Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Shri Veer Sena Kusum Sri Charitar��
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प्रस्तावना. * बुद्धि फलं तत्त्व विचारचं । देहस्यसारं व्रत धारणंच ॥ अर्थस्य सारं कर पात्र दानम् । वाचा फलं प्रीतिकरं नराणाम् ।। मनुष्य जन्म की प्राप्ति का मुख्य प्रयोजन है कि कृतव्य परामण होना, क्योंकि- आहार निद्रा भय मैथुन आदि कितनेक कृतव्यों तो मनुष्य के और पशुके एक सेही है, विशेषत्व फक्त बुद्धि शरीर द्रव्य और वचन शक्ति आदि काही देखा जाताहै. जिसका फल बुद्धिसे तत्वज्ञ होना, शरीर से व्रत धारण करना, द्रव्य से पात्र दान देना और वच- न से सर्व के साथ प्रेम बृद्धि करना, येही होता है. जो ऊपरोक्त चारों रत्नों को प्राप्त जो फल उनसे प्राप्त करने का है वोन किया तो वो मनुष्य पशु से भी निपाट-खराब क्योंकि-पशुको तो वो साधन प्राप्त हुवे हीनहीहै तो वो बेचारे करेही क्या?परन्तु जिनको जो साधन प्राप्त हुवे हैं ओर वो उनका लाभोपार्जन न करते व्यर्थ गमाते हैं या कु कर्मों मे लगा उलट खराब करते हैं उसके जैसे बेवकूप मूर्ख और हे ही कोन? अर्थात्-चोही !! ऐसा जान ऐसी अज्ञान तासे हुइ दुदी का अवलोकन कर स्वाम हितार्थी हो जो उपरोक्त चारो पदार्थ प्राप्त हुवे हैं उनका यथा शक्ति यथार्थ लाभ लेते हैं वो मनुष्य हो यो पशुहो किसी भी द्रव्य पर्याय को प्राप्त हुवे हो परन्तु मावों की और कृतव्यों की उ- तमता कर वो उत्तम होता है और अनेक दूसर्साध्य कामों कोभी सुसाध्य बना देव मानव दानवों का पूज्य बन अनेक एहिक और परमार्थिक सुख सम्पति का भुक्ता हो धर्मार्थ साधन से साध्यहो स्वर्ग और उपवर्ग (मोक्ष) प्राप्त करता है, यह बात ताहामेवं सत्य है. इसका हुबेहू चित्र दर्शाने के लियेही माना यह वीरसेण कुसुमश्री चरित्र रचागया हो ऐसा इसके पठन श्रवन मन से पाठ को श्रोताओं स्वतःही समझ सकेंगे, और जैसी कु- तव्य परायणता वीरसेग नृपतिव कुसुमश्री सती और चुडामणी शुक (तोता) ने करी है उसे ध्यान में ले कर आपभी करेंगे तो वो जरूरही वैसेही सुख के भुक्ता बनेगें इस उम्मे- दसे इस चरित्र की ५०० प्रत,तो यहां की गुप्तपरमार्थ की इच्छाक शास्त्र कोविंद सुव्रतिसो भाग्य वती श्राविका बाइ के द्रव्य के सदव्य से और ५०० प्रतों यहां के ज्ञान वाद्धि खा ते मे जमा हुवा द्रव्य जिसके सदव्यय से यो सब १००० प्रतों का अमूल्य लाभदेताहुवा कृतज्ञता हूइ समझताहूं कृतव्य परायणता का इच्छ राजाबहादरलाला सुखदेव सहायजी ज्वाला प्रसाद जौहरी (दक्षिण) अंगनाट नारकमान. वीगब्द २४४ १० श्रीवीरसेण कुसुमश्री चरित्र का शुद्धिपत्र. ' पाठक गणो ! प्रथम निम्र लिखित अशुद्धियों को शुद्धकर फिर यत्नासे पढीयेजी पल्या दीन पल्य दीनी श्वमेरे पर्व पृष्ट ओली अशुद्ध चिंडाका प्रति छाय चिदाकार पति छवाया २ ११ घाता वास १२ १३ मच्यो अपही आपही तप.) , १ मव्या इस डर- शोक्षित उछित लुली १. १२ ११ हरी शीकारे शोखरे कोइ पाकाइ पजगये पड़गये - शोभित उचित लुली२ फोटोलइ देतो. १२ १२ a १३ ८ देता - -- " पैसे पैसे " १ २८ है २ ३० १३ बार ४० ४१ ४२ ७ ११ रीसभर रतिभर १२ मिलगंदी मिल बाटी १४ विन विननही १२ कस्मान कसर नही लखय लखाय मुझा २ तपातारेताप तापतपतारे मीठे मीठेरे ३ चालोरी चालोरे हर्षिप्फा हर्षिपुप्फा २ कीजीये नकीजीये करखी करणी १३ छोडो छेडो ततो तूतो, ४३ २ ४ x १ ३३ ३४ आदि वाठी मनवोर कानसे लीलं असके तूयह अखण्ड किंककरी देवों बेठी 'मनवारे 'लाल लीला॥ आसके तूंक यह खण्ड " ४४ ' " ६८ 01 सत्य माया " " १ २ २ सत्यक मोहा में आदेख. णर करोजली धर आदख कर कराजली धन ६२ वमी भवी १३ जोय। १४ बहुरे माल हाहा बैठाहो तती सती के पृष्टाक उलट लग गयेहें परज परजा. पीजको के वीच धाराया थरराया फफेरी " १ वल्ला २ २ नत तन الله ه ه م م م م له ه ه ه ت هه . ५ " पहोच दशवी सपाय अमोल लये कहाव । नववी सवा अमो लगत चलते " १० फरेरी ४ ३ हम चलते " पृष्ट ओली १ ७१ १ १ ८१ १ १ जहाज में ८३ १ १ शुद्ध भल कोण देखे कोन देखे निकल लिय निक लिये जहाज चली सरे चाली येनरे आरी सिणगरे सिणगारे मुनिकरो मुनिकहे यथातथा यथातथ्य फलेफले फले मया वन्सव वन्धन ७२ पृष्टांक ७८ १३ कहवाय कसोय ९ गमावोगा गमावोगे ८२ १२ आयुअन्त आयुअन्त सम १४ पाचवी पेपेरे मेरे छोगरे १२ वाररे वररे भार भारगे १२ वपतिये पतितपे तस्य शिष्य इस सिवाय और भी दृष्टि दोष विग्रह मन और बुद्धि की, मन्दता से व कम्पो जिष्टर की अधिज्ञता से अनेक भूलों रह गइ है उन सब को सुधारीयेजी अमोल ऋपि. " ४ ८३ १ " १ १४ ८४ १ २ ८ " " जन गन्याया बीकानेर, (राजपूताना) PH ॥ ॐ श्रीवीतरागाय नमः॥ पगरचन्द सन लेठिया ॥ श्री वीरसेन कुसुम श्री चरित्र प्रारंभ ॥ ॥ दुहा-सचिदानन्द आनन्द कन्द । चिदाका चिद्रूप ।। जय शुद्ध चेतन्यमय । प्रभू- जगत्के भूप ।।१॥जिनवरेन्द्र त्रिकालके। हे हुवा होवे अनंत । ते जग तारण युग पदे । मु झ उतमांग नमत ॥२॥ सर्वज्ञ गणेश सूरी सुत्री। थिविर तपश्वी अणगार ॥ विद्या चरण धारक भणी । वारम्वार नमस्कार ॥ ३॥ भरम तिम्रहर विशुद्धकर । ज्ञानादि गुण दा तार ॥ अगाध उपकारी गुरु मणी । नमू अनन्ती वार ॥४॥ भारती बुद्धी उदारती। को- १ पण्डिनविद पूज्य कवीमाय ॥ जिनानने जे प्रगटीं । नमू छू करजो सहाय ॥५॥ इत्यादि सर्व जे टका। सरण गृहूं कर जोड ॥ विघ्न हरो शांति करो । पूरो म्हारा कोड ॥६॥ चउँ विध धर्म जग तारणो। दान शील तप भाव ॥ शील शिरोमणी सर्व मे | पूरे पालक के चाव॥७॥ कुसुम श्री मोटी सती। रही विश्वराणी आवास ॥ ब्रह्म वृत शुद्ध पालियो । तस चरी करुं प्र काश।।दापांच प्रमाद को परिहारी। धरी चित उत्साव ॥ नित्य नियम धरके सूणो। गृहो गुण शुभ भाव।।९दालश्ली-धम्मो मंगल महिमा नीलो।यह देशी शीलसे सर्वसुख संपजे।
। T परचक्री शीले लील विलास।।शीलसेसर्व संकट टलेोशीले फळे सर्व आसाशीशसर्व दीपोंमें दीपता। सर्वपृथवीका मध्या।सर्व द्वीपोंसे लघु कहा ! जंबूद्वीप सुसद्य ॥शी२॥ नग नगेन्द्र सुदर्शण वी कु तेहथी दक्षिण दिश ॥ भरत क्षेत्र कर्म भूमीका । शोभित विश्वावीस॥शील३॥ वैताड और गंगा सिन्धू से । हुवा तस छः भाग। दक्षिण के मध्य भाग मे । शोभित है बहू जाग ।।शी ला कनकशाल पुर तिण विपे । स्वर्ग तणे अनुहार ॥ ऋद्धि सिद्धी से पूण भरा । दो, १ स्वचक्री' चक्र भय निवार ॥शील ५॥ गढ पके कर वींटीया । कांगरा फिरणी बूरज ॥ द्वार बहू हुशोभिता । खाइ कपाट सूरज ॥शील ६॥ राज मार्ग चौवटादिक । पन्थ निर्मल सुख कार ।। उतंग मेहल ने हवेलीयां । रंगीछे विविध प्रकाराशीणाचार-वर्ण कौम छेमिली। बसे सर्व सुख माय । दूंदाला रुपाला कमलपैति । तेह वजारे शोभाय ॥शील ८॥ धर्म स्थान घणा तिण विषे। दातार उदार प्रणाम । जाचक जन संतुष्ट रहे। पावे इच्छित आराम ॥ शील ९॥ नट खट चोर क्षुद्रादिसे । रहित वस्ती अभीराम ॥ शील संतोप दयादि गुणें । वासुदेव जन से गाम ॥शील १०॥ हरी केसरी तस महीपति । हैरी ने केशरी समान ॥ अरी- रंजे सजन ने। मानी मछरालो सुलतान ॥शील ११|| न्याय नीती मे निपुण घणों। वचक्षण चित उदार ॥ रुप तेज दीपे इन्द्रसमो। राष्ट ऊपर अति प्यार ॥धील १२॥ प्रीति । २-शेठ १ माति पटरागणी। इन्द्राणी सी ससनूर ।। अहीण अंगी दिप्त अनंगी। लज्जादि गुण भरपूर गील १३॥ शीलवती ने महासती। पृतीवृत्ता पती प्राणाधार ॥ कुशल ते सकल कला विपे। धर्मार्थ काम जाणना।।शी१४॥ भारती चंद्र सचीवजी। चारो बुद्धि निघान ॥ राज धुरंधर गुण नीलो। प्रजा को जीवन प्राण ॥शील १५|| गज गाजी रथ पायका। चतुरंगी शैन्य श्रेय कार॥ देखी कम्पेरिपु कालजा। करे ते जय २ कार ॥शील१६॥ श्रीवसी भन्डार मे । कुशल सामंत के माय । आवक जावक दोनो घणी । विलसे पुण्य पसाय ॥शी०१७॥ सूमही आदि उद्यान में। वृक्ष अनेक प्रकार ।। बहू आकारे बहू शोभिता । नम्या फल के भार ॥शी० १०॥ वेली छाइ मंडपे। फूल फूल्या गुलयार ॥ पक्षी युग्म कि- डा करे। पंथी जन ने आधार ॥शी० १९॥ वावी कूपादि सरोवरे । निर्मळ भरीयो नीर॥ मिष्ट लहू निरोग्यता 1 कमलादि शोभे तीर ॥शील २०॥ पूर्व पुण्य पसायथी । होवे सर्व सुखदाय |,मंडण ढाल पहिली कथी । अमोल ऋपि हितलाय ॥शी०२१ # || दुहा-सय- न भवन सुहामणो। चित्र विचित्र रंग भर || स्थंभ खूटी ललित पूतली । सुगन्ध मह के वह पर ||१|| हीरेण ईस पाया हेमकी । पंच रंग रेश्मी निवार ॥ मुखमल खोली अकतुले भ- री। तोपक तकीया सूखकार ॥३॥ सौम्य द्रष्टी सिंह शार्दुलो । खेलतो गगन मझार । -r १ चादी २ सोना वी कु. राणी उवाशी लेवतां । पेठो उदर ते वार ॥४॥ तक्षिण जागी हर्ष भर । मन मे स्मर नव- कार ॥ अर्थ पूछण हंस गति करि। आइ जिहां भरतार ॥५॥ *|| दाल २ री || म्हाने खण्ड ? साई मिलावोरे ||यह हम स्वपनो दीठो ॥ अर्थ कहोजी शाणा साहिवा आं०|| निद्रा निवारण श्वामीनी सरे । माननी करे उपचार |॥ सयम सार अलापी रागणी । मधुर म- ध्य श्वर सार जी ||हम॥१॥ लगार निद्रागत महीपति । विचारे किहां सूरी गाय ॥ ही प्रेमला ऊभी जाणी । नेत्र विक्सी जोवे राय जी ॥हम २॥ देख प्रियवति हर्प पाय अति । बैठी आदर दीध ॥ रत सिंहासणे बैठाइ पूछे । प्रमुदित आवण विधजी ||हम ३॥ श्रम निवारी बोली प्यारी । कर जोडी उत्सहाय || प्राणेश तणां पसायथी जी में। स्वपन लियो सुखदाय जी || हम || सौम्य द्रष्ट शार्दूल केहरी । रमतो खगथी आय॥ ॥ उवासी आतां पेठों पेटते । इम देखी मे जागी रायजी || हम ५|| नाथ पास आइ फल इच्छाइ । प्रकासो जी जे होय || आनंदित हो बोले भूपति । अब कमी रही नहीं काय जी ||हम ६|| सिंह समानो पुत्र प्रशवसो । जग दिनकर कुलचंद' | यह अर्थ राणी हीये धारने पाइ । परमानन्द जी ||हम ७ ॥ ले आज्ञा निज स्थाने आइ। धर्मिण दासी बोलाइ || धर्म कथा कर रयण गुजारी।शुभ फल की इच्छाइजी || हम ८॥ प्राते ४ सिंह । २ सिाह क्षितीधव सेवक पास । शभा मंडप सजाइ ।। अष्टांग निमित के जाण विबुधको । सामंत हाथ बोलाइजी ।हम ९॥ सज हो ही पंडित आया। सत्कारी रायजी बैठाय ।। यथा विध पूछे स्वप्न फल कहो । हरिणादिप जो किस्यो पाय जी हम १०॥ निमंती वदे सुणी ये राजेश्वर । सहू बहोतर स्वप्न बताया। तीस उत्तम में चउदे श्रेष्ट अति । ते पेखे जिनेश्व र माया जी हम ११|| सात नारायण चार राम । एक मंडलिक के मुनि मातः॥ देखी तत्क्षिण जागे तेहने । कुल दीपक इम थात जी॥हम १२॥ केहरी स्वपने केहरी सम सुत सुर वीर थोरे थासी ॥ अरिकुल निकंद राजेश्वर वंद। मुनि मार्ग ने सो दिपासी जी ॥ हम १३॥ सुणी दम्पति अति हर्षाया। सस मानी तस वाया ॥ प्रभृत धन दे घर पहोंचा या। जोतिपी अति हर्षाया जी॥हम १४॥ सुखे राणी जी गर्भ ने पाले। दोपण सघला टाले । तीन मांस वीत्या आनन्दे । दान धर्म उजमाले जी ॥ हम १५॥ एक दिन राय मे बैठा। एक दूत विदेशी आयो । नृपति सन्मुख पत्र ठवीने । जय विजय बधा- जी हम १६॥ अरिवंद राय कटक ले प्रवल । दिग विजय करवा जावे ।। भक्ति श- इच्छा जिम कीजे । तुमे मना आगे सिधावे जी हम१७|| सुणी नृप कोधातुर हो क है। निकल तू शीघ्र ईहांसे ॥ आबू में पाछे अरिविंद बींदवा । रहे होंशार कहे तासे जी॥ ३ वचन खण्ड १ शोभा जन सव | चिन्ते यह कौन वीर । तेज रुप अजब देखो ११॥ भारती चन्द सचीव || समजे सर्व भेद || आणंदी सर्व से कहे । सुणों संशय छेद ॥देखो १२||| गर्म प्रभाव यह महाराणी साव ॥ प्रबल शत्रू हरायो । राखी राज आंब |देखो १३॥ सुन सर्व आश्च- र्य पाय । अति हर्षाय | वीर रत्न कूखे आये । सर्व सुख दाय |देखो १४|| फोज उमरा- व सव आये निजठाम || सर्व देश माहे फेले। गर्भ के गुणग्राम' ||देखो १५॥ राय प्रेम ला में आये। पूछे धर प्रेम ॥ लडने की इच्छा प्रिय । तुमको हूइ केम -॥देखो १६॥ राणी कहे वहुत दिन से। डोहला होता यह । परांजय शबू का करूं । जोग मिला तेह |दे० १७॥ गर्भ पसाय सर्व । सिद्ध हवा काम || पूत्र हुवा देस्या इसका। वीरसेण नाम दे० १८॥ दान पुण्य धर्म करते । वीते नव मास || शुभ मोहूर्त कुँवर जाया हुवा प्रकाश ॥देखो १९॥ प्राते दासी राजाजीने। जावधाइ दीध ॥धन बहुत देइ। तस बढारण कीध देखो३०॥ जन्म महोत्सव मंडाया नगरके मांय॥ दाण दंड किये बंधा बंधीवान छोडाय देखो२१|| टा ल अशुभची अहार निपाइ ॥ जिमायो परिवार ॥धाहा “वीरसेण” नाम दिया तेवार ||देखो २२ || ढाल तृतीय मे ॥ कियो जन्म अधिकार। आगे पुण्य : सुनों कहे अमोल अणगार॥ || २३॥ दहा-शुकेन्द्र ज्यो कुमरजी ।। पंच धाय परिवार अाद्धि होवे चेन में||रुप ४ २चद्रमा - तेज गुण सार ॥१॥ वस वर्ष अनुमान से। हुवे कुमर जिसवार ॥ विद्याभ्यास करावने आचार्य श्रेयकार ॥२॥ बोलाया शुभ महोत । सुरु कियो अभ्यास ॥ प्रबल प्रज्ञा पुण्य से । सीखे विनय प्रयास ॥३॥ बहोतर चौसट नर नारकी। कला धर्म राजनीति । प्रवीन भ- ये स्वल्प काल मे। हा सज्जन चित ॥४॥ अखूट धन कुलाचार्य को । दे पहोंचाये घर। वीरसेण वे फिकरसे। किडा करे बहूपर ॥५॥ बाल वय यो व्यत्तिकमी । जागृत हुवे नव अंग। हिरणाक्षी मन हरण को । नव योवन दिप्त रंग ॥३॥ लज्जा विनय मर्याद ते॥ यश विस्तों जग मांय ॥ आगे कुसुम श्री तणी। चरि सुणो चित लाय ॥७॥ ढाल ४थी- मांग २ वर मांगणी ॥यहा पुण्य से सर्व इच्छित मिले । पुण्य रहित सीदाय हो । ते कारण शुभ पुण्य को । संचो हित चित लाय हो ।पुण्य १॥ क्षिती मंडण रतन पुरी। ऋ- द्धि सिद्धि शोभाय हो। रत्न जडित आवास से । देवलोक लजाय हो ॥पुण्य २॥ कोट कांगरा पोलने । मेहल हवेली हाट हो ॥ श्रीमत विनित नर नार से। दिखता है वहथा ट हो ॥पुण्य ३॥ रण में धीर धरी रहै । रणधीर नामें राय हो । रुप पराक्रम बुद्ध बले। न्याय निति से शोभाय हो॥पूण्य ४|| नारी रत्न रत्नावती। पटराणी सूरुप हो । पति- वृता गुणकीलता। चातुरी से मोहायो भूप हो ॥ पूण्य ५॥ शारद चन्द्र मंत्री गुरु । चउ वी कु. ५ बुद्धि धरनार हो। और साहेवी बहू भूप के । योग युक्त श्रेय कार हो ॥पुण्य ६॥ पण एक खामी मोटकी । कुल में नहीं संतान हो ॥ ते चिन्ता से दम्पती। नित्य करे आर्त ध्यान हो ॥पूण्य ७॥ मंत्र तंत्र जंतर जडी || औषधादि उपचार हो । कर कर सहु सो थक ग-खण्ड? या ॥ न हुवों कुल आधार हो । पूण्य लाभांत्राय जहां लग रहे । तहां लग नहीं मिले योग्य हो । पुण्य विना कौन अवतरे। भोगवे राज के भोग हो ॥पूण्म ९॥ एकदा रण धीर राजवी। हय शैन्या करी तैयार हो ॥ गया उभ्या ने क्रिडा भणी। फेरवतो तोखार, हो ॥पूण्य १०॥ तब तिहां तुरंगेकी ।अजगर दष्टी ए आय हो । भडकी भगा कतार में | फाल भरंता जाय हो ॥पुण्य ११॥ खेच्या न रहे वाग से । घवरायो नरपाल हो ॥ न जा- णे किहां न्हाख से | अकाले आवे काल हो ॥पू० १२॥ घोडा तो जावो आगडा। ब- चावू म्हारा प्राण हो ॥ तव वृक्ष एक आवीया । तात्क्षण आया अवशान हो ॥पू० १३॥ डाली से झूली रहा । तुरी गया गिरी मांय हो ॥ महीप मैही पर ऊतरी । सूतो ठंडी छांय ३ पृथनी हो ॥पू० १४॥ श्रम शम्यो निद्रा लगी। फिर सो जागृत थाय हो ॥ चिंते, हूं किहां आवीयो। अब जावू किन ठाय हो ।पू० १५|| किहां राज सायबी रही । कहां शैन्या उमराव हो ॥ हाहा कर्म विटम्बना । क्षिण में करे रंक राव हो । पू० १६|| चिन्ता किये १जगल २घोटा - सो क्या होवे । करना कोई उपाव हो || ज्यो सम्पत पीछी मिले। यो चिन्ती धरे ओ- छार हो ॥पू० १७||, उठ चले रन उजाड मे । धूम्र निकलता जोय हो ॥ चिन्ते वन में वन्ही हे । तो नर इहां निश्चय होय हो ॥पु० १८|| तस अनुसार तिहां आवीया । जो- गी देखा एक हो ॥ अशुची तन अशुद्धी में । पडा है निर विवेक हो ॥पू० १९॥ करु- णा व्यापी घट मे। तुम्बी से जल लाय हो ॥ न्हवाइ पवित्र किया। वकल वस्त्र पहरायहों ॥पु० २०॥ तो पण शुद्ध मे न आवीया । बोलाये न कहे वाय हो ॥ जीवित के हे चि- न्ह सहू । चिंतवे तव नरराय हो ॥पू०२१॥ मुरछा गति किम यह हुवा । सावध होवे कौन उपाचार हो ॥ पूछं हू कौन से इहां। ज्यों यह होवे होशार हो ॥पु० २२।। योगी के सा ता हुवा । होसी मोटो पुण्य हो ॥ ढाल चतुर्थी अमोल कही । पुण्यवंत को क्या न्युन हो। पु० २३ । दुहा-जितने शाख सहकार पर । सूवटो तन बहूरंग । चवी मधुर वाणी तदा। नृप पेखी भयोदग ||१|| हुलसी पूछे शुक भणी। कहो खग पत यह भेद || कैसे योगी सावध हुवे । क्यो हुइ ऐसी खेद ॥ २॥ कीर कहे मही पीर को ! चडाते श्वास समा- || चूक्या गति यह जोगीवर । ऐसे हुइ यह व्याध ||३|| चलो शीघ्र संग महारे । बूं यी वतावू एक ॥ उद्देश्वर नेत्रांजने। लहे चैतन्यता विवेक |॥४॥ राय जाय लाय ते ज- १तोता २राजा - - खण्ड १ ६ 4 डी । यथा विधी लगाय । तत्क्षिण ऋषि सावध हुवे । सनन्दाश्चर्य नृप पाय ||५|| दाल ५वी-कपूर होवे अति ऊजलोरे |यह०|| पग प्रणम्यों रायजोगी काजी।जोगी दीयो सन्मान || उपकारी मोटा नर जान के जी। कहे ऋषि हर्ष आन || चतुर नर । सुख दीया सुख पाय ||आं०॥ १॥ किण पुरपत छो राजवी जी। वन में भ्रमो किण काज ॥ उपकार आज हम पर कीयो जी। दीयो जीवित दान साज ||चतूर २॥ भूप नरमाइ कर जोडने जी । कहे हूं पामर जीव ॥ समर्थ नहीं सेवा साधवा जी। आप हो, गुण अतीव ॥ चतूर ३ ॥ नहीं बन सकी कुछ मुज थकी जी। श्वामी की किंचित सेव || में हूं रत्न पुर राष्ट को जी। सेवक अहो भूदेव चतूर ४|| अश्व वक्रे इहां आइयोजी । देखा आप दीदार। सफल दिन लेखू आजका जी। भेट्या जोगी सिरदार ॥ चत्र ५|| देखी नम्रता भूपकी जी | निरभिमानी मिष्ट वेण॥हा जोगी गयावन में जी। कंदलाया तक्षिण || चतुर।। ६॥ वइरोयणी ताप में धयों जी । फूल्यो कुंभ समान || मुख छेदी झटक्यो पत्र पे जी। निकल्यो इष्ट पक्कान ॥चत्र ७॥ केली पत्र में धर दीयो जी। जाणे केशरीयां मात ।। अति स्वादिक राय जीमीयां जी । ते जोगी ने संगात || चतूर ८|| गंगोदक पी त्रप्त हुवाजी ॥ वै मनात नाना जी ॥ सेवा करे हित चहाय ॥ चतुर ।। ९ ।। ६ १ आनी ति विनीत वितक्षण गभीरता जी । देखी चिन्तवे ऋपिराय ॥ योग्य पात्र ऐसा नहीं मिले जी । देवू इसी को पसाय ।।चतुर १०॥ संतुष्टी कहे राय को जी । हम जोगी तज्या कन्क नार ॥ तुम हो गुणी महाराजवी जी । क्या करे तुमपर उपकार ॥चतूर ११॥ दुर्लभ्य मिलणी लि जगेजी। तीन वस्तु मुझ पास ।। ते अप हुँ तुम मणीजी॥ नाम गुण करुं प्र- काश ।।चतुर १२।। पहिलो चूडामणी सूवटो जी । अष्टांग निमित को जाण । अतीत अ- नागत दाखवजी । सकटे बचावे प्राण ॥चतूर १३॥ दूसरो अश्व रत्न गुप्त रहेजी । चिन्ते जिहा क्षिण मे पहोचाय ।। जल थले गमन सरखिो करजी । स्वार ही अद्रष्ट रहाय ॥चतुर १४॥ तीसरी सुख शैय्या मलीजी। मालक पीछे आय ।। वस्त्र भूपण खान पानादि जी देवें जहां चित चहाय ॥चतुर १५॥ सयन कीयां इस ऊपरेजी । रोग विय थाक गमाय ॥ दे व शैय्या सो मुख लहे जी । मौरी निद्रा आय ॥चतुर १६॥ यह तीहुं लेड् पधारीयेजी। सु खे निज राज के मांय ।। तुम सजन समारता होसी जी । तस दुःख देवो गमाय ॥ चतुर १७॥ कर जोडी मणे नृपतीजी । श्वामी आप पसाय ॥ मुज घर खामी कुछ नहीं आपही रखो इण ताय ॥चतूर १८। अनुग्रह होय तो दीजीये जी अपूत्र को पूत्र दान । लोक अपवाद निवारके जी । रखीये कुलको मान ॥चतूर १९॥ शकुन पेखी जोगी वदेजी खण्ड पूत्र को नहीं तुज जोग ।। कुसुम मंत्री देवू तुम भणी जी। होसी पुत्री मन्योंग ॥चतुर २०॥ में पण वृद्ध हुवो अवे जी । यह तिहूं वस्तु उदार ॥ मरतां चडे को दुष्ट करेजी। क- कु.रते किस्यो प्रकार ॥ चतूर २१ ।। खुशी से देवू ए तुज भणी जी । धर्मी पुण्यवन्त जाण ॥ यह देजो मुज पुत्री को जी। होसी तस सुख खाण चतूर २२|| शुक शकुन साधी कहे. जी। सत्य वाणी भूनाथ ॥ सुखदाइ हम होस्या सहीजी । नृप पुत्री और जमात ॥ चतूर २३॥ हट मत करो नरेश्वरुजी । हम छांतुम भाग्य मांय ॥ इम अग्रह से महीपती जी तीनो गुलीया पसायोचितूर२४ासाता दीयां साता मिली जी। देखो प्रत्यक्ष दया फल ॥ ढाल पांच भी अमोलख कहेजी। करणी फळ न विफळ ॥चतूर २५ ॥दुहा--खुशी होइ रणधीर जी । प्रणम्या जोगी पाय ॥ श्वामी कृषा मुझ पर करी। पधारो पुर माय ||१|| ऋषि कहे व- स्ती विषे । हमको नहीं सुहाय ॥ आनन्द में हमे यहां रहें । तुम जावो पुर राय॥२॥ अन कयों मान्यों नहीं। तब सुख अश्व और राय लुली २ जोगी पग नमी। नयनाश्रुत क हे वाय ॥३॥ परपंच फासे हम फस्या । स्वामी सेवा अंतराय || भाग्योदये फिर में टस्यां। चले पुनः प्रणमी पाय ॥१॥ अश्वारुढ भूधव भया । पलंग मया तस पूठ। सन्मु- ख शुख आवैठीया। चले सह संतुष्ट ।।५।। ढाल ६ ।।। वेदस्वीस्यूं मन वस्यो॥यह०॥ अ- . 1 व बके गया पछे । भूपू का सेवक लोक होलाल ।। दोडी देखे चहु दीशी । नमिल्या उप न्यो सोक होलाल | चित्तीत मिल शुभ जोग से ||आ० १|| थाका भागा सहू आवीया सुणी सहुने यह बात हो लाल | हाहा कार मव्यो शेहर मे । सहु नृप को भलो चहात हो लाल ॥र्वितीताकेइ प्रभूको केइ कर्मको । दोष दे करे विलाप होलाल ॥ मानता लेवे इष्ट समरके । होवे शीघ्र नृप मिलाप हो लाल चिंतीत३॥ सामंत पुरजन भेला हो । बैठा माहिर शभा माय हो लाल ॥ पासा आदि शकुन लेवे। जितने आश्चर्य थाय हो लाल ॥ चिंतीत ॥ गगन से अचानक उतरे। पोपट ने नर राय हो लाल || शमा मध्य ऊभाहू । देखी सर्व विस्माय हो लाल चिंतीण ५॥ कहां से किस्तरह आवीया। ए तोता बहु रंगी कोण हो लाल ॥ इत्यादि विचार में । सहु लगे पेखते दोन हो ला०॥चिं०६॥ ऊ- भा हो सत्कार दीया सहू । बैठा सिहासन भूप हो लाल ॥ सुख पूछे सर्व हर्ष से। पूछे वी- तक स्वरुप हो लाल ॥चिंतीत ७॥ नृपती थोडा में सहू। दर्शायो वीतक हाल हो लाल ॥ जोगी सेवासे पामीयां । तीनो अमोलक माल हो लाल चिं० ८. शभा सहु जय २ क । पुण्य प्रतापी राजान हो लाल || अल्प दुःखे महा सुख मील्या तीरल गुन खान हो लाल चि० ९ ॥ राजा सजन को.संतोप के । आया राणी पास हो लाल ॥ प्रमुदित A खण्ड ? वनीत प्रणमी । मधुरी करे अरदास हो लाल ||चिं० १०॥ मला पधार्या सहिवा । हमा वी कुरा उड्याथा होसं हो लाल || रखे अमंगल होवे अश्वसे । दर्शने हुवो संतोप हो लाल चि० ११|| रायजी वीती वारता । तीनो ही रत्न की केय हो लाल || राणी कहे कि- स्यो कीजीये । तनुज विना यह लेये हो लाल चिं० १२|| प्रिया पती कहे भाग्यविन । कुलाधार किम थाय हो लाल || कलंक निवारण कारणे । लाया हुँ एक उपाय हो ला ल ||चिं. १३॥ ही वदे प्राणेश जी । प्रकाशो तेह उपाय हो लाल || रायजी पुष्प ब- तवियो । यह सूंध्या धूयो थाय हो लाल चिं० १४|| कहे राणी भले कन्यका । वासे भागसी खोड हो ला०॥ पूत्र करीतसे मानस्या । पूरसा मन का कोई हो ला० चिं० १५|| कुसुम लेइ नृप कर यकी । ही सूंथ्यो घर प्रेम हो लाल ॥ देव जोग गर्भवती हूइ । कुल मे वरत्यो क्षेम हो लाल ||चिं० १६॥ पुष्प माल पेखी स्वप्न में वीत्या शीव नेत्र मांस हो लाल || देव पुष्प शैय्या सयन की। राणी मन हूइ आ- स हो लाल ||चिं० १७|| देव शैय्या किम पामीये । इम जाणी हूइ उदास हो लाल ॥ चंतातुर राणी देख के। राजा पूछे तास हो ॥ चिं० १८॥ हर्ष समय चिन्ता किसी । इच्छो से कहो काम हो ला०॥ कमी कुछ आपणे नहीं। कहो सो पूरूं हाम हो ला० ॥ चिं० १९ ।। २ ।
. उप जी आसा राणी कही। कहे राय यह तो सहज वात हा लाल ।। जागा आप्या पल। । प्रगट करी देखात हो लाल ॥चिं. २०॥ ते पर सूती रत्नावती। वहोत हुइ खुशाल हो लाल || ऋपि अमोलख हीं की। कही यह छडी दाल हो लाल ॥चि० २१ । दुहा- सुख से पाले गर्भ को । दान धर्म करे हुल्लास ।। आनन्द विनोद उत्सवे । वीत्या सवान व मांस ॥१॥ शुभ लमे पुत्री हुइ । चन्द ज्यो प्रकाश ॥ दासी वधाइ दी राय को । वहार ण करी तास ॥२॥ जन्म उत्सव मंडावीयो । वंदीवान छोडाय ॥ अशुची टाल भोज करी सह परिवार जीमाय॥३॥सर्व समझे कुमरी को || सा डोहला अनुसार ॥ नाम कुसुम श्री स्थापीयो । सजन हा अपार ॥॥ शुक पक्ष शशी परे । ववे रुप गुण विस्तार ॥ की- ती पसरी मुक मे। कृसुम श्री गुगागार ॥५॥ ढाल ७ मी- मुख से बोले देख जसोदा यह०॥ लावणा में ॥ वसुबर्ष माइ आइ वाइ। माइ वाप इस विचार ॥ सिखाणे तांइ, ग णिका वोलाइ। चतूर लजावन्ती नराि॥ सर्व चौसर कलाइ स्वल्प काले माइ । स्वल्प महे नते शीखीसारी ॥ राजा हर्षाइ, गुरुगी ताइ । धन वस्त्रे वह सत्कारी ।। स आनंद पाइ, विदाजो थाइ ! गइ निज घर सुख से पोडी । पूर्व पुण्य हो जो पूरे । तो मिलती ऐ- सी जोडी ॥आं० था फिर चित चहाइ, साध्वी पासाइ । शिखाइ धर्म करण रीती ॥ आव- Luna ९ । ३ कान श्यक समायी, शील गुण नरमाइ । पतिवृता आदि नीती ।। धर्म जाण्याइ, कूपन्थ कदाइ । ते न जाइ शीले प्रीती ।। सर्व को सुख दाइ । सत्यवंत थाइ । उज्वाले उभय कुल क्षिती वी कु ॥ सर्व कला में सदाइ । कुशल सा वाइ । बाल ख्याल करे धर कोडी ||पूर्व २JI हुइ यो खण्ड बन वन्ती। तन मोहन्ती। जे बाला ॥ अंग उपांगी दिप्त अनंगी। पूर्णागी साची शाला । नागण वेणी । लम्बी झीणी । भुग श्रेणिसा केश काला ॥ अर्थ शशी भाली । तेज क- १ हिरण, पाली कम्बा ताणी भंवाला । कुरंग नयणी लजा लेणी। तिक्षण खूणी तिलक चोडी॥ २ नाक में पूर्व ॥३॥ शुक जैसी नाशा । भरी सुवासा । अरुणोप्टासा। पुष्प करणी॥ दाडिम कणि- यां। दंत ज्यों मणियां । सतेज स्वच्छत रंग भरणी ॥ पुष्ट कैपोली । गुलाबी गोरी। अननगाल गोली चंद पूरणी ॥ कम्बू गिरवा । कंचू हिरवा । वट पुष्ट युत स्तनी॥ मच्छ जैसे उंदर ५ मुख । कर लंब सुंदर । कंकण वर धर रत्न चूडी ॥पूर्व ३॥ कोमल करतल । अंगुली पातल र क्त नख अमल सिहलकी ॥ पुष्ट नितवी। केली स्थम्बी । निरुम जंघी जानूढंकी ।। उतर ती पिंडी कूर्म पगतली । अंगूली मिली रेखा अंकी ।। सोवन वरणी पतली तरुणी। गोरी हरणी सा संकी । इम नख शिख सारी । रति अनुहारी। शोहे भारी कौन करे होडी ॥ पूर्व ५॥ एक दिन तस मांइ । देखी बाइ । उपवय पाइ वर जोगी। चिंतें राजा जी। काममें माजी । मूल्या याजी नहीं छोगी ॥ किम कर रहे घर में | लज्जा शर में । लोक धरै भरम देखे भोगी। सिणगार सजावू | शभामें पठावू । राजाने देखावू | समयोगी॥ पीठी ल- गाइ । न्हवाइ धोवाइ । वेश सजाइ करी रुडी ॥पूर्व ६॥ अंबोडा सिर । तेल कुसुम भर । विन्दी बोर केकत केवडा ॥ झूमर झल के नथ के हलके । मुखडो मलके टीकी जडा ॥ हार हांसली कसी कांचली। वेरखा वाजू बन्द कडा । हत फूल बीटी । कडदोरो खीटी रिम झिम करे झांजर तोडा । घेरदार घोघरी झीणी साडी | हात फूल मुख पान की वी डी॥पूर्व ७॥ मुराल गति कर । सेया परिवार । आइ शभा माहे कुंवारी । देख सकल ज || आश्चर्य पाये मन। चिंते उतरी कहां से सुरनारी । पुत्री जानी राय सन्मानी । कर घर पासे वेसारी । देखी उपवय रुप भारित गये, चिन्ता में गर्क भये तेवारी। किन्को पर णावू । जोग मिलावू । सुख रहे ज्यों सदा यह जोडी ॥र्व ॥ बाल वृद्ध नर अंध का गोवर । कुष्टादि रोग घर बलहीणो । मूर्ख वैरागी । लोनी अभागी क्रोधी कूरुपो दीनो निरदया निरभोही पागल सूरोही । इत्यादिने योग्य नही ईनो । योग्य वर व्यावे । तो सुख पावे । खुशी मे जावे राइ दिनो। इम विचारी कहे ते वारी । वर सोधावू सब काम छोडी ॥र्व ९॥ प्रधान वोलाइ सला ले राइ । तब तिहा जोर करे दैव । परदेशी वाण्यो १दारी १० | राय मन जाग्यो । मुनरो का ऊोखे । नाती पूछो कहो तुम कुगो । तब ते विस्ता- थी.कु. री वात के || कक शालपुर श्वामी हरी केशरी नामी वह।, नाती तेंहने सेवे || वीर खण्ड? ? सेण कुंवर वर । रुप यौवन भर । मागी शत्रु की खोर्ड।। १०|| उर्व कमाली । नं यन विशाली । शीख आत काली। शुरुनाशी || लम्बी वाया डर ऊंवाया । पृट सुम र्ण सिला खासी || मुख पूर्गे। तेजसी सेन्दू । गौर वर्ग गोरी डर वासी || भीम ज्यो प्राक्रमी । बुद्धि ब्रमही । निष्ट ववनी सदा हुलाती। उदार प्रगामी । इत्यादी श्वा । गुग धगा किम कहूं जीमोड। || पूर्व ११ ॥ त्रीखंड माही । नर ऐसा नाहीं । जो यासे कह सो साची ॥ सुग इस कुंपरी । कुतु मे भारी । लोभाइ मन लियो जाची ।। हप्ती नीचो जोइ महु खुशी हाई । जाण्यो वारसग पर राव। ॥ एक वार जोवाइ । देस्यूं पर- णाइ । कहे राजा यह नहीं काली मावा लजाइ। मेहल में जाइ । रहमा लागी वारपर गोडी || पूर्व १२॥ जो जस ध्यावे । सो तप्त पावे । जो होवे दैवको संजण ॥ यह ढाल स- तावी रशिफ वताव । शृंगार रस को मिल्यो नांगो कू इच्छा धारे ते पाप बबारे । नर्क ति- यचे करे सोगो ॥ सती संत शभागी के गुण अनुरागी। मुगे गावे होवे धर्म जोगी। अमो- ल वाणी गुण वाखाणी । धन्य ऐसा विषय फास दी तोडी ॥ पूर्व || १३ || ॥ दोहा ।। कुमरी
गया पछ नृपती । सारद सचीव घुलाय ॥ कहे सज्ज होइ शेठ संग । कन्क शाल पुरजा
य ॥१॥ देखो केशरी राय का । वीरसेण कुमार ॥ जो होवे वाइ जोगा। तो कर जो
सवार ॥ २ ॥ तुम शाणा सहू जाण छो। अपणो घर व्यवहार ॥ योगा योगदे
ख जो सहू । शोक्षित सुख आचार ॥३॥ वयण ते सीश चडाय कर । जाण न योग्यजे
वात ॥ निर्णय कियो पूछी सहू । फिर उछित साज सजात ॥४॥ गर्गा महुरत चालीया
है। शेठ सग प्रधान ॥ सुखे मुकाम करता सहू । आया कन्क शाळस्थान ॥५॥॥ ढाल
८ वी ॥ मोटी या जग माहे मोहणी ॥यही अच्छे को अच्छा मिले । खोटे नर कोहो
मोटा मिले आय ॥ यो जग मे शुभा शुभ उदय । बहोत रंगी हो रीती बरताय ॥अच्छे।।
था कन्क शाल पुर अवलोक के । शारद चंद हो आश्चर्य अति पाय ॥ क्या स्वर्ग टूट
टुकडा पड़ा । के देव कोइ हो रहे ग्राम वसाय ॥अच्छे।।२॥ मध्य बजारसे चल करी । ते
आया हो राज शभा मझार ॥ हर केशरी हेरी सारीखा । गुण रूपे हो देख मोह्या अपार
॥अ॥३|| लुली मुजरो कीयो । राजाजी हो जेष्ट नर तस जाण ॥ सत्कारी नेडा ली-
में या । वैठाया हो देइ सन्मान अ०॥४॥ पूछे कहां से पधारीया । गाम ठाम काम हो क
जे मन माय ॥ देखी. नम्रता राय की । ते सचीवजी हो बोले हुलसाय ॥अ० ॥ ५॥
मरजीहो
प्रेक्षी
तस
सन्मुखोअ॥१०॥जेष्ट
नरतस
जाणीया
।
सन्मानी
हो
निज
पास
बैठाय
३
रत्नपुरी रण धीर पति । उनको हो में सेवक प्रधान ॥ तास संज्ञी रत्नावति। तस पुत्री हो
कुसुम श्री गुणखान ॥अ०६॥ वरजोगी भइ राति समी.। आपतनुज के हो धन्ना शाह मु
वो कुख ॥ गुण सुण हुइ सो रागणी । सोही कार्य हो आयो आप सन्मुख ॥अं॥७॥ शेखण्ड?
