Sanmati Library, Jaipur
Anubhava Prakash
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SANVATI
SHRI
LIBRART
श्री सामति पुकालय
JAILOG
अनुभवप्रकाश.
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शा ॥ ॐ नमः सिद्धेभ्यः ॥ अनुभवप्रकाश. टान्त दोहा--गुण अनन्तमय परमपद । श्रीजिनवर भगवान् ॥' ज्ञेय लक्ष्य है ज्ञानमें । अचल सदा निजस्थान ॥ १॥ परमदेवाधिदेव परमात्मा परमेश्वर परमपूज्य अमल अनुपम आनन्दमय अख- ण्डित भगवान् निर्वाणनाथकों नमस्कार करि अनुभवप्रकाश ग्रन्थ करों हों, जिनके प्रसादत पदार्थका स्वरूप जानि निज आनन्द उपजै ॥ प्रथम यह लोक षड्व्यका बन्या है । तामैं पञ्चद्रव्यसौं भिन्न सहजस्वभाव सच्चिदानन्दाद्यनन्तगुणमय चिदानन्द है । अनादिकर्मसँयोगते अनावशुद्ध होय रह्या है । तातै परपदमैं आपा मानि परभाव कीये । तातै जन्मादि दुःख सहे है । ऐसी दुःखपरिपाटी अपनी अशुद्धचिन्तवन पाई है । जो अपने स्वरूपकी संभार करै तो एकछिनमें सब दुःख विलय जाय । जैसा कदु ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान २ ॥ सासंता आनन्दमय परमपद है, ताकौ पावै, ताकी संभारके करतही स्वरूपप्राप्ति होय है, यह उपाय दिखाइये है। येही परिणाम उलटि परमैं आपा मानि स्वरूपका विस्मरण करि रह्या है। येही परिणाम सुलटि स्वरूपकौं आपा मांनि परविस्मरण करै, तो मुक्ति- कामिनीका कन्थ होवे॥ ऐसे परिणाममें कबु कलेश तो नहीं । ये परिणाम कौन करै ? ताका समाधान, अनादि अविद्यामैं पडा है । मोहकी गांठि निवड पडी है । आत्मा परका एकत्लसन्धाने होय रहा है । जैसे कोई पुरुष अफीमके अमलको चढ्या है, वह दुःख पावै है, परि छुटि न सकै, काहेरौं बहुत चब्या? छूटे सुख है, कलेश नाही, परि वाइडि आवै सो लेही ले । तैसें पर मो वध्या है, छूटे सुख है, परि न छूटे है, अनादिसँयोग छूटते सुख है, परि झूठेही दुःख माने है। याके मेटवेको प्रज्ञाछैनी आत्मपरके एकत्वसन्धानमें डारे, चेतना अंश अपना जाने, जामें जडप्रवेश नांही । कैसे जाने? सो कहिये है ।।
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ३॥ यह परमैं आपा जाने है, सो यह ज्ञानी निज बानिगी है । इस निजज्ञानवा- निगीको बहुत संत पिछानि पिछानि अजर अमर भये, सो कहनेमात्रही न ल्यावै, चित्तको चेतनामें लीन करै, स्वरूप अनुभवका विलास सुखनिवास है, ताकौं करै । सो कैसे करे सो कहिये हैं। निरन्तर अपने स्वरूपकी भावनामैं मग्न रहै, दर्शनज्ञानचेतनाका प्रकाश उप- योगद्वारमैं दृढ भावै । चित्परिणतिते स्वरूप रस होय है । द्रव्य गुण पर्यायका यथार्थ अनुभवना अनुभव है। अनुभवतै पञ्च परमगुरु भये होहिंगे। सो प्रसाद अनुभवका है । अनुभव आचरणकौं अरिहंत सिद्ध सेव हैं। अनुभवमैं अनन्तगुणके सकल रस आवै है सो कहिये हैं । ज्ञानका प्रकट प्रकाश अनन्तगुणकौं जानै । ज्ञान विशेषगुणकौं परिणति परणवै, वेदै, आस्वाद करै । तहां अनुपम आनन्द फल निपजै ऐसेंही दरसनकों परिणति ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ४ ॥ परणवै, वेदै, आस्वाद करै सुखफल निपजै । याही रीति सब गुणकों परणवै, वेदै, आस्वादै आनन्द अनन्त अखण्डित अनुपमरस लीये उपजै । तातें सब गुणका रस परिणतिके द्वार अनुभव करवैमैं आया । ऐसेंही द्रव्यकों परणवै, वेदै, आस्वादै, आनन्द पावै । तब परिणतिदारि द्रव्य अनुभव भया । अनुभवका रस गुणपरिणति एकरस भये होय है। वस्तुका स्वरूप है । सो गुण चेतनाका सक्षेपमात्र वर्णन कीजिये है। सकलगुणमैं ज्ञान प्रधान है । काहेत? ज्ञान विशेष चेतना है। ज्ञान सबका ज्ञाता है । सूक्ष्म न होता तौ इन्द्रियग्राह्य होता। तारौं सूक्ष्मकरि ज्ञानकी सिद्धि सत्ता- गुणविना सूक्ष्म सासता न होता । वीर्यगुणविना सत्ताकी निष्पत्तिसामर्थ्य कहां पाईये ?। अगुरुलघुविना वीर्य हलका भारी भये जडताको धरता । प्रमेयगुणविना अगुरुलघुका प्रमाण कहां पाईये ? अप्रमाण भये कौन मानता ? वस्तुत्वविना प्रमाण किसका कहिये?
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ५ ॥ अस्तित्वविना वस्तुत्व किसके आधार कहिये? प्रदेशत्वविना अस्तित्व किसका निरू- पिये ? प्रभुत्वविना प्रदेशप्रभुता कहांत रहती ? विभुत्वविना प्रभुत्व सवमैं कैसै व्यापता? जीवत्वविना विभुत्व अजीव होता, चेतनाविना जीवत्व कहां वर्तता? ज्ञानविना चेत- नका विशेष जान्या न परता, दर्शनविना सामान्यविशेषज्ञान न रहता, सर्वज्ञताविना दर्शन कौन जानता? सर्वदर्शित्वविना ज्ञान कौन देखता? चारित्रचेतनाविना दर्श- नज्ञानकी थिरता कहां रहती? परिणामात्मकत्वविना चिदचिद्विलास कहांत करता? अकारणकार्यत्वविना परकार्य भये, निजकार्यको अभाव होता। असंकुचितत्वविना अविनाशी चेतनाविलास संकोच न आवता । त्यागोपादानशून्यत्वविना यहणत्याग लग्या रहता । अकर्तृत्वविना कर्मका कर्ता होता । अभोक्तृत्वविना परभाव भोगवता। असाधारणविना चेतनाचेतनका भेद न परता । साधारणविना कोई पदारथ सत् होता, कोई असत् होता । तत्वविना वस्तु स्वरूप न धरता । अतत्त्वविना परका तत्व ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ६॥ आवता। भावविना स्वभावका अभाव होता । भाव भावविना अतीतका भाव अना- गतमें न रहता | भावाभावविना परिणमन समयमात्र न संभवता । अभावभावविना अनागत परिणमन न आवता । अभावविना कर्मका सद्भाव जान्या परता। सर्वथा अभाव अभावविना अतीतमैं कर्म अभाव था, सो अनागत अभावमैं ऐसा न होता । कर्ताविना निजकर्मका कर्ता न होता। कविना स्वभावकर्मका अभाव होता। कर- णविना परिणमनकरि स्वरूपका साधन था सो न होता । सम्प्रदानविना परिणति- स्वरूपमें आप समर्पण न करता। अपादानविना आपते आपकरि आप न होता । अधिकरणविना सबका आधार न होता। स्वयंसिद्धविना पराधीनता आवती। अज- विना उपजता । अखण्डविना खण्डितता पावता । विमलविना मल होता । एकविना अनेक होता । अनेकविना गुण अनेकका अभाव होता। नित्यविना अनित्य होता। अनित्यविना षड्गुणी वृद्धिहानि न होय । जब अर्थक्रियाकारकस्वभावकी सिद्धि न ।। अनुभवप्रकाश ॥ पान ७॥ होय । भेदविना अभेद द्रव्य गुण होय । अभेदविना एक वस्तु न होय । अस्तिविना नास्ति होय । नास्तिविना परकी अस्तिता होय । साकारविना निजाकृति न होय । निराकारविना पराकार धरि विनाश पावै । अचलस्वभावविना चल होय । ऊर्ध्वगमन- स्वभावविना उच्चपद न जान्यौ परै । इत्यादि अनंत विशेपण ज्ञानी अनुभव करै। सो निजजानि कैसे होय? सो कहिये हैं ।। प्रथम अनादि परमैं अहं ममरूप मिथ्याका नाश करै। पीछै पररागरूप भाव विध्वंस करै। जब परराग मिटै तब वीतराग होय । परप्रवेशका अभावभाव भया, तब स्वसंवेदरूप निजजानि होय । अथवा अपने द्रव्य गुण पर्यायका विचार करि निजपद जानै । अथवा उपयोगमैं जानरूप वस्तुकौं जानै । अनन्तमहिमाभण्डार सार अवि- कार अपारशक्तिमण्डित मेरा स्वरूप ऐसा भाव प्रतीतिकार करै । ध्यान धरै निश्चल होय यह जांनि जाने । निजरूपजानहीकों अनुपपदका सर्वस्व जानै । इस स्वरूपकी ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ८ ॥ जानिविना परकी मानिकरि संसारी दुःखी भये । सो परकी मानि कैसे मिटैं? सों कहिये हैं। भेदज्ञानतें परनिजका अंश अंश न्यारा न्यारा जानै । में उपयोगी, मेरा उप- योगत्व अन्य गाव हैं। मै देखौं जानौं हौं । यह निश्चय ठीक कीये आनन्द बढे । परपरिणति मेरी करी है। न करौं तौ न होय मानि, मेरी परमैं मै करी मानि, अब मै निजमैं मानौं, तौ मानतप्रमाणही मुक्ति” याही सगाई अवश्य वर होंगा। करमके भरमका विनाश निजसरम पाये होय है । सो निजसरम कैसे पाईये ? सो कहिये हैं । मेरा अनन्तसुख मेरे उपयोगमें है। सो मेरा उपयोग तौ सदा में धरौं हों। मै उपयोगको भूलि अनुपयोगीमें अनादि रत भया सुखस्थानक चेतना उपयोग भूल्या सुख कहांत होय? अब मै साक्षात् उपयोगप्रकाश ठावा (योग्यस्थान) कीया । काहेत? अहं नर ऐसी मानि, नरशरीर जड मैं तौ न होय, मेरे उपयोग” भई है।
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ९ ॥ । सो ऐसा मानिका करणहार मेरा उपयोग अशुद्धस्वांगही धरि बैग है। जैसे कोई एक नटवा वरदका स्वांग ल्याया है, पूछ है, आपा भूल्या है, मैं नरकी पर्याय कब पावौंगा? झूठेही पूछ है, नर ही है । भूलते यह रीति भई है । तैसैं चिदानन्द आपा भूल्या है, परमैं आपा जान्या है, अपनी आप भूलि मेटै, सदा उपयोग धारि आन- न्दरूप आप स्वयमेवही वन्या है । विनायत्नतें निजनिहार नाही कार्य है । निजश्रद्धा आये निज अवलोकन होय है । यह श्रद्धा काहेरौं होय है सो कहिये हैं। प्रथम सकललौकिकरीति” पराङ्मुख होय, निजविचारसन्मुख होय, कर्मकन्दराविर्षे छिप्या है चिदानन्द राजा । नोकर्म प्रथमगुफा, दूजी द्रव्यकर्मगुफा, तीजी भावकर्मगुफा प्रथम नोकर्मगुफामै परिणति पैठि कि, हमारा राजा देखै, तहां उसको कछु न दीसै, चक्रति होय रही, तब फिरिनै लगी, तब श्रीगुरुनैं कह्या कि, तूं कहा हूंढे है ? तब वह कहने लगी, मेरे राजाकौं देखौं हौं सो न पाया। तब श्रीगुरुनें कह्या तेरा राजा यहांही है, ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान १० ॥ मति फिरै यहांत । तीसरी गुफा है, तहां वसे है। हाथकी डोरी इस गुफातक आई है। सो यह डोरी उसके हाथकी हलाई हाले है । जो वह न होय तो डोरी आपसैं न हाले है। तातें विचारि इस शक्ति या डोरीकी अनसूत चली जाना। कर्ममें देखि इसकी क्रिया डोरीकों कौन हलावै है ? द्रव्यकर्मगुफा अंदरी प्रकृति प्रदेश स्थिति अनुभाग वाहीके निमित्ततें नाव पथ है। वाकी परिणति भई जैसी जैसी वर्गणा बंधी वहांभी उसकी वणाई सत्तासौं द्रव्यकर्म नाव उसके भावोंके निमित्त” नानाकर्मपुद्गलनैं नाव पाया। भावकर्मगुफामैं राग द्वेष मोहका प्रकाशमैं छिप्या स्वरूप रहे है । वह प्रकाश तेरे नाथका अशुद्ध स्वांग है। तामैं खोजि, भय मति करै । निःशंक जानि यह राग देष मोहकी डोरीके साथि जाइ खोजि, जिस प्रदेश” उठी सोही तेरा नाथ है । डोरीकों मति देखे । जिसके हाथमें डोरी तिसकौं लगि तुरात मिलैगा। अपनी ज्ञानमहिमाको छिपाय बैठा है। तू पिछानि । यह गुप्तज्ञान भया तौऊ नाथ छिप्या नहीं। चेतना- तू ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ११ ॥ प्रकाशरूप चिदानन्द राजा पाय सुख पावैगी। निजशर्मका उपाय कह्या । यह निजसुख तौ निजउपयोगमैं कह्या । दुर्लभ क्यों भया है? सो कहिये हैं। यह परिणामभूमिकामैं मोहमदिरा पीय अविवेक मल्ल उन्मत्त होय विवेक- मल्लकौं जीति जयथंभ रोपि गढा (खडा) भया है जोरावर । तातें आपकी सुखनि- धिका विलास न करणे दे। विवेकमल्लका जोरा भये अविवेक हण्या जाय । तव निज निधि विलसिये । पररुचि खोटा आहार सेवतें मिथ्याज्वर भई । 'तब विवेक निर्वल भया । तातें स्वआचार पारा श्रद्धा बूटीके पुटसौं सुधाया। ताका सेवन करै, तब विवेकमल्ल मिथ्याज्वर मेटि सबल होय अविवेककौं पछारै । तब आनन्द निधिका विलास होय । स्वआचार कहा ॥ श्रद्धा कैसे हो सो कहिये इस अनादिसंसारमैं परविचार अनादि कीया। मेरी ज्ञानचेतना अशुद्ध भई । अब स्वआचार पारा सेवन करिये तो, अविनाशी पद भेटियै । मैं कौन हौं ? मेरा ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान १२ ॥ स्वरूप कहा? कैसे पाइये? प्रथम पद अपनेका उपयोगका प्रकाश है। दर्शनज्ञान उपयोग चारित्र उपयोग । दर्शन देखता है, ज्ञान जानता है, चारित्र परिणामकरि आचरिता है। ऐसा ज्ञेयका देखना जानना आचरणा अनादि कीया अपने विशुद्ध- पदमैं उपयोग न दीया । अतींद्रियसुखके लाभविना रीता रह्या । अनन्ते तीर्थङ्कर भये तिनहूनें स्वरूप शुद्ध किया, अनन्तसुखी भये । अब मोकौभी ऐसे स्वरूप शुद्ध करना। मुनिवर जन निरंतर स्वरूपसेवन करे हैं । तातें अपना त्रैलोक्यपूज्य सबतें उच्च- पद अवलोकि कार्य करना है । कर्मघटामें मेरा स्वरूपसूर्य छिप्या है। कछु मेरा स्वरू- पसूर्यका प्रकाश कर्मघटाकरि हण्या न जाय । आवया है। वारैही वारै घटाका जोर है। मेरे स्वरूपकू हनि न सके । चेतनाते अचेतन न करि सके । मेरीही भूलि भई । स्वपद भूल्या । भूलि मेटि जवही मेरा स्वपद ज्यौंका त्यौं वण्या है ।।
