Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner

Jiva Shabda Samvad

Jain,vinayachandra · 2011/03

PDF Proofread

Front matter

परधन्यवाद
इस पुस्तक के प्रकाशन में लोला सुन्दरलाल रोमचन्द्र
जैन सोनीपत वाले व श्री ओमप्रकाश प्रोपाईटर, फर
जगवराम दुर्गादास लुधियाना वालों ने सहायता दी है। इन
सजनों का हार्दिक धन्यवाद है।।
पुस्तक मिलने का पता
। श्री विनयचन्द जैन, ज्ञान भएडार, जयपुर
श्री जैनरत्न विद्यालय पुरडिपो भोपालगढ़ (मारवाड)JRy
श्री सम्यक् ज्ञान प्रचारक मडल, जोधपुर
श्रीगूजरमल बलवन्तराय जैन, लुधियाना

"द्वित्राः शब्दा." लेखक -विधाभास्कर विश्वनाय शास्त्री,न्यापरणन्यायादितीर्थ,लुधियाना । ससार के माणिमात्र कातिम ध्येय 'श्राध्यात्मिक, आधि भौतिक तथा प्राधिन विक' म्प निविध दु खों से छुटकारा पाना एक मर्व प्रकार के मुखों की प्राप्ति करना है। जिसके लिये प्राणिमात्र प्रतिक्षण यलशील रहता है-प्राणियों के प्रत्येक विचार तथा प्रियाएँ इही प्रयोजनों से ओतप्रोत हैं। परन्तु निरन्तर “यल करते हुये भी फिमो पुरुष को हो कभी इष्ट की प्राप्ति होती है, निसका कारण उसके पूर्व सश्चित का का सुविधा या दुर्विपाक ही है । प्राणी अपने जीवन काल में जैसे भी शुभ या अशुभ मम्म पता है उसके अनुमार ही शुभ या अशुभ अष्ट को उत्पत्ति होती है, और तदनुसार ही सुख अथवा दुख रूप स्लों का उपभोग करता है, दोनो प्रकार के इस फलोपभोग फो हो विशम शद से कहा जाता है । सामारिक प्राणियों के मुरूपता पिता, उच्चाभिजन नीचामिजन, धनाढ्य एव निर्धनादि भेद तथा अत्यन्त सुमित्व अत्यन्त दुखित्व, सुश्यिय दुसित्वादि तमस्त भेदों का कारण कर्म भेद ही हैं साधारणतया धर्म तीन प्रकार के हैं, 'मानसिक, पाचिक तथा पायिक' । उनमे से मानसिक धर्म के कहलाते है तो अन्त रण म दया भाक - धाति सङ्कल्प रूपेण पैदा होते हैं। शरीर से किये जाने वाले पर परिवाशादि कम्मों को कायिक तथा पाणी द्वारा किये गये सत्यमापणादि वर्मा को वाचिक कम्म कहते हैं। वाणी से पारस्परिक व्यवहार की सिद्धि के लिये किये जाने वाले व्यापार को ही शन्द कहते हैं। इस मथ का विशेष रूप से प्रतिपाय विषय शवदी है, प्रय में सर्व प्रथम शब्द के रिपय मे गुणत्व तथा द्रव्यत्व को धवलाते हुये शब्द के द्रव्यत्य को मिद पिया है। पुछ दाशनिक शब्द को आराश का गुण मानते हैं तथा कुछ शब्द को द्रव्य अथवा उसका पयाय मानता है, प्रियक्ता ने गुणत्व पक्ष को अस्वीकृत करते हुये अनेक प्रयल प्रमाणों से से शब्द को पुद्गल (प्रति ) द्रव्य का पयाय (अवस्था विशेष ) माना है। साथ ही शब्द किस किस प्रकार मनुष्यादि प्राणियों के शुभाशुभ का कारण बनता है इत्यादि पड़े अच्छे ढग से दिसलाया गया है, मनुष्य तिन शदी या शल समूहों का व्यवहार सिद्धयर्थ प्रयोग फरते हैं डाके पतिपय भेदा तथा अवान्तर भेदों का भी यही सुदर सरल तथा सुचौध शैली से वणन किया गया है। शब्द को मोट २ सत्य भाषा, असत्यभापा, मिश्र तथा व्यवहार मापा रूप धार भेदों की सुन्दर रूप स वणन करन क साथ साथ उनके प्रयाउर भेदा का भी बड़ी उत्तमता से वर्णन किया है। वर्णन शैली इतनी सरल है कि साधारण शान रखने वाला पुरुष भी प्रथ प्रतिपादित विषय को सरलता से पान सकता है। शब्द द्रश्यत्व,गद के मत्य भाषा आदि भदों क भापा, प्रदर्शन एन वणन के अनन्तर इन सब के जनक तया उपोभका पुरुप ( जीव ) का घणन बड़ी दौन होदशा में उसके अनुरूप ही किया गया है क्योंकि संसार में फंसा हुमा जीप अपने अज्ञान के कारण ही शिष्टाचार तथा शास्त्रों द्वारा सात तथा प्रतिपादित धर्म (क्त्त यार्म)को छोडकर वं अपने चन्तरात्मा की पत्तव्य क्मों में प्ररक अत्तनि को दया र हिंसाचनृत भाषण, व्यभिचार, पाम, क्रोध, लोभ, मोह आदि अन्त शत्रुश्री के घेरे मे आजाता है, कामादि अत शत्रों का अनुयायो धन अनिष्ट कायां मे प्रवृत्त हो जाता है मलों से युग होन के कारण उपर को उभर नहीं पाता, अपितु तिनोंदिन समारगच में गिरता चला जाता है। अत एव मुग्ध रूप चामलक्ष्य को प्राप्त नहीं करता अपितु लक्ष्य में कोमों दूर हटता जाता है। और पायत्र (इन्ट ) क समान उव नीच योगियों में चक्कर काटता रहता है।मय के अतम जीव को उपरिनिष्ठि मान हीन दशा को दिखाने याद परम कारुणिक भगवान् श्री महावीर सामीनी महागन द्वारा मुन्र सारगर्मिन फिन्तु सक्षिप्त रूपण जोर को मोक्ष (निर्वाणपद) प्राप्त्यय पदश दिया गया है जो कि मन्थ का अन्तिम लक्ष्य है। प्रथ का नाम, माय के प्रतिपाद्य विषय के अनुरूप "जीव शद याद" रमसा गया है। निससे पाठ गण अन्य को आद्योपात पदने मे पून ही प्रध के राम मात्र से उस के प्रतिपाय विषय का समग लंगप्रय के निमावा है 'उत्तराभ्ययन सूत्र, -ध- दशाश्रुतस्कन्धसन, अनुयोगवार, नशवैशलिक सून, तरवार्थ सूत्र, जैनागम समन्वय, जैनतत्त्वलकाविकास, जैनागमों में अष्टागयोग, श्रादि आदि के अनुवादक तथा निर्माता मुनिवर श्री १००८ उपाध्याय श्री श्रआत्मारामती महाराज | उपरिनिर्दिष्ट टीरारूपण अथवा स्वत वया लिसे गये प्रथ रत्न ही आप के परिचायक हैं। आप सी शात गम्भीर एप सरल लेखन शैली हा आप विशिष्ट स्वाध्याय तथा विद्वत्ता की ओर सङ्केत पर रही है। अत मं धम, पिपासु विज्ञ पठकों से अनुरोध है कि वे अपने अतिम ध्यय मुग्य प्राप्ति के लिये ससार के अनुत्तम सुख साधन शट के औचित्यानाचित्य का ज्ञान करने क लिये उत्तप्रन्थ रत्न का समतो भावन अपना, पार मर हित चितक मुनिवर उपाध्यायजी के प्रयत्न को सफल बनाते हुये परम सुम्प क भागी बनें। ज्येष्ट भुला पचमी स०२००१ वि० विश्वनाथ शास्त्री शुद्धि पत्र पृष्ठ पक्ति ग्रीष्मेतु प्रीष्मऋतु १ ३ कभी कमी भला भली २ उष्णता उष्णता २ क्षताएं ३ १ जन्त ३ २ और पुन स० यह पाठ एक बार ३ १३-१४ सपत्र सर्वत्र 30 . -- पूर्वक पूर्वक ने x २१ भ्रमण श्रमण ५ ३ १ स्नग्ध स्निग्ध ६ ६ वर्ष निर्मल निमल ६ शरीरिक शारीरिक ६ अशुद्ध पृष्ठ पक्ति चोप्य वीर्य १ त्यरूप स्वरूप १० वान वर्णन १३ क्सिा किसी १ को x ३ पए वर्ण २० १ धम धम १० श्रसरयात बसस्यात नीचसे कोचचे १३ कुलवद्धन फुल वर्द्धन २६ १३ जा जो * भी १४ कृष्वर्ण कृष्णवर्ण দিঃ প্রায় कहता मिल जाता है - अशुद्ध शुद्ध पृष्ठ पक्ति . यथेष्ठ यथेष्ट १० उच्छखल उच्छ्सल ३६ ५ प्रमाणु परमाणु १६ ३६ . प्रमाणुओं विवाददरा '- कूटसाक्षी भागयों में परमाणुओं विवादद्वारा कूटसाक्षी आगमों में ४० ६ ४० विश्वास विश्वास ३ निक्षत्र निलज्ज ४४ ह यह वगमें वगमें छूटन छूटने बातइए पताइए 7 श्रातागण श्रोतागण ४७ -- अशुद्ध प्रष्ठ पति पदापए पदापण ७ सघारत सटित k प्रप्रसन्न अप्रमन्न है सम्यजन अदित जीवित ५१ : सूर्य तो * २२ दोग- होगी ५२ १ व्यतद ध्यतात देनदा दनदार ५२ मामात्र भाभास १५ दो दागा ५ २० अपूष अपूष १ 5 अशुद्ध शुद्ध पृष्ठ पक्ति मे। मेरा अप आप ६ काय कार्य ५७ जीन जीवन १६ दशन १ रखता रखता २२ अब ०२ अवहूं पोने घोलन ६४ ८ क ६५ जपा कृपा २ पस्थिति परिस्थिनि

No text on this page.

जीव-शब्द द-सम्बाद
नमोत्थुण समरणस्म भगमयो महावीरस्स"
प्रीम प्रश्न का अवमान और वर्षा का प्रारम्भ।
भासर की प्रचण्ड किरणों से संतप्त भूमी जनता फेस ताप
का अधिक कारण घन रही थी। अधिक उमासे वह व्याउल
हो उठी थी । परिश्रम करते हुए प्राणिगण मवेद से भीगे जारहे
थ। चारोतरफ उघयता का ही साम्राय था । प्रत्येक स्थान
अशान्तिप्रद होरहा था । जलाशय भी सूरन गये थे। इसलिये
चहा पर भी प्राणियों को शान्ति का लाभ नहीं होता था।
इधर उध्ण वायु अपने तीव्र वेग से जतना को और भी दुखी
कर रहा था। पन के अनेक पशु पक्षी गण जनाशयों में
पानी न होने के कारण पिपासा के मारे दोन मुख होरहे थे।
अनेक प्रकार के शीतल उपचार करने पर भी सन्ताप में भी
नहीं होती थी। प्रेमीजनों के आमोद प्रमोद उप्णता के माताप
से विफल हो रहे थे । चन्दनादि शातल पदार्था का उपचार भी
सन्ताप शान्ति के लिये माथा अपर्याप्त हो रहा था। पथिक
जनों का गमन मार्ग भी निाद्ध होगया था।
धूप
के मारे वेचलने

(२) म पमा होरहे थे। वृक्षों का सौदर्य भी भया पता में घुषा था, पर बिहारों में भी नर नारियों के पिच को रात नहीं मिलती थी व्यापारिफ लोग व्यापार म उदामीनता र पर रहे थे । प्रत्येक पदार्थ म निसरी प्रचण्डता के हो दर्शन हो थे। शान्ति का यही नाम तक नही था। पृक्ष और कनापिनर आदि सय सूर्य र निभाण से बारहे थे प्रेमी दशा में अर्थ और जनास की अवस्था इससे सर्वथा विपरीत यो जिस प्रार सजनों कोदुखी देयार दुर्जन पुरुषों के हदय यिमित हो जान है, उसी प्रार'-पता की अधिकता से जय प्राय वृष अपना शोभा से रहिस हो रहे थे तब शत्रुकी भाति ये दोनों अक और नास अपने में फूले नही समाते थे।अर्थान् मला भाति पूल फ्ले हुए थे । परन्तु जनता पोहाये यमित होने में कई नही था। जिम प्रकार प्रत शील-स्वदार मातोपी पुरुप को पएय स्वीका प्रत्यव सुन्दर वेप भी मोहित नहीं कर मकना उसी प्रकार प्रवासादि बनरपेतिय भी अपने फूलन पालने म अमता के हदय को प्रेसनंनदीवर सकतीपयत्ता से व्याकुल हुए पशुपक्षी जिव्हा निकाते हुए शीतलता के लिये सड़प रहेथे । सम अक्रमात ही आकाश में बादलों की जमघट दिखाई देने लगा। उसको देख कर लोगों के हृदय में कुछ प्राशा का संचार हुआ। दग्य हो रहे 'ये कि आदला ने घरसना शुरू कर दिया और सदर बरसे कि सारी भूमि का सत्ताप दूर होगया । पशु पक्षि गण मानद के मार विभोर हो उठे धूतो में नये जीरन का मंचार हुआ।

( - चिरकाल से मुरमाई हुई पुष्प लत्तायें प्रहित हो उठी। चारो तरफ हरयाली ही हरयाली नजर आन लगी। उध्यता जन्त सन्ताप को जनता भूलसी गई। जिस प्रकार रवि के उज्य होते ही अधकार भाग जाता है -मी प्रकार अपी के श्रागमन से ही उष्णता भाग निकली। श्रर वनों और उद्यान की शोभा दखने योग्य थी । विविध प्रशर के सुन्दर पुष्पों की दर्शनीय श्रामा पान द मे विभोर हुप पक्षिगणों का गान, मयूरों का नृत्य और पल्लावित हुई वृक्षावला की अपूर शोभा, देशकों क मनों को यहलाकर अपना तरफ सेंच रहा यौ। उस समय अमन्द मुग घ युक्त शातल वायुका' सचार, और भ्रमरों के गुंजारत का प्रचार बहुत हा सुरर प्रद मालूम दता था। निस प्रकार दुजों के सग से कभी सजन पुरुष भी विचार को माप्त हो जाते हैं, और पुन सजनों संग अपन वास्तविक स्वप म आजात हैं, और पुन सजनों क सग से अपने वास्तविक खरूप म आ जाते हैं, उसा प्रकार सन्तप्त भूमि की भी वही दशा हुई। यह अपनी उघाता को त्याग कर मौम्य स्वरूप में आगई। जिधर देयो आनन्द ही आन द दिखाई देता था । इस ममय रानगृह नगर के ईशान कोण में होन वाले गुण शैल नाम के चैत्य उपान की शोभा तो विशेष रूप से दर्शनीय हो रही थी। प्रत्येक वृक्ष फ्लों मे लदा हुश्रा, पुष्प लताओं से व्याप्त होर अपूर शाम दे रहा था | स्थान र पर अतिम रूप से सनी हुइ छोटी २ पुष्पवाटिकोयें दशकों को अपनी और

-
-
आकर्षित र रही थी। प्रागन्तुकों के स्वागत के लिये उ7
भूमी ने सयंत्र मानों ही मरम्मन विदा ग्मी थी। पणि
अपने मधुर संगीन से डाम मनोविशाद परने में ससर !
भ्रमगें की गुंजार पनि म प्रमु पीना पापामार गिर
रहा था। म २ पायु से प्रेरित हुए सता गुन, अपन कर
पल्लयों से भागतुओं का मानो सप्रेम सागत करते हुए दिखाई
दत थे। कभी २ श्राश म दिपाई दन याना मेघगाला की
गजना में मयू की करा पाणो सार उशाम को जगा दतो थी।
उसस अनियनित हुआ गुण शैल नयन अपन हर्षातिरक का
पूण रूप स व्यक्त कर रहा था अधिक क्या य उम समय
ता वह माक्षात् नन्दन यनी शोभा का धारण कर रहा था।
गुण शल चत्य दान में पूनायर फ समान एक यदी ही
मन्य उद्यान शाला थी जिस में महत्रों नर नारी सुपूषक पेठ
सक्त थे । उस उद्यान शाला म अपने शिष्य परिवार के साथ,
सिहासनाकार पीठ-पलक पर विराने हुए भमण भगवान
श्री महावीर स्वामी, मध्याह के सूर्य समान द्रव्य और माय रूप
अधिकार का नाश करते हुए अपने अतिशय ज्ञान का प्रशरा पर
रहे थे । इतने म अाकाश प्रदश म मघ की गजना हुए उसक
गम्मीर शब्द का महमा मुन पर यहां पर येठा हुआ प्रमण संघ
अपने मन में अनाप्रम के विचार करने लगा, सय भावान्
ने उनको सम्बोधित करके इस प्रकार घोले-
६ श्रमों ? तुम मेघ गतना को सुन कर महसा चौक उठ
.

