Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Dandak Prakrnam
Front matter
आ पुस्तक-" श्री जैन एडवोकेट । प्रीन्टींग प्रेममा वाडीलाल
बापुलाल शाहे छाप्यु. घीकांटा जेशीगंभाइनी वाडी
अमदावाद.
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"
प्रकाशके छापवा छपाववा विगेरे तमाम इको १८६७ ना
२५ मा एक्ट मुजव स्वाधीन राख्या छे.
॥ अहम ॥ ॥ परमोपकारि पूज्यपाद सद्गुरुमीमाजिक नेमिसूरीश्वरेभ्यो नमोन ॥ श्रीदण्डक विस्तरोथ प्रस्तावना 4 ( शार्दूलविक्रीडित छंद.) जेनो उत्तम बोध शोध करतो तत्त्वार्थना तत्त्वनी, एकी साथ प्रशंसना मतिधनो जेना करे सत्त्वंनी; पाम्यो हुं श्रुतबोध योग विधिने जेना प्रसादे करी, वदुं 'श्रीगुरु नेमिसूरि' चरणे ते उपकारो स्मरी ॥१॥ सर्वज्ञ शासनरसिक प्रियवंधुओ ? निष्कारण जगबंधु- भावकरुणासिंधु-आसन्नोपकारि-श्री महावीरप्रभुनो-अतीत भावि वर्तमान समस्ततीर्थपतिना वचनने अनुसरनार-अचल सिद्धान्न ए फरमावेछे के-संसारि जीवोने कर्मोनो बंध या मोक्ष पोनानी अध्यवसायपरिणतिने आधीन 2.- तात्पर्य ए के- अशुभ अध्यवसायोना योगे कर्मोनो बंध अने तेथी विपरीत अमनिपाति उत्तम अध्यवसायोना योगे मोक्ष थायछे. एज रहस्यने प्रकट करता पूज्यपाद महोपाध्याय न्यायाचार्य श्रोमद्यशोविजयजी म. हाराज प्रतिपादन करेछे के-'मन एव मनुष्याणां,कारण यन्ध मोक्षयोः ॥' तेवा प्रकारनो विशिष्ट कर्मबंध पण चउद गुणस्था- नको पैकी दशमा सूक्ष्मसंपरायगुणस्थानक सुधीन होयछे. परंतु तेथी अवेतन उपशान्त मोहादि चार गुणस्थानकोमा ते संभवतो ४ नयी. कारण ते स्थले कषायोदयनो अभाव छे. एथी एसिद्ध थयु के-कपायोदय अवस्थामा विद्यमान आत्मपरिणति विशिष्ट कर्म- बंधमां हेतु थइ शके. एज रहस्य पञ्चम कर्मग्रन्थनी टीकापां अध्य- वसायनी व्याख्या करतां श्री देवेन्द्रसूरिमहाराजाए जणाव्यु छे के “अध्यवसानान्यध्यवसायाः, ते चेह कायजनिता जीवपरिणामविशेषाः ” यद्यपि उपशांतमोहादि त्रण गु. णस्थानकोमा शानावेदनीयनो बंध वर्ते छे, नो पण तेने (ते बंधने ] अध्यवसानिमित्तक स्वीकारेल नथी. कारणके श्री. पंचसंग्रहादिमां तेनी द्विममय मात्र अल्पस्थिति प्रतिपादन करेल छे. बंधपरत्वे करेल आ संक्षिप्त विवेचन एज जणावेछे के- जीवाजीवादि नवनवो पैकी पांचमा आश्रय तत्व अने आठमा बंध ववना फलरूपे मंसारिजीवो शुभाश्रवद्वारा करेल शुभ कर्मवं- धना प्रतापे शुभ दंडकोमा एटले देव मनुष्यना दंडकोमा अने श्र- शुभाश्रवद्वारा करेल अशुभ कर्मबंधना मनापे नरकनियंचोना अशुभ दंडकोमा उत्पन्न थाय. ज्यां उत्पन्न थया पछी विशिष्टमज्ञावाला ते ते देवादि जीवोने ए प्रश्नो प्रादुर्भवे छे, जे-आ आत्माए चोवीश दंडको पैकी कया कया दंडकोमा कयाकया हेतुभोथी केवी केवी स्थिति अनुभवी ? अनुत्तरदेवो पण जेनी निरंतर अभि. लापा करी रह्या छे, अने जे निर्वाणपदनु परम साधन छे, एवा मनुष्यभव रूप उच्च कोटीचें स्थान विद्यमान छतां पण कया कया हेतुओधी आ जीव ते स्थान मेळववामां मंदभाग्य थयो?,कदाच पा- म्यो, नोपण कया कया साफल्य प्रतिबंधकहतुओथी यथार्थलाभ मे- लववा असमर्थ थयो ? अने निगोदादिमां अनन्त कालसुधी रह्यो ? ये पछी गया कया कया उत्तमसाधनो सेवा जोडये ? के जेथी दीर्घकाळ सुधी भनुभवेल क्लिष्ट दुःखमय स्थिनिने न पामे ? इ. न्यादि अनेकपनी रूपी ग्रीष्मकालनी पाने शांत करवाया . . अमृत समान आ' श्रीदण्डकविस्तरार्थ ' नामनो अपूर्व ग्रन्थ के, ए. वात आहेतसिदान्तना रहस्यना. अभिज्ञमानवोने सहेजे जणाइ आचशे. ते उपरांत आ ग्रंथ सम्यग्द्रष्टिने ओळखवा- ना पांच साधनो पैकी उपशम १. संवेग २. निर्वेद ३. आ त्रण गुणोनो आविर्भाव करवामां तेमज परंपराए मोक्ष प्राप्तिमा पण असाधारण कारण छे. आटलाज विवेचन परथी नवताव पछी दंडकपकरणचें अध्ययन करवामां शु प्रयोजन ? ए प्रश्नना समाधानद्वारा प्रस्तुन प्रकरण- मुद्रण प्रयोजन पण सहज सम- जाय तेम छे. यद्यपि प्रस्तुत प्रकरण सामान्यतः शब्दार्थरूपे अनेक संस्थाओद्वारा प्रकट थएल छे, तो पण तेवा सामान्य संक्षेपमात्रथी तार्किक-तत्त्वजिज्ञासुओने संपूर्ण अर्थलामजन्य संतोष बीलकुल प्राप्त थनोज नथी. कारण के-ज्यारे तेओ ते ते मुद्रित प्रकरणना अर्थने जाणेछे, त्यारे तेओना हृदयमा स्वभा- वेज आ प्रमाणे तर्कणि प्रादुर्भवे छे. जे - १ - दंडक ए कयो पदार्थ छ १. २-अधिक वा न्यून न स्वीकारता चोवीश ज दंडको मानवानुभुकारण ?. ३-भुवनपतिना दश दंडकोनी माफक सात नारकीयोना सात दंडको न मानवामां शुं प्रयोजन ?, ४- । अमुक दंडकना अमुकजीवोने कहेल शरीरादिथी अधिक शरीरादि केम न होइ शके ?. ५-देवोए उत्तरवैक्रिय रूपे वनावेल छनां औ. दारिक जेवा देखाता सिंहादि औदारिक केम न कहेवाय १.६- वनस्पतिनी साधिक सहस्र योजननी अवगाहना की अपेक्षाये ?. ७-तेईद्रिय जीवोनी त्रण गाउनी अवगाहना कया जोवनी अपे. क्षाए घटे ?. ८-अवगाहनाद्वारमा वर्णवेल अवगाहना कया क्षेत्रमा कंया काले संभवे?.९-कया कया देवादि कया कया हेतुथी उत्तरवैक्रिय बनावे ?. १०-देवोए चनावेल उत्तरक्रियनी स्थिति अर्धमासयी अधिक होय के नहि?. तैजस काययोग नहि स्वीकारवानुY कारwo । ण १. ११-ज्यारे अहीं देवोने संघयण न होय एम की तो पछी श्री जीवाभिगमादिमां प्रथम संघयण मान्यु तेनु शु समाधान ?. १२-लेश्या कयो पदार्थ ?. १३-शु चारे गतिना जीवोने एक सर- खोज लेश्या होय ?. १४-शुं छद्मस्थनी अने सर्वज्ञनी शुक्ल लेश्या स्थितिनी अपेक्षाए एक सरखीज होय ?. १५-समुद्घात शुंपदार्थ ?. १६-तेने करवानु शु कारण १.१७-कया कया जीवो कया कया समये कइ कइ समुद्घात करे ? १८-एक काले एकथी बधारे समुद्घात होय के नहि ?. १९-एक ठेकाणे स्थावगेने मि- ध्यादृष्टि कीधा त्यारे अन्यत्र सास्वादन दर्शन मान्यु तेनुं | कारण ?. २०-पर्याप्तावस्थामा विकलेन्द्रिय सम्यग्दृष्टि के मि- ध्यादृष्टि ?. २१-विग्रहगतिमां पण अचक्षुदर्शन होय के नहि ?. २२-चक्षुदर्शननो व्यापार क्यारे होय ?. २३-शरुआतथीज प- रमाधार्मिको सम्यग्दृष्टि होय के नहि ?. २४-विभंगज्ञानिने अव- घिदर्शन होय के नहि ?. २५-तिर्यंचपंचेन्द्रियने अपर्याप्तावस्थामां अवधिज्ञान वा विभंगज्ञान होय के नहि?.२६-स्थावरोमां ज्ञान अने अज्ञान पैकी बेमतभेद कइ अपेक्षाए ?.२७-सास्वादनदर्शनकाले ज्ञान के अज्ञान ?. २८-समकाले एक जीवने ज्ञानलब्धि केटली होय ?. २०-अमुक दंडके कहेल योगो करतां अधिक योगो नहि होवान Y कारण ?. ३०-उत्तर वैक्रिय अने आहारकना प्रारम्भे अनुक्रमे वैक्रिय मिश्र अने आहारकमिश्र योग होय के औदारिकमि- श्रयोग होय?. ते वरखते-अमुकज योग होय तेमांशु कारण?.३१- मुंवधाए वायुनीवोने वैक्रियहोय ?. ३२-प्रत्येक मनुष्यादिने लब्धिाप केरला उपयोग केवी रीते होय ?. ३३-अमुक दंडकना जीवने कल उपयोगोधी अधिक उपयोग केप न होय ?,४- कडेल आयुःस्थिनि कया जीवनी अपेक्षाए घटे ?. ३५-Y सर्व देवलोकोमा देवीयोनो सद्भाव होय ?. ३६-इन्द्रोनुं आयुष्य ज.
धन्य भांगे के उत्कृष्ट भांगे होय ?. ३७-फया देवलोक सुधी इन्द्रा- दि व्यवस्था होय १. ३८-सर्वज्ञोने संज्ञान होय तेनु शुं कारण ? ३९-अन्यदर्शनकारी भवान्तर विषयक गस्यागति इश्वरेच्छा अने तेनी. रणाथी माने छे त्यारे जैनो कर्मद्वारा माने छे. तेनु शुं समा- धान ?..४०-देवोने श्रीभगवतीसूत्र अने श्रीविचारसप्ततिमा ५ पर्याप्तिी अने श्री नवतख भाष्यादिमां ६ पर्याप्तियो कीधी तेनु शुं कारण ?. ४१-अनुत्तरविमानवासि देवोने शब्दोच्चारना अभावे वचनयोग केम घटे ? जो ते न होय तो भाषापर्याप्ति केवी- रीते घटे ?. इत्यादि । जो तेओना ते व्याजबी तर्कोन पण समधान दीर्घकाल सुधी न थाय तो ए पण तर्को चिरस्थायि थतां तेओर्नु सम्यग्दर्शन पोतानी पूर्वस्थिति साचवी शकशे नहि ? कारणके जिज्ञासाजन्य तर्क पण कालान्तरे एवा संशयरूपे परिणमे छे, के-जे तर्क-श्रद्धाने पण अंशे अंशे घटाडनार नीवडे छे. आभाव- वर्तमानजमानाना अनेक दृष्टान्तोद्वारा अनुभवगोचर थइ शके तेम छे. तेमज पदार्थ तवोनो संगीन बोध पण प्रकट थयेल तर्कोना समाधाननेज आधीन छे, जेथी तार्किक भव्यसमाजने सानन्द समाधान मलवा पूर्वक संगीनबोध संपादन कराववो, ए पण आ प्रस्तुत प्रकरण बीजु मुद्रण प्रयोजन छे. हवे-१-प्रस्तुत प्रकरणने वीजा कोइपण शब्दथी न ओळखावतां दंडक शब्दथी ओळखाववानुभुं कारण ?, २. कर्ताए आ प्रकरणने स्तुतिग्रन्थनी माफक स्वतंत्र पद्धनिए रच्यु के के सिद्धान्तपद्धतिए ? जो सिद्धान्तपतिए तो कया सिद्धान्तोने अवलंबीने रच्यु १३ ते ते सिद्धान्तोमा दंडकोने स विस्तरवर्णन छतां पण पृथक् रचनानुं शुं प्रयोजन ? भा प्रश्नोनु समाधान कर व्याजबी ले-ते संक्षेपमां आ प्रमाणे- , . कया ८ १ जीवने स्वकर्मजन्य फलानुभव योग्य कया कया स्थानको छे ? ए जणाववा माटे प्रस्तुत प्रकरणने दंडक पदथी ओळखायेल छे. २ आ दंडकोर्नु मुख्यत्वे करी आपणा परमपूज्यतम पञ्चमांग श्री व्याख्याप्रज्ञप्ति (श्री भगवती ) सूत्र तथा चतुर्थोपांग श्री प्रज्ञापना सूत्रमा सविस्तर वर्णन करेल छे. जेथी अहीं संज्ञाक्रमादि पण प्रायः तदनुसारेज राखेल छे. ३ तेओर्नु सार्वजनिक अध्ययन नहि होवामां बे प्रयोजनो छे. जे १ मूल प्राकृतभाषानो अपरिचय तथा वृत्तिग्रन्थोनी संस्कृत भाषानु काठिन्य. २ जिनाज्ञाधारि सा- धुओने पण अध्ययननिमित्ते योगोद्वहन क्रियानी आवश्यकता. तेथी सार्वजनिक उपकार करवा माटे कर्ताए आ मूल प्रकरण बनावेल के सजनो ! जाणमांज हशे के "परिचय ए प्रवृत्तिनुं कारण है" तेथी आ श्रीदंडकविस्तरार्थ केटला भागमां केवी रीते व्हेंचा- येल छे ? आ बावत पण टुंक परिचय कराववो व्याजबीज छे. ऋण विभागे व्हेंचाएल आ ग्रन्थना कर्ताए- १. प्रथमविभागे-मंगलाचरणादि करवापूर्वक चोवीश दंडकोना नामो, नया भेद प्रभेदतुं मविस्तरवर्णन, तेमां उपयोगी प्रश्नोत्तरी, चोवीशे द्वारोनुं सविस्तर स्वतंत्रवर्णन करवा पूर्वक चोवीशे दंड कोमा ते द्वारो समजावी, पर्यन्ते श्री परमात्मापासे स्तुतिद्वारा मोक्ष- पटनी प्रार्थना करी तथा स्वपरिचय करावी ग्रन्थसमाप्ति करेल छे. २ द्वितीय विभागे-दंडकार्थ विषयक वे स्तवनो तेमां- ?--प्रथम स्तवन श्रीउत्तमविजयजी महाराजना शिष्य पण्डित श्रीपद्मविजयजीगणिएभावनगरमा रचेल छे. जेमा २४ दंडकोमा २९ दारो ढंकमां ममजावेल है. तेमां २४ द्वारो उपरांत ? नामद्वार जेमा २४ इंटकोना नामो दविल २.२ संपदाहार.जेमां १४ चक्रवत्तिना रन्नो तथा नीर्थकादि . सर्वपली २३ संपत्तियो कल है. ३ ९ धर्मद्वार-जेपो दरेक दंडकपत्ये विरतिधर्मनी विचारणा दर्शावेल छे. ४ जीवयोनिद्वार-जेमां दरेक दंदकना जीवने केटली केटली योनियो होय ए भाव जणावेल छे. ५ कुलद्वार-जेमां दरेक दंडकना जीवने केटली केटली कुलकोटीयो होय, ए अर्थ प्रतिपादन करेल छे. एम पांच द्वारो वधारे जणावेल छे. २. बीजुस्तवन- श्रीविजयहर्षवाचकना शिष्य श्री धर्मचन्द्रमुनिए जेसलमेरमां १७२९ नी सालमां दीवालीपर्वना दिवसे बनावेल छे. जेषां श्री पार्श्वनाथभगवाननी स्तुनि करवा द्वारा गत्यागतिना बे द्वारो विस्तारथी वर्णवेल छे, ३-तृतीय विभागमा मूल प्रकरण तथा ते उपर स्वोपज्ञ अवचूर्णि छे, प्रकरणकार जिनसमुदमूरिना पट्टप्रतिष्ठित जिनहंसमु. नीश्वरना राज्यमां वर्तमान-श्रीधवलचन्द्रगणिना शिष्य गजसा- रंगणि छे. तेमणे आ जिनविज्ञप्तिरूप दंडक प्रकरण जे तेमनाथी पूर्न समयमा पत्र उपर यन्त्ररूपे लखेल हतुं. ते सुगमताने माटे एटले बालजीवो अल्पशब्दोमां अर्थलाभ लइ शके, ए हेतुथी पाटणमां विक्रम संवत् १५७२ नी सालमां सूत्ररूपे गुंथ्यु. तेमणे अवचूर्णिमां मूल सूत्रनो आशय संक्षेपमां सारी रीते समजावेल के जेमांना केटलाएक कंठस्थ करणीय ज्ञेयमुद्दाओ ए छे जे १ स्वकीय क्षायोपशमिक ज्ञानद्वारा रागादिभाव शत्रुओने हठावदामा यथाशक्ति प्रतिपरायण सम्यग्दृष्टि जीवने दृष्टिवादोपदेशकी , सज्ञा होय. २ लब्धिद्वारा उत्तरवैक्रियकारक जीव ते शरीरमा अन्तर्मुहत कालयी वधु अवस्थान न करी शके. कारण तेटलो काल वीत्या बाद ते जीव औदारिक शरीरमा स्वस्थ बनेछे. ३ काग्रन्धिक मते देवोने तथा नारकोने संहनननो प्रतिषेध तथा सैद्धान्तिकमते नेनो सद्भाव होयो.
. १० ४- १० संज्ञाओ उपरांत केटलाएक मनुष्योने श्री आचारांग मूत्रमा कहेल - ? मोक्ष २ धर्म ३ सुख ४ दुःख ५ जुगुप्सा ६ शोक ए ६ संज्ञाओ पण होय छे. परन्तु तेवा जीयो अल्प हो- वाथी मूलसूत्रमा आ अधिकार ग्रहण करेल नथी. ५ वायु विगेरेना ध्वजादि संस्थानो श्रीभगवतोसूत्रना आधारे दर्शवेल छे. ६ 'सच्चे वि चउक्कसाया' आ वचन प्रथमना अगीआर गुण- स्थानकोना जीवोने उद्देशीने कहेल छे.७ सामान्यथी सात नरक- स्थानकोमा त्रण लेश्याओ कही. विशेषथी दरेक नरकंस्थाने एकज अवस्थिन लेश्या होय ते आ प्रमाणे, पहेलो बीजी नरकमां का. पोतलेश्या, त्रीजी नरकमां उपरना प्रस्तटोमां कापोतलेश्या, नीचेना प्रस्तटोमां नीललेश्या, चोथी नरकमां नीललेश्या, पांच. मोमां उपरना पस्नटोमां नीललेश्या, नीचेना प्रस्तटोपां कृष्णलेश्या. छही सातमी नरकमां कृष्णलेश्या अने तेवी रीते देवलोकमां पण सामान्यधी ६-लेश्याओ कही. विशेपथी -भुवनपनि तथा व्य. न्नरोमा पहेली-४-लेश्याओ तुधा ज्योतिषि तथा सौधर्मशान देवलोकमां तेजोलेश्या, ३-४-५मा देवलोकमां पद्मलेश्या होय. आगळ अनुत्तरविमानसुधीना देवस्थानोमां शुक्ललेश्या होय. ८ पृथ्वी-जल-वनस्पनिमां कार्मग्रन्थिकमते वे अज्ञान अने सैद्धा- निकमते श्रीपशमिकाशनने वमतां नथा ते त्रण दंडकोमा उत्पन्न धनां-ईशान सुधीनां देवीने स्वीकारेल सास्वादनदर्शनना योगे अन्तमहर्त काल मृधी अपर्याप्त अवस्थामां वे ज्ञान पण होय. नथा अवचूर्णिकारना समयथी पश्चाद्भाविसमयमा विद्यमान ऋतिकार श्रीरूपचन्द्रजी महाराज-ज-श्री हीरसरिजी महारा- जना मिष्य उपाध्याय भानुचन्द्रगणिना शिष्य उदयचंद्रजोना मिप्य इता.नेमणे विक्रम संवन १६७५ना जेठ मृद ६ गुरुवारे ५३६ शोक प्रमाण-प्रवचणिने अनुसरनारे आवृत्ति वनावी एम प्रशस्ति- - १२ ना श्लोकोद्वारा जणायछे.जेमांना केटलाएक कंठस्थ करणीयमुद्दाओ आ प्रमाणे-- १-प्रथपना६ समुद्घातोनी स्थिति अंतर्मुहर्त अने ७. मा केवलीसमुद्घातनी स्थति समय ८.२-श्रीसर्वज्ञमहाराजाने त्र- ण संज्ञाओ पैकी एक पण संज्ञा न होय. कारण-कर्मना क्षयोपशम- जन्य संज्ञाओ जे. ते क्षायोपशमिक भाव सर्वज्ञने न होय. ३-३वेयक अने अनुत्तरविमानवासि देवो-सामर्थ्य छतां पण प्रयोजनना अभाव उत्तरक्रिय रचना न करे. ४-देवोर्नु उत्तरवैक्रिय शरीर-उंचाइमा चतुरंगुलहीन लक्षयोजन, कारण-तेओ जमीनथी चार अंगुल अस्पृष्ट रहेछे. तथा मनुष्यो तेवा नहि होवाथी चार अंगुल अधिक लक्षयोजन प्रमाण उत्तरवैक्रिय रचना करे. ५-मतान्तरे-वायु जीवो. ने एक वैक्रिय शरीरज होय एम श्री अनुयोगदार वृत्तिमां कहेल छे ६ संमून्छिम पंचेन्द्रिय तिर्यंचने सैद्धान्तिकमते सेवासिंहनन अने कार्मयन्थिकमते छ ए संघयण होय. ७-परमाधार्मिक देवोने एक कृष्ण लेश्याज होय, ८ श्रवण नेत्रने कामेच्छा शेषत्रणने भोगेच्छा. "९-ज्यां केवल मनुष्योज उत्पन्न यइ शकेछे एवा आनतादि देव. लोकना देवो एकसमयमां संख्याताज च्यवे तथा उपजे, कारण- तेओनी उत्पत्ति संख्याता एचा गर्भज मनुष्योमांज होइ शके छे. १०-कर्मनायोगे श्रोताओने कदाच बोध न थाय तोपण अनुग्रह- बुद्धिथी उपदेशकने घणी निर्जरा थायज. अनन्तर जणावेल कार्मग्रन्धिक अने सैद्धान्तिकना वे मतभे- द पैकी अमुकज मत साचो छ,एवो निर्णय छमस्थ जीवो न करी शके. कारण-ए मतभेद वाचनाभेदजन्य छे. वाचना भेद थवार्नु कार ण आ छे-क्षयिकज्ञानवाला पूज्यपाद त्रिकालभावि सकलतीर्थपनि महाराजाओनो नो मूलथी एकजमन छे. कारण-अतीत अनन्न तीर्थकरोमांना एक पण श्रीमान् नीर्थकरमहाराजाए अर्थदेशनाद्वारा एवो शन्दप्रयोग नथी कर्यो जे आ- परमाणु आदि पदार्थना , १२ स्वरूपने हुँ पोतेज प्रतिपादन करुं छु परन्तु एज प्रतिपादन कर्युछे के-जेम अतीत अनंता तीथकगेए जे पदार्थभाव जेवारूपे प्ररूप्यो अने भावि अनन्ता तीर्थंकरो जे पदार्थभावने जेवारूपे प्ररूपशे, तेनेज अनुसरीने हु आ विवक्षितपरमाणु आदि पदार्थना स्वरूपने निरुपण करु ढु. अने तेज हेतुथी अविन्छिन्न प्रमावशालि-त्रिका- लाबाधित भवोभव चाहना करवालायक-जैनेन्द्रशासननी लो. कोत्तरता सिद्ध थायछे, जेमां त्रिकालभावि सर्वधर्मोपदेशकोमा प्र- रूपणा भेद होइ शकेन नहि. एज प्रणालिकाना विरहथी अन्यद- र्शनकारोने निरुपाये कहे पड्यु के- श्रुतिविभिन्ना स्मृतयो विभिन्ना, नको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणं । (मतं न भिन्नमित्यप्यन्यत्र) धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायां, महाजनो येन गतः स पन्थाः ॥१॥ कालान्तरे मूत्रार्थविषयक विस्मृनि आदि हेतु,ओना संनिधानथी वाचनाभेदथयो.ा भाव टुंकामां श्रीजंबुद्वीप प्रज्ञप्ति टीकामां वर्णवेल छे. नेमन परोपकारधुरीण आचार्य श्रीमलयगिरि महा- राजाए पण श्री ज्योतिःकरण्डक नामना प्रकीर्णकनी वृत्तिमा कहां, के-जनेन्द्रशासनभावि श्री स्कन्दिलाचायना समयमा पांचपा दुःपम आराना प्रनापे दुर्भिक्षकाल प्रवयों. जेथी साधुओ. मां सिहान्नवाचनादि प्रवृत्ति पंद थवा लागी. दुष्काल वीत्या बाद मृभिक्ष काल ममये १-बलभीपुर [ वळा ) २-मथुरा एप बे न्यने, भय भेगो थयो. जेमां मृत्रार्थनी संयोजनाना समये अनीन- दाकालना पनाचे मृत्रार्थनी विस्मृनि थपली होवाधी-वाचना- भेट भयो. ने अवसर समारमा अनन्नकाल सुधी भ्रमणकरा- वनारी प्रवननागाननाथी भय पामनार-कदाग्रहरदिन-तथा भव.
१३ ध्यादि प्रत्यक्ष ज्ञानरहित-अने तेज हेतुथी अमुकज वाचनापठि सत्य छे एवो निश्चय करवो अशक्य जाणनार संघनायक पूज्यपाद-श्री देवर्डिंगणि क्षमाश्रमण महाराजा विगेरे आचार्य महाराजाओए ते ते वाचनाओना पाठो परस्पर अविसंवादपणे स्मरणने अनुसारे तदवस्थज पुस्तकारूढ कर्या, जेथी आज सुधी पण तेज पद्धति तदवस्थभावे दृष्टिगोचर थायछे जेमां अवसाने • आबे अर्थमां सत्य अर्थ कयो ? ते केव लिगम्य छे एवो उल्लेख देखायछे. आ श्रीदंडकप्रकरणनो अनुवाद-छूटा शब्दार्थ मास्तर. चंदुलाल नानचंदे लखेल छे. अने प्रकरणना विषमस्थ- लोने सैद्धान्तिक सरलशैलीए स्पष्ट विवेचन टिप्पणी यन्त्रादि साथे समजारनार-मारा परमोपकारिशिरोमणि- चारित्रादि- गुणोने वृद्धि पमाडनार- उत्तम ब्रह्मचर्यादि लोकोत्तर सद्गुणोने धारण करनार--जंगमकल्पतरु-कलिकाले श्री गौ- नम गुरुसमान-श्री जैनेन्द्रशासनतीर्थरक्षणपरायण--परोपकार- शील-भावकरुणाजलनिधि-पूज्यपाद-प्रातःस्मरणीय-भावाचाये पुरंदर-श्रीस्थानांगोक्त पञ्चातिशयधारक-तपोगच्छाचार्य श्रीपरम गुरुवर्य श्रीमद्विजयनेमिसूरीश्वरभगवत्पदृपूर्वाचलनभोमणि- सदाचारशीलवैराग्यगुरुभक्तिपरायण, वासीचंदननी माफक भव्य जीवोने श्रृतादिना अध्यापनादिद्वारा कृतार्थी बनावनार-मारा श्रुनादिपाठक, सत्कृतिसांनिध्यकारक-परमोपकारी गीतार्थ मुख्य- सिद्धान्तवाचस्पति-न्यायविशारद पूज्यपाद श्रीमद्विजयोदयसूरिजी महाराज छे. जेथी तेओश्रीनो आ अनहद आभार अनाग्रही- गुणग्राही तत्वरसिक भव्यजीवोने अविस्मरणीय छ, पयन्ते भव्य. जीवो आ ग्रंथना अध्ययन-अध्यापन-मनन-अने निदिध्यास नद्वारादंडकोनु यथार्थ स्वरूप समजी, शुभ दंडकोने सुवर्णनी बेडी समान, अने अशुभ दंडकोने लोहनी बेडी समान गणी, पोनाना -- १४ दंडकस्थानो दूर करी, द्वादश भावनाना ध्यानरूप पवनना झगा- टाथी अष्टकमरूप वादळाने हठावी-पोताना - अन्यायाध निरुपाधि शाश्वन सच्चिदानन्द सूर्यने प्रकट करी-अने ते द्वारा लोकालोकना भाव जाणी-स्वपरोपकार करवापूर्वक मुक्तिपद पामे. एम हार्दिक निवेदन करी, हवे है आ टुंक प्रस्तावनाने संक्षेपी लइश. कारणके श्रीवीतरागर्विवर्नु संक्षिप्त वर्णन पण प्रभुदेवां रहेला लोकोत्तर गुणोनु भान कराववाद्वारा भेदज्ञानिजीवने तस्वरूपे लीन थवा मां निबंधनभून थायज छे. नथा छद् पस्थ जीवोने आवारक कर्मोना प्रतापे अनाभोगजन्यस्खलनाओ दुर्निवार्यछे यतः- अवश्यं भाविनो दोषाः, छद्मस्थत्वानुभावतः ॥ समाधि तन्वते सन्तः, किनराश्वात्र वक्रगाः ॥ १ ॥ तेधी आ ग्रंथमा गुणग्राही-विज्ञवाचक वर्गने दृष्टिदोषजन्य या मुदणजन्य जे कोइ. -योग्य भूलचूक जणाय, तेने महाशयो सुधारीने वांचशे. अने कृपा करी जणावा तसी लेशे, तो बीनी आवृत्तिमा सुधारो पण थइ शकरो. इत्यलं विस्तरेण भूयाभद्रं श्री श्रमणसंघस्य. निवेदक- श्री गुरु नेमिसूरीश्वरचरणकिंकर- मुनि पद्मविजयः
ॐ
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॥ औं अई नमः ॥
॥स्वपरसमयपारीण-विश्वोपकारधुरीण-चारुचारित्र-तपोगच्छाधिपति
आचार्यश्रीविजयनेमिसूरिसद्गुरुभ्यो नमः ॥
॥ अथदंडकविस्तरार्थः॥
॥ यंत्रादिविभूषितः॥
नत्वा श्रीमन्महावीरं, नेमिसरिं गुरुं तथा ।
दण्डकाख्यस्य शास्त्रस्य, विस्तरार्थ तनोम्यहम् ॥ १ ॥
अवतरण-आ प्हेली गाथामां मंगलाचरण करवा पूर्वक
दंडकरूप पदवडे श्रीऋपभदेव वगेरे २४ भगवाननी रतुति स्वरूप
दंडकपकरण अपरनाम विचारछत्रीशी अथवा लघुसंग्रहणि ग्रन्थ
सांभळयामां भव्योने सावधान करे छे. ?
नमिउं चउवीसजिणे-तस्सुत्तवियारलेसदेसणओ।
दंडगपएहिं ते च्चिय--थोसामि सुणेह भोभव्वा ? ॥१॥
( संस्कृतानुवादः)
नन्वा चतुर्विंशतिजिनान्-तन्मूत्रविचारलेशदेशननः ।
दंडकपः नांश्चव. नाग्यामि श्रृणुःवं मो भव्याः " ॥ १ ॥
(२) ॥ दंडकविस्तरार्थः ।। ॥ शब्दार्थः॥ नमि-नमस्कार करीने. दंडगपएहि-दंडकनां पदोवडे. चउवीस-चोवीश- ते-तेओने (-श्रीजिनेश्वरोने) जिणे-जिनेश्वरोने. चिय-निश्चय. तस्मुत्त-तेमना सिद्धांतनो थोसामि-स्तवीश- वियार-विचार-स्वरूप- सुणेह-सांभळो. लेस-लेशमात्र-किंचित्- भो-हे. देमणी-दविवाथी. भव्या-भव्यजनो! गावार्थ:-चोवीश जिनेश्वरोने नमस्कार करीने तेमना सि- द्रान्तनु स्वरूप लेशमात्र देखाडवा पूर्वक (२४) दंडक+पदोवडे (-टंटकनां स्थानवडे ) निश्रय तेमनी (-जिनेश्वरोनी) स्तुति क- गते हे भव्या मांभळो ! विस्तरार्थ:-आ ग्रंथमां अभिधेय (-विषय ) २४ प्रभुनी ग्लनि काग्वानो छे, हवे ते स्तुति प्रभुना गुणर्नु वर्णन-प्रभुनी का- यन वर्णन-प्रभुनां वचनोनुं वर्णन इत्यादि द्वारा अनेक प्रकार पशु स्तुति थट शके छे, त्यां आ ग्रंथकर्ता 'गजसार मुनि' आ ठे. काणे मिद्धान्तरूप प्रभुनां वचनोना वर्णनरूपे प्रभु स्तुति करे छे, माटे मूळ गाथामां कह्यु छ के नरमुत्तवियारलेसदेसणी-ते- मना सिद्धान्तनुं म्वरूप लेग मात्र देवाडवा पूर्वक (चौवीश दे- एकपदावटे ) हं नेमने रतवीग. " वो ए प्रमाणे जे स्तवना क- नी ने पण पटेलां नमस्कार कर्या वाद थाय छ माटे प्रथममा भयम " चोवीग जिनेश्वग्ने नमम्कार करीने "एम कहां छे. चाल पनि पण जिले के भगवाननं प्रथम नमस्कार कर्या बाट तेम- नी नि बोलायछे एज पहनि आ गायामां दावी छे. हये तमना मिदाननी विचार लेग मात्र देवाइवान जे स्तवना कर-
॥ चतुर्विंशतिदंडकवर्णनम् ॥ (३)
वी छे, ते सिद्धान्तनो विचार तो नयवर्णनथी-निक्षेपवर्णनयी--
द्रव्यानुयोगना वर्णनथी-गणितानुयोगना वर्णनयी इत्यादि अनेक
प्रकारे थइ के छ तो अहि कया प्रकारनो विचार दावी स्तव-
ना करवी छे? ते जणाववाने माटे कहे छे के-'दंडगपरहि-दंडकना
२४ स्थान ते वडे स्तवना करवानी के. अहिं जेटला भगवाननी
स्तुति करवी के तेटलांज दंडकनां स्थानोवडे सिद्धान्तनुं पण कि-
चित् स्वरूप दर्शाववानुं छे. माटे हे भव्यो तमे सांभळो.
अर्थात् आ दंडक प्रकरण ते २४ जिनेश्वरनी स्तुतिरूपे र-
चायलं छे, अने ते स्तुति प्रभुना गुण वगेरेनी नहिं पण प्रभुनां
सिद्धान्तगत वचनोनी छे.
भरत अने अरवतक्षेत्रमा प्रति उत्सर्पिणी अवसर्पिणीमां
२४-२४ ज तीर्थंकरो थाय छे माटे चोवीशनी स्तवनाथी अतीत
अनागत वर्तमान तमाम चोवीशीओ ( अनन्त चोवीशीओ) नी
स्तवना यइ ! आ प्रकरणमा करेली स्तुति ते नमस्कार आशीः इ-
त्यादि स्वरूप कोइ नही पण विज्ञापनारूप छे, जे माटे प्रकरणने अन्ते
पोतेज ग्रन्थकार 'गजसार मुनि' ते आशय व्यक्त करे छे. "दंडतिय
विरइ मुलहं, लहुं मम दितु मुक्खपयं. "
॥प्रथम गाथा तात्पर्यार्थ. ॥
मंगलाचरण, दंडकपदे करी अभिधेय, भवा एपदे करी भव्य-
वजी अधिकारी, संवन्ध तथा फल अर्थपत्तिथी मृचव्यां छे. (१)
अवतरण-आ गाथामां प्रकरण वक्तव्यतानो उद्देश करवा
२४ दंडकनां नाम दर्शाये छे.
नेरडया असुराई, पुढवाइ वेन्दियादओ चेव ।
गाभयतिरियमणुस्सा, बंतर जोइसिय वेमाणी ॥ २ ॥
मागदि १० भवनपतिना १० दंडक, नेनां नाम-अमरकुमार, (४) ॥ दंडकविस्तरायः ।। ( संस्कृतानुवादः) , नरयिका असुरादयः पृथ्व्यादयो दीन्द्रियादयश्चैव । गर्भजतिर्यग्मनुष्या, व्यन्तरो ज्योतिषिको वैमानिकः ॥ २ ॥ ॥ शब्दार्थः ॥ नेरड्या-नारक- गभय-गर्भज- अमुराई-अमुरकुमार वगेरे (१०) तिरिय-तिर्यच. मणुस्सा-मनुष्यो. पुढवाइ-पृथ्विकाय वगेरे (५) वंतर-व्यन्तर. पेन्द्रियादओ-हीन्द्रिय वगेरे(३) जोइसिय-ज्योतिपी. वेव-निश्चय. वेमाणी-वैमानिक. गाथार्थः-सात नारकनो १-अमुरकुमार वगेरे १०-पृथ्वी- . कायवगेरे ५-दीन्द्रिय वगेरे ३-गर्भजतिर्यंचनो १-गर्भज मनुष्य- नो ?-व्यंतरनो ?-ज्योतिपीनो १-ने वैमानिकनो १ (एम २४ दंडक छे.) ( अहिं चेव ए शब्दमां चकार समुच्चयवाचक ने एव निश्चयवाचक गाथा पूर्त्यर्थ छ ) विम्तरार्थः-आ गाथामां २८ दंडकनां नाम कह्यां छ, त्यां 'नेग्डया'-माते प्रकारना नारकनो ? दंडक गणेलो छे, ते ७ नार- कनां नाम-पत्नप्रभा पृथ्वीना नारक, शर्करामभाना नारक, वा- टुकामभाना नारक, पंकप्रभाना नारक, धूमप्रभाना नारक, नमः प्रभाना नाग्क ने नमम्तमःप्रभाना नारक तथा 'मुग'-अमुग्कु- . नागकुमार. विद्युत्कुमार, सुपणकुमार, अग्निकुमार. वायुकुमार, ग्ननिनकुमार उधिकुमार, दिशाकुमार, ने द्वीपकुमार (आ अ.
. ॥ चतुर्विंशतिदंडकवर्णनम् ॥ (५) नुक्रम तत्वार्थनो छे.) अहिं १५ 'परमाधार्मिकदेवो अमुरकुमार- निकायना छे. तथा 'पुढवाई-पृथ्वीकाय विगेरे ५ दंडक तेनां नाम -पृथ्वीकाय, अपकाय, अनिकाय, वायुकाय, ने वनस्पतिकाय तथा 'बंदियादओ'-दीन्द्रियादि ३ दंडक तेनां नाम-दीन्द्रिय, त्री- न्द्रिय, ने चतुरिन्द्रिय ए ३ विकलेन्द्रिय पण कहेवाय छे. तथा 'ग- भयतिरिय'-गर्भज निर्यचनो १ दंडक, तेमज (गन्भय) 'मणुस्सा'- गर्भज मनुष्यनो १ दंडक, तथा व्यन्तर ८ प्रकारना अथवा १६ प्रकारना अथवा १०५ प्रकारना तेनां नाम-भूत-पिशाच-यक्ष --राक्षस-किन्नर-किंपुरुष--महोरग--ने गंधर्व ए आठ मूळव्यन्तर छे, तथा व्यन्तरनी बीजी वाणव्यन्तर नामनी जातिना पण ८ भेद छ तेनां नाम-अणपन्नि--पणपनि ऋषिवादि--भूतवादि--कंदित-- महाकंदित-कोहंड--ने पतंग ए प्रमाणे ८ मळी १६ प्रकारना व्यन्तर कह्या, अने ए सर्वना उत्तरभेद मळीने १०५ प्रकारना व्य- न्तर देवो छे तेनां नाम- १०किन्नर. १० किंपुरुष. १० महोरग. १ किन्नर १ भुजग १ हाहा २ किंपुरुप २ सत्पुरुप २ भोगशाली ३ किंपुरुषोत्तम ३ महापुरुष ३ महाकाय ३ तुंवरु ४ किन्नरोत्तम ४ पुरुपकृषभ ४ अनिकाय ४ नारद ५ हृदयंगम ५ पुरुषोत्तम ५ स्कंधशाली ५ ऋषिवादिक ६ रूपशाली ६ अतिपुरुष ६ मनोरम ६ भूतवादिव ७ अनिन्दित ७ मरुदेव ७ महावेग ७ कादंब ८ मनोरम ८ महप्वक्ष ८ महाकादंब । अब-अंबरीप-शबल श्याम-गैद्र-उपगेद्र-अमिपत्र-धनु- कुभ-महाकाल-काल-वैतरणी बालक-महाधाष-मरन्बर- ना. मना १५ परमाधार्मिक देवो अमुरकुमार निकायना हं. १२ गांधर्व. २ हह । ८ मस्त (६) ॥ दंडकविस्तरार्थः॥ . -- वनभद्र ३ जोष ९ रतिप्रिय ९ मेरुपम ९ मेरुकान्त ९ रैवत १०. रनिश्रेष्ठ १० यशस्वद १० भास्वन्त १० विश्वावसु ११ गीतरति १२ गीतयश १३ यक्ष. ७राक्षस. ९ भूत. १६ 'पिशाच १ पूर्णभद्र १ भीम १ कुष्मांड २ पाणिभद्र २ महाभीम २ प्रतिरूप २ पटक ३ विघ्न ३ अतिरूप ४ हरिभद्र १ विनायक ४ भूतोत्तम ४ आन्हक ५ मनोमद्र ५ जळराक्षस ५ स्कंदिक ५ काळ ६ व्यतिपाति- ६ राक्षसराक्षस ६ महास्त्रंदिक ६ महाकाळ कभद्र ७ ब्रह्मराक्षस ७ महावेग ७ चोक्ष ८ प्रतिच्छन्न ८ अचोक्ष ८ मर्वतोभद्र ९ आकाशग ९ तापिशाच २. मनुप्ययक्ष १. वनाविपनि ११ अधस्तारक १२ देह १२ रूपयक्ष १ः यक्षोत्तम १३ महादेह १५ तूपिणक ७ मुभद १० मुखरपिशाच ११ रनाहार १४ महाविदेह १६ वनपिशाच तथा १० निर्यगज़ंभक नामना व्यन्तर- जानिना देवले तेनां नाम- अन्नभक-पानजुंभक--वस्त्र भक--- मथक गया भक--पुष्पमुंभक--फलज़ुभक---पुष्पफलज़ुभक--वि- याजभक ने अव्यक्तज़ंभक ए १० प्रकारना देवो ती लोकमां । धी ग्यटोकप्रकाश देह-महादह ने विदेहपूर्वक १६ पिशाच गणाव्या है, अने श्रीतस्वार्थ भाग्यमा दहन महावि 27 में मंदपूरक ... पिशान कया .
॥ चतुर्विंशतिदंडकवर्णनमः ॥ (७) चित्र-विचित्र--यमक-समक-कंचनगिरि--वैताहय वक्षस्कार- वि. गेरे वर्वतोमा वसे छे अने अन्नादि पदार्थोमा रसादिकनी हीनाधि- कता करवानी नँभना--चेष्टावाळा होवाथी तिर्यगजभक कहेवाय छे.. ए प्रमाणे ( १०-१०-१०-१२-१३-७--९-१६-२०) उत्तरभेदो ९७ तथा ८ मूळभेदो मळी १०५ प्रकारना व्यन्तर देवो कह्या. तथा ५ प्रकारना अथवा १० प्रकारना ज्योति. पी देवो छ तेनां नाम-चंद्र-सूर्य-ग्रह-नक्षत्र-ने तारा ए ५ मूळ ज्योतिषी देवो छे, ते पण दरेक २॥ द्वीपमा चर-चालता छ, ने २॥ द्वीप बहार स्थिर ठे. माटे चर अने स्थिर ए चे भेदवडे गुणतां १० भेद थया. दरेक चंद्र इन्द्रनी आज्ञामा रहेनार अने पाछन पाछळ चालनार अथवा साथे रहेनार दरेक चंद्रना ८८ ग्रह-२८ नक्षत्र-ने ६६९७५ कोडा कोडि तारा छे, अने सर्व चंद्र तथा सर्व मूर्य असंख्य असंख्य छे. छतां जातिभेदे ८ अथवा १० गणाय छे. पुनः ए ८८ ग्रह विगेरे जे चंद्रनो परिवार को तेज मूर्यनो परि- वार पण छे, परन्तु मूर्य इन्द्रनो परिवार जुद्रो नथी, अर्थात् एक जातना परिवार उपर बे इन्द्रोनी आज्ञा छे, अथवा वे इन्द्रोनो भेगो एकज परिवार छे. तेमां पण मूर्य इन्द्र करतां चन्द्र इन्द्र मोटो महद्धिकने पुन्यवान वळवान् गणाय छे, माटे सामान्य रीने ग्रहादि चन्द्रनो परिवार के एम विशेप प्रसिद्धि के. तथा 'वमाणी'-वैमानिक देवोना मूळ कल्प भने कल्पातीत एम बे भेटो छ, उत्तम्भेदो २६ अथवा ८ भेद-तेमा १० कल्प ने १४ कल्पातीन देवो मनो २६ भदनां नाम .
(८) १२ कल्प. १ सौधर्म- २ ईशान. ३ सनत्कुमार. ४ माहेन्द्र । दंडकविस्तरार्थः ॥ १४ कल्पातील. १ सुदर्शन. २ सुप्रतिवद्ध. ३ मनोरम. ४ सर्वभद्र. ५ विशाल. ( आ ९ ग्रेवेयक देवो कहे- वाय छे.) ५. ब्रह्मा. ६ लांतक. ६ मुमन. ७ शुक्र ७ सौमनस. , सहस्रार. ९ आनत. ८ प्रियकर. १ आदित्य- (आ पांच अनुत्तर विमा नवासीदेवो कहेवायछे.) १७ प्राणत. १ विजय. ११ आरण. २ वैजयंत. १० अच्युत. ३ जयन्त. ४ अपराजित. ५ सर्वार्थसिन्हा नया ब्रह्मदेव रोकने अन्ते रहेनार ९ लोकान्तिक देवो छे नथा : किल्विपिक देवो, ते पा प्रमाणे- " लोकान्तिक. ३ किल्विपिक. १ मारम्वन. १ सौधर्म अने ईगान- : लोकांनिकना सर्व देवा २५१५५ ने मतान्तरे २२६३७७ ,, नवं एकावनागी अथवा मतान्तः ७-८ अवतारी ग्राम- पटाफना तीजा पाटे आट कृष्णगजीओना मध्यमां रहला विमानामा नाग टे.
॥ चतुर्विशतिडकवर्णनम् ॥ (१ २ आदित्य. ३ वन्ति कल्पनी नीचे रहेनारा. ४ अरुण. ५ गर्दतोय. २ सनत्कुमार अने माहेन्द्र ६ तुषित. ७ अव्याबाध. कल्पनी नीचे रहेनारा. ८ मरुत. ९ अरिष्ट. ३ लांतक कल्पनी नीचे रहेजार. एप्रमाणे २६ अने १२ मळीने वैमानिकना ३८ भेद पणथाय छे. सर्व देव संख्या. १० भुवनपति ए प्रमाणे "श्री द्रव्यलोकप्रकाशमा" देव- १५ परमाधामी १०५ व्यन्तर ना भेद १७८ गणाच्या छे ते प्रमाणे अहीं १० ज्योतिषी पण गणाव्या. ३८ वैमानिक १७८ ( इति चतुर्विंशति दंडकभेदप्रभेदवर्णनम.) शंका-आ २४ दंडकोमा ७ नारकीनो भेगो १ दंडक ग- प्यो अने १० भुवनपतिना जुदा जुदा १० दंडक गण्या तेनु कार- ण गु.? तथा सम्मृच्छिम तिर्यंच अने सम्मृच्छिम मनुष्यनो दंरक केम न गण्यो ? उत्तर-आ दंडकप्रकरणना रचनार ग्रन्धकार इंटकनी सं. ख्या सिद्धान्तने अनुसारे राखी छे, अने मिध्यान्तोमां मर्वत्र पू- र्वोक्त रीतेज संख्या गणावी छे, तेनुं यथार्थ कारण श्री बहुश्रुत- गम्य है, परन्तु प्रायः एम समजाय छे के मंख्या गांधी ए वक्ता- नी इच्छाने आधीन के माटे सात नारकीनो एकज ने १० भुवन (१०) ॥ सविस्तरार्थः । तिथंच तथा सम्मू० म. ना १० दंडकनी संख्या राखी अने सम्मू० नुप्यने कंडक वखन नियंच-तथा मनुष्यना दंडकमां अंतर्गत करेल छ. छतां दरेक द्वार वर्णन प्रसंगे हुँ ए पन्ने भेदमां पण स्पष्ट समजाय नेवी रीते जुदो द्वारावतार करीश. नथा जेने विपे जीव स्वकृतकर्मनो दंड पामे ते 'दंडक कहे- आ- १ पकार्थक सरग्बो पाठ जेनी अंदर आवे ते दंडक क- देयाय 5. जेम ' उख, नख, णख, बख, मख इत्यादि गतौ' दंडक धातु कहेवाय छे. तेम प्रायः साते नरकमां सरखा पाटाळावा 'नेरहया ' शब्दे करी सिद्धान्तोमा घणुं करी दग्याय छे. माटे ने एक दण्डक जाणवो अने दश भुवनपति- आमां घणुं करी । असुरकुमारा ' 'जाध थणियकुमारा' इत्यादि सदी बढे अलग अलग आलायाओ सूचव्या छे. 'माटे ते दश- दण्डको ममजाय छे. तेज रीते एकेन्द्रियना अधिकारमा घणे पुढविकारया । इत्यादि शब्दो वडे अलग अलग लावा आवे छे. माटे तना पांच भण्ड को अलग जणाय छे. धनी गुरुमम्प्रदायथी पण एक हेतु समजाय छे जे रत्नप्रभा तथा गगप्रभानी यच्चे तेना आधार भूत घनोदधि-घनयात-तनुवात आफाशन अन्तर हे पण अमुरकुमार अने नागकुमारनी बच्चे म नरकना पाथडान अने नारकी जीवोनुं अन्तर छ तेवू को अन्तर नधो नंघीज गैत माते नरकमां पण एक बीजानी गरनं चोर्नु को अन्तर नथी माटे ते मातं नारकीना जीवो अव्य. यदिन गणाय 5. मेथी तओनी एफ दण्डक छे. अने भुवनप निमां पर योजामी बच्चे नरकना पाथडानुं अन्तर होवाथी दोकना भलग अलग मनी दश दण्डको जाणया. आज कार- पापी दयानगना अनेक प्रकाग होघा छतां पण तेमां गक बी. नि अन्तर नही होयाथी एकज दण्डक 5. तमज वैमानिकी. । कप-पानीन-टीयान्तिक- फिल्विपिक इत्यादि अनेक भी गया तो पण अन्तरनी अभाय हायाधीत वैमानिक परम, पाय र. ( म च. म. द. र. ग. ) ॥ चतुर्विंशतिदंडकेचतुर्विंशतिद्वारवर्णनम् ॥ (११) वाय, अथवा दंडक शब्द ते ते जीवोनो समुदाय ग्रहण करवा माटे छे (एम श्रीदंडकत्तिमां कह्यु छे.) पुनः आ प्रकरणमां सूक्ष्म अने अपर्याप्त जीवोनो अधिकार पण प्रायः नथी-(श्रीदंडक वृत्तिः) अवतरण--आबे गाथाओमां ( २४ दंडक उपर उतारवा) माटे २४ द्वारनां नाम कहेवाय छे. संखित्तयरी उ इमा, सरीरमोगाहणा य संघयणा । सन्ना संठाण कसाय, लेसिन्दिय दुसमुग्धाया ॥३॥ दिट्ठी दंसणनाणे, जोगुवओगोववाय चवणठिई । पजत्ति किमाहारे, सन्निगइ आगई वेए ॥४॥ (संस्कृतानुवादः) संक्षिप्ततरा त्वियं, शरीरमवगाहना च संहननानि । संज्ञासंस्थानकपाय-लेश्येन्द्रिय द्विसमुद्घाताः ॥ ३ ॥ दृष्टिदर्शनं ज्ञानं, योग उपयोग उपपातश्च्यवनं स्थितिः। पर्याप्तिः किमाहारः, संज्ञिर्गतिरागतिर्वेदः ॥ ४ ॥ ॥ शब्दार्थः ॥ सखित्तयरी-अति संक्षेपवाळी. संघयण-संघयण (६) उ-वळी. सन्ना-संज्ञा (2) इमा-आ (२५ द्वाररूपसंग्रहणी.) संठाण-संस्थान (६) सरीरं-शरीर (५) कसाय-कपाय (४) लेस-लेख्या (६) ओगाहणा-अवगाहना . (१२) ॥ दंडक विस्तरार्थः॥ गइ-गति. इंद्रिय-इन्द्रिय (4) चवण-च्यवन-(मरण). दुसमुग्घाया-समुद्घात. ठिई-स्थिति-(आयुष्य) दिहि-दृष्टि (३) पजत्ति-पर्याप्ति (६) दसण-दर्शन (४) किमाहारे-कइ दिशिनो आहार ? नाणे-जान (८) सन्नि-संज्ञा (३) जोग-योग (१५) उवओग-उपयोग (१२) आगइ-आगति. उववाय-उपपान-(जन्म). वेए-वेद (३) गाथार्थ:-अति संक्षेपवाळी ( २४ द्वाररूप संग्रहणी) आ (ममाणे छे.)-शरीर-अवगाहना--संघयण--संज्ञा--संस्थान--क- पाय--लेश्या--इन्द्रिय-बे समुद्घात-दृष्टि-दर्शन-ज्ञान-'अज्ञान--- योग--उपयोग--उपपात--जन्म-मरण--आयुष्य-पर्याप्ति--वइ दिशि- नो आहार--संज्ञिपणु---(संज्ञा)--गति--आगति---अने चंद ( ए २४ द्वार के.) विस्तरार्थ:-२४ दंडकोमा २४ द्वारोनो अवतार मात्र ४४ गाथामांज करेलो होवाथी 'संखित्तयरी उ इमा-आ २४ 31- ररूप संग्रहणी--( संग्रहन स्त्रीलिंग संग्रहणी) अनि संक्षिप्त छे. ते २४ टारोनुं किंचित् स्वरूप कहेवाय छे. ॥ १ शरीरहार.॥ शीरते--विनाश पाम ते शरीर पांच प्रकारनां है. ते आ प्रमाण- उदार--( विशाळ-प्रधान ) गुणवाला एवा श्री नी- शंकर --गणधर- सर्वस--सर्व विरनि- चक्रवनि- वासुदेव--प्रतिवामृदेव मृत, गायामां मानहार का नथी कारणके ज्ञानहा- मारने अंतर्गत गणन है. ने अंतर्गत असानहारने पद पारमा हार घाय. - ॥ प्रथमशरीरद्वारपर्णनम् ॥ (.१३) --बळदेव--इत्यादिने प्राप्त यतुं होवाथी, अथवा मोक्षरूप उदारगुण अथवा अनंत लब्धिरूप उदारगुण ए शरीर घडेज प्राप्त थतो हो- वाथी अथवा उदार एटले स्थूल पुद्गलोर्नु बनेलं तिर्यंच--अने म- नुष्योनुं शरीर औदारक कहेवाय छे. १ २ तथा विविधप्रकारनी क्रियाओवाळ एटले एक होइने अनेक थाय, अनेक होइने एक थाय, भूमिचर होइने आकाशचारी थाय, आकाशचारी होइने भूमिचारी थाय, नाना होइने मोटा थाय, मोटा होइने नाना थाय, हलकुं होइने भारी थाय, ने भारी होइने हलकुं थाय, दृश्य होइने अदृश्य थाय, अने अदृश्य होइने दृश्य थाय इत्यादि अनेक प्रकारनी क्रियावाळू अथवा शक्तिवाळ जे शरीर ते वैक्रियशरीर सर्व देव--सर्वनारक- केटलाएक गर्भज म- नुष्य-केटलाएक गर्भजतिर्यंच अने केटलाएफ वादरपर्याप्ता वायु-' कायने होय छे.२ ३ आमपापधि आदि लब्धिवाळा १४ पूर्वधर मुनि महारा- ज श्रीजिनेश्वरनी ऋध्धि देखवाने अथवा सूक्ष्मशंकानुं निराकरण करवाने १ हाय प्रमाणर्नु नवु शरीर वनावी श्री विहरमान तीर्थकर पासे मोकले ते 'आहारक शरीर कहेवाय.आ शरीरना परमाणुओ वैक्रिय शरीरना परमाणुओथी तद्दन भिन्न तथा सूक्ष्म होवाथी अने केटलाएक गुण वै० शरीस्थी जुदा होवाथी ए शरीर वैक्रिया- न्तर्गत न गणाय. ४ आहार पचाववामां, तेजोलेल्या मृकवामां, ने शीतलेल्या -- १ आग्वा भवमा वर्ततां चारवार आहारक शरीर बना- वे एक भवमा उत्कृष्ट वे वारज बनावे. आहारक शरीरनी जघन्य बिरहकाल १ ममय. उत्कृष्ट छ माम अथवा मतान्तरे यर्प पृथक्त्व विकास, ई.
