतप्रतिव-वस्याशक्यत्यागत्वात् तजन्यशोकनिवृत्तये ज्ञानमार्गेण स्थेय- मित्युक्तम् ॥४॥ अत पर भोगरूपप्रतिबन्धनिवृत्युपायगाहु साधारणो भोग. कथमित्यारभ्य त्याज्य इत्यन्तेन । भोगस्य मुसहेतुलेन त्याज्यत्व न मनस्यायातीत्याशक्याहु । सविनोल्पोघातक. स्यादिति । सविनत्वादल्पत्वाद्भोगम्य त्याज्यत्वम् । भोगम्य सविनत्वगत्पत्व च मुहुर्मुहुविचार्य त्याग कार्य इति मात्र । साधारणप्रतिवन्धम्य तु घातकलात्याज्यत्वम् । साधारण- N असधारणप्रतिबधस्थापीत्वपि पाठ ।

४५ लाटभट्टविरचितटिप्पणीसमेतम । प्रतिबन्धश्च वेदनिन्दारूपः पापरूपश्च । स च महादोपरूपत्वात् सेवासिद्धेर्यातको भवति । अत एव वेदनिन्दायाः पापानां च जन्मान्तरसम्पादकत्वं निवन्धे सेवाप्रकरणे उक्तम् । 'पत्रापि वेदनिन्दायामधर्मकरणात्तथा । नरके न भवेत् पातः किन्तु हीनेषु जायत' इति । एतस्य सर्वेषु सेवाधिकारिपु सम्भवात् साधारणत्वम्, सकलसत्कार्यमान- प्रतिवन्धकत्ताच साधारणत्वम् । भगवत्कृतप्रतिवन्धस्तु असुरमात्रविषयकत्वादसाधारण इति विशेपो ज्ञेयः । एतौ सदा प्रतिबन्धकाविति । लौकिकभोगसाधारणप्रतिपन्धौ सदा सेवाप्रतिवन्धको । लौकिकभोगस्य वेदनिन्दारूपपापरूपसाधारणप्रतिबन्धस्य च सर्वदा सम्भवातू सर्वदा प्रतिबन्धकत्वमित्यर्थः । तदुक्तं मूले । बलादेतो सदा मती । सदा प्रतिवन्धको मतावित्यर्थः । भगवत्कृतप्रतियन्धस्याशक्यत्यागत्वादनिवार्य- वेन आसुरजीवस्य सेवाफलामाव इति निरूप्य तत्कृतशोकनिवृत्तये ज्ञानमार्गेण स्थितिः कार्येति पूर्व निरूपितम् । अतःपरं येन ज्ञानमार्गोपि नायितुं शक्यम्तस्यासुरस्य चित्तस्वास्थ्यप्रकारमाहुः ज्ञानस्थित्यभावे चिन्ताऽभावार्थमाहेति । यस्यासुरम्य ज्ञानस्थित्यभावस्तस्य चिन्ताऽभावसम्पादनार्थमित्यर्थः । द्वितीय इतीति । भगवत्कृतप्रतिवन्ध इत्यर्थः । द्वितीये सर्वथा चिन्ता त्याज्या संमारनिश्चयात् ॥५॥ अर्थस्तु प्रतिबन्धयोर्मध्ये द्वितीये भगवत्कृतप्रतिवन्ध चिन्ता न कर्तव्या । तत्र हेतुः । संसारनिश्चयादिति । मम संसार एव फलं परमेश्वरेण विचारितं न मुक्तिः । अत आशैव न रक्षणीया । निवन्धायासुरी मता' इति वाक्यात् । एवं च चिन्तापि न कार्येति । एवं प्रकारेण स्वास्थ्यं मनसि सम्पादनीयमितिभावः । एवमासुरस्य भेदद्वयम् । तत्र 'ज्ञानमार्गेण स्थातव्य'मित्येकः प्रकारः पूर्व टीकाया- मुक्तः । मूले अकर्तव्यं भगवत इत्यारभ्य विवेकः साधनं मतमित्यन्तेनोक्तः । द्वितीयप्रकारस्तु 'ज्ञानस्थित्यभावे चिन्ताऽमानार्धमाहे'त्यनेन टीकायामुक्तः । मूले दितीये सर्वथा चिन्ता त्याज्या संसारनिश्चयादित्यनेनोक्तः । एवं द्विविधम्याप्यासुरस्य सेवाफलाभावो निरूपितः, शोकामावप्रकारचोक्तः ॥५॥ अतः परमुद्वेगरूपप्रतिवन्धे किं कार्यमित्याकांक्षायामाहुः न त्वाद्ये दातृता नास्तीति । न त्वाचे दातृता नास्ति तृतीये बाधक गृहम् । आये निपु वाधकेषु आये उद्वेगरूपे प्रतिबन्धे तु चिन्ता न साज्येति पूर्वस्थाभ्यां १तेनासिद्धेरिति पाट ।

सेवाफलम् । चिन्तापदत्याज्यपदाम्यामन्ययः । तथा चोद्वेगरूपप्रतिबन्धस्य निवारयितुं शम्यत्वेन तन्नि- वृत्त्युपायचिन्तां कृत्वा उद्वेगो निवर्तनीय इत्यर्थः । असाध्ये हि चिन्तात्यागो विधेयः । 'तस्मादपरिहार्येर्थे न त शोचितुमर्हसी'ति वाक्यात् । साध्ये तु चिन्ता रक्षणीयेव । याद्वैगरूपप्रतिवन्धनिवृत्तिर्न स्यात्तदा किं स्यादित्याकांक्षायामाहुः । आद्यफलाभाव इति आयेन फलाभाव इति तृतीयातत्पुरुष । आयशब्देन प्रतिवन्धेषु आद्य उद्वेग- रूपम्तेन कृते फलाभावे भगवतो दातृत्वं नास्ति, भगवान् सेवाफलं न दास्यतीत्यर्थः । तर हेतुः । तदा सेवा नाधिदैविकीत्युक्तं भवति । 'मनसो वृत्तिः स्वाभाविकी तु या । अनिमित्ता भागवती भक्तिर्मुक्तेर्गरीयसीति तृतीयस्कन्धे कपिलवाक्यात् सेवाया भगवत्परमनोवृत्तिरूपत्वेन तर चित्तस्थैर्यस्यापेक्षणादुद्वेगे च चित्तस्थैर्यनाशात् सेवाया आधिदैविकीत्व न स्यात्, अत उद्वेगनिवृत्ति कर्तव्येति तात्पर्यम् । पूर्व त्रयाणां साधनपरित्यागः कर्तव्य इत्युक्त टीकायाम् , बाधकानां परित्याग इत्युक्त मूले । ततश्योद्वेगत्याग. प्रतिवन्धत्यागो भोगत्यागश्चेति त्यागनयमनुमत भवति । तेषु तृतीयस्य भोगत्यागस्योपायमाहुः भोगाभावस्तदैवेत्यादिना । मूले तृतीये बाधक गृहमित्युक्तम् । अर्थस्तु तृतीये भोगत्यागे गृहं बाधकम् । गृहस्थस्य सर्वा- स्मना भोगत्यागासम्भवादिति । अवश्येयं सदा भाव्या सर्वमन्यन्मनोभ्रमः । अर्थस्तु इयमुद्वेगादिप्रनिवन्धकायी अवश्या खवश्या न भवति । अत. सदा भाव्या विचारणीया, एतत्प्रतिवन्धकनय्या साधनपरित्यागो निचार्यः । एतत्प्रति पन्धकायात् सावधानतया स्थेयमिति तात्पर्यम् । ननु तर्हि प्रतिवन्धकायसम्भवात् सोपाय सेवामार्ग त्यक्त्वा ज्ञानादिमार्ग एवानुष्ठेय इत्याशकामपनुदन्तो ज्ञानादिमार्गेण सेवासाध्य फल न भवतीत्याहु सर्वमन्यन्मनोभ्रम इति । सेवातिरिक्तज्ञानादिरूप साधन तु न सेनासाव्यफलसाधकम् । अतोन पूर्वनिरूपितफलनयाकाक्षिमिरन्यत्साधन कार्यमितिज्ञान भ्रममानमित्यर्थ ॥ ६ ॥ ननु पुष्टिमार्गीयम्य भगवदनुग्रहपापस्य भगवत्पुष्टिखभावात् सेराफल सर्वथा भवि: प्यत्येव प्रतिवन्ध कायी स्वप्रयोजिकेति किमय तद्विचार कर्तव्य इत्याशक्य तादृशस्यापि एतत्पनियन्धकायी विचारणीयात्याह तदीयैरपि तत्कार्यमिति । तदीगरपि तत् कार्य पुष्टी नव विलम्पयेत् । तदीयः पुष्टिमागीयैरपि तत्कार्यम् । प्रतिबन्धकायीमापन कार्यम् । किमर्थं कार्य- मित्याकाक्षायामाह पुष्टी नंघ पिलम्पयेत् । यद्यपि पुष्टी फलाभावो नास्ति, तथाणि फलविलम्नस्तु प्रतिमन्धरायण मवेदत पुष्ठौ पुष्टिमार्गे न विलम्पयेद्विलम्प न कार- लालूभट्टविरचितटिप्पणीसमेतम् । येत्, प्रतिबन्धकत्रयादसावधानश्चेत् स्यात्तदा विलम्यो भवेत् , अतः प्रतिवन्धकत्रयीगावनं मुहुर्मुहुः कृत्या त्रयाणां साधनपरित्यागः कर्तव्यः । सोपि शीघ्रमेव, न विलम्पेन । एत- द्वितम्बे फलविलम्बो भवेदितिभावः । ननु प्रतिवन्धकत्रयसाधनपरित्यागेपि सर्वत्र गीतामागवतादौ प्रकृतिगुणानां सत्त्वरजस्तमसां प्रावल्यस्योक्तत्वात्तत्क्षोमकृतः सेवाप्रतिवन्धो भवेत्तदर्थ किं कर्तव्य- मित्याकांक्षायामाहुः गुणक्षोभेपीति । गुणक्षोभेपि द्रष्टव्यमेतदेवेति मे मतिः॥७॥ गुणानां क्षोभेपि एतदेव मदुक्तमेव द्रष्टव्यं विचारणीयमिति । एतद्विचारे साधनपरित्याग एवोपायत्वेन स्फुरेत् । गुणक्षोभसाधनं तु सगुणवस्तुसंगः । सगुणं वस्तु भगवतैकादशे निरूपितं पञ्चविंशाध्याये । एवं सति सगुणवस्तुस्वरूपं ज्ञात्वा तत्संगस त्यागः कर्तव्यः । व्यवहारनिर्वाहस्तु 'मन्निष्ठं निर्गुणं स्मृत'मित्यादिवाक्याद्भगवत्सम्बन्धि- पदार्थस्य निर्गुणखाद्भगवदुपभुक्तशिष्टपदायः कर्तव्यः । तथा सति गुणक्षोभदोपोपि न मवेदित्यर्थः ॥ ७॥ . ननु भगवदीयाः पदार्था निर्गुणाः, तैः सम्बन्धदोपपरिहार उक्तः, स च न सम्भवति, सर्वस्यापि पदार्थस्य गुणत्रयात्मकत्वमितिसांख्यसिद्धान्तादित्याशंक्याहुः । कुसृष्टिरत्र वा काचिदुत्पद्येत स वै भ्रमः ॥ ७॥॥ भगवच्छास्त्रविरुद्धत्वात् सांख्यसिद्धान्तोक्तप्रमेयकथनं कुसृष्टिः । अतस्तादृशज्ञानं भ्रम एव । यद्यपि सर्वपदार्थस्य सगुणत्वं, तथापि भगवत्सम्बन्धिपदार्थस निर्गुणत्वमेव । 'मन्निष्ठं निर्गुणं स्मृतम्' 'मनिकेत तु निर्गुणम्' 'निर्गुणं मदपाश्रय' मित्यादिवाक्यग्य इति मावः । सेवां पुष्टिपथप्रोक्तां कारयित्वा निजां फलम् । ददातु प्रथमं देवो चालकृष्णो मदीश्वरः ॥१॥ इतिश्रीमद्गोवर्धनधरश्रीवल्लभाचार्यवरश्रीविठ्ठलेश्वरचरणानुचरसेवकेन लालूभट्टोपनामपालकृष्णदीक्षितेन विरचिता सेवाफलविवृति- टिप्पणी समाप्ता ॥

श्रीकृष्णाय नमः। सेवाफलम् । मठपतिश्रीजयगोपालभट्टकृतविवरणसमेतम् । 0000--- चाईबहलसन्मौलि वेणुवादविशारदम् । दुःखं दलयतादुचैत्रिमंगललितं महः ॥ १॥ नत्वा श्रीवलभाचार्यास्तत्सुतान् विठ्ठलेश्वरान् । विवृत्या सहित सेवाफल व्याख्यायते मया ॥ २॥ गीताभागवतादावप्युक्तं पण्डितबुद्धिगम् । पुष्टिसेवाफलं ज्ञात्वा विचारे त्वक्षमान निजान् ॥ ३॥ विवोधयिषवश्वकुप्रेन्यं सेवाफलाभिधम् । सम्यग्विवरणोपेतं श्रीमदाचार्यपण्डिताः ॥४॥ पगुणाः सप्तमो धर्मी सर्वधर्माधिको बजे । यथा विराजते नित्यं तत्सेवायाः फलं तथा ॥५॥ सर्वसेवाफलेम्पोत्र ज्ञायतामधिकं पुनः । इति ज्ञापयितुं सार्थसप्तपद्यनिरूपितम् ॥ ६॥ अथ श्रीभगवद्गीताश्रीभागवताणुभाप्यभागवततत्वप्रदीपसुबोधिन्यादिसमाकलना- समयः कैघिदतिकृपामाजनः स्वीयभगवदीयैः पृष्टाः श्रीवल्लभाचार्यचरणाः स्वमार्गीयसेवाफलं निरूपयन्ति यादृशी सपना मोक्ततत्यादि सार्धपधेन । यादृशी सेवना प्रोता तत्सिद्धी फलमुच्यते । अलौकिकस्प दाने हि घायः सिध्येन्मनोरथः ॥ १॥ फलं या घधिकारो या न कालोत्र नियामकः । एतम्य विवरणं तु मेयायां फलप्रपमलौकिफमामय सायुज्यं सेपो. पपियदेही या पैयुण्ठिादियिनि । अघ संयापामिनि तु यारशी सेयना मोता तत्सिदारिसतम्स पिवरणम् । फलप्रयमिति तु फसमुच्पन इत्यम्प पिय. रणम् । अलौकिकसामयमित्यादि अलौफिफस्स दाने हि पापः सिध्य- मनोस्प इत्यारम्प अधिकारी खेतदन्तम्म घ रियरणं योध्यम् ।

४९ मठपविजयगोपालभट्टकृतविवरणसमेतम् । अथ व्याख्या । यादृशी 'कृष्णसेवा सदा कार्या मानसी सा परा मता, चेतस्तत्प्रवणं सेवा तत्सिद्धौ तनुवित्तजे' त्यादिना स्वतनुजखवित्तजसेवया प्रेम्णि जाते आसक्तिस्वरूपतत्प्रवणचेतस्त्वरूपा फलरूपा मानसी सेवेति सिद्धान्तमुक्तावल्युक्त- प्रकारा सेवना सेवा मया प्रोक्ता तस्याः सिद्वौ पूर्णतयाविर्भावे सति यत्फलं मवति तदुच्यते कथ्यत इत्यर्थः । ननु सिद्धान्तमुक्तावल्यां तु स्वतनुजस्खवित्तज- सेवोत्तरं प्रेमोत्पत्तिः कण्ठरवेण नोक्तेति कथं भवतोच्यत इति चेत् ? अत्रोच्यते । 'यथा भक्तिः प्रवृद्धा स्यात् तथोपायो निरूप्यते, पीजभावे दृढे तु स्यात् त्यागाच्छ्वण- कीर्तना'दित्युपक्रम्य 'चीजदार्यप्रकारस्तु गृहे स्थित्वा सधर्मतः, अव्यावृत्तो भजे- कृष्णं पूजया श्रवणादिमि'रित्यादिना स्वतनुजखवित्तजसाधनरूपसेवामुक्त्वा 'ततः प्रेम तथासक्तिर्व्यसनं च यदा भवेदि'त्यनेन साधनरूपसेवोत्तरं प्रेमोत्पत्तिरुक्ता, तदनन्तरमासक्तिरुक्ता, तदनन्तरं व्यसनं चोक्तं श्रीमदाचार्यवभक्तिवर्धिन्यामिति । एकत्र नितिः शास्त्रार्थोपरत्रापि प्रवर्तत इति न्यायं मनसिकृत्यास्मत्प्रभुभिः सिद्धान्त- मुक्तावलीविवृतायुक्त मेतेन निरुपविस्खसर्वखनिवेदनपूर्वकं तत्रैव वदेहविनियोगे प्रेम्णि जाते सा भवतीति मयाप्युक्तमित्यवेहि । तल्कि फलमित्याकांक्षायामिदमिदं फलमिति फलत्रयं विवक्षव आध फलमाहुर्मूले अलौकिकस्य दाने हीति । एतद्विवरणं त्वलौकिकसामर्थ्यमिति । अत्र द्वितीयातत्पुरुपस्त्वसम्भव्येव, तृतीयापनमीपष्ठी- तत्पुरुषाणां सम्मवित्वेपि क्लिष्टार्थता सम्भवतीत्यलौकिकाय सामर्थ्यमिति चतुर्थीतत्पुरुपा- श्रयणादलौकिके सामर्थ्यमलौकिकसामर्थ्यमिति सप्तमीतत्पुरुपाश्रयणाद्वा अलौकिकविषयक- सामध्यं यावदलौक्रिकसम्बन्धननितसुखदुःखानुभवविषयकशक्ततेति यावदित्यर्थो ज्ञेयः । एवं च सति 'निःप्रत्यूहो महान्मोगः प्रथम विशते सदे'ति मूले, तथा च 'अलौकिक- भोगस्तु फलानां मध्ये प्रथम प्रविशतीति तद्विवरणे चोक्तो ह्यलौकिकभोगस्य प्रथमफले प्रवेश उपपन्नो भवेत् , तस्याप्यलौकिकपदेन संग्रहात् । कर्मधारयाश्रयणे तु सामर्थ्यमात्र- स्वैवालौकिकत्वात्तदतिरिक्तालौकिकभोगादेरलौकिकसामर्थ्यरूपत्वाभावादलौकिकपदेनासंग्र- हादलौकिकसामर्थ्यरूपप्रथमफले प्रवेशोक्तिरसंगता स्यात् । तस्माचतुर्थीतत्पुरुषः सप्तमी- तत्पुरुप एव वात्र साधुतरो न कर्मधारय इति योध्यम् । यद्वा । न लौकिकमलौकि- कम्, अलौकिकं च तत्सामर्थ्य चेति कर्मधारय एवास्तु । न च पूर्वोक्तदूपणापत्तिरिति वाच्यम् । अलौकिकभोगस्त्वलौकिकसुखदुःखसाक्षात्कारस्तु फलानां मध्ये प्रथमे फलेऽ. लौकिकसागर्थेऽधिकरणरूपे प्रविशति प्रविष्टो भवति, तदर्थमेवालौकिकसामर्थ्यस्य भग- वता दानात् । एवं च न पूर्वोक्तदूपणापत्तिरिति दिक् । एवं च विवरणे मूलस्थालौकिक- पदस्सालौकिकविषयकसामर्थ्यपरत्वेनालौकिकसामर्थ्यपरत्वेन वा व्याख्यानात् कस्यचि- देतत्संघाते कस्सचित्चेतदेहपातोत्तरं वृन्दावनादिष्वलौफिकसंघात एव वा ह्यलौकिक- सेवाफलम् । विषयकसामर्थ्यरूपस्यालौकिकसामर्थ्यरूपस्य वा फलस दाने वितरणे स आद्यः प्राथ- मिकः सत्संगादिनेदं प्रथमतयोत्पन्नः प्रियतमभगवत्संगमविपयको भक्तस्य मनोरथः स हि निश्चयेन सिध्येन्मनोरथविषयीमूतपदार्थप्रास्या पूर्णो भवेत्, तददाने तु न पूर्णो भवे- दित्यर्थः । तथा च मनोरथविषयीभूतप्रियसंगमसाधकं प्राथमिकं फलमलौकिकविषयक- सामर्थ्यप्राप्तिरिति बोध्यम् । अल्पः सिध्येन्मनोरथ इति पाठे त्वलौकिकस्या- लौकिकविषयकसामर्थ्यशालौकिकसामर्थ्यस्य वा अदाने हि निश्चयेन विप्रयोगोद्रेके सति कदाचित् कदाचिन्मनसि जायमानत्वादल्पः स्वल्पो मनोरथः प्रियसंगमविषयकः सिध्येदित्यर्थो ज्ञेयः । चकारेणैतदान एवान्योपि मनोरथः सिध्येदिति व्याख्येयम् । अत्रैवं ज्ञेयम् । प्रथमतो मूलेच्छया 'यमेवेति श्रुतेनिरुपपिरसरूपसपरिकरभगवत्कृपया शुद्धपुष्टिमार्गीय परणम् , तदनु सत्संगादिना प्राथमिको भगवत्संगममनोरथः, तदनु शुद्धपुष्टिमार्गीयाचार्यसंश्रयः, तदनु भगवत्राप्तिजनकतिरोहिततापक्लेशानन्दाविर्भावाय शुद्धपुष्टिमार्गीयाचार्यकृतं निवेदनम्, ततस्तदुपदिष्टोस्मिन्मार्गे गोपिकानामेव गुरुत्वमिति फलप्रकरणीयसिद्धान्ता 'दथ च गोपीभावेन ये भक्ता' इत्याद्यादिपुराणवाक्याच मूलरूप- शुद्धपुष्टिमार्गाचार्याणां व्रजभक्तानां यो भावस्तत्सजातीयभावभावनापूर्वकं खतनुजस्व- वित्तजमाधनरूपसेवाकरणेन दृढतरकथाश्रवणादिना वा कस्यचिद्विनैव प्रेमोत्पत्तिं देहपाते 'स्वयं समुत्तीर्ये ति श्लोके 'सदनुग्रहो भवा'नित्युक्तत्वात् प्रेमवदाचार्यस्थभगवदनुग्रहक्लेन प्राप्सालौकिकदहे. रसमागीयत्वात् पूर्वानुरागमारभ्य सकलप्रेमावस्थाविर्भावः । कस्यचित्त भगवदिच्छ्या प्रेमासक्त्यनन्तरमेव पूर्वानुरागजविरहेणैव व्यसनं विनैव देहपाते प्राप्ता- लौकिकदहे व्यसनाधवथाविर्भावः । कस्यचित्त्वक प्राकृतदेहे प्रेम्णि जाते तदप्राप्त्या पूर्वा- नुरागजपिरहापि यः, ततः स्वसेव्यस्वरूपे वा स्वप्नादौ यातिभाग्येन साक्षादपि वा प्रभु दर्शने 'चक्षुःप्रीतिः स्मृता तनातीवादरनिरीक्षण मिति लक्षणानुसाराद्भगवद्विपयकः परमा- दरपूर्वकनिरीक्षणरूपश्चक्षुरागरूपप्रथमप्रेमावस्याविर्भातः । तत चित्तासगः प्रियतमे नित्यं चित्तम्प पिश्रम' इति लक्षणानुयारात् 'ततः प्रेम तथासक्तिरित्युत्तत्वात् प्रेमोत्तरोत्पन्ना- सक्तिस्वरूपतत्त्रयणचेतस्त्वरूपचित्तासंगरूपद्वितीयोमावस्याविर्मावः । इयमेवावस्था सेवा- अधावस्था निरूप्यन्ते रसासस्थानसूचिकाः । बीजांकुरः पलाम वृद्धि- किन्नर एव च । अवस्था द्विनयेन साधक्षरागादिषु ममात् । चक्षुरागो मनःमंगः मंकल्पो जागरस्तया । तनुता पिपयदेपो लजात्यागस्ततःपरम् । उन्मादमूर्छामरणान्येता दश दशाः स्मृता' इत्युक्तलायझरागचित्तासंगाम्यां पीजरूपप्रथमप्रेमावस्योक्ता । ततः 'संकल्पस्तु मनोरथ' इति सक्षणानुमारासदा प्रियमंगमे एवमेवं मरिष्यतीत्यादिमनोरयरूपमंक-प- म्वरूपतृतीयप्रेमावस्यापिमाः । एतायता किभिलमितः पर्गनुरागनन्यो पिरदः । अपायमलौतिकरिपयत्तादलौकिो शिरदः प्रलयानलादयतिमदो भागीनि लौकिक- पदवाया।