ठजी से सब पूछीये । हम नीति हो ऋद्धि कंन्या गुन ॥ धन्ना कहे जोडी युक्त यह ।
प्र कगये हो इस रत्न के जतन ॥अ०॥८॥ नृप कहे पूछो कुमार ने । सोमाने हो तो मे
री मने नाय ॥ मन्त्रीजी आये कमर कने । रूप गुग देख हो अतीही हर्षाय॥अगा९॥
यह कंय योग्य है वाइ के । दम्पतिने हो सजन पाय सुख ॥ हर्ष हुलसित नमन कीया।
|आपण कारण पूछतां । प्रधानजी हो कुमरी छबी देखाय॥अ०॥११॥शीघ्र उठाइ जस कुमरजी
प्रेश हो एकान्त स्थान जाय।यह है नारीके सुसीराचा तन मन हो परणन करी चहाय||अ० १२
॥बोलाये सचीवकोशिश्मी पूछेहो कहो यस उत्पत।।मन्त्री यथा तथा दाखवी यह तन मने हो ११
आपहीने इछत ॥अ०॥१३॥ मोटो कुमर तणा । शुभ महूते हों कीनो सगपण ॥ लम महूर्तन
की करी । वीनंती कहो जान सज लावण ।।अा१४॥ आया फिरी रतन पुरी । सब
महा नपने देवाल || लब्बी देखाइ कुमर की।'गुग सुण जो हो भृप हुवा खु
शाल ||अ०॥१५॥ कुसुम श्री को दी छवी । लम महोत्सव हो अति जबर मन्डाय ॥ वहां भी हरी केशर राजवी । वह आडम्बर हो जान सज कराय ॥अ॥१६।। रत्न पुरी च ल आवीये । सन्मुख आये हो रण धीर राजान ।। वधाइ लेगये नगर मे । उतारेहो सुख कराि मकान ॥अग॥१७॥ गयवरा रूढ वर रायजी । व्यावन को हो चले दुल्ले राय ॥ गाय न और बा जित्र के । नादे रह्यो हो गगन गरणाय ॥अ॥१८॥ गोखालम्बी पेखे गोरडी । मार्ग में हो जन्या नरका ठाट । गुग रूप लक्षी कूपरके । कहे जोडी हो योगी पुण्य गह गा ट॥अ॥१९॥ महेल झरोके सासुजी । कूसुमश्री हो सहेल्या परिवार ॥ वीरसेण वर निरखके । सन पावे हो दिल हीं अपार॥अ॥२०॥तोरण वदी आये चौरी में । कर भेल्या हो दम्पति हुलास ।। दाल आठ अमालेख भणी। आगे स्वार्थ हो गत होवे प्रकाश ।।अ॥२१॥ * ॥ दोहा। पटान्तर से कन्यका । वार २ वर जोय ॥ जोडी इच्छित देख के | हर्षित हिय. होय ॥शा काम रति सम दम्पति । निरखे सर्व सजन ॥ परसंस्ये आपस मे । धन्य २ कूमरी पु- ण्य ||२|| जोगी जोडी जो मिले । तो धर्म अर्थ रु काम ॥ साधन सुख से कर सके। दोनो भव ले आराम ॥३॥ यो जाणी सुखार्थीयों । मन मेलो कू योग्य॥ तो यशः सुख जग पा । सन्मति संतती निराग्य ॥४॥ चोर दृष्टीसे वीरजी । प्रेक्षी त्रिया गुग धाम ॥ इच्छि वी.कु. १२ त अर्को गना मिली । पाये बहुत आराम ॥५॥ॐाढाल ९मी। धन्ना मुनि धन मान व पायो॥ आसा वरीराग ॥ देखो जी भाइ जगमा स्वार्थ सगाइ । सब निज २ मतलब च- हाइ ॥ आंकडी ॥ काम राग सव राग से महावली । प्रेमला पति से मोहवाइ ॥ आप खण्ड? जाती सारले जावै घरका । कर मावित्र से जुदाई ॥देखो॥१॥ हो अनुरागीणी कहे समक्षा से । चित्त में देना प्राणनायो | मुझ तात घर तीन वस्तु आमोलक । तस गुण कहूं गृहो साथां ।।देखो॥२॥ 'चूडामणी' नामे शुक सुरंगी । अष्टांग निमित का जाणो ॥ भूत भवि- ष्य प्रकाश शकुन फल संकटे बचाव प्राणो दे॥३॥ दूसरा अश्व 'मनोवेग' नामे । चि-* न्तित स्थान पहोंचावे । जल थल गगन गति कर जावै । वक्त पर काम सो आवे.॥दे०|| ४॥ तीसरी सैय्या चिन्तामणी जाणी । वस्त्र भूषण आहार पाणी ॥ चहावे तहां ते अपे तक्षीणु । चिन्ता सर्व मिाणी ॥दे॥५॥ शयन किये उस में सर्व अंग के। रोग क्लेश विरलावै ॥ स्थावर जंगम विय पणा से । संग रहे गुप्त स्वभावे ॥३॥६॥ यह तीनों व- स्तू त्रिजग दुर्लभ । मुझ तात पास है श्वामी ॥ जो यह लगजावै अपणे हाथ तो । फिर रहै कुछ न खामी॥दे॥७॥हस्त मोचन वक्त येही जाच जो । मत होना अन्य के गरजी ॥ अती अग्रहसे अरजी म भूल जो आगे आपकी मरजी ॥०॥८॥यों समझी वीर १२ आश्चर्य पाय । अहो त्रिया को स्नेहो ॥ मिलतेही घर का सार बताया । क्या करेगी आ- येगेह हो ॥देगा। यह तीनों रत्नों को न चहावै । महा पुण्ये कर आवे ॥ यों चिन्ति याचन कियो निश्चय । जब लम विधि निपटावै ।।दे॥१०॥ हस्त मूकाते रण धीर जपें । जो चाहीये सो लीजो ॥ शरम न कीजे घर यह तुमारा । मन में होवे सो कीजें ॥दे॥११ स्मरी वयण वीरसेण पयंपे. । शुक सैय्या अश्व दीजे ॥ तीनों रत्नकी चहा अति महारे । और न कांइ चहीजे दे॥१२॥ खेदाश्चर्य सुण नृपति पामें । मन में करे विचारो ।। यह मेरे घरका गुह्य क्या जाने । कुमरीने किया उचारो ॥दे॥१३॥ मेरे तो देना था इनी को । विन मांगेही देता ॥ परन्तु हा हा स्वार्थ सगाइ । आश्चर्य मोटा एतो ॥२॥१४॥ तनु- जा काजे जोगी सेवे । जीव जो यत्ने पाली ॥ योग्य वर देखी परणाइ । यह तो सार ले चाली दे॥१५॥ मेजानता यह पुत्री म्हारी । यह हुइ प्रीतम प्यारी ॥ सर्व राजका सार बताया। फिकर न कीनी म्हारी ॥२॥१६॥ धी धीधी ज्ञानी कहे संसार को । सो मे प्रत्यक्ष देखा ॥धी धी मुझको तनुज के कामे । नर भव किया अलेखा ॥दे०॥१७॥ इस कामें कु, गुरू देव माने । हिंसादि पाप करिये ॥ उसके फल यहां प्रत्यक्ष देखे । आ- केरी अनुसरीये ॥दे॥१८॥ होनहार सो तो होगया है । पस्ताये क्या होवै ॥ वाकी र वी.कु. म ही है उसेही सुधारुं । तो भी आत्म सुख जोवे ॥दे॥१९॥ परन्तु अभीवेराग्य कया तो। करनी युक्ति नाहीं ॥ प्रारंभा काम को पार करना । आगे आत्म सुधारांइ ॥देखो।॥२०॥ भङ्ग होने के डर से । वैराग्य भाव को दावाइ । कहेतीनों रत्नदिये मेने तुमको खण्ड? और कहो क्या चहाई ॥देखो।।२१॥ दम्पति को रङ्ग मन्डप पोचाय । सजन सब होये ॥ भोजन भाक्ति युक्ति करीसहू । सवही जन सुखाये ॥देखो।।२२। उदारता परशंस्ये नृ पतकी । प्राण प्यारी वस्तुदीनी ॥ अमोल कहे धन्य रागे वैरागे । तानेही मोक्ष दीग की नी ॥देखो।।२३॥ दोहा॥ निजराणी को रायज़ी । कही सहूमनकी वात ॥ हम दी- क्षा अवलेयगे ।कहो तुम मन क्या चहात ॥१॥ राणी कहे मुझे आपविन । सन सूना संसा ग॥ में भी आर्जिका होवूगी । जो आप बनो अणगार ||२॥ प्राते पुनी जमात को सज न स्नेही परिवार || बोलाइ कहे रायजी । सुनिये मेरा विचार ॥३॥ धारा सो काम सिद्धहु वा । वीरसेण राज जोग.॥ हम सुधारे आत्म निज । आबना इच्छित योग ॥४॥ मना कि या मानूं नाहीं । सो बात की एक बात।। यो सुग सव चुपके हुवे । गाम में हुवे विख्यात ॥५॥ढाल १० वी।। पणीहारकी देशीमें ॥ हरी केशरी नृप यों सुणी। सुगो रायारे आ- Imam II || अहो मगो गयारे॥ कहे तुमतो चातुर चणे ॥ मुणो ॥ जरा ऊंडा क- राये विमास ॥अहो।।१।। रङ्ग में भङ्ग न कीजीये सुणो ॥ यह तो बजे वालख्याल ||अहो। द्वदये प्राप्ती भये ॥मुणो। लेना संयम उजमाल अहो।।२।। रणधीर कहे सुणो राजजी सुगौ। चातुरहो वोलो किसपेर ।।अहो।पाव पल्या का भरोसा नही ।।सुणो।। कैसे करूं में दे र॥अहो॥३॥ बाल ख्याल है जगत् का ॥सुणो। पुण्य खुटे विरलाय ॥अहो। ज्ञानी उनों- कोही जानीये ॥सुगो।। अवसर ग छिटकाय ॥अहो॥४॥ तुमभी चेतो इस अवसरा।सुगो॥ मोतो छोड़ी वात ॥अहो। मेरे कोही फसावते ॥सुगो। यह क्या योग्य कहात ॥अहो।५ हरकेशर वैरागी से भणे ।।सुगौधन्य २ तुम अवतार ॥अहो। सशक्ति संयमवरो।सुणो। हम लुधे भोग मझार ।।अहो।।६यों कह निज उतारे गयां ॥सुगो।। कुसुमश्री आइ दोड ॥अहो। मात तात के पगमें नमी ॥सुगो। रुदन्तिकहे करजोड |अहो||७॥ क्यों छोडकर जावो तातजी ।सुणो।। माता मुझ किसका आधार ॥अहो।। सासरे दुःख होवे नारीको सु- ॥सुणो। पीयरीये कर संभार ।।अहो।चा विश्वासी नृपराणी वदे ॥सुणो॥ तेरेकमी कुछना य |अहो।। पुण्यात्म प्रीतममिले ।सुगो। और सब सामग्री सहाय ॥अहो।।९।। यह राजभी देवू तुझ भगी ॥सुगो। रहो तुम इच्छा चार ॥अहे। हमसबारे निज आत्मा ।।सुगो। हटक रे नहीं निकलेसार ||अहो॥१०॥ यों समझाइ पुत्री भणी ॥सुणो। तब मन्त्रि परजा आ +per १४ य अहो। प्रगमी ऊने नृप. सन्मुखे ॥सुगो। नृपसन्तोपे सर्व ताय ॥अहो॥११॥ वीरसेण *जी राज्य जोगहै ।सुगो।। सर्व मणी सुख कार ॥अहो। योग्य सुख सवको अपेंगे। ॥सु 1.कु... गो। यो सब को समझाय ॥अहो।।१२।। उत्सव कर वीरसेण को सुग। राज तखत बैग खण्ड य ॥अहो। नीति रीति दरसायदी ॥सुगा दीन दुहाई फिराय ||अहो॥१३॥ तब तहां पु ण्योदय करी ॥ सुगो। धोदय ऋपिराय ॥अहो। पधारे उतरे बाग में ।।सुगो।। बहुत सा धूमे सोमाय ॥अहो॥१४॥ राजा आदि सुग हया ।।सुगो। संगले सर्व परिवार अहो आये वन्दे मुनिराजको ॥सुगो। सुगने धर्म उचार ||अहो॥१५॥ मुनिवर देवे देशना । सुगो। अनित्य अशुचि शरीर ॥अहो। अशाश्चति सर्व सम्पदा ॥सुगो॥ धर्म करो शीघ्र वीर ॥अहो॥१६॥ इत्यादि बोध श्रवण करी सुगोपरिपद सर्व हाय ॥अहो। यथा श क्ति व्रत आदरी ॥सुगो।। निज निज स्थाने जाय अहो॥१७॥ रणधीरवन्दि मुनिसे कहे |सुंगो। मे लेवूगा संमय भार ॥अह।। मुनिवर कहे शीघ्रकीजीये ।।सुणो। धर्म में ढील वार |अह॥१८॥ वंदि आये राजमे ॥सुणो।। दीक्षा ओत्सव मंडाय ।।अहो। राजारा- सन होय कर |सुणो।। आडम्बर वाग मे आय अहो॥१९॥ लोच करी वेप धरियो ॥सणों। साधु सतीका श्रेयकार ।।अहो। लीदीक्षा शुभजोग से।।मुणो॥ वंदीगयो. परिवार ॥अहो॥२०॥ साधु साधुमे सती सती में सुणो॥ रहेशुद्ध पाले आचार ॥अहो॥ असेवना रु गृहणा शिक्षा सुणो।। शाखे विनय भक्तिधार ॥अहो॥२१॥॥ तप,जप करणी समा सगो।। ज्ञान ध्यान आत्म रमाय ॥अहो। अन्ते आलोइ अणसण करी ॥सुणो।स्व र्ग विराजे जाय ॥अहो।।२२।। भवकर मोक्षसिधायेगे ॥सुणो॥ यह हुइ दशवी दाल ॥अ हो। अमोल कहे सुज्ञ सांभलो ।।अहो।। करणी करोउजमाल ||अहो ॥२३॥॥ दोहा।। फिर हरीकेशर रायजी। राज संभालण काज ॥ कुमरको तहां छोडकर । चले लेइ निजसा ज ||१॥ सीम तक पहोचान को । गये वीरसेण कुमार ॥ पग प्रणमे फिरतात के । नरमी करे उचार ॥२॥ भूलजो मत अनुचर को । भेटुंगा अवसर पाय ॥ खमजो अविनय जो हुवा । आपकाजानों सदाय ॥३॥ तात तनुज उरचम्य के । सुखी रहा दे आसीस ॥ध म व्यवहार सुवारजो । पूरजो सज्जन जगीस ॥४॥ उभय चले भिन्न २ दिशा । आये नि ज २ स्थान ।। सुखे २ काला अतिक्रमें । संचे पुण्य धर्म दान ॥५॥8॥ ढाल||११वी॥ध रारे लोभी वाणीया ॥यह॥ वीरसेण नृप सोभागीया । सुखसे पाले राजोरे ॥ स्वजन पु- र जन मन झालवै । साधे आत्म को काजोरे ॥वी॥शा विद्यालय ओपधालय । अनाथा लय स्थापेरे । दानशाल धर्मशाल कर योग्य वस्तु सदा आपरे ॥वी॥२॥ तोल मापतो वढावीये । हांसलदंड घटायेजी ॥ लायकी बढाइ कामदारोंकी । यों सर्व वसमें आयेजी ॥जी॥३॥ सब परसंस्ये वीरको । नृपति अच्छे पायेजी ॥ दुःख गमाया जगत् का। चिरं जीवोजी ऐसे रायाजी पवारा॥४॥ कुसुमासी पति रंजणी। शील लज्जा बुद्धिवन्तिजी। खण्ड? नमण खमण गुणगण करी ॥ सुख सबको देवन्तिजी ॥वीरा॥५॥ आप भला तो जग भ- ला । गुणवन्त को गुणवन्त पावेजी ॥ पुण्य जोग जग जीवडा ॥ अचिन्त ऋद्धिपावजी ॥वीरा॥६॥ एकदा करे विचारणा । वर्ष बहुत वीत्याइजी ।। भेटुं मावित्र मित्रको। शीघ्र क क शाल जाइजी ॥वीर||७|| कुसुमश्री को पूछीया । हपीकरे सा उचारोजी ॥ मुझ मन- यह उमंग अति । वास बतावो तुमारोजी ॥वीर।।दा महामंत्री को बोलायके । राजका ज संभलायोजी ॥ हम जावे सजन मिलण को । होश्यारी से रहजो सदायोजी ॥वीर।।९। सिरांजली कर सोवदें । सुखे पधारो श्वामीजी ॥ फिकरन करिये पाछली। नहाँसी कोइ खा मीजीवीरा॥१०॥ सेनापति को बोलायके । कहे यहां रखो फोज आधीजी। आधी हम सं ग चालीये । न होवे कोइ उपाधीजी ॥वीर॥११॥ राजा राणी सज हुवा । सुखासन वाहन वैसीजी ।। सवपरीवारे पर्गवारे । चाले हर्प विशसीजी ॥वी।।१२॥ मध्य बजार हो संचरे । जान चालीती॥ दलग आनमे नृपको । कहे वेगा लीजो संभालीजो ॥वीर। १५ NET ॥१३॥ परजा जन पीछे फीरे। नृपगमन आगे कीधाजी ॥ एक योजन के अन्तरे । पडा- व जाकर दीधानी वीरा॥१४॥ चिन्ते वीरसेना सगे। दिनलग जाय घणेरारे । मनोवेग अ श्वेमरेकने । फिर क्यो करना देरारे ।वीरा॥१५॥ सेना पतिको बुला कहे । महतो जावेंगे आ गेरे । तुम सुखे २ पीछे आइये । हम मिलेगे निज जागेरे ॥बीरा॥१६॥ वचन प्रमाण उसने कीया। वीरसेण अश्वसयायारे ॥ दोनों आरुढ हुवे । बीरसे वचन बोलायारे ॥वीर ॥ ॥१७॥ होणहार के जोगसे । कन्कशाल नाम भूलेरे ॥ कुसुम श्रीमनमे रमे । कुसुमपुरखो ले प्रतिकूलरे ॥धीर॥१८॥ मोहलेहर से जो निपजे । सो देखो भव्य भावरे ॥ तत्क्षीण हयग गने चला । वायुवेग दरशावरे ॥पीरा॥१९॥ आगे अकित कुसुमश्री। तोतोतस खोले मा ॥ शय्या गुप्त आती पीछेसे । जग पेखंतासो जाइरे ॥वीरा॥२०॥ थोडीही देरमे वीर- जी। कुसुमपुरी वार आवेजी । हणणा के तुरी ऊभा रहा । अमोल हाछ ग्यारे थावेजी वी रा॥२१॥६॥ हरीगीत च्छन्द ॥ प्रथम खन्ड अखन्ड रङ्गे पुण्य फल सङ्गे कहा । वीरसेण कु सुमश्री का संजोग पुण्य मेला रहा ॥ श्रृंगार और वेराग्य रस चख श्रोताको मन गहगहा ॥ कहे अमोल कोतक कर्मगत ॥ अगे सुणीये यथा जहा ॥१॥ परम पूज्य श्री कहानजी ऋषिजी महाराज के सम्प्रदा के 45 वाल ब्रह्मचारी मुनिश्री अमोल ऋपिजी महाराज रचित वीरसेण कुसुम श्री चरित्रका पुण्य प्रवन्ध नामे प्रथम खण्ड समाप्तम् खण्ड ॥दोहा।। विश्वसिरे विश्वेश्वरु । स्वरुपे सिद्ध अनन्त ॥ द्वितीये खन्डा रंभकरत । प्रणमुं वा- र अत्यन्त॥१॥प्रभु शुभाशुभकर्म से। छूट भये अबीकार ।। जगजन्तु फसे कर्म में । दुःख सुर्ख सहे वारम्वारा ॥२॥ सुख बल्लभ सवजीवको । सो प्रभुस्मरण से होय ॥ यों जाणके सुख अर्थीयों । प्रभुमत विसरो कोय ॥३॥ उद्योत ढिग अधन्कारहे। यों सुख दुःख का मेल । वीरसेण कुसुमश्री । मिल देखा यह खेल ॥४॥ कर्म ग्रन्थकी बात को । केवली कथीसके नाय ॥ पण किंचित वरणन् करुं । सुगना सव चित्तलाय ॥५। उस अवसर वीरसेण नृप देखेदृष्टि प्रसार ॥ वनलागे विहामणा । नर पशुविन शुन्य कार ॥६॥ वृक्ष अच्छा दित वेलीसे । मार्ग छाया कंटघास | स्थान २ हड्डी ढग लगे । सब खाली पड़े घांस ॥७॥ दू- रसे श्रवण मे पडे । रौद्र पशुकी पोकार ॥ विस्मय पाये चित अति । अों यह क्या प्रका ॥८॥ कहां आया अश्वमुझ लइ । म्या आगे दोन हार ।। दिगमद शुन्य चित्त भये ।म चन सद्विचार ।।९॥ ॥ ढाल १ ली।।'रंगीला सूडा ॥ यह राग ॥ वीरसेण चिन्ते चित्त माहे । यह कन्क शाल भूमी नाहै । देव तुंरंग कैसे भूलोहरे ॥ रंगीला राया ॥१॥ चिन्ता समुद्रके माये । चित्त गोता रहा हे लगाय दिगमूढज्यो सुच न उपायरे रंगी॥२॥ सुक पक्षी देख यहहाल । श्वामी चित्त करने वहाल । सन्मुख आया तत्कालरेरंगी॥३॥ कहे हम सम सेवक श्वामी । तोहे आपके कैसे खामी । फरमावो जोमन हामी हो ॥रंगी॥४॥ तव वीर कहे संशोभाइ । मुझ निश्चय न कुछ थाइ । अपन उडआये किसजाइ हो ॥रंगीलासू- डा॥५॥ कोर कहे अहो राया। जोगाम नाम आप फरमाया। तहांही अश्व यह लाया। गीलाराय ।।६।। रायकहे कन्कशाल । नहीं नगर का यह थाल । यह दिखे साक्षात महा कालरे रंगी॥७॥ तोता कहे यहकुसुमपुरी।जोआप मुखेऊचरी । अब क्यों जातेहो फारीरे ॥गीलाराया॥ों सुणते वीर शरमाये । मूल राणी का नाम मुह आये । तोताभी तब मुस्कायेरे ॥२० रा०॥९॥ श्वामी हम वाइ गुणधामी । सदा आप चित्तकी विश्रामी॥ सोही बोला यावक्त नामाहो ॥ ० रा०॥१०॥ नृपकहे सचभाई । यह नगर जो नाम कहवाइ । त व कुसुमश्री मुलकाइरे ॥२० रा०॥११॥ ऐसा प्रेम रखना सदाइ । तुमपे वारु प्राण ने ताइ। अब आगे करणा काइहो ॥९० रा॥१२॥ सुक कहे कन्कशाल चलाये । रायकहे भूखे मो-
जन से मिलीये । राणाकहे शय्यासे आस फलीयेहो॥० रा०॥१३॥ तव पिलंग को प्रकट
कीना । करीपूजा कहे देवो चाना । तुष्ट शय्या देव इष्ट तस दीना हो ॥ २०॥१४॥ विछा
यत बाजोट पाट । सुवर्णयाल रत्नके वाट । रत्न जडित झरि मल मलाटेरे ॥९० रा॥१५ खण्डर
सन्मुख दम्पति विराजे । बीचमें भोजनाक सव साज । तब भोजन विविध प्रकट यांजरे
॥० रा०॥१६॥ लहुश्रीकेतरीया । मोतीचूर चुरमा पवारिया । खूब मेवा मशाला भराया
१२॥९० रा०॥१७॥ घेवर कलाकन्द ताजा। पेडा कलम पेठा खाजा । बडा पकोडी खरिसे
व साजारे ॥२० रा०॥१८॥ हलवा लापसी कतार । फुलका पुडी लुची पूर्वापार । तैसे अ-
थगा केइप्रकाररे॥२० रा०॥१९॥ झोलकी फरकी तरकरि । घृत मशाले वधारी धूंगारी ।
वासुंदी राइतो श्रेयकरिः ॥ २० ॥२०॥ मेवा खीचडी दाल भात । सुगन्धी धृतरेले वहा
त । पापड गोलीयों केइ मतिर ॥२०॥२१॥ सब शैय्या से प्रगटावै। कुसुमश्री पुरसती जा
वे । वहूत मनवार कर जीमावरे रं०॥२२॥ थोडे २ भोगव त्रप्तीआवे । शीतोदक भोगव
शुद्ध थावे ॥ जल अरोगी सुख मनावरे ॥०॥२३॥ तव थाल कटोरे विरलाइ । मुखवास
रकेत्री आइ । पान फोफल चूरण खटाइरे॥॥२४॥ सोभी चाखे यथा इच्छाइ । पाचन डका
जातोशकत
भागनकी दलाथाड
॥२५॥
कोये पर जालीवारो । तहां वेठे दम्पति चेन चारोरे ॥सा२६|| यह देवनेभी सब वाता विस्तारे ग्रन्थ वडजाता । ताते संक्षेपे चेतातारे ॥२०॥२७॥ द्वितीय खन्ड पहली दालो पुण्यकल प्रत्यक्ष निहालो । कहे अमोल सञ्चो उजमालोर ॥ रंगीलाराया ॥२८॥दोहा॥ तोता को खानेदिये । मेवा पिस्ता बादाम ॥ फल पुष्प बहू माँतके । सोभी पाया आराम ॥३॥ अश्वकोभी तब अर्पिये । उत्तम दाणा घास ॥ उदकपी तृप्तहुवा । पायचित हुल्लास ॥२॥ दम्पति वैठे सेजपे । करते वात वीनोद । जंगल में मगल हुवा। माने मन प्रमोद ॥३॥ तोता रहेतरु डालपर । करे रागणी ललकार ॥ समयोचित भापकरी । राजावे निज शिरकार ॥४॥ साक्षात जाने स्वर्गमे । वैठे वीरसेण जाय ॥ तासहृदय की खुशी । को सके मुख बरणाय ॥५॥।॥ ढाल २ री॥ प्रभू जगत् पति तुम छोजी ॥यह०॥ कौतुमक था यह भारी । चित्त स्थिर कर सुणो नरनारी ॥३।। सर्व सुस्त हुवे उस वारो। कान शब्द पडा भयकारो । वीर डर करऊमे तत्कारो । देखो चहुदिशा दृष्टिं प्रसारी चित्त।।१॥ कहे तोता मत घबरावो । पूछे नृपति क्या यह डावो । कार कहे कुसुमपुर इस ठावो ।सो उजाड हे इस वारी । चित्त॥२॥ उसमे पशु आकर भराये । सियाल चिते सिंह वनराये। सबमि- तकर शोरमचाये । नृप देखने की इच्छारी ॥चित्त॥३।। सुक कहे निजनगर पधारो । यह खण्ड२ कु. देखन में नहीं सारो । रखे विधन होवै कोई न्यारो । मुझे शङ्का पडेहै इस वारी॥चित्ता॥ कहे भूत इस वन माय । कौन विघन करन को आय । अपन भी कमी कुछ नाय । सुन शुक रहा मौन धारौ ॥चित्त॥५॥ मनोवेग अवरूद्ध थाइ । सब साथ में लीनी सज्झा इ। नगर सन्मुख चले उमंगाइ । हो तब जैसी मति होवे जहारी ॥चित॥६॥ ज्यों ज्यो पुर पास यह जावे । त्यों क्रूर शब्द अधिक सुनावे । तब जरा डर मन में लाये । अन्दर जाने हिम्मत हारी ॥चित्त।।७। तब ग्राम द्वारके पासे । एक मन्दिर दिव्य प्रकाशे । शि- खर गगनालम्बी भासे । वी कीरण सारहा मल कार ॥चित्ताला अश्व खडा किया उस वारें। तीनो प्रवेश देवल मझारे । चित्र विचित्र भीती निहारे । सुवर्ण जाय रत्न जडी सरि॥चित्त॥९॥ स्त्री मती मणी रत्नारी । देख जानी देवी ग्राम रखवारी । पूजा सामग्री वहां सारी । दम्पति गये देख अचंभारी चित्त॥१०॥ शुक्र से पूछे तब राय । ऐसी रक्षक नगर शुन्य थाय ॥ यह आश्चर्य मुझको आय । तब राघु ज्ञान बले ऊचारी ॥चित्त॥११॥ इस कुसुमपुर का सुर राजा। महा मिथ्यात्वी करत अकाजा। गया सीकार खेलने का- जा। एक मुनिवर वन में देखारी चित्त॥१२॥ तपोधनी ध्यान मझारो । तस पूछे नृप उ मगो कोड देवी तमने सीकारो। मुनि मौन रहे तब धारी ॥चित्त।।१३।। असुरत्त १८ राय बोलावे । नहीं वोले चपेंटा लगावे । मुनि धर्म शुक्क ध्यान ध्यावे । अतिकोपा तव अहंकारी ॥चित्त॥१४॥ कहेतूही सीकार है मेरी । मुनी तन माला से भेदेरी । चलनी जे मे छिद्रकियेरी । छूटीरक्त धार पिचकारी ॥चित्त।।१५।। मुनिनरक की वेदना संभारे । तैसी वेदना नहीं है यारे । तेसो भोगवी अनन्ती वारे । यह निर्जरा करे अपारी चित्त॥१६॥ तेने पाप का सञ्चय कोना । सूरनृप तस फल यह दीना। मेटे दुःख तेरे खोटी गातिना । यह तो मेस महा उपगारी ॥चित्त॥१७॥ यों उज्वल भावना माते । घनधातिक कर्म खपाते मुनिकेवल ज्ञान तब पाते । अन्तगडहो मोक्ष पधारी ॥चित्त॥१८॥ निर्वाण महोत्सव के ताई। देवोंकी छत्त गगनम छाडादेव इंदभी इनसुनाइ । यह देवीगइ तब तहांरी॥चित्त१९॥ अकाले मुनिमरण देखा।जाना भूपगुन्हेगार विशेखा। विनगुन्हे अनर्थ यह लेखा।गइअतिको पमाही भरारीचि. २०॥ महा विकराल रुप बनाई। कोपी किलकारी लगाइ। तासेनगरी सब धरराइ । जाना पापसे देवरुठारी ॥चि. २१॥सव जीव बचाने मागे।छोड़के धन पुत्रीनारी जागे| कितने ढके कितने नागे। मरण भय सबसे भारी॥चि॥कितनेक मरेवस्काई।बहूत मुरदे पडे उनकाइ।सुरनृप यह देख घव राइ की भगनेकी त्व इच्छारी॥चि. २३॥ मेसुरीतस शिखा को सहाइ। चकीकी तरह फिराइ । क्यों साधु सताये अन्याइ । दिया खड्गसे सिरउडारी॥चित . बह वी.कु. ण्ड२. १९ ।।२४॥ मर कुगति में सोसिधाया। तबसे उजड पुरराया। यो पाप के फल बताया । यह देवी हे न्याय कारी ॥चित।॥२५॥ मुझ निमित में यों भासे । यह देवी फिर नगर वसासे । आपको राजा यहां थापासे । यह सत्य है रखना धारी । चित्त॥२६॥ सुण वीरसेण विस्मा या। पाप के फल से डर पाया। ढाल दूसरी अमोल सुणाया । करो धर्म सदा सुख कारी चित्ता॥२७॥॥दोहा।। यों बातोंकी विनोद में। दिन कर्ता अस्तथाय ॥ पशु प्रकटे पक्षी छिपे । अन्धकार जग छाय ।।१।। देवालायसे अन्तरे । स्वच्छ सुखद स्थल जान । वीरसे ण परिवार युत । रहे आकर उसस्थान ॥२॥ शकुन अनुसार शुक कहे । सुणो श्वामी ए कवात ॥ आज निशी अपने विषे । होवेगा कोइ उत्पात ।।३।। इसलिये होंश्यारी से । पू रे करों चहू प्रेहर ।। नृप कहे सरस आहार से । आती प्रमाद की लेहर ॥४॥ शुक कहे पहि ले अपही । करोदो जाम विश्राम ॥ में जागी पहरो देवें । फिर आपरक्ष जो श्वाम ॥५॥ जागते ऊपर ताकता । आ नहीं पड़े कदाय ।। एक रातकी क्या कथा। सहज देवो विला य ॥६॥ धोका तो मुझ मन अति । पण प्रभू करेंगे खेर ॥ जो इस शंकट से बचे । तो फिर नही फिकर ॥७॥॥ढाल ३ री।। विछीया की देशीमें ।। हारे लाला ऐसे वचन शु में क के सुनी । वीरजीके आये दायरे लाला ॥ भलां माइ ऐसे कीजीये । दम्पति सूते मुख स द मायरेलाला ॥१॥ कर्मों की कथा सुण चत्तधरो।होनहार सा हाहायर लाला ।। बन्ध उपाय गत भोगवे । तस टाली सके नही कोयरे लाला ॥कर्मों।।२॥ वरिसेण निद्रागत हुवो । तो ता रखवाली कराय रे । छल छिद्र होने लगे। पण पोपट नाही ठगायरे० ॥कर्मों॥३॥ अरधी सखरी अति क्रमी । वीरसेण हुवे सावधान रे०॥ चतुर मन चिन्ता वसे । सोही दी हुइपाले जबान रे ॥मौ॥४॥ सूडा कहे अहो नृपति । आप सोचो सुखमांय रे॥ रक्षक मुझको रहन दो । रखे जासो आप ठगाय रे० ॥को॥४॥ वीर कहेरे भोलीया । मु- झ पशु से गिने निकाम रे०॥ ले निद्रा तूं तो सुखसे।में रक्षक भय मत पाम रे कर्मों। ६॥ यो सण तोतो चुपरह्ये । जागे तोभी निद्रित होयरे ॥ वीर कैरवाल नंगी ग्रही । देवे दीष्ट पहरौ चौबाजू जोयरे ॥कमों।।७। तब तहां से कुछ अन्तरे । सुनायो नाटिक झणकार रे. छे राग तीस रागणी । जाने गावे किन्नर सुर सारे० ॥कमों।वा तासे गगन गरणा गयो हैदाशी । सुगवीरजी आश्वार्य पायरे०॥ दंग दिग पर्ट फेंके तदा । ते देवालयमे देखायरे० ॥कों ॥९॥ दिव्य प्रकाश खी किरण सा । देखा मन्दिर मांयरे० आश्चर्य चकित हो चिन्तवे।इ देवार समेही नाचे गायरे० ॥कमो॥१०॥ अमेरअमरी मिल इहां । करेहे इछित विनोदरे० ॥ हाहा यह अपूर्व रचना। देखे उपजे प्रमोदरेला.॥कम।।११॥ अनोपम नाटक देवका । मनुष्य देख AU २० न कैसे पायरे० ॥अचिन्त्य पुण्ये अवसर मिला । में देखूदेवस्थान जायरे कर्मों।।१२। कुसु पी.कृ. . मश्री को जगावइ । कहे रहना प्रिया होश्याररे० ॥ देहीकी चिन्ता निवार के मे-पीछा आखण्डर ता इसीवारे।। कमो॥१३॥ रागे अकर्पा भूपति । चले सो देखन नृत्यरे० ॥ राणी चिन्ते चित्तमे । रखे प्रमादे होवे अकृत्य रेगोकमाँ॥१४॥ शैय्यासें नीचे रही । ऊभी निद्रामें झोका खायरे० ॥वैठी वृक्षके आसरे ॥ गइ निद्रामे घेरायरे ॥काँ॥१५॥ वीरजी पहोंचे देवालय । देखा अन्धारा घोररे ॥ प्रकाश नृस गीत कुछ नहीं । तब डरपाये दिल और रेकम॥१६॥ पुनःपेखे चारोंदिशी । प्रकाश नाहीं देखायरे । शब्द कछु सुणावे नहीं। मन आश्चर्य अतिही पायरे० ॥कमा॥१७॥ रखना यह इन्द्रजाल सम । विरालाइ देखाइमों यरे० ॥ इच्छा मेरी पूगी नहीं । कारण है यह कोयरे० ॥कों॥१०॥ बात स्मरण शुक की । मनमें गये धस्कायरे० ॥ रखे कोइ विधन हुवे । इन्द्र जाल में मुझको फसायरेक म॥१९॥ रखे हरण होवे नारीको । शैयातुरी लेजायरे०॥यों घबराते वीरजी चले शीघ्र उसीवार छायरे० ॥कर्मो॥२०॥ होन हार सोनीपजे । ते सुणना आगे अधिकाररे० ॥ अमोल कहीवाल तीमरी । दितीय खण्ड मझारे ।को।।२१।।दोहा।। अरुणोदय शुक जाग के। देखे द्राष्टिप्रमार | अशोया और गालवी। देर नहीं उमवार. ॥१॥ क्रममश्री कंत्री २० रही धस्काया यह देख ॥ घबराया पाडी चास तब । फरक शारापरास ।।।। मश्री तदा । देखेदृष्टि प्रसार ॥ नहीं पेखत घबरागइ । शैय्या तुरी भरतार ॥२॥मुरछाइ ध रणी ढली । तडफे ज्यो जल विन मीन ॥ पवन जोग सावध हुइ । रुदन करे होदीन ॥३ तजी भयङ्कर वन विपे । कहा गये राजान ॥ सासरा पीयर कहां रहे । क्या करे शुकहो जान ||५|| दाल ४ थी। आइरे पनोती जरासिन्वनेरे. ॥यह.।। सुगीयों कथा कर्मा तगीरे । कर्म करे मो होयरे ॥ जीव उपाव सुखके करे ॥ पण होतब नटाले कोयरे ।। सुणी यो॥१॥ रुदन सुगी तोता राणीकारे । वीर नृपति घबरायरे ॥ दोडके आये तरु तलेरे । शय्या तुरंग न देखायरे ॥सुणीयो॥२॥ मुरछाये सोनी वसुधा परे । क्या करूं अब हा- येरे ॥ कैसे उल्लंघु समुद्रकोरे । स्वपन ज्यों सुख विरलायरे ॥सणीयों॥३॥ राज ऋद्धि सब रहारे । कहाँ रह्या ,मुझ परिसाररेः ॥ तन नारी शुख कैसे पोपुगारे। हाहा गति कर ताररे ॥सणीयो॥४॥ यो लीनों प्राणी विल विलरे । रन में कौन समझायरे ॥ रङ्ग में मङ्ग क्षीण में होवेरे । कर्म अशुभ प्रगटायरे ।।सुगीयों॥५॥ दम्पति मुरछित देखकरे । सुख हु- वा सावधानरे ॥ रखे मरे यह शोकसेरे । समजावू राणी राजानरे ।सुगायो॥६॥ उडकर आया वीर जी कनेरे ॥मधुरा करे अरदासरे ॥ नरादिप हो रुदन करोरे ।नहीं छाजे गुण,रास १ वी.कु. २१ रे ॥मुगायो।।७। रोने से राज मिले नहींरे। शरीर सूके चक्षु नाशरे ॥ आपो लखी सा वध हुवारे । करो बुद्धि से विमासरे ॥सुणीयों वा वीती उसको वीसरियेरे । आगे का सोचो उपायरे ॥ संकट से केसे ऊबरें ।' पहोंचे सुख के मायरे ॥सुणीयों॥९॥ मेने खण्डर पहिले चेताये वहुरे । पन होन हार सो थायरे ।। आप कहां गये थे चलारे । मेरे को वि- न चेतायरे ॥सुगीयो॥१०॥ धैर्य धर कर कहे वीरजीरे । में मुढ नमानी तेरी वतारे ।। प्रका श पेख्यो देवलय विषेरे । नृत्यगीत शब्द सुणातरे ॥सुगीयों॥११॥ देव नाटक जानी क- *री रे । देखन उमंग अतिथायरे ॥ कुसुमश्री को जगाय केरे। में तो गया उस जायरे ।। ॥१२॥ इन्द्रजाल से विरला गयारे । वैम हुवा मन मायरे ॥ बात संभारी थारी कहीरें ।ध स्कायो आयो धायरे ॥सु।।१३।। रुदन तुमारा देखको । शकित पेखायह स्थानरे । अश्व शैय्यादेखी नहीरे । निरधार आइ मूर्छानरे ॥॥१४॥ कहां गये दोनों हरे कौननेरे । यह अचिन्त्य हुवा आपसोपरे ॥ मेरे दुर्गुण में दुःखी हूवारे । तेरा किंचित नहीं देोपरे ॥सु॥ ॥१५॥ सुक कहे विषय विटम्वनारे । देवे इसी प्रकाररे ।। हुवे का फिकर अब परहोरे । क हो आगे सुख विचारेरे ।।। १६॥ वीर कहे दिगमुढ ज्योरे। सूझे मुझे कुछ नायरे ।। जानी बुद्धि गुगनिलारे। कटेसो कर उपायरे० ॥॥१७॥ तोता कहे सावध मनेरे । की जीये वावी में स्नानरे ॥ अष्टम पत आदरी करी । करा दवाका ध्यानर सारा यम पुण्य पसाय से रे। देवी होवेगा प्रत्यक्षरे । संकट निवारसी आपणारे । होतब कहेगा सम क्षर ॥।॥१०॥ सुखउपाव एक येही हे जी। मुझमतिये इस स्थानरे ॥ दिन तीन मे आप मेरे । पहोचेगे सुखस्थानरेगा।॥२०॥ सुख उपाय शुक दाखव्यारे । ढाल चतुर्थी मांयरे ॥ अमोल कहे आगे सुणारे । करेनरेश यह उपायरे ॥सु०॥२०॥दोहा।। सुगीराय निश्चि । न्हाये वावडी माय ।। देवलमे देवीमुखे । वैठे ध्यान लगाय ॥१॥ उकार युत्त चि तमे। ध्यावे देवीनाम ॥ कार्यार्थी प्राणीको।प्रमाद का क्या काम ॥२॥ तोता जाइवन पे। मिष्ट अरोग्य फल देख ॥ तोडी लावै चोंचमे । देराणी को हमेश ।।३।। फल आहार पाणी गृही। करे दोनो गुजरान ॥ नवल निवन्ध पोपट कथी । तेर को दिन रान ॥४॥ वीर एकाग्र चित्तकी । लब देवीमें लगाय । मनतर कर मन्त्र को जापे । तोही कार्य थाय ॥५॥दालवी।। पांडव पांचों वन्दते ॥यह०|| सुगड नर सांभलो । पुण्य वि सुख कैसे पाय ॥ चतुर नर सांभलो । धर्म करनेसे दुःख विरलायजी ।।। इसविधि वीको ध्यावते । व्यतिक्रमे तीन दोह हो ॥ दिव्य रुपदेवी प्रकी। कहे नृप सेवच्छाअ विह ॥॥१॥ करजोडी वीर उभेहुये । मधुरालवे सीश झुकाय जी ।। देख पुण्यात्म प्राणी - खण्ड को । चित्त मे देवी अतिहर्षाय ॥।॥२॥ क्यो वछ मेरे लिये । सहन करे तूं कटरे । कार्य होने सो कहै । जोहोवे तुझइष्ट ।।।।३।। भूण्वदे अहो जगम्बे । है तुमसे छानी कोइ तरे ।। अन्तर जामिनी श्वामीनी । जानो सेवक के अवदात ॥॥॥ मुझदव के जो ग से । कोइ इन्द्र जालीया आयो । नाटक भरमे भरमाय के। हरा अश्व शय्याजोथाय ।।सु ॥५॥ मलके हम आये यहां । सुपुण्य हुवे आप दर्शनरे । अब यह कष्ट निवारीये । शी घ होवो अम्बाजी प्रसन्न ।।।।६॥ संकट यह स्थानज विषे । आधारिक आप मोयरे ।। होनाहोसो प्रकाशीये । शङ्का न रखीये कोय ॥।॥७॥ भिष्ट सुगड वयण सुन करी । हर्षि त हो दीया ज्ञानरे ॥ कर्म वीकट तस जानके । देवीमत हुवा हैरान ।सुावा यहां श्रोता हो विचारीये । पुण्य विन देव से क्या होयरे । सञ्चित पावै प्राणीया । भोलासो सम्यक् खोय ॥सु॥९॥ छोडो कुदेव पूजन नमन । रखो प्रमेष्टि ध्यानरे ॥ तो उद्यम से. पावोगे । सञ्चित गुप्त निधान ॥सु।१०॥ विश्वासी देवीभूपको कहै। भाइ है अवाक तुझ नपरे । द्वा दशसमांस लगे तुमे । पावोगे पूराकष्ट ॥सु॥११॥ फिर तुझ पुण्य प्रगट हुवे । करुंगा में सक्तिसी सहायर ॥ गइ ऋद्धिसंग बहूद्धि प्राप्त होसी वैमनाय ।।सु।१२॥ वीर पुरुष संकट पडे । वैसे सहेढ मनरे॥पर्व हवे महापुरूपजो। तस चरित्न कीजे चिन्तन ।।स।।१३। . .