(१४) ॥ दंडकविस्तरार्थः॥ मृकवामां जे कारणरूप शरीर ते तैजस शरीर सर्व संसारी जी- वने होय.४ ५ कर्मपुद्गलोथी बनेल ते कामण शरीर, केटलाएक आठ की परमाणुओना समुदायरूप-( १५८ प्रकृतियोना समुदाय)ने कहे थे. पण ते उचित समजातुं नथी. कारण कार्मण शरीर नाम कर्मना भेदरूप, बोरने कुंडानी जेम सर्व कर्मनो आधार छे. ते 'का- मण शरीर पण सर्व संसारी जीवने होय छे. आ शरीर जीवने परभवमां लइ जनार होय छे. ५ ॥इति प्रथमं शरीरद्वारम्॥१॥ ॥ २ अवगाहनाहार..॥ कया जीवन शरीर केटलं मोटुं होय, एम कहेवू ते अवगाह- नाहार कडेवाय. ।। इति द्वितीयमवगाहनादारम् ।। २ ।। -Rananda hombre ॥३ संघयणहार.॥ हाटकाना समृहनुं बंधारण ने संहनन कडेवाय. तेना ६ भेद आ प्रमाण- संधिने म्याने हाडना वे छेडा एक वीजाने प- रम्पर प्रांटी मानने वांढरीना बच्चानी पेठे वळगी रहेला होय, ने ने बन्ने छेटा उपर मध्यमां हाटकाना पाटो वीटायलो होय, अन ने उपन्थी चारे अंगने पटले प्रथम पाटाने, तनी नीचे मंधि- मनहाटने, नेनी नीचे मंधिगन चीजा हाटने, ने नेनी नीचे पाटाने नारीपनी उम्पनिमां. भवान्तर जयामां. प्रथम म. मंग IIT पुत्री या बिगरमा कारगमप है. - ॥ संहननदारवर्णनम् ॥ (१५) (ए चारने) मेदीने हाडकानी खीली आरपार नीकळी. होय, एवा प्रकारनी संधीना हाडकानी मजबुताइनुं नाम वजर्षभनाराच (-वज्र-खीली, ऋषभ-पाटो, नाराच-मर्कटबंध ) संहनन कहेवाय.? २ हाडकानी खीली सिवाय पूर्व कहेली संधिगतहाडनी मजबु. ताइ, के जेमां ऋषभ-पट्टो, ने नाराच-मर्कटबंध बेज होय ते ऋषभनाराच संहनन कहेवाय. २ ३ पूर्वोक्त रीते एकलो मर्कटबंध होय ते नाराच संहनन. ३ ४ पूर्वोक्त मर्कटबंध हाइकानां गन्ने छेडाना परस्पर हतो तेम नहिं होतां मात्र एक छेडो बीजा छेडाने मर्कटबंध रीते वळ- गेलो होय ने बीजो छेडो सीधो होय, तथा तेना मध्यमांथी हा- ट खीली पण आरपार थइ होय तो तेवी संधि रचनानु नाम अर्ध नाराच कहेवाय. ४ ५ तथा हाडना बे छेडा एक उपर एक सीश चढेला होय ने वचमां खीली आरपार थइ होय तो तेवी संधिरचनानुं नाम कीलिका संहनन कहेवाय. ५ ६ तथा हाडनो एक छेडो खोभण (-रहेज खाडा) चाळो होय अने तेमा हाडनो बीजो छेडोअडकीने रहेलो होय, तेवी संधिर चनानु नाम छेदपृष्ट संहनन कहेवाय, आ संहननमां वे छेटा सा- मासामी आवीने स्पर्शला होय पण एक वीजापर चडेला होता नथी, अने खीली होती नयी माटे कोइ हाइने खचेतो खोभण- मांथी वहार नीकळी जतां" हाडकुं उतरी गयुं " कहेवाय अने चे हाडकांने एवा प्रकारनो आंचको लागतां खोभणमांथी नीक- की एक बीजापर चढी जाय त्यार " हाड चढी गयुं " कहवाय, नया तैलादि मसवारूप सेवा वडे आत एटले पीडायलं (-ने बडे दृढ रहनाम) होवाथी पन वीजु नाम सेवा पण छे. ६ "मंद- (१६) । दंडकविस्तरार्थः॥ न्यन्ते-दृढीक्रियन्ते शरीरपुद्गला येन तत् अथवा संहन्यन्ते संहति (शक्ति) विशेष प्राप्यन्ते शरीरावस्थावयवा यैस्तानि संहननानि" (-जेनावडे शरीर पुद्गलो संहन्यन्ते एटले दृढ कराय अथवा जेना बडे शरीरमा रहेला अवयवो शक्ति विशेष पामे ते संहनन एवो व्युत्पत्यर्थ छे.) ॥ इति तृतीयं संहननद्वारम् ॥३॥ । ६ . ॥ ४ संज्ञाद्वारम. ॥ . जेना वडे "संजानाति एटले जाणे छे ते संज्ञा ते ज्ञानरूप अने अनुभवरूप एम बे प्रकारनी छे त्यां मति-श्रुत-इत्यादि आठ ज्ञा- नरूप संज्ञा छे, अने वीजी अशाता वेदनीयादिकमना उदयथी उ- पन्न थयेली आहारादिकनी अभिलापात्मक अनुभवरूप संज्ञा ४-१०-ने १६ प्रकारनी छे. ते आ प्रमाणे- १ क्षुधारूप अशाता वेदनीयकर्मना उदयथी आहार ग्रहणनी जे इच्छा ते आहारसंज्ञा. २ भयमोहनीय कर्मना उदयथी उत्पन्न थयेल त्रास उपजवा रूप ने भयसंज्ञा.. वंद मोहनीयना उदययी उत्पन्न धयेल विषयामिलाप ते मैथुनमंज्ञा. ४ लोभ मोरनीयना उदगथी उत्पन्न धयेल तृष्णा ते परिग्रहमंज्ञा. प चार मंत्राओ सर्व गति जीवाने प्रगट अनुभवरूप ले अने पकन्टियादि सर्व अमंदिन भीवाने अस्पष्ट अनुभवरूप . तथा प. चार मंहामीमा गार कापावरूप मंदानी अने लोक तथा ओघ ॥ चतुर्थसंज्ञाद्वारवर्णनम् ॥ (१७) संज्ञा मेळवतां १० संज्ञाओ पण कही छे. त्यां मतिज्ञानावरणना भयोपशमथी शब्द अने अर्थना विषयवाळी सामान्य अवबोधरूप क्रिया ते ओघसंज्ञा १ अने शब्द तथा अर्थनो विशेषावबोधक्रि- या ते लोकसंज्ञा, २ (इति प्रव० सारो० वृत्ति). अथवा दर्शनो- पयोग ते ओघसंज्ञा अने ज्ञानोपयोग ते लोकसंज्ञा (इति ठाणांग वृत्ति.) अथवा वल्लीनुं जमीन छोडीने भीत वंडी या वृक्ष इत्यादि पर चढवू इत्यादि ओघसंज्ञा, अने पुत्ररहितने सद्गति न होय, कूतरा ते यक्ष छे, ब्राह्मण ते देव छे, कागडा ते पूर्वज छे, मयूरीने मोरनी पांखना वायुथी अथवा मयूरनां आंसु चाटवाथी गर्भ रहे छे इत्यादि लोकोए स्वच्छंदमति कल्पनाथी उपजावेली कल्पना- ओ ते लोकसंज्ञा (इति आचारांग वृत्ति). ए १० संज्ञाओ कही. तथा मोह-धर्म-सुख-दुःख-जुगुप्सा-ने शोक ए ६ संज्ञाओ श्री आचारांगजीमां कहेली होवाथी पूर्वोक्त १० साथे मेळवतां १६ संज्ञाओ पण थाय, जीव जे संज्ञी अथवा असंज्ञी कहेवाय छ ते ए ४-१० वा १६ संज्ञाओवडे नहिं, पण आगळ कहेवाती दीर्घकालिकी आदि संज्ञाओवडे सजि असजिपणु कहेवाय छे. एकेन्द्रिय जीवोमां वादर प्रत्येकवनस्पतिने अंगे १० संजाओ लिंगरूपे नीचे प्रमाणे कही छे- १ वृक्षने जननो आहार होय छे माटे एकेन्द्रियने आहारसंज्ञा, २ लज्जालु नामनी वनस्पतिने हाथ अडाडवा जइए तो मं. कोचाइ जाय के माटे एकेन्द्रियने भयसंज्ञा. ३ बेलडी पोताना तंतुओवडे वृक्षने वींटी लेछ नेयी ने एके- न्द्रियने परिग्रहसंज्ञा. ४ कुरुवक नामर्नु वृक्ष लीना आलिंगनवहे पाळीभूत थाय , माटे एक ने मैथुनसंज्ञा.
-- (१८) 1. दंडकविस्तरार्थः॥ ५ कोकनद नामनो कंद हुंफारो करे छे माटे क्रोधसंज्ञा. ६ रुदंती वेलना रसना स्पर्शयी सुवर्णसिद्धि थाय छे, अने ते वेलमांधी रसनां टपकां झरतां रहे छे, जे परथी मानसंज्ञान अनुमान थाय छे. अर्थात् हुँ होते छते जगत्मां गरीवाइ कम होय? एवा अभिमानधी आंमु टपकावे छे ए हेतुथी मानसंज्ञानु अनु- मान थयेलं छे. ७ नेलडी पोतानां फळीने ढांकी देछे माटे मायासंज्ञा. ८ वीली अथवा धोळो खाखर प्रायः दाटेला निधान उपर उगे के अने पोतानां मूळ ते निधानपर फेलावी वींटी लेछे माटे लोभमंज्ञा. . कमळो रात्रे संकोच पामे छे माटे लोकसंज्ञा. १० बेलडी जमीनमार्ग छोडीने भीत या वृक्षपर उर्ध्व चडे छे. माटे ओघसंज्ञा प प्रमाणे वादर वनस्पतिने १० संज्ञाओनां लक्षण कह्यां, अने ते प्रमाणे वीजा दरेक जीवोमां कोइमां स्पष्ट तो कोइमां अ- स्पष्ट पण प. मंज्ञाओ रहेली छे. (४)॥इतिचतुर्थ संज्ञाद्वारम्॥४॥ ॥ ५ संस्थानहारम् ।। मामुटिकमायोक्त प्रमाणमदिन वा प्रमाणरहिन अवयवोनी रचनामी यलो शरीरनो शुभाशुभ प्राकार ने संस्थान कडेवाय. नकारना . नेनं वन्य प्राप्रमाणे- गग्ना सर्व अवयवो प्रमाणमर डाय ने ममचतुग्म मं- ॥ पञ्चमसंस्थानद्वारवर्णनम् ॥ (१९) स्थान कहेवाय. आ संस्थानवाळी मनुष्य पर्यकासने बेठेल होयतो तेना डाबा दींचणथी जमणा खभा सुधीनु माप, जमणा ढींचणथी डावा खभानु, अने पर्यकासनना मध्यथी नासिकाग्रसुधी, माप एक सरखु होय छे माटे सम-सरखा छे. चतुः-(बे खभाने बे ढींचणरूप)चारे अत्र खूणा ते जेमां ते समचतुरस्न संस्थान कहेवाय. २ तथा न्यग्रोध एटले वडनी पेठे नाभिथी उपरना अवयवो प्रमाणसर होय ने नाभिथी नीचेना अवयवो प्रमाणथी न्यूनाधिक होय ते न्यग्रोध संस्थान. ३ तथा आदि एटले पगना तळीयाथी नाभि सुधीना प्रथम अंगाधना अवयवो प्रमाणसर होय ने उपरना अवयवो प्रमाण र- हित होय ते सादि संस्थान (अहिं केटलाएक आ संस्थानने सा- चि एटले शाल्मली वृक्ष सरखा आकारवालु एम पण कहे छे.) ४ मस्तक-ग्रीवा-हाथ-ने पग ए ४ अंग प्रमाण सर होय अने शेष अवयवो प्रमाण विनानी होय ते वामनसंस्थान. ५ मस्तक-ग्रीवा-हाथ-ने पग ए ४ अंग प्रमाणरहित होय अने बीजा अवयवो (प्रायः) प्रमाण सर होयतो कुब्जसंस्थान. ६ प्रायः सर्व अवयव प्रमाण रहित होय ते हुंडकसंस्थान ॥ इति पञ्चमं संस्थानद्वारम्. ॥ ५ ॥ ॥ कपायहारम. ॥ । कप एटले संसारनो आय एटले लाभ जेनावट याय ते क- पाय कहेवाय, ते क्रोध-मान-माया-ने लोभ ए चार प्रकारना छे.
(२०) ॥ दंडकविस्तरार्थः॥ पीजा पण १६ अथवा ६४ प्रकार ग्रन्थान्तरथी जाणवा. ॥इति पष्टं कषायद्वारम्. ॥६॥ ॥ ७ लेश्याहारम.॥ ३ ३ "पिते वर्गणा मह जीव आभिरिति लेश्या:"-जेनावडे आ- मा कमबडे शिष्यते-संबंधवाळो थाय ते लेश्या कहेवाय. तेना व्यथी अने भावधी एम बे भेद छ, त्यो आत्माना योगपरिणाम रूप हेन्धी प्राप्त थवां अमुक प्रकारनां पुद्गलो ते द्रव्यलेश्या. दन्यलेश्यारूप पुद्गलोथी यतो जे आत्मपरिणाम ते भावलेश्या. ए बन्ने लेश्या कृष्ण-नील-कापोत-तेजो-पद्म-ने शुक्ल एम ६ प्रकारनी छे. तेमां कृष्णादि प्रथमनी ३ लेश्या अशुभपरि- णामरूप छे, अने तेजो आदि उपरनी ३ लेग्या शुभ परिणामवाळी छ, पुनः अशुभ : लेश्यामां पण कृष्णलेश्या अत्यंत अशुभ परि- णामवाली, नीललेश्या तेथी अल्प अशुभ परिणामवाली, ने का- पोतलेल्या नेथी पण अल्प अशुभ परिणामवाली छे, तेवीज रीते तेजोलेल्या अल्पविशृद्ध परिणामवाळी, पद्मलेश्या अधिक विशु- दिवाळी, अने नेथी शुक्ललेल्या अधिक विशुद्धिवाली छे. पुन: करणलेया अंमख्य अध्यवसायवाळी छे, ने ते अध्यवमाय- ( भान्म परिणाम )यां पण हला अध्यवधी बीजो अध्यव० अ. निविद नेथी नोजो अधिक विशुद्ध ए प्रमाणे असंख्य अध्यव- गायो अनुन मे अधिक अधिक विशुद्ध छे, ए प्रमाणे नीललेश्या- नया कापातलेल्याना पण अमंग्य अध्यवमायो अनुक्रमे अधि- काश्मिा विराट नाणवा. नोपण प. सर्व अध्यवसायो उपरनी त्रण .
॥ ससमलेश्याद्वारवर्णनम् ॥ (२१) लेश्याना शुद्ध अध्यव०नी अपेक्षाए अशुभज गणाय छे. तथा तेजो आदि त्रणे शुभ लेश्यामां पण असंख्य अध्यवसायो अनुक्रमे अ. धिक अधिक विशुद्ध जाणवा. तथा प्रथमनी ३ (द्रव्य)लेश्याओनो वर्ण-गंध-रस-स्पर्श अ- शुभ छे, ने उपरनी ३ द्रव्यलेव्याओनो वर्ण-गंध-रस-स्पर्श शुभ छै. तथा मनुष्य अने तिर्यंचनी द्रव्यलेश्याओ दरेक अन्तर्मुहूर्ने बदलाया करे छे, अर्थात् कृष्णलेश्यानां पुद्गलो ते अन्तर्मु० बाद नीलादि ५ मांथी कोइपण लेश्यारूप थइ जाय छे, एज प्रमाणे नीलादि सर्व लेश्यानां पुद्गलोनो वर्ण-गंध-रस-स्पर्श अन्तर्मु बाद अन्य लेश्याना वर्णादिरूपे थइ जाय छे. माटे मनुतियैनी लेश्याओ वस्त्र समान कही , कारणके वस्त्रने रंगमां बोळतां जेम सद रंगमय थइ जाय छे, तेमां कृष्णद्रव्यो ते नीलद्रव्यना संबं- धथी नीलरूप थइ जाय छे. पुनः देव अने नारकनी द्रव्यलेश्याओ स्फटिकवत् कही छे, कारणके स्फटिक जेम भिन्नवर्णना पुष्पादिकना संयोगथी सर्वाशे स्वरूप त्याग कर्या विना ते रंगवाळु देखाय छे, पण स्वरूपनो त्याग नथी करतुं. माटे देवनारकोनी द्रव्यलेश्या अवस्थित छे. पुनः भावलेश्याओ तो चारे गतिवाकाने अन्तर्मू० बाद बदलाया करे छे. चालु दंडक प्रकरणना अधिकारमा द्रव्य- लेश्यानोज अधिकार छे. ॥इति ससमं लेश्याहारम्. }|७|| ॥ ८ इन्द्रियहारम् ॥ इन्द्र एटले आत्मा तेनुं जे चिन्ह ने इन्द्रिय, अथवा इन्द एटले आत्माने जान धवान जे द्वार ते इन्द्रिय ते स्पर्शन-रसना- प्राण-चक्ष-ने श्रोत्र एम पांच प्रकारनी छे, न्या म्पर्शनादि ५ (२२) ॥ दंडाविस्तरार्थः ॥ इन्द्रियो द्रव्येन्द्रिय अने भावेन्द्रियरूप से प्रकारे छे, तेमां पण स्पर्श- न सिवायनी रसनादि ४ द्रव्य इन्द्रियो अभ्यन्तरनिति अने वाद्यनिति-(अंतरंग आकार ने वहार देखातो आकार ) एम ये प्रकारनी छे, त्यां जीन्हा-नाक इत्यादि जे दृष्टिगोचर थाय छे ते वाद्य निर्दनि छे, अने ए बाह्य आकारोनी अंदर विषय ग्रहण क- ग्वानी शक्तिवालां, अने दृष्टिथी नहिं देखी शकाय एवां सूक्ष्म प- रिणामी पुद्गलो कदंबपुष्पादि आकारे गोठवायलां छे ते अभ्य- न्तरनिति कडेवाय . तथा ए बन्ने द्रव्येन्द्रियोमा स्वस्वकार्य करवारूप रहेली जे शक्ति ते अभ्यन्तर तथा बाह्य उपकरणेन्द्रिय कहवाय छे, ए प्रसिद्ध सिद्धान्त छे, अने आचारांगजीमां तो इ. न्द्रियस्थाने गोंठवायला स्वच्छतर आत्मप्रदेशो ते अभ्यन्तरनि- ति, अने विपयग्रहण शक्तिवानां स्वच्छतर सूक्ष्मपुद्गलो के जे कदंबपुष्पादि आकारवाला छे ते वाह्यनिति कहेल छे, अर्थात् प्रज्ञापनादिमां जेने अभ्यन्तरनिति मानी छे तेने श्रीआचारांगजी निमा बाल्यनिति मानी छे, ए प्रमाणे द्रव्येन्द्रियना भेद कह्या. हो भावन्द्रिय आ प्रमाणे- लब्धि भने उपयोग एम भावन्द्रिय बे प्रकारनी छे, त्यां पनिज़ानावरणादिना क्षयोपशमथी इन्द्रियद्वारा विषय ग्रहण कर- वानी जे आत्मगति ते लब्धि भावेन्द्रिय दरेक जीवमात्रने सम- का. पांचे इन्द्रियरूप होय . अने प्राप्त थयेली अभ्यन्तरनिर्ट- निम्प द्रव्येन्द्रियदाग विषय ग्रहणमा प्रवन ने उपयोग भावे- न्द्रिय ने एक भवमां कोट जीवन एक, कोडने चे यावन् कोटने पनि न बटे ववत होय . जीर परेन्द्रिय दोन्द्रिय इत्यादि कवाय डे, ने द्रव्येन्द्रिय मिनी मा. नतिर लब्धिमर भावन्दियनी अपेक्षा सर्व ॥ ८-९ इन्द्रियसमुद्घातद्वारवर्णनम् ॥ (२३) जोव पंचेन्द्रिय, अने उपयोगरूप भावेन्द्रियनी अपेक्षाए सर्वे जीव एकेन्द्रिय गणाय. इत्यादि इन्द्रिय संबंधि घणुं विवेचन नवतत्त्व- विस्तरार्थमां करेल होवाथी अहिं लखायु नथी. ॥ इत्यष्टममि- न्द्रियद्वारम् ॥ ८॥ ॥ ९ समुद्घातहारम्. ।। , सम्-एकी भावे-( एकदम-शीघ्र ) उत्-प्रवळतावडे-(आ- स्माना अतिप्रयत्नवडे ) घात-कर्मपरमाणुओनो विनाश करवो ते समुद्घात, वेदना-कराय-मरण-वैक्रिय-तैजस-आहारक-- अने केवलिक ए प्रमाणे ७ 'प्रकारनी छे. ते दरेकर्नु किचिंत् स्वरूप आ प्रकारे-(१) समुद्घातस्वरूप- १ अत्यन्त वेदनावडे व्याकुळ थयेलो आत्मा तीन प्रयत्नथी १ गाथामां दु समुग्धाया-वे समुदधात ते एक जीव स- मुद्घात ने बीजी अजीव समुदघात, ए बेमांथी अहिं जीवनो अधिकार चालतो होवाथी मात्र जीवनीज ७ समुद्घातोनुं व र्णन कर्यु ले, अने अचित्त महास्कंध नामनी पुद्गल वर्गणानो एक स्कंध तथा विध विश्रसा-( स्वाभाविक ) प्रयोगे अथवा विश्रसा परिणामे परिणत थयो छतो आगळ कहेवाती केव- लि समुद्घातनी पद्धतिए प्रथम समये दंड, वीजे ममये कपाट, त्रीजे समये मथान, चोथे ममये मंथानान्तरपूर्ति करी लोकमा सर्व व्यापी थर पांच मे समये अन्तर मंहरण, छठे समये मं- थान सहरण, सातमे समये कपाट सहरण, ने आठमे ममये देड महरण करी स्वभावस्थ अंगुलनी असंख्यातमा भागनी अवगाहनावाळो धाय. ए अचित्त महास्फध संबंधि अजीब स- मुदयातनं अंचं प्रयोजन नहिं होवाथी अर्थ प्रमंग की नथी.
- (२४) ।। दंडक विस्तरार्थः॥ पोताना केटलाएक आत्म प्रदेशोने शरीर वहार काही मुखादिकनां विवर अने खभादिकनां अन्तर पूरी शरीरनी उंचाइ ने जाडार जेटलो एक सरखो दंडाकार रची अशातावेदनीयनां घणां कर्म पु- द्गलोनो उदीरणा करणवडे उदयावलिकामां लावी घात करे--(नि- जर ने वंदना समुद्घात. २ अत्यन्त कपायवडे व्याकुळ थयेलो आत्मा केटलाएक आ- त्मप्रदेशोने शरीर बहार काही मुखादिकनां पोलाण अने खभादि- कनां अंतर पूरी पूर्वोक्त गते स्वदेहप्रमाण आत्मप्रदेशोनो दंडाकार रची कपायमोहनीयकर्मनां घणां कर्म पुद्गलाने उदीरणा करणवर्ड उदयावलिकामां लावी घात करे--(भोगवीने निर्जरे ) ते कपा- य समुद्घात. ३ भरणना अन्त अवसरे मरणधी व्याकुळ थयेलो आत्मा मरणधी अन्तर्मु० हेलो पोताना आत्म प्रदेशोने शरीर बहार काही ज्या उत्पन्न थवानो छे ते स्थान मुधी आत्म प्रदेशोने लं- वावी स्वदेह प्रमाण स्थूळ ने उत्पत्तिस्थान मृधी (उ० असंख्य- योजन.) दीव दंडाकार रची अन्तर्मु० मुधी नेवीज अवस्थाए रही आयुष्यकर्मनां घणा पुद्गलोनो उदीरणा करणवडे उदयावलि- कामालावी घान करे ते मरण समुद्घान. ४ बैंक्रिय लब्धिवालो आत्मा पोताना आत्मपदेशोने शरीर वहार काढी जे स्थाने वैक्रिय नवु रूप रचवार्नु छ ने स्थानथी 3० धी संख्यातयोजन प्रमाण दीर्घ अने स्वदेह प्रमाण स्थूळ दंडाकार ग्ची पूर्व बांधेला वैक्रियनामकर्मनां पुद्गलाने पूर्वोक्त रीते उदयमां लावत्रा साये वैक्रिय शरीर वर्गणानां पुद्गलो ग्रहण करतो जाय ने उत्तरदहनी रचना करे ते बैंक्रियममुद्घात. ५ तेजोलल्यानी लब्धिवाळो आमा पोताना आमप्रदेशाने ॥ तैजसआहारककेवलिसमुद्घातदारवर्णनम् ॥ (२५) शरीर वहार काढी जे स्थाने तेजोलेश्या ( अथवा शीत लेश्या) मूकवानी छे ने स्थान सुधी ( उ० थी संख्यातयोजन ) दीर्घ अने स्वदेह प्रमाण स्थूल एवो दंडाकार रची पूर्वोपार्जित तैजस पर.. माणुओनो पूर्वोक्त रीते घात करवा पूर्वक तेजोलेश्या (अथवा शीतलेश्या) मके ते तैजस समुद्घात. ६ आहारक लब्धिवाळा चौहपूर्वधर मुनि श्रीजिनेश्वरनी ऋद्धि देखवाने अथवा सूक्ष्मसंदेह निवारवाने इत्यादि कारणथी स्वशरीर प्रमाण स्थूळ अने उत्कृष्टधी संख्यात योजन दीर्घ दंड करी पूर्वोपार्जितः आहारक नामकर्मनां पुद्गलो पूर्वोक्त रीते निर्ज- रवा पूर्वक आहारक देहयोग्य पुद्गलो ग्रहण करी आहारकशरीर रचे ते आहारकसमुद्घात. ७ जे केवलिने नाम-गोत्र-अने वेदनीय ए प्रण कर्मनी स्थि- ति पोताना आयुष्यनी स्थितिथी अधिक रही होय तो ते त्रणनी. स्थितिने आयुष्यस्थिति जेटली सरखी. करवा माटे अन्तर्मु. पहेला जेणे आवर्जिकरण कयु होय छनां कर्मस्थिति अधिक रही जाय तो तेनुं समीकरण करवा माटे जेओर्नु अन्तर्मु० जेटलं आयुष्य बाकी रह्य होय एवा केवलि भगवान् पोताना आत्मप्रदेशोने शरीर बहार काढी प्रथम समये लोकना नीचेना छेडाथी उपरना छेडा मुधी दीर्घ, ने स्वदेशमाण स्थळ दंडाकार करी, बीजे समय ते ई- डाकारमाथी आत्मप्रदेशोने स्वदेह प्रमाण जाडाइ कायम गरवी उ- तर दक्षिण लंबावी कपाट-(कमाड) आकारे रची, त्रीले समये पूर्व पश्चिम लंबावी मंधान--( रवैयानो ) आकार रची, चोथे स- मये चारे आंतरा पूरी समग्र लोकमां व्याप्त थाय, नदनंतर पांचमे समये आंतरामा रहेला आत्मप्रदेशो संहरो मधानस करी, छठे समये मंथानाकार संहरी कपाटकार करी, सानमे समये कपाटकार सहरी दंडाकार करो, आठमे समये दंड संहरी देहस्थ धाय. ते के- वलि समुद्घात. - . (२६) ।। दंडकविस्तरार्थः॥ आ आठ समयना प्रयत्नथी गे कर्मोनी स्थिति आयुष्य तु- ल्य थाय, अने ते साथे दरेक समये रसघात पण थाय छे, एमां त्रीजे चोथे ने पांचमे समये अनाहारक तथा कार्मण काययोगी होय, पहेलेने आठमे समये औदा. योगी होय अने वीजे छ ने सातमे औदा० मिश्र योगी होय. (१) काळनियम-केवलि समु० ८ समय प्रमाण, अने सर्व अन्तर्मु प्रमाण छे. (२) ग्रहणवर्जननियम-वेदनीय मरणने केवलि समु० मां कर्मपरमाणुओनो विनाश छे, पण नवु ग्रहण नथी, कपाय स- मु०मां कपायमोहनीय कर्मपुद्गलोनो विनाश, अने तेथी वीजा अ- धिक कषाय पुद्गलोतु ग्रहण पण थाय छे, ने जो तेम न थाय तो सर्वथा कर्मनो अभाव थवाथी वीतरागपणुं प्राप्त थवानो प्रसंग आवे.तथा वै०-० ने आहा० सम्मु०मां ते ते नामकर्मनां पुद्- गलोनो विनाश छे, ने ते ते देह वर्गणाना पुद्गलोर्नु ग्रहण छे. (३) आभोगानाभोगनियम-वेदनाकपाय-ने मरण ए ३ समुद्घात स्वाभाविक थाय छे, पण जीव जाणी जोइने करवा जाय तोज बने एम नथी माटे अनाभोगिक, अने शेप चारे समुद्- धात जीवना विचार पूर्वक थाय छे माटे आभोगिक, तथा दरेक समुद्घातमा आत्मप्रदेशो शरीरथी जे वहार नीकळे छे ते सर्व प्रदेशो वहार नीकळता नथी पण केटलाएक प्रदेशो शरीरमां पण होय ने वीजा केटलाएक वहार नीकळे छे, जेथी शरीर आत्मप्रदेश रहित थाय नहि. इत्यादि समुन्नु विशेष स्वरूप सिद्धान्तथी जाणवू. ॥इति नवमं समुद्घातद्वारम् ॥ . . - ॥ दृष्टिद्वारवर्णनम् ॥ (२७) ॥ १० दृष्टिहारम.॥ 7 दृश्यते अर्थानां सदसत्स्वरूपमनेनेति दर्शन-प्रदार्थोनुं सत् वा असत् स्वरूप जेनावडे देखाय-(जणाय) ते दशन अथवा दृष्टि सम्यग्-असम्यक् ने मिश्र एम त्रण प्रकार होवाथी सम्यक्त्व-मि- थ्यात्व-ने मिश्र एम ३ प्रकारनी दृष्टि छे. त्या पदार्थर्नु सत् स्व- रूप कदी सतरूपे ने कदी असत्रूपे जाणे, असत् स्वरूपने कदी असत्रूपे ने कदी सरूपे जाणे ए.रीते पदार्थना स्वरूपने य. थार्थ न जाणे ते मिथ्याष्टि, पदार्थना सत् स्वरूपने सत् स्वरूपे जाणे अने असत् स्वरूपने असत् स्वरूपे जाणे एम वस्तु स्वरूपने यथार्थ जाणे, ते सम्यग्दृष्टि, अने पदार्थना सत् स्वरूप वा अस- त स्वरूपने समकाले केटलेक अंशे यथार्थने केटलेक अंशे अयथार्थ जाणे ते मिश्रदृष्टि एत्रणे दृष्टिना उत्तर भेद आ प्रमाणे-- १ सम्यकत्व-आत्मानो पदार्थने यथार्थपणे जाणवारूप सम्य- क्त्वगुण रोकनार ३ दर्शन मोहनीय अने ४ अनंतानुवंधि ए ७ प्रकृति- यो उपशान्त थतां-(उदयथी रोकातां) आत्माने जे श्रद्धागण प्रगट थाय ते उपशम सम्यकत्व, अन्तर्मुहूर्त काळ मात्र टके छे. तथा भाखा भवचक्रमा पांचवारज, अने एक भवमां वे वार प्राप्त थायझे. १ अर्थात जेम मदिग पीवाथी विवेकश्किल येलो जीव माने मा कहे अने स्त्री पण कहे. त्रीने स्त्री कहे अत्त स्त्रीने मा एण कहे. पोते निधन होय छतां धनयान कहे, ने निधन पण कहे ए प्रमाणे सत्य अने अनन्य बन्नम्पे चोल तोपण विवेकान्य होवाथी मन्य ते पण अमन्य अने अनन्य गणाय. तम मिश्यावृष्टि मत ने कटी नन जाणे ने फदी अमन पण जाणे छतां अमन ज्ञानज कृयाय (भावार्थ खीतन्वामाग्यमां ). त पण अमन्यज , , १ (२८) ॥ दंडकाविस्तरार्थः।। तथा ए ७ प्रकृतियोनी सर्वथा क्षय थवाथी आत्माने जे - हागुण प्रगट थाय ते क्षायिकसम्यकत्व, आखा भवचक्रमां अ. थवा एक भवमा एकवार प्राप्त थाय छे, अने अनंतकाळ सुधी रहे- छे, पण कोइ काळे विनाश पामतुं नथी. तथा ए ७ प्रकृतियोमा ६ नो क्षयोपशम (वा प्रदेशोदय मात्र) अने सम्यक्त्व मोहनीयनो विपाकोदय वर्ततां आत्माने जे श्रद्धा- गुण प्रगट थाय ते क्षयोपशमसम्यक्त्व, आखा भवचक्रमां अ- संख्यात वार, अने एकभवमा घणी हजारवार-(प्रायः ९००० वार) प्राप्त थाय छे, तथा जघन्यमां जघन्य अन्तर्मु० अने वधुमां वधु ए श्रद्धागुण ६६. सागरोपमथी पण अधिककाळ टके के. ' तथा उपशम सम्यकत्वथी पडतां मिथ्यात्वे न पहोचे तेटलो बचमांनो काळ जघ० १ समय ने उ०६ आवलिका . प्रमाण जे अहान गुण होय ते पतित थतो श्रद्धागु सास्वादनसम्यकत्व, ए पण आखा भवचक्रमां५ वारज अने एक भवमा बेवार प्राप्त थाय. प प्रमाणे ५ प्रकार- सम्यक्त्व जाणवु अथवा वीजी रीते पण ?-२-३-४ ने ५ प्रकारचें सम्यकत्व छे ते आ प्रमाणे- २ श्री सर्वबोट कहेला तच उपर प्रतीति राखवी ते तत्वश्र- हान रूप १ प्रकार- सम्यक्त्व कहेवाय. गुर्वादिकना उपदेशादि प्रयत्न विना स्वाभाविक रीते कर्म- नो विनाश था जे सम्यकत्वगुण प्रगटे ते नैसर्गिकसम्य०, १ अने गुर्वादिकना उपदेश आदि सम्यक् प्रयत्नथी थयेलं सम्यकत्व अधिगम सम्य०२ एम बे प्रकारे अथवा सम्यकत्वनी करणी देव- पूजा-यात्रादि व्यवहारप्रवृत्ति के जे सम्यक्त्वगुणने उत्पन्न करवामां कारणरूप छे ते व्यवहारसम्य०१ अने ज्ञानादियय आत्मानो वि- शुनश्चयिकमम्य०२ एमबे प्रकारे अथवा सर्वज्ञे कह्यं ते सत्य , ॥ दृष्टिद्वारवर्णनम् ॥ (२१ छ एम माने पण परमार्थ न जाणे तेने द्रव्यसम्ब०,१ अने.परमार्थ जाणवा पूर्वक श्रीसर्वज्ञर्नु वचन सत्य माने तेने भावसम्य०,२ एम बे प्रकारे अथवा सम्यकत्वमोहनीय पुद्गलना उदयथी प्राप्त थयेलं क्षयोप० सम्य० पौद्गलिक होवाथी द्रव्यसम्य०,१ ने उपशम त- था क्षायिक सम्य० भावपरिणतिरूप अपोद्गलिक होवाथी भा- वसम्य०२ एम बे प्रकारे, ए प्रमाणे बे प्रकारचें सम्यक्त्व, व्रण अथवा चार आरीते छे. ३ श्री सर्वज्ञोक्त सम्यक्त्वनी करणीओ देवदर्शन-देव-पूना- यात्रा-शासनप्रभावना इत्यादि करवाथी कारकसम्य०,१ क्रिया कंइ पण न करे छतां सर्वज्ञोक्त तत्त्वपर प्रेम भाव होय ते रोचक- सम्य०,२ ने पोताने श्रद्धा न होय छतां देशना लब्धि इत्यादिवडे वीजा जीवने सम्यक्त्व पमाडे ते दीपकसम्य०३ अभविने पण होय, ए प्रमाणे ३ प्रकारचें सम्यक्त्व छे. अथवा उपशम-क्षयो- पशम-ने क्षायिक एम ३ प्रकारनुं सम्य० प्रथमज कधुं छे. ४ तथा उपशमादि ३ मां सास्वादन गणतां ४ प्रकारचें य- म्य०,५ अने क्षयोपशमसम्यगद्रष्टिने क्षायिक सम्य० प्राप्त थतांक्ष- योपशमना अन्त्य समये वेदक सम्यक्त्व होय ते गणता ५ प्रका- रनुं पण सम्यक्त्व थाय. २ मिथ्यात्व--असत्य छतां असलथी ए बात चाली भावी माटे सत्य एम मान, ते अभिग्रह मिथ्यात्व, सर्वधर्म सत्य , कोडने सारो खोटो न कहेवाय एम मानवू ते अनभिग्रह मिथ्वात्व,२ में जे वात मानी तेज सत्य अथवा ते मत्यज छे एम मानवू ते अ- भिनिवेशिकमिथ्या०-( कदाग्रही मिथ्यात्व),३ सर्वज्ञोक्त १३. नमां संदेह करवो-( जेम कहां छे तेमज हो के बीजी रीते हो इ- न्यादि ) ते 'सांठगायिकमिथ्या०,४ अने असजि जीवाने जे अ. १ कोड पदार्थमा नाणवानी जिज्ञामायडे में नर्क थाय (३०.) ॥ दंडक विस्तरार्थः ॥ स्पष्ट , मिथ्यात्व छे ते अध्यक्त मिथ्या०, अथवा अनाभोगमि- थ्या०५ ए प्रमाणे मिथ्यात्व-(मिथ्याष्टिपणुं) पांच प्रकारच्छे. ३ मिश्र-जे पदार्थ जोयो-सांभळयो-के अनुभव्यो नथी ते पदार्थ उपर रुचि के अरुचि भाव न होय तेम सर्वज्ञोक्त तत्वपर ने रुचि अने अरुचि बन्ने न होय ते मिश्रष्टिपणं १ ज प्रकारनुं छे. आ मिश्र० फक्त अन्तर्मु०ज रहे छे, त्यारवाद जीव मिथ्यात्वे वा सम्यक्त्वं जाय छे. ॥ इति दासं दृष्टिद्वारम्. ॥१०॥ ॥ ११ दर्शनद्वारम् ॥ दर्शन एटले सामान्य उपयोग अर्थात् घटादि पदार्थनो "आ कांइ " एवा प्रथम जे सामान्यवोध थाय ते दर्शन, चक्षु- अचक्षु-अवधि-ने केवळ एम ४ प्रकारचं छे ते आ प्रमाणे- १ चक्षु इन्द्रियद्वारा देखेला पदार्थनो जे सामान्य वोध ते च- क्षुदर्शन. २ चक्षु इन्द्रिय सिवाय शेष ४ इन्द्रिय अने मनथी यतो सामा- न्यबोध ते अक्षुदर्शन, अथवा इन्द्रिय अने मन विना पण जी- बनी जे दर्शनलब्धि छे ते पण अचक्षुदर्शन, ( आ बीजो अर्थ ग्रन्थोमां के सिद्धान्तमा स्पष्ट उपलब्ध नथी परन्तु जीवने पूर्वभ- वमाथी आवनां मार्गमा अने अपर्याप्तावस्थामां इन्द्रिय-मन विना पण उक्न प्रकारचें अचक्षु दर्शन गणेल छ, माटे अहि तेवा प्रकार- नो घीनो अर्थ पण लग्यो के) ने मंशय न कहवाय. कारण तर्क, तथा मझय. शंका ए ये भिन्न छे. तर्क जिजामास.प छे, अन मंशय ते अविश्वामरूपछे, ।। दर्शनशानद्वारवर्णनम् ॥ (३१) : ३ अवधिज्ञानीने अवधिज्ञानवडे प्रथम जे सामान्यबोध थाय ते अवधिदर्शन. सिद्धान्तमा विभंगज्ञानिने पण होय छे. ४ केवळ ज्ञानवडे प्रथम विशेष उपयोग थया बाद जे सामान्य उपयोग थाय ते केवळदर्शन. दरेक पदार्थमा सामान्य अने विशेष एबे धर्मो रहेला छे, त्यां आत्मानो उपयोग गुण जे समये पदार्थना सामान्य धर्म उपर प्रवर्ततो होय ते समये आत्मा दर्शन उपयोगवालो गणाय अने विशेष धर्म उपर प्रवर्ततो होय त्यारे ज्ञानोपयोग कहेवाय, ते आग- क ज्ञानद्वारमा कहेवाशे. पुनः घट पदार्थमां घटत्व-अने वर्णत्व ए सामान्य धर्म, अने अमुक स्थाननो, अमुकनो बनावेलो, अमुक व- नो, अमुक उपयोगमां आवनारो इत्यादि अनेक विशेष धर्मों के. तथा आ दर्शननुं वीजुं नाम निराकार उपयोग पण छे, ॥ इ. त्येकादश दर्शनटारम्. ११ , ॥ १२ ज्ञानहारम्. । आत्मानो पदार्थ प्रत्ये जे विशेष उपयोग ते ज्ञान, अधचा द- रेक पदार्थमां सामान्य धर्म अने विशेपधर्म ए वे धर्मों छे. त्यां आ- स्मानो उपयोग जे समये पदार्थना विशेष धर्म प्रत्ये प्रवते ते समये आत्मा ज्ञान उपयोगवाळो कहेवाय. तेमां छमस्थ जीवने प्रथम अन्तर्मु० सुधी सामान्य उपयोग ने त्यारवाद अन्तर्मुज्ञानोपयो- ग, अने श्री सर्वज्ञने केवळनान उत्पत्तिसमये केवळज्ञान अने बीजे सपये केवळदर्शन वीजे समये केवळ ज्ञान ४ थे समये केवळदर्शन ए प्रमाणे एकेक समयने अन्तरे दर्शनोपयोगने नानोपयोग पगवन- मान थया करे छे पुनः अहिं ज्ञान ने मम्याज्ञान ग्रहण करवं .
(३२) ॥ दंडकपिस्तरार्थः ।। पण विपरीतज्ञान नहि, कारण विपरीत-अयथार्थ ज्ञान माटे तो १३ मुं अज्ञानद्वार आगळज कोशे, त्या सर्वज्ञोक्त तत्व उपर प्रती- तिपूर्वक सम्यग्दृष्टिन जे ज्ञान ने ज्ञान कहेवाय ते पांच प्रकारनु आ प्रमाणे - १ मन अने इन्द्रियोद्वारा यतुं अक्षरोपलब्धि रहित जे यथार्थ ज्ञान ते मतिज्ञान. २ पन, अने इन्द्रियोदारा धतुं अक्षरोपलब्धिरूप (अथवा अर्थ- वाचक) यथार्थज्ञान श्रुतज्ञान. ३मन अने इन्द्रियोनी अपेक्षाविना आत्मसाक्षात् थतु रूपी प- दार्थ- यथार्थशान ते अवधिज्ञान. ४ मन अने इन्द्रियो विना आत्मसाक्षात् मनःपणे परिणमेला पु- द्गलोर्नु ज्ञान ते मनापर्यवज्ञान ( आ ज्ञान यथार्थ ज होय छे.) ५ मन अने इन्द्रियो विना सर्व द्रव्य अने सर्व पर्यायनु एक समयमा जे ज्ञान थ ते केवळज्ञान. ए पांच ज्ञानमा प्रथम मतिज्ञानी द्रव्यमां सर्व द्रव्यने सा- मान्यथी जाणे छे, क्षेत्रथी लोक अने अलोक मर्व क्षेत्र (मां रहे- ला पदार्थोंने ) सामान्यथी जाणे छे. काळथी त्रणे काळने सामा- न्यथी जाणे, अने भावथी अनंतमा भाग जेटला अनन्त पर्याय जाणे. श्रुतज्ञानी द्रव्यथी अभिलाप्य-(वचनगोचर ) द्रव्योने जाणे, अने देखे, क्षेत्रथी लोकालोक सर्व क्षेत्रने, काळथी त्रणे काळने, अने भावथी अभिलाप्य पर्यायो जे अनंतमा भाग जेटला अनंत , ते सर्व जाणे--देखे ( अथवा कर्मग्रंथटीका वगेरेमा सर्व द्रव्य-सर्वक्षेत्र-सर्वकाळ-ने सर्व भाव जाणे देखे एम पण का के.) अवधिज्ञानी द्रव्यथी सनरूपीद्रव्य, क्षेत्रथी असंख्य लोक १ , ॥ अज्ञानद्वारवर्णनम्.॥ (३३) प्रमाण, काळथी असंख्यकाळ, ने भावथी अनंतमा 'भाग जेटला अनंत पर्यायोने जाणे अने देखे. ॥ १३ अज्ञानहारम् ॥ अज्ञान एटले ज्ञानको अभाव एवो अर्थ नथी पण अ एटले अयथार्थ-विपरीत ज्ञान ते अज्ञान ए अज्ञान गिथ्यादृष्टि जीवने मानेलं छे. कारणके मिथ्यादृष्टि जीव कोइपण पदार्थना स्वरूपने सर्वोक्त वचनानुसारे जाणतो अथवा ओळखतो नथी पण स्वकल्पनावडे निर्णय करेला स्वरूपे ओळखे छे, अने पोते सर्वज्ञ नथी माटे कोइ पदार्थमा कोइ स्वरूप उलट रीते . पण स्वीकाराय अने कोइ स्व- । रूप सम्यग् रीते पण स्वीकाराय छतां - स्वकल्पितस्वरूप- होवाथी बन्नेस्वरूपे स्वीकार करवो ते अयथार्थ छ माटे मिथ्याटिन बान ते अज्ञान छे..जेमके नाडी परीक्षामा अनुभव विनानो वैद्य रोग- नी यथार्थ चिकित्सा करी शके नहिं. तेम स्वकल्पित स्वरूपवडे प-. दार्थ- यथार्थ ज्ञान थाय नहि, ते अज्ञान ३ प्रकारच्छे ते आ प्रमाणे- १ मन अने इन्द्रियोवडे यतुं ( अक्षरोपलब्धि विनानुं ) अय- थार्थ ज्ञान ते मति अज्ञान- २ मन अने इन्द्रियोबडे थतुं अक्षरोपलब्धिरूप अयथार्थज्ञान ते श्रुतअज्ञान. ३ मन अने इन्द्रियो विना आत्म साक्षावरूपी पदार्थनें अययार्थ ज्ञान ते विभंगज्ञान. अहिं पूर्वाचार्यों विभंगने अज्ञान शब्द नहिं जोडतांज्ञान शब्द जोडे छे तेनुं कारणके विभंग शब्दजअयथार्य श- ब्दनी वाचक छे, अर्थात् विभंग एटले उलट भांगावालं एटले अयथार्थ एवं (अवधि) ज्ञान ते विभंगज्ञान आ ज्ञान स्वरूपे अवधि अज्ञान है, , (३४) । दंडकविस्तरार्थः ॥ - अहि अज्ञानी जीव घट पदार्थने देखी पट कहे अथवा ओ- ळखे छे एम नथी पण घट पदार्थमा जेटला सत् धर्मो अने जेटला असत् धर्मों के तेटला व भौए करीने युक्त नथी मानतो पण केटलाक धर्मोने माने छे, बळी पेटलाक धर्म याने तेमां जे धर्म जे रूपे रहेलोछे ते रूपेज माने एवो पण नियम नथी. माटे घटने घट माने तोपण मिथ्यापिनु ज्ञान अज्ञान गणाय छे. आ ३ अज्ञान- नो द्रव्य-क्षेत्र-काळ-ने भाव ए चार प्रकारनो विषय अज्ञानमां ग्रहण थयेला द्रव्यादि जेटलो अनियमित प्रमाणे जाणवो. ॥ इति त्र- योदशमज्ञानद्वारम् ॥ १३ ॥ ॥ १४ योगहारपु.॥ योग एटले आत्मानो पोलिश व्यापार. ते ४ मनयोग ४ वचनयोग अने ७ काययोग मळी १५ प्रकारनो छे, त्यां सत्य- असत्य-मिश्रने व्यवहार ए नामे, ४ मनयोग तथा ४ वचनयोग छे, अने औदा०-औदा० मिथ-क्रिय-व क्रियमिश्र-आहारक-- आहारकमिश्र अने तैजसकामण एनाने ७ प्रकारनो काययोग छे. तेनु स्वरूप आ प्रमाणे- काययोगद्वारा मनोवर्गणानां युदलो ग्रहण करी मन (चिंत- वन)पणे परिणमावी अवलंबीन्ने विसर्जन करवा ते मनोयोगः, एमां मन ते पुद्गल द्रव्यनो समुदाय के, अने ते पुद्गल समुदाय छे, अने ते पुद्गल समुदायने काययोगथी ग्रहण- परिणमन-अवलंबन-ने विसर्जनरूप व्यापार ते काययोग विशेपर्नु नाम मनोयोग छे. काययोगवडे भापश वर्गणानां पुलो ग्रहण करी भाषापणे परिणमावी-अवलंबी-ने बिखनन करवारूप आत्मानो व्यापार ते { योगदारवर्णनम् ॥ (३५) वचनयोग. आ पण काययोग विशेषज, औदारिकादि शरीरना आलंबनवडे आत्मानो जे व्यापार ते काययोग. (मनोयोगना ४ प्रकार) १ मोक्षमार्गने अनुकूळ एवो मनोव्यापार ते सत्य मनयोग, २ मोक्षमार्गने प्रतिकूळ एवो मनोव्यापार ते असत्य मनोयोग, ३कंइक सत्य अने कंइक असत्य एवो मनोव्यापार ते मिश्र मनो- योग, ४अने मोक्षमार्गने अनुकूळ नहिं, तेम प्रतिकूळ पण नहिं ए- वो, अथवा जेमां चिंतबनना वस्तु स्वरूपनो निर्णयभाव न होय- (अमुक आ रीते छ, अथवा आ रीते नथी एवा निर्णय विनानुं चितवन) ते असत्याऽषा अथवा व्यवहार मनोयोग छे. ए प्रमाणे चारे अर्थ वचनयोगना संबंधमा उच्चार करवा पूर्वक विचारवा.(१)अहिं सत्यमनोयोग अने सत्य वचनयोगना १०-१० भेद छे तेनुं स्वरूप वचनयोगद्वारा (सुगम समजात होवाथी) दर्शावाय छे- जणवय सम्मय ठरणा, नासे वे पडुच्च सच्चे अ। ववहार भाव जोगे, दलले ओदरमसच्चे अ॥१॥" अर्थः-जनपदसत्य, लस्मतसत्य, स्थापनासत्य, नामसत्य, रूपसत्य, प्रतीत्यसत्य, व्यवहारत्तत्व, भावसत्व, योगसत्य, अने १० मुं उपमासत्य.१त्यां जे देशमा जे भाषा बोलानी होय ते देशमा ते भापाथी वोलायलो शब्द सत्य काय, जेम गुजरातमां पाणी- ने पाणी कहे छे, अने वीजा कोइ देशमा पाणीने पिच्च कहे , तो ते पाणीने ओळखावनार पिच शब्द असत्य नथी पण जन- पद-(देश) सत्य छे. २ अनेक वस्तुमां तेवा गुण होवा छतां पण पंडिनजनोए अमु- कनुज नाग अमुक ठराव्यु होय, जे " पंक" एटले कादवमा " , " . (३६) ॥ दंडकविस्तरार्थः ॥ "ज" एटले जन्मेली घास विगेरे अनेक वस्तु छतां कमळनेज "पं- कज" नामथी ओळखवानो व्यवहार ठराव्यो छे ते सम्मतसत्य. ३ अमुक वस्तु सरखा चितरेला अथवा कोतरेला आकारवाळी बीजी वस्तुने पण ते वस्तु कहेवी. जेम चितरेला अथवा कोतरेला सिंहना आकारवाळा काष्टादिने “ आ सिंह छे" एम कहे ते स्थापनासत्य. आ स्थापना सत्य अतदाकार वस्तुमा पण होइ शके छे, जेम घोढानो आकार नहिं छतां नाना वाळको लाकडीने "आ मारो घोडो छे एम कहे छे ते पण स्थापना सत्य छ, पण असत्य नहिं. ४ तेवा गुण नहिं होवा छतां बीजी वस्तुने तेवा नामथी वोला- ववी, जेम सिंहनो चाकर नहिं छतां सिंहदास नाम पाडवू, निध- न छतां लक्ष्मीधर नाम कहेवू इत्यादि नामसत्य छे. ५ तेवा गुणवाळो नहिं छतां वेष उपरथी तेवा नामे बोलाववो जेम साधुना गुण नहि छतां साधुनो वेष पहेरेलाने "आ साधु छे" एम कहेवु ते रूपसत्य. ६ जे कथन अमुकनी अपेक्षाए कहे, जेम अनामिका आंगळी कनिष्टाथी मोटी अने मध्यमाथी नानी छतां मोटी या नानी कोइ एकज अपेक्षाए कहेवी ते प्रतीत्यसत्य. ७ लोक रूदि प्रमाणे बोळ, ते जेम वासणमांथी पाणी झरवा छतांवासण गळे छे, पर्वतपर घास वळवा छतां पर्वत वळे छे, ने कन्या- ने पेट होवा छतां गर्भ नहिं धारण करवानी अपेक्षाए अनुदा (उदर विनानी) कोवी इत्यादि व्यवहारसत्य. ८ कोई वस्तुना संबंधची अमुक वस्तुने ते वस्तुना संवद्ध नाम- घी ओळखवी जेम. छत्र धारण करनारनी-पांसे छत्र होय न होय - - ॥ योगद्वारवर्णनम् ॥ (३७) तोपण छत्री, दंड धारण करनारनी पांसे दंड होय न होय तोपण दंडी कहेवो इत्यादि योगसत्य कहेवाय, ९ बाहुल्यतानी अपेक्षाए कहेवू ते जेमके पोपटमां पांचे वर्ण- (भाव-वर्णादिपर्याय ) छे छतां लीलो कहेवो. भ्रमर पांचे वर्ण- युक्त छे छतां काळो कहेवो इत्यादि अल्पत्वनीअविवक्षाए भावसत्य १० केटलाएक सरखा धर्मवाळी वस्तु साथे वीजी वस्तुनी सरखा- मणी करवी. जेम मोटा तळावने समुद्र जेवडु कहेवू, चंद्रमा सरखा कंइक गोल अने कान्तिवाळा मनुष्यना मुखने चंद्रमुख कहेवू इ. त्यादि उपमासत्य. ए प्रमाणे १० प्रकारनां सत्य कह्यां. . (२) तथा क्रोधरमान३माया४लोभप्रेमदहास्यभय-अनेटद्वेषथी उत्पन्न थयेली असत्यभाषा ते क्रोध निःसृत, माननिःसृत इत्या- दि कहेवाय.९अने वनावटी कथावार्ताओ करवाख्य भाषा कथा- निःसृत,१०अने खोटुं कलंक आपवारूप उपधातनिःसत ए रीते १० प्रकारना असत्ययोग छे. ३ पुनः मिश्रयोग १० प्रकारनो ते आ प्रमाणे-१ "आजे आ नगरमां दशेक बाळक जन्म्या छे." इत्यादि उत्पत्तिनी अनिश्चित संख्या कहेवी ते उत्पन्न मिश्रित २ दशेक मरण पाम्या छे इत्यादि विनाश संख्या कहेवी ते विगतमिश्रित, ३ दशेक जन्म्या, अने दशेक मरण पाम्या. इत्यादि उभयसंख्या कहेवी ते उत्पन्न विगत मिश्रित,४ शंखादि घणा जीवता अने थोडा मरेला देखी सर्व स- मुदायमां"आ जीव राशि छे."एम कहेQ जीवमिश्रित,५ घणा मरे- लाअने थोडा जीवता देखीअ"जीवराशि'कहे ते अजीवमिश्रित, ६आ राशिमां आटला जीवता छे ने आटला मरण पाम्या छे एम आसरे संख्या कहे ते जीवाजीवमिश्रित, प्रत्येक जीवमिश्रित साधारण वनस्पतिजीवराशिने साधारणराशि कहे जे ते साधारण . + (३८) {-दंडक विस्तरार्थ:॥ मिश्रित,अनंतकायमिश्रित प्रत्येक जीवराशिने "आ प्रत्येक जी. वराशि " एम कहे ते प्रत्येकमिश्रित,रात्री छतां शीघ्रता माटे कहेवू के 'जलदी उठ सूर्य उग्यो” इत्यादि अद्वामिश्रित,१०उ- तावळने अंगे दिवस वा रात्रिना एक भागने बीजो भाग कहीये जेम रात्रिनो प्रथम महर छतां मध्यरान थइ कहेते अहाहामिश्रित. (४)तथा असत्याऽमृषा एकले व्यवहार वचन योगना पण १२ भेद छे ते आ प्रमाणे-१' हे देवदत्त ! " इत्यादि अन्यने बोला- ववा रूप आमंत्रणी, २"तुं आ कर " इत्यादि आज्ञा करवा रूप आज्ञापनी अमुक आप ” इत्यादि मांगणी करवा रूप याच- नी,४प्रश्न करयो ते पृच्छिकी, उपदेश आपना रूप प्रज्ञापनी, कोइ कार्यथी निवृत्त (निषेध) करवा रूप प्रत्याख्यानी, अ- नुमति (मत-अभिप्राय ) जापया रूप इच्छानुकूलिका,८कोइए अभिप्राय पूछबाथी " तने जे ठीक लागे ते ” इत्यादि कहेधुं ते अनभिगृहिता.९अमुकज करवु, ने अमुक न कर इत्यादि नि- णयात्मक सलाह आपवी ते अभिहिता. १०ढ्यर्थी वा अनेक अर्थी वचन वोलवू के जेथी निर्णयात्मक भावार्थ न नीकळे ते सांशयिक,११प्रगट रीते जेनो अर्थ समजी शकाय तेवी अथवा स्पष्ट अक्षरो वाळी (पण अर्थ शून्य ) भाषा वोलवी ते व्याकृत (-व्यक्त)१२अने गभीर अर्थवाळी अथवा अस्पष्ट अक्षरवाळी भा- षा ते अव्याकृत, आ छेल्ली थापाद्वीन्द्रियादिजीवोने होय छे अने रे-लोल-लाल इत्यादि कविताना अलंकारी अर्थ विनाना शब्दो तथा पार' झुलावती इत्यादि कार्यमा पथ हललल इत्या- दि अर्थ विनाना बोलाता शब्दो तो व्याकृत वचन योग ए प्रमाणे सत्यना १०, असत्यना १०, मिथना १०, व्यवहार- ना१२ भेद गली ४२ मनोयोग ने ४२ वचनयोग थाय छे.
॥ योगदारवर्णनम्॥ तथा कायाना योग ने आ प्रमाणे--पूर्व भवमांथी परभव- मां जवाने कार्मण शरीर.कारण भूत छ, ने कार्मण शरीरनी साथे तैजस शरीर सदाकाल रहेल होय छे माटे कार्मण शरीरनी सहाय थी ( पूर्वभवथी परभवमा जबारूप) आत्मानो जे व्यापार ते का- मण काययोग, अथवा भवधारणीय शरीरव्यापारना अभावे मा-- त्र तैजसकामण कायाद्वारा आत्मानो परमवगमन-परथवोत्पत्ति प्रथमसमये आहारग्रहण-तथा केवलिससुद्धातना ३-४-५ समये प्रवर्तन रूप जे व्यापार ते कार्मिण काययोग अथवा तैजस का- मण काययोगः प्रश्न:--तैजस समुद्घात रखते, आहार पचन समये तैजस कायनो व्यापार प्रगट छ, ने कार्मणकायनो व्यापार छे नहिं तो ते चखते एकलो तैजसथोग केम न कहेवाय ? उत्तर-जे बखते तै० समुद्घातर्मा, अने आहार पचन व्यापारमा जीव वर्ते छे ते वखते आत्मानुं औदा० शरीर संपूर्ण रचायलं होदाथी औदा० शरीरना आलंबनथी तैजस परमाणुओ वडे पूर्वोक्त कार्य करे छे, माटे प्रयत्नमां औदारिक काय मुख्य छे, प्रश्न:-केवळी समु० ना ३-४-५ समये तै० का० काय- योग वडे आत्मा शुं करे छ ? नथी परभवमा जतो, नथी आहार पचन करतो; के नथी आहार ग्रहण करतो, त्यारे तैजस वा का. मण द्वारा आत्मा ते वखते कइ जातनो व्यापार करे छे ? के जेथी ते वखते ते का. काययोग कही शकाय. ? उत्तर--सयोगी आत्मा सदाकाळ योग प्रवृत्ति वाळो छ, त्यां जे बखते जे शरीरतुं साधन मले ते वखते ते शरीरद्वारा योग प्रतिवाळो होय, अहि समु० वखते औदा० शरीरथी धणे अंशे छुटो पड़ी गयेलो आत्मा तैजस कार्मण वडे सर्वांशे व्याप्त होवा- .