हा, और उमके विषय में तरह २ के विकल्प कर रहे हो, आयो । पान में तुगको इस विषय के रहस्य को समझाऊँ ? यह तुनत ही भ्रमण सघ को यहा हर्ष हुश्रा और परस्पर में एक दूसरे से बहन लगे कि आन हमारा अहोभाग्य है जो कि भगवान न हम मम्बोधित कर चुनाया है । और न जाने भाज हम किस अपूर्व तत्व की प्राप्ति हो ? इस प्रकार परस्पर विचार करता हुआ श्रमण और श्रमणो ममुदाय भगवान की सेवा में उपस्थित होकर यथा निर्दिष्ट स्थान पर शाति पूर्वक बैठ गया और भगान के मुखारविन्द मारन्द का निनिमेप दृष्टि से मानन्द पान करन लगा? तर उस अ आनन्द में विभोर हुश्रा वह श्रमण संघ क्या देवता है कि भगा के चरणों के समीप दो पुरुष और चार कुमारी यालिकाएँ हाथ जोड़े और मस्तक मुकाए हुए उपस्थित है, उनम एक पुरुप विचित्र वस्त्र धारण किए हुए है और एक पालिरा जो कि सोलह वर्ष की अवस्था म अपूर्व रूपलावण्य से मुशाभिन होती हुइ एक परम मुदर प्रतिस्पच्छ निमल बहुमूल्य श्वेत वस्न को धारण कर भगवान के चरणों में हाथ जोडे खड़ी है। उमफे भ्रमर सश श्रत्य त कृष्ण वर्ण के केश, और उसका माहाप लावण्य धन दयी रूप लावण्य को भी लजित करता था। इसक पास हो १६ यप का यौवन मम्पन्ना एक दूसरा कन्या खड़ा है जो कि कृष्ण वर्ण भी और कृष्ण वर्ण के ही वस्त्रों को धारण एि हुए भगवान की सेना म उपस्थित है । उसका श्याम वर्ण सजल मेध-पटल की श्यामता के समान अत्यत स्निग्ध और अत्यत मनोहर था। इसलिए कृष्ण वर्ण होते हुए भी वह रूप लावण्य में प्रथम बालिका से किसी प्रकार भी कम नहीं थी। तीसरी पोडशवर्षीर। यालिफा भी हाथ जोडे यहीं पर सही थी। वह सामा य रूप को धारण कर रही थी। उसका रूप यदि विशेष शोभनीय नहीं तो निदनीय भी नहीं था। उसके शरीर पर तीन रग के वान थे। श्वत, श्याम और पौत । रंग के संयोग से चरनों की शोभा भी कुछ कम नहीं थी। चौथी बालिराजोकि रूप लारण्य म सप मे विशेषता रखती थी, हर वस्त्रों से सुसज्जित होकर भगवान के चरण कमलों म उपस्थित हो रही थी, और इन पांचा के अतिरिक्त छठा पुरुष भी नतमस्तक होकर भगान की पर्युपासना म लीन हुआ उनके चरणों के समीप खड़ा था। उसम रूपलावण्य भी प्रशसनीय था, वह दशकों को अपगी ओर प्रारर्पित करने में अधिक निपुणता को लिये हुए था। उसके भति निमल स्वच्छ वस्त्र किंचित लालिमा को लिए उसकी शरीरिक शोभा को और भी दोयाला कर रहे थे। सब से प्रथम उसने हा घडे विनीत भाव से भगवान के समीप अपना हार्दिक भार प्रस्ट करने का साहस क्यिा । वह बोला-भगवन् । श्राप अनाओं के नाम, जगत-वत्मल एन त्रिलोकीनाथ है, तथा अनन्त ज्ञान, अन त-दर्शी और धनत बीय्य के धारक होने से सर्वज्ञ, सर्वदशी और सर्व शक्ति-सम्पन्न हैं। श्रत सत्र से प्रथम मेरी आत्मस्या को सुनन की कृपा करें।

इसके उत्तर में प्रमु कुछ कहे, इससे पूर्व हो, पहले पुरुष ने कहा कि भगवान् । इससे भी प्रथम मेरी आत्म कथा सुनने लायक है। आप कृपया प्रथम उमे मुनें, अनी उसकी यात पूरी भी होने नहीं पाई थी कि वे चारों न्यायें बीच में ही बोल पड़ी कि भगवान् । आप सरगुण सम्पन, परम-दयालु और न्यायशील हैं। अत हम अवलाश्रा को इन गेनों से पहले अपनी २ श्रात्मकथा कहने का अवमर प्रदान करने की कृपा करें। इस प्रकार अपनी अपनी अात्मस्था के निवेदन में प्रथम समय लेने की भागक्षा से आगे बढते हुए उन मय को सम्बोधित कर प्रमु घोले-कि तुम लोग इस प्रकार कोलाहल मत करो १ क्रम पूर्वदा हम पिसे आमा दत हैं वही अपनी आत्मकथा को सुनाने के fav प्रसर होवे, और दूसरे चुपचाप सुनते रहें । भगवान् । इम पादशसे पास में पैठे हुए श्रमण संघ की प्रस्तुन विषय का मुनने को और भी उरएठा यदी । वह अधीरता से उस समा की प्रतक्षा करन लगा जब कि उनमें से कोई व्यक्ति अपना श्रामस्या को प्रारम्भ करे। इतने में प्रभु का इशारा-पाते। प्रथम पुरूप न अपना वक्तव्य इस प्रकार प्रभु के समक्ष मारम्स क्यिा। भगवान् ? मेरा नाम शब्द है, मैं ससार की यथावत् व्यव। करने वाला हूँ। मेरे प्रभाव से हो-[शब्द को सुनकर ] ससा, जीव शान व प्रशारदशा को प्राप्त करते हैं। उनके वध मौर मोक्ष की व्यवस्था भी मरे हो शासन के आश्रित है। मगरन् ।

मरे मुख्य दो भेद है * प्रथात् भाषा और ना भाषा मे परिणन * दुविहे सई प० त-भाषा सह येव, णो भासा सद्दे चेय, माला स दुविहे ५० त०-अवसर- सम्बद्ध-चर, न-प्रशस्वर-सम्बद्ध चेर, णों-भासा-महे दुषिद्दे पनते त भाउमा सह चेर, णो पाउमा सद चेर, श्राउजा-सह दुविहे १० त०-तते घेर रितते चे, तते दुविहे प० त-धणे चेर मुमिरे चैत्र विततेवि, ये पाउना-सद दुविह-पनते त---भूसरए-म चेर ना-भूम-मद चेव, णा-भूमण-सद दुविहे १० त०-ताल-सद्दे चर लतित्रा-सई चेब, दोहि ठाणेहिं सरप्याने सिया, तजदामादमताण चा पुग्गलाय सप्पाप सिया भिजताण चेव पोगालाण सदुप्यार सि । (ठाणाग सू० स्था० २ उई • ३ स०८१) याल्पा-श्रस्य च पूर्व सपनेणायम भनघ - दशानन्तरोद्देशान्यपसूने देवाना शरारम्ति तरच शब्दात प्राहका मातात्यत्र शन स्तारनिरुप्यने इत्येर सम्ब धस्यास्य याख्या सा च मुकरे, नार भाषा शो भग्पापर्याप्नि-नामक दयापारिता जार शल इतरस्तु नो मापा श- पथक्षरमम्बरोचण-व्यक्तिमान् ना अक्षरसर दस्त्वितर इति, २ श्रातीति तस्य य शन्द स तथा ना श्रातोदय शब्दो वशस्फोगदिख ३, ततयत्त त्री घ्रादियद्धमातोद्य, ४ तरच किंचिद् धन यया-जिनिकादि विचि छुपिर यथा-वीणापहा िक तजनित शन्दस्ता घन शुभिरश्चेति व्यपश्यिते ५, वितत ततविलक्षण मन्त्र्यादिरहित तदपि धन भागवत् शुधिर काइलादि-वत् तन शादी होकर मेरे दोस्वरूप हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त प्रत्येक भाषा में भी मैं दो प्रकार से परिणमन करता हू जैसे कि- (१) अक्षरसम्बधित भाषा, (0) नो अक्षर मयभित भाषा । नो मापा में विविध परिणमन यथा-प्राताद्य और नो प्रातोय । दोलम आदि का शव पातोद्य पहलाता है। और घास क फटने से जो शन्द निपलता है उसको नोभाताव कहते हैं। आतोद्य भी दो प्रकार का है-तत्री जय और उससे रहित । सथा तत्री के भी धन और सुपिर ऐसे दो भेद हैं। नो पातोप भी दो प्रकार का है-भूपण शद और ना-भूपण शब्द भूपण गर' भी दो प्रकार का है-जैसे ताल शब्द और पाप्य परिहार शन्द । भगवान् । मेरी उत्पत्ति पुद्गलज य है, पुद्गलों के सघात विततो घन शुषिरश्चात चतु स्थान के पुनरिदमय भारभ्यते-तत वाशादिक शेय, वितत पाहादिकम् । घन तु काश्यानाति, घशादि शुश्पर मतम् ॥ १॥ इति विवक्षाप्राधा याच न विराध) मन्तभ्य इति ६, भूपय नुपूरादि ना भूपण भूपणादन्यत् ७, ताना हस्तताल ,'लत्तियति कामका तामियानांयत्वेन न रिवक्षिता इति अपना "लतियास्ट्" ति पाणि- प्रहारशद ॥८॥ उक्ता शन्द मा, इतस्तर कारण निरूपणापाइ-टाहो' स्यादि, द्वाभ्या 'स्थानाभ्या' कारणाभ्या शब्दोराय -स्य द् भवेत् ६ 'सान्यमानाना च, सघातमापद्य नानास्ता कार्यभूत शायद स्यात् पाययय वा पगति राइन्य मानभ्य इत्यय 1 पुद्गनाना चादरपरियामाना या पगालामा ,एर मिरमानना-नीयोमानानां च यथा सदला नामिति (स्थानांगसूर, स्थान २, उद्देश,३, और भनन से में उत्पन्न होता हूँ। पभी जीय के द्वारा प्रकट होता है और कभा अजीर के द्वारा पक्मा पीय अजीव दोनों के द्वारा । और मर पुद्गल लोग के अन्त पयत्त विस्तृत हो जाते हैं। मेग मधुर-गान भला रिसे प्रिय नही लगता ? मैने अपना अधिकार नीर और अनीर सभी प्रकार के पदार्थों पर जमा रस्सा है, जनता म मेरो दमप्रसर से प्रमिद्धि हो रही है। घंटे के पोप में मेरा ही म्य स्वरूप है, वीणा को मधुरम्पनि म मेरा ही •दमरिह सह पनत त-नीहारि, (१) विदिमे, (२) सुबते, (३)भिने, (४) परिते, (५) इत दी। (६) रहस्से, (७) पुहुने, (८) न, काकणी, (६) लिंग्विणिस्मरे (१०)॥१॥ (टा. १,०७०५) व्याख्या- दसव" इत्यादि नीहारीमिलोगो" निधारी यवान् शब्दापण शन्दवत्, डिन निवृत्त पिरिम्ना-घेएनजित कादिशश्वत्, रून झाकादिशब्दात् , भिन्न कुशा पद्दतथदसत्, झझरितो जनम्तिो वा सत त्रीक-कररिकारिवायत्, दीचों-दीयवर्णाश्रित दूरभन्यो वा मेधारिशन्दात् , इस्यो हवयास विवक्षया लघुवा धीयादिशन्दपत्, "पहत य ति पृथक्वे अनेकवे कोय ? नाना तूर्यादिन्द्र ययागे य स्वरा यमनशादिशब्दात् स पृयका इति सकराति सूझकर गीतपनि कालाति यारूट "तिरिसणा" ति किमिशी तुधरिएका तस्या स्परा धनि किकिणी स्वर ! (ठाणाग सू०स्था १० ७०५) ( ११-) गान है, काम की वाणी मे शिरूप मे मेराही श्राभास है, मेघों की गर्जना, शख को घोषणा और पत्तियों के मद-स्वर मे मेरा हो पालाप होता है। मसार में पितने वाद, सम्बाद दृष्टिगोचर होते हैं, उन पर मेरा ही एक मात्र प्राधिपत्य है, न्यायालयों में वादी प्रतिवादो के स्वरूप का निमाण मेरे बाग ही निष्पन्न होता है। ससार के जितने भी जीव हैं, उनकी हर प्रकार की याना मेरे ही अधीन है। भगवान् । कहा तक कहैं ममार का सारा व्यवहार एक मात्र मेरे पर ही निभर है। प्रभो ! मेरा परिणमन दो प्रकार से होता है। एक शुभ रूप, और दूसरा अशुभ-रूप । सम्पुर्ण श्रुतज्ञान का प्रदशन मेरे ही द्वारा किया जाता है। मभ्यग-श्रुत और मिथ्या श्रुत दानों का उपदष्टा मैं ही हूँ। स्वाध्याय, वाचना, पृच्छा, अनुत्ति और नम क्था आदि मे सर्वर मेरा ही प्रमुख है। ससारवर्ती जीवों को सम्यक्त्व का लाभ करा कर ससार-समुद्र से पार क्राना और मिण्यार के द्वारा ससार में गोत सिलाना मेर बाएँ हाथ का सल है। शात आत्मा को प्रोधादि पायों से व्याकुल करना प्रोर क्रोधादि से अभिभूत आत्मा को पाय-रहित बनाना मेर ही अधिकार म है। भगवान् । मैं अपने प्रभाव का कहा तक वणन करू ? मेर उप्रवरूप से (घोर शब्द से) मारी भूमी काप उठती है, पशु पक्षी नरत हो उठते हैं, ससार मे हलचल पर जाती है। यह मेरा सर्वसम्मत प्रभाव है। मेरा व्यक्त-स्थल स्वरूप तो सब के अनुभव मे श्राता है परन्तु मेरे सूक्ष्म स्वरूप का ।

छद्मथ आत्मा नहीं जान सकता। कोइ र वादी मुझे श्राश का गुण मानते हैं पर मैं प्रामाश का गुण होकर पौद्लक अथात पद्गुल का पयाय रूप हूँ। *हम योल कायस्थ यात्मा सरमाय से नहा जान सक्ता उहमें शम का भा निर्देश है यथा-'दम टाणार चउमत्येवमाणन नागद न पामद तनहा घम्मरियाय (1) श्रधम्मरियाय (२) श्रागासत्यिकाय (३) अमरीपडियद्ध, (४) परमाणु-पगलं, (५), (६) गथ (७) यात ८)श्चय जिणे भविस्ताद पाणयः भविस्म, (६)शय स दुक्रवाए अन्त कमरेस्सति या न मा कोस्मद (१०) एयाणि च उरए गनाए दसणाघरे अरहा जिसे देवली मध्वमावेश नाणह पासइ तनहा धम्मस्थिकाय जाब घरेस्सति या न मा वरस्मन्ति। (भगवती शतर ८ उर्द-सू. २१७) भागाथ-धमास्तिकाय, अधमास्तकाय, श्राकाशास्तिकाय, शरार रित जीव, परमाणु पुदगल, शय, गध और यायु तथा यह जिन होगा कि नहा ' यह सा दुखों का अन्त करेगा या नहीं इन दस बातो को हास्य यात्मा सब प्रकार सदा जान सकता! किन्तु जो रिहत लिन वाला है वही सर्व प्रकार से जानते हैं। x सधयार उत्र! अौरमा दायातवोह था। वएप गध पासा, पुणभाय तु नमपए ॥ १२ ॥ (छाया)-राजयकार उयत प्रमा छायातप इति वा । वर्ण-रस गध-सशा, पुद्गलाना तु लक्षणम् ।। १२ ।। (उत्तराध्ययन १०२८) (१३) भगवान् । मेरे परमाणु अत्यत सूक्ष्म होने पर भी वे मन पर यड़ा ही विलक्षण प्रभाव डालते हैं। संसार का व्यापारी वर्ग तो प्राय मरे पर हा निमर है, टेलीफोन ( Telephone ) में मेरा स्वरूप कितना स्फुट और रेडियों ( Radio ) मे मेरी व्यापकता कितनी प्रस्ट है। यह तो आजकल सभी को ज्ञात है। हजारों कोसों दूर में बैठे हुए लागों को घर बैठे समाचार पहुचाना यह कोई साधारण यात नहीं है। तथा प्रामोफोन (Gramophone ) यन न मेरी प्रोदगालकता को म्फुट करने म किसी प्रकार की भी कसर नहीं रक्सी फिर भी मुझे आकाश का गुण कहना य मानना एक प्रकार की धृष्टता के सिवाय और क्या हो सकता है ? सर्वज्ञादय । अन्त में आपके श्रीचरणों में मेरी विनम्र शन्दों में प्रार्थना है कि आप सज्ञ और सर्वदर्शी । मत आप मेरे स्वरूप को पूर्ण रूप से जानते हैं ? परन्तु फिर भी मैं यही प्राथना करूगा कि सय से बड़ा मैं ससार के सब कार्यों को निष्पन्न परने में मैं सब प्रकार से समर्थ हूं इमलिए प्रथम मेरा ही विपय आप वणन करने की कृपा करें, पण 'मैं अपना स्थान ग्रहण करता हूँ। इस प्रकार प्रथम मुरुप का भाषण समाप्त होने पर भगवान् की अनुमति से पहली पाइश वर्षीया कन्या-जो कि शेत वस्त्र धारण विए हुए अपने रूप लावण्य से दर्शकों के पित्तों को धार्पित कर रही थी, भगवान् के पर-कमलों में उपस्थित -होकर विनय पूर्वक प्रार्थना करती हुई बोली- . सय 1 - (१४ ) भगवन् । मेरा' नाम सत्य भापा है । मेरा नाम भी गुणनिष्पा है, जैसा मेरा नाम है उसके अनुरूप ही मेरा काम है। मैं सदा सत्य ही योला करती हैं। इस प्रथम पुरप-शब्द ने भाप श्री के समुस जो कुछ भी निवेदन किया है, मैं तो उसे मात्र प्रलाप मममती हूँ। कारण-एक तो यह व्यभिचारी है, कभी जीव के अश्रित हो जाता है और कभी अजीव के तथा कभी दोनों के, फिर यह भी निश्चय नहीं होने पाता कि यह शब्द सत्य है या मिथ्या । मालूम होता है कि इसने इसीलिये अपने साथ किसी विशेषण को नहीं रक्सा । क्या ऐसा व्यक्ति कभी प्रामाणिक माना जा सकता है ? यदि मेरे विषय में पूछा जाय तो मैंने तो पेवत जीर का ही श्राश्रय लिया हुआ है। उससे भिन्न मेरा कोई आश्रय नहीं, यद्यपि मैं प्रात्मा से भिन हूँ • तथापि आत्मा के आभित * रायगीहे जाव एर क्यासी श्रायभते ! भाग प्रमाभासा ! गोयमा ना ऋोया मामा अन्ना मासा, रुवि मते ? मामा अरूवि भासा ? गोयमा। रूनि भासा नो अरूवि मामा, सचिचा भते [मासा अचित्ता भासा ? गोयमा! नो सचित्ता भास अचिना भासा, जीवा मते भासा अनीता मामा ? गायमा नो जीवा मा अजीवा मासा, जीवाण मते ! भासा अजीवाण भामा ? गोयमा ! जीताण मामा नो जीवाण भामा, पुषि भंते !मासा भामिनमाणी भाला, मासा समय धीतिकाता मासा ? गायमा ! नो पुत्रि भामा भासि समापी माया यो माया ममपचीनिक्कता भासा, पुब्धि भते । मासा मिभनि, मामित्रमाणी भासा निनति भासा समय यातिक ता माता भिननि ! गोगमा ! ना पुलि मासा भिजति भासित्रमाणी भासा मिप्रति होकर ही रहती हैं। इस लिए मेरे मतीत्व में किसाप्रकार का भी ना भामा समय पातिवरता मासामिजति कति विहाय भने। मासापगगता! गायमा! चविहा मासा पपणत्ता, तजहा सच्चा मासा सचामासा प्रसञ्चा मोसा (ई० ४६३) टीचा-'रायगिद्दे" इत्यादि प्रायया मते ! मामति कास्याऽध्येय श्रात्मा श्रीवा भाषा नी स्वभावा मात्रय यतो जीवेन -गायत जीरस्य च बघ मोक्षार्थी भवति सनो जीव धमधाबीर इति व्ययदेशार्दा ज्ञानवदिति, अथान्या मापान मीन स्वमा आवेद्रिय ग्राह्यत्वेन भूत्ततयाऽऽत्मना पिलक्ष्यमादिति राप्रत प्रश्न । यत्रोत्तर-नो पाया भासत्ति, अमरूपा नामो भनि, पुद्गलमयत्वादात्मना च निसश्यमाणस्वात्तथा fলালশির, সুনাম্বাঘায়। ঘর নাইন সামান্য मात्र हा शनाचदेने कान्तिकम, नीव व्यापारस्य जीवादत्यन्त भिन्न पापविनादी दशनादिनि । रुविभते -मासात्रिमरिणी भदन्त ! भाषा आपस्यामहोपातकारियातया विधयोंमारण्यादिवत् इति शका, श्रत प्रश्न , उत्तर रूपिणी मपा, यवचनुप्राहात्तमरूपित्ताधनायकर, অনাবিক, কম মানুণিয়াৰ হানা ফানামৰি ৰালেনা भिमतवा ति, अनात्मापारि सचित्तासी भविष्यति बार शरीरात पृच्चमाइ-चित्तेत्यानि, उनर तु नासचिचा जीव निसा पुद्गल सहति हात्तथा शिष लोटरत्, तथा जीरा मद!"इत्यादि जावत तिमासा प्राय धारण सारा मारा, उत्तेतद्विलक्षणेनि प्रश्न श्रधातर नोजीवा, उन्हास्तादि पाशानानस्या प्रभागत् इति । १६ कैचिदम्युगम्यते अषया मापा, रमन मनराधारह जीगण मित्यादि, उनर ।

