Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Shree Parsavnath Chritam

Shree Manoharlal · 2011/07

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وه همراه فعال حاليا عقاع شيله पूर्वप्रकाशित ग्रन्य। है १ लघीयत्रयादिमंग्रह-इममें भाकलकदेवकृत लघीयत्रय चाटीक, आचार्य अनन्तकीर्तिकृत रघु सर्वसिद्धि और बृहत्सर्वज्ञसिद्धि, तथा अफाटकदेवकृत स्वरूपसम्बोधन इन चार प्रन्योंका समह प्रकाशित दुआ । मूल्य 1-) २ सागारधर्मामृन मटीक---पण्डित प्रपर आशाधरका यह प्रसिद्ध मन्य उनको भव्यकुमुदचन्द्रिका नामकी संस्कृत टीका सहित छपा है। मूल्य- ३ विमांतकौरव नाटककवि श्रीहस्तिमसकृत । जयकुमार और मुलोचनाकी कथापर यह मुन्दर नाटक रचा गया है । ०१५) प्रकाशित होनेवाले ग्रन्थ । ५ मैथिलीकल्याण नाटक-कवि श्रीहस्तिमढकृताम् ०३) ६ भाशावरकृत प्रतिष्ठाकल्प, ७ देवसेन रिकृत नयचक्र, ८ अंजनापवनंजय नाटक-~आदि और कई अन्योंके छपानेका भी प्रयत्न हो रहा है। नोट-ग्रन्थमालाके मब अन्य बम्बईके सब जैन युकसेलरोंके पास शोलापुर जैन युकडिपोमें और दिगम्बर जैन पुस्तकालय सूरतमें मिल सकेंगे। निवेदक- नाथूराम प्रेमी, मत्री हीराबाग, बम्बई।

प्रार्थनायें। १ इस ग्रन्थमालाका प्रत्येक ग्रन्थ लागतकी कीमतपर बेचा जाता है। अन्योंका उद्धार और प्रचार करना ही इसका उद्देश्य है । अतः प्रत्येक धर्मात्माको डमकी सहायता करना चाहिए और अपने मित्रों में कराना चाहिए। २ ग्रन्थमाटाके लिए जो फण्ड हुआ है वह बहुत ही थोड़ा अर्थात् लगभग चार हजार रुपया है; पर यह काम इतना बड़ा है कि इसके लिए कमसे कम ५० हजारका फण्ड ज़म्बर होना चाहिए। इसलिए इसके फण्डकी रकम बढ़ानेकी ओर प्रत्येक धनीका लक्ष्य रहना चाहिए। ३ धर्मात्माओंको इसके प्रत्येक ग्रन्थकी कममे कम २५ प्रति- योंके स्थायी प्राहक वन जाना चाहिए । यदि पच्चीस पच्चीस प्रति- याँ लेनेवाले सिर्फ २० और दश दश प्रतियाँ लेनेवाले सिर ५० ही ग्राहक इसके बन जायें, तो इसके द्वारा सैंकड़ों प्रन्थोंका उद्धार महज ही हो सकता है । मन्योंकी कीमत बहुतही कम होती है, इस कारण उनकी दश पचीस प्रतियाँ खरीद टैना साधारण गृह- स्योंके लिए भी कुछ कटिन नहीं है। ५ कममे कम २५० प्रतियों खरीदनेवालोंका फोटो और स्मरण- पत्र इसके प्रन्योंमें टगाया जा सकता है, अतः इम ओर भी धनि- योंको ध्यान देना चाहिए। ऐमा करनेसे धर्म और कोन दोनोंकी मावना हो मकती है। ५ पाह शादी, जन्मोन्मय, प्रतिष्ट्रा, आदि प्रफ आनन्द कार्योंमें दान करते समय प्रत्येक जनीको इम मंन्याका म्मरण रखना चाहिए. और शनि के अनुमार जितनी बन म इतनी महायता इमकी करना प्राषा- होराबाग पोर निरर्ग:वयम्य] माथूराम, प्रेमी-मा चाहिए।

माणिकचन्द दिगम्बर-जैनग्रन्थमालाकी नियमावली। . १-इस ग्रन्थमालामें केवल दिगम्बर जैन सम्प्रदायके संस्कृत और प्राकृतिक भाषाके प्राचीन अन्य प्रकाशित होंगे । यदि कमेटी उचित समझेगी तो कभी कोई देशभापाका महत्वपूर्ण मन्थ भी प्रकाशित कर सकेगी। २-दममें जितने अन्य प्रकाशित होंगे उनका मूल्य लागत मात्र रक्खा जायगा । लागतमें अन्य सम्पादन कराई, संशोधन कराई, छपाई, बैधाई आदिके सिवाय आफिस खर्च, व्याज और कमीशन भी शामिल समझा जायगा। ३-यदि कोई धर्मात्मा किसी प्रन्थकी तैयार कराईमें जो खर्च पटा है वह, अथवा उमका तीन चतुर्थांश, सहायना देंगे तो उनके नामका स्मरणपत्र और यदि वे चाहेंगे तो उनका फोटू भी उस मन्धकी तमाम प्रतियोंमें लगा दिया जायगा। जो महात्मा इससे कम सहायता करेंगे उनका भी नाम आदि यथायोग्य छपवा दिया जायगा। ४-यदि सहायता करनेवाले महाशय चाहेंगे तो उनकी इच्छा- नुसार कुछ प्रतियाँ जिनकी संख्या सहायताके मूल्यसे अधिक न होगी मुफ्तमें वितरण करने के लिए दे दी जायेंगी। ५-इसमें ग्रन्थमालाकी कमेटी द्वारा चुने हुए ग्रन्थ ही प्रकाशित पत्रव्यवहार करनेका पता--- नाथूराम प्रेमी, हीराबाग, पो. गिरगाव, बम्बई ।

में प्राथनाये। १ इस ग्रन्थमाटाका प्रत्येक ग्रन्थ लागतकी कीमतपर बेचा है । मन्थोंका उद्धार और प्रचार करना ही इसका उद्देश्य है । म प्रत्येक धर्मात्माको इसकी सहायता करना चाहिए और अपने मित कराना चाहिए। २ ग्रन्थमालाके लिए जो फण्ड हुआ है वह बहुत ही थोड़ा अक्षर लगभग चार हजार रुपया है; पर यह काम इतना बड़ा है कि इससे लिए कमसे कम ५० हजारका फण्ड ज़रार होना चाहिए। इसक फण्डकी रकम बढ़ानेकी ओर प्रत्येक धनीका लक्ष्य रहना धादि। ३ धर्मात्माओं को इसके प्रत्येक प्रत्यकी कममे कम २५ पुन यो म्यादी प्राहक बन जाना चाहिए। यदि परम पचीम प्रति यो लेनेवाले मिर्फ २० और दश दश प्रतिया लेनेवाले सिह ५०६ प्रारक इसके बन जाय, तो इसके द्वाग मकडों प्रन्योंका उमर मानी हो ममता है । मन्योंकी कीमत बहुतही कम हो, इस कारण उनकी दशमीम प्रनिया मद सेना माधारण र म्यों के लिए भी कुछ दिन नहीं है। ४ कममे कम २५० प्रतिया मरीनालामा फोटो और मर- पय दमक प्रन्थों में मनाया जा सकता है, अतः इस मोर भी धनिः यको ध्यान देना चाक्षिण । पेमा करनेगे धर्म और कान दोनों है। मराहमकती । - मार्ग, जन्मोगप, प्रनिशा, भारिपेक मानद दान का मनीको ग म्याका मरण मनाया बन मा निी बन मोनी AREER करनी CRPETH faritrat नागगम,मीको

माणिकचन्द दिगम्बर जैनग्रन्थमालाकी
नियमावली।
१-इम ग्रन्थमालामें केवल दिगम्बर जैन सम्प्रदायके संस्कृत
और प्राकृतिक भाषाके प्राचीन अन्य प्रकाशित होंगे। यदि कमेटी
उचित समझेगी तो कभी कोई देशभापाका महत्वपूर्ण प्रन्थ भी
प्रकाशित कर सकेगी।
२-इसमें जितने अन्य प्रकाशित होंगे उनका मून्य लागत मात्र
रक्खा जायगा । लागतमें अन्य सम्पादन कराई, सशोधन कराई,
छपाई, वैधाई आदिके सिवाय आफिस खर्च, ब्याज और कमीशन
भी शामिल ममझा जायगा ।
३-यदि कोई धर्मामा किसी अन्धकी तैयार कराईमें जो खर्च
पड़ा है वह, अथवा उसका तीन चतुर्थाश, सहायतामें देंगे तो उनके
नामका स्मरणपत्र और यदि वे चाहेंगे तो उनका फोटू भी उस
अन्यकी तमाम प्रतियों में लगा दिया जायगा। जो महात्मा इससे कम
सहायता करेंगे उनका भी नाम आदि यथायोग्य छपवा दिया जायगा।
४-यदि सहायता करनेवाले महाशय चाहेंगे तो उनकी इग्छा-
नुसार कुछ प्रतियाँ जिनकी संख्या सहायनाके मूल्यमे अधिक न
होगी मुफ्त में वितरण करनेके लिए दे दी जाएँगी ।
५-इनमें ग्रन्थमालाकी कमेटी द्वारा चुने हुए मन्य ही प्रकाशित
पत्रव्यवहार करनेका पता---
नाथूराम
हीराबाग, पो. गिरगांव, बम्बई ।
द्रमी
होंगे।

माणिकचन्द- दिगम्बरजैनग्रन्थमालासमिति। (प्रबन्धकारेणी सभाके सभ्य) २ " " " " . " १ राय बहादुर सेठ स्वरूपचन्द हुकुमचन्द । तिलोकचन्द कल्याणमल । ३ ओंकारजी कस्तूरचन्द। ४ सेठ गुरुमुखरायजी सुखानन्द । ५ हीराचन्द नेमिचन्द आ० म जेस्ट्रेट । ६ मि. लल्लूभाई प्रेमानन्द परीख एल. सी.ई.। ७ सेठ ठाकुरदास भगवानदास जौहरी। ८ ब्रह्मचारी शीतलप्रसादजी। १५ धन्नालालजी काशलीवाल। १० पं सूबचन्दजी शास्त्री। ११ नाथूराम प्रेमी ( मंत्री) श्रीवादिराजसूरिः। संति जैनेश्वेतादृशः स्वल्पा यः मुविष्यातस्यैकीभायस्तोत्रस्य फर्जुर्नाम 'नाकर्णिनं स्यात् । परंतु इंशा जना दिवा एव दुःसाध्यायरिदं ज्ञात स्याचकोयं वादिराजः, कदा बभूव, तस्य कामिः काभी रचनाभि: जैन- संप्रदाय उपकृतीवभूव । वयं पाठकानामने अनेन लेसेनावास्य महानुभावम्य किंचित्परिचय दिमामः। वादिराजमरिनन्दिसघम्याचार्य आसीत् । तस्य परपरायाः(अन्येयस्य) अरंगलेति नाम आमीत्। परमयं नंदिमंधः स च नास्ति यस्य गणना चतुः मवाना मध्ये कृता भवति, किंतु द्रमिलस्य द्राविडस्य या संघस्यको गम्छो भेदो पाति । पाटकानां पिदित स्यात् यदम्य द्रविडमवस्य म्यापकः यपादस्वामिनः शिष्यो यमनंदी अम्ति । अस्य गणना पजनामासेषु कृतान्तिा द्रविडदेशे भवन्यादेयास्य नामदारिटमय प्रथितः।म दाक्षिणा- त्येति संभाव्यते । पटतर्कपण्मुग्य-स्याद्वादविद्यापति- जगदेकमलवादी इत्यापनेरुशः पदव्यस्तस्यासीत् । स मिहपुरैकमुल्यविधवियेश्वरश्रीपाल- १. धीममिलमम्मिन्नंदिसंघलाल । अन्वयो भाति योऽशायदाराशियरग ॥ २.गोपुष्टा भेतवामो इपिसोयाग्नीया। नि पिच्छिाति पंचठे जनाभागा प्रातिना ।।-नीतिमारः। ३ पदनपण्मुसरं म्यादाविपापनिगल जयदेशमाहवागनु एनिसियी- मादिरामदेवतम्।

देगा... Primahrter trimonam try kirl Frt Irritrea frienter MARATTERTAITRINETFEnri First taimrtifirrrrieran niruralmfaritralit। मग weirmirror striratn rrrrirritam PRINTIMIMirri firms frruोगमापरता. Frima धीमEिATMA मांण भूमापिगधririrgini খান গত নিধ না সমস্যা ও তা নাম না মন मामे पाकिनाग्नि निरिक्ष तृतीपारिन । मिह पानि जपादिक यामती अनी कधपं मा रिनिगमिता मती मनु यः कल्याणविणा५॥ नपिया यम्य नृण मुदा Rafमनांद बोदयागनमान म बानि म पनि म प्रमा। इस म्पमिहिमाग्न मंगायपनयम्य 'भारता'मनावरे बनते। •म्प धीमतिमायरो गुममी वरवरचंदमू श्रीमान्यस्य म वादिराजमानत्मवतारी रिभोः । एकोढीव कृती स एव दियाउनदी बन्सन- सानामन्यपन्मिाप्रड्या व विप्रहे शिप्रा ॥४॥ (मदिरोगालिः)

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rमामने नमः। श्रीमहादिगजगारविरचितं श्रीपानापनरितम् । प्रथमः सर्गः। धीपचनपसंमोगमण्यानंदकनिये। नमः धागनाथाय दानद्वाभिमाये ॥१॥ अद्धदरयविनिमुना मायका या पादयोः । हिंगादोभयावेष पुष्पवधियं दशुः ॥२॥ अग्निवगंगा यम्य पूर्यदेवेन निर्मिनः। नामा महमा निन्ये पहुंकुमकताम् ॥ ३॥ गुग्योऽपि पिलोकम्य गुगेद्रोंदादियादयः । लाययं नलयन यम्य दानवप्रेरिता ययुः॥४॥ भूगांदुतनागचूडामणिमरीचिमिः । आवृता यम्य धणेयाश्वज्यत मेदिनी ॥५॥ आनपत्रं महाबोधैर्यम्य शुभ्रमिवांयुदं । पंधिनी विभरामाम पर्यतस्येव मुनि ॥६॥ १ धीरेव वधूमस्या नवसंभोगेन भन्यानामानदम्य एको मुरुपो हेनुस्वार । २दा बुषितो यो देखः कमटामुरम्तेन विनिमुताखता। कमटेन पूर्ण. जन्मनो चरिणा। ४ उगनत यमागच्छनो नागस घरजेंद्रस पूडामणिमी. चिमि.शिखामणिकिरण १५ पधावनी देवी। - २ श्रीपार्श्वनाथचरितम् । तापसैधिता यस्मिन् नित्योदोधपएण्यधे । अछिद्युत पनेतुच्छाः स्वयं दुस्तकंशासिनः ॥ ७॥ ज्ञानामृतार्णवे यत्र चित्ते मजति दुर्जये। क्रोधदाधाग्निसंतापो दानवेंद्रान्यवर्तत ॥ ८॥ प्रहदोनयमूर्धन्यमणिरागेण यद्धपुः । यभावनमिवाक्रांत विद्युता श्यामलेप्रभम् ॥ ९॥ निम्पलोकवृत्तांतमीक्षमाणं यमीश्वरं । उपास्थिपत गीर्वाणाः कामचारभयादिव ॥ १०॥ अनंतगुणसाम्राज्यलक्ष्मीकांतमुपांतिमम् । अघहंतारमहतं चंदिपीय तमव्ययम् ॥ २१॥ अपि प्रहास्ये मांये मे श्रेयस्कॉमितया प्रभोः। कवेयं चरितं तावदर्थी दोषं न पश्यति ॥ १२॥ जडाँशयोदयमपि भव्यं तद्वचनं भवेत् । यजिनामिमुखं पदमभ्यर्क न तु शोभते ॥१३॥ कुतस्तमो लयं याति पचोवातायनेन चेत् ॥ न विशेयुर्मनःसन सतां जिनगुणांशवः ॥ १४ ॥ अल्पसागपि मालेव स्फुरनायकसगुणा। कंठभूषणतां याति कवीनां काव्यपद्धतिः ॥ १५॥ १ कपिलादिमि । २ नित्योदोध केवलज्ञान सदेव परश्वध. परशुर्पस तस्मिन् । ३ दुतर्का दुष्टतकी एव शासिनो वृक्षाः । ४ नमीभूतकमठशिरो- रमलीहिस्येन । ५ नीलवर्णम् । ६ पूजयामागुः । ७ कामस्य चारदाममणा भयेन । ८ अतिमतीर्थकरस समीपवतिनं पार्थनाधमित्यर्थः। - मूसत्ये १. कल्याणवाच्छया : ११ कथयामि । १२ जडाशयाद् मूसादयः प्रादुर्भावो यस्य तत् । पक्षे-उलयोरभेदात् जलाशयान्सरसः प्रादुर्भूतिस्त्पतिर्यस्य सत् । शीतगुणवबलादुनमपि पामुणगुणवत्तायाभिमुगं यथा शोभते तथा मूलीफ वचनमपि सर्वज्ञामिमुख शोभते । १३वच एव वातायनं गाशंदेन । १४ जिनेंद्र- गुणा एव मरीचयः । १५ स्फुरतः प्रकाशमाना नायकस्य चरित्रवामिनः पशे- मालामध्यस्थितमणेर्गुणाचार्यक्षोसादयः पो सौगम्यादयो यस्यां सा ।

All मपमः सर्गः। अनुसगुणसंपानं गृपिच्छ नतोऽस्मि तं। पक्षीपति यं भव्या निर्याणायोत्पतियः ॥१६॥ म्यामिनधरितं तम्य कम् नो यिस्यायह। देयागमेन ममो येनाचापि प्रदर्यते ॥ १७ ॥ अचिस्यमहिमा देयः मोऽभियंयो हिनपिणा। सादाच येन सिनयंति माधुत्वं प्रतिलंभिताः ॥१८॥ स्थागी म एप योगीदो येनाक्षय्यमुसायहः । अधिने मध्यमार्थाय दिटो रत्नकरंडका १९॥ तर्कभूयासमो देयः स अपत्यकलंकधीः। जगद्रव्यमुपगे येन दंडिताः शाक्यदस्यपः ॥ २० ॥ म्यादादगिरमाश्रित्य यादिमिदम्य गजिते । दिग्नींगम्य मदायरे फीतिभंगो न दुर्घटः ॥२१॥ नमः मन्मनये नम्म भयपनिपातिनां । सन्मतिविता येन मुखधाममवेशिनी ॥ २२ ॥ जिनसेनमुनेम्नम्य माहात्म्यं फेन कथ्यते। शलाकाः पुरुषाः मयें यहयोयशवनिनः ॥ २३॥ आमनयाद्वितीयेन जीयसिद्धि नियनता। अनंतकीर्तिना मुनिरात्रिमार्गय लक्ष्यते ॥ २५ ॥ टमासानिमिष्य वलापिच्यापरनामक इति श्रवणवेम्गुलम्बशिठालेखत. प्रतीयने । २ पक्षम्याने कुनि साहाय्येनाथयतीत्यर्थ ।। उर्ध्वमुत्यनितु शीलं यो । मोक्ष गंनार इयर्थ । । समंतभदाचार्यम्य । ५ तत्वार्थमूत्रमहाभा- यस्य मगलाचरणम्पेशाप्तमीमामानामरेन स्तोत्रण। ६समंतभद्र 1. रल. वरावकाचार । ८ अकलंहदेव । ९ शाक्या बांदा एवं दसवाग । १.बावाचार्य दिमागस । मन्मनिविवरणनामकप्रथको। १२ त्रिषधिश- ला. पुरषा । प्राचीनमहापुरषाणा जनमाहित्ये दाटावा पुरषा इति धार १२ जीवनिदिलाहलपर्वइनिदिप्रयत्रयम्य बनी।

४ श्रीपार्थनायरितम्। कुनम्रया ना मा शनिः गायकीमहाजमः। श्रीपदभवणं या गादिकान कुरने जनान् ॥ २५ ॥ अनेकमेदमंधानाः यनंनो हृदये मुद्दुः। वाणा धनजयोन्मुकाः कर्णस्येय प्रियाः कथम् ॥ २६ ॥ वंदेयाननीयां यद्वागमतदृष्टिभिः । जगनिधमनियांणः शून्यवादहुताशनः ॥ २ ॥ कम्य स्फुरदनं विद्यानंदम्य विस्मयः। यतामप्यलंकारं दीप्तिग्गेषु रंगति ॥ २८॥ विशेषवादिगीगंफययणायद्धयुद्धयः । अलशादधिगच्छति विशेगम्युदयं युधाः ॥ २९ ॥ चंद्रप्रभाभिसंबद्धा रमपुष्टा मनः प्रिये। कुमुद्वतीय नो घचे भारती चीरनंदिनः ॥ ३० ॥ कुशलानि विपच्यतां यदि मंति नया मम । यावज्जीयं न पश्यामि दुर्जनं स च मां यया ॥३..॥ अक्षमः सन् बुभुक्षाय तरानं तया क्षण। मां विभीपयते यद्वदहेतुकुपितः खलः ॥ ३२॥ अथवाऽस्तु नमस्तस्मै दुर्जनायापि यद्यात् । सप्रयत्नपदन्यासा न प्रमाद्यति मन्मतिः ॥३३॥ कलालन न यते चंद्रस्येव करिव । कंठे विग्रहो यस्य धूर्जटेरिव दुर्मनेः ॥ ३४ ॥ जैनशाकटायनव्याकरणकर्नुनीम कदाचित्याल्यकीर्तिः स्थान् । शान्दिकान् वैयाकरणान् । ३ वाणाः शन्दाः शराथ। ४ अर्जुनननामा द्विमंधानाध्यकनी कविश्व । ५ श्रवणस्य कुंतिपुत्रम्य च । प्रमेयरलमाठानामत यवना स एव मेघस्तम् ७ नयेऽभूत् । ८ टोकवार्तिशलपारम् ।९ विशेरवादिनामाचा- यस्य गीर्वाणी तस्याः गुंफ रचना तम्याः श्रवणे आवs मुदितां । १. चंदप्रम- बरिठेविकाव्यसंबंधिनी । " म्यानः। १२ प्रयलपूर्वकरचनाया मुद्यता । -प्रमादमाचरति । १४ दोषप्रदः परे ।

-- प्रथमःमः। दुनमा पटुछिदं तत्प्रयेटुमनीपराः। भपिनि गुणाधि निग्छिद्रं धीमतां मनः ॥ ३५॥ नम्मात् मनामुपम्फारं मामयामो प्यपेक्षते। मपिराकरजः गुस्य तन्नस्येय क्रियाविधिम् ॥ ३६॥ अम्नि भाग्नेयास्येऽस्मिन् जनानःशांतकल्मपः । पुग्णाभिरतिहेतुल्यात् मुरम्याल्यस्तनुभृताम् ॥ ३७॥ भ्रांतालिमनरं व्योम शालीयामोदवासितं । धनतिऽपि विमतीय पत्र कालयलाहकम् ॥ ३८॥ भुज्यमाना जन स्वरं यम्मिनुशासितायराः म त्यति लीनन्यं धान्यपाकममृदयः॥ ३९॥ शंका यत्र भुयो राशयुन्मुिपन्निधिदीमयः । अयानशालिपाकेषु पामराणां प्रर्यते ॥ ४०॥ सयंतीमुदा यत्र यामाही प्रमयोन्मुग्वीः । आपगाः म्यपयःपुयाः पश्यनीयांयुजेक्षणः ॥४१॥ नयः स्फरिकपापाणदीप्तिभिंयत्र परिताः । पईतीय मुंची गुवागेऽपि गृहदभमः ॥ ४२ ॥ रथयो यत्र पाटेपु पाकभंगगलद्रमाः। प्रयाहीय प्रकल्प्यंने पायलमंतगमुपे ॥४३॥ पनेषु यत्र करमरेणुसुगंधयः । माधीमुपगृहंते मारता यहुपातमीः॥४४॥ १ गुणाधाने कृपयानो मुदा र भरतक्षेत्र । ३ भ्रमन्तोऽलय एवं प्रसर यत्र तन्।४ शासनामामोटेन मुगधिन । कृष्णमेघम् । ६ उदासितानि गंधयुकानि भवराणि यासा । पक्षे-उदानित अवरमावाशं यामिता.। . पृथिव्यां लीनन्द । अन्यत्र-उधादम्बित्यम् । ८ यथा खपयसा दुग्धेन परिपुर पुत्रं प्रमोनुमुन्मुलीवाला मानर पश्यति तपेव खपयमा जरेन पुलिंगता सम्म वृद्धी यः कमलपत्र प्रेक्ष। प्रीप्मावपि । १. पाल या ता.पविकसनश्लातिकारिणी मृषां मुष्णानीति तस्मै । .॥४॥२६॥ इति चतुर्थी।