(४०) ॥ दंडकविस्तरार्थः।। . थी योग प्रवृत्तिमां ते वखते ए बे शरीरज आलंवन रूप छे, मोटे ए काययोगतो तें, वखते संभवे छे, अने ते योग कईजातनो व्या. पार करे छे ? ते संबन्धमां तो एज समजाय छे के कार्मण शरीर ना आलयनथी आत्मा स्वप्रदेशोनी विचलतामा वर्ते छे, अने ते विचलता बडे कर्मप्रदेशोनुं ग्रहण करे छे, अथवा ते बे शरीरना आलंबन वडे ज ते वखते मंथनकरण--अन्तरपूर्ति--अन्तर संघर- र्ण रूप व्यापार करे छे. ॥ इति चतुर्दश योगद्वारम् ॥ १४ ॥ ॥ १५ उपयोगहारम.॥ . , उप एटले समीपमा युज्यते-जोडाय ते उपयोग, अर्थात् विषयदेशमा प्राप्त थयेला पदार्थोनी परिछित्तिमां (-वस्तु स्वरू- पावलोकनमां) जोडाय एवो आत्मानो गुण ते उपयोग. ते वे प्रकारनो छे, सामान्य उपयोग एटले दर्शन, अने विशेष उपयोग ते ज्ञान. त्यां दर्शनोपयोग चक्षुदर्शन-अचक्षुदर्शन- अवधिदर्शन- ने केवळदर्शन एम ४ प्रकारे छे, तथा ज्ञानोपयोग पण बे प्रकारे के. यथार्थ ज्ञानोपयोग अने अयथार्थ ज्ञानोपयोग. त्यां यथार्थज्ञा- नोपयोगनी पूर्वर्षिओए ज्ञान एवी संज्ञा राखी छे, अने अयथा- थं ज्ञानोपयोगनी अज्ञान एवी संज्ञा राखी छे. त्यां ज्ञानना ५ प्रकार मतिज्ञान-श्रुतज्ञान-अवधिज्ञान-मनःपर्यवज्ञान-ने केवळज्ञा- न ए प्रमाणे छे, अने मतिअज्ञान-श्रुतअज्ञान-ने विभंगज्ञान (-4. स्तुतः अवधिवज्ञान ) ए प्रमाणे अज्ञान ३ प्रकारे छे, मनःपर्यव ज्ञान सम्यग्दृष्टिनेज (मुनिने ज) होय छे माटे मनः पर्यव अज्ञान होतुं नथी, अने केवळ ज्ञानीने तो अज्ञान न होय ए स्वभाविक ज छे. .
॥ उपयोगद्वारवर्णनम् ॥
(४१)
3
माटे ज्ञान पांच अने अज्ञान ३ छे, ए प्रमाणे ५ ज्ञान-३ अज्ञान-
ने ४ दर्शन मलीने १२ उपयोग छे, तेमां अवधिद्विक-मनः पर्यव
-विभंग-ने केवळद्विक ए ६ उपयोगमा आत्मा इन्द्रिय अने मन-
नी सहाय विना स्वतंत्र रीते मवत छे, माटे प्रत्यक्ष अथवा साक्षात्
उपयोग ६ छ, अहिं प्रत्यक्षमा प्रति-समीपे अने अक्ष-जीव ए-
वो अर्थ होवाथी प्रत्यक्ष एटले आत्मसाक्षात् कहेवाय छे, अने
आत्मसाक्षात् नहिं ते परोक्ष उपयोग मति २-श्रुत २-चक्षुद०-
अचक्षुद० ए प्रमाणे ६ प्रकारे छे. ए ६ उपयोगमा आत्माने इन्द्रिय
अने मननी सहाय अवश्य लेवी पडे छे अने इन्द्रियोद्वारा ज जाणी
देखी शके छे, माटे ए ६ उपयोग आत्माने साक्षात् भावे नथी. जेम
निरोग चक्षुवालो पुरुष घटादि पदार्थने प्रगट रीते अन्य साधननी
सहाय विना देखी शके छे, अने हीनतेजचक्षुवालो पुरुष चस्मा विगेरे
अन्य साधनथी घटादि पदार्थ देखी शके छे तेम आत्मा इन्द्रियो अने
मननी सहायथी देखी जाणी शके तो ते उपयोग परोक्ष उपयोग
कहेवाय, अने इन्द्रियमननी सहाय विना स्वतंत्र देखी जाणी शंके
तो ते उपयोग प्रत्यक्ष उपयोग कहेवाय. ए वास्तविक रीत कही,
पण व्यवहार रुढीमां तो इन्द्रियोथी अनुभवेल घटादि स्वरूपने प्र-
त्यक्ष ज्ञान-( उपयोग) कहे छे, अने अनुमानादिप्रमाणथी निर्णय
करेला स्वरूपने फक्त मनोविपयिक ज्ञानने परोक्षज्ञान कहे छे, ए
व्यवहार (प्रत्यक्षने) पण शास्त्रमा व्यवहारप्रत्यक्षना नामथी स्वी-
कारेल छे. अने अनुमानगदि तो बन्ने रीते परोक्ष ज छे. अहि १२
उपयोगर्नु स्वरूप प्रथम दर्शनद्वारमा ज्ञानद्वारमा कहेवाइ गई है, माटे
पुनः कहेवाशे नहिं. ॥ इति पञ्चदशमुपयोगद्वारम्. ॥ १६ ॥
(४२)
। दंडकविस्तरार्थः ।।
॥ १६ उपपातहारम् ॥
।
+
कया दंडके एक समयमां केटली जीव संख्या उत्पन्न थाय
एम कहेवू ते उपपातद्वार, अने कया दंडकमां केटलाकाळ सुधी कोइपण
जीव आवी उत्पन्न थाय नहिं ? एम कहेवू ते उपपातविरह कहेवाय.
॥ १७ च्यवनहारम् ॥
कया दंडके एक समयमां केटलाजीव मरण पामे तेनी संख्यानो
नियम कहेवो ते च्यवनद्वार, अने कया दंडकमां केटला काळसुधी
कोइपण जीव मरण न पामे ते संबंधि काळ नियम दर्शाववो ते
च्यवनविरह कडेवायः॥
॥ १८ स्थितिवारम् ॥
कया दंडके जीवोनु केटलं आयुष्य होय ते आयुग्यकाळनो
नियम दविवो ते स्थितिद्वार.
॥ १९ पर्याप्तिहारम.॥
र
पर्याप्ति एटले जीवनी आहार ग्रहण करवादिकनी शक्ति,
अथवा ते शक्तिनी समाप्ति ते पर्याप्ति कहेवाय, ते पर्याप्ति आहा-
र-शरीर-इन्द्रिय-उच्छ्वास-भाषा ने मन ए प्रमाणे ६ प्रकारनी
छे, तेनु संक्षिप्त स्वरूप आ प्रमाणे-
॥ पर्याप्तिद्वारवर्णनम् ॥ (४३) आहारपर्याप्ति--आहार ग्रहण करी आहारपणे परिणमावी खल-रस जुदा करवानी शक्ति आहारपयोति आ पर्यासि उत्पत्ति. स्थाने आवेला जीवने-प्रथम समये जमगट थाय छे, अहिं ग्रहण करेल आहारनो केटलोक भाग देहपणे परिणमे नहिं एवो होय तेनो त्याग करे-छे, अने देहपणे परिणमवा योग्य आहारने देहपणे परिणमावे छे, त्यां देहपणे परिणाम न पामे एवा आहारने खलरूप-(कूचारुप) कही शकाय, अने शेष आहारने रसरूप कही शकाय, अन्यथा म- ळ-मृत्रमेज खलरस मानीये तो वैक्रिय अने आहारकनी पर्याप्तिमा खलरस पृथक्करणनो असंभव.छे, तो तेमां ए आहार पर्याप्तिनो अर्थ-केम समीचीन. थाय ? पुनः आ.. पर्याप्ति एकज समयमां समाप्त थाय छे. शरीर पर्याप्ति-ग्रहण करेला आहारने, शरीरपणे परिण- माववानी शक्ति ते दरेक जीवने अन्तर्मुहूर्तकाळे प्रगट थाय छे. इन्द्रियपर्याप्ति-ग्रहण करेला आहारमांथी इन्द्रिय योग्य पुद्गलोने अभ्यन्तर नि:त्ति इन्द्रियपणे परिणमावी इन्द्रियद्वारा वि- षय जाणवानी शक्ति प्राप्त थाय ते औदा० शरीरीने अन्तर्मु०काळे अने आहा० तथा वै० शरीरीने एक समये प्रगट थाय छे. उच्छ्वास पर्याप्ति-श्वासोश्वास योग्य पुद्गलो ग्रहण करी, श्वासोच्छ्वासपणे परिणमावी, अवलंबीने विसर्जन करवानी श- ति. ते औदा० शरीरने अन्तर्मुहर्त अने आहा० वैशरीरीने १ समये प्रगट थाय छे. भाषापर्याप्ति-भापायोग्य पुद्गलो ग्रहण करी, भापापणे परिणमावी-(भाषारूप बनावी) अवलंबोने विसर्जन करवानी श- क्ति तेनो काळ इन्द्रिय पर्याप्तिवन् (४४) ॥ दंडकविस्तरार्थः।। मनःपर्याप्ति-मन योग्य पुद्गलो ग्रहण करी, मनपणे परिणमा- वी अवलंबीने विसर्जन करवानी शक्ति तेनो काळ इन्द्रिय पर्याप्तिवत्। ए ६ पर्याप्तियोमा जे जीवने जेटली पर्याप्तियो पूर्ण करवा योग्य होय छे, तेटली पर्याप्तियो ते जीव उत्पत्तिसमये समकाळे प्रारंभे छे, पण पूर्ण अनुक्रमे करे छे, कारणके प्रथमसमयगृहीत आहारना उपष्टंभथी-(आलंबनथी) जीवने आहारपर्याप्तिरूप श- क्ति सर्वांशे प्रगट थइ, अने शरीरपर्याप्त्यादिरूप शक्तियो देशांशे प्रगट थइ छे, ए प्रमाणे प्रारंभ समकाळे अने समाप्ति अनुक्रमे होयछे. तथा जे जीवने जेटली पर्याप्तियो छे, ते जीव तेटली पर्या- प्तियो पूर्ण करे ज एवी लब्धिवाळो जीव लब्धिपर्याप्त कहेवाय. ते लब्धिपर्याप्तपणुं भवना प्रथम समयथी भवना अन्त्यसमयपर्यन्त होय. एजें आयु उ० ३३ सागर होय. तथा जे जीवने जेटली पर्याप्तियो छे ते जीव तेटली पर्याप्ति- यो पूर्ण नहिज करे एवी लब्धिवाळा जीवो लब्धिअपर्याप्त कहेवाय, ए लब्धि अपर्या०पणुं पण भवना प्रथम समयथी भवनाअन्त्य स- मय सुधी होय छे. आ जीवोर्नु आयु उत्कृष्ट अन्तर्मु० होय. तथा जे जीवने जेटली पर्याप्तियो छे, ते जीवे तेटली पर्या- प्तियो ज्यां मुधी पूर्ण नथी करी पण करशे एवो जीव करणअ- पर्याप्त, अने पूर्ण कर्या वाद करणपर्याप्त कहेवाय. त्यां करण अपर्याप्तपणुं भवना प्रथम समयथी अन्नमुं० पर्यन्त, अने करणपर्या- प्तपणुं अन्तर्मुन्यून स्वस्वपर्याप्तायुप्य जेटला काळवाळ छे. पर्या- प्ति संबंधि विशेष वर्णन प्रथम नक्तत्व विस्तरार्थमां विस्तार पूर्वक करेल होवाथी अहिं विशेष वर्णन कयु नथी.
॥ किमाहारद्वारवर्णनम् ॥ (४५) ॥ किमाहारहारमः ॥ किम् एटले कइ दिशिनो (दिशिथी आवेलो) आहार एटले आहार होय ? ते संबंधि जे निर्णय कहेवो ते किमाहार कहेवाय. त्यां लोकने अन्ते (किनारे) रहेला सूक्ष्म अपर्याप्त पृथ्व्यादि ५ तथा सूक्ष्मपर्याप्त पृथ्व्यादि ५ तथा बादरपर्याप्तवायु अने वादरअपर्याप्त- वायु ए १२ जीवभेदने ३-४-५ दिशिनो आहार होय, अने ए १२ सहित सर्व जीवभेदो जे लोकनी अदरना भागमां-(लोकनो दशे दिशाए फरतो अन्त्य किनारो छोडीने अंदरना सर्व भागमा) रहेला छ तेओने सर्वने छ ए दिशिथी आवेलो आहार होय छे. शंका:-जीव जे आकाश प्रदेशोमां अवगाह्यो छे तेज आ- काश प्रदेशमा रहेला आहारने ग्रहण करे छे तो छए दिशाथी आ- वेलो आहार ग्रहण करे ते केवी रीते ? उत्तरः-ए वात सत्य छे, परन्तु जीव जे आकाश प्रदेशोमां अवगाह्यो छे ते आकाश प्रदेशमा आहार ग्रहण समये ६ ए दिशि- थी आवता पुद्गलोने ग्रहण करे छे, माटे ६ दिशिथी आवेला पुद्- गलो ग्रहण करे एम कही शकाय. ए आहार ग्रहण व्याघातभावी अने निर्व्याघानभावी एम वे प्रकारनुं छे, त्यां अलोकाकाशवडे आहार पुद्गलोने आवतां जे स्खलना थाय अर्थात् न आवी शके ने व्याघात कवाय अने ते व्याघातना कारणथी जीव सर्व दिशिथी आहार न ग्रहण करी शके पण ओछी दिशिथी आहार ग्रहण करे ते व्याघातभावीआ- हार कहेवाय, प्रथम जे :-४-ने ५ दिगियी जे आहार ग्रहण कर्यु ने व्याघातभावी आहार ग्रहण जाणवू. अने नेवा व्यायानना अभावे सर्व दिशिथी एटले छा दिशिथी जे आहारनुं ग्रहण थाय ते निर्याघातभावीआहार कहवाय. .
। (४६), ॥ दंडकविस्तरार्थः॥ प्रश्न:-दिशाओ १० छतां ६ दिशिथी आहार ग्रहण केम कड्यु उत्तरः-विदिशाने पडखे रहेली दिशामां अन्तर्गत गणतां ६ दिशा पण कही शकाय, माटे अत्रे ६ दिशिथी आहार ग्रहण का, पुनः वास्तविक रीते क्षेत्रविदिशा एकेक आकाश मदेशनी श्रे- णिरूप होवाथी आहार्य पुद्गल स्कंध एक प्रदेशात्मक श्रेणिमां अ- गाहे नहिं पण जघन्यमां जघन्यथी अंगुलना असंख्यातमा भाग जेटला क्षेत्रमा अवगाहे छे, अने तेटला अवगाहमां विदिशि प्रदेशो करतां दिशि प्रदेशो असंख्यगुणा संभवे छे, माटे विदिशिने दि- शिमां अंतर्गत गणवापूर्वक ६ दिशिनो आहार कह्यो. प्रश्न:-आ किमाहारद्वारमा आहार्य पुद्गलो कइ वर्गणानां अंगीकार करवां.? उत्तरः-तैजस अने कामण वर्गणा वर्जीने शेष औदा० वैक्रिय-ने आहारक ए ३ भवधारणीय शरीर वर्गणाना पुद्गल स्कंधोनो अहिं आहार अंगीकार करवो, अने कार्मण पुद्ग- लनो आहार तो जीवने सयोगिपणा सुधी प्रति समय होय छे, माटे आ किमाहार प्रसंगे ते ते. का० नो आहार अंगिकार न क- रवो. ए आहार्य पुद्गल स्कंध पण कमीमां कमी अभव्यथी अनंत गुण परमाणुओनो बनेलो होय छे, कारणके तेथी कमी परमाणुओ- वाळा स्कंधो जीव ग्रहण करी शकतो नथी. पुनः ग्रहण कराता आहारमांथी असंख्यातमा भाग जेटलो आहार आहारपणे परिणमे छे, ने बीजो सर्व आहार गाये ग्रहण करेला घासमांथी जेम केट- लोक घास पडी-जाय छे तेम तेज समये विनाश पामी जाय छे, अने आहारपणे परिणमता आहारमांनो अनंतमो भाग जीवना आ- स्वादनमां आवे छे, अने शेप भाग जीवने आस्वादनमां आव्या , । किमाहारदारवर्णनम् ॥ - : (४७) विनाज देहने-इन्द्रियपणे परिणमी जाय छे. वळी आ आहार स- चित्त-अचित्त-ने मिश्र-एम ३ प्रकारनो, तथा ओज अने लोम एम बे प्रकारनो छे, ( अहिं कवलाहारने दिशिआहार साथे योग्य संबंध नहिं होवाथी कवलाहारने दिशिआहारमा गण्यो नथी, अने ए संवधि शास्त्रमा उल्लेख नथी.) पुनः आमांगिकने अना- भोगिक एम भेद पण छे, ते भेदो संबंधि विशेष वर्णन ग्रन्थान्त- , रथी जाणवु. , तथा प्रसंगे निराहारीपणु जीवने क्यारे होय छे ? ते पण कहेवाय छे. त्यां परभवमां वक्रगनिए जतां वे त्रण चार ने पांच समय लागे ते वखते हेलो ने छेल्लो समय वर्जी मध्य समयोमां अनाहारीपणुं होय छे, माटे बे समयनी एक वक्रगतिमां अनाहा- रीपणुं नथी पण त्रण समयात्मक द्विवक्रगतिमां, चार सम- यात्मक त्रिवक्रगतिमां, ने पांच समयात्मक चतुर्वक्रगतिमां अनुक्रमे १-२-३ समग निराहार छ, ने केवलि समुद्घात वखते ३-४-५ नबरवाळा समयोमा अनाहारीपणुं छे, ने अयोगी तथा सिद्धजीवो सदाकाळ अनाहारी छे. ॥ इति किमाहारद्वारम् . ॥२०॥ ॥ २१ संज्ञाहारम् ॥ सं-सम्यक् प्रकारे ज्ञान-जाणवू ते संज्ञा. ३ प्रकारनी छे, न्यां प्रथम हेतु-कारण-निमित्त एटले दृष्ट अने अनिष्टनी प्राप्तिपरिहार रूपकारणना उपदेश-कथनवाली. ते हेतृपदेशिकी संज्ञा. आ संज्ञा व्यक्त ( वा बुद्धिपूर्वक-अभिसंविज) अने अव्यक्त (वा अन- . भिसंधिज) एम वे प्रकारनी छे, त्यां एकेन्द्रियोने अनभिसंधिज हेतृपदेशिकोमंज्ञा छे, कारणके तेओनी आहारादिकमां प्रनि स्पष्ट , (४८) । दंडकविस्तरार्थः॥ जीवोनी कंइक बुद्धिपूर्वक इष्टमा प्रवृत्ति अने अनिष्टथी नित्ति हो- वाथी ए जीवो अभिसंधिज हेतूपदेशिकी संज्ञावाला छे, पण मनः पर्याप्तियुक्त नहिं होवाथी संजीवत् अति स्पष्ट बुद्धिपूर्वक प्रवृत्ति निवृत्तिवाला नथी छतां पण हेतूपदेशिकी संज्ञावडे द्वीन्द्रियादि जी- वो संज्ञी अथवा मनवाला गणायछे, ने एकेन्द्रियो ( हेतु०वडे ) अ- संज्ञि-मनविनाना गणाय छे. परन्तु शास्त्रव्यवहारमांतो हेतूप० संज्ञावडे संज्ञी एवा द्वीन्द्रियादिकोने पण विशिष्ट मनोविज्ञानमां कारणरूप मनःपर्याप्तिना अभावे असंज्ञिज गण्या छे. पुनः ए हेतू- प० संज्ञा वर्तमानकाळ विषयिक छे, पण भूत भविष्यना विचारथी विकल-(रहित ) छे, ते कारणथी जेम हेतूप० संज्ञावडे संनि छतां पण अल्पधनवाळो धनवान् न कहवाय, अने अल्परूपवाळो रुप- वान् न कहेवाय तेम द्वीन्द्रियादि जीवो हेतूप० संज्ञावडे अल्प वि- चारवाळा छतां संज्ञि न कहेवाय. तथा मनःपर्याप्तिद्वारा मनोवर्गणा ग्रहणे करी मनपणे परिण- माच्याथी विशिष्ट मनोविज्ञान लब्धिवडे अतिव्यक्त अने त्रणे का- ळनी विचारशक्ति ते दीर्घकालिकी संज्ञा मनःपर्याप्त जीवने एटले गर्भज पर्या० तिर्यच गर्भज पर्या० मनुष्य सर्व देव अने सर्व नारक ने होय छे. शास्त्रमा संज्ञि असंज्ञिपणानो व्यवहार आ दीर्घकालि- की संज्ञाने अगेज प्रवर्ते हे, कारणके जे जीवा दीर्घका० संज्ञावाला होय ते संज्ञि अने दीर्घका संज्ञा विनानां जे जीवो होय ते सर्व असजि कहेवाय छे. तथा दृष्ठि-सम्यकदर्शनादि संबंधि वाद-कथन तेना उप- देश-अपेक्षावडे जे संज्ञा ते दृष्टिवादोपदेश संज्ञा. अर्थात् दृष्टि- वादना एटले श्रुतज्ञानना उपदेशवडे-क्षयोपशमवडे जे सम्यगज्ञान ते दृष्टिवादोपदेश संज्ञा. तात्पर्य एछे के क्षयोपशमजन्य सम्यगज्ञान ॥ संज्ञाद्वारवर्णनम् ॥ युक्त एवो सम्यग्दृष्टिजीव दृष्टिवादोप० संज्ञावालो गणाय छे, पण विशिष्ट श्रुतज्ञानना क्षयोपशमरहित एवा नारक-देव-मनुष्योने तिर्यचो सम्यग्दृष्टि छतां पण दृष्टिवादसंज्ञावाळा गणाय नहि. कारणके जो के केटलाएक देवोमां अने तीर्थंकर थनारा नारकोमा अने कचित् ग० तिर्यंचोमां विशिष्ट श्रुतज्ञान सद्भाचे दृष्टिवादो ५० संज्ञा हशे छतां ते ज्ञान विशेषतः हितमा प्रवृत्ति अने अहित- मां निवृत्तिवा नहिं होवाथी तेओने अहिं दृष्टिवादो० संज्ञा न गणी होय तेम संभवे छे, (केटलोक भावार्थ श्रीनंदिसूत्रमाथी को छे.) जेने हेतूप० संज्ञा छ तेने दीर्घका० ने दृष्टिवादो० संझा नथी, जेने दीर्घका० संज्ञा छे तेने हेतू० संज्ञा नथी, अने दृष्टिवादो० संज्ञा होय ने न पण होय. अने जेने दृष्टिवादो० संज्ञा छे तेने हेतू० नयी पण दीर्घ० संज्ञा अवश्य छे. श्रीसर्वज्ञने ए त्रणमांनी कोइपण संज्ञा न होय, ॥ इति संज्ञासंवेधः॥ ॥ २२ गतिहारम. ॥ अमुक दंडकमांनो जीव मरण पामीने कया कया दंडकमां जाय-( उपजे ) ए संबंध कहेवो ते गति. ॥ इति गतिद्वारम् ।। ॥ २३ आगतिवारम् ॥ अमुक दंडकमां कया कया दंडकना जीवो मरण पामी आ- वीने उत्पन्न थाय ए संबंध कहेवो ते आगनि.इत्यागतिढारम्॥ अहि गति-आगतिने प्रसंगे जीवोन परभव गमननो विधि (५०) ॥ दंडक विस्तरार्थः ॥ कहेचाय छे.-जीवो परभवमा जतां वे प्रकारनी गति करे छे, त्यां रमण समुद्घातपूर्वक उपजनार जीवनी इलिकागति होय छे, कारणके येळ जेम शरीरना अग्रभागने आगळ फेंकथा वाद शरीर- ना पश्चात् भागने उपाडी आगळ फेंके छे, तेम मरण समुद्घातने प्राप्त थयेलो जीव उत्पत्ति स्थाने आत्मप्रदेशो फेंकथा बाद अन्तर्मु० काळे पूर्वभवसंबंधि शरीरमांथी आत्मप्रदेशो संकोची लइ उत्पत्ति स्थाने लावी मूके छे, आ इलिकागति वा मरणसमुद्घात ऋजु- गतिए अने वक्रगतिए पण होय छे, त्यां जीवन उत्पत्तिक्षेत्र सम- श्रेणिए होय त्यारे ऋजुगति थाय छे, अने विषम श्रेणिए होय त्यारे वक्रगति थाय छ, तथा दढो अथवा तोपमांथी छूटेलो गोळो जेम सर्वपिंडात्मकरूपे चाल्यो जाय छे तेम शरीरमांथी छुटेलो आ- स्मा पिडितरूपे-(दीर्घ श्रेणिरूपे नहिं ) परभवमां चाल्यो जाय ते कंदुक-(दडासरखी) गति कहेवाय. आ कंदुक गति प्रायः ऋ- जुगतिमां संभवे छे. ने वक्रगतिमां होय छे के नहि ते श्री बहु- श्रुतथी जाणवू. नथा मस्तक भागमांथी निकळेलो आत्मा देवलोकमां जाय, उदरथी निकळेलो आत्मा मनुष्यगतिमा जाय, पगथी निकळेलो आत्मा नरकगतिमां जाय, अने सर्वांगथी निकळेलो आत्मा मोक्षे जाय. ॥ २४ वेदहारम् ॥ वेद एरले नोकषायमोहनीयकर्मना उदयथी उत्पन्न थयेल विषयाभिलाष ते पुरुषवेदादि भेदे ३ प्रकारनो छे. त्यां पुरुषको ( स्त्रीप्रत्ये) विषयाभिलाप ते पुरुषवेद, स्त्रीनो ( पुरुषप्रत्ये) जे विषयाभिलाष ते स्त्रीवेद, तथा नपुर.कनो ( स्त्री ने पुरुष उभय प्रत्ये ) विषयामिलाप ते नपुंसक वेद कहेवाय. एमां पुरुष पणु - । पर्यासिदारवर्णनम् ॥ (५१) स्त्रीपणुं ने नपुं० पणुं नित्यादि भेदे त्रण त्रण प्रकारचें छे, ते आ. प्रमाणे लिंग-दाढी-मूछ इत्यादि युक्त देहाकृतिवाळो निर्वृतिपुरुष ( आकार पुरुष), योनि-स्तन इत्यादुि युक्त देहाकृति वाळी निति स्त्री, अने पुरुषाकारनां केटलांक लक्षण होय ने केटलांक न होय तेमज स्त्री पणानां पण केटलांक लक्षण होय ने केटलांक लक्षण न होय ए प्रमाणे उक्त लक्षणोना भावाभाव युक्त देहाकृति चाळ जीवो निर्वृति नपुसक कहेवाय. तथा स्त्रीउपर विषयाभि- लाषी जीव वेद पुरुष, पुरुष प्रत्ये विषयाभिलाषी जीव वेद स्त्री ने उभयाभिलाषी जीव वेद नपुंसक कहेवाय. तथा पुरुप नहिं छतां जेणे पुरुषनो वेष पहेयों होय ते नेपथ्य पुरुष, स्त्री नहिं छतां स्त्रीनो वेष पहेर्यों होय ते नेपथ्य सी, अने नपुंसक नहिं छ- तां नपुंसक नो (-हीझडा वगेरे सरखो) वेष पहेयों हो ते नेप- थ्य नपुंसक कहेवाय. ए प्रमाणे ९ भेद छे. तथा पुरुषादि आकृतिनो द्रव्य वेद अने विषयामिलापने भाववेद तरीके गणाय छे. पुनः एक जीवने एकज भवपां पुरु- पने ३ द्रव्य वेद अने ३ भाववेद थइ शके, नपुंसकने एकज भवमां नपुं ने स्त्री ए बे वेद द्रव्यने २ भाववेद होय, ने स्त्रीने आखा भ- व सुधी १ द्रव्यवेदने १ भाववेद होय ए वात द्रव्यवेदायि भाववे- द गणवानी पद्धतिए कही, अने द्रव्यवेदना आश्रय विना केवळ भाववेद गणतां स्त्री-पुरुपने नपुंसकने दरेकने 3-3 भाववेद अ- न्तर्मुहूर्त अन्तमुहूर्त परावृत्ति पाम्या करे छे. पुरुष वेद घासना अग्नि समान छे, कारणके घासनो अग्नि एकदम भडको थइ तुर्त समी जाय छे, तेम पुरुषवेद एकदम जागृत थद स्वीना संगमधी तुर्न शमी जाय छे, नया सीवेद बकरीनी लीं- डीयोना अग्नि सरावो में, कारण के फगनी लीडीयोनो अग्नि (५२) ॥ देडकविस्तरार्थः ।। सळग्या बाद एकदम होलवाय नहिं तेम स्त्रीवेद पण जागृत थतां पुरुपना संगमथो पण शीघ्र उपशमे नहिं. तथा नपुंसकवेद नगर दाहना अग्नि सरखो छे, कारणके द्वारिका नगरीनो दाह जेम ६ यास सुधी शान्त न थयो तेम नपुंसक वेद संगमथी शान्त न थाय अथवा नपुंसकपणाथी संगम थइ शके नहिं ने तेथी विपयेच्छा जागृत ने जागृत रहे छे. ए नपुंसक वेदना १६ भेद छे तेनो विस्ता- र नवतत्व विस्तरार्थमां कह्यो छे. त्यांची जाणवो. , अवतरण-हवे चोवीश दंडके २४ द्वार उतारतां प्रथम २४ दंडके शरीर द्वार उताराय छे. ॥ मूळ गाथा ५ मी,॥ चउ गब्भतिरियवाउसु, मणुआणं पंच सेस ति सरीरा। थावरचउगे दुहओ. अंगुल असंखभागतणू ॥ ५ ॥ ॥ संस्कृतानुवादः ।। चत्वारि गर्भजतिर्यग्वायुचु, मनुष्याणां पंच शेषेषु त्रीणि शरीराणि । स्थावरचतुष्के द्विधा, अंगुलासंख्येयभागतनुः ॥ ५ ॥ ॥ शब्दार्थ ॥ चउ-चार सरीरा-शरीर छे. गम्भतिरिय-गर्भजतिर्यंच थावरचउगे-४ स्थावरमां (ने) बाउसु-वायुकायमां (ने) दुहओ-बन्ने प्रकारे मणुआण-मनुष्योने अंगुल-अंगुलनो पंच-पांच (शरीर) असंख-असंख्यातमो शेप-बाकीना दंडकोमा भाग-भाग नगृ-गरीर छे. ति-त्रण . ॥ किमाहारद्वारवर्णनम् ॥ (५३) गाथार्थ:-गर्भजतिर्यंज अने वायुकायने ४ शरीर छे, मनु- प्योने ५ शरीर छ, अने वाकीना (२२) दंडके त्रण त्रण शरीर छ. ॥ चार स्थावरतुं शरीर अंगुलनो असंख्यातमो भाग छे. विस्तरार्थ:-अहिं २४ दंडकमां प्रथम शरीर द्वार उतार- तां गर्भजतिर्यंच अने वायुकायने औदा०-वै-तै० ने कार्मण ए ४ शरीर होय छे, ए सामान्यथी कह्य अने विशेषतः आ प्रमाणे- एक ग० तिर्यंचने २-३-के ४ शरीर होय छे, त्यां पूर्व भ- वमाथी आवता ग० ति० ने रस्तामां तैजस तथा कार्मण ए बेश- रीर होय, त्यार बाद उत्पत्ति स्थाने उत्पन्नथवाना प्रथम समयथी- ज औदा० शरीर नामनो उदय होवाथी औदा० शरीर सहित ३ शरीर होय अने कोइ लब्धिपर्याप्त गर्भज तिर्यंचे तप आदि करवा. थी वै० लब्धि उत्पन्न करी होय ने वैक्रिय शरीरनी रचना करे तो ते वखते वधुमां वधु ४ मुहूर्त सुधी वै० शरीर सहित ४ शरीर होय, पण आहा० शरीर तो फक्त चौदपूर्वधर लब्धिवंत मुनि मा- त्रने ज होवाथी गर्भज ति० ने ए शरीर कोइपण काळे न होय पुनः युगलिक तिर्यंचने रस्तामां आवतां बे अने उत्पत्ति स्थाने आव्यावाद त्रण शरीर होय पण तेओने व्रत तप आदिना अभा- वे वै० लब्धिना अभावथी वै० शरीर न होय तथा दंडक प्रकरण- मां अनधिकारी एवा संमू० तिर्यंच पंचेन्द्रियने पण रस्तामा २, अने स्वस्थाने औदा० शरीर सहित ३ शरीर होय. तथा वायुकायमां पण सर्व जीवने चार शरीर न होय प- ण रस्तामा आवताने तै० का० ए वे, स्वस्थाने औदा० सहित ३, ने केटलाएक लब्धि पर्याप्त बादर वायुकानेज विना व्रतादिके प- ण तथा स्वभाव वैक्रिय शरीर सहित अन्तर्मुः काळ मुधी ४ शरी- र होय ने त्यार बाट पुनः शरीर वाळो ज होय, ने वै० ल- ३ ३ (५४) ॥ दंडकविस्तरार्थः । ब्धि वाळा ल० पर्या० बा० सिवायना सर्व वायुकायी जीवोने र- स्तामां बे अने स्वस्थाने औदा० सहित ३ शरीर ज होय, तथा गर्भजमनुप्यमां पण रस्तामां आवनारने तै० ने का- मण ए वे शरीर अने स्वस्थाने ३ शरीर तो दरेक गर्भज मनुष्यने अमे दंडकमां अनधिकारी संमू० मनुष्यने पण होय. तथा केटला- एक गर्भज ल० पर्या० मनुष्य के जेभो ए व्रत तप आदि बडे वैक शरीर रचना वखते ४ मुहूर्त सुधो एकज जीव आश्रयि ४ शरीर होय अथवा जेओ ए चौदपूर्वनो अभ्यास करी आहा० लब्धि प्राप्त करी होय तेओने आहा० शरीर रचना वखते अन्तर्मु काळ सुधी ४ शरीर एक मनुष्य आश्रयि होय छे. पण एक मनुष्य आ- अयि ५ शरीरनो संभव नथी. कारणके वै० अने आहा० शरीर समकाळे होय नहि, माटे मनुष्यमां एक मनुष्य आश्रयि समकाळ २-३ ने ४ शरीर होय अने सर्व मनुष्य आश्रयि तथा एक म- नुष्यने भिन्नकाळ आश्रयि ५ शरीर होय. तथा देव अने नारक संबन्धि १४ दंडकने विषे एक जीव आश्रयि रस्तामां आवतां तै० ने का० ए बे, अने स्वस्थाने वै० शरीर होय छे वळी ए जीवो उत्तर वै० पण रचे छे ते पण वैक्रि- यज नाम वाल्लं होवाथी एक जीवने समकाळे ४ शरीर न गणाय. अने ए जीवोने औदा० शरीर तथा आहा० शरीर कोइपण काळे संभवतुं नथी. तथा शेष ७ दंडकोने विषे दरेक वा सर्व जीव आश्रयि रस्ता मांबे अने स्वस्थाने औदा० सहित ३ शरीर होय, इतिशरीरद्वारम् १ देयो उत्तर वैक्रिय करती वखते सिंह-मनुष्य आदि औदा० शरीर सरखां रूप रचे छे पण ते शरीर औदारिक न जागषां, पण वैक्रिय वर्गणाओन ज आदा० सरखी देखाववाळी कोली जाणवी. १ ३ ॥ उपयोगद्वारवर्णनमः॥ (५५) हवे बीजं अवगाहनाबार कहे छे ते आ प्रमाणे थावरच- उगे-एटले पृथ्वि-अप-अग्नि-ने वायु ए चार स्थावर ( ना दरेक भेद )नां शरीर दुहओ एटले जघन्यथी अने उत्कृष्टथी एम बन्ने प्रकारे अंगुलअसंखभागतणु एटले अंगुलना असंख्यातमा भा- गर्नु शरीर होय. ए प्रमाणे सामान्यथी चारेनुं अंगुलनो असं०मो भाग शरीर कछु तोपण परस्पर नानु मोटुं छे छतां अंगुलना अ- सं०मा भागथी वधीने संख्या०मा भाग जेवडं नथी, त्यां शरीरनी अवगाहनानो परस्पर तफावत आ प्रमाणे. सूक्ष्ममा. वादरमा सू० वनस्पतिर्नु बादरवायुनुं सू० वायुन वादरते हैं असं० सू० तैजसन वादरअपार्नु सू० अपर्नु बादरपृथ्वीन सू० पृथ्वीनु वादरनिगोदमुं बादरमत्येवन न * अल्प अल्प असं०गुण " अवतरण-अहिंथी ६-७-८-९-१० गाथाओ सुधीमां दंडकमां अवगाहनाद्वार कहेवाय छे. सम्वसिपि जहन्ना, साहाविय अंगुलस्सऽसंखेसो । उक्कोस पणसयधण, नेरइया सत्तहत्थ सुरा ॥ ६ ॥ ( संस्कृतानुवादः) सर्वेषामपि जघन्या स्वाभाविकाऽगुलस्यासंख्येयांशः। उत्कर्षतः पंचशतवपि, नयिकाणां सप्तहस्तसुराः ॥ ६ ॥ , ।। दंडकविस्तरार्थः॥ - S - ॥ शब्दार्थः॥ सव्वेसिं-सर्व दंडकोने. उक्कोस-उत्कृष्ट (अवगाहना). ऽपि-पण पणसय-पांचसें. जहन्ना-जयन्य (अवगाहना) घणू-धनुष्य. साहाविय-स्वाभाविक-( मूळ नेरइया-नारकजीवो(नी). शरीरनी.) सत्तहत्थ-सांत हाथ. अंगुलस्स-अंगुलनो. सुरा-देवो(नी). ऽसंखसो-असंख्यातमो भाग गाथार्थ:-सर्वे पण दंडकोना स्वाभाविक-(मूळ शरीरनी जघन्य (अवगाहना) अंगुलनो असंख्यातमो भाग छे, अने ना- रकजीवोनी उत्कृष्ट अवगाहना ५०० धनुष्य तथा देवोनी ७ हाथ प्रमाण छ. ( अहिं अवगाहना एटले शरीरनी उंचाइ अथवा लं- वाइ जाणवी.) विस्तरार्थः-पूर्व गाथामां पृथ्व्यादि चार जीवोनुं जध० अने उ० शरीर कां, ने हवे आ गाथामां शेष सम्वेसिंपि-सर्व दंडकर्नु मात्र जहन्ना एटले जय० साहाविय-मूळ शरीर अं- गुलस्सऽसखंसो एटले अंगुलना असंख्यातमा भागर्नु छे अने उत्कृष्ट शरीर दरेक दंडकर्मा भिन्न भिन्न छे ते कहे हे. नेरइया एटले नारक जीवोनुं शरीर उक्कोसा-उत्कृष्टथी पणसयधणू-५०० धनुप्य छे. अहिं धनुप्यनु प्रमाण ४ हाथनु छ. माटे नारकनु शरीर २००० हाथ एटले ०। कोश जेटलं उचुं छ. ए पण सामान्यथी कहीं अने विशेषतः भा प्रमाणे- नारकनु. जघ० शरीर, उ. शरीर रत्नप्रभामां. ७। थ० ६ अंगुल. शर्कराप्रभामां ७ घ०६० १५॥ ध० १२ अं० ३ हाथ. , ।। शरीरद्वारवर्णनम् ॥ (५७) वालुकापभामां. पंकमभा. धूममभा. तमःमभा. तमःतमःप्रभा. १५॥ घ०१२ अं० ३११ ध० ६२॥ ध० १२५ १० २५० घ० ३११५० ६२॥ ध० १२५ ध० २५० घ० 1 ५०० धनु० , सत्तहत्थसुरा-एटले देवोर्नु मूळ शरीर उत्कृष्टथी ७ हाथ- नु होय छे, एटलं शरीर भवनपति-व्यन्तर ज्योतिषी-तथा सौधर्म अने इशान कल्पना दरेक देव अने देवीनुं सर्वन जाणवू, एमां कोइपण देव के देवी ७ हाथथी नानां होयज नहि. त्यांथी आ- गलना देवोर्नु शरीर आ प्रमाणे. देवोर्नु. जघ० श० उ० शरीर. ६ हा० ७ हाथ. ३-४ कल्पे- ५ मे कल्पे, हा. ११ ६ हाथ, " ५ हा० ४ ११ हा० १ ७ .४ -हा० ह ५ हाथ. ८ मे १ ४ हाथ. ४- हा० ३ ३ . -हा० " ४ हा० मे मे ११ ૨ ११ " हा० ११ हा ३. हा ३२. हा १२ में ३ हार 3 हा.
(५८) ॥ दंडकविस्तरार्थः॥ १ ले अवेयके. २६, हा० ३ हा० ८ २ #" २ २ हा० जे जे २ द्दा० ११ हा० " हा० ११ हा० मे ११ हा० २६ हा० 10 ६ २. द्दा० ११ २ २१. हा० ७ मे ७ २ १२ है हा० ८ में " हा १२ हा० में २ हा० हा० ४ अनुत्तरे. ? हाथ. २ दा० १ सर्वार्थ. १ हाथ. १ हाथ ए प्रमाणे जघ० उत्कृष्ट कह्या छतां पण सर्व देवो प्रारंभमां उपजती वखते तो अंगुलनी असंख्यातमा भागनी जय० अवगाह- नावाळा होय, पण त्यारवाद अन्तर्मु० मात्रमा वृद्धि पामीने दर्शा- वेली जघ० अथवा उ० अवगाहनावाळा होय. तथा नारको पण उपजती बेळार अंगुलना अंसं० भाग जेटला होइ अन्तर्मु० मात्रमा वृद्धि पामी पूर्वोक्त जघ० चा उ• अवगाहनावाळा होय. पुनः जे स्थाने जे देवो अथवा जे नारको जेटला उंचा शरीर वाला कह्या छ ने स्थाने उत्पन्न थयेला ने उत्पन्न थनारा मवेदेवो. ने नारको तुल्य उंचाइवाला होय पण कोइ एक नारक पण अधि- कवा न्यून उंचाइवाळो न होय.
॥ शरीरावगाहनाद्वारवर्णनम् ॥ (५९) अवतरण-पूर्वगाथावत्. गभतिरि सहस जोयण, वणस्सई अहियजोयणसहस्सं । नरतेइंदि तिगाऊ, वेइंदिय जोयणे बार ॥७॥ । संस्कृतानुवादः॥ गर्भजतिर्यंचः सहस्रयोजनाः, वनस्पतिरधिकयोजनसहस्रः। नरत्रीन्द्रियास्त्रिगव्यूता, दीन्द्रिया योजनानि द्वादश ॥ ७ ॥ ॥ शब्दार्थः ।। गभतिरि-गर्भजतियच. नर-मनुष्य. सहस-हजार. तेइंदि-त्रीन्द्रियजीव. जोयण-योजन. ति-त्रण. वणस्सइ-वनस्पति, गाउ-गाउ. अहिय-कंडकअधिक. बेइंदिय-दीन्द्रिय. जोयणसहस्स-१००० योजन. जोयणे-जोजन. बार-बार (१२) गाथार्थ:-गर्भजतिर्यंच (शरीर) १००० योजन, व- नस्पति (तुं शरीर) कंडक अधिक १००० योजन, मनुष्य अने त्रीन्द्रियजीवो (नुं शरीर) ३ गाउ, अने द्वीन्द्रिय (नु शरीर) १२ योजन छे. विस्तरोथ:---गपभतिरि सहसजोयण एटले ग० तिर्यचनुं शरीर उत्कृष्थी १००० योजन लांबु होय छ" ए १२०० योनुं शरीर ते गर्भज मच्छरूप जलचर तिर्यच पंचेन्द्रियन होय छ पण दरेक गर्भनतिर्नु नहि ते सिवायना वीजा गर्भननिर्यच नधा दंडकमा अनधिकारी ममु० नि० पंवे०नां शरीर मा प्रमाणे . - - (६०) ॥ दंडकविस्तरार्थः ।। -निर्य-पंचेनु उ० शरीर. गर्भज जळचरनु-१००० यो०- समु० जळ०नु-२००० यो० गर्भज स्थळचरनु-६ गाउ. समु०स्थळ०-२ थी ९ गाउ गर्भज खेचरनु-२ थी ९ धनु० समु खेचर०-२ थी ९ गाउ' गर्भज उरपरिसर्पy-१००० यो० समुउरप०-२ थी ९ यो गर्भजभुजपरि०४-२ थी ९ गाउ समु०भुजप०-२ थी ९ १० वणस्सइ अहियजोयणसहस्सं एटले वनस्पति १००० योजनधी कंइक अधिक होय छे. एटली मोटी अवगाहनावाळी बादर प्रत्येक वनस्पतिकाय कमळ अने लता-( वल्लि.) वि- गेरे १००० योज'उंडा समुद्रोमां अने मानसरोवरादि जलाशयो मां होय छे, अने बीजी वादर वनस्पतियोना अंग विगेरेनी अ. वगाहना विस्तारवाळी होवाथी अहिं लखी नधी पण ग्रन्थान्तरथी जाणवी. तथा अहिं जे कंइक अधिकता कही ते पाणीनी सपाटी- थी कमळ विगेरे जेटलु उपर वधीने आवेल होय नेटली अधिकता जाणवी. पुनः ए अवगाहना कमळादिना स्कंधनी (नानी) 2 छे पण मूळ पत्र-पुष्पादिकनी अवगाहना नहि, तेओनी अवगाह- ना शास्त्रमा जुदी जुदी कही छे ते त्यांथी जाणवी. नर तेइंदि तिगाउ एटले मनुष्य अने त्रीन्द्रिय ३ गाउ ना प्रमाणवाला छे, त्यां दरेक मनुष्य अथवा दरेक त्रीन्द्रिय ३ गाउ प्रमाणना नथी पण भिन्न भिन्न प्रमाणवाळा हे ते आ प्रमाणे- १ समुद्रादि जळाशयोनी उंडाइ उत्सेधांगुलने हिसा हजार जोजनथी घणी अधिक छे, अने जीवोनी उंचाइ उत्से- भांगुलने हिसावे छे मार्ट उतार तथा चढाववाला जळाशयमां ज्यां उत्मेधांगुल प्रमाणे १००० योजन इंडाइ आवे त्यांनी क. मळनाळ-लतादि. १००० योजनवाळां बनस्पतिरप जाणवां, अने वधु उंढाइमा रहेलो कमत लतादि पृश्विकायरूप जाणवां.
।। शरीरावगाहनाद्वारवर्णनमु.॥ (६१) मनुष्यनु. जघशरीर उ० शरीर. देवकुरु अने उत्तरकुरुक्षेत्रना यु-अंगुलनो असंख्या- लिकनु सदाकाळ, तथा भरत | तमो भाग (अपर्या. ने औरवत क्षेत्रना युगलिकोनु ता मरण पामे ते ३ गाउ अवसर्पिणीना हेले आरे अने अपेक्षाए.) उत्सर्पिणीना ६४ आरे- हरिवर्ष अने रम्यकक्षेत्रना। यु- गलिकोन सदाकाळ अने भरत -औरव्रतना युगलिकोनु अव- २ गाउ. साना वीजा आरे अने उत्स० ना पांचमे आरे. 1 - , १ गाउ. , हिमवंत-हिरण्यवंतक्षेत्रना यु- गलिकोर्नु सदाकाळ अने भर- तैरव्रत्तना युगलिकोर्नु अवस० ना ने आरे अने उत्सना ना ४ थे आरे. अन्तहीपना युगलिकोनु स- दाकाळ अने भरत-अरबनना युग०मनुप्योर्नु अव०ना : जे ने उत्म. ना ४ थे आरे. ८०० धनुप्य.
(६२) ॥ दंडकविस्तरार्थः ॥ धनुष्. सर्व महाविदेहमां सदाकाळ अने भरतैर वत्तमां अव० ना ३-४ ने उत्सना ४-३ आरे. भरत-अरवतमां अव०ना ५ मे अने उत्सना आरे. ७ हाथ. भरत-अरवतमां अव०ना ६४ अने उत्सना १ ले आरे. २ हाथ. " " तथा दंडकमां अनधिकारी संमु०मनुष्यनुं जघ० शरीर उ- पति समये अंगुलनो नानो असं०मो भाग, अने उ. शरीर अंगु० नो मोटो असं०मो भाग जाणवो कारणके ए जीवो अपर्या० अ- वस्थामांज मरण पामे छे. अथवा मरण पामती वखते पण अनेक जीवो आश्रयि कोइ नानी अवगाहनाए मरण पामे तो कोइ मोटी अवगाहनाए मरण पामे एम मरण वरखते पण अवगाहनानी विष- पतानो अपेक्षाए जघ० वा उ० शरीर संभव छे. तथा त्रीन्द्रिय जीवोमां पर्या० त्रीन्द्रियनीज अने तेमां पण कानखजुरा विगेरे कोइकनीज ३ गाउनी लंबाइ बहारना द्वीप- समुद्रोमा जाणवी. वीजा कीडीआदि त्रीन्द्रियोनी एवडी मोटी अवगाहना संभवे नहिं. शास्त्रमा कोइस्थाने एकला कानखजुरानी अने भरत-अरवतमा अवाना ३ जा आरामा केटलांक वर्ष सुधी अनं उत्मना 2 था आरामा केटलांक वर्ष पछी युगलिकपणुं हाय ने मिवाय न होय. .
। शरीरावगाहनाद्वारवर्णनम् ॥ (६३) कोइस्थाने कानखजुरा विगैरेनी लंबाइ ३ गाउ कही छे. वेइंदिय जोयणे यार एटले द्वीन्द्रियजीवोनी लंबाइ१२ यो- जन छे, त्यां पर्या० द्वीन्द्रिय अने तेमां पण शंख विगेरेनी लंबाइ १२ योजन छे पण दरेक द्वीन्द्रियनी नहिं. एवा मोटा शंख विगेरे स्वयंभूरमणादि महासमुद्रोमां पेदा थाय छे पण आ मनु० क्षेत्रमा नहि. अवतरण-पूर्व गाथावत् ( गाथाना जा चरणथी उत्त- र वै० देहनी अवगाहना कहेवाय हे.) जोयणमेगं चारैदि-देहमुच्चत्तणं सुए भणियं । वेउवियदेहं पुण, अंगुलसंखंसमारंभे॥ ८॥ ॥ संस्कृतानुवादः।। योजनमेकं चतुरिन्द्रिय-देहोच्चत्वं श्रुते भणिनं । वैक्रियदेहः पुनरंगुल संख्येयांश आरंभे ॥ ८ ॥ ॥ शब्दार्थः ॥ जोयणं-योजन भणियं-कधु छे.. एग-एक वैउन्चिय-वैक्रिय (-उत्तरक्रिय) चरिंदि-चतुरिन्द्रियना देह-शरीर देह-शरीरनी अंगुल-एक अंगुलनो उच्चत्तणं-उँचाइ संबंसं-संख्यातमो भाग सुए-श्रुतने विपे आरंभे-प्रारंभमां १ आर्यनमाज मतना आचार्य मंन्यामी दयानंद मरस्पति आ मधाने जू पण त्रीन्द्रिय होवाथी जैनोनी मश्करी करै छ के ३ गाउ जेषडी मोटी जू तो जैनोना माथामांज पडती दशे" पण कृवानो देडको समुद्रनी बात शं जाणे? केवल मां तेओ. नी शाननी अनामिना-पालता यादता ज मचवे . - (६४) । दंडकविस्तरार्थः ।। गाथार्थ:--चतुरिन्द्रियजीवोना शरीरनी उंचाइ सिद्धांतमा? योजन (-४ गाउ ) कही छे, अने उतर वैक्रिय देह प्रारंभवेळाए ( वायु विना सर्वने)अंगुलनो संख्यातमो भाग होय छे. विस्तरार्थ:-चतुरिन्द्रियनु शरीर १ योजननु का त्यां प- ० भमरा विगेरे १ योजन अवगाहना बाळा वहारना द्वीप समुद्रोमां पेदा थाय छे. तथा उत्तरवैक्रिय शरीर प्रारंभती वेळाए अंगुलनो संख्यात- मो भाग होय एम कडं ते वाकाय सिवायना ग० मनु० गर्भः नि०-देव-अने नाकने अंगे-जाण, कारणके वायुकायनु शरीर अंगुलना असं० मा भागथी अधिक होतुं नथी, माटे वायुकाय जी- व ज्यारे वैक्रिय प्रारंभे त्यारे ते उ० वैक्रिय शरीर अंगुलना असं- ख्यातमा भाग जेटलु जाणवू. अने देव नारकनु मूळ वैक्रिय आरं- अमां अंगुलनो असंख्यातमो भाग होय, तेमज आहारक देहना सं- बन्धमां कंइपण का नथी छतां आहा० शरीर पण प्रारंभवेळाए - गुलनो संख्यातमो भागज संभवे, कारण के ए पण उत्तर देह छे, अवतरण-आगाथामां उत्तर वै० नी उत्कृष्ट अवगाहना कहेवाय छे. देवनर अहियलक्खं, तिरियाणं नव य जोयण सयाई। दुगुणं तु नारयाणं, भणियं वेउव्विय सरीरं ॥९॥ । संस्कृतानुवादः ॥ देवनराणामधिकलक्ष तिरश्चां नव च योजनशतानि । द्विगुणं तु नारकाणां, भगिनं वैक्रियशरीरं ॥९ ॥ ॥ शब्दार्थः ॥ देव-देव सयाई-सो नर-मनुष्य दुगुणं-वे गण । शरीरवारवर्णनम् ॥ तु-वळी अहिय-कंइक अधिक लक्ख-१ लाख (योजन) नारयाण-नारकजीवोन तिरियाण-तियैचोर्नु भणिय का छे. नव-नष उदिय-उत्तरबै क्रिय य--वळी सरीरं शरीर जोयण---योजन गाथार्थ:-- देव अने मनुष्यनु ( उत्तरवैक्रियशरीर ) कंइक अधिक (-४ अंगुल अधिक ) १ लाख योजन, नियंचोर्नु ९०० योजन, अने नारकोतुं उत्तरवैक्रिय शरीर वमणु कधु छे. विस्तरार्थः-देवनर अहिय लक्खं एटले देवर्नु उत्तरवै. शरीर १ लाख योजन, अने मनुष्यर्नु चै० शरीर १ लाख योजन- थी कंइक अधिक कर्यु छे त्यां अधिकता ४ अंगुल जेटली जाणवी कारणके ' देव भूमिथी ४ अंगुल अधर रहे छे, पण भूमि उपर ए- ग राखता नथी अने १ लाख योजनहुँ बीजु शरीर रचे छ, भने मनुष्य तो भूमि पर उमो रही देवना शीर्पनी (पस्तकनी ) स- पाटीए सरखा आवी रहे तेटलं उत्तर शरीर० रचे के माटे मनुष्य उ० वै० शरीर १ लाख योजन ने ४ अंगुल अधिक होय छे. आवद्ध घोड़े उत्तर वैक्रिय शरीर पद्मचक्रवर्तिना पापी अने मुनियोने व- पकाळमां पण देशनिकाल वालो हुकम फरमावनार नथा मु. नियोए बहु सगजामा छनां पण उडनाइ दर्शावी ३ पगला जे. दली नगीनगा रहेदानी रजा आपनार दृष्ट नमुचिने शिक्षा क. वा माटे आधार पोताना वे शिष्योहारा गेमपर्वत परथी गोला क निय रूप बिना देगो युनया पनुधीना जाणा, इने ९ गगनका अनुमा नाशिर Nि धारता गयी G - (६६) ॥ दंडकविस्तरार्थः॥ वेला, अने चैक्रियादि अनेक लब्धिवाळा विष्णुकुमार मुनिए रची वे पगला जंबूद्वीपने बे छेडे मूकी त्रीजा पगलानी जमीन मा- गता नहिं आपनार नमुचिनी छातीपर त्रीजु पगलु मूकी संघने उपजेलो उपद्रव शान्त करी शासन प्रभावना करी. 'तिरियाणं नव य जोयणसयाई एटले तिचोर्नु उत्कृष्ट वै० शरीर ९०० योजन जेटलं होय छे. अने 'दुगुणं तु नारया- गं' एटले नारकजीवोर्नु उ० उत्तरवैक्रिय शरीर पोताना मूळ 4. क्रिय शरीर करतां वमणु होय छे, जेमके ७'मी नारकीना नारकर्नु मूळ वै० शरीर ५०० धनु० छे, तो तेओ १००० धनुष्यतुं उ० वै. शरीर रची शके छे, तथा वायुकायना उ० उत्तर वै० शरीरनी अवगाहना अहिं क- ही नथी तोपण अंगु० ना असं० मा भाग जेटली जाणवी. ए प्र- माणे 'भणियं वेउब्वियसरीरं'-उत्तर वैक्रिय शरीरनु प्रमाण कडं अहिं उत्तरवै० शरीर रचवानुं प्रयोजन आ प्रमाणे-देवो तीर्थकर भगवाननां कल्याणक आदि वखते मनुष्य क्षेत्रमा आव- वाने, परजीवना उपकार माटे अथवा अपकार माटे, स्वऋडिदर्श- नाथै, विषय सेवनार्थ इत्यादि अनेक कारणे वै० शरीर रचे छे. त- था मनुष्यो उपकार अने अपकार करवादि अनेक कारणे. नारको फक्त बोजा नारकने दुःख देवाने कुंथु आदि रूप विकुबै छे, वायु- काय स्वभावथी विकुर्वे छे, अने तिर्यच पंचे० ने वै० शरीर रचवा- नु ण तथाविध विशिष्ट कारण समजवू , अवतरण:-आ गाथामां उत्तर वैक्रिय शरीर केला का- ळ मुधी टके ? ते कहेवाय छे. ॥ मूळ गाथा १० मी.॥ अंतमुहुत्तं निरए-मुहुत्त चत्तारि तिरिय मणुएसु । देवेसु अद्धमासो, उक्कोस विउठवणाकालो ॥१०॥ ,
॥ उत्तरवैक्रियकालवर्णनम् ॥
(६७)
-
चत्तारि-चार
॥ संस्कृतानुवादः ॥
अन्तर्मुहूर्त नैरयिके, मुहूर्त्ताश्चत्वारि तिर्यग्मनुजेषु ।
देवेष्वधमास, उत्कृष्टो विकुर्वणाकालः ॥ १० ॥
॥ शब्दार्थः ॥
अंतमुहत्त-अंतर्मुहूर्त
देवेसु-देवोमां
निरए-नारकजीवोमां अडमासो अर्धमास
मुहुत्त-मुहूर्त ( २ घडी)
उक्कोस-उत्कृष्ट
विउवणा-विकुर्वणानो(-उत्त-
तिरिय-तिर्यंच ( अने)
र वै० शरीरनो)
मणुएसु-मनुष्योमा
कालो-काळ
गाथार्थ:-नारकजीवोमां (वै० श० उ० नो काळ ) अ-
न्तर्मु०, तियेच अने मनुष्योमा ४ मुहूर्त (-८ घडी ), अने दे-
चोमां ॥ मास उत्तर वै० शरीरनो उत्कृष्ट काल कयो छे.
विस्तरार्थः-मुगम छे. विशेप ए के देवकृत वै० शरीरनो
काळ ६ मास पण कयो छे. कारण के परमाधापीकृत पर्वतनी ६
मास स्थिति श्री सूयगडोग सूत्रमा कही छे.
अवतरण-आ गाथामां २४ दइके संबयण कहे छे.