दोप नहीं आता ? मैं भापण से पूर्व य पश्यान माया नहीं कहलाती किन्तु जिम ममय मुझे कोई घोलता है, उसी ममय मैं भाषा कहलाती हैं मैं रूपी हैं, चित्त हैं, अजीव धौर जावो द्वारा प्रस्ट होती हैं। मीराना भाषा, वणना सल्वादियापार पल्लात् ताल्यानि व्यापारस्पर भीमश्रितत्वात् , यर्याचा जीवेभ्य शब्द उसने तथापि नासो भाया माय যায়ি ব্যাবৰ যুবক সান্তনামমার নি। যখ্য ৭ ' मित्यादि, अमोचर नौ पूर्व भाषाणात भाषा भवति मृशिपायाया घ ह, भाष्यमाणा-निसर्गारस्पायामाना मापा घरायस्यायो घर वरूप जिब, "हो" मैं भाषा समययतिमान्ता मापा ममया निसज्यमाना वस्थातो या गद् भाषा रिणाम समयस्तं “यतिमान्ता या तग मारा भवति, घ? समगन्तान्तप्रवत् कप लावस्थरत्यर्थ ।' पुगि" गते rमार, अनातर 'ना नै पूर्व निसर्गममया मापा द्रव्यभेदेन भाषा भियते, भाष्यमाणा भाषा भियते, श्रामवाभिवाय कश्चित पपनी का मवति सचा भिनाशदद्रयाणि निमूनाति, तानिय निरगन्यमवेया (मनत्वात् परिस्थरताच विभियन्ते, विभिर ननिच सल्यान योजना ग वा शब्द परिणाम त्यार मेव कुर्वन्ति कश्चितु महाप्रयत्नो मति स म्वल्लादान निसर्गप्रयत्नाम्यामित्येव सिजति नानि च सूक्ष्मताद् पद्धत्वाचा- नन्त गुण तृया बईमानाति परसु दिनु लोकान्तमाप्तुति, प्रत्र च ययामरस्थाया शब्द परिणामस्तस्या माध्यमाणताऽसयति, नौ मा समय थी इक्कते' ति परिताकत भाषा परिणामेर उत्कृप प्रयत्नस्य तानी नि सन्मादिति भाव [धमा सू० श० १३३ पृ.]

भगवान मेरे सूक्ष्म परमाणु चार * स्पर्श वाले हैं और वे लोक के अन्त तक जा सकते हैं उनकी गति असरयात पोजन र पर्यन्त होती है। जब सीकर देवों के जन्म आदि कल्याण को का समय आता है तयशक्त की आज्ञा स अभियोगिक दव, सुघोषा मुरचर नाम बाले घटे सेद्र के आदेश को सुनाता है, उसरा यह पचन घसीस लाख विमानों के घंटर मे जा पहुचता है तय यत्तीस लाख विमानों के दव अपने • घटों से इन्द्र के आदेश को मुनत हैं। 1 . * "मण्जोगे वय जोगेय च उपासे"-यूक्ष्म परिणाम पुगल स्पमत । र नुपर्श, ते च शीतो गा स्निग्ध रूक्षा (भगवनी सू० शत० १२ उद्दे०५] + मूल 'सए ण से परिणागमसी देवे पायत्ताणीया हिबई स्पण ३ जाप एव कुत्ते समाणे तुटु आव एव स्वाति प्राणाय विवरण चयए परिसुणे २ ताकस्स ३ अतियायो पाणिरसमइ २ साजरीव सभाए मुइम्मार मघाघरसि गम्भारमहुरयसद जो अपपरिमएहला सुधोसाधएग ऐन आगच्छाइ २ सा त मधोघरसि अगम्भार मारपरमद ज श्रण परिमण्डल सुधीत घरट तिमवृत्ती उल्लाद, तप ए तीसे मोघसि अगम्भी- रमहरयररुहाए जो भएपरिमण्डलाए सुघोसाएघ एगए तिरछुतो उल्लालि पाए घमाणाए सोम्मे कप्पे अएगोगिया िवत्तीभिागा बससयसहरसेदि श्ररणाद एग्णाइ बत्तीस घण्टामयसबासाह उमगसमग वणवणारा काउ पयत्ताह हुत्या इति, तए ण सोहम्मे कप्पे पसायमाण निगवरिश्रम इमम दिन घण्टा पहें सु आसयसहस्स संकुले जाए भावि हत्या इति, सस यं तेसि साइम्मकारवामोए यहूए वेमाणियार देवाण य देवीण य रहपमत्तणियामत्तरिसयसुहमच्छिमाण सूमरघण्यरसि अनि उलबोल पूरि श्वचरन पहियोगणे गए समाणे घासणकोऊहलदिएण वरण र गमाचित्त उपनमाणमाण से पायताणी वाहिवई देवे तमि घण्गरवासि निसतपदिसतमि समाणसिताय तय तरि२ देसे मझ्या मध्या सईण उम्पोसेमाणे २ एव क्यासीति त मुणतु भरता घहवे मान्म्म अण्णयामी वैमारिप्रदेवा देवाग्रोथ साइम्मकार वइयो हामो यथए दिवसुइत्य -थाणावर ए भो मका त चेर मार तिब्र पाउ मनहत्ति, व्यारया! ए ण से हरिणेगमेसी' इत्यादि, तत सहरिणेगमपी देव पदात्यनीकाधिपति शरद देवे द्रण दयराजा एवमुक्त सन् इष्ट इत्यादि यानदेव देव इति श्राशया विनयन वचन प्रति णात प्रतिश्रुत्यक शक्रान्तिकात् प्रनिनिस्मामति प्रतिनि'कम्य च य सभाया सुधर्माया मपापरतिगम्मीरमधुरतशम्दा योजनपरिमए'ला मुघोसा घएग तत्रोपाग च्छति उपागत्य च ता मेघौ पासितगम्भारमधुरताशब्दा यो जनप्रतिमण्डला मुपाषा घरी त्रिकत्व उमालयतीति, उल्लाल गानन्तर यदजायत सदार 'तार यसीमे मेघोररसि अगम्भीरमाहुरयर' इत्यादि, तत-उल्लालनानन्तर तस्या मघौधरसितगम्भीरमधुरतरश या योजनपरिमएडनाया सुघोषाया धगया पिल उल्लालितायां त्या सौधर्मे कल्पेश्रयेषु एकानेषु द्वात्रिंशविमानरूपा ये आवासा-देवयासस्थान नि तपा शतमहस्सु श्री सप्तम्पथे तृतीया श्रन्यायकोनानि द्वात्रिशद घएशतसहस्राणि कणकणाराव फत्तुं प्रवृत्ता यन्य भवन् , श्रनापिशब्दा भिन्नःमत्वात् घण्ट' शतमसाएयरि हत्येव योजनाय , श्रथ घाना तो यत् प्रवृत्त तदार 'तएण मिया, 'तता परगना एकसागरप्रवृत्तरनन्तर सौधम्म पल्लप्रासादाना यमसमक युगपत् भगवान् । मैं जनता म * चार रूप म प्रसिद्ध हो रही हैं। यथा-सत्य मापा, असत्य भापा, मिन मापा और व्यवहार भाषा। इन चारों का सर्व बालके तीर्थवराने घणन किया है तथा ये चारों विमानाना पा ये निष्पुटा-गम्मार प्रदेशास्ते ३ अारिता सम्प्राप्ता शम्दा दरगणा पुद्गलास्तेभ्य समुस्यितानि यानि घण्टाप्रतिश्रु ता- पएासम्बधि प्रतिशम्दानाशतसहस्राणि ते सकुलो जानश्चाप्यमर, किमुस्त भवति घरपया महता प्रयत्नेन ताहिताया ये रि निगता शन्द युगला स्तव्य तिघातात सर्वासु दिक्षु पिदित्तु च दिव्यानु भारत समुच्चलित प्रतिशब्दै सक्लो.रि सौधम्म कल्पो बधिर उपजायत इति, एते दशया जनेभ्य समामत शब्द धीनग्राह्यामवति न परत तत क्यमेकर ताडिताया घरगया सवत्र तच्छन्दश्रु निरुतायत इति यदुच्यत तदाकृतमयसय, सवय निपान भारत तयारूपशब्दाच्छल्ने यथोक्न दोषासम्मवात् , एव शब्दमये सोधमें करपे साते पदानिरतियद करोत् जम्बूद्वीर प्रशप्ति तीर्थकर जन्म मात्मव । * ग्रह मिक्यू ण मारणेना चत्तारि भासा जायाइ, तजहा सम्म गरम मानजय, ीय मस तदयसच्याभोंस, जर सच्च णेर भाम 'असच्चामास" रणाम त चउत्थ भामजात [७७t] ४सरेमि जे अतोना जेय पडुपमा जेय अयागता रहता भगरतो सरे ते ण्याणि चेचित्तारि मासजायाद मामिसु भासिस्सतिया, परपति सुना पणब्वतिया परणविस्मतिबा । सम्पादच णपाणि एणमप्राणि गध मनाशिरस वनाणि फसमत्राणि चारच या विपरिणाम पाद भवतीति समक्त्तायाइ [७७२] पाचराम सू० अ० १२३ १ ~ - हो यण, गन्ध रस और स्पर्श घाली, ण्य चय उपचय विपरिणाम धम को प्राप्त करती रहती हैं। परतु इन चारों में प्रधान स्थान मेराही है, क्योंकि मेग नाम सत्य भाषा है। मेरा व्यहार करने वाला ही लोक में सबसे अधिक प्रामाणिक माना जाता है। भगवन् । गौतमम्यामो के पूछने पर मेरे (अर्थात् पापा ) आदिकारण, मेरी उत्पत्ति और मेरे मस्थ तथा पययमा विषय में प्राप श्री ने जो कुछ * फर्माया है यह सर्वथा मनन करने योग्य है। मेरा आदि * मापारी भते 1 किमतीया किंगवा कि सरियाषि पत्रपमि । गम पाया जीवादीया सररमा यज्ज संठिया लागत परसिया पएणता,-'भासा क श्राय पभाति कतिहिव समाहि-मासति भान मासा कतिप्पगारा कतित्रा भामा-गुमाउ॥१॥ सरीरमा भासा दाहिय समयहि भासता भास । भासच चउप्यमार दारिणय माणा मता ३॥ २॥ प्रशाधना ए. भाषापद ११ टो-भार्ण मते ! विभाडया' इत्यादि, भाषा अश्याप मीन भूता समिति वाक्य लकारे, रिमादिका-उपादान कारण व्यक्तिरेषेण विभादि - मौल कारण यस्या सानिमाटिका तया कि प्रमरा-वस्मात् प्रमा-- उत्पादो यस्याइ सा कि प्रभवा, सत्यरि मौले कारणे पुन परमात् कारणा- सरा दुत्ययत इति भाव , तपा कि सस्थितेति-येा कारेण शस्थिता सिस्थिता कश्यवास्थानमस्या इति भाव , तथापियवासिता इति- करिमन् स्थाने पयवाधिदा-मिठागत कि पयवाहिता ! भगवानाइ-- गौतम जीया दिया' जीर शादि-मौल कारण यस्याः सामीपादिसा, मागत तथा विध प्रयत्न मतरेणा- बाप बीज भूत माया सभपात +म्मति श्राइ च भगवान् गदगदु स्वामो-तिरिइमि सारेमि जीयपाएमा हानि नीरस्स ! जहि ३ गेरहद गहणतो भासह मासयो मास ॥ १॥ कि पमया" इत्यस्य निरचनमाद-"शरीर प्रभ श्रौदारिक वैक्रिवादारया “यतमशरीरमामा भाषाद्रव्यविनिर्गते तथा किस स्थिता इत्यस्य निर्व- चन "वसस्थिता" यज्रस्येव सध्यान पस्या मा पनसस्थिता, भापाद्रयाणि हितारिधययन निमृगानि सन्ति मालमपि लोकमभिन्यान्नुवन्ति, लोकश्च मारस्थित इति मारि यत्रसास्थना, कि पयामितेरान्न निश्चन लोका तपयवमिता, परतां भाषा-द्रव्याणा गत्युप्रभा पस्तिकाभावतागमना प्रनतामया शेषश्नतीय कृमि || पुरपि प्रश्नमाह भासा क्ता य पभवा, इत्यादि, भाषा उत-- योगात् प्रभवति-उत्पद्यते, काययोगाद् वाग्मगाद वा । तथापति में स्मयभाषा भापते ? विम्बत मरत । तिमि समयानमृज्यमानद्र -स त्यात्मिका भाषा मानि, नया भाषा कति पुकागा कति प्रमे पति या भागा धूना वक्तुमनमता-अनुनाता अत्र निर्वाचनसरीर मा' इ. मादि श्री शरार ग्रहणेन शरारयाग परिगृह्यने, शार मात्र प्रमत्वस्य प्रागेर न तत्वात् शरिप्रभा इति कार्य ? काय-यग भग तथाहि कायय गेन म पा-यग्यान् पद्गलान् गोया माप लेन परिणमय्य धाग्योग निहनति, तत काययाग द् भ पा उत्सयत इति काय-योग- प्रभवे युनि, श्राइच भगवान् भद्रगधामी-गिएइ य कादएरा निमरह सर वा एमागे" -ति कह िव ममादि मामई भन्ममित्याच निवचन द्वाम्यो समयाभ्या भ पतं भाषा, तथानि-एक्न समयन भाषा या ५द्गनान् एति, द्विताये समये मात्वेन परिणमय्य जितीनि । - -- - प्रज्ञापना सून ११ भाषा :

पारण जीव है, मेरी उत्पति शरीर मे है मेग साथान यत्राशर और पर्यवसान लोरया अत है। अथात मेरे परमाणु लोक के अन्त तक जा सकते हैं। नथा श्री नती सन द्वारा यह तो 1 • मासासमसेटियो मद, ज मुगद मीमिय सुगा। वीसेती पुण सद्द मुणे। नियमा पराया ॥ ७e || (भाषा-समर्थगीत शर ययाति मिश्रित शरणादि । विधीगि पुन शब्द, शृणोति नियमात् पमधाने ॥) टीका-भासा-ममेत्यादि, माध्यते इति माया-वाब शब्द-रूपतया उत्सज्यमाना द्रय-म तति मा च वात्मिका मग भवामदि-रूपमा द्रष्टव्या, तस्या समा श्रेणयो नाम क्षत्र-प्रदेश-पस्तयामियन्ते, साश्च सवस्यैव भापमापस्य पानि पिय ते यायल्पृष्टा सत्ती भाषा प्रयम-समये एव लाका तमनुधावति, भाषा समय समणि-पदण विश्रण- “पयरछेदार्थ, भाषा-समणि इतो-रात प्राप्ता भाषा-मश्रेणीत माप सम-णिव्यवस्थित इत्यथ य शन्द पुरुषादि-साधिन म मधिन वा शृणोनि गत्तदानित्याभिसम्बधात् त मिन गाति, उत्युप-शब्द द्रव्य भाषिता-या तरालस्थ-द्रव्य मिश्र शृणातीति भानाथ । वीपटीत्यादि श्रमत इति वर्चते, ततोऽयमथ -विश्रोणि पुनरित प्राप्ता निभोहि व्यवस्थित पुनन्त्यिय अथवा विपरित तो रिश्रेणिरित्युच्यत शब्द गणाति नियमात् पराघात सोत, नायथा, रिमुक्त भवति ' उत्स्प्र-शब्द-द्रव्य शदा-( शन्द घ्या) भिवतेन यानि वामितानि शब्द द्रव्याणि तान्यव केलानि पात, न कदाचिदपि उत्सृष्टानि, पुत्त हात चत् उच्यते तेषामनु भिगम सात प्रतिस्ताभाराच । (नन्दी सत्र, सू० ३७ पृष्ट १०४) । स्पष्ट ही है । भाषा की ममत्रोण म रहा हुआ शन्द रूप से छोटा नाता हुआ पुद्गल समूह भापा कहलाता है, उसके प्रचाराध क्षेत्र प्रदेश का पतिया समणि है, जो हर एक चत्ता कछहो दिशाओं म होती हैं। उनमें छोडी गई भाषाएँ प्रथम ममय म ही लोकान्त तक चला जाती है, उन श्रेणियों में रहा हुश्रा जो सुनता है वह मिश्र-बीच ये शब्द द्रव्यों से मिश्रित शस्त को सुनता है, और विश्रण में नियम से पर द्रव्यों के अभिहत अर्थात् उत्कृष्ट शब्द दयां क अभिपात से आहत होने पर हा शब्द को सुनता है। इसप अतिरिक्त मेरा और महत्व देखिये-मैं सम्यग-दशन स युक्त होती हुइ पायों का यथाथ म्वर वणन कर रही है, स्था-धम अध, श्राश, काल, मोर और पुद्गल ये छहा द्रव्य अनादि अन त हैं। इन्हीं के समूह को लार वा जगत कहते हैं। अनादि 'नधन होन म इस लोक का कोई निमाता या कर्मफल नाता नहीं है। अनन्त आत्माएँ अपने २ द्रव्य गुण और पर्याय से युक्त है, वे जिम कारक कम परत है उमके अनुसार फल का स्वय उपभोग करते है "मम और पिमा व्यक्ति का सम्मथ नहीं है। यदि मझेर से कहूँ वो जान और प्रजाप ये दो ही द्रव्य है, फिर यदि व्यहार नय का प्राय लिया जाय तो इनका विस्तार नव तत्व के नाम से किया जाना है यथा-(१) नोवतत्त्व (क) अजीर-तत्व, (३) पुण्य-तत्त्व, (४) पाप-तत्त्व, (५) श्राश्रय तत्व, (६) मवर तत्व, (७) निर्जरातरव, () बन्य-तत्व, और (६) -- : मोक्षतत्व।