मठपतिजयगोपालभट्टकृतविवरणसमेतम् । ५१ सामर्थ्यवता शरीरेण मनसा च सोढुमशक्यो देवकृतसम्भोगो मानुषजात्या खियेवेति भगवता तापक्लेशविशिष्टालौकिकविरहरसभोगसामर्थ्य प्रथमतो दीयते । तदनून्ट्वासनिवासस्मृत्याय- नुमावविशिष्टो 'निद्राछेदस्तु निद्राया अमावः परिकीर्तित' इति लक्षणानुसारानिद्राछेद. रूपश्चतुर्थप्रेमावस्थाविर्भावः । आभ्यां संकल्पनिद्राछेदाभ्यामंकुरावस्थोक्ता । तत स्तनुता निखिलांगानां दौर्यल्यं परिकीर्तित मिति लक्षणानुसारात् पाण्डुत्वाधनुमावविशिष्टतनुता- खरूपपश्यमप्रेमावस्थाविर्भावः । ततो 'विषयेभ्यो निवृत्तत्वमरतिविषयान्तरे' इति लक्ष- मानुसाराचक्षुर्निमीलनासहनशीलतायनुभावविशिष्टविषयनिवृत्तिरूपपष्टप्रेमावस्याविर्भावः । आभ्यां तनुताविपयनिवृत्तिभ्यां पल्लवावस्थोक्ता । एतावत्पर्यन्तमासक्तिकार्यमेष । अत एप 'लेहाद्रागविनाशः सादासत्या साहारुचि रित्यनेन गृहारुच्युपलक्षिता विषयनिवृत्ति- रुक्ता श्रीमदाचार्यभक्तिवार्षिन्याम् । ततो 'दैहिकान्सकलान् भावान् निजां नीडांच दैहिकीम् । परित्यज्य हरिनास्यै यदेव स्यात्तदेव हि । लौकिकं वैदिकं चापि तत्कर्ता व्यसनी मत' इति दशमस्कन्धीयभागवततत्त्वदीपसिद्धान्तसिद्धलौकिकवैदिकप्रियप्राप्ति- सापनकरणरूपव्यसनाविर्गावः । ततः पुनः प्रियप्राप्तिदुर्घटत्व ज्ञानेन 'उपस्थितान्तिके तस्सै व्यसनं स्वमवोचतेति दशमस्कन्धपधव्याख्यानसुबोधिन्युक्ताप्रतीकार्यदुःखस्वरूप- व्यसनान्तराविर्भावः । येन विना प्रियतमांगसंग क्षणमानमपि स्थातुं न शझोति, तेन प्रिय- तगांगसंगं च प्रामोत्येव । अत एव 'यदा स्याद्व्यसनं कृष्ये कृतार्थः स्यात्तदैव ही'त्यनेन तवानुपदमेयोक्तं व्यसनोत्तरमेव कृतार्थखमप्रतीकार्यदुःखरूपव्यसनपदवाच्यान्यन्यसन- पाया । अत एव प्रतरूपव्यसने जाते प्रियप्राप्तिरेव जाता श्रीमतीनां कुमारीणाम्, तद- नन्तर चाप्रतीकार्यदुःखरूसे व्यसने जाते एव च प्रियतमांगसंगो जात इति श्रीमागवते सष्टमेव ( अत्र कृष्ण इति विपयसक्षमी निमित्तसप्तमी वा, 'चर्मणि द्वीपिन'मित्यत्रेव । तथा च कृष्णविषयकं कृष्णनिमित्तं वा यदा प्रथमव्यसनोत्तरमप्रतीकार्य तापसहितं दुःखरूपं क्लेशापरपर्यायं द्वितीयं व्यसनं स्यात्तदा 'लजात्यागोतिवैवश्यात् अपानाशोभिधीयत' इति लक्षणानुसारादाकस्मिकहसनरोदनानुभावविशिष्टप्रपानाशस्वरूपसप्तमप्रेमावसाविर्भायः । तदन्यचेतनेपु प्रश्नादिरुन्मादः परिकीर्तित' इति लक्षणानुसासदाकाशालिंगनाउनुमाव- विशिष्टोन्मादरूपाष्टमप्रेमावस्याविर्भावः । आम्यां वपानाशोन्मादाभ्यां वृद्ध्यवस्थोक्ता । ततः 'प्रलयो रागदुःखादेरिन्द्रियास्तमयो मत' इति लक्षणानुसारान्निथेष्टत्वायनुभाव- विशिष्टमूलीपरपर्यायप्रलयरूपनवमप्रेमावस्याविर्भावः । ततः 'प्राणत्यागोतिदुःखेन मृतिस्तु परिकीर्तिते तिलक्षणानुसारान्मृतिरूपदशमप्रेमावस्थाविर्भावः। आभ्यां मूसितिभ्यां विस्तरा- वस्योक्ता । तथा चैतादृशानुभावविशिष्टव्यसनोत्तरं प्राकृतदेहपाते सचिदानन्दस्वरूपालो- किकदेहलामे च सति भगवत्सरूपानन्दप्राप्त्या कृतार्थः स्यादित्यर्थः । अत एवेदमाती- कार्यदुःसमेव प्रार्थितं निरोधलक्षणाख्ये ग्रन्थे श्रीमदाचार्यचरणैर्यच दुःखं यशोदायानन्दा- ५२ सवाफलम् । दीनां च गोकुले । गोपिकानां च यदुःसं तद्दुस स्यान्मम क्वचिदि'त्यादिना । अत्रेदमपि ज्ञेयम् । येषां त्वलौकिक शरीरं तेषां तु व्यसनानन्तर प्रभुसगम एव, न दशमदशाप्राकट्यम् यथा रासमण्डलमण्डनानाम् । येषां तु लौकिक शरीरम् , तेषां तु व्यसनानन्तरं दशमदशो दयो भवत्येव, यथान्तहगतानाम् । इदमेव ज्ञापयितुमन्तहगतानां लीला । अन्यथा प्रजस्थानां सर्वेषामप्यलौकिकशरीरमिति तासागप्यलौकिकशरीरवत्वात्तथाकृतिय॑र्थी नीरसाच स्यादितिदिक। नन्वन्ते या मतिः सा गति'रिति प्रेमवदाचार्यानुग्रहवलेनात्यसह्येन पूर्वानु- रागजभगवद्विरहेण वा तत्क्षणमेव देहपाते प्रियसगमो भविष्यत्येव । अन्यथा 'ये यथा मां प्रपद्यन्त' इति मर्यादा भज्येतेति किमर्थमलौकिकसामर्थ्यदानं किमर्थ या न तत्तदशानु- भावनमिति चेत् । अन वदामः । 'रसो वै स' इति श्रुते. प्रभो रसरूपत्वाद्रसमर्यादयैव खखरूपदानमित्यलौकिकसामर्थ्यदान तत्तद्दशानुभावनं चेति जानीहि । अपि च, तत्क्षण- मेव देहपाते चक्षुरागादिक्रमेणावस्थानुभावाभानदर्शने रसमार्गीयभगवदीयानां सन्देह. स्यात्को वेद रसस्वरूपभगवत्प्राप्तिरेतस्याथवान्यस्वरूपभगवत्प्राप्तिरिति । तदर्थमेव कस्स- चिदलौकिकसर्वावस्थानुमगोत्रैव कार्यते प्रभुणा । तथा सति तत्तदवस्थानुभवम्य प्रत्यक्षतो दृश्यमानत्वेन सःपां रसस्वरूपप्राप्लेनिश्चयादेतन्मार्गीया प्रवृत्तिरपि निःप्रत्यूहा भवेत् , तदर्थमवालौकिकसामर्थ्यदान ततद्दशानुभावन चेत्सल पल्लवितेन । एवमेवालौकिक- सामथ्यं साक्षाद्वृन्दावनादिष्वपि दीयत इत्यने व्यक्तीभविष्यति । यदा, योस्मिन्मार्गे समायाति तस्य तु 'गृहे स्थित्वा स्वधर्मतः । अव्यावृत्तो भजेत् कृष्ण पूजया श्रवणादिभिः । व्यावृत्तोपि हरौ चित्त अवणादौ न्यसेत् सदा । ततः प्रेम तथासक्तिर्व्यसन च यदा भवेदिति भक्तिवर्षिन्यां तनुजत्तिजसेवाकरणे प्रेमासक्तिव्यसनानि भवन्तीत्युक्तत्वात्तद- नन्तर तर 'यदा स्याव्यसन कृष्णे कृतार्थः स्यात्तदैव ही'त्युक्तत्याच व्यसनप्राप्ते. कृतार्थी- करणम्वभावात् प्राथमिको मनोरथो व्यसनप्राप्तितिपयको भवति । तन व्यसनाविर्भावे महातापोदयात्तत्सहनं लौकिकसामर्थ्येन कर्तुमशक्यमतिदु.सत्यादिति भगवता व्यसना- विभीवादव्यवहितपूर्व तत्समकालमेव वानालौकिकसामर्थ्य दीयते व्यसनसहनार्थम् । एवं घालौकिकस्य दाने हि । हि निश्चयेनालौफिस्यालौकिकसामर्थ्यस्स दाने आद्यः प्राथमिको मनोरथो व्यसनप्राप्तिविषयमः सिध्यनिष्पन्नो भवेत् , व्यसनप्राप्ति. स्यादिति यावत्, तददाने स न निष्पद्यत इत्यर्थ , । तथा च शुद्धपुष्टिमागीयस प्रेमासक्तिरूपायां सेवायां मिद्धायां प्रथमफलमलौकिक्रमामर्थ्यप्राप्तिरिति श्रीमदाचार्यरतस्स प्रथमफलत्व- मुक्तमिति भावः। अर्थताशविप्रयोगजनितदेहपातोतर तु पायाभ्यन्तरमेदेनेदानी तु देहस्य लौकिक- त्वात्स्यायिमानात्मकमगात्सम्बन्धेना-त.करणम्यवालौकिकलाबान्तरेव च भाभि परम- काष्ठापनं फलरयेपि मुख्यफलरूप द्वितीय फलमाहुः पलं चेति । अन पिवरणे फलपदम्य ५३ मठपतिजयगोपालभट्टकृतविवरणसमेतम् । सायुज्यत्वेन व्याख्यानाद्वितीयं फलं सायुज्यरूपं वा भवेत् । अत्र वाशब्दो पिक- सार्थः । यद्यतिकृपाविशिष्टमूलाचार्यरूपश्रीमद्रजभक्तंगितविशिष्टा प्रभोस्तादृड्यूलेच्छा सात् । अत्र सायुज्यं शुद्धपुष्टिमार्गीयमेव विवक्षितम्, न त्वन्यत् । शुद्धपुष्टिमार्गीय- सेवाफलस्यैव निरूपणात् । ननु सायुज्यमेकविधमेव शास्त्रान्तरेषु श्रूयते, न त्वन्यप्रकारक- मतो न वन्यदिति निषेधो नोपपद्यत इति चेत् । अत्र वदामः । द्विविधं तावरसायुज्यं स्थूलतया । तत्रैकमभेदसम्बन्धघटितम् , द्वितीयं तु भेदसम्बन्धघटितम् । तत्राद्य 'ग्रा वेद ब्रह्मैव भवती'त्यादिश्रुतिप्रमाणसिद्धम् , साधारणानुग्रहात् केवलमर्यादारूपमेकविधमेव । द्वितीयं तु त्रिविधम् । तत्रैक 'ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मेत्यादिगीतावाक्यसिद्धम् । ब्रह्मभावो. त्तरसामयिकोत्तमाकस्मिककृपाजनितपरमभक्तिलामजन्यभगवदानोत्तरसामयिकभगवत्प्रवेश- रूपगृहादिप्रवेशवत् । प्रवेशस्य भेद एव सम्भवाद्भेदघटितत्वं ज्ञेयम् । द्वितीयं तु 'ब्रह्मविदाप्नोती'त्यादिश्रुतिसिद्धम् । ब्रह्मभावोत्तरसामयिकाकस्मिकोत्तमतरकृपाजनितभक्ति- लाभजन्यभगवत्प्रवेशरूपसायुज्योत्तरं तत्सहभागविशिष्टसर्वकामभोगरूपम् । भोगोत्तरं खस्मिन्प्रवेशश्च मर्यादासंवलितत्वात् । तृतीयं तु 'केवलेन हि भावेनेति वाक्येन 'न जानं न च वैराग्यं प्रायः श्रेयो भवेदिहे'ति वाक्येन चात्युत्तमतमकृपया ब्रह्मभाव- ज्ञानवैराग्यादिनिरपेक्षप्रेमासक्तिव्यसनरूपकेवलभावजनितभगवत्सहभावविशिष्टसार्वकालिक- सर्वकामभोगरूपं च । तत्र गीतोक्तप्रवेशरूपसायुज्ये पुरुषोत्तमप्रवेशमात्रमेव फलम् , विशेष- कृपाऽभावात् । न चाक्षरज्ञानमार्गसायुज्यात् को विशेष इति वाच्यम् । अक्षरज्ञानमार्गे त्वभेदेन गणितानन्दाक्षरसायुज्यम् । पुरुषोत्तमज्ञानमार्गे तु भेदेनागणितानन्दपुरुषोत्तम- सायुज्यम् , मेदेनानुभूयमानमिति विशेषस्य जागरूकत्वात् । अत एवाचार्याश्चतुर्थस्कन्ध- निरन्धे 'मायुज्ये तु रसाधिक्य भेदेनानुभवात्तत' इत्युक्तवन्तः । किचाक्षरस्य धर्मरूप- त्वाद्धर्मसायुज्यम् । पुरुषोत्तमस्य तु धर्मित्वादेतत्सायुज्यस्य धर्मिसायुज्यरूपत्वाचास्सा- विक्यस्यैव विशेषरूपत्वाच । ब्रह्मभावोत्तरमामयिकसर्वकामभोगरूपसायुज्ये तु मर्यादा- रूपब्रह्ममावोत्तरं सर्वकामभोगस्य मर्यादापुष्टिरूपत्वात् प्रमाणानुरोधिपुरुपोत्तमेन सहो- त्सर्गतो मर्यादापुष्टिरूपमहिपीसजातीयगर्वकामभोग एन । न तु शुद्धपुष्टिमार्गीयो ब्रज- भक्तसजातीयसर्वकामभोगः । 'ब्रह्मविदामोती'त्यत्र ब्रह्मभावोत्तरं सर्वकाम- भोग एव श्रूयते, न परमभक्तिलाभ इति ब्रह्मभावोत्तरसामयिकभक्तिलाभोत्तरं सर्वकामभोगः कथं भवतोच्यत इति वाच्यम् । 'सह ब्रह्मणे त्यत्राप्रधानतृतीया- निर्देशात् । तत्राप्रधानत्वं तु 'अहं भक्तपराधीनो बखतत्र इव द्विजे'त्यादिप्रमाणैर्भक्त- विपय एव भगवतो, नान्यविषय इति मध्ये परमभक्तिर्भवतीति तथोक्तत्वात् । ननु श्रुतिवलेन ब्रह्मभावोत्तरसामयिकसर्वकामभोगेणि पिनव गतिं परब्रह्मणोप्रधानत्व- मगीक्रियतामिति चेत् ? न । 'इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपवूहये दिति वाक्या- न च - सेवाफलम् । दितिहासपुराणादिषु कुनापि भक्तिमार्गातिरिक्तमार्गे ब्रह्मणोप्रधानत्वस्साश्रूयमाणत्वात् अपरञ्च, यदि ब्रह्मभावोत्तरसामयिकमर्वकामभोगो विनैव भक्ति स्यात्तदा त्वदुक्तं घटेतापि, न तु तथा । यतस्तादृशसर्वकामभोगस्य पुरुषोत्तमज्ञानजन्यभगवत्प्रवेशरूपसायुज्यसाध्य- त्वात् । तत्र पुरुषोत्तमज्ञानं च भक्तिसाध्यम् । 'ब्रह्मभूतः प्रसन्नामे'त्यारभ्य 'विशते तदनन्तर मित्यन्तेन प्रघट्टकेन भगवता पुष्टिमर्यादामार्गे एवमेव सिद्धान्तितत्वात् । अन्यथा सर्वेपामेव ब्रह्मभावापन्नाना सर्वकामभोगः प्रसन्जेत, नियामकाभावात् । अतो ब्रह्मभावो- त्तरसामयिकसर्वकामभोगस्य भक्तिं विना जायमानत्राभावादप्रधानत्व परब्रह्मणो भक्तिकृत- मेव, न तु भक्तिं विना कुनापीति मदुक्तमेव साधीय इति दिक् । अत एवाखातष्यभिया 'मुक्ति ददाति कर्हिचित् स्म न भक्तियोग मिति भगवतो भक्तियोगदानाभावः श्रूयते यस्य कस्यचिदिति दिक् । तृतीये सायुज्ये तु वेदमर्यादासवलनाभावात् प्रमाणातीत- स्वरूपेण प्रमाणातीतभक्तानां प्रमाणातीतसर्वकामभोगः । एवञ्च चतुर्विधसायुज्यस्यापि प्रमाणसिद्धत्वेन प्रकृते सायुज्यपदेन मेदघटितसायुज्येषु तृतीयमेव सायुज्य विवक्षितम् । इदमेव च शुद्धपुष्टिमार्गीय सायुज्यमिति । अन 'प्राणेन सायुज्य सलोकतामामोती'त्यादि- श्रुतिप्रयोगायुजिर् योग इति धातो बहुल छन्दसी'ति बाहुलकाद्भावे किपा युक्शन्द- सिद्धिः, तत सहशब्देन समासः, ततो वोपसर्जनस्येति सहशब्दस्य सादेशः, ततो भावे प्यम्प्रत्ययश्च । यद्वा । सहयुनक्तीति सयुक् किचेतिसूत्रेण कर्तरि किए, सयुजो भावः सायुज्य सहभाव इति ज्ञेयम् । अद तत्त्वम् । कदाचिदतिकृपायां पुरुषोत्तमप्रवेशमान- लक्षणसायुज्यपतो ब्रह्मभावजनितप्रवेशोत्तर सर्वकामभोगरूपसायुज्ययोग्यतावतश्चापि शुद्ध- पुष्टिफलप्राप्ति केपाञ्चिद्भवति, मुक्तोपसायव्यपदेशादिति न्यायात्, नतु सर्वेषाम् । अन्यथा मार्गभेदकरणावयापात इत्यवधातव्यम् । नन्वेताहशशुद्धपुष्टिफलप्राप्तिश्चेत्केषाश्चिद्भवति तर्हि तत्सायुज्य किमर्थ दत्तमिति चेत् । स्वस्य स्वतधेच्छत्वादि ज्ञापयितुमिति गृहाणेति सर्व चतुरस्रम् । अथ यस्मिन् जीने यादृशी कृपा तस्मिन्तादृशफलदानौपयिकभावप्राकटयपूर्वक- सेवया ताग्भगवद्रूप फलमिति सिद्धान्त , तथा च यस्मिन् प्रजभक्तरागितविशिष्टा भगवत्कृपा देहपानोत्तरक्षण एव साक्षादगसगविपयिणी तस्य तु पूर्वोक्तपणाल्यैतदेहे तत्क्षण एव मनसि स्खमादौ वैतदेहपातोत्तर तु वृन्दावनादौ चाविलम्चेन साक्षादगसग एव भवति । यस्मिंस्तु देहपातोतरक्षण एव न साक्षादगसगविपयिणी कृपा, किन्तु विलम्पेन, तस्यापि प्रेमोत्पत्त्यमाव एव या प्रेमासक्त्यनन्तरमेव भगवदिच्छया वा देहपाते प्राप्तालौकिकदेहे प्रेमाचवस्थाविभीवन व्यसनाधरस्थाविर्भावेन ना विलम्भेन च माक्षादगसग एव भवति । यस्मिस्तु दाम्पसखित्वाघधिकारविपयिणी कृपा तस तु तादग्भावपूर्पकसेवया पूर्वोक्त- प्रणात्यैतदेहपानोत्तर वृन्दापनादी दास्ससखिलाघधिकारपिशिष्टालोकिकदेहप्राप्तिरूप मठपतिजयगोपालभट्टकृतमिवरणसमेतम् । तृतीय पल भवतीत्याहु अधिकारो वेति । सायुज्यरूपफलदानेनाधिकारविशिष्टदेह- प्राप्तिर्वा भवतीत्यर्थ । अत्र सेवोपयिकदेहो वा वैकुण्ठादिप्विति विवरणोक्त- वैकुण्ठपदेन 'गोकुल वनवैकुण्ठ'मिति कृष्णोपनिषदुक्तं प्रपञ्चातीतभगवन्निवासस्थान व्यापिवैकुण्ठान्तर्गत वृहदन नन्दीश्वर चोच्यते । आदिपदेन श्रीवृन्दावनश्रीमगोवर्धनादि च । तन सायुज्यरूपफलादानेऽधिकार सेवौपयिकदेहरूपो वाधवा भवतीत्यर्थ । वैकुण्ठा- न्तरस्य शुद्धपुष्टिमागीयफलरूपभगवलोकत्वाभावाद् गोकुलस्यैव तादृग्भगवलोकत्वादैकुण्ठ- पदेन श्रीगोकुलम्, आदिपदेन वृन्दावनादिक चाभिप्रेतमिति बोध्यम् । अत्रालौकिक सामर्थ्य यथावान्तरफलरूपम् , मुख्यफल तु मुख्यसायुज्यमेव, एवमेवाधिकारिदेह- प्राप्तिरूप तृतीय फलमप्यवान्तरफ्लरूपमेव, मुख्य फल त्वधिकारिदेहद्वारैवाचापि मुख्य सायुज्यमेव । म्वदत्ततागधिकारिदेहकृत त्वत्पृष्टप्रियवार्ताकथन च ब्रह्मयज्ञोस्त्वित्यादिरूप- प्रियतमसेवामन्तुष्टश्रीमद्रजभक्तरत्नानुग्रहेणैवेति युध्यख । अत एवालौकिकस्प दाने हीत्यत्राधिकारो वेत्यत्र च फलपदाप्रयोग सायुज्य एव च फलपदप्रयोगश्च । अनातिरहस्यत्वाच्छ्रीमदाचार्यरलेरलौकिकसामर्यसायुज्यवैकुण्ठादिपदानि परोक्ष वादत्वेनैव प्रयुक्तानीति ज्ञेयम् । ननु यत्र परशुरामशचीपतिविरिश्चिवदलौकिकसामर्थ्य भोगाधिकारा दृष्टास्तन न सर्वदा दृष्टा इति सामर्थ्य भोगत्वाधिकारत्वसामान्यादेतेपामपि नाश स्यादिति न परमफलत्वमेतेपामित्याशझ्याहु न कालोत्र नियामक इति । अनालोकिकसामर्थ्य भोगाधिकारेषु सर्वोत्तमप्रभुप्रीत्याधायकत्वात् काल आधिभौतिक आध्यात्मिक आधिदेरिको वा नियामको न भवति, भगवनियम्यत्वादित्यर्थ । दृश्यते लोकेपि प्रमुदत्तसामर्थ्य भोगेधिकारे वाधिकारिणो नियामकत्वाभाव । अत एवोक्त सगुणम्मेव काराधीनतम्, न गुणातीतस्पेति 'मन्निष्ट निर्गुण स्मृत'मित्यादिना प्रभुणै कादशे । तस्मानेपा कालाधीनत्वमिति पयाणा फलत्व नि प्रत्यूहमित्यास्ता तावत् । यद्वा, अलौकिकस्यालोकिकविपयसामर्थ्यम्य दाने हि निश्चयेन जातो य आद्यः शुद्धपुष्टिमागीयाचार्यसनयात्पूर्वमेवैतन्मागायसत्सगादिनेद प्रथमतयोत्पन्नो मनोरथः सिध्येत् सिद्वो भरेदित्यर्थ । म आयो मनोरथ क इत्याकाक्षायामाहु फल वा हाधिकारो ति । फ्लरूपो वाधिकाररूपो वा । नार सदेह इति भाव । अन फल विपयकोधिकारविपयको मनोरथोपि फ्लवदधिकारवदेव सुसननक इति ज्ञापयितु रूप केण निरूपणमिति दिक् । तथा च ब्रजभत्तभावसजातीयभावे शुद्धपुष्टिमार्गे भजन कर्तव्यमिति सिद्वान्त सम्पन । तर समक्तेपु 'नन्दगोपसुत देवि पर्ति मे कुरु ते नम' इति वाफ्यादनन्यपूर्वा कुमाय। भगवति पतिभावयुक्ता । अन्तर्गहगतारूपा अन्यपूर्वास्तु 'जारधर्मेण सुस्नेह सुदृढ सर्वतोधिकम् । मयि सम्प्राप्य सर्वेपि कृतकृत्या भविष्यये ति वृहद्वामनपुराणादथ च 'तमेव परमात्मान जारवुझ्यापि सगना, मत्कामा रमण जार ५६ सेवाफलम् । मस्वरूपविदोक्लाः । ब्रह्म मां परमं प्रापुः संगाच्छतसहस्रश' इति दशमस्कन्धीयैकादरा- स्कन्धीयभगवद्वाक्येभ्यो भगवत्युपाधिरूपजारभावयुक्ताः । अप्रतिवन्धेन प्रभुसमीपं गता अन्यपूर्वास्तु सर्वभावप्रपत्तिपूर्वकनिरुपधिप्रियत्वभावयुक्ताश्च भगवति । तत्र परकीयायामेव रसस्य परमा काठेति रसशाससिद्धान्तादनन्यपूर्वाणां नन्दाधीनानां भगवति पतिभाव- युक्तानां कुमारीणामय च निरुपपिप्रियत्वभावयुक्तानां नित्यमिद्धानां जारभावयुक्तानां च श्रुतिरूपाणां चान्यपूर्वाणां परकीयात्वात् परकीयात्वधर्मविशिष्टत्वेनैव परमकाष्ठापन्नरसरूप. भगवत्प्राप्तिः । न तु कुमारीणां स्वीयात्वेनान्यपूर्वाणां तु परकीयात्वेनेति भेदः । तथा सति विवाहितानामेव खीयात्वात् श्रीभागवते कुमारीभिर्भगवतो विवाह उक्तो भवेत् । अन्यपुराणादिषु मूलमाधवमाहात्म्ये रुक्मिणीविवाहात्पूर्वं कुमारीणां भगवता सम विवाहः श्रुतो यद्यपि तथापि स कल्पान्तरीयांशावताररूपश्रीकृष्णविपयकः । तत्कल्पीयश्रीकृष्ण- खरूपस्यांशत्वात् तस्यापि स्वरूपस्य पूर्णत्वेनैव व्यासचित्तप्रसादो जातः स्यात् । तस्मा- त्सारखतादिकल्पान्यकल्पीयावतारा अंशावतारा एवेति जानीहि । निरूपित चैतत्सविस्तर मत्कृतवहिर्मुखमुखमर्दनाख्ये ग्रन्थ इति तत्रैवावलोकनीयम् । ननु यदि भगवति पतिभाव एव कुमारीणां तदा महिपीप्राप्यप्रमाणानुरोधिभगवत्स्वरूपप्राप्तिः स्यान्न तु लोकवेदातीतप्रमाणाननुरोधिखरूपप्राप्तिः स्यादथ च तदनुरोधेनाश्रुतोपि विवाहः कल्पनीयः सादिति चेत् । अत्र धूमः । 'कात्यायनि महाभागे महायोगिन्यधीश्वरि । नन्दगोपसुतं देवि पति मे कुरु ते नमः ।' 'भूयान्नन्दसुतः पति'रितिमत्रयोर्नन्दसुत एव पतित्वप्रार्थना मावना च । स श्रीमानन्दसुतस्तु व्रजे 'एकादशसमास्तत्र गूढार्चिः सवलो- वस'दिति तृतीयस्कन्धीयश्रीमदुद्धवगक्यादेकादशवर्षपर्यन्तमेव स्थितः । तदुत्तर तु मथुरायामेव गतः । यज्ञोपवीत च वैश्यानां द्वादशे वर्षे, यज्ञोपवीत विना च न विवाहः । स विवाहोपि तजातीयानामासुरपैशाचगान्धर्वभेदेन निविधः । तनापि वैश्यस्यासुरो मुख्यः । तत्र द्रव्यादानादासुरः, छलेन कन्याहरणात्पैशाच.. गान्धर्वस्त्वन्योन्यानुरागेण च मे भार्या त्व मे पति'रितिसमयरूपः । एवं चान यज्ञोपवीतकालाभावेन प्रमोर्यज्ञोपवीताभावा- देकादशवर्षाम्यन्तर एव च कुमारीणां भगवत्मम्मन्धाच कोपि विवाहो नान वक्त शक्यः । तया च रिवाइजनितपतित्वाभावान्न महिपीप्राप्यम्वरूपप्रातिर्न वा चिनाहकल्पनेति युध्यख । न च 'ये यथा मां प्रपयन्त' इति मर्यादाभग इति वाच्यम् । भगवसकाशात् प्रमाणा- तीतफलप्राप्त्या तासां पतित्वप्रार्थनेव जाना, न तु विवाइजनितपतित्वप्रार्थनेत्युनयनात् । अन्यथा 'नन्दगोपमुत देषि पतिं मे कुरु ते नम' इत्यन निगाहोलेसोपि कृतः म्यात् । तस्मादन्याधीनतानिवारणार्थ निःशस्नया मर्वदा मिलनार्थं च 'म यै पतिः म्यादफुनोभयः स्वयं समन्ततः पाति भयानुरं जन'मित्युक्तलक्षणपतित्वमेव प्रार्थित ताभिर्न तु विवाह जनितपतिलमिति । अत एर प्रमाणातीतायां रामलीलायामेर तामागाकारणम् । गतध मठपतिजयगोपालभट्टकृतविवरणसमेतम् । न विवाहितपतिभावना प्रमावत एव च न तासामन्यपूर्वाभिः सह लीलायामीर्ष्यादिकं जातम् । विवाहितपतित्वे सति वीर्ष्यादिकं कासाचिदपि सर्वदावश्यमुद्भवेदेव, सत्य- मामादिवत् । न च 'तस्सा अमूनि नः क्षोभं कुर्वन्त्युचैः पदानि यत्, यैकापहृत्य गोपीनां रहो मुंक्तेऽच्युताधर मित्यर्ध्या तासामपि श्रूयत एवेति वाच्यम् । नेयमीा सहभोगेपि खेकैव भुक्त इत्यस्मिन्नशे ईर्ष्या । तथा च समानशीलव्यसनरूपा सखी भूत्वा प्रियविप्र- योगजनितात्यसशास्मद्विप्रयोगजनितं दुःखं ज्ञात्वापि यदस्मान् विहाय मुंक्त तत् क्षोभं जनयतीति सखीत्वप्रयुक्ततत्लेहजनिता, न तु सपनिमावजनितति निर्णयात् । अत एव 'ददृशुः प्रियविश्लेपमोहितां दुःखितां सखी मित्यग्ने तस्यास्तासां च सखीभाव उक्तः । अत एवाग्रे तत्सहभावेन रासलीला, अन्यथा तया सहान्याभिः सह वा रासलीलायाम- मर्यादरसो न स्यात् । तस्मादस्मदुक्ताभिप्राय एवात्र । विवाहितपतिना सपत्नीसहभावकृत- लीलायां तु घहिरीया॑दिमावादर्शनेप्यन्तरीकॊसंवलनं तिष्ठत्येव लोके राजमहिपीणाम् । अत एव वासरदाननियमोपि तत्र, अत्र तु सर्वदा सर्वसंवलितत्वेनैव लीलाकरणादिति महदेव वैलक्षण्यमित्यास्तां तावत्प्रसक्तानुप्रसक्तचिन्तया । एवं चैतादृशपतिभावेनानन्यपूर्वाणां कुमारीणां जारमावेनान्तहगतानां निरुपधिप्रियत्वभावेन च रासमण्डलमण्डनानां च परमकाष्ठापन्नरसरूपमगवत्प्राप्तिः, तया च 'गोपीभावेन ये भक्ता' इत्यादिपुराणवाक्यात् तादृशभावसजातीयमावेनैवाधुनिकानामपि तादृशभगवत्प्राप्तिरिति सिद्धम् । तत्रायं रसो. परिच्छिन्न इत्यपरिच्छिन्नखरूपसर्वभावप्रपत्त्यैकलभ्यः । तत्र जारभावो न सर्वभावप्रपत्तिरूपः कामैकमात्रपूरकत्वेनैव तस्योद्भवात् , परिच्छिन्नखरूपत्वात् । अत एव तेन भावेनास्य रसस्स न प्राप्तिरिति तासां प्रतिवन्धोपि जातः । तस्स देहस्य च सगुणभावाश्रयत्वेन सगुणत्वादेव तत्यागानन्तरमेव सर्वभावप्रपत्या निर्गुणताग्रसखरूपप्रियप्राप्तिस्तासामजनि, अन्यया तद्भावस्स सर्वभावप्रपत्तिरूपत्वेन निर्गुणत्वे तच्छरीरस्य च निर्गुणत्वे तेनैव शरीरेण प्रियप्राप्तिः स्याद्रासमण्डलमण्डनानामिव । अप्राधिकपूर्वपक्षसमाधानानि तु फल- प्रकरणीयसुवोधिन्यामवलोकनीयानि । तथाचातिप्रतिकूलद्वेपादिभावेनापि चेत् प्रभुर्योगीन्द्र- प्रार्थ्या मुक्ति ददाति तदातिप्रेमसंवलितजारभावेन कथं न गुणातीतरसरूपखरूपं यात् । परन्त्वेतदेहपातानन्तरमेव सर्वभावप्रपत्तिमुत्साधैव दास्यति । एतादृशस्वरूपस सर्वमावप्रपत्यैकलम्यत्वात् । एवं च सति यद्येतदनन्तरगपि सर्वभावप्रपत्तिरेव भाविनी, तर्हि भगवति सर्वभावप्रपत्तिरेव कार्या, न तु जारभावः । 'प्रक्षालनाद्धि पंकस्येति न्यायात् । यदि कुनापि सर्वोपमर्दैन जारभाव एवोदेति तदा भगवदिच्छैव तथा, परन्तु सर्वभाव- प्रपत्तिमुत्साद्यैव तत्रापि फलं दास्यतीति ज्ञेयम् । न च 'ये यथा मां प्रपद्यन्त' इति प्रतिज्ञाविरोध इति वाच्यम् । सर्वभावप्रपत्तिलम्यप्रभुरूपप्राप्ती जारभावजन्यकामपर्तिरूप- फलस्याप्यन्तर्भूतत्वात् प्रतिज्ञाविरोधाभावात् , तस्माजारभावेन भगवद्भजन न कर्तव्यमेव । ८ सेनाफलम् । अत एव सर्वभावप्रपत्तिसहितानां रासमण्डलमण्डनानामपि कामपूर्तिरूपफलमपि दत्तं प्रभुणा, अन्यथा तन्न दत्तं स्यात् , ततो ज्ञायते सर्वभावप्रपतिलभ्ये फले तदप्यन्तर्भूतमिति । न च पतिभावेपि न सर्वभावप्रपत्तिः, पतित्वभावस्यापि परिच्छिन्नत्वादिति शंकनीयम् । पतिव्रतानां पत्यौ भगवत्ताज्ञानपूर्वकमजनम्स विदितत्वात् सर्वत्र सर्वदा सर्वसमयेषु च मम पतिरेव गतिरिति सर्वभावापत्तेः सत्त्वात् । एवं च सति यत्र विवाहित लौकिकेपीयं रीति- स्तत्रालौकिके साक्षाद्भगवति पतिभावे सर्वभावप्रपत्तिरिति किं वक्तव्यमिति । न च तर्हि महिषीणां कुतो न सर्वभावप्रपत्तिजनितं फलं जातमिति वाच्यम् । विवाहरूपसंस्कारस तत्र प्रतिबन्धकत्वादिति दिक् । तथा चानन्यपूर्वकुमार्यभिप्रेतकुमारीसजातीयपतिभावे- नान्यपूर्वव्रजसीमन्तिनीनिष्ठनिरुपधिप्रियत्वभावेन वा भजनं कर्तव्यमिति निष्कपः । तत्रेदं भजनं श्रीमद्रजभक्तभजनोपेक्षया खातध्येण न कर्तव्यम्, यत एतादृम्भावेन भजने 'मन्माहात्म्यं मत्सपी मच्छ्रद्धां मन्मनोगतम् । जानन्ति गोपिकाः पार्थ नान्ये जानन्ति मर्मणी'त्यादि पुराणेऽर्जुनं प्रति भगवता स्वसपयां गोपिका एव जानन्तीत्युक्तत्वाद्वजमक्ता एव गुरवः । तथा च तत्समकक्षतया खातध्येण भजने गुरुहेलनरूपापराधः प्रसज्येत । तथा च भगवान् फलं न दद्या'दाचार्य मां विजानीया' दिति वाक्यात् । किन्च, 'न पारयेऽहं निरवयसंयुजां स्वसाधुकृत्यं विबुधायुपापि यः । या मामजन् दुर्जरगेहशृंखलां संवृश्य तद्वः प्रतियातु साधुने'त्यादिफलप्रकरणीयप्रभुवास्यादयं प्रभुरेतदधीन एव सर्वदा क्रीत- जनवन्न त्वन्याधीनः, अतोपि न तदुपेक्षया भजने फलप्राप्तिः । न च 'अहं भक्तपराधीनो ह्यखतन्त्र इव द्विज । साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्कैर्भक्तजनप्रियः । नाहमात्मानमाशासे मद्भक्तैः साधुभिर्विना । श्रियं चायन्तिी ब्रह्मन् येषां गतिरहं परा । ये दारागारपुत्राप्तान् प्राणान् वित्तमिमं परम् । हिस्वा मां शरणं याताः कथं तांस्त्यक्तुमुत्सहे । मयि निर्वद्धहृदयाः साधवः समदर्शिनः । वशे कुर्वन्ति मां भक्त्या सस्त्रियः सत्सति यथे'त्यादिनाम्बरीपादिभक्ताधीनत्व- मपि श्रूयते, न त्वम्बरीपादेरेतत्खरूपप्राप्तिरिति वाच्यम् । 'भक्तिभेदो बहुविधो मार्गीमिनि भाव्यते । स्वभावगुणभेदेन पुंसां भावो विभिद्यत' इतिवाक्यानक्तिमार्गोनेकविधः, तेषु च भक्तिभेदेष्वेतासां भक्तिरत्युत्तमा, परमकाष्ठापनस्वरूपलाभात् । अत ए'वैताः परं तनुभृतो ननु गोपवध्वो गोविन्द एव निखिलात्मनि रूढभावाः । वान्छन्ति यद्भवमियो मुनयो पयं च किं ब्रह्मजन्ममिरनन्तकधारसस' । अत्रैता गोपवध्वः परमतिशयेन तनुभृत इत्य- नेनान्ये भक्ता अतिशयेन तनुभृतो न भवन्तीत्युच्यते । नन्वत्र किं कारणमित्याकांक्षाया- माहुः गोविन्द एवेति । गोविन्द एव निरूढभावाः, न लन्यस्मिन् । निरूढः वक्त- मशक्यो भावो यासा ताः । यथा निरूढशब्दे व्युत्पत्तिर्न कर्तव्या तागर्थाभावात्तथैतासां भावेपीति भावः । गोगोकुलेन्द्रवाचकेन गोविन्दपदेन च धर्मिमानपरता तासां निरूपिता । नन्वन्यभावभक्ता अपि महिप्यादयो धर्मिपरा एवेत्याशकायामाह निखिलारमनीति ।

५२ मठपतिजयगोपालभट्टकृतविवरणसमेतम् । निखिलानामन्येपां धर्मिणा धर्माणामप्यात्मा मूलरूगधर्मीत्यर्थ । तादृशत्व श्रीयशोदा- नन्दने श्रीकृष्ण एव, 'कृष्णमेनमवेहि समात्मानमपिलात्मना'मिति वाक्यात् । तथा चान्ये धर्मिपरा अपि न निखिलात्मस्वरूपश्रीकृष्णरूपधर्मिपरा इति भाव । नन्वेव किमित्यय भाव स्तूयते, भिन्नरुचिहि लोक इति न्यायाद्यस्य यद्रोचते स तमेव भाव तमेव स्वरूप च सर्वोत्कृष्ट जानातीति चेत्तनाह वाच्छन्ति यद्भवमियो मुनय इति । पूर्व ससार- भयेन मुनय. मननशीला भूत्वा प्राप्तज्ञाना निवृत्ताविद्या शुकादयोपि यद्यस्मात्कारणात् वान्छन्ति य भावम् । तथा च येन नि शेषाविद्याभानवन्तस्त एवान्यप्रकारक भावमन्यप्रकारक भगवत्स्वरूप च सर्वोत्कृष्टत्वेन परमकाष्ठापन्न जानन्तीति भाव । किञ्च, वयमपि वैश्या पेक्षयोत्कृष्टा क्षनिया लौकिका आप वान्छाम । यतोनुमावदर्शन विना नोत्कृष्ट मन्यते कोपि कमपि । तस्माचा लौकिकालौकिकाना वाञ्छाखभावस्तरस्वरूपमेव तदासक्ताश्च सर्वोपरि विरानमाना इति किं वाच्यमेतत्भावस्सैतत्स्वरूपस्य तन्निष्ठानामासा सर्वाधिकत्व इति निगर्व । अत कारणादनन्ता कथा यस्यासावनन्तकथ श्रीकृष्णस्तस्मिन् यो रसोदोधाभाषयान् तस्य ब्रह्मानन्ममि सहस्रमुखचतुर्मुखादिजन्मभि किम् ? न किमपी त्यर्थ । यद्वा, जन्ममि पुन पुनर्जन्मभिरनन्तकथारसस्य तस किं ब्रह्म अक्षरखरूपम् ? न किमपि । नेपा मनसि ब्रह्मस्वरूपमप्रयोजक मासत इत्यर्थ । तथा चानन्तकथारस- निष्ठत्वे जन्मैव वरम्, न तु गुक्तिरिति । तथा चैतन्मार्ग एतासामेव गुरुत्वेनान्यस्वरूपस्सा न्याधीनत्वेप्येतासा भावस्य सर्वोत्तमत्वात् परमकाप्टापन्नरसरूपभगवत्स्वरूपमेतदधीन मेवेसपि विचार्यासामेवातिदैन्येन दासकरणे तत्स्वरूपप्राप्तिस्तदनुग्रहेण, न तु स्वातन्ये ऐति ज्ञेयम् । अपर च 'आसामहो चरणरेणुजुपामह स्या वृन्दावने किमपि गुल्मलती- पधीनाम् । या दुस्त्यज सजनमार्यपथ च हित्वा भेजुर्मुकुन्दपदवी श्रुतिभिर्विमृग्याम्', 'वन्दे नन्दनजस्त्रीणा पादरेणुमभीक्ष्णश । यासा हरिकथोद्गीत पुनाति भुवनाय'मित्या दिना व्रजमक्का स्वननस्यार्यपथस्य च परमकाष्ठापनस्य स्यागेन मुकुन्दस्य मोक्षदातुरपि पदवी येन मार्गेण भगवान् गच्छति त मार्गमेव तचरणरेणुसवलित भेजुर्न तु मुक्तिम् । तथा च मुक्यपेक्षयापि भगवचरणरेणुरेव सर्वोत्कृष्ट इति सिद्धम् । एव चेतादृक्चरणरेणोरेता दृशानुभावज्ञापने ब्रजसीमन्तिन्य एव गुख इत्येतासामनुवृत्त्यैव भगवचरणरेणुप्राप्तिरिति श्रीनजभक्तचरणरेणुसम्वन्धि गुल्मलतौपधिजन्मापि प्रार्थितमतिदीनतया श्रीमदुद्धवैर्वन्दन च तचरणरेणोरेव च कृतमन्यथा गुर्ववज्ञाकृतमताजनितापराधेन न भगवचरणरेणुप्राप्ति- रिति दिक् । तस्मादेतासा गुरुत्वादेतदधीनत्वाच तचरणरेणुदास्येनैवैतादृशभगवत्प्राति - न्यथेति नि प्रत्यहम् । सादेतत् । अय सर्वापि यत्नो रसरूपप्रभुस्वरूपफलप्राप्त्यर्थमेव । 'रसो वे रस झवाय लब्ध्वानन्दीभातीति श्रुत्या रसरूपभगवत्प्राप्तेरेव परमफलत्वात् । सा स ६० सेवापलम् । प्राप्ति स्तेनेन सर्वभावेन परमानन्दमश्नुते' इति नादपिन्दपनिपच्छुत्या सोचते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिते'ति तैत्तिरीयोपनिपछुतेथ सर्वभावप्रपतिलम्पसर्वकामभोग- रूपा । स च पूर्णसर्वकामभोगोपि तेपा जसीमन्तिनीसदृशमावेनैन, नान्यभक्तमावसना- तीयमानेन । एतदतिरिक्तस्थले प्रभुरशेनेव, न तु पूर्णखरूपेणेति । तथा च तत्कामनया भजने क्रियमाणे जसीमन्तिनीदासकरणेपि मनसि तत्समतामावनासत्वात् कापटप सिद्धी तामा गुरुरूपत्वेन सकपटभजने फलसिद्धरमावस्तत्समकक्षता च स्यादिति चेत्, अब घूम । परमकाष्ठापन्नरसरूपो भगवान् हि लोकेतिरहस्सतमा पुष्टिलीला यत् प्रकटित- वान् तत्किमर्थमिति पृच्छाम । न च 'आगामिनि निरिधी तु जाते सृष्टयर्थमुद्यते । कल्प सारस्वत प्राप्य नो गोप्यो मनिप्यय । पृथिव्या मारते क्षेत्र माथुरे मम मण्डले । वृन्दावने भविष्यामि प्रेयान् यो रासमण्डले । जारधर्मेण सुनेह सुदृढ़ सर्वतोधिकम् । मयि सम्प्राप्य सर्वेपि कृतकृत्या भविष्य'ति गृहद्वामनपुराणोक्ते श्रुतीनामनुग्रहार्थमिति वाच्यम्। अनुग्रहस्स श्रुतिनिमित्तप्रदर्शितप्रकृत्यतीतलोकेपि कर्तुं शक्यत्वात् । न च 'पुरा महर्पय' सों दण्डकारण्यवासिन । दृष्ट्वा राम हरि तन भोक्तुमैन्छन् सुविग्रहम् । ते सर्व स्त्रीत्व- मापना समुद्भूताय गोकुले। हरिं सम्प्राप्य कामेन ततो मुक्ता भवार्णवादिति । 'अमिपुना महात्मानस्तपसा स्त्रीत्वमापिर । भतार च जगयोनि वासुदेवमन विभुम् । कृष्णस रमणायं हि सहस्राणि च पोडश । गोप्यो रूपाणि चतुश्च तनामीडन्त केशव'मित्यादि पद्मपुराणोत्तरखण्डमहाकौर्मादिवाराहपुराणादिवचनसिद्धदण्डकारण्यवास्तव्यमहीणामतु- ग्रहार्थमित्यपि वाच्यम् । दण्डकारण्यस्थमहीणामपि तव स्त्रीदेह सम्पाय रामरूपेणैव न रमण कृतम्, किन्तु तद्देहपातानन्तर स्त्रीदेह सम्पाद्य ब्रह्माण्डान्तर्वर्तिवृन्दावन एव श्रीकृष्णरूपेणैव रमण कृतम् । एव च तदेहपातानन्तरमलौकिकदेह सम्पाद्य श्रुतिप्रदर्शित- वृन्दावन एव कुतो नानुग्रह कृतवानिति प्रश्ने तवोत्तराभावात् , न च स्वतनेच्छो भगवा निति वाच्यम् । 'अनुग्रहाय भक्ताना मानुप देहमाश्रित । भजते तादृशी कीडा या श्रुत्वा तत्परो भवेदिति फलप्रकरणीयवाक्याद्भक्तानुग्रहार्थमेवैतादृशलीलाविशिष्टप्रभुप्राकट्यात् । प्रपञ्च नि प्रयोजनकप्राकट्यस्याश्रुतत्वाच्च । न चानुग्रह विना नैतादृशफलप्राप्तिरित्यनुग्रहेण प्रापचिकजीवानामप्येतदेहपातोत्तर तादृशफलदान तनैव स्थित्वा कुतो न करोतीति वाच्यम् । भगवान् हि रसरूपखरूप प्रापचिकजीवानामपि केपाश्चिातु विचारितवान् खमुख्यमक्तेच्छापूर्वकखेच्छया । तन रसरूपभगवत्प्राप्तिस्तु रसरूपमागेनैव योग्या, नान्याशभावेन, 'ये यथा मा प्रपद्यन्त' इति वाक्यात् । तत्र रसरूपभावस्वरूप साधन वेदादिषु कुनापि नोक्तमत प्रपञ्चे वृन्दावन रसरूपस्वस्वरूप रसरूप परिकर च तत्प्राध्यनु- गुण रसरूप साधन च प्रकर कृत्वा ताशसाधनेन तादृशस्वरूपप्राति महादीना कृत- वान् प्रभु , तदनन्तर ताशसाधनस्साविर्भावादतिभाग्यवता जीवाना तदनुष्ठाने तरखरूप- ~ ६१ मठपतिजयगोपालभट्टकृतविवरणसमेतम् । प्राप्तैर्नि प्रत्यूहलमिति तधाकरणागानात् । न च रसरूपभावमनादत्वानुग्रहेणैव कुनो न ताइक्फलदानमिति वाच्यम् , स्वतःच्छेन भगवतैव 'ये यथा मां अपयन्ते तांस्तथैव भजा- म्यह'मित्युक्तत्वात् ताटकप्रतिपत्तिं विना तादृशानुग्रहाभावात् ताशफलदानाभावात् प्रपत्ते. रपि तव दानेन प्राकट्यवैयर्थ्यमिति पूर्वमेवोक्तम् । न च 'नायमात्मा प्रवचनेन लम्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन, यमेवैप वृणुते तेन तम्य' इति गुण्डकोपनिषद्वाक्याद् पिनापि साधन भगवत्प्राप्तिरिति वाच्यम् । एतद्वाक्यानुपदोक्त 'नायमात्मा बलहीनेन लम्यो, न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिंगात्, एतैस्पायैर्यतते यस्तु विद्वांस्तस्यैप आत्मा विशते ग्रह्मधामे तिवाक्य 'एतैरुपायैर्यतत' इत्युक्ते पूर्ववाक्येन मर्यादीयसाधनमान- निपेध एव, न तु एतैर्मन्मनसि स्थितैरुपायैर्वजभक्तसजातीयभावादिमि यः कश्चन यतते तस्य भगनदशीकारकसर्वात्मभावरूपवललाभादेष आत्मा ब्रारूप हृदये प्रकटं धाम विशते प्रनिष्टो भवतीत्यर्थान्न मर्यादातीतसाधननिषेध इति सदुक्तेरनवकाशात् । अन्यथा फलत्वव्याहतिः । यत्किञ्चित्साधनसाध्यस्यैव फलत्वात् । तस्मादतिभाग्यरत्तराणां जीवानामेतादृशसाधनेनैवैतादृशफलप्राप्त्यर्थमेतादृशोवतार इति । एव च ब्रजभक्तसमानभावे- नामजने तत्फलप्राप्ते. कस्याप्यभावादेतादृशमार्गप्राकट्यवैयर्थ्यापात. स्यात् । अत एव 'स्त्रियो वा पुरुपो यापि भर्तृभावेन केशवम् । हृदि कृत्वा गति यान्ति श्रुतीना नान सशय' इति वृहद्वामनपुराणे । 'येपामह प्रिय आत्मा सुतश्च सखा मुहृदो दैनमिष्ट मित्यादिना श्रीभागवते चोक्तम् । अन्यथैतादृग्यास्य व्यर्थ स्यात् । तस्माद्रजमक्तसजातीयभावेनैव भजन कर्तव्यम् । परन्तु प्रजभक्तदास्यपूर्वकमेव, न तु सातत्र्येण, ब्रजभक्तानामेतन्मार्ग- गुरुत्वाप्रभोस्तदधीनत्वाचेति निष्कर्ष इति सौ समञ्जसम् । न च प्रभोजभक्ताधीनत्वेन तहास्यकरणेपि यदि ता प्रतिवन्ध कुर्यु प्रभो स्वखरूपदाने स्त्रीस्वभावसिद्धप्रचुरेय॑या तदा कथमेतादृशफलप्राप्तिरिति वाच्यम् । रसरूपप्रभोरेव फललात् रसस्य च निभावानु- भानव्यभिचारिसमूहरूपत्वात् तन विमानत्वेन ननभक्ताना रसम्पप्रभुत्वात् तपामप्यनु- मत्यैवैताग्मार्गप्राकट्यस्य जातत्वेन तत्कृतेjया प्रतिवन्धाभागान् । फिच, यव लौकिको नायकोनेकनायकानामेककालापच्छेदेन रमदान कर्तुं न शक्नोति तनापि सम्भाति । अन तु प्रभोरलोकिकत्वात् 'कृत्वा तावन्तमात्मान यावतीर्गोपयोपित । रेमे स भगवांस्तामिरात्मारामोपि लीलये त्यनेपानन्तर पत्येन सर्पपा रमदानकरणसगबलात् केयविकाश , यन सर्वनैव सर्वानुमाद्य एष गभु सर्वदा पिरागते । ननु प्रभू रस- रूपस्तदन्तर्गताश्च बनमक्ता विभागलेनास्मदादिनपत्तिश्च प्रजभक्तदास्यविशिष्टभगाद्विषयक सत्मिभानेन । एष च भगवळपरसानुभने सिद्दे समय तामा दास्य स्यान्यति। न - तदुत्तरमेतासा दास्स मास्त्विति शमनीयम् । 'ये यथा मा प्राद्यन्ते' इति मोटामापत्त रिति चेन्न, अलौफिकरसभोगानुल्सामर्यम्य पाया रसमसभगा दोगरा नभाकदाम्प ६२ सेवाफलम् । भोगस्य चैककालावच्छेदेनैव सम्मवेन 'ये यथा मां प्रपद्यन्त' इति मर्यादाया अभंगात् ! न 'चाचार्य मां विजानीयादि'त्यनेनाचार्यस्य भगवत्वेन तदास्यपूर्वकमेव जीवमंगवहास्य क्रियते साधनदशायाम् , फलदशायां तु भगवहास्यमेव तिष्ठति, न वाचार्यदासम्, तत्र क्वेयं मर्यादा, तघात्रापि मविष्यतीति वान्यम् । सर्वेषां भगवद्रूपाणां नित्यत्वेनाचार्यरूपस्य भगवद्रसानुगुणभगवल्लीलान्तर्गतत्वात् स्वरूपस्स चालौकिकसामर्थ्येन तदास्यकरणसापि सम्भवात् । एवमेव सर्वभावप्रपत्त्या भजनमिति प्रमुदत्तालौकिकविषयकसामर्थ्येन सर्वविध लीलास्वप्येतस्य भजनकर्तुः सान्निध्यं सिद्धम् । किं पहुनांशावतारादिलीलायामप्यंशेनैव च भक्तोपि तत्तलीलानुभवं करोतीति न कस्यामपि लीलायामेतादृशभक्तासहमायो भगवतः । न चैवं श्रीनारायणादिमक्तस्सापि श्रीनारायणे सर्वभावप्रपत्तेः सत्त्वात् सर्वत्र तत्सहभाव- प्राप्ती पुरुषोत्तमसहभावोपि स्यादिति वाच्यम् । 'ये यथा मा मितिपये मामिति पदेन पुरुषोत्तमत्वेनांगुल्या खस्वरूपप्रदर्शनपूर्वकमुक्तत्वादेतसाः प्रतिज्ञायाः पूर्णपुरुषोत्तम मानसम्बन्धित्वात् , अन्यथा दण्डकारण्यस्थपणामपि तेनैव स्वरूपेण रसदानं कृतं स्यात् कोसलेन्द्रकुमारेण । किचैतस्याः प्रतिज्ञायाः सर्वमगवत्स्वरूपसम्बन्धित्वे पूर्णत्वांशत्वादिविभागोपि न स्यात् । न चेष्टापत्तिः, तदान्यखरूपाणामशरूपश्रीकृष्ण- स्वरूपाणामपि श्रीमता व्यासेनोक्तत्वेन चित्ताप्रसादो न स्यादिति सर्वमनवद्यम् । एवन्चक- भक्तसम्पन्धिन्या अपि लीलाया न परिच्छेदस्तहि सर्वभक्तसम्बन्धिन्या लीलायाः परिच्छेदः केन कर्तुं शक्यतेति किं वामनसागोचरमाहात्म्येषु प्रभुतत्परिकरतद्भक्तेषु विचारचातु- र्येण । किञ्च 'त्रैलोक्ये भगवद्भक्ताः के त्वां जानन्ति मर्मणि । केपु वा त्वं सदायत्तः केपु प्रेम तवातुलमि'ति श्रीमदर्जुनेन पृष्टो भगवानुवाच 'न तया मे प्रियतमो प्रया रुद्रश्च पार्थिव । न च लक्ष्मीन चात्मा च यथा गोपीजनो मम । भक्ता ममानुरक्ताश्च कति सन्ति न भूतले । किन्तु गोपीजनः प्राणाधिकप्रियतमो मम । न मां जानन्ति मुनयो योगिनश्च परन्तप । न च रुद्रादयो देवा यथा गोप्यो विदन्ति माम् । न तपोभिर्न वेदैश्व नाचारैर्न च विद्यया । वशोस्मि केवलं प्रेम्णा प्रमाणं तत्र गोपिकाः । मन्माहात्म्यं मच्चयाँ मच्छूद्धां मन्मनोगतम् । जानन्ति गोपिकाः पार्थ नान्ये जानन्ति मर्मणि । निजाङ्गमपि या गोप्यो ममेति समुपासते । ताभ्यः परं न मे पार्थ निगूढप्रेमभाजनम् । मम भक्तास्तु ये पार्थ न मे भक्तास्तु ते मताः । मम भक्तस्य ये भक्तास्ते मे भक्ततमा मता' इत्यादि- पुराणप्रघट्टकान्मद्भक्तपूजाभ्यधिकेति श्रीभागवताद्वजभक्तानां भक्तशिरोभूपणत्वात् प्रभोरतिप्रियत्वाचापि एतासां दास्यं कर्तव्यम् । एवञ्च सति एतद्दास्यकरणे प्रभोरत्या- नन्दाविर्भावेन तासामसानन्दाविभीवान्मनसि सन्तोषेण तदनुग्रहात् तत्पूर्वोक्तं फलं भगवान् ददातीसपि तद्दारसकरणम् । तथा चैतासां गुरुत्वात् प्रभोरेतदधीनत्वाद्भक्त- शिरोभूपणत्वादतिप्रियत्वाच सर्वथैतहासकरणपूर्वकमेव प्रभुदास्पकरणमिति सिद्धम् ।