॥ मूळ गाथा ११ मी.॥
थावरसुरनेरइया, अस्संघयणा य विगल ठेवता
संघयणगं गप्भय, नरतिरिएसु वि मुणेयव्वं ॥११॥
। संस्कृतानुवादः ॥
स्थावरसुरनैरयिका असंहननाश्च विकलाः मेवार्ताः ।
मंहननपटकं गभजनरनिरश्चोऽपि ज्ञातव्यं ॥ ११ ॥
मुर-देव गभय-गर्भज , (६८) । दंडक विस्तरार्थः ।। ॥ शब्दार्थः ॥ थावर-स्थावर छेवट्ठा सेवा संघयण वाळा संघयण-संघयण नेरइया-नारक छगं-छ असंघयणा-संघयण रहित य-अने नर-मनुप्य विगल-विकलेन्द्रियो निरिएमु-तिर्यंचा मुगेयव्यं-जाणवां गाथार्थः-स्थावर-देव-अने नारको संघयण रहित छे, अ- ने विकलेन्द्रियो सेवा संघयणवाला , अने गर्भज मनुष्य तथा तिर्यंचोने छ ए संघयण जाणवां विस्तरार्थ:-हवे आ गाथामा २४ दंडके संघयणद्वार कहेवाय छे. थावरसुरनेरइया असंघयणा--स्थावरना ५ दंडक, देवना १३ दंडक, अने नारकनो १ दंडक ए प्रमाणे १९ दंडक संघयण विनाना छे, कारणके देवोने नारकोने अने स्थावरोने हा- डकां होय नही, अने हाडकां न होय तो हाडकांनी रचनारूप सं- घयण पण क्याथी'होय? य विगलछेबहा--वळी विकलेन्द्रियो छेदस्पृष्ठ संघयण- वाळा होय छे, अहिं द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-ने चतुरिन्द्रिय जीवोमा के- टलाएकने हाडकांनो संभव छे, जेमके शंख-कोडा चंदनक इत्या- दिहीन्द्रियोनुं शरीर हाड अने मांसयुक्त छे, शेप अळसीयां वि- १ श्री जीवाभिगममां देवीने पण वर्षभसंघयणवाळा, अने एकेन्द्रियान छेदस्पृष्ट संघयणवाका कद्या छे ते शक्तिनी अपेक्षाए पण हाड रचनानी अपेक्षाए नहि. अने त्यांज नार. कने अर्मवयणी कद्या छे.
॥ संघयणद्वारवर्णनम् ॥ (६९) गैरे द्वीन्द्रियोनुं शरीर हाड विनानु छ, तथा केटलाएक त्रीन्द्रियोने तथा केटलाएक चतुरिन्द्रिय जीवोने हाडनो संभव छे, पण स्पष्ट रीते ओळखाता नहि होवाथी नाम आपा अशक्य छे, माटे ए प्रमाणे जे जे विकलेन्द्रियोने हाड होय ते ते विकलेन्द्रियोने संघयण होय, ने वीजाने न होय, तेमां पण ए जीवोने मात्र छेदस्पृष्ट संघयणज होय छे, कारणके तेओना हाडना बे छेडा संधिस्थाने मळेला होय छ, अथवा जेमोने एकज आखं हाडकुं पण ककडा न होय तो प- ण ( सेवा वडे करीने पीडायलं ए अर्थने अनुसारे ) सेवा संघ- यण ज होय ( अहिं छेदस्पृष्ट अने सेवा बन्ने नाम छेवठ्ठा संघ- यणनां छे.) संघयण छगं गप्भयनरतिरिएम वि मुणेयवं-गर्भग मनुष्यने अने तिर्यंचोने ६ संघयण होय परन्तु एक जीवने एक- ज संघयण होय छे. माटे अनेक गर्भज मनुष्य वा तिर्यचनी अ- पेक्षाए ६ संघयण होइ शके. अहिं कोइपण गर्भ० मनुष्य वा कोइ पण गर्भज तिर्यच संघयण विनानो होय नहिं, तथा दंडकमां अनधिकारी सम्मू तिर्यंच अने सम्मू०मनुप्यने दरेक- ने सेवा संघयण श्री जीवाभिगमजीमां कयु छे. (0) अवतरण-आ गाथाना हेला चरणमां सर्व दंडकोने विो संज्ञा कहेवाय छे, अने शेष त्रण चरणमा संस्थान कहेवाय छे. ॥ मूळ गाथा १२ मी॥ सव्वेसि चड दह वा, सन्ना सव्वे सुरा य चउरंसा । नरतिरि छ स्संठाणा, हुंडा विगलिंदि नेरइया ॥१२॥ ॥ संस्कृतानुवादः ॥ सर्वेषां चत्वारि दश वा संज्ञाः सर्व सुराश्च चतुरस्त्राः (रंशाः) नरतिर्यचः पद संस्थाना इंडकाः विकलेन्द्रियनैरयिका॥१11 (७० ॥ दैडकविस्तरार्थः॥ ॥ शब्दार्थः ॥ सव्वेसिं-सर्वे दंडकोने चउरंसा-समचतुरस्त्र संस्थानवाळा चउ-चार नर-मनुष्य दह-दश तिरि-तिर्यंच वा-अथवा छ-छ (६) सन्ना-संज्ञाओ संठाणा-संस्थानवाला सव्वे-सर्व हुंडा-हुंडक संस्थानवाला सुरा-देव विगलिंदि-विकलेन्द्रिय य-अने नेरइया-नारको गाथार्थ:-सर्वे दंडकने (-जीवोने ) ४ अथवा १० संज्ञा होय छे, अने सर्व देवो समचतुरस्र संस्थानवाळा छे. मनुष्य अने तिर्यचो ६ संस्थान वाला, अने विकलेन्द्रिय तथा नारको हुंडक संस्थान वाला छे. विस्तरार्थः-आ गाथामां संज्ञाद्वार तथा संस्थान बार कहेवाय छे. सम्वेसिं चउ दह वा सन्ना -सर्व दंडकोमा चार अथवा १० संज्ञा होय छे. अहिं गर्भन मनुष्य सिवाय २३ दंडकमां आ. वेला सर्प संसारी जीव मात्रने ४ के १० संज्ञा होय छे, पण गर्भ- ज मनुष्यमां दरेक गर्भन मनुष्यने ज्यां सुधी मोहनीय कर्मनो उदय छे, त्यां सुधी सर्व दशे संज्ञाओ होय, अने मोहनीयनो उपशम वा क्षय था वीतरागी जीवने फक्त वेदनीयजन्य, अथवा सर्वज्ञ- ने आहारसंज्ञा पण न होय आहारसंज्ञा होय. सव्वे सुरा य चउरंसा-सर्वे देवो समचतुरस्र संस्थानवा- ला छे, ए मूळ वैक्रिय शरी नी अपेक्षाए तेमन उत्तर वैफ्रियनी - पेक्षाए पण समचतु० कर्मनो उदय होवाथी अन्य संस्थानवाळे . , ॥ संस्थानद्वारवर्णनम्॥ (७१) भरीर विकुा छतां ते देवने समचतु० संस्थानन कहेवाय, अथवा देखवानी अपेक्षाए उत्तर वैक्रिय देव ६ संस्थानी गणाय पण तेवा व्यपदेशनी प्राधान्यता नथी. नरतिरिय छसंठाणा-गर्भज मनुष्य अने गर्भज तिर्यच ६ ए संस्थान वाळा होय, एम सामान्यथी कडं अने विशेषतः आ प्रमाणे सर्व युगलिक मनुप्यो युगलिक तिर्यंचो सर्व तीर्थंकर- सर्व चक्रवर्ति-सर्व वासुदेव-सर्व वनदेव-सर्वप्रनिवासुदेव-इत्यादि उत्तम पुरुषो समचतुरस्र संस्थान वाला छे, सामान्य केवलि विगेरे तथा सामान्य मनुष्यो ६ ए संस्थानवाला छे. तेम युगलिक सिवा- यना तिर्यच पंचेन्द्रियो पण ६ ए संस्थानवाला छे, अहिं एक जीवने एक संस्थान भवपर्यन्त होय. तथा दंडकमां अनधिकारी सम्मू० ' नियंच अने सम्भू० मनु ध्यने श्री जीवाभिगममा हुँइक संस्थानी कह्या छे, हुंडा विगले दिनेरइया सर्व विकलेन्द्रियो अने सर्व नार- को हुंडक संस्थान वाळा छे. एमां नारकोनुं हुंडफसंस्थान तो पा खो उखेडी लीधेला पक्षी सरखं अत्यंत कुत्सित कयुं छे, , अवतरण-आ गाथामां पण पृथ्व्यादि पांच स्थावरनां मं. स्थान वहेवाय छे. ॥ मूळ गाथा १५ मी.॥ नाणाविह धय सूई, बुबुय वण वाउ तेउ अपकाया । पुढवी मसूर चंदा-कारा संठाणओ भणिया ।। १३ ॥ ।। संस्कृनानुवादः ॥ १. मम्मू० निर्यचने छठा फर्मग्रंथना अभिप्रायथी श्री . हदमंग्रहणीवृतिमा ६ मंस्थानी कथा छ-नि द्रव्यलोकः आकार वाळी (७२) । दंडकविस्तरार्थः ॥ नानाविधांध्वजसूचीबुबुदाश्च बनवायुतैजसएकायिकाः । पृथिमसर वंहाकाराः संस्थानतो भणिताः ॥ १३ ॥ ॥ शब्दार्थः ।। नाणाविह-नाना प्रकारर्नु अपकाया-अपकायन (-अमेकपकारचं) पुढवी-पृश्चिकाय धय-ध्वजना आकारनु मनुर-मस्रनी दाल रखूई-सोयना आकारनुं चंदाकारा-अर्धचंद्रना दुव्वुय-परपोटाना आकारने वण-वनस्पतिकायन संठाणओ-संस्थानथी चाउ वायुकायन (-आकारथी) पेप-अग्निकायन भणिया-कही छे. गाथार्थ:--वनस्पति कायतुं (संस्थान) अनेक प्रकारचं, वायुकायनु ध्वजाने आकारे, अग्निकाय सोयने आशारे, अपकाय पाणीना परपोटाने आकारे, अने पृथ्विकाय आकार बडे मसूरनी दाज अथवा अर्धचंदना आकारे कहेली छे. विस्तरार्थ:--आ गाथामां पृश्चिकायादि ५ स्थाघरोतुं सं- स्थान कहे छ ते आ ममाणे- वण याउलेउ अपकाया-वनस्पति-बायुशाय--अग्निकाय - जळकारतुं संस्थान अनुक्रो नाणाविह धय हा बघुय-अ. नेकपकारन बना सरग्छ, सोय सरखु, ने परपीटा सरखं छे, अर्थात् ननपतिनुं शरीर अनिस्र्थस्थ (-अमुक प्रकारनु छे एम नः माटे अनियत) आकारवाद्धं श्री नस्वार्थतिमां कहेल छे. याण के कोइ वनस्पति केवा आकारनी ने कोई वनस्पति केवा आसानो होय छे माटे बनम्पति, संस्थान अनेक आकारतुं ऋदछ. नया वायुनुं मथान पटले वायुकायी एक जीवना भी. .
॥ संस्थानद्वारवर्णनमः॥
(७३)
दा० शरीरनो आकार ध्वजा-पताका सरखो छे, अने उत्तरवैक्रि-
य शरीर रचे ते पण मूळ शरीरना आकारेज ( एटले पताकाने
आकारेज) रचे छ, तथा अग्निकायी एक जीवना औदा० शरीर-
नो आकार सोय सरखो छे, अने जळकायी एक जीवना औदा.
शरीग्नो आकार परपोटा सरखो अर्ध वर्तुल छे.
पुढवीमसूरचंदाकारा संठाणओ भणिया-आकारवडे
पृथ्वी मसूर अने चंद्र आकारनी कही छे. अर्थात् पृथ्विकायी ए-
क जीवना औदारिक एक शरीरनो आकार मसरनी दाळ अथवा
अर्धचंद्रना आकार वालो छे. ए प्रमाणे शास्रमा जे संस्थानो कह्यां
छे, ते एकेक शरीरने आश्रयि जाणवां, अने ते एकेक शरीर दृष्टि-
गोचर नहिं होवाथी ते संस्थानो पण दृष्टिगोचर थतां नथी, फ-
क्न वनस्पति जीव महाकायावालो होवाथी तेनुं अनेकविध सं-
स्थान तो प्रत्यक्ष छे.
पुनः ए संस्थानो बादरस्थावरनी अपेक्षाए छे, अने मूक्ष्म
जीवोमा सूक्ष्म वनस्पतिर्नु संस्थान स्तिबुक आकार- एटले प्रायः
घन गोळाकार छे. वीना सूक्ष्मजीवोनो आकार चादरवत् छे के
घन गोलाकार छे ते मारा जाणवामां नथी इति संस्थानद्वारम्
~
अवतरण-आ गाधाना प्हेला चरणमां सर्व दडकने कपा.
य केला होय ? ते, अने शेष त्रण चरणमा कया दंडके कइ लेश्या
होय? ने कहेवाय के.
॥ मूळ गाथा १४ मी.॥
सव्वे वि चउकसाया, लेस छगं गभतिरियमणुएसु ।
नारय तेऊ वाऊ, विगला वेमाणि यति लेसा ॥१४॥
(७४) ॥ दंडकविस्तरार्थः ॥ ॥ संस्कृतानुवादः ॥ सर्वेऽपि चतुष्कषाया लेश्याषटकं गर्भजातियग्मनुजयोः । नारकतेजोवायुविकला वैमानिकाच निलेश्याः ॥ १४ ॥ ॥ शब्दार्थः ॥ सव्वे-सर्व नारय-नारक उवि-पण तेऊ-अग्निकाय चउ-चार वाऊ-वायुकाय कसाया-पायवाळा विगला-विकलेन्द्रियो लेस-लेश्या वेमाणिय-वैमानिकदेवो छगं-६ (छ) ति-प्रण गम्भतिरिय-गर्भजतिर्यंच लेसा-लेश्यावाळा मणुएसु-मनुष्योमा गाथार्थ:-सर्वे जीवो चारे कपायवाला छे. गर्भन तिर्यंच अने मनुष्योमा ६ लेश्या, अने नारक-अग्निकाय-वायुकाय-वि- कलेन्द्रिय-तथा वैमानिक देवाने ३ लेश्या छे. विस्तरार्थ:-हवे आ गाथामां कपाय तथा लेश्याहार कहे छे. सव्वेवि चउकसाया-सर्वे दंडको चार कपायवाला छे. त्यां साते नारकना नारकोने एक बीजापर वैरभाव होवाथी क्रो- धवाळा छे, तेमज मान-माया-अने लोभ कपायी पण छे तथा दे- चोमां पण परस्पर वैरभाव छे, एक वीजानी साथे युद्ध करे छे, कोइ कोइनी देवांगनाओ उपाडी जाय छे, इन्द्रो परस्पर विमा- नोना भाग माटे युद्ध करे छे, एक वीजानी प्रभुता सहन करता नथी, माटे देवमां पण चारे कपाय रहेला छे, तेमा ९ अवेयक अने ने करतां पण ५ अनुत्तरवासी देवोनो कपाय अतिमंद छे, त्यां परस्पर युद्ध-लडाइ-झगडा-इर्ष्या-अभिमान छे नहि, परन्तु अ- .
॥ उत्तरवैक्रियकालवर्णनम् ॥ '(७५) स कषाय छे, पुनः अनुत्तरविमानवासी देवो अति वैराग्यवान, देवलोकने केदखाना तुल्य समजी मनुष्यमा आत्री मोक्ष जवानी आकांक्षा वाला, अने सदाकाळ द्रव्यानुयोगना चितवनमा अनुर- क्त छ, तथा अति मंदकपायी छे, नथा गर्भज तिर्यंचोने तो कपाय प्रत्यक्ष देखीए छीए, तथा गर्भज मनुष्योमां वीतराग सिवायना सर्वे कपायवाला है, परन्तु युगलिक तिर्यंचो बहु अल्प कपायवा- ला छे, तथा उत्तरोत्तर गुगडिने प्राप्त थयेला एवा अवीतरागी मुनिमहात्माओ पण अल्पकपायवाला छे. युगलिक तियेचोमां सिं- हादि हिंसक प्राणीओ पण अति दयाई चित्तथी मृगनां बच्चांनी साथे वात्सल्य भाववाला छे, पोतानां मात पिता साथे पण अ- ल्प राग धारण करनार छे तो युगलिक मनुष्योनी तो वा- तज शी? तथा स्थावरो अने विकलेन्द्रियो पण अस्पष्ट अथवा स्पष्ट कपायवाला छे. तेमज सम्मू० निर्यच अने सम्मू० मनुष्यो पण चारे कषायवाला छे. ॥ इति कषायद्वारम् ॥ लेसछगं गभतिरियमणुएसु-गर्भजतिर्यच अने म- नुष्य ए वे दंडकमां ६ए लेश्या होय छे, त्यां एक ति० वा मनु० ने अन्तर्मु० ' सुधी एकज लेश्या होय पण एक जीवने समकाळे वे लेश्या न होय, तथा मनुष्यमा अप्रमत्तने ३ शुभ लेश्या, अने श्र- णिगततथा सर्वज्ञने केवळ शुक्ल लेश्या छे. नारय तेऊवाऊ विगला वेमाणिय तिलेसा-नारक-में- ग्नि-वायु-विकले०-वैमानिक-मांत्रण लेश्या छे एम सामान्यधी कहीं अने विशेषतः आ प्रमाणे- १ .सर्वज्ञने शुक्ल लेग्या देण पूर्वकोड वर्ष सुधी होय छे माटे ने सिवायना शेष काळमां सर्व तिर्यच मनुष्योने मा- दे राज़ नियम छ. .
(७६) ॥ दंडकविस्तरार्थः॥ रत्नप्रभा ने शर्करामभामां सर्वनारकोने कापोतलेश्या छ, अने वालुकाप्रभामां पल्योपमना असंख्यातमा भोग अधिक ३ प ल्योपमना आयुष्यवाळा सुधीना नारकोने कापोतलेश्या छ, ने तेथी उपरांत आयुष्यवाळाने नीललेश्या छ, तथा पंकप्रभामा सर्व नारकने नील लेश्या छे, अने धूमप्रभामां पल्यो० ना असं० मा भाग अधिक १० सागरोपमना उत्कृष्ट आयुष्यसुधीना नारकोने नीललेश्या छे, अने तेथी उपरांत आयुष्यवाळा सर्वनारकोने नी- ललेश्या छ, अने तेथी उपरांत आयुष्यवाळा सर्व नारकोने कृष्ण- लेश्या छे, तथा छठी अने सातमी नरकमां सर्वने कृष्णलेश्या के. अहिं प्रथम पृथ्विथी बीजी पृथ्विमां अधिक मलिन लेश्या यावत् सातमी सुधी अधिक अधिकतर मलिन लेश्या जाणवी- ए लेश्याओ आयुष्यपर्यन्त अवस्थित जाणवी. अग्नि-वायु-अने विकलेन्द्रियने प्रथमनी त्रण अशुभ कुप्ण- नील-ने कापोत लेश्या छे. पण एमांना एक जीवने एक अन्तर्मु० मुधी एकज लेश्या होय छे. वैमानिक देवोमां-१-२ कल्पे तेजो लेश्या, ३-४-५ कल्पे पद्म लेश्या अने त्यार पछी ६ हा कल्पथी सर्वार्थ सुधी सर्व- व सर्व देवोने केवल शुक्ल लेश्या छे, १ ला कल्पथी उपर उपरना स्वर्गौमां अनुक्रमे अधिक अधिकतर विशुद्ध लेश्या होय छे, अने ए वैमानिकनी लेण्याओ स्व स्व आयुष्य पर्यन्त अवस्थित छे. अवतरण-आ गाथाना पूर्वाधमां लेश्या अने उत्तरार्धमां (त्रीजा चरणमां) इन्द्रियद्वार अने ( चोथाचरणथी) समुद्घा- नद्वार कहवाय छे. ॥ मूळ गाथा १५ मी.॥
, ॥ लेश्या-इन्द्रिय-समुद्घातद्वारवर्णनम् ॥ (७७) जोइसिय तेउलेसा, सेसा सव्वे वि हुंति चउलेसा । इंदियदारं सुगम, मणुआणं सत्त समुग्घायो ॥१५॥ ॥ संस्कृतानुवादः॥ ज्योतिष्कास्तेजोलेश्याकाः, शेषाःसर्वेऽपि भवंति चतुर्लेश्याकाः। इन्द्रियद्वारं सुगम्यं, मनुजानो सप्त समुद्घाताः ॥ १५ ॥ ॥ शब्दार्थः ॥ जोइसिय-ज्योतिषीदेवो इंदियदारं-इन्द्रियद्वार तेउलेसा-तेजोलेश्यावाळा सुगम-सुगम छे सेसा-बाकीना मणुआणं--मनुष्योने सव्वे वि-सर्वे पण दंडको सत्त-सात हुति-छे समुग्धाया-समुद्घात छे चउलेसा-चार लेश्यावाळा गाथार्थ:-ज्योतिपीदेवो तेजोलेश्यावाला छे, अने वाकीना सर्वे दंडक ४ लेश्यावाला छे. इन्द्रियद्वार सुगम छे. मनुष्यने सान समुद्घात छे. विस्तरार्थः--ज्योतिपीदेवो सर्व तेजोलेश्यावाला छे, अने शेष पृथ्वी-अप-वनस्पति-१० भुवनपति ने व्यन्तर ए १४ दंढ- कमां चार चार लेश्या छे, एम सामान्यथी कहां, अने विशेषतः आ प्रमाणे- पृथ्वी ने जळ-ए ये यादरमा ज प्रधमनी चार लेश्या , ने मुक्ष्मपृथ्वी अने जळमां प्रधमनी त्रण ज लेश्या छे, नथा वनस्पतिमां बादरपर्याप्त प्रत्येक वनस्पनिमां ज ४ लेण्या छे, ने बीजी सर्व व- नरपतिमा ३ लेश्या छ, नेमां पण दरेक वाटर पृथ्व्यादिने १ ले- , (७८) ॥ दंडकविस्तरार्थः ।। श्या नहिं पण- स्वाभाविक लेश्या त्रण ज छे, परन्तु तेजोलेश्या ए मरणपामेलो इशानसुधीमांनो कोइ देव बादर पृथ्वीपणे बादर ज- ळ पणे अथवा बादर प्रत्येक वनस्पति पणे उत्पन्न थाय तो उत्पन्न थती वखते ज अपर्याप्त अवस्थामा अन्तर्मु० सुधी ते पृथ्व्यादिने तेजोलेग्या होय छे, ने त्यारवाद ते जीवने आखाभव सुधी ३ ले- श्याओ ज जुदे जुदै अन्तर्मुहूर्ते प्राप्त थाय छे, परन्तु तेजोलेश्या क- दी पण प्राप्त थती नथी. अने शेष सूक्ष्म पृथ्व्यादि भेदोमां देवनो जीव आवी शकतो नयी माटे तेओने चोयी तेजो लेश्यानो कदी पण संभव नथी. तथा १० भुवनपतिमां असुरकुमार निकायना जे १५ परमा- धार्मिक देवो छे तेओने फक्त कृष्णलेश्या छे, ने बाकीना असुर कुमारनिकायी देवोभा केटलाएक देव कृष्णलेश्यावाळा, केटलाएक नीललेश्यावाळा-केटलाएक कापोतवाला ने केटलाएक तेजोलेश्या. वाळा पण छे, ए रीते चार प्रकारना असुरकुमार निकायी देवो छे. पण एक देवने जुदें जुदे वखते चारे लेश्या छ एम नहिं, कारणके देवोनी लेश्यो अवस्थित छे. तथा जेम असुरकुमार निकायी देवो ४ लेश्यावाला कह्या तेवी जरीते शेष ९ भुवनपति अने व्यन्तरनी पण सर्व (१६) निकायोमी चार चार लेश्या जाणवी. तथा दंडकमां अनधिकारी तिर्यच अने सम्मू० मनुष्यने पण प्रथमनी ३ लेश्याओ जाणवी ॥ इति लेश्याद्वारम् ॥ हवे इद्रियद्वारने दंडकमां अवतारतां ग्रन्थकर्ता कहे छे के इंदियदारं सुगम--इन्द्रियद्वार सुगम छे माटे तेनु विवेचन क- रातुं नथी, छतां विशेष समन आ प्रमाणे- नरकनो ?--भुवनपतिना १०-गर्भजतिर्यंच १--गर्भजमनुष्य १-व्यन्नर-ज्योनिपी-ने वैमानिक ए १६ दंडकमां सर्व जीवने ५ सम्मू० ।। इन्द्रिय-समुद्घातबारवर्णनम् ॥ (७९) , इन्द्रियो छे, पृथ्विकायादि ५ स्थावरमे केवळ स्पर्श इन्द्रिय छे, दी- न्द्रियने स्पर्श-तथा रसनेन्द्रिय, श्रीन्द्रियने स्पर्शन-रसना-प्राणइ- न्द्रिय, ने चतुरिन्द्रियने श्रोत्रेन्द्रिय सिवायनी ४ इन्द्रियो छे. ए संख्या द्रव्यइन्द्रियोनी अपेक्षाए जाणवी. अन्यथा लब्धिरूप भाव- इन्द्रिय तो दरेक जीवमात्रने पांच पांच छे. सर्वज्ञ सिवायना सर्व जीवोने इन्द्रियद्वारा तथा मनद्वारा ज्ञान था शके थे, ने सर्वज्ञ भ- गवानने इन्द्रियो छे, पण ज्ञानप्राप्तिमां कारण पणे प्रवर्तती नयी, कारणके ऐन्द्रियज्ञान अन्तर्मुहूर्त काळे थाय छ, ने सर्वज्ञने तो ए कज समयमां सर्वज्ञान थाय छ, माटे ज श्री सर्वज्ञने १० प्राण- मांथी ५ प्राण गणाय. पुनः दरेक जीवने इन्द्रिय पर्याप्ति पूर्ण क- र्या वाद इन्द्रियद्वारा ज्ञानप्राप्ति होइ शके. ॥ इति इंद्रियहा।। हवे दरेक दंडके समुद्धातद्वार अवताराय छे, त्यां प्रथम मणुयाणं सत्त समुग्घाया-मनुष्योने ७ समुद्घात हो. य, तेमां घेदनाकपाय ने मरण ए ३ समु० सर्व मनुष्य- ने होय, वै० समु० वै० लब्धिवाला कोइक गर्भज मनुष्यने, ते- जस समु० पण तैजसलब्धिवाळा कोइक मनुष्यने, आहा० समु० कोइक चौद पूर्वधर मुनिने अने केवलिसमुद्घात केटलाएक केव- लिभगवानने होय पण सर्व केवलिने नहि, कारणके अन्तर्मु. थी ६ मास सुधीन आयुष्य शेष रहेनां केवळज्ञान पामेला जीवो नि- श्चय समुद्घात करे अने वीजा ६ मासथी समयादि अधिक आयु- प्य वाकी रहेतां केवलज्ञान पामेला जीवो समुद्घात करे अथवा न पण करे एम ( श्री आव० वृत्तिमां ) कडं छे. अथवा दरेक के- वलिने वेदनीयादि ३ अघाति कर्मनी स्थिति आयुष्य करनां अधि- कज होय एवो नियम नहिं होवाथी पण कोइ केवली समु० 4 (८) ॥ दंडकं विस्तरार्थः ॥ - करे ने कोई न करें. (०). अवतरण--आ गाथामां ७ समुद्घातनां नाम कहे छे. ॥ मूळ गाथा १६ मी॥ वेयण कसाय मरणे, वेउव्विय तेयए य आहारे । केवलि य समुग्घाया, सत्त इमे हुंति सन्नीणं ॥१६॥ " ॥ संस्कृतानुवादः ॥ . वेदना कषायो मरण, वैक्रियस्तैजसश्चाहारकः । केवलिश्च (कैवलिकः) समुद्घाताः, सप्तैते भवंति संज्ञिनाम् ॥ शब्दार्थः ॥ वेयण-वेदना समुद्घात केवलि (य)-केवलसमु० (के- कसाय-कपाय समु० वलिक समु०) मरणे-मरण समु० . समुग्घाय-समुद्घात बेउव्विय-वैक्रियसमु० सत्त-सात तेयए-तैजसममु० इमे-ए पूर्वोक्त य-अने हुति-छे आहारे-आहारक समु० सन्नीण-संजीजीवोने १ गुणस्थान प्रत्ये विचारतां मिथ्यात्वे वे०-क०-म० व-ने तै०-ए पांच मसु० छे. तथा २-४-ने ५ गुणस्थाने पण एज पांच ममु० छे. ३ जे मरण-वै० मिश्रयोग ने अति सं- क्लेशन अभावे मरण वै० तै प ३ समु० मिवाय मात्र वेदना -ने काय ममु० छ. १-७-८-~९ १०-११ मे मरण समु०. अहि मतांतरे ६ थी ११ सुधीमां मरण छे पण मरण समु० न. हि १२-१४ मे मम० मंथी. ने १३ मे केवलि समु० एकज छे" । लइयां-इन्द्रिय-समुद्घतिद्वारवर्णनम् ।। (८१) गाथार्थः-वेदना-कषाय-मरण-वैक्रिय-तैजस-आहारक-अने कै- वलिक ए.७ समुद्घात संज्ञिजीवोंने छे, (-संज्ञि मनुष्योने छे.) विस्तरार्थी द्वारवर्णनमा जुओ. अवतरण-आ गा मां कया दंडके कैटली समुद्घात होय । मूळ गाथा १७ मी.॥ एगिदियाण केवल, तेऊ आहारगविणा उ चत्तारि । ते वेउब्विय वज्जो, विगला सन्नीण ते चेच ॥ १७ ॥ ॥ संस्कृतानुवादः॥ एकेन्द्रियाणां केवलतैजसाहारकान् विना तु चत्वारि । ते वैक्रियवर्जा विकलाः, संज्ञिनां ते चैव ॥ १७ ॥ ॥ शब्दार्थः ।। एगिदियाण-एकेन्द्रियजीवोने ते-ते (४ समु०) माथी केवल-केवल समुद्घात चेउविय-वैक्रिय समु० बज्जा-रहित आहारग-आहारकसमु० विगला-विकलेन्द्रियोने विणा-विना सन्नीण-सज्ञिजीवोने उ-चळी-अने ते-ते [ साते समु.] चत्तारि-चार चैव-निश्चय गाथार्थ:-एकेन्द्रिय जीवोने केवलि-तैजस-आहारक सिवायनी ४ समुद्घात छे, विकलेन्द्रियो वैक्रिय समु० सिवाय ते ( चार स- मु. मांथी त्रण) समधातवाळा छे. अने संशिजीवोने (मनुप्यनी अपेक्षाये) निभय ते सर्व (साते) समुद्घातो. तेज-तेजस समु०
,
(८२) ॥ दंडकविस्तरार्थः ।।
विस्तरार्थ:-एगिदियाण इत्यादि-एकेन्द्रिय जीवोने के
वलि -तैजस-ने आहारक सिवायनी ४ समुद् होय, तेमां पण
सनाडीमा रहेला पृथ्वी-अप--अग्नि-ने वनस्पतिना सर्व भेदोमां
दरेक जीवने ३ समुद्घात प्रथमनी होय, अने फक्त केटलाएक
(-संख्यातमा भागना) वादर लब्धिपर्याप्त वायुकायने ज वै-
क्रियसहित ४ समु० होय, ने शेष वायुना सर्वभेदोमा दरेक
जीवने ३-३ समु० होय. तथा त्रस नाडी बहार लोकना निष्कुट-
मां रहेला पांचे एकेद्रियोने वेदनासमुद्घात होय नहि, तेमज क-
पायसमुद्घात पण एकेन्द्रियोने पूर्वभवानुवृत्तिए छ, पण त्रस जी-
वोनी पेठे अत्यंत तीव्राध्यवसायनो अभाव होवाथी कपाय समुद्-
घात प्रायः मनायलो छे. ने मरणसमुद्घात पण दरेकने होय ए-
वो नियम नथी. पण दरेक दंडकमांना केटलाएक जीवोनेज होय छे
'ते वेउवियवजा' इत्यादि-ते एटले एकेन्द्रिय संवधि ४ समु०
मांथी वैक्रिय समु० सिवायना ३ समु० विकले० ने होय छे,
अनेसंझि जीवोने आहारक शरीरि-केवली आदि मनुष्योनी अपे-
साये सर्व साते समुद्घातो होयछे.
अवतरण--आ गाथाना पूर्वार्धमां वाकी रहेला दंडके समुद्घात
अने उत्तरार्धयी दंडकोमा दृष्टिद्वार कहे छे.
॥ मूळगाथा १९ मी.॥
पण गप्भतिरिसुरेसु, नारयवाऊलु चउर तिय सेसे
विगल दुदिट्ठी थावर, मिच्छत्ति सेस तियदिछी॥१९॥
॥ संस्कृतानुवादः ॥
पंच गर्भजतिर्थक्सुरयो रकवाय्वोश्चत्वारि त्रीणि शेषेषु
विकले द्वे टी स्थावरे निथ्येति शेषेत्रु तिलो दृष्टयः ॥१८॥
. । उत्तरक्रियकॉलवर्णनम् ॥ ( ॥ शब्दार्थः ॥ पण-पांच विगल-विकलेन्द्रियमां गम्भतिरि-गर्भजतियेच दु-चे सुरेसु-देवोमां दिट्टी-दृष्टि नारय-नारक थावर-स्थावर जीवमां पाऊसु-वायुकायमां मिच्छ-मिथ्यादृष्टि चउर-चार त्ति-इति-ए नामनी तिय-त्रण सेस-बाकीना दंडके सेसे-बाकीना दंडकोमा तिय-त्रण दिहि-दृष्टि गाथार्थ:-गर्भजतिर्यंचने अने देवोने पांच समु०, नारक तथा वायुकायने चार समु०, अने बाकीना दंडके प्रण समु० छे.॥ विकलेन्द्रिय ने बे दृष्टि छे. स्थावरने मिथ्यात्व ए नामनी दृष्टि छे. अने बाकीना सर्व दंडके त्रण दृष्टि छे. विस्तरार्थ:-गर्भज तिर्यंच अने देवोमा ५समु० होय, का रण के आहा०समु० फक्त कोइक चौद पूर्वधर मुनिने अने केवलि समु०कोइक केवलिने होय माटे ए बे सिवायनी शेष पांच समुहोय तेमां पण दरेक गतिर्यचने प्रथमनी३ समु० होय, वैःलब्धिवाला कोइक गर्भज तिर्यंचने वै० समु०, ने तै० लब्धिवाला कोइक ग. तिर्यंचने तै० समुद्धात.पण होय. नारयवाउसु चउर-नारक अने वायुकायने प्रथमनी चार समु० होय त्यां नारकमां दरेक नारक जीवने अने वायुमा स- वं वायुजीवोथी संख्यातमा भाग जेटला असंख्य लब्धपर्याप्त बादर वायुजीवोने वै० समु० होय' पण ए जीषोने तै० समु० न होय, ने ३ समु० तो सनाडीगत जीवने होबाथी परेने पण , -~- (1) ॥ देरकविस्तरार्थः ॥ होय छे-माटे ४ समु० छे. तियसेसे-शेष दंडकमा ३ समुद्घात होय, अहिं २४ दंडकमां समुद्घातो कही पण तेमां ओघ ( सामान्य ) एकेन्द्रियमां चार कही ते मात्र पर्याप्त लब्धिवंत वायुकायनेज होय अने वाको- नाओने उपर विस्तरार्थमां वताच्या प्रमाणे समुद्घातो होय छे. ते जाणवी " तियालेसे .. बाकीनागओने त्रण. एम. लख्यु छे, पण तेनो विचार उपर-लख्या प्रमाणे जाणवो, ॥ इति समुद्घानद्वारम् ॥ विगल दुदिट्ठी-विकलेन्द्रिय जीवोने सम्यक्त्व अने मिथ्यात्व ए बे दृष्टि छे, त्यां पूर्व भवमाथी उपशम सम्यकल वमतो जीव सा- स्वा० सम्य० कंइक बाकी रहेतां वीन्द्रियादि पणे उत्पन्न थाय तो अ- पर्याप्तपणामा प्रथम अन्तर्मुः -मात्र सास्वादन -सम्यक्त्व होय, ने त्यारवाद आखा भवपर्यन्त मिथ्यादृष्टिपणुज होय छे. थावरमिच्छ स्थावरना पांचे दंडक मिथ्याइष्टि वाला छे, आ- विचार सिध्यान्तकारने मते जाणत्रो कारण के तेओ 'उभयाभा. वो पुढवाइसु कहे छे अने कर्मग्रंथकारोए तो प्रथम मिथ्या०अने-द्वि- तीय सास्वादन गुणस्थान कहेला छे. सेसतियदिहि-शेष १७ दंडक-त्रणे दृष्टिवाळा छे, तथा स- स्मूमनु मिथ्याहछे अने सम्मू नियंचो मिथ्या नथा,अपर्या० पगामा प्रथम अन्तर्मु०. मात्र(.सास्वादनी होत्राथी )सम्यग्दृष्टि छे, ॥ इतिदृष्टिद्वारम्॥
॥ दंडकेषु दर्शनद्वारवर्णनम् ॥ (८५), अवतरण-आ गाथामा सबै दंडके दर्शनद्वार कहे छे. ॥ मूळगाथा.१९.मीं ॥ थावरबितिसु अचरकू, चउरिदिन तदुगंसुए भगियं मणुआ चउदंसणिणो, सेसेसु तिगं तिग भणियं ॥१९॥ । संस्कृतानुवादः ॥ स्थावरदित्रिष्वचक्षुश्चतुरिन्द्रियेषु तद्विकं श्रुते भणितं । मनुजाश्चतुर्दशेनिनः, शेषेषु त्रिकं त्रिकं भणितं ॥ १९ ॥ ॥ शब्दार्थः ॥ थावर-स्थावरजीवोने भणिय-कल छे, वि-द्वीन्द्रियने मणुभा-मनुप्यो तिस-त्रीन्द्रियने चउदंसगिणो-४ दर्शनवाला अचरकू-अचक्षुदर्शन सेसेसु-पाकीना दंडके. चउरिदिसु-चतुरिन्द्रियने निग निर्ग-त्रण त्रण तदुग-ते बे (बे दर्शन) भणियं-कमु छे, सुए-सिहान्तमा गाथायी स्थावर-द्वीन्द्रियने त्रीन्द्रियने अचक्षुदर्शन अने चतुरिन्द्रि यने वे दर्शन (चक्षु सहित) श्रुनने विषे कह्यां ' मनुष्यो ४ दर्श- नवाळा-छे, अने चाकीना दंडकोमा त्रग त्रण दर्शन कयां छे, विस्तरार्थ:-धावर बितिसु अचस्कू-नावरना ५ दंडक तथा द्वीन्द्रिय ने त्रीन्द्रिय ए ७ दंडकमां अचक्षुदर्शन है, त्यां अचक्षुदर्शन स्पर्शेन्द्रिय-रसनेन्द्रिय-घ्राणेन्द्रिय-श्रोत्रंन्द्रिय- ने मन संबंधी एम ५ प्रकारनु छे, तेमज इन्द्रिय अने मन सिवा- य स्वाभाविक लब्धिरूप दर्शनगुणने पण अचक्षुदर्शन मानतां ६ मकारनु पण अचक्षुदर्शन गगाय, तेमां पूर्व वनांयी आमता -- 6 (6) दिकविस्तरा ॥ स्थावरजीवोने दरेकने रस्तामां तथा उत्पत्तिस्थाने उत्पन्न थया- वाद इन्द्रियपर्याप्ति समाप्त न थाय त्यां सुधी लब्धिरूप अचक्षु दर्शन, ने इन्द्रिय पर्याप्तिए पर्याप्त थयेलाने स्पर्शनेन्द्रियरूप अचक्षुद- शन छे, तथा द्वीन्द्रियने पण पूर्वभवमाथी आवतां मार्गमा अने उत्प- त्तिस्थाने इन्द्रियपर्याप्ति समाप्त न थाय त्यां सुधी लब्धि रूप अचक्षुदर्शन, अने इन्द्रिय पर्याप्ति पूर्ण थया वाद स्पर्शनेन्द्रिय तथा रसनेन्द्रिय संबंधी बे प्रकारनु अचक्षुदर्शन छे. तेम त्रीन्द्रिय जीव- ने द्वीन्द्रियवत् अचक्षुदर्शन जाणवू पण विशेष ए के इन्द्रिय पर्या- प्ति पूर्ण को वाद स्पर्शन संबंधि-रसनासंबंधि-ने घ्राणेन्द्रिय संबंधि एम ३ प्रकारचं अचक्षुदर्शन जाणवू. चउरिंदिसु तदुगं-चतुरिन्द्रिय जीवने ते बे एटले चक्षु अने अचक्षु एम बे दर्शन जाणवां. त्यां चतुरिन्द्रियने श्रीन्द्रियवत् लब्धिरूप-विगेरे ४ प्रकारनां अचक्षुदर्शन छे, अने स्वयोग्य पर्या. प्तिओ पूर्ण थया वाद 'पर्याप्तावस्थामां चक्षुदर्शन कहेवु. ए भावा- . थं सुर भणियं-सिद्धान्तमां कह्यो छे. मणुआ चउद्सणिणो-मनुष्यो ४ दर्शनवाला छे, तेमां सर्व सामान्य मनुष्योने अचक्षुदर्शन तथा चक्षुदर्शन चतुरिन्द्रियवत् जा- णवु, ने केटलाक ग० मनुष्यो के जेओने अवधिज्ञान अने केवल- ज्ञान होय तेवा मनुष्योने अवधिदर्शन तथा केवळदर्शन होइ शके पण सर्वने नहिं. तेमज एक मनुष्य संमकाळे १-२ ने ३ दर्शन लब्धिवाळो होय पण दर्शनोपयोग तो एक मनुष्यने समकाळे एक ज होय, त्यां १-२-३ दर्शन समकाळे लब्धिरूपे होय ते आ प्रमाणे- १ चक्षुदर्शन सर्व पर्याप्तिओना समाप्तिरूख कारण पर्याप्त वस्थामांज होय पण इन्द्रियपर्याप्ति पूर्ण कर्या बाद तुर्तहोय नहि, . , ।। इन्द्रिय-समुद्घातद्वारवर्णनम् ॥ (८७) अपर्याप्त गर्भज मनुष्यने मात्र अचक्षु दर्शनज होय माटे स- मकाळे १ प्रकार, अथवा श्री सर्वज्ञने फक्त केवलदर्शनज होय माटे १ प्रकारचें दर्शन छे, तथा अवधिज्ञान अने केवळज्ञानरहित एक ग० मनुष्यने समकाळे चक्षु ने अचक्षुदर्शन लब्धि होय माटे बे प्रकारे, अने अवधिज्ञानी मनुष्यने त्रणे दर्शन लब्धि होय, ए प्र. माणे १-२-३ दर्शनलब्धि समकाळे होय पण ४ लब्धि न होय, तथा एक समये एकज दर्शनोपयोग तो दरेक जीव मात्रने जाणवो. सेसेसु तिगं तिगं भणियं-शेप १५ दंडकमां त्रण त्रण दर्शन कह्यां छे, त्यां देवना १३ दंडक अने नारकनो १ दंडक ए १४ दंडकमां तो दरेक देवने अने दरेक नारकने अपर्याप्तपणामां अचक्षु अने अवधिदर्शन बे होय अने पर्याप्तपणामां दरेक देव नारकने त्रणे दर्शनलब्धि छे, परंतु अहिं एटलो अपवाद छे के पूर्व भवमांथी सम्मूछिम तिर्यंच पंचेन्द्रिय जो देवपणे उत्पन्न थयो होय तो ते देवने अपर्या० अवस्थामा अवधिज्ञान न होय माटे अवधि- दर्शन पण न होय एम जाणवु. तथा गर्भज तिर्यंचमां अचक्षुदर्शन ने चक्षुदर्शन तो चतुरि- न्द्रियवत् अने अवधिदर्शन ग० मनुप्यवन कोइकनेज जाणवू.. तथा दंडकमां अनधिकारी सम्मू० तिर्यंच पंचेन्द्रियने अचक्षु तथा चक्षुदर्शन चतुरिन्द्रियवत् जाणवू, अने सम्ऋ० मनुष्यने मात्र अचक्षुदर्शनज होय छे कारण के ए जीवो अपर्याप्त अवस्थामांज ॥ इति दर्शनद्वारम् ॥ C मरण पामे छे. अवतरण-आ गाथामां सर्व दंडके शानद्वार कहे हे. ॥ मूळ गाथा २०॥ अन्नाणनाणतियतिय, सुरतिरिनिरए थिरे अनाण दुगं ।
दु-बे (८८) It दैडक विस्तरायः ।। नाणन्नाण दु विगले, मणुए पण नाण तिअनोणा २० ॥ संस्कृतानुवादः ॥ अज्ञानज्ञानत्रिक त्रिक, सुरतिर्यग्नैरयिकेषु स्थिरेऽज्ञानदिक। ज्ञानाज्ञानदिकं विकले, मनुजे पंच ज्ञानानि त्रीण्यज्ञानानि॥ ॥ शब्दार्थः ॥ अन्नांण-अज्ञान दुगं- नाण-ज्ञान नाण-ज्ञान तिय निय-त्रण त्रण अन्नाण-अज्ञान सुर-देवने तिरि-तियचने विगले-विकलेन्द्रियोने निरए-नारकने मणुए-मनुयने थिरे-स्थावरने पण नाण-५ ज्ञान अनाण-अज्ञान ति अनाणा-३ अज्ञान गाथार्थ:-देव तिर्यंच अने नारकने ३ अज्ञान ने ३.ज्ञान छे, स्थावरोने बे अज्ञान छे, विकलेन्द्रियोने बे ज्ञान तथा बे अंज्ञान छे, अने मनुष्यने ५ ज्ञान अने ३ अज्ञान छे (अहिं ज्ञान तथा अज्ञान -ए वे द्वार कहेवायां). विस्तरार्थः-अन्नाणनाणतियतिय सुरतिरिनिरए- -देवना १३ दंडक, ग० तिर्यचनो १ दंडक, अने नारकनो १ दंडक ए १५ दंडकमां त्रण ज्ञान ३ अज्ञान छे, एम सामान्यथी का, अने विशेषतः आ प्रमाणे- ' सर्व इन्द्र-दरेक विमानना अधिपति देवो-प्रायः सर्व लोका- न्तिक. ५ अनुत्तरंना सर्व देवो ए सर्व सम्यग्दृष्टि होवाथी :म- श्रु०-भक०५ ३ मानवाला छे. १५ परमाधार्मिक भनेर किलि.
॥ लेझ्या-इन्द्रिय-समुद्घानद्वारवर्णनमः ।। (८९) षिक देवोने पण सम्यक्तव होवायी ३ ज्ञान अने मिथ्यात्व होवा- यी ३ अज्ञान होय छे, त्यां परमाधामीने पूर्वनी सोबतवाळा देवना उपदेशादि प्रयत्नथी सम्यक्त्व याय छे, परन्तु प्रथमथीज सम्यक्त्व होवानो संभव नथी, शेष भुवनपत्यादि देवो उत्पन्न थतां अने उत्पन्न थया बाद पण सम्यत्त्व युक्त थवाथी ३ ज्ञानवाळा होय अने मि- थ्यादृष्टि भवनपत्यादि देवोने ३ अज्ञान होय. ए प्रमाणे देवोमां ३ ज्ञान अने ३ अज्ञान कह्या बाद हवे तिर्यचोमां कहे छे, तिर्यंचमां पण ३ ज्ञानने ३ अज्ञान के. अहिं तिर्यंच सामान्ये कहेल छे तो पण गर्भज तिर्यंच पंचेन्द्रियोज जाणवा, तेओने पर्या- प्त अने अपर्याप्त अवस्थामां पण सम्यक्त्व होवाथी३ ज्ञान होयछे अने मिथ्यादृष्टिओने : अज्ञान होय छे. अहिं तिर्यंचने अपर्याप्त अवस्थामां पण मनुष्यवत् परभवथी साथे लावेलु अवधि अने वि- भंगज्ञान होवु केटलाएक मानेछे. अने केटलाएक नहि मानता होवाथी बे मत छे, परन्तु विशेषतः तो तिर्यंचोने गुणप्रत्यधिक होवाथी व्रत तपश्चर्यादि गुणथी पर्याप्त अवस्थामा अवधि अने विभंग उत्पन्न थाय छे. ए प्रमाणे गर्भज तिर्यंचपंचेन्द्रियमा ज्ञान अज्ञान कह्यां नारकोमा सातमी पृथ्वीना अपर्याप्त नारक सिवायना १३ नारकोमा सम्यक्त्व होवाथी ३ ज्ञान अने मिथ्यान्व होवाथी : अज्ञान छे, अने सातमी पृथ्वीना अपर्याप्त नारकने तो केवळ मि. थ्यात्वज होवाथी ३ अज्ञान होय पण ज्ञान न होय. नारकोने भ- वप्रत्ययिक अवधि अने विभंग होवाथी त्यां उत्पन्न थती वखते ए ज्ञान पामे है. थिरे अनाणदुगं-स्थावरने २ अज्ञान ज छे, अहिं सिद्धान्नने मते अल्प पण सम्यत्तवांश नही होबाथी २ अज्ञान जाणवां, अने कर्मग्रंधकारनेमते पण जेओ पूर्वभवमांधी उपशप सम्यक्त्ववमतां कि- ६ (९०) । दंडकविस्तराथः । चित् सास्वादन सम्यवत्व वाकी रह्ये काळ करी एकेन्द्रिय थएला लब्धिपर्याप्त दादर पृथ्वीकाय-अप्काय-अने वनस्पतिकायने अ- पर्याप्तावस्थामां अल्पकाळ पर्यन्त सास्वादन सम्यक्त्व होते छते पण सास्वादन भावमां कार्मग्रंथिकमते ज्ञान मानेलं नही होवाथी सर्व एकेन्द्रियोंने अज्ञानज होय छे, नाणनाणदुविगले-सिद्धान्तकारमते सास्वादन सम्यक्त्वे ज्ञान मान्यु छे अने केटलाक विकलेन्द्रियोने अपर्याप्तावस्थामां सा- स्वादन सम्यक्त्व मानेलं होवाथी सम्यक्त्ववाळाने २ ज्ञान अने वाकीनाओने : अज्ञान होय छे अने कर्मग्रन्थकारने मते सास्वादन सम्यक्त्व छनां पण अज्ञानज कहुं छे. मणुए पण नाण ति अनाणा-गर्भज मनुष्योमा ५ ज्ञा. न अने ३ अज्ञान छे ते आ प्रमाणे- एक जीवने समकाले १-२-3 ने ४ ज्ञानलब्धि होय छे, त्यां जे ग. मनुष्यने अवधि-मनः ५०-ने केवळज्ञान न होय तेवा सम्यग्द्रष्टिओने मतिज्ञान अने श्रुतज्ञान छे, तथा अवधिज्ञान अथवा मनःपर्यवज्ञान बेमांथी कोइपण एक ज्ञान उत्पन्न थयुं होय तो एक जीवने मा-श्रु०-अव० अथवा म०--श्रु-मनः० एम बे रीते ३ ज्ञान होय, ने जेने अवधि अने मन:प० बन्ने उत्पन्न थयां होय तो एक ग० मनुष्यने समकाळे चार ज्ञान होय, ने सर्व केवलि भगवानने एकज केवज्ञान होय पण मत्यादि ४ ज्ञान न होय. नथा मिथ्यादृष्टि ग० मनुष्योने विभंगज्ञानरहितने बे अज्ञान अ विभंगज्ञान सहितने ३ अज्ञान, ए प्रमाणे एक ग. मनु ने सम. काले २ अथवा अज्ञान छे, इति ज्ञानाज्ञानद्वारद्धयं, + अवतरण-आ गाथामां १५ योगनां नाम कहे छे.
॥ इन्द्रिय-समुद्घातबारवर्णनम् ॥ ॥ मूळ गाथा २१.मी. ॥ सञ्चअरमीस असच्च मोस मणवय विउव्वि आहारे उरलं मीसा कम्मण, इय जोगा देसिया समप||२१॥ संस्कृतानुवादः सत्येतरमिश्रासत्यमृषा मनो वांसि वैक्रिय आहारक: औदारिको मिश्राः कार्मणः एते जोगा देशिताः समय॥२१॥ ॥ शब्दार्थः- सच्च-सत्य. उरलं--औदारिकयोग. इयर-असत्य. मीसा-एत्रणे मिश्रयोग. मीस-मिश्र. कम्मण-कार्मणयोग. असच्चमोस-असत्यामृपा. मण-मनयोग. नोगा-योग. वय-वचनयोग- देसिया-बतान्या छे. घेउन्धि-वैक्रिययोग. समए-सिध्यान्ता- आहारे-आहारकयोग. माथार्थ:-सत्य-असत्य-मिश्र-ने असत्यामृषा (एचार ) मनयोग तथा (ए चारे ) वचनयोग (नया) वैक्रियकाय- योग१-आहारककाययोग२-औदारिककाययोग३-ने (ए त्रणे) मिश्र तथा कामंगकाययोगश सर्वपली १५योग सिरान्तमां कबाडे, विस्तरार्थ:-दारवर्णन प्रसंगे करो छे त्यांची जाणवो. इय-ए सर्व. अवतरग--आ गाथामां सर्वदंडके योगद्वार कहे डे, ॥ मूळगाथा २२ मी; ॥ इक्कारस सुरनिरए, तिरिएसु तेर पनर मणुएसु । विगले चउ पण वाए, जोगतियं (गं) थावरे होइ २२ (९२) ।। दंडकाविस्तरार्थः ॥ -- सुर-देवने तिगं-त्रण; ॥ संस्कृतानुवादः॥ एकादश सुरनैरपिकयोस्तियक्षु त्रयोदश पंचदश मनुजेषु विकलेषु चत्वारि पंच वायुषु, योगत्रिक स्थावरे भवति २२ ॥ शब्दार्थः ॥ इवकारस-अगीआर, विगले-विकलेन्द्रियोने, चउ-४ योगः निरए-नारकने, पण-५ योग, निरिएसु-तिर्यंचोने वाए-वायुकायने, तेर-१३ योग, जोग-योग; पनर-१५ योग, मशृए-मनुष्योने; थावरे-स्थावरने, होइ-छे, गाथार्थ:-देव अने नारकने ११ योग, तिर्यंचने १३ योग मनुप्यने १५ योग, विकलेन्द्रियने ४ योग, वायुने ५ योग, अने स्थावरने ३ योग छे, विस्तरार्थः--इकारस सुरनिरए-देव अने नारकने ११ योग होय ते आ प्रमाणे- पूर्वभवमांथो आवता देवने मार्गमां तथा उत्पत्तिना प्रथम स- मये तैजस कामेण योग, उत्पति स्थान प्राप्त थयेला देवने द्वितीय समयथा अन्तर्मु० सुधी शरीरपर्याप्ति समाप्त थाय त्यां सुधी अथ- वा वीजे मते अपर्याप्त अवस्था सुधी तैजस कार्मण सहित वै० काययोग होवाथी वैक्रिय मिश्रकाय योग, अथवा उत्तर क्रिय रचनार देवने रचनाना प्रारंभमा अने अन्ते वै०मिश्रकाययोग, तदनंतर शरीरपर्याप्ति समाप्त थया वाद अथवा पर्याप्त थया वाद ॥ दंडकैषु दर्शनद्वारवर्णनम्.॥ (९३ ) ४ मनना-४वचनना--ने १ वैनियकाययोग एम ९ योग होय ए प्रमाणे सामान्यपणे ११ योग जेम' देवमां कह्या तेम नारकमां पण विचारवा. तिरिएसु तेर--गतिर्यंचने पूवोक्त ११ मां औदा०मि- श्र अने औदा० मेळवतां १३ योग थाय ते आ प्रमाणे-- मार्गमां आवताने अने उत्पत्तिना प्रथम समये तै०, का, उत्पत्तिना द्वितीय समयथी शरीरापर्याप्तपणा सुधी अथवा अपर्या रतपणा सुधी ओदा. मिश्र०, शरीर पर्याप्तने अथवा पर्याप्तने औदा, पर्याप्तने ४ मनना ने ४ वचनना, कोइक वै० लब्धिवंत तिर्यच वैक्रिय रचना करे तो रचनाना प्रारंभमां ने अन्ते वै० मि- श्र, अने वै० शरीर संबंधि शरीर पर्याप्ति वा सर्वपर्याप्ति समाप्त थया वाद वैक्रिय काययोग ए प्रमाणे १३ योग होय अहीं चैक्रि- य रचनाना प्रारंभमा जे वैक्रिय मिश्रयोग कह्यो . ते सिद्धान्तका- रना मते जाणवु अने कर्मग्रन्थकारने मते प्रारंभमांतो औदा०मिश्र मा- न्योछे पण अन्ते एटलेके वैक्रियशरीर छोडती वखतेज चैक्रियमिश्रयोग मान्यो छे. तिर्यंचा जे तिर्यचो पोपट विगेरे स्पष्ट भापा बोली श- के तेोने वचनना चारे योग छे, अने अस्पष्ट भाषा बोलनार ति- यचो पण मनसंज्ञा पूर्वक सत्यादिक सूचवता होवाथी अस्पष्ट भा- पकोने पण ४ भापायोग मानी शकाय, अन्यथा तो सम्मू० निर्य- चवत् १ व्यव० वचनयोग होय, पनर मणुएसु-गर्भज मनुष्योने १५ योग होय. तेमां १ नत्र ग्रेवेयक देयोने उत्तर ये क्रिय संबंधि चमिश्र ने 20 काययोग न होय, अने अनुत्तर याती देवोने शब्दोच्चारना अभावे प्रवृत्ति रूप वचनयोग पण न होय.
