Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Prabhu Ke Marag Me Gyan Ka Prakash
Front matter
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मूल्यवान धावीतरागापनम प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश मद्गने श्रीविजयकसर हारतान्बहाराज श्रनुवारक- ब्रह्मचारी शङ्करदास जैन मत्री श्री प्रात्मानन्द जैन सभा, , . १९८० इस्वी सन् १९३२ प्रकाश- अम्बाला शहर। [सं० २४१ ma विक्रम स.
मनी, श्री प्रात्मानद जैन सभा, अम्बाला शहर। मुहक- - सत्यवत शमा, शानि, प्रेम शीतलागलो N समर्पण में इस पुस्तक को पूज्यपाद श्री श्री १००८ आचार्य देव श्री विजयबल्लभ सूरि के करकमलो में सादर अर्पण करता हूँ और उनका आशीवाद अपनी भात्म-शुद्धि के लिए चाहता हूँ। दासानुदास- शंकरदास जैन।
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दान-प्राप्ति-स्वीकार
निम्नलिसित दानी महाशयों ने इस पुस्तक की छपाई में
आर्थिक सहायता दी है।
१-ला० येनूराम सत्यपाल जैन नौजक्सा जीरा ८०)
२-ला० चादनमल रत्नचर जैन र
अम्पालाशहर
३-ला. राधामल “योतिप्रमाद वन अम्बालाशहर ५०)
-यानू कुन्नलाल पी० पी०टी निकोटर
(विवाह की प्रसनता में) २५)
यह सजन हमारे हार्दिक धयवाद के पात्र हैं। इन्होंने
अपनी शुभ कमाई का कुछ यश धार्मिक साहित्य के प्रकाश
नार्थ अपण कर यश और पुण्यापार्नन किया है। श्राशा है कि
अय महानुमार मा इनश अनुकरण करेंगे।
।
-प्रराशका
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मेरी प्रार्थना मान्यवर सजनो। इस पुस्तक के क्त्ता पूज्य योगीश्वर श्री १००८ स्वर्गवासी श्री विजय केसर सूरिजी महाराज हैं। मूल पुस्तक गुजराती भाषा में है। इम पुस्तक के पढ़ने से मुझे बहुत आनन्द और लाभ हुश्रा, इसलिए मेरी भावना हुइ कि मैं इस पुस्तक का हिन्दी भाषा म अनुवाद कतिस से हिन्दी भाषा के प्रेमी भी इम पुस्तर से लाभ उठायें। पुस्तक के पढने से प्रतीत होगा कि ग्रन्थक्त्ता ने जनता पर क्तिना उपकार दिया है। बडे-बडे गहन विपया को वैसी सरल रीति तथा युक्ति प्रमाण मे पणन दिया है। जो सजन ध्यान पूरक पढ़ेंगे, चे चाहे किसी भी मत मतान्तर के अनुयायी हों वे इस से अवश्य लाभ उठायेंगे। सुमाग्य अध्यापनरों द्वारा यह पुस्तक जैन विद्यालय, गुरुकुल और पाठशालामा में भी पढाइ जा सकती है। इतने लाम और गुणों को देख कर मैंने इस पुस्तक का गुजराती से हिन्दी भापा में अनुरा- क्यिा है। मेरा भावना थी कि पुस्तक का मूल्य कम से कम रक्सा जाय । निन सजनों ने दान देकर मेरी इस इन्या को पूर्ण क्यिा है ग्न का मैं आभार मानता हूँ। यद्यपि यह पुस्तक प्रागर प्रकार में छोटी है तथापि जान का भएडार है-इस में कोई भी सनेह नहीं ।
दि सजनगण इस पुस्तक को पर उस के पिपर । रिया में लायगे तभी- मैं अपने इस प्रपत्र सममगा। स पुस्तक के अनुमान तथा प्रकाशन में मुझे निम्नलि में सहायता मिली है (-ला पडित शशिभूपण शास्त्री । -भाई फूलचन हटाशा-पाटण । ३-ला ज्ञानच जैन एम. एम-मी । y-श्री पडित हसरान जा शास्त्रा। में उनको हार्दिक धन्यवाद दता हूँ। पुस्तक के अनुपात तथा छपाइ श्रादि में यदि नाना गई हो तो पाठगए मुझे क्षमा करें। निनात- शकर दामा मूल लेखक की प्रस्तावना इस पुस्ताकानाम 'प्रभु केमार्ग म ज्ञान या प्रश"इमलिए रक्या गया है कि इस पुस्तक में प्रथम् पृथक् विषय आत्मा को प्रकाशित करने वाले हैं। कर्म से बद्ध आत्मायें प्राय अज्ञानामृत होती हैं। अज्ञान ही अन्यार है और ज्ञान प्रकाश । प्रमु मार्ग में चलने हुए यति ज्ञान की ख्याति साथ हा वो मनुष्य बीड और पठिन मार्ग में चलता हुश्रा भी ठोकरा मे बच कर सीमा निश्चित स्थान पर पहुँच जाता है। एव प्रान भो माया प्रपच मठोर साने वाले नीर को पचा वर मीधा प्रभु मार्ग का पार ले जाता है। इस पुस्तक म अलग अलग अठारह विषय हैं और वे मर प्रमु मार्ग में ले जाने के लिए अपने अपने स्थान पर सहायक है। कई उनमे प्रहण करने के लिए, कई सममाने के लिए और का त्याग के लिए उपयोगी हैं। याग्य साधर अपनी योग्यता अनुमार इमो ग्रहण कर मरता है। इम पुस्तक को मैने म्वतनता मे नहीं लिसा । जैसे इसमें मेरे विचार है, मे ही दूसरे महानुभार ग्रन्थमाओं के भी हैं। मैन इन रिचारा का ममद इस पुस्तक म सार म्प से इम लिए पिया है कि ये मेरे विचारों के अनुकूल हैं। यदि इन विचारों मे विमी को लाभ पहुँचे तो इस लाभ के अधिरारी ये ही प्रथ क्त्ता होंगे | एक पूण् या नदी का पानी अमुा कारण से पीने मी mगाने जीता +1
?
स्वाार को हुइ पामना के कारण पानी पिलाना, यह
भी र प्रकार का पालजीगा लिए उपकार का
पारण मममा जाता है। यहां उद्देश्य इस पुम्ना रे लेपन म
रस्सा है। शेप वान यह है कि यदि मिमरा थन्केर म साद
नाय नो भा मुंह मीठा होगा, ममे मशय नहीं ।
1
रिपय अनुगमणिमा-(१) प्रेम श्रामबाप है, (क)जो
निम की सोन करे वह उमको पायगा । (३) श्रात्मा म्यनर है,
(१) काय कारण व नियम रिपय अचल है । (५) एकामना पूरी
ध्यान करना याग्य है । (६) कर्म का मत्ता । (७) पम की मता
तोडने का ज्ञान आत्मा को है । (5) पुस्पार्थ । (६) विचार और
इन्छा के पल श उपभोग । (१०) नार मी पनित्रता। (१९)
माया का न्याग ! (१२) मन्य की प्राप्ति के लिए नशा बग्लो ।
(१३) विचार शक्ति का प्रभाव । (११) प्राध्यामिर जीर।।१५)
मारलम्वन । (१६, २५) श्रात्मज्ञान की प्राप्ति के लिए रिम
प्रभार और कहाँ से प्रारम्भ करना । (१८) सुप और शान्ति में
लिए परमात्मा का स्मरणा यह दम पुनरपिय हैं।
वि० स. १९८४
भाषण पदी ३
रविवार
प्राचार्य श्री विनयकमर मरि
वोशनगर।
ॐ ह्रीं अहम् नम
प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश
प्रथम प्रकरण
[प्रेम]
।
मस्त सद्गुणों का मूल प्रम है। इस प्रेम का
आधार शरीर का सौन्त्य या धन की प्रचुरता
नहा । मुमे क्मिा मे भविष्य में लाभ होगा,
क्सिी मे महायता प्राप्त होगी यह विचार इस
प्रेम का आश्रय नहीं । परतु केवल सत्ता को
पहुँचा हु आत्मा अनन्त शक्ति वाला है और
'आत्मा हो परमात्मा है-सा मानकर आम दृष्टि में आत्मा पर
प्रेम करना ही वास्तविक प्रेम है। इसके अतिरिक्त अन्य प्रेम, प्रेम
नहीं किन्तु मोह है, राग है। दूसरों को शान्ति देकर आप
सुग्म मानना यह प्रेम है। प्रेमी, दूमरा को पवित्र बनाने का
कार्य करता है। प्रेम के विशाल राज्य म सद्गुण रूप अनेक
छोट छोटे राज्यों का ममावेश होता है । जहाँ प्रेम निवास
२ प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश करता है वहाँ हो पात्म ज्योति का प्रकाश है, प्रेम के भीतर आत्मा का अनुभव हाता है । जो सत्ता, शक्ति, राय और धन क अधिकार से प्राप्त नहीं होती, वह प्रेमी उपरेशक के वचन में नियाम करता है, जिस उपदेशा म प्रेम नदा उमका उपरेश चाह किनना हा दृमरो को मोहन याला क्यों न हो, पारिइत्य से परि पूर्ण क्या न हो ता भी उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता, "रममें विशेष अधिकता का युद्ध अनुभर नहीं हाता । प्रत्युन वह उपर आत्म जागृति और अन्तर्गय प्रेम के अभाव मे रूपमा और प्रभार हीन हा जाता है। जैसे श्रद्धा चिसा माध्य का माधन है वैस प्रभ साधन नहा किन्तु साध्य है और यह मान का फ्ल म्वरूप है। प्रेम को प्रकाशित करने का एक ही मार्ग है। और वह यह है कि दूसरा को दान देना । नान प्रेम का प्रणाली है इसके द्वारा प्रेम रूप जल, बाहर निकल कर दूमगे का शात परता है । माँगन याने याचों को पैसा देतायाराटाका टुक्डा नाकार न कार्य नहीं, परन्तु प्रेम, दरिद्रता के मूल कारण, दुनिया भर और अज्ञानिया के अज्ञान को दूर करा म ममर्थ है। प्रभु महावार ने अष्ट दन वाले चडकौशिर का भी, उमरा मूल तलार उमे सत्य मार्ग पर लाने का प्रयत्र किया । एक नमुदन वाले पर भा इतनी उतारता का होना, यह प्रेम का है। श्रद्ना महिमा है । मगमदव ने प्रभु महावीर म्यामा को ६ माम ना कल्पनावात करिये ' भगवान ने उनको बडे ही वैर्य म सहन रिया, भगवान् चाहते थे - इमरे बदल उस आत्मा ग - 9 ३ ३ प्रभु के माग में ज्ञान का प्रकाश कुछ उपकार हो जाय परन्तु उमे सोधि वीज सम्यकन्व की प्राप्ति न हो सकी। इस कारण भगनान के नेत्रों से जो अश्रुधारा यहा यही प्रेम की निमल धारा थी । यह रोता हुअा हृदय उम अभव्य जाप को वोध प्राप्त कराने म निप्पल हुश्रा । भगवान् के हृदय म एक क्रूर म र आत्मा के लिये भा स्निना प्रेम है यह इम उदा हरण म स्पष्ट नाना जा माता है । प्रभु शान्तिनाथ ने-पूर्व जन्म में मेघरथ राजा के जन्म म-य माया से बने हुए क्यूतर का याज के भय स मुक्त करन क लिये अपन शरीर का माँस काटकर दिया और थान स क्यूनर को छुडाया । इम कार्य की जड़ म प्रेम हा गर्भित है । क्मठ तपम्वी जीव ने ईर्या से पार्श्वनाथ प्रभु को नामिका ता जल वषा कर उसम डुबाने का प्रयत्न क्यिा, परन्तु भगगन न उमगो योधि बीन देकर अपने हा प्रेम मार्ग का पथिर बनाया । यहाँ पर भी प्रम ही अपना कार्य कर रहा है। नेमनाथ प्रभु ने गृहस्थाश्रम में अपने पिनाह क समय, नारात का भोजन देन के निमित्त इक्ट्ठे किये हुए पशुओं को मुक्त कराने म अपन ग्विाह का परित्याग कर दिया और मयासाश्रम म प्रविष्ट होगये । इम अपूर्व त्याग म उहाने समार को प्रम का माग पतलाया । मैतार्य मुनि ने, मोने के जी चुगने वाले पक्षी यो मुनार से बचाने क लिये मुनार क हाथ में अपने जीरन की आहुति देवर विश्वव्यापी प्रम की मुग्यता पतलाइ । मुनि मुव्रतस्वामा ने, भार के राजा को पार स अश्वमेघ यज्ञ में यलिशान होते हुए ET घाडे को पचाने के लिये, जीना के प्रेम के कारण एक रात्रि में - न ४ प्रभु क मार्ग मे ज्ञान का प्रकाश ६. योनन की यात्रा करने का महा कष्ट उठाकर वहाँ के राजा को प्रतिरोध देकर जो उन जीवों की रक्षा की था यह भैम की ही अपार महिमा का परिणाम है । गृहस्थाश्रम म भी त्यागिया की तरह धार्मिक जीवन विताने वाले मठ सुदर्शन न अभया रानी का बचाने के लिये मौन धारण कर, सूली पर चढना स्वीकार किया। नोर्थकर देवों के समरसरण में गाय मिर, वारा और वाय जिल्ला और चूहा, साँप और मोर ऐसे ही दूमर प्राणी-पितका परम्पर विरोध है- एक हा स्थान पर शान्तिपूर्व इक्ट्ठे बैठने हैं और अपना जाति विरोध भूल जाते हैं, इसमा यही कारण है कि श्रा तार देना ने अपने जीवन में विश्वव्यापी प्रेम को प्रष्ट पशु पक्षी भी प्रम को मिमी अंश तर समझते हैं। अपन प्रमा था नरफ वुत्ता अपनी पूछ हिला कर, घोडा हिनदिनाकर प प्रस्ट करता है। गाय भैंस अपने मालिक की तरफ प्रेम से बनी हैं और हाथों को निहा से चाट कर प्रेम को जतलाता हैं। मचे प्रेमा मनुष्यों का उपदेश प्रायः निरर्थक नहीं जाता। लोग उन्हें हृदय मे चाहते हैं, उनक पचनों में श्रमाय शशि होती है इमलिये जीवों के हृदय पट पर सदा के लिय गहरा अमर मम्मान के साथ अकित हो जाता है । यह नगा न्या परा वालों के न होने से दुखित है । जीवों को प्रारिक बाध, न मिलन से ही उनमें प्राची प्रान्त शक्ति गुम और दया पना रहती है ।
प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश ग्यालु प्रेमा महामाश्री की सहायता से उनकी शक्ति शीघ्र हा प्रादुर्भाव होती है। प्रेम कभी निष्फल नहीं जाता ! प्रेम का टला प्रेम से देना जगत् में को उत्तम सद्गुण नहीं है । तुम्हारे में यदि प्रेम है ता सिके ममस्त जानों की तरफ भेट भार न रयकर प्रेस की वपा घरमाया मच प्रेमी म भेट मार नहीं रहता नह सबका समान दृष्टि से देखता है। गरी का अपेक्षा धनी पुग्यों में अधिक प्रेम रखना चाहिये, क्योंकि उनके ममान न्यापार टूमरा जीव भाग्यश ही मिलेगा। यह बात दबने म तो तुम्ह पक्षपातपूर्ण अथवा निग्द्ध सी मालूम गा, परन्तु विचार करने पर मालूम होगा कि घना लोगों का नीरन, पाशा-तृष्णा, लाभ-इया और अभिमान मे भरपूर होता है, इच्छानुमार अनुकूल विपयों क भोगोपभोग में लगे रहने के कारण परमार्थ मापन का काय तथा परोपकार करने का काम नको भाग्य मे हा मूमता है। अपन आपको दुसया अनुभव न होने में उन्हें दुनिया के दुग्यित आमा का पीडा का विचार नहीं होता । इन्द्रियों के पापर पियों की प्राप्ति के कारण ये सुग्गी मालूम पड़ते हैं परन्तु प्रात्म जाग्रति म, श्रामधन से ता वै रङ्क और अज्ञानी होन है। क्रयाण क मार्ग मे रिमुख होते हैं। पूर्व पुण्य भागने में पुण्य फल समाप्त हो जाना है, भविष्य के लिये तम्याग न करन से भात्री सम मवे अरश्य दुग्या हागे ।
। ६ प्रमुफे माग मे ज्ञान का प्रकाश गरी। ता यत्तमान समय म दुग्यी होने से इस दुम मे छूटने और भनिग्य में सुग्री होने के लिये विचार करता है। वर्तमान दुस उनको भावी सुसमा प्रवृत्ति के लिये प्रेरित करता है। इस लिये वत्तमान समय का दुसा जीर भविष्य काल म धनवान ही है। प्रत वर्तमान समय में धनवानों को श्रात्म पिचार की जागति करानी, प्रभु मार्ग पर चलाना, यह विशेष दया का काम है। और यह काय ऐमे प्रेमी श्रात्मा ही कर सकते हैं। श्रीमानों के पाम लक्ष्मी होन म वर्तमान समय में दूसरा की अपेक्षा नहीं करते, इसलिये प्रेमी श्रात्मा उन पर प्रेम की पा रसा कर ग क उनई और सूगे क्षत्र रूप हृदय में श्राम जाग्रनि और स्वय पत्तव्य केनीन वो मक्त हैं| प्रेमी श्रात्मा में इष्र्या नहीं होती, इप्या का दाप दूमरा का महिमा को रेसने नहीं देवा । जो दृमरा का महत्व दस माते हैं वे ही महत्व का मूल्य जानते हैं और 4 हा भविष्य के महा पुरुप वनते हैं। प्रेमा श्रात्मा गुणानुरागा हाता है, जो गुण निस जार को प्यारा लगता है उम गुण के आने के लिये गुणानुरागी जार उम दिशा का द्वार बोलता है। यह गुण उस द्वार में जार क अदर प्रवेश करता है । इम उदारता के कारण या उन गुणों से भूपित होता है। प्रेमा जावन मे अभिमान नहीं होता । वह अपन उत्तम कार्यों को दूसरों क मामन नहीं ला, योरि यह भा गुप्त अभिमान है । दूसरा का उसाहित करन क लिय प्रसग से बात करत समय मा यह अपनी प्रशमा नहीं चाहता ||२|| प्रभु के माग म ज्ञान राप्रकाश प्रेमी आत्मा अपने अन्छ तव्या का काला नहा चाहना । अच्छा काम करके बदला चाहना-यह प्रेम में नहीं हाता, यह तो न्यरहारिन लन दन महोता है। नम्रता के गुण मे श्राकर्पित होकर अभिमाना जी भी उमर पास मे सद्गुण प्राप्त करते हैं पापी जानों पर भी उसकाद्वप न होने सवे भी उममेसुधर सकते हैं।शा प्रेमा जीप में स्वार्थ नहा होता, इसलिये उसने उपरेश का प्रभाव उत्तम होता है। स्वार्थ त्यागी मची मूर्तिया ही विश्व की नेता बननी है।०६॥ मवा करने मे ही श्रात्मा कीमहान शक्तियों का शिकाम हाता । त्याग में ही आत्मा की उन्नति निवास करता है जिमको महा पुष्प बनना है उसे प्रथम अपन मर्मस्व का बलिदान करना होगा।॥२७॥ मोध और प्रेम में परम्पर विरोध है । बाघ हानिकारक तत्व है, बाघी म मनुष्य म्नभान की निर्मलता और कर्म के सिद्धान्तकी अमानता सूचित हाता है । शारीरिक पारमेमोध कापाप कम नहा बल्कि अधिर है। ब्रोध म तो गृहस्थ का धम भी नहीं रहता ना फिर त्याग धम कहा रह सकता है। उसके जीवन में मधुग्ना नहीं रहतो, जीवन रग होताता है। क्रोधा मनुष्य मे इपा, अभिमान, कृपणता, निशाम धानरता, निर्दयता, कठोरना, हठनाद् शोका तुरता और दुराग्रह गेम अनेर दुगुण होते है । म स्वभाव का पालन क लिये प्रेम ही मुग्य साधन है। प्रेम से यह समस्त यूनियें बदल जाता हैं।
प्रभु के मार्ग म ज्ञान का प्रकाश । प्रकरण दूसरा जिसकी ग्बोज करोगे वह मिलेगा। विश्व म अच्छे पुरे दोना ही तत्व भरे हुए हैं। इनम जिमको तुम तलाश करोगे, निमकी तुम इच्छा रागे वह तुमको मिलेगा जिसकी तुम हट्य म इन्छा करते हो उसको हो लेने का तुम्ह अधिकार है । धने पर दृष्टि न डाला श्रीरों के दीपा कोन मेलों पर दूसरों के जीरन के शुभ गुग्गा की ओर ध्यान दा। क्योंकि श्रात्मा अमर स्वरूप है, दाप विनयर हैं उनको श्रात्मा से पृथक होना ही पड़गा ॥१॥ यह विश्व एक पाठशाला है। इसम रहकर प्रेम क पाठ सीसने और उनका पराक्षा के बहुत से अमर मिलते हैं। इस प्रेम से सन जायो के प्रिय बना । प्रम यह एप लगार ही नहा, परतु इसक मूल म अध्यात्म शक्ति का बल है। यदि इममें यह प्रध्या शात न हो नो इम प्रेम का उमाल थोडी देर म शान्त होकर निमारमय मोह के रूप में बदल जायगा । उमे प्रेम नहीं कह सक्ने । प्रेमम यदि सच्ची चिंगारी होगी तो हा वह सारे मित्र को प्रेममय बनान के लिये ममर्थ होगा। निम श्रपस्दा म रस गये हा उसीम रहकर उन्नति करा पिपरीन अपाय जाप को सहनशील, नम्र, उदार न्यातु निस्यारी गौर विवकी बनता मिसाना है। यह विपरीन मयो। अपने गेणग्य बनाने के साधन है समलिये इनका म्यागा करो। रेन पार होई कार में उन्ता हुश्रा प्रमु के माग में मान का प्रकाश लोहा जैसी चाहे वैसीश्राकृति कोधारण कर मकता है। इसी प्रकार विद्ध और विपरीत अवस्था रूप रन तथा हथोडे के बीच में कार्य करती हुइ श्रात्मा भी अवश्य उन्नति कर सकता है। श्रागे जाने के लिय तुम कभीसुख काइच्छानरो प्रतिकूल अन्यायों के बीच म रहकर प्रेम और मकल्प का बल बढाते रहो! जिनम आम प्रेम का बल अधिर हो उनस सहनास तथा अनुसरण करते हुए आगे नतो॥४॥ प्रम, प्रेम को पोषण करता है । इमलिये सि पुरुप ने मन जाग के लिये अपन नीवन में प्रेम दिग्पाया है, ऐसे महापुरप का प्रादर्श जीवन अपने मामने रखो। उमरे अन्दर रहने वाली त्या, रमके कोमल स्वभार और दयालु जीवन स विचार करो। इम भावना मे तुम्हारा उस महान शक्ति के साथ अन्तराय मम्बन्ध जुडगा और तुम सन जीवा से प्रेम करना मीचोगे। निम ला की तार द्वारा पिनली का प्रया चल रहा है उम तार फे माथ लोहे का टुक्डा लगान मे उमम भी निनली का प्रवाह चलने लगेगा इमी प्रकार जिमने अपने जीवन में प्रेम का प्रवाह बहाया है उमम प्रेम रखने मे तुम्हारे नय म भी प्रेम का प्रवाह बनेगा ॥६॥ प्रज्ञान सा दुर्गुणों का मूल है इमलिये तुम्हारे मम्बन्ध में जो मनुष्य पार उममे अज्ञान को दूर करन का तुम प्रयत्न करो, उमको विशुद्ध आत्म शक्ति का मान करायो पाग चल्ने प्रभु क मार्ग म ज्ञान का प्राश का मार्ग रियायो । ऐमा करने मे तुम अपने प्रेम का मटुपयोग कर सकोगे॥७॥ जैसे दूमरों को गुएमाही बनार गुणगान देते हो ऐसे दूमरों से गुणग्रहण करना भी मारयो । श्रामदनी के पिना दान देने से निपाला अवश्य निग्लेगा, परनु निनके अतर्गय कपाट खुल गय हैं उनको इममा आवश्यकना नहीं। जन तक तुम्हारे म यह महा शक्ति पैदा नहीं होती नयना हा अपने लिय गुण ग्रहण करने की अधिक पारश्यक्ता है।॥८॥ तुम्हारे सहवाम म नो ना मनुष्य या उनम जो कुछ भी उत्तम गुण हो उनस प्रहण क्रो और उनके गुणा का अनुमोदन करो, ससे तुम भी गुणी रनोगे। दूमरा के टोप सने से उनके दोप ग्रहण क्रोगे। श्राप प्रभु रूप बने रिना दूमरा मे प्रभुता नहीं देगा माते । महापुरप ही दृमरा म प्रभुता दर मक्त हे क्योंकि गुणों का अनुराग तथा उचित ममान करना पडे पुरुषों का ही एक डा लक्षण है ||६|| रिचार यह एक शचि है । प्रत्येक शक्ति अपने जैसा दूसरी शक्ति को उत्पन्न अथवा प्रस्ट करती है। हरण विचार के अनुकूल दूमर विचार वातावरण म म तुम्हारी श्रोर बार्पित होंगे। तुम निम मनुष्य का तई प्रेम और सदभार दशात हो उमम उस मनुष्य म रहा वाल प्रम नया मरगुणाका पिलसित तथा प्रालिन करत हा, और उमाल्य में भी तुम्हारी श्रोर ।
। है प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश पैसा ही भान उदय होगा। रिचारा को निमल बनाया, क्योंकि इनमें विचित्र शक्ति रहती है । तुम्हारे शा म तुम्हारे विचारों का भाव मालूम हो जाता है। तुम्हारा भविष्य बनाने वाल तुम्हारे निचार ही हैं। तुम्हारा हरक निगर यल शक्ति रूप मे बाहिर नाता है और यहाँ से अपने स पिचारों को लेकर वापिस पाता है । ये उक्त विचार शरीर को नीराग बनाते हैं। वचनों में चल पैदा करत हैं और मन को हर सम्ल्प माला बनाने में ||१|| प्रेम उन्नति का मार और द्वेप उसका पाधक नियमों का जहाँ जहाँ भग होता है वहाँ इसका परिणाम टम्म और ज्याधि अथवा श्रय रूप में प्रकट हुए गिना नर्म रहता। यह नियम अटल है ।।१२।। प्रेम, प्रेम को और द्वप, द्वेष को उपन्न करता है। विश्व में उत्तम भापना फैलाश्रो और सामने से ग्च भावना, याज सहित ग्रहण करो। निर के जानों को बल दो, इसमे तुम में मस्ट के समय अधिक परिणाम में चल प्राप्त होगा । विश्वाम ग्यो कि इम प्रकार महायता करने मे तुम्हारी महायना भा अन्य लोग श्रापत्ति के ममय में करेंगे। द्वेप का बरला प्रेम रूप म हो समे तुम्हारी अधिक रनति होगा ।।१३॥ द्वपी को गित बनायो और ग्मा भी क्याण चाहो । अपकार का घाला उपफार महो। प्रेम से ही द्वप जीता जाता है।पा की तफ प्रेम के विचार भेनो। इससे उसमा द्वैप । । ।
प्रभु क मार्ग में ज्ञान का प्रकाश अममय हो जायगा । द्वीप से प्रेम अधिक बलवान है। इसलिये प्रेम से ही द्वेप को जीतना चाहिय । यदि द्वेष के पल्ले शत्रु से प्रेम करोगे तो उसका द्वेष तुम्हारे तक पहुँच ही नहीं मांगा। दूमरा की उन्नति करने से अपनी उन्ननि स्वत हो जाती है ॥४॥ नम्रवाणी वर्ग में मे प्रवाहित होता हुआ दिव्य रस है। प्रेम की मधुग्ना और फरणा दक्षि ग यि ये जीरा को देसी ॥१॥ प्रकरण तीसंग श्रात्मा की स्वतत्रता हमारी श्रात्मा के अतिरिक्त हम विश्व में कोई दूमरी शक्ति मुस दर दने के लिये समर्थ नहीं। हम अपनी शुभाशुभ प्रत्ति के परिणाम से सुख और दुग भोगते हैं। क्म के फल को भेने थाली किमी दूमरा शक्ति का महाग लने की आत्मा को श्रापश्याना नहीं ॥१॥ अय सत्ता की प्रसन्नता या अप्रमत्रता, प्रात्मा क हितान म वाधा डालने की शक्ति नहीं रखना मा अपना अच्छी या पुरी प्रवृत्ति से जा जा कारण उप7 पता है मरे परिणामा का अनुभव करती है । "मस हनिमय होता है रिशामा का अपने हा पालम्पन काश्यता है ॥२॥पितमनुध्या को अपनी सा विश्वास नहा हाता इसाजिय ने एपने स प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रमाश अधिर रिमी महामत्ता की कल्पना करते हैं और उसके चरणों म अपना मस्तर भुमाते हैं तथा इस समार फ दुग्मा मे मुक्त होने के लिये उसकी कृपा की याचना करते हैं ॥३॥ मनुष्य के पत्य की निचलता के कारण निम्ली हुई याचक वृत्ति, जीर को बहुत हानि पहुँचाती है। जीन अपनी कल्पित महासत्ता पर अपना मारा आधार रबर अपनी भलाइ फेलिये पुरपार्थ करना चन् कर देता है॥५॥ अपने अतिरिक्त दूमरी शक्ति के उपर अपन हित के लिए श्रापार गगने की प्रवृत्ति र अत्यत बढ़ जाती है, तब मनुष्य का मुग्य कतन्य ग्स सत्ता को प्रमन करना हो जाता है। यह सकी ही मना, पूना और भक्ति करता है और-श्राप म्वतन्त्रशाला श्रात्मा है-इस विचार का भूल पर अपना मस्तर यहा ही मुराता हुश्रा इम ममय का अपना क्तन्य कम र कर देता है। सी निफल प्रवृत्नि में मनुष्यों को पचाने के लिए भगवान् महावीर स्वामी ने फर्म की सुता भावना का ज्ञान देकर जगन् को एक उत्तम तत्व का पाठ पढाया है। जैन धर्म की र्म पिला मफी इमी कारण मभी दार्शनिक विचारों में अधिक उपयुक्त और सच पर निर्भर है। इस फर्म के रिपय पर जैन धर्म की अन्य विशेष विचार णाओं का प्राधार भी हमी में है। कमों के नियम अटल हैं।