मठपतिजयगोपालभदृष्तविवरणसमेतम् । अथ श्रीमत्स्वामिन्यादीनां सर्वासां समतयैव दास्यं कर्तव्यमयवा न्यूनाधिकमायेनेति पृच्छसि चेत् । अत्रोच्यते । 'यथा राधा प्रिया विष्णोस्तस्याः कुण्डं प्रियं तथा । सर्व- गोपीपु सैवेका विष्णोरत्यन्तवल्लभे ति पमपुराणवचनात् । अय च 'प्रैलोक्ये पृथिवी धन्या तत्र वृन्दावनं पुनः । तत्रापि गोपिकाः पार्थ तत्र राधाभिधा ममे'त्यादिपुराणवचनात् । 'सर्वश्रेष्ठा गान्धर्युवाचेति गोपालतापिन्युपनिषच्छुतेश्च गान्धर्व्यपरनामिकायां श्रीखामि- न्यामेव सर्वापेक्षया भगवतो ममतातिशयात् तत्रैव निजदासं मुख्यतया स्थापयित्वा:- न्यासु व्रजसीमन्तिनीषु 'मोहितां दुःखितां सखीमि'त्यादिना सखीत्वोक्तेः सख्याश्य समानशीलव्यसनवत्त्वात् तासां खामिनीसमानशीलव्यसनवत्वात् तासां श्रीमत्स्वामिन्या अतिप्रियतमानां दास्यमपि सामिन्यनुग्रहाकांक्षया खामिनीदास्यांगत्वेन खामिनीवदेव कर्तव्यम् । तासां समानशीलसखीत्वात्तदास्पकरणे श्रीखामिन्यत्सन्तमनुगृह्णाति । स्वामि- न्यनुग्रहे च ता अनुगृह्णन्ति । तदनुग्रहे च ब्रजराजकिशोरानुग्रह इति न कदापि कुत्रापि केनाप्यंशेन फलविच्छेदः । अत एव कैश्विद्भगवदीयः सिद्धान्तितं श्रीमचन्दावल्यादिपु खामिनीप्रतिपक्षात्वमपि न सम्भवति, सखित्वोक्तिविरोधात् । अत एव 'यदैव श्रीराधे मिलति रहसि त्वां मधुपतिस्तदैवाकार्याहं निजचरणदास्येतिगदिता । मुदा चन्द्रावल्ये'ति पद्ये अस्मत्प्रभुभिः सखीत्वमेव स्फुटीकृतम्, न तु प्रतिपक्षात्वम् । अत एवास्मत्सर्व- खायिताः प्रभुचरणाः श्रीमत्स्वामिन्यष्टकतवादशकपटपधादौ तद्दास्यमेव सविस्तरं प्रार्थयन्तो 'यावन्ति पदपमानी'त्यादिनाऽन्यासामपि दासं प्रार्थितवन्तः । अन्यथा श्रीस्वामिन्या इवान्यासामपि पृथक्तया दासं प्रार्थयेयुर्न तु तद्दास्यप्रार्थनाप्रसंगे । सर्वांसामपि सम- प्राधान्यात् । तस्मादन्यासां दास्यमंगत्वेनैवेत्यस्मदुक्त एव पन्थाः । ननु एवं चेत् सर्वा- स्वपि सतीत्वं तदा रसान्तर्गतामानखण्डिताकलहान्तरितादिलीला नोपपद्यतेति चेत्, अत्र वदामः । हृदयादिस्थिताभरणमणिगणप्रतिविम्वितदृष्टनिजससे प्रतिनायिकाभ्रमात् संकेतस्थलानागमनाद्वा मानोदयात् । एवमेव पन्धविशेषाकस्मिकललाटसंक्रान्तस्य चरणतल- लाक्षारसे सुरतसमयसमुद्भूतनिजदन्तनसक्षतादिषु च कदाचिदतिविस्मरणेन रासस्थनिखिल- ग्रजभक्तातिरिक्तपरकीयाकृतत्वभ्रान्सा मानखण्डिताकलहान्तरितादिलीलानां सम्भवात् । न च लाक्षारसदन्तनसक्षतादिपु स्वयूथकृतत्वमान्तिरेव कुतो न जायत इति वाच्यम् । तथा प्रान्ततायामपि तामु परस्परं दृढतरसतीत्वजनितातिप्रेम्णा ईर्ष्यानुदयेन तथालीलासम्भवात् । किच 'योगमायामुपाश्रित' इत्यनेन रसलीलायां योगमायामाश्रितो मगवान् । एवञ्च योगमाया यथा यथा येषां येषां पदार्थानामुपयोगो रसलीलायाम्, तथा तथा करोतीति परकीयासम्भोगादिदर्शनजमानादिरसानुभवार्थ परकीयासम्भोगादि प्रदर्य मानादिरसानु- मवं कारयतीत्यनेनापि प्रकारेण मानादिलीलानां सम्भवाच । यदि चात्यन्तमाग्रहो भवतां यचन्द्रावल्यादिसम्भोगदर्शनेन मानादिरेताखेप च प्रतिपक्षालं तदा तत्सर्व कल्पान्तरीयांश-

सेवापलम् ।
रूपकृष्णावतारीयरमलीलायामेर, न सारसतस्त्पीयपूर्णानतारसम्पन्धिरमलीलायामिति
युद्ध्यताम् । यदि सारस्वतकन्पे मवदुत्तमकारः म्यात्तदा श्रीगागयते सुटमुपलभ्येत ।
उपलभ्यते तु ससीत्वमेव परस्परं फलप्रकरण इति सर्व चतुरसमिति कृतं प्रसक्तानुप्रसक्त-
चिन्तया । अनेदं जयम् । अत्र फलमये फलट्यमेतद्देदेपि भवति परन्तु मनसेव रमरूप-
मगमत्सम्बन्धेन मनसोलौकिकत्यामागत् । सेनापयिकदेहरूपतृतीयं फल खेतदेहपातो.
तर एव भवति सर्वथा ! सर्वत्र लौकिकदेहपातोत्तर एवालीफिकदेहसम्यन्यसम्मवा-
दिति दिय ।। १।।
अय प्रकृतमनुमरामः । ननु यापके गति कार्यानुदयादाधकागारस सर्वत्र
कारणतेन्यन यदापकं तनुजरितजरूपसाधनमेवायाम् , तद्वक्तव्यम् , यदभावं सम्पाय
मानससेवारूपं तत्कार्य सम्पायतामित्याकांक्षायां तनुजत्तिजरूपसाधनमेवारापकमाहुः
उठेगा प्रतिवन्धो चेति ।
उदेगः प्रतियन्धो वा भोगो वा स्यातुयाधकम् ॥२॥
एतस्य विवरणं तु सेवायां प्रतियन्धकत्रयम्। उदेगो वा प्रतिबन्धो
वा भोगो था। प्रयाणां साधनपरित्यागः कर्तव्य इत्यन्तम् । तत्र तनुजवित्तज-
रूपसाधनसेवायां येन क्रियमाणेन उद्वेगप्रतियन्धमोगा भवन्ति तस्स परित्यागः
कर्तव्यः । तत्परित्यागे तत्साध्योद्वेगायनुदयात्तनुजनिचजरूपसाधनसेवासम्पत्ती सत्यां
मानससेवासिद्धिर्भवतीति गावः । तनोद्वेगः शोकदुःसादिजनितो भवति, तेषु शोकादिषु
जातेषु 'चित्तोद्वेगं विधायापि हरिय॑चत् करिष्यति तथैव तस्स लीलेति मत्वा चिन्तां द्रुतं
त्यजे'दिति नवरत्नोक्तेभंगवलीला यथा सर्वा तधेयमप्येका भगवलीला भगवतः सुखा-
धायिकेति ज्ञात्वा शोकादित्यागः कर्तव्यो, न तु शोकादिदूरीकरणाथं यत्नः कर्तव्य इति ।
अन्यथा यद्यपि भविष्यति तदेव यत्प्रभुणा पिचारितमस्त्यतः तस्य स्वरूपेण विघटन तु
न कर्तुं शक्यम् , तथापि प्रभुसुसाधायकलीलापदार्थविघटनेच्छायामपि खामिद्रोहो भवेदत.
प्रविच्छां ज्ञात्वा तादृशशोकदु:सादिकेषु सत्तेषु सत्सूद्वेगकारणाभावादुद्वेगामातस्य जाय-
मानत्वादुद्वेगसाधनपरित्यागः कर्तव्यः । यद्वा, बलिष्ठम्लेच्छयलिष्ठवेदवाबजनितोपद्रवेण
साधनरूपसेपायामुळेगो भवति तदभावाय तत्सान्निध्यरूपगाधनपरित्यागः कर्तव्य इखे.
तदर्थ साधनपरित्यागः कर्तव्य इत्युक्तम् ॥२॥
तनोद्वेगकारणानामनन्तत्वात्तजन्योद्वेगानामप्यनन्तत्वात् परिगणना कर्तुमशक्येति
सर्वविधमप्युरोगमुद्वेगत्वेनैकविधमेव निरूप्य द्वितीय प्रतिवन्धरूप तनुजवित्तजसेवायां
वाधकमाहुः अकर्तव्यमिति ।
अकर्तव्यं भगवत सर्वथा चेद्गतिन हि ।
यथा या तत्वनिर्धारो विवेका माधनं मतम् ॥३॥

, गठपतिजयगोपालभट्टतविवरणसमेतम् । ६५ एतस विवरण तु प्रतिवन्धोपि विविधः, साधारणो भगवत्कृतश्च, तत्राद्यो बुद्ध्या त्याज्य । भगवत्कृतश्चेत् प्रतिवन्धस्तदा भगवान् फलं न दास्यतीति मन्तव्यम् । तदान्यसेवापि व्यर्था । तदासुरोयं जीव इति निर्धारः । तदा ज्ञानमार्गेण स्थातव्यं शोकाभावायेति विवेक इत्यन्तम् । अत्र भगवतः सर्वथा चेदकर्तव्यं भगवत्कृतप्रतिवन्ध इति यावत्, तदा गतिः तदभावसम्पादकसाधन किमपि नास्तीति मूलार्थ । अत्र उद्वेगः प्रतिवन्धो वा भोगो वा स्यात्तु बाधकमित्यनेन पूर्व सेवाया घाधकाय यदुक्त तत्तु तत्रया- भावसम्पादनार्थमेव । अत एव याणा साधने त्यक्ते तदभाव सम्पद्यत इति तयाणा साधनपरित्याग कर्तव्य इति निवृतौ स्फुटीकृतम् । न च पाधकनयत्याग एव कुतो नोक्त , तत्साधनपरित्याग किमर्थमुक्त इति याच्यम् । जाते उद्वेगे जाते च प्रतिवन्धे जाते च मोगे सेवाभावस्तत्समयावच्छेदेन सिद्ध एव जाते तत्त्याग कर्तुमशक्योप्युत्तरसमये तन्नाशोपि स्वयमेव भविष्यतीति व्यर्थस्तत्परित्याग कर्तव्य इति पुरुषप्रयत्नोपदेश इति मनसिकृत्य सेवाविपये बाधकनय न यथोत्पद्यत एन तथा कर्तव्य पुरुपेणेत्येतदर्थ नयाणा सापनपरित्याग कर्तव्य इत्युक्तत्वात् । एव च सति अकर्तव्य भगवत सर्वथा चेगतिर्नहीत्यनेन भगवत्कृतप्रतिवन्धाभानसम्पादनार्थं गतिर्नास्तीत्युक्तत्वादन्यकृतप्रति पन्धामावसम्पादने गतिरतीत्यर्थत सिद्धत्वाद्विविध प्रतियन्धकमागतमेवेति कण्ठरनेण मूलेनुक्त्वा निवरणे प्रतिबन्धकरूपसेवायाधकद्वैविध्यमाहु प्रतिवन्धोपि विविधः । साधारणो भगवत्कृतश्चेति । तन भगवत्कृतप्रतियन्धागाव सम्पादयितुमशक्य साधारणस्तु शक्य इति विवरणे आहु तत्रायो युद्ध्या त्याज्य इति । तत्र प्रति पन्धकरूपसेवायाधकभेदद्वये आयः साधारण प्रतिवन्धो भगवद्विमुखभार्यादिकृत प्रतिवन्धस्तन साधनपरित्यागस्योक्तत्वात् तत्साधनरूपो यो भार्यादि स त्याज्यस्त्या शक्य । तत्यागेन प्रतिवन्धाभानरूपवाधकामाव सम्पादयितु शक्य इत्यर्थों ज्ञेय । अत एवोक्त 'भार्यादिरनुकूलशेत् कारयेद्भगवत्कियाम् । उदासीने स्वय कुर्यात् प्रति- कूले गृह त्यजे दिति भागवततत्त्वदीपे । अय भगवत्कृतप्रतिवन्धस्तु न केनापि सक्तु शक्य इत्याहु भगवत्कृतश्चेत् प्रतिवन्धस्तदा भगवान् फल न दास्यनीति मन्तव्यमिति विवरणे अर्थ स्पष्ट । ननु भगवत्कृत प्रतिबन्ध कस्य फलामावसम्पादक ? किं कायवाट्ननोमिभजन कुर्वत पुरुपस्साहोखिद्धननेच्छावतो वा? तन नाय । 'इति निश्चित्य मनसा कृष्ण परिचरेत्सदेति भागवततत्त्वदीपकारिकाच्यारयाने 'एकापि सकृत्कृता परिचर्या परम पुरुषार्थदेति । पर विद्यमानदेहस्य नि कृत्यर्थ सदा परिचरे'दित्याचाथै सिद्धान्तितत्वात् किचित्कालिकमजनोत्तर यावनीव क्याचिद्भगवदिन्छया भगवत्कृतसेवाप्रतिवन्धेषि परम .

सेवाफलम् । पुरुषार्थलामस सिद्धलादन भगवान् फल न दासतीति निषेधस्स विरुद्धलात् । अत एवं 'न घगोपक्रमे धसो मद्धर्मसोद्धवाणपीति एकादशस्कन्धीयप्रभुवचनं 'यानास्थायेति वचन ‘सदिष्ट्वादिपुरुप पुरुपो याति साम्यतां सवत्मर किघिदूनं दित्सा पद्धरिरर्चित' इति पष्ठस्कन्धीयाटाध्यायीयशुकवचन घ । न द्वितीयः, पिना भगवत्कृपां मजनेच्छानु- दयात् , तदुदये च मजनस्य भविष्य निश्चयेनापि निषेधस्स चैयापातात् । तथाचाय निधो भगवत्कृतप्रतिनन्धे कालविलम्नेन फलदानेन्लामेव व्यनक्ति, न तु तददाने. च्छामिति भावः । अन्यथा मजनच्छानुकूलकृपावैयय प्रसजेतेति । न च विनयानुग्रह भजनेच्छोदय इति वाच्यम् । अवतारदशाया स्वरूपदर्शनेनैवेच्छोदयसम्मवेप्यनवतार- दशाया सत्सगश्रीमागरतादिश्रयण बिना शुद्धपुष्टिभजनेच्छोदयस्यादृष्टत्वादश्रुतत्वाच । यदि पुनर्विनादर्शनश्रवणादिकमपि शुद्धपुष्टिमार्गीयभजनेच्छोदयः स्यात् तदा पुरुषोत्तमावता- रोपि न स्यात् । अत एवानुग्रहाय भक्तानां मानुष देहमाश्रित'इत्युपकम्य 'विक्रीडित ब्रजवधूमिरिद च विष्णो. श्रद्धान्वितोनुशृणुयादय वर्णयेद्य' इत्यत्र य इतिपदेन यस्य- कस्यापि श्रवणवर्णनाम्या भक्ति परामित्यनेन भक्तिलाम उक्त, स विच्छोत्पादनपूर्वक एव । तस्माद व्यर्थ भगवत्कृतश्चेत् प्रतिवन्ध इत्यादिनिरूपणमिति चेत्, अन वदामः । पुनादि- जन्मायुत्तर केनापि प्रतिवन्धेनाकृतपुनादिनिवेदनस्स करसचिन्महत्तमस्य पुरुषस्य तदनन्तर मतिकृपया पुत्रादिलेहेन वा कदाचित् तदनिवेदनस्मरणे मनसि स्यान्मम पुत्रादि. शुद्धपुष्टि- भजनेन भगवन्त प्राप्नोस्विति मयास्मे नागनिनेदने दल्ला भगवत्सेवा कारणीया तदा त्व सेवा कुरु मत्तो नामनिवेदने गृहीत्वेति कयने यदि तम्स हृद्यल्पोप्युत्साहो न दृश्यते कदापि प्रत्युत द्वेप तदोन्नयमिदम् , यदस्य भगवत्कृत प्रतिवन्धोस्ति भगवान् फल न दास्सती- सस्मै नोपदेष्टव्य फिमपीति ज्ञापनार्थत्वेन भगवत्कृतश्चेत् प्रतिवन्ध इत्यादिनिरूपणस्य सार्थकत्वात् । ननु तदा शुद्धपुष्टिमार्गीयपूर्णस्वरूपसेवाफल मा भवत्वस्याशस्वरूपसेवा- फल तु भविष्यतीत्यशसवोपदेश एव कर्नव्यस्तैनेति चदित्याशक्याहु तदान्यसेवापि व्यथेति । अशाशिनोरभेदादशवाश्यधीनत्वाचाशिकृतप्रतिवन्धेशस्य फलदानासमर्थ- खान्महाराजकृते प्रतियन्धे सचिवादेरिवेत्यर्थ । नन्वशिनो न स्वस्वरूपपरमफलदानेच्छा किन्तु स्वल्पफलदानेच्छाशद्वारा तदाशेन फलदान कर्तव्यमेव, महाराजस्य महाफलदानेच्छा- भावेपि सचिनादिद्वारा स्वल्पफलदानेच्छाया सचिवादिनेवेति चेत्, सत्यम्, यताश्य- विरोधेनाशभजन तनैवाशेन फलदान महाराजाविरोधेन सचिवादिभजने सचिवादिनेव, न तु तद्विरोधेन भजने । तथा चैतस्य भगवत्सेवाकर्तव्यत्वकथनेपि कदाप्युत्साहाभावात् प्रत्युत्त उपोद्भवान्नाशेनापि फलदानमित्यन्यसेनावेयात् सापि नोपदेष्टप्येति सुक्त तदान्यसेवापि व्यर्थेति । किच, तदैतादृशम्य यत्स्वरूप तस्स धिोरोपि भवतीत्याहु तदा आसुरोयं जीव इति निर्धार इति । आसुर आसुरापेशी आसुरभाववान् ६७ मठपतिजयगोपालभट्टकृतविवरणसगेता । वा सहजासुरो वेति निर्धारो निश्चय इत्यर्थः । अब कदाचिद्भक्तसनिधी यस मनसि भगवति सद्भाव उत्पद्यते द्वितीयक्षणे तदमनिधी तु नश्यति स आसुरावेशी आसुरभाषवान् वा ज्ञेयः । यस्य तु सत्संगेपि भगवति न सद्भावः कदापि स तु सहजासुर इति ज्ञेयः । ननु तर्हि महत्तमकृपायैयर्यप्रसंग इत्याशक्याहुः यथा वा तत्त्वनिर्धारो विवेकः साधनं मतामिति । वा अथवा यथा आसुरस्य तत्त्वनिर्धार उक्तस्तथा विवेको विचारो ज्ञान- मिति यावत् । तत्साधनमासुरस्य शोकामावरूपफलाय मत सम्मतमित्ययः । अव ज्ञेयम् । 'मायेत्यसुरा' इति श्रुतेरसुराणां माया सेव्या, सैयेश्वरः, तत्कृतलाजगन्मायिकर, तेषां मुक्तिश्चान्धन्तमः प्रविशन्ति ये सम्भूतिमुपासत' इति श्रुतेर्दैवेष्वनाविष्टानां सहजा- सुराणां कामनाभावपूर्वक सम्भूत्युपासकानां तदुपासनारूपसाधनयलेनासुरज्ञानमार्गप्रवेशे सति शोकामावरूपावान्तरफले जाते सुखदुःखात्यन्ताभावस्वरूपपुनरावृत्तिरहितप्रकृतिलय- रूपान्धन्तमःप्रवेशरूपा मुक्तिः । आसुराविष्टानां दैवजीवानां तु निरुपधिकृपया भगवता हतानां मध्ये दैवस्य दैवज्ञानामावात् स्वरूपवलेनाक्षरब्रह्मणि लयरूपा मुक्तिः, तदा- विष्टासुरस्य त्यासुरज्ञानाभावात् सरूपयलेनैवापुनरावृत्तिरहितान्धन्तमःप्रवेशापरपर्यायप्रकृति- लयरूपा मुक्तिः । अन्येषां सकामानां सहजासुराणामासुराविष्टदेवजीवानां च 'असुयी नाम ते लोका अन्धेन तमसा वृताः । तांस्ते प्रेत्यापि गच्छन्त्यविद्वांसोबुधा जनाः', 'तानहं द्विपतः क्रूरान् संसारेषु नराधमान् क्षिपाम्यजसमसुरानासुरीप्येव योनिष्विति श्रुतिमगवद्वाक्याभ्यामन्धन्तमोवृतकेवलदुःखात्मकलोकरूपनरकप्राप्तिस्तद्भोगानन्तरं पुनरा- मुरयोनिप्राप्तिरेवेति कृतं पल्लवितेन । एवं च सर्व मायिकमेकोस्मदाद्यात्मा स एव परमार्थों मायैवेश्वरो नान्य ईश्वरः कोप्येवं तत्त्वनिर्धाररूपो विवेकः सोस साधनं मतं सम्मतं यावजीवं शोकाद्य- मावाय, तदनन्तरं तादृशमुक्तये वेतिशेपः । तथा च तादृशपुत्रमार्यादेः संसाराविष्टत्वा- न्महत्तमकृपया तेषां संसाराभावेन शोकायभावपूर्वकतादृशमुक्तिनिमित्तमासुरज्ञानमार्ग- मुपदिशेदिति भावः । अत एव श्रीमद्वसुदेवैरासुरज्ञानमार्ग एव कंसस्य श्रीमद्देवकीवधो- घतस्योपदिष्टो न तु दैव इति ज्ञेयम् । इदमेवाहुविवरणे तदा ज्ञानमार्गेण स्थातव्यं शोकाभावायेति विवेक इति । तदा तेप्वासुरावेश्यासुरभाववत्सहजासुरजीवन- निर्धारे सत्सेतैरासुरज्ञानमार्गेण स्थातव्यमित्ययं विवेको विचारः सिद्धान्तभूत इत्यर्थः । तथा च तान् प्रत्यासुरज्ञानमार्ग उपदेष्टव्य इति भावः । यद्वा पूर्वमासुरोयं जीव इति निर्धार इत्युक्तं तर्हि तेन किं साधनमनुष्ठेयमित्याकांक्षायां तदा ज्ञानमार्गेण स्थातव्यमि- १ भावेशजीवास्ते सर्ने देसानां वपुरि स्थिता , आपेशेन विना ये च मूलदला इति स्मृताः, वेषा तमध सम्मोक नान्ये देवाशिनस्तथा, देषा सानं च स्वर्गादि तत्त-परमवामुयुरितिपद्मपुराणोत्तरखण्डीयवाक्येभ्य आगुरावैशिनों मुक्केरासुराणामन्यन्तमोस्पनरकमातेरकत्वात् ।

सेवाफलम् । त्यासुरस्यैव साधनमुपदिशन्ति तदा ज्ञानेत्यादिना । एवं च ज्ञानमार्गपदेनासुरज्ञानमार्ग एवायातीति तथा व्याख्यातमिति ज्ञेयम् । न ह्यासुरस सर्वं ब्रह्मेत्यक्षरज्ञानमार्गे पुरुषोत्तम- ज्ञानमार्गे वाधिकारः, तस्य तामसत्वात् । अत एवेश्वरत्वेनामिमततामसमायाशक्त्युपास- कास्तेषु सत्त्वाभावात् सत्त्वजनितज्ञानाभावे नोय गच्छन्ति सत्त्वस्था' इत्युक्ता नोर्ध्वगतिः, किन्तु तामसशस्युपासनाजनितज्ञानस्य तमोगुणजनितत्वेन तामसत्वा दधो गच्छन्ति तामसा' इत्यधोगतिरूपनिरयान्वन्तमोरूपप्रकृतिलयान्यतरप्रवेश एव, 'ये यथा मां प्रपद्यन्त' इति वास्यात् । अत्र अध.पदेनाधममेव विवक्षितम्, न तु नीचस्थानम् , निरयाणां नीचस्थानलेपि अन्धन्तमःप्रवेशरूपामुरमुक्तेः सुखदुःखाभावरूपत्वेन नीचस्थानत्वाभावात् , सर्व ब्रह्मेत्यक्षरब्रह्मज्ञानमार्गे तु 'देवी सम्पद्विमोक्षायेति वाक्यादेवसम्पद्युक्तजीवा- नामेवाधिकारः । अत एव 'जायमानं हि पुरुप य पश्येन्मधुसूदनः । सात्विकः स तु पिनेयो भवेन्मोक्षायाधिष्ठित' इतिमोक्षधर्मीयनारायणीयवाक्यान्मोक्षाधिकारिणां साविक- खेन 'सत्वात्सायते ज्ञान मित्युक्तसत्त्वगुणजनितज्ञाने नोवं गच्छन्ति सत्त्वस्या' इति वास्योत्तोर्ध्वगमनरूपा स्वर्गमुक्त्यन्तरप्राप्तिर्भवतीति । अत्रोचंपदस्सोत्तममित्यर्थो न तूच- स्थानम्, स्वर्गलोकसोललोकत्वेपि 'यन्न दुःखेन सम्भिन्न'मित्यादिवाक्योक्तस्वर्गसुख- स्स मुक्तेश्चोर्यलोकत्वाभावात् । तस्मादूर्ध्वपदेनोत्तमत्वमेव विवक्षितमिति ज्ञेयमिति दिक् ॥३॥ तथा च यस्माद्वाधकेपु सत्सु न सेवामिद्धिरतम्तन यत्साधनपरित्यागः कर्तव्य इत्याहुः बाधकानां परित्याग इति । एवं द्विविधमपि प्रतिवन्धरूपं सेवावापकगुक्त्वा लौकिकमोगरूपं सेवाबाधकं वदन्तो द्विविधं भोगमाहुः भोगेप्यकं तथा परम् । निःप्रत्यूहम् । एतद्विचरण तु भोगो टिवियो, लौकिकोऽलौकिकय । तन लौकिकस्त्याज्य एय। अलौकिकभोगस्तु फलानां मध्ये प्रथमे प्रविशतीत्यन्तम् । अत्र या प्रतिबन्धे साधारणस्त्याज्यो, भगवत्कृतस्तु फलविता- मेर जनयेत्, तया भोगेपि मुखदुःससाक्षात्काररूपभोगरूपयस्तुन्यपि एकं साधारणं लौकिकमिति यावत्, तत् तथा त्याज्यम्, तत्माधनपरित्यागः कर्तव्य इत्यर्थः । परं द्वितीयं साधारणादिनमलौकिकमिति यावत्, तादृशभोगरूप वस्तु निष्प्रत्यहं निर्गतः फलप्राप्ती सिमो यस्मातसलाप्रतिवन्धकमिति यापदेताशमित्यर्थः । तया च नत्फलानुएलमेरेत्यर्थ इति भावः । एवं द्विविधोपि भोगो मूले कण्ठरवेणोक्तो यनमेव भोग विवरणे भोगोपि द्विविधो लोरिकोलारिकाधेत्यादिना फुटीकृत्य तम सौकिकन्याज्य पयेत्यनेन ठाफिकमोगम्पारि तरमापनपरित्यागेन साज्यत्वगुतम् । गनु कथमलीफिकम्प दिनीयम्स भोगम्य फलामनियन्धकवगिन्याकायामाहुः महान भोगः प्रथमे पिशम मदेति । महानलोरिको भोगत्तु प्रथमे अलौकिकरमोप.