१ , (९४) ॥ दंडकविसरार्थः॥ १३ योग तो ग० तिर्यंचवत् जाणवा अने शेष बे योग आ म. माणे-आहारक शरीर रचनार चौद पूर्वधर मुनिने सिद्धान्तका- रने मते रचनाना प्रारंभे अने अन्ते अने कर्मग्रन्थकारने मते प्रारंभ- मांतो औदारिक मिश्र मान्यो छे पण अन्ते एटले के आहारक श- रीर छोडती वखते आहा. मिश्र, अने आहारक शरीरपर्याप्ति पूर्णथया पाद अथवा ६ पर्याप्ति पूर्ण, थया बाद आहा० योग हो- य ए प्रमाणे अनेक जीव आश्रयि-मनुष्यने १५ योग कह्या, धिगले चउ-विकलेन्द्रियोने ४ योग होय ते आ प्रमाणे- पूर्वभवथी आवतां मार्गमा अने उत्पत्तिना प्रथम समये तै०का०, उत्पत्तिना वीजा-समयथी ,शरीरापर्याप्तावस्था अथवा अपर्याप्ता. वस्था सुधी ओदा०मिश्र, अने पर्याप्तावस्थामां आखो भवपर्य- त ओदा० अने व्यवहार पचनयोग ए चे योग छे ए प्रमाणे विकलेन्द्रियना ४ योग. पण वाए--वायुकायने ५ योग छे तेमां तै० का० -औदा० -ने औदा०मिश्र ए ३ योग विकलेन्द्रियवत् जाणवा अने वैः- मिश्र तथा वै०काययोग गर्भनतिर्थचवत जाणवा, वायुकायने व- घनयोग होय नहि. जोगनिगं थावरे होइ-वायुकाय सिवायना ४ रथावरीने तैष्का०-औदा. मिश्र-अने औदा० १ ३ योग छे ते विव.ले- न्द्रियवत् जाणवा. अहित. का. काययोग जो के पर्याप्त अवस्थामां पण होय एतां भवधारणीय शरीरनी मुख्यता होवाथी भवधारणीय शरीर- १ परन्तु विशेष ए छे के-श्री सर्वज्ञने समुद्घात समये माठ समयमा यीजे छठे ने सातमे समये औदा० मिथ तथा श्रीजे चोथे ने पांचमे समये कार्मण योग होय छे, ।। उत्तरवैक्रियकालवर्णनम् ॥ (९५) नोज योग गणाय. तथा एक जीवने समकाळे उपयोग पूर्वकनो १ ज योग छे, परन्तु उपयोग रहिन चेप्टामात्रने योग गणीए तो वधुमां वधु : मननो १ वचननो अने औदा० साथे आहा० वा आहा०मिश्र वा वै० वा वै० मिश्र ए बे काययोग अथवा मूल बैं० माथे वै०मिथ एम पांच रीते वे काययोग मळी ४ योग होय कार- णके आहा. अने वैक्रिय ए बे शरीर समकाळे एक जीवने न होय. तथा दंडकमां अनधिकारी समु० तिर्यंच पंचे. अने समु० म- नुष्यने पूर्वोक्त पद्धतिए तै०का०-औ०मिश्र अने औदा० एश्योग कायाना अने व्यवहारभापारूप १ वचनयोग मळी ४ योग विकले. न्द्रियवत् होय छे. ॥ इति योगद्वारम् ॥ अबतरण-आ गाथामा १२ उपयोगनां नाम कहे छे. ॥ मूळ गाया २३ मी.॥ ति अनाण नाण पण चउ, दंसण बार जिअ लक्वणु वयोगा इय बारस उवओगा, भणिया तेलुक्क दंसीहि ॥२३॥ ॥ संस्कृतानुवादः ॥ लोण्यज्ञानानि ज्ञानानि पंच, चत्वारि दर्शनानि द्वादश जीवलक्षणोपयोगाः। पते बादश उपयोगा भणितानि लोक दार्शभिः॥ २३ ॥ }} शब्दार्थः ॥ ति-त्रण लवण-लक्षण रूप योगा- उपयोग अनाण--अज्ञान (९६) ।। दंडकविस्तरार्थः।। in -सुगम छे. नाण--ज्ञान इय-ए ( पूर्वोक्त) पण--पांच बारस-बार चउ-चार उवओगा--उपयोग दसण-दर्शन भणिया-कहा वार-चार. (१२) तेलुक्कदंसीहि-त्रण लोकने दे- जिअ-जीवना खनार एवा श्रीजिनेश्वरोए गाथार्थ:-३ अज्ञान--५ज्ञान-ने ४ दर्शन ए जीवनां लक्षण रूप १२ उपयोग छे, ए १२ उपयोग त्रण लोकने ( केवलज्ञानद- शनवडे ) देखनार एवा श्री जिनेश्वरोए कह्या छे, विस्तरार्थः 20)- अवतरण-आ गाथामां सर्व दंडके उपयोगद्वार उतारे छे. ॥ मूळ गाथा २४ मी.॥ उवओगा मणुएसु, बारस नव निरय तिरिय देवेसु विगलदुगे पण छक्कं, चउरिंदोसु थावरे तियगं ॥२४॥ ॥ संस्कृतानुवादः ॥ उपयोगा मनुजेषु द्वादश नव नैरयिकतिर्यग्देवेषु । विकलद्विके पंच, षट् चतुरिन्द्रियेषु स्थावरे त्रयः ॥ २४ ॥ ॥ शब्दार्थः ॥ उवओगा-उपयोग विगलदुगे-वे विकलेन्द्रियने मणुएसु-मनुष्योने पण-पांच उपयोग बारस-बार छक्कं-छ उपयोग नव-नव उपयोग चउरिंदिसु-चतुरिन्द्रियाने निरय-नारकने थावरे-स्थावरने निरिय-तिर्यचने-देवेसु-देवने तिअगं-त्रण उपयोग ॥ उपयोगद्वारवर्णन (५७) , गावार्थ:-मनुष्योने १२ उपयोग, नारक--तिर्यच--अने दे- वोने ९ उपयोग, बे विकलेन्द्रियने ( द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रियने ) ५ उपयोग, चउरिन्द्रियोने ६ उपयोग, अने स्थावरने ३ उपयोग के. उपयोग होय एम सामान्यथी का पण विशेषतः आ प्रमाणे- विस्तरार्थ-इवे आ गाथामां कया दंडके केटला उपयोग होय ते दर्शावतां उवओगा मणुएस्नु वारस-मनुप्योने १२ उपयोग होय एम सामान्यथी कहां अने विशेषतः आ प्रमाणे- अनेक मनुष्योनी अपेक्षाए अथवा एक मनुष्यने भिन्न काळ- नी अपेक्षाए मनुष्यने १२ उपयोग छे. अने एक मनुप्यने सम- काळे तपासीए तो २-४-५-६-७ उपयोग लब्धिरूपे होय, त्यां समकाळे केवळज्ञान अने केवळदर्शन ए बे उपयोग श्री सर्वज्ञने लब्धिरूपे होय, तथा मति-श्रुतज्ञान अथवा मनि-श्रुत अज्ञानस- हित चक्षु अने अचक्षुदर्शन गणतां समकाळे ४ उपयोग होय, न. था ३ अज्ञान अने चक्षु-अचक्षुदर्शन गणतां ५ ' उपयोग अथवा मति-श्रुत-ने मनःपर्यवज्ञानयुक्त चक्षु अचक्षुदर्शन गणतां प- ण ५ उपयोग, तथा मति-श्रुत--अवधिज्ञानसहित चक्षु--अचक्षु अने अवधिदर्शन गणतां ६ उपयोग नथा एमां मनःपर्यवज्ञा- न मेळवतांउपयोग एक मनुष्यने लधिभावे होय पण उपयोगरूपे न होय, उपयोग रूपे तो एक जीवने १समये १ ज उपयोग होई . नव निरय-तिरिय-देवेसु--नारकनोनिचर्यनो?-अने दे- वना १३ दंडक मळी १५ दंडकमां केवळज्ञान-केवळदशन-ने मनःपर्यवज्ञान शिवायना ९ उपणेग छ कारणके मनःपर्यवज्ञान अप्रमत्तमुनिने ज उत्पन्न थाय छे, अने प्रमत्तादि मुनिने ज होय १ विभंग ज्ञानीने भवधिदर्शन न माने तो अने मिहान्तकारने मते विभंगशानीने अवधिदर्शन मानेल तो ते अपेक्षाए ६ उपयोग ३ अज्ञान ने ३ दर्शन सहित धाय उपयोग , (९८) । दंडकविस्तरार्थः।। पुनः आ मनःपर्यव ज्ञान जो के अध्यवसायनी निर्मलताथी थाय छे. पण तथाप्रकारनी जगत्मर्यादाए ए अध्यवसायो द्रव्यभावमुनिलिंग- धारीनेज आची शकेछे माटे ए ज्ञान मुनिवेष सिवाय वीजा गृहस्थादि वेषमा होतुं नथी माटे तिर्यंचादि १५ दंडकमाँ मुनिलिंगपूर्वक अध्य वसायनी नथाप्रकारनी निमलताना अभाव अप्रमत्तादिपणानो अ- भाव होवाथी चारित्रप्रत्ययिक मनःपर्ववज्ञान होतुं नथी, अने भाव- चारित्रना अभावे केवळज्ञाननो अभाव होवाथी केवळज्ञान अने के- बळदर्शन पण होय नहि माटे तिर्यंचादि १५ दडकमां ए बेउ प- योगनो पण अभाव छे तथा ए९ उपयोग पण अनेकतिर्यंचपंचेन्द्रिय अनेक देव अने अनेक नारकनी अपेक्षाए कह्या छे. पण दरेक तिये- चपंचेन्द्रियादिने लब्धिभावे समकाळे न होयं माटे एकतिर्यंचने या १ देवने वा १ नारकने केटला उपयोग होय ते पूर्वोक्त पद्धतिए स्वयं विचारवा. विगलदुगे पण-विकलद्विक एटले द्वीन्द्रियने तथा त्रीन्द्रियने मतिज्ञान मतिअज्ञान-श्रुतज्ञान-श्रुतअज्ञान-ने अचक्षुद- शन ए ५ उपयोग छे तेमां पूर्वभवे उपशम सम्यक्त्व वमीने सास्वादन सम्यकत्व किंचित् शेष रहेतां मरण पामी द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रियपणे उ स्पन्न थयेला जीवोने अपर्या० अवस्थामां अन्तर्मु० मात्र बे ज्ञान ने अचक्षु० द० सहित ३ उपयोग होय ने त्यारवाद ते तथा अन्य सर्व द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय जीवोने सदाकाळ दे अज्ञान ने अचक्षुदर्शनरूप ३ उपयोग होय छे. छक्कं चउरिदिसु-चतुरिन्द्रियजीवोने चक्षुदर्शनसहित ६ उपयोग होय शेप सर्वभावना द्वीन्द्रियवत् जाणवी. थावरे तियगं-स्थावरना ५ दंडकमां मति अज्ञान श्रुतअज्ञान -ने अचपदर्शन ए ३ उपयोग छे, कर्मग्रन्थकारमते पूर्व ज्ञानाज्ञान- ॥ उपपात-च्यवनद्वारवर्णनम् ॥ द्वारमा वर्णव्या प्रमाणे जाणवू तथा दंडकमां अनधिकारी एवा सम्म० तिर्यंचपंचे० तथा स- म्मू० मनुष्यने पण स्थावरवत् ३ उपयोग जाणवा, ।। इति उपयोगद्वारं ॥ - अवतरण-आगाथामा दरेक दंडके उपपातद्वार अने च्यवन द्वार ए बे द्वार कहे छे. संखमसंखा समए, गम्भतिरिविगलनारयलुरा य । मणुषा नियमा संखा, वणणंता थावर असंखा ॥२५॥ संस्कृतानुवादः संख्येया असंख्येयाः समये गर्भजतिर्थविकलनारकसुराश्च मनुजा नियमात् संख्येया वना अनंताःस्थावरा असंख्येयाः२५ ॥ शब्दार्थः ॥ संख-संख्याता मणुआ-मनुष्यो असंखा-असंख्याता नियमा-निश्चयथी समए-एक समयमां संखा-संख्याता गम्भतिरि-गर्भजतियचो वण-वनस्पति विगल-विकलेन्द्रियो अणंता-अनंत नरय-लारको थावर-स्थावरो सुरा-देयो असंखा-असंख्याता य-अने। गाथार्थ:-गर्भजनियंच-विकलेन्द्रिय-नारक-अने देवो एक समयमां संख्यात अथवा असंख्यात ( उपजे अने चय) मनुष्यो निश्चय संख्याताज, वनस्पतिकायजीवो अनंत, अने स्थावरी अ- संख्यात ( उपजे अने च छे) (१००) ॥ दंडक विस्तरार्थः । विस्तरार्थः-आ गाथामां कया दंडकला जीवो एक समय- मां एटले समकाळे केटला उपजे ! अने मरण पामे ? तेनी संख्या- नो नियम जणाववा माटे को छ के-संखलसखा समए-गन- तिरिविगलनारयलुरा य-गर्भजतियेच-दीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-च- तुरिन्द्रिय-नारक-ने देवना १३ ए प्रमाणे १८ दंडकना जीवो १ समयमां जघन्यथी संख्यात एटले कमीमां कमी. १--२--३ यावत् उत्कृष्ट संख्याता उत्पन्न थाय, अने उत्कृष्टथी असंख्याता उत्पन्न थाय, पण अनंन न उपजे, कारणके ए१८दंडकमांदरेक दंड. कनी अंदर त्रणे काळमां तपासीए तो सर्व जीवो पण ' असंख्यज छ. पुनः मरण पण एटला ज जीवो पामे ए प्रमाणे आगळ सर्वत्र उत्पत्तिवत् मरणसंख्या जाणवी, नथा-मणुआ नियमा संखा--गर्भजमनुष्यो निश्चयी. सं- ख्यानज छे. अने ते पण बेनी संख्यानो ६ वार वर्ग करी ५ मा- वर्ग साथे गुणाकार करे तेटली अथवा१ने९६वखत ठाण वमणा क- रे तेटला ग० मनुप्यो छे. ते सर्व संख्या ७९२२८१६२५१४२६- ४३३७५९३५४३९५०३३६ ए प्रमाणे २९ आंकडानी संख्याए गर्भजमनुष्य होय छे, अने मनुष्यना अशुचि १४ स्थानकोमा उ- पजता सम्मृच्छिम मनुष्यो असंख्याता ज होय छ तेथी बेउ (ग. सं०) मनुष्योनी सेख्या असंख्यात प्रमाण थाय, पण कोइक का- विशेपमा सम्मृच्छिमनो २४ मुहूर्तनो विरहकाल पड़े छे, ते व- खने पृर्वना उत्पन्न थयेला अन्नमुहर्ननुं आयुष्य होवाथी अन्तर्मुह- त चवी जाय छे. ते वखते माधिक २३ मुहूर्त मुधी एकला गर्भज मनुप्यो ज होय छे तेनी संख्या उपर लख्या प्रमाणे जाणवी, i बमानिकदंडकमां सर्वार्थ सिद्ध मांज मात्र संख्यात देवो छे, शेत्र मर्व देवलोकमा असंख्य देवोते, ॥ दंडकेषु दर्शनद्वारवर्णनम् ॥ (१०१) वणणंता-वनस्पति काय रूप १ दंडकमां एक समये अनंत जीवो उत्पन्न थाय छे, अने मरण पाये हैं. त्यां प्रत्येक वन- स्पतिजीवो असंख्यात ज होवाथी एक समयमां असंख्य उपजे अने असंख्य मरण पामे, अने सूक्ष्म साधारणवनस्पति तथा बादसा- धारणवनस्पति ए बन्नेमां प्रतिसमय एक निगोदगत जीवरा- शिथी असंख्यातमा भाग जेटला जीवो उत्पन्न थायछे अने मरण पाये छे, कारणके बन्ने वनस्पतिजीवो जगत्यां अनंत अनंत छे, थावर असंखा-वनस्पति सिवाय पृथ्वीकायादि ४ दंडकना जीवो एकसमयमां असंख्यात उपजे अने अस ख्यात मरण पाये कारणके पृथ्वीकायादि चारे जीवो असंख्य असंख्य छे, पण अ- नन्त नथी बळी एमां कोइ पण समये संख्यात जीवो न उपजे. अवतरण-आ गाथाना पूर्वाधमां वाकी रहेला दडके उप- पात अने च्यवन द्वार अने उत्तरार्धथी दरेक दंडके आयुप्यद्वार कहे छे. ॥ मूळ गाया २६ मी. ॥ असन्नि नर असंखा, जह उववाए तहेव चवणे वि। वावीस सग ति दस वास--सहस्स उकिह पुढवाइ. २६ ॥ संस्कृतानुवादः ॥ असंज्ञिनरा असंख्येया, यथोपपातस्तथैव च्यवनमपि । हाविंशत्सप्तत्रिदशवर्ष-सहस्रा उत्कृष्ट पृथ्न्यादयः॥२६॥ ॥ शब्दार्थः ॥ असन्नि -असंजि (सम्मृन्छिम)| उववाए- उपपानटारमा नर--मनुप्य नहेव-तीरीज असंखा- असंख्यात चवणेऽवि- व्यवहारमा पण जह--जेपीरीने वावीस-बावीस .
(१०२) ॥ दंडकविस्तरार्थः ॥ सग--सात सहस्स--हजार ति--त्रण उकिट--उत्कृष्ट दस-दश पुढवाइ--पृथ्वीकायादि वास--वर्ष गाथार्थ:-सम्मूच्छिम मनुष्यो ( एक समयमां) असंख्यात ( उपजे ने चवे ) ए प्रमाणे जेवीरीते उपपातद्वारयां ( का ) तेवी रीते ज च्यवनहारमा पण (कहेवु). पृथ्वीकायादिजीवोनुं उत्कृष्ट आयुष्य २२००० वर्ष--७००० वर्ष--३००० वर्ष ने १०००० वर्ष ( अनुक्रमे जाणवु ) विस्तराथ:-असनी नर असंखा-असंज्ञिमनुष्यो एक समयमा असंख्यात उपजेछे. ने चवे छे, अहिं दंडकमां अनधिकृत एवा सम्मू० मनुष्योनी संख्या पण कही. पुनः जे रीते उपपातद्वारमा छे. तेज रीते च्यवनद्वारमा पण छे. (के जे उपपोतनी साथे साथे च्यवन द्वार पण कहेवायुं छे,) एवी रीते उपपात--च्यवनद्वार समय सख्याए कडं पण ते उपपातनो अभाव कया दंडकयां केटला काळ सुधी होय ते “ उपपातविरह" अने कया दंडकमां केटला काळ सुधी कोइपण जोव मरण ज न पामे ते "च्यवनविरह" पण प्रसंगथी कहेवाय छे- उत्पत्तिच्यवननो विरह काल- दंडकोमा उत्कृष्ट साते नरकमां १ समय १२ मुहूर्त • रत्नप्रभामां २४ मुहूर्त शर्कराप्रभामां ७ दिवस जघ० " " ।। दंडकविस्तरार्थः॥ (१०३) १५ मास " १ मास २ मास वालुकाप्रभामा पंकमभामां धूमप्रभामां तमःप्रभामां तमस्तमःमभामा चारेनिकायना देवोमां भवनपतिमा " ४ मास ६मास १२ मुहूर्त २४ मुहूते ग ९ दिवस-२० मुहू० २ दि०-२० मुह० " , व्यन्तर ज्योतिषी सौधर्म ईशान सनत्कुमारमा माहेन्द्रमा ब्रह्मलोकमां लांतकमां शुक्रमां सहस्रारमा आनतमा प्राणतमां आरणमा " " २२॥ दि० ४५ दि० ८० दि० १०० दि० M संख्यातमास (१० मास) " ( ११ मास ) संख्यवर्प (१००वर्ष नी अंदर छे.) अच्युतमा ।
(१०४) ॥ दंडकविस्तरार्थः ॥ " प्रथम त्रण ग्रेवैयके बीजांत्रण अवेयके " सख्यात १०० वष (-१००० नी अंदर संख्यात १००० वर्ष (-१ लाखनी अंदर सख्यात लक्षवर्ष. (.-१ क्रोडनी अंदर पल्योपमनोअस त्रीजावेयके ४ अनुत्तरे " ख्यातमो भाग पल्यो नोसंख्यातमो सर्वार्थसिद्ध भाग १२. मुहूर्त " " २४ मुहूर्त अन्तर्मु० गर्भनतिर्यंचमां गर्भज मनुष्यमा सम्मू०मनुष्य दीन्द्रियमां त्रीन्द्रियमां चतुरि०मां असनिपंचे० पृथ्वीकाय " अन्तर्मु० विरह नथी | विरह नथी -- " अपकाय अग्निकाय " " वायुकाय पनस्प० " ॥ दंडकेषु उपपात-च्यवनदारवर्णनम् ।। (१०५) ए प्रमाणे ज्यां जेटलो विरहकाळ कयो छे, त्यां तेटला काळ सुधी कोइपण जीव नवो उपजे नहिं, तेम कोइ मरे पण नहि, तथा दंडकमां अनधिकृत सम्मू० मनुष्योनी एक समयमा उ- त्पत्ति च्यवन संख्या तो ग्रंथकारे गाथामांज कही अने सम्मू० पंधे- न्द्रिय तिर्यंच एक समयमां निश्चय असंख्यात ज उपजे अने असं- ख्यात मरण पामे छे, पण संख्यात नहिं, ॥ इति उपपात-च्यवनदारयुगलम्, ॥ , हवे दरेक दंडकमां आयुष्यद्वार कहेवाना प्रारंभमां बावीस सग ति दस वास सहस्सुक्कि पुढवाई-पृथ्विकायादि पां- चनुं अनुक्रमे २२००० वर्ष-७००० वर्ष-३००० वर्प-१०००० वर्ष-उत्कृष्ट आयुप्य छ एम सामान्यतः कयु, अने विशेषतः आ प्रमाणे- पृथ्विकायमां हीरा-पन्ना विगेरे अनिनकर पृथिवर्नु २२००० वर्ष आयुष्य छे, कांकरा-हडताल-सुरमादिकनुं १८००० वर्ष आ- युष्य. मणसिल विगेरेनुं १६००० वर्प, रेतिनुं १४००० वर्प, गो- पीचंदन कुमारमाटी विगेरेनुं १२००० वर्ष अने मुंहाळी माटीनुं १००० वर्ष आयुप्य छे, शेप पृथ्वीओन आयुष्य श्री सर्वज्ञदृष्टिए जे होय ते जाणवू, ते उत्कृष्ट आयुष्य निर्व्याघात स्थानमा रहेला र- नादिकनुं जाणवू, अन्यथा जघ० आयुष्य दरेकर्नु अन्तर्मु० छे. तथा निर्व्याघात स्थळे रहेला घनोद्ध्यादि जळर्नु, अग्निनु, वायुनुं वनस्पतिनु उत्कृष्ट-आयुष्य केटलाक जीवोनुन होइ गकेले. पुनः वनस्पनिमां फवन बादर मत्येक वनस्प० मुंज टत्कृष्ट आयुष्य . , ॥ दंडविस्तरार्थः॥ (१०६) थे, ने पृथ्व्यादिकमां पण दरेक चादरनुज उत्कृष्ट आयुष्य जाणवू, कारणके दरेक मूक्ष्मजीवनु अन्तरर्मुव्थी अधिक आयुष्य होतु । अवतरण-आगाथामां पण ( अग्नि-मनुष्य-तिर्यंच-वै- मानिक-नारकने व्यन्तरतुं ) आयुष्य कहेवाय छे. मूळ गाथा २७ मी, तिदिणग्गि तिपल्लाऊ, नरतिरिसुरनरयसागरतित्तीसा वंतरपलं जोइस, वरिसलक्खाहियं पलियं ॥२७॥ ॥ संस्कृतानुवादः ॥ त्रिदिनमग्निस्त्रिपल्यायुप्को नरतियश्चौ सुरनारको सागर- त्रयस्त्रिंशत्को। व्यंतरस्य पल्यं, ज्योतिषो वर्षलक्षाधिकं पल्यं ॥२७॥ ॥ शब्दार्थः ॥ ति-त्रण सागर-सागरोपम दिण-दिवस तित्तीसा-३३ (तेत्रीस) अगि-अग्निकायर्नु वंतर-व्यन्तरर्नु ति-त्रण पल्लं-१ पल्योपम पल्ल-पल्योपम जोइस-ज्योतिषीन आउ-आयुष्य परिस-वर्ष नर-मनुप्योन लक्ख-१ लाख तिरि-तिर्यचो अहियं-अधिक पलिय-१ पल्योपम निरय-नारकोनुं गाथार्थ-अग्निकायन ( उत्कृ० आयुप्य ) ३ दिवस, मनु- प्य ने निर्यचोनुं आयुष्य ३ पल्योपम, देव ने नारकर्नु ३३ सा- मुर-देवोर्नु ॥ दंडकेषु आयुरिवर्णनम् ॥ (१.०७) गरोपम, व्यन्तरनु १ पल्योपम, अने ज्योतिषीनुं ( उ० आयुष्य ) १ लाख वर्ष अधिक ' पल्योपम छे, विस्तरार्थ:-तिदिणनि-अग्निकायना एक जीवन उ स्कृष्ट आयुष्य३दिवसतुं छे,अने तिपल्लाउ नरतिरि-मनुष्यनु आ युष्य ३ पल्योपमनु कहुं ते देवकुरु उत्तरकुरुनां युगलिक मनुष्योनु सदाकाळ अने भरत-औरवत क्षेत्रमा अवसर्पिणी काळे १ ला आ- राना अने उत्सपिणि काळे छट्ठा आराना मनुष्योनुजाणवू,पुनः ए युगलिकोनु जघ० आयुष्य पल्योपमनो असंख्यातमो भाग न्यून ३ पल्योपम छे (एम प्रश्नोत्तर सार्धशतकमां कहा छ.) क्रोडपू- थी अधिक आयुष्यवाळा युगलिक मनुष्यो होय छे, अने तेओ असंख्य वर्षना आयुष्यवाला गणाय छे,ने क्रोडपूर्व सुधीना आयुष्य वाळा ते संख्यात आयुष्यवाळा गणाय एवो शास्त्रव्यवहार छे. वळी अपर्याप्ता युग० मनुष्योनु जघ० आयुष्य अन्तर्मु० मात्रजछे. तथा जे प्रमाणे मनुष्यनु उत्कृष्ट आयुष्य युग० मनु० आश्रयि का ते प्रमाणे ग० विर्यचनु उ० आयुष्य पण युग० तियेच सिंहादि- कनी अपेक्षाए जाणवू शेप सर्व वक्तव्य मनुष्यवत् विचार. सुरनिरयसागरतित्तीसा-वैमानिक देव अने नारकनु आयुष्य उत्कृष्टथी ३३ सागरोपम छे, ते सातमी नरकना नारक अने अनुत्तर देवोने आश्रयि कहयु, अने शेष सौधर्मादिकल्पमा आगळ यन्त्रमा कहा छे, ते प्रमाणे जाणवू. वन्तरपल्लं-व्यन्तरनु १ पल्योपम आयुष्य छे, ते जोइस वरिसलक्खाहियं पलियं-ज्योतिपी देवनु ला- ख वर्ष अधिक १ पल्योपम उत्कृष्ट आयुष्य छे, अहिं देवोमां मर्व इन्द्रोनु, अने देवीयोमां गई इन्द्राणीयोनु (१०८) ॥ दंडकविस्तरार्थः ॥ अवश्य उत्कृष्ट आयुष्य होय अने प्रजा देव-देवीयोनु (ज्योतिषी सिवाय ) सर्व प्रप्रकारे आयु. होय, अवतरण-आ गाथामां पण ( भुवनपति-ने विकलेन्द्रियो- D) आयुष्य कहेवाय छे, मूळ गाथा २८ मी. वास वर्ष असुराण अहिय अयरं, देसूणदुपल्लयं नव निकाए वारस वासुणपणदिण, छम्मासुक्किक विगलाऊ ॥२८ ॥ संस्कृतानुवादः॥ असुराणामधिकमतरं, देशोनद्विपल्यं नव निकायेषु । द्वादशवर्षोंनपंचाशदिनषण्मासा उत्कृष्टं विकलायुः २८॥ ॥ शब्दार्थः ।। असुराण-अमुरकुमारोनु अहिय-वाइक अधिक उण-२ न्यून। }-४९ अयरं-१ सागरोपम पण-पचास देमृण-कंइक न्यून दिण-दिवस दुपल्लं-चे पल्योपम छम्मास-६ मास नव-नव (९) निकाए-निकायमां (भेदमां) विगल-विकलेन्द्रियोनु वारस-वार आऊ-आयुष्य गाथा:-असुरकुमार (निकाय) नु कंइक अधिक १ सागरोपम ( उत्कृ. आयुष्य ) छे, अने ( शेष )नव निकायोनु उक्किट्ठ उत्कृष्ट ॥ दंडकेषु आयुरवर्णनम् ॥ आयुः) कंइक न्यून २ पल्योपम छ, तथा विकलेन्द्रियोनु उत्कृष्ट आयुष्य ( अनुक्रमे ) १२ वर्ष-४९-दिवस ने ६ मास (जेटल) छे, विस्तरार्थ:-सुगम छे, विशेष आगळ ओपेला यन्त्र जुओ. अवतरण-आ गाथामां (पृथ्व्यादि १० पदोनु तथा भव- न० नारक ने व्यन्तरोनु जघ० आयुष्य कहेवाय छे, मूळ गाथा २९ मी. पुढवाइ दस पयाणं, अन्तमुहुत्तं जहन्न आउठिई। दस सहस वरसठिइआ, भवणाहिव निरयवंतरिया २९ संस्कृतानुवादः पृथ्ब्यादिदशपदाना- मन्तर्मुहूर्तजघन्यमायुःस्थितिः । दशसहस्रवर्षस्थितिका, भवनाधिपनैरयिकव्यन्तराः॥१९॥ शब्दार्थः पुढवाइ-पृथ्विकाय विगेरे दससहस-दश हजार दस-दश (१०) वरिस-वर्ष पयाणं-पदोनु-दंडकोनुं ठिइआ-आयुप्यवाळा अन्तमुहुत्त-अन्तर्मुहूर्त भवणाहिव-भवनपति जहन्न-जघन्य-अति अल्प निरय-नारक आउठिइ-आयुष्यनी स्थिति वन्तरिया-व्यन्तरो गाथार्थ-पृथ्विकाय वगेरे १० दंडकोनी जघन्य आयुस्थि- ति अन्तर्मुहर्त छे, अने भवनपति-नारक-ने व्यन्नरो ( जय० थी) १०००० वर्पना आयुष्यवाळाछे, विस्तरार्थ:-मुगम है, विशेष आगळ आपेलो यन्त्र जुभो.
(११०) ॥ दंडक विस्तरार्थः॥ " ॥ देवोनुं आयुष्य ॥ देवोनुं जघ० उत्कृष्ट १० हजार वर्ष १ सागरो० द० असुर० देवोर्नु द० " देवीनु ३॥ पल्यो० साधिक १ सागरो० " ४|| पल्यो० उ० देवन उ०" देवीनुं द० ९ निकायदेवतुं द" देवीनु देवन ॥ पल्यो । पल्यो ० " उ०" देशृण २ पल्यो० उ०" " १ पल्यो० देवीनुं व्यन्तर देवर्नु व्यन्तर देवीन १ पल्यो " ०॥ पल्यो चन्द्र इन्द्रनु १ लाखव वर्षाधिक १पल्योपम १० हजार वर्ष " चन्द्रनी प्रजादेवन मूर्य इन्द्रन मूर्यना प्रजादेवोर्नु १००० वर्षाधिक १ पल्यो १०.०० वर्ष (१२१) ॥ दंडकेषु आयुर्धारवर्णनम् ॥ १ पल्यो० " १०००० वर्ष ०॥ पल्यो १०००० वर्ष ०|| पल्यो साधिक | पल्यो १००००० वर्ष ग्रह अधिपतिनुं ग्रह देवोर्नु नक्षत्र अधिपतिनुं नक्षत्र देवोनुं तारा अधिपतिनुं तारा देवोर्नु सूर्यनी इन्द्राणीनुं सूर्य देवीयोनुं चन्द्रनी इन्द्राणीनुं चन्द्र देवीयोनुं ग्रहाधिपति देविन ग्रह देवीयोनुं मुर्यथी अर्ध " १०००० वर्ष चन्द्रयी अध १० हजार वर्ष ग्रहथी अर्थ १०००० वर्ष नक्षत्रथी अर्थ नक्षत्राधिपति देवीन १०००० वर्ष नक्षत्र देवीयोनुं ताराधिपति देवी- तारायी अर्ध १. अहिं देवीयो ते प्रजा देवीयो जाणवी.
॥ दंडक विस्तरार्थः॥ तारा देवीयोनुं १०००० वर्ष अधो किलिविषिक १ पल्यो ३ पल्योपम सौधर्म देवोन १ पल्यो० २ सागरो० ईशान देवोनुं साधिक १ पल्यो | साधिक २ सागरो० सौध० इन्द्रनु २ सागरो० ईशान इन्द्रनुं साधिक २ सागरो० सौधः परिगृहीता १ पल्यो ७ पल्यो० देवीनु सौधर्म अपरिगृहीता ५० पल्यो देवीयोनुं ईशाने परिगृहीता | साधिक १ पल्यो ९ पल्यो देवीयोन ईशाने अपरिगृहीता ५५ पल्यो० देवीयोk मध्य किल्बिपिकोनुं २ सागगे० ३ सागरो० सनत् कुमारेन्द्र ७ सागरो० सनव कु० देवोर्नु २ सागरो० " " १ अहिंथी आगळ देवीओनी उत्पत्ति नथी माटे पण का नथी. आयुष्य ॥ दंडकेषु उपपात-च्यवनमारवर्णनम् ।। माहेन्द्र 'देवोनुं साधिक २ साग० साधिक ७ सागरो० ब्रह्म देवोन ७ सागरो १० सागरो० ८ " ८ ९ लोकांतिनुं उर्ध्वकिल्बिषिकोर्नु १०" १३ लांतक देवोन १० सागरो १४ १४ सागरो० १७ " १७ सागरो० १८ " १८ १९ " शुक्र देवोनुं सहस्रार देवोर्नु आनत देवोनुं प्राणत देवोतुं आरण देवोन अच्युत 'देवोनुं १ ली ग्रेवयकनु १९" २० " २० २२ " " २२ २१ " २२ २३ ॥ " २ जी २३ " ३ जी २४ " २९ विचार सप्ततिका ग्रन्थे. १-२ । नच देवलोकना इन्द्रोर्नुमात्र उत्कृष्ट आयुष्यज है. ३ अहिंधी आगळ मर्वत्र देयोज पण इन्द्रादि भेद नयी
(११४)
॥ दंडकविस्तरार्थः ॥
४ थी"
२५ "
२६ ॥
५ मी"
२६
२७ "
६ ही,
२७ "
२८"
७ मी
२८
"
२९
८ मी'
"
२९ "
३०
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९मी,
३१ "
३१ "
४ अनुत्तरे
सर्वार्थसिद्धे
"
॥ दंडकेषु आयुरिवर्णनम् ॥ (१२५) ॥ नारकनुं आयुष्य ॥ पृथ्विमा जघर रत्नप्रभामा १०००० घर्ष १ सागरो० शर्कराप्रभामां सागरो० वालुकाप्रभामां ३ ॥ " पंकमभामां ७ १० " धूमप्रभामां १० ॥ " १७ तम प्रभामां १७ " २२ ॥ ८ तमस्तमःप्रभामां २२ " ए प्रमाणे वैमानिक देवो उत्कृष्ट आयुष्य सर्वथी उपरना प्रत - रमां जाणवू अने नारकोनु उ० आयुष्य सर्वथी नीचेना प्रतरमा जाण, अने ज्यां १ ज प्रतर होय त्यां केटलाएकनु जघ० ने के- टलाएकनु उत्कृष्ट जाणवू, शेष प्रतरोमां केटलं आयुष्य छ तेनो विस्तार सिद्धान्तादिकथी जाणवो.
(११६) ॥ दंडक विस्तराथः ।। ॥ मनुष्यनुं आयुष्य ॥ मनुष्योतुं जघन्य० उत्कृष्ट संपूर्ण ३ पल्यो० ३ " देवकुरुमां पर्यानुं | देसूण ३ पल्यो० उत्तरकुरुमां, हरिवर्षमा " देसूण २ पल्यो० रम्यक्मा " संपूर्ण २ पल्यो० " " हिमवंत देसूण १ पल्यो० संपूर्ण १ पल्यो० हिरण्यवंत " " " अन्तद्वीपोमां देसूण पल्योपमासं- | पल्योपमासंख्येय ख्येय भागः भागः महाविदेहमा " अन्तर्मु० पूर्वक्रोड वर्ष भरत-औरवत, अन्तर्मु० ३ पल्योपम अन्तर्मुः अपर्याप्त युगलिकोतुं अन्तर्मु० लघु अन्तर्मु० संमु० मनुष्य लघु अन्तर्मुः अहि देमृण एटले पत्योपमनो असंख्यातमो भाग न्यून जाणवो- ॥ दंडकेषु आयुरवर्णनम् ॥ (११७) ॥ तिर्यंचोनु अयुष्य ॥ तिर्यंचनुं जघ० उत्कृ सर्व सूक्ष्मस्थावरनु अन्तर्मु० अन्तर्मु० ~ वादर पृथ्विनुं २२००० वर्ष बादर अप्नु ७००० वर्ष " बादर अग्निर्नु ३ दिवसर्नु बादर वायुनु ३००० वर्ष बादर साधारणवर्नु० अन्नमुं० बादर प्रत्येकवन० १०००० वर्ष द्वीन्द्रिय १२ वर्ष त्रीन्द्रियनुं " ४९ दिवस चतुरिन्द्रियनुं ६ मास गर्भज जळचरनुं पूर्वकोड वर्ष गर्भन स्थलचरनुं ३ पेल्योपम १ मनुष्यायुष्य आयन्त्रमा लख्या प्रमाणे युगलिक स्थलच. रोना ३-२-१ पल्यो०-पल्योपमासंख्येय भाग आयुष्य उत्कृष्ट तथा जघन्यथी देसूण विचारयां.
(११८)
॥ दंडकविस्तरार्थः ॥
पूर्वक्रोडवर्ष
"
गर्भज उर:परिसपंर्नु
गर्भज भुजपरिसर्पन
गर्भज खेचरनु
संमु० स्थलचरनु
संमु० जळचरनु
संमु० उर:परिनु
संमु० भुजपरितुं
संमु० खेचरनु
अपर्या० तियेच०४
पल्योनोअसंख्यातमो
८४००० वर्ष
पूर्वक्रोड वर्ष
"
५३००० वर्ष
४२००० वर्ष
७३००० वर्ष
"
अन्तर्मु०
॥ दंडकेपु आयुरिवर्णनम ॥ अवतरण-आ गाथाना पूर्वार्धयां वाकी रहेला दंडकोनुं ज- घ० आयुष्य अने उत्तरार्धथी दंडकोमा पर्याप्तिदार कडेवाय छे. ॥ मूळ गाथा ३० मी.॥ वेमाणिअजोइसिया, पल्लतयटुंसआउआ हंति । सुरनरतिरिनिरएसु, छपज्जत्ती थावरे चउगं ॥३०॥ । संस्कृतानुवादः ॥ वैमानिकज्योतिष्काः पल्यतदष्टांशायुष्का भवन्ति । सुरनरतियग्नरयिकेषु, षट् पर्याप्तयः स्थावरे चतुष्कं ॥३०॥ ॥शब्दार्थः॥ वेमाणिय-वैमानिकदेवो नर-मनुष्योने जोइसिया-ज्योतिपीदेवो तिरि-नियंचोने पल्ल-१ पल्योपम निरएसु-नारकोने तयटुंस-तेनो(पल्योनो) छ-६ (छ) आठमो भाग) पज्जत्ती-पर्याप्तियो आउआ-आयुष्यवाळा थावरे-स्थावरोने हुँति-2 चउगं- पर्याप्तियो सुर-देवोने गाथार्थ:-वैमानिक देवो (जय० थी) १ पल्योमना, अने ज्योतिषी देवो (जघ० थी) पत्योपमना आठमा भाग जे- दला आयुष्यवाळा छे, देव-मनुप्य-तिर्यंच अने नारकोने ६ पर्या प्ति छे. अने स्थावरोने ४ पर्याप्तियो छ, विस्तरार्थ:-वेमाणिय जोइसिया पल्ल तयईसआ- उआ हुन्ति-चैमानिकनु जय० आयुष्य १ पल्योपम ने मौधर्म देवलोकना देवोने आश्रयि जाणवू. अने ज्योनिपीनु आयुष्य प- ल्योपमनो आठमो भाग छ ने नाराना विमानवासी देवोनी अप- (१२०) ॥ दंडविस्तरार्थः॥ क्षाए जाणवू, शेष देवोने एथी अधिक आयुष्य छे ते संबन्धि वि- शेषता यन्त्रमा कही छे, सुरनरतिरिनिरएमु छ पजत्ति-देवोने, गर्भज मनुष्योने -गर्भज तिर्यंचोने अने नारकोने ए सर्व जो लब्धि पर्याप्ता होय तो तेओने ६ पर्याप्तियो होय छे, थावरे चउगं----लब्धिपर्याप्त स्थावरोने आहाने--शरीर--इ- न्द्रिय अने उच्छवास ए ४ पर्याप्ति होय छे, अवतरण-आ गाथामां विकलेन्द्रियोने पर्याप्ति तथा सर्व दंडके कइ दिशिनो आहार होर ? ते कहेवाय छे. ।मूळ गाथा ३१ मी.॥ विगले पंच पजत्ती, छदिसि आहार होइ सम्वेसिं पणगाइपएभयणा, अह सन्नतियं भणिस्सामि ॥३१॥ सिंस्कृतानुवादः।। विकले पंच पर्याप्तयः पदिगाहारो भवति सर्वेषां । पनकादिपदे भजना, अथ संज्ञात्रिकं भणिष्यामि ।। ३१ ॥ ॥शब्दार्थः।। स- १ देवोने सिद्धान्तमा (-श्री भगवती जी मा) ५ पर्या- प्तियो पण कही छे, परन्तु भाषा अने मन पर्याप्ति एक मयमां समकाळे उत्पन्न थवाथी प वे पर्याप्तिने एक गणा छे. माटे वस्तुतः तो दवने ६ पर्याप्तिज कहेवाय, पुनः अनुत्तर वासी देवोने शब्दोच्चार करवा जरुर नहिं होवाथी शब्दो- च्चार करता नथी परन्तु शक्तिरूप वचन पर्याप्ति छे. तथा श्री विचारसप्ततिकामां देवने नारकने बन्नेने मूळ क्रिय तथा उत्तर क्रिय संवन्धि उपरोक्त रीते ५-५ याप्तियो कही छे.
नियंत्रण ॥ दंडकेपु आहारतारम् ॥ (१२१) विगले-विकलेन्द्रियोने [अथवा मूवनस्पत्यादि] पंच-पांच पदे-स्थानकमा पज्जत्ती-पर्याप्ति भंयणा-भजना-विकल्पे छद्दिसि-छ दिशाओथी अह-हवे आहार-आहार सन्न-संज्ञा होइ-2 सम्वेसिं-सर्वदंडकोने भणिस्सामि-कहीश पणगाइ-पांच दिशि इत्यादिक गाथार्थ:-विकलेन्द्रियोने पांच पर्याप्ति के. ६ दिशिथी आवेलो आहार सर्व जीवोने होय छे पण पांच दिशि इत्यादि (त्र- ण) पदमां (-५ दिशि-४ दिशि-ने ३ दिशि ए ३ पदमां) वि- कल्पे छे, वीजो अर्थ-सर्व जीवोने ६ दिशिथी आवेलो आहार होय छे, पण मू० वनस्पत्यादि ( पांच ) स्थानकोमा विकल्प है, हवे त्रण संज्ञाओनुं द्वार कहीश. विस्तरार्थ:-विगले पंचपज्जत्ती विकलेन्द्रियोने आहार - शरीर--इन्द्रिय--उच्छ्वासने भापा ए पांच पर्याप्नि छ, कारणके ए जीवोने जीहाइन्द्रिय अने मुख होवायी अव्यक्त उच्चार क- री शके छे, अने सम्मृच्छिम होवाथी मननो अभाव छ माटे मन:- पर्याप्ति होय नहि. तथा दंडकमां अनधिकृन सम्मृ०मनुप्य आहार-गरीर--ने इ- न्द्रिय ए ३ पर्याप्नियो होय, अने सम्मृतिर्यंच पं० ने विकले. वत् ५ पर्याप्तियो होय. ॥ इति पर्याप्तिहारम् ॥ , , (१२२) ॥ दंडविस्तरार्थः ॥ गमा रह्या छे, हवे दिशि आहारद्वारमा प्रथम छद्दिसिआहार होइ सव्वे- सिं-सर्व दंडकमां छए दिशिथी आवेलो ओज आहार अने लोम आहार होय, कारणके सर्वे दंडकना जीवो लोकनी अंदरना भा. परन्तु विशेष ए छे के पणगाइ पए-पनक एटले सूक्ष्म वनस्पति इत्यादि पांच पदमां (--मू० वन० बन्ने वायु--सू. अग्नि--सू० अप्-ने सू० पृथ्विने ) भयणा--भजना एटले विक- ल्पे, अर्थात् छ दिशिनोज आहार होय एवो नियम नहिं परन्तु ६-५--४--ने ३ दिशिनो आहार पण होइ शके, कारणके, ए जी वो लोकनी अंदरना भागमां अने लोकने अन्ते-किनारे पण रहे- ला छे. त्यां ६-५--४--३ दिशिनो आहार केवी रीते होय ? ते दर्शावाय छे- लोकना सर्वथी नीचेना छेल्ला प्रतरोमां निष्कुट स्थाने खूणे रहेला एकेन्द्रिय जीव नीचे अलोकाकाशनो व्याघात होवाथी पु- द्गल द्रव्यना अभावे अधो दिशिनो आहार न ग्रहण करे, अने दिशिमां पण अलोकाकाशना व्याघाते पुद्गलागमन नहिं होवा- थी खूणानी बे पासनी बे दिशाओमाथी पण आहार न मेळवी शके माटे लोकनी नीचे छेडे रहेला जीवने ३ दिशानोज आहार मळी शके, अने एज प्रमाणे लोकना सर्वोपरि अन्ते निष्कुटस्थाने खूणामां वर्तनो एकेन्द्रिय जीव बे दिशीथी अने ऊर्ध्व दिशीधी आहार न मेळवी शके माटे बे रीते ३ दिशिनो आहार एकेन्द्रि योनेज होय, लोकना सर्वथी नीचेना छेल्ला प्रतरोमां निष्कुट स्थाने दि- १ पकेन्द्रियोना २२ भेदमांथी वायु ने प्रत्ये० वन - सि- वायना ४ बादरो नहिं होवाथो १२ भेद लोकने अन्ते रह्याछे पम श्री भगयती जीमां क छे.ह्यु ॥ दंडकेपु संज्ञाद्वारम् ।। (१२३) शिमा रहेलो एकेन्द्रियजीव नोचे अने एक पासनी दिशामा अलो- कांकांश होवाथी बे स्थानेथी आहार मेळवी शके नहि माटे ४ दि- शिनो आहार करे. ए प्रमाणे सर्वोपरितन प्रतरोमां उध्वदिशियो अने एक पडखानी दिशिमांथी आहारना अभावे बे रीते ४ दिशि- नो आहार होय. तथा सर्वथी नीचे एकादि प्रतर छोडीने उपरनां प्रतरोमां लोकने अन्ते दिशामां रहयो होय तो मात्र जमणी वाजूनी दि- शाए अलोकनो व्याघात थवाथी पुद्गल ग्रहण नहिं करी शक- वाथी पांच दिशिथीं आवेलो आहार ग्रहण 'करे, अने लोकनी अंदरना भागमा रहेला एकेन्द्रियोने कोइपण दिशाए अलोकाकाशनो व्याघात नहिं नडवाथी छए 'दिशिमांथी आहार मेळवी शके छे. ॥ ॥ इति आहारद्वारम् ।। तथा सम्मू० ति ने सम्मू० मनुष्यने ६ दिशिनो आहार होय भने जीवोना निराहारीपणानो समय आहारद्वारना वर्णन प्रसंगे कह्यो छे, ॥ इति आहारद्वारम् ॥ 1 उध्घ वा सर्वाधस्तन वा सर्वोपरितन प्रतरोमां लोकनो तीळन्ति भाग वर्जीने अंदरना भागमा रहेलो एके० जीव पण अधीमाथी कोइपण एक दिशिनो आहार न मेळघी शकतो ए रीते पण पांचदिशीनो आहार संभवे छे परन्तु सिद्वा- न्तोमा उपर प्रमाणेनु दृष्टांत बतायेलं होवाथी अहीं ते प्र. माणे लख्यु छे, तत्त्व केवलिमहाराज नाणे. २ अहीं विदिशाओ एक प्रदेश श्रेणिरूप होवाथी तेटला एक प्रदेशरूप भागमां आहार होइ शके नहिं कारण पक प्रदे- श स्थित द्रव्य जीवगाद्य होय नही. आहारदेशमा आवेली विदिशानो एक प्रदेश बहुतम दशयालो दिशाओमांज गणार जती होवायी १० दिशानो आहार करवाय नाही.
(१२४) ॥ दंडकविस्तरार्थः॥ अहसन्नितियं भणिस्सामि-हवे हुँ हेतुवादोपदेशिकी- दीर्घकालिकी-ने दृष्टिवादोपदेशिकी ए त्रण संज्ञाओमांनी कये दंडके केटली संज्ञाओ होय ते कहीश. अवतरण-आ गाथामा दंडकाने विषे संज्ञाद्वारे कहे . A , ॥मूळ गाथा ३२ मी.॥ चउविहसुरतिरिएसु, निरएसु य दीहकालिगी सन्ना विगले हेउवएसा, सन्नारहिया थिरा सव्वे ॥३२॥ ॥संस्कृतानुवादः॥ चतुर्विधसुरतिर्यक्षु, नैरयिकेषु च दीर्घकालिकी संज्ञा । विकले हेतूपदेशिकी, संज्ञारहिताः स्थिराः सर्वे ॥३२॥ शब्दार्थः। चउविह-चार प्रकारना विगले-विकलेन्द्रियोमा हेउवएसा-हेतुवादोपदेशिकी तिरिएसु-तिर्यंचोमां संज्ञा निरएम-नारकोमा सन्नारहिया-स ज्ञारहित थिरा-स्थावरो दीहकालिगी-दीर्घकालिकी सब्वे-सर्व संज्ञा गाथार्थ:-चार प्रकारना देवो-तियचो-अने नारकोमां दीर्घकालिकी संज्ञा छे, विकलेन्द्रियोमा हेतुवादोपदेशिकी संज्ञा छे. अने सर्वे स्थावरो संज्ञारहित छे, विस्तरार्थ:-सुगम छे. सुर-देव य-~अने है ॥ दंडकेषु संज्ञाद्वारवम् ॥ (१२५) अवतरण-आ गाथाना पूर्वार्धमां बाकी रहेला दंडकोए संज्ञा, अने उत्तरार्धमांथी आगति तथा गतिद्वार कहेवानां प्रारं- भमां प्रथम देवमां आगतिद्वार कहे छे, ।।मूळ गाथा ३३ मी॥ मणुआण दीहकालिय, दिट्ठीवाओवएसिया केवि । पज्जपणतिरिमणुअच्चिय,चउविह देवेसुगच्छति॥३३।। ॥संस्कृतानुवादः।। मनुष्याणां दीर्घकालिकी, दृष्टिवादोपदेशिकाः केऽपि । पर्याप्नपंचेन्द्रियतिर्यग्मनुजा एव चतुर्विधदेवेषु गच्छंति ३३ ॥शब्दार्थः।। मणु आण-मनुष्योने पण-पंचेन्द्रिय दीहकालिय-दीर्घकालिकीसंज्ञा तिरि-तिर्यंचने दिठ्ठीवाओवएसिया-दृष्टि मणुअ-मनुष्य वादोपदेशिकी संज्ञा च्चिअ-निश्चय के-केटलाएक चउविह-चारमकारना ऽवि--पण-वळी- देवेसु-देवोमां गच्छति-जायछे गाथार्थ:--मनुष्योने दीर्घकालिकी संज्ञा छे. अने केटलाएक ( मनुष्यो )ने तो दृष्टिदोपदेशिकी संज्ञा पण होय छे, ।। पर्याप्त पंचेन्द्रिय तिर्यंच, अने पर्या० मनुष्यो ज चारे प्रकारना देवोमां जाय छे, १ चोथी गाथामां द्वारोनो जे अनुक्रम दर्शाव्यो छे, ते मां प्रथम गतिद्वार अने बीजु आगतिहार का छे, ने अदि द- डकोमा अवतारतां प्रथम आगतिहार अने त्यारवाद गनिहार कहेवाशे ए क्रमविपर्यय वक्तानी विवक्षाने आधारे होय हे. पज्ज-पर्याप्त (१२६) ॥ दंडक विस्तरार्थः ॥ विस्तरार्थ:-मनुष्योने दीर्घका० संज्ञा कही पण ते सर्व गर्भज मनुष्यने छे, अने सम्मू० मनुष्यो तो मनरहित होवाथी है- तुवादो० संज्ञावाळाज छे, पुनः केटलाएक मनुष्योने जे दृष्टिवादो० संज्ञा कही ते संवन्धद्वार प्रसंगे कहयो छे, दृष्टिवादो० संज्ञा सम्य- ग्रदृष्टिने ज होय छे, 1 नथा पर्या० पंचे० ति० अने मनुष्यज चारे प्रकारना देवोमां जाय. ए देवोमां आगति सामान्यथी कही, ने विशेषथी आ प्र- माणे--१० भवन, १६ व्य०, १५ परमाधामी, १० जुंभक, ए ५१ देवोमा १०१ प्रकारना लब्धिपर्याप्त मनुष्यो तथा युगलिक चतुष्पद सहित ५ गर्भज तिर्यंच लब्धिपर्याप्ता ने ५ सम्मू तिर्य- च लब्धिपर्याप्त एटला जीवो ( ए ५१ देवोमां) आवी उपजे. अने १० ज्योतिषी तथा सौधर्मकल्पमा अन्तीप विना ४५ क्षेत्र- ना मनुष्यो ने ५ गर्भ० तिर्यंच ए ५० जीवो आवी उपजे छे, ई- शानमां पूर्वोक्त ५० मांथी ५ हिमवन्त ने ५ हिरण्यवन्त क्षेत्रना युगलिक मनुष्य अने युगलिक तिर्यंच सिवायना ४० जीवो आवी उपजे, अधो किल्बिषिकमा १५ कर्मभूमिना संख्येय वर्षायुष्क ( वधुमां वधु पूर्वक्रोड वर्षायुष्क ) पर्या० ग० मनुप्यो, ५ देवकुरु ने ५ उत्तरकुरु क्षेत्रना युगलिक तिर्यंच अने युगलिक मनुष्यो तथा संख्येयायुप्क ५ गर्भज तिर्यंच लब्धिपर्याप्ता ए ३० जीवो आवी उपजे, तथा ३ जा थी ८ मा कल्पसुधीमां संख्येयायुष्क लब्धिप- र्याप्त १५ कर्मभूमिना गर्भज मनुष्यो अने एज विशेषणवाळा ५ गर्भतिर्यचो मली २० जीवो उपजे,ने आनतथी सर्वाथ मुधीमां- उक्त विशेषणवाला १५ कर्मभूमि मनुप्यो आवी उपजे. अवतरण-आ गाथामां देवनुं गतिद्वार (-देवो मरण पामी ने क्यां उपजे ? ते ) कहे छे, ॥ दंडकेषु गत्यागनिद्वारम् ।। (१२७) ॥ मूळ गाथा ३४ ॥ संखाउपज्जपणिंदि, तिरियनरेसु तहेव पज्जत्ते । भूदगपत्तेयवणे, एएसु च्चिय सुरागमणं ॥ ३४ !! ॥संस्कृतानुवादः॥ संख्ययेयायुष्कपर्याप्तपंचेन्द्रिय तिर्यग्नरेषु तथैव पर्याप्तेषु । भूदकप्रत्येकवनेषु, एतेष्वेव सुरागमनं ॥ ३४ ॥ ||शब्दार्थः॥ संखाउ-संख्यातवर्पना आयु- भू-पृथ्वीकाय ब्यवाळा दग-अपकाय पज्ज-पर्याप्त पत्तेयवणे-प्रत्येक वन० कायमा पणिदि-पंचेन्द्रिय एएसु-ए ५ दंडकोमा तिरिय-तिर्यंचमां च्चिय-निश्चय नरेसु-मनुष्यमा मुर-देवतुं तहेव-तेमज-तथा आगमणं-आवर्बु (-गति) पजते-पर्याप्तमां गाथार्थः-संख्यातवर्पना आयुप्यवाळा पर्याप्त पंचेन्द्रिय तिर्यचपां अने ( संख्या० पर्या० पंचे० ) मनुष्यमां, तेमज पर्या- प्त पृथ्वीकाय--अपकाय--अने प्रत्येकवनस्प० कायमा ए ५ दंड- कोमा ज देवोर्नु आव( उपजq ) थाय छे. विस्तरार्थः-संख्यान आयुष्यवाळा एटले कर्मभूमिमां उत्प- न थयेला, वधुमां वधु कोडपूर्व वर्पना आयुष्यवाला लब्धिपर्याप्त पंचेन्द्रिय गर्भज तिर्यंचोमां, कर्मभूमामां उत्पन्न थयेला बधुमां वधु क्रोडपूर्व वपना आयुष्ययाला लब्धिपर्याप्त गर्भज मनुग्योमा, स- (१२८) ॥ दंडकविस्तरार्थः ॥ , वत्र उत्पन्न थती लब्धिपर्या० बादर पृथ्वी, लब्धिपर्या० बा० अप, अने ल० पर्या० चा० प्रत्येक वनस्पतिमां ज, देवोर्नु आगमन( गति. -उत्पत्ति ) छे. कारणके देवो मरण पामीने अपर्याप्ता थता नथी, ते- मज देवोच्यवीवमां अने नारकमां पण न जाय अने विकलेन्द्रि- यमां तथा अग्नि वायुमा उत्पन्न थतां नथी, ए प्रमाणे देव ( ना १३) दंडक नी गति सामान्यथी कही, अने विशेष एज छे के भु- वनपति--व्यन्तर--ज्योतिषि-सौधर्म- ने ईशान एटला देवलोकना देवोज पूर्वोक्त ५ स्थाने जाय छे, सनत् कुमारथी सहस्रार सुधीना देवो संख्येयायुक ल० पर्या० ग० तिर्यंच अने एज विशेषणवा- ला ग० मनुष्योमां जाय छे आनतादिथी सर्वार्थ सुधीना देवो फक्त कर्मभूमिमां संख्यात आयुष्यवाळा पर्याप्त गर्भज मनुष्यो. मांज जाय छे, पुनः प्रत्येक वनस्पतिमा जे देवो उत्पन्न थाय छे, ते पण अमुकज उत्पन्न थाय छे ते संवन्धि विशेष विगत श्री भग- वतीजीमां अथवा द्रव्यलोकप्रकाशमां छे त्यांथी जाणवी. पुनः केटलाएक देवोने जेओ प्रथमथी जाणे छे के मारे अमु- क वृक्षमां उत्पत्न थवार्नु छे तो ते देवो मान दशाना बशथी ते वृ- क्षनो दैविक चमत्कार दर्शावी लोकोमा पूजनीक करे छे, ने ते तृ- क्षनो महिमा वधारे छे, अवतरण-आ गाथामां नारक जीवोनी आगति तथा गति (-कया कया जीवो नारकगतिमां आवे. अने नारको · मरण पामीने कइ कइ गनिमां जाय ते ) कहे छे.
॥ दंडकेषु गत्यागतिद्वारम् ।। ॥ मूळ गाथा ३० मी.॥ पज्जत्तसंखगब्भय, तिरियनरा निरयसत्तगे जन्ति । निरयउवहा एएसु, उववज्जति न सेसेसु ॥ ३५॥ ॥ संस्कृतानुवादः॥ पर्याप्तसंख्येयायुर्गर्भजतिर्यग्नरा नरकसप्तके यान्ति । नरकोत्ता एतेषूपपद्यन्ते न शेषेषु ॥ ३५ ॥ ॥शब्दार्थः॥ पज्जत्त-पर्याप्त जन्ति-जाय छे, संख-संख्यात आयुष्यवाला निरय-नरकमांथी गव्भय-गर्भज उवट्टा-नीकळेला जीवो तिरिय-तिर्यंच नरा-मनुष्यो उववजन्ति-पजे छे निरय-नरकमा न-नथी उपजता सत्तगे-सात (मां) सेसेसु-चाकीना दंडकोमा गाथार्थ:-पर्याप्त संख्यात आयुग्यवाळा गर्भज तिर्यच अने पर्या० संख्यायुष्यवाळा गर्भज मनुष्यो साते नरकमां जाय छे, ए नारकनी आगति कही, अने नरकमांधी निकळेला (अर्थात) नारको ए बेमा ज उपजे छे पण वाकीना (२२) दंडकोमा उप- जता नबी ए नारकनी गति कही, विस्तरार्थः-पर्याप्त संख्यात आयुष्यवाला गर्भन निर्यची अने एज विशेषणवाला ग० मनुष्यो सात नरकमां जाय ए नार- कमां आगति सामान्यथी कही, अने विशेषधी आ प्रमाणे- रत्नप्रभामां-१५ कर्म० मनु- ग. निः-५ समक एएसु-ए वन्नेमां
(१३०)
॥ दंडक विस्तरार्थः॥
ति०-ए २५ लब्धिपर्याप्ता आवे, युगलिक मनुष्य वा तिर्यंचोनी
अवश्य देवगति होवाथी तेओ नरकमां उपजता नथी.