१५ प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश हो सकता है कि मनुष्य, समान में बाध नुये नियमों का ताइ र और उसम ठहराय हुए नएड से चूट मक, परन्तु कर्मा के नियमों का नहीं ताइ सकना । यह हा सकता है कि उन नियमों का अनादर करे । परन्तु उसस उपन्न हुए टएड व भोग से नहीं छूट मक्ता ॥७॥ मकता। "अमुक सयोग और अमुक प्रवृत्ति या अमुर परिणाम होता है " इममै थाहा भी परफार मर्ग हा इसका नाम प्रति नियम (कानून बुदरत ) या रों का नियम है। प्रति नियम, तुम्हे यह करो या यह क्ग प्रमा श्रादा नही देता पर यदि तुम्हे अमुर परिणाम सारश्यकता हा ना अमु कार्य क्रा, पेमा रहता है। जो चीजन में जौं, काकनानने स क्नक, २'टा म साट और पुष्पा से पुष्प मिलेंग। बीनाग पहा लगा | यह प्रकृति कहती है, पर तु तुम क्या चीनो ? या बारा प्रति नहीं दता । तुम को जा पसन हो पाना, परन्तु वान के पश्चा 'उमर रटले दुमरे फल की आशान रकयो। “करना चाहिए। इमको म्यतयना प्रकृति र तुम्ह दा है पर इसम रत्पन्न हो पाले फ्लम तुम नहीं च मरता या कर्मा का महा नियम कर्म व नियम म त्या नहीं, प्रभुका हा या प्रमार का उसमे प्रवेश नहीं । यति यह हाना तो कनों का अटलता नहीं प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश १६ कहा जा सस्ती । इस नियम में यदि फेरफार हो तो रिस सामग्री में से क्या फल निग्लेगा इसका निर्णय न हो।मति गेमा हा तो मनुष्यों का सम्पूर्ण पुस्पाय म्फ जाय । इसलिए कहा है कि प्रकृति में दया नहीं पर इममें न्याय अपश्य है ॥१०॥ यति कर्मों की यह सत्ता दया वाली और निबल हृदय क होना तो मनुष्या का करणामया हाय धनि को सुन कर प्रत्ये ममय म प्रकृति का अपन नियम बटलन पडत । इमसे क्मों का एक भा नियम निश्चित न रहना और अयवस्था बढ़ जाती सब प्रकार के फल मनुष्य अपन कत्त य स पाता है । इम सल का न्शन प्रभु महागार ने सारे विश्व को कराया है। इस अनु भव मिद्ध नियम म उच्च म उच्च सत्ता भी हस्तक्षेप करने के लिए ममथ नहीं । ममार इम मत्य का जय भूल जाना है तर पर महापुस्प प्रस्ट हारर इसी सत्य मोरि मममात हैं । कुदरत क इम मृष्टि म कृपा अथरा प्रसाद को स्थान नहीं । का रिसी क सुप या दु यन्ने में ममर्थ नहीं । एक कौडी जैसे क्षुद्र जीव र लेकर थक्रा राना व इद्र पाटि तक का जा सुप या दुर होता है यह उनक याग्य या अयोग्य कर्तव्य का हा फल है. उनका कर्म ही मुग्प दुमका कारण है। जो निमरे योग्य नहीं उसमे वह नहा मिलता इम सत्य का भूर कर मनुष्य नहुधा मिसी कल्पित सत्ता के आगे ना अपन फत्तर में से फल मिलना चाहिये उमर यल दूमर फल की प्राथन करता है। अपन लिय प्रकृति के इस अटल नियम को बदला प्रमुक माग मझान काप्राश के का अनुनय विनय करता है। पर भ्रान्त मनुष्य । ऐमा अनु नय पिनय करके अपने क्त्तव्य फल स यचने के लिये तेरा यह प्रयत्न निष्फल है। इस पल का निष्फल करन क लिये किमा कल्पित महा सत्ता क धागे करणाननक मुप थनार पासू गिराने की तेरी मेहनत निस्सार है। इमलिये तू अयोग्य कर्तव्य से उत्पन्न होन वाले परिणाम का सिंह की तरह वार बनार भाग । करे की तरह में में नकर ।यह काय रिसीमत्ताश्राधान नहीं कि वह तुम्हें इममे मुक्त करद । जो कुछ है वह तुम्हार पर ही निभर है ॥ १५॥ तुम एक स्वतन शनि हो । तुम मे पुरपार्थ करन की शक्ति और अवराश हैं । अत प्रार्थना करके एक कपल नमरा फ्ल मागने की मूपा और याचना की प्रवृत्ति का र” करना। इस समय विफल न नो पर कम परत हुए सारधान रहा मापना करने के स्थान पर यह विचार करा कि नमु” महान् थामा न कैम ज्ञान प्राप्त किया और कैसी प्रवृत्ति पर दर्मों का नाशर श्राम स्वरूप को प्रकट क्यिा । कर्म व यधन का ताडकर स्वय सरूप से मोन को प्राम क्यिा इस बात का उनके जीवन स राम लेकर उसी तरह घरतार करन के लिय तैयार हो जाओ । पापा लोग "सा फर्म वैसा फल" इम मनाउन सत्य को भूलकर इन्छानुमार फल प्राप्त करने के लिये देव मदिरा में पना प्रभार की मूर्म्यतामयी प्रार्थना काते हैं । जैसे-प्रभो । हम यह हो वह दो । प्रभु महावीर न किसी स्थान पर भी कहा नुम मरी पार्थना 1 ।
प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश करोगे तो मैं तुम्हारे किये हुए अयोग्य कर्मफ्ल से तुम्हें छुडा दूंगा प्रथया इसके बदले उत्तम फल दूंगा । प्रभु ने तो अच्छा तरह बतलाया है कि तुम्हारा आत्मा हा मुस दुम, स्वर्ग नरक, भव या मोक्ष का पत्ता है । यनि मुस दुम देने की शक्ति प्रभु के हाथ म हाती तो वे (प्रमु) ऐसी अाज्ञा देते कि भाइयो तुम अपनी इच्छानुसार कर्म करत जाओ पर तु निस समय तुम मेरी प्राथना क्रोगे तर मैं उस प्रार्थना स प्रसन होरर तुमको उत्तम और मुँह माँगा फल दूंगा। ग्म महाप्रभुने जो यह बताया है कि यदि तुमका उत्तम फल की इच्छा है तो तुम अच्छे सर्य (क्म) करत जाओ। तथापि लोग मार्ग दर्शक पर ही अपने या पार लगाने का वोमा डाल देत हे और कर्म य क्म को नहा करत अर्थान् गस्ता निमान वाल के ऊपर अपने तारने का भार डालर जम मरण के चक्र को बढाने वाल पिपरात कर्म करते हैं। मनुष्य का सर्वदा यह दृढ विश्वास रखना चाहिय कि मुझ मुग दुप देने वाला दूसरा नहीं पर में श्राप ही हैं। मेर अयोग्य फर्म विना कोर टूमरा मेरा एक वाल मा वाँका नहा कर माना । इम निश्चय म ही मनुष्य का श्रात्मरल रहता इस कारण मे हा प्रभु महावीर ने श्राममत्ता को मिद्ध ममान अनन्त शक्तिशाली रहा है। निर्मलना हा दूमगें पर आधार रसने की प्रेरणा करता है। निस फ्ल का कोई प्राणी नितना अधिकारी है उसको उतना ही । २ alig
१८
प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश
उसी प्रकार फल देकर कर्म की सत्ता समाप्त होती है। उस फल.
मे मुक्त करने के लिये सहयों मनुष्य या देवता उसकी सहायता
के लिये आयें पर उनमें स कोई भी यचा नहीं सकता। यहाँ यह
शका पैदा होती है कि यदि ऐमा ही है तो फिर देव गुरु और
दूसरे सत्पुरुषों की सहायता लेने स क्या लाभ ? इसका उत्तर
यह है कि गुर पाद, सुग्र उपानन करने या दुस हटाने के
माधनों का ज्ञान और उन साधनों के अनुकूल फर्म करने का
मम्मति दे सकते हैं। व सत्कम करने के लिय उत्साहित करते हैं।
दुष्ट कम स वचन का जाप्रति उत्पन्न करत हैं। इस प्रकार गुर
आदि निमित्त कारण हैं । इसस अधिक वे हमारी हानि |
लाभ म युछ भी भाग नही ल सकते।
हम दूमरा का उपचार करना चाह तो उनका उत्तम फल
प्राप्ति के लिय उत्तम यौन धान की प्रेरणा कर मक्ते हैं। अपन
उत्तम चरित्र और अनुभव म उनको सन्माग पर चलान फ लिय
उदाहरण बन सक्त हैं। उनरा इष्ट प्रानि और अनिष्ट त्याग
का मार्ग दिमा मरने है।
कम य अटल नियम की श्रमापता को देख कर यहुत स
पुरप दर जात है। परन्तु मम डरोपी काई यान नहीं है। जैस
कम बीमत्ता पलयान है येम आत्म सत्ता उसम कही अधिक
यता है। याग्य साधन मिलाार पुरुषार्थ करने यालीमामा फर
पाग कम कर नान है।
1
प्रभु के मार्ग म ज्ञान का प्रकाश प्रकरण चौथा कार्य कारण के नियम कर्म का सामान्य अर्थ कर्म ही है और प्रत्येक कर्म का कारण होना चाहिये। हरएक पाये भूत काल के कारण का कार्य है और यही कार्य भविष्य में होने वाले कार्य का कारण बनता है । इस दृष्टि मे दसें तो प्रत्येक पाय एक प्रकार से कार्य होता हुआ दूमरी दृष्टि से कारण है । इस प्रकार काय कारण का सम्बध है। विश्व में सर्वत्र कार्य और कारण के नियम एक जैसे हैं। इमम प्रारस्मिक्ता का कुछ भी अश नहीं है। जिसको सद् भाग्य या पुण्य फल कहा जाता है यह भी रिसी देर की कृपा से अस्मान् ही प्राप्त नहीं होता । वह भी पूर्व क्म का ही फल है । यह क्रिया करना चाहिये या नहीं यह मनुप्य के अपने हाथ म है परन्तु इस कार्य के लिये अमुक अमुक सामग्री चाहिये, ऐसे ऐसे सयोग चाहिये, इमका आधार उपर यहे हुए कार्य कारण के नियम पर अपलम्बित है। जहाँ तक मनुष्य इस सामप्री और सयोग को नहीं जानता अथवा प्राप्त नहीं करता वहाँ तक वह इम कर्म के अधीन रहता है। यह सयोग पैसे होने चाहिये, यह जानकर भी जीव यदि उमी तरह क्रिया न करे या विन्द्ध क्रिया करे तो वह उसके अधीन ही रहता है। पर जो इन सयोगों को जानकर उस रीति से वर्तन करे तो ये क्रियायें इसके वश म
प्रमुपे मार्ग में ज्ञान का प्रकाश
रहेंगी। निया का परिणाम जानकर जार रसोफे अनुमार अपनी
इच्छा से क्रिया कर सकता है। यह जोर जहाँ पर इन माधना
को नहीं समझना यहाँ तक इसको कर्म अपने यश म रसते हैं।
इन साधनो को समझ कर अनल पुरपाय कान वाला जाप कर्मा
को अपने श्राधीन कर सकता है।
ज्ञान एक प्रकार की मत्ता है। ज्ञाती मृधिक काय कारण के
नियमों को जानकर उससे अपने इष्ट का सिद्ध कर लेता है इसमे
जीर शक्तिमान है । त्रिया करन में साधनो की प्रारभ्यरता है
माधना म परिवर्तन करने में क्रिया म मा परिवतन ताना है।
इम नियम मे ज्ञानी पुरुप अमुक फाय करने के निय ग्न उन
माधना को मिलाकर कार्य कर लेते हैं । एमे हा स निया म
पर पार करके या चन्द करके अपनी थानश्यक्ताग्रा प अनुमार
परिणाम उत्पन्न करन हैं । इससे यह सिद्ध हातानिइन्दानुसार
परिणाम "उत्पन्न करने म कम नियम पे ज्ञान की मुग्य
श्रावश्यकता है।
जो मनुष्य अपने जीरन का सुधार मक्त हैं व ही अपनी
भपित यता को श्रेष्ठ बना सक्त हैं। भरिय इसक अनुमार
हा बनता है। जो क्म के नियमों को जानता है, वह इन्चानुसार
अपना भविष्य बना सकता है, इसम कोई नतीन पात नहीं।
भविष्य में जिस स्थिति या गति म जाम
शक्तियां प्राप्त करना है उसा लिये
भागमा भार
।
प्रभुके मार्ग में ज्ञान का प्रकारा
करते रहना चाहिये और यदि उसके लिये पूर्ण तैयारी हो जाय
तो उसका भविष्य वैसा ही यन जायगा। इससे यह स्पष्ट
होता है कि मनुष्य मर्नया पराधीन नहीं पर अपनी
स्थिति के अनुकूल अपना भविष्य बनाने में स्वतन भी है।
इम म्वाधीनता के भान मे उम उस कार्य के लिये उस जीपमा
उमाह बढ़ता है। जो कर्म फल देन के लिये तत्पर है उसक
भोगने की हमारी इन्या हो या न हो तो भी उसका प्रवृत्ति
श्ररश्य होगी। यह रिया स नहीं मरती इसी को कर्म का
उन्य कहत हैं।
पून जन्म की विविध प्रवृत्तिका फल स्वरूप जो कर्म समूह,
कम की सत्ता में मगृहीत हुआ है, उम "सत्ता" कहते हैं।
ध्यान और सपन्या प्राति उत्तम परिणाम के योग मे इसम बहुत
कुछ परिवर्तन कर सरते हैं।
यतमान की शुभाशुभ प्रवृत्ति के परिणाम से जो भनिय
जनना है यह वतमान काल में क्रिया कहलाती है। कम धन
मे राग, द्वप की माननायें विशेष भाग लेती हैं।
प्रत्यर जीय अपन क्म में अपने काय करने की शक्ति
उत्पन्न करता है। ऐसे ही अपने लिए अमुम शरीर म, दशम,
कालमें, या भायम रहन की मयाना भी म्यत' वाघ लना है। तो
भी जीर इस मर्यादा क परिवर्तन करन म, और शक्तिया ,
विकास करने म म्यतन है अयान इम मयादा को मकुचिन भी
कर मक्ता है और वढा भी मरता है।
-
प्रभु के मार्ग म शान का प्रकाश
जो फर्म के यधन मनुष्य के सामने उपस्थित होत है उसके
अपने ही याधे हुए हैं। इन यधनों को हट करना या शिथिल
करना अथषा तोड़ना इसी के हाथ में है। जैसे पुम्हार मट्टी में
नई नई वस्तुएं बनाता है, एम नीय भी परिणामों द्वारा नये नये
कों का समूह करता रहता है।
कर्म करने के जो ना साधन हैं उममें विचार ही मुग्य माधन
है। इसका कारण यह है कि शिवार जीरकी शक्ति के पाहिर
निकालन में भरने के ममान है। विचार मनमें प्रकट हात है
और विचारों से प्ररित होरर गति योग्य मानसिक दायक
अणु (पुद्गल) परम्पर मिलने से अनेस श्रारतिय रत्पन्न
होती है। ये सर श्रारतियें मनरे ही चित्र है। धार धार फेरल
एक ही विषय पर विचार करने मे ग्म उस जाति के मसार दृढ़
होगये हैं । यह हर हुए मस्सार विचारो की क्रिया रूपम लाने
हैं इन विचारों को परार योग्य माग की ओर लगाये तो मनमे
धारण की हुइ थारतिय रत्पन करके शुभ प्रनाह बहाया जा
मरता है । इसके लिये जैमी जैसी मानसिक शक्ति उत्पन्न करना
हो मे विचार यार चार करने से इम शक्ति को रिपन कर
सकते हैं।
अमे जैसे मनुष्यों की कामना और तृप्णा यम होता जाता
है वैसे वैसे मनकी पवित्रता बढता जाती है । इम प्रयल मे शुद्ध
विचारों का संग्रह होता है। इमम उमका मन तनोमय और
मुदर बनता है।
।
प्रभु
के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश
२३
मनुष्यों का जीवन विचार मय है। प्रत्येक समय यह शुभा
शुभ विचार करता रहता है। एक जन्म में वह जैसा विचार
करता है वैसा ही वह दूसरे जम में होता है। इम नियम स
हम अपनी मानसिक प्रकृति मी बनानी चाहिये, यह काय
हमारा ही है। यदि मनुष्य का आचरण अच्छा है तो, इसका
यश व लाभ उसको है यति धुरा है तो इसका दोप भी उसी
मनुष्यों में विचार नल मे भी अधिर कामनाओं का बल
प्रनल होता है। यह वामना और कामना निस परिमाण में
प्रगल अथवा निवल हागी उसी परिमाण में नीर की गतिरा
निचय हाता है । अथात् वामनाओं के मन्तुष्ट करने का सयोग
जहाँ मिल जाय उसी स्थान में इमोनम लना पडता है।
विश्व म जो कुछ भी मुस या दुस का भोग है वह सब
हमारे लिये है। उसका कारण हम अवश्य हैं। हम ऐसा कोई
भोग नहा भोगते, जिमरा हमने पत पानन न किया हो।
कनाचित् हम इस भोग के कारण को भूल गय हा पर जो चीन
रूप मस्सार सत्ता में स्थापित क्यिा था उसका क्म कभी नहीं
।
भूलता।
।
कार्य करने में जो हेतु या उद्देश रहा हो वह कार्य से विशेष
मुरय होता है । निस हेतु से मनुप्य कार्य करता है उसका प्रभाव
उमरे कर्ता के स्वभाव पर होता है। यह प्रभाव बड़ा दृढ होता
है क्योकि इससे उम मनुष्य के स्वभार में सुधार या निगाड़
हुए बिना नहीं रहता । उसका असर उसके जीवा ग चिरस्थायी
रहता है।
यदि वह काय बुरा है पर उम कार्य के करन का गमेश्य युग
नहा है तो उसका बल एगर जम में फल देकर गमात्र होताता
है। इसका कारण यह है कि उस गाय का अमर सिक समाय
पर नहा हुआ था। उसम विशेष बलपना शक्ति पर नहीं
हुइ थी।
इससे यह सिद्ध हाता है कि प्रत्येन काय परे म रिपक
पती बुद्धि का उपयाग फरा' काय का दश शुद्ध ग्या। स्वार्थ
को चित्तमें ग्थान न दो। हृदय का निमल रसा। इनना विचार
रमने पाला कार्य करने में निभय रहता है । उसरा दुस रूप
प्रवाह आगे बढ़ने से रक जाता है।
कार्य विचार के पाछे स्थूल रूप है। एक पाछे हा
जानि के विचार करत करत न्न विचारा का ममूह इतना प्रपल
होता किस्सिी भी प्रसग के पिचार निया रूप
हम
यि करें ता पिर
दीघ काई
151प्रमग
श्रपराध
गगनक
शिवध भी
मिलते ही
k
जो मई
यता का
२५ प्रमु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न करके अपनी भावना को बनाते हैं। तब वे प्रबल बनी हुइ भावनाओं से प्रमग मिलते ही कोई वीरता का कार्य कर मक्ते हैं। पूर्व जन्म में भी निहोंने जो जो भावनायें हर की हैं और ये वहाँ अनुकूल प्रमग न मिलने से ग्पयुन नहीं हुई हैं उनका जर इम जम में उदय होता है तब ऐमा कोई प्रमग मिलते ही थे ही भावनाये काय रूप में प्रगट होती है । इम प्रमग पर यह काय "मैंने क्यों पिया" इसका ज्ञान न होन पर भी कार्य नन पाना है । उस मनुष्य को श्राश्चर्य होता है कि यह कार्य उमने पिस लिए मिया, यद्यपि उम रिचार करने का प्रसग भी नहीं मिला था, परन्तु यह भलामानम यह नही जानता कि पूर्व जन्म म अनक विचार करके यह भावनायें दृढ का गइ थी इमलिये ही इन प्रगट होने का अनुकूल प्रसग मिलने पर यह काय इम जन्म म उन मापनाश्रा द्वारा यन गया। इससे यह ममझना चाहिये सिर कोई भी मनुष्य किमी काय के करने का वार मार श्रामहपूरक रिचार करता है तर ग्मनी इच्छाशक्ति इस कार्य को करने के लिए दर होती परन्तु यह कार्य वह कर करेगामा श्राधार योग्य प्रसग पर निर्भर है। योग्य प्रमग मिलते ही वह इच्छा शक्ति कायरूप में प्रस्ट होनी है। विचार करने को शक्ति रसने याला मनुष्य रिचार करते समय बितर है क्योंकि पूर्व विचार करने से मन म जो चित्र जीर ने बाँधा था वह चित्र पूर्व विचारों के निरोधी नपान उत्तम
।
प्रभु के माग मे शान का प्रकाश
विचार उत्पन्न कर बदल सकता है । जब ये पूर्व जन्म की
भावनायें निकाचित म्वरूप धारण कर चुकी हैं तर उनके अनु
कून प्रसग मिलने ही वे काय रूप में अवश्य स्फुरित होती हैं।
उम समय इम जीर की स्वतनता नहीं रहता और वह परतत्र हो
जाता है। उसके विचार, मन की प्रवृत्ति को किसी प्रकार भी
बाल नहीं सकते किन्तु उनके आधीन होकर उनका अनुभव
परना हा पडता है । चाहे उसकी इच्छा हा या न हो ।
मनुष्यो । यति इस ममय के सरकार तुम को इष्ट न लगते
हों तो तुम इसके विराधी उत्तम विचार करने का टेव अभी
स हालो ? इससे भविष्य में ये मम्मर वनवान होकर पूर्व क
समारो को निरल कर दगे । दो मट लडते हैं उसम छोटा
हारेगा पर वह छाटा मढा जन वडे मढे मे अविर पुष्ट और
लगान होगा तब बडा मटा उसके मुमानिले म निपल हो
जायगा, अत यह मेटा उम पडे मेढे को जीत लेगा इम दृष्टान्त
म मिद्ध होता है कि इस समय का किया हुआ थोडा थोडा
पुरपार्थ प्रगल होरर, दृढ होर निर्मल हुए पूर्व के पुरपार्थ को
जीत लेता है। निनली का शक्ति को यदि लोहे की तार मे जोडा
जाय तो गर्मी उत्पन्न होगी और यदि टेलीग्राफ की तार से लगाया
जाय तो गति रसन करती है । पर यदि उमी निनला का शक्ति
कोक्सिी और वस्तु की तार द्वारा उपयाग म लाया जाय ता
प्रकाश उत्पन्न होता है अथान् पर ही निपला का शक्ति भिन्न
भिन्न साधनों द्वारा भिन्न भिन्न परिणाम, पल का उत्पन परती
।
के मार्ग में ज्ञान या प्रकाश है। इसी प्रकार एक ही आत्मशत्ति भिन्न भिन्न साधनों द्वारा उपयुक्त की हुई इच्छित फ्लों, परिणामों की आवश्यक्ता को पूरा करती है। प्रकरण पाचवा एकाग्रता और ध्यान एकाप्रतापूर्वक क्यिा हुआ काय थाड़े समय में और बहुत अच्छी तरह पूर्ण हो जाता है। चाहे कार्य स्थूल हो या सूक्ष्म, उममे मन को लगातार लगाना चाहिय । इस प्रकार मन का काम होन कारभार बन जाता है। मन को एकाम और एकलक्ष्य दिये बिना मनुष्य ध्यान के मार्ग में आगे नहीं बद मस्ता। जन मन का प्रवाह किन्हीं दूसरे इधर उधर के विचारों से नही टूटता पर अपह प्रवाह बना रहता है तर आत्मा की मत्ता में स्थित महान शक्तिया प्रगट होती हैं । आत्ममार्ग में आगे वढने की इच्छा न रखने वाला को मनको एकाग्रता को मीनने का प्रारम्भ इसी तरह करना चाहिये । प्रथम जो कार्य करना चाहते हा स कार्य को निरन्तर लक्ष्य में रसो । व्यवहार के काय, जैम कि पढना, लिग्गना, सुनना, यातें करना इत्यादि में से किसी कार्य को करते समय उसी पाय को लक्ष्य म रसना चाहिये । इसके अतिरिक्त इधर "प्रेमु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश उधर चाहे कैसी भी चित्तास्र्पक वस्तु अथवा मनुष्य दृष्टि में चायें, तुम्हारे ममीप कोई याने हा हो, गायन होता हो, याजे बनते हा इनकी और तक भी ध्यान नहीं रना और व्याय- हारिस या परमार्थिक लक्षित काय कुछ भा हो, सो पूर्ण करने के बाद ही दूमरे काम म ध्यान देना चाहिये । नम एका- प्रता से मनुष्य म ग्रहण करने की, धारण करने का और स्मरण करने की शक्तिया बढ जाती हैं। दूसरा के रिचार जानने को शक्ति, बालने मे पहले यह अमुक बात कहगा, इन राता के समझने की शक्ति और अपने विचाग का गहरा असर दूमरो पर डालने की शक्ति नती है। शतारधान अथवा सहस्रावधान जैमे पिरमय कारक, स्मरगा शक्ति के काय, एकाग्रता से ही रिये जा सफ्ते हैं । एकामता बढाने का उत्तम साधन ज्ञानोपदेश का मुनना है। धर्म के व्या रयान को एक चित्त होरर मुनने से एमाग्रता का शत्ति शीघ्रता से विकमित होता है। वत्ता के प्रत्येक विचार को ग्रहण करने के लिये उसके शदा में एज तार होना आवश्यक है। उस प्रसग पर चा कोई सामे या काइ बोले तो भी सुनने में लगा हुआ ध्यान दूमरी ओर नहीं जाना चाहिये । इस एकाग्रता के विना योग विद्या का मत्य मार्ग हाथ नहीं लगता। * मन को एक स्थान में डोडना, एक विचार पर ठहराना एम श्राध मदगुण मे लग्नान करना, किसी मूर्ति के प्रपयों पर
प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश
जमाना, ये कार्य एकाग्रता के बिना नहीं बन सकत । इस प्रकार
यदि मन को काम न किया जाय तो काय के अन्त तक नहीं
पहुँचा जा सस्तो । इस दशा में ही मन को सयम म लगायो
जा मस्ता है । मयम के विना समाधि का सिद्धि नहा होती
और समाधि के निना वस्तु तत्व का अनुभव नहीं होता इस
लिए एकाग्रता की अधिर श्रावश्यस्ता है।
इसमे यह सिद्ध होता है कि जो जो काय करो उमका एक
चित्त से करो। पढ रहे हो नो पत्ने म चित्त लगाओ, सान
बैठते हा सोसाने के सिवाय दूमरी ओर ध्यान न हो । यदि लिग्नते
हो तो लिखने में ही ध्यान दो । जप करते हो तो जप म ही
र तार बनो। और सोते समय भी अय विचारों को अन्द
परो। ऐसे छोटे छोटे कामा का कामता म फग्न की टेव
डालन मे अन्त में श्रात्म ध्यान करते समय आमा के मियाय
तुम्हारी वृत्ति दुमरा तर्फ नहा जायगी। इस प्रकार आत्म साक्षात्
कार अथात् श्रात्मा के सच्चे स्वरूप का दर्शन भी एकाग्रता स हो
सकता है। इसलिये मन को एकान करने को ओर विशेष ध्यान
हना चाहिये।
ध्यान
मन मक्रप निक्ल्प रूप है । मन क मकल्प निसल्पों का
चन होना मन का मरण है । प्रारम्भ मे शुभ सकल्पो के स्थान
पर शुभ मफल्प करने पड़ते हैं और शुभ मकल्पों के स्वभाव के
पश्चात् शुद्ध प्रास्मिक मफ्ल्पो के करने का अभ्यास डाला।
yot.