६९ मठपतिजयगोपालभट्टकृतविवरणसमेतम् । भोगसामध्यरूपे पूर्वोतफले विपयत्वेन प्रविशतीत्यर्थः । नन्नलौकिकभोगस्तु नेह भवनि किन्वेतद्देहपातोत्तरं माक्षाद्भगवत्सम्बन्ध सति भवति । तथा चावालौकिकभोगप्रसक्ते- रेवाभावात् तद्भोगप्रसक्ती सत्यामेव लौकिकभोगवदम्यापि त्यागाशंकायां प्राप्तायामेतस्स प्रथमफले प्रवेशवचनं सार्थकं स्यातस्मान्महान्भोगः प्रथमे रिशते सदेति वचनं व्यर्थमिति चेत्, अत्र वदामः । अलौकिकभोगस्तगापि मनोमानस्य स्थायिमावात्मकभगवत्सम्बन्थे- नालौकिकत्वान्मनोमाने त्वात्मनि द्वारा भवति, तत्सहनार्थमेवालौकिकसामर्थ्य भगवता दीयते, अत एवालीफिकभोगस्य प्रथमफलान्तरभायोक्तिः संगता भवति । अन्यथा प्रथम- फलान्तरभावोक्तिरसंगता स्यात् । तस्मायदा तनुजपित्तजसेवया प्रेमोत्पत्तिस्तदनन्तर- मलौकिकमोगरूपे अपूर्वानुरागरूपविरहजदुःससाक्षात्कारे विषयत्वेन प्रविष्टस्स दु-सस्य तापविशिष्टस्य सहनार्थमलौकिकसामर्थ्य भगवता दत्ते खसेव्यश्रीविग्रहे खप्तादिपु वा सशंदि- जनितविलक्षणसुखभोगप्राप्तिरतापि भवति तदाचार्योंगः प्रतिवन्धकत्वेनोक्तोतोय भोगो- पि मम प्रतिवन्धकः स्यादिति कदाचित् कस्यचिन्मनसि भवेत् , प्रेमभरेण च स भोग- स्त्यक्तुमशक्यस्तदा व्याकुलतया महान्सेद उत्सघेत, तेन च विरहानुभवप्रतिबन्धः स्यादिति तत्सेदनिवारणार्थ महान्भोगः प्रथमे विशते सदेति मूले, अलौकिकभोगस्तु फलानां मध्ये प्रथमे प्रविशतीत्येतद्विवरणे चालौकिकभोगस्य प्रथमफले प्रवेश उक्त इति तथोक्तेः सार्थकत्वस्य सिद्धत्वान्न त्वदुक्त्यवकाश. कथमपीति धुध्यस्ख । ननु लौकिको भोगो न तनुजवित्तजसेवायाः प्रतिबन्धकः किन्तु 'ता नानिद'नित्याद्युक्तमकारक- चेतस्तत्प्रवणत्वतद्रपायां मानससेवायां प्रतिवन्धक. । यदि तनुजवित्तजसेवाप्रतिनन्धक स्सात्तदा लौकिकसुससाक्षात्काररूपभोगाभाव देहस्थितेरमानात् तनुजवित्तजसेवाश्रवण- कीर्तनादीनां चामावे सिद्ध कारणामावेन प्रेमोन्पत्तेरभावान्मानससेवासिद्धेश्चामावात् परम- फलप्राप्तिन भवेदेव कस्सापीति न कोप्यस्मिन्मार्गे प्रयतॆतेति मार्ग एवायमुन्धेित, तस्मान्न तत्प्रतिवन्धको लौकिको भोग, । सति च लौकिक भोगे 'पियाविष्टचित्ताना नावेशः सर्वदा हरे'रितिवचनातत्कारणविषयावेशेन भगवद्विषयकतनुजवित्तजसेवाभावे कथ पूर्वोक्तं फलं स्यादिति चेत्, अन वदाम. लौकिकरिपयभोगो द्विविधा, एकः केवले- न्द्रियपोपको, द्वितीयो गगवत्तनुजपित्तजसेवोपयोगी। ना केवलेन्द्रियमारपोपकविषय- मोगो न कर्तव्य , किन्तु अनुसेवोपयोगित्वबुद्ध्या अ५ च खस्स दासत्वेन दासधर्मन्व- युद्ध्या च लौकिकभगवन्निवेदितविषयभोग. कर्तव्यः । एवं च 'तावद्रागादयः स्तेनाम्ताव कारागृह गृहम् । तावन्मोहोनिनिगडो यावत्कृष्ण न ने जनाः । त्वयोपभुक्तसग्गन्ध- वामोलकारचर्चिताः । उछिटमोजिनो दासास्तव माया जयेमही त्यादिवचनानि च यभगवत्मेवोपयोगित्तेन दासधर्मत्वेन बन्धकमायाजवसाधकत्वेनानर्थनिवारकत्वेन च भगव- निवदितलौकिकविषयजभोगस्य निहितत्वात् । तस्मारकेवलपिनापोपकलौकिकभगवद- सेवाफलम् । निवेदितविषयजमोग एव त्याज्यत्वेनोक्तोत्र, स तु तनुजवित्तजसेवायाधक एवेति स एवं त्याज्यो न तु भगवत्सेवौपयिकत्वेन दासधर्मत्वेन च प्राप्तो विपयजभोग इति बाधकत्वाभावेन पूर्वोक्तफलस्य निःप्रत्यूहत्वात् । अत एव 'पीजदार्यप्रकारस्तु गृहे स्थित्वा स्वधर्मतः, अव्यावृत्तो भनेत्कृष्णं पूजया श्रवणादिमिरित्यादिना भक्तिवार्षिन्यां तनुजवित्तजसेवाकरणे गृहस्थितिरुक्ता । प्रेमासक्त्यनन्तरमेव च 'ताशस्यापि सततं गेहस्थानं विनाशकम् । त्यागं कृत्वा यतेद्यस्तु तदर्थाथै कमानसः । लभते सुदृढां भक्तिं सर्वतोम्यधिकां परामित्यनेन भगवद्भजनान्यविषयकव्यासंगजनकत्वेन सर्वविधस्यापि गृहस्स त्याग उक्तः सर्वविध- भोगाभावसाधकत्वेनेति कृतं पल्लवितेन ॥४॥ ननु भगवता साक्षात्सम्बन्धेपि यदि सुखदुःखसाक्षात्काररूपो भोग एव भवति तदा लौकिकभोगः किमर्थ त्याज्यत्वेनोच्यत इत्यनतिपण्डिताशंकां परिहरन्त आहुः । सविनोल्पो घातकः स्याद्वलादेतो सदा मतो। एतद्विवरणं तु साधारणो भोगः कथं त्यक्तव्य इत्याकांक्षायामाह सविनोल्पो घातकः स्यादिति । सविनत्वादल्पत्वाच भोगस्त्याज्यः। एतौ सदा प्रतिबन्धका विसन्तम् । लौकिकसुखभोगसुखभोगसाधनानां नाशात्स- विभो, अथ च लौकिकभोगः किश्चित्कालिकत्वात् परिछिन्न इत्यल्पश्च । अथ च परमफल- बाधक इति धातकः । एवमेव लौकिकदुःखमोगस्तु यद्विपयक उत्पद्यते तद्विषयस्य कसचिदेव प्राप्तिर्न सर्वस्येति सविनो, अथ च लौकिकविषयस्य तुच्छत्वात् तुच्छविषयक इति अल्पस्तुच्छश्च । अथ च परम्परया मानससेवाप्रतिवन्धकत्वात् फलप्राप्तिघातकथेति मूले हेतुगर्भविशेषणानि । अत एवान भावप्रधानो निर्देश इति ज्ञेयमिति मनसिकृत्याचार्याः सविसत्वादल्पत्वादातकत्वाचेति हेतुत्वेनैव विवरणे व्याख्यातवन्तो भोगविशेषणानि । अत एव एतौ भगवत्कृतप्रतिवन्धसाधारणभोगौ पलाद्धेतोः सदा याधकाविति भावः । नन्वत्रको भोगः एवोक्तः पूर्वमव्यवहितः, तथा सति सदायं प्रतिबन्धक इत्येकवचनमेव पक्तव्यम् , न लेताविति द्विवचनमित्साशंकायामाहुः द्वितीयो भगवत्कृतः प्रतिपन्ध इति। द्विवचनाकान्ततच्छन्दे द्वितीयो द्वित्वसंख्यापूरको भगवरकृतः प्रतियन्ध इति तात्पर्यात् द्विवचनस्स सार्थक्यमिति भावः । ननु भगवत्प्रतिबन्धे ज्ञाते संसाराभायायातिकृपया तस्यामुरज्ञानमार्ग उपदेएल्य इति पूर्वमुक्तम् , तनापि तस चेन्न स्थिरता तदा महत्तमैः किं कर्तव्यमित्याकांक्षायामाहुः दितीय इति ॥५॥ टितीये सधा चिन्ता याज्या संसारनियात् ॥५॥ एतद्विवरणं नु ज्ञानस्थित्यभाये चिन्ताभावार्थमा दितीय इत्यन्तम् । द्वितीये भगारनपनियन्ध आमुरज्ञानोपदेशपर्यन्तं चिन्ता फर्नव्या महत्तगैरतिकृपया। , - मठपतिजयगोपालभट्टकृतविवरणसमेतम् । पदासुरज्ञानेपि भार्यादेः स्थितिर्न दृश्यते किन्तु 'कामोपभोगपरमा' इति वचनसिद्धकामोप- मोगमायपरत्वं दृष्टम् , तदास्यासुरमुक्तिरपि न देया भगवता किन्तु मरणानन्तर मसुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसा वृताः । तांस्ते प्रेत्यापि गच्छन्त्यविद्वांसोवुधा जना' इति श्रुत्सुक्तान्धन्तमोवृतकेवलदुःसात्मकलोकप्राप्तिपूर्वकं 'तानहं द्विपतः क्रूरानि'त्यादिवाक्योक्तः संसार एव देयोस्पेति संसारनिश्चयं प्राप्य सर्वथैव चिन्ता त्याज्या । तादृशपुत्रादिरपेक्ष्य इति भावः ॥५॥ एवं प्रसंगादासुरस्य पुत्रादेरुद्धारोपायस्य कर्तव्याकर्तव्यत्वं निरूप्य प्रकृतं विचार- यन्ति । ननु यथासुरस्यासुरमुक्तिसंसारयोनिश्चयः कृतः कामोपभोगपरत्वापरत्वादिलिडैस्तथा शुद्धपुष्टिमार्गीयेष्वेतस्य शीघ्रं फलमेतस्य विलम्वेनेति केन लिन ज्ञेयमित्याकांक्षायामाहुः । न त्वाद्ये दातृता नास्ति । तुशब्द आसुरप्रसङ्गनिवारणार्थः । आद्य अलौकिकमामर्थ्यरूपे फले जाते सति भगवतः दातृत्वं नास्तीति न, किन्तु दातृवं वर्तत इति ज्ञेयम् । नन्याय इति पाठे नु निश्चयेन दातृता नास्तीति न, किन्तु वर्तत एवेत्यर्यो ज्ञेयः । एतद्देहे मनसि एतदेह- पातोत्तर चालौकिकसंघात एव फलं भविष्यतीति भावः । अय मूलार्थः स्पष्ट एवेति मत्वाचे दातृता नास्तीत्येतस्यार्थमनुस्त्या आद्यफलाभावे एतदेहे मनसि एतद्देहपातोतरं च भगवतो दातृता नास्तीति शिरश्चालनेनोक्त्वा किन्तु विलम्वेन दातृता वर्तत इत्यर्थतः सिद्धमर्थमाहुर्तिवरणे आयफलाभावे भगवतो दातृत्वं नास्ति तदा सेवा- नाधिदैविकीत्युक्तं भवतीत्यन्तेन । यतश्चायमार्थिकोर्थ उक्तोत एव इत्युक्त भवतीत्युक्त न वित्यर्थ इति । यद्वा आयफलाभावे तनुजवितजसेवाजनितप्रेमासक्त्यनन्तरमलौकिक- सामर्थ्यदानामाचे भगवतो दातृलाभानो नास्ति किन्तु विलम्वेन दातृत्व वर्तत इत्यकार- प्रश्लेपेण व्याख्येयम् । नन्वायफलाभावे दातृत्वं कुतो नास्तीत्याकाक्षायामाहुर्विवरणे सदा सेवानाधिदैविकीत्युक्तं भवतीनि । व्यसनपर्यन्त खतनेच्छत्वेन प्रेमावस्थानामा- निर्माव्यत्वाभारात् पूर्णप्रमानि नामानाद्रसरूपताभावात्सेवाया आधिदैनिफवाभावादिति हेतोतृत्व नाम्ति, यत आधिदैविकसेवयैवापिदैविकम्वरूपप्राप्तिर्य यथा मा प्रपद्यन्ते तांस्त- थैर भजाम्यहमिति याक्यादित्यहि । रसरूपस्सैनाधिदैविकत्वे 'रसो वै स' इतिश्रुतिस्थ- परमकाष्ठापनानासरूपनिश्चयवाचकउत्सव्ययशब्द. प्रमाण परमकाष्ठापन्नस्यैव पर्यन्ततः सर्वाधिदैविकत्वात् । एव चाद्यफले जाते फल शीघ्रं भविष्यति तदभारे भगवदिच्छाभावेन कस्यचिदिलम्येन भनियती याद्यफलोत्पत्त्यनुत्पत्तिरूपलिङ्गाम्या शुद्धपुष्टिमागीयस्यापि भक्तस्य शीप्रफलोत्पत्त्यनुत्पत्ती झये इति दिक् । अथ उद्वेगाभानप्रतियन्धाभानमोगाभानानां बाधकाभावलेन पूर्व कारणत्वमुक्तम् । तन सरस्थापि भगवल्लीलालेन ज्ञानादुद्वेगाभाष, सिद्धस्तर न गृहत्यागः । सेवाप्रतिनन्धका- ७२ सेवाफलम् । मुरपुनादेस्त्यागात्प्रतिवन्धाभावसिद्धेश्च तत्र पाक्षिको गृहत्यागः । दैवपुत्रादिषु सत्सु गृहत्यागाभावात् । भोगाभावस्तु लौकिकमोगत्वावच्छेदकावच्छिन्नाभावः । स तु लौकिक- गृहत्वावच्छेदकावच्छिन्नत्यागेनैवेत्याहुः । तृतीये वाधकं गृहम् । तृतीये वाधकाभावत्वेन कारणे लौफिकभोगाभावे लौकिकं गृहं बाधकम् । तादृशगृहे सति तादृशमोगागावाभावात्, सर्वेन्द्रियाणां लोकवेदसंकोचनापि स्वस्वविषये प्रवृत्तिसम्भवादिति भावः । एतद्विवरणे इदमेवाहुः भोगाभावम्तदैव सिध्यति यदा गृहपरित्याग इति । अत्र पर्युपसर्गो वेश्मस्त्रीतत्रस्थपुत्रादिवाचको ज्ञेयः । अन्योर्थः स्पष्टः । गनु एतादृशसेवनातिदुर्लभेत्याशकायामाहुरवश्येयं सदा भाव्येति । अवश्येयं सदा भाव्या सर्वमन्यन्मनोभ्रमः ॥६॥ अत्र विवरणामावादस्माभिरेव व्याख्यायते । इयमव्यवहितक्षण एवोक्ता बुद्धिस्सा मानसी सेवना 'न रोधयती'त्यादिवास्येभ्यः कस्यापि कर्मज्ञानादरवश्याधीना यद्यपि न भवति, प्रजभक्तरूपसाधुकृपामाराधीनत्वात् , तथापि श्रीप्रभुव्रजमक्तदास्यपूर्वक भाव्या चिन्तनीया । एतादृशी सेवनां कदास्मत्प्रभुरस्मत्स्वामिन्योस्मभ्यं दास्यन्ति, कदा भगवति चक्षुरागः, कदा वा चित्तासंगः, कदा वा 'भगवता सह संलापो दर्शन मिलितस च । आक्षेपः सेवनं चापि स्पर्शश्चापि तथाविधः । अधरामृतपान च भोगो रोमोद्गमस्तया । तत्कूजितानां श्रवणमाप्राण चापि सर्वतः । तदन्तिकगतिनित्य'मित्यादिः संकल्पः, कदा निद्राछेदः, कदा तनुतनुता, कदा विषयनिवृत्तिः, कदा पानाशः, कदोन्मादमूर्छामृतय इत्यायुक्तप्रकारेण सदा देहपातपर्यन्तं भाच्या, भावनया मनसि स्थापनीया । अतिदीनतया ज्ञानविषयत्वमापदनीयेति यावत् । यद्वा इयं मानसी सेवा सदा भाव्या, प्रेमाघभावेपि प्रेमाघरसायनुकरणकरणेन च चिन्तनीया । तथा च मनसे ताशमावनापूर्वकं तनुजत्तिजसेनाकरणे 'तं यथा यथोपासते तथैव भवतीति श्रुते'य यया मां प्रपधन्ते ताम्नथै भजाम्यह'मिति गीतास्थभगवद्वाफ्यादय च 'याशी भावना यस मिद्धिर्मपनि तादशी'त्यादिवचनाचैतदेहपातोत्तरमलौशिकदेशातौ वा कस्सचित्कस्स चित्तु जन्मान्तरे वा पहुतरभगवत्कृपायामस्मिन् जन्मन्यपि वा 'ना नापिद नित्सा- धुक्तपकारा फलरूपा मेघना मिद्धा भविष्यतीति मावः । अथवा इयं रमरूपा प्रेमामक्तिप्यमनामिना सेना सटा मर्मदा : मगरान् पश्यो यस्यां या भाव्या अंगा । एनारामानेनापि फलमिद्धिरित्यर्थः । तया चान्यप्रकारकर्मनायां न मर्षदा भगरान् यत्यो भवति, न या तग्नानमात्रेण च पलमिनिति भावः । ननु सानादि- मार्गप्रशारणापि मा प्रभु नामे करिष्यति प्रमुगेवामाशिपादिन्या स्याः मर्यमन्य- न्मनोभ्रम भी। जन्मत् गर्व मनोगमा पर्मन । तया च भगन्मायामादिनानानेवाय .

मठपतिजयगोपालभट्टकृतविवरणसमेतम् । सिद्धान्तो यदन्यत्रापि मार्गे प्रभुश्यो भवतीति । अत एवास्मिन्मार्गे मार्गान्तराच्छ्रेष्ठ यम् । अत एव च 'मुक्तिं ददाति कर्हिचिरस्म न भक्तियोग'मिति वचन चेति दिक् ॥६॥ एवं मानससेवाभावनाया माहात्म्यमुक्त्वा पूर्वोक्तसेनायाधकत्यागस्यावश्यकतामाहुः तदीयैरपि तत्कार्यमिति । तदीयैरपि तत् कार्य पुष्टौ नैव विलम्बयेत् । चालयोधमन्थे 'समर्पणादालगनो हि तदीयत्व भवेद्धव'मित्युक्तत्वा देव धर्म- मनुष्याणा'मित्यादिभगवद्वाक्याच पुष्टौ पुष्टिमार्गे तदीयैरपि आत्मसमर्पण कृतवद्भिरपि तत् पूर्वोक्त वाधकनितयत्यागरूप यत् तत् कार्य कर्तव्यम्, न तु मयात्मसमर्पणं कृत तदीय च सर्व जातमत. पर प्रभुर्यथा ज्ञास्यति तथा करिष्यति मम का चिन्तेति निश्चिन्ततया स्थेयम् । तथा सति भगवति भरदाने पुष्टिमार्गम्य प्रेमात्मकत्वात् प्रेममार्ग- निरोध आपयेत । सर्वथा स्वाशक्येर्थे हि भगवति भरदानम् , न तु खशक्येपि, खशक्येर्थेपि तन भरदाने खामिन्यादीनां स्वप्राणप्रियस्सायासदर्शनेन महान् सेद उत्पयेत, तेन तदधीनत्वात्फलस्य तत्फलदाने भगवतो विलम्बस्तत्सेददानजनित स्वामिनीप्लापयेतेति । अत एवाने आहु. पुष्टौ नैव विलम्ययेदिति । पुष्टापिति देहलीदीपन्यायेनानापि सम्बध्यते । अन्यमार्गस्थस्तु कृतात्मसमर्पणो विक्रीतपश्वादिवत् खदेहभरणपोपणादिचिन्ता- रहितो विलम्न कुर्यादपि, पुष्टौ शुद्धपुष्टिमागे तु तन्मार्गस्यो नैव विलम्बयेन्न विलग्य कुर्यादाधकायापनोद इत्यर्थ । यहा खयमेवात्मसमर्पिणा वाधकनयापनोदे कृते म्वग्राण- प्रियस्सायासादर्शनात् म्यामिन्यादीनां सेदाभावात् तदधीनफलदाने प्रभुन निलमयेन्न विलम्ब कुर्यादिति वार्थ । अत एव 'मदर्थेथपरित्यागो भोगम्य च मुसम्य चे'त्येकादश स्कन्धीय प्रभुचनमात्मसमपिणो मोगादित्यागमुपदिशति, न तु सस्मिन् भरदानेन निश्चिन्ततयारस्थानम् । अन्यया तासा सेदे सति तनुजवित्तजसेवाया प्रतिवन्धे जाते सति फलरूपसेवाप्राप्त्याशा दूरापास्ता । तथा च यन तनुजपित्तजसेवायामपि नाधक स्यक्तन्य जात तर फलरूपसेनासिद्वौ सत्या प्रयायासस्फुरणाद्विलम्ब न पुर्यादेवेत्यर्थः । औतापज्नेयम् । साधनरूपसेवाया 'प्रतिकले गृह त्यजे'दित्युपदेशे भजनप्रतिवन्धक गृह पैर त्यागो, न भजनानुकुलगृहस्य । फलरूपसेपाया तु भजनानुकृलम्यापि गृहम्य साग इति । एतद्यया तथा मत्कृतभक्तिपर्धिनीटीकायां 'तादृशस्यापि सतत गेहस्थान निनाश मितिश्लोके द्रष्टव्यम् । अथ तनुजनित्तजसेवया प्राप्तमानसमेवम्य व्यसने जाते दशावस्थामु महादु सानु भवादतितापेन कदाचिदतिनिष्टर प्रियो यदेनानपर्यन्तमपि न मिलति, मया त्वेताबडु स मनुभूयते तदर्थमित्यादिको दोपारोपो भगवति भगवदीयम्य स्सात सोपि पाधक एवेत्याहु गुणक्षोभेपीति ।

सेवाफलम् । गुणक्षोभेपि द्रष्टव्यमेतदेवेति मे मतिः॥७॥ गुणैः रसावस्थारूपैर्निद्राछेदादिभिर्मनःक्षोभेपि प्रियदोषारोपेपि एतदेव भगवदप्राप्तौ प्रतिबन्धकत्वमेव द्रष्टव्य दोषारोपस्य । तथा च तादृशावस्थायामपि प्रिये दोषारोपो न कर्तव्यः । यत. प्रियस्य निर्दोषपूर्णगुणवत्त्वात्ता दोपारोपे स्वामिन्यादीनां रोपे फलप्राप्ति- विलम्ब. स्यात् । किन्तु धन्योह यत्प्रियार्थमेतादृशावस्थामनुभवामीतिगुणारोप एव कर्तव्य इति भावः । इद पानाशावस्थापर्यन्तमेव कर्तव्यत्वेनोपदिश्यते । उन्मादावस्था- प्रादुर्भावे तु देहानुसन्धानाभावान तत्र दोषो दोषारोपेपीति ज्ञेयम् । अत एवोद्धवद्वारा ब्रजसीमन्तिनीना ज्ञानोपदेशो दोपाभावार्थमेव कृतः प्रभुणा ॥७॥ नन्विद सर्व प्राकृततुल्यमेवेति किमेतादृशावस्थामायाप्युत्कर्ष इत्याशक्याहुः । कुसृष्टिरन वा काचिदुत्पद्येत स वै भ्रमः ॥७॥ ॥ अन या काचित् कुसृष्टिरुत्पयेत सा भ्रमो ज्ञेयः । यतो 'रसो वै स' इति श्रुते रसरूपो भगवान् सिद्धस्तदा सर्वा अपि रसावस्था भगवद्रूपा एव, रसस्स विभावा- नुभावव्यभिचारिभावसमूहालम्वनरूपत्वादिति सिद्धः सर्वोत्कर्पोस्स मार्गस्यास्य फलस। चेति सर्व चतुरस्रम् ॥ ७॥ ॥ अन केचिदस्मच्छ्रीमदाचार्यमार्गीया भगवदीया यादृशी सेवनेति मूले सेवायां फलत्रयमिति तद्विवरणे च पुष्टिमर्यादाप्रवाहभेदमिन्नमार्गसम्बन्धिनिविध- सेवानां कगेण फलनयमुक्तमिति व्याचक्षते । तचिन्त्यम् । एव सति मूले यादृशी सेवनेत्यत्र तद्विवरणे च सेवायामित्या काचन श्रीमदाचार्यैनं दत्त स्यात् । मूले कदाचिच्छन्दोनुरोधेनैकवचनदानेपि मिवरणे सेवासु फलनयमिति बहुवचनमेवोक्त स्यात्, विवरणम्य मूलाभिप्रायप्रकटनार्थमेव क्रियमाणलात् । अतो मूलविवरणयोरेकवचनदाना न्यथानुपपत्या तनत्यैकरचनाभ्या शुद्धपुष्टिमार्गसेवाफलमाननिरूपणमेवान श्रीमदाचार्य- चरणानामभिप्रेत स्वीयमानेभ्यो ज्ञापनार्थमिति ज्ञायत इति सारम् । अन्ये वेतन्मार्गीया भगवदीया मूलविवरणोक्तकरचनानुरोधेन शुद्धपुष्टिसेवाफलायमेगान श्रीमदाचार्याणाम- भिप्रेतमधिकारभेदेनोत्तमत्वमध्यमत्वसाधारणत्वभेद भिन्नम् । तनोत्तम फलमलौकिक- सामर्थ्यम् , तनु सेवाया क्रियमाणायामेव प्रशुसम्पादितालौकिकशरीरनिष्ठखरूपानुभव- सामर्थ्य प्रमाणाननुरोधिप्रमेयसाध्यम् , यथा रासमण्डलमण्डनायमानानाम्, मध्यम पाल तु सायुज्पम् । तत्तु सह युनक्तीति सहयुक, सेनाया क्रियमाणायामेव भगवता सह सतत- स्थिति सादिकमयोगरमानुमा इति यानत् । तथा च भक्तिमार्गीयेण प्रकारेण युगपद- १इत परं 'शी श्रीवमन] नवरविनाथातिरेणु वय उन । जयगोपाल कृतवान्' इति प्रथम ििगत, हरिनारे पाणादिनम् । सन पर वियानीमनाम पाल, सदमाशंगालसित प्रतिभाति । एनोरन परमनराश ममतादीकरणम् । गता म्पयमेन नि , कथनेनायमेवाभिप्रायः स्फुटीकृतः श्रीमदाचार्यचरणैरिति वाच्यम् । अनत्यसायुज्यपद- मठपतिजयगोपालभट्टकृतविवरणसमेतम् । खिलपुण्यपापक्षयद्वारा पायमौतिकं देहं निव-लौकिकं दत्वा खस्मिन्नेव स्थितिं विधाय ततो निष्कास्य प्रभुकारितखलीलानुभवरूप प्रमाणानुरोधिप्रमेयसाध्यम्, यथा लक्ष्म्या अन्तहगतगोपिकानां वा । अन मध्यम चाय फलस्य विप्रयोगरसानुभवाभावाज्ज्ञेयम् । साधारणफलं तु सेवोपयोगिदेहो चैकुण्ठादिपु । ततु सेवायां क्रियमाणायामे- वानुग्रहविशेषाभावात् साक्षात्सेंवानुपयोगेन्यैस्वादशसाक्षाद्रमानुभवकर्तृभिः क्रियगाणायाः सेवाया उप समीपे योगः सम्बन्धस्तद्वन्छरीरप्राप्तिस्तद्रूपम्, यथा वृन्दावनस्थपक्ष्या- दीनाम् । तस्स चान्तररमणानुकूलत्वात्फलत्वम्, पहिसाक्षासम्बन्धाभावादधिकाररूपत्वं व शेयमिति वदन्ति । तवान्तहगताना मध्यम फलमिति त्वस्मदाचार्यचरणसिद्धान्त- विरुद्धम् । तथा हि । यद्यस्मदाचार्याणामेवमेवामिप्रायः स्यात्तदा कुत्रापि दशमस्कन्पसुयो- पिन्यां श्रीमदाचास्तहिप्पण्या च तनुजवर स्फुटीकृतः स्यात् । न चान्तहगताः काश्थिदित्यस्यामासे 'यासां कालः प्रतिबन्धकः, पूर्वमेव भक्तियुक्तास्ता मजनानन्दमननु- यैव प्रतिवद्धा एव भगवत्सायुज्यं प्राप्तवत्य इत्याहे त्यात्यसायुज्यपदेन, पुनरेतस्यैव पदस्थ व्याख्यानान्ते 'ततो मुक्ता जाता इत्यारभ्य 'तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्यापि सङ्गता' इति पधव्याख्यानान्तप्रयुक्तैर्मुक्तापदैव्य मुख्यफलापेक्षया मुक्तिरूपफलस्यैव प्राप्ति- मुक्तापदानां परोक्षवादरूपत्वमिति सायुज्यपदस्स भगवत्सहभावपरत्वेन मुक्तापदानां जहुर्गुणमयं देहमित्यत्रोक्तगुणमयदेहत्यागोत्तरप्राप्तगुणातीतसङ्घातनिष्ठभगवदसानन्दानुभव- विशिष्टत्वपरत्वेन च प्रयुक्तत्वात् । न च पूर्वोक्तानां पदानां परोक्षपादत्वे प्रमाणाभावः । लक्षणां नैव वक्ष्यामि न न्यूनादन्यपूरणम् । आर्थिक तु प्रवक्ष्यामि परोक्षकथनात' इति प्रथमस्कन्धीयसुयोधिनीप्रारंभप्रपकपयस्य परोक्षकथनात' इति श्रीमदाचार्यप्रति- साया एवं प्रमाणत्वात् । अस्यार्थः । अहं श्रीमागपते कुत्रापि लक्षणां नैव वक्ष्यामि, न कथयिष्यामि । लक्षणा हि मुख्यार्थयाधे भवति, तत्रात्र प्रतिपाद्यस्य भगवतः सर्व- शक्तिमत्त्वेन सर्वमवनसमर्थत्वेन मुख्यार्थवाधाभावात् । 'पुराणं मानवो धर्मः साङ्गो वेद- चिकित्सितम् । आज्ञासिद्धानि चत्वारि न हन्तव्यानि युक्तिभि'रिति गौतमस्मृतिवचनेन पुराणेषु लक्षणावृत्त्याश्रयणस्य निषिद्धत्वाय । अथ च न्यूनात्पुराणान्तरकथया न्यूनत्वं प्राप्य मावप्रधानो निर्देशो, ल्यव्लोपे पञ्चमी । यहा, न्यूनात्पुराणान्तरकथया न्यूनान्यून प्रमेयं प्राप्यान्यपूरणमन्येन पुराणान्तरेण पुराणान्तरकथयेति यावत्तेन पूर्ण श्रीभागवतस्य भगवदीयान्तरकृतश्रीमागवतव्याख्यान इव न वक्ष्यामि । यदि सा कयैतत्कल्पीया स्यात् तदा च्यासचरणरेव निवद्धा स्यादतो न वक्ष्यामीति भावः । केचित्तु न्यूनाच्छब्दादर्था- चान्यस्य तस्य पूरणं नेत्यर्थः, अध्याहारं शब्दस्य वार्थस्य वा न करिष्यामीत्याहुः । तत्र 'जन्मायस्येति प्रथमस्कन्धीयायलोक एवं 'धीमहि' इति तिड्याच्यकारकवाचिनो- .