शर्करामभामां-१५ कर्म० मनु०-ने ५ ग० ति०-२०
वालुकाप्रभामां-१५ कर्म० मनु०, ने भुजपरि० विना -४
गर्भज तिर्यंच ए १९ लब्धिपर्या० जीवो आवे.
पंकप्रभामां-१५ कर्म० मनु०, ग० जल०-१० थल० ने
ग० उर० ए १८ ल० पर्याः जीवो आवे,
धूमप्रभामां-१५ कर्म० मनु० ग० जल०-ग० थल०-१७
तमप्रभामां-१५ कर्म० मनु०-ग० जल० १६
तमतमप्रभामां-स्त्रीविना १५ कर्म । मनु०-गजल०-१६
ए प्रमाणे नारकजीवोमां आगति कहीने हवे नारक जीवो
क्या उत्पन्न थाय ? ते नारकनी गति कहे छे,
रत्नप्रभादि ६ नी--लब्धिपर्याप्त संख्येयायुष्क गर्भ० म.
नुष्यो १५ कर्मभूमिना, अने एज विशेषणबाळा गर्भ० तिर्यंच पं
चेन्द्रिय पांच ए २० भेदमा जाय, नारको मरण पामीने लब्धि
अपर्या०
॥ इति नारकगत्यागतिः ।।
० न थाय.
अवतरण-आ गाथामां पृथ्वि-अप्-अने वनस्पतिनी (मां
कई कइ गनिना जीव आये ते ) आगति कहे छे.
।।मूळ गाथा ३१ मी.॥
पुढवी उवणस्सइ--मज्झे नारयविवजिया जीवा ।
सव्वे उववजंति, नियनियकम्माणुमाणेणं ॥ ३६ ॥
संस्कृतानुवादः।।
पृथ्व्यवनस्पतिमध्ये नारकविवनिता जीवाः ।
मा उपपद्यन्ते निजनिजकर्मानुमानेन ॥ ६ ॥
॥ दंडकेषु गत्यागतिद्वारम् ॥ (१३१) ॥शब्दार्थ पुढवी-पृथ्विकाय जीवा-जोवो आऊ-अपकाय सव्वे-सर्व जीवो वणस्सइ-वनस्पतिकाय उववजन्ति-उत्पन्न थाय छे, मज्झे-मध्ये-मां नियनिय-पोतपोताना नारय-नारक कम्माणुमाणेणं-कर्मने अनुसारे विवज्जिया-वर्जीने-सिवायना गाथार्थः-पृथ्विकाय-अप्काय-ने वनस्पति मध्ये नारक सिवायना सर्वे जीवो पोत पोताना कर्मने अनुसारे उत्पन्न थाय छे, (ए पृथ्व्यादि ३ मां आगति कही.) विस्तरार्थः-आ गाथामां पृथव्योदि ३ दंडकमां आगति सामान्यथी कहीने विशेपथी आ प्रमाणे-- प० पृथ्चि-अप-ने प्र० वनस्पतिमा-४८ तिर्यंच-१. ०१ सम्मू० मनुष्य कर्मभूमिना पर्या० अपर्या. मली ३० मनुष्य- १५ परमाधामी-१० भवनपति-१६ व्यन्तर-१० मुंभक-१० ज्योतिपी-सौधर्म-ईशान-अधो किल्विपिक ए प्रमाणे २४३ जी- वो ए ३ लब्धिपर्याप्तमां आवी उपजे. अपर्या० पृ० अप-प्र० वनः तथा सर्व साधा० वनस्प- तिमी ४८ तिर्यंचो तथा ३० कर्म० मनुष्यो,१०१सम्मू० मनुग्यो आवी उपजे छे, ए प्रमाणे ए ३ दंडकमां पूर्वोक्त दंडकना जीव- भदो पोत पोताना कॅमने अनुसारै (-कर्मना वशथी ) उत्पन्न था- य छे, ए चोया चरणमां जीवोने परभव जवामां ईश्वरप्रेरणा- ना लौकिक मतनुं निवारण कयूं जाणवू. १ कर्भने अनुसारे कहेयाथी जे केटलाक घादीभो ईश्वरेच्छा अथवा ईश्वरप्रेरणाथी गत्यागति करे हे तेम फद्दे ई तेनु संडन कयु कारण इच्छा अथवा प्रेरणा सकर्मजीवk कार्य हे, अने कर्म रहित थया विना ईश्वर कही याय नाही ॥ दंडविस्तरार्थः॥ अवतरण-आ गाथाना पूर्वाधमां पृथ्वी अपू-ने वनस्पति जीवो मरण पामीने का गतिमां उपजे ? (त्रणनी गति ) ते अने उत्तरार्धमां तेउकाय-वायुकायमां कया जीवो आवे ? (ए बेनी आगति ) कहेवाय छे, मूळ गाथा ३७ मी॥ पुढवाइदसपएलु, पुढवीआऊवणस्सई जन्ति । पुढवाइदसपएहि य, तेउवाऊसु उववाओ ॥ ३७॥ । संस्कृतानुवादः॥ पृथ्व्यादिदशपदेषु पृथ्व्यापो वनस्पतयो यान्ति पृथ्व्यादिदशपदेभ्यश्च तेजोवाय्वोरुपपातः ॥ ३७॥ ॥ शब्दार्थः॥ पुढवाइ-पृश्चिकाय विगेरे पुढवाइ--पृथ्विकाय विगेरे दस-दश पएम-पदोमां--स्थानमां पएहि--पदमांयी-स्थानमांधी पुढवी-पृश्चिकाय य--वळी आऊ- अपकाय तेउ- अग्निकाय वणस्सइ- वनस्पतिकाय वाऊमु-वायुकायमां- जन्ति--जाय छे. | उववाभो-उपज उत्पत्ति-आगति गाधार्थः-पृथ्विकाय विगेरे १० स्थानमां पृथ्वि-अप- अने वनस्पनिकाय जाय छे, अग्निकाय अने चायुकायमां पृथिव- काय विगैरे १० स्थानकवी (जीवोन ) उपजवु ( आवg ) धाय विस्तरार्थ:-पृथ्वि-अप-ने वनस्पतिजीवी पृथ्वि-अप- अग्नि-वायु-वनस्पति-द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-चतुरिन्द्रिय-ग० तिर्य- ॥ दंडकेषु गत्यागतिद्वारम् ॥ च-ने ग० मनुष्य ए १० स्थानमां जाय छे, परन्तु विशेष ए छे के-ए ३ जीवो कर्मभूमिना ३० मनुष्यभेदोमा १०१ सम्मृ० मनु०मां, ने ४८ तिर्यंचमां मली १७९ जीवभेदमां उत्पन्न थाय छे, पण युगलिकोमा जता नथी. पृथ्व्यादि ३ नी गति कही, हवे अग्नि अने वायुमां आगति कहे छे के पृथ्ब्यादि १० पदमांथी नीकळीने जीवो अग्नि अने वायुमां उपजे छे, त्यां १०१ सम्म्० मनुष्य, ३० कर्म० मनुष्य, ने ४८ तिर्यंच ए १७९ जीव भेद अग्नि-- वायुमां आवी शके छे, पण युगलिको आवता नथी, ॥ इति अग्निवायुमां आगति ॥ अवतरण-आ गाथाना पूर्वार्धमां अग्नि अने वायु मरण पामीने क्यां जाय ? (-अग्नि-वायुनी गति ते ), अने उत्तरार्धमां विकलेन्द्रियोनी आगति तथा गति कहेवाय छे. ॥मूळ गाथा ३८ मी,॥ तेऊवाऊगमणं, पुढवीपमुहमि होइ पयनवगे | पुढवाइठाणदसगा, विगलाइतियं तहिं जन्ति ॥३॥ ॥ संस्कृतानुवादः ॥ तेजोवायुगमनं, पृथ्वीप्रमुखे भवति पदनवके । पृथ्व्यादिस्थानदशकाद् विकलत्रिकं तत्र यान्ति ॥ ३८ । ॥ शब्दार्थः॥ तेऊ--अग्निकाय पुढवी-पृथ्विकाय चाऊ-वायुकायन पमुहम्मि--वगेरेमां गमण- गति-जवू होइ--छे,
(१३४)
॥ दंडकविस्तरार्थः॥
१
: पयनवगे-नव स्थाने
विगलाइ-विकलादि
पुढवाइ-पृथ्विकाय विगेरे तियं-त्रिक
ठाण--स्थान-पद
तहि-त्यां (पृथ्व्यांदि१०स्थानमां)
दसगा--दशमांथी
जति-जाय छे,
गाथार्थ-अग्निकाय अने वायुकायनी गति पृथ्विकाय वि-
गेरे नव स्थानकमां होय छे, विकलेन्द्रियो पृथ्विकाय विगेरे १०
स्थानमाथी आवे छे, अने ( पुनः ) त्यांज (पृथच्यादि १० स्था-
नमां) जाय छे.
विस्तरार्थः-अग्नि ने वायुनी गति पृथ्व्यादि ९ पदमा
(--४८ नियंचमां),
तथा विकलेन्द्रियमा आगति-पृथ्व्यादि १० पदथी क-
ही ते पृथ्व्यादि ३ दंडकवत् १७९ जीवभेदथी जाणवी. तथा वि-
कले० नी गति पण तेवीज रीते १७९ जीवभेदोमां जाणवी
गाथामां पुढवाहठाणदसगा विगलाइ तियं एटलां पदथी वि-
कलेन्द्रियोनी आगति कहे छे, अने विगलाइतियं तहिं जंति
ए पदथी विकले० नी गति कही छे. त्यां विगलाइ तियं ए पद
डमरुकमणि न्यायथी बन्ने बाजु लागी शके छे.
अवतरण-आ गाथाना पूर्वाधमां गर्भनतिर्यंचोनी आगति
तथा गनि, अने उत्तरार्धमां गर्भज मनुष्योनी आगति नथा गति
कहे छे,
।।मूळ गाथा ३९ मी.।।
गमणागमणं गब्भय-तिरियाणं सयलजीवठाणेसु ।
सव्वत्थ जन्ति माणुया, तेऊवाऊहि नो जन्ति ॥३९॥
॥ दंडकेषु गत्यागतिद्वारम् ॥ ५ ॥संस्कृतानुवादः।। गमनागमनं गर्भजतिरश्ची सकलजीवस्थानेषु सर्वत्र यान्ति मनुजास्तेजोवायुभ्यां नो यान्ति ॥ ३९ ॥ ॥शब्दार्थः॥ गमण-गति- जर्बु सम्बत्थ-सर्व स्थानके आगमण-आवद्यु जति-जाय छे. गब्भय गर्भज मणुभा-मनुष्यो तिरियाण-तिर्यंचोर्नु तेउ-अग्निकायमांथी सयल-सकल-सर्व वाऊहिं-वायुकायमाथी जीवठाणेसु जीवस्थानोमां नो-नथी ( जीवभेदोमां) जंनि-जाय छे गाथार्थ:-गर्भन तिर्यंचोनी गति आगति सर्व जीवभेदोमा होय छे, (ग० तिर्यंचो सर्व जीवभेदोमां जाय छे ), मनुष्यो सर्व जोवभेदोमां जाय छे, ( अने सर्व जीवभेदोमांथी आवे छे परन्तु ) अग्नि अने वायुमाथी जता ( आवता ) नथी. . विस्तरार्थ:-गर्भज तिर्यचौनी गति ने आगति सर्व जीव स्थानोमा छे एटले गर्भज तिर्यंचो सर्व दंडकमां उपजे छे, अने ग. ति० मां पण सर्व दंडकना जीव आवी उपजे छे. तोपण विशेष जीवभेदने आश्रयि ग० तिर्यंचनी गति आ प्रमाणे- पर्या० ग० जलचर-आननादि १८देवलोक सिवायना५२७ जीवभेदमां उत्पन्न थाय छे. पर्या० ग० उरपरिसर्प-ऊर्ध्वना .८ देवलोक तथा ६-७ पृ. थ्वीना नारक सिवाय ५२३ भेदमां. 4 , (१३६) ॥ दंडकविस्तरार्थः ॥ गर्भ० पर्या० चतुष्पद-ऊर्ध्व १८ देव०, तथा ५-६-७ पृ- थ्वि सिवाय ५२१ भेदमा ग० पर्या० खेचर-ऊर्ध्व १८ देव०- तथा ४-५-६-७ पृथ्वि सिवाय ५१९ भेदमा ग० पर्या० भुजपरि०-ऊध्र्व १८ देव०-तथा ३-४-५-६ -७ पृथ्वि सिवाय ५१७ भेदमां, सम्मू० पर्या० तिर्यंच पंचे०५-ज्यो० वै० सिवाय ५१ देवमां, ५६ अन्तीपमा, रत्नप्र० मां, ३० कर्मभूमि मनु० मा, २०१ सम्मू० मनु० मां ने ४८ तिर्यचमा पर्याप्त पणे ने अपर्या- प्नपणे पण उपजे तथा ए १० अपर्याप्त तिर्यंच पचेन्द्रियो ३० कर्म० मनुष्योमा १०१ सम्मृ० मनु०मां, ने ४८ तिर्यंचमां उपजे ए प्रमाणे २० ति- बैंच पंचेन्द्रियोनी गति कहीने हवे २० तिः पंचे० नी आगति कद्देवाय छे. ५ पर्या० ग० तियेचमां-१०१ सम्मू० मनु०, ३० क- म० मनु०, ४८ ति, १५ परमा०, १० भुव०, १६ व्य०, १० जे०, १० ज्योनिपी, ३ किल्बि०, ९ लोकां, ८ कल्प, ने ७ नारकना जीवो आवी उपजे, ५ अप० ग० तिर्यंचमां-१०१ सम्मू० मनु०, ३० कर्म० मनु०, ४८ नि०, एटला जीवो आवी उपजे. १० सम्मू० तिथंच पंचे० मां-१०१ सम्मू० मनु०, ३० कर्म० मनु०, ने ४८ तिर्यचो आवी उपजे. ए प्रमाणे तिर्यचोनी गत्यागनि कहीने हवे ग. मनुष्योनी गत्यागनिमां प्रथम ग० मनु० नी आगति ने त्यारवाद गति कहेवाय . , ॥ दंडकेषुः गत्यागतिहारम् ॥ (१३७), ३०१ १५ ग० पर्या० कर्म० मनु०-५६३ जीवभेदमां जाय, ३० पर्यो० अकर्म० मनु०-१० भु०, १६ व्यं०, १५ प- रमा०, १० ०, १० ज्यो०, १ अधोकिल्बि०, सौ०, ने ईशान ए ६४ स्थाने जाय. ५६ पर्या० अन्तर्वीप मनु०-५१ देवोमां १०१ अपर्या० ग० मनु० ४८ तिर्यंच, ३० कर्म० मनुष्य,ने १०१ सम्मू० मनु० १०१ सम्मू० मनुष्योमां उपजे. ए प्रमाणे मनुष्योनी गति कही ने हवे आगति कहेछ, १५ ग० पर्या० कर्म मनु० मां-१५ कर्मभू० मनु०, अग्निने वायु विना सर्व सूक्ष्मवादर एकेन्द्रिय, ३ विफले०, सर्वप्रकारना ति. पंचे०, १०१ सम्मू० मनुष्य, ९९ देव, अने प्रथम ६ पृथ्विना नारक आवी उपजे. ३० अकर्म मनु० मां-१५ कर्म० पर्या० मनु०, ने ५ ग० पर्या. ति० ए २०. ५६ अन्ती मनु० मां-१५ कर्म० पर्या० मनु०, १० पर्याप्त नि० पंचे० ए २५. शेष सर्व मनुष्यमां--२०१ सम्मू०, मनु०, तेउ० वायु वि- ना शेष सर्व तिर्य०, ने १५ कर्म० मनुष्य आवी उपजे. । इति गत्यागतिद्वारम् ॥ , . अवतरण-आ गाथामां सर्व दंडकने विषे वेदवार कडेवाय छे.
(१३८) ॥ दंडकविस्तरार्थः ॥ नारएम-नारकोपां (ने) ॥ मूळ गाथा ३४ ॥ वेयतिय तिरिनरेसु, इथि पुरिसो य चउविहसुरेसु । थिरविगल नारएसु, नपुंसवेश्रो हवइ एगो ॥४०॥ ॥संस्कृतानुवादः॥ वेदत्रिक तिर्यग्नरयो: स्त्री पुरुषश्च चतुर्विधसुरेषु । स्थिरविकलनारकेषु, नपुंसकवेदो भवत्येकः ॥४०॥ शब्दार्थः॥ वेय-घेद थिर-स्थावर तिय-त्रण विगल-विकलेन्द्रिय तिरिनरेसु-तिर्यचमनुष्योमा इत्यी-स्त्रीवेद नपुंसवेओ-नपुंसक वेद पुरिसो-पुरुषवेद य-अने चउविह-चारप्रकारना एगो-एक मुरमु-देवोमां (देवोने) गाथार्थ:-तिर्यच अने मनुष्योमा त्रण वेद छे, चार प्रका- रना देवोमां स्त्रीवेद अने पुरुपवेद छे, अने स्थावर ( एकेन्द्रिय ) --विकलेन्द्रिय-तथा नारकोमा एक नपुंसकवेद ज छे. विस्तरार्थः----निर्यच तथा मनुमा ३ वेद कह्या त्यां स- र्व सम्मृ०मनुष्य तथा सम्मृ०निर्यच पञ्चन्द्रियने फक्त एक नपुंसक- बद होय, अने गर्भज जीवामां केटलाएक पुरुपर्वदी केटलाएक स्त्री- बेदी ने केटलाएक जीवो नपुंसकवेदी पण होय छे, नधा चारे प्रकारना देवोमां नपुंसकवेद नहिं होवाथी मात्र स्त्रीयद अने पुरुषवेदन छे, शेप व्याख्या सुगम हे.
॥ दंडकेषु अल्पबहुत्वद्वारम् ॥ (१३९) अवतरण----हवे आ.गाथाथी २४ दंडकमांथी कया दंडकना जीवो अल्प अने कया दंडकना जीवो अधिक छे, ? ते कहे छे. ॥ मूळ गाथा ४० मो. ।। पजमणु बायरग्गी, वेमाणियभवणनिरयवंतरिया। जोइसचउ पण तिरिया, बेइंदि तेइंदि भूआऊ॥४०॥ ।। संस्कृतानुवादः ॥ पर्याप्तमनुजबादाग्निवैमानिकभवनपतिनैरयिक- व्यन्तरकाः। ज्योतिश्चतुष्कपञ्चेन्द्रियतिर्यचो द्वीन्द्रियत्रीन्द्रियभ्वापः ॥४०॥ शब्दरार्थः पज्ज-पर्याप्त जोइस-ज्योतिषीदेव मणु-मनुष्य घउ-चतुरिन्द्रिय बायर-बादर पण-पञ्चेन्द्रिय अग्गी-अग्नी तिरिया-तिर्यंचो वेमाणिय-वैमानिक वेइंदि-दीन्द्रिय भवण-भवनपति तेइंदि-त्रोन्द्रिय निरय-नारक वंतरीया-व्यंतरो आऊ-अपकाय गाथार्थः- पर्याप्तमनुष्य--बादर अग्नि--यैमानिक--भवनपति --नारक-व्यन्तर-ज्योतिषी- चतुरिन्द्रिय-पचेन्द्रियतिर्यच--दीन्द्रिय -त्रीन्द्रिय-पृथ्विकाय-अप्काय ( संवन्ध आगळनी गाथा साये.) ? आगळ लघु अल्पावहुत्व जुओ. भू-पृथ्विकाय (१४०) ॥ दंडकविस्तरार्थः॥ विस्तरार्थ:-सुगम छे. पण आगळ लघु अने- महाल्पबहुता जुओ . अवतरण-- गाथामां पण बाकी रहेला दंडकोनुं अल्पवहुत्व कां छे. |मूळ गाथा ३८ मी॥ वाउ वणस्सइ च्चिय, अहिया अहिया कमेण मे हुति। सब्वेवि इमे भावा, जिणा मए गंतसो पत्ता ॥ ४२॥ ॥ संस्कृतानुवादः॥ वायुर्वनस्पतिश्चैव अधिका अधिका क्रमेणेमे भवन्ति । मर्वेऽपि इमे भावाः, हे जिना मया ऽनन्तशः प्राप्ताः ४२॥ ॥ शब्दार्थः॥ वाउ--वायुकाय हुंति छे. वणस्सइ-वनस्पनिकाय सव्वेवि--सर्वे पण चिय-निश्चय इमे--ए पूर्वोक्त(पर्या०मनुष्यादि) अहिया अडिय--अधिक भावा--भाव अधिक जिणाहे जिनेश्वरो कमेण- अनुक्रमे इमे--ए पूर्वोक्त ( पर्याप्त अणंतसो- अनंतवार मनुष्यादि ) पत्ता--प्राप्त कर्या गाधार्थ:----वायुकाय अने वनस्पतिकाय निश्चय ५ पूर्वोक्त ( पर्या० मनुष्यादि) अनुक्रमे अधिक अधिक छे. हे जिनेश्वरी ए सर्व पर्या०मनुष्यत्वादि ) भावो में अनंतवार प्राप्त कर्या के. ( माटे हवे एकवार प्राप्त यना मोक्ष पद आपो ..-ए दंडक रूप म्नुनिन नात्पर्य आगलनी गाथा माथे मंवन्धवाळु छे. ) मए-मे ॥ दंडकेषु अल्पबहुत्वद्वारम् ॥ (१४१) विस्तरार्थ:---अल्पवहुत्व संबन्धि बन्ने गाथाओमां जीवो सामान्यतः अधिक अधिक कह्या पण केटला अधिक ? ते कयु नथी माटे ते स्पष्ट रीते दर्शावाय छे.--. ॥ २४.दंडकनु अल्पबहुत्व ।। ग पर्याप्त मनुष्य १ बादर अग्नि १ वैमानिक भवनपति १० सर्वथी अल्प असंख्य गुण असंख्य गुण असंख्य गुण असंख्य गुण असंख्य गुण संख्य गुण संख्य गुण - नारक व्यन्तर ज्योतिषी चतुरिन्द्रिय पञ्चे निर्यच १ द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय पृथ्विकाय अप्काय वायुकाय वनस्पतिकाय ? २ विशेषाधिक विशेषाधिक असख्य गुण असंख्य गुण असंख्य गुण अनंत गुण M *अहिं पर्याप्त जीवाश्रयि आ अल्पबहुत्व का खे- (२४२) ॥ दंडकविस्तरार्थः॥ ॥ महादंडकाल्पबहुत्वम् ॥ सर्वथी अल्प संख्य गुण/२७अधिक२७गुण असंख्य गुण संख्यात गुण " " १ गर्भज मनुष्य २ गर्भज मनुष्य स्त्री ३ पर्यावा० अग्नि ४ अनुत्तर देव ५ उर्वत्रण ग्रेवेन्देवो ६ मध्मवैत्रिकदेवो ७ अधो ग्रे० देवो ८ अच्युत कल्पदेवो २ आरणकल्प देवो १० प्राणतकल्प देवो ११ आनतकल्प देवो १२ नमतमा नारक १३ तमा नारक १४ सहसार कल्पदेवो १५. महाशुक्र कल्प देवो १६ धृमप्रभानारक १७ लांतक कल्प देवो १८पंप्रमानारक १० प्रकल्पदेव २० वान्टकांप्रभा नारक असंख्य गुण २ गर्भज मनुष्यथी गर्भज मनुः) मी मख्यगुण छे. प्रमाणे दरेक अल्प बहुत्य पूर्य पूर्व मव्यानी अपेक्षा जाणवू ॥ दंडकेषु अल्पबहुत्ववारम् ।। (१४३) . . २१ महेन्द्र कल्पदेव २२ सनत्कुमार कल्पदेव २३ शर्कराप्रभानरक २४ समुछिम मनुष्य २५ ईशान कल्पदेवो २६ ईशान कल्पदेवी " " संख्यगुण (३२ अधिक३२गुण) ३२अधिक ३२गुण असंख्यगुण ३२अधिक३२गुण ३ असंख्यगुण सं०(३ अधिकश्गुण) १३ अधिक ६ गुण) २७ सौधर्मकल्प देवो २८ सौधर्मकल्प देवी २९ भवनपति देव ३० भवनपति देवी ३१ रत्नप्रभा नारक ३२ खेचर ति-पंचे पुरुष ३३ खेचर ति०पं०स्त्री ३४ चतुष्पद ति० पुरुष ३५ चतुष्पद ति० स्त्री ३६ जळचर ति० पुरुष ३७ जळचर स्त्री ३८ व्यन्तर देव ३९ व्यन्तर देवी ४० ज्योतिपीदेव ४१ ज्योतिषीदेवी ४२ नपुं०खेचर ति० ४३ नपुंसक स्थलचर ति० ४४ नपुं० जळचर " (३ अधिक गुणी) (३२अधिक ३२गुण) " (३२अधिक ३२गुण) " (१४४) ॥ दंडकविस्तरार्थः ।। विशेषाधिक असंख्यगुण विशेषाधिक असंख्य गुण " ४५ पर्या० चतुरिन्द्रिय ४६ पर्या० पञ्चे० ४७ पर्याद्वीन्द्रिय ४८ पर्यात्रीन्द्रिीय ४९ अपर्या० पञ्चेन्द्रिय ५० अपर्या० चतुरि० ५१ अपर्या० त्रीन्द्रिय ५२ अपर्या० द्वीन्द्रिय ५३ पर्या प्रत्येक वनस्पति ५४ पर्या० चा० निगोद ५५ पर्या० बा० पृथ्वि ५६ पर्या० वा० अप्काय ५७ पर्या० वा. वायु ५८ अपर्या० वा० अग्नि ५९ अपर्या०प्रत्येकवन० ६० अपर्या०वा० निगोद ६१ अपर्या वा० पृथ्वि ६२ अपर्या० वा० अपकाय ६३ अपर्या० वा० वायु ६४ अपर्या० मू० अग्नि ६५ अपर्या० मू० पृथ्वि ६६ अपर्या० ऋ० अपकाय ६७ अपर्या० मृ० वायु ६८ पर्याप्त मू० अग्नि ६०. पर्याप्त मू. पृश्चि " 없 विशेषाधिक संख्यात गुण विशेषाधिक ॥ दंडकेषु अल्पबहुत्वद्वारम् ॥ (१४५) " ७० पर्याप्त सू० अपकाय ७१ पर्या० सू० वायु ७२ अपर्या० सू० निगोद ७३ पर्या० सू० निगोद ७४ अभव्य ७५ पतितसम्यकत्वी असंख्यात गुण संख्यात गुण अनंत गुण ७६ सिद्ध विशेषाधिक ७७ पर्या० बा० वन० ७८ बादर पर्याप्त ७९ अपर्या० वा. वन० ८० वा० अपर्याप्त असंख्य गुण विशेषाधिक ८१ बाद संख्यगुण विशेषाधिक ८२ सू० अपर्याप्त वन० ८३ सू० अपर्याप्त ८४ पर्या० सू० वनस्पति ८५ सू० पर्याप्त ८६ सूक्ष्म ८७ भव्य ८८ निगोद ८९ वनस्पति ९० एकेन्द्रियो " " ९१ तिर्यंच ९२ मिथ्यादृष्टि ९३ अविरत ९४ सकपायि (१४६) ॥ दंडक विस्तरार्थः॥ " 4 ९५ छनास्थ ९६ सयोगि ९७ संसारीजीव ९८ सर्वजीव अवतरण-आ दंडकरूप स्तुति करवानुं फळ ग्रंथकार श्री जिनेश्वरोनी पासे मागे छे. संपइ तुम्ह भत्तस्स, दंडगपयभमणभग्गहिययस्स दंडतियविरयसुलहं, लहु मम दितु मुक्खपय॥४३॥ । संस्कृतानुवादः ॥ संप्रति तव भक्तस्य, दंडकपदभ्रमणभग्नहृदयस्य दंडत्रिकविरतसुलभ, लघु मम ददतु मोक्षपदम् ॥४३॥ || शब्दार्थः ॥ संपइ-हमणां-हवे दंडनिय-३ दंड (मन-वचन- तुम्ह-आपना कायाना अशुभव्यपार भक्तरस-भक्तर्नु विरस्स-विरनिवडे [त्यागवडे] दंडगपय-दंडकस्थानमा सुलभं-सहजे प्राप्तथनार भमण-भ्रमणकरवाथी लघु-शीघ्र भग्ग-भग्न-उदासीन यम-पने रिययस्म-हृदयवाळा (नु) दितु-आपो •मनवाळा शुक्खपय-मोक्षपद गाथार्थ:-(ए. सर्व भावो अनंतवार प्राप्त कर्या . ) हवे दटकम्यानामां भ्रमण करवायी उदासीन मनवाळा आपना भक्तने मने गजगारमुनिने ) व्रण दंटना न्याग करवाथी सहजे प्राप्त धनार पचं मोक्ष पद गीय आपो.
, ॥ दंडकमणेतुः प्रभुनीप्रार्थना ॥ (१४७) विस्तरार्थ:--श्रीगजसारमुनि श्रीवीरप्रभुने प्रार्थना करै छे के ए पूर्वोक्त २४ दंडकमां अनादि काळथी परिभ्रमण करवा वडे क- रीने हवे मारूं हृदय बहु खेदवाळ उद्विग्न (उदासीन') थयेलुं छे माटे मनने अशुभ विकल्पमा प्रवविवारूप मनदंड,मोक्षमार्गने प्र- तिकूळ वचनो बोलवा रूप वचनदंड, अने मुक्तिमार्गने प्रतिकूळ क्रियामां कायाने प्रवर्ताववा रूप कायदंड, ए ३ दंडना त्यागथी सहजे मलनारु मोक्षपद मने शीघ्र आपो ए दंडकप्रकरणरूप श्री महावीर स्वामीनी स्तुतिनो अन्तिम परमार्थ ( सार ) जणाव्यो. अवतरण-आ गाथामा श्री ग्रंथकारनी प्रशस्ति छे. सिरिजिणहंसमुणीसर -रज्जे सिरिधवलचंदसीसेण गजसारेण लिहिया, एसा विन्नत्ति अप्पहिया ॥४४॥ ॥ संस्कृतानुवाद ॥ श्रीजिनहंसमुनीश्वरराज्ये, श्रीधवलचंद्रशिष्येण । गजसारेण लिखिता:एषा, विज्ञप्ति रात्महिता॥४४॥ ॥ शब्दार्थः ।। सिरि-श्री सीसेण-शिष्ये जिणहंस-जिनहंसनामना गजसारेण-गजसारमुनीए मुणीसर-आचार्यना लिहिया-लखी रज्जे-राज्यमां एसा-आ सिरि-श्री विन्नत्ति-विज्ञप्ति धवलचंद-धवलचंद्र अप्पहिया-आत्महितकारी गाथार्थः - श्री जिनहंसनामे आचार्यना राज्यमां (शास- नमां श्री धवलचंदमुनिना शिष्य गजसार मुनिए आ विज्ञप्ति आत्म हितकारी लखी छे.
(१४८) ॥ दंडकविस्तरार्थः ।। विस्तरार्थ:---गजसारमुनि १६. मासैकानी शरुआतमां थ- येला तेम तेमना हाथना वनावेलो जंबुद्धीपनो नकशो (पट) जो- वामां आव्यो छे. ते उपरथी जणाय छे. आ प्रकरण तेओश्रीए परोपकारार्थे वनावेल छतां आत्महितने माटे लख्यु तेम लखी पोता. ना आत्मानी लघुता भावी छे. श्री दण्डकविस्तरार्थः सम्पूर्ण:
మరుపు ॐ ॥ श्री महावीरप्रभुस्तुतिगर्भित परमकारुणिक पं० पद्मविजगणिप्रणितं ॥ विविधरागबद्धं, एकोनविंशतिद्वारेषु चतुर्विंशति दण्डक समवताररूपं स्तवनम्, + (दुहा) प्रणमी सरसति भगवति, तीम जिनवर चोवीश, गौतम प्रमुख मूरि तथा, गुरु उत्तम सुजगीश चोवीश दंडकने विषे, द्वार अछे गुणतिश; विवरी कहिशु तेहने, जिम भाख्या जगदीश ॥ २॥ नाम १ लेश्या २ त्रीजुं तनु, ३ अवगाहना ४ संघेण, ५ संज्ञा, ६ आकृति सातमु, ७ संपराय ८ मुणो सेण ॥३॥ ९इन्द्रि१०समुद्घात?? दृष्टि१२दर्शन, १-नाण१४-१५जोगोपयोग; १६उपपात ने२७वचन१८स्थिति१९पज्जत्ति२० आहारनो भोग ॥ २१गति आगति २२वेद २३भवननो, चोविशमो २४माणदार; २५संपदा२६धर्म२७जीवायोनि,२८कुळ २९अल्पवहुत्व विचार ॥५॥ " (१५०) । दंडकस्तवनम् ॥ (द्वार ? लु)-घमा, वंशा सेला, अंजना रिष्टा नाम: मघा, माधवति सातमी, ए साते दुःख खाण १असुर रनाग ३सुवर्ण, ४विद्युत ने ५अग्निकुमार; ६दीव उदधि ८दिशि ९वायु, १०स्तनित ए दश श्रीका।।७.! सात ११नरकनु एक छे, एकादश दंडक एम; थावर १६ पांच तथा १९ त्रण, विगलेंद्रिय गणिए तेम ॥८॥ २० पंचेन्द्रितिर्यच २१ मनुज ने, २२व्यंतर ने २३जोतिष; २४ वैमानिक चोवीश ए, नाम द्वार मुण शिष्य ॥९॥ (द्वार २)-नरक, तेउ, बाउ, विगलेन्द्रिय, अपज्ज लेश्या तीन; पंचेंद्रिय तीर्यच मनुपने, पट् लेग्या होय पीन ॥१०॥ भवनपति दश व्यंतर, पृथ्वी अप वण काय; ए चउद दडकमांहि, आगली चार कहाय ॥११॥ ज्योतिपि सोहम इशान, एक तेजो होय; पंचम देवलोक लगे पद्म, उपरे शुक्ल जोय ॥२२॥ (द्वार )--नारकी देवता सर्वने, वैक्रिय तेजस कर्म, वायु तिर्यंच पंचेन्द्रिय, आहारक विनु ए मर्म ॥१३॥ वायु विना चउ थावर, विगलने त्रण शरीर; औदारिक तेजस कर्म, मनुजने पण कहे वीर ॥१४॥ || हाळ ?-गग मारु.॥ (द्वारे ४) नरक गते गन पंच धनुप् अवगाहनारे: समुन्चे उत्कृष्ट भाखी (२) साखि पन्नवणाअछरे ॥१॥ १४ देदकोना नाम, २ कृष्ण, नीट, कपोत, तेज , पद्म शुक्ल, ए ६ लेण्याओं छे. 3 औदारिक, वैक्रिय, आहारक जन्म कार्मण ए पाच शगेर टे, शरीर प्रमाण.
॥ पं०पद्मवि०गणि प्रणीतम्।। (१५१) साडापंदर धनुषु ने पुणा आठ धनुष् षट् अंगुल देहडीरे; घमामें उत्कृष्ट, त्रण्यरे (२) हाथ जघन्य शरीर छे रे ॥२॥ बार अंगुल लहीरे; त्रीजे सवाएकत्रीश; पंकेरे (२) साडीबासठ धनुष्नीरै ॥३॥ सवासो धनुष्नी धूमप्रभे लहीरे; मघामा अढीशत, धनुष्य (२) शत पंच गुरु सातमी रे ॥४॥ ए उत्कृष्ट कही म्हें साते नरकनी रे; पूरवनी उत्कृष्ट, उत्तरे (९) उत्तरनी ते जघन्यथी रे ॥५॥ भुवनपति वण ज्योतिषीने सात हाथनी रे, तिम सोहम इशान, त्रीजेरे (२) तीजे चोथे षट् तणी रे ॥६॥ पांचमे छठे पांच, चार सातमे आठमेरे; चार लगे तिन हाथ, हाथरे (२) नाथ भाखे त्रण लोकनोरे ॥७॥ नव ग्रेवेयक बे कर, अनुत्तरे एक छे रे; भूनल अग्नि ने वाय, तेहनीरे (२) अंगुल असंख्यम भाग छे रे ८ लाख जोजननी उत्तरवैक्रिय देवतारे, वनस्पति प्रत्येक. झाझीरे [२] जोयण सहस उत्कृष्टथीरे ॥९॥ अंगुल असंख्यमे भाग नघन्यथी जाणीयेरे; बेइंद्रिय जोजन बार कोशरे (२) त्रण चउतिचौरिंद्रियेरे ॥१०॥ तिन कोश दनुजनी सहस जोयण तणीरे; तिरि पंचेन्द्रिय देह, वैक्रियरे(२)लाख जोयण नव शत तथारे ॥११॥ (द्वार ५)--पट संघयण मनुज तिरि पंचेन्द्रि लह्यारे; विगलेन्द्रिय छेवढ, जाणोरे (२) शेष संघयणि अछेरे ॥१२॥ ५ प्रथम प्रथम नरकना उत्कृष्ट अवगाहना ते आगल आ- गल जघन्य जाणवी. ६ व्यंतर, ७ नयमे, दशमे. अगीयारमे, बारमे देवलोके, ८ वर्षभनागच, ऋषभनाराच, नाराच, अर्ध नाराच, कोषिका, सेवार्त ए ६ मंघयण छे, , , (१५२) ॥ दंडकस्तवनम् ॥ (द्वार ६)--आहारादिक चवीशे दंडके लहारे, (द्वार ७)-देवने समचउरंस, आगेरे(२)पट् नरतिरि पंचेंद्रिनेरे॥१३॥ *(द्वार ८) नारक थावर विगल समुठिम मनुष्यनेरे; एक हुंडक संठाण, होयरे (२) चार कषाय सवि दंडकेरे ॥१४॥ ॥ ढाळ २ जी. पियु पियु करतां नाम जपु दिन रातीयां--ए देशी. (द्वार ९) देव नारक नर तिरिपंचेन्द्रिय पणइन्द्रि, थावर वि ति चउरींद्रि इग वि ति चउ बदि; (हार १०)-नारक वायुने चार समुद्घात आगला, देव तिर्यच पंचेन्द्रियने पण(५) आदिला ॥२॥ थावर चउ विगलेन्द्रियने पहेला तिन करा, मनुजने सात समुद्घात पन्नवणाए लह्या; (द्वार ११)-नारक नर देव तिरि पंचेन्द्रि तिदृष्टि छे, थावर पंचने एक मिथ्यात्व ते इष्ट छे ॥२॥ विगलेन्द्रियने समकित मिथ्या ए दोय छे. एणीपेरे द्वार एकादशभु दृष्टि होय छे (हार १२) देव नारक निरि पंचेन्द्रियने केवल बिना, चरिदिने चक्षु थचक्षु ये दर्शना ९. आहाग्नंगा. भयमंझा, मैथुनसंज्ञा, परिग्रहसंज्ञा, चार मंगा छे. ममचतुरस्र, न्यग्रोध, सादि, यामर कुटा, ९टक प ६ संस्थान छ, + क्रोध, मान, माया, टीम ए कपाय हे, १५ म्पर्श, ग्मना, वाण, चक्षुः, श्रोत्र ए ८. निग्य १२ बंदना, कपाय मरण, क्रिय, तंजम, आहा. का करिक श ७ ममुदयान छे. १३मिथ्यात्व मम्यक्त्व मि- 7. प वाटि ठे, २४ प्रदर्शन छे, अचक्षुद०, अवधिद. पचन.. दर्शन में ।। पं०पद्मवि०णि प्रणीतम् ।। (२५३) एक अचक्षु यावर वि ति इंद्रिय तणे, चक्षु अचक्षु ओहि केवल चउ मनुजने; (द्वार १३)-त्रण ज्ञान अज्ञान नरक देव तिर्यचने, थावरने मति श्रुत अज्ञान ए बिहुँ भणे ॥४॥ विगलेन्द्रियने ज्ञान अज्ञान दुधा भणुं, मनुजने ज्ञान पंच अज्ञान ते त्रण गणुं (द्वार १४)-औदारिक आहारक दुग विणु मुणो, योग अग्यार नारक देव दंडके भवि मुणो 16॥ औदारिक दुग कर्म जल वन्हि वण प्रते, वैक्रिय दुग युत पंचयोग वायु मते; औदारिक दुग कर्म चोथो वाग् योग ए विगलेन्द्रियने चार योगनो भोग ॥६॥ तिरिपंचेन्द्रिने आहार दुग विण जाणीप, पन्नर योग मनुष्यने भवि मन आणीए: (दार १५)-त्रण ज्ञान अज्ञान दर्शन देव नरक निरि, ज्ञान अज्ञान दो एक अचक्षु वे निरिंदरि ॥७॥ ज्ञान अज्ञान दर्शन दोय ए छ चउरिदिने, मइ स अज्ञान अचक्षु थावर एकदिने भू १५ मतिज्ञान. श्रुनज्ञान. अवविज्ञान, मन.पयवज्ञान, केवलज्ञान. ए पांच ज्ञान तथा मतिअज्ञान, श्रुतअज्ञान, विभंगज्ञान ए व- ण अज्ञान छे, १६ सत्यमन, असन्यमन, मिश्रमन. व्यवहार (असत्यामृषा) मन, सत्यवचन, अमत्यवचन, मिश्रवचन, व्य- यहारवचन,ए चार मनना अने चार वचनना मढी आठ योग, तथा औदारिकयोग, औदा मिश्रयोग. बैंक्रिय,बक्रियमिश्र, आ- हारक, आहारकमिश्र, तेजमकामग, ए सात काययोग मळी १५ योग छे. १७ ५ज्ञान, 3 अज्ञान, दर्शन प १२ उपयोग हे (१५४) ॥ दंडकस्तवनम् ॥ वार उपयोग मनुष्यने लहिए इम सुणो, नाण अन्नाण दर्शन पण ति चउ क्रम थुणो ॥८॥ (द्वार १६-१७ -नारक देव निच पंचेन्द्रि विगल तथा, उपपात चवन कहुं भवि भगवति कहे यथा; एक बेत्रण जघन्यथी संख्य असंख्याता, उत्कृष्टा उपपात वचन समे विख्याता ॥९॥ एक समे असंख्याता थावर प्राणिया, उपजे चचे अनंता साधारण जाणिया; एक आदि देइ जाव संख्य मनुष्य लहो, समुछिम नरमांहि असंख्याता सद्दहो ॥१०॥ ॥ दाळ ३ जी. हवे कुमर इस्युं मन चिंतवे, ए राग. (द्वार १८)-रत्नप्रभाए जयन्यथी, दस सहस बरसना आयोरे, सागर एफ उत्कृष्टो लहो, चीजे त्रण सागर थायोरे. जिनवर भाखे इम बयणडां ॥१॥ पालप्रभा नरके सातनु, पंके दश सत्तर ते धूमे रे; ऊदधी चावीश नम नरकमां, मागर तेत्रिश तमतमेरे. जि० ॥२॥ आदि उत्कृष्टी जे कही, उनरनी तेह जघन्यरे; १८ अमुक दंडकमां एक समये केटला जीयो जवन्यथी पा उराट यो उपजे ! पम कद्देधुं ने उपतहार अने अमुक प्रया नमनः केरला जीवो जय० थी या उत्कृ० थी मा पामे न करे ते चयनमार १९ काश दडके केटलु ज. पन्य आयुष्य अने उत्कृष्ट आयुष्यहीय पम कदेवु ने आयुष्यद्वार, जि० ॥८॥ , ॥ पं०पद्मविगणि प्रणीतम ॥ (१५५) तेर प्रतर पहेली नरकमां, तस उत्कृष्ट सुणो देइ कर्णरे. जि० ॥३॥ नेउ सहस तथा नेउ लक्ष छे, पुरव कोडि त्रीजे जाणोरे; एक सागरना दश भागमां, एक भाग चोथे मन आणोरे, जि०॥४॥ एम भाग एकेक वधारतां, तेरमे थाय दश भागरे, सागर एक पुरुं थइ रहे, हवे जघन्यनी सुणो वागरे. जि. ॥५॥ दश सहस तथा दश लक्ष छे, नेवू लाख ने पूरव कोडी हवे आगलीनुं उत्कृष्ट जे, उत्तर जघन्ये जोडी रे. जि०॥६॥ एकादश नव सत पण तथा, त्रण एक अनुक्रम धारोरे: हबे प्रतरे गणवानो कहुं, आम्नाय ते एक उदारोरे. जि० ॥७॥ जे नरकनी स्थिति उत्कृष्ट छे, तस कीजे जघन्य ते बादीरे; प्रतर जेटला ते नरकना, कीजे भाग प्रतरे साधीरे. दस सहस बरस ते जघन्यथी, आयु भवनपति तणु होय रे; उत्कृष्ट चमरनुं सागरतणु, बलि इन्द्रनुं अधिकुं जोयरे. जि० ॥९॥ साडा त्रण तथा साडा चार छे, तस देवी तणु अनुक्रमे रे; हवे नव निकाय दक्षिणतणुं, आउखु दोढ पल्योपमरे. जि० ॥१०॥ पल्य दोय देशोन उत्तरतणु, तस देवीनुं अद्ध एकोरे; देशे उण पल्योपम कडं, क्रमे गणीए धरी विवेकोरे. जि० ॥११॥ सन्ना शृद्धा त्रिजी वालुका, चोथी मणशिला नाम रे; शर्करा खर पूढवी जाणीए, अनुक्रमे सुणो आयु ठामरे. जि०॥१२॥ एक बार चउद सोल तेम वली, अष्टादश ने बावीसोरे; सहस शब्द ते तीहाँ जोडीए, आउखुं भाखे जगदीशोरे; जि०॥१३॥ सात सहस वरस अप्कायद्, वासर प्रण अग्निनु आयुरे; त्रण सहस बरस वायुकायतुं, दश सहस वरस वणकायरे.जि०॥१४॥ बेइन्द्रिनुं वार वरसतणु, तेइन्द्रिनुं ओगणपचास दिनरे; पटू मास, चौरेन्द्रितणु, मघन्य मुहूर्त होय भिन्नरे. जि० ॥१५॥ , , (१५६) ॥ दंडकस्तवनम् ॥ जलपर गर्भज समुर्छिम तथा, गर्भज उरभूजपरिसप्परे; पूरन कोडी वरसन आउखु, भिन्नमुहूर्त सप्पनुं भल्परे. जि० ॥१६॥ थरुचर गर्भम प्रण पल्यनु, समूर्छिम वर्प सहस चोरासीरे; भाग पल्योपम असंख्यातमो, गर्भज खेचरनुं खासीरे. जि० ॥१७॥ खेचर, वहातेर सहसन, उरपरितुं त्रेपन हजार रे; भूजपरिनु बेतालीश सहसनु, ए त्रण सम्मूर्छिम धाररे. जि०॥१८॥ गर्भज नरनुं त्रण पल्यनु, जघन्यथी भिन्नमुहत रे; दश सहस वरस व्यन्तरतणुं उत्कृष्ट पल्यनुं हुंतरे. जि० १९॥ भध पल्यन तस देवी तणु, लाख वरस ने पल्य शशिकेरुंरे; सहस बरस ने पल्योपमतणु, सूर्यनु ग्रहनु पल्य धारूं रे. जि० ॥२०॥ चंद्र सूर्य ने ग्रह देवीनगुं. निज आयु अरध करी दीयोरे; अर्ध पल्य तथा पा पल्यन, नभत्र तारानुं लहीयोरे. जि० ॥२१॥ चोथी आटमो भाग झाझेरडो पल्यनो देवीनो मान वे सागर सोहम जाणीए, बे उदधि झाझेरां इशान रे. जि० ॥२२॥ एक पल्य नया अधिकरई, जघन्य आउखु सारो रे; मान सागर अथ झाझेर, त्रीजे ने चोथे उदारोरै. जि० ॥२३॥ वे मागर अधीकरडं, आयु जघन्य का नासरे; हये उत्कृष्ट अनुक्रमे कहुँ, मृणजो ते धरी उल्लासरे, जि० ॥२४॥ दश च उद सत्तर अष्टादश. मागरन अनुक्रमे जाणी: आगळे एकक वधारीप, एकत्रीग ग्रेवेक लगे आणीरे. जि० ॥२६॥ नेत्रीश मागर विजयादिके, चारने एकत्रिश जघन्यरे; भागळने उत्कृष्ट जघन्य ते, उत्तरतुं धागे सज्ज नरे. जि० ॥२६॥ ॥ ढाल ४ थी.॥ देशी एकत्रीशानी.
. ॥ पं०पद्मविगणि प्रणीतम्॥ (१५७) (धार-१९) थावर पंचनेरे, चार पर्याप्ति अगली, विगलेन्द्रियनेरे, टाळो मन एक छेहली%3B शेष सर्वनेरे, षट् पर्याप्ति द्वारे भणी, (द्वार-२०) द्वार वीसमुरे, भाखे हषे त्रिभुवनधणी ॥१॥ [घुटक] मनुष्य तिरि विगलेन्द्रि पण ए दंडके त्रण आहार ए शेषने करल आहार टाली दोय आहार निरधार ए; (द्वार-२१) तिरि पंचेन्द्रि मनुजमांहि नारकी जाइ सहि, आधे पण ए बिहुमांथी पाये वेदना बहुतही ॥२॥ ( ढाळ ) व्यंतर ज्योतिषिरे, भुवनपति बळी जाणीए, सोहम इशानरे, पांच दंडकमांहि आणीए; पृथ्वी अरे, वण तिरि पंचेन्द्रिय मनु, उपजे तिहारे, तिरि पंचेन्द्रि मनुज ननु (घुटक ) त्रीजाथी सहसार जावत गत्यागति मनु तीरितणी, नवमाथी सर्वार्थसिद्ध मनुजनी जिनवरे भणी%B चोविशमाहे मनुज जाए, श्राय तेउ वाउ विणु, चोवीशमाहे गत्यागति करे तिरि पंचेन्द्रिय घणुं ॥४॥ ( ढाळ ) गति आगतिरे. विगलेन्द्रिने दश दंडके, तिरि पंचेन्द्रिरे, थावर विगल मनुज जीके; भू अप् वणनेरे, एहीज दशनी गति कही, वीशमारे, नारक विणु आगति लही ( घुटक ) नवनी गति आगति दशनी तेउ वाउने तदा, २० आहार पर्याप्त, शरीरप०, इन्द्रिय प. उच्छयास प०. भाषा पर्या० मनः पर्या० ए ६ पर्याप्ति छे, २१ ओजम्आहार, लोमआहार, प्रक्षेपाहार ( कवलाहार ), ए ३ आहार छे, अमुक दंडकना जीव कया कया दंडकमां जइ उपजे ते गति, अमुक दंडकमां कया कया दंडकना जीवो आवी उपजे ते आगति, ૨૨ (१८८) ॥ दंडकस्तवनम् ॥ थावर विगल तिरि पणेन्द्रि मनुज सहि करो जदा; श्री वीरजिनवर तणा पदयुगपद्मने अवलंवता, गत्यागति सवि दूर थाय पामीए सुख शाश्वता॥६॥ वास; ॥ ढाळ ५ मी.॥ ॥ चोपाइनी देशी, ॥ (द्वार-२२) नारक थावर विगल नपुं वेद, देवने पुंनि वेद मन वेद निरि पंचेन्द्रि मनुज त्रण जाण, हवे भुवन द्वार मन आण ॥१॥ सात नरकना अनुक्रमे सुणी, त्रीश पचवीश पन्नर दश त्रीणि; लाख शब्द सयले जोडीए, छठ्ठीए लखमां पण छोडीए ॥२॥ सातमीए पण नरकावास, चोराशी लख सर्वनि चोत्रिश चोयालिश (४४)अडत्रीश, नवमी निकाय विना चालिश३ नवमीने पचाम उदार, लक्ष शब्द सघळे विस्तार; दक्षिण दिशे दश इन्द्रना एइ, चउ कोडि पट् लख सर्व गुणेह वे उत्तर दश इन्द्रना कहुँ, उणा प्रत्येके चउ लख लहु ; मात कोडि ने बहोतेर लाख, सर्व थइ ए जिनवर भाख ॥५॥ एक लाख अंशी सहप्त जोजन, स्त्नप्रभा पिंड भाखे जिन; सहस जोजन उपरि अध टाल, वचमां भुवनपनिने भाळ ॥६॥ संख्य असंख्यात जोजन मान, भवन कया छे तेहने यान; लोकव्यापी सूक्ष्म थावरा, चादर देगे कहे जिनवरा ॥७॥ बादर अग्नि मुनुज ए दोग, अढा द्वीपमां कहीए सोय; उपरी महम जोजनमा थकी, उपरी अध शन जोजन मुकी ॥८॥ नगर असख्याना निहां का, नाना भरत जेवडा लया; महाविदंर सय मत्यग जाण, मोटा जंबुट्टीपप्रमाण ॥९॥ २३ शायद. पुरुपवेदन. पुमकवेद: ए ३ वेद छ, T ॥ दंडकपणेतुः प्रभुनीमार्थना ।। (१५९) संभूतल पृथ्वी मर्याद, सातशें ने, जोजन संवाद, ताराथी दश जोजन रवि, अंशी जोजन तिहांथो शशि मवि॥१०॥ नक्षत्र बुध जोजन चार चार, शुक्र गुरु मंगल शनि त्रण धार; ज्योतिषीनी छे असंख्य विमान, हवे देवलोकनी संख्या जाण।।११।। वत्रीश अहवीश बार अड चार, लाख शब्द जोडीए उदार; पचास चालिश ने छ हजार, आनत प्राणते चउ शत धार ॥१२॥ आरण अच्युते त्रणशें रया, ए मान विमान संख्यायां लह्या; प्रथम त्रोके एकसो अग्यार, बीजे एकसो सात विचार ॥१॥ त्रीजे सो ने उपरि पंच, अनुत्तरमां पण पुण्यनो संच; बार जोजन उंची सिद्धशिला, द्वार३४)प्राण कहु हवे दश मांहीला१४ फरस इन्द्री तनु बळ श्वासोश्वास, आउखु ए थावर होय तास; रस इन्द्री ने वचन सहित, बेइन्द्रियने षट् ए रीत; नारक सहित तेइन्द्रिने सात चौरेन्द्रिने चक्षु अवदात; मन ने श्रोत्र इन्द्रिय ए युत, शेष दंडकने दश ए उत्त ॥१७॥ - ॥ ढाळ ६ ही.॥ राग वेलावल. (रि २५) नवनिधान चोद रतन ए, भाख्या भगवते; चक्र, छत्र, दंड, असि वलि, कांगणी, चर्म मणि, ते नमिये जिनरायने ॥१॥ सात एकेद्रिय रतन ए, गाथापति, सेनापति: पुरोहित, वार्षिक, अश्व, गज, स्त्री संपत्ति, ते० ॥२॥ तीर्थकर, चक्री, वळ, वासु, केवलि, साधु, श्राह; समकिति, मंडलिक मळि, सनि त्रेवीश लाधु. ते ॥३॥ २४ प्राणदश आगल कद्या छे ते. २२ चौद चक्रवर्तिना रत्न अने नव तीर्थकरादि मली २३ संपत्तिद्वार, -- (१६०) ॥ दंडकस्तवनम् ॥ पहेली नरकनो नीकन्यो, सोळ संपदा पामे सात एकेन्द्रिय टाळीने, गुणज्यो इणे ठामे. ॥४॥ वीजीनो पंदर चक्री विना, त्रीजीनो तेर; वल वासुदेव ए टाळजो, चोथीनो वार. तीर्थंकर विणु पांचमीनो, पामे अगीआर; केवली विणु दश उठीनो, साधु विणु निरधार. ते० ॥६॥ अश्व गज समकीत त्रण, सातमीनो जाण; भवनपति वण जोतिषी, एकवीश लहे ठाण. ते० ॥७॥ तीर्थंकर वासुदेव विना, भू अप वण नर तिरीनो; तीर्थकर चक्री वल वासु, विणु ओगणीश कीनो. ते० ८॥ तेउ वाउनो नीकल्यो, अश्व गज ए दोय; सात एकेन्द्रि इम नव, पामे जीव कोय. ते०॥९॥ विगल अढार संपद लहे, तीर्थंकर चक्री वल वामु; केवली ए पांच टालजो, सोहम इशाने ते वीशु. ते० ॥२०॥ पहेली नरक परे जाणजो, सोल संपद इहां; त्रीनाथी आठमा लगे, नवमाथी चौद जिहां. ते० ॥११॥ एक-द्र अश्व गज टाळजो, अनुत्तरना कहीए; * आठ निशान वासुदेव विना, द्वार मंपदा लहिए. ते॥१२॥ (द्वा-२६) करणीरूप धर्म मनु तथा, तिरि पंचंद्रिमांहि; वावीश दंडके ते नहि, धर्म द्वार ए त्यांहि ते०॥१३॥ (द्वार-२७) भु अप तेउ बाउ सत, दश लाख प्रत्येक साधारण वण मनु चौद, चउ चउ लख निरि नरक ते० १४ - +-- तीर्थकादि आट पदवीओ प्रत्येकवनस्पति २१ दंडके अनितिना उदय छे. २६ विरतिमपधर्म. २७ ८९ लाखजीया. गोमिदार,
॥ पं० पद्मवि० प्रणीतं ॥
(२६१)
,
लाख लाख दो दो विगलेंद्रिमां, देवने लख चार,
इम चोराशी लख जीवायोनिमां, नव नव अवतार ते ॥१५॥
(द्वार-२८) पचवीश छवीश बार सात त्रण सात अडवीश;
सात आठ नव बार लाख, कुळकोटि जगीश. ते० ॥१६॥
साडीवार दश वार दश, नव लाख कुलकोडि;
नारक देव अनुक्रमे, पांच थावर जोडि.
ते० ॥२७॥
बि ति चौरेंद्रि अनुक्रमे, मनुज जलचर थलचर;
खेचर उरपरि भुजपरि, अनुक्रमे सवि विस्तर. ते ॥१८॥
(द्वार-२९) गर्भ नर थोडा सर्वधी, पडू गुण असंख्याता;
वादर अग्नि वैमानिक, भुवनपनि आख्याता. ते० ॥१९॥
नारक व्यंतर ज्यातिषि, संख्य गुण चारिदि;
त्रण विशेषाधिक लहो, पंचेंद्रि वि तिइंदि.
ते० ॥२०॥
त्रण असंख्यातगुण करो, पृथ्वी अपकाय;
चौदमे बोल वनस्पति, अनंत गुण थाय. ते० ॥२१॥
उत्तम विजय गुरुतणा, साधु कहेवाय;
भावनगरमा वीरना, पद्मविजय गुण गाय.
ते० ॥२२॥
इति श्री वीरजिनस्तुतिगर्भित चोवीश दंडक स्तवन.