इन तत्वों के स्वरूप-निर्णय के लिये लिये मात नय, चार प्रमाण और चार निषा या अभिधान दिया गया है,इनक बाय सम्यग्दशन प्राप्त होता है। सबसदेव यह आत्मा नतोनि हैन अणु, किन्तु शरीर प्रमाण होता हुआ लोक ये असण्यात आकाश + प्रदेशांक समा7 अस ख्यात प्रदशी के धारण करने वाला है । मरा और सम सम्बध गमावासमेही भापा पर्याप्ति के नाम सहागया था। अत सम्यग् दर्शन कारण से मैं -मके और जगत् के स्वरूप को यथावस्प से वणन कर रहा है। प्रभो । मुझे हम रात की घड़ी हो प्रसन्नता है कि श्रापन भा अपो वचन योग में मेर को स्थाया है तथामस्वती नाम मुझे विरयात कर दिया है । यह मेर परम मौभाग्य को यात है। नाथ । मां के वशीभूत होकर यह लोक-मसार, नरक तिरंय, मनुष्य और दव-पयायां यो धारण कर रहा है। अधो- नोक में मात नरक हैं जिनमा अत्यात भयार स्वम्प मैन प्रापरे द्वारा आगमों म प्रदर्शित पिया है अंगमा मही उक्त विषय का परपजनता अवगत कर सरताहै। तियरलोक में असरयात द्वीप और समुद्र हैं, उनम श्रदाई द्वीप को छोड़कर शेष द्वीपी और ममुद्रो मे प्राय देव और तिरचा का निवास है। भगवन् । तियर लोक म पच स्थावर-पृथ्वीय, अपाय, लेजरकाय, वायुकाय और वहस्पतिकाय, तथा चार प्रस- दो यि वाल जीव, तीन इद्रिय वाले जीव, पार इद्रिय वाले और पाच इद्रिय वाले जीव, ग्न सय की तियों म गणना की जाती है। यद्यपि मनुष्य और दर भी पाच इन्द्रिय वाले होते हैं तथापि वह मनुष्य और देव गति वाले जीव कहे जाते हैं। पतितपावन | इस अतिरिक्त उध-लार म प्राय मानिस माय निवास स्थान है उनरे दिमागे का रचना बडो अद्भुत हानी । प्राय पान पुएर कम करन घाले जाच ही इन स्थाना म उत्पन्न होत ई । यहा इना ध्यान रह कि पुण्य का क्यन तो व्यवहार सापत है फितु बहुत से मुलभ-योधि जीर भावहा पर नगमान है, तथा पर भवावरी जान भी रहा पर विद्यमान है, पार लाक के त मसिद्ध भगवान विगतमान है जा जाम मरण र दुसों स मुक्त हारर अनर अमर वन हुए परमान द पद मोक्षपद को प्राप्त हो रहे हैं । इम गति को प्राप्त हान वाल जीव ही सिद्ध पद म अलवृत होते हैं ।कारण विज्ञानावरणीय आदि थाठ प्रसार क कर्मा का क्षय करप यह जार इस गनि-सिद्धगति को प्राप्त कर सकता है । तथा मैने जीय अनाय ए. रूरी, अस्पी पायों का यथार्थ तथा विस्तार से प्रापक प्रचन म कथन किया है। यह सर मम्यगदर्शन और सम्यग ज्ञान काही माहाल्य है क्योकि इन दोनों ही कारण भाषा की प्रवृत्ति होती है । मग अधिरु और स्पष्ट म्वरूप जैन- प्रवचन में दग्पना चाहिए। - से मेरी-अथात् सत्य तीर्थकर देव । मैंन जनता को व्यवहार और भावसाय मे प्रतिष्ठित करने के लिए दश प्रहार के रूपों को धारण कर रक्या

(२६)
। यथा--(१) जनपदसत्या, २) सम्मतसत्या, (३) स्थापनासत्या,
(४) नामसत्या, (५) रूपमत्या, (६) प्रतीत्यमत्या, (७) व्यवहार
मस्या (८) भावसत्या (6) यागमत्या पार (१०) आँपम्यमत्या -
(2)-मच्चाए मते। भामा पत्रात्तया पति विशालता!
गायमा ' सायदा १० हजहाजपयर घा, (१)सम्मयम्या (२)
व्यणस्थ, ३)नाम सच्चा (४) पसया, ( )पय सचा
(६) यार मचा (७) भार सया (८) जोग सभा (६)
श्रोवम्म सया, (१०) नव पममत टण नामे स्ने पहुच सरचय
चवहार भाव जागे दमम श्रारम्म स चेय।
"
थारया-पानराण भतइत्यानि भावित नर मत्या मृपा
चत्युक्त मत मत्या भेगमाय प्रश्नमा सञ्चार मते ! माया पत्तिया
पहारहायपरए ता, ति पठसिद्ध - भगवा- गायमा मानि।
"जर सच हात त त नमपदमधिकृत्येणर्य प्रसानि उनवतया
व्यवहार गुल्यात् मल्या जम्परस्त्य' यथा-कोकराए पय विश्वमित्या
1ि, मम्मन मन्या या मकन लोक पामत्येन मस्यतम प्रमिद्धा चुमुद
पुष बासनता मरमानासमानेऽपि प समरत्वे गोपाल जा श्रावित
मा पकज यत न कोषमित्यरशिदे पजामति मामत त्या (२)
स्थानामत्या य तथा घ मकादिपन्य - मुद्रा यास चापलाम्प
प्रयुज्यते यथा कक प्ररत! पिदुदर साहिन्मुगल म्य शतपि-मिति,
विभय महित सहसाममिति, तथात्तथा । ध मुद्रादि याममुग्लाम्य
मृत्तिका पु मापाय कार्याणा-यमिति (३) तथा नामत सत्या नाम
सत्या यथा कुलमबद्ध यी कुल पदैन इति, (४) तथा रूपता

. (२७) , सत्यो रूप सत्या, यथा दम्मतो गृहीत प्रव्रनित रूप प्रनितोऽयमिति, (५) तथा प्रतीत्य-आनित्य वरत्व तर स्त्या प्रतात्य स्सा, यथा अनामिकाया कनिष्यामधिकृत्य दीर्घन्च, मध्यमा मधिकृत्य हर त्व, नच वाच्य क्यमे कस्या हस्वत्व-दीयत्व च तात्विक परस्परविरोधादिति, भिन्न निमितन रोधासम्भवात् , तयाहि तामे-यदि कनिमा मध्यमा वा मामगुन्निमर्गकृत्य धन्यत्व दधत्य च प्रतिगत ततो राध मम्भवेत् निमित्त पर विरुद्धायदवासभन्, यदात्वेकामधिकृत्य इस्वत्यमपरामधिकृत्य दाघव सदा सत्वासस्वयारिख मिन निमितवामपरस्पर विराध , अधयादे तात्विके हस्पतदीर्थत्वे तत ऋजुत्ववकत्वे व वस्मात्ते परनिरपक्ष। प्रतिभासत ? द्विविधादि घरतुनो धर्मा-सहकारि व्यग्य रूप इतरेच,, तत्रये महकारि, व्यङ्गयरूगास्ते महकारि सम्पयशात्प्रतीताथमा त, यथा पृयिध्या जल सम्पकता गघ, इतरेत्वेवमाप यथा पुरादि गध , हदायत्वे अपिच सहकारि व्यग्य रूप, ततस्ते सकाएमासान्या नि यतिमाय त इत्यदाप , (६) तया व्यवहारो-लाकविवक्षा व्यवहारत सत्या बार-मत्या यया गिरिदाते, गलति भाजन अनुदरा क्या नमालिका एहका, लोकाहि-गिरिंगततृणताहे तृणादिना मह गिरेग्मंद विक्षिता गरिदह्यते इनि पन्ति, भाजनादुर के प्रति उदकभाजनयार भेट विनित्या गलति माजन मिति, मम्मागजिप्रभवोदगभावे श्रनुदरा इति, लवनयोग्य मामावेऽलामिनि, ततो लोक यवहारमपेपर साधरपि तथा व वता भाषा व्यवगरमत्या भवति, (७) सथा-भावो वाद- भावन सत्या भार सत्या, किमुक्त भवनि ? यो मावा वर्णादियस्मिन वटा भवति देन या सत्या श्री ) भाग्मत्या, यथा सत्यति ५५ -3 (१) जनपदमत्या निमदश मनिमय के निरजिमशर की प्रतही उमो प्रधबाध के लिरमीशब्द का पार करना जनपद सत्य पहलता है। जैग योनादि दशो म पय उससे पिच महत है। इसका भार यह है कि निम दशम निम अर्थ यलिये जोश प्रालित होन्मी प्रथ कलिय उमी दशम ममारण करना मत्य पहा जाता है। मासय कि श्रान दश की भाषा सत्य हो जाता है, इमो का नाम जनम मत्य है। ( मम्मतमत्या-नोलार को सम्मान र प्रतिको गद हो अथवा नोक म म शदम क्मिागेर अध का योधो मे सम्मान मत्य यहत हैं यथा परनया श्रथ रमल यापि पराम) कीचड़ में उ महान पालर rb पनाथ पो पंज पहा जा मरना है म प्राप-बीर मनोर। शाद- मैं रो भी 47 मरते है तथापि ज ता म पान " काध परल कमल प्रसिद्ध है मिलिय मात्र के लिये पान शन या प्रयाग करना मम्मा मत्य यहा जता रानो ममर नाका शुक्न त भया या -मम्ध रस्मत् ा योगा सब छत्रयागात् विधन्ति ग प्रग काल छाभावा एष यमस्य मात् इत्रा तरह यमात् टए (६) Pा यथा समुद्रनिहाग (१.) अशर्षे विनयजन तुप्राय समग MINIK गएर माय ठाए, या भावनाया।

( ६ ) राजिस अध में सर्व लोक सम्मत हो रहा हो इस श्रथ के लिये इस शब्द का उत्चारण करना सत्य ही है। (३) स्थापासत्य-जिस यस्तु की स्थापना जनता में प्रसिद्ध हो उससे स्थापना सत्य कहते हैं। जैसे अंकादिविन्यास क्या मुद्रावि याम । यथा-1 के आगे एक बिदु हो तो दस, दो हों तो सौ तीन हो तो सहस्र इत्यादि । मुद्राविन्यास-जैसे मृत्तिकादि फकिमीश विशेष में माशा और तोला आदि का पियास अर्थात् यह माशा है यह तोला है इत्यालि, क्या राजकीय अफ- यास सई स्थापनासत्य में परिगणित किये जाते हैं यथा- वतमान समय में प्रचलित नोट आदि। (४ नामसत्य-गुण निष्पन्न न होने पर भी उस नाम से प्रसिद्ध एवं पारित किया जानो नाम सत्य है, जैसे कुल-बद्धक न होन पर भी कुलबद्धन, अविद्वान-अनपढ होने पर भी विद्या- सागर लक्ष्मा न होने पर लक्ष्मीपति तथा सूर्य का कोई गुण भा न रहन से सूयप्रकास एवं धर्म से सदा पिमुस रहते हुए भी यमपाल इत्यादि गुण रहित संशाएँ नाम-सत्य मे परिगणित छाती है। (५) रूपसत्य-जिस व्यक्ति ने ना रूप धारण किया हुआ है घसम उस रूप-वेष के अनुमार गुण न होने पर भी फेवल रूप- बाफै कारण उसने उसी नाम से सम्बोधित करना रूप-सत्य = कहलाता है, जैसे लोर म साधु के गुण न होने पर भी केरल माधु के वेप को देखकर यह साघु पा रहा है ऐसा व्यवहार होता है इमको गणना रूपमत्य म की गई है।

( ३० ) (६) प्रतीत्य सत्य-अपेक्षा से कहा ना बाला मस्य प्रतीत्य सत्य कहलाता है, जैसे कि यह दीर्घ है, और यह लघु, एवं यह यहा पुत्र है थौर यह छोगे इत्यादि । पातु गद लघु दीघे प्रया छोटा यहा दोनों प्रकार का व्ययहार अपेक्षारय है जो प्रामिण अगुली को निक्किा की अपेक्षा से पढ़ी और मध्यमा यो अपेक्षा से छोटी कहा जाता है। इसी प्रकार विनी। अग्निात, निधन और धनवान इत्यादि संमारगत जितना भी पचन व्यवहार है यह सय अपसाजय होने से प्रोत्ग-मत्य में परिगणित होता है। (1) यवहार सत्य-जो भाषालाय व्यवहार मप्रचिलता और लोग उमी प्रकार घोलत हो य म योम फोर दोर नहीं अर्थात यह व्यवहार-मत्य है। यया-माम धा गया, स्टेशन आ गया तथा कूप चलना है, परत जलता है, यह गाना अमुष स्था7 को जाता है इत्यादि भाषामों को व्ययहारमत्य म स्थान दिया गया है। (E) भावमत्य-पदाध म निसवण की दस्तादा उसा षण के नाम से उसशे सनीव अधया अजीव को सम्बोधित करना भाषसत्य है, जैसे मलाका पत्ती म पायों वणी पर भी श्वत वण की उत्तटता के कारण घसाका श्वत है मा वहा जाना एप काक पृष्ण है और तोता हरा इत्यादि प्रकार यवन प्रयाग भारसत्य यह जाते हैं। -योगसत्य-जिस यातु के साथ जिसका योग-सबध हा रहा हो उस समय उसको उस सम्बध से आमन्त्रित करना ( ३१ ) योगसत्य पहलाता है । यथा-अरे घोडे याले, तागे वाले, या छतरी वाले इत्यादि वाक्य प्रयोगां मे अपरिचित व्यक्ति को घोडे आदि के मन्य च से घुलाने की जो प्रथा प्रचलित है उसी गणना योगसत्य म है। १०-ौपम्य सत्य-यह तालाब ममुन की तरह भरा हुआ है, यह क्या च द्रमुग्पी है, इस पुरुष का तेज मूर्य के समान है, इत्यादि उपमाओं से रिसी पदार्थ को उपमित करना औपम्यसत्य पहलाता है। सर्वज्ञ देव । मभी श्रेष्ठ पुरुप मेरी उपासना करते हैं इतना ही नहीं रितु उनकी श्रष्टता मेरे ही स्वाधीन अर्थात वे मेरी ही महिमा से श्रेष्ठ बने हुए है, जो व्यक्ति पूणरूप से सत्य का पसपाती है मरी देवता तक भी रक्षा करते हैं। याव मात्र विधाए हैं घे सत्र सत्य में ही प्रतिष्ठित हैं। सन विद्याओं में सत्यवादी ही सरलता प्राप्त कर सकता है तथा स्वर्ग और मोन पी प्राप्ति + मात्र मत्य के ही प्राश्रित है। प्रभो । समस्त प्रागमों और प्रचना म मरगुणो काव्यारयान है। मैं सर्व स्थानो म पूजी जानो हूँ, मभी सजन पुरुष मेरा सत्कार परत है, विद्यालयों में छात्रों पे प्रति शिक्षा स्प मे मेरा ही = म्यम्प सत्यभाषण रूप प्रदर्शित किया जाता है। अधिक क्या पहूँ मैं तीनों लोक में संस्कृत हो रही हैं, मेर द्वारा मुनि जन अदभुत शक्तिय गत्पन्न करके इस जगत् को विस्मित कर रहे हैं। मेरा शामन असह है । और वह मया रक्षक है । जगत् वत्सल ! .