. . सेयाफलम् । मच्छब्दस्य चाध्याहारदर्शनात् सोक्तिश्चिन्त्या, किन्त्वार्थिकं वाच्यार्थसिद्धमेवार्थ प्रवक्ष्यामि प्रकृष्टलेन वक्ष्यामि । अगोप्यत्वादिति भावः। परन्तु परोक्षकथनाहते परोक्षकथनमप्रत्यक्ष- कथनं वाचकशब्देतरशब्देन कथन गोप्यक्रथनमिति यावत् तद्विहायेत्यर्थः । तथा च परोक्षकथनेनानधिकारियो गोपनार्थ लक्षणां लक्षणावृत्तिविशिष्टशब्दानथ च न्यून प्रमेयं प्राप्यान्येन पुराणान्तरेण पूरणं च वक्ष्यामि परन्तु तात्पर्यग्राहकलिङ्गादिसिद्धमेव, न तु तदसिद्धमपीत्येतावदधिकं योध्यम् । तथैव सुबोधिन्यां दृश्यमानत्वात् । ताइक्कथायाः कल्पान्तरीयत्वात् । एतत्कल्पीयत्वे तु 'गोप्यः संस्पृष्टसलिला अगेपु करयो. पृथक् । न्यस्यात्मन्यथ घालस्य वीजन्यासमकुर्वत' 'इति मन्त्र जपन्यस्ताः पूजां चक्रुः कुमारिका' इत्सादिमबद्रष्तृत्वादिरूपलिङ्गं कुमारिकानामग्निकुमारत्वे, अथ च तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्यापि सङ्गता' इत्यत्रत्यजारबुद्धिरूपं लिगमन्तहगतानां 'जारधर्मेण सुस्नेह सुदृढ सर्वतोधिक । मयि सम्प्राप्य सर्वेपि कृतकृत्या भविष्यथेति बृहद्वामनोक्तभगवद्वर- दानविशिष्टश्रुतित्वे च यथोक्तं तथोक्तमेव स्यादतो ज्ञायते तन्नैतत्कल्पीयमिति तादृश- पुराणान्तरकथया पूर्ण न करिष्यामीति जेयम् । अथ च परोक्षकथने वाच्यार्थसिद्धमेवार्थ न प्रकृष्टत्वेन वक्ष्यामि किन्तु गोप्यत्वात् प्रकटतया न कथितमीदृश तात्पर्यवृत्त्या सिद्ध मप्यर्थं वक्ष्यामीति भावो ज्ञेयः । एवञ्च फलप्रकरणीयलीलायामतिगोप्यत्वादुपक्रमे फलप्रकरणीयसुबोधिनीस्थसायुज्यमुक्तापदा'न्युक्तं पुरस्तादित्यारभ्य 'यत एतद्विमुन्यत' इत्यन्तं मध्ये प्रयुक्तानि मुक्तिमुच्यतइत्यादिपदानि, अथ च रासलीलोपसंहारे च 'नहरान उपावृत्त' इतिपद्यन्याख्याने 'यतो भगवान् मोक्षदाता ताश्चेदासन्थ्यमन्तःस्मरण करि- प्यन्ति तदा मोक्षाधिकारिण्यो भविष्यन्तीति वासुदेवानुमोदिता' इत्यनत्यमोक्षपदं च न लोकप्रसिद्धलयरूपसायुज्यपरत्वेन लयरूपमुक्तिविशिष्टत्वपरत्वेन लयरूपमोक्षपरत्वेन च न प्रयुक्तानि, किन्तु परोक्षवादेन भगवत्सहस्थितिपरत्वेन गुणमयदेहत्यागोत्तरप्राप्तालौकिक- देहनिष्ठभगवद्रसानुमवविशिष्टत्वपरत्वेन निप्रयोगोत्तरप्राप्तमगरद्दर्शनानन्दपरत्वेन च प्रयुक्ता- नीति ज्ञेयम् । पयाध्यायीव्याख्यानस्थसायुज्यमुक्तामुक्तिमोक्षपदानि परोक्षवादरूपाणीति भापयितुमेर पयाघ्यायीसमाप्तिश्लोकव्याख्यानीयश्रीमदाचार्यतनुजरसकृतफलप्रकरणीयसु- योधिनीटिप्पण्यां व्याख्यात 'दिया प्रियोगजार्ती मत्यां दिनान्ते प्रियसङ्गमे य आनन्दो, न स सर्वदा दर्शन इति मोर मोक्षपदेनोच्यत' इनि मोक्षपदस तागानन्दपरत्वमेव । एवष सायुज्यमुक्तामुक्तिमोक्षपदानां परोक्षवादद मिद्धम् । अन्यथा ' नव रिस्मय' इति पघव्याख्याने 'एतत्परिदृश्यमान जगत् सर्वमेव यतो पिमुक्तिं यास्सनि, मास्नया गोकुले स्थित आह, भानाध्या वे'त्यम निमुक्तिपदसोपसदारलोकव्याख्यान श्रीमदाचार्यचरण- मोक्षपदस चोक्तनाद्राममण्डलमण्डनायमानानां च लोकप्रसिद्धमोक्षप्राप्तिपिशाध्याये याप- मीप्रसाहीये तत्रैका पिता मर्षे निपपल्याख्यानमुपोपिन्या मतस्तस्सा मुक्ति मिद्धे'त्युक्तत्या ७७ मठपतिजयगोपालभट्टकृतविवरणसमेतम् । द्विप्रमायया अपि मोक्षप्राप्तिरंगीक्रियताम् । तस्मात् परोक्षवादरूपाण्येवान सायुज्यादि- पदानीति न लोकप्रसिद्धमोक्षरूपमध्यमफलप्राप्तिरन्तहगतानामिति बोध्यम् । ननु मुक्तिवाचकपदैरेवाप्रपरोक्षवादकरणे किं वीजमिति चेत् ? श्रीमागवतमेप चीजमिति गृहाण । तथाहि । 'न चैवं विस्मयः कार्यों भवता भगवत्यज' इतिपद्यने 'यत एतद्विमुच्यत' इतिपदगुच्यते, तेन च सर्वस्यापि गोकुलस्य मुक्तिः प्रतिपाद्यते, न हि भवतापि सर्वस्य गोकुलस्य मुक्तिरंगीक्रियते लोकप्रसिद्धा । एवं च विगुच्यतइतिपदं परोक्षवादरूपमेव । तथा सति श्रीव्यासचरणैरन प्रकरणे मुक्तिवाचकपदेनैव परोक्षवादः कृत इति श्रीमदाचार्यैरपि मुक्तिवाचकपदैरेव परोक्षवादः कृत इति सुतुक्तं श्रीभागवत- मेव वीजमिति । ननु न वयमेवंरूपं मध्यम फलं तासां वदामः, किन्तु प्रकारान्तरेण मध्यमफलं वदामः । तत्तु भक्तिमार्गीयेण प्रकारेण युगपदखिलपापपुण्यक्षयद्वारा पाच- भौतिकं देहं निवर्त्य तदनन्तरं चालौकिकदेहं दत्वा स्वस्मिन्नेव थितिं विधाय ततो निष्कास्य प्रभुः संयोगरसलीलानुभवमेव कारयति, न तु विप्रयोगरसलीलानुभवम् , एवं च रसरूपभगवत एकदलानुभवरूपं फलं मध्यममेव, द्वितीयदलानुभवानावात् । मुख्यानां तु दलद्वयानुभवस्यापि जायमानत्वान्मुख्यं फलमिति चेत्, अत्र पृच्छामः । अलौकिकदेह- प्राप्त्यनन्तरं भगवत्कृता स्वस्मिन् स्थितिस्तासां केन रूपेण, सार्वदिकलयरूपेण वा, रस- व्यभिचारिभावलयरूपेण वा, 'सायुज्ये तु रसाधिक्यं भेदेनानुभवात् तत' इति श्रीमदा- चार्यसिद्धान्तितभेदविशिष्टसायुज्यरूपेण या, सर्वदा कण्ठलग्गत्वेन वा, 'चैत्यस्य तत्त्वममलं मणिमस कण्ठे, कौस्तुभव्यपदेशेन वात्मज्योतिर्विभर्त्यज' इत्यत्रोक्तानां खाङ्गीकृतात्मनां तत्त्वरूपकण्ठस्थितकौस्तुभे लयरूपेण वा, लक्ष्मीवद्वक्षःस्थलस्थितिरूपेण वा, शिवोमा- वदर्धनारीश्वररूपेण वा, पूतनासुपानसमानीतभगवदुदरस्थितपूतनाभक्षिताग्निकुमाररूप- कुमारीपुंस्त्वधर्मरूपवालकवद्वा । तत्र गायः । पुरुषोत्तमे सार्वदिकलयरूपेण स्थितिस्तु केवलजीवात्मनामेव, सा त्वेतासामसम्भावितैवालौकिकदेहप्राप्तिप्रविष्टत्वात् , न हि शरीर- विशिष्टानां लयः कुत्रापि वेदादौ श्रुतोस्ति । पुरुषोत्तमे लयस्य पुरुषोत्तमविपक- मर्यादामक्तिफलत्वाच । मवद्भिस्त्वेतासां शुद्धपुष्टिमार्गीयमध्यमफलविशिष्टत्व सिद्धान्ति- तमस्ति । न द्वितीयः । एतादृशलयस्यात्मानिरप्यत्राङ्गीक्रियमाणलात्। न च तर्हि मध्यम- फलपसक्तिः । एतादृशलयस्य रासमण्डलमण्डनायमानावग्यसावह मित्यादौ दृष्टत्वेन तत्समकक्षत्वान्मध्यमफलवाभावात् । न तृतीयः । तादृशसायुज्यस्स मर्यादापुष्टिफल त्वात् । न चतुर्थः । सर्वदा कण्ठलमत्वेन स्थिते रसामासरूपत्वात् । न पञ्चमः । देह- विशिष्टत्वेन तत्रापि लयासम्भवात् । न पष्ठसवमौ । तत्र प्रमाणाभावात् । शिवोमयोरर्ध- नारीश्वररूपेण स्थिती च निसिठपुराणेतिहासादीनां प्रमाणत्वान्न तयार प्रमाणमस्ति । नचार्धनारीश्वरवदेतासां स्थितौ 'वर्ध शोणमथार्धमम्बुदनिभं पद्धं ललाटे लगा वहीं- सेवाफलम् । कल्पतया विलाससदनं स्त्रीपुंमयं वाङ्मयम् । हस्तैर्वेणुवराभयानि दधत लावण्यवारां- निधिम् । ध्यायामि स्मितशोभितास्पकमलं गोपालचूडामणि मितिसुन्दरीगोपालमत्रसम्बन्धि- ध्यानप्रतिपादकागम एव प्रमाणमिति वाच्यम् । अर्को वा एप आत्मनो यत्पनी ति श्रुतौ यज्ञसम्बन्धयुक्तायाः स्वविवाहिताया एवार्धत्वमुक्तमिति लक्ष्म्या एवार्धनारीत्वेन स्थितिरागमन प्रतिपाद्यते न त्वेतासाम्, स्वविवाहितत्वाभावेन पत्नीत्वाभावादित्यस्या अपि भवदुक्तेरनवकाशात् । नाप्यष्टमः । तेषामपि केवलजीवरूपाणामेव खोदरे पूतनया समान- यनम्, न तु बालकदेहसहितानाम् , तदनन्तरं भगवतापि तदसुपानद्वारा तादृशानामेव खोदरे समानयनम् , पश्चाद्वयस्यैरागतस्तत्रेत्यत्र व्रतर्याप्रसङ्गे त्वलौकिकदेहं दत्वा तल्लीला- प्रदर्शनं कारितवानिति निश्चयस्य दृढतरत्वेनासापि दृष्टान्तत्वाभावात् । शरीरविशिष्टानामेव तेषां खोदरानयनमित्यस्य कण्ठरवेणाश्रूयमाणत्वात् , प्रत्युत पष्ठदशमस्कन्धीयाध्यायसुबो- धिन्यां 'तया खस्मिन्नानीता ये बालकानां जीवास्ते स्वजीवमर्मस्थाने स्थापिताः सन्तीति तान् खस्मिन्नानेतुं भगवांस्तनिष्पीडनमेव कृतवानित्यभिप्रेतोर्थ' इत्यनेन केवलजीवाना- मेवानयनस्स श्रीमदाचार्यैरुक्तत्वाच । न च लालनमृद्भक्षणलीलाप्रदर्शितखमुखस्थसर्वव्रजे भगवति देहसहितानामपि स्थितिरस्यैव, एवं चालौकिकदेहसहितानामप्येतासां स्थिति - सम्भावितेति वाच्यम् । स्वमुखारविन्दप्रदर्शितसर्वत्रने रासमण्डलमण्डनायमानानामपि स्थितत्वात् तासामपि मध्यमफलप्राप्तवेक्तुं शक्यत्वादिति न किश्चिदेतत् । अथ यद्यपि भगवतोऽचिन्त्यशक्तित्वात् केनापि प्रकारेणैतासां भगवति स्थितिः सम्भवेदपि, तथापि यघेतासां मध्यमफलं स्यात् तदाऽचिन्यशक्तिमत्त्वपर्यन्तं धावना समअसा स्यात् , तदेव तु खपुष्पायमाणम्, यत एतासां सगुणदेहत्यागोत्तरं निर्गुणदेहप्राप्त्यनन्तरं तु सर्वभाव- प्रपत्तिरूपसाधनस्य सर्वभावप्रपत्तिलभ्यस्यैव च फलस्य प्राप्तिः श्रीमदाचार्यैः सिद्धान्ति- तास्ति । तथाहि 'कृष्णं विदुः परं कान्त'मितिपयश्लोकीसुबोधिन्यां प्रथमव्याख्याना- भिप्रायविशदीकारकद्वितीयव्याख्याने 'उक्तं पुरस्तादितिपद्यव्याख्यायां 'यथा भगवति गुणातीत एव परिनिष्ठवुद्धित्वेपि द्वेपस्स तत्र प्रयोजकत्वात् सगुणत्वमेवेति लक्ष्यते, अयं च रसः सर्वभावप्रपतिलभ्यः । नहि जारत्वबुद्धौ सर्वमावपत्तिः । कामपूर- कत्वेनैव तत्सम्भवात् , अत्र च सगुणत्वस्य प्रतिबन्धकरवाद्यया चैद्यादीनां स्वाधि- कारानुसारेण तादृशशरीरनाशे तरपदप्रामिः स्वाधिकारानुसारेण, तथैतासामपि स्वाधि- कारानुसारेण तथात्वं सगुणत्वोपरमेण सर्वभावप्रात्यैव, ततो निजपतिमजनमिति सर्वमव- दातम् , अन्यया 'ये यथा मां अपयन्ते ताम्नथैव भजाम्यह'मिति मयीदा भज्यते'त्युक्त्या, अथ च ननु तथापि ताराप्रपत्तरे। मूलत्वात् कथं सर्वभावप्रपत्तिमाध्यं फलं भविष्यतीत्या- गासं दत्वा 'द्विपन्नपी स्यादिप्रतीक-यारल्याने 'मोक्षसुखानभीप्मुम्तद्विरुद्धद्वेषकर्ता च चैध. लस्मै यथा शानिनामपि दुर्लमां मुक्ति दत्तपानेवं तारापत्तिमूलानामप्यतासां ताश . मठपतिजयगोपालभट्टकृतविवरणसमेतम् । फलं दत्तवा' नित्युक्त्या, तदनु किमाने 'यदि सर्वभावप्रपतिलभ्यफलमेव दित्सितं भगवत- स्तदा पूर्वमेव स एव भावः किमिति नोत्पादित इति चेदिति पूर्वपक्षीकृत्य 'अत्र वदामो, यासां साक्षाद्भगवत्सम्बन्धस्तासां सर्वासामेव रासमण्डलमण्डनायमानानां शरीरमपि गुणातीतमेवेति ज्ञापयितुं भगवानेव कतिपयगोपीः सगुणदेहाः स्थापयित्वा पूर्वोक्तानां मावोपि निर्गुण इति ज्ञापयितुमासां सगुणभावमुत्पावैतन्निवर्तकोपि स्वयमेव नान्य इति ज्ञापयितुं तन्निवृत्तिं विधायाने माविखविरहजदुःखस्वसङ्गमजसुखयोः कर्माजन्यत्वमपि ज्ञापयितुं कर्मक्षयप्रकारेण स्वप्राप्ति विधाय मत्स्वाम्यैव सर्वं कृतवा'नित्युक्त्या च सर्वभाव- प्रपत्तिरूपं साधनं सर्वभावप्रपत्तिलम्यमेव च फलमेतासामिति दृढीकृतं श्रीमदाचार्यचरणै- रिति तद्विरुद्धा मवढ्याख्यानपद्धतिर्नादरपदवीमारोहति । तस्मान्नान्तहगतानां सर्वदा संयोगरसानुभवमात्ररूपं मध्यम फलम् , किन्तु पूर्णसंयोगविप्रयोगरसात्मकमुत्तमफलमेव । उचितं चैवमेव यत्सर्वभावप्रपत्तिर्नाम साशेन प्रपत्तिः, तस्यां सत्यां सर्वाशेनैव प्रभुणा फलदानं कर्तव्यम्, न तु केनाप्यंशेन न्यूनफलदानं सम्भवति, 'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यह मितिमर्यादा यतोस्तीति दिक् । अपरञ्च । 'या मया क्रीडता राज्यां वनेस्मिन् व्रज आस्थिताः । अलन्धरासाः कल्याण्यो मापुर्मवीर्यचिन्तये'तिभ्रमरगीतस्थपद्यव्याख्याने 'भवत्यः समागता अन्तर्गृह- गतास्तु गृह एव स्थितास्तदैव सर्वप्रकारेण प्राप्तवत्यो न तु भवत्योनेनैव निदर्शनेन भवतीभिरप्यहं प्राप्तव्य' इति श्रीमदाचार्यैरुक्तम् । तत्र सर्वप्रकारेण भगवत्प्राप्तिरन्तह- गतानां न तु केनाप्यंशेन न्यूनप्रकारेणेत्युक्तत्वात् सार्वदिकसंयोगरसमात्रानुभव एवैतासा- मिति भवदुक्तिः कथं सङ्गच्छताम् । भगवतो रसरूपत्वाद्रसस्य द्विदलत्वाद्भवन्मते विप्रयोगप्रकारेण प्रात्यभावादिति कृतं पल्लवितेन । अत्र तदैवेतिपदमेव न तु भवत्य इत्यत्रापि सम्बध्यते । तथा च तदैव तत्क्षण एव तासां मप्राप्तिः सर्वप्रकारेण जाता। मवतीनां तु तरक्षण एव न जाता क्रमेणैव मद्विषयकदोपारोपरूपदोपनिवृत्तौ सत्यां भविष्यति, तासां तु मयि दोषारोपो नासीदिति निर्दोपत्वात्तदैव जाता । अन्यथा तदैवेति पदस्यात्रानुपङ्गामाचे तासां सर्वप्रकारेण मत्प्राप्तिर्भवतीनां सर्वप्रकारेण न जातेत्येवमर्थे सम्पन्नेन्तहगतानामेव रासमण्डलमण्डनायमानाभ्योधिकत्वमापयेत । तदैवेतिपदस्य त्वत्रानुपजने तासां तदैव जाता, भवतीनां तु दोपनिवृत्तौ प्रमेण भविष्यतीति न न्यूनता फले प्राप्नोतीति ज्ञेयम् । ननु साधारणानामपि भक्तानां दोपान भगवान्न गणयति, रास- मण्डलमण्डनायमाना स्त्वेताः परं तनुभृतो ननु गोपवध्यः', 'आसामहो चरणरेणुजुपामहं स्याम् ,' 'वन्दे नन्दबजस्त्रीणां पादरेणुमभीक्ष्णश' इत्यादिप्रकारेण श्रीमदुद्धवैः स्तुतानां प्रणतपादरेणूनामय च तदोपस्य विप्रयोगरसारस्थारूपत्वेन निर्दोषाणां च ताशं भावं दोषत्वेन किमर्थ भगवानगणयदिति चेत् । अत्र वदामः । केपाधिदतिकृपानिपयाणां तदा त्वलौकिकदेहप्रात्या . सेवाफलम् । (अत्र एक पत्रं त्रुटितमिति प्रतिभाति)----टानामन्तहगतानां रासानुभवोत्तरं भवन्मते कुन स्थितिर्भवतोच्यते, अस्मन्मते तूक्तस्थानान्यतमस्थाने लयाद्भगवता सह ब्रज एवं समा गमनम् , पुना रासलीलासमये भगवता सह तत्र गमनम, रमणम् , पुनरपि तत्रैव लय इति चेत् , अन ब्रूमः । यावद्जीयैरलक्षितत्वेन केवलप्रपश्च- मानाविर्भावितलीलादर्शनाभावविशिष्टत्वेन चास्मिन्नेव ब्रजेन्तहगतानां स्थितिः । न च निशेषणद्वयविशिष्टलेनास्मिन्नेव ब्रजे तासां स्थिती किं मानमिति वाच्यम् । 'या मया कीडता रा या मिनि भ्रमरगीतपद्यसुयोधिनीस्थश्रीमदाचार्यकृतव्याख्यानस्यैव प्रमाणत्वात् । तथा हि, यदि ब्रजीयैरन्तहगतानां सगुणदेहत्यागोत्तरप्राप्तनिर्गुणदेहसम्बन्धिनी लीला दृश्येत तदा रासमण्डलमण्डनायमानाः प्रति वन्तर्गृहगताविषयकखकृतकीडाव्रजस्थिति- कथनपूर्वक फिमिति स्वप्राप्तिसाधनं वोधयेत् , म्वप्राप्तिसाधनमानमेव तु बोधयेत् , स्कृतकीडाब्रजस्थिल्लोस्तु तामिदृश्यमानत्वादतो नैतासां तलीलादर्शनगिति भगवतासां म्सकीडाप्रजस्थिती अपि वोध्येते इति यावद्वजीयैरलक्षितत्वं सिद्धम् । अथ च भवत्य. समागताः अन्तर्गगता गृह एव स्थितास्तास्तदैव सर्वप्रकारण मां प्राप्तवत्यो न तु भवत्यः। अनेनैव निदर्शनेन भवतीभिरप्यहं प्राप्तव्यस्तस्मान्मदर्थ जीवनस्थापनमिति पक्षो निरर्थक । अन्यथा समागतानां भातीनां पुन. क्लेशो न भवेदनुभवसिद्धश्च क्वेश. । ननु ताः प्रति- चन्धेन तथाभूता. कथ स्तुत्या इत्याशक्याह कल्याण्य इति । तासां महद्भाग्यमस्तीत्य- वश्यप्रतिवन्धरूप दुरित दृष्ट एनोपक्षीणमिति कण्टकेन कण्टकोद्धारपद् देहनिराकरण एवो- पक्षीणम् , भवतीनां तु तद्दुरितमिमामवस्यां प्रापितवत्, अतो मदुक्तप्रकारेण दोपं परित्यज्य तामनस्था प्राप्य मां प्राप्म्यथेति भाव इति श्रीमदाचार्यव्याख्यानपर्यालोचनेन्तहगतानां नाकूरागमनरूपमथुरोदेश्यकभगवन्नयनरूपप्रपञ्चमायाविर्भावितलीलादर्शनमस्ति । यदि तदर्शन म्यात् तदा भरतीना तु तहुरितमिमागवस्था प्रापितवत् , तास्तु महाभाग्य. वत्यम्नासामवश्यप्रतिवन्धरूप दुरित सगुणदेहनिवृत्तावेवोपक्षीणमतस्ता इमामवस्थां न प्रापितवदिति भगनान्न कथयेदेव । अऋरागमनभगवन्नयनदर्शनजलेशस्यैतासामप्यवश्य- मिद्धतात् । तस्मादन्तहगतानां न प्रपञ्चमानाविर्भूतलीलादर्शनमित्यपि मिद्धम् । उचित चैवमेन यत. श्रुतिरूपाभिरन्तहगताभिर्यया त्वलोकवामिन्यः कामतलेन गोपिका. । भजन्ति रमण मत्वा चिकीर्पा जनिता तथे'त्यनेन प्रकृत्यतीताक्षरग्रसम्यव्यापिनैकुण्ठान्त- गंतरजान्तसप्रपयानन्तर्गतगृन्दापने तनस्थनानागरारमोन्मत्तगोपीकदम्नकभामजातीय भागेन भगवता मह रमणं प्रार्थितम् , तयदि तासां प्रापधिपदार्थदर्शन म्यात् , तदा अपमानन्तर्गनवृन्दारने तादृशभान भगरता सह रमण न प्राप्तमेव म्यात् , पर च 'ये यथा मा प्रपद्यन्ते ताम्नधैन मजाम्यह'मिनि मर्यादाभंग. सादिति न तामां प्रपयमाना तितलीलादर्शनमिति साधीयसी पत्तिोक्तिः । एवमेवास्मिन्नेर बजे ता आस्थिता इनि ८३ मठपतिजयगोपालभट्टकृतविवरणसमेतम् । भवतीनामपि निर्वन्धेनैवात्र स्थापनमित्यनेनास्मिन् ब्रज आस्थिता इत्यस्य व्याख्याने- नास्मिन्नेव बजे स्थितत्वमपि सिद्धम् । इदमेवाभिप्रेस पूर्वमेवोक्तं यज्ञपत्नीप्रसंगे विंशा- ध्याये, 'तत्रैका विधृता भा भगवन्तं यथाश्रुतम् । हृदोपगुह्य विजहौ देहूं कर्मानुबन्धन'- मितिपद्यव्याख्यानसुयोधिन्यां भगवत्सङ्गतायाः स्थानान्तरं न मृग्यम् , तच्छक्तीनामिव । अत्र यत्र भगवांस्तन तच्छक्तयः ध्यादयो गोप्यादयो वेत्यर्थो ज्ञेयः । एवं चात्र भगवान् बजे तिष्ठतीति ता अपि बजे एव चेति बजे स्थितत्वमायात्येवेति दिक् । एवं च सिद्धा विशेषणद्वयविशिष्टत्वेनास्मिन्नेव ब्रजे स्थितिरन्तहगतानाम् । तथा च गोपसाहित्येन गोचारणलीलार्थ भगवतो गमने रासलीलानन्तरं भगवतो गृहगमने च दिवा विप्रयोग- रसानुभवः, सायंसमये परावृत्य भगवदागमने रात्रौ च वृन्दावन एव महानन्दसन्दो- हानुभवश्वैतासामपीति संयोगरसमानानुभव एवैतासामिति कथं वक्तुं शक्यत इति कृतं विस्तरेणेति सर्व चतुरस्रम् । स्सादेतत् । वयमन्तहगतानां यन्मध्यमं फलं वदामो न तूत्तमफलम् , तत्र यतो- न्तर्हिते भगवतीति फलप्रकरणीयद्वितीयाध्यायस्थप्रारम्म यव्याख्यानसुपोधिन्यां सन्ति च सिंहास्तयात्र काल इति श्रीमदाचार्यरुक्तम् । व्याख्यातं चैतत् तत्तनुजरत्नैः खकृततट्टि- प्पण्यामवतारसम्पर्तिकाल इत्यर्थ इति, तत्रापूर्णविप्रयोगसंयोगात्मकः पूर्वावतारः समाप्त इदानी पूर्णविप्रयोगात्मकपूर्णसंयोगात्मकपुरुषोत्तमावतारो जात इत्युच्यते, तवान्तर्हिते भगवतीत्यनेन पूर्णविप्रयोगात्मकम्तदनन्तरं 'तासामाविरभूदित्यनेनैकोनत्रिंशाध्याये पूर्ण- संयोगात्मकपुरुषोत्तमावतार उक्तः । एवं च पूर्वस्वरूपानिन्नमेवेदं भगवत्स्वरूप परम- काष्टापन्नम् , एतत्तु अन्तर्गृहगताः प्रति न प्रकटमेव, अतस्तासां नैतादृशभगवत्स्वरूपप्राप्तिः, किन्तु न्यूनसंयोगविप्रयोगरमात्मकत्वेनासम्पूर्णत्वात् तादृशभगवत्स्वरूपप्राप्तिरेवेति न सम्पूर्ण- फलप्राप्तिरिति तासां मध्यमफलप्राप्तिरित्युच्यते । न चैद स्वरूपं पूर्व न प्रकटमिदानी- मेवाविभूतमित्यत्र किं प्रमाणमिति वाच्यम्, 'गायन्त्य उच्चै'रितिपयव्याख्यानसुबोधिनीस्थ- शब्दो हि धूमवल्लोक इति श्रीमदाचार्यतनुजरनकृतश्रीमदाचार्यकारिकाटिप्पण्या 'अत्रेदमा- कृतम्, एतावत्कालपर्यन्तं भगवता स्वरूपानन्दो न प्रकटितः । तस्य खरूपात्मकत्वेन तयाकट्यं विना तदनुभवासम्भवात् , 'तथा परमहंसाना मिति वाक्याद्याशेन भक्तियोगेन तयाप्तिस्तादृक् तत्प्रकटनायाधुनैव पुरुषोत्तमावतारादित्यादितत्तनुजरत्नप्रतिपादनान्तर्ग- तैतावत्कालाधुनापदयाच्यातर्धानकालतदधिकरणकपुरुषोत्तमावतारोक्तरेव प्रमाणत्वादिति चेत्, अत्र वदामः । आगामिविरचियष्टयुपतविरिचिदिनरूपसारस्वतकलये भवन्तो भने गोप्यो भविष्यथ तत्र पृथिवीस्थमारतक्षेत्रान्तर्गतमाथुरमण्डलान्तर्गतवृन्दावनेहं भवतां प्रेयानरासमण्डले भविष्यामीति प्रकृत्यतीताक्षरब्रह्मान्तःसानन्दमयन्यापिवैकुण्ठलो- कस्यशुद्धपुष्टिस्थानरूपश्रीमगोवर्धनयमुनासहितनानारासरसोन्मत्तगोपीकदम्बकविशिष्टकेवल- ८० सेवाफलम् । जीवानां शुद्धपुष्टिमार्गफलं दिसुभगवान् प्रपञ्चे लीलासहित आविर्भवति । अन्यथा सर्व- भावप्रपत्तिरूपसाधनस्य सर्वभावप्रपत्तिलभ्यफलस्य चाज्ञायमानत्वात् कथमेतन्मार्गप्रवृत्ति हेतुभूतफलज्ञानं स्यात्, कथं वा एतन्मार्गीयं साधनं च ज्ञातं स्यात् । तत्रैतन्मार्गीर्य फलं तु व्रजभक्तसजातीयभावेन भजने भवतीति तझावानुसारेण भजने क्रियमाणे भगवत्ताज्ञानेपि तासां दोपारोपो न बाधको जातः, एवं ममापि न भविष्यतीति कदाचिच्छीनं भगवता फलादाने तनुजवित्तजसेवाकरणसमय एव भगवति दोपारोपं कुर्याद्यन्मया त्वेतावदुःख- मनुभूयते सेवाकरणे, भगवांस्त्वतिनिष्ठुर एतावत्पर्यन्तमपि प्रेमासक्त्यादिकं नाविर्भावयति येन फलं स्यात्तदा भगवतो निर्दोषपूर्णगुणत्वेन तत्र दोषारोपे तस्स फलप्राप्तौ विलम्बः स्यादतो भगवति कस्यामप्यवस्थायां दोषारोपो न कर्तव्य इति ज्ञापयितुं यथान्तहगतान जारभावोत्पादनेन रासमण्डलमण्डनायमानानामपि शरीरादि निर्गुणमिति ज्ञापयितुं तासां जारभावमुत्पादितवानवमेव रासमण्डलमण्डनायमानानामपि तादृशरसावस्थारूपमपि दोपा- रोपरूपं भावं दोपत्वेनाख्यापयच्छ्रीमदुद्धवमुखेनेति सबै सुस्थम् । तस्मादन्तहगता- नामपि मुख्यमेव फलमिति सिद्धम् । अन्यत्र जारधर्मेण सुठेहं सुदृढं सर्वतोधिकं मयि सम्प्राप्य सर्वेपि कृतकृत्या भविष्यथेति श्रुतीः प्रति भगवदुक्तेस्तद्भावज्ञापकजारवृद्ध्यापि सङ्गता इति फलप्रकरणीयवचनस्थजारबुद्धिसङ्गतत्वोक्त्या च श्रुतिरूपा एता अन्तर्गृहगता इति ज्ञायते । एवं च श्रुतिकृतस्तुतिसन्तुष्टप्रकृत्यतीताक्षरमध्यस्थेन श्रीवृन्दावनगोवर्धन- यमुनानानारासरमोन्मत्तगोपीकदम्बकविशिष्टेन किशोराकृतिना भगवता किं करवाणी- त्युक्ते 'कन्दर्पकोटिलावण्ये त्वयि दृष्टे मनांसि नः । कामिनीभावमासाद्य स्मरक्षुधान्यः संशयम् । यथा त्वलोकवासिन्यः कामतत्वेन गोपिकाः । भजन्ति रमणं मत्वा चिकीर्षा जनिता तथेत्यादिना श्रुतिभिः खस्स कामिनीभावपूर्वकः स्मरक्षोभ उक्तस्तत्र मा कदा चिद्भगवानेव जागातु यदेतासां लौकिककामामिलाप इति शङ्कां वारयितुं यथा त्वलोक- वास्तव्या गोपिकाः कामतत्त्वेन कामस्य तत्त्वं परमकाष्ठापन्नं रूपमाधिदैविकमिति यावत् ताशकामाधिदैविकेन रूपेण रमणं रमणकर्तारं मत्वा त्वां भजन्ति तथा भजनेस्माकं चिकीपी जनितोत्पादिता त्वद्रूपदर्शनेनेति श्रुतिमिः प्रार्थितम् । तत्र भगवलोकस्यनित्य- सिद्धगोपिकाभावसजातीयभावेन भजनचिकीपैतासाम् । तत्र भगवल्लोकस्यनित्यसिद्धगोपि- कानां न भगवति जारभावः किन्तु सर्वभावप्रपतिरूपो भावः । एव च यघेतासां मध्यम फलं भगवान् दयात् नदा 'ये यथा मा मिति मर्यादा मज्येत । तस्मादपि न तामां मध्यम फलं किन्तूत्तममेर । अग्रेपि 'दुर्लभो दुर्घटक्षेप युप्माकं गुमनोरथः । मयानुमोदितः सम्यक ससो भनितुमर्हती'सन मनोरथस्य दुर्लभत्वं दुर्घटत्वं चोक्तम्, सुमनोरथ इत्यनेन मनोरयम्य गुम्त्य चोक्तम् । यदि जारभावेन भजन एव मनोरयः स्यात् तदा दुर्लभत्वं दुर्घटत्वं च गोतं. म्यान् । लदाचित् तदानी श्रुतीनां विवाहितपतेरमायात् सस्मिन् ८१ 'आगा मठपतिजयगोपालभट्टतविवरणसमेतम् । जारभावो दुर्घटोत एव दुर्लमश्चेति दुर्लभत्वदुर्घटत्योक्ति. सङ्गच्छेतापि, परन्तु सुमनोरथ इत्यन मनोरथे सुष्टुत्व तु न सङ्गच्छेत, जारभावेन भजनमनोरथस्य दुष्टत्वेन सुमुत्वा- भावात् । तस्मात् सुमनोरथपदेन सर्वभावप्रपत्तिपूर्वकभगवलोकवास्तव्यगोपिकाभानसजा- तीनभावमनोरथ एवोक्तोनेति निश्चितम् । अत एवाग्रे मयानुमोदित इत्यनेन पूर्व मल्लोक- चामिगोपीभिर्मादितो अनु पश्चान्मया मोदितो अत एव सम्यक समीचीन. सत्यो भपितु योग्यो भवति । ममैतदधीनलादेतासा मोदन दिनान सयो भवितु योग्य म्यादिति भाव । अन्यथा तामा मोदन नापेक्ष्येत, निकृष्टमनोरयस्य सत्त्वात् । एतदने तु मिनि पिरिमो तु जाते मृष्टयर्थमुद्यते । करप सारम्बत गप्प बजे गोप्यो भविष्यथ । पृथि-या भारते क्षेत्र माथुरे मम मण्डले । वृन्दावने भविष्यामि प्रेयान्यो रासमण्डले, नारधर्मेण मुलेह मुहद्ध सर्वतोधिकम् । मयि सम्प्राप्य सपि कृतकृत्या भविष्यये त्यनेन प्रयझेनैताभिरप्रार्थित किविकार्याधै जारभावो भगवतेव दत्त इति प्रतीयते स्फुटमेव । तमाय भगवदभिप्राय । मया त्यागामिविरिञ्चिदिनरूपसारखतकल्पे पृथिवीस्थभारतक्षेनस्थ माधुरमण्डलान्तर्गतवृन्दावने सर्वगावप्रपत्तिस्तत्फल च प्रकटनीय जीवविशेपोद्धारार्थम् । तर सर्वभावप्रपत्तिनिर्गुणा, तद्भावयता देहादिक च निर्गुणम् , तादृशीना भगात्सङ्गम पिरहजन्य सुख दुख च निर्गुणमिति ज्ञापनीयम्, अन्यथा रासमण्डलमण्डनायमानाना मावादिपु सगुणत्वबुद्ध्या सर्वेपा प्रवृत्तिर्न सात् , तथा च मदवतारोपि व्यर्थ स्यादत एता एव श्रुतीस्तस्मिन्कल्पे अवतारयित्वैतासा भावादिक च सगुण विधाय सगुणभाव सगुणदेह सुसटु सादिक च कर्मजन्यमिति ज्ञापनीयम् । एव सत्येतासा तद्भावतदेहादि- नाशे लौकिकभिन्नशरीरप्राप्ती सर्वभावप्रपत्तिरूप साधन तलभ्य फल भविष्यति, मुख्याना भावादेनिर्गुणत्व च ज्ञापित भविष्यतीत्युभयमपि कार्य सेत्स्यति । अन्यथा तज्ज्ञापनार्थ प्रयनान्तरकरणमापयेतेति जारभावो भगवतैव दत्तो, न तु तासा जारभावप्रपत्ति साह- तिकीति बोध्यम् । एव च गृहद्वामनपुराणायकथाविचारेणापि नैतामा मध्यमफलमायाति किन्तूत्तमफलप्राप्तिरेवेति कृतमधिकतराभिनिवेशेन । अत एव सुबोधिन्यामुक्त पुरस्ता दित्यस्य द्वितीयव्याख्याने श्रीमदाचार्यरुक्त ‘यासा साक्षाद्भगवत्सम्बन्धम्तासा सर्वासा मेर रासमण्डलमण्डनायमानाना शरीरमपि गुणातीतमेवेति ज्ञापयितु भगवानेव कतिपय गोपी सगुणदेहा स्थापयित्वा पुर्वोक्ताना भावोपि निर्गुण इति ज्ञापयितुमासा सगुण भावगुत्पाद्यतन्निवर्तकोपि स्वयमेव नान्य इति ज्ञापयितु तन्निवृत्ति विधायाने भावि खविरहजदु खस्तसङ्गमसुसयो कर्माजन्यत्वमपि ज्ञापयितु कर्मक्षयप्रकारेण म्वप्राप्ति विधाय मत्स्वाम्येव सर्व कृतवानिति निगर्व । अन पुष्टिमार्गानिकारान्मर्यादामाीया अनुप पत्तयोनवसरपराहता इति सर्वमनवद्य'मिति । न च तासा यदा सगुणदेहनाशस्तदैव भगवति सर्वजीवतत्त्वरूपमगवत्कौस्तुमे वा 'गणिधर पचिदागणयन्गा' इत्यनोक्तगोपि- ८२ सेवाफलम् । (अत्र एकं पत्रं त्रुटितमिति प्रतिभाति)----टानामन्तहगतानां रासानुभवोत्तरं भवन्मते कुत्र स्थितिर्भवतोच्यते, अस्मन्मते तूक्तस्थानान्यतमस्थाने लयाद्भगवता सह बज एव समा- गमनम् , पुना रासलीलासमये भगवता सह तत्र गमनम् , तदा त्वलौकिकदेहप्रात्या रमणम्, पुनरपि तत्रैव लय इति चेत्, अत्र ब्रूमः । यावद्रजीयैरलक्षितत्वेन केवलप्रपथ- गात्राविर्मावितलीलादर्शनाभावविशिष्टत्वेन चास्मिन्नेव व्रजेन्तहगतानां स्थितिः । न च विशेषणद्वयविशिष्टयेनास्मिन्नेव बजे तासां स्थितो कि मानमिति वाच्यम् । 'या मया क्रीडना राज्यामिनि भ्रमरगीतपद्यसुवोधिनीस्थश्रीमदाचार्यकृतव्याख्यानस्यैव प्रमाणत्वात् । तथा हि, यदि ब्रजीपैरन्तहगतानां सगुणदेहत्यागोत्तरप्राप्तनिर्गुणदेहसम्वन्धिनी लीला दृश्येत तदा रासमण्डलमण्डनायमानाः प्रनि लन्तहगताविषयकवकृतकीडाप्रजस्थिति- कथनपूर्वक किमिति स्वप्राप्तिसाधनं बोधयेत्, स्वप्राप्तिसाधनमात्रमेव तु बोधयेत्, स्वकृतकीटावजस्थित्योस्तु ताभिदृश्यमानत्वादतो नैतासां तलीलादर्शनमिति मगवतासां म्सकीडावनस्थिती अपि बोध्येते इति यावद्वजीयैरतक्षितत्वं सिद्धम् । अथ च भवत्यः समागताः अन्तर्गृहगता गृह एव स्थितास्तास्तदैव सर्वप्रकारेण मां प्राप्तवत्यो न तु भवत्यः। अनेनैव निदर्शनेन भवतीभिरप्यहं प्राप्तव्यस्तस्मान्मदर्थं जीवनस्थापनमिति पक्षो निरर्थकः । अन्यथा समागतानां भवतीनां पुनः केशो न भवेदनुभवसिद्धश्च क्लेशः । ननु ताः प्रति- पन्धेन तथाभूताः कथं स्तुत्या इत्याशंक्याह कल्याण्य इति । तासां महाग्यमस्तीत्य- वश्यप्रतिबन्धरूपं दुन्तिं दृष्ट एवोपक्षीणमिति कण्टकेन कण्टकोद्धारवद् देहनिराकरण एवो- पक्षीणम् , भवतीनां तु तदुरितमिमामवस्था प्रापितवत्, अतो मदुक्तप्रकारेण दोपं परित्यज्य तामवस्यां प्राप्य मां प्राप्यथेति भाव इति श्रीमदाचार्यव्याख्यानपर्यालोचनेन्तहगतानां गारागमनरूपमथुगेद्देश्यकभगवनयनरूपप्रपञ्चमात्राविर्भावितलीलादर्शनमस्ति । यदि तदर्शन म्यात् तदा भरतीनां तु तदुरितमिमामयस्था प्रापितवत्, तास्तु महाभाग्य- यत्यम्नामामवश्यप्रतियन्धरूप दुरितं सगुणदेहनिवृतायेवोपक्षीणमतम्ना इमामवस्थां न प्रापितवदिनि भगवान कथयेदेव । अरागमनभगवन्नयनदर्शनजल्लेशस्यैतामामप्यवश्य- मिद्धत्वात् । तस्मादन्तहगतानां न प्रपद्यमामानिर्भूतलीलादर्शनमित्यपि मिद्धम् । उचित चयमेर यतः श्रुतिरूपाभिरन्तगृहगनाभि यथा वलोकवामिन्यः कामतत्वेन गोपिकाः । भजन्ति रमणं मला चिकीर्पा जनिता तधेसनेन प्रकृयतीताक्षग्मयम्थप्यापिनकुण्ठान- गंतानान्तस्सप्रपमानन्तर्गतवृन्दारने तमन्थनानागमरमोन्मत्तगोपीकदम्याभारगजातीय भारेन भगरता मह रमणं प्राधिनम् , तपदि तामां प्रापगिकपदार्थदर्शनं अपमानन्नर्गनन्दानि नाममान मगाता मह रमपं न प्राममेय पात्, एच 'य यगा मां प्रपपन्ते तान्नधेष मनाम्यहमिति मर्यादाभंगः म्पादिति न तामां प्रपसमाना. शितलीलादर्शन मिति मापीयमी पूक्लिोनिः । एयमेयाग्मिर मने ता भाभिता म्पात्, तटा मठपतिजयगोपालभट्टकृतविवरणसमेतम् । भवतीनामपि निर्यन्धेनैवात्र स्थापनमित्यनेनास्मिन् ब्रज आस्थिता इत्यस्य व्याख्याने- नास्मिन्नेव ब्रजे स्थितत्वमपि सिद्धम् । इदमेवाभिप्रेस पूर्वमेवोक्तं यज्ञपत्नीप्रसंगे विशा- ध्याये, 'तत्रैका विधूता भर्ती भगवन्तं यथाश्रुतम् । हृदोपगुह्य विजहौ देहुं कर्मानुषन्धन'- मितिपद्यव्याख्यानसुबोधिन्यां भगवत्सङ्गतायाः स्थानान्तरं न मृग्यम् , तच्छक्तीनामिव । अत्र यत्र भगवास्तत्र तच्छक्तयः ध्यादयो गोप्यादयो वेत्यर्थो ज्ञेयः । एवं चान भगवान् बजे तिष्ठतीति ता अपि व्रजे एव चेति बजे स्थितत्वमायात्येवेति दिक् । एवं च सिद्धा विशेषणद्वयविशिष्टत्वेनास्मिन्नेव बजे थितिरन्तर्गृहगतानाम् । तथा च गोपसाहित्येन गोचारणलीलार्थ भगवतो गमने रासलीलानन्तरं भगवतो गृहगमने च दिवा विप्रयोग- रसानुभवः, सायंसमये परावृत्य भगवदागमने रात्रौ च वृन्दावन एव महानन्दसन्दो- हानुभवश्चैतासामपीति संयोगरसमावानुभव एवैतासामिति कथं वक्तुं शक्यत इति कृतं विस्तरेणेति सबै चतुरतम् । स्यादेतत् । वयमन्तहगतानां यन्मध्यम फलं वदामो न तूत्तमफलम् , तत्र यतो- न्तहिते भगवतीति फलप्रकरणीयद्वितीयाध्यायस्थप्रारम्भ व्याख्यानसुयोधिन्यां सन्ति च सिंहास्तथात्र काल इति श्रीमदाचार्यैरुक्तम् । व्याख्यातं चैतत् तत्तनुजरनैः स्वकृततट्टि- प्पण्यामवतारसम्पूर्तिकाल इत्यर्थ इति, तत्रापूर्णविप्रयोगसंयोगात्मकः पूर्वावतारः समाप्त इदानीं पूर्णविप्रयोगात्मकपूर्णसंयोगात्मकपुरुषोत्तमावतारो जात इत्युच्यते, तपान्तहिते मगवतीत्यनेन पूर्णविप्रयोगात्मकस्तदनन्तरं 'तासामाविरभू'दित्यनेनैकोनत्रिंशाध्याये पूर्ण- संयोगात्मकपुरुषोतमावतार उक्तः । एवं च पूर्वस्वरूपादिन्नमेवेदं भगवत्स्वरूप परम- काष्ठापन्नम् , एतत्तु अन्तहगताः प्रति न प्रकटमेव, अतस्तासां नैतादृशभगवत्स्वरूपप्राप्तिः, किन्तु न्यूनसंयोगविप्रयोगरमात्मकत्वेनासम्पूर्णत्वात् तादृशभगवत्स्वरूपप्रासिरेवेति न सम्पूर्ण- फलप्राप्तिरिति तासां मध्यमफलप्राप्तिरित्युच्यते । न चैद खरूपं पूर्व न प्रकटमिदानी- मेवाविर्भूतमित्यय किं प्रमाणमिति वाच्यम्, 'गायन्त्य उच्चै 'रितिपद्यव्याख्यानसुबोधिनीस्थ- शन्दो हि धूमवलोक इति श्रीमदाचार्यतनुजरनकृतश्रीमदाचार्यकारिकाटिप्पण्यां 'अवेदमा- कृतम्, एतावत्कालपर्यन्तं भगवता स्वरूपानन्दो न प्रकटितः । तस्य खरूपात्मकत्वेन तत्प्राकट्य विना तदनुमवासम्भवात् , 'तथा परमहंसाना मिति वाक्याचाहशेन भक्तियोगेन तत्राप्तिस्ताक् तत्प्रकटनायाधुनैव पुरुषोत्तमावतारादित्यादितत्तनुजरत्नप्रतिपादनान्तर्ग- तैतापत्कालाधुनापदवान्यान्त(नकालतदधिकरणकपुरुषोत्तमावतारोक्तेरेव प्रमाणत्वादिति चेत्, अन्न वदामः । आगामिविरिधिसष्टयुद्यतविरिचिदिनरूपसारखतकल्पे भवन्तो बजे गोप्यो भविष्यय तत्र पृथिवीस्थमारतक्षेत्रान्तर्गतमाथुरमण्डलान्तर्गतवृन्दावनेदं भवतां प्रेयान्रासमण्डले भविष्यामीति प्रकृत्यतीताक्षरब्रह्मान्तःस्थानन्दमयन्यापिवैकुण्ठलो- कस्थशुद्धपुष्टिस्यानरूपश्रीमद्गोवर्धनयमुनासहितनानारासरसोन्मत्तगोपीकदम्बकविशिष्टकेवल- ८४ सेवाफलम् । शृंगाररसानन्दमयेन सारस्वतकल्पानुसारिश्रीभागवतीयकृष्णस्तु भगवान् स्वयमितिवचन- सिद्धपरमकाष्ठापन्नत्वेन भगवता वेदान् प्रति वरो दत्तः । एवं च ब्रह्मकल्पादारभ्य सार- खतकल्पपर्यन्तं न पूर्णपुरुषोत्तमावतारो जातः, सारस्वतकल्प एव च जात इति सिद्धम् । एवं चेदं प्रघट्टकमेव मनसिकृत्यैतावत्कालाधुनापदे उक्ते। तथा चैतावत्कालपर्यन्तपदस्य ब्रह्मकल्पादारभ्य सारखतकल्पपर्यन्तमित्यर्थोऽधुनापदस्य च सारखतकल्पे इत्यर्थः सम्पन्नः। तथा च बाल्यमारम्य कृता लीला सर्वापि रसालतामापद्यते । भवदुक्तप्रकारे त्वेतदवतार- पूर्वसामयिकी सर्वापि लीला खरूपान्तरसहभावेन कृतत्वाद्रसाभासतामाविष्करोति । किञ्च । रासमण्डलमण्डनामिः कृतं 'कस्साश्चित् पूतनायन्या' इत्यादिलीलानुकरणमपि न सङ्गच्छते इदानीमाविदंतविप्रयोगसंयोगात्मकस्वरूपेण तत्तलीलाया अकृतत्वात् । खप्रियकृत- लीलानुकरणस्यैव लीलाहावरूपत्वमिति रसशास्त्र सिद्धान्तात् । अपरश्य । विचयनसामयिक- नन्दसूनुर्गतो हृत्वा रामानुजो मानिनीनां, गोविन्दचरणप्रिये इत्यादिपु नन्दसुतबल- मदानुजगोकुलेन्द्रादिनामकथनस्थाथ च ' विषजलाप्ययायालराक्षसा'दित्यायुक्तकालीयादि- भयरक्षितत्वगोचारणगमनकर्तृत्वादिकथनस्य तत्समयप्रकटस्वरूपे सम्भवाभावेन भ्रम- रूपत्वापातात् । न चास्तु भ्रमरूपत्वमिति वाच्यम् । तथा सति रासमण्डलमण्डनाय- मानानां भावानुसारेणेदानीन्तनमजनकर्तृमिरेतादृशभवसिद्धान्तस्य ज्ञायमानत्वेन नन्द- सन्वादिनामाग्रहणस्य बाललीलामारभ्य रासलीलाप्रारम्भपर्यन्तकृतलीलानामभावनाप्रसक्तेः। अन्यच्च । श्रीमन्नवनीतप्रियश्रीमगोवर्धनोद्धरणखरूपभजनाप्रसक्तेश्च महाननर्थः प्रसन्जेत । न च तदन्तर्गतमिदमपि स्वरूपं वर्तत एवेति वाच्यम् । तथा सति तत्तल्लीलाविशिष्ट- स्वरूपाणां तत्तल्लीलाश्रवणादीनां तत्तत्स्वरूपभजनस्य च गौणलीलात्वगौणश्रवणादित्व- गौणस्वरूपभजनस्वापत्तेश्च । अपरश्च । 'जानीत परमं तत्वं यशोदोत्सद्गलालितम् । तदन्यदिति ये ग्राहुरासुरांस्तानहो बुधा' इतिपधेन श्रीमदाचार्यशोदोत्सङ्गलालितस्य सिद्धान्तितायाः परमतत्त्वताया मङ्गप्रसङ्गश्च । न हीदानीमाविर्भूते खरूपे यशोदोत्सद्ग- लालितत्वमस्तीति तद्विरुद्धा भवद्गाद्धान्तपद्धतिः कथं भव्यतामुपेयात् । अथ च 'सखि कापि सापि सम्प्रति परिवर्ति किमु प्रजाधिपप्राणा । या नन्दसूनुमुरलीतरलं चेतः समादध्या'दिति तत्वगुजराजोक्का खस तरलरेतस्त्वे नन्दसूनुमुरत्या हेतुत्वोक्तिरपि कयं सगअसा स्यात् । श्रीमदाचार्यरतानां तत्तनुजराजानां च अजमत्तमावात्मकभगवत्स्वरूप एव निष्ठावत्वात् । ननु तवतारसम्पूर्तिकाल इत्ययास्मप्रभुकृततयात्र काल इत्यवत्स- कालपदय्याख्यानस्य का गतिरिति चेत् । अनोच्यते । पृ पालनपूरणयोरितिधात्वर्थानु- सारात् सम्पूर्तिशब्दस सम्पूर्णता यर्थः, सा च केनचित् प्रकारेण न्यूनस भवति । तत्रास्मदाचार्योक्तमार्गो हि फलमार्गः । तत्र फलरूपो मगवानेव साधनम्, फठरूपो भगवानेर घ फलम् । तत्र परमकाष्ठापनस फलरूपभगवतो 'रसो वैस' इति भुते मठपतिजयगोपालभट्टकृतविवरणसमेतम् । ८५ रसरूपत्वात् स्वप्नादिसंयोगविशिष्टप्रेमासक्तिव्यसनपर्यन्तावस्थासंवलितपूर्वानुरागजविप्रयोग- रूपेण साधनता । तदनन्तराविर्भूतपरस्परपोष्यपोपकभावविशिष्टविप्रयोगातिपुष्टपूर्णपूर्णतर- पूर्णतमसंयोगतादृशसंयोगातिपुष्टपूर्णपूर्णतरपूर्णतमविप्रयोगपरम्परारूपेण च फलता । तत्रापि परम्परायां परमफलता तु संयोगरूपस्यैव । इदं यथा तथानुपदमेव प्रतिपादयिष्यते । एवं च चाल्यमारभ्य पोगण्डान्तं पूर्वोक्तप्रकारकपूर्वानुरागजविप्रयोगरूपसाधनविशिष्टत्वमेव प्रजभक्तानाम् । तत्र फलात् साधनं न्यूनमेवेत्यनुभवसिद्धम् । अन्यथा साधने प्राप्ते फला- काहा न स्यात् । तथा चैतासां पूर्वानुरागविशिष्टस्वप्नादिसंयोगसुखे प्राप्तेपि पायसयोग- सुखस्सामिलपितस्याजातत्वादेतावत्पर्यन्तं साधनरूपत्वमात्रेणैव भगवत आविर्भावात् पुरुषो- तमावतारो न्यून एव स्थितः । अतःपरं तु 'बाहुप्रसारपरिरम्भे'त्याद्युक्तेन तदमिलपितपूर्ण- बाह्यसंयोगसुखरूपेण, तदनन्तरमेतत्संयोगसुखपोपार्थमुक्तसंयोगपु धन्तर्हिते भगवती'त्याधु- तेन पूर्णविप्रयोगस्वरूपेण, तदनन्तरं 'तासामाविरभू'दित्यायुक्तेन रासावसानपर्यन्तं पूर्वपूर्ण- संयोगसुखस्वरूपादपि कोटिगुणेन पूर्णविप्रयोगपुष्टेन पूर्णतरसंयोगसुखरूपेण, तदनन्तरं च गोप्यः कृष्णे वनं यात इत्याद्युक्तेन पूर्वोक्तपूर्णतरसंयोगसुखपुष्टेन परार्धगुणमाविसयोग- सुखपोपार्थ पूर्णतरविप्रयोगम्वरूपेण, ततः पुनः पूर्वोक्तपूर्णतरविप्रयोगपुष्टेन गोचारणपरावृत्ति- जनितबदुपरार्घगुणपूर्णतमसंयोगसुखरूपेणाविर्भूतः, ततः पुनरप्यक्रूरकृतमथुरानयनजनितेन पूर्णतमसंयोगसुखपुष्टेन पूर्णतमविप्रयोगरूपेण पुनरपि मावमरेणानन्तगुणान्तरवाहसंयोग- सुखस्वरूपेण चेत्येवं संयोगपरम्परारूपेणाविर्भविष्यति भगवान् । एवं चेदानीमेव रस- रूपावतारस्य पूर्व पाहुप्रसारेत्यादिना एकदलरूपसंयोगावतार उक्तः, इदानी मन्तहिते भगवती'त्यादिना द्वितीयदलरूपविप्रयोगावतार उच्यते इति सम्पूर्णता जायत इत्यवतार- सम्पूर्तिकाल इत्यतत्यसम्पूर्तिशब्देन सम्पूर्णतोक्ता, न तु पूर्वावतारसमाप्ति तेत्युच्यते । समाप्तिरूपार्थस्यैव विवक्षितत्वेवतारसमाप्तिकाल इत्येवोक्तं स्यात् । तस्मादवतारसम्पूर्ति- काल इत्यस्यावतारसम्पूर्णताकाल इत्यर्थः सम्पन्न इति नन्वित्यादिभवत्प्रश्नोत्तरस सिद्धे. रिति सर्व भव्यम् । यपुनर्विप्रयोगस्यैव फलत्वम्, न संयोगस्य, संयोगस्तु तडिल्लतावत् किञ्चित् कालं मध्ये मध्ये जायमानो भक्तानां देहस्थित्यर्थमुपयुक्तो भवति । भगवद्विपयक- विप्रयोगस्यातिदुःसहत्वात् । अत एव भगवतो मथुरातः परावृत्त्यानागमनम्, “संयोगस्सैव फलवे मथुरातः परावृत्यागमनमेव स्यात् । नन्वत्र किं प्रमाणमिति चेत् । 'भवतीनां वियोग' इति पद्यव्याख्यानसुबोधिन्यामयदेहभावनात्मा गौण इति देहेन सह वियोग आविर्भूतस्योन्येत । तदपि न पटते । समवायिकारणत्वेन तेषु वर्तत इति । अन्यथा देहा निःखमावाः स्युः । आविर्भूतेन वियोगस्तु हितकारी । अन्यथा खरूपनाश एव स्यात् । यथामिकाष्ठयोः । पूर्वसम्बन्धेनैवैता अर्धदग्धाः, पुनः सम्बन्धेन सर्वदाह एव सात् । मुखानुमवस्तु खान्तःस्थिताम्यमिन्यक्तिवत् स्वान्तःस्थितभगवदभिव्यक्त्या । सर्वयामि- सेवाफलम् । व्यक्ती काष्ठांशो ज्वलिप्यतीति न सम्बध्यते, यतो भगवान् प्रलयकर्तसादिप्रघट्टकपर्या- लोचने काठान्तःस्थिताग्नेरभिव्यक्तिर्यथा वाह्योपाधिसम्बन्धामावे किञ्चित्कालिकी,एवं स्वान्तः- स्थितगगवदभिव्यक्तिरपि तडिल्लतावद्भगवत्संयोगाद्विप्रयोगस्यैव सार्वकालिकत्वाद्विप्रयोगस्यैव फलत्वं न सयोगसेति श्रीमदाचार्यचरणोक्तेरेव प्रमाणत्वात् , आविर्भूतेन वियोगस्त्वित्या- देरयमर्थः । यद्याविभूतस्वरूपेण संयोगः स्यात् तदा मथुरात आगमनज्ञानेऽस्मान् विहाय गत इति निश्चयजनितमहादुःखेन देहपातः स्यात् , तदेवोक्तमन्यथेत्यादिना सदृष्टान्त- मतोयं वियोगो हितकारीति भावः । पूर्वसम्बन्धेनेत्यादेरयमर्थः। राससामयिकवियोगोत्तर- सातसम्बन्धेनैवैताः स्वत्यागजनितमहादुःसेन स्मरणपथगतेनार्धदग्धाः, अतःपरमिदानी- न्तनसम्बन्धे मथुराविषयकगमनज्ञानेन कोटिगुणे दुःखे जाते सर्वदाहः सादिति ज्ञेयाने स्पष्टोर्थ इति वदन्ति । तत्रापि वदामः । भगवद्रपरसो ह्यग्निरूपः। तर यथानिस्तापजनका शीतलताजनकश्चेति द्विविधः । तनान्नादिपरिपाकजनकोग्निस्तु तापजनकः । हिमादि- रूपोमिस्तु शीतलताजनकः । तत्र यावत्पर्यन्तं देहादिपु तापस्तावत्पर्यन्तं हिमरूपोमिः खसम्पन्धेन देहादिस्थितिकारकः । सर्वथा स्वसम्बन्धेन देहादिनिष्ठतापनिवृत्तौ शीतलता- गुणेन देहादिनाशारश्च । एव रसरूपो भगवद्रपोग्निरपि विनयोगसंयोगरूपेण द्विधः । तन विप्रयोगात्मको रसरूपो वन्हिस्तापकारकः, सयोगरूपो वह्निस्तु शीतलताकारकः । तत्र यावत्पर्यन्तं देहे विप्रयोगजनितस्तापसम्मन्धस्तावत्पर्यन्तं तापनिवर्तकस्खशीतलतागुणेन देह- जीवात्मनोः स्थितिकारकः । खसम्बन्धेन सर्वधा तापनिवृत्तौ संयोगरूपो वह्निस्तु जीव- लयसम्पादकखभावत्वात् स्वसम्बन्धेन सर्वथा जीवस्य लये सम्पन्ने स्थितोपि भक्तिमार्गीय- जीवात्मा रसानुभवाभावान्नष्ट एप भवतीति तन्नाशकारकः । अस्मिन् पक्षे श्रीमदाचार्योक्त- सर्वदाह एव स्यादित्यवत्सदापदेन स्वरूपनाश एव स्यादित्यत्राप्याचार्योक्तनाश- पदेनापि लय एव ज्ञेयः । जीवस्याविकृतत्वान्नित्यत्वात् काष्ठादिदाहबद्दाहस देहादिनाश- पन्नाशस्य पाउसम्मवात् । एव च सति यदि भगवानेतामिः सह संयुज्येत तदा पूर्वानुभूता- नन्दात् कोटिगुणानन्दप्रादुर्माने सर्वथा तापनिवृत्ती मक्तात्मनां लय एव भवेद्, एवं च रस मार्गीयफलाभारः सम्पयेतेत्याविभूतेन पियोगस्तु हितकारीत्युक्तं श्रीमदाचार्यचरणैः । न च सयसम्भावनायामेव पुनरपि पिप्रयोगाविभीवे पूर्वोक्तफलमम्मव इति वान्यम् । यदि पुनरपि पहिरापिभूतम्यरूपरिप्रयोगाधिर्मावावश्यकत्वम् , तदैतेनेच विप्रयोगेग चारितार्यात् पिटपेषणन्यायमसक्तेः । न च मुसानुभवाध पहिरापि तस्वरूपेण संयोगो देय एवेति पान्यम् । अन्तःस्थितान्यभिव्यक्तिवदन्तःस्थितमगादभिव्यक्तया मुसानुभवसिद्धिरिति श्रीमदाचार्यरेखोक्तवाददिरारितम्परूपसंयोगम्म निःप्रयोजनकत्वादिति दिक् । यद्वा । पहिरारितम्परूपेण पियोगस्लु हितकारीत्यम्सायमर्षः । अपमप्रादुर्भूतमधुरागतमगा- रसम्मन्थे महामुराानुभये जाने पुनरपि रसरूपमगवरम्पभावाद्विप्रयोगे जाते यया यया ८७ मठपतिजयगोपालभट्टकृतविवरणसमेतम् । संयोगानन्दाधिक्यम् , तथा तथा विप्रयोगे तापाधिक्यम्, यथा यथा विप्रयोगे तु दुःखाधिक्यम् , तथा तथा संयोगे आनन्दाधिक्यम्, इत्यनुभवान्मथुरागतस्वरूपेण विप्र- योगे पूर्वतापादपि कोटिगुणे तापे जाते देहनाश एव स्यात्, एतत्तापस्य प्रलयामितापादपि प्रवलत्वात् । यथा बाह्याग्निकाष्ठसम्बन्धे काष्ठनाशः । अस्मिन् पक्षे पूर्वसम्बन्धेनैवैता अर्धदग्धाः, पुनः सम्बन्धे सर्वदाह एव स्यादित्यत्रत्यपूर्वसम्बन्धेनेत्यस्य पूर्वविप्रयोगसम्बन्धे- नेति पुनः सम्बन्धे इत्यस्य च पुनर्विप्रयोगसम्बन्धे इति चार्थों बोध्यः । तस्मादहिरा- विर्भूतस्वरूपेण भगवान्न सम्बध्यते । सुखानुभवस्वन्तरनुसन्धानेन्तःस्थिताम्यभिव्यक्ति- वदन्तःस्थितभगवत्स्वरूपाविर्भावेनान्तर्यहिरनुसन्धाने भगवत्सङ्गमाकाङ्क्षायामप्यन्तःस्थितस्य बाह्यप्राकट्यादेव पहिरपि भविष्यत्येवेति पहिराविर्भूतस्वरूपेण वियोगो हितकारीत्युक्तं श्रीमदाचार्यः । न चान्तःस्थखरूपप्राकट्येन तत्सम्पन्धजनितसुखातिशयोत्तरसभातविप्र- योगादपि देहनाशप्रसत्तिर्मवित्र्येवेति वाच्यम् । पाद्यतृणतूलरूपोपाधिसम्बन्धाभावे मथनाविर्भूतकाष्ठान्तःस्थवह्निर्न काष्ठदहनसमर्थः, तथात्र बाह्योपाधिरूपसर्वमुक्तिदानसम्ब- न्धाभावे बहिराविर्भूतखरूपमप्यमित्वान देहनाशकरम् , किन्तु प्रपञ्चातीततापल्लेशनाश- रूपरसधर्मपुरस्कारेणैव प्रकटमिति तदेव करोतीति भवदुक्त्यप्रसक्तेः । यद्वा । आविर्भूतेन वियोगस्तु हितकारीयादेरयमभिप्रायः । प्रपश्याविर्भूतखरूपं हि सर्वमुक्तिदानाय प्रकटम् , तत्र सर्वमध्ये गोपिकानामपि सत्त्वादेतासामपि लयरूपमुक्तिमेव प्रतिक्षणं ददाति भगवान् , परं तस्मात् पृथक्कृत्य भजनानन्दमनुभावयति । 'ये यथा मा मिति प्रतिज्ञातः । अघो- पष्टम्भकरूपा 'यत एतद्विमुच्यत' इतिफलप्रकरणीयपञ्चाध्यायीपघव्याख्यानसुबोधिनी द्रष्टव्या । एवञ्च तस्मात् पृथक्करणक्लेशः प्रतिक्षणं प्रभोर्भवतीति प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्पति न्यायादहिःप्रपश्याविर्भूतखरूपेण भगवान् न सम्बध्यते, तेन गोपिकानां लयनिवृत्तेहित भवतीति प्रपश्याविर्भूतखरूपेण वियोगो हितकारीत्याचार्यरुक्तम् । बाह्याननुसन्धानेनु- सन्धाने वा भावभरेणान्तर्वहिःप्रकटरसरूपस्वसंयोगं तु करोत्येव प्रभुः । तासामभिलपित- त्वाद्रसमार्गीयपरमफलरूपत्वाच । तस्मान्न विप्रयोगस्य परमफलत्वम्, किन्तु संयोगस्यैव । संयोगसाधनस्वात् पूर्वानुरागजनितविप्रयोगस्य संयोगपोपकत्वात् संयोगानन्तराविर्भूतस्य विप्रयोगस्य च परमफलत्वमुच्यते । अन्यथा भगवत्सयोगोस्माकं भवत्वितीच्छोदय- वजभक्तानां भगवद्विप्रयोगोस्माकं भवत्वितीच्छोदयोपि श्रीभागवते श्रुतः स्यात् । इदानीन्तनानां भगवद्विप्रयोगेच्छोदयस्तु मगवत्संयोगसाधकत्वपोषकत्वज्ञानादेव भवतीति न काप्यनुपपतिः । यद्यपि भगवतो रसरूपत्वात् संयोगविप्रयोगात्मकत्वाद्रसरूपभगवत्प्राप्ती विप्रयोगोप्याम्रादिफले त्वग्वीजादिवदन्तर्गतोभवति तथापि त्यग्वीजादिप्रात्या यथाम्रफल- रसाकाङ्क्षा भवत्येव, तद्रसप्राप्त्या तु त्वग्वीजाधाकाहा न भवति, तथा विप्रयोगप्राप्त्या संयोगाकाहा भवत्येव, संयोगप्राप्त्या तु विप्रयोगाकाहा तु न भवतीति संयोगस्यैव परम- ८८ सेवाफलम् । फलत्वं वक्तुं शक्यते । ज्ञाते सति खवृत्तितयेष्यमाणस्यैव फलत्वात् । न त्विदं विप्रयोग इति न विप्रयोगस्य फलत्वम् । अत एव फलप्रकरणीयप्रथमाध्यायसुवोधिनीप्रारम्भस्थाया- 'मतो हि भगवान् कृष्णः स्त्रीपु रेमे बहर्निशम् । वाह्याभ्यन्तरभेदेन ह्यान्तरं तु महाफल'- मितिकारिकायां रमणपदवाच्यवाह्याभ्यन्तरसंयोगस्यैव फलत्वं महाफलत्वं च क्रमेणैवोक्तम् । एवमेव 'खानन्दस्थापनार्याय लीला भगवता कृता । स बाह्यो जनितः पुष्टो यथान्तर्निविशे. त्पुनः । तदर्थ भगवांस्तासु लीलया सहितोविश'दित्येतद्वितीयाध्यायसुबोधिनीप्रारम्भ- कारिकायां विप्रयोगस्य संयोगपोषकत्वमेव, फलत्वं तु संयोगस्यैव श्रीमदाचार्यवर्यैरुक्तम् । अत एव 'मयि ताः प्रेयसां प्रेष्ठ' इति भ्रमरगीतपद्यव्याख्यानसुबोधिन्यामपि फलसाधकत्वाद्भ- क्तिमार्गे विरह एव पुरुषार्थ इति किमिति निराक्रियते तबाहेत्याभासे विप्रयोगस्य फलसाध- कत्वमेवोक्तं श्रीमदाचार्यचरणैर्न तु फलत्वमिति भवत्सिद्धान्तिता विप्रयोगस्यैव परमफल- रूपता कथं सङ्गच्छेततराम् । अतःपरं विप्रयोगान्तर्गतभगवत्खरूपप्राकट्यं तडिल्लतावत् किश्चित्कालिकमेव भवति, अन्यथा देहनाशः स्यादिति यदुक्तम् , तदपि न विचारक्षमम् । तामिः किधिकालिकसंयोगसानाकासितत्वात् , बहुकालिकसंयोगस्यैव तदाकासाविषय- त्वात् । इदं तु दशमस्कन्धीयपत्रिशाध्याये 'अहो विधातस्तव न क्वचिद्दया संयोज्य मैत्र्या प्रणयेन देहिनः । तांश्वाकृतार्थान् वियुनचपार्थकं विचेष्टितं तेर्भकचेष्टितं यथे'- सारभ्य लोकचतुष्टये 'निवारयामः समुपेत्य माधवं किन्नो करिष्यन्कुलवृद्धवान्धवाः । मुकुन्दसङ्गान्निमिपार्षदुस्त्यजादवेन विध्वंसितदीनचेतसाम् , यस्यानुरागललितस्मितवल्गु- मत्रलीलावतोकपरिरम्मणरासगोठ्याम् । नीताः स्म नः क्षणमिव क्षणदा विना तं गोप्यः कथं न्वतितरेम तमो दुरन्त मितिशोकद्वये च प्रकटमेव । एवमपि सति यदि किंचित्का- लिकमेव संयोगं दद्यात् तदा 'ये यथा मा'मिति भगवत्प्रतिज्ञाहानिः स्यात् । तडिल्लताव- देतासां संयोगो भवतीत्यादिप्रकारस्य श्रीमदाचार्यस्ततनुजरत्नेथ कण्ठरवेण कुत्राप्यनुक्त- त्वाच । तस्मादन्तहिर्दिवा रात्री चातृप्तिसंयोगरूपेण प्रकटः, पुनस्तत्संयोगपोपार्थं विप्र- योगरूपेण च प्रकटः, पुनः पूर्वप्रकारसंयोगरूपेण पुनर्विप्रयोगरूपेणेति परम्परया गोपि- काभिः सह फ्रीडति भगवानिति कृतं विस्तरेण । ननु तथापि नान्तहगतानामेवं विध- सम्पूर्णरतसमगपत्रारितासां मुत्यनन्तरमेवैतादृशरसलीलाप्राकट्यादिति तत्प्राप्तफलस्य मप्यमफलत्वमस्माभिरुच्यत इति चेत्, अयोच्यते । सगुणशरीरत्यागोत्तरतत्क्षणप्राप्त- गुणातीतदेहेन भगवन्निकटगतानामन्तहगतानामपि 'ताभिः समेतामिस्दारचेष्टिन' इत्यादिलीलासौमगजन्यमदमानलीलापायुत्तरसामयिकान्तानलीलामारभ्य कुलवामकपोले'साधुक्तयुगलगीतलीलान्तसलीलानामपि प्राप्तिरेतासामिति श्रीमदाचार्य- तनुजरसानां हि मिझान्तः । अत एर 'ता दृष्ट्वान्तिकमायाता' इतिफलप्रकरणीय- पपप्याल्यानमुपोधिन्यां 'यास्तु समाहनाः समागताम्ता न निवार्यन्ते, याः पुनः सगुणा 'बामबाहु मठपतिजयगोपालभट्टकृतविवरणसमेतम् । ८९ अन्यसम्बन्धिन्यस्ताः शन्दश्रवणात् समागता इति शब्देन निवारणीयाः, अन्यशेषतया भजनमयुक्तमिति । करिष्यमाणलीला तु सर्वभावप्रपत्तिसाध्या, अतो निवारणार्थ यनमाहे'ति श्रीमदाचार्याख्यातम् । विवृतं चैतत् तत्तनुजरत्नैः स्वकृतटिप्पण्यां 'यदन्तहगता अनाकारिता एव नादं श्रुत्वोयुक्ता इति प्रतिवन्धोभूदिति शानिरासायाहुः याः पूर्वो- कास्ता अप्याहूताः, तत्रोपपत्तिमाहुः समागता इति । अन्यथा तथा न स्यादिति भावः । गेहस्य देहसम्बन्धित्वात् तस्य च नष्टत्वे नैतासां गृहामावात् तत्र गमनं वाधितमिति न निवार्यन्ते' इति । एवं चान्तर्गृहगता न निवार्यन्त इति स्फुटमेव प्रतीयते, तत्र तन्निवारणं च भगवन्निकटप्राप्ती सति सम्भवति । भवदभिमतसिद्धान्ते त्वेतासामिदानी लय इति तनिवारणप्राप्तेरभावाच्छ्रीमदाचार्योक्तिस्तत्तनुजरनोक्तिश्वासमजसा स्यात् । तस्मादन्तहगतानां गुणातीतदेहास्या भगवन्निकटगमनं सिद्धम्, तदा तन्निवारण- प्रसञ्जनं च सिद्धम् । एवं च तदुत्तरसामयिकी सर्वापि लीलैतासु सिद्धेति न मध्यमफल- त्वमेतत्फलस्य, किन्तूतमफलत्वमेवेति व्यर्थ एवैतासां मध्यमफलप्राप्तिरिति सिद्धान्ता- भिमानः केपाश्चिदिति सर्वमवदातम् । श्रीवलमतत्सुतवरविठ्ठलनाथाविरेणुलवयलतः । जयगोपालः कृतवान् सविवृतिसेवाफलव्याख्याम् ॥ १॥ मूय॑खलिं ननु निधाय निधाय भूयो भूयः कृपालुपु महत्सु निवेदयामि । यत्किञ्चिदत्र लिखित मयका भवद्भिः तत् पुष्टिमार्गपथिकैः परिशोधनीयम् ॥२॥ इतिश्रीवल्लभाचार्यचरणकमलैकतानमानसश्रीमन्महामभुश्रीविठ्ठलेम्वर- कृपाकटाक्षोद्दुद्धबुद्धिना सुबुद्धिना मठपतिजयगोपालेन विरचिता सविवृतिसेयाफल टिप्पणी समासा॥ ॥श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ १ इदं पयं जयगोपालकृतबहिर्मुखमुखध्वंसान्तेऽपि वियते। मारम्मस्थं 'यहिबहलसग्निति पचं तत्कृत- तैत्तिरीयभाष्यस्थम् । दं पथद्वयं तत उत्सास्यां टीकार्या प्रन्यकृता पश्चाग्निवेशितमिति प्रतिगावि।