चोविश दंडकनुं स्तवन.
( गनि आगतिनु स्वरूप.)
ढाळ १ ली.
आदर जीव क्षमा गुण आदर, ए देशी.
पुरे मनोरथ पास जिनेश्वर, एह करुं अरदासजी:
तारण तरण विरुद तुज सांभळी, आव्यो ताहरी परसजी पुरे ॥२॥
एणे संसार समुद्र अधागे, भमीयो भवजलमांहिजी:
गीलगीलीयो जीम आयो गीलनो, साहेब हाथे साहीजी. पुरे० ॥२॥
(१६२) ॥ दंडकस्तवनम् ॥ , तुं ज्ञानी तो पण तुज आगळ, बीनक कहीए वातजी; चोवीशे दंडके हुं फरीओ, वर्ण, एह विख्यातजी. पुरे० ॥३॥ साते नरकतणो एक दंडक, असुरादिक दश जाणजी; पांच थावर ने त्रण विकलेंद्रिय, ओगणीश गणतां आणजी.पुरे० ॥४॥ पंचेंद्रिय नियंच ने मानव, एह थया एकवीशजी; व्यंतर ज्योतिपी ने चैमानिक, एम दंडक चोवीशजी. पुरे० ॥५॥ पंचेंद्रिय नियंच ने मानव, पर्याप्ता जे होयजी; ए सघळा देवांहे उपजे, एम देव आगति दोयजी. पुरे० ॥६॥ असंख्यात आयुषे नर तीरि, निश्चे देवज थायनी; निज आयुषे सम के ओछे, पण अधिके नव जायजी. पुरे० ॥७॥ भुवनपनि ने व्यंतरमांहे, संमुर्छिम तिर्यंचजी; स्वर्ग आठमे तांइ पुहचे, गर्भज सुकृत संचजी. पुरे० ॥८॥ आयु संख्याते जे गर्भज, नर तिर्यंच विवेकजी; वादर पृथ्वी ने वळी पाणी, वनस्पति प्रत्येकजी. पुरे० ॥९॥ पर्याप्ता एणे पांचे ठामे, आवो उपजे देवनी; एणे पांचे मांही पण आगे, अधिकाइ कहुं हेवजी. पुरे० ॥१०॥ त्रीजा स्वर्गवकी मांडीने सुर, एकेंद्रिय नवी थायजी; आटपाथी उपरला सघळा, मानवमांहि जायजी. पुरे ० ॥११॥ ढाल २ जी. आज नही जोरे दीसे नाहलो, ए देशी. नरकरणी गति आगनि एणी परे, जीव भमे रे संसार; दीय गनि ने दोय आगनि जागीए, बळी विशेष विचार. नरक० ॥१॥ संड्याने आयुष पर्याप्ता, पंचेंद्रिय निर्यच; निपटीज मनुष्य एहिज नरको, जाए पाप प्रपंच. नरक० ॥२॥ प्रथम नरकलगे जाए असनीयो, गोह नकुळ तीम वीय,
॥ पं० पद्मवि० प्रणीतं ।।
(१६३)
गीय प्रमुख पंखी त्रीनी लगे, सिंह प्रमुख चोथी जाय. नरक० ॥३॥
पांचमी नरके सीमा सापनी, छठी लगे स्त्री जाय;
सातमी नरके माणस माछलां, उपजे गर्भज आय. नरक० ॥४॥
नरकथकी आवे बोहुँ दंडके, तीर्यच के नर थाय;
ते पण गर्भज ने पर्याप्ता, संख्यातेज सुहाय. नरक० ॥५॥
नारकियाने नरकथकी निकळ्या, जे फळ प्राप्ति होय;
उत्कृष्ट भांगे करी ते कडं, पण निश्चे नहीं कोय.
नरक० ॥६॥
प्रथम नरकथकी चवी चक्रवर्ति होये, बीजी हरी बळदेव
श्रीजी लगे तीर्थकर पद लहे, चोथीए केवल हेव. नरक० ॥७॥
पांचमा नरकनो सर्वविरति लहे, छठीए देशविरत;
सातमी नरकथकी समकीत लहे, न होवे अधीक निमित्त. न०॥८॥
दाल ३ जी.
करम परोक्षा करण कुमर चल्यो रे, ए देशी.
मानव गति विण मुक्ति होने नहिरे, एहनो एह अधिकार;
आयु संख्याते नर सहु दंडकेरे, आवी लहे अवतार. मानव० ॥१॥
तेउ वाउ दंडक वे नजीरे, वीजा ते वावीश;
तिहांथी आन्या थाये मानवीरे, सुख दुःख पुन्य गरिष्ट. मा० ॥२॥
नर तिर्यंच असंख्ये आयुषेरे, सातमी नरकना तेम;
तिहाथी चवीने मनुज होरे नहिरे, अरिहंते भाष्यो एम. मा० ॥३॥
वासुदेव बलदेव तथा वली रे, चक्रवर्ति अरिहंत;
स्वर्ग नरकना आया ते होवे रे, नर नियंच न होवंत. मा० ॥४॥
चौविह देव थकी चवो उपजेरे, चक्रवर्ति ने वलदेव;
वासुदेव तीर्थकर ते हो रे, वैमानिकथी हेच.
मा० ॥५॥
(१६४) ॥ दंडकस्तवनम् ॥ ढाळ ४ थी. हेम घडो रत्ने जड़यो रे, ए देशी. , - हवे तिर्यंच तणी गति, श्रागति कहीए अशेष, जीव भभे एणी परे, भवाहि कर्म विशेष आयु संख्याते जे, नर तिर्यच विचार ते सघला तियेच, माहे लहे अवतार. ॥ २ ॥ जिणे नियंचमांहे, आवे नारक देव, ते कयो पहेले, तिण कारण न कहुं हेच; पंचंद्रिय तिर्यच, संख्याते आयुषे जेह, ते मरी चउगति मांहे, जावे इहां न संदेह. ॥ २ ॥ थावर पंच त्रण, विगलेंद्रिय आठे कहावे, तिहांथी आयु संख्याते, नर तिर्यंचमां आवे: विकल चवी लहे सर्व विरति, ते पण मोक्ष न पावे, तेउ बाउथी आयो, तेहने समकित नावे. नारक वर्जीने, सघला ए जीव संसार, पृथ्वी आउ वनस्पनि, मांडे लहे अवतार, पत्रण इहांधी चवी, ते आये दश ठामे, थावर विगल नीरि, नरमांहे उत्पत्ति पामे. पृथ्वी काय आदे, लइ दश दंडक एह, तेउ बाउ मांहे, आधी उपजे तेह; मनुप्यविना नव माहे, नेउ बाउ वे जाये, विगोंदिय ते नगमांही, जागे पाछाही आवे. ॥ ५॥ एम अनादि दणो ए. मिथ्या जीव एकंन, बनस्पति मां निहां, गद्दियो काल अनंत: - , ॥ दंडकप्रकरणं सटीकम् ॥ (१६५) पृथवि पाणी अग्नि, अने चोथो वलि वाय, कालचक्र असंख्याता, त्यांइ जीव रहाय. बेइंद्रिय तेइंद्रियने, वली चौरेंद्रि मझार, संख्याता वरसा लगे, भमीयो कर्म प्रकार; सात आठ भव लगे, नर तिर्यंचमें रहियो, मानव भव लहिने, साधुनो वेष में ग्रहियो. ॥ ७॥ राग द्वेष छुटे नहि, किम थाये छुटकबार, पीण छे साध्य मन माहरे, तुंहीज एक आधार; तारण तरण में त्रिकरण, शुद्धे अरिहन्त लाधो, हवे संसारतणा भवमें, भमवो पुद्गल आधो ॥८॥ तुं मनोवांछित पूरण, आपदाचूरण स्वामी, ताहरी सेव लहिने में, हवे नव निधि पामी, अवर काइने इच्छु नहि, इण भव तुहिज देव, छ मने एक ताहरी, होजा.भव भव सेव. ॥ ९ ॥ कळश। 3 इम सकळ सुखकर नगर जेसलमेर महीमा दिने दिने संवत सत्तर ओगणत्रीशे, दिवस दिवाली तणे: गुरू विमळचंद समान वाचक,विजयहर्प सुशिष्य ए, श्री पार्श्वना गुण इम गावे, धर्मचंद्र सुजगीशए. ॥१॥ ॥ इति चोवीश दंडकस्तवन ।।
ܨܫܨ ॐ ॥ ौं अई नमः ॥ स्वपरसमपारावारपारीणेभ्यः सूरिंगणसार्वभौमेभ्यः तपोगच्छाचार्य- श्रीविजयनेमिसूरिभगवद्भयो नमः । स्वोपड़ावचूर्णि-श्रीरूपचन्द्रमुनिविनिर्मितविकृत्यलङ्कृत श्रीगजसारमुनिप्रणीतं- ॥ दण्डकप्रकरणम् ॥ (अव०) श्रीवामे महिमामेथ, प्रणिधाय थालधीगम्यम् । स्वोपझं कुर्वेऽहं, विचारषद्भिशिकासूत्रम् ॥ १ ॥ इह चतुर्विशतिदण्डकेषु प्रत्येकं संक्षिप्तसंग्रहणी २४ पदाना- मवतारणं चिकोर्षितम, तच्चाईविज्ञप्तिद्वारा प्रकटयन्नाह सूत्रकृत्- नमिउं चउवीसजिणे, तस्सुत्तवियारलेसदेसणओ। दण्डगपएहिं ते चिय,थोसामि सुणेह भो भव्वा!१॥ (अव०)नत्वा मनोवाक्कायैः महीभूय,कान्?,चतुर्विंशतिजिनान्, अत्र भरते माम्मतीनाऽवसर्पिणीमाश्रित्य, अन्यथाऽतीतानागतका- लपञ्चदशकर्मभूमीश्च प्रतीत्य जिनवहुत्वापचेः । अहं तानेव जिनान्, स्तोष्ये । कुतः?,तेषां सूत्रमागमो जिनागमस्तचेह"सरीरमोगाहणा य संघयणा सण्णेत्यादिरूपं तस्य विचारो विचारणं तस्य लेशस्तस्य देशनतः कथननः । कैः सह?, श्रीभगवत्यादिगाधाक्रमनिवददण्डक- " (२) ॥ सावचूर्णिकं सटीकं च ॥ संक्षित २४ जीवस्थानः, शृणुत भो भव्या इति- " अप्रतिबद्धे " योतरि, वक्तुर्वाचः प्रयान्ति वैफल्यम् इतिवचनात् श्रोतसम्मु- खीकरणार्थम् ॥ १ ॥ अथ दण्डकमाह- (टीका) प्रणम्य परया भक्त्या, जिनेन्द्रचरणाम्बुजम् । लघुसङ्ग्रहणीटीका, करिष्येऽहं मुदा वराम् । १॥ नमि० चतुर्विशतिजिनान् नत्वा-अभिनम्य चतुर्विश- तिदण्डकैः कृत्वा तानेव-जिनानेवादिनाथप्रभृतीनहं स्तोड्या- मि-स्तयोमीत्यर्थः । कस्मात् १ .तस्मुत्तत्ति 'तत्सूचविचारलेशदे- शनतः तेषां-भगवतां सूत्र-सिद्धान्तस्तत्सूत्रं तत्सूत्रस्य विचारस्त. सूत्रयिचारः तन्त्र विचारस्य लेशो-लवः तत्सूत्र विचारलेशः नत्वविचारलेशस्य देशन-कथन तस्मात इति तत्सूत्र विचारलेश- देशनतः 'भो भव्या !' भी भविका ! यूयं शृणुत-श्रवणविषय कुरुत इत्यर्थः सुकरत्वाल्लेशतः प्रथमगाथाया व्याख्यानं कृतम्॥१॥ अथ चतुविशतिदण्डकनामान्याह- नेरइथा असुराई, पुढवाई वेइंदिआदओ चेव । गम्भयतिरियमणुस्सा वन्तरजोइसियवेमाणी ॥ २ ॥ (अब०) सप्तपृथिवीनरयिकाणामेको दण्डका, भवनपतीनाममू- रादिदशनिकायमेदाद्दश दण्डकाः, पृथिव्यादीनां पञ्च विकलानां त्र- यः, गर्भननिर्यग्मनुष्यव्यन्तरज्योतिष्कबैमानिकदण्डकाश्चेति सर्व २४, इद्द मूक्ष्मा अपर्याप्तकाश्च माया नाधिक्रियन्ते ॥ २॥ ( टीका नरेति. अघ नैरयिकाः पृथिवीभेदेन सप्तधा ज्ञात. न्या, मानविधा: 'मप्त प्रकारा येषां ते सप्तविधाः । यथा-१ अन्नप्रभा २ राप्रभा ३ वालुकाप्रभा ४ परप्रभा ५ धूमप्रभा ६ नमःप्रभा ७ तमम्तमःप्रभा । एतासु भयानां नैरयिकानामेको दण्डको दोयः । इह हि दण्डकाधिकारत्यात चतुर्विशतिस्थानेषु ॥ दंडकपकरणं॥ (३) %- पूर्वगाथोक्तदण्डकशब्दो.योजनीयः । असुरकुमारादीनां भवनप- तिनिकायभेदेन दश दण्डकाः स्युरित्यर्थः, अस्यन्ति क्षिपन्ति देवान् सुरान् ते असुरा., कुमाराकाराः कुमारपत्कोडाप्रियत्वाच कुमाराः, ते च ते कुमाराश्च असुरकुमाराः । ते आदौ येषां ते असुरकुमारादयः । तेषां दशप्रकारत्वादश दण्डकाः स्युरित्यर्थः, तथा पृथिव्यादीनां पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतिनिकायभेदानां पञ्च दण्डकाः स्युः । द्वीन्द्रिया आदी येषां ते 'द्वीन्द्रियादयः । तत्र (a) शरीररमनालक्षणे इन्द्रिये येषां तेहीन्द्रियाः । यथा- शसकपदैत्यादयः। त्रीणि शरीररसनाघ्राणलक्षणानि इन्द्रियाणि येषां ते त्रीन्द्रियाः । यथा-पिपीलिकामत्कुणेत्यादयः । चत्वारि शरीररसनाघ्राणचक्षुलक्षणानि इन्द्रियाणि येषां ते चतुरिन्द्रिया। यथा-मक्षिकाभ्रमरपतझवृश्चिकेत्यादयः । एवं द्वित्रिचतुरिन्द्रियः कृत्वा दण्डकात्रयो जाताः स्युरित्यर्थः । गर्भे भवाः गर्भजाः ते च ते निर्यश्चश्च मनुष्याश्च-गर्भजतिर्यग्मनुष्योस्तेषां द्वौ दण्डको स्थानामित्यर्थः । तथा विविधमन्तरं बनान्तरादिकमाश्रयतया येषां ते व्यन्तराः यहा भृत्यवच्चवाराधकन्वेन विंगतोऽन्तरं -विशेषो मनुष्येभ्यो येषां ते तथा, वनानामन्तरे भवाः पृषोद- रादित्वान्मागमः वानमन्तराः तेषामेको दण्डकः स्यात् । ज्यो- तिष्काणां चन्द्र सूर्यग्रहनक्षत्रताराणामेको दण्डको ज्ञेयः । वैमा- निकानामेको दण्डकः । ते च द्विधा-कल्पोपपन्नाः कल्पातीता- श्च । तत्र कल्पः स्थिति तं मर्यादेत्येकार्था । स च इन्द्रतत्स- मानिकादिव्यवस्थारूपस्तं प्रतिपन्ना कल्पोपपन्ना: ग्रैवेयकानुत्तर- वासिनस्तु' कल्पानीताः, तेषां सर्वेषामप्यहमिन्द्रयात् । विमा न्ति वर्तन्तेऽस्मिन् देवा इति विमानं तत्र भवा वैमानिका । नैरयिकादिवैमानिकान्ता एते चतुर्विशतिदण्डकाः ज्ञातव्याः । अत्र चकारः समुच्चयार्थः एवशब्दो निश्चयार्थे ज्ञेयः । अघ गाथा. यां दण्डकशब्दोऽनुक्तोऽपि दण्डकशब्दो ग्राह्यः । शब्देन किमुच्यते ' तबाह-तजातीयसमूहप्रतिपादकत्वं ज्ञेय- मित्यर्थ । संक्षेपतो गाथाहितीयस्य ( द्वितीयगाथायाः ) व्या- ख्यानं घिहितं । इह सूक्ष्मा अपर्याप्ताश्च प्रायो नाधिक्रियन्ते ॥२॥ अन दण्डक- (४) ॥ सावचूर्णिकं सटीकं च ॥ अथ चतुर्षिशतिहारेषु गाथाद्वयेन शरीरादिस्वरूपवक्तव्यमाह- संखित्तयरी उ इमा, सरीरमोगाहणा य सङ्घयणा । सन्नासंठाणकसाय, लेसिन्दियदुसमुग्घाया ॥ ३ ॥ दिहीदसणनाणे, जोगुवयोगोववायचवणठिई । पज्जत्तिकिमाहारे, सन्निगइयागई वेए ॥ ४ ॥ (अव०) गाथाद्वयं लघुसंग्रहणीसत्कमिहैपामेव पदानां विचारणी यत्वात् पििशकायां लिखितम्, व्याख्यालेशच यथा-स्वाभाविक- शरीरं च पन्नधा,औदारिकवैक्रियाहारकतैजसकार्मणभेदात् ।। एषां चावगाहनोच्छ्यमानं जघन्यमध्यमोत्कृष्टभेदात् त्रिधारा कार्मग्रन्थि- काभिप्रायेण अस्थिरचनाविशेष: संहननं तच्च षोढा-बज्रऋषभना- राच १ ऋषभनाराच २ नाराचाश्र्धनाराच ४ कीलिका ५ से- वत्ति ६ भेदात्, संहननादिलक्षणं तल्लक्षणशास्त्रादवसेयम् ।३। संज्ञा चतस्रः-आहार-भय-परिग्रह-मैथुनलक्षणाः, दश वा एतास्ते च चतुष्कपायसंज्ञा ४ लोकसंज्ञा १ ओघसंज्ञा २ क्षेपात् ।४। सम- चतुरम १ न्यग्रोध २ सादि ३ वामन ४ कुब्ज ५ हुंडक ६ भेदा- नि संस्थानानि । कपायाश्चत्वारः । ६। लेश्याः पटू-कृष्ण ? नील २ कापोत ३ तंजस ४ पद्म ५ शुक्ल ६ रूपाः परमत्र ता द्र- व्यरूपा अनस्थिना विचार्याः, न भावरूपाः ।७। इन्द्रियाणि पश्च।८। दो समुद्यानी-समवहननमात्मप्रदेशविकरणं समुद्धातः स चानी- वविषयोऽचित्तमहास्कन्धरूपः, नोजीवविषयः सप्तधा, "वेयण १ क- साय २ मरणे ३, पंउविय ४ नेउए य ५ आहारे ६ । केवलिए चेव भवे,जीवमणुम्साण सत्तेव ॥१॥"त्तिा दृष्टिविधा-मिथ्यात्वसास्वा- दनमिश्रभेदान.१०दर्शनं-चक्षुरचक्षरवधिकेवलभेदाच्चतुर्विधम्॥११॥ज्ञान ३ ॥ दंडकप्रकरणम् ॥ (५) ३ मतिश्रुतावधिमनःपर्यायकेवलभेदात् पश्चधा ।१२। अत्र ज्ञानसाह- चदिनुक्तमप्यज्ञानं ग्राह्यम् । तच्च विधा, मत्यज्ञानं श्रुताज्ञानं विभङ्ग- ज्ञानरूपम् । १३ । योगाः पञ्चदश, मनोयोगश्चतुर्थी वाग्योगश्चतुर्धा, औदारिको १ दारिकमिश्र २ वैक्रिय ३ वैक्रियमिश्रा ४ हारका- ५ हारकमिश्र ६ तैजसकार्मणरूप ७ सप्तधा काययोगभेदेन ।१४। उपयोगो द्विधा, तत्र ज्ञानाज्ञानभेदाष्टकरूपः साकारोपयोगः, चतुर्भेददर्शनरूपोऽनाकारोपयोगः,संयोगे द्वादश ।१६। एकसमये उ- त्पद्यमानानां च्यवमानानां सङ्ख्येनि द्वारद्वयं ।१६।।१७। स्थिति- रायुषो जघन्योत्कृष्टमानं ।१८। आहारादिग्रहणशक्तयः पर्याप्तय- स्ताश्चषट् आहार १ शरीरे २ न्द्रिय ३ श्वासोच्छ्वास ४ भापा ५ मनः ६ स्वरूपाः ।१९। के जीवाः कतिभ्यो दिग्भ्य आगतमाहारद्र- व्यमाहारयन्तीति किमाहारदार २०१ विशिष्टाः संज्ञास्तिस्रः । य- या त्रिकालमर्थ जानाति सा दीर्घकालिकी संज्ञा मनस्कानामेव १, यश्च देहपालनातोरिष्टवस्तुषु प्रवर्तते अहिनाच्च निवर्तते वर्त- मानकालविषयं च चिन्तनं यस्य तस्य हेतुवादोपदेशसंज्ञा द्वीन्द्रि- यादीनामेव २, यश्च सम्यग्दृष्टिः क्षायोपशामिकज्ञानयुक्तो यथाशक्ति रागादिनिग्रहपरस्तस्य दृष्टिवादोपदेशिकी संज्ञा ३१२१॥ गतिर्भवा- न्तरगमनं ।२२। आगनिः परभवात् ।२३। वेदश्च स्त्री(नपुंसकभे- दात् ।२४ ॥३-४॥ अथैतानि द्वाराणि २४ दंडकेऽववारयति- (टीका)--सवित्त० दिछी० गाथाद्वयस्य व्याख्यानं सुकरम- पि तु पुनः किमपि क्रियते-मयेति कर्तृपदं वहिर्गम्यं । संक्षि. प्ततरा तु संग्रहणी इयं शरीरादिचतुर्विशतिद्वारात्मिक्षा । तत्र शरीराणि पश्च औदारिकादीनि । शीर्यते इति शरीरः विना- शकारित्वात् ( विनाशित्वात् ) । पुंक्लीवलिगः । अवगाहन्ते ; अवतिष्ठन्ते जीवा अस्यामिति अवगाहना । संहन्यन्ते दृढीकि. -- ॥ सावर्णिकं सटीक च ॥ या भ- यन्ते शरीरपुद्गला येन तत् अथवा सहन्यन्ते संहति- विशेष प्राप्यन्ते शरीरावस्थावयवा यस्तानि संहननानि । तानि (च) बज्रर्षभनाराचादिभेदात् षोढा । संस्थान द्वेधा, जीवानां अजीवानां च । सतिष्ठन्ते प्राणिनोऽनेनाकारविशेषेणेति संस्थान तञ्च पोढा समचतुरनन्यग्रोधसादिवामनकुञ्जहुंडभेदः संस्था- नानि भवन्ति । द्वितीय तु अजीवानां रूपिणां पश्चधा संस्थान यथा,-परिमण्डलं वृत्तं त्र्यनं चतुनमायतं च । इह तु जीवानां संस्थाने ( न ) प्रयोजनमित्यर्थः । संज्ञाश्चतुर्धा दशधा वन्ति । चत्वारः प्रकारा यासां ताः । अथवा दश प्रकारा या- मां ताः । यथा-आहारभयपरिग्रहमैथुनभेदाच्चतुर्धा । ( पूर्वोक्त- भेदचतुष्फ ) क्रोधमानमायालोभओघलोकभेदाच्चेति दश संशाः स्युरित्यर्थः । तथा ग्रन्थान्तरोक्ताः सुखदुःखमोहधर्मरूपाधतनः पतास्वेवान्तर्भवन्ति इत्यर्थः ( अनया ) संजानातीति संझा । कष्यम्ते हिंस्यन्ते प्राणिनोऽस्मिन्निति कषः संसारस्तस्यायो लाभो येभ्यस्ते कषायाः क्रोधादयश्चत्वारोऽप्यनन्तानुबन्ध्यादिभे- देन पोडश भवन्ति । लेश्याः कृष्णाधाः षोढा स्युः । लिश्यते -श्लिप्यते कर्मणा सह जीवः आभिरिति लेश्याः । यदुक्तं- कृष्णादिद्रव्यसाचिव्यात्, परिणामो य आत्मनः । स्फटिक- म्येष तप्रायं, लेश्याशद: प्रवर्तते " ॥ १ ॥ कृष्णानीलफापो. ततेजःपद्मशुक्लरूपाः,परमत्र ता द्रव्यरूपा अवस्थिता विचार्या न भायरूपाः । इन्द्रियं श्रोप्रादिभेदात पञ्चधा । दुसमुग्धायेति. हो ममुद्घाती जीवाजीयसम्बन्धिनी भवतः । तत्राचं जीवसमु- मातमाह-तथादि-सम्यक् आत्मनो वेदनादिभिरेकीभावेन उ. मावल्येन घातः समुद्घानः । स च मप्तधा, यथा-वेदनाक- पायमरण कियेन्यादि। वेदनादीनां पण्णां मानमन्तर्मुहत स्यात् मातमम्नु फेलिसमुद्घातो दण्डादिना लोकल्यापी, दण्डादि प्रमेण सकललोकस्य पूरणात, कालतोऽष्टमामयिकः । द्वितीयन्तु ममुदघानोऽनित्तमलाम्यन्धम्प.; म च कवलिसमृदयातयत अ. मामयिक. पर मिहानाधिकारान्नोन. । दिट्टी० दृष्टिविधा, यथा सम्यादयः १. मिश्यावृष्टिः २: मम्याम्मिश्यावृष्टि. ३ ( च ) !
॥ दंरकमकरणं॥ (७) दर्शनानि चत्वारि भवन्ति; यथा-चक्षुर्दर्शनं अंचक्षुदर्शनमय. धिदर्शनं केवलदर्शनं (च) घटपटादिपदार्थसार्थसामान्या- कारपरिज्ञान ज्ञातव्य । पदाषिशेषाकारपरिज्ञानं पुन- शनि ज्ञातव्यम् । अयमेव ज्ञानदर्शनयोर्भेदः । पञ्च ज्ञानानि भवन्ति । यथा पञ्चभिरिन्द्रिपः षष्ठेन मनसा जीयस्य यत् झानं स्यात् तन्मतिझानं । अतं द्विधा भवति । द्रव्यश्रुतं भावश्रुतं च, यथा-द्रव्यश्रुतं द्वादशाङ्गीरूपं, भावश्रुतं द्वादशाङ्गीसमुत्पन्नोपयोग- रूपं । अबंधिज्ञानं द्विप्रकारं-मवहेतुकं श्राद्धसाधुतिरञ्चां ( गुण. हेतुकं ) च । मनःपर्यायज्ञानं साधनों (वय) द्वीपसमुद्रस्थितसं. झिपञ्चेन्द्रियमनोविषय विभेद ऋजुमतिषिपुलमतिरूपं साधूना- मेव भवति । केवलज्ञानं धनधातिकर्मचतुष्टयक्षयसमुत्पन्न सक- ललोकालोकविषयं । ज्ञानसाहचर्यादत्राप्यनु(पानु)कमपि विधा- ऽज्ञान, यथा-मत्यज्ञानं श्रुताज्ञान विभङ्गज्ञानं । सप्त द्वीपसमुद्रान् यावत् विभङ्गज्ञानं तु पश्यति मिथ्यादृष्टीनामेव त्रीण्यज्ञानानि भवन्ति । एतत्सूत्रे नोक्तं वहिर्गम्यं । वाचां मनसां चायतो व. क्ष्यमाणाः प्रत्येक चतुर्धा ( चत्वारो) योगाः । तथा कायानां योगाः सप्तधा (सप्त सर्वमीलनेन पञ्चदश योगाः स्युग्त्यिर्थः। उपयोगो विधा-तत्र सामाज्ञानमेदाप्टकरूपाः साकारोपयोगाः (इतरे ) चत्वारः. यथा- चक्षुर्दर्शनाचक्षुर्दर्शनावधिदर्शनकेय- लदर्शनम्पाः । संयोगे एवं द्वादश उपयोगाः स्युरित्यर्थः। उत्प. धन्ते (पपत्तिः ) उपपातः । च्यवन्ते चेति (म्युतिः) च्यवनं । जीवानां उपपातच्यवनयोरिहापि सम्बन्धादुपपातच्यवनविषय- योर्विरहकाललक्षण-अपान्तरालकाललक्षणमेकसमयसङ्ख्या चेति गृोते इत्यध्याहारः । तिष्ठन्ति नरकादिभवे शृङ्खलाबद्धा व जन्तवः पाप(पुण्य)कर्मपरिणत्या स्थितिरायुर्जीवितमित्येकार्था। 'पज तित्ति आहारादीनामत्र निर्वृत्तिनिष्पत्तियतो दलिकाद-दल- भूतात्पुद्गलसमुहाद भवति तस्य दलिकस्य तामेवाहाराघभिनि- वृत्ति स्वस्वविषयपरिणमनरूपां प्रति यत् करणं जीवमम्बन्धि. शक्तिरूपं सो पर्याप्तिः । तास पोटा आहुः, यथा-आहारशरी. रेन्द्रियश्वासोच्छ्यासभाषामनःस्वरूपाः । किमाहारेत्ति० किमा- हारकोऽनाहारको वा जीवः ? यहा किस्वरूपः मचित्तादि- (८) ॥ सावर्णिकं सटीकं च ॥ आहारकः १ केन धा शरीरेणाहारोऽस्येति किमाहारः? । आह- रणं आहारः । सन्नीत्ति० विशिष्टा संशास्तिस्रः । यया त्रिकाल. विषयमथै जानाति सा दीर्घकालिकी(क्ये)वसमनस्कानामेष । यश्च स्वदेहपालनद्देतोरियस्तुषु प्रवर्तते अहिताश्च निवर्तते वर्तमान- कालविषयं च चेतनं ज्ञानं यस्य तस्य हेतुपादोपदेशिकीसंज्ञा वीन्द्रियादीनामेय । यश्च सम्यग्दृष्टिः क्षायोपशमिकज्ञानयुक्तो यथाशक्तिदेयोपादेयनिग्रहपरस्तस्य दृष्टिवादोपदेशिकीसंज्ञा छा- स्थसम्यग्दृशामेष इति संज्ञात्रिकमधमन्तव्यं । गमन गतिः । आगमनमागतिः । अथ वेदत्रयमाह-पुंवेदः स्त्रीवेदः नपुंसकवेदः । प्रज्ञापनादिषु विस्तरेणाभिहिता. अर्थाः ततः संक्षिप्य गृह्यन्ते प्रतिपायन्तेऽभिधीयन्ते घाऽस्यामिति ग्रहेरणिरित्यौणादिके अणिप्रत्यये छीप्रत्यये च मङ्महणोति निष्पन्न । संक्षेपतो द्वार- गाथाहयस्प व्याख्यानं कृतमित्यर्थः । अत्र चकारः समुच्चयार्थ: ।॥ ३ ॥२॥ अथ चतुर्विशतिदण्डकेषु चतुर्विशतिहाराणि निरूपयन्नाद- चउ गभतिरियवाउसु, मणुयाणं पंच सेस तिसरीरा। थावर चउगे दुहयो, अंगुलअसंखभागता ॥ ५॥ ( अव० ) 'दुव्बयणे बहुवयण ' मिति प्राकृतलक्षणेन गर्भज- तिर्यक्वायोश्चत्वारि शरीराणि सम्भवन्ति, सम्भवश्च न भव- न्येवेति निश्चयः, एवं सर्वत्रापि ज्ञेयम् । आहारकत्यागेन फयोश्चि- सोफियकरणेन चतुर्णा सम्भवः, मनुष्याणां पश्चापि । शेपा दण्टकात्रिशीरा औदारिकयुक्ताभ्यां च तैजसकार्मणाभ्यां ।। स्थावरचतुष्के पृथिव्यप्नेजोवायुरूपे 'दुहतोत्ति' बाभ्यां प्रकाराभ्यां जघन्योत्कृरूपाभ्यां अकुलासंख्येयभागानि शरीराणि, यद्यपि सादगणां चानाम्यापृथिवीनां शरीराणि मिथोङ्गलासङ्ख्येय- गुणवृहानि तथापि यथोक्तमानान्येव ॥ ५॥ -- , . ॥ दंडकपकरणम् ॥ -- (९) (टीका)-चउगम्भेत्ति० गर्भज तिर्यग्वाय्वोश्चत्वारि औदारिक- वैक्रियतजसकामणलक्षणानि शरीराणि भवन्ति, भवन्तीत्यध्या- हारः । “ दुव्वयणे बहुवयणमिति" प्राकृतलक्षणेन (द्वित्वेऽपि बहुवचनं ) गभजतिर्यग्वारखोश्चत्वारि शरीराणि सम्भवन्ति, संभव एष न निश्चयेन । आहारकत्यागेन वैक्रियकरणेन च चतु. पणी संभवः। 'मणुआणं पञ्चेति.' मनुष्याणां पञ्च औदारिकवै. वियआहारकतैजसकामणलक्षणाः शरीराः स्युः । सेसे ति० शेषेषु दण्डकेषु त्रीणि शरीराणि भवन्ति, तान दण्डकान् विस्तरेणाह- प्रयोदश देवानां सप्तपृथिवीभेदेनैकः नैर यिकाणां सर्वमीलनेन चर्दश दण्डकाः जातास्तेषु प्रयो वैक्रियतैजसकार्मणलक्षणाः शरीरा भवन्ति । तथा पृथिव्यप्तेजोवनस्पतीनां चत्वारः पञ्चमो द्वीन्द्रियाणां षष्ठस्त्रीन्द्रियाणां सर्वमीलनेन सप्त दण्डका जाता. स्तेषु त्रीणि औदारिकतजसकामणलक्षणानि भवन्ति । सर्वमील- ने नैव वि तिर्दण्डका जातास्तेषु त्रीणि शरीराणि भवन्ति इत्ययं भावः । प्रथमं शरीरद्वारं व्याख्यातं । अथावगाहनाद्वारमाह- थावरे ति० वनस्पति मुक्त्वा स्थावरचतुष्केषु शरीरं द्विधा, यथा जघन्यतः उत्कृष्टतश्चागुलासख्येयभागप्रमाणं शरीरं स्यात् , अगुलांसंख्यातभागवपुर्मानं स्यादित्यर्थः, परं जघन्यापेक्षया उत्कृष्टमसङ्ख्येयगुणमित्यर्थः ॥ ५ ॥ सव्वेसिपि जहन्ना, साहाविय अंगुलस्ससंखंलो। उक्कोस पणसयधणू, नेरइया सत्तहत्थ सुरा ॥६॥ (अव०)शेषाणां सर्वेषां विंशतिदण्डकजीवानां स्वाभाविकस्य मौलस्य शरीस्य जघन्यावगाहना अङ्गुलस्यासङ्ख्यातो भागः । उत्कृष्टतः पञ्चशतधनुरुच्चा नैरयिकाः, सुराः सप्तहस्तोचाः ॥ ६॥ (टीका)-सव्वेसिपि जहन्ने तिः पृथिव्यप्तेजोचायन स्थायर- चतुष्कान् सत्यज्य विहाय सर्वेषामपि विंशतिदण्डकानां स्वभा. वतो जघन्याङ्गुलासंख्यातभागतनु स्यात् । सर्व निकृष्टं वपुर्मानं स्यादित्यर्थः अथ उत्कृष्टदेहमानमाह उन्कोस पणसयेति० (१०) ॥ सावचूर्णिक सटीकं च ॥ सप्तम्यां माघवत्याख्यायां नरकपृथिव्यां धनुःपञ्चशतप्रमाणवपुषः पञ्चशतकोदण्डशरीरमानाः नैरयिकाः जीवाः स्युः, स्युरित्यध्या- हार । ततोऽो(?ि )ना ज्ञेया रत्नप्रभां यावत् । । सौधर्म- शानयोर्देवानां तथा भवनपतिव्यन्तरज्योतिष्काणां तूच्चत्वं चपु:- प्रमाणं उत्कृष्टतः सप्त हस्ताः ज्ञेयाः, सप्न रत्नयो भवन्ति .इत्यर्थः, "बद्धमुटिरसौ रत्निः" इति वचनात् ॥ ६ ॥ गभतिरि सहसजोयण,वणस्सई अहियजोयणसहस्सं । नरतेइंदि तिगाऊ, बेइंदिय जोयणे बार ॥७॥ जोयणमेगं चउरिं-दिदेहमुञ्चत्तणं सुए भणिों। वेजवियदेहं पुण, अंगुलसंखं समारंभे ॥ ८॥ (अव०) गर्भजतिरश्चां मत्स्यादीनां योजनसहस्र, वनस्पतेः साधिकयोजनसहस्रं तवं तु पृथ्वीविकारः। नराखोन्द्रियाश्च त्रि- गन्यूनोच्चाः । द्वीन्द्रिया 'जोयणे वारत्ति' द्वादशयोजनोच्छ्रयाः। चतुरिन्द्रियदेवमुच्चत्वेन योजनमेकं । श्रुते प्रज्ञापनादौ भणितमुक्तं प्रस्तावादाह-वैक्रियदेहं पुनः प्रारम्भेऽङ्गुलसङ्ख्यातभागमानं,उत्कू- धं 'देवनरअहियलक्खति' २द्वा० ॥ ८ ॥ (टीका)-गभतिरिमहसेति. मत्स्योरगादयो गर्भजास्तिर्यञ्चः सहत्रयोजनमाना:-सहन्नयोजनप्रमाणा भवन्ति भवन्तीत्यध्याहारः । घणम्मतिः प्रत्येकवनम्पतीनां मागगदिगतपचनालादीनां श. भी देशमान फिश्चिधिक योजनसहनमुचन्वं म्यात । ननु दाचीरमान उन्मेधांगुलेन समुद्रपादादीनां प्रमाणांगुट योजन- योजनमानायगाहत्त्वान तहत पानालादीनां तु उत्सेधांगुलापेक्ष. गायन्ददाय स्यात् ? अत आह- उन्नधांगुलयो नमनमाने जलाटाये गातीयांदिम्थाने बनम्पनः साधिकं योजनसहनं, तदृ- चन विधी विकार इत्ययः । नरहन्ति० श्रुते मिहान्ते नरा- tri मनुष्याणां धीन्द्रियाणा कणगानिकादीनां क्रोधिक देहो.
॥ दंडकपकरणं ॥ (११) चत्वं भणितं कथितं अहतेति कर्तृपदं । गम्यूतित्रयमुश्वत्वं शरी- रमानेन नरत्रीन्द्रियौ भवत इत्यर्थः । बेइंदियेति. ही प्रियाणां शङ्खप्रभृतीनां द्वादशयोजनप्रमाण देहोच्चत्वं वपुनि स्याटित्यर्थः ।। ७ ।। जोयणेति० चतुरिन्द्रियाणां मक्षिकाभ्रमरदंशककंशारिश- लभपतनवृश्चिकप्रमुखाणामुत्कृष्टतो योजनमेकं देहमानमुच्यत्वं भ- णितं कथितं । अध खण्डान्धयो शेयः, गाथात्रयेणावगाहनास्वरूप व्याख्यातं । अथ पुनर्वैक्रियावंगाहनामाह-वेउब्धियेति ,पुनक्रिय देहस्य प्रारम्भ जघन्यतोऽबगुलस्य संख्यांशः संख्येयभाग घपुभ- वति उत्तरवैकियशरीरापेक्षया । भवधारणीयं तु अगुलासंख्येय. भाग प्रारम्भे ॥ ८ ॥ अथोत्कृष्टां वैक्रियाषगाहनामाह- देवनर अहिय लक्ख, तिरियाणं नव य जोयणसयाई। दुगुणं तु नारयाणं, भणियं वेनवियसरीरं ॥ ९ ॥ (अव०) लब्धिक्रियशरीरिणो जीवतोऽन्तर्मुहूर्तात् सपरो न वैक्रियशरीरेऽवस्थानमस्ति । पुनरौदारिकशरीरस्य अवश्यं मतिप- तेरिति ॥९॥ (टीका ) देवनरेति० असुरकुमारादिव्यन्तरज्योतिष्कसौध- धर्माद्यच्युतावसानदेवानां च उत्कृष्टतः सहजशरीरग्रहणोत्तर- कालं कार्यमाश्रित्य विविधा क्रियत इति उत्तरवैफ्रिया च पुन- देवानां उत्तरवैक्रियतनोर्योजनानां किञ्चिदधिक लक्षं । नराणां वैक्रियशरीरं किञ्चिदधिकं योजनलक्ष भणितं कथितं । 4वेयकानुत्तरेषु देवानामुत्तरवैक्रियतनुर्नास्ति, सामर्थ्य सति कार्याभावात्तदकरणमित्यर्थः । तिरिये ति०, अन तुशब्दः पुनरर्थे तिरचा उत्कृष्टा वैक्रियतनुर्नधयोजन शतप्रमाणा भणिता। तु पुनः नैरयिकाणां स्वस्थाभाविकदेहादुत्तरवैकियशरीरं दिगुण क्षेयं, तथा (१२) ॥ सावचूर्णिकं सटीकं च ॥ - यथाऽऽधायां रत्नप्रभायां धनुःपञ्चदशकं हस्तद्वयं द्वादशांगुल- प्रमाण । सतो द्वितीयायां धनुष(नू षि) एकत्रिंशद्धस्तमेकं । तृ- सीयायां हापष्टि हस्ताय । तुर्यायां धनुषः(पां) पञ्चविंशत्य- धिकं शतं । पञ्चम्यां पञ्चाशदधिकं शतद्वयं नैरयिकाणां देह- मानमुत्धेन स्यात् । षष्ठयां नारकाणां धनुःपञ्चशतानि शरीरं स्यात् । पुनः सप्तम्यां नैरपिकाणामुच्चत्त्वेन धनुःसहनमेकं उत्तरक्रियदेहमान स्यादित्यर्थः । जघन्यतस्तु तदेव नारकाणां मिविधोऽपि स्वाभाषिक उक्तरवैक्रियश्च क्रमांदगुलासख्यातांशोऽ- ऽगुलसंख्यातांशश्व, जघन्पश्चोत्पत्तिसमय एष नान्यदा ॥ ९ ॥ सय उत्तरवैफियशरीरमानमाह- अंतमुहुत्ते निरए,मुहुत्तचत्तारि तिरियमणुएसुं। देवेसु श्रद्धमासो, उक्कोस विउवणाकालो ॥१०॥ ' (अव०) इतिवचनसामर्थ्यान अन्तर्मुहूर्त चतुष्टयं तेषां देशवन्ध इत्युच्यते तन्मनान्तरमित्यवसेयम् । दनीयसंहननहारमाह ॥१०॥ टीका-अम्तमुहुत्तन्तिः नरकस्थजीवानां वैक्रियशरीरस्यान्त- मुदत्तमुत्कृष्टमानं भवति । तिर्यग्मनुष्ययो क्रियशरीरस्य चत्वारो मुश्ताः उत्कृटाः स्थितयो भवन्ति (तिर्भयति) इत्यध्याहारः । भयनपत्यादिसौधर्मायच्युतान्तदेवानां उत्कृष्टत: उत्तरवैक्रियषपु- पोऽईमामः कालः स्यान। क्रिश्चिहिशेषमाइ-देवनैरयिकयोः स्वा- भाविक कियदे. उत्तरक्रियदेहश्च स्यात्,च पुनः तिर्यग्नरयोकि- यदेव.(अस्वाभायिक.) स्यात्। चायोरस्वाभाविकं स्वाभाविकदेह स्यात् । केभिन्मते मौदारिक चक्रिय च, केपाश्चिन्मते घेकि- य मेयन्यनुयोगहरवृत्ती प्रोक्तमिन्यर्थः । पृथिव्यप्तेजीयनस्पति विकले कियेषु च येफियदेदा न स्युरिति भावः । देशध्दः पुं- पाटीयप (प.) । अयगाहनाहार हिनीयं प्ररूपितं ॥ १० ॥ सद मंहनना तृतीयमाद - थावरसुरनेरइया, अस्संघणा य विगलवहा।
॥ दण्डकमकरणं ॥ (१३) संघयणछक्कं गब्भय-नरतिरिएसुं मुणेयव्वं ॥ ११ ॥ . (अव०)स्थावरमरनैरयिकाः संहननरहिताः अस्थ्यभावादेव । चः समुच्चये किं समुचिनोति सैद्धान्तिकमतेन सुरानारकाश्च प्रथमसंह- ननिनः विकलाः सेवार्ता इति अस्थिसम्बन्धमात्रसंहननवन्त:,गर्भ- जनरसिरश्वोः संहननषदकं ज्ञातव्यम् । ३ वा० ॥ ११ ॥ चतुर्थ मंज्ञाद्वारमाह- टीका-थावरसुरेति० पानां स्थायराणा, प्रयोदशदेवानां, सप्तपृथिवीभेदेनैकः नारकाणां सर्वमीलनेनैकोनविंशतिर्दण्डका जातास्तेषु दण्डकेषु षडपि संहननानि न सन्ति न ज्ञातव्यानि इत्यर्थः । विकलेन्द्रियाणां द्वित्रिचतुरिन्द्रियाणां संमूच्छिमपञ्चे. न्द्रियतिर्यग्नराणां च सहननं सेवार्त ज्ञातव्यम् । कार्मग्रन्थिका- स्तु संमूच्छिमपञ्चेन्द्रियतिर धां अपि. षडप्याहुः। क्वचिदेकेन्द्रि- याणां सेवात्त देवानां च बर्षभनाराचमुक्तं, तदौपचारिकं । तुशब्दार्थ अपिशब्दः, तु पुनः, गर्भजतिर्यग्मनुष्ययोः षडपि संहननानि ज्ञातव्यानि । को भावः ? गर्भज तिर्यग्करेषु षडपि संहननान्याहुः विकलेऽवेक सेवातमन्येष्वेकोनविंशतिदण्डकेषु न संहननानि भवन्ति इत्यर्थः । अत्र चकारः समुच्चयार्थः ॥११॥ संहननद्वारं तृतीयं निगमयन्नथ संज्ञाद्वाराभिधित्तया चतुर्थ संज्ञाद्वारं व्याख्यानयति- सम्वेसिं चउ दह वा, सन्ना सठवे सुरा य चउरंसा । नर तिरि छस्संठाणा, हुंडा विगलिन्दिनेरइआ ॥१२॥ (अव०)संज्ञा सर्वजीवानां चतस्रो दश वा, केपाश्चिन्नृणां पोडगापि परमरूपत्वान्न विवक्षिनम । ४दा० । पञ्चमं संस्थानद्वारमाह- सर्वे सुराश्च भीमो भीमसेन इतिन्यायेन समचतुरस्र संस्थानाः। नरनिर्यश्ची षट् संस्थानौ विकलेन्द्रियनरयिका हुण्डसंस्थानाः ॥१२॥ स्थिराणां षइविधसंस्थानराहित्येऽपि संस्थानानां आकारभेदत्वादेव एतच्छ- रीराकारानाह- , (१४) ॥ सावर्णिकं सटीकं च ॥ टीका-सव्वेसिं चउ दहेति० सर्वेषां चतुर्विशतिदण्डकजी- वानां आहारभयमैथुनपरिग्रहलक्षणाश्चतस्रः संज्ञाः स्युः । अथवा दश संज्ञाः स्युः यथा- पूर्वोक्ताश्चतस्रः क्रोधमानमायालोभलोक- आघलक्षणा:(णाश्चेति) संज्ञाः दश भवन्ति, भवन्तीत्यध्याहारः। चतुर्थ संज्ञाहारं व्याख्यातं । अथ पञ्चमं संस्थानद्वारं प्रोच्यते । सव्व सुरेति भवन पत्यादिवैमानिकान्ता देवाः सर्वेऽपि सम- चतुग्नसंस्थानाः स्युः, समाश्चतस्रोऽनयश्चतुर्दिग्बिभागोपलक्षिताः शरीरावयवाः यत्र समा वा चत्वारोऽस्राः कोणाः यत्र ते (तत्) समचतुरस्त्राः (लं) गभजनरा गर्भतिर्यञ्चश्च तयोः समचतुरस्र- न्यग्रोधपरिमण्डल सादिकुज वामनहुण्डाख्यानि षड पि संस्था- नानि भवन्ति । हुंडा बीति० विकलेन्द्रियाणां नैर यिकाणां स्थावराणां च हुण्डाख्य संस्थान स्यात् । हुण्डस्य किं लक्षणं स्यात् ? तदुच्यते । यथा- सर्वावयवेषु अलक्षणं स्यात्, शुभा- काररहित हुण्डं भवति इत्यर्थ निनु चतुर्विशतिदण्डकानां षडपि संस्थानानि प्रोक्तानि, यदि स्थावराणां नानाविधध्वजसचिबुद्घु- दाधमरा (आ)कारा वर्तन्ते तर्हि बहूनि संस्थानानि भवन्ति ! प्रोच्यते, अमी भेदा हुण्डान्तर्गता भवन्ति इत्यर्थः ॥ १२ ॥ हुण्डस्य भेदनाह- नाणाविह धयसूइ, बुट्युय वणवाउतेउअपकाया । पुढवामसूरचंदा-कारा संठाणओ भणिआ ॥१३॥ (अव०) नानाविधं, १ भ्वजः पताका, • मृची, ३ बुद्बुदा- काराणि क्रमेण वनस्पनिचायुतेजोऽप्कायशरीराणि । पृथ्वी अर्द्ध- ममुगकाग भणिना भगवत्यादौ ॥ १३ ॥ पाटं कपायबारमाह- दीका-नाणाविति. वनस्पतयो नानाविधर्मस्थाना विचि. प्रमंस्थानाः भणिताः। च पुनः वायवो यजमस्थाना गणिता । अग्नयः मचिकलापमम्थानाः भणिताः प्रोक्ताः । आप: स्तियु- पविन्दमम्बाना' वृट युदामाग, भगिना. कविता: पंपोटा इति लोकोक्तिः । पृथियो मसर वाम्राकाग अधमनगाकारा इत्यर्थः , TI . ॥ दण्डकपकरणं ॥ (१५) सव्वेवि चंउकसाया, लेसछगं गभतिरियमणुएसुं । 'नारयतेजवाज, विगला वेमाणिय तिलेसा ॥१४॥ (अव०) सर्वेपि जीवाः चतुष्पार्यवन्तः । निष्कवायाश्च केचन मनुष्येषु । सप्तमं लेण्याद्वारमाह- लेझ्यापटुकं गर्भजतिर्यग्मनु- व्येषु, नारकतेजोवायुविकला वैमानिकाश्च त्रिलेश्याः प्रथमद्विती- योः पृथिव्योः कापोता । तृतीयस्यामुपरि कापोता अधो नीला। पंकायां नीला धूमायां नीला कृष्णा च ( षष्ठीसप्तम्योः कृष्णा एव । तथा ' सौधर्मशानयोस्तेजः कल्पत्रये पद्मा लान्तकादिषु शुक्ला एवेति ॥ १४ ॥ - पञ्चमं संस्थानद्वारं संहरन षष्ठं कषायद्वार प्ररूपयति ।। टोका- सव्वेवि चउ० इति० केवलिसिद्ध जीवान् मुक्त्वा चतु. विशतिदण्डकानां जीवेषु चत्वारः कषायाः भवन्ति । षष्ठं कपा- यद्वार घर्णितं । अथ सप्तमं लेश्याद्वारं विवृणोति । लेसेति० -गर्भज तिर्यग्मनुष्ययोर्लेश्या. षडप्याहुः । च पुनः नारयेति० नैर- यिकानां तेजसा वायूनां विकलेन्द्रियाणा च कृष्णाास्तिस्रो लेश्या भवन्ति । वैमानिकानां देवानां तेजआद्यास्तिस्रो लेश्या भवन्ति, भवन्तीत्यध्याहारः ॥ १४ ॥ जोइसिय तेउलेसा, सेसा सव्वेवि हुंति चउलेसा । इंदियदोरं सुगम, मणुयाणं सत्त समुग्घाया ॥१५॥ (अव०) ज्योतिप्काः केवलतेजोलेश्यावन्तः । शेषाः सर्वेऽपि पृथिव्य वन-पतिभवनपतिव्यन्तराश्चतुर्लेश्या भवन्ति । तेजोलेश्यावतां केपा- श्चिद्देवानां भृजलवनेपत्तादात् कियत्कालं तल्लेश्यासम्भवः ।। ७ ॥ इन्द्रियद्वारं सुगमम् । ८ । नवमं समुद्वातद्वारमाह- मनुप्येषु सप्त समुद्घाताः॥ १ सप्तसमुद्घानानां नामान्याह- - (१६) ॥ सावचूर्णिकं सटीकं च । - टीका--जोइसियेति० तेजोलेश्याका ज्योतिष्काः भवन्ति । आधपदं व्याख्यातं | गाथाद्वितीयपादस्य व्याख्यानमाह-सेसा सम्वेवित्ति० शेषाः सर्वेऽपि चतुर्लेश्यावन्तः स्युः । को भायः ? चतुर्दशदण्डकेषु चतस्रो लेश्याः भवन्ति । तद् विस्तरेणाह- भवनपतीनां व्यन्तराणां च कृष्णा नोला कापोता तैजसी चेति चतस्रो लेश्याः स्युः । च पुनः पृथिव्यब्वनस्पतीनां कृष्णाधाच. तम्रो लेश्याः स्युः, अत्रापि विशेषमाह-परमाधार्मिकाणां कृष्णैव ज्योतिष्केषु आद्यकल्पद्विके च तेजोलेश्या । कल्पत्रिके सनत्कु मारादिके पझलेल्या लान्तकादिषु चानुत्तरान्तेषु शुक्रलेश्या भवति भयति इत्यध्याहारः । सप्तमं लेश्याद्वारं निरूपित । अथ अष्टम इन्द्रियद्वारं व्याख्यानयति-इंदियेति. इन्द्रियद्वारं सुगममपि बहिस्तः किमपि विशेषमाह-तत्र इन्द्रियाणि पञ्च श्रीपादीनि प्रसिद्धान्येय सामान्यतः, विशेषतः पुनस्तानि द्विधा द्रव्येन्द्रियाणि भावेन्द्रियाणि ( च ) । तत्र द्रव्येन्द्रियाणि पुद्ग- लद्रव्यरूपाणि भावेन्द्रियाणि लब्ध्युपयोगलक्षणानि, तत्र पुनद्र- व्येन्द्रियाणि निघृत्युपकरणभेदात् । द्विधा | निवृसिरपि द्विधा अन्तवाहिश्च । तत्र श्रोत्रेन्द्रिस्यान्तमध्ये कदम्बपुष्पाकारदेहाघ. यवरूपा चक्षुषोर्मसगकाग घ्राणयोगतिमुक्त पुष्पाकारा रसना- याः श्रुरप्राकारा स्पर्शन्द्रियस्य च नानाकारा विचित्र स्थाना नित्तिरस्ति इत्यर्थः । द्रव्येन्द्रियस्वरूपं प्रोक्तं, अथ भावेन्द्रि- याणि लम्ध्युपयोगरूपाणि जीवस्य ज्ञानावरणादिकर्मक्षयोपश- मभावात् या शब्दग्रहणशक्तिः सा लब्धिः, येन पुनः शब्दादी. नां प्राणपरिणामः म उपयोगः, एतदद्वयरूपाणि भावेन्द्रियाणि । ट्रध्यन्द्रियभावेन्द्रिययोः संस्थान स्वरूपं च व्याख्यातं । अथ पपां पञ्चेन्द्रियाणां विषयमाद- श्रवणयोर्वादशयोजनविपयः म्यान, हाशयोजनात मेघादीनां शब्दग्रहणशक्तिरस्ति इत्यर्थः। घ पुनः चक्षुषोः किञ्चिदधिकं यं लक्ष विषयः स्यात, उत्कृ- तः किञ्चिदधिकमेयं लक्षं दृष्टिप्रमाण मयति इत्यर्थः, अत्र शान विष्णुकुमारग्गांचरता । च पुनः घाणेन्द्रियस्य नय यो. जनानि यापन विषयः न्यान, नययोजनान पिपयं गृहाति इ. ग्यच. । पून उमटतो रसनायाः नव योजनानि यातिपयः -
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॥ दण्डकपकरणं ॥
(१७)
1
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स्यात्, नवयोजमात्पुद्गलरसमास्वादयतीत्यर्थः । यथा दूरतस्ति-
तिडीरसालक्षारादीन् दृष्ट्रवा
मुखे जलं समेति इति दृष्टा-
म्तो ज्ञेयः । तथा स्पर्शेन्द्रियस्य नवयोजनानि यावत् विषयो
भवति, स्वशरीरं प्रारभ्य नवयोजनप्रान्तं यावत् पुद्गलद्रव्यं
स्पर्शेन्द्रियो गृह्णाति इत्यर्थः । च पुनरेषां पञ्चानां विषयभेदं
विवृणोति- श्रोत्रयोराकर्णन-श्रवणं विधा भवति, यथा- शुभः
अशुभः मिश्रश्च । अथवा जीवेभ्यो द्वीन्द्रियदिभ्यः,अजीवेभ्यः
पटहादिभ्यो मिश्रेभ्यो भेर्यादिभ्यः,( शब्दानामुत्पन्नानां) कर्ण
योराकर्णन त्रिविधं स्यात् । च पुनः चक्षुषोविलोकनभेदाः प-
ञ्चधा भवन्ति,यथा-चक्षुषा पञ्च शुक्लपीतरक्तनीलकृष्णा वर्णा
गृह्यन्ते, पञ्चवर्णा दृष्टिगोचरा भवन्ति इत्यर्थ । तथा घ्राणे-
न्द्रियस्य द्वौ सुगन्धदुर्गन्धविषयभेदौ भवतः, घ्राणेन्द्रियं सुगन्ध-
दुर्गन्धे गृह्णाति इत्यर्थः, घ्राणविषये समभ्येत इत्यर्थः । रसना-
याः पञ्च कटुकादिविषयझेदा भवन्ति । केऽपि षडप्याहुः, यथा
कटुकतिक्तकषायाम्लमधुरक्षारभेदात् । षण्णामपि रसानां स्वाद
जिह्वा जानाति इत्यर्थः । तथा स्पर्शेन्द्रियस्याष्टौ सुकुमालादि-
विषयभेदा भवन्ति, यथा- सुकुमालकर्कशगुरुलघुशीतोष्ण-
स्निग्धरूक्षभेदात्, स्पर्शेन्द्रियः स्पर्शन स्पर्श जानाति
इत्यर्थः । पञ्चेन्द्रियाणां सर्वेऽपि त्रयोविंशतिर्विषयभेदा जाता
इत्यर्थः । अथ श्रवणादीनामवगाहनामाह-चतुपर्णा कर्णचक्षुओ-
णरसनानामगुलासख्येयभागावगाहना भवति । च पुनः स्पर्शे-
न्द्रियस्य स्वदेहप्रमाणावगाहना ज्ञातव्या । अथ केपामिन्द्रिया-
णां काम भोगेच्छा भवति तल्लक्षणमाह-श्रवणचक्षुषोः कामेच्छा
भवति, च पुन घ्राणरसनास्पर्शेन्द्रियाणा भोगेच्छा भवति,
आधौ धौ कामिनी ज्ञेयौ त्रयः प्रान्ताः भोगिनो ज्ञेया इत्यर्थः ।
अथ एषां पञ्चेन्द्रियाणां पुनरुपकरण किं स्यात्तदाह-कणेन्द्रि-
यादीनां निजनिजविषयग्रहणशक्तियथा चन्द्रहासस्य छेदनश-
क्तिरिव । इन्द्रियाणां सदृष्टान्तो विचारः प्रवचनसारोद्धारवृ-
तितो भावनीयः । अष्टममिन्द्रियाद्वारं व्याख्यातं । अथ नधर्म
समुद्रातहारं प्ररूपयांत-मणुएसु इति० मनुष्ये सप्त समुद.