तार्येश यक्रिहरी हरी । कर्म तणे प्रतापरे ॥ ऋद्धि सजन से विछडके । सहे महा सन्ताप ॥स ।।१४परन्तु दुःखी वो रहे नहीं । पुनः पाये सुख विशेषरे ॥ ढलती चडती छांह । यो शुभा शुभ कर्म अशेप ॥सु० ॥ १५॥ अति संकट मे तुम तणी । करूंगा विच सहाय ॥ हिवे सिन्धू तरखा तणों । दाखवू एक उपाय ॥ सु० १६॥ रक्त द्वजा ऊंची अ ति । बान्धो देवल पर जायरे ॥ उसे अवलोक सायर पन्थी । तुम उद्धारण करेगे उपा- य ॥ सु० ॥ १७॥ श्रेष्ट एक आइ करी । ले जावेगा तुम को साथ ।। आगे होतब जो होयगे । सो देखोगे तुम नर नाथ ॥ सु०॥ १८ ॥ अन्तर ध्यान सुरी हुइ । वीर शुक राणी दिग आयरे ॥ बात कही देवी कही । सो भी सुण कर बिलखाय ।। सु०॥ १९।। शुक सवादी फल लादिया । परणो कीयो राय तामरे ॥ तीनो तहां इस विध रहै । दे खो कर्म के काम ॥ सु० ॥ २० ॥ शुक मनो रन्जन कथा । कह कर काल खुटायरे ॥ पांचमी दाल द्वितीये खण्डे । ऋपि अमोलख गाय ॥ सु० ॥२१||॥ दोहा ॥ देवलमे से बना गृही । देवल उपर जाय ॥ वन्धी शीकारे उतंग अत । ज्यो दूर से सो देखा य ॥२॥ उसवक्त एक धनेश्वरी ॥ धन्ना सार्थ वाय ॥ साथ बहूत नर परिवरे । आवे स- मुद्र रहाय ॥२।। कुसुम पूरके आखाद में । चला बाहन देखे सोय ॥ नवी दजा देवाल नमा । कहे शान्ति कीजो अम्मा । घणी खम्मा । शङ्कट से उधारीयेजी ॥ हमारे इच्छित वी.कु. में कार्य कीजे । परिवार के दर्शन दीजे । अर्ज मानीजे। विज्ञप्ति अवधारीयेजी ॥१२॥ और भीखण्डर भा सब पाये नामी । मांगी जो जो थीखामी । सुख आरामी।सव इच्छे प्रभु कह्योजी॥ हिल मिलकर सवही चले । उदधी कण्ठ आये जेतले । उसहीपले । चड वाहन रसताल ह्याजी ॥१३॥ असल कोटडी निहाली । करदी कुमर मणी खाली। तीनों संभाली । उ- स में सुखे रहने लगे जी ॥ भूपण एक बेंचहीया। वस्त्रा भरण उत्तम लीया । युक्ते रीया । खान पान सुख जे मंगे जी ॥१४॥ देख वीरकी चातूरी । शेठ खुशी भये ऊरी । भये मन्तरी । सुबुद्धि ख्याल नित्य रमेंजी ॥ नीति रीति हित की कहे । जिससे सब मोद ज लहे । हुकमेरहे । सर्व साथी के मन गोंजी ॥१५॥ अनिन्दक अमत्सरी । गुण ग्राही न ही छिदरी । 'धीर वीर सिरी । सन्तोपीरु सोभिताजी ॥ उदार चित्तिदयालु । सत्यवन्त अ नाथपालु । यह गुणमाल । पेखी सबमन लोभताजी ।।१६।। गुण से पूजापावे सहू । विन गुण सूरुपा लहू । इसलिये कहूं । धारो यह गुण सुखचहे जी॥ द्वितीयेखण्ड पष्टीढाल । ऋ अमोल कहे उजमाल । अहो जनमाल । आगे चरित्र हे रसमहे जी ॥१७॥ ॥दोहा २४ .को ना१ - तस तन तेज विद्युत प्रभा । देखा धन्नाशेठ ॥ आश्चर्य पा मुञ्छित हुवा । पाप गया म न पेठ ॥२॥ लोकों मिल सावध कीया। मिथ्या कहे अवीमोय ॥ शीत जोर मुर्छा ल- ही । अवर कारण नहीं कोय।।३।।दामनी कामनी मनवशी। भूले शुद्ध बुद्ध साराचिन्ते श्व पातल मे । ऐसी नहीं कोइ नार ॥४॥ नर जन्म सम्पदलही । जो नमिले ऐसीना।। निष्फल धन तन तासहै । इसलिये मुझ धिकार ॥५॥ दालण्वी ॥ गुरांजी ज्ञानदीयो भारी ॥या विषय की वांच्छा दुःख कारी । सुन तस फल जो निर्विप रहेतो सुख पावे मारी ॥॥ विपय वामना पीशाच के वस्य । शेठहुवे तेवारी | खान पान सन्मान वि सारे । चित्त वसी प्यारी ॥विय।।१।।उपावढूढे मिलने प्रेमला । लगेन कुछ कारी । मन त- सागर भृगजो। उछले लेहर वारी ।।विषा२॥ बहूत सलामें अन्तिम सला । जची म न मझारी । पति जीवित पत्नी नहीं पावै । न्हावू वीर मारी ॥विप।॥३॥छल छीददेखे नृ पत के । एकदा निशीकारी ॥ लघु शङ्का निवारण कारण । आये वीर बारी॥विप॥४॥ वाहन कण्ठे निशङ्क वैठे । शेठजी तक पारी ।। धीरेसे आकर धक्का लगाया । दियेवारीमें डारी ॥विप॥५॥ थोडी देखाद पूकार कीनी । दोडो दीपक लारी॥ कौनपडा दरीयाव के अन्दर । वाजा इसवारी ॥विप॥६॥ अपने २ साथके सब जन । लिने सभारी ॥ दीपक २ अभीमायर में । कोइ नर नारी ॥ जानी निज पति पडी मुरछाइ । शुद्ध न लगारी॥विपखण्डर धार केइनर नार आये । मचीगड वड भारी ॥विय॥७॥ कुसुमश्री जाग्रतहो देखे । पतिन ही सेजारी ॥ वाहिर आनर बृन्द मे देखे ।नही दिखे कहारी ॥विपाका सुना लोक मुख वी २५ ॥९॥ शीतल पवन जोग क्षीणन्तर । सावधता धारी ॥ विरह वन्हिसे प्रजली प्रवल । क- रा तव पोकारी ॥विप॥१०॥ अहो प्राणेश्वर अवला अलवेशर । यह क्या विचारी ॥ निरा धार मेली शरणागत । गयेकहां पधारी ॥विय ॥ ११ ॥ जान अजान में श्वामी आपको । दुहव्यान लगारी ॥ अम्बुनिधमें एकली छोडते । कहां गइ दयारी ॥विष॥१२॥ कहां पी यर कहाँ सासरा रहिया । अववीच लामारी ॥ हाय २ अब क्या करूंमें । होगइ निराधारी ॥विया॥१३॥ यो पुकार सुनके सब लोकों । गयेअति घबरारी ॥त्रहा २ मचगइ शाहजमें । शुन्य गइ छारी ॥विप॥१४॥ अहोप्रभू ' जुलम हुवा यह भारी । रावजी व्यारी ॥ ऐ- गुणवन्त पुण्यवन्त प्राणी । मिलने दुक्कर कारी विप॥१५॥ हाहा कार मच्या सब सा में । धन्ना हरष्यारी । कारमो सोग ऊपरसे करते । आये कुसुमांजाहारी॥विप॥१६॥ ते कूटते सन्ताप मेंरही । पूरी हुइ निशारी ॥ प्राते सव मिल शेठे समजाइ । राखे रोता । ॥१७॥ रुदन करतो धन्नोबोले । अहो मित्र सहचारी ॥ अवबीच प्रीति तोडके डू २५ वे। यह क्या विचार विप|१८|| विल २ ते कहे कुसुमश्री से । गये नहीं आतारी ॥ नाहक फिकरतजी चलो मुझ घर । रसुंगा सुखमंसि ॥विप।।१९।। मुझ साहवी सवहै तुमा री । पूरुगा इच्छारी ॥ लोक जाणे विश्वासे अवला । कौन जाने व्यभिचारी ॥विष||२० परन्तु कुसुमां समझी मतलब । ऊठी तन झालरी ॥ इसही दुष्ट डूंबा ये पति मुझ । रखे करे बलत्कार विप||२१|| रहने जोग नहीं यह जागा । मरना श्रेयकारी | झम्पा करं समुदमें । ऊठीयों धारा ॥विग॥२२॥ तव पोपट ज्ञाने परचावे । रहो धैर्य धारी। को माराने समर्थ वीरको । होंगे पुण्य सहारी वि०॥२३॥ विरह व्याकुलन सुणे वचन त । लोक फिरे आडारी ॥ सब चुकाजा वाहण कंठे । कूदी पाणी मारी वि०॥२४॥वी रसेण तस कर धर राखी । न मरीये 'प्यारी । भयवसे सती आंख मित्रानी । शेठने गृहीधा री ॥ वि०॥२५|| कहे चिल्लाइ छोड दुष्ट मुझ । किसे कहे प्यारी ॥ जैसी गति करी मुझ पतिकी । तैसी होगी थारी ॥विधा२६॥ वारसण मन मतलब समझे । पण घुस्सा मराि॥ कहे जरा ऑख खोल कर देखो । कौन दुष्ट क्यारी ॥वि०॥२७॥ ओलखीपति वचन नय न खोले । ही निहारी ॥ सब हर्षाये ढाल सातमी । अमोल ऊचारी ॥विं॥२॥ॐदो हा।। कुसुमश्री अति हर्पथी । पुन गइ मुरछाय । तत्क्षिण पुनः सावध हुइ-। गइ मन मे खण्ड२ ये । रहे सो आगेपाय ॥ ऋपिअमोल यह ढाल आठ कहे । कीजीये सुख उपाय ॥कर॥ १८॥दोहा॥ आयुवाले होंशारहो । शुकउड गगने जाय ॥ श्वामी सुखको इच्छता। वी.ऊ. देखे गगने रहाय ॥१।। अन्तराय उदय दम्पति । जुदे २ पटीये सहाय ॥ अलग २ नीकले । कुसुमश्री वीरराय ॥२॥ ज्यों जुदे २ कर्मों वस्ये । जुदी २ गति जीव पाय ॥ सो वायु जोग दोनोही। जुदी २ दिशचले जाय ॥३॥ मिलन उपाव किये अति । परन्तु नहुवा सिद्ध ॥ होनहार हुवा रहे । कर्मोंकी यहविध ॥४॥ जहां लग दृष्टिगत रहे । तहां लगरहा विश्वास ।। विशेष अन्तर अदृश्यहो । हुवे शिथिल निरास ॥५॥ ॥ढाल ॥९वी श्रेणिक राय हरे अनाथी निग्रन्थ ॥यहाखेचर राय । दम्पतिको समझाय ॥टेर। अन्तलि खसे कार देखा । जुदा दोनों जाय । वियोग देख श्वामी श्वामिनीका । हृदय तस थररा य खेचरा॥१॥ शीघ्र उतरी आया वीरढिग । मधुरो नमी बोलाय ॥ सुभाग्य श्वामी दर्श देखी । मन विश्रान्ति पाय खेचर॥२।। जिन्दे रहेतो धारा करेंगे । टलीमरन बलाय ॥ पन्तु राणाजी जुदा जावे । क्या करूं मिलन उपाय ॥॥३॥ आज्ञा होवेतो जाकर उन को । देऊं धैर्य बन्धाय ॥ ले समाचार उडकर चाला । कुसुमश्री ढिग आय खि।।४ान मनकर कहे फिकर सागो । रोनेसे क्या थाय ।। शुकदर्श कुसुमा बाइ । ही अङ्कित बैठा य खे॥५॥ पोपट कहे श्वामा आपवियोगे। अतिरहा दुःख पाय ।। कर्म योग अम्बनि- माहे । सूचेन कोई उपाय खे॥६॥ ऑव न्हाखती कुसुमा कहती। क्या करूं में भा य ॥ पक्षिणी होवुतो उड़ी मिलुमे । कालजारहा है चिराय खा| कहे राघु छोडीये मु झ । मिलू श्वामी को जाय ।। कुशल आपकी कही आवू । कूसमा छोड़ा उस तांय खि ॥८॥ नमन कर के कहजो श्वामी । रही आप सुखध्याय ।। जीवती रहती मिलूंगा फिर- भी। नहीं तो रखीये कृपाय स्व॥९॥ धैर्य देइतोता चाला । वार पास सो आय ।। कुश कही राणी कहीसो । ज्ञाने धैर्य दाराय ||१०॥ क्षाणिक में इत वीणिक में उतर हा गोता लगाय ।। अन्तर अधिक हुवा दोनों का | वीरजी को दया आय ।।१२॥ दीनश्वर कहे अहोमणी चूड । अब तुमफिरिये नाय ।। हमारे तो पापदिशा प्रगटी । सो न छूटे भक्त्याय ॥।॥१०॥ तुप्रभी भुक्तो सङ्ग हमारे । मुझ से नदेखा जाय ॥ वेठो आ इ अङ्कित मे । लो विश्रान्ती माय ॥ खे॥१३॥ सूडो बैठा नृपति खोले । अति उदासी जणाय । विश्वासी पूछे तस भूपत । देवो ज्ञान से तुम बताय ॥॥१४॥ हम जीवगेके इस मे मरेंगे । मिलेगे पीछके नाय ॥ सूवा कहे मुरी वचन संभारो । मेरेसे पूछो काय ॥॥१५॥ सुख दुख दलती चडती छांया । अधीरा होना नाय ॥ वडे २ में शंकट पडे खण्ड २ २८ हैं । पीछे गये सम्पत पाय || ||१६|| राम लक्षमण हरिश्चन्द नलादि। कृष्ण पांडव म- कुहाराय ॥ केइ वर्षोलग विपती भोगवी,। उत्तनी तो अपने नाय ॥ख।।१७।। वो सब सब धै- धरी सुख पाये । तैसेलो धैर्य को सहाय ॥ दुःख के दिन भी बीतेंगे अवी। देवी बच न सत्य जणाय ॥खे।।१८।। गत जन्म में करणी करते । कसर रही देखाय ॥ अचल सु ख नहीं पाये स्वामी । अवतो वन्धिये नाय ॥१९।। जो शंकट में साहस न खण्डे । तस दुःख ते नलखय।। संकट और जन्म तो पूराहोवे। नाम अमर रह जाय ॥॥२०॥इत्यादि शुकबोधसुणीनृपाधैर्य दिलमे लाय।।नववी ढाल अमोल ए भाखी।ज्ञान सदासुखदाय।। खे ॥२१॥ॐ॥दोहा।।अहो वल्लभ नृपति कहे । सच्च है तेरी वात ॥ हित शिक्षादी अवसरे । सच्चा मित्र सुखदात ॥ अव एक वचन तूं माहेरो ॥ मान्य करीले भ्रात ॥ तो तुम ह म दोनोसुखा । होते अवी देखात ॥२॥ यह दिखताहे सन्मुखे । वन बृक्ष भरा सुषकार ।।तु जा रहा इसके विये । जहां तक हम पर भार ॥३॥ पुण्य प्रकट मिलो आयके । भोगवें सब सुखासुख उपाव और इस विना । देखाता नहीं शुक ॥४॥ सुन वचन यों भूपके तोता नयनाश्रुत होय ॥ गद २ वयण तव ऊचरे । बूरा है जगमें विछोहः ।।५।।दा ला वी।। अपाद भूती अणगार ॥यह०॥ देख सूवेके यह हाल। कहने लगे नृपाल । २८ सुण पोपट प्यारा । ज्ञानी होकर यह क्या करोरे ॥१॥ तूं मुझ जविन प्राण । पण येही युक इस ठाण । सुण पोपट प्यारा । मुझ तूंतो जाने खरोरे ॥ २॥ रुदन्त शुक तव के य । जाणू श्वामी को सत्य एया ।। सुणो सूरा राजा । पण दुःख में छोडे जावै नहीजी ३ ।। जो सेवक दुःख माय । श्वामीको तज जाय ॥ सुणो सूरा राजा ॥ नीमक हरा सो सहीजी ॥ ४ ॥ वीर कहे इस ठाम । जाते शका न पाम ॥ सुणो पो०॥ न जा वे तो आज्ञा भङ्ग कहीजी ॥ ५॥ शुक निरुत्तर होय । सूजे उपाव न कोय ।। सुणो सू ॥ पग प्रणमी, गगने चलाजी ।। ६ ॥ खंग में खंग ऊभारेह । वर्पावे नयने मेह ।। सु णो सूरा ॥ भक्ति भाव छत्ता दाखवे जी ॥ ७ ॥ भूप नयनाश्रुत होय ।' जाने समक्षा को सोय ॥ सुणो पोपट ॥ चला शीघ्र वो वहां थकीजी ॥ ॥ कुसुम श्री पास आय ऊभा गगन मे रहाय ॥ सुणो श्रोताजन हो ॥ अक्रन्द सुना अति आकराजी॥ ९॥ शीघ्र उतर दिग आय । प्रण में राणी के पाप । सुणो श्याणी बाइ । राजानी मुझ राखे जी ॥१०॥ कुसुम श्री तो न सुणे कान । लागा आर्त ध्यान । सुणो श्याणी रा णी। आशु आशुं पूछे तस पाख से जी ॥ ११ ॥ देख तोता को पास । राणीजी पाइ विश्वा- स। सुणो पो. ।। भले आया इस अवसरे जी॥ १२ ॥ लिया खोला में कर फेर'। कहे -- खण्ड २ । पीछे गये सम्पत पाय ॥२॥१६॥ रामः लक्षमण हरिश्चन्द नलादि। कृष्ण पांडव म- कु से हाराय ॥ केइ वर्षोलग विपती भोगवी,। उत्तनी तो अपने नाय ॥खो॥१७।। वो सब धे- र्य धरी सुख पाये । तैसेलो धैर्य को सहाय ॥ दुःख के दिन भी वीतेंगे अव। देवी बच न सत्य जणाय खे॥दा गत जन्म मे करणी करते । कसर रही देखाय ।। अचल सु ख नहीं पाये स्वामी । अवतो वन्धिये नाय ॥१९॥ जो शंकट में साहस न खण्डे । तस दुःख ते नलखय ।। संकट और जन्म तो पूराहोवै। नाम अमर रह जाय ॥१॥२०॥इत्यादि शुकबोध सुणीनृपाधैर्य दिलमें लाया।नववी ढाल अमोल ए भाखी।ज्ञान सदासुखदाय॥खे ॥२१॥दोहा।।अहो वल्लभ नृपति कहे । सच है तेरी वात ॥ हित शिक्षादी अवसरे । सच्चा मित्र सुखदात ॥१॥ अव एक वचन तूं माहेरो ॥ मान्य करीले भात ॥ तो तुम ह म दोनोंसुखा । होते अवी देवात ॥२॥ यह दिखताहे सन्मुखे । वन वृक्ष भरा सुखकार ।।तु म जा रहो इसके विपे । जहां तक हम पर भार ॥३॥ पुण्य प्रकट मिलो आसके । भोगवे गे सब सुखासुख उपाव और इस विना । देखाता नहीं शुक ॥४॥ सुन वचन यों भूपके । तोता नयनाश्रुत होय ॥ गद २ वयण तव ऊचरे । बूरा है जगमें विछोह ॥५॥६॥दा ला १०वी।। अपाद भूती अणगार यह०॥ देख सूवेके यह हाल । कहने लगे नृपाल । २८ सुण पोपट प्यारा । ज्ञानी होकर यह क्या करोरे ॥१॥ तूं मुझ जीवन प्राण । पण युक्त इस ाण । सुण पोपट प्यारा । मुझ तूंतो जाने खरोरे ॥ २॥ रुदन्त शुक तव के । जाणू वामी को सत्य एया ॥ सुणो सूरा राजा । पण दुःख मे छोडे जावै नहींजी ॥ ३ ।। जो सेवक दुःख माय । श्वामीको तज जाय ॥ सुणो सूरा राजा ॥ नीमक हरा सो सहीजी ॥ ४॥ वीर कहे इस ठाम । जाते शंका न पाम ॥ सुणो पो०॥ न जा आज्ञा भङ्ग कहीनी ॥ ५॥ शुक निरुत्तर होय । सूजे उपाव न कोय ॥ सुणो सू ग०॥ पग प्रणमी गगने चलाजी ॥ ६ ॥ खंग में संग ऊभारेह । वर्पावे नयने मेह ।। सु णो सूरा ॥ भक्ति भाव छत्ता दाखवे जी ॥७॥ भूप नयनाश्रुत होय । जाने समक्षा करे सोय ।। सुणो पोपट ॥ चला शीघ्र वो वहां थकीजी ॥ ८ ॥ कुसुम श्री पास आय । ऊभा गगन मे रहाय ॥ सुणो श्रोताजन हो ॥ अक्रन्द सुना अति आकराजी ॥९॥ शीघ्र उतर दिग आय । प्रण मे राणी के पाप । सुणो श्याणी बाइ । राजानी मुझ राखे नहीं जी ॥ १०॥ कुसुम श्री तो न सुणे कान । लागा आर्त ध्यान । 'सुणो श्याणी रा गी । आशुं पूछे तस पॉख से जी ॥ ११ ॥ देख तोताःको पास । राणीजी पाइ विश्वा- स ॥ सुणो पो. ॥ मले आया इस अवसरे जी-॥ १२ ॥ लिया खोला में कर फेर । कहे १आकाश २ तोता खण्ड२ वी कु विश्वाशी टेरे । सुणो पोपट ॥ भाइ तूंछे ज्ञानी गुणी जी ॥१३ ।। मुझ पर पडपा ७.५ पूर । कब होवेगा यह दूर ॥ सुण पोपट ॥ के डूब मरु उंदधी विपेजी ॥ १४ ॥ सूडा क हे मिष्ट वाय । यह वचन मत वदो माय । सुणो शाणी राणी ॥ धैर्य धरीजे मन विपे- जी ॥ १५ ॥ देवी वचन करो याद । तज दो सब विषवाद ॥ सुण ॥ शा.॥ संकट पडे सतीयों परेजी ॥ १६ ॥ सोही खमे द्रढ रहाय । ते धन्य २ जग में कहाय ॥ सुण शा॥ याद करो जो सतीया हुइ जी ।। १७ ॥ सीता द्रौपदी जाण तारा । अंजण वखाण ॥ सुण शा. ॥ इत्यादि जाणो सहुजी ॥ १८ ॥ पाइ दुःख अपार । वियोग सहे वर्ष वार।। सुण शा० ॥ धैर्य से सुख पाइ बहुजी ॥ १९ ॥ तुम हो चतुर सुजाण ॥ चडती पडती जाण ।। सुण शा०॥ आते तजो साहस धरो, जी ॥ २० ॥ थोडेही दिनों के माय । मि सजन सुख आयु ।। सुण शा० ॥ सुख न रहा तो दुःख क्या रहे जी ॥ २१ ॥ गया अपना सुख । तैसेही जावेगा दुःख ॥ सुण शा० ॥ निश्चय यह देवी कहे जी ॥ २२ ॥ धर्म कर्म के माय । दी होगी अन्तराय ॥ सुण शा०॥ उस से यह विछोहा हुवा जी ॥ २३ ॥ शुभ ध्याने स्वल्प काल मांय । देवो अन्तराय खपाय ॥ सुण शा०॥ यह हित वाक्य मन धारीये जी.॥ २४ ॥ अमोल बोध उजमाल । कहा दशवी यह ढाल ॥ २९
सुगो श्रोताजन हो ॥ धारण कर सुख पाइये जी॥२५॥ * ॥ दोहा शुक बधि श्रवण
काही कुसुमा चित्त ॥ हांभाइ साची कही । कर्म गति ऐसी मित ॥ ॥ गत काले स
तीयो बहू भइ । द्रढ रही संकट मांय ॥ यह लक्ष विन्दू आज से । कर रक्खू में भाय ॥२॥
तैसेही सुख यश पावूगी । कर प्राण प्यारो शील ॥ सचा सूख उपाव यह । स्वीकारु वि-
न ढील ॥ ३॥ हित मित देवी तुम तणा । फळ से शीघ्र बचन ॥ जिस दिन श्वामी
भेटेगे । सो दिन होगा धन ॥ ४ ॥ यों अनेक कथा कथन । चलते सिन्धू पन्थ ॥ हि-
त वांछे एक एक का । सोही प्रेम की ग्रन्थ ॥ ५ ॥ॐ ॥ ढाल ११ वी ॥ वारीयां ३रे
॥ यह ॥ मानीये नानीये मानीयेरे । एक बचन शुक जी मेरा मानीये ॥ टेरे ॥ आगे
जाते देखे राणी । वन एक सूखस्थानीयेरे ॥ एक ॥ १॥ कहे शूक से सुन मुझा हित
वाणी । एक बात जची मेरे ध्यानीयेरे ॥ एक ॥२॥ सो माने तो तूं सुख पावे । मुझ म
न को भी सुख जानीयेरे ॥ एक ३॥ कीर कहे सो झट फरमावों । जो तुम हम हित
व्यानीयेरे ॥ एक ॥ ४ ॥ कुसुम कहे दिखे सामें बगीचा । वृक्ष फल भरे सुख स्थानीयेरे
॥ एक ॥ ५॥ तुझे सान पान स्थान इच्छित मिलेगा। जावोइ तुम इस स्थानीयेरे ॥
एक ॥ ६ ॥ जहां लग पुण्य हमारा प्रगटे । तहां लग रहो यह मकानीयेरे ॥ एक ॥७॥
वी कु पीछे हमो सुख सम्पति पावे । तब तुम आजो हम कानीयरे । एक ॥ ८॥ साथ हमारे दुःख भोगवे । येही अयुक्त पहचानीयरे ॥ एक ॥ ९॥ ऐसे बचन सुन पोपट की आँ खो । तत्क्षीण भरागइ पानीयरे ॥ एक ॥ १० ॥ गद • कण्ठे कहे अहो वाई । क्यों मु- झसे भये है रानीयेरे । एक ॥ १ ॥ प्रथम नरेश्वर मुझको निकाला । ताते आयो तुम कानीयेरे । एक ॥२॥ बाल पने से तूम हम स्नेही । सो प्रीति कैसे नशानीयरे ॥ एक ॥ १३ ॥ संकट समय नहीं छोडके जावू । पाप लगे असमानीयेरे ।। एक ॥ १४ ॥ देवो धके तोभी नहीं जावू । बालपरे हठानीयरे॥ एक ॥ १५ ॥ राणी'उठाइ तस कण्ट लगायो । विश्वासी कहे मधुवानीयेरे ॥ एक ॥ १६ ॥ आज्ञा से जाते पाप न लागे। आगे के हित परमाणायेरे ॥ एक ॥ १७ ॥ जीवते रहे तो फिर सब मिलेंगे। सुक माल तन तुझ जानीयेरे ॥ एक ॥१८॥ हमारे बान्धे हमही भोगवें । तूं क्या हिस्सा बटानीयरे ॥ एक॥ ११ ॥ वश ज्यादा अब हट नहीं करना। उचित अवसरे वात तानी रे ॥ एक ॥२०॥ क्षीणी क विरह यह तो अब बीत जावे । फिर बहुत रहेंगे एक स्थानीयेरे ॥एक ॥२०॥ यो सुन-शु क निरुत्तर होइ । नमी उडा असमानीयेरे । एक ॥ २२॥ ऑखो नीर वर्षता जावै । जा रहा जाग मुख दानीयेरे।। एक ॥ २३ ॥ खावे पुष्प फळ रहे स्वेच्छा | अजपाजप दोनों ध्यानी- ३.
येरे ॥कए॥२४॥ खण्ड दूसरे ढाल एकाददश । ऋपिअमोल बखानीयेरेएक।।२५।।।ह- गीत ॥ छन्द दूसरे उल्लासे कर्म सम्माते तीनो की हकीगत कही। श्रीवीरसेण कुसुमश्री शु कपक्षी तीनो जुदाम्ही ॥ धन्नो अरु सुरराज कर अकाज सो कुगतलही ॥ तीनो पुण्य प्र ताप गमा सन्ताप पासे सुखसही ॥१॥ परम पुज्य श्री कहानजी ऋपिजी महाराज के सम्प्रदाय के बाल ब्रह्मचारी मुनिश्री अमोल ऋपिजी रचित वीरसेण कुसुमश्री चरित्र का कर्म प्रबन्ध नामे द्वितीय खण्ड समाप्तम् ।।दोहा।। स्वयं स्वरुप परमात्मा । अनन्त अक्षय अव्या बाथ ॥ ध्यान धरत परमेश्वरका। पावत सुख समाध ॥१॥ त्रिकरण त्रियोग से । जोशुद्ध पाले शील ॥ सोही सन्त सती वरणवे।सूत्र व्याख्यान अखील।।२॥अनसंजोगे जगत में।बाजे सागी अनेक|संयोग नि श्वल रहै । सो कोट्यन मे एक ||३|| तासही एक प्रभाव से । कवी वाणी सोभाय || ३० पीछे हमो सुख सम्पति पावे । तब तुम आजो हम कानीयरे | एक ॥ ८॥ साथ हमारे यी कुतूं दुःख भोगवे । येही अयुक्त पहचानीयेरे ॥ एक ॥ ९ ॥ ऐसे वचन सुन पोपट की आँ । तत्क्षीण भरागइ पानायरे ॥ एक ॥ १० ॥ गद • कण्ठे कहे अहो वाई । क्यों मु- झ से भये है रानीयेरे ॥ एक ॥ ११ ॥ प्रथम नरेश्वर मुझको निकाला । ताते आयो तुम कानीयरे ॥ एक ॥ १२ ॥ बाल पने से तूम हम स्नेही । सो प्रीति कैसे नशानायरे ॥ एक ॥ १३ ॥ संकट समय नहीं छोडके जावू । पाप लगे असमानीयेरे ॥ एक ॥ १४ ॥ देवो धक्के तोभी नहीं जावू । वालपरे हठानीयरे ॥ एक ॥ १५ ॥ राणी उठाइ तस कण्ट लगायो । विश्वासी कहे मधुवानीयेरे ॥ एक ॥ १६ ॥ आज्ञा से जाते पाप न लागे। आगे के हित परमाणीयेरे ॥ एक ॥ १७ ॥ जीवते रहे तो फिर सव मिलेंगे। सुक माल तन तुझ जानीयेरे । एक ॥ १८॥ हमारे वान्थे हमही भोगवें । तूं क्या हिस्सा बटानीयेरे ॥ एक ॥ १९ ॥ वश ज्यादा अब हट नहीं करना। उचित अवसरे वात तानी रे ॥ एक ॥२०॥ क्षीणी क विरह यह तो अब बीत जावे । फिर बहुत रहेंगे एक स्थानीयरे ॥एक ॥२१॥ यों सुन.शु क निरुत्तर होइ । नमी उडा असमानीयेरे।। एक ॥ २२ ॥ ऑखो नीर वर्षता जावै । जा रहा जाग सुख दानीयेरे ॥ एक ॥ २३ ॥ खावे पुष्प फळ रहे स्वेच्छा | अजपाजप दोनों ध्यानी- ॥कए।॥२४॥ खण्ड दूसरे ढाल एकाददश । ऋपिअमोल बखानीयरेएक॥२५॥ॐ॥ह- संगीत ।। छन्द दूसरें उल्लासे कर्म सम्माते तीनो की हकीगत कही। श्रीवीरसेण कुसुमश्री शु कपक्षी तीनो जुदाग्ही ॥ धन्नो अरु सुरराज कर अकाज सो कुगतलही । तीनो पुण्य प्र ताप गमा सन्ताप पासे सुखसही ॥१॥ परम पुज्य श्री कहानजी ऋपिजी महाराज के सम्प्रदाय के बाल ब्रह्मचारी मुनिश्री अमोल ऋपिजी रचित वीरस्रेण कुसुमश्री चरित्र का कर्म प्रबन्ध नामे दितीय खण्ड समाप्तम् 1090 TARA * AR ॥दोहा।। स्वयं स्वरुप परमात्मा । अनन्त अक्षय अव्या बाध ॥ ध्यान धरत परमेश्वरका। पावत सुख समाध ॥१॥ त्रिकरण त्रियोग से । जोशुद्ध पाले शाल ॥ सोही सन्त सती वरणवे।सूत्र व्याख्यान अखील||२||अनसंजोगे जगत मे।वाजे त्यागी अनेक॥संयोग नि चल रहे । सो कोख्यन मे एक ॥३॥ तासही एक प्रभाव से । कवी वाणी सोभाय ।।
खण्ड ३ ३१ सद पुराण कुराणमे । ता के गुण बखाणाय ॥४॥ शील सुरंगी महा सती। कुमुमश्री वीरना। र ॥ कोविद शुक के सहाय से । विशुद्ध शीलर खासार ॥५॥ जगपत्नीके सदन रहे ।नं. रपत पत्नी जहार ॥ ठगेनरोंसा नठगी | शुकवाद्ध उपचारा|सत्य शील बुद्धि कला । सरस रस भर खण्ड ।। सुणीयों श्रोता दत्त चित्त । रसीये रस अखण्ड ॥७॥ शुक गये त दन्तरे । कुसुमा धैर्यढ़ धार ॥ क्षत्री अश्वारुढ ज्यों । हुइ पटीये असवार ॥८॥ निश्चय हो हे तव पर धरी । पवन जोग चली जाय ।। आगे होतव तेकथु । जोराणीजी पाय ॥९॥ ढाल|श्ली। चेतनजी वारणे मत जावोजी ॥यह०॥ सुणो कर्मों तणी गति भाइजीपू रे भुक्तेही सुख पाई ॥सुणो।टेर। शुक उपदेश मन मे ध्यावेरे । उससे दुःख मन में न वेदावरे ॥ ज्ञान ध्याने दुःख अल्प लखावे ॥सुणो॥१॥ जो होणा होवे सो थासीरे । पण सुख तोपीछा आसीरे । यो धैर्य लावे विमासी ॥सुणो॥२॥ पाणीका लोटमहा आवेरे।जि ससे पीया गगन चडजावरे । तब मन ने धेसत थावे ॥सुणो॥३॥ लोट गये पाटीया नी चे आवेर । जाणे पाताल में धस जावरे । अब डूबी यों घबरावे ।।सुणो॥४॥ क्षारा पाणी अंग को लागेरे । जिससे फटी चमडी पडे दागरे । ऊपर परणी लगे ज्यों आग||सुणो॥५ जल चरजीव मच्छ कच्छ मोटारे । सो पटिये कोदेवे दोटारे । डरे पेटमें उपजे गोटा ॥सुणो २८
जो
यम
नर्क
कुम्भी
पचावरे
।
पूराकृत
पाप
भुक्तावर
।
तैस
राणी
तहाँ
दुःख
पावे
॥सुणो
.