- । प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश इसके बाद सर्वया सकल्प बन्द परने चाहिये पर सदा के लिये सकल्प बन्द नहीं हो सकते पर धीरे धीरे मफल्प यन्द करने की प्रवृत्ति के समय को बताते रहो। फिर सफ्ल्प उठने हैं पर वे शुभ होने हैं। इनमें से शुद्ध म जाना पड़ता है वहा स्थिरता न रहे तो फिर शुन मही आना पडता है । इम प्रकार शुभ स शुद्ध म और शुद्ध में से आत्म स्वरूप में जाने पाने का अभ्यास वरन के पास किसी ममय स्वस्वरूप में ही अधिक समय तक रह मक्ते हैं। सव कम क्षीण होन से अन्तत सदा य लिये सब प्रकार के सकल्प नष्ट हा जाने हैं। महो मन का नित्य मरण कहलाता है । मन जैसे-जैम सकल्प करने बद करता है वैसे-वैसे उत्तरोत्तर इन्द्रियों का मरण हाता जाता है अपने अपने निपयों म इन्द्रियों की प्रवृत्ति ही इन्द्रियों का मरण है। इन इन्द्रियों का भी एक ही ममय उनके पियां में जाने से नहीं रोक सक्ते । पाच इंद्रियो को अशुभ विषयो से हटारर शुभ में लगाना चाहिये । जैसे देव गुरु के दर्शन में प्रभु और सत्पुरुषों के गुणानुराद मुनने में, देव गुरु आदि के गुणगान मे एव शरीर को दूमरों की सेवा में, भक्ति में परमाध और परापकार के कामो में लगाना चाहिये । अन्तर्दृष्टि पर थनान्त्तादि नाद सुनने में, अन्तरीय स्वरूप देखन में, दिव्य गध के सू घने में इन्द्रियों को लगाया जाता है। इस सूक्ष्म स्वरूप के अतए और दर्शन आदि में लगी हुइ इन्द्रियें तथा मन, यारा स्थूल विषयों की । ।
के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश ओर से उदासीन बनकर अन्दर की तरफ मुक जाता है। अन्तत वहां से भी मन और इन्द्रियो को खीचकर आत्मा के अन्दर लवलीन करना हाता है। मन और इन्द्रिये अपने साधारण स्वभाव को बदल पर जब श्रात्मा म लीन होती हैं तन श्रात्मा की निर्मलता प्रगट होने लगती है। मन इन्द्रिया का स्वामी है । मन की प्रवृति बन्न होते ही इन्द्रियें अपने अपने विषया मे जाने से रक जाती है। ऐसा हाने से नगीन कर्मों का यधन रुक जाता है और कमों का ऐमा स्वरूप अथात् श्रास्रव बन्द होते ही पूर्व के कर्मों में निरा हाती है। लोहे से मिली हुई अग्नि की तरह और दूध म मिले हुए पाना की तरह जो कर्म आत्म प्रदेश के माथ एक एक रम हा रहे थे वे आत्म प्रदेश स अलग हो जाते हैं यही कर्मों की निर्जरा है। कम घन्ध के हेतुश्रा का अभाव हाना और पूर्व के सब कर्मो का आत्म प्रदेश से जुदा होना यही माक्ष है। ऐसे सर कर्मों क क्षय से शाश्वत सुरस की प्राप्ति हाती है । इस लिये निपया की ओर प्रवृत्त होते हुए मनको प्रबल प्रयत्न से रोक्ने की अधिक आवश्यकता है। मन के वश म होने इष्टानिष्ट विषया म प्रीति और अप्राति रूप राग द्वप नष्ट होते हैं । राग द्वपके नाश होने से परमोपशम भाव (स्थिर शान्ति) प्राप्त होता है। राग द्वेष का उपशम करने वाला जीव मन का निग्रह करने के लिये समर्थ होता है। जो
1
।
प्रभु
के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश
विश्वमें भ्रमण यरता है। इस प्रकार भूमण करते हुए मन के
रूप को निग्रह करने से राग द्वेप से मुक्त होकर आत्मा परमात्म
म्वरुप हो जाता है।
जैसे जम इन्द्रियाकै विषयों की ओर जारस राग शात होना
जाता है तैसे तैमे मनका विस्तार पालम्बन रहित होने म अर्थात
रति के श्राश्रय से हीन होने के कारण आगे बढ़ने स क जाता
है। विषयों म प्रीति करना ही रवि है। मनके प्रमार का रति
काही आधार है । रति से मन पुष्ट हाता है । इस पोषण के न
मिलने से मन आगे बढ़ने से रुक जाता है। यह रात श्रन
रिपया का श्राधार छाडर ज्ञानका श्राधार लेती है । जहाँ रति
हानी है वहा ही मन की प्रगत्ति होती है। इस प्रकार मन का
झुमार ज्ञान की तर्फ होता है । इममे मन विपया को छोड
पर ज्ञानम लगनाता है। विपया व आलम्बन मै रहित हुआ
मन, झानकरी मुगास से वासित हाने मे श्रन शुद्ध परमात्मस्वरूप
मोक्ष क मुस में लग जाता है।
इष्टानिष्ट म राग तथा द्वेप करना यह मन रूपी वृन का
दो शासायें हैं। इनका नाश करो। इसम मन रूप वृक्ष का
सरल्प विक्रप रूप प्रवृत्ति बद होगी । ण्मा करन से ही ममल
मोह रूप पाना से मन रूप वृक्ष कमल का सिंचन वद हो
नायगा । इस प्रकार मूल नष्ट हान स अकुर प्रगट ही नहा हाता।
मन का सकल्प निसरप रूप व्यापार नष्ट हात स फर्म
श्रानन का निरोध हाता है और मा म सक्ल्प विकल्प उत्पन
1
-
.
प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश
हान म मा का वध होता है। यति श्रात्मा मे विमुग्न हार
गग द्वैप में रहाग तो मानावरण श्रादि वर्मा का नाम नहीं
कर सकोगे इसलिए मन का शून्य करी । विषया में रिमुरय होना
प्रधान मन में विपय विकार का न होन टेना, यहा मन का
शय करना कहलाता है। इस प्रकार अपनी शुद्ध प्रात्मा म
लगने म फर्मो पर विनय प्राप्त कर सकोगे या
निमा मन गग द्वेष के कल्लोला म शान्त होना, यहा
दम आत्म नव को गम मरता है। हमरा प्रकार मनुष्य नर
में अनुभवी नहा यन मक्त । पिनप हीन मन ही मनुष्य नय
है। और निक्षेप याला मन । श्रात्मा का भ्रानि है।
यदि शुद्ध प्रामा की ग्पामना के ल म मन का निश्चल न
पिया नाय तो श्रात हुए कर्म नहीं ग मान । मन, वचन,काया
की प्रनि मे श्रात हुए कमाणु एक मनर ही निरार म ग्य
जाने हैं। मन की प्रवृत्ति न होत ही अना नमार उपानन
रिय हा पृन के कर्म भा जीण वा सात है तथा श्रामा का शुद्ध
म्वरूप फरल मान प्रगट हो जाता है । इस प्रकार ना लाभ
हात
यद्रिय कर्म तथा भार मा जनय करने या इच्छा हो
तो मन मकल्प विकल्प हीन करना चाहिए । जैम पाटला के
त्रिपर जाने म मृय प्रगट होता है, वैम ही निपया म निमुस
तमा शान्त हुग मनम श्रात्म ज्याति प्रगट जाता है। आत्मा
प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश
सम्पूर्ण और निमल क्वल ज्ञान की मूर्ति है। यह राग द्वेषाद
दाप हीन मन द्वारा ही प्रगट हो मक्ता है।
मन, वचन काया क व्यापारा की शून्यता से आत्मा के
शुद्ध सहबास की शून्यता नहीं होती । शुभाशुभ, मन वचन
काया की क्रियायें मारप पिल्प रूप हैं। यह विभाष रूप होने
में श्रात्मा क आगे शुभाशुभ गदल को पडा करते है। इन
शुभाशुभ क्रियाया के न करने मे यागा,-निरिकल्प ध्यान म
प्रविष्ट हो कर प्रात्मा क सत्य मुम को पाता है। इस निर्विकल्प
स्थिनि म आत्मा अग्निाशी निरूपम आनट से भरपूर हाता
है । यह शुद्ध स्वभाव ही चत य, ज्ञान, दशन और चारित है।
ज्ञान आदि गुणा का चितन अधात विकल्प करना शुद्ध
निरिप ध्यान नहीं पर वह चिन्तन अथवा भावना है। जैस
पानी के प्रयोग मे पिमा वस्तु म मिला हुआ नमा निगल
जाता है सी प्रकार मनमो शुद्ध प्रात्म याग में लालान करनेमे
श्रात्मा के माथ लगे हुए शुभाशुभ कर्म प्रथक हा जात हैं और
निमल चिदानन्द स्वरूप परमात्म रूप प्रगट हो जाता है।
स वृक्ष आपस म सघर्पण खाने में अग्नि रूप हो जाते है
म आत्मा आत्मा को उपासना करनेसे अपने निजी परमात्म
म्वरूप को प्राप्त हा जाता है। मन के व्यापार का सक्न बाला
परमात्मा का ध्यान ही है । मन और न्द्रियों क यापार शान्त
हाते ही श्रात्मा ही परमात्मा त गाना है। ध्यार म सब कुछ
माध्य है।
प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश
प्रकरण छठा ।
कर्म की सत्ता तोड़ने का ज्ञान
कर्म का सत्ता के सन्मुस आत्मा अपन बल की परीक्षा दो
प्रकार म कर सस्ता है । प्रथम वर्मक मामन उमक रोिधी
म मत्ता को रमना, दूमग प्रगार यह है कि जर पिस कर्म की
मत्ता उदित हुइ हा तन सी प्रवृत्ति करना कि आत्मा के प्रश
पर सुम्ब दुस की भावना को अस्ति न होन देना । इन नाना म
प्रथम प्रकार मुख्य है । जाग्रत श्रात्मा सुगमता से इम प्रवृत्ति को
मम्पादन कर सकता है । दूमर प्रगर को निशपत झानी पुरप
हा व्यवहार म ला मरते हैं । इस नियम के अनुसार चलन
पाले का आधार रिशेपत अतरणीय नल पर श्ररलम्बित है।
प्रथम प्रकार जैस शस्त्र क सामन शम्न फेरना । ऐसे
স্মযুগ
के सामने शुभ उपस्थित करन को मत्ता को नाण करना है।
दूमरे प्रकार में पून जन्म + उरित क्म को ममभार से-अनन्ध
परिणाम स भाग कर क्षय करना है।
।
क्म का नियम अचल है । इमलिए परिणाम को निष्पल
करने के लिए अन्य कार्य क वग्न का अपमाश रहता है। एक
नियम के मामने दूमरा विरोधी नियम उपस्थित करने से दोनों
विरुद्ध मत्तायें एक टूमरे के सपर्पण मे मत्य हीन हो जाती हैं।
इम दशा में आत्मा अपन भागे का मार्ग माफ कर लेता है।
'निम नि'मा सत्ता मरा परिणाम उत्पन होता। उम्म पिरोपी परिणाम 7 ग्यन रन का ज्ञान निम मनुष्य को हो है यह मनुष्य दसा टुगम बच मरना | मा चिरा माममा क धान न रगत समनुप्य नियम की मत्ता या मगुप्य कम क मामन लड़ नहीं माता पर मर निय का ज्ञान प्राप्त पर पर नियम क पल क मामन मर नि का प्रयोग करक प्रथम नियम के पल को तोड माता। यह श्रात्मा 'अपना भागी भविष्य अपनी इदानुमार बना स- है। श्रभ्याम और अनुभर म यह ज्ञान मिलता है। मन जड़ है । एक जड पनाथ निम नियम क ाधीन उमी नियम क श्राधीन मन है। जड द्रव्य का प्रत्येक श्रा काय कारण क नियमा य श्राधीन है। इमम मन का प्रत्या परिपतन उमस पूर्वगामी काय - परिवतन क ाधान है। मनुष्य य श्रत करण म कइ निसार और घासनायें उत्पन हानी हैं । तय नहाँ या चाहिए कि यह पूरवर्ती कर्मा के परिणाम हैं। निम माममा म स जा विचार माम मच उत्पन्न श्रश तक आत्मा म्यत
M
।
प्रभुक मार्ग में ज्ञान का प्रकाश
अत करणरे रिकार रूपये उत्पन्न होनेकी, याग्य माममा
क मिल जाने क अन तर उस विकार सम्बन्धमें मनुष्य निम्पाय
-
है और परता है। मन परतत्र है यह उसके पूर्वक कारणार
यशम है। इसमे जान मस्त हैं कि जिनमे मे जा उत्पन्न होना
चाहिये उसक सम्बन्ध म हम मरथा निम्पाय हैं।
मन म्यतन नहा पर श्रामा म्वतन है। मनी काम प्राधानि
के कारण उत्पन्न हुई अथवा रदली हुइ अररथा के माथ रम
प्रम न मिलकर तटस्थ भारम मनकी प्रस्थानों का माती
रहनेमे आमा यधन म मुक्त जाता है। यह कम धन काटन
वाला "प्रमोघ शव है इसका उपयोग करनेवाला उच्चकोटि का
श्रात्मा फिर पाय कारण के प्राचार नहीं रहता। यह शरीर की
और उममे रही हु मनी मागे प्रवृत्तिया का वश म रयकर
आत्म रूपमे निरन्तर ममभानम स्थिर रहता है।
मन चाहे कुछ करे और रिसी स्थान पर नाय तो भी उसमा
दृष्टा आत्मा मना मावधान रह मक्ता ।। श्रात्मा नानता है कि
मन, निन स्थितिया के वश म होकर काम करता है वह उसर
पूर्व के कारणो की धनह से हैं और आत्मा उमम फेरफार नहीं
र माना, परतु यनि आत्मा उमम रम पूवक न मिल तो मन
आगे नहीं बढ़ सरना । इस आत्मा का मनमा प्रवृत्तिके साथ
मिलना या न मिलना उमीफे श्राधान है।
श्रात्मा की स्वतंत्रता यही है कि वह प्रत्येक प्रबल प्रबल
पिचार के गाद आरश को भी यति चाहे तो थोडे ही समय म
प्रभु व मार्ग में जान का प्रकाश
दमन कर सकता है । यही उसकी सत्ता है। शिकार के उदय क
समय यदि आमा तटस्थ रहे तो उरित क्माणुओं के वहीं
शिथिल होने मचाय पारण की परम्परा र जाती है।
नगान कारण का उत्पन हाना कहाँ स हावट हो जाता है।
परन्तु नो शरीर तथा मनकी प्रवृत्ति कमाथ अनिमान को मिलाया
जाय तो उस भावना का प्रयाह बढता है। इसमे आत्म रस
यो पोपण मिलता है। इसलिये स्म बलमार हैं। श्रात्मा के हित
काग पिचारों में रहना प्रत्येर ममय ना विचार त्पन्न होते हों
उनम न मिलना और अपने ग्राम पिचार मन्द रहना यह
हमारे पुम्पाथ का परम साध्य है और यह दाघ अभ्याम से
प्रान हाती है।
तापर्य रिशरीर की या मन को पिसी प्रकार की हलका
स्थिति म आमा न होना, उम अयथा कामाक्षी वनार रहना,
प्रिय या अप्रिय मन प्रसर के भाग क उत्यये प्रति ममान दृष्टि
रयना रति भावा म रम पूगर मिलनेमे तिन निन भागा का
पापण मिलता है यह पोपण यद हा जाता है।
अभिमान म मन जापित रहता है, आत्मा म रािर पार
मामा तुरन्त ही मरना पड़ता 15म प्रयार मनर मन कारण
एक पीछे र यथा ममय रहित हार पापग्ग के अभार स
मन्द होते हुए अन्नमें गगहा जात है। र यामा सम्पाप का
अनुमय परता।
।
प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रमाश ३६
धर्म में धर्म को तोडना और द्रष्टारहरर म के पन्ने प्रवाह
को रोकना, इन मार्गों में शानियों को मरा मार्ग ही पमन
है। प्रथम उपाय शुभ सन्धना का हेतु है। दूसरा उपाय निरा
का कारण है । अशुभ क्म में रचन के म्यानपर, प्रथम मार्ग में
शुभ कर्म का पन्ध हाना है। यह परिग्गाम म हितकारी नो
परतु पातर म तादूमरा माग हा उपयोगी है।
श्रामा से मिले निना रिमी पामना या पियार की श्रेणी
आगे नहीं यढनाम निम्मय कारस पिचागे की उपेक्षा करना
मोरना चाहिये । इम मान व स्थिर रहन म मममान की उत्ति
स्थिर बना रहती है। मे हा मयाग कग न हा उममें मनमी
ममाधान नाली स्थिति का घिर रखने की शिक्षा प्राप्त करनी
।
चाहिये।
प्रकरण सातमा
पुरुषार्थ
फ्मक नियम को निस पूसर प्रयोग में लान मे हम
निश्चित परिणाम रपत कर मस्त हैं। विचार के अनुमारा
चरित्र अथवा श्रापरण बनता है । मिमी यस्तु की स्थिति को
प्राप्त करन को प्रयल इन्दा अात्मा के लिये ग्म सन्तु की स्थिति
प्राप्त करने का हेतु उपन्धित कर नती है।
पूर्व कर्म, यह अपना इच्छा मे पहल प्रयाग में लाया हुश्रा
अपना बल है । इम मम्मुम उसकी गति का विरोधी प्रवाह ,
प्रभु मार्ग म ज्ञान का प्रश सपने में उन दोनों के मघपण हाने में समान प्रवाह निबल प्राह को अपना निशा म साचता है । म पुम्पार्थ म क्म का अनुकूल बनाने का प्रयन करना चाहिय । यदि पूर्व क्म अनिष्ट हा तो उमा निराधी दशा म फेरन का पुरपार्थ क्रा। कर्मो की रचना नियमा की रचना हे | म नियम 7 सम्मुख दूसर' नियम का प्ररणाम नैस कि मोर क माथ क्षमा का मिलान स दाना गतिया कम जान स रनमा शुभाशुभ फल प्रकट होता हुप्रास नाता है। यति जान थविक ममय तक एक हा विषय व चिंतन क परिणाम का निवारण न कर मक ता मम प्रचण्ड बल तैयार हो जाता है। उमा प्रबल प्रनाह का रोम्न कलिय उस समय लगभग अशा मा हा जाता है। क्यारि श्रात्मा इम समय चाह स्सिना हा प्रवल पुरुषार्थ कर तो भाग ममय म पूर्व जम का मधूत दहइ गक्षमा नामनामा का श म र मक एमा बनना श्रसम्भर है। इम प्रसर कक्मा का निसाचित्त अवश्य भोक्तव्य कहत हैं । एसा कम हा ममय क पुरपार म श म नीश्या माता । पर पुरषाथ और भोग द्वारा धीरे धार नाश स्यिा ना मरता है । उमम विरुद्ध दशा म प्रयन परन म वह शिथिल अथना पुम्पार्थ साध्य बन मम्ताह । पुम्पाथ भी एक प्रार का भोग ही है। w- -- - प्रभु क माग मज्ञान का प्रकाश पुरपाय करके क्मों का क्षय करना ऐमा ही है जैमा नि उनका भाग करके क्षय करना । भागने मे कष्ट और परिश्रम होता है। पुरपाथ म भा इतनी ही महनशीलता, धैर्य, उद्योग और शाति की आवश्यकता है। निर्यल जाव भाग द्वारा और वीरपुरप पुरपाथ द्वाग क्मिा भी नियम को प्रयोग म लार पूर कर्म क्षय कर मरना है !पूर क्म मे पुरपाय मदा प्रबल है | कइ एक पुरुष कट गातों मनिषकी और मयमी हाने हैं पर उनको पूर भर का गामनाय अमुक रिपया मे प्राय निरल रनानी हैं। इसे प्रमग पर पूर्व क्म के म्वरूप तथा क्ल का ममभन वाल पिवेका मनुष्य उनकी ओर तिरस्कार के भार म नहीं नलि तमा की दृष्टि म सते हैं पार ग्नमा मम्मनि नत हैं कि पूर्व के मस्कार के मामन अपना मत्ता को प्रयाग में लाकर उमा पराभर क्रो। यति गमा बग्न म उममा पुरपार्थ तत्काल राम म न पाय ता सम- झना चाहिये कि जीन न इन पासनाश्रा का पूर्व ममय में एम प्रेम म मेरन पिया है तथा इमा मृत्य में यह मे मम्मार दृढ हा गय है कि उन पर वनमान काल की बुद्धि निर की शक्ति रिनय नहीं प्राप्त कर माना । उमा वर्तमान समय मानिक परन ग की नरह एक दिशा म गति करता है। तब उस मनुष्य का पूर्व ममय का नामना शनि रूप निली उमस गिद्ध नशा म पड जोर म काम करता है। इमलिये उम जीव का पतमान ममय का ज्ञान निवेर और बुद्धि का उदय उमरे प्रनल सस्कार मा नहीं दना मक्ता। M
२
प्रभु के मार्ग मेंज्ञान का प्रकाश
अपने मम्मान को समान म चारे सा ही घश पहुँचे
ग्मका भी अपेक्षा करता अपना फिलॉस्फी और तत्व ज्ञान का
यार करता है । इस वासना सम्पध में एक पालक
कवना भी सयम और धैर्य नहा रम माता ।
गम प्रसग पर उमके आचरण पर हम नमारी दृष्टि रखना
चाग्यि ! उसक थाडे से लोप या निर्मल श्रग का दस कर उमके
अर चरित्र का भी श्रादर न करना ठीक नहीं । विश्व में कोई
भी मान सम्पूर्ण नहीं। यद्यपि वह अपरा है नथापि अपनी
पन्नति के माग पर है । एम निपल मनुग्या में पूण चरिन की
श्राशा कहाँ तक हो मस्ती है।
दमर के दोप का नयर तुम्ने निगश न होना चाहिय।
श्रन भी पमरे सुधरने का श्राराश यह दृष्टि रखनी चाहिय ।
मम इष्टि म प्रत्येक प्रमग गे सो। तुम कोकुम्म का नाश
नहीं मिला इसलिये तुम श्रभा तम पनि हो। अमर श्रीर
अनुकूलता ये दोनों देव को मनुष्य और मनुष्य को राक्षम बना
न्नी हैं। प्राचीन शास्त्रा म ऐसे बहुत दन्त श्रान हे चोह पूर्व
पारा मे उछ न्यून ज्ञाना पुरप भा स्मिी प्रलोभन के वश म
हार बहुत ममय तर भ्रष्ट रहे । और ठोसरे लगा क पश्चा
ठिकान आपर अपना भूल सुधार
लो।
भूले हुए का तिरपार करना योग्य नहीं ! -सरा कारण यह
है"मम इमका दोष नहीं है । पूर्व के प्रपन यार मराभूल
3
*
-
।
प्रमु
के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश
की दिशा मे शीघ्रता से ले जा रहे हैं । उनके मम्मुम्ब डट कर
गडे रहना, यह पुम्पार्थी आत्मा के लिये भी करिन तथा कभी
असम्भव हो जाता है।
दूसरी ओर विचार करन म मालूम हाता है कि कई एक