मुझे इस बात का अत्यत हर्ष है कि मयमे अधिक श्राप श्री ने मुझे अपनाया और मेरा सम्मान क्यिा है,द्वितीयमहाप्रत कौरक्षा के लिये श्राप श्री ने मेरा ही उपयोग लिया है। समिति में पहने को तो मुझे दूसरा स्थान प्राप्त है परन्तु वहा प्रधान पद मुझे ही प्राप्त है। भाप श्री को लोग सत्य को मूर्ति कहते हैं। यह सुनकर मुझे अत्यन्त प्रसन्नता हाती है इसम मरा ही गौरव बढता है। भगवान् । प्रापन फमाया है कि सत्य भाषण पूर्ण माधि है, अत सर्व प्रथम श्राप मरे विषय मे ही करने की कृपाकरें? प्रभो । अब मैं अघिक कुछ न पहनी हुई अपना स्थान प्र. करती हैं। जिस प्रकार सूय थपन प्रकाश की प्रशसा नही करता मितु लोग स्वयं उसकी प्रशंसा करते हैं, इसी प्रकार मैंने कभी भी अपनी प्रशंसा नहीं की परतु मेरे विषय म अापन जो कुछ गणन किया है उमीका मैन यहा पर दिग्शन राया है, मुझे प्रसन्नता है कि उपस्थित परिषद् न मेरे भाषण को बड़ी शाति से श्रवण किया, अस्तु अव मैं अपन भाषण को समाप्त करती हूँ। श्रमत्प भापा- इस प्रकार पहली पया-सस्य भाषा का भाषण हो चुरने के अनतर वर्ण की दूसरी पया-असत्यभापा ने भगवान के सन्मुस होकर नम्रता पूरक अपना भाषण इस भाति प्रारम्भ क्यिा- भगवन | मेरा नाम असत्य मापा है, मेरा शारीरिक वण और परत्रों को देखकर जो लोग विस्मित हो रहे हैं वे मेरे व्यापक - म्वरूप को जानकर तो और भी चक्ति होगें। मालूम होता है अभी तक उनको मेरे प्रभार का परिचय नहीं मिला। प्रभो ! मेरी परो धनि-सत्यभापा-की गर्मी बातें सुन कर मुझे बड़ा खेट हो रहा है, तथा जनता में होने वाले उसके मकार को देसार नो मुझे उस पर अधिक से अधिक रोप पाता है। इम लिये मैंने तो यही निश्चय किया है कि जहां तक हो मधे इसका विरोध पर और हर समय इसके विपक्ष म ही बोलू , नाकि ममार में इसका यदा हुआ सवार कम हो जावे और अधिक से अधिक लोग "सा स्थान म मुझे ही अपनाने का यत्न करें ! इसी उद्देश से मैंने प्रमके नाम पर ही अपना शामन घलाना आरम्भ कर दिया है। लाग नाम तो इसका सुन पर आते हैं परतु पाम यहा में करती हूँ यथा-नय कोई व्यक्ति-जिसपर मेरा प्रभाव पड़ 'चुस है जनता क समक्ष इस प्रकार कहना है कि भाइयो ! मैं तुम से सत्य कहता हूँ, तुम ध्यान देकर सुनो ? तय पह, सत्य के नाम से मेरा ही वणन करने लग जाता है । कारण फि उस वणन में मेरे स्वरूप को व्यक्त करने क अतिरिक्त और कुछ भी नहीं होता! अर्थात् उस वणन मं सत्य या कहीं लेश भी नहीं होता। भगयन् ! कहीं पर तो मैं प्रकट रूप से भी शामन करती हूँ परन्तु गुप्त रूप से तो मेरा सभी जगह पर शासन चल रहा है ! प्रभो। यह ठीक है कि आपने सर्व प्रकार से इसे ही-सत्य को हो-अपनाया हुआ है ! और यह भी यथाथ है। प्रतिमा है। आपके आत्म प्रदेश सत्यकी 4 (३४) श्रोन प्रोत हैं, और इसके विपरीत मुझे निरस्कार परके यहिष्कृत पर रखा है, परन्तु अनन्य भक्ति के कारण अथवा आप श्री की परम दयालुता के कारगा में पापा दरबार से मरवा त्यागी नहीं गई ? किमी न किसी रूप में मुझे आपने प्रालय दे ही रक्सा है फिर वह चाहे स्मिी दृष्टि से हो और चाहे स्तिना ही क्षुद्र हो। मुझे ता इसीम यहा भागद है कि मुझे भी आप यहा स्थान प्राप्त है यथा-आपन परमाया है कि इश्वर जगता है, और पर श्रारमा सब व्यापक है इत्यादि कथन अमत्य हाने पर भी मान अ य दाशनिका कसिधान्त को निसलात हुए श्रापके द्वारा कहा गया है। भगवन् ! मुझो तो अपनी हम घड़ी बहिन से इपा है। जो पुछ यह कहे मैने उसर विरुद्ध करना है। यदि यह यह कि ध्यहार नय से प्रात्मा क्त्ता है तब सक विपरीत में कहँगी रिश्रमा का नहीं अपितु ईश्वर का है। तथा आत्मा को पत्ता न मानन पालेरी माया बहुत अधिक है यह मन मेरा ही प्रभाव तो है। "सीसे तो मैं इससे याजी ले जाती हैं अथात इसे परास्त कर देती हैं। इसने कहा है निधमास्तिगय, अधमास्तिमाय, जीवास्तिकाय, पुरगलाम्तिमाय श्रामश और पाल ये छ द्राय है, इस पर मैं कहती हैं कि नहीं द्रव्य नौ हैं, यथा-पृथिवी, जल,तेज, वायु, श्रापाश, काल, दिशा, आत्मा और मन । इसने कहा है मुफात्मा का पुनरागमन नहीं होता अर्थात् माक्ष हुए पश्चात् यह जीनामा फिर जम मरण पसंसार थम म नहीं माता, और इसके विपक्ष । 1म में रहती हूं अवश्य भाता है, यदि न पाए तो यह ससार ही एक न एक दिन साली हो पाये। जहा फेल तिफलना हो हो, भान का सनथा प्रतिमध हो वहा साला हा जाने म क्या सदद। तथा यह कहती है-नीर अनत और प्रतिव्यक्ति भिन्न ५ है। में कहती हूं नहीं, केवर एक ब्राह्म ही है अय सब कुछ उसीरी माया है यह कहती है समार अनादि निधन हैं। मैं कहती हूं नहीं यह इश्वर द्वारा रचा गया है। श्रत मादी और मात है। इसने रहा है कि पाच भूत अन्य हैं और उनका चेतित करने वाला जीवात्मा अन्य है 1 मैं कहती ई नहीं, पाच भूत ही जीवात्मा है चासे अलग सी कोई सत्ता नही । यह कहती है म यलोक मे असत्यात द्वीप समुद्र है, में कहती हूँ नही मध्य लोक में तो केवल सात द्वीप और सात समुद्र बल्कि इमसे भी कुछ न्यून हैं। यह कहती है सूय चालू आर, पृथिवी स्थिर है, मैं कहती हूँ नहीं सूर्य स्थिर और पृथिवी चलती है। इसका क्थन है कि मिद्ध परमात्मा अरूपी और अशरीरी है मैं कहती हैं यह शगर धारी पुत्र पौनों वाला भी है। यह कहती हैं कि प्रात्मा उपयुक्त 1 साधन के द्वारा सर्वक्षता-लामफरमकता है अथात सर्वज्ञहो सकता है, मैं कहता हूँ कि लास सर पटकने पर भी वह अल्पज्ञ ही रहता है। यह कहती है मोक्ष कर्मक्षय का परिणाम है। मैं कहती हैं यह शुभ कर्म का फल है यह कहती है मृतक ये निमित्त दिया गया दार उमको नहीं मिलता, मैं कहती हैं अवश्य मिलता है। जिस प्रभार लैटरबक्स में साला हुअा पत्र जिसके नाम का 1 हो उसे मिल ाता है उसी प्रकार ब्राह्मणवर्ग प पट मे डाला A हुआ अन्न अल उसे अवश्य पहुंचता है इमम मन्देह को कौन मो पात है। यह कहती है-पूथिना, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति मनीय हैं अथात आम पीवात्मा की स्थिति है, मैं पहती हैं यह यिलकुल भ्रम और उमत्त प्रलाप है। यह स्तिनी असगत यात कि थियी आदि नितात जड़ पदार्थ भी सजीर हैं। यह पहती है कि मनुष्यों को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये और शृए। का निरोध व सतोप धारण करना चाहिए मैं बहती हूँ नहीं, ससार बनाया हो इमलिए है कि अन्य प्राणी अपनी इच्छानुसार काय करे, ये सब इन्द्रिय इमालिए तो है यदि विषय भोगों का इन द्वारा यथा उपभोग नहीं करना तो इनकी आवश्यक्ता ही क्या थी। खाना पीना और विषय मोगों म मरत रहना ही तो मानव जीवन का सार है। यह कहती है पशु पती आदि किसी भी जीर का बध मत करो, मैं रहती है पशु धनाय ही यज्ञ के लिये है उनका यज्ञ के निमित यध परना सर्वथा निदाप है। अगर इमपी यात यो मान पर इनका यध धन्द कर लिया जाय और इन मास का उपयोग करना छोड दिया जाय तब सार इनमे ही भर जायगा, मनुष्या को तो यहाँ चैठने को भी स्थान नहीं मिलेगा। याह । क्या अच्छी यात है, जिनको विधाता न केवल मनुष्यों के लिये ही पेंदा रिया हो उनको वन स्वायें, सी वेसुरी धात है। अगर भासा खाये तो यल यहा से लायें, मांस का त्याग करना मानो कमजोरी को श्रावित करना है। पिर यह कहती है किसी से अयाय मत करो, मैं कहती हूँ अवश्य करो, इसके बिना धा, सम्पति, राज्य और वैभव आ ही नहीं सकता।

- यह याय और अन्याय की यादें तो केवल पुस्तकों में सम्माल रखने की है । साम्राज्य स्थापना के समय अथवा भाग विलाम की सामग्री सम्पादा के समय इस ओर ध्यान देने की कोई भानश्यकता नहीं। नाथ । इस बात का मुझे पड़ा हो खेद है कि आपने इस सत्य भाषा की भाति मुझे नहीं अपनाया, इता ही नहीं बल्कि साधु के द्वितीय प्रत का मविनार वर्णन करते हुए मेरा यहा तिरस्कार किया है। मुमको सप्रथा त्याज्य पतलावर और भी अधिक अपमानित क्या है इमी अपमान से सतप्त होकर ही मैंने आपके माग बणन किये गए जीनादि पदाधों की यथाथता थे विरोध में ३६३ मत खड़े कर दिये हैं। इसरा फल यह हुआ कि उनके प्रभार से प्रभावित हुई जनता पाप थी से घिमुग्र हो गह। और मेर सवार में सलाहोकर सत्पथ से गिर कर अमृत पथ में जा थमी । श्राप ता समागे जीवों का पल्याण चाहते हैं परन्तु मैं रहे मंसार में ही स्थिर रसना पाहती हूँ। अस्तु अब मेरे दासों का और भी जरा दृष्टि डालिये। पापी असंयती, अप्रती, कपटी, कामी, मोधी, लोभी, ग, घोर, जुवारी तथा भययुक्त, उपहास कान पाले, राजस्मधारी, कारागृह के संरक्षक, फूट तोल और फूट नाप रम्बन याले दुकानदार, सोग सिकरा याने बाले, परकारक (जुलाहे ), पलाद ( सुनार ), छोपे, गुद्दाघर, भाट, चारण नगरगुप्ता । थानेदार धौरह और धुगलोरमेर इयानि सब मेर उपामर है, ये गत दिन मेरी ही आराधना में लगे रहते है,इमस अधिक मेरा और क्या प्रभाव हो साता है, मेरी इस वाहन

ऐ मुशयले म भेग frm प्रभार है मया नियता बहुत ही
महा है। मरे और इसके पामों पारिभाकर दीनियरि
देगा रिम भाता यी साया अधिक प्राम दोदील.
लोपिये । रममें इममा भक्त तो मुश्किल में कई प्राय हो
निमलेगा यास मय के सर मी हो पासना परत हुए ष्टि
गोचर होगे। क्या यह मरा कम प्रभाव है।
है,
भगवान मशकहना है किसमार में पारितावा गुरूप
है सोको प्रधानता है, पय कि मैं तो है ही, ममा मnt
सरत्र नारितक्ता काही साम्राज्य है पागे भार मीकी विजय
दुटुभी बन रही है। जिधर देयो उधर पाय यही मुगाई दता?
किजानि पोति कुछ नहीं, परलोक की गायना निकामना है,
7 पुण्य है 7 पाप यह शरीर ही सब कुछ है, इसके अतिम
दिमी पारमा पनि परायगा स्वीकार करना रिनान मुदता
शरीर हो सब है, इसको पृष्ट गाना हो परम पुपाय है मरने
फे बाद न कोइ पाता है और न जाना है,शरीर का शहा साना
ही मोत है, संसार की वृद्धि करना, शरीर को मुन्दर और पल
घान बनाकर उस द्वारा विषयों का यथेष्ट उपमोग काही
जीवन का एक मात्र सार है। प्रत्यादि इत्यादि। पातर म देरय
जाय तो नरम और स्वर्ग यह फेवल कल्पना दिये गय पदार्थ है।
इनकी पतत्र कोई सत्ता नहीं, तथा माता पिता और गुरु प्रालि
यो सेवा लिय प्रेरणा करना भी 0 प्रश्र का यार्थ पूर्ण
व्यवहार है। माता मिता की सेवा म मार इम पर क्यों ? हमें
।

( ( ३६ ) उनका क्या देना है ? क्या हमने उनको अपने जम के लिये कभी बाधित किया था यदि नहीं, तो फिर हम पर उनकी देन २रा ? यह तो कामदेव का शिलास मान है किसी से किमी को अमुक प्रकार की सवा को इन्छा रसना कुछ अर्थ नहीं रखता। स प्रकार के उच्छ मन भाषणों मे मेरा होप्रभाव पामपर रह है। भागवन् ! पर जरा आस्तिश्चाद में भी मेरे छिपे हुए प्रभार का दरिषय- -- आत्मा और परलोकादि में विश्वास रपने घाला आस्तिक ६ग भी अपनी मन कल्पित मा यता के प्रचार में लगा हुआ है। सका कथन सुनिये १ यह संसार अड से उत्पन्न हुआ है । प्रथया माको किनिष्णु के नाभि क्मल से उत्सान हुए है, इसके निमाण-पत्ता है । अथवा यू पहिये कि इस ससार को प्रजापति- श्यर न रचा है। इसके विपरात किसी की मा यता में पारमा अकत्ता और सर्वथा निलप है, ससार की रपा या मार केवल मात पर ही है, किसी के पथनानुसार ईश्यर की इच्छा से पृथ्वी आदि के प्रमाणुओं म मिया उत्पन्न होकर प्रमाणु आदि मम से हम सृष्टि का प्रारम्भ होता है। किसी के मत म, यह जगत प्रकृति का परिणाम और ब्रह्म या वियत है। कोई ईश्वर को निमित्त और का अभिन्न निमित्तापालान कारण मान रहा है,यहातक कहें अजातवान, प्रारम्भ गाद, परिणामवाद और वियतवादादि श्रने मानववाद का आस्तिक वर्ग म पचलित होना मेरी हो, था फल भार प्रमरदै "समे मत

निनादरा प्रमिद्ध है। यह मय मेगही पिलाया हुया माया
भगवन का ताप, विधर देखो उपर मेगको श्राप
मयुत करा दना मर थायदाथका तव्य हैअापक श्रगिया में
मेरे स्वरूप का पूरा २ निधन उपलभ होता ६, दराने की इदा
गीग्ध नहीं इस चारी शेवा श्राज्ञवल कोई पूडमा तक ही,
विलक्षणवा है कि प्रत्येक काय में नाम इसस लिया जाना है और
(४० ।
कर रही है। अगाएर मात्र काल ही लगदरचना म हेतुभूत है,
जाल है।
पत्य है । गर्भपात, भ्रूणहत्या, और सात पाद निन्दनीय
कों में मरथ मरा ही हाय । परेसाक्षी, कयायिक ये, यासा
पहार, अमानत म प्रयानन इत्यादि जय पायों में जाता को
रस्खन याले प्रश्न यावरण के दूमर अध्ययन को पढ़ें।
अपनी बड़ी बहन को गरीनी यात सुन कर
पाती है, इस यह पता नही शिपाजयल जनता में इमराध
मात्र इने गिन् पुरुष हैं जो इस बात पर है इन चंगुलियों
पर ने जाने वाले व्यक्तियों को बोदर धामी के सथ
पर तो एक मात्र मरा ही अधिकार हो रहा है। इस पर भी या
सुमेलोमी
जावों
काम मेरा बनता है।
भगवन् । मैं अपनी बहा से किसी प्रकोर भी कम नहीं।
इसकी भाति में भी ससार मे दम पशर मे होया की जाती
यथा-२ कानिमृता २ माननियता ३ मायानिसेता लो
स्मृता ५ मनिस्ता ६ व पनिस्ता ७ हास्यास्ता भयानम्

( ४३ )
।
धाम में लाना और पाछ से उसको लूटना और
के साटाम डाल कर स्मय प्रसन्न होता इत्यादि
जीलाएँ हैं। अधि: क्या विश्वासघात, मित्रद्रोह
क अन्य कार्य मेरे ही द्वारा सम्पन्न हात हैं।
मृता-लोम के वश होकर यह मनुष्य जितन
है उन सब म मरी ही प्रेरणा काम करती है।
३१ परन का यत्न करना, स्मिी पे घर हुए याम
म रस पर मुकर जाना प्रार मारण मान
पत्रिका नियात्रा म प्रवृत्त हाना इत्यादि जितने
घिय काम हे जम मरी ही अभियक्ति है
ता-निम समय इस जीव म पाम रागानिकी
तब उसकी पूर्ति के लिए पह पर स्त्रीय म मुग्य
करता है । यथा-मैं तुम्हारा हर प्रकार स श्राश
श्रार किर है, तुम्हारे कठोर वचन भी
“रल प्रतीत होते है इत्यादि प्रना प्रारक
अनुगग प्रकट करते हुए कामी पुरुषां कीजि हा
अमत्य प्रतिक्षा श्रीर
रविश्याम' श्रो पालर और
है। इस

११) मा निमूना नयायनि प्रायशीभूत हो जाए।
तर मैं उम पर गय अपना प्रभाव जमाता है या मोघ में वापर
गोई यति माय भी १६ नाम अपन प्रभाव में उसे मी अमत्य
धना दती हैं। म पुप द्वारा किया गया दुग्धपान, अपन र
रग को छोह पुरुष क भातर भर हुए मूत्रादि के रूप म पदलगता
है #मह ाधा पुरुष या माय भी यह तो भी मैं उसे मदर
नहीं पहन दता । इमानिए मुझ माप-नियता पहा है।
( । माननिहता-ग्राहकार प यशोभूत हुए पुरम में अपन
ना प्रसार कस्प दिग्याता जिम में अमुक व्यांग का
क्या सममना हैं, धद नो मर जाकी भी होड़ ही पर सiat
मरा रेश्चय, मरा विद्या मरी नाति मेग पुन और मेरी शांग
को बराबरी कान र माता है इस्पादि श्राभमान-यूरण
म मेरा हो हार है। मगुरा-सम्पन्न, गाग्वाचिन व्यक्ति को भी
तुन्छ यना डालना मर लिए साधारण सी बात है। इसी
को
असाधु
यो
माधु
धनी दोन
और निधन को धना, पाहत को मूर्य श्रार मूग को पहित यह
दना मेर गाय हाथ का मन है। मुत्र माननिस्ता पहने का यही
सालय है क्योंकि मरा समयिाम है।
(३) मायानिस्ता--सब मे अधिक मेरा प्रमश माया में
होता है, दूसरा यो छलन क लिये मैं ही काम पाती हैं, अनक
प्रकार क छन क्पट परफे भाग तुष-व्यक्ति को विस्याम का पात्र
प्रनान में में ही अप्रसर होती है । मित्र धन र नम्रता दिन
गयों
प्रसार माधु
अमापु और

( ४३ ) 'हर किमी को विश्वास में लाना और पीछे से उमो लूटना और इमे अनक प्रगर के सम्टा में हाल कर सय प्रमन्न होगा इत्यादि मक मग हो ता लीलाएँ हैं। अधिक क्या विश्वासघात, मित्रद्रोह पआर इसी प्रकार के प्राय काय मेर ही द्वारा मम्पन्न हात हैं। (४) लोमनिमृता-लोम के वश होकर यह मनुष्य जितन भा अन करता है उन सब म मरी ही प्रेरणा काम करती है। पर सम्पत्ति को हड़प करने या यत्न करना क्सिी क घर हुए याम (श्रमानन) को घर में रख कर मुकर जाना श्रार मारण माहन तरा साटनादि तानिका क्रियाया म प्रवृत्त हाना इत्यादि नितन भी लोम-प्रभव जघन्य काम है उनम मेरी ही आभव्यक्ति है। (५) प्रेमनिसृता-निस समय इम जी म काम रागानि की श्रासक्ति बढती है तर उमकी पूर्ति के लिए यह पर स्त्री क म मुग्न मग ही उपयोग करता है । यथा-मैं तुम्हारा हर प्रकार स आज्ञा री, दास हूँ, सेवर श्रार फिर हू, तुम्हार कठोर वचन भी मुझे फूल जैसे कोमल प्रतीत होते हैं इत्यादि अनक प्रकारक मृदु भाषणों द्वारा अनुराग प्रकट करते हुए कामो पुरूषा की जिहा में मेगही निनाम है। इस अतिरिक्त अमत्य प्रतिज्ञा और असत्य मयतों का विश्वास दिलाकर मैन अनक पालक और चालिकाओं के जीरन नष्ट-भ्रष्ट कर दिये हैं। (६) तपनिमृता-द्वेष के आवेप मे श्रार मैं मत्य प्रतिज्ञा और सूर्य के समान प्रतापी पुरुषों मुग्म में भी श्राधास पुस्मित घधन कहला डालती है। गुरणपान परापारी

पुरुषों को कपटी, विश्वासघाती और दुराचारी कहला देना तो मेरे
लिए बिलकुल साधारण सी बात है।
(७) हास्यनिसृता-हास्य से प्रभावित होकर तो में ऐसी
यात सुनाता है जो किसीने जीवन भर म भी न सुनी हो । तथा
हास्य हाम्य मे ही किसी सम्भावित व्यक्ति को निलज, धूर्त और
अनाचारी बना दना तो मेर लिए बहुत ही सहज है।
(E) भयानमृता-चोरी आदि के सम्बन्ध में व अन्य क्विं
विशिष्ट अपराध म पकड़ा गया पुरुष मेरी ही शरण लेता है
निम ममय बद गिड़गिड़ाना हुआ रहता है, हुजूर मैंन पुत्र नई
पिया मुझे १३६ कर लान बाल पहले ही गेर ? मन हैं श्राप म
थाप क सामन मैं जो कुछ कहता हैं यहो यथाध है, इत्या
सम्भाषण में मैं हो तो भाल रही हैं।
(e) प्रारयाविशानिमृता-५ यास लिस्वत समय परस्पर
क. प्रेम पाश मय घ हुए युवा यु+ता विग्ह के चिन्तनम तय
दूर बैठ हुए प्रेमा क अपनी प्रेमिका पर किये हुए पत्र म उपयुक्त
होन याला वचनावलि म सिवा मरे और क्सिको प्रेरणा है । नय
उस लरगयली को पढ़न माने युवा युवतियों क दय में हलचल
सौ मचा दना यही मरा प्रभार है। वस्तुत उप यासादि माथी ।
मर म्यरूप काही मनाचित्रण है।
कमी
E
माचारएसी

-
।
.
-
मेरे द्वारा कलकित किये जाने पर जीवन में ही हाथ धो बैठते है।
भगवन् । कहा तक वणन करू, प्राजक्ल की जनता तो मुझे
पंग पग पर अपना रही है। क्या छोटा और बड़ा, क्या धनी
पार निधन वा विधान और मूर्ख सघ मेरा ही उपासना म लगे
हुए हैं। क्या है मेरा कुछ कम प्रभान है
प्रमो, एक बात और है जिसका जिम करना में भूल गई हूं
यह है मरी अत्यंत प्यारी सहेली माया की बात, माया या मुझे
बटन महारा है यह मेर हरएक पाम में मेरी पूरी २ सहायता
करनी है जो माम मुझ में नहीं बन पाता उसे वह मद से यना
दती है और मैं उमे जहाँ भा भेज़ वही वह मफलता प्राप्त करती
है "मलिए मैं उसकी फूतन : ऐमी सहली क लिए मैं जितना
गर कर सकू उतना कम है।
नाथ 1 अपने मुझे नहीं अपनाया सो तो ठीक पर तु आपके
मज्ञानाय ग म (जोर वर्ग में) तो मुझे स्थान मिला हो रहा है
श्रत श्राप से माक्षात नही तो दूर का मम्य ध तो बना हुआ ही
है। मामाय जीवा म मेग जा मौलिक सम्पन्य है उसका विच्छेद
यदि असम्म नहीं ता दुष्पर अवश्य है। इस जोन-समुदार म
पतिपय जीवों म तो मेरा चिरन्तन सम्बन्ध है परतु वह एक न
एक टिन टूर आने वाला है और कितने एक पेमे जान (अभव्य)
मी हैं जिना माथ मेग अनादि निधन-कभी न छूटन वाला-
चेतनता कानात आपके समातीय
-
.
.