॥६॥जाने अब पटीया छूटजावेरेराअथवा मगर मच्छ गटकावेरे। कैसे देवी बचन खाली जा
वे ॥सुणो।जायो दुःख केइ सिन्धु उपजातारे । क्षुधा तृपाशीत तणतारेतापा घात से चू
चूक आगे जाता ॥सुणो॥८॥ यों भमर मे पटिया सिधायारे । चक्री जो गमन फिरा
यारे । राणी का भान भूलाया ॥सुणो॥९॥ जैसे तन तज जीव सिधावरे । तैसे राणीकर
पटिया जावेरे । कर्म ऊपरा ऊपरी सतावे ॥सुणो॥१०॥ छूटा पटिया डूबीजल माहीरे ।
शुद्ध बुद्ध सबही विसराइरे। एक मगर गया गटकाई ॥सुणो।।११॥ देखो श्रोता भव्य तव्य
रचनारे। कैसे धार्या होवे कैसे बचनारे । यो जान जगमे न पचना ॥सुणो॥१२॥ जैसे न
के की कुम्भी मांइरे । उपजे कोइ नेरीया आइरे । तैसे कुसुमा मकै उदर रहाई ।सुणो।१३ मगर
॥१४॥ सुकमाल तन आति उसकारे । स्वपन मे न देखा दुःख किसकारे । देखो हाल अ
सब विसका मुणो॥१५॥ जठारामि उष्णता भगिरे । वायु अन्दर न जावे लगगिरे।
द्धि मे रही घबरारी ॥मुणो॥ १६ ॥ आयुवल जिनका पूरारे । उसेमारे कौन अदूरा
भोगवे कर्म रक रुशूरा ॥सुणो॥१७॥ कर्म करते तो लगते मीठे । पण भोगवते वडे चा-
ठेरे । नृपत तनुजा के हाल दीठे ।।सुणो॥१८॥ सुसर पेट वजन हुवा भगिरे । जिससे ति
( दाम ॥ गरीवतो लेसके नहीं । लेवे जस दाम हराम ॥५॥ढालशरी ॥ भूडारे भू । खण्ड वी कु रने की शक्ति हरािरे । ते तो पच्न न होवे लगारी ॥सुणो॥१९॥ घबराकर कण्ठ सोआ यारे । ऊदर पीडा से रहा घबरायारे । कीचडमें तन फसाया ।।सुणो॥२०॥ तृतिये खण्डप थम ढालोरे । दाखी अमोल कर्मकी चालरी । सुणीश्रोता दया धर्म पालो ॥सुणो॥२१॥ दोहा॥ उस अवसर एक धावरा । मच्छीयो धरने काम ॥ आया सिन्धू कण्ठसो । देखा स्वल्प जल ठाम ॥१॥ मकरसो दृष्टिण्डा । फसा कीचड मांय ॥ हर्षाया अति मन में । जोरंक निधान पाय ॥२॥ पूंछ पकड तस खेंचकर । कहाडा पद्धके बहार ॥ जालमें धरे सिरले चला ॥ पावूगा द्रव्य अपार ॥३॥ तहां से थोडेही दूरपर । था एक श्रीपुर सेहर ॥ इच्छित मूल्य वहाँ पावूगा । ले आयाविन देर ॥४॥ वेंचन ऊभा बजार में । मांगे व २ कादव ख अभागणी ॥यह॥ श्रीपुर नगर माहें वसे । पुप्फा गणिका धनवन्त लालरे ॥ जोवन रङ्ग मदमे छकी । रुपकला गुण सोहन्त लालरे ॥श्री॥१॥ मुग्धा मुग्धने मुग्ध कर । ठगी या हॉस्य विलास लालरे । द्रव्य बहूत संग्रह किया । वो कैसे सुकृत खरचास लालरे ।श्री ॥२॥ मांस भखे मदिराछ के । जूवाखेले पाप पूरलालरे ॥ मनुष्यमारे विश्वासदे । ऐसा वै हीनेहली। निपजाने को आहार ललरो दासी H ०दव्या व्यंजन लेने बजार मे । गइ नाणा लेके लार लालरे ॥ श्री ॥ ४ ॥ बडा मकर देख पू-मगर तरकारी छती। उम ने कहा जो मोल लालरे । सो खुशी से तस अर्प के । लाइ गणिका ओल लालरे ॥ श्री ।। ५ ॥ पुप्फा पेखा गौखसे । बहुत वजन दार मच्छ लालरे ॥ ठग शिरो मणी वेशीया । जाना लाइ कुछ लच्छ लालरे ॥श्री॥५॥ शीघ्र आइ दासी ढिगे । कहे लावो घरके मांय लालरे ॥ रसखा पाटके ऊपरे । तीक्षण छुरी मांगाय लालरे ॥श्री॥७॥ तब जलचर हालने लगा । गणिका को आया वैम लालरे ।। मृत्युक मीन केसेहला । है| इसमे कुछ हेम लालरे ॥श्री।।दा हात फेर तस उद्रपर । तो लगा उष्णस्पर्श लालरे ॥चतु हरिजली गइ से चीरीया । अन्दर न होकर्श लालरे ॥श्री॥९॥ निकलपडी तब मांयसे । जैसे द मानी मलकार लाल ॥ कामनीरुप अतुल्यासी । विस्मय पाइ अपार लालरे ॥श्री॥१९॥ गाङ्गी मनोहरु । लक्षण व्यंजन श्रेयकार लालरे ॥ नख शिख तन अवलोक के ॥ लक्ष्मी वी अनुहार लालरे ॥श्री॥११॥ हर्पिप्फा अति धणी । मूछित कुसुमा पेख लालरे ॥नि रा वाधे आसा वन्धि । देवावेगी द्रव्य विशेग्न लालरे ॥श्री।।१२।।गृही तस रुइके पेलंमें । सुख शेय्या सयन कराय लालरे॥ अनेक द्रव्य देवेद्य को । औपध उपचार चलाय लाल र ॥श्री॥१३॥ थोडे काले सावध हुई । चैतन्य शुद्धि आइ अंग लालरे ॥ योग्य मधुरव- चने करी । पुष्फा पछे धरे रंग लालरे ॥श्री॥१४बाइ तेरेदर्शन करी।हमपाये बहुत आ नन्द लालरे ॥ आकृतिसे ओलखाय है। तुम उत्तमकुल चन्द लालरे ॥श्री॥१५॥ पूर्वो पार्जित पुण्य से । तुम आये हम घर लालरे ॥ इच्छित सुख यहां भोगवो। नरखो कोई फि खण्ड ३ कर लालरे ॥श्री॥१६॥ योसुन शब्द पुप्फा तणा।वेम आया मन मांय लालरे । में आइ कहाँ यह कोन है । देखेदृष्टि फेलाय लालरे ||श्री॥१७॥ शृगारी सहू जायगा । शैयावि छायत चित्र लालरे ॥ अतर पुष्फ तंवोलादी । भोगीका स्थान विचित्र लालरे ॥श्री।।१८ १लक्ष्मी आश्चर्य पाइ अतिचित्तमें । यह स्थान ऊंच के नीच लालरे ॥श्रीबहूत पणहीरी नहीं। के लज्जा तरङ्ग ऊ दिल वीच लालरे ॥श्री॥१९॥ निश्चय कुछ होवे नहीं। पूछन्ति शरमाय लाई लरे ।। यह सचकहे के मिथ्या वदे । क्यों यह मुझ ललचाय लालरे ॥श्री॥२०॥ पूरी स- माधी हुव पीछे । प्रचुंगा सवही हाल लालरे । ऋपिअमोल सती सुखकी । कही, यह प्र- थम ढाल लालरे ॥श्री।।२१॥ॐ॥दोहा॥ सुख सातासव विधी हुइ । एकान्त अवसर देख ॥ ऊंच मिष्ट इष्ट वचन से । पूछे पुप्फासे असेख ॥१॥ वाइजी क्या तुम जातहै । कुलाचा र गोचार ॥ कृपा कर फरमाइये । ज्यों मुझ होवे आधार ॥२॥ पुष्फा वदे सुज्ञ पुत्रिका । भातार मौतम माव बिलसीये। विद्यापणान कभी आत॥३॥नि 12.2:- و لم سهل स नवल शृंगार सज। नित्य नवे भरतार॥ नित्य नवल भोजनवसन । काम नकाज ला २॥४॥ महान पुण्य तें सञ्चिये । जिससे पाइ यह कुल ॥ चिन्ता किञ्चित कीजीये ।सदा रहो फल ज्यो खुल ॥५॥ढाल शरी॥ थारो गयोरे जोबन पालो नहींआवे॥ यह।।य- ह वचन सतीके श्रवण पडीया ।जाणे कानके तो कीडा झडीया। अति२ मन में पस्तावे सती सत्य शील कभी नहीं गमावे॥१॥वदन कुमला कर ऊतरीया ॥औरनयनों में श्रु मरीया ॥ निश्वास न्हाखी कर्म ठोकावे ॥सती॥१|| अहो गर्भ मे सडके मे क्यों नहीं मरी । आडी क्योनी आइ ज्यों कटाती छरी । जन्मता काल मुझ क्योनी खावे ॥सती।। ३॥ पालणो हटतो तो भली थाती । भला होता शीतला वोदरी खाती । क्यों सुज्ञ नरको परणावे ॥सती॥४ज्यों अश्वशैय्या का हुवा हरण । त्यो मेरा क्यो नहीं हूवा-मरण व हां पशुभी क्यो नहीं मुझ भक्षावे।सती॥५॥जहाज डूवीतहां क्यो नहीं मसि पटिया छूटा वाहिर निसरी । मगर ऊदरे क्योनी गलावे ।सती॥६।। छुरी से काट ते क्यो नही छिदी औषधी ये देही क्यो नहीं मिदी । कैसे कर्म कठिण इस स्थान लावे ॥सतीजा स्वप्न मे देखा नहीं ऐसा ठाम । कभीन सुना यह रण्डा का नाम । यह अत्यन्त निन्द्य कर्मक हलावे ॥सती।।दाधिक ३ मुझ करणा भणी । क्या करी चोरी में कर्मों तणी । ऐसे नी अर यह क्यों यो करे दावे ॥सती ॥१८ ॥ शुद्ध आइ अरूण नेत्र किये । देखके सवज : पी च सदन मुझ पावे ॥सती॥९॥ अर २ अबमें कैसा करूं । कूवे पडूंके जेहर खाके मरू। तन मुझे नहीं सुहाके ॥सती॥१०॥ इसका नाम सुनतेही पापलगे । मुख देखेसञ्चित खण्ड ३ । पुण्य भगे। तो घरमे रहने से क्या कहवावे ||सती॥११॥ यों अनेक पश्चाताप करती। और सब दुःखों को विसरती-। अती सन्ताप से तन संताचे सती॥१२।। थर २ अङ्गज व थरराया। ऑस्खों मे चौधार पानी आया । शैय्या वस्त्र सब धुजावे । सती।१३।। गाण का देख आश्चर्य पाइ । मधुरी कहे क्या करे वाइ । मन मे होवसो क्योनी दर्शावै सती ॥२४॥ सती चिन्ते जो कहू मन आइ । तोयह कभी मानने नाहीं । वलत्कार व्रत मेरा भगाने सती।।१५।। इससे श्रेयमरण मुझ ताइ । व्रत रक्षण मरते दोष नाहीं । झरोखेजा इ तन अम्पावै ।।सती॥६॥ पुष्फ द्रढ पकड के रखी। खेंच के लेजावे घर मे पखी। भी- त से शिर तब अथडावे ॥सती॥२७॥ खाकर मुरछा पडी धरणी । सब अचंभे देख करखी न चौंक गये । यह क्या बलाय घर भरावे।।सती॥१९॥पुप्फ कहे सब लोको भणी । अवी यह है दुःख यति घणी । कोइ छोडो मत धारय दारावे सती।।२०।। सतीसे कहे तेरी पुरे । क्या हम उपकार ऐसे फेडावे ॥मती॥२१॥ मत जाने मच्छोदर से तुझे कहाडी । आराम किया औषध खवाडी । तूं मरके क्या कलङ्क चडाव ॥ सती,॥ २२ ॥ कोइ बलत्कार करे तेरे साथे । तो कोप कर तू उसके माथे । यो बहुत प्रकारे प्रचावे ॥ सती ॥ २३ ॥ लोभी कामी और अन्याइ । मतलब लिये क्षमा खाइ । यह देख सती जरा सुख पावे ॥ सती ॥ २४ ॥ यो सुण सुस्ताइ सती बैठी । दाल तीस री तीसरे खण्ड मीठी । अमोल सोही सत्य मे स्थिर रहावे ॥ सती ॥ २५॥ ॥ दोहा ॥धैर्य धरी सती चिन्तव।कठिण वणा यह काम।।न मरनान भगना होवे।रहना पडेगा इस धाम ॥२॥ खाये विन चालेही नहीं । मुझे करना शुद्ध अहार ॥ यहां हित शिक्षा देने मे कुछ नहीं निकले सार ॥ १|| मौन भूपण है मूर्ख का । दे ज्ञानी को सन्मान | जिस- ने जिह्वावश करी ॥ न होवे तस नुकशान ॥३॥ शुद्ध इच्छित अहार भोग कर । नित्य करे प्रमेष्टी ध्यान ॥ लाज रखो अबला तणी । शील सहायक भाग्यवान ॥५॥गाढाल ४थी। न्यालदे की देशी मे ॥ देखो द्रढ़ता सतीयों तणीजी कांई। रहकर गणिका द्वार ॥ सत्य शीलकी रक्षा करीजी । करी सुबुद्धि उपचार ॥ दखो॥१॥ एकदा वैश्या चिन्तवेजी काइ । देख सतीको होश्यार ॥ पूछू उत्पती जातडीजी । कैसे कियो मच्छ आहार ॥ दे- खो।।२॥ देखे सतीको आयकेजी कांइ । आर्त रहीसो ध्याय॥ हंसती सन्मुख बैठकेजी। R । ॥ . वी मधुरालाप बोलाय ॥देखो।।३।। सती मौन करी रही कांइ । तब पुप्फा यों केय । ऐसा न्हा हम क्या कियाजी। जोवयण उत्तर नहीं देय देखा॥४॥ तेरी चाकरी करी मुफतमे जी । हम दुनिा जीवत दान ॥ बोलणे सेही हलका हुवाजी । तूंरक्खे इतना गुमान ॥दे पण्ड ३ खो।।५॥ ओर कछु पूछे नहीं हम । उत्पति तेरी दाख ॥ तात स्वसुर पक्ष गाम कीजी । जात नाम ऋद्धि भाख देखो॥६॥ ऐसी बातों करतें थकेजी कांइ । नलगे तेरे को पा ५॥ धीठाइ किये कैसे चालसाजी । नहीं कोइ स्वजन मा वाप ॥देखो।।७॥ सती अति चिन्ता तूर हुइजी काइ । सोचे वचन उपाव ।। बोले विन चाले नहीं जी। पड़ी इस व- श में आय ॥देखो॥८॥ नरमी सती कहे साभलोजी बाइ । मत वदो खोटी जवान ।ओ र पूछो कहना सो कहूंजी । करं काम म्हारे समान ॥सती॥९॥ यों सुन बचन सती त- गजी काइ । पुष्फ अति हर्षाय ॥ अबतो नरम हुइ खरीजी । मुझ घर भरेगा कमाय ।।दे खे।॥१०॥ नायका कहे तेरीवाणी से जी मुझ उत्पन्न होवे अति प्यार ॥ तूंकहे सो सब ह म करेजी । कहे तुझ बीतक प्रकार देखो॥११॥ कुसुमा दीर्घ विचारीयो जी काइ । सा च कहे होवे दुःख ॥ कल्पित सत्य कुछ कही करीजी । करुं जो होवै मुझ सुख ॥देखो। १२।। माता में वसती वसन्त रेजी काइ । देवस्वरुप भरतार ।। वहाण चड चले विदेश मजा। करन काई व्यापार दिखाारा ताप रा राहाण यामेरे हाथ ॥ सोभी छूटा अशुभ उदयजी । तव मगर गटकात ॥देखो॥१४॥ आगे की कुछ शुद्ध नहीं जी । अब एक करु अरदास ॥ निकालो मुझ घर बाहिरेजी । करूं मुझ पति की तलास देखो।।१५।। कारमो दु.ख गणिका करीजी । काइ ऑखे लाइनीर ।। उ र चम्पी तस यों कहैजी । हाहा दुःख वडवीर ।। देखो।॥१६॥ मन मे जाने मला हुवाजी काइ । मरा होगा इस कन्त ॥ अब यह निवारस हुईजी । मुझ इच्छासो करन्त ॥देखो ॥ १७ ॥ प्रगट कहे घर छोड केरी बाई । कहा जावे पति के काज ॥ यहा दुखः है तुझे कौनसाजी कर मन मानी मजाजादेखो॥१८॥वसन्तपुर दूरा रहरि बाइ। कहा यह श्रीपुर शेहर ।। वे पति कैसे मिलेरी । कौन जाने तस खेर देखो।।१९।। ऐसेवयण सती सु- नीजी कांई । लागा जैसे तन तीर । परन्तु मन मारी रहीजी । पर वश्य पनेघर धारदे ख॥२०॥ पर मैष्टी ध्यान मौने धराजी भाइ । दाल चतुर्थी मांय ॥. अमोल सुबुद्धि आगे सूणोजी । किसविध शील बचाय ।।देखो॥२१॥दोहा।। फिर पुप्फा कर धर कहै । सु ण शाणी मेरीवात ॥ मदन रेखा तेरी बेन यह । मेरीहे अङ्ग जात ॥१॥ सर्व वैस्या सि शेहरो । रुप रम्भा साक्षात ॥ सब जग जन मोहित किये । सुर नर खगादि चहात ।।
खण्ड कु ३ २॥ दोस्ती कर ताके सङ्गे । और सब मूलपरिवार ॥ याद करो मेत कोइ दुःख । जो त ज गये भर तार ॥३॥ खावो मेवा माल को । झीणे जरी वस्त्र र ॥ भूषण सजरूमझुम पी.कु फिरो । लोरसीये चित्त फेर ॥४॥ ले लावा जोबन का । जो गया पीछां नहीं आय ॥ निकम्मी चिन्ता करी । यह अवसर म गमाय ॥५॥ढाल॥ क्षत्री कलङ्क के रागमें। सुन ऐसे वैश्या के बचन । धिक धिक धिक तुझेरी ॥ आग २ लगी सतीके तन । विक धिक० ॥१॥ रोशे कहे वश जादा मत बोल धिक।। तेरे बोलने से समझी तेरा तोल ॥ धिक०॥२॥ सवों से नीच तेरी जात ॥धिक।। नहीं शरमाती कर खोटी बात ॥धिका॥३॥ निन्द्य २ निद्य अति तेरा नाम ॥धिक॥ तूंतो सब जगत की गुलाम ॥धिक॥४॥ नहीं छोडे भगी भील चामार ॥धिक।। तेरी सगंति रमेहै गोवार ॥धिक॥५॥ निर्दयी तेरीहीया हे कठोर ॥धिक। मारे विन शास्त्र साहू चोर ॥६॥ मिथ्या बोलती जरान अचकाय धि क।। ।। रची दाव पेंच भोले को भरमाय ॥धिक॥७॥ चोरे हाथ में लगे जो माल ॥धिक ॥ तूं लगी जिसके लगा काल ॥धिका॥ सेवे वाप बेटे नरतें अनेक ॥ धिक।। तो भी तृत्पिन धरे क्षाण एक ॥ धिक।।९॥ तंतो करे फक्त पंसेका प्यार ॥धिक। खोस लेती मा; मरे मतलब दे प्यारे को निज निमटा कलता तेरी चाल || धिक ॥ ११ ॥ रूप जोबन मद म रह छक ॥ धिक ॥ आफू फूले जों का । श्वामी भक विक|१२|| कूड कपट की थेली अति गुढ धिक। ठगे है तेने शाणे रु मुढ ॥ धिक ॥ १३।। जगत भोगे तो न तृप्ति पाय ॥ धिक ।। ज्यादा देवे सो कन्त ते- रा थाय ॥ धिक ॥ १४ ॥ नीच कुरूप कुष्टि खोटा नर ॥ धिक ॥ ताको नाथ कर देवे जो जर ॥शिक ॥ १५॥ ब्रह्मचारी सती सन्त जग जोह ॥ धिक ॥ धरे से द्रोह ॥ धिक ॥ १६ ॥ जो फसे तेरे फन्द में आय ॥धिक ॥ लगी उस घट घरमै लाय ॥ धिक ॥ १७ ॥ जो तेरे दुर्गुण को वताय ॥ धिक ॥ तास शिर कलङ्क तूं गय ॥धिक ॥ १८ ॥ इत उत जुगली तूं खाय ।। पिक ।। तुझे पोपे उस को तूं लडाय ॥शिक ॥ १९ ॥ पर निन्दा मे विगोवे अवतार । धिक ॥ गये निन्दे करे आते से प्यार ॥ धिक ॥ २० ॥ क्षीण खुश क्षीण उदास रहे मन ॥ धिक ॥ लूंटा चहावे सब ज़ गत् का धन ॥ धिक ॥ ॥ मन चीठी मीठी ऊपर सेरेय ॥ धिक ॥ तेरी कला का कौन पावे छेय ॥ धिक ॥ २२ ॥ यह मिथ्यात से भरा तेरा तन ॥ धिक ॥ तेरे पापी जग में न अन्य ॥ धिक २३ ॥ ऐसे अष्ट दश पाप में तूं पूर । धिक कहीं तक कयूँ तेरा नूर ॥ धिक ॥ २४ ॥ एक नर को ऑखों से समजाय ॥ धिक ॥ 16.
वी कु खण्ड ३ एक शेन कर घर में बोलाय ॥ धिक ।। २५ ॥ एक को देखावे गुप्त अङ्ग ॥ धिक ॥ एक साथ करे मेज मे भदंग, ।। धिक ॥ २६ ॥ दीप शिखा जैसी तेरी काय । धिक ॥ होमे कामी तन धन, पतंग, आय ॥ धिक ॥ २७ ॥ सड कर मरे केइ तेरे जार ॥ धिक। दोनो लोक से करे तूं क्षवार ॥ धिक ॥ २८ ॥ ऐसे तेरे दुर्गुणों का न पार ॥ धिक ॥ कहांतक देना तुझ धिक्कार ॥ धिक ॥ २९ ॥,कहा तेरे को में पहले समझाय ॥ धिक ।। निकालना-नहीं खोटी कभी वाय ।। धिक ।। ३० । । कर, काला मुख् यहां से अब ॥ कि ॥ फिर बताना न वदन यह कब ।। धिक ॥ ३१ ॥ यों सती कहे कूसती सवाल ॥ धिक ॥ अमोल कहीं वैराग्य गमनी को ढाल || धिक ॥ ३२ ॥ * ॥ दोहा।। सती वचन पुप्फा सुनी । अंग २ प्रगटी झाल ॥ भडकी वन्हि घृत ज्यों । करी वदन विकराल ॥ १ ॥ रहे २ सती सौभाग्यनी । जाने तेरे हाल ॥ नहीं दे है उत्तम कुल तणी है नीच कोइ चण्डाल ॥ २॥ विना कागकी घोडली । बोले आल पम्याल ॥ जो तूं सती खरी । तो दे दमडा डाल ॥ ३॥ मोल लइ साजी करी । कर औपध उपचार । खान पान वस्त्रादिके । किये ते मेरे क्षवा ॥ ४ ॥ नहीं तो चुप बैठी रही। बन्ध तन पा रन पाल, || कहा करे जो हम तणा। तो तुझे भले है हाल ॥ ५॥ ॥ दाल ६ठी।।
धीज करेसीता सतारेलाल। यह.।।धीरज स काज सम्पजरे लाल। उतावल हायविनाश हा| सुजाण सती धीरज वस्तु सुख दाय हैरेलाल रखधीरज विश्वाश होसुजणसती ॥धीरज॥१॥ बचन सुगीयो पुष्का तणारेलाला सतीगइ मुरझाय हो सुजाणं सती ।उत्तर कुछ देसकी नहीरे लालाचिन्ता पेशामन माय होसू ॥ रिजा२।। बातसची पुप्फा तणारेलालामेंने खाया इसका धन हो सु०॥ अन्नवस्त्रइस के भोगवूरे लालाजीवित रखाइस ने तन हो सुधीरज ||३|सेवा मुझ साधी अतिरे लाल ॥ खमे दो वक्त कु बोल हो सु०।। तो भी यह नम्र होरहेरे ला ल। यह गुण इस के अमोल हो सु०॥ धीरज ॥ ४॥ शील कदापि खण्डू नहारे लाल । जो कभी जावै प्राण हो सु॥ शील विना इस जगत मेरे लाल । जीवित पशु प्रमाण सु॥ धीरज ॥ ५॥ ऋण इसका फेडने भणारे लाल । फूटी कोडीन मुझ पास हो सु०॥ केसे यहछोडे दियाविनारेलाल। जोमेनपूर्वं आस हो सु०॥ रिजा।।।मरने कीचिन्तामु शे नहीरेलालापण केसे रखूपतिव्रतोस।।खाडकूव वीच आफसी रेलालामुजसेनहो वेअकृतहो सुधिरणामात तात पर भव वसेरेलाल पति छोड गये निराधार होसुहाधिक मेरे खोटें का मकोरे लाल ! किसका न.जरा आधर हो सु०॥ धीरज ॥ ८॥ उपाय कुछ सूजे नहीरे लाल । दुःख से गइ घवराय हो सु०॥ हृदय दुःख मावे नहींरे लाल । उपर आयो ऊभ राय हों सु० ॥ धीरज ।। ९ ॥ किलकारी दे रोइ पडारे लाल । करे अक्रन्द अपार होसु०. महिदाकाशे को नहींरे लाल । उसेयों लगा उसवार हो सु०॥ धीरज ॥ १०॥ दुःखणी खण्ड वहूत इस विश्वमेरे लाल । परन्तु मुझसीन और हो सु० ॥ हीन से हीन पुण्यणी हुइरेला ल। हाहा कर्म कठोररे सु० ॥ धीरज ॥ ११ ॥ ऐसा विलाप उसका देखकरे लाल । कर घर कहे पुष्फा तासरे स० ।। रोयां से राज मिले नहींरे लाल । शाणी हो बनी बेंडासरे सु० ॥॥१२॥ क्या है तेरे मन में रेलाल । कहदे साची बात हो सु० ॥ कर्जा चुकाये विन महारा रेलाल । छुटक कभी नहीं थातरे सुगावी॥१३॥ सती चिन्तवे पति सुखकारे लाल । जहां तक खवर न पाय हो सु० ॥ वहां लग यहांही रहणा पडेरे लाल। रक्वं ल करी को उपाय हो सु० ॥धी॥१४॥ देवीने कहाथा थोडे मांस मेरे लाल । संकटहो वेगा दूरहो सु० ॥ उसमें कितनेक तो निकलगयेरे लाल ! रहे सो खपाचूहो शूरहो सु०॥ थ॥१५॥ यो चिन्त वत वाद्ध केलवीरे लाल। कल्पिवात बनाय हो सु०॥शील रक्षण स्व जन भेटनेरे लाल । कहे तव सुणो मेरी माय हो सु० ॥ी।।१६॥ में तो दुःख से बली अ तोरे लाल । न रहे बोलने की शुद्ध हो मुलगा अचूट उपगार तुमारडोरे लाल । ते फेडन न उपजे बुद्ध हो स० ॥॥१७॥ जीवित दान तुमही दियोरे लाल । निरोगी करी मुझ ३८ कायहो सु०॥ द्रव्य खरच बहू तुम कियोरे लाल । कहां लग गुण कथु गाय हा ॥ ॥धी॥१०॥ मे तो पूरी अभाग्यणारे लाला कोडी सत्तान मुझ पासहो सु.॥ भोजन वस्त्र भोगू तुम तणारे लाला कर्ज कैसे फिटे फिकर खास हो सु. ॥धी॥१९॥ जो कूकर्म तुम दा खवारे लाल । सो मुझ से न कराय हो सु. ॥ क्योंकि कुल रीती हम तणीरे लाल। अ- वी करी हम नाय हो सुणाज माता ॥धी॥२॥ इतनो कही चुपकी रही रे लाल । तीस- खण्ड पट दाल हो सुजाण सती ॥ अमोल उपाव हाथे लगारे लाल । सुन वैश्या खु- भोशी थाय हो सुजाण सती ॥ धीरज ॥२१॥दोहा॥ नायका तब हंसकर वदे । मली क- तुम बात ॥ जो हे रीती तेरे कुलतणी । सो पाहले करो जीत ॥ १॥ उपाय मेरा जहां लगे। चलेगा उस माय ॥ तहा लग संव पूरा करुं । फिर मानना मेरी वाय ।।२।। कुसु मीश्री कहे सुणीजीये । हम घर कुलकी रीत ॥ पती वियोगी जो हुवे । नकर परसे प्रि- ॥३॥ विहरणी पट मासतक । रहकर एकान्त स्थान ॥ चुगा डाले पक्षीयों भणी । ना- विधका धान ॥४॥ जो याचक प्रदेशसे । दुःखी निराधार आय ॥ अन वस्त्र तस वेि । यह मुझ से कैसे थाये ॥५॥ढाल७वी।। बंधव बौल मानो हो ।यह।। सुणके बच न सती तणा । वैश्या हर्षाइ हो।तेरे कुल कीरीति सबी । पूरी हम करें बाइ हो ।। भवि पुर्व वी कु ह खण्ड ३ शील सुख दाइ हो ॥१॥ प्रभु कृपा हम घर विष कमी कछु नाहीं हो ॥ न्हाखो चु पक्षी मणी । पोपो पन्थीके ताइ हो ॥॥२॥ फिरतो कहेण करो माहेरी । सच्ची कहो मुझ ताइ हो । सती कहे फिर मेरे भणी । जागा अन्य न देखाइ हो ॥भ॥३॥ यों सुण चन कुटुम्बनी । अति आनन्द पाइ हो ॥ कहे मुझ बल्लम तेरे विना । नही अन्य से सगाइ हो ॥म॥४॥ सप्त मजल हवेली सती भणी । दीनी रहने के ताइ हो । चानणीब डी तस ऊपरे । नीच शाळ सो हाइहो ।म॥५॥ नव रङ्ग नवो भलकी रह्यो । चित्रादि शो भाइ ॥ सयना सन भूषण वस्त्र । दीना जो चहाइ हो ।म।।६॥ दास दासी रखीयेब हु। जो लुच्चा सोदाइ हो । सती पहोंचाइ ता विषे । सती देख हाइ म७ि॥ इस ज गह मे रहकरी । करुंगा चिन्त्याइ हो । मिलावु पतिरु तोता भणी । रखी व्रत द्रढताइ हो माद॥ यथा इच्छित धर्म तप करी । रही तन को सुकाइ हो ॥ दोपहरे दासी दास कों । धर्म कथा सुणाइ हो ॥म॥९॥ सत्य शील तप दान की। महिमा दरशाइ हो ॥ दास दासी धर्मीहुवे । रहे हुकम के माही हो ॥ भा॥१०॥ तास सहाय अन्य पुरूप के । नहीं आवे निगाइ हो । दुःख मे आधार हुवा जरा । शीले सव सम थाइ हो ॥ भ॥ ११ ॥ शाल स्थापन करी- अन्न वस्त्र भराइ हो।। मागे सोदे विदेशी को। कीर्ति फेलाइ . । भ॥ १२ ॥ दूर देशान्तरों रहे । समण माहण आइ हा । उस रहा २५ पस जो पति गति पाइ हो ॥ भ ॥ १३ ॥ कोइ सुभाग्य मेरे नाथ की । शुद्धदेवे लगाइहो ॥ योग्य समचार पुछा करी।विदाकरे तस ताइहो।।म।।१४॥ऊंच आकाशी के विपे।अनज आदि जो पाइहो ।तेसा पक्षी भक्ष बहु ।देवे पथराइहो।भ॥१५॥अङ्ग अच्छादि एकन्त र ही । पेखे दृष्टि जमाइ हो । मणी चूड़ शुक आवे इहा । तो होवे सखाइ हो ॥भ। १० ॥ १ पक्षी - निज २ भक्ष अवलोक के । बहु विहंग आर हो ॥ चीडी कमेडी कागला । कोंचने कावराइ हो भ॥१७ ॥ चकवा चास चण्डूल चील । उ लोह कार हो । देवी मलारी गणेसीया । इत्यादि बहुतार हो । भ ॥ १०॥ आवे खाये शन्छित वस्तु । बोले आपस मा हो । मनुष्य को दान देवे घणा । तामे कैसी नवाद हो । भ॥ १९ ॥ पशुरू पक्षी को पोपका । विरला जग माइ हो ॥धन्य सति भाग्य शालनी । पोपे हम तार हो ॥भा२०॥ विन अभिमान दे दान जो । फल बहुलो पार हो ॥ सती सुउपावे दाल सातगी। आगो लक गार हो भा॥२१॥दोहा ॥ शुक विहर दम्पति तणे । अतीही गगा कमलाग॥ स्थान मुखद पाया अति । तो भी तहाँ न सुहाय ॥ ॥ स्मरण अहो निशते रो । पेट पर के काम ॥ खाये मिले भावजि को ॥ जी तो मिले शाम ॥२॥ वन पुर में अमित
वी
खण्ड३
रे । शुद्ध कहीं नहीं पाय ॥ सुणे वातों नरं पक्षी की । कोइ खबर दे आय ॥३॥ दूर रहो वा
इकडा । सू सज्जन एक प्रेम ॥ नागर वेल के पत्र ज्यों । हरीत शुक्क रहे जेम ॥ ४॥ सजन
सोही जानाये । जो संकट करे सहाय ॥ वो सज्जन क्या काम के । सुख में आय दुःखे जाय
॥५॥ढालवी। राहेल्याहो आंबो मोरी रीयो॥यह.।। सत्य से सुसगंति मिले। बीछडी-
या हो मिले शील प्रसाद ॥ द्रदतासे निश्चय फले । रन्धेसे हो होवे भक्ष स्वाद ॥ सत्या।।
याचक भूचर खेचरू । दान तणी हो सुणकर प्रसंस्य । दिन २ बृद्धि हुइ घणी। व्यापी कार्ति
हो विश्वमें बहु अंश ॥ सत्य ॥ २॥ सकून बहुत निज बोली मे । आपस मे हो करे ऐसी.
वात ।। नव जुवति लज्जावति । पति विरहणी हो दिखती यह मात ॥ सत्य ॥ ३ ॥ उदा.