॥ अनुभवप्रकाश ।। पान १३ ॥ जैसे कोई रत्नद्वीपका नर था। तहां रत्नके मंदिर थे । रत्नसमूहमैं रहै था । परख (कमरमें बांधनेका कटिसूत्र) न जान था। और देशमैं आया, कणगतीमैं हरिन्मणि लगी थी। एकदिन सरोवर रनानको गया । जौहरीने देख्या । हया पाणी इसकी मणिप्रभातें सरोवरका भया। तब उसपासि एक नग ले राजासमीप उस नरकों ले गया। कोडि मंदिर भरै एती दीनार दिवाई। तब ओ नर पिछताया। मेरा निधान मैं न पिछान्या । तैसैं अपना निधान आपसमीप है । पिछानतही सुखी होय है । मेरा आत्मा तातै ज्ञानका धारी चिदानन्द है । मेरा स्वरूप अनन्तचैतन्यशक्तिमण्डित अनन्तगुणमय है। मेरे उपयोगके आधीन वण्या है। मैं मेरे परिणाम उपयोग मेरे स्वरूपमैं धन्यौंगा । अनादिदुःख मेटौंगा। सुगमराह स्वरूप पावनेका है। दृष्टिगोचर करनाही दुर्लभ है । सो संतोनें सुगम कर दिया है । उनके प्रसादतें हमोनें पाया है ॥ सो हमारा अखण्डविलास सुखनिवास इस अनुभवप्रकाशमैं है । बचनगोचर नाही, ॥ अनुभवप्रकाग ॥ पान १४ ॥ भावनागम्य है । यह मेरा ज्योतिःस्वरूपका प्रकाश प्रगट इस घटमैं प्रकाशता है। छिप्या नही, गोप्य कैसा मानौं? छती वस्तुकौं अछती कैसे करौ ? छती अछती न होती है । पीछे झूठेही छतीकों अछती मानी थी। तिसका अनादि दुःख फल भया था । शरीरकों आपा कैसे मानिये ? यह तो रक्तवीर्यते भया सात धात जड विजातीय विनश्वर पर, सो मेरी चेतना यह नाही । ज्ञान वर्ण वर्गणा विजातीय स्वरूपकौं वर्ण अचेत बंधक विनश्वर रसविपाकहीन है, सो मेरी नाही। विभाव स्वभाव मलिन करै कर्मउदयतें भया, मेरा नाहीं । मेरा चेतनापद मैं पाया । ज्ञानलक्षणते लक्ष्य पिछानि स्वरूपश्रद्धा” आनन्दकन्दकी केलींकरि सुखी हौं । सो आनन्दकन्दकी केली स्वरूप- श्रद्धातें कैसे होय ? सो कहिये है ।। अनन्तचैतन्यचिन्हकों लिये अखण्डितरणका पुञ्ज पर्यायका धारी द्रव्य ज्ञानादिगुणपरिणति पर्यायअवस्थारूप वस्तुका निश्चय भया । ज्ञान जाननमात्र, दर्शन देखवेमात , सत्ता अस्तिमात्र, सो वीर्य वस्तुनिष्पन्न ॥ अनुभवप्रकाशः॥ पान १५ ॥ सामर्थ्यमात्र, केवल ऐसा प्रतीत्यभाव रुचिभावकी आस्तिक्यताश्रद्धान श्रद्धा कहिये । तिसत उपजी आनन्दकन्दमैं केलिकरि सुखी हौं । जान्या आनन्द ज्ञानानन्द, स्वरूप देखै आनन्द सो दर्शनानन्द, परिणया आनन्द चारित्रानन्द । ऐसें सब गुणानन्द, तिसका मूल निजस्वरूप आनन्दकन्द । तिसकी केलि स्वरूपमें परिणति रमावणी । तिसतें सुखसमूह भया है। और इसते ऊंचा उपाय नांही। भव्यनकों शिवराह सो. हली (सहज ) यह भगवंतनें बताई है। भगवन्तकी भावनातै सन्त महन्त भये। मैंभी याही भावनाका अवगाढ थंभ रोप्या है। सम्यग्दृष्टीकै ऐसां निरन्तर अभ्यास रहै ॥ कर्मअभावतें ज्ञान स्वरसमण्डित सुखका पुंज प्रगटै तब कृतकृत्य होय है । इस आतमका स्वरूप गोप्य हो रहा है। साक्षात् कैसे होय ? भावना परोक्षज्ञानकरि बढाई है । सो कैसे सिद्धि होय सो कहिये हैं। जैसे दीपकके पांच पडदे हैं। एक पडदा दुरि भये, झीणा वारीक उद्योत ।। अनुभवप्रकाश ॥ पान १६ ॥ भया । दूजा पडदा दूरि भया, तब चढता प्रकाश भया। तीजा गये चढता भया । चउथा गये अधिक चढना भया । ऐसें ज्ञानावरणके पांच पडदे हैं । मतिज्ञानावरण गये स्वरूपका मनन कीया ॥ अनादि परमनन था, सो मिट्या। अनन्तर ऐसी प्रतीति आई, जैसे कोई पुरुष दरिद्र है, करजको स्वौका है, उसकै चिन्तामणि है, तब काहू. कह्या, इस चिन्तामणिके प्रभावतें निधि विस्तरि रही है, कास्कौं फल दीया था, सो अब तुमहु निधितौ ल्यो । साक्षात्कार भये सब फल पावहुगे । प्रतीतिमें चिंतामणि पायेकासा हर्ष भया है। ऐसे मतिज्ञानी स्वरूपका प्रभाव एकदेशहीमें ऐसी जागा केवलज्ञानकी शुद्धत्वप्रतीतिद्वार आया सो अशुद्धत्व अंशहु अपना न कल्प है। स्वसंवेदन मतिज्ञानकरि भया है। ज्ञानप्रकाश अपना है । ऐसें श्रुतमैं विचारै, मैं मनन कीया ॥ सो कैसा हौं ? ज्ञानरूप हौं, आनन्दरूप हौं । ऐसें व्यारि ज्ञानमैं स्वसंवेदनपरि- ।। अनुभवप्रकाश ॥ पान १७॥ णतिकर तो प्रत्यक्ष है । ज्ञान अवधिमनःपर्ययके जानवेत एकदेशप्रत्यक्ष । काहेते सर्वा- वधिकरि सर्व वर्गणा परमाणुमात्र देखै, तातै एकदेशप्रत्यक्ष । मनःपर्ययहू परमनकी जाने, तातें एकदेशप्रत्यक्ष है। केवल सर्वप्रत्यक्ष है । अपना जानना ज्ञानमात्र वस्तुमैं जो प्रतीति भई , तारौं सम्यक् नाम पाया । ज्ञानमात्र वस्तु तो केवलज्ञान भये शुद्ध जहांतक केवल नहीं तहांतक गुपत, केवलज्ञानमात्र वस्तुकी प्रतीति प्रत्यक्ष करिकरि स्वसंवेदन बढा है। जघन्यज्ञानी कैसैं प्रतीति करै ? सो कहिये हैं ॥ मेरा दर्शनज्ञानका प्रकाशप्रदेश मेरेतें उठे है । जानपना मेरा मै हौं । ऐसी प्रतीति करता आनन्द होय सो निर्विकला- सुख है । ज्ञान उपयोग आवरणमैं गुप्त है । जानिमैं आवरण नाहीं। काहेत ? जेता अंश आवरण गया, तेता ज्ञान भया, तातें ज्ञान आवरणते न्यारा है, सो 'अपना स्वभाव है। जेता ज्ञान प्रगट्या तेता अपना स्वभाव खुल्या, सो आपा है । इतना ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान १८ ॥ विशेष आवरणकौं गयेहू परमैं ज्ञान जाय, सो अशुद्ध । जो जेता अंश जिनमें रहै, सो शुद्ध । तातें गुपत केवल है । परि परोक्षज्ञानमैं प्रतीति निरावरणकी करिकरि आनन्द बढाईये । ज्ञानी शुद्धभावनातें शुद्ध होय, यह निश्चय है। 'या मतिः सा गतिः' इति वचनात् । अपना स्वरूप साक्षात् कैसे होय ? सो कहिये हैं । प्रथम निर्मलत्वभाव संसारके भाव अधो करैं। कैसे करें सो कहिये हैं। दृश्य- मान जो सब रूपी जड, तामैं ममत्व न करना। काहेतॆभी जड तामैं आपा मानै सुख कहा? शरीरादि जड तामें आपा मानै सुख कहा? अर राग द्वेष मोह भव भाव, असा- ताभाव , तृष्णाभाव, अविश्रामभाव, अस्थिरभाव , दुःखभाव, आकुलभाव, खेदभाव, अज्ञानभाव यातें हेय हैं ॥ आत्मभाव, ज्ञानमात्रभाव, शान्तभाव, विश्रामभाव, स्थिर- ताभाव, अनाकुलभाव , आनन्दभाव, तृप्तिभाव, निजभाव उपादेय हैं। आत्मपरिणतिमैं आत्मा है। मैं हौं ऐसी परिणतिकरि आपा प्रगटै। आपामैं ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान १९ ॥ परिणति आई मै हौंपणाकी मानि स्वपदका साधन है। मैमैं परिणाम में कहे हौं । मेंमें परिणामोंने स्वपदकी आस्तिक्यताकरि स्वपदपरिणामविना वा योग्य स्थान न होय । कायचेष्टा नही । वचनउच्चारणा नहीं । मन चिन्तवन नहीं। आत्मपदमैं आपकी मनता स्वरूपविश्राम, आनन्दरूप पदमैं स्थिरता चिदानन्द, चित्परिणतिका विवेक करना। चित्परिणति चिदमें स्मै, आत्मानन्द उपजै । मनद्वार विवेक होय परि मन उरै रहै । मन पर है ज्ञान निजवस्तु है । सो ऐसैं विचारौं दूरि रहे है । काहेत? पर- मात्मपद गुप्त है। ताकी मन व्यक्त भावना करत संकै है। काहेत? परमात्मभावना करत करत परमात्मपद नजीक आवै, तब परमात्माके तेजते मन पहल्यौंही मरि निवरै (निवृत्त होय ) है । काहेत ? सूरिमाका तेजते कायर विनासंग्रामही मरै । सूर्यके तेजतें अंधकार पहल्यौंही नाश होय जाय, तैसें जानियौ । चिदानन्द भावनातै चित्परिणति शुद्ध होय । चित्परिणति शुद्ध भये चिदानन्द ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान २० ॥ शुद्ध होय है । अनात्मपरिणाम मेटि आत्मपरिणाम करनाही कृतकृत्यपणा है। योगी- श्वरभी इतना करे हैं। प्राणायाम, ध्यान, धारणा, समाधि याहीके निमित्त हैं। स्वरूपपरिणाममैं अनन्तसुख भया । निजपद आस्तिक्यता भई । अनुपपदमैं लीनता भई । एक स्वरस भया, शुद्ध उपयोग भया। अनुभव सहजपदका भया। महिमा अपार आपपरिणामकी है। परिणाम आपके कीये विना परमेश्वर परपरिणामतें गोता खाय है । अपने परिणाम स्वरूपानन्दी भये, परमेश्वर कहाया। ऐसा प्रभाव आत्म- ज्ञानपरिणामका है । अपूर्वलाभ अविनाशीपदका भया परिणमन” । सो परिणाम कैसे स्वरूपमें लागै? सो कहिये हैं। परपराङ्मुख होय वारंवार स्वपद अवलोकनिके भाव करै । दर्शन ज्ञान चारित्र चेतनाका प्रकाश ठावो करिकरि स्वरूपपरिणति करै । आत्मज्योति अनात्मसौं भिन्न अखण्डप्रकाश आनन्दचेतनास्वरूप चिदिलासका अनुभवप्रकाश परिणामकरि प्रकाशै ।
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान २१ ॥ परिणाम जातें उठ्या तामैं परिणाम लगावै । ज्ञानवारै परिणाम न करै। परिणाम रङ्गचेतना अङ्ग अभङ्गमैं अन्तरङ्ग लीन भया करै । अमरपुरीनिवास निजबोधके विका- सौं व्है । निश्चय निश्चल अमल अतुल अखण्डित अमिततेज अनन्तगुणरत्नमण्डित ब्रह्माण्डको लखैया । ब्रह्मपद पूर्ण परमचैतन्यज्योतिःस्वरूप अरूप अनुप त्रैलोक्यभूप परमात्मरूप पद पाय पावन होय रहै । सो अनुभवकी महिमा है। यथार्थज्ञान, परमार्थनिधान , निजकल्याण, शिवस्थानरूप भगवान् अम्लान- सुखवान् निर्वाणनिधि निरुपाधि निजसमाधि साधिये आराधिये । अलख अज आनन्द महागुणवृन्द धारी अवकारी सर्व दुःखहारी वाधारहित महित सुरस रससहित निरंशी कर्मको विध्वंसी, भव्यको आधार, भवपारको करणहार, जगत्सार, दुर्निवाग्दुःख चूरै । पूरै पद आप भवताप पुण्यपापकों मिटायक, लखाय पद आतम दरसाय देत चिदानन्द, सदा सुखकन्द निरफंद लखावै, अविनाशी पद पावै, लोकालोक झलकावै, फेरि ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान २२ ॥ भवमें न आवै, सब वेद गुण गावै । ताहि कहां लौं बतावै ? वैनगोचर न आवै । यह परम तत्त्व है, अतत्त्वसौं अतीत जामें नांहि विपरीत करणी, भवदुःखनकी भरणी, हितहरणी अनुसरणी अनादिकीही मोहराजानैं बनाई । जगजीवनकौ भाई, दुःखदाई ही सुहाई, या अज्ञान अधिकाई, जातें लगी बहु काई । ज्ञानरीति उरि आनी । विप- रीत करणको भानी । साधकता साधि महा होइ । निजध्यान आनन्द सुधाको व्है पान । मोक्षपदको निदानी इदानींही समयमैं स्वरसी वशी भये हैं। इन्द्रियचोर कसी, काय निरताय निहायो पद परमेश्वरस्वरूप अघटघटमैं । व्यापक अनुप चिद्रूपकों लखायो। भ्रमभावकों मिटायो। निज आपतत्त्व पायो । दरसायो देव अचल अमेव टेव । सासतीको निवासी सुखरासी भवसौं उदासी हो लहै। बाहरिन वहै । निजभावहीकों चहै। स्वपदका निवास स्वपदमें है । बहिरङ्गसंगमें ढूंढि ढूंढि व्याकुल भया जैसे मृग वासकों ढूंढे, कहूं परजायगां न पावै, तैसें पद आपकौं परमैं न पावै ॥ मोहके विकारतें आपा ॥ अनुभवप्रकाश ॥ गन २३ ।। न सूझे । सन्तनके प्रतापते गुण अनन्तमय चिदानन्द परमात्मा तुरंत पावै ।। परपद आप जहांताई तहांताईं सरागी भया व्याकुल रहै । ज्ञानदृष्टिसौं दर्शनज्ञानचारित्रकों एक पदस्वरूप अवलोकन करतही पर मानिकी तुरत हानि होय । रागविकार मिटतही वीतरागपद पावै । तब अनाकुल भया अनन्तसुख रसास्वादी होय आपा अमर करै ।। जैसैं कोई राजा मदिरा पीय निन्द्य स्थानमें रति मान, तैसें चिदानन्द देहमैं रति मानि रहा है। मद उतरै राजपदका ज्ञान होय राजनिधान विलसै, स्वपदका ज्ञान भये सच्चिदानन्द सम्पदा विलसै ।। कोई प्रश्न करै, ज्ञान तो जानपणारूप है, आपकौं क्यों न जाने? ताका समा. धान, जानपणा अनादि परसौं व्यापि परहीका हो रह्या है। अब ऐसा विचार करै, तें शुद्ध होय। यह परका जानपणाभी ज्ञानविना न होय । ज्ञान आत्माविना न होय। तातें परपदका जाननहारा मेरा पद है। मेरा ज्ञान में हौँ । परविकार पर हैं। जहां जहां - । अनुभवप्रकाश ॥ पान २४ ॥ जानपणा, तहांतहां मैं ऐसा दृढभाव सम्यक्त्व है । सो सुगम है, विषम मानि रह्या है। मोहमद वायो ज्ञान अमृत पीय उतरि ब्रह्मपदकों सँभारि, डारि भवखेद, भेद पाय निजसौं, अभेद आपपदकौं पिछानि, सागि परवाणी, जाणि चिदानन्द, मोह मानि भानिके, गुणको ग्राम अभिराम सुखधामरूप सोही है स्वरूप । सोही भावमो- क्षको उपाय उपेयको साथै, शुद्ध आतम आराधै। योही शिवपंथ निर्ग्रन्थ वहू साधि साधि, समाधिको पाय, परमपदकों पहुंचे। अपना चेतनाप्रकाश मोहविकारकों पाय, मैला भया। भेदज्ञान जडचेतनका निखारा करै । ताकी उरमें धरिकरि निजज्ञानका अभ्यास वारंवार सार अविकार अपना अखण्डरूप जानि अनुभव उर आनि महामोह हठ भानि स्वरूपरस अपने स्वभावमैं है। तिस स्वभावकों निज उपयोगमैं ठावा करै । स्वरूपकी उपयोगशक्ति कर्ममें गुप्त भई तो कहा शक्तिको अभाव मानिये ।। जैसे काहूको पुत्र घरमें है, बाजारमैं काहूनें बूझ्यो, तौ कहै हमारे पुत्र है ।
. -- ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान २५॥ अभाव न कहै। व्यवहारमैंहू यह रीति है। छतेकौं अनछतो न करै । चिदानन्द है तेरौ अचिरज आवतु है । दर्शनज्ञानशक्ति छती करि अनछती राखी है। जैसे लोटनजडीकों (जटामांसी जिसको बिल्लीलोटन कहते हैं) देखि बिल्ली लोट है, मोहत संसारभ्रमण है । नै कहूं इतें स्वरूपमें आवै तो त्रिलोकको राज्य पावै । सो तौ दुर्लभ नाहीं ॥ जैसैं नर पशुस्वांग धरै तौ पशु न होय, नरही है । तैसैं आत्मा चौरा- सीके स्वांग करै तौऊ चिदानंदही है। चिदानंदपणो दुर्लभ नाहीं ॥ जैसे कोई काठकी पूतरीकों सांची नारी मानि वाकौ बुलावै, चाहि करै, वाकी सेवा करै, पीछे जाने काठकी, तब पछितावै । तैसें जडकी सेवा करै है । अज्ञानी भया जडमैं सुख कल्पै है। ज्ञानी होय जब झूठ मानि तजै॥ जैसैं मृग मरीचिकामैं जल मान है, तैसैं परमैं आपा मान है । तातें सांचे ज्ञानतें वस्तु जानौ तबही भ्रम मिटै । वारंवार सार सांचो उपदेश श्रीगुरु कहै हैं ।
॥ अनुभवप्रकाश ॥. पान २६॥ आपहू जाने हैं। अविद्याको आवरण है ताकरि झूठको सांच मानि रह्यो है । त्रिंबक (तीन जगह वांकी ऐसी रस्सी) जेवरीमै सर्प त्रिकाल नाही, तैसैं ब्रह्म में अविद्या नाहीं । सो सारे समुद्रके जलसैं धोयेहू देह अपावन है। ताकौं पावन मानि रह्यौ है । ऐसी धिौंही पकरी है । जोरावरी ठीकरीको रुपयो चलावै सो न चालै । अपनी भूलि न तजै तो अपनी हांसी खलकमैं आप करावै। कै देखो अनन्तज्ञानको धनी भूलि दुःख पावै है । हांसीके भयें जन सरमिंदो होय । फेरि हांसीको काम न करै । याकी अनादिकी जगतमैं हांसी भई है । लाज न पकरै है । फेरि फेरि वाही झूठी रीतीकौं पकरै है । जाकी बातहूके कीये अनुपम आनन्द होय, ऐसो अपनो पद है। ताकौं तौ न ग्रहै । परवस्तुकी ओर देखतही चौरासीको बंदीखानो है, ताकौं बहोत रुचिसेती सेवै है। ऐसी हठरीति विपरीति-रूपको अनुप-मानि मानि हर्ष धरै है। जैसें साँपको हार जानि हाथ घालो तौ दुःख होयही होय तैसें रुचिसेती. परसेवन.संसारदुःख होयही होय ॥
। ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान २७॥ जैसे एक दृष्टिबन्धवालो नर एक नगरमैं एक राजाके समीप आय रह्यो। केतेक दिनपीछे राजा. मूवौ । तब वा नरनैं राजाको मूवो न जनायो । राजाको तो बहुत उंडों गाडि माटी दे, ऊपरि बेमालुम जायगां करि दृष्टिबन्धसौं काठकों राजा दरवारमैं बैठायो । दृष्टिबंधसूं सबकौं सांचौ भासै । जब कोई राजाको बूझै, तब वो नर जुबाव दे, तब लोक जानै, राजा बोलै है । ऐसो चरित्र दृष्टिबन्धसौं कीयो। तहां एक नर वनकी बूंटी सिरपरि टाँगि आयो, उस बूंटीके बलते वाकी दृष्टि न बंधी। तब वह नर लोकको कहने लाग्यो, रे कुबुद्धि जन हौ! काठको प्रत्यक्ष देखिये है । तुम याको साचौ राजा जानि सेवो हो, धिक्कार है तुमारी ऐसी समझिको। तैसैं ये संसारी सव इनकी दृष्टि मोहसौ बंधी, परको आपा मानि सेवै हैं । परमैं चेतनाका अंशहू नाही। ज्ञान जाकै भयो, सो ऐसै जाने है, ये संसारी कुबुद्धि जडमैं आपा करि मान हैं। दुःख सहे हैं। धिक्कार इनकी समाझिको! झूठ हठ दुःखदायको सुखदायक जानि सेवे हैं !!