होगा।
श्री के चरणों में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है तो कुल्ल अनुचित न
ही देखने में आता है। पहले तो पतिपय जीव ही इसे अपनाते
(४६ )
भगवन् | जैसे कि मैंने
पहिले कहा है-मैं कतिपय जीवों क
साय अनादि अनत सम्बध मे सरचित हो रही हूँ और मेरी
इस बडी बहिन का सबंध तो
तो अपेक्षाकृत सादिसान्त
हैं और जो अपनाते हैं वह पहले तो इसका धडा स्वागत कर
है रात दिन इसी के अराधा में व्यतीत करते हैं, इस प्रका
इसको पूर्ण विश्वास में लाकर अन्त मे इमका पारत्याग कर
है। तात्पय कि निधाण-प्राप्ति के समय वचन योग का पूण
फरफ प्रभापिक हो र परमधाम पनल्य पद को प्राप्त पर
है। इस समय इस विचारो का यह नाम शेप भी नहीं रहना
इससे मिद्ध हुआ कि समारी जावों क साथ मरी स्थिति को "
अनादि अन्त ही है और इसकी सादि अथच शान्त है।
पाप ही घातइए कि हम दोनों म अधिक व्यापक और अधि
प्रभानशालिनी कौन ? यह तो मैं चारचार कह चुकी हैं कि संस
में मेरे भक्त इसको अपेक्षा धष्टन अधिक है। मैं सो समारी लीयों
पोनर तिर्यक देव और मनुष्य योनियों में भ्रमए घराने में
हो लगी रहती हैं परनु रिपरीत इसपे मेरे काय में पि धन
पर यह बहे भीयों को निर्वाण को भार घलान का यत्न करती
है, सय पाप हो कहिए कि मेरा इसकी में निभ सकती है?
पान अय मैं पाप धी से जमा को प्रापना करती हुद अपना
निरो
ले

(४७) गन मद्द करती हूँ। तथा उपस्थित श्रोतागण से आशा करती कि च मा मुझे क्षमा करेंगे, और अपने भाषण को समान रखा हूँ। - - सामृषा-सत्य और झूठ से मिली हुई मिश्र भाषा का भिभाषण- इसके अनन्तर सोलह वर्ष की तीसरी कुमारिका युवावस्था पदार्पण करतो हुइ श्वेत कृष्णा और पीत वर्ण के वस्त्रों से अंकृत होकर अपने असाधारण रूप लावण्य से उपस्तिथ जनता (मुग्ध करती हुई भगवान् के चरण-कमलों में उपस्थित होकर प्रकार बोली- मगवन् । मेरा नाम मिश्र-भाषा मैन अपनी इन दोनों हना के अभिभाषण को बड़े ध्यान से सुना है, मुझे तो इन दोनों हो हामि प्रेम है। दोनों मे ही मेरा घनिष्ट महधार है, और गोनो भी मेरे से प्रेम रखती हैं इनफा प्रापस में विरोध भले रहता हो परतु मेर साथ तो इन दोनों का ही बहुत अच्छा नाव है। समय ५ पर ये दोनों ही मेरा सहायता करती हैं और मी अपन पाप को न दोनों के आश्रित समझती हैं। इसी ए मैन पाजता भी इनका विरोध नहीं किया और न मेरे विरोध करन की शक्ति ही है । मैं तो वैसे तैसे शात रहार थपना जीमा व्यतीत करना उचित समगती हैं। भगवन जैसा मैंन पर बतलाया है मैं इन दोनो का पामय नोकर चलता हैं। सम्मयत: भागमा म मुझे इसी अभिप्रा ।

में अपर्याप्त माला पहा । (१) मेगचभमापण पुष्ट धापट सा
होता है, इसीलिये जाता इस गमन में प्राय असमर्थ हनी
है। यही कारण है कि अधिक लोग मेरा यार्य बाप समा
नदी पाते। यास्तव में देखा जाय तो मरोहादोनो यहनों क. जो
शरीर है धमफे पाशिक समिण सही मग शरीर सघारत
हुया है। यदि सरेप म य मासदों को ममिमय ही भग
स्वरूप, म लिए मर अभिभाषण में घासाघों का कमी
निणय पर न पहुँचना कोई अस्वभायिर नही।मर भिमाप
मे मोत्यगे को प्रसन्न और प्रसन्न गरम सरदाप का बत
नहीं होती थापि उसम पनिपय ता प्रसन्न होते हैं, और बहुम
स अप्रसन्न । मला इमम मम क्या दाप, पारण कि माता
स्वरूप ही इस प्रकार का है । उमम सत्य और और असत्य दानों
हा समिलित है । सम्यजन मन हा मर म दूर रहत हो पर
यह अनुभव सिख है कि मेर दशन की लालसात किमीनमी
सप म उन्हें भी यनी रहती है। पंशुयता-चुगली मागि कार्यों के
“पस्थित होने पर व मरा हा शरए म बात हैम और उनके
पार्य की सफलता के लिय वरदान दर प्रमन्ना यक विदा
करती है। मुझे ता यही यही प्रसनता है कि हम संभार म बहुत
से धनी माना और प्रतिष्टित गृहस्थों तक म मग सादर है और
-
-whereume
(१)-अपजत्तिया मत का विदामा मामा ५. गमा! मुगिहा
५०-ध्यामोगा असचा मामाय, प्रशाय. मा० १६० (१६५/y
२५६ 3

(४६) वे मुझे हत्य से चाहते हैं! मैं संसार में इस (१) रूपों में अभि यक्त हो रही हैं यथा- (सचा मोमा मते ! मामा निविदा पन्नता गोयमा ! दस विा पन्नता त महाउप्परए मिस्मिया (१) विगतमिस्सिया (२) उपए विगत मिस्मिया ( ३ ) जाव मिस्मिया (1) अजीर मिस्सिया (५)ीगीर मिस्सया (६)श्रणत मिम्मिया (७) परित्त मिस्सिया 10 मा मिमिया (६) अद्भाहा मिस्सिया (१०) व्यास्था-मस्यामृषा दशविधा, तम्या-उपए मिस्सिया" इत्यादि, उत्पमा मिश्रिता नुम्ने मह सस्था पूर्थि यत्र मा उसन्न मिथिता, एबमन्यत्रापि यथा कश्मिश्चित प्रामेनगरे वा श्रनेपधिरेपुवा दारगेषु जाते दशदाबा अस्मिता जाता इत्यादि (१) रमेर मा कथा विगत माता (२) तथा जामता मरणस्य च कृत परिमाणुस्या मिधाने विगवादेन चौबन्न । गत मिश्रिता ( ३) तथा प्रभूताना जीरता स्तोकानां च मृताना शख शुक्ला यादीमेवा राशा रप्टे या कश्चिदेव वदति श्रदो महान् और राशिरय मिति तसा 7व मिश्तिा, मत्यामृष ल चास्या तीरत्न सत्यत्वात् मृतच मृपावात् ( ४ ) तथा यदा प्रभूतेषु मृतेषु सोये नावसु एकत्र राशी अनेषु शादिस्वर पति-ग्रहो महानय मृता भीर राशिरिति तासा अजीर मिश्रिता, अस्त्रा अपि सत्या भूपाल मृत्यु सरसत्वात् जामसुम्पासात् (५) तय' तरिम व रशी एतावन्तोत्र वीचन्त पतातोऽत्र मृता इति नियमे नाव भरयता विसादे जीवामीर मिश्रिता (६) तथा मूलकादिक मनन्त काय तस्यैव सके परिमांड पत्रे

t
।
श्रापको सो अवाज मारी होगा श्राप पिरमा नहीं योले इत्यादि।
(१०) अद्धाद्धा मिश्रिता-जमे सूर्य के उन्य मान होने पर
भी कह दना कि शीघ्र चला मध्याह हो गया त्यादि।
भगवन् । मेगा वरूप मा लोक व्यापी है। अनक रूप से मैं
समार में अपना काय कर रही हैं तथा अनक व्यक्ति मेर सहारे
पर जीवन व्यत त कर रह हैं उनम ऋणापुर मुख्य हैं लेनगर,
मे अपना पल्ला छगने के लिये दनवार को मेरी ही शरण में
श्राना पड़ता है। निस ममय माहार दमा के पाम आर
उमसे अपना शृण चुरान को पता है तर मेरी महायता
प्रप्त कर यह उत्तर देता है, 'माहिन श्राप चिता न यर मैं
अक दिन श्राप शृण अवश्य का दूगा, आप घबराये नहीं
मुझे खुद ही बहा रयाल है, आपस रुपया यहुत जल्दी पहुंचाने
की कोशिश करूगा।" मोगरा प्रान परपिरमा प्रसार या व्याज
पूरण । यहान यानी ना) उत्तर दन त्यात कार्यों में मेरा ही
म्पुर श्राभाप है।
सत्य और असत्य भाषा क या मान निदश है उनकामम
श्ररण रूप स निर्देश करना मग काम है।
भगवन् । मर्ग य दोनों यहिन दूत है मुझे इनकी उद्बतमा
श्रन्छा नहीं लगती मिमी व्यक्ति के विषय में श्रथात उनके
गुण दोष विवेचन,म न य दानों प्रवृत होता है वय इन दानों
का आपस मे म्यून विवाद होता है । पर दूमरी पर सूब घरसती
एक बहती है यह व्यक्ति यहुत हो मला है तो दूसरी उसे

( ५३ ) सर्वथा धुरा बतलाने लगती है। इनको परस्पर की कलई को देख कर मैं तो यही कहना उचित सममची हैं कि यह व्यर्थ का वाद विवाद निरर्थम्पाय है, हम मे तो मय ही अन्चे हैं, वैसे तो सिवाय वीतराग के इस संमार में ऐसा कोई भी व्यक्ति उपलब्ध नहीं हो जिसम कोई न कोइ गुण अथवा दोष विद्यमान न हो। सहदेव ! मैं अभिमान तो नहीं करती, परतु यह अवश्य कहूँगो, इनका अनुयायीवर्ग-(सत्य और अमत्य भाषी सभी जीय) वो गाय को शरण जाते हैं जबकि मेर सहचर मिश्न गुणस्थान में वर्तमान जीव मृत्यु का मुग्न नहीं देखता । अर्थात् उसमें क्सिी भी जीव की मृत्यु नहीं होती। यही मेरी विशिष्टता है। इसके अधिरित्त मेरा प्रभाव भी इन दानों से कम नही । जहा पर मेरा आधिपत्य होगा वहा पर किसी वस्तु का निणय नहीं हो सकता, स देहदोला मे पड़ा हुआ व्यक्ति वो व्यतीत होजाने पर भी किसी सुनिश्चित परिणाम पर नहीं पहुंच सक्ता । श्रद्धा-देवी फ साथ मेरी बहुतअनरन है। मरा जहा पर अधिकार होता है यहा मैं उसे फटक्ने नहीं देती। नाथ! यही मेरा प्रभाव है। अस्तु, अप मैं आप श्री से अपना स्थान ग्रहण करने की आज्ञा मागती हैं। मेरे वाव्य मे यदि किसी को प्रकार घृष्टसा हुई हो सो उसके लिए मैं क्षमा चाहती हूँ। असत्यमृपा-स प्रकार सत्यमृपा नाम की तृतीया कुमारिका के घोल चुस्ने पर मोदशवर्षीया चौथी कुमारिका ने प्रभु के आदेश से अपना मापण आरम किया। यह भी अपने रूप लागण्य से r अपूर्व शोभा को धारण कर रही थी। भगरान फे चरणकमलों में उपस्थित हो कर बडे विनीत भाव से वह हम प्रकार बोली भगवन् ! मेरा नाम असत्यमृपा है, दूसरे शब्दों में मुझे व्यवहार मापा कहते हैं, मैं इन तीनों से छोटी और चौथे स्थान पर हूँ (*) भगवन् ! मेरी यह तीनो बहने बोलने और अपनी प्रशंसा के गीत गाने में बड़ी निपुण हैं जन कि में तो एक सीधी साधी अरोध थालिसा है, मुझे तो इन का वाद विवाद अच्छा ही लगता । इसीलिये में इन से प्राय अलगसी रहती है । तथाअयोध होते हुये भी आप श्री ने मुझे जो अपन निफ्ट स्थान दे रक्खा है यह मेरे परम सौभाग्य की बात है। मेरी बड़ी बहिन-सत्यभाषा-1 तो आपके सदैव समीप रहती है इस फ आदरणीय स्थान पर मरे को किसी प्रकार की इपा नहीं, श्रार यह है भी इसी योग्य । पर तु मुझे भी धाप अपना रहे हैं बस यही मेर लिये पर्याप्त है। जब मैं आपके मुसारविद मे यह सुन पाती हैं-"हे आर्यो । सत्य और व्यवहार ये दोनों भाषायें उपयाग पूर्वक भापणीय हैं।" । T 5 (*) श्रद भिक्खू ए बाणेश्या चत्तारि भासा-नायाइ, तजहा सच-मेग पदम मासजाय, वय मोस, तइय सघामोस, 7 णेव स च णेव मोस णेव रुचचामोस असचामोस शाम ते च उत्य भाषाजात" (७७१ श्राचारांग श्र० १२ उ०१) अर्थात् सत्य भाषा मृषा भाषा मिश्र माषा और जो न सत्य हो न झूठ ही हो उस का नाम असत्यमषा अर्थात् व्यवहार भाषा है।

है तब मेर हप का पारागार नहीं रहता । मेरी बहिन-सत्य का स्थान थादि है और मे । चतुर्थ अर्थात् सब से अतिम है। तब आदि और अत की हम दोनों बालिकाओ का प्रहण और मध्य को इन दोनों बहिनों का त्याग करने के लिये आप श्री का जो अपदेश है वह हमार में विद्यमान गुण दोषों के अनुरूप ही है। किसी वस्तु का प्रहण और त्याग उमक अपने गुण दोष पर ही निर्भर करता है। इस मक्सिी को उपालम्भ देना व्यर्थ है। प्रभो । सभी प्रकार मासारिक और धार्मिक कार्यों में जनत' जो मेरा अधिन में अधिक प्रादर करता है सका एक मार श्रेय थाप श्री सोही है, मैं ता एक तुच्छ अबोध बालिका हैं फिर मेरा माता में इचना बार इतना माग यह आपके ही चरण मलों पा प्रताप है, नाथ ! आपरे प्रादेशातुमार क्सिी पो विमो प्रकार की भी हानि न पहुँपा, और शान्त भान से अपने अधिकार को सुरक्षित रसत हुय पतव्य काय म पत्त रहना ही मेरे जीवन का एक मात्र ध्येय है, मेरी इस पांडनीय स्वतन्त्र प्रति मे संसार मे शायद ही - पिसी व्यक्तिको विरोष हो। आप सादर को कृपा से इस लघुगा में प्राप्त हुई प्रभुता पो देश पर यदि मेरे म भी गर्व की माना का उदय हो थाये तो या अस्वाभाविक नही है। भगवन ! आगामों में मेर स्त्रम्प का यार (2) प्रा र से (6) धमधामोहा मत ? मामा अबत्तिया पशि प० गा० दुगनविदा ५. तना-नामपि भागमगि २ शायशी ३तई ( ५६ ) निदेश दिया है यथा-(१) भामंत्रणी-हे देवदत्त इत्यादि । प्रभो 17य किसी को सम्बोधित करना होता है प्रया बुलाना होता है उस समय मेरा ही उपयोग क्यिा नाता है। श्राज्ञापनी-क्सिी कार्य के लिये प्रवृत्त करना-यथा-हे बाल पुच्छणीय ४ परणवणी ५ पञ्चपाण! ६ भासा मासा इच्छागुलोमा १ ॥१॥श्रणभिग्गहिया ८मामा मामा य अभिग्नदमि बोदल्या ६ सय करणी भासा १० धागड ११ अरगड चेय १२ ॥२॥ (सूत्र १६५ ব্যাথায় য়-বি, কথা—“ল্পামযি” | तत्र श्रामणो ह देवदत्त इत्याशि, एपाहि प्रागुनमत्यादि भाषा तय लदन विम्लत्वात सत्या नापि मृषा नारि सत्या मृषा केवल व्यवहारमात्रप्रवृत्तिार सत्यामा म सत्र भावना वाया, श्रापापनी, कार्यरस्य प्रवतन, १० घुवति २ याचनी वस्यादि यस्तावशेषस्य देह ति मागण, पृच्छनी अविर सस्य सन्दिग्धस्य वस्यचिन्यस्य परिजानाय तद्विद पावें दिना प्रज्ञापनी विनात नियस्य नियननस्या देशदान यथा, प्राणियधाम भान्ति भवान्तरे प्राणिना युप हायता उक्त --पाणिवघाउ निय पनि दाहाउया अगाया ण्मान पएणता परणपणी बीयरागेहिं ।। ५ याचमानस्य प्रतिषेध-वचन प्रत्याख्यानी ६ इच्छानुलामा नाम | पश्चित् किंचितायमारममाण कञ्चन पृच्छति, प्रसाह-करोतु म ममाप्येतदभियतमिति ७ अनामग्रहा-या न प्रतिनियत विधारणा , बहुआयवस्थित काश्चत् पञ्चन पृच्दात मिदानी करोमि १ स प्रार यस्प्रतिभामते तत्कुविति अभिगृता-प्रतनियतार्थावधारण यथा । मिदानी वतन्यमिद नेति, ६ मशय करणी, या धाक अनेकार्याभिषाम -- सू पद, इत्यादि प्रयोगा में भी में ही काम आती हूँ। (३) याचनी- क्सिी मे किसी वस्तु की याचना करना, (१) पृच्छी-मन्दिग्ध विषय में उत्पन्न हुए सन्देह की निवृत्ति अथवा श्रथ-परिज्ञान के लिये विमी विद्वान मे पूछना । (५) प्रज्ञापना--विनीन-विनय युक्त शिष्य को उपदेश देना यथा--हे शिष्य । जो जीन प्राणियों का बध नहीं करते थे भवा तर मे दीर्घायु हात हैं इत्यादि । (६) प्रत्याख्याना-मागो पर निषेध कर देना । (७) इच्छाउलोमा- फाई भी कार्य प्रारम्भ करते हुये किसी के पूछने पर यह पहना विश्रपथ्म काम को करें मेरी भी यह मम्मत्ति है। (E) अन- भिमहा-यहुत से काय एकत्र हो जाने में पूछ २ कर काम करना जमे दिन में क्या कर १ इम उत्तर में यह कहना जो तुम को अच्छा लगता है पहला उमगे।(E) पभिगृहीता-प्रतिनियत अथों के निश-यग्ने पर उमी समय वह काय करने लिये दिये भाने वाला वार प्रयोग । (१०) संशयकारणी-अनेक अर्थों वाले शब्दों का प्रयोग करना यथा-सै धन लामा यहा पर सैधव शब्द है. लवण, वस्त्र पुरुष और अश्व ऐमे अनेक अर्थ है, म के अयण से प्रादेशित पुरुष को सदेह हो जाता है कि वह इन में स क्सिकोलावे। হয় সুয়ায়েবি যখ ধঘৰমানীনমি যখন লযৰ पुरुषवानिपु १० च्यात्ता या प्रकराया ११व्याक्ता, प्रतिगम्भार शब्गर्या, प्रग्यताहरप्रयुक्ता या अविमारितार्थत्वात् ।। [प्रशाना स० भाषा पट "1