रता धन्य इसकी खरी।यों बोलत हो गगन मग जाय।। चूडामणी शुक ते समय । खवर का
रण हो तस लारेधाय ।। सत्य ।। ४ । सुन पर संशा सति तणी । चित चिन्तेहो यह कौनम
ति वन्त ॥ जो पोपे खग पशु मणी ! रखे होवे हो कुसुमश्री मुझ खन्त ।। सत्य।।५मुझ मि
लने के कारणे । पक्षी चुगावे हो कहाने समाचार । प्रथम शीघ्र देखू जायके । फलित होवेहो
मुझ सत्य विचार ॥ सत्य ॥ ६ ॥ अन्य पक्षीयोके पाछले । दे उत्तेजन हो तहा शीघ्र सो
आय।। खान पान विविध भात का। अवलोकी हो अति आश्चर्य पाय ॥मत्य ॥७॥
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1.कु... ध्याय ॥ सत्य ॥ १६ ।। कीर नीर नेणा भरी । कहे मात जी हो मुझ कहां से खबर ।। प, छोडा वन में मुझे। तब से पेखू हो नहीं पायो सबर ।। सत्य।। १७ यों सुनसा मु- ञ्छित भइ । शुक सावध हो करी मधुर उचार ॥ रुदन्ति कहे कैसों करूं । श्वामी विना खण्ड ३ -दुःख यह निवार ।। सत्य ॥ १८ ॥ शुक भाइ'आज ताइ मे । महा मुशीबत में रख शील रतनः ।।-गणी का सदन रेइ करी । रवी इज्जत हो मुझं व्रतं जतन ॥ सत्य, ॥ १९ ॥ मुझ कारण इण वेसीया । खर्च कीधो हो तन द्रव्यं अपार ।। कर्ज़ कैसे फेडी सकूँ। कैसे होवे हो महारो छूट कार ॥ सत्य ॥ २० ॥ पक्षी'चुगाइ तुझ भेटीयो । याचक' पोपे हो नहीं - भेटे श्वाम || कर्ज प्रति दिन बड रह्यो । करी कैसे हो हूँ अपंगा दाम. ॥ सत्य ॥ २१ ॥ पट महीना अभी बीतगे। तव-पुप्फा हो आमंत्रे अनाचार ।। नहीं माने बल गि से । यह करासी हो मुझ इज्जत खुवार ॥ सत्य ॥ २२॥ अब उत्तर देवण तणी। प्यारा. शुक जी-हो मुझ शक्ति नाय ।। मृत्यु होतो दिख माहेरो । सिर कर्जा हो विन मिले भरतार ॥ सत्य ॥.२३ ॥ हा दैव हे शक अहो प्रभू! इम विल बिल हो कुसुमा अं कुलाय-। शुक पण भेद समझो सह । पशु जाति हो करें केसो उपाय।। सत्य ।। २४" बुद्धि कोश सूडा कनः। होश पूरस हा सर्व सता का सार ।। ढाल वस्तू खण्ड तृतिये ऋपि अमोलक हो करे आगे विचार ।। संस ॥ २५ ॥ ॥ दोहा।। कीर सती पीर लायके । धीर घर कहे सुणो बात ॥ वीर अंगना होय के। योग्य नहीं विलापात ॥१॥ ज्यों इत ने दिन अति क्रमे।त्यों उल्लंघो कुछ दिन ॥ मिलेगे नृप सुखी होयगे । सुरीश ब्द चित्त चीन ॥ २ ॥ मुझ शक्तिसी सेवा करी । करूंगा दुःख निवार ।। दो-अपन सो अधिक । कर वतावूगा इस वार ॥ ३॥ यो सुन सेती धैर्यज धरा । सुवर्ण पिंजर, मं- गाय । तामे शुक जी स्थाप के । मनवोर मेवा जीमायः॥ ४॥ लाइ निजासन, मुखे। थाप पिञ्जर सुखे रेय || आधार दुःख में हुवा आति । जाणे बीते जेय ॥५॥ढाल९ वी।। इण सावरी यारी पाल ऊभी दोय रावली ॥ यह० ॥ सुक संजोगे सती,ताम | पाइ साता घणी ॥ हो सुजाण पाइ साता घणी ॥ अवसर अवलोकी कार'। अपनी दास्योभ णी हो सु०॥ अप॥ कुसुमश्री का चरित्र । यथार्थ सुणा चीया हो मु०॥ यथार्थ ॥ खे दाश्चर्य सहु होय । धन्य सती ने जणावीया। हो सु०॥ धन ॥१॥ जाणी माह भाग्य वन्त । नृपकी अङ्गजा हो सुकै।नृप० ॥ ऐसे चतुर पक्षी'जस दास । तो अन्य की क्या ४३ किससे क्यो, लजो हो सु. ॥१२॥ कहना पुप्फा को समजाय। कहा तेरा करूं होसु.॥क हा ॥ परन्तु तेरे देखत । लज्जा नहीं पर हरूं, हो सु. ॥ लज्जा॥ आप रहो सुखे घर ।इ यी कुच्छे तस भेजीजो । लेगा इच्छित द्रव्य । बताकर सेज जो हो सु. बत्ता॥ १३ ॥ मे र-खण्ड क्षक तुम शीलालील करो यहां रही हो सु.॥लील ऊपरन असके कोय । युक्ति ऐसी करूं स ही, होसु. ॥ युक्ति ऐसी सीखाय । शान्त सती को करी, हो सु. ॥ शान्त ॥ शुक वयणे विश्वास । सति हिम्मत धरी, हो सु. ॥ सति. ॥ १४ ॥ दूसरे दिन पुप्फा हर्ष । आकर क- हे तन सजो, हो सु. ॥ आ. ॥ उत्सुक है बहुत लोक । आवे उसको भजो, हो सु.॥आ. || मन मानालो । धन छबीली छेल छेतरी, हो सु.॥छ.॥हम कुल की देखो मोज । औ-: र कहां ऐसी सिरी, हो सु.॥ औ. ॥१५॥ सती कहे आप हुकम से । में कहां हूँ दूरी, हो सु. ।। इच्छे तस देवो भेज । हूं नाथ केह जूरी, हो सु. ॥ हूं ॥ परन्तु तुमारी शरम । मेरे टुटे नहीं, होसु. ॥ मेरे ॥ इस लिये आप इसस्थान । पीछे न आना फिरी, हो,॥ पी.।' । १६ ॥ धन से भरूं कोगरं । इच्छा पूरी करूं, हो सु.॥ इच्छा ।। यों सुन पुप्फा जाय। तूं कहे तैसे करूं तूंयह हुइ नवमी ढाल । अमोल अखण्ड तीसरे, हो सु. ॥ अ. ॥ सुणो शुक के पर्यन । शील रक्षा करे, हो मु.॥ शील. ॥१७॥॥ दोहा।। ता समय,एकव्य- वहारी यो। धन योबन मद मस्त ।। कह पुफा से मिलाइयं । दता * पुप्फा सदन बतावइ । सुख से पधारिये माय । सो आयो सती भवन में । दासाने दिया अटकाय ॥२॥ पूछ के आवं बाइ को । तहां लग रहो इसस्थान ॥दासी सती कोजा कहा । पुरुप आया धनवान ।।३ ॥ सती कहै शुक को पूछीये । वो कहे सो करो तुम ।। शुक से पूछे चेटी तवा वो करे एसा हुकम ।. ४ ॥ पूछो जाकर जार'को । देता सावसो दीनर ॥ जो देवतो सुख से । रहो रात की पेहर चार ॥ ५॥ किंककरी कामी से कहा। वो भी अति हर्षाय । दे सोनेये सवा पाचसो। शाम को आवो चलाय ॥ ६ ॥ खुशी हो सो घर गया। दासी सोनेया लेय ॥ दीना लाकर शुक भणी । अब सुणो शुक करे तेय ॥ ७ ॥ढाल १० वी ॥ जीवा वारूं छुरे महारा वालहा ।। यह ॥ सुणीयो बुद्धि चूडामणी-शुक की । कैसे ठगे कामी के ताइ जी ॥ अभीनव युक्ति रच करी । साधे का र्य चित्त लाइ ॥ सु ॥ १॥ पच्चीस मोर कने रखी । पाचसो दासी को देइजी ॥ कहे जा देवो पुष्फा भणी । तुर्त आपीछी कर येही ॥ सु॥२॥ दासीने तैसाही किया। पुप्फा अ- ति हाइजी ॥ इतना द्रव्य नित्य आयगा । फिर मुझ कमी कुछ नाहीं ॥सु ॥३॥शुक लाइ सव दासीयों । युक्ति ताम सीखावेजी ॥ नीचेकी चारों मजल में । रचना ऐसी र- । कु खण्ड चावे ॥ में ॥ ४॥ सहश्र पाक लक्ष पाक तेलको । पाठी मरदन मुख' कारोजी ॥ एक दीनार दो चातुर' नाविको यो । तामें प्रहर एक गुजारो ।। सुणो ॥ ५ ॥ दूजी मजल रसवती निपजावीये । मेवे मशाले खूब संस्कारोजी ॥जीमावो बीताको एक जाम को । कर मनवार नशा चखाडो । सुणो॥६॥ नवल नाटिक मजल तीसरी । रचो आश्च- र्थ भाव जणावोजी ।। रींजवो नृत्य कला करी । सुखे पहरे एक गमावो ॥ सुणो ॥७॥ सङ्गित सामग्री चाथी-मजल में । गान तान रागणीये लोभावोजी ॥ दिन कर प्रगट होव । कहो कामी को घर को सिधावो ॥ सुणो ॥ ८॥ यों युक्ति सिखाइ दास दासी को सर्व रचना दीनी जमवाइजी ॥ निज २ कामे सहु दक्ष किये । तामे दिनार बास खर चाइ ॥ सुणो ।। ९ ॥ पांच रक्खी घर खरचको । दान शाला पड्डी को चुगावेजी ॥ चौ- कस लागे जो वारकी । द्रव्य होवै वहां सर्व थावे ॥ सुणो ॥ १० ॥ शुक सुबुद्धि रचना- रची । ताकी सतीतो खबर नहीं पाइजी ॥ सा एकान्त रही. धर्मतप करे। धर्मध्यान रुपति चित्त ध्याइ ।। सुणो ॥ ११ ॥ अब कामी सो बाकी दिन रहा । बहूत मुशीबत से वीता याजी ।। श्याम होतेही सिणगद सजी । बनी बनडा सती सदन आया ॥ सुणो ॥ १२॥ पेसन्ते नाइ जी ऊठ कर । दे. सत्कार ऊंचे बेठायेजी ॥ प्रथम शुकनही मस्तक मूडीया । ४४ हाता आगे इच्छित कैसे पाय ॥ सुणो ।। १३ ।। तेल ऊगटणे मर्दते । शीत उप्पों दक से न्हवावेजी ।। वस्त्र भूपण ठाठ जमावते । सहज पेहर एक बीतावे.|| सुणो ॥ १४ ॥ ऊंचे चडतेही भट चट ऊठ के । करसत्कार पाटे बैठायाजी ।। रजत पाट थाल हेमकी । तामे रतन कटोरा जमाया ॥ सुणो ॥ १५ ॥ शाल पक्कान विविध भांती के । मेवें मशाले भरेइजी ।। अलग २.सो चखावते । एक जाम बातों में बीतेइ ॥ सुणो ॥ १६ ।। औष धी केफी अहार से । मद में मद मस्त बनाइ जी ॥ तीसरी मजल पहाँ चावीयो जाने मिलेगा मन चाइ ॥ सुणो ।। १७ ।। वारङ्गनाये घेरा तदा। बहुत हावे भाव दर्शाइजी॥ नाटिकारंभ विविध कीया । तामे गये कामीजी मोहाइ ॥ सुणो।। १८॥ लटक मटक क- र चटक से । एक प्रहर दीनी गमाइ जी ॥ अवही मिले प्राण बल्लभा । यों चौथी मज ले चडपाइ ।। सुणो ॥ १९॥ पोडश श्रृंगारे सिणगरी | तरुण सुन्दरी तस सत्कारी जी।। विठाया सुकुमाल सेज में । राग रागणी मधुर ललकारी ।। सुणो ॥ २०॥ तीनोश्वर सप्त- ताल से । सात ग्राम रागपट जाणोजी ॥ छत्तीस रागणीवाजिनसे। जाणे गगन गयोगर जाणो । सुणो ।। २१|| नशा वाजिन्त्ररु राग की । सम्बन्ध प्रेम अपारो जी। गाती सा जब चुप रहे । तव छेल कहे धर प्यारो ॥ सुणो ॥ २२ ॥ एक ध्रुपद और सुणाइये।
तृप्ति सो नहीं पावे जी ॥ एतले अरुण दिशा हूइ । गानतान सो वन्ध करावे ॥ सु ची.कु. , णो ॥ २३ ॥ कहे कामी से घर को पधारीये । सो चमकी देखे प्रकाशोजी ॥ कहे आ- ज निशी छोटी हुइ । वीती देखत क्षीणेक तमशो ॥ सुणो॥ २४ ॥ काम न हुवो मन चिन्ती यो । करे पस्तावो जायो न जावे जी ॥ किन्नरी कहे हम क्या करें । तुमे राग अ धिक सुहावे ॥ सुणो ॥ २५ ॥ हमतो गाती बन्ध हुइ । तूं मूर्ख चेत्या नाहीं जी ॥ चा *रो पेहर गमाये खल में । अब फिर आना न कदाइ ॥ सुणो ॥ २६ ॥ यों अपमानी तास निका लीया । धन गमा अति पस्तावेजी ॥ कहे अमोल ढाल दोपंचमी । यों शी ल सती को रक्षावे ॥ सुगो ॥ २७ ॥ * ॥ दोहा ॥ चिन्ते ठगाया वाणीया । जो करूं । सच्ची बात ॥ तो हंसे सर्व मेरे को । मूखों में प्रगटात ॥ १॥ और ठगावे मेरे जिसे । तोही मुझ रहे माम ॥ मिथ्या लवी ललचाय के । अन्य भेजूं इस धाम ॥ २॥ सन्मुख मिला आ दोस्त तव । पूछे कहो निशी वात ॥ ऑखों अरुण है तुम तणी । तासे जगे सब रात ॥ ३॥ इस अनुमान से जानते । भोगे सुख तुम पूर ॥ बात तो चीती की- ॥गा कगर क्या दामले। सो करे संग्रह हम ॥ जरूर ४५ .
जायंगे एक वक्त । जन्म सफल उस दम ॥ ५॥ ॥ ढाल ॥ ११ वी ॥ मिजवानी देशी ॥ भव्यजन सुणी ये हित आणी। हित आणी विपय दुःख दाणहो राज॥हितआ णी शील सुख खाणाहो राज ॥ भव्य ॥ ७ ॥ ठगा ठगाने दूसरे भणी । ते विवहारी मु ख मुल कानी होराज ॥ कहे हम मोजा निशीमे जोमानी । सो तो वचने न जाय वखा णीहो राज ।। भव्य ॥१॥ सा अपच्छरा महा मोहनी समानी। नहीं ता सम'नारी जा ग जाणीहो राज ॥,नाजुक लाजुक चन्द्रावदनी । देखी लाज पावे इन्द्राणी होराज ॥भ- व्य ॥ २॥ तीक्षण नयनी अमृत वयणी । रुपाली रु अति नखराली होराज । हाव भाव कटाक्ष विकासे । वस्त्र भूषण झाक झमाली होराज ।। भव्य ॥ ३ ॥ नागनवेणी मृ गानयनी । अरुणोष्टी लघुदन्ति होराज ॥ कचकी तगी पातली अङ्गी। विद्युत जैसी भ कन्ति होराज ॥ म ।। ४ ।। नमणी खमणी रु मन गमणी । रमणी के सुख अनन्त होराज ॥ कहां लग वरणूं मुख एक है । जाणे जोही भोगन्त होराजे ॥ भ.॥ ५॥ प- बीस पाचसो दीनी दीनारो । मुझ खट के सो. नही लगारो होराज ॥ परन्तु विरह दुःख अतिही साले । नहीं इस जन्म में होय विसारो होराज ॥भ ॥ ६॥ आज धामनी चा- .
। कु. र जामनी । वीती घटिका समानी होराज।। जो नर तास सङ्गत नहीं कीनी । तास ज- न्म जानो अप्रमानी होराज ॥ भ ॥ ७॥ जीवेंगे तो कमावेंगे बहुते । धनतो वि.३ हाथ का मेलो होराज ।। सफल जन्म हम आजही करीया । पेखी रजनी खेलो होराज र प्रहर भ ॥ ८॥ कारण एक गुप्त प्रकास्यू । सा एक नरको एक वारो होराज ।। भोगी देखे नहीं दूसरी वारो । अब मिलणी दुल्लभ प्रकारो होराज ॥ भ ॥ ९ ॥ इत्यादि खूब बातों बनाइ । सुण श्रोता देखन उमाइ होराज ॥ आपस में बहूत वारे बंध्धे । हूं आज जास्य तुं तो कल जाइ होराज ॥ भ ॥ १०॥ दूसरे दिन तैसे दूसरा आया । सवा पाचसो मो हर दरिया होराज ॥ चारोही पेहर तस तैसे विलमाया । देइ धक्का वाहिर कहढाया होरा ज॥ भ ।। ११ ॥ सों मी अति पस्ताया शरमाया । भेद पहिले का पाया होराज ॥र- खने माम. मुखको मलकाया । मिला मित्रोंको आयाहो राजाम॥१२॥ पहिले सभीअधिक वखाणी। सुन तीसरेकी इच्छा उमंगाणी होराजामहा परिश्रम कर भूख प्यास सहेमिलीकरीमोहर सोनानीहोराज।मि।।१३।। सो भी आया पस्ताके सिधाया। झूटीहीमाम जमायाहोराज ।। सुन घनाआया एक सिवाया। आनेन दे घरमाया होराजाभा॥१४॥ नित्य पांच सो मोहर कमाया तारा पत्तागा होगज| मनी वात कोइ नही प्रकाशे । रहे मनही मन मुरझायाहो
राज ॥भ ॥ १५ ॥ सती का करजा थोडेही दिनो मांइ । शुकजी कीना अदाइ होराज
देखके पुप्फा अति हर्षाइ । फिरे मेडक जैसी पोमाइ होराज ।। भ॥ १६॥ विश्वास आ-
यो हुयो मन चायो । रहेगा जन्म भर या इस गयोहो राज || प्रसङ्गानुपेत मिलास्युं भूप
यो मनोराज बने मन मायो होराज ।। म ॥ १७॥ सती तो रह मजल सातमी।
तप ध्यान ज्ञान माही होराज || जो जो रचना रची नीचे तोते । ताकी खबर न
काइ होराज || भ ॥ १८ ॥ चिन्ता तुरी मिलने को नाथ को । जव २ मन मुरझावे हो
राज ॥ तब २ शुक सुनावे हित वातों । यों सुखे काल गमावे होराज ॥ भ ॥ १९ ॥
पेखाये मव्यो हृदयके मांही। सती कुसुमश्रीकी पुण्याइ होराजाजो सदा द्रढ रही सत्य शी)
ल व्रतमे । तो चिन्तित फलेरु फलसाइ होराज || ॥ २०॥ यह तृतिय खण्ड सती
शील मण्डन । चरी कुसुमश्री की दशाइ होराज ॥ एकादश ढाल दासी अमोल ऋपि
आगे सुणो वीरसेण की पुण्याइ होराज ।। भ ॥ २१ ॥ ॥ खण्ड सारांश-हरीगीत छ
न्द ॥ तीसरे खण्डे शीलं सम्वन्धे कुसुमश्री की कही चरी । तज,मच्छोदर पुप्फागणिका
घर अखण्ड रही शील सत्य धरी । शुकै पसायं कर्जा फॅिटाय, । कामीकी कुबुद्धिः हरी।यों
शील पालो सुसन झालो । कहे अमोल वरो मुखसिरी ॥१॥
- र जामनी । वीती घटिका समानी होराज। जो नर तास सङ्गत नहीं कीनी । तास जः सन्म जानो अप्रमानी होराज ॥ भ ॥ ७॥ जीवेंगे तो कमायेंगे बहुते । धनतो ख.३ वी-कु हाथ का मेलो होराज ।। सफल जन्म हम आजही करीया । पेखी रजनी खेलो हाराज भार प्रहर ४६ ॥ भ ॥ ८ ॥ कारण एक गुप्त प्रकास्यू । सा एक नरको एक वारो होराज ।। भोगी देख में नहीं दूसरी वारो । अब मिलणा दुल्लभ प्रकारो होराज ॥ ॐ ॥ ९ ॥ इत्यादि खूब बातों ... ग श्रोता देखन उमाइ होराज ॥ आपस में बहूत वारे बंधे । हूं आज जास्य जाइ होराज ॥भ ॥ १०॥ दूसरे दिन तैसे दूसरा आया । सवा पाचसो मो। होराज ॥ चारोंही पेहर तस तैसे विलमाया । देइ धक्का वाहिर कहढाया होरा भ ॥ ११ ॥ सों भी अति पस्ताया शरमाया । भेद पहिले का पाया होराज ॥र- ६खने माम मुखको मलकाया । मिला मित्रोंको आयाहो राजाभ|१२शा पहिले सभीअधिक एणी। सुन तीसरेकी इच्छा उमंगाणीहोराजामहा परिश्रम कर भूख प्यास सहेमिलीकरी मोहर जाम॥१३॥ सो भी आया पस्ताके सिधाया। झूटीही माम जमायाहोराज ।। सुन सिवाया।आनेन देघरमाया होराजाभि॥१४॥ नित्य पांच सो मोहर कमाया प्याटोगज ॥ सच्ची वात कोई नही प्रकाशे । रहे मनही मन मुरझायाहो १६ राज ॥ भ॥ १५॥ सती का करजा थाइही दिनो मांई। शुकजी कीना अदाइ होराज, ॥ देखके पुष्फा अति हर्षाइ । फिरे मेडक जैसी पोमाइ होराज ॥मा। १६॥ विश्वास आ- हुयो मन चायो । रहेगा जन्म भर या इस गयोहो राज ॥ प्रसङ्गानुपेत मिलास्यु भूप । यो मनोराज बने मनमायो होराज ॥ भ ॥ १७॥ सती तो रह मजल सातमी । तप ध्यान ज्ञान माही होराज ।। जो जो रचना रची नीचे तोते । ताकी खबर न कांइ होराज ॥ भ ॥ १८ ॥ चिन्ता तुरी मिलने को नाथ को । जब २' मन मुरझाये हो मैं राज ॥ तब २ शुक् सुनावे हित वातों । यो सुखे काल गमाव होराज ॥ भ ॥ १९ ॥ पेखाये भव्यों हृदयके माही। सती कुसुमश्रीकी पुण्याइ होराज । जो सदा द्रढ रही सत्य शी ल व्रतमें । तो चिन्तित फलेरु फलसाइ होराज || भ ।। २० ॥ यह तृतिय खण्ड सती शील मण्डन । चरी कुसमश्री की दशाइ हाराज ॥ एकादश, दाल दासी अमोल ऋपि । आगै सुलो वीरसेण की पुण्याइ होरांज । भ॥ २१ ॥ 8 ॥ खण्ड सारांश-हरीगीत छ न्दै। तीसरे सपल सम्बन्धे कुसुमश्री की कही चरी । तन, मच्छोदर पुप्फा गणिका घर अखण्ड रही शील सत्य धरी । शुक पसाय कर्जा फिंटाय, । कामीकी कुबुद्धि हरीयों शील पालों सस झालो'। कहे अमोल वरो मुखसिरी ॥१॥ H । परम पूज्य श्री कहानजी ऋपिजी माहाराज की ,सम्प्रदाय के बाल ब्रह्मचारी मुनिश्री अमोलक ऋषिजी महाराज रचित "श्री वीरसेण कुसुमश्री चरित्र" का बुद्धि प्रवन्ध नामक तृतीय खण्ड समाप्तम् ॥३॥ ख.३. वी.कु. ४७ -- - ॥ ५॥हा नागिनती रुचो शरण पर्म ॥ शा दानादि चौ धर्म में । महा प्रभाविक शील ।। सन्त सतीयोआ राध के । पावे हे दोनो भवलील ॥ २॥ कुसुमश्री मोटी सती । कलङ्कित कुलरेय ॥ निकलाडूत हुइ शील से । हरा सभी का सन्देह ॥ ३ ॥ तैसेही वीरसेण सत्यवन्त । भये अम्बनिधी पार ॥ सुखी हुवे दम्पति मिली । वरणुं यही आधिकार ॥ ४ ॥ तदन्तर श्री चारनृप । पत्री शुक के वियोग ।। पवन वेग चले काष्टारुढ । धरते मन मे शोग ॥५॥ कहां जाता? कहां निकलता' । क्या होंगे आगे हालगाकहां प्रेमला? कहां सूभटा। कैसे निगमें काल' ॥ ६॥ क्षार जले तन फटगया । वायु शीत थरराय ॥ क्षुधासे तन सङ्को चीया । तृपा से कण्ठ सोपाय ॥७॥ जल कलोल से पटीया । क्षीण नभ क्षीण पाताल ॥ उलट होत क्षीणक में । जाने आपहोंचा काल ॥ ८।। दृढ गृहा कर पगतले । ताते न छुटा सोय ।। ऋद्धि परिवार सम्पति मिले । सुणियों श्रोतो 'सोय ॥ ९॥ ॥ ढाल १ ला ।। गोतम रासाकी देशीमें ॥ अयुष्य पुण्य प्रबल से। नृप दरीया की भरती के मां- य ।। छोलों से उछाले लेते । पडे किनारे पे आयजी ॥ अथडाने से मुरछायजी । छूटा पटिया पाणीमें वहायजी । वारकीचड में फस रहायजी. । शुद्ध बुद्धि रही कुछ नाय- २आकाश ।। जी ॥ १॥ भवी पुण्य प्रवले सुख पाइये ॥ आ ॥ सिन्धूतटे तह. भृगूपुराजी ॥ १प्रपच नगर था सुखकार ॥ वसुपत नामे विवहारीया । तहा रहता था नामदारजी ॥ वो शौचं ख.४ कारण उसवारजी । आया दरीयाव के किनारजी । देखे दिव्य स्वरूप कुमारजी ! पडाशु दी नहीं लगारंजी ॥ भवी ॥२॥ हृदय प्रेम जगा पुण्य.से । और कूरूणा धर्म पसाय ॥ आये ताढिग शेठजी । झवके से लिया उठायजी ॥ धोकर शुद्ध करी तस काय- उष्ण वस्त्र मे लपटायजी। किसी वाहण में सोलायजी। ले आये निज घर मायजी ।॥ ३॥ सुकुमाल सुखदाई सेजपर । सुलाये सुख माय । | राजवेद बोलाय के 'इच्छित द्रव्य दलिायजी । औषध उपचार करायजी । पथ्य तथ्य रखा सवायजी ॥ तासे मुरछा तस विरलायजी । जरा सावधानी जब आयजी ॥ वभी॥४॥दृष्टि वि- काश पेखनलगे। में कहा यहा आया चाल ॥ किसका सदनरू सेज यह । आंत मनो- हर महालजी ॥ कोन कोहे मेरी रखवालजी) देखे शेठजी साम तत्कालजी। शेठ मिष्ट व- यण करे स्वालजी । क्यों बन्धु साता हे हालजी ॥ भवा ॥५॥ उपकारी बृद्ध पेछाणीयेजी - डा बद्धिचन्त ॥ कहे तात आप पसाय से । हुइ होवेगा सुख शन्तजी ॥ सुण-वा .
मानन्तजी ।। भंवी ॥ ६॥ पूरीसुख शनती हुवेजी। शेठजी धरके स्वहे ।। पूछे एकान्त में वीरसे | तुम उत्पति वीतक केहजी । कैसे डूबे सरीताकन्त मेहजी। जात भात तुमारीक्या छेहजी ! में सुणने को उमंगेहजी । दिखते पुण्यात्म तुम देहनी ॥ भवी ॥ ७ ॥ वीर वच- न सुन शेठ के । सब गत दुःख आयें याद । राज पनि शुक सम्मरे । तासे उपना चित्त विषवादजी ॥ ऑखों से वर्षा बर्षादजी । हुइ आर्तवस्य अस्मादजी । मोहसे ज्ञान गया अच्छादजी । वियोग की वडी है व्याधजी ।। भवी ॥ ८॥ रुदन्ता कुमर देखके शेठ चि न्ते यह भागवान ॥ दुःख मुक्ते दिखते अति । तासे अकुलाये प्रानजी । अपन पूछे किस कारन तानजी । तन लक्ष्ण गुण प्रधानजी । बोलना पेरना खान पानजी । चाल किरिया विनय विज्ञानजी ।। भवी ॥ ९ ॥ है किसि गुणवन्त शेठकाजी । कुल दीपक सूपूत ॥पु ण्यवन्तो का विनकहे ! देखाते है गुण नूतजी । जो रत्नजोती अद्भूतजी । विन वोलेही मो ल अखूटजी । तेसे इसमे गुण मजबूतजी। यह रक्खेगा हम घर सूतजी ॥ भवी ॥१०॥ सम्पति है मेरे घर घनी । पण कोई नहीं रखवाल । पूर्व पुण्य प्रतापसे । यह मेरे घर आ या चालजी ॥ नहीं दूसरा ऐसा जंग बालजी । करेगा मेरे धनकी संभालजी । ररोगा रा नाम वहालजी ॥ यो हिम्मत धरे धनपालजी ॥ भवी ॥ ११ ॥ बुचकार के कहे कुपार १प्रपच ख.४ ४८ जी ॥ १॥ भवी पुण्य प्रवले सुख पाइये ॥ आ ॥ सिन्धूतटे तह. भृगूपुराजी॥ नगर था सुखकार ॥. वसुपत नामे विवहारीया । तहा रहता था नामदारजी । वो शौच कारण उसवारजी । आया दरीयाव के किनारजी। देखे दिव्य स्वरूप कुमारजी ! पडाशु दी नहीं लगारजी ॥ भवी ॥२॥ हृदय प्रेम जगा पुण्य से । और कूरूणा धर्म पसाय ॥ आये ताढिग शेठजी। झवके से लिया उठायजी ॥ धोकर शुद्ध करी तस काय- जी। उष्ण वस्त्र मे लपटायजी। किसी वाहण में सोलायजी। ले आये निज घर मायजी ॥ भवी ॥ ३ ॥ सुकुमाल सुखदाई सेजपर । सुलाये सुख माय ।। राजवेद पोलाय के तस इच्छित द्रव्य दीलायजी । औषध उपचार करायजी । पथ्य तथ्य रखा सवायजी ॥ तासे मुरछा तस विरलायजी । जरा सावधानी जब आयजी ॥ वभी ॥ ४ ॥दृष्टि वि- काश पेखनलगे। में कहा यहा आया चाल ॥ किसका सदनरू सेज यह । आंत मनो- हर महालजी ॥ कोन करेहे मेरी रखवालजी । देखे शेठजी साम तत्कालजी। शेठ मिष्ट व- यण करे स्वालजी । क्यों बन्धु साता हे हालजी ॥ भवी ॥५॥ उपकारी वृद्ध पेछाणीयेजी ॥ कुमर महा बुद्धिवन्त ॥ कह तात आप पसाय से । हुइ होगा सुख शन्तजी ।। सुण वा शेत दर्षन्तजी जाना कोरनर महन्तजी।बोलनेगर लटन्तजी । वीरजी भी सुख माजी । कहे अमोल आत्म समझायनी ॥ भवी ॥ २१ ॥ ॥ दोहा ॥ एकदा सूते कुमर शी हुवे साहूकार । प्रसार रुजगार हुवा आत ! ५० हर्ष शेठ तवारज र लगारजी। करे धर्म दान हो उदारजी । खर्चे सुकृत्य द्रव्य शक्ति पारजी । दीया शुभमे आवे सो लारजी ॥ भवी ।। १७ ॥ मुक्त्यारी घरकी दीवीजी। शेठ कुमर को तमाम । स व कहे पुत्र अच्छा मिला । थोडे दिन में दीपाया नामजी ॥ है विनय आदि गुण धाम- जी। काल कौशल्य विज्ञ अभीरामजी । यो पसरी कीर्ति गामजी । बहुत जन पाये विश्रा मजी ॥ १८॥ यों सुख से काल गूजारतेजी । सो शेठजी धर्म वन्त । आयु तिथी पूरी हु | आया तव भवका अन्तजी ॥ वेदनी के निमित-से मरन्तजी । सजन परिजन आ- मिलन्तजी । जाय स्मशाण देह जालन्तजी । आये फिर रुदन करन्तजी ॥ भवी ॥१९॥ वारसेगादि सगे संबोजी । गुन उपकार करें याद । जगरीती सव साचवीजी । धर्म कर्म विपादजी ॥ दिन थोडे में हुवा समादजी । शेठ पदे कमर को प्रसादजी । करे कृतव्य व- तसा सादजी ॥ सादे अवसर गुग अगादजी ।। भवी ॥ २० ॥ वीर नृपति वाणिक हुवे. जी। 'कुमरजी' नामे ओलखाय । एकही भव मे कर्म यह । नाना रुप जावका बनायजी देखोप्रत्यक्ष इसही न्यायजी । डरो कर्म कमावा लजायजी । चौथेखण्ड ढाल पहली थाय- अण्ड४ पुत्र तुमेरे जीवन प्राण ॥ तनुज करके मे रक्खूगा । नहीं पूछतेरा वयानजी ॥ तूं तो दिखताहै गुन वानजी । मेरे आधार काठी समानजी। यह घर सम्पत तेरी जानजी।दे तू ही मुझे खान पानजी ॥ भवो ॥ १२ ॥ देता तेरे मेरे बीचमें । जरा न जानो आज से कडी भ्रात । मेरे घर ऋदिहै अति । परन्तु नहीं एक अङ्ग जातजी ॥ जानु तूं मेरा नाम दीपा तजी । अव में करुं धर्म दिन रातजी। यह घर धन मुझे नहीं चहातजी । यों सुन वीर जी हतिजी ॥ भवी ॥ १३ ॥ कृपा पिताजी आपकी मे रहा आप आश्रय आय ।। आ ज्ञा शक्ति सी आचरुं । नहीं धन की मेरे कुछ चहायजी ॥ आप प्रशादे कमी नहीं काय जी । यो रह सो शेठ इच्छायजी । बुद्धिसे काम चलायजी। ऊपर खुशी न मनकी जना- यजी ॥ भवी ॥१४॥ कुसुमा मन में रमेरही। अरु तोता नहीं भूलाय || याद आवे जबम न विपे । तब एकान्ते ऑश्रू गिरायजी । फिर ज्ञान से मन समझायजी। फिर निज काम लग जायजी। शंठजी को अन्तर न जनायजी। करे व्यापर द्रव्य कमायजी ॥मवी॥ १५ ॥ महा वावकी वारजी । वैठे दुकाने हो होंशार । अन्यको काम करते देखके । सीखे वाणिक व्यापारजी । लेन देन परिक्षा सारजी । नाफा टोटा व्याज उधारजी। करे चूके नी। कमाया द्रव्य अपारजी ॥ भवी ॥ १६ ॥ चतुराइ उनकी देखकजी। खु- शी हुवे साहूकार । प्रसार रुजगार हुवा अति ! दख हर्प शेठ तवारजा ।। नहीं घरकी फिक र लगारजी । करे धर्म दान हो उदारजी । खर्चे सुकृत्य द्रव्य शक्ति पारजी। दीया शुभमे आवे सो लारजी ॥ भवी ।। १७ ।। मुक्त्यारी घरकी दावीजी। शेठ कुमर को तमाम । स व कहे पुत्र अच्छा मिला । थोडे दिन मे दीपाया नामजी ॥ है विनय आदि गुण धाम- जी। काल कौशल्य विज्ञ अभीरामजी । यो पसरी कीर्ति गामजी । बहुत जन पाये विश्रा मजी ॥ १८ ॥ यो मुख से काल गूजारतेजी । सो शेठजी धर्म वन्त । आयु तिथी पूरी हु वे। आया तब भवका अन्तजी ॥ वेदनी के निमित से मरन्तजी । सजन परिजन आ- मिलन्तजी । जाय स्मशाण देह जालन्तजी । आये फिर रुदन करन्तजी ॥ भवी ॥१९॥ वारसेगादि सगे संबीजी । गुन उपकार कर याद । जगरीता सब साचवीजी । धर्म कर्म विपादजी ॥ दिन थोडे मे हुवा समादजी । शेठ पदे कुमर को प्रसादजी । करे कृतव्य व- तसा सादजी ॥ सादे अवसर गुग अगादजी ।। भवी ।। २० ।। वार नृपति वाणिक हुने जी। 'कुमरजी' नामे ओलखाय । एकही भव में कर्म यह । नाना रुप जावका बनायजी । देखोप्रत्यक्ष इसही न्यायजी । डरो कर्म कमावा लजायजी । चौथखण्ड ढाल पहली थाय- जी। कहे अमोल आत्म समझायजी ।। भवी ॥ २१ ॥ ॥ दोहा ॥ एकदा सूते कुमर अण्ड जी । मव्यनिशी जागृत होय । कुटुम्ब जागरणा जगते । आर्त ध्यावे सोय ॥ १ ॥ धि- क्मे लुब्धा परघरे । मानूं नाना मोज ॥ राणी शुक कहां जारहे । न करी अभी तक खो ज ॥ २ ॥ सुखी दुःखी मेले जुदे । है कैसे किसस्थान ।। अब प्रमाद सोपरिहरी । हेरूंभू तल म्यान ॥ ३ ॥ प्राते वैठे दुकान पर । प्रेक्षी तास उदास ।। कमकर सजन चिन्तवे । विन नारी जगफास ॥ ४ ॥ इसलिये ऐसे सुज्ञ का । सुलक्षणी कन्या सङ्ग । लम शीघ्रही कीजीये । जो रहे सदा धर रङ्ग ॥ ५॥ ॐ ॥ ढाल २ री ॥ श्रीजिन आयाहो ॥ यह ॥ सजन मिलके हो, आये कुमर के पास, कहे अरदास एक मानीये ॥ लक्ष्मीशाह कीहो वि टुपी वाला गुणवन्त । रूप इन्द्रिणी समानीये।। पाणी गृही जेहो । लाइजे घर मांय । लो लावा धन योवन तना ॥ कुमरजी दाखे हो, अभी नहीं मुझ चहाय । पहिले कमावू मे ध न धना ॥ २॥ जाके विदेशे हो, पेखू नव नवा स्थान । द्रव्य उपार्जी करूं नाम में॥यों कह सजीयेहो । साकर तुरङ्ग अनेक । बहुत जन सङ्ग हित हाममे ॥ ३॥ खपता किराणा हो, भरा बहुतही माल । शुभ महूर्त देखके चालीये ॥ मगधरू अंगजहो, वंग कुणाला गु- जरात, पंजाबादिक निहालीये ॥ ४॥ ग्रामागर नगरेहो, पेख प्रसिद्ध गुप्त जाग, जानके कि हांही प्यार मिले । आर्य अनार्य टो. देखत देश विदेश, पत्ता तास जरान खिले ॥५॥ अति घवाराइहो । करने लगे विचार।कुसुमा विनसूना सुख सबी।अब कहा .... ले माकब, क्या काजीये किससे अबी ॥६॥ मरेतो नाही हो, देवी बचन प्रमाण । नहीं तो मरणा निश्चय सही ॥ ७ ॥ कहां तक भोगूहो विरह विप्ति यह पूर । गत सुख कव कर अवेगे ॥ अन्न न भावेहो नयने निदान आय । कव पती सुक पावेंगे ॥ ८॥ यह गत देसी हो, पूछे साथके लोक । क्या दुःख मन फरमावीये ॥ अट्ठम सट्ठम हो कह कर ताको समझाय लोक माने सब साचीये ॥९॥ फिरते २ हो किसी पुण्य पसा । श्रीपुर सानिध आगये ॥धसते पुरमे हो । शुकन हुवे श्रेयकार । जाने के गत द्र- व्य पागये, ॥ १०॥ सोले सिणगारे हो सोभागण पुत्र युत सामे आइ तब वीरहर्पियो। भोजन पाणीहो, हय गय पायक सिणगार । पेखन्ते अमृत हीये वर्षियों ॥ ११ ॥माल- न आइहो, कर घरकुसुमकी माल।सुगन्ध पचरङ्ग पुष्यों खिले ।।इस अनुमाने हो, जानाइ- स पुरमाय । अङ्गना शुक निश्चय मिले ॥ १२ ॥ रोगी औपधी हो, मिले वन भूले सा- थ । खेचर खग स्थान चौपदे ॥ क्षुधित भोजनहो, तृपित नीर ज्यों पाय । तैसे आधार तस हृदे ।।१३।। मध्य बजार मेहो । जोग जुगत जाग जोया भाडे लेकर तहां ऊत मॉडी दुकान 'जहो । शोभित मोहित ग्राहक । व्यापार नफाभी हुवे बहरे ॥१४॥ ए अण्ड कु जा । मध्यनिशी जागृत होय । कुटुम्ब जागरणा जगते । आर्त ध्यावे सोय ॥ १ ॥ धि- में लुब्धा परघरे । मानूं नाना मोज ॥ राणी शुक कहां जारहे । न करी अभी तक खो ज ॥२॥ सुखी दुःखी मेले जुदे । हे कैसे किसस्थान । अव प्रमाद सौपरिहरी । हेरूं भू तल म्यान ॥ ३॥ प्राते वैठे दुकान पर । प्रेक्षी तास उदास ॥ कमकर सज्जन चिन्तवे । विन नारी जगफास ॥ ४ ॥ इसलिये ऐसे सुज्ञ का । सुलक्षणी कन्या सङ्ग । लम शीघ्रही कीजीये । जो रहे सदा धर रङ्ग ॥ ५॥ * ॥ ढाल २ री ॥ श्रीजिन आयाहो । यह ।। सजन मिलके हो, आये कुमर के पास, कहे अरदास एक मानाये ॥ लक्ष्मीशाह कीहो वि टुपी वाला गुणवन्त । रूप इन्द्रिणी समानीये।१। पाणी गृही जेहो । लाइजे घर मांय । लावा धन योबन तना ॥ कुमरजी दाखे हो, अभी नहीं मुझ चहाय । पहिले कमावू में ध न घना ॥ २॥ जाके विदेशे हो, पखू नव नवा स्थान । द्रव्य उपार्जी करूं नाम मे ॥ यों कह सजायेहो । साकट तुरङ्ग अनेक । बहुत जन सग हित हाममे ॥ ३॥ खपता किराणा हो, भरा बहुतही माल । शुभ महूर्त देखके चालीये ॥ मगवरू अंगजहो, वंग कुणाला गु- जरात, पंजाबादिक निहालीये ॥४॥ ग्रामागर नगरेहो, पेख प्रसिद्ध गुप्त जाग, जानके कि हाही प्यार मिले। आर्य अनार्य हो, देखत देश विदेश, पत्ता तास जरान खिले ॥५॥ अति ॥ . .."