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प्रथमः सर्गः मुमानि मुगंधीनि निकुटे यम्य धीम्यां। पियंनि भ्रमराः स्त्रीणां गृहे यत्राणि यल्लमाः ॥ ५५ ॥ नयीनां पदपात्यं नयापनसंप्रहे। पत्र यूनां मनःपूपं नियें देनेय गच्छति । ५६ ॥ पत्र दुग्धच्छटागुम्राधि भोगैरपृहायतां । तन्याकटासविक्षेपा रागोपादानहेनपः ॥ ५७n वेदारनप्रमोन्कीर्णाः प्रानादाः यत्र पांदुराः। संदचापदारमधषिम्रमं माधु यिम्रते ॥ ५८ ॥ गृपाप्रोचनरसानां पुरंत्यो रदिममूरयः। दियापि यत्र कुति शंकामुल्कामु पश्यताम् ॥ ५९॥ आस्तीणी विपणियंत्र प्राप्यमाणिक्यरोचिषणा। प्रामा पालातपनेय प्योर्मपाययलिप्सया ॥६॥ पनीलनिर्माणगृहमितीरपस्थिताः । हेमपर्णाग्रियो भांति कालाम्दानिय विधुतः ॥ ६ ॥ मपनोत्तमिता यत्र पताकाः पीतमामुराः । माययंत्यधने प्योग्नि सणंदीधितिविभ्रमम् ॥ १२ ॥ हरिन्मणिमयाग्भामुन्मयूखां जिसिया। याँकुरधिया यत्र यत्सा धानि देवलीम् ॥ ६ ॥ अगाधान्नायमंपनी गुणी कर्कशदंडभृत्। अरविंदादयस्नत्र गजा धीनिलयोऽभवत् ॥ ६४ ॥ मातुं दिक्चत्रमाक्रामन्नद्वितीयेन सेजमा। च्याप्नुवंतं जहासेव म पहनेण नेजमा ॥ १५ ॥ यहारामे २ वृक्षाणाम् । ३ दुग्धवस्वेता । । सेवनम्य-अदनम्य च । ५ रागम्य प्रेम्णो लाहित्यम्य च । ६ थाकाशगमनममये कार्यकारिपाय सन्धु. मिस्छया । . नीलमणिनिर्मितगृहाणां मिनी समुपस्थिता । णमेपानु- पस्थिता इत्यर्थ । ९ विद्युविभ्रमम् । १. अनु खादितुमिच्छया। प्रभून- .. धान्यममृद्धिशाली। 1 F श्रीपार्श्वनाथचरितम् । स मनोकलाकांतिरुदयारतमंडलः। राजा मृदुकरोल्लामैः कुर्मुदानंदमादधौ । ६६ ॥ तादृशी पात्रता तम्य तं गच्छंनं करेच्छया। शिरोदारप्रदानाय शत्रयोऽपि यदभ्यगुः ॥ ६७ ॥ आशया कृतमर्यादे भुवने तस्य मध्यमे । साऽप्राकारखाताधाः शोभाय पत्तनादिषु ॥ ६८॥ तस्य धर्मभृतो युद्ध गुणारोपितशतयः । पत्रिणोऽपि स्थिरावस्थानुदास्यनवीभृतः॥ ६९ ॥ कामवी स मस्मिन्नुन्ननेप्यधिकक्रियः । तथापि जलदस्येव पहगुणाः मन्पथस्थितः ॥ ७० ॥ निर्गतं दिसतम्तम्य न लक्षादृनमाननान् । प्रत्यपधंत मतम् तथापि मितभापिणम् ॥ ७॥ धम्यमानाविपाक म लोकस्थित्या यदन्नपि । विचिकाय न कस्यापि चित्तऽपायं दयापरः॥ २ ॥ मंबद्धोऽपि मदाऽध्यक्षः करणसमवनिमिः । अम्नन्धः सन्नुपालन्धम्म्यूलमर्थमनभ्यरम् ॥ ३ ॥ जनम्य क्षुण्णमागेण दीर्थयात्रां प्रकुर्थतः । धमतापहरास्तम्य प्रपा इय विभूतयः ॥ ७॥ मुमोऽपि चक्षुण पश्यन् जगतजोमयेन सः । दहन दर्शयामाम मागंमुगमार्गगामिनाम् ॥ ७॥ कोरगान म आस्थाहानार्य सहरमयोः। कोपरमादयोम्मिलिमयापरिमित्रयोः ॥ ७६॥ १ मनोहरा चतुलाना नियम, पोपला पोरसो भागः । २ टक्ष्य प्रादुर्भवममय पदनमालवान् । ३ नृपश । ४ कोमलरिरणाना- मुगम पो राजदेवन्यूरभाग ।५ पृथ्वी । यिनीदनाय । . महम्म समव । प्राप्तान, पहचा९| मेरी मानुगारनिनिः । " पानीपसारिकादमरः ।

प्रथमः सर्गः। दुरुपान् मजा भूपः म चित्रं त्रपिशमः। पदुमहार रेऽपि मुजेनाजानुलंपिना ॥ ७ ॥ तम्बाराधयमा धर्म निन्यं तत्परया घिया। अनदयतां न कामाधायमोगादिय भूपतेः ॥ ७८॥ तहमागृतपानात् म्ययं कामदुधा मही। तत्फलानुभये पन्नः प्रजानामयशेषितः ॥ ७९ ॥ तस्य गमविदम्नेजो देयमन्यदिय प्रजाः । अयूभुजन्फलं काले प्रच्छन्नस्यापि कर्मणः ॥ ८॥ दिनपा प्रजानां सदाघमायाम्य तेजमा। पुरंपपि प्रथये न कृष्णेयार्मा गुचिप. ॥ ८ ॥ तंदुरामदमानाप विश्वभूति प्रभावितम् । उपाचेदं पचो मंत्री विध्यतिर्यिशापतिम् ॥ ८२ ॥ देष देयांगनापांगरचिगारगुणा गुणाः । किनगायिग्ने मानुषोनरमूर्धनि ॥ ८३ ॥ स्वपिशाम्नेरि लोकम्य शिवमेय गुणोतरं । प्रपीटयति मामेव केवलं प्रयला जग॥८४॥ देव! पश्य जपाधाग यिमुना रक्तर्यामसः । जरमा अरठा. संतो निर्भत्स्यने मम द्विजा.॥५॥ पाई क्यवेपदेन म्पलतोऽनुपदं मम । चित्तगुस्यय नियत्या दृश्यते पांडुरं शिरम् ॥ ८६ ॥ दायल्यं मम हप्देय अरिणो जनगर्दिनं । दुःनेप्ययन यनते स्यकायें चक्षुगदयः ॥ ७॥ १जयीलपराकमवान । सभोगत इव । ३ मही तणादेव प्रमवित्रीसतो प्रजानां तद्भोग एवं यत्नोऽनशिष्ट । । तत्तत्यमये। ५हीनचरियोऽमिथ । ६ सुन्नीकटाक्षविक्षेपवन शुभ्रा । शामदे। ८ रक्तवबधारिण । निर्ग- या।1.दुटभरवत।

१० धीrनागरिगम। जागरनीय मावानातिनी। प्रनिहंगिग कांगानो मागमागमकम् ॥ ८॥ प्रेषितः प्रापटीशमनिगमियांगता। मां प्रामयानपुरम्नादिय मृत्युमा । ... वयमा परिमिनेदमयंतापातानं । उपोगमिय मृणायां निति शिरो मम ॥१०॥ सनी मामनुमन्येया जिलं जिनदाशिनं । पपोकानेगागेश्यमन्यया मान मुंचति ॥ ९॥ यदि दिन जनीयं कः पुमानोपमानि। गंभीर भयपतालमयियो मृगतृष्णया ॥ ९२ ॥ इति विज्ञाप्य राजानमाभ्याम्यांयुधरी प्रियां। निषिध्यानुगनी पुत्री म प्रतस्थे तपोयनम् ॥ ९३॥ कमटे सत्यपि ज्येष्ठे तस्य पुत्रं गुणाधिकं । मरभूति महीपालः साधिव्ये प्रत्यतिष्टपत् ॥ ९४॥ अमात्यलक्ष्मीमामाघ सयभार यमुंघरां। समुद्रमेखलाफांनां मियामपि मुंघराम् ॥ ९५॥ आरुयास्तस्य मंत्रण परेपामपि संपदः । अनुरागप्रकग ममालिप्यन्महीपतिम् ॥ ९६ ॥ सदमदर्शनोपार्य श्रवणानुगतायनि । नृपस्तमात्मनो मेने तृतीयमिव लोचनम् ॥ ९७ ॥ नीरसंभृत्या तेन तीक्ष्णयाऽजिह्मधारया । बुद्धया निस्विंशयया च विभिदे मर्म शात्रयम् ॥ ९८ ॥ १ धागमिष्यता । २रसा। ३ वृद्धावस्थाया निगलनम् । ४ जिनोपदिष्ट- सम्यग्दर्शनादिचक्षुर्विना स एव मिथ्याज्ञानरूपमृगतृष्णावशाद् जन्मकूपे पांती- सर्प । ५ धरिणीम् । ६ एनानो स्त्रीम्। उभयत्रापि समानम्। ८ जलसहि- तया, नीरस दुहृदं मृतया पारिश्या दंडयिश्येलर्थः ।

प्रथमः सर्गः। भोगवणानुरे मूमें कमटे पारणीप्रिये। स पापन् म्नेहसंयंधात् परां मतिमदर्शयत् ॥ १९॥ पादनम्गभिगोमारमादिश्य सचियाम। सामान्यः प्रपया राजा पनीरजिगीपया ॥१०॥ प्लेन घलतस्तम्य भारामांना समततः। मागेपायनता धात्री पधादमागें महीभृतः॥ १० ॥ अनेमभूदायदा दिसिसमतंगजा। सानुरागयती तम्य धरेप धलिता पम् ॥ १०२॥ भूभरिफक्रियापंधोलम्याभ्यागच्छतोऽतिमिः। स्वागतं अगदे नूनं सेनायोपप्रतिस्यनः ॥ १०३ ॥ अदि गुन्ममयस्कंद पंकमुशर कंटकं । गछन् प्रियं व्यधनेव स पली पनपद्धतेः॥ १०४।। आरुदमिधुरस्कंध राजन्यपरिषेष्टितं । वर्तच्छण राजानं अनुजानपदा जनाः ॥ १०५ ।। भूगजः संन्यसंपातादुत्पपात नभास्थलं । तस्य धूम याभ्यप्रस्तेसोयन्हेज्य लिप्यतः॥ १०६ ।। अरीत्मीदरिमुहर्प सपनं मधुपं तथा। मंकुचत्यत्र संपत्ति यथा तीयो हिमागमः॥१०७॥ निर्गत्य पनीरोऽपि मयलो नगराद यदिः । प्रत्यग्रहीन्महानायं याणवरणातिथिम् ॥ १०८॥ खगसंघहनोझांतरफुलिंगः शरमंडपः। युदं प्योग्नि तयोधन मतहिन्मेघयिभ्रमम् ॥ १०९ ॥ पनीर जैनुमिच्छया । २ बहुनानिमिवेटिना, पझे-असंख्यपर्यने । ३ दिशु स्याता हम्निनो यम्या । अन्यत्र-दिग्गजा । ४ भूधारकरवाईधु । ५ समामे प्रत्ययातम्य पूर्वनिपान । ६ येनांगिविकारेत्यंभावी । 111५.. नीत्यंभारे तृतीया। जनपदे देशे भवा । ८ कुत्सितातिथिम । *AA १२ धीपार्थनायचरितम्। प्रहिता यनयीरेण श्यामपत्राः शिलीमुंगाः। नारपिंदमुपामग्नपि तेजोयिकम्यरम् ॥ ११ ॥ धनविकर्मसंनाहमंगान्मृदुरियाभयत् । मदंडमविदम्य कर्फ मोदुमक्षमः ॥ ११ ॥ भयेन धावतो युद्धादव्ययस्थितदिक्लया। तस्याप्रे चारविंदम्य जययाती जयाद् ययी ॥ ११२ ।। राजा पश्चात् समात्राम्य करणधनिप्छरैः। करग्रहेण युमुजे स पद्मनगरश्रियम् ॥ ११३ ।। नृपतिरहितमेयं यज्रवीरं विजिस्य स्वपुरमभिजगामोहामलक्ष्मीसमेतः। विकर्चकुमुदताराहारशुनं यशः स्वं दिशि दिशि सवधूळंगापयत्किनरोधैः ॥ ११५ ॥ वातोन्नर्तितकेतुष्टिभुजया व्याहूयमानस्तया तात्पर्यादिव विप्रयोगविधुरामासाद्य रम्यां पुरीं । कुर्वन् जैनमहप्रबंधविधिना लोकस्य भूरिथियं राजावारिधिमेखलां वसुमती दीर्घ ररक्षाशया॥११५।। इति श्रीवादिराजत्रिविरचिते श्रीपार्वजिनेश्वरचरिते महाकाव्येऽरविदमहाराजसंग्रामविजयो नाम प्रथम सर्ग । १ वाणाः । २ प्रभूतपराक्रमनाशात् । ३तुम् । ४ प्रफुलकमलताराहार- वच्छुकम् । ५ वातेनोन्नतिमा उचनीर्तता केनुयष्टिरेव भुजा यस्यास्तया । ६ विप्रयोगेन वियोगेन विधुरो सिताम् । ७ मह उसव उत्सव इत्यमरः ।

द्वितीयः सर्गः। अधाना पायांगनाया पुरस्य यूनांतयिोपदी। निदिनारमा रचियद्वितीयं घरोनराधीपरमानयाद ॥१॥ गाजधिनमस्नरेन प्रणय भूमायुपपिर पानी । प्रमोनियोगान् मनियोगमेयं प्रचामे पानुमनुभमेण ॥ २॥ सिरोभिरमय अगटीभ्यामभिमुर पगासनं ते। লেখালি গা বিমা নিনানমিম ॥ ২॥ यत्रो पिरंप! तापमान कलंकित नन् कमटेन मन्ये । पियोगिकीनामुपअनेन प्रायधनेनेव हिमाद्रिकटम् ॥ ४ ॥ त्यपि प्रयास र ! यसरं जेतुं म गोमा दिनस्य । मच्याविहारी मरुभूनिकांनां पहुंधरामशत पंकजाम || नृपहरीकामुकयष्टिभाजा कीनन निरचेताः । বরখাগল বিবাহিৰা ৰি মাখন ২৫ सायंकायगुणोप न कुची निर्जिनकुंभिभी। नयोमयेगाहरनादियाभूदनभंग खलु तम्य चिनम् ॥ ७॥ न्यन विच मुपद्रविध नम्या. म कामालतीप्रताप । समाय पापन तथापि नम्य स्मराग्निगामविधिगमीत् ॥८॥ स्मृतिबंधेन यधगया विद्याधर चेतसि गंदधानः । स नानिमुनाराप्रमागममंस्न मनं मकाभ्याम्य ॥ + अमिरा मुदा यस सन् । पिरमरच्छादियुमनार म. यनीति सेन । परी एवं धनुष्टिमा भजतीति तेन । ५ पूर्णकटोरे । जिता निन्या कुभी यान्यां। , यद्यपि शेक २. मलसमंतापहानये भवनि, नयापि कमान उनापदन्न विपरीन एव जान इत्यर्थः पुन पुन म्मरणेन।

१४ धीपाश्चंगायचरितम्। मनोरमापर्तिनि नामिक निपातिनं तेन मनम्नटीये। पुनर्न कर्मण्युदतिष्ठत स्वे गमीरपातालमिय प्रविष्टम् ॥१०॥ निषेधनायेय पुनः प्रवृद्धः कांचीगुणेनामिनियध्यमानः । सविस्तरस्तन्मनमाऽणुनाऽपि न्यानो मृगाच्या युगपभिनयः ॥११॥ धृत्या लतांगी करपल्लो ताममनमारमिवानिवृतम् । निरुद्धपंचेंद्रियवृत्तिचित्तं तं मृत्ययेऽयच्छदिय प्रणेन ।। १२॥ पूर्वापरालोचनकर्ममून्या तथागतस्येय मतिलटीया। वृहत्समारोपतया रुशांग्याः कोऽयलो मुनराममाक्षीत् ॥ १३ ॥ स विव्हलः सन्मदनानटेन किमप्यत्या जनतासमक्षं । नृवीर! विश्वास्य जनेन साप न्यविक्षतोचानमशेपितात्मा ॥१४॥ अतिप्रवृद्धेन मनोभयाग्नेस्तमोप्मणा दुर्विपहेन राजन् । अनीयत पावकतां तदंगे पुनः पुनश्चंदनपंकलेपः ॥ १५॥ स्थितोऽपि तम्यामशनैरशोकप्रबालशय्यां स विवृद्धतापः । ज्वालाभिवायुद्ध दयानलस्य सरातुरस्यास्ति कुतो विवेकः॥१६॥ स चंदनांमःकणसेकतिरावीजितः सन्कदलीद्रुमाणां । मुहर्तमापांडुरगर्मपर्वर्विपानलस्पृष्ट इवामुमूर्छ ॥ १७ ॥ मुहुः समुत्थं दुकलाविशुद्धां वहन्मृणालीमुरसि स्मरातः । असून स्वकीयानर्दतस्तदानीं दंडामियातकयदंतकम्य ॥ १८ ॥ मांदोलितोपांतसरस्तरंगो विनर्तकश्चंदनवलरीणां । विदाहकारी श्वसनोऽपि तस्य को वा प्रियो धर्मपथच्युतस्य॥१९॥ मुगंधिनीलोत्पलतल्पशायी मुद्दतिरेफरुपरिभ्रमद्भिः। धूमायमानस्स इवाभवत् मागभिज्यलिप्यन् ऋशंकेतनेन ॥२०॥ आसादिताः पलपरागभंगं तच्छासतापन तदीयदुःखं । सामीप्ययोगादिव बालचूताः स्वयं विभागागतमन्यभूवन ॥२१॥ बुद्धस्य । २ झारप्रदेश ३ मंतियति स्म। ४ जनसमुदायसम्मुतम् । ५ उष्णताम् । ६ भक्षयनः । ७ वानः । ८ कामेन।विभागे भागतम् ।

पानीमाभिगेणा मि। निपामिपा पामोदिगार्म प्रममामोतिर ता, गन पुराण मामलपोपमाया Trयागामिनाममायांना मानायराय.. नागपणनावीमापारिदंगमामा। मिधा गर्दनि स्थानों में पुराने र पापमाRUR भनिषितामग्मिन् पिया पर्मपिपपिनि। परमाणपरमपिपनि गानुगः ॥२५॥ मितामय पारंगपापामं मापा गागमना। अपादनाांगमया मतपः हग्यानिक निहितम्य ॥२६॥ সাবান বিন সালসলখানালদাে। अपुरयांगमनंगा, ग्विादिनाग्मिन पिपये पिरग्धाः॥२॥ सोनयनमानीय पानिमिनमा पिपरिया निदिनानि पंचा प्रतिमियां पारमादिनि॥२८॥ मरपन तिचिनिदोगा आशयं पापं मृगन्दोचनाया। दिया वियप प्रथिगुप्यमानो प्रातृप्रियां परमपोचदिएम् ॥ २ ॥ মনাময়লখি !নিলিম ােিখনি যাযিয়মল। चिकिरिमन पेट ममानगामा शायुतस्तात मुलभ न पेनि॥३०॥ मंतापमादा एग्दीकभगायध्यप जन मनोत्र । मनोमर्याम्नागिपं मतिमें प्रिपाधिरुदय विभतिलोत्यम् ॥३१॥ मी गृगणेय यनं जनानां राजाभिमानेन मनोऽपिछले। तापत् ममात्रामति सीमाती यायन माईल यांगजम्मा ३२ धुनोति नूनं गनने मितीय धर्मस्नदाहामनिलंघयंतं । गगेक्षण!न समतं मनोभूः क्षणेऽपि भंग निजशासनम्य ॥३ पाठक याभ्यानका । ३ नेत्राभिरामाम् । शोभनदन्ते।। पराध । ६ उभयत्रापि हारदिता।

श्रीपार्श्वनाथचरितम्। अकारणोद्वगकरो नराणां त्यया स माहादमिय अपनः । उदासिनानन्धि!नयांतिकस्यं यत् मांगतं मांप्रति पुगधन्या॥३४ भायोग्नं भावगीरमित्यं निवेद्य तम्मिन् विरने नतमः। अभापत भयकोपमिश्रं ग्मांतरं किंचिदिय प्रपन्ना ॥ ३५॥ गुणगुणी योजयिता अनन्य दोगनदोषीच निराकरिष्णुः । यदि त्यमुन्मार्गमुपाजिहीयाधिांतनो नश्यति हंत पंया ॥ ३६॥ पियशीतं विरामकियांतं मंकलारभ्यं चरितं सरस्य । नसेन कुरीति यो मलिए लोकलयमाप्यगुणं गुणादगाः ॥३७॥ मनाममंगोपि पगंगनायां भिणोति पुण्यं प्रथम जनम् । ग पुरिनम्ननुयारमगंग गत्यापि मारण लगने किमान्य गुणानुलेपन गुभग मविणोलीमाशे तिष्ठति माना। मग पर शताभिटामीर्यायीयोन्नति निर्मिनंगा ॥ ३॥ तिं यदीच्छेदिमीर में पुनयंगो मा चायः कर्णचित । इति मनिप्रतिपिता नयी पिमनमय कमटोपध शिमलो गगगी ममापमुग्ययाम्नन्यि ! नितंपशनं । न शिनाने विनियतनामा रमानभिज्ञोऽधपारण ॥ ५॥ यमनी नायनाट्य कला शिक्षा विपुलाय दक्ष्मीः । अपत गमिदं निगमनाग्माणामधगेष्टमियम ॥ ४२ ॥ গিলা কানা:না ন মাধ্যমি। माम्नु मानयि रिया नियागंतामन पदाव्यति पनि प्रयुनानुनयानण प्रियाग मंग्यामगमगमगी। बनायव मया श्रीया मन, मिन पाजाम ... मन , म पगा... पत्र! Thera •ाीम।

नियमः। अपि निगमम्म पुंगोऽभिगुगा भुजपंजरेका मकामिनी पनि मगन सापाया तुम किंफरोनि ॥४॥ रूपंगु यापनमामिमान्य नतनपान पिचारयनि। चिनियपि सन्निविष्टाः पंदपदपं परिवति । ४६॥ उपसभाप दिनादी कगंपरशापि मपासपीः । सगरमाणिनि मानुरागा पनं न हि ग्लामरनिर्गुण ॥ ४७ पिरप्रयाया फलदं मम छायोपपन्न मगुणाभयंती। मंदता पुर्णपती तु काले क्यरोपमोगं मधुगाय दसे ॥४८॥ आस्तामयं बीमानियादी प्यायनितुपियान मुमुक्षो. । मुये पर नग दुगचरित्रं निशम्यतां दय: नदप्यारम ॥४९॥ सायनोप्माणमभीतता- स्त्यदेकया गणिकाजनम्य । यक्षस्थलनोदजहाद् रहस्ये मलीदहार कुचकुंभभारम् ॥ ५० ॥ रक्षिता। बाहुपपरेण । ३ रे हिरणहम्नवी । ४ पशे-पुष रजसती जसलेत्यर्थ ५ मधु मा पिवनीति तस्म मोक्रमिण्डोः। भ्रूयताम। - भ्रमराय श्रीपाश्यनाथचरितम्। स राजगेहाद् दिवसेषु निर्यन् । मातंगमातुहात मार्गपीतात् । तवाप्यसंभाव्य नमन् मनुष्या- नसहपीडानकरोदुयरमा ॥ ५ ॥ अपश्यदापूरितरंध्रमागं तवानुकुन् नृप ! राजयीयी। मेंद्रयायी पुरसुंदरीणां नेत्रोत्पले सोधगवाशजालम् ॥ ५२ ।। इतीदृशं गर्हितमन्यदन्यत् नरेंद्र तस्यास्ति याप्रकारम् । अनिर्जितात्मा कुरते हि नो यत् तत्सर्वमुर्यामधया प्रदुष्टम् ॥ ५३ ॥ श्रयं यथापत् प्रणिगय तस्मि- लिच्छाधिकाप्सनृपप्रसादे । घरे गते तं मरभूतिरेयं प्रज्ञार्यमाया गिरमायमापे ॥ ५४॥ असस्यय न घदंति दंडा- दसहादुःस्वादनुजीयिनस्ते। संयाधतां देय तथापि पापयं चरम्य ताईटनिर्णयाय॥ ५५॥ बिचायं कुपोलेमतेऽनुराग जनस्य लक्ष्मीः खलु तन्निमित्तात् । युरोपिशुद्धिय पर निघते द्वाराणि पापम्य दिमा पित्त । ५६ ॥ भसक्स । ३ अत्यधिरामो कृपय प्रगादो येन । ३ मिध्योखिम् ।

१ ९ दितीयः पर्गः। अधिधिनागमपि मंनिरहे करोति दिदियधुपर्गः। भ्रमं प्रपतुंपिग्माभिसंधिः कि.मंग! भायो पिपये परोसे । ५७॥ अतःवर्ष सम्म पिपिप्प दो पतम्य नीम्या नप! निगृहीतुं । जनम्य मन्युज्यटनापसीदा नयाऽन्यथा मलायति कीर्तियागी।५८॥ नदेतिरामा जनतामम पिचिन्यतामायि तथा स धर्मः। पहुंधरामपहनाधएत्ये पधा म्पपनिए पचो जनस्य ॥ ५९॥ जनम्नतो राजममीपवर्ती पराधिरु कमटं नगर्या। निर्यासयामाग स टोटघानं पूपांतपत्रं परिभूप पापम् ॥ ६॥ असल्यवृत्तापि विप्रयोग- तस्याधिक पंधुजनप्रियम्य । घकार दुखं मचिर्यस्य दोपात् मनतिन प्रेम महानुभायः॥१॥ चित्ते गते ज्येष्टघियोगदुख- भागक्षमत्यादिय पिप्रमोग। चिराय तस्य प्रतिमुप्रयुद्ध- न भोगयांच्छां दधुरिद्रियार्थाः ॥ ६२ ॥ कोपाप्तिमम्परा । २ मरभूतिपत्नीपाणिप्रहणादि । । दुधरित्रस्त, ४ मरभूते.. १ Hrmगाग्निम्। कुर्वन प्रगानेन नपांग रिगामी कमठानगांग। माणपननमर्मगे येन मीन गनेगोण.३॥ समाय! जानामि रायामा प्रांगगुरागया गया। पगिते कागुनमत्र गर्न मगिनां यमि गाउयदि ॥ ३५॥ इतोनिदेयोजनाले मत म भूताचलगामधयः । अत्युत्थितं यम्य महधामा एमादनिकामति भंगाटम् ॥ ६॥ आमुर्ननियन्दमनीमहाग भुजालंनामम्यिननागमुदाः। गृहन्नितयाः सविलामभारा मनोगमा यध विमति भित्तीः॥६६॥ पनद्रुमान्निारगुम्नतोय~ घेपि यो यधंयनि प्रकामम् । पादाथिनानाममिरक्षणं यन् तदेय कृत्यं नु महोमतीनाम् ॥ ६॥ यः पार्श्वभागायिलंयितेन विचित्रजीमूनकुयन गयी। १ मार्ग परयनिसर्थ । २ कमटमपिनम् । ३ सूर्यः। मामुका नियंधा निझरा एव मनोहरा हारा यामाम् । ५भुजाएर लनामामामधे स्थिता नागा एवं मुद्रा यामाम् । ६ वृहत्तापायाः| ग्रीष्मेषि। विचित्रमेष एवानरणविशेषरतेन ।