(११) व्याश्ता- मुनने मात्र मे निमको प्रर्य प्रस्ट हा जाये।
(१०) अव्याकृता-श्रतिगम्भार शब्द और अथ से युक्त
अथमा अन्यत्त अक्षरा नाली।
मभो! यह सक्षिप्त रूप है, इन पांसे में जगत् पर अपना
शासन कर रहा है। मेग मार्ग मेरा इन तीनों ही पहले से घाग
है, में इन पे रिमा फाय हस्तक्षेप नहीं परती, और अपा
स्वतन शासन चला रही हूँ।
भगवन् ! श्रापन दस हो लिया है कि-श्रुत शान की उपदष्टा
एक मात्र में है, पामत्रा करने, आज्ञा देन, याचना परन, पूछने
और प्रज्ञापन परन पत्र प्रत्यारयान और इच्छानुकूल काय करन
म तथा अनभिगृहीत अधों क पृछन, समय या विभाग करने,
और सशय ल म अथ निर्णय पनि ए३ व्या और अध्यक्त
शरनाथ के ज्ञान मम्पादन म मात्र ही पाम पाती है। यन्तु
अप मैं श्राप म क्षमा चाहता है और पस्थित तास यह
निधन परती हु विश्राम लेता हूँ कि यह मर पूपि भापए पर
अवश्य विचार करें।
जोर-इम प्रकार श्रमस्यामृपा नाम की घौथी पालिका का
भाषण समाप्त हो ज्ञान पर जीन समया छटा युरफ भगवान के
समुप प्रस्तुत हुा । वह अस्य त सूक्ष्म श्वेत पस्नों को धारण
यि हुये पूण युनावस्था सम्पन्न अपने रूप लावण्य से पन ममुदाय
की दृष्टि को अपना और रीचता हुआ अपूर्व शोभायमान हो रहा
था। उसने यह विनीत भाव से भगवान् क पाणों मे विधि-पूर्वक
-

जी-न वृत्ता त दत्तचित होकर श्रवण की।
।
म
यो। तय यह युगक भगवान पंचरण म पिर मर ग्य
भगवन् । मैं भी अपना वृक्षात मनान लिय चिरकाल म
उर्वठित हो रहा हैं। मेग वृत्तान्त कुछ घचौरममश है इस
लिये मैं उपस्थित सभ्यसनों से भी प्रार्थना करता कि वे मेरा
दशन वार्य और उपयोग ये मरे महमवी गई। मैं अपने में
( ५६ )
बन किया, पश्चात् हाथ जोड़ कर भगझन् क समुत्र उपस्थित
हुआ। उसकी उस ममय को शोभा कुछ अपूर्व ही यो। प्रानन्दा'-
तिरेक से उसका मुस-कमल सिलसिला उठा था! श्रार्खा स
तेज की रश्मिय निकल रही थीं। शरीर का नावण्य दराने वालों
को विस्मय में डाल रहा, था। इतने में पहली-सत्यमापा-और
चौथी-व्यहार भाषा यालिस दोनों
उस के पास पाकर महो
हो गई, वह इन दोनों का सहचारी है और बीच को दादालाय
अमत्य और मिश्र भाषा-लजाशील होकर इसके पीछ दर होर
खड़ी हो गइ । दोनों चालाओं के मध्य मे खड़ा हुआ यह युइक
इस प्रकार शोभा देता था जैमे दो भागों में विभक्त हा कर मार
रूप से सही हुई पाठ सिद्धियों के मध्य म उपास्थत परम यो
रान सुशोभित होता है। अधिक क्या कह इस दृश्य के सामन
प्रद्धि और सिद्धि मे सम्पन्न विनायक को शोमा मामी
हुआ उनकी अनुमति मिल जाने पर इस प्रकार बोला-
1
मेरा नाम जीव है। मेरा अन्तित्र अन्धदि निधन है । म
विश्व के समस्त पदार्थों के जानन की...'

मेरा जीवन वृक्षात सुनिये ? मरा सर्व प्रथम स्थान अनादिशल से चला आने वाला-तो तिर्यच गति म रहा है और मैंन पाप कर्मों का उपार्जन १ भी वही पर ही दिया जिसके फल स्वरूप अनन्त यातनाओं का अनुभव (१) जागाणा भते ! पाव क्भ्म कति समजिणिसु कहि समयरिमु । गायमा । स वेत्रि ताव तिरिक्त जोणिसु हाना (२) अहला निरिक्ख जागिएसुयणसुगमय होना (२) अया तिरिक्त जोणिएमु य मयुससु य होजा (३) श्राया तिकिपजाणिमुय देवेमु य हक्षा (४) श्रा तिरिकपनारिणएमु य मणुस्मयु देवेमुय हाना (५) नवा तिरिकत्वको पिण्यणेग्इइस्य देवेसुध हाला(६) श्रया तिरिस लागिएमय मणु रमेमुय देवेसुय होजा (७) अतिरिक्त जारिएएमय होरहएसुय मगुरु- समु देवेसुर हाजा (८) [मगपती स्त्र शत० २८ उई.१] रोग-जीवा ण भंते !' इत्यादि, 'कहि साजणेसु ति कस्या गती यतमाना 'ममनितान्त'? गृहातान्त 'बाहि' 'समायरिसु' त्ति कस्या समाचरितान्त १ पाप कम्म हेतु समाचरणेन, तहियाकानुभयनेनेति वृद्धा अथवा पर्याय शम्भवेतापिनि, 'म वेति तात्र तिरिमाणिएतु होच' नि, इह तिर्यम्योनि सर्वे जापाना मानृत्यानीया वठ्ठलात् ततः सर्वे.पि तियग्थ्यो ऽन्ये नारकादयस्तियग्भ्य श्रागल्यारना कदाचिद् भवेमुस्ततस्ते सर्वेऽपि तियां नए चमून्निात व्यपदिश्य ते, अयमभिप्राय --ये विवक्षित समये नारकादयोऽमृगस्ते सत्वेन ममस्ता अपि सिद्धिगमनेन तिर्यग्गति प्रवेशन निनातयाद वास्तव तियगतेरनन्तत्वेनानिलेर यातन उचास्ति ना मेरे सिरे अनिवार्य था। 18 में किसी क्षयोपशम भार फे चरण विशुद्धि मार्ग का विकास-माग का अनुसरण करता हुया अनुष्य योनि को प्राप्त हुआ तब मैंने अपने प्रामविकास के लिये भाषा पयान का पालन क्यिा, कारण निमो छारा ही स्वा- धाय, ध्यान और सत्य माग काठीवर प्रकाश हो सस्ता है। फिर मैंने जो पुद्गल द्रय से भापापने ग्रहण पिये च स्थित पुद्गल है जय दर से अनन प्रदेशक द्रव्य ग्रहण किया, क्षेत्र से अस पिनाकाश के प्रदेशों पर टहरा हुअा पुद्गल दव्य प्रहण क्यिा, पल से अन्यत्र समय की स्थिति वाले पुद्गल प्रदण किये, भाय তখনও পায়দিনীং নানান, বিসরী নালাবিহন্তে মূল र कर्म सममित त हत्युच्यत इत्येक , 'श्रइवा तिरिवरच जोगिएम नैरइ fo सुन ति रिक्तिसमये ये मनुष्य या अभूपस्ने निलेपतया तथैवोदता #ংখ্যান ব বিনা বাবা , ব; যবিষযৰ-পিয়া विभूनने, ये च यत्रा भूमस्ते तत्रैव मोगनिता त इयों लभ्यत 'न हिताय , 'अहवा तिरिववागिणासु य हाज' नि रिवलिन समये ये मैकिदवारते तथेघ f पतयता तस्थानेषु च तियन्मनुष्येभ्य थागत्यातना ते चैत्र परिश्यन्त-तियग्मनुष्येष्वमूर नेत, ये च यत्रा मूल तत्र व मशिनत इति सामध्यगम्यमिति तृतीय तदेवमनया मानय ऽणते भन्न, तस्लिम्यगत्यैव, श्रये तु तियानरयित्ताभ्या निम्मनुयामा तिया वाम्यामिनि प्रयो द्वि योगा, तथा तियनयिक गनु अनिवारय देवस्तियामाग्यवेवैरिति प्रतिक्सयोगा एक्श्च तुम्क रुयोग इति। [भावती सूत्र उत२८ उद्दे०१] - . से, वर्ण धान गप वाले रम बाल और स्पर्शवाले पुद्र प्रण क्येि तथा वर्ण से पाच वर्ण याने गप से दोगध वाले रस से पाच रस याले और पश से घार स्पश वाले पुद्गल मा रिये यथा-शीत स्पर्श, उघ सर्श स्निग्ध सर्ग और रुक्ष पश, इतना ही नहीं जो पुद्गल द्रव्य आत्म प्रदेशों से पशिस हो रहा है सस को प्रहण किया, अणु और बादर ही निशाधों में ठहरे हुने पुगल सविषय होने पर प्रहण किये, और वे पुद्रला भाषा संप में परिणत करके छोड़ दिये गये। ये ही पुल सृद्धि पाते २ लोकान्त तर जा सकते हैं। भगवन् ! अन मैन इस प्रकार से पुदलों पदणं किया तव पिर वे सत्य असत्य मिश्रित और व्यवहार मापा के रप में परिणत हो गये। मेरे मिध्यात्व और प्रशान-भाव के कारण से अमत्य- भाषा और मिथ-मापा ये दोनों ही मेरी सहचरी पन गई और मैं इन थे यश हो गया त जिस प्रकार होने चाहा उसी प्रकार मेर से करपा हाना में अपनी सुध धुध को सप प्रकार से खो यैठा। जब मैने इन से कहा कि मैं तो अब अमापित भनना पाहता हूँ।क्यो कि-मैन सुना है मिसिद्ध पमु प्रभाषक होते हैं अत में भी चाहता है कि उस गति को प्राप्त होकर अभापक ? Pos र (१)ीपाण भत! कि भामगा प्रभासगा ? गोयमा । जीया भागावि अभासगावि स एट ए मत। एव पुचती, जीवा, मावि धमाधमोवि गयमा जावा दुविदा परबत्ता त-जहा सारसमायएएगाय असधार-समायएएगाय तत्य एजेत असार-समावएस ते हिसा, पद की प्राप्ति करके अजर अमर और स्थिर रूप से सदैव रह सकूँ तय मुझे श्रमस्य मापा ने विश्वास दिलाया कि में तुमको प्रभाष बना दूगी, इस विश्वास म जब मैं इसम अनुगामी चना तब इमन मुझे पाच स्वारों मे डाल दिया। जिसमे में सख्यात असायति और अनन्त काल पर्यन्त प्रमापा दशा में रहा, जब में वहा से द्वीन्द्रियानि प्रसकाय में आया तब मुझे इस प्रकार के दुःख का अनुभव करना पड़ा जो मेर कथन से पाहिर है अर्थात् मुझ से कहे नहीं जा मस्ते। यद्यपि एकेन्द्रिय दशा मिद्धा ग भामगा, तस्य ते सस र सभाएगा ते दुविधा पणत्ता तनहा सेलेस डिवएएगा ये अमेलेम पनिरूपम य तस्य ए जे ते सेलेसी लम पनि गाते ण अमासगा, हरय ण जे ते शसलेसिपहिवरणगावे दुब/प० तजागिंदिया य श्रणे गदिया य तत्य राजे ते एगिदिया से पश्रमामगा तत्प गज ते नए गिरिया ते दुविहा प० ता-पनलगाय अपजत्तगांव तत्यण ने अपजनगा तण श्रभासगा तत्व ए जे ते पञ्चसमा ने भा गा, में उएगा?ग गोरमा व पुच्चता जीपा भासंगा विश्रमामगावि नेहारा भते ! भासगाश्रमासगा। गरमा । नरक्ष्या मा गावि प्रभासमाधि से से प? गभते । एवं युञ्चति-नेरड्या भारगावि प्रभागात १ गापमा ! नेरइया दुविधा पन्नता तमग पजत्तगा चजतगाय तस्य य ज ते प्रश्नत्ता से ए श्रमासगा, तस्य जे ते पजचगा चे ण भागा, से पराग गायमा ?" घुर्ता-नरहया भामगा वि भ्रभागा वि, पप गिदिय-बनाए निरचर माणियश्य ।। प्रहारना एय भाषा पद ११

म भी मैने श्रमहनीय या कामव रिया तयापि चे दुम
अश्य रूप में य, १५ शि पसाय में समय
किये जान पनि
दुख व्यक्त हैं और परम भREET रहे है । यह सब दुद ममस्य
और मिन्न भाषा का समर्ग का परिणाम है। ये दोनों मिया
दशन-माल्य की महपरी है । और रात दिन उमीफ गुण At
रहती है। इन्होंने मुझे अपन पगुर में पमाया और में बुरी
नाह मा जिस या मुरबार : पनामापाता है। प्रस्तु-
(१) यह बात निर्विवाद सिद्ध है कि जिस भाषा क पोलन में
लिये मापा गण के पुदल प्राण पियवान है यह नारगी भापा
--
(मारमा परमपाप)
(१) जीरे ग भन । साहलाई मञ्चम
मनमा कि
सयामामत्ताए निसिरह मामभामा निसरह धाम-मासा FARH
श्राचामासभामचाए निमरद मायामासTn fir नाममभा
पत्ता निससि नाया-म्भासगारा निर्गत नामसभ'मत्ता
निमरत एप एमिरियनिगरिय दाता र वैमागिया एवं पुरतो
नि । जव मन जाह दगइ मम सनापगमति तारक
स- भामत्ता निमाति मोममामतारा मन्चमसमासनाए श्रम धाम :-
मामा निसरद गायमानो सचमत्ताय निमरति माममान
निसरति सच्चाम'म एम्यामममा निसरति सना
मममा पाएवि, असचामाममामलापति म्यापर याममा
गिलिनिया तहेर पुग्नुमति भए घेर गिम्हात ताप व निसरत, पर्ष
एस या अगा मागियासु १५२ मारना भाषा

का व्यवहार परता है अगर मत्य भापाये व्यगर के लिये भाषा
वगणा के पदलों का ग्रहण हो तो सस्य भापा, और असत्य मापा
के लिए पुदगलों
का प्रदण ता अमत्य भापा का व्यवहार
करना पड़ता है। पर इस
अमत्य भापा के
प्रभाव
से प्रभावित होकर मैने ऐसे ही पुद्गला सा प्रण किया कि जिनको
परिणति अमत्य भापा के ही रूम म होती है। भा मत्य भाषा
पुद्गला रो प्रहण करन की अभिलाषा भी होती रही परतु
इमम तीन प्रभार मे व्यामाहित हा
में ऐसा करन में असमर्थ
रहा । पलस्वरूप इस लोर म मेरी प्रतारणा हुद्द, मै मप या
अविश्वास पात्र बा। तथा मिश्या दशन फे संसग मे श्राकर
अन त समार घर म परिभ्रमण क्यिा और नाना प्रभार फ थमा
दुसोको सहा । इसके अतिरिक्त मिन भाय ने तो मुझे कही का
भी नहीं रहन दिया। परि वसुदव राजा की भाति मुझे अधोगनि
मही धकेला।
1
"भगवन् । इन दोनों के सहवास में धान मे मेरी जा
तुदशा हुई है उसका पणा करते हुए तो जिहा करने लगती है
पूणदिराय दे इन्हांन मुझे विश्वाम मे लेकर मेरे साथ बहुत ही
अनुचितव्यवहार किया। इनकी कृपा से मने जो• यातनायें
भोगी हैं उनका स्मरण होते ही मेरा गरीर काप उठता है। मैं तो
इनकोबहुत भली सममता था परन्तु ये वा देवी के वर में छिपी
हुई हायने है।