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान २८ ॥ जैसे काहूको जन्म भयो, जन्मतेंही ऑखि परि, चामडीको लपेटौ चल्यो आयो माहितूं ऑखिको प्रकाश ज्यौंको त्यौँ बाह्य चर्म आवरणसौ आपको न दरसे । जब कोऊ तबीच मिल्यो, तानें कही, याकै मांहि प्रकाश ज्योतीरूप आखि सारी है। वा. जतनकरि चर्मको लपेटौ दूरि कीयो, तब शरीर आपको आपही देख्यौ, औरभी दरसै लाग्यौ । याप्रकारि अनादि ज्ञानदर्शन नैन मुद्रित भये चले आये आप स्वरूप न देख्यो । जब श्रीगुरु तबीब (नेत्रवैद्य) मिले, तब ज्ञानावरण दूरि करणको उपाय बता- वतही याकै श्रद्धान करि दूरिही भयो । तव आपणौ अखण्ड ज्योति स्वरूप पद आप देख्यो, तब अनन्तसुखी भयो । जेवरीमें सांप नही, सीपमें रूपो नही, भाडलीमें (मृगतृष्णा) जल नही, काचमन्दिरमैं दूजो स्वान नहीं, मृगबारै बास नही, नलनीको सूवो काहूनें पकन्यो नहि, वानराकी मूठी काहू पकरी नहि, सिंह कूवामैं दूजो नहीं, ऐसैं कोऊ . ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान २९ ॥ दूजो नही, आपहीकी भूलि झूठी, तातें आप दुःख पावै है। दुजो मानि मानि दुःख पावे है। सांच जानै सदा सुखी होईयै ॥ यह आत्मा सुखके निमित्त अनेक उपाय करै है । देश देश फिरे, लक्ष्मी कमाय सुख भोगवै । अथवा परीषह अनेक सहै, परलोक सुखनिमित्तका निधान निजस्वरूपको न जानै । जानै तो तुरत सुखी होय ॥ जैसैं सब जनकी गांठडीमैं लाल हैं, वै सव मसकती होय रहे हैं। जो गठडी खोलि देखै, तौ सुखी होय । अन्धले तो कूपमै परै अचिरज नहीं । देखता परै तो अचिरज । तैसें आत्मा ज्ञाता द्रष्टा है, अरु संसारकूपमैं परै है, यह बड़ा अचिरज है । मोह ठगर्ने ठगोरी इसके सिर डारी, तिसतैं परघरहीकौं आपा मानि निजघर भूल्या है, ज्ञानमन्त्र” मोह ठगोरीनै उतारै, तब निजघरकौं पावै । वाखार श्रीगुरु निजघर पाय- वेको उपाय दिखावै है। अपने अखण्डित उपयोगनिधानकौं ले अविनाशी राज्य
अति
आनन्द
मानि
रह्या
है
।
अनादिहीका
सो
यह
दुःखकी
मूल
भूलि
जवही
मिटै
,
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ३०॥
करि । तेरी हरामजादगीते अपना राजपद भूलि कौडी कौडीकौं जांच कंगाल भया
है। तेरा निधान ढिगही था, तैं न संभाल्या । तातें दुःखी भया ।
जैसैं चांपा. ( नामका) गवाल धतूरैकों पीय उन्मत्त भया मैं चांपा नाही,
चांपाके घर पीछे ठाढा होय हेला दीया, चांपा घरि है? तब उसकी नानि कह्या, तूं
कौन है ? तव चेत भया मै चांपा हौं । तैसैं श्रीगुरु आपा बताया है। पावै ते सुखी
होय । कहाँलों कहिये ? यह महिमानिधान अम्लान अनूपपद आप वण्या है, सहज
सुखकन्द है, अलख अखण्डित है, अमिततेजधारी है ॥ दुःखद्वन्द्वमैं आपा मानि
श्रीगुरुवचन सुधारस पीवै । चेत होय परकी ओर अवलोकन मिटै । स्वरूप स्वपद
देखतही तिहूं लोकनाथ अपना पद जाने । विख्यात वेद बतावै हैं ।
नटवा स्वांग धरे नांचे है । स्वांग न धरै पररूप नाचना मिटै। ममत्वतें पररूप
। प , ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ३१ ॥ होय होय चौरासीका स्वांग धरि नांचे है। ममत्व मेटि सहजपदकौं भेटि थिर रहैं, तो नांचना न होय । चंचलता मेटै चिदानन्द उधरै है, ज्ञानदृष्टि खुलै है । नैक स्वरूपमैं सुथिर भये गतिभ्रमण मिटै है । तातें जे.स्वरूपमैं सदा स्थिर रहैं, ते धन्य हैं । अपनी अवलोकनिमें अखण्ड रसधारा वर्षे है, ऐसा जानि, निज जानि, पर मेटि, 'यह मैं सुखनिधान ज्योतिःस्वरूप परमप्रकाशरूप अनुपपदरूप स्वरूप इस आकाशवत् अविकारपदमैं चिद्विकार भया, परसंयोगते । इहां तौ परके अवकाश न था । कैसे अनादि ठहय? तहां कहिये हैं ॥ नकखानमैं कनक चिरहीका गुप्त है। तैसैं आत्मा कर्ममैं गुप्त अनादिहीका है। अनादित अशुद्ध उपयोग अशुद्धता लगी है, सो देखि। कैसे लगी है, , . । ध मान माया लोभ इन्द्रिय मन वचन देह गति कर्म नोकर्म धर्म अधर्म ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ३२ ॥. आकाश काल पुद्गल अन्यजीव जीतनेक परवस्तु है तितने आपकरि जानिये है। सो मैही हौं, मै इनका की हौं, यो मेरे काम हैं, “मै हौं सो ये हैं, ये हैं सो मै हौं ऐसें परवस्तुकों आपा जाने, आपकू पर जानै, तब लोकालोककी जाननेकी शक्ति सर्व अज्ञानभावकू परणई है। सोई जीवको ज्ञानगुण अज्ञानविकार भया। यौही जीवका दर्शनगुण था। जेते परवस्तुके भेद हैं, तिनकौं आपकरि देखें है, ये मै हौं, आपा परमैं देखै है, आपाकौं पर देखै हैं । लोकालोक देखनेकी जेती शक्ति थी, तेती सर्व शक्ति अदर्शनरूप भई । यौंकरि जीवका दर्शनगुण विकाररूप परणम्या । अर जीवका सम्य- क्त्वगुण था, सो जीवके भेदनकौं अजीवकी ठीकता करै है। चेतनकों अचेतन, अचेत- नकों चेतन, विभावको स्वभाव, स्वभावकों विभाव, द्रव्य अद्रव्य, गुण अगुण, ज्ञानकों ज्ञेय, ज्ञेयकौं ज्ञान, आपकौं पर, परकौं आप यौहीकरी और सर्व विपरीतिकौं ठीकता आस्तिक्य भावकों करे है। यौं जीवका सम्यक्त्व गुण मिथ्यारूप परणम्या । और जीव || अनुभवप्रकाश ॥ पान ३३ ॥ स्वआचरण गुण था, जेतीक परवस्तु तिसी परकौं स्वआचरणकरि कीया करै, परविर्षे तिठ्या करै, परहीकौं ग्रह्या करै, अपनी चारित्रगुण सब शक्ति परवि लगि रही है, यौँ जीवका स्वचारित्रगुण विकाररूप परिणमै है ।। अवर इस जीवका सर्व स्वरूप परिणमनेका बलरूप सर्व वीर्यगुण था, सो निर्बल रूप होय परिणभ्या स्वरूपपरिणमनेका बल रहि गया निर्वल भया परिणम्या। याकरि जीवका वीर्यगुण विकाररूप परिणम्या ।। अवर इस जीवका आत्मस्वरूप रस जो परमा- नन्द भोगगुण था, सो परपुद्गलका कर्मत्व व्यक्त साता असाता पुण्यपापरूप उदय परपरिणामके बहुभांति विकार चिद्विकार परिणामहीका रस भोगव्या करै रस लीया करै, तिस परमानन्द गुणकी सर्वशक्ति परपरिणामहीका स्वाद स्वाद्या करै । सो परस्वाद परम दुःखरूप । यौंकरि जीवका परमानन्दगुण दुःखविकाररूप परणम्या ॥ यौहीकरि इस जीवके अवर गुण ज्योज्यों विकारी भये हैं, त्योत्यौं ग्रन्थान्तरतें जानि लेने ॥
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ३४ ॥ इस जीवके सर्व गुणहीके विकारको चिदिकार नाम सङ्क्षपसूं कहना ॥ गुण गुणकी अनन्ती शक्ति कही सत्ताकी है शक्ति अनन्तगुणमैं विस्तरी । सब गुणकी आस्तिक्यता सत्ता” भई । सत्ता. सासता सबकौं राख्या । अनन्तचेतनाका स्वरूप असत्ता होता तो चिच्छक्तिरूप चेतना अविनाशी महिमा न रहती। सच्चिदानन्द- विना अफल भये किस कामके ? तातें सच्चिदानन्दरूपकरि आत्मा प्रधान है। अरूपी आत्मप्रदेशमैं सर्वदर्शनी सर्वज्ञत्व स्वच्छत्व आदि अनन्तशक्तिका प्रकाश है, ते उपयो- गके धारी अविकारी कर्मत्वकरि आवरै, सङ्कोचविस्तार शरीराकार भये । आत्मा आकाशवत् कैसे सङ्कोचविस्तार धरै? पुद्गल संकुचै विस्तरै, तो काष्ठ पाषाण घटते बढते होय । सो चेतनाविना न बढे । चेतनही बढे घटै, तो सिद्धके प्रदेशका विस्तार होय के घटि जाय, सोभी नाही। जडचेतन दोन्यों मिले संकोच विस्तार है। परदे- शमैं सब गुण कहे हैं। परि संसार अवस्थातें मोक्षमार्गकी चढि न भई । तहां सम्यग्द- ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ३५ ॥ निज्ञानचारित्र मोक्षमार्ग कह्या । इनकी जेती जेती विशुद्धि होत भई, तेता मोक्षमार्ग भया ॥ निश्चयमोक्षमार्ग दोयप्रकार, सविकल्प निर्विकल्प । मै “अहं ब्रह्म अस्मि" ऐसा भाव आवै निर्विकल्प वीतराग स्वसंवेदन समाधि कहिये । लोकालोक जाननेकी शक्ति ज्ञानकी, स्वसंवेदन जेता भया, तामैं स्वज्ञानविशुद्धताके अंश होत भये । सो ज्ञान सर्वज्ञशक्ति में अनुभव कीया। जेता ज्ञान भया शुद्ध, तेता अनुभवमै सर्वज्ञानकी प्रतीतिभाव वेदना ऐसा भया । सर्वज्ञानका प्रतीतिभावमें आनन्द बढ्या । ज्ञान विमल अधिक होत भया । ज्ञानकी विशुद्धताको ज्ञानके बलका प्रतीतिभाव कारण है । ज्ञान परोक्ष है । परपरिणतिके बल आवरणके होतेभी उस स्वसंवेदनमें स्वजातिक सुख भया. ज्ञानस्वरूपका भया । एकदेश स्वसंवेदन सर्व स्वसंवेदनका अङ्ग है । ज्ञानवेदनामैं वेद्या जाय है साक्षात् मोक्षमार्ग है । स्वसंवेदन ज्ञानीही जान है । स्वरूपतें परिणाम वारै भया, ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ३६॥ सोही संसारस्वरूपाचरणरूप परिणाम सोही साधक अवस्थामैं मोक्षमार्ग, सिद्धि अव- स्थामैं मोक्षरूप है। जेता जेता अंश ज्ञानबलतै आवरण अभाव भया, तेता तेता अंश मोक्ष नाम पाया। स्वरूपकी वार्ता प्रीतिकरि सुणै, तो भावी मुक्ति कही । अनुपम सुख होय अनुभव करै, तिनिकी महिमा कौन कहि सकै? जेता स्वरूपका निश्चय ठीक भावै, तेता स्वसंवेदन होय एक भये, तीनौंकी सिद्धि है । गुप्त शुद्धशक्ति सिद्धिसमानमैं परिणति प्रवेश करै । ज्यों ज्यौं शुद्धताकी प्रतीतिमें परिणति थिर होय, त्यौं त्यौं मोक्षमार्गकी शुद्धि होय । ज्यों कोई अधिक कोस चालै तब नगर नजीक आवै, त्यौं शुद्धस्वरूपकी प्रतीतिमैं परिणति अवगाढ गाढ दृढ होय , मोक्षनगर नजीक आवै । अपनी परिणति खेल आप करि आप भव- सिन्धु पार होय । आप विभावपरिणतिनै संसार विषम करि राख्या है। संसार मोक्षकी करणहारी परिणति है । निजपरिणति मोक्ष, परपरिणति संसार । सो यह सत्स- ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ३७ ॥ इते अनुभवी जीवनिके निमित्तः निजपरिणति स्वरूपकी होय, विषम मोह मिटै, परमानन्द भेटे । स्वरूप पायवेका राह संतोंने सोहिला (सरल) कीया है ।। चौरासी लाख योनि सरायका फिरनहारा कबहू कहूं थिररूप निवास न कीया। जबतक परमज्योति अपने शिवघरकौं न पहुंचे, तबतक कार्यभी न सरै । कहा भया जो तपी जपी ब्रह्मचारी यति आदि बहुत भेष धरै, तो तातै निज अमृतके पीवनेते अनादि भ्रम खेद मिटै| अजर अमर होय तत्त्वसुधा सेवनेका मार्ग कहा ? सो कहिये हैं। अपने चिदानन्दस्वरूपकौं अवलोकि अनुभव करि। कैसे ? सकल अविद्यार्ते मुक्ति तत्त्वकी कौतूहली होय । निजानन्द केलि कलाकरि स्वपदकों देखि । अनातमका सङ्ग फिरि न रहै अनादिमोहके वशतें । निज हितअहितमैं भेदज्ञानतें ज्ञानचेतनका अनुभव करि अनादि अखण्ड ब्रह्मपदका विलास तेरै ज्ञानकटाक्षम है।
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ३८ ॥ अज्ञानपटल जब मिटै, सद्गुरुवचन अञ्जन” पटल दृरि भये ज्ञाननयन प्रकाशै, तब लोकालोक दरसै । ऐसा ज्ञान ताकी महिमा अपार, अनेक मुनि पार भये । ज्ञान- मय मूरतिकी सूरतिका सेवन करि करि अपने सहजका ख्याल है । परपरचेमें विषम है। सहज बोध कलाकरि सुगम, कष्टक्लेशतें दूरि है । काहेत? अफीम खाये विषकी लहरी तुरत चढे । अमृतसेवन” सुरततृप्ति हो सुख पावै । तैसें कर्मसंक्लेशमैं शान्त पद नहीं। अनन्तसुखनिधानस्वरूप भावनाके करतही अविनाशी रस होय, ता रसकौं संत सेय आये । तूं ताकौ सेय । श्रेयपदरूप अनूप ज्योतिःस्वरूप पद अपनाही है। अपने परमेश्वरपदका दूरि अवलोकन मति करें। आपहीकों प्रभु थाप्या, जाकाँ नेक यादि करि, ज्ञानज्योतिका उदय होय, मोह अन्धकार विलय जाय, आनन्दसहित कृतकृत्यता चित्तमें प्रकटै। ताकौं बेगि अवलोकि, आन ध्यानता निवारि विचारिक संभारि, ब्रह्मविलास तेरा तोमें है । यातें कहा अधिक ? जो, याकों छोडि तूं परकों ध्यावै ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ३९ ॥ च्यारि वेद भेद लहि, गहि स्वरूप सुखरूप तेरी भावनामें अविनाशी रस चोवा चूवै है । सो भावनाकरि भ्रमभाव मेट, तेरी भावनाही झूठेही भव बनाया है । ऐसा बदफैल स्वभाव कल्लोलके प्रगट होतेही मिटै है ॥ देखि, तूं चेतन है । जड अजान है । ते अजानमैं आपा मान्या, अशुद्ध भया, तेरी लैर अजान न परै है। तूं अपने पदतें ईधैंकों (इधरको) मति आवै । तेरा जड कछु पल्ला न पकरै है। अनाहिक (व्यर्थही) बिरानी वस्तुकौं अपनी करि करि झूठी हौंस करै । यह हमैं भोगसुख भया, हम सुखी हैं। झूठी भरम कल्पना मानि मोद कर है। किछुभी सावधानीका अंश नाही। यह कोई अचिरज है, तिहूं लोकका नाथ होय अपने पूज्यपदकौं भूलै । नीच पदमें आपा मानि विकल होय व्याकुलरूप भया डोले है। जैसे कोई एक इन्द्रजालका नगरमै रहै । तहां इन्द्रजालीके वश हुवा इन्द्रजा- ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ४०॥ लके हाथी, घोरे, नर, सेवक , स्त्री सव; तिसमें काहूकौं हुकम करै है। सेवक आय सलाम करै, स्त्री नृत्य करै। हाथी चढे । घोडा दौडावै । इन्द्रजालमैं सांचि जाने । विकलता धरि कबहूं काहूके वियोग” रोवै । दुःखी होय छाती कूटै । कबहू काहूका लाभ मानि मोद करै । कवडू शृङ्गार बनावै । कबहू फौज देखै । सब कहै इन्द्रजाल झूठा है, उनमें रंच सांच नांही। ऐसे देव, नर, नारक, तिर्यचके शरीर जड हैं । चेतनका अंश नाही, भ्रमतें शृङ्गारै । खान पान चोवा ( अर्क चूआ) लगावनादि अनेक जतन करें। झूठहीमैं मोद मानि मानि हरखै । मूवैसौं जीवता सगाई करै ! कार्य कैसे सुधारै? जैसे श्वान हाडको चावै, अपने गाल गल मसोडैका रक्त उतरै, ताकौं जानै भला स्वाद है! ऐसे मूढ आप दुःखमें सुख कल्पै है! परफंदमें सुखकन्द सुख माने ! अमिकी झाल शरीरमें लगे, तब कहै, हमारे ज्योतीका प्रवेश होय है। जो कोई T ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ४१ ॥ अग्निझाल• बुझावै, तासौं लरै ! ऐसैं परमैं दुःखसंयोग, परका बुझावै तासौँ शत्रुकीसी करै । चौरासीमैं परवस्तुकों आपा मानै । तातें चोर चिरहीका (चिरकालका) भया । जन्मादि दुःखदण्ड पाये तोहू चोरी परवस्तुकी न छूटे है । देखो! भूलि तीहूं लोकका नाथ नीचपरकै आधीन भया । अपनी भूलितें अपनी निधि न पिछाने । भिकारी भया डोलै है। निधि चेतना है सो आप है। दूरि नाही । देखना दुर्लभ है। देखें सुलभ है। किसीनें पूछा , तूं कौन है ? वा. कह्या, मैं मडा (मुर्दा मरा हुवा) हौं तौ बोलता कौन कह ? मैं जानता नाहीं। तौ में मडा हौं ऐसा किसने जान्या? तब सँभाया, मैं जीवता हौं। ऐसे यह माने, मैं देह हौं तौ यह देहमैं जो मानना कीया सो कौन है? कहै, मैं न जानौं ऐसा ल्यावना किसनें कीया? यह आपाकौं खोजि देखनै ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ४२॥ जाननै परखनेमैं स्वरूप संभारे, तब सुखी होय है। जैसे कोई मदिरा पीय उन्मत्त पुरुषाकार पाषाण थंभकौं देखि सांचा जानि उससौं लय। वह ऊपरि आप नीचे आपही भया । वाकौं कहै, मैं हाय। ऐसे परकौं आपा मानि दुःखी भया। कोई दूजा नाही। दुःखदाता तेरी भावना भव बनाया, नापैद पैदा कीया, अचेतनकौं चलाया मूवैका जतन अनादिका करता है। आपसा तू करता है झूठी मानिमैं तेरा कीया कछु जड चेतन न होय । तूंही ऐसी झूठी कल्पनाते दुःख पावता है। तेरा क्या फायदा है ? तूही न विचारे है । मेरा फंद मै पारत हौं । कछु सिद्धि नांही। विनु विचारतें अपनी निधि भुल्या। अनन्तचतुष्टय अमृत मैला कीया। चेतना मेरा पाड्या फंद ऐसा है। आकाश बांधा है। अचरज आवै है। परि जो केवल अविद्या याही होती तो तू न आवया जाता ॥ अविद्या जड छोटी शक्ति, तेरी मोटी शक्ति, न हती जाती। परी तेरि शुद्ध- ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ४३ ॥ शक्तिभी बडी, तेरी अशुद्धशक्तिभी बडी । तेरी चितवनी तेरै गरै परी । परकौं देखि आपा भूल्या । अविद्या तेरीही फैलाई है । तूं अविद्यारूप कर्म न परि आपा न दै, तौ किछु जडका जोर नही । तातें अपरंपार शक्ति तेरी है । भावना परकी करि भव करता भया । निजभावनातै अविनाशी अनुपम अमल अचल परमपदरूप आनन्दघन अविकारी सार सत् चिन्मय चेतन अरूपी अजरामर परमात्माकौं पावै है। तो ऐसी भावना क्यों न करिये ? इस अपने स्वरूपहीमैं सर्व · उच्चत्व सकलपूज्य पद परमधाम अभिराम आनन्द अनन्तगुण स्वसंवेदरस स्वानुभव परमेश्वर ज्योतिःस्वरूप अनूप देवा- धिदेवपणे इत्यादि सब पाइयै । तातें अपणौ पद उपादेय है। अर अवर पर हेय है एकदेशमान निजावलोकन ऐसा है । इन्द्रादिसम्पदा विकाररूप भास है। जिसकै भये तें अनन्त सन्त सेवन करि अपने स्वरूपका अनुभव करि भवपार भये । तातें अपने स्वरूपकों सेवौ ॥