स द्वितीयः सर्गः। नयमानापरिचीतगूपों मपनमन्वेति गजापिगमम् ॥ ८॥ भीमो भृशं भानुभागभिमार यः सूर्यकांतरितमनोमः । गंदांगुणानदयविकांना गंसर्गजा दोगुणा भयंति ॥ ६॥ पिलोचनानीय मगंगि पम्मिन् पिनगीनमनोहराणि। नीलोत्पलीरमणीयतारा- मागंदगण्यापतिमंति मंति ॥ ७० ॥ प्रानि मह प्रियामि- नभधग पम्य गुरुममादाः । भंगीगादगलागून-- पपीतमपपुलतागृहेषु ॥ ७ ॥ गुदामुगदगर्भग कंटीग्यम्यानमुभीमशाद। यः पायने यमनि पर्तमानी मातंग कुरने दविष्टम् ॥ ७२ ॥ निहन्यवन्येभविगणभाजा निर्मूलितानेकपनमण। मार्गेण यस्मिन् दायर.शयनां नियुध्यते कायमहत्ययोगः ॥ ७३ ॥ दुटितमीनमनोहानि । २ सानुषु । ३ भ्रमगंगमूहक्षोदेन गलनि यानि प्रनानि ते पीतानि नल्यानि येषु। । कदरामप्यस्थितम् । ५दरशन्दस्पेष्ठ- प्रत्यतिम्प पम् । निहन्यवनभवगजदतगहिनेन । . उत्पारिता भनेक बनाक्षायम्य तेन । नागानाम्।

२२ श्रीपार्श्वनाथचरितम् । तस्योपकंठे यनराजिरम्या तपोभृतामाश्रमभूमिरस्ति। या प्रत्यहंग्योमनि होमयूम- नयायुयादशियमातनोति ॥ ७॥ कुरोपमेयः कलशरिप्रमंध्य पपः सात्यो यतिमुग्धकन्याः। स्थमध्यमादयपुर्णन पदया सनादुर्म यत्र विपर्धयन्ति ॥ ७॥ सापागगा पत्र गृहीतशिक्षा नगनिक चापलमुगतः। कति मागीय निगरपा नानामंधादालयीः ॥ १॥ विरहस्यायनमा गधा- बनना पंजरपागितानम् । यद्यानुवादः गुरासारिकाणा- माकने कामायनी ॥७॥ जटायां जीर्णोरगतम्या मागिय किरदेशान्। মাথামেণি माना नाम्पामग्मग्री ममुगमीटर या निशान मुमा म दिशामां। मापन पाहिग. पानिया नियति मानभंगी.. "fmgrahrum द्वितीयःमः। निषेध पानी कमटम्य सम्मिन् गृहीतमत्वामित किगते। अपयन मनियन गया दुमोहपातम्यारितेन गजा ॥ ८॥ मेमानुसंधः म्यजने अनानां पचिन् प्रभो ! दयपलात् पुतोऽपि । पर मप्येत गुणमार्गद दोगनु न मच्यपले कदाऽपि ॥ ८॥ अतो पियांग न महे दुरनं कृतागमोऽपि म्ययमजस्य । पुनः करिष्यामि तयांतिक तं प्रमापता देय!नयर भृत्यः ॥ ८२॥ भूनाद्रिश्रृंगे मनपीवियांगा भूयाग्निकारच म पादनेऽम्मिन् । पुरि गुणेषु प्रदिणाति तम्य प्रमाप्टिं दापं च पुगनिविष्टः ॥ ८३ ॥ इति प्रचंतं तमुयार गजा शुचिम्मिताहासितदंतकांन्या। कुर्वन् पुरस्ताद गगनप्रदेश चंद्रोनपेनेय दियाऽपि लिप्तम् ॥ ८४ ॥ अपथ्यकर्तव्यमिदं हि पुसि यत् सर्घषा प्राधुजनप्रसंगः। विधेकसि से भवत्युपायः धेयस्करी सा च भवदयेऽपि ।। ८५॥ पते । २ भपराधिनोऽी। चदिकया। दिवसेऽपि। ५ श्रीपार्श्वनाथचरितम् । अहं तयाऽपि प्रतिवेदनीये वायेऽपि दोपे सति निम्पिंगः। গিনিত্যতমনা किमंग! याहापु करोति तृष्णाम् ॥८६॥ तुलेन कुर्यग्नपि दमानं श्यो नियोगस्नय निस्लरीतुम् । मात्रा निकारप्रतिकोपिनेन प्राणायाय पुनः प्रयोगः ॥ ८॥ अगमन्यिमि यद्यपेया म्नमुन्यणक्रोधनासदाधम। सायंकगफादितमम्न था व्य कंदामाणं गुजंगर ॥ ८॥ अमान्य कामं नानेगमाय प्रायागनग्नं गृहमधगरे। शायाममुहिदप ग निहंगाम पोधादमांन यदि या तीनम् ॥ ८॥ বিনা নিসা বিশ্বাস নিন। प्रामाद,ग मरितादिनीय गिकमालायन गुमममम..॥ विवस्तुंगारंगलम बलाकागदपार विनिम्नरपदान नगिन: from य। HTTTTTA द्वितीयःगंः। मिनमायालयमा जुन्यं पाण्यापिकादेन मायामः। चिगय वन निर्मपिताम्म मेवामिगम्योरपनाविशेषः॥१२॥ इनि प्रियामानय गमा पर मुहलाद रोम मेयः। प्रचंपातीपात- भापादितोहारपिट १३॥ नांऽयुदम्य प्रति म पदयं- धावयारनि पिरनानाः। अनेन पुरविण्यहियाणा- मताभ्यनत्यं घुटता घनेन ॥ ९५॥ पपुः म्यभायाधुचि भंगशील निदानम पदुदुएगः। मदर्थमारमानपयोधम्हा अनारमनीनं रदयंनि यत्नम् ॥ १५ ॥ हिवाहसंबंधिनि नायदम्मिन् देहदप्रेम जनो नियनन् । दीतनिर्मुनाचिरंतनानां मंग पुनर्यिस्मरतीति चित्रम् ॥ १६ ॥ प्रयत्नयहारमशीचपात्रम् क्षेत्र यपुर्याधिमर्गपाणाम् । कारयाम । , दशित ।। प्रचलपवन एवोदरदामस्य पावेन नाशिनोऽसारीरपिडो यम्य ग । भाग्मविवेमूर्मा १५ द्योत्रयाणा दिनानां गंबधो यस्य तस्मिन् । ६ पूर्व गृहीता पधागिर्मुना ये चिरंतन पूर्वजन्ममधिनस्तेषां । . रोगपसपणाम्।

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हिनीयामा चिम्ममंगलांगलेग्गः पपुषमाग मधुपरणाद। लताः म्ययं दनितलाम्पालीला- मनग्येप गायंनि नाप्रमापम् ॥ १०४॥ मुनेशाकम्प पनायो निस्निायपमशोकपक्षा। भुवं समपरशेष पद यंजन्ति रागं नयपाहपु । २०५॥ नाकालिपानीमभयं गुनींदी- गुंणं प्रशासन दय द्रमाणाम् । आघ्रांबुरम्यादपिपरदः कर्णनि लीलाकलमन्यपुष्टां ॥ १०६ ॥ यतिप्रभायोपनतेन घृता पमनटपनियमगमन । मरामहाष देय! मर्य शाखाहमालभारसिना ॥१७॥ नमोमुचस्तम्य गुणप्रकासात् महीश! विस्तारयतो मिये। अन्वेति नन्यागतमकराश्य तमस्तमालगुममंनिशम् ॥ १०८ ॥ नयन् सलीलं सरमोऽथुपिंदून पाघानियाकटानगंधः। यदान्य ! पन्यदुमपुणदो मदी मरन्त गुरुमभ्युदेति ॥ १०९॥ १ अमर । २ कोपिला । ३ दायासहपत पलास्तेषां भारे सिन्ना ४ गजकुभगतगध ।

२८ श्रीपार्श्वनाथचरितम् । विपाकमाधुर्यभृतो मनोन- क्रमास्समासातिशयावरुद्धाः। तपोभृता विभ्रति सांकुमार्य जनार्य वाचो नववल्लयश्च ॥ १२० ॥ नवोद्गमाः स्थावरजंगमानां प्रमोदपात्रा यतिसंगमेन। रजस्सुगंधि भ्रमरावलीढं क्षरंति नांगा यदि वा मदांमः ॥ १११ ।। क्षमोपन्ना व्रतेतीरनूढा दृढं वहंतस्सुमनस्समृद्धाः। मधुवंतानां प्रियमुन्नयंति धनद्रुमा देव ! यतेर्गुणाश्च ॥ ११२ ॥ पिशंगितांगी परितो रजोमिः पुनांगनव्यप्रसवामिवांतः। विभाति साधुप्रणयोत्सवेन मही महीमाथ! हिरण्मयीव ॥ ११३ ॥ तपोनियोगाद् यमिनो वनांते पूगदुमान् दर्शयतः फलानि । लिप्यंति वेश्या व नागवल्ल्यो नखक्षतावर्जितपत्रभंगाः ॥ ११४ ॥ मनोहरा रचना श्ली यासां । उभयत्रापि समम् । २ समासेनातिशये. मावरमा । अन्यत्र-समस. संक्षेप । ३ भचला.। ४ पृथ्वी, शातिय । ५पत्री, विदमानता च ६ पुष्पाणि, मुटु घेतथा ७ प्रमराणा, मघमतिना च।मुवर्णमयीय।

हिनी । मनापागाय प्राः पीप मागुता। Srini एमाण पाया ममानित १५ ॥ गांगुर्णमा तिमिर पापर चिनाधिकापमधमांगम । मामा मतिमंद गणपमानंद १५॥ पदानिमिगत भान रयम.गांजरिमारिए। मनाम नाम मुनिपुंगराय गुणी दिगुल्या पिलय. प्रभूणाम् । ११७ ॥ পায়খানি বিসি म्प पयगाबादपतारितानि । अपनपाए जा दानोगामामयता दिएः॥१८॥ सपोरणामापागलो. मुंजालमागी मागतम्। प्रग्यानमेगापर्षयात यदिः पुगेपानपनं जगाम ॥ ११९॥ मस्मियशोगद्रुमचारशावा- लतांचितामाटिकनिषण्णम् । पिधामृतम्यादपिपरमान प्रकादपि माऽपिपण्णम् ॥ १२० ॥ मनस्विनराग्यममर्षम् . 1am श्रीपार्श्वनायचरितम्। धर्मस्य सर्गमिव देहमिय क्षमाया मोहस भंगभिय संघमित्र मतानाम् । दृश्यं प्रकाशमिव तत्यधियो दयाया मूर्तप्रयोगमिय सार्थमियागमानाम् ॥ १२१ ॥ यतिपतिमवलोक्यानेकपाद दूरदेशे क्षितिपतिरवीणस्तूर्णमुदेलहर्षः। सधिनयमुपगम्य इमातलनातचूडा- मणिरगणितलस्मीः माधुयंचं ययंदे ॥ १२२॥ मानीतं म्यनियोगयतनपरः कातिलक्षणा- दाक्षिण्यामलसेजमा यमयतामाजात-मापासनम् । प्रौढाधिमभक्तिनिर्भरतया पृष्ठे भुपस्तिष्ठता पाच्य मुनिमयः क्षितिभुमा म्याक्तगुसभिया॥१२३॥ इति श्रीयादिराजरिधिरचित श्रीपाजिनभरचरिते महाकाव्ये म्ययंत्रमागमनं नाम हितीय मर्ग।

तृतीयः सर्गः भपतापनिदाघपीडितं भयता नाय मनश्चिरायन अमृतधुतिनेष नेत्रयोः परिलम्धेन भृशंप्रमोदते ॥१॥ धुतसंतमसं रजो पमत् सविकाशपति मत्पथोन्मुखम् । तय संनिधिनाऽभवन्नृणां हृदयं पममिवाहिमपुतेः ॥ २॥ विषयव्यतिपंगनिम्हं चरितं ते दुरितप्रमार्जनम् । अपयन्नयसानपेक्षालं सहदामादमुपैति मानयः ॥ ३॥ स्वपराधनियईणं पला- दसिधारापमणोपमममम्। पिरलाः खलु ते भवाशा नियमं निर्मलमुहंति ये॥ ४॥ मलिनानयलोकते जनो जगदुपोतकतो भयाणान् । अधिवेशतमा मलीमसान् रविरमीनिय नाममदिजः॥५॥ १चंदममा। २ सूर्यम् । ३ जानन् । । सनपागे परिगमनमिन कति मित्यर्प । ५ राहु।

धीपाश्र्धनाथचरितम् । अथ कुंजरौलनिहरो- चलदच्छांयुविवादितगुमंम्। मलये नृवर! प्रतीयता- मनुवेगापति महकीवनम् ॥ १८॥ . जटिलाः परिधीतरल्कलाः स्थिरतावाधलदंतपंनयः। तरयः मययोयिकृदयो विदिता यत्र तपोभृतोऽयया ॥ १२ ॥ निजचापलनारनिम्यना नयीयपमरच्छिलीमुगाः। कुरामस्नयाभ्यजोरदा रणधुयां दय यत्र शासिनः ॥ २०॥ अतिमगनिमगमार करिमग्नं पलु यत्र यंदनम्। अनुशोचति निश्वसनाली नमय गुणो न नाशः ॥२१॥ मुपिरम्यानमंतन- अनिमियद्यशाल्मलीना। व्यपयेव विषयनं मह- घटनामाशितकंटकातः २२॥ यननिमहावयागिता पितता यद्विपमहाधिाम्। गुमेपुनारामारभ दिगुणं रिमनि भंगणेशलम् । २३॥ 12: शरचा try बैशाम पवार मात्र - नृतीयः मर्गः। पदविधरनोई- नियि भूरिजराहनावृतः। श्रुतिरम्पग्याशिलीमुग्वा निषित न परे गुणच्युनाः॥२४॥ मुरभिनंदपालयास्नरी पपया यदनयंदनापतिः। परिरम्यतयेय भोगिमि- नयनागः ममस्तु भन्यते ॥ २५ ॥ नययाणयुनाः कुजातयो विकटाधा विकलाः पलाशिनः। प्रतिविम्रति मत्पोन्नति नग्यो यत्र न पन्यमानधाः॥२६॥ यितनोति पडप्रये भृशं प्रमदं यम्य मदानता लता। मुगमिप्रमयाऽय निना- मपि भूनाथ : मदानतालता ॥२७॥ तिलकांकितगंडमिनयों नखरन्यामवरणहारिणा। हरिणाऽपमन्यपिप्टिनाः पृथुला इय पत्र कुंजराः ॥ २८॥ समददिग्दनिपातिता-- स्तरवो यम्य निरंधने पथः। मरला ननु मार्गविश्य. स्थितिभनचितं विधीयते ॥ २९ ॥ . Imत गरसमक्षा ।

भागायनायग्निम्। निशिया मुइंगमः फुरन् मणये नकिरणोपदर्शिनः। दायरेयिंचभियुग पनिनादिकचिदंग! भृत्यो। ३०॥ ज्यनिय यनांतशायिभि निशि पम्मिन बहने गंदनः। प्रविमुच्य गाग्भमा नमोरंगमति पदपा ३॥ FATमागगगहर মুন্নিয়া । যমনি বা नग मिथ्यायमनशाणम ॥ ३९॥ বা সানুলকি গ पावापादयीनुनमा । माएकोयममाये अवयं गुणता गुण. ॥ ३३॥ एमसनं पिता गंगा गमाhि) विशालमाग सनामामामा पान जवानिमन। अटानामापन: मानविन .. Au -------- ३७ दतीयःमर्गः। त्यग्येय मधेगनिम्यना मलितुं भर्तृममीपमुपताः। नरलांगतरंगपाणिभिः हरती तीरलताः मग्गीरिय ॥ ३६॥ अमितम्नटमंयु मालकी नरनियामकायितीदरम् । प्रतिपूर्व पदस्यनारतं यिषमा धेगवती च यमदी। ३७॥ कुलकम्। गुमलामममुहसंभृतः सममून् नत्र महागजो गजः। प्रथितः पृपिपीनले भृग पपिपीघोष इति प्रभापितः ॥ ३८॥ सविभागशरीरभागपि प्रपलप्रेमतकतां गता। मसी मुरमच्रममा- रमयसम्म घशाऽपि परी॥३१॥ मरभूतिरपाम्य जीयित मनमातेन विवेकमूढधीः। उदिने म तयोर्षनातरे पवियोगाद्वयनंदनोऽनि ॥ ४० ॥ घटुपाटलपुष्करोदर. मपिरियन्निजचिंमलीलया। पितरी सुतरामम्मुदत् मजलम्निग्धघनायनच्छयिः॥४१॥ ऐरावतस्य । २ स्वनिनतनामिकाया टीलया।

३८ धीरायनायचरितम्। पपुग किमपि प्रपुण्यता स पितुः पीतययास्मीपगाः। गिरिराजममीण्यतिनी- महरण गंडशिलोपयश्रियम् ॥ ४२॥ कलमेन मामलटाः मपन्निविगणकोटिगा। अभपन प्रतियोगमनमाः करिणम्म कगटनेशमा ५३n अनासपने प्रति पागि प्राय ग गपनापनामा पापिनं भिगमन fnfrinातागुगपुग.. पत्रमगोडपत्रमः परमदिनादिया। परिणीनिगमायगाने महिनालंधगर्ग मधिलम ॥ कारण मतदार मनागमन। भातानिदर्शन প্লাগ নাবিকাশিম। अपमानित महापामा अनिल ना म मा गjिi...

AN - गृतीयः सर्गः। प्रनिपानि पनांतवाली गुमामोदिनि मंदमाने। मनटीपुदिनाभिगंभयो निति निद्रामुग्वसिद्धिगृच्छति ॥ ४८॥ अनुजय पंधन नापमः चुपितंगधमतो दिः कृतः। पमठोपि किगतंगाना निपटाराशीमात॥४९॥ नगरे कचनारिमाय:- निहती गोपदणे म दुप्पकः । अमुमिनिरमुच्यत मिय- रपि दुफमरतो न बंधपः ॥ ५० ॥ अजनिएम पापयेष्टितो- गूनुन्मुच्य गजमियायने । कुपाकुफी पुरारतं मनु काले नियमन पच्यने । ५.॥ पतिपुत्रवियोगदुःसिता परिहत्येयमराननुधरी। ससकर्मविपाकदोपतो विपिन तत्र यभूय मकटी। ५२॥ पतन कपायरंजित प्रविधेयं विदुपा निज मनः। रिपुरस्ति कपायनिभी न परस्संततःखलभनः ॥ ५३॥ मीनराश्रितः। २ प्रायोति। शापक्षना। ४धानरी । ५.

४. धीपार्श्वनाथचरितम्। अविरम्य यथेष्टमाचर- न्नुपचित्याशुभकर्मपुद्गलान् । परिपकरसानुशलिह- अनु शेते भृशदुःखितो जनः ॥५५॥ विनियम्य मनो जिनेश्वरे विदधत् माधुसमाधिभायनाम् । शतांनय पंचपक्षणः परिणामान्नृप ! यंधवाहिनः ॥ ५५ ॥ इति नम्य निशम्य शंसित पतमुग्यम्य मुखोद्गतं ययः। प्रभुयमनायत क्षिते- नाम भीतमना भयभ्रमात् ॥५६॥ अयिनम्वरसाव्यकारणं प्रनियोधनमायापया पिया। विषयोपनिपातामयाः प्रतियन प्रभयो न मुनयः ॥ ५ ॥ अभिषिच्य नरेंद्रमामन -- म्ननप गयधुरे नगधिपः । मागायुग्मनही या विधि सम्पय मुनग्नुभया. परिहत्य दिविभूषण मगिदागदादि प्रारदामयं पुन गया गनिराशियोचना । ५..॥ मदीदा।

मृतीयःमः।
अधिगम्य पुनर्निनिर्णय
ग्ययमंगेतु म सीमयमः।
गुणगाग्यमनमुपक
रपधिमानमयापपद्धनम् ॥ ६॥
चिरमुप्रतया नपधर-
प्रथपिमानमयेन भुग।
अयरमपश्यदायुषः
म निद्वादशवर्षमंधितम् ॥ ६॥
परिहत्य गुणी गणान्ययं
विदधान' पुनराममंस्त्रियां।
जिनचन्यगृहान विवंदिषुः
सह मायन यया दयानिधिः॥२॥
शिविर पणियां नियामिने
मति तम्मिन्नयमालकीवनम् ।
ममया ममयानिीतिमान
कचिदाशिष्ट शियानले यमी॥ ६३॥
विनयावनतानतामस.
नाशिगुमममुवान यणिग्यगन ।
मन्दकाईममदनक्षमा-
मशिषद धर्मकथां यथागमम् ॥ ६४॥
मगभतिवर. कर्ग नदा
पवियोग मदमेदभीषण.।
जनघोपनिपीडितश्रया
कृतकोपः शियिरांतकं यया ॥६५॥

४२ श्रीपाश्वनायचरितम् । त्वरया गिरिराजमनिमः स निवेश वणिजां ममनमत् । श्रुमिताणवतोयदुःस्यतां कृतीतिर्जनसंहतिर्दधौ । ६६ ॥ मयनुन्नतया ममुश्चरन् ककुचंतं जनताध्यनियंयो। यमुधोद्वहनाय दीक्षितान् स्वयमाक्रष्टुमिवाष्टदिग्गजान् ॥ ६७ ॥ अशमी समयर्तिनो वपुः कुपितम्य प्रथयनिय द्विपः। शिविरं निजघान यम्मरः करदंतप्रमुखनिजायुधैः ॥ ६८ ॥ मनुजं मनुजेन गां गया हयमवन लुठन् म निष्ठुरम् । अवधीदयधौ निजायुप भनु तत्तस्य वधाय साधनम् ॥ १९॥ सुभटस्य समुक्षिपन् यपु- निहितम्य स्थकरेण सत्पथे। इयतीति पराक्रमोन्नति- गुणवश्यः स्वयमत्रवीदिय ॥ ७० ॥ नमसि प्रहिता भरावली द्विरदंतम्य करेण सक्षता। रपिरेण मिपेच भूयसा निजमन्युमचयोपमाभृता॥ ७१ ॥ , यमस्य । २ मसणीत।समेघसमुदयतु येन ।

- रातीयः मर्गः। अपलंग्य करेण पादयोः दितिपृष्ठे रदिना निपीडितम् । दातथा पिभिदे नृणां शिरो न निकारानिमहोत्नमांगता ॥ ७२ ॥ अमजन् गजदंतकीलिता- स्नुरगाः मोणितशोणमूर्मयः नाशिकोटिविटारितोरमो नवसंध्याजलदम्य विभ्रमम् ॥ ७३॥ यिनिकृत्य स्पा तनूभृतां प्रविकीणपु शिरस्मु दंतिना। पादिग्मुसता म्वयं दधे मभियेव प्रपलायितुं भुया ॥ ७४ ।। इति भूमिविहायसोर्ययं द्विरदे तन्यनि मार्थवासिनाम् । रुधिरप्रवदा तरंगिणी पनमूमायुदपादि भयमी ॥ ७ ॥ मदमीग्भलोभविभ्रमद- भ्रमरालीकलीघझरनम्। निजविधामकीर्तनोपम सविण्यन विपरीतधेदकः ॥ ७६ ॥ म हितांधकगलनिर्गमे नृकबंध परियसिताकृतिम् । प्रविकृत्य करेण विभ्रम न्नुपतस्थी यनिपुंगवं द्विषः ॥७॥ mरीरा । २ चंद्रकिरणविस्फारिततेजस । ३ मिभ्याचा ४४ श्रीपार्श्वनाथचरितम् । मुनिराजविलोकनक्षण- प्रतियुक्षेतग्जन्मसंस्फियः। नमयुद्ध म पीदनाधि मम्मतिं म्यमपि द्विपाधिरः ॥ ७॥ प्रतियुसमना भयस्थिती म चिनिदन्निकर्म निर्मदः । प्रणनाम मुनींदपादयो-- गुंगाकोतापलोधनः ॥ ७॥ • गृभीनिपलापिला जनाः पुनाम्येय मयालयोपितः। गर्गपगुन निधी गुनिग्येश्य यिम्मपम् ॥ ८॥ अधि प्रणिधायगयी माभूति प्रनिएप नं गमम्। राकिमलाय मरिता पायमपानीम् ॥ ८॥ दिनय मद कि मारगामिन 'गीरने । मनियम न भूत- नंन बाम्यांग मी मिल fair ८९. अनुगगायती मनान माममासमान पात्र। पत्रिमंगा मृगादमानिने ६. विमान।

तृतीयः सर्गः। गुपयंधुजनोपदर्शितं कथमुलंयमतो हितषिणां ॥ ८॥ मदमुग्धमिदं फ जन्म ते छ पुनमैत्रिपद महोदयम्। मुघटीकुरुते हि दुर्घट ननु कर्मानयबोधदितम् ॥ ८५ ॥ अवधेयमिदं ततस्त्यया जिनधर्मादपरं न अन्मिनाम्। भयपनियहणक्षम सुखपन्नोपन निरूप्यते ॥ ८६ ॥ मुखमिच्दुरपायहे रचिं जिनतळागमिधेययन्तु। भयसि त्यमनन कर्मणा गज! मम्यक्त्यसमृद्धमानमः ॥ ८॥ मलपचार्जितद्युति इदमभ्यफ्यमयं महागुणम् । गजरन 'जगत्रयीशिखा--- मणिता ते दधतो भविष्यति ॥ ८८॥ जिनपुंगवपादपायो स्ननु भक्ति शतमन्युमान्ययोः। दुरितद्रुमपंक्तिपाटने भयन. मघ परस्यधायते॥८॥ कुर कुंजर! मानस गर्न हदमम्यक्त्यमरालगजिते। (Hron जातीचाररहितम् । २।