घाता भवन्ति ॥ १५ ॥
विणा उ (१८) ॥ सावचूर्णिकं सटीकं च ॥ वेयणकसायमरणे, वेउविय तेथए अ आहारे। केवलिय समुग्घाया, सत्त इमे हुंति सन्नीणं ॥१६॥ टीका-यणकसायेति० संज्ञिमनुष्याणाममी सप्त वेदनाक- पायसरणादि(द्याः)समुद्याता भवन्ति, भवन्तीत्यध्याहारः॥१६।। एगिदियाण केवल-तेउया हारग चत्तारि। ते विउवियवज्जा, विगला सन्नीण ते चेव ॥१७॥ टोका-एगिन्दियाणेति. एकेन्द्रियाणां केवल तजमआहारकान विना- वर्जयित्वा चत्वारो वेदनाकषायमरण क्रियरक्षणा: समुदघाता भवन्ति । तु पुनः वैक्रियवस्तेि पूर्वज्ञाः ( काः )। फे ते ? केपलतेजसआहारकवैक्रियसमुद्घातवर्जा विकला भव. न्ति, विफलानां प्रयो वेदनाकषायमरणरूपाः समुदाता भव- न्तीत्यर्थः । संशिनां ते सप्त समुद्घाता भवन्ति । तुः पुनरर्थे । एय निश्चयार्थे । चः समुच्चयार्थे ।। १७ ॥ पण गम्भतिरिसुरेसु, नारयवाउसु चउर तिय सेसे । विगल दुदिही थावर, लिच्छत्ति सेस तिय दिछी।१८ (अव०) गर्भजनिर्यकमुरयोः पञ्च, नारकवाय्वोश्चत्वारः । शेपे स्थावरे विकले च त्रयः समुद्धातोः सर्वत्रानुक्रमेण ।९१ दशमं दृष्टि द्वारमाह- विकलेपु दृष्टिद्विकं सम्यक्त्वमिथ्यात्वरूपं,स्थावरा मिथ्या- स्विनः । शेषास्तिर्यामृग्नारकनरास्त्रिदृष्टयः सम्यमिथ्यात्वमिश्र महिना भवन्ति ? ॥ १८ ॥ अर्थकादशदर्शनद्वारमाह- का-पण गम्भति, गर्भजतियश्च भवन पायादिमानिकान्तेपु देवेग घr पञ्च ममुदयाना भवन्ति । तघाहार ककेचलिममु. दशामामायात । नारयेनि. नरयिकवाय्योराधाश्चत्वारः समुदघा.
॥ दंडकपकरणं ।।
'(१९)
ता भवन्ति । तियसेसे इति०, शेषेषु प्रयः समुद्घाता भवन्ति
। चकारात् चतुर्यु पृथिव्यप्तेजोवनस्पतिषु विकलेन्द्रियेषु चा-
धात्रयः समुद्याता भवन्ति । अर्थात् सप्तदण्डकेपु त्रयः समुद.
धाता भवन्तीत्यर्थः । नवम समुदघातद्वारं व्याख्यातं । अथ द.
शमं दृष्टिद्वारं कथ्यते । विगलेति. विकलेषु द्वित्रिचतुरिन्द्रि-
येषु.२ दृष्टी भवतः, सम्यग्दृष्टिमिथ्यावृष्टिश्चेत्यर्थः । स्थावरा-
णामेका मिथ्यावृष्टिः स्यात् । सेसति० शेषेषु दण्डकेषु तिम्रो
दृष्टयो भवन्ति । सविस्तरेणाह-नैरयिकाणां भवनपत्यादिवै-
मानिकान्तानां देवानां मनुष्याणां गर्भज तिरश्चां च तिस्रो दृष्ट-
यः प्राप्यन्ते । कोऽर्थः ? षोडशदण्डकेषु तिस्रो दृष्टयो भवन्ती-
त्यर्थः । दशमं दृष्टिारं व्याख्यातं । चः समुच्चयार्थः ॥ १८ ॥
अथ एकादशं दर्शनद्वारमाह-
थावरबितिसु अचक्खू, चउरिंदिसु तदुगं सुए भणियं
मणुआ चउदंसणिणो, सेसेसु तिगं तिगंभणिअं ॥१९॥
(अव०) स्थावरतीन्द्रियत्रीन्द्रियेषु केवलमचक्षुर्दर्शनं, चतुरि-
न्द्रियेषु तद् द्विकं चक्षुरचक्षुरूपं श्रुते कर्मग्रन्थादौ भणितं,मनुष्याश्व-
तुर्दशनिनः। शेषेषु सुरनारकतिर्यक्षु त्रिकं त्रिकं दर्शनस्य चक्षुरचक्षुरव-
धिरूपं ।१२॥१९॥ द्वारद्वयं समकमाह-
टीका-थावरबितिसुत्ति० पञ्चसु स्थावरेषु द्वीन्द्रियेषु त्रीन्द्रि
येषु च अचक्षुर्दर्शनमेकं भणितं प्रोक्तं श्रुते । चतुरिन्द्रियेषु तद.
द्विकं भणितं तयोश्च चक्षुरचक्षुदर्शनयोडिकं तद्विकं । च पुनः
मनुष्याः चतुर्दश निनो भवन्ति, मनुष्येषु चत्वारि चक्षुरचक्षुरव
धिकेवलरूपाणि दर्शनानि भणितानीत्यर्थः । सेसेसु तिग तिग.
ति० शेषेषु दण्डकेपु त्रिकं त्रिकं भणितम् । नैरयिकेषु भवनप-
त्यादिवैमानिकावसानेषु तिर्यक्षु चाधानि त्रीणि दर्शनानि भव-
न्ति, एतावता पञ्चदशदण्डकेषु त्रीणि आधानि दर्शनानि भय-
न्तीत्यर्थः । दर्शनद्वारं समुदीरितम् ॥ १९ ॥
२०) || सावचूर्णिकं मटीकं च ॥ - --- - अथ बादशं ज्ञानद्वारं व्याख्यानयति- अन्नाण नाण तिय तिय, सुरतिरिनिरए थिरे अनाणदुर्ग नाणनाणदु विगले, मणुए पण नाण ति अनाणार (अव०) द्वन्द्वैकवद्भावात् सुरतिर्यग्निरयेऽज्ञानत्रिक ज्ञान त्रिकं च भवति सम्यक्त्वप्राप्तौ स्थिरे ज्ञान द्विकं,यद्यपि भूदकवनेषु संहानिन- कमतेन सम्यत्तवं वमतां देवानां तेषूपादे सास्वादनसद्भाशच श्रुन- मती भवतः, परं नेहाधिकृते विकले ज्ञानाज्ञानयोटिवं,पनुष्येषु पञ्च ज्ञानानि त्रीण्य ज्ञानानि भवन्ति ॥ २० ॥ चतुर्दशं योगद्वारमाह-' टीका-अन्नाणनाणेति० मर्वेषु देधेपु तियक्षु नरयिकेषु च झानपिकं भवति, त्रीणि मतिज्ञानश्रुतज्ञानावधिज्ञानरूपाणि भवः जीत्यर्थः । च 'पुनः विकलेघु हिविन्तुरिन्ट्रियेषु ज्ञान हिकं भ. पति, मतिज्ञानश्रताने स्यातामित्यर्थः । च पुनः मनुष्येषु पञ्च- धानानि भवन्ति, मतिज्ञानश्रुतक्षानावधिज्ञानमनःपर्यायज्ञान केव. लहानम्पाणि भयन्तीत्यर्थः । द्वादशं ज्ञानहार प्ररूपितम् । अथ गावात तं प्रयोदशमशानद्वारं निरूप्यते-मधुपु देवेषु तिर्यश्च मेगायिका प्रीणि मत्यज्ञानताज्ञान विभङ्गज्ञानरूपाणि अज्ञानानि भयन्ति । च पुनः स्थापु अज्ञान द्विकं भवति, मत्यज्ञानं श्र. ताशानं च म्यादित्यर्थः । पुन: विवलेघु अज्ञानाहिकं भवति, मत्यशानं श्रुनाजान च स्यदित्यर्थः । मनुश्यपु मत्यज्ञानता कानपिमानम्पाणि प्राण्यज्ञानानि भन्ति । ज्ञानद्वागत्तर झा नदारमन्न तं ना प्रादुरतं । अघ्र चफानः समुच्चयार्थ: ॥२०॥ अनहा महरमाय चतुर्दशे योगदारमाह- सचेअरमीसयसच्च-मोस मणवय विउव्वियाहारे । उरलें माता कम्मण, इय जोगा देसिया समए।२१॥
॥ दंडकप्रकरणम् ॥ (२१) टीका-सच्चेअरेति० प्रथमः सत्यमनोयोगः १ । इतरो हिती- योऽसत्यमनोयोगः २ ! तृतीयो मिश्रमनोयोगः ३ । चतुर्थोऽस- त्यामृषामनोयोगः ४ । तथैव वचनस्यापि चत्वारो योगा क्षेयाः । नवम औदारिकयोगः ९ । दशम औदारिकमिश्रयोगः १० । एकादशो क्रिययोगः ११ । द्वादशो वैक्रियमिश्रयोगः १२ । प्रयोदश आहारकयोगः १३ । चतुर्दश आहारकमिश्रयोगः १४ । प्रयाणामौदारिकादीनां प्रत्येक मिश्रशब्दः प्रयोज्य | पञ्चदशस्तु तैजसकार्मणयोगः १५ । को भाव: ? मनोवचनयोरष्टौ योगाः कायस्य सप्त योगाश्च ख्युः, सर्व पञ्चदश योगा ज्ञेया ' इत्यर्थः । समये सिद्धान्ते भगवता इति योगा दर्शिता:, आगमे योगा: कथिता इत्यर्थः । कथमितीति किं .ते पूर्वोक्ता एवेत्यर्थः ॥२१॥ केषां कियन्तो योगा भवन्ति तदाह- इक्कारस सुरनिरए, तिरिएसुं तेर पनर मणुएसुं । विगले चउ पण वाए, जोगतियं थावरे होइ ॥२२॥ ( अव० ) औदारिकद्विकाहारकतिकाभावात्सुरनिरययोविपये एकादश योगाः। तिर्यक्षु त्रयोदश केषांचिक्रियलब्धिसम्भवेन तद्रिकसम्भवात् । पञ्चदश मनुष्येषु, विकले औदारिकद्विककार्मणा- न्तिमभाषारूपं योगचतुष्क, पञ्च वाते औदारिकद्विवैक्रियद्विक- कार्मणरूपं योगत्रिकं स्थावरचतुष्के भवति ॥ २२ ॥ पश्चदशमुप- योगद्वारमाह- टीका-इकारेति० भवनपन्यादिवैमानिकान्तेषु नैरयिकेषु चौदारिकौदारिकमिश्राहारकाहारकमिश्रवर्जा पकादश योगा भ- वन्ति । ते के ? मनोवचनयोरष्टौ कायस्य प्रयो वैक्रियवैकिय. मिश्रतैजसकामणरूपाः योगाः स्युः । तथा तिर्यच आहारकाहा- रकमिश्रो विहाय अन्ये प्रयोदश योगा भवन्ति । च पुनः मनु. व्येषु पञ्चदश पूर्वोक्ता योगा भवन्ति । च पुनः विकलेए हिनि (२२) ॥ सावचूर्णिकं सटीकं च ॥ चतुरिन्द्रियेषु असत्यवचनौदारिकौदारिकमिश्रतैजसकार्मणभेदा- श्चत्वारो योगाः स्युः । च पुनः वायौ औदारिकौदारिकमिश्र- वैक्रियवैक्रियमिश्रतैजसकामणलक्षणभेदात् पश्च योगा भवन्ति । वायून् वर्जयित्वा चतुर्पु स्थावरेषु औदारिकौदारिकमिश्रतैजस. कार्मणलक्षणाः प्रयो योगाः स्युः । योगद्वारं ब्याख्यातम् । अत्र चकारोऽध्याहारः ॥ २२ ॥ अथ पञ्चदशमुपयोगद्वारं व्याख्यानयति- ति अनाण नाण पण चउ, देसण बार जिअलक्ख- गुवओगा। इय बारस उवओगा, भणिया तेलुक्कदंसीहिं ॥२३॥ टीका-तिअनाणनाणेति०, त्रिलोकदर्शिभिर्वादश उपयोगाइति भणिताः । प्रयाणां लोकानां समाहारस्तत्रिलोकं, त्रिलोकं पश्य- न्ति ते त्रिलोकदर्शिनस्तः कथमितीति किं ते ? तानाह-मत्य- ज्ञान-श्रुताशान-विभज्ञानरूपाणि त्रीण्यज्ञानानि नथा पञ्चज्ञाना. नि च प्रसिद्धानि, च पुनः चत्वारि चक्षुरचक्षुरयधिकेवलदर्श नलक्षणानि दशनानि, सर्वेऽपि मिलिता द्वादश उपयोगा जाता भवन्ति, भयन्तीत्यध्याहारः तत्र ज्ञानानि विशेषार्थावगाहोनि । दर्शनामि तु मामान्यार्थाचगाहोनि । एतेषां ( एते ) द्वादश जोय लक्षणानि, इति म्यरूपकथनम् । उपयोगा नाम्नेति ज्ञात. व्याः ॥ २३ ॥ क.पु के कति कति उपयोगा भवन्ति ? तानाह- उवओगा मणुएसु, वारस नव निरयतिरियदेवेप्सु । विगलदुगे पण छकं, चउ रेदिसु थावरे तिअगं ॥२४॥ (अ१०) मनुष्येषु द्वादशोपयोगाः । अष्टौ साकाराश्चत्वारो निराकागः,एन एव मनःपर्याय केवलज्ञान केवलदर्शनादिना नव नि- +- , ॥ दण्डकप्रकरणम् ॥ (२३) स्यतिर्यग्देवेषु, विकलद्विके मति १ श्रुत २ मत्यज्ञान ३. श्रुताज्ञान४ अचक्षुदर्शनरूपाः पञ्चोपयोगाः । चतुरिन्द्रियेषु पञ्च पूर्वोक्ताः चक्षु. दर्शनसहिताः षट् उपयोगाः। स्थावरे त्रिकं.मत्यज्ञानश्रुताज्ञाना चक्षुर्दर्शनरूपम् ॥ २४ ॥ षोडशं सप्तदशं च संख्याद्वारमाह- टीका-उवओगा मेति० मनुष्येषु द्वादश उपयोगा भवन्ति । च पुनः नैर यिकेषु यिनु च भवनपत्यादिवैमानिकान्तेषु नष उपयोगा भवन्ति, त्रीण्यज्ञानानि आधानि त्रीणि ज्ञानानि केष- लदर्शनरहितानि त्रीणि दर्शनानि ज्ञेयानि, सर्वेऽपि मिलिता नव उपयोगा जाता इत्यर्थः । च पुनर्विकलहिके हीन्द्रिये श्री न्द्रिये च मतिज्ञान-श्रुतज्ञान-मत्यज्ञान-श्रुताज्ञान-अचक्षुदर्शनभे- दात् पञ्च उपयोगा भवन्ति । तथा चतुरिन्द्रियेषु मतिज्ञानश्रत- झानमत्यज्ञानताज्ञानचक्षुर्दर्शनाचक्षुर्दर्शनभेदात् षट्र उपयोगा भवन्ति । पञ्चसु स्थावरेषु मत्यज्ञानश्रुताज्ञान अचक्षुर्दशनभेदा- स्त्रय उपयोगा भवन्ति । उपयोगहारं व्याख्यातम् ।। २४ ॥ अथ षोडशमुपपाताख्यं सप्तदशं च्यवनाख्यं चेति द्वारद्वयं गाथयाऽऽह ( एकयैवाह )- संखमसंखा समए, गब्भयतिरिविगलनारयसुरा या मणुआ नियमा संखा, वणणंता थावर असंखा ॥२५॥ (अव०) चतुर्दशरज्ज्वान्मकेऽपि लोके एकस्मिन् समये उत्पद्य- माना नियमेति पदं सर्वत्र ग्राह्य, तेन नियमान्निश्चयेन गर्भजतिर्य- ग्विकलनारकसुराश्च एको द्वौ त्रयो दश विंशतिर्यावत्सङ्ख्याता- असख्याता वा प्राप्यन्ते नत्वनन्ताः । मनुष्यास्तु नियमात्स- ख्याता एव । वनस्पतयोऽनन्ताः " निश्चमसंखो भागो अणंतजीवो चयइ एइ” इतिवचनात् शेषाश्चत्वारः स्थावरा असङ्ख्याता एव न सइख्याता न चानन्ताः ॥ २५ ॥ प्रस्तावादाह-
(२४)
॥ सावणिकं सटीकं च ।।
..
टीका-गर्मजतियञ्चो विकला द्वित्रिचतुरिन्द्रिया नैरयिका
भयनपत्यादिवैमानिकान्ताश्च कस्मिन् समये जघन्यत एको छौ
प्रयो वा उत्कृष्टतः संख्याता असंख्याता वीपपाते तथैव च्यवने
च भवन्ति । को भावः ? एकस्मिन् समये उत्कृष्टतः संख्याता
असंख्याताश्च गर्भजतिर्यगादयः उत्पद्यन्ते च्यवन्ते चेत्यर्थः ।
विशेषमाह-केवलं सहस्रारादुर्व सर्वत्र देवाः संख्याता उत्पद्यन्ते
च्यचन्ते च, यतस्तत्र मनुष्या पव यान्ति, आनतादिच्युता
देघाश्च नरेवागच्छन्ति अयं विशेषः । तथा एकस्मिन् समये
एकादिसंख्यानां चोपपाते तथैव च्यवने या, अथवा नियमे ति
पदं सर्वध योज्यम् । सम्मूच्छिममनुष्या असंख्येया उत्पद्यन्ते
ध्यन्ते च । च पुनः घनस्पतिकायिका जीवाः स्वस्थानतः
प्रत्सिमयमनन्ता एवोत्पद्यन्ते । तथव च्यवन्ते, यद्यस्मात् कार-
णान पकैकस्मादपि निगोदात् तदसंख्येयभागोऽमन्तजीवात्मको
नित्वं च्यवते उदर्तते एति चोत्पद्यते । यदा तु परस्थानत उ-
त्पद्यमानाश्चिन्त्यन्ते तदा संख्याता असंख्याता एवेत्यर्थः । अथ
स्थायराः पृथिव्याद्याः एकेन्द्रिया: स्वस्थानतः परस्थानतो वेत्य-
नपेय मामान्यतः उत्पत्ती चिन्त्यमानाः प्रत्येकमनुसमयमसं.
न्याना भवन्त्युत्पद्यन्ते तथैय असख्याता एप च्यवन्ते, न पुनः
समयावन्तरेण नाप्येकाधाः संख्याता:॥ २५ ॥
यसन्निनर असंखा, जह उववाए तहेव चवणे वि
वावीससगतिदसवास-सहस्स उकिट्ठ पुढवाई ॥२६॥
(अव०) असंझिनो नरा उत्पद्यमाना असख्याना लभ्यन्ते ।
अवानिदेशमार- ययोपपातद्वारं सहख्यामाश्रिय व्याख्यातमेवं
यवनदारमप्यवसातव्यम, समानत्वादुपपातच्यवनयोः । अष्टादशं
आयरिमाह- अंग्रेस्थितमप्यायुरिनि पदं सर्वत्रानुवर्तनीयम, तेन
पृशिशः दाविशनिवर्षमामाण्यत्कृष्टमायुगिनि सर्वत्र योज्यम् । एवं
उदफस्य सप्त वायोत्रीणि, वनस्पतेर्दशवर्षसहस्राणि ॥ २६ ॥
-- ॥ दण्डकप्रकरणम् ॥ (२५) टीका-असन्नित्ति. असं झिनो मिथ्यादृष्टयः सर्वपर्याप्तिभिरप- प्तिाश्च एवंविधा नरा असंख्याताः प्रादुर्भवन्ति तथैवासख्याता एव च्ययन्ते-नियन्ते च । यथा उपपातो भवति तथैव च्यवन- मपि शेयमित्यर्थः । अपिशब्दः- समुच्चयोर्थः । उपपातच्यवनद्वा- रमभिधाय अथाष्टादशं स्थितिहारमाह- बावीससे ति० पृथिवी- कायजीवानां द्वाविंशतिवर्षसहस्रा उत्कृष्टा स्थितिः स्यात् । अ. थाप्कायस्थितिमाह- अप्कायस्य सप्तवर्षसहस्रा उत्कृष्टा आ- यु स्थितिर्भवति । अथ वायुकायस्य स्थितिमाह- वायुकायस्य त्रयो वर्षसहस्रा उत्कृष्टा स्थितिः स्यात् । अथ वनस्पतिकाय. ज्योत्कृष्टां स्थितिमाह- वनस्पतीनां तरुगणानां उत्कृष्टा दशवर्ष- सहस्रा स्थितिर्भवति ॥ २६ ॥ तिदिणग्गि तिपल्लाज, नरतिरिसुरनिरयसागरातत्तीसा वंतरपल्लं जोइस, वरसलवखाहियं पलियं ॥ २७ ॥ ( अव० ) अग्नेः त्रीणि दिनान्यायुः । गजनियर नरा त्रिप- ल्यायुषो देवकुर्वादिषु सुरनारकाणां त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि व्य- न्तराणां पल्योपमम, ज्योतिषां वर्षलक्षाधिक पल्योपमम् ॥ २७ ॥ अमुराणामायुःस्थितिमाह- टीका-तिदिणग्गीति० तेजस्कायस्य उत्कृष्टा स्थितिः त्रीणि दिनानि भवन्ति । स्थावराणां स्थिति प्रसप्याथ नरतिरथाः स्थितिमाह-तिपल्लेति० नरतिरश्चोत्रीणि पल्योपमानि स्थिति. र्भवति । अथ सुरनैरयिकानां स्थितिमाह-सुरनैरचियोस्त्रयचिं. शत्सागराणि उत्कृष्टा स्थितिर्भवति । अथ व्यन्त स्थिति. माह-वन्तरेति० प्यन्तरदेवदेवीनां दशवर्षसहस्राणि जघन्या स्थितिः स्यात् । अथ उत्कृष्टां स्थितिमाह- व्यन्तर देवानां प. त्योपमं व्यन्तरदेवीनां तु पत्यार्द्ध ज्योतिष्याणां चन्दविग्रहन- क्षत्राणां च वर्षाणां लक्षणाधिक पल्योपममुत्कृष्टमायुरवगन्तव्यमा एषां किञ्चिद्विवरणमाह-चन्द्राणां लक्षणाधिकं पल्योपममायस्ततो रवीणां वर्षाणां सहस्राधिकं पल्योपमं ततो प्रहाणां पल्यापमं . H
(२६)
॥ सावर्णिकं सटीकं च ॥
ततो नक्षत्राणां पल्योपमाई ततस्तारकाणां पल्यस्य चतुर्थो भा-
गः। एषां देवीनां स्थितिमाह-चन्द्रविमानवासिदेवीनां पञ्चाश-
द्वर्षसहवाधिक पल्याई ततः सूर्यदेवीनां पञ्चशतवर्षाधिकं प.
ल्याई, ततो ग्रहदेवीना पल्याईमेव नक्षत्रदेवीनां विशेषाधिकः
पल्यस्य चतुर्थो भागः ततस्तारकदेवीनां किञ्चिदधिकः पल्य.
म्याष्टमो भागः । अथ ज्योतिष्काणां जघन्यां स्थितिमाह-चन्द्रा
दिदेवदेवीरूपाणां चतुर्गों युगलानां पल्यस्य - चतुर्थो भागः प
चमके युगले तारकदेवदेवीरूपे पत्याष्टमो भागः ॥२७॥
असुराणां स्थितिमाह-
असुराण अहियअयरं, देसूणदुपल्लयं नवनिकाए।
वारस वासुर्णपणदिण, छम्मासुकिट्ट विगलाऊ ॥२८॥
(अब०) असुराणां चमरादीनां कियताप्यधिकमतरं सागरोपम-
शेषे निकायनवके देशोनपल्योपमधिकं दक्षिणदिशमाश्रित्य यधप
ल्योपा उत्तरस्यां तु द्वे देशोनपल्योपमे । द्वीन्द्रियाणां द्वादशवर्षाणि
। त्रीन्द्रियाणामेकोनपश्चाशदिनानि । चतुरिन्द्रियाणां पण्मासा उ.
कृष्टामायुः । २८ । उक्तोत्कृष्टा स्थितिः । अथ जघन्यान्तामेवाह-
टीका-असुगण अहियेति० असुराणां किञ्चिदधिकमेकमतर.
मेकं मागरोपममित्यर्थः । तर दाक्षिणात्यानामसुराणामेकमतर-
मोत्ताणां साधकमतरमित्यर्थः । दाक्षिणात्यानां धरणेन्द्रादीनां
नक निकायानां द्वितीयमई यस्य (हितीयस्यार्ध यत्र ) तद्
दाद माईपल्योपमा स्थिति यति इत्यर्थः । तथा उत्तरदि-
ग्यतिना नयनिकायानां देशोने किञ्चिदने व पल्योपमे भयतः।
तर्गतमशक्यं प्रमूलकालतरणीयत्यादतरं सागगेपमं । असुगणां
यिनि प्रमाय अथ विकलानां स्थिति प्ररूपयति । यारसेति.
विकानां-हीन्द्रियाणां त्रीन्द्रियाणां चतुरिन्द्रियाणां च दादश
पाणि पोनपश्चाशदिनानि पण्मासाश्च मेणोत्कृष्टा स्थिति.
या मानव्या न्यर्थः ॥ २८ ॥
, - ॥ दंडकपकरण ॥ पृथिव्यादिदशपदानां जघन्यां स्थितिमाह'- पुढवाइदसपयाण, अंतमुहुत्तं जहन्नन्याउठिई। दससहसवरिसठिइआ, भवणाहिवनिरयवंतरिया॥२९॥ (अव०) स्थावरपंचकविकलत्रिकतिर्यक्नराणामतर्मुहूत जघन्या. युः स्थितिः । भवनाधिपनरकच्यंतरा जघन्यतो दशसहसस्थितिका भवति २९ ॥ अथ वैमानिकानामायुःस्थितिमाह । टीका-पुढघाइदसेति० पञ्च स्थावरात्रयो विकलेन्द्रिया हो मनुष्यतिञ्चौ सर्वाणि मीलितानि पृथिव्यादीनि दश पदानि जातानि । एतेषां पृथिव्यादिदशपदानामन्तर्मुहूर्त जघन्यमायुर्भ- वति । अथ भवनाविपानां जघन्यस्थितिमाह- ८ ससबसेति. भवनाधिपानां नैर रिकाणां व्यन्तराणां च दशवर्षसहस्राणि जघ- न्या स्थितिईया ॥ २९ ॥ अथ .वैमानिकानां स्थितिमाहे- वेमाणिअजोइसिया, पल्लतयईसआउआ हुंति । सुरनरतिरिनिरएसुं, छ पज्जती थावरे चउगं ॥ ३०॥ ( अव० ) वैमानिका ज्योति पिकांश्च जघन्यतः क्रमेण एक- पल्योपमाष्टभागायुषो भवन्ति । अथैकोनविंशतितम पर्याप्तिद्वारमाह । सुरनरतियनिरयेषु पर्याप्तेषु षट्पर्याप्तयो भवन्ति । स्थावरे आहारशरीरइंद्रियश्वासोवासरूपं पर्याप्तिचतुष्कं, अपर्याप्ता अपि जीवा पर्याप्तित्रयं समाप्यैव नियंते नार्वाक् ।। ३० ॥ टीका-वेमाणीति. वैमानिकानां जघन्य पल्योपममायभवति | ज्योतिप्काणां च तदष्टांश भायुभवति । तस्य पल्यस्य प्टांशः पल्यस्याष्टांशोऽ( पल्याष्टांशोऽ ) ष्टमो भागो भवती. - - - अ.
(२८) ॥ सावचूर्णिकं मटीकं च ॥ त्यर्थः । उत्कृष्टजघन्ययो स्थितिमभिधाय अर्थकोनविंशतितम पर्याप्तिहारमाह-सुरनरेति० भवनपत्यादिवैमानिकान्तेषु सुरेषु नरेपु र यिवे घु तिर्यक्षु च षडपि पर्याप्तयो भवन्ति । पञ्चसु स्थावरेः आहारशरीरेन्द्रियश्वासोच्छ्रयासभेदात् चतस्रः पर्या- तयो भयन्ति ॥ ३० ॥ अथ विकलानां पर्याप्तिमाह- विगले पंच पजत्ती, छदिसि याहार होइ सव्वेसिं । पणगाइपए भयणा, अह सन्नतियं भणिस्सामि ॥३१॥ (अव०) पूर्वोक्तं पर्याप्तिचतुष्क भाषापर्याप्त्यधिक विकले पर्याप्तिणनकम । अथ विंशतितममाहारद्वारमाह | सर्वेषां जीवानां पट्टदिक्क आहारो भवति । सर्वे जीवा दिवषट्कस्थानाहारपुद्गलान् गृहन्तीतिभावः । पञ्चदिवकादिके आहारे भजना। यथा लोका- त्वर्तिजीवानां पश्चदिक्कः । लोकनिकूटस्थानां त्रिचतुर्दिक्कः। एविशं संज्ञाहारमाह । अथ संझात्रिक भणिष्यामि ॥ ३१ ॥ टीका-घिगले पञ्चेति विकलानां द्वित्रिचतुरिन्द्रियाणामा- हारशीद्रयश्वासोच्छ्वासभाषाभेदात् पञ्च पर्याप्तया भव- न्ति । पर्याप्तिहारं व्याख्यातं । अथ विंशतितममाहारद्वारं वि. वृणोति । छडिसिप्ति० पट्स दिक्षु सर्वेषां संसारिणां जीवानां गत सहा मति । पदभ्यो दिग्भ्यो जीवा आहारं . त इत्यर्थः । लोकान्ते लोकप्रान्ते च पुन: लोककोणे लोकाने ये जीयाम् ति तेषां जीयानां पञ्चस अथवा चतसृघु तिसृषु यथा मंमयमाहागे मयति, पञ्चकाटिपदेषु भजना कोऽर्थः ? केचन जीयाः पञ्चम दिक्षु गतान् पुन्टान् केचन चतस्पु दिनु गतान् पुहरान कचन तिस्पु दिक्षु गतान पुनलान आहारयन्ति इति भाषः ! क्रिमाद्वारमारं व्याख्यातं । अवैकशितितमं संज्ञानारं प्यान्यायति । अति० अथ संशाधिकं मणिप्यामि मणामी. ग्यः ।। ।
1 5 ॥ दण्डकपकरणं ॥ (२९) चउविहसुरतिरिएK, निरएसु य दीहकालिगी सन्ना। विगले हेउवएंसा, सन्नारहिया थिरा सव्वे ॥३२॥ ( अव०) चतुर्विधसुरतिर्यक्षु निरयेषु च दीर्घकालिकी संज्ञा । दीर्घोऽतीतानागतवर्चमानविषयः कालो ज्ञेयो यस्या इति व्युत्पत्तेः, विकले हेतूपदेशिकी संज्ञा । किञ्चिन्मनोज्ञानसहिता वर्तमानविषया संज्ञेत्यर्थः । विशिष्टतत्संज्ञात्रयरहिताः सर्वे स्थिरा ज्ञेयाः ॥३२॥ रीका-चउबिहेतिः चतुर्विधसुरेणु तिर्यक्षु नैरयिकेषु च दी. र्घकालिकीसंज्ञा भवति । अत्र चकारः समुच्चयायः, भवतीत्य ध्याहारः । यः पुरुषः दीर्घमपि कालं विषयमतीतमर्थ स्मरति भविष्यञ्च वस्तु, चिन्तयति । कथं नु नाम मया कर्तव्यमिति स दीर्घकालिक्युपदेशेन युक्तः । विकलेषु विकलेन्द्रियेषु हेतूपदेशि- की संज्ञा स्यात् । यस्तु सविन्त्येष्टानिष्टेषु छायापादिवस्तुषु स्वदेहपालनहेतोः प्रवृत्तिनिवृत्ती विधत्ते स हेतूप बायोपदेशेन युक्तः । सर्वे स्थावराः संज्ञारहिता भवन्ति । स्थावरेषु सज्ञा न भवन्तीत्यर्थः ॥ ३२ ॥ केषु केषु काः संज्ञा भवन्ति ? ता आह- मणुयाण दीहकालिय, दिट्ठीवाजवइसिया केवि । पण पजतिरिमणुअच्चिय, चउविहदेवेसु गच्छंति ॥३३॥ (अव०) मनुजानां दीर्घकालिकी संज्ञा । दृष्विादोपदेशिकी क्षायोपशामिकादिसम्यक्तसहिताः केऽपि । पञ्चेन्द्रियतिर्यंचोऽप्येत संज्ञायुक्ता भवन्ति । केचित् परमल्यत्वान्न विवक्षिताः, द्वाविंशं ग. विद्वारं त्रयोविशमागतिद्वारं चाह । पर्याप्ताः पञ्चेन्द्रियाश्च तिर्यंची मनुजाश्चतुर्विधदेवषु गच्छन्ति । न शेषजीवाः । इवि देवानामागति द्वारम् ॥ ३३ ।। अथ देवानां गतिद्वारमाह- .
(३०) ॥ सावचूर्णिकं सटीकं च ॥ टोका--मणु आणेति. मनुष्यामा सामान्यतः दीर्घकालिकीसंज्ञा भवति, विशेषस्तु केऽपि मनुजाः दृष्टिवादोपदे शिकाः स्युः । यस्तु गस्यग्दृष्टि तोर्यथाशक्ति रागद्वेषादिरिपून् पराभवति जयतीत्यर्थः, स दृष्टिवादोपदेशिक्या सम्यग्दृष्टिरेवेन्यर्थः । केऽ. पि पञ्चेन्द्रियतिर्यश्चोऽपि एतत्संज्ञायुक्ता अपि, परमल्पत्वान्न विवक्षिताः । सुखावबोधाय स्वामितया संज्ञार्य योजयति, यथा-दीन्द्रियादीनां अर्थात् सम्मूच्छिमपञ्चेन्द्रियाणां च हेतू पदेशिकी ताग, गर्भजतिर्यग्नरसुरनारकाणां दीर्घकालिकीसंज्ञा, छास्थसम्यन्दृशां मनुष्याणां केषाञ्चित् तिरश्चां च दृष्टिवादोप- देशिकी संज्ञा, तु पुनः मनुष्याणां दीर्घकालिकीसंज्ञा स्यात्, अतो मनुष्येपु हे दृष्टी भवत इत्यर्थः । पृथिव्याघेकेन्द्रियाणां वल्ल्यारोहणाघभिप्रायरूपा ओघसंहवेत्यर्थः । संज्ञाद्वारं प्ररूपित । सथ माविंशतितमं गतिहारमाह- पणपजेति० चतुर्विधदेवेषु पर्यापिनभिः पूर्णाः गर्भजपञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चो मनुष्याश्च गच्छन्ति- यन्तीत्यर्थः । चतुर्विधदेवेषु संख्यातायुषो मनुष्यास्तेषां गमनं अत्र गमन प्राप्तिः स्यादवादो भवतीत्यघसेयम् । देवानां गति- द्वार मनाप्तम् ॥ ३३ ॥ अथ देघानामागतिहारमाह- संखाउ पजपणिदि, तिरियनरेसु तहेव पजते । भूदगपत्तेयवणे, एएसुच्चिय सुरागमणं ॥३४॥ (अव० ) संख्यातायुःपर्याप्नपञ्चन्द्रिय तिर्यग्नरेषु । तथैव प प्तिामृट कमन्येकवने एतेष्वेव मुराणामागमनमुत्पादो भवति । इनि मु.पु गत्यागनी नारकाणां गत्यागती आह ॥ ३४।' टीका--मंग्राउ पजेतिः मख्यातायुष्प पर्याप्तेषु पञ्चेन्द्रिय- निर्यक्ष या मनुग्न्येषु च नधव पर्याप्तयोर्मूदकयो ज ठयोः प्रत्येकासाती च एतेव्येष पञ्चम्वेवेन्यर्थः, मुराणामागतिराग- मनं भवति । मुराणामागतिहार व्याख्यातं ॥ ३ ॥ ७ ॥ दंडकपकरणम् ॥ पज्जत्तसंखगब्भय, तिरियनरा निरयसत्तंगे जति । निरयउवद्या एएसु, उप्पजंति न सेसेसु ॥३५॥ ( अव० ) पर्याप्तसंख्यातायुषो गर्भजतिर्यग्नराः नरकसप्तके यांति 'असन्नि खलु पढम मिति वचनात् असंज्ञिनोऽपि प्रथमां पृथि- वीं यावद्याति । परं तेषामिह नाधिकृतत्वात् । नरकाताश्च जी- वा एतल्लक्षणेषु एतेष्वेव तिर्यङ्नेरघूत्पद्यते, न शेषेषु जीवेषु । इति नारकगत्यागती ॥३६॥ अथ पृथ्व्यवनस्पतीनां गत्यागती आह- टीका पन्जतेति० पर्याप्ताः संख्यातायुषो गर्भजतिर्यचः सं. ख्यातायुषो नराश्च सप्तसु निरयेषु यान्ति-गच्छन्ति । “असन्नी खलु पढम" इति वचनात् असं शिनोऽपि प्रथमां पृथिवी यावत् यान्ति, परं तेषा इहानधिकृतत्वात् नोक्तं । नैरयिकगतिवारं व्याख्यातं । अथ नैरयिकागतिहारं व्याख्यानयति । निरउसि० तथा निरयानरकात् उध्धृताश्च्युता जीवा एतेष्वेव संख्याता- युष्षु गर्भजतियग्मनुष्येष्यप्युत्पधन्ते आयान्तीत्यर्थः, शेषेभ्यो द्वाविंशतिद्वारेभ्यो नैरयिका जीवा न भवन्ति, एतेषु च नोत्प- धन्ते नायान्तोत्यर्थः । नैरयिकागतिहारं प्ररूपितं ॥ ३५ ॥ अथ पृथिव्यब्धनस्पतिषु जीवानां गतिहारमाह- पुढवीआउवणस्सइ, मज्झे नारयविवज्जिया जीवा। सव्वे उववजंति, नियनियकम्माणुमाणेणं ॥३६॥ (अव० पृथिव्यवनस्पतिकायमध्ये नारकविवर्जिताः सर्वे त्रयोविंश- तिदंडकस्था जीवा उत्पद्यते । निजनिजयथाकृतकारितानुमोदित- कर्मणामनुमानेन । नजनिजेतिवदता सूत्रकृता स्वयं कृतं कर्म भुज्यते न परकृतमित्यावेदितम् । कर्मानुमानेनेति सत्कर्मणा शुभ- स्थाने असत्कर्मणाशुभस्थाने ॥ ३६॥ एतेषामेव गतिद्वारमाह।
2 (३२) ॥ सावर्णिकं सटीकं च ॥ टीका पुढवीति० पृथिव्यवनस्पतीनां मध्ये नारकविवर्जिता प्रति, कोऽर्थः-निरयजीवान् विहाय अन्ये सर्व प्रयोविंशतिद- एकस कजीवा निजनिजकर्मानुमानेन-निजशुभाशुभकर्मानुसारे- । त्पद्यन्ने प्रादुर्भवन्तीत्यर्थः । गतिद्वारं विवर्णितम् ॥ ३६ ॥ अथ पृथिव्यव्वनस्पतीनां त्रयाणामागतिद्वारमाह- पुढवाइदसपएसुं, पुढवीआळवणस्सई जंति । पुढवाइदसपएहि य, तेउवाउसु उववायो ॥३७॥ (अव०)तस्यैव दंडकत्रयस्य जीवानां गतिबारमाह । पृथिव्यादिदश- पदेषु अनुक्रमस्थितिषु पृथिव्यब्बनस्पतिजीवा यांति । न नारक- सुरेप्वित्यर्थः इति पृथ्व्यब्बनस्पतीनां गत्यागती। तेजोवायवोरागति- बारमाह । तेजोवायबोर्विपये पृथिव्यादिदशपदेभ्य एवं उत्पद्यन्ते जीवाः ॥३७॥ अथ तेजोवायवोर्गतिमाह- दीका--पुढवाइत्ति० पृथिव्यादिदशपदेषु- स्थावरविकलेन्द्रिय- तिर्यग्मनुष्येयु पृथिव्यटयनस्पतयः- पृथिव्यवनस्पतिसत्कजीवा यान्ति गच्छन्तीत्यर्थः । पृथिव्यादिभ्यः दशपदेभ्य. जीवानां तेजोमारयोरपपात उत्पत्तिर्भवति इत्यर्थः । प्रयाणां पृथिव्यग्व- नस्पतीनामागतिद्वारं व्याख्यातम् ॥ ३७ ॥ अथ तंजोयाय्बोर्गतिद्वारमाद- तेउवागमणं, पुढवीपमुहमि होइ पयनवगे । बुढवाइटाणदसगं, विगलाइतिथं तहिं जंती ॥३८॥ (१०) तेजोवायवोरागपनं पृथिवीप्रमुखे पदनवके भवति ; तेग वागन्यागती। विकलेन्द्रिया पृथिव्यादिदशस्थानेभ्य ए- 'पर्थ मन्वा च नत्र यांति नान्यत्र । इनि विकलगत्यागती .. : ८ .. अय गर्भननिर्यगमनुष्याणां गत्यागती आह ।
॥ दण्डकपकरणम् ।। टीका-तेउवाऊ इत्ति० तेजोवायवोर्गमनं पृथिव्यादिनवपदेपु स्थावर विकलेन्द्रियतियक्षु तेजोवायुजीवानामुपपातः स्यात्, स्या- दित्यध्याहारः पृथिव्यादिनवपदमम्बन्धिनो(षु)जीवा(वेषु)(गच्छ) भवन्तीत्यर्थः । प्राकृतत्वात् द्विवचनं न स्यात् एकवचन बहुवचनं च स्यात्, (तां), द्वयोस्तेजोवाय्वोर्गतिद्वारं कथितम् । अथ वि. कलानां गतिहारमाह-पुढवाइठाणेति. विकलेन्द्रियेषु पृथिव्या. दिस्थानदशका जीवा यान्ति, स्थावरविकलेन्द्रियतिर्यग्मनुष्या गच्छन्ति इत्यर्थः । विकलानां गतिद्वारं व्याख्यातम् । अथ वि- कलानामागतिद्वारमाह-तेषु पृथिव्यादिस्थानदशकेषु विगलेति. द्वीन्द्रियत्रीन्द्रियचतुरिन्द्रियत्रिकं याति विकलेन्द्रियास्तेषु भव- न्तीत्यर्थः विकलानामागतिद्वारं विवणितम् ॥ ३८ ॥ अथ गर्भज तिरां गत्यागतिहारमाह- गमणागमणं गन्भय-तिरिआणं सयलजीवठाणेसुं। सम्वत्थ जंति मणुआ, तेउवाउहि नो जंति ॥३९॥ ( अव० ) गर्भजतियचो मृला चतुर्विशतिदंडकेषु यांनि । चतुर्विशतिदंडकेभ्यश्चोत्प ते । इति गर्भतिर्यगगत्यागती। मनु- जा मनुष्याः सर्वत्र यांति । सर्वत्रेतिवचनबलात् चतुर्विशतिदंड- कजीवेषु कालक्षेत्रसंहननसद्भावे च सिद्धावपि यांति । आयांतश्च मनुजास्तेजोवायुवजितेभ्यो द्वाविंशतिदंडकेभ्यः समायांति । इति समर्थिते सविस्तर गत्यागतिद्वारे । अथ चतुर्विशं वेदवारमाह । टीका-गमणेतिः सकलजीवस्थानेषु चतुर्विशतिदण्डकेषु गर्भ- जतिरश्चां गमनागमने-गत्यागती भवतः । अथ मनुष्याणां ग. तिमाह-सर्वत्र चतुर्विशनिदण्डकेषु मनुष्या यान्ति गन्छन्ति । अथ मनुष्याणां गतिद्वारं प्रोच्यते- द्वाविंशतिदण्डकेभ्यो उधृ. ताश्च्युता जीवा मनुष्या भवन्ति, तेजोवायुभ्याम् च्युता जीवा मनुष्यत्वेन नोत्पधन्ते, न मनुष्या भवन्तीत्यर्थः । सूत्रपाटन्यात् यापि व्यस्तं प्रतिपादित, अनुक्रमेण नोक्त मित्यर्थः । गन्यागतिद्वारे विधर्णिते ॥ ३९ ॥ अ ॥ सावर्णिकं सटीकं च ॥ मथ चतुर्विंशतितमं वेदद्वारमाह- वेयतिय तिरिनरेसु, इत्थी पुरिसो य चउविहसुरेसु। थिरविगलनारएसं, नपुंसवेओ हवइ एगो ॥४०॥ (अव०) घेदत्रिक तिर्यङ्नरेषु, स्त्रीधेदः पुरुषवेदश्च चतुर्विधसु- पु, स्थिरविकलनारकेषु नपुंसकवेद एक एव भवति । अथ संक्षि- तसग्रहणीगाधाद्वयानुक्तमपि, सोपयोगित्वात्किचिज्जीवाल्पवहुत्वं दश्यते ॥ ४० ॥ टीका-अतियेति० तिर्यग्नरेषु पुरुषस्त्रीनपुंसकलक्षणा वेदा भवन्ति । तथा चतुर्षिधसुरेषु श्रीपुरुषलक्षणौ वेदो भवनः । च पुनः स्थावरविकलेन्द्रियनैरयिकेष्येको नपुंसकलक्षणो वेदो भवति । अन चकारः समुच्चयार्थः । तत्र येन स्त्रियं प्रति अभिलाषः स्यात् स नरपेदः तृणदाहतुल्यः । येन पुरुष प्रति अभिलाषः स्यात् स खोवेदः करीषदाहतुल्यः । येन पुंखीविषये अभिलाष: स्यात् स नपुंसकवेदः नगरदाहतुल्यः । वेदद्वारं प्ररूपितम् ॥४०॥ अथ गाथाद्वयेनाल्पयत्वहारमाह- पज्जमणु वायरग्गी, वेमाणियभवणनिरयवंतरिया । जोइस चउपणतिरिया, वेइंदि तेइंदि भू आउ ॥४१॥ वाज वणस्सइचिय, अहिआ अहिया कमेणिमे हुंति सब्वेवि इमे भावा, जिणा! मएऽयंतसो पत्ता ॥४२॥ ( अव०) पज्जत्तिपदं वायरतिपदं च वदनः मुत्रकृतोऽय- माशयः, यदहं पर्याप्तवादरजीवविषयमेवाल्पबहावं वदिष्यामिनोऽ पर्यालमत्मविषयमिति । इह संमारे स्नोकाः पर्याप्तमनुष्याः । म- नुष्यभ्यो बादराग्निनीवाः असंख्यातगुणाः । एभ्यो वैमानिका अ.
॥ दण्डकप्रकरणम् ॥ (३५) संख्यातगुणाः । एभ्यो भवनपतयोऽसंख्यातगुणाः ! एभ्यो नारका असंख्यातगुणाः । एभ्यो व्यंतरा असंख्यातगुणाः । एभ्यो ज्यो- तिष्काः संख्यांनगुणाः । एभ्यश्चतुरिंद्रियाः संख्यातगुणाः । एभ्यो पंचेन्द्रियास्तियचो विशेषाधिकाः । एभ्यो हींद्रिया विशेषाधिकाः एभ्यस्त्रीन्द्रिया विशेषाधिकाः । एभ्यः पृथ्वीकाया विशेषाधिकाः । ततोऽपुकाया विशेषाधिकाः। अप्कायिकेभ्यो वायुकायिका असंख्या- तगुणाः । ततो वनस्पतयोऽनन्तगुणाः। संख्यातगुणेन असंख्यात- गुणेन अनन्तगुणेन च यथासम्भवमिमे जीवाः क्रमणाधिका भवन्ति । अथ ग्रन्थकारो जिनान् स्तौति । सर्वेऽपि च इमे पूर्वोक्ता भावा: तेषु तेषु जीवस्थानकेषु गमनागमनरूपाः हे जिनाः मया भवे भ्रमता अनन्तशः अनन्तकृत्वः प्राप्ताः यथा मया नयाऽन्यैरपि जीवैः । एतेन स्वामिनः पुरः स्वदुःख निधेदितम् । अथ तद्विमोचनलक्षणां प्रार्थ- नामाह। टीका- पजमणुइति० पजत्ति वायरत्ति पदं वदतः सूत्रकृतो. ऽयमाशय -यदहं पर्याप्तवादरजीवविषयमेवाल्पत्वबहुत्वं वदिष्या- मि नापर्याप्तसूक्ष्म विषय मिति । इह संसारे सर्वजीवेभ्यः सर्वस्तो- का: गर्भजमनुष्यास्तेभ्योवादराग्नयः पर्याप्ताः असंख्येयगुणाधि कास्तेभ्यो वैमानिका देवा असंख्येयगुणाधिकास्तेभ्यो भवनवा सिनो देवा असंख्येयगुणाधिकास्तेभ्यो नैगयिका असंख्येयगु- णाधिकास्तेभ्योच्यन्तरा असंख्येयगुणाधिकास्तेभ्यो ज्योतिष्काः संख्येय गुणाधिकास्तेभ्यश्चतुरिन्द्रियाः पर्याप्ताः संख्येयगुणा- धिकास्तेभ्यः संज्ञिनः पञ्चेन्द्रिया विशेषाधिकास्ततो ही. न्द्रिया विशेषाधिकास्ततस्त्रीन्द्रिया विशेषाधिकास्तेभ्यः पृथवी- कोयिका जीवा असंख्यातगुणाधिकास्तेभ्योऽप्कायिका जीवा असंख्यगुणाधिकास्तेभ्योः वायुकायिका जीवा असख्येय- गुणाधिकास्तेभ्यो वनस्पतिकायिका जीवा अनन्तगुणा' क्रमेण इमे पूर्वोक्तपदार्था: अधिका अधिका भवन्ति, मनुष्यादिवनस्प. ..
(३६) ॥ सावचूर्णिकं सटीकं च ॥ त्यषसानान. शब्दान् प्रति प्रत्येकं भवन्तीति क्रिया प्रयोज्येत्यर्थः । अन्न चकारः समुच्चयार्थः । घण्टालालान्यायेन पूवमग्रतः सर्वत्र उधिका भवन्ति च इति ग्रहणीयम्ल्पवहुत्वद्वारं समाप्तम् । अथ गाथोत्तरार्धन ( दण्डकान्ति दर्शयति-) सर्वेऽपि च इमे पृर्वोक्ता भावाः पर्याप्तास्तेषु तेषु जीवस्थानेषु गमनागमनरूपाः हे जिना ! मया भवे भ्रमता अनन्तशोऽनन्तकृत्वः प्राप्ताः । यथा म्या तथोऽन्यैरपि जीवैः । एतेन स्वामिनां पुरः स्वदुःख निवेदितम् । अथ तबिमोचनलक्षणां प्रार्थनामाह-सव्वेवि इमे भावेन हे जिना ! परमेष्ठिनो ! मया सर्वेऽपि इमे चतु. विशरि दण्डकभावाः अनन्तशः प्राप्ताः अनन्तवारानू संप्राप्ता इत्यर्थः : अनन्तघारान् अनन्तशः ॥ ११ ॥ ४२ ॥ संप: तुम्ह भत्तस्स, दंडगपयभमणभग्गहियअस्स । दंडतिविरय(इ)सुलहं,लहुं मम दिंतु मुक्खपर्य ॥४३ ( अव० ) हे जिना इति पदं पूर्वस्थित मिहापि गृह्यते । तेन है जिनाः : सम्प्रति इह भवे भवतां भक्तस्य त्रिकरणशुद्धया भक्ति- मनः । दण्डकपदेषु सूक्ष्मवादरपर्याप्तापर्याप्तरूपेषु भ्रमणं पुनः पुन- गत्यागतिरूपं तम्माद्भग्न निवृत्तं हृदयं मनो यस्य एवंविधस्य मम विज्ञप्तिकत्तुः । दण्डत्रिकात् मनोवाक्कायानर्थप्रवृत्तिरूपाद्विरतानां मुलभं समापं दण्डत्रिकविरतमुलभं मोक्षपदं लघु शीघ्रं भवन्तो ददतु विनरन्तु ।। ४३ ।। अन्यकारः स्वनाम कथयति- टीका-सम्पर तुम्हे ति. हे जिना ! हे परमेष्टिनो भवन्तः सम्प्रति शीनं मम मोक्षपदं-शियपदं ददतु दिशन्तु दिन्तु इति जयाप भयन्त इति कर्तृपदमध्याहार्य । नदि म विधयो पिकलायन्ते रतियचनात युष्मदर्थे अन्य. गरपनप्रवृत्तिरियर्थः । कथम्भूतं ? मोक्ष पदं दण्डषिकयिरति- मल दयने मषम्यापहारेण लुप्यन्ते जन्तयः प्राणिन पभि. in अण्डा: मनायाक्कायम्पा रत्यर्थम्तयां त्रिकं दरधिक अथवा प्रा.
॥ दण्डकप्रकरणम् ॥ दण्डक. - दण्डत्रिकस्य विरतिविरमण दण्डत्रिकविरतिः त्रिकषिरत्या सुलभ सुप्रापं दण्डत्रितिरतिसुः भं किं- भूतस्य मम भक्तस्य-भक्तिमतः केषां ? युष्माकं पुतः किं. भूतस्य मम ? दण्डकपदभ्रमणभग्नहृदयस्य दण्डकपदेषु सूक्ष्मवादरपर्याप्तापर्याप्तरूपेषु भ्रमणं पुनर्गत्यागतिरूपं तस्मात् भग्नहृदयस्य निवृत्तचित्तस्येत्यर्थ: दण्डकानां पदान दण्डकपदानि दण्डकपदेषु भ्रमणं दण्डकपदभ्रमणं दण्डकपदनभणात् भग्नं-नि.. वृत्तं हृदयं-चित्त यस्य स दण्डकपदभ्रमणभग्नहृदयस्तस्य दण्ड- कपदभ्रमणभग्नहृदयस्य इति गाथार्थः ॥ ४३ ॥ सिरिजिणहंसमुणीसर-रज्जे सिरिधवलचंदसीसेणं । गजसारेणं लिहिया, एसा विन्नत्ति अप्पहिया ॥४४॥ ( अव०) श्रीजिनहंसमुनिनामानो ये श्रीजिनसमुद्रमूरिपट्ट- प्रतिष्ठिताः मुनीश्वराः खरतरगच्छाधिपतयः । तेषां राज्यं गच्छा- धिपत्यलक्षणं तस्मिन् विजये सैद्धान्तिकशिरोमणीनां श्रीधवलचन्द्र- गणीनां शिष्येण संविग्नपण्डिताभयोदयगणि लालितपालतेन गज- सारगणिना नाम्ना साधुना । एषा विचारपत्रिंशिकारूपा श्रीतीर्थ- कृतां विज्ञप्तिलिखितेतिपदेनौडत्यं परिहृतं । यद्वा पूर्व यन्त्रपत्रतया लिखिता ततः सुगमतायै सूत्रतया गुम्फिता इत्यर्थः । विभूता आ- त्महिता अनेन " न भवति हि धर्मः श्रोतुः, सर्व-यैकान्तो हित- श्रवणात् । अवतोऽनुग्रहबुद्धया वक्तुस्त्वेकान्ततो भवति ॥ १ ॥ इति सूक्तं स्थापितम् ।। ४४ ॥ निधिमुनिशरेन्दु(१५७९)संवल्लिपीकृता पत्तनेऽवचूर्णिरियम् । संशोध्या धीमद्भिर्मत्वेदं बालचापत्यम् ॥ १ ॥ " 82 ॥ श्रीगजसारमुनिप्रणिता स्त्रोपज्ञाऽवचूर्णि. समाप्ता ।। మంజుల (३८) ॥ सावचूर्णिकं सटीकं च ॥ टीका- सिरिजिणेति० हे जिनाः ! जिनहंसमुनीश्वरराज्ये गजसारेण एषा विचारषत्रिंशिकाकरणरूपा विज्ञप्तिलिखिता । किंभूतेन गजसारेण ?-श्रीधवलचन्द्रशिष्येण श्रिया युक्तो धवल- चन्द्रः श्रीधवलचन्द्रस्तस्य शिष्यः श्रीधवलचन्द्रशिष्यस्तेन श्रीध- वलचन्द्रशिध्येण, किंभूता विज्ञप्तिः ?-आत्महिता आत्मने हिता आत्महिता, परेषां वोधो भवतु वा मा भवतु परं वक्तुर्बोधो भवति, यदुक्तं-अस्तु वा माऽस्तु वा बोधः, परेषां कर्मयोगत । तथापि वक्तुमहती, निर्जरा गदिता जिनैः ॥ १ ॥ १४ ॥ अथ टीकाकारप्रशस्तिः-- (आर्या) श्रीहीरविजयसूरीश्वरा बभूवुर्जगत्त्रयोविदिताः । तद्वाचका महोदयराजः श्रीभानुचन्द्राद्वाः ।। १ ।। जयन्तु ते वाचकभानुचन्द्रा, अभ्यस्तसवाङ्मयवीततन्द्राः । ये मानसे हंसतया बभूवुरकब्बरक्षोणिपतेस्तु भूते ॥ २ ॥ श्रोभानुचन्द्रामलपट्टचारप्रासादगार्जुनकुम्भकल्पाः । ते सन्तु चारुदयचन्द्रसन्तः, सुखापनोः सूरिकलालसन्तः ॥३॥ मार्थसार्थाकृतिकामधेन्वाः, यस्य प्रासादाद गुणचक्रधाम्नः । पट्टत्रिशिकायाः किल रूपचन्द्रोवृत्तिं चकारोदयचन्द्रशिष्यः । मंयत्शरयेनिशेश १६७५ वर्षे, ज्येष्टस्य कृष्णेतरचारपक्षे । पाठयां तियो वाक्पतियर्यवारे,स्वस्यावबोधाय विनिर्मितेयम् ॥ अनुष्म-ग्रन्याग्रगणितं मर्य, संख्ययाऽत्र विनिश्चितम् । पत्रिंशदधिक पश्च, शतं जातमनुष्टुभाम् ॥ ६ ॥ 5428 . । श्रीरूपचन्द्रमुनिप्रणिता वृति: समाप्ता ॥
32
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॥ समाप्तमिदं वृत्यवचूर्णिविभूषितम् ।।
॥ श्रीदण्डकप्रकरणम् ॥
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जैनधर्मना महान् तत्त्वज्ञानथी भरपूर
मूल्य रु, १-८.०
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५.००
१ संबोधप्रकरण,
२ न्यायालोकवृत्ति (तत्त्वप्रभा)
३ स्याहादविन्दु.
४ जैनतत्त्वपरिक्षा
५ स्तोत्रभानु.
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२-०-०
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०-६-०.
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०-४-०
हालमां ज बहार पडयो छे.
६ नवतत्त्वविस्तरार्थः ५० फरमानु डेपीसाइझयां ३.००
७ दण्डकविस्तरार्थः २५ फरमानु डेमीसाइझमां १-८-०
मळवानु ठेकाणु:-
श्रीजेनग्रन्थप्रकाशक सभा.
घीकांटा, गेट जेशींगमाइनी वाडीमां
जैन एडवोकेट प्रेस-अमदावाद.