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ४४ ॥ सर्वज्ञदेवनैं सब उपदेशका मूल यह बताया है, एकवेर स्वसंवेदरसका स्वादी होय तो ऐसा आनन्दमैं मम होय, परकी ओर फिरि कबहू दृष्टि न दे। स्वरूपसमाधि सन्तनका चिन्ह है। चिसके भये रागादि विकार न पाइये जैसे आकाशमें फूल न पाइये । देह अभ्यासका नाश अनुभवप्रकाश चैतन्यविलास भावका लखाव लखि ल- क्ष्यलक्षण लिखनेमैं न आवै । लखै सुख होय । स्वादरूप लिखै न होय । आत्मसहित विश्व व्याख्येय, व्याख्या वाणीकी रचना, व्याख्याता व्याख्यान करनहार ये सब बात कछु है, सो मोहके विकारतें मानिये हैं । अनादि आत्माकी आकुलता एक विशुद्ध बोधकलाकरि मिटै है । तातें सहजबोधकलाका निरन्तर अभ्यास करो। स्वरूपआनन्दी होय भवोदधिकों तिरौ ॥ नरभव कछु सदा तौ रहै नहि, साक्षात् मोक्षसाधन ज्ञानकला इस भवविना और जायगा न उपजै । ताते वारवार कहिये है, निजबोधकलाके बलकरि निजस्वरूपमैं ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ४५ ॥ रहौ । निरन्तर यह यत्न करौ। ऐसा कहाव तौ बारखार बालकहू न करावै । तुम अन- न्तज्ञानके धनी होयकरि ऐसी भूलि धरौ, सो बडा अचिरज आवै है। सो अचिरजकी बात न करियै । वा महाजड शरीरमैं आपा मानै मोटी हानि है। आपकी जानिमें सुखसमुद्रकू पाय अविनाशिपुरीका राजा होय, अनन्तचैतन्यशक्तिराजधानीका विलासी होय है । परमैं आपा मानि तूं ऐसे दुःख पावै, जैसैं कोई मडेको वस्त्र आभू- षणादि करै, मानै मै पहरै है! तो जीवता झूठही आपका मान है। ऐसे देह जड है। याके भोग तूं आप मानि झूठही काहेको जडकी क्रिया आपकी माने ? जैसे साँप कास्कौं काटै, काहूकौं विष चढे, तौ अचिरज मानियै । जड खाय पहरै, स्नानचोवादि (तैलमर्दन) क्रिया करै, तुम कहो हम खाया, हम भोग कीया, परके स्वामी भये । सो परस्वामीभी यौं न मानें । जैसे राजा किङ्करनका स्वामी है । उनके धाये (भोजनसे तृप्त हुये) यौं न कहै धाया हौं । अर तुम देखो, तुमारी ऐसी चाल तुमहीकौं दुःखदायी है।
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ४६ ॥ जो सुन्दर वस्तु होय तौ ऊपरिकी अङ्गीकार न कीजै। देह अशुचि नवद्वार सवै, दीखतहीकी ग्लानिरूप, मांहि सुन्दर होय, तौ वाहिरमें बुरी परी है । सो माहि विष्ठामूत्रकी खानि न विनसै, तो ऐसीहूं लीजै। विनसौहू जो आपको दुःखदायी न होई, तौ, तातें ऐसैंको स्नेह तुमही करौ । जन्मादिदुःख भरौ । तुमारी लार जन्मादि अनादिके लगे आये हैं। तूं मोनैं महन्तपुरुषोंकीसी रीतिका भाव किया है, जो हमसौं लगै, तिनकौं न छोडै । यौं तौ महंत न कहावोगे। महंत तौ पापकों मेटै होय । ये तो पापका रूप है । तातें तुम समझो। अपने धनको अंग जो विराना धन जाता रहै तुम फेरि ग्रहौ, ताके दण्ड भवदुःख सही हो, तोऊ परको लेते थके नाही। बहुत दुःखी भये परि परग्रहणकी बाण न छोडो हौ । साहपद तौ अपने धनतें पावोगे। याते स्वपरविवेकी होय आत्मधन ग्रहौ । परका ममत्वकौं स्वप्नांतरमें मति करौ । तुमारे अखण्ड रत्नत्रयादि अनन्तगुणनिधान है दरिद्री नाही। जो दरिद्री होय सो ऐसे काम करै।।
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ४७॥ तुमारा निधान श्रीगुरुनें तुमपैं दिया अब संभारि सुखी होहु । जैसें काहू नारीनैं अपनी सेजपरि काठकी पूतरीकों सिंगारी सुवाणी, पति आया तब यौँ जान, मेरी नारी शयन करी है । हेला दे, वा न बोलै, तब पवनादि खिजमति सारी रात्रि- विर्षे करी । प्रभात भया, तब जानी मै झूठही सेवा करी । ऐसें देहको सांचा आपा मानि सेवै है। ज्ञान भये जानै, यह झूठ अनादि देहमैं आपा मान्या । चिदानन्द तुम इन्द्रिय पंच चोर पोषौ हो; जानौ हौ यह हमकौं सुख दे हैं! सो अन्तरके गुण- रत्न ये चोर ले हैं, तुमकौं खवरी नांही । अब तुम ज्ञानखड्ग संभालौ । चोरनको ऐसे रोको फेरि बल न पकरै । विषयकषाय जीति निजरीतिकी राहमैं आवौ । अर तुम शिवपुरको पहुचि राज करौ । तुम राजा, दर्शनज्ञान वजीर राजके थंभ, गुण वसति, अनन्तशक्ति राजधानीका विलास करौ। अभेद राज राजत तुह्मारा पद है। अचेतन अपावन अथिरसौं कहा स्नेह करौ ? ॥
॥ अनुभवप्रकाश ।। पान ४८॥ नीकै निहारो। इस शरीरमन्दिरमैं यह चेतनदीपक सासता है । मन्दिर तौ छूटै परि सासता रतनदीप ज्योंका त्यों रहै । व्यवहारमें तुम अनेक स्वांग नटकीज्यौं धरे । नट ज्योंका सौं रहै । वह स्पष्टभाव कर्मको है । तौऊ कमलिनीपतकीनांई कर्मसौं न बंधै, न स्पर्शे । अन्य अन्य भाव मांटी धरैह एक है। तैसैं अन्य अन्य पर्याय धरैहू एक है । समुद्र तरङ्गकरि वृद्धि हानि करै, समुद्रत्वकरि निश्चल है, विभावकरि वृद्धि हानि करे। वस्तु निज अचल है । सोनों वान भेद परि अभेद, यो नानाभेद कर्मते, परि वस्तु अभेद । फटिकमणि हरी लालपुडीते भासै , स्वभाव श्वेत है। परसौं पर, निज चेतनामें पर नही । षड्भाव ऊपरि ऊपरि रहै । जलपरि सिवालकीनांई गुप्त शुद्धशक्ति तेरी चिदानन्द व्यक्त करि भाय ज्यों व्यक्त व्है । तूं अविनाशीरसका सागर । पररस कहा मीठा देख्या ? जाके निमित्ततें संसारकी घुमेरी भई, ताहीकौं भला जानि सेवै है। जैसैं मद पीवनहारा मद पीवता जाय, दुःख पावता जाय, अधिक घुमेरीमें भला जानि जानि सेवै; तैसें भूला है।
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ४९ ॥ जैसे एक नगरमैं एक नर रहै । नगर सूना, तहां दूजा और नाहीं, सो वो नर उस नगरमैं चौरासी लाख घरि, तिन घरनकों सदा सवायही करै, फिरि दूजे दिन फिरि औरमै रहै, तब वाको संवारै । इस भांति उन भीतडेको संवारतें सवारतें सारा जन्म वीता। उनके संवारनेरौं रोग भया । जबका संवारै था तबहीका रोग लग्या । आपकी परमचातुरकौं भूल्या । वा नरकों बडी विपत्ति, विनाप्रयोजन एकला सूने घरनमैं मसकति उनकी करै । आप अनन्तवलवान् वृथा भूलि दुःख पावै है । इस नरका शहर एक परमवसतीका , वहांका यह राजा है, वहांकौं संभालै तौ सूने घर- नकी सेवा तजै, वहांका राज्य करै। तैसैं यह चिदानन्द चौरासी लाख योनिके शरी- रनकी संवारना करै । जिस घरमें रहै वसे संवार, फिरि दूजी शरीर झोपडीको संवारै फिरि और पावै, उसको संवारता फिरै । सब देह जड, तिन जडनकी सेवा करते करते अनादि वीता । इस शरीरसेवामैं कर्मरोग अनादिका लग्या आया । तिसते इस ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ५० ॥ रोगकरि अपना अनन्तबल छीन पऱ्या, बडी विपत्ति जन्मादि भोगवै है । जडनकों ऐसा मान है, मैही हौं॥ जैसें वानर एक कांकरा पडै, तब रोवै, ऐसे याके एक अङ्गभी देहका छीजै, तौ वहुते रोवै । ये मेरै, मै इनका झूठही ऐसे जडनके सेवन” सुख मानै । अपनी शिवनगरीका राज्य भूल्या, जो श्रीगुरुके कहै शिवपुरीकों संभाले, तो वहांका आप चेतनराजा अविनाशी राज्य करै । तहां चेतना वसती है । तिहुँ लोकमें आन फिरै न भवमें फेरि जडमें न आवै । आनन्दधनों पाय सदा सासता सुखका भोक्ता होय सो करिये ॥ यह परमातम पुरुष तिसकी निजपरिणति अनन्तमहिमारूप परमेश्वरपदकी रम- णहारी, सोही मूलप्रकृति पुरुषप्रकृतिका विवेकरूप तरु, तिसके निजानन्द फल तिसकौं तूं रसास्वाद लेकरि सुखी होहु । जैसैं कोई राजाको विरानां गढ लेना मुसकिल, तैसे ॥ अनुभवप्रकाश || गान ५१ ॥ इस आतमार्कों परपद लेना मुसकिल है । काहेरौं अनादि परपद लेता फिरै है । परि पररूप न भया, चेतनही रह्या । अरु चेतनापद आतमाका है, इसकौं न भी जाने है, भूल्या फिरै है, तौभी वाकी रहणी निश्चयकरि याहीमैं , यातें मुसकिल नाही, अपना स्वरूपही है । भ्रमका पडदा आपहीन अनादिका कीया है। तातै ना भास है, आप आपकौं । परि आप आपकौं तजि बाहरि न गया । जैसैं नटवे. पशुका वेष धन्य तौ वह नर नरपणाकौं तजि वारे न गया। पशु वेष न धरै तौ नरही है। भ्रमपरममत्व न करै, तौ देहका स्वांग न धरै, तौ चिदा- नन्द जैसैका तैसा रहै । जैसैं एक डाबीमैं रतन वाका कछु विगया नाहीं, गुपत पुडत दूरि करि, काढे ती व्यक्त है । तेसैं शरीरमें छिप्या आतमा है, याका कछु न विगऱ्या गुपत है, कर्मरहित भये प्रगट है। गुपत प्रगट अवस्थाभेद है। दोन्यौं अवस्थामै स्वरूप जैसैका तैसा है, ऐसा श्रद्धाभाव सुखका मूल है । जाकी दृष्टि पदार्थशुद्धिपरि ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ५२ ॥ नाही, कर्मदृष्टित अवलोकै, सुख कौन पावै ? जैसी दृष्टि देखै, तैसौ फल होय । मयूर- को मुकरंद पाषाण है तामैं सब मोर भासै , पाषाणओर देखें मोर भासै , पदार्थओर देखें पदार्थही है, मोर नाही । तैसैं परमैं पर भासे, निजओर देखे पर न भासै , निजही है। सुखकारी निजदृष्टि तजि दुःखरूप परदृष्टि न दीजै ।। हे चिदानन्दराम! आपकौं अमर करिक अवलोकौ । मरण तुममैं नहीं। जैसे कोई चक्ररत्न जिसके घरमैं चौदा रत्न नव निधि अर वह दरिद्री भया फिरै, ताकों अपनैं चक्रवर्तिपद अवलोकनमात्रतें चक्रवर्ती आप होय, ऐसैं स्वपदकौं परमेश्वर अव- लोकै, तो तब परमेश्वर है । देखो देखो भूल! अवलोकनमात्रतें परमेश्वर होय । ऐसी अवलोकना न करे, इंद्रियचोरनके वश भया अपने निधान मुसाय (लुटवाय) दरिद्री भया, भवविपत्तिकों भरै है, भूलि न मेटै है । सो चित्तविकाररूप जीव होय, तब परको आपा माने । ए भाव जीवका निज जातिस्वभाव नाहीं हैं। इन भावनते जो ॥ अनुभवप्रकाश ।। पान ५३ ॥ व्यापार सोही चेतना एक तूं जीव निज जातिस्वभाव जानु । यह चेतना है सो केवल जीव है, सो अनादि अनन्त एकरस है, तिसतै चेतना साक्षात् आप जीव जानना, तिसौं शुद्धचेतनारूप जीव भये । इन रागादिभावविहू आपनमैं जीव कर्मचेतनारूप होय प्रवर्ते है । चेतना जीवचेतना चेतनारूप आप तिष्ठै है । कर्मचेतना कर्मफलचेतना. विकार जीवचेतनका है । परि व्यापक चेतना है । चेतना जीवविना नाहीं है । चेतना शुद्धजीवका स्वरूप है । ताके जाने ज्ञाता जीवकै ऐसा भाव होय है ॥ अब हम शुद्धचेतनारूप स्वरूप जान्या । ज्ञानदर्शन चारित्ररूप हम हैं, विका- ररूप हम नाही, सिद्धसमान हैं, बन्ध मुक्ति आश्रव संवररूप हम नाहीं, हम अब जागे, हमारी नींद गई, हम अपने स्वरूपकौं एक अनुभवै हैं, अब हम संसारतें जुदे भये, स्वरूपगजपरि हम आरूढ भये, स्वरूपगृहविर्षे प्रवेश कीया, हम तमासगीर इन संसारपरिणामनके भये । हम अब आप अपने स्वरूपकौं देखै जाने हैं। इतना विचार ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ५४ ॥ तो विकल्प है। ज्ञानका प्रत्यक्षरस वेदना भावनमैं सो अनुभव है। विचारप्रतीतिरूप साधक है, अनुभव भावसाध्य है। साधकसाध्यभेद जानै तौ वस्तुकी सिद्धि होय । सो कहिये हैं। साध्यसाधक उदाहरण कहिये हैं । एकक्षेत्रावगाही पुद्गलकर्महीका सहजही उदय स्थितिको होय है, सो साधक अवस्था जाननी। तहां तवलग तिस हवनेका (2) स्थितिस्यौं चित्तविकार हवनेकी (2) प्रवर्तना पाईये है, सो साध्यभेद जानना ॥ मिथ्यात्व साधक, बहिरात्मा साध्य है। सम्यग्भाव साधक है, तहां वस्तुस्वभाव जातिसिद्ध होना साध्य है। जहां शुद्धोपयोगपरिणति होना साधक है, तहां परमात्मा साध्य है। व्यवहाररत्नत्रय साधक है, तहां निश्चयरत्नत्रय साध्य है। सम्यग्दृष्टिकौं जहां विरति व्यवहारपरिणति हवना साधक है, तहां चारित्रशक्ति मुख्य हवना साध्य है । देव- शास्त्र-गुरु भक्ति विनय नमस्कारादि भाव जहां साधक है, तहां विषयकषायादि भाव- ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ५५ ॥ नसौं उदासीनता मनःपरिणतिकी स्थिरता साध्य है। जहां एक शुभोपयोग व्यवहा- परिणति हवना साधक है, तहां परम्परामोक्ष साध्य है। जहां अन्तरात्मारूप जीवद्रव्य साधक है, तहां अभेद आपही जीवद्रव्य परमा- त्मारूप साध्य है। जहां ज्ञानादिगुण मोक्षमार्गरूपकरि साधक है, तहां अभेद आपही ज्ञानादिगुणका मोक्षरूप साध्य है। जहां जघन्य ज्ञानादिभाव साधक है, तहां अभेद आपही वेही ज्ञानादिगुणका उत्कृष्टभाव साध्य है | जहां ज्ञानादि स्तोक निश्च- यपरिणतिकरि साधक है, तहां अभेद आपही बहुत निश्चयपरिणतिरूप ज्ञानादि गुण साध्य हैं । जहां सम्यक्त्वी जीव साधक है, तहां तिस जीवकै सम्यग्ज्ञानदर्शनचारित्र साध्य हैं। जहां गुणमोक्ष साधक है, तहां द्रव्यमोक्ष साध्य है। जहां क्षपकश्रेणी चढना साधक है, तहां तद्भवसाक्षान्मोक्ष साध्य है। जहां द्रव्यते भावतें साक्षात् द्वैतव्यवहार साधक है, तहां साक्षान्मोक्ष साध्य है। जहां भावितमनादिरीतिविलय (?) साधक है, ॥ अनुभवप्रकाग ॥ पान ५६ ॥ तहां साक्षात्परमात्मरूप केवल हवना साध्य है। जहां पौद्गलिककर्म खिरणा साधक है, तहां चिदिकारविलय हवना साध्य है। जहां परमाणुमात्रपरिग्रहप्रपंच साधक है, तहां ममताभाव साध्य है। जहां मिथ्यादृष्टि हवना साधक है, तहां 'संसारभ्रमण साध्य है। जहां सम्यग्दृष्टि हवना साधक है, तहां मोक्षपद होना साध्य है। जहां काललब्धि साधक है, तहां द्रव्यकों तैसाही भाव हवना साध्य है। हम स्वभावसाधनकरि अपने स्वरूपकौं साध्य कीया है ॥ यह साध्यसाधकमाव जानि सहजही साध्य सधै है ॥ विशेष इनका कीजिये है। अहं नरः। अहं देवः। अहं नारकः । अहं तिर्यक् । ये शरीर मेरे, परमैं निजभाव परकों आपा मानना, स्वरूपतें बाहरि परपदार्थमें परिणाम तन्मय करना रागभावतें रंजकताकरि परके स्वरूपकों आप प्रतीतिकरि जानिये । ऐसा मिथ्यात्व दूजा भेद मिथ्यात्वका । ऐसे मिथ्यात्वकौं साधै है । सो कहिये हैं।
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ५७ ।। अतत्त्वश्रद्धान मिथ्यादर्शन, अयथार्थज्ञान मिथ्याज्ञान, अयथार्थाचरण मिथ्या आचरण । क्षुधादि अठरा दोष संयुक्त देवकी भक्ति तारणबुद्धि” मिथ्यात्व होय । काहेत ? परानुभवी है, मिथ्यालीन है, तिनके सेये मिथ्यात्व होय । ऐसें दोषसहित गुरु ग्रन्थलीन विषयारूढ परबुद्धिधारककौं मानै मिथ्यात्व, मिथ्याशास्त्र मिथ्यामत मिथ्या- धर्म इनकौं मानि मिथ्यात्व सो मिथ्यात्व बहिरात्माका साधक है। अनादिका बहिरात्मा इस मिथ्यासेवननै भया है । तातें बहिरात्मा साध्य है। दुजा सम्यग्भाव साधक है। सो वस्तुका जो स्वभाव अनन्तगुण ताकी सिद्धि करे है। काहेरौं ? सब गुण यथाविधि स्वरूप सम्यक् अपने स्वरूपकों जब धरै, जब सम्यग्भावकों लीये होय, ज्ञानका निर्वि- कल्प जानपणा सब आवरणरहित केवलज्ञानरूप सम्यगवस्थारूप , सो सम्यग्ज्ञान कहिये । याँही आवरणरहित शुद्ध सम्यक्रूप यथावत् निश्चयभावरूप निर्विकल्प सव गुण सम्यक् कहिये ॥
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ५८ ॥ द्रव्य अपने शुद्धत्व जैसा स्वरूप है , तैसैंकों लीयै । पर्याय जैसा कबु परिणम- नरूप स्वभाव है, तैसैंकौं लीयै । ऐसें द्रव्यगुणयर्यायका स्वभाव जाति सब सिद्ध हवना सम्यग्भाव है । तारौं सम्यग्भाव साधक है । वस्तुस्वभाव जातिसिद्ध हवना साध्य है, शुद्धोपयोगपरिणति साधक है । परमात्मा साध्य है, सो कहूर्त शुद्धोपयोगस्वभावसङ्गतै होय है। ज्ञानदर्शन तो साधक | तातें सब रूप शुद्धोपयोग, चारित्ररूप शुद्धोपयोग, सो ज्ञानदर्शन तो साधक, तातें सब शुद्ध नाहीं। केतेक शक्तिकरि शुद्ध है। चारित्र- गुण वारमैके ठिकाने सब शुद्ध हैं। परि परम यथाख्यात तेरमैं चौदमैमैं नाव पावै है। तातें केतेक ज्ञानशक्ति शुद्ध भई । ता ज्ञानशक्तिकरि केवलज्ञानरूप गुप्त निजरूप ताकों प्रतीति व्यक्ति करि, तब परिणतिनें केवलज्ञानकू प्रतीति रुचि श्रद्धाभावकरि निश्चय कीया। गुप्तका व्यक्तश्रद्धानतें व्यक्त होय जाय है ।। एकदेशस्वरूपमें शुद्धत्व सर्वदेशकौं साधे है । शुद्धनिश्चयकरि शुद्धस्वरूप जान्या ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ५९ ॥ परिणतिमैं शुद्धनिश्चय भया। तब वैसाही वेद्या । शुद्धका निश्चय शुद्धपरमात्माको कारण है।तातें शुद्धोपयोग साधक, परमात्मा साध्य है। निश्चय साध्य है सो कैसे तत्त्वश्रद्धानमैं है। याका हेय श्रद्धान । निजतत्त्वका उपादेय श्रद्धान तत्त्वज्ञानमैं परतत्त्वका रूप हेय जान्या, निजतत्त्व उपादेय जान्या । भवभोगादिविरति कार्यकारी जानी। सम्यक्त्वा- चरणरीति उपादेय जानी। ऐसा व्यवहार तत्त्वसौं मिल्या विचार हेय उपादेयांका सम्यग्भेदकौं लीये है। इस व्यवहारकै होते निजसम्यक्स्वरूपकौं मन इन्द्रिय उपयोग निरोधि शुद्ध अनुभवै । निजश्रद्धान सिद्धसमान स्वरूपका करै । तत्त्व सातका भेल नहीं । निजशुद्धतत्त्व अनुभवगोचर करै। निश्चयकरि श्रद्धानमैं आपकौं परमात्मा शुद्ध है । निश्चयकरि ज्ञान परमात्माका जानपणा केवलज्ञान जातितें जानै । स्तोक सम्यग्ज्ञानतें सब सम्यग्ज्ञानकौं प्रतीतिमैं जानै । स्वसंवेदमैं जातिरूपकरि अपना स्वरूप केवलज्ञानमैं ठीक जान्या। थोरे ज्ञानमैं बहुत ज्ञानकी प्रतीति आई। निश्चयकरि स्वरूप जान्या ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ६०॥ सो निश्चयज्ञानपरिणतिकरि स्वरूप आचरना स्वरूपाचरण । परमात्माका श्रद्धानज्ञान निश्चयकरि केतेक ज्ञानादि शुद्धशक्तिकरि भया । तैसेंही आचरण भया ।। निश्चयनय परमात्मा है । परिणति वैसीही निश्चयरूप परिणई है। ये निश्च- यरत्नत्रय प्रथम व्यवहाररत्नत्रय भये होय हैं । तातै व्यवहाररत्नत्रय साधक, निश्चय- रत्नत्रय साध्य है। सम्यग्दृष्टिकै विरति व्यवहारपरिणति साधक है, तहां चारि- त्रशक्ति मुख्य साध्य है। सो कहिये हैं। विरति परिणति कहिये रति नांही। ताके भेद विषयनमैं रति नाही, कषायमें रति नाही, अशुभाचरणका त्याग, शुभाच- रणमैंह रति नाही, कर्मकरतूति रति नांही । ज्यों ज्यों पररातभाव तजै, सौं सौं स्वरू- पविर्षे थिरता विश्राम और आचरण होय, तहां चारित्र कहिये । परिणतिशुद्धता प्रगटै चारित्रशक्ति मुख्य साध्य है । देवशास्त्रगुरुभक्ति विनय नमस्कारादि भाव साधक है, तहां विषयादि उदासीनतामैं परिणति स्थिरता साध्य है देवभक्ति परमात्मव्यक्त शुद्ध- ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ६१ ॥ चेतना प्रगट अनन्तगुण प्रगट तिनकी पूजा सेवा मनसौं परिपूर्ण प्रीति बाह्य प्रभावना अन्तरङ्ग ध्यान गुणवर्णन अवज्ञा अभाव परमउत्साह मन वच काय धन सर्व भक्ति- निमित्त लगावै, अपने प्राणहू वल्लभ प्राण दुःखमूल जानै, उनकौं अनन्तसुखकारण जाने, शुद्धस्वरूप जानि भक्ति करै, शुद्धस्वरूप अभिलाषी आप यातें उनकी भक्ति रुचि श्रद्धा प्रतीतित करै, शास्त्रकी भक्ति करै । काहेत ? अपनी स्वरूप शास्त्र” पावै है । संसारदुःखहानि स्वरूपभावना” होय , सो पावै । स्वपरविवेक ग्रन्थ” प्रगटैं। मोक्ष- मार्ग मोक्षस्वरूप वाणीत लहै । तातै शास्त्रभक्ति कही। गुरु मोक्षमार्ग उपदेशै, शान्त- मुद्रा धारी गुरु, मुद्रा विनावचन बोल्याही मोक्षमार्ग दिखावै । ऐसै श्रीगुरु सर्वदोपर- हित तिनकी भक्ति कही । इनकी भक्ति करै, मुक्तिके ये कारण जानि करै । तब भव- भोगसौं उदास होय मन स्वरूपहीकी स्थिरता चाहै, तब साधै । तातें उनकी भक्ति साधक है, मनकी स्थिरता साध्य है ।।
