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Vandemataram
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वन्दमातरम्
सम्पादन
विवेकी राय
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3 आमुख राजस्थान के शिक्षक सहि. कार प्रकाशि कर आज के का- मंत . अध्यापक-वर्ग स्वाध्याय और एवं संवर्धन.मे साधक की भांति तशील धारा के साथ नित नये यस्तु, शिल्य एवं अभिव्यक्ति स्तरों पर। :- . जिस तरह से अतीत में शिक्षक साहित्यकारों ने साहित्य को श्रीवृद्धि मे योगदान दिया था, चाहे काव्य-शास्त्र के सिद्धातों की रचना का कम हो या 'साहित्यालोचन के मानदण्ड निर्धारण को लकरत नग काल के आवायो य में छाप अकिन की थी जयी कृतियों दी थी, सकता है. कि राज्य के हमारे ये शिक्षक साहित्यकार एक सफल्म के साथ साहित्य सृजन से सभृक्त. तुल्याकन करने वाले 4. . . . . न योजना प्रचारित आग्रह किया था, वह विगत पन्द्रह वर्षों मे अनवरत-अबाध चल रहा है । विभाग की इस योजना की सिर्फ स्तरीय पत्रपत्रिकाओं में प्रशसा हुई हैं. अपितु अन्य राज्यों ने भी " अपने वहा भी ऐसे प्रयास प्रारंभ किये हैं। सर्वेश्वर दयाल सक्से (कविता) (कहानी) मन्नु मदारी देगा। विवेधीराय
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अपनी वात.
शिक्षकों से अनुरंजनकारी प्रवृत्ति की प्रधानता है।
परिवनित हो जाता
उगतियों और अन्न
विरोधो गरे गरी चोट करता है। क्या ऐतिहानिक परिवर्तनः
मल्लन की.
तित हो गयी
डते विशाल प्रेमाने.पररीले व्यग्धोका सजनवमन का
--
के लिए माल को माध्यम बनाया नो भगनी प्रसाः गौतम में नजको नया गाम ईन् अाचारी अनि का साकारको नवर की गो का ही नती होने दिया गया है। समदत मां को बनाना पहनाने का कार आ जाती है। मानवी रास में 'म मरे भी भारती रन गये ! जईन अरविद रीगना सर्वत्र में व्यंग ने अधिक समय है। परत पद नवनानी ने बीच में गजरना। दुब यह है कि उस जमानी से निगुना अच्छी- स्तरीय व्यन्न रचनालों को जमीन के गाने में डालना पा। मेरे मन में न अधीनों के लिए बेहद ज्जन का भाव है। अन्त्रिलवर गजा कालिया, कजोड़ीमल गनी, ननाराम धात. नील अपार, रमेश चन्द्र भट्ट रन्द्रा, मांगरमल शाह और मान्दचन्द्र मल आदि की रचनाओं में मार्मिक न्याय मिला। नारान की मख्या सम्बन्ध सीमा के वाव से निल रचनाकारों को स्थान नहीं मिला है उनकी रचना होन- • ऐसी बात नहीं है । अधिनम ने पूर्ण मनोयोग से इस.स जैन्स' रमक समारोह में आरमदान किया है और वह सब प्राप्त ध्यानाकर्पक है । मुझे तो चन्द्रमा की हर कला मुन्धकान लगता है । किसे सुन्दर कहूँ और क्नेि अनुन्दर कुछ ऐसी ही स्थिति विचार, भाव, कराना, शिल्प और सौन्दर्य समन्धित गद्य:विधा की विविध बननाओं की है। कोने रचना हान है, केंद्र में कंदना कठिन है । को बड छोट कहत अपराध । फिर भी अप:' काय करना ही पड़ा। सबने बड़ा अस्वीकृति अपराध एकाकी. कारों की भारी मोडे, के साथ हुआ । दल अभी राम की एकाकी रचना का सवाल , में मचीय गुण पर्याप्त मात्रा में है । नन्दलाल शर्मा और मन्द्र अचन में रचना धो उन्माद प्रशसनीय है ।। भगवती लाल शर्मा, दिनाप सिह नौहान, वन गम शर्मा, गुलाव चन्द्र निर्वाण, अमोलक चन्द्र जागिड, मत्यपाल मह, 'प्रकाश नारा- या निक, मंदन सिंह सजल, जवाहर लाल रावत प्रेम भट-
नागर, त्रिलोक गोयल रल कमार मलागिगोमोग्न
अपनी विनाद-वृत्ति के प्रकाशन के लिए अन्य च
माध्यमों की करनी चाहिए। नीदे हास्य व्यंग्य
दि विधाला में भी गतिः .
- सिंह वी फन्तानी,
'और स्पष्टता का:
साथ ही मान
"
.
पनी
। उनमें सना धामिता
वत, आरएम. नागदा
म मुदामा की चिनायें
अतिरिक्त
शानजय यमी, कला साधक बलवीर मिह करण, इन्द्र लाल
आमेटा, ओम जयलिया, गौरी का आयका लाल,
तो, इनके
यकार अभी इतना जीवन है।
सम्पादन करते समय मालिपि को विभाल
। जनगानीमन को विमानतामा सरकार देवा और पारस पित ना। रही शिवति नाराणा की मापा चना में युगीन या चमनी र गोमाग योग किया nariरी मार: मारक जाग: गादास दामोरे बोलना वाली मनाही, अनुदान का है। चतुर्वेदी जी का धनी है माद गला वाटते । नहुन सकने बनाने ? कुछ ऐन हो कलंग के धनी मान्नु न बान । में पने अन्दर' करार बानका साहगिकता माना नि नियन्त. नो सिमा बस माल की : आमा-बय- 'कुरा हानीनमा गायनान करवारिक नियन की और भुनाता है। मसलन में सीधे विपनि नियर की, जिनमें नी-मी विनात और निमारद- . प्रतिमा की परिका नलती है, कमी नहीं है। गोग परता। हमारा दागिन्च" :गम-नामयिक नाष्ट्रीय ; समस्यानो, रिगकर नाम्प्रदायिकता की समस्या को दाविन" बोधन में मानाने में विरोपित किया गया है। विषयनिष्ठ निबन्धों में रह रन माददारी - यह य 'होता है जो पासीय चित को धूना है। इनी मुन्थ के चलने ‘श्रमं देवी की पूजा' शीर्षक निवन्ध में गहरी प्रेरणा और छट- पटाहट आ गयो है, और नर नारी में भेद को का सतर्क' विपण, हमे प्रभावित करता है । कल को समाज में उचाइये' बोर्पक व्यावहारिक रचना में कुछ नौनिक प्रश्न उठा कर शिक्षा शास्त्रीय गायनाएँ प्रस्तुत की गयी है । मीताराम स्वामी ने जो प्रश्न यहाँ उठाया है वह एक चुनौती है तथा जिन , मुद्दो को नामने रखा है हमार्ग अस्तित्व की लड़ाई से मन्धित हैं। क्या भयमुन हम माँन्चे बन्द कर देखते रहने : और हमारी भावी पीडी विद्यालयों से ऐने ही शत-प्रतिगत खोखली होकर निकलती रहेगो ? राजस्थान के निक्षक माहिए- कार' अपनी सम्पूर्ण परम्पराओं और अपने मास्कृतिक परिवंश - के बीच चुनौतियों को स्वीकार करें, यही न्याय है । .
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है। उनमे किनी सान्यावादी अतीत में फेक कर लेखक जैसे वर्तमान के लिए कोई निर्णय लेने के मौके दे रहे है। वाम्नत्र मे ऐसे मां के बहुत काम के सिद्ध होते हैं ।..,दस मौके पर यह मौके की बात. सभेप में उठाकर में अपनी बात समाप्त करना चाहता हूँ। स्वय भी शिक्षक होने के नाते एक इच्छा अपने बन्धुओं को रचना के अन्तर्गत भापा और शिल्प सम्ब धी कुछ सावबानियों के सम्बन्ध में शिक्षा देने की जोर मार रहीं है, परन्तु में सावधान हूं। मात्र गिक्षा ने होता क्या है ? सामने रचनात्मक आदर्श होना चाहिए । धन्यपाद है उस राजस्थान परकार को जिसने विगत डेड दशक से रचनात्मक आदर्श का एक अद्वितीय, मानक, निष्ठा.', वान और सार्थक शुभारंभ किया है। प्रतिवर्ष शिक्षक दिवस पर सृजनशील शिक्षक साहित्यकारों की कृतियों के पांच-पांच सफलनों का प्रकाशन और आज के माहोल मे सरकारी स्तर .. पर इस प्रकार साहित्यिक प्रवृत्तियो को प्रोत्साहन प्रदान करने का आदर्ग वास्तव मे चकितकारी है। इस प्रयास की सफलता का ही यह परिणाम है कि सामान्य शिक्षक वर्ग के भीतर से इतनी,भारी सख्या में इतने अच्छे रचनाकारो की कतारें उग आयी। निस्सन्देह पूरे देश के साहित्य प्रेमियों के लिए यह बहुत उत्साहवर्धक सदर्भ है। किलो बड़ी बाग, गाजोपुर, उ० प्र०, (233009) अनुक्रम हास्य-व्यंग्य एक जननेता से अन्तरग बातचीत भगवती लाल व्यास कहाँ ढूंढ़े रस को? जगदीश प्रसाद सैनी मौत एक बकरे की : भगवती प्रसाद गौतम ढाई अक्षर ब्लेक का : भंवर लाल नागदा सड़क के गड्ढे रामदत्त शर्मा : अर्जुन अरविंद घुसपैठ १० १५ १८ २१ वैचारिक राष्ट्रीय एकता : हमारा दायित्व : ओकार मेहता श्रम देवी की पूजा : जितेन्द्र नर-नारी में भेद क्यों? सत्या भार्गव स्कूल को समाज से बचाइये सीताराम स्वामी २७ .. .. ३४ .. सांस्कृतिक राजस्थानी गीतों में वर्षा चन्द्रदान चारण मनभावन गणगौर श्याम मनोहर व्यास साहित्यिक सांस्कृतिक राजस्थान : श्रीमती कमला अग्रवाल ५२ शोध-समीक्षा शकुन बत्तीसी श्रीमाली श्रीवल्लभ पोप ५६ आठवें दशक के राजस्थान के हिन्दी काव्य में मूल्य संक्रमण भगवती लाल व्यास एक और कवीर : संयद कमालशाह घायल .. चतुर कोठारी डॉक्टर पाडुरंग रेखाचित्र रूपनारायण काबरा : वासुदेव चतुर्वेदी ८७ मास्टर फिरगी एकांफी खेमाशाह मुक्ति नालदा का प्राचीन विश्वविद्यालय बोला अचलचन्दन लीला शर्मा विद्यासागर राय ११५ .. . विविध वन्देमातरम् (कहानी)। : चुन्नीलाल भट्ट. १२३ घोर अधकार (रिपोर्ताज) गोपाल प्रसाद मुद्गल . १२८ जहाज रेगिस्तान का (फन्तासो) : दिलीप सिंह चौहान अपने अन्दर (ललित निवन्ध) : अब्दुल मलिक खान नाना रूप धरे(सस्मरण) निशान्त सृजन के क्षण (डायरी) रमेश गर्ग मचीय कविता और शाश्वत मूल्य की समस्या (बहस) .. श्रीनन्दन चतुर्वेदी:, . ...१४४ वृक्षारोपण (भावात्मक) - : प्रेम 'खकरध.ज. दक्षिणी राजस्थान का, बहुचर्चित मदिर अधूणा (वर्णनात्मक) रवीन्द्र डी० पण्ड्या १३५ .....१३८ .. १४० .. . १४८ एक जन-नेता से अंतरंग बातचीत - भगवती लाल व्यास आजकल नेता लोग बड़ी मुश्किल से पकड मे आते है। और अगर नेता के आगे 'जन' विशेषण लग गया तो समझिए उसकी कीमत विहारी की नायिका की तरह अनगिनत गुना बढ़ जाती है । 'तियलिलार की बेंदी' की तरह इस 'जन' शब्द की महिमा अपरम्पार है । 'तत्र' अपने आपमे बहुत सामान्य शब्द है किन्तु इसके आगे 'जन' जुड़ते ही इसकी सत्ता सार्वभौमिक और सार्वकालिक हो जाती है। इसी प्रकार 'संख्या', 'आदेश', 'आक्रोश', 'सहयोग', 'भावना', 'क्राति' जैसे शब्दों के साथ 'जन' जोड़ते चलिए और चमत्कार भुगतिए। 'जन-गणना' का महत्त्व पिछले दिनों नजर आया था। ठीक इसी तरह 'नेता' की तुलना मे 'जन-नेता' अधिक चमत्कारमय है सो हमने एक शुभ घड़ी मे संकल्प किया कि किसी जननेता से बातचीत कर ही ली जाय । जब हम जन-नेता के निवास पर पहुचे तो फाटक के सामने ही सार्व- जनिक नल पर दातीन करते मिल गए । हमने बातचीत वाकायदा 'इन्टरव्यू स्टाइल' मे शुरू की। 'आपका शुभ नाम ? 'नाम में क्या रखा है ? कोई भी नाम सोच लीजिए जो आप को पावर- फुल लगे । असल चीज तो काम है । जिस नाम से काम निकले, वही सच्चा । बाकी सब कच्चा।' 'अच्छा 'काम' सही । आप क्या करते हैं ?' 'हम कोई एक काम तो करते नहीं कि झट बता दें, फलां काम करते हैं। आप देख ही रहे है अभी हम दातीन कर रहे ये अब आपसे बातचीत कर रहे हैं । सुविधा के लिए यही मान लीजिए हम आप जैसे लोगों को इन्टरव्यू देने का काम करते है। 'आपने पिछला इन्टरव्यू कब दिया था ?' एक जन-नेता से अतरंग यातचीत/१ 'दातोन करने से पहले-यू फहिए यही कोई आठ मिनट नीयन संका हले।' 'यह किस पत्र के लिए घा?' 'कोई विदेशी पत्र था। नाम जान कर नया करेंगे? यहागो यह पत्र आता भी नहीं । 'आप देश के भविष्य के बारे में क्या सोचते है? 'मैं देश के भविष्य के बारे में 1947 में पहले माया करता था क्योकि उस समय सोपने वाले पराये थे । न जाने मया उलटा-सीधा सोच लें। अब से सोचने वाले अपने ही लोग हो गए हैं तो हर आदमी सोचने की गुलामी मे क्यो बधा रहे? 'मैं आपका मतलब नहीं समझा । घोडा स्पष्ट करेंगे?' 'अरे भाई, इसमें समक्षने-समझाने की बात ही नहीं है । अगर सोच का स्तर राष्ट्रीय है तो हमारी लोकसभा मोचेगी, अगर प्रादेशिक सोच है तो विधान सभा है ही। अगर ग्रामीण सोच है तो ग्राम पचायत और नगरीप सोच तो नगर पालिका सोच लिया करेगी । हो, व्यक्तिगत सोच के मैं खिसाफ हूं। मेरी मान्यता है कि व्यक्तिगत सोच होता ही नहीं, 'चिन्ता होती है और आप तो जानते ही है चिन्ता विता के समान होती है ।' 'नही, मेरा मतलब था...' नेता जी ने मेरे वाक्य को बीच में ही काट कर कहा-'हा-हा मैं आपका मतलब समझ गया । आपका मतलब है जिन लोगों पर सोच की जिम्मेदारी है, वे ठीक से नही सोच रहे हैं । मैं आपसे पूर्ण सह्मत नही होते हुए भी मुख्य मत्री जी को फोन कर दूगा कि मोहल्ला और सडक स्तर पर कुछ सोच समि- तियां बना दें। 'वर्तमान राजनीति के बारे में आपके क्या विचार है?' 'देखिए, राजनीति बड़ी गदी चीज है । अच्छे नागरिकों को इसमें नहीं पड़ना चाहिए। मैं बहुत जल्दी सार्वजनिक स्थानों पर तस्तियां लगवा दूगा- राजनीति स्वास्थ्य के लिए घातक है। 'फिर भी लोग राजनीति की चर्चा तो करेंगे।' 'वेरोक करे। मेरा उत्तरदायित्व तख्ती लगवाने भर का है।' ‘फिर तो कानून और व्यवस्था जैसी चीज को कोई जरूरत नहीं रह जाएगी? २/वन्देमातरम् 'मुझे आपके सामान्य ज्ञान पर आपत्ति है । क्षमा करें, आपने ये शब्द शायद कही पढ़-सुन लिए हैं । वस्तुतः इनका सही अर्थ नहीं जानते । भाई, कानून और व्यवस्था समय, स्थान और व्यक्ति सापेक्ष चीजें हैं। समय, स्थान और व्यक्ति स्वय अपने कानून और व्यवस्था का निर्माण करते है। मेरा मत- लव है एक ही व्यवस्था और एक ही कानून सब स्थानों, सब कालों और सब व्यक्तियों पर लागू नहीं किए जा सकते । इन चीजो को सार्वकालिक बनाने से व्यक्तिगत स्वतत्रता पर आंच आती है जो प्रजातय के बुनियादी सिद्धान्तों के खिलाफ है। 'क्या आपका प्रजातम में विश्वास है ? 'आपका सवाल बड़ा बोदा है। कोई अगर पूछे, क्या आपका अपनी पत्नी में विश्वास है ? इस सवाल के जवाब में कौन मर्द होगा जो यह कहेगा कि मुझे पत्नी विश्वास नहीं है। मगर विश्वास कितना है, यह हर मर्द जानता है। दरअसल विश्वास-अविश्वास व्यक्ति का निजी मामला है। मैं इसमे दूसरों की दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं करता। फिर भी आपने पूछ लिया है तो कहूंगा कि मेरा हर तत्र-मंत्र-यंत्र, गण्डा-ताबीज, ज्योतिप-वोतिस सबमे विश्वास है । विश्वास बडी चीज है। बाकी सब तो माध्यम हैं। विश्वास से देश तरक्की करता है।' 'अब तक विश्वास से देश की क्या तरक्की हुई है।' 'यही तो रोना है। देश अगर तरक्की नहीं कर रहा है तो आप जैसे शकालु लोगों के कारण। हमारे हर अच्छे काम में आपको गोलमाल दिखाई देता है । हम देश की तरक्की के लिए नेतृत्त्व को योग्य हाथो मे सौंपना चाहते है । आपको वह कुर्सी की लडाई लगती है। जव-जव जनता हममे विश्वास प्रकट करने लगती है आप पत्रकार लोग उसे बरगलाते है । मैं कहता हू भाई, कुछ रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाओ।' 'रचनात्मक दृष्टिकोण से आपका क्या आशय है ?' 'लगता है पत्रकारिता के पेशे मे नये-नये आए हो। रचनात्मक कार्यक्रमो तक की जानकारी नहीं है। उद्घाटन, अभिनन्दन, भाषण, नेता को सिक्को से तौलना, फूलो से लादना, फोटो खीचना, फोटो खिंचवाना, उन्हे छापना और छपवाना ये सब रचनात्मक कार्यक्रम हैं । इमसे जनमानस में अपने नेता के प्रति सम्मान-भाव बढ़ता है। सम्मान से. आत्म-सम्मान का विकास होता है। आस- सम्मान के लिए हमारे देश का नागरिक प्राणों की बाजी लगा देत एक जन-नेता से अतरंगावातचीत / ३
इस महान् देश को महान् परमारा है। कृपया मे बहन न होने दें।
आत्म-सम्मान के अभाव में देश गोगला हो जाता है।'
'मगर आज आदमी की मूल समस्या रोटी है, आत्म-सम्मान नहीं ।'
'रोटी आदमी को मूल समस्या कभी नहीं रही और न आर है।
आदमी ही रोटी के लिए हमेशा एक समस्या रहा है। अगर घोडीबहुत समस्या
रहो भी होगी तो दूर हो जाएगी। इस वर्ष शीतकालीन वर्ग से फमल बहुत
अच्छी होगी।'
'और अन्त मे चलते-चलते एक प्रश्न और करन-जनता के लिए आपका
क्या मन्देश है
'जनता को अजन्ता की मूर्तियों से प्रेरणा लेनी चाहिए। मूर्तियत् सर
देख कर भी नहीं देखना चाहिए, मुनकर भी नहीं मुनना चाहिए, गोरख कर भी
नहीं बोलना चाहिए।
.
४ । वन्देमातरम्
कहाँ ढूँढ़ें रस को? 0 जगदीश प्रसाद सैनी आजकल साहित्य और जीवन से रस उसी प्रकार गायव हो गया है जिस प्रकार गंजे के सिर से बाल गायब हो जाते है । साहित्य तो जीवन का ही प्रतिविम्ब है, अतः जब जीवन मे ही रस-स्रोत सूख गया तो फिर साहित्य मे वह क्या खाक दिखायी पड़ेगा? क्या कोई सूर्पनखा-मार्का स्त्री दर्पण में उर्वशी दिखायी दे सकती है ? रस का स्रोत तो हमारे मन के स्थाई भाव है। वाह्य परिस्थितियाँ इन भावों को जागृत कर रस रूप में परिणत करती है । लेकिन जब हमारा मन इतना पत्थर हो जाये कि वाह्य परिस्थितियाँ उसमे कोई भाव उपजा ही नहीं सके तो फिर रस के लिए जगह ही कहा रह जाती है ? आपने "पिटोकड़ा' घोड़ा देखा होगा। तांगे वाला उसकी पीठ को सपासप धुनता रहता है और घोड़ा है कि अपनी चाल तेज करने का नाम ही नहीं लेता। बस, कोड़े को मार के साथ थोड़ी-सी चमड़ी को कपा भर लेता है और उसी तरह घिस- टता रहता है । कोड़ों को मार उसके लिए बेअसर हो जाती है । वह मार उसकी आदत में शुमार हो जाती है । मुझे लगता है कि आजकल आदमी का दिल भी उस पिटोकड़े घोड़े की तरह ही हो गया है। परिस्थिति की मार उसे प्रभा- वित ही नहीं करती। गहरे से गहरा हादसा भी उसे रच मात्र उद्वेलित नहीं कर पाता । सब कुछ निरावेग रूप से सह जाने की उसकी आदत पड़ गयी है । अतः न उसे अत्याचार होते देख कोध आता है, न किसी को पीड़ित देख करुणा आती है और न ही कुत्सिततम कृत्य को होता देख कर उसके मन में घृणा उत्पन्न होती है। वास्तविक जीवन की परिस्थितियों से निरुदलित रहने का मानव मन इतना आदी हो गया है कि भब उन्ही या उन जैसी परि- स्थितियो का चित्रण वह साहित्य मे पढ़ता है तो वहा भी वह तटस्थ बना रह जाता है । परिस्थितियों का चित्रण उसमें कोई भाव जागृत कर उसे रस मग्न कहाँ ढूंढ़े रस को?/५ कर पाने में असमर्थ हो जाता है। इमी विवगन के संदर्भ में हम आप को परिस्थितियों में विभिन्न रसों की स्थिति का जायजा लेना चाहंगे। पहले रस राज शृगार की ही तलाश करें। स्कूल कनिती को गह-निभा, फिल्मी ग्लैमर के जाद, फैनन-परस्ती र फलस्वरूप नित्य प्रति बढ़ती हुई नक-भडक तथा क्लब और कंबर को आयातित मरति के कारण रहने को जीवन शृगारमय हो गया है लेकिन उसकी 'उत्तम प्रति नही उद्दाम यागना की आधी में उडकर, कही सूटे प्यार के घना को भूलभुलैया मे भटक कर, कही दहेज की याग्नि की लपटो में गुलस कर और कहीं अपहरण-बलात्कार की गन्दी नालियों में ड्य कर नष्ट हो गयी है। ऐमी परिस्थितियों के बीच शृगार रम को ढूढ़ना चील के घोसले में मास कूदना होगा। हाम्य रस की मरसता को बढ़ती हुई गरीबी, भुगमरी, बेकारी और मह. गाई चाट गयी है। बढ़ती हुई आवश्यकता और घटती हुई पूर्ति की वारत- विस्ना ने मनुष्य को परिवार नियोजन के पद से वात्सल्य रस का निर्ममता से गला घोट डालने के लिए मजबूर कर दिया है । विज्ञान के बढ़ते प्रभाव के साथ हो माथ ब्रह्मचारी को गोल में दुबके हुए व्यभिचारियों ने, धर्म के नाम पर इमान को इमान के खून की होली मेलने के लिए उकसाने वाले मठाधीशों ने तथा ईश्वर के नाम पर अपने घृणित स्वार्थों की पूर्ति करने वाले धर्म-ध्वजी पांगे पुरोहितो ने लोगों को ईश्वर के प्रति आम्या गत्म करके शात रस की हत्या कर दी है। जहां एक ओर मभी प्रकार के मोह-बन्धनों को निर्दयता से काट कर, सिर पर कफन बांध राष्ट्र निर्माण के यज्ञ की धू-धू जलती आग में कूद पड़ने के 'उत्माह' का स्थान येन-केन प्रकारेण कुर्सी हथियाने को घिनौनी व्यावसायिक राजनीति ने ले लिया है, वहां दूसरी ओर अव्यवस्था, और कुव्यवस्था, अनाचार और भ्रष्टा. चार, अन्याय और अत्याचार को अपनी अग्नि मे भस्म कर देने वाले सात्विक 'त्रोध' का स्थान स्वार्थ प्रेरित व कायरतापूर्ण कमीनी चाटुकारिता ने ले लिया है । ऐसी अवस्था में वोर और रौद्र रस को कहाँ दूहा जा सकता है ? जहाँ हर प्रकार के चोर, लुटेरे, हत्यारे, बलात्कारी, भ्रष्टाचारी, रिश्वतखोर, जमाखोर आदि जसामाजिक तत्त्व निर्भय होकर अपनी-अपनी कारगुजारियाँ दिखाने के लिए स्वतन्त्र हो वहाँ भयानक रस खोजने का प्रयास मस्स्थल में जल ढूढने के समान ही होगा। सबसे ज्यादा मिट्टीपलीद तो अद्भुत रस की हुई है। नित्य नये वैज्ञानिक आविष्कारो ने 'आश्चर्य के लिए कोई जगह ही नहीं छोड़ी। पुराने ६ / वन्देमातरम् कवि जिन अलौकिक घटनाओं के माध्यम से आश्चर्य का सृजन करते थे, आज के वैज्ञानिकयुगीन मानव के लिए वेअसर हो गयो । वैज्ञानिक आविष्कारों की बात छोड़ भी दी जाये तो भी नित्य-प्रति के जीवन में भी आदमी- इतना आश्चर्य-प्रूफ हो गया है कि चाहे कुछ भी अघटित घट जाए, उसे कोई आश्चर्य नही होगा । कुर्सी के लिए घिनौने समझौते किए जा सकते है, एक ही व्यक्ति हमेशा मनी रह सकता है चाहे सरकार किसी भी दल की हो, गुण्डे सरेआम पति को चाकू दिखाकर उसके सामने ही पत्नी के साथ बलात्कार कर फरार हो सकते है और पुलिस मक्खी मारती रह सकती है, दहेज के लिए दुल्हे के विवाह की वेदी से उठ कर लापता हो जाने पर दुल्हन तिमजले से छलाग लगा सकती है, पुलिस द्वारा डाके डाले जा सकते है, हरिजनो को जिन्दा जलाया जा सकता है, स्त्रियों को सड़को पर नगा घुमाया जा सकता है, चीनी अठारह रुपये किलो बिक सकती है, विचाराधीन कैदियो की आँखे फोड़ी जा सकती है, मतलब यह है कि कुछ भी हो सकता है लेकिन ये या ऐसी ही अन्य घटनायें किसी को चौकाती नहीं । बड़ी आसानी से आज का आदमी इन घटनाओ को जान कर विना कोई प्रतिक्रिया जाहिर किए, अपने धधे में व्यस्त हो जाता है । कुछ भी ऐसा नही रहा जो उसे हक्का-बक्का रह जाने के लिए विवश कर दे । सभी कुछ सहज स्वीकार्य हो गया । ऐसी स्थिति में अद्भुत रस के लिए जगह कहा रह जाती है ? यही वात वीभत्स रस के बारे मे कही जा सकती है। हमारे नाक गन्दगी को सूधने के, हमारी आँखें गन्दगी को देखने की और हमारे कान गन्दगी को मुनने के इतने आदी हो गये है कि अब हमें कुछ भी गदा नही लगता, कुछ भी घृणित प्रतीत नहीं होता। इतना ही नहीं, स्थिति यहाँ तक पहुँच गयी है कि हम गन्दगी से घृणा करना छोड़ उसमे रस लेने लग गये है। चोरी, डकैती, हत्या, बलात्कार जैसी सामाजिक गदगी की खबरो को शहद की तरह चाव से चाटते है । कही फसाद हो जाता है तो दर्शकों की उत्सुक भीड़ आंखो मे चमक लिए आ जुटती है। आज का आदमी सैक्स और अपराध से सम्बन्धित कुत्सित साहित्य, कामुक फिल्मो, अश्लील कैबरे एवं भौडे व बेतुके फिल्मी गीतो पर किस कदर दीवाना हो रहा है, यह किसी से छिपा नही है । इस जुगुप्सा-प्रेम के वातावरण में वीभत्स रस की कल्पना ही नहीं की जा सकती। रही बात करुण रस की, सो उसके बारे में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि आजकल लोगो के कलेजे पत्थर के हो गये है जो किसी के भी दुःख-दर्द से पिघलना नहीं जानते । कही कोई दुखद घटना या दुर्घटना होने पर लोगों की कहाँ ढूंढ़े रस को ?/७ भीड उमडती जरूर है पर उनकी आंखो में सवेदना के आंसू न होकर तमाश• चीनी कुतूहल को चमक ही रहती है। ऐसे मौकों पर लोगों की मनोवृत्ति दूसरे के दुःख-दर्द को मनोरजन का साधन बना कर ही तृप्त नही हो जाती बल्कि उनकी स्वार्थ प्रेरित गिद्ध-दृष्टि किसी लहूलुहान लाग को फटी जेब में अटके पर्स पर, किसी कट कर छितर गयी कलाई में बंधी घड़ी पर या किसी कुचली गर्दन में अटकी चैन पर टिकी मौके की तलाश भी करती रहती है । स्थिति के यहाँ तक पहुच जाने के बावजूद भी यदि कोई किसी से दूसरे के दुख- दर्द मे आंसू बहाने की आशा करता है, तो उसे मेरा यह विनम्र मुझाव है कि मानवता की इस दर्दनाक मौत पर वह स्वयं ही जी भर कर रो ले । अत. यह मान लेने में कोई अमगति नही होगी कि आज का जीवन रसोद्रेक की परम्परागत स्थितियों के अनुकूल नही रहा है। आचार्यों ने रम का सम्बन्ध औचित्य और उत्तम प्रकृति के साथ जोडा है, लेकिन हमारे आज के जीवन में औचित्य विचार विलकुल गायब हो गया है । प्रकृति की उत्तमता को घास नही डालता। लोग औचित्य स्थान पर अनौचित्य में उत्तमता के स्थान पर निकृष्टता से और सगति के स्थान पर विसगतियों से रम ग्रहण करने लगे हैं। इसके एक नही, अनेक उदाहरण नित्य प्रति के जीवन में देखे जा सकते है, जैसे वावा लोगों को भक्ति के स्थान पर भाग, गाजा और चरस में रस मिलता है तो भक्तो को मदिर में भगवान के स्थान पर पूजा के लिए आने वाली नयी नवे. लियो के दरस-परस मे रस आता है। कवाड़ी को नये माल की जगह रद्दी में रस मिलता है तो नेताजी को देश की सेवा की जगह कुर्सी को गुलगुली गद्दी से रस मिलता है। इसी प्रकार आमदनी वाले को करो को चोरी मे, अफसर को घूसखोरी में, नशेबाज को दारूखोरी मे, निठल्ले को जूआखोरी में, शहरी मजनू को गाँव की गोरी में और ब्लेक मार्केटियर को चीनी की बोरी में रस मिलता है । इतना ही नहीं, वकीलों को मुकदमेबाजी मे, दलालों को सांदेवाजी मे, बाबुओं को अडगेबाजी मे, अध्यापको को ट्यूशनबाजी मे, विद्यार्थियों को नकल- बाजी मे, चमचों को मक्खनवाजी मे, पत्नियों को नाराजी में, और दोस्तो को जालसाजी मे रस आता है । जिस प्रकार कुत्तो को भौकने और गधो को रंकने में रस मिलता है उसी प्रकार छात्री को विद्यालयो और मोटर-रेलो के शीशे-खिडकियो पर पत्थर फैकने में ही रस मिलता है। जैसे कलियों को चटकने और रूपकलियो को मटकने मे रस मिलता है वैसे ही हराम को खाने वालों को पराया माल गटकने में रस मिलता है। आजाद देश के नवयुवको को पढ़-लिख कर बेकार भटकने में रस मिलता है तो आजाद देश की रेलो और बसों को ही नहीं, ऋण, ८/ वन्देमातरम् राहत और राशन के साथ-साथ ही समाजवाद को भी रास्ते में अटकने मे रस मिलता है । दलाल चोरी का माल बिका कर रस लेते है तो ब्रह्मचारी हमी- नाओं को योग सिखा कर रस लेते है । लडकियो के वाप अपनी बिटियाओ के लिए नामी घराना ढूंढ़ने में रस लेते है जबकि नामी घरानों के बाप अपने शाह- जादों की सरेआम नीलामी करने मे रस लेते है। खैर, तो कहने का आशय यह कि रस का और औचित्य का नाता टूट गया है। अब तो स्थिति जितनी अनौचित्यपूर्ण होती है, लोगों को उतना ही रस आता है । आचार्यों का मानना है कि जहाँ अनौचित्य आ जाता है वहाँ रस भग होने लगता है। किन्तु आज के जीवन में स्थिति इमके विपरीत दिखायी देती है। बनौचित्य और विसगतियो की वजाय औचित्य और संगति रस-भग का कारण बन जाती है । उदाहरणार्थ, उपभोक्ता वस्तुओं की उपलब्धि ठीक होते ही लेक मार्केटियरों का रस भंग होने लगता है, वीमारों की मख्या कम होते ही डाक्टरों के चेहरे की चमक कम होने लगती है, लडाई-झगडे और सिरफुटीवल में कमी आते ही वकीलो मे नीरसता व्यापने लगती है, चोरी-जुवारी की वारदातो में कमी आते ही पुलिस वालो का दम घुटने लगता है, भावों में गिरावट आने के साथ ही व्यापारी का रक्तचाप ऊचा होने लगता है। जिस वर्ष रिश्वत का बाजार नर्म पड़ जाता है, उस वर्ष की सदियों में कईयों के घर गर्म कपड़े नहीं वन पाते, जिस वर्ष अकाल नही पड़ता, जिस वर्ष वाढ नही आती उस वर्ष कइयों के बीवी बच्चों को हवाई जहाज से चित्ताकर्षक दृश्य न देख पाने के कारण मन मसोस कर रह जाना पड़ता है, देश की स्थिति में सुधार आते ही विरोधी दलों को स्थिति में विगाड़ आने लगता है । मतलव यह कि आज जैसे रस का सम्बन्ध अनौचित्य से जुड़ गया है वैसे ही औचित्य के साथ रस भग का सम्बन्ध जुड़ गया है। आप कह सकते है कि मैं काव्य के रस के फार्म ले को वास्तविक जिन्दगी में घमीट लाया हूँ, इसी कारण ये विसगतियां नजर आती है । ठीक है, आप ऐसा कह कर मेरी तुच्छ बुद्धि पर तरस खाकर रस लेने के लिए स्वतन्त्र है, लेकिन मेरा निवेदन है कि काव्य या माहित्य से रस ग्रहण करने की मानसिकता वास्तविक जिन्दगी के अनुभवो से ही तो उपजती होगी। शरीर जब अपनी चेतना ही खो दे तव चाहे उसमें सुई चुभोवो या तलवार घुसेड़ो, दर्द तो होने से रहा । आज के मानव के हृदय ने जब अपना उद्वेलन ही खो दिया है तब न उसे वास्तविक जीवन की घटनायें प्रभावित कर सकती है और न हीकाव्य-साहित्य में चित्रित जीवन स्थितियां हो। ऐसी स्थिति से रस को कहाँ ? कहाँ ढूंढे रस को? 18 मौत एक बकरे की Dभगवती प्रसाद गौतम पैसेंजर ट्रेन के भीड भर कपार्टमेंट से नीचे उतरते ही मैने जी भरकर सास ली और गेट की तरफ बढ़ गया। ड्यूटी पर पड़े टिकट बटोरते सज्जन से आखो ही आखों में दुआ-सलाम की रस्म अदाई के बाद अपनी जेब से एक अदद तुडा-मुडा टिकट निकालकर बढाया तो उन्होने बड़ी उदासी के साथ उसे अपनी गड्डी में मिला लिया। मन ही मन बीवी-बच्चों के बारे में सोचता हुआ मैं प्लट-फार्म के बाहर निकला तो वातावरण में अजीब-सी खामोशी का अहसास हुआ। मार्केट से गुजरते हुए लगा जैसे बहुत कुछ बदल गया है। दरअसल यहाँ से गया था तो बात कुछ और थी, जव लौटा तो कुछ और..... लोग वैझिझक इधर से उधर आ-जा रहे थे। भक्त महिलाएं सहन ढग से मंदिर की ओर प्रस्थान कर रही थी । नन्हे बच्चों के हाथों में फल-फूल सुरक्षित थे। रामजी वा दूकान के बाहर बैठे चन से अखबार वाच रहे थे। गेहूँ वाले सेठ जी ने अपनी छडी हमेशा-हमेशा के लिए खूटी पर लटका दी थी। रमकू बुआ ने आगन मे मूग-उड़द की दालें सुखा रखी थी। कुल मिलाकर कही कोई गडबड़ी का समाचार नहीं था। अचानक गोपाल भाई दिखे। न जाने किन खयालो में खोये वे पास से गुजर ही रहे थे कि मैने उनके कंधे पर हाथ दे मारा-"किधर ?" "इधर हो जा रहा हूँ, प्रताप सर्कल तक ।" उन्होने बेमन से जबाव दिया। "मगर यह कैसा चेहरा बना रखा है आज ?" "कुछ मत पूछो, भैया। कभी नहीं सोचा था कि वह इतनी जल्दी मौत की गिरफ्त में आ जाएगा।" "मौत?.."किसकी ?" १० / वन्देमातरम् "अरे, कल्लू बकरे की।" "कल्लू बकरे को ?" मेरे हाथ से भूटकेस छूट गया । "हां भैया, ऐसी हस्ती के गुजरने से बस्ती क्या, सारा इलाका ही सूना हो गया है।" "इसमें कोई शक नही, गोपाल भाई। क्या प्यारी चीज थी। भगवान ऐसे बकरे सभी को दे । मगर समय से पहले किसी को न उठाये।" मेरे लिए संवेदना प्रकट करना जरूरी था। आखिर मै भी तो वस्ती का एक जागरूक नागरिक था। वैसे तो दुनिया में हजारो वकरे रोज-रोज मरते है और अच्छी से अच्छो नस्ल के बकरे मरते है । मगर यह बकरा कुछ और ही किस्म का था। सारी वस्ती का नूर था वह । आखिर वह था भी खान नूर मोहम्मद का। कार वाले की असीम अनुकपा से खान साहब के दिन ठीक चल रहे थे। इसलिए बकरे का दवदवा होना स्वाभाविक था। माथे पर उगे हुए तीसे- खड़े सीगो को फ्री-स्टाइल में हिलाता-डुलाता जब वह बाजार से गुजरता था तो लोग अगल-बगल हो जाते थे। उसका रास्ता रोकने का मतलब था एक अनचाही आफत मोल ले लेना। खैर साहब, वकरा मर गया । (हमेशा-हमेशा के लिए कौन जिदा रहता है !) पर मरते ही वह भी रातों-रात महान हो गया। इस धरती पर महान् होना भी जरूरी है । और महान होने के लिए ढेर सारे प्रशंसकों की भीड़ और भी ज्यादा जरूरी है । हा, तो बकरा महान् हो गया क्योकि उसके प्रशसको की कोई कमी नहीं थी । जनाब, आज के प्रशसक भी तो तिलो ने तेल देखना सीख गये है । कल्लू का तेल वैसे भी कम असरदार नही हो सकता था क्योकि उसने खान साहब के आगन में अवतार लिया था । जब यह नही रहा तो कई तरह की रस्मो का निर्वाह भी जरूरी हो गया। खान साहब की आवाज में दम था, इसलिए यह मौत भी एक महान् दुर्घटना ही मानी जानी चाहिए थी। और ऐसी स्थिति में नगर के बडे-बडे धुरधर अपनी सवेदनाए प्रकट करने को उतावले हो गये। छोटी-बड़ी सभी सस्थाओ-कार्यालयो की चौखटों पर उद्गार प्रकट करने वालों का ताता-सा लग गया। किसी ने भी उसे 'महान्' से नीचे की श्रेणी प्रदान करने की भूल नही की । वास्तव मे कितना महान् था वह । घर पहुचते ही श्रीमती जी ने रोटी पर फिरते बेलन को रोककर सबसे मौत एक बकरे की। ११ पहले यही यवर प्रसारित को-"अभी हाल 'टाउन हॉल' पहचिए । नगर- पालिका के दो-तीन व्यक्ति आये थे । कह रहे थे—कल्लू दुनिया से चल बसा सो...... । क्यों जी, कोन था यह कल्लू मैं तुरत बोल उठा--"तुम नहीं जानती उमे और अगर जानती होती तो नीद में चोक चोंक उटती । पर, नगर पालिका वाले पीछे थोड़े हो रहेंगे । वहा भी धुआधार आयोजन होगा। कितने ही नेता-अभिनेता इकट्ठे होगे । इसलिए चेहरे पर उगी इम घाम को साफ करके जाना ही ठीक रहेगा।" मैने जल्दी-जल्दी अपना व्यक्तित्व मवारा और बाहर निकलकर 'टाउन. हॉल' की तरफ रुख मोड दिया । चौराहे पर नागपाल हायर सैकडरी स्कूल का जमादार मिल गया। कहने लगा--"साय, बेचारा कल्लू बल वमा। अब गम इस बात का है कि वह मर गया सो मर गया, पर हमारे एक साथी को भी मार गया।" "क्या मतलब ?" मैने उत्सुकता जाहिर की। "मतलव यह कि..." उसने अपनी बात आगे बढाई-"एक चपरासी तो इसी काम पर तैनात किया गया था कि वह कल्लू पर नजर रखे। यदि वह स्कूल में घुस जाये तो उसे टोके नहीं। आजकल बिगडैलों मे मुहजोरी करना ठोकनही है सो जैसे-तैसे प्यार से पुचकार कर उसे गेट से बाहर कर दे। आपने तो देखा होगा सा'ब, कैसे आता था वह-एकदम नामी गुडे की तरह । इधर उधर ताका-झाकी करते हुए इस बरामदे से उस बरामदे तक मस्तानी चाल से चक्कर काटता था और फिर अपने आप बाहर निकल जाता था । उसके न रहने से एक चपरासी की पोस्ट कम हो गई है । मैनेजमेट वाले कहते है-अब क्या जरूरत है इतने आदमियों की।" मैंने कहा-भाई देखो, महान् चीज ऐसी ही होती है। यह तुम्हारे एक साथी को ही नहीं, पूरी की पूरी वस्ती को भी मार दे तो कोई आश्चर्य नहीं।" मैं फिर आगे बढ़ लिया। सब्जी मड़ी भी उदास थी। थड़ो पर बैठे लोग या तो रेजगारी गिन रहे थे या चाय के गिलास सुडक रहे थे। नीचे बैठी माल- नियाँ घर-गृहस्थी की बातो में उलझी हुई थी। इक्का-दुक्का आदमी ही कही कुछ तुलवा रहा था । फत्ता दा से पूछ लिया-"कैसा चल रहा है ?" "चल क्या रिया है मालिक, वस समझो कि दिन कटना मुश्किल होइ रिया है । वो था तो भडी मे जान थी। दिखते ही लोग चिल्लाते थे-आ गया, आ गया । सब अपनी-अपनी कामड़ियाँ उठा लेते थे। फिर उसका स्ख समझकर १२/ वन्देमातरम् । -- कुछ चीजें सड़क पर फेंक देते थे। यह समझो कि उसे अपना कमीसन मिल जाता था। हमारे यहाँ की रौनक ही पतम हो गई अब तो।" "सब कुछ वक्त के हाथ है, फत्ता दा।" इतना कहकर मैं टाउन हॉल की सड़क पकड़ना चाहता था कि पशु चिकित्सालय वाले शर्मा जी ने आ पकड़ा। इधर-उधर की बातचीत के बाद यही एक धुन-वड़ी गजब की नस्ल पायी थी उसने । देखते ही बकरियों में- में कर उठती थी। अव स्साली पब्लिक हमें टटोलेगी। खैर, हम भी कह देंगे-- कल्लू गया तो क्या हुआ, लल्लू तैयार करो।" वे हंस पड़े। मैंने भी साथ दिया और हम विद्युड गये । काफी देर हो गई थी। समय पर यथास्थान पहुंचना चाह रहा था। लेकिन बसंत जलपान गृह में बैठे चकोर भाई ने आवाज लगादी। हम ठहरे एक ही विरादरी के। वे है पत्रकार और मैं हूँ कवि-~-यानी कि दोनों बुद्धिजीवी । बुद्धि- जीवी नाम के व्यक्तियों को पकड़ बड़ी गहरी होती है और उनका हरेक मसला चाय को टेवल पर हल होता है। उन्होने चाय का आर्डर मार दिया। मुझे उनका सम्मान रखना पड़ा। फिर ले-दे कर बात आ पहुची उसी मुकाम पर। वे आत्मविश्वास से बोल उठे-~~"कविराज, अब हमे चुप नही बैठना चाहिए।" "हां, बिल्कुल नहीं बैठना चाहिए।" मैने सहारा लगाया। "कबीर की तरह नगे होकर चौराहे पर खड़े हो जाना चाहिए।" "नही. यह वात तो बहुत पुरानी हो गई। निराला जैसी खोपड़ियों की बात "निराला भी वैसे तो आउट-डेटेड ही है। हम इसी दशक की बात क्यों न करें।" "हा, तो यह हुई न वात! लोगों ने उस समय मेहनतकश लोगों को अपनी रचनाओं में उठाया । औरतों से पत्थर तुड़वाये (वह तोडती पत्थर ! )। हमे अपने ही ढग से औरों को पकडना होगा।" "तो फिर हम कल्लू बकरे जैसी हस्तियो पर लिखें?" "हो हो, क्यो नही । और ऐसा लिखें कि पुराना विलकुल साफ हो जाये।" "फिर ती गुरु, हम-तुम धड़ल्ले से चल निकलेगे।" "सच? तो फिर हो जाये एक-एक चाय और । फिर हम चलें 'टाउन- हॉल' । आज ही लो-उन सब हाथियों को खाट खड़ी कर देनी है और सावित मौत एक बकरे की / १३ -अब कर देना है कि मौत' 'मौत तो बकरे को भी खूबसूरत हो सकती है बशर्ते...!"- "वशर्ते उसके सच्चे पारखी भी पैदा हों दुनिया मे।" हम दोनो ने एक साथ ठहाका लगा दिया। वहाँ बैठे चाय के प्यालों से जूझते लोगो की निगाहे हमारे चेहरों पर गड़ गई। अतरात्मा ने कहा- यहाँ से उठ जाना चाहिए। काउन्टर पर हिसाब चुकता हो जाने के बाद हम चलने को हुए कि जल- पान गृह का बूढा चरा नीचे उतर आया और हमें घूरते हुए बोला- 'माफ करना वाबूजी, एक वकरे की मौत पर लोग भापण झाड़ रहे है । पर ऐसी जबान क्यों चला रहे है वे ? महज इसलिए कि वह खान नूर मोहम्मद का बकरा था और खान अभी जिंदा है । उसकी डुगडुगी बज रही है इलाके में । इसलिए यह सब कुछ हो रहा है । जव वह खुद मरेगा न, तब ये ही लोग उसके . नाम की धज्जियां उड़ाएगे, धज्जियां ।...समझे?" मुझे लगा जैसे अभी-अभी एक बटन दवा है और मेरे मन का अधेरा गायब हो गया है। मुझसे रहा न गया--"चकोर भाई, हमारा लेखन तो इन जैसे फकीरों की सपाट वयानी से ओत-प्रोत होना चाहिए। वधु 'टाउन-हॉल' को मारो गोली। हम तो घर चलें और कुछ ऐसा करें कि लोग याद रखें ।" उन्होने मेरी बात पर स्वीकृति की मुहर लगादी और हम आगे बढ गये । १४/ वन्देमातरम् ढाई अक्षर ब्लेक का भंवरलाल नागदा ढाई अक्षरी के शब्द की महिमा बडी अपरपार है । जिसका वर्णन आदि काल से वेद, पुराण, उपनिपद् आदि करते आ रहे है। इन शब्दों की आयु बड़ी लम्बी, भाव बडे ऊँचे एव गहरे प्रतीत होते है । इनके प्रादुर्भाव के बारे मे शायद ही किसी को मालूम हो। किन्तु इतना अवश्य है कि आदिकाल मे अर्थात् सृष्टि की रचना से लेकर आज तक जन्म, मृत्यु, रक्त, अस्थि, चर्म, स्वाद, खट्टा, मिट्ठा, भक्ति, शक्ति, धैर्य, शान्ति, हल्का, सख्त, सत्यं, शिवम् व श्रेष्ठं आदि ढाई अक्षरों वाले शब्द मानव जीवन से सांकल की कड़ी की भांति जुड़े हुए है। ढाई अक्षरों के शब्द पर कवीर जी ने स्वयं कहा है : पोधी पढि-पढ़ि जुग मुआ, पडित भया न कोय । ढाई अक्षर प्रेम का, पढ़े सो पडित होय ॥ आप भी सोचेगे कि वह हाई अक्षरो वाला शब्द कोन-सा है-प्रेम । जी नहीं, मगर आपने कह दिया तो इस पर कुछ दृष्टि डाल ही दें । वास्तव में प्रेम के बिना दुनिया मे कुछ भी नहीं है, और है तो सब कुछ है । आप कहेगे कैसे ? प्रत्येक की सीमा होती है और सीमा से बाहर हर एक'। इस पर "बिहारी" ने व्यंग्यात्मक रूप से राजा जयसिंह को चेतावनी दी है नहिं पराग, नहि मधुर मधु, नहिं विकास इहि काल । अली कली ही सौं विध्यो, आगै कौन हवाल । तो आप कहेगे प्रेम नही तो वह शब्द कौन-सा है ? सट्टा या जूआ ? जी नही, फिर भी आपने कह दिया तो कुछ दृष्टि इस पर भी डाल दें। आपकी तो तारीफ बडी ऊँची है, आप हजारों घरो को बर्बाद कर देते हैं । यानी हजारों को मिटाकर आप एक पर आवाद करते है, वो भी भाग्य दुरस्त हो तब? ढाई अक्षरो की बदौलत शायद ही कोई घर बसा हो। विपरीत, कई बार इस शब्द से बरवादियों को ज्वाला में झुलसते देखा है मैंने इसान को । उदाहरणार्थ ढाई अक्षर ब्लेक का/१५ - आदिकाल में युधिष्ठिर दुर्योधन से सट्टे (जूभा) में राज-पाट, धन-दौलत आदि सब कुछ हार गया तो अन्ततोगत्वा उसने अपनी भार्या द्रौपदी को भी दौर में लगा दिया। यह प्राचीन का प्रत्यक्ष प्रमाण है । आधुनिक कलयुग हो दोपदी को दांव पर लगाने को गबरें आजकल अग्रवारी सुगियों को आम बात हो गई है ? अत्र में आपके सामने दाई अक्षरी के ऐने सन्द का वर्णन करने जा रहा हूँ जो सर्वत्र व्याप्त है। इसके बिना मास तौर से इस युग में तो आपका काम हो नही चल सकता । ये साहव हर व्यक्ति, वस्तु और स्थान पर कार्य करते है। आप कहेंगे; ये श्रीमान् हैं कौन ? श्रीमान् आप है "लेक" सर्व गुण सम्पन्न, यथा नाम तथा गुण कह दें तो कोई अतिशयाक्ति नहीं । आपका सिद्धान्त है-"करना तो लार्ज स्केल पर और वह भी बडो की छाया में रहकर।" आपके कारनामो से आप परिचित होगे । आधुनिक युग मे जितना विज्ञान ने कमाल कर दिखाया उतना ही इस मंहगाई के स्वर्ण युग में "लेक" साहब ने। जीवनोपयोगी वस्तुएँ उपलब्ध कराने में आपके बिना काम नहीं चल सकता ! जीवन का कोई पक्ष ले लीजिए । उदरपूति के लिए अनाज, तेल, घी, चीनी आदि खरीदना है तो आपको "ब्लेक" साहब के चरणों में शीश नवाकर उनसे आशी- दि प्राप्त करना होगा। इसी तरह मनोरंजन हेतु सिनेमा या कवि सम्मेलन मे जाना है तो "आप" साहब से सम्पर्क स्थापित करना होगा तभी आपको टिकिट मिल सकेगा, अन्यथा असभव है। इसी तरह जिन्दगी सुविधाजनक व्यतीत कराने हेतु मकान का निर्माण करना है तो आपको सिमेन्ट आदि मैटेरियल उपलब्ध कराने के लिए "आप" साहव की विधिवत् परिक्रमा करनी होगी। अन्यथा आप कुवारे रह सकते है । "आप" तो इतने शरीफ है कि लाठी चार्ज करवा कर या घोड़े द्वारा कुचलवा कर मरवा सकते हैं और दाह-सस्कार हेतु पाइयो में डलवा सकते है। यदि आप अपने बालक-बालिकाओं को विद्याध्ययन कराने के इच्छुक हैं तो उनके लिए स्टेशनरी, पुस्तके, कापिया खरीदने के लिए आपको गलियां, मोहल्लो और शहरों मे भटकना पड़ेगा । सौभाग्य से आपके दर्शन हो भी गये तो अनजान की तरह मुह छिपाकर निकल भागने की कोशिश करेंगे। यदि आपने जबरदस्ती रोक लिया तो आसमान से छूती बातें करेंगे। जो हा, इस कलियुग में प्रेमी-प्रेमिकाओं के फोटू का ब्लेक, उनके प्रेम- पत्रो का ब्लेक और यहां तक कि आजकल युवकों और युवतियों के ब्लेक की पबरें आये दिन आप सुनते है । आजकल जिधर देखो उधर ब्लेक ही लेक । १६ / वन्देमातरम् दिन मे ब्लेक तो रात मे ब्लेक । घर में ब्लेक तो घाट पर ब्लेक । होटलों में ब्लेक, सिनेमा व सोसायटी मे ब्लेक । पृथ्वी पर ब्लेक तो चन्द्रमा पर ब्लेक । शायद स्वर्ग में भी ब्लेक चलता होगा। नरक के लिए तो "आप' साह्न प्रतीक्षा कर ही रहे होगे। गलत न समझियेगा। दीन-हीन, निर्बलो को 'आप' से घृणा होती है तो धनिको, रईसों एव पूंजीपतियों के मुंह से लार टपकती है । आप कहेगे, लार तो पागल कुत्तो के मुंह से टपकती है । तो मै कहूगा कि ये क्या उनसे कम है ? 'आप' भी तो स्वार्थ मे पागल हो तेज रफ्तार से दौडते है और शोपित वर्ग को आज यहाँ काटा तो कल वहाँ काटा 'आपका' कहना है लार्ज स्केल पर ब्लेक वह भी बड़े लोगो की छन-छाया में रहकर । सीमेंट की जगह राख का ब्लेक, मावे मे सोपस्टोन का ब्लेक, सोना- चाँदी में सफेद ताव का ब्लेक, धनिये मे लीद का ब्लेक, अफीम में काली मिट्टी का ब्लेक, शक्कर में रेत का ब्लेक, शहद में गुड का ब्लेक, काली मिर्च में पपीते के बीजो का ब्लेक, कैरोसीन, कोयला, पेट्रोल में पानी का ब्लेक, वाटर- वर्स मे पानी के नाम हवा का ब्लेक, कल-कारखानो मे समय का ब्लेक, नियुक्तियों में नोटो का ब्लेक, ट्रान्सफर मे जी० ओ० का ब्लेक, राजनीति मे नेताओं का ब्लेक । बुरा न माने आजकल ब्लेक के पीछे सारी दुनिया दीवानी हो गई है । इसी ब्लेक ने सत्यवक्ता को सफेद झूठ बोलना सिखलाया । यहाँ तक कि व्यवहार व रिश्ते तुड़वाने में भी कसर न रखी है। फिर भी 'आपकी' आदर्शवादिता तो देखिये । वैसे मैं नेहरू जी से ज्यादा शास्त्री जी के मार्ग पर चलता हूँ। जिस रास्ते से होकर मैं दूकान पर गुजरता हूँ वह शास्त्री मार्ग है । मैंने हर चीज का शीलभग होने दिया है किन्तु ब्लैक जैसे महामहिम की शील की सदैव रक्षा की है। बुद्धिजीवी सभी शेर है किन्तु आप इनके बीच रंगे सियार का स्वांग कर बैठे हैं। जी हाँ, आपका कहना है मैं कितना ईमानदार, सच्चा, दयालु और त्यागी हूँ कि सवों को आवश्यकताओं की पूर्ति करता हूँ फिर भी लोग मुझसे ईर्ष्या क्यों करते हैं ? ढाई अक्षर ब्लेक का/१७ सड़क के गड्ढे 0 रामदत्त शर्मा हम सडक के गड्ढे है । इसीलिए शायद आप हमसे बचकर निकल रहे हैं । आप सोच रहे होंगे कि यदि वचकर नहीं निकले तो ये गड्ढे हमें गिरा देंगे । इनमे भरी कीचड में हमारे पैर सन जायेंगे और हम गन्दे हो जायेंगे। आपकी सावधानी की दाद देनी पड़ेगी। परन्तु कब तक आप हमसे बचकर निकलते रहेगे । क्या हमको भरने की भी बात कभी सोचेंगे या अपना ही बचाव करते रहेगे। आप अच्छी तरह जानते हैं कि हमे जन्म देने वाले भी आप नही तो आपके भाई ही है। हमारी मां को आपने बेदर्दी से रौंदा है तो हमारा जन्म हुआ है । विना इस बात की परवाह किए कि सड़क में आप और आपके वाहनों के सरपट दौड़ने से उत्पन्न घर्षण को सहने की क्षमता किस सीमा तक उसमें है, आप दिन रात उसको छाती पर मूग दल रहे है । फिर भी आप सोचते हैं कि वह वेचारी अपने स्वरूप एव स्वास्थ्य को यथावत् बनाए रखे। भला यह कैसे सभव है । स्वतन्त्रता प्राप्ति के वाद आपने हमारी जननी का विस्तार तो बहुत किया है । अनेक राष्ट्रीय मार्ग बने हैं। शहरो को कस्बों से जोड़ा गया है । इतना ही नही गांवों तक भी सड़क तेजी से पहुँचती जा रही है । वह विकास का प्रतीक हो चुकी है । पचवर्षीय योजनाओं में निरन्तर उसका विस्तार हुआ है । परन्तु संख्यात्मक विकास के चक्कर में उसकी गुणात्मकता की उपेक्षा हो रही है । निर्धारित मापदण्ड के अनुसार न तो उसमें मसाला लगाया जाता है और न मजबूती के साथ उसका निर्माण होता है और प्रयोग शुरू हो जाता है । इतना सब भला किसे है जो सड़क को मजबूत बनने दे और इसके बाद उसका प्रयोग करे। उसका निर्माण मजबूती के साथ हो। इसकी चिन्ता भी आज बहुत कम की जाती है, क्योकि यदि ऐसा हो गया तो सड़क के नाम पर १८/ वन्देमातरम् । धंधे कम हो जायेंगे । इसलिए इस 'धंधे' के युग में ऐसी ही सड़कें बनती रहेंगी, उनकी मरम्मत होती रहेगी और हमारा जन्म भी होता रहेगा। हां, तो यह ध्यान रखें कि आप हमारे जन्मदाता है, फिर भी हमसे बच- कर क्यों चलना चाहते है ? आपको भय है कि हम कहीं चोट न कर दें। ठीक है जमाना नियोजन का है परन्तु अपनी धुन मे अंधाधुंध चलने की प्रवृत्ति को छोड़िए और जिसका प्रयोग कर रहे हो उसके स्वास्थ्य का भी ध्यान रखिए। यदि आप सड़क पर चलते हुए निर्धारित नियमों का पालन करेंगे तो निश्चित ही हमारे जन्म पर कुछ नियन्त्रण होगा। क्या आप नही जानते कि आज के इस वेतहाशा दौड़ के युग में ये सब बातें आदर्श वधारने जैसी है । किसे फुरसत है कि जो सड़क के नियमों की परवाह करके चले । ये बातें तो किताबो मे लिखने की हैं। इसीलिए तो हम कहते है कि हमारा जन्म और हमारी बढ़ोतरी आज कोई नहीं रोक सकता है। आप जैसे सावधानी बरतने वाले और हमसे बचकर चलने वाले हैं कितने ? बहुलता तो आँख मीच कर चलने वालों की है । अधाधुध चलने की धुन मे हम उन्हे दीखते ही नही । जब वे मुंह के बल गिरते हैं तो नाहक मे हमे दोष देते है । गलती खुद करते हैं और उसे हमारे मत्थे मढ़ते हैं । हम न तो किसी को चोट पहुंचाना चाहते है और न गिराना। हम स्वयं अभागे हैं जो बिना चाहे पैदा हुए हैं । उपेक्षित होने के कारण बढ़ते भी जा रहे हैं और गहरे भी हो रहे हैं। हमारी दशा सुधारने की ओर हमे भरने की कितनी चिन्ता की जाती है ? यह बात अलग है कि हमे भरने के नाम पर लोग अपनी जेब भर लेते है। नाम हमारा होता है, काम उनका। कभी तो यह भराई कागज पर ही हो जाती है और कभी चेपा चेपी करके हमारा मुंह बन्द कर दिया जाता है। हम भी सब समझते है । यह बात दूसरी है कि चुप हैं और मुंह से कुछ कहते नही, क्योकि हमारी सुनने वाला है कोन । ये चेपा-चेपी टिकाऊ तो होती नही क्योकि हमे ठीक तरह भरा ही कब जाता है ? अतः थोडे दिनों में ही वह माल-मसाला उखड़ जाता है और हम पुनः नंगे हो जाते हैं। हमें भरने के नाम पर पुनः ठेके होते है और इस प्रकार यह क्रम चलता ही रहता है । हमारे नाम पर ब्लेक- करने वाले जब तक बढ़ते जाएगे हमे पैदा होने से और बढ़ने से कोई नही रोक सकेगा। हमारे नाम पर धन्धे होते रहेगे और हम उभरते और अधिक कुरूप होते रहेगे । सरकार की योजनाए चलती रहेगी और हमें भरने के नाटक भी होते रहेंगे।
-- यदि आप वास्तव में हमें भरना चाहते है और हमारे मु.य-ददं या दुरवस्था से आपको सही रूप मे गहानुभूति है तो पहले आने इस नेक इरादे का कोई सबूत प्रस्तुत कीजिए। हमे नापकी कथनी और करनी में स्पष्ट तर दिखाई दे रहा है । इसी गे गरी यात करनी पड़ रही है। यदि हमें भरने के नाम पर ब्लेक होता रहा तो हमें मुंह गोलार और अधिक चौड़ा एवं गहग होना पड़ेगा। अपनी मन्मा भी वहानी पड़ेगी और पाना एक मगठन भी बनाना होगा । हम ऊधम मनायेंगे और अपनी माको छाती पर भारी- भारी वाहनों को बंददीं दोटाने वालों को नाम में दम कर देंगे। उन्हे मर बूर कर देंगे कि वह हमारे दनकों के भय में आंगनोलकर धीरे-धीरे चलें। हमारा यह सोचना कहां तक प्रभावी है, इस पर हमे भरीमा कम ही है, क्योंकि हडताल और धरनो को इतनी भरमार हो गई है कि इनकी परवाह कम हो होने लगी है। ये हिमक तरीके उन लोगों पर ही अमर डालते है जिनका हिमा में विश्याम है । आज तो अहिमा के ढोल पीटे जाते है परन्तु हिमा के तोर तरीके अपनाने को बाध्य किया जाता है। यदि ऐमा न किया जाए तो फिर अहिंसक आन्दोलन को हिंसा भडकाने वाला सिद्ध करके उसका दमन की किया जाए। इसलिए हमें अपनी शक्ति के प्रदर्शन का कोई और ठोस और कारगर तरीका योजना पड़ेगा । अब हमे अधिक उपेक्षित होना कतई बरदाश नहीं होगा। । u २०/ वन्देमातरम् घुसपैठ 0 अर्जुन 'अरविंद' शोक पालना मनुष्य की जन्मजात प्रवृत्ति है । लगभग हर आदमी अपनी रुचि के अनुसार कोई न कोई शौक पाल ही लेता है । शौक कई प्रकार के होते है-गप्प मारना, पतंगवाजी, बटेरयाजी, अपनी हर बात के माथ एक शेर जोड देना, चीता मारना, चिडिया मारना या मक्खी मारना आदि शौक तो अव पुराने हो चले है । जिस प्रकार जमाने की हवा के माथ फैशन वदलता है टीक उमी प्रकार इसान के शौक भी बदलते जाते है । आजकल चमचे पालना, दूसरे की लिखी पुस्तके अपने नाम से छपवाना, फोटोग्राफी करना, मुकदमेवाजी करना और क्रिकेट कॉमेन्ट्री मुनना जैसे हजारो शौक लोग पालते है । आजकल के ये अधिकतर शोक इतने खर्चीले और दुस्साहसपूर्ण है कि उनको पालते हुए आदमी की कमर टूट जाती है। फिर भी आदमी बाज नहीं आता और हर समय अपने शौक की दुम थामे रहने में ही गर्व महसूस करता है। अपना सिद्धान्त आम लोगों से कुछ भिन्न है । कुछ खोकर या हाथ-पैर तुड़वाकर किसी शौक को अपने सिर बैठाया जाना- तो महज मूर्खता या अदूर- दर्शिता ही है । किसी जमाने में आम के आम और गुठली के दाम वाली बात कहकर लोगों ने अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया है । इस कहावत के अनु- सार शोक भी ऐसा होना चाहिए कि एक भी पैसा खर्च न हो और जहा हाथ डालो वहा लाभ ही लाभ प्राप्त हो । जैसे सेहत के लिए, मनोरजन के लिए तो हों ही, इसके अतिरिक्त जेब गर्म करने वाले लाभ भी हों। बचपन में नव स्कूल में मै खुराफात किया करता था तब से ही न जाने यो लिखने का शौक हम पर सवार हो गया था और कालेज की हसीन चारदीवारी से रस्सत्त होने तक हमने सैकड़ो रचनाओ को जन्म दिया था। लेकिन हर सम्पादक को जैसे हमारी रचनाओ से एलर्जी थी। हमने रचना पोस्ट की नहीं कि अगले सप्ताह ही सपादक के अभिवादन व खेद की स्लिप घुसपैठ/२१ अपने पल्लू में गोरा कर हमारे दरवाजे पर इस तरह ओघे-मुह पड़ी मिसी जमे उन्हें बहुत ही हिकारत को दृष्टि में दंगकर लौटा दिया गया हो। नेकिन भनेक वर्ष पहले लिखी ये रमनाएं जो जमेर गर अस्पोहत होकर लोट चुकी थी, अब गोटी को पत्रिकानों में पहले से जा रही है। ही मपादक अव सम्मान सहित रु या मोटा-सा धनादंग भी बदसे में भवन नगे है। मेरी इस बात पर आपको आरवयं होगा, पहरी में स्वयं भी पारनयं करना था। लेकिन सन मानिये, यह करामात है हम पर शयार हुए नये शौक के धुमपंट की। हुआ यों कि एक बार हमारा दिल्ली जाना हो गया। उस समय हमारे नए शोक ने एफ नई योजना ईजाद फर गली । जिस होटल में हम ठहरे हुए ध, उसी के कमरे में एक साहित्यिक गोष्टी आमत्रित कर गली । यो-बड़े सपादकों को आमषित किया हमने । गोष्ठी का मुध्य आकर्षण यह था कि हमने दुस्साहसपूर्वक घोषणा कर दी कि गोप्टी की अध्यक्षता स्यय शिक्षा मन्त्री करेंगे। उस निमन्त्रण-पत्र का जादू ऐसा सिर धका कि केवल कुछ को छोड़कर अनेक सपादक, समालोचक और लेखक हमारे कमरे में मौजूद थे। जब उपस्थिति अच्छी यासी हो गयी तो हमने लोगों से समंद निवेदन किया कि शिक्षा मंत्री जी आने से मजबूर हो गए, लेकिन उनका सन्देश आया है कि एक यास काम से उन्हें दिल्ली से बाहर जाना पड़ रहा है । इसलिए वे गोष्ठी मे न आ सकेंगे । यदि उनके साथ विवशता न होती तो वे अवश्य आते । फिर हमने सहर्ष घोपणा की कि प्रसिद्ध पत्रिका 'सुरंग' के संपादक श्री किताची लाल जी हमारे देश के गौरव है । इसलिए आप हो आज को साहित्यिक गोप्टी की अध्यक्षता का भार संभालेंगे । शिक्षा मंत्रीजी के लिए आयो मसनद पर अपने आपको सभालते हुए कितावी लाल जी का दिल बाग-बाग हो उठा था। फिर गोष्ठी ऐसी जमी कि हर समालोचक, लंगक, सपादक ने हमारी साहित्यिक सेवाओं की तारीफ के पुल वाध दिए । और उस पुल पर चलते हुए हम एक ही रात मे देश के चर्चित साहित्यकार बन गए। सपादक स्वयं हमसे रचना की माग करने लगे । फिर हम उनके पत्रों को टीक उसी तरह हिकारत की दृष्टि से देखते जैसे कभी वे हमारो रचनाओ को देखा करते थे। हम उन्हे अपनी पुरानी-सी कोई रचना भेज दिया करते जो प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में बड़े इत्मीनान के साथ छप जाती। घर में जब भी रेडियो खोला जाता तो हमारी श्रीमती बड़े ही अपमान- २२ / वन्देमातरम् जनक शब्दों में हमें ताना सुनाने लगती-'बड़े साहित्यकार वने फिरते है आप । ऐरों-गरों के प्रोग्राम रेडियो पर प्रसारित होते रहते हैं। लेकिन आपका नाम कभी रेडियो पर सुनने में आया है ?' श्रीमती का वह ताना सीधा हमारे दिल पर कटार की नोक-सा उतर जाता । रेडियो स्टेशन वालों को वैसे तो हम अनेक रचनाएं भेज चुके थे। लेकिन वे लोग हमारी रचनाओं का प्रसारण करना तो दूर रहा, उन्हे लौटाते तक भी न थे । श्रीमती के ताने की चुभन इस तरह खटकने लगी कि हमें मज- बुर होकर अपने उसी शौक का सहारा लेना पड़ा । एक दिन हम टहलते हुए खुद ही रेडियो स्टेशन जा पहुचे । दरबान द्वारा जब कार्यक्रम अधिकारी से कहताया कि अमुक सासद के छोटे भाई आपसे मिलने आए है तब कार्यक्रम अधिकारी ने हमे आदर सहित बैठाया ही नही बल्कि वही जलपान की व्यवस्था भी करा दी। औपचारिक बातों के बाद जब हम असली मुद्दे पर आये और उनसे शिका- यत की कि अनेक नाटक लिखकर भेजने के बावजूद हमारा एक भी नाटक प्रसारित नहीं हुआ है तब वे बड़े लज्जित और विनम्र स्वर में बोले-'हमारे स्टाफ में कुछ लोग ऐसे है जो समझते नही कि किन लोगो को प्रसारण की मुविधा प्राप्त होनी चाहिए । खैर, जो कुछ हुआ उसे भूल जाइए । अब आप हर तीन महीने पश्चात् एक नाटक भेज दिया करे । उसे प्रसारित करने मे हमे प्रसन्नता होगी।' जब हम कमरे से निकलने लगे तो कार्यक्रम अधिकारी स्वयं कमरे के दरवाजे तक हमे छोड़ने आए । तब से हम श्रीमती के तानों की मार से मुक्त हो गए और रेडियो पर नियमित रूप से हमारे नाटक प्रसारित होने लगे है । जिस तरह मेहभान बिना सूचना दिए चले आते है, ठीक उसी तरह बीमारी का भी कोई भरोसा नहीं रहता। विना अल्टीमेटम दिए शरीर पर हमला कर बैठती है । एक दिन अचानक ही मलेरिया ने हमे धर दबोचा । इस तरह आकस्मिक अटैक किया कि हम कुनैन आदि मामूली दवाएं भी न जुटा सके । विवश होकर हॉस्पिटल की शरण लेनी पडी। डॉक्टर के कमरे के बाहर दरवाजे पर मरीजों की जो कतार देखी तो होश हवा हो गए । तोबा ! ऐसी लम्बी कतार तो कभी फिल्म-हॉल या राशन की दुकान पर भी न देखी थी। लेकिन मजबूर होकर कतार में खड़े हो जाना पड़ा । जब कि हाथ-पैर हमारा साथ देने से कतरा रहे थे। लेकिन उस कतार का हाल ब्रेक-डाउन गाड़ी के घुसपैठ/२३ है .
जंसा था। सोग रास्टर के कमरे में गे बाहर निकला तो हिगने भनि रतार का आरमी जहाँ भा वही गराया। आशा पटाएंगी बीत गया। चुधार में तपता परीर गरे रहनं गे साफ मुकर रहा था। पर हम मजबूर होकर कतार में निरस पडे और पास नरूर जा पारागी से पूछ ब- "माई. लोग जो कमरे में बाहर निकल रिर में का नपरामो ननिक सोनियार पा । मुरुगकर बोना-भीतर के दरवार "हम नौस पर लिन भीनर में जाने का दरवाजा नी यल युद ग्राम लोगों के लिए होता है। यह मौगार हम निगम नगर मांटना री चाहते थे कि नगी वक्र मे को अपना विवादिन विचार बार आ गया। डॉक्टर के कमरे के बाहर दरवान हमने कहा- सर माहब म जाकर कही कि अमुक दैनिक पर गारदाता आगे मिलने आए है।' आधी कुक चुनी चोडी को अपनी गप्पल मे निमता के साथ कुचलता हुना दरयान भीतर गया और कुछ पल याद लौटा ना हम ममम्मान पटर के कमरे में ले गया। डॉक्टर हमारे पहुंचते ही अपनी कुर्सी में गडे हो गए और वडी गर्मजोशी के माथ हममे हाथ मिलाकर सामने रखी मुर्ती पर बैठने के लिए संकेत किया । हमारे बैठने के बाद ही वे अपनी कुर्मी पर बैठे । भीतरी दरवाजे से प्रवेश करने वाले लोग हमारी और ईर्ष्या की दृष्टि से देग्र रहे थे। डॉक्टर निहायत ही पोलाइट स्वर में हास्पिटल की व्यवस्था, प्रगति और परिवार कल्याण के अन्तर्गत चलाए जा रहे अभियान का विस्तार में वर्णन करने लगे। लेकिन हमारी देह तो बुखार में बुरी तरह झुलमी जा रही थी। इसलिए हमने एक उवासी लेकर डॉक्टर साहब में कहा-'अभी तो मैं तेज बुखार मे जस रहा हूँ, फिर कभी आऊगा तो आपके हॉस्पिटल की प्रगति के पूरे आकडे लेकर जाऊगा और अपने दैनिक-पत्र में प्रकाशित करा दूंगा।' डॉक्टर फोरन अपना स्टेथिस्कोप मभालकर उठ पडे हुए। हमारे बुद्धार की जाच की और स्लिप लिखकर पकड़ाते हुए बोले-'ये मब दवाइया और इजेक्शन आपको यही से मिलेंगे।' और स्लिप के साथ ही हमें कुछ टॉनिक के सम्पल फॉर फिजिशियन भी दे दिये। इस अचूक युक्ति को मफल देखकर हम खुश होते हुए लौट आए । सच मानिए, हमारा आधा बुखार तो रिक्शा से उतर कर घर को सीढ़िया लांघते-लाघते ही उड़न छ हो गया था। कुछ ही दिन बीते होगे कि एक मामला हमारे सिर पर आ गया । हमारे २४ / वन्देमातरम् छोटे भाई इसी शहर मे सरकारी नौकरी कर रहे थे और सुकून से अपनी जिंदगी बिता रहे थे कि अचानक उन्हें स्थानातरण-आदेश मिल गया। कम्बस्त स्थानातरण हुआ भी तो सैकड़ो किलोमीटर दूर ऐसे कस्बे में कि इन्सान तो इन्सान, कोई जानवर भी वहा जाकर शिफ्ट होना पसन्द न करे । यानी पानी की किल्लत, रोटी की किल्लत, मकान का मिलना दूभर और ऊपर से नीरस जिंदगी । भला यह भी कोई बात हुई ? हमारे भाई परेशानी में पड गए । उनकी परेशानी देखते न बनती थी हमसे । इमलिए अपने उसी सौ फीमदी लाभकारी फार्मूल का सहारा लेकर हम एक दिन राजधानी पहुच गए। छोटे भाई के विभाग के मन्त्री जी के पास पहुच गए । मन्त्रीजी के बंगले के अहाते में खडी विशाल भीड के होते हुए मत्रीजी तक पहुचना कोई आसान काम न था। लेकिन वहा हमारा अमुक समाज का प्रातीय महामत्री बनना काम आया । क्योकि हम देख चुके थे कि आजकल पूरी राज- नीति केवल जातीय और वर्गवाद के आधार पर ही चल रही है। एक बहु- सख्यक समाज के महामत्री के रूप में हमें अपने सामने खड़े देखकर मत्रीजी बोले- 'अरे ! आप अब तक खडे क्यो है ? बैठिए न?' हम बैठ गए तो मन्त्रीजी बोले-'कहिए, आपके समाज की क्या गतिविधि चल रही है आजकल ?' हमने तत्काल उत्तर दिया-'जी । इन दिनो अनेक कार्यक्रम निश्चित किए हैं हम लोगो ने । शीघ्र ही एक प्रातीय अधिवेशन बुलाने की तैयारी करने जा रहे है । अध्यक्षता के लिए आप ही से निवेदन करेंगे।' मत्रीजी की जैसे वाछे खिल गयी । वे मुस्कराते हुए बोले-'भई मै तो आप लोग जब भी बुलायेंगे तव ही आ जाऊगा।' उपयुक्त अवसर देखकर खास मुद्दे की बात भी अनायास ही हमारे मुह मे निकल पड़ी-'जी, छोटे भाई का स्थानातरण हो गया था आपके विभाग में । मैं उसी के लिए। 'लाइए, उनकी एप्लीकेशन तो लाए होगे ? मत्रीजी बोले । हमने झट से एप्लीकेशन निकाल कर उनके आगे बढा दी। मत्रीजी ने तत्काल स्थानातरण निरस्त करने के लिए एक छोटा-सा वाक्य लिखकर पी. ए. को दे दिया। हम उन्हें धन्यवाद अर्पित कर उठने लगे तो ममीजी ने फरमाया-'आते रहा करिए, मुझे आपके सामाजिक कार्यों को देखकर बडी प्रसन्नता होती है । हां, अपने भाई का स्थानातरण-निरस्त आदेश आप थोडी घुसपैठ / २५ देर पश्चात् अपने साथ ही लेते जाना।' कहकर वे हंस पड़े और ठीक उसी दिन हमारे छोटे भाई पर अकस्मात ही आने वाली वह मुसीवत टल गयी। हमारे एक मित्र को पी एच. डी. की डिग्री प्राप्त करने की धुन सवार हो गयी । वे अनेक वर्षों से धीसिस लिख रहे थे और वह नामजूर होकर हर साल रद्दी की टोकरी में डाल दी जाती थी। लेकिन हमारे मित्र भी नम्बर एक के सनकी थे। जिद पर अड़े थे कि पी एच. डी, की डिग्री लेकर ही दम लेगे चाहे कितनी ही वर्ष खप जाएं। एक दिन मिले तो अपनी असफलताओं का बयान करने लगे। हमें उनका दयनीय दशा पर तरस आ गया। हमने कहा-'भाई जान, इस तरह तो आपकी थीसिस जिंदगी भर रद्दी की टोकरी के हवाले होती रहेगी।' 'फिर ?' वे निराश होकर बोले । हमने उन्हे घुसपैठ करने का अचूक नुस्खा बता दिया। वे चले गए। फिर बहुत दिनो तक इस तरह गायब रहे जैसे वरसात निकलने के बाद मेढक । फिर वे हमे दिखाई दिए तो ठीक एक वर्ष बाद । हमने देखा, उनके चेहरे पर एक नई चमक थी और हाथ मे एक मिठाई का पैकेट भी। आते ही वे हमारे गले से लिपट गए और वोले-'यार तुम भी आदमी गजव के हो । इतने साल मै नाहक ही झक मारता रहा । तुम्हारे फार्मूले से मुझे डॉक्टरेट मिल गई है, लो मुह मीठा करो।' कहकर उन्होंने मिठाई का पैकेट हमारी ओर बढा दिया। इस प्रकार हमने जिंदगी मै अनेक अनुभव करने के वाद पाया है कि सफ- लता प्राप्त करने के लिए घुसपैठ से बढ़कर कोई सस्ता और सरल तरीका नही है । शौक का शौक, कहीं रोक न टोक । घुसपैठ करने का चलन अब तो आम होने लगा है। हर क्षेत्र में लोग धड़ल्ले से घुसपैठ कर अपना काम सहज निकाल लेते है। चाहे आपको किसी ठेके का टेण्डर लेना हो, राजनीति में प्रवेश करना हो या नौकरी प्राप्त करनी हो, आप भी घुसपैठ का सहारा लीजिए और अपनी हर मुश्किल को आसान कीजिए । घुसपैठ का दूसरा रूप है पिछले दरवाजे से प्रवेश करना। आपने स्वय अपनी आंखो से देखा होगा कि आप ईमानदारी के साथ अपनी बारी की प्रतीक्षा करते रहते है और पिछले दरवाजे से प्रवेश करने वाले विना कठिनाई के अपना काम कराकर ले जाते है। आपको बदले मे खीझ या परेशानी ही मिलती है । इसलिए याद रखिए, जहाँ भी आपको जाना हो, पिछले दरवाजे से हो जाए । ऐसा न कर यदि आपको अपना समय नष्ट करने या कतार में गड़े रहकर धक्के खाने का शौक है तो वह वात अलग है। २६ / वन्देमातरम् राष्ट्रीय एकता : हमारा दायित्व L7 ओंकार मेहता भारत अनेक संस्कृतियों का देश है । वह विभिन्न संस्कृतियों के मेलजोल और आपसी लेन-देन मे विश्वास करता है । समय-समय पर भारत में बाहर से अनेक जातियों आती गयीं और राष्ट्र की मुख्यधारा में घुलती चली गयी। भारत में जिस प्रकार विभिन्न धर्म फले-फूले है वह भारतीय सस्कृति की सहि- ष्णुता, सहअस्तित्व और सद्भाव के विलक्षण उदाहरण है। भारत विभिन्न धर्म, जाति और भाषा वाले लोगों का निवासस्थान है । उनके रहन-सहन, खान-पान और बोली आदि अलग-अलग है । इतनी विभिन्नताएँ होते हुए भी देश में भावात्मक एकता बरावर बनी रही। हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई आदि मिलजुल कर रहते आये है। लेकिन विदेशी शासकों ने सुनियोजित ढंग से भारत में साम्प्रदायिकता, क्षेत्रीयता और भाषावाद के विषले जहर को फैलाकर तथा देशवासियो को पर- सार लड़ाई-झगड़ों, विवादों और आपसी फूट मे उलझाकर अपनी राजसत्ता को बनाये रखने के लिये उक्त तत्वों का खुलकर उपयोग किया जिसके दुष्परि- णाम स्वरूप हमे स्वतंत्रता के सुख के साथ-साथ देश के वटवारे का दुख भी झलना पड़ा । आजादी के बाद के वर्षो मे भी फूट और वैमनस्य के महारोगों से भारत सर्वथा मुक्त नही हुआ है । साम्प्रदायिकता और प्रान्तीयता देश को अखण्डता और एकता के सामने आज भी प्रश्न चिन्ह वनी है । आपस मे लडने-झगड़ने की शिक्षा कोई भी धर्म नही देता। जो लोग धर्म के नाम पर लड़ते-झगड़ते है वे अज्ञान, अशिक्षा एव धर्मान्धता जैसी मानसिक विकृतियों के शिकार हैं। साम्प्रदायिक एकता आज सारे देश के लिये अत्यन्त आवश्यक है। धर्म तो आदमी का बनाया हुआ है । आदमी की अच्छाईयों के लिए है। सच्चे और अच्छे हिन्दू और मुसलमान न आपस में लड़ते है राष्ट्रीय एकता : हमारा दायित्व | २७ और गतिमो को गुनगान गाता है। मं मा मामी बनने, साल आदमा मोर भाग की frur देना है। अगर मगार में अपने देश को गौरवाका करना में मस्तिगानो और मम्मान गाल बनाना तो गारी गती मोर निरन नये मिरगे गोगना है। नानी सोम भनेक धो. जालियों, मनियां और भाषा का गम है। किसी एक कोम रामाननी है। दिनान तो उन मनकामी उमे गार गारंग। धर्म, जाति और नापानादि में राष्ट्र गोपरि है। राष्ट्रीय पाको बगाने मना प्रत्येक भारतीय परम संध्य है। कर्नल की भाग्ना को भारतीय परिभा में धर्म मात्रामा है। राष्ट्र प्रति गद पुषी हा कसंगती नरा राष्ट्रधर्म है। यही मर देशवामियों का एक मपंधर्म है। पति, मुस्लिम, गिय, गाई आदि धर्म पर धर्म है, व्यक्तिगत धर्म है । एक पर मया दो गधिक प्रमं भी हो गाने है। किन्तु एक राष्ट्र में गयका एक ही राष्ट्रधर्म होता है और वह है "राष्ट्रीय एकता" । व्यक्ति र धर्म भात्माननि और आरम कल्याप का गान है। राष्ट्रधर्म राष्ट्रोन्नति द्वारा राष्ट्र को गौरव प्रदान करने वाला धर्म है। राष्ट्र के उत्थान गे ममाज और व्यक्ति का उत्थान जुड़ा है । सम्पन्न राष्ट्र का नागरिक अपना व्यक्तिगत धर्म निभाते हुए भात्मकल्याण कर सकता है। अतः राष्ट्रधर्म अर्थात् राष्ट्रीय एकता ही हमारा प्राथमिक धर्म है। राष्ट्र को नगण्डता और एकता सर्वोपरि है। इसको बनाये रखने के लिए हमे त्याग और बलिदान के लिए तत्पर रहना है। स्वतत्रता के बाद देश मे यदा- कदा माम्प्रदायिक झगड़े मुल्ला-मौलवियो, पण्डितो व राजनीतिज्ञो अथवा चद स्वार्थी लोगों द्वारा भडकाये जाते रहे है । अविश्वास और पूर्वाग्रह के वातावरण के कारण अथवा जाति, धर्म या भाषा के प्रति सकीर्ण लगाव के कारण ये व्यक्ति- गत बगड़े सामूहिक मघर्ष में परिवर्तित हो जाते हैं। तथा स्वार्थी तत्त्व इन झगड़ों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में लाभ उठाते है । वेकसूर लोग कानून के फन्दे में जकडे जाते है और कसूरवार बैपटके घूमते रहते है। संसार के समस्त धर्म और धर्मग्रन्थों की नीव सच्चाई पर रखी हुई है। सब में एक ही ईश्वर का मन्देश है । धर्म और धर्मग्रन्थ मानव-मानव मे वर- विरोध के लिये नही अपितु मनुप्यो मे एकता पैदा करने के लिये ही है । इनके मूल में जो एकता छिपी हुई है उसका ईमानदारी के साथ पालन किया जाय तो सहज मै ही राष्ट्रीय एकता स्थापित हो सकती है। हिन्दुत्व और इस्लाम में २८/ वन्देमातरम् कोई दोष नहीं है । उनके सहारे जीते लोग आत्म सस्कार और आत्मशुद्धि की स्थितियां प्राप्त करते है। प्रत्येक भारतीय को धर्म निरपेक्षता की परम्परा का निर्वाह करना चाहिये। साम्प्रदायिकता से देश कमजोर होता है । देशवासियो को अपने मस्तिष्क से इम बात को तो निकाल ही देना चाहिये कि उनका अपना कोई अलग अस्तित्व है। एक धर्म, एक भाषा और एक प्रान्त के लोगो को अलगाव की मनोवृति से हटकर आपसी सद्भाव कायम करना चाहिए। सकुचित और सकीर्ण विचारो ने भारतीय को भारतीय का शत्रु बनाकर रख दिया है । देश में हर प्रान्त की अपनी भाषा है। बहुभापी होने पर भी भारत एक राष्ट्र है। हमारी संस्कृति की जडे इन विभिन्न भाषाओ मे दिखाई पउती है । अत. प्रत्येक भारतीय चाहे वह हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख आदि मे से कोई भी क्यो न हो उन्हें दूसरों की भापा सीखनी चाहिये । अपनी भाषा को छोड़कर किसी विदेशी भाषा का राग अलापना अलगाव की वृत्ति है। भारत में भारत के सिवाय कुछ भी एक नही है । धर्म एक नहीं, जाति एक नही, भापा व प्रदेश कोई भी एक नही, इमलिये भारत में एकता का आधार देशवासियों के भारतीय स्वरूप के सिवाय दूसरा और क्या हो सकता - भारतीय संस्कृति की विशेषता यही विविधता में एकता है । समन्वयता ही भारतीयता की आत्मा है । मुस्लिम समाज जब तक पृथकतावाद को नही छोडेगा, अन्य इस्लामी देशों में रहने वाले अपने सह धर्मावलम्बियो की तरह आधुनिकता से नाता नहीं जोड़ेगा तब तक वह वृहत्तर समाज का विश्वास अजित नहीं कर सकेगा, साथ ही साथ उसका सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक विकास भी अवरुद्ध रहेगा। साम्प्रदायिक भेदभाव राष्ट्रीय एकता का सबसे बड़ा शत्रु है । इसे मिटाना प्रत्येक समझदार भारतीय का कर्तव्य है । देश में कबीर, रहीम व रसखान की रसधारा, सम्राट अकवर का हिन्दू-मुस्लिम सस्कृतियों में एकता के स्नेहपूर्ण आदर्श तथा महाराजा शिवाजी का सव धर्मों के साथ सद्व्यवहार देश मे साम्प्र- दायिक सद्भाव एवं एकता बनाये रखने मे हमारे लिये प्रकाशपुज का कार्य करते है। धर्म के सकुचित दृष्टिकोण ने मानव-मानव मे भेद भर दिया क्योकि एक ही गाव व शहर मे रहने वाले मनुष्य आपस में एक दूसरे से घृणा करने राष्ट्रीय एकता : हमारा दायित्व / २६ :
लगे। देश को अखण्डता एव कौमी एकता के लिये देशवासियों को सब धर्मों के प्रति उदारता का भाव रखना पड़ेगा तभी साम्प्रदायिकता का जहर देश से समाप्त हो सकेगा । राष्ट्रवाद जातिवाद से श्रेष्ठ है और इस रूप में हम सब से पहले भारतीय है और बाद में हिन्दू-मुस्लिम या ईसाई । राष्ट्रीय एकता भार- तीयो मे अपने आधिक विकास और सास्कृतिक उन्नति के लिये एवं दूसरे पर निर्भर होने की आवश्ययाता को पहचानने और उसके अनुरूप कदम उठाने से ही मजबूत हो सकेगी। समाज का कमजोर वर्ग यह अनुभव करता है कि राष्ट्रीय जीवन की मुख्यधारा में आर्थिक और शैक्षणिक क्षेत्रों में पिछड़ने के कारण वह अपने आप को इसमे पूर्णतया आत्मसात नहीं कर सका है । उनके लिये अधिक विकास, अधिक शिक्षा और अधिक रोजगार के अवसर जुटाने और उनकी सांस्कृतिक परम्पराओ की सुरक्षा की स्थितियाँ बननी चाहिए। समय रहते यदि साम्प्रदायिकता के विप पर काबू नही पा लिया गया तो भारत की अखण्डता दांव पर लग सकती है और भारतीयो को पुनः दामता के दिन देखने पड़ सकते हैं। अतः आज प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है कि वह सकीर्णता का परित्याग कर जातिवाद से ऊपर उठकर देशहित में अपने को उत्सर्ग करे और देश तथा राष्ट्र की रक्षा करे । ३०/ चन्देमातरम् श्रम देवी की पूजा जितेन्द्र हम लोग देश की गरीवी तथा पिछड़ेपन के लिए स्वय ही जिम्मेदार है। पहले तो हम वहाना बना सकते थे कि हमारा देश विदेशी शासकों के अधीन था। लेकिन अब तो वह वहाना भी नही है । जो थोड़ी बहुत उन्नति हुई भी है वह इतनी अधिक नहीं है कि जिस पर सतोप किया जा सके। अन्य कई पश्चिमी और पूर्वी देशों के उदाहरण हमारे सामने हैं । महायुद्ध की विभीपिका ने उन देशों को वर्वाद कर दिया लेकिन मेहनत और श्रम के बल पर वे फिर उन्नति के शिखर पर जा बैठे। उन्होंने किसी बहानेबाजी का सहारा नही लिया। आज जब संसार के समस्त देश प्रगति की दौड़ में एक दूसरे से होड़ कर रहे है, हमें भी उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलना होगा। देश की उन्नति का दायित्व केवल सरकार अथवा मुट्ठी भर समाज सेवियों पर ही नही है । यदि हमने अपने कर्त्तव्य में कोताही की तो आने वाली पीढ़ियां हमे क्षमा नही करेंगी और आलसी तथा कामचोरों की सूची में हमारा नाम सबसे ऊपर लिखा जाएगा। आज जो व्यक्ति उच्च पदो पर आसीन तथा उद्योग आदि के क्षेत्र मे धन एवं प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुके है, उनके जीवन पर दृष्टि पात करें। कितनी कठिनाइयों एवं प्रतिकूल परिस्थितियों से संघर्ष करके आज वे उस स्थान तक पहुच सके हैं । जव उनके अन्य साथी मस्ती एवं बेफिक्री की नीद सो रहे थे तो वे रातों मे जाग-जाग कर कठिन परिश्रम में व्यस्त थे। उनकी सफलता के पीछे एक लम्बे संघर्ष का इतिहास जुड़ा हुआ है। उसमें चमत्कार जैसी कोई बात नहीं है। उनकी सुख-समृद्धि को देखकर ईर्ष्या करने से कुछ नही बनेगा। सुविधाओं की कमी की दुहाई देकर हम बचने के रास्ते न ढूंढे, बल्कि उन "साहसी एवं कर्मठ लोगों के जीवन क्रम को देखें जिनके पास हमसे आधी सुवि- श्रम देवी की पूजा | ३१ धाएं भी नहीं थी फिर भी अबाध गनि में परिश्रम के मार्ग पर बाते हो चले गये। छोटी-मोटी अरचनें उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकी। यदि कोई व्यक्ति कठोर परिश्रम करना है तो उसे पसीना आना स्वाभा• विक है । यह पसीना नो शीघ्र ही गूग जाएगा लेकिन श्रम उम व्यक्ति के जीवन का एक अनिवार्य जग बन जाएगा । कार्य की अधिकता में नहीं बल्कि कार्य की चिन्ता से पकान आती है। कार्य का अभाव बोरियन दा करता है। उममें भी थकावट का जन्म होता है। ऐगा सोचना को एकदम गलत होगा कि श्रम करने से हमारी भक्ति घटती है । वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है। धम करने में हम अपनी मचित शक्ति को गंवाते नही, उममें वृद्धि करते है। हमारे शरीर के सेल काम में आने से गुहा होते हैं । मानव द्वारा निर्मित नभी मशीने काम में आने से घिमती है। हमारे शरीर को मशीन पदि कम काम आती हे नो इसमें जग लगने की आगका बहुत रहती है । इस्टरों ने यह सिद्ध कर दिया है कि परिथमो व्यक्ति दीर्घजीवी होते हे तप आरामतलर व्यक्तियों को विभिन्न व्याधियां घेर लेती है। माइकल एनिलो, वालंयर, गोथे, नेहरू आदि अनेक दीर्घजीवी व्यक्ति जीवन की अतिम मास तक कार्यरत रहे । टामस एल्वा एडीसन अपनी प्रयोगशाला में निरंतर 18 घंटे तक प्रयोगों में जुटे रहते थे और थकते नही थे । आलस्य या अकर्मण्यता टी. वी. या कंसर रोग के सदृश है । 