४६ भीगार्श्वनाथचरितम्। त्यमणुनतमसमनि प्रियपुण्यांयु निगाध पीयताम् ॥२०॥ जहि कोषमपायकारणं जादि प्रहगाम महोपतिम् । गजराज ' हीहिनामा ममेनी जहाहि रेहिमिः॥ २१॥ पनि यो पगोग पHिIT Tणे मागत गिTrtm गुनएनम नगणारी १२॥ नागर प्रतिमा गिरा। मान sinfRT R.३॥ मानिसमा प्रम ममान। अमप4TAT 41 mi।..॥ बारा frammfriinामर iamrriffast *-- - गुनाया। গান पिधे गाणुगमन सुपितोपि पागुणारात् মহিমা। दुrirmiuमरणी- नियमापामिकरण पाणः.00 मदनदिनोनित मिशनगुणपुरिमियतः। थत न पाय- ग्ननु प्याभूरियामपननु ॥ १८ ॥ गचिगजनगुतीनां दधदापायदनुनितादर । जिनराजमगलभूषणं गुम्याचलग म मानम्मम् ॥ १०॥ गजधगृहीतपित जाटमच्छ म निरातुमिच्छया। उपशन्यमवर्दम विजगाई गहने जलाशयम् ॥ 100॥ नियम यातागमक्षम पलितुं गादमुदम्य कईमम्। ननुहगत मवान् गजगज एक्यापनग. 100॥ अभिपत्य म पूर्वया गया नयनाभ्या विश्वविमुदहन।

भीगनागग्निम्। Finममा मन ननशंमार दाम्नि गा॥ १०२॥ भगहिग्येश्य मांटी माण पुगगनगम्। निशान निम्न TIPT या १000 TITणी नंगी मानोशागामम। अगुजामा THIनगर एपी ॥१५॥ Inना माना निगा fTION Sam गी! HImantr famler "ममामि iamvara ingrani zip Irrigator. Marrfant Fruffarna +मा+FTHI तृतीयः सर्गः। अभवत् स पतिः स्वयंप्रम- मपिताख्यानपिमानसंपदाम् ॥ १०८ ॥ मुहर्तममप्रयाचना तनुमिद्धां शयनोपपादिताम् । अयहन्नवदीप्यपोडशा भरणामितिपिंडगर्भिताम्॥ १०९ ।। नवरत्नमरीचिमेच शयनीये म निदियान क्षणम् । प्रघुगन्धिनरंगमंगिन- स्तपनम्यानुचकार भाम्बर. ॥१०॥ म यिमानगुहाइ विनिम्मर न्नमगदुमिनादयोधित। जयकारनिगदिमुर्ग दो मांजलिधंधमान. ॥११॥ अधिरोप्य मन्नपीटियां प्रपितम्मन मुघया मुधाशनः । विदशादिनटम्ग मंदधे थ्रिामदुतिमध्ययनिन ॥10 निपतयुगुमायलिच्छलात म्ययमयं प्रतिन्ननधिया। मयिलाममुदाम्पत भयं धपम्निग्धकटाक्षपति ॥१३॥ पनितामुग्वनमंडल- सग्दालोकरपात पर्यम्य । २ ।

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- तृतीयः सर्गः। दिम्भित्तयः मुरतिनो जनने समंता गंभीरदुंदुभिरयः स्फुटिता यासन् ॥ १२०॥ पश्यन् स पैभयमिदं मविचारचेताः प्राप्यायधि भयनिमित्तमुपेत्य धात्रीम् । हेमारविंदनियहररविंदमुभ- रानचं तचरणपातितरतमौलिः ॥ १२॥ विविधकुसुमवर्गः प्राच्यमभ्यर्च्य देहं मादि मुक्तयेटी म्यर्गमभ्युजगाम । मुकुटमणिमयूषगल्लिसन कटे- प्पमिश्लिमदखंडामर्त्यकोहण्डलक्ष्मीः ॥ १२२ ॥ आल्या नाशिमम इति प्रधितां दधानो देय मशोणशनपत्रपटाशलेश्यः । मासाटके गुरभिनिभ्यसितंकवृति. स्वगे यभी चतुरसियपु'प्रमाण ॥ १२३ ॥ मोका पर्पसहसपोडशनया दिव्यागृतम्यापर- रस्नोमालिंगनलम्धरम्यपग्मप्रीत्युमधीनिधिः । तरथी दिध्ययकटाक्षनिपतन्नेत्रदिफायली- नित्यासेव्यमनोनमनिमुमना म्यगेंद्विग्यार्णयान ॥१२४॥ ति धीयादिगजगारिविरचितं प्रापाजिनमा परिने महाकाय पनयोपस्वर्गगमनं नाम तृतीय गग। पोग्रामालरप्रमाणपत्र चतुर्थः सर्गः। प्रवृद्धजंवूममुख्यलांछन-- प्रभावितद्वीपविशेषमध्यमः। निसर्गहेमच्छविमंडलोदरः स्थिरस्वभावोऽस्ति मुमेरुपर्वतः॥ १॥ समंततो यः प्रभयावगाहते नमःप्रदेशांतपनीयपिंगया। जिनार्भकम्मानपयोरमाप्लुतः सदा विवद्धिष्णुरियावतिष्ठते ॥ २ ॥ वित्ति य. स्वयं विनतनं नयस्यभावं मुरतालसंगतम् । गुहागृहेप्वप्मरसामपि प्रज प्रियांकशय्यामु रतालसं गतम् ॥ ३ ॥ पयोधरभ्रंशितगुंभदंशुका विभक्तमूलागतहस्तविक्रिया। वधरिव प्रेमवती दिनात्यये यदंगमालिंगति तारकावली ॥ ४॥ स्थिरप्रकृत्या जगति प्रतीयते नितांतमामांतमरुत्पयोऽप्ययः । रसातलस्योऽपि दिविस्तृगुचकः रविस्यमायोऽपि मुवर्णसंभयः ॥ ५॥ मुवर्णवन् । २ देवाना नालेन महितं । ३ रतेनालगभाष प्राप्त घिरो मेष सनथ । अशरिणा, भाई व च । ५ व्याप्तामा रिहारः। ६ अचल ।

चतुर्थःमः। मुमच्छायमुरयेषु मानुषु प्रामगीतं सुरसुंदरीगणम् । करोति यम्नं मणिरश्मिभूपितं गुणो हि नन्वेष रमायगाहिनः ॥ ६॥ अनोकदा यन्मपिगशेखरा नमोऽचम्पंत्यरणप्रभोदमे। अनारतं विभ्रति पर्णमंहतीः प्रयालभावानतियतिनीरिय॥ ७॥ पतत्रिणां यत्र जलाशयोग्य न पुंडरीकावृति पांडुकंपलम् । तनोति न श्रीजिनराजमजनं शिलातलं विम्रति पांडुर्फ पलम् ॥ ८॥ विवेकचा विषयेषु मध्यमः समस्तशाग्वाभृदयाप्तसत्पथः। प्रपद्य य. म्बनतया तनूभृतां प्यनक्ति विद्यानिय लब्धवर्णताम् ॥९॥ महीरहो दंनदीपुमंडल प्रकाशितव्योमगृहोदराथये। नितांतमंधकरणं शरीरिणां न यत्र रात्रावपि ज़ुभते नमः ॥१०॥ चकास्ति नित्यं विषयोऽम्य भूभृतः पुगे विदेहे महनीयवभवः । जिनेश्वरीमुख निर्गतं घनो यमाख्यया शंसति पुष्कलावतीम् ॥ ११ ॥ उदफ्तटं मंडयति स्यभूगुण- धिराय सीतासरितो निवासः ।

भीगनाधरितम्। नमा गगनगि- Fiftस्मिन शिलापतः ॥ १२ ॥ मीनिभान रिपोरगशिपलो गुणी भो। गाशित प्रोत्रमिनांगाय: न भागात गिरे। ॥१३॥ कागान गंगाri पतिमनमनाचिया । Tumनागिता atlam गिरिमा॥१५॥ भमानामादिगानी मिना मनो। प.नि.पापना Him Ariftinimum १५॥ Farminfusional [1199 ante forfatter atment f1111114 fruitml minute Tan" Hari ME यियत्ययियायिषि ध्ययोधयत् ॥ २४॥ रामदयराहिनमपि।२ मुग्धा गोवाणी किराणाया मा अंगापित एपगप बिमाणि भूषितम् ॥ १॥ शिप मम्माममंगतिः पामाग पनी ममभा। शिपायामधिया प्रियाली ॥ नगमानिinent दीपनारंग पनामापुर-- मायातिपिदारना। पियन भियागुपदुमंडर-- पुटाधोपगारगुजा on. रति मिनापामगोरपुगिनयो भय पुत्र गुमरागिनी मममायांनिशशिप्रभाम दिपगुनीयाणा गुगामाम ॥ २१॥ गजातमाशी पापापियाम्पिनी जन विश्वान गुणारिममिर्गुणी । नतः ममाम्यापन रिमगर- म्यमिव्यया पंधुजनन यंधुग्म ॥२२॥ म मुग्धगुलाहिनागिपंकज म्यभायनिर्सगतमा नयादयः। शियिषा गिरिगरिग्विनी ध्ययन नित्यं मुखचारिण. ग्वगान ॥ २३ ॥ पितुः प्रयतन मुर पग्यलित. गुयिग्मिताविर्दशनाशुनिगम । अनङ्कितोएस्पिनयंहिकांजनान् 4 धीरानापनलिम्। सिमभिमानमा प्रा। गुलेगाभिनifret nirmitोगपति निगंजमानियाmmii fifry के गाए। rifertime areATTERTRan 14 निगमन भिगिनाया। anामगनगन भुग.ifiमिना ... किना ferit friraTRAMA । Arrairat aamaamiremun .. mamtaram --- fr.kamafri frrenा मा AN AN चतुर्थः सर्गः। हदेष यंगमदि पत्रवीर्य - त्युदाहरंति शुनयामंदिनः ॥ १८ ॥ अयुप्पत म्यममपि प्रजाहिते प्रवृक्षरोपोऽपि ररक्ष म समाम् । न भूपमाऽभियलितोऽपि तेजमा प्रजायनम्नेहगुणं प्यालीनयत् ॥ १९॥ प्रमूतदानः म मदान्ययानं बभूय नक्षत्रतया विनाऽभिजित् । अहीनसिपिजी डिजिवनां पिना म्ययंशम्य विदिता जलः॥७॥ पराम्पकमा म जहन भुजंगता- मपि म्वधात्री युभुजे भुजं गताम् । प्रजामु चो. एण्या गपंधुनां करमरया विहिनोत्मयं धुनाम्॥ ७॥ म यापदंतं निजकीर्निमामिनी- प्रवेशदानादिव नुष्टमानमः। यशोऽमृतालायनदनतृप्तिका- थकार तमा रविरश्मिमिर्दिशः॥ ७२ ॥ निसर्गसेव्ये नृपती महागुणाः स्थिति गतास्तत्र यदद्भुतम् । जनम्य दूरेय मतोऽपि चेतसि स्थिरानुपगमसयम्प पीजनाम् ॥ ७३ ॥ उपाधितोमविधानदीक्षितो गुणैर्गुणकोऽयममूल्यएटिभिः। - दीविटत्वम् ।

६६ श्रीपाश्वनाथचरितम्। तया नु मानयजमापतास्या सलीलमुद्यच्छफरानुरूपयोः। गुणेन संधानभृतोन जंघयो- मनम्मु न व्यजन माधु पश्यताम् ॥ ८॥ करेणुकांताकरवृत्तपीवरी मृर्गाडगूस हि गुरु पराजिना। प्रदीपम्पलगसंश्रयाविय व्यमामिगनां नवचंपकच्छची ॥८॥ अनेकपनोल्लिसितायतां जरा गुणं नवोग्चि जेतुमनमा । वनस्थिति काचिदयाद्विलत्रया विग्ज्य ग्भाम्विनगमरोगता ॥ ९॥ मनोरमां पुष्टिमसम्रमाग्लिपन् म योवनी नूतनरत्नमेग्वलाम् । चकार मागलयनित्यमन्निधि- प्रसंगीला मुदतीकटीतटः॥ ९॥ विकीर्णग्नांशुनिग्नदुस्तमः- प्रपंचकांचीरिमयो विनियमी। वृहन्नितंय मुनीम्ननभृतां न दक्षिणाशाविपयो जनाथपः॥ ९१ ।। तनोतु मागेभयपावर्तिनों मियेय भूनः म्यविगेपिनो गुणात् । चिराय मध्यम्यतयापि पार्थ गुणाननिनन् कृशिमा मृताः ॥ १२॥ विमुच्य मभूय मुवर्णहोरिण नितंयमुपलि.मिनंतम्रपः। मनवाटिनम् ।

चतुर्थः सर्गः। न मध्यदेशो सरधेन यघिरं भयेन् एमात्यम्य फलं तदीयम् ॥ ९३॥ मुत्तमुत्तामयना म्यसंगिनो गुणेन दारम्य समृद्धिमोजमा। प्रयोजयंतापपि माधु मुभूयः कथं न्यभूतामपिधेफिनी सनी ॥ ९५ ॥ समप्रभूभृन्मणिमुक्तरागमा- घमेदवृत्ती पृथुलम्धमंडली। मरम्य मूनी नयविक्रमाविय स्ननी तटीयायुचितं यदुद्धती ॥ ९५ ॥ नदीयमादयविशेषरिम्मिन म्मरण गगो रतये विचादिनः। प्रकल्प्य मूल्यं नवपलपश्रियं यसी मृगाक्ष्या करमप्रहीद ध्रुवम् ॥६॥ भृशं शशांग्या. करजायनांपुरै- न केतकीचिमम पंचभि । चिराय जेता मदनो महीभुज- स्नदादि य फिल पंचयापताम् ॥१७॥ न्यधन रक्षएतिजालमामले परद्रुमस्कंधममाश्रये यथः। मनोमलापण्यपयोनिपेकिते हनालयाले पलय जादते ॥ ९८ ॥ निगष्टमंगरमृतात्मकर्यपु द्वितीपमिदोरिच सुंदरीमुखम् ।

भीपाश्नायचरितम्। किमा नियदिन सीलया विजिग्पिरे पंकजगंधपाः प्रियः॥५॥ समुहागाकांतिमयांपुगंभो मुगापोगे कमाको भुगम् । परगाभिन्नडमीगयो - मानगो गहनुगाणे भियम्॥ १०॥ अपांगतीमानी निधिमगारतिनिहारिणी। गरातीनामम्मी पमा सम्मा' प्राणानुपर्निनी ॥ १०॥ पण निमन गुणाभार नपा काप्राशिजगिnिirn माणुगमा भगत नाम गारिनानिधिः ॥ १० ॥ गना निविगानि.. मनमगोपांगमारा। नियमांतरंग नागिनीमाता...। अमन RT निमान Fregnा न मनाना गमन TTAR५ मनार Minet frá fathnat:ft 441 writera Marriagnfrast चतुर्थः मर्गः। गृहीतपूरिथतिका महीभून- स्लरीमिपानुदिातरतमंडनाम् । उपाल कानामुदयाधमय दियः स देयः क्षणीधितिमभः॥ १०६॥ जगजिगीपोटराशये शिमोः फमान् मवृद्धी दिवसेप्यनाथुलम् । मियेव तसादनुपद्धतिभि--- विमुक्तमामीद पलिभियंदरम् ॥ १०७ ॥ असण्डभूमंडलरक्षणक्षम- प्रभावमंतर्दधती तमर्मकम् । प्रादाय जहेमदीजसं निजोदरक्षामतया नितंयिनी ॥ १०८॥ निपीददंगेप्यथ गर्मशायिनः शिशोर्गुणानामिय भूरिगीरम् । अमिन्यनक्ति स्म गजेंद्रगामिनी विनोदलीलास्थलसेन कर्मणा ॥ १०९॥ सखीप्रकोष्ठं प्रनिगृध गर्भिणी कथंचिदुत्याय कृतांजलिक्रियाम् । नृपः कृपाहपविमिथया दृशा गृहागतो चै क्षणमक्षत प्रियाम् ॥ ११०॥ उदगमा दयितां प्रजापति- निधानग मिय भूलधारिणीम् । अनेकविधाजपहोमकमि- चिमकरक्षापधिरन्वयन्त ॥ ११ ॥ स्कंधम् । wittee ७० श्रीपार्श्वनाथचरितम् । प्रवर्तिता पुंसवनादिषु क्रमात् स विक्रमी दोहलमेदमाहितः। प्रपृच्छय शृण्वन् मुदृशः सखीजना- ज्जहर्ष मत्पुत्रविनिर्णयावहम् ॥ १२ ॥ स्फुरत्प्रभामंडलमध्यवर्तिना विजित्य चक्रेण दिशां विशांपतीन् । स्त्रपादमूलानतमौलिमस्तकान् व्यधीत मदुत्साहवती मती मती ॥ ११३ ॥ नयापि मा पीनपयोधग वधू - निधीन्विधेयान प्रविधाय धामभिः। यभृव युना भुयनम्प तदने धनाभिलापग्रहनिप्रहेच्छया ॥ ११४॥ प्रभावभूयांममपाशुलच्छवि महीशमालागुणरुदमुन्नतम् अजीजनम् सूनुमिलापने प्रिया ग्पनेधरित्रीय विनिमंलं मणिम् ॥ ११५॥ ग्यग्विाम्यागिलदिप्रभायिनी भियेय धानो भृशमलसियत । प्रतिकाले तिनी नयनह. गुमेनगम्थितिर यमुध्यत ॥ ११६ ॥ उतीर्णतज. प्रमरण पाक्षिणा करग्रहणोपरिभाषिनं पतिम् । मीश्या स्टुमियोदित दिगो निगमुमोदपटामियटनम विकम्यगंधानललायिनतनः नामगंधिता चतुर्थः सर्गः। माय सिमन्निव देहिनः शन- पंया तदानंदममुद्रमीकरः ॥ ११८॥ स्वयंप्रभाघोपनतास्नमोपहा नृपंदविद्या इय रत्नदीपिकाः । परीत्य तं पुण्यनिधि चतुर्विधाः शियामयूखोल्लिसिनांवरा यभुः ॥ ११९ ॥ एनानियतालिकनिध्यनस्नया दियः पतंती कुसुमावली तदा। व्यधादनामातंचरेण हारिणा जनस्य गंधेन यमुंधरातलम् ॥ १२० ॥ निशम्यमानेन विवृत्य दिग्गजैः सणं समुत्तमितकर्णपलयः। गभीरांमध्यनिनाभिचुयितं तदाबरं शम्दगुणं व्यग्रंमत ॥ १२१ ॥ मुखेन हर्षामृतबिंदुवर्षिणा निवेदितार्थ पुनरुनया गिरा। इदं भुजिप्या समुपेत्य सत्वरं नरेंदमाम्थानगतं व्यजिशपत् ॥ १२२ ॥ व्यपाचि शुक्लेन जनस्य कर्मणा तयांघ्रिमेवारसदिनोऽधुना। अमीष्ट पुत्रं मदभिष्टुनं गुण- यंदध पृथ्यीश्वर भदारिका । १२३ ।। भुजेन पूर्व यहतस्तयोपरां महाययानित्यभयन यद् पचः। पूर्वमनाघातेन । ३ शन्दो गुणो यस्य । ३ दाम्या । ४ शुमेन । ५ बनानम्।

श्रीपार्श्वनाथचरितम्। नमदिरेफप्रकरायगुंठितो व्यधत्त माक्षादिय मेघदुर्दिनम् ॥ १३७ ॥ मदांधमारुहा महागजं नृपः प्रयन् स यीथिप्विभयूथवेष्टितम्। प्रभुर्वितस्तार कृतस्तयो जन- जनप्रियामंयरगृष्टिमंयरात् ॥ १३८ ॥ क्षितिपतिमयलोक्य प्रौढहर्गतिभारा इयपुग्नुपयीची माधरंगाधिरुदाः । अतिमधुरमगायनंगनाः काधिदन्याः । नन्तुगतयोगीमीभणेपिंक्षिपरयः ॥ १३९ ॥ गुमदिनगमगाये लागुशायमान्य--- रधिगननयमानदेय माधम् । भिमतमनिगम्य प्राणायप्राणियग नयमात नाना यमनाम भूपः॥ १०॥ पमाभोगगनसमग यिनी नग्नालादिन- म्नमांदीय पिकामगुग्गुकतया तिग्मांशुधामाभपम्। स्पापागनिपियकालमा नांगमाक्षिणी नम्मी पनीदरममकला मम्माम्मरोगाभा॥१४१६ मनोकाधिानमनगमलानागमोगादिनः । पाना प्रगुगनुगनिमगारांप. प्रतीयम्। পায়খামারপিস আনা बादागा निकाम गला गम प्रणामांना १२॥ गिnिHai এ বনাননাপামাশা নন

पंचमः सर्गः।
विजयातनयः सवर्धमानः
सह पंधुभमदेन सन्मुखश्रीः ।
निजपुष्टिविलिप्सयेय पश्चात्
गुणमुख्यरनुपंधिभिः सिपेये ॥१॥
विनिरुद्धतमरमु नेन भूयः
कमलानंदकरेण भास्वतेव ।
घनीधिरियासिलामु दिक्षु
प्रचकास जननी नवोदयेन ॥२॥
अपि पध्यममुख्यप्रजाना
मुपसेयाफलद. सदोपहारी।
अभयन्महतः क्षयम्य हेतु
पिनां दयमचिंतनीयशनिः॥३॥
गुणवत्यतिपनमाधुसंधि
प्रथमोदीरितवृद्धिमायसुद्धम् ।
प्रयतः पितुराशयाऽभ्यगीर
स्वममं व्याकरण सवृत्तचाल ॥४॥
प्रतिवोधकचिनदर्णमंगे
पलिना मेन एने मदोदयेऽपि ।
विषया विजगादिरे हपीक
द्विपनार्दर्न यथामतं नदीयः॥ ५॥
दिमानिवि नदंगमंघि-
प्यनुयभननुजीविभिपययः ।।
अनिए दुरत्ययो गुणानां
पलपसा न पिना प्रधानमंयाम् ॥ ६॥

७६
श्रीपार्श्वनायचरितम् ।
बतमृप्वयमुद्यमादधीती
नृपविद्यासु निन्दसंप्रदायः।
विजहे निजबाल्यकेन मनु-
रयथाकाममवस्थयेव रामः ॥७॥
विकसन्मुखचंद्रकांनिकाश-
च्छविधातांवरमुविहंममुद्रम् ।
नदारन्समयम्य मत्सरीव
प्रतिजग्राह वपुः म योवनश्रीः ॥ ८॥
परिघायतवादुषर्षीया
कृशमध्यं घुतिमविशालयक्षः।
अजनहिपतां भिये विचित्रं
यपुग्व्याजमनोहरं तदीयम् ॥ ९॥
विकचांयुजहाग्यचिन्ह
दटोजः गिरमीमनिसमभ्यम् ।
कमलाकारतामिवाचयक्ष
बिन्दमपाणितलं नृपात्मजभ्य ॥ १०॥
अधिगजग्मामहति नुपर-
विनयधीचिोण यानाम.।
मययाभिग्मामहति सिद्धि
गुरुमित्रानुनयं क्रमेण ऐमे ॥ १५॥
महिनी परमंगद्रदिना
ग्मधाराग्निी विद्यादेनुः ।
ने दिनण परको कृपाण
कमहोनामिनि निमा मुपि ॥ १२॥

७ पंचमार्ग। अगिनीमानिनदंगार- ग्यमनीपा पगहाप्रसादक्षा। मयतापदी महम्न एय पिलमानलता कऽपि न १३॥ गुणहोरिगीण दिमाजा दिनपर्मप्रनिधिमंधनेन । कलिनन मानिमेय पने स्वपमेण मनोऽपि धर्मजेता ॥१४॥ पान्दमझिममुन्नटीयों गुणयोगमभायनाभिनुन्नः । कणयः प्रतिपिश्यति माप रिपुरासन्यमनांसि र प्रमायः ॥ १५ ॥ सम्पपि मशीयमु यंटमुर करप्रण व । यग्वामुकमलं म यिधा- मनुशीलनय किं पुनजिंगीपुः ॥ १६ ॥ नवयौवनयभृतांगष्टि कृतरियाधिगम नमुरेशाम् । ननवाः म्यपमेव निन्युगंध बुचकुंभोढहनातिसिनमध्याः॥ १७ ॥ यदनेऽधरपानलिप्सयेष प्रतिलग्नं शादिंदुपियकाने। परहारमय्खमंडलेन स्तनयो संनिहितं युयुत्सपेय ॥ १८ ॥ - 1नृपाणाम्। +.