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ६२॥ शुभोपयोगके तीन भेद हैं । क्रियारूप, भक्तिरूप, गुणगुणिभेदविचाररूप । सो सातिशयकौं लीये निरतिशयकौं लीये षड्भेद । ये जो सम्यक्त्वसहित सो सातिशय, सम्यक्त्वविना तीनौ निरतिशय । सम्यक्त्वसहितमैं तो नियम है, परम्परा मोक्ष करैही करै । विनासम्यक्त्व शुभोपयोग संसारसुख दे, देवपद दे, राजपद दे। तहां देवगुरुशा- स्त्रको निमित्त होय याकै लाभ होनो होय तौ होय, नांही तो न होय । कारजको कारणविना नियम है, ऐसी रीति जानियौं । याप्रकार शुभोपयोग साधक है, परम्परा- मोक्ष साध्य है। अन्तरात्मा भेदज्ञानकरि परसौं भिन्न निजरूप जान, सिद्धसमान प्रतीतिज्ञान- गोचर करै, तब साधक है आपही आप, निश्चयनय अभेद परमात्मा साध्य है। जहां ज्ञानादि मोक्षमार्ग कहिये एकदेश स्वसंवेदन शुद्धोपयोगरूप, तहां अभेदज्ञानमूर्ति आत्मा मोक्षस्वरूपकौं साधै, ताः अभेदज्ञान मोक्षरूप साध्य है । जघन्यज्ञानतें उत्कृष्ट- M. ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ६३ ॥ ज्ञान पाईये, तातें जघन्यज्ञान साधक उत्कृष्टज्ञान साध्य है । जहां ज्ञान स्तोकादि नि- श्चय करै, तहां वह निश्चय बढे । जैसे स्तोक अमल है चाहि लीन अमल बहुत बढे, बहुत निश्चयपरिणतिरूप ज्ञानादि गुण बढे, सो साध्य है । सम्यक्त्वी जीव दर्शनज्ञान- चारित्रकौं साधै, तातैं सम्यक्त्व ज्ञान दर्शन चारित्र साध्य हैं । सम्यक्त्व साधक है। सम्यक्त्वज्ञानादि भाव शुद्ध होय जब द्रव्यकर्म मिटै, तब द्रव्यमोक्ष होय, ताते गुणमोक्ष साधक, द्रव्यमोक्ष साध्य है। क्षपकश्रेणी चहै जब तद्भवमोक्ष होय, ताते क्षपकश्रेणी चढना साधक है, तद्भवमोक्ष साध्य है। दरवितलिंग होय, भावित स्वरूपभाव भाव होय, तब साक्षात् मोक्ष सधै, तातें दरवित भावित यति व्यवहार साधक है, तहां साक्षान्मोक्ष साध्य है । भावितमनके विकार विलय भये साक्षान्मोक्ष होय ताते भावित मनादिरीति विलय साधक है, साक्षान्मोक्षरूप साध्य है। जहां पौगलिक कर्म खिरणा साधक है, काहेत? पुद्गलकर्म विपाक आये मनो- ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ६४ ॥ विकार उपजे है, तातै पुद्गलही सिरि जाय, तब मनोविकार कहांत रहै ? तातै मनो- विकारविलय हवना साध्य है, कर्म खिरणा साधक है। परमाणुमात्रभी परिग्रह होय तौ ममताभाव होयही होय, तातै परमाणुमात्र परिग्रह साधक है, ममताभाव साध्य है। मिथ्यात्वतें संसार भ्रमै , मिथ्यात्व साधक, संसारभ्रमण साध्य है। सम्यक्त्व भये मोक्ष होय , तातें सम्यक्त्व साधक है, मोक्ष होना साध्य हैं। जैसी काललब्धि आवै, तैसीही स्वभावसिद्वि होय, तातै काललब्धि साधक है, तैसाही स्वभाव हवना साध्य है। साधकसाध्यभेद अनेक हैं, सो जाननै ।। शद्द साधक है, अर्थ साध्य है । अर्थ साधक है, ज्ञानरस साध्य है। स्थिरता साधक है, ध्यान साध्य है। ध्यान साधक है, कर्म क्षरणा साध्य है। कर्म क्षरणा साधक है, द्रव्यमोक्ष साध्य है । राग-द्वेष-मोह अभाव साधक है, संसाराभाव साध्य है। धर्म साधक है, परमपद साध्य है । स्वविचारप्रतीतिरूप साधक है, अनाकुलभाव ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ६५॥ साध्य है। समाधि साधक है, निजशुद्धस्वरूप साध्य है। स्याद्वाद साधक है, यथार्थ पदार्थकी साधना साध्य है । भली भावना साधक है, विशुद्धज्ञानकला साध्य है। विशुद्धज्ञानकला साधक है, निजपरमात्मा साध्य है। विवेक साधक है, कार्य साध्य है। धर्मध्यान साधक है, शुक्लध्यान साध्य है । शुक्लध्यान साधक है, मोक्ष साक्षात् साध्य है। वीतरागभाव साधक है, कर्मअबंध साध्य है। संवर साधक है, निर्जरा साध्य है। निर्जरा साधक है, मोक्ष साध्य है। चिदिकारभाव साधक है, शुद्धोपयोग साध्य है। द्रव्यश्रुत सम्यगवगाहन साधक है, भावश्रुत साध्य है। भावश्रुत साधक है, केवलज्ञान साध्य है। चेतनमें चित्त लीन करना साधक है, अनुभव साध्य है। अनुभव साधक है, मोक्ष साध्य है। नयभङ्गी साधक है, प्रमाणभङ्गी साध्य है । प्रमाणभङ्गी साधक है, वस्तुसिद्धि करना साध्य है। शास्त्र सम्यक् अवगाहन साधक है, श्रद्धागुणज्ञता साध्य है। श्रद्धागुण साधक है, ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ६६॥ परमार्थ पावना साध्य है। यतिजनसेवा साधक है, आत्महित साध्य है। विनय साधक है, विद्यालाभ साध्य है । तत्त्वश्रद्धान साधक है, निश्चयसम्यक्त्व साध्य है। देवशास्त्रगुरुकी प्रतीति साधक है, तत्त्व पावना साध्य है । तत्त्वामृत पीवना साधक है, संसारखेद मेटना साध्य है। मोक्षमार्ग साधक है , संसारखेद मेटना साध्य है। मोक्षमार्ग साधक है, मोक्ष साध्य है। ध्यान साधक है, मनोविकारविलय साध्य है। ध्यानाभ्यास साधक है, ध्यानसिद्धि साध्य है। सूत्रतात्पर्य साधक है, शास्त्रतात्पर्य साध्य है। नियम साधक है, निश्चयपद पावना साध्य है । नयप्रमाणनिक्षेप साधक है, न्यायस्था- पना साध्य है। सम्यक्प्रकार हेय उपादेय जानना साधक है, निर्विकल्प निजरस पीवना साध्य है । परवस्तुविरक्तता साधक है, निजवस्तुप्राप्ति साध्य है। परदया साधक है, व्यवहारधर्म साध्य है । स्वदया साधक है, निजधर्म साध्य है। संवेगादि आठ गुण साधक हैं, सम्यक्त्व साध्य है। चेतनभावना साधक है, सहजसुख साध्य है।
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ६७॥ प्राणायाम साधक है, मनोवशीकरण साध्य है। धारणा साधक है, ध्यान साध्य है। ध्यान साधक है, समाधि साध्य है। आत्मरुचि साधक है, अखण्डसुख साध्य है। नय साधक है, अनेकान्त साध्य है। प्रमाण साधक है, वस्तु प्रसिद्ध करना साध्य है। वस्तुग्रहण साधक है, सकलकार्यसामर्थ्य साध्य है। परपरिणति साधक है, भवदुःख साध्य है। निजपरिणति साधक है, स्वरूपानन्द साध्य है। ऐसे साधकसाध्य हैं। अनेक भेद जानि निज अनुभव करिये। ये सब स्वरूप आनन्द पायवेकौ बताये हैं। कर्मकल्पना कल्पित है। आत्मा सहज अनादिसिद्ध है। अनन्तसुखरूप है । अनन्त गुणमहिमाकौं धरै है। वीतरागभावना भावनतें शुद्ध उपयोग धारि स्वरूपसमाधिमैं लीन होय स्वसंवेदन ज्ञान परिणतिकरि परमात्मा प्रगट कीजै ॥ कोई जानेगा, आजिके समयमैं स्वरूप कठिन है, तिसर्ने स्वरूप चाहि मेटि बहिरात्मा है, आजिसौं अधिक परिग्रह चतुर्थकाल पुण्यवंत नर चक्रवर्ती आदिक । अनुभवप्रकाश ।। पान ६८॥ तिनकै था, सो इसकै तौ थोरा है, सो परिग्रह जोरावरी इसके परिणामनमैं न आवे है । यौही दौरि दौरि परिग्रहमैं धुकै है । जब गलौ होय, तब विकथा करै । तब स्वरू- पके परिणाम करै, तौ कौन रोकै? परपरिणाम सुगम , निजपरिणाम विषम वतावे है। देखौ अचिरजकी बात, देखे है जाने है देख्यौ न जाय जान्यौ न जाय । ऐसें कहत लाजहू न आवै। संसारचातुरीको चतुर आप जानिवेकौ शठ ऐसौ हठ धिठौहीसौं पकरि पकरि पररत विसनकौं गाढौ भयौ । स्वभावशुद्धि विषारी भारी भव बांधि अंध धंधमैं धायौ न लखायौ। आप अब श्रीगुरुप्रतापते संतसंग मिलाप, जातें मिटै भवताप, आप आपहीमैं पावै, ज्ञान लक्षण लखावै, आप चिंतन धरावै, निजपरिणति वढावै, निजमांहि लवलावै, सहजस्वरसकौं पावै, कर्मवन्धन मिटावै, भाव आपमै लगावै, वर चिद्गुणपर्यायकौं ध्यावै, तब हर्ष उपावै, मन विश्राम आवै, रसास्वादकौं जु पावै, निज अनुभव कहावै, ताकौं दूरिको वतावै, भवभावरी घटावै, आप अलख लखावै, ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ६९॥ चिदानन्द दरसावै, अविनाशी रस पावै, जाको जस भव्य गावै, जाकी महिमा अपार जानें मिटै भवभार महा, ऐसौ समयसार अविकार जानि लीजिये ।। जीजिये सदैव कीजिये, सोही वोही द्रोही न होय, आप अवलोय, शुद्ध उप- योग थाय, परको वियोग भाय, सहज लखाय, जिन आगममें कही वात, तिहु लोक- नाथ व्है, विख्यात निजअनुराग सेती धरि, वीतरागभाव यह दाव पायो, फिरि मिलै न उपाय , ऐसो भाव धरि, जातै मिटै भवफंद, तातैं मानथंभ मेटि मायाजलकौं जलाई। क्रोध अग्नि बुझाइ, लोभलहरि मिटाइ, विषयभावना न भाइ, चिदानन्दरायपद देखो देखो। निज आपको गवेषौ परवेदनाकी उच्छेदना करि सहजभाव धरि अंत. र्वेदी होय, आनन्दधाराकौं देखि, परमात्मनिश्चयरूप देखि, इस परपरिणतिनारीसौं ललचाये। कुमतिसखी संगि गतिमैं डालै, निजपरिणति राणीके वियोग बहुदुःखी भये ।
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ७०॥ अब निजपरिणतियासौं अतीन्द्रिय भोग भोगवो, जहां सहज अविनाशीरस वर्षे है। अरूपीकमैं पद्मराग मणि कल्पि आनन्द झूठेही मानौ हौं । ऐसें परमैं निजभाव कल्पा सो झूठेही हौस पूरी करो, सो न होय । आकाशमें देव एक, ताके करमें चिंतामणि, ताको प्रतिविम्ब अपने वासनके जलमें देख्यौ, मनमें विचारि मेरै चिन्तामणि है, ताके भरोसौ विराने लाखौ देने कीये तो कहा सिद्धि है ? झूठ कल्पना तुमहीको दुख- दाई है । साचौ चिन्तामणि घरमैं ताकौ न देखौ ! अरु प्रतिविम्बमैं हाथि न परै । बहुत खेद करो, सो कहा वढाई ? अब अपनो साचो अखंड पद देखो । ब्रह्मसरोवर आनन्द सुधारसकरि पूर्ण, जाको सुधारस पीवत अमर होय, सो रस पीवनो।। ॥ अथ अनुभववर्णनम् ॥ पौगलिककर्महीकरि पांच इंद्रिय छठे मनरूप वन्या सझी देह, तिस देहविर्षे तिस- प्रमाण तिष्ठया जु है जीवद्रव्यभी इंद्रिय मन सज्ञा नाम पावै । भावइन्द्रिय भावमन ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ७१ ॥ छह प्रकार उपयोगपरिणामभी भेद पड्या है । एकएक उपयोगपरिणाम एककौं देखें जाने। मन उपयोग परिणाम चिन्ता विकल्प देखै जानै । परिणाम विचार विकल्प चिंतारूप मानना होय। तिस होनें सो तिस परिणामभेदकों मन नाम कह्या देखि संत अवर अब इनहकौं एक ज्ञानका नाम लेइ कथन करूं हौं। तिस ज्ञानकथ करि दरसनादि सब गुण आगया । इन मन इंद्रियभेदहके ज्ञानकी पर्यायका नाम मतिसज्ञा कहिये । मिश्र भेदज्ञानकरि अर्थस्यौं अर्थान्तरविशेष जान, इस जाननेको श्रुतसज्ञा कहिये। दोन्यों ज्ञानपर्याय कुरूप सम्यग्रूप कहिये । मिथ्यातीको जाननमैं कुरूपता पौद्गलिक कर्मकरि पांचइन्द्रिय छठे मनरूप बन्या संज्ञी देह । तिस देहवि. तिसप्रमाण तिष्ठया जु है जीवद्रव्यभी इन्द्रिय मन संज्ञा नाम पावै । भावइन्द्री भावमन छहप्रकार उपयोगपरिणामभी भेद पड्या है, एकएक उपयोग परिणाम एकएककों देखे जानें मन- उपयोग परिणाम चिन्ताविकल्प देखै जानें परिणामविचार विकल्पचिंतारूप मानना ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ७२ ॥ होय, तिस होनेसों तिस परिणामभेदकौं मन नाम कह्या । देखि संत (?) अवरु इन- हिकौं एकज्ञानका नाम लेइ कथन करूं हौं, तिस ज्ञानकथनैंकरि दर्शनादि सवगुण आय गए । इन मनइन्द्रीभेदके ज्ञानकी पर्यायका नाम मतिसंज्ञा कहिये मिश्रभेदज्ञान- करि अर्थस्यौं अर्थान्तर विशेष जानै तिस जाननैंकों श्रुतसंज्ञा कहिये। दोन्यों ज्ञान- पर्याय कुरूप सम्यग्रूप कहिये मिथ्यातीकै मतिश्रुतरूप जानना है, तिस जाननै विर्षे स्व-परव्यापक अव्यापककी जाति नाहीं । तिस ज्ञेयकों आप लखै अथवा लखताही नाहीं । मिथ्यातीकैं जाननमैं कुरूपता है । सम्यग्दृष्टि परकौं जान हैं । स्वकौं स्व जानै है। चारित्रमै परकौं निजरूप अवलंबै है मिथ्याती। सम्यग्दृष्टि निजकों निज अव- लंबै है । सम्यक्ता सविकल्प निर्विकल्परूपसौं दोय प्रकार है । जघन्यज्ञानी जब तिस परज्ञेयकौं अव्यापकपररूपत्व जानि आपकौं जाननरूप व्यापक जानै सो तो सविकल्प- सम्यक्ता । अवरु जु आप जाननरूप आपकोही व्याप्यव्यापक जान्या करै सो निर्वि- ।। अनुभवप्रकाश ॥ पान ७३ ॥ कल्परूप सम्यक्ता । अवरु जो एकबेर एकसमय वि स्वकौं सर्व स्वकरि लखै, सर्व- परकों परकरि लखै तहां चारित्र परमशुद्ध है ।। तिस सम्यक्तताकौं परम सर्वथा सम्यकात्म कहिये केवल दर्शनज्ञानपर्यायविर्षे पाइये । अवरु जिस ज्ञेयप्रति प्रयुजै तिसहीकौं जाने औरको न जानें । मिथ्यातीक वा सम्यक्हष्टिक ज्ञेयप्रयोजना ज्ञान तो एकसा है, परंतु भेद इतना ही, मिथ्याती जेता जानै तेता अयथार्थरूप साधै । सम्यग्दृष्टि तिसही भावकौं जानैं तितनँही यथा- थरूप साधै । तात तिस सम्यग्दृष्टिकै चारित्र अशुद्ध परिणामनसौं बंध होय सकता नाहीं । तिन उपयोग परणामौनें बंध आस्रव तिन अशुद्ध परिणामनकी शक्ति कीलि राखी है । तातै निरास्रव निबंध है । अरु सब एक आपहीकों आप चित्तवस्तु व्यापक व्याप्यताकरि प्रत्यक्ष आपही देखन लगें जानन लगैं, अरु ते चारित्रपरिणाम निज उपयोगमय चित्तवस्तुविर्षे थिरीभूत शुद्ध वीतराग ममरूप प्रवर्ते । तिनही चारित्र परि- ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ७४ ॥ णामजन्य निजारथ होय है। यौकरि सम्यग्दृष्टिक ज्ञानदर्शनचारित्रसहित परिणाम निजचित्तवस्तुहीकौं व्याप्यव्यापकरूप देखते जानतें आचरत निजास्वाद लेय निज- स्वाददशाका नाम स्वानुभव कहिये । स्वानुभव होतें निर्विकल्प सम्यक्ता उपजै। स्वानुभवकों कहौ वा कोई निर्वि- कल्पदशा कहौ, वा आत्मसन्मुख उपयोग कहौ, वा भावमति भावभुत कहौ, वा स्वसंवेदनभाववस्तुमगन भाव वा स्वआचरण कहौ, थिरता कहाँ, विश्राम कहाँ, स्वसुख कहौ, इन्द्रीमनातीत भाव , शुद्धोपयोगस्वरूप मम वा निश्चयभाव, स्वरससाम्य- भाव, समाधिभाव, वीतरागभाव, अद्वैतावलंबीभाव, चित्तनिरोधभाव, निजधर्म- भाव, यथास्वादरूप यौंकरि स्वानुभवके बहुत नाम हैं। तथापि एक स्वस्वादरूप अनु- भवदशा मुख्यनाम जानना। जो सम्यग्दृष्टि चउथेका है। तिसके तो स्वानुभवका काल लघु अंतर्मुहूर्तताई रहै है। वह काल पीछे होइ है । तिसतें देशवतीका स्वानुभव ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ७५ ॥ रहनेका काल बड़ा है । अरु थोरे ही काल पीछे होइ है। सर्वविरतिकै स्वानुभव दीर्घ अन्तर्मुहूर्तताई होइ है । ध्यानस्यौं भी होइ है । अति थोरे थोरे कालपीछे स्वानुभव हुवा ही करे, वारंवार अवरु सातमैं । तेई परिणाम पूर्वस्वानुभवरूप भए थे तेतौ स्वानु- भवरूप रहै, पै तहांसों मुख्यरूप कर्मधारासौं विकसि निकसि स्वरसस्वाद अनुभवरूप होते हैं ते चले । ज्यों ज्यौं आगूंका (पहिलेका) काल आवै है त्यौं त्यौं अवरु अवरु परिणाम स्वस्वादरस अनुभवरूप होई करि बढते चलें हैं। यौंकरि तहांसौं अनुभव- दशाकी परिणाम बढनि करि पलटनि होइ है । क्षीणमोह अन्तलगु जाननी ।। भो भव्य! तू एक बात सुनि-हम एक अवरु कहैं हैं। यह स्वानुभवदशा स्वस- मयरूप सुख है, शान्ति विश्राम है, स्थिररूप है, निजकल्याण है, चैन है, तृप्तिरूप है, समभाव है, मुख्य मोक्षराह है, ऐसा है। अरु यहु सम्यक् सविकल्पदशा यद्यपि उपयोग निरमल है तथापि यहां चारित्र परिणाम परालंब अशुद्ध चंचल होते संतै सवि- ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ७६॥ कल्पदशा दुःख है । तृष्णातप्तकरि चंचल है। पुण्यपापरूप कलाय है । उद्वेगता है। असंतोषरूप है । ऐसें ऐसे विलापरूप है । चारित्र परिणाम दोन्यौते अवस्था आपविर्षे देखी है । तिस” भला यह जुतू स्वानुभवरूप रहनेका उद्यम राख्या करु । यह हमारा वचन व्यवहारकरि उपदेशकथन है। जेती जेती विशुद्धता थिरता गुणस्थान माफिक बढी तेता तेता सुख बब्या। बारमैंलगु कषाय घटनेतें थिरता बढी । मतिज्ञानावरण श्रुतज्ञानावरणके क्षयोपशमतें स्वसंवेदन रस बढ्यौ। स्वसंवेदन थिरता करि उपज्यो रसास्वाद स्वानुभव सो अनन्तसुख मूल है । सो अनुभव धाराधरजगै दुःख दावानल रंच न रहतु है । स्वानुभव भववासघटा भानवेकों परम प्रचण्ड पवन मुनिजन कहतु है । अनुभव सुधापानकरि भव्य अमर अनेक भए । परमपूज्यपदकौं अनुभवही करै है। सब वेदपुराण याविनु निरर्थक है। स्मृति विस्मृति है। शास्त्रार्थ व्यर्थ है। पूजा मोहभजन है। अनुभवविना निर्वि.