नीर, पूर्व म के प्रल मम्मार के बहाने में अपनी म्वच्छन्दता
क श्रापीन होकर म्बपर को ठगन है । इम समान टूमरा कोई
घोर पाप नहीं। पुम्पार्थ को छोड़ कर पूर कर्म के सरकारी को
आगे रखते हैं। अपने दापों का नोमा भूत काल की वासनाया
के माथे मढते हैं। पर उनको इस पुस्पार्थ के भवान की कुटिलता
काला अवश्य मिलेगा।
मनुष्या ना मो- कर्म का प्रकृति के मम्मुग्प मर मामर्थ्य
म लडना चाहिये । यदि उमम पगभर भी हो तो भी यहाँ
अपना निचलता क कारण अपना टोप नहीं है। इस युद्ध म
अपने वीर्य को छुपार वामनानों के पश म हाना ही अधमता
की ओर ल जान पाला है। रमों का म्वाध्याय (पाठ) इतना
तो अवश्य मिमाना है नि चाह कैम भा प्रबल प्रलोभन हो
उनके माथ एक बार वीरता म युद्ध करने मेरे शिथिल पड
जाते हैं। यदि हम हार भी नायँ तो भी इमम हमारी आधी
जीन है। कोंकि यह हार, श्राग को होन वाली जीत की मामग्री
है। अपनी रिजयी शक्ति की मौटी जीत में नहीं पर प्रलोभना
- मामन डट कर सडा रहने में है । नानिमी कमीटी प्रलोभना
के सामने प्रामाणिकता है। पवित्रता की मौटी वासनाओं के
।
।
-
प्रभुदे माग म ज्ञान का प्राश
निमित्ता के मध्य में स्थिर रहन म । अयमर, अनुथूलता और
एकान्त म अपनी मसा प्रामाणिकना (ईमान) को स्थिर
ग्वन घालावीर पुम्प है । सभा यागा पहाता यमती म
रहकर बननाम मी पगिनना या निर रस! पराम का
मौटा, राग द्वेपानि अनराय शत्रुश्रा व नाश करन में है।
न्सम यह स्पष्ट कि नहाँ म पिमा म भएना में वहाँ
पर दम अपना सम्मति प्रगट सरना अनारत ह । हम प्रार
परानय पर पगनय पान पाल कपल का निर्णय परना दक्षना
नहीं । कैसा ही अधम आमा हा हमाग क्त्तव्य यह है कि
उमक कल्याण का पन्छा करें। और उमरा यथाथ मार्ग पर
लान या प्रयत करें।
अपन हदय में महानुभूति अनुसम्पानि रिश्रम आदि
'उत्तम वृत्तियों के उपन करने और उनसे काय रूप म परिणत
करने का जहाँ अवसर मिल वहाँ उनी यत्तय प म लाना
चाहिये । कारण यह है कि आत्मा की उन्नति, नत्य का उच्च
वृनिया को प्रयोग म लान स हानी है । वृत्तिया को जहाँ क्त्त
न्यामार होन का प्रसग मिलता हा वहाँ मन अपना अपना कम
भागत है, ण्मी मूर्यतापूर्ण नीति तत्व का पालम्बन कर क्त्त
व्यहान बनना उचित नहीं।
मेरा, नापण, त्याग और बन्धुता द्वाग ही श्रात्मा का
उर्ध्व गति का मार्ग खुलता । प्रति चाहे रिसा प्राार काम
प्रभु क मागम ज्ञान का प्रकाश
के
करती हो पर हमाग यम तो यही है कि हम दूमरे का टुस
जहाँ ना हो म कम करने का प्रयत्न कर।
प्रकरण श्रठावा।
विचार और इच्छा के यलका उपयोग
मनुष्य जमा विचार करता है वैमा बनता है। एक हा प्रकारक
तिरन्ना विचाराम चरित बनता है। पिचारा की देर पडन के
पीछे, न जानत हार भी व विचार अन्त करण म श्रानाते हैं।
इम नियम का यह अभिप्राय है कि तुम जैसा विचार करोगे वैमा
।
नोगे।
तुमन अपन चरित्र म मटगुण बढाने हा और दुर्गणों का
नाश करना नाता टुगुणा व निरोधा मदगुणों का चिनन करो।
अभिमान और लाभ कादर करन के लिय नम्रता तथा त्याग का
चित्र अपन हुल्य पर पर कपना रूप लसिनी मे लिखला।
ग्मक चिन्तन म लग नाश्रो गुण का चिन्तन न कर सको ता
'ग्म गुणको धारण करन वाले क्मिा महापुम्प का चिन्तन करा।
उमरी नम्रता, निरभिमानता मनोप और मरम्ब त्याग का अनु
करण करो ? अभिमान और लाभ के प्रबल गारणो क मध्य म
रटना रयकर अडोल वृति म रहो। महापुम्पा का चित्र तुम
अपनी मानमिर दृष्टि के सामने यडा क्ग और उमरो टेसते
रहो?
प्रभु मा म जान का प्रकाश
निमित्ता के मध्य में स्थिर र मह । असर अनुकूलता और
एकान्त म अपगी मथा प्रागपिता (ईमानदाग) का स्थिर
गगन पाला हा चार पुरप है । मया यागी यहा ता यमनी म
रहार नपास मी पवित्रता या पिर रखे। पराक्रम की
कमोटा, राग द्वेपादि श्रनगय शगुना र नाश करने महै।
मम यह स्पष्ट मि नहीं गम ग्मिा म भ्रता देखें यहाँ
एक दम अपनी सम्मनि प्रगट करना अनुचित है । इस प्रकार
परानय पर पराजय पान बाल क ल मानर्णय करना नक्षता
नही । वैमा ही अधम श्रात्मा हा हमाग क्त्तव्य यही है कि
उमरे न्याण कारया करें । और उमसे यथार्थ माग पर
लान का प्रयत्न पर।
अपन हत्य में महानुभूति अनुकम्पादृत्ति विश्वप्रम आदि
उनम यत्तिया क रत्पन रन और उनका कार्य रूपम परिणत
मग्न का जहाँ अवसर मिले वहाँ उनी क्त्तय म्प म लाना
चान्ये । कारण यह है कि श्रात्मा का नति, हृदय की म
वृत्तिया को प्रयोग में लाने मे हाता है । यत्तिया का जहाँ क्त्त
व्यागार हान का प्रसग मिलता हो वहाँ सर अपना अपना कम
भोगत है, एमी मूर्यतापूर्ण नीति तत्व मालम्पन करय पत्त
व्यहान बनना रचित नहीं।
सेना, स्वार्पण, त्याग आर बन्धुता द्वारा भी आत्मा का
उर्ध्व गति का मार्ग म्बुलना - । प्रनि चाह रिसा पकार काम
५
प्रमु र माग म ज्ञान का प्रकाश
करती हो पर हमाग ग्म ना यी है कि हम दूमरे का दुख
जहाँ तरहो म कम करन का प्रयत्न करें।
प्रसग्गा अठावा।
विचार और दन्छा के पलका उपयोग
मनुष्य नमानार बगना मा पनना है। हा प्रकारक
निरन्तर निगम चार रनना है। विचारों का टेर पड़ने व
पीछे, न नानन ? भा व पिचार श्रत करण म ानाते हैं।
हम नियम र या रप्राय है कि तुम जैमा पिसार रोग वैमा
नोग।
तुम अनि चरित्र म मटगुण रटान हा और दुगणों का
नाश पन्ना नाना टगुणा 7 पिराधी मदगुणो म तिन करा ।
अभिमान पार लाभ पाटर करन क लिय नम्रता तथा त्याग का
पिन पन त्य पर पर सपना रूप लग्मिनी स लिसला।
ग्म । न म लग नाश्रा गुण का चिन्तन न र मोता
'ग्म गुग्गमा पारगा ग्न याल रिमी महापुम्प का चिन्तन क्ग।
उमका नम्रता, निगममानना मन्ताप और मरम्वयागमा अनु
मग कग ' अभिमान श्रीर लाभ के प्रवल कारणों के मध्य म
न्दना रयर श्रढाल वृति म रहा । महापुरपा का चित्र तुम
अपना मानामरष्टि के मामन गड़ा क्ग और ग्मायते
६
मनु क माग मान राप्रकाश
याई दिनार ही अभ्यास में नुम अपने स्वभावम भारा
नरिवतन रसग । जस नर गुमम इन गुणो का समावेश पूरी
र पर हा गय नन तर निरन्तर महापुरपा का ध्यान करत
हो । अोर इम्म भिसा प्रकार का कारट न होने दो। यह
यमित आचरग प्रयाग-इस अभ्याम पल या उपयोगी अग
, और कम की मत्ता को तोडन का अमोघ शस्त्र है।
तुम्ह निस गुण की पारश्याना होवे उसका चित्र हदय
पर बना ला। उमका चिन्तन कग ? जैस जैम तुम्गरा प्रम इस
गुण की पार बागा वैसे वैम तुम गुणी बनोग । इमस स्पष्ट है
जिपिचार में ही चरित्र बनता है।
वतमान दूपण भूतकाल क पिचाराम परिपार रूप है और
बर्तमान विचारों से ग्ममें परफार हो माता है। पूर्व क कम +
सामने उमस विरोधी प्रपल मन परिणाम को उमा समान रय
कर उसरा विनाश कर माने हैं। राम मरल, परन्तु अमोघ
नियम म योड मनुष्या का हा विश्वास है।
विचार म अद्भुत शक्ति उत्पन करने का सामान्य रहता है।
प्रात्मा अपना अप्रगटिन सत्ता का दृष्टि स परमात्मा हा है और
इस मे म ही यह परमात्म शक्ति बाहर पाता है। में का हूँ?
कैमे नियमा के श्राधीन हूँ ? इन नियमा का स्मि प्रमार आच
रण म लान म म्बउन्नति साधी जा मयी है। इस बार स
अपना उन्नति अति शीघ्रता म होमवतार
परिवरण
*
प्रभु के माग म ज्ञान का प्रकाश कर्म का बल यहा तक है जहा तक उमको दूर करने का साधन हाथ मे नहीं है । एक परम योगी और दूसरा विषयी पामर जीन यह गेनों अपने विचारो के भ म ही बनत है। मनुष्य इम विरार शक्ति को पिरक पूरक क्रिया म लाना सीने तो उसकी मत्ता में रहन वाला परमात्म म्वरूप थोड ममय में प्रगट हा नाना है, इममें कुछ भी मन्ह नहीं । । । प्रत्यक इन्छा इन्चा के विषय का प्राम कर लेती है । इच्छा और सकल्प बल इन नानों म यह भेद है । इच्छा नाह्य पताथा में श्रामक्त होती है, उममें शुभाशुभ और याग्यायोग्य का निपक नहीं होता । सक्ल्प कल एपरित अनुभव क बल मे,याग्यायोग्य का नियाय करके कल्याण क माग म प्रतित करता है। एक प्रल चरित्रवान पुरप और टमरे निनल पामर जीप म इतना ही भेद है कि यह नर्मल श्रात्मा तुन्द्र प्रलोभना स अपना निश्चित मार्ग छोड र बाह्य श्रारपणा में मिल जाता है। सरल श्रात्मा अपन अनरीय अनुभव मारप बल श्रार विनेर स निश्चित विय मागम श्राग्रह पूर्व प्रयत्न रहता है। निर्बल मनुष्य के उपर पूरा विश्वास नहीं रपया जा मक्ता और जिन कामा में प्रलाभन और पाक्पण विशेष हावहाँला यह मनुष्य निस्सार हा है। परन्तु प्रबल मकल्पमान मनुष्य ऐसे माल नियमां के मध्य म एक जैसा दृढ रहता है। प्रत्येा अच्छी या बुरी इच्छा अमुक प्रकार के कर्म को उत्पन करती है और उस । y प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश कर्म के परिपार के ममय में आत्मा को निश्चित पल निलता यह नियम क्म याचने म और कम तोडने म मन में उपय: म्मान लेता है । मनुष्य को स्मिी प्रकार का इच्छा करन पाले बडे निम को आवश्यक्ता है । उमको मालम नहीं है ग्म प्रयल इन्छा द्वारा, वह शक्ति को ग्मि और लगा रहा ग्स पिकाम क ममय यह गच्छा महा विन रूप होरर मध्य पड़ी रहती है प्रल बामना पानी इच्छा रमन लिए के मयोग उपस्थित क्येि गिना नहा रहती। उमसे अमापारण पुरम करना कर वह छा उमर इष्ट भार का पूरा कर देता परन्तु इमर प्राप्त होन के पश्चान् श्रामा का जो अपम्था - हैमा ज्ञान नष्टि द्वारा नयन म महान पर श्रार पारतापरत करती है। यह इन्छिन विषय की प्रानि श्याम पिसाम म म या होन क स्थान मापपरीत और पिनकाग हाना है। यह मनुष्य भोग का एक कीडा ही बन जाता है। 11 1 यश, कार्ति और रयाति की लालमा मा मनुष्य का पा चना देती है। बहुत में मनुष्य उमका गुण गाय ला म वाह- हो, और मय का ध्यान भा मा का पार पाकापत हो, : इन्छाय करता है पर ग्मा नाम नहा हाता मि अभिE कागोमा उठाना कितना भर है। यश की लालमा नालग अन्य मनुष्या के अभिप्राय मान कर अपना स्वतन्त्रता त्याना पडती है। अपनीइच्छामि । प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश 28 मई अभिप्राय कोलवाकर लोगा से यश खरीदने के लिये अपना प्यारा धन व्यय करना पड़ता है। कीति रूपी भयकर पिशाच को स्थिर करन के लिये हर समय हानि उठानी पडती है अपने यह पन का घटा निरन्तर गले मे बापना पडता है। गेसी इच्छा र फल भोगे विना उमका छुटकारा नहीं होता। मची कीर्ति तो मनुष्य के सागरण के पीछे रहती है। उसके मलों के पीछे वह स्वयमेव आना है। यह मत्कम क्सिी कौनि का प्राम करने के लिय नहीं करन चाहिये । इस नीति की इच्छा अपनी स्वनाम्ना के उपर अकुश रगती है । यह ठीर है कि उत्तम कार्य करने की इच्छा करो पर सर्म कीर्ति प्राप्त करने क लिये न करो । काति लाग्यों निहापाली एक शारिनी है। उसकी कुछ निहायें नुम्हाग गुण गाती हैं और दूसरी निन्ना करना हैं । तुम अपनी कीति के लिय किम रिस को प्रमन कर मस्त हो। हरक का अभिप्राय एक समान हो जाय इमप लिये तुम्ह अपनी म्वत नता योनी ठीक नहीं। निवर हित इच्छा हानिकारक है। तुम्हारी प्रवृत्ति ऐसी नहा होनी चाहिये जो कि तुम्हे अधागतिक माग में हो जान वाला हो, किन्तु आमारे अनन्त गुणों को प्राम करने के मार्ग में प्रकाश रूप होनी चाहिये। आगे बढन पाले मनुष्या राशुभ इच्छाश्रा का त्याग नहीं करना चाहिये । मनुष्य को इच्छाओं का यल ही आगे बढ़ाता है। एक इच्छा के विषय की प्राप्ति होत ही दूसरी इच्छा स प्ररित और आगे चलता है। जहाँ श्रात्मा अपनी पिछली प्रवृत्ति को । प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश शुद्धतर करना बन्द कर देता है वहाँ ही से इसका विनाश अर्थात् अध पतन प्रारम्भ हो जाता है। कारण यह है कि प्रवृत्ति का मूल हेतु, आत्मा की पूर्णता प्रकट करना है। पूर्णता प्राप्त करने मे पहले इन्छा को त्यागना यह प्रगति के रोक्न के ममान है। इमसे यह बात स्पष्ट होती है कि तुम को प्रत्येक इच्छा से पूर्व बहुत विवेक स काम लना चाहिय। इच्छा के प्रपल शास्त्र का उपयोग अपने घात करने के लिये नहीं, किन्तु रक्षा करन के लिये उचित है।इच्छास उत्पनशुभाशुभ कर्मों के अनुभर किये बिना जीव का जुटकारा नहीं । विपर लोलुप प्रात्मा, यसन्त की मधुमक्षिका की तरह एक पुष्प र दूमरे और दूमरे म तीसरे पुष्प का रम चूमने के लिये भ्रमण परता है। उसका यह सपर नहीं कि इसका समुद्र वन सय है है। यह पुष्प ता थोडे ममय फे पश्चात् कुम्हलारमुग्मा जायेंगे इसलिये है और यदि तू विवस्वती बुद्धि का नगर उपयोग करेगा तो जीवन का अन्तिम मर्म और रहस्य ममम मरगा। प्रकरण नवमा पवित्रता पवित्रता के रिना किसी प्रकार मा मचा श्राम विकास नहीं होता। आत्मा, मन वचन और शरीर के विकारा के वशवर्ती = यने किन्तु मन वचन शरीर आमा र अाधान रहकर यथोचिन प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश प्रवृत्ति कर सकें इसी का नाम परिनता है। आत्म-मार्गम भागे बढने की इच्छा रखने वाले जीनों के लिय यह पवित्रता मुग्न्य साधन है। सामान्य मनुष्या के जीवन यहुधा इन्द्रिया के श्राधीन रहते हैं वे इद्रिया के विपया म रमे रहते हैं। वे जहाँ जायें उनकी ओर हो उनका ध्यान आकर्षित होता है । व रिकार और तुच्छ इच्छाओ के वश में रहत हैं तथा परिणाम स्वरूप इष्टानिष्ट पियों की प्राप्ति अप्रानि म विविध दु ग्मा का अनुभव करते हुए अनेर जन्मों के अनुभवा का साथ लेकर ममार चन म घूमते रहते हैं। अनेक अच्छे या बुरे अनुभा के अन्त म ना मन का विकास होता है । जर वे मन में रमण करत हे तन उन्हे इन्द्रिय जय मुख की अपक्षा मानसिक मुग्य अधिक प्रिय लगता है। मन क विशेष अनुभवों के अन्त म उनको श्रात्मा का सुख और भी अधिक चिर होता है। तन मन के विकल्प जाल में पारा कर यह ग्रामीन हो जाता है। इस आत्म सुसका प्राप्त करने के प्रमग मे, जीन को मन तथा इन्द्रिया ने पूर्वाभ्याम म जा तुन्छ मस्कारा का समह रिया होता है उसके माथ युद्ध करना पड़ता है प्रबल इच्छा शक्ति के वल मे, अन्तत इन वासनाओं का पराजय होता और श्रात्मा विनय पाता है। इस युद्ध के प्रसग में इन प्राचीन समारों वाली वामनाओं नथा कामनाओं का कितना भारी बल मत्तामे सगृहीत है यह विचार म पाता है। मन की शक्ति स्तिनी प्रबल है इसका
प्रमु के मार्ग में प्रान का प्रकाश
मान इस समय होता है । जिन मसारा का नष्ट हुश्रा ममझता
रा, व दिप हा थे । नष्ट न थे । उसे अब पता लगता है कि
निन लागणियों में श्रावेश को वह अपने श्राधान सममना था च
महज निमित पान ही फैस प्रयल जोर म अकस्मात प्रक्ट हो
पति हैं । उमा मन ज्ञान होता है कि इन उत्तियो का नाश
बहुत दीर्घ काल में होता है । मन तथा इन्दिया की पराधीनतास
गुटना रो मामान्य बात नहा ।
इन्द्रियो तरा मन न घ समय स अमुक प्रकार का जा
विरद्ध गति प्राति का है, रमा वेग वालन म नवीन वेग देना
पडता है उस समय रहुत बल लगाना पड़ता है। उन्हल मन
तथा इन्यि अपनी इच्छा के निद्ध वर्तती हैं। प्राधाति का
गाने का प्रयन करते हुए भावे प्रेस विपम प्रसग म, थाडामा
निमित्त मिलता हा प्रवल होर वार की इन्छा क रिद प्रकर
होनात हैं
गेम मनुष्य म्यभार को शुद्ध करन क लिए उमाह के मान
विधापूपर काम करने की प्रारश्यकता है। विपरीत गति का
भधारने का उपाय यह है कितने शुभ रिवाय नमन में एकत्रित
परो कि अशुभ विचारा को मन म रहन माधान न मिल
दिय के विवाग या मूल स्थान मन है । मन का किम
शुभ विचार, पवित्र नाप और किमा मद्गुरण र प्राधार में
लगाया नावे और वह अभ्याम निरनर माह क्याथ दी
प्रभु के मार्ग म ज्ञान का प्रकाश
काल सक फरने म ारे तर यह अवित्रता और अशुद्धि, परि
जता के रूप म यल मानी है। एम शुभ विचार यति मन में
अच्छी तरह पत्रित हात रह तो फिर अशुभ विचाग का नवी
मन 'उत्पन गेना चन्द हो जाता है। पनी नतीन पोपण न
मिलने म पूर्व के मम्कार नष्ट हो नात हैं या शुभ म परिवतित
हो जाते हैं। यहाँ विशेष मारधानता यह रखनी चाहिये कि इममे
नीच सगनि और विपरीत सयोगा मे, जार का बहुत दूर रहना
चाहिये । एक मनुष्य कामवासना + दुर्गुणों के उपर विजय पाने
के लिए प्रयत करता है। यह मममना है कि अनम पिचार
नहीं उठत अथान यामना मर गई है । परन्तु एका तराम म
कामवासनानुस्ल मयोग मिलत हा उन वामनाया का उन्य हा
जाता है और मन के उपर मयम नहा रहता।
उम समय एमा मालूम होता है कि श्रोही। या क्या
श्राश्चय हुश्रा मि श्रान तक परिजम पर पानी फिर गया।
मुझे थोड़ा भी लाभ न हुआ। यात भी ठीक है, अग्नि की एक
ही चिनगार्ग जहाँ श्रग्नि काजलाने कागुण रखता है, यहाँ उमम
प्राम के ग्राम जलान की भी मत्ता है । एमे ही दुर्गुण का पोज
भी यदि मत्ता म पडा हा तो उममा तनिक भा विश्वास न करना
चाहिये।
-
जय तक अपनी यासना को प्रत्येक प्रमग पर नाश कर
मकने अथरा रूपान्तर में पलटने की प्रबल शक्ति अपने म प्रकट
।
प्रभु के मार्ग म ज्ञान का प्रकाश
न हो तर तक यथा तथा ऐस विपयों की वासना को पोषण तथा
उत्तेनन करने वाले द्रयों मे दूर रहना चाहिये इसमें हालाम है।
जो जीप रिपय वासना से हटाना चाहते हैं उनकी काम के
उत्तेतक नाचल, कथा, चार रस पूर्ण वाता विषय रमपोपक
नाटक और विषयों को जागृत करने वाले मनुष्यों के महास
से दूर रहना चाहिये । गनम आहार कम करना चाहिये ।
खी पुस्पा के सहवाम वाले स्थान में और उना समीप न
रहना चाहिये और न इम प्रकार का वातालाप करो ऐम ऐसे
दृश्या को ध्यान स न नयो। पूर के विषया के अनुभव को
म्मरण म न लाया और विपयों के उत्तेनक पदार्थों का भाग
उपभोग त्यागो।
मनुष्यो की मनोवृत्तियाँ हर समय एक समान नहीं रहतीं।
नर नीच वृत्तियों का बल कम होता है तरच नियों का उत्पन्न
करने का काम मुगम हाता है। उस प्रमग के लत ही और