"भगरन । श्राप मुझे ना घगुल से जिस तरह मा होमके
छुटकारा दिलान की पपा कीनिये ? मैं तो इनसे भव बहुत ही
सग आ गया हूं और इसीलिय श्रापकी शरण ली है।"
प्रमो मेरी रक्षा करो। रक्षा करो।
जीव नाम का युवा पुरुष भी अपना भापण ममाप्त भी न
फरने पाया था कि वे दोनों असत्य और मिश्र भाषा बीच म
योल
7
-
भगवन । यह युवक बड़ा प्रपची है, आप इसके यतध्य पर
यिलकुल ध्यान नहीं देना । यह दम पर झूठा हो दोप लगा रहा है,
जोफुद्रभा नरक तिर्यच आदि योनिया में प्राप्त होने वाली यातनाst
के भोगन के विषय म इमन कहा है यह सब ठीर है परन्तु इसमें
हमाग कोई दोष नही, इममी रसूत पा ही यह पल है। हमने
इमको भी किमी यात की प्रेरणा नहीं की, प्रत्युत्त हमें ही इसने
हर एक कार्य के लिये नाधित पिया और हमको इसकी आशा
नुसार सत्र फुर करना पड़ता रहा है इसमें यदि कुछ दोप तो
स६ एका अपना है हमारा उमस सोइ मराकार, नहीं, यह स्मये
हो हमारे अनुरूप असत्य और मिन भाषा के अनुरूप पुदल द्रव्य
पा महण करन म प्रवृत्त रहा, और उमसे हमार स्वरूप का संगठन
परफे उसके द्वारा अपना कार्य मिद्ध करता रहा है। इसमें हमारा
अणुमात्र भा क्सूर नहीं है। जैसे कोई मदिरा पीने पाला पुरए
नालियां म गिरता हुआ अपनी दुदशा के लिये मदिरा को दोषी
टहराता है वैसे ही यह अपनी भावनानी भोगने का दीप हम

पर योपता है ! क्या मदिरा ने कभी किसी के पास जाकर यह प्रार्थना की है कि तुम मुझे पियो ? तो रि मदिरा विचारी म क्या दोप, "उधर तो यह स्वभार ही है कि उसे जा पोयेगा वह बार उन्मत्त होगा अथात् उसमे यह अवश्य मानकना नायगी । पुरुष को स्वयं चाहिए कि वह उसके संसग से दूर रहे। इसी भाति हमने कभी भी इससे अपने व्यवहार के लिए प्राथना नहीं की, यह तो बलान हमको अपने संसग म लाता रहा है। M Ali "प्रभो। हम अपला हैं और इसके आश्रित है। इसलिए अनिन्छा होने पर भी हमको इसके आदेशानुसार काम करना पड़ता है। हम तो अपने गुण स्वभाव के अनुमार पूरी ईमानदारी से इसरी धाज्ञा का पालन करती रहती हैं, फिर यदि कोई इट या अनिष्ट हो तो उसका उत्तरदायित्व हम पर कमे १ हम तो इसकी पया मे द्वारभूत है। जैसे कुटार के द्वारा लण्डी का छेदन भदन पग्नेम छदाभ नमियाओं की तत्व धुटार पर नहीं रितु कुटार को चलाने वाले पुरुष पर ही है ठीक उसी प्रकार हमारा व्यवहार उयितानुचित्त भाषण करने पर उमस पिपन्न होने वाले अच्छे पुरे फल का उत्तरदायित्व भी इसी पर है अर्थात उस, फ्ल को यही भोगेगान कि हम या कोई और। इसलिये अपनी दुसमयी घेदनाओं का कारण हमे बतार हमको उपालभित करना इसका सरासर अन्याय है जो कि पिसी प्रकार भी च तव्य नहीं मारा - जा सकता है।

इस प्रकार उन छ व्यक्तियों की प्रात्मक्या को मुनर परम
दयालु मन और सरदर्शी स्वनामधन्य भगवान महागीर स्वामी
घोले- "भाग्य शालियो ! तुम्हारे सत्र में अभिभापणों को
भली प्रकार सुना, ओर इम परिषद् ने भी दत्तचित्त होकर
श्रमण किया "ममे सदेह नहीं कि तुम सब भापण
करन में सूर निपुण हो ? तुम्हारा पार पटुना श्लाघनीय दै और
इसी लिये अपना २ पक्ष स्थापन करने म तुम में से किसी ने भी
कोई कमी नहीं रकवी । एप तुम मर का कपन सर्वथा असत्य
नहीं किन्तु उसमें अपेक्षा कृत सत्यता भी है। हम तुम सबके
वास्तविक स्वरूप को अन्त्री तरह से जानते है और जिस
परस्थिति म रह कर तुम्हें पाम करना पड़ता है उसस भी हम
भला भाति परिचित है । पर तु तुमसे ध्यान अश्य रहनों
चाहिय मि तुम मा चिरकाल से एक दूसरे के ममीप में रहने
याने हो, एक यो टुसरे से हर समय का वास्ता है, अर्थात, एक
पो दमर को महायता का आवश्यकता रहती है। और तुम सब
एर होस्था पर रहन वाले एवं बावन मरण के साथी हो इसलिये
तुमको चापस म मदा हिल मिल कर रहा चाहिये परस्पर
प्रेम और शान्ति का वताय ना चाहिये इसी
में तुम मय की भलाई है। परसर घे इर्षा द्वेप और कलह क्लेश
में तुम सब की हो हानि है, ताम पिसी का नहीं। श्रत जो पुष्ट
भो बोलो समम सोगवर बोलो जो कुछ भी गे विवेक और
विचार से परो जिससे पीछ पश्चाताप न करना पड़े। (चार

वालिकाओं को लक्षित करके ) देखो तुम चारो का उद्गम स्थान एक है ? स्वभाव में विभिन्नता होने पर भी तुम्हारा सत्ति स्थान एक ही है, [द की ओर संकेत करके ] यह युवा भी तुमारा सहो दर ही है। इसका जम स्थान भी यही है जो तुम्हारा, इस नाते में तुम पाचों आपस में यहन भाई हो, और यह छठा युवक तुम मवका आश्रय गता है। इसी पर हो तुम पार्चा की स्थिति निभर है । इमफे गिना तुमारा कोई ठिकाना नहीं और पास कर तुम धागं चालिसों का । अत तुम सबने इसे प्रेम पूर्वक अप नाना चाहिये और यथाशक्ति इमकी सहायता के लिये उद्यत रहना चाहिये। [नीसरी ओर लक्ष्य करके ] तथा इस युवक को भी उचित है कि यह तुमारे उपकार को समझे और तुमसे पूरी २ सानुभूति र ? यह इसकी बही भारी भूल है जो तुमको उपक्षा की दृष्टि स दसन लगता है यदि इसको तुम्हारी सहायता प्राप्त न हो तो यह कुछ भी नहीं पर सक्ता सका कोई भी काय तुम्हारी महायता करना सम्पन्न नही हो सकता। तात्पय म -मर ससारवति मारे काय तुम्हार हा सहयोग स हो रहे हैं! इमालय तुम्हार विषय म इसको सवचि तत रहना चाहिय और अधिर स अधिर कृतज्ञता प्रशशित करना चाहिये । इसी म इसका हित है । परन्तु म भी कुछ बाधीन नहीं, यह भी इस समय परश हो रहा है। परवशता के कारण इसको अपने म्वम्प का बिलकुल ध्यान नहीं रहा भिड़ों में विचरने वाले सिंह को भाति ग्रह भी अपने आपको भूला हुआ है ! सारे जगल मे श्रयता और सयमा सम्राट होकर विचरन वाला एक सिंह, । ।

( ७०
स्वरूप को भूलने से एम गरिये की लाठी में हम आपर भेड़ा
के माथ परतत्रता के पाश म य धा हुमा तरह तरह की यातनायें
'भोगे । यह नितनी आश्चय जनक यात है उतनी ही बल्कि इससे
भी अधिर आश्चय में डालन वाली इम छठे युवक की यात
यह परम घनी होते हुए भी निधन, परम ऐश्वर्य का अधिपति
होते हुए भी कगाल अपने म हर प्रकार की शाक्त गसते हुए भी
महादुयला, मरझान सम्पन्न होते हुए भा महामूदऔर मात्र
प्रसार स्वतन एवं स्वाधीन होन पर भी मगीन और पामुगा
पेक्षी बन रहा है । क्या यह फ्म पाश्चय की बात है ? महानुमायो
इसकी इस प्रकार दयनीय दशा का दग्नयर हमने इस पर
बड़ा तरम अाता है, तुमको भी इस पर दया का चाहिये और
इमके मंगल कल्याण के लिये इसकी अधिक मे प्राधक सहायता
करनी चाहिय ? जिससे इस बालक को इन उपस्थित यातनाओ
में मुक्त होकर कभी मुख का साम लने का भी अघमर प्राप्त हो
सके ? और तुम सब का हित भी इसी म है।
-
तब जीन नामक छठे पुरुष का सम्बोधित करते ॥ भगवान्
बोले- अरे युगर । तू अपन स्वरूप को भूलकर
पिम गहरी
निद्रा म सोया पहा है ? उठ ! जाग और अपने वासनिक रूप
को देय तु कौन है ? और अब क्या बना हुआ है ? जैसे रात
का भूला हुआ, दिन मे घर बाजान पर भूला हुआ न कहलाता
नमी प्रकार यदि तू पर भी समल जाय और अपने स्व स्वरूप
को पहचान ले तो तरा कुछ भी नहीं मिला। इन मभी प्रकार की

1
-
रेममें किसी दूसर को उपालम्भ देने की आवश्यवान
अनुसरण करना तेर लिय आवश्यक है पथान बिन
पायत्मिा बन रहा है अर्थात् दन पयाँ होहोनल निका
रूप समम रहा है, इनके प्रगाढ सम्बर को नाना
प्रकार की ऊंच नीच योनियों में भ्रमण अन्य पद है, भोर नम
प्राप्त होने वाली थसह्य वेदनाश्रीकामा दिया है। परन्
वास्तव म तेरा स्वरूप उपयोग अर्थात
दोन देता
है, तू अन त शक्तियों का भंडार है। लरे प्रशुद्ध होने
पोछे लगी हुई ये सारी उपाधि पर प्रबल दग से हि
यातनाओं का कारण तेरा वैभाषिक परिणमन है, इनमें
पारणतियों न ही तुझे दासता को जजोड़ों में जा रम्मा
स्वभाव
रमण करने वाला मयश अधिपति और म
शासन करने वाला सर तर स्वतन एक सो विजक्षण पर
थारमतत्व है ! निश्चय म तो तेरे में इन च्याधियों असम
नीं। यह तो तुम्हारी अपनी वुलाइ हुई है, तुम जय पाहा:
घोड़कर अपने निन स्वरूप में रमण कर सकते हो।
स्वय अपनाया और अब य तुम्हार लिये ववाल बन रहा
अपन भूल हुए स्वरूप को प्राप्त करने के बारत दिसा
सू अपने आत्मस्वरूप को प्राप्त कर सकता उनको मदों में मात्र
धान होकर सुन?
ज्ञान
के
पर
तु सोधमान माया और लाभ से अभिभूत हार इस साल
प्रभाव से तू अनेक प्रकार के पद को दूर कर म

( " । हुए बादलों की तरह कुछ ही समय में तितर यिनर हो जायेंगी सूय के उदय पर जैसे अपार का अस्तित्व नहीं रहता उमा प्रकार तरी ज्ञान ज्योति का उदय होने हो, तर अदर घर किय बैठा हुआ यह अज्ञान गक्षम सदा के लिये, अपना पिरतर थोरिय उटाकर विसी घमा प्रदश म चला जायगास लिये तुम थोड़े से पुरुषाध की आवश्कता है। यत मयसे प्रथम स मयम और न्यागशील यनार इन पूक्ति पार्यों का शिकार पर। इनर यहिपार से इनके आश्रित और जितने निभाव या दुर्भाव है व भी उसो क्षण तुमसे सदा के लिये अलग होने को प्रग्तुन हो जायेंगे । तथा जिन दो बालिकाओं-असत्य और मिश्र-भाषा तुम उपाल भित पर रह हो वे बिचारो ता तुमार पास तक भी नही फ्टकगी इमलिये सबसे प्रथम गग द्वेष के सम्म घ का विछन्द करो, उसके विच्छेद से कम बघ का विच्छ हागा । इमी प्रकार प्रमश प्रास्त्र का निरोध सम्बर का उदय और शशिष्ट को २१ निजरा स मोक्ष मदिर के मातिभव्य द्वार का उद्घाटन होगा। इसक लिये तुम स्वनामघय मुनि पुंगय गन सुकुमार के प्रशस्त जीवन का अध्ययन और मनन करना ही पर्याप्त है। पतदय तुमको सम्यग दर्शन मम्यग मान और सम्यक् चरित्र रूप रत्ननय की आराधना में सर्वती भाव से प्रवृत्त होना चाहिये ? तुम सत्य और व्यवहार नाम को इन दोनों कुलान म' पारियों की सहायता से अपना यथेष्ट विकास कर सका। तथा सम्यग ज्ञान के उदय से तुम्हार आवरणों वैभाविक गुणों

अमापी अभापक बनने का भी शुभ अवसर प्रती
हैं यथा-"कतिविहेण भते १ ययणे पनत्त पर होमबह इस
xप्रशाग्ना सून ११व भाषापट में बना
षयणे, श्रपझस्थायणे उवणीयवयसे प्रयास गए, ये
वयरणे, श्रवणीयोचणीय वयणे, तीतवणे,
पप, अजगर
पच्चस्पायणे परवखश्यणे। श्रवणय अयणे, या पीस
अवर्ण यो वणीय क्यणे, पुच्चेत भव । नव वधाइ पल्म
यण वा वदमाणे परगणा रासा मामाय पनामा
गायमा इन्चेत एगवयण वा नाव परवाएमा पस्यावसीय
एमामा गए मामामामा" (घ
द्विवचन पुरुषाविति, बहुवचन पुरया इति श्री वचन मिय छी
टीका-कतिविप मत ? क्या एकवचन पुरुप ३
कातिरोभाव और तुम में स्वाभाविक गुग्गों का यथष्टप्रश्नाश होगा,
और हयोपादेय विचारणा की शक्ति, श्रापिभूत होगी । इसस
फिर तुम्हार अतिम ध्येय की प्राप्ति मे कुछ दर नहीं लगेगी।
यही तुमारे अभ्युदय का सबसे अधिक सरल और सर्व प्रसार
की बाधाओं मे विनिमुक्त एन निपटक और निर्भय राजमार्ग है।
इस मार्ग के अनुसरणार्थ तुमको सर्वप्रथम मा समिति की
आराधना करनी होगी, उसकी मध्य प्रागपना से, नुमो कर
मत्य और भाव सत्य का परिमान होगा। इसके ज्ञान म तुमको
भाषा ५योग बचा प्रयोग के विषय में विवेक प्राप्त होगा।
विवेक से शन शनैः तुम मपूर्ण मत्यभाषी पनते हुए, एक दिन
तथा वचन के प्रागमो में वर्णित भेदोपभेदों ५ मा ज्ञान तो सुमो
- वयणे, दुषयणे, वहुव्यये इस्थि यदस्य, अभ्यास

प्रशमति यथय रूपा पर सुशीलात, अर्त तश्नन अवरोत् त्या चाह रच्चेदय भते! एगवयग दक्षपया मित्यापि, भावितायें, श्रवण- श्रारम्भ में ही होनायगा। इसके लिये तुमगे किमी प्रकार परिश्रम की आयस्याता नहीं। आवश्यक्ता तो वचन गुप्ति क सम्यग अनुष्ठान * उसके अनुइटान स तुम अध्यात्म याग की साधना माग, उत्तरो पचाय पुमान नामकवचनामिद एड, अध्यात्माचा पायोनि निधाय विश्रत रक दयाऽन्यद् भिगिरपि सहमा यच्चेतसि सवले. उपनीत यापशमा वचा यथा स्परतीयम्रा अग्नीन पचा नि वचन पथ्य বন্যা করা সুনানীষন য ময় নি यथा रूपरतीय वा परदुश्शाला, अपनीतोपनातायन-पत्रिका प्रयुटराभवचन वतमानरालवचन परतीन्यादि । यहागरकाल पर परिष्यतीत्यानि, प्रत्यक्षाचन श्रयमित्यानि, पराक्षवचनसत्पादि" एता शा-पारि वचनानि यपास्थितस्तुविषगणि पायनियान ततापदैतानि सम्यगुपयुज्य वदति तास भ पा प्रज्ञापनी द्रव्या, तथा प्रतीत एव"। * 4-ययगुनण्ण भने १ जी विजार १ २०ीबियार जब निकियार ण जीवे रहगुत्ते अभय जाग साइण मुने याधि विहरद ॥५४॥ (छाया)-वागगुत्या भदन्त । जीव कि जनयारी ? यागमय, निरिकारित्व ज यति । निर्विकारोजीचा वाग गुप्तोऽध्यात्म साधन युक्त श्या पिहरति ॥ ५४॥ ख- +य ममाहारणयाए भंते १ जीके कि जणा! ३० वर्ष समाहारण दसण पजावे विमादे । वय समाहारण दमण पजवे खिोहित सुनद बोधियचे नि वचे इ, दुलाद वेहियत निजरेह ।। ५७ ।।

मे सदा
तर विकास करत हुए पृत्ति सतय रूप समाधि को प्राप्त कर
सो, जिसमें तुम्हारे कल्याण को पराकाष्ठा पर्यसित है ?
सोका हो पर नाम निर्माण पर है । इम देशामे तो न गय है
न शर, और न रस है न पश, न कोइ संस्थान है और न
शरीर, किन्तु फेवल द्रव्यात्मा, झानात्मा दशन और उपयोग तथा
कार्यात्मा हो शेष रहता है जो कि अनात सुख सागर
लिय लोन होकर अपने शुद्ध स्वरूप में कभी भी च्युत नहीं होता ?
यम इमो अनुपम पकी प्राप्ति कं लिय हमने तुम्हाने प्रति पूर्वोक्त
-साधन मार्ग का नर्देश किया है, अस्तु अब तुम मर श्रवमर
यो ? आज की यह परिपद् अप्रिनित की जाती है।
भगवान् वे इस याय संगत और कल्याणप्रद अभिभाषण
से उन छओं -यक्तियों सहित मागे हा परिप बाद से
प्रमोर हा उठा और चारों ओर से जय जयकारकी धनि गूजन
बागी।
(छाया)-या समाधारणया भदत ? और विजनयति ?
নাহ্ম নাখাব খাৰু, গাব্য বয়ন থাকা বিঘিরি,।
याक साधारण दर्शन पयवार विशोष्य मुलमनोधिक्य तिमति दुलम
बाधिन्य निजरयति ।। ५७ ॥ उत्तराध्य० ० २६)

प० भरलाल जैन न्यायनीथ
भो वीर प्रेम मनिहारों का रारता
जयपुर।

No text on this page.

Jiva Shabda Samvad

Author
Jain,vinayachandra
Title
Jiva Shabda Samvad
File name
Jiva Shabda Samvad
Text
OCR done
Citation
1949
Published
2011/03
Publisher
Jaipur,gyan Bhandar Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
86
Library
Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Classification
Devotional
DLI number
551942
Barcode
4990010032633.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
zQB1Tw2WfaU
Download PDF

Jiva Shabda Samvad