'मैं इस कार्य को नही कर सकता' अथवा 'फिर कभी कर लूंगा'-- यह सोचना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। बच्चों में बचपन ही ऐसे सस्कार डालने चाहिए कि वे श्रम की महिमा को समझें तथा उनकी यह भावना जीवन पर्यन्त बनी रहे। युवावस्था मे तो वैमे भी बहुत कुछ कर गुजरने की चाह होती है। नवीन शक्ति का संचार और उत्साह श्रम के लिए बहुत अनुकूल सिद्ध होता है। जो व्यक्ति सदा से परिश्रम करता चला आया है वह वृद्धावस्था में भी नही त्याग सकता। चिकित्सकों के मतानुसार हर व्यक्ति को सेवा निवृत्त होने के बाद अपनी शक्ति के अनुसार कार्य व्यस्त रहना चाहिए नही तो उसके स्वास्थ्य पर इसका बुरा असर पड़ने लगेगा । रुग्णताएँ उसे शीघ्र ही अपना शिकार बना लेगी। हमारा जीवन लय- पूर्ण होता है । जब लय मे रुकावट या परिवर्तन होता है तो नयी-नयी परेशा- नियाँ पैदा हो जाती है। अतः परिश्रम को एक दम तिलाजलि देना सभी दृष्टियों से हानिकारक होगा। कुछ लोगों का ऐसा भी ख्याल होता है कि कमजोर आर्थिक स्थिति वाले व्यक्ति को ही परिश्रम की आवश्यकता है। सुदृढ़ आर्थिक -३२ / वन्देमातरम् स : स्थिति वाले व्यक्ति को परिश्रम से दूर ही रहना चाहिए । यह भावना अपने आप में पूर्णतया गलत है। सुख का मतलब पूर्ण विश्राम या घोर विलासिता नही है । अधिक विधाम एवं विलास भी दुःख के उपादान बन जाते है। अव आवश्यकता है पुराने देवी-देवताओं को भुलाने की और युग आ गया है श्रम की देवी की वंदना करने का। इसमे अन्य यज्ञो में काम मे आने वाले पी और समिधा नहीं चाहिए। इसमे तो चाहिए परिश्रम का घी तथा लगन व निष्ठा की समिधा । इस पूजन को समय की सीमाओ मे नही वाधा जा सकता। ये तो समस्त जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है। जो व्यक्ति विना श्रम किए खाता है उसकी तुलना चोर से की जा सकती है। किसी देश की स्वस्थ्य सभ्यता एवं संस्कृति का सृजन मेहनत और पसीने से ही होता है । भारतीय का नाम आते ही एक आलसी आदमी का चिन्न नही उभरना चाहिए। परिश्रम और भारतीय एक दूसरे के पर्याय बन जाने चाहिए। बहुत से व्यक्ति यह सोचते है कि अकेले उनके परिश्रम करने क्या होगा। यदि मभी ऐसा सोचने लगे तो बेड़ा गर्क हो जाएगा। हर व्यक्ति अपने-अपने स्थान पर महत्त्वपूर्ण होता है। प्रत्येक व्यक्ति द्वारा किए गए श्रम से राष्ट्र का विकास होता है । परिश्रमी नागरिकों के बल पर ही राष्ट्र ऊंचा उठता है । श्रम देवी की पूजा / ३३ नर-नारी में भेद क्यों ? O सत्या भार्गव प्राचीन काल की गाथाओं के अनुसार चण्ड-मुण्ड महिपासुर का सहार करने वाली, उन्हें सतीत्व के तेज से भस्म करने वाली, भक्तों को धन ऐश्वर्य से समृद्धिशाली बनाने वाली, ज्ञान का अतुलनीय भण्डार भरने वाली तथा देव. ताओ से अधिक आदर पाने वाली देवियां आज कहां गई? क्या ये सिर्फ धोयी कल्पनाये हैं या सत्य भी ? अगर उनमें सत्य का लेशमात्र भी अश है तो आज नारी हीन-भावना से क्यों ग्रसित होती जा रही है ? नन्ही-सी कोमल कली को जन्म से ही पुट्टी मे पिलाया जाता है कि तेरा अस्तित्व नगण्य है। लड़के स्वच्छन्दता से कही भी घूम-फिरें पर लडकी ने जवानी की ओर कदम बढ़ाये नही कि माता पिता कहने लगते हैं, क्यों उच्छं. खल हो रही है । घर के काम-काज मे भी हाथ बटाया कर । क्यों रात-दिन पढ़-पढ़ कर आँखे फोड़ रही है ? अन्त मे सरोकार तो चूल्हा-चक्की से ही पड़ेगा ? समय बदल रहा है, अब जाकर सभी स्वीकार करने लगे है कि लड़का हो या लड़की, दोनों जीविकोपार्जन करेंगे तभी घर की नैया पार लगेगी। फिर भेदभरा अलगाव कहाँ तक उचित है ? लडकी विद्यालय में पढती हो तव तक तो कुछ नही पर यदि महाविद्यालय मे पढ़ने गई और सह-शिक्षा प्राप्त करने लगी तो वस बेचारी को क्या-क्या नहीं सुनना पडता है ? "अरे देखा नही कैसे लड़को से हंस-हंस कर बातें कर रही है ? जरा भी शर्म नहीं। कपडे पहनने का ढग देखो। बम अपनी आँखें नीची करलो। इन्हें तो पता नही कैसी हवा लगी है ?" अगर आलोचक उस लडकी के माता-पिता को जानते है तो किसी न किसी बहाने बातें वहाँ भी पहुंच जायेगी और असली वात को मक्खन में लपेट कर ऐसा कहेगे कि समझने वाला शर्म से गड़ भी जाय और कुछ कह भी नहीं सके। अपनी बच्ची की उन्नति चाहते हुए भी उसे इन सब दकियानूसी बातों का एक लम्बा चौड़ा ३४ / वन्देमातरम् .... उकता देने वाला भाषण भी दे देंगे जो उसकी उन्नति में बाधक ही सिद्ध होगा। चलो किसी तरह पढ़-लिख भी गयी और शादी अभी हुई नहीं। खाली बैठे क्या करें? यह सोच कर नौकरी कर ली तो मानो कहर ढा दिया । "अरे, क्या वेटी की कमाई खाओगे या दहेज का रुपया बेटी से ही वसूल कर लोगे?" "अरे देखा? नौकरी करते ही इसके पर के रंग-ढंग ही बदल गये?" माना वेटी-धन पराया है पर वह स्वावलम्बी वन कर जिये तो क्या बुराई है ? आज भी समाज में सत्तर प्रतिशत व्यक्ति ऐसे हैं जो लड़की को नौकरी करवाना पसन्द नहीं करते। कुछ लड़के वाले भी यही चाहेगे कि हमारी बहू पढ़ी-लिखी नौकरी करने वाली हो। पर उस बहू की दशा पर विचार कीजिए जो भोर में चार बजे उठती है। सारे परिवार का खाना वनाती है, सफाई करती है। पति देव के ऑफिस जाने की सभी तैयारियां करके बच्चो को तैयार करती है। प्रातः ७ बजे नौकरी करने निकल जाती है। दिन को दो-तीन बजे थकी मादी घर में घुसी नही कि सासजी ने ताने देने शुरू कर दिये-"तुम्हारे बेटे ने तो थका डाला और तुम अव घर में घुस रही हो ? लो सम्भालो अपनी औलाद को।" अव सोचिए उस बहू का हाल । खाना भी जहर लगेगा या नहीं ? दिन भर मशीन के समान चलने वाली उम नारी के बारे मे भी किसी ने सोचा है ? अगर बहू जवाब दे दे तो सभ्यता के विरुख होगा। दो पाटों में पिसती नारी किसको दोप दे? मैं उच्च वर्ग के समाज मे पलने वाली नारी की वात नहीं करती। मै उस मध्यम वर्ग की बात कर रही है जिसके घर मे खाने वाले आठ और कमाने वाला एक होता है । नारी अपने कर्तव्य को निभाने के लिए नौकरी करे, सब का पेट पाले फिर भी ऐसा घुटन भरा जीवन जिये तो क्या उसे जीना 1 कहेगे? समय परिवर्तनशील है। आज परिवार की तथा समाज की अवधार- णायें बदल रही है । अगर परिवार मे सहकार भाव से कार्य करने की भावना जागृत हो जाय, सभी की आदतें स्वस्थ हों तो नारी का उत्थान हो सकता है। समाज कल्पना जगत से दूर रह कर यथार्थ धरातल पर उतर कर देखे तो देखिए शिक्षित नारी समाज का उत्थान करके समग्र देश को उन्नत कर सकती है। नर-नारी में भेद क्यों? | ३५ स्कूल को समाज से बचाइये 0 सीताराम स्वामी आज प्रत्येक भारतीय की जबान पर एक ही बात है कि "आज को शिक्षा पद्धति को बदलो।" आम जनता ही नहीं वर्षों से स्वतन्त्र भारत के शिक्षा मंत्री, प्रधान मत्री एवं राष्ट्रपति तक यह घोषणा करते रहे हैं कि वर्तमान शिक्षा निरर्थक है, इमे बदलना होगा। शिक्षा के स्वरूप के निर्धारण हेतु अनेक शिक्षा आयोगों का गठन किया गया। उनकी अनुशसाओं के क्रियान्वयन पर गरीब देश का पैसा पानी की तरह बहाया गया। शिक्षको को विशेष प्रशिक्षण दिया गया। विदेशो से शिक्षा में नवाचार आये । पर क्या शिक्षा में बदलाव आया ? क्या शिक्षार्थी का शारीरिक, नैतिक व बौद्धिक विकास अधिक हो पाया ? स्पष्ट उत्तर है "नहीं" । मर्ज बढता ही गया ज्यो-ज्यों दवा को ! कोई भी योजना स्वय में बुरी नहीं होती। योजना से सम्बन्धित पटक यदि उपयुक्त वातावरण मे योजना को प्रियान्विति करे तो सफलता मिल सकती है। कोई भी किसान ग्रीष्म ऋतु में सूखे रेगिस्तान मे हल जोत कर पौधे नही उमा मकता । यही हाल शिक्षा का है । आज देश को न तो नई शिक्षा नीति की आवश्यकता है, न नई शिक्षण विधि को तथा न नवाचारों की। यदि आज के वालक को शिक्षा के माध्यम से एक सच्चरिय उत्तरदायी नागरिक बनाना है तो स्कूल को समाज से बचाना होगा । होनहार बालकों को पतनोन्मुख समाज की छाया से दूर रखना होगा। यदि समय रहते समाज रूपी दैत्य से बालक को नही बचाया गया तो आगे आने वाली पीढी मे सच्चे अर्थों में इसान दूढ़े नही मिलेगा। यह निर्विवाद सत्य है कि जन्म के समय हर बालक पवित्र होता है, निर्दोष होता है । अपने चारों ओर के वातावरण से प्रभावित होकर वह तदनुकूत ढल जाता है । मनोवैज्ञानिको ने वश-परम्परा से अधिक प्रभावशाली वातावरण को भाना है। फिर वंश परम्पग भी तो शनैः शन: वातावरण से प्रभावित होती ३६ / वन्देमातरम् रहती है। काश! हम प्रसिद्ध शिक्षा-शास्त्री रूसो के इस कथन पर ध्यान दे पाते : Everything that comes from the hands of the creater is good, but degenerates in the hands of society." जगन्नियन्ता के कर- कमलो से आने वाली हर वस्तु पवित्र होती है पर समाज मे आकर वह विकृत हो जाती है । रूसो ही क्यो, स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् यदि हम हमारे ऋषि- मुनियों के कथन व प्राचीन गुरुकुल शिक्षा पद्धति पर ध्यान देते तो आज हम यह दुर्दिन न देखना पडता। आज हमारे राज-नेताओ की दशा उन मृगो के सदृश है जिनकी नाभि में कस्तूरी है पर अज्ञानवश अन्यत्र कस्तूरी तलाशते दौड़ रहे है । क्यों न दौड़ें, आज यदि कोई शुभ फलदायक प्राचीन पद्धति का बखान करता है तो उसे परम्परावादी, रूढिवादी कह कर उसकी खिल्ली उडाई जाती है। पर कोई विदेशी नवीन विधि, जो चाहे विदेश मे असफल ही हो गई हो, की बात करता है तो वह प्रगतिवादी कहलाकर प्रशसित होता है । स्कूल एव समाज से लुढक कर गाड़ी प्राचीनता एवं नवीनता की पटरी पर लुढ़क गई । हाँ, तो मै कह रहा था कि आज शिशु विद्यालय से लेकर विश्व- विद्यालय तक नगरों में स्थित है । वालक विद्यालय में पाँच घण्टे, तथा समाज में उन्नीस घण्टे रहता है । पाँच घण्टे मे बालक पर सप्रयत्न चढाया हुआ रग उन्नीस घण्टे में केवल उतर ही नही जाता बल्कि उस पर विपरीत रंग भी चढ़ जाता है । यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। बालक पर विपरीत रग अधिकाधिक गहरा होता जाता है । शिक्षा समाप्ति पर जब बालक जीवन-क्षेत्र में प्रवेश करता है, तब उसका रूप वैसा नही होता, जैसा शिक्षक बनाना चाहते थे; पर वैसा होता है, जैसा समाज ने उस पर रंग चढ़ाया है। यही कारण है कि स्वतत्र भारत के चौतीस वर्षों मे हमारे विद्यालयों ने चौंतीस करोड़ दानव पैदा किये है ; सच्चे मानव सम्भवतः चौंतीस भी न बन पाये हों। आज देश मे नीचे से ऊपर तक भ्रष्टाचार का बोलवाला है। आज समा- चार पत्रों के पृष्ठ के पृष्ठ चोरी, डाके, ठगी, हत्या, अपहरण, बलात्कार आदि की घटनाओं से भरे रहते हैं । आज का बालक त्याग, ईमानदारी, शौर्य-वीर्य आदि की घटना महीनो न देखता है न सुनता है जवकि मारपीट, ठगी, भ्रष्टा- चार, बलात्कार की घटनाएं प्रतिदिन सुनता है और देखता है। चलचित्रों के अर्द्धनग्न कामुक चित्र, ध्वनि विस्तारक यंत्रो पर अहर्निश बजते हुए गन्दे गीत, प्रतिदिन घर के सामने फेंके हुए निरोध, क्लवों की रगरेलियां, कॉल- गर्ल्स के गुलछरें, रोमास युक्त सस्ते उपन्यास सब मिलकर विद्यालय में स्कूल को समाज से बचाइये | ३७ बालक को दिये गये शान से कही अधिक भारी बंटते हैं। फिर अच्छाई से बुराई का प्रभाव भी अधिक तथा शीघ्र होता है । नतीजा यह होता है कि वालक में शनैः शनै सुधार के स्थान पर विगाह आता जाता है एवं समाज की उन्छ । गलताओ में एक कड़ी और जुड़ जाती है । कर्णधार पुनः विचार करते हैं । पुनः वही भापण दोहराया जाता है, शिक्षा मंत्री द्वारा, प्रधान मंत्री द्वारा, राष्ट्रपति द्वारा-"आज की शिक्षा वेकार है। शिक्षा पद्धति को बदलना होगा।" फिर पैसा पानी की तरह बहाया जाता है। फिर नये आयोग गठित होते है। नये प्रयोग होते हैं। नवीन प्रशिक्षण दिये जाते है। मगर ढाक के वही तीन पात । बुनियादी शिक्षा, हरचार्ट को पचपदी, उद्देश्यनिष्ठ शिक्षण, इकाई योजना, अविभक्त इकाई, मोटेसरी, किडर गार्टन, शाला सगम, आन्तरिक मूल्याकन, नवीन वस्तु निष्ठ परीक्षा पद्धति, मीयो-कमाओ योजना, कार्यानुभव योजना आदि पता नही गत ३०-३५ वर्षों में हमने कितनी पद्धतियां अपनाई और कितनी का त्याग किया । पर कोई भी पद्धति वालक में सच्चे इसान के गुणो को विकसित न कर सकी । करे भी कैसे ? जब मूल ही मे भूल हो तो सफलता कैसे मिल सकती है । बालक मे नैतिक गुणों के विकास के सर्वाधिक शक्तिशाली अवरोधक समाज की तरफ हमारा ध्यान गया ही नहीं । आज वाहनों का शोर-गुल, रेडियो का कर्ण-प्रिय सगीत, चल-चित्रो का आकर्षक प्रचार और चलते-फिरते लोगो द्वारा प्रयुक्त अपशब्द एक ओर विद्यार्थियों के ध्यान के एकाग्र होने में वाधक है तो दूसरी ओर घर मे भाई- भावज का प्रेमालाप, डंडी-मम्मी का क्लबों मे जाना, गन्दे साहित्य व चित्रो का प्रचार-प्रसार विद्यार्थी के कच्चे मस्तिष्क को सेक्स की ओर आकर्षित करता है । शिक्षित होकर भी बेरोजगारी का सामना करना पडता है, जिससे नैराश्य की भावना का प्रादुर्भाव होता है, ऐसे में पूजीपतियो के ठाठ-बाट व ऐश-आराम को देखता है तो उसमे अपराधवृत्ति का प्रादुर्भाव हो जाता है । इन सवसे वालको को बचाने का एकमेव उपाय है विद्यालयो को समाज से दूर, बहुत दूर, शैक्षिक सस्कारों की गोद में ले जाना, जहाँ समाज की कलुपित छाया बालक पर न पडे । स्वस्थ एकान्त में बालभारती, माध्यमिक विद्यालय, महाविद्यालय आदि का निर्माण होना चाहिए जहाँ तीन या चार वर्ष से २५ वर्ष तक लगातार बालक समाज से दूर, पवित्र वातावरण मे रहकर विद्या- ध्ययन करते हुए स्वय मे महामानव के सच्चे गुणो का विकास कर पच्चीस वर्पो- परान्त परिपक्व बुद्धि लेकर समाज मे प्रवेश करे तथा समाज के अन्य घटको + ३८ / वन्देमातरम् के समक्ष अपने आदर्श जीवन का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करे जो अनुकरणीय हो । ऐसी स्थिति में समाज के कलुपित विचार उस पर हावी नही हो सकेंगे। इसी प्रकार जिस दिन पच्चीस वर्षों को कठिन साधना से अपने व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले नवयुवकों का समाज मे बाहुल्य हो जायेगा, उस दिन समाज का, देश का कायाकल्प स्वयमेव हो जायेगा । उस दिन कोटि-कोटि सच्चे मानवों के इस देश के सम्मुख सम्पूर्ण विश्व नतमस्तक हो जायेगा। स्कूल को समाज से बचाइये | ३६ राजस्थानी गीतों में वर्षा Dचन्द्रदान चारण आस लगाया मुरधरा देख रही दिन-रात । भागी आ तू, वादळी आयी रुत वरसात ।। वर्षा राजस्थान का प्राण है । वह यहां के सुख और समृद्धि का प्रतीक है । काली-काली घटाएँ जब उमड-धुमड़ कर यहाँ जल बरसाती हैं तो चारों ओर आनन्द और उल्लास, हर्ष एव खुशी का वातावरण बन जाता है। उस समय राजस्थान नाचता है, कूदता है, हंसता है और गाता है। स्त्री-पुरुप, बच्चे-बूढ़े और पशु-पक्षी सभी पर वर्षा की मस्ती छा जाती है। लेकिन यह सिदि, हर्ष का यह ज्वार कडी साधना के उपरान्त आता है। ग्रीष्म के भयंकर उत्ताप के बाद जब तक वादलों के दर्शन नहीं होते, राजस्थान का हृदय आकुल रहता है। आषाढ़ के प्रथम दिवस 'मेघदूत' के यक्ष को बादल देखकर उतनी विकलता न हुई होगी जितनी एक राजस्थानी को आषाढ़ में सूना आसमान देख कर होती है । जल ही जीवन है। अत उसके लिए सभी तरसते है। वर्षा की प्रतीक्षा करता हुआ मन अनुहार करता है- जीवण ने सह तरसिया रजड़ झंखड़ बाद । वरसे भोळी बादळी आयो आज अपाढ॥ धरा वधू को तृपित देख मेघ दौड़ पड़ते है । शून्य मेघाच्छन्न हो जाता है। चन्द्रमा के चारों ओर 'जलेरी तथा सूर्य के चारों ओर 'कुड' देखकर अनुमान होता है कि वर्षा का अधिक जोर है, शीघ्र ही वर्षा आयेगी- आभ जळ रो जोर है 'जळ भर बाद जलेर'। कुडाळो करड़ो कस्यो, सूरज-रे चौ-फेर ।। मोटी-मोटी बूदों के बरसते ही जव इस सुन्दर ऋतु का आगमन होता है ४०/ वन्देमातरम्
तो राजस्थान के गावों में वर्षा का हार्दिक स्वागत करती हुई बहनें भाइयों के
प्रति अपने स्वाभाविक प्रेम को व्यक्त करते हुए उल्लास भरे शब्दों में गाती
मोटी मोटी छोटा ओसर्यो, ए बदळी
ओसर्यो ए बदळी
कोई जोड़ा ठेलमठेल
मुरंगी रुत आयी म्हारे देस, भली रुत आयी म्हारे देस
ओ कुण वीज बाजरो, ए बदळी
बाजरो ए बदळी
ओ कुण वीजे मोठ मेवा मिसरी
सुरगी रुत आयी म्हारे देस, भली रुत आयो म्हारे देस ।
काले-कजरारे बादलों और उनके बीच चमकती बिजली को देख राजस्थान
का प्रेमी मन मूमल की प्रेम-कथा की स्मृति में तन्मय हो जाता है । प्रेमी के
हृदय में अमृत की वर्षा होने लगती है और वह मूमल के अप्रतिम सौन्दर्य की
कल्पना से भाव-विभोर होकर गाने लगता है---
काळी रे काळी काजळिये री रेखडी रे
हां जी रे, काळोड़ी कोठळ मे चमक वीजळी
म्हारी वरसाळे री भूमल, हाल नी ए आलीजे रे देस
वर्षा ऋतु सुहावनी है, सुन्दर है, मनोरम है, आकर्षक है और हर्षोन्मत्त
बनाने वाली है पर तभी जब सयोग-सुख हो । पावस की कलायण आये, प्रिय
विदेश मे हो तो घनघोर घटा में विद्युत का चमकना प्रिया की विरह-वेदना
को द्विगुणित कर देता है। उसकी पीड़ा, उसकी कसक, उसका दर्द, उसका
दुःख बादल से अनुहार करता है कि वह बहुत धीरे-धीरे, मधुर-मधुर ध्वनि में
बोले । यदि निर्लज्ज बिजली उसके विरह-अनुताप को देख चमकना बन्द न करे
तो कम से कम वह तो शर्म करे । ढोला के वियोग मे दुःखी मारवणी कहती
बिज्जुळियां नीळज्जियां, जळहर तूं ही लज्जि ।
सूनी सेज, विदेस प्रिय, मधुरइ मधुरइ गज्जि ॥
वियोगिनी के लिए वर्षा ऋतु बहुत ही कष्टदायक है। काली घटा उसे
शत्रु सेना के समान प्रतीत होती है, दामिनी की दमक तलवार जैसी है और
राजस्थानी गीतों में वर्षा | ४१
वर्षा की बूंदें तीर की तरह लगती हैं। भला ऐसे समय विना प्रिय के कोई कैसे
जीवित रह सकती है-
फोज घटा, यग दांमणी, बूंद लगइ सर जेम ।
पावस पिउ विण वल्लहा, कहि जीवोज केम॥
विरहिणी नायिका को वर्षा की बूंदें नहीं सुहाती पर कवि की कल्पना
उसमे व्यापक सहानुभूति का भाव देखती है। उसे तो ऐसा प्रतीत होता है
मानो मरुधरा को ग्रीष्म से जलता देख कर आकाश रोने लगा हो और फिर
उसके बादल रूपी नेत्रो से जल रूपी अश्रु प्रवाहित होने लगे हो--
मुर-थळ जळतो देय कर, आभो रोवण लग्ग ।
लोयण-वादळ वह चल्या, आंसू नीर अथग्ग ।।
इधर वियोगिनी प्रिय को पाकर हपित होती है और उधर मेघ सौदामिनी
को गले लगाये आगे बढ़ते है । धरती की प्यास और तपन अभी मिटी नहीं है
अत. सावन के वादल कभी श्याम तथा कभी उज्ज्वल रूप धारण करके जोर से
वरसते हैं एव निरन्तर बरसते ही जाते हैं । ऐसा प्रतीत होता है मानो अजस
अश्रु प्रवाहित करने वाले वियोगिनी के नेत्र हों-
काळी करि काठळि ऊजलि कोरण,
धारे स्रावण धरहरिया।
गळि चालिया दसो दिसि जळग्रभ,
थभि न, विरहणि-नइण थिया ।
और यह वर्पा किस रूप में होती है ? बूंदें 'पड़ड़ पड़ड' की आवाज करके
गिर रही है, बादल 'गडड़ गड़ई' का घोप करके गर्जना कर रहे है, विद्युत
'कडड़ कड़ड' करके चमक रही है और इन सबकी समवेत ध्वनि से ऐसा लगता
है मानो धरती फट जायेगी--
'पड़ड पड़ड़ बूंदा पड़े गड़ड गडड़ घण गाज ।
कड़ड़ कड़ड़ वीजळ करे, धडड धड़ड़ धर आज ||
अपने खेतों मे धनी वर्षा देख किसान हर्ष से हल चला रहा है और 'तेजा'
की ऊची टेर से गगन-मडल को गुंजा रहा है-
सखरी वरसी सावळी खेता हरख हिलोर ।
हळ वावतड़ा छेडता 'तेज तणो झिलोर'।
४२ / वन्देमातरम्
किसान ने कितनी आकुलता से इस 'कलायण' की प्रतीक्षा की है। अज वह इसके दर्शन कर धन्य हुआ है और अनुरोधपूर्ण शन्दों में उससे विनय करता है कि वह मास्थल में नित्य बरसे क्योकि वह जानता है कि मेघ और धरती ही समस्त चीजों के उत्पादक हैं- नित वरसो, मेहा, वागड मे, नित बरसो, मोठ-बाजरो वागड निपजे, गेहूंड़ा निपजे धादर मे, नित बरसो, मेहा, वागड में, नित बरसो। कृपक संगीत मुखर हो और कृपक-कुमारियां मौन रह जाएँ, यह असम्भव है । कृपक के सुखी जीवन को वाणी देकर वे गाती हैं- आयो आयो सावण-भादवो, कोई काली घटा घिर आय, आज म्हारी बदळी बरसंगी । म्हारो वीरोजी बीज बाजरो, म्हारा भाभोजी काट फोग, आज म्हारी बदळी बरसंगी लेकिन यह दो तभी सुखदायक है जब यह समय पर हो तथा मावश्यक मात्रा से अधिक न हो । कई बार वर्षा आरम्भ होने के बाद रुकने का नाम ही नहीं तैती । ठंडी वायु के झकीरों से ग्रस्त लोग चूते हुए फूस के घरों में बैठे वर्षा रकने की प्रार्थना करने लगते हैं--- माणस बैठा मांय, वार कादै मुख मोखी। अरे ! पून एक जाव, सुवा थार-सू चोखो। चुवै टापरा रात-रा से, टप-टप टपकै टाप अवै कळायण ! ठहरज्या तू घरा गयी सा धाप है ।। राजस्थान का वास्तविक सौन्दर्य वर्षा ऋतु में ही दृष्टिगोचर राजस्थानी स्त्रियों का सबसे प्रिय त्यौहार---तीज- इसी ऋतु में आता है। इस समय प्रायः सभी स्त्रिया, विशेषत. नवविवाहिता स्त्रियां अपने पीहर आ जाती हैं। कई भाई अपनी बहिनों को पीहर लाने के लिए उनकी ससुराल जाते " - सावण तो लहर्यो भादवो रे वरसं च्या कूट म्हारा मोरला, सावण लहर्यो रे राजस्थानी गीतों में वर्षा | ४३ - सावण बाई गवरां सासरे कन्हैयो वीरो लेणिहार म्हारा मोरला, सावण लहर्यो रे वर्षा के माध्यम से राजस्थान के लोक-जीवन और लोक-संस्कृति की भी. सरस झाको प्रस्तुत हुई है। चारों ओर से उमड़-घुमड़ कर घटाएँ घिर आयो हैं । झिरमिर-झिरमिर मेह वरस रहा है। गड्ढे और तालाब पानी से भर गये हैं। पनिहारिनें पानी लाने जा रही है और अपने कोकिल-कठ के मधुर- स्वरो से मार्ग को रसमय वना रही हैं- काळी ए कळायण ऊमटी ए पणिहारी ए लो छोटोडी छोटा रो बरसै मेह वाला जो भर नाडा, भर नाडिया ए पणिहारी ए लो भरियो भरियो समंद-तळाव वाला जो आज विज्ञान के विकास के साथ साथ मानव जीवन अधिक जटिल हो गया है । यान्त्रिक सभ्यता ने मनुष्य को प्रकृति से दूर कर दिया है। गगन-चुम्बी उच्च अट्टालिकाओ के कारण तथा बड़ी-बड़ी मशीनों को भडाभड़ के कारण बड़े नगरो मे अव वादलो के आने, विद्युत के चमकने और मेघ की गर्जन-ध्वनि का पता भी नहीं चलता। फिर भला वर्षा के आगमन पर कौन खुशियां मनाये, कौन हर्षोन्मत्त होकर नाचे । अत: अव विशाल नगर में रहने वाली राजस्थान के गांव की गोरी, गाँव की ज्यादा 'हर' करती है और नगर के जड़-जीवन पर व्यग्य करते हुए प्रिय से अनुरोध करती है कि उसे सावन की वर्षा में उन्मुक्त होकर स्नान करने की सुविधा दी जाय-- कुण गावे कुण नाचे मन मे कुण मोद कर, कुण जाणे चौक सिगरथ पावणी आई है, कुण पूछ बात अठ देसा परदेसा री, देवां री काई आ सदेसी लाई है, छोड़ मिनखावणी इण मोटी नगरी नै, जूनी सी मंडी रे डागळिय जावण दो, आडा तो टेढ़ा म्हारे पड़दा बधाय राज, सावण भर अलवेली बिरखा मे न्हावण दो। इस प्रकार राजस्थानी काव्य और लोकगीतों मे वर्षा को विभिन्न रूपो में ४|वन्देमातरम् अकित किया गया है । कही 'वरखा बीनणी' है तो कही देवो की सन्देश- वाहिका। कही उसका आलम्बन रूप में चित्रण है तो कही उद्दीपन रूप में। कहीं वर्षा के माध्यम से स्थानगत रूप-रंग दिखाया गया है तो कही उसे कथा की पृष्ठभूमि के रूप में प्रयुक्त किया गया है । कही भाव-व्यजना के लिए उसको आधार बनाया गया है तो कही जीवन और प्रकृति में समानता दिखाने के लिए उसका उपयोग किया गया है। राजस्थानी काव्य और लोक-गीतो मे जितना व्यापक, विस्तृत, सरस और सुन्दर वर्णन वर्षा का हुआ है उतना किसी अन्य ऋतु का नही। काल का अविराम चक्र धूमता रहता है। काली घटाएं उमड-घुमड कर बरसती है और मिट जाती हैं। उनका कोई इतिहास, कोई अस्तित्व नहीं रहता । पर मेघमाला का यह आख्यान एक ओर पर्वतीय चट्टान की भांति शाश्वत है तो दूसरी ओर पानी के बुलबुले की तरह चिर नवीन। इसीलिए प्रकृति पर प्रति वर्ष नूतन भाष्य लिखने वाले वादल से राजस्थान का भावुक मन बार-बार यही विनय करता है- उपराड़े कर आवज्या ओळू मेटण-हार । मुरधर मन सू वीनवै तै-सू वारबार ।। राजस्थानी गीतो मे वर्षा / ४५ मन भावन गणगौर श्याममनोहर व्यास राजस्थान रगोले एव मनभावन पर्वो का प्रदेश है। यहां हर मास लोक- गीतों से ओत-प्रोत अनेक पर्व उल्लासपूर्वक मनाये जाते हैं । आबाल-वृद्ध नर- नारी इन मोहक पर्वो पर उल्लसित हो उठते हैं। इन्ही में से गणगौर गीतों भरा यह महिला-पर्व है । होली के दूसरे दिन से यह प्रारम्भ होता है और चैत्र शुक्ला तृतीया के दिन इसका धूम-धाम से समापन होता है। बालिकायें एवं नव-विवाहिता युवतिया बड़े ही उमंग, उत्साह एव उल्लास के साथ इसे सम्पन्न करती हैं। जली हुई होली की भस्म से अठारह एव गोबर की आठ पिण्डिया बनाकर इनकी पूजा चैत्र शुक्ला तृतीया तक चलती है। शीतला सप्तमी को वालिकायें मिट्टी से गणगौर, ईसर, कान्हा आदि की सुन्दर प्रतिमा बनाती हैं । इन्हे फिर किसी सद्य विवाहिता महिला के घर रखा जाता है । गणगौर का अर्थ है-गण अर्थात् शिव और गौर का अर्थ पार्वती है। शिव व पार्वती के रूप मे इन आकृतियों को पूजा जाता है । कहीं-कही काष्ठ की प्रतिमाओ की भी पूजा की जाती है। चैत्र शुक्ला तृतीया के दिन एक जुलूस के रूप मे इन प्रतिमाओं को बाजे-गाजे के साथ सन्ध्या के समय किसी जलाशय पर ले जाया जाता है। वहा इन प्रतिमाओ को नदी या जलाशय के पानी से स्नान कराकर पूजा-अर्चना की जाती है तथा राख व गोवर की पिण्डयों को पानी मे विसर्जित कर दिया जाता है । अठारह दिन तक कुंआरी कन्यायें मनभावन पति की प्राप्ति के लिये और सुहागिनें चिर- काल तक अपने सुहाग को बनाये रखने के लिये गणगौर पूजती है। गणगौर का पूजा-स्थल मांडणों से सजाया जाता है। दीवार पर बने मांडणे अड़े सुन्दर एवं चित्ताकर्षक होते हैं। मांडणे में कही पार्वती का महल होता है तो कही स्त्री-पुरुप का जोड़ा। भूमि पर निर्मित मॉडणों पर एक चौकी रखी जाती है। ४६ / बन्देमातरम् चौकी पर मिट्टी से बनाई गई गौर, ईसर आदि की प्रतिमायें रखी जाती है । इस पूरे स्थान को जो की वालियों से ढक दिया जाता है । "गणगौर' पूजने वाली महिलायें सूर्योदय से पूर्व नहा-धोकर बगीचे से फूल एक कच्ची दूब लेकर आती हैं और मनभावन कर्णप्रिय गीत गाकर वातावरण को मोहक बनाती हैं । तदनन्तर पूजा कर घर लौटती है । गणगौर की पूजा के पीछे पौराणिक आख्यान है। शिवपुराण के अनुसार पार्वती ने शिवजी को अपने पति के रूप मे पाने के लिये कठिन तपस्या की थी। उनकी कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने पार्वती का पति होना स्वीकार कर लिया । पति रूप में शिवजी को पाने के बाद पार्वती जब अपने पीहर गई तो उनका अपूर्व स्वागत किया गया । तभी से गणगौर-पर्व मनाने की प्रथा चल पडी। कूर्मपुराण में एक कथा इस प्रकार आती है-पार्वती के पिता हिमवान् ने पार्वती से स्वयर के लिये ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, वरुण, सूर्य आदि कई देवताओ के नाम सुझाये । पर उमा ने उन देवताओ में कुछ न कुछ दोष निकालकर उन्हे अस्वीकार कर दिया । जब नीलकण्ठ शिव का नाम आया तो पार्वती ने उन्हे तुरन्त स्वीकार कर लिया। इस उपलक्ष्य मे गणगौर पर्व मनाया जाता है । वस्तुतः यह पर्व शिव-पार्वती के अटूट प्रेम का प्रतीक है। महाकवि तुलसीदास रचित रामचरित मानस मे राम को वर के रूप मे पाने के लिये सीता ने भी पार्वती की पूजा की थी । श्रीमद् भागवत पुराण के अनुसार श्रीकृष्ण को वर के रूप मे पाने के लिये रुक्मिणी ने गोरी का पूजन किया था। पृथ्वीराज चौहान ने भी सयोगिता का अपहरण उस समय किया था, जब वह गौरी का पूजन करने मदिर मे गई थी । गणगोर के अवसर पर महिलायें मनमोहक गीत गाती है जिनकी सख्या लगभग ३५ हैं । इन गीतों में भारतीय नारी अपनी मनोदशा का सुन्दर चित्रण करती है । कुआरी कन्यायें इसी उद्देश्य से गणगौर पूजती हैं कि उन्हे सुयोग्य, स्वस्थ एवं सुन्दर वर मिले। वे गाती है :- सोलह पोऊं सतरह खाय, हाँडी रो हडवाल । ओवर टाळो माता गौरजा ए। मैं तन पूजण आय । डोढी बांध पागड़ी ए, मन भावन गणगौर | ४७ सांवलियो सरदार। यो वर देई माता गौरजा ए, मैं तने पूजण आप (अर्यात में सोलह रोटी बनाई और यह (पति) सत्रह पाए, सम्पूर्ण हडिया साता-याता पाली कर जाए और कुछ काम नहीं करें, ऐमा पर मुझे मत देना है गौरी माता । मैं तेरी पूजा करने आई है और मुझे तिरछी पगड़ी बांधने वाला सावता सरदार वर के रूप में देना ।) वर कसा चाहिए, इस बारे में वह कहती है प्रीतम तो पतळा भला, मोटा जाट वार। मंडी बैठ्या मद पोवं, ए लीली करो असवार। खांगी बाँधे पागड़ी, मधुरी चाले चाल। कण मोड, घोड़े पड़े, चाल निरखता जाय। ओ वर दोग्यो माता गोरजा ए, म्हां थने पूजण पाय। तरुणिया रंग-बिरंगे परिधान पहने, नाना प्रकार से शृगार किये हरी दूब को लेकर गणगौर पूजती है । वे गणगौर माता से मांग करती है कि जिस प्रकार हरी दूब जल्दी-जल्दी चढ़ती है उसी प्रकार मेरा और मेरे पति के बीच प्रेम बढे । सर्वाधिक लोकप्रिय एक गीत इस प्रकार है भंवर म्हांने खेलण दो गणगौर, म्हारी सहेल्पां जोवे बाट, भंवर म्होंने पूजण दो गणगोर । एक अन्य गीत के बोल इस प्रकार है- गौर ए गणगौर माता, पोल ए किंवाड़ी। बारे अबी थारे - पूजण वारी । ४८/ वन्देमातरम्
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इन गीतो मे आचलिक जीवन का सुन्दर चित्रण हुआ है । एक गीत इस
प्रकार है-
म्हारी सोने सू उजळी गोरत
वाने ईसर सावलो।
जळ चादळ विच चमके जी तारा,
साँझ पड्या पिव लागोजी प्यारा ।
यह शृगार रम प्रधान लोकगीत है।
हाथों में मेहदी रचाकर, सोलह शृंगार से सज-धज कर युवतियां गणगोर
पूजती हुई गाती है-
गौर-गौर गोमती, ईसर पूजे पारवती।
चीरा म्हाने चूनर दी,
चूनर को म्हा बरत किया।
राणी पूजे राजा ने,
म्हा पूजा म्हारा सुहाग ने।
एक लोकगीत में कुंआरी कन्या पति के अतिरिक्त अन्य मांग इस प्रकार
रखती है-
कान कवर सो बोरो मांगा,
राई सी भोजाई।
चूड़ले वाळी वैनड़ मांगा,
ऊट चढ्यो बहनोई।
युवती कुंवर कन्हैया जैसा भाई, लावण्यमयी भोजाई, चुटीली ननद और
सम्पन्न बहनोई चाहती है।
झूलो, घूमर, घुड़ला एक रुणमणियो आदि कई प्रकार के लोकगीत है जो
नृत्य की ताल पर गाये जाते है । पूजन के समय गाया जाने वाला एक गीत यह
आज म्हारो दाडीजी ने गणगौर पामणा.
गाय दुवाडू छालरी ने दूध पकाऊ खीर।
गणगौर की पूजा काजल, सिन्दूर, मेहदी तथा रोली आदि से की जाती
है । गणगौर के पर्व पर राजस्थानी महिलायें 'घूमर' नृत्य करती है। इसमें
मनभावन गणगौर/४६
...... महिलायें सुन्दर साड़ी, घाघरे पहन कर वृताकार नाचती है । यह नृत्य नयना- भिराम एव आकर्षक होता है। 'घूमर' नृत्य के साथ जो गीत बोले जाते है, वे इस प्रकार है- (१) म्हारी घूमर छ नपराळी ए मा. (२) म्हारी नखराळी गणगौर, म्हारी प्यारी गणगौर...... (३) सागर पाणी लेणे जाऊँ सा, नजर लग जाय..." (४) काळे रग री चूंदड़ी ले दे रे म्हारा वालम" (५) काजळ भरियो कूपलो कोई पड्यो पलग अधबीच' राजस्थान की देशी रियासतों में गणगौर पर्व आजादी के पूर्व बहुत धूम- धाम से मनाया जाता था। उदयपुर, कोटा, जयपुर, बीकानेर और जोधपुर में गणगौर की सवारी वडे राजसी ठाठ-बाट से निकाली जाती थी। मेवाड़ में उदयपुर, नाथद्वारा तथा गोगुन्दा में यह पर्व बड़े उल्लास के साथ मनाया जाता है। वल्लभ सम्प्रदाय के प्रधान तीर्थ-स्थल नाथद्वारा मे गणगौर का चार दिन तक मेला जुडता है। इस दौरान पहले दिन चूदडी, दूसरे दिन हरी, तीसरे दिन गुलाबी और चौथे दिन केसरिया गणगौर होती है। सामान्यजन भी गणगौर के परिधान के अनुसार ही वस्त्राभूषण धारण करते हैं । कई पुरुष उसी रंग की पगड़ी बांधते है। मेला वनास नदी के तट पर स्थित गणगौर बाग मे लगता है। केसरिया गणगौर का अन्तिम दिन का मेला मोती महल मे आयोजित होता है । इन दिनो दूर-दूर गांवो से आदिवासी स्त्री-पुरुष भी समूह के रूप में गाते-बजाते है । साय काल श्रीनाथ जी के मन्दिर से गणगौर की सवारी प्रारम्भ होती है। इसमें ईसर व गोरी की प्रतिमायें पालकी मे निकाली जाती है । यह शोभायात्रा गण- गोर बाग में जाकर समाप्त होती है। मार्ग मे आदिवासी महिलायें घूमर नृत्य करती है । उदयपुर में महलों से पिछोला झील पर स्थित गणगौर घाट तक यह सवारी निकाली जाती है । पहले उदयपुर के भूतपूर्व नरेश भी इस शोभा यात्रा में भाग लेते थे। महाराणा गणगौर घाट पर एक विशेप नौका में सवार होते । इस नौका में विशिष्ट रूप से कलात्मक सजावट होती। महाराणा के साथ अन्य सरदार, सामन्त, उमराव भी अपने पद-प्रतिष्ठा के अनुसार स्थान पाते । एक नौका में सो के लगभग व्यक्ति बैठते । इसी नौका के साथ एक अन्य नौका होती ५०/ वन्देमातरम् जसमें अन्य सामन्त सरदार होते और नृत्य करने वाली पारागनायें भी होती। रे पिछोला झील का चक्कर लगाकर नौकायें पुनः गणगौर घाट पर लौटती। इसके पश्चात् महाराणा गणगौर माता की पूजा-आराधना करते । पुरोहित इस कार्य में उनकी मदद करते और उन्हें आशीर्वाद देते। आज भी गणगौर की शोभा यात्रा निकलती है पर कचोट यह है कि अब वे गठ-बाट कहाँ ? अब वह उल्लास कहाँ ? मनभावन गणगौर / ५१ साहित्यिक-सांस्कृतिक राजस्थान ॥ श्रीमती कमला अग्रवाल सस्कृति एव साहित्य की दृष्टि से राजस्थान भारतवर्ष के समुदतम प्रदेशो मे से एक है । ऐतिहासिक दृष्टि से भी राजस्थान भारत के उन विरल प्रदेशों में से है, जिनका नाम अपनी गौरवमयी परम्पराओं के लिए बहु-विश्रुत रहा है। राजस्थान को 'भारत की वीर-भूमि' कहा गया है । यहाँ का इतिहास भारत को वीरता का इतिहास है। यही नही, राजस्थान की धरती प्राचीनता की दृष्टि से अपनी विलक्षण पहचान रखती है। पुरातत्त्व-शास्त्रियों के मतानुसार इस प्रदेश के बीकानेर, जैसलमेर और जोधपुर के मभागों मे कभी हड़प्पा-मोहन जोदडो के समान ही प्रागैतिहासिक वस्तियां थी। प्रवाद के अनुसार महर्षि कपिल बीकानेर के कोलायत स्थान में हुए, जिनका स्वतत्र दर्शन साख्य मत के रूप में प्रसिद्ध है। अजमेर के सुप्रसिद्ध तीर्थस्थल पुष्कर के सम्बन्ध मे यह जन- धारणा है कि ब्रह्मा ने सृष्टि-रचना के पश्चात् इसी स्थल को यज्ञ करने के लिए चुना था। चौरामी जातियो की नामावली मे वहुत-सी जातियों के नाम राजस्थान के किसी नगर विशेष से सम्बधिन्त हैं । श्री मालापुर से श्रीमाल जाति प्रसिद्ध हुई। इसी तरह ओसिया से ओसवाल, खडेला से खडेलवाल, पाली से पल्लीवाल, प्राग्वाट प्रदेश से पोरवाल, मेडता से मेड़तवाल, डीडवाना से डीडू, जालोर से सोनगरा, साचोर से साचोरा, हर्पपुर या हरसोर से हरसोला, चित्तौड से चित्तौडा, नागोर से नागोरी, मेवाड से मेवाडा आदि जातियां प्रसिद्ध हुई। जिस स्थान की महिमा का पार चन्द्र (चन्दवरदाई) और सूरज (सूर्यमल्ल मिश्रण) की लेखनी भी पूरी तरह पा नहीं सकी, वहाँ के क्षात्रधर्म का सम्पूर्ण चित्र कौन, कैसे खीच सकता है ? जब सरस्वती नदी समुद्र तक बहती थी, उम पुण्य युग मे यह मरु-भूमि सलिलार्णव के नीचे छिपी हुई थी। विधाता के विशेष प्रसाद से वीर रस ने अपने निवास के लिए इस भू-भाग को सागर गर्भ से प्राप्त ५२ / वन्देमातरम् किया था। यहां के रण-बांकुरे नर-पुंगवी और आर्य-देवियों के चरित्रो का गान करके कविगण अनन्त काल तक अपनी लेखनी को पवित्र करते रहेंगे । राज. स्थान का प्रत्येक स्थान एक न एक वीर की कोतिगाथा से सम्बद्ध है । यहाँ पद- पद पर आर्यनारियों ने सहनों की संख्या मे सनातन सतीत्व की रक्षा के लिए हँसते-खेलते आत्म-बलि दी है। इसके अर्बुद पर्वत को दुर्गम घाटियों में अनेक बार राजस्थान की आकुल मर्यादा को बचाया है । वापा रावल, समरसी, राणा कुम्भा तथा सागा जैसे वीर इसी राजस्थान मै हुए है। हिन्दू जाति को स्वातन्त्र्य का पाठ पढ़ाने वाले अमर आचार्य महाराणा प्रताप सिंह ने यही सिसोदिया वश को मान-रक्षा के लिए मसार प्रसिद्ध हल्दीघाटी के युद्ध में अस्य यवन-सेना का वध किया था। जिस नीले चेतक के अश्वारोही का चरित्र राजस्थान के प्रत्येक घर में आज भी गाया जाता है, उस वोर केशरी का यश जब तक भारत वसुन्धरा के युवकों में प्राण है. तब तक अक्षुण्ण बना रहेगा। राजस्थान ने किमी समय यौधेय तथा मालवगणों को शरण दी थी। पजाब- हरियाणा के समान ही राजस्थान की भूमि भी अनेक गणराज्यों की जननी रही है, उनके अंको से चिह्नित मुद्राएं आज भी मिलती हैं। यहाँ की मध्यमिका नगरी किसी समय शिवि जनपद की राजधानी थी, जिसमे वासुदेव का भी धाम था। बेडन नदी के किनारे यह एक बड़ा बाबाद नगर था। नगरी नाम से यहाँ छोटा-सा गांव बसा हुआ है, जिसके आस-पास बिखरे पडे टूटे-फूट कुछ खण्डहर आज भी पुरातत्ववेत्ताओं को राजस्थान की प्रायः सबसे पुरातन राजधानी के अस्तित्व की गाथा सुना रहे है । एक पुराना शिलालेख भी यहाँ मिला है, जो प्राचीन ब्राह्मी लिपि में लिखा हुआ है और जिसकी भाषा मस्कृत है। भारतवर्ष में अब तक जितने सस्कृत-लेख मिले है, उनमें यह प्राचीनतम है। लिपि-विज्ञान के आधार पर विद्वानो ने इसका समय कम से कम विक्रम पूर्व २५० मे ३०० वर्ष तक का स्वीकार किया है। इस मध्यमिका का सबसे पहला उल्लेख आचार्य पतञ्जलि के 'व्याकरण महाभाष्य में मिलता है। उनके समय से अर्थात विक्रम संवत् के प्रारम्भ से प्रायः एक सौ वर्ष पूर्व किसी पवन राजा ने मध्यमिका पर आक्रमण किया था। यह यवन राजा पुराविदों के मतानुसार ग्रीक शासक मिनेंडर (१५०-१६० ई.पू.) तथा डिमिट्रियस माने जाते हैं । उस समय मध्यमिका के शासक कौन थे? इसका कुछ पता नहीं लग पाया है। सभवतः मध्यमिका में शिवि जाति के लोगो का जतन्त्रात्मक शासन था, जिनके कई सिरके यहां मिले है । नगरी के आस-पास के पुराने खण्डहरो से ज्ञात होता आज भी एक साहित्यिक-सास्कृतिक राजस्थान / ५३ है कि अपने समय में यह स्थान रहा गनिमासी और आबाद रहा होगा । यही पर बोर धर्म के HITE कुछ स्वर भी मिले है। जन-साहित्य के उदरणों से मात होता है कि जन-समदाय वालों का भी यहां एक प्रसि केन्द्र था। जन- माधुओ को एक स्वतंत्र गरणारा ही ग स्पान के नाम में अर्थात् 'माध्यमिक मागा' के नाम से प्रसिरहा है। यहां पर गमय के भी अनेक सि मिले दे नभा गुप्तकालीन स्थापत्य के कुछ अवगेप भी उपलब्ध हुए है, पिनसे मात होला है कि गुप्तकाल में भी इस स्थान का महत्व बन रहा। जमलमेर में प्राप्त 'कुमारणात नरित्र' नामक एक सस्कृत-प्रय में चित्रकूट अपात पित्तोडगढ़ की उत्पत्ति का विश्वसनीय ऐति विवरण दिया हुआ है । इस विवरण के अनुसार मध्यमा (माध्यमिका या मध्यमिा) नामक प्राचीन नगरी में निवागद नाम का कोई राजा राम करता था। उसने समीप के वित्र- गिरि पहाड़ पर एक मुविशाल एव मुद्वा किला बनवाया, जिसका नाम चित्रकूट रखा और मध्यमा नगरी से राजधानी हटाकर इम निवकट को ही अपनी नूतन गजधानी बनाया । धोडे ही समय में चित्रकूट बहुत आवाद हो गया। हजारो-लायो की गंख्या में लोग यहा आकर यम गये । पहाड़ के जार किते में जब लोगो को बसने की जगह नहीं मिली तो फिर तलहटी मे बस्ती बसाई गई। इसी राजस्थान में विराटनगर था, जहाँ पाण्इ कुल के वंगततु को अवि- च्छिन्न रखने वाली देवी उत्तरा का जन्म हुआ था। यही दक्षिण में महाकवि माघ की जन्म भूमि श्री माल नगरी है। राजस्थान के क्षत्रियों के छत्तीस कुतों का पृथक्-पृथक विस्तृत वर्णन प्राय: असम्भव हो है। पमिनी और दुर्गावती को जन्मभूमि को आर्य सतान अब भी श्रद्धा के साथ प्रणाम करती है। भक्ति-स्रोत. स्विनी मीराबाई का स्मरण करके भारतीय महिलाओ के मुख-मडल आज भी जगमगा उठते है। भक्ति-रस का काव्य तो भारतवर्ष के प्रत्येक साहित्य में किसी न किसी कोटि का पाया ही जाता है । राधा-कृष्ण को लेकर प्रत्येक प्रात ने साधारण या उच्च कोटि का साहित्य निर्मित किया है, लेकिन राजस्थान ने अपने रक्त से जो साहित्य निर्मित किया है उसकी जोड़ का साहित्य और कही नही पाया जाता और उसका कारण है-राजस्थानी कवियों ने कठिन सत्य के बीच में रहकर युद्ध के नगाड़ो के बीच अपनी कविताएँ बनाई थी। प्रकृति का ताण्डव रूप उनके सामने था । क्या आज कोई कवि अपनी भावुकता के बल पर फिर वह काव्य-निर्माण कर सकता है ? राजस्थानी भाषा के साहित्य मे जो एक प्रकार का भाव है- . ५४ / वन्देमातरम् - जो उद्वेग है, वह राजस्थान का खास अपना है । वह केवल राजस्थान के लिए ही नहीं, सारे भारतवर्ष के लिए गौरव की वस्तु है। राजस्थान का यह साहित्य कवियों के अन्तस्तल से निकला है। केवल वीरता के क्षेत्र में ही नही, सगीत कला, चित्रकला और साहित्य के क्षेत्र में भी इस प्रदेश ने अत्यधिक प्रसिद्धि प्राप्त की है। यहां के रागी में 'मीराबाई का मलार बहुत प्रसिद्ध है। इसके अतिरिक्त राग माड और राग सिन्धु राजस्थान के अपने हैं। शृंगार रम के लिए बहुत ही उपयुक्त राग मांड का उत्पत्ति-स्थल जैसलमेर माना गया है। राग सिन्धु धीर रस का राग है । रण के लिए प्रयाण करते समय ढोली और दादी लोग इसे सेना के आगे गाते हुए चलते थे। डिंगल के कवियों ने इसका वर्णन किया है। मंगीत शास्त्र सम्बन्धी प्राचीन संस्कृत ग्रथों में इस राग का नामोल्लेख नहीं मिलता। संगीत-शास्त्र विष- यक कई उत्कृष्ट प्रथ भी यहां लिखे गये है, जिनमे सगीत कला के विविध अगों का सूक्ष्म एवं वैज्ञानिक विवेचन मिलता है। इनमें मेवाड के महाराणा कुंभा के रचे तीन प्रथ-~-'सगीत की मीमामा', 'सगोत राज' और 'सूड-प्रवन्ध-~~-बहुत ख्याति प्राप्त है। जयपुर के कछवाहा राजा भगवत दास के पुन संगीत प्रेमी माधव सिंह ने छान देश के पुडरीक विट्ठल से 'राग मजरी' अथ लिखवाया था। महाराजा प्रतापसिंह (जयपुर) के समय में "राधा गोविन्द-संगीत सार', "राग-रत्नाकर' और 'स्वर-सागर' जैसे उत्कृष्ट कोटि के ग्रंथ लिये गये। महाराजा अनुपसिंह (बीकानेर) ने भी अपने आर्थित प. भाव भट्ट मे 'संगीत-अनूपाकुश', 'अनूप मंगोत-विलास' और 'अनूप सगीत-रलाकर' ग्रंथ बनवाये थे। राजस्थान के राजकीय चिवालयों तथा राजपूत सरदारों के घरों में पुराने चित्र बहुत बड़ी संख्या में मिल जाते है। इन राजस्थानी शैली के चित्रो में देवी-देवताओं, राग- रागिनियों, पौराणिक कथाओं, सामन्तों, युद्ध-घटनामो आदि के चित्र अधिक देखने में आते है। इन चित्रों को मुख्य विशेषताएं हैं-~-रगो की उज्ज्वलना, कल्पना की सुघड़ता और वातावरण की तीव्रता । इन चित्रो में कई ऐसे भी हैं, जिन पर मुगल शैली का प्रभाव दिखलाई देता है। सस्कृत, राजस्थानी, फारसी आदि भापाओं के चित्रित पय भी राजस्थान में बहुत मिलते है । रामायण, महाभारत, पृथ्वीराज रासो आदि प्रसिद्ध प्रयों से सम्बन्धित प्रमुख प्रमुख घटना-चक्रों के चित्र चित्रित किये गये हैं पर विहारी. मत्तसई जैसे शृंगारिक ग्रंथ के प्रत्येक दोहे का चित्राकन किया गया है । जयपुर के पोथी खाने में रक्षित महाभारत का कारमी में साराम 'रक्मनामा' की सचित्र साहित्यिक-सास्कृतिक राजस्थान / ५५ प्रति में 169 चित्र हैं, जिन पर चार साय रपये अप हुए थे और अकबरी दरवार के गोदह पित्रकारों ने इस पर काम किया था। यह प्रम भारतीय चित्रकला भण्डार का अनमोल रत्न है। इसी प्रकार की चित्रित पोपियों का सब से या सग्रह उम्पपुर के सरस्वती भगार में है। राजस्थान के कई स्थानों में निहा-नानुम्मे के भी उत्कृष्ट उदाहरण उपलब्ध होते है । उदयपुर से कोई 125 मोन पूर्व दिशा में गाड़ोती गाव नवी-दसवी शतालियों में समर होकर भद्रायती के नाम मे विरूपात था। यहां शिव-विष्ण त्रिमूर्ति आदि के कई जीर्ण-गोणं मदिर हैं, जिनको कारीगरी को भारतीय शिल्प के विशेपम फर्ग्युसन ने बहुत प्रगसा की है और शेष-गायी नारायण को मूर्ति को अब तक देयो हुई हिन्दु-मूर्तियों में सर्वोत्तम कहा है ।" रनल टॉड ने भी इन मदिरो को गली और मुन्दर गुदाई की बहुत प्रशसा की है । 