नीच वृत्तिया का प्रबलता का उदय होते ही उन वृत्तिया के पोपक
ममागमा के मिलते ही, मनुष्य अपने मन की स्थिरता और
स्वाधानता सो बैठता है । एसे प्रमग पर इष्ट देव के स्मरण करने,
परित्र पुरपी को याद करने, उनमें मनावल का प्रयल और
पवित्र चित्र हत्य म लाने से और उम स्थान को त्याग करके
क्सिी मरपुरुष के ममागम म जान से उन भावनाओं का प्रवाह
बदल जाता है । तुच्छ वृत्तियों पायल कम हो जाता है और
मन की निर्मलता को पोपण मिलन लगता है।
प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश यदि वासनाओं के अपर विजय पाना हो तो अपरित्र विचार उत्पन्न करने और मे सहनास प्राप्त करने में किन किन दुगों की मम्भावना रही हुइ है इसका भली प्रकार विचार करो। जब जब ऐमी तुच्छ भारनायें उठने लगे तर तर तत्काल मन को उन निचारो की पिद्ध दिशा म पिरा देना चाहिये और उसमे अलग जाति के रिचार करने का प्रारम्भ कर देना चाहिये। ऐमे प्रमग पर टममे अधिक लाभदायक कोई दूसरा मार्ग नहीं। जहाँ पवित्रता है वहाँ ही आत्मिकनल प्रकट होता है। जो माग्य, शरीर मन और नीति मे नितना निनल है उतनी ही "उसके उपर तुच्छ स्वभार की सत्ता राज्य करती है। परिनता ही यात्मिा वल, अमरत्व, प्रकाश, शाति और 'अनन्त शक्तियों का माग है। जहाँ पवित्रता रहती है वहाँ प्रभुता भी रहती है । मनुप्या, तुम पविन बनो। यदि पवित्र न बनोगे तो दुस महन करने के लिये कटिबद्ध होना होगा। प्रकरण दसवा "त्याग" मनुष्य जहाँ तक इन्द्रिया को शान्त करता है और मन को 'पवित्र तथा स्थिर करता है वहाँ तक यह शुद्ध प्रात्मा का अनुभव कर सकता है॥१॥ 4 । प्रभु फेमाग में ज्ञान का प्रकाश शुभाशुभ कर्म करन म जीय उमकी मला म स अमुक शरीर क श्राकारा को धारण करता है। उमम जीवन प्रकट होता है और शरीरो का नाश होने म नवीन नवीन शरीर महण करके श्रना अनुभवा के माध जीवन बिमाम को पाता जाता॥२॥ जार प्रति म अथात् पुटगल म प्रस्ट होता है। अपने ममीप र पुद्गला को प्रारर्पित करता है और उनसे श्रापार , ग्चता है । जीवन के क्त्तय करता हुश्रा वह शरार घिमता है। उसर परमाणु निमर जात हैं। उमम्मान पर नपान परमाणु प्रहण करके, जार बार बार नगरीन शरीर रचना है। श्राकार घिसता है नान परमाणु उसमे प्रवेश करत हैं। राम बार बार पुदगल प्रहण करो नवीन शरीर रचन म और उसमा स्थिर ग्सने म परमाणुश्रा का उपयाग करके जापन परम्परा प्राग बढता है। नपान परमाणु लिय बिना प्राकार दीप समय ता स्थिर नहीं रह साता। प्रवृत्ति के मार्ग में परि पनन करना और निन का वनाना यह अपना विकास माता जाता है। निवृत्ति मार्ग की ओर बढते ममय उमक प्रतिकूल अनुभव होता है। जीवन, प्रहण क्रन से नहीं रिन्तु त्याग म स्थिर रह सस्ता है । परम्पर त्याग और ग्रहण करन म, तथा परस्पर के आधार के नियम को स्वीकार करन म सय जीव, जावन पूना करत है अर्थात् आस्तित्व रमन हैं। -
प्रभु प मार्ग म ज्ञान का प्रकाश
इस आकार घालेहधारी समार मे हम अकल नहीं रा
सक्ते । दूसरे पुद्गल परमाणु ग्रहण फरक धनम्पति आति
शरीरों का उपभोग करके ऋणी हुए बिना हम अपने शरीर को
स्थिर नहीं रप मक्त । इमण को हमन, प्रहण की हुइ किसी
मी वस्तुका, इमर जोगा का रचान के लिय, उनका भला करन
फे लिये, अथवा स्थिर रखन लिय भोग टर उतारना है।
इमका त्याग पिये गिना श्रधान भाग लिये रिना मनुष्य
दम मामारनेह धारा रिन मनहा रह मक्ता दम मार पिसस
का मूल त्याग महै । इम त्याग के परिणाम म सर शुभ वस्तुय
प्राप्त होता है ज्ञान का अभ्याम करके, गुर म मान लकर हममा
हम त्याग भी कर मान हैं। दूमरों को इममा लाभ पहुँचा मान
हैं और इसी प्रकार त्याग कर हम पागे पट मफत है।
टूसरा की महायता क्रन तथा उन्नत करने में जो जो काम
और त्याग करने पड़त हैं उन उन काया को छोड कर शेष सर
कामों मे जोर अपन श्रापको बन्धन में डालता है। कर्मक पल
की इच्छा मनुष्या का क्म के बन्धन में गाँधती है। यदि ग्न
उन्धना म मुक्त रहना है ता मा के पल का भाग देना मीस्वा।
सत्कार्य के फल का उपभोग दुमरों का महायता के लिय
करो उस सहायता के फल के पदले की भाशा फिर पिना
परमार्थ के लिये कार्य करो। फर्म फल त्यागने मे नवीन कर्मों
मेबन्ध नहीं होता । आत्मा की ऐमी निर्लेप'श्रयन्धक
प्रभु फे माग में ज्ञान का प्रकाश पूर्व कर्मों की निरा होकर वे नष्ट हो पात हैं और ऐसा होने से प्रात्मा अपने मत् म्वरूप में प्रगशित हो जाता है। प्रवृत्ति मार्ग की जहाँ ममाप्ति होती है और अपने आत्मा गेभोर पाना हाता है वहाँ सही निवृत्ति मार्ग या प्रारम्भ हाता है। इम निवृत्ति माग में प्रवेश करते ममय सर वस्तुओं का और उनकी श्रामत्ति का त्याग करना पड़ता है। उस ममय नाय का बहुत दुस होता है। कारण यह कि निवृत्ति के मार्ग की शान्ति का आनन्द अभी से मिला नहीं और प्रवृत्ति का त्याग करना पड़ता है। श्रत इस निराधार मार्ग पर चलना कठिन प्रतीत हाता है। तो भी हे श्रात्मन्य तू इम समय घरा नहा । शाश्नात तत्व के माथ सम्बध करने और उमको प्रकट करने के लिये तुम्ह क्षणिक वस्तुआ को त्यागना चाहिये। इन क्षणा घस्तुओं का सम्बध छोडना चाहिये। इस स्थिनि में आये निना किसी दूसरे तट पर पहुँच नहीं सक्ते । दूमरे तट पर पहुँचने के पश्चात तुम्हें यह जीवन प्रान दमय प्रतीत होगा। जो अपना व्यावहारिक जीवन चाहते हैं ये आत्मिा जीपन खोते हैं। और जो इम व्यावहारिक जापन का यागते हैं वे ही श्रात्मा के अनत जीवन में स्थान पाने के याग्य होते हैं। जहाँ तक इन तुच्छ पदार्थो के साथ सम्बन्ध न छूटे यहाँ तक उच्च जीवन का अनुभव कभी नहीं हो सकता। प्रकृति जन्य अड पी दगलिक जीवन और आध्यात्मिक जायन के मध्य
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प्रमुफे मार्ग में ज्ञान या प्रकाश
म कोई दूसरा मार्ग नहीं। इसके मध्य में पड़े हुये माया जाल को
पार करना चाहिये । यहाँ तुम्हे अपन श्राप पर ही आधार
रखना पड़ेगा।
मायारी श्राकार वाले मारे आधार छोड़ देने पड़ेंगे। इम
ममय सर कुछ शून्य और निराधार मा होगा। तर शान्त
जीरन पाले शून्य स्थान के बिना दूसरा कोई स्थान देखने में नहीं
आयगा। तय ही म जीवन की शून्यता में म शाश्वत प्रभु
प्रक्ट होंगे।
जिम निसने इस विनश्वर विश्व के सह प्रकृतिमय माया
जाल की मीटियों को पार करने का प्रयन किया है वह ही परम
शान्त अनन्न और अविचल स्थान पर श्राफर स्थिरता से
रहते हैं।
जो भूतकाल में यात्मिक-जीवन को ऐमी स्थिति में पहुँचे थे
उन सरसो ऐमा ही अनुभव हुआ था। हानि के सग लगी हुई
थाकार वाली हलकी वासनाथा, भागाका त्याग किये बिना
कमी भी आत्म-ज्योति प्रक्ट नहीं होती।
तुच्छ स्वभार को जला देना ही चाहिये। यह काम स्वत
करने का है। म्यय ही ज्ञान रूप अग्नि को प्रीम कर उमम इमा
होम करना चाहिये।
इस जड़ यम्नु की आसक्ति वाले वासनामय जीरन का त्याग
करो।सर्वस्व का त्याग करने म जहा सब तुमको मालूम हो वहाँ
नक कोई भी यस्तु पची ना रहे। आत्मा के उपर पूर्ण विश्वाम
।
-
प्रभु मार्ग में मान का प्रकाश
रखो ? इस मर्वस्य त्याग न, अनेक जीवों को अनन्त जीवन में
मिला दिया है।
जीरन लेनेम नहीं पर त्यागन में है। स्वामित्व प्राप्त करन
मनहारिन्तु अपने पास जो पुरमा हा उमके ते देने म ही पूर्ण
जायन है। श्रद्धा म्मा दिव्य जीवन की पृयता प्राम करने क
लिय मर्यम्य त्याग हा एक मार्ग है।
शरारा की मयाना है आत्मा का मादा नहीं, इमलिये शरीर
प्राण कर जाविन और पामा त्याग करखे पारित है। इस
लिय नितना मायाची प्राकृतिया का वासति स रहित होंग
उननी दिय पूणना अपन अन्दर प्रगट होगी । निवृत्ति मार्ग का
मुग्य लाण त्याग । पहरण करना यह इन जातियों म
बने हुए शरीर में यार थार श्रान जाने का लक्षण है। दते रहो
पो मेही जा मफत हानिरनि माग मे त्याग हा महायक भूमा
यनारामा कायागे बटानारजहाँ भय इम शरीर व माथ
ना मानर नाव उम मालिपट साईया तर त्याग
पनि मजार को भय और उद्वेगोना है। यह नाही त्याग
दुम र मालम हाना । परन्तु जय विविध भागग म पड़
हुए आत्मा यायन, अनुभव करन का यह जीय प्रयन परता
मात्र त्याग । पान दम्प मात हाता! त्याग मही धान
का मड़ा परमना ।
मध्यात्म जीवा का माग रणमर मा म जीयक अनु
मर में मापे मो इस, पारधार यदान हुए मंमार का रहस्य
--
प्रभु क मार्ग में ज्ञान का प्रकाश
समझ में आ जाय। और निम जगत की यह 'अमूल्य यन्तु
मममता है उसकी अमारता सममानी मी कठिन न होगी।
जा मनुष्य, श्रासार म जीता है वह क्षण क्षण में मरता है
क्याकि आकार क्षण सण म बदलता है । इसलिये ही वह मनुष्य
मरणाधीन है। जा मनुष्य श्रात्मा में जाता है वह अमर हाता है।
यामि यही सधा जीवन है।
इम जीवन को स्थिर रपने लिय हलक म्बभार वाली
बासनाओं की उपेक्षा क्रा। इन सुनना भी चन्द करो। नन
तक आमिर जावन म जीना सोना नर तर इसी प्रकार जीवन
“यतीत करन का प्रण क्रो। अात्मिा जीपन नित्य प्रक्ट होता
रहे इसके लिये, हलके तुच्छ मायाया पदार्था का त्याग करा।
यही मुमुक्षु का जीयन है । म्वार्थ को सपथा भूल जाओ ? स्वार्थ
त्याग तुम्हारा म्वाभाचिर जीवन बन जाय इमक लिए छोटे म
छोटे म्वार्थ त्याग से प्रारम्भ पर मरम्ब त्याग की अन्तिम चोटी
नक पहुँच जाओ। एक हाथ म सक्रप रूपी यल का हथोडा लो
दृमरे में विचार रूपी छैगी परड कर जीवन मूर्ति के कारीगर
बनो?
नस कारीगर पत्थर में रहा हु मूति को निगलने के लिए
अपने हथौड़े और छैनी से (जो इसम विघ्न और म्कावट हाती
है उनमो निकाल कर बाहर पं पर) मूर्ति को बाहर निकालता
है, वैसे ही नहा तक तुम्हारे अनर रहा हुश्रा प्रमु देखने मन
आये यहाँ सब उसक श्रागरण करने वाली शरीर नथा
-
६.
प्रमु के मार्ग में ज्ञान या प्रकाश
धूल रूपी भावनाओं को बाहर निकाल दी। एसा करने मे इस
मनुष्य जीवन म स दिव्य प्रभु मुटर रूप म प्रगट हागे ।
।
प्रकरण ग्यारहवा
दिशा का परिवर्तन करो
वन्धन से मुक्त होने के लिये ज्ञानरा बारश्यस्ता है। किमी
तरह भी हो पर तुम बधे हुए हा । इस धधन का कारण समझा।
फिर पन्धन तोडन का साधातयार रस उस पूण बल से तोड़ने.
का प्रयत करो।
जीपको धनादिस कभा मन्ताप नहीं पाया। इसका कारण
यह है कि जिम वस्तु का वह साह करना चाहता है उस वस्तु
के स्वभार म अपूर्णता है ।निसम पृणता ही है ऐस प्रात्मप्रकाश
के प्रक्ट होन से ही सन्तोष या शाति मिलगी। अभा तक जीर
का जीनन जड़ प्रकृति के अनुमार ही था "सको अरमात्मा क
अनुसार बनाभो ? जीवन अभी तक इम भौतिक माया का
अपने ग्य म मुरय स्थान दिया हुआ था, अन आमा को
हुनय में मुरय स्थान दो ।अपन काय की दिशा बरलो और उनस
महायकों का परिपतन क्रो माया के लिये तून माया का ।। मूल्य
दिया है अब श्रात्मा के लिय आत्म परायण याल शुद्ध उपयोग
का मूल्य दो। अपन जीरन के रोम राम म और क्षण क्षण मै
उपयोग को स्थान दी। इस मायावी जगत में और आत्मा के शुद्ध
४
- - AM प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश स्वरूप म भूमि आकाश का अन्तर है। प्रकाश और अन्धका जैसा अन्तर है। छोटी लडकिया अपने मट्टा के घर यनाकर गुड्डे गुड्डियों के विवाह का रोल सलती हैं इतनी हो कीमत इस विश्व को माया की है। तुम्हारी सगृहीत वस्तुआ का इससे अधिक मूल्य नहीं हो सस्ता। अपना दृष्टिकोण बलो ? इमसे तुमको कुछ और भी मालूम होगा। यह विश्व जो तुमको अनुकूल प्रतीत होता है उसका असा- रता का तुम्हें ज्ञान हो जायगा।प्रामा ही तुम्हारो भूख मिटायगा अर्थात् सघाशाति देगा।इद्रिया के पियों मे सन्तोप नहीं होगा। ये अन्त में विरम मालूम पड़ेंगे। इनका श्रानद शोक के रूपमें बदल जायगा । निपया में श्रासक्त रहने वाले मनुष्या को हैरान होते, दुस सहते, निन्दा पाते, दरिद्रता भोगत और निराश होत देखार तुम इमम कुछ पाठ मीसो तो अच्छा है। तुम अपना मार्ग बन्लो ठीक है अयथा ठोकर साकर पाठ सीसना पड़ेगा। विपयों की क्षणिक रमणना इनसे उपभोग के पार होते हुए दुय या अनुभन तथा इनम स अन्यान्य क्षण म प्रगट होती हुई दुस की लालमात्रा पर विचार करो' श्रा अनन्त शक्तिमान् श्रात्मा ! अन तू अपने स्वरूप की तर्फ पापिम लौट ? प्रवृत्ति माग से निवृत्ति माग के मंदिर की तफ श्रा। उप तो मही वहा शांति आनद, प्रेम, ज्ञान और अनन्त जारन आनि कैमी मुन्र साम- प्रिया है। ऐसा होते हुए तू क्सिलिये नाहर भटस्ता है । वात
।
प्रमुवे मार्ग म शान मा प्रकाश
मच है। दुख सहन किय मिना पुग्म नहीं मिलता और नदुम्म
पिना सुख का अनुभव हाता है। दुम्ब रिना सच्चे मार्ग पर नहीं
चल सस्त । दुगक वाद मिला हुश्रा उप रिशेप रममय होता
1 अनुमर
में और स्वय प्रश्न उभाग मे मिला हुआ
माग रहुत हा अमृत्य मालूम होता है। दुयय गिना मुग्म की
रामत नही मालम हाता । तपम पिनाशीलता या भान नहीं
हाता । श्रामवता नाय पिपया मायाया माधना से व्याकुल
हा गया होता अन्तरीय मापना मातफ वापिम श्रानिम
ममय य मायिक यन्तु तुम्ह श्रानन ना वन्त रेंगी उभी
ममय नर लिये अन्तरीय श्राम द्वार खुल नायग और प्रभु दशन
का प्रकाश श्रात्मा का गमगाता ज्याति नर हृदय म प्रगट होने
लगेगा। यह प्रभु का पर है इम पार चलना प्रारम्भ कर
या प्रभु मनिर का माग है।
71
प्रभु बाहर विमा स्थान पर न बैठे व ता तर मधे आम
भारम विगतमान हैं। नरेत्य मे ही प्रगट हाग। तरे पास है
हैं। मनुत वह तो तू हा है। ण्मा ममम कर बम्बम्प म रहते
हा तू जीवन को व्यतीत करन का निश्चय पर?
यह अमूल्य अवमरन सानना । अनान गनी धीत गइ
प्रारम प्रकाश का वाम शुरू हो गया है। अग्णादय में पान
मर्य का उन्यता है। अन्त अन्तः साला ?इम प्रका
पार निद्रामय तक पड़ारहगा।
प्रमु
के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश
६५
तुम्हाग अत परण निस काम का निषेध करे वह न करो।
"इस मार्ग पर मत चलना" इस प्रकार अन्न करण से श्राती हुई
श्रानान को जोषित प्रभु का आगाज मममा । उसक करने पर
चलो। अपनी दृष्टिको विशाल धनाओ। इस मायानी माग
नथा प्रमु मार्ग में जो दीगार बडी है उसको तोड दा और उसको
पार करसे आगे चले जायो।
श्रो मुमाफिर चाहे क्तिनी ही कठिनाइय क्यों न श्राने तो
भी तू इन मायागो विषया के पिपमिश्रित मधुर ग्म को छाडदे ।
अपनी विश्व व्यापी इच्छाओं का त्याग कर।
म्नह स धन्यन ताड र । इस मायावी दीवार के पीछे ही
सीवा रानमाग है । वहाँ मे तुम्हारे आगे बढ़ने का सरल माग
प्रभुद्वार का थोर जाता है। नू इमलीपारको उल्लघन किये बिना
श्राग नहीं जा मकगा। कई एक जीर यहाँ श्राफर म जात हैं।
कई जान तो यहाँ मे अपनी आगे बढने की असमथता जानर
पाद लौटे श्रात हैं । परन्तु घरा मत । अपन पिचारा को शुद्ध
और रद बना। मायाची विचारों को सस्रता-मिलापट-का
दूर कर।
-
यह दृढ निश्चय करो कि में अनात शक्तिमान प्रात्मा
सारे विश्व को हिनादने का मुम में वन है । माया दूर होता मुझे
माग मिलना ही चाहिये । इन विचारा म स्वलीन हो, मरे
विचारों को भूल जा ! स्थिरता बढा फिर देखेगा कि स्वार्थी
मायानी अज्ञानता का गढ हिलने लगेगा । यह गिरा, वह गिरा,
।
प्रभु के मार्ग म झान का प्रकाश
अर' सचमुच टूट ही गया। श्रन मागे सीधा और विशाल
गाया है। श्रमड प्रयाण पर अप्रमत्त होकर आगे बढ । अरे
दूसरो के नीच व्यवहारा का तिरस्कार क्यो करता है ? इमी
समय पर से धनि प्रगट होता है कि यह तो रिघ्न रूप है।
जाग | इसकी उपेक्षा कर' इमकी सत्ता में स्थित प्रभु अयान
पूर्णात्मा म दृष्टि लगा । एसा करन स गुग्णानुगग प्रकट होगा।
यह प्टि भूलकर श्रात्माकार वृत्ति होगा । नम मयोग बल्लन
लग। विचार रूपान्तर म प्रगट होने लग। तिरमार वृत्ति दर
हुइ । प्रेम, सच्चाप्रम श्रात्मभार प्रगट होने लगा।
श्री प्रभु मार्ग के पथिक अभी श्रागे चल । प्रतिल सयाग
श्राते है तो उनको स्वानुकूल बनाता रह | विचार पदलन
प्रनिल मयोग भी मुखदायी और अनुकूल मालम होते हैं। इसस
तुम्हारा प्रातरिक बल विशेष रगा। निर्मलता दूर होगी।
अनन्त शक्तिमान श्रात्मा में निरलता का स्थान नहीं है।
पार्शप परमात्मा को टेस? इसप्रभु क अनुकूल तू अपना
व्यवहार कर । नत्यम प्रमुक प्रकाश जागृत प्रयोघ-सा प्रगट
कर। इस प्रकाशक तेन म काम वासना का धूनी का सोनार
निकाल और निरिकल्पर ध्यान मी ज्वाला में जलासर भम्म कर
निश्च का तफ प्रेम प्रगट परना रह । इमम सारा विश्व,
भयानर अटवी रूप स यदल कर नन्दन यन बन जायगा।
।
प्रमु के माग में ज्ञान का प्रकाश
६७
प्रकरण चारहवा
विचार शक्ति
याप भाप और बिजली का शक्ति से जो महान कार्य नम
समय शीतता पार सुगमना म हो रहे हैं उन सभा महान काय
विचार शक्ति मे हो सकते हैं। म निजली और पाप को एक
यत्र में लगान की थानश्यकता है मे हा पचार शक्ति को भा
अमुम मयादा न श्रासार स नियमित करन की आवश्यक्ता
तभी यह शक्ति बाहर कार्य कर मस्ती है।
जम परम्परा स घुमान बाल पिचार हैं। ऐम हो जमाना
नाश भी विचारों में ही हो सकता है । य पिचार पवित्र और
उत्तम हाने चाहिय । जैमा मनुष्य नापन क तुल्य कोई जीवन
नहा मे हा मन में विशेष कोई उत्तम माधन नहीं। पर तु इम
मन क प्रयोग का ज्ञान ठीक होना चाहिये । मनुष्यों के भविष्य
का अाधार निशपन मन पर ही अपलम्बित है।
जैसे तमाम मिलें (मशाने) वाष्प भाप मे चलती हैं एमे ही
प्रत्ये। कार्य चलाने वाल विचार हैं। रिचार जड प्रवृति पर भी
प्रभान डालने हैं रिचार एक स्थान म मरे स्थान पर पहुँचाये
ना मरते हैं।
जड़ प्रकृति रूप रहे हुए मूक्ष्म अणु विचार से यासित होकर
एक टूमरे से गासित करते हैं। इस प्रकार परम्परा से मैक्डों
कोमों पर रह हुए जीना पर प्रभाव पड सस्ता है।
।
.
.