तस हृदे ॥१३ ॥ मध्य बजार मेहो । जोग जुगत जाग जोया भाडे लेकर तहां ऊत , घवाराइहो । करने लगे विचार। कुसुमा विनसूना सुख सवी।अब कहां जावूहो । कहां मि ले साकब, क्या कीजीये किससे अबी ।। ६॥ मरेतो नाही हो, देवी वचन प्रमाण । तो मरणा निश्चय सही ॥ ७ ॥ कहां तक भोगूहो विरह विप्ति यह पूर । गत सुख कव कर अवगे । अन्न न भावेहो नयने निद्रान आय । कव पत्नी सक पावेंगे ॥८॥ यह गत देसी हो, पूछे साथके लोक । क्या दुःख मन फरमावीये ॥ अहम सट्ठम हो । कह कर ताको समझाय लोक माने सब साचीये ॥९॥ फिरते २ हो किसी पुण्य पसा इय । श्रीपुर सानिध आगये ॥ धसते पुरमें हो । शुकन हुवे श्रेयकार । जाने के गत द्र- व्य पागये, ॥ १० ॥ सोले सिणगारे हो सोभागण पुत्र युत सामे आइ तव वीरहर्षियो। भोजन पाणीहो, हय गय पायक सिणगार । पेखन्ते अमृत हीये बर्पियो ॥ ११ ॥माल- आइहो, कर घरकुसुमकी माल। सुगन्ध पचरजपुष्यों खिले ॥इस अनुमाने हो, जाना इ- पुरमाय । अङ्गना शुक निश्चय मिले ॥ १२ ॥ रोगी औषधी हो, मिले वन भूले सा- । खेचर खग स्थान चोपदे ॥ क्षुधित भोजनहो, तृपित नीर ज्यों पाय । तैसे आधार में ॥ मॉडी दुकान'जहो । शोभित मोहित ग्राहक । व्यापार नफाभी हुवे बहरे ॥१४ा ए (भ खण्ड४ कदा कुमरजी हो । देखन पुर चरी ताय । उपाय लिया गवेपणा ।। उई अधो प्रेक्षत हो, । सूक्ष्म दृष्टि प्रसार । परन्तु नहीं सुनी धोषणा ॥ १५ ॥ हुवे निराशी हो चिन्ते खुटी झ आय । अनि स्नान करना सही ॥ व्यर्थ मेनत हो । शकुन फोकट होय । कर्म अडावे जग मुझ यही ॥ १६॥ यों चिन्तवते हो । देखा बृद्ध नर एक । नमन करी बैठेता कने ॥ सुज्ञवीर देखीहो । तेभी देता सन्मान । सन्मुख बैठ इस तरेह भने ॥ १७ ॥ कहां आयहो । किस कामें क्या जात । वीर वसुपत नाम भाखीया । पुनः वीर पूछे हो । आप नगरी की बात । आश्चर्य जनक सो दाखीये || १८ ॥ वृद्ध प्रकाशे हो, यहां न- यसार राजान, न्याय नीति में निपुन घणा ।। यहां व्यवहारी हो, बहुत वसे धनवान, ध मात्म सुखी सज्जना ॥ १९ ॥ आश्चर्य कारी हो, और सुनाईं एक बात । पुप्फा गणिका एक यहां रहे ॥ रुपे अन्नोपम हो धन कला में सा पूर । तास घर में एक सती सहे॥२' है नव योवन हो । रुप इन्द्राणी लजाय । यो महीमा मेने सुनी घणी ।। उसको देख | गयें पुरुप अनेक । नदेख सूरती कोइ उसतणी ।।२१।। सवा पांचसो हो । लेती नित्य दीनार । फिर घर में तस आनदे ।। चारों पेहर मे हो, पर पंचोमे लोभाय । घर मे सतीपासन जानदे ॥२२॥ तसु गुण सुनने हो, । बहुता द्रव्य कमाय । होस्य धरके हो जाते तस घरे ।। सब को रोवाइहो, खोसी लेती सब मल । निराश हो के पीछे फीरे ॥ २३ ॥ तोभी कामान्ध हो । जाते रहते हैं नाय । अचंभा यह मुझ हो रहा ॥ जैसा सु- णीया हो । तैसा कहा आप ताय | नवा वृतान्त यह है यहां ॥ २४ ॥ यों सुण वीरजी हो । चले नमन कर तास । विचारते घर आ रहै ॥ चौथे खण्डकी हो । यह हुइ दूसरी ढाल | आगे रसीक कथा अमोलख कहे ॥ २५ ।। दोहा । एकान्त वैठे कुमरजी । कर ते मनसे विचार ॥ यह कुसुमा के अन्य है। कैसे करु निरधार ॥१॥ जो गुण वृद्ध मुख से सुने । सो पावे तस अंग ॥ परन्तु नट खट नार का । नकरे ते कदा सग ।।२।। अहो आश्चर्य यह वडा । रही जार जारणी मांय ॥ सती बजे कैसे यह । देखनी तो स ही जाय ।। ३॥ देखें से मालम हुवे । सच्चके मिथ्या बात ॥ के ठगारी के है सती । कै- सा मांडा उत्पात ॥ ४ ॥ तब गुप्तन्द्रिय नेत्र भुज । दक्षिण के फरकाय || मन मे सम- मुमप्रिया । निश्चय करूं अब जाय ॥ ५॥ ॥ ढाल ३ री ॥ पोप दशम दिन यह० ।। सुणीयो सुज्ञ जन विरह दुःख कारी । सजन मिले होवे सुख अपारी यह|| निज अङ्गा का निर्णय करन को । चले वीरजी वैस्या द्वारी ॥ हृदय उमट हर्ष स्वभा- *वे । नयनो से बर्पन लगा वारी ॥ दखो ॥१॥ पूछत कुसुमा घर वाहिर । तोता टंगा - + खण्ड ॥चलन बचन तस लगे सेन्दे से । तवतो शुक देखे दृष्ट प्रसारी ।। दे- ने श्वामी हर्प अति पाभी । जाने के अमृत मेह यूठारी ॥ हृदय उमा- ऑस आया । उडकर आया सती वैठी जहारी ।। देखो ।। ३ ।। आज बधा- इदेता अति सुखदाइ । स्थिर चित्र कर तुम सुनो अम्मारी॥श्वामी श्री वीरसेण राजिन्द्र। आकर ऊभे हैं घरके दारी ॥ देखो ॥ ४ ॥ सूणत वधाइ सती होइ । धन्य २ आजका दिन ऊगारी ।। हुइ होशारु आधार हृदय में । जाणे मृत्युक तन हुवा जीवतारी । देखो ॥ ५॥ तब दासी आके पूछे शुक को | कामी पुरुप विदेशी को आयारी ॥ अन्दर आनेको सो चहावे । आप कहो सा कंहू तस जारी ॥ देखो ॥ ६ ।। शुक कहे शीघ्र य हैं. हां ही पधारावो।वोही हैं हमारे प्राण आधारी॥दासी शीघ्र आइ वीरपासे । नमी कहे च लीये सती पासारी ।। देखो ।। ७ ।। सुणी वयण नृप आश्चर्य धरते । चडने लगे हवेली गरी ॥ देखें कैसी सती है क्या कुसुमश्री। मन ह्रदय मिलने उमगरीि ॥ देखो । सी पास सती पतीकी । आदर सत्कार कराइ सारी ॥ सुकुमाल सेजपे आकर देखन सती है आवे कदारी ॥ देखो ॥ ९॥ सज सिणगार कुसुमश्री ततक्षीण 'शि आइ पति पासारी । सन्मूख अन्य आसन पर बैठी 1 शरमी ढाणि भाग री ।। देखो ।। १० । विरह दुःख उरमे नहीं माया । नयनो से नीर बहे चौधारी ॥ वा- क्या न निकले मुरजावे मन मे । हर्प शोक की हुइ मिश्रतारी ॥ देखो ॥ ११ ॥ इतने महाविप्ति सहकर । आज नीठ देखे पति दीदारी ॥ तेह हर्ष है राणी के हृदय । प भेटीन जोग जागारी ।। देखो ॥ १२ ॥ धिक २ मेरे निठारे कर्मों को । लाके वसा दाइ वेस्या आगारी ॥ मेरे लायक यह नहीं स्थानक । रखे कलङ्क यह देवे लगारी ॥ दें ॥ १३ ॥ कैसे प्राणेश परतीत लावै । समल के विमल यह मुझ नारी॥ गुण ढंकन यह आवास पाइ । कैसे शब्द मुख करुं उचारी ॥ देखो ॥ १४ ॥ अनेक विप्ति सही इ- अस तनसे । वोदुःख मुझ होता न लगारी ॥ परन्तु वसीआ कुटनी सदने । यह दुःख व- हती पदय कारी ॥ देखो ॥ १५ ॥ ॥ श्लोक ॥ टक छेदो नामें दुःख । नादहनच धर्पणे ॥ एत्दैव महादुन्वं । गुंजाया सय तोलनं ॥१॥ ॥ ढाल ।। कहे सुवर्ण मुझ ताडन तापन का । दुःप तो होता नहीं है लगारी ॥ परन्तु अति यह दुःप होता । मेरे बरोबर तुलती गंजारी ॥ देखो ॥ १६ ॥ हलकी सङ्ग से गुण नाश पारे । लागै लंछनज न फिरकारी ॥ अहो जिनेश अब क्या करूं में । यो मन में सती रही मुरझारी ॥ देखो ॥ १७ ॥ देष कुमक्षी को तत्र वीरजी । अधोदृष्टि चिन्ते वारम्वारी ।। यह कुसुमश्री खण्ड४ के कोइ अन्य । निश्चय न होवै कोइ प्रकारी ॥ देखो ॥१८॥ मुझ प्यारी महा सुन्दर अ । यह तो कृप कृष्ण रङ्ग वारी ॥ वो तो कुशल सर्व कला गुण सागर । यह मूग्धा सी कौनहै नगि ॥ देखो ॥ १९ ॥ वो तो निश्चय नरहे कदापि । अति अयोग्य यह वै स्य आगारी ॥ जैसे कमल अगिने में ऊगे। चन्द्र से नहीं बर्ष अङ्गारी ॥ देखो ॥ २०॥ ५३ अगणिका भी तो यह नजनावै । वैठी कुलवन्ती जो शरमारी ॥ दुबली दुःखणी दिखती है मुद्रा । होवेगा विरहणी कोइ विचारी । दोखे ॥२१ ।। नमिली मुझ धारी प्यारी । अब मृत्यु मुझ आइ ढिगारी ॥ क्यों बैठा चल वीरस्वस्थान । यो वड २ ते ऊळ चलारी ॥ दे खो ॥ २२ ॥ देखत वीरको जाते राणी । अतीही चिन्ता प्रगटी उरमांरी ॥ कहे अमोल यह ढाल तीसरी ॥ सतीका शील होवेगा सहाय करी ॥ देखो ॥ २३ ॥ ॥दोहा॥ शुक छत्त दण्डिपे रहा । देखे यह चरित्र ॥ दम्पति मिल बोले नहीं। मिलबहु दिने- विचित्र ॥१॥ हर्ष समय दुल्लभ मिला । तामे करै यह शोक || आश्चर्य आवत अति मने । क्या चिन्ता अवलोक ॥२॥ मधुर स्वरे उमगे धर । बोले नमी सुणो श्वाम ॥ आश्चर्य मुझ उपजे अति । देखी आपके काम ॥३॥ यह अति आणन्दकी घडी । मि लीमहा पुण्य जोग | आप मन में अणन्द नहीं। क्या उपजा मन रोग ॥४॥ बीती रा - बात विशारदो । स्थिर करो चित्त उमंग ॥ विरह भगो इच्छित करो यह नहीं कछुवि रन ॥ ५॥ | दाल ५ थी। नित्य प्रतवन्दूहो बेकर जोडने ।। यह० ॥ सुणीयो श्वा- माहो शङ्का छोडके । श्रीहरी केशरी कुमार । प्यारा प्राणका आधार । महारी काया का सिणगार ।। सुणीयो । आं॥ वाणी सुणकेहो वीर कुमारजी । ऊंचादेखे उसवार ॥ छत्त पर ठो हा देखा सुवटा । पेछन्याजी तत्काल ॥ सुणीयो ॥१॥ यह चूडामणी हो शुक निश्चय सही। रहा इस स्थान के आय ॥ इस से पूछूहो कूसुमश्री कहां । जानेतो देगा ब- ाय || मुणी ॥२॥ सूवटा उडकेहो सन्मुख आवाया। किया लुली २ प्रणाम । वैठा अ देत हो सन्मुख छोगना । रहा हृदय हर्ष पाय ।। सुणी ॥ ३॥ तस बुचकारीहो पूछे राज श्वरू । कहो शुकजी समाचार ।। तुझ श्वामानीहो अव्वी है कहां । कहो जानतो सब-प्र- कार ।। सुणी ॥ ४ ॥ यो सुणवाणी हो तसी मुरझागइ । हय २ कर्म कठोर ॥ कूस्थान देवाहो पेहचानी मुझ नहीं । भ्रमवशे चित्त चोर ॥ सुणी ॥ ५ ॥ शुक तव भालेहो प्रभु भूली गये। थोडे दिनों केही मांय ॥ के कूछ केफसे हो भ्रमवश मे हुवे । नारी ओल- खो नाय ॥ सणी ॥ ६ ॥ यह तुम सन्मुख हा वैठी श्वामिानी ! निरखो शका दिलकी छो ॥ सुख अर्पिजेहो देइ सन्मानने । करो वात वनो प्रोड ॥ सुणी ॥७॥ आप विरहसे - खण्ड ४ की गइ | करी अंबिल आदि तप ॥ दुष्कर स्थानेहो व्रत शुद्ध पालीयो । आप जप ॥ सुणी ॥ ८॥ यों सुण वाणीहो शुककी वीरजी । झांके पडे म न धिक्क २ जगमे हो त्रिया चरित्र को । पार कहो कोन पाय ॥ मुणी ॥९॥ राजकी पुत्रीहो यह कुसुमश्री । वेश्या पना स्वपन मांय ॥ न कभी जानती हो सो कर ५४. ने लगी। कुलपर स्याही फेराय ।। सुणी ।। १०॥ मेरे जैसेकी हो यह पत्नी हुइ । फ- सी कु कर्म मे आय ।। सिणगार सजके हो वणी मस्तहनी । नित्य यों पर नर सजाय सु णी ।। ११ ॥ मुझने रीजाने हो आइ सती वनी । कल के कर के मुख श्याम ॥ धिक २ इसको लाज आइ नहीं। यहां मोगे नित्य अराम || सुणी ॥ १२ ॥ इसकी सङ्ग से हो शुकविगढ़ गया। जाना पुत्र समान॥ जार कर्म की हो दलाली यह करे । आखरि जा त पशुजान ॥ सुणी।। १३ ॥ इन दोनों के हो मुख देखना नहीं । यहां ठेरना भी यो- ग्य नाय ॥ धिक २ मुझको हो आया ऐसे घरे । यह मेरे कुल को लजाय ॥ सुणी ॥ १४॥ मेरे साथी जन हो बात यह जानेगें । तोफि टकारेंगे मोय ।। किम अब उनको हो मुख देखावु मे । रखे छूटे सङ्ग सोय ।। सुणी ॥ १५ ॥ हाहा मेनेहो इसके कारणे । सहा एता परिश्रमः।। झुरता निशदिनहो : प्यारीशक भनी । उनके देखो यह कर्म -- ।। सुणी ॥ १६ ॥ यों पस्ताते हो क्रोधे असुरत्त भये । फेक दिया शुक का दूर ।। अर्ज मरोड केहो शीघ्र उभे हुवे । जाने को प्यो तव भूर ॥सुणी १७॥ यह गत देखके हो स ती बिलखी हुइ । आडी फिरी कर जोड ॥ जाने न देवंगा हो प्राणके पाल का । दाख वोजी मेरी खोड ।। सुणी ॥ १८॥ क्यों रसाने होशाणे साहीवा । जीती आपके आधा र ॥ विन कुछ पूछे हो विरहणी तज करी । जाते विन मोत-मार ॥ सुणी ॥ १९॥ जो कभी सूवर्ण हो पडे विष्टा विपे । तोते पीतल नहोय ॥ यो कुस्थान में हो मुझ को देखके । वैम म लावोजी मोय ॥ सुणी ॥ २० ॥ वीरजी भारवे हो मलीन सुवर्ण 'भणी । । देह अमि'माहें तपाय ॥ यो बोलन्ते हो तुर्त उतरी चले । चौथी अमोलक गाय ॥ सुणी ।। ॥8दोहा।। नजीक रायके मेहल में । कोला हल असराल ।। हुवा सुता सो वीर जी । जाते फिरे तत्काल ॥ १॥ सुनते कान लगायके । दोडो छोडावो मोय ॥ फासे फसा आति विषम है। दया करो मुझ कोय ॥ २॥ सुन विस्माये वीरजी । दयालु दिल हुवा दुःख ।। जावू देखु सुखीया करूं । जो मेरा चले वहां रुख ॥ ३ ॥ पती गये संती मुरछा लही । हो सावध कर विलाप । हाहा दैव अब क्या करूं । घर आगये पतिआप ॥ ४ ॥ सुवर्ण तापे शुद्ध हुवै । सो कही धीज कराय ॥ तेही करण तैयार में । परन्तु - रखण्ड ४ आय ॥ ५ ॥ () || ढाल ५ वी ॥ नामजी सूतो खूटी ताणरे ।। यह ।। ना थजी अबला के आधाररे वाइला । दयालू निदर्यां क्यों हुवे हो नाथजी ।। नाथजी इत नदिन दुःख सेही रे वाहला । आप आधार मेने खूवेहो नाथजी ॥ १॥ ना० ।। दिन पूछे कोइ बातरे वा० । तृटकाने क्यों परहरीरे ना० ॥ ना० आप मिलने किये केइ उपा वरे वा० ॥ सो सब अव हुवे अरीरे ना० ॥ २॥ ना० आपपे घर विश्वासरे वा० । गुप्त ऋद्धी तात की दाखवीही ना०॥ ना० दिलायो तात को राजरे श्वामी । अन्तर जरा न राखवी हो ना०॥ ३॥ ना० कुसुमपुरी रन माय रे श्वामी । विप्ति सही सङ्ग आपके ना०॥ना० वाहणे आप: वियोगरे श्वामी । झम्पा पात करी ताप के हो ना०॥४॥ ना० आपके दर्शके काम रे श्वामी । मच्छोदर जीवती रही हो ना०॥ ना० पर वश्य ग णिक गेहरे श्वामी । आइ में कर्मे वही हो ना० ॥ ५॥ ना० आप विना अन्य ताय में । मन कर के इच्छा नहीं रेना०॥ ना० वैस्या से बची जिस ति रे वहाला । सो बात केसे जावे. कही रे ना० ॥ ६॥ ना० खंग दान के प्रायोग्य रे में । शुक राजने मि लावीयारे ना.ना. इन बुद्धि प्रचार रे मेरा शीलरे अरु इज्जत प्राण बचावीयारे ना.॥७॥ना अति आशासे ध्यावतारे ।आप आकर यहां दर्शन दियारे ना०॥ ना० भोजन परसीले १ पक्षी है खेचरे । सा आस निरासा कर गया रे ना.॥८॥ ना. आपका नहीं कुछ दोपरे वहान ला । में मेरे कर्म कठीण अतीरे ना. ॥ ना. मिल २ होय वियोगरे. श्वामी । मुझको दे ख फिर जावे मतिरे ॥ ना. ॥ ९ ॥ ना. मेनेदी होगी अन्तर रायरे प्रभु।पर भव में कि जीव कोरे ना ॥ ना. उस सेही वारम्वार रे मे । भोगवती ऐसी रीव कोरे ना.॥१० ना. भरमा के स्त्री भरतार रे । आपस में लडाइ यारे ना. ॥ ना. उनका किया वियो कर्म उदय मुझ अपियारे ना ॥ ११ ॥ ना. नर मादी का विजोगरे में। पशुवि छोडी के कियारे ना. ॥ ना पक्षीयो पाजरे मायरे में । रोक रखे संतावीयारे ना. ॥१२॥ ना. भाने सती सन्त व्रतरे में । बलत्कार छेला वीरे ना. ॥ ना. दलाली व्यभिचार की ।करी होगी मडवा तणीरे ना. ॥ १३ ॥ ना. हो विदा पतिने वियोगरे में । अन्य न सङ्ग जारी रमीरे ना ।। ना. हो पर दास का लुन्धरे में । अत्रप्त सेव्या अब्रह्मोरे ना. ।। १४ ॥ ना. अनङ्ग क्रिडा में लुब्धायरे में । कुचेष्टा करी के हांसीरे ना. ॥ ना. ले ले भले व्रतरे में। लज नहीं धारी किसीहो ना. ॥ १५ ॥ ना. इत्यादि पातक अतिरे में । भवान्तर में किये सही रे नाथ. ।। ना. जिससे वसी वैश्या गेहरे में । वो कर्म तो छोडे नहीं रे नाथ. ॥ १६ ॥ ना. अब माफी मांगू देवरे । जरा रांकडी पर दयाकी जीयेरेना खण्ड४ ॥ ना. सब पाप कीजिये नाशरे । मुझ दुर्गुणी की दया लीजियेरे ना..॥ १७ ॥ ना.यों देख रुदन्ती सती भणीरे तव । शुक अति व्याकुल भयोरे ना. ॥ ना. आपड्यो सती च रण मायरे । गद्गदित हो यों कयोरे ना. ॥ १०॥ मातजी आती मेलो दूररे मेरी अर्जी एक चित्त में धरोरे मातजी ॥ मात. नृपति इसही पुर मायरे में मिलकर वैम करूं गा परोरे मा. ॥ १ ॥ मा. सत्य वीतक, दर्शायरे में । ले साथ यांही आवृंगारे मा. ॥ मा सत्यका बाली सहीवारे वाइ आखीर सत्यतिरे वतावूगोर मा. ॥ २० ॥ मा. ॥ अपन ने खोटे किये नहींजी बाइ | मन तन से हैं निर्मळे रे मा. ॥ मा. वक्तो होवेगा धाजरे त ब शील सत्य सब अटकळेरे मा. ॥ २१॥ मा. करो देव गुरुका ध्यानरे बाइ । अभिग्रहम न दृढधरियेरे मा.मा. जिससे शीघ्र संकट टलेरे अब हिम्मत नहीं जरा हारीयेरे मा.॥२२॥ भाइजी ऐसे वचन सती सुणाजी कांइ । ध्यान किया एकान्तमेंहो भा.॥ भा. अमोलक ढाल पंचरे अब आगइ दुःख के अन्त में हों भाइ भा. ॥ २३ ॥ ॥ दोहा । हाक ऑखोमे सुन कर वीरजी । शीघ्र गति कर चाल ॥ राज महेल मे आय के । देखे दंग चौफाल ॥ १॥ मुख्य जे राज शभाविपे। नयसार राजान । जकड वन्य बन्धा पडा। लोटे मीन वि न पान ॥२॥ चक्षुवक्र दोनों हुवे। मुखपर आये फेण ॥ वे शुद्ध पाडे चीस सो। और र मन्छी पानी V साँपों - न निकले वेण ॥ ३ ॥ ताहा २ करें अति । जाने क्षीण में मर जाय ।। जस मरण के स्थान में । पशु जात अरडाय ॥ ४॥ स्वजन सामन्त परिवार सब । परज पुरजन लो क। दोड २ आते तहां । जमा अतीही थोक ॥ ५॥ ॥ ढाल ६ वी ॥ गाफल म त र हरे ॥ यह ॥ दगा मत कर रे, मेरी जान दगा मत कररे । सगा कभी दगा नहीं होवे । नहाक क्यों दुःख बीज को वोवे, दगा ॥ आं ॥ यह रचना देख राजारी । सव आश्चर्य पाये भारी । चिन्ते कोइ देव कोपारी । अन्य कुछ राजाने कीया कि-जिससे कप्टलीया ॥ दगा ॥१॥ नगर में डंडोरा पीटाय । राजा अति दुःख से घबराया जो वेदना देत गमाया ॥ सो इच्छे सोपावै । सुन घने करामाती आवै ॥ दगा ॥२॥ वैद्य वायु शीत दर्शावै । केइ औषधी पावै लगावै । तोभी रोग कोन गमावै ॥ जोतपि यो गृह दोप दाखा | दिया उनने दान.जो मुख भाखा ॥ दगा ॥ ३ ॥ मंत्र जंत्र तंत्र वादी । जडी डोरा पुटलिया वान्धी ।झाडे उवारेणे किये आदि । भोपा घुण देव दोप के ता । पूजाआदि देमांगे जेता.॥ दगा:॥४॥ इत्यादि उपाव घना कीधा । पण एकन कार्य सीधा । सबों ने उत्तर यह दीधा । जिनोका किया जोइ पावै । कर्मों का रोगको गमावे ॥ दगा ॥ ५ ॥ ऐसे वचन राजाने सुणीया । तब पातक स्मर सिर धुणीया ।
खण्ड ४ भी कु रसदो लगाय ॥ ३॥घां रुजण जडीका तदाः। रस मसला तस अङ्ग ॥ रुधीर रुका घा वज मिटा । सुष्टपुष्टे हुव'नत रङ्गाधनयसार पूछे तदा । कौन बन्धे कारण काय ।। वीत क सत्यक कथा कहो । तव खेचर दर्शाय ॥ ५॥ ढाल ७वी ॥ अहो पियु पंखी- डा ॥ यह० ॥ अहो सुणो नृपतीजी । गिरी वैताढे धूर दिशाके मांय जो । महीला पु- री'नो हूंतो पती लली ताङ्ग मेरे लो।अहो मुणो नृपताजी । लीला क्रान्ति मुझ नारजो । गुणवन्तीरु शोभित अङ्को पाग मेरे लो ॥ १॥ अहो, ताकी महीमा सुन कानजो। विद्युत नाम खेचर माह्या तास सेरे लो ।। अहो । एक दिन क्रिडा काज जो । में वाग गया में सेना सङ्ग हुलास सेरेलो ।। २ ॥ अहो० ॥ वो कामी मुझ अन्तर देख जो मेरा रुप बनाके गया मुझनारी पेरेलो ॥ अहो० ॥ भोली को भरमाय जो । लेगया वन कुबुद्धि कर प्यारी परेरेलो ॥ ३ ॥ अहो. ॥ में आया फिर मेहल माय जो । निज न यने नहीं देखी लीला कारी ने रेलो ॥ अहो० ॥ चौकस करी सब स्थान जो । तब एक चेटी वोली सुणो अवधारी नेरेलो ॥ ४॥ अहो० ॥ अभीही आयेथे आपजो । लेराणी बैठ विमाने सिधावी यारे लो॥ अहो०॥ फिर आकर एकले आपजो । देखो राणी यह आश्चर्य मुझ मन पावीयारे लों ॥५॥अहो। यों सुण दासी बचन जो । घबराया में 4 गो तास देंखन भणीरे लो ॥ अहो० ॥ फिरतो वन गिरी माय जो । इसही वनमें आ मेहल शोभा घणारे लो ॥ ६ || अहो० ॥ दोनो सूते सुन्दर सेज जो । भोगवे ड च्छित भोग नडर जरा परेरे लो ।। अहो०॥ मुझ तन व्यापो क्रोध जो । हकार्या तस ते मुझ देखा निजरेर लो ॥ ७ ॥ अहो० ॥ कोप्यो मुझ पर जोर जो । मुझे मारने मे सन्मुख आवीयारे लो ॥ अहो० ॥ लीला कृति उसवार जो । शरमाणी घवराणी ख नहीं भाइयो रे लो॥८॥ अहो० ॥ करा रुदन असराल जो । में मोह्यो तस सन्मु- ख देखा प्रेमसेरे लो ॥ अहो ॥ तो मेरी निघा चुकाय जो । टूट पड़ा मेरे पर वन्ध व न्धे अतीरे लो ॥ ९ ॥ अहो० ॥ घसीटतो यहां लाय जो । वन्धि इसही वृक्षको वोभा गी गयारे लो ।। अहो ।। गया होगा उसही स्थान जो । क्या करेगा अबला का न- नावै कयारे लो ॥ १० ॥ अहो० ॥ तुम किया अति उपकार जो । अव आधार बन्धा है मुझं मन में घणारे लो ॥ अहो० ॥ अब अपन दोनो मिलजो । परांजय करेंगे उस त्रु तणारे लो ॥ ११ ॥ अहो० ॥ यों कर एका दोय जो । वनागार में आदेख छिपके रहेरे लो ॥ अहो० ॥ लीलाकृत्ति उसवार जो । धिक्कारण कर मुद्राते दुष्टसे कहेरे लो॥१ २॥ अहो॥ अरे तुझ कोडों विकार जो । मुझ भोली को ठग कर पत्ति वृत भागीयोरे खण्ड ४ क ना किया भिक्षुक जो । मेरे करणी फल स्त्री होना यह महारी रे लो ।। अहो. ॥ बीचमें भव हुवे हैं अनेक जो । विद्युत प्रमहुवा नारीहरी तिण थायरीरे लो ॥ २८ ॥ अहो. ॥ दम्पति वाणिक भ्रम जो। ललीतासने लीलाकृति दोनों थयारे लो॥ अहो.॥ निदानके पसाय जो । हरण करी भोगो कर्म फल छुटाथयार लो ॥ २०॥ अहो. ॥ आयुजिस प्रकारहो । बन्धा तेसा भोग के लीलाकृति मरी रे लो ।। अहो. ॥ छोडो चिन्ता वैर जो । निर्मळ मने मिल वैर विरोध दो परिहरीर लो।३० अहो.। यो सुण मुनि सबोध जो । विद्युप्रभ वैरागी हुइ दीक्षी गृ हीरे लो॥ अहो. ॥ गयामुनिवर के साथ जो। दाल सातमी ऋपि अमोलक ऊचरीरे लो ॥ ३१॥ * ॥ दोहा ।। नयसार ललीताङ्क मिल । लीलाकृति शरीर ॥ अमि संस्कार कर निवृते । मेटी मन की पीर ॥१॥ खेचर कहे भूचर भणी । तुम उपकार अपातेतो फेडी सकूँ नहीं। पण कुछ शक्तिसार ॥२॥ नम गंमनी विक्रोवणी। दोनों विद्या गृहो राज ॥ अ- ति अग्रह इण सो गृही। गयो खेचर निज जगाज ॥ ३॥ देख प्रभाव दो मन्त्र का लिलचा या इस मन ।। अन्यभी ऐसे मिलान को। करन लगा भ्रमन ॥४॥ अश्व शैया रूशुककी । सुनी पर संस्य कान ॥ तत्क्षीण गया रत्नपुरी । तुम पीछे लगा राजान ॥५॥ कुसु मपुरी के वनमे । रचा इन इन्द्रजाल ॥ विन गुन्हे तुमें सन्तापीया । हरी शैय्या अश्वमा १ गगन - ॥ ६॥ इस मौके इस दुष्ट को। लेवी मारकर वैर । मे तो अब छोडूं नहीं। हुइ बहु- देर ॥७॥ ॥ ढाल ८ वी॥श्वामी सुणीयें ॥ यह० ।। सुगुणा सुणीयें! गुणी हो परगुण लुणीये ॥॥ यो कहे देवी मुद्गल सहाइ-[ नृपको मारने धाइ ॥ इस दुष्टका पृथ्वीसे । सहन होताहै नाही ॥ सुगु ॥१॥ अतिदीन बचने नयसार बोले । वीर 'शरणे तुमारे ॥ मुणतेही वीर फिरे देवी आडे । माताजी इसे मत मारे । सुगुणा ॥ २॥ आपहो समर्थ यह अनि असमरथ । आप नाथ यह अनाथो ॥ कीडीके ऊपरक चडाना । युक्तं कदापि न देखाते ।। सुगु ॥३॥ आप बडा बड पनने विचारो। 7 कीजे ॥ इतनीही अर्जी मेरी मान्य कर । अभय दान इसे दीजे ॥मुरि वीर वाणी श्रवण कर । देवी आश्चर्य अति पाइ ॥ गुण कर्तापे गुणकरे सव । उसमें क्या है नवाइ ॥ सु॥ ५॥ महा दुःख दाता दुर्गुणी शत्रु । तास दया छोडावे ॥ धन्य २ धन्य हरी केशरी नन्दन । तुम जोडे कौन आवै ॥ सु ॥ ६ ॥ न छोडती कोडो उपावे । पन तेरा बंधन न लोपाइ ।। नहीं माऊँ मुद्गल पड़ा रहो व- न्धन । मरेगा योंही तडफडाइ || सु ॥७॥-विकराल रुप मिटा निज देवी । दिव्य क- प प्रगट करीया ॥ होकर संतुष्ट कहे वीरसे । मांगे, सो देवु इणवीरीया ।मु०॥ ८॥ वीर खण्ड ४ वो कु ना किया भिक्षुक जो । मेरे करणी फल स्त्री होना यह महारी रे लो॥ अहो. ।। बीचमें भव हुवे हैं अनेक जो । विद्युत प्रमहुवा नारीहरी तिण थायरीरे लो ॥ २८ ॥ अहो. ॥ दम्पति वाणिक भ्रम जो। ललीतासने लीलाकृति दोनों थयारे लो॥ अहो.॥ निदानके पसाय जो । हरण करी भोगो कर्म फल छुटाथयार लो ।। २०॥ अहो.॥ आयुजिस प्रकारहो । बन्धा तेसा भोग के लीलाकृति मरीरे लो ॥ अहो. ॥ छोडो चिन्ता वैर जो । निर्मळ मने मिल वैर वरोध दो परिहरीर लो ।३० अहो.। यो सुण मुनि सद्रोध जो । विद्युप्रभ वैरागी हुइ दीक्षी गृ हीरे लो॥ अहो.॥ गयामुनिवर के साथ जो । ढाल सातमी ऋपि अमोलक ऊचरी रे लो ॥ ३१ ॥ ॥ दोहा ।। नयसार ललीताङ्क मिल । लीलाकृति शरीर ॥ अमि संस्कार कर निवृते । मेटी मन की पीर ॥१॥ खेचर कहे भूचर भणी । तुम उपकार अपारातितो फेडी सकू। नहीं । पण कुछ शक्तिसार ॥२॥ नम गंमनी विक्रोवणी। दोनों विद्या गृहो राज ॥ अ- ति अग्रह इण सो गृही। गयो खेवर निज जगाज ॥३॥ देख प्रभाव दो मन्त्र काललचा या इस मन॥ अन्यभी ऐसे मिलान को। करन लगा भ्रमन ॥ ४॥ अश्व शैया रूशुककी । सुनी पर संस्य कान ।। तत्क्षीण गया रत्नपुरी । तुम पीछे लगा राजान! ।। ५॥ कुसु मपरी के वनमें । ग्चा इन इन्द्रजाल ॥ विन गुन्हे तुमें सन्तापीया । हरी शैय्या अश्वमा १ गगन सा ल ॥ ६॥ इस मौक इस दुष्ट को । लेवो मारकर वैर ॥ मे तो अब छोडूं नही, हुइ बहु- तही देर ।। ७ ॥ हाल ८ वी ॥ श्वामी सुणीयें ॥ यह० ।। सुगुणा सुणीय गुणी हो परगुण लुणीये ॥॥ यो कहे देवी मुगल सहाइ । नृपको मारने धाइ ॥ इस दुष्टका भार पृथ्वीसे । सहन होताहै नाहीं ॥ सुगु ॥१॥ अतिदीन बचने नयसार वोले । वीर सेण शरणे तुमारे ।। सुणतेही वीर फिरे देवी आडे । माताजी इसे मत मारे । सुगुणा ॥ ॥ २ ॥ आपहो समर्थ यह अति असमरथ । आप नाथ यह अनाथो ॥ कीडीके ऊपरक चडाना । युक्त कदापि न देखांते ॥ सुगु ॥ ३ ॥ आप वडा बड पनने विचारो । र क की करुणा कीजे ॥ इतनीही अर्जी मेरी मान्य कर । अभय दान इसे दीजे ॥सुटि ।। इत्यादि वीर वाणी श्रवण कर । देवी आश्चर्य अति पाइ ॥ गुण कर्तापे गुणकरे सब जगमें । उसमें क्या है नवाइ ॥ सु ॥ ५॥ महा दुःख दाता दुर्गुणी शत्रु । तास दया कर छोडावे ॥ धन्ध २ धन्य हरी केशरी नन्दन । तुम जोडे कौन आवै ।। सु॥ से न छोडती कोडो उपावे । पन तेरा बचन न लोपाइ ।। नहीं मारु मुद्गल पड़ा रहो ब- न्धन । मरेगा योंही तडफडाई || सु ॥७॥ विकराल रुप मिटा निज देवी । दिव्य रु- प प्रगट करीया ॥ होकर संतुष्ट' कहे वीरसे । मांगे, सो देवु इणवीरीया |सु०॥ ८॥ वीर खण्ड ४ १देव पयम्पे कृपा करके । नयसार के बन्धन छोडो । इसके जीने से सब खुश होवेंगे । और न मुझे कुछ कोडो॥ सु ॥ ९ ॥ देवी कहे यह नहीं मेरे हाथे । वीर कहे यह क्या भा- खो । आपसे जबर और कौन जगत् में । आश्चर्य एहभी दाखो ॥ सु ॥ १० ॥ अमेरी कहे महा सती पतिवृता । त्रिकरण शुद्ध शील पाले । वो जो पाणी छाँटे इस दुष्टपर । तो छू वन्ध तत्काले ॥ सु ॥ ११ ॥.यों सुणकर सब जन हर्षाया। सतीयों बहुत जग । अभीही बन्ध मुक्त नृप करेगा। अन्त वरसे राणीयों बुलाइ ॥ सु ॥ १२ ॥ त्र- थम पटराणी आगे आइ । कहे देवीकी शाखे ॥ मुझ व्रत शुद्धतो प्राणेश छूटो। यों कह कर जल न्हाख ।। सु ॥ १३ ॥ पण किञ्चित प्रतीकारन चाला । पटराणी मी शरमाइ । पर नीचो मुख छिपी मेहल में । तव आगे दूसरी आइ ॥ सु ॥ १४ ॥ तैसेही किया प क वन्धन छूग । शरमा सो घर मे सिधाइ ।। यों सब राणीयों परिचय दाने । पण एक नकार्यज सोजाइ ॥ सु ॥ १५ ॥ तब नामाङ्कित गाम में की सतायो । अति आदरसे बुलाइ ।। राजवले आवे मान धरी के । पण कोइ न बन्ध छोडाइ ॥ सु ॥ १६ ॥ सवस भाजन आश्चर्य पाया। अरे कोइ न सती जग माही ॥ छोडन की नही देवी के मन में क्यों अबला का मान गमाई ।। सु ॥ १७ ॥ मनोगत देवी जाने सब के । कहे अं- ६१ ब मो सर्व मुणो लोगो । काया से शील पाले बहुतेरी । उसका मुख क्या छागा "सारमा अवाल पनसे मन मात्र कर । अन्य नरको नही वांछे । सोही महा सती जगमें पू- जावै । ऐमी मिले तो वन्ध काटे ॥ सु ॥ १९ ॥ सब कहे ऐसी महीला जगमे । निश्च- न मिले कोइ ॥ नरसे अष्ट गुणा काम कामनीके । तो मन स्थिर कैसे होइ ॥ सु॥ ॥ नमिले सती न बन्ध छुटे । न नृपती जीवीता रहावे ॥ मारण की देवी के मन में । तो सारा कौन करावे ॥ सु ॥२१॥ निरासा हुइ रायका मन में । महा वेदना भड- काइ ॥ विननीर मान ज्यो तडफण लगो । पशु परे अरडाई ॥ सु ॥ २२ ॥ तब वीर म न कुरुणा उभराइ । देवी चरण मुंक ठाइ ॥ कहे कर जोडी माजी आप बतावो। त्रिया कहासे पार ॥ सु।। २३ ॥ देवी कहे इस वसुधरा में । यद्यपी रत्न बहुत पावै ॥ सही नगर में पुप्फा गणिका घर । कुसुमश्री सती रहावे ॥ सु ॥ २४ ॥ ते आकर जो पाणी छोटे । तो निश्चय वन्ध तूटे । सुनके खुशी हुवे राजा परजा । वारजी का वैम छु ।सु ॥ २५ ॥ यहतो काम हुवा अति सुन्दर । इस गामेही निकलङ्ख थावे ॥ ढाल अमोल भणीयह आठवी । चौथे खण्ड सोभावे ॥ सु २६ ॥ ॥ दोहा ।। मन्त्रि साम- न्त उमराव मिल । शिविका सज कराय॥ वाजिब नाद बहूत जन सङ्ग। पुप्फा के घर आ टे खण्ड श पहोंता तिहारे । यह जोग बना श्रेयकोरे ॥ वि॥१८॥ धीज करण वक्त आइसोक वी कु-वरं सब सन्मुख जाइ । ज्यो नाथ को विश्वास आइजी ॥ वि ॥ १९ ॥ ज्यों नाग कंचु- की त्यागे । त्यों घर तज सती तब भागे । वैठी शिवकामें सब हुवा आगेजी ॥ वि ॥ २०॥ बजित्र आडम्बर जावे । छत्र थारे चमर दुलावे । सव गुण सती के गावेहो ॥वि ॥ २१ ॥ वेस्याके घर रेइ । विशुद्ध शील राखेइ । धन्य २ सती इण नेइहो । वि।॥२२॥ तब छेल छबिला भाखे । हम गये इस घर धर न्हाख । पण देखी नहीं कोइ आँखे हो॥ वि ॥ २३ ।। पुप्फादि गणीका सारी । भेलाहो हंसे विचारी । कैसे सती रही यह नारी हो । वि ।। २४ ॥ लक्खों सोनैया लीधा । घणा कामी को पसन्द कीधा । देवी भरो सा कैसे दीपाहो ॥ वि ॥ २५ ।। चलो देखें यह भी तमाशा । कैसे काटे नृपकी फासा ॥ चाली सब करती हांसा हो ॥ वि ॥ २६ ॥ सती आये पहिले राज माहें । वहू लोक गये भराइजी ॥ पीछेसे सेविका आइ हो । वि ॥ २७ ॥ जय सती २ धुनकारे । अका शभा मझारे जी । देवी को किया नमस्कार हो ॥ वि ॥ २८ ॥ वारीको कळशकर लेइ । अधो दृष्टि ऊंचेश्वर केइजी । मेरे साक्षी केवली छेइ हो । वि ॥ २९ ॥ वारसेण नृपति. त्यागी । अन्य से मनसा नहीं लागी। तो फासी जावो भागी हो । वि ॥ ३० यो कही छोटा वरि । नृप छुट्टा भया तत्काली। हुइ जय ध्वनि उस वारी हो ।वि।। ३१ ।। सुगन्धोदक पुष्प वर्षाये । सच्च शील प्रभाव दर्शाये । नव ढाल अमोलक गाये हो । वी ।। २३ ॥ * ॥ दोहा । सब चिन्ते कौन विश्वद्धज । वीरसेण नामे राय ।। की यह अर्धाइना । प्राणी पुण्य सिर ताज ॥ १॥ शरमी ऊठे नयसारजी। करदेवी को नमस्कार ॥ फिर वीरसेण कुसुमश्री के । पकडे चउ चरणार ॥ २ ॥ नम्र भूत अर्जी । करिये अपराध माफ ॥ मुझ अपकार उपकार तुम । अथाग को कथे साफ।। ३|| वीरसेण कहे रायजी । दुःख सुख कर्म से पाय ॥ आप प्रसादे से दोनो हम। विश्वमे गये प्रकटाय ॥ ४ ॥ सब समझे यह दम्पती । शील विशुद्ध सुरी पूज्य ॥ जग भूपण धन्य उभय को । जोडा मिला संतुज ॥ ५॥ ॥ ढाल १० वी ॥ गोपीचन्द लडका।यह.। सत्य शील प्रसादे । आखीर सव सुख पाय है ॥ आ॥ यह ॥ त्रिदशी के चरणों मे नमकर । वीरसेण पूछन्त ॥ वैश्याके घर में रह नारी । कैसे रही शुद्ध शील वन्तजी ॥ सत्य ॥ १ ॥ सूर कहे सब सुणो शभा जन । इस महा पुरुष की बात ।। कन्क शाल हरी केशरी नन्दन । व्यावन रत्न पुरा आतजी ॥ सत्य ॥ २॥ रणधीर नृप पुती कुसुम श्री। परणे उत्सव सङ्ग ॥ तोता अश्व शैय्या डायजे में । दी सुसरे घर रह जी।सत्य।।