'याड़ोतो के मन्दिरों की विचित्र और भव्य बनावट का ययावत् वर्णन करना लेखनी की शक्ति के बाहर है। यहाँ मानो हुनर का खजाना याली कर दिया गया है। उनके स्तभ, छतें और शियर का एक-एक-पत्थर छोटे से मदिर का दृश्य बतलाता है । प्रत्येक स्तभ पर गुदाई का काम इतना मुन्दर और बारीकी के साथ किया गया है कि उसका वर्णन नही हो मकता। ये मदिर संकड़ों वर्षों के पुराने होने पर भी अब तक अच्छी स्थिति में पड़े हैं।" ये मन्दिर कव बने, इसका ठीक-ठीक निर्णय अभी तक नहीं हो पाया, पर वहाँ पर उत्कीर्ण छोटे-छोटे लेखो में से एक विक्रम संवत् 983 (ई. मन् 926) का है । यद्यपि इस लेख से इनके बनने के सम्बन्ध में प्रकाश नही पड़ता पर यह तो निश्चित ही है कि उक्त सवत् से पहले ये मन्दिर बन चुके थे। ये आबू (देलवाडा) के मन्दिरों से भी प्राचीन है पर वहा जाना श्रम-साध्य है क्योंकि मार्ग दुर्गम पर्वत श्रेणियों में से होकर निकलता है । सभवतः इसीलिए भारत के इन सर्वश्रेष्ठ मन्दिरों को देखने का परम सौभाग्य अब तक अधिक पुरुषो को प्राप्त नहीं हो पाया है। इसी प्रकार आबू, चित्तोड़गढ़, जगत (उदयपुर), नागदा, चंद्रावती, झालरा- पाटन आदि स्थानों के कुछ प्राचीन देवालयों में खुदाई का काम इतना सुन्दर और बारीकी के साथ किया गया है कि उसे देखकर चकित हो जाना पड़ता है। प्राचीन समय में राजस्थान के मेवाड संभाग मे शिल्पकला बहुत ही उन्नत स्थिति मे थी। बाड़ोली, नागदा और चित्तौड़ के अतिरिक्त मैनाल, बीजोल्या, तिलस्मा, धौड़ आदि के कई मन्दिरी में तत्कालीन तक्षण कला के अपूर्व ५६ / वन्देमातरम् आदर्श प्राप्त होते है। मैनाल (भीलवाड़ा) एक छोटा-सा पुराना गांव है जो अव करीब-करीव उजड़ा पड़ा है पर यहां पहले अच्छी बस्ती होने के आभास मिलते हैं । यहाँ कई पुराने मदिर हैं, जिनमे श्वेत पाषाण का बना महानाल देव का विशाल शिवालय प्रमुख है और इसी के नाम से इस गांव का नाम महानाल (मैनाल) पड़ा है । मदिर के द्वार पर लकुलीश" की मूर्ति बनी है । इसी मदिर के पीछे एक सुन्दर कुआ है, जहाँ से ऊंचे-ऊँचे स्तम्भो पर निर्मित पापाण की नाली से मन्दिर मे जल पहुँचता था । मदिर के आगे सुन्दर खुदाई के काम वाले तोरण है । इस मंदिर के साथ पास ही दुजिला मठ भी है जिसकी मजिल के एक स्तंभ पर अजमेर के चौहान राजा पृथ्वीराज (पृथ्वी भट्ट) द्वितीय के समय का वि. सं. १२२६ (ई. सन् ११६६) का लेख (जिसमें मास, पक्ष, तिथि नहीं दी हुई है) खुदा है जिससे ज्ञात होता है कि यह मठ उक्त राजा के राज्य-काल में भाव ब्रह्म मुनि (साधु) ने बनवाया था। महानाल के मन्दिर के आगे कई शिव-मन्दिर भग्नावस्था मे पडे है, जो वहाँ के महन्तों की समाधियों पर बने प्रतीत होते है । यहाँ से कुछ दूर चौहान पृथ्वीराज (द्वितीय) की रानी सुहव (सुहाव) देवी (रूठी रानी) के महल और उसी का बनवाया हुआ सुहवेश्वर नामक शिवालय है, जो वि. स. १२२४ में बना था ऐसा वहां के लेख से ज्ञात होता है । मैनाल में एक सुन्दर विशाल कुण्ड भी इस समय गिरी दशा में है, जहां अब झरना गिरता है । कर्नल टॉड को यहाँ से एक शिला लेख वि. स. १४४६ का मिला था, जो हाडा शाखा के चौहानों के प्राचीन इतिहास के लिए बड़ा उपयोगी है पर अब वहां उसका पता नही लगता । संभव है टॉड अन्य शिलालेखों के साथ उसे भी इंगलैण्ड ले गये हों। १. यही मत्स्य प्रदेश की राजधानी थी जहाँ पाण्डवो ने द्रौपदी के साथ अज्ञातवास का तेरहवां वर्ष व्यतीत किया था । २. इसको 'लक्ष्मी देवी का निवास स्थान' माना जाता रहा है। इस नगर के माहात्म्य के रूप मे 'श्रीमाल माहात्म्य या पुराण' प्राप्त है । ३. डा. वासुदेव शरण अग्रवाल । 'मातृ भूमि' शीर्षक निबन्ध । ४. १८ फरवरी १९३७ को राजस्थान रिसर्च सोसाइटी, कलकत्ता के प्रागण में विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा सभापति पद से प्रदत्त भाषण का अश । ५. गो. ही. ओझा : राजपूताने का इतिहास (पहली जिल्द) पृ. ३१ ६. उदयपुर के सरस्वती भण्डार में 'रागमाला' को एक चित्रित प्रति है । यह साहित्यिक-सास्कृतिक राजस्थान | ५७ प्रति में 169 चित्र हैं, जिन पर चार लाख रुपये व्यय हुए थे और अकबरी दरवार के चौदह चित्रकारों ने इस पर काम किया था। यह ग्रंथ भारतीय चित्रकला भण्डार का अनमोल रत्न है। इसी प्रकार की चियित पोधियों का सब से बड़ा सग्रह उदयपुर के सरस्वती भण्डार में है। राजस्थान के कई स्थानों में शिल्प-चातुर्य के भी उत्कृष्ट उदाहरण उपलब्ध होते है । उदयपुर से कोई 125 मील पूर्व दिशा में बाड़ोली गाव नयी-दसवी शताब्दियो मे समृद्ध होकर भद्रावती के नाम से विख्यात था। यहां शिव-विष्णु त्रिमूर्ति आदि के कई जीर्ण-शीर्ण मदिर हैं, जिनकी कारीगरी को भारतीय शिल्प के विशेषन फर्ग्युसन ने बहुत प्रशंसा की है और रोप-पायी नारायण की मूर्ति को अब तक देखी हुई हिन्दु-मूर्तियो में सर्वोत्तम कहा है।" कर्नल टॉड ने भी इन मंदिरों की शैली और सुन्दर खुदाई की बहुत प्रशसा की है । 'वाडोली के मन्दिरो को विचित्र और भव्य बनावट का यथावत् वर्णन करना लेखनी की शक्ति के बाहर है। यहाँ मानी हुनर का खजाना खाली कर दिया गया है । उनके स्तभ, छते और शिखर का एक-एक-पत्थर छोटे से मदिर का दृश्य बतलाता है । प्रत्येक स्तभ पर खुदाई का काम इतना सुन्दर और वारीको के माय किया गया है कि उसका वर्णन नहीं हो सकता। ये मदिर सैकड़ों वर्षों के पुराने होने पर भी अब तक अच्छी स्थिति में खडे है।" ये मन्दिर कब बने, इसका ठीक-ठीक निर्णय अभी तक नहीं हो पाया, पर वहाँ पर उत्कीर्ण छोटे-छोटे लेखों में से एक विक्रम संवत् 983 (ई. सन् 926) का है। यद्यपि इस लेख से इनके बनने के सम्बन्ध में प्रकाश नहीं पड़ता पर यह तो निश्चित ही है कि उक्त सवत् से पहले ये मन्दिर बन चुके थे। ये आबू (देलवाडा) के मन्दिरों से भी प्राचीन है पर वहा जाना श्रम-साध्य है क्योकि मार्ग दुर्गम पर्वत श्रेणियो में से होकर निकलता है । संभवतः इसीलिए भारत के इन सर्वश्रेष्ठ मन्दिरों को देखने का परम सौभाग्य अब तक अधिक पुरुषों को प्राप्त नही हो पाया है। इसी प्रकार आबू, चित्तौड़गढ, जगत (उदयपुर), नागदा, चद्रावती, झालरा- पाटन आदि स्थानो के कुछ प्राचीन देवालयो मे खुदाई का काम इतना सुन्दर और बारीकी के साथ किया गया है कि उसे देखकर चकित हो जाना पड़ता है। प्राचीन समय में राजस्थान के मेवाड सभाग मे शिल्पकला बहुत ही उन्नत स्थिति में थी। वाडोली, नागदा और चित्तौड़ के अतिरिक्त मैनाल, बीजोल्या, तिलस्मा, धौड़ आदि के कई मन्दिरो मे तत्कालीन तक्षण कला के अपूर्व ५६ / वन्देमातरम् आदर्श प्राप्त होते है । मैनाल (भीलवाड़ा) एक छोटा-सा पुराना गांव है जो अब करीब-करीब उजड़ा पड़ा है पर यहाँ पहले अच्छी वस्ती होने के आभास मिलते हैं। यहां कई पुराने मंदिर है, जिनमें श्वेत पापाण का बना महानाल देव का विशाल शिवालय प्रमुख है और इसी के नाम से इस गांव का नाम महानाल (मैनाल) पड़ा है । मदिर के द्वार पर लकुलीश" को मूर्ति बनी है । इसी मदिर के पीछे एक सुन्दर कुआ है, जहां से ऊंचे-ऊंचे स्तम्भों पर निर्मित पापाण की नाली से मन्दिर में जल पहुंचता था । मदिर के आगे सुन्दर खुदाई के काम वाले तोरण हैं । इस मदिर के साथ पास ही दुमजिला मठ भी है जिसकी मजिल के एक स्तंभ पर अजमेर के चौहान राजा पृथ्वीराज (पृथ्वी भट्ट) द्वितीय के समय का वि. सं. १२२६ (ई. सन् ११६६) का लेख (जिसमे मास, पक्ष, तिथि नहीं दी हुई है) खुदा है जिससे ज्ञात होता है कि यह मठ उक्त राजा के राज्य-काल में भाव ब्रह्म मुनि (साधु) ने बनवाया था। महानाल के मन्दिर के आगे कई शिव-मन्दिर भग्नावस्था में पड़े है, जो वहाँ के महन्तों की समाधियों पर वन प्रतीत होते है। यहां से कुछ दूर चोहान पृथ्वीराज (द्वितीय) को रानी सुहव (सुहाव) देवी (रूठी रानो) के महल और उसी का बनवाया हुआ मुहवेश्वर नामक शिवालय है, जो वि. स. १२२४ मे बना था ऐसा वहां के लेख से ज्ञात होता है । मैंनाल मे एक सुन्दर विशाल कुण्ड भी इस समय गिरी दशा में है, जहाँ अव झरना गिरता है । कर्नल टॉड को यहाँ से एक शिला लेख वि. सं. १४४६ का मिला था, जो हाड़ा शाखा के चौहानों के प्राचीन इतिहास के लिए बड़ा उपयोगी है पर अब वहाँ उसका पता नही लगता । संभव है टॉड अन्य शिलालेखों के साथ उसे भी इगलण्ड ले गये हो । १. यही मत्स्य प्रदेश की राजधानी थी जहाँ पाण्डवों ने द्रौपदी के साथ अज्ञातवास का तेरहवां वर्ष व्यतीत किया था। २. इसको 'लक्ष्मी देवी का निवास स्थान माना जाता रहा है। इस नगर के माहात्म्य के रूप में 'श्रीमाल माहात्म्य या पुराण' प्राप्त है । ३. डा. वासुदेव शरण अग्रवाल । 'मातृ भूमि' शीर्षक निबन्ध । ४. १८ फरवरी १६३७ को राजस्थान रिसर्च सोसाइटी, कलकत्ता के प्रागण में विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा सभापति पद से प्रदत्त भाषण का अश। ५. गो. ही. ओझा . राजपूताने का इतिहास (पहली जिल्द) पृ. ३१ ६. उदयपुर के सरस्वती भण्डार में 'रागमाला' को एक चित्रित प्रति है। यह साहित्यिक-सास्कृतिक राजस्थान / ५७ संभवतः महाराणा जयसिंह के राजत्व काल (सं. १७३७-५५) में निर्मित की गई थी। इसमें राम सिन्धु को राग दीपक का पुत्र बतलाया है। इसमें राग सिन्धु का एक भव्य चित्र भी है। ७. गौ ही, ओझा : राजपूनाने का इतिहास (पहली जिल्द) पृ. ३२ । ८. ब्रज निधि प्रधावलो (ना. प्र. सभा द्वारा प्रकाशित) भूमिका पृ ५५ १ गो. ही. ओझा . योकानेर राज्य का इतिहास पृ. २८६ १० टी. एच. हैडले : ममोरियल्स आँच दि जयपुर इग्जिविशन (भाग चतुर्थ) भूमिका पृ.२ ११. दि हिस्ट्री आंद इण्डियन ईस्टर्न आर्किटेक्चर, पृ. १३४ १२. दि एनाल्स एण्ड एटिक्विटीज आंद राजस्थान (अक्स-संस्करण पृ. १७५२- १३. लकुलीश (लकुटीश) शिव के अठारह अवतारी में से एक हैं। प्राचीन काल में शैव-सम्प्रदायों में लकुलीश सम्प्रदाय अति प्रसिद्ध था । एतदर्थ अब तक समस्त राजस्थान, मालवा, गुजरात, वंगाल व दक्षिण तक मे लकुलीश को मूर्तियो मिलती है । लकुलीश की मूर्ति के सिर पर जैन-मूर्तियों के समान केश होते है जिससे कोई-कोई उसे जैन मूर्ति मान लेते है। यह द्विभुज होती है, उसके वायें हाथ में सकुट (दड) रहता है, जिससे लकुलीश (लकुटीश) नाम पड़ा और दाहिने हाय मे विजोरा फल होता है, जो शिव की त्रिमूर्तियों के मध्य के दो हाथो में से एक हाथ में पाया जाता है । यह मूर्ति पद्मासन पर बैठी होती है । लकुलोश को किसी-किमी मूर्ति के नीचे नदी और कही-कही दोनो तरफ एक-एक जटाधारी साधु भी होता है। इस समय इस सम्प्रदाय के अनुयायी नहीं रहे। यहाँ तक कि लोग बहुधा इस सम्प्रदाय का नाम तक भूल गये हैं पर प्राचीन काल में इसके मानने वाले कई थे, जिनमे मुख्य कनफड़े (नाथ) साधु रहे होगे, ऐसा अनुमान है। इस सम्प्रदाय के अनुयायी लकुलीश को शिव का अवतार भागते हुए उसका उत्पत्ति-स्थल कायावरोहण कापारोहण, कार वान् बड़ौदा राज्य में) बतलाते थे। लकुलीश उक्त सम्प्रदाय का प्रवर्तक होना चाहिए। उसके मुख्य चार शिष्यों के नाम कुशिक, गर्ग, मित्र व कोरुप्य मिलते है । थी एकलिग जी (उदयपुर-मेवाड़) के पुजारी कुशिक की शिष्य परम्परा से सम्बन्धित थे, जिनमे से हारीत राशि (ऋषि) बापा का गुरु माना जाता है। 0 marm शकुन बत्तीसी ॥ श्रीमाली श्रीवल्लभ घोष राजस्थान प्रान्त की एक लोकप्रिय रचना "शकुन बत्तीसी" है जो 32 दोहो मे पूर्ण होती है । यह रचना लोक साहित्य की धरोहर है। पूरी रचना शकुन शास्त्र के सिद्धान्तों पर आधारित है। जन मानस शकुन प्रिय होता है इसलिए यह रचना इतनी लोकप्रिय हो गई कि इसके दोहे लोक जीवन मे सर्वत्र प्रचलित हो गये । रचना मे शकुन के लक्षणों व फलो का वर्णन है। प्रत्येक दोहे के तृतीय चरण में "सुकन विचारो पथियो" का प्रयोग समान रूप से हुआ है। नौ दोहो में यह चरण नही है। दोहाकार का नाम और रचनाकाल मूल दोहों में नहीं मिलता है । आरम्भ मे जो शीपंक है उसमें "राव जोधाजी अन हरभूजी रा कह्या" मिलता है। इस प्रकार इस रचना का सम्बन्ध दो महान् ऐतिहासिक व्यक्तियों से है। इस रचना की पांच प्रतियां मेरे देखने में आई । चार प्रतियां हस्तलिखित है तथा पाचवी प्रति एक मुद्रित प्रतिलेख रूप में है । इनका विवरण इस प्रकार है- (1) सवत् १८७६ को लिखी, दस पयों में पूर्ण प्रति मेरे निजी संग्रहालय में है। प्रति का आकार ६"x४" है। इसका कागज व स्याही लिपिकाल के अनुरूप है । रचना का शीर्षक व पुष्पिका इस प्रकार है- आरम्भ-श्री गणेपायनमः ।। अथ सुकन वतीसी लिप्यते राव जोधाजी अन हरभूजी रा कहा ॥ पुष्पिका-इति मुकन बत्तीसी सम्पूर्णः ॥ संवत् १८७६ चैत्र सुदि ९ गुरु- वारे : लिखतु जोसी सवाईराम सोजत रा ॥ जोधपुर नगरे लियत् ।। (2) सवत् १८०४ की मेड़ता में लिखी दूसरी प्रति है जो इस समय राज- स्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर के संग्रह में ग्रन्ध सख्या १७१७७ पर मकुन बत्तीसी /५६ संग्रहीत है। इसको पुष्पिका मे हरभुजी कृत होने का उल्लेख है । "सांखला हरभम् जी कृत सम्पूर्ण ।" (३) यह प्रति १९६२ मक्त् की कटालिया ग्राम में लिखी गई। यह रा. प्रा. वि. प्र. के संग्रह में ग्रन्थ सख्या १३७७७ पर सग्रहीत है। (४) यह प्रति संवत् १९४४ को लिखी है और राजस्थानी शोध मस्थान, चौपासनी मे ग्रन्थ सख्या ५४/८ पर संग्रहीत है। इस प्रति के आरम्भ में राव जोधा और हरभूजी का उल्लेख है। इस प्रति मे लिपिकार की भूल से २६ मध्या बाला दोहा नही है और अन्त में अतिम दोहे के बाद ॥ ३३ ॥ लिखा गया है। (५) श्री सौभाग्यसिंह शेखावत उप निदेशक रा. शो. म., चौपासनी (जोधपुर) को हस्तलिखित प्रति मेवाड में मिली थी । उसको प्रतिलिपि करके उन्होंने सकुन बत्तीसी को एक लेख रूप में जयपुर से प्रकाशित मासिक पत्र संघ- शक्ति (वर्ष ५ अक २ पृष्ठ ३४-३६) में प्रकाशित कराई। इस मुद्रित दोहावली मे २८ दोहे है । जान पड़ता है श्री शेखावत जी को कोई खण्डित या अपूर्ण प्रति मिली होगी। उपयुक्त पांचों प्रतियों में रा. प्रा. वि. प्र. को दोनो प्रतियां प्राचीन हैं पर ये गुटकों में कई अन्य कृतियों के माय है तथा लिपि व भाषा भी सुपाठ्य और सहज नहीं है । चौपासनी की प्रति आधुनिक व प्रतिलिपि असावधानी से की जान पड़ती है । श्री शेखावत की प्रति अपूर्ण है अत मेरे निजी संग्रहालय को प्रति पूर्ण सुपाट्य और विश्वसनीय जान पड़ती है। रचनाकार के सम्बन्ध में प्रतियों के आरम्भ और पुष्पिकाओं को देखकर जानकारी मिलती है कि श्री हरभू जी ने राव जोधाजी को ये दोहे मुनाये थे । इस प्रकार हरभू जी सांखला इनके रचनाकार थे या उन्होने भी जन मानस से सुनकर उन्हे सुनाया था। राव जोधा जी व हरभू जी सांखला ऐतिहासिक पुरुष है । राव जोधा जो को १५ वर्षों तक दर-दर भटकना पड़ा था। इस संकट काल में राव जोधा जी फलोदी परगने के गांव बूंगटी में सिद्धपुरुष हरभू जी की सेवा में रहे। इनसे ज्ञान व विवेक मिला और अन्त में राव जोधा जी को सहायता भी मिती, उनका खोया अधिकार मण्डोर पर हुआ । सवत् १५१५- १६ मे नया किला वनवाकर जोधपुर नगर की स्थापना की। हरभूजी की अन्य कोई रचना नहीं मिलती है । रचना को भापा १६ वी शताब्दी की नही जान पड़ती। इसलिए जब तक नई सामग्री उपलब्ध नहीं होती तब तक हरभूजी द्वारा श्री जोधाजी के कहे दोहे ही मानना होगा। हस्तलिखित प्रतियो में पाठ ६०/ वन्देमातरम् प्रकृतियां भी पाई गई है। शब्दों की लिखावट में अन्तर तो है ही पर अनुस्वार मात्राओं की भूले भी की गई है। इस स्थान मे ३२ दोहो का सकलन है पर हम एक-सा नहीं है । सवत् १८०४, १८६२ और १८७६ की प्रतियों का क्रम एक-सा है। प्रत्येक दोहे के तीसरे चरण में "सकुन विचारो पथिया" मे शकुन विचारने का जो प्रश्न है वह किसी पथिक को सम्बोधित है । विपय के अध्ययन से इतना ही ज्ञात होता है कि किसी भी यात्रा के समय आरम्भ मे पथिक को किन-किन लक्षणों के आधार पर शकुन मानने चाहिये । इस रचना मे जिन प्राणियो या वस्तुओं के दाये बाए या आगे पीछे आने- जाने या दर्शन होने पर शकुन प्रभावित होते है वे इस प्रकार है . राजा, भैरव, हल, मोर, मुर्गा, (कुकुंट), माल्हाली, खर, विप, दही, नारी, कुम्हार बंदर, हरिण, सांड, सारस, कोआ, साधु, ब्राह्मण, गाय, वैश्य, आग, वैलगाड़ी, आटा, पत्थर, घी, घड़ा, लोमडी, आदि ! यह रचना लोक समुदाय मे बहुत अधिक प्रचलित होने के कारण सुभाषित के रूप में प्रयोग आती रही है। इसकी भाषा का स्वरूप बहुत कुछ आधुनिक राजस्थानी का-सा हो गया है। राजस्थानी भाषा को उच्चारण विशेषता के कारण हिन्दी के शब्दों में रूप परिवर्तन हुआ है । व्याकरण की दृष्टि से मात्राएं लघु-दीर्घ पाई जाती है और हिन्दी के शब्दों को इसमें परिवर्तित भी किया है । इस रचना के कुछ लोक प्रमिद्ध दोहे इस प्रकार है :- १. राजा डावो जीमणो, जो भैरव कुरलाय । सुकन विचारो पथिया, पग-पग लाख लहाय ॥१॥ २. कूकड़ डावो सुर कर, चोले वारो वार । सुकन विचारो पथिया मान राज दवार ॥४॥ ३. खर डावो विश जीमणो, डावा स्याली ऊत । सुकन विचारो पथिया, अफला विरख फलत ॥७॥ ४. कुंभ करेवो कोचरी, हणवत नै हिरणाह । एता लीज जीमणा, बीजा सब डावाह ॥६॥ ५, अग धुणता मंडली, जो नर गमण करत ते धन धान्य विहूनडा,":परदेसा भटकत ॥१२॥ शकुन बत्तीसी गुपु पिता ६. नाई सामी आवतो, दरपण लीना हाथ । सुकन विचारो पथिया, संपत आवं साथ ॥१७॥ ७. जल भरियो सिर वेहडो, सामी आवै नार । सुकन विचारो पथिया, पावै राज दवार ॥२०॥ ८. गऊ सबछी आवती कबहु सामी होय । सुकन विचारो पधिया, लिछमी लाहा सोय ॥२१॥ ६. वृषभ से जुति वाहिणी, कबहू सामी होय । सुकन विचारो पथिया, राज करेसी सोय ॥२७॥ १०. आटो भाटो घो घडो, तेली ने सोनार । इतरा सामा जो मिले, गांवत रो निवार ॥३०॥ ११ कांटो झगडो सेवडो, खुलां केसा नारि । बामण टीका बाहडो, पांचू परा निवारि ॥३१॥ आधुनिक वैज्ञानिक बुद्धिवाद के युग मे इन शकुनो का महत्त्व कम अवश्य होता जा रहा है फिर भी जनमानस पर इनका परम्परागत प्रभाव शेप है । ६२ / वन्देमातरम् आठवें दशक के राजस्थान के हिन्दी काव्य में मूल्य संक्रमण भगवतीलाल ध्यास मूल्य संक्रमण एक धीमी किन्तु दीर्घकाल तक चलने वाली ऐसी सामाजिक प्रक्रिया है जिसे किसी दशक जैसे लघु काल खंड में बांटना समीचीन नहीं होगा। अत: जब हम आठवें दशक के राजस्थान के हिन्दी काव्य में मूल्य संक्रमण की चर्चा करें तो यह न समझा जाय कि मूल्म सक्रमण को यह प्रक्रिया इन दस वर्षों का ही उत्पाद है। फिर मूल्यों को किसी विशेष भूभाग पर घटित होने वाती घटनाए हो प्रभावित करती हो यह भी आवश्यक नहीं है। युद्ध जैसी घटनाएं समग्र मानव समुदाय के मूल्यों को समर्मित करती है । मानव का काव्य विषय बनना अपने आप में ऐसी महत्वपूर्ण घटना है जिसे मूल्य संक्रमण की दिशा में श्रीगणेश कहा जा सकता है । सत्ता परिवर्तन के आयाम भी मूल्यों में रेखाक- नीय परिवर्तन उपस्थित करते हैं । कोई भी सत्ता मोटे रूप से जन को दो वर्गों में बांटती है-~शासक और शासित । शासक और शासित वर्गों का आधार अवश्य बदलता रहता है पर वर्ग-चरित्र कठिनाई से ही बदलवा है । शक्ति, बुद्धि और धन इन वर्गों के आधार के रूप में अतीत से वर्तमान तक देखे जा सकते हैं । ये ही तीनों घटक विश्व की प्रमुख विचारधाराओ के नियामक भी है। राजस्थान के काव्य से हमारा आशय यदि उस काव्य से है जो राजस्थान को भौगोलिक सीमाओ में लिखा जा रहा है तब तो स्थिति बिलकुल स्पष्ट है किन्तु यदि हमारा आशय ऐसे काव्य से हो जिसमें राजस्थान मौजूद हो तो शायद यह एक कठिन कम हो जाएगा। अलवर से प्रकाशित कविता-१० के एक आलेख में डॉ. हरदयाल के इस तर्क से असहमत होने का कोई कारण नजर नहीं जाता कि राजस्थान के हिन्दी काव्य में राजस्थानीपन नगण्य है । कुछ आठवें दशक के राजस्थान के हिन्दी काव्य"/६३ आचलिक शब्दों के प्रयोग को छोड़कर राजस्थान की हिन्दी कविता में ऐसा कुछ भी नहीं है जो उसे एक विशिष्ट भगिमा प्रदान करता हो । अतः आज की राजस्थान की हिन्दी कविता को सम्पूर्ण हिन्दी कविता के सदर्भ मे ही देखना चाहिये ।' आज मनुष्य जिस क्रूरता का शिकार है वह उसे एक व्यापक स्तर पर सम्पूर्ण मानव समुदाय से जोड़ती है । यह क्रूरता सामाजिक, राज- नैतिक, आर्थिक, धार्मिक, साम्प्रदायिक चाहे जिन कारणों से हो, एक सा ही परिणाम दिखाती है । उसका स्थान विशेष पर घटित होना कोई विशेष महत्त्व नहीं रखता । यही कारण है कि आज को समूची हिन्दी कविता मानव द्वारा मानव के प्रति वरती जा रही क्रूरताओ का एक प्रामाणिक दस्तावेज हुआ चाहती है। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि कवि राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, वंगाल अथवा अन्य किसी प्रान्त का है। क्रूरता भोगना मनुष्य को नियति रही है किन्तु राजनैतिक चेतना के प्रसार के साथ साथ उसकी अनु- भूति अधिक मुखर हुई है। आठवे दशक का आरम्भ वगला देश की जनक्रान्ति से होता है । यह एक ऐसी घटना थी जिसने इस दशक का श्रीगणेश चिरपरिचित मानवीय मूल्यों पर एक भयानक प्रश्नचिह्न अकित करते हुए किया। इस घटना ने राजस्थान के कवि कर्म को भी उसी प्रकार प्रभावित किया जिस प्रकार चीन और पाकिस्तान के साथ हुए संघर्ष की घटनाओं ने किया था। इसके बाद दूसरी महत्त्वपूर्ण घटना देश में आपातकाल को घोषणा थी । आपातकाल की घोषणा देखने में भले ही एक राजनैतिक मतव्यपरक घटना दिखाई दे पर यह स्वतन्त्रता संग्राम के वाद की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना थी जिसने जन चेतना को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप मे काफी व्यापक स्तर पर प्रभावित किया । आपातकाल की घोपणा जिन राज- नैतिक मतव्यों से की गई वह एक इतर प्रसग है किन्तु इतना निश्चित है कि इस घटना ने व्यक्ति के 'स्व' को बहुत गहराई तक आन्दोलित किया और अभि- व्यक्ति पर कठोर अकुश के बावजूद बहुत कुछ ऐसा अभिव्यक्त होता रहा जिसका अभिव्यक्त होना उन स्थितियो में खतरनाक था । सत्तारूढ़ दल के विकल्प के रूप में जनता पार्टी का उदय, श्री जयप्रकाश नारायण का लोक- नायकत्व, जनता पार्टी का विघटन एवम् तद्जनित राजनैतिक उथल-पुथल तथा पुन सत्ता का हस्तातरण आपातकाल की घोषणा के उप-उत्पाद के रूप में देखें जा सकते है। आटवे दशक की इन महत्त्वपूर्ण घटनाओ के परिप्रेक्ष्य में यदि हम मानवीय ६. / वन्देमातरम् मूल्य संक्रमण की छानबीन करें तो कुछ उल्लेखनीय तथ्य प्रकट होते है : (१) शासक वर्ग की तथाकथित शालीनता का मुपोटा उपड़ा है और उसकी स्वाभाविक क्रूरता बर्बरता की सीमा तक अभिव्यक्त हुई है। यह मान- सिक क्रूरता आचरण में शायद ही कभी इतनी अधिक प्रकट हुई हो जितनी इस दशक में हुई। (२) कानून और व्यवस्था के नाम पर चलने वाले अन्धा-धुन्ध दमन चक्र ने सविधान द्वारा प्रदत्त नागरिक मूल अधिकारो के प्रति अनास्था उत्पन्न की है जिसके परिणामस्वरूप व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का हनन हुआ है। (३) प्राकृतिक विपदाओं की आड मे राजनैतिक सौदेवाजी के कारण जीवन की अनिवार्य आवश्यकताएँ महगी हुई हैं । परिणामस्वरूप बाजार में चीजों के दाम जितने बढ़े है मानव मूल्यों में उतना ही ह्रास उपस्थित हुआ है। (४) मानवीय सम्बन्धों में एक ऐसी जडता का उदय हुआ है जो उसे भीड में एक कटरने अकेलेपन का अहसास दे जाता है । एक अजीव प्रकार की टूटन, घुटन और विखराव वायुमण्डल में व्याप्त हो गये है और व्यक्ति स्वय को स्वयं से कटा हुआ महसूसता है । (५) शहर होते हुए गाँव का आदमी आज एक अजीव कशमकश से घिर गया है। एक ओर उसकी अपनी परम्पराए है दूसरी ओर प्रगति का प्रलोभन । वह बड़ी दुविधाग्रस्त स्थिति में एक वेचनी मात्र भोगने को मजबूर है । जहा आठवें दशक ने ये उपहार अनुभूति और सवेदन को दिये है वहां शिल्प और कथ्य की दृष्टि से कुछ विशिष्टताएं भी दी हैं- (१) भाषा को चुस्ती। (२) नवगीत की जगह गजल । (३) भाषा तथा कथ्य दोनों स्तरो पर आचलिकता । (४) व्यग्य का पैनापन । (५) नये प्रतीक और बिम्ब । मध्यप्रदेश से प्रकाशित होने वाली पत्रिका "पूर्वग्रह" के जुलाई-अक्टूबर, १९८० अक के पूर्व लेख को यह मान्यता निरर्थ नहीं है कि हमारे समय में महत्वपूर्ण और वयस्क कविकर्म हो रहा है जिसके माध्यम से न केवल हम अपने अनुभव और भापा की संपदा ममृद्ध कर सकते हैं बल्कि अपने समय के मनुष्य, उसके संकट, उसके सुख-दुःख, उसकी समूची स्थिति को समझ सकने की ओर सार्थक रूप से बढ़ सकते हैं । आठवें दशक के राजस्थान के हिन्दी काव्य.../६५ अपने समय में होने वाले इस वयस्क कवि कर्म के प्रति राजस्थान का कवि भी सजग है तथा अपने उत्तरदायित्व का परिचय दे रहा है । योगेन्द्र किसलय ने राजस्थान के कवि (हिन्दी) दूसरा भाग को भूमिका में ठीक ही कहा है-- "राजस्थान की हिन्दी की नई कविता किसी भी प्रान्त में पीछे नहीं है मिवाय एक बात के कि हमारी कविता पर्याप्त चर्चित नहीं हुई है । कुछ हमारे समा- लोचको की मेहरबानियों जिनकी नजर जब भी पडी बाहर पड़ी। प्रान्त से प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पत्रिकाओं ने भी अपने कवियों का ध्यान कम रखा । कुछ पत्रिकाओ की नजरें तो दिल्ली, इलाहावाद और बनारस में हटी ही नहीं । फिर भी हमारे कवियो की वाहर चर्चा है । "मेरे कहने का आशय इतना ही है कि राजस्थान का कवि आत्मनिर्भर है। जो वह है अपनी रचना शक्ति के कारण है। उस पर कोई प्रतिष्ठानी अथवा इस या उम सेमे की कृपा नही है । और यह शुभ भी है।" आठवें दशक में राजस्थान के कवियों की चालीस पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं । काव्य संकलनो और पत्रिकाओं के कविता विशेपाकों को भी इसमें मम्मिलित कर लें तो यह सख्या साठ तक पहुंचती है। अलवर से श्री भागीरथ भार्गव के संपादन में प्रकाशित होने वाली पत्रिका 'कविता' तथा काकरोली से श्री कमर मेवाड़ी के सपादन में 'सवोधन' पत्रिका के विशेपाक इस दृष्टि में उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त प्रान्त तथा प्रान्त से बाहर राजस्थान का कवि विवेच्य दशक में छपा भी है और गत दशक की तुलना मे चचित भी हुआ है। आठवें दशक की हिन्दी कविता का मूल स्तर मनुष्य की वेचारगी है। इस बेचारगी और छटपटाहट को रेखाकित करते हुए श्री विश्वेश्वर शर्मा अपने काव्य सकलन 'आश्विन के धूप विम्व' में कहते है--- 'वर्जना और निषेध की लक्ष्मण रेखाओ को लांघ कर मनुष्य ने अपनी आत्मीयता को दर्प रूपी रावण के हाथों में विवश छोड़ दिया है । अब अपने ही अहकार के पाश में बँधे मनु पुत्र को सिवाय छटपटाहट, घुटन, आक्रोश और कुछ हाथ नहीं लगता । इस कुठा और वास से मुक्त हो लेने के लिए जैसे इस युग का मनुष्य जी रहा है। एक प्रकार से यह सास्कृतिक क्रान्ति का काल है। सस्कारो के नवीनीकरण का समय है, मूल्यों के पुनस्र्थापन की वेला है। परिवर्तन इतनी तीव्रता से हो रहा है कि कोई भी क्षण की साक्षी नहीं देता। वस, घटित होता जाता है, एक अवाध धारा मे मव कुछ बिगड़ता-बनता चला जाता है।" रुदन के ६६ / वन्देमातरम् युवा कवि एवम् गीतकार कृष्ण कल्पित की कविता 'दरद जुलाहे का की ये पक्तियां हमारा ध्यान उस मनुष्य की ओर खीचती है जो प्रतिदिन ईसा वन- कर मूली पर चढ़ने के लिए बाध्य है- भिक्षा पात्र लिए सड़कों पर जीवन फिरता है। स्वाभिमान चौखट चौखट पर सजदे करता है। भरी जवानी में होते हैं सपने वैरागी आत्मसमर्पण करते जैसे चम्बल के बागी रोज नया ईसा अब तो सूली पर चढता है । (भीड़ से गुजरते हुए) आठवें दशक तक आते-आते मूल्य इतने सक्रमित हो गए है कि आदमी दोहरी जिन्दगी जीने के लिए मजबूर हो गया है । दुराव के लिये वह भांति- भांति के मुखोटों का प्रयोग करता है । उसको कथनी और करनी में कोसो का अन्तर है । काव्य में प्राय. इस दोगलेपन के लिए राजनेताओ को कोसा जाता है किन्तु विडम्बना यह है कि आज आम आदमी चालाक बनता जा रहा है । प्रो. नन्द चतुर्वेदी आदमी के इस चालाक मिजाज की ओर इगित करते हुए कहते हैं- समय आ गया है लोमड़ियों की तरह दुबक कर जलने और चालाक होने का नहीं किन्तु अपने रक्त की गर्मी और प्रवाह और अस्तित्व की मचाई के लिए निकल आने का और आदमी के दबे हुए वक्ष से . ताप जलाने का. और उस सबके विरुद्ध हाँक लगाने का जो आदमी को छोटी और चालांक लोमड़ी बनाता है ! (राजस्थान के कवि-भाग-२) आठवें दशक के राजस्थान के हिन्दी काव्य / ६७ । . ... i वर्तमान सभ्यता ने मानव को मानसिक धरातल पर बहुत बौना बना दिया है। मनुष्य का उत्साह-उमग जैसे सब समाप्त हो गया है। एक मशीनी क्रम ढोना मानो मनुष्य के जीवन को एक अनिवार्यता बन गई है। मनुष्य की टूटन और विवशता जो पिछले दशको मे नगरीय एवं महानगरीय परिवेश मे ही अधिक व्यजित हुई थी, विवेच्य दशक में गाँवों, जगलो, ढाणियों और ठेठ आदिवासी इलाको तक पहुँच हुई है। मणि मधुकर, डॉ. सुधा गुप्ता, डा. जयसिंह नीरज आदि की कविताओं में इसके पर्याप्त उदाहरण देखे जा सकते है। वानगी के तौर पर डॉ. नीरज की निम्नाकित पक्तियाँ दृष्टव्य है. क्या करेंगे हम इत्ती जोत का? भरू, खेतरपाल और माता के मड मे जलाये हुए दीये अपनी अपनी सुविधा देख अंधेरे से डिडी और सड़क नापते राजपथ पर पहुंच गये वह ढाणी अधकार में फिर भाय भाय करती रही। (राजस्थान के कवि-भाग:२) वर्तमान दशक मे मानवीय मूल्यो के साथ- सबसे बड़ा छल हमारे राज- नेताओं ने किया है। ये राजनेता अपने छोटे-छोटे स्वार्थों के पीछे आम आदमी का कितना अहित कर रहे है इसे दोहराने की आवश्यकता नहीं। राजनेता आये दिन नया नारा उछालते है जिससे व्यक्ति की मूल आवश्यकताएँ उसे न कचौटे और एक सुनहरे भ्रम मे वह सारी उम्र गुजार दे। डॉ. मदन डागा ने अपनी कविता 'कुर्सी प्रधान देश' मे बहुत ठीक कहा है- पहले लोग सठिया जाते थे अब कुर्सिया जाते हैं दोस्त मेरे। भारत एक कृषि प्रधान नही कुर्सी प्रधान देश है। आठवें दशक ने आदमी की पहचान तीन भिन्न-भिन्न सेमो मे दी है । पहला सेमा उन लोगो का है जो कुर्सी पर है दूसरे सेमे में वे लोग हैं जो पहले खेमे के लोगों को कुर्सी पर बिठाने और उनकी कुर्सी की सलामती के लिए नाना कौतुक . ६८/ वन्देमातरम् करते रहते है। तीसरे और आखिरी खेमे में वे लोग हैं जो इन दोनों समों में नही हैं । वस्तुतः वे कहीं नहीं हैं, कही के नहीं है । आश्चर्य यह है कि इस सेमे वालों को सख्या बहुत अधिक है लेकिन हर बार वे दूसरे सेमे वालो से छने जाते हैं। कमर मेवाड़ी की कविता 'वे लोग' इसी स्थिति का बेवाक चित्र खीचती है- वे लोग किस्तों में अपनी ज़िन्दगी जी रहे थे फिर भी उनके गाल रूई के फाहो की तरह फले हुए और हर बार तालियों के लिए उनके हाथ हवा में उठ जाते थे उनमें से कई लोग अपनी आवाज शाही तिजोरी में कंद कर दया के पात्र बन गए थे और राजमहल के इर्द गिर्द उमड़ आई भीड़ पर हंसी के झाग बिसेर रहे थे। (कविता, राजस्थान अक) ये तीसरी किस्म के लोग जिन्दगी की हर लड़ाई हारे हैं। इनमे संघर्ष की सभावनाएं अत्यन्त क्षीण हो गई हैं । श्री भगवतीलाल व्यास की कविता 'बस्ती के मुक्त लोगो के लिए' की ये पंक्तियां इसी पराजय बोध को अभिव्यक्ति देती मैं गलत नहीं कह रहा हूँ भाई, यकीन न हो तो कभी जाकर देख आना ये लोग.हर लड़ाई में हारे हैं अपने राजा से हारे हुए अपनी प्रजा से हारे हुए अपने पेट से हारे हुए ठेठ से हारे हुए आठवें दशक के राजस्थान के हिन्दी काव्य.. | ६६ ये लोग अब शायद अपने आप से लड रहे है मगर अफसोस इनकी पकड इतनी ढीली है जैसे इनके हाथ में गिरेवान न होकर गोता की पोथी हो इनकी हर लडाई मुक्ति के लिए होतो है विजय के लिए नहीं। (सम्बोधन, कविता विशेषाक, १९८०) मनुष्य की यह पराजय अकारण नहीं है। इसके लिए वे लोग जिम्मेदार है जिन्हें हम सृष्टा मानते हैं । रामदेव आचार्य ने अपनी कविता 'महाभियोग' मे ठीक ही कहा है-- हमारा सृष्टा हमारे मुखों से शान्ति और विद्रोह के शख बजाता रहा और अपने जीवन में अपने मुख से एक शर्मनाक समझौतापरस्त भापा का उच्चारण करता रहा । हमारे माध्यम से वह व्यवस्था से युद्ध करने का नाटक रचता रहा और अपने जीवन में आत्म समर्पण के शर्तहीन सधि पत्रो पर हस्ताक्षर करता रहा। मैने पूर्व मे निवेदन किया था, मुल्य सक्रमण एक व्यापक स्तर पर घटने वाली घटना है । युद्ध चाहे वियतनाम में हो या ईराक मे। मनुष्य का रक्त चाहे मुरादाबाद मे बहे या अलीगढ़ मे, मनुष्य की हँसी छीनता ही है । श्री जुगमदिर तायल की कविता "हँसी' इसी व्यापक सदर्भ की ओर सकेत करती है जिसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार है- मैने लला खालिद से कहा ७०/ वन्देमातरम् सिर्फ जेरूशलम में मत हंसो मेरी प्यारी धरती को भी हैसाओ मैंने वियतनाम के जगलो से कहा थोड़ा जहरीला धुंआ मेरी हरी भरी धरती को भी पिलाओ तब वियतनाम के जगल और लैला खालिद ने एक साथ कहा हंसी कोई मुघौटा नहीं है न कोई कौशल हँसी भीतर से फूटती हुई कविता है जिसे लिखते समय अंगुलियों के पोर जलने लगते है । मूल्य सक्रमण का यह सिलसिला वियतनाम से लेकर व्यक्ति के घर-आंगन तक मौजूद है। अत्यत कोमल और आत्मीय सम्बन्ध भी इसके प्रभाव से नही बचसके हैं। डॉ. रणजीत की कविता 'टूटन' पारिवारिक सम्बन्धों के विघटन का एक सशक्त चित्र उपस्थित करती है- हुआ यह है कि अपनी बीवी से मेरा सम्पर्क टूट गया है जो कुछ था हमारे बीच बरसो से न जाने कहाँ छूट गया है ऊपर-ऊपर से सब ज्यो का त्यों दिखता है पर भीतर ही भीतर कुछ है जो पूरी तरह टूट-फूट गया है वह टूटा हुआ बजता रहता है हमारे सवादों के बीच। मनुष्य को इस विसगतिपूर्ण जीवन यात्रा में भी कम ही सही, कुछ पड़ाव ऐसे हैं जो इस बात के लिए आश्वस्त करते है कि मूल्य परम्परा में अब भी कुछ शेप है जिसे सहेजा जा सकता । श्री हरीश भादानी की इन पक्तियों में ऐसा ही विश्वास प्रकट हुआ है- खामोशियों की छते आबनूसी किवाड़े घरो पर आठवे दशक के राजस्थान के हिन्दी काव्य" /७१ आदमी आदमी बीच दीवार है तुम्हें निया लेकर बुलाया है सीटियों से साम भर कर भागते वाजार, मिलों, दफ्तरो को रात के मुद्दे देखती ठण्डी पुतलियां आदमी अजनवी नादमी के लिए तुम्हे मन पोलकर मिलने बुलाया है । (कविता, राजस्थान अक) यह सही है कि मूल्य मक्रमण जो कारक है वे हमारे नियंत्रण में नहीं हैं और इम अवश्यभावी प्रक्रिया को हम रोक नहीं सकते पर श्री हरीश भादानी के कवि के आह्वान पर दीवारो को काटने के लिए हम आनी छैनी को पनी तो कर हो सकते है । दिल खोलकर मिलते हुए आदमी-आदमी के बीच फैले गजनवीपन के जगल को किसी सीमा तक तो काट ही सकते है। डॉ. प्रकाश आतुर को कविता 'कब तक?' वर्तमान विसंगतियो और मूल्य- हीनता पर प्रश्न टागती हुई हमे मतत संघर्ष की चुनौती देती है- कब तक बेजुबान बने रहेंगे चौराहे, नुक्कड, गलियो के मुहाने कब तक वहकाओगे भूगोल की दिशाओ को कब तक घृणा के बीज वो कर काटते रहोगे साप्रदायिक फसलें कब तक चौकसी करते रहोगे भययुक्त लूट, कपy, बलात्कार बारूदी मौसम की सुनते हो छोटे छोटे घेरों में अब नहीं टूटेगी आक्रोश की असयत लहरे । यदि व्यवस्था के प्रति हमारा आक्रोश कायम रहा तो निस्संदेह व्यवस्था को बदलना होगा। व्यवस्था के इस बदलाव में 'कविता को हथियार' की भूमिका निभानी पड़ेगी जैसी कि उमने हमारे देश मे और अन्य देशों में भी समय-समय पर निभाई है। ७२ / वन्देमातरम्
हमारी शुभाकाक्षा है कि कविता का हथियार अधिक धारदार बने और
आने वाले समय में अपना चमत्कार दिखाये ।
संदर्भ-सामग्री
(१) कविता-१० (राजस्थान के कवि-कविता अक)
मंपादक : भागीरथ भार्गव, डॉ. जयसिह नीरज
कविता प्रकाशन, आर्य नगर, अलवर (राज.)
(२) पूर्वग्रह ३०-४० (जुलाई-अक्टूबर, १९८०)
संपादक : अशोक वाजपेयी, मध्यप्रदेश कला परिषद,
टैगोर मार्ग, भोपाल (म. प्र.