६८ प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रयाश
विश्व में प्रवाहा पदार वायु के अणु और इससे भी विशेष
सूक्ष्म कइ प्रकार के जो अणु प्रमाणु हैं इन अणुश्री में विचार
गुजर कर, उनका अपन जैमा वनाफर टूर र पहुँचा सकते हैं।
इन पिचारा का भला या बुरा प्रभार नारों पर पड़ता है । विचार
मन के अन्तर आन्दोलन रूप है। ग्म श्रादालत के आगे पीछ
आई हुर सूदम प्रकृति र परमाणश्रा का चरायमान करने म
पीनों पर प्रभार पडता है।
निला और याप्प म तो धनी पुरुप | लाभ ठा सकते हैं
पर विचार शक्ति, गरीव तथा बनाय प्रम के श्राधीन है।
इमक नियमो को समझ कर पयाग म लार लाभ उठाया जा
सरता है।
है
विचार थान्गलन को उत्पन्न करत है, इसम उनका श्रारतियाँ
वनी दियाइ देता है। मनुष्यो क से पचार हा तथा उनमें जैमी
वासनायें और भावनायें हों मे हा आगोलन मन के पर
उत्पन हान हैं। और उतने ही बल से ग्ममें गति प्रगट होती हैं।
स्वाधमय वासनामय तुन्छ विचारों से हलकी गति मन में
प्रगट होती है। पर जो उत्तम नि नापपिचार होतो ऊँचे प्रकार
का मानसिक प्रति म श्रादोलन उत्पन्न होता है। जैसे विचार
और यामनाहा सी प्रकार कामन का चित्रवनता है। हलका
मन श्राध्यात्मिक अनि में विघ्नरूप है । इसरो मुधारने के लिए
अशुभ विचारा मकान का प्रभाव छोड़कर ग्ना विपरीत,
शुभ विचारों को करने का म्पमार डालना चाहिये। प्रारम्भ में
।
।
।
प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश
यह वाय अयश्य कठिन प्रतीत होता है क्योंकि मन फे परमाणु
अशुभ विचारा के बन गये हैं। मन अशुभ विचारों म भगहुश्रा
है। और धार धार अशुभ परमाणुश्रा को पत्रिन पर रहा है
जब तक इन परमाणुओं को अलग न किया जाय तब तक शुभ
तथा अशुभ परमाणुपा म युद्ध चलता रहेगा।
जमे जैसे शुभ विचारा को मन म प्रगट करनजाग मे वैम
श्रशुम विचार उत्पन्न करन याले परमाणु कम होन जायेंग ।
और नरे स्थान पर शुभ विचारा क अनुकून परमाण बनते
पारेंग। निगन शुभ पिचाग का प्रगट करने वाला मनाचल
अद्वि पाता है । शुद्ध परमाणुश्रा म मानमिक यल बदन ही अशुभ
मनकापगतय होगा।
माम अन्य प्रकार श्रागलन उपन करने की टेर पडन
सं या- मुगमना में त्तम श्रान्दोलन उत्पन्न कर सकेंग । क्वामि
यनि एक बार रिचार को इस माग पर पान जाने का टेर पड
जाय ता फिर इस मार्ग पर चलने का काम रिचार को मुलभ हो
जाता है। मानाष्टात यह ह परमात्मा का नाम स्मरण करने
कसभा मे मन म लिए यह पाय मुगम मानायगा । यदि दमक
विपरात, दुसरे के नोप टेवन अवगुण यालने का टेर मन में पष्ठ
नाय तो टूमरा क गुण नेसन का काम कठिन मालूम होगा। मन
पर विचारों को दूर करने का पाय एक यह भी है कि मन
में ऐम रिवारों का उत्पन्न न होने दें! परतु यह मार्गता ऐसे
परम बैरागी क लिए ही अनुकूल है निमम रिश्य की विविध
७२
प्रभुक माग 7 मान पायाश
प्रकार की वासनाया शोर दाया था परित्याग पिया हा।
और निस नाच प्रनिया से कार मन TELI
परतु निन में ऐसा चिम्म व्यापी प्रम प्रगट नहीं हुआ
इपोमे हलक विचारो स्थान पर -न विरद्ध समाय
गाल शुभ विचारा को मन में म्यान दा राष्टिय और वार या
से विचारों की पुनराति परत रहना चाहिय। इस प्रकार
अशुभ विचार म्यत नष्ट मा जागतिानिन वृत्तिया फेनार
करने की इच्छा हो रन उन वृत्तिया द्धि गुण याली वृत्तिय
उत्पन्न करते रहा । जैसे राग कयले नगन्य, क्रोध के पद
क्षमा, द्वेप के स्थान पर प्रम, अभिमान व स्थान पर नम्रत
और लोभ क स्थान पर सन्तोष इत्यादि निरद्ध विचारों के
कपना करत रहो। इसम पूरथती हलक विचार नष्ट होंगे
मन -त्तम विचारों क अान्दालनों का मुग्य म्या। धनगा। जैसे
रिल से सामन श्राता हुश्रा गाला हर रारा जाता
शुभ परमाणों में बना हुप्रा मन अशुभ परमाणुओ के
रोक सकेगा।
विचारा का प्रारत्तिय यन्धती हैं और उनको मनसे पोपर
मिलता है। मन म उत्पन हुए प्रादोलन म मन के अनुणा
पुन गतिमान होता है। उससे द्यगुरु पुन की अलग अल
श्राहनियाँ बनती हैं। यदि विचार यलमान और चौक्स न
ना विचारा की प्राकृति निर्मल बनती है और थोड़े समय
चनकर पिसर जाती है।
ऐ
।
।
-
प्रभु क मार्ग में ज्ञान का प्राश
यदि विचार प्रबल हा और वार बार उनकारटन क्यिा हुआ
होता आरतियाँ नियमित और चौक्म बनती हैं। पवित्र रिचार
का पविन प्राकृति और खराव विचार की खरान प्राकृति वनती
है। निसक विषय में विचार किया गया हो उसकी ओर
श्राति तीर की तरह भागता है। यदि अपन विषय में विचार
किया गया हो तो उस पिचार की श्राकृति हमारे मन रूपो ममुद्र
में नैरती सी प्रतात होती है। उमी आरति का अपने ऊपर
असर पडता
वार नार गम विचारों को उत्पन्न करने म ये प्राकृतियाँ
महापर होती हैं । इमलिए विचार अथवा माननाय उत्पन करन
से पहिले विशेष सावधानी की आवश्यकता है। सावधान रहो
निसम कि अपना शन अपना गत न करे। सरान विचार के
पले उत्तम विचार को टेन भी डाली जा मस्ती है। यह बाजी
तुम्हार हाथ का खेल है। ऐमा उत्तम शक्ति क होत हए तुम
अधम शत्तिया की ओर क्सि लिप गिरे जा रहे हो।
शुभ श्राशासनर और विश्व की गला करने वाल विचारों
को अपने हदय म स्थान दा । निरन्तर से ही विचार करो।
पिर देसो, कि अमगल रूप अशुभ विचार भागते हैं कि नहीं।
इसमा परिणाम यह होगा कि यदि तुम पिसी भा विचार के
परने का प्रयन्न नहीं करते तो उम समय तुम्हारे मन म शुभ
रिचार हो स्फुरित हागे । प्रथम स्यि हुए शुभ विचारा की आर
तियाँ, थास पास फिरने स शुभ विचारों की वृद्धि करता है।
.
अनु मे माग में गान का प्रकाश
माय, विसार शनि रानम उपयोग पाना सीमें तो नपा
रन गुमा चौर गान्न निही मयना।
प्रसग्गा तेरहवा
प
में
रिचार या प्रमार
यदिएमा मगर 7 या या नाय । पथर गिरन
rmr mार नग्ग रपन हाता- नगदूमर
पार दमग माराया और चौथी या-पर
र मगयर छ .MITI र पंरपार मग,
राका परन T! THIPIERRIT विभाग
भीमाप्रशिदा पप गायन
inाश भारताला पाणी
Trnमरमा माग धार उपनयर
Pार मगर समय विराग का प्रया
1777RT-1 पर पनामा ममनुष्य र पाम जार
• Tranti बार पानी पियर -म
omरना। मामा मnि अनुमार।
REEE मन मेग पगा।
गुमनामी काना
पा. मग मागिर पान यान का हानि पदेगा
। गाrantiमा बाम पनाम
A STATE या गुण मनाया
1
-- ७३ प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश उनके माग में गहन वाल अणश्रा को अपने बरूप में यासिन फरक शत्र की आकृतियाँ -पन्न कर, दमरे मनुष्य के कण में प्रविष्ट र शद ये प्राशय या गाध कराना है। यह मनुष्य हमारे बचन र श्राशय को समन पर तदनुकूल ही प्रवृत्ति करता हैं। इस प्रकार क तथा इमस भा सूक्ष्म और प्रनल गुण, निचारा म कल्याण का माग नीव या म माग का गामी बनाता द्वप का दिगार प्रशॉनि, उद्धग उपन करता है। जिनकी विश्व पि पिशाल है नको तरह यदि हमारी भा दृष्टि पिर- मित हा नाय, ता हम अशुभ विचार करने छाइ सकन हैं। निन मनुष्या का म्यभार मात्विा और सद्विार वाला हो उनके मनाम म भान म मनु या को शांति मिलता। उनर पाम बैठा म आनन्द प्रास होता है। ममीप रदन म शुभ विचार के घान पुष्ट हान है । एम ममय में मद्यतन का काय मुगम हो जाता है। हमारा मान कारण यही है कि एक मपुरप रे रिचाराय श्रान्गलन म उमर ममीप घर्ती पवित्र वातावरण 7 हमरी गमी मुदर स्थिति में पहुँचा दिया है। मरी पार पुत्र हला पियार पाल न्यभिचारा और दगुणी पुरुषों क सहनाम में आने का प्रमग मिले तो, मनुष्या में अशांति असन्तोप, कामयामना और द्वेष का वृद्धि होती है। उनमे दूर भागो को मन चाहता है। समराकारण उन जीवों का ग्पन्न क्यिा हुया अशुभ यातावरण है। ग्नको खरान ।
प्रमुक मागम मान का प्रमश जादालन की प्रारतियों हमार म वैसी ३२ अशुभ भावनायें उत्पन्न करता है। उन्दी भान का वार अपने स्वभाव म पड़ता है। ये श्राकृतियाँ उस गन का जागर करती हैं। यह पान हममा पशुम रतन लिए परिर Tरता है। ऐसी प्रवृत्ति स अपन म रहने वाले प्रशुभ माना पापण मिलता है। भित्र मिन विचार गलाव्यत्तिया के आसान प्रवाह भिन मिननिगा में चलत हे चिरागा पुर प व मन म रैराग्य का पाता चरण प्रगट होता है। यागा के मन म मे याग का, तपस्नीक मन म नपम्या का, यागी स मन म योग का ज्ञाना के हदय से ज्ञान का, भक्त हत्य से भक्ति का और भोगा मन से भोग के विचारों का प्रवाह यहा करता है। इसम उस उस जाति के श्रान्दोलनों का प्रवाह उस उस जाति की भावना ररने वाले और ही मसार पाल जानों मन म उसी जाति र निचार बहुन जरी असर करने वाले हात हैं। इराम यह स्पष्ट है कि विचार तुम मरोगे जैसे उमा विचार के जान तुम्हारा ओर धार्पित हाग। और वहीं प्रभार निस 4 जागा पर कर सोग म विचारों का मुग्य केन्द्र तुम नोगे। और ऐम सनातीय निधार नाला के तुम महायर मनोगे। नोमाट म डालन वाले तथा ममाग से भ्रष्ट करने वाल नुम ही होगे । अात्म ज्ञान की जाति पिना तुम जाहलये विचार पैदा करत हा ग्नस तुम अपन का और दूसरा को दुर- के ग म धम्लने हा। इममा भली प्रगर ध्यान रक्यो कि
७५
प्रभु के मार्ग म ज्ञान का प्रकाश
नितने जिम्मदार तुम अपने बचना के हो उससे भी अधिर
जिम्मेदार विचारों के हा। इसका कारण यह है कि वचन का
अपना विचार प्रविन दूर जाते हैं और मनुष्या पर अधिक
अमर डालते हैं । वे मनुग्या म रहने याने सत्तागत मस्कारों के
विशेष प्ररक तथा पोपर बनते हैं। दमरा के सम्बन्ध में सराव
पातें करनी, निन्दा करनी, निर्णोप पर दाप लगाना उनको लोगो
का दृष्टि में गिराना ये कार्य बहुत पुरे हैं । ग्नमें ये लोप हो या न
हों तो भी तुमने उनस काइ प्रयोजन नहा होना चाहिय । इसमे
नुम अपनी ही अधम वृत्ति को प्रगट करते हा । इस का
यह फल होगा कि तुम दा दोपा के भानन वरूप
हो जायगे । इसलिए तुम दूसरों की राइ की बातें कराा
छोड़ में और ऐसे विचार करने की टेन डालो जो तुम्हारे लिये
और दूसरा के लिये भी लाभ-गया हा । कपना क्रोनिग्मिी
मनुष्य में अमुर दोप है और उसमें पिसी मनुष्य ने प्रगट किया
'ग्मा प्रगट करने में बहुत से मनुष्यों-[ उसके दोप को जाने
या न जानने वाले लोगों ने अपनी ष्टि और मारना उसकी
नरफ लगाई, उन मरोही उममे दोप का पता लग गया तथा
अपनी अपनी मम्मति प्रगट करन लगे। इस रिचार न का
प्रगाह दोपी के इरद गिरद घूमता है उसक मन में यह विचार प्रविष्ट
हाते हैं। यति ममें दोप कम य ता पर इन पिचारा म उमर
नोपा में और भा वृद्धि हो गइ। और ग्मा श्राचरण भी वैसा
हापाता है। इसका परिणाम यह हुआ कि इस विचार के फैलाने
वाले मनु य ने इस-निपि या सदोष मनुष्य ने दोपा के यौनों
१६
प्रभु क माग मशान कामाश
को पूर्णत जमा दिया। यदि “ममें थोर थे तो उनकी वृद्धि
हो गइ।
इस दाप और टुस पृण समार म म प्रकार के अधम
मनुष्य विशेषत ज्ञान से या श्रज्ञान मदोपों की वृद्धिकर रहे हैं। ऐसे
कारण रहित और निप्रयानन उत्पन रिय हुए पापा से श्राप
पाडित हो रहे हैं। और सरों की पोनित कर रहे हैं। इसलिए
निन्द्रा दोप स जहाँ तक हामी बचना चाह्य ।
ह मनुष्यो ' तुम मद वृत्ति की तरफ मुको । सम तुम शुभ
विचारा को अपनी तरफ आर्पित करागे और दूसरे के सद्
गुणा का पोपण कर सोग । यति किमी २ अरगुण दृष्टि में
था तो उनकी तरफ लक्ष नना। उन चितन न करो। यदि
तुम नापा की नरफ ध्यान दागे ता तुम्हार विचारों क यादोलन
स उसके अवगुणारा उत्तनना मिलेगी और वे और भी गि
ड्ग। तुम्हारे बम प्रेमिया का यह क्त य है कि तुम्ह जिम गुण
की भारश्यस्ता हा उमका तरफ ध्यान लगायो प्रेम और एका
प्रना बाल विचारा म तुम अपने मन का परिपूर्ण करा । और
उन विगारों की मानमिर मूति अपने सामने सड़ी करो? इन
विचारा का प्रवाह मरों की तरफ बहाया। इस प्रकार तुम
अपने हितपिया का सहायता कर सकोग और उनका गुणी
बना सकोगे।
इम प्रसार विचारा का मदुपयोग करो? अपन विचार बल
क परिमाण म गुप्त रीति से तुम विश्व का कल्याण कर सकोगे।
-
.
।
प्रमुफे मार्ग म ज्ञान का प्रकाश
इम शक्ति का मदुपयोग करा । इम ममय मनुष्यों के विचार यल
बहुत कम और मन्द हैं। आमदनी के निना सर्च करना मूर्यता
है। इमलिए इम रोनि म यतन पगे निमम अपना और दूसरा
का भलाह11
ध्यान और योग के स्वतत्र माग भा अपनी विचार शशि
मद् व्यय और निराध के लिए ही निमाण स्यि गये हैं। चित्त
को वृत्तियों या निगार करना योग है। शिवार शक्ति महान शक्ति
है। विश्व क सम्पूर्ण मायिर मुग टु य का पनि इम विचार
शक्ति के सदुपयोग और दुम्पयाग म ही हाती है। मन को
निरिकल्प नशा मामा की अन त शक्तियाँ मगर हाती हैं,
बा शाश्वत हो पर परम शान्ति पानी है।
प्रकरण चौदया
श्राध्यात्मिक जीवन
यह जीव हागरों घटनाओं य पाच म मे गुजर कर माया
जाल को भे पर और प्रत्यक परिवर्तन शाल नेह-श्रागार में भी
"म शाश्वन अात्म तत्व को दग्पना है। यही-श्राध्यात्मिक जीवन
। श्रात्मा गया। उस पर प्रीति रया । श्रात्मा का अनुभव
गे। ग्रही मची श्राध्यामिर विद्या है। इसर अतिरिम सब
ज्ञान अज्ञानही है।
निस जोर का जायन-धायर-दह म आसा होकर श्राकार
में ही मर्याग्नि रहना है यह प्राध्यामिर जीवन नही
M
न
1
"मग रान भामाश
का सम्मा - RAT सान पर परमाणु
मया हु रूप का भयान्ति होते हैं पर यामा
थमयादित
पसीम यामत सारन गमन मिद्धियों मा मायका
। प्राररिया। मायामा पाग्न प्राचार
भर मगन - *न मायामा श्राम के पादे रह हार सत्त को
शासन या शाश्यालाई असर थागर लिए प्रिय नहीं
IFA लाय हैं। मान यात्म मान रोमा
भाराला पानापन है।
भतारण प्रदेश म रा हमारा दर्तय। उसे
पाचरण म गान श्रीर मय श्रामा में निधन रहन म अपन
अन्ना का प्रतिमा मिला लगता है। इमी का न करण की
धनि सहन । मन शगर धामनायाम उपनामार मनुष्य
पा रहार गार ग्लट माग पर ल जाना मस यह जोर श्रपन
माग भूायर गार गारमा माग में चला जाता है। और
यह मममना है कि मैं अपना श्रग या पारा अनुमार
चल रहा हूँ। परन्तु यह श्रम कान है या अपने मन
काइया
। इमसमर जानना ज्ञार के लिए पठिनह ।
इमका निश्चय करन निा अपन शात चित्त म प्रविष्ट हान
ही सत्य माग है।
प्रथम हत्य की इलाओं का नर करो। मैं शुद्धग्राम
स्वरूप हूँ ण्मा विचार पर मन और शरीर का अभिमान छाडना
भने का परिश्रम सममत हुकाम हा पार पसका अपना मार्ग ठीन मालूमदा नम पारामा मा प्रयन क्रन परमाणामार मतपय मम हा भूल मममा। अपना दमयन क लिए अपना भूल स्वीकार करना चाहिINE प्रसार पोरा कवशाभूत रहन म भूजबान्क लिा प्रयत्न करत हार यह भूल सुधर जायगा मामा पर चलन दुप करो। मारिदुम अपनगराइपालको भूल का दुख सहन यदि मनुष्य किमा कानाका निश्चय करता। उसमी कठिनाइया म घाण की ध्यान करता है और काइदूमान माग पताव यह स्वाग समझता हुश्रा, नानुकरण कि उसके अन्तररण का पड़ जाता। तिम मार्ग पर चलनरत प्रमुक मार्ग मेre चाहिए । श्रात्म भाव का रा रा रा रा और गमा हा इष्ट गुरु म प्राथना करो दिनमा मासपर धमाश्य । आम निरीक्षण और मन मम मम मम जा और यह एक गुप्त श्राशावर है। की हो उस माग पर चलने हाते हो। "यह नासे परता है। व उम मार्ग पर प्रवृत्ति करताना परिणाम सिद्ध मनि म है। mRT
प्रभु के मागे म ज्ञान का प्रकाश
निगमाग पर चलन से नो परिणाम हागा समे भी सहस्र
गुग युग परिणाम अन्त करण के प्राशय विरद्ध सिमी भी
माग पर चलन से होगा । निरन्तर उगोग यि गिना कर्तव्य का
जग हाथ नहा आता । अपन मच नीरन गुजारने वालों
पार श्रात्म मान तथा अनुभन म आगे पहुए गुस्पा का मगति
स्रनाभा-यात्म साधन का आरश्यक माग
नमसा भावना का प्रान्श तुम म उच हा वह ही
नुम्हाग गुरु बनने र योग्य है। मच्चा श्रामक्ष है उसका
नापन डे उच्च प्रकार का हाना चाहिय । ग्नमा पार पूज्य बुद्धि.
रसार उनी श्राज्ञा पालन करो।
जो तुम्हारे समगुण हो उसके प्रति नम्र, प्रेमी नन कर सय
सहायर पनो। अपन म क्म गुण पाल नापा की तरफ दया
और सहानुभूति का भाव रवरया । यह मन मामा य क्तव्य है।
आगे पढन वालों को इम क्त्त य में परा भा भून नहीं करना
चाहिये । जागेम साधारण कामा का रक्षा करता है पर श्रात्म
मार्ग गरिमारा नहीं हो सकता।
-
यह ध्यान रसा मि जो कोइ भा मनुष्य तुम्हारे परिचय म
श्रार, व तुम्हारे समागम म प्रेष्ठ मनुष्य वन नाय । यति कोइ
अज्ञाना तुम्हारे पास श्राय, तो अपन ज्ञान स उसका लाभ पहुँ
चाना । यदि कोइ दुखी तुम्हारे सहबास में मारे ता, उमा
सात्वना देकर उमा दुस को कम करने का प्रयत्न करा!
प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रमाण
काइ निराधार मनुष्य तुम्हारा महारा लेने तुम्हार पास पायें,
और तुम में पल हो तो अपनी शक्ति का उपयोग परये गमका
दुख क्म करो। तर हा तुम्हारी सगति और शक्ति का
मारता है।
तुम निर तर अधिकाधिक नम्र और महानुभूनि पूर्ण
बना। पठोर होकर दूमग का व्याकुल मत कंगा नगन म
दमनायत नहीं। इसका तुम नम ही कगे मगर अधिक न
होन दो। तुम प्रकाश रूप हार मरा क लिए मागदर्शक
यनो। तुम्हारा मगति मा वाल जीप तुम्हारे प्रकाश का
लाभ उठाकर निश्चित और निर्भय स्थान म पहुँच समें इसस
तुमनी महायता करो।
तुम्हारा मरा पर फैमा प्रभाव पड़ता है, इसी मही सभी
प्राध्यात्मिस्ता मालूम हा जायगी। तुम्हारा जन्म स्वय नव वन
पर तमराको उच्च बनाने के लिए है, इम भादर्श कोस मुस रस
कर अपने जीवन का सद् “यवहार करा। पापा की अज्ञानता
निमलता और नीर वृत्ति को देख कर उनकी शार कठार मत
नो, घे गिरे हुए हैं उनके उठाने में सहायक बना, तुम
पड़े हो यहाँ में यदि गिर जाओ ता तुमचा सडा हान लिये
दूमरा की सहायता की आवश्यकता और माया
तुमको उस वक्त मिलेगी जर कि दुमने दूसरों सादा
की होगी।
L
के मागमार का प्रसाश
यह समस्त जीरा अध्यात्म जीवन है। उनमा में प्रारमा
क गुणों का चिन्तन क्रा, तर ही तुम्हारी भाननायें च्च होंगी।
रहादि पाधिया मनिस भेट भार को तुम दस रहे हो, वह
भर भार श्राम ज्योति क दशन स नष्ट हा जायगा। श्रध्यात्म
जापन म नान याला अत में परमात्म स्वरूप हा जायगा।
प्रकरण पन्द्रहमा
स्वाश्रय
अपने ग्रात्मा पर श्रद्धा रसपर श्राग घटने वाला मनुष्य,
महान् से महान काय कर सकता है। श्रात्म श्रद्धा विनय की
चाना है। स्वाश्रय पर रहन याला मनुष्य, अपने आप अच्छा
बना मक्ताह।
यह जाप आप हा अपना मित्र तथा शत्रु है । एक का टुस
दूमरा नहीं भोगता । इसा प्रकार का मुस भा दूसरा नहा भोग
सक्ता । प्रत्यर जीन का भला बुरा पुरपाथ ही उसको सुनी
या दुपी बनाता है । मनाया औषधियों मे भरी हुई अलमारिय
को देखने से क्या लाभ? जन तर सिरोग का निश्चय कर
योग्य औषधि का उपयोग न पिया जाय। इसी प्रकार धर्म के
"श्रीपधियाँ थामिक पुस्तका मलिसी हुइ है केवल उन पुस्तक
को पाने और सुनने मान से ही श्रान्तरिक्सग कमरोग नह
मिटेगा वि तु उन पुस्तमा म पढे प्रथया मुने हुए को व्यवहा
~
८३
चाहे तुम गुरुनना का सहामारहो तो मा
चारी जापन तो तुम्ह स्वय ६० ।।
सचालक बनो । तर ही मुर पुल्तार से
इस जापन गाडीकगुनगरस्य।
प्रभु
के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश
म लाने स ही तुम्हारा पुरपार्थ तुमको जन्म मरण करोग
से छुडायगा।
इस विश्व वाटिका में उत्तम से उत्तम स्वादिष्ट पौष्टिक,
सुखदाया पार नलगायी अनेक प्रकार क फन उत्सन्न हाते हैं
पर उनका मूल्य ने वाना ही उन पनों का उपभाग कर सम्वा
है। इस विश्व वाटिका का स्वादिष्ट फ्ल, आत्मा का अनन्त
शक्तियों का विकास है। कोई चिरला पुस्प ही इन अनन्त शक्तिया
का आनन्द प्राप्त कर ममता है।
वसन्त ऋतु का लक्ष्मी का श्रान' माला स अधिक उसमें
मर्म मान का समझने वाला ही ल सस्ता है । इसा प्रका
प्रकृति के मम अथान् वन्नु तत्व परपरका उस लिए म
प्रयन करने वाला और रसको सममन दला हा जान म
है। जैसे भामाशीय यात्रा का आनन्द वा या
जहाज ) का किराया टेकर मिल माना है इना प्रमा
के प्रान को भोगने का अाधारा, किराय
पर विश्व की मायिक वस्तुओं का देने यात
हो सकता है।
स्थान पर
।
4
f
अमोगे।
६.