खण्ड ४ ६४ श॥राज जमात कोदे रणधीरजी । ले दीक्षा मोक्ष साधाया॥ वारसेण परिवारभेटने । कन्क साल को जाया जी ॥ सत्य ॥ ४ ॥ नाम भूल कुसुमपुरी कहवा । तहां नयसार करी कुचोरा ॥ इन मुझ अष्टम कर आराधी । मे दीया वचन प्रेम जेसिजी ॥ सत्य ॥ ५॥ अ शुभ उदयं तुम रहेगा जहां तक । करुंगा उचित में सहाय ॥ शुभ प्रगटे वहां में प्रगट । देवूगा सब जोग मिलायजी ॥ सत्य ॥ ६ ॥ वणीये इने समुद्र मे डाले। वहां भी मेने उवारे ॥ तोभी डूबी जहाज तीनों विछडे । कर्म आगे क्या सारेजी ॥ सत्य ॥७॥ छूटा पटीया सती गइ मछोदरें। धीवर ला बेंची वैश्याने ॥ मच्छ फाडते जीवती निक- ली। किये उपचार बचाने जी ॥ सत्य ॥ ८॥ अपार द्रव्य खरच कानी साजी ॥ फिर गणीका भोग आमन्त्रे ॥ नहीं माने मांगे खरचा देहम क्या करे पड़ी पर तन्त्रेजीस त्य ॥ ९॥ शील रक्षण पक्षीयों को चुगाइ । विबुद्ध तोता मिलाया ॥ इन ठगे सब का मीयों ताइ । वैस्यका कर्ज चुकायाजी ॥ सत्य ॥ १० ॥ पहले मंजन दूसरे भोजन । नृ त तीसर चौथे गान ॥ यों कामी चौपेहर भरमाये । गये सो सब रहे जान जी ॥ सत्य॥ ११ ।। यह सब युक्ति पोपट की है । सतीन जाने लगार ॥ सती सातवी मजले धर्म ध्यान ।करती दिन गुजार जी ।। सत्य ।। १२ ।। उधी कण्ठे मुरछा खाइ । पडे नृप वीरसेण ॥
वसुपत शेठ उठाकर लेगया । ओपधी देकिया चेन जी ॥ सत्य ।। १३ ।। पुत्रपरे घर मा लक बनाकर । वसुपत पाये मरण ।। वेपार मिस परदेश में निकले । पत्नीकी चौकसक रणजी ॥ सत्य ॥ १४ ॥ इहां आया गया पत्नी सदने । शदीत हो तब नीसरीया ।। धीज करण की तव सुचना । सती ध्यान तब धरीया जी ॥ सत्य ॥ १५ ॥ सत्य शील ढया दान प्रसादे । पाप थोडा में खपाया । अशुभ पकी झड गये आत्म से । शुभ-त- दा प्रगटायाजी ॥ सत्य ॥ १६ ॥ चोरही शिक्षा कर्म से पाया । सत्यवन्त सत्य प्रगटाया में भी महारा वचन निभाया । सो वस भणी जणायाजी ॥ सत्य ॥१७ ॥ यो सुन वी रसेण हर्षाया। विस्माया सव लोक ॥ केइ वीर की केइ सती की शुक की । सराइ बु- द्धि विलोकजी ॥ सत्य ॥ १८ ॥ दम्पति करजोडी कहे सुरी से । जबर किया उपकार । आप कृपासे पीछा पाया । ऋदि सिद्धि सुख सारजी ॥ सत्य ॥ १९ ॥ सुरी कहे तुमसम सती सन्त की। कहां मुझ भाग्य में सेव ॥ कर्म टालने नहीं मे समर्थ । पुण्य मिल्या सुख हेवजी ।। सत्य ॥ २० ॥ सर्व समक्षे भेटकलं एक । तेस्वीकारो आप । कुसुम पुरीका राज कीजीये । छोड्न सेवा कदापजी ॥ सत्य ।। २१ ॥ में अब जाकर पुरी वसा फि र सामन्तो पगबुं । उनके साथ आप पधारजो । येहीज में चित्त चहाबुजी सत्य।।२२।।
खण्ड४ तब अश्व शैया नयसार सोपी । गइ वस्तु पुनः पाया ॥ पुण्य प्रगटयां सब सुख प्रगट्या वीरसेण हर्षायाजी ॥सत्य।।२३।। याद किया से हजार होवूगा । यों कही देवी जावे ॥ महीमा शीलकी ढाल नववी में । ऋपि अमोलक गावेजी ॥ सत्य ॥ २४ ॥ ॥ दो- हा।। पुण्य पसाये वीर नृप । कीर्ती नोवत घुराय ॥ निकलङ्क नारी शुक तुरी। शैय्यामि- ६५ भली पुनः आय ॥ १ ॥ निज तात पुर जान को । दम्पनि हुवे तैयार ।। नयसार आडा फिरा । नजानैदु इसवार ॥ २ ॥ दुःख अति पाये मेरेसे । ते ऋण फेंडन काज ॥ कुछे क सेवालीजीये। मान विनंति राज ॥ ३ ।। अति अग्रह जाणी रहे । अन्य मेहले सप. रिवार ॥ भोगो पभोग दासादिक । सब सुख विलसे सार ॥ ४॥ सब लोक गये निज घरे । यशः पसरा मुल्क मांय ॥ धन्य वसुधा तेविष । हुवे रत्न ऐसे पेदाय ॥ ५ ॥ * ॥ ढाल ११ वी ॥ घुडला गज घेवर ।। यह ॥ उस अवसर माहे । भृगूपुरी के लो. क ॥ सुणी कुमर पर संस्था । बंधन चला सब थोक ॥१॥ राय शमा केमाही । आयास वही साथ ॥ परन्तु गडवड माहें । कर नहीं सके कुछ बात ॥ २॥ देखी कुमर की ऋ. द्धि । अश्चर्य जनक करामात ॥ अपछरा जैसी नारी । इन्द्रसी ऋद्धिसाक्षात ॥३॥ चि अहो गंभीर्यता । कभी नहीं करी बात ।। अपने समहो रहे । किये काम साक्षात ॥
* ४ ॥ अब वसुपत घर की । कौन करगे संभाल ॥ यहतो निश्चन्तहो वैठे वन भूपाल ५ एकन्त मेहल मांय । देखे कुमर जिसवार ॥ सब अधारे होकर । आये तहा तत्काल ॥ ६॥ देखी साथी जन को । वीरजी अति हाय ॥ ऊठ सन्मुख आया । कियो सत्कार सवा ॥ ७॥ पहिले की तरहही । वैठे सव बरोवर ।। सुख साता पूछे । तब देवे सो उ र ॥ ८॥ हम सवों की साता । हे जी आपके पास ॥ रचना दखी आजकी । हमम न हुवा निरास ॥ ९॥ हम आप हाथ नीचे । पाये बहूत आणन्द ॥ अव आपके हमा रे। कैसे रहे पूर्व समन्द ॥ १०॥ कोन संभालेगे । शेठ धन परिवार ॥ वेतो आप के सुपरत । कर गये सव संभार ॥११ ॥ इतने दिन माहें । आपका सच्चा अवदात ॥ जरा न दर्शाया । आज देखा साक्षात ॥ १२ ॥ यह कपट आपको । करना नहीथा जोग । आ हमारे छाने । मिलाया सव संयोग ।। १३ ।। कुमर कहे भाइजी । नगरदेखने के का म । में निकल अया यहा । दुःखी देखे नर वाम ॥१४॥ तस साता कारण । करे यथा शक्ति उपाय ॥ आप पुण्य पसाये | गइ ऋद्धि मिली आय ॥१५॥ सब सराजामले इ । आप आवो इण स्थान ॥ नीचे की मजल मे । सुख से रहो खान पान ॥ १६ ॥ फिर अपन सब मिलके । करेगे उचित सब काम ॥ और भृगूपुर से बोलावोबडे नरआ खण्ड ४ वी कु ६१ म ॥ १७॥ यो सुन सब हर्षे । रहे उसी स्थान आय ॥ भूगूपुर से आये वृद्ध नर ते ठा य ॥ १८ ॥ कूमर साथे मिल । उचित विचार सव कीध ॥ उत्तम नर देखी । शेठ के ना दीध ॥ १९ ॥ कुलरीती सर्व ही । दीधी सर्व वताय ।। गुप्त चोडेकी ऋद्धि दीनी संभलाय ॥ २०॥ वली पलंग पसाये । बहू मूल्य भूपण निकाल ॥ यथा उचित सव को । देकर किये खुशाल ॥ २१ ॥ इच्छा सव पूरी। दिये निज घर को पहोंचाय ॥ सब रहे सुखमाही । कुमरजी का गुणगाय ॥ २२ ।। फिर वीर कुमरजी । शुक पत्नी एकन्त वीराज ।। करी बातों मनकी । जो इतने दिनों रहीथी भराज ॥ २३ ॥ सती अ भि ग्रह फलीयो । आविल तप पारणा कीध ॥ जीभ्या इच्छित भोजन । शुक कोभी मे वा दाध ॥ २४ ॥ रहे सदा सुख माही। चारों रत्न सङ्ग वीरसेण ॥ कहा अमोल चौथा खण्ड । ढाल इग्यारे सुसयोगेन ।। २५ ॥ ।। हरी गित छन्द ॥ श्रीवीरसेण समुद्र पा रहो । वसुपत घर पति भये ॥ करदेशाटन पत्नी शुक शैया तुरी चउमिलगये ॥ विद्या घर नयसार देवी दत्तपुत्रादि मध्यकये॥श्रीपुरनगरसबसुसेड्डारहै अमो. पुण्य सेसुख लगये? परम पुज्य श्री कहानजी ऋपिजी महाराज के सम्प्रदाय के वाल ब्रह्मचारी मुनिश्रीअमो लक ऋपिजी महाराज रचित श्रीवीरसेण कू. चरितका शील प्रभाव नामक च.ख.॥समाप्त।
॥ दोहा ।। परम पावत्र परमात्मा । 'अरिहंत सिद्ध मुनिइश । उपाध्यायः मुनिवरजी प्रणमु चरण पर सीश ॥१॥ दधी मथन नवनीत सम । सारांश पञ्चम खण्ड ॥ पुरु- पार्थ धर्मार्थ फल । सुणो भव्य मन अखण्ड ॥२॥ शील सत्यसे इह भवे । मिले ऋास जन मान ॥ पर भव स्वर्ग ऽपवर्ग लहै । वीर कुसुमा के समान ॥३॥ श्रीपुर मे नय- सार घर । पूर्व पुण्य पसाय ॥ नित्य नवले सुख भोगवे । युगल सदा आनन्द माय।४। इच्छित दायनी सेजसे । कहाडे-बहुत धन आहार ॥ खरचे खरचावे लाभले । दान पुण्य विवहार ॥ ५ ।। मन विन दान होवे नहीं । दान विन कीर्ती नाय ॥ हाथ पोला का जग गोला । कहवत जग कह वाय ॥ ६॥ अवसर जाके कचरी मे । करे अदल इन्सा ॥ आश्चर्य पाय शभा सभी । परसंशे नृप आप॥७॥दुःखी दरिद्रि कोइ आयके । करे वीर मुलाकात ॥ यथा शक्ति 'इच्छित दये । ताते हुवे विख्यात ॥ ८॥ यों सुखे काल शीघ्रही गमे । अव आगे लाभ की वात॥ तज प्रमाद श्रोता सुणो । धारो जो-पाली जात ॥ ९ ॥ ढाल १ ली ॥ ललनाहो ॥ यह ।। कुसुमपुरी पोल वासीनी । देवी गई स्वस्थान ललनाहो ॥ भागे सब जन लायके । वसायापुर भर भान ललनाहो ॥ सुणना चरित्र सुहामणा ॥ १ ॥ भण्डार धन से पूर्ण भरे । सेना समेलन कीध ल..॥ मेहल म- खण्ड४ कु हुवा उदास लः॥ पहोंचाने वहुते चले । आये.सीम तक सबहाल ल.॥ सु॥२२॥ न मन करी सवयों कहे । रखना हमपर मेहर ल. ॥ भूलना मत जानो आपके । दर्शनशी घ. देना फेर ल..॥ सु २३ ॥ वारजी सव को सन्तोपीये । नयना श्रुत सब फिर जाय ल ॥ ढाल प्रथम खण्ड पंचमें । ऋपि अमोलक गाय ललनाहो ॥ सु ॥२४॥ दोहा ॥ सुखे मुकाम करते थके । आये कुसुमपुर बार' । प्रजा आइ सन्मुखे । लुली किया नमस्कार ॥ १॥ सोवागणी कड पुत्रले । दधी घट शिरे वधाय ॥ गान वाजिब जयदनी । उतरे वाग में आय ॥ २॥ तखंतारूंढ शुभ महूर्तमें । हुवे शुरी कुसूम बर्षाय । स्वजन परजन आणन्दिये । रही बधाइ बटाय ॥ ३॥ देव दोगुंदक की तरह ॥ भोगवे सुख नित-मेव ॥ वीते दुःख सब भूलीये । पूण्येकी यही देव॥४॥राजाराणी परजा सुखी। आनन्दे का हाल वीतया ॥ अव कहूं पीछे की कथा । जासे सम्बन्ध मिलजाय ।। ५॥ ढाल २ री॥ व इम बोले ॥ यह. ॥ श्रीवीरसेण रत्नपुरी थकीजी सेना मेलीथीलार।। हूकम प्रमाणे लती । पहोंची कन्क शाल के द्वारजी ॥ सजन प्रेम देखो ॥१॥ सामाडीये दल दे के । घवराइ पूछा करन्त ॥ किसका.दल कैसे आयाहै । सत्य कहो जो होवे चित्त स *, जी॥ स ॥२॥ फोजा धाप कहे वीरसेण काजी। जाणो यह सब परिवार ॥ वो आ -- ३ पाकर सबी ही लोको । देख दृष्टिं पसार । आसपास चौबीजू जोतां। दिखे न कोइ प्रकार जी। अ॥ २ ॥ इतने में ऊमा रहा आकार । सिर उपर वीमान ॥ सब जन चित में खन्डर चमक के सरे । देखन लगे असमान ॥ थक हुवे तस तेज प्रतापे । साक्षात जाने भान जी ॥ अ-॥ ३॥ विद्या धर के देव हे सरे । क्यों स्थंभा यहां यान ॥ के इस मे हे वीर सेण जी । लाय देव कोइ तानं ॥ इत्यादि केइ कल्पना सरे । ऊपजी केइ मन म्यानजी ॥॥४॥ विमान स्थंमा जान के सरे । वीरजी नीचे जोए । स्वजन सेना ठाठ सो देखी । हपश्चिर्या चित्त हाए। क्यों यहां सब सज आकर ऊभे । कारण होगा कोएजी ।। अ ॥ ५ ॥ इन्द्र इन्द्राणी कीपरे सरे । दम्पति नीचे आए ॥ इच्छित जोडी देख के सरे । ज य २ कार बधाएं ॥ धन्य सफल यह घडी हमारी । भेट जिनकी चहाए जी॥ ॥ ६॥ पि ताश्रीके चरणमे सरे । रखा सीस वीर आय ।। पूत्र पराक्रमी देखी ह । उठाकर हृदय लगा य ॥ सपूत देख सबही खुश होवे । तो माचित्र कहणा क्याय जी ॥ अ॥ ७॥ कुसुम श्री तिया मण्डल मे । गइ झांजार झण कार । सासू जीके पग लगी सरे। हर्षे दोनों अपार ।। पुष्प वृष्टि सवी के सिर ऊपर । देवी करी उसवार जी I वीछायत विछाय केसरे। सब बैठे एक स्थान ।। पीता श्रीसे वीरजी पूछे कहीये वीतक वायान ॥ आप सभी - जन भेल होकर क्यों आये इस स्थान जी ॥ अ॥९॥ हरी केशरी कह तुम तणी सर । भेजी सेना यहां आइ ।। तुम कोण देखे पूछते सर । आगे आये कहांइ ॥ चौकस क री पता नहीं लागतासरे । सबजने गये घबराई जी ।। अ॥१०॥ आकाश वाणी हु। उसी वक्त । इस वक्त के मांय ॥ सुख से दम्पती आयंगे सरे । सुनकर सब होय ॥ सी प्रमाणे हम सबी मिल । तुम सामे आये चलाय जी.॥ अ ॥११॥ तुम इतने दिन कहां विलमे थे । सो कहीए समाचार । तब शुक कहे सुणीयो सब लोको । वीर वीतक प्रकार ॥ सती सतवन्त की कथा सुणने से । होवे पाप उदारजी ॥ अ ॥ १२ ॥ रत्न पुरीसे निकल लिये सरे ॥ सजन दर्शन काज ॥ उतावले हुवे वीर जी सरे । उडन अ श्वारूढ थयाज ॥ कन्क शाल नाम भूलके सरे । कुसुम पुरा गया जरे ॥ अ॥ १३ ॥ अश्व और पलंग की सेर । चोरी हुइ उसवार ॥ जहाज बेठके चलीयसरे । फूी समुद्र म झार ॥ पटीया जोग राजा राणी । अलग २ चले त्यारजी ॥ अ॥ १४ ॥ मछोदर पड़ी कुसुम श्री जी । वीकी जा वैस्या घर ॥ शील रन अती जत्न से राखा । संकट, सहकई पर ॥ धीज करी प्रगट हुइ । मिले पति श्रीपुर जी ॥ अ॥ १५ ॥ वसुपत घर रहे वीर जीसरे । फिरे बहूत प्रदेश ॥ श्री पुर आये सव मिले सरे । किये सुखी वहां नरेश ॥ चौ २४३ खन्ड कु ७१ दो विद्या पाये । पुण्य फले विशेष जी ॥ सु॥ १६॥ कुसुम पुरकी देवी. इस बहूत ही सहाय ।। कुसुमपुरका राज भी दीना । ऋद्धी सिद्धी सधाय । आपको मिल ने आये सब । ऐसे कष्ट सहाय जी ॥सु॥ १७ ॥ इत्यादि सुनवीर चरित्रको । आ श्चर्य सब ही पाया । कितनी बात सुण हीया सरे । कितनीसे दुःख थाया ॥ शील स स उदारता क्षमा । यह गुग सव ही सराया जी ॥सु ॥ १८ ॥ वरिसेण जी मातेश्वरीके जाकर प्रण मे पाय ॥ पुत्र बहु की जोडी देखी। माता जी अति होय ॥ हृदय चम्पा प्रेमात्सुक होकर । सफल घडी सो जणाय जी ॥ सु ॥ १९ ॥ हानन्द की बटे वधाइ । भेटणा बहुते आय । सो स्वीकारी यथा योग सबको सत्कारे तव राय । मंजूल रागे सखी सहेल्या हिल मिल गीत रही गायजी ॥ सु ॥ २०॥ पुण्योदय प्राप्त हूवा सरे । संव होवे सु-संयोग ॥ यो सुख इच्छो तो करो सरे । निवर्य पुण्य सब लोग । पंचम खंडे ढाल ती सरी । कही अमोल गुण छोगजी ॥ सुणो ॥ २१ ॥ * ॥दोहा॥ अच्छा जोशी बोलाय के । अच्छा मुहूर्त देखाय ॥ ऊंच ग्रह चन्द्र योग सुभ । देख जोतिषी फरमाय ॥१॥ स्थिर चंद्र शुभ लम यह । अभी ही है महाराज ।। इस ही वक्त प्रवेश से । सिद्ध होवे स व काज ॥२॥ यो सुण सब खुशी होवे। सेना मेली कीध ॥ यथा योग वाहण चडे । नो बत डंका दीय ॥ ३ ॥ माटे गयवर ऊपरे । हरी केशरी वीर सेण । बैठे चामर छत्र युत्त । विरूधावली गर्जेण ॥४॥ प्रिती मती कुसुम श्री। बैठी महारथ माय ॥ बहु देशी बहु दासीयों । पखिरी गीत गरणाय ॥ ५॥ ॥ हाल ४थी । आज आनन्द घन जो गीश्वर आया ॥ यह ॥ आनन्द घन आज चिन्तित सार्या । सजोडे कुमर पधारेलो ॥ आरी जन का तो मुखडा उतार्या । सजनोंका हुवा धायारे लो ॥ आ ॥१॥ फोज यथा योग्य सर्व सज़ाइ । आगे कोतल चाल्यारे लो। तस पीछे पायक शस्त्र वकासज । तस पीछे अश्व अणी काइरे लो ॥ आ॥ २ ॥ तस पीछे श्रेष्ट कूजर नृपका। आगे पी वी नचाइरे लो । वंदी जन विरुदावली बोले । भाट चारणों बोले बडाइरे लो ॥ ॥३॥ अमोघ धारसे दान सवी को। अर्प कुमर उमाइरे लो॥ दारिद्रीके दारिद्र गमावे । जाचक अति सन्तोष्याइरेलो ॥ आ॥ ४ ॥ दोनों वाजु गज सब सिणगरें । मेघ घटा जैसा कालारे लो ।। रत्न होदा बीजली परे चपके । गरजे गुल गुलाट मतवालारे लो ॥आ। ५॥ तस पाठल शीवका और पनिस । तामे श्रेष्टि बैठाइरे लो॥ दूंदाला फूंदाला रूपाला छोगाला । वस्त्र भूषण सोभाइरे लो ॥ आ॥ ६॥ ता पीछ रथ जरी झुलर शोभे । राण्या मेठान्या वेठाइरे लो ॥ देश अहारे की पखिरी दासीयों । निज २ भाषा में गीत गाइरे - खन्ड लो॥ आ ॥ ७॥ अनेक प्रकार के वाजिब बाजे । तासे अम्बर गाजरे लो ॥ इत्यादि सब गठ से चाले । नगर में महाराजेरे लो ॥ आ॥८॥ सोले सिणगार सोवागणस जाइ। सिर घट केड पुत्र सहारे लो । शुभ शकुन देने सन्मुख आइ । दक्षीणे ऊभी रहा इरेलो ॥ आ॥ ९ ॥ बजार गली हाट हवेली माई । नरनारी अति ही भर्याइरे लो॥ देखने सायवी ऊभे उमाइ । चौ वाजु नरछत छाइरेलो ॥ आ॥ १०॥ जोहरी वजारे स वारी आइ । शाह मोतीयों के मेह वाइरेलो॥जय वीजय कुमरजीकी जय बोल्याइ । यो आये राज मेहल माहोरे लो.॥ आ॥ ११॥ वाहग तज सिंहासग बेठे । तात तनुज खुशी साइरे लो। और यथा योग स्थान बैठाइ । तंवोल मीठाइ बटाइरे लो ॥ आ॥ १२ ॥ फिर सब निज २ स्थान गयाइ । सब पक्कान निपाइ जीम्याइरे लो॥ अष्टानिक महोत्सव पुर मे मंडाइ । वंदीवान छोड्याइरे लो ॥ आ॥ १३ ॥ हांसल दंड को दीये घटाइ । तोला मापा बधाइरे लो । सजनो को इच्छित दें पोपे । यो सव को सन्तोष्या इरे लो ॥ आ॥१४॥ राज परजा देश जन सघलाइ । आनन्दे काल वीताइरे लो। अ व आगे सुणो धर्म कथाइ । जो दोनों भव सुख दाइरे लो ॥ आ ॥ १५ ॥ तेही काल अवसर माही । धर्म प्रिय ऋपि राइरेलों ॥ चरण करण गुणी विद्या सागर । बहूतमुनि ७२ परिवर्याइरे लो |आ।। १६ ॥ अमति वन्ध विहार करन्ता । तारता भव्य गण तांइरेलो कन्कशाल के सुमही उध्यान । पधारे सबमुनिराइरलो।१७योग्य जागारू अचित वस्तु को । जाची उतर्या वाग माहोरेलो ॥ ज्ञान ध्यान तप सयम करके । रहे निज आत्मा भाइरे लो ॥आ॥१८ ॥ दीनी वधाइ वन पाल जाइ । सुन हर्षे वीर नृप सघलाइरे लो। व्य देइ मालिको संतोपा । फिर पोनादि सज कराइरे लो ॥आ१८॥ नृप कुमर राणी स ती सजन । सचीव उमराव परजाइरे लो । निज शके तव सिणगार सज कर । सविधी वन्दन चाल्याइरेलो ॥ आ॥ २० ॥ पंच अंग नमी वन्दन कीना । अदूर सामान्त वेग इरे लो ॥ तब आचार्य सबोध फरमावे । मो भव्य सुणो हित लाइरेलो ।। आ ।। २१ ।। अपार असार संसार के माइ । दुर्लभ नर देह पाइरे ला । मोक्षका कारण करलो कमाइ । तो जन्म मरण मिट जाइरे लो ॥ २२ ॥ अनित्य तन धन स्वार्थी सज्जन । काल सदा ढिग आइरे लो ।। शीन ही चेते सो सुख पावे । वक्त गमाइ पस्ताइरे लो आ ॥ २३ ॥ कभिभी मुनिकाजी मार्ग । लिया विना मूक्तिन पाइरेलो | फेरक्यो जानके भव बडावो चेतो! चेतो वक्त पाइरे लो। आ ।। ४२॥ कहना हमारा करना तुमारा । जो माने सो सुखपाइरे लो ।। इत्यादि बहुत भात समझाये । अमोल ढाल चौथी माहिरे लो।
it:२५ ॥ दोहा । सुण उपदेश ऋषि राज का, समझे बहुत भव्य लोक शा क्ति सम व्रत आचारी । गये तिज स्थान दे धोकं ॥१॥ श्रीहरी केशर राजची। ऊठे अ- 7 . ति हर्ष लायं । यथा विवी, वंदन करी । कहे सत्य वाणी ऋषिराय ।। ।। निग्रन्थं पर वचन श्रधीयः। फरसन, उत्कृष्ट चहाय ।। मुनि करों शीघ्रही करो, धर्म में दीलन थाय ।। ३॥ आनन्दी मुनि चरणवंद । आये निज महल माय ।। बात करी दीक्षा तणी । सुण सज्जन, सब आय.॥४॥ ॥ ढाल, ५मी ॥'उमीया अट याणी की देशी में ॥ वैरागी राग्य में रांचे. हो नहू जाचे सज्जन मिली उने । नहीं काचे निकले तेह ॥ जिनको चडे साचे हो वो राचे मुक्ति नारीपे । कोइ खेंचे धर्म स्नेह ॥ वै ॥१॥ प्रीयवती कर जोडी हो अङ्गमोडी कह नाथ सांभलो काइ । अमी क्या करो यह वात ॥ पचेन्द्रिय सु ख भोगा हो काम जो गो पुत्र है आप के । अब क्या इस में ज्यादा चहाते ॥ वैरा ॥ २॥ नृप कहे मामीनी सुनिये हो यह लुनिय पुण्य फल पूर्व के । कांइ आगे संघ नहीं आय ।। यह सुख दुःख के दाता हो नहीं चहाता मुजमन अब रती उमाता शिव लेवाय वि॥३॥ तब कहे राणी शाणी हो लाभाणी मन वैराग्य में । काई भली विचारी नाथ । जिस पदं को आप चाओहो उमावो उसी को माहेरे । मे आगा आपके साय ॥2॥ 2017 ४ ॥ तनवीरजी आय हा साथ लाये कुसूम ओ मणी काइ प्रणम तात पपाय ।।। नृप कहे राज सभालो हो तुम आलो आज्ञा हग भणी दोनो लेवे दीक्षा हित लाय ॥ वे ॥ ५ ॥ यो मुंन राज की वाणी हो विलखाणी कुमर कहे ऐसा हम आये मिलने काज। राज,पाठ नहीं चाहिये हो । मुज चाहिये सेवा आप की। यों कैसे तजो महाराज ॥ वै ॥६॥ सुख से रह घर मांही हो कमाइ करिये धर्म की । उस मे नहीं देखें अन्तराय ।। पिंथ संबर सामायि हो । सुखदायी यह भी है घणी । जिस से सबको सुख थाय ॥ वै ॥ ७ ॥ हरी केशरी यों कहते ते हो। यह वय है हमारी धर्म की । काल का नहीं श्वास। संजम सेही सुख पावे हो । मिटावे फेरे भ्रमण के । लूं नर मव लावा खास व ॥८॥जो तुम मुज मुख दाइ हो तो मनाइ अब करना नहीं। दोनों भव के सज्जन त्य ॥ राज संभाल ने जोग हो । तुम होगे सर्व गुण संपन्ना । अब मेर अन्तराय क्यों दाय ॥ वै॥ ९ ॥ इत्यादि: समझाया हो वह डाया कुमर सब समझीये ॥ कहते ने नारलाय ॥ करीये जैसे सुख पावे हो । कोन आडा आवे शुभ काम में । यो कहकर मोने रहाय ।। वै ॥ १०॥ कुसुम श्री तव आइहो । नरमाइ हट कर यों कहे । नहीं जान दूंगी लगारमा क्या-दुर्गण भरे में हो। सब छोडके जावो एकली। मुझे आपही का आ- खण्ड: कु धार ॥ वै॥१॥ में तो उत्साइ आइ हो आज्ञा मांइ रहूं आपके । आप करोगे मेरे लाड॥ सुरु कुछ न बतायेर हो । तरसाया उलटा काल जा। नहाखा मुमपर दुःख पहाड ॥ व ॥ १२ ॥ राणी जी तस बुचकारी हो । कहे म्हारी शागी बहू सुगो । क्यो आर्त व्य लाय ॥ तुम तोहो धणी शाणी हो । कोइ जीव समाणी पति भणी। और घरमें कमी कुछ नाय ॥ वै ॥ १३ ॥ तुम हुइ हो पर जोगी हो । अव दुःख भोगी हम क्या करे । कोइ तुम जैसी बहू पाय ।। यों बहुपर बहु समझाइ हो । धीरपाइ दे सुसती करी । भी चुप तव रहाय ।। वै ॥ १४ योगोत्सव कराया हा। बैठाया गादी कुमर भगी दी देश में आणा फिराय ॥ दीक्षा उत्तव मण्डायाहो । हुलसाया हीया राणी रायका सिणगा- से तन सझाय ॥वै ॥ १५ ॥ सहश्र पूरुष उठावे हा ॥ बैठावे ऐसी पालखी । काइ छत्र चमर ठूलाय ॥ बहू पर वाजा वाजत हो कांइ गाजत गगन गायन थकी । सहनों गम परिवयार्य ।। है ॥ १६ ॥ ॥ मध्य वजारस चाले हो निहाले जन नयनाश्रूत । केइ धन्य२ शब्द वधाय ॥ वाग के पास ही आया हो । देखाय दर्शन मुनि तणा । सव उतरे उस गय ।। वै ॥१७ ॥ उतरासण कर आइ हो । नमाइ पांचों अंगको। वंदणा कर कनं आय गोल अभिकर्मकी। आप विना जग माय।।व।२८ ७४ । तारो तारा तारो हो । उतारो पार भवोदधी । यो कह इशाण कुण आय ॥ पंच मुष्टि क र लोचो हो तजो सोचो वस्त्र भूषण तजे । साधु साध्वी लिग सजाय ।। वे ॥ १९ ।। आचार्य दिग आय के हो । सामायिक ली जावजीवाकी । करिया आत्म का काज॥ मनि पक्ति मे राजाजी हो । आर्याजी पंक्त राणी गइ.। यों मोक्ष पन्थ लगे आज ॥ ॥ २० ॥ सब सज्जन वन्दन कर के हो । चिन्ता धरकर गये निज २ घरे । रहते आ- णन्द माय ॥ पंच मे खण्डे पंचमी हो सुख संचमी ढाल कही भली । अमूल्य वैराग्य भ राय ॥ ॥ २१ ॥ ॥दोहा॥ श्री वीर सेण नृपती । सुख से पाले राज ॥ चउरंत चक्रवर्ती ज्यों । भोगवते पुण्य साज ।। १ ॥ रत्नपूर कन्क शालपुर ।। कूसुमपुर यह तीन ।। वीच के राजाओ वशकर । आणा पलावे परबीन ॥२ ॥ देवी सदा हुकमे रहे । श- य्या दे सुख साज । शुक रीजावे ज्ञाना नन्दे । अश्वदे इच्छित जागाज ॥३॥दोनों विद्या प्रभाव से । करते इच्छित काम ॥ दान पुण्य करे उलट धर । धर्म ध्यान मे हाम ॥४॥ परखी दिन पोपा करे । सामायिक त्रिकाल । जैनान्नति तन मन धने । करते हो उ- जमाल ॥ ५॥ दाल,६ ही ॥ कुमर अभय बुद्ध का भण्डारी ॥ यह०॥ जीवको धर्म है हिनकारी। यथ्या तथा सरदे पाले तो । होवे खेवा पारी । आं॥ अव हरिकेशरी खण्ड ७५ ऋपि राय जी, प्रगमे गुरू पाया । असेवना और ग्रहणा शिक्षा । सीखे नसाइ काया॥जी॥ १॥ द्वादशांगादि वहु पढीये । फिर शुभ परिणामो॥ अनेक प्रकार तप- श्चर्या मांडी। मोक्ष की धरी हामो ॥जी॥ २॥ द्रव्ये चौथ छः अठमादि । मासी अर्थ मां सी॥ भावे राग ढेर किये पतले । प्रमाद विनाशी ॥जी॥ ३ ।। अपूर्व करण आया मु- निवर को । क्षपक श्रेणी चडीया ॥ हो अपेदी सूक्ष्म सबराइ । मोह वैरी हणीया ॥जी॥ ४ ॥ तब पलायन हुये तीनो शत्रु, ज्ञान दर्शनावरणो। अन्तराय जाते प्रगटीया । विम भागगयो ल केवल ज्ञानो॥जी॥ ५ ॥ प्रियश्रीजी गुरुणी पास रही । ज्ञान उद्यम कीना ॥ फि र मांडी अति दुक्कर तपस्या । प्रमाद तज दीना ।। जी ॥ ६॥ कर्म खपाते पूर खूटे न ही। बीच में आयु खुटिया । छेद नारी लिंग वरी सुर पद्धी । पुण्य फळ लुटिया ॥जी॥ ७ भवान्तरे महा विदेह में मनुष्य हूइ | संयमपद धारी ॥ कर्म खपाइ केवल पाइ । होवेंगे अवीकारी ॥जी॥ ८॥ अब केवली घणामुनि संग, गाम नगर फिरता ॥ कन्कशाल सुमही उद्याने । ले आज्ञा उतरता ॥ जी ९॥ दी वधाइ माली आइ । केवली पधार्या नृप हाइ प्रीति दाने । बहु धन दे सत्का॥ जी ।। १० ॥ फिर चतुरंगी सेना सजा । संग ले परिखारा ॥ वन्दण व्याख्यान सुगन को चाले । परजा जान सारा ॥जी॥