श्रीपाभ्यनाथचरितम् । कनकांगदटंपलां ययंध स्खलितात्मानमिव स्थितं च यादो। नवरातिनिर्गमच्छलेन प्रचुर पाणितलादिय क्षरंतम् ॥ १९ ॥ श्रयमोरिय दीर्घलोचनाभ्यां घयलापांगरुचा निपिच्यमानाम् । तनुजन्मतयेय मुग्धति मिथग्भारुप निषिष्टमंसदेशे ॥ २० ॥ निकटस्थगभीरनाभि नमदन यलितं कशिग्नि माम् । मनिपानमयल्यमापदेश कृपयेय ग्धगयमगुरासंतम् ॥ २१ ॥ मगणं मददयगया गुर्गमधोग्य पकतं गर्गयः। रमणीयतयेय गोपभोग जयनं समदिनारमन्यतम् ॥ २२ ॥ करणी परिणीयमा गमोनी शुदायमामा गुणधामा। मदन गणाधिन पुल मनिम्नादिमिनाभि বলিনবিল পাস भनय यह विमगा। निगमरमारिवानिमिग्नी विधी पुरे गधाला २५ अयिताय मनमानी गुग विभाग गया।

ममः। मोरियामादमाना मुभिधी पधिकारनंदनाया । १५ ॥ अधिगमनापगलतिद- नपानीः प्रमतो दिक्षयेय । भूमपानगुराग पधार मगोपापनाममानपूर्वम् ॥ २६॥ अयष्य निशापय विशदाद पिनाया.ारदो दिमागमादी। भृामधुलपन्धि प्रम हिमपिपांगपिंपत्यपारे ॥ २० ॥ शरदः मुहदोनयन रोक्षा पदिलाया मुनगं मगलपन। धुनपसतिनिर्विरयमाणं मुदिनं वलमियांवर परमीत् ॥ ८॥ हिमालयातनिपात दिप भीत्यायपिजीर्णपक्ष। याधामदगेदरेषु घर नरनारपाः प्रविमुख्य मनिशः ॥ २० ॥ समये हिमवििण म्बनि- प्रापयालानिमयादियांगजामा ! अमनागविरागमन कुटीर युवराजशपुरे यशोदरीणाम् ॥ ३०॥ दिशिदिश्युपञ्चयमानमूर्ति- पमूनोग्य शत्रुभातचित । - •भारम्वाण ८० श्रीपानायचलिम्। शिशिरस हिमतुरेव जने विरहनीहदयप्रकंपकार्ग ॥ ३१॥ इतरतरकुट्टनकपनि इंशनः सरमुजस्म दानपाः । ज्यलदग्निसदः प्रधानमहा- मविशन कपटिनः संवेगमंने ॥ ३२॥ निशि निम्नतया हिमं निपीय प्रचुरं प्रातरिदं वपुष्यजीम् । अयमनिव वलस्थायं प्रमयच्छमनया मधूकवृष्टाः॥ ३३॥ सबयोविस्ताः स्वपत्रनेत्र- स्तुम्हिनांशुमनुवाच तीरवृक्षाः। भृशमन्यदनियान्मनीनं हिममग्नं कमलाकरं प्रभात ॥ ३४॥ शिशिगंगनया करीपजामि मह यन्मः परिवृत्य गोपदिमाः। प्युदतम्मन मंत्रमार्य चाहन् दियमादी नगगद यहिम्मता ॥ ३५॥ অনিনঃবমানম্যান अणुदन जामियाशु पपंजालम् । प्रथमेहनि देवकांतिहारी पयमानः प्रपया मशगंधिः ॥ १६॥ आदिग्वैिधि नलिन्याः किल तलालदतागर्न निकारम् ।

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विमिशिनरंपराग
पिन मvिita .॥
अवस्लिमातीधि
पिराITमदिरागारः
पमितागुमरंजगेपणी
गुगल्लिातिर म निशि ॥४१॥ युटकम्॥
मनुमा समयन नामा-
दिय एनापिनंदनप्रमापान।
विगोपदिशामाय
इनपयालयबमक्षयेण। ४२॥
शिशिानाविहायानां
मयिधातानु पर्ती दुरात्मा ।
सूर्य । २ बसंत ।

भीगनागरितम् । पहोलिकतिसमंती पनमिया मंपिट: ४२ अनुरागमा गुगंधिगरे गुरभेनयमन गंगमेन। प्रभात पनगारो गानो ठीनगम ४५॥ किती- हितगी नगरानी।। #r* ftatinitrifi- नियमपिपालिकाman from forfar front 1ि मागप्रमाणाम्। पनि परमारा. गमगण harana गमगाः ! मानल्ली- PATEL ANTARVASNA Farvaruning samuta.. पार wr marrifimalsmat hrrhit rint मरlarinetri Terrfarmirianा- पhिmina मनीमा Esfm fram fent firfAcानापपरम । प्पमाnिfirmat Enterienfant नोट ॥ ५॥ पुणीमा- मप्रियपानमामि। परनामपति पायु विvिaiनयिमयोग:५९ ॥ पयिषामागं Www.गुगः। विमिवायरमामा. पर प्रादानियाममंधार ॥५२॥ মাদাগিনি , मनिरपरम्! अनदेय बने विभाग परिषग्राम सभा प्रयामी ५॥ मुभियमनेन ननितापा- मशिदोनपटनेन पुण्यम्याम् । मगरगुपतर्गन मजगे फिनागोयुगेन पम् ॥ ५५ ॥ वलप किगतकामिनीनां मुग्णानंमधु मंपच फुलः। लिमिव । लना।

शीर्थनापरितम्। मोरनुपातिभिः गिरी मनु मयंगुको ममानशीनैः ॥ ५५ frifयोगिनीना স্লিপ কালাগিলকিানা। frशिदिगिशि माति- प्रतिशत प्रम॥५॥ परतान पdिiनिमागमा। तिमणिगे- गगन लिपि Again 3॥ मनामनामनामनामा Tertisettyft sposta गानाMमागमन मिाग पत्रनाम.n मामालनमा विवाना। आपन गया म.HTML.Tra HTaalमाग । कामागायन thromatm । पाramme Vri प्रगतमाये। Frimarimmithun Forfari REALRingh ॥१२॥ गुमानfirit.in धिमानः । अपपीविनमान पुमातरमयागापमानय ॥६॥ विपिमानानि पम বানাসথোলি। पिनिगायो मगर पनि मायाम् ॥१५॥ नपनापनिरी प्रतिग्विधिनांधारित। पिरामप्य पाप्रभापमान: मुलागाधमहादणः मयः॥६५॥ अनिदाघरमारिया परिमाया पियल्यंगतियः । भक्तिरिय भानुपम हिल्या कचिदश्य धुर्धाम्निगंधये ॥ ६६ ॥ ग्मन्यतया विकारिताम्या पदनोडानाजोयितानधूम्राः। अभयन भो निदायमक्षा: पथि राक्षम्य यामुमद्विभीन्य ॥१७॥ दिश..-

Urmनाथमलिम्।
रिमा मागःगसोगः
पशिमोगालो निराला
शहित महिलामा
गमिमागमा गत १८ ॥
सोधिनातिना
पर काभन त्रिता रिजः।
नाशिनातोjिar
रितालियर..॥
पनितानगरामलीग
गजगापिनो मोन
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समानुमाना।
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७
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पारमाण भामगा।
मिमधर्म.
पिंप्रमाणे ॥
अपशिदामनामा
मनाभाविपरममिः गणें ।
भंगारमामाया-
मपिगियर्माणगांगे॥ ७५
विपिधारनियंत्र--
गुनधाशिशिगंगा निपाने ।
মালখো বন
परिनि नपमानिकप्रपादाम् ॥ ६ ॥
दरिदमदिग्परिणनि-
विपुलोररथगितामहारपरिः।
पिगमान कापावेन काना-
पभीमदनिमर्गशीती॥ ७॥
मधुरयनिगम यिपंची-
गुणष्टिप्रभयं नृपम्य पुत्र।
धयमांगपतंगयप्रयच्छ-
पनिदाघस्य निशांतिकमवेशम् ॥ ७८ ॥
निजमंगनिपिद्धतोयादि-
बिंदलांगकरम्मलिगक्ष।
नृपमूनुमियेष गोविनाएं
प्यमुचद् धर्मजनंगम प्रश्नम् ॥ ७९ ॥

८८ न । । श्रीपार्थनाथनरितम्। पिरहन्यवाहमरांगी पतिभ्यासपरंपरेय रा। निशिदियुपादि मेगरेगा मयमादुपि धर्मकाभंगे ॥ ८॥ मरणासनमा काग मेघा पगुरुगना याताम्। यमगरमारियापनेनु गुहाना य दिग्गजरमा nan মালিকানা- frम निषित। সাপ মাগসমলা ममतयः प्रतुः ॥ ८॥ হশালা TAM कागति नियाम् । जितनागगनाला--- परभागनिहानि गणतानिaan मनापामा: Trn rग। अर्गना अधिमान गोषI Neen प्रति ननी'. पाना fri मxiimra शिzTami: Fariarifts पंचमः सर्गः। पथिका मरणे मति पपंधुः फरहामतहितकदंष्ट्रम् ॥ ८६ ॥ परितापहरं पयःप्रफेनं मरनभ्यानमनेकरिधारम् । दुदोह महीविवृद्धये गाः समयः पीनपयोधरायतन ॥८॥ पिरहामहनादिवायुपादे मुहुरावति पर्वतावीपी। पतिमभ्ययुरापगाः प्रवेगा- लदर्गहस्तगृहीतपूगपात्रा. ॥ ८८ ॥ स्मरतोमरतीनभेदरिंद- पनिता चिनशिलातलोपजाताः। स्फुरदसिशिखा इयोल्लियंत्यो धनकुटानि नडिताः प्रसनुः ॥ ८९॥ घनिताहदये तमोमीरे रजनीभरिखकया मनोमया। चलितम्य घनरियाचिरां-- च्छललीलाम्चय. समुदभूयुः॥ १०॥ चिरमम्रकामिनीत - क्षयगा पनकावयासतोश । गृहयुदगुज्यमानाय पृथुधाराः परिपालिता योन्याम् ॥ २१ ॥ अचिरतिरनाकर्षमा रिप कालेन पिभिप बाधमानः। गधे धपा पिपर्तमान- मुंगु भरिजलं भृशापमा १२ ॥ क . श्रीगनायचरितम्। कमलाकरमूर्जितप्रसाई रसिक मंपिमुख्य मुग्धमरम्यैः । अगिगाभिातुकर्मभूये गुनगुपितमं गिरगाहम् ॥ १३ ॥ अनभितः गहानमोगे- तामणगुणनिरिकगी। अशिमीरगृहीतापगंधा घनमापन केतकी पलानि॥१५॥ शिपिविलिगगों राणाशपरिष्मरण पनमागणशका प्रनिम्नामाग्गामाताम् ॥५॥ अभिमानमुरम्म मनोका- मनिाशनी का यनिता ममुनिगमका- मगि मंगागम म nan मुरगीगिता मोरया मुगा. प्रमादिया। পাথর সাদা तुगल पदागिना म... अटामिन मानानिमालेगा भिगा लिन बभिमान ...

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९२ थीपाभ्यनाथचरितम् । जलदागमनोचितस्तु साध्यै- युवराज प्रमदासदोनिषण्णम्। रचितांजलिरित्युवाच कश्चिद् यचनं हेतिगृहे शताधिकारः॥ १०५॥ स्फुरदरिदम्रदीर्घ लेखा- प्रकगनांतनभस्तयाध चक्रम् । प्रविशारदेय! शस्त्रशाला - महमद्राक्षमरातिदुनिरीश्यम् ॥ १०६ ॥ अमरः पग्विीश्यते तदुरी- मंणिमालिस्फुरदंगुचित्रलेखः । प्रयददिग्यि प्रमोददेवून गुपचापान्याहस्य पारिदेश्यः ॥ १०७॥ जननाथ ! रांगतो यिभीता इय घामयिमुच्य मुक्तशमा। मिलिता धनदायो धनांत पथिकमाणहगतिरोमयंति १०८॥ चकितय विधेययर्णमीन- लय देतिरयगुणगते रोंगे प्रयिमुनानिशापिदाक्ति- यंगुधा पंकिलतामपोहतीपम् ॥ १०९॥ परिदेतिमममीर गगनयमिदं प्रगतिलोयम् । सरच! याम्गाना- निवरयंत्रमिनिगममा १.. १४पारे। २ri.marh ३ o पंचमः सर्गः। देव! प्रयोदश परेऽपि परोपताप- काले प्रभावमहिमोदयहेतवस्ते। अन्यागताः सपदि चक्रधरस्य च कुर्यति रत्ननिधयो विविधांगलक्ष्मीम् ॥ १११॥ पालं दिग्विजयोद्यमस्य शरदं दिश्याखिलक्ष्माभृतां घेतोजर्जरणप्रभावमहिनं चकादिरत्नागमम् । तस्य इयतः प्रमोदविकसनेत्रोत्पलदीप- थ नकमहनवस्तुनिवहस्तृप्याकुटीपूरणम् ॥११॥ इति श्रीवादिराजरिविरचित श्रीपार्वजिनेश्वरचरिते महाकाव्ये पजनाभचक्रवर्तिचरमादुर्भायो नाम पचम सर्ग।

षष्ठः सर्गः। विधिप्रमिद्धां प्रविधाय पूजा चक्रस्य चकी म यली यलेन । प्रमेण दिक्चकजयाय जिणु- जंगाम कामाचिंतजीवलोकः ॥१॥ अरातिभूपालममूहमीनि- म्फुटन्मन शलग्यम्य शंकाम् । य्यधत्त पुंमां नरोकभः प्रस्थानशमी पटहप्रणादः ॥ २॥ जिनेश्वराभ्यचंगपुण्यनंदुले. मम म दिएं जिनशामनदिजः। महर्गमाशीपंचनं मममहीन् भयंति मन्या हितवस्तुयेदिनः ॥ ३ ॥ लायण्यपनयनो मुपदर्पणांका- ग्मांगल्यपूर्णकलशानिय यायोगः। आयेष्टगंध यमुपशमनाशीति कानबासमविचारमान वधाना ॥४॥ कमलोहि दरमुनिगामी ग्यमामेरितत्र पासिंग। अभवन् मुमहोदयः पुरम्ना- दनुगगोत्यगमुमकि. '.. अग्निदविरदिन- मागोवियतहम ?riment 1 . पटः मनः। प्रभाघिनना भयादिया घवं प्रभामानि पचाल भीमम् ॥ ६॥ पसभाषेन नृपय जो निषेश्यमानं निगिलासुधि। उन्मादलेनादिनभूपतीना- मुत्रामयामाम विटोचनानि on पत्रच्छरोन गुविशारदमम्रमुष- पन्यप्रभामुपरि पधगदमोदुम् । एकांपरानुगमपंधुतयेष भानु छायायुधामधुरमावृतमध्यरक्षत् ॥८॥ श्रयमालया पिशंगही प्रतिस्थूलरती र दंडनी। शिनिपा निदेशकाम्ययेया- चलतामप्रपद मियोऽधिगद्धी ॥९॥ नम्य पार्थिवपनेगभिराध्य घामरे प्रचलिते दिमागुनं। कायकांतिविमपामृतमियो पीचिपिभ्रमरचं व्यदधाताम् ॥१०॥ नियतहाटकरचिः कटकावमामी मोच्छायमूर्तिरतिलंधितसर्यतेजाः । ग्जे सरतमुटेन यथा मुमैर-- स्तारागणेन शिरसि प्रतियुजिनेन ॥ ११ ॥ सकलवसुधानार्थ तम्मिन् जयाय दिशां तदा चलनि तदरिद्रांतावासप्रधानरतागसः। जिवामदानादपरादा ।

श्रीराधनागमरितम्।
निपुणा मुर्गा
प्रारमणिपुगतान
गांभा: गुभगाJi
mमको गुगाहनाः ॥ १R
भोगिनिमायामा-
गर्मनि गोलि हानेपः।
मेन तातो मामा
पाभाल्पनिक...
एमपुर्णाषितोषगरम
मकानं गि।
विनितानुभगाया
नपिपनाग पिणा निगुणा ॥..
पसिना iranimla -
प्रमागिलास पास।
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पष्टः मर्गः। मायूपिउरचितोडमदानपत्र छायावृनरनुगमागधरम्यानेः । अंदोलकः मुगभचंदनदिग्धगात्राः फेचिन् सुसालसाः प्रययुमहीशाः ॥ ३१॥ वस्तुगारनियहं प्रतिपाद्य प्रीणिनेन विजयातनयेन । नन्प्रयोजनस्तम्मह नन- मंडलाधिपतयः प्रविचेलुः ॥ ३२॥ पामरः म ददृशे भयादुप प्रामयनिभिरपत्य चक्रभृत् । क्षेमदः गुरभिशालितंडुल स्तोमहेमनियहाथपायनः ॥ ३३ ॥ कंचिदयमवदन्हो या- मानपेमजत धर्म दधीय। दीपिकानटभुय. महकाग विश्रमाय पुग्नोऽपि भयंति ॥ ३४ ॥ तीरे भूरिदमयति वधूयंधुभिभोजनांने विधांताना क्षणमनुचरा. पद्मिनीपत्रग्दम् । अंभःशुभं मयिमवलयं पद्मजालं मनालं ताम्पत्यांशी पधि धनयतामाहान् दीर्घिकाभ्यः ॥ ३५॥ गृहटागया. पृथुलधवलांगा घलयभृ- द्विपाणा. मिरच्छविगचिरचूडादृढयलाः। यराहालंशारा यवसभरमूढा क्षितिपने हो धत्यापरस्यपि तत्क्षणे सेनाणवे ॥ ३६॥ (1) - धीश्यनायचरितम्। (मति नलाति चक्रधरप्रमायः।) पुरस्तात् प्रम्यानी पटुमुभरसेनायुधमया- यमंडप्रारही रणशिरसि दंडी विजयिनः। न्युदम्य स्यम्थानादनयननमृद्धमु महतो द्विमेदान्यस्येमा म्फुटमयनतेपु भितिभृतः ॥ ३७॥ चमी म एवं यहुभिः प्रयाण रक्तांमगादुद्धतभंगकारी। हमावलीनिस्म्यनमुग्धवाचा तस्यय मा स्वागतमध्यधन ॥ ३८॥ भंगोच्छलच्छिशिरशीकरजालमज- किंजल्कपिजरितमधियेव विम्रत् । अभ्यागतं क्षितिपमभ्युदयाय वायुः सिंधोः स्फुटध्यनिमधुव्रतडिडिमाघः ॥ ३९ ॥ प्रोल्लसत्कमलमुन्मदेभमु- ल्लोलहंसधयलध्वजं जलम् । चक्रिणश्च बलमत्रुटद् ययो विक्रमादुभयतो नदीतटम् ॥ ४० ॥ स्फुरन्मणिशिलातले सुरभिवल्लरीमंडप-- च्युतप्रसववासिते मरुति पाति नद्यास्तटे। प्रियाधरमधु श्रमादिव निपीय मार्गागता विशUमुरिलेश्वराः सुखनिमीलिताक्षाः क्षणम् ॥ ४१ ॥ यावदिष्टमितरेतरपुष्टि- स्पर्दयेय मधुरः फलपर्गः । चक्रवर्तिकटकाय विभेजे तनदीमणितटद्रुमखंडेः ॥ ४२ ॥ श्लोकादधिकं प्रतीयते. २ नदीम् ।

१०१ पष्टः सर्गः। शितिपतिमयलोक्यैवागतं दिग्जयाय स्वयमधिकमयोका पत्मंयुक्ता व रक्ता। स्फुटमित इत पहीत्यावदंती शकुंत- ध्यनिभिरिय पुरस्तात् गच्छ गच्छेत्यगच्छत् ॥ ४३ ॥ आमीदत्सकलजनोत्सवेन गच्छन् भूनाथरनुनदि रम्यवर्मनेयम् । उद्योगस्पगितमनाः स चक्रवर्ती शीतोदानिकटमगादगाधशार्यः ॥ १४ ॥ तस्मिलघुस्यपतिनिर्मितम्र्मगुम- प्रासादमालि नगरं नरलोकपालः । गच्छदिरेय कृतविलयमाटुलोके माहालशालमणिगोपुरमुत्पताकम् ॥ ४५ ॥ विमत्य सेनापतिपारिपाश्चिकाः परिभ्रमंतो भृतवंशयष्टयः। परीत्य चश्वरयाममंदिरं निवालयामामुरिलातलेश्वरान् ॥ ४६॥ अप्रप्रधावितकशाकरमौयिदल्ल- गन्सारितेषु नृपु शिल्पिविशेषभाजः। विद्युलना इव धनादयतीर्य यानाद देव्यो यथास्यमविशपमंदिराणि ॥ ४ ॥ कधिनुरंगमनताः स्वयमप्रभूत्या- दभ्यर्थितस्तु दयितरयरोप्यमाणा.। भीत्येव चारकुचपीडितयक्षसस्तत्- कंटेषु गादविधियाहुलता ययंधुः॥४८॥ - सहिता।

श्रीपाभ्यनायचरितम्। आश्लिप्य कंठमयगेपयतुस्तुरंगात् कांतम्य नन्छयमि कानिदयोचदेयम् । मपातु मधग्णयो कठिना धरित्री पीडां तनोति नय तत्म्यमेव शय्याम् ॥ ४॥ गलहाप्रम्येदा व्यजनकममंगमुहिना यीयोयनांता. क्षणमनयदा हयकुतात् । विपश्यंताम्मुनिजभानगम्याजिग्गतां यथास्थान मेनामभिनिविशमानां शितिभुतः ॥५०॥ अगमागमायरिधानयेगा पाम्नध्यतामिय गता नगाभा श्या । भाकस्मिकम्मिनशानुन तगान प्रत्यही गतिविपतमांगनान || ११॥ সাগানিলসবিকাছা मष्ठा भितियटनामुननिगा। सर्गानन पातुमास्ताना अग्म नागरह पमाणा ॥१२॥ अंगविणाभूती भगाना नागािनी। प्रमानापानमा नभायमानलमानी या प्रतिमा Bifreमानां मीनार अनुभवानिगानमत्र । virहिनामा मनामनांक डा. -4 पष्टः सर्गः। मणिमयतटभिती तीनवेगाभिघातात् प्यननि पपिरता निम्नगायास्तरंगे। विकृतगलयहत्कं हितं श्यामलाः प्रतिरपमिय पश्यफ्रिसेनागजेंद्राः ॥ ५५॥ आसन्नमस्तमयमात्मन एव दृष्टा पक्षस्थलादिय मयस्फुटिताद् गलद्भिः। किपिलित श्य पाटलितो यभूय पृद्धो रविः करधृतदुमदीर्घशाखः । ५६ ॥ जनपतिरयचक्रनेमियाजि- मजबुरघातसमुत्थितः प्रलेपम् । अयमवहदरज्यत प्रतीची यदयिरलरपरादिधातुचूर्णः । ५७ ॥ गिरिपृयुलकुयोपगूढमास्वद-- विटयपुरविलामिनीय संध्या। कलितपृथुयोरणीप्रमाया- दिय परिपाटलदर्शना यभूय ।। ५८॥ कृतसमयमसंग प्रेयसीखर्यसोदं तदनुगहृदयत्वादक्षमाधवाकाः। विविशुरिव विपादादुग्ग्यलंतं कृशानुं प्रएनकपिलसंध्यारागसंपर्कपिंगाः॥ ५९॥ आरब्धहममधुरम्यनिजाप्यमंत्र- स्तकालकुललितपाटलपद्मपाणिः । अंभःशुचिपिपलनारचितोपवीतः संध्यामिव स्वयमवंदत पाखंडः॥६॥ - मयम्।

श्रीपाश्चनापचरितम्। उपर्युपरि पारिदैरपरपर्यंत भानुमत्- मोगरयकेनुयष्टिरक्षकोटिदीगोदरः। पिदमलादिभिः सपदि मुध्यमानेरिय पभाग्यन रियाममागृतमुदीर्णतारागः॥६॥ भनुदमरणप्रभामणीनां गारिता पमीनीय होगात् । गपितरिमोफिनिकाते गलमाणाहिनुमागनेर मंगा ॥ १२॥ মামালাক' মাশা नोपाय निता गुका विषयः । attratमा गगनालायनंती- मुग्मुराणक.मदा प्रशाशा १३॥ কলসি পি এ্যানি। मानिनारा दाय निमामिला। मिनियमनागमनमाशुकशावता विपनामनाती. १५ ॥ अनानिमय f**517414747 fast बनानगरमा पाश्रिी ... TARTA Tarn forfritt Tripurternaमामाम। xzrmeries Terrorsmम.. Tag karis परामर्गः। अभिमनरनमंपिदै प्रदेश पालतमोपिदिनेऽपि राजमार्ग। मनमिजमनिपोपदेशपा म्यमापनरमिमारिका प्रजग्मुः। ६७॥ हरचिलटालीप्पया मीलयामा निभूतपदमटनंघकापि जने। निशियिनिषदो महिमामालभारी भ्रमरपटलनियानकोलाहलेन ॥ १८॥ पिकयपुगुमदामोदामगंधानुवंपि- भ्रमरपुटिलमाला लियाशेपरामाम् । स्वग्निमपगम्य फारदीपांकुरेय- स्नममय पिभीग्या पामरेखा यिोजे॥६॥ शिलीमुखानां चलनामितस्ततः मुगपिमास्यप्रथितामु पीपिपु । निशि स्मरम्पेय निशम्य {पति मुहम दर्यिताधियोगिनः ॥ ७ ॥ औकात मति नमसा नमभ्ययारे पम्राजे मणियचिमंडलन गत्री। आटीदोदरमय चक्रिवेश्म यत् कालोदस्तुरगयघूमुग्धानलाग्धिं ॥ १॥ बहलनमोपिहिते सायंधधारेगावादित ।२ मननिय कामदेव भ्रमराणां द्विरेफाना पटलं समुदाय तस्य निप्पान निखनं तदेव कोलाहल सारस्तंन । ४ दामा सद । ५ शिलीमुखानां भ्रमराणाम् । ६६यिता योगिन विरहिण । माक्रति म्याने । ८ आना या उदर तन् । १ दावानल प्रवृद इत्यर्य ।