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ७७ ॥ घ्नकार्य विघ्न है । परमेश्वरकथा सोभी झूठी है । तपभी झूठ है । तीर्थसेवन झूठ है ।। तर्क पुराण व्याकरण खेद है। अनुभवविना ग्रामविर्षे गाय श्वान, बनमें हिरणादिज्यौं अज्ञानतपसी । अनुभवप्रसादतें नर कहूं रहौ सदा पूज्य है । अनुभव आनंद, अनुभव धर्म, अनुभव परमपद, अनुभव अनन्तगुणरससागर, अनुभवते सिद्ध है अनुपज्योति अमिततेज अखण्ड अचल अमल अतुल अवाधित अरूप अजर अमर अविनाशी अलख अछेद अभेद अक्रिय अमूर्तिक अकर्तृत्व अभोक्तृत्व अविगत आनंदमय चिदानंद इत्यादि अनंत परमेश्वरका विशेषण सर्व अनुभवसिद्धि करतु है । ताते अनुभव सार है। मोक्षको निदान सब विधानको शिरोमणि, सुखको निधान अमलान अनुभव है । अनुभवी जीव मुनिजनके चरणारविंद इन्द्रादि सेबें हैं। तातें अनुभवकरि ये ग्रन्थ ग्रन्थनमें अनुभवकी प्रशंसा कही है। अनुभवविना साध्यसिद्धि कहूं नाहीं। अनन्तचेतनाचिन्हरूप अनंतगुणमंडित, अनंतशक्तिधारक, आतम- ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ७८ पदको रसास्वाद अनुभव कहिये । वारंवार सर्व ग्रन्थको सार अविकार अनुभव है। अनुभव शासतौ चिन्तामणि है। अनुभव अविनाशी रसकूप है। मोक्षरूप अनुभव है। तत्त्वार्थसार अनुभव है। जगत उधारण अनुभव है । अनुभवतें आन कोई उच्चपद नाहीं । तातें अनुभव सदा स्वरूपको करिये । अनुभवकी महिमा अनंत है कहांलो वताइये । आठकर्मप्रदेश परि आपणी थितिकरि बैठे सर्व पुद्गलका ठार है। तिनके विपाकके उदयकरि चिदविकार भया सो विकार जीवका है । वर्गणा नोकर्म द्रव्यकर्मरूप सव पुद्गल हैं । भावजीवके हैं। एकसो अठतालीस प्रकृति वर्गणा जड वणी है । उनके विपाक उदय व्यक्तता निमित्त पाय चिदविकारभया, सो विकारका स्वांग जीवन धन्य है। इस ज्ञेय रंजक अशुद्धता भाव उस शुद्धभावकी शक्ति अशुद्ध भई तब भया है। अशुद्धपरनिमित्तै उफदू ? मैल है । पर इसने कीया तातें इसका है। इसका मूलभाव नाही, कातें बादरकी । अनुभवप्रकाश ।। पान ७९ ॥ घढा लाल श्याम पीत हरितरूप भये आकाश वैसा न भया। जैसे रतनपरि मांटी बहुत लपटी परि रतनका प्रकाश मांटीके लपटें न गया। अंतरशक्ति ज्योंकी त्यौं है। यों आतमाके अशुद्धभाव भयें आतमाका दरसन ज्ञानकी अंतर ज्योंकी सौं है । पर पुद्गलका नाट बहुत बन्या है। सो पुद्गलका खेल जानु, तेरा आतमा खेल मति जानै॥ कहिये हैं दशधा परिग्रह क्षेत्र, वाग, नगर, कूप, वापी, तडाग, नदी आदि जेतेक पुद्गल माता पिता कलत पुत्र पुती वधू बंधू स्वजनादि जावंत सर्प सिंह व्याघ्र गज महिषादि जावंत दुष्ट अक्षर शब्द अनक्षर शहादि वाग गव्यग स्नान भोग संजोग वियोग क्रिया जावंत परिग्रह मिलाप सो वडा परिग्रह नाश सो दलिदादि क्रिया जावंत चलना बैठना हलना बोलना कांपनादि क्रिया जावंत लडना भिडना चढना उतरना वाचना खेलना गावना बजावना आदि जावंत क्रिया सर्वे पुद्गलका खेल जानु।
प्रेम मिटाय अचेतना प्रकाशका विलासरूप अतीन्द्रियभोग भोगि कहा ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ८० ॥ नर नारक तिर्यञ्च देव इनके विभव भोगकरण विषयरूप इन्द्रियनिकी क्रियादि सब पुद्गल नाट है। द्रव्यकर्म नोकर्मादि सब पुद्गल अखारा है। तामैं तूं चिदानंद रंजन होय है। अपनी जान है। अपने दर्शनज्ञानचारिवादि अनंत अखारा गुणका परि- णति पातरा नाचे स्वरूपरस उपजा जेते गुणकौं वेर्दै द्रव्य वे सब भाव भये सत्ता मृदंग प्रमेय ताल इत्यादि सब निज अखारा है। ऐसे अपने निज अखारेमैं रजि, परके अखारेमैंने ममत्व कीया जिसका जन्मादि दुःखफल अपनां माया अपनें सहजा- झुठे ही सुनें जडमैं आपा माने है। अर परकौं कहै- हमकों दुःख यह दे है । यामैं शक्ति दुःख देनेकी नाहीं। विरानै सिर झूठा उलाहना दे है अपनी हरामजादगीकों न देखै है । अचेतनकों नचावत फिरत है, सो लाशहु न आवत है । मडेसौं सगाई करि अब हम इससौं ब्याह करि संबंध करेंगे सो ऐसी वात लोकमैंहूं निंद्य है । तुम तो ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ८१॥ अनंतज्ञानके धारी चिदानंद है । अनादि झूठी विडंबना जडसौं आपा माननैंकी मेटौं। तुम एक परमानि छांडौ । पराचरणहीतैं तुमारा दर्शन ज्ञानमैं लाभ भया है। देखने जानने” जो बंध, तातो सिद्ध लोकालोककौं देखत है, जानते हैं तेहू बंधते तिसतै परिणाम तादात्म्य नाहीं । तातें सिद्धभगवान न बंधै हैं। परिणामही, संसार परिणाम ही मोक्ष मानि परिणामकै है रागद्वेष मोह परिणाम करै । इनका जतनहूं परणाम करै ज्ञानदर्शनमैं रागदोष नहीं, वै देखवे जानवे मात्र है। इसकी विकारतात वैहू विकारी कहावे । देखना जानना राग देष मोह करि होय तो बंधै, राग द्वेष मोह न होय तो न बंधै । इस परिणाम शुद्धता अभव्यकैं न होय तातें ज्ञानदर्शन शुद्ध न होय । भव्यकै परिणाम स्वरूपाचरणके होय तात ज्ञानदर्श शुद्ध होय । उक्तं च पद्मनन्दि- पचीसीमध्ये, “स्वानुष्ठानविशुद्धे दृग्बोधे जायते कुतो जन्म ॥
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ८२ ॥ उदिते गभस्तिमालिनि किं न विनश्यति तमो नैश्यम् ॥१॥ कोई प्रश्न करै--वस्तु देखिये नाहीं जानिये नाही परिणाम वामें कैसे दीजिये? ताको समाधान-- पर दीखता है जानिये है सो परका देखनेवाला उपयोग है तो देखे है, ज्ञान है तो जाने है। उपयोग तौ ठावा (?) भया नास्तिरूप हुवा, जो यह उपयोगे गहखां तिसहीमें परिणाम धरि थिरता धरि आचरण करि विश्राम गहूं। येताही परिणाम शुद्ध करनेका काम है। उक्तं च-“उववोगमई जीवो” इतिवचनात् जारौं परिणाम वस्तु वेद्यस्वरूपलाभ ले, वस्तुमैं लीन होय है । स्वरूपनिवास परिणाम ही करै हैं । उत्पाद व्यय ध्रुव परिणाममें आया, उत्पादव्ययध्रुवमें सत् भया । सत् तामें स्वरूप सब आया, तातें परिणामशुद्धतामैं सब शुद्धता आई ॥ उक्तं च- जीवो परिणामयदा सुहेण असुहेण चासुहो असुहो। सुद्धेण तदा सुद्धो परिणामो होदि सम्भावो॥
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ८३ ॥ परिणाम सर्व स्वस्वरूपका है। पराचरण दोय भेद है-द्रव्यपराचरण-भावपराचरण, नोकर्म उपचार पराचरण है, परंपराकरि अनादि उपचार है ॥ वा देहका धारण सादि उपचार है। द्रव्यकर्मजोग अनादि उपचार है। भावकर्म अशुद्धनिश्चयनयकरि है। द्रव्य- कर्मनोकर्मका द्रव्यपराचरण उपचारतें है। भावपराचरण रागद्वेषमोह है तिसका आचरण है। कोई प्रश्न करै- जु रागादि जीवके भाव हैं परभाव सपरसादि हैं। रागादिककों पर- भाव क्यों कहे ? ताका समाधान- शुद्धनिश्चयनय रागादि जीवके नहीं, येभी पर हैं, काहेरौं भावकर्म ये हैं इनके नाशर्ते मुक्ति है। पर हैं तो छुटै हैं । तातै परही कहिये । जब यह रागादिकौं अपनें न मानेगा भवबंधपद्धति मिटैगी। तिसतै पररागादि तजि शुद्ध दर्शन ज्ञान चारित्र हैं। आप जानि ग्रहै यह मुक्तीका मूल है । परिणाम जीधै कौंधुकै जैसा हैं । तातैं परवोर छोडि स्वरूपमै लगाय निज परिणाम हैं। उत्पादव्यय- ध्रुव षद्गुणी वृद्धि हानि अर्थक्रियाकारक परिणाम" सधै हैं ।
॥ अनुभवप्रकाश ।। पान ८४ ॥ ॥आगें देवाधिकार लिखिये हैं। काहैते देवतें परममंगलरूप निजानुभव पाईये हैं। तातें देव उपकारी हैं। देव परमात्मा है। अरहंत परमात्मा साकार है। शरीरयुक्त हैं। तातै सिद्ध निराकार हैं । किंचून चरमशरीरतें आकार तातें साकार भी कहिये हैं। अरहंतकै अघातिकर्म रहे तातें बाह्य विवक्षामैं च्यारि गुण व्यक्त न भये । ज्ञानमें सब व्यक्त भये । सो कहिये हैं। नामकर्म मनुष्य गतिरूप है। तातें सूक्ष्म बाह्य नहीं। केवलज्ञानमैं व्यक्त है । वेदनी है तातें बाह्य अबाधित नहीं। अंतरमैं ज्ञानमें व्यक्त है। अवगाह बाह्य नहीं। आपतें ज्ञानमैं व्यक्त है। अगुरुलघुगोत्र” बाह्य व्यक्त नहीं, ज्ञानमैं है । यह अघातिहू व्यक्त नाव न पाया। नामस्थापनाद्रव्यभाव पूज्य हैं अरहंतके नाम लेतही परमपदकी प्राप्ति होई ॥ उक्तं च- जिन सुमरो जिन चिंतवो जिन ध्यावो सुमनेन ॥
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ८५ ॥ जिन ध्यायंतहि परमपय लहै इक क्षणेन ॥ १॥ जिनथापनाते सालंबध्यानकार निरालंबपद पावै है । कैसी है थापना ॥ उक्तं च किं ब्रह्मैकमयी किमुत्सवमयी श्रेयोमयी किं किमु । ज्ञानानन्दमयी किमुन्नतमयी किं सर्वशोभामयी ।। इत्थं कि किमिति प्रकल्पनपरैस्त्वन्मूर्तिरुदीक्ष्यता । किं सर्वातिगमेव दर्शयति स ध्यानप्रसादान्महः॥१॥ मोहोदामदवानलप्रशमने पाथोदवृष्टिसमः । स्रोतोनिझरणीसमीहतविधौ कल्पेन्द्रवल्ली सताम् ॥ संसारप्रबलान्धकारमथने मार्तण्डचण्डयुति-। जैनी मूर्तिरुपास्यतां शिवसुखे भव्यः पिपासास्ति चेत् ॥ स्वसंवेदनरूप वीतरागमुद्रा देखि स्वसंवेदभावरूप अपना स्वरूप विचारै- पूर्व ॥ अनुभवप्रकाश ।। पान ८६ ॥ गुणकों ये सराग थे, राग मेटि वीतराग भये। अब मैं सराग हौं। इनकीज्यौं राग मेटौं तौ वीतराग मेरा पद मैं पावौं । निश्चयमैं हूं वीतराग हौं । उक्तं च--- * पिच्छहु अरहो देवो पच्छरघडियो हु दरसय मग्गं” इतिवचनात् ॥ इस स्थाप- नाके निमित्त तिहुंकाल तिहुंलोकमैं भव्यजीव धरम साधै हैं । तारौं स्थापना परम पूज्य है। द्रव्यजिन द्रव्यजीव सोहू भाव पूज्य हैं। तातै पूज्य भावि नय । अथवा तीन कल्याण तक द्रव्यजिन हैं। सो पूज्य हैं । भावजिन समवसरणमण्डित अनंत. चतुष्टय युक्त भव्यनकौं सारै। दिव्यध्वनितें उपदेश देयकरि साक्षात मोक्षमार्ग वर्षा करै परमातमा भावजिन कहिये ॥ आरौं सिद्धदेवका वर्णन कीजिये हैं ॥ सिद्ध निराकार परमातमा है । अनंतगुणरूप भये अपने अनंतसुखकौं गुणनिकरि पर्यायतें वेदि, द्रव्य- अरु भोगवे हैं । लोकशिखर परि तिष्ठे हैं। षड्गुणी वृद्धि हानि अर्थ पर्याय किंचून चरमदेहत प्रदेशनिकी आकृति आकार व्यंजनपर्याय ! उक्तं च---- ॥ अनुभवप्रकाश ।। पान ८७ ॥ मय नग योग लि मूसिमें जार स अंबर होय । पुरुषाकारें ज्ञानमय वस्तु प्रमानौं सोय ॥ देवकों जानै तब स्वरूप अनुभव होय है। इति देवाधिकार । ॥ अथ ज्ञानाधिकारः॥ ज्ञान लोकालोक सकलज्ञेयकों जानें निश्चय जाननरूप स्वरूप है ऐसी ज्ञानकी शक्ति है । संसार अवस्थामैं अज्ञानरूप भई है। तोऊ निश्चय निज शक्ति न जाय है । बादरघटाके आवरण” सूर्यतेज न जाय, यौँ ज्ञानावरण ज्ञान न जाय आवस्खा जाय नाश न होय । ज्ञान सव गुणमैं बडा गुण है। इसमें अनंतगुण व्यक्त जानें ॥ ज्ञानविना ज्ञेय न जान्या पखा। ज्ञेयविना जानवा योग्य कछु भी न होता यातें ज्ञान प्रधान है । अनंतगुणात्मवस्तु तौऊ ज्ञानमात्र ही है। आचार्य बहु ग्रन्थनमें आतमा ऐसौ कह्यौ । काहैतें “लक्षणप्रसिद्ध्या लक्ष्यप्रसिद्धयर्थम्” जैसे ॥ अनुभवप्रकाश || पान ८८॥ मन्दिर श्वेत कहिये मन्दिर श्वेतादि बहुगुण धेरै हैं । तथापि दूरितें श्वेतगुणकरि भासै तातें मुख्यतातै श्वेत मन्दिर कहिये । प्रसिद्ध लक्षण आतमाम ज्ञान है, तातें ज्ञान- मात्र आतमा कह्यौ । एक एक गुणकी अनंत शक्ति अनंतपर्याय गुणकी एक अनेक भेदादिसब जान, ज्ञानविना वस्तुसर्वस्व निर्णयरूप स्वरूपकू न जानें, तातें ज्ञान प्रधान है। मतिज्ञानादि ज्ञानके पर्याय हैं। सो क्षयोपशम ज्ञान अंश भेद शुद्ध भये। तातै पर्याय लोकालोक जानें ज्ञेयाकार ज्ञानपर्यायकरि है। ज्ञेय नाश होत परि ज्ञाननाश नाहीं तातें जेतौ ज्ञेय तेतौ ज्ञान मेचक उपयोगलक्षण ज्ञान उपचारतें ज्ञानमैं ज्ञेय है। ताते वस्तुस्वरूपमैं ज्ञेयकै विनाशता, ज्ञानविनाश नाहीं ।। कोई तर्क करै-ज्ञानमैं सकलज्ञेय उपचारतें हैं। तौ सर्वज्ञपद उपचरित भयो उपचार झूठ है। तो कहा सर्वज्ञपद झूठ भयो? ताको समाधान--जाकै उपचार- हीमात्रमैं लोकालोक भास्यौ तौ वाकै निश्चयज्ञानकी महिमा कौंन कहै? यह ज्ञान ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ८९ ॥ स्वसंवेदनही भया सबकौं जाने, आपके जाने परका जानना थपै, स्वका जानना थप है। परकी उपेक्षा आप है आपकी उपेक्षा पर है। विवक्षाः वस्तुसिद्धि है, ज्ञानतें स्वरूपानुभव है। यह अज्ञेयाधिकार लिखिये । “ ज्ञातुं योग्यं ज्ञेयं जानवेयोग्य पदार्थकों कहिये । सो पदार्थकी तीन अवस्था हैं। द्रव्य अवस्था-- गुणअवस्था--पर्यायअवस्था ॥ द्रव्यअवस्था मुख्य है। काहेत? पदार्थ द्रव्यअवस्था न धरै तौ द्रव्यविना गुणपर्यायका व्यापना न होय, तब द्रव्य न होय, तब पदार्थ न होय, ताक् द्रव्यअवस्था मुख्य है। पीछे गुणअवस्था है। काहेत? गुणविना द्रव्य न होय । तातें “गुणसमुदायो द्रव्यं ऐसा जिनवचन है । पर्यायअवस्था न होय तौ वस्तुकौं परणावै कुन ? । उत्पाद व्यय ध्रुव न सधै, षड्गुणी वृद्धिहानि न होय, तब अर्थपर्यायका अभाव भये, वस्तु अभाव होय, तातें पर्यायअवस्थातें सर्वसिद्धि है।