११ विधी से वन्दन कर क बठा । हपयर अपारो ।। कूरुणा सिन्धू जग तारण कर दश ना उचारो ॥जी॥ १२॥ अहो भव्य जीवो अपार संसार में । अनन्त भ्रमण करता जन्म जरा रु रोग मरण के । दुःखसे अति डरता ॥जी॥ १३ ॥ औदारिक वैक्रिय ते जस कारमणा । मन वचन श्वाशो ॥ यह सातो पुद्गल गृही छोडे । सूक्ष्म बादर तासो।। जी ॥ १४ ॥ सातो के सब द्रव्य गृही छोडे। वादार कहवाये ॥ प्रथम औदारिक नन्तर वैक्रिय । अनुक्रमे सूक्ष्म थाय ॥ जी ॥ १५॥ सर्व लोक जन्म मरण कर फरसा । क्षेत्र परावृत वादर । मेरु से असंख्यात श्रेणी आकाश की, फरसी फिरी सादर ॥जी॥१६ । एक एक श्रेणी उपर निरन्तर । आद अन्त किया मरणा। यों अनुक्रम से सब श्रेणी फरसी । सो सूक्ष्म वरणा ॥ जी ॥ १७ ॥ समय आंवली आदि काल सब । जन्म मर ण फरसा ॥ सो बादर काल परावर्तन । सूक्ष्म होवे ऐसा ॥जी॥ १८॥ सर्पणीके पहि लेही समयमें । जन्म धरी मरीया ॥ दुसरी सरपणी के समय दूसरायों समय पूर्ण करिया ॥जी॥ १९ ॥ यो आंवलिका लव मूहूर्त दिन । पक्ष मांस वर्षों । पल्य सागार सर्पणी काल चक्कर । मर अनुक्रम फयों ॥जी॥ २०॥ भाव परावर्त मीणा अती है वर्णादि की स बोलो। जिन के सब पुद्गल फर्श छोडे । बादर ते तोलो ॥जी॥ २१॥ सूक्ष्म प्रथम खण्ड५ एक गुणकालो । बढता अनन्त गुणो ॥ यों बीसौं फर से अनुक्रम से, भाव सूक्ष्म सुणो, ॥ जी ॥२ ।। सब मिल एक पुद्गल परावर्तन । जिन जी फरमाया ॥ ऐसे अनन्त पुद्गल परा वर्तन । कर के अपन आया ॥ जी ।। २३ ॥ पापोदय दुःख पुण्योदय सुख ! उलट पुलट पाया ।। राग द्वेप कर कर्म संञ्चये । गोता बहु खाया ।। जी ॥२४॥ ज्ञान से जाणो दर्शन से श्रयो । हेय चरित्रे सागो। पूर्वोपार्जित तप से खपावो । यो मोक्ष पन्थ लागो ॥जी॥ २५।मनुष्य जन्म का सार ज्ञान है । ज्ञान सार दया ॥ ज्ञान दया दोनों आराधी मोक्ष घणा गया । जी. ॥.२६ ॥ भव भ्रमण टालन उपाव यह । आराधी सुखी होवो, छटी दाल यह कहे अमोलक । वक्तमती खोवो ॥ जी ॥ २७ ॥ ॥ दोहा ।। सुन उपदेश ऋ पि राज का । हर्षे सब समा जन ॥ वीर सेण कर जोड तव । पूछे करी नमन ॥१॥ सर्वज्ञ जी सर्व जानो हो। त्रिकाल के भाव ॥ आपही संशय छेदकर। वढावो धर्म उत्सा व.॥२॥ क्या कर्म से ऋद्धि लही। क्या करें पाया दुःख ।। वियोग संयोग आदि क, थन । प्रकाशो स्वमुख ॥ ३॥ केवली कहे देवानु प्रिय । सहज से कर्म बंधाय ॥ कडक फळ भोगवते । अति ही मन पस्ताय ॥ ४॥ दत्त चित्त सुणी यों सबी। पूर्व व विग्नन्त ॥ कर्म वन्धको डर धरी । तज अप वनीये सन्त ॥ ५॥ ॥ दाल७वी।।
* सुगो चन्दाजी।।यहाणो राजाजी। पूर्व भवकी कहणीजाणी चतजो। सुख साजाजी पुण्य फले फले फलीयोतेलुगजो खेतजी।आइसही जम्बू द्वीपमाहीएरावत क्षेत्र कहवाइवोहीहै इसही भरतससाही अतीत काले आरे तीसरे माही।सुगोशाबराडी देश वस्थलपुरी।शोभित उभय भयसे दूरी । ऋद्धि सिद्धि से भरपूरी । देवलोकसी सनूरी ॥ सुगो ॥२॥ तास पति सोहं- क, राणो । न्याय नीती का घणा जाणो । पशू परजाका पाले प्राणो ॥ महा परतापी घणा गुण खाणो ॥ सुगो ॥ ३ ॥ राणी सोभाग्यवति सती । शील रूप गूणे मोहे पति। नमन खमण गुग देती रति । पुन्य सुख भोगवे काल गति ॥ सुणो ॥ ४ ॥ एकदा रा- णी के गर्भ मया। नवमास गये जन्म भया । गुगे क्षेमकर नामठया । भणी गुणी परवीन भया ॥ सुणो ॥ ५॥ दुसरा-पुत्र और भी भया । नाम प्रियंकर तास ठया । स्वभाव से भोला रया । दोनो साथ ही रहे प्रेम गया ।। गुणों ।। ६ ।। लघु बन्धव भोलप भासी।जेष्ट बन्धन करे हांसी।वहुत चिडाइ उपजावे वगासी । यो नानाविध करता मासी ॥ सुणो॥७॥ क्षेमंकर परणा वेगवती । रूप सुगो मे शोमे अति । एक स्वभा वी पतनी पति । वो भी देवर से हसत्ती ।। सुगो॥ ८॥ प्रियंकर जोडी मिलाइ । प्रिय वती भोली परणाइ । सुख भोगवे सुखी राही । होनहार सो टले नाही ॥ सुणो ॥ ९ ॥ ।
खण्ड वडा माइ अरु मोजाइ । भोले दम्पति को चौडाइ । फिर मिष्ट बचने समझाई । यो बीते दिन बहूताइ । सुणो ॥ १०॥ एक दिन प्रियंकर पत्नी सङ्गे । खेलने गये वन में रखे पुष्करणी पर ऊभे उमंगे। तब बृद्ध बन्धव आया उसे दंगे ॥सुणो॥ ११॥ वावी में जा ना थोडा पानी । मनमाहे कितुहल आणी । धकेल दिया दोनों प्राणी । अचिन्त पडे गये घवरानी ॥ सुगो ॥ १२ ॥ तिर कर दोनों वाहिर आये । चिन्ते किसीने गिराये । देखे तो पता कुछ नहीं पाये। तब हंसी क्षेम कर प्रगटाये ॥ सुणो ॥ १३ ॥ प्रियवात अ ति शरमाइ । असुरत्त हो कहे भोला भाइ । यह हामी भली नहीं कहवाइ । मिष्ट बोल दोनों को लिये मनाइ ॥ सुणो ॥ १४ ॥ एक दिन कोइ पर्व आया। भोले दम्पति को नीमाया | क्षेम कर प्रियंकर को हँसाया । वंगवती प्रियवती को रमाया । सुगो॥१५॥ दोनों रस्ते दोनों ताइ । अन्धारे भवन में लेजाइ ॥ छोडके चूप वाहिर आइ । श्रवण दे दे सुणे सो करे काइ ॥ सु ॥ १६ ॥ दोनो आपस में अयडावे । भय भीत हो शोर करे अरडावे । चमक के भीत से भडकावे । यों भटकत घबराते बाहिर आवे ॥ सुगो॥ १७ ॥ दोनों हसते वाहिर रहीया | वो आकर ओलंभा दइया । मिष्ट बचने दोनों समझावइया । निज स्थान तास पहोंचावइया ।। सुगो । १८ ।। एकदा प्रियवती ताइ । आदरे वेगवती बोलाइ । वस्त्र भूपण खूब सजाइ । उंच सिंहासण-वेठाइ ।।सुगा।।१९।। दपर को तब वो लावे । कहे वेस्या बताईं घर में लाचे मोल भावे ते तहां आवे । प्रियवती कोतवावतावे ॥सुगो ॥ २०॥ दोनों गये तव शरमाइ | अलग २ भगे घरमाइ । जेठाणी अति ह- । यो हंसी मे कर्म कठण वधाइ ॥ सुगो॥ २१ ॥ यो सहज कर्म बधावे । वन्ध नि काचन उदय आवे । डरकर चेते सो सुख पावे । नहीं तो पीछे ते पस्तावे ।।सुगो।।२२ ॥ यह दाल सातवी माइ । कर्म बन्धन रीति दर्शाइ । हंसी न करे सो सुखपाइ । अमोल उ देश कथे हित चहाइ । सुगो ॥ २३॥ दोहा ॥ एकादा बैठे गोखमे । पेखत पुर रचनाय ॥ देखे पन्थे मुनिवरा । इर्या पेखत जाय ॥ १ ॥ कृष तन तप से हुवा ।तप तेजे दीपाय ॥ अन भूयण भूपित परे । रहा तन सोभाय ॥ २ ॥ तीसरे प्रहर मध्यान मे । चण्डै तपे पर चण्ड । तो भी गजगति चालते । रखके धैर्य अखंड ३॥ दखके हर्षा मन घणा । तुर्त आ वन्दे पाय ॥ अति अगृह लाये सदन मे । चारों अहार वहराय ॥४॥ कर जोड कर । फरमावो हमें धर्म ॥ मुनिजी कहे स्थानक मे । गुरु जी मिटावे ॥ ५॥ यों कहकर मुनिवर गये । करा आलोइ आहार ॥ क्षेमंकर वेगवती तदा वंदन हूवे तैयार ॥६॥ आये मुनिवर सन्मुखे । विविसे वन्धन कधि ॥ सन्मुख वैठे न
खन्ड५
महो । तव गुरु उपदेश दीध ॥७॥ ॐ ढाल ८वी। पूर्व गुवालिया तन मव जा ।। यह
॥ मुनि कहे भव्य सांभलो जी । सर्व जीव सुख चहाय ॥ अज्ञाने उपाव दुःख के करे
जी। तन धन जन पर लोभाय ॥ भविक जन सुनना धर्म प्रकार ॥ आं॥१॥ तन
वय पलटे वृद्ध होवेजी। धन पुण्य खुटने से जाय ॥ स्वार्थ सरे बदले सगाजी । कहो
कोन है सुखदाय ॥ ॥२॥ दीर्घ दृष्टिसे विचारतें जी । अनित्य सदा दु:ख कार ॥
ममत्व इस से उतार के जी। करो आत्म गुगे प्यार ॥ भ ॥ ३ ॥ धर्म ही गुण चैतन
तणा जी । भावे तस चउ भेद ॥ ज्ञाने जाणे श्रद्धं से मकिते जी । चारित्रे कर्म छेद ॥
म ॥ ४॥ द्रव्यं दाने शील तप मावना जी । इच्छित सुख दातार ॥ अनुक्रमे मोक्षस्थान
देजी । तास है विविध प्रकार ।। म ॥ ५॥ अभय दान सव में श्रेयजी । वचाने अना
थों के प्राण ॥ पाले निजात्म सम सवेजी । तलहे अमर विमाण ॥म ॥ ६॥ सूपात्र
मुनिवर तणाजी । आहार वस्त्रस्थान शिष्य ॥ प्रतिलाभे उलट भावसे जी । ताकी सब
जगीस । य ॥ ७॥ सधार्मी यों को पोपते जी । स्वामी बत्सल होय ॥ धर्म उपकर
ण पुस्तक देवे जी । धर्म दान कहवाय ॥ म ॥ ८॥ खाया तो अफल होवे जी। दि-
सो अफलं न होय ।। इस भव यश कीर्ती बडे.जी। परभव मी सुख जोय ॥भा॥९॥
या जानके उलट भाव से जी । करो दान का सदव्यय ॥ पुण्य पन्त धर्प वाद्ध करे जी प्राप्त लावा लेय ॥ म ॥ १० ॥ शील धर्म दूसरा कहाजी । सर्व व्रतो का मूल ।। मुन्द्र नरेन्द्र तस प्रमाणे जी । स्वर्ग मोक्षकासूल ||म।।११।। अब्रम्ह एकदा सेवतांजी । नव ला ख सन्नीविनाश । असंख्य असन्नी पचेन्द्रिय को जी। मोह बन्ध करे नाश ॥ भ।। १२॥ कोटी सोनेय दान देजी । कोइ एक दिन पाले जी शील ।। शीलका लाभ होवे घणाजी देवे दोनों भवलील ॥ भ ॥ १३॥ इन भवे बल बुद्धि क्रान्तीजी । रूप गुण वृधि पाय पर भव मोक्षगति लहेजी ।। निश्चय अमर गत जाय ॥म ॥ १४ ॥ जो सर्व न पाली सकोतो । अपरिग्रही करो त्याग ।। निज परणी ने तोपवे जी । न करे अधिक अनुरा ॥ ॐ ॥ १५ ।। फट परखी और दिन विरे जी । वली एकसे दूसरी बार ॥ श्रावक अव- सेवे नहीं जी। टाले सो टाले भारे ।। भ ॥ १६ ॥ यो उतार ने मोहको जी। अवसरे सब करे त्याग ।। यो आराध धर्म शील काजी । मिले मुक्ति मे माग ।। १७॥ तृतीय धर्म तपका कहाजी । अघ नग बजू समान ॥ दुकृत्य वन प्रजालने जी। दावा नलसा जान ॥भ ॥ १८॥ अनन्त मेरु मिश्री मखीजी। अनन्त समुद्र पीया दूध ॥ सर्व पुद्गल भखे वि श्वके जी । तोभी न आइ सुव ।।म ॥१९॥ अब तुच्छ प्राप्त वस्तू से जी । इच्छा न तृप्ति पा खण्ड बी कु. य ॥ अनन्त वक्त नर्कादि में। सही क्षुवा तृयाय ॥भ ॥ २०॥ तोमी गर्न सरी नहीं जी। अब बना सुजोग ।। यथा शक्ति तप समाचरो जी। मिटे द्रव्य भाव रोग॥भ ॥२१॥ दान शील तप यह तीनों जी । माल जानो श्रेयकार ।। चोथा भाव सिद्धि कहाजी। यथा तथ्य फल दातार ॥ भ ॥ २२ ॥ चडते माव तीनों किये जी । पावे उत्तम फल ॥ वि ना भाव वी आदरेजी । तुछ फल देत अचल ॥ भ ॥ २३ ॥ क्षयोपशम करते थके जीक्षा यक ता जब आय || सो रमे जब निजानन्दं में जी । सो सुख न, वरणाय ॥ ८ ॥ २४ ॥ आराधो.हित कर चहु जी । कहता ऋषि अमोल ॥ मुनिवोध वसुढाल में जी । अर्पे सुख अतोल ॥ भ ॥ २५ ॥ ॐ ॥ दोहा॥ यो सुन मुनि सदोध को । हर्षे दम्पति अपार ॥ सम्य क्त्व युत धारन किये । मर्यादें व्रत बार ॥ ॥ वन्दन कर आये घरे'। नित्य करे धर्म अभ्या स-॥ सामायिक पोषध व्रत । राके अव्रत खास ॥२॥ हंसी मे कर्म जो बन्धिये । आलोये नहीं तैय ।। निकाचित बन्ध सो पडा । अवस्य भोगवे जेह ॥ ३ ॥ दान देते उलट भाव से। शुद्धमन पाले शील ॥ तपस्या करते विविधपरे । भाव सब से मिल ॥४॥ चउविध कर्म आराधते । उन्नति कर जैन धर्म ॥ सेवा करे चारों तीर्थ की। जानते येही पर्म ॥ ५॥१॥ दाल ९वी ।। धन २ मेतारज मुनि ॥ यह ॥ जैसा कर्म करे जीवडा । फल तैसा पावै॥
आर्त किये आधिके बन्धे । ज्ञानी समसे खपावे ॥जेसा॥। एक दिन मुनि वन्दन करन विदेशी संघ आयो॥ तविषे एक श्राविका । धर्म रंग सवायो जैिसा॥२॥ निग्रन्थ के प्रवचन की । वो थी बहुत जाणो ॥ देख क्षेमंकर वेगवती। धर्मराग प्रगटाणो जे सा॥३॥ संघकी सेवा साच वी । जाते सुख से पहोचाया ।। प्रिय धर्मिणी को तहां रखी। ज्ञान लेवा उमाया॥जेसा॥४॥ मन तन धन से तेहनी । सेवा अति कीधि ॥ अन्त सम य साज तसदीयो । स्वर्ग गति लावीसो ॥जैसा॥५॥ प्रियंकर मणी धर्ममें । घालण कीना उपावो । अन्तराय उदय नहीं गृह्यो । रहीयो भोले भावो जिसा॥६॥ आयुर्वन्धको भो- गवी । प्रथम देवलोके ।। इन्द्रके सामानिक पने । पुण्य फल विलोके ||जैसा॥७॥ वेगव ती आयु क्षय करी । ताकी देवी उपन्नी।।भोले दम्पति दोनो मरी।हुव कुगति गमनी जै सा॥4॥ तुम यहां अलग २ ऊपना । मिला पुन्य से जागो॥ विप्ति भोगवी तुम घणी । सभलो पूर्व रोगो॥ जैसा।।९।। प्रियंकर बहू भव भमत | धनपति सेठ थइया ॥ कुसुम पुरी तुमको मिले। जहाज मे लगइया ।जैसा॥१०॥ वावी मे तसन्हाखीया । तिन समुद्र * में डाले ॥ हंसी करते देवर तणी। वेगवती फल भाले ॥जैसा||१|| प्रियवती पाप उदय से । वैश्य घर जाइ ॥ ताघर कुसुम श्रीगइ । पूर्व प्रीति पाल्याइ ॥जैसा ॥ १२ ॥ मोयरे मे .
खण्ड अदम्पति को । हांसी कर के भमाया ॥ दो घडी दो वर्ष तुम ॥ परदेशे, दुःख पाया ॥जैसे ॥१३॥ वैस्या बनाइ देराणी को । तातें वैम्या कहाइ । यो बन्ध निश्चय भोगवे । तब कोन होवे सहाइ । जैसा ॥ १४ ॥ ते श्राविका व्रत भंग से। भव के ताइ करने । कुसुम देवी हूइ । भइ सहायक तुमने ॥जैसा ॥ १५ ॥ संकट निवारी, यश कियो। सत्वर्म पसायो । दुःख दिये दुःख होते है । सुख से सुख पायो । जैसा ॥ १६ ।। चउ विधधर्म आराधीया । चारों रत्न तुम पाये ।। दान से धन पाया घणा । शीले रूप सवाया ॥जेसा। १७ ॥ तपुसे तेजस्वी हुवे । भाव से मिला चाया । प्रत्यक्ष फल यह धर्मके । तुमारे को बतायां ॥जैसा॥१८॥ करीये सो यहां पाये हो । करोगे सो पावोगे ॥ अवसर रूडा - यह मिला । सुज्ञ नहीं गमावोगा जैसा॥१९॥ प्रत्यक्ष परिचय प्रेक्षकर । कर्म वन्ध से डर जो। हाँसी ठोग छोडके । आत्म हित ने कर जो ॥जैसा ॥२०॥ नववी पञ्चम, खंड की। कही अमोल ढालो। चारोंही धर्म आराधने । होना उजमालो. जैसः॥२१॥दोहा।। यों पूर्व, भव सुग करी । कुसुम श्री वीरसेण ॥ हियापो करे मन विपे । सेन्दा लागे वेण ॥१॥ज्ञाना वरण पतले हुवे । जाति स्मरण ज्ञान ।। उपना जाणी सहूचरी । सत्य वचन भगवान।।२॥ करीये सोही पामीये । वैम नहीं इसमाय । अवन विगाई प्राप्त भव । करुं शिव सुख उपाव॥३॥ ॥ द , धन्य जो तजे संसारको । मेरी नहीं स्मर्थ ।,आगरी धर्म आदरी । करुं कुछ आत्म अर्थ ॥४॥ केवली कहे करो शक्ति सम । ढील तणा नहीं काम ॥ व्रत वरण सावध हुवे । ते सुणजो धर हाम ॥५४ाढाल २०वी ॥ या धर्म पावे तो कोइ पुण्यवन्त पावे ॥यह०॥ व्रत करके अव्रत घटावे । मोक्ष मार्ग सो पावेजी ।। येही सार नरदेह पाये का । कोइ व सुपन्थ आवेजी।बूत॥॥दोष आगरा रहित अरिहंत जी। शुद्ध देवसोही धारोजी ।। गुरु निग्रन्थ गुण सप्तवीस धारी । धर्म दया मझारोजी वृत ॥ २॥ स जीवोंकी हिंसा सागो बन्ध छेद अति भार वर जोजी । आहार पाणीको अन्तराय न देणी । स्थावर की यतना करजोजी॥ व्रत ||३॥ बड़ा मृपावाद निवारो । कूडा आल नहीं देणा जी। गुझ मक मत मरम प्रकाशो । वरजो कूबोध रू लिखाणाजी ॥ वृत ॥४॥ चोरी न करो चोरी व न लीजो । तोल मापा खोटा छोडोजी ॥ अच्छी बुरी वस्तु न मिलावो। राज विरोध तजो जोडोजी ॥वृत॥५॥ पर स्त्री संग अनंगक्रीडा न करणी । छोटी उमर कुंवारीत्यागो जी॥ वेस्या विदा स्वल्प काल की । नपुंसक संग मत लागोजी ॥ वृत ॥६॥ द्रव्यराज्य करो मर्यादा । ज्यादा इच्छा टालोजी ।। द्रव्य वढे तो धर्मार्थ लगावो । तृष्ण ममता जालोजी ॥ व्रत ॥ ७॥ पूर्वादि चउ ऊंची नीची । दिशाका प्रमाण कीजेजी । क्षेत्र बृ खण्ड वी कु ८१ द्धि संमेल न करना। आगे पग नहीं दीजेजी ॥ वृन ॥ ८॥छवीस बोल की करो मर्या दा। पंच अभक्षयन भकीयेजी॥ पन्दरह प्रकार का व्यापार त्यागो। सातमा व्रत रक्षीये जी॥ वेत ॥ ९॥ अनर्थ आत्मा से सदा वारो । सस्त्र संग्रह नहीं करणाजी॥ परवाही व स्तू उघाडी मतमेलो। हिंसक उपदेशन उचरणाजीवत०॥तीनों काल सामायिक करणा। सावध काम परहरनाजी । संसा रीकार्यवी कथा छोडो ॥ ज्ञान के ध्यान में रमणाजी ॥ व्रत ॥ ११॥ नित्य दिशा वगासी करिये । परिमाण उप मोग परि भोगोजी ॥ दय पालो दश पञ्चखाण धारो । राको इच्छा तिहु जोगो जी ॥बूत ॥ १२॥ प्रति पूर्ण पापध व्रत धारी । त्याग करो चहुं आहारोजी ॥ धर्म ध्यान में चहू, पेहर गुजारो । एक दिन तो लेखे लगाडो जी॥ व्रत ॥ १३ ॥ जीमते विभाग करो अहारका । साधूको दान दे नाजी ॥ सूजती वस्तू असूजती नमेलो । हाथ सो साथ लावा लेनाजी ॥ व्रत ॥ १४ ॥ आयू अन्त जाण के करीये-संथारा । जीवन मरन इच्छा टारोजी । आलाई निन्दी शुद्ध होयके । आत्म कार्य सुधारो जी ॥ व्रत ॥ १५ ॥ इत्यादि शिक्षा जिन जी दीनी । दंप ति धारी लीनी जी ॥ यथा विधि फिर वंदना कीनी । आत्म ऋधि वरी चीनीजी व्रत ॥ निजस्थान आइ जेठ पुत्र बुलाइ । रांज ऋधि संभलाइ-जी ॥ पोपध शाल ८१ रहे आइ । धर्म ध्यान म आत्म रमाइजी ॥ व्रत ॥ १७॥ हरीकेशर जिनकी आयु खूटा वेदनी नामरू गोतोजी ॥ यह भी आयु के साथही खूटे । तव मिली जोतमें जोतोजी ॥वतः॥ १८॥ प्रिती मति सती स्वर्ग पधारे । स्त्री लिङ्गको छेदी जी । मानव होकर संय म लेकर । होवेगा सिद्ध अखेदीजी व्रत१९॥दोनोंका निहारण किया वीर सेणजी । ज गरीति प्रमाणोजी ॥ कृत कृतार्थ हवा राजा राणी । कृत करणी फल जाणोजी ॥व्रत ॥२०॥ वीर सेण कुसुम श्री ताइ । धर्म करन्ता देखीजी ॥ चुडामणी सुख कहे नरमाइ । धर्मेच्छु हो विशेखीजी ॥त्रत।। २१ ॥ जैसे सुख आपकी आत्मा चावे । तैसे ही महारी चावेजी ॥ जो आप करो सो मुझं बतावो । तो सत्सङ्ग फल आवेजी ॥ व्रत ॥ २२ ॥ वीर जी समणोपा सकू उसको । नवकारदि सीखावे जी । थोडे मे बहुत धारा बुद्धिवन्त। सम्यक्त्व आत्म स्पर्शावे जी व्रत॥२३॥ ज्ञान ध्यान तप जप शुक करके । सातवे स्वर्ग सीधाया जी ॥ देखो प्रत्यक्ष सत्संगती फलं । तदन्तर राणी, रायाजी। व्रत ॥ २४ ॥ आलोइ निन्दि संस्थारो करियां । धर्म ध्यान चित धारीया जी ।। आयू अन्त अचुत स्व ग.सिधाया जी ॥ वृत ॥ २५॥ दोनों देवं मित्र हुवा आपस में ! यथा पाणी सी प्रीति जी ।। दाल दशवी पांचवी दाल यह पंचवे खण्डकी । ऋषि अमोल कही इतिजी ॥वत।। है खन्ड५ वी कु ८२ २६॥8॥ दोहा ॥ वीर कुसुम दोनों देवता । निजेन्द्र दर्शन काम ॥ चाले महा विदेह को । प्रश्न पूछन हाम ॥२॥ चूडामणी शुक देवतामिला रस्ते मे आय ॥ प्रीति पूर्व जा गृत हुइ । देखे ज्ञान लगाय ॥२॥ जाणा पूर्व सम्बन्ध को । अलंगी मिलेतेह ॥ मिल आवन्दे जिनन्द्र को । वाणी सुणी धरनेह ॥३॥ वन्दि पूछे नम्रहो। हम भव्य केअभव्य ॥ चरमा चरमे सुलभवोही । फरमावो भव तव्य ॥४॥ जिनजी कहे भव्य चर्म तिहूं । सु णकर अति हाय ॥ वन्दि आये निजस्थान के । रहते मिल सुख मांय ॥५॥ शुकजी व सतरे सागरापेम । देवका आय भोग । मनुष्य होकर श्रावक बने । पूर्व सुकृत योग ॥६॥वहांसे चव त्वर्ग तीसरे । देव हूवा दिव्य काय॥आगे शिव सुख सव वरे । सुणना सोही उपाय।।७॥ढाल११वी॥चंद्रायणकी देशी।।शील सुवा पियकोगुणग्रही सुखी होवो भवी जना ।। टेरे।। तिण काले पूर्व महा विदेहके मांयरे । सुकच्छ नाम विजये छे खण्ड चायरे । मध्य खंड में स्वगत पुरी सोभायरे। महागुणवन्त जसोधर नामे रायरे। पद्माराणी शील रूप दीपायरे ॥ पणहां। रहती सुख के माय पुन्य विलसायरे ॥ शील॥शील।।१।। स्वर्ग वारवे थकी चवे दोनों देवेरे । पद्मावती कूके उपने तत् खेवरे ॥ युगल वृषभ शुभ राणी लेवरे ॥ हर्ष धरी महीपति को हाल सोकेवरे ॥ दान पुन्य डोहल हुवे अह- । '८२ मगर नाला२॥rs TATI आपणहाँ।। शुभ वक्त क माय हुवे प्रसेवरे ॥शीला॥२॥ जोडले दोनों पुत्र जन्मिया जनरे । दासी बधाइ दीनी नृप ने तबरे । करी बडारण धन दिया अवयंवरे । नगर देश गांडा तब ओछत्ररे । बहुत लोको सुणके पाये अचवरे । पणही। पांच धायसे वृद्धि होय सू ढवरे ॥शील||३॥ दिन वार मे न्याती सब जीमायरे । द्रढ धर्मी प्रिय धर्मी नाम थपायो । शुक्ल शशीपरे वृद्धि नित्यही पायरें । बाल पने से धर्मपे मिति सवायरे। योग्य वय मे बहूतर कला पढायरे ॥पणहां। जोवन वयमें जवरीसे परणायरे ॥शील॥४॥ लुख तिसे भोग रहेप्तो मोगरे । परन्तु मनमें वसे निरन्तर जोगरे । सामायिक पायध करे सु योगरे । तीसरे वर्गसे शुख जीव आयु वियोगरे द्रढ धर्मी के पुत्र हुवा पुण्य छोगरे।।पण हो। धर्म धुरंधर नाम दिया गुण छोगरे ॥शील॥५॥ वोमी वाल पणासे धर्म में सूररे । पाप कार्यसे सदा रहोसो दूररे भण गुण कर विद्या में हुवा भरपूररे । मात पिताके सदा रहे हजूररे । परणाने हटकरे ते न करे मजूररे आपणहां। दिक्षा लेनेकी बात करे ते भूररे ।। शील॥६॥ द्रढ धर्मी प्रिय धर्मी धर्म धुरं धररे । तीर्थकर दिग संयम लीना वाररे । दारशां गी ज्ञान किया कंठागररे । फिरतो तपस्या मांडी बहुतही पररे । कर्म कटक का जोर लि या सब हरेपणहां। मोक्ष पुरी लेनेका रहे विचररे ||शील||७॥ हो अप्रमादी अपूर्व क - खण्ड.५ रण आवन्तरे । अवेदी अकपाइ पद पावन्तरे । क्षयकर मोहंणी शुक्ल ध्यान ध्यावन्तरे । अप्रति पाती अखण्ड ज्ञानी थावन्तरे । सर्वलोका लोक हस्तावल सा पहावन्तरे।पाकेवल ज्ञानी शिव दुलहा बने भगवन्तरे ॥शीलादा गाम नगर.पुरं विचर किया उपकाररे । व हुत पूर्व लग पाला संयम भारे । आयु खुटे अवाति कर्म कर छाररे । तीनो विराजे जा कर मोक्ष मझारे । अजर अमर अवीन्याशी हुवे अवीकारे पगही। चिन्तित कार्य स पडे तस पारे ।। शील ॥ ९॥ यहतो कथा सु कथा करने उपदेशरे । अब इसका सा रांश सुणो वररेहशरे । वीरसेण ज्यों वर तो नरों हमेशरे । वालही वयसे धार्माभ्यास शरे । विप्त समय में धैर्य धारिये विशेषरे ।।पणह। को वैरीपे उपकार तो यशः लहसरे ।। शील ।।१०॥ मय स्थान कदा नहीं करीये प्रमादरे । संकट समय करो ज्ञान से चित समादरे । जान दुसरेके छिद्र न करना यादरे । उपगारीका उपकार कयो सुसादरे । पाकर सम्यक्त्व दानी बनो स्याद वादर ॥पणही। धर्म आरोधी पावो सुख अगादरे॥शील॥११॥ सती कुसुम श्री वपतिपे धरा.प्रेमरे। अति संकट नहीं खण्डा जरा नेमरे । वैश्याके घर शी ल पालाउन केमरे । धैर्य से उज्वल हुइ शर्द शशी जेमरे । अन्ते वरत वर पाइ अपिछल खे मरेपणहा। अहो बाइयों यो वरते पायोगी सब क्षेमरे ॥शील||१२|| हरी केशरी-घर योग धुन को जानर । संभलॉयो राज संयमलिया सुन खानरे कर ८३ रे। रणधीर ना. Arr T- को जानरे। संभलाया राज संयमलिया गुन खानरे कर उद्यम आत्माका कियाकल्या नरे । रणधीर नृप स्वार्थीया जग पहचानरे । छोडी ममता पाये मुक्ति स्थानरे ॥ पणहां ॥ यो अवसर लख चेतो चतुर सुजानरे ॥ शील।।'३॥ क्षेमंकर वेगवती ने कीना हांसरे । प्रियंका प्रियाती को भोले विमासरे। सहज कर्म बंध भोगवे होके उदासरे । छोडी हांस आराधो धर्म हुलासरें । दान शील तप भाव येही माल खासरे ॥पणहां।। यों हांसी तज करो धर्म तो मिले सुख सासरे ॥शील।।१४॥ पशु भी हो शुक करी अति श्वामी सेवरे । संकट मे सुबुद्धि से सहाय तस देवरे । स्वामी साथ ही धारा धर्म तत् खेवरे । कर करणी आत्मा तारी पशू मेवरे । तुमतो मानव का कहिये अधिकवरे आपणहां। शुद्ध करणी करो स्वर्ग मुक्ति वक्त एवरे ॥शील॥१॥ द्रढ धर्मी प्रिय धर्मी दोंनो भाइरे। धर्म धुरंधर करणी करी हेतलाइरे । छत्ते जोग तजा भोग संसार में रहाइरे । साधा आत्मिक अर्थ सा अ- वसर पाइरे । लीनो संयम भारसो मुक्ति गयाइरे । पणहां ।। इत्यादि सारांश गृहो सुखदा ॥शील।। १६ ।। तो पावोगे सुख दोनों भवमाइरे । इस भव होवे यश आगे मोक्ष पाइ । सुनने का यह सार जो आये चलाइरे । वक्ता कर्ता की मेहनत सफल जो थाइरे । अभी कुछ भी पच्चखाण करो । उमाइरे आपणहां। करना सो करो आत्म हित वक्त येही खण्ड वी कु सहाइरे ॥ शील १७ ॥ बोध प्रदीपक माय में बांची यह कथा । जुडता सम्मास मिलाय के जोडी ये यथा । जिनाज्ञा विरुद्ध जो कोइ कथा व्रता । तो मिथ्या दुष्कृत्य देता संघ की सथा। आसय पर उपकार मेने यहा मथा ॥ पणहां ॥ समजाइ मेरी आत्म करी ज- गकी प्रथा ॥ शील ।। १८॥ इन्दू निधी रु काय शशी सवत्समंही । विजय दशमी अश्वि न मांस शोमे सही । मुम्बापुरी हनूमान गली ज्यूंनी ज़ही । मंगलदास की बाड़ी में चौ मास रही। वीरसेण कुसुमश्री की चरी कही ॥पणहां। शीलवन्तो के गुण कथनेसे पवित्र मही ॥-शील ॥ १९॥ श्रीमहावीर-वृद्धमान प्रभु साशण धणी । पाटानु पाटे श्रेणि हुइ मु निश्वा तणी। लूकागच्छ कहानजी नापिकी कीर्ति घणी ॥ साधूमार्गी मूल सम्प्रदाय यह अतिही गुणी । श्री तारा ऋपिजी तस शिष्य हुवे गुणमणी ॥ पणहाँ ॥ श्री काला ऋ पिजी पूज्य हुवे गुणवन्त गुणी ॥शील२०॥ श्री वक्षु ऋपिजी के शिष्य पूज्य धन जी म ये । तस्य शिष्य श्री खूबा ऋपि ज्ञानी गुणी थये । तस्य श्री चेना ऋषि आर्य भावमये। श्री केवल ऋषि के आश्रय अमोलक रय । गुरुपासाय चरित्र कथेसु बुद्धि भये ॥पणहां।। का वक्ता श्रोता ही श्री लये ॥ शील।। २१ ॥ ८४ "
।। सारांश-हरीगीत छन्द ।। वीरसेण कुसुमपुरी पतहो पिताके दर्शन लिया।हरी
केशरी ऋषि केवली हो कर । पूर्व भव दर्शा दिया ॥ श्रावक हो स्वर्ग वास कर महा वि
देह से मुक्ति गया। पंचम खण्ड यह सार मुनि अमोल संक्षेपे किया ॥१॥ कळश ॥
धन्य २ मुनि हरीकेशरी धन्य २ प्रियमतिवर ।। धन्य २ रणधीर नृपको धन्य २ रत्नावती
सर ॥ धन्य २ श्रीवरिसेण को ॥ धन्य २ हो कुसुम श्री॥ धन्य २ शुक चूडामणी। सब
को वंदन हो मेरी ॥ १ ॥ दान शील तप भावना । यह धर्म चारो सार है । परभाव वर
णा इनोंका आराधे खेवा पार है ॥ देव जिनेश्वर जपो गुरु,निग्रन्थ को प्रणमीजीये । जि
नाज्ञा मे धर्म धारो दयामूल सो कीजीये ॥ २॥ यह धर्म धारो आत्म सुधारो आरे
उत्तम आवीया ।। इसलिय यह वोरसेणे कुसुम श्री चरित्र गावीया ॥ कहे अमोल श्रो
ता धार धर्म हृदय अति हुलसावीया ।। इह लोक सुख संपत वरे | परभवे शिव सुख
पावीया ॥ ३॥
खण्ड. वी कु सहाइरे ॥ शील १७ ॥ बोध प्रदीपक माय में बांची यह कथा । जुडता सम्मास मिलाय के जोडी ये यथा । जिनाज्ञा विरुद्ध जो कोइ कथा व्रता । तो मिथ्या दुष्कृत्य देता संघ की सया। आसय पर उपकार मेने यहा मथा ॥ पणहां ॥ समजाइ मेरी आत्म करी ज- गकी प्रथा ॥ शील ।। १०॥ इन्दू निधी रु काय शशी सवत्समंही । विजय दशमी अश्वि न मांस शोभे सही । मुम्बापुरी हनूमान गली ज्यूंनी ज़ही । मंगलदास की बाड़ी में चौ मास रही। वीरसेण कुसुमश्री की चरी कही ॥पणहां। शीलवन्तो के गुण कथनेसे पवित्र मही-॥-शील ॥ १९ ॥ श्रीमहावीर-वृद्धमान प्रभु साशण धणी । पाटानु पाटे श्रेणि हुइ मु निश्वर तणी । लूंकागच्छ कहानजी नपिकी कीर्ति घणी ॥ साधूमार्गी मूल सम्प्रदाय यह अतिही गुणी । श्री तारा ऋपिजी तस शिष्य हुवे गुणमणी ॥ पणहां ॥ श्री काला ऋ पिजी पूज्य हूवे-गुणवन्त गुणी ॥शील२०॥ श्री वक्षु ऋपिजी के शिष्य पूज्य धन जी म ये । तस्य शिष्य श्री खूबा ऋपि ज्ञानी गुणी थये । तस्य श्री चेना ऋपि आर्य भाबेमये श्री केवल ऋषि के आश्रय अमोलक रय । गुरुपासाय चरित्र कथेसु बुद्धि भये ॥पणह। की वक्ता श्रोता ही श्री लये ॥ शील।। २१ ॥ ८४
नाज्ञा
में
धर्म
धारो
दयामूल
सा
कीजीये
॥
२॥
यह
धप
धारो
आत्म
सुधारो
आरे
॥ सारांश-हरीगीत छन्द ॥ वीरसेण कुसुमपुरी पतहो पिताके दर्शन लिया॥हरी
केशरी ऋषि केवली हो कर । पूर्व भव दर्शा दिया ॥ श्रावक हो स्वर्ग वास कर महा वि
देह से मुक्ति गया। पंचम खण्ड यह सार मुनि अमोल संक्षेपे किया ॥१॥ कळश।
धन्य २ मुनि हरकेशरी
धन्य २ प्रियमतिवर ॥ धन्य २ रणधीर नृपको धन्य २ रत्नावती
सर ॥ धन्य २ श्रीवरिसेण को " धन्य २ हो कुसुम श्री ॥ धन्य २
शुक चूडामणी। सव
को वंदन हो मेरी ॥१॥ दान शील तप भावना । यह धर्म चारो सार है । परभाव वर
णा इनोका आराधे खेवा पार है ॥ देव जिनेश्वर जपो गुरु निग्रन्थ को प्रणमीजीये। जि
म आवीया । इसलिय यह बोरसेण कुसुम श्री चरित्र गावीया ॥ कहे अमोल श्रो
-ता धार धर्म हृदय अति हुलसावीया ।। इह लोक सुख' संपत वरे । परभवे शिव सुख
चाया !!
म
परम पूज्य श्री कहानजी ऋपिजी महाराजके सम्प्रदायके महन्त मुनि श्री
खूबा ऋषिजी महाराजके आर्य शिष्य श्री चेना ऋपिजी महाराज
और तपस्वीजी श्री केवल ऋपिजी महाराज के आश्रित
श्री अमोलख ऋपिजी महाराज रचित वीरसेण कुसुम
श्री चरित्रका धर्म प्रबंध नामक पंचम
खन्ड समाप्तम्.
और
॥ श्री वीरसेण कूसुम श्री चरित्र समाप्तम् ॥
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