(३) राजस्थान के कवि (हिन्दी) भाग दूसरा-सपादक : योगेन्द्र किसलय
राजस्थान माहित्य अकादमी, उदयपुर. प्रथम सस्करण १६७८ ।
(४) आश्विन के धूप बिम्ब · विश्वेश्वर शर्मा, राजस्थान साहित्य
अकादमी, उदयपुर (राज), १९७७
(५) सम्बोधन (मासिक) संपादक . कमर मेवाडी, राजस्थान हिन्दी
कविता विशेषाक स्वाधीनता दिवस, १९८०
(६) राजस्थान की हिन्दी कविता-~-डॉ. प्रकाश आतुर, सघी प्रकाशन,
उदयपुर, १९७६
आठवें दशक में प्रकाशित राजस्थान का हिन्दी काव्य
(१) मदनलाल डागा-अनजानी मलीवों पर, १९७१
(२) डॉ. जमिह नीरज-दुःखान्त समारोह, १९७१
(३) सं० वसन्तकुमार व्यास-अन्तर्कपोत परिवेश के, १९७१
(४) अफजल खा अफजल-अजाने स्वर, १९७२
(५) कैलाश जोशी, रामनाथ परिकर - बगभारती, १९७२
(६) सं. प्रीतमसिंह वागरेचा प्रश्न भरी दृष्टियां, १६७२
(७) कुमार शिव-शंख : रेत के चेहरे, १९७३
(८) तारादत्त निर्विरोध-गीत यात्रा
आठवे दशक के राजस्थान के हिन्दी काव्य.." | ७३
(6) विश्वेश्वर शर्मा-आश्विन के धूप बिम्ब (१०) ज्ञान भारिल्ल-सांस उतरी (११) योगेन्द्र किमलय-~और हम. १६७३ (१२) मरुधर मृदुल-शब्दो का घूघट, १९७३ (१३) जुग मदिर तायल-जगल से गुजरते हुए, १६७३ (१४) गुरुदत्त सोलकी-तालारुय और अन्य कविताएं, १६७३ (१५) हेमन्त शेष-जारी इतिहास के विरुद्ध, १६७४ (१६) विजेन्द्र--जन शक्ति, १९७४ (१५) अक्षयकोति व्यास-प्रताप शतक, १६७४ (१०) कन्हैयालाल सेठिया-निग्रन्थ, १९७५ (१६) सावर दइया-दर्द के दस्तावेज, १९७६ (२०) कुमार शिव-पंप धूप के, १९७७ (२१) स. प्रभाकर आर्य--युगदाह, १९७७ (२२) कमर मैवाडी-बहस अभी जारी है, १९७७ (२३) अफजल खा-कठिन रास्तो पर, १९७७ (२४) भगवतीलाल व्यास-शताब्दी निरुत्तर है. १९७७ (२५) डॉ. सुधा गुप्ता-चेतना के फूल, १९७७ (२६), -रोशनी को शहतीर, १६५७ (२७) त्रिलोक गोयल-त्रिलोक गोयल की कविताए, १९७७ (२८) स. योगेन्द्र किसलय-राजस्थान के कवि भाग-२ (हिन्दी), १९५६ (२९) सावित्री डागा - सदों के कटे हुए (३०) डॉ. विश्वभर उपाध्याय-कवध, १६७८ (३१) मणि मधुकर--बलराम के हजारों नाम, १६७८ (३२) --धास का घराना, १९७८ (३३) रामदेव आचार्य-रेगिस्तान से महानगर तक, १६७८ (३४) बी. आर. प्रजापति एक मुट्ठी धूप, १९७८ (३५) रेवती रमण शर्मा-जमीन से जुड़ते हुए, १९७८ (३६) हरीश भादानी-नष्टो मोह, १९७६ (३७) कृष्ण कुमार वशिष्ठ-अक्षत, १९७६ ७४/ वन्देमातरम् " "
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एक और कबीर : सैयद कमालशाह
घायल
चतुर कोठारी
सैयद कमालशाह "घायल" का जन्म राजनगर (राजसमद) जिला उदयपुर
राजस्थान मे सन् १८३३ में श्री गुलाम मोहम्मद साहब कादरी के परिवार मे
हुआ। श्री गुलाम मोहम्मद साहब को एक मात्र सन्तान श्री फतेह अली संयद
"गोश" आपके पिता थे। आपकी मृत्यु ६६ वर्ष की अवस्था मे १४ अप्रैल,
१६२६ को हुई । आपका मूल नाम कमालुद्दीन था। एक बार आप अजमेर
तशरीफ ले गये । वहां पर किसी ने आपका परिचय पूछा तो आपने अपना
परिचय यों शायरी मे दिया-
(१) जिस जगह रहता हूँ उसका नाम है
मुनफ अद हरफो मे वो अरकाम है
रे अलीफ और जीम साकीन नुन नाम
गाफ रे को तू मिला ए नेक नाम ।
(२) वो इलाका उदयपुर का है यार
जिस जगह रहता है अजीज खाक सार
काकरोली से फक्त दो मील है
और समन्दर वहा का मिसले नील है।
(३) है मुसनीफ का कमालद्दीन नाम
मैं तो हूँ सादात के घर का गुलाम
बुजुर्गों का
तो सिन्ध है
अब ये बाशिन्दा मुल्के हिन्द है ।
वतन
७६ / वन्देमातरम्
। - श्री 'घायल" की शिक्षा किसी पाठशाला में नहीं हुई। प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही पिता श्री के द्वारा पूरी हुई । वे अरबी, फार्सी और उर्दू भाषा के अच्छे विद्वान थे। राजस्थानी मिथित हिन्दी का ज्ञान भी उन्हे कम नहीं था। श्री "घायल" सादगी पसन्द व्यक्ति थे। साधारण खान-पान एवं गरीबी के जीवन से उन्हे बड़ा लगाव था। पर विचारो के बडे धनी व्यक्ति थे । "सादा जीवन उच्च विचार" वाली कहावत निसदेह आपके जीवन पर चरितार्थ होती है। इसी मादगी के प्रति लगाव प्रकट करते हुए आपने एक जगह लिखा है- कोई है लाल के सदके, कोई है हीर के सदके । हम खुशक रोटो विन बगारी दाल के सदके । कमालशाह अपने समय के एक अच्छे शिक्षक व हकीम तो थे ही, पर महान् चिन्तक व साहित्यकार भी थे । आपके समय में छापे खाने का अधिक विकास नहीं हुआ था, अत. जीवन का अधिकाश समय कुरान शरीफ और धार्मिक पुस्तको के लेपन में व्यतीत हुआ। जीवन काल में अपने हाथ से कुरान की लगभग दो सौ पुस्तके लिखी। साथ ही शरियत अर्थात् धार्मिक कानून की कई पुस्तको का लेखन भी आपने किया। मुसलमानो में "संपद" जाति सवसे ऊंची मानी जाती है। ऊंची जाति मानने का कारण यह है कि यह जाति पैगम्बर मुहम्मद साहब के नवासे इमाम हसन हुमैन के वशज की है, लेकिन सैयद' जैसी उच्च जाति में जन्म लेने के पश्चात भी कमालशाह अपने को उच्च जाति याने मुहम्मद साहब के वश के योग्य नहीं मानते थे। और कहा करते कि-मै तो उस वश का गुलाम हूँ। मैं तो सादात का चाकर और गुलाम । "धायल" नामकरण-एक बार राजनगर (राजसमद) में कोठार के पास एक मकान में एक शेर घुस गया। किसकी हिम्मत थी कि शेर को नगर से जगल मे भगाये । कुछ लोगों ने कमालशाह को शेर से लड़ने के लिए प्रेरित किया । फिर क्या था? साहसी कमालशाह एक छुरी लेकर शेर से भिड गये । हिम्मत के साथ छुरी सहित अपना हाथ शेर के मुंह में डाल दिया। शेर ने कमालशाह को घायल तो कर दिया, पर उन्होने भी शेर का काम तमाम कर दिया। इस प्रकार शेर से लड़कर घायल होने वाले कमालशाह को बाद में "घायल" खिताब से पुकारा जाने लगा। और इसी "घायल" खिताब का प्रयोग आपने अपने भजनों, प्रभातियो और दीगर पद्य रचनाओं में किया है। जिसकी एक और कबीर : सैयद कमालशाह / ७७.
पुष्टि करते हुए आपने एक शेर में यों कहा है कि- में तो हूँ सादात का चाकर और गुलाम । कविता में उस्ताद ने दिया "घायल" नाम ॥ महाराणा को भेंट अस्वीकार-श्री कमालशाह की जन-सेवाओं से प्रभा-, वित हो मेवाड़ के तत्कालीन महाराणा श्री फतेहसिंह जी ने एक बार आपको, दरवार में बुलाकर पांच सौ रुपया नकद व एक साफा भेटस्वरूप दिया, . लेकिन कमालशाह ने उमत भेंट लेना अस्वीकार कर दिया और महाराणा से कहा कि- मेरा पुष सरदार आपके रावले की सेवा करता है । मैं भक्ति करता हूँ। मुझे ईश्वर की भक्ति का लालच है, दुनिया के माल, धन किसी को परवाह नहीं है। वसीयत-श्री कमालशाह की अन्तिम वसीयत यही थी कि मेरी का कच्ची ही बनाना ताकि लोग यह न जान म कि मैं कहां सो रहा हूँ। मेरी लम्बी नीद में खलल न पड़ने पाये । मगर उनके चाहने वालो ने नोचौको मार्ग पर उनका मजार पक्का बनवा रखा है। पूर्व दिशा में श्री कमालशाह का. मजार है। उसके पास ही उनके दोनो पुत्र श्री सरदार अली व उमराव अली. के मजार स्थित हैं। मरने के बाद भी कुछ लोगो ने कहा कि कमालशाह का निधन हो गया है, तो सुनने वाले व्यक्ति ने कहा कि आज ही सुबह तो वे मुझसे मिले है, यानी मरने के बाद भी लोगो द्वारा उन्हें देखने व मिलने की लोक चर्चा है । ऐमा लगता है कि मृत्यु से उनका साक्षात्कार हुआ है-- एक चोर ने धूम मचाई कोई नाय चली चतुराई । चार वीर ता वीच नायक ताके कण्ठ मरोड़े। गढ़पति की एक नहीं मानी सातो ताला तोडे । कोट न टूटो भीत न फूटी नाम जुस उठाए । आभूषण उन इक ही ना लीनों निज विद या ऊचाई। आत-जात दीखत नाही नजर बद कर दीनी ।। मब सखियो को मुरछा आई चाहत वस्तु लीनी। कम्पत राजा कम्पत प्रजा तज गर अकः अकारी ॥ कहे 'घायल' अति मूढ है मूरख है बलवन्त अकारो। भजन (कमाल भजन माला-चतुर्थ पुष्प) ७८/ वन्देमातरम् कृतित्व-श्री कमालशाह द्वारा अरबी, फारसी व उर्दू में हस्तलिखित कई पुस्तकें उपलब्ध हैं । राजस्थानी मिश्रित हिन्दी में "कमाल भजन माला" नाम से सात पुष्प प्रकाशित हुए है, उनमें से कुछ पुष्प तृतीय, चतुर्थ व पचम उपलब्ध है। इनका प्रकाशन काल दीपावली १९६६ है । प्रकाशन कमालशाह के पौत्र मुशी अली अकबर ने कराया । और मुद्रक हैं पडित रघुनाथ पालीवाल नाथद्वारा (मेवाड़)। प्रत्येक पुष्प का मूल्य एक आना रखा गया है । प्रथम वार २०० प्रतियां छापी गई। इसके अलावा अन्य कोई सामग्री प्रकाशित नहीं हो पाई है। लगता है कमाल के भजनो का प्रभाव लोक जीवन में अधिक था अतः उनकी स्मृति मे ही यह प्रकाशन हो पाया है। कबीर की तरह कमालशाह भी निर्गुण निराकार ईश्वर की आराधना करने वाले सन्त थे। एक नायिका के रूप में ही आपने ईश्वर की आराधना की है । आपने सम्प्रदायवाद, हिन्दू-मुसलमानों को फिरकापरस्ती, पाखण्ड और झूठी परम्पराओ पर साधारण वोल-चाल की भाषा में गहरी चोट की है। आपने ग्रामीण संस्कृति में स्थापित प्रतीको के माध्यम से शरीर, आत्मा, पंच इन्द्रियों, काल आदि को सटीक चित्रों मे उभारा है तथा मनुष्य को सचेत हो, जागकर ईश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त कर ईश्वर मे रमने के लिये प्रेरित किया है। भक्ति-दर्शन-कमालशाह दार्शनिक होने के साथ-साथ कवि हृदय भी थे, और हर वात का जवाब कविता मे दिया करते थे। कोठारिया के रावजी ने जब इनकी काफी तारीफ सुनी तो एक व्यम्ति के साथ यह लिख भेजा कि यदि खुदा है तो कहाँ है ? श्री कमालशाह ने उसी कागज पर वापस यह उत्तर लिख भेजा कि है कहूँ तो कहाँ बताऊँ नही कहूं तो है । दोनों है के बीच में जो कुछ है सो है। पाखण्ड-विखण्डन-पाखण्ड विखण्डन करते हुए कमाल शाह ने इस संसार के प्राणियों को कहा है कि ये सभी पन्थ तो गोता देने के रास्ते हैं । अगर शुद्ध पन्य को चाहता है तो प्रथम तो अपनी काया को शुद्ध कर, फिर निरगुनी के रग में रग जा। तेरा पन्थ नहीं पाया, मैं हेर हेर घबराया मन्दिर हेरा मस्जिद हेरी, थानक शीश झुकाया। भरम की टाटी परतन फाटी, फिर फिर जन्म गमाया न्हाय धोयकर तिलक लगाया, हर्पित शख बजाया। एक और कवीर सैयद कमालशाह | ७६ - दीपक जोड़ आरती गाई, सारा नगर जगाया ज्योति अखड को करिके सेवा, जमला जाय जगाया। पन्थ की साड़ी में गोता खाए, सब पापण्ड उपाया जो तू चाहे शुद्ध पन्य तो, प्रथम शुद्ध कर काया । 'घायल' रग लगा निरगुन का, जिन सब रग बनाया भजन (कमाल भजन माला चतुर्थ पुष्प पृ. ५) साधु-सन्यासियों के ज्ञान, जप, माला, छापा, तिलक, गंगा-स्नान करने, हस्तरेखाएँ देखने आदि पर चोट करते हुए कहा कि जिन्हें अपने वारे में ही शुद्ध ज्ञान नहीं है वे साधु दुनिया को क्या बतलाएंगे? यह सव कुछ धौषा देना है-भोले मनुष्यो को लूटना है- सब अपनी अपनी गाते है, निरकार भेद नही पाते हैं। पूरब जनम अगम पच्छम का पण्डित भेद बताते हैं । रेख करम अपनी नही जाने औरों को भरमाते है । गंगा जा स्नान किया और काया शुद्ध बनाते है । मन का मैल कभी नहीं छूटे उल्टा पाप कमाते हैं । काजी मुल्ला खोल किताबें निरंकार पद गाते हैं । अर्थ निरर्थ को कोउ ना जाने अपनी तात बजाते हैं। 'घायल' तन्त्र निरन्जन सुमेर वही सन्त कुछ पाते हैं ।। प्रभाती (कमाल भजन माला-तृतीय पुष्प पृष्ठ ३) कमालशाह ने जीवन के अन्तिम पड़ाव में जो कुछ लिखा है, लगता है वह अनुभव कञ्चन जैसा मूल्यवान व परा है । वृद्धावस्था में जो कुछ अनुभव हुआ उसमे शरीर को रस-राग की एक पेटी ही माना और जगाने की चाबी देने के लिये कहा है, सचेत करने के लिए कहा है- या पेटी रस-राग की, दे दे चाबी जाग की। कारीगर ने मशीन बनाई गुप्त पवन जल आग की। पाच खार की पान लगाई छल बल सब है नाग की। स्वासा तार प्रेम पद गावे ठुमरी देश भाग की ॥ स्वर और ताल धरी बटकल सु मशीन करी बे लाग की। अशान करे अज्ञानी होवे । झूम झूम स्तुति गावे निरगुन मे बेराग की। ८०/ वन्देमातरम् पावे रीझ मोज तूं घायल अपने अपने भाग की॥ रोझ प्यारे प्राणपति की देखो अमर सुहाग की। प्रभाती (कमाल भजन माला-तृतीय पुष्प पृ. जवानी के बाद शरीर अशक्त हो गया। वृद्धावस्था आ गई। अब जीव- की गाड़ी चलाने मे बड़ी कठिनाई होती है, तो शरीर को बैलगाडी के प्रतीक रूप मे प्राणी मात्र को चेतावनी देते हुए कहते हैं कि- तेरी गाड़ी हो गई पुरानी, तू चेत चेत अज्ञानी । ओदन के बद बड़कन लागे कड़कन लगी कमानी ।। कील कील हो गई ढीली मत कर खेंचा तानी । जूनों ठाट काठ धन खायो, चाल चले मन मानी ॥ पिन्जनियाँ अदबीच सू टूटी मन मूरख अभिमानी । बैल थके दो हत भी टूटे पूठी पूठ दिखानी ॥ बिखर गए सब फाचरा मुड़ गई लोर निमानी। कहे "घायल" सब कल कल विखरी तो भी नही पिछानी ।। उलट गई जब गाड़ी वन मे गुडक गए सैलानी। भजन (कमाल भजन माला चतुर्थ पुष्प पु. ४) जीवन को रेल और मन को उसमे यात्रा करने वाला मुसाफिर मानकर जीवन को वस्तु-स्थिति का ज्ञान कराते हुए लिखते हैं कि हे मन ! तू अपनी इच्छाओ का त्याग कर- मुसाफिर रेल विखर गई तन की, पर हर नही जावत मन को। अगनी बल सू सव जल सूखो मिट गई तपत अगन की। भस्म हुए सब काठ कोयला चाल थकी अजन की। लालटेन की जोत बिलाई लिपटी पवन पवन की। अन्त लेन पर भई अधियारी आई टेम चलन की। चौकीदार ध्वजा दिखलावे रग कर लाल विरन की। सिगनल के दोई हत्ता टूटे झण्डी देख विगन की। स्वासा सीटी पड़ गई फोटी फूक गई धम्मन की। टूटे तार मुसाफिर अटके चिट्ठी यांच गवन की ।। एक और कवीर : सैयद कमालशाह /८१ खाई। लेट हुई जब रेल ए 'घायल' उलटी मेल जतन की । गजर वजा और हो गई घण्टी गोरखपुर टेशन की। भजन (कमाल भजन माला-चतुर्थ पुष्प-पृ. ३) जीवन रक्षा के कवि ने लाख उपाय किये, पर एक न चली और शरीर रूपी सेत मे बोई हुई खेती खाकर मृग चला गया। कवि ने अपनी व्यथा को अभिव्यक्ति करते हुए मार्मिक शब्दो मे मन के भेद को यो खोला है- करूं क्या मृग ने खेती खाई, मेरी कोई ना चली चतुराई । काया खेत सास हल होक्यो करम किचाड लगाई ।। और निज नामक वीज छांटियो शील सन्तोप सुहाई। मन माली ने अन्त जतन से तन की खेती बाई ।। डर विश्वास भंवर रखवाली चोको भजन विठाई। एक मृग और चार मृगनियां वाड़ी मे घुस आई । रखवाली सं हेत लगायो हरयाली सव मृगा बेत हमें कर छल बल पाप की पवन चलाई। घर भेदू मिली खेत खवायो 'घायल' कहो न जाई। भजन (कमाल भजन माला-चतुर्थ पुष्प पृ. ५) भक्त कवि ने मन को मूर्ख और अभिमानी कहते हुए कहा है कि नो मास तक शरीर रूपी चादर को बड़े जतन से बनाया, पर तूने इसकी सार-सम्भाल नहीं की। इसका ताना-बाना टूट गया और यह शरीर अब जरा-जरित हो गया है। तूने अमानवश इसे मैली कर दी है जबकि कबीर ने कहा कि- ज्यो की त्यो धर दीनी चदरिया । यहाँ कवि की वाणी दृष्टव्य है-- चादर हो गई पुरानी तू लायो मांग बिरानी ॥ सात सयी मिली पूणी कातो और चढाई तानी । पाँच जणा मिली रेजो बुन्यो कर कर खेचा तानी । नौ मास ता वुनता लागा, धोई चोवटे आनी। प्रेम-प्रीति सू करी उस्तरी मूंगे मोल बिकानी । साधु सन्त ओल्या ओढ़ी धो धो निर्मल पानी। मूरख नर चादर ने राखी पर जानी मन मानी। ८२ / वन्देमातरम् ताना कटा वाना टूटा ऊन गई विखरानी । "घायल" चादर मेली कोनी मन मूरख अभिमानी । दीगर (कमाल भजन माला-पंचम पुष्प पृ. ३) चेतावनी-अपने संगी-साथियो, शिष्यो व संसार के लोगो को कबीर की तरह ही चेतावनी देने में कवि चूका नहीं है। जीवन के गहनतम अनुभवों को शब्द देते हुए कवि कहता है कि इस शरीर रूपी महल में काल रूपी ऐसा चोर आएगा जिसके पास न हथियार है न कुछ। न वह दीवार तोडता है, न कुछ धन माल हो लूटता है । व्यक्ति को शक्ति उस समय यों की यों धरी रह जाती है। चोर चोरो कर चला जाता है और महल के मालिक मन राजा को कुछ नही चल पाती है- इक चोर महल मे आवेगा नही सस्तर आयुध लावेगा। फोड़ी भीत न खोदी खाई सांधा नाही लगावेगा । साकल ताला कोई ना खोले मन्दिर में घुस आवेगा । होरा मोती सोना रूपा ना कोई वस्तु उठायेगा । पड़ा रहेगा हीरा उठंग उड़ावेगा। महावीर बलवन्त मूरमा ना कोई आंख मिलावेगा ॥ दिन धोले वो धाड़ो नाक मोहन । मूठ चलावेगा। दुरवल देह अनाथ नाथ पर बिल्कुल दया न लावेगा ॥ ए “घायल" . बलवीर का सस्तर खूटी पर रह जावेगा। दीगर (कमाल भजन माला--तृतीय पुष्प पृ. ६) अन्तिम सीख-जीवन के अन्तिम समय मे जो कुछ अनुभव हुआ सार स्वरूप ससार के लोगों के लिये आपने लिखा । एक भजन मे आप अपने को सखी-मान- कर कहते है कि ये पांचों इन्द्रियां रूपी सहेलियाँ मुझे संसार सागर में अकेली छोड़ गई है अर्थात् सभी ने साथ देना बन्द कर दिया है और अब यह दुल्हन कर्म की गठरी बाँध कर अकेली ही पियर त्याग कर अपने प्रियतम के घर जा रही है। तुम सुनो री आज सहेली, पिया घर जावत अलवेली ॥ अन्त: कोर .कुलच्छन नारी पांचो . होकर भेली। माया मोह में मोए फसाई अन्त भई. मैं गेली।। एक और कबीर : सैयद कमालशाह /८३ माल खजाना छोटी सु मोटी भई अलि रेन दिना सग ली। छोड गई भव के सागर में रप गई हाय अकेली ॥ जावत आज भयानक नगरी मगदा रूप नवेली। सुबस बसायो देश तुमारो मडप महल हवेली ॥ पिहर में पिय हरके बेटी मद जोवन में फैली। 'घायल' दुल्हन जात अकेली शीश गठरिया ले ली ।। भजन (कमाल भजन माला-पंचम पुष्प-पृ. २) इस संसार मे जन्म और मृत्यु को आना और जाना मानकर प्राणो को राही (बटाऊ) सम्बोधित कर कहा है कि- बटाऊ मनख जनम यू ही खोयो रे ! गगाजी सूं नीर मगायो नीर मे नीर समोयो रे ॥ कर स्नान करी शुद्ध काया मायलो मैल न धोयो रे । बाल पनो हँस खेल गमायो भर जोवन में सोयो रे । मोह लोभ में कई नही मूज्या वृद्ध भयो तव रोयो रे । अन्त समय पर भजन न कोनो गेहरी नीद मे सोयो रे ।। पतित भयो लालच के. फन्दा अन्त मोल भी खोयो रे। तीनों ही काल गये अधर्म में तन्त नाम ना जोयो रे ।। अधरमी 'घायल' तेरे अधरम सूं पापी ने पाप डवोयो रे । दीगर (कमाल भजन माला-पचम पुष्प-पृ. ३) कवि कहता है कि अव ईश्वर के घर से सदेशा आ गया है अत. ससार का जो कुछ देना-लेना शेष है, उसे चुका कर ही जाना और साहूकार की तरह अपनी साख जमाना-- आया प्रियतम का परवाना, तू रीते हाथ न जाना ॥ दानी आकर दान जो माँग मत ना वस्तु छिपाना । कोही कोडी हासल देके चिट्ठी माल कटाना ।। सत का सौदा वेच बावरे भर्यो माल खजाना। लालच के मत भूल भरोसे मत ना मोल' लगाना ।। तन्त माल के अक्षर माडे वो ही निज माल भराना। साचे रहो साहूकार से अपनी बढिया पेठ बढाना ॥ ८४/ वन्देमातरम् ठग एक कुटिल वात में बैठो प्राणो .प्राण बचाना । 'घायल' कहे एकन्त नगर मे एक दिन वास वसाना ॥ भजन (कमाल भजन माला-चतुर्थ पुष्प पृ.-७) अपनी सीख में आगे आपने कहा कि और एक दिन ऐसा आएगा कि यह शरीर प्राणों का साथ देने से मुकर जाएगा। अतः ए प्राण ! तू कपटी शरीर का संग मत कर कर्ता की ओर ही ध्यान लगा। चल दिये प्राण मुकर गई काया। प्राण कहे सात स्थल में हमने जीव छिपाया । चहुँ ओर मे निरमुख आए पांच मिन ने मिल पकडाया। मैं जानूं तो सग चलेगी कावा हज कराया ।। जमजम काजल भरकर लाया जमना जल स्नान कराया। पात्रो मित्र निकस गए कपटी काम पडे पर जाया॥ काया का अव दोप कहाँ है करम लिखा था हमने पाया। कहे 'घायल' कपटी की मग करके वृथा जन्म गमाया । दीगर (कमाल भजन माला-पचम पुष्प-पृ. ४) भक्त कवि को अनुभव हुआ कि जो जैसी खेती करेगा वह वैसा ही फल प्राप्त करेगा । अत. हे प्राणी ! ससार मे रह कर जीवन में अच्छे-अच्छे कार्य करना । मदा सावधान रहना, नही तो खेती मुफ्त मे ही नष्ट हो जाएगी। अत हे बावरे मन ! तू अच्छी खेती करना । मन वावरो रे तू आछी करजे खेती। आछो धरती देखा पना को ऊसर सेती रेती ।। हल हाके तो तन्त नेहसू छाटे वीज अगेती। भजन भाव को पानी दीजे रहे वावड़ी वहती ॥ हासल दे और घर मे खावे वा खेती करमेनी। करज राज को जमा कराने जद आवे कामेती ।। शील दृढ सुं कर रखवाली मत ना न्हाक पछेती। 'घायल' तक पर करजे खेती मत करजे अनवेती ।। कमर वाध नित चोकस कीजे खेती धणिया सेती। दीगर (कमाल भजन माला-पंचम पुष्प-पृ. ७) एक और कवीर : सैयद कमालशाह / ८५ :
इस प्रकार कमालशाह ने बुगीन प्रभाव में न बह कर संसार के लोगों को मनुष्य जन्म को वृथा न गंवाकर अच्छे कार्य करने व जीवन के मर्म को समझाने के लिए भजन-कीर्तन शैली का उपयोग किया । क्योकि लोक शैली में गीतो और भजनो का जो प्रभाव धार्मिक काल में भारतीय जनता पर कबीर, मीरा, सूर आदि का हुआ, लगता है वही प्रभाव इस युग में राजस्थान के अन्य सन्त चतुर सिंह जी के साथ निरगुणी भक्त कवि सैयद कमालशाह 'घायल' का भी रहा । इस सम्बन्ध में इतना ही लिखना पूर्ण नही होगा। विज्ञ पाठको के लिये कमालशाह के साहित्य के अध्ययन व शोध की तो आवश्यकता है ही पर अप्रकाशित साहित्य के प्रकाशन मे अरबी, फार्सी, उर्दू व हिन्दी के वाइ मय की अभिवृद्धि होगी । ऐसा मेरा विश्वास है। ८६ / वन्देमातरम् डॉक्टर पाण्डुरंग रूपनारायण काबरा सांभर झील कोई छोटा मोटा कस्बा नहीं है, ३५ हज की आवादी है। ३०-४० वकील । नमक की सबसे बड़ी झोल है हिन्दुस्तान की । इसका पौराणिक इतिहास है-महाभारत काल से राजा ययाति, देवयानी और शमिष्ठा से जुड़ा हुआ। पृथ्वीराज चौहान से भी इस कस्बे का सीधा सबध रहा है । वडे. बड़े सेठ, साहूकार, नमक विभाग के अफसर, कर्मचारी, हायर सैकण्डरी स्कूल, कॉलेज, कोर्ट, अस्पताल आदि सभी कुछ है, पर सबसे बढकर डॉक्टर पाण्डुरग है, जिन्हे सभी जानते है । इस कस्बे मे डाबर के च्यवनप्राश की तरह आप भी जगह-जगह दीवारों पर नजर आ जाते है । कस्बे का कोई ऐसा कोना नहीं है जहाँ अपकी कीर्ति-किरण नहीं पहुची है। प्राइमरी के बच्चों से लेकर कॉलेज के पीएच. डी. प्रोफेसर तक दीवारो पर इस 'राष्ट्र सेवक' का परिचय प्राप्त करते रहते है। डॉक्टर पाण्डुरग के पोस्टरों से साफ जाहिर होता है कि उन्हे कितना दर्द है राष्ट्र का, कितनी चिन्ता है देश की प्रगति की। डॉक्टर साहब के एक पोस्टर का नमूना--भ्रष्टाचार मिटाओ, विनयशीलता ही विशालता है, सुखी जीवन पुरुषार्थ है, आता ही परमानन्द है, दूषित करने वाले विचारो से बचो इत्यादि । डॉक्टर पाण्डुरग अपने पोस्टरों और बुलेटिनो मे कहा करते हैं "शरीर नाशवान है। दिन में तीन समय विचार करें और सोचें कि हम देश के लिए क्या करते है। हम राष्ट्र के नवयुवकों से प्रार्थना करते हैं कि राष्ट्र को संभात कर रखना आपका काम है। एक गुरुकुल १०१ प्रौद व बालकों को साक्षर डॉक्टर पाण्डरग / ८७ बनाने के लिए ११० रुपये मासिक और तीन घंटे शानदान । गरीबों को एपया दिलाकर बेकारी को हटाने में पूर्ण योगदान दें।" आपका शुभचिन्तक राष्ट्रभेवक डॉ. पाण्डुरण सस्थापक विश्व प्रेम संघव राष्ट्र सेवक समाज, साभरलेक - ये सभी के पास इस प्रकार के बुलेटिन भेजकर अपनी जन कल्याणकारी योजनाओ का बखान करते रहते है। ऐसी योजना की तारीफ भला कौन नही करेगा | कितने ही पत्र लिगे है देश के महान् नेताओं को । उनके संग्रह मे पत्र है महात्मा गाधी, जवाहरलाल नेहरू, राजेन्द्र प्रमाद, गजगोपालाचारी, विनोबा भावे इत्यादि के। इनकी योजनाओ एव विचारो की मबने तारीफ की है । कितनों का कल्याण हुआ है, कितने नाभर हुये है, कितनी शान्ति स्थापित की है, इसका वास्तविक लेखा-जोया या प्रमाण कही नही है। एक अदमनीय आकाक्षा महत्त्वपूर्ण वनने की, बड़ा बनने की, विशिष्ट बनने की इनमे इतनी धनघोर है कि ये इस प्रकार का प्रचार-प्रसार किये विना नहीं रह सकते । कस्बे के विकास के लिए क्या नही किया था इन्होने । (स्वयं की मान्यता है), दुनिया भले ही न माने-दुनिया की आदत जो है ! किसी की तारीफ करते कितना कष्ट होता है लोगों को। और इसलिए तो विचारे डॉक्टर साहब को स्वय ही यह सब कुछ करना पड़ता है। डॉक्टर पाण्डुरग विद्वान है, धर्म एव दर्शन के ज्ञाता। घटो वात कर लीजिये उनसे । उनके पाम वक्त की कमी नही । सेवा भाव वाले वक्त की परवाह नहीं किया करते है । अव आपके पास समय नहीं है तो आपका दुर्भाग्य । आपकी समझ मे उनकी फिलासफी नही आती है तो वे क्या करे । उनकी बातो से आप बुरी तरह बोर हो जाते है तो उनका क्या दोष ? आप अपनी समझ पर ही तरस खाइये। कस्वे मे कोई भी विशिष्ट अतिथि आयेगा तो कोई पहुंचे या न पहुंचे, डा. पाण्डुरग अवश्य पहुंच जायेगे और बड़े विनीत भाव से अपना परिचय-पत्र पेशकर पुनः अपने को प्रस्तुत कर देगे और पूछेगे, 'सेवक को क्या आज्ञा है ?' चाहे नेत्र रोग का चिकित्सा शिविर हो या मूत्ररोगो का, या परिवार नियोजन शिविर । .८८/ वन्देमातरम् डॉक्टर साहब अपने को 'आफर' कर देते हैं। यदि कोई इनसे सेवा नहीं लेता है तो वे क्या करें? सदव अध्ययनशील, चिन्तन मनन करने वाले डॉक्टर पाण्डुरग को नासमझ लोग, जिनमे ज्यादा संख्या बड़े लोगों की है, 'क' भी कहते हैं। मुझे तो आते जाते टोक लेते है, कहते है-"मास्टरजी, कभी-कभी तो इस नाचीज को वक्त दिया करो।" और मैं बैठ जाता हूँ। वे अपनी विशाल योजनायें बताते हैं । "देखिये १०१ केन्द्र प्रौढ़ शिक्षा के खोलने है । मुझे आव- श्यकता है 'वर्कर्स' की, निष्ठावान कार्यकर्ताओ की। आप जैसे महानुभाव ही मेरी इस योजना को सफल बना सकते है। आप यह सूचना प्रार्थना मे लड़कों को सुनाइयेगा । मैं आऊँगा एक रोज । केन्द्र संभालने है।" सत्य यह है कि कही कोई केन्द्र नहीं है-डॉक्टर साहब की महत्वाका- क्षाओं को किसी ने समझा नही । उस दिन जब मैं बैठा तो कहने लगे, "मास्टर- जी जो कुछ कर सकता हूँ, करता रहता हूँ। यह शरीर नाशवान है, कुछ काम आ जाय तो पान्ति मिलेगी। समाज के विकास के लिये कुछ न कुछ करने की आदत सी पड गई है । देखिये न, राष्ट्रपति और प्रधानमत्री इत्यादि सभी से पत्र- ' व्यवहार चलता रहता है । मैंने कुतूहलवश वह पत्र-व्यवहार देखना चाहा । वे बड़ी प्रमन्नता के साथ यत्न से सहेजा एल्बम निकालकर दिखाने लगे। उन ऐतिहासिक पत्रों में से अधिकाश जन्म दिवस पर भेजे गये सदेश अथवा उनके उत्तर थे। कुछ शोक संदेश, आभार प्रदर्शन, शुभकामनाये या चुनाव जीतने की बधाई । एक भी पत्र पर राष्ट्रपति या प्रधान मत्री के हस्ताक्षर नही । सब सचिव द्वारा लिखे गये छपे हुये पत्र । कौन नहीं जानता इस भव्य मूर्ति को, साभर की इस विभूति को । पेशा तो इनका डॉक्टरी है । आप चश्मो के और दांतों के डॉक्टर है । होमियोपैथी और आयुर्वेद की औषधिया देते है । ७५ वर्ष की उम्र यों ही नहीं बिताई है । वड़ा तजुर्वा लिया है दुनिया का। इनके कबाड़ी खाने मे या यों कहिये सग्रहालय में जाने कैसे-कमे मे दुर्लभ ग्रन्थ हैं, कैसी दवायें हैं, नुस्से है पर मरीज इनके पाम कम ही जाते हैं । ये सेवक जो ठहरे ! अन्यथा काफी कुछ कमा सकते थे। वैसे दवा बगैरह के पैसे लेते तो कस कर ही हैं। सांभर का ऐसा कौनसा महत्त्वपूर्ण कार्य है जो इनकी सहायता के विना हो गया हो। मुखाड़िया से पहाड़िया तक आपकी सीधी पहुंच है । अपनारायण व्यास भी इनसे ही विचार विमर्श करते थे कस्बे के विकास हेतु । जब लोग ! डॉक्टर पाण्डुरग / ८६ नही बतायें, नहीं जिक्र करें तो क्या हुआ, वात छिपी नही रहती है। डॉक्टर साहब खुद बता देते हैं कि उनका इन मवमें कितना महत्त्व है। काश, डॉ. पाडुरंग के दर्द को कोई ममाता और उनकी महत्वाकाक्षा की कद्र करता तो वे निश्चय ही सही राष्ट्र-संवक वन दिया। पर लोगों ने मन ही मन (सामने नही) उनका मजाक उड़ाया है और इसीलिये अपने अनन्त मान- कोप से वास्तव में वे किसी को कुछ नहीं दे पाये । सब कुछ अधिकारी को ही मिलता है, कुपात्र को नही । ये तो लालायित है अपना मब कुछ देने को, समर्पण करने को।पर लोग दो मिनट का वक्त तक भी तो नहीं दे पाते उनको । यही तो डॉक्टर साहब की वेवसी है। डॉक्टर पाण्डुरग-सा विनीत विद्वान सहज मे नही मिल सकता। काश, उनकी महत्त्वाकांक्षायें पूरी हों और कस्वे का भी कल्याण हो। ६०/ वन्देमातरम् मास्टर फिरंगी 10 वासुदेव चतुर्वेदी . मिस्टर फिरंगी के अब्बा ने न जाने क्या सोच कर उनका नाम फिरंगी रखा। हो सकता है वचपन मे गिरगिट की तरह रंग बदलते देख कर उनका नाम फिरंगी रख दिया होगा । अब फिरंगी को लोग रगी भी कहने लगे है । मेरे ख्याल से उनका आकार प्रकार, उनका रंग रोगन, उनकी झगड़ालू प्रवृत्ति किसी पेटन टैक को भी मात कर देती है। इनके मुंह मे पान की गिलौरियां इस तरह दवी रहती हैं कि बस यो समझो दुनाली भरी हुई है । उनकी विलोरी आँखें बिल्ले की आँखो को भी मात कर देती है । गेहुँ रग को कुर्ते पाजामे में समेटे, चप्पलें घिसटते घिसटते उनका असली रंग बदरग हो गया था। वीवी का रुतबा ऐसा कि चौराहे पर दहाडने वाले मास्टर फिरगी घर में भीगी विल्ली बन जाते। आप कुछ भी कहे पर मिस्टर फिरंगी को लोग मास्टर फिरगी के नाम से ज्यादा जानते है। चाहे उन्होंने स्कूल मे कभी नही पढाया और पढते थे तब भी पांचवें दर्जे में फेल हो जाने के बाद गाडी आगे नहीं बड पायी । कुछ परीक्षाएं उन्होंने प्राइवेट पास करके एक-आध छोटी-मोटी डिग्री हासिल कर ली । जव उन्होंने कभी पढ़ाया नहीं तो फिर उनको मास्टर के नाम से क्यो पुकारा जाता है। इसलिए कि मास्टर की कक्षाएँ तो स्कूल में लगती हैं पर मिस्टर फिरगी को कक्षाएं लगती थी पान वालो की दुकान पर या चौराहे पर । पढ़ाई पढ़ाते थे राजनीति की। फटेहाल फटीचर मास्टर फिरगी रगोन तवियत के आदमी हैं। इसमें आश्चर्य करने की कोई बात नहीं। इनके जीवन में रंगी अथवा फिरगी का जो प्रभाव है उसे अलग नही किया जा सकता । इसलिए कि आदमी भले ही फटीचर हो पर कदर तो उसके गुणों की होती है । उनकी अदाओ पर रीझ कर कॉलेज में पढ़ने वालों ने इनको अपना जीवन साथी चुन लिया। मास्टर फिरगी/६१ उधर इनके चाचा इनको लाखो की दौलन का वारिस बना रहे थे पर शर्त यह थी कि फिरगी शादी करे उनकी पसद की लड़की से । वे कहते, अगर हमारी वात नहीं मानेगा तो जिन्दगी भर फटीचर बना रहेगा । इस दौलत से महरूम रहेगा। पर फिरगी तो कालेज की उस हसीना पर जी-जान से मर मिटे थे । इसलिए लाखो की दौलत को लात मार कर उस हसीना से शादी कर ली। दो-चार दिन हो-हल्ला मचा फिर सब ठीक-ठाक हो गया। इसके बाद जमाने की हवा का असर फिरगी पर इस कदर चढ़ा कि दिन भर राजनीति की बातें करते। पान वालो की दुकान पर मजमा लगा लेते। चौराहे पर भाषण झाने लगते । राजनीति में गाली पुराण को कठस्थ कर लिया हो तो उसका सितारा बुलद होने में देर नहीं लगती । रेस मे मौका आने पर फिसड्डी घोड़ा भी कभी-कभी बाजी मार ले जाता है। यही हाल फिरगी का भी हुआ । राज- नीति के रंग में इस तरह चोला बदल लिया कि लोग उन्हें सच्चा सेवक मानने लगे । मगर पार्टी दफ्तर में बिछी जाजम पर लेट कर पने की हवा में ताजगी लेने वाले मास्टर फिरगी की जिन्दगी में कभी वहार नही आई। । खर्चे के लिए यहाँ-वहाँ से जो कुछ मिल जाता उमी से काम चल जाता था । शहर के नब्बे प्रतिशत पान वालों के यहाँ उनके खाते लगे हुए थे। नेतागिरी का लेवल इस तरह चिपका हुआ था कि किसी भी आफिस मे घुस जाएँ, मिस्टर फिरगी काम करवाए वर्गर नहीं लौटते । इस तरह गुडते गुड़ते महादेव हो गये थे । शहर में किसी भी लक्ष्मण को 'शक्ति' लगती तो बस हनुमान जी संजीवनी लाने दौड पडते । उस समय हनुमान वायु मार्ग से गए थे। आज रेल, मोटर, तागा और रिक्शे है। एक से एक बढकर फाइव स्टार होटल है । किसी कार्य से राजधानी में पहुँचना है तो खर्चे-पानी के नाम से दस आद- मियो से 'कुछ' बटोर लिया और निकल पड़े सजीवनी लाने। इस तरह नि स्वार्थ जन-सेवा भी हो गई और अपनी पहुँच का अच्छा-खासा लाभ भी मिल गया। इधर फिरगी को वीवी जगी ने देखा कि समाज सेवा का गजब का शौक फिरगी को लगा हुआ है । मुझे भी कुछ करना चाहिए, इसलिए उसने भी मोहल्ले की औरतो से सम्पर्क कर समाज-सेवा का बीड़ा उठा लिया। भगवान जाने समाज-सेवा का यह काम हुआ भी या नहीं, पर इसकी कई सहेलियां जरूर बन गई। मोहल्ले के हर घर में दिन प्रतिदिन चाय नाश्ते के दौर चलते । गपशप ६२/ वन्देमातरम् होती। रगी-जगी और फिरगी नामो की चर्चा वच्चे बूढ़े और जवान के मुंह पर आ गई। फिरगी के एक दोस्त है वेणुगोपाल । वैचारे हमेशा राजनीति के पिटे इस मोहरे ने अबकी बार मास्टर फिरंगी को पत्र लिया- मेरे जिगरी, मौका है, कई दिनो में मुलाकात नहीं हो पाई, अधिवेशन में भी प्रतीक्षा रही। प्रेम को पटा लो और किसी तरह अबको बार बाजी मार लो। कहो तो साथ चलू । कुछ दिन राजधानी में मस्ती रहेगी। 'वेणु' पत्र घर के पते से लिखा था। वेणुगोपाल 'वेणु' हो गई, जब फिरगी की बीवी ने पथ पढ़ा। पत्र पढ़ते पढ़ते जंगी के तन वदन मे आग लग गई । अच्छा तो यह माजरा है ! नेतागिरी करते है या छोकरियों से चोचे लडाते है । इस हरामजादी वेणु को भी गुलछरें उड़ाने की सूझ रही है। बेहया लिख रही है प्रेम को पटा लो। आ जाएँ तो खबर लेती हूँ। कौन है यह राड़े ? जवानी के दिनो मे मेरे इर्द-गिर्द चक्कर काटे। मुझ पर डोरे डाले । अब बुढापे मे भी नीयत ठिकाने नहीं । आ तो जाएँ यहाँ वो मजा चखाऊँ कि छठी का दूध याद आ जाए। शाम को थके-हारे फिरगी पर लौटे तो जगी को बदरग देखकर कुछ पूछने की हिम्मत नहीं कर पाए । पर जगी तो जग करने पर तुली हुई थी। राजा दशरथ की रानी कैकयी ने नो कोप भवन में शरण ले ली थी। इधर जगी मैदान छोड़ने वाली नहीं थी । तेवर बदल कर फिरगी को खवर लेने पहुंच गई। मैं पूछती हूँ यह रोड कौन है ? कब से डोरे डाल रहे हो इन पर? कौन है ये वेणु और कौन है ये प्रेम ? बेहया लिख रही है प्रेम को पटा लो और किमी तरह थाजी मार लो। लो देखो तुम्हारे काले कारनामो का फल । फिरगी ने बीवी का क्रोध देखा तो ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की सांप नीचे रह गई। उनके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी। वेणु का पत्र पढा तो उनकी जान मे जान आ गई । मुस्करा कर वे वोले- भाग्यवान, वात को समझा करो। अक्ल का अगर दिवाला निकल गया हो तो जबान से बाहर बात निकालते समय सोच लिया करो कि क्या बात कर रही हो मास्टर फिरंगी/३ - और किसको कह रही हो। पहले एक गिलास पानी तुम तो फिर मुझे भी एक गिलास पानी पिला दो। दिमाग ठाडा हो जाए तब बात समझाऊँ । ऊल- जलूल बोल कर दिमाग पराव करने की जरूरत नहीं। दोनो ने एक-एक गिलास पानी पिया। जब दोनों नार्मल हो गए तो फिरगी ने कहा, जिसे तुम वेणु समझ रही हो यह कोई औरत नहीं बल्कि मेरे दोस्त वणुगोपाल है । दीपक जिन्हें चाचा जी कहता है वे ही वेणुगोपाल हैं और जिस प्रेम को पटाने की बात यह लिख रहा है वह कोई प्रेम नाम की लड़की नही, वह राजनीति का धुरधर खिलाड़ी प्रेमस्वरूप है जो इन दिनों प्रान्त में पार्टी के उम्मीदवारो को टिकिट देने का काम कर रहे है । समझी? सकेतात्मक भाषा में पत्र लिखा है। प्रेमस्वरूप चूंकि वेणुगोपाल का लगोटिया है इसलिए उसने चल कर काम करवाने की बात लिखी है। मैं भी इस वार एम. एल. ए. के चुनाव मे खड़ा होना चाह रहा हूं। यह पत्र उसी सदर्भ में लिखा है। जगी इस बात को सुनकर मन ही मन खुश थी कि उनके पति निकम्मे नही है। आखिर वे भी चुनावी दगल मे कूदने के लिए जोड़-तोड़ बिठा रहे है। फिरगी की बात सुन कर वोली-ओह, तो यह बात थी? सचमुच में गडबड सोच गई थी। अब मेरी समझ सारी बात आ गई है। आइए, अब खाना खा लें। जी-जान से प्रयत्न करने पर टिकिट मिल गया। टिकिट मिलने का श्रेय जितना फिरगी के गाली पुराण को है उतना फिरगी को नही । गाली पुराण का दो चार बार पारायण करने के बाद जब टिकिट मिल गया तो फिरगी की रगत ही वदल गई। कुछ दिनो बाद बात करने का लहजा ही बदल गया। चाल बदल गई, बात करने का ढग बदल गया। बदल गई रगत । सबसे बढ़ कर बात हुई कि बदली हवा में पूरा माहौल बदल गया। कुछ तो मोहल्ले के लडकों ने जोर लगाया. कुछ पार्टी के नेताओं ने मदद की। चुनाव में जीत मास्टर फिरगी की ही हुई । तरह तरह की वातें होने लगी। कोई कह रहा था, अरे एम. एल. ए. हो गया तो कौन-सी बड़ी बात हो गई है ? आज के जमाने में हर पांचवें साल एक रेस होती है जिसमे जितना दम खम होता है वह मव लगा कर जीतने की कोशिश करता है । इम वार जो घुड-दौड़ हुई उसमें यह पांचवी फेल आदमी बाजी मार ले गया । कौन-सी बडी बात हो गई।" "अरे जिन्दगी खपा दी बेचारे ने । पार्टी का वफादार कार्यकर्ता रहा है । देखना मिनिस्टर बनेगा मिनिस्टर !" १४ / वन्देमातरम् "अरे घोड़ा घोडा होता है । अच्छी नस्ल का घोड़ा अच्छी चाल चलता है। देखते हैं यह फिसड्डी घोडा कौन-सी चाल चलता है।" "अरे मैं कहता हूं, देखना जैकी को भी पीठ से गिरा कर यह ऐसी दुलत्ती झाडेगा कि कुछ ही दिनों में यह चमक जाएगा।" "क्या खाक चमकेगा। मिनिस्टर भी बन गया तो पहले ये अपना घर भरेगा फिर लोगों का मुंह बद करेगा।" चौराहे पर खडे लोग मास्टर फिरगी के बारे मे तरह तरह की बातें करने लगे। मास्टर फिरंगी की जीत जनता को जीत थी। पार्टी के वफादार सेवक की जीत थी। एक समाज सुधारक और सच्चे कार्यकर्ता की जीत थी। जिस पार्टी के टिकिट पर मास्टर फिरंगी जीते थे बहुमत उसी पार्टी का था। इसलिए चास था कि मास्टर फिरगी भी मिनिस्टर वन जाएँ। जोड-तोड़ शुरू हुआ । वफादारी की शपथ और शहादत का परवाना। नए चेहरो को मौका मिले इस दृष्टि से मास्टर फिरगी को मिनिस्टर बना दिया गया । पार्टी के लोग सोचने लगे यह फिसड्डी घोड़ा रेस में सबसे आगे आ गया। देखें क्या गजब ढाता है। पार्टी के भीतर कुछ लोग मास्टर फिरगी को बुद्ध, अड़ियल राजनीति में लगड़ा और नौसिखिया मानते थे। उन्हें उसका मिनिस्टर बनना फूटी ऑस्त्र भी नहीं सुहाया । उन्हें लगा कि यह कोआ अब हस की चाल चलेगा। मोहल्ले की औरतें, रिश्तेदार, पान की दुकान वाले और राशन की दुकान वाला रोशनलाल भी मौके का फायदा उठाने की सोचने लगे। बस मास्टर फिरगी के शपथ लेते ही पहले वधाइयो का ताला लगा, उसके वाद-पत्रम् पुष्पम् लेने का कार्य शुरू हुआ। कुछ ने रियायतें हासिल की, कुछ ने परमिट हासिल किए, कुछ ने अहसान जता अपना काम निकलवाया, कुछ ने तबादले करवाये, कुछ ने अपनो-परायो को लाभ पहुंचाया। बात की बात में मास्टर फिरगी की क्लम एक्सप्रेस बन गई। पी. ए., सचिव जो भी कागज बना कर लाते वस फिरगी की कलम उस पर ऐसे चलती जैसे किसी बकरे की गर्दन पर छुरी चल रहो हो । मास्टर फिरगी/६५ दूर बैठा को देखता रहा । फिसड्डी घोड़ा काफी नाच कूद लिया । अब इसके लगाम लगा देनी चाहिए। जैकी वेचारा सोचता रहा । फिरंगी को कलम अपना कमाल दियाती रही। वूचढ़पाने में हड्डियों का ढेर हो गया तब पता लगा कि अब गन्दगी बर्दाश्त से बाहर है। घी, दूध की नदियां बहाई जानी वद की जानी चाहिए। जैकी लगाम लेकर उठा और पानी की नदी के किनारे लाकर खड़ा कर दिया फिरंगी को । . ६६ / वन्देमातरम्
खेमाशाह
अचलचंद जैन
पात्र-परिचय
मुहम्मद वेगडा
(वर्घरा)--गुजरात का वादशाह
दीवान-बादशाह का प्रधान सलाहकार
खेमाशाह-नाटक का मुख्य नायक, गुजरात का
प्रसिद्ध दानवीर शाह
शाहगण-अहमदाबाद के लक्ष्मीचन्द, लखपतराय,
हजारीमल, मनोहर लाल आदि
पहरेदार--शाही दरवार का पहरेदार
जनसमूह--अकाल पीडित लोगों का समूह
बूढा व्यक्ति-~अकाल पीडित समूह का एक वयोवृद्ध,
साहमी एव समझदार व्यक्ति
जौहरी बादशाह के दरबार का एक प्रसिद्ध जौहरी
दरवारोगण-वादशाह के दरवार के दरबारी लोग
समाचाह /
पहला दृश्य स्थान-वादशाह मुहम्मद वेगड़ा का शाही दरवार बादशाह तख्त पर बैठे दिखाई दे रहे है। वादशाह के दोनों तरफ दीवान व सामन्तगण यथास्थान बैठे है । दीवान दाहिनी ओर के आसन पर एवं सामन्तगण बाई ओर के आसनों पर बैठे हैं। दीवान की कुर्सी से थोड़े तिरछे हटकर नीचे की ओर दरबारीगण बैठे है। उनसे थोड़े फासले पर सुसज्जित पहरेदार खड़ा है । अन्य सभी यथास्थान अदव-कायदे से खड़े हैं । पर्दा खुलते ही सभी दरवारीगण उठकर वादशाह को कोनिश (झुककर तीन बार सलाम करना) बजा लाते हैं एवं यथास्थान बैठ जाते हैं । वादशाह-(दीवान की ओर मुखातिब होकर)-क्यो, दीवानजी, अबकी मर्तबा कौन-कौन से इलाकों में बारिश नहीं हुई ? दीवान-(खड़ा होकर, कोनिश बजाकर) जहापनाह, इस बार खास तोर से दक्षिण एव पश्चिम के बीच का इलाका बिलकुल सूखा रह गया है । आलमपनाह, ऐसी भी खबर मिली है कि उन इलाको मे मवेशी पास-पानी के अभाव मे मर रहे हैं । वहा के वाशिन्दों ने दरख्तों के छिलके कूट-पीसकर कुछ दिनों तक तो जैसे-तैसे गुजारा किया परन्तु अब तो किसी दरख्त पर छिलका भी नही रहा जिससे अगणित बच्चे एव बूढे बेमौत मर रहे है। बादशाह-हम क्या करें? उनकी तकदीर ही ऐसी है । अन्यथा अकात ही क्यो पड़ता? दीवानजी, जिनके तकदीर मे वेमौत मरना लिखा है तो वे मरेंगे ही। दीवान--खुदाबन्द, उन वेचारों पर कहर टूटा है। कैसी उनकी तकदीर फूटी है ? आलमपनाह, मैंने यह भी सुना है कि उन इलाकों के बचे-खुचे औरत मदं सभी पनाहगीर होकर पेट भरने की फरियाद लेकर आलमपना के दरवार में पहुंचने वाले हैं। . १८/ वन्देमातरम् (कुछ टहरकर) ऐसा दीख रहा है आलीजाह कि एक न एक दिन उन लोगों का काफिला जरूर यहां आ धमकेगा । ऐसी हालत में उन्हे एक मात्र आपका ही सहारा हो सकता है। मौत और जिन्दगी का सवाल जो ठहरा। यादशाह--तो इस तरह तो मुझे यों साफ-साफ दिख रहा है कि उन मूर्यो के अगली फसल तक खाने के बन्दोवस्त में शाही खजाना चन्द रोज मे ही (हाथ से चुटकी बजाकर) खाली हो जायगा। दरबारी-(खड़े होकर हा मे हा मिलाते हुए) हजूर, एकदम दुरुस्त फरमा रहे है । (वैठते हैं) वादमाह--(दरवारियो की कही वात अनमुनी करके) इधर मेरी फौज को मैंने शुमाल की सरहद सर करने भेजा है । फौज की तीसरी कुमक भी भेजी का चुकी है। फौज के खर्च के मारे तो वैसे ही महफिलों एवं रंगरेलियों का रंग फीका पड़ता जा रहा है। और अब तो यह वाकया सुनकर मेरी रूह काप उठी है। दिल की धड़कन बढ़ने लगी है। (बादशाह का बयान सुनकर दरवार मे एकदम सन्नाटा छा जाता है। सभी सिर नीचा कर लेते हैं। कोई-कोई थोड़ा-थोड़ा ठहरकर वादशाह के चेहरे की ओर जरा-सी ऊची नजर करके देयकर फिर नीची नजर कर लेते है।) बादशाह-(दरवारियों की ओर मुखातिब होकर) बोलो। तुम सभी लोग चुप्पी साधे क्यों बैठे हो ? तुम लोग भी तो अपनी-अपनी सलाह पेश करो। (वादशाह सबके सामने तीखी नजर से देखता है। इतने मे पहरेदार दौड़ता, हाफता दरबार में बादशाह के सामने हाजिर होता है। बादशाह को झुककर कोनिश बजाता है। उसकी सास फूल रही है, वोला नहीं जाता।) बादशाह-(पहरेदार की बदहवासी देखकर गुस्से में) क्या है ? इतनी बदहवासी का सबब ? खैरियत तो है । अवे बेवकूफ, बोलता क्यों नहीं? (माजरे को समझकर दीवान का मन ही मन मुस्कराना।) पहरेदार-(फिर कोनिश वजाता है). आलमपनाह, सारे जहा मे आपके - सेमाशाह | ६९ । . नाम का डका वजता रहे । (हाफना अभी जारी है।) बादशाह-(वीच मे ही वात काटकर, गुस्से में) अवे अक्ल के अन्धे । तू जिरा यात को कहने आया है, उसे जल्द क्यों नहीं कहता? पहरेदार-(गिड़गिड़ाता हुआ हाथ जोड़कर) यता मुआफ हो, कहता हू सुदावन्द । क्या करू ? दौड़ते-दौड़ते, यहा तक आपके कदमों में पेश होते, इस नाचीज याकसार का तो दम ही फूल गया। (फिर हाफता है, कुछ रुक कर) जहापनाह, दक्षिण व पश्चिम के बीच के इलाको मे भुखमरी पडने से वहा की तमाम रियाया टिड्डी दल की तरह यहा उमड़ी आ रही है । और हजूर, वे सब के सब आलमपनाह के महल के सामने ही पनाह लेने को कह रहे है ? (गिड़गिड़ा कर दोनो हाथ जोड़कर) वस इतना ही आपके कदमो मे अर्ज करने आया था। हुजूर, मेरी खता मुआफ की जाय । (पहरेदार का बादशाह के कदमो में गिरना) बादशाह-(डाटते, हुए) चल हट, निकल यहा से । (सुनते ही पहरेदार का चले जाना। दरवारियो की ओर.मुखातिब होकर -लो, जिसकी अभी-अभी: चर्चा कर ही रहे थे वह शामत सचमुच आज.ही आ गई.. वादशाह--(दीवाना की ओर • मुखातिब होकर) देखो, बाहर मेरे महल के सामने वाले मैदान मे लोगो के झुण्ड के झुण्ड आ रहे है, सो पहरेदारो को, लेजाकर उन्हें वही चुपचाप मैदान में बिठाने की कोशिश करो। खवरदार । हो हल्ला कतई न होने पाये। उन लोगो से कहना कि बादशाह सलामत खुद तशरीफ लाकर तुमसे मिलेगे । दीवान-जो हुक्म आलीजाह । (आदाब बजाकर जाना । बादशाह गमगीन बन जाता है । दरवार वरख्वास्त किया जाता है । बादशाह का तख्त से उठना । पर्दा गिरता है ।).. दूसरा दृश्य- स्थान-बादशाह के महल के सामने का मैदान । भूख से. मरते नर-जारी, बच्चे, बूढे सभी;जसहाय अवस्था में १०० / वन्देमातरम्
बैठे दिखाई दे रहे है । वच्चे भूख के मारे चीख रहे है, उनकी
माताएं रो रही हैं । सभी ओर से आर्तनाद सुनाई दे रहा
(दो सिपाहियो का प्रवेश)
सिपाही-(भूख से तड़पते लोगों को डाटकर) चुप हो जाओ । खवरदार,
अगर किसी ने भी हल्ला मचाया तो। बादशाह सलामत
अभी ग्युद तुम्हारे पर मेहरबानी करके तशरीफ ला रहे है ।
जनसमूह---(जोर में एक साथ चिल्लाकर) जय हो वादशाह सलामत की
जय हो । (मिपाही फिर डाटता है। सिपाही के डाटने पर
सब शान्त हो जाते हैं । इतने मे वादशाह अपने कुछ दरबारी
व सामन्तों के साथ आते हुए दिखाई देते है ।
सिपाही-(जनसमूह को सम्बोधित करके) बैठो, बैठो चुपचाप बैठ
जाओ। देखो, वे बादशाह सलामत तशरीफ ला रहे है।
(वादशाह को आता देखकर जनता आधी को तरह उमड़कर
बादशाह के कदमों में गिरना चाहती है । इस हड़बड़ी में कई
लोग एक दूसरे पर गिरते है, चिल्ल-पो मचती है। सिपाही
जनता को रोकने की कोशिश करते है।)
बादशाह---(अव्यवस्थित उमड़ती भीड़ को देखकर गुस्स मे) भूखे मरते
हो तो यहा क्यो आये हो ? चले जाते किसी दूमरे राज्य में
और मेहनत मजदूरी कर पेट भरते । यहा क्या तैयारी है कि
तुम सयका प्रवन्ध हो जाय?