१०६ श्रीपार्श्वनाथचरितम्। यिमुख इति विवेकी नेति दुवारदर्पा- यह इति घरहारीत्युद्धतश्चेति नित्यम् । कमलमुखितवाराद्वक्षसश्चेद्वराकः स कथय कुचयोस्ते कि न ते संति धर्माः॥ ७२ ॥ पीडासहं मधुरमव्यतिरिक्तंराग- मायद्धचुंबनरुचि रतिनाट्यरंगम्। तं चेन यांच्छसि मुखान्वितवस्तु नाम विस्तारमृच्छति गुणस्स तवाधरेऽपि ॥ ७३ ॥ निर्मलथवणसंगमनंगो श्रृंहणच्छविमतुच्छविलासम् । कांतमाक्षिपसि यद्युत्पनं किन से तरणि तादृगपांग ॥ ७ ॥ स्वभाषमलिनस्थिती शुचिरहेनुयमारुती ग्रज स्वरसगंधतृप्तमधुपे सतामाधयः। निस्एरतिनिप्रहे सरति मायकः निग्धया घटेत यदुपेक्षते मुदति केशवेपे त्यया ॥७॥ किमिति तणि तस्मिन्नंजनन्याममन्य रचयसि तय सिद्धयदन्यथा कामसिद्धिः। स हि तय मृगने नेत्रगर्भस्थितः स- मपि भयति निमित्तं त्वन्मुखश्यामतायाम् ॥ ७६ ॥ मुचित्यमपि तम्य विद्धि यचनान्मम प्रत्युत स्त्यमेय गुभगे गुचिः कुचभरापमोचितम् । 1 दुरद वह दुवार निवारयितुमशक्यं यर्य गर्न पहतीति । २सम्यतिरिकं अपग् रागोऽनुरागो यस तम् ।

पः परमि पक्षमा गनिन्दारमान- मयूरपमुग्वपिताधरमसी पानसंबंधिनी ॥ ७॥ रति पगि कपयेव नमोमुंगा युगतिगामयनी दयितागमे । अएन परिमधियारामने निशिगीपगते कुमुमायुधे ॥ ७॥ नापिना मागपि विगज्य पथ- रतिकातुन सपनेऽधिनिशम् । दयितम्प पतमनागमना-- दमिमीलदंगापिनेय in ९ ॥ तीमाभिपंगमतिपात्य रतम्य कालं. पाला प्रियम्य निशि काचिदुपस्थितस्य । मोधोदयानुनयादयधीरयंती पादमदारमरतोरपि यायकांतम् ॥ ८० ॥ आगता प्रतिनिवृत्य येश्मनो पहभम्य निशि साभ्यम्यया। कांनयतिनयमोगेन्दाछना पंफलीवचनमभ्यदीयत ॥ ८॥ संख्यं दृति यदाययोरषिविधत्तत्रापि मत्प्रेयमी तत्मज्य प्रतिपन्नमय यदयं महदेश्यं व्यधात् । प्रस्वेदाईमुखं नवक्षनवचं निर्दिएदंतच्छदं नांवृन्दांकविलोचनं नय रतियत्यम्नयत्रं यपुः ॥ ८२ ॥ ,अया निर्मलमत व सुरत देदीप्यमाना ये मयूरा। किरणानि तान मुसानि नथुवितमधरं दलद येन तम् । २ तमोमुचा चंद्रण । ३ अपि मारोपितं शरासन धनुर्यम्य तस्मिन् । ४ अतिचापल्येन । ५ नव च तत् तस्य लोच्छनं चिन्ह यम्या सा।

१०८ श्रीपार्श्वनाथचरितम् । घनतमसि निवासे सन्निधाने सखी मां युवतिरधरविये चुम्यमाना प्रियेण । उपनतरतिलोपं दीपमुद्दीपयंतं परिजनमुदितेयारक्षमीक्षांबभूव ॥ ८३n वनितालयनीविखंडवामा शिशिरंभामपिता भियेव शीताद् । वृणु मां वृणु मामिति प्रयंती शयनस्थं परिपस्वजे स्वमीशम् ॥ ८॥ योजयन् जघनमंडले हशी यल्लमा प्रमदया विवस्त्रया। मनमकुचभरावनुदव-- क्ष स्थला युवतिरपीच्यताघरे ॥५॥ अनुनयकृतिवल्लमे कृताग- स्युचितमियावयती जगाम लभ्राम्। अनुनिमभिमानबंधमंगा- दिप युवतरिमाथिलीवभूच नीधी । ८६ ॥ गगी वियोगममहप्रिय गत्रिमिदु- मुंनां मुहर्नमयनीप्रथितप्रदोषम् । नस्याः प्रसादनमियणकमुखहला-- मन्येष्ट काम य गोधरमप्यरोहन् ॥ ८॥ हिमांशुरुषत्मागरम्यालं पोरणम्पारणानदीप्तिः। मुयो भृता यं स्वयमन्यिपाय प्रमामियोतीशिनुमुन्धितय ८८ पत्रमूरदा। मृगानिशेषनाचिर रियतामस सिरप कातिरपी अमितानि ।

पटःमः। पिगमंगः गुशुमे दिमागो- विषं गिरेः एंगपिपि रात्री। नावालाघ्राज्यहनं माग प्रापोदयम्पप गुपर्णपीठम् ॥ ८॥ मदापदारमयकोग्नेत्रा- मुमारयन् प्यांतरिमाग्पिामः। निशामिपालिगिनुमंगगगी प्रसारयामास करान्मृगांकः॥१०॥ मुदं मृदिना जनयन्जनानां परिधिरं मंडलगगाढः। गजा मघोनोऽपि पिलिप्य काष्टा- मध्याम माधोदयमद्वितीयम् ॥ ११॥ तिमिरममप्रथ्योमगायकीणी विरारयिधिकमिदोग्यमयः राम्राः। सरमि रमषियोगापंकमात्रायशेष यिततमृदुगृणालीयिममं यिनने म । ९२॥ आपाप्यदमननिर्विदलिनाननामुच्छम-- सरगशयनांशनः पुमुदिनी विमनाया। करणासमर्पित नवसुधारमं सुंदरी- युयापि मधु मानयो रचिरहंमतूलाथयः ॥ ९३ ॥ अभिनयरिमात्मनि प्रमत्तां स्मरक्तमिद्रदिशः स्वयं धया। परचरक योपलीपिशुद्धे हिमचिरंकभृदायमाघदमः ॥ ९५॥ मृग अंके ग्रेडे यम्यामा इदुरित्यर्थ । २ रमवियोगात् दलराहित्यात् २एमयमित्यर्थ..

- mनागालाम्। गुरागाग्निागी- मानिनामेन जगजिन अनेराम- जगाम far.rriम..॥ im Mirmirpो. HTTीनाम । mulinarsinा मगि नाका प.. मा मा भार.11111 in mam.... raute art111गा नामा मना 44:414 Tal 41:11मी E mantra.tirit Firsainiktat mitr 41 +farina . पए मगर माधापामा एपथप्रयाणा- दिए धमाा निशिगंद्रपादाः । भूप मंदागतमारवायां पिराधमुः स्पृएपनितंपाः ॥११॥ मरम्नांगामननपरदा. मंदान पुंगति पंकमिन्यः। आनंदयोगादिय मानुगगा- म्पमालयन्नंपुजलोचनानि ॥ १०२३ शुचिम्मियामयिलोचनानां प्रदामगोष्टपामभिनंदमानः । बभूप गगादिय पीरगमा मृगकरश्मिप्रमगे निय।।१०३॥ लीलापिलोलनयनोत्पल ति माप श्रृंगे शशांकचिमति मदोपहंति । कामातुरा युरतय. म्यधंयग्मनि नागां मुग्वानि गमरवानि पुनयुपानः ॥ १०४॥ अपेक्ष्य मुनि मधुनि स्वकामिति ध्यतयत्वाचन काननी। अहं निपीतास्मि किमंग होलया मयच रागात्मनिपासितम्यया ।। १०५॥ अनिपानाविधैरगृनुमका- प्रियमुद्दाममुगंधिकापि गये। अधरप्रनिविदर्शनेन स्पृपालुं विदधे पुनर्यिदग्धा ।। ९०६ ॥ प्रामादपंक्याम् । २ अपिधन् । ३ मुरया ।

११२ श्रीपार्श्वनाथचरितम्। हरिणदृशां मुखः सह निशोदितशीतरुचिर- फलदंफल्गुयांधयममीभिरमा। यदयं मणिमयभाजनस्थमदिराभूतवारि मिलनलुठदनल्परागसुदिप्रतिबियगतः ॥ १०७ ध्रुवं यधूवल्लभकंठगहरा- गृहीतहालामदशक्तिस्दना। विमोहनं देहभृतां व्यधनत - सरस्वती गीतमयोभुनि गता ॥ १०८॥ बदतरपरिग्भणयलेन यूनां कुचभरमुद्रहनामिय प्रमत्राः । अधामधु नत यो थिनेनु- स्नगुननवम्ननुमायदतुम् ॥ १०॥ पधूयगमधुमदनि लप्रियः मा मुदा भरतामक्रियागुमः। अयोगपनियननृत्यकमंणा ममुसमहरलतालयोमनः ॥ १० ॥ अचिहिदन्यामरा प्रयानाः प्रयंदनीयः तुममायिनेषु। यशांति पटगाकुमां भगुन. नरिय प्रेमगः प्रियाणाम् ॥ ११ ॥ गतिवियागमगिकमवृत- पाएंगीलादयटमादाः। अन्यभिनय गमयी- नागरिकारियाः १.२॥ अलमपरिगणिती मृगांकी मदनलाध्यमतुल्यः ।

সামামিমাসঘানা- गुपरि गुधामिर मंदिकां मुमोन ॥ ११ ॥ सोमालिकरण गुमाए हनामिप चंद्रमगा पिएरा। जारेज गतिरपराद्विमिपाए गुतं गुने जने घुप्रद पधिमदेशभक्या । १९४ ॥ उपगुप्य सम्मानमुद गुप- राजानमागपिनयागणीपम्। आयनयामा थपणानुयती मसवलोकनमनु प्रताय । ११५ ॥ भृिशोलमन्मनोभू- रभिगमनपरी दुपारपामा पदते समुपादागुन-- प्रमदानां जपनानि याकः ॥ ११६ ॥ गादरतियंत्रतया मुरतिकमेण कृतिभिनिता । परिरभ्य परमधुरोष्टमणीनिभृतं निशा परिणती मुधुपे ॥१७॥ गृहेषु गहामपरक्षणार्थ निद्रानुगेधेऽपि चिराभिपोगान् । पुरस्सरकापनिजस्वराणां समुन्भुषयंगपरमयोपाः ॥ १८ ॥ अंधांनयांतमदमारमलोभमंगि-- भृगस्यन रिष सुखप्रतियोधभाज। ११, नृप च । वारुणी मुग, उतरतिक न सको मागों में सदमार्गानुयायीत्यर्थ । पर्छ जसको मार्गो येन स्वमार्गानुयायीत्यर्थ । ४ क्षत्रियसमहेनति शेष । ५निरंतरप्रवाहितस्येत्यर्थ ।

११४ श्रीपार्श्वनाथचरितम् । आलानधामग्रंखलब्धशब्दाः शय्यां विमुच्य शनकैरगमनाजेंद्राः॥ ११९ ॥ शिथिलय कलकंठि फंउदेशात् भुजवलयं ललिते ! मम क घस्त्रं । परिणतिमगमन्निशा यदेताः शफटरवैः श्रवसी तुदंति रथ्याः॥ १२०॥ संभूय संभृतलयाः प्रयदति तांग्र- चूडाः सनीडरतयस्तदहं प्रजामि । तन्वंगि यन्मयि समाभितभृत्यभूये भूयः प्रमादयिघिरेप विधायिपीए ॥ १२१ ॥ पिधमान् प्रियनयसंगमेऽपि चेतः मर्यस्यं त्ययि रगतो मयान्यधापि। आनेयं मम पुनरप्यदो निशीथे मत्स्येम्छागृहमिदमभ्युपेहि मा या ॥ १२२ ॥ पेनोवृत्तिपिपुलपिलादागरनापनमा माइती योगानियतमहिम । न पीसनोति। मोगिन् क्रीडाशलमयता पपस्यंत काले प्यालय्याया यिग्यपति में दुग्यो प्रयोगम् ॥ १२३॥ इति विटालटासनगर- मग्नाग्मीनिको वियोगमारे। उपनत्यति गाविपधिमान प्रणयगुर्यचनकमो पभूध ॥ १२ ॥ आलिंगनोरहनमंडलिकांना कांतापयनकाशन गत्रा। .

पा: गर्गः। া সথ মানিয়ায় नोगुग्गी पुनभिप्रयारमधीः ॥ १२ ॥ रिचिन्निमालपितोयलनेगरि- निगरकणिकामु मुटनीषु । पांत पिधी यिपिपदनसमीपयाने शोकालार य भृगग्यो पमूए । १२६॥ रिमनिममये प्रमंगाया- दुपरि यिदारिणि दल प्रपाते। मनिलकुमुदधणा मुट- म्यपियमनि म्म सरस्नग्गशय्याम् ॥ १२॥ प्रियविरहनादेनाशोकनिश्यामदाय प्रपरभग्निमुन्मयोम चंदनसम्मी । हरणहरिपाटी दाहभीनेग्धाय स्थग्निमिय मर्मापं पधिमन्यायम्य ॥ १२८॥ आलिंग्य पालमतनू विचासंधि निहायिता यिकचचारिजगंधयंधी। पग्वेषु युतिमधुर्जधनच्युनेषु प्रामातिक मति पानि पिलामयत्यः॥ १२९॥ समयमत परम्परेण दर- प्रगननया निशि लम्धभोगपीडाः। यरयुयनिकुचा यिभानकाले ममदमुपोन्नतयथ चयाकाः ॥ १३०॥ रात्री नीतमयावशेषभुजगादाचविगेशारिणो भीमेवारियोगिनी कमलिनी निद्राउलान्मूर्छिता । राभ्यदमाने । २ प्रस्फुरितकमलमुभिवाहिनि । .

धीपार्थनापचरितम्। तस्मिन् कंधरकाललमणि गते शोणाममुंभन्मुस- रजातभ्यामनयप्रभातमाता लम्धेय संघेतनम् ॥११॥ धीरंधकी निशि मगेमहगेहगी- होगाकरेण कुमुदाकरपेश्म नीता। मास्यारिप्रयम्य पुनरागमनाहियेय प्रत्यायिषेश पुनरंयुम्हें प्रभाते ॥ १३॥ अनुपिधिमधिकप्रभाविनम्ने गफिन र कहो विधातम। अपगरमपनीयर प्रतीरान गिशिलतरिता लागुगम् ॥ १३ ॥ मृगगगगुमिनितोहार्गा निमाविमतिकामिय प्रसाधाम । মানসমাগম্বা। गुरागा निति नपचंद्र माhिar ॥ ३५ ॥ निगुनिया मागम मधीना मागायनिशाना । प्रशननशानाजा मन्त्राची जगदमिनमनांना शरणा..॥ अम्बेट विनियममा पंगवर्गमतामामा লাখমান্না লিসা সকল साना नाणी. পাৰিম এবিপাশা मानाकामिय म।

पठःमः। अमिनियेष्टुमियांगपनोरण- स्पिनयनी कमला प्रतियीसने ।। १३७ जमियनः म्यमदशाभूतम्ने ये प्रत्ययापिपअपाता। भपादिय नानिमयो यथोनों पुर्षतु सर्पजनीनसिनिम् ॥ १३८ । मस्थेदांयुलधान मुखादरगुदमामालयन लोचने मोहामामकापटी विडयन मंजन नितपस्थलम् । नारीणांपुरतापमानसमये कामीप पुर्यन्नियं मात्य देय तथानिके प्रसरति नामानिको मारनः॥१३९.॥ तनुजिनपनिपाला प्रारथिदं विकमदनयमाने मानसे तत्र भूयः । सरलसरगना नरमीविलासे स्वमपनिपतिहमोहंमलीलां मजेयाः ॥१४॥ रत्याविष्कृतपंचमप्यनियच. थोचामृतं धीपतिः पान्य प्रतिपनियोधयिमत्रो मंदागनं दिनाम् । বা মল্লিকাকোনাঃ चमी विक्रममोदर म्याविहादील्येय कारिणः॥१४१॥ इति श्रीवादिगजमृरिविरदिने प्रीपाश्वजिनेवाचरित শাখা বঙ্গব্যঙ্গবাধীখ নার सप्तमः सर्गः। तमोप्रतिमाहय वलिहारं दिशामि। समाभिः प्रमरक्षोहितयिःne मानुमानगांयाहागिनायास्ताधिप। समी कमलागामे मंजीनियमिजिनम् ॥ ९॥ भगमगणारिताय कानने। जलमग गुगपरि मंभिता॥१०॥ मात गागल्या ग्नाले। नमसालानागुणामक्रिगामिन ॥ ११ ॥ नि:TITI पता नणा। माननितामागरमम ॥ १२॥ Hererani गोपिनाम् । पनवनगaraman गादादिगननामा मनपाम। म्ननगगाग्रीमा पनि witarragniorNEROTII a.TAMARITERATED PALI भागी Tmi Trinी। पापमपंगमनमाम । ११. रमावर mitafalta मनमानी Arrian ३१ सप्तमः सर्गः। चचाल चरिणयम्या चकिताम्य चमूदिपाम् । शिपियन्निर्गमे तम्याः कायेभ्यो नियंयाविय ॥ १८॥ तेजोमिपंधे नम्प सर्यदिश्च प्रतिक्षणम् । आलिंगनादियारिस्त्रीनिभ्यामप्रसरोमणाम् ॥१९॥ अदृश्यो पलसंपाताञयमासतो भिया । पृप्परेप्येयामयत्तस्य नूनं सेनापरिच्छदः ॥ २०॥ सेनयाऽनूनया तम्य निएष्टोद्धतभंगया। मीतोदयेय मीतोदा प्रस्यामाचनुरनया ॥ २१ ॥ सीरनुमापलीरामात् दयामयारिस्नागिणी। उरपत्येय तमायातमद्राक्षीप्रसवेक्षणा ॥ २२॥ तम्मन्यतूर्यमंघातबानोचतुमुलापनिम् । नादेयमाहिनिघोपः म्यपोपमपुषन्पुनः ॥ २३ ॥ जलेभपुकोद्रीनगडातुच्छच्याटाजलेः । नपोषोत्तंभितारतम्य यजाममंनिधिहएया ॥ २४॥ फलस नियातव्यं नत्र सत्र मनोहरे। मस्येत्यानपत् निधुभंगपणापम् ॥ २ ॥ तीरपर्यतमंकीर्णनगगमरीचिभिः । पुरम्यतानुगगेप निग्नगानमा निर्वभौ ॥ २ ॥ फेनलंगननयोंग्नि भंगरगाम्य पातिमिः । गुगलम्यगामय दयमा महानदी ॥२७॥ नायगाधना सम्म माम्यय पदीया। द्विग्नापा परि निभंना पजनाभायोप्या ॥ २८ ॥ नरपीपलाशानामा विमुप्यते । नापटे पत्रपति ना।

१२२ श्रीपाश्र्वनाथचरितम्। तपसमयोगीर्णोधपूर्णद्विलोचनः । प्रोद्यत्कहकहाध्यानं प्रहस्येदमच कथत् ॥ ५४॥ ईदृशी तादृस्यैव युज्यते साहसक्रिया। यशसैवार्थिनो नित्यं न प्राणः प्राणभृत्प्रियैः ॥ ५५ ॥ विगाहमाना व्योमाग्रमद्य मत्कीर्तिवल्लरी। अनेनास्त्रप्रकांडेन किन चंडेन खड्यतमम् ॥ ५६ ।। तोमरप्रणिधेस्तस्य जलातिक्रमकारिणः । अमी रत्नविशेषाः कि नोपस्थानं प्रकुयते ॥ ५७ ॥ इति क्रोधोपहासाभ्यां यथार्थमेव भारतीम् । अमिजल्पतमाचण्युस्तमन्ये ख्यातपौरुषाः ॥ ५८॥ इयमत्युज्यला लक्ष्मीर्यवतः प्रधितानतेः । मौदामनीच जीमूतात् कस्य शक्या पृथपिक्रया ॥ ५९ ।। व्योमेवानांतविश्वांते यलाद् दुर्लध्यपौपाम् । हटादाक्रप्टुष्टेि कः श्रियं चंद्रकलामिय ॥६॥ तस्य का था भवेन श्रीर्यस्तु ते संगरोत्सवे । चंडदोडकंइतिकडूयनमरक्षमः ॥ ६१ ॥ अमत्यनियहाचार्यवीयंत्यतेस्तदेशी। मानवानुत्तमे तस्मिन्नाक्षेपोक्तिरयुक्तिका ॥ ६२॥ अतस्मुभटसंमईलम्धविक्रमसिद्धयः । ईप्सितार्थक्रियासिद्धी देव! प्रेप्यामहे धयम् ॥ ६३ ।। यहलपस्टतोद्दामधूमप्रत्यहलोचनः । दूरादभ्येत्य दायान कातिकमितुमीश्वरः ॥ ६४ ॥ शुष्कायुतलमात्रस्थम्राम्यत्तिमितिमिगिलम् । फरयाम यदीच्या ने सातोदाकुहरोदरंम् ॥ ६५ ॥ मीनमकरनकचकादे।

१२३
मप्तमःमः।
निरम्य नीरसं पारिक्षारमणवगदरम् ।
संपादयेम संपूर्ण नव देव यमोऽमृतः ॥ ६ ॥
मेयमुन्माल्य भूगर्भात प्रभायं नत्र शाध्यतम ।
कीर्तिकल्पलतालंयम्तयमुनभयेम ने ॥ ६ ॥
अपारभान्मनः शुभ्राः पलादाहग भावली.।
हाररतामिन्नाभिने भपयेम भुजातरम् ॥ ६८ ॥
धीरमित्यभिधायोगकागविरलोचमा ।
अभूवन्युसंनद्रा मागधानीकनायका ॥..॥
মাসাম্বা ছােয়া বল্ললামিম্বেন ।
प्रागेाजनि मंग्रामात् म ध्र दिसटोहिन ॥ ३०॥
फैध्रिद्धनमाया दंडा हदमुष्टिनिपादिना ।
मीचमार्यिक्रमोदगिधयेय परिभ्रमम ॥ ॥
दृढस्यामधिकर्मण्यायो महादरतम ।
जयधीसंप्रदाय ददमियापरे ॥ २ ॥
रत्नांवादिनभान्ये मन्त्रमामध्ययर्तिनः ।
पकाशिरे भृशंपनेज पल्लविताय ॥ ३ ॥
फैचिम्निमनिॉग्गा निस्किान दधत और।
प्रत्यागरणग्रीन्या बभूषदिगुणाप ॥ ७ ॥
মাঘবঃ নাথ বিশ্বমিষাসি।
गदापननयदायादीगः करिताना ॥ ॥
भोपामगरनीसिमिनाक्षणाम्गुषमम ।
अभिपिनामियोदायपिंपरिमं भरा sta
आपतमालागारिपरिमाना ।
पंमितापालगामागुरिय प्रशमाघमम ॥3॥

१२८ श्रीगनाथचरितम्। नं म्लेच्छा मर्यभायेन ममरेऽममरे निते। भग्ना शरण्यमाजम्मु पीइने पीडनेरिना ॥२५॥ ममदनीप्रदानेन ममदस्त्री म मयुगे। मनुज म्वामिन संगमनुजप्राह तानय ॥२॥ मन्यादपिणमादाय मनोमानयाहित । आयया मनपोषातमनामानयाहिता । ...। मातोमणि गुहागर्भ ग मम्राट तामेनगा। अगादशस्यमयाना गुधिया सामना ॥ १.८॥ निमिलेपानालाकीणनिर्मिना । नत्रामा जान पुणः । तमा । । मा मना गमपामागगुमास गानागमपामामा राजन पिदिनानिमितानेन hिn नाम महागा वैश्निी मानवाना AT AAI ।। , नगननाप्रामाणमा मामामन ममामायममुगना । .. म.T414। नियाम HERITA Martinisमान । TIPTVnafasi , ...ttarts organikata ... T । . 4 .