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ९० ॥ द्रव्य गुणपर्यायकौं ब्यापै, गुण द्रव्यपर्यायकों व्यापै, पर्याय गुणद्रव्यकों व्यापै, तीनों अवस्था पदार्थकी है । पदार्थ सत्वअवस्थाकरि अस्ति है, परचतुष्टय अवस्थात नास्ति है, गुणअवस्था अनेक है, वस्तुअवस्थातें एक है, गुणादिभेदकरि भेदरूप है, अभेदवस्तुस्वरूपकरि अभेद है, द्रव्यकरि नित्य है, पर्यायकरि अनित्य है, शुद्धनि- श्चयतें शुद्ध है, सामान्यविशेषरूप वस्तुरूप है, वस्तुत्व है, द्रव्यके भावकौं धरै द्रव्यत्व है, प्रमेयके भावकों धारै प्रमेयरूप है, अगुरुलघुके भावकों धरै अगुरुलघु अवस्था है, प्रदेशकौं धरै प्रदेशरूप है, अन्यत्वगुणलक्षणभेद अन्यकरि अन्यत्व है, स्वपरकरि अन्य है, नानापदार्थतें अन्य है, द्रव्यत्व है, पर्यायत्व है, सर्वगत अप्रदेशत्व है, मूर्त है, अमूर्त है, सक्रिय अक्रिय चेतन अचेतन कर्तृत्व अकर्तृत्व भोक्तृत्व अभोक्तृत्व नाम उपलक्षण क्षेत्र स्थिति संथान सरूप फल द्रव्य क्षेत्र काल भाव संज्ञा संख्या लक्षण प्रयोजन तत्स्वभाव अतत्स्वभाव सप्तभंगरूप अन्योन्यगुणकरि सिद्धिगतहेतुत्व स्थितिहेतुत्व ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ९१ ॥ अवगाहहेतुत्व वर्तनाहेतुत्व चेतनत्व मूर्तत्व विशेषगुण पदार्थ सामान्यविशेष स्वभाव धेरै हैं । नानापदार्थ एकपदार्थकरि जैसी विवक्षा होय तैसी समझि लेणी ॥ पदार्थ सत्तारूप है। सत्ता- महासत्ता अवान्तरसत्ता दोय भेद लीया छ। सत असत्वं त्रिलक्षणं अविलक्षणं एकत्वं अनेकत्वं सर्वपदार्थस्थितत्वं एकपदार्थस्थितत्वं विश्वरूपं एकरूपं अनंतपर्यायत्वं एकपर्यायत्वं द्रव्य ऐसा द्रव्यभाव सर्व द्रव्यमैं महासत्ता जीवद्रव्य पुद्गलद्रव्य स्वरूपरूप वर्ते । अवांतर सत्ता द्रव्यसत्ता, अनादिअनंतपर्यायसत्ता, सादिसांतस्वरूपसत्ता तीन प्रकार । द्रव्यस्वरूपसत्ता गुणसत्ता पर्यायसत्ता गुणसत्ताका अनंतभेद ज्ञानसत्ता दरसनसत्ता अनंतगुणसत्ता पृथक्तभेद न छे । अनन्यत्वभेद छ । जेते कछु निज द्रव्य गुण पूर द्रव्यगुण हैं । जतीक सब द्रव्यनकी अतीत अनागत वर्तमानपर्याय तीनकालके नवपदार्थ द्रव्य गुण पर्याय उत्पाद व्यय ध्रुव सब ज्ञेयनाम आगममैं कह्या है। ज्ञानगोचर जो कछु होय, सो सव ज्ञेयनाम जानौं ज्ञातुं ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ९२ ॥ योग्यं ज्ञेयं” यह ज्ञेयाधिकार ज्ञेय जानि परकौं व्यंजन करै निज ज्ञेयकौं जानि स्वरूपानुभव करणां॥ ॥ आगें निजधर्माधिकार कहिये हैं । निजधर्म वस्तुस्वभाव सो आतमा निजधर्म निर्विकार सम्यक् यथारूप अनंत- गुणपर्यायस्वभाव सो धर्म कहिये । निश्चयज्ञानदर्शनादि अपना धर्म है। जीव निज- धर्म धरतही परमशुद्ध है । निज कहिये आप, तिसका धर्म कहिये स्वभाव, सो निजधर्म कहिये। अपने स्वभावरूप सब पदार्थ हैं। उनका धर्म उनका निजधर्म है। आतमामैं है । तातें दर्शन ज्ञानहीकौं निजधर्म ऐसा मति कहौ । ताको समाधान-- स्वभाव तौ सब सबही कनै है। उनका धर्म उनका स्वभाव यह तौ यौही है। परितारण धर्म, सजीवधर्म , प्रकाशधर्म , उनके धर्मकौं प्रगटै । ऐसा धर्म परमधर्म, हितरूपधर्म, असाधारणधर्म, अविनाशी सुखरूपधर्म, चेतनापाणधर्म, परमेश्वरधर्म, सर्वोपरिधर्म, ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ९३ ॥ , अनंतगुणधर्म, शुद्धस्वरूपपरिणतिधर्म, महिमा अपारधारक धर्म, निजशुद्धात्मस्वभा- वरूपधर्म, सो निजधर्म है । इनका विशेषभेद कहिये हैं। यह अनादिसंसारमैं जीव कर्मयोगते जन्मादिदुःख भोगवै हैं। इस परधर्मकों निजधर्म मानै हैं । तातै दुःख पावै हैं । यह तो सांच है। काहेत? जो सिरदार प्रधान पुरुषकौं निंद्यमैं गिणै सो दण्ड है । निंद्यदेहमैं चेतनधर्म मानें, सो दुःख पावैही पावै । शुद्धचैतन्यधर्मकौं जब धर्म जानै तब संसारतारणधर्म अनंतचेतनारूपधर्म तातें सुजीव- धर्म स्वज्ञेय परज्ञेय प्रकाशै, यात प्रकाशधर्म सव द्रव्यनिके धर्म प्रगट यानैं कीये उनके धर्मकौं प्रगटै ॥ सव” उत्तम यातै परधर्म धर्म निजरूपते अनंतसुख होय । यात हितधर्म औरमैं न पाइये । यातें असाधारणधर्म अविनाशी आनंद सहजरूप तातें अविनाशी सुखरूपधर्म चेतनाप्राण धरै, तातें चेतनाप्राणधर्म परमेश्वर सहजरूप ऐसे स्वभावमय परमेश्वर धर्म सवतै उत्कृष्ट है । तातें सर्वोपरि धर्म अनंतगुण है स्वभाव ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ९४ ॥ जाको तातें अनंतगुणधर्म शुद्धस्वरूप सदा परणमै शुद्ध भयें । तातें शुद्धस्वरूपपरि- णतिधर्म अपारमहिमाकों लीये । तातें अपारमहिमाधारक धर्म अनंतशक्तिकों धरै ॥ अनंतशक्तिरूप धर्म अनंतपर्याय एक गुणकी, ऐसे अनंत गुण अनंतमहिमा- कौं धरै, सो निजधर्मकी महिमा कहांलौं कहिये ? । एकोदेश निजधर्म धरैहूं संसार- पार होय है। काहेत? एकोदेश भये सर्वोदेश होयही होय । तातें जानियौं परधर्म- ते अनंतदुःख, निजधर्मते अनंतसुख ॥ यातें निजधर्मकों धारि अपना परमेश्वरपद प्रगट कीजै । निजधर्मकी धारणा अनुभव होय । निजधर्म भये अनुभव होय । यात अनुभवसार सिद्धिनिमित्त निजधर्म अधिकार कह्या ॥ ॥ आणु मिश्रधर्मअधिकार कहिये हैं । सो मिश्रधर्म अंतरात्माकै है, सो काहेते सम्यक् स्वरूप श्रद्धान जेते कषाय अंश हैं तेते रागद्वेषधारा है। आत्मश्रद्धाभावमैं आनंद होय है। कषाय सर्वथा न ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ९५ ॥ गई मुख्य श्रद्धाभाव गौण परभाव एक अखण्ड चेतनाभाव सर्वथा न भया, ताते मिश्रभाव है । अज्ञानभाव बारमैतक एकोदेश ज्ञानचेतना है। अरु कर्मचेतनाभी है। तातें मिश्रधारा है। स्वरूपउपयोगमैं प्रतीत भई । परि शुभकर्मकी धारा वहै है। तिनसौं रंजकभाव कर्मधारामैं है । परश्रद्धानस्वरूप मुक्तिकारण है। भववाधा मेट- नकौं समर्थ है। ऐसा कोई कर्मधाराका दुर्निवार आप है। प्रतीतिमैं स्वरूप ठावा कीया है । तौहू सर्वथा न्यारा न होय है, मिश्ररूप है। कोई प्रश्न करै-कि, सम्यक्- गुण सर्वथा क्षायिकसम्यग्दृष्टिकै भया है वा न भया है? ताकौं समाधान कहौ- जो कहुगे, सर्वथा भया, तौ सिद्ध कहौ । काहेत? एकगुण सर्वथा विमल भये सब शुद्ध होय सम्यक्गुण सब गुणमैं फैल्या है, सम्यग्ज्ञान सम्यग्दर्शन सब गुण सम्यक् भये । सर्वथा सम्यग्ज्ञान नहीं, एकोदेश सम्यग्ज्ञान है । सर्वथा ज्ञान सम्यक् होता तौ सर्वथा सम्यक् गुण शुद्ध होता, तातें सर्वथा न कहिये । जो किंचित् सम्यक्गुण ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ९६ ॥ शुद्ध कहिये, तौ सम्यक्गुणका घातक मिथ्यात्व अनंतानुबंधी कर्म था सो तो रह्या । जिस गुणका आवरण जाय सो गुणं शुद्ध होय । तात किंचत् हूं न वणै ॥ सो कैसे है, सो समाधान करिये है । सो अवरण तौ गया परि सब गुण सर्वथा सम्यक् न भये । आवरण गयेते सम्यक् सब गुण सर्वथा न भये तातै परमसम्यक् नाहीं। सवगुण साक्षात् सर्वथा शुद्ध सम्यक् होय तब परमसम्यक् ऐसा नाम होय ॥ विवक्षाप्र- माणः कथन प्रमाण है। तिस दर्शनपरि पौगलिक स्थिति जैसैं नाश भई तबही इस जीवका जो सम्यक्त्वगुण मिथ्यात्वरूप परणम्या था, सोई सम्यक्गुण संपूर्ण स्वभावरूप होय परणम्यां प्रगट भया । चेतन अचेतनकी जुदी प्रतीतिसौं सम्यक्तगुण निज जाति स्वरूप होय परणम्या, तिसका लक्षण 'ज्ञानगुण अनंतशक्ति न करि विकाररूप होय रह्या था, तिन गुणकी अनंतशक्तिविर्षे केतेक शक्ति प्रगट भई । सामान्यसौं नाम भयो । मति श्रुति कहिये । अथवा निश्चयज्ञान श्रुतपर्याय कहिये । जघन्यज्ञान कहिये।
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ९७ ॥ अवर सर्वज्ञानशक्ति रही, ते अज्ञान विकाररूप वगै है। इन विकारशक्तिनकौं धर्म- धारारूप कहिये । तैसेंही जीवकै दर्शनशक्ति अदर्शनरूप होयगी । तैसेंही जीवकै चारित्रकी केतेक चारित्ररूप केतेक अवरविकाररूप हैं। ऐसे भोगगुणकी सब गुण जेतेक निरावरण सो शुद्ध । अवर विकार सो सर्व मिश्रभाव भया । प्रतीतिरूप ज्ञानमैं सर्वशुद्ध श्रद्धाभाव भया। परि आवरणज्ञानका तथा और गुणका लग्या ह । तातें मिश्रभाव है स्वसंवेदन है । परि सर्वप्रत्यक्ष नाहीं । सर्वकर्मअंश गये शुद्ध है । अघाति रहै शुद्ध है । घातियानाश” परि सकलपरमातमा है। प्रत्यक्ष ज्ञान तो भया है । सिद्ध निकल सकलकर्मरहित परमातमा है । अंतर आतमाक ज्ञानधारा कर्मधारा है । कोई प्रश्न करै-जो वारमैं दोय धारा कि एक ज्ञानधाराही है? जो ज्ञानधाराही है, तो अंतर आतमा मात कहौं । जो दोय धारा है तौ वारमै मोहक्षय भयो राग द्वेष मोह सब गये दूसरी कर्मधारा कहां रही? ताको समाधान-ज्ञान परोक्ष है केवलज्ञाना.
A ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ९८॥ वरण है। ताः अज्ञानभाव वारमैतक है । तातें अंतर आतमा है । प्रत्यक्षज्ञानविना परमातमा नाहीं । कषाय गये परि अज्ञानभाव है । तातै परमात्मा नाहीं अंतर है, वारमैं अज्ञान कहा? ताको समाधान- केवलज्ञानविना सकलपर्याय न भासै सोही अज्ञान निज प्रत्यक्षविनाहू अज्ञान है । तातैं अज्ञानसंज्ञा भई । यह मिश्रअधिकार ॥ आगैं, निश्चयकरि वस्तुका स्वरूप जैसा है, ताका कछु वर्णन कीजिये है । वस्तु निज अपनां स्वरूप अनंतगुणमय तिनमैं दर्शन ज्ञान चारित्र प्रधान काहेत ? देखन जानन परिणवनकरि, वेदन” रसास्वाद अनुभव होय, तहां सुख कित प्रगटे, तिनकरि चेतना जानी परि, तब चेतनसत्ता, चेतनवस्तुत्व, चेतनद्रव्यत्व, प्रमेयत्व, प्रदेशत्व ये गाये। तातें दर्शन ज्ञान चारित्र जीववस्तुका सर्वस्व है। द्रव्य गुण पर्याय ये वस्तुकी अवस्था है । अनादिनिधन वस्तु अखण्डचेतनारूप वर्ते है। परि अनादिकर्म- जोगते अशुद्ध होय रही है । सुखनिधानकों न जानें है, तोऊ शुद्धखरूप है (A ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ९९ ॥ जैसे काहू. कोई एक ज्ञानवान पुरुषकौं पूछा- हमकौं शुद्धचेतनकी प्राप्ति बताओ ॥ तब ता पुरुषनें कह्या एक अमुका ज्ञानवान है तापासि जावो, तुमकौं वो बतावैगा, प्राप्ति करैगा । तब वो गयो । जाय, प्रश्न कियो-हमकू चेतनकी प्राप्ति करौ। तब तासौ कयौ, जु तुम एक दरियावमै मछ रहै है, तासमीप जावो । तुमकों वो मछ चैतन्यप्राप्ति करैगो । तब वाके उपदेशसौं वो नर ता मछसमीप गयो, जाय प्रश्न कीयो, हमको शुद्धचैतन्यकी प्राप्ति करौ। तब मछ ऐसौ वचन कह्यौ, हमारौ एक काम है, सो पहलै करो, तो पीछै तुमकौं चिदानंदमैं लीन करै । तुम बडे संत हौ, हमारो कार्य काहू. अबतक न कीयो, तुम पराक्रमी दीसौ हौ । तातें यह नियम है, हमारो काज कीयां, अवश्य तुमारो काज करेंगे । ठीक जानौं तब वो पुरुष बोल्यौ, तुमारो कारिज करौंगौ संदेह नाहीं करौ । तब मछ. वासौं कह्यौ, हम बहोत दिनके तिसाये या दरियावमैं रहे हैं। हमारी तृषा न गई । पाणीको जोग न ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान १००॥ जुखौ । कहीँ जतनकरि जल ल्यायो, तुम बडो उपकार करौ, हमारी तृषा मेटौ, महाजनकी चाल है परदुःख मेंटे। तातै यह उपगार करौ हम तुमकौं चिदानन्द प्रत्यक्ष दिखाई प्राप्ति करेंगे। तब वो पुरुष बोल्यौ तुम ऐसे काहे कहौ । जलसमूहमांहि तुम सदाही रहो हौ, ऐसे मति कहौ, जो, जल लावो, दरियाववोर देखौ, यह जलसौं प्रत्यक्ष भखौ है। तब मछ बोल्यौ, ऐसे तुम कहत हो, सो यह बात तुम मानत हो, तो तुम चिदानंद प्रत्यक्ष हो, चेतना है तो ऐसो विचार तुमनें कीयो है। अब तुम हमकौं पूछण आये हौ, ता चिदानंद हंस परमेश्वर तुमही हौ । संदेह त्यागौ थिर होइ । आपणौ चैतन्यस्वरूप अनुभवौ परके अनादि जोग में हूं आतमा जैसाका तैसा है, परमें अत्यन्त गुप्त भया है। तोऊ देखनेका स्वभाव न गया। ज्ञानभाव न गया। परिणाम न भया । परमैं बरननेते आवस्या, मलिन भया परि निश्चयकरि अखण्ड ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान १०१॥ स्वरूप चिदानंद अनादिका है, सो ज्यौंका सौं बण्या है। कछु घट्या बढ्या नाहीं भरमकल्पनाते स्वरूप भुल्या है। परहीको आपा मान्या तौ कहा भया ॥ जैसे कोई चिंतामणि करविर्षे भूलि काचखण्डको स्तन मांनि चलावै तौ वह रतन न होय, चिंतामणिको काच जानें, तौ काच न होय, चिंतामणिपणा न जाय। तैसैं आतमाकौं पर जानें तौ पर न होय । परकौं आपा जानैं तो आपा न होय । वस्तु अपने स्वभावका सजन काहू काल न करै । वस्तु वस्तुत्वकौं न तजै। अपने द्रव्यकौं न तजै । अपने प्रमाणकौं न तजै । अपने प्रदेशकौं न तजै । इत्यादि भावकों न तजै। तारौं अनादि प्रदेशप्रमाणकौं न तजै । शुद्ध अशुद्ध दोऊ अवस्थामैं अपनी द्रव्य क्षेत्र काल भावकी दशा न तजै । महिमा अनंत अमिट है । काहूंपै न मैटी जाय। निश्चयकरि जो है सो है। तातै निजवस्तुका श्रद्धान ज्ञानादि अनंतगुणमात्र जांनि अनंतसुख करै, तो सुखी होय । उपायतै उपेय पाइये है । सो उपेय आनंदघन पर- ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान १०२ ॥ मातमा परमेश्वर है । ताकी उपाय यातें करणौ, जु, संसारअवस्थामैंही शरीरमै कर्मबंधते गुप्त भयो परभावनातै दुःखी भयो अपनौं परमेश्वरपद न पायो । ताको उपाय होय तो उपेय पाइये, सो उपाय कहिये हैं । उपाय अपने स्वरूप पावनेका अपना उपयोग है। और उपाय तप जप संय- मादि शुभके हैं। जिनमें परमात्माकी भक्ति शुभपरि प्रतीति कारणभी है। कारण ध्यानतें कार्यकी सिद्धि है । ग्रन्थ उपदेशभी कारण है । परि उपभोग आये शुद्ध है। ताते उपयोगकी एकोदेश शुद्धकी चढनि ज्योज्यौं होय सौंत्यौं मोक्षमार्गकौं चढै ।। यह श्रीजिनेंद्रभगवानका निरावाध उपदेश है। सकल उपाधि अनादितें लगी आई। जब उपयोग कर समाधि लागै, साक्षात् शिवपन्थ सुगम होय । अनेक संत स्वरूप- समाधि धरि धरि पार भये । ॥ अब कछुक समाधिवर्णन कीजिये हैं ।।
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान १०३ ॥ समाधि तौ प्रथम ध्यान भये होय है । सो ध्यान चिन्तानिरोध एकाग्र भये होय है । सो चिन्तानिरोधं रागद्वेषके मिटें होय हैं । सो राग द्वेष इष्ट अनिष्ट समाज मिटे, मेटे है । तातें जीव जे समाधिवांछक हैं, इष्ट अनिष्टका समागम मेटि रागदेप त्यागि चिंता मेटि ध्यानमैं मन धरि थिरत्व स्वरूपमैं समाधि लगाई निजानन्द भेटौ स्वरूपमैं वीतरागतात ज्ञानभाव होय तब समाधि उपजै । वह अपने स्वरूपमैं मन लीन करै । द्रव्यगुणपर्यायमैं परिणाम लीन लय समाधि ऐसी होय है। इन्द्रादि संपदाके भोग रोगवत भासै । द्रव्य द्रवण” नाम पाईये है । गुणकौं वै सो द्रवत्वलक्षण परिणाममैं तातें गुणद्रव्यमैं परिणाम लीन होय । गुणद्रव्यमै द्रवत्व लक्षण है । तौ परिणामसौं द्रव्य गुण मिलि गये तातें द्रव्यत्वकी एकोदेशता साधककै ऐसी भई जो परीषह अनेककी वेदनां न वेदै हैं । रसास्वादमैं लीन आनंदरस तृप्ति भया । जब मन परमेश्वरमै मिलै लीन होय न निकसै परमानंद वेदै स्वरूप धारणा ।।