भीड मे से एक बूढ़ा और सयाना व्यक्ति साहसपूर्वक उठकर
खडा होता है और बादशाह को हाथ जोड़कर अर्ज करता
बूढा-जय हो, आलमपनाह की । हम सब आपकी रियाया है।
आपके सिवाय हमें कोन सहारा दे सकता है ? इन बच्चों
और बूढों का इस भयंकर अकाल में हुजूर के सिवाय और
कोन माकूल इन्तजाम कर सकता है ? अन्नदाता हम सब
आपके ही आसरे हैं। (बच्चे चिल्लाते है । जनसमूह भूख के
मारे व्याकुल है । चारों ओर गमगीनी छा गई है।)
बादशाह—(करुण चीत्कारों से पसीज कर) दीवान जी, इस जनसमूह
खेमाशाह | १०१
के लिये १५ दिन तक के भोजन का प्रबन्ध शाही राजाने में किया जाय और तय नम आगे के प्रयाध के लिये कोई उपाय ढूंढा जाय । बूढ़ा-(उचे स्वर मे) जय हो, नासमपनाह की। हम इसी भरोसे आपके कदमों में हाजिर हुए है। जहापनाह, हमारा इन्तजाम जल्द में जल्द करवाया जाय, नहीं नो हम सब भूप के मारे वेमौत मर जायेंगे। (रोने का स्वर उनकी पुकार सुनकर बादशाह उन्हें ढाढ़स बंधाते है एवं शोघ्र इन्तजाम का आश्वासन देकर वहा से प्रस्थान करते है । पर्दा गिरता है।) तीसरा दृश्य स्थान-बान मुहम्मद वेगडा का शाही दरवार। दरवार खचाखच भरा है, सभी दरवारी एवं कर्मचारीगण ययास्थान बैठे एव पडे हैं । बादशाह तस्त पर चिन्ताग्रस्त बैठे है । पहरेदार का प्रवेश । पहरेदार-हजूर का बोलबाला । जहापनाह की खिदमत में कुछ शाह लोग पेश होना चाहते हैं। वादशाह-शाह लोग? कैसे शाह ? दीवान जी, इन शाह लोगों के बारे मे आपको जानकारी है क्या ? दीवान-(खडे होकर) हुजूर, इनके पूर्वजों ने इस धरती पर कई ऐसे ऐसे काम किये है, जिससे उन्हे यह खिताब इनायत हुआ है। यह बात आजकल की नहीं है जहापनाह, सदियों से चली आ रही है । (वैठ जाना) बादशाह-समझ मे नही आता कि जो सल्तनत का मालिक होता है वही शाहजहा कहलाता है । (गुस्से व जोश मे) फिर इन शाह कहलाने वालों ने कौन-सी सल्तनतो पर राज्य किया है ? कौन से 'मुल्क फतह किये है ? दीवान-(पुनः खड़े होकर) जहापनाह आपका फरमाना ठीक है कि इनके पुरखो ने सल्तनतों को फतह करके राज नहीं किया । परन्तु हुजूर, इतिहास इस बात का साक्षी है कि शाह लोगो के पुरखो ने ही आड़े समय मे सल्तनतो की आर्थिक सहायता १०२/ वन्देमातरम् कर उनके अस्तित्व की रक्षा की है जिससे सल्तनत दुश्मनों के पंजों से बाल-बाल बच गयी। इतना ही नहीं हुजूर, शाह लोग अपनी बुद्धि-कौशल से कई सदियों तक सारे राज की बागडोर को भी सम्भालते रहे है । (बैठ जाना) बादशाह-हू-तो इसी कारण वे लोग शाह कहलाते है । (मन ही मन मे) तव तो अच्छा अवसर है, अकाल के समय इन्हे परखने का । पहरेदार, शाह लोगो को दरबार में आने की इजाजत है। उन्हें वाइज्जत दरवार में आने दिया जाय। (पहरेदार का प्रस्थान एवं शाह लोगो का प्रवेश ।) शाह लोग-जहांपनाह की जय हो । बादशाह-आप लोग ठीक वक्त पर आये हैं । वैठिये । (शाह लोग बैठते हैं) उनमे सबसे वृद्ध लक्ष्मीचन्द हाथ जोड़कर वादशाह से अपनी बात अर्ज करने की इजाजत मागते है । वादशाह उन्हे इजाजत देते है। लक्ष्मीचन्द-(हाथ जोडकर) इस बार दक्षिण एवं पश्चिम के बीच के इलाके में जबरदस्त अकाल पड़ा है । भूख के मारे चारों ओर त्राहि-त्राहि मची हुई है । जहापनाह, ऐसे वक्त मे हुरड़ा ग्राम के खेमाशाह ने अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति से अनाज खरीद- कर प्रत्येक गांव में मुफ्त अनाज की दुकानें खोलने का सकल्प किया है । और हुजूर से इस हेतु प्रत्येक गाव में केवल व्यवस्था सम्बन्धी मदद चाही है ताकि अकालग्रस्त सभी गावों में लोगों को भूख से मरने से बचाया जा सके। बादशाह-(आश्चर्य मिश्रित खुशी से) क्या ? खेमाशाह ने अपना सारा धन अकाल पीड़ितों की भूख मिटाने के लिये खर्च करने का निर्णय ले लिया है ? (दीवान की ओर मुखातिब होकर) दीवानजी, अगर यह सही है तो सेमाशाह का राजकीय सम्मान किया जाना चाहिए। लक्ष्मीचन्द-हुकम की यह वात सौ फीमदी सही है । दीवान-जहापनाह, शाह लोगो की बात ही और है, ये लोग अपने बुद्धिवल से कमाते भी अनाप-शनाप है और समय आने पर देश के लिये सब कुछ लुटा देते है। खेमाशाह / १०३ बादशाह ह-~अव मैं समझ गया कि एक बार एक चारण ठीक ही कह रहा था कि यह कोम पहले को शाह है। बाद मे सल्तनत हमारे पुरखों के हाथ में आयो है, इसीलिये हम लोग बादशाह कह- लाये । शाह लोगो, हम दानवीर सेमाशाह से मिलना चाहते लक्ष्मीचन्द-हुजूर, वे भी आपके दर्शनों के लिये लालायित हैं। बादशाह--तो उन्हें यहा आदरपूर्वक बुलाया जाय । शाह लोग हम उन्हे शीघ्र ही हुजूर की खिदमत में ले आयेगे। बादशाह-बहुत अच्छा । दीवानजी, सभी सूबेदारों के नाम आदेश जारी कर दो कि वेमाशाह द्वारा अकालग्रस्त लोगों के लिये वित- रित किये जाने वाले अनाज को वितरण करवाने एवं व्यवस्था बनाये रखने में हमारे शासन की ओर से पूर्ण मदद दी जाय । और हमारे राज्य में जहा भी खेमाशाह जायें उनका खूब आदर-सत्कार किया जाय। दीवान-जो हुक्म। पर्दा गिरता है। चौथा दृश्य स्थान-स्थल मार्ग। लक्ष्मीचन्द, लखपतराय, हजारीमल एव मनोहरलाल चारो शाह वलगाड़ियो में बैठकर आपस में बातें करते हुए खेमा- शाह के गांव की ओर जा रहे है। लखपतराय-भाई साहब, खेमाशाह ने तो कमाल ही कर दिया । उन्होंने अपने बच्चो के लिये एक कोडी भी शेप नही रखी। हजारीमल-ठीक ही है । पूत सपूत तो क्यू धन सचे, पूत कपूत तो क्यू धन सचे। मनोहरलाल T-वास्तव मे भूखे इन्सानो की मदद करना ही सच्चा धर्म है । मानव वही है जो मानव के लिये मरे । लक्ष्मीचन्द---सेमाशाह, मही माने में भगवान महावीर के अनुयायी हैं। लगता है 'दया धर्म का मूल' उनका जीवन दर्शन बन गया है । धन्य है ऐसे सपूतों को। मा के ऐसे सपूत ही कोम और देश का नाम रोशन करते हैं। १०४/ वन्देमातरम् (काफी रात्रि गये पड़ावों के बाद चारों शाह लोग खेमाशाह के गांव हुरड़ा पहुंच जाते हैं। प्रातः ६ बजे के लगभग गाव के नर-नारी और चौपाये जानवर आते-जाते दिखाई दे रहे है । शाह लोग गाव में प्रवेश करते है।) लक्ष्मीचन्द -अच्छा हो, हम लोग मन्दिर मे चलकर पहले भगवान के दर्शन करलें। (चारी शाह लोग भगवान के दर्शनार्थ मन्दिर में पहुंचते है । सयोग मे धमाशाह भी उस समय मन्दिर मे है । वे पूजागृह में पूजा के कपडे वदन रहे है । अत. इन शाह लोगों को नहीं दीख पाते। जैसे ही चारो शाह लोग दर्शन कर लौटते है खेमाशाह उन्हें मन्दिर को सोढ़ियों पर ही मिल जाते हैं। जैसे ही वे एक दूसरे को देखते है परस्पर जय- जिनेन्द्र करते है । अभिवादन के बाद वे उत्साहपूर्वक एक दूसरे से गले मिलते है । खेमाशाह खद्दर की मोटी धोती, अगरखी एव साफा वाधे हुए है। ललाट पर तिलक किया हुआ है।) वेमाशाह--(चारों से गले मिलने के बाद) पधारो शाह सिरदारो। लक्ष्मीचन्द-हम आ ही रहे थे। सोचा कि भगवान के दर्शन करके ही चलें । अच्छा हुआ इतने में आप भी मिल गये । खेमाशाह--- भगवान सब अच्छा ही करता है । अब आप घर पधारो और भोजन करो। (चारों शाहों का सेमाशाह के साथ उनके मकान की तरफ प्रस्थान । पर्दा गिरता है।) । पाँचवाँ दृश्य स्थान-मेमाशाह का मकान । चारों पाहों को सेमाशाह मान-मनुहार पूर्वक भोजन करवा रहे हैं। चारो शाह प्रेमपूर्वक भोजन करने के बाद सेमाशाह के मकान मे बने बैठक के कमरे मे जाकर बैठते है । इतने में घेमाशाह का लड़का सुपारी इलायची लेकर आता है एव सबको पेश करता है। खेमाशाह-आपने मेरी अर्ज बादशाह सलामत तक पहुंचा दो होगी। मेमाशाह / १०५ लक्ष्मीचन्द-आपको सम्पूर्ण योजना हमने बादशाह सलामत को अर्ज कर दी है और वादशाह सलामत ने समस्त अकालग्रस्त इलाको के सूबेदारों को आप द्वारा वितरित करवाये जाने वाले अनाज की व्यवस्था करने के आदेश जारी कर दिये हैं । खेमाशाह -~-इस मदद की पहल करने के लिए आपको खूब-खूब धन्यवाद। लखपतराय--असली धन्यवाद के अधिकारी तो शाह साहब, आप है। आपने अकालग्रस्त लोगों के दुःख को अपना दुख समझा है और उनके लिए आपने अपना सर्वस्व दे दिया है । हजारीमल-(बीच में ही) शाह साहब, आपने तो हमारी शाह कौम की प्रसिद्धि में चार चाद लगा दिये हैं । और लाखो लोगों को मौत के मुंह से बचा लिया है । पूरे देश को आप जैमे दानवीर शाह पर गर्व है। खेमाशाह-(हाथ जोडकर)-सिरदारो, मै तो सिर्फ आप सब का तुच्छ सेवक हूं। मनोहरलाल-बस, बस शाह साहब, "हीरा मुख से कब कहे लाख हमारो मोल ।” अब एक अर्ज और है कि आप मेहरबानी कर हमारे साथ बादशाह के दरवार मे पधारें। खेमाशाह-मुझे नाम और मान की कोई चाह नहीं है। मैंने यह एक हीरे की अगूठी बादशाह सलामत को भेंट करने के लिए रखी है अत मेहरबानी कर अगूठी बादशाह सलामत को भेंट कर देना। लक्ष्मीचन्द -बादशाह सलामत ने स्वयं आपसे मिलने की इच्छा जाहिर की है । इसलिए हम लोग आपको लेने यहाँ आये हैं। मनोहरलाल-(बीच मे ही) और बादशाह सलामत ऐसे नररल से मिले विना कैसे रह सकते है ? अतः आप और हम सब एक साथ ही चलते है। (रास्ते में खेमाशाह द्वारा राजधानी में एकत्रित अकालग्रस्तो एव अकालग्रस्त अन्य गावो हेतु भेजी गई अनाज की वोरियो से भरी हुई असख्य गाडिया अलग अलग गावो की ओर जाती हुई दिखाई दे रही है । पाचों शाह लोग रात्रि पड़ाव १०६ / वन्देमातरम्
करते हुए राजधानी पहुंचते हैं ।)
पट परिवर्तन
स्थान-बादशाह का दरवार
बादशाह तख्त पर विराजमान है और सभासद यथास्थान
बैठे हैं । पहरेदार का प्रवेश।)
पहरेदार-(आदाव बजाकर) जहापनाह, शाह लोग आपकी खिदमत में
हाजिर होने की इजाजत चाहते हैं ।
बादशाह --उन्हें इजाजत है (एक ओर से पहरेदार का जाना दूसरी ओर
से चारों शाहों का प्रवेश।)
रों शाह एक साथ-~-शाहशाह की जय हो ।
बादशाह-(उनको ओर देखकर) सेमाशाह कहां है ।
लक्ष्मीचन्द- हम उन्हें ले आये हैं । वे आपके दर्शन के लिए बेताब हो रहे
हैं । आपका हुक्म था कि उनका राजकीय सम्मान किया
बादशाह-हा शाह लोग, हम ऐसे दिलेर इन्सान का राजकीय सम्मान
करना चाहते है । दीवानजी राजकीय सम्मान के साथ उन्हें
पहा लाने की व्यवस्था की जाय ।
(दरवार का वरख्वास्त होना एवं दीवान का चारों शाहों के
साथ बातचीत करना । सेमाशाह को सम्मानपूर्वक लाने हेतु
सबसे बुजुर्ग शाह लक्ष्मीचन्द के नेतृत्व में राजकीय सवारी
भेजना । पर्दा गिरता है।)
छठा दृश्य
बादशाह के महल के सामने दूरस्थ मंदानी भाग। जहां
अकाल पीडितो की वस्ती एव उनके साथ के मवेशी दिखाई
दे रहे है । इन सबके जीवन यापन की व्यवस्था खेमाशाह की
ओर से हो रही है । इस व्यवस्था के कारण अकाल पीड़ितो
के दिल में सेमाशाह के प्रति श्रद्धा है। वे वात बात मे
खेमाशाह की दानवीरता की तारीफ करते है एवं उनकी जय
जयकार करते है।
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खंमाशाह / १०७
पट परिवर्तन स्थान-बादशाह का शाही दरवार बादशाह तख्न पर बैठे है। सभी दरवारोगण यथोचित स्थान पर बैठे है। पहरेदार--(कोनिश बजाकर)-जहापनाह का सितारा दिनों दिन बुलन्द हो । येमाशाह कुछ शाह लोगो के साथ दरबार में हाजिर होना चाहते है। बादशाह--उन्हें बाइज्जन हाजिर किया जाय । (पहरेदार का प्रस्थान एव मेमाशाह का शाह लोगो के साथ प्रवेश ) " सब एक साथ-बादशाह सलामत की जय हो। बादशाह-(मेमाशाह एव अन्य शाही को आदरपूर्वक यथा स्थान विठाते हैं एव बादशाह खेमाशाह को कुछ समय तक गौर से देखते है।) इतने बड़े दौलतमन्द इंसान को इतने सादे लिबास में देखकर एकाएक यह विश्वास करना कठिन हो जाता है कि जिस खर्च का भार वहन करने में शाही खजाना भी डगमगा रहा था उस मम्पूर्ण खर्चे का भार इस शख्स ने उठाया है। धन्य है, खेमाशाह जैसे सपूत को। (खेमाशाह बादशाह को एक वेशकीमती हीरे की अगूठी भेंट करते है।) बादशाह-(चमचमाती अगूठी को हाथ मे उठाकर) आह, क्या ऊची किस्म का हीरा है । (शाही जौहरी की ओर देखकर एवं उसके हाथो मे अँगूठी थमाकर) क्यो? इसकी कीमत आक सकते हो? जोहरी-(हीरे की अंगूठी को अच्छी तरह से जाच कर एवं परख कर आश्चर्य के साथ) जहापनाह, ऐसा कीमती हीरा मैंने आज तक नहीं देखा है । इसकी कीमत कम से कम भी आकी जाय तो एक करोड़ अशफियो से क्या कम होगी? हजूर, यह हीरा तो जन्नत की जमीन का दीखता है। जहापनाह, इस धरती पर तो ऐसा हीरा मिल नहीं सकता। (जौहरी १०८/ वन्देमातरम् अंगूठी बादशाह को वापस देता है। सभी दरबारी एव बादशाह स्वय आश्चर्यचकित होकर खेमाशाह को देखते है । बादशाह-(खमाशाह से) ऐ मेरे रहम दिल, महामानव शाह, तुम्हारी जितनी भी तारीफ की जाय वह थोड़ी है। तुम्हारे सादे लिवास को देखकर तो हैरानी होती है। क्योकि आजकल के रईस तो बेशकीमती जेबरो व कपड़ों से खूब लदे रहते है । जवकि तुम्हारे हाथ में तो एक अगूठी तक नहीं है । समाशाह-बादशाह सलामत, मै तो एक अदना इसान हूँ । सादगी को ही खुदा प्यार करते है। बाहरी शृगार तो दुनिया को रिझाने के लिए किया जाता है । बादशाह-क्या सार की बात कही है ? खमाशाह-हजूर, हमारे पूर्वजो ने वक्त पर बड़े से बड़ा त्याग एव बलि- दान किया है एव सल्तनतो को-इज्जत आवरू ही नहीं रखी अपितु करोडों इन्सानो के जान की रक्षा भी की है। जहापनाह. यद्यपि मैने परिश्रम से धनोपार्जन किया है फिर भी मै इस धन को मेरा नही मानता। मैं इस पर सम्पूर्ण समाज का हक मानता हू और इस धन को सार्वजनिक हित के काम लगाना अपना कर्तव्य समझता वादशाह (खुश होकर) क्या मूव । वाह, वाह ! तुम्हारी कौम मे रहम-दिली तो कूट कूट कर भरी हुई है। वाकई तुम सच्चे माने में 'शाह' हो। खेमाशाह-हजूर, प्राणी मात्र पर दया करना ही धर्म है । बादशाह-वेशक, तुम्हारी रहमदिली की हम तारीफ करते है । तुम्हारे जैसे शाह लोगों को खुदा सलामत रखे, यही मेरी आरजू - खंमाशाह-हजूर, भूखे, नगे, वेसहारा एव उपेक्षित लोगो की मदद करने मे ही शाह' पिताव की गरिमा है । बादशाह खेमाशाह तुम महान हो। खेमाशाह--महान तो जहापनाह हैं जिन्होंने मुझ इन्सान को दरवार में आने एव इन लाखो लोगों की सेवा करने का अवसर दिया। बादशाह -(दरवारियों की ओर मुखातिब होकर) सके मब खेमागाह मामाह / १०६
की जय बोलो।
सेमाशाह-नही जहांपनाह, जय मेरी नही, जय आपकी हो। (सेमाशाह
एवं साथ आये शाह लोग बादशाह की जय बोलते हैं । इधर
दरवार के अन्य सभी लोग बादशाह के हुक्म के अनुसार खेमा-
शाह की जय बोलते हैं 1 उधर वाहर दूर मैदान मे सेमाशाह
के जय की आवाजें आसमान छूने को हो रही थी।
पर्दा गिरता है।
११०/ वन्देमातरम्
मुक्ति
लीला शर्मा
(एक बड़ी हवेली के बड़े कमरे मे सेठ दोलतदास मसनद के
सहारे लेटे हुए हैं । पास मे सेठानी बैठी सरौते से सुपारियां
काट रही है।)
दौलतदास--सेठानी, तुझे इस सरौते से सुपारियां काटते हुए कितने साल
हो गये?
सेठानी-तीस साल से ज्यादा तो हो ही गये हैं। क्या आप नया सरीता
खरीदने की सोच रहे हैं ?
दौलतदास-नहीं, मैं स्वस्थ हू । मुझे फिजूलखर्ची का बुषार नही चढ़ा है।
मैं सोचता हूं तुम्हे सुपारियां काटने का काफी अभ्यास हो गया
है । यह काम तो तुम अन्धेरे में भी कर सकती हो । रोशनी
की क्या जरूरत है । इसे वद कर दें ताकि कुछ तो बचत हो
सके।
(दौलतदास ने बैठे बैठे ही छड़ी के सहारे बटन ऊपर कर
दिया। हल्का अन्धेरा हो गया।)
सेठानी
-इस अन्धेरे में मेरी अंगुली कट गई तो?
दौलतदास-थू थू, बुरा मत सोचा करो। मेरी तरह हरदम अच्छा सोचा
करो।
सेठानी -इस समय आप क्या अच्छा सोच रहे है ?
दोलतदास- वही जो किसी व्यापारी को सोचना चाहिए। मैंने गोदाम
बाजरे से भर रखे है और मेरे सामने वाले ने ज्वार से । मैं
तो यही सोचूगा कि चाजरे के भाव बहुत ऊचे चले जायें और
ज्वार के एकदम नीचे गिर जायें । इसी तरह अपने रामदास
मुक्ति / १११
के लिए ऐसा रिश्ता मिल जाये कि खूब दहेज आये और इस बेटी राधा का ब्याह बिना दहेज के हो जाये । (दरवाजे पर खटखट होती है । सेठानी जल्दी से उठकर रोशनी करती है और भीतर चली जाती है । सेठ दौलतदास दरवाजा खोलते हैं । दरवाजे पर सेठ पूंजीदास खड़े हैं ।) दौलतदास-आइए आइए । रात के समय कैसे चले आये ? खाना तो खाकर ही आये होगे ? आप कुछ गम्भीर नजर आ रहे है । कही बाजरे का भाव नीचे तो नही आ गया है ? पूंजीदास-नही भाई, मैं तो आपसे कुछ निजी वाते करने आया है। दौलतदास-फिर तो रोशनी की क्या जरूरत है। हमने एक दूसरे को देख ही रखा है। पूंजीदास-सुनिये भाई साहब, जमाना वड़ा अजीव आ गया है । मेरो वेटी स्मिता ने आज ही अपनी मां को बताया कि वह आपके वेटे रामदास ने प्यार करती है। वह शादी करेगी तो सिर्फ रामदास से। आप जानते ही है मेरे एक ही बेटी है । मेरी पत्नी को तो आप जानते ही है, वेटी जो कह देती है उसे पूरा करके ही मानती है । उसी ने मुझे आपके पास भेजा है। आप यह रिश्ता स्वीकार कर ले । दौलतदास-वाह सेठ जी, सौदा लेकर आप खुद ही चले आये । हमारे रिवाज के मुताबिक तो पहले दलाल आते है । भाव ऊचे नीचे होते है । यह वैभव का सौदा...? पूंजीदास-~-थोड़ी देर के लिए व्यापार को भूलकर प्यार पर आ जाइए। दौलतदास--सेठजी, रामदास मेरा इकलौता बेटा है । मैने उसे कालेज में पढ़ाया है । अपनी बिरादरी मे कालेज में पढ़े लडके को दहेज मे स्कूल तक पढे लड़के से दो गुना धन मिलता है। चलो, सीधे ही फाइनल पर पहुच जाते है। एक लाख रुपया नकद लूंगा । गहने और कपड़े तो आप अपनी बेटी को देंगे ही। पूंजीदास-सेठ दौलतदास, तुमने बाजरे का स्टाक किया है। उसका भाव बढ़ता जा रहा है। मेरे ज्वार के स्टाक पर तो सीधा घाटा पड़ रहा है । ज्वार के भाव ही नहीं बढ़ रहे है। कुछ कम करो। ११२ / वन्देमातरम् दौलतदास-रामदास भी मेरा स्टाक है । जब बाजरे के भाव बढ़ रहे हैं तो रामदास के क्यों नही? पूंजीदास-सेठजी, मान लो मामला इसके विपरीत होता। दोलतदास-यानी बाजरा आपके गोदामों में और ज्वार मेरे गोदामों मे तो? पूंजीदास-यही मान लो। आपकी बेटी राधा भी कालेज में पढ़ती है और मेरा बेटा अशोक भी। यदि उनकी आँखें चार हो जाती यानी जिस तरह मैं आपके पास आया हू, वैसे ही आपको आना पड़ता तो? दौलतदास-तो क्या ? मैं कोई आपकी तरह कजूस थोडे ही हूँ। लड़की के रिश्ते की बात करने आता तो दहेज को सूची साथ में लाता । अगर मेरी बेटी राधा ने आपके बेटे से प्यार किया होता तो शादी मे दो लाख रुपये नकद देता। एक कार, फ्रिज और टेलीविजन भी देता । गहने और कपड़ो का ढेर लगा देता। पूंजीदास-सेठ दौलतदास को मैंने व्यापार में तो जवान का पक्का देखा है ब्याह शादी के मामले में। दौलतदास-अरे क्या बात करते हो सेठ पूंजीदास । जवान से जो कह दिया वह कह दिया । उससे फिरता नही हू मै । पूंजीदास-तो सेठजी, आपके लिए खबर यह है कि आपके बेटे ने मेरी बेटी को नही बल्कि मेरे बेटे को आपको बेटी ने पसद किया दौलतदास-है है ? क्या यह सच है ? (सेठ दौलतदास वेहोश हो जाते है । भीतर से सेठानी भागी आती है । सेठजी के मुंह पर पानी के छोटे मारे जाते हैं तो उन्हें होश आ जाता है । वह कुछ देर सेठ पूंजीदास को पूर कर देखते हैं।) दौलतदास-सेठ पूंजीदास, आज आपने व्यापार में मुझे मात कर दिया । मेरे बाजरे का भाव मदा कर दिया और अपनी ज्वार को ऊचा उठा दिया । लेकिन मैं भी सेठ दौलतदास कहलाता है। जितना कहा है, उससे ज्यादा दूंगा। मुझे मेरी बेटी का रिश्ता तुम्हारे बेटे के साथ मंजूर है। सुस्ति । ११३ (सेठ पूंजीदास के चेहरे पर खुशी न देखकर) क्यों सेठ पूंजीदास, उदास क्यो हो गये। खुश हो जाओ । तुम्हारी वेटी को मनचाहा वर मिलेगा और तुम्हे दहेज में मन- चाही राशि । तुम्हारे ज्वार का भाव ऊंचा हो गया यार, मेरे बाजरे का नीचा, फिर भी मैं खुश हू । तुम क्यो नही? पूंजीदास-सेठजी, गोदामों में भरा आपका बाजरा और मेरा ज्वार दोनों अपने लिए मिट्टी हो गये हैं। मेरे बेटे ने कह दिया है वह दहेज नही लेगा । जब वह अपने पाँव पर खड़ा हो जायेगा तब आपकी वेटी से किसी मदिर मे, शादी करेगा । हमारे पास तो वे सिर्फ आशीर्वाद लेने आयेंगे। दौलतदास-रोशनी जलाओ यार.। जब ऐसी औलाद पैदा हो गई तो किसके लिये कजूसी।। . - O ११.४ / वन्देमातरम् नालन्दा का प्राचीन विश्वविद्यालय बोला Dविद्यासागर राय (एकान्त और सन्नाटे का अनुभव कराने वाली ध्वनि, तेज हवा, साय- साय । पतों की गड़गड़ाहट, बिजली की कड़क का प्रभाव, धीरे-धीरे फेड आउट और फिर गूंजती हुई आवाज में निम्नलिखित स्वर उभरता हुआ- वक्त से है आज और कल, वक्त से है कल और आज, वक्त की हर. शे गुलाम, वक्त का हर 0 पे राज, आदमी को चाहिए वक्त से डर कर रहे कोन जाने किस घडी वक्त का बदले मिजाज । आवाज (प्रतिध्वनि में) ओह ! समय, बलवान होता है। समय समय की बात है । समय के झझावतो ने बड़े बड़े राजा महाराजाओ को मिट्टी में मिला दिया । रक को राजा और राजा को रक बना दिया । भव्य एव मुन्दर प्रसादों को वीरान कर दिया। ओह ! क्या था मेरा वह ,रूप? और आज आज यह खण्डहर यह एकान्त कितना भीषण' "कसा भयावह " (वही सन्नाटे की आवाज वेज होती हुई). आज यहां उल्लू बोलते हैं "(उल्लू की धू धू, चमगादडों की ची । 1 . N जी की ध्वनि) चमगादड़ें यहां अपना वसेराामनाये हुए है आज मेरा कोई न रहा, नालन्दा का प्राचीन विश्वविद्यालय.बोला / १,१५ मेरी बात तक सुनने वाला कोई न रहा (सन्नाटे की ध्वनि और उभरती हुई) हा, कभी कोई भूले भटके मुझे देखने चले आते है और यहा मेरे आगन में खड़े होकर मेरे पुराने गौरव को नमन करते है, तो सहसा मेरा मन पुरानो स्मृतियो मे खो जाता है। पहिचाना मुझे मैं कौन हूँ (पांज) मैं "मैं नालन्दा का प्राचीन विश्वविद्यालय हूँ जो लगभग 600 वर्षों तक एशिया की चेतना का केन्द्र रहा । दुनिया आज तक मेरा नाम भूल नहीं पाई। शायद भूलेगी भी नही, क्योकि में भारतीय प्राचीन संस्कृति का प्रतीक, पुरातन में ज्ञान का सूर्य वन कर चमका हूँ। मैने अपने ज्ञान आलोक सं दिशाओं को प्रकाशित किया है ।... कितना श्रेष्ठ और पावन दिन था वह, जिस दिन बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध के चरण यहां पड़े थे और "और मेरे जन्म के मूत्र एकत्र हुए थे । ओह, वह घटना । (समवेत स्वर मय सगीत)- धम्म शरणम् गच्छामि, संघ शरणम् गच्छामि, वुद्ध शरणम् गच्छामि, (जयजयकार की ध्वनि उभरती हुई)-बौद्ध धर्म की जय हो, बौद्ध सघ की जय हो, भगवान बौद्ध अमर रहे।) शान्त ! राजग्रह के धर्म प्राण लोगो, शान्त । धर्म को शरण मिलेंगी, सप की शरण मिलेगी, अहिंसा को ज्योति फैलेगी, ज्ञान का प्रकाश अमान के अन्धकार पर विजय प्राप्त करेगा । बोलो तुम्हारी क्या इच्छा है ? एक यणिक भगवान हम अभागों को पापों का प्रायश्चित करने का अवसर प्रदान करें। हम मगध राज्य के ५०० व्यापारी आपकी शरण में आए हैं। हम अपने धन से भूमि परीद कर आपको समर्पित करते है। देव ! स्वीकार करें। चुद- सपास्तु । व्यापारी पभो ! आप सोयों का विचार श्रेष्ठ है। इस भूमि पर एक विपरिवासम-मान का केन्द्र बनाया गय । उसका ११६ / बन्देमातरम् नाम नालन्दा विश्वविद्यालय होगा जो ससार में ज्ञान ज्योति को प्रज्वलित करेगा और भारत के नाम को सदियों सदियों तक अजर अमर रखेगा। (वही जयजयकार और समवेत स्वर-उभरती हुई ध्वनि मे, बौद्ध धर्म की जय हो, बौद्ध संघ की जय हो, भगवान बुद्ध अमर रहे।) धम्म शरणम् गच्छामि, सघ शरणम् गच्छामि, बुद्ध शरणम् गच्छामि (धीरे-धीरे फेड आउट) नालन्दा–हा, तो इस प्रकार ५०० व्यापारियो के महान दान से राजगृह के तप्त कुण्डों से सात मील दूर उत्तर में मेरा जन्म हुआ। ओह । कितने भव्य, विशाल, गगनचुम्बी छह विहार बने । मेरे विहारो की पक्तियो के ऊचे ऊचे शिखर आकाश के मेघो को छूते थे। इनके चारों ओर नीले जल से भरे सरोवर थे । सरोवरो मे लाल कमल तैरते थे । बीच बीच में आम्र कुजो को सघन छाया थी। (छनी हथौड़ों द्वारा मूर्तिया बनाने की ध्वनि मय सगीत के) नालन्दा-ये शिल्पियो द्वारा मूर्तिया बनाने की आवाजें । ओह ! कितनी लगन और मेहनत से शिल्पियों ने मुझे सवारा। उस शिल्प, उस स्थापत्य कला को देख दर्शक आश्चर्य चकित होते थे । आज भी मेरे खण्डहर उनकी याद को ताजा बनाये हुए है । -(वही छेनी हथोड़ों की ध्वनि) मेरे यहा संसार के ज्ञान पिपासु आए । मुझे याद है उस ह्वेनसाग की, जो दूर चीन से, यहा ज्ञान की ज्योति लेने आया (सगीत, फेड इन) बनसाग-प्रहरी ! में इस विश्वविद्यालय के आचार्य से मिलना चाहता हूँ। मै चीन देश का युवक ह्वेनसाग हू । ज्ञान की प्यास मुझे यहा खीच लाई है। प्रहरी- आओ युवक ! मेरे साथ आओ, मैं तुम्हे आचार्य शीलभद्र के पास पहुचा देता हूं। (सगीत और धीरे धीरे फेड आउट) हनसाग-ओह ! इतना भव्य, इतना विशाल (गूजती हुई मगीत ध्वनि) प्रहरी ! यहा कितने विद्यार्थी अध्ययन करते हैं । प्रहरी- आगन्तुक ! यहा दस हजार छात्र और पन्द्रह सौ अध्यापक हैं । नालन्दा का प्राचीन विश्वविद्यालय बोला / ११७ था।
--- ह्वेनसाग-~अच्छा ! और यह क्या पुस्तकालय ? प्रहरी~हा यह यहा का पुस्तकालय है जो एशिया का सबसे बड़ा पुस्तकालय है। इसमें भापा, दर्शन, तर्कशास्त्र, चिकित्सा शास्त्र, धर्म,शिल्प आदि विभिन्न विषयो की असख्य पुस्तके है। लो, यह सामने आचार्य शीलभद्र का कक्ष है। वहा जव सरस्वती वदना होगी। हम सरस्वती वदना के पश्चात् आचार्य से मिलेंगे। (शीलभद्र के कक्ष से आ रही सरस्वती वदना की सगीत, मय ध्वनि) या कुन्देन्दु तुपार हार धवला, या शुभ्रवस्त्रावृता, या वीणा वरदण्ड मण्डित कर या श्वेतपद्मासना, या ब्रह्माऽयुत शकर प्रभृतिभिर्देवै. सदा वन्दिता, सा मा पातु सरस्वती भगवती नि शेप जाड्यापहा । (हल्का संगीत और साज) ह्वेनसाग-परम पूजनीय कुलपति जी के चरणो मे प्रणाम । आचार्य--प्रसन्न रहो । आओ युवक, क्या नाम है तुम्हारा ? कहा से आये हो और तुम्हारा क्या प्रयोजन है ? ह्वेनसाग---मैं चीन देश से ह्वेनसाग विद्या अध्ययन के लिए श्रीमान् के चरणो में आया हू । क्या मुझ पर कृपा करेगे ? आचार्य अवश्य, तुम्ही क्यों, यहा सभी को विना भेदभाव के प्रतिदिन एक सो व्याख्यान दिये जाते है। (सगीत ध्वनि) नालन्दा---और ह्वेनसाग ने आचार्य शीलभद्र के चरणों में बैठकर पहले न्याय, योग, व्याकरण आदि का अध्ययन किया फिर उसने पाच वर्ष तक अनेक बौद्ध शास्त्रों का परायण किया!...भारत के अतिरिक्त चीन, कोरिया, तिब्बत, तुखार एव सुदूर मगोलिया तक के ज्ञान पिपासु यहा आए। (संगीत) -~-मुझे याद है आर्यवर्ग 'नाम के कोरियन विद्वान सन् ६३८ ई० मे यहा गए। ओह, यही पढ़ते पढाते 70 वर्ष की आयु में उनकी (दु.ख प्रकट करने वाला संगीत) -हा । यहा इसिग नामक चीनी यात्री भी आया। उस समय तक मेरे भवन का बहुत विस्तार हो चुका । 300 बडे कमरे और आठ मण्डप बन चुके थे... -मेरी व्यवस्था के लिए पैसो की कभी कमी नही रही। भूमि और ११८ / वन्देमातरम् मृत्यु हुई।... (संगीत) भवनों के दान के अतिरिक्त प्रतिदिन के खर्च के लिए सौ गांवों को आय मुझे समर्पित थी। इत्सिंग के समय में यह संख्या दो सौ गावों तक पहुंच गई थी। मेरे निर्माण कार्य और अर्थव्यवस्था में उत्तर प्रदेश विहार, वगाल ने पर्याप्त योग दिया। -हा । विदेशी सम्राट भी मेरे यहां आर्थिक सहायता भेजते रहते थे !....."एक बार भुमात्रा के शासन श्री बालदेव पुत्र ने अपना दूत भेजा । मुझे याद आ रही है वह घटना--(फ्लेश बैंक का सगीत, उसके बाद उभारती हुई पदचाप की ध्वनि) दूत-प्रहरी मुझे मगध के सम्राट श्री देवपालदेव के पास पहुचाये । प्रहरी-आगन्तुक तुम कौन हो? और मम्राट से मिलने का तुम्हारा क्या प्रयोजन है ? दूत-मैं एक विदेशी दूत हू और कुछ सदेश लाया हूँ । (परिवर्तन सूचक सगीत) प्रहरी-सम्राट के चरणों में प्रहरी का प्रणाम । देव । यह विदेशी दूत आपसे मिलना चाहता है। कुछ सदेश लाया है । सम्राट-कहीं दूतवर, क्या बात है? किसका सदेश लोये हो? दूत-सम्राटवर ! मेरा प्रणाम स्वीकार करें । मै सुमात्रा के सम्राट श्री वालदेव पुत्र का दूत हूँ । मुझे आपके यहाँ भेजकर, सम्राट ने प्रार्थना की है कि उनकी ओर से पांच गांवो का दान नालन्दा विश्वविद्यालय को किया गया है । यह ताम्रपत्र सम- पित है। सम्राट-टूतवर ! सम्राट बालदेव पुत्र के हम बहुत आभारी है । उन्हे हमारा शुभ सदेश दें। हमें प्रसन्नता है कि उन्होने नालन्दा की ज्ञान ज्योति को अखण्ड रखने में, अपना सहयोग दिया है । (संगीत) नालन्दा-इस प्रकार विदेशी शासको द्वारा मेरे लिए धन समर्पित होता रहता था । एक बार शिप्यो को सम्बोधित करते हुए मेरे बारे में आचार्य शीलभद्र ने कहा" (सगीत) शीलभद्र--(प्रतिध्वनि में) प्रिय शिष्यों ! नालन्दा विश्वविद्यालय भारतीय ज्ञान साधना का पुण्य सरोवर है । इस सरोवर के शीतल जल का पान करने के लिए सभी देशो से जिज्ञासु आते ही रहते हैं। नालन्दा का प्राचीन विश्वविद्यालय वोला/ ११६ इस विश्वविद्यालय का सम्पूर्ण व्यय राज्य वहन करता है अतः हम निश्चित होकर ज्ञान की साधना में लगे रहते हैं। यहाँ शिष्य गुरु के चरणों में बैठकर विनम्रतापूर्वक गहन अध्ययन करता है। (संगीत) नालन्दा-आचार्य शीलभद्र ने ठीक ही कहा। मेरे यहाँ गुरु शिष्यों के सम्बन्ध बहुत मधुर एव सम्माननीय थे। आज जब मैं गुरु- शिप्यो के बीच खाई और अनुशासन हीनता की घटनाए सुनता हूँ तो मुझे बहुत दुःख होता है । मेरे यहाँ गुरु की महत्ता के मधुर स्वर गूजते ही रहते थे। (गूजते हुए स्वरो में) गुरुयह्मा, गुरुविष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरः गुरुः साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवेनमः । (धीरे-धीरे फेड आउट) नालन्दा-मेरे यहाँ केवल पांच विषयों की ही शिक्षा दी जाती थी। ये विषय थे व्याकरण, तर्कशास्त्र, चिकित्साशास्त्र, शिल्प विद्या और दर्शन व धर्म । मेरे यहां शिक्षा के उद्देश्य आज की शिक्षा के उद्देश्यों से भिन्न थे। (संगीत) -आज की शिक्षा को देख मुझे बहुत दुख होता है। आज हमारे विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम का रूप समग्रतया जीवनोपयोगी एवं व्यावहारिक नही। इसी कारण आज शिक्षितों पर भी निराशा के बादल मण्डराते है। (निराशासूचक सगीत) -मेरे यहाँ का पाठ्यक्रम व्यावहरिक था। व्याकरण या शब्द- विद्या द्वारा विद्यार्थी भाषा का सम्यक् ज्ञान प्राप्त करता था। तर्कशास्त्र द्वारा वह अपनी बुद्धि की कसौटी पर प्रत्येक बात को परखता था। चिकित्सा शास्त्र द्वारा वह स्वय स्वस्थ एव दूसरों को स्वस्थ रखता था। शिल्प विद्या द्वारा, विद्यार्थी आर्थिक क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनता था। धर्म व दर्शन की शिक्षा द्वारा विद्यार्थी अपने जीवन को सयत व अनुशासित बनाता था। (सगीत) - मुझे याद आ रही है वह घटना जब इत्सिग चीनी यात्री आया १२० / बन्देमातरम् ही था और उसने धर्म की शिक्षा के बारे में आचार्य से पूछा- (संगीत) इत्सिंग-आचार्यवर ! क्या यहाँ बौद्ध धर्म की ही शिक्षा दी जाती है ? आचार्य-नही, आगन्तुक ! इस विश्वविद्यालय में धार्मिक सहिष्णुता को अपनाया गया है । ब्राह्मणो और बौद्धो के महित्य, दर्शन, विज्ञान और कला का हमारे पाठ्यक्रम में समावेश है। यहाँ बौद्ध धर्म के ग्रन्थी के साथ-साथ वेदागों के अध्ययन अध्यापन की सुन्दर व्यवस्था है। यहाँ का प्रत्येक छात्र अपनी मचि के अनुसार धर्म और दर्शन का अध्ययन करता है । इत्सिग-आचार्य ! यह धार्मिक सहिष्णुता और धर्म निरपेक्षता का प्रतीक है। इस प्रकार की धार्मिक शिक्षा, बिना भेद-भाव के सभी को अपने अक में समेटने वाली उत्तम व्यवस्था है । (संगीत) नालन्दा–हाँ, तो मेरे यहाँ, अपनी रुचि से धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने की स्वतन्त्रता थी। बौद्ध धर्म के साथ-साथ वेदो के अध्ययन अध्या- पन की अच्छी व्यवस्था थी, इसी कारण मेरे यहां से निकले छात्रों का नैतिक स्तर ऊँचा होता था ! उनमे धार्मिक सहिष्णुता घर कर जाती थी (पॉज) नालन्दा--आज के नवयुवकों की नैतिक स्थिति को देख कर मुझे दया आती है। देश मे बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों के होते हुए भी अनु- शासन एवं धार्मिक सहिष्णुता की कमी है। (सगीत) -मुझे गर्व है मेरे से निकले, विद्वानों पर जिन्होने देश विदेशो मे जाकर ज्ञान का प्रसार किया। आज से लगभग २६०० वर्षों पूर्व मेरे आचार्य शान्तिरक्षित तिब्बत पहुंचे। उन्होने यहाँ से प्रस्थान करते समय सकल्प किया। उनके वे शब्द, आज भी मुझ मे गूज रहे है (संगीत) शान्तिरक्षित-~-(गूजती हुई प्रतिध्वनि) मैं तिब्बत जाकर वहाँ बौद्ध विहारों की स्थापना करूंगा। भारतीय धर्म ग्रन्थों का तिब्बती भाषा मे अनुवाद करते हुए मैं अपना शेप जीवन वही धर्म प्रचार में व्यतीत करूंगा। (सगीत) नालन्दा और हाँ आचार्य शान्तिरक्षित ने ऐसा ही किया। इसी प्रकार मेरे अनेक ग्रन्थो की प्रतिलिपियां चीनी यात्रियो के द्वारा चीन नालन्दा का प्राचीन विश्वविद्यालय बोला/१२१ पहुची और वहां की भाषा में अनूदित दुई। कला के क्षेत्र में भी में अग्रणी रहा""(ॐनी हथौड़ों से मूर्तियों पर काम करने का उभरता हुआ स्पर) मेरे यहाँ के कलाकार आकर्षक कास्य मूर्तिया बनाते थे। मेरी दम कला का प्रभार नेपाल, तिम्बत, हिन्देगिया, एवं मध्य एशिया के कलाकारों पर पड़ा । मेरी कला उन कलाकारों की छनी में समा गई। (वहीं उभरता हुआ और फिर हलका होता ना स्वर) नालन्दा-मेरा अपना गौरव है। मेरी गौरव गाथा को अब भी गाया जाता है और उसमे दिशा लेने का सकल्प किया जाता है । मगध अनु- संधानशाला का शिलान्यास करते हुए हमारे भूतपूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय डा राजेन्द्रप्रसाद ने भी अपने विचार प्रकट किये (सगीत) डा राजेन्द्रप्रसाद-~नालन्दा को सर्वांगीण उन्नति वस्तुत: उस समन्वित साधना का परिणाम थी जो शिल्प विद्या, शब्द विद्या, तथा धर्म और दर्शन को एक साथ पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने मे सभव हुई। हमारी भी अभिलाषा होनी चाहिए कि हम भूतकाल की व्यवस्था से शिक्षा ग्रहण कर, कला, साहित्य, धर्म, दर्शन और ज्ञान का एक बड़ा केन्द्र नालन्दा में पुनः स्थापित करें। (संगीत) नालन्दा-तो हो, इसी सकल्प से मेरे यहां अब नई-नई अनुसंधानशालाए बनाई जा रही है । उनमे काम करते हुए जिज्ञासुओं को देख मुझे अपार आनन्द हो रहा है किन्तु उनका वर्तमान पाठ्यक्रम मुझे और मेरे शिष्यो को वही प्राचीन गौरव एवं रूप दे सकेगा, इसमे मुझे सन्देह है। बीते दिन पुनः आना कठिन है। मुझे आशा के बादल नही दिखाई देते । मुझे जान पड़ता है, मुझे मेरे इन खण्डहरों में ही भटकना होगा। ये मेरे गौरव की याद सदियो-सदियो दिलाते रहेंगे। (एकान्त और सन्नाटा बताने वाली ध्वनि, तेज हवा, साय-साय, पत्तो की खड़गड़ाहट, बिजली की कड़क एवं आंधी तूफान-- और फिर हल्ले सगीत से समाप्ति) १२२ / वन्देमातरम् वन्देमातरम् चुन्नीलाल भट्ट मैं अपनी धुन मे यो ही चला जा रहा था। एकाएक ध्यान सामने के आलीशान बगले की ओर गया। अहाता लोगों से खचाखच भरा हुआ था । चमचमाती सरकारी कारो की कतारे लगी हुई थी। भीड़भाड़ से भरी सड़क पर पुलिस वाले हाथो में डडे लिए इधर-उधर दौड़ रहे थे। कुछेक अनावश्यक ही लाठियां जमीन पर ठोक रहे थे । मानो उन्हे देखकर जल्द ही कोई हवलदार बना देने वाला हो । मेरे कदम भी उसी बहाव में चल पडे ---यही सोचकर कि शायद यही कही कहानी का कोई 'प्लाट' मिल जाये। दरवाजे पर पहुचते कुछ सकपकाया । सम्भवतः रोजमर्रा की तरह पहरे- दार रोक लेगा । क्योकि वह एक मन्त्री महोदय की कोठी थी। लेकिन आज किसी ने कुछ नहीं पूछा । मालूम नहीं ये सब इतने मेहरबान कैसे बन गये...? कही इलेक्शन विलेक्शन का तो चक्कर नही। सूट-बूट में अपटूडेट अफसरो, खादी के लबाद से लदे नेताओं की भीड़ ने मत्रीजी को घेर रखा था। इतनी भीड़भाड के बावजूद भी एकदम सन्नाटा था"शान्त वातावरण... पिन ड्राप साइलेन्स अनायास मेरा ध्यान उनके चेहरे की ओर गया । मत्रीजी एकदम गम्भीर मुद्रा में खड़े थे । मानो किसी गहन शोक में डूबे हुए हो। आसपास खडे उनक इष्ट-मियो सहयोगियो के नेत्र भी आंसुओं से लबालब भरे थे। मैं बड़े सकट में फस गया । बात क्या है, समझ नहीं पा रहा था । पूछू तो भी किससे ? अपनी विरादरी के लोग तो नहीं के बरावर ही थे । कुछ थे भी तो वे उन्ही की जी-हजूरी मे व्यस्त थे । वन्देमातरम् / १२३ खैर ! मन को मार कर एक तरफ खड़ा देखता रहा । गम्भीर मुद्रा वना- कर । पास मे एक सरदार भी खड़े थे। लगते तो वे भी कोई अफसर ही, लेकिन बडे हँसमुख । अपने मूरजमुखी से खिले हुए मुंह को गम्भीर बनाने का असफल प्रयास कर रहे थे। काफी कोशिशो के बावजूद भी अपने को असफल पाकर कोट के जेब से कुछ निकाल कर जोर से सूघ लिया। देखता हूं कि एक दो क्षणों में उनके प्रफुल्लित चक्षुओं से अश्रुधारा बह चली है । इसे देखकर तो मुझे वही फिल्मी हीरोइनों वाली बात याद आ गई जो अपने प्रेमी के वियोग में आसू बहाने के लिए नेत्रो मे ग्लिसरीन लगा लेती है । सामने से आते एक युवक को देखकर मन्त्रीजी के पास खड़े एक नेताजी रोव से चिल्ला उठे-"क्यो जी ! बड़ी देर लगा दीन तुमने ? कब से फोन किया था तुम्हारे अखबार को।" "जी. 'जी''जी माफ कीजिए' जैसे ही मुझे खबर मिली मैं दौड़ा आ रहा हू..." कपकपी भरे स्वर में उसने जवाब दिया । युवक इस शहर से प्रका- शित एक पत्र का सवाददाता था। "ठीक है.."ठीक है. 'अव देर मत करो. देखो आज के अक में ही यह शोक समाचार मुख-पृष्ठ पर ही बड़े बड़े अक्षरो में प्रकाशित हो जाना चाहिये..." "जी.. वैसा ही होगा।" "और, हाँ देखो !..'थोडी 'ममता' की जीवनी मंत्रीजी का उमसे अटूट स्नेह "आदि पर एक दो पेराग्राफ लिख देना. 'थोड़ा-सा अपनी ओर से नमक- मिर्च लगा देना, ठीक है ?.."अरे हाँ, फोटोग्राफर साथ नही लाये ?" "जी, नही तो? आपने तो सिर्फ..." "देखिए साहब ।" मत्रीजी को सम्बोधित करते हुए एक नेताजी बौखला उठे-"इनका संपादक तो वडा घमण्डी है हजूर ! ""कुछ समय के लिए विज्ञा- पनों तथा कागज के कोटे पर पाबन्दी लग जाये तव ठिकाने आयेगो अकल..." सवाददाता से-"अच्छा, तुम तो जाओ और अपने फोटोग्राफर को जल्दी भेज दोहां यह समाचार मय फोटो के छपना चाहिये, समझे?" मुझे भी अब कुछ कुछ समझ में आ रहा था। आखिरकार, किसी न किसी की मौत हो गई है, जिसका मन्त्रीजी से अटूट रिश्ता था। तभी तो वातावरण इतना शोकाकुल था। १२४ / वन्देमातरम् परन्तु यह ममता कौन थी? भतीजी..? भानजी...? बेटी? बहन या पली? इसी प्रश्न से वेचैन था। "नमस्कार''नमस्कार साहब !" एक सज्जन ने बीच में आकर मन्त्रीजी को साष्टांग दण्डवत करते हुए कहा-"मैं मैं मदन, आईमीन मदनकुमार चट्टोपाध्याय''आकाशवाणी का सवाददाता "जैसे ही यह 'वंड न्यूज' सुनो दौड़ा आ रहा हूँ..." वह एक ही सास में बोलता रहा-"सर !..'तो यह ममताजी को डेथ.."आईमीन स्वर्गवास कब हुआ...?' "आज बड़े सवेरे हो"बड़े डॉक्टरों ने भरसक प्रयल किये लेकिन सब निरर्थक "आखिर ममता को तो चल बसता ही था'.." कहते कहते आवाज भर्रा गई उनकी । मत्रीजी के नेत्रों से अथुधार वह चली। पास में खड़े सभी सज्जन भी अपनी-अपनी जेबो से रुमाल निकाल अपने आमू पोंछने लगे। "डॉन्ट वरी सर !".. मै यह दुखद समाचार अभी ब्राडकास्ट करवा देता "देखिए !..'