समम सर्गः।
कृतपरयामोशा पृतनाक्षोदपीडिता।
पांगुष्योत्पपातेय स्वस्थानादियदुरा । १३७ ॥
सपो पापरयो प्योग्नि जमे पीरमुभरन् ।
मपोषादपास्यानु संगरोदेगकारणम् ॥१३८॥ अक्षरच्युतकम्।
अरीणामुत्तमांगानि निशिताननतोमरैः।
चिच्छेद निधयाकधित् व्योमस्थपिनतोमरैः । १३९ ॥
तरयारिभृतः सी पीराः कातरवारिणः ।
का नि:पति रेयाची भटेस्संपतिरे परः॥१०॥
अंतःशून्या पदनागपाशमनहनाया।
अनया पनपनियांण फेचित् प्रजाहिरे ॥ ११ ॥
अंतःशून्या वृद्दनागपाशसंनहनाहयाः ।
अनया धनध्यानः कोणः केचित्यजहिरे ॥१४२॥अक्षरव्यत्ययः।
अररिपुषियो गादारटरप्यन्यकहता ।
स परिषु थियोगादकृष्टो हत्याऽभ्यगुते ॥ १४३॥
विनेनुषसुधाचक्र परवारणयाजिनः ।
आहये निहतास्साकं वृत्तया रयकद्यया ॥ १४४॥ अपवर्गः ।
निस्त्रिंशच्छिन्नभूलनशिरमो विषय हो ।
अरिमभ्यगुरच्छखा. कर्वधाःसार्यशालिनाम् ॥ १४ ॥
असहिष्णुतया युद्ध चिलातावनभूभृत.।
पूर्यमाराघश्यानामहींद्वाननुसम्मः ॥१४६॥ अथवर्ग
अमी मेघमुम्बा व्योमध्यानयारिमहाग्यम् ।
वयर्पुत्रिपुलोच्छाया गिरिडंयग्गोपकम् ॥ १४७ ॥
विकीर्णधर्मग्नस्थ कटकं चयनिन ।
एवं जुगोप नदृष्टे. प्रयमान महाजले ॥ १४ ॥

वनमुचीमुखोद्भिनं छाधारगतांबुना।
तन्सर्य नृपतेवेंद्यमकुर्वन् नत्समीपगाः ॥ १४ ॥
कि केनेत्यसहे तीक्ष्णं कथयत्यय राजनि ।
क्षितिग्रस्तं जलं यने नताम्ते तदातय ॥ १५० ॥निरोष्ठय।
सारवस्नुप्रदानेन म्लेच्छविनतमीलिमि ।
सारवस्तुप्रभानूयं रक्तोदा देवता यया ॥ २५ ॥
माभिपिच्य तमुवीशं रिपुमभद्रमासनम् ।
दीप्तरत्नमयं तस्मै प्रददौ भद्रमासनम् ॥ २५२॥
निपधं प्राप्य गोशीपचंदनायैस्तदीशिना ।
अनुजग्राह स पश्चात्यूजितो दिव्यमेपजे ॥ १५३ ॥
रक्ता देवी नृसिंहाय तस्मै सिंहांकमासनम् ।
भयाददायि याताय कृत्या प्रागभिपेचनम् ॥ १५४ ॥
सदेवमानवानीकैरायया वृषभाञ्चलम् ।
सदेवमानवानीयोऽनुतस्थावन्यजन्मनि ॥ १५५ ॥
तग्रालिख्य समुहामशववीयश्रुतादिकम् ।
मकांडकप्रपाताख्यगुहापार्यमुपायया ॥ १५६ ॥
अदायि तस्मै स्त्रीरत्न नयते गगनेचरैः ।
अतोऽदायि नतोदारैरयत्नं दायिने नरः॥ १७ ॥
पृतनापतिना पाय मंडलाधिपमंडलीम् ।
निर्जित्योद्घाटितद्वारा स गुहामत्यगात्प्रभुः ॥१५८ ।।
तानमालस्तमामाच भंगारच्छयचामरः ।
अपूजयन्ममेतोऽन्यरादरात्त चामरः ॥ १५९ ॥
ऊर्जस्वलां म्लेच्छकुलम्य लक्ष्मी
निर्मित्य यिभ्यां पृतनेश्वरेण ।
पति यामध्यपुरं प्रतम्ये
समुन्नतः किंनरगीतकीनिः॥१६॥

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अष्टमः सर्गः। पिकस्यगंमोरहमनिभाननं घनस्तनोगंमितद्देमपरिकम्। मनो मुदं नम्रततान मंतनं नतभ्यां पाणयतः महप्रकम् ॥ १॥ गतुः पगीति कलागल्यया महागणदाभ्यमिता महोसताः। प्रभागयस्तयनागणशिति गमुझमगमदायुपिछलाम ! २॥ मास्यश्यामाध्यमलयाना शाए गोकराया प्रतीताः। भशीनागना. मनु मगध नरिमन प्रगम मानसम्मान्दिमण निण निर्माता जिगातीली। बभनगामी प्रणाली हाािमा रहण.४॥ प्रमाविरगिनिगममा मुगनपानामधामतः । माय TRIमन सीता नानिय नि तिमि कानnifxam निधनाधिगम । 4 '६५.

अष्टमः मा पगतलामीगुणपतिरक्षण जगाम पारनपालचोदिनः । पमप्र मधुगंगभृती- महामुजो टिपयायतीं। गूनोग्दर्गादानात भंगायीमंतुणमंजरीकः ॥७॥ प्रयालगारमादिग्वि- गुद्रिामामागुचामना। अधाण विश्व ममारिणं यां जपेयासंगरवोरमा विकापाटीदागुरामं ममीभयो भनमानिधितो धनु' । चनमा दलदम्या शिल गुलोत्पादनिशामिना.. तदायीmilti गुणे गगुबगप्रापरी । भयानहरपामपिाप प्रयास मिनोग : t." भवानविय माकाजाति गोपनानातिनापस ! तमोपित पदारयागर सीमाभिमानामा ११. भुष वरीपपमि nia माशाला मामिला - श्रीपार्श्वनाथचरितम् । प्रवासिनां चेतमि चूत ! सत्यं प्रजति मुच्छांमतियोवनस्थाः ॥ १२॥ अयं मनोभूः सहकारमंजरी- रुदत्यत्येव लघु प्रवासिनः। प्रियाः नियनेति समादिशनिय तदाश्रयी कूजति मत्तकोकिलः ॥ १३॥ रजाक्षरन्तीः महकार सांप्रतं समुद्रहेः पल्लवरतामंजरीः। मुखासयामोदलमन्मधुवता विचेतसे तुभ्यमपि प्रभुः स्मरः॥१४॥ इति स्म चूतं मनसेव जल्प- भनल्पसौभाग्यगुणं गुणशः। मियासहायः सहितो वयस्य- चनेऽचनीशो विजदार हृद्ये ॥ १५॥ नतम्रयामाननगंधाच्या मधुवनेस्तत्क्षणमुनपुष्पाः। अवाप्य लजामिव कंपमाना नता यभुनभूमिधल्यः ॥ १६ ॥ कृतानुयोगा प्रततीषु योपितः प्रियः स्वसंवीक्षणलोलुपेक्षणाः । स्वभायमुग्धाः स्मितमेदुरानने- रमदृश्यंत मुहूर्द्वमांतरः ॥ १७ ॥ व्ययत्त काचित् तम्पल्लयानां म संप्रहं नापि नतो ग्यरंमीत् । १ भग्नं करोति । १पूर व्यायाम इत्यम्य पम् । ३ समस्थपुरमुर्गधन बिसगंनो भ्रमरा मामु । । लालमया ।

अष्टमः गगः।
সাবিলা সহ সখ
मदममामयधुश गुग्धा ८॥
पुची कपाचिद्विनियाणा
हदप्रयोशनयमयाला।
पधाधिपानामिय मग्मयण
पविणधामाभिमामgin.n
मनर कंगनापलट
भुगी nिitarन योजयापा।
प्रिया मानीनग्यावया
समामिंगगग्यो मिration
जगाद साधन rartun
लोकजम्मा गयरयार ।
माधानकापाटन
रियाति नई परे
Braখান fuখাবা
नाम गातार ।
नयाधगेऽयंग किमिrmuया
प्रावि दर.
ঘিলা খায়
पाप गrat NIRTE
गादती यापा
nauit & MITEITSP:TREL
प्रिया पुर गुली
Tranा।
।

श्रीपाश्वनाथचरितम्। अधस्तरोस्लत्कुसुमैः मुगंघिमिः यध तम्या कयरी युवापरः ॥ २४ ॥ निगृह्य केशेष्यथ चापपाणिना मखीं प्रियस्कंधगतांघ्रिपल्लया। स्वयं मपनीजनसंनिधी वधू लुलाय शाखाग्रिमभूनमंजरीः ॥ २५॥ मनोशताऽस्मादपि तस्य तस्मात् तस्येति प्रादिश्य विकाशिवृक्षान् । स्वेच्छारतो कश्चन निश्चितात्मा निनाय जायां विजनप्रदेशं ॥ २६ ॥ बहुप्रसूनाभरणाभिरामा तरुपयालस्तरणे निषण्णा । उपांत्यवर्तिन्यचकाच काचित् प्रिये घसंते वनदेवतेव ॥ २७॥ विसृष्टवन्यप्रसवोदरस्थिते- मधुप्रतानां नियहादभिद्रुतात्। मनोरमामोदमुखारविदया कयाचिभ्राम्यत सत्वरं मिया ॥ २८ ॥ मनोज्ञमाल्यं दयितेन यच्छत् प्रिया सपत्नी गुणनामचोदिता। हिया कृताऽस्यमभूदयारमुखी तमुद्रतीय इदि व्यवस्थितम् ॥ २९ प्रमूनपल्लीमपल्य कश्चित् कांतामखीनां निकटं जगाम । केशव अष्टमःमः। - उदाप गावामगियानुकाम- धिनायनाकामिय प्रियायाः ॥ पतालनांनादपायमाना- दाग्यांपूर्ण मामिलान दिया। निगरमा मामात्रयुगा नप्रमाणिहान ॥ १॥ नितंपदेशनागपारा गुमाउनीमारदाrore भायोयन का वागिमा पुषा रामिणप्रयोगमः ॥१९॥ अधाप जपनानदारानं भकहिदोगगता मिथिमी। नतिधिपाधिषणप्रतिमा निशाय ना froyeu पुगतनागपरविता nary गुवाहा । यापुर प्रचार योगाभाडा Ren पागापy nam sh mrate पुरमा परितirfel सन्यः परावृणीका १५ अगाnिfirmमा ayumदीपि । rre Trir, २३८ -- धीपायनाधचरितम्। निरीत्य नागैर्दुमकोटरोन्मुसः प्रदित्मयेवोन्मणिभिध शुभुये ॥ ३६ ॥ फ यासि मत्माणममा यिलोचन- थियं यदुन्मुध्यमृगीति कथन । प्रयुज्य पाणिं हरिणीमनुयजन मनं दगद प्रियया यिशोपया ॥ ३७॥ तलं मः कठिनाश्मकृष्टया प्रतुयते मप्रपिलोकयेति। निनाय काचिन्नयनोपटं परयुगानीजनर्मनिधागे ॥३॥ मितप्रहारेण नयनाने केलीविलागणिधिनेन । भजग्मन. शियन पतीवर यथार्थनामानि पुणवणेः ॥ ३९॥ গ. গুণাগ্নি प्रमोय पितामिय मियाम। ना महामेष मागी- गंगान itfami nok भयंता गगनने शिनावादाविदोकना। अनीपणामनुरा मनमायासिंग बहिना मागणी पायाम्नानिवागना।

अरमागर्गः - प्रवियायामयमंरानां मप्यदोपतानातागु ॥ १२ ॥ नुवांमागविहारगिना সাদামাসাম্বিয়া। पापण्यनिधोगिय मिग- मोदयिमापसिंगा.. मंगपंच पांगुलयाममिीि नितंयभागलिय गगांगी। नियोगगामगिरिमामया' सभालाषा net मातायेगगंधा- नगगेन। हता पम्पषिमादारण जगतागाय मणिपातम... महापाविनाया प्रमितम्याrg अभिपनि नियोग व भयं तदा गातो . पागधारोपण औधोगतमा । Tarky बंगा- गुपतिOMAfa Trur । ४. मिरमिलापता मागा भनिभाए १४० श्रीपाश्वनायचरितम् । अतहणाः कैयन चास्यारिज- रधोमुखत्वं प्रपयेय संदधे ॥ ४॥ विकस्वरांभोगहगर्भनिस्सरन् मधुमतीमधुरस्वरोगमः। उपयुषम्म्यामुपभोमिच्छया प्रियं जगादेव नपा सानि ॥४९॥ कम्याधिदंभः प्रथम प्रविश्य प्रियेण यकाभिमुखं प्रयुक्तम् । म्यजात्ययोग्यं पत मामगाने- रन्याशये विधनतामियाय ५०॥ पकिमपि गुगंधतेति मुग्धांगना कपन पंयपिया। मधयमन गुरांग या निगाका मा पा ॥५१॥ आदितनीसंगमनंगमुग्धा मागिताला पामले। मानना गा रोग नागामित विमा ५२, गीतममा प्रमाण नियम्मिन राना। গাসি মাখা मीशाणामा ५॥ आ किमाम पाihi farriri निगम मानाप्रम। भागितामा अष्टमः। पाजे गगनी दधाना पपुष गुंगा नयनामिगमम् । मामारियापनका समानता भने गगा। अपारगी: मिंगमा दिगिण। विदायरामकाया बनाया गया अनुमानिया নসা হাসিবুল। समापुनानामी विमोपनी जबाम ". कोण गणापvि गरण rimin यापारगम mar परिपा ... Himarfegantuni तगारगमगर । पyya निय योग्य प... अमेजrderstriminnerficfcfa 1 बिरfenior ( inthin... witraरनपत. -~ins भारत ... श्रीपार्श्वनाथचरितम् । यभंज तत् कंजमतोऽपि पद्यदाः प्रणय जग्मुयधिका वासवः ॥ ६॥ स्तनी नलिन्याः परिहत्य काचित् पत्रण नोयोशिनमुत्तरीयाम्। अवीक्षमाणा नियमन्चरीसीत् त्वया गृहीतं व नु नस्करेति ॥ १२॥ रतोत्सवे तामिरियाभियुक्तं नुनं पतीनां धरहासहेतिम् । विकल्पयताः खलु चक्रयाका- खपायनमा विदधुः पुरंधीः ॥ ६३ ॥ দ্বিষয়ক বহিনি भयादियागाधजलव्ययस्थिनः। चकार काचिद्धलयालिकारयं शाकुन्तकोलाहलगभंदुस्श्रयम् ॥ १४॥ नतधयोभन्या नम्बयामगोवा युगानुयोग व्यदिनस्यनुतरम् । माम्नान्मजयोप्युजिक्रिया-- যষবিমান থের निर्गय कालानुनयानुरंध नांगरायागु पागनाना। कोणनिध्याममनाम्पदग्न- नाननी वाचियराताम् ॥ १६ ॥ लीलासनमाननादी- अपडपामारियांमा मंदरामगंगरतानुगण- माविकारय समा.

आएमःमः। এ বয়স যপিস जनासायामा जारनियमषम् । विनिमीत्रनिमि- निगमायंभूनामियम १८ ॥ निगरपाजामयागमा मगुटनिगममा। मिमगंगयाभिग irth मृगः नयीiriगमग.. मटकायापा प्यान्टोटबादिगणात । समग्यगनशिरासन सानिलिय.. गणेन mt गाना पाक्षिणादाय गमा थाriनिधिATRIES तापमान पुनाstu माnia ति भात ran T एमागकता नपप्रामापपनाममा जमाया hिuroper সিমা খাল हिनि धर्मा विषायारिए। maनेपाल मार- मायाप काय ! पोनर बल्ला राम गा !'

.
श्रीपायनायचरितम्।
हिनाममायति पर नजानं-
स्थतकिनोस्पिनमंतकम्य ॥ ७४
तनोत्यविद्वान् मृगवद्धिमोहं
विद्वान् म्यविद्या मृगदृष्णिशा चेत् ।
वितीर्यनां नहि विवेकी--
स्स्तुत्यंजलिम्मत्यजलांजलियां ॥५॥
यदि नियासायदिनाशियल
गुणछिदे यापनापसंधियः।
अनात्मनीनं तत एव तर्हि नई-
धय धिग्धि विषयोन्मुखं सुखम् ॥ ७६,
इति स्वनिवेदविधेयया पिया
विधाय राज्यं निजपुत्रगोचरम् ।
स भूपतीनां निबहेन सेवितो
धनं प्रतस्थ वनजोपमाननः॥७॥
क्षेमंकरं प्राप्य यतिप्रारं
तपः ममाधाय नृपप्रधीरः।
जगाम दीर्घ नियमस्थमार्ग
निग्विाधागमुग्यतुल्यम ७८॥
रसानलायासरतदु ग्वं
चिरंतनारातिनुदम्य नम्य।
किरातजाती गुणपर्शिनायां
कुरंगनामानि तुंगकायः ॥ ७९.१
विरतिमामा विपुलादिसंश्रये
ममाधिमारपाय शिलानले स्पिनम् ।
अयस्यदुन्मालिनवरया सा
सहा म पापभिंगतो यतीश्वरम् ॥ ८ ॥

14 अरमःमगा। अनधि नपाय गुण्यको যুগসালে গাথা। निपानयामागापानी भून पात्राकान पत्रिणा in पासीय भंजन पालिसान- নাম শিবলীল। आप मुंनं. बमजगंज बन गणपागोगन. पदमानियमान * म्यागुमा गुनिगमगी। गुमानानुगुनहगार प.प्राrafat faran. पm Timinatam पंचम भी। गुगतनावपापना omen luniaudime I OVO su (poleg ye man । पुपियनाि मनपnanvarmपाग अपीतnिgtuter मेगा Raमनाप लिया। WITH ** molem पाया mfemavaktri पुस्।

श्रीपाश्यनाथचरितम् । उपस्तुता तस्य गुपरमा पुन- स्तदेय मय मुषुये मनीपिनम् ॥ ८॥ आयामिरी पात्मयिदः प्रमेय दीपस्य मूलेय मुरटुमस्य। हचापदीमा य गुणान्यिता च प्रभाकरी तम्य यभूय कांना ॥ ८८५ तामुद्रहमाहितपयशामा ग्मोपपनामविपनपमम्। কমামলা মাম नुपरगनियं नलिनीमियाः॥ ८॥ मनोनयी म्मम्मोगमागमन- म्नमय भोगं प्रणयादयुपत। प्रद्धरागमयमय प्रियं निमप्रियां प्रीनिमयुर या...॥ उदातमुखां सतया कृतांदवं संधी दियांकादमिद्रमागतम् । সবা গ্লাসগোদা दिशा महमायमियोदयायः ॥ १॥ আসামঙ্গল गमतमिहामनमुग्मोमम्। म मुभवामानमनीय दी गएपन में नम्योरये कानांगवितो - बंगाप्रतीगीर भुतं नाश्री। महार गांववादाना जात्रामाटिनम

अएमः
গ্রিনপিসীতাপমা
प्रमादिनमोनिमामागताः ।
आर्यिमायालमपयन प्रमा--
पगुनावी परिणारिकाय t
গা বাঘ নিয়া
मृपामांगामि हिमामयः।
गयाममाया नटीयविधि
भंगगनय प....
अजमानांनुभाथा
यं जमानामा गंद।
निपदगं ग.
विधारणा पर ..r
नपेय नं परमण
पारीन गाणी गा|
वितीयarm
गावापा I...
गगामामaur
मनापमोगा।
सननियाnthroom
This
भापतिसमान
ममतामागवITTER
परिदाप गापामा
प्रसारमायापार ए...।

२४८
श्रीपाश्यनाथचरितम्।
ततस्तृतीये जरयापहास्ये
विरक्तचेता पयसि क्षितीशः
सितातपत्र स्वसुताय दरया
यनं तपस्थानरूचिः प्रतस्ये १००१
आनंदने नग योदयधाग्नि राज्य
माज्यं तुपारकरविंयमियोजगाम ।
दीर्घ करेषु विधी कुमुदानुकत्यं
किनुक्रमादपि दिशं न पर प्रदे। १०१
अधिकयिनमितायां तस्य संडेन भूमी
भिय यिनिपाता मर्यदिगम्यो नित्यों।
उपरि म परिरेभे पार्थिवेयरयुदासः
स्थितिमुपमधिगंतुं करायल्योपदाम्या || १००
তাকাব্বানীসাথিলথলথ
যিনিয়ষিবানসাথিকাৰ্যায়।
तारागुनसम्प्रवेशपयलाः कुर्य दिशा मयंदा
गीयांणायनमः गयुमुजे मूरिभियं भूपति:१०
इति श्रीपादिशदिलित श्रीजिनेभरवरित
সায়া ল্যানিন নাম
अरममा

नयमः सर्गः। पर्षपुण्यतिनिगिन- धायिका पिपुर गालिका गर्वमंगादनियनमनिम- धाम, पितामगिमाम" पुगनिमय मानिन । यापागनिनिधिपाय नगरपय नावामगनपतart निमशिनपिपाणप । গোয়ি tuRemin. merाणीमगारा বিমান বিশ্বাস । विपनागि सदसनामारण .. मार्गणाव या पिरिधागुणा एमाला । गरिधाम - KEKH rrutto e Tiene farerit Entertast श्रीपाश्र्धनाथचरितम्। संयमस्थिरपदमयर्तना सम्बरम्ययिलसद्रिभूनयः ॥ ६ ॥ कामनिग्रहनिराकुले मनो पोधयंत श्य भोगनिस्पृहाः। सर्वतः समनयन्यनागुणं सूचयंत य चांयरत्यजः ॥ ७॥ तीमयोगायनयना पाहाकर्मपदलोपमायहम्। दुर्यहमलमारपीयका- यमोपदिशरिम्रतः॥ ८॥ भूषिजन्माधि परी- রাংগাসনসবিয়স্কা। पागनिपिनिगाणा गान्- मारना या निर्णयः ॥ ॥ भूपतिर्गनिमगुरमुरागार नियंग्मानिनाम्। तत्पति गुरमनियमान- খ গনমিলীগ। शुखका माविलास मिथुनो। मलकामा कम्नुनिागिाडामग्रिम नयमीर मम पागंज friffarमाम् । মাদাগণনা मनमरिना मयमः। গৃথিসামি जमविथगिटायरमग। ना गनिज पाने मिःमतगमन गिलाम आतु या REATE THोगमा संगम भने Eि गेय गमातिमा माला 'नागमे ॥५॥ मागविहिन मोनापिharma निमोरमणि गांगत ) Yantin पागमा Infrinो नि । मnिing Tohrna Halfalfanा थाgularfarादि। whemam पापपारपाRin.se पmments feamfemmer पताx " REFRAM. vanaamera- Vanteer धीपार्श्वनाथचरितम्। पंधुरेय स पुनमनस्वनः संधिविप्रहविधी यिधिन्मते ॥ १९॥ द्रध्याकसमस्ययोजना युज्यने न जिन नित्ययेरमा । सामो हि सुयियेवयं:- न तेयातकरयनिर्णयः ॥ २०॥ तिते सुरयिमानमंभिमाः मलोकनिलये जिनालया। भध्यकमंशानियनयः माकुररमणियिगियानपः॥ २ पत्र न भगवहानता नि गामरविमानानपः। दीमा तिमयमंदोदरी-- मागिमागमविभूषणा २२॥ लनुलाममुद्रमंमयं সস খাসি। आदनिरिमन : म पनि तिम्॥२३॥ माननुनि मन प्रभू नाममालालमोरा ममंदिगदगी- मनहार निगमन 144 पर पगलिमा मानविatml Famiram नामांनिMIXI.

नयमः। पुण्यहा मोण्ययमहन् गाना गण्यगुणगशिष्य। भण्यात युधामाका- हुण्ययमनमा शानि रगुमगारण मानना मंगाएगा। मपियार गालामा प्रा ... मुंगगाriminili +Hary दिगमा । गिएपण सनाकापागाणा Her olmaym nimam milan Minfo गुण graft मगुपmain..!" HARITRARIupamaan mang name! विuTufenioan... नाप falmmam fes inrlaruto आरपाEिR पापा Intestant ATTrtRE are norther

धीपार्श्वनायचरितम्।
आदरादिकमलोकयन्पुरः
स्फारचारमुकुरोदरे वपुः ॥ ३२ ॥
इंद्रनीलरुचिरोमविस्तरे
मस्तके पलिनचयः क्वचित् ।
तेन संदशिरे निशामय-
स्यामिकास्पृश इवेंदुरदमयः ।। ३३ ।।
तन्नियद्धपलितांकुरं शिरः
प्रत्ययुध्यत स बुद्धिमत्प्रियः।
तत्क्षणे विदलिनं उरद्वयः
कालसर्पदशनांकुररिव ॥ ३४ ॥
इतोऽमन्यत जग शिरम्ययं
लग्न पय सितवाललीलया।
उल्लमन्मदपरिद्विलासिनी-
हासरंद्ररूचिबंधुपांडिमा ॥ ३५ ॥
मंच मां तरुणि भोगलालसे
तावदंत्यययसा विरुपकम् ।
यायदेव न जुगुप्सया त्वयि
स्मेरवास्यदनो वधूजनः ॥ ३६॥
यजयाहुमभिषिच्य म शिते
रक्षणाय तनयं ततो नृपः।
निर्जितप्रसवकामुकतो
राजिमियननिवाममयजत् ॥ ३७॥
निर्विमुच्य दलितस्पृहागुण-
प्रधिरंगवहिरंगमंडनम्।
आदद न निधिगुप्तिसंनिधी
योधगोचरतमोपहं तपः॥ ३८॥

পদঃ সঃ।
ধনিষেধ -
গানঃ গণিমালাম।
अन्याय गुग्षगुदभव या
গি বল বাবাঃ ।
ঘ। লিখি না
বাবা মিঃ।
গুলানি হিলা--
বি পিন না । ২০।
থবা
নিথর।
মঙ্গণ।
ভালবাসা
[লালমাখনল''
বখানা-
ঘল নিয়া ।।
আহি লা লা
windilariner
निधान
পালা ।
শাখাযথ।
লাগান।।।।
নায়াগালি
( (শ গা ধন্য ।
atramine alatt
সমৰ ।।
এখন কি
গলা *

धीपार्श्वनाथचरितम् । सिंधुकेलिकतये कदाचन व्योमयाहिनविमानपंक्तिमिः। तेन देवनियहेन गच्छना जंगमेव नगरी विनिर्ममे ॥ ५८॥ यारिधीतरसितो विभामुर- खीरतो जलविलामकेलये। व्योमनः म निरमन्तदेकदा यारियाह इच विद्युतावृतः ।। ५९.॥ अनुयंमदरनिमंमितं वासि मासि दशमे दददपुः। मोऽन्यभुन दिबिजेंडयभवं विशतिविमलीगदन्यताम् ॥ ६० ॥ तम्य यत्मग्महम्रविशति व्यंन्ययम्मृतिगता मृनाशिनः । मनिधानमगमहोदध- ग्त्यमाभयमागगयधिः॥ ६१ ॥ नत्र मत्यवगरे म लीलया येतेम्म हरियिष्टरं हो। धर्मतीथमपतारषिण- स्तन्य गंगादिय पधिमं परः ॥ १२ ॥ नधायदयधाय गंम्रमा- दामनारमादि मा गतम् । नं ननाम जयकार मालिपटनिविदाहिनांजलि १३॥ समयमाणमारमंगता गंजगार गलत मागिता