श्रीकृष्णाय नमः। सेवाफलम् । मठेशश्रीलक्ष्मणभट्टविरचितसेवाफलविवृतिविवरणसमेतम् । विचार्य श्रीमदाचार्यप्रोक्तं सेवाफलाभिधम् । ग्रन्थं तद्विवृतिं चापि विवृणोमि यथामति ॥१॥ साययोगावभेदारों भक्तिर्भेदकरी हरौ । स्नेहासक्तिव्यसनिनी तसिद्ध्यै स्वाहवित्तजा ॥२॥ व्यसनं मानसी सेवा माहात्म्यज्ञानभक्तितः ॥३॥ अथातः श्रीवल्लभाचार्याः स्वसिद्धान्तमुक्तावल्या 'कृष्णसेवा सदा कार्य'त्यादिना ब्रह्मवादसिद्धान्ततः सत्ये जगति कृष्णस्य सेवाभक्तिं निरूप्य तत्सिद्धौ मुख्यं फलं सपरिकर निरूपयितुकामाः सेवाफलनिर्णयग्रन्थं सविवरणमाहुः । यादृशी सेवना प्रोक्ता तसिद्धौ फलमुच्यते । सेवना च प्रागुक्का निविधा, अत्यन्तरङ्गा अन्तरङ्गा पहिरङ्गा चेति प्रशब्देन सूच्यते, या नित्यश्रीस्वामिन्यन्तरङ्गस्य खस्वामिनः पुरुषोतमस्स 'प्रतिकृतिरूपस्य' काश्मीर- चन्दनसुगन्धतैलाभ्यङ्गस्लापनपूर्वकशृङ्गारादिज्ञानक्रियारूपा साक्षादशेषु मृदु संस्पृश्य लोकवत् सलेहं क्रियमाणा सैपा प्रथमा । मन्दिरपात्रसम्मार्जनोपलेपनचित्रकरणपूर्वक- सिंहासनादिशय्याम्तरणकीडनोपस्करणपीठखण्डाक्षिभृङ्गारादियोजनान्नादिपयःपाकसामग्री- साधनज्ञानक्रियारूपा परिचयी द्वितीया । पुष्पगन्धताम्बूलफलकन्दमूलशाकामानरस- संशोधनधनवसनभूपणसम्पादनज्ञानक्रियारूपा परिचर्या वहिरगा तृतीयेति याशपदस्पार्थः। सैव स्वतनुवित्तजेति तत्रोक्ता । तत्सिद्धौ 'तत्र प्रेमासक्तिव्यसनात्मना परिणतायां मानस्यां सत्यां' सेवकम्य याक् फलं तदुच्यते । यद्यपि तत्र 'ततः संसारदुःखस्य निवृत्तिब्रह्म- बोधन मिति फलमुक्तं तथापि तदवान्तरमेवेति मुख्यं फलमुच्यत इत्यर्थः । तदपि विविधमिति सचिवरणं निरूपयितुमाहुः । अलौकिकस्य दाने हि चान्द्यः सिध्येन्मनोरथः ॥१॥ फलं वा यधिकारो वा न कालोत्र नियामकः । पिवरणमत्र मेयायां फलप्रयमलौकिकसामर्थ्य सायुज्यं सेवोप- योगिदेहो वा वैकुण्ठादिष्विति । अलौकिकसामध्ये प्रथमायाः फलम् । ज्ञानी पाट-1 २सपति पाय ।

९१ मठेशलक्ष्मणभट्टतविवरणसमेवम् । सायुज्यं द्वितीयायाः । सेयोपयोगिदेहो या वैकुण्ठादिपु 'अधिकृतः' तृती- यायाः । तनालौकिकस्य भगवत इवालीफिकमेव ज्ञान क्रियाम्यां सामध्ये जगळ्या- पारवज यत् तत्तथा । खेच्छया देहेन्द्रियप्राणान्तःकरणैरेच सदा सेवापरैः सहितस्यात्मनो जीवनशक्तत्वं 'श्रुति'कुमारिकाणामिय, तत्सरित्यजने च खेच्छयाशक्तत्वमित्यैहिकमन्त- गुहगतानामिव । तान्कादाचित्कीखेन्छया गुन' मगवलोकगमनशक्तलमित्यामुष्मिक ध्रुवादेरिव तत्तथा । 'मृत्योः कृत्वैव मूर्च्यगिमारुरोह हरेः पद'मितिवाक्यात् सर्शमणि- न्यायेन तेपाममाकृतत्वेन त्यागासम्भवात् भगवदानन्दानुमवसामध्यं यत् तस्सालीफिकस्स दानेनाद्यो मनोरथः उत्पन्नः प्रमाणाननुरोधी प्रमेयैकसाघ्यो मनोरथः सामिलपित. रूपो 'मनोरयान्तं श्रुतयो यया ययु'रितिवास्यात् तद्भजनानन्दानुभवच सिध्येत् । एतेन कालकर्मप्रकृत्यनधीनत्व घोतितम् । द्वितीयायाः फल सायुज्यम्, तदपि द्विविधम् , रूढार्थकं यौगिकार्यकं च । तनाय ज्ञानमिश्रितानामेकत्वरूपम् , अमेदरूप मेदात्यन्ता- भावरूपमात्मनस्यमित्यर्थः । 'शुद्ध' भक्तानामपरम्, सह युनतीति सयुक् , सयुजो भावः सायुज्यम् , तद्भक्तानां भेदतस्तद्दत्तमसित्वतस्तदानन्दानुभवात्, पूर्वन देहेन्द्रियप्राणान्तः- करणानि विहायेह स्वात्मनैव केनलेन तदानन्दानुभयः, अपरन सहैव तैः स इति सार्थक- तैपामन्यन नेति तारतम्यम् । तच स्पष्टमेव पार्पदानामसुराशिनां ज्ञानयोगिनां चोक्तम् । तृतीयायाः फलं संयोपयोगिदेहो वा चैकुण्ठादिषु । अप्राकृतभूतभौतिक- तृणलतापधिवृक्षपशुपक्ष्यादिदेहः अधिकारात्मा, तन सेवोपयोगी योध्यः । पूर्वनापरोक्ष- मेवान च परोक्षमिति भेदः । वैकुण्ठे मुख्येऽमुख्ये च । आदिपदेन स्वर्गादिपु विष्णोः स्थानेष्वपि तयेति निरूपितम् । वेति चार्थे शेयः । अन फलनयेपि न कालो निया- मकः । काल इत्युपलक्षणम् , कर्मप्रकृत्योरपि न नियामकतेपर्यः । अत एव श्रीमागवते द्वितीये 'न यत्र सत्वं न रजस्तमय न वै विकारो न महान् प्रधानं,' तृतीये 'न कहि- चित्मत्पराः शान्तरूपे' इति, कपिलेनोक्त च 'नक्ष्यन्ति नो निमिपो लेढि हेतिरित्यादिश॥ तर सेवायां प्रतिनन्धकामावः कारणमिति प्रासनिक प्रतिवन्धमपि त्याज्यत्वेन निरूपयन्ति । उद्धेगः प्रतियन्धो वा भोगो वा स्यात्तु पाधकम् ॥ २॥ अन याधकमित्येकवचनेन मिलितानामेव पापकतेत्याशय विवृण्वन्ति, सेवायां प्रतिबन्धकत्रयमिति । अयोदेगः साधारणः स त्याज्य एव । एवमुद्वेग निरूप्य प्रतिबन्धमोगी निरूपयन्तोऽनुरोधरूपस्य प्रतियन्धस्यानिवार्यत्वेन पाठकममनपेक्ष्यार्थ- मतो मोगं विवृण्वन्ति भोगो द्विविध इति । लौकिकोलौकिकच । तत्र लौकिकस्त्याज्य एव, अलौकिकस्तु न, तस्स फलानां मुख्यमध्यमसाधारणानां प्रथमे प्रविशतीति प्रथमे फलेऽलौकिकसामर्थ्येन प्रभुखरूपानन्दानुभवमोगे प्रवेशात् ।

९२ सेवाफलम् । एवं भोगं निरूप्य प्रतिषन्धं निरूपयन्ति प्रतियन्धोपीति । स च साधारणोड- साधारणश्च । साधारणः सेवासमये लौकिकवैदिककर्मानुरोधरूपस्त्याज्य एव, स्वाधीन- त्वात् । असाधारणो भगवत्कृतः, स सद्य एवेति भावः । ननु कथमेतेषां सिद्धानां त्याग इत्याशङ्कयाहुः त्रयाणां साधनपरित्यागः कर्तव्य इति । साधनमत्र तजनन- हेतुभूतं यत् तत्परित्याग इत्यर्थः । नन्वावश्यकस लोकवेदसिद्धतया अशक्यत्यागत्वात् कथं साग इसाशन तदुपायं विवृण्वन्ति तत्राद्यो वुद्ध्या त्याज्य इति । सेवाया अवसरे त्याज्यः, अनवसरे विधेय इति चातुर्येणेत्यर्थः ॥ २ ॥ एवं साधारणप्रतिबन्ध निरूप्य भगवत्कृतप्रतिवन्धं निरूपयन्ति । अकर्तव्यं भगवतः सर्वथा चेद्गतिन हि । यथा वा तत्वनिर्धारो विवेकः साधनं मतम् ॥ ३ ॥ प्रमोरेव अकर्तव्यं खसेवाकारणमचिकीर्पितं चेत् तदा खस्स गतिर्न हीति निश्चयः । तदा ज्ञानमार्गेण स्थातव्यं शोकामावायेति । वक्ष्यन्ति चाने तदान्यसेवापि व्यर्थेति भावः । नन्वासुरेष्वेवं न तु दैवे तथेत्याशयाहुः तदा आसुरोऽयमिति । एवंविधप्रतिवन्धरूपलिङ्गेन खसासुरत्वमनुमेयमितिभावः । तत्रा- सुरत्वमागन्तुकं वा साहजिकमिति निर्धारा) विवेकः, सांख्यज्ञानमिति केचित् । तेन शोकाभावमा: न तु मोक्षः ॥३॥ पूर्वोक्तमेव निगमयन्ति । याधकानां परित्यागो भोगेप्येक तथा परम् । भोगयोरपि पूर्वसमतामाशङ्कप वैलक्षण्येनाहुः । नि:प्रत्यूहं महान् भोगः प्रथमे विशते सदा ॥ ४ ॥ प्रथमे अलौकिकमामध्ये भोगो भजनानन्दानुभवरूपो महान् सदा स्वरू- पतः साधनतः फलतःसर्थः । पाटान्तरे अल्पो भोगः सविधः राप्रतिवन्धः ॥४॥ सविनोल्पो घातकः स्यादिति । सविनोल्पो घातकः स्याद्वलादेतो मदा मतौ। अत एवैताविति विवृती । भगपत्कृतप्रतियन्धे अन्यफलचिन्तया शोकः कदाचित् तस स्यादिति तदमावा चिन्ता न कापैयाशयेनाहुः । द्वितीये सर्वथा चिन्ता त्याज्या संसारनिश्चयात् ॥५॥ भगवत्कृतप्रतियन्थे । तत्र हेतुः । स्वस्थ संसारनिश्चयादिति । संसारोऽहंमम- तया जन्मकर्मप्रवाहमार्गस्वरूपः, तस्य निर्धारणादित्यर्थः ॥५॥ एवं प्रतिपन्धं विचार्य उद्वेगरूपप्रथमं प्रतिबन्धेन फलाभावे भगवतो दातृत्वाभावं हेतुत्वेन निरूपयन्ति ।

, । मठेशलक्ष्मणभट्टकृतविवरणसमेतम् । नन्वाये दातृता नास्ति तृतीये पाधकं गृहम् । अत्र आद्यफलाभाय इति विवृतम् । आयेन वा प्रतिवन्धन फलाभाव इत्यर्थः । नन्विति विरोधोक्तौ । आये उद्वेगरूपप्रतिवन्धे, भगवतः सर्वसमर्थस्सापि सेवाया ममानसीत्वेन अनाधिदैविकीवे तत्प्रयुक्तः प्रभोः फलदातृलाभाव इत्यर्थः । एतदेव विवृण्वन्ति तदा सेवा नाधि विकीत्यादि । तृतीये लौकिकभोगे गृहमेव याधकम् । गृहमत्र पत्यादिकं विष्णुपहिर्मुखमेव त्याज्यम् । अत एपोक्तमाचार्यनिवन्धे 'गृहं सर्वात्मना त्याज्य मित्यादि । एवं फलनयं प्रतिवन्धकत्रयं च प्रासनिकं निरूप्य एतद्विचारमावश्यकत्वेन वक्तुमुपसंहरन्ति । अवश्येयं सदा भाव्या सर्वमन्यन्मनोभ्रमः॥६॥ (इयं दातृता हरेः यद्वा भक्तितः मदुक्तिवा)। सेवा पूर्वोक्ता तश्यी या विचिन्त्येत्यर्थः । एतदतिरिक्त सर्व मनोभ्रमः । भक्तिमार्गे त्रिविधसेवाया एव पूर्वोक्त फलमयं नान्यत्, प्रतिबन्धकं चोद्वेगादिकमेव न पापादिकं । 'स्वपादमूलं भजतः प्रिय- स्से'ति भागवतवाक्यादिति भावः ॥ ६ ॥ ननु भगवदीयैर्ने माध्येत्युच्यतां किन्त्वन्यैरेवेत्याशन्याहुः तदीयैरपि तदित्यादि। तदीयैरपि तत् कार्य पुष्टी नैव विलम्पयेत् । कली देशादीनामसाधकत्वात् तथा । पुष्टौ स्थितः प्रभुस्तु नैव विलम्पयेत् । मध्यस्थैरेवेह तथेति भावः । एतदेव निमित्तमन्यत्राप्युपदिशन्ति । गुणक्षोभेपि द्रष्टव्यमेतदेवेति मे मतिः॥७॥ एतद्भावनेन मनसो भगवत्तत्त्वपरतायां गुणक्षोभोपि न भवितेति भावः । अन स्वसंमतिरेव मानमाहुः इति मे मतिरिति ॥७॥ नन्वत्र काचित् कुतर्ककल्पना उत्पयेत तदा कथं विचारणीयेत्याशङ्कायामाहुः । कुरष्टिरत्र वा काचिदुत्पद्येत स वै भ्रमः ॥ ७॥ स्पष्टार्थः ॥ ७॥ ॥ इति श्रीशाचार्यवर्यमतमार्गानुवतिना । सेवाफलं सविवृति विवृतं च यथामति ॥ १ ॥ इतिमठेशश्रीनाथमहात्मजगोपीनाथसुतलक्ष्मपाभट्टविरचितं संवाफलविवृतिविधरणं ममाप्तम् ।।

श्रीरष्णाय नमः। सेवाफलम् । विवरणटिप्पणीसमेतम् । श्रीमदाचार्यचरणान् सेवारसफलप्रदान् । नमामि तद्रजोलेशलवस्पर्शसमीया ॥१॥ श्रीमदाचार्यचरणैत्रिधा सेवा फलत्रयम् । निर्णीतं तत्र मे घोषस्तथाहि कृपयोच्यते ॥२॥ यादशी सेवना प्रोक्ता तत्सिद्धी फलमुच्यते। यादृशी सेवनेत्यस्य विवरणे सेवायां फलनयमिति । अयं भावः। भक्तिमार्गे पुष्टिमर्यादाप्रवाहभेदेन जीवेषु भगवदगीकारत्रिधा । तत्रापि पुष्टिमार्गफलार्थ यद्वरणं तत्पुष्टौ मर्यादापामेष, न तु प्रवाहमार्गेपीति विवरणे स्फुटीकरिष्यत इति । तेषां साधनरूपा सेवापि विधा प्रोक्ता । अतस्ताशतत्प्रकारकसेवासिद्धौ फलमुच्यते । तल्किमित्या- काङ्खायामुक्तमलौकिकसामर्थ्य मित्यादि । तत्र पुष्टिमार्गाह्रीकृतस्य साधनदशाया। माचार्योक्तप्रकारेण सेवाकरणे मानसीतत्सिद्धौ फलं साक्षाद्भगवत्सम्बन्धरूपं भवेदिति । तस्पेदमेव अलौकिकसामयं यदाधुनिकजीवस्य तादृशपूर्णालौकिकैश्वर्यवीर्यादिगुण- पता समं साम्येन रतिः रसोरोधश्च भवतीति तथोक्तं विवरणे, न हि साधारणस्य तादृशेन महता सममेतत् कर्तुं शक्यम्, रसामासहेतुत्वात् । ननु पूर्व मानससेवायाः सिद्धिः कथं तबाहुः अलौकिकस्येति । अलौकिकस्प दाने हि चाद्यः सिध्येन्मनोरथः ॥१॥ 'मानसी सा परा मते'त्युक्त्या सा सेवा वतत्रपुरुषार्थरूपेत्यलौकिकस्य प्रभो- दाने परमकाष्ठापनस्वरूपसम्बन्धामिलापरूपमावदाने सः आद्यः पुष्टिफलरूपः सर्वो- स्कृष्टो मनोरथः सिध्येत् । मनोरथपदेन प्रेमासक्तिन्यसनसंकल्पादिरूपः सन् सिद्धि प्राप्नोति, फलसम्मुखो भवतीत्यर्थः । अत एव मनोरथपदमुक्तम् । इयमेव मानसीतसिद्धिः। तदुक्तं 'चेतस्तत्प्रवणं सेवेति । यद्यपि मानससेवासिद्ध्यै तनुजा वित्तजा च द्वे अङ्गे, तथापि मुख्यमङ्गं दानम् , यतस्तत्करणेपि यदा दानं भवति, तदैव तादृशी सा भवति, अन्यधा मर्यादामार्गीयभक्तानामपि निरन्तरं तत्करणे पुष्टिरूपायां तसां को विशेष इति १ यद्यप्येतद्विवरणकृता नाम न ज्ञायते तथापि जयगोपाबमकृततदुपम्यासादस प्राचीनल निश्चीयते ।