यह भी घोपणा करवा दीजिये कि इस नगर के सभी दफ्तर व शिक्षण सस्थाएं इस महान् आत्मा के निधन पर शोक सभाएँ आयोजित कर छुट्टी कर दें।" एक सज्जन ने बहुत गम्भीरता के साथ कहा। तभी पास मे खड़े पुलिस इस्पेक्टर को देख उसको ओर मुखातिब हुए - "अरे हा देखिये इस्पेक्टर साहब !.. आप भी अपने कुछ सिपाहियों को भेज कर 'मार्केट'। बन्द करवा ..दीजिये और - पूरे नगर में 'एनाउन्समेट' करवा दीजिये कि आज साय काल चार बजे शवयात्रा में अधिक से अधिक लोग ममताजी के अन्तिम दर्शन के साथ अन्तिम संस्कार में सम्मिलित हों।" इसी बीच अपने शरीर पर कैमरे लादे कैमरामेन आ पहुँचा। मत्रीजी सहित उनके साथियो के अनेक कोणीय फोटो खीचे जाने लगे। एकाएक मेरा ध्यान कलाई में बंधी अपनी घड़ी की ओर गया। लेकिन मैं हंस पड़ा, अपनी इस आदत पर । मैं तो भूल हो गया था कि दो दिन पहले ही इसे मैं गिरवी रख चुका था। पास खड़े एक अजनवी से जो मेरी ही तरह बड़े विस्मय से इस रहस्यमय करुण दृश्य को फटी आँखों देख रहा था मैने समय पूछा। "बारह बजा है."भाई साहा !" उसने कहा । यानी चार घटे शेष है, शवयात्रा के। अच्छा हो तब तक किसी रेस्टोरेन्ट को शरण ली जाय" यही सोचकर चल पड़ा वहां से । जेब मे पड़ी दो चवन्नियो वन्देमातरम् । १२५ , ने लम्बे समय से उछल-कूद मचा रखी थी "मानो जेब में पड़े पड़े उनका दम घुट रहा हो। रेस्टोरेन्ट मे पड़े नये-पुराने असवारी के पृष्ठों को पलटता विचारों में खोया अपनी किस्मत को कोसने लगता 'काश ! मै मत्रीजी का कुछ होता। ठीक चार बजे शवयात्रा का जलूस ममता के अन्तिम संस्कार के लिए शमशान-घाट की ओर बढा । संकड़ो की सख्या में नेता, अफसर, नगर के गण- मान्य लोग, सरकारी गैर-सरकारी कर्मचारी व नगरवासी इम शवयात्रा में मम्मिलित थे। मैं भी चुपचाप इन सबके पीछे पीछे चल पड़ा। घंटे भर में शवयात्रा का जलूस नियत स्थान पर पहुंच गया । शव को चन्दन-चिता पर सुला दिया था। मेरी निगाहे ममता के अंतिम दर्शन को आतुर थी, मगर करता भी क्या ? देख भी तो नहीं सकता था, पास जाकर । शव तो पूरी तरह पुष्पों से ढंका हुआ था और चिता को चारों ओर से मरीजी के सहयोगियों ने घेर रखा था। सभी हाथों में पुष्प लिए शोक मग्न खड़े थे । मेरे पास सिसकते खड़े एक विधायक को पता नहीं क्या हुआ, लड़- खडाती आवाज मे चिल्ला उठे, वन्देमातरम् ? एक पडित जी जिनकी तोद का घेरा ढाई मीटर से कम नहीं होगा, एकदम नग्न बदन, खडे अपने मुखारविन्द से श्लोकों की बौछार कर रहे थे। आवाज तो मैं साफ साफ नहीं सुन पा रहा था लेकिन दूर खड़े यह अवश्य ही दिखाई दे रहा था कि आवाज के माथ साथ उनकी मदमस्त तोंद भी हिलोरें लेती जारही है। ज्योही उनकी नकल करते हुए चिता के चारो और खड़े । मन्त्रीजी एव उनके इष्ट मित्रो ने नतमस्तक हो ममता के शव पर श्रद्धा-सुमन अर्पित किये, त्योंही चिता भी अग्नि शोलो की तरह भभक उठी। • । आसमान ममता और मंत्रीजी की जय जयकार से गूंज उठा था। इस करुण 'दृश्य को देख कर मेरो आँखें भी अपने आंसू न रोक पायी। पर मौत से भी बड़ा दुःख अभी भी मेरे मन मे टीस मार रहा था । शव- यात्रा के साथ होते हुए भी सैकड़ों की हृदय सम्राज्ञी 'ममता देवी के अन्तिम दर्शन न कर सका । अपनी श्रद्धा के दो सुमन भी इस महान आत्मा को अर्पित न कर सका""1 खैर, इसी सोच मे बगल में फंसी अपनी फाइल" को मजबूती से दबाये घर की, ओर चल पड़ा। + - म । १२६ / वन्देमातरम् मड़क पर एक अखवार वाला जोर जोर से चिल्ला रहा था-"आज की ताजा अपर मत्रीजी के घर मोत-ममता को "देखिए.. पढ़िए"मात्र पन्द्रह पैसा..." मुखपृष्ठ पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था--"मन्त्रीजी के घर मौत ममता को।" नीचे फोटो छपा था, जिसमे मत्रीजी सहित उनके कई साथी अश्रु बहा रहे थे । आगे लिखा था---"मग्रीजी के परिवार का अभिन्न अग, उनकी प्राण प्यारी पालतू बिल्ली, जिसको सभी प्यार से ममता कहा करते थे, आज ब्राह्म- मुहूर्त मे इस दुनिया को छोडकर परलोक सिधार गयो ।' 0 वन्देमातरम् / १२७ घोर अन्धकार गोपालप्रसाद मुद्गल चम्बस के यादरों में, धौलपुर के पाम, कासिमपुर ग्राम में पचायत चुनाव का आदेश मिला है। कासिमपुर पहुंचने से पहले मानग में भर का पटाटोप अंधेरा है । चुनाव फराकर सही सलामत लोट आने के लिए दुआ मना रहा हूँ। आज याद आ रहा है कि चाकर है तो नानाकर । वास्तव में "नौकरों" और "न" मे वैर है । उस पर भी एलेक्शन अचॅण्ट । लो, कासिमपुर आ गया। गांव को देय देवकर आठ आठ ओम् रोना आ रहा है। गांव की गलियां टेढ़ी मेढ़ी, ओधक नोची। मकान आदिवासी जमी अवस्या में रहने वालों जैसे । गांव में गरीबो कितनी माफ झलकती। चुनाव के लिए प्राथमिक शाला में अस्थायी व्यवस्था है । उसी में ठहरना है। दहरने के लिए अगल बगल में (8x8' को) दो कोठरिया है। पार्टी में उन्नीस व्यक्ति, जाड़ा अलग । कोठरियों के ऊबड़-गावड़ फर्श को देखकर तन-मन दोनो कांप रहे । सोच नही पा रहे, रात कैसे गुजरेगी? खैर, किसी तरह इधर उधर सहारा लेकर रात गुजारते है । बड़े सवेरे से ही पचो और सरपचों के पर्चे भरे जा रहे हैं । गांव में चहल पहल है । कही सुले आम विचार विमर्श, तो कही कानाफूसी । किसी तरह आठ वाडौं में से पाच मे निविरोध पचों का चुनाव हो गया है । दूसरे, तीसरे, चौथे वार्डों के पचो का तथा सरपच का चुनाव कराना शेप है। काफी सहूलियत मिल गई है। सरपच के लिए केवल दो नाम (बाबा-नाती) मैदान में हैं । वाया 12 वर्ष का नाती 27 का । घर में ही धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र रचा है । मतदान से एक दिन पूर्व मतपत्र तैयार कर लिये गए हैं। पटवारी और ग्राम सेवक इशारो पर नाच रहे है। चुनाव लड़ने वाले भी हमसे चुपवाप मिलने को नाकामयाब कोशिश कर रहे हैं । वे हमारे लिए सहूलियत की सामग्री १२८ / वन्देमातरम् । जुटाकर हम पर एहसान थोपना चाहते है। हम भी पत्थर के नीचे से अपनी अंगुली निकालने की फिराक में हैं। किमी तरह दूसरी रात भी गुजरती है । मतदान को भोर आ गई है । समय से पहले सभी तैयार है । सभी आठ बजते ही ओटोमैटिक मशीन की तरह लग गए है। मैं पीठासीन अधिकारी, पैसा ज्यादा काम कम। बस डाँग पटैलाई में हू, फिर भी मेरी पूछ ज्यादा है । मैने अपनी दुकान एक तख्त पर लगा रखी है। मतदान केन्द्र के चारों ओर चम्बल के पादरो के व्यक्ति दुनाली बन्दूक को सम्हाले मूछों पर ताव दे रहे है । गनीमत यह है कि वोट डालते समय वे अपने हथियार मतदान केन्द्र मे भीतर नही ला रहे है । हाँ इतना अवश्य है कि किसी किसी को स्वच्छन्द प्रकृति जाग उठती है और वह केन्द्र को छोड़ते समय दोनों हाथ उठाकर जयघोष कर अपनी छाप छोड़ देता है । उन्हीं अनजान चेहरो में एक तिलकधारी सज्जन दिखाई देते है। मै स्वत. स्फूर्त श्रद्धा में झुक जाता हू । प्रश्न फूट पडता है : "मवा धरम निवहैं किहि भीती ?" इसका उत्तर वह तिलकधारी गोली की तरह देता है : "जिमि दसननि मह जीभ विचारी ।" मैं प्रभावित होकर उन्हें अपने पास विठा लेता हूँ । वे मशीन गन की तरह तुलसीदाम को चौपाइयों को दागते चलते हे और मैं सोचता हू कि चम्बल के बीहड़ो मे धर्म की कैसी तूती बोल रही है। गर, काम में मैं व्यस्त हो जाता हू और तिलकधारी जी खिमक जाते है। मतदान समाप्त हो जाता है । परिणाम शान्ति से सुना दिया जाता है किन्तु उस तिलकधारी की छाप मेरे मानस से हटाए नही हटती। तभी एक ब्राह्मण मेरे पास आकर प्रश्न करता है--- "महाराज आपने वा तिलकधारी कू डडोत चौ करी? वाए आपने अपने पास चौं बैठायौ?" एक वार तो मै प्रश्नों को सुनकर सकपका जाता हू। समझता हूँ, कोई गलती हो गई और मिर पर कोई आफत आने वाली है किन्तु साहस बटोर कर उत्तर देता हू- "तिलकधारी के स्वरूप को देखकर डडोत की और पास बैठाया।" इतना सुनते ही वह ब्राह्मण आक्रोश से फूट पड़ता है "अजी महाराज बू तिलकधारी पक्की डकैत औ। पहले भोपाल मे तार- . घोर अधकार/ १२६ । पर में चपरामी नो। तारपर में तारखाव की जनीमान्म नोदह कलम पही धर्मात्मा । ई तिलकधारी वा उनीमान्स ए या दिया के बहाने सौत आयो ओर यहाँ छ मो मायान में बेच दई। मैंने काफी समझायो पर एक नहीं सुनी । काऊ तरिया सरकार के मालिम पर गई । गुसिग में दक्षिम दई । छ मान्गन के हथकडी परी । मेरे हथकड़ी पसे। या जनीमान्म ने अंग्रेजी में पुलिस पारेन ते कळू कही तब मेरी हथकडी गुली । मैने भोपाल जनीमान्ग के मद तार कियो । यू भलोमाग आयो दोनों एक दूसरे क् देय दंग के रोने लगे । जनीमान्म की हिलकी वैध गई, गरी धगो, याने मान्य के पैर पकर लिए। कही के म तिहारे मतलब की नॉप रही । तुम्हें दूगरी माह करलो परंगो। बू याही सतं पै सग गई। व तारबाबू के मग अपऊ मयुरा में रह रई ए । वान अपनी पन निभायो सपने मद को दूगरौ ब्याह करा दियो । पात मांडा मौरी एं और वू विचारी नौकरानी की तरह रह रई ए । महाराज ये ऐसे कनास ऐं।" मैं उस अपरिचित याह्मण मजन मे उग तिलकधारी को कहानी सुनकर चकित रह जाता हूँ। मैं उसमे दो प्रन और करता हूँ : "क्या यहा से चुपचाप निकलना सभव नही ? क्या कोई अहीमी पड़ौसी सहायता नहीं करता ?" उस ब्राह्मण ने लम्बी सास भर कर कहा : "एक जनीमान्स को का चल दस-दस, वारह-बारह जनीमान्स के पांव बांध के डार दे। वे कैसे निकास के नाय जाय सके। अच्छे-अच्छे माहूकारन के मोड़ाऊ नाय भाग सके तामें तो वे जनीमान्म ए, कितेक दम होय । दूसरी बात को उतर ई ए के कोज एक दूसरे की कछू नाय कह सक ची के सबन के घर मे ई ई धन्धो होय ।" में दांतो तले अंगुली दवाता हूं, बार बार सोचता हू, बीसवी सदी मे यह पोर अन्धकार । तभी एक भूभरिया जाति की औरत रोती फिफाती मेरे सामने हाथ जोडकर कहती है- "महाराज मेरी कामी को थारी ए दिन मे अवई अवई कोऊ लंगो। तुम अफमर आए हो, निकरवा देऔ तो बड़ी महरवानी होय ।" मैं किंकर्तव्य विमूढ-मा उमे देखता रह जाता हूँ और अपनी असमर्थता उसके गले नहीं उतार पाता। 1 १३०/ वन्देमातरम् जहाज रेगिस्तान का दिलीपसिंह चौहान ब्रह्माजी जब प्राणियो का निर्माण करने बैठे तो उन्होंने सबसे पहले छोटे- छोटे जीव-जन्तु बनाये । उसके बाद पक्षी और उसके बाद उन्होने मनुष्य बनाया। पक्षियो और मनुष्यों के दो दो पाव दिये । अब उन्हे पशु बनाने थे। भण्डारी को बुलाया और कहा, 'सामान निकालो।' भण्डारी ने पेट निकाले । अलग अलग रख दिये । फिर पूछ साया। ब्रह्माजी ने पेट के पीछे पीछे एक एक पूछ लगा दी। इसी तरह से गर्दन, मुंह, आँख, कान, नाक आदि भण्डारी रखता गया, ब्रह्माजी बड़े-छोटे पेट के अनुसार उन्हें लगाते गये। अव नम्बर पांवों का आया। ब्रह्माजी ने अन्य प्राणियो की भाति दो-दो पांव बनाये और प्राण फूक दिया। प्राण मिलते ही सबके सब पशु खडे हो गये। लेकिन गर्दने लम्बी थी और पेट बड़े थे। इसलिए धड़ाम से मुंह के बल गिर गडे । घोड़ा हिन-हिनाया हि- हिं 55। गधा भोंका तिभों-तिमी । लेकिन शरीर अधिक भारी होने से ऊंट गराड़े करने लगा हरूंडू-ड्डू-ड. 5551. ब्रह्माजी ने देखा, इनके दो पाव से काम नही चलेगा भण्डारी को वोले, "इन्हे आगे की तरफ दो-दो पाँव और दे दो।" भण्डारी ने दो दो पांव और लगा दिये । सब पशु चारों पांवो पर खड़े हो गये और ब्रह्माजी ने पृथ्वी पर फेंक दिये । घोड़ा भी गिरा, गधा भी गिरा और ऊँट भी गिरा। धम से धरती पर : पृथ्वी पर आते ही मनुष्य ने इन्हें देखा । पकड़ना चाहा। लेकिन शेर, चीते, हिरण, खरगोश आदि तो जगल मे भाग गए। वेचारे गधे, घोड़े, ऊँट आदि पशु पकड़ में आ गये। फिर क्या था मनुष्य इनके मुंह वाधकर माल लादने लगे। गधा छोटा था इसलिए कम घोझा लदा । घोड़े पर उसने ज्यादा, क्योंकि वह उससे बड़ा था। मगर ऊंट तो सबसे बड़ा था, इसलिए कई बोरे लाद दिए गए। जहाज रेगिस्तान का / १३१ ऊँट गराड़े करके रोने लगा-हरूड़, डूडू । अब तो वजन के मारे उसकी रीढ़ की हड्डी वीच से टूटने लगी। मौका पाकर ऊंट भागा । ब्रह्माजी के पास रोता हुआ गया। उसने शिका- यत की- "हे मेरे पिता ब्रह्मा ! पृथ्वी पर काले सिर वाला मनुष्य बडा खराब प्राणी है । वह मेरे ऊपर इतना बोझा लादता है कि मेरी रीढ़ की हड्डी टूट जायगी और मेरा पेट फूट जायगा । इसलिए मुझे एक पाव बीच में और दे दो।" ब्रह्माजी को यह बात टोक लगी और भण्डारी से बोले, "इसे एक पांव और दे दो।" उन्होने एक पांव बीच में और दे दिया । अब ऊँट के पांच पांव हो गए थे । दो आगे, दो पीछे और एक मध्य मे । ऊँट बहुत खुश हुआ और धरती पर लौटा। मनुष्य ने ऊंट को पुन. पकड़ लिया। उसने देखा कि 'इसके पांच पांव है ।' इसलिए उसने पहले से ज्यादा योझा लादना शुरू कर दिया। ऊँट घबराया । अव तो पांचवें पॉव से ज्यादा परेशान हो गया । वह नीचे वैठता तो पांचवा पॉच बगल में नहीं निकल सकता था इसलिए पेट के नीचे पिचकता था । जय बोझा लदा हुआ होता तव तो और भी ज्यादा दवता । उसे भारी पीड़ा होने लगी । मौका पाकर एक दिन वह फिर ब्रह्माजी के पास हरूड़, डूडू 55 गराडे करता हुआ गया और कहा, "प्रभो ! यह पांचवी दाग तो मेरे अत्यन्त दुःखदाई हो गई है। इससे मनुष्य ज्यादा बोझा लादने लग गया है और बैठते समय यह टांग पेट के नीचे पिचकती है। इससे पीड़ा होती है इसलिए इसे हटा लो।" ब्रह्माजी को गुस्सा आया । उन्होंने यमराज को हुक्म दिया, "ऊँट को पुन' नष्ट कर दो। इसने परेशान कर दिया है । इसका शरीर बेनाप का बन गया है और इसकी आवाज भी रोने जैसी है। ले जाओ इसे काल कोठरी में और बन्द कर दो। जब मर जाय तो सब अग वापस भण्डारी के पास जमा कराकर प्राण लाकर मुझे सोप देना।" यमराज ऊंट को लेकर चल दिया। ऊँट हरूड-ड़-ड से रहा था और आगे आगे यमराज और पीछे पीछे ऊँट । दोनो काल कोठरी की ओर जा रहे थे। काल कोठरी आ गई । बहुत छोटी-सी कोठरी थी जिसमे ऊँट मुश्किल से समा सकता था। उसका आकार गोल था । दीवार गोल लोहे की बनी हुई थी। उसके एक दरवाजा बना हुआ था, जिसके दो फाटक वाले किंवाड़ थे । छत भी लोहे को गोल थी, जो ऊपर नीचे सरकने वाली थी। यमराज ने ऊँट को वहा ले १३२ / वन्देमातरम् जाकर खड़ा किया । ऊँट कोठरी से भी बड़ा था । वह हरूड डडडू गराड़े करके रो रहा था और प्रार्थना कर रहा था कि "मुझे मत मारो।" यमराज ने काल कोठरी की फाटकें खोली । छत को ऊपर सरकाई और ऊंट को पूंछ की ओर से उल्टा अन्दर घुसेडा । ऊँट का शरीर अन्दर समा गया। मगर गर्दन सम्बी थी, आज की तरह टेढी नही थी वल्कि विल्कुल सीधी सामने तनी हुई थी, इसलिए वह कोठरी से बाहर निकली हुई थी। यमराज को फाटके वन्द करनी थी। वह सोचता रहा। यमराज ने जोर से दोनों फाटकों को ऊँट का मुंह अन्दर लेते हुए बन्द कर दिया। इस झटके से ऊँट की गर्दन सलवट खाकर अन्दर चली गई। दोनो फाटको के मिलान के स्थान पर अन्दर की तरफ ऊँट के होठ आ गये । ऊपर वाला होठ कट गया और दो भाग हो गये । नीचे वाला होठ नीचे फिसल जाने से कटा नही और नीचे लटक गया। वह अन्दर जोर जोर से हरूडू डू इ. इ. गराडे करने लगा, पर यम ने एक भी न मुनी। अब यमराज ने ऊपर की गोल छत को धीरे धीरे नीचे उतारना प्रारम्भ किया। ज्यों ज्यो छत नीचे खिसकने लगी ऊँट जोर जोर से गराडे करने लगा हरूडू डू डू ड.51 अव छत ने ऊंट के ऊपरी पीठ को स्पर्श किया और वह धीरे धीरे नीचे से नीचे खिसकती रही। वह काफी भारी थी इसलिए ऊँट नीचे बैठने लगा । लेकिन अपने पांवो को वगल मे फैलाने का स्थान नहीं था। इसलिए वह अपने चारो पांवो को अपने शरीर के नीचे समेटने लगा और वैठता गया । मगर उस पाँचवे पांव को मोड़ना भूल गया । इसलिए वह पांचवां पांव पेट के अन्दर घुसने लगा और अन्दर इकट्ठा होते होते नहीं समाया तो बीच मे ऊपर यम्भ निकल गया जो आज भी है। यम ने सोचा कि अब ऊँट सिकुड़ कर बैठ गया होगा। सभी अग टूटे नही इसलिए छत को और अधिक नीचे नही उतार कर वही रोक दी। ताला लगा दिया और चला गया। एक महीने बाद यमराज ने सोचा कि अब तो ऊँट भूख और प्यास के मारे मर चुका होगा । इसलिए उसके अगों व प्राण को लेने के लिए काल कोठरी में गया । यमराज ने कमर से चावी खोली। ताले मे लगाई ताला खुला । किंवाड़ खोले तो ऊँट गराड़े करने लगा हरूंडू डू डूडू.55। वह तो मरा नही जिन्दा था। जहाज रेगिस्तान का / १३३ यमराज को बडा आश्चर्य हुआ कि यह सा प्राणी है जो एक माह बिना गाये ओर बिना पानी से भी जिन्दा है। उसकी इस विशेषता की जानकारी देने यह उमे ब्रह्मा के पाम से गया । आगे आगे गमराज और पोछ पोछे ऊँट हरूड, हमारता जा रहा था। ब्रह्माजी दूर से रोते हुए ॐ को आते देगकर जगम्भ में पड़ गये। उन्होंने पाम लारर देवा-उसकी सीधी गन टेनी हो गई थी। कार का होठ कट चुका था । नीचे वाला होठ लटका हुआ था। पौनया पोर गायब हो चुका था। केवल धाराना नीने का भाग शेष दीग रहा था । पीट पर मध्य में सम्भ निकल आया और जो पोडे के सुरों की तरह तीग-तोग गुर थे। दबकर गदियो- नमें बन गये थे और वह एक माह बाद भी बिना गाय पीये जिन्दा है। उनको युमी हुई और वे निल्ला उटे, 'तथास्छु । गम, यह तो वक्ष उपयोगी पशु वन गया है । अब इमे एमा हो रहने दो और रेगिस्तानी भाग में भेज देना चाहिये। वहाँ पानी की कमी रहती है। यह कई दिनों तक बिना पानी के जिन्दा रह मकंगा । देगी इसके पांवो में कमी गद्दियो बन गई है । इनगे रेत मे पाव भी नहीं धसेगा । बेचारे की गर्दन टेती हो गई है, मगर कोई वात नहीं, मवार की लगाम से इस पर नियन्त्रण अच्छा रहेगा । अव इमे मत मारो और भेज दो रेगिस्तान मे । यह तो रेगिस्तान का जहाज बन गया है।" इस प्रकार तभी से ऊंट का शरीर इस प्रकार का बन गया है जो आज भी है। और ब्रह्माजी ने उनके सिर पर हाथ फेरा और वह वोला-हरूंड इ. 555। ब्रह्माजी ने मीधा रेगिस्तान की ओर फेंका । धम मे आ गिरा रेत में। मनुष्य ने पुनः उसे पकड़ा । उसके पांवो की गद्दिया देखकर वह बहुत खुश हुआ तथा कई दिन विना पानी के भी जिन्दा रह पाने से इसका नाम रेगिस्तान का जहाज रख दिया। । १३४ / वन्देमातरम् अपने अन्दर D अब्दुल मलिक खान डेन्मार्क को किसी अदालत मे मजिस्ट्रेट के सामने एक व्यक्ति लाया गया। उस पर कार तेज चलाने का आरोप था। जैसे ही उस व्यक्ति ने मजिस्ट्रेट का चेहरा देखा उसकी आँखें झुक गई । न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठा हुआ नवयुवक किसी समय उसका शिष्य रह चुका था। शिष्य ने भी अपराधी के कटघरे में खडे अपने पुराने स्कूल मास्टर को पहचान लिया था। सुनवाई करने के बाद मजिस्ट्रेट ने उचित दड का आदेश दिया। यह विदेश की घटना है । अपने घर की चर्चा करे। सिनेमा शो चालू होने वाला है। टिकट खिडकी पर भीड़ लगी हुई है । एक किशोर छात्र चोर नज़रो से इधर-उधर ताकता खिड़की की तरफ कदम बढ़ाता है कि अचानक उसके पैर ठिठक जाते है । यह क्या ? सामने मास्टरजी तेजी से इधर ही आ रहे है। स्कूल समय मे गोत मारकर पिक्चर देखने आया था। शायद पोल खुल गई, अब खैर नही । छात्र के मन में अपने अनुचित कार्य के लिये ग्लानि पैदा होने लगती है । इसी समय मास्टर जी की आवाज उसे झक- झोर देती है, "एक टिकट मेरे लिये भी बच्चे । खिड़की पर बड़ी भीड़ है।" वाद में उन्होंने यह भी बता दिया कि वे हेडमास्टर साहब से बीमारी के बहाने छुट्टी लेकर आये हैं। जब मूर्तिकार ही देवता के स्थान पर राक्षस की मूर्ति बनाने लग जाएँ तो इसमे धातु का क्या दोष ? उसे तो ठोक-पीटकर जैसा आकार दिया जाता है वैसा रूप वह ग्रहण कर लेती है। अपने हाथो से निर्मित विकृत आकृति में सम्मान पाने की आशा रखना किसी मृगतृष्णा से कम नहीं। उन दिनो बच्चों को खेलकूद प्रतियोगिता भवानी मडी से वारह किलोमीटर दूर मिश्रोली ग्राम में चल रही थी। बहुत सी प्राथमिक शालाओं के छात्र उसमे अपने अन्दर / १३५ ? भाग लेने आए थे। मियोली के प्रतिष्ठित नागरिक के जिस कमरे में हम ठहरे थे उसमें एक और टीम अपने अध्यापक जी के साथ ठहरी हुई थी। सितम्बर का महीना । कड़ाके की सर्दी । अपनी टीम के बच्चो को जल्दी ही रजाई में दुवका दिया और मैं भी रजाई ओढ़ कर लेट गया। लेकिन उस एक मास्टर जी को नीद नही आ रही थी। उन्होंने दो तीन होशियार बच्चो को साथ लिया और यह कहते हुए चल दिये, "गुरुजी । हम बाजार तक जा रहे है कृपया वाकी बच्चों का ध्यान रखना"। व्यावहारिकता के नाते मैने हाँ कर दी लगभग आधे घंटे बाद वे पान खाकर वापस आ गए । विस्तर पर बैठकर एक छात्र से कहा-"ला निकाल" 1 छात्र ने अपनी जेब से सिगरेट का पकिट और माचिस निकालकर मास्टर जी के सामने रख दी। उन्होंने सिगरेट सुलगाई फिर खुला पैकिट उस छात्र की तरफ वहा दिया। छात्र ने झिझक प्रकट की तो बोले -"पी ले भाई, अभी कौन सा स्कूल लग रहा है" ? फिर मेरी ओर मुखातिब होकर कहने लगे---"अरे इनसे क्या शरमाना ? ये भी तो अपने ही है" । उत्साह वर्धन करने पर छात्र ने सिगरेट सुलगा ली और कश खीचने लगा 1 मैंने एतराज किया तो बोले--"मोडर्न जमाने में सब चलता है जो। छानो गुरूजी ? जिंदगी मे क्या रखा है ? अपना तो बस यही सिद्धान्त है 'ईट ड्रिंक एन्ड वो मेरी'।" उनकी बात सुनकर मेरी जवान पर ताले पड़ गए। कोरी धरती में बबूल का बीज योकर अगूर की अपेक्षा करने में कितना यथार्थ है । जव उसी बबूल का कॉटा चुभता है तो हाहाकार मच जाता है । पुलिस बुलानी पडती है, आयोग विठाने पड़ते है। कक्षा में अक्सर ऊँधना, मेज पर पैर फैलाकर बैठना, आपस में बतियाते हुए घर की रामकहानी बच्चो को सुनाना, रात देखे गए सिनेमा की खुली समीक्षा, फिल्म पत्रिकाओं की टीका, कक्षा मे छल्लेदार धुआँ, गप्पास्टिक और सुलफास्टिक, बच्चों से तम्बाकू के तिनके साफ करवाना, सुपारी तुड़वाना, उनके सामने जर्दा, चूना और सुपारो मसलकर साना तथा कक्षा के आस-पास कई किश्तो मे आधुनिक चित्रकारी करना, कोनसी ऐसी बात है जिसके लिये हम ताल ठोक कर कह सकें कि ऐसा नहीं होता, यह मिथ्या है। हम सोचते है वालक अनभिज्ञ है लेकिन बालक नजर चुराकर पल प्रतिपल हमारी गतिविधियों को मानस मे उतारता चला जाता है । हमारा हर डायलॉग वह टेप कर लेता है और वही टेप शब्द-प्रतिशब्द अपने साथियों, अपने घरवालों को सुनाता है। इसी टेप के आधार पर बच्चों में, अभिभावको में और समाज १३६ / वन्देमातरम् में हमारा मूल्यांकन होता है और हमे श्रेणी विशेष मे रख दिया जाता है । हम बच्चों और बड़ों के सामने कितना ही दोहरा अभिनय करें हमारी असलियत छिप नहीं सकती। चालक जब सुनता है कि मास्टर जी परीक्षा देने जाते हैं तो वे भी नकल मारकर पास होते है । वह खुलकर नकल करना अपना अधिकार मानने लगता है । परीक्षा भवन में नकल करने से रोकना उमे अन्याय लगने लगता है। हम नजर घुमाकर देखेंगे तो यहां भी दोप का अग्निवाण हमारी ही तरफ आता दिखाई देगा। इन सब बातो से हमारा सम्मान गिरता चला जाता है । प्रसिद्ध विद्वान रूसो ने कहा भी है, "आत्मा जितनी भ्रष्ट होती है मस्तिक उतना ही मकुचित होता जाता है"। हमें अपना मस्तिक सकुचित नही करना है बल्कि उसकी वन्द खिडकियौ खोलनी हैं । मस्तिष्क मे यदि सकुचन की प्रवृत्ति जन्म ले लेगी तो शिक्षा की सार्थकता पर स्वतः ही प्रश्नचिह्न लटक जाएगा। बालक रूपी दर्पण के सामने जब भी दुर्गुणो की अग्नि-लपट आ जाती है तो वह भभकती आग उसके अन्दर भी साकार हो उठती है, वह भी जल उठता है, विकृत हो जाता है। छात्र शिक्षक से रूपान्तरकारी शालीन व्यवहार की अपेक्षा रखते है । शिक्षक दिव्य कलाकार की अनुपम कलाकृति पर पड़े अनेकों आवरण हटाकर उसमें अन्तनिहित सौन्दर्य को उजागर करता है। शिक्षक वह पवन है जो चमचमाते सूर्य पर आच्छादित श्यामल मेघो को हटाकर लोक कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता इस पावन वेला में हम छिद्रान्वेषण के इरादे से नहीं अपितु आत्म विश्लेपण और आत्म निरीक्षण की भावना से अपने अन्दर झांके, अपने आप को ऑकें। आदर्श वीज टूटती आस के रेगिस्तान में गहरी जड़ों वाले शाखा- प्रशाखाओं से सज्जित ऐसे बोधिवृक्ष को खड़ा कर देगा जिसकी छाया मे बैठकर अनेकों सिद्धार्थ बुद्ध वन जाएँगे, जो ससार को पीड़ा की जलती नदी से निकाल कर सुख के हरियाले मैदान मे छोड कर ही दम लेंगे। फिर हमारी वनाई हुई मालाएं अपने ही हाथो से हमे अपने गले मे नही पहननी पडेगी । समाज हमें सम्मान देकर फूला नही समाएगा। मशहूर शायर "उबंद" के शब्दों में, इस वक्त तो कोई भी हमे पूछता नहीं; कल ढूढता फिरेगा जमाना गली गली। अपने अन्दर /१३७ नाना रूप धरे निशान्त याद आ रहा है कि पहले दिन उन्हें मैने लुहार-लुहारी के भेष में देखा था। उनकी भेष-भूपा और भाषा से उन्हें बहुरूपिया समझना बड़ा कठिन था। पहली बार तो यही दिमाग में आया कि ये वास्तव में ही लुहार-लुहारी है : लेकिन वे काफी देर तक प्रदर्शन करते रहे तो वास्तविकता समझ में आई। दूसरे दिन इन्हे पठान-पठ के भेप में देखा । उस दिन भी उनकी कला कमाल की थी। भिखारी के रूप में जब एक दिन वह मेरे एक मित्र को दुकान पर गया तो मित्र ने सचमुच ही उसे भिखारी समझा और पंसा देने लगा । लेकिन वह तो भिखारी था नही, था बहुरूपिया इस लिए पैसा लेने से इंकार कर दिया और आगे बढ़ गया। मित्र एक बार तो ठगा सा रह गया। अगली दूकान पर उसे फिर उसी प्रकार करते देखकर मित्र के वास्तविकता समझ मे आई। कला तो उनकी बहुत बड़ी है लेकिन आज कलाकारो की कदर कहा होती है ? लेकिन हाल चाल पूछने जब मै उनके तम्बू पर गया तो वह मेरे ही हाल चाल पूछ बैठा--आपको हमारे पर लिखने से क्या मिलेगा? मैंने कहा-अगर लेख छप गया तो यही कोई सी-पचास मिल जाएंगे। उसने कहा-बस इतने से के लिए काहे को इतनी तोहमत उठा रहे हो और काहे को हमे टटोल रहे हो? बात उसकी सच्ची थी। फिर भी जव में चला ही गया तो कुछ बाते कर ही आया। वह मुझे अपने पेशे से सन्तुष्ट नजर नहीं आया-इतनी महगाई के युग साहब क्या होता है ? पहले जितनी कदर भी अब नहीं रही । सचमुच ही उसकी कोई अच्छी हालत नहीं थी। उसकी फटी पुरानी १३८/ वन्देमातरम् कमीज में कई बद लगे थे। पौष्टिक आहार न मिलने से उसके बच्चे मरियल थे । उनकी प्रत्येक चीज मे बदहाली स्पष्ट नजर आ रही थी। लौटते हुए रास्ते मे जब मै उनकी बदहाली का कारण ढूढने लगा तो मुझे उनकी बदहाली का सबसे बडा कारण रुपये का अवमूल्यन नजर आया। जब मै छोटा था तो हमारे गाव मे भी बदरी भांड नामक एक बहुरूपिया आया करता था। हम बच्चे उसके स्वाग देखकर बड़े खुश होते थे। वह तो लगूर वनकर रात को सोते हुए लोगो को डरा दिया करता था। गनीमत यह होती थी कि वह शीघ्र ही खड़ा होकर वोल जाता था। आखिरी दिन जब वह आता था तो पिता जी उसे एक रुपया इनाम स्वरूप देते थे। गाव में काफी लोगो द्वारा एक एक रुपया देने पर उसका गुजारा अच्छा हो जाता था । लोग अपनी पुरानी आदत के मुताबिक आज भी वहीं एक रुपया देते है । लेकिन आज के रुपये में और उस समय के रुपये में कितना अतर आ गया है ? यह कोई नही देखता । एक कला इस ससार से विलुप्त न हो और कुछ गरीव परिवारो का इस कला के द्वारा किसी तरह गुजर होता रहे इसके लिए हमे कुछ सोचना और करना चाहिए । बहुरूपिया चूकि लोगों के मध्य जाता है और उन्ही से अपनी आजीविका कमाता है । इस लिए इस कला को हम लोक कला भी कह सकते है । इस प्रकार यह कला केवल लोगों के द्वारा ही जीवित रखी जा सकती है । अगर हमारी मरकार और कला अकादमिया भी उनके लिए कुछ कर सकें तो और भी अच्छा है। हो सकता है, कुछ आधुनिक दिमाग वाले लोग बहुरूपिये को देखकर नाक- भी सिकोडे लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह कला आज भी वच्ची, कम पढ़े लिखे कस्बाई लोगो और अनपढ ग्रामीणों के लिए बहुत बड़ी है। उनका इससे मनोरजन होता है । उनके नीरस जीवन में यह कला रस घोलती है। नाना रूप धरे/१३६ सृजन के क्षण O रमेश ग- 15.12.78 पूरा एक सप्ताह बीत गया है । इन दिनो विस्तृत आकाश के नीचे विचरण करते हुये "स्पेस के प्रति मानवीय उत्सुकता" "रोशनी कहाँ से आती है "मिम एम" "मानवीय आकाक्षा" इत्यादि ५४४ फुट के विशाल चित्रो सृजन में लगा हुआ हूँ। 'स्प्रे मशीन' की सहायता लेने का मेरे चित्रों में पहला अवसर है । मशीन की महायता ली जा सकता है पर हावी होने की हद तक नहीं। यह बात बार-बार अन्तर में उठ रही है कि मशीनी सहायता में मैने अपने निजी क्षेत्र को बहुत पीछे छोड़ दिया है । लगभग एक दिन में १० घण्टे काम हुआ है । सृजन के समय का यह मुख बहुत मीठा है, जिसे शब्दो में वर्णित नहीं किया जा सकता। चारों तरफ जिस्म के जरे-जरे में एक प्रसन्नता, उमग, आनन्द, उल्लास बरावर बना रहा है, फिर भी कृति के पूरे होने तक कई बार अपूर्णता का अह- सास एक 'दर्द' के रूप में भी साथ रहा है। 2212.78 मृजन के आनन्द के बीच-बीच मे भौतिकवादी उपलब्धियां भी जुड़ने लगी कि इस पेंटिंग की सफलता अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र से जुडकर खूब आगे निकल रही है और इस प्रकार की आशाओं ने एक सप्ताह बडे उमंग से काम करवाया। इस बार काम मैने किया नही, किन्ही आशाओ के वशीभूत स्वय हो हो गया है । इन आशाओं से मेरे सगे सम्बन्धी मित्रगण वडे खुश हो सकते है पर मुझे इनसे कुछ शिकायत है। १४० / वन्देमातरम् रात चौथी कृति "मानवीय आकाक्षा" को भौतिकवादी आशाओ से जुड़ते देख मन ममोस कर रह गया था । भौतिकवादी उपलब्धियो यो तो मुझे मिली नहीं है, और जब कभी इनके लिये भटका हूँ प्रकृति ने ही साथ दिया है । जब इस प्रकार की उपलब्धियां मुझे निकट लगने लगी उन्हें छोडकर मैंने अध्यात्म से जुड़ना ज्यादा उचित समझा है। आध्यात्मिक सुख, भौतिक सुख से ज्यादा गहरा है। 27.12.78 प्रगतिवादी दौड़ में शहरी और मशीनी यय के जुड़ने का स्वरूप ऐसा है... एक ग्रामीण बैलगाड़ी में बैठा हुआ रेलगाडी ने बैठे हुए लोगों से अपनी पूरी क्षमता के साथ प्रतिस्पर्धा करता है पर उनसे पीछे रहकर अपने आप पर विश्वास होते हुए भी हतप्रभ रह जाता है। मेरा भी यही हाल है । मैं इस समय दुविधा का शिकार हूँ। मशीन का उपयोग कर अपने ही साथियो को जो बैलगाड़ी में बैठे हुए है छलना और दूसरी तरफ "हवाई जहाज" मे बैठे लोगो से खुद का ठगाव कचोट रहा है । कला सजून मे मशीनों का उपयोग मैने खुद किया नहीं, मशीन वालों ने ऐसा करने को विवश किया, पर हाथ से काम करने का जो आनन्द 'मशीन' ने छीन लिया, मेरा खुद का आनन्द 'मशीन' के भेंट चढ़ गया है । फिर भी तेज मशीनों की आकाक्षाएं लगी हुई है। चित्रकला मेरे लिये कभी अधिक से अधिक निलिप्तता प्राप्त करने का साधन रही है, पर जीवन का एक ही 'सत्य' मैं स्वीकार नहीं करता भौतिक ससार को नकार कर अलौकिक ससार मे जाने का जितना सुख है उतना ही अलौकिक से लौकिक की ओर लौटने का होना चाहिए । 31.11.79 लगभग एक सप्ताह यों ही गया। अब मैं कोई नई राग अलापने के चक्कर में हूँ। बहुत कठिन व्यसन कहना चाहिये इसे । यदि किसी शास्त्रीय सगीत के गायक को यह रोग लग जाय कि वह अब कोई नया राग गायेगा तो और बना | मै ऐमा हो 'राग' गाने का प्रयल कर रहा हूँ। मालकोश, विलावल, परमजरी, ठुमरी के मिश्रित स्वर कभी-कभी यह भ्रम पैदा करने लगते है कि यह अब तक ज्ञात रागों मे से कोई नहीं है और जिसकी मुझे चाह थी वह मिल गया है । सृजन के क्षण/११ अव तक ज्ञात रागो में विदेशी शिम्फनी (प्रयोगवाद) का भी ऐसा मेला है कि में यह भी गा लेता हूँ जो अभी 'भारत' में नया है। प्रयोगवादी विकसित शैलियों में आधुनिक चित्रकला की पॉप, ओप, वक दादावाद, इम्प्रेसनिस्ट, एक्सप्रेशनिस्ट, स्युअरियलिज्म, आदि से ऊपर व्यक्ति- वादी शैली में अछूता नही हूँ। उनमें मानवीय संवेग आधुनिकता को छूकर यह तक पहचान खो बैठते हैं कि आखिर सृजन का ससार कितना विकसित और विस्तृत है कि मीमित शब्दो में यह नहीं कहा जा सकता कि आज का सृजन-ससार क्या कहना चाहता है। इसी खोज में अनेक स्वर गुनगुनाता हूँ जिन्हें अब स्वर नहीं कहा जाना चाहिये। मैंने अब तक जिन सवेगों से जुडकर सृजन किया उन सवेगों से रहित स्वर रहित, भाव रहित, रस और उद्वेग रहित, विचार वोध से दूर एक ऐसे चित्र की तलाश है जिसका, शीर्षक "भाव शून्य' हो सके। 1412.79 विस्तृत आकाश के नीचे समस्त लिप्तता से छूटता मन कुछ भी नहीं गाना चाहता, और इन्ही दिनो...."नही इस बात को पूरी कर खत्म नहीं करना चाहता। एक पूरी बात बेबात लगने लगती है। सृजन का स्वरूप, कम्य में नहीं उभरना चाहिये, सृजन की खोज में फैले हाथ परसो तो ऐसा अनुभव करने लगे थे कि किनारा बहुत नजदीक है । उत्ताल तरगों से जूझता हुआ, आगे बढता हुआ, किनारा पाकर प्रसन्नता होनी स्वाभाविक थी। पूरी रात सोचता रहा, कितनी सुन्दर धरती होगी वह मेरे नये 'किनारे' की, पर-~कहा न, रात मनुष्य को थकाकर, 'किनारे' के समीप पहुँचने को विवश करती है, सुबह का सूर्य, किनारा तो दूर, समुद्र की लहर तक की पहचान नहीं होने देता।' और मैं स्वय विवश होकर जिसे किनारा कह रहा था उसे छोड़ विपरीत लौट आया हूँ। 2612.79 नहीं बिलकुल नही, पूरे सप्ताह नये राग की इन्तजार में कोहनी टेक कर बैठे विता दी है। महीन से महीन, और मोटे से मोटे, सरल से सरल, सुमधुर भी, समतल १४२ / चन्देमातरम् भी और वक्र रेखा वाले जितने भी राग मानस पर उतरे, मेरे परिश्रमी पूर्वजों द्वारा सृजित हैं और उन्हें जोड़ तोड़ कर गाना और अपना कहना, ईमानदारी नहीं। ".."तो टीक है मैं विना गाये ही रहूँगा।" 2.1.80 सप्ताह भर बैठे रहना कि क्या गाया जाय और कुछ तय नही कर पाना एक गायक के लिए कितना कप्टप्रद है। गायक सब कुछ के विना रह सकता है पर गाये विना नही । कि मैं पूरे सप्ताह बैठा रहा हूँ और मुझे मौलिक सृजन के लिये कुछ नहीं मिल पा रहा । 31.80 नये सत्य के साथ द्वन्द्वात्मक विरोधाभास से ग्रस्त हूँ । स्प्रे मशीन की सहायता से सृजनरत हुआ था न मशीन की औद्योगिक प्रगति बहुत तेज हो सकती है.पर मानवीय स्पन्दद और भावनाओं को व्यक्त करने में यह सफल नहीं हो । सकती। मशीन बहुत कुछ उपलब्धि दे सकती है पर चेतन मस्तिष्क के तत्वो की खोज तक नहीं पहुंच सकती। 17.10.80 में अब अपनी नई कृति को जन्म देने की तैयारी मे हूँ। मुझे यह तो मालूम नहीं कि प्रसव का कष्ट कैसा होता है पर जो कुछ में सह रहा हूँ, बड़ा कप्टदायक है। अब किसी भी प्राणी को उपस्थिति मुझे पसन्द नहीं है, यहाँ तक कि किसी का बोला एक शब्द भी। लेकिन कुछ लोगो की आवश्यकता मुझे पड़ सकती है, कि वे मेरी आवश्यकतानुसार साधन जुटायेंगे । मैंने पूरे वस्त्र भी नहीं पहन रखे है । पहना हुआ बनियान मैं खोल भी सकता हूँ : या पहनने को कमीज भी माग सकता हूं । दोनो ही में मेरे सहायक दोड़ने को तैयार है। लगभग ४ बजे शाम तक विना किसी को जन्म दिए, वड़ी कष्टप्रद स्थिति मे रहकर अब मैं आराम चाहता हूँ पर यह समय आराम का नहीं है । फिर सृजन से जुडता हूँ और लगभग ५ बजे मुझे ऐसा आभास होने लगता है कि अब किसी कृति का जन्म हो गया है। मैंन जिसे जन्म दिया उसे मैं देख भी नहीं सकता, इस आशका से कि जन्म देना आसान होता है उसे ठीक तरह से सवारना बहुत मुश्किल ! . सृजन के क्षण / १४३ मंचीय कविता और शाश्वत मूल्य की समस्या D श्रीनन्दन चतुर्वेदी कवि सम्मेलन में खरी उतरने वाली हर कविता क्या शाश्वत मूल्य की हो मकती है ? इस प्रश्न को लेकर विवाद जब-तब चतता रहा है। बहुत वर्प हुए, राष्ट्र कवि बाबू मैथिलीशरण गुप्त ने तो इतग तक कह दिया था कि हिन्दी कविता की चिरतनता यदि वानी है तो कवि सम्मेलनो की परपरा को समाप्त करना होगा । समर्थक थोडे थे, विरोधी अधिक । किन्तु सम्मेलनों की परपरा बदस्तूर रहो। आज तो यह परपरा एक फैशन बन गई है और व्यवसाय भी विद्यालय का वार्षिकोत्सव, मेला, पर्व, विवाह, यज्ञोपवित, गृह प्रवेश या अन्य कोई समारोह हो, कवि सम्मेलन आयोजित किये जाते है । परिवार कल्याण का प्रचार सामुदायिक विकास, कृषि उन्नयन, छात्रावास के समारोह सभी में कवि सम्मेलन का वजट सुरक्षित रहता है। कवि गया । जो कवि के स्वाभिमान की चर्चा कर कवि सम्मेलनो को भत्र्सना करते दिखते है, वे भी ऐसे मचों पर कविता पढ़ते दिख जाते हैं। यही नहीं, उन्हे ऐसे सम्मेलन में कविता पढने का अवसर मिले, इसके लिए पहले में जोड़-तोड भी करते दिखते है। कवि सम्मेलन आज कविता का मव कम, व्यवसाय अधिक वन गया है। जिनकी साख मचीय कवि के रूप में जरा ठीक से जम गई है, वे सदभ मुद्रा-अर्जन मे लगे है । जिनकी दूकानें जम नही पाई वे जमाने की फ़िक्र में पागल है । कभी कभी तो अजब सा लगता है, आखिर यह हो क्या रहा है ? यजमान को अपनी वाहवाही चाहिए और पंडे को उसकी दक्षिणा । यजमान न हो तो पडा नहीं पलेगा और पड़ा न हो तो कारण नही सरेगा । यही नहीं, कुछ और भी स्वार्थ जुड़ जाते है । आयोजको मे कुछ प्रभावशाली स्थानीय कवि अवश्य होते है। वे केवल उन्हें ही बुलाने में रुचि लेते है जो बदले में इन्हें अपने यहां भी १४४ / बन्देमातरम् बुलवाकर किसी महाविद्यालय या नगर पालिका के फंड से अच्छी राशि दिलवा सकने की क्षमता रखते हो । यहा आयोजक कविता नही, अपना भविष्य देखता है। सम्मेलन मे आपसी संबध कविता के नही, व्यापार के बन जाते है । कवि वहा क्यों कविता के विषय में सोचने लगा वह कैसी भी सामग्री प्रस्तुत करे, पैसे तो उसके पहले से तय है ही ! फिर असल कविता मच से आएगी कैसे? लेकिन कई प्रश्न फिर भी उभरते है । क्या ये सम्मेलन एक दम निरर्थक है ? क्या सचमुच एक स्वाभिमानी कवि का अहं इन सम्मेलनों से कुचल जाने वाला है ? क्या हिन्दी कविता को कवि सम्मेलनों ने कोई योग नहीं दिया है ? राष्ट्रीय समस्या और जन जाग्रति मे क्या ये सम्मेलन विलकुल सार्थक नही थे? हिन्दी कविता आज जहा तक पहुंच गई है वहा तक क्या वह बद कमरे या पुस्तकों की जिल्दों व कवियों की डारियों से भी पहुच सकती थी ? आगे क्या कवि सम्मेलन एक दम रोक दिये जाने चाहिए ? और यदि ऐसा हो तो क्या वह हिन्दी के हित में होगा? समस्या का हल दुराग्रह से मुक्त रह कर करना होगा। सच्चाई का अश दोनों ओर दिखता है। राष्ट्र कवि की बात मे जितनी वेदना, टोस और मर्मान्तक तड़प रही उतनी अधिक क्या वास्तविकता की पकड भी थी ? बहुत लोग कहते है, अग्रेजी मे कवि सम्मेलन परम्परा नहीं है फिर हिन्दी मे ही यह क्यों बनी रहे? कोई कुछ भी कहे, तथ्य नकारा नही जा सकता कि हिन्दी की कविता जितनी जनता के निकट रही, उसका कारण केवल मात्र जन सपर्क था । सदेह नही कि पुस्तके काल की शाश्वत धरोहर होती है, किन्तु जिस समाज मे शिक्षित व्यक्ति अनुपात में बहुत कम हो वहा पुस्तको को राष्ट्रीय संस्कार बनाने में हजार हजार बरस लग जाया करते हैं । वाणी का सीधा मप्रेषण वहा लिखित विचारो की अपेक्षा बहुत शीघ्र असर कर जाता है । भारत राष्ट्र की राजनीतिक स्वतत्रता को लाने वालों पर मची मे गला फाड कर जमने वाले श्री रामधारी सिंह दिनकर, बालकृष्ण शर्मा नवीन, शिवमगल सिह सुमन, माखन लाल चतुर्वेदी, डा० ब्रह्मदत्त सुधीन्द्र, कविवर हरनाथ, नरेन्द्र शर्मा, निराला, सोहन लाल द्विवेदी जैसे कितने ही कवियो का योग उनके द्वारा रचित पुस्तको में कम न था। वे पुस्तकों से अपने जीवन काल में उस जन जागृति को नहीं ला सकते थे, जिसको वे मंचों से ला पाये। दुमरी बात है कि मत्रीय वाणी का देशकाल मोमिन होता है और पुस्तक रूप में मंचीय कविता और शास्वत मूल्य की ममस्या/१४५ .