प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश
दूसरे सत्पुरुप हमार लिए अधिर म अधिर इतना कर
मस्त हैं कि वहम धाधा रहित निर्दोष माग पतला दें परन्तु
रसा लाभ लकर स माग पर चलने का प्रयन तो हमें स्वयं
करना हागा । इमफे विना तुम पृण स्वरूप का नहीं पहुँच मरते।
अनुशल और प्रतिकूल मयोगा को तुम अपने विचारा में
चल सस्त हा । तात्पय मि श्रनुकूल मयागा को प्रतिकूल बना
मान हा और प्रतिकूल सयोगों का श्रनुल बना मकन हो ।
इमलिए प्रतिकूल सयोगा का अनुकूल बनाना मागो। और
"अनुल मयोगा या निलम्न रहित लाभ लो । मामि यह क्सि
का पता है कि कल अनुकूल सयाग प्रतिरल रूप मचल जायें ।
'म रेसा चाहूँ वैसा बन मक्ता हैं' ऐसी न्ढ श्रात्म श्रद्धा ही
तुमम मर गुणा को लाने म समय है। मानसिक शक्ति वाला
प्राध्यात्मिर बल वाला और सत्य को मममने वाला विवेका
मनुष्य भा यदि आगे नहा नढ सकता तो उसका मुग्य
कारण आत्म श्रद्धा और तनुकूल पुरपार्थ की कमी है। यदि
इन कमियों को दूरपिया जाय तो यन्तु म स उमका सत्य म्वरूप
श्रय प्रगट होगा।
मनुष्य को पुरपार्य करते हुए यदि किसी कार्य म सफलता
नहा तो वस्तु का सिद्धि म नाधक म्यरूप कारण की सोज करो।
इसम या तो साधन की पूर्णता नहीं या अपनी निर्मलता है । यदि
पुस्पार्थ की कमी हो तो सोन से प्रतिकूल सयोगों को निकाल
कर और पुरुपाथ परके उस पर पिनय प्राप्त करो।
प्रभु के माग में ज्ञान का प्रकाश
दमरों की सहायता पर अाधार रसने वाले, सना दूमरा के
आधान हो रहा करने हैं । अपने उपर भरासा रसने याल ही
कार्य सिद्ध कर सकते हैं । वहा मनम पलमान गिन जात हैं।
पामा बाहर की वस्नु नहीं इमलिग यह वाह्य वस्तुओं के माधनों
पर श्राधार नहीं रखता, श्रामा बा ही अपने आपसे प्रगट
होना है।
जो मनुष्य परीना के समय दम तथा कठिनना क
प्रसग में म्बय पडा रह कर अपन बल की परीक्षा
करता है वही अपने श्रात्म बल पर जीन वाला है ।
नमको किसी महारा रेन वाले या महानुभूति प्रस्ट ररने वाले का
श्रापश्याता नहीं क्यामि मन मा अपने आधार पर रट्ना
सोया हुआ है। जो काम स्वत पिया जा सफ्ता है, उस सम
को करने के लिए यदि दूसरा पर आधार रपा जाय तो तुम में
धारे पोरे थालम्य का प्रवेश होन लगेगा। फिर तुम्हारा कार्य
करन में आत्मविश्वास कम होता जायगा । अन्त में तुम अपनी
शक्ति, प्रलता को यो बैठोगे।
यह मनुष्य अभिमान स अपने मे ही सर्वस्व तापने की
वृत्ति रगत हैं। पर तु यह यात्म श्रद्धा नहीं । श्रात्म श्रद्धा, विप
रीन सयोगा में भी अपन मामर्थ्य पर हा विश्वास तथा श्राशा
अकेले सड़े रहने का निशिष्ट शक्ति है। मे लना
वृक्ष का आधार लेती है ऐम तुम अाधार लेने वाले मन यना, IF
रसते हुए,
SAMA
महायता से ग्राम स्वरूप प्रगट किया हो। उनको अपने पृहुक्मां का नाश या उपभोग स्वय ही करना पड़ेगा और प्रसनता पूरक करना चाहिये। इन क्मा के सय करन के प्रभु के माग मशान का प्रकाश भीग्य माँगन म फाई नहीं देता। थो श्रनत शक्तिना आमा 'तुम अनन गनियार निधान हो । याहर से तुममें का शक्ति न पायगा । "माना नुम म्बय पुरपार्थ परो और कम- योम र नीचे दी हुर, टिपा हुइ श्रामशक्ति को प्रगर करा प्रभु महानगर पा यह मिनाद है कि तुम पार स्तिना प्रार्थन करा, अनुनय विनय करा पार गया कग ता भी तुमका तुम्ही श्रन न शक्ति नहीं मिल मनी । वह तो तुमा म्वय पुरण करने म प्रगट करना होगा। श्राम स्वरूप नुम म्यय ।। यह ऐमी यस्नु नहीं जो तुम् काइ टूमरा सा । इमका ना तुम म्यय ही अनुभव में मकत दा। ना तो दूर रहा कम य प समय कोई यक भा नहा हा मरगा पाप धर्म ग्यय ही भोगन पड़त प्रभु महापार जावा म - घना थाना है कि, जर त्याग का मार्ग प्रण किया गम ममय इद्रदय बार का रिप्रभा ' आपने कर्म नहुन भोगने है और-नके उपभो -पसग भा बहुत होंग इमलिए आपकी आज्ञा हो तो में उपमर्गा का दूर करन क लिए प्रापय समीप रहूँ । म भगवान महावीर न यह उत्तर दिया था, पद्र'rसा नहीं हुआ, न होगा, किती करा अथमा दमरों ने किसा दि हार्ण ज्ञान प्रगट हाता है।
प्रमु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश कमां का भोग ही मां का तय है। कर्म नय करना ही पडना है। दूसरों की सहायता लेने में क्म भाग का समय रता है । अन्न मरिना भाग छुटकारा नहीं होता । जर भोगने हा में तत्र शूरवीर यन कर क्या न भाग जाप । इम उत्तर पर शन निरुत्तर हो गया, तो भी वह भक्ति म प्ररित होकर एक नेप को प्रभु की ममा में, मरणान्त उपमगा को निवारण यग्ने के लिए छाड कर देव लोक का चला गया । न भी प्रभु क मामने प्रल पमगा में टस भागन का प्रमग -पस्थित हाता था तर हा यह परिमी न रिमा पारण मे यहाँ उपस्थित न होसम्ता पर उपमर्ग जय कष्ट भागन के पास तुरन था उपस्थित हो जाता और अपन प्रमा- य लिए पचात्ताप करना पा । उपर्युक्त क्थन का यह अभिप्राय है कि तार ने थपना श्राम भ्रान्ति के समय म श्रात्म जान भूल फर जो कम बाँधे थे वह याँधने की शक्ति जीर का थी । पर शक्ति का दुरुपयोग कमा क पन्धन का कारण हुश्रा । उमी श्रात्मशक्ति कामदुपयोग करने म जार मा के बन्धनो को तोड माता है । म गला को ताइने म दूमर का महायना उपयागी नहा होती । क्योंकि परिणाम की वारा ग्लने मे ही कम म छूट सम्न हैं । परि रणाम को धाग का तो जीर स्वयमेव हा बल सरना है । इसमें दूसरा का प्रवृत्ति उपयोगा श्रथना सफल नहीं हा सरनी। इन्चा रहित हुए निना म्य म्यरूप में स्थिति नहा होती। इन इच्छाओं के सम्बध को जोर स्वत हा परे हटा सकता है । यह कार्य अन्तरग
ने
।
प्रमुफ मागम ज्ञान या प्रकाश
है । टुस पे उपभोग में, दूसरे मनुष्य याह्य अनुकुलता
मस्त है या चतावना र सरते हैं परन्तु अन्तरगइन्छायों का
पाश श्रार म्यम्पम स्थिति का काय सो जाव को अपन श्राप
हा करना पडता है।
श्राम म्वरूप का विकास करन के लिए यह जावन पर युद्ध
का प्रसग है । य युद्ध म्यय लडने का है । इसम वार पुरुष की
तर अपन पराक्रम से पुत्र कार्य कसं दिग्पाना है । क्याकि
मामन काम, माय, लोभ, मोह और अज्ञानता की मना बडी
। उमक माय मुमारिला करना है । यह मुसायिला एक दिन,
एक महान या एक वप श नहा कि तु जीपा पर्यत युद्ध करक
दनक उपर पिनय प्राप्त करना है।
दम लडाइ मे तुम दूसरों का नहा भन सस्त । इमम भाड़े
के पामी काम नहा पा सकते । श्रार दस लडाइ स तुमभाग भा
नदा सरन । 'उमम विनय का प्रश्न है, जीवन मरण या विचार
है। स्थायी बन कर पुरपाय करो, यही विनय है, यही श्रात्म
विकाम का मूल मत्र है । जिस शक्ति को प्राप्त करने की इच्छा
है
उसका मूल्य तो तर तुममा वह शक्ति प्राप्त होगी। तुम्हारीजाति
ता आत्मा ही है, मन, वचन, शरीर इत्यादि तुम्हारे साधन हैं।
हामा सदुपयोग करा । इमसे तुम्हारी अखट शक्ति यडेगा।
तुम सद्गुणा की सान हा । इसमें सूर गहरे ग्तरा । सिर
अन्दर छिपी हुइ वस्तु तुम्हारा हा है । परन्तु थाहा पुस्पाथ
करके, इसको गहराइ से बाहर निकालो। इसको दया कर रखने
।
प्रभु के मार्ग म ज्ञान का प्रसाश
वाला इच्छा, कामना, वामना, रूप, कर्म की धूल है, उसको दूर
भगाओ, एमा करने स इम अक्षय भडार सामा तुम ही
बनाग।
तुम इस समय निम स्थिति म हो मस -त्तम स्थिति में
पाने का प्रयत्न करा । इसम श्रात्म श्रद्धा की दरता क साथ
श्राम शक्ति के विकास का प्रारम्भ हागा । इसी प्रकार तुम्हारा
पत्र ग्नति की दिशा मे श्राग पटेगा।
मे युद्ध म विजय का मुख्य साधन यहा है गि-पहल स,
वस्त्र, शस्न, सन प्रकार की सेना तथा अयान्य युद्ध मम्वन्धा
मामप्रो उचित और अधिन परिमाण मे मचर करके उमस एक
इद्धिमान् सनापति व आधिपत्य म रखा जाता है इमा प्रकार
माह गमा के साथ युद्ध करने क लिय, अपने ज्ञान प्रालि हथि
पार, शरीरादि माधन और विचार आदि के माग का नाना
सद्गुरों की टेस रेस म रसा का प्रयन करना चाहिय । तर
अवश्य तुम्हारी विनय होगी।
सचा सम्बन्ध तो शुद्ध आत्मा के साथ करना चाहिये । गन
वप में तुम नैसे थे, उसस अन्ले और बड़ बननमा प्रयत्न करो।
पहा अन्दर का विकास है। श्रात्मा में अनन्त शत्तियाँ है और
व पुरुषार्य द्वारा प्रगट होती हैं।
भय स न घरायो ? निराश न हावा? श्रात्मा के समीप
आ नाओ' यहाँ भय नहीं पर शान्ति है। निराशा नहीं पर
प्रभु के मार्ग म नान या प्रकाश
पान है। अपन उपर श्राधार रक्या । सय परिश्रम करो।
यन्त में तुम्हारा ही यल तुम्हारे पाम आयेगा । मेग व रोमा
था, मरा गुरु एमा था, हमारे पृरत मे महान हो चुके हैं एमी
एसा पातों मे मन्तु न होया । वे बडे पुम्पार्थी हो चुक
तुम
भी ग्नरे चरण रिहों पर चलकर यदि श्रात्म पुरपाय
पराग तो अपश्य स नीग।
हैं
प्रकरण मोला
"यात्मभान"
बहुत से मनुप्य शरीर प्राण थार मन दयादि नवा म
अधिक नागत रहते हैं, परतु इनका प्रयाग नही जानने । इन
तपास अपने तथा दृमग को लाभ कैम पहुँचे, रोमा ज्ञान सर
म ममान नदा हाना । तथापि इनका उपयाग स्वत सर कर रहे
हैं। परन्तु मचा श्रामभान [श्रात्मनिशा ] ता यहुत ही थोडे
नीनों मजाग्रत होता है।
कइ लाग शरीर वल का पन्छा तरह से उपयुक्त करते
हैं। विविध प्रकार के व्यायाम सरत कररे, मैएडा का मा
शारारिक बल प्रगट कसे मोटर रोक्न है। सगल तोड सक्त हैं,
छाती के ऊपर पत्थर तुडपाते हैं और हाथा चदवाते हैं। इस
प्रमार शरार चल का बटार वीर पुरुषा का गणना में पाते हैं।
का एक जोर, अपना इन्द्रिया को इस प्रकार तेलम्बी बनाते
हैं कि बहुत दूरपति तथा-सुक्ष्म वस्तुओं को ऑग्यो मे देख
प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश
मक्त हैं। अनेक मिश्रित वस्तुओं का गध, नासिका द्वारा पद
चान कर, पृथर पृथक पस्तुओं के नाम पता दते हैं। एक ही
साथ बहुत से वात्रा का गट सुन कर, परापर मनरा
प्रया प्रथा नाम बता देत हे। अना घी पुरुषा क
स्वरों को अलग अलग पहचान लेते हैं। बहुत वा क
सुन हुए श को पहचान लेने हैं। मुँह से अनेर पशु
पतिया की बोली को परामर गोल मरत है। रसना इद्रिय
का इतनी तीक्षण बना लेते हैं कि रिविध रम पाली वस्तुया के
भ्यार मे, ग्न रम्नुश्रा का अलग अलग यता रते हैं। हाथ, पाँच
के म्पर्श से विविध प्रकार का वस्तुया का पहचान लेत हैं।
ऑग्गा फे पिना, केवल हाथ मे ही खरे मोटे स्पय का पराक्षा
कर लेते हैं। बहुत ममय के बाद भी, देगा या अनुभूत की हुई
उम्तुश्रा के स्पश म उनकी दशा ठीर ठीक बता देते हैं।
प्राण वायु क रास्ने का अभ्याम करने वाले अधिक ममय
तर प्राणों का रोर सस्ते है । म्याम प्रशाम कोयन्ट करके समुद्र
तल तर पहुँच कर माता इत्यादि रना का निकाल लेत हैं।
प्राण का रोक पर मृतसरह की तरह कुछ ममय तक पडे रह
मक्त है। नाडियों की गति को वट से प्राणवायु को ब्रह्मरध्र
म रोस कर महीनों तर जमान में न रह कर फिर जीवित
याहर निक्ल ात हैं। अभ्यास मे प्राण जैसी सूक्ष्म वस्तु का
मा वश में कर सक्ते हैं।
प्रभु
माग में ज्ञान का प्रसाद
मन को रोकने के अभ्याम से विचार किये बिना ना पाल
तक रह सकते हैं । विद्याभ्याम द्वारा मन को बहुत मजबूत कर
सकते हैं। मानमिस वल के योग से एक पुस्प यहतों को चरित
और पति पर देता है। तथा बहुतों का मुरायला कर सफ्ता
। कइया को परास्त कर पिय प्रान कर मस्ता
वचन क बल में प्रयोण पुम्प, अनेक जीनों को अपनी बार
चातुरी मे मुग्ध कर लेता है, और ग्नपर अपना प्रभाव डाल
सस्ता है। वचन के प्रभार में वीर रस उत्पन करक अनक
जीयों को रण भूमी में उतारता है वैराग्य रस उत्पन्न पर,
अनेरों को ससार स चिरक्त नाता है। शृङ्गार रस म
विविध कामनाओं के बल की पुष्टि करता है। मरणा
शात रम पैदा करके श्रनक जागा को प्रात्मा की थार लाता है।
सन पुरुषों को वचन वल से थाश्यामन देकर उनम नर
जापन का सचार करता है। कठार हत्यों को कोमल और
कामल हदया का कठोर वनाता है । पिरागा कारागी और रागा
का विरागी धना मयता है । घडी म जावा का ग्लाता, और
घडी म हँसाता है। य सब बचन बल क कार्य हैं। इस प्रकार
एक क याद दूसरे यथान् शरीर वल वाग्बल, इन्द्रियनल, प्राण
वल और मनीचल म चतुर-तनस्वी पुम्प विश्व म कइ मिल
जात है, परतु घार अज्ञान म निद्रित पुरपा को, स्वभार म
जागृति पैदा परान याल श्रात्मज्ञानी काइ चिरल हा बार इस
निश्व म मिल सस्ते हैं।
३
प्रमुफे मार्ग में शान का प्रकाश
६३
प्राय मनुष्या के जीयन का अधिय भाग, प्रात्म मान की
निद्रित अवस्था म चला जाता है । और बहुधा शरीर मन
द्रिय पानि तमामीअधिर समय थान जाना है। यह एक
बार यह नहीं जानत कि मैं, "आमा हैं या क्या है। यही शरा
परत रहन है। अपने मन, देह और प्राण काही नीयन मानते हैं।
नया नेहादिय मा म अपने का मृन मममने हैं।
म में शरीर, प्राण, इन्द्रिय, वरन और मा प्रबल हात
जान है, यमे स नाथ, लोभ, मोह, राग और द्वेष धादि भी
प्रबल हाने नात हैं। इन मन थाद की शमिया पवन माध
जीर का तापित भा रहता है । श्राम ज्ञान के जागन हुए
पिना मन श्राति की पढ़ी हुई शनियाँ जाप को ग्ल्ने माग में
चलाता है तथा उसर माती भयाण माग में यहा बडी पाचाय
उपस्थिति करता है। निरादर हटान के लिए जीन का यहुन
प्रयत्न करना पड़ता है।
यह समस्त, निरसित, शरीर प्रादि की शक्तियों जर श्रात्मा
के प्राधीन रहती है नन इसमें पवित्रता बढ़ता है, शान्ति पाती
है, विपया की लोतुपना और मन की चचनना कम होती है।
जीवन नियमित चनना है, परोपकार की चि जागनी है। यह
मर का भला चाहता है और प्रसंग यश मला परता है । मय
जीना को अपन समान गिनता है। ना सहायक होता है।
ननायों को मुसी रेप कर आनन्ति होता है। यदि आरम
जागृति न हो तो इन शक्तिया के दुरपयाग का कार्य सुगम हर
प्रभु के माग में ज्ञान का प्रकाश
जाता है । म्यामी रहित पशु की तरह उम जीव का जीरन म्ब
छन्न क्लिामी और निम्मा बन जाता है । इमरे माथ योर
जाना क सामन उपद्रवारी हाता है।
अनत शक्तिया कामात श्रामा मे यहता है। शरीर "द्रिय
और मन श्राति को शक्ति भी श्रामा देता है । उस शनि के
श्रभाव स शरीर श्रादि चेष्टाहीन हारर, ऐम हा निपला जान
से वृक्ष मूल म रस न मिलने से सूख जाते हैं। नम प्रकार
स शरीर यानि जमीन से दयाने क्या अग्नि में जलाने क याग्य
हा रह जाते हैं।
यह चैतन्य मय प्रात्मा अमर है । मनुष्य जैसे पुरान वन
धन्ल र, ननान वस्र धारण करते हैं। वैम ही आत्मा म
पुराने शरार का छोड कर नये शरारा में प्रवेश करता है । फिर
उनम हलन, चलन, स्वमन, वचन और विचार प्राटि नियात्रों
का प्रारम्भ होता है।
इन साग नियात्रा का प्रेरक अथरा म्वामा अात्मा है।
आत्मा की तरफ दृष्टि ग्रसत हुए शरीर आदि की मारी क्रियायें
होती रहें और उसरी प्ररणानुकूल हा बतन हान, एन इन्द्रिय
मन प्रादि अपने स्वार्थ के लिए अपनी इच्छानुसार वर्तन न पर
सकें, तब आत्मा का जाग्रत सममो ।
जैसे जमे श्रात्मभान निशेष जागृत होता है जैसे वैसे स्वरूप
या प्रकाश अधिक समय तक स्थिर रहता है तथा उसके जीवन
में विशेष अन्तर पड़ता जाता है। यह जीव अब आवश्यकता से
।
। प्रमु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश अधिक नहीं बोलता । मौनत्रत उसको अच्छा लगता है । एकान्त वास उमे भाता है। वह समस्त विश्व में प्रेम रसता और शाति का अनुभव करता है । अपने ज्ञान वल से प्रतिकूल सयामा को भी अनुकूल बना लेता है। निम ममय जो वस्तु मिले उमा में सचोप मानता है। विजय और पगनय दानों अवस्याना मे उसकी मनोवृत्ति मम और स्थिर रहता है । वह महत्वामराक्षा को घृणा की दृष्टि से देखता है । विपय और अधिकार, उमगे लालच में नहा फैमा सक्ते । टु यी जीया की श्रार महानुभूति ग्यता है । दु सा जीना को टग्य कर समा हत्य पिघल उठना है । जहाँ तक हो सकता है उनको सहायता रेन का यह प्रयन करता है । अपन मिर पर पडे हुए स्टा के सामन निष्ठुर और कठार बन कर उनमा महन करता है । वल के स्थान पर नम्रता दिसाता है । पिरोयी के मामन भी यह शानि और सहनशीलता रखता है। अभिमान उमसे दूर भाग जाता है । क्रोध उसम देश निकाला माँग लेता है । यह केवल प्रात्म भान म ही मा रत और स्थिर रहता है । जड वस्तुएँ सो मन को नहा मीच सक्ती । यात्मा के अदर वह शाति का अनुभर करता है। आत्मध्यान में मग्न रहता है। कारण के बिना, वृत्तिया का प्रयाग परक यह अपने बल का नाश नहीं करता । वह जीवों को श्रात्मा की ओर लाने के लिए, श्रामभान म जागृत करने के लिए अपनी शक्तियों के व्यय की उपेक्षा नहीं करता। श्रात्मध्यान में रह कर क्षण, तण में अपनी शक्ति का विकास करता जाता है। ।
क
३
प्रभु के माग में ज्ञान का प्रकाश
इस अमूल्य जीवन का प्रत्येक क्षण, पपिन श्रात्मशक्ति विसाम
में सच करता रहता है।
नारको जहाँ ता इन्छायें विषया की ओर याचसी हैं वहाँ
तर,
कर्म की घेडियों का तोडार मुक्त होन का ममय बहुत दूर
रहता है। जहाँ सा श्रात्मा वाद्य जगत के सम्बन्ध में आना
चाहता है वहाँ तक इसमी इन्छाश्री की वृत्ति नहीं होती। जन
तर पिपयों स पूरी घृणा न हो जाय तर नर मचे श्रारम मार्ग
का प्रारम्भ नहीं होता।
नम गरि जाग्रत होन पर साया हुया भोजन, पुष्टिकारक
होन फ सार वल की वृद्धि करना है । म हा अध्या मज्ञान की
भूग लगन पर स मार्ग में प्रविष्ट होन स, शान हा श्रात्मा इस
माग म अग्रणी होता है। एम ही मनुष्या का श्राम-शा क प्रगट
करन से जो ममय का अमून्य लाभ मिलता है यह होशियारा से
लेना चानिये । इमरे लिय शात ममय निश्चित स्रो, जर राति
शा त हो, पास पास म शाति हो । श्रथवा ऐमा भोइ वन
निश्चित करा पिसफ शान प्रदेश में पशु पक्षी तथा मनुप्या के
श- सुनाइ न ते हा । ऐम, प्रभात स्थान पर बैठार, इन्द्रिया
से मन का मीच कर, मन के सम्ल्प निक्ल्प शान्त करके अन्दर
की भनि का मुनना चाहिये।
विध काम्थूल ना में जा मधुर शद मुनाई नहीं पडता,
हशद, अतर ति से अपने अनर सुनी। पहले तो कुछ
प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश
मुनाइ न देगा, पर इस शात मौन में निरिकल्प थिनि म, मन
का स्थिरता वाली दशा में पवित्र होन का चल रहता है।
कुछ समय के बाद अनर मगीत पाला शन्द प्रगट होगा।
ग्मा अन्तरीय शब्द मुनने पर ग्मसे ग्मी में आग आगे गहरे
गहरे चलत जाओ । इमरे पाद वह नाट, अनेक धनियों को
एकत्रित कर पर रूप हो जाता है। अत म यह र नाद भी
नहीं रहता। साधर, रमसी गान म उसके पीछे मूक्ष्म उपयाग
को चलाता है। पर उम नार या मोन म देह का विचार
भूल
पर उममें एक तार हो जाता है, तय नाद, निंदु के रूप म परि
रगत हो जाता है । यह पिदु प्रकाश रूप होरर श्रात्म म्यरूप
का एक मदशवाहक बनता है। श्रन म उसय सच्चे प्रभु
साथ-शुद्ध श्रामा के माय भेट करार उस प्रभु के साथ ही
माधर को मिला देता है।
प्रकरण मत्रता
साधनका श्रारम्भ
मन के मुधरने स, वचन और शरार मुधरत है और मन
के निगडन से सन किंगडत हैं। श्रारम्भ म समस्त दुर्गुण मनम