সহম ঃ।
*
সাস্যায়--
খাগ: { }
মাথিন থানা
মাথা।
কিথা
গিংস খায়।।
সাধারনা
স্যা হলো ।
* সগন্য on
পাস সাগ। }}।
ওয়াসা
লাখ গ (বিন।
যখন পার
সাগy ।।
# {18 শ্য
{ } শাল।
নাবিধ ( ২৫
খ গ : খ গণ । • ?
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श्रीपार्श्वनाथचरितम्। मुख्यसौरमसमीरसंगत- स्पंदितादरसरागपल्लया। निर्मलस्मितसुधानयोगमा स्पर्द्धते मधुयनथिया पधूः ॥ ७ ॥ पालिकातरलनेत्रयुग्मनि- पूननिर्मलमयूखलेसया। सिंधुयारकुमुमायसन- प्रपनामिय फगेति कर्णयोः। ७२ ॥ आलि पश्य मृगलोचनाकुची तारहारगिपपलेदिनी तकी कोस्नियंधुग्पृहत्तरंगिणी- यमपाकमिनायताविमौ ॥ ३॥ कोमलारनिग्रगोलकया पीलयोनमितटरटा। गुंवर्गकरनलरिवोमगाः बलिहंगशिशयो लिदाणी ॥ ७॥ माति नन्यधि नियाल मात्रमाग मनमुता। गायरानामाग्मुलगा लिममय मुलाजिम प्रणाम्मलिमनावममला बालगानिमा !ि विश्वनमनभ्यांगना निगा डानमा सामानहान- भारमाग गhi ཀ་ཏརཾ;, tiཆཀཾxt;ནf- འitirའདུགཾ བཀག i s, t ༢༔ ཀུནཀུ་ཀimན། ཀtrནrfreit t ན anijjzu ཀུན་ ནཱyiimixwjijin ! $ ནifatraiin]༣) Intri;ཀ ཀུirཀཨུཏྟཾ ན ནgritxttritiiའ rnia •tisdistrii།་ ། •ivང་འགའtitགནཀའ་ titantu |་nitn་་་་་་ sixnno/571 m{ a• tཀཟ{y!, , , injnqxaj༌དདit ༣ ! v"}nt, ffན •iriw• •lta |tti •tr༩ན •icན་{{༣༥ inatཀ»)15•ད་ ཀ་ཤཱ,!ཀད •q4vvfsics7 ཟ:43 wirv • f, a''། རྒྱ་ཆུtit: 3:2i +++༩ । भीरार्थनाथमरितम्। अंगुलीसपिलागपाना- लीलालारुपल्लीगणे । रागराममुरापास्यत्परा पंगमं युयनिमितानम् ॥ १५ ॥ किभर प्रधिनशुपंधु- प्रामगगागिगंगहाग्गा । नाभिकाये मतभूपे गुपया रगितलामालीनणा ॥५॥ नियमानुपिन शुरनगि निमिंतामरः । मपिगमागण मनभावपिशितारिशोऽगिला AM FIRMागि प्रासंगितामा निणनर्माणानि गुगे viratiforintTION अमितानिनमा- मनिममग । नमतामानित मितिमा Racha प्रारमा नियनि- भोपाmagarat भावामाना Afterriftin. -

লম, ব
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সাসি।
কাপাৰি
বলম্বিয়া ।
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বিগণ '৯২৫

श्रीनागमरिनम्।
आस्थानापनतारिमालिपिलसम्पादापिहाय में
गोताले न्योदयायः मिहागनार्धासिता।
तमोऽगयाग्जिनस्य भमे पुत्ररित्रलोकीपतिः
गा गानामा मागमभूय-प्रमोदभिषा II
ही श्रीपागजगमितानिने
गरिने
4.गिरिमाण

दामः गगः।
mstream
माहिपिपवित्रता
जामियागगनमागहम।
पान पिता pririd:
नियमान निरनिगा
अधियानि जगामी
FAMITRA HARATI
TARATीगगा
a frम।
Sirneaton (70117
पता I
AMITRA
milammaunk ।
RAMITIOn
ng aanlm.
पिन पrnlant
pia non faretru,
any ग.
paraman
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धीपायंगायचरितम् । उपनतमुरामुप्रसन्नधि निमितमर्यरजः कणानुबंधम् । जिनयरजनने जगरसमस्तं क्षणमिय मुक्तमभूदमुतरागम् ॥७॥ नयारिमलमारभायट - भमदलिमेचकिताग्मरणयामार। अपिरलपहला गुरदुमाणां नपतिग्रो निषपात पुषधिः ॥८॥ সব থ মাথল্লির त्रिभुवन जीयनिकापनित्यधोः । भुतिपयशुगमरम्पती गगनतले गा मागगर्ग।.॥ जिनाननमये या प्रगादाता महामों। সাগদান মস निदियनिनानिmann.॥ गणितमादमागन- भनिदिनानिमारा। अमरनरिमामय नमितगममा वा ॥ अनिमिनर्माणमाणाभिमा- দ্বিখণিলায়। ममममधगम्य द्वारमणमामला rain femmeमोमिनमामा শানি?।

१६३ गमःमगा। प्रवियपमधामप्रभाव गंगगोशालाiment प्रथिनाम: पग- पुरनुमानिमगिधोगिग। मधुमिप पिमिरची बिपिfait. TRatha मातापिmarh | rammar गुनगुनियाnt I.. रागिना FREEffभानामा amratafajin- राणागिरjangali दीन on Ramriterinte। मनारयार mumtayaram IN. #furrrgdistinx ran Mantyercा ANTantrimalik Ansamanarter ... पारीका पिपर मyिmn Twi raftware....

fromitrint AT THE FRHITTITE THATru stfuTETTE farmiltini Hitrnati- MinuTEEL PORTA५॥ wrAmirmity Treभिः । Humitra int.LTD२२॥ गिनिये:गा गनगुगिपा ममामान । म्नुतिमुपगमुगयुन गुणा मनितगृह ग कामिनिष्णुः ॥२३॥ मददगणपन्दामा এtঘনাবি मुटु मदनमणाम्। जिनयषि विदो जमा न लेंभे यहरयामभृति प्रमोदमिः ॥२४॥ प्रतिनयनयनामिरम्यदीनि वहलनमालयि यहरिजनंदम् । म दिनरुदयादितुल्यलील: कुलिशधरः प्रतिमंदरं प्रतस्थे ॥ २५॥ प्रविसरदमृतीबिंदुसन्ध-- स्फुटजडिमासनमेमगंधाधुः।

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१७. धीपायनायचरितम्। अविरलप्रपलानपत्र- विदशपयः स दियोकमांप्रमाहः। म्ययमिय जिनदेयमानार्थ गिरिशिखरं प्रथयो पय पयोधेः॥ ३३ ॥ प्रतिफलितनिलिंपरिकोला- हलजयकारहंदरीमुखौधः । সিম্বিলালগালি- भुवनगुनियनं खलु व्ययत्त ॥ ३४॥ पृथुमणिमयपांडुकंवलाय- प्रपिनशिलास्थितरतमिहपीठम् । जिनपतिमधिरोप्य देवराज- सपनविधावधिकोस्थमभ्ययुनः॥ ३५॥ अमृतमुपनिनीपयो नगैद्रा- दमृतभुजः सविलासमासमुद्रात् । अबिरलगतयो नभस्यभूवन् दृढतरसेतुबंधतुत्यलीलाम् ॥ ३६ ॥ किमगमदमृतार्णवस्स्थमा दिविजगिरि दिविजस्तोपनिन्ये । अविदितमिति केवलं लुलोके नमसि पहनमलस्तु दुग्धराशिः ।। ३७ ॥ प्रविकचकुमुदरिवोद्वमासे पयमि तरत्तरलैस्तु तारकाधैः। तदुभयतरवृत्तिमित्तिस्तु लेमे प्रविततशीकरभूरिविभ्रमधीः ॥ ३८॥ पहुयहुमुखयाहुलीदपूरैः कनकदैः स वृषाकपिविरेजे।

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श्रीगायनायवरितम् । अतिगुरुगुणजनभनिगी भृशमभृतः सपनोइकायगाना। अघिलजललाम्बकोला-- हलयधिगनु दिशातदेय प्रः ॥४॥ गिरियरममिनिय देपमेयं विषयपतिः सपहरलप्रमोदः । जिनगुणमणिगंधयंगेयं भुपनगुरोः म पुगेऽमरो नननं ॥४॥ अगणिनयुजिग्दिीघंशा मरममताम:। गटागमनानगंदनी कुािरतीय का...॥ अनविजांगनाममात्र- कमगागंगगुहामुग्णप्रणायाम्। नानिमिपाल -- सिमरियागMum... শিগৰিবিশ্বাস বা महिलामiatriti मुलाना तुश्मिनुmusicn.ek जगनि मनrrar मिशन *7 *7 fantafim. गिनिगम AA गममraftriax. गारमोनियम |

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श्रीपानारचरितम् । जिनाम्जनकप्रमोदहेतो- महिमपरं दियिताः पुनयिंधाय । मनजिननमना दियं प्रजाम- मंमिगारन्यायमगीनाशाः ॥ ५॥ प्रतिदिनममगेपनीतभोगा- সমাসঃ মম সস। कपिपरियारश थालयं नानुभया ययगा गमुद्रभूः ॥१०॥ हिमागुनम गुजोगमारं পৃথিনংস। नायिaram- तमाम प्रकारच्यम् ॥ ११ ॥ अनिगिनधिो मधि- गागलपमेजले मलागीदम । प्रगाममोनं মুখমস মায়াবি । Tufगतिमिर्मभिध महामरिक्ष मेन परमेश्वो कानमनminपियम... समसामान मगि गर्न माग निमित माग fromfrमा TTTTTY «ftra मुनिशाना orat

नियमाप्रमध्यनि-
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यमपदधीमाईम गयारम !
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मिजरिषुधेवगमगुपमएम.
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१७६
श्रीपार्श्वनाथचरितम् ।
क्षणदर्शनपूर्वमालिताक्षी
स्मरवियशा तु तमेव भावयिन्या ।
अपस्तमपुनर्विलोकयंती
निजमतिमेव निनिंद कापि मुग्धा ॥७२॥
तदनु गहदर्यच माघशृंगे
विषमतले पदसंधिमादधाना।
इत दृतिभयचोदिता मसीभिः
कथमपि काचन चेतनां प्रपेदे ।। ७३॥
विकसितवदनायुजा वराच्छ-
स्फटिकगृहम्य शिरोगताननांगी।
कुचनपरिभाव्यलेख्यपना
नभसि गता नलिनीव निर्वभाप ॥ ७४॥
निजगृहगुहम्थिता गवाक्षा-
गननृपनंदनदर्शनोन्कष्टिः।
रतिरमदयतानुगेधर्मका
नका
मर्याय बुध्यनेस्स ॥ ७५॥

मामः। प्रमिरियमममायुधमदायो- रिनितिगाद गिगारिमेशराम ॥ मदग्विाह बमाला प्रतिनिपिनाराम। ননসিলগালা iminimum अHaitiani गुपगुनगंग infrinला । पानापानी ATTARAunilian निमग पपRIRam पnिtritm- Trenaram I.।। बरया HTaluraft nfirman Pा गqि Haintiment : met U MIAKA HII मगrima रूपमmuiry arerana..। मनमPATNA WRITERyan learntam f**ntferter trum माReirt - श्रीपाश्वनाथचरितम्। प्रणिहितमनसो गुरुस्तवेपु व्ययितनमो मुजगो विपत्तिकाले। अपि लघुगणनेषु देवदेयो न हि कुरते स रुती कदाप्ययनाम् ॥५॥ परिगतदहनं व्युदस्य देई मुजगपतिर्मवने यमूच देयः । समजनि मुजगी च तस्य देवी- पदलन्कोमलनीलनीरजाही। ८६ ॥ पद्मावती च धरणय कृतोपकारं तत्कालजातमधि प्रणिधाय युद्धा आननमीलिरुचिरछपिचर्चितांनि- मानचंतुः सुरतरुममयजिनेंद्रम् ॥८॥ सामाधाम धाजिनघमादपि याम: कापक्लेशादायुरपाये म तपस्यी। देयो जातः हातिमयामीदपि नामा भूनानंदो मुयनदेयेप्यमुरेषु ॥४८॥ श्रीमानूर्षितशामनो जिनपिमुः श्रीवारणम्यां पसन् तत्तवासितमभ्यम्नुविमरत् मागययोपपुतिः। नागेंद्राघुरनीत निन्यायिलमदोगोपमोगायदो देषः मप्रजयोधकारमुगां पित्रोम्म नेत्रोरमयम् ॥ ८॥ इस धीमादिगमरिधिषित श्रीकाग्निपावर महाकाय कुमारचरितण्यापर्णनं नाम दाम मग ।

एकादशः मर्गः ।
भारपायधम्या कम्या मधे महाभृन ।
वाराणमीमुनीम जिगी
विधारमंगलाचर विभ्यान मारे।
कुमाriनि.मागायनामापामग्री
विमानन कि नाम ।
घालामायामाग
विग्यमापदण्वानंदन थारमः
भीगाणि पातुभिानो बानपा १
आमिगत पिपया।
सधवा मनपा पागाणाgfmaitun
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मामायिनो गोगामशिन TARA
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आता परालोसपा ..
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धीपाश्र्वनाथचरितम्। अदूरक्षेमदा नूनं प्राप्य मार्गमनगलम् । प्रत्यावर्तितको नाम प्रयुद्धः शुद्धदर्शनः ॥ १२॥ दोपहराया यदि साज्यो विषयस्तहेण किं!। प्रक्षालनादि पंकम्प दूरादस्पर्शनं परम् ॥ १३ ॥ पित्र निवेदयन्नेयमिदमेय तदागतः । देवलोकांनिम्चेि दियःप्रणनमी लिमिः ॥१४॥ प्रमीद मदनाराते प्रमीद मानदीधिते । प्रसीद जगदीशान प्रमीद परमेश्वर ॥१५॥ आजयंजवनिवेदम्तय मार्योदपादियः। उत्तरक्रियया देय शतायः क्रियतामयम् ॥१६॥ अयारपारिलायंमं ध्यानोदयगताते। जानभानोम्नानुन्य भयलोका प्रतीक्षने॥१७॥ मुनियमनिबंधाना मंति दुनंयतस्कराः । धेयरी जगतां पु स्याप्रमायः प्रभाम्यताम् ॥१८॥ नाग्मत्याहम्म देय मप्र प्रनियमम् । परामभृतत्रस्य यंधुनयानगुना ॥१॥ अपना तनी देयं जगदेयमहर्षयः । नदमिमायणेधार्थप्रमोदोमयागः ॥ २० ॥ नुगमा पुगे धावतानु विदिशाधिः। धारणागिमुरामगगनोग्रामोधिना ॥२॥ दिलंय ममयं हारे वागारिकनिदिना। महतो रसमयी लगामारयतांना याद में मामला OTHER भनुम भR अमन च ।

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मायभूमिभूनां मांय मापयशिनम्।
গলাম মাসদমামা ? ?
সাপ্লসিসাম্যমণি।
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বিগাথদনানয়ন্স্যশ্যামঃ।
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পাখানাগালাপি ।
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খোলা মামা।
মাহমময়। ৮৬
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শাপলা: গাফফথ ।
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মাঝখৰখা গwwণা * *
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শশাস ? । । ।
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धीपार्श्वनाथचरितम्। आरटभ्रमराष्टिरपतत्कौसुमी दियः । तत्स्वयंवरमालेव निर्मुक्ता निर्वृतिथिया ॥ ३५॥ विचित्रमणिनिष्प्यूनगचिमचरितांयरा। शिपिकाचामरम्यानातुपतस्थे तमीश्वरम् ॥ ३ ॥ अयहाभयनीपालाः तया तं पदमाकम् । परं क्रमेण गीयांणाः कर्मारियिनयरिणाम् ॥ ३७॥ विपोगेन जगहालोयिंभयनगरं पर। शोकांधतमसं नं मंकुचन्मुसरंकजम् ॥ ३८॥ आगमाद गवानंदि पुरंदरपुरस्टतः। म्येण्यभोगयिकगानापश्यत्ययनमीभ्यरः ॥ ३९॥ हस्तप्रतिप्यालसेनाकलकलो। अरित्या प्रामुप सत्र मटिकोपलमंडल ॥ ५० ॥ पांजलिमाण मानमः गिरम्य इत्यलम् । निः पुनशान गंगामिपिभिः ॥ १ ॥ तयागशिमादाय मयया भाग्यान्धिी। निराधी गोपि पम्राम नानापि मगंद्रमाः ॥ ४२ ॥ नेता निमगरव्यानि मुननायकयामी। मौतुन मुलगा प्रतिमायाan मरमानविय शानंतात मनायनामानि प्रश्न मारमाप्रमो. सिमान देवः रामरणिः । पारत्रादिवर्गमा गुरुमममम. गा प्रमोगला पनि प्रगतमामशशिनानsatara.

एकादशःमर्गः। मंविधानं पुनः गुग पाय नाम प्रति यथाविधि। प्रथयिना पाचा प्रोग्राम पृथिोपनिम ॥४॥ इलाम्बपपिगमयसमाग्यानिपिः। नापुगेगनयनित्यं रएया प्रामाणि यामया ॥ ५ ॥ गगनयोपिया नावहायमहिमाम किंग भुनाये गुनायेऽपि था. अनुगम्य सामान नियन्य घनदाया। अहमहीशिवदाधिमाधर्मपंगाम .... पापनेपने पिय पदागिनोनिषित। पनिमायोगमायाय नाभीयाrafmmen.१ ॥ चीनप्रमाविन नाम। भमरणविमातीनi filmनागिन ॥ गोगिमो धर्मानमा शिwिs मापन नियमाimmoant raghe firainRITUTI थाहात गोडfaftaalaatkare Rint भएमारंपतानाmukta-fah | पानीashan. faranारनाul । अधाmnirmfarmiliatitent . WITMENminsfer परhatarnt t... मोमिनार meen गनिमा मामीwne. .. । - भागनागितम्। Frमानप्रति हेतुं शिपिगियाम् । नगदेशकोण ग ५. रोगिता पाना मानमोगा। Tom TnETTTTRan अपोलिसrial। कोपराधिय गरलानाम् ॥५ লাস সে পথ। नागदा नगेनिस यः ॥ ९॥ fair FAAAधिनम् । अलमा नानिmm TRA गिरण Tritan 11.37st for air forintot आHTTAITIranian५॥ गरमाग fifts raliasmitaafirinfrint finh गगा। FirffHATARI. rfe.nirnamgirafire | मानgnmentin मामा ATTAITIRata Barnahru infrasforry! frrawan sing Time inferetun ।

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श्रीपार्श्वनाथचरितम्। फणामणिशिलाघाताचूर्णितो जलदद्रयः। पनिरे भुजगेंद्रस्य यासधूमोनमश्रियम् ॥ ३ ॥ एकत्यस्तिकंयीचारभ्यानयद्विप्रभावतः । पातिकमयनं समदोपविजिगीपणा ॥४॥ आवियंभूय देयस्य तत्क्षणादेय केवलम् । पर ज्योतिरनाभासं संयंतो मासनझमम् ॥ ८॥ ततः प्रयोग जयकारतूर्य- दियांकमा उल्लसितं समंतात् । निशम्य निर्मुच्य तु नदेय पभूग शमय कांदिशीकः ॥ ८॥ अनन्यशग्णाना प्रभुगुपस्य पांगले- जिन जगतांगने जय जयामिति मार। मनाम मुरोलमरमणिमिलिग- अपंग जगत्रयगुरु रिपुपिपुलवोधनामीनिधिम् । देयाः मयंयनुनिकायातयामुष गती সমিযম শাখা। ओरोमागगनगनुभूतांना प्रविण -- লল নগৰাণসপালগঞ্জ धारितitin mit मायनशान प्राम

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१८८ श्रीराधनायचग्निम् । या यभयुरमुरेंदभुतप्रभाय- मोगादिनादिकधावियरोपमेयाः ॥ ६॥ म्नः पयोधपथस्फरिका ग यशाः कटानकोटिदलिननमभ्राताः। माययपुपो नितरामभया माग गर्ने म्पटनकालियायिय: Un মানমণিমালাস্কা म्भ गशिरारम्तिहमपश्याः । नयभिम जयोतिसंगितामा दयण नननिमानाजांगिडुंगाम् Hen नपग्निमनिता निषिणमा আপসোনিনা। गादामिनीगुणदताकदिनोरम पीलांशुनिलकालयातार माना। अंविनाकादायनि- रामममिय: दिपाः primeiropinigining गापितो.104 माय मानिगरमा- Firmirarमरया। पनि प्रायमरमार मागिता निर... Hriyarai प्राणायारामः। raniमा- पसरला

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- धीपार्श्वनाथचरितम्। शृंगेषु यम्य गुणतुंगतया प्रमिद्धा सिदिगता गरजस्ता जिनंदः॥ ४॥ आमंदसुंदुभिरयमतिसदभूम- रुद्वामगहरमुलस्म घरापरेंदः। तम्यानिचारमसहाय सर्पमतः शको मनुगशिखरोल्लसिताऽम्रा मारोपकंठायेलमामगिगाटे तरकुंभनिभनिधिभिनदेयम् । मिदं पयरयरगियोपतम्य मयोगिनं प्रनि नयागुपुषष्टिः॥४॥ तत्रागात्य पदमः म्ययमेव यो मागेन योगमपमुष्य गमोनमिकः । गुवक पर पातक्रियममानि पानं निधानमिय विगहे पहार॥४ কাণঘানি সাধাগী বানান। তারা। दानाविधिना गममाणुग.. प्रामादिबंधानधनमा निना...॥ निमिंग कमेनिगमाय निगममा परमरोहता স্নান সেরোগ- निगममा निश मगेल गति- nirirमनोगतमानमांग। rimai ir rífa'nffitt माया पनि

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श्रीपार्थनायचरितम् ।
शृंगेषु यम्य गुणतुंगतया प्रसिद्धा
मिद्धि गता गनरजस्कन जिनेंद्रः ॥ ४॥
आमंद्रदुंदुभिरवप्रतिशब्दभूम--
रुद्वामगहरमुखस्म घराघरदः।
तम्यातिचारमसहानव समर्नुः
राको सनुगशिखगोल्लखितोऽनकरः ४६ ॥
द्वारोपकंठायलमन्मणिशृंगटे
तत्कुंभनिर्मतिविभितदेवस्य ।
सिद्धेः स्वयंवरयरनगिोपनम्थे
संयोगिनं प्रति नवामुरपुष्पवृष्टिः ॥ ४॥
तत्राममृत्य समः स्वयमेव दृश्यो
मासेन योगमयमुच्य ममोमिच्छुः ।
गुल्कं परं ब्युपरतक्रियमप्रपाति
ध्यानं निधानमिव चित्तगृहे चकार ॥४॥
पचाक्षर्गममयवर्तिनि तत्त्वदीमो
ध्यानानले म यलयत्यखिलावलोकी।
उदातकर्मविधिना मममायुपा म--
नामादिबंधगर्मिधनतां निनाय ॥ ४२ ॥
निभिद्य कर्मनिगलं मकलं नदेय
निहुंन्य दुःपममतं पदमम्परोहत् ।
आसैदिरे च करयारिजकुमलाघ-
रंतशा नियमिनां निदलप्रदेशाः ॥ ५० ॥
देवनदेव समुपेत्य चतुन्निकार्य-
रानंदमंदरमनोगतमनिमारः।
तस्यांतिमां जिनरवेविधिविद्भिरिग्या
प्राग्या म्ययं विजयराज्यगायन ॥ ५॥

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श्रीपार्श्वनाथचरितम्। निस्संगसारकथयेय मुखं प्रयच्छन् भव्यान् कृतार्थसि दिव्यानिकामसेभ्यः ॥ ५० त्वामव्ययं सकलयत्सल समभावं चित्ते करोमि यरमंत्रपदस्तबीमि। क्लेशार्णयप्रमवदुःमहदुःखपंकात् मामुदरिष्यति हि धर्मविनोद पपः ॥ ५९॥ आस्थां गुणस्तवाती तय देव दक्षा श्रेयो लभंत यतिकांतगुणार्णवस्य । शुभ्यं नमोस्तु वरदेव प्रवक्तुकामाः सम्यक्त्वतुंगमहिमानमुपाश्रयति ॥ ६०॥ स्वाधीनशेधमनिमलदर्पणांत- विवागतत्रिविधकालजगत्रयाय मन्यांवुजाकरवियोधनतत्पराय श्रीपार्श्वनाथभगवन् भवते नमोऽस्तु ॥ ६१ त्रिभुवनगुरुमेवं सिद्धिलक्ष्मीसमेत त्रिभुवनशिखरधीसाधशृंगाधिरुदम् । सविनयममिनुत्य स्वर्गिणामप्रगण्या निजपदममिजग्मुस्तिग्मरश्मिप्रकाशम् ॥ ६२॥ श्रीनिर्याणनयादयादिशिखरमव्यक्तयोधस्तुति- स्वगी ग्रामहरोपि नीनविनयप्राहामपुण्यांजलिः । भय्यांभोजयिकाभयकरी देयारस यः श्रेयसि देवो दीर्घमुपतिमो जिनरपिः कैपस्यसिद्धिःश्रियम् ॥६॥ इति श्रीया दिराममरिविरचिते श्रीपाश्रनायजिनेवरचरिते महाकाव्ये भगयन्नियांणगमनं नाम द्वादशः सर्गः।

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१९८ श्रीपार्श्वनाथचरितम् । निप्पन्नोऽयं नवरससुधास्यंदर्मिघुप्रयंधो जीयादुधैर्जिनपतिमवप्रक्रमकांनपुण्यः ॥ ६ ॥ अन्यश्रीजिनदेवजन्मविभवव्यावर्णनाहारिणः श्रोता यः प्रसरत्प्रमोदमुभगो व्याख्यानकारी च य । सोऽयं मुकियधूनिसर्गसुभगो जायेत कि चैकश- स्सर्गात्तेऽप्युपयाति वाङ्मयलसलक्ष्मीपदश्रीपदम्।। इति प्रशस्तिः। Descoccasveer समातमिदं पार्श्वनाथचरितम् । COGOGod

Shree Parsavnath Chritam

Author
Shree Manoharlal
Title
Shree Parsavnath Chritam
File name
Shree Parsavnath Chritam
Text
OCR done
Citation
1936
Published
2011/07
Publisher
Mumbay,nirnaya Press
Language
Sanskrit
Pages
189
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
DLI number
312239
Barcode
99999990311011.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
zV4slIpr7oH
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