सकलित सामग्री का असीम । सदेह नहीं कि मच जन रुचि का आश्रित है और भाव सप्रेषण का सरलतर साधन है। भोली, अपढ़ निरक्षर जनता तक कवि के अनुभूत सत्य को पहुचाने का इससे सुगम और साधन क्या हो सकता है ? मंच का दुरुपयोग निश्चित रूप से निन्दनीय है किन्तु सम्मेलन के माध्यम से भोली जनता किसी काव्य कृति का बोध पाती है, तो इसमे निन्दा को अवकाश कहा है ? यदि सरकारी या गैर सरकारी मच से परिवार कल्याण, कृपि या योजना सबंधी कविता पढ़कर कवि समाज के लिए कुछ उपयोगी बन सकता है और साथ मे अपना अर्थार्जन भी कर सकता है तो इसमें दूसरा कोई क्यों चिल्लाये ? आज भी हिन्दी जगत के अनेक कवि ऐसे है जिनकी जीविका के साधन ये सम्मेलन ही है। यह कहना भी एकदम गलत है कि उनकी सभी कवितायें निरर्थक है। जनरुचि का रजन करती हुई भी कई कविताएँ अपने स्तर से नीचे नही गिरती। फिर इसमे दो मत नहीं कि कवि यदि जनता के मंच पर जाता है तो उसके लिए आवश्यक होता है कि जनता की रुचि के अनुकूल बात कहे लेकिन जन रुचि का स्तर तो जो है उसे सभी जानते है। इसलिए कवि सम्मेलन की परम्परा बढती है तो कवि का स्तर आसमान को छोड़कर धरती पर उतरेगा ही। प्रश्न फिर भी सिर उठाकर खडा होता है कि क्या कवि केवल सस्ती जन रुचि का पोपक बन जाएगा ? जिन कवियों में कविता छपवाने या पुस्तकाकार निकलवाने की क्षमता नहीं है, वे क्या मंचों पर ही न टूट पड़ेगे? तब क्या कविता 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' की ऊंचाई से उतरकर कैबरे-नर्तकी नही बन जायेगी? वह किसी नीली फिलम की नायिका सी निर्वसना होकर जनता के मच पर अपनी शूटिग नहीं देने लगेगी? और नही तो तथाकथित, अधुनातन प्रगतिशील सभ्यता की जन रुचि में उसके लिए स्थान कहा होगा? आज कवि सम्मेलन मच और श्रोताओ का जो सबध जुड़ता जा रहा है उससे कविता के मूल लक्ष्य सत्य शिव सुन्दर का कोई सीधा सबध नही दीखता है। फिर भी समस्या बहुत भयदायक नहीं है । सतह की वात और होती है गहराई में गुरु गंभीर रहस्य छिपे होते हे । समस्या की गहराई तक पहुचने वाली कविता सम्मान पाती है। धरती पर केवल कीड़े मकौड़े नही है । कविता का सबध सीधे आदमी से है। जिसके अन्दर युगो के सचित सस्कार है। इस लिए कवि-कर्म का यथोचित निर्वाह जन रुनि को उदात्त बनाने में होता है । धरती को कविता वस्तुतः वह कविता है जो इंसान के सुख-दुख मे हंसती रोती है । १४६ / वन्देमातरम् रामधारी सिंह दिनकर तो एक दम स्पष्ट कह चुके है- व्योम कुजों की परि अयि कल्पने आ उतर हँस खेल ले वन फूल मे रेणुका हंसने लगे, जुगनू चलो आज कूकें खण्डहरों की धूल मे। सच है, आसमान मे उड़ कर कविता नही जी सकती। जिन्होंने कविता को छायावाद से जोड़कर आसमान में उडाना चाहा था, उन्हें शीघ्र ही अपनी भूल पकड़ में आ गई। सच्चाई यह है कि कवि मे यदि प्रतिभा और कठ का सम्मिश्रण है तो उसकी कविता का उदात्त स्वर आज जन बोध के धरातल पर मंच से उतर सकेगा और दम-खम के साथ जमेगा । घटिया किस्म की सामग्री प्रस्तुत कर जमने की प्रतिस्पर्धा केवल वे कर रहे हैं जिनकी स्तरीय सृजन-प्रतिभा चुक गई है या कभी यह प्रतिभा उनमें रही ही नहीं । जन रुचि को ही पूर्ण दोषी मानकर स्वयं को श्रेष्ठ कवि माने रहने का भ्रम-पालन गर्हित अहं का पोषण करना है। आज भी गहरे भरे कवि सम्मेलनो मे जमने वाले भवानी प्रसाद मिश्र दिनकर सोनवलकर, नीरज, मयूख, रामकुमार चतुर्वेदी, रघुराज सिंह हाडा, अजेश चंचल, कुमार शिव, सोम ठाकुर, नन्द चतुर्वेदी, जगदीश सोलकी, दुष्यन्त कुमार आदि कवियों की कृतियां स्तर से नही गिरती। मच सम्राट नेपाली ने कभी अपनी कविता को स्तर से नहीं गिरने दिया था। क्या उनकी कविता में शाश्वत मूल्य नही थे। ये कवि सम्मेलन की परपरा न पाते तो क्या इनकी कविता अब से अधिक शाश्वत होती ? उत्तर सरल है। उस स्थिति में बात कुछ और होती । निश्चित रूप से इनकी कविताएँ तब जिन्दगी से इतनी नहीं जुड़ पाती। कवि यदि अपने कर्म के प्रति सजग है तो उसे मचो के बहिष्कार की आवश्यकता नहीं । जन रुचि के संस्कार का बीड़ा उठाया जाना चाहिये और यह कार्य समय प्रतिभाओ को सम्पन्न करना चाहिए । कवि कर्म का यथोचित निर्वाह हुआ तो मनीय कविता में भी शाश्वत मूल्य पलेंगे ही। मवीय कविता और शाश्वत मूल्य को समस्या | १४० वृक्षारोपण 10 'प्रेम खकरधन' वृक्ष शस्य श्यामला मां वसुन्धरा का शृगार है। जलाशय मे विकसित पदों का पराग शीतल जल की उमियों की चञ्च- लता को दोलायमान करता हुआ, लौनी लतिकाओ के जाल को सहलाकर जब आम्र कुञ्जो मे प्रवेश कर नव आम्र-मन्जरियों से चुहल व छेड़छाड करता आगे बढ़ता है तो मानव मन अनिर्वचनीय शीतल गन्ध का पान करता तन मन को कर्पूर चन्दन की शीतलता से आप्यायित कर अनूठे आनन्द में निमज्जि हो पूर्ण विश्रान्ति का अनुभव करता है। वृक्ष धरती की सज्जा है । सस्कृति के उत्स से लेकर आज तक कृषि एवं पशु-पालन प्रधान समाज में मानव जीवन पूर्णरूपेण वृक्षों पर आधारित रहा है । मानव और पशुओं को जीवन दान देने में वृक्षो ने अपनी शीतल छाया, प्राणदा वायु, फल, अन्न, रस औषधियों का मुक्त हस्त से इतना दान दिया है कि वृक्ष और बादल दोनो ही परोपकार के पर्याय बन गये ये। औद्योगीकरण के युग मे सम्पूर्ण विश्व को वायु प्रदूषण से बचाने का सबल और श्रेष्ठ उपाय वृक्षारोपण है । वर्षा, भूसंरक्षण, जलावन, औषध, भवन-निर्माण आदि के लिए वृक्षो की उपादेयता असन्दिग्ध है । लेकिन मानव ने अपने स्वार्थ, अपनी अतृप्त तृष्णा को शान्ति के लिए शीतल छाया, सुस्वादुफल, सरस द्रव्य और औपधदाता वृक्षो के पैरो पर ही कुल्हाडी चलानी प्रारम्भ कर दी । वृक्ष घायल हुआ, रक्त निकला अग-अग क्षत विक्षत । उमके मौन प्रतिरोध, मूक चीत्कार को मानव का स्वार्थी मन न समझ सका । उनके प्राण दान के प्रार्थना पत्र को आरे से चीर दिया। मनुष्य हाथ में चम- चमाती धार वाली कुल्हाड़ी लेकर इन परोपकारियो का वध करने निकल पड़ा, १४८ / वन्देमातरम् जिसमे वह अपनी निरर्थक आकाक्षाओं की तृप्ति कर सके, अपने जड जगत (सोमेण्ट, पत्थर, लोहा, विद्युत तार आदि) में लकडी को सम्मिलित कर सके, वृक्षों की लाशो से अपने लिए पलग, आलमारी सोफासेट, मेज कुसियां बना सके। वृक्षो पर किए गये अत्याचार से उनकी जननी मां वसुन्धरा रो पड़ी, नदियां रोई, पशु और पक्षी रोये लेकिन मानव का वज्र हृदय द्रवित नही हुआ। उसकी कुठार की चमचमाती धार वृक्षों को धराशायी करती रही। मानव वृक्षों के बलिदान पर अपनी समृद्धि व सुख-सुविधाओं का महल खडा करता रहा । वृक्ष वदलते रहे, दरवाजे, खिड़कियां, पर्दे व सजावट के सामान में मूसे वृक्षो की तो वात ही अलग, कोमल और मासूम हरे भरे, उत्साह और जीवन्तता से भरे किशोर वृक्षों को भी मानव ने अपनी आकाक्षाओं का शिकार बनाकर असमय मे काल के गाल मे पहुंचा दिया । परिणाम यह हुआ कि प्रकृति क्रुद्ध हो गयी। इस छोर से उम छोर तक उत्ताल गगनस्पर्शी लहरों से जूझते मकान, गलियां, बाजार, मेना के जवान, बाढ भयकर बाढ, तबाही, फसलें और पशु बरबाद, बंगाल, विहार, उड़ीसा, पजाब, हरियाणाउत्तर प्रदेश समूचा उत्तर भारत इम शताब्दी की भयकर वाढ की गिरफ्त मे । बाढ से जूझता वियतनाम, थाइलण्ड, लाखो लोग बेघर, अरबों की सम्पत्ति का विनाश, लाखो मकान धराशायी, उलटती नौकाएं, बाद में वहती बसें, हजारो गांव बाढ़ की चपेट मे, नदियों की उत्ताल तरगों से होता भूक्षरण, नदियो के तल में भरती मिट्टी, ससद में वहस, विदेशी सहायता और न जाने क्या क्या ? वृक्षों पर मानव द्वारा किए गए अत्याचारों के लिए प्रकृति द्वारा लिया गया भयकर प्रतिशोध । बादल, वृक्ष, नदी, धरती सभी ने मानव से खुलकर प्रतिशोध लिया। यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि इस देवी आपदा के लिए मानव स्वय उत्तरदायी है। वनो के निरन्तर कटते रहने से, वनों के साफ हो जाने से, भूमि का कटाव बढ जाने से, भूक्षरण के कारण नदी का पाट मिट्टी से, भरने लगा। जो नदी जीवन दायिनी, तृपित जनों को तृप्त करने वाली थी वृक्षों पर होने वाले अत्या- चारों से क्रुद्ध नागिन की भांति फुफकार उठी । बादल गर्जन-तर्जन कर रह-रह कर बरसते रहे । ऐसा लगता है, सभी सगठित होकर वृक्षो पर किये गये अत्या- चारो का बदला ले रहे हो। क्या इस दवी आपदा का अन्त सम्भव है ? वृक्षारोपण | १४६ हो यदि मानव पुनः वृक्षों को जन्म देने, उनका सम्बर्द्धन करने, उन्हें पुणित, पल्लवित कर वृक्षों के प्रति किये गये दारुण अत्याचारों का प्रायश्चित करे। उनका सम्बर्द्धन होते ही मभी प्रसन्न होंगे। बादल, पृथ्वी, नदी, जल, मानव से बदला दलेकर उसकी सेवा के लिए तत्पर होंगे। कल्पना कीजिए। भवेत कमलो से भरे जलाशयों के किनारे हरी भरी घास के मखमली विछोनो पर कुलाचे भरते और पनघट से आती किसी शकुन्तला के आंचल से उलझते मृगशावक वृक्षों की सघन छाया में विश्राम करता गौओं का समूह आन मञ्जरियो की गमक, मन में प्रणयोन्माद जगाती मौलश्री के सुमनों के मौरभ, सधेरे की धूप के वितान पर मोती और लाल की तरह जड़ें, पात झरे हर- मिगार के फूल, कुवारी आकाक्षाओं की भांति करोदों की झाड़ियों में विधाम करते कोमल गात शशक, मानवीय मन की भांति अम्बर के वक्षस्थल को चीर अनन्त की और उड़ानें भरती श्वेत वगुलो की पक्तियो, करोंदो की झाड़ी, पाकुर पुरइन, अशोक, आम, जम्बू, जम्बीर, नीम, वट, शिरीप, कणिकार, पीपल, वट, ग्वेजडी, रोहिडा, शीशम, कुम्भट, जाल; सन्देडा, बकाइन, पाकिंग, सोनिया, यूकि- लिप्दम, अर्जुनवृक्ष, से घिरे भवन, ढाणियां, झोपड़े उन वृक्षो की शीतल छाया में विश्राम करते मयूर समूह, शाला भवन के प्रागण में घास के हरित मखतूलो पर विश्राम करते, अध्ययन करते, वहस मे तल्लीन छात्र समूह, एक जाल की आड मे अलगोजे पर चिरमी बजाता बकरियों का ग्वाला, रोहिडे की छाया में घान का गट्ठर जमीन पर डाल झुमके से झुके कान के पीछे का पसीना, आंचल की बयार से सुखाती ग्राम्या । कितने जीवन्त, कितने उदात व आकर्षक दृश्य होंगे जो वृक्षारोपण के वाद दृष्टिगोचर होगे। वह दिन कितना सुखमय होगा जब दृष्टि के इस छोर से उस छोर तक मानव के उल्लसित मन की भांति पूर्व- वत् हरियाली का सागर हिलोरें लेगा। . १५० / वन्देमातरम् दक्षिणी राजस्थान का बहुचर्चित मंदिर-अथूणा । रवीन्द्र डी. पण्ड्या - सन् १९७० में मुझे अधूणा के प्राचीन स्मारकों में लगभग एक-डेढ मास तक रहने का सुअवसर मिला । इस समय भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग भारत सरकार ने इन प्राचीन स्मारको के उत्खनन एव जीर्णोद्धार की शुरुआत ही की थी। एक डेढ माह के प्रवास के समय प्रायः यह देखा कि इन प्राचीन मन्दिरो में इने-गिने लोग शिवालयों में दर्शनार्थ आते थे । किन्तु जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इन स्मारको के जीर्णोद्धार एव उत्खनन में तेजी की तब इसी तेजी के साथ दर्शकों की भीड़ भी तेज गति के साथ बढ़ती गई। वर्त- मान मे यह स्थिति है कि अधूणा में जमा हो रही दर्शकों, पर्यटकों की भीड़ खजुराहो, मन्दिरो मे जमा हो रही भीड़ से कम नहीं। शिवालयो मे लटकते घण्टे की मधुर आवाज सूर्योदय के पूर्व से लेकर १० बजे रात्रि तक इस परिक्षेत्र मे गूजती रहती है । यह गूजती आवाज दर्शको की भीड एव शिवालयों की महत्ता के ज्वलत उदाहरण है। मै आपको उस स्थान से परिचित करवाऊ जहा असख्य बेमिसाल मूर्तियां आपकी प्रतीक्षा कर रही हैं, मौन निमन्त्रण दे रही है । इतिहासकार की गवेषणा के लिए, साहित्यकार की सृजन प्रेरणा के लिए, पर्यटकों के पर्यटन-विनोद के लिए एव चित्रकार को चित्रों द्वारा अपना दर्द प्रसारित करने के लिये । बॉसवाडा से अनुमानतः ३० मील दक्षिण-पश्चिम मे अधूणा नामक प्राचीन कस्बा है। प्राचीन अधूणा नगर बागड के परमार राजाओ की राजधानी था। वर्तमान-कस्बा-प्राचीन नगर के भग्नावशेषों के पास वसा हुआ है। प्राचीन नगर के खडहर और कई मन्दिर अभी कस्बे के बाहर विद्यमान है, जिनमें सबसे पुराना मदिर मंडलेश्वर (मडनेश) का शिवालय है। इस मदिर को यहा के दक्षिणी राजस्थान का बहुचर्चित मदिर अथूणा | १५१ - परमार राजा मडलीक मडनदेव के पुत्र चामुण्डराज ने अपने पिता की स्मृति में वि. स. ११३६ फाल्गुन सुदी ७ ई. स. १०८० तारीख ३१ जनवरी शुक्रवार को बनवाया था। उसके साथ एक मठ भी था। मन्दिर के मुख्य द्वार तथा कोट गिर गये है । मन्दिर के बाहर वहत वडा नदी है जिसका सिर टूटा हुआ है। गुम्बद के भीतर तथा निज मन्दिर के द्वार आदि पर बड़ी सुन्दर कारीगरी का काम है । द्वार के दोनो तरफ नीचे ब्रह्मा, ऊपर विष्णु और सबसे ऊपर शिव की मूर्ति है। द्वार पर गणेश और उस पर लकुल श की मूर्ति है जिससे अनुमान होता है कि यहाँ के मठाधीश पाशुपात सम्प्रदाय के कनफटे साधु रहे होंगे। निज मन्दिर में शिवलिंग, पावंती तथा उमा-महेश्वर की मूर्तिया है । मन्दिर के बाहरी ताकों में भैरव, ताण्डव नृत्य करते हुए शिव और चामुण्डा की मूर्तियां है । यह शिव पचायतन मन्दिर था परन्तु इसके चारो कोनो के छोटे- मोटे मन्दिर नष्ट हो गये है । जिनके चिह्न मात्र अब अवशिष्ट हैं । इस मन्दिर के एक ताक मे सवत ११३६, फाल्गुन सुदी ७, इ. स. १०८० तारीख ३१ जनवरी शुक्रवार की एक बड़ी प्रशस्ति लगी है । इसमें वहाँ के कितने ही परमार राजाओ की वश परम्परा और उनके कार्यो का उल्लेख है। इस मन्दिर के सामने एक पहाड़ी पर भग्नप्राय चार शिव मन्दिर है, जिसके आस-पास गणेश, शिव, ब्रह्मा, विष्णु, नवग्रह, ताण्डव नृत्य करते हुए शिव, चामुण्डा, भैरव, दिक्पाल आदि की खडित मूर्तियां पड़ी हैं। उक्त पहाड़ी के दक्षिण के कुछ दूर गमेला तालाब मे होकर पश्चिम में जाने पर एक सुन्दर सुदाई वाला दो मजिला द्वार आता है जो उधर के मन्दिर समूह का मुख्य द्वार होना चाहिये, वह मन्दिर समूह "हनुमान मन्दिर समूह" के नाम से प्रसिद्ध है । उस समूह में एक हनुमान का, एक वराह का, एक विष्णु का और तीन शिव के मन्दिर हैं । विष्णु मन्दिर मे वशी बजाते हुए कृष्ण, ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा अठारह भुजाओं वाली विष्णु की त्रिमूर्ति, पार्वती एव पूतना आदि की मूर्तियां रखी हुई है। निकट ही पापाण का बना हुआ एक कुण्ड है जितके सामने नीलकठ का वडा मन्दिर है । उसमें नवग्रह, चामुण्डा और उमा-महेश्वर आदि की मूर्तिया रखी हुई है । निज मन्दिर में शिवलिंग के पास पहुंचने के लिए नौ सीढ़ियां उतरनी पड़ती है। वहा शिवलिंग के अतिरिक्त पार्वती, गणपति और दो उमा-महेश्वर की मूर्तिया है । चातुर्मास में यह मन्दिर जल से भर जाता है, हनुमानगढ़ी के मन्दिर समूह में यह सबसे बडा मन्दिर है । इसका तक्षण कार्य अत्यधिक मुन्दर है, इसके निकट एक और शिवालय है १५२ / वन्देमातरम् जो जीर्णावस्था में है । उसके एक ताक में परमार राजा चामुण्डराज के समय का आधा बिगड़ा हुआ वि. स. ११३७ ई. स. १०८० का शिलालेख था। जो इस समय अजमेर के राजपूताना म्यूजियम मे सुरक्षित है । इसके निकट एक छोटे से मन्दिर में हनुमान की एक विशाल मूर्ति है। उसकी चरण चौकी पर वि. सं. ११६५ ई. स. ११०८ का परमार राजा विजयराज के समय का ६ पक्तियों का लेख खुदा हुआ है । यह हनुमान की मूर्ति या तो किसी अन्य मन्दिर से लाकर यहा खड़ी की गई है अथवा मन्दिर का द्वार किसी पुराने मन्दिर मे लाकर लगाया गया है ऐमा प्रतीत होता है। यहा कई जैन मन्दिर भी थे । अव उनके पत्थर द्वार आदि ले जाकर दूर- दूर के गांवों में जैनियों ने नये मन्दिर खड़े कर लिए है। वर्तमान अधूणा गाव का जैन मन्दिर भी पुराने जैन मन्दिरों के पत्थरों से बनाया गया है । एक पहाड़ी पर के टूटे हुए जैन मन्दिर मे परमार राजा चामुण्डराज के समय के दो शिलालेख बिगड़ी हुई दशा में मिले है, जिसमे से वि. स. ११५६ ई. स. १२०२ का और दूसरा भी उसी समय के आसपास का है। ये दोनों भी राज. पूताना म्यूजियम अजमेर में सुरक्षित है। उक्त जैन मन्दिर के आस-पास कई दिगम्बर जैन मूर्तियां इधर उधर पड़ी है । इसके अतिरिक्त यहाँ कई मन्दिरों के भग्नावशेष विद्यमान हैं । अधूणा की मूर्तिकला कई श्रेणियों में विभाजित की जा सकती है । सम्प्रदाय विशेष से सम्बद्ध मूर्तियां, दीवारों, आलो और मन्दिरों के ऊपरी भाग पर उत्कीर्ण परिवार, पार्श्व वाली देवी-देवताओ की मूर्तियां, देवताओ एव दिक्पालों आदि की मूतियां अत्यन्त ही सुन्दर एव सजीव है । इसके अति- रिक्त बाहरी या भीतरी दीवारों, खम्भों, छत एवं द्वारो आदि पर उत्कीर्ण, सुर- मुन्दरियों, अप्सरामओ और नायिकाओ की मूर्तियां कला की दृष्टि से श्रेष्ठ हैं । अप्सरायें अनेक नृत्य मुद्राओं में या देवताओ की सेविकाओ के रूप चित्रित है। उनके हाथ जुड़े हुए, तथा उनमें कमल, दर्पण, जलपात्र आदि वस्तुएँ पड़ी हुई है । मुर-सुन्दरियों को नायिकाओ से पृथक करना अत्यन्त कठिन है, क्योकि इनको प्रतिकृतियाँ तथा हाव-भाव लगभग एक समान है । घरेलु तथा सामाजिक दृश्यों सहित तथा अनेक विषयों से सम्बन्धित धर्म-निरपेक्ष मूर्तिकला कुछ शृगारिक मूर्तियो में अत्यन्त दुर्लभ सम्मिश्रण के साथ दिखायी पड़ती है। दक्षिणी राजस्थान का बहुचर्चित मदिर--अधूणा | १५३ हस्ति, वानर, अश्व कुत्ता या उनके मुख आदि अधूणा के सबसे अधिक लोकप्रिय और विशिष्ट-कला विषय है। अधूणा की मूर्तिकला में मानव शरीर का कामोत्तेजक पक्ष भी चित्रित है। मूर्तिकला सम्वन्धी यह विशेषता नीलकण्ठ महादेव के ऊपरी भाग पर एवं उत्खनन से प्राप्त शिव मन्दिर में अत्यधिक विकसित रूप से पाई जाती है। अथूणा की शृगारिक मूर्तियां मबसे अधिक यात्रियों को आकपित करती है । इन मन्दिरों का अवलोकन करते हुए खजुराहो सचमुच दर्शकों के ख्यालों में आता है । अथूणा के ये मन्दिर खजुराहो की तरह ही अपनी विशेषता लिए है । कुछ लोगो का कथन है कि ये अपने समय के समाज के निम्न नैतिक स्तर की परि- चायिका है । कुछ लोग इनकी अनेक सौन्दर्य शास्त्रीय या सास्कृतिक धार्मिक और आध्यात्मिक व्याख्याये करते है । कुछ इन्हें कामसूत्र में वर्णित शृगारिक मुद्राओ का चित्रण मानते है । कुछ लोग यह विचार प्रकट करते है इनके दर्शन से अनियन्त्रित यौन-सुख से मुक्ति मिल जाती है तथा भक्त के हदय की पवित्रता इस उपासना-गृह मे सरल हो जाती है। इसी के लिए मन्दिरी की बाहरी दीवारों पर शृगारिक मुद्राएँ अकित की गई है । अधूणा की प्रणय क्रीड़ा वाली मूर्तियो से यह भी स्पष्ट है कि उस समय समाज में सेक्स का एक विशिष्ट स्थान था और यौन भावनाओं में कोई बुराई नही मानी जाती थी एवं उन्हें धर्म की ओर से मान्यता प्राप्त थी। अधूणा स्मारको तक पहुँचने हेतु राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात तीनो राज्यो के यात्रियों के लिए मार्ग जुड़ा हुआ है। गुजरात से आने वाले यात्रियो के लिए दाहोद से भूखिया कस्वा, भूखिया से अधूणा पहुचा जा सकता है। मध्य प्रदेश से आने वाले यात्रियों के लिए रतलाम से बाँसवाडा, बांसवाड़ा से अधूणा के लिए यातायात की मुविधा है। राजस्थान के यात्रियों के लिए उदयपुर मे डूगरपुर, डूगरपुर से खडगदा-गलिया कोट मार्ग होते हुए अधूणा आमानी से पहुंचा जा सकता है।..'आप वहाँ पधारें, लेखक का आमत्रण है। / वन्देमातरम्
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डॉ० राजानन्द, 35. आंधी अर आस्था व भगवान महावीर (दो राजस्थानी उपन्यास) स. यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र', 36. वारखड़ी (राजस्थानी विविधा) स. वेद च्याम 1975 : 37. अपने से बाहर अपने में (कविता) स. मगल सपसेना, 38. एक और अन्तरिक्ष (कहानी) स. डॉ० नवलकिशोर, 39. संभाळ (राजस्थानी कहानी) स० विजयदान देथा, 40. स्वां-भ्रष्ट (उपन्यास) भगवती प्रसाद व्यास, म० डॉ० रामदरश मिश्र, 41.धिविधा स० डॉ० राजेन्द्र शर्मा 1976 : 42. इस बार (कविता) सं० नन्द चतुर्नेदी, 43. सकल्प स्वरो के (कविता) स० हरीश भादानी, 44. बरगद को हाया (कहानी) स० डॉ० विश्वम्भरनाथ उपाध्याय, 45. चेहरों के बीच (कहानी व नाटक) स० योगेन्द्र किसलय, 46 माध्यम (विविधा) सं० विश्वनाथ सचदेव 1977 : 47. सृजन के आयाम (निबन्ध) सं० डॉ० देवी प्रसाद गुप्त, 48. क्यों (कहानी व लघु उपन्यास) स० श्रवण कुमार, 49. घेते रा चितराम (राजस्थानी विविधा) सं० डॉ. नारायण सिंह भाटी 50. समय के सन्दर्भ (कविता) सं० जुगमन्दिर तायल, 51. रंग वितान (नाटक) सं० सुधा राजस 1978 : 52. अंधेरे के नाम सन्धि पत्र नहीं (कहानी संकलन) मं० हिमाशु जोशी, 53. लखाण (राजस्थानी विविधा) सं० रावत सारस्वत, 54. रचेगा संगीत (कविता सकलन) सं० नन्दकिशोर आचार्य, 55. दो गाव (उपन्यास) मुकारव खान आजाद, सं० डॉ. आदर्श सक्सैना, 56. अभिध्यक्ति की तलाश (निबन्ध) स० डॉ० रामगोपाल गोयल 1979 : 57. एक कदम आगे (कहानी सकलन) सं० ममता कलिया, 58. लगभग जीवन (कविता संकलन) स. लीलाधर जगूड़ी, 59. जीवन यात्रा का कोलाज नं. ? (हिन्दी विविधा) स. डॉ. जगदीश जोशी, 60. कोरणो कलम री (राजस्थानी विविधा) स० अन्नाराम सुदामा, 61 यह किताब यच्चों को (बाल साहित्य) सं. डॉ. हरिकृष्ण देवसरे 1980 : 62. पानी को लकोर (कविता मकलन) सं० अमृता प्रीतम, 63. प्रयास (कहानी सकलन) स० शिवानी, 4, मंजमा (हिन्दी विविधा) सं० डॉ० होमतान्प भावर राजस्थानी-विदिमा) स० डॉ० नृसिंह राजपुरोहित, 66. खिलते रहें गुलाब (बाल साहित्य) स० जयप्रकाश भारती 1981 67. अपने से परे (कहानी संकलन) सं० मन्नू भण्डारी, 68. अंधेरों का हिसाय (कविता सकलन) स० सर्वेश्वर दयाल मक्सेना, 69. वन्देमातरम् (हिन्दी विविधा) स. डॉ. विवेकीराय, 70. सिरजण (राजस्थानी विविधा) स० नेजसिंघ जोधा, 71. एक दुनिया बच्चों को (बाल साहित्य) स० पुष्पा भारती। ०००
राजस्थान के शिक्षक दिवस प्रकाशन
कुछ सम्मतियां
राजस्थान शिक्षा विभाग द्वारा शिक्षक दिवस प्रकाशन योजना के अन्तर्गत
राज्य के सृजनशील शिक्षक साहित्यकारों को चार कृतिया १९८० वर्ष की
सार्थक उपलब्धियां हैं।
-नव भारत टाइम्स
संग्रह (पानी की लकीर) मे सभी कविताएं, कविता की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण
है, यद्यपि कुछ कविताओं को पढ़कर कविता जैसा कुछ नही लगता किन्तु
कलात्मक प्रयास को नकारा भी नहीं जा सकता।
-नव भारत टाइम्स
'प्रयास' कहानी लेखकों का उत्तम प्रयास है तथा शिवानी का सम्पादन
वक्तव्य नव लेखको को गुरु-प्रेरणा का प्रयास है ।
--नवभारत टाइम्स
'मजूपा' मे मकलित अधिकाश रचनाएं एक ओर शिक्षकों की जीवन-पीडा
तथा घुटन प्रस्तुत करती हैं तो दूसरी ओर सामाजिक मूल्यो में उनकी
आस्था, व्यवसाय के प्रति उनको निष्ठा और शिक्षार्थियों के गिरते स्तर के
प्रति चिन्ता तथा जागरूक उत्तरदायित्व उभारती है ।
----नव भारत टाइम्म
सकलन (खिलते रहे गुलाब) मे एक तरफ तो ऐसी रचनाए हैं जिनसे बच्चों
को चरित्र निर्माण की प्रेरणा मिलेगी तो दूसरी तरफ ऐसी रचनाए भी
है जिनसे उनका स्वस्थ मनोरजन भी होगा।
--समाज कल्याण, दिल्ली
रचनाओं को विषय वस्तु परपरागत होते हुए भी वालको के मानसिक
विकास में सहायक हो सकती है। सभी रचनाओ मे विशेषकर कहानियो
में अनुभव की उष्णता विद्यमान है । सकलन निश्चत ही नन्हे मुन्ने पाठको
के लिए उपयोगी है।
-~-समाज कल्याण, दिल्ली
सग्रह की अधिकतर कविताएं जिन्दगी के फोटो हैं। इनमें किसी प्रकार के ब्दम् आदर्श की प्रस्तावना नहीं है । -समाज कल्याण दिल्ली इस संग्रह की अधिकाश कविताएं एक ऐसे आदमी की छटपटाहट को व्यक्त करने का प्रयास है जो निरन्तर अपरिचित एवं अमानवीय होते जा रहे परिवेश से पूर्णतया संपृक्त है। इस संपृक्ति के कारण ही राजस्थान के ये सृजनशील अध्यापक अपने आस-पास के परिचित सदर्भ को सर्जनात्मक आयाम प्रदान कर पाए है। -समाज कल्याण, दिल्ली जिस तरह सग्रह की रचनाओं की सवेदना जिन्दगी से निप्पन्न है, उसी तरह इनकी सरचना भी। कविताओं की संरचना में कोई जटिलता नही है। लगभग सभी कविताओं मे एक अनगढ़ता मौजूद है । यह अनगढ़ता ही इन कविताओं को विशिष्ट बनाती है। -समाज कल्याण, दिल्ली राजस्थान के शिक्षा विभाग ने विगत कुछ वर्षों से शिक्षक दिवस पर राज्य के शिक्षक साहित्यकारो की रचनाए पुस्तक रूप में छापने की एक स्वस्थ परम्परा प्रारंभ की है। इस योजना से अनेक सृजनशील साहित्यकारों को साहित्यिक क्षेत्र में अपना स्थान बनाने के लिए भी प्रेरणा तथा प्रोत्साहन मिला है। -दैनिक हिन्दुस्तान 'पानी की लकीर' कुल मिलाकर यह एक अच्छा सकलन है और उसमे सम्मिलित कवियों की क्षमता का परिचायक है। दैनिक हिन्दुस्तान 'अतस रा आखर' में आरम्भ से अन्त तक राजस्थानी की ही छटा मिलती है। दैनिक हिन्दुस्तान आज भी समाज में अध्यापक से ही आदर्श जीवन की अपेक्षा की जाती है, अत. इन कहानियों में से अधिकाश का स्वर आदर्श और सुधारवादी रहा है तो उसे अस्वाभाविक नहीं माना जा सकता। -प्रकर, दिस०,८० जयप्रकाश भारती ने अध्यापकों की इस अनमोल भेंट को सम्पादित कर बच्चों के सामने प्रस्तुत किया है, सम्पादक का कहना है जव-जव बच्चे इसे पढ़ेगे मनोरंजन होने के साथ उनको कही कोई रोशनी की लकीर भी दिखाई देगी। -दैनिक हिन्दुस्तान सरकारी महकमो ने इतना निराश किया है कि जब हम राजस्थान के शिक्षा विभाग के प्रकाशनों पर नजर डालते हैं तो एक बारगी आश्चर्य में ही डूब जाते हैं। -दैनिक राजस्थान पत्रिका संकलन (पानी की लकीर) को अधिकाशतम कविताएं जैसा कि कहा- जीवन की विसगतियों, दैनिक जीवन की आपा-धापी और उधेड़बुनों को व्यक्त करती हैं। इनमे ज्यादातर प्रलाप लगती हैं, कविता कम । -इतवारी पत्रिका
विवेकी राय
जन्म : सन् २४, सोनवानी, गाजीपुर
शिक्षा : एम. ए., पी-एच. डी०
सेवा : प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, स्नातकोत्तर
महाविद्यालय, गाजीपुर, उ० प्र०
कृतियां
काव्य : अर्गला, रजनीगंधा
कहानी : जीवन परिपि, नयी कोयल, गूगा
जहाज
उपन्यास : बबूल, पुरुप पुराण, लोक ऋण,
श्वेतपत्र
ललित निबन्ध : फिर तलवा बाल पर,
केकहल चुनरी रंगाल, जलूस
रुका है, भगद : भागीरथी
माटी
रेखाचित्र : गंवई गघ गुलाव
समाक्षा: विधारा
निबन्ध : किसानो का देश, गांवों की दुनिया
अध्ययन-पालोक
शोध प्रबंध :स्वातन्योतर, हिन्दी कथा साहित्य
और ग्रामजीवन
सम्पादन : भोजपुरी निवन्ध, और प्रस्तुत कृति
सर्वेक्षण : कल्पना के २५ वर्ष
सम्पर्क:बड़ी बाग, गाजीपुर,
उ०प्र०-२३३००१