टिप्पणीसमेतम् ।
तद्भावोदये नेय सा भवेदित्यर्थः । तेन तत्करणेपि दानेनैव ताशमावः सिध्येन्नान्यथेति
ज्ञेयम्, परन्तु तस्कृतिस्तु सर्वदा कर्तव्या, अकरणे भावः क उद्भवेद्, विपयामावाद,
अत एवागमूते ते उक्त ॥१॥
ततः किमित्यत आहु. फलमिति ।
फलं वा घधिकारो वा न कालोन नियामकः ।
तादृशप्रचुरभावे सति फलं स्वरूपसम्वन्धरूपम् , अधिकारः अलौकिकदेहवयो-
गुणादिक भवेत् , तनाहु. न काल इति । अन कालः पयोवस्थादिसमयरूपः
नियामको न, भगदिच्छयैव सर्व लीलोपयोगि तदैव भवेत् , न कालापेक्षा । तादृश
प्रति भगवतोपि विलम्बासहिष्णुत्वात् ।
एव पुष्टिफल निरूप्य मर्यादाफल निरूपयन्ति । तथा हि, मर्यादामार्गाझीकृतस्स
माहात्म्यज्ञानपूर्वकसेनाकरणे भगपति माहात्म्यभावसहितलेहेन तदात्मतया सायुज्यं
साक्षात्पुरुषोत्तमम्वरूपे भवेन्न त्वक्षरे । तर तदालौकिकदानेच्छाऽभावात् स्वरूपसम्बन्धा-
त्मक फल न भवेदित्यर्थ । यदा पुन भगवान् कदाचिद् दातुमिच्छति तदा खस्वरू-
पात् पृथक्कृत्य तादृश प्रचुरभावदान कृत्वा फल प्रयच्छति, यतोस्मिन्मार्गेपि दातृत्वाभि-
प्रायेणैव वरणकार्यवात् । एव भक्तिहसे स्फुटीकृत श्रीमत्प्रभुचरणै भक्तिमार्गीयभक्तकृते-
त्यारम्य, अनापवर्गवर्मनी'त्यन्तम् ।
प्रवाहभक्तिमार्गलक्षणकथनेन व्यापिवैकुण्ठस्स लोकत्वेनाक्षरात्मकत्वादक्षरमुक्तिरेव
फले, न तु पुरुषोत्तमसायुज्यम् । अक्षरमुत्तौ तु आयफलदानेच्छाऽभावात्तदर्थं वरणमेव
नास्तीति नायफलसम्भावनेति मर्यादातो हीनत्वमुक्तम् । पुरुषोत्तमसायुज्ये तत्सम्भावना
वर्तत इति प्रयाहभक्तिमार्गसेवाफलादुत्कृष्टत्वम् । यत एतत्फलदानेच्छया यद्वरण तन्मार्ग-
द्वये एव, न तु प्रवाहमार्गे, तदप्युक्त भक्तिहसे 'विवरणे चास्ति प्रकारद्वय'मिति ।
एव सेवास्वरूप साधनफलसहित मार्गनयेपि निरूपितमिदानी तादृशसेवासिद्धौ
प्रतिरन्धकाय निरूपयन्ति उगः प्रतिवन्धो चा भोगो वेति ।
उद्वेगः प्रतिवन्धो या भोगो वा स्यात्तु बाधकम् ॥ २ ॥
श्लोकनिवरणे सेवायां प्रतिबन्धात्रयमित्यादि । एतत्रितयनिवारणे त्रयाणां
साधनपरित्याग इति विवरणे प्रिवृतम् । तनोद्वेगसाधन लौकिकशोकदु सादिकम् ।
तस्य भगदिच्छाधीनल ज्ञात्वा तत्त्यागेन तम्यापि त्यागो भवत्येवेति । 'चित्तोद्वेग'मित्यु-
क्तत्वादन न विशेपतो विवृतम् । तथा अपर प्रतिवन्धः । स च विविधः ।
साधारणो भगवत्कृतश्च । साधारणो वुढ्या त्याज्यः। बुद्धिस्तु यस्मिन्कृत सेवा
प्रतिवन्धोऽभूचेत् स न कर्तव्य इति पिचाररूपनुच्या त्याज्य । भगवत्कृतमने वदिष्यन्ति ।
सौकिकभोगस्तु विषयरूपत्वात् याधक इति तत्माधनवस्तुमानत्यागादेव तत्त्याग इति
तदेव त्याज्यमित्यर्थ । एव नप्रय त्याज्यमित्युक्तम् ॥ २॥

९६ सेवाफलम् । याधकानां परित्यागो भोगेप्येक तथापरम् । एतत्रयाणां सापनपरित्यागेनैव पाधफानां परित्यागो भवतीति शेपः । ननु सेवायां वस्तुमानोपयोगात्तत्यागे कयं तन्निर्वाह इत्याशशायामाहुः भोग इति । तत्रापि भोगे एक लौकिकं त्यजेदपरं नेति शेपः । यतस्तेपा स्वार्थमुपयोगे लौकिकत्वम्, मग- दर्यमुपयोगे अलौकिकत्वम्, अतः सायं ते त्याज्याः, मगवदर्यमुपयोज्या इति भावः । तदनन्तरमयाधकत्वमाहुः निःप्रत्यूमिति । निःप्रत्यूहं महान् भोगः प्रथमे विशते सदा ॥३।। निःप्रत्यूहमिति प्रतिपन्धरहितं प्रत्युत साधकर ॥ ३॥ एवं पाधकानां परित्यागे निर्विघ्नसेवासम्मये तस्यैव भोगस प्रतिवन्धत्यागे च हेतु निरूप्य भगवत्कृतप्रतिवन्धे हेतुं निरूपयन्ति अकर्तव्यं भगवत इति । अकर्तव्यं भगवतः सर्वथा चेद् गतिर्न हि । यथा या तत्त्वनिर्धारो विवेकः साधनं मतम् ॥ ४॥ अस्स विवरणे भगवत्कृतश्चेत्यादि विवेक इत्यन्तम् । असायमर्थः । यदि भगवतः तत्फलदानं न कर्तव्यं भवेत् तदा तादृशसेवायां सर्वथा सर्वप्रकारेणापि गति- नमवति । तत्र यया तथा प्रतियन्धकमेव भवेत्, न तु निर्वाहः । ननु स्वमार्गीयसेवायां तस भगवान् प्रतियन्धं करोतु, परन्तु अन्यमार्गीयसेवायां न करिष्यतीति चेत्, तत्रोक्तं विवरणे तदा अन्यसेवापि कृता व्यर्थेति । प्रवाहादिमार्गेषु कृतापि व्यर्था । यतः सकलमार्गेषु फलदाता भगवानेव । तस त्वकर्तव्यमेवेतीति तथा । यदा यत्ने कृतेपि प्रतिवन्धकं भवेत् तदा यथा तत्वनिर्धारो भवेत् तथा कर्तव्यम् । तत्त्व- निधीरः कथमित्याकाङ्क्षायां विवरणे विवृतम् । आसुरोयं जीव इति । एवं तस्य विवेकेन ज्ञानस्थितिरूपमेव साधनं मतम्, यतः पूर्वमासुर एव जीवः । यथासुरदेह- युक्तम्लेच्छादिषु कस्यचिदैवजीवत्वात् भगवत्सरता दृश्यते, तथासुरजीवस्यापि कदाचिदैव- वशाद्भगवद्भक्तसङ्गेन सेवायां प्रवृत्तिर्गवति, परन्तु आसुरे भगवतो दातृत्वाभावात्तत्र प्रतिवन्धकमेव जायते । यतस्तेपामन्यदेव फलम् । तदेवासुरी योनिमापन्ना' इत्यादिनो- क्तम् । तथापि भगवद्भक्तसङ्गानुभावात् ज्ञानमार्गेपि स्थितिरुक्ता ॥४॥ तत्रापि चेत् स्थितिनं भवेत्तदा तत्पूर्वोक्तफलविपयिणी चिन्तापि सर्वथा त्याज्ये त्याहुः द्वितीय इति । वितीये सर्वथा चिन्ता त्याज्या संसारनिश्चयात् ॥ ५॥ विवरणे झामस्थित्यभावे चिन्ताऽभावार्थं द्वितीय इति । तन हेतुः । संसारनिश्चयादिति । स्वस पूर्वोक्तसंसाररूपस फलस्यैव निश्चयात् सा न कार्या, पुनस्तदाशोच्छेद एवेति सर्वथेत्युक्तम् ॥५॥ राविनति लोकाधों विवरणद्भिर्विस्मृतः, अथवा विवरणभागस्टुरित इति प्रतिभाति । - टिप्पणीसमेतम् । ९७ ननु यथा द्वितीय प्रतियन्धे पूर्वोक्तप्रकारेण आसुरजीवस्य सर्वथा फलविपयिणी चिन्ता साज्या, तया साधारणप्रतिबन्धेपि सा त्याज्या, अन्यथा सा कथं भवेदित्याशक्षा- निरासायाहुः न त्वाय इति । न त्वाद्ये दातृता नास्ति तृतीये पाधकं गृहम् । आये साधारणप्रतिवन्धे दातृता भगवतो नास्तीति न किन्तु वर्तते, परन्तु फलस्य कियजन्मानन्तरभावित्वात् तद् भवति । तदपि प्रतिवन्धकं साधारणं निवारयितुं शक्यम् । तेन भगवत्कृत एव तस्मिन् दातृत्वाभावो, न साधारण इति ज्ञेयम् । अतो यस्य आद्यफलदानार्थ मर्यादयाङ्गीकारः तस्य तथैव सेवाकरणे साधारणप्रतिबन्धश्चेद भवेत् , तदा तन्निवारणेन सेवानिर्वाहात् पूर्व सायुज्यफलं तदनन्तरं तत्फलं भविष्यतीति सा चिन्ता न त्याज्येति भावः यस्य पुष्टौ अङ्गीकारस्तस्य तनिवारणेन तादृशतत्सिद्धौ तत्फलं भवेदिति सा तथेत्यर्थः । एवं सति प्रवाहमार्गसेवायामपि सेवायाः साधनदृश्यमानत्वात् साधारणप्रतिवन्धे दातृत्वं भविष्यतीति शानिरासाय आद्यफलाभाव इति विवृतम् । आद्यफलस्साभावो यत्रैतादृशे प्रवाहमार्गे तदर्थमगीकार एव नास्तीति नायफलसम्भावना- पीति न दातृत्वम् । सा सेवापि नापिदैविकी, तत्र पूज्यखरूपेपि नाधिदैविकत्वम् , किन्तु विमूतिरूपत्वमिति महद्वैलक्षण्यात कुतः साम्यमिति ज्ञेयम् । एवं साधारणप्रतिबन्धस्य व्यवस्थामुक्त्वा प्रथमवृत्तौ सर्वथा लौकिकभोगत्यागा- सम्भवात् , तत्रापि भगवतो दातृत्वाभावमाशय तन्निवारणाय तट्यवस्थामाहुः, तृतीय इति । तृतीये लौकिकभोगेपि दातृता नेति न, यत एतन्मार्गे द्वये तादृश एवाङ्गीकारः, किन्तु तत्र मूलमूतं साधनं यगृहं तदाधकमिति तत् त्याज्यमिति शेषः । तत्त्यागे सर्वथा भोगाभावात् प्रतिवन्धकामावेन तादृशभगवद्भक्तसङ्गेन सेवानिर्वाहात् तत्फलमपि भवेदिति भावः । एतदेव विवरणे विवृतं भोगाभावस्तदैवेति । अत्र कश्चित्पूर्वपक्षी शङ्कते । तथा हि । स्वमार्गीयपरित्यागस्तु प्रेमासक्तिव्यसनात्मक- भक्तौ सत्यां कर्तव्यो, न तु साधनभक्तौ । तदुक्तं सन्यासनिर्णये 'सन्न्यासवरणं भक्तौ' 'अतोत्र साधने भत्तो नैव त्यागः सुखावह' इति च । तत्र करणे विपरीतफलमपि भवेदि- त्यपि । प्रकृते तु तत्पूर्वमेव भोगाभावार्थ सेवानिवीहार्थ च त्याग उच्यत इति कथमेक- वाक्यतायां विरोध इव प्रतिभाति ? तत्रोच्यते । प्रथम खमार्गीयभक्तिसिद्धौ मुख्य कारणं सेवा । सा सेवा 'गृहे स्थित्वा अव्यावृत्त्या गृहव्यावृत्त्यभावे न, प्रत्युत पुत्रकलत्रादीनां भगवदर्थमुपयोगेन स्वधर्मतः करणे सिध्येत् , तच्चेदनुकूलं भवेत् , नो चेत् मजनप्रतिवन्धकत्वेन सर्वात्मना तस्य त्याग एवोचितः । अन्यथा तत्सङ्गेन पुत्रकलवायुपभोगे खस्स मजनासम्भवे शरणगतिर्भज्येत, तदा सेवाऽभावे प्रेमासक्तिव्यसनात्मिका भक्तिरपि न भवेत्, तदभावे तन्मार्गीयपरि- सागोपि न, तदभावे फलामाव एव च स्यादिति मार्ग एवोच्छिद्येत इति । तझोगामा ९८ सेवाफलम् । सिद्ध्यर्थ तथा तत्सेवासिद्ध्यर्थं च कथनम्, तदनुकूलतद्रहणाभिप्रायेणैवेति, न तत्राश्रम- खीकार , सेवाभावानुपपत्ते, साधनभक्ती निषेधाच । एतदेवोत तत्त्वार्थदीपेपि 'प्रति कूले गृह त्यजे'दित्यनुकूलतत्त्यागाभावाभिप्रायेणान्ते प्रेम्णि जाते अङ्गेपि यत्किञ्चित् भोगस्यापि बन्धकत्वात् तेनैव तन्नाशे सति ततो यथा साधारणप्रतिबन्धनिवारणेन सेवा करण तहान च, तथा लौकिकभोगत्यागेनापि निर्मिनसेवाकरणे सति तत्फल भवेदिति ज्ञेयम् । तत्र पुष्टिमर्यादाया भगवति लीलामाहात्म्यगुणादिभावेनैव प्रेम भवेत् , न पुष्टि रीत्येति तादृशस्य तादृशप्रेम्णा क्रमेण सर्वविषयत्यागे, ततो तप्तभावेन तदात्मकतया श्रीकृष्णे सायुज्य भनेत्, ततो यदा दानेच्छा तदा खरूपात् पृथस्कृत्य तद्भादाने तत्त स्फलानुभव कारयिष्यतीति मर्यादाङ्गीकारे आद्यफलदानप्रकार उक्त । तदुक्त तत्वार्थदीप 'सर्वत्यागेऽनन्यभावे कृष्णमाकमानसे सायुज्य कृष्णदेवेन शीघ्रमेव ध्रुव फल मिति सायुज्यानन्तर ध्रुव फल तदेवेतिभावार्थ । यस्य शुद्धपुष्टावगीकारस्तम्य तदारभ्यैव पूक्ति भोगादिप्रतिकूलगृहत्यागेनानुकूलगृहे स्थित्रा सेवाकरणे भावात्मिको प्रवृत्तिर्भवेत् , तनो यदा प्रेमासक्तिव्यसनानि भावात्मकतया पुष्टानि भवेयु , तदा तन स्थितो यत्किञ्चिद्भोग सम्बन्धेनापि भावनाश इति तदभावेन तद्विगाढभावपोपादिना पूर्णविरहानुभवाथै सन्यास निर्णयोक्तप्रकारेण परित्याग सन्यास आवश्यक उक्त । अन्यथा क्षणमान भावान्तरसम्बन्धे भावशथिल्याद् विरहानुभवाभावात् फलाभार इति । ततस्तत्पूर्णानुभवे दशमावस्थया प्रति वन्धकदेहनिवृत्ती अलौकिकतत्प्राप्या तत्फलानुभवो भवतीति पुष्टिमार्गाङ्गीकारे फलदान प्रकार उक्त । अत एव मर्यादाया 'मदर्थऽर्थपरित्याग' इत्यादिना भोगाभानार्थ भगवत्प्राप्त्यर्थ च सर्वसमर्पणरूप एव साग उक्त , न तु सन्यासप्रकार । यत सन्यासे तस्य पुरभाषा दतोपि तादृशेरेव सम्भोगणे भवतीत्युक्तवाधकलात् । अत कलो स मन्यास पश्चात्तापाय इति निषेधोप्युक्तसिद्ध एन । अग्रेपि त्वयोपभुत्तेपि विरोधो भवतीति । सन्यासस्तु नाश भक्तावेवेत्युक्तम्, 'सन्यासवरण भक्ता विति गार्गद्वयभेदेन परित्यागस्य भिनत्यान्न कोपि विरोध इति ज्ञापितम् । एय मार्गनयसेवाफलभेद त्यागभेद च निरूप्योपसहरन्ति अवश्येयमिति । अवश्येय सदा भा या सर्वमन्यन्मनोभ्रमः ॥६॥ इयं पूर्वोक्ता त्यागपूर्वनिरूपिका मदुक्ति अवश्या भाव्या, सर्वथा सदा, भाव्या कर्तव्या । अथवा अवश्या यद्यपि खवशेन कर्तुं न शक्यापि तथापि भाव्या, मावयितु मनसि चिन्तयितु योग्या । तत एव म भविष्यतीति सर्वथा कर्तृत्वमुक्तम् । आवश्यककरणे हेतु एतदन्यत् सर्व मनोभ्रम एष न तु फलम् । मदुतप्रकारातिरिक्तकरणे सर्वोत्कृष्टफलामारो न, प्रत्युत मनसो भ्रम एवेत्यर्थ । ननु कथ मम ? सर्वैस्तदेव नियते तनाहु तदीयैरपीति । तदीपैरपि तत्कापं पुष्टी नच विलम्ययेत् ।

. टिप्पणीसमेतम् । गुणक्षोभेपि द्रष्टव्यमेतदेवेति मे मतिः ॥७॥ कुसृष्टिरन वा काचिदुत्पद्येत स वै भ्रमः ॥ ७॥ ॥ तदीयैः पुष्टिमार्गातिरिक्तजीवैः भ्रमसम्बन्धिभिरपि कार्य तदेव, सर्वसागपूर्वकं मदुक्तरीत्यैव भजन कार्यम् । न क्रियते चेत् तदा अज्ञानाद्धम एव, न तु फलम् । यदि तदीयैरपि तदेव कार्य तदा यः पुष्टौ स्थितः कोपि मदुक्तप्रकारसेवाकरणजनितप्रेमासक्ति- व्यसनादिभाववान् स तु विशेषतः क्षणमात्रमपि न विलम्वयेत्, मद्रुक्तकरणे विलम्ब न कुर्यात् । यदि विलम्वयेत् तदा पुष्टिभावान्तरत्यागाभावे विजातीयसङ्गेन भावशैथि- ल्यात् फलाभाव एव भवेदित्यर्थः । यतस्तादृशस्य खरूपव्यतिरिक्तवस्तुमानस्मरणस्यापि फलप्रतियन्धकत्वम् । तदेवाहुः गुणक्षोभेपीति । अयं भावः । तादृशपुष्टिमार्गीयस्य व्यसनानन्तरं विरहानुभवार्थ त्यागे कृते स्वरूपसहाभिलापायाः प्राचुर्याद्विगाढभावेन देहप्राणेन्द्रियान्तःकरणानि स्वरूपात्मकान्येव भवन्ति, यतः विकलत्वास्वास्थ्यादिकं निरन्तरं भवति तदा ताग्दिशायां मध्ये कदाचित्तस्य भगवल्लीलागुणादिस्फूतिर्न भवेत् , तदा मनःस्वास्थ्येन भावशैथिल्यात् स्वरूपान्तरायो भवेदित्येव गुणक्षोभः गुणैः कृत्वा मनःस्वास्थ्यरूपोऽविकारस्तस्मिन्नपि एतदेव द्रष्टव्यम् , फले प्रतिवन्धकमेव, द्रष्टव्यमिति- पदं प्रत्यक्षप्रमाणत्वेनोक्तम् । एतेन लीलागुणस्मरणस्य वाधकत्वं कथं वक्तुमुचित- मित्याशङ्का निरस्ता । एतदेव सन्यासनिर्णये 'ज्ञानं गुणाथेति वाधकत्वमुक्तम् । एवं सति यत्र स्वरूपगुणस्मरणेपि फलाभावः, तत्र गृहादीनां प्रतिबन्धकत्वेन त्यागविलम्वे फलाभाव इति किं वाच्यमिति भावः । अत एव सर्वथा भोगाभावस्त्याग एवेत्याशयेन विवृतावुक्तं भोगाभायस्तदैवेति । अत्र प्रमाणं मे मतिरिति । खस्यैव तादृकप्रकारकानुभवात् स्वमतिरेवोक्ता । यदि मन्मतिप्रमाणत्वेन य एवं करिष्यति तर्हि तस्य सर्व सुष्ट्येव भविष्य- तीति मावः । अकरणे वाधकमाहुः कुसृष्टिरिति । अत्र एतत्प्रकारकसेवाफलनिरूपण- रूपमदुक्ती कथं किमित्यादिरूपा कुसृष्टिश्चेदुत्पयेत वै निश्चयेन स भ्रम एवेति सा न कार्येत्यर्थः । करणे सर्वस्वहानिरेवेति निश्चयः ॥ ७॥॥ एतद्विवृतेरों यद्यपि विवृतो महचरणैः । तदपि तदेव हि गूढं दृष्ट्वा भावः स्फुटीकृतः कृपया ॥१॥ सोपि तथेतरथा वा नो जाने सद्भिरीक्षणीयस्तत् । कृपया च मार्जनीयस्तेन ततोहं विभूषणीयश्च ॥ २ ॥ श्रीमदाचार्यचरणे सरोजे मानसे मम । तिष्ठतां विकचे नित्यं तत्प्रभावोत्र भानुना ॥३॥ इतिश्रीमदाचार्यकृतसेवाफलनिरूपणविवृतो टिप्पणी समाता ॥

प्रथमं परिशिष्टम् सेवाफलविवरणत्रयम् श्रीकृष्णाय नमः। सेवाफलम् विवृतिसमेतम् । नैसर्गिकी मधुमिदश्वरणस्य सेवा जीवस्य तन सुतरां हरिमार्गलिप्सोः। धुध्येत नो विघटनं च फलं यदास्सा नो सेवनाग्रथनमा तदर्थमिष्टम् ॥१॥ वहिर्वमूष जगतो हितकारणाय पारीक्षितस्य विवृति पदशश्चकार । यः सूत्रयोनिगमसंशयवाधनाय संक्षिप्य च प्रकरणानि नुमस्तमीशम् ॥ २॥ सिद्धान्तमुक्तावल्यादिभूयस्सु निबन्धेषु सेवाया उक्तत्वेपि तत्फलानां प्रतिपन्धानां चेतस्ततो विप्रकीर्णवेन तत उद्धर्तुमशक्तान् स्वान् संक्षिप्य तदुपदेष्टुं सेवाफलनिरूपणं प्रतिजानते यादृशीत्यादि, नोच्यत इति । तत्फलं तु श्रोत्रमिमुखीकरणं निरूप्या- येस्स यावतः प्रतिज्ञोचिता, नत्वेकदेशति तु न शक्यम् । यतः फलमेव प्रधान प्रति. पत्यकं तु तद्विघटकतया त्याजनाथ निरूपितमिति तच्छेपस न पृथक्प्रतिज्ञानम्, खप्र- सेवाफलम् विवृतिसमेतम् । धानलेनानिरूपणात् । फलमिति जासैकवचनम् । यादृशी यस्यकारिका उक्ता सिद्धान्त- मुक्तावल्यादौ, अकरणे प्रत्यवायः प्रार्थः । स च हतय इवेत्यादि निन्दया योध्यः । त- सिद्धौ तस्या यावजीवनिर्वाहे व्यसनरूपत्वसिद्धौ फलमुच्यते । फलं चान वक्ष्यमाणन- यमेव बोद्धव्यम् । यत्तु सेवाया एव फलरूपत्वेन तत्फलकथनमनुपपत्तमित्याशंकनम्, तत्तु केवलपौष्टिकाभिप्रायेण, पुष्टिमर्यादास्थितस्य तु साधनरूपत्वमेव सेवायाः । न चैवं गोणलम् । पुरुषोत्तमस्यैव साध्यसाधनोभयरूपत्वात् । कर्तृतावच्छेदकमेव परं गौणम् , फलस्य मूले स्पष्टतयाऽकथनादुक्तं विवरणे सेवायां फलनयमिति । अलौकिकसामर्थ्य अपारतेजसः फलदित्सायां सलीलस्य हृदि प्रवेशे तदनुभवसामर्थ्यम् । अधानुभवश्व म- नसा तदध्यक्षीकरणम् । न चैतदेतच्छरीरेण संभवति, अप्राप्य मनसा सहेति वचनात् । तदर्थं च तद्भोगयोग्यत्वमलौकिकत्वं मृग्यम् । तच संघाते अलौकिकसंघातस्य विज्ञाने चानन्दमयस्स प्रवेशात् स्पर्शसंबन्धेऽयसश्यामीकरत्वमिव सम्पद्यते । एतच्च प्रम्बेकसंपाद्य- मित्याहुः अलौकिकस्य दाने हि चायः सिध्येद् मनोरथ इति । चस्त्वर्थे । हि युक्तचायमर्थः । 'यमेवैष घृणुते तेन लभ्य' इति श्रुतेः । तमेव विदित्वेति तु मार्यादि- कस्म । तथा चोक्तम् 'गतेरर्यवत्वमुभयथा अन्यथा हि विरोध' इति । सायुज्यं त्वन्तहगता- नामिव मध्यम फलम् । तच द्विविधम् । घाघमाग्यन्तरं च । वाहमलौकिकशरीरप्राप्तिरू- पम्, आन्तरं तु व्युचरणसामयिकपरिच्छिन्नानन्दादिमत्त्वेन अणुत्वेन च विशिष्टस्य ब्रह्म- णि लयः । अत एव च निरस्तधर्मस्य ब्रह्मणि लयरूपात् कैवल्याद्भेदः । न च मक्तस्स न लयः । ज्ञानिनोऽक्षरे भक्तस्स पुरुषोत्तमे लयादिति भाष्योक्तेः । एतच 'सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह' 'निरजनः परमं साम्यगुपैतीति वाक्याम्यां गम्यते । परं ब्रह्मोपैति तद- नन्तरं साम्यमुपैतीति वाक्ययोजनां कृत्वाशेर्पाहीः कतिपयैर्वेति संदिद्य 'न तत्सम' इति नियेधादशेयः साम्यासमवात् कतिपयैरेव साम्यं निश्चित्य, न च कतिपयैरपि धर्मीयमानं साम्यं तदभेदगमकमित्यर्थे 'कुशाच्छन्दःस्तुत्युपगानवदिति सूत्रात्रयवयोजनायामान्तरसायु- ज्यस्प हानौ तूपायन'सूत्रमाप्य एव स्पष्टत्वात् । तृतीयं सेवोपयोगिदेहो वैकुण्ठा- दिपु । सेवाया उप समीपे योगवत् शरीरप्राप्तिरूपम्, पक्ष्यादीनामिव । ननु प्रग्वेकस- म्पाधपूर्वफलस्यान्यानधीनत्वेपि सायुज्यसेयोपयोगिदेहयोः फलतदधिकाररूपमध्यमावा- न्तरफलयोस्तु ज्ञानादीनामिव कदाचित् कालकर्मसाध्यत्वं भवेदिति नेत्याहुर्मूले फलं वा घधिकारो वा न कालोत्र नियामक इति । फलं सायुज्यम् । अधिकारः सेवो- पयोगिदेहः । अत्र एतदुभयोः कालो न नियामकः, फलदः प्रतिवन्धको वा नेत्यर्थः । अत्र पाद्वयं फलतदधिकारयोरुमयोरपि भगवरसमक्षत्वयोधनाय । यद्वा, वाद्वयं क्रियाक्षेपकम्, फलं वा सादधिकारी या सात् । कालेनेति नेसाहुः यतस्तयोरनियामक इति । अत्र एतयोः । उद्वेगः प्रतिवन्धो वेति वाक्यं विघृण्वन्ति सेवायां प्रतियन्धकत्रयमिति । ८ल.

सेवाफलम् वितिसमेतम् । उद्वेगः सेवायां कियमाणायां मनोवृत्तेरस्थिरता । प्रतिबन्धभोगयोः प्रकारभेदानां बहु क- क्तव्यत्वेन प्रथमतः सिद्धानां दोपाणां दुर्विनाश्यत्वात् प्रयाणां साधनेत्यादिना तत्सामग्री- सागमेवोपदिश्य पाठक्रममनपेक्ष्य चरमोदिएमपि मोग सनिहिततरत्वेन लौकिकालौकि- कभेदेन विभज्य 'भोगो द्विविध' इत्यादिना लौकिकस्य त्याज्यत्वं तत्र लौकिकेत्यादिना निर्दिश्य प्रतिबन्धद्वैविध्यं वक्तुं 'प्रतिवन्धोपि द्विविध' इत्यादिना तत्खरूपं निर्दिश्य द्वयं विभजन्ते साधारणो भगवत्कृतश्चेति । तत्र साधारणो दुरदृष्टजन्यः, भगवत्कृतस्तु उत्तम मार्ग दृष्ट्वा सङ्गतः प्रवृत्तासुरमात्रविषयकः । न च तादृशस्स नात्र प्रवृत्तिरिति रा- गतः प्रवृत्तेरनिवार्यत्वात् भगवत्कृतस्याग्रे वक्तव्यत्वात् तत्स्वरूपमात्र निर्दिश्य साधारण- माद्यपदेनोल्लिख्य बुद्ध्या त्याज्य इत्याहुः । आयत्वं तु प्रतिबन्धकमे, बुद्धिस्तु सेवाया. मायतनस्य लौकिकवैदिकादेरनावश्यकस्साकरणम् , आवश्यकस्य तु अनवसरे प्राग्वा क- रणम् । निःप्रत्यूह महान् भोगः प्रथमे विशते सदेत्यस्य व्याख्यानमलौकिक- भोगस्तु फलानां मध्ये प्रथमे विशतीति । अस्य व्याख्यानम्स व्याख्येयानुसारित्वाभावात् तदर्थमानप्रकाशकत्वाचादोपः । अक्षरार्थस्तु भोगो महान् स्वरूपतः फलतः साधनतश्चेति । स्वरूपं स्वरूपानन्दानुभवः । साधन प्रवनुग्रहः । विषयानन्दब्रह्मानन्दापेक्षया स्वरूपा- नन्दस्सोत्कृष्टत्वात् । फलं तु 'सोऽश्रुते' इत्यादि प्रथमेऽलौकिकसामर्थ्यरूपे फले विशते । निःप्रत्यूहं क्रियाविशेषणमेतत् । जायमान इति क्रियाध्याहर्तव्या । विशती विशेषण- दानस्साप्रयोजकत्वात् तनापि विशेषणस्य संभवादर्थवत्ता, न च कश्चिद् व्यभिचारोस्ति । एतस्मिन् भोगे कालकर्मादीनामविघातकत्वात् । अकर्तव्यं भगवतः सर्वथा चेन्नति- नहीत्यस व्याख्यानं भगवत्कृतश्चेत् प्रतिवन्धस्तदा भगवान् फलं न दास्य- तीति मन्तव्यमिति । अक्षरार्थस्तु भगवतश्चेत् फलदानमकर्तव्यं सर्वथा न तदा गति. प्रभुप्राप्तिः । अकर्नव्यतानिर्धारस्तु निरन्तर सेवां कुर्वाणस्याचिन्तितसापि लौकि- कवैदिकादेर्मुहुरापतनात् । ननु भगवरसेवासिद्धी इतरसेवा भगवत्प्राप्त्यर्था कर्तव्येत्याश- क्याहुविवरणे तदान्येति । भगवलक्षणफलस्सेतरसाधनासाध्यत्वेन अनुग्रहमानसाध्यत्वेन च सेवायां प्रतिबन्धकरणादनुग्रहानिश्चयेन तत्साधनार्थ प्रयासस्य तदसाधकत्वात् व्यर्थ- तेत्याशयः । अत एवोक्तमासुरोयं जीव इति निर्धार इति । यथा वा तत्त्व- निर्धारो विवेकः साधने मतमेतस्स निवरण तदा ज्ञानमार्गेण स्थातव्यं शो- फाभावापेति । विक इति । ज्ञानमार्गय जीवनमणोरभेदज्ञानं जगन्मिथ्यात्वज्ञानं नि- त्यानित्यवस्तुविवेक इहामुत्रफलभोगविराग इत्यादिः । सांख्येन योगेन वा सिद्धिः, नौप- निपदः, तस्मिस्तस्यानविकारित्वात् । मूले या शब्दोनादरे । इतोपि न ज्ञानमार्गीया मुक्तिरपितु शोफामार एवेसाहुः शोकाभावायेतिपदेन । कथमेवमिति चेत् , नियन्धाया- मुरी मतेति पास्यादिति गृहाण ! भगवदथिनः फलम्पर निरूपणमुचितम्, न प्रतिवन्ध.

सेवाफलम् विकृतिसमेतम् । निरूपणमित्याशंक्य त्यागार्थमेत निरूपितमित्याहुवाधकानां परित्याग इति । परित्यागस्तु साधनपरित्यागरूपः पूर्वमेवोक्तः । नन्वेवमलौकिकभोगस्यापि त्याज्यत्वमागतं, नेत्याहुर्भो- गेप्येक परं विहाय । तथेति त्याग इत्यर्थः । याधकानामिति वाक्यं सुगमत्यादव्याख्याय निष्प्रत्यूहमिति वाक्यस च अलौकिकमोगस्त्वित्सादिना पूर्वमेतद्व्याख्यातत्यात् तत्प्रती- कमपि अगृह सविनोऽल्प इति वाक्यं व्याख्यातुमामासयन्ति साधारणो भोगः कथं त्यक्तव्य इत्याकांक्षायामाहेति सविनोल्पो घातकः स्यादितीति प्रती- कमणम् । तदर्थस्तु सविनत्वादल्पत्वाद्भोगस्त्याज्य इति । बलादेतो सदा मताविति वास्यव्याख्यानं एतौ सदा प्रतिबन्धकाविति । एती लौकिकभोगसाधारण- तिवन्धी सविनत्वात्पत्वपातकत्वादिमिर्हयतावच्छेदकरूपायुक्तौ । द्वितीये सर्व इति धास्यं विवृण्वन्ति । द्वितीयो भगवत्कृतप्रतियन्ध इति । द्वितीयत्वं चात्र प्रतिवन्धक्रमेण योद्ध- व्यम् । एवं द्वितीयपदमा व्याख्याय कृत्सं वाक्यं व्याख्यातुमयत्तारयन्ति ज्ञानस्थि- त्यभावे चिन्ताभावार्थमाहेति । द्वितीय इतीति स्पष्टत्वात् न व्याख्यातम् । भगव- स्कृतप्रतिरन्धे जायमाने संस्तेरवश्यभावित्वेन फलान्तरस्यासंभवात् तद्विपयिणी चिन्ता नैव कर्तव्या, व्यर्थत्वादित्यर्थः । नन्वाये दातृता नास्तीति वाक्यव्याख्यानमायफ- लाभावे भगवतो दातृत्वं नास्तीति । मूले आद्यपदं प्रतियन्धकाये आयपरम् । तथा चाये उद्वेगे जायमाने सतीत्यर्थी योध्यः । विवृतौ तु आधफलाभाव इत्यत्र फलामावपदयोः ५- ठीतत्पुरुपं विधाय समस्तस्स आद्यपदेन तृतीयातत्पुरुषो वोध्यः । आद्यफलस्य अभाव इति तु न अमितव्यम् । फलाभायस्याप्रत्यक्षत्वेन दातृत्वाभावे लिंगत्वासंभवात् । तथा च सेवायां कियमाणायाम् मनस उद्वेगे जायमाने अमानसीत्वादनाधिदैविकीत्वसंपत्ती मौ- तिक्याच फलाजनकत्वेन भगवतो दातृत्वामावः स्पष्ट एव । प्रभोः का वा शक्तिर्मानसोद्रे- गनिबारणे यतः । तदेवोक्तं विवरणे तदा सेवाऽनाधिदैविकीत्युक्तं भवतीति । तृतीये बाधकं गृहमिति वाक्यस्य आशयं विवेचयन्ति । भोगाभावस्तदेव सिध्यति यदा गृहपरित्याग इति । तथा च मूले प्रतिबन्धकतृतीयापेक्षं तृतीयपदं बोध्यम् । यदर्थमेतावन्निरूपितं तत्प्रयोजनमाहुरवश्येति । इयं फलययी प्रतिपन्धकत्रयी चावश्या, स्ववशा, मक्तिमार्गीयफलप्रतिपन्यानित्योपदीनत्वात् , तथापि निरन्तरं माया फलप्रतिवन्धयोः सक्षेपासंश्लेपार्थम् । नन्वितोपि किश्चित्फलान्तरं प्रतिघन्धान्तरं वा भक्तिमार्ग स्यादिति नेत्याहुः सर्चमन्यन्मनोभ्रम इति । मोक्षपापादेः फलत्वप्रतियन्धकत्वयोरसं- भवादिति भावः। तथा च 'वर्गापवर्गनरकेप्वपीति 'विकर्म यच्चोत्पतित'मिति च भक्तिमार्गीय- स्यैतदेव फलम् , उत्तममध्यमसाधारणादिभेदेन । न च निरस्तसमस्तविशेपे कचं तारत- म्यमिति वाच्यम् । एतद्विना लीलानुपपत्तेः । तथा चोक्तम्, 'अहो मायागुणा विष्णोरा- कारबिच्छरीरता । निर्दोपत्वं तारतम्य मुक्तानामपि चोच्यते' । 'मुक्ता अपि लीलाविग्रहं सेवाफलम् टिप्पणसमेतम् । कृत्वा भजन्त' इति च । स्पष्टं चैतदाकरे । प्रभुसमर्पितदेहादेः फलनैयत्यात् न तेनैत- द्भाव्यमिति नेत्साहुः तदीयैरपीति । तत्प्रतिवन्धकत्रयस्य फलत्रयस्य च भावनं कार्यम्, पु. टिमर्यादास्थस्य साधनद्वारैव फलनैयत्यात् । तथा चोक्तमाकरे 'स चिरकालोत्तेत्यारभ्य सुधां ववर्ष तथैव सर्वत्र वर्षिष्यतीति न ज्ञातुं शक्यम्, अतो मर्यादया तद्भजनमेव सर्वेषां क- तव्यत्वेन स्पेयमिति दिगित्यन्तेन । न चायं पुष्टिस्थ एवेति वाच्यम् । तस्स फलविलंबा- संभवादिति आहुः पुष्टौ नैव विलम्बयेदिति । फलं प्रभुरिति शेषः । एवं सत्त्वरजस्त- मसां परस्पराभिभवनोद्रेकनिमित्तमनःखेदेपि एतद्भावनमेव कर्तव्यम्, तत एव भगवत्परे चित्ते जायमाने मनःक्षोमनिवृत्तेः । क्षोभश्चायं फलविलंबादेव, नान्यस्मात् । अतस्तत्रापि नान्यत्साधनं, किन्त्वेतदेव कर्तव्यमित्याहुः गुणक्षोभेपि द्रष्टव्यमेतदेवेति मे मति- रिति । ननु भगवदीयत्वस्य फलावश्यंभावनियमात् फलविलम्बे च भगवदीयत्ववैय- यात् प्रतिबन्धानामसंभव एव, ततश्चैतन्निरूपणं व्यर्थमेवेति चेत्, इयं नाशंका, अपि तु सिद्धान्तायोधजनमजन्या कुसृष्टिरेवेत्याहुः कुसृष्टिरन वा काचिदुत्पद्यते स वै श्रम इति । अमत्वं तु खतळेच्छस्य प्रभोभक्तवैचित्र्यं विना लीलानुपपत्तेर्वैचित्र्य- सावश्यवान्यतया मर्यादापुष्टेरनपोद्यत्वात् तादृशभक्तस्य च प्रतिवन्धफलविलम्यानामपरि- हार्यत्वात् तस्य तथा निरूपणमनुचितमिति कथनस्य सिद्धान्तानवबोधविजृमितत्वात् पुष्टौ नैव विलम्बयेदित्यादिनोक्तोप्यर्थोवसरे स्मारितः । वृष्ण्यन्ववायजलधिप्रविभूतचन्द्रश्चन्द्रावलीरमणकौशलमादधानः । राधाननेन्दुसुपमामृतपानमत्तो नन्दात्मजो हृदि तमोहतये समेऽस्तु ॥ १॥ इति श्रीसेवाफलटीका । श्रीकृष्णाय नमः। सेवाफलम् टिप्पणसमेतम् । चलभाचार्यचरणाः प्रसीदन्तु सदा मयि । यदाश्रयकयामानेऽप्यसिलाः पुष्टिसिद्धयः॥१॥ यधपीश्वरवाक्यार्थाः सतोऽज्ञेयास्तथाप्यहम् । सेवाफले टिप्पणं तत्कृपया वक्तुमुत्सद्दे ॥२॥ अथ श्रीनभाचार्यनिरूपितं सेवाफलाख्यं प्रकरणं तनिरूपितयैव टीकया सहितं मुगमलाय पिनियते । यादृशीति । यादृशी सेवा मया मुख्यसेवासाधनीमूता तनुवि- सजा मिद्धान्तमुक्तावत्यादिषु प्ररूपेणोक्ता तस्याः सिद्धी परिणामदशायां इहामुन घ य. स्फत भाति तदुच्यते । अत्र फलमिति जासभिप्रायेणैकवचनम्, तेग फलनयमुक्तं ग- पति । तदेयोक्त टीकायां सेपायां फलनयमिसनेन । नन्वकस्सा एवं सेवाया विसशं पसमय कय मनिनुभहतीति चेत्, इत्यम्, भगवानस्मिन् मक्तिमार्गे शुद्धपुष्टिमर्यादा.