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान १०४॥ निरंतर जहां अचलज्योतिका विलास अनुभवप्रकाशमैं भया उपयोगमैं परिणाम लगे ज्योज्यौं दर्शन ज्ञान चेतना स्वरूप अनूप अखण्डित अनंतगुणमण्डितकों जानि रसास्वाद ले सौंत्यौं परविस्मरण होय पर उपाधिकी लीनता मिटै । समाधि प्रगटै । तब उत्कृष्ट सम्यकप्रकार स्वरूपवेत्ता होय ॥ सम्यग्ज्ञान भये वस्तुकी महिमा जाने । जानतां आनंद होय । ज्ञान ज्ञानकौं जानें । ज्ञान दर्शनकौं जानें । ज्ञान सब गुणकौं जानें । द्रव्यकौं जानें पर्यायकों जानैं एकोदेश भेद साधक ज्ञान जानैं । ज्ञानकरि वस्तु जानतां परमपद पावै । कासा सुख (संपूर्णसुख) परोक्षज्ञानहींमैं है। प्रत्यक्षप्रतीतिमैं वेदै है। तहां आनंद ऐसा होय है ।। संप्रज्ञात समाधिमैं दुःखादिवेदना प्रत्यक्ष भये हू न वेदै । विधान स्वरूप वेद- नेका है । मन विकार विलय जेते अंशकरि गया तेती समाधि भई । सम्यग्ज्ञानकरि जेता भेद वस्तुका गुणनकरि जान्या तेता सुख आनंद बब्या। विश्राम भये स्वरूप । अनुभवप्रकाश ॥ पान १०५ ॥ थिरता पाय समाधि लागी ज्ञानधारा निरावरण होय ज्योज्यों निजतत्व जाने त्यौंत्यौं विशुद्धता केवलकरि ज्ञान परिणति परमपुरुषसौं मिली, निज महिमा प्रगट करै। तहां अपूर्व आनंद भावका लखाव होय तब समाधि स्वरूपकी कहिये ॥ तहां अनादि अज्ञानका भ्रमभाव आकुलतामूल था सो मिट्या, अनात्म अभ्या- सके अभावतें सहज पदका भाव भावत, भववासना विलावत, दरसावत परमपदका स्थान गुणका निधान, अनलाम भगवान सकल पदार्थका जाननरूप ज्ञानकी प्रतीति प्रमाणभावकर नवनिधान आदि जगतका विधान झूठा भास्या । तब प्रकाश्या आत्मभाव लखाव आपके तैं कीना, तव चेतनभाव लीना, शुद्धधारणा धरी, निजभावना करी, शिवपदकौं अनुसरी, आनंदरससौं भरी, भवबाधा अवाधा जहां सदा मुदा सेती एती शक्ती बढाई, शिवसुखाई, चिदानंदअधिकाई, ग्रन्थग्र- न्थनमैं गाई, सो समाधित पाईये है ॥
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान १०६॥ स्वरूपानंद पद भेदी समाधितें होय है । वस्तुका स्वरूप गुणके जाने तें जानें। गुणका पुंज वस्तुमय है। वस्तु अभेद है। भेदगुण गुणीका गुणकरि भया। तातें गुणका भेद वस्तु अभेद जनाव.कौं कारण है। वितर्क कहिये-द्रव्यका शब्द ताका अर्थ भावना भावभुत श्रुतमैं स्वरूप अनुभवकरण कह्या । परमातम उपादेय कह्या । ताहीरूप भाव सो भावभुत रस पीव । अमरपद समाधितें है। विचार अनादि भवभावनका नाश चिदानंद द्रव्य गुण पर्यायका विचार न्यारा जांनि दर्शन ज्ञान वानिगीकौं पिछानि, चेतनमें मम होता ज्यौंज्यौं उपयोग स्वरूप लक्षणकौं लक्ष्य रसस्वाद पीवै, सो स्वपरभेद विचारने सार पद पाय समाधि लागी। अपार महिमा जाकी परमपद सो पाया। अनादि पर इन्द्रियजनित आनंद मानें था, सो मेट्या । ज्ञानानंदमै समाधि भई वस्तु वेदी आनंद भया । गुण वेदि आनंद भया। परिणति विश्राम स्वरूपमैं लीया, तब आनंद भया।
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान १०७॥ एकोदेश स्वरूपानंद ऐसा है ॥ जहां इन्द्रियविकार बल विलय भया है, मन विकार न होय, सुख अनाकुल रस रूप समाधि जागी है, “अहं ब्रह्म" "अहं अस्मि" ब्रह्म प्रतीति भावनमें थिरतामै समाधि भई; तहां आनंद भया । सो केतेक काललगु 'अहं' ऐसा भाव रहै, फिर समाधिमैं 'अहंपणा' तौ छुटै, 'अस्मि' कहिये है, ऐसा भाव रहै तहां दर्शन ज्ञानमय हौं, मै समाधि लागें हौं, ऐसा हू रहणा विचार है ॥ इसके मिटें विशेष ऐसा होय जो द्रव्यश्रुतवितर्कपणा मिटी । एकत्व स्वरूपमें भया एकताका रसरूप मन लीन भया समाधि लागी तहां विचारभेद मिट्या अनु- भव वीतरागरूप स्वसंवेदनभाव भया। एकत्व चेतनामें मन लागा लीन भया । तहाँ इन्द्रियजनित आनंदके अभावते स्वभाव लखावका रसास्वाद करि आनंद वढ्या तहां फिरि अस्मिभाव ज्ञानज्योतिमैं था सोभी थक्या ।
॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान १०८॥ आगें विवेकका स्वरूपका स्वरूप परिणति शुद्धीका ऐसा-जहां परमात्माका विलास नजीक भया तहां अनंतगुणका रस फिरि परिणाम वेदि समाधि लागी। निर्विकार धर्मका विलास प्रकाश भया। प्रतीति रागादिरहितभावनमैं मनोविकार बहोत गया । तब आगें अंश प्रज्ञात भया। तब परके जाननें विस्मरणभाव आया। तब केवलज्ञान अतिशीघ्रकालमैं पावै । परमात्मा होय लोकालोक लखावे । ऐसी अनुभवकी महिमा मनके विकार मिटें हैं। सो मनविकार मोहके अभाव भय मिटै है । सकलजीवकौं मोह महारिपु है। अनादि संसारी जीवकों नचाव है। चउरासीमें अरु संसारी हर्ष मानि मानि भवसमुद्रमैं गिर हैं, परै हैं। आपाकौं धन्य माने है । देखो चिठी ही भूलित कैसी पकरी है। नैक निजनिधि अनंतसुखदायक कौन सभारै है। यातें इनही जीवनकौं श्रीगुरूपदेशामृत पानक जोग्य है। इस मोह मिटै अनुभव प्रगटै सो कहिये-- ॥ अनुभवप्रकाश ।। पान १०९ ॥ प्रथम श्रीजिनेन्द्रदेव आज्ञा प्रतीति करै, तहां पार्छ भगवत्प्रणीत तत्व उपादेय विचारै । चेतन प्रकाश अनंतसुखधाम , अमल अभिराम, आत्माराम पररहित उपादेय पर हेय स्वपरभेदज्ञानका निरंतर अभ्यासतें शुद्धचैतन्यतत्वकी लब्धि होय तिहित राग देष मोह मिटै । कर्मसंवर होय । तब कर्म मिटवातें निजज्ञानतें निर्जरा होय । तव सकलकर्मक्षय निजपरिणाम हुवा भावमोक्ष होय । तब द्रव्यमोक्ष होयही होय । ताते भेदज्ञान अभ्यासतें परमपद सिद्ध सो भेदज्ञान उपजावाको विचार कहिये है । ज्ञानभाव जाननरूप उपयोग विभावभाव अपनें जान है । सो विभावके जाननेकी शक्ति आत्मा आपणी जान । जानि रूप परिणमन करै । ज्ञानरस पीवै विभावनकों न्यारे न्यारे जाने । विभावसुधाधारा ज्ञानरूपपरणाम सुधाधारा न्यारी । धारा दोन्यौ जानैः । पुद्गल अंश आठ कर्म शरीरभिन्न है जड है, । चेतन उपयोगमय है। इनमें विवेचन करै। जुदा प्रतीतिभाव करै, प्रत्यक्ष जड रहै। सदा जामैं चेतना प्रवेश न ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ११० ॥ होय । चेतना जड न होय यह प्रत्यक्ष सबं ग्रन्थ कहै सब जन कहै। जिनवाणी विशेषकरि कहै। अपनें जानहमैं आवै । शरीर जड अनंते त्यागे। दर्शनज्ञान सदा साथि रहवो कीया सो अबभी देखने जाननेवाला यह मेरा उपयोग सोही मेरा स्वरूप है। इस उपयोगी अनउपयोगी विचारत प्रतीति जड चेतनकी आवै । विभाव कर्मचेतना है। कर्म राग द्वेष मोह भावकर्म तिसमें चेतना परणाम है। तब चिद्विकार होय । इस चिदिकारकों आपकरि आपा मलिन कीया है। केवलज्ञानप्रकाश आत्माका विलास है । तिसकौं न सभार है। मोहवश” ग्रन्थकौं सुणै है अरु जाने है। शरीर विनसैगा परिवार धन तिया पुत्र येभी न रहैगे। परि इनसौं हित करै । नरकबंध परै । अनंतदुःखकारणकौं सुख समझै ॥ ऐसी अज्ञानता मोहवशकरि है । ताते ज्ञानप्रकाश मेरा उपयोग सदा मेरा स्वरूप है । सो सदा स्वभाव मेरा मैं हौं। कबहूं जिसका वियोग न होय अनंतमाहमा भण्डार ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान १११ ॥ अविकार सारसरूप दुरनिवार मोहसौं रहित होय । अनुपम आनंदघनकी भावना करणी । अंश अंश परका जडवा परजीव सब स्वरूपसौं भिन्न जानि दर्शन ज्ञान चारि- त्रादि अनंतगुणमय हमारा स्वरूप है। प्रतीतिमैं ऐसैं भाव करत पर न्यारा भासै विभाव ऊफदमल आपके न रमते भया । तिसतै भरम मेटि विभाव न होय स्वभाव प्रगटै अनादि अज्ञानतें गुप्तज्ञान भया । शुद्ध अशुद्ध दोऊ दशामैं ज्ञान शासती शक्ति कौं लीये चिद्विकारभाव क्रोधादिरूप भये होय सोही भाव मेटि निर्विकार सहजभाव आप आपमें आचरण विश्राम थिरतापरणामकार करै । जो बाह्यपरिणाम उठे है सो अशुद्ध है सो परिणामका करणहार अशुध्द होय है । बाह्य विकारमैं न आवै । चेतना नांव उपयोगरूप अपनी इस ज्ञायक शक्तिकी नीकै जान तो निजरूप अवा होय । प्रतीति चेतन उपयोगकी करत करत परसौं स्वामित्व मेटि मेटि स्वरूप रसास्वाद चढता चढता जाय । तब शुद्ध उपयोग स्वरस पूर्ण विस्तार पावै । तब कृतकृत्य नि.
॥ अनुभवप्रकाश। पान ११२ ॥ वसै। यह श्रीजिनेन्द्रशासनमें स्यादादविद्याके बलतें निजज्ञानकलाकौं पायअनाकुल पद अपना करै । इहां सब कहनेका तात्पर्य यह है । जो परकी अपना पति सर्वथा मेटि स्वरसरसास्वादरूप शुध्द उपयोग करिये । रागद्वेष विषमव्याधि है सो मेटि मेटि परम- पद अमर होय । अतीन्द्रिय अखण्ड अतुल अनाकुल सुख आप पदमैं स्वसंवेदनप्रत्यक्ष- करि वेदिये । सकल संत मुनिजन पंचपरमगुरुस्वरूप अनुभवकौं करै हैं। तारौं महान् जन जा पंथकौं पकरि पार भये सोही अविनाशीपुरका पंथ ज्ञानीजननकौं पकरणा अनंतकल्याणका मूल है। परिणाम चेतनाद्रव्य चेतनामें लीन भयें अचलपद ज्ञान- ज्योतिका उद्योत . होय है। एकोदेश उपयोग शुद्ध करि स्वरूपशक्तिकों ज्ञानद्वारमै जाननलक्षण करि जानै । लक्ष्यलक्षणप्रकाश आपका आपमैं भासै । तब सहजधारा वाही । निजशक्ति व्यक्त करता करता संपूर्ण व्यक्त करता करता संपूर्णव्यक्तत्ता करै। तब यथावत् जैसा तत्त्व है तैसा प्रत्यक्ष लखावै । देखो कोई भगल विद्याकरि - ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ११३ ।। कांकरेनकौं हरि हीरा मोती दिखावै है। बुहारीके तृणकौं सर्पकरि दिखावै है। तहां वस्तु लोकनकौं साची दरसै । परि साची नाहीं । तेसै परमै निज मांनि आपकों सुख कल्पै सो सर्वथा झूठ है । सुखका प्रकाश परम अखण्ड चेतनाके विलासमें है। शुद्धस्वरूप आप परकौं (खौ )जना करें तब पावै । वारवार विस्तार कहिणां इस वाखौ आवै है। अनादिका अविद्यामै पगि रहा है। मोहकी अत्यंत निविड गांठि पारी है। तातें स्वपदकी भूलि भई है। भेदज्ञान अमृतरस पीवै । तब अनंतगुणधाम अभिरामकी अनंतशक्तिकौं अनंतमहिमा प्रगट करें। यह सब कथनका मूल है। परपरिणाम दुःखधाम जानि भानि परकी मेटि स्वरस सेवन करणां अरु निदान परि दिष्टि कीजै। विनश्वर परदुःखमूलका सेवन अनादि कीया। जन्मादि दुःख भये। अब नरभवमैं संत संगते तत्वविचार कारण मिल्या तौ फेरि कहा अनादिभवसंतानकी बाधाके करणहार परभाव सेइये । जिसः अखंडित अनाकुल अविनाशी अनुपम अतुल होय सोहू भाव ।। अनुभवप्रकाश ।। पान ११४ ॥ करिये। जो भाव मनोहर जानि मोह करै है । अपने आतमाको झूठी अविद्याके विनो- दकरि ठग है। सकल जगत चारित्र झूठ बन्याही है, सो मोहतें न जाने है। जो स्वरस- सेवन तौ पर प्रीति रीति रंच हूं न धारै । अनंतमहिमाभाण्डारको ज्ञानचेतनामैं आपा अनुभवै । जो जो उपयोग उठै सौ मैं हौं ऐसा निश्चय भावनमै करै, तौ तिरही तिरै । अनादिका विचार करै । अनादिका पर आपा जानि दुःख सह्या । अव श्रीगुरुनें ऐसा उपदेश कह्या है । तिसकौं सत्यकरि मानतही श्रद्धातें मुक्तिका नाथ होय है । तातें धन्य सद्गुरु जिनौंने भवगर्भमेसों काढनेका उपाय दिखाया। ताते श्रीगुरुकासा उपकारी कोई नाहीं । ऐसें जानि श्रीगुरुके वचनप्रतीतिते पार व्हैना ॥ जेता अनुराग विषयनमैं करै है, मित्र पुत्र भार्या धन शरीरमैं करै है, तेता रुचि श्रद्धा प्रतीतिभाव स्वरूपमैं तथा पंचपरमगुरुमै करै, तो मुक्ति अतिसुगम होय । पंचपरमगुरुरागभी ऐसा है, जैसा संध्याका राग सूर्य अस्तताका कारण है प्रभातकी ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ११५ ॥ संध्याकी ललाई सूर्यउदयकौं करै है। ता विविध परमगुरुविना शरीरादिराग केवल ज्ञानकौं अस्तताकौं कारण है। पंच परमगुरुका राग केवलज्ञान उदयकौं कारण है। गते विशेषकरि परमधर्मके दाता परमधर्मका अनुभवराग परमसुखदायक है ॥ अर्थ अनंत अनर्थकौं करै, सो किसही अर्थ नहीं, अर्थ सोही परमार्थ साधै । तिसकरि कामसौं किस काम निजकामनासै काम सोही सुकाम सुधारै। धर्म मिथ्यारूप अनंतसंसार करै, सो कहा धर्म? सर्वज्ञप्रणीत निश्चय निजधर्म व्यवहार रत्नत्रयरूप कारण । मोक्ष सोही फेरि कर्म न बंधै , ऐसा विचारणा-जैसे दीपक मंदिरमें धरते प्रकाश होय तौ सब सूझै, तैसें ज्ञानीको ज्ञानप्रकाशसौं सब सूझै ॥ कैसैं ज्ञानकरि विचारै, शरीरमैं चेतन है, दिष्टिद्वारकरि देखै है। ज्ञानद्वारकरि जाने है । अपने उपयोगकरि आप चेतन हौं। आपा ऐसें जानै देहमैं देहकों देखने हारा मेरा स्वरूप चेतनरूप है । तौ जडकौं चलावै है, चेतनप्रेरक है। अचेतन अनु.
।। अनुभवप्रकाश ॥ पान ११६ ॥ पयोगी जड न देखै न जानै । यह तौ प्रसिद्ध है, जो देखै जाने । शरीर तौ गत्यंतर जीव होय, तब शरीर क्यों न देखै ? तातें यह देखनेजाननेंकरि आपा चेतनरूप प्रत्यक्ष वा करि स्वरूपकों चेतन मांनि अचेतनकै अभिमान तजनां मोक्षका मूल है ॥ शरीवासनाका त्यागी स्वरूप आपा अवगाढ चेतनस्वरूप करि भावना । उजड़कों वस्ती माने है। चेतन वस्तीकौं उजड मान है। ऐसी भुलि मेटी, चेतना- वस्ती शासती है। जहां वसै तो अपना अनंतगुणनिधान न मुसावै । निजधनका धणी परमसाह होय । तब अनंतसुखव्यापारमै अविनाशी नफा होय । अनादि परमैं आपा मान्या। परकौं ग्रहण करत परवस्तुका चोर भया जनमाहि दुःख दण्ड भोगवै है। विवेकराजाका अमल होय परग्रहण चोरी मिटै । तब आप साहपद धरि सुखी होय, तब निजपरिणतिरमणीकरि अपना निजघर थिर करै। अनादि अथिर- पदका प्रवेश था, ताकौं सागि अखण्ड अविनाशी पदकौँ पहुचै यह साक्षात् शिवमा- ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ११७॥ । गस्वरूपकौं । अनुभव यह शिवपद स्वरूपकौं, अनुभव त्रिभुवनसार, अनुभव कल्याण अनंत, अनुभव महिमाभण्डार, अनुभव अतुलबोधफल, अनुभव स्वरसरस , अनुभव स्वसंवेदन, अनुभव तृप्तिभाव, अनुभव अखण्डपद सर्वस्व , अनुभव रसास्वाद, अनुभव विमलरूप, अनुभव अचलज्योतिरूप प्रगटकरण, अनुभव अनुभवके रसमें अनंत- गुणकार रस है, पंचपरमगुरु अनुभव भये होंहिगे। अनुभवसौं लगेगे। सकलसंत महंत भगवंत तातें जे गुणवंत हैं, ते अनुभवकौं करौ। सकलजीवराशि अनुभवौ स्वरूपकौं । यह अनुभवपंथ निरगंथ साधि साधि भगवंत भये ।। परिग्रहवंत सम्यग्दृष्टिहू अनुभवकौं कबहू कबहू करै हैं, तेहू धन्य हैं । मुक्तिके साधक हैं।जा समय स्वरूप अनुभव करै है, ता समय सिद्धसमान अमलान आत्मतत्त्वकौं अनु- भवै है । एकोदेशस्वरूप अनुभवमैं स्वरूप अनुभवकी सर्वस्वजाति पहचानीहै । अनुभव पूज्य है, परम है, धर्म है, सार है, अपार है, करत उधार है, अविकार है, करै भवपार ॥ अनुभवप्रकाश ॥ पान ११८॥ है, महिमाको धारै है । दोषकों हरणहार है । याते चिदानंदको सुधार है । सवैया. देव जिनेन्द मुनीन्द सवै अनभौरस पीयके आनंद पायौ । केवलज्ञान विराजत है निति सो अनभौरस सिद्ध लखायौ। एक निरंजन ज्ञायकरूप अनूप अखण्ड स्वस्वाद सुहायौ । ते धन्य हैं जगमांहि सदैव सदा अनभौ निज आपकौं भायौ ॥ १॥ अडिल. यह अनभौ परकाश ज्ञान निज दाय है। करि याको अभ्यास संत सुख पाय है। यामैं (अनूप अरथ) सदा भवि सरद है। कहै दीप अविकार आपपदकौं लहै ॥ १॥ इति श्रीदीपचंद साधर्मीकृत अनुभवमकाश नाम ग्रन्थ संपूर्ण.
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VOYOYOY अनुभवप्रकाश समाप्त.
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