उत्पन होत हे, फिर वचन और शरीर म इत्य की दृष्ट भावनायें
कार्य रूप म प्रगद हाता है। मन क मुधारन म प्रथम पालन
को दूर करने का भार यस्ता है। यह प्रथम सीढा है । इमा
उपर पग रग्गिय । रक्ये विना ममान के उपर नहा चढ माना ।
। ६८ प्रभु के माग में ज्ञान का प्रकाश श्रालस्य प्रभु मार्ग का रोक्ता है, अथवा मुलाता है । आवश्य- क्ता से अधिर निद्रा न लेनी चाहिये। शरार को, ऐसा निशप श्राराम न दो जिससे कि वह आलसी वन । काम कार स घराना नहीं चाहिये। कार्य को विशेष धोरे वार करके, उसमें व्यर्थ समय व्यतीत न करो। भोजन से पहल या पील, प्रातः या साय, निकम्मी गप्प मारने म समय का साओ। निरन्तर प्रभात में उठन का म्बमार डालो। शरीर को श्रार यकतानुसार विश्राम दा । काम छोटा हो या वडा, उसका ध्यान दर करो। जागने क बाद शय्या महान पड रहा । निम्पयोगी बात करने की यादत छाड दा। एव, एठतर पट भर कर सान का स्वभाव न डालो। यह उच्च जापन की दूसरी सीढा है। जो मनुष्य, आवश्यकता से अधिक साता है, स्वादिष्ट पदार्था को देखकर प्रत्यर ममय ग्याने का इन्चा करता है उसका शरीर रोगा क लिए भोग रूप बनता है। निरन्तर अमु परिमाण में ही, वस्तुएँ साना चाहिये, उनकी गणना करनी, और गणना स भी कुछ क्म खाना उचित है। स्वच्छ और पवित्र तथा सादा भोनन साना भोपन करने का समय निश्चितरसना चाहिया यह न हो कि जब इन्छा हा तय ग्गा लिया जाय, परन्तु तान भूप में निश्चित समय पर साना योग्य है। रात्रि को भोजन न करना चाहिये। क्योंकि भोजन करने से निद्र विशेष प्राता है। भाजन के सम्बन्ध में, परिमाण, मयादा और निश्चित समय का उल्लघन न होना चाहिये। इसम सावधान
प्रभु क मार्ग म ज्ञान का प्रकाश
रहना जमरा है। साने के सम्न धम, जब तक किसी वस्तु से
हत्य न फिरे, अथवा मन की भावना न बदले, तन तर भानन
म फेरफार करना, अति उपयोगी नहीं हाता! स्वाद के लिए,
या मन का प्रसनता के लिए, न स्याना चाहिये। पिया का
इछा और निहा की लालुपता से साना स्वन्छन् वृत्ति है ।
एसा वृत्ति मे हृदय का, सदा स्वतन रमकर अपन श्राप का
परित बनाना चाहिये।
पिलम्ब तथा दूमरा के सहारे के बिना, शारीरिक सयम का
रक्षा करना शक्ति पूरा काम करना प्रात काल जागना, मिता
हार, स्वप भानन म मताप, निशेप भानन में अरचि और
विपय यामनाा पर अकुश रसना, श्रादि नाता स, जीन शरार
सम्बन्धी दा मीडिया पर चढा हुआ गिना जाता है ।
शरीर शुद्धि के पश्चात् वचन शुद्धि करन का अभ्याम
श्रारम्भ करना चाहिय । पर की निन्दा न करनी, दूमरों की
बुराइ का न ढूढना, दूसरा क दापा को उनके परोक्ष में न कहना,
इस दोपा का विस्तार अथना अतिशयाक्ति से यणन न
करना, किसा का गुप्त बातें प्रगद न करना, इन सब बाता का
समारश, निदात्याग म किया जाता है। हर एक निन्दा करने
थाल म घूरता अविश्वास और पालम्य के तत्व अवश्य
होत हैं।
सत्य जीवन व्यतीत करने वाले मनुष्य निदा के वचन
नहा बोलत । बे तो ऐस वचनों को दूर करन का प्रयत्न करते हैं।
प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्राश
किसी पर पलक नहीं लगाते । शत्रुओं का भी अनादर नहीं
करते। वे जिन बातों को शत्रुथा के मामने नहीं कह सस्ते,
पनको परोक्ष म भी नहा कहत । इस प्रकार श्रीरा के साथ
थाचरण करन
से दुष्ट भावनायें स्वयमेर शान्त हा जाता है।
साला समय म व्यर्थ बातें करना, बिना जान ही दूसरा के
घर का बातें करनी समय यतात करन क लिए रद्देश्यहीन
वनाद करना वस्तु तत्र का ज्ञान न हात हुए मा, अपनी
पदिता जतलाने के लिए "में जानता हूँ" इस प्रसार दूसरा की
हाँ म हाँ मिलाना घेतुको चातें, दूसरा के न मानन हुए भा,
करते
जाना, इन सनका व्यर्थ भाषा में समावेश होता है।
चाणा की उमलता, वाणी पर अपुश न होना इसका
कारण अनियमित नहीं हाता है। सचरित नान, अपना निहा
को अपने वश में रयत हैं। इस प्रकार अन्त म मन पर अधि
कार जमाना सीसते हैं। निता यास प्रारनहाचलात निम
से कि उनकी मुग्र्या में गणना हा। वे जो कुछ वोलत हैं हेतु
पृचक्र बोलते हैं अथवा मौन रसते हैं। यह टीम भी है काकि
'अण्डरएड वक्ने स तो, शात बैठना ही उत्तम समझा जाता है।
कठोर भाषा बोलने वाला मनुष्य औरों को गालियाँ रन
वाला पुरप, पौरों में सोटे दोपा का प्रारोपारण करन वाल
जार, स मार्ग स पवित हुया हुआ होता है। अनुचित वचन
कहना फेरल मूर्सता है। जन स्टोर वचन बोलन का मन *
भान उत्पन हो तर मुँह बन्द रखना चाहिय । सदाचारी जान
।
के मार्ग में मान का प्रकाश १०१
कलह करने के स्थान म शात रहते हैं। इसलिए उपयोगी, मत्य,
पिन और आरश्यानानुमार यमन का व्यवहार करना
शाहय । मल प्रकृति और दूसरों व अपमान करन की
देव न रखनी चाहिय । ग्ग म भग हो ऐमी हमी निम्म्मा गप्पा
पार जानना बाना म सनापरा रगना चाहिय। दूमराय
दार रायन का प्रारत पर पितय प्राप्त करो। छोटे हा या घड
किमाघे भा दापों की, अतिशयात्ति म वशान परा। मृगता
म भरी रात, रहम्य हान कुतर्ग, यह मय होप -ष्टि म म प्रगट
हाता है। दूमरा की भूल निकालने म पाप, दुग्य अथवा शोक
दूर नहीं होता।
जा मनुप्य, दूमरो का त्रुटियों का ग्योतन के लिए तमरा का
यात मुनना है यह सत्य क मा मे बहुन दूर है। तो मनुग्य
अपनी नागी को नम्र तथा शुद्ध करने का प्रयन करता है वह ही
मया जापन प्राप्त कर मक्ता है, अपनी शनि को सचित कर
मरता है, और मन को स्थिर र मत्य का प्रपने हृदय में
सप्रन कर मरना है।
बुद्धि पूनर निहा पर सयम रखना माना। शुद्ध, नत्र,
और पापश्यतानुमार, सत्य वचन वाला जाय तर शुद्ध वाणा
म्याधीन हुइ नही जाती है।
शरीर के दामन से मुक्त हुए बिना कोई भा मनुष्य अपन
मन को मत्य माग म नहीं लगा सस्ता । सदाचरण का पक्का
सौर दिना मन ६ सूक्ष्म गुण, समझ में नहीं पाते ।
है तन
।
प्रमु के मार्ग म ज्ञान का प्राश
आलसी शरीर का यह अर्थ है कि मन शानमी है। उनल
वाणा का यह भार है कि उसरा मन अनियनित है अथात्
म्वाबीन नहा।
जर मनुष्य, पालम्य तथा म्याथे पर विनय पाता
वह सयम, विनयशालता, और म्यार्थत्याग श्रादि महागुणा का
अपने हदय रूपी भूमी म वीन नोरर, उमाज्ञान रूपी जल से
मीचता हुआ, उसका पोषण करता है । तथा चल, शक्ति और
दृढ प्रतिशन प्राप्त करता है। पर यही इमरो उध उपश ग्रहण
करने म सहायर साधन रूप बनते हैं।
निम पुरुप की वाणा के दाप दूर होताते हैं, उस सत्यता,
विश्वाम, सत्कार, न्यालुता, और श्रात्म मयम श्रादि गुणों
को पोपण मिलता है। और यह मानमिन स्थिरता तथा दृढ़
पतिज्ञा पालन करने का वल प्राप्त करता है जिसम कुमास
नापा को वशम परक, पाचरण तथा ज्ञानकी ग्च भूमि म
पदापण करता है।
वर्त या निरन्तर पालन क्यि विना उच्च मदगुणा की
पाप्ति और सत्य ज्ञान नदा मिलता । स्वार्थ की ष्टि न रख कर
पूण रूप म रत्त य का पालन करना चाहिये । क्त्तय पालन के
समय,
व्यक्तिगत भार और म्बार्य के विचारा का त्याग करना
चाहिये । एमा करने से स्त्तय, लेशनना होने के स्थान में
अानन्दनना होगा। परिश्रम करने से कर्तव्य क्लेशजना
नहीं होता । परतु स्वार्थमयी इच्छाना मे क्त्तव्य पालन छोड
प्रभु के मार्ग मन्नान का प्रमाण १०३
दना, क्लशनाया होता है । तय क्म जन प्रेम का विषय
बनना है तन हरण काय, विश्वास और वैर्य से रिया जाता है
वर मासाथपरता भली प्रकार से नष्ट होती है । तर ही, सत्य
कञ्च शिखर पर चरने की नि मरणी मनुष्य के हाथ में श्राती
है । महायागे मनुष्य मा कर्त या पालन करने में ध्यान
रेत हैं। ये ट्रमरों के काम में रोडा ना अटकाते । अपनी भूल
मे मानपान रहते हैं । दूमरा की भूल देखने में समय का यय
नहा करने।
शुद्धि और मत्यता का अभ्याम करने वाले मनुष्य का
अप्रमाणिस्ता, टगवानी और कोगे चतुराई निसाने की टेन,
दूर करनी चाहिये । गोलन म अतिशयोक्ति अथवा असत्य का
प्रयोग न करना, अपयश 7 भय, अपया लाभ की अाशा मे,
छल का उपयोग न करना, मन, वचन और स्त्तय में प्रामाणिक
होना, तथा न्यायपूर्वक और पक्षपात रहित होकर व्यवहार
करना चाहिये । नन स्वप्न में भा अशुम पिचार न ान पान तन
हृदय शुद्ध और उदार बनता है।
क्षमा की भावना का शिकाम करने मे, द्वप, बैर और
इत्यानि दाप दूर होत हैं । क्षमा और दान की प्रवृत्ति म, जीवन
विकाम हाता है। पर आदि का मारनाश्रा का दूर करने से,
कोई शत्रु नहा रहना । स्वार त्याग मे दान पार गरता के
विचार प्रगट होते हैं। इस प्रकार अन्त मरण का परिपतन करन
मे, श्रात्मा की अधिक उन्नति होनी है । जो मनुष्य, मन, वचन
-
।
१०४ प्रमु के मार्ग म ज्ञान का प्रकाश
और शरार को रढता स पाठ सिसाता है रद हा श्रपन को वश
में रमता है। वह ही दुगुगों और कुमासनात्रा पर निय
प्राप्त करता है । ममार में, ममम्त पाप क्बल अज्ञानता से प्रगट
हात है। यह अन्नान अधार प्रात्मा व अधिकाम की अवस्था
है । जहा तर अज्ञान का दमन न किया जाय, यहाँ तक श्रानन्द
का प्रानि श्रमम्भव है।
मर प्रकार का दुग, मनमी दुष्ट मारना म से प्रगट होता
है। तथा सब प्रकार के सुग्य, मन का उत्तम भावना में से प्रगट
हात हे। मुग, मन का यपस्था पूर्वर उपयाग करने और दुग्म
मन का अव्यवस्था पूरक पयाग करने से प्राप्त होता है। जहाँ
तर मनुष्य मन का अनुचित भावनात्रा में प्रवेश करता रहेगा।
वहाँ तक मका जोपन अनुचित्तता से यतीन हागा और सा
हा वह क्लेश पायगा।
भूल करना शाम का कारण है। ज्ञान से हो आनद का
उत्पत्ति होती है। श्रनान और मोह का नाश करन मे हा मुक्ति
हानी है । जहाँ मन को अनुचित भावना श्रार अनुचित प्रवृत्ति
है वहाँ र वन है। जहाँ उचित भावना और उचित प्रवृत्ति है यहाँ
स्वतन्त्रता और शाति है।
प्रकरण अठारहवा
मुस्त्र थार शान्ति के लिए परमात्मा का स्मरण एक राना
और गक रक, एक मुसी ओर एक दुसा, एक नीरोग और एक
प्रभु के मार्ग में ज्ञान का प्रकाश
सावान् एमा विविधताय विश्व में दृष्टिगोचर हाती।इमरा
गावापर कारण पुरय और पाप है । पुण्य स जीय मुग्गी और
पाप म दुग्यो हान हैं
सिर में कार्य कारण के नियम अचल है। कारण के दिशा
काय नहीं हाता । वनमान, सुख दुमक कार्य उना पारण की
अपक्षा रगते हैं। प्रथम कारण पार पीछे काय हाता है। इस
नियम के अनुमार मनुष्य या यत्तमान स्थिति पूर्व कारणा
नुमार बनी है । धन प्राति अतुल माधनों का प्राप्ति में, पुरुषा
के साम, यदि पुण्य प्रकृति हो तन मनुप्यों को सफलता हाता है।
परमार और परोपकार के माया मे, जीर पुण्य उपाना परता
है । मन, वचन, शरार और पनादि के मदुपयोग परो स
पुण्या का पाना करता है और इमस नीर सुसी होता है।
परमा मा का स्मरण करने स श्रात्मा निमल हाता है। तथा
निशप प्रसार स पुग्य उत्पन हाना है। इस प्रकार जीन, प्रात्म
मार्ग में उत्तरात्तर पटना जाता है |
परमामा के नाम का स्मरण, नियन, धनाश्य, बाल युना,
युद्ध मुनी और दुग्नी प्रत्या नीन पर ममता है। जिसमा
समय प्रम मिल वह भी हर समय उठते बैठते चलत पिरने और
कामयान परत ममय भा प्रभु का स्मरण कर समता है। यात्र
और गरार का शुद्धि न होने हुए भी चुप चाप मन मे जप करता,
अनुचित नहीं । चलने के समय मन को जप के काम में
लगान म जप हो सकता है। रेल में या जहाज में या ये
।
प्रभु के मार्ग म ज्ञान का प्रकाश
भी यहाँ बैठे बैठे मन में, उप पर मक्ते हो। यदि जप
करते करते निद्रा भी श्रानाय, तो म्यन भी पायगे ! तात्पयसि
समय या स्थान सा ही क्या न हो, जप घरने म रोइ याचा
नहीं। मनुष्यों की श्रायु तो किमी न क्सिी प्रकार से पूर्ण होनी
हा है। पर तु यदि अपने जीवन म कोई एक महत्व का काय
क्यिा हुआ हो तो भारी जीवन सुखमारक बनता |व्यवहार
के रिसी काय म भी परमात्मा का नाम न भूलो। पिशपत ,
काय + पूरा होते ही तुरन्त प्रभु का नाम स्मरण करो। म्यान
दशा म भी परमात्मा का नाम म्मरण होता रहे। ऐमी स्थिति
को मनुष्य इस जीवन म प्राप्त करे तो उपन मनुष्य जीवन प्रात
करके अच्छी कमाई की ऐसा माना जाता है। तथा उमी का
जन्म सफल समभा जाता है।
जाप अनेक प्रकार के हेनिस ममय अपना माध्य स्मरण
राम राम म अपना लक्ष्य रमा रहे यह हो जाप उत्तम है। ऐसा
नाप-"ॐ श्रह नम" यह पाँच अतरा का है । इसका श्रथ
यह है।
में पाँच परमेष्ठी का समावेश होता है।
एच परमष्टी यह श्रात्मा शुद्ध म्यरूप की प्रानि की पाँच
भूमिकाय है। इनमें से प्रत्येक भूमिका के प्रथम अनर के मल से
ॐ कार बनता है।
अरित, अशरीरी, प्राचाय, उपाध्याय और मुनि यह पाँच
भूमिका है।
।
।
कार
t
प्रमुपे मार्ग म शान का काम
মা-মাম ই qল ঃ ; ঘী গান, ম স
t {ধ থামা। পান ? ম ত্র =
শ, অস, ম্য, শধিগী মাসি জনই বা
गुसार
গামা । মই গা ঘিা গ্রাম মায়া না লামা
বা গা মা ।
— * fifa বা গম পাশা দা পা
1 স্পা ন দ খান ধান স এর গােয় শা
। ম স ল না মগ লালা
শাক খা যায় না।
আঘাথ-~ধ র শ র য বশ ক্ষম
যাক, নয় যা * ৪াম বা না থামা , (প
প্রাণ কান ও গলা মাখি ৰা সমাথ পা।
पाध्याय पशुगत प्रतिपाय: "पन
পী অী রাধ। গাশ থ দ ক খ গ
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নিথ দ ধ াদা হা । খাগাম ধ মা
tধান ! ধর্ম ) গান বা
गरमा काममा
ও ধ ম ব , , , * * * *
পাখা ।r rd ? ? বিষ পা।
- না শ নাম। ঘন বা কি
গগ, গাব ? , *** য় fথ যা লা
}
।
105 प्रभु के माग म ज्ञान का प्रकाश
न है। अहं शमिद्व चर का पान मत्र है । मिद्ध प्रभुश्रा
का समुदाय मिद्ध यत्र है। पिसम विश्व य तत्व रूप देव,
गुर धम इन नीन तत्या का समावेश हाना है। अरिहन्त और
सिद्ध इन दो के अदरका ममाश हाता है। प्राचार्य उपा
ध्याय और मुनि इनका गुस्नग म समापश हाता है। दशन,
मान चरित और तप इन चारों का धर्म में ममारश हाता है।
श्रात्मा शुद्ध म्वरूप का प्रगट करने का माधन धम है। श्रात्मा
पाटि यस्तुओं का पूर्ण ज्ञान "ज्ञान' में । इन ज्ञान में रहने वाली
दृढ श्रद्धा का नाम "दशन" है। ज्ञान और श्रद्वा के परिमाण में
व्यवहार करना 'चरित्र' है। सर इलापा का निराध "तप
है। इन चारोंसे धम कहा जाता है। उपर से पाचपग्मी के माध
इनमा मिलान से इनसी नर सरया बनती है । इस नव य समु
दाय को मिद्ध चन कहन है । इम ना नर पद का पाचक अहं
शत है। अह शट, नीन रूप होन म उसम सिद्ध चक्र का
ममाश हाता है। श्रात्मा का उच्च भूमिका म ल जान पाल दव
गुर पार म म लक्ष्य लगा कर जाप करना, आत्मा के शद
म्प प समान है। यह जाप 'ॐ श्रहं नम" है । इस मन
र काटि नाप करने चाहिये । इससे नाच विचार पास नहीं
श्रान । मन क अन्य दिशा म न भरने म, यह जीन पाप म
बद्ध नहीं हाता । जाप स अपनी पार पवित्र परमाणुश्री का
प्रारपण होना है। अपन इधर उधर का वातावरण पवित्र होता
है । मन और शरीर प्रादि क परमाणु पवित्र बनते हैं। सकल्प
सिद्ध हो जात हैं । पाप कम होता है। प्रतिकूलतायें दूर होता है ।
।
.
-
प्रभु फे मार्ग में ज्ञान का प्रकाश
अनुकूलतायें प्राप्त होती हैं। प्रभु क मार्ग में आगे बढने के अधि
काग होते हैं। लोक प्रिय बनते हैं। यनहार का न्याहुलता क्म
हाती है, भीर्घ समय के बाद वचन सिद्धि की प्राप्ति होती है
यह सब कुछ परमात्मा के नाम स्मरण स होता है। तात्पर्य गि
उप स प्रत्येक मन कामना सिद्ध होती है। अधि ज्ञान की
भाति त्रिकाल मान भी जाप से प्रगट होता है । यह गुण जाप म
अगट हाता है।
किमा भा धर्म को इस जाप से बाधा नहीं पहुँचता। इसका
कारण यह है कि इसम क्मिी धम रिशेप का निशेष प्रकार से
नाम नहा लिया जाता है। पर, साधारण नाम है। निश्च म
प्रत्यक योग्यातियोग्य तत्व को मैं नमस्कार करता हूँ। यह इसका
मामान्य अथ है । इसलिए, महा फ्लदायक यह जाप, प्रत्या
मनुष्य को करना उचित है। आगे बढने की इच्छा वालों के
लिए यह जाप प्रथम भूमिका है। ऑयें बन्द करके, भृकुटी
में उपयोग के साथ ध्यान देकर खुला हुइ ऑग्मों की तरह निमी
लिन नेनों से अन्तध्यान हापर'ॐ अनम
इस मना
प करना चाहिये ।। इति ।।
ग्रन्थ ममासि *
"स प्रसार तपगन्छ के प्राचार्य श्री रिनय कमल
सूगिनी के शिष्य, आचार्य श्री विजय सर सरि का नाया
ओर सग्रह किया हुश्रा "प्रभु क भाग म ज्ञान का प्रकाश" इम
नाम का यह प्रयान०म० १९८४ का श्रावण कृष्णा पचमी का
बास नगर में समाप्त हुा । शुभमस्तु ।
"
प्रभु के मार्ग म ज्ञान का प्रकाश
'आत्मानन्द'
जैन श्वेताम्बर समान में हिन्ना भापा म मामयिक पत्रा
फा अभाव देसर, और इममा हाना अति आवश्यक समझ
कर श्रा यात्मानन्द जैन ट्रक्ट सामाइना, था प्रात्मानन्द जन
गुम्युन, पनान और श्रा आत्मानन् जैन महाममा पजान न
इस अपन मुग्न पत्र रूप में निकालना प्रारम्भ किया है। इसमें
यामर, एतिहासिक, सामाजिक नतिर थोर वनानिर लर
रहत है। वापिक चन्ग मा सब साधारण का सुविधा प लिए
फरल २) रम्ग्या है । हर सान एक बहुरगा नन पचाग भी
मेम्बरा का भेट रिया जाना है।
ऐसे पत्रों का सावता ग्राहमा की बहु सरया परनिभर है ।
प्रत नैन समान म मविनय प्राथना है कि इस पत्र को श्रप
नायें स्वय इमके ग्राहक बनें, और अपन मित्रा का भा
मादक बनायें।
चदा मना प्राडा से हा भेनना उचित है बार बा.पा.
द्वारा) अधिक दन पडत है।
पता
मैनेजर-'प्रात्मानन्द
अम्बाला शहर।
-
मनु क मागम ज्ञान का प्राश
१११
नवतत्व संग्रह तथा उपदेश वाचनी
यह अपन प्र4 श्री सद्गत न्यायाम्भानिधि जैनाचार्य
1 १०८ श्रीमद्वितयानद सूरि (थात्माराम जा) महाराज
अद्वितीय रचना है। उनका अपनी हन्तलिग्विन प्रति से श्री
रालाल कापडिया एम०,०, न नाचाय श्री विनय वल्लभ
गि महारान का प्रेरणा स इमका सपादन किया है । इमम
द नही मिमी पुस्तके वार यार नहीं प्रकाशित हुश्रा करती।
म अपूर्व प्र या का घरम रसना भार उनी रक्षा करना
त्येिक जैन का कर्तव्य है। ऐसी पुस्तका स हरवाल म प्रथ
Fता तथा जाति का नाम जर्गाद्वरयात होता है । पुस्तक सपिल्द
सचिन है ओर अग्छ माटे कागन पर डरल प्राउन साइज
बम्ब के प्रसिद्ध निणय सागर प्रेस म छपा है । मू य मान
०४) है । श्राशा है कि प्रत्येक जैन इस प्रथ के प्रचार म
यथा शक्ति योगटेगा।
पच प्रतिक्रमण (हिन्दी)
यह पुस्तक शुद्ध मुदर टाइप मे छपी है । पुस्तक सनिल्द
है । मूत्य क्वल ॥) प्रति है।
पता-
मन्त्री, श्री प्रात्मानन्द जैन सभा,
अम्बाला शहर।।
SHRI ATMANAND JAIN SAANO
-
२१०
प्रभु क मार्ग म मान का प्रकाश
म साधारण के लिए
उपयोगी पुस्तकें-
मूल्य
१--मामायिक तथा चैयरन्दा ( हिन्दी भाषा)
(याय-ब्रह्मचारा शारदाम जा)
-11
-गृहम्था कराजाना पराइन यार तारा मस्सद
(उदू भाषा) अनुसार ननचारा शारतास निना मूल्य
३-श्री श्रारमानद न शिनापला-भाग पदला
-श्रा श्रात्मानन गितारला
-
तासरा
चौथा
इन पुस्तक अध्ययन से सर्व मापारण का जैनधर्म के
वास्तविक मम का पूग पूरा ज्ञान हा मरना है। यह पुस्तक
प्रत्यक्ष परम रहनी चाहिये।
मिलन का पता-
मत्री, श्री प्रात्मानन्द जैन ममा,
अम्माला शहर ।
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