सेयाफलम् टिप्पणसमेतम् । पुष्टिप्रवाहपुष्टिमेदेन भक्तानंगीकरोति । तत्र शुद्धपुष्टिमार्गाचार्यप्रकटितत्वात् साक्षात्पर- म्पराभेदेन सयो विलम्पेन या पुरुषोत्तमसम्बन्धावश्यंभावरूपः पुष्यंशसिष्वप्यनुस्यूत एव । इतरावो वक्ष्यमाणपाधकसम्गवान्ययापत्त्यवधेयौ फलमयकयनेन च । साधन- फलयोस्त्रिले पस्तुतो नियमिका विचित्रा तदिन्छैव । तथा च यं मतं यस्मिन्मार्गे म- गवानंगीकरोति तस्मै तदनुसारेण फलं प्रयच्छतीति न काप्यवानुपपत्तिः । अय तप्रयं किंरूपमित्याकांक्षायामुच्यते । अलौकिकस्येत्सारभ्याधिकारो घेत्यन्तेन । तद्विवर- गमलौकिकसामर्थ्यमित्यादि वैकुण्ठादिनित्यन्तम् । अर्यस्तु भगवानलौकिकं लोकवेदातीतं पूर्ण सर्वात्ममावैकलम्यं फलं साधनरहितं यदा वरवत् दातुमिच्छति तदैव आयः फला- प्यमिचरितपूर्वजन्मसंयंधी सकलफलाग्रगण्यो ब्रजमक्तसदृशो यो मनोरयः स सियेत् । तदवान्तरफलं अलौकिकसामर्थ्य भजनानन्दानुमवयोग्यतारूपं सिध्यतीत्यर्थः । अत्र दि. रसायां वक्तव्यायां दान इति सिद्धवनिर्देशस्तु भगवतः खतघ्रत्वात् तदानस नित्यत्वात् निरपेक्षत्वादनंतत्वाच । तथा चास्मिन्नेव जन्मनि भगवान् साक्षात् स्पर्शादिसुखं कदा कदाचित् तमनुभावयतीति इह लोक एव तेषां सकलपुरुषार्थाधिकफलसिद्धिर्भवति, किमु वाच्यमय इति कैमुतिकन्यायेन मामुष्मिकफलसानिर्वचनीयत्वं सूचितम् । अत एव पुष्टि- मार्गीयामुनिकफलस्पात्र न स्फुटोक्तिः अनुक्तसिद्धत्वादवचनीयत्वाच । हि युक्तश्याय- मर्थः । यत् परमोत्कृष्टं फलं मगवदत्तमेव प्राप्यते, नान्यथापीति । चकारस्त्वप्यर्थे । तथा चायोपि श्रेष्ठोपि जीवखरूपविचारे भवितुमयोग्योपि श्रीमदाचार्यपक्षपाताभगवता दीयते चेत्, सिध्यत्सेव, केन वा रोद्धव्यः, नान्यथापीति भावः । अल्प इति पाठे पुष्टि- मार्गीयसाक्षाद्भगवत्संबन्धिफलमगम्यत्वात् जीवैर्मनोरथीकर्तुमपि न शक्यते । अतः फ- लापेक्षया स्वल्पोपि मनोरयः भगवान् खानुरूपमेव फलं ददातीति पूर्ण एव सिध्यति, न तु जीवविचारितरूपमान इत्यर्थः । इत्येकमविहितमक्तसदृशं फलमुक्तम् । विहितमक्त- विहितं द्वितीयमाहुः फलं वेति । तद्विवृतिः सायुज्यमिति । सायुज्ये फलोक्तिस्तु लो' कवेदयोस्तस्यैव फलत्वेन प्रसिद्धः । तेन यं मर्यादापुष्टावंगीकरोति तस्मै 'मामेवैष्यसी- त्यादिवाक्योपदिष्टं पुरुपोचमसायुज्यं प्रयच्छतीत्यर्थः । तृतीयं फलमाहुः अधिकारो येति । तट्टीका सेवौपयिकदेहो वैकुण्ठादिग्विति । वैकुण्ठादिपु किश्चित् परिचरणं कु- र्वन् तिष्ठतीत्यर्थः । आदिपदामावपि जन्मान्तरान् चेदवशिष्टान् प्राप्नोति तदापि सेवा- पर एव भवतीति ज्ञापितम् । अथवा देहाध्यासस्योक्तत्वात् जीवन्मुक्तो भवतीत्यर्थः । पु. वंशस्य सत्त्वादग्रे यथाधिकारं पुरुषोत्तमसंबन्धो भावीति ज्ञेयम् । तदुक्तं सिद्धान्तमुक्ता- पल्या 'उमयोस्तु क्रमेणैव पूर्वोक्कैव फलिप्यतीति । यद्वा, यादृशीति पूर्ववत् । फले त्रित्वोक्तिरैहिकामुष्मिकामिप्रायायान्तरपरमफलाभिप्राया वा । वस्तुतः परमफले विहिता- विहितमत्त्यधिकारके सायुज्यमजनानन्दरूपद्विविधे एव । तया चैकमैहिकमवान्तरफलं सेवाफलम् टिप्पणसमेतम् । वा । अग्रे आमुष्मिकमधिकारिभेदेन द्विविधं परमफलमिति त्रैविध्यं फले । अत एव नि- धन्धे विहितभक्तानां सायुज्यमुक्त, परमफलत्वेन, अविहितभक्तानां गोपिकादितुल्यानां भज- नानन्दरूपमेव । फलद्वैविध्ये कारण, सर्वात्मभावतदितरभावसाध्यपदार्थतारतम्यज्ञापनमेव । अथ कश्चिद्रहिलस्तकलस द्विविधत्त्वे तत्प्राप्तौ चान्यत्सेवैव वा भिन्नप्रकारा कारणम- स्त्विति वदति चेत्, तबाहुः अलौकिकस्येति । इदं फलत्रयमप्यलौकिकं भवति, अत. स्तद्भगवतैव दीयते चेत् प्राप्यते, नान्यथा । तत्रैकं प्रथम फलमिह लोके एव भवति, इतरे त्वमुत्र । तत्राग्रिमफलद्वयस्य प्रत्येकं सूचकम् । ऐहिकफलेपि वैविध्यमाहुः आद्य इति । आयः सिध्येत् , मनोरथश्च सिध्येत् । अयमर्थः । यस्य सायुज्यं भावि स आयो मुख्यः भक्तिमार्गीयसकलसाधनसंपन्नो भवति । यस्य पुनः साक्षाच्छ्रीपुरुषोत्तमसंवन्धिमु- ख्यरसानुभवो भावी तस संन्यासनिर्णयोक्तप्रकारकातिविरहजवेक्लव्यादिसहिता परमार्ति- रूपाधिकारसंपत्तिर्भवति । अल्प इति पाठ अल्पस्तुच्छो दास इति यावत् । तथाच माहात्म्यपूर्वककेवलदासभावयुक्तो भवतीत्यर्थः । अने पूर्ववत् । एमवान्तरफलद्वयं निरूप्य अग्रिमपरमफलद्वयमाहुः फलं सायुज्यं वा पुरुषोत्तमस्य । अधिकारः सेवापयिकदहो वैकुण्ठादिषु वा । अत्र धैकुण्ठपदं लोकवेदप्रसिद्धयभिप्रायेण । वस्तुतस्तु ब्रह्मात्मके स्वधामनि । तथाच 'यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयासः' इति श्रुतिनिरूपिते परमपदे मुख्याधिकाररूपसाक्षाद्भजनानन्दानुभवयोग्यस्वरूपावाप्तिरूपः । सिध्येदिति सर्वत्रानुषङ्गः । आदिपदात् यत्रैव - साक्षात् पुष्टिपुरुषोत्तमसांनिध्यं तत्रैव सेवां कुर्वन् तिष्ठत्तीति ज्ञापितं भवति । यद्वा । आध इति । आदिपदेन अ- ग्रिमफलाधिकरणकस्थित्यपेक्षया प्राथमिकं सयोनुभूयमान जन्मोच्यते । तत्सम्बन्धी यो गनोरयः यथाधिकारमनिमफलविषयकामिलापरूपः स सिध्यतीत्यर्थः । पाठान्तरे तु पूर्वा- र्थवत् । इममेव सर्वमर्थमनुसन्धाय टीकायामुक्तमलौकिकसामर्थ्य मिति । सायुज्यप्रापर्क भक्तिमार्गीयसाधनसम्पत्तिरूपं खरूपप्रापकं तद्रससहिष्णुतारूपं चेति । अत्र साधनफ- लयोः सम्पत्ती कालकर्मादयो नियामका भविष्यन्तीत्याशङ्कायामाहुः न कालोऽन्नेति । सर्वोपजीव्यत्वात् काल एवोक्तः । तेन भगवदिन्छाव्यतिरिक्तः कोऽपि न नियामक इ- त्युक्तं भवति । तत्र स्वच्छंदचारिलं मविष्यतीत्याशय तन्निरासपूर्वकं सावधानतया स्थितिज्ञापनाय मध्ये अन्तरायोत्पत्तिमाहुः उमेग इति । तस्य विवरणं सेकायामित्यारम्य भोगो येत्यन्तम् । एतत्रितयमपि पाधकमस्ति । यथा तदनुसत्तिर्भवति तथा यतनीयमि- त्याशपः । ननु उद्वेगप्रतिवन्धभोगाः क्रमेण मनोजन्यत्वात् दैवागतत्वात् क्षुदादिनिवर्तः कत्याचाशस्यपरिहारास्ने कयं सक्तव्या इसाशङ्कायां त्यागप्रकारमाहुरने याधकानां परित्याग इति । तट्टीका प्रयाणां साधनपरित्यागः कर्तव्य इति । सिद्धार्थत् त्यत्तुम- शाया एर । अतस्तरसाधकास्तूनां त्यागे तदनुत्पचिर्मवतीत्यर्थः । अथ तेषु प्रसेकं त्या- सेराफलम् टिप्पणसमेतम् । ज्यासाज्यभेदेन द्वैविध्यमस्तीति सामान्यतो वदन्तः प्रथमं त्याज्यवस्तुम्खरूपमाः अ. फर्तव्यमिति । व्याकृतिः भगवत्कृतथेत् प्रतियन्ध इत्यारभ्य विवेक इत्यन्ता । अर्थस्तु यकार्य सर्वथा भगवान् का नेच्छति तन यानगुद्धिवलोदयं जीरैः दृष्टादृष्टोपायैः प्रयले कृतेपि प्रतिरन्धराहित्यपूर्वकं तत्कार्य न सिध्यति, तदा भगवत्कृतोऽयं प्रतिवन्धोऽयमित्यवधेयः । तदा भगवान् फलं न दासतीति मन्तव्यम् । तदा भन्या तदनन्तरं कृता या सेगा सा व्यर्या । यतः फलशून्या । तदा किं कर्तव्यं तेनेति प्रश्ने उच्यते । तदाय परिदृश्यमानो मलक्षणो वा जीव आसुर इति मनसि निर्धार्य ज्ञानमार्गेण वेदोक्तेन स्पेयम् , तन मयेयान् प्रयासः कृतस्तथापि किमिति न स सिद्धि प्राप्त इतिरूपखेदाभावाय हरिः सा निजेच्छ- यैव करोति करिष्यति अफापीदित्येवं विवेकः कर्तव्य इत्यर्थः । अनासुरत्वमावेशजन्य शेयम् । अन्यथा सहजासुरस ज्ञानाघनधिकारित्वेन श्रीमदाचार्यास्तस कर्तव्यस्त्वं नोपदिशेयुः । तेनासुरल आवेथिसहजभेदेन द्विधि नेयम् । द्वितीयमो वक्ष्यति द्वितीयेत्यनेन । अन्यथा पूर्व विवेकः साधनं मतं इत्युक्तम् , अग्रे सर्वधा चिन्ता साज्येति वक्ष्यते तेनान्योन्य विरुद्धवाक्यकयनेन वदव्याघातः प्रसज्येत । तथा च स- र्वथा भगवान् यत्कतुं नेच्छति तस्साचार्योक्तसकेतैर्भगवदीयद्वारा वा यया तत्वनिधारो भवति तथा कृत्वा सर्वथा असाध्यत्वे ज्ञाते तदुपक्रम एव न कार्यः, किन्तु निवेकपूर्वक स्पेयमित्यर्थः । अथ साज्यात्याज्यभेदान् तत्स्वरूपाणि च विविच्य प्रकटमाहुः भोगे- प्येकमित्यादि तृतीय पाधकं गृहमित्यन्तेन । तशाख्यानं भोगो दिविध इत्या- रम्य आग्रन्यपरिसमाप्ति । अर्थस्तु मोगप्रतिपन्धी लौकिकालौकिकमेदेन साधारणभगव- स्कृतभेदेन च प्रत्येक द्विविधौ । तन लौकिको भोगः खच्छन्दतया यथेष्टं सर्वेन्द्रियसतर्प- मादिरूसः । स सर्वथा त्याज्यः । तदुक्तं श्रीमदाचार्यः 'स्वयमिन्द्रियकार्याणि', 'विषया- फ्रान्तदेहाना मित्यादिवास्यैः । साधारणप्रतिबन्धस्तु वर्गिकायासासक्त्यादिरूपः, सोपि तथा । एतस्य भगवद्धर्मापेक्षयातिनिर्वलत्वेन सेवाधासक्तम्स वृथा कालक्षेपजनकत्वमस्ति । तदुक्तं तावत्कर्माणि कुति' 'मत्कर्म कुर्वतां पूंसा'मित्यादिवाक्यैः । ननु तर्हि धर्मादिशात्रभयवैययं स्यादिति चेत् । न । यतो बुद्धयेत्युक्त टीकायाम् । लोकसंग्रहा- र्थकरणाभिप्रायेण । तदेव गीतायामुक्तं 'सक्ताः कर्मण्यविद्वांस' इति । अन्यथा तत्तनियत- कारणकमेव फलं स्यात्, नैतन्मागीयम् । अघालौकिकभोगस्तु वस्तुमानस्स भगवदुष- योगे पदयोग्यते च जाते तहतप्रसादत्वेन खोपयोगादिरूपः, स न साज्यः। यतः स मोगः फलानां मध्ये प्रथमफलेऽलौकिकसामर्थ्यरूपे प्रविशति, तदङ्गतां प्राप्नोति । काय- वामनायोधकलात्, वधर्मत्वाच । तदुक्तं 'सयोपमुक्तसग्गन्धे'सादिवाक्यैः । 'यत्क- रोषि यदनासि' 'कायेन याचा मनसेन्द्रियैवी' इत्यादिभिभोगस्य यथाकचित् कर्तव्य. ताप्युक्ता । द्वितीयो भगवत्कृतप्रतिबन्धः, स खरूपतः फलतच पूर्वमुपपादितः । नन्व- .

सेवाफलम् विवृतिप्रकाशसहितम् । सामर्थ्यरूपं फलमुच्यते । यतो हि निश्चितम् । अलौकिकसामर्थ्यस्य दाने सति तनुवित्तजा. सेवाप्रारम्मे जातो यो मनोरथः ममानया सेवया मानसीसेवा सिध्यत्वेवंरूपः स सिध्येत्, अत इदं फलमङ्गभूतमुच्यते । अथवा सायुज्यं फलमद्भूतमुच्यते । अथवा साक्षात्सेवोपयो- ग्यधिकाररूपदेहोभभूतं फलगुच्यते । यत एतयोरपि दाने प्रथमं जातो मनोरथः सिध्येत्, नान्यथा । तस्मादेतयोरपि मानसीसेवायामङ्गभूतत्वम् । अस्मिन् फलत्रये कालो न नियामकः संपादको न भवति । यतः पुष्टिमार्गायदैवजीवे मानसीसेवार्थ भगवदुत्पादितमेवैतत्फलनयम् । एवं मानसीसेवायामङ्गभूतं फलत्रयमुपपाय मानसीसेवायां प्रतिबन्धकत्रयमुप- पादयन्ति सेवायां प्रतिबन्धकत्रयम् । तदेव विशदयन्ति उद्वेग इति । मानसी- सेवायां तु उद्वेगः वाधकं भवेत् । अथवा प्रतिबन्धः बाधकं भवेत् । भोगो वा बाधक भवेत् । एवं बाधकत्रयं सेवायां प्रतिवन्धकत्रयम् । तुशब्दोन्यव्यावृत्यर्थम् । बाधकानां परित्याग इति । वाधकत्रयाणां साधनपरित्यागः कर्तव्यः । भोगो द्विविधः । लौकि- कोऽलौकिकश्च । द्विविधेपि भोगे एक लौकिकमोगरूपं बाधकं तथा साज्यम् । अपरं द्वितीयमलौकिकमोगस्वरूपं निष्प्रत्यूहं निर्विघ्नं भगवतैव निर्वाहात् । स अलौकिकमो- गस्तु महान् भोगः सदा निरन्तरं सर्वेन्द्रियाणां भगवत्परतारूपः । फलत्रयाणां मध्ये प्रथमे फलेऽलौकिकसामर्थ्यरूपे प्रविशति । अतो न सक्तुं योग्यः। प्रतिवन्धोपि द्विविधः। साधारणो भगवत्कृतश्च । तत्र प्रतिवन्धद्वये आधः साधारणः बुद्ध्या उपायेन त्याज्यः । भगवत्कृतश्चेत् प्रतिबन्धस्तदा भगवान् फलं न दास्यतीति मन्तव्यम् । तदेवाहुः अक- तव्यमिति । भगवतो जीवकर्तृक भजनं कर्तुमयोग्यं चेत्तदा सर्वप्रकारेण गतिर्नहि । फलं नेति निश्चयः । यदा भगवत्कृतप्रतिवन्धः सर्वथा निवारयितुमयोग्यस्तदा तपति- पन्धनिवारणार्थ कृता या अन्यदेवतासेवा सापि व्यथी । अन्यफलदाणामपि देवानां मगवदधीनानां भगवत्कृतप्रतिवन्धानिवारकत्वात् । किच, यदा भगवत्कृतप्रतिवन्धस्तदा मासुरोयं जीव इति निर्धारः । अयं जीवो देवः पुष्टिमार्गीयजीववत् सेवादिना प्रती- यमानोप्यासुर इति निर्धारः । दैवजीवे भगवत्स्कृतप्रतियन्धासंभवात् । ननु यदा भक्ति- मार्गीयमजने भगवत्कृतप्रतिवन्धस्तदा शोकाभावाय तेन किं कार्यमित्याकांक्षायामाहुः यथा येति । वेत्यनादरे । यया येन प्रकारेण वेदान्तश्राणादिना अन्येनापि येन केन- चित्प्रकारेण तत्त्वनिर्धारः सरूपनिर्धारो भाति तेन प्रकारेण तस विवेकः साधनं संमतम् । विवेकखरूपं तदेव विवृतं तदा ज्ञानमार्गेण स्थातव्यम्, शोकामावायेति विवेकः । यदा भक्तिमार्गीयमनने भगवत्कृतप्रतिवन्धन्तदा शोकामावाय ज्ञानमार्गेण मया स्थातव्यमिति विवेकरूपं साधनम् । साधारणो भोगः कथं त्यक्तव्य इत्याकांक्षायामाहुः सविनोल्पो घातकः स्यादिति । सविमलादल्पलादावविघातकत्वात् साधारणो भोगस्त्याज्यः । पलावेतौ सदामती । एतौ साधारणप्रतिपन्धसाधारणमोगरूपी पदापतिनन्धको संमतारत- सेवाफलम् विगृतिप्रकाशसहितम् । स्त्याज्यौ । द्वितीय इति । द्वितीयो गगवत्कृतप्रतिबन्धस्तस्मिन् सति ज्ञानमार्गेणापि स्थित्य- संभवे चिन्ता भवति । तदभावार्थमाहुः द्वितीय इति । ज्ञानमार्गेणापि स्थिती भगवत्कृ- तप्रतिवन्धे सर्वया चिन्ता साज्या । संसारनिश्चयात् । सर्वत्र भगवत्कृतप्रतिबन्धादयं जीव आसुर इत्यस्य संसार एव भवति, नतूद्धार इति निधारात् सर्वथा चिन्ता त्याज्या । भगव- कृतप्रतिबन्धस्य ज्ञापकमाहुः नन्वाद्य इति । नन्विति विरोधोक्तौ । दैवजीवे सर्वेन्द्रियाणां भगवत्परत्वं, तेन तत्कृता सेवा आधिदैविकी, आधिदैविको भगवान् तत्संयन्धिनी भवति । मासुरजीवे मगवत्कृतप्रतिवन्धादायफलामावे सर्वेन्द्रियाणां भगवत्परत्वाभावे सति तत्र भगवतः फलदातृत्वं नास्ति । तदा तत्कृता सेवा नाधिदैविकी भगवत्संबन्धिनी न गवती- त्युक्तं भवति । तस प्रपञ्चासक्तत्वात् । तृतीय इति । ननु तृतीये-भोगाभावे बाधक गृहम् । भोगामावस्तदैव सिध्यति यदा गृहपरित्यागः । अवश्येयमिति । इयं फलत्रयी प्रतिवन्धकामावत्रयी अवश्या, न स्वशक्या । तथापि भाव्या विचारणीया । मम फलत्रयं भवतु, प्रतिबन्धकामावत्रयं भवतु, एवं विचारणीया । फलत्रयप्रतिवन्धकाभावत्रयाभ्याम- न्यत् सर्व फलभावनं प्रतिबन्धकमावनं स्वान्तान्तिरित्ययः । ननु पुष्टिमार्गीयाणां किमर्थ भावनं, तं विनैव फलसिद्धरित्याशंकायामाहुः तदीयैरिति । पुष्टिमार्गीयैरप्येतद्भावनं का- यम् । एतद्भावने भगवान् पुष्टिमार्गे फलदाने विलम्यं न करोत्येव । अतः पुष्टिमार्गीया- णामेतद्भावने शीघ्र फलं भवत्यतस्तैरपि भावनं कार्यम् । ननु सत्त्वादिप्राकृतगुणकृतचित्त- क्षोभे सति कयं भावनं कार्य तबाहुः गुणक्षोभेपीति । चित्तस्य गुणत्रयकृतक्षो- भेप्येतदेव फलप्रतियन्धकायप्राप्तिनिवृत्तिभावनं तन्निवारणे साधनरूपं द्रष्टव्यम् । एत- भावनयैव गुणत्रयक्षोमोपि नश्यतीति मे मतिः । एवंप्रकारिका मम बुद्धिः । कुसृष्टिरिति । अौतदावनकृतगुणत्रयक्षोमनिवारणे काचित् कुसृष्टिरेतद्भावनयैव गुणत्रयकृतक्षोमो नश्य- तीति कथं, गुणत्रयकृतक्षोमनिवारणे साधनान्तराण्यपि भविष्यन्तीत्येवंरूपानुपपत्तिरुत्ायते चेत्, निम्बयेन स वै भ्रमः । स्वान्तान्तिः । अत्र न काप्यनुपपत्तिरिति दिक् । इति श्रीसेयाफलविवृतिप्रकाशः।

सेवाफलम् टिप्पणसमेतम् । निषिद्धसुखत्यागी पशुरेवेति न्यायेन साधारणो भोगः किमर्थं त्यक्तव्यः, तत्राहुः सधि- नेति । अस्स टीका सविनत्वादादिप्रतिबन्धेसन्ता । अर्थः सविनत्वात् वह्वन्तरायवत्त्वात् तत्रापि खरूपतः कालतश्च स्वत्सत्वात् पातकोयं साज्य एवेत्यर्थः । तथाच साधारणभो- गभगवत्कृतप्रतिवन्धौ प्रसध फलाभावजनको । यतस्तौ मतौ संमतौ न, प्रतिबन्धक- स्वात् । अथवा मती प्रतिवन्धकलेन संमतावित्यर्थः । तत्र तयोराधः स्वसाध्यत्वात् त्याज्य एव । इतरोसाध्यत्वात् मर्यादामार्गेण स्थिला सोढव्य इति । पूर्व यदुक्तं तत् 'प्रति च निवृत्ति चेत्यादिमगवद्वाक्यैः सहजासुरेषु मर्यादामार्गोपि याथातथ्येन न सिध्यतीति शानस्थित्यभावेयाभासेनानूध तेषां कर्तव्यमाहुः द्वितीयेति । द्वितीये बाधके भगव- स्कृतप्रतिवन्धे, अथवा द्वितीये आसुरत्वे साहजिके जाते फलविपयिणी चिन्ता साधनान्वे- पणं न कर्तव्यम् । यतः फलं तस्यैतन्मार्गीयं न भवत्येव । तर्हि तस्स किं भवतीति प्रश्ने आहुः संसारेति । तस्याविधकोऽहंममात्मकः संसार एव भवति, अग्रेपि तदनुसारेणैव फलम् , नान्यदपीत्यर्थः । नन्वन्त्यबाधकद्वये द्विरूपत्वं विविच्योक्तं नत्वादिनैतत्कुतः इ- त्यत्राहुः नत्वाय इति । तट्टीका आद्य इति । आयो यः फलस्साभावो यस्मादिति फला- भावः प्रतिबन्ध उद्वेग इति यावत् । स यद्यपि साहजिकदुःसङ्गकृतभेदेन द्विविधोस्ति त- दशातत्र पित्तशुद्ध्यभावेन कदाचित् स्वधर्मत्यागनिन्दादिकमपि भवति, तथापि द्वैविध्येपि भगवान् सर्वात्मना फलं नैव संपादयतीति न, किन्तु किञ्चिन्यूनाधिकं भवत्येव । अत- स्तत्र भगवतोऽदातृत्वं फलविपयकं नास्ति, किन्त्वग्रिमजन्मान्तरेषु फलमुत्तमं मध्यमं वा भवत्येवेत्यर्थः । तदेवोक्तं नियन्धे 'अत्रापि वेदनिन्दायामधर्मकरणात्तथा । नरके न भवेत्पातः किन्तु होनेषु जायते । पूर्वसंस्कारतस्तत्र भजन्मुच्येत जन्ममि रिति । तर्हि सद्यस्तस्स किं भवतीत्याकांक्षायामाहुस्तदेति । तदा तनुवित्तजा सेवा आधिदैविकी न भवति । यसां कदा कदाचित् साक्षात्स्वरूपानुभवः सर्वदा तत्सङ्गमार्थ परमार्तिश्च नियता ताशी साम्प्रतं न गवतीत्यर्थः । अथ लौकिकमोगत्यागप्रकारमाहुः तृतीय इति । तयाकृति- र्मोगामाव इति । गृहे त्यक्ते तदधीनत्वात् सोपि त्यक्तो भवतीत्ययः । अथ अवश्येत्याध- वशिष्टमूलव्याख्या श्रीगदाचार्यकृता न लभ्यत इति तद्वयाख्यायते । इयं सेवा सदा अपश्या जीवससाध्यति मापनीया । अयमाशयोग्य तस्याः कृतौ स्सस्स कर्तृत्वामि- माने जाते कृताप्यकृतप्राया मक्तीति भगवत्येव सर्व भारं निक्षिप्य तदिच्छयैव सर्व सम्प- पत इति निमित्य तत्परता सेयमिति । तदुक्तं 'अशक्ये वा सुशक्ये 'त्यादियाफ्यः । एतदन्यप्रकारा मावना मनोममरूपा । यद्वा । इयं सेवा सदा अवश्या, जीवकृत्यसाध्या माय्या च, मावसम्पन्धिनी तप्रधाना च येति शेषः । एतस्मादन्यजीवसाध्यत्वविध्यधी- नत्वज्ञानं मनसो भ्रमः । इति संक्षिप्य सेवाखरूपमापातत उक्तम् । एवं स्वरूपमुक्त्वा तसा एतप्रकारेणैव ज्ञानं कर्तव्यतां चाज्ञापयति तदीपेरिति । अत्राप्रस्तुतत्वेन प्रतीय- सेवाफलम् विविप्रकाशसहितम् । मानोप्यपिशब्द एतत्प्रकारकज्ञानविशिष्टत्वमाक्षिपति । तथाचैवं ज्ञानपूर्णैरपि तन्मदुक्कमेव कार्यम् , नान्यदित्यर्थः । नन्वन्त्यमार्गद्वये यथोक्तकरणं युक्तं, लोकवेदानुसारित्वात्, न तु शुद्धपुष्टी, लोकवेदातीतत्वात् । अतस्तत्र यथोक्तकरणं नोपदिश्यत इति चेत्, तबाहुः पुष्टाविति । एवकारेण विचारान्तरामावपूर्वकमवश्यकर्तव्यत्वं सूच्यते । तथा च पुष्टि- मार्गे एतदुक्ताचरणे विलम्यो न कार्यः । यतस्तत्र मार्गाचार्यप्राधान्यमेवोत्कर्षः, तदेव च निर्वहति । तथाकरणेनैव भगवान् प्रसीदति, नान्यया । अतस्तास्तदुक्तकरणे सर्वथा विलम्यो न कार्यः । ननु पूर्व यदुक्तं भगवत्कृतप्रतिबन्धसंमवे तत् सोहा स्पेयमिति, तन्न युक्तम्, यतस्तपोऽनशनदेहाभिधातादिमिराग्रहे क्रियमाणे देवव्रतादेरिवासापि प्रतिज्ञा- पालनं भगवान् करोत्येवेति चेत्, तत्राहुः गुणेति । गुणानां सत्त्वादीनां क्षोमेऽतिक्रान्त- 'मर्यादत्वे जाते अर्थात् गुणाधिक्येन क्रोधमदमात्सर्यादिविकारसमवेपि खामाविकं त्यक्त्वा मढुक्तमेव कार्यमित्यर्थः । दर्शनमालोचनज्ञानं दृष्ट्वा कर्तव्यमित्यर्थः । तत्र प्रमाणं मे मतिरिति । पूर्व यदाक्षिप्तं तत्सर्व सगुणभाववद्भक्तकृत्यम् , मदीयास्तु निर्गुणमावा इति तैर्मदुक्तमेव विधेयम् । तत्राज्ञानमन्ययाज्ञानं च वारयन्ति कुसृष्टिरिति । अत्र मदुक्ती या कुष्टिहेतुवादादिरुत्पयेत स वै निश्चयेन भ्रम एव । श्रीमदाचार्योपदिएप्रकारेषु यत्र- माणान्तरान्वेषणं तमरूपमेवेति दिक् । इति सेवाफले मूले टीकायां च कृतं मया । टिप्पणं श्रीमदाचार्यपदपमानुसारिणा ॥१॥ इति श्रीसेवाफलटिप्पणम् । श्रीकृष्णाय नमः। सेवाफलम् विगृतिप्रकाशसहितम् । प्रणम्य पुष्टिमार्गीयं ससूनुं वलभं प्रमुम् । सेवाफलस्य विवृतिप्रकाशः क्रियते मया ॥१॥ श्रीमदाचार्याः पुष्टिमार्गीयदैवजीवानां मानसीसेवासिद्धावङ्गभूतं फलत्रयं प्रतिय- न्धकत्रयं तदमावं च प्रतिपादयन्ति सेवायां फलनयमिति । मानसीसेवायामामूर्त तनुविचजासेवासाच्यं फलत्रयम् । अलौकिकसामर्थ्य सर्वेन्द्रियाणां भगवत्परतारू- पमेकं फलम् । सायुज्यं सह युनक्तीति सयुक्, सयुजो भावः सायुज्यम्, व्यसनमा वानन्तरं देहनाशकेन विगाढमावेनान्यस्फूर्तिराहित्यपूर्वक भगवता सह योगः द्वितीय फलम् । सेयोपयोगिदेहो वैकुण्ठादिषु । यथा यैकुण्ठवजादिषु साक्षात् सेवोप- योगिदेहस्तथा देहो मानसीसेवायामधिकाररूपस्तृतीयं फलम् । एतत्फलप्रयमेव साध- लोकेन प्रतिपादयन्ति यादृशीति । याप्रकारका मानसी सेवा 'ता नाविद नित्यादि- वाक्पैमंगवता प्रोक्ता तसिदावहमतं येन विना यन संभवति तदङ्गमेताध्यमलौकिक- परिशिष्टम् । ८ ७ ८ २५ पृष्ठम् पावः पाठान्तरम् । सद्विषयकः सिद्धिविपयकः दर्शनसेवायाम् दर्शने सेवायाम् २२ अलौकिकसाधन अलौकिकमोगसाधन द्विविध इत्यनन्तरम् , लौकिकोऽलौकिकश्च । तत्र लौकिकस्त्याज्य एव । प्रतिबन्धो द्विविधो । द्रवादस्य द्रवश्व ३ प्रयत्नसम्भवेन । प्रयत्नासम्भवेन । २२ तदवैयर्थ्य- तद्वैयर्थ्य- श्रीवल्लभगोखामिनां टीकाया मुद्रणानन्तरं प्रभुकृपयास्माभिस्तेषां टीकायाः द्वितीया प्रतिः प्राप्ता । सा टीका श्रीवल्लभगोस्वामिभिः पुनलिखिता, इति प्रतिभाति । तन्मध्ये तैः प्रथमटीकापेक्षया केषु केपु स्थलेषु किञ्चिदधिकं लिखितम् , तदत्र वाचकानां जिज्ञासा. तृत्यथै ग्रन्थरक्षणार्थ चावतार्यते । पृष्ठ २३, पह्नि १२, सर्वाभोग्यसुधानन्तरमिदमधिकं वाचनीयम्-'फलरूपापीयं भगवता साधनतामापादितति वेणुगीते निरूपितमतोऽलौकिकत्वम् ।' पृष्ठ २३, पनि २४, सेवोपयोगिदेहो-इत्यस्यानन्तरं 'इति यस्य देहस्य सेवायामेवोपयोगः, अन्यदावयवा अप्रकटा एव स इत्यर्थः । यत्र खरूपानन्ददानम् , तत्र फलत्रयमपि, यत्र धर्मभूतानन्ददानम्, स्वयमप्रधानीभूय, तत्र फलद्वयम्, यत्र खप्राधान्येन धर्मभूतानन्ददानम्, तत्र सेवोपयोगिदेहगात्रदानमिति ज्ञेयम्' इत्यधिकम् । पृष्ठ २३, पहित २७, लभन्ते-इत्यस्यानन्तरं 'इमान्येव फलरूपात्मनिवेदनसख्य- दास्यानि ज्ञेयानि' इत्यधिकम् । पृष्ठ २४, पल्लि ३, भोगः- इत्यस्यानन्तरं 'भगवदुपयोगिवस्तुपरतायाः प्रति- पन्धकत्वामावादन यमुम्बुजाक्षेतिश्लोकव्याख्यातः सर्वथा भगवन्तमप्रपन्नः अन्यपदार्थों ज्ञेयः । अप्रपन्नोननुगतो भगवदनुपयोगीति यावत् । नवरने चित्तोद्वेगमित्यस्सामासे चित्तस्य पुत्रादिपरता उद्वेगपदार्थो निरूपितः । अन्यपरतेतियावत् । तन्यायेन त्रयमपीदं ज्ञेयम् ।' इत्यधिकम् । पृष्ठ २४, पक्लि५, मूलार्थः-इत्यस्यानन्तरं 'तत्र द्वयं साक्षात्तदायकं प्रतिवन्ध- रूसम्, एकं च तदाधारस्य साधनस्य पान पापकमिति भेदो ज्ञेयः । सामर्थ्यस पापकयनेन सामर्योत्पतेः पूर्वमेतत्सम्भवे सामध्ये नोत्पतेति सिद्धमेवेति मावः । नपरले तयानिरूपणान्निवेदनपदार्थनाशामावेपि तद्वाधस्तु स्यादिति तुशब्दः । तेन जन्मान्तर- व्यवधानं भवतीति निवन्धे निरूपितमिति भावः । सामर्थ्यवाधश्च तहेतुभूतान्यासबाधेन सेवानभ्यस्ता भवतीत्यर्थः । इत्यधिकम् । पृष्ठ २४, पल्लि ७, लौकिकभोगानाम् इत्यस्यानन्तरं 'बाधकत्वात्तत्साधनपरि- त्यागः कर्तव्यः । मनोदेहेन्द्रियाणि च भगवदसम्बन्धिपु न प्रवर्तनीयानि । तथा सति पां तत्परता भवति 'विषयान् ध्यायतश्चित्तं विपयेषु विपजत' इति वाक्यादिति भावः । साधन- परित्याग विवृण्वतो' इत्यधिकम् । पृष्ठ २४, पति १२, भोगः- इत्यस्यानन्तरं 'लौकिकस्त्याज्य इति । सिद्धान्त- रहस्सोक्तप्रकारेण यथासम्भवं भगवदुपयोगं सम्पाय भोगः कर्तव्य इत्यर्थः । प्रतिवन्ध इति । श्रवणकीर्तनादिना हरिश्चेद्धृदयं निविशते तदा पूजा सर्वदा निर्वहति । एवं जाते ततः कार्यान्तरवशाजाता तनोरन्यपरता साधारणः प्रतिवन्धः । क्रियमाणेपि श्रवणकीर्त- नादौ हरिश्चन्न निविशेत्तदाम्यासो न भवति । तेन जाता तनोरन्यपरता या स भगव- स्कृतप्रतिवन्धः । पृष्ठ २४, पति १३, विभावनीयेत्यर्थः इत्यस्यानन्तरं 'बुद्धिर्वा तत्र न स्थाप- नीया । यत्रकरणेपि तदनुचिन्तनं न कर्तव्यमित्यर्थः । अलौकिकभोगो न त्याज्य इत्या. शयेनाहुः अलौकिकेति ।' इत्यधिकम् । पृष्ठ २४, पति २०, प्रतिवन्धः-इत्यस्यानन्तरं 'ध्रुवस्य गता भक्तिः कुरेण सिद्धेति चतुर्थस्कन्धे निरूपितं तयात्राप्याशक्य नेत्याहुः तदेति' इत्यधिकम् । पृष्ठ २४, पति २२, वोध्यम्-इत्यस्यानन्तरं 'ननु दुरदृष्टनाशनार्थ कात्यायनी- पूजेति कात्यायनीपदनिरुक्ती सुयोधिन्यां निरूपितम् , दुरदृष्टस्य भगवत्कृतप्रतिवन्धलं च तत्रैव निरूपितम् । यदि भगवदिच्छयैवेति । खेच्छामप्येतदनुगुणां करिष्यतीति च । तथा च कथमन्यसेवावैयर्थ्यमित्यत आहुरयमिति । लीलास्थेषु रसविशेपानुभवार्थं भगवता प्रतिवन्धः सम्पायते न खासुरत्वं तेषु । आधुनिकोयं त्वासुर एव भगवता प्रतिवन्धयुक्तः क्रियते, तदा तु फलाभावनिश्चयात् साधनवैयर्थ्यमिति भावः ।" इत्यधिकम् । पृष्ठ २५, पति १७, बाधकत्वामावात् इत्यस्यानन्तरं 'विद्यमानमप्यदृष्टं तस्य दुर्यलम् । अत एव प्रारब्धभोजनार्थ प्रभुश्चेद्विलम्बत इत्युक्तम् । लोकवेदस्वास्थ्यं हरिन करिष्यतीति चोक्तम् ।। इत्यधिकम् । ३२ पति दृढाद् हठात् ३२ २८ विवरणे पृष्ठ " " वरणे " "

Jal Bhed

Author
Vallabhacharya
Title
Jal Bhed
File name
Jal Bhed
Text
OCR done
Citation
1980
Published
2012/08
Publisher
Mumbai.,shri Ratnaprabha Bahuji Maharaj
Language
Sanskrit
Pages
456
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
311522
Barcode
99999990320401.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
zIOiJNjBTfM
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